प्रसन्नता की तलाश आमतौर से वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और परिस्थितियों में की जाती है। पर वस्तुतः यह चिन्तन अवास्तविक है। यदि लोक मान्यता यही रही होती तो जिनके पास प्रचुर साधन हैं और जिन्हें प्रतिकूलताओं का भी सामना नहीं करना पड़ता, वे सदा प्रमुदित और सन्तुष्ट पाए जाते। इसके विपरीत जिनके पास स्वल्प सम्पदा है, जो अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहते और प्रतिकूलताओं के मध्य जीवनयापन करते हैं, वे सभी दुःखी देखे जाते।
प्रसन्नता सोचने की एक पद्धति है। उसके साथ व्यक्ति का दृष्टिकोण स्वभाव और व्यवहार जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व में घुली हुई शालीनता को सुसंस्कारिता कहा जाता है और जिसके पास वह जितनी मात्रा में होती है, उसी अनुपात से उसे प्रसन्न रहते एवं रखते हुए देखा जाता है।
जिसे दोष-दर्शन, अभाव चिन्तन और हेय आरोपण की आदत है, वह हर स्तर की अनुकूलता में रहते हुए भी अपनी दुर्गति का जिस-तिस पर प्रयोग करेगा। फलस्वरूप कीचड़ फेंक कर साफ कपड़े को भी कुरूप बना देने की तरह सर्वत्र विपन्नता का दर्शन करेगा। हो यह भी सकता है कि यदि चिन्तन को उत्कृष्टता के पर्यवेक्षण और आरोपण के लिए प्रशिक्षित कर लिया जाय तो दृश्य कुछ दूसरी तरह के ही सामने आएँ।
गुम्बज की आवाज लौटकर वापस आती है। गेंद जहाँ से फेंकी गयी थी, वहीं वापस लौटकर आती है। हमारा अपना व्यक्तित्व ही जिस तिस के साथ टकराकर भली और बुरी अनुभूतियाँ कराता है। इसी से संसार को दर्पण की उपमा दी जाती है। अपना स्वरूप जैसा है, वैसा ही प्रतिबिंब उसमें दीखता है।
जिसकी भूख मारी गई उसे व्यंजन भी स्वादिष्ट नहीं लगते। जिसने जीवन का महत्व, स्वरूप और उद्देश्य ही नहीं समझा उसे न उसमें आनन्द आता है और न परिष्कृत करने का प्रयत्न चलता है। रात्रि का निद्रा में व्यतीत होना प्रकृति व्यवस्था है किन्तु यह मनुष्य की अपनी मर्जी है कि वह दिन में भी सोता रहे या जागता हुआ जिए। जगने का तात्पर्य है- इस ईश्वर प्रदत्त सम्पदा की गरिमा और सदुपयोग करने पर हस्तगत हो सकने वाली विभूतियों की महिमा का आँकलन करना।
जीवन भार नहीं है, जिसे अनख, उपेक्षा के साथ किसी तरह ढोया जाता रहे। वह अलभ्य अवसर है। वह बहुत कुछ है। ऐसा है जिसके सहारे बहुत कुछ किया पाया और बना जा सकता है। प्रमादी ही इसे भारभूत मानते और किसी तरह खाते, सोते इस बहुमूल्य सुयोग को अर्ध मृतकों की तरह उपेक्षा अवज्ञापूर्वक किसी खाई खंदक में धकेलते-उड़ेलते रहते हैं।
जो अपने से असन्तुष्ट है, उसके लिए इतना ही पर्याप्त नहीं कि खीज या निराशा प्रकट करे और दुःख दुर्भाग्य प्रकट करने वाले आँसू बहाये। वरन् यह भी आवश्यक है कि किन कारणों से उसे हेय परिस्थिति में पड़े रहना पड़ रहा है और उन्हें किस प्रकार बदलना सम्भव हो सकता है। जो है, वह पत्थर की लकीर नहीं है। उसे भाग्य का विधान मान बैठने में कोई सार नहीं। हमें सोचना चाहिए कि किस प्रकार परिस्थितियों में परिवर्तन हो सकता है। इसका प्रथम चरण यह है कि मनःस्थिति बदली जाय। यह आँशिक सत्य है कि परिस्थितियों ने हमें जकड़ा और विपन्नता में दिन गुजारने के लिए विवश किया। सच तो यह है कि दुर्बल मनःस्थिति ही अनुपयुक्त को पकड़ती और उसके साथ जुड़ती जकड़ती चली जाती है। कोई चाहे तो उसे छोड़ या बदल भी सकता है। इसके लिए बाहरी परिवर्तनों की आशा करने से पूर्व, भीतरी परिवर्तन आवश्यक है। हेय स्तर का जीवन जीने से इनकार कर देने के उपरान्त, यह किसी के लिए भी सम्भव नहीं कि उसके लिए विवश कर सके। विवशता हमारी अपनी दुर्बलता के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।
विघ्न, विरोध, प्रतिबन्ध, वर्जन अपने स्थान पर सही हो सकते हैं, पर उनमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि किसी को श्रेय पथ पर चलने से रोक सकने में समर्थ हो सके। मनुष्य की अपनी निजी क्षमता भी तो कुछ है। वह घिरा तो अवश्य है, पर घेरे इतने जटिल नहीं है जो सत्पथगामी संकल्प और साहस को निरस्त करके उसे हेय स्थिति में पड़े रहने के लिए विवश बाधित कर सके। समाज की सामर्थ्य इतनी ही है कि वह कुमार्ग पर चलने से रोके, अनाचार पर अंकुश रखे। इससे आगे की वह सामर्थ्य किसी में भी नहीं कि उत्कृष्टता अपनाने और श्रेय प्रयोजनों की दिशा में चल पड़ने की विविशता उत्पन्न कर सके। यह अपनी ही आन्तरिक दुर्बलता है जिसके कारण हेय स्तर का जीवन जीना पड़ता है। बाहरी दबाव की बात तो बहाना मात्र है। बाहरी विरोध और सहयोग तो मनुष्य की अपनी स्थिति को देखकर ही बनते, बिगड़ते और बदलते रहते हैं।
समाज में भले और बुरे सभी तत्व हैं। जब हम बुरों पर दृष्टि डालते, ललचाते और पकड़ते हैं तो वे सहज ही समीप आते और प्रभाव डालते हैं। इसके विपरीत जब भलाई का देखना खोजना आरम्भ किया जाता है। न उनकी तो मात्रा कम प्रतीत होती है और न पकड़ने के लिए कहीं बहुत दूर जाने की। व्यक्ति न सही, सद्ग्रन्थों से सहायता मिल सकती है। इतिहास यह बता सकता है कि भूतकाल में श्रेष्ठता कितनी प्रखर रही है। बेधक दृष्टि हो तो यह भी विदित हो सकता है कि छाये हुए कुहरे से आगे श्रेष्ठता की सत्ता और महत्ता इन दिनों भी किसी प्रकार सजीव और सक्रिय बनी हुई है। समर्थन आरम्भ में नहीं, अन्त में मिलता है। श्रेष्ठता की बात सोचने वालों को आरम्भ से अपना समर्थन सदैव आप ही करना पड़ा है।
एकाग्रता की साधना ही योग साधना है। पातंजली के योग दर्शन का प्रथम सूत्र है- ‘योगः चित्त वृत्ति निरोधः’ अर्थात्- चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है। चित्त वृत्ति से तात्पर्य यहाँ चंचलता से है। संक्षेप में चंचलता के अवरोध को रोककर उसकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाकर अभीष्ट प्रयोजन में निरत करने के अभ्यास को योगाभ्यास कहा जा सकता है।
इस निमित्त क्या किया जाय? इस संदर्भ में अब तक धार्मिक क्षेत्रों में जो प्रयत्न हुए हैं उनमें प्रतिमा विशेष पर भावनात्मक ध्यान करने की ही एक विधि बताई जाती रही है। इसी को प्रकारान्तर से मैस्मरेजम जैसे मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के रूप में क्रियान्वित किया गया है। अन्तर केवल इतना ही है कि धार्मिक क्षेत्र में इसके लिए देव प्रतिमाओं को निमित्त कारण बनाया जाता रहा है और मनःशास्त्रियों ने प्रकाश बिन्दु, काला गीला या अन्य कोई ध्यानाकर्षण में सहायक माध्यम एकाग्रता के लिए प्रयुक्त होता रहा है। इसके अतिरिक्त नट विद्या के कलाकारों को भी एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है, वे इसके लिए जो अभ्यास करते हैं उनमें उन प्रदर्शनों को ही छोटे रूप से आरम्भ करके बड़े रूप में ले जाने तक का क्रम अभ्यास कराया जाता है। लोभ और भय दिखाकर जानवर अमुक प्रयोजन के लिए प्रशिक्षित किये जाते हैं और उनकी स्वाभाविक चंचलता से विरत कराया जाता है। इस प्रकार के प्रयत्नों को एकाग्रता अभ्यास के लिए विविध प्रयत्न कहा जा सकता है।
सूर्य की किरणें आतिशी शीशे के माध्यम से एक केन्द्र पर केन्द्रित करने के फलस्वरूप आग जलने लगती है इसे सभी जानते हैं। सुई की नोंक ही बारीक छेद कर पाती है, यह कार्य मोटी लकड़ी से नहीं किया जा सकता। सुई का सिरा छोटी नोंक पर सकोड़ने से उसकी क्रियाशीलता बढ़ती है। इंजन की भाप इस छोटे छेदों द्वारा पिस्टन तक पहुँचाने पर उसका दबाव बढ़ता है और रेल दौड़ने लगती है। फायर ब्रिगेड के पाइप का मुँह छोटा और पानी का दबाव अधिक होने पर धारा दूर तक पहुँचती है और उसमें तीव्रता भी रहती है। बन्दूक की नली में सिकोड़ी गई एक दिशा विशेष में चलने के लिए बाधित की गई तनिक-सी बारूद किस तेजी से चलते और लक्ष्य बेधती है, इस आधार पर भी एकाग्रता का चमत्कार समझा जा सकता है। बिखरी हुई सूर्य किरणें भाप, बारूद आदि से वे कम नहीं हो सकतीं जो उन्हें एकाग्र करने पर होते हैं। मस्तिष्कीय क्षमताएँ अनेक प्रयोजनों में उड़ती रहती हैं इन्हें यदि नियन्त्रित करने और दिशा विशेष में लगाने का कौशल हस्तगत हो सके तो सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी विलक्षणों के कान काट सकता है। कछुए ने खरगोश से इसी आधार पर बाजी जीती थी। वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार, शिल्पी, मुनीम, नट आदि को इसी आधार पर अपने-अपने कार्यों में प्रवीणता और सफलता मिलती है।
मानसिक क्षमता को अभीष्ट प्रयोजन में एकाग्रता पूर्वक नियोजित करने की दक्षता में सभी महत्वपूर्ण कार्यों की योजना और कार्य पद्धति सर्वांगपूर्ण बनती है। सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने का अवसर इसी आधार पर उपलब्ध होता है। अर्जुन का मत्स्यवेध इसी आधार पर सम्भव हुआ। जबकि दूसरे प्रतिद्वंद्वी एकाग्रता साधने में उतने प्रवीण न होने पर हारते चले गए।
एक बार अमेरिका में स्वामी विवेकानन्द ने एक व्यक्ति को बन्दूक से निशाना साधने का प्रयत्न करते देखा वह हर बार असफल रहा था। स्वामी जी रुके और मुसकराये। बोले, मित्र! लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करो, तभी बात बनेगी। उस व्यक्ति ने इसे अनाधिकारी परामर्श समझा और उलटकर पूछा- क्या आप निशाना साधना जानते हैं जो ऐसी शिक्षा देते हैं। स्वामी जी ने कहा- मैंने कभी बन्दूक छुई तक नहीं, फिर भी आप कहें तो मैं ध्यान का अभ्यस्त होने के कारण निशाना साधकर दिखा सकता हूँ। उस व्यक्ति ने कौतूहल वश छह नली का रिवाल्वर हाथ में थमा दिया। स्वामीजी ने इतना अपनी ओर से किया कि लक्ष्य बेध के छह अलग अलग निशान अपनी ओर से बना दिये। इसके बाद निशाने साधे गए और एक-एक करके छह बार घोड़ा दबाने पर छह ही लक्ष्य बेध दिये गए। उस अभ्यासी व्यक्ति को स्वामी जी ने चलते समय फिर कहा- न केवल निशाना लगाने के लिए वरन् हर छोटे-बड़े काम को सफलता पूर्वक सम्पन्न करने के लिए एकाग्रता का अभ्यास निश्चित रूप से सहायक होता है।
देखा भी यही गया है कि जो भी अपना काम मनोयोगपूर्वक करते हैं उनका क्रिया-कलाप अधिक उच्चस्तरीय परिणाम उत्पन्न करता है। काम साफ सुधरे और कलात्मक होते हैं। साथ ही कम समय अधिक सफलता प्राप्त करने का सुयोग भी बनता है। जबकि उदास मन से बेगार भुगतने की तरह भार ढोने वालों के काम न केवल फूहड़ होते हैं। वरन् उनकी मात्रा स्थिति एवं सफलता भी उपहासास्पद रहती है। तन्मय प्रकृति का वया पक्षी का घोंसला कितना सुनियोजित होता है वह देखते ही बनता है जबकि अन्यमनस्क कबूतर ओधे-तिरछे तिनके जमाकर अल्पजीवी और अनगढ़ घोंसले ही बनाता रहता है।
मन की चंचलता, जीवनचर्या की अनेकानेक आवश्यकताओं का समाधान खोजने की दृष्टि से प्रकृति ने प्रदान की है। इसके लिए वह प्रवृत्ति स्वामान्य स्वभाव का एक अंग भी कही जा सकती है। प्राणी अनेकानेक योनियों में परिभ्रमण करते हुए इसी आधार पर अपना निर्वाह चलाता आया है। उन पिछड़ी परिस्थितियों में एकाग्रता की आवश्यकता भी नहीं पड़ती, जिस प्रयोजन के लिए उसकी जितनी मात्रा अभीष्ट होती है उतनी वंश परम्परा के आधार पर अनायास ही उपलब्ध होती रहती है। मनुष्य की प्रगतिशील स्थिति ही जब उसे महत्वपूर्ण कार्यों को कौशल नियोजित करने के लिए बाधित करती है तो यह नई आवश्यकता सामने और आती है कि मन को नियोजित करने के उपरान्त दिशा विशेष के लिए प्रशिक्षित कैसे किया जाय। एकाग्रता की उपयोगिता और आवश्यकता उसी निमित्त समझनी पड़ती है।
इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए जब तब- जिस-तिस प्रकार के सामयिक अभ्यास करते रहने में हर्ज नहीं। व्यायामशाला में कसरत कुछ समय ही की जाती है। किन्तु बात उतने से ही नहीं बन जाती। उस अभ्यास के उपरान्त भी संयम और परिपोषण के प्रयत्न जारी रखने पड़ते हैं। मात्र व्यायामशाला में कुछ घन्टे लगाने और शेष समय अस्त-व्यस्त रीति से असंयमपूर्वक गुजारने पर तो वह अभ्यास का श्रम भी निरर्थक चला जायेगा और पहलवान बनने का स्वप्न साकार न हो सकेगा। स्वास्थ्य रक्षा के लिए अथवा विद्वान् कलाकार बनने के लिए अपनी प्रवृत्ति ही ऐसी बनानी पड़ती है कि ललक अभीष्ट उद्देश्य पर छाई रहे और उस हेतु कुछ न कुछ प्रयास निरन्तर चलता रहे।
यही बात एकाग्रता साधने के सम्बन्ध में भी है। इसके लिए भी अनवरत प्रयत्न करने पर ही चिर अभ्यस्त चंचल स्वभाव में भी कुछ टिकाऊ परिवर्तन हो सकता है। थोड़ी देर, कुछ समय तथाकथित ध्यान धारणा की लकीर पीटने और उस आवेश को बबूले की तरह समापन कर देने से हाथ कुल लगता नहीं। एकाग्रता की उपलब्धि इतनी सरल नहीं कि उसे कौतुक-कौतूहल जैसे तनिक से उथले अभ्यास से ही हस्तगत किया जा सके। इसके लिए ऐसी विधि-व्यवस्था अपनानी होती है जिसके आधार पर चिर अभ्यस्त चंचलता पर अंकुश लग सके। इसके लिए लम्बे समय तक सतत् प्रयास क्रम अपनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। जो लोग इसके लिए जादुई तरकीबें ढूंढ़ते हैं- हथेली पर सरसों जमाने जैसी बाल-क्रीड़ा करते और शेखचिल्ली जैसे दिवास्वप्न दीखते हैं, वे भूल करते हैं। प्रवीणता प्राप्त करने के लिए सामान्य उपक्रमों में भी दीर्घकालीन साधना करनी पड़ती है फिर अनगढ़ मन को सुगढ़ सुसंस्कृत बनाने के लिए साधने का काम चुटकी बजाते ही हो सकने की आशा कैसे की जाय। कुछ दिन की ‘मेडीटेशन’ बाल क्रीड़ा से, इस संदर्भ में किसी चिरस्थायी सफलता की आशा नहीं करनी चाहिए। जिन्हें और अभीष्ट हो उन्हें दीर्घकालीन एवं सतत् प्रयत्न के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।
एकाग्रता की साधना के लिए सबसे सरल और सुनिश्चित अभ्यास एक ही है कि जो भी काम हाथ में लिया जाय उसे योगाभ्यास मानकर चला जाय। उसकी योजना एवं व्यवस्था बनाने के लिए जिन साधन सामग्री की, जिस सहयोग की, जिस क्रम को अपनाने की आवश्यकता है उसके लिए कार्यारंभ से पूर्व ही साँगोपाँग चिन्तन कर लिया जाय। कठिनाइयों को समझ लिया जाय और उन्हें कितने समय तक श्रम करना पड़ेगा। इसकी सुविस्तृत कल्पना करते हुए परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए योजनाबद्ध निर्धारण स्थिर कर लिया जाय। इसके बिना ऐसे ही आवेशग्रस्त होकर किसी कार्य में लग पड़ना भूल है। जो सही और व्यावहारिक योजना बनाने तक में एकाग्रता नियोजित न कर सके वे काम को सही ढंग से करने में समग्र मनोयोग किस प्रकार लगा सकेंगे?
कार्य को आवेशपूर्ण नहीं व्यावहारिक योजना बनाने में लगाया गया मनोयोग यथार्थवादी चित्र सामने प्रस्तुत करता है। उस आधार पर ही और समझा जा सकता है कि किस प्रकार कितनी अवधि तक किन साधनों के सहारे प्रयत्नरत रहने की आवश्यकता पड़ेगी। इतना कर चुकने के उपरान्त ही वे कदम उठते हैं जिनसे हाथ में लिया हुआ काम शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता के सहारे आगे बढ़ाया जाता है। तत्परता का अर्थ है स्फूर्ति और समग्र श्रमशीलता का नियोजन। आलस्य प्रमाद बरतने पर तो सब कुछ चौपट ही चौपट होता चला जाता है। तन्मयता का अर्थ है- आशा, उमंग, लगन और परिपूर्ण दिलचस्पी के साथ लगाया गया मनोयोग। इसके बिना कोई काम समग्र रूप से साधता ही नहीं। अन्यमनस्कता रहने पर तो मात्र लकीर पिटती रहती है, चिन्ह पूजा होती रहती है। समय ढेरों लग जाता है, और काम का परिणाम देखने पर वह मुट्ठी भर हाथ में आता है। जो होता है वह भी काना, कुबड़ा, कुरूप, फूहड़ स्तर का होता है। सही और उत्साहवर्धक कर्तृत्व मात्र उन्हीं का होता है। जो श्रमशील तत्परता और उमंग भरी तन्मयता का अभ्यास एवं उपयोग भली प्रकार कर पाते हैं। जहाँ इस संदर्भ में जितनी ढोल-पोल अपनाई जा रही होगी समझना चाहिए कि उत्साहवर्धक सफलता प्राप्त कर सकने का दिन अभी बहुत दूर है। यों गुड़ गोबर तो कोई भी कुछ न कुछ तो कर ही लेता है। ‘घुणाक्षर न्याय’ से भी हाथ-पाँव चलाने पर कुछ न कुछ तो ओंधा-सीधा बनता रहता है पर ऐसा कर्तृत्व किसी स्वाभिमानी को शोभा नहीं देता। काम वे ही सराहना के योग्य बन पड़ते हैं जिन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पूरे मन और पूरे परिश्रम के साथ सम्पन्न किया जाता है।
ध्यान योग का चिरस्थायी सहज स्वाभाविक अभ्यास यही है कि सामने जो भी काम हो उन्हें सर्वप्रथम आदर्शों के अनुरूप होने की कसौटी पर कसकर खरा पाया जाय। इसके बाद कुछ देर उसे आरम्भ करने से लेकर समापन तक की स्पष्ट एवं व्यावहारिक रूप रेखा बनाई जाय। आवश्यक साधन जुटाये जायँ और परिस्थिति से तालमेल बिठाते हुए धैर्य, साहस और संकल्पपूर्वक निश्चित कर्म को आरम्भ कर दिया जाय। उतावली में बिना सोचे समझे कुछ भी कर बैठने की अपेक्षा यह अधिक अच्छा है कि पक्ष विपक्ष के सभी पहलुओं के विचार करने के उपरान्त योजना बद्ध कदम बढ़ाये जायं। बीच-बीच में आने वाले अवरोधों का ध्यान रखा जाय और उससे निपटने के लिए आवश्यक कौशल, साहस एवं धैर्य का संचय करना चाहिए।
द्वे कर्मणां नरः कुर्वन् अस्मिंल्लोके विरोचते। अब्रवन् पुरुषं किंचद् असतोऽनर्चयंस्तथा॥
दो काम करने वाले पुरुषों को ही इस संसार में परम प्रतिष्ठा होती है। जो कभी भूलकर भी कठोर या अप्रिय वचन नहीं बोलता और न दुष्ट की पूजा या सत्कार करता है।
“एक ही कार्य किसी के लिए बोझ किसी को योग्यता बढ़ाने का साधन तथा किसी के लिए योग कैसे बन जाता है,” एक जिज्ञासु ने स्वामी विवेकानन्द से उनके अमरीका प्रवास के दौरान पूछा। उत्तर में उन्होंने एक घटना सुनायी- “एक बार वे एक निर्माणाधीन मन्दिर से होकर गुजर रहे थे। तब वे सामान्य संन्यासी थे। प्रव्रज्या के लिए निकले थे। सबसे सीखने की अधिक, सिखाने की इच्छा कम रहती थी।
एक भव्य मन्दिर का निर्माण हो रहा था। चिन्तक मनोवृत्ति होने से वे हर कार्य के प्रत्येक घटना की समीक्षा गहराई से करते थे। जैसे ही उस मन्दिर में चल रहे निर्माण कार्य पर दृष्टि पड़ी उन्होंने उसके प्राँगण में प्रवेश किया। देखा कि सैकड़ों मजदूर, कारीगर, मिस्त्री बढ़ई, राजगीर वहाँ काम कर रहे हैं। सामान्य व्यक्ति के लिए यह घटना उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी। प्रतिदिन संसार में ढेरों प्रासादों की नींव पड़ती, असंख्यों तैयार होते तथा हजारों लाखों का उसमें श्रम लगता रहता है। पर स्वामी विवेकानन्द को वह घटना भी विशेष जान पड़ी। कारीगरों, मजदूरों के कार्यों में उन्हें विशेष अन्तर दिखायी पड़ा। कोई बोझिल मन से बेगार भुगतने जैसे कर रहा था, तो किसी का मनोयोग देखते बनता था, किसी की भाव भंगिमा स्वयं परिचय दे रही थी जैसे सन्तोष आनन्द का कोई स्रोत फूट पड़ा हो।
चेहरे की भाव भंगिमा में इतना अन्तर क्यों? कार्य करने के ढंग में इस विभिन्नता का क्या कारण है? इन प्रश्नों से कौतूहल बढ़ा। उत्तर पाने की जिज्ञासा प्रबल हुई। किनारे बैठे काम कर रहे मजदूर के पास जाकर उन्होंने पूछा- “भाई क्या कर रहे हो?” स्वामी जी की आशा के विपरीत उसने कठोर तथा झल्लाये स्वर में उत्तर दिया- “देखते नहीं हो! पत्थर तोड़ रहा हूँ।” प्रश्न बड़ी विनम्रता से पूछा गया था पर उत्तर अत्यन्त तिक्त मिला। उन्हें समझते देर नहीं लगी काम करने वाले को अपने काम में तनिक भी रुचि नहीं है।
स्वामी जी थोड़ा और आगे बढ़े और दूसरे मजदूर के पास जाकर उसी प्रश्न को दुहराया। इस मजदूर का उत्तर पहले वाले जैसा न था। उसने कहा- “पेट भरने के लिए रोटी चाहिए तथा आगे बढ़ने के लिए योग्यता भी जरूरी है। रोटी जुटाने तथा अपने काम में कुशलता हासिल करने का प्रयास कर रहा हूँ।” उसके उत्तर में थोड़ी विवशता झाँकती दिखायी पड़ रही थी, पर उज्ज्वल भविष्य की कल्पना के कारण उसके कार्यों में उत्साह एवं मनोयोग का समावेश था। इसी कारण वह पहले से कम दुःखी, कम उद्विग्न तथा कम निराश था।
एक तीसरे कार्य कर्मी के पास वे पहुँचे और उससे भी वही प्रश्न किया। पर ऐसा लगा जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। उसकी तत्परता एवं तन्मयता देखते बनती थी। चेहरे पर एक आनन्द की दीप्ति नाच रही थी। आँखों में आह्लाद की चमक थी। स्वामीजी ने उससे दुबारा थोड़ा तेज स्वर में पूछा- “भाई यहाँ क्या हो रहा है, तुम क्या कर रहे हो?
