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वर्ष-46 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-11
अध्यात्म का एक पक्ष है- योग और तप। दूसरा है पुण्य परमार्थ। दोनों की संयुक्त शक्ति से ही समग्र शक्ति उभरती और स्थायी सफलता की पृष्ठभूमि बनती है। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चलती है ? एक पैर से लम्बी यात्रा करना और एक हाथ से तलवार चलाते हुए युद्ध जीतने का उपक्रम कहाँ बनता है ?
योग का तात्पर्य है- भावना, आकाँक्षा, विचारणा की उत्कृष्टता के साथ जोड़ देने वाला चिन्तन प्रवाह। ताप का अर्थ है- संयम, अनुशासन, परिशोधन, साहस और अनौचित्य के साथ संकल्प युक्त संघर्ष। यहाँ उतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष का सुनिश्चित आधार खड़ा हो गया। आत्मबल का भण्डार भरा और व्यक्ति सर्व समर्थ-सिद्ध पुरुष- महामानव बना।
इस उपार्जित आत्म-शक्ति का उपयोग विलास, वैभव, यश सम्मान के लिए करना निषिद्ध है। उसे ईश्वर के खेत में बीज की तरह बोया और हजार गुना बनाने के लिए सोचा संजोया जाना चाहिए। यही है- पुण्य परमार्थ का मार्ग। साधु ब्राह्मण-योगी-यती आजीवन लोक मंगल के प्रयोजनों में अपनी क्षमता नियोजित करते रहे हैं। यही है समग्रता का मार्ग जो भी साधक इस अध्यात्म तत्व दर्शन के सिद्धान्त एवं विज्ञान को समझेंगे अपनायेंगे। वे इस क्षेत्र में चरम सफलता प्राप्त कर सकने में समर्थ होंगे, यह निश्चित है। निराशा तो भ्रमग्रस्त में -टकराव में उलझने वाले-सस्ते रास्ते ढूंढ़ने वालों को ही हैरान करती है।
पाँचों पाण्डव एक दिन बिहार के लिए जंगल गए। साथ में शिकारी कुत्तों का झुण्ड भी चल रहा था। एक कुत्ता जंगल में दूर तक अकेला निकल गया। लौटा तो उसके होंठ बाणों से भरे हुए थे। भौंक नहीं पा रहा था।
कुत्ते की दुर्दशा देख पाण्डवों का क्रोध के साथ-साथ आश्चर्य भी उमड़ा। किसने कुत्ते को सताया, यह बात तो गौण हो गयी। चिन्ता इस बात की हुई कि जिसे हमें नहीं सिखाया गया, उस बाण विद्या का ज्ञाता और कौन है? खोज के लिए वे निकले। कुत्ते के मुँह से टपके खून के निशान को सुराग मानकर वे चले। वे निशान्त उन्हें एक भील युवक के झोंपड़े तक ले गए। देखा तो सामने अकेला बैठा धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था।
पाण्डव बन्धु एकटक हो उसका कौशल देखते रहे, उसकी प्रवीणता सराही तथा पूछा किस गुरु की छत्रछाया में इतनी प्रगति की ? उसने द्रोणाचार्य का नाम लिया।
पाण्डव सन्न रहा गए। गुरुदेव ने हमसे छिपाया और यह रहस्य भील पुत्र को सिखा दिया। अपने गुरु के प्रति उपजे क्रोध के कारण तत्काल लौट पड़े और डेरे पर पहुँचते ही अपना आक्रोश भी प्रकट कर दिया।
द्रोणाचार्य ने जब सारी घटना सुनी तो अपने इस अनजान शिष्य को देखने स्वयं साथ चले पड़े। एकलव्य अपनी बाण साधना में मग्न था। ध्यान बंटते ही उसने आगंतुकों से सत्कार पूर्वक आगमन का कारण पूछा।
चर्चा वहाँ से आरम्भ हुई, जिसमें उसे प्रवीणता प्रदान करने वाले गुरु का शिक्षण और अनुग्रह जानना था। एकलव्य ने मिट्टी की द्रोणाचार्य की प्रतिमा की और इंगित कर कहा- मैंने प्रत्यक्षतः तो उन्हें देखा नहीं, कल्पना के आधार पर उनकी प्रतिमा बनाकर उसे प्रत्यक्ष गुरु के समान माना है।
द्रोणाचार्य स्वयं एवं पाण्डव आश्चर्यचकित थे कि श्रद्धा किस प्रकार प्रत्यक्ष से अधिक सामर्थ्यवान सिद्ध हो सकती है अब जीवित द्रोणाचार्य ने श्रद्धा की कठिनतम परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगूठा माँगा, ताकि पाण्डवों को किसी भी तरह प्रतिद्वन्द्वी का भय न रहे। शासन-सत्ता के प्रति समर्पित द्रोणाचार्य का- उनकी स्वयं की दृष्टि से यह कृत्य अनुचित भी नहीं था।
एकलव्य ने सबको स्तब्ध करते हुए तुरन्त अंगूठा काटकर गुरुदेव के चरणों में रख दिया। मण्डली लौटते हुए यही विश्वास साथ लिए चल रही थी कि श्रद्धा यदि सच्ची और गहरी हो तो बड़ा चमत्कार दिखा सकती है। मिट्टी से भी शक्तिशाली देवता प्रकट हो सकते हैं।
एक व्यक्ति इस बात के लिये प्रसिद्ध था कि उसके पास ऐसा रसायन है जिसकी एक बूँद पानी में ला देने पर रोगी अच्छे हो जाते हैं हजारों व्यक्ति लाभ लेने लगे।
इस व्यक्ति के गुरु को भी अनायास कई व्याधियों ने आ घेरा। शिष्य की यश चर्चा ने उन्हें भी आकर्षित किया। उनके आगमन पर शिष्य ने अपने भाग्य को सराहा और सम्मान दिया। उसकी एक ही खुराक ने उनकी व्याधियाँ मिटा दीं। गुरु बड़े प्रसन्न हुए। चलते समय धीरे से पूछा- ‘बेटा! इस रसायन का नुस्खा मुझे भी बता दें ताकि आगे तकलीफ होने पर प्रयोग कर सकूँ।” शिष्य एकान्त में ले गया और बोला- ‘हे देव! यह आपका चरण प्रक्षालन से जो जल जाता हूँ उसी की एक बूँद सबको देता हूँ। वही आपको भी दिया है।’
गुरु ने शिष्य के शपथ पूर्वक दिये गए कथन पर विश्वास कर घर पहुँचते ही मुनादी करवा दी कि वे अब सिद्ध रसायन द्वारा किसी भी असाध्य रोगी को स्वस्थ कर सकते हैं। अपने पैर धोकर घड़ों पानी एकत्र कर लिया।
रसायन पिलाई जाती रही। लाभ किसी को न हुआ। उल्टे पाखण्ड बताकर लोगों की मारपीट, गाली गलौज ही पल्ले पड़ी। चारों और अपयश फैल गया।
गुरु अपने शिष्य के पास पहुँचे व दुर्दशा बतायी, उसे खरी-खोटी सुनाई। नम्र भाव से शिष्य ने कहा- “मात्र चरणोदक नहीं, मेरी गहन श्रद्धा का पुट भी उसमें रहता है। जबकि आपकी धोवन में आपके अहंकार का विष उसमें धुल गया। फलतः वह उपहास का ही कारण बना।”
गुरु ने श्रद्धा और अहंकारिता का मध्यवर्ती अन्तर समझा ओर समाधान लेकर आत्म-शोधन की साधना हेतु हिमालय की ओर प्रस्थान कर दिया।
बनावट की दृष्टि से मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई विशेष अन्तर नहीं होता। सामान्यतया संरचना सबकी ही एक–सी होती है। हाथ-पैर, कान, नाक, आँख, मस्तिष्क की बनावट एक जैसी होती हुए भी कितने ही विद्वान प्रतिभावान हो जाते हैं और अपनी उस विशेषता के सहारे क्रमशः प्रगति सोपानों पर चढ़ते जाते हैं। जबकि कितने ही पिछड़ेपन से ग्रस्त रहते, असहाय, दीन, दरिद्र और दुर्बल बने रहते हैं। प्रकृति प्रदत्त सुविधाएं होते हुए भी उनके सम्बन्ध में सही जानकारी एवं प्रयोग का विधान मालूम न होने से अवनति का अभिशाप ही परिणति बनता है। कितने ही ऐसे भी है जो प्रतिकूलताओं में भी आगे बढ़ने का मार्ग ढूंढ़ लेते-मिट्टी में से सोना उगा लेते हैं। प्रगति के शिखर पर चढ़े तथा अवगति के गर्त्त में पड़े देशों के बीच भारी अन्तर को देखकर इस सत्य को और भी अच्छी प्रकार रखा जा सकता है। आधुनिक तकनीक से अपरिचित रहने वाली कितनी ही जातियों को आज को आज भी जंगली जीवन ही जीना पड़ रहा है। साधनों के करतलगत हो जाने मात्र से प्रगति सम्भव नहीं होती तो मानी सभी मनुष्य एवं सभी देश जातियाँ एक जैसी होतीं, उनमें धरती और असमान जितना अन्तर नहीं दिखायी पड़ता।
मनुष्य ही नहीं अन्यान्य जीवों के लिए भी प्रकृति सम्पदाएं खुली पड़ी है। उन्हें भी खुली छूट थी कि उनका मनमाना उपयोग करें। पर वह प्रवीणता- वह विशेषता अन्य जीव नहीं दर्शा सके, जिसे मनुष्य ने प्रदर्शित किया। मालामाल कर देने वाले हीरे, सोने की खदानें, खनिज सम्पदाएं-पेट्रोलियम के भण्डार आदि उन जीवों के पैरों के नीचे भूगर्भ में दबे पड़े हैं उनमें से कोई भी उनका उपयोग कर सका। पैरों से रौंदे जाने वाले धूल सदृश कणों से परमाणु बम तो मनुष्य ही बना सका है। वे बेचारे तो माचिस की एक तीली का भी निर्माण न करे सके। जो भी मिल जाय कच्चे खा लेने तथा जहाँ-तहाँ प्रकृति के अंचल में सो जाने का उपक्रम मात्र ही वे बना पाते हैं। प्रकृति की अनुकम्पा पर ही उन्हें पूर्णतः आश्रित रहना पड़ता है। करोड़ों वर्षों से वे असहाय, असमर्थों की स्थिति में है तथा आगे भी उसे दयनीय स्थिति से उन्हें मुक्ति मिलने वाली नहीं है।
इस दृष्टि से मनुष्य समझदार ही नहीं सौभाग्यशाली भी है। यह सौभाग्य रूपी अनुदान ही है उसे बुद्धिरूपी अतिरिक्त तथा बेमिसाल विभूति भी मिली है, जिसके सहयोग से वह पदार्थ के हर घटक का अध्ययन गंभीरता पूर्वक कर सकता है। न केवल अध्ययन कर सकता है। न केवल अध्ययन कर सकता है। बल्कि उनका मनमाने ढंग से सदुपयोग-दुरुपयोग भी कर सकता है। उस विलक्षण बुद्धि की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही होगी, जिसकी अन्वेषक विशिष्टता ने एक से बढ़कर एक सामर्थ्यों के स्त्रोत ढूंढ़ निकाले। उनसे इस दुनिया भी काया ही पलट गयी। एक सदी पूर्व के एवं अज के संसार में आकाश पाताल जितना अन्तर है, यह वस्तुतः उस अन्वेषक बुद्धि का ही चमत्कार है।
पर उस विडम्बना पर भी कम आश्चर्य नहीं होता कि धरती से अन्तरिक्ष में छलाँग लगाकर उन्मुक्त आकाश में स्वच्छंद विचरने वाला मनुष्य अपनी ही सत्ता से आज भी उतना ही अपरिचित है, जितना कि सदियों पूर्व था। अपने स्वरूप एवं सामर्थ्य का यथार्थ ज्ञान न होने से भटकाव ही हाथ लगता है। शरीर विज्ञान, भौतिक विज्ञान, जीव-विज्ञान, मनोविज्ञान जैसी विविध ज्ञान की धाराओं से जो ज्ञान मनुष्य के संदर्भ में प्राप्त हुआ है, वह अत्यन्त है। उनसे मानवी सत्ता की सर्वांग- पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती है। जो ऐसा दम्भ भरते हैं उन्हें अल्पज्ञ ही कहना चाहिए। इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मैटर की व्याख्या-विवेचना करने वाले भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र तथा जीव विज्ञान के माध्यम से एक चेतन जीवन की समग्र व्याख्या करना भी सम्भव नहीं है, पर आश्चर्य यह है कि विज्ञान जगत में ऐसा ही उल्टा प्रयास किया जाता है।
मनुष्य का स्वरूप एवं उसके जीवन का प्रयोजन इतना उथला नहीं है जितना की प्रायः समझा जाता है। मानवी व्यक्तित्व के अनेकों आयाम है। शरीर, मन और बुद्धि से भी ऊंची परतें हैं, ‘सोल’- आत्मा के रूप में सबसे सामर्थ्यवान, रहस्यमय तथा विलक्षण आयाम है, जिसकी सम्वेदना और प्रेरणाओं की अनुभूति तो प्रायः हर व्यक्ति को न्यूनाधिक किसी न किसी रूप में होती रहती है, पर उसके यथार्थ स्वरूप की थोड़ी भी जानकारी नहीं होती। रही होती तो जीवन की दिशा कुछ और ही होती। कमाने-खाने और इसी ढर्रे में खप जाने कितने मात्र से ही अमूल्य जीवन की इतिश्री न हो जाती।
कहना न होगा कि भौतिक जगत के प्रति सजग होते हुए भी संसार आत्म विस्मृति के एक भयंकर युग से गुजर रहा है। उस विस्मृति का ही परिणाम है कि मनुष्य-मनुष्य से लड़ रहा है। बुद्धि दूसरों को गिराने एवं मारने में ही अपनी दुर्बुद्धि का ही परिचय दे रही है। साधन सुविधाओं का अम्बार होते हुए भी मनुष्य की आन्तरिक दरिद्रता, दुःख अशान्ति एवं असन्तोष की मात्रा दिनों दिन बढ़ती जा रही है। मरघट के पिशाचों जैसी उसकी स्थिति हो गयी है। जितने साधन संसार में उपलब्ध है, मात्र उतनों से ही स्वर्गीय परिस्थितियों का आनन्द उठा सकना सम्भव था, पर उस विस्मृति की विडम्बना को क्या कहा जाय? जिसके रहते मनुष्य को नारकीय यन्त्रणा सहनी पड़ रही है। यह दासता वस्तुतः अपने ऊपर मनुष्य ने स्वयं ही थोपी है।
आत्म विस्मृति का घटाटोप छा जाने का एक कारण और भी है। बुद्धिवादी युग की एक मनोवृत्ति-सी बन गयी है कि जो बातें दार्शनिक तर्कों अथवा वैज्ञानिक तथ्यों के ढाँचे में नहीं आती है, उन्हें निरर्थक, अप्रामाणिक ठहरा दिया जाता है। बात इतने ही एक समिति नहीं रहती, उनकी सत्ता को मानने तक से इन्कार कर दिया जाता है। यह बुद्धिवादी पूर्वाग्रह है, जिसके रहते आत्मसत्ता के स्वरूप जैसे गम्भीर विषयों का रहस्योद्घाटन सम्भव नहीं हो पाता। विश्लेषणात्मक बुद्धि की मोटी पकड़ सीमा के बाहर होते हुए भी अतींद्रिय सामर्थ्य दूर-दर्शन, भविष्य दर्शन, विलक्षण इच्छा शक्ति के प्रमाण अनेकों व्यक्तियों में समय-समय पर मिलते रहे हैं जो आत्म-सत्ता की असीम सामर्थ्य का ही परिचय, प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इसके बावजूद भी वैज्ञानिक ऐसी किसी अदृश्य-सामर्थ्यवान-सूक्ष्म सत्ता के अस्तित्व के प्रति शंकालु बने हुए हैं जो शरीर मन बुद्धि की संचालक है। इसे पूर्वाग्रह नहीं तो ओर क्या कहा जाय?
पर यदि सत्य की खोज करनी हो तो सत्यान्वेषियों को इस पूर्वाग्रह से मुक्त होना ही होगा। आत्म-सत्ता के अनुसन्धान के लिए नये आधार, नये मापदण्ड तैयार करने होंगे। जिस विज्ञान एवं उसके उपकरणों के माध्यम से शरीर के सूक्ष्म घटकों, केन्द्रों का सही स्वरूप, क्रिया प्रणाली नहीं ज्ञात हो सकी, मस्तिष्क की शक्ति का सात प्रतिशत ही जाना जा सका, उनसे उस सूक्ष्मतम सत्ता का परिचय कैसे मिल सकता है, जो चैतन्य है- अगोचर है निराकार है। सम्भव है, सत्य की खोज के लिए निर्धारित सभी स्थूल वैज्ञानिक मापदण्ड जो बुद्धि द्वारा निर्धारित किये गये है, उलटने पड़े और उनके स्थान पर ऐसे आधार खड़े करने पड़े जो बुद्धि की नहीं मन और अन्तःकरण की उपज हों, जिनका मूलभूत आधार ही सम्वेदना परक हो।
आज का युग, विज्ञान एवं मनोविज्ञान की सन्धि बेला के एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। एक प्रौढ़ हो चला, दूसरे का बचपन आरम्भ हो रहा है। मनःशास्त्र ने इच्छाओं, आकाँक्षाओं, सम्वेदनाओं को व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण प्रेरक तत्वों के रूप में स्वीकार किया है तथा सम्भावना व्यक्त की है कि इनकी व्यक्तित्व गठन में प्रभावी भूमिका हो सकती है। पर आज भी यह अविज्ञात ही है कि एक-सी परिस्थितियाँ एक जैसे दो व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न प्रकार से क्यों प्रभावित करती है ? भली-बुरी इच्छाओं, आकाँक्षाओं को उत्पन्न करने में किनकी प्रमुख भूमिका है- परिस्थितियों की अथवा मनःस्थिति की? यदि मनःस्थिति की, तो एक सी परिस्थितियों में ही वह दो व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न तरह की कैसे विनिर्मित हो जाती है ? आनुवाँशिकी घटकों पर टालकर कभी सन्तोष कर लिया जाता था तथा यह कहा जाता था कि जन्मजात प्रतिभाओं, विलक्षणताओं के लिए जिम्मेदार आनुवाँशिक तत्व है। पर उस टालमटोल में अब कोई विशेष दम रहा नहीं। क्योंकि समस्त आनुवाँशिक सिद्धान्तों को झुठलाते हुए ऐसे विपरीत प्रमाण भी मिल चुके हैं, जिनका कोई तुक्का उन सिद्धान्तों से नहीं बैठता है। सम्भव है, कल तक जिसे अन्ध विश्वास कहकर तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उपहास उड़ाया जाता रहा, उस कर्मफल सिद्धान्त में ही उपरोक्त रहस्यों के सूत्र विद्यमान हो।
वास्तविकता तो यह है कि अब तक ऐसी मशीन का निर्माण न हो सका है, जो भावनाओं, सम्वेदनाओं का यथार्थ स्वरूप बता सके। गणित के फार्मूलों, रसायन शास्त्र के नियमों द्वारा स्नेह प्यार की व्याख्या-विवेचना नहीं की जा सकती। उन्हें किस तरह घटाया, बढ़ाया तथा दिशाबद्ध किया जा सकता है, यह तो बहुत दूर की बात है। ऐसी हालत में उस भौतिक विज्ञान तथा उसकी विभिन्न शाखा प्रशाखाओं से यह कैसे आशा की जा सकती है कि वे आत्मा के स्वरूप का रहस्योद्घाटन कर सकेंगे? वस्तुतः ऐसा सम्भव भी नहीं है।
प्रसिद्ध विचारक एलेक्सिस कैरेल का कथन जरा भी अत्युक्ति पूर्ण नहीं जान पड़ता कि- “यांत्रिक आविष्कारों की वृद्धि से किसी विशेष लाभ की अब अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जब तक मानवी सत्ता अविज्ञात बनी रहेगी, उन उपलब्धियों को सही लाभ नहीं उठाते बन पड़ेगा।” इस बात में किंचित् मात्र भी शंका नहीं की जा सकती कि याँत्रिकी, भौतिकी, जैविकी तथा रसायन शास्त्र जैसे अनेकानेक विषयों के अगाध ज्ञान से मानव जाति के नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास में- शाँति, सुरक्षा एवं पारस्परिक सौहार्द बढ़ाने में थोड़ी भी मदद नहीं मिल सकी है, न आगे मिलने की सम्भावना।
आत्म-सत्ता का रहस्योद्घाटन युग की एक परम आवश्यकता है। ऐसी आवश्यकता जिस पर मनुष्य जाति का भविष्य अवलम्बित है। मनुष्य अपने को पंचतत्वों से बना शरीर तथा धमाचौकड़ी मचाने तथा विस्फोटक परिस्थितियां रचने वाली बुद्धि भर मानता रहा तो भारी भूल होगी। चली आ रही है इस मान्यता की परिणति सामने है- नर पशुओं की भाँति एक दूसरे का अस्तित्व मिटा डालने के लिए हर मनुष्य हाथ बाँधे खड़ा है। उस मान्यता को उलटने से ही इस संकटपूर्ण स्थिति का अन्त होगा। मान्यता भी तब बदलेगी जब मानवी सत्ता का सही बोध होगा। कहना न होगा इसके लिए ऋषि तुल्य आत्मानुसंधान की- उस गहन ज्ञान साधना में प्रवृत्त होना होगा, जिस -साइन्स आफ सोल’ आत्म-विज्ञान’ के नाम से प्राचीन काल से जाना जाता रहा है। चेतना के विज्ञान के रूप में वह आज भी उतना ही प्रामाणिक एवं उपयोगी है जितना प्राचीन काल में था। आवश्यकता इतनी भर है कि इस क्षेत्र में उसी गम्भीरता से अनुसन्धान किया जाय जितना कि भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में किया जाता है।
एक ही मेले में दस जुलाहे साथ-साथ चले। कोई खो न जाय। इसलिये गिनती गिन ली। पूरे दस थे। लौटते समय सोचा गिन लें। कोई घट-बढ़ तो नहीं हुई। गिने तो नौ। एक-एक करके सभी ने गिने पर निकले नौ ही। एक कहीं खो गया। सोचकर सभी दुःख मनाने लगे। एक समझदार उधर से निकला। रोने वालों से कारण पूछा। उसने कहा- हम दसवें को बुलाये देते हैं। रोओ मत। सभी बहुत प्रसन्न हुए। समझदार ने उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया, एक-एक के सिर में एक-एक चपत लगाई और गिनता गया- एक, दो, तीन, चार। पूरे दस हो गये। सभी बुद्धिमान की अनुकम्पा को सराहते हुए घर लोटे। अपने को न जानने के कारण ही यह भूल हो रही थी। उसे सुधार लें तो रोना न पड़े।
आशा और निराशा की अपने-अपने स्थान और समय पर अपनी-अपनी आवश्यकता है। दोनों की ही उपयोगिता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा रहनी चाहिए। इससे उत्साह उठता है और पराक्रम करने का साह उभरता है। श्रेष्ठ जनों ने जो सौभाग्य अर्जित किया उसके स्मरणों से बल मिलता है और विश्वास जमा है कि उस मार्ग पर .चल पड़ने से अपने लिए भी वैसे ही सौभाग्य का सुयोग मिल सकता है। इस प्रकार सत्प्रवृत्तियों के सत्परिणामों का चिन्तन करने से आशा बंधती है और उसे अपनाये रहने पर कठिन मंजिलों को पार करते हुए भी दूरदर्शी लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव होता है।
निराशा इस अर्थ में अच्छी है कि अनुपयुक्त प्रलोभनों की ओर जब मन चले तो उस मार्ग पर चलने वालों की भुगतने पड़े कष्टों और तिरस्कारों का स्मरण करके मन पर अंकुश लगता है और बनाई गई योजना को छोड़ देने का समाधान सामने आता है। यदि दुरात्माओं की सफलता का चिन्तन क्रम चले पड़े तो दुस्साहस उभरने में भी देर नहीं लगती और कुकर्मों का सिलसिला चल पड़ता है। यदि उस दिशा में सहयोग जुटने तथा सफलता मिलने की आशा बैठने लगे तो फिर पतन के मार्ग पर बढ़ते हुए कदम रुकते नहीं।
अधिक उपर्युक्त यह है कि आशा और निराशा को आदेशों की गणना में सोचा जाय और दोनों से ही बचने का प्रयत्न किया जाय। यह दोनों आरम्भ से ही अपना प्रभाव नशे जैसा दिखाते हैं किन्तु अनन्तः परिणाम अनुपयुक्त ही निकलता है। शराब से उत्तेजना आती है और अफीम से सुस्ती काहिली लदती है। आशा शराब है और निराशा अफीम। दोनों ही अपनी-अपनी दिशा में धकेलती है। पर उनमें यह सामर्थ्य नहीं जो सुझाया गया था उसे परिणाम तक पहुँचने में जो समर्थ हो सके।
कर्त्तव्य पालन का संकल्प अपने आप में एक शक्ति है। उसमें सफलता असफलता दोनों की प्रतिक्रिया समान बनी रहती है खिलाड़ी विनोद के लिए खेलते हैं। हार जीत से उतने प्रभावित नहीं होते। रंगमंच के पात्र अभिनय से दर्शकों को तो हंसाते रुलाते रहते हैं, पर उनकी निजी स्थिति पर इसका कोई अतिरिक्त प्रभाव नहीं पड़ता । खजांची के हाथों हर दिन लाखों का लेन-देन होता है इतने पर भी वह हानि-भा की प्रतिक्रियाओं से विरत ही बना रहता है और सुखपूर्वक नींद लेता है।
आशा जहाँ उत्साह प्रदान करती है वहाँ उस सम्भावना के प्रति इतना अधिक आसक्त भी कर देती है कि वह परिणति अनुरूप न तो आघात भी गहरा चलता है। आशावादी की हिम्मत सफलता मिलने पर ही बढ़ती है असफल रहने पर वह बेतरह टूट जाता है और दूसरी बार साहस करने में समर्थ नहीं होता। ऐसे लोग गहरी निराशा में पड़ते और भविष्य के लिए थके, टूटे, निराशा और अपंग जैसे बन कर रहते हैं।
निराशा उससे भी बुरी है, वह उन कार्यों को भी नहीं करने देती जो प्रस्तुत योग्यता एवं परिस्थिति में भी भली प्रकार हो सकते हैं। आशंका और असफलता के अतिरिक्त और कुछ सूझता नहीं है। ऐसा व्यक्ति न आगे बढ़ने की बात सोचता है और न ऊंचा उठने की योजना बनाता है। निराशाग्रस्त व्यक्ति प्रतिमा और सम्भावना दोनों से ही हाथ धो बैठता है।
कर्त्तव्य के परिपालन को ही यदि सफलता मानकर चला जाय तो हर स्थिति में मनुष्य अपना साहस और पराक्रम यथावत् बनाये रह सकते हैं। ऐसा व्यक्ति अपना चरित्र और चिन्तन सुस्थिर बनाये रहता है। और देर-सवेर में उच्चस्तरीय प्रगति तक पहुँच कर रहता है।
परब्रह्म पर भाण्डागार असीम है। वहाँ कभी-किसी भी वस्तु की नहीं। वस्तुतः वह अपने आपमें पूर्ण है। अपूर्ण को पूर्ण कर सकने वाली समर्थ सत्ता ही अपने चारों और विद्यमान है। प्रश्न केवल उसके साथ संपर्क साधने और आदान प्रदान का द्वार खोलने वाली घनिष्ठता को बढ़ाने का है। वह प्रवास प्रक्रिया जैसे-जैसे लघु को महान बनने-तद्रूप विकसित होने का अवसर मिल जाता है।
परब्रह्म को एक प्रकार का पावन ग्रिडस्टेशन कहा जा सकता है जिससे अनेकों बिजली घर जुड़े होते हैं। यदि पन्द्रह वॉट की क्षमता की अपनी काया को सामर्थ्यवान बनाकर सौ वॉट की विद्युत प्राप्ति योग्य बनाया जा सके तो उस विद्युत भण्डार की आरे से कमी नहीं होने वाली। विश्व चेतना रूपी विराट् पुरुष के साथ संपर्क जोड़कर सामान्य स्तर के साधक भी असामान्य स्तर प्राप्त करते देखे जा सकता है।
दैवी शक्तियों के किसी व्यक्ति विशेष पर अनुग्रहीत होने पर अहैतुकी कृपा करने की मान्यता व्यर्थ है। जहाँ सबके लिए समान रूप से द्वार खुला है। पक्षपात जैसा प्रचलन यहाँ है ही नहीं। अपने पराये का भेदभाव यदि दैवी शक्तियाँ भी करने लगे तो फिर पशुता और असुरता का लाँछन भी उन्हीं के कन्धों पर लदेगा। तब वे वैसी न रहेगी जैसी कि होनी चाहिए और है।
सूर्य के लिए भी सभी समान हैं चन्द्रमा की शीतल किरणों, प्राणवायु, शीत-ग्रीष्म के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे अपनी ओर से सभी को समान रूप से प्रभावित करती है, सर्वत्र समान रूप से अपना असर डालती हैं। वह व्यक्ति विशेष पर निर्भर है कि उनके साथ सघनता स्थापित करने और विलग रहने का कौन कितना प्रयत्न करें और उनसे परिणति का कैसा आधार खड़ा करें?