मजदूर ने बिना हाथ का काम रोके एक बार स्वामी जी की ओर देखा। मुस्कराते हुए धैर्यपूर्वक उत्तर दिया- “यहाँ भगवान का मन्दिर बन रहा है। उसके निर्माण पुरुषार्थ में मैं भी अपनी नगण्य सेवाएँ अर्पित कर रहा हूँ।” इस अन्तर से उन्हें अपूर्व सन्तोष मिला, एक प्रेरणा मिली।
शिष्य को समझाते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा- “भावों के आरोपण से एक ही कार्य किसी के लिए बोझ किसी की दक्षता बढ़ाने का साधन तथा किसी के लिए कर्मयोग बन जाता है।” जिज्ञासु का समाधान हुआ, नयी दृष्टि मिली।
मनुष्य क्या है, इस प्रश्न की यथार्थ व्याख्या करना प्रायः कठिन है। तो भी विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों ने अपने-अपने ज्ञान के आधार पर इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास किया है। परिभाषा, जो मनुष्य का समग्र और सही स्वरूप प्रस्तुत करे- दी जाय, इसके पूर्व उन विशेषज्ञों का मत जानना आवश्यक है।
भौतिक विज्ञान का “थर्मो डायनामिक्स” सिद्धान्त मान्यता प्राप्त है। इसके द्वितीय नियम के अनुसार ब्रह्माण्ड की प्रत्येक क्रिया ऊँचे एन्ट्रापी- अव्यवस्था अर्थात् असन्तुलन की ओर चलायमान है, पर जीवित प्राणी इस नियम के अपवाद हैं। उनमें यह क्षमता पायी जाती है कि प्राकृतिक प्रक्रिया के विपरीत चलकर, व्यतिक्रम के स्थान पर सन्तुलन स्थापित कर सकते हैं। इस मान्यता के आधार पर मनुष्य ‘एन्ट्रापी रिडयूसर’- अव्यवस्था को दूर करने वाला सृष्टि का श्रेष्ठतम प्राणी है।
दूसरी परिभाषा रसायन शास्त्रियों ने दी है। उनकी मान्यता है कि विकास की आरम्भिक अवस्था में यह पृथ्वी बंजर रूप में थी। समुद्र का फैलाव और भी अधिक व्यापक क्षेत्र में था। मिथेन, अमोनिया जल, हाइड्रोजन, सल्फाइड, नाइट्रोजन आदि का वातावरण में बाहुल्य था। बाद में सौर विकिरण, भूमिगत ताप तथा विद्युतमय वातावरण से मुक्त हुआ प्रकाश तथा रेडियो धर्मी पदार्थों से युक्त भूपृष्ठ को मुक्त किया गया, सूक्ष्म विकिरण ऊर्जा के रूप में विस्तारित हुआ। इन ऊर्जा स्रोतों ने सामान्य अणु संरचना को अधिक जटिल बना दिया सर्वाधिक छोटा अणु कार्बन आपस में सिमटकर एक मजबूत बंध के रूप में परिवर्तित हो गया। प्रत्येक कार्बन अणु में चार बन्ध बने। अन्थ जैविक अणु कार्बन से सम्बन्धित हो गए। अन्ततः जैविक अणु अधिक विकसित एवं जटिल होकर क्रियाशील हो गए। इसी आधार पर पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हुआ और विकास क्रम में उच्चतर प्राणी तथा मनुष्य का प्रादुर्भाव हुआ। अतएव रसायन शास्त्रियों ने मनुष्य की व्याख्या “कार्बन अणु की जटिल जैविक संरचना” के रूप में की है।
जैव रसायनविदों ने रसायन शास्त्रियों से थोड़ा अलग हटकर मनुष्य की व्याख्या की है। उनका मत इस प्रकार है- “छोटे तथा बड़े अणुओं में जीवन तत्व का अभाव है। अपने आप वे गति करने में असमर्थ होते हैं। पर पृथ्वी के शैशव काल में जब अणु अधिक जटिल स्वरूप धारण करने लगता है, तो कुछ जैविक तत्वों का उद्भव अपने आप होता है, जो उन अणुओं को गति देते हैं। उन्हें न्यूक्लिक एसिड कहा जाता है। दूसरे प्रकार के उत्पन्न हुए जैविक अणु प्रोटीन हैं। कुछ प्रोटीनों में उत्प्रेरक गुण पाये जाते हैं, जिन्हें इन्जाइम कहते हैं। विभिन्न प्रकार के न्यूक्लिक एसिड विभिन्न तरह के इन्जाइमों का निर्माण करते हैं। जीवन का जटिल स्वरूप इनके सहयोग से प्रकट होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार जैव रसायन के विशेषज्ञों ने मनुष्य को न्यूक्लिक एसिड व इन्जाइमों के बीच पारस्परिक क्रियाशील रहने वाला प्राणी कहा है।
अन्यान्य क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भी अपने विषय ज्ञान के आधार पर मनुष्य की परिभाषा विभिन्न रूपों में दी है। जीव विज्ञानियों ने मनुष्य को एक कोशीय सम्पिण्ड माना है, तो ज्योतिर्विदों ने उसे तारों के बीज कोष की रचना माना है। मानव शास्त्री कहते हैं कि मनुष्य कुशाग्र दृष्टि, सुविकसित मस्तिष्क, कल्पनाशील मन तथा समर्थ शरीर से युक्त एवं सृष्टि का सुविकसित प्राणी है, पुरातत्व वेत्ताओं की मान्यता है कि मनुष्य संस्कृति का संचायक, नगर का निर्माता, मिट्टी पात्र से लेकर अन्यान्य कलाकृतियों का आविष्कारक, संगीत, कृषि साहित्य जैसे विषयों का निर्माता है।
समाज शास्त्रियों के अनुसार वह एक सामाजिक प्राणी, समाज का एक अभिन्न घटक तथा उसका निर्माता है। पाश्चात्य मनःशास्त्र को मानने वाले मनुष्य को एक अद्भुत तथा विलक्षण सचेतन जीव मानते हैं, जिसके पास मन और मस्तिष्क जैसे बहुमूल्य घटक प्राप्त हैं। वह मूल प्रवृत्तियों का गुलाम है। सेक्स ही वह प्रेरक तत्व है जिससे उसकी प्रत्येक भली-बुरी गतिविधियाँ संचालित हैं। जिसकी सन्तुष्टि अथवा अतृप्ति पर मानवी विकास अथवा पतन आधारित है। वह सचेतन जीवों का प्रचण्ड शक्ति स्रोत है।
अर्थ शास्त्रियों ने पार्थिव शरीर के रूप में मनुष्य का मूल्याँकन किया है तथा शरीर का विश्लेषण अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि मानव शरीर में फास्फोरस की इतनी मात्रा पायी जाती है कि माचिस की 220 तीलियों के शीर्ष पर एक परत लगायी जा सके।” ऐसी ही गणना उन्होंने अन्य घटकों की भी की है। सभी तत्वों की कीमत अर्थशास्त्रियों ने लगभग सत्ताईस रुपये लगायी थी। कुछ व्यक्तियों का आक्षेप है कि कुछ दशकों में महंगाई बेहिसाब बढ़ी है ऐसी स्थिति में मानव शरीर की कीमत भी अधिक आँकी जानी चाहिए। यदि उनकी बात मान ली जाय, तो मनुष्य शरीर की कीमत अधिक से अधिक पचास रुपये तक मानी जा सकती है।
रिश्तों के आधार पर भी मनुष्य का एक स्वरूप प्रकट होता है। एक ही समय में वह किसी का पुत्र, किसी का पिता, एक स्त्री का पति, एक लड़की का भाई, किसी का दोस्त तथा किसी का दुश्मन, कहीं कर्मचारी, किसी का नौकर, किसी का अधिकारी, सम्पत्ति का स्वामी संरक्षक हो सकता है। प्रकृति एवं अभिरुचि के अनुरूप भी उसका एक रूप है। वह विचारक हो सकता है। कलाकार, गायक, संगीतज्ञ, अभिनयकर्ता, दार्शनिक, अध्यापक, अर्थशास्त्री, कृषक, विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, संत, दुष्ट, समाज सुधारक, भ्रष्ट, ब्रह्मचारी, व्यभिचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, बालक, युवा, वृद्ध, नर, नारी जैसे अगणित उसके रूप में हैं। एक साथ वह एक से अधिक विशेषताओं से युक्त भी हो सकता है। वह बुद्धिमान हो सकता है और मूर्ख भी। बलवान अथवा निर्बल भी हो सकता है। सुन्दर और कुरूप दोनों ही उसके रूप हैं।
पुरातन तथा आधुनिक मनीषियों एवं दार्शनिकों ने भी मनुष्य की व्याख्या विभिन्न ढंग से की है। पाश्चात्य दार्शनिक प्लेटो ने मनुष्य को एक पंख विहीन द्विपाद के रूप में वर्णन किया है। दार्शनिक सेनेक्रा उसे एक सामाजिक प्राणी मानता है। एल्डुअस हक्सले का कहना है कि- “मनुष्य इन्द्रियों की दासता में जकड़ा एक बुद्धिमान जीवन है।” डर्विन ने ‘जीव विकास की एक उच्च स्थिति के रूप में मनुष्य का वर्णन किया है। फ्रायड मनुष्य को पशु प्रवृत्तियों में जकड़ा एक जीव मानता है। जान स्टुअर्ट मिल मनुष्य को एक चलता-फिरता नश्वर प्राणी कहता है, जो अन्य जीवों की तुलना में अधिक समझदार तथा सृष्टि के लिए उपयोगी है। वर्ट्रेण्ड रसेल उसे बुद्धिमान किन्तु ध्वंशक जीव मानते हैं।
भारतीय ऋषियों तथा मनीषियों ने भी मनुष्य तथा मनुष्य जीवन की विवेचना अनेक रूपों में की है। नास्तिकवादी दार्शनिक चार्वाक ने मनुष्य को नश्वर माना है। इस मान्यता के आधार पर ही उन्होंने कहा था-
“यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्।”
अर्थात्- “जब तक जिये, सुख से जिये, ऋण लेकर घी पिये।” क्योंकि शरीर के भस्मीभूत हो जाने के बाद कौन लौटकर आता है।
योग मनोविज्ञानियों के अनुसार मननात् मनुष्यः। अर्थात् मनन करने से मनुष्य कहलाता है। शास्त्र कहते हैं-
“मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
अर्थात्- मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है।
वैरस्यमत्र विषवत्सुविधाय पाश्चादेनं विमोचयति तन्मन एवं बन्धात्। -विवेक चूणामणि
अर्थात्- यह मन ही देह आदि सब विषयों में राग की कल्पना करके रस्सी से पशु की तरह पुरुष को बाँधता है फिर इन विषयों से वैराग्य उत्पन्न करके इसको बन्धन मुक्त भी कर सकता है।
भगवान राम को ऋषि वशिष्ठ ब्रह्म विद्या का उपदेश देते हुए कहते हैं- हे राम! मैं तुम्हें एक रहस्य की बात बताता हूँ- मनुष्य से बढ़कर इस संसार में और कुछ भी नहीं है।”
मनुष्य क्या है। आत्मज्ञानी कहते हैं- अहंमात्मानं पराजिग्ये। मैं अपराजित आत्मा हूँ।
एक ब्रह्मज्ञानी का उद्घोष है-
“अहं ब्रह्मास्मि। सोऽहम्। सच्चिदानन्दोऽहम्।”
वह ब्रह्म मैं हूँ। वह मैं हूँ। मैं सत्-चित् और आनन्द से युक्त हूँ।
“अकर्ताहम् भोक्ताहमविकारोऽहमक्रियः। शुद्धबोध स्वरूपोऽहं केवलोऽहं सदा शिवः॥ -विवेक चूणामणि
अर्थात्- मैं अकर्ता-अभोक्ता हूँ, अविकारी हूँ। शुद्ध बोध स्वरूप हूँ। एक हूं और नित्य कल्याणस्वरूप हूँ।
नाहमिदं नाहमदोऽप्युम योरवभासकं परं शुद्धम्। ब्राह्याभ्यन्तरशून्यंपूर्ण ब्रह्माद्वितीयंमवाहम्॥ -(विवेक चूड़ामणि)
अर्थात्- मैं न यह जगत् हूँ, न वह ईश्वर है, बल्कि इन दोनों का प्रकाशक, बाह्याभ्यन्तर शून्य, पूर्ण, अद्वितीय और शुद्ध परब्रह्म ही हूँ।
मनुष्य क्या है? उत्तर एक प्रतिप्रश्न में सन्निहित है कि मनुष्य क्या नहीं है? अर्थात् सब कुछ है। बीज रूप में उसके भीतर विकास की असीम सम्भावनाएँ विद्यमान है। अपने विषय में जो जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। वह एक ऐसा अनगढ़ प्राणी है, जो सुगढ़ बन सकता है, नर से नारायण बन सकता है और अधोगामी मार्ग अपनाकर नर पशु-नर पामर भी बन सकता है। अभीष्ट दिशा में चल पड़ने की उसे खुली छूट है। शरीर, मन, अन्तःकरण तथा उनसे जुड़ी असामान्य क्षमताएँ सदुद्देश्यों से जुड़कर उसके विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं और निकृष्ट दिशा में नियोजित होकर पतन पराभव की ओर ढकेल भी सकती हैं।
अपने को वह रसायनों का सम्मिश्रण मूल प्रवृत्तियों का गुलाम, अणुओं का संगठन अथवा चलता-फिरता पौधा भर मानता रहे, यह मनुष्य के लिए शोभा नहीं देता। उचित यही है कि वह मनुष्य जीवन की गरिमा समझे तथा यह माने की सुरदुर्लभ प्रस्तुत अवसर उसे विशिष्ट प्रयोजन के लिए प्राप्त हुआ है, जिसका सदुपयोग होना चाहिए। श्रेष्ठ मान्यता के अनुरूप ही विचारणा का क्रम चलता और अन्ततः वही आचरण में उतरता है। भौतिक मान्यताओं से ऊपर उठकर ही मनुष्य का सही एवं शाश्वत मूल्याँकन करना विवेक सम्मत है।
एक अन्धा था। किसी अपराध में आजीवन कारावास का भागी बना। बहुत दुःखी रहता। राजा को दया आयी। वे दण्ड मुक्त तो नहीं कर सकते थे, पर इतनी व्यवस्था कर दी कि यदि यह जेल द्वार से अनायास ही निकले तो उसे कोई रोके नहीं।
अन्धा इतने से भी प्रसन्न हुआ। उसने जेल की दीवार पकड़ी आर फाटक की तलाश में उसके सहारे चलने लगा। फाटक पर सुन्दर उद्यान था, शीतल वातावरण।
अन्धे के सिर में खाज थी। ठण्डक पाकर वह और जोर से खुजलाने लगी अन्धे ने दीवार छोड़ दी और दोनों हाथों से गंज खुजलाने लगा। चलने से रुका नहीं और फाटक निकल गया। वह फिर उसी कुचक्र में परिभ्रमण करने लगा।
हर बार यही हुआ। बार-बार फाटक आया और गंजा खुजलाने के कारण वह बार-बार उसी प्रकार भटकता रहा। बाहर निकलने का अवसर पा नहीं सका।
चौरासी लाख योनियों का परिभ्रमण एक कारावास है। जीव अन्धा, वह चाहे तो मनुष्य जन्म फाटक से बाहर निकल सकता है पर जब वह सुयोग आता है तो विषय विकारों की गंज खुजलाने लगती है और बार-बार फिर उसी कोल्हू में घूमता रहता है। फिर गंज खुजलाने पर नियन्त्रण कर सके तो पार होने का सहज सुयोग हाथ से क्यों जाये?
अन्तःकरण में वैराग्य की ज्योति जलते ही महाराज हरिदास का मन राजपाट के भोग विलास से उचटने लगा। एक अभाव सदा महसूस होने लगा कि अपने स्वरूप एवं लक्ष्य से अपरिचित रहकर जीवन का एक बड़ा भाग व्यर्थ चला गया। शेष को गंवाना उचित नहीं, यह सोचकर राज्य भार महामन्त्री को सौंपकर वे वन में कठोर तप करने के उद्देश्य से चल पड़े।
दिन बीतते गए और उसके साथ-साथ हरिदास की साधना भी प्रचण्ड होती चली गयी। चित्त की वृत्तियों के निरोध तथा मन की मलीनताओं के परिशोधन के लिए उन्होंने जप, तप एवं तितीक्षा की कठोर साधनाएँ कीं। तपाग्नि में जलकर काया अत्यन्त दुर्बल हो गयी। आत्मदेव की उपासना में शरीर का भी ध्यान न रहा। पर इन कठोर साधनों के बावजूद भी हरिदास का मन व्यग्र तथा असन्तुष्ट बना हुआ था। आत्मसाक्षात्कार का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा था। सब कुछ निराशाजनक और प्रयत्न निष्फल जान पड़ रहे थे।
साधना की तन्द्रा की स्थिति में भीतर से आवाज आयी- ‘सबसे मूल्यवान वस्तुओं का समर्पण कर, तुझे लक्ष्य की प्राप्ति होगी। महाराज संशय में पड़े सर्वाधिक मूल्यवान चीजें कौन-कौन-सी हैं। वापस राजदरबार लौटे। राजपुरोहित महामन्त्री तथा प्रधान सेनापति को अविलम्ब परामर्श के लिए बुला भेजा। उनके आते ही संशय प्रकट करते हुए तीनों से जानना चाहा कि मनुष्य के लिए सबसे मूल्यवान कौन-कौन सी चीजें हैं। राजपुरोहित ने शास्त्र को सर्वोपरि महत्व दिया, सेनापति ने शस्त्र को तथा महामन्त्री ने सत्ता को। राजा हरिदास को लगा जैसे समाधान मिल गया हो।
शास्त्र के प्रतीक महाभारत को शस्त्र के प्रतीक तलवार को तथा सत्ता के प्रतीक राज मुकुट के समर्पण का राजा ने संकल्प लिया। बुद्धिबल, शस्त्रबल तथा धन बल की तीनों शक्तियों को अपने इष्ट के समझ उत्सर्ग का निर्णय लेकर वे पुनः मुदित मन से तप करने चल पड़े। भीतर के अहम् ने गर्व से कहा सर्वस्व इष्ट के चरणों में अर्पित कर दिया गया। पर त्याग का यह अहंकार अधिक समय तक सन्तोष न दे सका। साधना से जिस आत्म सन्तोष शान्ति एवं आनन्द की अनुभूति होनी चाहिए, हरिदास का अन्तःकरण कोसों दूर था। पहले की अपेक्षा मन की व्याकुलता और भी बढ़ी। समर्पण में कहाँ किस तरह की गलती रह गयी है, राजा को यह नहीं सूझ रहा था।
अन्तः करण के कोने से पुनः आवाज आयी “मूर्ख! तूने भौतिक चीजों का तो समर्पण किया पर अपने अहम् को छाती से चिपकाये हुए है। अहम् के रहते समर्पण पूरा नहीं हो सकता। ईष्ट के प्रति भावनाओं का आरोपण नहीं हो पाता। अपने अहं को विगलित कर। जा दीन-दुखियों की सेवा कर- उनके दुःखों में हिस्सा बँटा। उनमें ही अपना रूप देख। तेरी साधना सफल होगी।”
राजा को अपनी भूल मालूम हुई। जप, तप के साथ-साथ उस दिन से उन्होंने सेवा को भी साधना का अनिवार्य अंग माना। पीड़ितों की सेवा से अहं विगलित हुआ आत्म विस्तार का अवरुद्ध मार्ग खुल गया। धीरे-धीरे आत्म सत्ता की प्रकाश किरणें भी अन्तःकरण में झिलमिलाने लगीं। उस पावन आलोक में हरिदास ने सर्वत्र अपनी सत्ता को ही एक अखण्ड रूप में क्रीड़ा-कल्लोल करते देखा। अन्तस् का तमस् सच्ची समर्पण योग की साधना से जाता रहा अवतरित दिव्य प्रकाश के आलोक ने हरिदास के समूचे व्यक्तित्व की कायाकल्प कर दिया। अब वे राजा हरिदास नहीं तत्व ज्ञानी हरिदास थे।
अच्छी फसल उगाने के लिए जितना महत्व अच्छी भूमि और अच्छे बीज का है उतना ही इस बात का भी कि उपज को उदरस्थ कर जाने वाले खरपतवार को बढ़ने न दिया जाय। बीजारोपण से पूर्व भूमि की जुताई इसीलिए की जाती है कि खेत की उर्वरता को आरोपित पौधों के पोषण में लग सकने का सुरक्षात्मक प्रबन्ध पहले से ही कर लिया जाय। सुयोग्य पीढ़ियों के उत्पादन का दूसरा पक्ष यह है कि अयोग्य उत्पादन की रोकथाम भी साथ-साथ की जाय। अन्यथा जिन साधनों का उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए किया जाना है उनका अधिकाँश आवेगों के निर्वाह तथा उनके द्वारा उत्पन्न की गई विकृतियों के निराकरण में ही खर्च होता रहेगा। खेत में खरपतवार को निर्वाध गति से बढ़ने की छूट दी जाती रहे तो समझना चाहिए कि उपयुक्त फसल के पकने की सम्भावना समाप्त हो गई।
सन्तान को सुयोग्य बनाने में माता-पिता की प्रजनन प्रक्रिया ही सब कुछ नहीं होती। वे तो श्री गणेश- बीजारोपण मात्र करते हैं। अगला सारा काम तो समूचे परिवार या समाज को करना होता है। बीज उपयुक्त खेत में पड़ कर अंकुरित होता और किसान के प्राथमिक पुरुषार्थ की सफलता व्यक्त करता है। पर इतने से ही तो काम नहीं चल जाता। उसके लिए खाद कहीं से लाना पड़ता है। पानी का प्रबन्ध कहीं से होता है। निराई गुड़ाई में किसी का पसीना बहता है। पशु-पक्षियों से रखवाली, और कृमि कीटकों को निरस्त करने की जिम्मेदारी किसी को उठानी पड़ती है। इस प्रबन्ध में अनेकों की भागीदारी रहती है और अनेक साधन जुटते हैं। सुयोग्य पीढ़ियों के निर्माण में न केवल गर्भ स्थापन एवं गर्भ धारण से उत्तरदायित्व सम्पन्न होता है वरन् उस अनुष्ठान में समूचे समाज को प्रकारान्तर से योगदान करना पड़ता है। ऐसी दशा में उत्पादकों का ही नहीं समाज के कर्णधारों का भी यह कर्तव्य हो जाता है कि वे सुयोग्यता सम्बन्ध के आवश्यक वातावरण बनाने, साधन जुटाने की तरह इस बात का भी ध्यान रखें कि कहीं हेय सृजन का दौर तो नहीं चल रहा है। सज्जन और चोर साथ-साथ बढ़ते रहे तो सज्जनता के लाभ से लाभान्वित होने का स्वप्न साकार न हो सकेगा। उठने के लिए सीढ़ी बनाने और गिरने के लिए खाई खोदने का उपक्रम साथ-साथ चले तो बात कैसे बनेगी।
सुसंतति का शुभारम्भ जनक जननी को गर्भाधान क्रिया के साथ आरम्भ होता है। उन दोनों की शारीरिक मानसिक स्थिति तो वंशानुक्रम के रूप में सन्तति को सुसंस्कारिता एवं दीक्षता प्रदान करने के लिए उपयुक्त होनी चाहिए। इसमें कमी पड़ेगी तो सड़े घुने बीज से उत्पन्न हुए अंकुर पूर्णता तक पहुँच नहीं सकेंगे। वरन् उल्टी खीज पैदा करेंगे। जो बोने की क्रिया सम्पन्न करें वे ही उगने से लेकर पकने तक की अवधि में अभीष्ट आवश्यकताएँ जुटाने का भी प्रबन्ध करें। इसके लिए उनकी पूर्व तैयारी होनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि प्रजनन कृत्य में संलग्न होने वाली को आर्थिक स्थिति भी इस योग्य होनी चाहिए कि वे अपने उत्पादन को समुचित खाद पानी देने तथा सुरक्षा जुटाने में व्यतिरेक उत्पन्न न हो सके। जिसके पास ऐसे साधन नहीं हैं वे बोने के साहस ही न करें। इसमें जुताई, बुआई का श्रम निरर्थक जाता है। साधनों के अभाव में अब अंकुर सूखते हैं तो दुःख भी होता है और अपयश भी लदता है। इस अक्षम विकृति सृष्टि का यदि समाज को भार वहन करना पड़े तो यह भी विश्व मानव की कुसेवा है। उत्पादित सन्तान का भविष्य न बना सकने की क्षमता न होते हुए भी उस वजन को उठा कर अपनी गर्दन तोड़ लेना और भार की गठरी को जमीन पर गिरा कर चूर-चूर कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है।