परब्रह्म और दैवी शक्तियों में मूलतः एकता रहते हुए भी उनके मध्य अन्तर उतना ही है जितना कि जलाशय और उनके ऊपर थिरकने वाली जल तरंगों का। अदृश्य अनुशासन की विधि-व्यवस्था रूप में विद्यमान अदृश्य अनुशासन की विधि-व्यवस्था रूप में विद्यमान सत्ता की वे अभिव्यक्ति मात्र है। व्यक्ति एक ही है पर उसके पाँव, हाथ, उंगलियां अपना-अपना काम अलग-अलग रूप में करती है। यही बात आँख, कान, जिह्वा आदि के संबंध में भी है। सभी है तो कायसत्ता के अविच्छिन्न अंग ही। फिर उनके जिम्मे जो-जो काम सौंपे गए हैं, जिस स्तर की उनकी संरचना हुई है, उसी परिधि में उनके क्रिया-कलाप भी चलते हैं। उनकी कार्य पद्धतियों में अन्तर भी रहता है और स्वरूप में भी, फिर भी तत्वतः इनकी कोई पृथक सत्ता है नहीं। मूलभूत है। दैवीय शक्तियों के- देवताओं के- कृपा बरसाने वाली अदृश्य सत्ताओं के संबंध में भी यही बात है। इस देव समुदाय में वे सभी अदृश्य चेतन घटक आ जाते हैं जिनकी प्रकृति उत्कृष्ट उदारता के साथ सम्बद्ध है।
इस चेतन समुदाय में पितर वर्ग के अदृश्य सहायकों को भी सम्मिलित किया जाता है, जो मनुष्य से आगे बढ़कर देवत्व की भूमिका में प्रवेश कर रहे हैं किन्तु अभी उस स्तर में पूर्ण परिपक्व नहीं हुए हैं। ऐसी आत्माएं मनुष्यों के साथ व्यक्तिगत संपर्क साधने और कल्याणकारी सहायता करने में भी रुचि लेती है जबकि पूर्ण देवत्व प्राप्त कर चुकने वाली शक्तियाँ व्यक्तियों के साथ मोह न रखकर व्यापक प्रसंगों पर ही ध्यान देती है और जो करना है वह हर सत्पात्र को समान रूप से उपलब्ध हो इतना भी ध्यान रखती है। महापुरुष स्तर के व्यक्ति परब्रह्म की प्रखरता व पवित्रता को अपने जीवन में उतार कर अपनी क्षमता असाधारण रूप से बढ़ा ले हैं लेकिन इनमें भी ऊंची भूमिका ऋषिकल्प योगीजनों की है। वे अपने सुपर चेतन को परिष्कृत विकसित करते-करते उच्चतम स्तर तक पहुँचा देते हैं। ताकि परब्रह्म का तेज उनमें अधिकाधिक मात्रा में अवतरित हो एवं वे उस महान स्तर की देवोपम भूमिका निभा सकें। ऐसे देव पुरुषों को भूसुर कहना तनिक भी अत्युक्ति पूर्ण नहीं होगा।
परब्रह्म की इन दैवी शक्तियों को इस प्रकार अनेकानेक वर्गों में बाँटा जा सकता है एवं इनके उदाहरण की पुराण आख्यानों में पाए जाने सकते हैं। विक्रमादित्य के साथ पाँच ऐसे ‘वीरों’ का संबंध था जो समय-समय पर उन्हें इच्छित सहायता करते थे। वे समय-समय पर दूरगामी हितों को ध्यान में रखते हुए मार्गदर्शन एवं सहयोग भी दिया करते थे। अलादीन के चिराग की कथा भले ही कल्पना लोक ही हो, पर उसमें चिराग के माध्यम से सशक्त अदृश्य आत्माओं के सहयोग का तथ्य ही सन्निहित है।
सुकरात ‘डेमन’ प्रख्यात था। वह काई अदृश्य आत्मा थी जो सत्त सुकरात के साथ बनी रहती थी अथवा उनके बुलाते ही आ उपस्थित होती थी। मात्र दर्शन हेतु नहीं अपितु सहयोग करने के लिए। सुकरात अपनी हर समस्या व नये चिन्तन के लिए महत्वपूर्ण विषयों पर उससे परामर्श करते तथा तदनुसार ही कार्य करते थे। अन्यायों को तो उसका दर्शन नहीं होता था पर सुकरात उसके साथ वैसा ही संपर्क परामर्श करते थे, मानों कोई जीवित व्यक्ति सामने बैठा हो।
दैवी सहायता के अनुदान प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से सुपात्रों को पुण्य-प्रयोजन के निमित्त प्राप्त होने के कई उदाहरण मिलते हैं। विश्वमित्र यज्ञ रक्षा हेतु राम व लक्ष्मण को दशरथ से आग्रहपूर्वक ले गए थे और वहाँ उन दोनों को बला-अतिबला विद्या सिखाई थी। बला -सावित्री’ को एवं अतिबला ‘गायत्री’ को कहते हैं। सावित्री अर्थात्। भौतिकी। गायत्री अर्थात् आत्मिकी। इन्हीं विभूतियों के कारण वे लंका विजय और रामराज्य की संस्थापना के भिन्न प्रकृति के किन्तु परस्पर पूरक कार्य कर सकने में समर्थ हुए थे। विश्वामित्र ही राम को सिया स्वयंवर में अपनी ओर से ले पहुँचे थे एवं ऋषि रक्त सिंचित बीज से विकसित जनक सुता से अवतार राम विवाह के स्वयं सूत्रधार बने थे।
ऐसे ही सहयोग अन्य महामानवों ऋषिकल्प दिव्यात्माओं ने अपने साथ जुड़े हुए सत्पात्रों को प्रदान किये है एवं अपूर्णता को पूर्णता से बदलने वाला असाधारण सहकार किया, भावभरा अनुदान दिया है। समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी के मध्यवर्ती आदान प्रदान की कथा प्रख्यात है। समर्थ ने ही अपने सत्पात्र को खोजा। उसे उद्बोधन देकर आदर्शवादी महानता अपनाने और तद्नुरूप जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित किया। बात आगे बढ़ी तो अनुदान देने से पूर्व यह भी जाँचा कि पात्र-कुपात्र का चयन करने में कहीं कोई भूल तो नहीं हो रही है।
ठीक इसी से मिलते-जुलते आदान-प्रदान चाणक्य और चन्द्रगुप्त के, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द के, विरजानन्द और दयानन्द के तथा प्राणनाथ और छत्रसाल के मध्य भी चले है। यदि इन युग्मों को पृथक करके देखा जाय तो दोनों ही अपूर्ण रह जाते है॥ अंधे और लंगड़े के बीच परस्पर सहन सहयोग जुड़ा तो दोनों ही नदी पार करने में सफल हुए। पृथक-पृथक रहते, सहयोग न साधते हुए तो सम्भवतः दोनों में से किसी को वह श्रेय न मिलता तो एकात्मता के सहारे बन पड़ा।
मीरा का विष का प्याला पीना ओर अदृश्य सत्ता द्वारा उस हलाहल को निगल जाना एक रहस्य नहीं, परब्रह्म की सत्ता व उनकी सहायता का बोधक प्रसंग है। दुर्वासा के शाप से त्रस्त राजा अम्बरीष की सहायता हेतु स्वयं सुदर्शन चक्र आया। समुद्र से टिटहरी के अण्डे दिलाने में सहायता हेतु भगवान सत्ता की अगस्त्य मुनि के रूप में प्रकट हुई। कोई अदृश्य बाजीगर ही था जिसने हनुमान को समुद्र लाँघने हेतु अपरिमित सामर्थ्य देकर चमत्कार दर्शाया। ये सारे प्रसंग चाहे वे ऊंची स्थिति में पहुँचे साधारण मनुष्य हो अथवा तप पूत ऋषिगण, अदृश्य सहायक हो अथवा पितरगण, एक ही तथ्य सत्यापित करते हैं कि परब्रह्म असीम सामर्थ्यों का समुच्चय है। सुपात्र को दैवी अनुदान किसी भी माध्यम से मिलते रह सकते हैं उसके लिये याचना नहीं अपितु प्रमाणित सिद्ध करनी होगी।
आत्म विस्मृति से जबरन स्वयं को जान लेना सबसे बड़ी उपलब्धि है। साधारणतया लोग अपना अस्तित्व शरीर और मन से बने कार्य कलेवर तक ही सीमित मानते हैं। वासना और तृष्णा में ही उलझा चित इससे ऊपर कुछ सोच भी नहीं पाता। सारे क्रिया कलाप मात्र पेट प्रजनन के लिए होते हैं इसका एकमात्र कारण है अपनी गरिमा को, देवत्व को भुला देना। ईश्वर के युवराज के रूप में अवतरित मनुष्य मार्ग पर चलते हुए भटक जाता है। अज्ञानान्धकार में भटकते-भटकते यह जीवन तो बीत जाता है और अन्ततः पछताने के अतिरिक्त कुछ और हाथ नहीं लगता।
इसीलिये आत्म तत्व की गहराई को समझना सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है। जिसने स्वयं को जानकार जीवन लक्ष्य की पूर्ति की आवश्यकता को समझ लिया, वह महामानव बनता है और देव समुदाय में सम्मिलित होकर अपना ही नहीं अन्य असंख्यों का कल्याण भी करता है। अपने में ओत-प्रोत ब्रह्मसत्ता को जागृत करना ओर स्वयं में देवत्व तथा ईश्वरत्व का उदय करना ही आत्मबोध ही परिणित है और यह आत्मबोध ही ज्ञान साधना का चरम लक्ष्य है। जिसने अपने को जान लिया, उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने का मार्ग हस्तगत कर लिया।
दर्पण में अपनी ही छाया दिखाई पड़ती है, जैसे भी कुछ भले बुरे हम है, उसी के अनुरूप यह विशालकाय दर्पण-संसार हमें दृष्टिगोचर होता है। अज्ञानवश हम बाह्य परिस्थितियों अथवा बाहरी व्यक्तियों को अपने सुख दुःख का उत्थान पतन का कारण मानते हैं पर वास्तविकता इस मान्यता से सर्वथा भिन्न है। जिस प्रकार समुद्र की अगणित लहरों पर एक ही चन्द्रमा के अगणित प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ते हैं, उसी प्रकार संसार के अगणित प्राणियों एवं पदार्थों पर अपनी ही मान्यताएं और क्रियाएं अपनी ही भावनाएं और प्रवृत्तियों थिरकती दिखाई पड़ती है।
दृष्टिकोण का दोष दूषण-जगत में प्रतिबिंबित प्रतिध्वनित होता है। इसलिए तत्वदर्शी सदा से यह कहते रहे कि कि बाह्य परिस्थितियों में यदि सुधार करना हो तो उसका प्राथमिक सुधार परिष्कार से आरम्भ करना चाहिए।
आत्म परिष्कार का प्रयास आरम्भ करने से पूर्व अपना स्वरूप समझना होता है और किस प्रकार अपना आपा बाह्य जगत पर प्रतिबिम्बित होता है, इस तथ्य को हृदयंगम करने की आवश्यकता पड़ती है। यही अध्यात्म विज्ञान का समस्त आवरण इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुआ है कि मनुष्य अपने को जाने और उस तथ्य के आधार पर अपने चिन्तन एवं क्रिया-कलाप का नये सिरे से निर्धारण करें। आत्मदेव की साधना इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर की जाती है।
इसी तथ्य को तत्व-दर्शियों ने अनेक शास्त्रों में अनेक प्रकार से लिखा कहा है। जिस प्रकार अक्षर ज्ञान, अ, आ, इ, ई से आरम्भ होता है उसी प्रकार आत्मोत्कर्ष, आत्म-साक्षात्कार और आत्म-कल्याण की ब्रह्म विद्या का, साधना विज्ञान का का आरम्भ भी आत्मबोध से होता है। अपने आपको जानने के लिए गम्भीर चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म साधना का उपासना, तपश्चर्या और योग साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-
स्वमेवात्मनाऽऽत्मानमानन्दं पदाप्स्यसि। -महोपनिषद् 6।78
अर्थात् समस्त अध्यात्म शास्त्रों का सार इतना भर है- कि विषयों से मुक्त चित्त ही आत्मा है। सो स्वच्छ अंतःकरण द्वारा आये को ही देखो।
आत्मनि रक्षते सर्व रक्षितं भवित। आत्मायतौ वृद्धि विनाशौ॥ -चाणक्य सूत्र 1 82, 83
अर्थात् - अपनी रक्षा करने से सबकी रक्षा होती है। वृद्धि या विनाश करना अपने हाथ की बात है।
अपने आपको सत्-चित् आनन्द परमात्मा का स्वरूप माना जाना चाहिए और काय कलेवर के साथ जुड़े हुए इन्द्रिय समूह को- मन, बुद्धि, चित्त अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय को अपना वाहन, उपकरण, सेवक स्तर का प्रयोग साधन मात्र मानना चाहिए। इस मान्यता की जितनी परिपक्वता होती है, आत्म ओर अनात्म भेद जितनी गहराई तक अन्तःकरण में निष्ठा बनकर प्रतिष्ठित होता है उतने ही अंशों में आत्म-बोध प्राप्त हुआ समझ जाना चाहिए।
मनुष्य प्रायः भ्रमग्रस्त स्थिति में ही रहता है। जीवन अपने को शरीर मात्र अनुभव करता है और उसी के सुख-साधन जुटाने में जीवन सम्पदा को नियोजित किये रहता है। ऐसे ज्ञानवानों को भी अज्ञानी ही कहना चाहिए। आत्मबोध का उदय आत्म तत्व की स्पष्ट एवं सघन मान्यता से ही आरम्भ होता है और वह मान्यता इतनी प्रबल होती है कि आत्मज्ञानी अपने चिन्तन एवं क्रिया-कलापों को आत्मानुगामी, परमार्थ परायण बनाये बिना रह नहीं सकता। ऐसे ही यथार्थ आत्मज्ञान का स्वरूप समझाते हुए ईशोपनिषद् में कहा गया है। “ज्ञान ओर अज्ञान के अवलम्बन के परिणाम अत्यन्त भिन्न है। यह अनुभव हमने उनसे सुना है जिन्होंने तत्व गहन अवगाहन किया है।”
त्वं राजा सर्वलोकस्य पित्रो रिपो रिपुः। यत्न्याःपतिः पिता सूनो कस्तवाँ भूप वदाम्यहम्॥36
त्वं किमेतछिरः कि तु शिरस्तव तोदरम्। किमु पादादिक त्वं तवैर्तात्क महीपते॥ 37
समस्तावयेभस्त्वं पृथम्भूतो व्यवस्थितः। कोऽहमित्यत्र निपुणं भुत्वा चिन्तय पार्थिव॥ तच्छुत्वोच राजा तमवधूत द्विजं हरिम्॥38
अर्थात्—तू इस विश्व वसुधा का शासक है। पिता का पुत्र है। शत्रु का शत्रु है। पत्नी के लिए पति है। पुत्र के लिए पिता है। बता तुझे मैं क्या कहकर पुकारूं ?