सुप्रजनन की आवश्यकता और उसकी पूर्ति के लिए विज्ञजनों में उपयुक्त वातावरण, प्रशिक्षण एवं सुविधा साधन जुटाने के लिए समूचे समाज को प्रोत्साहित किया है। इससे पहले उनका कथन यह भी है कि यह कार्य मात्र उन्हें ही करने दिया जाय जो हर दृष्टि से इसके लिए उपयुक्त होने की कसौटी पर कस लिये जायं। जिस प्रकार डाक्टर, इंजीनियर, सैनिक विद्यालयों में भर्ती होने से पूर्व छात्रों को प्राथमिक योग्यता जाँच ली जाती है उसी प्रकार बालकों के उत्पादन की आज्ञा भी समूचे की ओर मिलनी चाहिए ताकि कुपात्र उस कार्य में हाथ डालकर मानवी बिरादरी का अहित न करने लगे। नागरिक अधिकारों की गणना में यदि यौन कर्म आता हो तो भी उसके पीछे इतना नियन्त्रण तो रहना ही चाहिए कि वह शरीर क्रीड़ा तक सीमित रहे और समाज संकट उत्पन्न करने का कारण न बने। सन्तानोत्पादन समाज को प्रभावित करने वाला कृत्य है इसलिए उस पर यदि समाज या शासन की ओर से अंकुश लगता है तो इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। नागरिक अधिकारों की स्वतन्त्रता तभी तक उचित ठहरती है जब तक कि उसका प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता है। इसके आगे कदम बढ़ते ही समाज को अधिकार क्षेत्र बनता है कि वह स्वतन्त्रता का व्यतिरेक न करें। अपनी मर्यादा में सीमित रहे। शरीर क्रीड़ा तक ही नागरिक अधिकारों की परिधि समाप्त हो जाती है। प्रजनन कर्म स्पष्टतः समाज को लाभ या हानि पहुँचाने वाला कृत्य है। ऐसी दशा में उसका अधिकार होना चाहिए कि सुप्रजनन के लिए प्रोत्साहन प्रदान करें और उपयुक्त जोड़ों को यह उत्तरदायित्व निभाने के लिए अनुरोधपूर्वक अनावश्यक सुविधा प्रदान करे। प्राचीनकाल में इसके लिए ‘नियोग’ प्रचलन था अब उसके लिए वीर्य बैंक स्थापित किये जा रहे हैं।
यह व्यवस्था जुटाना अगला काम है। प्रथम चरण कुप्रजनन को रोकना है जिसके कारण इन दिनों त्राहि-त्राहि मची हुई है और अगले दिनों विपत्ति बरसाने वाली घटा घिरती आ रही है। इस रोकथाम की ओर विश्व विचारकों का ध्यान गया है और उनने व्यक्ति तथा समाज से समान आग्रह किया है कि वह अवाँछनीय प्रजनन की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने वाले कदम उठायें। अन्यथा भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली विभीषिकाओं में अनुपयुक्त सन्तानों की भरमार से जो संकट उभरेगा उसका समाधान कर सकना किसी के हाथ में नहीं रहेगा। टिड्डी दल से होने वाली हानियों को जो जानते हैं जिन्हें मूषकों की- मच्छरों की अभिवृद्धि के दुष्परिणामों का पता है उन्हें यह भी जानना चाहिए कि आज का कुप्रजनन अगले कल किसी प्रकार समूचे वातावरण को विषाक्त करेगा और अनेकानेक समस्याओं का कारण बनेगा।
फ्राँस के व्यक्तित्व विशेषज्ञ अल्फेडविने ने मेधावी और मन्दमति लोगों की इस मौलिक विशेषता का आधारभूत कारण उनके जन्मदाताओं की जीन्स सम्पदा को बताया है और कहा है मेधावी सन्तानों का जन्म वे ही लोग दे सकते हैं जिनका व्यक्तित्व इसके लिए हर दृष्टि से परिष्कृत हो। पुरातन जीन्स वैभव में आज के व्यक्तित्व का सबसे अधिक प्रभाव रहता है।
विने ने अपने ग्रन्थ ‘दि ट्रेनिंग ऑफ इन्टेलिजेन्स’ में इस बात पर अधिक जोर दिया है कि किसी को बुद्धिमत्ता विकसित करनी हो तो यह कार्य उसके जनक जननी को अपनी शारीरिक, मानसिक दक्षता तद्नुरूप बनाने के साथ आरम्भ करना चाहिए अनुपयुक्त वंश परम्परा लेकर जन्मे बालकों में प्रतिभावान बालकों का उत्पादन बहुत प्रयत्न करने पर भी एक छोटी सीमा तक ही सम्भव हो सकेगा।
अमेरिका में इस सम्बन्ध की खोजबीन करने और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए कई महामनीषियों ने असाधारण प्रयत्न किये हैं। इनमें से स्टैन फोर्ड के डा. लीवस टर्मान, न्यूजर्सी के प्रो. हेनरी गोडर्ड और हारवर्ड विश्व विद्यालय के राबर्ट यर्कीज प्रमुख हैं। इन तीनों ने सन्तानोत्पादक दक्षता के सम्बन्ध में एक विशेष पर्यवेक्षण पद्धति का आविष्कार किया है। उसका नाम दिया है- “स्टैन फोर्ड विने टैस्ट” वे कहते हैं जो इस परीक्षण में खरे उतरे मात्र उन्हीं को सन्तानोत्पादन का लाइसेन्स मिलना चाहिए। शेष को इसके लिए अयोग्य घोषित कर देना चाहिए।
यूनेजिम्स रिसर्च ऐसोसिएशन को “कमेटी ऑन इन हरिटेस आफ मेन्टल टेस्ट” के सम्मुख प्रो. गोडार्ड ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था कि ऐसे लोगों को बलपूर्वक ‘वधिया’ बना दिया जाय यौन कर्म में तो रत रहते हैं किन्तु सुयोग्य उत्पादन की दृष्टि से अक्षम।
इस प्रतिवेदन से प्रभावित होकर ‘मूढ़ता की रोकथाम, प्रयोजन के लिए कई देशों ने कानून भी बनाये और अंकुश भी लगाये। ऐसे अनुबन्धों में पेन्सिल्वानिया, इण्डियाना, न्यूजर्सी और इओवा में हलके-फुलके कानून भी बने। प्रजातन्त्र में बहुमत का विरोध देखकर भी ऐसे सुधार करते समय फूँक-फूँक कर कदम उठाने होते हैं। इन कानूनों में शराबी, अफीमची, अपराधी, आक्रामक, असन्तुलित, विक्षिप्त, सनकी, दुर्बल, रोगी लोगों को सन्तानोत्पादन के अयोग्य घोषित किया गया और अनुबन्ध के उल्लेख पर कड़े दण्ड का प्रावधान रखा गया।
सरकारी महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती करने के सम्बन्ध में उपयुक्त व्यक्तित्व तलाश करने की दृष्टि से उपयुक्तों का परीक्षण करने में अमेरिकी साइकोलॉजी ऐसोसिएशन की भी भागीदारी थी। उसके अध्यक्ष मेजर यर्कीज ने जिन्हें प्रतिभावान पाया उनमें से अधिकाँश वह विशेषता अपनी वंश परम्परा से साथ लेकर आये थे।
भविष्य निर्माण के लिए जहाँ अन्यान्य साधन जुटाने की आवश्यकता है वहाँ भावी पीढ़ी में मनस्वी एवं व्यक्तित्व सम्पन्न होने की बात को भी महत्व मिलना चाहिए। इसके लिए सुप्रजनन को प्रोत्साहित और पात्रता को निरुत्साहित प्रतिबंधित करने की भी आवश्यकता है।
यों वंशानुक्रम में प्रधानतया जनक जननी के संस्कारों का ही बाहुल्य रहता है तो भी माता और पिता की पिछली पीढ़ियों के उत्तराधिकार भी किसी मात्रा से हस्तान्तरित होते रहते हैं भले ही वे अपेक्षाकृत स्वल्प मात्रा में ही क्यों न हों। यह विरासत आगे-आगे बढ़ती चलती है और अनेक पीढ़ियों तक अपने प्रभाव किसी न किसी रूप में छोड़ती जाती है।
इस संदर्भ में सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनक और जननी की आती है कि उनने अपने उत्तराधिकारियों को देने के लिए क्या कुछ सँजोया है। इन दोनों में भी पिता की जिम्मेदारी अधिक है क्योंकि भ्रूण पर वर्चस्व उसी के पक्ष का रहता है। प्रतिभा जितनी पिता की सन्तान को हस्तांतरित होती है उसकी तुलना में माता का योगदान अपेक्षाकृत कम ही रहता है। वंशानुक्रम में पिता की विशेषता रहने पर माता का उत्तरदायित्व हलका नहीं होता वह उस कभी को ऊपर से गर्भधारण के समय अपनी सुसंस्कारिता हस्तान्तरित पूरा करके संपन्न करती है। जबकि यह कार्य पिता की लम्बी अवधि तक साधना रत रहकर पूरा करना पड़ता है। सुप्रजनन की दृष्टि से उपयुक्त पिताओं को तलाश करना और उन्हें अपना महान उत्तरदायित्व सम्भाल सकने के लिए लम्बे समय तक आत्म निर्माण साधना के लिए सहमत किया जाना चाहिए। उनके व्यक्तित्व का ही अगली पीढ़ी से हस्तांतरण जो होना है। इसका अर्थ यह नहीं कि माता की अपेक्षा की जाय। उनमें से अधिकाँश में भावनात्मक वरिष्ठता प्रकृति प्रदत्त परम्परागत रूप से पाई जाती है। तो भी उन्हें गर्भ धारण के समय की तथा पालन-पोषण के दिनों की उत्कृष्टता तथा सतर्कता जानने तथा अभ्यस्त करने का प्रयत्न समय रहते किया जाना चाहिए।
बढ़ती हुई जनसंख्या की रोकथाम अपने स्थान पर उचित एवं आवश्यक है। इस प्रयास में उन्हें अग्रिम रहना चाहिए जिनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं पारिवारिक क्षमता सुसन्तति निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है। जो इस स्थिति में है कि भावी पीढ़ी के लिए संस्कारवान प्रतिभावान नागरिक प्रदान कर सकते हैं उन्हें इसे भी एक परमार्थिक देशभक्ति पूर्ण कार्य समडडडडडडडडडडड कर सम्पन्न करना चाहिए। इसके लिए मेधावी और प्रतिभावानों युग्मों को अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना चाहिए।
सूर्य बहुत बड़ा है पर जरा सी बदली उसका प्रकाश हम तक आना रोक देती है। इसी प्रकार ईश्वर अति विशाल और सर्वसमर्थ है पर अज्ञान की अँधियारी उसका अनुग्रह हम तक आने का मार्ग अवरुद्ध कर देती है।
रहना सबके साथ है। करना और खाना भी साथ-साथ ही बन पड़ता है। इतने पर भी अपने अकेलेपन को भूल नहीं जाना चाहिए। मनुष्य अकेला आया है। परलोक भी अकेले जाना पड़ेगा। खाने, नहाने सोने में हर व्यक्ति अकेला होता है फिर यह यथार्थता ऐसी नहीं है जिसे भुला दिया जाय।
अपना अहित निवारण और हित साधन करने के लिए एकाकी चिन्तन की आवश्यकता है। लोग क्या कहते और क्या करते हैं, इस आधार पर जो किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते हैं, वे भूल करते हैं। एक केन्द्र से अनेक दिशाओं में अनेक पगडण्डियाँ जाती हैं। उनमें से हर एक पर प्राणी गए होते हैं इनमें से अपने लिए एक का चुनाव ही करना होगा, सभी पर नहीं जाया जा सकता है। अनेक पगडण्डियों में से एक का चुनाव अपनी ही विवेक बुद्धि के आधार पर करना होता है। यही है यह दृष्टि जिसे अपनाकर संसार के मेले से अपने काम की वस्तु चुनी जा सकती है।
पीड़ा आप ही सहनी पड़ती है। इन्द्रियों के सुख-दुख भी अपने को ही होते हैं। इसमें किसी की साझेदारी सम्भव नहीं। अपने कृत्यों का परिणाम भी अपने को ही भोगना पड़ता है। न एक के बदले का दूसरा सिंहासन पर बैठता है और न फाँसी पर लटकता है। सहयोग समर्थन, सहानुभूति और संवेदना में अनेकों की साझेदारी रहती है। क्योंकि हम सब समुदाय के अंतर्गत निर्वाह करते हैं फिर भी अपनी समस्याएँ आप ही सुलझानी पड़ती हैं।
शास्त्रों- आप्त पुरुषों और धर्मोपदेशकों की कमी नहीं। सन्तों और सम्प्रदाओं के प्रतिपादनों में एकता कम और भिन्नता अधिक है। ऐसी दशा में क्या उपयुक्त क्या अनुपयुक्त इसका निर्णय स्वयं ही करना होता है। सभी के मत का न तो समन्वय है और न उन सभी का खण्डन करने लायक तर्क किसी के पास है। ऐसी दशा में विवेक के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं जिसे छोड़कर किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकना सम्भव हो सके।
गरुड़ अकेले उड़ते हैं। भेड़ें ही सदा भीड़ की प्रतीक्षा करती हैं और झुण्ड के साथ किसी भी दिशा में चल पड़ती हैं। सूर्य, चन्द्र, तारक सभी अपने-अपने पथ पर एकाकी परिभ्रमण करते हैं। दो का साथ कहीं नहीं। रास्ते में पथिक अनेकों मिलते और बिछुड़ते रहते हैं। न तो वे अपने साथ आ सकते हैं और न अपने लिए ही उनके साथ चले जाना सम्भव हो सकता है। सबका अपना मार्ग है उस पर चलने के लिए अपने ही पैरों का प्रयोग करना पड़ता है। थकान में किसी की साझेदारी नहीं। राह की ठोकर में अपने को कष्ट होता है और उसके लिए पट्टी भी अपने ही पैर में बँधती है।
अपने विवेक से काम चलता है। वही अपना सच्चा सहचर है। अपने ही पराक्रम से अभीष्ट का उपार्जन सम्भव है। दूसरों के परामर्श और सहयोग से न तो समस्याएँ हल होती हैं और न उनके सहयोग से मंजिल तक पहुँच सकना सम्भव होता है।
विवेक को जगाया और परिपक्व किया जाय। उसे साहस के सहारे इस योग्य बनाया जाय कि सच्चा मार्गदर्शक और सहयोगी बन सके। इसके लिए आवश्यक है- आदर्शों के प्रति निष्ठा। वही ध्रुव तारे का काम देती है। आकर्षणों के प्रति लुभाने वाली दुर्गति ही प्रायः मनुष्य पर लद पड़ती है और उसे कठपुतली की तरह नचाती है। जो इस भ्रम जंजाल में से अपना श्रेय और अभीष्ट चुन सकता है वह बुद्धिमान है।
बुद्धिमत्ता का अर्थ प्रलोभनों का परिपोषण करने वाली चतुरता नहीं। वह दूरदर्शिता है जो श्रेय को उपलब्ध कराती और महानता के लक्ष्य तक पहुँचाती है। ऐसी दूरदर्शी विवेक बुद्धि को प्रज्ञा कहते हैं। यही है जिसे प्रखर करने की साधना करनी चाहिए। यही है वह उपलब्धि जिसके सहारे अकेला भी हजारों लाखों से बढ़कर समर्थ सिद्ध होता है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की चतुर्विधि आवश्यकताएँ कहा गया है और उनके लिए प्रयत्नरत रहने का आप्तजनों द्वारा परामर्श दिया गया है।
इनमें से धर्म और मोक्ष की बात आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने और पारलौकिक लाभ लेने के लिए आवश्यक समझा गया है। अर्थ की आवश्यकता इसीलिए है कि उसके बिना शरीर यात्रा के आवश्यक सुविधा साधन उपलब्ध नहीं होते। असमंजस ‘काम’ के सम्बन्ध है। ‘काम’ शब्द सामान्यतया हेय कृत्य के रूप में प्रयुक्त होता है। काम, क्रोध, लोभ मोह, मद, मत्सर ये रिपु कहे जाते हैं। इनमें काम प्रमुख है। यह सभी निन्दनीय और त्याज्य ठहराये गए हैं फिर ‘काम’ को चतुर्विधि पुरुषार्थ में कैसे सम्मिलित किया गया है उसके लिए प्रयत्नशील रहने का निर्देश कैसे दिया गया, यह विचारणीय है।
यहाँ ‘काम’ का अर्थ क्रीड़ा है। क्रीड़ा अर्थात् विनोद। विनोद भी मानसिक आहार है। इसलिए तैरने, खेलने, गाने जैसे कितने ही विनोद कौशलों को क्रीड़ा कहा जाता है। प्रायः समस्त कलाएँ उसी परिकर में आती हैं। भक्तजनों का गायन वादन, नृत्य कीर्तन इसी श्रेणी में आता है। प्रसन्नता की अभिव्यक्ति का नाम ‘काम’ है। इसका तात्पर्य हुआ- ऐसे प्रयत्न करना जिससे मन हलका-फुलका रहे, प्रसन्नता प्रफुल्लता का अनुभव करे, हँसती-हँसाती जिन्दगी जिये, सन्तुष्ट और उल्लसित मनोभूमि बनाये। निराशा विक्षोभ, उद्वेग, चिन्ता, भय, ईर्ष्या, द्वेष, आक्रोश, आशंका, दर्प आदि उन मनोविकारों से बचा रहे तो मन पर अनावश्यक दबाव डालते हैं और भार बनकर लदे रहते हैं।
काम का दार्शनिक अर्थ क्रीड़ा, विनोद प्रसन्नता की मनःस्थिति बनाये रहना वैसी गतिविधियों आदतों को बढ़ावा देना है। किन्तु इसका एक दूसरा शब्दार्थ भी है। जो लिपि और उच्चारण की दृष्टि से समान दीखते हुए भी तात्पर्य की दृष्टि से सर्वथा प्रतिकूल है। वह अर्थ है- कामुकता। कामुकता का अर्थ है- अश्लील चिन्तन, विषयासक्ति निन्दा इसी की गई है और इसी को शत्रु मानने, बचने का परामर्श दिया है।
कामुकता एक प्रकार का मनोविकार या मनोरोग है। इसमें अकारण अनावश्यक- अश्लील चिन्तन मस्तिष्क पर नशे की तरह छाया रहता है और उसके सन्तुलन पर बुरी तरह आघात करता है। यह प्रवृत्ति क्रोध, आवेश, उन्माद जैसी अवाँछनीय है। उसका आकर्षक प्रवाह चिन्तन तन्त्र को इस प्रकार जकड़ लेता है कि हर घड़ी वैसी ही कल्पनाएँ उठती, इच्छाएँ उभरती और योजनाएँ बनती रहती हैं। यह समूचा चिन्तन न केवल उत्तेजक वरन् निरर्थक भी होता है। कामुकता मर्यादा रहित है वह किसी के भी सम्बन्ध में काम सेवन का ताना-बाना बुन सकती है। जब कि प्रस्तुत समाज व्यवस्था के अंतर्गत वह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। अपनी ओर से जिस रूप सौंदर्य पर आसक्ति उभारी जा रही है आवश्यक नहीं कि दूसरा पक्ष भी उसके लिए सहमत हो। ऐसी दशा में निराशा के अतिरिक्त और क्या हाथ लगने वाला है। कामुक चिन्तन प्रकारान्तर से एक प्रकार का उन्माद है जिसमें व्यवहारिकता अव्यावहारिकता का कोई भान नहीं रहता। नीति-अनीति भी विस्मरण हो जाती है।
इस आधार पर उत्तेजित अस्त-व्यस्त रहने वाली मनःस्थिति में कोई गम्भीर या महत्वपूर्ण चिन्तन सम्भव नहीं। दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहित्यकार, सृजेता स्तर के लोगों को जिस स्तर की एकाग्रता आवश्यक है। वैसी बन पड़ना कामुक उत्तेजना के रहते सम्भव नहीं। इसी प्रकार हेय उपयोग की अनियन्त्रित आकाँक्षा मनुष्य की अपराधी प्रवृत्तियां अपनाने के लिए घसीट ले चलती है। जब किसी के भी साथ काम सेवन की योजना बन सकती है तो उसका धन, अधिकार आदि के अपहरण में भी क्यों संकोच होगा? यह पाप पतन का प्रवाह है जो काल्पनिक, असम्भावित होते हुए भी मनुष्य को अनैतिक, बनाने की भूमिका बनाता रहता है। अन्ततः यह प्रवाह चारित्रिक पतन के गर्त में ही गिराकर छोड़ता है। चिन्तन ही परिपक्व होकर कर्म बनता है। कामुक कल्पनाएँ या तो व्यभिचार बलात्कार के रूप में प्रकट होती हैं या फिर अपने लिए कोई और रास्ता ढूँढ़कर मर्यादा उल्लंघन के अनाचारी कृत्य कराने लगती हैं।
शारीरिक बलिष्ठता की दृष्टि से ब्रह्मचर्य की महिमा सर्वविदित है। ब्रह्मचारी सदाचारी सदा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बलिष्ठ रहे हैं। हनुमान, भीष्म, शंकराचार्य आदि के उदाहरण इसकी पुष्टि में दिये जाते रहते हैं और कामुक लोगों को क्षय जैसे रोगों से ग्रसित होकर बेमौत मरने वालों के उदाहरण भी कम नहीं है। शारीरिक काम सेवन से धातु क्षय की हानि होती है, जिसे किसी प्रकार सहन भी किया जा सकता है किन्तु मानसिक व्यभिचार से तो और भी बड़ी हानि होती है। उसमें ओजस् ही नहीं मनस् भी क्षीण होता है और मनुष्य संकल्प, सहारा एवं मनोबल ही गँवा बैठता है। ऐसे व्यक्ति हर दृष्टि से खोखले सिद्ध होते हैं।
अश्लील काम क्रीड़ा का तो दाम्पत्ति जीवन तक में निषेध है। भावना विज्ञान के मूर्धन्यों ने अपनी स्त्री तक की सहधर्मिणी, सहचरी, धर्मपत्नी आदि के रूप में मान्यता दी है। रमणी और कामिनी रूप में उस तक की भर्त्सना है। प्रजनन कृत्य को भी भारतीय धर्म में गर्भाधान संस्कार का रूप दिया है और उस मात्र समाज सेवा का एक रूप मानते हुए ही अपनाने की छूट दी है। विनोद के लिए कामुकता का उपयोग बुरे किस्म का फूहड़पन है। इसके स्थान पर सात्विक हास परिहास किसी से भी किया जा सकता है। इसके लिए पत्नी, बच्चे, मित्र, साथी छोटे बड़े सभी को माध्यम बनाया जा सकता है। पर वह सब होना चाहिए सात्विक, सौम्य शालीन। इसी में काम शब्द की सार्थकता है।
आज कामुकता की बाढ़ जैसी आई हुई है। पाश्चात्य देशों में उसका खुला प्रचलन बढ़ता जाता है और उसे सामान्य जीवन व्यवहार के रूप में मान्यता मिलती जा रही है। अन्य सभ्यताभिमानी देशों में वह सब पर्दे के पीछे होता है। विकृतियाँ वहां भी कम मात्रा में नहीं पनप रही हैं। यही है वह हेय प्रचलन जिसकी ‘काम’ विकार के रूप में निन्दा की गई है। उसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि सौम्य काम विनोद के स्थान पर अश्लील काम विकार जन समाज पर नशीले उन्माद की तरह सवार होता चला जाता है। सामने प्रस्तुत प्रमाण इस विभीषिका को उजागर करते हैं और कहते हैं कि समय रहते इसकी रोकथाम होनी चाहिए।
खिलवाड़ के लिए बहुमूल्य वस्तुओं को भी हेय उपहासास्पद एवं हानिकारक प्रयोजनों के लिए खर्च किया जा सकता है। गन्ने की उपयोगिता आहार में है। पर उन्हें शराब बनाकर भी पिया जाता है। इसमें हर दृष्टि से हानि ही हानि है। बारूद की खिलवाड़ में ढेरों समय, श्रम और साधन खराब होते हैं। बदले में दुर्घटना होने और वायु में विषाक्तता बढ़ने जैसी हानियाँ प्रत्यक्ष सामने आती हैं। इसी प्रकार शरीर को जिस बहुमूल्य शक्ति ‘ओजस्’ के रूप में प्रयत्न करके मनुष्य हर दृष्टि से समर्थ बन सकता है उसे गन्दी नाली में बहा देने में ने जाने क्यों बुद्धिमत्ता समझी और आतुरता बरती जाती है। मस्तिष्क तक पहुँचकर जो शुक्र मनुष्य को अधिकाधिक मेधावी, प्रज्ञावान बना सकता है उस तुच्छ से मनोरंजन के लिए बर्बाद करते रहने में समझदारी कहाँ है?
दाद खुजाते समय चमड़ी छील लेने और घाव होने से कष्ट बढ़ने का ध्यान नहीं रहता। सूखी हड्डी चबाकर कुत्ता अपने ही जबड़े में घाव कर लेता है और उसमें बहने वाले रक्त को चाटकर हड्डी से स्वाद मिलने की बात सोचता है। कामुकता में जो क्षणिक उत्तेजना मिलती है उसे इसी स्तर का समझा जा सकता है। उसमें विनोद कम और विनाश अधिक है।
‘काम’ का उपयोगी स्वरूप विनोद है। विनोदों में कामुकता ओछे दर्जे की है। दाम्पत्ति जीवन में भी उसका न्यूनतम एवं सौम्य उपयोग होना चाहिए। इससे बाहर के क्षेत्र में उसका चिन्तन और प्रयोग अहितकर ही समझा जा सकता है। शास्त्रकारों ने मात्र सात्विक ‘काम’ का ही समर्थन किया है।
नर और नारी के दो भागों में विभक्त मनुष्य जाति वस्तुतः एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ हैं। एक ही शरीर में दो हाथ, दो पैर, दो कान, दो नेत्र, दो फेफड़े, दो गुर्दे होते हैं। उसके स्तर में कोई अन्तर नहीं होता। दोनों परस्पर मिल-जुलकर काम करते हैं। परस्पर पूरक बनकर एक दूसरे की सहायता करते हैं। वजन उठाने और हलका करने में पृथकता के बीच एकात्मकता का परिचय देते हैं। दोनों के मध्य अविच्छिन्न सहयोग पाया जाता है। यही बात नर और नारी के सम्बन्ध में भी है। दोनों के मध्य जब, जहाँ जितना सहकार रहा है वहाँ उतनी ही सफलता, सुविधा और प्रगति का वातावरण बना है। विभिन्नता उत्पन्न होने पर तो दोनों ही पक्ष घाटे में रहते हैं।
एकता- एकात्मकता के लिए उस मनःस्थिति की आवश्यकता है जिसमें सहयोग पनपता है। इसमें निमित्त कारण है सद्भाव सम्पन्न सहकारिता का। उसके लिए सर्वाधिक आवश्यकता है- एक दूसरे द्वारा समान रूप से सहयोग और सम्मान प्रदर्शित किया जाना। इस दृष्टि से दोनों एक दूसरे से आगे रहने की सहज प्रतिद्वन्द्विता करें कि किसने अपने साथी के प्रति कितना अधिक सम्मान प्रदान किया है। इसके लिए आवश्यक है कि दोनों पक्ष अपने को छोटा और दूसरे को बड़ा समझें। अपने लिए कम रखने और दूसरे के लिए अधिक देने की बात सोचें। जहाँ इस निर्वाह में कटौती होती है, व्यतिरेक या व्यवधान पड़ता है, वहाँ वह स्नेह सौजन्य निभ नहीं पाता, जिसके आधार पर घनिष्ठता निभती और भावभरी आत्मीयता उमंगती है।
गड़बड़ी वहाँ पड़ती है जहाँ अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा समझने की अहमन्यता पनपती और उस आधार पर दूसरे का तिरस्कार करती है। यह भूल प्रायः पुरुष वर्ग की ओर से होती रही है। वह अपने को वरिष्ठ और नारी को कनिष्ठ समझता रहा है। कई बार तो उसे पालतू पशुओं अथवा सम्पत्ति की तरह उपयोग किया जाता है और उचित या अनुचित मर्जी पर चलाने के लिए बाधित, प्रताड़ित तक किया जाता है। इस अहमन्यता के पीछे एक कारण यह हो सकता है कि पुरुष कमाऊ होता है और नारी की शरीर संरचना उसे बच्चों की जिम्मेदारी सँभालने के लिए घर रहने को बाधित करती है। कमाऊ सो श्रेष्ठ, जो व्यवस्थारत सो निकृष्ट। जो शरीर से पुष्ट सो श्रेष्ठ, जो तनिक सा दुर्बल सो निकृष्ट। यह मान्यता न तो तथ्यपूर्ण है न नैतिक। स्त्री पतिव्रता रहे और पुरुष स्वेच्छाचार बरते। इसका कोई औचित्य नहीं। इसके पीछे प्रकृति-संरचना या समाज व्यवस्था की दुहाई देना व्यर्थ है।
सतयुगी समाज में नर-नारी को समान ही नहीं वरन् नारी को अपेक्षाकृत अधिक सम्मानित किया और वरिष्ठता का स्तर प्रदान किया है। संसार में ऐसे अनेकों क्षेत्र अभी भी हैं जहाँ मातृकुल की प्रधानता है और नारी को परिवार तथा अर्थ व्यवस्था सँभालने की वरीयता है। पुरुषों को उनका सहयोगी बनकर रहना और अनुशासन में चलना पड़ता है। ऐसी दशा में इसे प्रचलन ही कहना चाहिए जिसमें कहीं नर की कहीं नारी की प्रमुखता है। वस्तुतः दोनों के मध्य ऐसी कोई विभाजन रेखा नहीं है। जिसमें किसी को वरिष्ठ और किसी को कनिष्ठ ठहराया जा सके।
प्रकृति संरचना की दृष्टि से भी ऐसी कोई बात नहीं। नर में एक विशेषता अधिक है तो नारी में दूसरी। यह उनकी कार्य पद्धति के अनुरूप अनुदान मिलने की निर्यात व्यवस्था है। इसके पीछे छोटे या बड़े का, हलके या भारी होने जैसा कोई अन्तर नहीं है।
साहस, बल, दृढ़ता, पराक्रम में यो पुरुषों को चिरकाल से आगे रहना पड़ा है इसलिए वे विशेषताएँ उनके स्वभाव का अंग बन गई हैं। पर यह अकाट्य विभाजन नहीं है। अनेक बार नारियों में नर जैसा ही नहीं वरन् उससे भी अधिक साहस-पराक्रम पाया गया है। झाँसी वाली रानी, दुर्गावती, चाँद बीबी, जोनआर्क आदि अनेकों महिलाओं के ऐसे इतिहास हैं जिन्हें देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि नारी की संरचना में पुरुष की तुलना में दुर्बलता के अधिक अंश पाए जाते हैं। इन दिनों भी अगणित उदाहरण अपने इर्द-गिर्द ही ढूंढ़े जा सकते हैं जिनमें नारी का पौरुष अपनी प्रौढ़ता का परिचय दे रहा है।
शरीर संरचना की दृष्टि से नारी और नर मूलतः एक जैसी विशेषताओं से युक्त हैं। आगे बढ़ने पर ही विभाजन की दिशा धाराएँ कटती हैं। इसमें हेर-फेर भी होता रहता है और हो सकता है। लिंग-परिवर्तन की ऐसी घटनाएँ अब अस्पतालों द्वारा अधिक संख्या में सामने आती रहती हैं जिनमें एक ही शरीर में दोनों प्रकार की विशेषता पाई गईं। फलतः एक को समाप्त करके दूसरे को उभारा गया। जब इस प्रकार के ऑपरेशनों की सुविधा नहीं थी तब कितने ही व्यक्ति उभयलिंगी शरीर रचना के बीच रहकर भी अपना काम चलाते थे। अभी भी ऐसे प्रमाण जहाँ-तहाँ मिलते रहते हैं कि लिंग एक प्रकार का और स्वभाव दूसरी प्रकार का। कई बार तो ऐसी संरचना पाई जाती है जिसे अविच्छिन्न ही समझा जा सकता है और जिसे शल्य क्रिया द्वारा भी बदल सकना सम्भव नहीं है।
मूल रूप से हर मनुष्य के भीतर नर और नारी की दोनों ही विशेषताएँ पाई जाती हैं। इनमें से एक प्रबल हो उठती है और दूसरी प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। यदि मान्यता बदली जा सके तो एक लिंग दूसरे में मानसिक दृष्टि से सरलतापूर्वक और शारीरिक दृष्टि से थोड़ी अधिक प्रयत्नशीलता के साथ बदला जा सकता है। नर में नारी की या नारी में नर की विशेषताएँ उभर सकती हैं। एकाध जन्म के अनवरत प्रयत्न से तो अगले जन्मों में यह परिवर्तन निश्चित रूप से हो सकता है।
उपलब्ध प्रमाणों में ऐसे अगणित हैं जो नर और नारी के बीच प्रचलित अन्तर को अवास्तविक सिद्ध करते हैं। उनमें परिवर्तन न हो सकने की सम्भावना को स्पष्ट करते हैं।
इस संदर्भ में कुछ उपलब्ध तथ्य सामने हैं जिन पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि नर-नारी के मध्य इन दिनों जो वरिष्ठता-कनिष्ठता की मान्यता है उसका कोई ठोस आधार या कारण नहीं है। तथ्यतः दोनों एक हैं। एक जैसी सम्भावनाओं से भरे-पूरे हैं। जो प्राकृतिक अन्तर है वह सृष्टिक्रम की प्रजनन-प्रक्रिया को ध्यान में रखकर ही सृष्टा ने बनाया है, पर इसमें ऐसा कोई अन्तर नहीं है जिससे किसी को किसी से वरिष्ठ या निकृष्ट ठहराया जा सके।
क्यूबा में जन्मी लाकेता जनेता थी जो महिला पर उनका मन सैनिक जीवनचर्या अपनाने के लिए उद्विग्न रहा। इसके लिए उसने एक सैनिक से विवाह भी किया पर इस प्रयास से भी वे सैनिक न बन सकीं, वरन् मात्र गृहिणी बन गईं। इस असन्तोष में उसने तलाक ले लिया और मर्दाना वेष बनाकर सेना में भर्ती हो गई। उसका युद्ध-कौशल निखरा। नकली मूँछ लगाकर वह पूरी जवान लगती और साथियों से हर प्रतिद्वन्द्विता में आगे रहती। एक बार उसका पति ही उसकी टोली को ट्रेनिंग देता रहा। इस बीच उसे भी पहचान न हो सकी कि रंगरूटों में एक उसकी पूर्वपत्नी भी है। मुद्दतों वह उसी कार्य में संलग्न रही। भेद तब खुला जब वह एक मोर्चे पर घायल होकर अस्पताल पहुँची और बेहोशी की हालत में उसका ऑपरेशन किया गया।
सोने की खदानें खोदने वाली कैलीफोर्निया की वेल्स फारगो कम्पनी अपने समय में बहुत प्रख्यात थी। अमेरिका भर में उसकी सम्पन्नता की चर्चा चलती रहती। खोदे हुए सोने तथा महत्वपूर्ण कार्यकर्ता और कागजात लेकर एक तेज घोड़े वाली गाड़ी खदान से दफ्तर तक का लम्बा रास्ता पर करती। सड़क ऊबड़-खाबड़, ढेरों पहाड़ी मोड़, घात लगाकर बैठे रहने वाले डाकुओं की भरमार। इन कठिनाइयों के बीच गाड़ी को सरपट दौड़ाकर ले चलना बड़ा जोखिम भरा काम था। कई कोचवान डाकुओं द्वारा मारे गए, कई दुर्घटनाग्रस्त हुए, कई आकर्षक वेतन वाली उस नौकरी को छोड़कर भाग गए। अन्ततः एक कोचवान टिका। उसकी बहादुरी का सभी ने लोहा माना। यों सुरक्षा गार्ड तो गाड़ी में भी चलता था फिर भी दुस्साहसी डाकू गाड़ी को रोकने और पीछा करने से चूकते नहीं थे। नया कोचवान जहाँ गाड़ी को सरपट दौड़ाता जाता वही इर्द-गिर्द मँडराते डाकुओं की भी लम्बे हण्टर से चमड़ी उधेड़ देता। अवसर आने पर दूसरे हाथ से निशाना भी साधता और डाकुओं के हौसले पस्त कर देता। युवक कोचवान का नाम था- चार्ली उसकी निर्भीकता, बहादुरी तथा खुशमिजाजी पर सभी मुग्ध थे। उसे सम्मान भी खूब मिला और वेतन भी भरपूर।
चार्ली नौकरी पूरी करके रिटायर हुआ तो उसे बहुत पैसा मिला। इस धन से उसने एक बड़ा कृषि फार्म खरीदा और शेष जीवन वहीं रहकर शान्तिपूर्वक बिताया। मरने के उपरान्त अन्त्येष्टि के समय ही लोगों को यह पता चला कि चार्ली नाम से प्रख्यात वह योद्धा नर नहीं वस्तुतः एक नारी थी, जिसने आजीवन अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाए रखा।
जेम्स रॉड थी तो महिला पर उसमें नारी सुलभ कोमलता का नाम भी नहीं था। वह मन से मर्द थी और मर्दानगी के साथ ही जीना चाहती थी। उसे नाविक का काम पसन्द आया। वह जोखिम भरा था। उसमें तगड़े और बहादुर प्रकृति के लोग ही भर्ती हो सकते थे। जेम्स रॉड ने अपने असली रूप को छिपाने का लगातार अभ्यास करके प्रवीणता प्राप्त कर ली। उसे प्रकृति ने कद भी ऐसा ही दिया। पाँच फुट साढ़े नौ इंच ऊँची तथा 180 पौण्ड भारी होने के कारण 16 वर्ष की उम्र में ही वह परिपक्व लगने लगी और प्रतिद्वन्द्विता में कितने ही जवानों को हराकर जलयान चलाने वालों में भर्ती हो गई। मर्दानी आवाज, नकली मूँछ- किसी को सन्देह तक न होता था कि वह नारी है। एक बार तो वह कप्तान तक से झगड़ पड़ी और धक्का मारकर उसे औंधे मुँह गिरा दिया। तेज-तर्रार स्वभाव होने के कारण सभी उसका लोहा मानते थे। साथियों में वह अग्रणी गिनी जाती।
किसी प्रकार भेद खुल गया और चर्चा होने लगी। उसने नौकरी छोड़ दी और नाम बदलकर दूसरे जहाज में नौकरी कर ली। बाद में उसका रहस्य वर्षों तक छुपा ही रहा। ब्रिटेन में इसी प्रकार वेष बदलकर नौसेना के लड़ाकू जहाज पर लम्बी अवधि तक नौकरी करने वाली एक अन्य महिला मैडम कोली हुई हैं। वे भी पूरी अवधि तक नौकरी करके निवृत्त हुईं और किसी को असली भेद का पता न चलने दिया। बात तब प्रकट हुई जब वृद्धावस्था में उसने नाविकों के लिए एक जलपान गृह खोला। तब भी वह अपने वस्त्र मर्दों जैसे ही पहनती रही।
जर्मनी के प्रसव विशेषज्ञ डॉ. रुडोल्फ ग्रेइत्स ने जब देखा कि उन दिनों इस विषय की प्रवीण महिला डाक्टर उपलब्ध नहीं है और इस कारण अनेकों प्रसूताओं को अपनी जान गँवानी पड़ती है तो उनने महिला डाक्टर के रूप में एक अपरिचित स्थान में नौकरी कर ली। बहुत समय बार भेद खुलने पर उसे वह नौकरी छोड़नी पड़ी। तब तक अन्य कुशल चिकित्साएँ तैयार हो चुकी थीं।
प्राणी की आरम्भिक सत्ता नर या नारी के रूप में पूर्व निर्धारित नहीं होती। वह परिस्थितिवश इस विभाजन में से एक को अपनाती है। भ्रूणावस्था के आरम्भिक दिनों में प्राणी लिंग रहित होता है अथवा उसे उभयलिंगी भी कह सकते हैं। प्रगति के उपरान्त ही वे चिह्न उभरते हैं जिसके आधार पर उसकी अमुक वर्ग में गणना की जा सके। अविकसित प्राणियों में से अनेकों उभयलिंगी होते हैं और आवश्यकतानुसार अपना रूप बदलते रहते हैं। किन्तु विकसित प्राणियों में भी यह स्थिति देखी गई है। इस उभयलिंगी स्थिति को विज्ञान की भाषा में ‘हर्माफ्रोडाइट’ कहा जाता है। इस शब्द के पीछे वह ग्रीक गाथा जुड़ी हुई है जिसमें ‘हर्माफ्रोडाइस’ नामक युवक का सल्पाइसिस नामक जलपरी के साथ प्रणय हो गया और वे दोनों देवताओं के अनुग्रह से एक दूसरे में समा गए। फलतः वह संयुक्त शरीर ‘हर्माफ्रोडाइट्स’ कहलाया। उसमें उभयलिंगी चिह्न थे।
ऐसे व्यक्तियों में नर-नारी की भिन्नता करने वाले दोनों ही प्रकार के अवयव पाए जाते हैं। जब वे बड़े होने लगते हैं तो दोनों का ही विकास होता है। इनमें से एक प्रधान होता है, दूसरा गौण। पुरातन काल में तो इसमें हेर-फेर की गुँजाइश नहीं थी पर अब यह सम्भव है कि विकसित पक्ष को बढ़ने देने के लिए अविकसित भाग को ऑपरेशन से हटा दिया जाय।
उभयलिंगी अपवादों के कारण और विवरण प्रस्तुत करते हुए तद्विषयक अनुसन्धानी जेम्स कोलमैन ने एक ग्रन्थ लिखा है- “एबनार्मल साइकोलॉजी एण्ड मॉडर्न लाइफ”। इसमें जहाँ उदाहरणों का विवरण है वहाँ उनमें से प्रत्येक में पाई जाने वाली एक दूसरे से भिन्नता का भी उल्लेख है। कोलमैन लिखते हैं कि ऐसे लोगों में दोनों प्रकार की यौन भावनाएँ पाई जाती हैं जो अवसर पाने पर इस या उस ओर लुढ़कती रहती हैं।
फ्रेडरिक ड्रिमर ने उभयलिंगी अपवादों की विशेष विवेचना करते हुए एक पुस्तक लिखी है- “वेरी स्पेशल पीपुल”। उसमें भूतकालीन तथा अर्वाचीन ऐसे उदाहरणों की चर्चा है जिनमें यौन दृष्टि से पाई जाने वाली विलक्षणताओं पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक में ‘वाकी वार्क’ नामक एक व्यक्ति की विस्तार पूर्वक चर्चा की गई है। उसका आधा शरीर नारी का और आधा पुरुष का था। दोनों ही लक्षण पूर्णतया स्पष्ट तथा सुदृढ़ थे। उसका नाम इसी आधार पर रखा गया था। बाकी (नारी) कार्क (नर) का संयुक्तिकरण होने की बात इस नाम से प्रकट होती है।
यह व्यक्ति लन्दन में एक कार्निवाल का प्रमुख आकर्षण था। दर्शकों की भीड़ में से अधिकाँश उसी को देखने के लिए आते थे। प्रकृति की इस अद्भुत ठिठोली को देखकर सभी आश्चर्यचकित होकर लौटते थे जिन्हें इसमें किसी जालसाजी की आशंका होती थी उनके सन्देह निवारण के लिए अतिरिक्त फीस देने पर पीछे के कमरे में उसे वस्त्र रहित स्थिति में देखने यहाँ तक कि छूकर वस्तुस्थिति समझने की भी सुविधा थी। अन्ततः इस सन्देह का पूर्णतया निराकरण हो गया था और सभी यह विश्वास करने लगे थे कि वह पौराणिक अर्धनारी-नटेश्वर का जीवन्त उदाहरण है।
न्यूयार्क के डाक्टर लियोवल मैन ने अपने एक मरीज का आश्चर्यजनक उल्लेख किया है। मेट्रोपोलिटन क्षेत्र के एक 40 वर्षीय गृहस्थ को एक रोग विशेष के लिए फिमेल हारमोन इन्जेक्शन दिये गए। उससे रोगमुक्ति के अतिरिक्त एक विशेष परिणाम और देखा गया कि उस व्यक्ति के स्तन उभर आये और उनमें से दूध बहने लगा। इस पर उसने उस दूध को अपनी छोटी बच्ची को पिलाना आरम्भ कर दिया तो तीन मास तक पीती रही। यह हारमोन वह था जो दूध बढ़ाने के लिए प्रायः पशुओं को दिया जाता है।
फ्राँस में अठारहवीं सदी के अंत में एक रेनी बोदेयूँ नामक महिला हुई है। उसके परिवार के 42 व्यक्तियों को एक आक्रमणकारी दल द्वारा बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। रेनी ने बदला लेने की ठानी। बन्दूक प्राप्त करने और निशाना साधने का अभ्यास करने के लिए पुरुष वेष बनाकर वह सेना में भर्ती हुई। युवावस्था से लेकर बुढ़ापे तक वह अपने को चतुरता के साथ छिपाए रही और किसी को यह पता न चलने दिया कि वह नर नहीं नारी है।
ये उदाहरण व अनेकानेक वैज्ञानिक प्रमाण बार-बार इस तथ्य को सत्यापित करते हैं कि शरीर संरचना प्रधान नहीं। इस दृष्टि से नर-नारी में भेद किया भी नहीं जाना चाहिए। नारी की मूल थाती उसका स्नेह-सौजन्य से लबालब अन्तःकरण है। अपने को वरिष्ठ न मानकर यदि परस्पर सहकार का स्वरूप बन पड़े तो समाज में दोनों शक्तियों का सहयोग मिलता रह सकता है।
युवैव धर्मशीलः स्यादनित्यं खलु जीवितम्। को हि जानाति कस्याद्य, मृत्युकालो भविष्यति।13॥
अर्थात्- यह जीवन अनित्य है, यह समझकर युवावस्था से ही धर्म का पालन करना चाहिये। मृत्यु का पता नहीं कब हो जाये, यह सोचकर पहले से ही धर्म का पालन करते रहना चाहिये।
बालकों का मस्तिष्क अविकसित तथा अपरिपक्व होता है। उनमें सहज जिज्ञासा, दृश्य संसार के रहस्यों को जानने की पायी जाती है। जिन गुत्थियों को वे सुलझा पाने में असमर्थ होते हैं, वे उन्हें चमत्कार लगती हैं। रेलगाड़ी, वायुयान मोटर, राकेट कारखानों आदि का चलना भी छोटे बच्चों को अचम्भित करता है पर बड़े होने तथा बुद्धि के विकसित होते ही उनके चलने का सिद्धान्त समझते ही वे सहज- साधारण कृत्य जान पड़ते हैं। चमत्कार जैसी उनमें कोई बात नहीं दिखायी पड़ती।
बालकों में ही नहीं, अविकसित मानसिक स्तर की जनता में भी चमत्कारों के प्रति बहुत आकर्षण होता है। बाजीगरी, नट विद्या, अजाबघर, चिड़ियाघर, सरकस आदि अनेकों आविष्कार मनुष्य के इस कौतुक-कौतूहल अथवा चमत्कार की आकाँक्षा रखने वाली बुद्धि को तृप्त करने के लिए ही हुए हैं। पर तथ्यों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने पर उनमें चमत्कार जैसी कोई बात अंततः सामने नहीं आती। हाथ की सफाई विशेष करतब का अभ्यास जैसी विशेषताएँ ही बाजीगरी, नट विद्या की सफलता के कारण हैं।
चमत्कारों का तावित्क विश्लेषण करने पर जो निष्कर्ष सामने आता है वह यह है कि बुद्धि की पकड़ सीमा में जो घटनाएँ नहीं आतीं वे चमत्कार मालूम पड़ती हैं अथवा जो बातें आमतौर पर प्रचलन में नहीं हैं, तब तक चमत्कारी प्रतीत होती हैं। जैसे ही उनका रहस्य प्रकट होता है, उनमें कोई आश्चर्यजनक बात नहीं जान पड़ती। वैज्ञानिक आविष्कारों के आरम्भिक दिनों में रेल, तार, टेलीफोन, वायुयान, मोटर आदि का नया-नया प्रचलन हुआ था। तब लोग इन्हें देखने के लिए सौ दो सौ मील पैदल चलकर आते थे, पर धीरे-धीरे जब ये वस्तुएँ नित्य के व्यवहार में सर्वत्र प्रयोग में आने लगीं तो कुछ दिनों में उनका आकर्षण जाता रहा- वह चमत्कार समाप्त हो गया। पहली बार जब डायनामाइट का विस्फोट हुआ तो उसे एक अचरज की घटना मानी गयी। विस्फोट का सूत्र हाथ लगते ही वह एक सामान्य बात हो गयी है। जो परमाणु बम की बनावट तथा नाभिकीय विस्फोट के सिद्धान्त से अपरिचित हैं, उनके लिए वह एक असाधारण घटना मालूम पड़ती है, पर भौतिक शास्त्र के ज्ञाताओं के लिए वह उतनी आश्चर्यजनक नहीं। मानव विहीन उपग्रहों का, धरती का गुरुत्वाकर्षण चीरकर अन्तरिक्ष की कक्षा में प्रतिष्ठापित होकर चक्कर काटने लगना अज्ञ मस्तिष्कों को हैरत में डाल सकती है पर विज्ञ उसे तकनीकी ज्ञान की एक विशेष विधा भर मानते हैं।
मानवी मन की बनावट ही ऐसी है कि वह असामान्य वस्तुओं अथवा घटनाओं को देखकर उनके पीछे किसी अविज्ञात गुप्त शक्ति की कल्पना करता है। बिजली चमकने जैसी प्राकृतिक बात का ठीक कारण न मालूम होने से यह मान्यता मन में बिठाली गयी कि इन्द्र के हाथ में वज्र चमकता है जो शरीर शास्त्र तथा आरोग्य विज्ञान से अनभिज्ञ हैं अथवा जिन क्षेत्रों में आधुनिक प्रगति नहीं हुई है, उनमें आज भी यह विश्वास प्रचलित है कि बीमारियाँ, महामारियाँ किसी देवी देवता के प्रकोप से पैदा होतीं तथा उनकी अनुकम्पा से ही दूर हो सकती हैं। विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिए उनमें भूतों, जिन्नों, प्रेतों, देवियों को भगाने वाले ओझा अभी भी पिछड़े हुए समाजों में पाये जाते हैं, पर विज्ञान की कसौटी पर उनकी मान्यताओं को मूर्खतापूर्ण माना जाता है तथा यह समझा जाता है कि उस समाज में घटनाओं की समीक्षा करने की बुद्धि संगत कसौटी का अभाव है। पर विज्ञ समाज में ये अन्धविश्वास नहीं पाये जाते।
अभी कुछ दशकों पूर्व तक प्रकृति की अनेकानेक घटनाएँ रहस्यमय बनी हुई थी, जिसे भारी आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता रहा है बारमूड़ा त्रिकोण की घटना अभी कल परसों की है जहाँ कि सैकड़ों जलयान, वायुयान यात्रियों समेत गायब होते रहें हैं जिनका कोई अता-पता अब तक नहीं मिल सका है। उसके साथ अनेकों किम्वदंतियां जुड़ गयीं। किसी अन्यान्य ग्रह के लोगों के कारनामे, देवता का प्रकोप आदि मानकर सन्तोष किया जाता रहा, पर विज्ञान की नवीनतम खोजों ने उन सभी मान्यताओं को झुठलाकर यह सिद्ध कर दिया कि वह भी एक प्रकार का ‘ब्लैक होल’ है। ऐसे केन्द्र एक ही सीध में पृथ्वी पर आठ स्थानों पर हैं, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर भी दो केन्द्र हैं। अन्तरिक्ष में असंख्यों की संख्या में ब्लैक होल मौजूद हैं। इनकी आकर्षण शक्ति अत्याधिक प्रचण्ड है। हाथी जैसे विशालकाय जीव भी उसके आकर्षण से तिनके की तरह खिंचते हुए चले आते हैं। उस प्रचण्ड आकर्षण शक्ति के कारण ही जलयान, वायुयान बारमूडा त्रिकोण नामक स्थान पर जाकर गायब होते रहे। ऐसे प्रकृति रहस्यों की संख्या असंख्यों है, जिनके विषय में आधुनिक विज्ञान को भी कुछ ज्ञान नहीं है, पर समझा जाता है कि उनके रहस्योद्घाटन में लगे वैज्ञानिक उन रहस्यों को उजागर करने में अगले दिनों समर्थ होंगे। पर जब तक कि प्रकृति की उन विलक्षणताओं का कारण नहीं ज्ञात हो जाता, तब तक के लिए वे रहस्य हैं।
सृष्टि का दूसरा घटक चैतन्य है, वह जड़ प्रकृति की तुलना में कहीं अधिक सामर्थ्यवान अधिक विलक्षण है। जीवधारियों के भीतर उस चेतना का छोटा अंश कार्य करता, अनेकों प्रकार के अचम्भित करने वाले करतब दिखाता देखा जा सकता है। प्रकृति की तुलना में चेतना के अन्तराल में बहुमूल्य उपलब्धियों के भाण्डागार मौजूद हैं, जिन्हें प्राप्त करके असम्भव समझे जाने वाले कार्यों को भी सम्भव बनाया जा सकता है।
उपलब्धियों को करतलगत करने की एक सशक्त प्रयोगशाला मानवी काया के रूप में हर व्यक्ति को मिली हुई है। वह इतनी विलक्षण तथा उपयोगी यन्त्रों से सुसज्जित है, जितनी प्रकृति की अन्य कोई भी संरचना नहीं है। शरीर, बुद्धि, मन अन्तःकरण में से प्रत्येक को विभिन्न आयाम समझा जा सकता है। अभी मानवी विकास की सीमा मैटर तक सीमित है। शरीर और बुद्धि भी इसी सीमा के अंतर्गत आते हैं। बुद्धि का वह हिस्सा जो अधिक समर्थ है- चैतन्य है जिसे वैज्ञानिक 93 प्रतिशत मानते हैं, इन्ट्यूशन प्रज्ञा का है, वह अविज्ञात का क्षेत्र है, सात प्रतिशत का ही समस्त व्यापार अनेकानेक वैज्ञानिक उपलब्धियों के रूप में परिलक्षित हो रहा है। बोलचाल की भाषा में जिसे मन कहा जाता है, उसकी अति नगण्य जानकारी मनुष्य को है। आधुनिक मनोविज्ञान को भी अपनी खोजों द्वारा जो प्राप्त हुआ है, वह अत्यल्प है। उसकी गहरी परतों की सामर्थ्यों का कुछ भी ज्ञान मनोविज्ञान को नहीं है। इसी क्षेत्र में अगणित रहस्यों की चाबी छुपी हुई है। अतींद्रिय सामर्थ्य के रूप में प्रख्यात शक्तियाँ इसी के अन्तराल में उपजती तथा किन्हीं-किन्हीं महापुरुषों में प्रकट होती दिखायी पड़ती हैं। इच्छा शक्ति के चमत्कृत कर देने वाले, कौतूहलवर्धक कृत्य आये दिन देखे जाते हैं। वह और कुछ भी नहीं मन की एकाग्रता का एक छोटा-सा पक्ष है। इसी की एक छोटी सामर्थ्य हिप्नोटिज्म को पश्चिमी मनःशास्त्रियों ने भी मान्यता दे दी है, उसके अभ्यास एवं सामर्थ्य के विकास के लिए कितने ही विद्यालय भी खुल गए हैं।
अमरीका के विस्कासिन विश्वविद्यालय में हिप्नोटिज्म योग की विधिवत् शिक्षा दी जाने लगी है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अतीन्द्रिय सामर्थ्य पर शोध कार्य चल रहा है। बोस्टन के एक महाविद्यालय में एक रहस्य विद्या पढ़ायी जा रही है- ‘द रिटोरिक ऑफ डस्क’ ओकलैण्ड विश्वविद्यालय में इच्छा शक्ति तथा प्राण शक्ति के प्रयोग उपचार चल रहे हैं। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. इडेन का मत है कि भोगवादी संस्कृति से ऊबा हुआ मनुष्य राहत के लिए किसी अतिमानवी सामर्थ्य की खोज में भटक रहा है। पश्चिम के व्यक्ति में एक ऐसी व्याकुलता पैदा हो गयी है जो अनायास ही उसे पूरब की आध्यात्मिक विशेषताओं की ओर आकर्षित कर रही है।
मूर्धन्य मनःशास्त्रियों तथा कुछ वैज्ञानिकों ने भी परामानसिक शक्तियों का अस्तित्व स्वीकार कर लिया है। न्यूयार्क विश्वविद्यालय के मनःशास्त्री डा. मेहलान वैगनर ने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उल्लेख है कि अमरीका के 9 प्रतिशत विचारशील व्यक्ति अतीन्द्रिय शक्ति को एक वास्तविकता, 45 प्रतिशत एक प्रबल सम्भावना मानते हैं। फ्राँस, हालैण्ड, रूस, चेकोस्लाविया जर्मनी आदि के वैज्ञानिक भी परामानसिक शक्ति को एक सच्चाई के रूप में स्वीकार करने लगे हैं। प्रिंसटन विश्व विद्यालय के डा. राबर्ट डीन मानसिक शक्ति का पदार्थों पर प्रभाव का अध्ययन गम्भीरता से कर रहे हैं। नोबुल पुरस्कार विजेता डा. ब्रायन जोसेफसन के अनुसार परामनोविज्ञान के नये क्षेत्र के आविष्कार के बाद भौतिकी की नयी परिभाषा देनी होगी रूसी प्रोफेसर लियोनिद वासिलयेव ने हिप्नोटिज्म तथा टेलीपैथी पर अनेकों प्रकार के प्रयोग किये हैं। अपने अनुसन्धान निष्कर्ष में उन्होंने बताया है कि सुविकसित मानव मस्तिष्क विचार प्रसारण केन्द्र की सफल भूमिका सम्पन्न कर सकता है।
अति मानसिक शक्तियों के प्रति बढ़ती हुई मानवी अभिरुचि मनुष्य की उस सहज जिज्ञासा का परिचय देती है तो मात्र उथली बुद्धि के सहारे चेतना क्षेत्र के रहस्यों को जानना एवं पाना चाहती है। उन्हें चमत्कारिक इसलिए भी समझा जाता रहा है क्योंकि विज्ञान की यान्त्रिक तथा बुद्धि की पकड़ सीमा से वे बाहर हैं। उन्हें जानने, सामर्थ्यों को करतलगत करने की विद्या बुद्धि तथा उसके द्वारा आविष्कृत विज्ञान के पास नहीं है, हो भी नहीं सकती। कारण कि बुद्धि का क्षेत्र तर्क, विज्ञान का मैटर है। पदार्थ एवं तर्क से परामानसिक शक्तियाँ परे हैं। उनका भी एक विज्ञान है, वह विज्ञान भौतिक विज्ञान के नियमों पर नहीं, चेतना विज्ञान के नियमों पर आधारित है। ‘साइन्स ऑफ सोल’ आत्म विज्ञान के नाम से वह अध्यात्म जगत में जाना जाता है।
एक तथ्य सुनिश्चित रूप से जानना आवश्यक है कि पदार्थ विज्ञान की तरह चेतना विज्ञान के भी निश्चित नियम एवं विधान हैं। चमत्कार जैसी किसी कला का उस विधा में कोई स्थान नहीं है। बुद्धि उन्हें समझ नहीं पाती, इसलिए वह चमत्कार प्रतीत होता है। अन्यथा सब कुछ एक निर्धारित सिद्धान्त से परिचालित है। साथ ही यह बात भी हृदयंगम करने योग्य है कि हाथ पर सरसों जमाना, वस्तुएँ मँगा देना, बाल से भभूत निकालना जैसी बाल-क्रीड़ाओं का अतीन्द्रिय सामर्थ्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। बाजीगरी के वे कृत्य सिद्धियों के नाम पर जहां कहीं भी आते हों, समझना चाहिए वहां अवश्य ही धूर्तता का समावेश है। अतीन्द्रिय सामर्थ्य का प्रत्यक्ष स्वरूप बढ़े हुए संकल्पबल, प्राण शक्ति, वाक् शक्ति के रूप में उभर कर सामने आता तथा परिष्कृत-प्रखर व्यक्तित्व के रूप में अपना परिचय देता है। प्राण बल, संकल्पबल, विचारबल ही समीपवर्ती तथा दूरवर्ती वातावरण तथा सम्बद्ध व्यक्तियों को प्रभावित करता उन्हें जबरन अभीष्ट दिशा में चल पड़ने को बाध्य करता है। ऐसे व्यक्तित्वों के अन्तःकरण उस निर्झर की तरह होते हैं जिनसे निस्सृत भाव सम्वेदनाएँ असंख्यों मुरझाये हृदयों को अपने अमृत रस से परितृप्त करती है। परिष्कृत, प्रखर उदात्त व्यक्तित्व ही अध्यात्म जगत की सर्वोपरि सिद्धि है- सबसे बड़ा चमत्कार है।
दो भक्त थे। एक बहुत देर भजन करता। दूसरा कुछ ही क्षणों में काम निपटा देता। दोनों ही मन्दिरों में रोज दर्शन करने जाते।
कम भजन करने वाला सम्पन्न बनता चला गया और बहुत करने वाला दरिद्र ही बना रहा। बड़े मानस ने देवता से शिकायत की कि ऐसा क्यों? अधिक भक्ति का कम प्रतिफल कैसे? देवता मुस्कराये। एक तुम हो जो मनोकामना से लदे रहते हो और पुरुषार्थ के नाम पर आलस बरतते हो। दूसरा है जो पुरुषार्थ करता है और उतने से ही व्यवस्थापूर्वक काम चलाते हुए सन्तोष करता है। देवता ने फिर समझाया। भजन निस्पृह और पराक्रम युक्त होना चाहिए। तभी उसकी सार्थकता है।