क्या तू शिर है- नहीं शिर तो तेरा है। क्या तू पेट है- नहीं पेट तो तेरा है। क्या तू पैर है- नहीं, पैर तो तेरा है? वह समस्त अंग तेरे उपकरण मात्र है। तू इससे कुछ पृथक ही है। हे मिट्टी के पुतले! मैं कौन हूँ, इस पर अत्यन्त गम्भीरता और सावधानी के साथ विचार कर।
नाहं पदार्थस्य न में पदार्थ इति भावते। अन्तःशीतलता बुद्धृया कुर्वतो लीलया क्रियाम्॥ -महोपनिषद् 6।43
अर्थात् - न मैं इन पदार्थों का हूँ और न ये मेरे हैं अन्त-करण में शान्ति और प्रफुल्लता प्राप्त हो, हे ईश्वर मेरी यही प्रार्थना है।
आत्मा का विकसित, परिष्कृत रूप ही परमात्मा है। जीव की सुविकसित स्थिति का नाम ही ब्रह्मा है। अज्ञान जन्य अन्धकार से निवृत्त हो जाने का नाम ही आत्म साक्षात्कार अथवा ईश्वर दर्शन है। यह प्रक्रिया अपने से बाहर संसार में अन्यत्र कहीं सम्भव नहीं है। तीर्थ, गुरु सत्संग आदि से मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन भर मिलता है। अभीष्ट वस्तु की उपलब्धि तो अपने भीतर अंतःकरण में ही होती है। तप करने से लेकर ईश्वर दर्शन करने तक का प्रयोजन पूर्ण करने से लेकर ईश्वर दर्शन करने तक का प्रयोजन पूर्ण करने के लिए हृदय गुफा रूपी तीर्थ को, तपोवन को ही एक मात्र उपयुक्त स्थान माना गया है।
हृदिस्था देवताः सवर्सा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः हृदि प्राणश्य ज्योतिश्चय त्रिवृत्सूत्रं च तद्विदुः। हृदि चैतन्येतिष्ठति॥ —ब्रह्मोपनिषद् 4-5
अर्थात्- हृदय में समस्त देवता निवास करते हैं हृदय में ही प्राण और प्रकाश है। परमात्मा के इन तीन आधारों की अभिव्यक्ति के लिए यज्ञ सूत्र यज्ञोपवीत पहना जाता है।
हृदय में परब्रह्म का निवास है। यह तथ्य यज्ञोपवीत प्रकट करता है। जो इस तथ्य को जानता है वही देवज्ञ ब्राह्मण है।”
नवद्वारे पुरे देहि हंसो लेलायत बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य चं॥18 -श्वेताश्वेतर
अर्थात् - सम्पूर्ण स्थावर-जंगम विश्व का नियामक परमेश्वर नौ द्वार वाले देह रूप पुर में स्थित में निवास करता और बाह्य संसार में भी वही क्रीड़ा कर रहा है।
तस्मादिदं गुहेव हृदयम्। -शतपथ 11।2।2615
अर्थात् - यह हृदय ही गुफा है।
अणोरणीयान् महतो महीया- नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्। तमक्रतुः पश्यति वीताशोको, धातुः प्रसादान्महिमा महात्मनः। -(कठ 2120)
अर्थात्- छोटे से भी वह छोटा है बड़े से भी बड़ा है, इस जीव की हृदय रूपी गुफा में भी वह विराजमान है। उस परमात्मा की महिमा को उसी परमात्मा की कृपा से कामनाशून्य वीतशोक के पुरुष देखते हैं।
वस्तुतः इस आत्म गुहा में आश्रय वाले उस परम पुरुष-विश्वरूप-हिरण्यमय तथा बुद्धिमान है और वह बुद्धि का अतिक्रमण करके ही स्थित रहा है और वह बुद्धि का अतिक्रमण करके ही स्थित रहा करता है। वह शास्त्र वचन हर क्षण एक ही सत्य की प्रतिष्ठापन करता है। वह उद्घोष करता है कि अपने को परमात्मा का अविनाशी अंश मानकर जीवन नीति निर्धारण करना ही जीवन मुक्ति का एकमात्र साधन है। इसके विपरीत जो शरीराभ्यास में क्रीड़ा-कल्लोल में निमग्न रहकर अपने आपको देहधारी मात्र मानत हैं और भौतिक सुखों के लिए आत्म-कल्याण की अभीष्ट और भौतिक सुखों के लिए आत्म-कल्याण की अभीष्ट गतिविधियाँ अपनाने से इन्कार करते हैं, उन्हें आत्महंता, माया मोहग्रस्त लोगों की भर्त्सना ही की गई है एवं सत्पथ अपनाने वालों की प्रशस्ति कर उन्हीं का अनुगमन करने का निर्देश दिया गया है।
यह तथ्य है कि आत्मज्ञान प्राप्त मनुष्य का घर ही तपोवन बन जाता है। अन्तर की महानता घर-परिवार से लेकर समीपवर्ती कार्य व्यवसाय में भी आनन्द, उल्लास का, उत्कृष्टता का वातावरण उत्पन्न करती है और उन परिस्थितियों में रहता हुआ मनुष्य श्रेष्ठ बनता है और अपने आपको सब प्रकार का धन्य हुआ अनुभव करता है।
वसिष्ठोस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासगृहेष्वपि। वसिष्ठात्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धिमाम्॥ -महाभारत
अर्थात्- “घर में रहते हुए भी मैं वशिष्ठ हूँ। मैं सबमें बसा हुआ हूँ। सब मुझमें बसते हैं। इससे मैं वसिष्ठ हूँ। “
यह विशिष्टता--मानवी जीवन की श्रेष्ठता ही मानव को वशिष्ठ का ऋषि पद देती है एवं उसे गौरवान्वित करती है। मनुष्य की चरमोपलब्धि यही है- आत्मज्ञान। जिसे वह प्राप्त हो गया, उसे ऋषि स्तर पर पहुँचा माना जाना चाहिए।
एक किसान के चार बेटे थे। उनकी बुद्धिमता जाँचने के लिए बेटों को बुलाकर किसान ने एक-एक मुट्ठी चावल दिये, ओर कहा- “इनका जो मर्जी हो सो करना”
एक ने उसे छोटी वस्तु समझा और चिड़ियों को फेंक दिया, दूसरा उन्हें उबालकर खा गया, तीसरे ने संभल कर डिब्बे में रख दिया ताकि कभी पिताजी माँगे तो उन्हें दिखा सकूँ। चौथे ने उन्हें खेत में बो दिया ओर टोकरा भरा चावल पिता के सामने लाकर रख दिये।
पिता ने बोने वाले को अधिक समझदारी पाया, और बड़ी जिम्मेदारियों के काम को उसी के सुपुर्द किये। भगवान भी यही करता है।
एक चूहा था। किसी तपस्वी की कुटी में रहता था। बिल्ली उधर से निकलती तो चूहा डर से काँपने लगता। महात्मा ने उससे भयातुरता का कारण पूछा। चूहे ने कहा- बिल्ली का भय सताता है। मुझे बिल्ली बना दीजिए, ताकि निर्भय रह सकूँ।” तपस्वी ने वैसा ही किया। चूहा बिल्ली बन बया- और सिर उठाकर उस क्षेत्र में विचरण करने लगा। कुत्तों ने उसे देख पाया, तो खदेड़ने लगे। कुत्तों ने उसे देख पाया तो खदेड़ने लगे। बिल्ली पर फिर संकट छाया और फिर से तपस्वी से अनुरोध किया- इस बार भी संकट से छुड़ाये और कुत्ता बना दें।”
दयालु महात्मा ने उसकी वह मनोकामना भी पूरी कर दी। बिल्ली अब कुत्ता बनकर भौंकने लगी। अधिक दिन बीतने न पाये कि जंगली भेड़ियों ने उसी गन्ध पाई और मार कर खाने के लिए चक्कर लगाने लगे। कुत्ते का भास फिर लौट आया। डरे, घबराये कुत्ते महात्मा का फिर से अंचल पकड़ा। नया वरदान माँगा भेड़िया बन जाने का। इस बार की कामना भी पूर्ण हो गई। जरक भेड़िये को सिंह नहीं देख सकते क्योंकि उससे चोर शत्रुता मानते हैं। सिंह परिवार की सूचना मिली, तो वे उस भेड़िये की जान लेने पर उतारू हो गये। जरक क्या करता। महात्मा ही उसे त्राण दिला सकते थे। सिंह बनकर निश्चिन्त रहने की कामना जगी और गिड़गिड़ाकर किसी प्रकार अब की बार भी उसकी पूर्ति करा ली। अब उसका परिवर्तित रूप सिंह का था। दहाड़ से उसने सारा क्षेत्र गुंजाना आरम्भ कर दिया। बहुत दिन नहीं बीते थे कि शिकारियों का एक छकड़ा, सिंहों के शवों से भरा हुआ निकला। शिकारियों ने उस क्षेत्र के सारे सिंह मार लिए थे। एक बचा था। उसी की तलाश करने वे महात्मा की कुटी वाले क्षेत्र में ढूंढ़ खोज चला रहे थे। वरदान से बने सिंह को पता चला तो संकट की घड़ी सिर पर मंडराती दीखी। जाता कहाँ, तपस्वी के पास ही हर संकट के निवारण और मनोरथ पूरा कराने पहुँचता था। इस बार भी पहुँचा।
अब की बार तपस्वी की मुद्रा बदली हुई थी, उन्होंने कमण्डल से जल छिड़ककर सिंह को फिर चूहा बना दिया बोले-संकटों का सामना करने का जिनमें साहस पराक्रम नहीं, उसके लिए दूसरों की सहायता से भी कब तक काम चल सकता है।
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एक बार इन्द्रदेव पृथ्वी लोक पर से गुजरे ओर दुःखियों की व्यथा पूछते और वरदान देते चलते। एक जगह पाँच अपंग मिले। एक अन्धा, दूसरा गूँगा, तीसरा बिना पैर का, चौथा बिना हाथ का, पांचवां बिना बुद्धि का। पाँचों ने अपने अभावों को दूर करने के लिए वरदान माँगे। इन्द्रदेव ने उन्हें इस शर्त पर तथास्तु कहा कि नई उपलब्धियों को परमार्थ में लगाया करेंगे।
बहुत दिन बाद देवता उनकी खोज खबर लेने आये देखा कि वे सभी उपलब्धियों को स्वार्थ साधने ओर कुकर्म करने में लगा रहे हैं। इस पर इन्द्रदेव क्रुद्ध थे और जो दिया उसे वापस ले लिया।
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श्रुतायुध के कठोर तप से प्रसन्न होकर शिवजी उसे अमोघ गदा प्रदान की ओर कहा- “इसका उपयोग परमार्थ के लिए करना। स्वार्थ में करने पर यह उलटा फल देगी और प्रयोक्ता को ही मारेगी।
श्रुतायुध उस उपहार को लेकर चला गया एवं उचित अवसर की प्रतीक्षा में उसे संजोकर रखे रहा।
एक दिन तरंग विनोद में अपना अपमान समझकर आवेशग्रस्त श्रुतायुध ने वस गदा भगवान श्रीकृष्ण पर ही चला दी। क्रोध में न विवेक रहा न औचित्य। गदा चली तो वरदान के अनुरूप लौटकर प्रयोक्ता पर आ गिरी और उन्हीं को धराशायी बना दिया।
अध्यात्म का लक्ष्य अंतरात्मा में सन्निहित सत्प्रवृत्तियों से बनी काया को विज्ञान सम्मत पद्धति से इस स्थिति तक उभारता जागृत करता है कि वे व्यावहारिक जीवन में ओत-प्रोत हो सके। इसी प्रकार विज्ञान का लक्ष्य प्रकृतिगत शक्तियों एवं पदार्थों के स्वरूप तथा क्रियाकलापों का अध्ययन करना है। उस अध्ययन द्वारा ऐसे निष्कर्ष प्राप्त करना है जिससे समुचित लाभ उठा कर मनुष्य अधिकाधिक सुखी सम्पन्न हो सके। प्रकृति के नियमों का अध्ययन कर, उनके अनुकरण द्वारा मानवी सुख-सुविधाओं की अभिवृद्धि करना ही मुख्यतः विज्ञान का उद्देश्य है। इस प्रकार दोनों का कार्यक्षेत्र प्रत्यक्षतः अलग होते हुए भी वे दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि जीवन आत्मिक एवं भौतिक दोनों ही प्रकार के तत्वों से मिलकर बना है। जड़ चेतन के समन्वय से ही जीवन का स्वरूप प्रत्यक्ष होता है।
जीवन सत्ता के अस्तित्व में आने पर भी यह अन्तर तो मानना ही पड़ेगा कि हृदय और मस्तिष्क की तरह दोनोँ का कार्यक्षेत्र भिन्न है, जड़ और चेतन का समन्वय जीवन है लेकिन जड़ अलग है और चेतन अलग। इसी प्रकार अध्यात्म और विज्ञान का कार्यक्षेत्र भिन्न है, यद्यपि वे दोनों एक दूसरे के पूरक है।
धर्म और अध्यात्म का समग्र ढाँचा वस्तुतः नैतिक, भावनात्मक एवं सामाजिक परिष्कार की प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिये खड़ा किया गया है । धर्मधारणा अपने मूल स्वरूप में होगी वहीं उसका लाभ आत्मसंतोष और आत्मिक उल्लास की ऐसी शक्ति के रूप में विद्यमान दिखाई देगा, जिसके सामने भौतिक दृष्टि से अभावग्रस्त जीवन जीने वाले व्यक्ति व्यक्ति भी अपना जीवन और धैर्यपूर्वक सरल सुरम्य बना सकें। लेकिन इन दिनों जन जीवन पर, आध्यात्मिक प्रभाव तेजी से घटता जा रहा है । इसका कारण है कि धर्म क्षेत्र समय के अनुरूप अपने को ढालने के लिये तैयार है और परिवर्तनों का सतत् स्वागत करता है।
आवश्यकता इस बात की है कि अध्यात्म को भी विज्ञान की भाँति उदार और गतिशील तर्क एवं तथ्य सम्मत बनाया जाय तथा उसे वान के समकक्ष ला खड़ा किया जाये ताकि दोनों का समन्वय मनुष्य जाति के लिये गंगा यमुना के संगम की तरह पावन और कल्याणकारी सिद्ध हो सके। कहा जा चुका है कि आध्यात्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक है तथा दोनों संतुलित गति प्रदान करने में ही मनुष्य जाति जाति का हित सधेगा। यदि धर्म को मात्र पूजा प्रक्रिया और विज्ञान को शिल्प व्यवसाय तक ही सीमित कर दिया जाये तो दोनों की गरिमा इससे घटेगी ही, बढ़ेगी नहीं। इन दोनों का परस्पर पूरक सिद्ध होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
लन्दन विश्व विद्यालय के एस्ट्रोफिजीसिस्ट प्रो0 हर्बर्ट डिग्ले का कथन है कि “विज्ञान की एक सीमित परिधि है। उसका काम पदार्थ के स्वरूप एवं प्रयोग का विश्लेषण करना भर करना है। पदार्थ किसने बनाया है? किस प्रकार बना ? क्यों बना ? इसका उतर दे पाना वर्तमान स्थिति में संभव नहीं है । इसके लिये तो विज्ञान को बहुत ऊँची कक्षा में प्रवेश करना पड़ेगा। वह कक्षा उतनी ही ऊँची होगी, लगभग उसी स्तर की होगी, जितनी की अध्यात्म के तत्वाँश की समझी जाती है, आप्त वचनों में जिनका वर्णन किया जाता रहा है।
धर्म और विज्ञान को एक-दूसरे का सहायक-पूरक बनाने की आवश्यकता बताते हुए दार्शनिक पॉलटिलिच ने कहा है “कि धर्म और विज्ञान का मिलन दार्शनिक स्तर पर ही हो सकता है। दानों के क्रियाकलाप एवं प्रतिपादन की दिशाएँ अलग-अलग है और उस स्थिति में भी अलग-अलग ही बनी रहेगी। लेकिन दार्शनिक स्तर पर दोनों पूरक सिद्ध हो सकते हैं। क्योंकि धर्म का लक्ष्य आध्यात्मिक जगत में सत्य की खोज है तो विज्ञान प्रकृति के नियमों और विधि-विधानों का यथार्थ खोजना चाहता है। दोनों का ही लक्ष्य यथार्थ का-सत्य का पता लगाना है । लेकिन दोनों का एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करेंगे तो इसमें व्यर्थ के भ्रम उत्पन्न होंगे क्योंकि न तो धर्म शास्त्रों के आधार पर खगोल, रसायन और पदार्थों का विश्लेषण सम्भव है और न भौतिक विज्ञान की प्रयोगशालाएँ ईश्वर आस्था, कर्मफल, सदाचार, भाव प्रवाह जैसे तथ्यों पर कुछ प्रमाणिक प्रकाश डाल सकती है। ऐसा केवल बौद्धिक दार्शनिक स्तर पर ही सम्भव है कि वहाँ दोनों धारायें मिल सके।
स्थल दृष्टि से विचार करने अध्यात्म और विज्ञान भले ही एक-दूसरे से भिन्न और परस्पर विरोधी प्रतीत होते हो। लेकिन दार्शनिक दृष्टि से दानों एक ही है ठीक उसी प्रकार जैसे पृथ्वी के दो ध्रुवों से अथवा शीत ग्रीष्म के ऋतु प्रभाव एक दूसरे से भिन्न दिखते हैं। लेकिन सभी परस्पर संबद्ध हैं । उसी प्रकार कार्यक्षेत्र, शैली और पद्धति से अध्यात्म और वान एक दूसरे के पूरक ही है। इसलिये यह भी एक तथ्य है कि दानों में से एक के आधार पर जो निष्कर्ष निकाला जायेगा वह अपूर्ण ही रहेगा। पदार्थ में चेतना का अस्तित्व और चेतना के सक्रिय रहने में भौतिक पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। इस दृष्टि से भी अध्यात्म शास्त्र और वान को एक दूसरे का पूरक व सहयोगी बनना चाहिये परन्तु हुआ अन्य ही है। धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक बनने की अपेक्षा आज की परिस्थितियों में तो विरोधी सिद्ध होते जा रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने जो नये तथ्य खोजे उन्हें स्वीकार करने से धार्मिकों ने यह कह कर इन्कार कर दिया कि वे अध्यात्म सम्मत नहीं है। उसी प्रकार धार्मिक सत्यों को विज्ञान यह कह कर झुठलाने लगा कि ये बातें प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं होती। इस विरोधी प्रतिपादन में बुद्धिजीवी वर्ग विज्ञान से ही प्रभावित हुआ क्यों कि विज्ञान ने नित नये का स्वागत किया और और उसे स्वीकार करने तथा अपनी पिछली भूलों को मानने एवं उन्हें सुधारने में सदैव में सदैव बेहिचक तैयार रहे। यदि धर्म क्षेत्र के लिये भी शोध और सुधार का अन्वेषण और मंथन का का क्षेत्र खुला रखा जा सके तो, उसे भी भी वैसी मान्यता मिलेगी जैसी कि विज्ञान को प्राप्त हुई है।
आज आवश्यकता है अध्यात्म को विज्ञान के साथ मिलकर चलने हेतु बाध्य किया जाये और उसे नये का स्वागत करने की सीख लेने को कहा जाय। इसी प्रकार विज्ञान को अध्यात्म कसे मनुष्य के हित में प्रकृति की शक्तियों के उपयोग की सीख लेनी पड़ेगी और अपने को भी विध्वंस से मुक्त रखना पड़ेगा। मनुष्य के हित और समाज का उत्कर्ष अध्यात्म तथा विज्ञान दोनों का ही लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये गहराई में जाना है, दूसरी ऊंची उड़ान भरनी है। तो जरूरी है कि धर्म और विज्ञान को एक दूसरे विरोधी नहीं पूरक और सहायक ही बनाया जाये। थोड़े-थोड़े सुधार के साथ दानों ही परस्पर मिल कर इस लक्ष्य को त्वरित गति से प्राप्त कर सकते हैं।
यह कार्य कठिन नहीं। मात्र दुराग्रहों से मुक्ति पाना भर है। दुराग्रह पूर्वाग्रह दोनों ही ओर से है। अध्यात्म अपनी पूर्व मान्यताओं से हटना नहीं चाहता तो वान दृश्य दृश्य के प्रत्यक्ष को ही सबकुछ माने बैठा है। अध्यात्म को श्रद्धा प्रतिपादनों हेतु तर्क तथ्य की कसौटी पर खड़े होने के लिये स्वयं को तैयार करना है तो वान को प्रत्यक्षवाद की ही नहीं -दार्शनिक मान्यताओं के दृढ़ आधारों की भी पुष्टि करनी है। मनीषी एवं वैज्ञानिक गणों के पारस्परिक सहयोग से - इस समुद्र मन्थन रूपी असम्भाव्य पुरुषार्थ को भी सम्पन्न किया जा सकता है ।
नैतिकता को नागरिकता एवं सामाजिकता का एक पक्ष माना जाता है, पर वस्तुतः वह इतने उथले धरातल पर उपजती नहीं। सामाजिकता नैतिकता लोक हित के नाम पर कुछ भी कर गुजरने पर उतारू हो जाती है उसे अपने मूल स्वरूप को भुला देने में देर नहीं लगती। देश और धर्म के नाम पर लोगों ने ऐसे अन्यान्य अत्याचार किये हैं जिन्हें देखते हुए व्यक्तिगत रूप से उन्हें पशु या पिशाच भी कहा जा सके।
यही बात नागरिक स्तर की नैतिकता के सम्बन्ध में भी हैं। वस्तुतः शिष्टाचार कहना चाहिए। बड़े आदमियों के लिए बने खर्चीले स्कूलों में प्रायः शिष्टाचार ही प्रधान रूप से सिखाया जाता है। इस प्रकार की व्यवहार कुशलता प्रशंसनीय तो है पर वह नैतिकता का स्थान नहीं ले सकती। हो सकता है कि कोई व्यक्ति मधुर भाषी, विनम्र और शिष्टाचार परायण हो किन्तु भीतर ही भीतर दुष्टता से भरा हो, दुरभि संधियाँ रच रहा हो। विक्रय-कला में प्रायः इसी प्रकार की धूर्तता का पुट रहता है। भोले लोग शिष्ट को सज्जन भी मान बैठते हैं और उसका परामर्श मानकर अपनी जेब कटाते देखे जाते हैं।
नीति वस्तुतः भावनात्मक उत्कृष्टता है जिसे ‘प्रेम’ शब्द से सम्बन्धित करता अधिक उपयुक्त होगा। आत्मीयता भरी सम्वेदना अन्तराल की विशेषता है। वह जहाँ होती है। प्रेमी स्वभाव का व्यक्ति किसी के साथ भी अनीति नहीं बरत सकता। उसे दूसरों का अहित सोचते या करते समय ऐसा लगता है, मानों अपनी ही कुल्हाड़ी से अपना ही पैर काटने जैसा अनर्थ किया गया।
प्रेम की शक्ति मात्र-आत्मानुभव से जानी जा सकती है। इस भाव के उठते ही हमारा शरीर रोमाँचित, स्फूर्तिमय एवं सशक्त बनने लगती हैं। भय एवं घृणा की स्थिति में काल्पनिक अवसाद एवं आसन्न तिमिराछन्न संकट ही सूझता है किन्तु प्रेम-मैत्री भावना पुष्ट हो जाने पर अपनी आत्मा का प्रकाश ही सर्वत्र दृश्यमान होता है जो प्रकारांतर से परमात्मा का प्रकाश पुँज ही होता है। साधन की पराकाष्ठा साध्य में स्वयमेव परिणित हो जाती है। प्रेम से परमेश्वर प्राप्त है। इसे यों कह लें - प्रेम और परमेश्वर एक है अथवा प्रेम ही परमेश्वर है।
जबकि दूसरी और घृणा से क्रोध और क्रोध से ध्वंस की शृंखला है। प्रेम से स्वार्थ त्याग-समष्टि बुद्धि और उससे विश्वात्मा तक ही पहुँच होती है। द्वेष भावना निर्बलता की एवं मैत्री भावना सबलता की प्रथम सीढ़ी शिला है जिनसे अभ्युदय या पतन-पराभव सम्भव है। द्वेष और प्रेम के संघर्षों में प्रेम की निरन्तर स्थायी विजय पायी गई हैं।
रोनाल्ड निक्सन जो प्रख्यात चिन्तक हैं, को जब कहीं से शान्ति न मिली तो संयोगवश एक प्रक्रिया उनके हाथ लगी। एक दिन ज्यों−ही उन्होंने अपना ध्यान आक्सफोर्ड कैम्पस स्थित बुद्ध-प्रतिमा में लगाया, तत्काल ही उन्हें अनुपम अगाध शान्ति सहज ही मिल गई। वस्तुतः बुद्ध ने मैत्री-प्रेम भावना का उतना सघन अभ्यास आजीवन किया था कि उनके स्मरण दर्शन मात्र से घृणा, पशुता एवं अशान्ति जैसे दुष्ट भाव स्वयमेव भाग जाते हैं। ऐसे “रसो वै सः” से अभिपूरित प्रतिमा पर ध्यान का आरोपण भी साधक में उन गणों का समावेश कर देता है। वस्तुतः प्रेम वह पारस है जिसके स्पर्श-मात्र से दुःख, दुःख नहीं रह जाता, बड़े से बड़ा त्याग बलिदान भी तुच्छ प्रतीत होता है। दुर्बुद्धि, शत्रुता, पशुता एवं कलुषता क्षण मात्र में छू मन्तर हो जाते हैं। निरन्तर अभ्यास से शाश्वत मानसिक शान्ति सहज सम्भव हो जाती है। प्रेम की ही शक्ति है कि नर-नारी सहजीवी के रूप में गृहस्थ के तपोवन में बने रहकर अपनी सत्ता एक-दूसरे में घुला देते हैं, निजी अस्तित्व मिटा देते हैं।
स्नेह सौजन्य और सद्व्यवहार का समन्वय नीति वान आचरण के रूप में प्रकट होता है। आध्यात्मिक उत्कृष्टता का किसने किस सीमा तक अभ्यास कर लिया इसकी परख एक ही आधार पर हो सकती है कि वह कितना नीतिवान दृष्टिकोण अपना सका और अपने व्यवहार में उसने कितनी नीति सत्ता का समावेश कर लिया। चिन्तन और व्यवहार क्षेत्र का यह समन्वित रूप ही आदर्शवादी व्यक्तित्व का ढाँचा बनाता है। इस फर्मे में विकसित हो कर ही साधारण से मनुष्य महामानव बनते-महत्वपूर्ण भूमिका निभाते देखे जाते हैं।
प्रसिद्ध चिन्तक-लेखक रूसो का मत था कि जो लोग राजनीति एवं नैतिकता को अलग-अलग समझते हैं वे सामाजिकता एवं वैयक्तिक आचार संहिता के मूलभूत दर्शन से अनभिज्ञ हैं। व्यष्टि और समष्टि दोनों ही के लिये नीतिमत्ता ही एक मात्र मार्ग है जिस पर चलकर प्रगति की जा सकती है।