भगवान समुद्र है। उसी से संपर्क मिलाकर बादल अपनी सामर्थ्य जितना जल ले भागते हैं और उसे धरती पर बिखेर कर नदी, सरोवर, वनस्पति, वृक्षावली तथा प्राणी जगत का परिपोषण करते हैं। स्वयं श्रेयाधिकारी बनते हैं और विश्व सुधा की शोभा-सुषमा से सराबोर करते हैं। भगवान से विशिष्ट गठबँधन करने वालों को भक्त जन कहा जाता है। सामान्य विधि-व्यवस्था परक सम्बन्ध तो समस्त जड़-चेतन का उस परम प्रभु है। किन्तु भाव श्रद्धा के सहारे जो उसके साथ आत्मीयता जोड़ लेते हैं वे उसकी विभूतियों के साथ भी जुड़ते हैं। दो तालाबों के बीच नाली बना दी जाय तो ऊँचे का पानी नीचे की ओर बहना आरम्भ कर देता है और अंततः दोनों का स्तर समान हो जाता है। ईश्वर के साथ सघन श्रद्धा के सहारे जुड़ जाने और उसकी इच्छा में अपनी इच्छा मिला देने का परिणाम भी इसी प्रकार का होता है।
आग के साथ ईंधन का समर्पण उसे तद्रूप बना देता है। तब सड़ी गली लकड़ी भी ईंधन न रहकर अग्नि रूप बन जाती है। नाले के नदी में मिल जाने, दूध-पानी परस्पर मिलकर एक हो जाने पर दोनों का मूल्य समान हो जाता है। नल का पानी तब तक समाप्त नहीं होता जब तक कि उसका सम्बन्ध भरी हुई टंकी के साथ बना रहता है। भगवान और भक्त की एकता तथा उसकी परिणति को भी इसी प्रकार समझा जा सकता है।
भाव श्रद्धा से तादात्म्य स्थापित करने वाली उपासना यदि समर्पित शरणागति स्तर की है तो भक्त उसके अनुशासन को हृदयंगम करता है। अपनी इच्छा ईश्वर की इच्छा में विसर्जित कर ललक लिप्साओं में भटकने के बजाय अन्तराल को पवित्र व्यवहार को प्रखर बनाने में लगाता है। पात्रता-प्रमाणिकता विकसित करने वाले के लिये न आत्म-सन्तोष की कभी कमी रहती है, न लोक सम्मान की। ऋद्धि अर्थात् प्रतिभा, सिद्धि अर्थात् सम्पदा- सफलता की प्राप्ति ही ईश्वर भक्त को प्राप्त दैवी अनुदान है।
समर्पित भक्त जनों को मिलने वाले अनुदानों से इतिहास पुराणों के पृष्ठ भरे पड़े हैं। निर्धन सुदामा की अभावग्रस्त दूर हुई तथा सारी द्वारिकापुरी का वैभव उन्हें प्राप्त हुआ था। नरसी मेहता के आँगन में हुण्डी बरसना, विभीषण को अपने अग्रज का सारा वैभव हाथ लगना, सुग्रीव को खोया राजघाट व सारा सम्मान दुबारा मिलना, अपनी करनी से वनवास में भटक रहे पाण्डवों को फिर से सिंहासनारूढ़ होने का अवसर मिलना भगवत् अनुग्रह का ही परिणाम है। अर्जुन का समर्पण ही था कि भगवान ने इतने बड़े महाभारत का सरंजाम जुटाया और स्वयं सारथी बन गए! प्रह्लाद को मरण तुल्य मुसीबतों से उबारने में भगवान का ही हाथ था। अन्यथा पर्वत पर पटके जाने, होली में जीवित जलाये जाने की स्थिति में उसकी रक्षा कैसे हो पाती।
बुद्ध, गान्धी, नानक, विवेकानन्द के पीछे-पीछे वैभव लगा फिरा। यह उनकी योग्यता, प्रतिभा, श्रमशीलता का प्रतिफल नहीं था। इसके पीछे दैवी अनुकम्पा की ही प्रधानता थी। तुलसी की वाणी लेखनी पर सरस्वती बिठा देने की कृपा भगवान ने ही की थी। रैदास की कठौती से गंगा का प्रकट होना यह बताता है कि मात्र भक्त ही भगवान को आत्म समर्पण नहीं करते। भगवान भी भक्तों को निहाल करने में कुछ उठा नहीं रखते।
वस्तुतः अपूर्ण को पूर्ण करने वाली समर्थ सत्ता अपने ही चारों और विद्यमान है। प्रश्न केवल उसके साथ संपर्क साधने का नहीं, आदान-प्रदान का द्वार खोलने वाली घनिष्ठता को बढ़ाने का है। यह प्रयास प्रक्रिया जैसे-जैसे प्रखर होती चली जाती है वैसे वैसे लघु को महान एवं तद्रूप बनने का अवसर मिलता जाता है।
अन्य प्राणियों की तुलना में मानवी शरीर संरचना ही विशिष्ट नहीं है। उसकी सम्भावनाएँ भी इतनी विपुल हैं कि जहाँ भी दृष्टि डाली जाय वहाँ सब कुछ आश्चर्य, अद्भुत ही दीखता है।
अद्भुत का अर्थ है वह प्रक्रिया जो सर्वसाधारण में- सामान्य रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती। मनुष्य के साथ ऐसा बहुत कुछ जुड़ा हुआ है, उसमें सूक्ष्म रूप से विद्यमान है जिसे यदि जागृत किया जा सके- निखारा या उभारा जा सके तो वह उस स्तर पहुँच सकता है, जिसमें सामान्य जन निर्वाह नहीं करते।
समझा जाता है कि विचित्रताएँ और विशेषताएं किसी-किसी में जन्मजात ही होती हैं। उन्हें संयोग, पूर्ण संचय, ईश्वर अनुग्रह आदि ही कह और अपवाद तुल्य मान सकते हैं। यह कथन आँशिक रूप से ही सत्य है। इसमें मात्र उस सम्बन्ध में विचार किया गया है कि यह विचित्रताएँ किस प्रकार प्रकट होती हैं। मूल प्रश्न यह नहीं वरन् यह है कि मानवी सत्ता में वैसे प्रकटीकरणों का उपयुक्त गठन है या नहीं। समझा जाना चाहिए कि मनुष्य विचित्र है। उसकी सामान्य गतिविधियाँ तो अन्य प्राणियों की तरह काम चलाऊ निर्वाह के लिए आवश्यक जितनी दीखती हैं किन्तु विशेष अवसरों पर विशेष उपायों से उन विशेषताओं को भी उभारा जा सकता है जिस आधार पर उसे अद्भुत कहा जा सके। और यह आशा की जा सके कि जब वैसी संरचना विद्यमान है तो उसे आवश्यकतानुसार प्रयत्नपूर्वक उभारा भी जा सकता है।
मनुष्य का शरीर भी ऐसी विचित्रताओं से भरा है और मन भी। अवसर मिले तो शरीर का कलेवर, तथा बल पराक्रम असाधारण रूप में विकसित हो सकता है। अवसर मिले तो यही काया ऐसी सुदृढ़ता एवं सहनशीलता का परिचय दे सकती है, जैसी कि सामान्य काया से आशा नहीं की जा सकती। हाड़माँस का शरीर तो तनिक से झटकों से भी टूट सकता है। उसमें बहुत बड़ी सहन शक्ति नहीं है। मृत्यु उत्पन्न करने वाले आघातों से उसकी रक्षा नहीं हो सकती। किन्तु देख गया है कि आकार, बल एवं सुदृढ़ता की दृष्टि से कई बार मनुष्यों में ऐसी क्षमता पाई जाती है जिसे अद्भुत ही कहा जा सकता है।
स्मरण रखने योग्य बात यह है कि सृष्टा की इस संरचना में न कहीं अपवाद है न व्यतिरेक। प्रकृति भूल नहीं करती। उसके कुछ नियम हैं। जिनमें से हम बहुत थोड़ों को जानते हैं और उतनों तक ही प्रकृति को सीमाबद्ध मानते हैं। वस्तुतः ऐसा है नहीं। अविज्ञात नियमों को भी यदि समझा और प्रयुक्त किया जा सके तो आज का अद्भुत कल नितांत सामान्य बन सकता है। मानवी काय संरचना में कितनी सम्भावनाएँ भरी पड़ी हैं जिनका परिचय यदा-कदा ही देखने को मिलता है। इन्हें कौतूहल मात्र नहीं समझा जाना चाहिए वरन् यह माना जाना चाहिए कि अपवाद रूप में देखी जाने वाली सम्भावनाएँ भी मानवी संरचना का एक अविच्छिन्न अंग हैं। वे प्रयुक्त नहीं होतीं, उनकी आवश्यकता नहीं समझी गई, उन्हें जगाने का प्रयत्न नहीं हुआ- इसलिए उपेक्षित, प्रसुप्त स्थिति में किसी कोने में पड़ी रहती हैं। यदि आवश्यकता समझी जाय और चेष्टा हो तो काय संरचना में विद्यमान अनेकानेक विचित्रताओं में से जिन्हें आवश्यक समझा जाय उन्हें जागृत एवं प्रखर किया जा सकता है।
गोल्ड हिल आँरुगान (यू.एस.ए.) में जैक शवार्ज नामक व्यक्ति ने सामान्य शरीर में असामान्य विशेषताएँ होने की सम्भावना प्रदर्शित करने के लिए एक प्रयोगशाला स्थापित की है। इसमें वह सिद्ध करता है कि शरीर को तेजधार वाले हथियारों का प्रवेश होने पर भी उसका कुछ नहीं बिगड़ता। पानी में ढेला फेंकने पर कुछ ही क्षण के लिए आघात वाले स्थान का पानी हटता है और तत्काल उस स्थान पर पास का पानी आकर उस गड्ढे को समतल बना देता है ऐसा ही दृश्य मानवी शरीर में भी देखने को मिल सकता है। बात सहज ही समझ में नहीं आती, पर है सच। जैक शवार्ज ने यह प्रदर्शन अनेकों स्थानों पर किये हैं और सामान्य जनों से लेकर विशेषज्ञों तक को यह चुनौती दी है कि वे जिस तरह भी चाहें इस विशेष की यथार्थता परखने के लिए जाँच-पड़ताल करलें और यह भ्रम मिटालें कि इस कृत्य में कोई बाजीगरी की जा रही होगी।
मैनिंगर फाउण्डेशन के डायरेक्टर ‘एलियर ग्रीन’ ने अपनी आँखों से देखा कि उसने लोहे की पैनी शलाख अपने हाथ में आर पार की। लिपटे कपड़े में सूराख हो गए किन्तु खून नहीं निकला। बाद में शलाख निकाल लेने पर वह छेद भी अपने आप भर गया जो शरीर में सलाख पार होने के कारण हुआ था। वह पैनी नोंकें लगे तख्त पर सोकर भी दिखाता है और छाती पर अपने से भी अधिक वजन का आदमी खड़ा कर लेता है ताकि नोंकें उसके शरीर में न घुसने की दूसरी क्षमता का भी प्रदर्शन हो सके।
हिमाचल प्रदेश के भोरज ब्लाक में एक छोटा गाँव है- बस्सी। यह शिमला से 85 किलोमीटर दूर है। यहाँ का 23 वर्षीय युवक रामचन्द्र विषपायी होने के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है। यह शौक उसे जन्मजात विशेषता के रूप में मिला है। जब आठ वर्ष का था तभी साँप, बिच्छू आदि जहरीले कीड़े को चाव पूर्वक पकड़ लेता था। 13 वर्ष की आयु में उसने तेजाब पीकर दिखाया। बाद में उसने अनेकों इससे भी बड़े ‘पोटेशियम साइनाइड’ जैसे विष विशेषज्ञों की उपस्थिति में खाकर दिखाये। नींद की गोली वह दर्जनों निगल जाता है। यह प्रदर्शन उसने चण्डीगढ़ के कृषि विश्व विद्यालय तथा दूसरे प्रामाणिक संस्थानों में करके यथार्थता प्रमाणित की है। कई समाचार पत्रों में यह विवरण छपा है और टेलीविजन पर भी प्रदर्शित हुआ है।
इसी प्रकार मनुष्य शरीर एक विलक्षण बिजली घर है। बिजली को शक्ति का प्रतिनिधि माना जाता है। उसके सहारे कितने ही यन्त्र उपकरण काम करते हैं। ऊर्जा की आवश्यकता उससे पूरी होती है। जहाँ शक्ति की आवश्यकता है वहाँ बिजली का प्रयोग किया जाता है। मनुष्य शरीर की सामान्य गतिविधियों के लिए जितनी बिजली काम आती है प्रायः उतनी ही उसमें बनी रहती है। अधिक की आवश्यकता समझी जाय तो उसके अन्तराल में ऐसे स्रोत विद्यमान हैं जिनके सहारे उसे अधिक बिजली उगलते पाया जा सकता है। यदाकदा ऐसी घटनाएँ देखने में मिलती रहती हैं जिनमें मनुष्य को एक चलते-फिरते बिजली घर जैसा काम करते पाया गया है।
लन्दन के डा. डिन्वल ने अपने अनुभव में आये विशेष विद्युतीय क्षमता वाले कितने ही व्यक्तियों के विवरण अपनी पुस्तक में प्रकाशित किये हैं। इस पुस्तक का नाम है- “एवनार्मल हिप्नोटिक फिनामिना” इसमें प्रस्तुत किये गए वर्णनों से विदित होता है कि कभी-कभी किसी की शरीर विद्युत असाधारण रूप से उद्दीप्त हो उठती है और वह अपने स्पर्श करने वाले व्यक्तियों तथा पदार्थों पर आक्रामक प्रभाव छेड़ने लगती है। वे कहते हैं- “एक सीमित मात्रा में यह जैव विद्युत हर किसी के शरीर में रहती है और नाड़ी संस्थान के सहारे इस छोर से उस छोर तक दौड़ती रहती है। इसी के आधार पर शरीर यन्त्र के विभिन्न क्रिया कलाप चलते हैं। सामान्य या स्वाभाविक मात्रा में कमी आने पर व्यक्ति निर्बल, निस्तेज हो जाता है और उसकी हर क्रिया प्रक्रिया से शिथिलता दीखने लगती है। साथ ही यह भी देखा गया है कि वह मात्रा अनावश्यक रूप से बढ़ने लगे तो आदमी आवेशग्रस्त, क्रोध, आक्रामक, अस्थिर प्रकृति का बनने लगता है। सामान्य जाँच-पड़ताल से कोई रोग प्रतीत न होने पर इसे वैयक्तिक विशेषताएं माना जाने लगता है, पर वस्तुतः यह होता बिजली की मात्रा घटने बढ़ने के कारण ही है। जिस प्रकार अन्यान्य विकृतियों की अभिवृद्धि के उपचार हैं। उसी प्रकार शरीर गत विद्युत प्रवाह की अव्यवस्था को भी नियन्त्रित किया जा सकता है।
अपवाद रूप में मानवीय विद्युत के अत्यधिक उद्दीप्त हो उठने की कई घटनाओं का प्रामाणिक विवरण वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की जाँच-पड़ताल से होकर गुजर चुका है। इसमें एक घटना अमेरिका लड़की लूलू हर्स्ट की है। उसकी आयु 14 वर्ष की होते-होते एक ऐसा विद्युतीय उभार आया कि सभी सम्बन्धियों के लिए विशेषतया उसके लिए सर दर्द बन गया। वह जिसे भी छूती उसी को बिजली का भारी झटका लगता। मनुष्य छूते तो औंधे मुँह गिरते। धातुओं की वस्तुएँ छूती, तो वे बुरी तरह हिलने-डुलने लगती।
इस अनोखेपन की चर्चा गली मुहल्ले में फैली और कई दिन कौतूहल के लिए भीड़ इकट्ठी होती रही, पर अन्त में यह मामला विशेषज्ञों के सामने प्रस्तुत किया गया पुलिस आई वास्तविकता की जाँच-पड़ताल होने लगी। अनेकों परीक्षण हुए। अन्ततः पाया गया कि उसके शरीर से बिजली का प्रवाह फूटता है।
लड़की तथा उसके अभिभावक कई दिन तक बहुत हैरान रहे कि उसे अछूत बनाकर किस प्रकार रखा जाय और एकाकी निर्वाह में होने वाली कठिनाइयों का सामना कैसे किया जाय। अन्ततः कुछ बुद्धिमान लोगों की सलाह से यह उपाय अपनाया गया कि इस कौतूहल का जगह-जगह प्रदर्शन करके धन कमाया जाय। सूझबूझ के साथ वह व्यवस्था बना ली गई। दो वर्ष तक उसकी विशेष स्थिति रही। इस अवधि में उससे लाखों की राशि एकत्रित कर ली। इसके बाद वह उभार उतर गया और लड़की सामान्य जीवन जीने लगी।
एक ऐसा ही उदाहरण फ्राँस के लावेरे नगर में देखा गया। एगलिन कोटिन नामक लड़की ने जनवरी 1946 में पन्द्रहवें वर्ष में प्रवेश किया तो उसके शरीर से असाधारण बिजली का प्रवाह फूटने लगा, छूने पर झटके खाने वालों और वस्तुओं के गिर पड़ने की बात वैज्ञानिक अनुसंधान का विषय बन गई। भौतिक विज्ञानी फेंकाई ऐरगो के नेतृत्व में एक कमेटी इस संदर्भ में गहरी जाँच पड़ताल करने के लिए बिठाई गई। उनने इस विशेषता का कारण शरीर में उभरने वाले विशेष प्रकार के मैगनेट को पाया और इसका प्रभाव न केवल दूसरों पर वरन् उसके निजी शरीर को भी उत्तेजित करता देखा गया।
‘एवनारवल हिप्नोटिक फिनामिना’ पुस्तक में एक ऐसी ही तीसरी घटना का भी वर्णन है। लन्दन की 17 वर्षीय लड़की केरोलिन सन् 1870 में बीमार पड़ी। चारपाई छोड़ते-छोड़ते उसे एक नई व्यथा लग गई शरीर से विद्युत धारा फूट पड़ने की। इसका प्रथम बार परिचय तब मिला, जब उसका एक युवक मित्र मिलने आया और जैसे ही चाय का प्याला पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया वैसे ही उँगलियाँ छू जाने के कारण वह झटका खाकर गिरा। इस युवती की स्थिति भी प्रायः दो वर्ष ही ऐसी विचित्र रही बाद में वह भी सामान्य स्थिति में आ गई।
लन्दन के स्नायु रोग विशेषज्ञ ज्ञान एस. क्राफ्ट के सामने भी सुप्रसिद्ध जैनी मार्गन नामक लड़की का प्रसंग आया था जिसमें उसका शरीर बिजली घर बना हुआ था और उसे बिना सुरक्षा उपकरणों की सहायता लिए कोई उसे छूने का साहस नहीं करता था।
इस प्रकार की घटनाओं में प्रायः लड़कियों को ही प्रधान रूप से प्रभावित पाया गया है। सो भी चौदह से अठारह वर्ष की उठती आयु में लड़कों की एक भी ऐसी घटना प्रकाश में नहीं आई।
हाँ पुरुषों में एक ‘स्टोन सलावा’ नामक व्यक्ति पोलैण्ड में हुआ है। जिसने 1908 में वैज्ञानिक जगत में खलबली मचादी थी। वह इच्छानुसार अपनी उँगलियों से चुम्बकीय किरणें प्रवाहित करता था और धातु विनिर्मित पदार्थों में से जिसे भी हाथ में लेता उसे चुम्बकीय विशेषताओं से सम्पन्न कर देता। उसकी यह विशेषता वैज्ञानिकों के लिए एक विशेष अनुभव एवं अनुसंधान का कारण बनी रही। उसमें भी यह क्षमता अधिक समय न रही दो तीन वर्षों में ही घटते-घटते समाप्त हो गई।
देखने में सामान्य लगने वाले मनुष्य शरीर में एक से एक अद्भुत सम्भावनाओं बीजाँकुर भरे पड़े हैं। आवश्यकता उनके उभारने की है। यह साधना द्वारा सम्भव हो सकता है। किन्हीं-किन्हीं की पूर्व जन्मों की साधना भी इस जन्म में काम आती देखी गई है। अनायास ऐसी अद्भुताएँ प्रकट होना इसी कारण सम्भव होता। जिनमें यह क्षमताएँ प्रकट हों उसका उत्तरदायित्व है कि वे उन्हें खिलवाड़ में खर्च न करें। मात्र उच्चस्तरीय प्रयोजनों में ही लगायें।
स्पेन की एक ईसाई भिक्षुणी मेरी आमतौर से अपने गिरजे में ही रहती थी। पूजा में निरत रहती और अहाते से बाहर भी नहीं निकलती थी। फिर भी उसके बारे में यह कहा जाता रहा कि वह सूक्ष्म शरीर में मैक्सिनों में बसे आदिवासियों में ईसाई धर्म का प्रसार करने जाती रहती है। तथ्य की जाँच पड़ताल करने के लिए जैम्स कैरिको ने अमेरिका का दौरा किया और उसने प्रस्तुत प्रमाणों के साथ यह विवरण छपाया कि वस्तुतः मेरी मैक्सिको जाती है। वहाँ के आदिवासी उसे नीली पुतलियों वाली देवी के नाम से जानते और चली जाने पर उसके आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते रहते हैं।
जिन दिनों गोवा भारत में पुर्तगाल का उपनिवेश था उन दिनों एक पुर्तगाली व्यवसायी अचानक गायब हुआ और कुछ भी क्षणों में अपने देश में जा प्रकट हुआ। उसने यह आश्चर्यजनक विवरण सुनाया तो किसी ने विश्वास नहीं किया वरन् अतिशयोक्ति कहने के अपराध में उसे जीवित जल दिया गया। बाद में खोज करने पर ऐसे प्रमाण मिले जिससे सिद्ध हुआ कि वस्तुतः व्यवसायी ने जैसा कहा वही तथ्य था।
पौराणिक कथाओं में भी मनुष्य में अतीन्द्रिय सामर्थ्यों की सम्भावना सम्बन्धी अनेकों प्रमाण मिलते हैं। कभी इन बातों को कपोल कल्पनाएँ कहा जाता था, पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। कई प्रत्यक्ष प्रमाणों की जाँच-पड़ताल करने के उपरान्त प्रत्यक्षवादी जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, उसके अनुसार मनुष्य में ऐसी सामर्थ्यों का होना शक्य माना गया है, जो मानवी सामर्थ्य से बाहर की हैं- इन्द्रियातीत हैं।
संजय की दूर-दर्शन दूर श्रवण की क्षमता का उल्लेख मिलता है। वे महाभारत के मोर्चे पर चल रहे दृश्यों और सम्भाषणों का यथावत् विवरण जन्मान्ध धृतराष्ट्र को घर बैठे सुनाते रहते थे। लोक-लोकान्तरों में परिभ्रमण करते रहने की शक्ति देवर्षि नारद में थी। उन्हें पूर्वाभास भी होता था और वे सम्बन्धित व्यक्तियों तक सहज सेवा साधना के भाव से पहुँचते रहते थे। गाँधारी की आँखों की विद्युतशक्ति ही थी जिसने दुर्योधन को लोहे जैसा सुदृढ़ बना डाला था। बाली की शक्ति के शाप वरदान के कितने ही वर्णन दुर्वासा-अम्बरीश, शृंगी, परीक्षित, कपिल मुनि-सागर के आख्यानों के रूप में मिलते हैं।
महाबली रावण मायावी विद्याओं का जाना-माना महामांत्रिक था। उसने दस सिर, बीस भुजा, देव-विजय स्वर्ण भवन, काल-विजय जैसी अनेकों अद्भुत सिद्धियों का अर्जन किया था। मारीच ने सीता हरण में जो भूमिका निभाई उससे विदित होता है कि वह अदृश्य प्रकट होने की आँख मिचौनी खेलता था और वेश बदलकर मनुष्य से स्वर्ण-मृग बन जाने जैसे छद्मों में प्रवीण था। हनुमान जी ने “मसक समान रूप कपिधरी” और “तब कपि भयेऊ भू धरा कारा” जैसी अनिमा और महिमा सिद्धियों का परिचय दिया था।
ये समस्त उदाहरण एक ही तथ्य का प्रतिपादन करते हैं कि मनुष्य अद्भुत क्षमताओं का पुँज है। असीम सम्भावनाएँ उसमें छिपी पड़ी हैं। कभी-कभी यदा-कदा छुट-पुट घटनाएँ जो प्रकाश में आती रहती हैं, अतीन्द्रिय सामर्थ्य की वास्तविकता ही प्रामाणित करती हैं। यदि इन्हें सुनियोजित किया जा सके, इनसे प्रेरणा लेकर इनका प्रयोग मात्र प्रदर्शन में नहीं उच्चस्तरीय व्यक्तित्व सम्पन्न बनने हेतु करने का संकल्प उठने लगे तो ही इनका सार्थकता है। विधाता ने किसी को शक्ति दी है तो छीनने का भी उसे पूरा अधिकार है। यदि प्राप्त सामर्थ्य का दुरुपयोग होगा तो वे स्वतः लुप्त भी हो सकती हैं। अनुशासन की विधि-व्यवस्था से संचालित यह धरती और सारा चेतन जगत इस तथ्य का प्रमाण समय-समय पर देते रहते हैं।
सच्चा कलाकार वह जो अपना स्वरूप संसार के सामने ऐसा रखे जिससे अज्ञ जन भी भावना और प्रेरणा ग्रहण कर सके।
समझा गया है कि अनेकता की सूक्ष्म परतें न केवल स्वयं रहस्यपूर्ण हैं वरन् इस विश्व ब्रह्माण्ड में जो कुछ अदृश्य सूक्ष्म रहस्य है उसके साथ सम्बन्ध जोड़ने, आदान-प्रदान करने की क्षमता भी उसमें विद्यमान है। प्रश्न एक ही है कि उसे उपयुक्त अवसर मिलता है या नहीं। उपयुक्त आधार उसे मिल सकता या नहीं? यह कार्य आमतौर से मन संयम की ध्यान धारणाओं द्वारा मनस्वी लोग प्रयत्नपूर्वक सम्पन्न करते हैं, पर कई बार वह पूर्व संचित अभ्यास के आधार पर अथवा अन्य अविज्ञात कारणों से इस स्थिति में भी पहुँच जाता है कि परिष्कृत स्तर जैसी अनुभूतियाँ उपलब्ध कर सके। जब कभी कुछ ऐसा होता है स्वप्न सार्थक भी होते देखे गए हैं। उनमें ऐसे संकेत रहते हैं, जिनके माध्यम से विगत का इतिहास और भविष्य का भवितव्य जाना जा सके। न केवल इतना ही होता है वरन् वर्तमान उलझनों तथा आवश्कताओं के सम्बन्ध में उस माध्यम से ऐसा मार्गदर्शन परामर्श भी उपलब्ध होता है जिसे दिव्य प्रेरणा कहा जा सके। ऐसा सर्वदा तो नहीं होता, पर जब कभी अचेतन की उत्कृष्टता और सचेतन द्वारा उसे समझने की उभयपक्षीय विशिष्टता एक साथ उभरती है तो ऐसा संयोग बन पड़ता है जिससे स्वप्न को सार्थक ही नहीं महत्वपूर्ण भी कहा जा सके। ऐसे सपने कई बार तो मनुष्यों की जीवन दिशा को उलट देने तक में समर्थ हुए हैं।
ऐसी स्वप्न शृंखला का इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। हिटलर सन् 1916 में एक मामूली सिपाही था। मोर्चे पर खंदक में वह लेटा पड़ा था। इसी बीच उसे झपकी आ गई। स्वप्न देखा कि एक भयानक अग्नि पिण्ड सामने से उसकी ओर लपकता आ रहा है। स्थिति मरने जैसी बन गई, पर किसी दिव्यशक्ति ने उसे हाथ पकड़कर दूसरी ओर उछालकर फेंक दिया और कहा- “यह विशेष व्यक्ति है। अभी उसे विशेष काम करना है। यह समय इसके मरने का नहीं है।” स्वप्न का अन्त होने भी न पाया था कि हिटलर आतंकित होकर हड़बड़ाते हुए उठने लगा। अभी पूरी तरह संभल भी न पाया था कि सचमुच ही तोप का गोला सामने से सनसनाता हुआ आया और उसका कंधा छूते हुये निकल गया। यही वह दृश्य था जिसने हिटलर को अपने बारे में सर्वथा नवीन धारणा बनाने का अवसर दिया। उसी दिन से वह अपनी सहायता का सपना देखने लगा। इसी मानसिक उथल-पुथल ने उसे वह कर गुजरने तथा इतिहास में एक अहम् भूमिका निभाने का अवसर दिया। जिसकी कि एक सामान्य स्तर के सिपाही से आशा की नहीं जा सकती।
जे. गुवे की पुस्तक ‘एन एक्सपेरीमेन्ट विद टाइम’ में ऐसे अविज्ञात आयामों का उल्लेख किया है जो विज्ञात तीन आयामों की तरह सर्वविदित तो नहीं, पर अपने अस्तित्व के प्रमाण समय-समय पर प्रस्तुत करते रहते हैं। लम्बाई-चौड़ाई-गहराई की तरह प्रकृति में कुछ अन्य आयाम भी हैं। आइन्स्टीन ने टाइम, स्पेश और कॉजेशन को भी आयामों में गिना है साथ ही ऐसे अन्यान्य आयामों की सत्ता का भी संकेत दिया है जिसके आधार पर रहस्यों की दुनिया में प्रवेश पाया जा सकता है।
मार्क ट्वेन ने स्वप्नों के सम्बन्ध में गहन अनुसन्धान किये हैं। उसने अनेकानेक उदाहरणों के आधार पर कितने निष्कर्ष ही निकाले हैं। इस दिशा में इतनी तत्परता के साथ जुटने की प्रेरणा उन्हें अपने भाई के स्वर्गवास का पूर्वाभास होने से मिली। उसका भाई अच्छा-खासा था पर ट्वेन ने स्वप्न में देखा कि वह एक ताबूत में मरा पड़ा है और ऊपर से सफेद फूल रखें हैं। आँख खुलने पर उस डरावने स्वप्न से असमंजस तो हुआ पर वैसा घटित होने का कोई कारण न देखकर उसे भुला दिया गया ठीक एक महीने बाद वही घटना घटित हुई और उनका भाई स्टीम वोट में दुर्घटनाग्रस्त होकर मर गया। उनके सामने लाश ठीक उसी रूप में आई जैसा कि उनने स्वप्न में देखा था।
जर्मनी के मनोविज्ञानी जिस रिचर्ड ने स्वप्नलोक की संरचना में ‘एक्स्ट्रा सेंसुअरी परसेशन’ को कारण माना है और कहा है कि जिस बाह्य वातावरण से मनुष्य घिरा रहता है और उससे जितना जिस स्तर का प्रभाव ग्रहण करता है उसी से स्वप्नलोक का सृजन होता है। अपना तो इतना ही होता है कि बाह्य घटनाचक्र को किस दृष्टि से देखा और किस सीमा तक अपनाया गया। इतने पर भी वे यह मानते हैं कि भली-बुरी घटनाओं का क्रम तो सभी के सामने चलता रहता है उनसे किसने क्या समझा सीखा? यह अपनी निजी विशेषता है। इस विशेषता का परिचय स्वप्नों के पर्यवेक्षण से जाना और किसी के व्यक्तित्व के स्तर को देखकर समझा जा सकता है।
बाइबिल में एक मिस्त्री राना के रहस्य भरे सपने का उल्लेख है। उसकी व्याख्या सन्त जोसेफ ने की है। उसमें बताया गया था कि अमुक सात वर्ष समृद्धि के और अमुक सात वर्ष घोर दुर्भिक्ष के रहेंगे। वह भविष्यवाणी अक्षरशः सच सिद्ध हुई थी।
सिकन्दर महान ने सपने में अपनी ढाल के ऊपर एक घोड़े के कान और वैसी पूँछ का देवता नाचता हुआ देखा। इस विचित्र स्वप्न का अर्थ तत्कालीन भविष्यदर्शी अरिस्ताँदर ने बताया कि अगले युद्ध में तुम्हारी विजय निश्चित है। इसी आशा और उत्साह से उसने तत्काल नये युद्ध की तैयारी की और विजय पाई।
मिस्र के राजकुमार तुत्मेस ने स्वप्न देखा कि देवता उससे कह रहे हैं- “मैं तुझे छोटे राज्य का न रहने दूँगा। बहुत बड़े क्षेत्र का शासन प्रबन्ध कराऊँगा। धन सम्पत्ति की कमी न रहने दूँगा। तू अपने पिता होरयाखू की शानदार स्मृति बनाना।” राजकुमार ने सपना याद रखा और देखा कि राजगद्दी पर बैठते ही ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ बनने लगीं जैसा कि स्फिंक्स देवता ने उसे बताईं थीं। उसने अपने पिता की सामान्य-सी कब्र को बहुमूल्य पत्थरों से इस प्रकार बनवाया जिससे उनकी स्मृति चिरकाल तक बनी रहे।
स्वप्नों की सच्चाई भी अनेक बार प्रकट होती है। पौराणिक कथा के अनुसार बाणासुर की पुत्री उषा को स्वप्न में बिना किसी पूर्व विचार के श्रीकृष्ण पौत्र अनिरुद्ध के दर्शन हुए और दोनों के बीच प्रणय सम्बन्ध बन गये। बाद में बहुत ढूँढ़ खोज के बाद पता चला कि स्वप्न में देखा गया वह व्यक्ति कौन था? इस जानकारी के उपरान्त ही वह विवाह सम्पन्न हुआ।
जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर के जनम से पूर्व उनकी माता को ऐसे स्वप्न आये थे जिनमें होनहार बालक की जीवनगाथा का स्वरूप, पराक्रम एवं भविष्य दर्शाया था।
परमाणु भौतिकी के आद्य प्रवर्तक नील्स बोहर जिन दिनों इस उधेड़ बुन में लगे हुये थे और सम्भावना को मूर्त रूप न दे पाने के असमंजस में फँसे थे उन दिनों उनने एक स्वप्न देखा- जिसमें सारे ग्रह नक्षत्र एक रस्सी में बँधे दीखे। वे ठण्डे होकर एक केन्द्र पर जमे और विस्फोट होने पर बिखर कर अपनी-अपनी कक्षा में घूमने लगे। इस स्वप्न को उनने अणु संरचना में उसके नाभिक तथा सदस्य घटकों की संगति बिठाई। यह सूत्र हाथ लगने पर उनका पर्यवेक्षण आगे बढ़ा और अन्ततः परमाणु भौतिकी का एक व्यवस्थित ढाँचा खड़ा हो गया।
सिलाई मशीन के आविष्कारक इलिलास हार्वे बहुत समय से अपने प्रयास में लगे थे पर उसके लिये उपयुक्त सुई का कोई सही स्वरूप बन नहीं पा रहा था। जिन दिनों वे इस उलझन से ग्रसित थे उन्हीं दिनों उन्होंने एक सपना देखा कि बर्बर लोगों के एक झुण्ड ने उन्हें पकड़ लिया है। उनके नेता ने हुक्म दिया कि या तो यह चौबीस घण्टे के भीतर सिलाई की मशीन विनिर्मित करे या इसे कत्ल कर दिया जाय। हार्वे ने जान बचाने के लिए भरपूर प्रयत्न किया, पर वे नियत अवधि में वैसा न कर सके। इस पर उन्हें भालों से बेधने के लिए जल्लाद आ गए। भालों की नोक विचित्र थी। हार्वे ने उन्हें गौर से देखा तो पाया कि नोंक से ऊपर सभी भालों में छेद थे। सपना टूट गया। भालों के नोक से ऊपर छेद की विचित्रता उनके मन में घर कर गई और उन्होंने इसी संकेत पर सिलाई मशीन की सुई बनाई और आविष्कार हो गया।
फ्रेण्डरिक केकुले ने सुगन्धित द्रव्य रसायनों के अभूतपूर्व फार्मूले ढूँढ़ निकाले। इससे उसने धन भी कमाया और यश भी। इस आविष्कार में सहायक उनका साँपों का सपना प्रख्यात है। उसी से प्रेरणा पाकर उन्होंने प्रस्तुत संकेतों के आधार पर अपना कदम उठाया और सफलता तक पहुँचाया। केकुले स्वप्नों को सार्थक सिद्ध करने में बहुत उत्साही रहे।
यूनान देश के दालदिस नगर निवासी आर्तेमिदोरस नामक विद्वान ने एक ग्रन्थ रचा था- ‘ओनाईकर्मसी’ जिसका अर्थ होता है- स्वप्न दिया। बहुत समय तक उसकी बहुत धूम रही और असंख्यों ने उस आधार पर अपने स्वप्नों के अर्थ लगाये। अभी भी उसमें दिये हुये समाधानों का संदर्भ संसार भर के स्वप्न विशारद समय-समय पर देते रहते हैं।
हेगरी के डा. साँडर फोरेस्त्सी ने अपनी निजी तथा दोस्तों के अनेक विवरण प्रस्तुत करते हुए स्वप्नों में से अधिकाँश के सारगर्भित एवं उद्देश्यपूर्ण होने की बात कही है।
न्यूयार्क में मेमनाइड मेडिकल सेण्टर ने स्वप्नों के तारतम्य का विश्लेषण करते हुए एक साधन सम्पन्न “ड्रीम लेबोरेटरी’ की स्थापना की है। इसके मूर्धन्य अनुसंधान कर्ताओं में से डा. डलमैन ओर क्रिपनर ने जो निष्कर्ष पिछले दिनों निकाले थे उन्हें अधिकाँश में सारगर्भित पाया गया। उपरोक्त दोनों डाक्टर अब इस प्रयास में जुटे हैं कि स्वप्नों की सहायता से जागृत को अधिक सुखद और समुन्नत बनाया जाय।