कोई भी सभ्य समाज किसी प्रकार के आरोपित नियन्त्रण की आवश्यकता अनुभव नहीं करता। लेकिन जहाँ स्वार्थ ही सब कुछ है- संकीर्णता मोहग्रस्तता ही जिनके पल्ले बँधी है, उन्हें व्यक्ति नहीं, नरपशु, नरपामर की श्रेणी ही दी जा सकती है। सम्वेदना शून्य होने के नाते वे इससे ऊँचे दर्जे पर विकसित होने की योग्यता भी नहीं रखते। समाज के नैतिक अवमूल्यन से खिन्न शॉपेन हावर ने इसी कारण बारम्बार दुहराया था कि नैतिकता का उपदेश देना तो सरल है किन्तु सिखाने हेतु आधारशिला खड़ी करना एक कठिन कार्य है। यहाँ भी समाज में नीतिमत्ता का बाहुल्य है वहाँ पारस्परिक सहकार-स्नेह सद्भावना सहज ही पायी जाती है अतः वहाँ ऐसी कोई आवश्यकता रह नहीं जाती। स्वार्थ त्यागकर परमार्थ पकड़ना कभी भी सरल नहीं रहा। इस ध्येय की प्राप्ति के लिए आत्म नियन्त्रण का राजमार्ग सदा से रहा है। इस मार्ग का क्रमिक अभ्यास बचपन से चलाने के निमित्त वयस्कों को कुछ स्वीकारात्मक अभ्यासों को अपनाना और अवाँछनीयता को त्यागना पड़ता है। बच्चों की अति सुरक्षा के नाते अभिभावक अपना भय, निराशा अवसाद बालक पर थोप देते हैं जबकि दुलार के नाते उसे अनुशासनहीन न बनने देकर उनमें विश्वास एवं उत्साह-साहस जगाना चाहिये।
अति प्रेम प्रदर्शन से खिन्न होकर ‘ब्राक शिशोल’ ने लिखा था “दुर्भाग्यवश अभिभावक प्रेम के नाम पर बच्चों का भयानक अनर्थ करते हैं।”
उनके कथन का प्रयोजन यह है कि प्रेम के साथ औचित्य भी जुड़ा रहे। व्यक्ति विशेष से लगाव बढ़ा कर ऐसा कुछ न किया जाय जो दूरदर्शिता एवं नीतिमत्ता के प्रतिकूल पड़ता हो। यह भूल प्रायः अभिभावक अपने बच्चों के साथ करते रहते हैं। मैत्री के नाम पर भी ऐसा ही अनौचित्य बरता जाता है। ऐसी दशा में दूध में जहर मिल जाने की तरह प्रेम भी अपनी गरिमा से गिर जाता है और सहित करने लगता है।
प्रेम व्यवहार में दूसरों के साथ जो उदारता बरती जाती हैं उस पूँजी को आत्म नियन्त्रण के आधार पर अर्जित किया जाना है। लोभी के लिए यह किसी प्रकार भी सम्भव नहीं होता कि वह अपने को किसी प्रकार की क्षति पहुँचाये बिना दूसरों का हित साधे। दूसरों को हानि पहुँचाये बिना अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं हो सकता और प्रेमी के लिए ऐसा कर सकना अतिकठिन है। इसलिए स्वार्थ अथवा मोह की प्रेम के साथ कोई संगति बैठती नहीं।
प्रेम प्रकारान्तर से त्याग का एक स्वरूप है। त्याग और “नैतिकता का परस्पर अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। प्रेम व्यवहार में प्रत्यक्षतः जो घाटा दीखता है वही प्रकारान्तर से महानता एवं परमार्थ परायणता के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
व्यक्ति के पास कुछ है जो उसे धन, यश कीर्ति प्रलोभन की चुनौती देने को बाध्य करता रहता है। गैरीवाल्डी ने अपने सिपाहियों से यही तो कहा था में, तुम्हें पर्याप्त आवास, सुविधा सामग्री नहीं दे सकता। में तुम्हें भेंट में चढ़ाता हूँ भूख को, थोपे गये युद्ध को, संघर्ष और मृत्यु को। विन्स्टन चर्चिल आपदाग्रस्त देशवासियों को उपहार स्वरूप क्या देता? सिवाय खून, परिश्रम, आँसू और पसीने के। इतिहास साक्षी है कि इन राजनेताओं को कितना बड़ा जन सहयोग मिला। वास्तव में व्यक्ति में अन्तर्निहित, चिनगारी प्रसुप्त है, किन्तु जहाँ कहीं उसे त्याग, समर्पण, आत्मनियन्त्रण, आत्मानुशासन, न्याय या मर्यादा के लिए ललकारा गया, वहीं वह भड़क उठी है।
बाइबिल का यह उद्धरण “वह जो अपने आप पर नियन्त्रण कर लेता है, उत्तम है, अपेक्षाकृत उस विजेता से जो एक नगर या राज्य पर अपना आधिपत्य जमाए बैठा होता है” स्पष्ट करता है कि आत्म-नियन्त्रण एवं गौरवपूर्ण साहस ही गन्तव्य तक पहुँचाने में सहायक होता है। यह बिना प्रेम भावना एवं नीति मर्यादा के पारस्परिक सन्तुलन के सम्भव नहीं। यही वह आचार संहिता है जो मनुष्य को अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठाकर देवोपम स्थिति में पहुँचाती है।
परिभाषाएँ कुछ भी बना दी जाय व्यवहार में उतरने वाला आचरण जब तक नीतिमत्ता प्रेरित न होगा-मनुष्य को मनुष्य नहीं कहा जा सकता। आप्तवचनों में इसी मर्यादा को मानवी गरिमा का पर्याय बताते हुए सम्वेदना सिक्त अन्तःकरण एवं उससे निस्सृत प्रेम भावना से भी व्यवहार को आध्यात्मिक जीवन का अनिवार्य अंग माना है।
परिभाषाएँ कुछ भी बना दी जाय व्यवहार में उतरने वाला आचरण जब तक नीतिमत्ता प्रेरित न होगा-मनुष्य को मनुष्य नहीं कहा जा सकता। आप्तवचनों में इसी मर्यादा को मानवी गरिमा का पर्याय बताते हुए सम्वेदना सिक्त अन्तःकरण एवं उससे निस्सृत प्रेम भावना से भी व्यवहार को आध्यात्मिक जीवन का अनिवार्य अंग माना है।
किसी सुसंस्कृत व्यक्ति को पहचानने के लक्षण स्पष्ट हैं, वह अपने को भुला कर दूसरों का ख्याल रखता है, वह यथा शक्ति दूसरों की मदद करता है और हर तरह के संग साथ में अपने शिष्टाचार से पहचान लिया जाता है।
एक गुरु के दो शिष्य थे एक सौम्य दूसरा उद्धत। गुरु दोनों को ही पूजा पाठ कराते और कहते भजन से स्वर्ग मिलेगा। दोनों को वह बात भाई और बताया गया विधान पूरा करते रहें। फिर भी उनने स्वभाव बदला नहीं। एक प्रसन्न रहता दूसरे पर आवेश छाया रहता।
समयानुसार तीनों ही मरते चले गये और स्वर्ग जा पहुंचे। वहाँ तीनों की परस्पर भेंट हुई। उद्धत शिष्य ने शिकायत की स्वर्ग तो मिला पर यहाँ सुख कहाँ है। हर दिन लड़ाई झगड़ा होता है और में अशान्त रहता है।
गुरु ने कहा- “भजन स्वार्थ सुख तो हो सकता है पर शान्ति पाने के लिए स्वभाव को सौम्य बनाना पड़ेगा।”
छोटे से बीज में एक विशालकाय वृक्ष का समूचा ढाँचा अदृश्य रूप से विद्यमान रहता है। अवसर मिले तो अदृश्य से दृश्य बनते देखा जा सकता है। शुक्राणु में एक समूचा मनुष्य अपनी वंश परम्पराओं को समेटे बैठा रहता है। समय आने पर उस तुच्छ को महान बनते देर नहीं लगती। संसार के सबसे छोटे घटक परमाणु में अदृश्य रूप से सौर मण्डलीय गतिविधियाँ उसी रूप में काम करती रहती है। विखण्डन होने पर पता चलता है कि अणु विस्फोट से कितनी प्रचण्ड ऊर्जा का प्रकटीकरण होता है। यही बात मनुष्य के सम्बन्ध में भी है वह आमतौर से पेट प्रजनन भर के दो कृत्यों में अपनी सामर्थ्य एवं आयुष्य खपा पाता है। पर यदि इस सामान्य से थोड़ा और आगे बढ़कर देखा जा सके तो प्रतीत होगा कि उसके भीतर ऐसा भी बहुत कुछ है जिसे असाधारण कहा जा सके।
अविज्ञात के प्रकटीकरण को ही चमत्कार कहते हैं। वस्तुतः इस संसार में चमत्कार जैसी कोई वस्तु है नहीं। प्रकृति के अन्तराल में उसकी सनातन सत्ता इस प्रकार भरी पूरी है कि उसमें कमी पड़ने या बढ़ोत्तरी होने जैसी कोई बात होती नहीं। जो व्यवहार में आता है, जो विदित या प्रकट है, वही सामान्यतया दृष्टिगोचर होता है, पर इस छोटे क्षेत्र से आगे बढ़कर कोई विशेष उपलब्धियाँ यदि सामने आती हैं तो उन्हें देवी अनुग्रह या सिद्धि चमत्कार कहा जाने लगता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। उस आधार पर कितने ही कौतुक कौतूहलों के विवरण सामने आते रहते हैं। इन्हें कौतुक कौतूहलों के विवरण सामने आते रहते हैं। इन्हें आकस्मिक नहीं समझा जाना चाहिए वरन् इतना ही कहा जाना चाहिए कि अविज्ञात से विज्ञात बनकर आने का सुयोग बन गया। अवसर मिले तो मनुष्य उतना ही चमत्कारी एवं समर्थ बन सकता है जितना कि उसके उद्गम एवं सृजेता सर्वशक्तिमान को भगवान हैं।
आध्यात्म की भौतिक अभिव्यक्ति का सर्वप्रथम वैज्ञानिक परीक्षण फ्राँस के काउँट अगेनर डी गेस्परिन ने किया। उन्होंने अपने कुछ वैज्ञानिक मित्रों के साथ कुछ प्रयोग किये। उन्होंने देखा कि कुछ व्यक्ति वस्तुओं को बिना स्पर्श किये एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाने की पात्रता रखते हैं। उन्होंने वस्तु को बिना स्पर्श किये हटाने वाली शक्ति को उसी प्रकार नापा जैसे भौतिकी विज्ञानी गुरुत्वाकर्षण शक्ति को उसी प्रकार नापा जैसे भौतिकी विज्ञानी गुरुत्वाकर्षण शक्ति को नापते हैं। अभी तक किसी भी वस्तु का अथवा व्यक्ति हवा में उड़ने की घटना को जो कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सिद्धान्त के प्रतिकूल है, एक पारलौकिक और दैवी शक्ति के हस्तक्षेप द्वारा ही सम्भव माना जाता था। किन्तु ही गेस्परिन इस कार्य में कोई अन्य बुद्धि संगत मर्म होने की सम्भावना को मानते थे। उनका तर्क यह था कि यह कार्य मानव अपनी आत्म शक्ति के द्वारा भी असम्भव को सम्भव बनाते हुए कर सकता है।
डी गेस्परिन की रिपोर्ट सन् 1854 में प्रकाशित हुई और इसके एक वर्ष बाद ही जिनेवा के प्रोफेसर ड्यूरी ने भी अपने शोध का विवरण प्रकाशित किया। उनके परिणाम भी गेस्परिन से मिलते-जुलते थे। उन्होंने बताया कि कोई अज्ञात शक्ति इसमें कार्य करती है इसे अतीन्द्रिय अथवा आत्मिक शक्ति कहा जा सकता है तदनन्तर प्रोफेसर सर विलियम क्रुक्स ने इस पर अनुसन्धान किया। उनकी विद्वता की साख थी और वे रायल सोसायटी के फेलो गरिमामय पद पर भी थे अतः उन्हें अपने अनुसन्धान से सम्बन्धित प्रयोगों को 1971 तिमाही पत्रिका “जनरल ऑफ साइन्स’ में प्रकाशित करवाना सम्भव हो गया। उन्होंने डेनियल डुँगाहोम जो कि इन अज्ञात शक्तियों का माध्यम था के प्रयोगों का कई बार सफल परीक्षण किया और देखा कि वह कितनी सरलता से बिना स्पर्श किए किसी वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित कर देता है।
एक बार अन्य वैज्ञानिकों के सामने क्रूक्स के घर पर एक प्रयोग किया गया इसमें तार के एक पिंजड़े में एक आकार्डियन रखा गया। पिंजड़े में केवल आकार्डियन को छुआ भर जा सकता है। और उसकी चाबियों तक हाथ पहुँचा नहीं जा सकता था । होम के हाथ की गतिविधियों को सब दर्शक देख सकते थे। इन दर्शकों में कई मूर्धन्य भौतिक शास्त्री और वकील भी थे । थोड़ी देर में वह आकार्डियन अपने आप हिलने लगा और थोड़ी देर बाद ध्वनि निकलने लगी। फिर लय और स्वरबद्धता के साथ एक के बाद दूसरे क्रम से कई ध्वनियाँ निकलने लगी। सामान्यतया कोई भी धुन बिना उसकी चाबी को चलाये निकालना सम्भव ही नहीं होती है किन्तु सबने आश्चर्य से देखा कि वाद्य बड़ी मधुर ध्वनि निकाल रहा है। इसके बाद सबके आश्चर्य में और भी वृद्धि तब हुई जब सबने देखा कि आकार्डियन को छूने वाले हाथ को भी पिंजरे में से होम ने निकालकर पास में बैठे एक अन्य व्यक्ति के हाथ में दे दिया और आकार्डियन उसी प्रकार ध्वनित होता रहा । इस प्रयोग में किसी अन्य कृत्रिम दूर सम्प्रेषण माध्यम को तो प्रयुक्त नहीं किया गया है, यह भी परख लिया गया था।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयोग के बारे में क्रूक्स ने लिखा है कि एक भारी भार तौलने की मशीन के बोर्ड के एक सिरे को छू भर देने से से होम उसके वजन को अधिक अथवा कम करके दिखा देने की पात्रता रखता था जबकि उस मशीन पर स्वयं क्रुक्स के चढ़ने पर उस पर बहुत थोड़ी प्रतिक्रिया हुई। केवल छूने भर से वह भारी मशीन कैसे कम ज्यादा वजन बना सकी यह एक रहस्य ही था। आत्म शक्ति का जड़ पदार्थ को प्रभावित करने वाला वैज्ञानिकों को स्तम्भित कर करने वाला यह एक सफल प्रयोग था।
श्री जे0बी0 रिने उत्तरी अमेरिका के उतरी केरोलिना में ड्यूक विश्व विद्यालय में मनोवैज्ञानिक विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। उनकी पत्नी लुईसा रिने ने अपनी पुस्तक जड़ पदार्थ पर आत्मशक्ति -मनः सम्प्रेषण (माइण्ड ओवर मैटर=सायकोकाइनेनिस) में एक घटना का विवरण दिया है। एक दिन उसके पति के कार्यालय में एक व्यक्ति आया और उसने उनको बताया कि अचानक जुए के खेल में उसे संकल्प शक्ति की क्षमता का आभास हुआ है। वह जुए के खेल में जिस तरह के पासे के अंक वह चाहता है, वैसे ही वह आते हैं। अपनी इच्छानुसार वह पासे को डलवा सकता है। डा. रिने ने उसके कथन को सत्यता की कसौटी पर कसना चाहा और वे उसी कार्यालय के एक कौने में पहुँच गये और उन्होंने पाया कि उसका कथन एकदम सत्य था । संयोग मात्र भी यह नहीं था।
अभी तक लोगों को दिव्य दृष्टि के बारे में ही मालूम था और उसके प्रयोग ताश के खेल में देखे भी गये थे। जिसमें किसके पास कौन से पते हैं यह मालूम हो जाता था अथवा भूमि के गर्भ में कहाँ क्या छुपा है यह भी मालूम हो जाता था। किन्तु भविष्य में क्या होने वाला है । कौन सा पत्ता किसके दाँव में किसके पास पहुँचेगा-इसका एक नया प्रयोग लोगों ने देखा। इस युग के लिये यह एक अजूबा था।
रिने ने फिर इसका एक प्रयोग अपने विश्वविद्यालय के 25 विद्यार्थियों के बीच करवाया, और उनमें से प्रत्येक विद्यार्थी की आकाँक्षा के अनुसार पासों के अंक पाये गये। इनमें से कोई भी अंक गलत नहीं पड़ा। इसमें उनके कथन के अनुसार एक करोड़ प्रयोगों में एक गलत होने की सम्भावना भी नहीं है। यह एक विचित्र किन्तु सत्य तथ्य था।
एक भौतिकी शास्त्री हेलमट श्मिट जो कि ड्यूक विश्वविद्यालय में रिने के स्थान पर आये थे, ने भी प्रेरणा पाकर एक प्रयोग किया। उन्होंने देखा कि रेडियो धर्मी तत्वों की समाप्ति होती रहती है यह एक प्रकृति के नियमों अनुसार सहज रूप में घटित होता ही रहता है। किन्तु उन चार तत्वों के समाप्त होने का क्रम कभी भी नियमित नहीं होता, वह बेतरतीब होता है। कौन सा तत्व समाप्त हुआ यह जानने कौन सा तत्व समाप्त हुआ यह जानने के लिये इसे बिजली के बल्ब द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। जो तत्व समाप्त होता है। उसी स्थान पर वह बल्ब जल जाता है। कौन सा बल्ब पहले अथवा बाद में जलेगा इसके बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती किन्तु यहाँ प्रयोग में प्रो0 श्मिट ने पाया कि उस व्यक्ति ने जैसा क्रम बताया उसी के अनुसार वे बल्ब जलते चले गये ।
सोवियत रूस जो कि ‘आयरन करटेन’ माना जाता है में भी मन सम्प्रेषण पर लेनिन ग्राड की एक महिला नेल्या कुलंगिना पर प्रयोग किये गये है। नेल्या कुलंगिना जर्मनी के आक्रमण के समय उन्नीस वर्ष की आयु से पूर्व ही एक टेक रेजिमेन्ट में सार्जेट के पद पर थी। युद्धं में घायल होने पर सेना से सेवा निवृत्त किये जाने पर उसने विवाह कर लिया और पुत्रवती होकर दादी भी बनी रूसी वैज्ञानिकों ने उसके ऊपर कई वैज्ञानिक परीक्षण किये विलियम ए. मेकगेरे के नेतृत्व में कुछ डाक्टर व अन्य लोगों का एक दल उसकी अतीन्द्रिय क्षमता की जाँच करने पर 1970 गया था। उसने एक होटल में भोजन के टेबल पर रखी हुई वस्तुओं को इस पार से उस पार तक बिना स्पर्श किये केवल ऊपर हाथ घुमाकर ही दिखाया। उसने सिर को गोल-गोल घुमाकर एक अंगूठी को भी बिना किसी धुरी के गोल-गोल घुमाकर प्रदर्शित किया। उसकी एक फिल्म में उसको पिंग पांग की गेंद को ऊपर हवा में उड़ाकर वापस नीचे बुलाते हुए दिखाया है।
इसी प्रकार एक 17 वर्षीय अंग्रेज बालिका जूम कार्लटोन ने भी पिछले दिनों भोजन करने के चम्मच और काँटों को बड़ी सरलता से केवल छूकर उन्हें टेढ़ा करके दिखाया है। इसके प्रयोग सुप्रसिद्ध यूरी गैलर से मिलते जुलते पाये गये पर उनमें कोई ‘फ्राड’ नहीं पाया गया। वस्तुतः यह सब आत्म शक्ति द्वारा जड़ वस्तु को प्रभावित करने की ही घटनाएँ है जो विज्ञान सम्मत ढंग से परिलक्षित किये जाने पर भी खरी उतरी है। मनुष्य की सामर्थ्य का प्रमाण देने वाले उन प्रयोगों की तो अब अनवरत शृंखलाएं चल पड़ी हैं। चाहे ये पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिकों के लिये अपने मन समझाने के ख्याल मजबूत करने हेतु किये जा रहे हों, इनकी प्रामाणिकता भारतीय आध्यात्म की मान्यताओं के अनुसार असंदिग्ध है।
यही नहीं समझा जाना चाहिये कि मनुष्य की बौद्धिक क्षमता दूसरों को ज्ञान कराने, प्रभावित करने एवं गति देने में ही समर्थ है। वरन् इस कड़ी में एक नया अध्यात्म और जुड़ना चाहिये कि मानवी चेतना प्रकृति पदार्थों को-सी गति या दिशा दे सकती है। यह कार्य यों श्रम या उपकरणों की सहायता से भी सम्पन्न होता रहता है पर अब यह तथ्य भी प्रकट हो रहा है कि मनुष्य की अविकसित क्षमता को विकसित करके उसके द्वारा पदार्थों को भी प्रभावित एवं परिवर्तित किया जा सकता है।
आदर्श निर्धारित है, पर उन्हें उपयुक्त परिस्थितियों के अनुरूप ढाला जाना है। इस तथ्य को सत्संग समागम में एक महर्षि उपस्थित जिज्ञासुओं को समझा रहे थे। उनने एक कथा कही -‘देवता, मनुष्य और असुर प्रजापति के पास अपने काम का कोई सदुपदेश प्राप्त करने के लिये गये ।
ब्रह्माजी ने उनका मनोरथ समझा और एक ही संकेत शब्द कह दिया ‘द’ - साथ ही यह भी कहा - इसका तात्पर्य समझो और स्वयं ही यह बताओ कि इस निर्देश का पालन कैसे करोगे। देवता ने कहा ‘द’ इसका अर्थ है -दमन, हम संयम बरतेंगे और अपने को अधिक प्रखर करेंगे । मनुष्यों ने कहा - ‘द’ का अर्थ है दान, जो कमाएँगे मिल-बाँटकर खायेंगे। असुरों ने कहा- ‘द’ का अर्थ है दया, हम अहंता और क्रूरता छोड़ेंगे-हम अपनी सामर्थ्य को पीड़ितों की सहायता में नियोजित करेंगे।
आदर्श एक पर उसे व्यक्ति विशेष की परिस्थिति के अनुरूप प्रयुक्त किया जाता है। यह तथ्य सभी ने भली प्रकार समझ लिया। इसे अणुव्रत के रूप में ग्रहण कर तीनों पुण्य प्रयोजन में जुट गये ।
पदार्थ का गुण है-क्रिया। शरीर प्रकृत पदार्थों से बना है अस्तु उसमें निर्वाह के निमित्त चलने वाली पाचन रक्ताभिषरण, आकुँचन जैसी आन्तरिक गतिविधियों का चलना स्वाभाविक है। निर्वाह के अतिरिक्त शरीर का दूसरा दायित्व है-सुविधाओं का उपार्जन अवरोधों का निराकरण। यह भी बहिरंग क्रियाशीलता है। शरीर की गतिविधियों का समापन इसी छोटे क्षेत्र में हो जाता है। समस्त प्राणी इसी गतिचक्र में भ्रमण करते हुए शरीर यात्रा पूरी करते हैं। जिनकी क्षमता एवं चेष्टा इसी परिधि में सीमाबद्ध है उन्हें स्थूल शरीर में आबद्ध कहा जाता है।
मनुष्य का दूसरा कलेवर है-सूक्ष्म शरीर। वह इच्छा, विचारणा की दृष्टि से स्थूल शरीर जैसी आदतों का अभ्यस्त हो सकता है, पर उसे निर्वाह के लिए साधन नहीं जुटाने पड़ते। ऋतु प्रभावों से प्रताड़ित नहीं होना पड़ता। मात्र इच्छा और आदत ही भली बुरी क्रिया-प्रतिक्रिया उत्पन्न करती रहती हैं यही उसका स्वनिर्मित परलोक है। स्वर्ग और नरक की भाव सम्वेदनाओं से सूक्ष्म शरीर धारी इसी स्थिति में आँख मिचौनी खेलता रहता है। दृश्य की दृष्टि से स्थूल शरीर और अदृश्य में प्रखर होने की दृष्टि से सूक्ष्म शरीर वरिष्ठ बैठता है।
आमतौर से मरने के उपरान्त ही प्रेत पितर के रूप में सूक्ष्म शरीर का अनुभव होता है। कभी-कभी दिव्य स्वप्नों में भी उसके पृथक् अस्तित्व का परिचय मिलता है। किन्तु बात बहुत आगे तक चली जाती है। मानवी सत्ता ने तीन कलेवर ओढ़े हैं। ‘स्थूल’ अर्थात् दृश्यमान। ‘सूक्ष्म’ अर्थात् अदृश्य दिव्य लोक से सम्बन्ध ब्राह्मी चेतना के साथ तालमेल बिठाने आदान-प्रदान करने में समर्थ ये तीनों ही स्तर क्रमशः अधिकाधिक उच्च स्तर की विशेषताओं विभूतियों से सम्पन्न पाये जाते हैं।
देवात्मा, ऋषि-सिद्ध पुरुष, अवतार, कारण शरीर की योग साधना एवं तपश्चर्या द्वारा समुन्नत बनते हैं और स्वर्ग वासियों की तरह जीवन मुक्तों की स्थिति में रहते हैं। सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व दृश्यमान काया में रहते हुए मनोबल के रूप में प्रकट होता रहता है। गुण कर्म, स्वभाव की विशेषताएं सूक्ष्म शरीर में ही केन्द्रीभूत रहती हैं। साहस, संकल्प, पराक्रम एवं दृष्टिकोण की जाँच पड़ताल करके सूक्ष्म शरीर के उत्थान, पतन का अनुमान लगाया है। प्रतिभावान ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी, देखने में सामान्य होते हुए भी सूक्ष्म शरीर की दृष्टि से प्रखर पहलवान होते हैं। इन्द्रिय शक्ति से आगे बढ़कर अतीन्द्रिय क्षमताओं में सुसम्पन्न होना ऋषि-सिद्धियों की दृष्टि से अपने विभूति भण्डार भरे रहना सूक्ष्म शरीर के लिए ही सम्भव है।
स्थूल शरीर को स्वस्थ, सुडौल समर्थ, दीर्घजीवी बनाना-बनाये रखना आहार-बिहार पर प्रकृति अनुसरण पर निर्भर है। व्यायाम, टॉनिक आदि के आधार पर उसकी स्वाभाविक पुष्टाई कुछ अधिक भी हो सकती है। किन्तु सूक्ष्म शरीर को समर्थ बनाने के लिए दृष्टिकोण एवं स्वभाव संस्कार का परिमार्जित करना आवश्यक है। उसके लिए पड़ती है। साथ ही स्वार्थ को घटाने-परमार्थ को बढ़ाने के लिए लोक-मंगल की सेवा साधना को भी चिन्तन तथा व्यवहार के साथ जोड़ना पड़ता है। आदर्शों की कसौटी पर खरा उतरने के लिए शौर्य, पराक्रम एवं त्याग बलिदान की वरिष्ठता का भी परिचय देना पड़ता है। सूक्ष्म शरीर ऐसे ही आधार अपनाने से बलिष्ठ होता है। उसका सहयोग पाकर स्थूल शरीर की क्षमता अनेक गुनी बढ़ जाती है। व्यक्तित्व की प्रखरता प्रतिभा के रूप में प्रकट होती है। असामान्य क्षमताओं के धनी प्रायः इसी स्तर के होते हैं।