एडगन ऐलन, मोजार्ट और आइन्स्टीन सदृश्य उच्चस्तरीय विज्ञानवेत्ता यह स्वीकार करते थे कि उन्हें कितने ही स्वप्नों ने शोध कार्य में सहायता दी है और उलझी गुत्थियों को खोलने वाले संकेत दिये हैं। स्वयं अलबर्ट आइन्स्टीन के इस सम्बन्ध में अनुभव बड़े अद्भुत थे। विश्व विख्यात गणितज्ञ आइन्स्टीन को एक वैज्ञानिक गोष्ठी में किसी जटिल समीकरण का हल प्रस्तुत करना था। वे कई दिनों से उसे हल करने में लगे थे पर कोई हल नहीं निकल पा रहा था। एक दिन पूर्व वे सोये तो उन्हें लगा कि किसी अज्ञात सत्ता ने उनके सारे कठिन सन्दर्भों को सरल बनाकर आइन्स्टीन के सामने समाधान प्रस्तुत कर दिया। स्वप्न टूटने के बाद आइन्स्टीन ने स्वप्न में देखे गये दृश्य के अनुसार फिर से प्रश्न को हल किया और उसका सही उत्तर उन्हें मिल गया। ऐसा उनके जीवन में कई बार हुआ। इसलिए वे कहा करते थे कि स्वप्नों में कोई सत्य है जो हम वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे हैं।
“अपनी अद्भुत कल्पनाओं के उठने का मूल स्रोत कहाँ है?” इस प्रश्न का उत्तर देते हुए आइन्स्टीन ने कहा था कि प्रायः निद्रित अथवा अर्द्धनिद्रित अवस्था में कभी-कभी ऐसे समय आते हैं जब मस्तिष्क अपनी सामान्य मर्यादाओं का उल्लंघन करके ऐसी सूचनायें देने लगता है जिनके आधार पर आविष्कारों की आधारशिला रखी जा सके।
स्वामी रामतीर्थ के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि गणित का कोई कठिन प्रश्न आने पर वे उसे हल करने की भरसक कोशिश करते थे। फिर भी हल नहीं होता तो वे थककर सो जाते थे और सोते समय स्वप्न में भी उन्हें अपने प्रश्नों का हल मिल जाता था।
फ्राँसीसी राजक्रांति की सफल संचालिका ‘जॉन आफ आर्क’ एक मामूली किसानी के घर जन्मी थीं। उन्होंने वहीं एक रात सपना देखा कि आसमान से उतरता कोई फरिश्ता उन्हें कह रहा है कि ‘अपने को पहचान समय की पुकार सुन, स्वतन्त्रता की मशाल जला।’ ये तीनों ही बातें उसने गाँठ बाँध लीं और उसी समय से फ्राँस को स्वतंत्र कराने के लिए नये आवेश के साथ उस संग्राम में कूद पड़ीं।
इंग्लिश महाकवि कॉलरीज और प्रख्यात उपन्यासकार स्टीवेंसन ने अपनी प्रमुख कृतियों के लिये प्रेरणास्रोत स्वप्नों के माध्यम से ही उपलब्ध किये बताये हैं।
मनोविज्ञानी डैविड रेवैक ने जार्जिया विश्व विद्यालय के 433 स्नातकोत्तर छात्रों से उनके स्वप्नों के सम्बन्ध में 80 प्रश्नों की प्रश्नावली बनाकर पूछताछ की, जिससे समझदार लोगों का अनुभव एवं अभिमत इस सम्बन्ध में जाना जा सके। प्रश्नों का उत्तर देते हुये अधिकाँश छात्रों ने यही बताया कि उनके बहुत सारे स्वप्न सार्थक रहे हैं और उनके सहारे उन्हें सामयिक वस्तुस्थिति तथा भावी सम्भावना के सम्बन्ध में समय-समय पर संकेत मिलते रहे हैं।
फ्राँस के डा. अलफ्रेड मरे ने प्रायः 3000 प्रामाणिक व्यक्तियों के स्वप्न अनुभव एकत्रित करके उनके निष्कर्षों को प्रकाशित किया है। इनमें अधिकाँश ऐसे थे जिनमें सारगर्भित सूचना मिली और वे उपयोगी सिद्ध हुईं। वे कहते हैं कि आवश्यक नहीं कि स्वप्न भविष्यदर्शी हों या अदृश्य का ही उद्घाटन करते हों। उनमें मनुष्य की अपनी शारीरिक, मानसिक स्थिति का भी दिग्दर्शन रहता है।
भारत के वायसराय लार्ड डफरिन ने एक रात डरावना सपना देखा कि कुछ हत्यारे किसी को कत्ल करके उसकी लाश को लादकर भाग रहे हैं। डफरिन उनका पीछा करते हैं। उनमें से एक को पकड़ भी लेते हैं पर जैसे ही वह पकड़ा हुआ व्यक्ति मुड़कर देखता है डफरिन उसकी भयानक आकृति को देखकर बेतरह घबड़ा जाते हैं। इस घबड़ाहट में उनकी नींद खुल गई। बात गई आई हुई, पर उसका प्रभाव इतना अधिक रहा कि कारण ढूंढ़ने की दृष्टि से उन्होंने उसे अपनी डायरी में नोट कर लिया।
समय बीता द्वितीय महायुद्ध के समय ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फ्राँस का राजदूत बनाकर उन्हें भेजा। एक बार वे किसी महत्वपूर्ण चर्चा के लिए फ्राँस के उच्च अधिकारियों से मिलने के लिए गये। दफ्तर पांचवीं मंजिल पर था। लिफ्ट से जाना था। लिफ्ट पर पैर रखने भी न पाये थे कि चालक की आकृति देखते ही वे घबड़ा गये और दस कदम पीछे हट गए। यह वही आकृति थी जो उन्होंने भारत वायसराय रहते समय सपने में देखी थी। डफरिन सन्न खड़े रहे। लिफ्ट चली गई। किन्तु कुछ मिनट ही गुजरे होंगे कि लिफ्ट दुर्घटना ग्रस्त हो गई और उसमें सवार सभी लोग मर गए।
इसी प्रकार एक घटना अमेरिका की है। प्रिस्टीन युद्धपोत विदेश यात्रा पर जा रहा था। उसका प्रवास उद्घाटन कर्नल डेविडगार्डी को एक समारोह के साथ करना था। उनकी पुत्री जूलिया और पत्नी भी साथ रहने वाली थी। निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व कर्नल की पुत्री और पत्नी ने अपने-अपने ढंग के दो स्वप्न देखे जिसमें भयानक विस्फोट और मृत्यु के भयानक दृश्य थे। दोनों ने उसकी संगति समारोह में दुर्घटना होने की सम्भावना से जोड़ी और सम्मिलित न होने का अनुरोध किया। किन्तु वे माने नहीं। स्वप्नों की सच्चाई वाली बात उसने हँसी में उड़ा दी। समारोह यथा-समय रहा। सभी लोग उसमें पहुँचे।
उद्घाटन के अवसर पर युद्धपोत पर लगी तोपों द्वारा सलामी दिये जाने का कार्यक्रम था। रस्म पूरी किये जाने के समय एक तोप फटी और तत्काल कई अधिकारियों के चिथड़े उड़ गये। उन्हीं में से एक गार्डी भी थे। सपना सच निकला।
प्रकृति की सूक्ष्म परतों में अनेकानेक हलचलें होती रहती हैं। उन्हें समझ सकना कामकाजी मस्तिष्क के लिये सम्भव नहीं। यह अतीन्द्रिय क्षमताओं के धनी अचेतन या सुपरचेतन का काम है। अचेतन की- प्रकृति की सूक्ष्म परतों तक पहुँच है और सुपर चेतन- ब्रह्माण्डव्यापी चेतना ब्रह्म सत्ता से संपर्क साधने में समर्थ है। यह दोनों ही क्षेत्र सूक्ष्म शरीर की परिधि में नहीं आते। वह तो दृश्य जगत के साथ ही व्यवहाररत रहता और अनुभवों के आधार पर सोचना चाहता है और किसी निर्णय पर पहुँचता है। इसके आगे प्रकृति या ब्रह्म की रहस्यमयी परतों के साथ सम्बन्ध जोड़ने का और कोई साधन नहीं है। यह साधन उच्चस्तरीय स्वप्नों के माध्यम से ही सम्भव होता है।
व्यावहारिक जीवन में मस्तिष्क का सचेतन ही कार्यरत रहता है किन्तु जहाँ तक श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा का तृप्ति-तुष्टि-शान्ति का- प्रतिभा और वरिष्ठता का सम्बन्ध है, पूर्णतया वह अचेतन और सुपर चेतन की स्थिति पर निर्भर है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का भाण्डागार उस क्षेत्र में प्रसुप्त रूप में पड़ा रहता है। इसे अपना भार हलका करने और परिष्कृत स्तर की ओर बढ़ने के लिये सचेतन के दबाव से छुटकारा पाने की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य योगीजन प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि के द्वारा सम्पन्न करते हैं। मेडीटेशन के विभिन्न प्रकार और प्रयोग इसी प्रयोजन के निमित्त किये जाते हैं। समाधि की एक छोटी भूमिका उच्चस्तरीय स्वप्नों के माध्यम से ही सम्पन्न हो सकती है।
प्रकृति और मनुष्य के बीच सामान्य संबंध इतना ही चलता है कि जिन पदार्थों पर अपना अधिकार हो उन्हें बलपूर्वक या इच्छानुसार प्रयुक्त किया जा सके। ऋतु प्रभाव जैसे कुछ ही प्रसंग हैं जो मनुष्य को बरबस प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रकृति और मनुष्य के बीच खाई ही बनी रहती है। दोनों एक दूसरे की कुछ सहायता नहीं कर सकते। पिछले दिनों इस विलगता को समीपता के रूप में विकसित करने का थोड़ा प्रयत्न पदार्थ विज्ञान के माध्यम से हुआ है। इस आधार पर प्रकृति की कुछ शक्तियों को हस्तगत करने का प्रयत्न हुआ। यत्किंचित् सफलता भी हाथ लगी है। अनेक यन्त्र उपकरणों के माध्यम से तरह-तरह के सुविधा साधन उपलब्ध किये जा रहे हैं। वैज्ञानिक प्रगति की विजय दुंदुभी बजती सुनी जाती है। इस आधार पर मनुष्य की शक्ति और सुविधा भी बहुत बढ़ी है। इतने पर भी प्रकृति और चेतना के मध्य चलने वाली शृंखला का एक बहुत बड़ा क्षेत्र ऐसा है जिसे कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता है।
संयोगों के रूप में अनेक बार ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जिससे प्रतीत होता है कि प्रकृति मनुष्य की अनायास सहायता भी करती है। अनचाहे ही ऐसे प्रसंग सामने आ खड़े होते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि अदृश्य क्षेत्र की कोई सत्ता मनुष्य की अप्रत्याशित सहायता कर रही हो। ऐसे संयोग प्रायः ऐसे ही होते हैं जिनमें मनुष्य नफे में रहता है और प्रसन्नता अनुभव करता है।
आश्चर्य यह होता है कि ये संयोग दिग्-काल की परिधि लांघकर किसी घटना की पुनरावृत्ति के रूप में ही क्यों घटते हैं। लगता है मानो सुनियोजित रूप में प्रकृति जगत में क्रियाशील चेतन-सत्ता उन्हें संचालित कर रही हो। क्या कारण है कि सफलता अथवा अभिशाप के रूप में पकती और समय पाकर घटती इन घटनाओं के मूल स्रोतों की जानकारी इससे अधिक मनुष्य को नहीं है कि ये मात्र संयोग हैं? शोध का यह आयाम मात्र पृथ्वी की परिधि में ही बड़े विस्तृत रूप में फैला पड़ा है। पृथ्वी से इतर तो अन्तरिक्ष जगत, ध्रुव प्रदेश, भूगर्भ एवं अन्यान्य ग्रह पिण्डों में भी यह क्षेत्र खुला हुआ है। मात्र पृथ्वी के ही दृश्यमान प्रसंगों को लेते हैं तो “अनएक्सप्लेंड” नाम से ही फाइल में दर्ज अनेकों घटनाएँ दृश्य पटल पर गुजरती- विश्व मनीषा को चुनौती देती रहती हैं, नित्य जुड़ती चली जाती हैं।
ग्रेमाउथ न्यूजीलैंड के बन्दरगाह पर वल्लवी नामक स्टीमर 5 नवम्बर 1870 को डूब गया। लगातार कई वर्षों की कोशिशों से बड़ी मुश्किल से उसे बाहर निकाला गया। मरम्मत करके इस लायक बनाया गया कि वह फिर से अपना काम कर सके।
कई वर्षों तक वह ठीक प्रकार काम करता भी रहा पर एक आश्चर्यजनक दुर्भाग्य फिर सामने आया। ठीक 16 वर्ष बाद वह उसी तारीख को उसी स्थान पर आकर फिर डूब गया जिस पर कि यह पिछली बार डूबा था।
पेरिस की एक महिला एडिग्यू रेरिइट की सोने की अंगूठी उनके रसोईघर से गायब हो गई। बहुत ढूंढ़ने पर भी वह मिली नहीं। कई वर्ष बीत गए। रेरिइट एक मछली बाजार से खरीद कर लाई। पकाने के लिये जब उसका कतर व्योंत किया गया तो मछली के पेट में वही अंगूठी मिली जो कई वर्ष पूर्व रसोई घर में खोई थी और जिस पर उसका नाम भी खुदा था। हुआ यह कि अंगूठी रसोई घर से नाली में बहती हुई नदी में पहुँची और उसे एक मछली निगल गई। संयोग ही कहना चाहिये कि वही मछली, मछुआरों के हाथ में घूमती-फिरती फिर वहीं पहुँच गई जहाँ अंगूठी वापस पहुँचनी थी।
मान्टिसेनी (न्यूयार्क) में पैंट लेनाहन नामक व्यक्ति तालाब के किनारे लालटेन जलाकर कुछ काम कर रहा था। अचानक लालटेन की चिमनी गिरी और तालाब में डूब गयी ढूंढ़ने पर भी मिली नहीं।
एक लम्बा समय बीत गया। लेनाहन उसी तालाब में मछली पकड़ने बैठा। तीसरे पहर एक मछली उसके काँटे में फँसी। खींचकर बाहर निकाला तो वह आश्चर्यचकित रह गया। जब उसने देखा कि पाँच वर्ष पहले जो चिमनी उसकी लालटेन से छूटकर तालाब में गिरी थी। उसी को वह मछली काँटे की तरह पहने हुई थी। इसे संयोग ही कहना चाहिये कि मछली उस चिमनी में घुस गई और उस लम्बी अवधि तक उसे यथावत् पहने रही।
फ्राँस के डु-बेरे के गिरजे में 75 वर्षों तक कार्यरत पादरी सेन्ट विल्स को दफनाया गया था। बहुत दिन बाद गिरजे की एक दीवार गिर पड़ी। जो भाग गिरने से बच गया था वह मनुष्य की मुखाकृति का था और गौर से देखने पर पादरी की आकृति से बिल्कुल मिलता-जुलता था। सभी उसे आश्चर्य से देखते और दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाते थे- इस अद्भुत संयोग पर।
उल्कापिण्ड आमतौर से सुनसान जगहों में ही गिरते पाये गए हैं। मनुष्य पर उनका आक्रमण हुआ हो तो ऐसी घटना इतिहास में एक ही मिलती है। यह व्यक्ति था इटली का मैन फ्रेडो सेट्टाला। यह वैज्ञानिक भी था। उसकी शोध भी उल्काओं के स्वरूप तथा धरती के वातावरण में प्रवेश करने के रहस्यों पर चल रही थी। शोध काल में वह उल्कापिंड की चोट में बुरी तरह घायल हुआ और अन्ततः मर ही गया। खेतों में घूमते समय एक उल्का पिंड का एक छोटा-सा टुकड़ा उसके ऊपर गिरा और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।
व्हेल मछली का शिकार करने वाली नाव ‘विनस्लॉ’ का मालिक एडमण्ड गार्डनर की एक बार पेरु के समुद्र में व्हेल से मुठभेड़ हुई। मछली भाले की चोट से आहत हुई और उसने उलटकर हमला बोल दिया। उसने जबड़े से नाव के अगले हिस्से को बुरी तरह चबा डाला और साथ ही कप्तान को दबोच लिया। वह किसी तरह बच तो गया, पर दाँतों के भिचाव में उसकी खोपड़ी में छेद हो गया, गले की हड्डी चकनाचूर हो गई और एक हाथ पूरी तरह कुचल गया। कई महीने उसे अस्पताल रहना पड़ा। वह न केवल अच्छा हो गया बल्कि दुर्घटना के 301 वर्ष बाद तक जीवित रहा- और तारीख के हिसाब से उसी दिन मरा मरा जिस दिन व्हेल मछली ने उसे चबा डाला था।
सन 1300 में इटली के राजा चार्ल्स ने ल्युसेरे का गिरजा एक अरबी मस्जिद के मलबे से बनवाया। इसके पूर्व यह मस्जिद भी केथेड्रल के गिरजाघर के मलबे से बनाई गई थी।
ईसा से 105 वर्ष पूर्व जर्मनी और रोम से भयंकर लड़ाई हुई। जर्मनों ने रोमनों को हरा दिया और उनकी सेना कत्ल कर दी गई। मात्र अकेला जनरल सरटोरियस ही जीवित बच सका। उसने कत्लेआम का शिकार होने की अपेक्षा उफनती रोम नदी में छलाँग लगाकर पार जाने और किसी प्रकार प्राण बचाने की बात सोची। इस प्रयास में उसे लोहे के कवच, ढाल तलवार से लदा होने के कारण अपना और शस्त्रों का भारी बोझ ढोना पड़ा। नदी की धार काटते हुए तैरना पड़ा। इस प्रयास में वह जिन्दगी मौत की लड़ाई लड़ता हुआ पार हुआ और अन्ततः बच ही गया। इसके दस वर्ष बाद उसकी मृत्यु ठीक उसी दिन आश्चर्यजनक ढंग से हुई। पैर फिसला, मोच आई सूजन बढ़ते जाने भर से तीन दिन में मौत हो गई।
मनुष्य और जड़ पदार्थों के साथ घटित होते रहने वाले इन संयोगों की बड़ी लम्बी शृंखला है। ये बताती है कि समष्टि चेतना मानवी व्यष्टि चेतना से तथा पदार्थ जगत से अविच्छिन्न रूप ले जुड़ी हुई है। आदान-प्रदान का क्रम भी इन्हीं के बीच चलता है। अद्भुत नजर आने वाले ये संयोग तो उस प्रक्रिया का आभास भर देते हैं। वस्तुतः ज्ञान उतना ही नहीं है जितना मानव को बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अब प्राप्त है। बहुत कुछ ऐसा है, जिसे अभी जानना शेष है।
“आकल्ट साइन्स इन मेडिसिन” पुस्तक के लेखक हैं- फ्रान्ज हार्टमान। चिकित्सा विज्ञान के मूर्धन्य विद्वानों में इनकी गणना होती है। लेखक ने आधुनिक चिकित्सा के जन्मदाता थियोफ्रेस्टस, पार्सेल्सस और उनकी पुस्तक ‘दि फण्डामेण्डो सेपियेण्टी’ का उल्लेख किया है। पार्सेल्सस अपने समय के प्रख्यात चिकित्सा शास्त्री थे। उनका कहना था कि प्रचलित चिकित्सा प्रणाली ने मनुष्य के स्थूल शरीर (जिसे एनीमल बॉडी का नाम दिया है), की ही जानकारी उपलब्ध की है किन्तु मनुष्य-शरीर में निवास करने वाली चेतन सत्ता की ओर उसने कोई ध्यान नहीं दिया। जो व्यष्टि में होते हुए भी समष्टि के चैतन्य प्रवाहों से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़ी हुई है और भले बुरे प्रवाहों से प्रभावित होती है। पार्सेल्सस का मत है कि मनुष्य की संरचना इतनी सरल नहीं है कि उसे मात्र शरीर के विश्लेषण द्वारा समझा जा सके। न ही स्वास्थ्य और रुग्णता का कारण मात्र स्थूल अवयव है। इनके कारणों में अदृश्य कारणों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उनकी उपेक्षा कर न तो सुस्वास्थ्य का लाभ प्राप्त किया जा सकना सम्भव है और न ही रोगों का वास्तविक कारण तथा निवारण का स्थाई उपचार ढूंढ़ सकना। पार्सेल्सस के अनुसार सामान्य ही नहीं असामान्य, असाध्य शारीरिक तथा अनेकों मनोरोगों को दूर करने के लिये शरीर निदान, मनोविश्लेषण के साथ-साथ अंतर्ग्रहीय प्रवाहों की जानकारी प्राप्त करना अतीव आवश्यक है। क्यों कि पृथ्वी सौरमण्डल के अन्यान्य ग्रहों से जुड़ी है और उनकी गति और और स्थिति से प्रभावित होती है। अस्तु, मानवी स्वास्थ्य मात्र पृथ्वी के वातावरण से नहीं संबंधित है बल्कि अंतर्ग्रही परिस्थितियों से भी जुड़ा हुआ है।” इस सम्बन्ध में विस्तृत प्रकाश डालने वाली उनकी पुस्तक ‘एस्ट्रोनामिया’ कितने ही गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करती है।
पुस्तक में वर्णित तथ्यों के अनुसार शरीर के स्थूल-सूक्ष्म, जड़-चेतन आदि घटकों का सम्बन्ध विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों से सतत् बना हुआ है। सात ग्रहों का तारतम्य इस प्रकार है। ‘शनि’- प्रकृति- पृथ्वी तत्व। इन्द्रिय-गम्य सभी पदार्थ इसके अंतर्गत आ जाते हैं। सूर्य- प्राण का अधिष्ठाता। यह हमारे जीवन में क्रियाशक्ति प्राणशक्ति के रूप में परिलक्षित होता है। चन्द्रमा मनःसंस्थान का स्वामी। यह चिन्तन को हर क्षण प्रभावित करता है। मंगल- इच्छा, वासना, काम से सम्बन्धित है। बुध- मन की विविध क्षमताओं से सूक्ष्म रूप से जुड़ा है। गुरु (बृहस्पति) आध्यात्मिक शक्ति, सम्वेदना, भावना, श्रद्धा को प्रभावित करता है। शुक्र- अंतर्मुखी प्रवृत्तियों को जन्म देता है।
पार्सेल्सस का मत है कि ज्योतिर्विज्ञान मात्र आकाशीय पिण्डों की गति, स्थिति की जानकारी तक सीमित नहीं है वरन् उनका पृथ्वी के वातावरण एवं प्राणियों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन, विश्लेषण और परस्पर आदान-प्रदान से लाभ उठाना भी उसका उद्देश्य है। इस प्रश्न के उतर में यदि अन्यान्य ग्रह पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करते हैं तो उनका प्रभाव सर्वत्र एक जैसा क्यों नहीं दिखता है, पार्सेल्सस का कहना है कि “जिस प्रकार एक ही भूमि पर बोये गए आम, नीम, बबूल अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप गुण धर्मों का चयन कर लेते हैं। सोने की खदान की ओर सोना, चाँदी की ओर चाँदी और लोहे की खदान की ओर लौह कण आकर्षित होते हैं। आकाश में संव्याप्त ईथर तत्व में फैले विभिन्न प्रसारणों में रेडियो मात्र उस स्टेशन की आवाज ग्रहण करता है जहाँ से उसकी सुई का सम्बन्ध जुड़ा होता है। ठीक उसी प्रकार पृथ्वी के जीवधारी विश्व चेतना के अथाह महासागर में रहते हुए भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप अंतर्ग्रही अनुदानों को ग्रहण करते हैं तथा बुरे प्रभावों से प्रभावित होते हैं। उदाहरणार्थ पूर्णिमा के दिन जब चन्द्रमा अपने पूर्ण गौवन पर होता है तो मनःस्थिति पर प्रभाव डालता है। पर यह एक समान नहीं होता है। कमजोर और असन्तुलित मनःस्थिति के व्यक्तियों में इसकी प्रतिक्रिया अधिक दिखाई पड़ती है। अपेक्षाकृत सन्तुलित दृढ़ मनःस्थिति वालों के।
भारतीय ज्योतिष विज्ञान की ही भाँति पाश्चात्य ज्योतिर्विद् तथा चिकित्सा शास्त्री डेविड कान्वे ने अपनी पुस्तक “मैजिक ऑफ हर्ब्स” में मनुष्य के शरीर और उसके विभिन्न भागों पर राशियों, ग्रहों का तारतम्य एवं प्रभाव इस प्रकार दर्शाया है।
मेष राशि के अधिपति ग्रह मंगल शरीर के मस्तिष्कीय क्रिया-कलापों से संबंधित है। वृषभ- अधिपति, ग्रह शुक्र, का सम्बन्ध शरीर के गला-कंठ, मिथुन- अधिपति ग्रह-बुध, सम्बन्ध- हाथ, पाँव, फेफड़ा, कर्क- अधिपति ग्रह- चन्द्र, सम्बन्ध- छाती, पेट, सिंह- अधिपति ग्रह सूर्य, शरीर से सम्बन्ध हृदय, मेरुदण्ड, कुहनी के नीचे, कन्या- अधिपति, ग्रह- बुध, शरीर के अवयव से सम्बन्ध- पेडू, हाथ, आँतें, विसर्जन तन्त्र, तुला- अधिपति ग्रह- शुक्र, शरीर के अवयवों से सम्बन्ध- पीठ का निचला हिस्सा, मूत्राशय तन्त्र, वृश्चिक- अधिपति ग्रह- मंगल, शरीर से सम्बन्ध- पेडू, जननाँग (तन्त्र-प्रजनन तन्त्र), धनु- अधिपति ग्रह- गुरु, शरीर से सम्बन्ध- जाँघ, नितम्ब, जिगर (तन्त्र- हिपेटिक तन्त्र) मकर- अधिपति ग्रह-शनि, सम्बन्ध- घुटने, हड्डियां, कुँभ- अधिपति ग्रह- शनि, सम्बन्ध- चमड़ी, टखना (तन्त्र- रक्ताभिसरण), मीन- अधिपति ग्रह- गुरु, सम्बन्ध- पैर (तन्त्र- नाड़ी संस्थान)।
बोस इन्स्टीट्यूट कलकत्ता के माइक्रोबायोलॉजी के दो वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि सौर विकिरण से वायुमण्डल के जीवाणुओं का भी नियन्त्रण होता है। 16 फरवरी 80 के पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर कलकत्ता के प्रख्यात बोटे निकल गार्डन के वायुमण्डल में बैक्टीरिया, फजाई एवं घातक जीवाणु प्रचुर मात्रा में पाये गए। सूर्यग्रहण के पूर्व और उसके बाद विभिन्न जीवाणुओं का अध्ययन करने पर पाया गया कि सूर्यग्रहण के समय न केवल इनकी संख्या में वृद्धि पाई गई अपितु मारक क्षमता भी अपेक्षाकृत अधिक थी। इस तथ्य की पुष्टि रीवाँ विश्वविद्यालय के विक्रम फिजिक्स सेन्टर और इनवॉयरमेन्टल बायोलॉजी सेन्टर के वैज्ञानिकों के प्रयोगों से हुई। इन वैज्ञानिकों ने देखा कि सूर्यग्रहण के अवसर पर पानी को खुला छोड़ देने पर उसमें विभिन्न प्रकार के विषाणु और जीवाणु वायुमण्डल से आकर उसे विषाक्त कर देते हैं जबकि अन्य अवसरों पर ऐसा नहीं होता।
भारतीय ऋषियों का निर्देश है कि सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय किसी भी प्रकार का आहार ग्रहण ना किया जाये। पानी आदि पीना भी वर्जित है। उस दिन उपवास आदि करने की परम्परा भी सदियों से चली आ रही है। तत्वविद् ऋषि पृथ्वी पर पड़ने वाले अंतर्ग्रही दुष्प्रभावों से परिचित थे तथा यह जानते थे कि ग्रहण के समय खान-पान से शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। अंतरिक्ष से आने वाले दुष्प्रभावों से बचाव के लिये व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर उपासना-साधना के सूक्ष्म उपचार किये जाते थे जो आज भी विभिन्न स्थानों पर व्यक्तिगत स्तर पर छिटपुट रूप में प्रचलित हैं। सूर्य एवं चन्द्रग्रहण के बाद नदियों आदि में स्नान करने की परम्परा है जो पूर्णतया वैज्ञानिक है। वैज्ञानिकों का मत है कि प्रवाहित जल में प्राण ऊर्जा की प्रचुरता होती है। शरीर पर सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण से बढ़ने वाले वायुमण्डलीय विषाणुओं का आक्रमण होता है। स्नान करने से नदी के जल की प्राण ऊर्जा उन्हें मार डालती है। इस अवसर पर उपवास, स्नान, उपासना आदि कृत्यों को कभी महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता था पर नवीन वैज्ञानिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि सभी क्रियायें पूर्णतया वैज्ञानिक सुरक्षा और उपचार की समर्थ माध्यम हैं।
शरीर का स्थूल पक्ष पृथ्वी एवं सम्बन्धित वातावरण से, पर सूक्ष्म घटक अंतरिक्षीय सूक्ष्म चैतन्य प्रवाहों से जुड़ा हुआ है तथा भले-बुरे प्रभावों से प्रभावित होता है। अस्तु, स्थूल अध्ययन, विश्लेषण एवं उपचार के लिये किये जाने वाले प्रयत्नों के साथ-साथ अंतर्ग्रही प्रभावों की जानकारी रखना तथा उपचार के लिये उपाय ढूंढ़ना भी आवश्यक हो जाता है। कहना न होगा यह समग्र जानकारी अध्यात्म सम्मत ज्योतिर्विज्ञान द्वारा ही सम्भव है।
आयु का शरीर पर प्रभाव पड़ता तो है, पर उस प्रभाव को ऐसा नहीं कहा जा सकता जिससे उसकी कार्य क्षमता ही समाप्त हो जाये। हल्के और भारी काम करने की सामर्थ्य एक बात है और सर्वथा अशक्तता दूसरी। जिसमें मनुष्य को दूसरों पर आश्रित रहना पड़े अपनी शरीर चर्या अपने अपने द्वारा न बन पड़े तो उसे असमर्थता कहते हैं। ऐसी स्थिति तक पहुँचने जैसी मनुष्य की काय संरचना है नहीं। यह अभिशाप ईश्वर प्रदत्त नहीं, मनुष्य का स्वउपार्जित है।
मानवी सत्ता दो भागों में बंटी हुई है एक काया दूसरी चेतना। दोनों के मिलने से ही मानवी अस्तित्व का समग्र स्वरूप बनता है। इन दोनों के मध्य परस्पर सघन संबंध ही एक का दूसरे पर सुनिश्चित और गम्भीर प्रभाव पड़ता है। मतभेद का विषय इतना ही रह गया है कि इनमें से कौन वरिष्ठ और कौन कनिष्ठ है। सर्वसाधारण की मान्यता यह है कि शरीर के साथ ही मन घटता, टूटता, हारता और मरता है। जबकि विशेषज्ञ अपना भिन्न मत प्रकट करते देखे गए हैं कि शरीर पर मन का नियन्त्रण ही सुनिश्चित तथ्य है इसलिये यह माना जाना चाहिये कि मन का स्तर ही शरीर की समर्थता और असमर्थता के लिये बहुत हद तक उत्तरदायी है। इसमें अपवाद इतना ही है कि प्रकृति की सामान्य विधि-व्यवस्था के अनुसार समय के साथ-साथ शरीर भी बढ़ता और घटता है।
शरीर का बुढ़ापा चमड़ी पर झुर्रियाँ पड़ने, दाँत उखड़ने, बाल सफेद पड़ने, घुटने और कमर जकड़ने जैसे चिन्ह देखकर जाना जा सकता है, पर मन के बुढ़ापे से दूसरे ही प्रकार के लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। आकांक्षाओं का सकुल जाना, निराश रहना, दोस्तों का अभाव दीखना, काम में मन ऊबना जिनमें दिख पड़े समझना चाहिये कि मन के बुढ़ापे ने घेर लिया। शरीर और मन का बुढ़ापा आमतौर से साथ-साथ आता है, पर यह आवश्यक नहीं और न अनिवार्य ही। शरीर प्राकृत पदार्थों का बना है इसलिये उस पर नियति व्यवस्था का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, किन्तु चेतना प्रकृति का गुलाम नहीं है। उसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता है वह चाहे तो अपने विचार तन्त्र को मरण काल तक सुरक्षित रख सकती है और उसे बुढ़ापे के चिन्हों से बचाये रख सकती है।
शरीर शिथिल पड़ने से इतना ही हो सकता है कि कठोर परिश्रम न बन पड़े। पर इससे क्या, मेहनत की दृष्टि से हल्के समझे जाने वाले काम भी ऐसे हो सकते हैं जो मजूरी की तुलना में कहीं अधिक ऊंचे स्तर के हैं। उन्हें हल्के-फुल्के ढंग से करते रहने में किसी वयोवृद्ध को भी कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये। इस प्रकार व्यक्ति मरण काल तक उत्पादक और श्रम रत बना रह सकता है। थकान काम करने से नहीं, निठल्ले बैठने, काम सामने न रहने से आती है। ऊब सबसे अधिक थकाने वाला भार डालती है। इस ऊब का कारण अनिच्छित काम का दबाव रहना या खाली बैठना ही होता है। समय काटने के लिये निरुद्देश्य खटपट की निरर्थकता समझदारी की पकड़ में आ जाती है और उस बाल-क्रीड़ा से वे लोग उद्विग्न होने लगते हैं जिनने पिछला युवावस्था वाला समय व्यस्तता और उत्कंठा के सहचरत्व में गुजारा है। यही असली बुढ़ापा है। शरीर पर झुर्री डालने वाली जरा-जीर्णता तो एक छोटा चिन्ह है। इतना छोटा जिसकी उपेक्षा भी की जा सके। जिसके कारण उत्पन्न हुई कमजोरी की हल्के कामों के साथ तालमेल बिठाकर उत्साह भरी क्रियाशीलता को जीवन्त बनाये रखा जा सके।
आदमी का महत्व जब उसकी अपनी दृष्टि में घट जाय, जब वह अपने को असमर्थ और निरर्थक समझने लगे तो समझना चाहिये कि उसे सचमुच ही बुढ़ापा मौत का चचेरा भाई है। दोनों के बीच दोस्ती भी है। जहाँ एक को पहुँचना होता है वहां दूसरे को इशारों से न्यौत बुलाता है। शरीर बूढ़ा होने पर सावधानी बरतने पर मन को जवान बनाये रखा जा सकता है।
कहते हैं कि बच्चे भविष्य की सोचते हैं। बुड्ढे भूतकाल की राम कहानी कहते रहते हैं और जवान वर्तमान की समस्याओं के समाधान में व्यस्त रहते हैं। पर उन्हें किस श्रेणी में माना जाये जो भूतकाल के गुण गाते रहते हैं और भविष्य को अन्धेरे से घिरा देखते रहते हैं। भूत वापस नहीं आ सकता। भविष्य के संबंध में हथियार ही डाल दिये गये फिर वर्तमान का नीरस और बोझिल होना स्वाभाविक है। जिन्हें ऐसे असमंजस में रहना पड़ रहा है उन्हें मौत की गोद में ही राहत मिल सकती है। विधि का विधान इन निराश्रितों की मनोकामना भी पूरी करता है और भगवान जल्दी बुला ले की उनकी मुखर या मौन प्रार्थना को स्वीकार कर लेता है। मौत भी आखिर छप्पर पर से तो नहीं कूदती उसका तरीका भी घुटन के घुन दीमक लगाकर खोखला करने और अन्ततः धराशायी करने का है। वृद्ध जन इच्छा अनिच्छा से इसी रस्से में अपने हाथ-पैर बाँध वाले और अंधकार के गहरे गर्त में गिरने के लिये घिसटते या घसीटे जाते गतिशील रहते हैं।
भविष्य से भयभीत रहने वाले, जिम्मेदारियाँ उठाने से इन्कार करने वाले, अपनी दृष्टि से अपना मूल्य गिरा लेने वाले व्यक्ति वस्तुतः बूढ़े हैं, फिर भले ही आयु की दृष्टि से युवा ही क्यों न हों। कितने व्यक्ति जवानी में भी जीर्ण-जीर्ण पाये जाते हैं जबकि कितने ही वयोवृद्धों पर जवानी छाई रहती है। न उनकी हिम्मत कम पड़ती है और न बहादुरी को कोई आँच आती है। आयु बढ़ने की यह अलामते नहीं है। यह सब तो मानसिक बुढ़ापे के चिन्ह हैं। इसी से अधिकाँश लोग घिरे देखे जाते हैं।
जो अशुभ ही सोचता है। हारने की आशंकाएँ करता रहता है। जिसे भविष्य पर विश्वास नहीं, जिसका आत्म विश्वास खोखला है, जो पराक्रम करने से डरता है, समझना चाहिये उसने बुढ़ापे के साथ अपना गठबन्धन कर लिया। ऐसा गठ जोड़ जिसके सहज टूटने की भी सम्भावना नहीं है।
बुढ़ापे में शरीर का वजन घट सकता है और दूर तक देख सकने की क्षमता में कमी आ सकती है, पर यह नहीं हो सकता कि इस कारण किसी की सृजन शक्ति घट जाये। कल्पनाएँ बचपन से प्रारंभ होती हैं और मरते दम तक साथ देती हैं। यही है वह क्षमता जो मनुष्य की बुद्धिमता, प्रतिभा और गरिमा को विकसित करती है। बुढ़ापे में इसे घटना नहीं वरन् संचित अनुभवों के आधार पर और अधिक बढ़ना चाहिये।
जीन मेसफिल्ड कहते थे- मनुष्य की सृजन शक्ति बुढ़ापे के कारण क्षीण नहीं होती वरन् तब होती है जब उसकी कमी होने से स्व रचित अन्धविश्वास में घिरता चला जाता है। जब कोई कहता है कि मेरी क्षमता चुक गई तभी वस्तुतः वैसी स्थिति पैदा होती है। यदि कोई अनुभव करता रहे कि उसकी मौलिक क्षमता यथावत् विद्यमान है और मात्र अंग अवयव ही आयु के अनुसार ढीले पड़े हैं तो ऐसा व्यक्ति उम्र के बढ़ते जाने पर भी बूढ़ा ना होगा।
एडीसन ने लिखा है- जंग लोहे को खा जाती है। शीत में पानी जम जाता है। इसी प्रकार हिम्मत हार जाने की मनःस्थिति में मनुष्य वस्तुतः असमर्थ हो जाता है।
सिसरो ने इस मान्यता को गलत बताया है कि बुढ़ापे में स्मरण शक्ति चली जाती है। वे कहते हैं मैंने ऐसा कोई बूढ़ा नहीं देखा जो जमीन में गढ़े धन की संख्या या स्थान भूल गया हो। विस्मृति उन बातों की होती है, जिनमें दिलचस्पी नहीं होती जो बेकार प्रतीत होती हैं। क्या जवानी व बुढ़ापे का विस्मरण कारण एक ही है-दिलचस्पी का कम होना। यह कमी उन प्रसंगों में पड़ती है उन्हें महत्वहीन समझा जाता है। जिन्हें महत्वपूर्ण समझा जायेगा उनके सम्बन्ध में विस्मरण होने जैसी कोई कठिनाई उत्पन्न नहीं होगी। मनुष्य अपने समीपवर्ती व्यक्तियों, पदार्थों या उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करते हैं और विस्मृति पर दोषारोपण करते हैं।
सुकरात की बौद्धिक क्षमता 71 वर्ष की आयु में भी ठीक वैसी ही थी जैसी कि 40 वर्ष पूर्व की आयु में। मिल्टन की अधिक प्रख्यात और वजनदार कविताएँ उसने 60 वर्ष के होने के उपरान्त लिखी थी।
मावटियर कालिन्स कहा करते थे- “समय आदमी के शरीर को चुनौती दे सकता है, किन्तु वह इतना प्रबल नहीं है कि उसके आगे जीवट को हार माननी पड़े।”
सेमुआल जेन्सन के अनुसार सृजन की सामर्थ्य सृष्टि के आदि में आरम्भ हुई और मनुष्य को ईश्वर को विरासत के रूप में मिली। कौन है जो उसे छीन सके। फिर बेचारे बुढ़ापे की क्या विसात जो किसी को सृजन प्रयोजन में आजीवन संलग्न रहने से रोक सके। यह कर सकना तो बुढ़ापे के बस की बात भी नहीं है।
डा. सी.वाय कैम्पटन कहते थे- आज का आदमी स्वाभाविक मौत नहीं मरता वह अपने हाथों धीरे-धीरे आत्म-हत्या करते रहने में लगा रहता है।
यह धीमी आत्महत्या क्या है? इसका उतर है अवयवों की कार्यक्षमता का अस्वाभाविक रूप से- अनावश्यक तेजी से ह्रास। ऐसी घटोत्तरी का प्रकृति व्यवस्था में कोई स्थान नहीं। यह मनुष्य का अपना ही कर्तव्य है भले ही वह जानबूझ कर किया गया हो यह अनजाने ही चलता रहा हो। यह ख्याल सही नहीं है कि अधिक काम करने से आदमी जल्दी मरता है। यह बात अतिवाद बरतने के संबंध में ही सही हो सकती है वस्तुतः अस्त-व्यस्तता, अनियमितता प्रकृति नियमों के प्रति बरती गई उपेक्षा, अवज्ञा ही शक्ति क्षय का आधारभूत कारण होती है।
9 वीं सदी से लेकर 16 वीं सदी तक रसायन वेत्ताओं ने पारे को माध्यम बनाकर दो प्रयोगों पर अपना ध्यान विशेष रूप से केन्द्रित रखा है और सफलता पाने के लिये उन दोनों से जो सम्भव था वह सब कुछ किया है। एक प्रयत्न है तांबे और पारे के संयोग से सोना बना लेना। दूसरा है कि कोई औषधि बना लेना जिससे मनुष्य अमर न सही चिर यौवन का आनंद प्राप्त कर सके- बुढ़ापे को युवावस्था में बदल सके। इस सम्बन्ध में सफलताओं की चर्चा में कितनी ही किम्वदंती तो सुनी जाती हैं किन्तु ऐसे सुनिश्चित प्रमाण नहीं हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि इस प्रयत्न में कोई कहने लायक सफलता मिली। अभी भी उस शृंखला के छुटपुट प्रयत्न चलते रहते हैं और उनकी सफलता में आशा उत्साह भरने वाली कई किम्वदंतियां सुनने को मिलती हैं किन्तु प्रमाणों के अभाव में विज्ञ समाज ने उस दिशा में अधिक प्रयत्न करने में रुचि नहीं ली।
वृद्धता के पर्यवेक्षण का अब एक स्वतन्त्र विज्ञान ही विकसित हो गया है। उसका नाम है- जेरेंटोलॉजी उसमें कलपुर्जों का घिस सकना, ताजगी का कठोरता में बदल जाना तथा कोशाओं की क्षतिपूर्ति न हो पाना प्रकृति क्रम के अनुरूप कारण बताया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि वृद्धता में मानसिक मान्यताओं का बड़ा योगदान है। कोई व्यक्ति बुढ़ापे की बात अधिक सोचे तो उसे समय से पूर्व ही जीर्ण-जीर्ण होना पड़ेगा। इसके विपरित इसके विपरित यदि कोई अपने को युवक मानता रहे और भविष्य को युवकों जैसा होने पर विश्वास करे तो यौवन की अवधि लम्बी हो जायेगी और बुढ़ापा धीरे-धीरे आयेगा- गहरा न होगा और वैसा कष्ट न देगा जैसा कि मानसिक वृद्धता से ग्रसित लोगों को देता है।
अधिक तापमान में रहने वाले अथवा भीतरी क्षेत्र में उत्तेजना उत्पन्न करने वाले लोग प्रायः आत्म जीवी होते हैं। उनकी तुलना में ठंडे क्षेत्रों में रहने वाले तथा आहार-विहार एवं चिन्तन में ठंडक को स्थान देने वाले देर तक जीवित रहने वाले पाये गए हैं। शरीर पर हल्का-फुल्का दबाव रहे और मानसिक स्थिति हंसने-हंसाने जैसी बनी रहे तो लम्बी आयुष्य संभव होती है। उद्विग्न और असंतुष्ट व्यक्ति जल्दी मरते हैं। यह मानसिक दबाव बीमारियों की तरह ही काया को घुलाता है और समय से पूर्व मरने की परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है।
लम्बी और गहरी साँस लेने की आदत से फेफड़े मजबूत बनते हैं और अधिक आक्सीजन मिलती है। इस संदर्भ में बरती गई सावधानी आयु की लम्बाई बढ़ा देती है जबकि झुककर बैठे रहने वाले श्रम न करने वाले उथली साँस लेते हैं फेफड़े आशक्त होते जाते हैं साथ ही आक्सीजन न्यून मात्रा में मिलने के कारण पोषण की कमी और जिन्दगी का वृद्धि का क्रम चलते रहने के कारण भी अकाल मृत्यु का संकट उत्पन्न होता है। बुढ़ापा इसी का पूर्व सन्देश है। परिश्रम न करने वाले आलसी या अमीर- श्रमजीवियों की तुलना में अधिक जीते हैं। तर्क यह दिया जाता है कि कम परिश्रम करने से शक्ति का व्यय कम होगा और सामर्थ्य का भण्डार भरा रहेगा। यह प्रतिपादन अतिशय- सामर्थ्य से कहीं अधिक श्रम करने पर ही लागू होता है। सामान्यतया भीतरी और बाहरी अवयवों का क्रिया-कलाप गतिशील रखने के लिये श्रम संलग्न रहने की भी आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना पुर्जे अपनी स्वाभाविक क्षमता गंवाते चले जाते हैं और जंग खाये हुए लोहे की तरह निरर्थक बन जाते हैं। अशक्ति का यह भी एक बड़ा कारण है।
वैज्ञानिकों ने यह विश्वास व्यक्त किया है कि थकान के कारण जिनकी मृत्यु हुई है उनके मृत शरीर को लम्बी अवधि तक शीत तापमान में सुरक्षित रखा जाये तो उपयुक्त अवधि तक विश्राम पाने के उपरान्त मृतक जीवित हो सकते हैं। उन्हें इसी काया में पुनर्जन्म मिल सकता है।
इस विश्वास का परीक्षण करने के लिये कितने ही अमीर अमेरिकियों ने अपने शरीर को मृतक होने पर सुरक्षित रखे जाने की व्यवस्था की है। लम्बे समय तक शीत प्रबन्ध करने तथा देखभाल की व्यवस्था बनाने में प्रायः 90 हजार डालर खर्च बैठता है। बीस अमेरिकी ने समय से पूर्व ही यह राशि इस प्रयत्न में संलग्न वैज्ञानिकों को सौंप दी। इनमें जो मर चुके उनके शव निर्धारित योजना के अनुरूप शीत भण्डार में यथावत रख भी दिये गए हैं।
कनाडा के मूर्धन्य शरीर विज्ञानी एल्विन टॉफलर ने एक असाधारण मृत्यु का सविस्तार वर्णन किया है और उससे निकले निष्कर्षों को बहुत गम्भीरता से लिया है और समूची मनुष्य जाति के लिये एक चेतावनी के रूप में प्रस्तुत किया है।
कुछ दिन पूर्व कनाडा में एक 11 वर्षीय बालक की कुछ अनोखे रूप में मृत्यु हुई, न गम्भीर बीमारी में ग्रसित हुआ न कोई अन्य ऐसे कारण देखे गए जिससे इस छोटी आयु में अकारण मृत्यु हुई। चिकित्सकों के लिये यह आश्चर्य का विषय था। शब्दच्छेद हुआ। पाया गया कि लड़का असमय की वृद्धता का शिकार होकर मरा है। उसमें वे सभी लक्षण उभर आये थे जो 80-90 वर्ष के जरा जीर्णों में मृत्यु से पूर्व स्वाभाविक रूप से देखे जाते हैं। भीतर ही भीतर उसका हर अवयव जीर्णता ग्रस्त जर्जर हो गया था।
कनाडा के मूर्धन्य शरीर शास्त्रियों पर इस बीमारी को “प्रोजीरिया” अर्थात् समय से पूर्व का बुढ़ापा नाम दिया और इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए व्यापक जाँच-पड़ताल की कि कहीं यह बीमारी गुपचुप अन्य शरीरों में प्रवेश नहीं कर रही है। अनेक चिकित्सकों ने अपने-अपने रोगियों की जाँच-पड़ताल की तो पाया कि जवानी में मनुष्य को जिन विशेषताओं से भरा-पूरा होना चाहिये उनमें भारी कमी पड़ रही है और असमय की वृद्धता का प्रवेश उन अनेक शरीरों में हो रहा है जो बाहर से देखने में सामान्य प्रतीत होते हैं।
डा. एल्विन ने इस संदर्भ में सुविस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है और कहा है कि यह बढ़ता हुआ मर्ज अगले दिनों समूचे मनुष्य समुदाय को अपनी चपेट में ले सकता है। चिकित्सकों के पास इसका कोई उपचार भी न होगा।
क्योंकि यह किसी बाहरी आक्रमण का प्रतिफल नहीं है। यह प्राकृतिक जीवन के व्यतिक्रम का ही परिणाम है जिसके दबाव से स्वाभाविक जीवनी शक्ति का बेतरह ह्रास होता है और अवयवों को उपयुक्त पोषण विश्राम न मिलने के कारण वे थकते टूटते चले जाते हैं।
वे कहते हैं बढ़ती हुई व्यस्तता, उद्विग्न, विलासिता और एकाकी जीवन के कुचक्र में लोग फंसते जा रहे और अपने अस्तित्व तक को विस्मरण किये दे रहे हैं। यही क्रम चलता रहा तो लोग असमय वृद्ध होते और अकाल मृत्यु के शिकार होते चले जायेंगे। यह वंशानुक्रम के आधार पर नई पीढ़ियां वृद्धता साथ लेकर ही जन्म लेंगी।
भारतीय संस्कृति के संस्कारों को संस्कृति कह सकते हैं। प्रकृति पदार्थ अनगढ़ स्थिति में होते हैं उन्हें सुरम्य, सुव्यवस्थित एवं उपयोगी बनने के लिए उन्हें संस्कारित किया जाता है। लोहा जमीन से जब निकलता है तब विशुद्ध न होकर मिट्टी मिला होता है उसे आग में तपाकर शोधित किया जाता है। हीरा खरीदा जाता है। कच्ची धातुएँ से उपयोगी औजार उपकरणों के रूप में परिवर्तन करने की प्रक्रिया भी ऐसी ही है। विष को अमृत बनाने वाली रासायनिक पद्धति के सम्बन्ध में भी यही कहा जायगा।
जन्मतः सभी नर पशु होते हैं उन्हें सभ्य, सुसंस्कृत, महान देव बनाने का कार्य जिस रीति-नीति को अपनाने से सम्भव होता है उसे संस्कार पद्धति ही नाम दिया जायगा। अपनी धर्म परम्परा में जन्म से लेकर मरण पर्यन्य पुंसवन से लेकर अन्त्येष्टि तक मनुष्य को सोलह बार निर्धारित कर्मकाण्डों के अनुसार संस्कारित किया जाता है। उन प्रेरणाओं के अनुरूप साधन जुटाते एवं अनुशासन रखने से ही सामान्य को असामान्य- नर पशु को देव मानव बनने का अवसर मिलता है। वस्तु का जितना महत्व है उससे अधिक उसकी प्रस्तुत क्षमता सुन्दरता उभारने वाली कुशलता कलाकारिता की है। यह है संस्कृति का चमत्कार। जो मानवी कलाकारिता के संपर्क में आने वाले प्रत्येक पदार्थ या प्राणी में दृष्टि गोचर होता है। इसी को परिष्कार की प्रक्रिया कहते हैं।
अग्नि प्रज्ज्वलन मनुष्य की सामान्य आवश्यकता एवं कुशलता है। इसके सहारे भोजन पकाने से लेकर कारखाने चलाने तक के अनेकानेक कार्य सर्वत्र सम्पन्न होते रहते हैं। इसी सामान्य को असामान्य बनाने की पद्धति अग्निहोत्र है। अग्नि प्रज्ज्वलन और अग्निहोत्र का मौलिक अन्तर एक ही है एक अनगढ़ प्राकृत होता है दूसरे में प्रयुक्त होने वाला प्रत्येक उपकरण संस्कारित किया जाता है। संस्कारित- अर्थात् अध्यात्म विज्ञान के आधार पर भाव सम्वेदना एवं चेतन ऊर्जा द्वारा किया गया अनुप्राणित है। इस आधार पर सामान्य जड़ पदार्थों को भी दिव्य क्षमता सम्पन्न बनाया जाता है और उससे उसी स्तर का काम लिया जाता है।
प्रसाद, पंचामृत, चरणोदय, यज्ञोपवीत, प्रतिमा आदि का भौतिक बाजारू मूल्य नगण्य है। पर उन्हें उच्चस्तरीय भावनात्मक प्रयोग प्रक्रिया द्वारा दिव्य बनाया जाता है। अभिमन्त्रित करना इसी को कहते हैं। इसमें मात्र मन्त्रोच्चार से ही काम नहीं चलता वरन् और भी ऐसे कितने ही भाव पक्ष जुड़ते हैं जिनके कारण जड़ वर्ग की वस्तुएँ सचेतन से भी एक कदम आगे बढ़कर देव वर्ग में गिनी जाने योग्य बन जाती हैं। तब उनका प्रभाव भी वैसा ही होता है। प्रतिभा में प्राण प्रतिष्ठा करने से लेकर- अभिमन्त्रित वस्तुएँ आशीर्वाद वरदान देने तक का सुविस्तृत अनुदान प्रकरण इसी तथ्य पर टिका हुआ है कि प्रयुक्त वस्तुएं कितनी प्रखरता के साथ अनुप्राणित की गईं।
यज्ञ का तत्वज्ञान यहीं से आरम्भ होता है। अग्नि प्रज्ज्वलन से तो गर्मी भर पैदा की जा सकती है। जलाने पकाने से जो लाभ-हानि मोटेतौर पर हो सकती है उस परिणाम का पता लगाया जा सकता है। पर जब अग्निहोत्र की देव सत्ता का- दिव्य ऊर्जा उत्पादन की संज्ञा मिलती है तो निश्चय ही उसमें उन विधि-विधानों का चमत्कार होता है जो मात्र क्रिया-कृत्य न होकर भाव सम्वेदनाओं से भरे होते हैं और उनका सूत्र संचालन उत्कृष्ट स्तर की जीवन पद्धति अपनाने वाले याजक वर्ग द्वारा होता है। अभिमन्त्रण की शास्त्रीय परम्परा में देवत्व का समावेश करने वाला रहस्य उस संस्कार प्रकरण में ही खोजा जा सकता है जो यजन कृत्य के हर छोटे-बड़े उपकरण या कर्मकाण्ड के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा होता है। यदि उस प्राण प्रतिष्ठा की उपेक्षा की जाय और मात्र अग्नि में सुगन्धित पदार्थ भर होमे जाते रहे तो उसका प्रतिफल उतना ही होगा जितना कि अगरबत्तियों का एक गट्ठा अँगीठी पर रखकर जला देने का।
सुसंस्कारी अग्नि, समिधा, हविष्य, उपकरण, सम्बद्ध व्यक्ति एक निर्धारित पद्धति के अनुरूप संस्कारित किया जाता है। इसमें मन्त्रोच्चार से लेकर अनेक निर्धारित क्रिया-कृत्यों का समावेश करना होता है और वह कार्य बाजारू लोग नहीं ब्राह्मणोचित जीवनचर्या अपनाने वाले पुरोहित द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए सच्चे अर्थों में अग्निहोत्र हो रहा है और उसका निर्धारित प्रतिफल मिलने का आधार बन रहा है।
देव संस्कृति में हर वस्तु को संस्कारित करने पर जोर दिया गया है। स्नान जल, परोसा भोजन, शयन, जागरण आदि सभी को संस्कारवान बनाने की विधिव्यवस्था निर्धारित है और उसी को नित्य कर्म विधि कहते हैं। देव पूजा में तो प्रतिमा से लेकर उपचार सामग्री तक की दिव्यता सम्पन्न बनाने के लिए मन्त्र पाठ एवं दूसरे कृत्य करने पड़ते हैं। उससे पूजा कृत्य भावनात्मक ऊर्जा से भरा-पूरा बनता है और देखने में खिलवाड़ जैसा लगने पर भी महान परिणामों का आधार बनता है।
यज्ञाग्नि चूल्हे या अलाव में से निकालकर नहीं लाई जाती थी वरन् विधि-विधान के साथ आरणि मन्थन से उत्पन्न की जाती थी। यजन कृत्य के लिए प्रयुक्त होने वाली अग्नियाँ कर्मकाण्डी ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा अखण्ड सुरक्षित एवं नित्य यजन द्वारा परिपुष्ट रखी जाती थी। उन्हीं को यज्ञ कार्यों में उपयोग किया जाता था। आह्वानीय, गाहिपत्य, दक्षिणाग्नि यह तीन अग्नियाँ व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं विश्व कल्याण के देव प्रयोजनों के निमित्त प्रयुक्त होती थीं। इन्हें सुरक्षित रखने तथा यजन द्वारा परिपुष्ट करते रहने वाले अग्निहोत्री शास्त्रों में ‘अहिताग्नि’ नाम से सम्मानित किये गए हैं और देव कृत्यों में उन्हें प्रमुखता प्रधानता देने का निर्देश किया गया है। अग्नि स्थापन, प्रज्ज्वलन, यजन, स्वाष्टकृत पूर्णाहुति, वसोधारा आदि की आहुतियों में विशेष मन्त्रोच्चार एवं विधि-विधान अपनाना पड़ता है। इसे संस्कार प्रकरण ही समझा जाना चाहिए।
जिस भूमि पर यज्ञ किया जाय। जहाँ वेदी या कुण्ड बनाया जाय। वहाँ भूमि शोधन संस्कार करना होता है। शास्त्रों में आया है कि भूमि की शुद्धि संमार्जन (स्वच्छ झाड़ देने), प्रोक्षण दूध, गोमूत्र या जल छिड़कने या धोने), उपलेपन (गोबर से लीपने), अवस्तरण (कुछ मिट्टी को ऊपर डाल देने) एवं उल्लेखन (मिट्टी को कुछ खुरचकर निकाल देने) से हो जाती है। जब ये विधियाँ भूमि की स्थिति के अनुसार प्रयुक्त होती हैं तो उस प्रकार की अशुद्धि दूर हो जाती है।
“भमस्तु संमार्जन प्रोक्षणोपलेपनावस्तरणोल्लेखनेर्यथा स्थान दोषविशेषात्प्रायत्यम्। (बा. घ. सू. 1। 5। 66)।
यही बात वशिष्ठ (3। 56) में भी आती है। एक अन्य स्थान पर बौधा. ध. सू. (1। 6। 17-21) में आया है- जब कठोर भूमि अशुद्ध हो जाय तो वह उपलेपन (गोबर से लीपने) से शुद्ध हो जाती है, नरम (छिद्रवती) भूमि कर्षण (जोतने) से शुद्ध होती है (अशुद्ध तरल पदार्थ से) भींगी भूमि प्रच्छादन (किसी अन्य स्थान से शुद्ध मिट्टी लाकर ढँक देने से) और अशुद्ध पदार्थों को हटा देने से शुद्ध हो जाती है।
वशिष्ठ (3। 57) ने बौधायन के समान पाँच शुद्धि साधन दिये हैं। मनु (5। 124) ने भी पाँच साधन दिये हैं- झाडू से बुहारना, गोबर से लीपना, जल-छिड़काव, खोदना (एवं निकाल बाहर करना) और उस पर (एक दिन एवं रात) गायों को रखना। विष्णु. (23। 57) ने छठा अन्य भी जोड़ दिया है, यथा- दाह (कुछ जला देना)। याज्ञ. (1। 88) ने दाह एवं काल जोड़कर सात साधन दिये हैं। वामन पुराण (14। 68) के अनुसार भूमि की अशुद्धि का दूरी करण खनन, दाह, मार्जन, गोक्रम (गायों को ऊपर चलाना), लेपन, उल्लेखन (खोदना) एवं जलमार्जन से होता है-
भमिर्विशुध्यते खातदाहमार्जन गोक्रमै। लोपादुल्लेखनात्सेकाद्वेश्म संमार्जनार्चनात्॥ (वामन पुराण 14। 68)
देवल (मिता. एवं अपरार्क, याज्ञ 1। 88) ने विस्तृत विवरण उपस्थित किया है। उनके मत से अशुद्ध भूमि के तीन प्रकार हैं, अमेध्य (अशुद्ध), दुष्ट एवं मलिन। जहाँ प्रजनन कृत्य हो, कोई मरे, या जलाया जाय या जहाँ कुकर्मी रहें या जहाँ दुर्गन्ध युक्त वस्तुओं, विष्ठा आदि की ढेरी आदि हो, जो भूमि इस प्रकार गन्दी वस्तुओं से भरी हो उसे अमेध्य घोषित किया गया है। जहाँ कुत्तों, सूअरों गधों एवं ऊँटों के निवास वाली भूमि दुष्ट कही जाती है।
इसके उपरान्त देवल ने इन भूमि प्रकारों की शुद्धि की चर्चा की है। शुद्धि पाँच प्रकार की होती है, यथा खनन, दहन, अवलेपन, वापन (मिट्टी से भर देना) एवं पर्जन्य वर्षण। इन पाँचों द्वारा अमेध्या (अनुपयुक्त) भूमि की शुद्धि की जा सकती है इन्हीं विधानों का संकेत महर्षि देवल ने इस प्रकार किया है- “दहनं खननं भूमेखलेपन वापन। पर्जन्य वर्षणं चेति शैचं पंचविधं स्मृतम्॥ पंचधा वा चतुर्धा वा भूरमेध्या विशुध्यति। द्विधा त्रिधा वा दुष्टा तु शुध्यते मलिनैकधा॥ देवल (शु. कौ.)।
यज्ञ उपकरणों में स्रुवा, स्रुचि, प्रणीता, प्रोक्षणी, आज्य स्थली चरुस्थली आदि का प्रयोग होता है। उन्हें काष्टकार से खरीदकर ऐसे ही प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। इन्हें आरम्भ में तो देव प्रयोजन में प्रयुक्त हो सकने का कृत्य करना ही पड़ता है। हर यज्ञ में उन्हें प्रयुक्त करते समय अग्नि संस्कारित करना होता है। इन्जेक्शन की पिचकारी की तरह इनका भी परिशोधन आवश्यक माना गया है। इसका निर्देशन सूत्र ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर हुआ है। शतपथ के संस्काराध्याय में समिधाओं को संस्कृत करने के लिए उसके धोने- अभिसिंचित करने का विधान है-
‘प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्ते। स इध्ममवाग्रे प्रोक्षति ‘कृष्णोऽस्याखरेष्टोऽग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि’ - इति। तन्मेध्यमवैतदग्नये करोति॥1॥ (शतपथ 1 काण्ड। 3 अध्याय। 3 ब्राह्मण)
अर्थात्- ‘अध्वर्यु, प्रोक्षणी को लेता है। वह अध्वर्यु कृष्णस्याऽखरेष्ठोऽग्नये श्त्यादि मन्त्र बोलते हुए समिधाओं का अभिसिंचन करता है। इस प्रोक्षण कर्म द्वारा समिधाओं को यज्ञ-कर्म के अनुरूप संगमनीय पावन और पवित्र बनाया जाता है।’
मार्जनं यज्ञपात्राणं पाणिना यज्ञकर्मणि। चमसानां ग्रहाणां च शुद्धि प्रक्षालनेन तु॥ चरुणां स्रक् स्रवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिण। स्फ्य शूर्प शकटानां च मूसलोलूखयस्य च॥ (मनु. 5। 116-117)
अर्थात्- यज्ञ कर्म में यज्ञ पात्रों की शुद्धि हाथ द्वारा मार्जन करने से और चमस तथा ग्रह नाम के पात्रों की शुद्धि जल के धोने से होती है। चरु तथा स्रुक् और स्रुवा आदि यज्ञ पात्रों की शुद्धि गरम जल से और स्फ्य, शूर्प, शकट, मुसल और ओखली की शुद्धि जल के प्रक्षालन से होती है।’
याज्ञवल्क्य स्मृति में भी कहा है-
‘मार्जनं यज्ञपात्राणाँ पाणिना यज्ञकर्मणि।’ (आचाराध्याय, 185)
अर्थ- ‘यज्ञ-कर्म में यज्ञ पात्रों की शुद्धि दाहिने हाथ से कुशा द्वारा मार्जन करने से ही हो जाती है।’
स्वच्छता का उपयोग सर्वत्र होना चाहिए। अस्पतालों, भोजनालयों में जिस प्रकार सफाई का ध्यान रखा जाता है। उसी प्रकार यज्ञ कृत्य की प्रत्येक वस्तु तथा विधि-व्यवस्था में इस प्रकार का ध्यान रखा जाय। स्नान, शुद्ध वस्त्र धारण की मर्यादा में जहाँ स्वच्छता को आवश्यक बताया गया है वहाँ याजक को अभिमन्त्रित जल से नहाने या ‘दश स्नान’ पद्धति के अनुसार सुसंस्कारित बनाने का विधान है। स्नान के सम्बन्ध में तो और भी स्पष्ट निर्देश है:–
अस्नात्वानाचरेत्कर्म जप होमादि किंचन। - धर्म सिन्धु
अर्थात्- बिना स्नान किये जप, होम आदि नहीं करने चाहिए।
स्वच्छता और सुसंस्कारिता के समन्वय से यज्ञ की विधि-व्यवस्था देव प्रयोजन के अनुरूप बनती और अपना सत्परिणाम प्रस्तुत करती है। यही वह रहस्य है जिसे समझने और अपनाने पर शास्त्रकारों ने बहुत जोर दिया है और अभीष्ट फल प्राप्त करने के लिए इस मर्म को विस्मृत न होने देने का निर्देशन किया है।
वाणी का उपयोग सामान्यतः जानकारियों के आदान प्रदान तक ही सीमित है। इस आदान-प्रदान में शब्द ही उच्चारित होते हैं। शब्दों को वाणी का प्राण कहा जा सकता है अन्यथा अकेले वाणी कुछ भी करने में, कोई भी जानकारी दे पाने में असमर्थ ही है। शब्द या ध्वनि सुनकर ही कई बातों का पता चलता है। पैरों की चाप ध्वनि के रूप में होती है, जिसे सुनकर पता चलता है कि अमुक प्राणी आ रहा है। बादलों की गड़गड़ाहट, हवा की सनसनाहट, पत्तों की खड़खड़ाहट सुनकर बिना देखे भी बहुत कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। मुंह की आवाज सुनकर यह पता चलता है कि यह शब्द किस प्रणी का है? और वह कहाँ है? बातचीत से घटनाओं, परिस्थितियों एवं समस्याओं की जानकारी मिलती है। सामान्यतया शब्दोच्चार जानकारी के आदान-प्रदान में ही प्रयुक्त होता है। उसकी इतनी ही बौद्धिक उपयोगिता है। स्कूलों में, कारखानों में, यात्राओं में, व्यवसाय में, कुटुम्ब में, मित्रों में प्रायः इसी प्रकार का वार्तालाप होता पाया जाता है।
इस प्रकार सामान्यतः शब्द जानकारी के आदान-प्रदान की मस्तिष्कीय आवश्यकता को ही स्थूल रूप में पूरा करता है। यह आवश्यकता पूर्ति स्थूल रूप में तो कम होती है, विशेष स्थिति वह है जिसमें जानकारी के आदान-प्रदान की मस्तिष्कीय आवश्यकता तो कम पूरी होती है, पर उसमें अन्तरात्मा की भाव सम्वेदनाएँ पर्याप्त मात्रा में जुड़ी रहती हैं। ऐसे शब्दों को गान कहते हैं। स्थूल शरीर हलचलें करता है और आवाज निकालता है। सूक्ष्म शरीर शब्द द्वारा जानकारियों का आदान-प्रदान करता है। कारण शरीर की सत्ता भावपरक है। जब अन्तःकरण बोलता है तो उसमें भावनाएँ भरी रहती हैं। इसे ही आध्यात्मिक अर्थों में ‘गान’ कहा जाता है।
सामान्यतः ‘गान’ शब्द से गीत का आशय लिया जाता है। शब्दों को लयबद्ध करके गाया या गुनगुनाया जाना, उसमें भावनात्मक मस्ती का जुड़ा रहना ही ‘गान’ है। इसे और भी अधिक सुसंस्कृत किया जाता है तो ताल-स्वर आदि का समावेश हो जाता है। उस स्थिति में इसे छन्द नाम दिया जाता है। काव्य या कविता भी इसी लयबद्ध भाव प्रवाह को कहते हैं। उसे जब वाद्य यन्त्रों के साथ मिला दिया जाता है तो संगीत बन जाता है। वेदों की ऋचाएँ छन्द कही जाती हैं। मन्त्रों में गान की इन विशेषताओं के साथ शब्द-गुँथन का भी असाधारण महत्व है।
इस विशेषता के कारण ही मन्त्र सामर्थ्यवान् बनते हैं और अभीष्ट चमत्कार उत्पन्न करते हैं। गायत्री मन्त्र को ही लें। उसका शब्दार्थ बहुत सामान्य-सा है, तेजरूप भगवान से सद्बुद्धि की याचना भर उसमें की गई है। इस अर्थ की बोधक अनेक कविताएँ प्रायः सभी भाषाओं में मौजूद हैं अथवा बन सकती हैं। किन्तु इनका वह प्रभाव नहीं हो सकता जो गायत्री मन्त्र का होता है। कारण यही है कि उन कविताओं में शब्द विज्ञान और भाव विज्ञान का उतना अद्भुत समन्वय नहीं है और सूक्ष्मदर्शी तत्त्ववेत्ताओं की विशेष मनःस्थिति में ही ऐसे दिव्य अवतरण सम्भव होते हैं। इसलिए वेदमन्त्रों की संरचना को ‘अपौरुषेय’ कहा गया है।
गायत्री शब्द का सामान्य अर्थ भी यही है कि जो गाई जाने पर अपना चमत्कार प्रस्तुत करे। इस तथ्य को प्रामाणित करने वाले अनेकों प्रमाण मौजूद हैं। यहाँ गायन का अर्थ संगीत से नहीं, वरन् उस मनःस्थिति में उपासना क्रम चलाने से है जो भावनापूर्वक, भावभरी मनःस्थिति में चलाया जाता है। साधक के अन्तस् में मस्ती छाई रहनी चाहिए और बेगार भुगतने की तोता रटन्त की तरह नहीं, अपितु भाव तरंगों में लहराते हुए उसे गाया गुनगुनाया जाना चाहिये। जिह्वा का शब्दोच्चार मात्र तो बकवास कहलाता है। अन्य प्राणी, छोटे बच्चे अथवा अविकसित मस्तिष्क वाले प्रायः बिना मतलब की बकझक करते रहते हैं। वाणी की प्रौढ़ता सुविज्ञ मस्तिष्क की ज्ञान सम्पदा जुड़ जाने से ही वह विशेषता उत्पन्न होती है जो प्रखर भी होती है और प्रभावशाली भी। इस उच्चारण से बोलने वाले का भी लाभ होता है और सुनने वाले का भी। इसके बाद दिव्य वाणी आती है, जिसमें परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ जुड़ी रहने वाली भाव संवेदना का भी समावेश होता है। ऋचाओं का यही स्तर है। उनकी विशेषता सामगान को निखारती है।
उपासना प्रक्रिया में भी मन्त्रोच्चार के साथ श्रद्धा भरी अनन्य तन्मयता का समावेश होना चाहिए। ऐसा समावेश जिसमें क्रमबद्ध, लयबद्ध, स्वरबद्ध गुनगुनाहट तो हो ही साथ ही इष्ट के साथ एकाकार होने की आकुलता भी हो। मन्त्रों का वास्तविक लाभ इसी गान वाली मनःस्थिति में मिलता है। विशेषताओं से संयुक्त गायत्री शब्द के अनेक अर्थ हैं। गय ‘प्राण’ को भी कहते हैं और ‘गीत’ को भी। भगवान ने गीता में “गायत्रीच्छदंसामहम्” वाक्य में गायत्री छन्द को अपना रूप बताया है। यहाँ छन्द से तात्पर्य गीत से है, पर वह मनोरंजन के लिए नहीं है। दिव्य तन्मयता की भावभरी लहरों में लहराने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला ‘नाद ब्रह्म’ है। वह गान गायन कर्त्ता को ऐसी भाव भूमिका में ले उड़ता है जो सर्वतोमुखी कल्याण का अनुदान दे सके। गाने वाले का त्राण करने वाली मन्त्र शक्ति को गायत्री कहा गया है। प्रभा का त्राण करने वाली भी गायत्री का एक अर्थ है। इस सम्बन्ध में शस्त्रों में कई स्थानों पर विभिन्न तरह से उल्लेख किया जाता है-
वेद में कहा गया है-
बसन्तः प्राणायनो गायत्री बसंती। -यजु. 13। 5
अर्थात्- गायत्री वह है जो बसन्त में गाई जाती है और गाने वाले की रक्षा करती है।
गायंति त्वागा यत्रिणोऽर्यन्त्यकर्मर्किणः। - ऋग्वेद 1। 10। 1
अर्थात्- गायत्री का गान करने वाले तेरा ही गुणगान करते हैं। तेज के उपासक उसी सूर्य की उपासना करते हैं।
यद् गायत्री अधिगायत्र माहितम्। -ऋग्वेद 1। 164। 23
अर्थात्- जिसका गायन करते हैं उसे गायत्री कहते हैं।
गायन्तं त्रायतं इति गायत्री। - गोपथ.