कुछ लोगों के सूक्ष्म शरीर पूर्व संचित संस्कार सम्पदा के कारण अनायास भी अपनी विशिष्टता का परिचय देने लगते हैं। किन्तु साधारणतया प्रयत्नपूर्वक ही उसे बलिष्ठ बनाना पड़ता है। जिस कारण भी वह समुन्नत हुआ हो अपनी विशेषताओं का ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में परिचय देने लगता है। इनकी साधारण झाँकी प्रतिभा के रूप में परिलक्षित होती है। अग्रगामी, दुस्साहसी प्रायः सूक्ष्म शरीर के क्षेत्र में ही अपनी विशिष्टता का भण्डार भरे रहते हैं।
इस अदृश्य विशिष्टता का कभी-कभी किसी-किसी में परिचय मिलता है तो लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं और उसे किसी देवता का अनुग्रह मानने लगते हैं वस्तुतः वैसा कुछ है नहीं। सूक्ष्म शरीर ही निकटतम देवता है। उसे छाया पुरुष से लेकर पीर बैताल जैसे अनेकों चमत्कारी परिचय देते देखा जाता है। आत्म देव सबसे बड़ा देवता है। उसकी उपासना का हाथोंहाथ प्रतिफल मिलता है। वर्तमान या भूतकाल में जो उसकी जितनी साधना कर चुके कर रहे हैं वे उसी अनुपात से चमत्कारी और सिद्ध पुरुष कहलाते हैं। इन विशेषताओं का परिचय जहाँ-तहाँ अनायास भी मिलता रहता है। प्रयत्नपूर्वक तो उन्हें कोई भी कभी भी उपार्जित कर सकता है।
शरीर में काम करने वाली गर्मी तथा गतिशीलता से सभी परिचित हैं। अध्यात्म विज्ञानी जानते हैं कि सूक्ष्म शरीर से दिव्य ऊर्जा के भण्डार भरे पड़े हैं। उसकी बिजली न केवल व्यक्ति की पुरुषार्थ क्षमता को अनेकों गुना बढ़ा देती है। वरन् ऐसे काम भी कर दिखाती है जिन्हें सामान्य जनों के लिए असम्भव ही कहा जाता है। पर इसमें अलौकिक जैसी कोई बात है नहीं। सूक्ष्म शरीर की दिव्य ऊर्जा के ये साधारण और स्वाभाविक चमत्कार हैं। यान्त्रिक बिजली जब इतने बड़े काम कर सकती है तो सूक्ष्म शरीर की दिव्य ऊर्जा अपनी विशिष्टता क्यों सिद्ध न करेगी ? दिव्य ऊर्जा का प्रवाह कभी-कभी सूक्ष्म शरीर से फूटकर स्थूल शरीर में प्रवेश करने लगता है तो मनुष्य एक चलता फिरता बिजली घर जैसा दीखने लगता है।
नवम्बर 1967 की एक घटना है। पश्चिम जर्मनी के बेवेरिया क्षेत्र के अंतर्गत राशेन हेम के एके पदाधिकारी की छत से लटक प्रकाश देने वाला ट्यूब अपने आप ढीला पड़ने लगा। बिजली के बटनें स्वतः गिर गयीं। इतना ही नहीं कार्यालय के सबसे सब टेलीफोन एक बारगी घनघनाने लगे और उनके रिकार्ड में हजारों बातचीत करने का लेख बिल पर अंकित होने लगा। कारणों की बहुत छानबीन की गयी। अन्त में प्रो. हंस वेन्डर जैसे मनोवैज्ञानिक ने पता लगाया कि यह वातावरण सम्बन्धी परिवर्तन 19 वर्षीया नौकरानी एनीमैरी की उपस्थिति में घटित होता है।
एनीमैरी के असाधारण व्यक्तित्व के कारण दीवाल पर लटकती तस्वीरें औंधकर उलट जाती थीं। बल्ब फ्यूज होने लगते थे। मेजों की दराजें स्वयमेव खुल जाती थीं। लगभग पौने दो क्विन्टल भार की फाइलों से युक्त आलमारी दीवाल को 12 इंच छोड़ देती थी। समय मापक घड़ियों ने 20 मिनट में ही घण्टा पूरा करने की रफ्तार पकड़ ली तथा 10 बाट की विधुत माइक्रोफोन के द्वारा नोट की गयी। करेंट की रिकार्ड 50 एम्पीयर पर देखा गया जबकि विद्युत सप्लाई काट दी गयी थी। टेलीविजन में प्रयुक्त होने वाले ऐमपेक्स वीडीओ रिकार्डर ने तात्कालीन वातावरण का जो चित्राँकन किया उससे अस्पष्ट भुतहा दृश्य दिखायी पड़ा। इंग्लैण्ड में भुतहा मकान के प्रेतों को टेलीविजन कैमरा नहीं पकड़ सका था। राशेन हेम में फोटो प्रयुक्त यह बैटरी बिना पावर हाउस कनेक्शन से चला करती थी। इतनी ही नहीं एनीमैरी के चलने पर बिजली के बल्ब झूलने से लगते थे।
प्राचीन भारतीय लोग चाँगदेव के बारे में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने अपनी मौत को 14 बार वापस लौटाया था ईसा मसीह के समय से लेकर बारहवीं शताब्दी तक सन्त ज्ञानेश्वर के समय तक उनकी योग गाथाओं के उल्लेख मिलते हैं। 1400 वर्ष की आयु में शेर के ऊपर सवार होकर हाथ में वे नाग का चाबुक लेकर सन्त ज्ञानेश्वर के पास पहुँचे थे।
लोगों के द्वारा चुनौती दिये जाने पर एक बार हवा में स्थिर रहकर उन्होंने प्रवचन दिया था एक के ऊपर एक क्रमश चौबीस चौकियाँ रखकर मंच बनाया गया, प्रवचन देते समय उनके संकेत के अनुसार सारी चौकियाँ हटा दी गयीं। वे हवा में अवस्थित हुए ही प्रवचन करते रहे। लोगों ने उनका जय-जयकार किया तो उन्होंने इतना ही कहा कि इसमें उनका अपना कुछ भी बड़प्पन नहीं, वरन् योग क्रियाओं के अभ्यास का ही यह चमत्कार है। वस्तुतः सूक्ष्म शरीर की साधना से अर्जित उपलब्धियाँ ऐसी असाधारण हैं जिन्हें असंभाव्य ही कहा जा सकता है।
अमेरिका के प्रसिद्ध मनोविज्ञान शास्त्री डा. राल्फ एलेक्जेण्डर ने सन् 1951 में मेक्सिको सिटी में कई विद्वानों एवं वैज्ञानिकों के समक्ष अपनी इच्छाशक्ति के प्रयोग द्वारा मेघ रहित आकाश में 12 मिनट के अन्दर बादलों को पैदा करके कुछ बूँदा-बाँदी भी करादी थी। उस समय तो उपस्थित लोगों ने डा. राल्फ ने सन् 1954 में फिर 12 सितम्बर को ओण्टैरियो ओरीलियो नामक स्थान पर खुलेआम प्रदर्शन करने का निश्चय किया। पचासों वैज्ञानिकों पत्रकार नगर के वरिष्ठ अधिकारी एवं मेयर भी उपस्थित थे। प्रामाणिकता की कसौटी के लिए तेज फोटो खींचने वाले कैमरे भी लगा दिये थे।
दर्शकों ने आसमान में छाये बादलों में से जिस बादल पट्टी के हटाने के लिए कहा डा. एलेक्जेण्डर ने आठ मिनट के भीतर उसको अपनी दृष्टि जमाकर गायब करके दिखा दिया। कैमरों ने भी बादल हटने के ही चित्र दिये। लोग इसे संयोग मात्र न समझें इसलिए उन्होंने यह प्रयोग तीन बार दुहराकर दिखाया, तब वहाँ के सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने इस समाचार को “क्लाउड डेस्ट्रायड बाई डाक्टर” (बादल डाक्टर द्वारा नष्ट किये गये) का बहुत बड़ा हेडिंग देकर प्रकाशित किया “स्ट्रेंज हैपिनिंग्स” पुस्तक से इसी प्रकार की कई घटनाओं का उल्लेख मिलता है। जिनमें इच्छाशक्ति के बल पर चमत्कारी प्रदर्शनों का वर्णन है।
हालैण्ड निवासी क्रोसेट का जन्म 1909 एक साधारण गरीब माँ बाप के यहाँ हुआ था, ये दोनों थियेटर में काम करते थे। बचपन से ही क्रोसेट भविष्यवाणियाँ किया करते थे। बचपन में ही उसने नाजी आक्रमण तथा जापानियों द्वारा डचों के ईस्ट इन्डीज अधिग्रहण के बारे में सही सही पूर्व सूचना दे दी थी।
36 वर्ष की आयु आते ही वह इस विद्या में इतना निष्णात हो गया था कि किसी भी वस्तु को देने पर बनता देता था कि वस्तु का मालिक कौन है ? उसका सामान्य परिचय तथा वर्तमान परिस्थिति ही नहीं वह बताया करता था कि मालिक के मित्र, नौकर-चाकर तथा पारिवारिक सदस्यगण कैसे हैं ? उनकी स्थिति कैसी है अर्थात् घर, आस-पड़ौस स्थिति एवं मनोदशा कैसी है ? उसकी इन प्रतिभाओं का प्रयोग पुलिस ने चोरों, अपराधियों तथा कत्ल करने वालों को ढूँढ़ने पकड़ने में किया। उसे स्थान विशेष पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। वह फोटो, नक्शा, साक्ष्य वस्तुएँ जैसे कपड़े अथवा हथियार आदि की सहायता से चोरों, हत्यारों एवं खोयी वस्तुओं का पता बता दिया करता था।
“इनवेस्टीगेशन एण्ड सीक्योरिटी’ नामक कम्पनी को ‘रेग मैकहंग नामक एक व्यक्ति ने सभी को सुरक्षा की सुविधा मिले, इस उद्देश्य से खोला था। वे चोर का पता अपनी अतीन्द्रिय शक्ति से लगा लेते थे। पहले तो वे इस कार्य को कनाडा में पुलिस अफसर के रूप में करते रहे, बाद में वे स्वयं करने लगे। अनेकानेक कम्पनियों को उनकी चोरी का पता बताकर लाभान्वित करा देने से उन्हें भी काफी सम्पत्ति हाथ लगी और कुछ ही दिनों में वे धनवान् हो गये। सन् 1973 में टोरोंटो नगर में इस विलक्षण शक्ति के प्रदर्शन में एक फिल्म भी बनी। इस क्षमता के विषय में श्री रेग का कहना था कि हर मनुष्य में ऐसी विलक्षण सामर्थ्य पाई जाती है। जिस को पुरुषार्थ द्वारा जगाना बढ़ाना पड़ता है।
दक्षिण जापान के बौद्ध मन्दिरों में किये जाने वाले एक विशिष्ट धर्मानुष्ठान का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मनःशास्त्री डा. विक्टर ने लिखा है कि इस धर्म के अनुयायी ध्यान योग पर बहुत आस्था रखते हैं और उनकी आस्था इस हर तक दृढ़ रहती है कि उन्हें कठिन तितीक्षाओं से होने वाले कष्टों का अनुभव नहीं होता। उनके शरीर पर इन कष्टों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उन मन्दिरों में जब साधक छः फुट लम्बी दहकते कोयले से सजायी गयी वेदी पर नंगे पैरों नाचते हैं और उसे पर करते हैं तो आग से जलने का अनुभव तो दूर रहा उनके पैर झुलसते तक नहीं। उन साधकों के लिए धधकती आग ठण्डी राख के समान हो जाती है। ऐसे प्रसंग तो भारत में कई स्थानों पर आज भी देखे जा सकते हैं। सिंगापुर के एक भारतीय योगी ने, जिसका उल्लेख “वन्डर बुक आफ स्ट्रैन्ज फैक्ट्स” में भी है, अपने शरीर में नुकीले 50 भाले आर-पार घुसेड़ लिये और इस अवस्था में भी वह सबसे हँस-हँसकर बातचीत करता रहा। लोगों ने कहा यदि आपको कष्ट नहीं हो रहा हो तो थोड़ा चलकर दिखाइये। उस पर योगी ने 3 मील चलकर भी दिखा दिया। उन्होंने बताया कि कष्ट शरीर को होता है। पर यदि आत्मसत्ता का बोध हो तो उसे भुलाया भी जा सकता है।
स्थूल शरीर की तुलना में सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण शरीर की सामर्थ्य कहीं अधिक है। सूक्ष्म शरीर की शक्तियाँ प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती हैं। उन्हें साधना के माध्यम से जगाया उभारा जा सके तो मनुष्य अतीन्द्रिय शक्ति सम्पन्न बन सकता है। कारण शरीर जीवात्मा की क्रीडा स्थली है परमात्मा की दिव्य अनुभूतियाँ इसी क्षेत्र में रमण करती हैं। उनका जागरण सम्भव हो सके तो प्राप्य उपलब्धियों से अपना ही नहीं दूसरों का भी हित साधना सम्भव है।
एक थे सेठ। वे गुरु की तलाश में थे। पर चाहते ऐसे थे, जो पहुँचा हुआ हो ज्ञानी हो। बहुतों को जाँचा परखा पर कोई खरा न निकला। तलाश का अन्त न हुआ।
सेठानी ने कहा-“यह काम मेरे ऊपर छोड़ दे। जो मिला करे उसे मेरे पास भेज दिया करें। सेठ जी सहमत हो गये। एक झंझट टला।”
सेठानी ने पिंजड़े में एक कौआ पाला। जो भी महात्मा आया, उससे यही कहतीं देखिये मेरा पाला कबूतर अच्छा है न ?
सन्त लोग आते। कबूतर कहाँ है ? कैसा है कहते। जब सेठानी अपनी बात पर अड़ी ही रहतीं, तो वे क्रोध में भरकर उल्टी सीधी बातें कहते और वापस चले जाते।
यही क्रम चलता रहा। बहुतेरे आये और सभी चले गये। कई खरा उतरा नहीं। जो आवेशग्रस्त हो चले, वे सन्त कैसे ? जो सन्त नहीं वह गुरु योग्य कहाँ ?
एक दिन एक वयोवृद्ध सन्त आये। सत्कार करने के उपरान्त सेठानी ने वही कौआ कबूतर का सिलसिला चला दिया।
यह सन्त आवेश में नहीं आये। कौए और कबूतर का अन्तर समझाते रहे। न समझ पाने पर इतना ही कहकर चले गये बेटे हठ मत करना। तथ्य का पता लगाना। कोई सर्वज्ञ नहीं। हमसे आपसे भूल हो सकती है। सत्य को समझने के लिए मन के द्वार खुले रखने चाहिए। वे हँसते हुये चल दिये। क्रोध था न आवेश, न मानापमान का भाव।
सेठानी ने सन्त को द्वार से वापस लौटा दिया। नमन किया और कहा “जैसा चाहती थी, वैसा आपमें पाया। कृपया हमारे परिवार के गुरु का उत्तरदायित्व ग्रहण करें। घर के सभी लोग आपके शिष्य बन गये।
मनुष्य की लगन, सूझ बूझ प्रतिभा ओर तत्परता को जिस भी केन्द्र पर नियोजित कर दिया जाय उसी में चमत्कारी उपलब्धियाँ हस्तगत होने लगती हैं। संसार की महती सफलताओं का इतिहास इसी आधार पर लिखा गया है। उदासी, उपेक्षा, ढील-पोल रहने पर आधे शरीर आधे मन से काम होता है। ध्यान बिखरा रहने और बेगार भुगतने की तरह काम करने पर ही थोड़े समय में अधिक मात्रा में हो सकने वाला कार्य ढेरों समय लगता और आधे अधूरे, काने कुरूप स्तर का बन पड़ता है। सफलताएँ प्राप्त करते रहे हैं। भविष्य में भी यदि कभी कठिन, असम्भव लगने वाले कार्य सम्पन्न होने लगें तो समझना चाहिए कि यह किसी जादू चमत्कार के वरदान अनुदान के आधार पर नहीं लगन तत्परता के मूल्य पर सम्भव हो सका है।
नव सृजन युग परिवर्तन के सम्बन्ध में भी इसी आधार का अवलम्बन लेना होगा। अग्रगामी प्राणवानों की भावभरी तत्परता यदि जुट सकी तो कोई कारण नहीं कि उज्ज्वल भविष्य के लिए जो सोचना करना और जुटाना है उसका सुयोग न बन सके। मानवी संकल्प का चुम्बकत्व इतना बलिष्ठ है कि वह किसी को भी घसीट कर खिंचते चले आने के लिए विवश कर सकता है। भले ही वह उज्ज्वल भविष्य का प्रत्यक्षी काम ही क्यों न हो। असीम क्षमताओं का भाण्डागार मनुष्य सृष्टा का युवराज और प्रकृति को कोषाध्यक्ष है। उसके संकल्पों और प्रयासों ने अतीत में वह सब सम्भव कर दिखाया है जिसे आज मानवी पुरुषार्थ को करते नहीं बन पड़ता है। लगता है ऐसे असंभव को संभव कर दिखाना किसी देव दानव का कृत्य ही हो सकता है। रहस्यों की परत उठाने पर यह यथार्थता सामने आ खड़ी होती है। कि मानवी प्रतिभा ही अपने विकसित रूप में देव दानव की भूमिका सम्पन्न करती है। अनगढ़ मनुष्य ही पिछड़ा पतित, दरिद्र और विपन्न दीखता है।
इस तथ्य का प्रमाण उदाहरण चाहिए तो मानवी उमंगों के वैज्ञानिक आविष्कारों की दिशा में जुट पड़ने के प्रवाह पर दृष्टिपात किया जा सकता है। सन् 1850 से आरम्भ हुआ यह उत्साह सुविधा साधन बढ़ाने वाले शक्ति की आवश्यकता पूरी करने वाले आधार एवं यन्त्र उपकरण ढूंढ़ निकालने की दिशा में द्रुतगामी हुआ और उसने एक शताब्दी जैसे स्वल्प काल में ऐसी उपलब्धियों के ढेर लगा दिये जिनके सामने पौराणिक उपाख्यानों में वर्णित ऋद्धि सिद्धियां फीकी पड़ गई। सन् 1850 में 1924 के मध्यवर्ती स्वल्प समय में अगणित आविष्कार हुए हैं उनमें सर्वविदित और बहु प्रचलित ही गिन जायं तो उनका समुच्चय पर्वत जितना विशालकाय बन जाता है। कहना न होगा कि इन सौ वर्षों में मनुष्य ने इतनी सामर्थ्य सुविधा अर्जित करली, जितनी कि उसे आदिमकाल से लेकर अब तक के समय में भी हस्तगत नहीं हुई थी।
अग्नि प्रज्ज्वलन, पहिया, धातुओं का उपयोग, कृषि उद्यान, अक्षर ज्ञान, भाषा-विज्ञान चिकित्सा, धर्म दर्शन समाज शास्त्र जैसी उपलब्धियों के क्रमिक विकास में हजारों लाखों वर्ष लगे हैं। उन आधारों को अपनाकर मनुष्य अधिक समर्थ सम्पन्न होता गया है। पर उनकी गति से उठता रहा है। एक पीढ़ी के अनुभवों का लाभ दूसरी पीढ़ी ने उठाया है। किन्तु वैज्ञानिक प्रगति के उपरान्त सौ वर्षों में तो पिछली सफलताओं की तुलना ने एक प्रकार से जादू ही कर दिखाया। इन सफलताओं के पीछे मानवी उत्साह, मनोयोग, और प्रयत्न में तूफान उभर पड़ने के अतिरिक्त और कोई रहस्य नहीं है। यह सुयोग जहाँ कहीं भी, जब कभी भी कार्यान्वित हुआ है वहीं उसका चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत होकर रहा है।
सन् 1850 से 1900 तक की अवधि में कई उपयोगी आविष्कार सर्वसाधारण के सामने आये। दो पहियों का साइकिल का आविष्कारक जर्मनी के बैडेन राज्य का एक सामन्त जिसका नाम था “ड्रैस वान सोयेरेब्रान।” सन् 1851 में ड्रैस तो इस लोक से चल बसा लेकिन आगे चलकर मैकमिलन नामक व्यक्ति ने इसी साइकिल का परिशोधित स्वरूप प्रस्तुत किया।
‘कार’ के मूल स्वरूप की विचारणा का व्यवहारिक स्वरूप 1886 में जर्मनी की मैनहीम नगरी के कार्ल बैज ने प्रस्तुत किया। देखने में बदसूरत तथा चाल में धीमी गति के कारण उसे उपेक्षा उपहास ही सहना पड़ा। परन्तु कुछ ही वर्षों बाद अमेरिका के हेनरी फोर्ड ने जन-जन की उपयोगिता की वस्तु बनाकर रख दिया।
पेडल व्हील का भाप से चलाकर एक लम्बा मार्ग आसानी से किस प्रकार तय किया जा सकता है, राबर्ट फाल्कम नामक अमरीकी ने सर्वप्रथम इसकी खोज की लेकिन इस सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय आर्किमिडीज को ही दिया गया है, कि पानी द्वारा भाप को सहन कर वस्तुओं को तैराया जा सकता है। भाप के इंजन इसी आधार पर बने और रेलगाड़ियाँ तथा वायलरों वाले कारखाने चल पड़े।
आविष्कारों में जब मानवी मस्तिष्क जुट पड़ा तो एक से एक बढ़कर चमत्कार सामने आते गये। 1900 से लेकर 1910 के बीच मात्र दस वर्षों में इतने अद्भुत उपकरण बन गये जिनने मानवी सुविधाओं को अनेक गुना बढ़ा दिया और आर्थिक क्षेत्र में एक प्रकार से क्रान्ति करके रख दी।
टेलीफोन, रेडियो, विद्युत टाइप राइटर, मल्टीफोन, लाउडस्पीकर, मूवी और टाकी फिल्में, टेलीविजन, इन्हीं दश वर्षों के भीतर आविष्कृत हुए और बाजार में आये। कृषि क्षेत्र में क्रान्ति करने वाले ट्रैक्टर पम्प, और कृत्रिम खाद का आविष्कार इसी अवधि में हुआ। हैलिकाप्टर एवं वायुयानों की उड़ाने संसार को प्रथम बार इन्हीं दिनों देखने को मिलीं।
इन्हीं दिनों अनेकों चमत्कारी औषधियाँ सामने आई। संज्ञा शून्य करके आपरेशन की पद्धति में आश्चर्यजनक सुधार हुए। डायनामाइट बारूद ने विध्वंसकों में कीर्तिमान स्थापित किया और स्वचालित राकेट लम्बी उड़ाने भरने लगे। कम्प्यूटरों और यन्त्र मानवों के सिद्धान्त का अब भी सन् 30 से पूर्व ही हो गया था। माइक्रोस्कोप, रेडार और दूरदर्शी टेलिस्कोप भी इसी अवधि में बनने लगे और टेप रिकार्डर बाजार में आ गये। रबड़ का स्थान प्लास्टिक लेने लगा।
नाइलोन के कपड़े फोटो स्टेट, अणु विस्फोट जैसे एक से एक अद्भुत आविष्कार सामने आये। लेसर किरणों की खोज हुई इसके बाद अन्तरिक्षीय उपग्रहों का सिलसिला चला और मनुष्य का पैर चन्द्रमा की धरती पर पड़ा। हजारों श्रमिकों का काम अकेले निपटा देने वाली मशीनें बनी और छपाई के उद्देश्य से द्रुतगामी एवं रंगीन छपाई करने वाले यन्त्र बाजार में आ गये।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आविष्कारों का क्षेत्र युद्ध उपकरणों को विकसित करने की दिशा में मुड़ गया है। एटम बम, न्यूट्रान बम, जहरीली गैस, मृत्यु किरणें और न जाने ऐसा क्या-क्या बन रहा है जिसके सहारे ही बटन दबाते इस धरती को फुलझड़ी की तरह जलाकर देखते देखते समाप्त किया जा सके। सौर मण्डल की सीमा पार करके अनन्त ब्रह्माण्ड पर कब्जा करने की महत्वाकाँक्षी योजनाएँ बन रही हैं।
संकल्प और प्रयास का भावभरा समन्वय कितने स्वल्पकाल में कितनी उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सकता है। इस तथ्य की एक हलकी सी झाँकी सौ वर्षों की सफलताओं को देखते हुए हर किसी को होती है। यदि यही प्रयास प्रस्तुत विपन्नताओं को निरस्त करने और उज्ज्वल भविष्य को खींच बुलाने के लिए जुट सकें तो कोई कारण नहीं कि युग परिवर्तन का लक्ष्य स्वल्प समय में ही सम्पन्न न हो सके। वैज्ञानिक प्रगति में सीमित लोगों का ही पुरुषार्थ नियोजित हुआ था किन्तु युग परिवर्तन की सामयिक आवश्यकता को पूर्ण करने में जो आज की असंख्यों प्राणवान आत्मायें कुछ कर गुजरने के लिए लालायित हैं। बात सुनियोजन भर की हैं।
जीवन क्रम किसी सरल गतिचक्र पर परिभ्रमण करता दीखता है, जन्म, बचपन, यौवन जरा और मरण के सामान्य चक्र में सभी परिभ्रमण करते दीखते हैं। जगाने, निपटने, खाने, काम करने, थककर सो जाने की दिनचर्या ही प्रायः सभी को बितानी पड़ती है। पेट और प्रजनन की समस्या सुलझाने में ही जिन्दगी कट जाती है। अनुकूलता, प्रतिकूलता की कड़वी मीठी अनुभूतियाँ भी दिन रात की तरह आती और चली जाती हैं। लाभ हानि के झूले में झूलते हुए हर्ष विषाद की अभिव्यक्तियाँ प्रकट करते हुए लोग मौत के दिन सम्मान-अपमान सहन करते हुए व्यतीत करते हैं। इस ढर्रे से सभी परिचित हैं। इसलिए जन्मने, मरने और दिन गुजारने में कोई अनोखापन प्रतीत नहीं होता।
इतने पर भी यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो उसके साथ कुछ विचित्र संयोग जुड़े हुए दीखते हैं और लगता है कि मनुष्य सर्वथा अपना स्वामी आप नहीं है। उसके पीछे कोई नियति तन्त्र भी जुड़ा हुआ है जो ऐसे संयोग बिठा देते हैं जिनमें व्यक्ति का अपना कुछ हाथ न होते हुए भी वह था अत्यन्त आश्चर्यजनक। ऐसी घटनाएँ बताती है कि जीवन जितना सरल है उतना ही विचित्र भी है। जिसका स्वरूप जितना साधारण है उतना ही बहुत कुछ असाधारण भी, उसके साथ संयुक्त सम्बद्ध है।
तारीखों का घटनाओं के साथ कभी कभी ऐसा विचित्र संयोग बैठता है कि सामान्य बुद्धि यह समझने में समर्थ नहीं होती कि आखिर ऐसा किस कारण होता है। उसके पीछे प्रकट या अप्रकट रहस्य क्या है ?
ऐसी ही तारीखों की संयोग की एक घटना स्पेन की है। बार्सिलोना नगर में एक ‘सिएट सेटिएम्ब्रे नामक व्यक्ति हुआ है। जिसका अर्थ स्पेनी भाषा में होता है। सात सितम्बर। यह नाम उसे माता-पिता से नहीं मिला। लोगों के द्वारा थोपा गया। वह 7 सितम्बर 1786 को पैदा हुा और 7 सितम्बर 1801 को मर गया। उसके बेटे का भी यही नाम था। वह 7 सितम्बर 1774 को पैदा हुआ और 7 सितम्बर 1824 को मरा। इतना की नहीं उसके पोते का भी यही नाम था और जन्म-मरण का दिन भी पूर्वजों की भाँति ही। पोता 7 सितम्बर 1814 को पैदा हुआ और 7 सितम्बर 1862 को दिवंगत हुआ। तीन पीढ़ियों तक एक ही नाम और एक ही जन्म-मरण का दिन, अभी तक उस देश में चर्चा विषय है।
जापान पर भूकंपों की विपत्तियाँ अनेक बार आई है पर छह भयानक संयोग ऐसे हैं जो एक ही तारीख को घटित हुए । और विनाश की दृष्टि से असाधारण रूप से भयानक माने गये। (1) 1 सितम्बर 1827 (2) 1 सितम्बर 1856 (3) 1 सितम्बर 1867 (4) 1 सितम्बर 1185 (5) 1 सितम्बर 1646 (6) 1 सितम्बर 1923। इनमें से छठे ने सबसे अधिक विनाश किया। उससे टोकियो और योकोहामा शहर बुरी तरह बर्बाद हुए और प्रायः 1 लाख 43 हजार व्यक्ति दब कर मर गये। घायलों की संख्या तो इससे भी कहीं अधिक थी।
विश्व-विख्यात चित्रकार अल्मा टाडमा के जीवन में “17” की संख्या महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। यह बात वे स्वयं स्वीकार करते हुए कहा करते थे “जब मैं 17 वर्ष का था तब 17 तारीख को अपनी प्रिय पत्नी से मिला। मेरे पहले मकान का नम्बर 17 था। जब दूसरा मकान बनाया था वह भी 17 अगस्त से प्रारम्भ हुआ और उस नूतन गृह में मेरा प्रवेश भी 17 नवम्बर को हुआ। चित्रकारी के लिए सेन्ट जोन्स वुड में जो कमरा लिया वह भी 17 नम्बर का ही निकला।”
लेखकर ए.बी. फ्रेंच के जीवन की अधिकाँश घटनाएँ 7 की संख्या के साथ ही घटित हुई। उनका जन्म 7 वें महीने की 7 वीं तारीख को हुआ था। 7 वर्ष तक के कभी बीमार नहीं हुए। 7 वीं कक्षा तक वे कभी फेल नहीं हुए। उनका विवाह 7 वीं लड़के के साथ हुआ और संयोग से उस लड़की के लिए भी फ्रेंच 7 वें ही लड़के थे।
ऐलन वान ने अपनी पुस्तक, “इन क्रेडिबल कोइन्सी डेंस” में अंक संयोगों पर आधारित एक घटना का उल्लेख किया है। आयरलैण्ड स्थित डबलिन के निवासी एन्टोनीक्लेंसी के जीवन में 7 संख्या का विशेष महत्व रहा। उसके जीवन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर सात का संयोग अवश्य रहा। एन्टनी क्लेंसी के शब्दों में “सप्ताह के सातवें दिन, महीने की सातवीं तारीख को, वर्ष के सातवें दिन, इस सदी के सातवें वर्ष में मेरा जन्म हुआ था। मैं अपने माता-पिता का सातवाँ बेटा हूँ, यहाँ तक कि मेरे पिता भी अपने अभिभावक के सातवें पुत्र थे। अपनी सत्ताईसवीं वर्ष गाँठ पर सातवीं घुड़ दौड़ में मैंने सात नम्बर का घोड़ा चुना और उसका नाम था “सातवाँ बहिश्त” मैंने उस घोड़े पर सात शिलिंग लगाये। रेस में भी उसका सातवाँ नम्बर था।”
उत्तरी बर्टन यार्कशायर के डा. रुड के जीवन में 13 की संख्या दुर्भाग्य सूचक के रूप में रही। 13 वर्ष की अल्पायु में वे बीमार पड़े। 13 दिन तक घोर कष्ट सहते हुए 13 तारीख को हृदय की बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उनके परिवार में 13 सदस्य थे। मृत्यु के समय कुछ 13 शिलिंग ही उनके फण्ड में बचे थे। अन्तिम संस्कार के समय भी 13 सदस्य ही उपस्थित हुए। रुड का नाम फूवाह था जो कि बाइबिल के 13 वे छन्द में आता है। उनकी मृत्यु के समय मात्र 13 तारीख ही शोक संवेदना के रूप में आये।
इसके विपरीत डेनवरा कोलराडो के धनाढ्य उद्योग-पति शेरमैन के लिए 13 की संख्या सौभाग्य सूचक थी। शेरमैन का जन्म 13 की संख्या सौभाग्य सूचक थी। शेरमैन का जन्म 13 तारीख को हुआ। उनकी सगाई 13 तारीख को हुई ओर विवाह भी 13 जून सन् 1913 को हुआ। पत्नी का जन्मदिन भी 13 तारीख का ही थी। उनके विवाहोत्सव में कुल 13 सदस्य ही उपस्थित थे। 13 की संख्या उनके जीवन में सदैव लाभ दायक रही।
फ्राँस के सिंहासन के साथ 14 की संख्या का महत्व संख्याओं के साथ जुड़ी विचित्रताओं को प्रकट करती है। फ्राँस के प्रथम सम्राट हेनरी 14 मई 1029 को सिंहासन पर बैठे जबकि वहाँ वहाँ के आखिरी सम्राट का नाम भी हेनरी था 14 मई 1910 को उनकी हत्या कर दी गई थी। जिस तारीख को एक को सिंहासन मिला उसी को दूसरी 14 मई को मृत्यु का उपहार। वहाँ के अन्य सभी राजाओं के लिए 14 संख्या का महत्व सदैव बना रहा। हेनरी द्वितीय ने 14 में को ही फ्राँस का राज्य विस्तार किया। हेनरी तृतीय को 14 मई के दिन युद्ध के मोर्चे पर जाना पड़ा। हेनरी चतुर्थ ने आयवरी का युद्ध 14 मार्च 1590 को जीता 14 दिसम्बर 1566 को सवाय के ड्यूक ने अपने आपको हेनरी को आत्म समर्पण किया। 14 तारीख को ही लार्ड डफरिन ने 13वें के रूप में बैपतिस्मा ग्रहण किया।
हेनरी चतुर्थ के पुत्र लुई 13वें की मृत्यु 14 मई 1643 को हुई। लुई 14वें 1643 में (1+6-4-3-14) सिंहासन पर बैठे और 77 वर्ष 7+7+14 की आयु में उनकी मृत्यु हुई। लुई 15वें ने कुल 14 वर्ष राज्य किया। इस प्रकार फ्राँस के सिंहासन पर 14 का महत्व सदैव बना रहा।
जर्मनी के शासक चार्ल्स चौथे ने अपने जीवन में चार की संख्या को अत्यधिक महत्व दिया। वह चार रंग की पोशाक को दिन में चार बार पहनते थे। चार चार प्रकार का भोजन, चार मेजों पर दिन में चार बार करते थे, चार प्रकार की शराब पीते थे। उनके अंग रक्षक चार थे, बग्घी में चार पहिये और चार ही घोड़े जुतते थे। उनके चार महल थे उनमें चार-चार ही दरवाजे और प्रत्येक महल में चार-चार कमरे, प्रत्येक में चार-चार ही खिड़कियाँ। मृत्यु के दिन उनके समीप चार ही डाक्टर उपस्थित थे। उन्होंने चार बार “गुडबाय” कहा ओर ठीक चार बजकर चार मिनट पर इस संसार से विदा हो गए।
अमरीका के जिम विशप ने अमरीकी राष्ट्रपतियों अब्राहमलिंकन और जान एफ. कैनेडी के जीवन का तुलनात्मक अध्ययन कर बड़ा ही रोचक निष्कर्ष निकाला उनकी मान्यता है कि अब्राहमलिंकन ही जान एफ. कैनेडी थे।
चालीस वर्ष की आयु में ही लिंकन को भी राष्ट्रपति बनने की इच्छा हुई और कैनेडी को भी। दोनों की इच्छा थी कि अमरीका ओर विश्व में शान्ति स्थापना के लिए प्रयत्न करें। लिंकन दक्षिण को बहुत चाहते थे कैनेडी भी। नीग्रो स्वतन्त्रता के लिए लिंकन ने भी प्रयत्न किये पर दक्षिण के लिए तैयार नहीं हुआ, यही स्थिति कैनेडी की भी रही। लिंकन के चार बच्चे थे, दो मर गये थे, दो उनके साथ रहते थे। कैनेडी के चार पुत्र हुए दो मर गये, दो जीवित रहे। लिंकन की पहली पत्नी फैशनेबल थी, कविता और पेंटिंग उन्हें पसन्द थी। कैनेडी की पहली पत्नी भी ठीक वैसे ही स्वभाव की थीं लिंकन की धार्मिक मान्यताएँ बहुत गहरी थीं, वे हमेशा बाइबिल पढ़ते रहते थे। कैनेडी भी धर्म पर अडिग विश्वास रखते थे और बाइबिल पढ़ते थे। दोनों ही लिबरल पार्टी से सम्बद्ध थे। खाद्य पदार्थों में लिंकन को भी “स्पर्श” प्रिय था और कैनेडी को भी लिंकन 1861 में राष्ट्रपति बने और कैनेडी 1961 में लिंकन की सुरक्षा के लिए जो सर्वाधिक चिंतित रहता था उसका नाम कैनेडी था और कैनेडी की सुरक्षा की सबसे अधिक चिन्ता करने वाले उसके प्राइवेट सेक्रेटरी का नाम लिंकन था। दोनों ही मृत्यु शुक्रवार के दिन हुई। दोनों ही गोली के शिकार हुए। लिंकन का पद उनकी मृत्यु के उपरान्त दक्षिणी उपराष्ट्रपति जान्सन ने सम्भाला और कैनेडी की मृत्यु के बाद भी दक्षिणी उपराष्ट्रपति जान्सन ने ही राष्ट्रपति पद सम्भाला।
कभी-कभी ऐसे विलक्षण संयोग किन्हीं व्यक्तियों के जीवन से जुड़े रहते हैं जिसमें किसी अंक या किसी दिन का विशेष महत्व होता है। जिनसे प्रतीत होता है कि उनका क्रम मनुष्य जीवन को भी प्रभावित करता है। कोई अंक किसी के लिए शुभ और किसी के लिए अशुभ सिद्ध होता है। यद्यपि इसका कुछ कारण समझ में नहीं आता। इसी प्रकार घटनाक्रमों की एक जैसी पुनरावृत्ति में कई बार अंकों की अद्भुत पुनरावृत्ति पायी जाती है। ये पुनरावृत्ति कई बार ऐसी विलक्षण होती है जिसे मात्र संयोग पड़ती है।
किन्हीं व्यक्तियों के जीवन में कुछ अंकों का विशेष महत्व रहता है। प्रिंस विस्मार्क के जीवन में 3 का अंक कुछ विलक्षण संयोग लाता रहा। उनके तीन नाम थे लाएन वर्ग, शोवासेनी और विस्मार्क। उन्हें तीन उपाधियाँ मिलीं प्रिन्स ड्यूक तथा काउन्ट। तीन कॉलेजों से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। वे तीन देशों में राजदूत रहे। वे तीन युद्धों में लड़ने गये। तीन बार उन पर घातक आक्रमण हुए। तीन बार उन्होंने त्याग पत्र दिया। तीन ही उनके पुत्र हुए।
साइप्रस के शासनाध्यक्ष मकोरिआस के जीवन में 13 का अंक कुछ ऐसे ही संयोग लाता रहा। 13 अगस्त 1613 को उनका जन्म हुआ। 13 वर्ष की आयु में चर्च में भर्ती हुए। 13 नवम्बर 1946 में उन्होंने प्रोस्ट शिक्षा ली। 13 जून 1948 में वे विशप बने तथा राजगद्दी पर बैठे। 13 मार्च 1651 में यूनान के राजा ने उनका अभिनन्दन किया। 13 दिसम्बर 1956 को वे राष्ट्रपति चुने गये।
भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री के जीवन मंगलवार का विशेष महत्व रहा। उनका जन्म मंगलवार के दिन हुआ। बचपन में एक बार वे गंगा में डूबते डूबते बचे वह दिन भी मंगलवार था। 1940 में वे गिरफ्तार हुए वह दिन भी मंगलवार था यू.पी. पार्लियामेन्टरी बोर्ड के मन्त्री, 1947 में पुलिस एवं यातायात मन्त्री, 1651 में काँग्रेस के महासचिव 1952 में रेलमन्त्री, 1957 में परिवहन मन्त्री आदि पर उन्होंने मंगलवार के दिन ही प्राप्त किये। यहाँ तक कि वे प्रधानमन्त्री भी मंगलवार को ही बने। मंगलवार को ही उन्हें स्व. राधाकृष्णन ने भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया। ताशकन्द वार्ता भी उन्होंने मंगलवार को प्रारम्भ की ओर अन्त में उन्होंने अपना पार्थिव शरीर भी मंगलवार के दिन छोड़ा।
आयरलैण्ड के क्रुक हैवेन शहर में एक ही मकान में रहने वाले दो दम्पत्तियों के एक ही दिन कुछ मिनटों के अन्तर से दो पुत्र पैदा हुए। नाम रखा गया एलेनर ग्रेडी तथा पैट्रिक।
दोनों बच्चे अलग-अलग खेलते किंतु एक दिनों दोनों रोते-रोते घर पहुँचे तो उनके माता-पिता ने देखा कि दोनों के पैर में एक ही स्थान पर चोट लगी थी। दोनों बच्चे पढ़ रहे थे तब कई बार ऐसा हुआ कि दोनों को परीक्षा में समान अंक मिलें दोनों का विवाह एक साथ ही तय हुआ। शादी के बाद पहला बच्चा भी दोनों के एक ही दिन हुआ।
पैट्रिक और एलेनर 96 वर्ष की आयु में एक ही दिन बीमार पड़े और साथ ही मृत्यु भी दोनों की एक ही समय में हुई। इन घटनाओं से आयरलैण्ड के शिक्षित व्यक्ति भी इस बात को मानने लगे कि कोई नियन्ता व सृष्टि में अवश्य काम कर रहा है।
भारत की थुवाल रियासत के उत्तराधिकारी के मुकदमें का फैसला संसार के इतिहास में अपने ढंग का अनोखा है। रियासत का राजा रमेन्द्र राय 1909 में मरा। उत्तराधिकारी स्थानापन्न हो गये। इसके 12 वर्ष बाद राजा प्रकट हुआ और उसने अदालत में अपनी सम्पत्ति वापस लेने का दावा किया। उसका कहना था कि घर के लोग चित्त में आग लगा कर घर चले गये और उसी समय वर्षा से आग बुझ गई और वे मृतक से जीवित होंगे। स्मृति न रहने के कारण वे बारह वर्ष जहाँ-तहाँ भटकते रहे और अब वे अपनी बंगला मातृ भाषा तक भूल चूके हैं।
इस दावे का उनके पूरे परिवार ने खण्डन किया। विधवा ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि यह कोई जालसाज है। उसका पति नहीं इतने पर भी ब्रिटिश की प्रिवी कौन्सिल ने सन् 1935 में राजा के पक्ष में फैसला दिया। राजा की भारी जायदाद थी। यह सम्पत्ति फैसले के अनुसार उस मृतात्मा को मिल गई जिसने अपने आपको जीवित सिद्ध किया और न्यायकर्ताओं को प्रभावित करने में विचित्र सबूतों के आधार पर सफलता पाई।
जीवन के साथ जुड़ी हुई इन विचित्रताओं विलक्षणताओं की कोई संगति प्रत्यक्ष कारणों से नहीं बैठती तो भी उनकी प्रमाणिकता पर सन्देह नहीं किया जा सकता। अध्यात्मवेत्ताओं का मत है कि अविज्ञात होते हुए उनके सुनिश्चित आधार पर जिन्हें बुद्धि के सहारे समझ पाना सम्भव नहीं है। यथार्थता की खोज के लिए अध्यात्म की उस गुह्य विज्ञान विद्या का अवलम्बन लेना होगा जिसे वैज्ञानिकों ने उपेक्षित मानकर समुचित सम्मान नहीं दिया।
तैमूर लंग ने बहुत से गुलाम पकड़े और उन्हें बेचने के लिए स्वयं ही मोल भाव करता और सौदा पटने पर गुलामों को बेच देता। पकड़े हुओं में तुर्किस्तान के दार्शनिक अहमदी भी थे। उनसे पूछा- बताइये पास खड़े हुये दो गुलामों की कीमत कितनी होगी ? अहमदी ने कहा- यह समझदार मालूम पड़ते हैं इनकी कीमत चार-चार हजार अशर्फी से कम नहीं हो सकती। अबकी बार तैमूर ने प्रश्न किया तो बताइये मेरी कीमत क्या हो सकती है ? अहमदी बोले- 20 अशर्फी।
तैमूर गरजने लगा- मेरा ही अपमान। इतने की तो मेरी सदरी है। दार्शनिक ने कहा- “यह कीमत तो मैंने सदरी देखकर ही बताई है। आप जैसे अत्याचारी की कीमत एक छदाम भी नहीं हो सकती।” तैमूर का गुस्सा ठंडा पड़ गया। मन की बात कहने की हिम्मत रखने वाले उस दार्शनिक को उसने बन्धन मुक्त कर दिया।
नोबेल पुरस्कार विजेता अरनो पेन्जियास और राबर्ट विल्सन ने अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध किया है कि विश्व की उत्पत्ति ‘बिग बैंग’ (महत्तम विस्फोट) से हुई है। विश्व की आयु की गणना भी इसी आधार पर कर ली गई है जो 20 खरब वर्ष पूर्व मानी जाती है। पृथ्वी की उत्पत्ति साड़े चार खरब वर्ष पूर्व हुई थी। हमारी आकाश गंगा के निकटतम तारों में कई ऐसे हैं जिनमें हमारे सौर मण्डल जैसे अनेकों सौर मण्डल हैं तथा कई ऐसे ग्रह हैं जहाँ पृथ्वी की तरह जीवन संभव है हमारी पृथ्वी की अपेक्षा उन तारों के ग्रह काफी विकसित और पुराने हैं। उन ग्रहों की आयु 5, 10 या 15 खरब वर्ष आँकी जाती है। पृथ्वी में जीवन का उद्भव सर्व प्रथम 30 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ है। इस दृष्टि से मनुष्य की अपेक्षा अन्य तारों पर रहने वाले प्राणियों के अधिक बुद्धि सम्पन्न होने की पूरी सम्भावना है।
पृथ्वी पर 1960 से लेकर अब तक विभिन्न केन्द्रों से रेडियो संकेत भेजे जा रहे हैं। प्रकाश की गति के हिसाब से ये संकेत 240 ट्रिलियन माइल की दूरी तय कर चुके हैं। इससे कम से कम निकटतम 40 तारों तक ये संकेत पहुँच चुके हैं। अगर उन पर कोई विकसित प्राणी जीवनयापन कर रहे होंगे तो पृथ्वी से प्राप्त संकेतों के जवाब में भेजे गये उनके उत्तरों को पृथ्वी पर पहुँचने में बीस वर्ष और लगेंगे। यह सम्भावना की जा सकती है कि प्रत्युत्तर के रूप में आगामी 20 वर्षों में उनके संकेत पृथ्वी पर प्राप्त होंगे या फिर उनका कोई प्रतिनिधि यहाँ आयेगा।
कुल 12 तारों मण्डलों में मनुष्य से अधिक बुद्धिशाली प्राणियों के प्रमाण मिले हैं इनमें से दो प्रमुख है पहला अल्फा सेण्टोरी इसकी आयु सूर्य जितनी है। जीवन की सम्भावना भी अधिक है क्योंकि वहाँ जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन कार्बन जैसे तत्व हैं। दूसरा तारा मण्डल है “एव्सीलान”। इसकी आयु भी सूर्य के बराबर मानी जाती है। वहाँ पाये गये तत्वों से ज्ञात होता है कि वहाँ जीवन की सम्भावना है।
इन अनआइडेण्टि फाइड फारेन आब्जेक्ट्स जिन्हें “यूफो” नाम से भी पुकारा जाता है, में यदि कोई जीवित व्यक्ति होगा तो उसे लगभग पच्चीस ट्रिलियन माइल (हमारे निकटतम तारे सीरियल की दूरी) से भी अधिक लम्बी यात्रा करनी होगी। इस यात्रा में वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार दस लाख वर्ष लगेंगे। हमारी तकनीकी इतनी विकसित नहीं है कि हम वहाँ जीवन की कल्पना करते हुए भी उनसे मिलने हेतु जाने की बात भी सोच सकें। इसका कारण यह तो है ही कि इतनी लम्बी यात्रा हेतु अन्तरिक्ष यान बनाने वाली स्पेस टेक्नोलॉजी विकसित होने में अभी समय लगेगा। दूसरा कारण यह भी है कि हम अपने संकेतों की सर्वभौम बनाने एवं बाहर से आने वाले संकेतों के अर्थ को समझने में असफल रहे हैं। अमेरिका के अन्तरिक्ष विज्ञान से सम्बन्धित ‘नासा’ विभाग द्वारा हमारे सौर मण्डल के विभिन्न ग्रहों पर भेजे गये सेटेलाइटों द्वारा कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है जिससे लगता हो कि पृथ्वी से इतर भी कहीं जीवन का अस्तित्व होगा। यह मात्र हमारा सीमा बन्ध है, सम्भावनाओं की समाप्ति नहीं। हमारे कई लाख साल के वंशजों के लिए शायद यह सम्भव होगा कि वे निकटतम तारे तक पहुँच पायें। लेकिन ऐसे ग्रह जिनका विकास पृथ्वी से खरबों साल पूर्व हो चुका है वहाँ के निवासियों द्वारा पृथ्वी तक यात्रा का साहस जुटा पाना सम्भव है।
“यूफो का धरती पर आना एक तथ्यपूर्ण वैज्ञानिक धारण है” इस नाम से लिखे निबन्ध के रचयिता वैज्ञानिक राबर्ट जेस्ट्रा का यह दृढ़ मत है कि यह वास्तविकता है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। क्या पृथ्वी पर ऐसे सुदूर ग्रह के निवासियों का आना हुआ है। ? इस विषय पर बाइबिल के इजकेल के अध्याय 1,4,24 में कई हजार वर्ष पूर्व ऐसे लोगों के आने का उल्लेख है।
डॉ. एलेन हेनेक ने यूफो सम्बन्धी अनेकों रिपोर्टों का अनुसन्धान करके यह निष्कर्ष निकाला है कि यह केवल कल्पना की उड़ान या किंवदंती न होकर दृढ़ आधारों पर टिका एक तथ्य है। पृथ्वी पर से बीस वर्षों से लगातार रेडियो संकेत विश्व के सुदूर स्थानों तक भेजे जाने के कारण पहले की अपेक्षा अब अन्य ग्रह निवासियों के यहाँ आने की सम्भावना अधिक मानी जाने लगी है। इस सम्बन्ध में लिखी गई कथाएँ अब मात्र यूटोपिया नहीं रह गयी हैं। इन्हें अगले कुछ दशकों में ही सत्य होते देखा जा सकेगा।
नोबेल पुरस्कार विजेता एस्ट्रोफिजीसिस्ट डा. पेजियम और डा. पेजियस और डा. बिल्सन दोनों ही यह विश्वास करते हैं कि इस ब्रह्माण्ड में ऐसे ग्रहों का अस्तित्व है जिनमें मनुष्य से भी अधिक बुद्धिमान प्राणी निवास करते हैं। वे सोचते हैं कि यदि मात्र धरती पर विभिन्न क्षेत्रों के निवासी पारस्परिक आदान-प्रदान से महत्वपूर्ण प्रगति कर सकते हैं और उसका लाभ समस्त संसार को मिल सकता है तो ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि ब्रह्माण्ड में निवास करने वाले बुद्धिमान जीव अन्तर्ग्रही सम्बन्ध स्थापित करें और मिल जुलकर ऐसा कुछ सोचने लगे जो ब्रह्माण्ड परिवार भर के लिए उपयोगी सिद्ध हो सके।
इस सम्बन्ध में सबसे बड़ी कठिनाई एक ही है कि अभी प्रकाश गति से अधिक द्रुतगामी और कोई संचार पद्धति हस्तगत नहीं है। अन्तर्ग्रही दूरी को देखते हुए यह गति ऐसी नहीं है जिसमें सौ वर्ष की आयुष्य वाला मनुष्य इस संपर्क में अभीष्ट समय के अंतर्गत ऐसे आदान-प्रदान में समर्थ हो सके। यदि वार्तालाप में इतनी देर लग सकती है तो फिर आवागमन में लगने वाला समय कितना अधिक हो सकता है, इसकी परिकल्पना तक कठिन है। फिर इतनी दूरी पार करने और लौटने वाले वाहनों के लिए ईंधन भी तो इतना अधिक और इतना महंगा होगा कि उसकी व्यवस्था कर पाना असम्भव जैसा दीखता है।