अर्थात्- जो गाने वाले का त्राण कर वह गायत्री यद्गायत तद्गायत्री- शत. जिसे गाते हैं वह गायत्री है।
त्रायन्तों गायतः सर्वान् गायत्रीत्यमिधीयते। - अहि. वु. स. 3। 16
अर्थात्- अभी गान करने वालों की रक्षा करती है, इससे उसे गायत्री कहते हैं।
गायत्री प्रोच्यते तस्यात् गायत्तं त्रायते यतः। गायतात् त्रायते यस्मात् गायत्री तेन कथ्यते॥
अर्थात्- गायन करने वाले का त्राण करने वाली होने से वह गायत्री कहलाती है।
तमेत देव गायत्रं साम गायन्न वायत। यद गायन्न त्रायद तद् गायत्रस्य गायत्रत्वम्॥ - जै. ब्रा. 3। 38। 9
अर्थात्- जो गायत्री का मान करता है गायत्री उसकी रक्षा करती है।
गातार त्रायते यस्माद् गायत्री तेन गीयते। - स्कन्द पुराण (काशी खण्ड)
अर्थात्- गाने वाले की रक्षा करती है, इसी से उसको गायत्री कहा जाता है।
गायतो मुखाद् उदपतदिति गायत्री। - निरुथ 7। 12
अर्थात्– सबसे प्रथम गान करते हुए परमेश्वर के मुख से जो गीत निकला वही गायत्री है।
सर्वेषामेव वेदानाँ गुह्योपनिषदाँ तथा। सारभूता तु गायत्री निर्गता ब्रह्मामे मुखम्॥
अर्थात्- सब वेदों और गुह्य उपनिषदों का सार रूप ब्रह्माजी के मुख से गायत्री मन्त्र प्रकट हुआ।
गायत्री किस प्रकार अपने उपासक का सर्वविध कल्याण करती है और उसे सर्व समर्थ बनाती है? इसका एक सुसंगत विज्ञान है। मन्त्र विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि जीभ से जो भी शब्द उच्चारित होते हैं, उनका उच्चारण केवल जीभ द्वारा ही नहीं होता। अपितु उनके उच्चारण में कण्ठतालू, मूर्धा, ओष्ठ, दाँत, जिह्वा मूल आदि मुख के विभिन्न अंग महत्वपूर्ण भूमिका निबाहते हैं। इस उच्चारण काल में जिन भागों से ध्वनि निकलती है, उन अंगों में नाड़ी तन्तु शरीर के विभिन्न भागों तक फैले हुए हैं। इस विस्तार क्षेत्र में कई ग्रन्थियाँ होती हैं, जिन पर उच्चारण से दबाव पड़ता है। जिन लोगों की कोई विशेष सूक्ष्म ग्रन्थियाँ रुग्ण या क्षत-विक्षत होती हैं, उनके मुख से कुछ खास शब्द अशुद्ध निकलते हैं, या रुक-रुककर निकलते हैं। हकलाना या तुतलाना इसी को कहते हैं।
योगी लोग जानते हैं कि शरीर में विद्यमान अनेक छोटी बड़ी ग्रंथियों में विशेष शक्ति भण्डार छिपा रहता है। सुषुम्ना से सम्बद्ध षट्चक्र प्रसिद्ध है। ऐसी अगणित ग्रन्थियाँ शरीर में विद्यमान हैं विविध शब्दों का उच्चारण इन विविध ग्रन्थियों पर अपना प्रभाव डालता है और उस प्रभाव से इन ग्रन्थियों का शक्ति भण्डार जागृत होता है। मन्त्रों का गठन इसी आधार पर होता है, यह बात पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है। गायत्री मन्त्र के 24 अक्षर हैं। इनका प्रत्येक का सम्बन्ध शरीर में स्थित ऐसी ग्रन्थियों से है, जो जागृत होने पर सद्बुद्धि प्रकाशक शक्तियों को सतेज करती है। गायत्री मन्त्र के उच्चारण से सूक्ष्म शरीर का सितार, शरीर में विद्या पाठ सूक्ष्म ग्रन्थियाँ इस प्रकार झंकृत और स्पन्दित होती हैं जिसका प्रभाव अदृश्य जगत पर पड़ता है और साधक की चेतना भी उससे इस प्रकार प्रभावित होती है कि अनेकों प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं। यह प्रभाव ही गायत्री साधना के सत्परिणाम प्रस्तुत करती है।
शब्दों की शक्ति साधारण नहीं है। प्रकट तौर पर भले ही वे जानकारी का आदान-प्रदान करने वाले प्रतीत होते हों, परन्तु शब्द विद्या के, ध्वनि विज्ञान के आचार्य जानते हैं कि शब्दों में कितनी शक्ति है? और उसकी अज्ञात गतिविधि के द्वारा क्या-क्या परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं? शब्दों की इस असाधारण शक्ति क्षमता के कारण ही शब्द को ब्रह्म कहा गया है। गायत्री मन्त्र में इस शब्द विज्ञान का भरपूर उपयोग हुआ है।
गायत्री उपासना को और भी फलवती बनाने वाला कारण है, साधक का श्रद्धामय विश्वास। विश्वास की शक्ति से सभी मनोविज्ञानवेत्ता भली-भाँति परिचित हैं। इस तरह के कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि केवल विश्वास के कारण ही लोग भय की वजह से अकाल मृत्यु के मुख में चले गए और विश्वास के कारण ही मृतप्राय लोगों ने नवजीवन प्राप्त किया। रामायण में तुलसीदास जी ने ‘भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रुपिणौ’ गाते हुए श्रद्धा विश्वास को भवानी शंकर की उपमा दी है। लोग अपने विश्वासों की रक्षा के लिये धन, आराम तथा प्राणों तक को हँसते-हँसते गँवा देते हैं। एकलव्य, कबीर आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनसे प्रकट है कि गुरु द्वारा नहीं केवल अपनी श्रद्धा के आधार पर प्राप्त होने वाली शिक्षा से भी अधिक विज्ञ बना जा सकता है। हिप्नोटिज्म का आधार रोगी को अपने वचन पर विश्वास कराके उससे मनमाने कार्य करा लेना ही तो है। ताँत्रिक लोग मन्त्र सिद्धि की कठोर साधना द्वारा अपने मन में उस मन्त्र के प्रति जमी श्रद्धा के आधार पर ही सफलता प्राप्त करते हैं। जिस मन्त्र से श्रद्धालु ताँत्रिक चमत्कारी काम कर दिखाता है, उस मन्त्र की अश्रद्धालु साधक चाहे जिस तरह आराधना करे, उसे कुछ लाभ नहीं होता। गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में भी यही तथ्य बहुत सीमा तक काम करता है। जब साधक श्रद्धा और विश्वासपूर्वक आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और विश्वास विज्ञान दोनों की विशेषताओं से संयुक्त गायत्री मन्त्र का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्धि होती है।
गायत्री को इसीलिए गान करने वाले का त्राण करने वाली कहा गया है कि वह शब्द विज्ञान और विश्वास के आधार पर साधक में अनेकों सूक्ष्म शक्तियाँ जागृत कर देती है। यह शक्तियाँ साधक को अनेकों प्रकार की सफलतायें, सिद्धियाँ और सम्पन्नता प्राप्त कराती हैं। गायत्री साधना एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे भली-भाँति सम्पन्न किया जाये तो उसके सत्परिणाम प्राप्त होना सुनिश्चित है।
ब्रह्मविद्या या तत्वदर्शन तात्पर्य उस परमात्म सत्ता का स्मरण, उसकी विशेषताओं का चिन्तन-मनन है जिसे प्रभु, परमात्मा, ईश्वर या भगवान कहा जाता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय को ही भगवान कहते हैं। विराट्-परब्रह्म तो वह सूत्र-संचालन शक्ति है जिसे सारी सृष्टि की व्यवस्था चलानी होती है। नियम अनुशासन से अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना ही उसका काम है। उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है। यह भगवान कोई व्यक्ति नहीं, सद्भावना-सद्विचारणा, सत्प्रवृत्तियों का समुदाय है जिसकी समस्त विशेषताओं का स्मरण कर उन्हें आत्मसात करने का प्रयास किया जाता है।
उपासना में अन्तःकरण को- भावनाओं को उच्चस्तरीय उद्देश्यों के अनुरूप गतिशील बनाना पड़ता है। साधना व आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना- कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिये इन्हीं विविध सोपानों को अपनाना पड़ता है।
उपासना, साधना व आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
मानव सहज अभ्यास क्रम में अनगढ़ है। कुसंस्कारिता से छुटकारा पाकर सुसंस्कारी शालीनता के ढाँचे में ढलने के लिये आत्मसत्ता को विवश करने हेतु योगत्रयी के ये तीनों ही उपचार नित्य जीवन में अपनाने होते हैं। उपासना से ईश्वरीय गुणों को जीवन में उतारने का अभ्यास किया जाता है, साधना से मन को दुष्प्रवृत्तियों से जूझने योग्य सशक्त बनाया जाता है एवं आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरीय उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।
इतनी-सी बात समझ में आने में किसी को भी कोई परेशानी न होगी कि परब्रह्म को किसी उपहार मनुहार से प्रसन्न नहीं किया जा सकता। भ्रान्तियाँ फिर भी मन पर छायी रहती और मनुष्य को दिग्भ्रांत करती रहती हैं। परब्रह्म सृष्टि की अनुशासन व्यवस्था का नियन्ता है। उसे फुसलाया नहीं जा सकता। पूजा उपचार, कर्मकाण्ड तो उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने का प्रभावी व्यायाम पराक्रम भर है। इन माध्यमों को अपना कर जो अपनी चेतना को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालता चला जाता है वह ऋषि, देवदूत, महामानव, महात्मा जैसे स्तर को प्राप्त होता है।
उपासना अर्थात् आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। भाव संस्थान जो मान्यताओं, आकाँक्षाओं से लिपटा होता है- वही अपनी आत्मा ही तो है। परमात्म तत्व उत्कृष्ट आदर्शवादिता का ही दूसरा नाम है। अपनी ढर्रे में चली आ रही, लोभ-मोह के बंधनों में जकड़ी आत्मा को परिष्कृत शोधितकर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ देना ही सच्ची उपासना है। उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना। यह समर्पण घनिष्ठता जितनी निश्छल उच्चस्तरीय होगी, उतनी ही उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासना का तत्व दर्शन समझने के उपरान्त शेष इतना ही रह जाता है कि प्रारम्भिक प्रयासों में उसे भावनात्मक व्यायामों की तरह प्रयुक्त कर धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाय। कर्मकाण्ड यदि काय कलेवर है तो तादात्म्य वाला पक्ष उसका प्राण है। एक प्रत्यक्ष है, दूसरा परोक्ष। जप, ध्यान, प्राणायाम का क्रिया पक्ष महत्वहीन है, यदि भाव पक्ष को प्रधानता नहीं दी गयी है। पौरुष हीन के हाथ में तलवार सौंप दी जाय तो पराक्रम के बिना वह मात्र लोहे का एक टुकड़ा भर सिद्ध होती है। पराक्रम ही जिताता है, तलवार नहीं। इसी प्रकार भाव-श्रद्धा ही उपासना को सार्थक बनाती है, कर्मकाण्ड के क्रिया-कलाप नहीं।
महाप्रभु चैतन्य के जीवनकाल की एक घटना है। वे जगन्नाथ पुरी क्षेत्र में प्रचार यात्रा पर निकले थे। मण्डली में कई विद्वान भी थे। वट वृक्ष के नीचे एक किसान को उन्होंने तन्मयतापूर्वक गीता पाठ करते देखा उसकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। उसकी तन्मयता देखते बनती थी। हाव-भाव ऐसे थे, मानों वह स्वयं अपने अंतर्चक्षु से गीता काल की घटनाओं को भगवान कृष्ण एवं अर्जुन को दृश्य रूप में सामने देख रहा हो। मण्डली रुक गयी। पाठ सुनने लगी। उच्चारण नितान्त अशुद्ध था। अल्प शिक्षित होने के कारण वह न तो संस्कृत भाषा से अवगत था, न ही श्लोकों का अर्थ उसे समझ में आता था।
विद्वानों ने उसे टोका एवं अशुद्ध बोलने से रोका महाप्रभु एकटक- भाव विभोर हो उसे देख रहे थे। वह रुका नहीं, पढ़ता ही रहा। बोला- “मेरे लिए इतना ही बहुत है कि भगवान जो कह रहे हैं उसे मेरी आत्मा अमृत की तरह पी रटी है।” महाप्रभु के बोल फूटे- उन्होंने उस भक्त को नमन करते हुए कहा- ‘भक्तों! इस अशिक्षित की भावना स्तुत्य है। यही है वह तत्व जिसके सहारे भक्ति की जानी है, जो भक्त की उपासना को सार्थक बनाती है।” वस्तुतः यह समर्पण “तादात्म्य का भाव नियोजित किए बिना सारे पूजा उपचार के क्रम अधूरे, खोखले हैं।
तादात्म्य का अर्थ है भक्त की भावना और इष्ट की उससे अपेक्षा का एकीकरण। दोनों की अन्तःस्थिति का समन्वय विसर्जन। दैवी अनुशासन के अनुरूप जो अपनी जीवनचर्या का निर्धारण कर लेता है, वही सच्चा उपासक है। इसमें अपने आप से कठोर संघर्ष तो करना पड़ता है, पर आत्मबल सम्पन्न उस परम तत्व पर पूरा भरोसा रख अपनी नाव खेते चले जाते हैं। साधक को अपना स्वरूप कठपुतली जैसा बनाना होता है और अपने अवयवों में बँधे धागों को बाजीगर को सौंप देना पड़ता है। यह बाजीगर ईश्वर ही तो है। इससे कम में वह स्थिति बनती नहीं जहाँ आत्मा-परमात्मा का मिलन संयोगक्रम बन सके।
बूंद चाहती तो बरसकर सूखी धरती को तृप्ति, प्यासों को तुष्टि दे सकती थी। सरोवर तट पर पड़ी सीप में गिरकर मोती भी बन सकती थी। यदि उसने अपनी अहंता- पृथकता को बनाये रख और ओस बनकर सर्प द्वारा चाटी जाने पर विष में स्वयं को बदल दिया, तो यह उसकी अपनी नियति है। जो न समुद्र बनने को तैयार है, न बदल; उनकी परिणति अधोगामी ही होती है। यह तो एक उदाहरण हुआ पर मनुष्य पर यह शत प्रतिशत लागू होता है। समर्पण माँगता है- लोभ, मोह से विरक्ति, अहंता से मुक्ति। यदि समर्पण भाव न विकसे तो मानना चाहिए कि जीव ब्रह्म की एकता में विलगता उत्पन्न करने वाली बाधाएं लोभ-मोह-अहंता के रूप में ही विद्यमान हैं। उपासना के कर्मकाण्ड इसी कारण बाह्योपचार मात्र बनकर रह गए हैं। समय क्षेप तो इसमें होना ही था, असन्तोष एवं ग्लानि और साथ लग जाती है। देवात्मा बनना तभी सम्भव है, जब परमात्मा के समकक्ष विशेषताएं उत्पन्न करने योग्य पात्रता विकसित कर ली गयी हो। भावना विचारणा और क्रिया प्रक्रिया में जितना अधिक उत्कृष्टता आदर्शवादिता का समावेश हो सकेगा, उपासना उतनी ही सफल होगी। यही है श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का तत्वदर्शन।
पुष्प उद्यान में गुणग्राही बुद्धि, पुष्पों की शोभा देखती है, सुगन्ध का आनन्द लेती है तथा सुरभित वृक्षों की छाया में बैठकर आनन्द लेती हे। गुणग्राही जब लौटता है तो उसे उद्यान की शोभा का भी स्मरण रहता है और उसके निर्माता, माली तथा प्रयास की सराहना भी करता रहता है।
इसके विपरीत दोषदर्शी बुद्धि को उसमें पग-पग पर कमियाँ-खराबियाँ और बुराइयां दीख पड़ती हैं। यहाँ तक कि उसके निर्माता, संरक्षकों में भी इस प्रयास के पीछे कोई दुरभिसन्धि दीख पड़ती है। भौंरे, तितली, मधुमक्खी, कोयल स्तर के प्राणी उस रसास्वादन में निरत रहते हैं। जितना समय उस क्षेत्र में बीतता है, उसे सौभाग्य मानते हैं। किन्तु एक अन्य प्रकार के कीड़े भी उसी क्षेत्र में रहते हैं जिन्हें खाद गोबर की ही तलाश रहती है। खोजने पर हर जगह हर चीज मिल जाती है। सर्वथा निर्दोष तो इस संसार में कुछ भी नहीं है। भगवान, देवता, ऋषि, महामानव तक में खोट ढूंढ़े जा सकते हैं। पुष्प वाटिका में भी कहीं न कहीं खाद गोबर कूड़े-कबाड़ का अस्तित्व रहता है। उसे ढूँढ़ निकालने पर वे यह भी कह या सोच सकते हैं कि बगीचे में दुर्गन्ध के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। पुष्पों की आरे से मुँह मोड़ लेने पर वे दीखते भी कहाँ हैं।
गायत्री मन्त्र को भी कहने वाले शब्द रचना की दृष्टि से अशुद्ध, छन्द शास्त्र की दृष्टि से दोगला और परिणाम की दृष्टि से झूठा भी कह सकते हैं, पर ध्यान पूर्वक देखने से वे तीनों ही आक्षेप निस्सार प्रतीत होते हैं। ऋचाओं के सृजेताओं को इतना भी ज्ञान न रहा हो, ऐसी बात नहीं है। उनने वेद मन्त्रों की संरचना में जहाँ शब्द, छन्द, अर्थ का ध्यान रखा है, वहाँ मुख्यतया उसकी परिणति को भी ध्यान में रखा है। गायत्री की प्रेरणा तथा उपासना की परिणति ऐसी नहीं है जिसे भ्रान्त एवं निरर्थक कहा जा सके। दूर से तो तारे भी जुगनूँ जैसे दीखते हैं। समीपता अथवा जानकारी की गहराई बढ़ते जाने पर ही यह प्रतीत होता है कि वे उतने छोटे नहीं हैं जितने कि सामान्य दृष्टि से प्रतीत होते थे। गायत्री की गरिमा के सम्बन्ध में भी यही बात है। त्रुटि वेद मन्त्र में नहीं उसके प्रयोक्ताओं, पर्यवेक्षकों में हो सकती है। संशोधन उसी का होना चाहिए। न कि मूल मन्त्र का।
गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में आपत्ति उठाने वाले नासमझों को मात्र व्याकरण के आधार पर ही नहीं- शास्त्र, तर्क, तथ्य, दर्शन आदि सभी प्रमाणों के आधार पर यह बताया जा सकता है कि ऐसा विचार मात्र करना कितनी बड़ी दुर्बुद्धि का परिचायक है। यदि हम पहले व्याकरण पक्ष को ही लें तो कुछ पृष्ठभूमि भी पाठक समुदाय को समझनी होगी।
ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में वेदार्थ की गूढ़ता और उसे समझने की क्षमता के सम्बन्ध में कहा गया है कि उन्हें आत्मसात् करने के लिए परिष्कृत प्रज्ञा की आवश्यकता है। साधारण भाषा ज्ञान से उस प्रयोजन की पूर्ति ठीक प्रकार से होती नहीं। इस संदर्भ में उल्लेख है- “वेदों की व्याख्याओं के विषय में ऐसा समझना कि जब तक सत्य प्रमाण सुतर्क, वेदों के शब्दों का, पूर्वा पर प्रकरणों, व्याकरण आदि वेदांगों- शतपथ आदि ब्राह्मणों पर्व मीमाँसादि शस्त्रों-शास्त्रान्तरों का यथावत् बोध न हो और परमेश्वर का अनुग्रह, उत्तम विद्वानों की शिक्षा, उनके संग से पक्षपात छोड़कर आत्मा की शुद्धि न हो तथा महर्षि गणों के किए व्याख्यानों को न देखें तब तक वेदों के अर्थ का यथावत् प्रकाश मनुष्य के हृदय में नहीं होता।” -(विश्वामित्र संहिता)
वेदार्थ मात्र संस्कृत शब्दों का तात्पर्य एवं व्याकरण विद्या मात्र के आधार पर सही रूप में प्रकट नहीं होता। उसके रहस्यों को यदि भाषा के आधार पर जानना हो तो भी पद रचना, वर्ण संख्या, पद क्रम, स्वर सन्धान, ध्वनि जैसी विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए ही उस रहस्य को समझा जा सकता है, जो सृजेताओं ने उन शब्द गुँथनों में सँजोया है।
यास्क निरुक्त के (अ. 13 ख. 12) में उल्लेख है-
“न हि एषु प्रत्यक्षमस्ति अनषः अतपसो वा, पारोवर्योवत्सु तु वेदितृषु भूयः विद्यः प्रशस्यः भवति।”
अर्थात्- ऋषियों जैसे ज्ञान-विज्ञान के बिना उच्चस्तरीय तप तथा अध्यवसाय के बिना वेदमन्त्रों का अर्थ प्रत्यक्ष नहीं होता। वेदज्ञों में भी जिनकी ज्ञान साधना जितनी समृद्ध होती है, वे उसी अनुपात से रहस्यों को समझ पाते हैं। उनका ज्ञान उतना ही प्रशंसनीय होता है।
वस्तुतः श्रुति को सर्वथा छन्द परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। ऋचाएँ व्याकरण और छन्द नियमों से ऊपर हैं। व्याकरण के प्रस्तोता महर्षि पाणिनी ने वेदों को अपौरुषेय माना है। उन्होंने यह अभिमत व्यक्त किया है कि जहाँ कहीं भी वेद संरचना एवं व्याकरण विधा के मध्य व्यवधान उत्पन्न होने की स्थिति आए, वहाँ श्रुति संरचना को ही सही मानने का अभिमत व्यक्त किया है।
“छंदासि दृष्टत्वात् शुद्धम्”। अर्थात् जहाँ कहीं उनने व्याकरण की परिधि के बाहर वाक्यों का उपयोग देखा उसे वेद से शुद्ध माना। इतना ही नहीं इसके लिए उन्हें कई वाक्यों के वैदिक प्रयोग के लिए अलग से सूत्रों की संरचना करनी पड़ी। उपरोक्त कथन में भी इसी निर्णय का प्रकटीकरण हुआ है।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि वेद पहले बने- व्याकरण बाद में। श्रुति अपौरुषेय है एवं अनादि है। शब्द शास्त्र का विस्तार होने के उपरान्त उन्हें क्रमबद्ध बनाने की दृष्टि से व्याकरण एवं छन्द शास्त्र की रचना हुई है। न कि छन्द शास्त्र पहले बना और वेद बाद में। कितने ही ऋचा खण्ड ऐसे हैं जो वर्तमान व्याकरण के हिसाब से सही नहीं बैठता तो भी उनकी श्रेष्ठता एवं मान्यता में कोई अन्तर नहीं आता। उदाहरण के लिए ‘सत्यमेव जयते’ शब्द को लिया जा सकता है। व्याकरण के अनुसार इसे ‘सत्यमेव जयति’ होना चाहिए था। यह विवाद का प्रश्न नहीं बनाया जाना चाहिए। भाव उनके पीछे क्या है, उसे महत्व मिलना चाहिए, सद्बुद्धि यही कहती है।
गायत्री मन्त्र में प्रयुक्त तत् शब्द एक प्रकार से तो नपुँसक लिंग ठहरता है, पर उसकी व्युत्पत्ति तथा पदच्छेद दूसरे प्रकार से किये जाने पर वैसी स्थिति नहीं रह जाती और सहज समाधान हो जाता है।
“तंदित्यत्त्र सुयां सुलुगिति षष्टयलुक्” इस व्याकरण के अनुसार तत् पद को नपुँसक लिंग नहीं माना जा सकता। यहाँ तत् की व्याख्या तस्य की गयी है। लिंग व्यत्यय के अनुसार भी समग्र व्याख्या बनने पर अर्थ इस प्रकार निकलता है- “हम ‘तत्’ उस भर्ग (तेज) का ध्यान करते हैं।” यहाँ मन्त्र के यः वर्ण की यत् के रूप में व्याख्या की जानी है। ये सभी प्रमाण बताते हैं कि प्रचलित गायत्री छन्द पूर्णतः विशुद्ध एवं व्याकरण सम्मत है। इस सम्बन्ध में जो भी व्याकरण का सहारा लेकर जनमानस को गुमराह करने का प्रयास करते हैं, उनकी बुद्धि को क्या कहा जाय?
जिस ढंग से पदच्छेद कर तत् को नपुँसक लिंग ठहराया जाता है उसे अन्य दो ‘सर्वनाम’ शब्दों के साथ जोड़कर विसंगति बताई जाती है- यदि उस पदच्छेद के स्थान पर दूसरी प्रकार से उसका पदच्छेद किया जाय तो यह झंझट अनायास ही समाप्त हो जाता है। एक ही पदच्छेद का आग्रह करना असंगत है, कुतर्क है। अन्य पदच्छेद भी उसी प्रकार मान्य हो सकते हैं। ऐसे कुछ शुद्ध पदच्छेद इस प्रकार हैं।
1) ॐ भूर्भुवः स्वः धीमहि तत् वरेण्यं भर्गो देवस्य सवितुद् यः प्रचोदयात् नः धियः (2) तत् धियो यः नः प्रचोदयात् भर्गो देवस्य सवितुद् वरेण्यं धीमहि (3) देवस्य सवितुर यो भर्गो नः धियो प्रचोदयात् वरेण्यं धीमहि (4) तत् सवितुर वरेण्यं भर्गो देवस्य यः नः धियो प्रचोदयात् धीमहि।
‘तत्’ के स्थान पर ‘तस्य’ रखने का सुझाव देना वेदों के आदि सृजेताओं को पाठ पढ़ाने के सदृश है। ऐसे प्रस्ताव रखने वाले अपने आपको वेद सृजेताओं से अधिक विद्वान होने का दावा करते हैं। न जाने उनकी अहमन्यता कहाँ तक सही है?
वैसे तत् शब्द से ऐसी कोई अड़चन नहीं उत्पन्न होती, जिससे उसे बदलने की आवश्यकता पड़े। संस्कृत व्याकरण के सामान्य जानकार भी समझते हैं कि “तस्य सवितुः” का समास संयोग भी “तत्सवितु” ही बनता है। ऐसी स्थिति में हम तो यही कह सकते हैं कि ‘तत्’ के स्थान पर तस्य या ‘तम्’ कर देने, ‘यो’ के स्थान पर यद् कर देने का प्रस्ताव करने वालों के सम्मुख वेद रचयिता ऋषियों को जाना चाहिए और कहना चाहिए कि उन्हें इतना भी नहीं आता था तो इन प्रस्तावकों के पास जाकर व्याकरण एवं छन्द शास्त्र पढ़ते। जब कुछ पढ़ लिख जाते तब कहीं यह साहस करते कि वेद सृजन का साहस जुटायें। इसे व्यंग्य न मानकर यथार्थ माना जाय और उस अन्तर्वेदना की अनुभूति की जाय जो किसी भी उचित शब्द के तोड़-मरोड़ कर गाली-गलौज के रूप में प्रयुक्त होने पर किसी को भी होती है।
इसी प्रकार गायत्री महामन्त्र में प्रयुक्त हुए शब्दों में लिंगभेद की गलती निकालना भी अनुपयुक्त है। भर्ग शब्द को साधारण संस्कृत में पुल्लिंग माना गया है पर वैदिक कोषों में उसे संज्ञा, सर्वनाम एवं नपुँसक लिंग भी निरूपित किया गया है। सायण भाष्य के अनुवर्ती मैक्डॉनल की संस्कृत डिक्शनरी में ‘भर्ग’ का अर्थ करते हुए लिखा गया है- भर्गोः वैदिक, पु. एफल्जैन्स (ज्योतिर्मयो), वैदिक शब्द नपुँसक लिंग- ग्लोरियस (गौरवशाली, तेजस्वी)। उसे डा. विश्व बन्धु ने भी माना और उद्धृत करते हुए अपना प्रस्तुतीकरण किया है।
गायत्री महामन्त्र में तेईस अक्षर होने की बात कहकर कई व्यक्ति उसकी छन्द रचना को अशुद्ध मानते हैं और लगभग झूठा आदि तक कहने लगते हैं। वस्तुतः उसमें छन्द रचना की दृष्टि से न तो कोई दोष है और न ही व्याकरण की अशुद्धि।
वेदों में अनुष्टुप, त्रिष्टुप, जगती, बृहती, पंक्ति, गायत्री आदि अनेकों छन्दों का प्रयोग हुआ है। इनमें से प्रत्येक के कई-कई भेद हैं। उपरोक्त छन्दों को एक वर्ग समझा जा सकता है और उनके भेदों को उप वर्ग की संज्ञा दी जा सकती है। छन्दों की संख्या सीमित कर देने की दृष्टि से एक बड़े वर्ग के अंतर्गत छोटे उपभेदों का समावेश कर दिया गया है।
गायत्री भी एक छन्द वर्ग है। उसके कितने ही भेद-उपभेद-उपवग हैं। यथा-गायत्री छन्द-निचृद् गायत्री छन्द, आर्षी, आसुरी, विराड् गायत्री, विराडार्थी गायत्री, निचृटार्षी, स्वरा ढन्नाभार्षी, प्रजापात्या, भूरिग्, भूरिग्त्रिपाद, वर्धमाना, पिपीलिका मध्या, निचृद् गायत्री आदि, आदि। यह सभी गायत्री भेद हैं। इनमें जो थोड़ा-थोड़ा अन्तर है, उसके रहते हुए वे एक ही समान गायत्री के अंतर्गत आते हैं। इन भेदों के कारण उनका कोई अन्य छन्द नहीं बन जाता। वे एक परिवार से निकलकर सर्वथा स्वतन्त्र नहीं बन जाते। गायत्री में 23 अक्षर होने से वह निचृद् उपवर्ग में तो आता है, पर इससे उसमें अशुद्धि होने जैसी कोई बात नहीं है।
गायत्री के तीन चरण हैं। अक्षर गणना के अनुसार प्रथम पाद में सात और द्वितीय-तृतीय पाद में आठ-आठ अक्षर हैं। एक अक्षर का झंझट “ण्यं” शब्द में है। उसे एक गिन लिया जाय तो ही सात अक्षर होते हैं। अन्यथा उसे ध्वनि के अनुरूप वर्गीकृत किया जाय तो संख्या पूरी आठ हो जाती है।
आद्य शंकराचार्य ने इस पाद का पदच्छेद इस प्रकार किया है। (1) तत् (2) स (3) वि (4) तुः (5) व (6) रे (7) णि (8) यम्। उनके मत से ध्वनि गणना के अनुसार 24 अक्षर पूरे हो जाते हैं।
‘मन्त्रार्थ चन्द्रोदय’ (पृष्ठ 33) पर ‘ण्यं’ के शब्द में ऐसा ही अभिमत व्यक्त किया गया है और भ्रांति निवारण के सम्बन्ध में अधिक स्पष्ट प्रस्तुतीकरण किया गया है-
‘तत्र वरेण्य-मित्यत्र वरेणियं इति व्यूहेन पाद पूरणम् तदुक्तं पिंगलेन पाद इत्यधिकृत्य’ इयादि पूरण इति।
अर्थात्- पिंगल शास्त्र में वरेण्यं नामक शब्द के अन्तिम भाग में इय जोड़ने से आठ अक्षरों का प्रथम चरण शुद्ध हो जाता है। अर्थात् “तत् सवितुर्वरेणियम्” इसका अर्थ यही हुआ कि छन्द शस्त्र की दृष्टि से भी गायत्री मन्त्र शुद्ध गायत्री छन्द है।
ऋचाओं की संरचना मात्र अर्थ प्रधान ही नहीं है, उनमें स्वर विज्ञान के अनुरूप शब्द गुँथन भी एक तथ्य है। शब्द क्रम के अनुसार छन्द संरचना होती है। सितार के तारों की तरह एक के बाद दूसरों के झनझनाने से, जो स्वर लहरी उत्पन्न होती है, उसके प्रभाव परिणाम का रचनाकारों ने ध्यान रखा है। स्वर शास्त्री जानते हैं कि कई बार अमुक राग प्रवाह उत्पन्न करने के लिए शब्दों को दीर्घ से ह्रस्व और ह्रस्व से दीर्घ भी करना पड़ता है। ऋचा में स्वर विद्या का रहस्य अर्थ से भी अधिक है। गायत्री के सृजेता ने ‘ण्यं’ शब्द के लेखन और उच्चारण में जो अन्तर रखा है, उसमें स्वर विज्ञान के रहस्य समाहित है। ऐसा मात्र गायत्री में ही नहीं, अन्यान्य मन्त्रों में भी हुआ है। स्वर के अनुरूप ही शब्द गुँथन को यहाँ विशेष महत्व दिया गया है। यहाँ पर ण्य शब्द का स्वर विज्ञान वाला पक्ष प्रबल मानते हुए ही उसे इस प्रकार रखा गया है।
गायत्री छन्द नाम से वेदों में कितने ही मंत्र हैं। किन्तु ‘वरेण्य’ वेदमाता गायत्री का नामकरण उसमें प्रयुक्त हुए छन्द के आधार पर नहीं हुआ है। उसको गय=प्राण, त्री=त्राणकर्त्री क्षमता के आधार पर यह नाम दिया गया है। यह विशेषता इस स्तर के अन्य छन्दों में नहीं है। इसलिए उन्हें गायत्री नाम से नहीं पुकारा जाता। बृहती जिसे अन्य छन्दों के आधार पर किसी भी वेदमंत्र को पुकारा नहीं जाता। फिर गायत्री के नाम से यह एक मन्त्र ही क्यों प्रख्यात हुआ? इसका उत्तर यही हो सकता है कि उसकी प्राण सम्बर्धिनी शक्ति को विशेष महत्वपूर्ण माना गया है और उस विशेषता की जानकारी देने की दृष्टि से ही इसको वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता- त्रिपदा का मान दिया गया है। अन्य छन्दों को यह सम्मान प्राप्त नहीं।
द्वैतवाद के प्रस्तोता जी. माध्वाचार्य ने वेदार्थों की गम्भीरता एवं गरिमा के सम्बन्ध में कहा है-
“गुणाधिक्यं भवेद् येन, वेदस्यार्थ स एवहि। प्रयोजकत्वात् नान्यस्य, कलाभावात्त दर्थता॥”
अर्थात्- “भावार्थ से नहीं, वेदों की रहस्यमयी गरिमा उनके स्वर, मात्रा, वर्ण, पद, पद्याँश, चरण आदि की संगति बिठाते हुए ही समझी जा सकती है। मात्र शब्दार्थ भर से उसकी वास्तविकता का बोध नहीं होता।” यह कथन कितना सटीक है, इसमें किसी को कोई सन्देह नहीं होना चाहिए।
इतना कुछ कह लेने पर गायत्री मन्त्र के पाप नाशक होने सम्बन्धी विवाद को सुलझा लेना भी उचित होगा। किसी भी मन्त्र को मात्र रटते रहने या मुख से उच्चारण कर व्यवहार को यथावत् बनाये रखने पर बदला जा सकता है, इस मान्यता को सर्वथा निर्मूल करना चाहिए। गायत्री मंत्र की प्रेरणा ही कुछ ऐसी है कि उसके भाव को आत्मसात करने पर व्यक्ति पापों की ओर- दुष्कृतों की ओर- उन्मुख नहीं होता।
गायत्री उपासना से पाप नाश होने या सुख शांतिदायक पुण्यफल प्राप्त होने की फलश्रुति के साथ इतना संकेत और भी जुड़ा हुआ है कि उस आधार पर उपलब्ध होने वाली प्रेरणा को जीवनचर्या में सम्मिलित किया जाय। व्यवहार क्रम में उतारा जाय। इसका अधिक स्पष्टीकरण इसलिए नहीं किया गया है कि पुरातन काल में इस तथ्य से तो सभी अवगत थे कि आदि और अन्त के संकेत करने पर उसकी मध्य शृंखला का अनुमान सामान्य ज्ञान के आधार पर ही हर कोई लगा लेता है।
स्कूल में प्रवेश- स्नातकोत्तर सम्मान। व्यायामशालाओं में भर्ती- प्रख्यात पहलवान। खेत में बीजारोपण- कोठे भरने वाली फसल। भूमि पूजन-भव्य भवन। व्यवसाय आरम्भ- समृद्धि का स्वप्न। इस प्रकार के कथन ही आमतौर से कहे सुने जाते हैं। इतना अनुमान सहज ज्ञान के आधार पर लगाया जा सकता है कि आदि और अन्त के बीच मध्य भी होता है। भूमि पूजन भर से भवन नहीं बन जाता। उसके लिये श्रम साधन जुटाने होते हैं। बीज बोते ही कोठे नहीं भर जाते वरन् लम्बे समय तक खाद, पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि का भी प्रबन्ध करना होता है। विद्यार्थी स्कूल में प्रवेश लेने भर से अफसर कहां बन जाता है। मध्यान्तर का विशेष वर्णन न करने पर तो यह अनुमान लगा पाना भी सम्भव नहीं। विवाह-संस्कार फले-फूले, गृहस्थ जीवन का स्वर्णिम स्वप्न देखा जाय, यह तो ठीक है। किन्तु उसके बीच पति-पत्नी का निरन्तर कर्त्तव्य-पालन भी एक तथ्य है। इसे भले ही विस्तृत रूप में वर्णन किया न जाय पर उसकी जानकारी तो रखनी ही चाहिए।
यह हो सकता है कि कोई प्रयोक्ता या आलोचक-मध्य शृंखला को प्रयोग में आने की उपेक्षा होती देखकर यह अनुमान लगाने लगे कि मध्य शृंखला का कोई विधान ही नहीं है। मात्र आदि अन्त ही सब कुछ है। इस भ्रान्ति के कारण जो भी रहे हों, इससे प्रभावित कोई कितना भी क्यों न हो, तथ्य यही है कि मध्यान्तर की व्यवस्था करने पर ही लक्ष्य पूर्ति होती है। गायत्री मन्त्र का भावार्थ दृष्टि में रखें तो यही तथ्य उसमें सन्निहित दीख पड़ता है।
गायत्री में सद्बुद्धि की- महाप्रज्ञा की आराधना है। उपासक उसका जप मात्र ही न करें वरन् प्रचोदयात्- प्रेरणा भी ग्रहण करें। उस अनुशासन के अनुरूप उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं उदात्त व्यवहार का भी अभ्यास करें तभी वह प्रक्रिया पूरी होती है जिसके आधार पर उपासना का महत्व एवं माहात्म्य वर्णित किया जाता रहा है। निश्चय है कि गायत्रीमय जीवनचर्या अपनाने पर व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का समावेश होगा और उस प्रक्रिया में संलग्न व्यक्ति को प्रगति, समृद्ध, संस्कृति एवं सुख शान्ति जैसे प्रतिफलों से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
यह बात पाप नाश के सम्बन्ध में भी है। पाप नाश से तात्पर्य क्रियमाण भले-बुरे कृत्यों का फल न मिलने से नहीं, वरन् यह है कि कुकृत्यों में लगाने और नरक यातनाओं में संत्रस्त करने वाली दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा मिलेगा। सत्प्रेरणा के- सद्बुद्धि के आधार पर सत्प्रेरणा अपनाने वाले को पाप नाश एवं नारकीय प्रवृत्तियों से छुटकारे का लाभ मिलना ही चाहिए।
कितने लोग पालन करते हैं, कितने नहीं, यह प्रश्न सर्वथा दूसरा है, उसमें सिद्धान्त को झुठलाया नहीं जा सकता। प्रयोक्ताओं की ना समझी या अवहेलना की ही भर्त्सना की जा सकती है। रिश्वतखोरी का कानून है, उसे लोग पालते नहीं, इस कारण उस कानून निर्धारण पर दोष नहीं लगाया जा सकता। अवहेलना करने वालों की ही निन्दा की जा सकती है। भले ही वह अवहेलना ना समझी के कारण की जा रही हो अथवा जान बूझकर वैसा किया जा रहा हो। गायत्री का समय स्वरूप तब बनता है जब उसका शास्त्रोक्त उपासना परक ही नहीं, मन्त्र में सन्निहित प्रज्ञा प्रेरणा पक्ष भी अपनाया जाय और सत्प्रवृत्तियों के रूप में उसे जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग भी बनाया गया। ( क्रमशः )
( मंगल विजय)
प्राणवान जन पा पाते हैं, प्राणों का उपहार निष्प्राणों में हो पाता कब, महाप्राण संचार॥1॥
निश्चय ही महाप्राण के अनुदानों की बेला। महाप्राण को जीवित रहना भाता नहीं अकेला।
महाप्राण से स्रोत प्राण के अविरल फूट रहे हैं, वह उतना सहे जले जिससे जितना जाये झेला।
महाप्राण से सतत् प्रवाहित है प्राणों की धार। प्राणवान जन पा पाते हैं, प्राणों का उपहार॥2॥
भोग, वासनाओं में अपने प्राण न क्षरित करें। संयम और साधना द्वारा प्राण बलिष्ठ करें।
महाप्राण के प्राण सहेंगे, जागे वह क्षमता, महाप्राण के स्वर, प्राणों में हम प्रतिध्वनित करें।
महाप्राण के अनुदानों का तब होगा अधिकार। निष्प्राणों में हो पाता कब, महाप्राण- संचार॥3॥
प्राण-ऊर्जा अन्तरिक्ष का करे प्रदूषण दूर। यह तब ही सम्भव, जब हमें हों प्राणों से भरपूर।
घुटे जा रहे विकृतियों से मानवता के प्राण, वातावरण विषाक्त हुआ है और हुआ है क्रूर।
प्राणवान बन, करना है मानवता का उद्धार। प्राणवान जन पा पाते हैं, प्राणों का उपहार॥4॥
निष्प्राणों सी जीवनचर्या का कर डालें त्याग। प्राणवान बन, महाप्राण से चलो! करें अनुराग।
महाप्राण का और प्राण का संगम ही हो लक्ष्य, सुप्त प्राण में ऐसी अनुपम जीवट जाये जाग।
महाप्राण के अनुदानों से हो युग का श्रृंगार। निष्प्राणों में हो पाता कब, महाप्राण संचार॥5॥
*समाप्त*