स्पष्ट है कि अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान या आवागमन यदि आवश्यक ही समझा जाय तो प्रकाश गति से अधिक दौड़ सकने वाली और बिना खर्चीले ईंधन से चल सकने वाली व्यवस्था हस्तगत करनी होगी। इस संदर्भ में विचार शक्ति ही एक ऐसी है जो प्रकाश गति से अधिक दौड़ सकती है। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर का वजन और स्तर ही ऐसा है जो बिना भौतिक ईंधन की अपेक्षा किये लोक लोकान्तरों तक दौड़ लगा सके।
यह कार्य पदार्थ विज्ञान की परिधि से बाहर है किन्तु अध्यात्म विज्ञान के आधार पर यह सम्भव भी है और कितना अधिक सुविधा संवर्धन सम्भव हो सका यदि इस तथ्य के सहारे ब्रह्माण्डीय चेतना की अस्त-व्यस्त कड़ियों को जोड़ सकने की बात सोची जा सके और उस आधार पर सम्भव हो सकने वाले लाभों का अनुमान लगाया जा सके तो फिर अध्यात्म विज्ञान का आश्रय लेने और उसे सुव्यवस्थित करने की बात सोचने के अतिरिक्त और कोई चारा है नहीं।
एक व्यक्ति के पास रेशम का थान था-धागे आपस में लड़ने लगे। अलग-अलग रहने की सबने ठानी। दर्जी ने उसके टुकड़े काट दिये।
एक जगह खजूर की पत्तियाँ थी। सूखी और बिखरी पड़ी थी। उसने मिल जुलकर रहने का निश्चय किया। माली ने इकट्ठी करके उनकी चटाई बुन दी।
रेशम की धज्जियाँ दुकान-दुकान पर मारी फिरी, किसी ने नजर उठाकर भी उन्हें नहीं देखा। जबकि चटाई का गट्ठा हाथों हाथ बिक गया।
अलग होने और शामिल रहने का अन्तर दोनों ने समझा और भविष्य के लिए सही रास्ता अपनाया।
सहायकों की वृद्धि सभी को अभीष्ट है। प्राणियों को प्रगति का अवसर, साथी सहायकों की संख्या बढ़ाने पर ही सम्भव हो पाया है। जो झुण्ड बनाकर रहते हैं, उन्हें सुरक्षा का लाभ भी मिलता है और पारस्परिक सहकार के आधार पर मनोबल ऊँचा रहने से लेकर सुविधा सम्पन्न जीवन-यापन का अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिलता है। चींटी, दीपक, मधुमक्खी जैसे प्राणी किस प्रकार पारस्परिक सहयोग का लाभ उठाते हैं इसे सभी जानते हैं। हिरन, सिंह हाथी आदि का झुण्ड बनाकर रहना उनके लिए लाभदायक ही रहता है।
मनुष्य की प्रगति में उसकी अपनों से तथा अन्यान्य प्राणियों के साथ संपर्क साधने और सहयोग का आदान-प्रदान की आदत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। इसका एक प्रमाण पशु पालन के संदर्भ में मिली सफलता का उल्लेख किया जा सकता है। साधारणतया वन्य पशुओं के साथ मनुष्य का सीधा कोई तालमेल नहीं बैठता। मिलने पर बिदकते हैं और भयाक्रान्त होकर दूर भागने की चेष्टा करते हैं। इसे व्यवहार कुशलता ही कहना चाहिए कि उनके बीच परस्पर आदान-प्रदान का क्रम चल पड़ा। कृषि के उपरान्त दूसरा सबसे बड़ा उद्योग पशुपालन ही है। सुविधा ओर समृद्धि बढ़ाने में पशुओं ने जो मनुष्य की सहायता की है उसे भुलाया नहीं जा सकता। यदि यह तालमेल नहीं बैठता तो दोनों आपस में टकराते और नितान्त घाटे में रहते।
इस दिशा में अब एक कदम और उठाने की आवश्यकता है। मात्र पशुओं की शरीर सम्पदा को ही पर्याप्त न समझा जाय वरन् उनकी बुद्धिमत्ता को भी विकसित किया जाय और उसका लाभ उठाया जाय। शरीर कितना ही उत्तम हो, बुद्धि उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण और बढ़-चढ़कर है। पशुओं को बुद्धिमान बनाकर सरकस वालों ने उनके द्वारा अपेक्षाकृत अधिक लाभ उठाया है। घोड़े, हाथी सिखाये-सधाये गये तो वे युद्धों से लेकर अन्यान्य कार्यों में उनसे असाधारण असाधारण सहायता प्राप्त कर सकने में सफल रहे। कुत्तों ने अच्छे खासे पुलिस मैनों से बढ़कर अपराधियों का पता लगाने और अपराधों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब आवश्यकता इस बात की है जो पशु पक्षी मनुष्य के संपर्क में आ चुके हैं, जिनमें बुद्धि की मात्रा कुछ बढ़चढ़कर है इन्हें अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाय जहाँ ऐसे प्रयत्न चल पड़े हैं उन्हें प्रोत्साहन दिया जाय और मिल जुलकर काम को आगे बढ़ाया जाय।
इन प्रयासों के माध्यम से हम एक अन्य दूसरे दर्जे की मनुष्य जाति उत्पन्न कर सकेंगे और उनके सहयोग से उससे कहीं अधिक लाभ उठा सकेंगे, जो आज की उपेक्षित स्थिति में उठा पाते हैं। समुचित प्रशिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके आधार पर अविकसित प्राणियों को भी उनकी सामर्थ्य के अंतर्गत आने वाले कार्यों के लिए दक्ष बनाया जा सकता है। कुत्ता एक सामान्य स्तर का पशु है। आमतौर से उससे चौकीदारी जैसा काम ही लिया जाता है, पर प्रशिक्षित करने पर उसे कितने ही ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए सुयोग्य बनाया जाता है। जिसके लिए उसकी बिरादरी में कोई प्रचलन या परम्परा नहीं है।
अन्धों का मार्गदर्शन करने में अब वे असाधारण सहायता करने योग्य बनाये जाने लगे हैं। एक नियत स्थान से दूसरे स्थान तक वे अपने मालिक को नियमित रूप से पहुँचाने और वापस लाने का काम करने लगे। प्रशिक्षित कुत्ते की गरदन में रस्सी बाँध दी जाती है और वह आगे आगे चल पड़ता है। अन्धा मालिक उस रस्सी के संकेतों पर अपने पैर बढ़ाते और मोड़ते को रुकना पड़ता है। यह मोड़ रास्ते में आने वाले व्यवधानों के कारण आते हैं। सामने से आने वाली भीड़ या सवारी की दिशा और तेजी को देखकर वह अनुमान लगा लेता है कि सामने वाला बचेगा या नहीं। यदि लगता है कि उसके कारण अपने सफल में कोई अड़चन नहीं पड़ेगी तो ही वह यथावत् चलता है अन्यथा बाई ओर बचने का ध्यान रखते हुए स्वयं भी मुड़ता है और मालिक को भी मोड़ता है। उसे ध्यान रहता है कि उसे अकेले ही नहीं चलना है वरन् मालिक के मार्गदर्शन का उत्तरदायित्व भी ठीक तरह निभाना है।
उँगली या लाठी पकड़कर अन्धों को कहीं से कहीं ले जाने की पुरानी परम्परा में एक कीमती आदमी घिरता है। वह कार्य कुत्ते के सस्ते श्रम से क्यों ने पूरा करा लिया जाय। यह सोचकर उस प्रयोजन के निमित्त उन्हें सिखाने साधने के लिए कितनी ही संस्थाओं का सृजन हुआ है और उनने अपना काम सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है। पाश्चात्य देशों में चल पड़े ऐसे प्रयासों में इंग्लैण्ड अग्रणी है। उसकी एक संस्था है “दि गाइड डाग फार दी ब्लाइण्ड्स”। उसकी वरसेस्टर, एसेक्स, फोरफर लीमिग्टन, वार्गिधम आदि स्थानों में 70 शाखाएँ हैं। सरकस के लिए जानवर सधाने वालों की तरह इन संस्थानों में भी श्वान मनोविज्ञान के ज्ञाता काम करते हैं और भिन्न-भिन्न उपायों द्वारा अपने छात्रों का कौशल निखारते हैं नर उद्दण्ड होते हैं और मादा स्वभावतः सहनशील। इसलिए इस प्रयोजन के लिए मादाएँ भर्ती की जाती हैं। प्रशिक्षण आरम्भ करने से पूर्व उनके प्रजनन अवयव निकाल दिये जाते हैं ताकि उस उत्तेजना के कारण अपनी ड्यूटी पूरी करने में गड़बड़ी न करें।
शिक्षा का आरम्भ भीड़ रहित स्थानों में होता है। बाद में उन्हें भारी भीड़ के बीच गुजरने और द्रुतगामी वाहनों से बचने के लिए भी अभ्यस्त बना दिया जाता है। जिस मालिक को उसे सुपुर्द किया जाना है उसे तीन सप्ताह केन्द्र में रहकर अपने भावी मार्गदर्शक के साथ दोस्ती बढ़ानी पड़ती है। जब दोनों के बीच घनिष्ठता विकसित हो जाती है, तभी कुत्ता विद्यालय छोड़कर उसे नये मित्र के साथ जाने का रजामन्द होता है।
पशु पक्षियों में से कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनमें समझदारी की मात्रा काफी है और थोड़े से प्रयत्न से उनकी विशेषताओं का लाभ उठाया जा सकता है। इस संदर्भ में कबूतर मनुष्य के लिए अन्य पक्षियों की तुलना में अधिक उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।
मास्को को ‘अनातोली शेरोब इन्स्टीट्यूट’ ने ऐसे पशु पक्षियों का विशेष परीक्षण आरम्भ किया है जिसके अनुसार यह जाना जा सकेगा कि उनकी संरचना, प्रवृत्ति एवं सूझबूझ को मोड़ मरोड़कर किसी मनुष्य के साथ सहयोग करने को उपयुक्त बनाया जा सके। इस परीक्षा में प्रायः आधे दर्जन पशु और सात पक्षी उत्तीर्ण हो गये हैं। फलतः उनके लिए कार्य निर्धारण और पाठ्यक्रम बनाने की तैयारी तत्परतापूर्वक हो रही है।
जानवरों को विशिष्ट प्रयोजनों के लिए सधाने वाले रूसी प्रशिक्षक ब्लादिमिर दुरोव ने अपने सधाये पशु पक्षियों के निवारण प्रकाशित किये हैं। उसमें उनने जानवरों की अतीन्द्रिय क्षमता को अपनी संकल्प शक्ति से प्रभावित करने और तद्नुसार विलक्षण काम कराने का सफलता का उल्लेख किया है। सामान्यतया जानवरों को लालच या प्रताड़ना के माध्यम से उनकी आदत में भिन्न प्रकार की बातें सिखाई जाती हैं। जब तब प्यार प्रदर्शन का भी प्रयोग होता है। किन्तु दुरोव ने इस से भिन्न मार्ग चुना। जिन्हें संवेदनशील पाया उन जानवरों को अति निकट बुलाकर बहुत देर तक प्यार भरी नजर उनकी आँखों में डालने का अभ्यास किया। पाया कि इस प्रयोग में वे सम्मोहित एवं समर्पित जैसी मनःस्थिति में जा पहुँचते हैं उसी समय दुरोव ने छोटे छोटे निर्देश दिये और उन्हें पालने का अग्रह किया। आश्चर्य यह कि वे इसी मानसिक संकेत के आधार पर वैसा करने लगे जैसा कि उन्हें बिना कुछ कहे या सिखाये चाहा गया था इस प्रयोग में उसकी एक कुतिया बहुत सफल रही वह मूक सन्देश द्वारा बताई गई पुस्तक को दूर रखे पुस्तकों के ढेर में ढूंढ़कर ले आती थी। पुस्तक का नाम तो वह नहीं पढ़ी सकती थी पर रंग ओर डिजाइन का नक्शा मस्तिष्क में उतार दिये जाने पर वह दिये गये निर्देश को ठीक प्रकार पालन करके दिखा देती थी। इसी प्रकार यह शिक्षक अतीन्द्रिय क्षमता का प्रयोग करके अदृश्य संकेतों के आधार पर अन्य पशु पक्षियों से भी आश्चर्यजनक कार्य करा लेता था।
बीवर खरगोश जाति का छोटा सा जन्तु है जिसकी लम्बाई पूँछ समेत चार फुट से कम ही होती है। यह अपने रहने के लिए नदी किनारे ऊँचे बाँध खड़े करता है और संरक्षित घर बनाकर सुख पूर्वक रहता है। यह बाँध लकड़ी के लट्ठों मोटी टहनियोँ, पत्थरों तथा कड़ी मिट्टी के सहारे बनाये गये होते हैं। बीवर समुदाय बनाकर यह रचना करते हैं। वे जिस पेड़ को उपयुक्त समझते हैं और उसकी जड़े दाँतों से काटने में जुट पड़ते हैं और अन्ततः उसे धराशायी करके ही छोड़ते हैं। इन पेड़ों के दो टुकड़े काटकर वे मिल जुलकर उन्हें घसीट ले जाते हैं और धराशायी करे ही छोड़ते हैं। इन पेड़ों के दो टुकड़े काटकर वे मिल जुलकर उन्हें घसीट ले जाते हैं और जमीन में गाड़कर बाँध की इतनी मजबूत नींव रखते हैं जिस पर पत्थर लकड़ी आदि जमाते हुए बाँध को नदी की सतह से 12 फुट ऊँचा तक ले जाया जा सके। यह बाँध 500 फुट तक लम्बे पाये गये हैं और इतने मजबूत देखे गये हैं कि नदी का पानी टकराकर उन्हें हिला न सके वरन् तिरछा वापस लौटने लगे। एक बाँध में दर्जनों बीवर परिवार रहते हैं। मध्य यूरोप में नदी तटों पर पाया जाने वाला यह छोटा सा जन्तु अपनी श्रमशीलता, सूझ बूझ के कारण मनुष्यों के लिए भी आदर्श बन गया है और बड़े अपने से छोटों को उसका उदाहरण देकर उत्साहित करते हैं।
रूस के समीपवर्ती समुद्र क्षेत्रों में पाई जाने वाली डाल्फिन मछली प्राकृतिक ऐसी है जिसे मनुष्य के साथ दोस्ती करना बहुत सुहाता है। उसे थोड़ी भी ट्रेनिंग देकर पालतू बनाया जा सकता है। वह हाथ से दिये हुए बिस्किट पाने के लिए बार बार लपक कर आती है और तब तक देने वाले के इर्द-गिर्द फिरती रहती है जब तक कि वह निराश नहीं हो जाती या किसी दूसरे द्वारा बुला नहीं ली जाती। पालतू कुत्ते या बिल्ली की तरह वह नाम लेने पर पानी से निकलकर ऊपर आ जाती है और अपनी उपस्थिति का परिचय देती है। थोड़े दिन की शिक्षा पाकर वह हलके फुलके आदमियों तथा बच्चों को अपनी पीठ पर बिठाकर पूरे तालाब का इस सधे हुए ढंग से चक्कर लगाती है जिससे सवार को गिरने का खतरा न उठाना पड़े। वह कुछ शब्दों का अर्थ भी समझ लेती है और इशारों के आधार पर अपनी गतिविधियों में हेर फेर करती है।
इंग्लैण्ड के प्लीमथ अस्पताल में मनुष्य धावकों के स्थान पर कबूतर कर्मचारी भर्ती ओर प्रशिक्षित किये गये हैं। इस अस्पताल की रक्त परीक्षण प्रयोगशाला कई मील दूर है। वहाँ तक पहुँचने और रिपोर्ट लाने में काफी समय लगता है तथा खर्च पड़ता था। अब वह कार्य प्रशिक्षित कबूतर करने लगे हैं। उन्हें अस्पताल से सीधे प्रयोगशाला तक उड़ने की शिक्षा दी गई है। पैर में जाँच के रक्त की छोटी थैली बाँध देने पर वे सीधे प्रयोगशाला पहुँचते हैं। डाक्टर उस थैली की जाँच पड़ताल करके रिपोर्ट टेलीफोन से अस्पताल कार्यालय को बता देते हैं। इस योजना से समय तथा पैसे की बहुत बचत होने लगी है।
कबूतरों को वस्तुओं में से खरी खोटी काटने का काम बड़ी आसानी से सिखाया जा सकता है। कैपसूलों, बीजों, बाल बेयरिंगों में से जो निर्धारित मापदण्ड में घटिया या खराब होता है उसे वे चुन-चुनकर अलग रखते रहते हैं। अमेरिका के वाल्टररिच ने इस दिशा में चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत किये हैं। वे कबूतरों से यान्त्रिक खराबियाँ तलाश कर लेने में उनकी मौलिक क्षमताओं का उपयोग करने की सफलता में बहुत आशावान् हैं।
जासूसों के कामों में उनका बहुत उपयोग है। छोटे कैमरे और टेप रिकार्डर उन्हीं के जैसे रंग के बनाकर इस प्रकार बाँध दिये जाते हैं कि किसी को उनके साथ इन उपकरणों के होने का सन्देह तक न हो। शत्रु क्षेत्रों में जाकर आवश्यक जानकारियाँ संग्रह करके लाने में उनके द्वारा अच्छी भूमिका निभाये जाने की आशा की जा रही है। उसके लिए आवश्यक उपकरण बनाये जा रहे हैं।
मास्को का समाचार है कि सीसिया क्षेत्र के एक गड़रिये का पालतू सारस उसके भेड़ बाड़े की पूरी तरह चौकीदारी रखवाली करता है। जब भेड़ें बाड़े में होती हैं तो वह दरवाजे पर पहरा लगाता है। कोई भेड़ बाहर जाना चाहती है तो उसे पंख पसार के रोकता है और चोंच से धकेलकर भीतर खदेड़ता है। दिन भर वहीं रहता है जहाँ भेड़ें चरती हैं। कोई खतरा देखता है तो चिल्लाकर सावधान करता है। जब उसे सोना होता है तब भेड़ों के साथ ही सोता है। इस सारस को गड़रिये ने घायल अवस्था में एक पहाड़ी पर पड़ा पाया था और उसे घर लाकर पाल लिया था।
मलेशिया में बन्दरों द्वारा ऊँचे पेड़ों पर चढ़कर नारियल, सुपाड़ी, खजूर, तोड़ने का प्रशिक्षण बहुत सफल हुआ है। मनुष्य की तुलना में उनका कार्य जल्दी भी होता है और सही भी। साथ ही उनके श्रम का मूल्य मात्र मन पसन्द आहार देने से ही काम चल जाता है। जबकि उन कामों के करने वाले मनुष्य का वेतन कई गुना अधिक होता है।
वानर जाति के कई वर्ग ऐसे हैं जिनमें सूझ बूझ और अनुशासन का अभ्यास करना सरल है। इनमें से चिंपांजी वनमानुष और बस्तियों में पले बन्दर अधिक उपयोगी पाये गये हैं। डा. मार्केल आन्द्रे चिंपांजियों को इस योग्य बनाने में लगे हुए हैं कि वे होटलों में सेवा कर्मचारियों का काम कर सकें और आगन्तुकों के लिए कौतूहल मनोरंजन का माध्यम बन सकें। सामान्य दफ्तरों और कारखानों में भी हलके फुलके काम कर सकते हैं और श्रमिकों जैसी ड्यूटी देते रह सकते हैं। चौकीदारी के लिए भी उन्हें प्रयुक्त किया जा सकता है।
झज्जर (जिला रोहतक) में एक साँड़ बन्दर को अपनी पीठ पर बिठाये-बिठाये फिरता है और बन्दर जो कुछ यहाँ-वहाँ से छीन झपटकर लाता है उसका एक हिस्सा बैल को खिलता है। बैल को छेड़ने पर बन्दर और बन्दर को छेड़ने पर बैल हिमायत लेता है और उसे दूर तक खदेड़ने में दोनों साथ-साथ चलते हैं। इस दोस्ती का दृश्य देखने के लिए स्थानीय तथा बाहर के लोगों की भीड़ पीछे पीछे लगी रहती है।
मेरठ में एक बन्दर को शराब का ऐसा चस्का लगा है कि वह निरन्तर ऐसा अवसर ढूँढ़ने के लिए फिरता रहता है जिसमें उसके हाथ यह पेय लगे। होटलों, शराबखानों के इर्द-गिर्द वह घात लगाये छिपा बैठा रहता है। और जब भी अवसर पाता है बोतल छीनकर पेड़ पर जा चढ़ता है और देखते देखते गटक जाता है। नशे में उन्मत्त होकर अभी किसी पर हमला तो नहीं किया पर उसकी उछल कूद और मुखाकृति देखते ही बनती है। यह चस्का उसे एक बार कहीं से खुली शराब प्राप्त कर लेने और उसका स्वाद चख लेने तथा मस्ती का मजा लूट लेने के बाद लग गया मालूम देता है।
मोदी नगर (मेरठ) से 11 किलोमीटर द्वार मुरादपुर पुर्सी गाँव में प्रायः आधा दर्जन डकैतों ने मूलचन्द्र वैश्य के घर पर हमला किया। गृह स्वामी के पुत्र को डकैत पिस्तौल से मारने की धमकी दे रहे थे और धन पूछ रहे थे। उतने में पालतू गाय ने रस्सा तुड़ाकर डकैतों पर हमला बोल दिया। एक को सींगों से वहीं मार दिया और अन्यों ने भागकर अपनी जान बचाई। गाय की यह बहादुरी चर्चा का विषय बनी रही।
बुद्धिमानी केवल मनुष्य के ही हिस्से में नहीं आई। पशु पक्षियों में भी वह क्षमता मौलिक रूप से विद्यमान है। बड़े भाई के नाते मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने छोटे भाइयों की बुद्धिमत्ता विकसित करने का कर्त्तव्य निभायें। इससे अनेकों प्राणियों की उपयोगिता बढ़ेगी तथा मनुष्य भी अपने प्रयत्न का समुचित प्रतिफल उनकी विशेष सहायता के रूप में प्राप्त कर सकेगा।
आकाश ने अपने विशाल अँचल के एक कोने में बैठी मक्खी जैसी पृथ्वी पर नजर डाली और दोनों के मध्यान्तर को देखते हुए हँस पड़े।
पृथ्वी तात्पर्य समझ गई। उसने विनयनत् होकर कहा “दैव ! आपके विशाल अँचल में बैठकर भी तुच्छता के कारण उपहासास्पद क्यों बनी ? आपसे पृथक कैसे समझी गई।” आकाश ने अपनों को बिराने की तरह देखने में भूल समझी और उसे तुरन्त सुधार लिया।
मनुष्य को दृश्यमान समर्थता उसके कायकलेवर के अंतर्गत उसी परिधि में काम करती हुई दीखती है। पर वस्तुतः उसका क्षेत्र इतना सीमित है नहीं, वह समीपवर्ती क्षेत्र में बाहर भी विद्यमान रहती है और संपर्क में आने वाले वातावरण को भी प्रभावित करती है। सान्निध्य में आने वाले व्यक्तियों को भी प्रभावित करती है।
शरीरगत क्षमता का क्रिया कलाप किसी भी रूप में दृष्टिगोचर क्यों न होता हो, वस्तुतः वह विद्युत प्रवाह के रूप में होता है। नस नाड़ियाँ उसी के आधार पर अपना रक्त संचार क्रम जारी रखती हैं। ज्ञानतन्तु उसी के सहारे मस्तिष्क के साथ विभिन्न अंग अवयवों का सम्बन्ध जोड़े रहते हैं। माँस पेशियों का आकुँचन प्रकुंचन उसी के सहारे गतिशील रहता है। निद्रा और जागृति में भी उसी की भूमिका रहती है।
इसी जीवन्त विद्युत को अध्यात्म भाषा में प्राणशक्ति कहा जाता है। शरीरधारियों की शारीरिक मानसिक हलचलों में इसी की प्रधानता रहने से उन्हें प्राणी कहा जाता है। जिससे इसकी अधिकता होती है उन्हें प्राणवान और न्यूनता वालों के अल्प प्राण कहते हैं। कई बार बातचीत में इस न्यूनता का अत्युक्तिपूर्ण दोषारोपण किसी को निष्प्राण कहकर भी किया जाता है। वस्तुतः जीवधारियों की वास्तविक एवं आन्तरिक समर्थता इसी क्षमता के आधार पर दृष्टिगोचर होती है। कइयों के कायकलेवर भैंसे जैसे सुदृढ़ और विशाल भी होते हैं पर अल्प प्राण होने के कारण उनका पुरुषार्थ नगण्य रहता है जबकि उससे कहीं छोटे आकार का चीता दौड़ने उछलने और वजन ढोने में असाधारण सामर्थ्य का परिचय देता है।
यो प्राण अदृश्य है। उसे आमतौर से खुली आँखों नहीं देखा जा सकता। तो भी अब सूक्ष्मदर्शी उपकरणों से यह सम्भव हो गया है कि उसका अस्तित्व शरीर के बाहर भी देखा जा सके। उसे आभा मण्डल या तेजोवलय कहते हैं। यही है वह विद्युत अंश जो संपर्क में आने वाले अन्यान्य प्राणियों तथा पदार्थों को आकर्षित प्रभावित करता रहता है। शरीर के भीतर काम करने वाली इस बिजली को भी अवयवों की हलचलों में तीव्रता न्यूनता देखकर जाना जा सकता है। यों इससे रहित तो कोई भी प्राणी नहीं रहता, पर उसकी न्यूनाधिकता के आधार पर स्फूर्ति, तत्परता क्रियाशीलता एवं क्षमता में अन्तर तो बना ही रहता है।
अब इस आभा मण्डल को भी प्राणी की समर्थता का मूल्याँकन करते समय जाना जाने लगा है और यह भी विचार होता है कि इसे किस प्रकार बढ़ा या घटा कर सन्तुलित स्तर पर लाया जाय। सामान्य स्वस्थता और समर्थता के लिए आवश्यक है कि यह विद्युत संतुलन हर किसी में सही स्तर का बना रहे। विशिष्ट प्रयोजनों के लिए इसे बढ़ाने या घटाने की बात भी सोची जाती है। समाधि, तन्द्रा एवं शान्ति, विश्रांति के लिए उसकी न्यूनता अपेक्षित होती है। जबकि दुस्साहसी पराक्रमों के लिए उसे कहीं अधिक मात्रा में बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। अब इस संदर्भ में अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया जा रहा है और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भौतिक स्तर का अनुसंधान क्रम भी चल रहा है। अध्यात्मवादी तो आरम्भ से इसे खोजने और आवश्यकतानुसार घटाने बटाने की कुशलता प्राप्त करने के लिए साधना स्तर के विभिन्न प्रयोग करते रहे हैं।
मानवीय प्रभा मण्डल की जानकारी अति प्राचीन काल से चली आ रही है। यह एक प्रकाश पुँज के रूप में मनुष्य के शरीर को ढके रहता है। इजीप्ट, भारत, ग्रीस और रोम में इसे धार्मिक मान्यताएँ प्राप्त हैं और प्रत्येक धार्मिक मूर्तियों में इसका प्रदर्शन भी किया जात है।
प्रभा मण्डल का स्वरूप प्रत्येक मनुष्य में भिन्न-भिन्न रंगों व विशेषताओं का पाया जाता है। यह भिन्नता उनके स्वास्थ्य, भावना व धार्मिक मान्यताओं के ऊपर आधारित होती है। एक महान दार्शनिक स्वीडेनबोर्ग ने अपनी “स्प्रिचुअल डायरी” में लिखा है कि “प्रत्येक मनुष्य को चारों और एक अध्यात्मिक प्राकृतिक व शारीरिक प्रभा मण्डल का घेरा विद्यमान होता है।”
इंग्लैण्ड के डा. वाल्टर जॉन किल्नर ने अपने अथक प्रयास से इस मानवीय प्रभा मण्डल की वास्तविकता को जन-सामान्य के लिए सुलभ बनाने में सफलता प्राप्त की है। उन्होंने 1908 ई. में डिक्यानिन (अलकतरा रंग) द्रव्य के उपयोग से इसे प्रयोग द्वारा सिद्ध करने का भी प्रयास किया। कई प्रयोगों में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त उन्होंने अपनी उपलब्धि को 1911 में दी ह्युमन एटमोसफेयर” नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। उनके इस प्रयोगों को कई विवाद का भी समाना करना पड़ा, परन्तु इसके बावजूद भी डा. किल्नर ने अपना प्रयोग अन्ततः जारी रखा। उन्होंने अपने प्रयोग के अंतर्गत रोग लक्षण को भी ज्ञात का कार्य आरम्भ किया और उन्होंने इस कार्य में सफलता भी पाई। उनके इस अद्भुत प्रयोग की जानकारी अभी जन-सामान्य को मिल भी नहीं पाई थी। कि 23 जून 1920 को 73 वर्ष की उम्र में उनका देहान्त हो गया।
आगे चलकर उनके इन प्रयोग को एक ब्रिटिश अध्यात्मवादी मिस्टर हैरी बोडिंगटन ने और आगे बढ़ाया। किल्नर ने प्रभा मण्डल को देखने के लिए एक संकुचित बॉक्स की सहायता ली थी जिसकी दीवारें शीशे की बनी थी और उससे अलकतरा रंग का अल्कोहलिक घोल रखा था। परन्तु इसमें कुछ कठिनाइयाँ थीं क्योंकि अत्यधिक रंग की आवश्यकता पड़ती जो अत्यन्त ही महंगा पड़ता था, साथ ही इसकी दीवारों से देखने में अति कठिनाई होती थी। अतः बोडिंगटन से एक रंगीन चश्मे का प्रयोग आरम्भ किया जो दोहरे शीशे का बना था और उसके बीच अलकतरे का घोल रखा रहता था। अतः इसमें इस खर्चीले द्रव्य की बहुत की कम आवश्यकता पड़ती थी। इसके पश्चात् 1937 में प. जर्मनी के ओश्कर बैगनल ने किल्नर के प्रयोग को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया और इस पर उन्होंने एक पुस्तक “दी आरिजिन एण्ड प्रोपर्टिज ऑफ दी ह्युमन आरा” भी लिख डाली। बैगनल ने अपने प्रयोगों में डिक्यानिल की अपेक्षा एक अन्य अलकतरा रंग “पिनै सियानोल’ का प्रयोग किया था जो अत्यन्त सस्ता था।
वर्तमान में इंग्लैण्ड के मैटाफिजिकल रिचर्ड ग्रुप के वैज्ञानिक मिस्टर जे. जे. विलियमसन ने किल्नर, बोडिंगटन और बैगनल के प्रयोगों का समन्वयात्मक परीक्षण व प्रयोग किया है। डा. डब्ल्यू. इ. बेनहम, जो कि एक आधुनिक रेडिएस्थेटिस्ट हैं, ने तो यह बतलाया है कि कीड़ों के भी प्रभा मण्डल होते हैं जिसे प्रयोग द्वारा देखा जा सकता है, उदाहरण स्वरूप मधुमक्खी का 20 फीट लम्बा प्रभा मण्डल दृष्टिगोचर हुआ है। अब इससे हाइ वोल्टेज स्रोतों द्वारा स्पष्ट फोटो ग्राम भी खींचे जाने लगे हैं।
डा. किल्नर की शोधें इस संदर्भ में प्रख्यात है। वे किसी का भी प्रभा मण्डल देखकर यह बता सकते हैं कि उसकी जीवनी शक्ति एवं मानसिक क्षमता का स्तर क्या है। इस आधार पर किसी के पराक्रम एवं आयुष्य का भी पता चला सकता है। साथ ही स्वभाव एवं उपयोग के सम्बन्ध में भी ऐसा कुछ निर्धारण किया जा सकता है जिसके सहारे कि उसके लिए ऐसे उपयुक्त कार्य का चुनाव किया जा सके जो सरलता के साथ बन पड़े । डा. क्लिचर उन उपायों की खोज निकालने के लिए भी प्रयत्नशील हैं जिससे इस प्राण विद्युत का अनुपात घटाने बढ़ाने की विधि हस्तगत करके किसी को भी अधिक समर्थ या असमर्थ बनाया जा सके। जिस प्रकार रक्त की शुद्धता, मात्रा एवं गतिशीलता पर स्वस्थता निर्भर रहती है ठीक उसी प्रकार आभा मण्डल की स्थिति का भी महत्व है।
यह तेजोवलय प्रकृति क्षेत्र में कहाँ से उपलब्ध होता है। इसकी खोज करते करते वैज्ञानिकों ने इस समूची पृथ्वी को ही एक पदार्थ शरीर कहा है और उससे एक विशिष्ट आभा मण्डल बाहर निकलते देखा है सूर्य किरणों से तो चमकता ही है। इसके अतिरिक्त उसमें निजी चुम्बकत्व और प्रकाश भी है। वह भीतर भी है और बाहर भी। इसे भूमण्डल का प्राण कहा जा सकता है। यदि यह उबलने लगे तो विस्फोटक स्थिति उत्पन्न होगी और गिरने घटने लगे तो उर्वरता समाप्त होने अथवा हिम युग पहुँचने जैसी स्थिति बनेगी। पृथ्वी की अनेकानेक अदृश्य परिस्थितियों में समय समय पर उतार चढ़ाव आते रहते हैं उसके लिए इस भू चुंबकत्व अथवा तेजोवलय को उत्तरदायी माना जाने लगा है।
पृथ्वी वस्तुतः एक विशाल स्थायी चुम्बक है। इसका चुम्बकीय क्षेत्र कहीं कम, तो कहीं पर सबसे ज्यादा है। भू-चुंबकीय क्षेत्र का प्रभाव आकाश में कई किलोमीटर दूर तक फैला हुआ है। ये चुम्बकीय क्षेत्र सूर्य और अन्य ग्रहों से आने वाले आकाशीय विकिरण कणों को अपनी ओर खींचते रहते हैं। वैज्ञानिकों, इंजीनियरों को पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की जानकारी रहने पर खनन कर्म के पूर्वेक्षण में पर्याप्त सहायता मिलती है। लौह अयस्क (आयरन ओर के चारों तरफ एकत्र अन्य तत्वों जैसे एस्वस्टस, सल्फर, लेड, क्रोमियम, तेल और गैस तथा अन्य धातुओं की खोज में भू चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव का मापन उपयोगी सिद्ध हुआ।
वैज्ञानिकों का अभिमत है कि चुम्बकीय क्षेत्र का प्रभाव पृथ्वी के हर स्थान पर बदलता रहता है। किसी किसी स्थान पर प्रतिदिन तो अन्यत्र स्थानों पर वार्षिक चुम्बकीय परिवर्तन होता रहता है। प्रतिदिन होने वाले परिवर्तन बहुत छोटे होते हैं परन्तु जब कभी अचानक ज्यादा परिवर्तन होता है चुम्बकीय तूफान उठ खड़े होते हैं जिसका प्रभाव समस्त भू-मण्डल पर पड़ता है।
भू-चुंबकीय क्षेत्र के प्रभावों के अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि मनुष्य पर भी इस क्षेत्र का प्रभाव पड़ता है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने अपने विभिन्न प्रयोग परीक्षणों के आधार पर इस बात की पुष्टिकरण की है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में होने वाले तीव्रगामी परिवर्तन से हृदय और मस्तिष्क के विद्युतीय क्रिया-कलापों में आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। कमजोर मन स्थिति वाले व्यक्तियों पर इस परिवर्तन का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है।
जलवायु के आधार पर किन्हीं क्षेत्रों को स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त अनुपयुक्त माना जाता रहा है अब इस शृंखला में एक कड़ी और जुड़ती है कि पृथ्वी की भू चुम्बकीय तेजोवलय आभा के अनुरूप भी मनुष्य की स्वस्थता, समर्थता अविज्ञात प्रभाव पड़ने रहते हैं। अस्तु विशेष महत्वपूर्ण कार्यों के लिए तद्नुरूप स्थान चयन करते समय अब न केवल स्थानीय सुविधा साधनों का महत्व माना जाता है वरन् यह भी खोजा जाता है कि किस क्षेत्र में भू-चुम्बकत्व की स्थिति क्या है ?
व्यक्तित्व के उच्चस्तरीय विकास में हिमालय एवं गंगा हर क्षेत्र की धरातल प्रखरता को उपयुक्त माना जाता रहा है। इसी प्रकार महाप्राण ऋषि तपस्वियों के सान्निध्य में न केवल उनके परामर्श का वरन् तेजोवलय का भी लाभ मिलता है। इस संदर्भ में ऋषि आश्रमों में सिंह गाय का एक घाट पानी पीना एक उपयुक्त उदाहरण है। ये सारे प्रसंग वातावरण में संव्याप्त चुम्बकीय तेजोवलय की महत्ता बताते हैं, जिसे बढ़ाकर व्यक्ति सामर्थ्य सम्पन्न बन सकता है।
महर्षि धोम्य के गुरुकुल में पाठ्यक्रम के साथ सदाशयता और अनुशासन भी सिखाया जाता था। एवं दिन मूसलाधार वर्षा हुई। आश्रम के खेत की मेड़ टूट गई थी। गुरु ने खेत का पानी रोकने के लिये एक शिष्य आरुणी को भेजा। उसने अपनी बुद्धि और मेहनत से सब कुछ किया पर पानी रुका नहीं तो वे उस स्थान पर स्वयं लेट गये जहाँ से पानी बह रहा था।
बहुत देर हो गई तो महर्षि विद्यार्थी की तलाश करने स्वयं निकले। देखा तो आरुणी मेड़ का पानी रोकने के लिए स्वयं लेटा हुआ था।
ऋषि ने तत्काल पानी बन्द किया। आरुणी को उठाकर छाती से लगा लिया। बोले- कर्तव्य परायणों की विद्या ही सार्थक होती है। सच्चा लाभ उन्हीं को मिलता है।
मनुष्य के भीतर असीम क्षमताओं का भण्डार भरा पड़ा है। उसकी संरचना ऐसे तत्वों से हुई है कि असम्भव को सम्भव कर दिखाने वाले पराक्रम कर सकता है। प्रश्न एक ही है कि उस विशिष्टता का उपयोग किस प्रयोजन के लिए किया जाय।
साधारण व्यक्ति इस शक्ति भण्डार को वासना तृष्णा की पूर्ति के लिए नियोजित करता रहता है। प्रश्न निर्वाह का नहीं, महत्वाकाँक्षाओं की ललक का है। निर्वाह तो सभी प्राणी अपने अनगढ़ शरीर और नगण्य से साधनों द्वारा भी समय एवं परिश्रम से चला लेते हैं। फिर मनुष्य की शारीरिक, मानसिक संरचना तो ऐसी है, जिसके द्वारा किया गया कुछ घण्टे का परिश्रम ही जीवन यात्रा के आवश्यक साधन जुटाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। जिसकी पूर्ति नहीं हो जाती वह ललक लिप्सा की गहरी खाई ही है जिसे उचित अनुचित सभी उपायों से पाटने में अहिर्निशि निरत रहने पर भी काम नहीं चलता। अभाव निरन्तर खटकता ही रहता है।
श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी क्षमताओं के आदर्शवादी प्रयोजनों के लिए नियोजित करते हैं और लोक-कल्याण के साथ-साथ आत्म-कल्याण में भी आशातीत सफलता प्राप्त करते हैं। ऋषि-मनीषियों की - सन्त सुधारक शहीदों की - महामानवों की दिशाधारा ऐसी ही होती है। हाथ पैर सभी के एक से हैं। मस्तिष्कीय विस्तार भी प्रायः एक जैसा ही है, पर यह दृष्टिकोण का ही चमत्कार है कि जहाँ सामान्य जन पेट प्रजनन मात्र के क्षेत्र में भी अभावग्रस्त और अतृप्त बने रहते हैं वहाँ उत्कृष्टता अपनाने वाले उतने ही समय साधनों में ऐसा कुछ कर गुजरते हैं जिनका अनन्त काल तक स्मरण किया जाता रहे। पेट तो उनका भी भरता है परिवार तो उनका भी पलता है।
दृष्टिकोण में निकृष्टता भर जाने पर मनुष्य कितना क्रूर और पतित हो सकता है इसका भी एक रोमाँचकारी अध्याय है। अकेला यदि आतंक में रस लेने लगे, सताने में विनोद खोजने लगे विनाश को ही पराक्रम मानने लगे तो व्यक्तित्व के इसी काया में रहते हुए भी पिशाच बनते देर नहीं लगती है। वह ऐसे कुकृत्य भी करता रह सकता है जिस पर निर्लज्जता को भी लज्जा आने लगे। इतिहास में ऐसे क्रूर कर्माओं के अनाचार भी उपलब्ध होते हैं जिनके स्मरण से रोमाँच हो उठते हैं।
पन्द्रहवीं सदी के ट्रासिलवानिया पहाड़ी क्षेत्र का शासक ड्राक्युला अपनी हृदय विदारक नादिरशाही के लिए इतिहास प्रसिद्ध था। इतिहासकारों ने उसे विश्व का सर्वाधिक क्रूर शासक माना तथा नर-पिशाच की संज्ञा दी। अपने मनोरंजन के लिए ड्राक्युला नवजात शिशुओं को मारकर उनकी माताओं के सीने में जुड़वा देता था। अनेकों बार तो माता-पिता को अपने ही बच्चे का माँस खाने को मजदूर कर देता। गाँवों में बाल-वृद्ध, नर-नारियों सहित आग लगवा देना, अपराधियों को पेड़ों पर फाँसी चढ़वा देना, ड्राक्युला के दरबार में चारों ओर लाशें टंगी रहती थीं। एक बार उसके मन्त्री ने निवेदन किया कि लाशों को कहीं अन्यत्र टंगवाया जाय, क्योंकि उनसे असह्य बदबू आती है। इस पर ड्राक्युला ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि इसे भी एक खूँटे पर थोड़ी ऊँचाई पर जिन्दा ठोस दिया जाय। गलती के लिए क्षमा याचना करने के बावजूद भी उस कठोर का पाषाण-हृदय पिघला नहीं। उसने अपने जीवन में कितने व्यक्ति इसी क्रूर तरीके से मारे, इसकी कोई गिनती नहीं। उसका स्वयं का अन्त भी ऐसे ही वीभत्स ढंग से हुआ।
पन्द्रहवीं शताब्दी में तुर्की के सुल्तान मोहम्मद द्वितीय ने अरब और मिस्र के नगरों में ऐसा कत्लेआम मचाया, कि नगरों की गलियाँ लाशों से पट गईं। ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में भी इनकी उसमानी जातियाँ फैली हुई थीं और अपनी निर्दयता के लिए प्रसिद्ध थीं। फैली हुई थीं और अपनी निर्दयता के लिए प्रसिद्ध थीं। मान्यता है कि गुलामी प्रथा का आरम्भ इन्हीं के द्वारा किया गया। मुहम्मद तुगलक के विषय में कहा जाता है, कि उनके अत्याचार से पीड़ित होकर लोग अपने घर-द्वारा त्यागकर जंगलों में छिपने लगे। सल्तनत काल में नृशंसता निर्दयता चरम सीमा पर थी। दूसरी ओर आतंकवादियों ने अपना कुचक्र अलग फैला रखा था। अपने भोग-विलास के लिए बड़े से बड़ा कुकृत्य करने में कुछ भी उठा नहीं रखा था। मुगलकाल के कई शासकों एवं मंचूरियन शासक चंगेज खाँ से सम्बन्धित ऐसे अनेकों प्रसंगों का विवरण मिलता है जिसमें क्रूरतम अत्याचार किये गए।
मेसेच्युसेट्स निवासी कुर्टेन बचपन से ही अपराधी प्रवृत्ति का था, अपराध कर्म करते-करते उसका सम्बन्ध अपराधियों के संगठन से हो गया। अपराधी दल के सरदार ने उसके जघन्य अपराध करने की चरम सीमा की परीक्षण लेनी चाही, जो उसने एक अबोध जीवित बालक को नदी की वेगवती धार में फेंक कर दिया। दूसरा बालक बहते बालक को बचाने दौड़ा तो उसे भी झपटकर कुर्टेन ने डुबो दिया। उसका आतंक बढ़ने लगा। हत्या उसका व्यसन बन गया। अब वह रक्त पिपासु की भूमिका निबाहने लगा। तड़पते बच्चों को देखकर खुशी से नाच उठता। बालक न मिलने पर भेड़, कुत्ते, बकरी के बच्चों पर यही प्रयोग करता। बीस बरस तक वह क्रूर कर्म करते-करते थका नहीं अन्त में पकड़े जाने पर फाँसी पर लटकना पड़ा।
हंगरी के ‘सील्वेस्टर मटुस्का’ को नर पिशाच के रूप में जाना जाता है। वह एक प्रख्यात कम्पनी का मालिक था, अपार धन और वैभव के रहते भी उसकी पिशाच वृत्ति इसी में आनन्द पाती कि लोगों को तड़पाकर मारा जाय, उजाड़ा जाय घायल और अपंग बना दिया जाय। उसे रेल दुर्घटनाएँ कराने, लोगों को आहत होते देखकर बहुत हर्ष होता था। उसने अपने जीवनकाल में अनेकों दुर्घटनाएँ कराई। हजारों मौत के मुँह में धकेले, बेसहारे और अनाथ बनाए। अन्त में एक दुर्घटना कराते समय पकड़ा गया और फाँसी पर लटका दिया गया।
रोम सम्राट नीरो को भी नर पिशाचों की श्रेणी में रक्खा जाता है यह नृशंसता उसे अपनी माँ से मिली। रोम की गद्दी हाथ लगते ही नीरो के कुसंस्कारों को जैसे खाद पानी मिला गया हो। निरपराधों तक को तड़पाकर मार डालने में उसे आनन्द आता। नीरो की गणना अधपगले, सनकी शासकों में की जाती है। उसकी आज्ञा की अवहेलना सीधे मृत्यु का ग्रास बनने को मजबूर करती। अजीब सनक सवार हुई उसके सर पर, मेरे बाद रोम का कोई शासक ही बन पावे। अतः आदेश दिया कि रोम नगर को जलाकर नष्ट कर दिया जाय। नो दिन तक अनवरत अग्निकाण्ड होता रहा। अबला, बाल-वृद्ध, सम्पत्ति सहित जलाकर खाक कर दिये गये। कहा जाता है रोम सम्राट् शहर की ऊंची मीनार पर बैठकर नृशंस अग्निकाण्ड हत्याकाण्ड देखता रहा।
मिस्र के पिरामिडों के साथ भी ऐसा ही रक्तरंजित इतिहास जुड़ा हुआ है। मिस्र के शासक फराहो की मृत्यु के पश्चात् उसकी कब्र में बहुमूल्य वस्तुएँ, हाथी, घोड़े, असंख्यों नौकर, दासियाँ, दफनाए गये। जीवित दास-दासियों को इसलिए गाड़ दिया जाता, क्योंकि तत्कालीन लोगों की मान्यता थी कि मरणोपरान्त भी ये नौकर-नौकरानियाँ राजा की सेवा कर सकेंगे। बर्बरतापूर्ण यह अमानवीय घटना मात्र करोड़ों तक ही सीमित नहीं रही, वरन् यह प्रक्रिया लम्बे काल तक तत्कालीन मिस्र में चलती रही, और हजारों निरीह निष्ठुरता के कोप भाजन बने।
मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने राज्यकाल में लगान दस गुना- बीस गुना कर दिया था। लगान के अलावा भी अतिरिक्त कर लगाये थे। परेशान होकर लोगों ने अनाज के खलिहानों को जला डाला और मवेशियों को घर से निकाल दिया। दस-दस बीस के मण्डल बनाकर उन्होंने गाँव छोड़कर जंगलों व तालाब के किनारे शरण ली। इस पर सुल्तान लश्कर लेकर दोआव पर चढ़ आया। मृतकों के खलिहान लग गये। खून की नदियाँ बह गयीं। जानवरों की तरह लोगों की चुन-चुनकर मारा गया। सल्तनत काल में जहाँ एक ओर नृशंसता निर्दयता दृष्टिगोचर होती है, वहीं दूसरी ओर अय्याशी का आभास भी मिलता है। अमीर खुसरो ने लिखा है कि उस काल में जब कोई नई इमारत बनायी जाती थी तो उसे खून से धोया जाता। अलाउद्दीन ने अपनी इमारतों के उद्घाटन पर हजारों बकरे जैसी दाढ़ी वाले मुगलों का वध कराया। मुहम्मद-बिन-तुगलक के द्वार पर हत्यारे लोग मारते-मारते तंग हो जाते और तीन-तीन दिन तक लाशों के ढेर सड़ते रहते थे। मात्र अन्य जाति के काफिर कहे जाने वाले ही नहीं, मुसलमान भी उसकी नृशंसता के शिकार हुए।
यह कुछ उदाहरण हैं जिनसे इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि मनुष्य का मन कोरे कागज की तरह है जिस पर कुछ भी भला-बुरा लिखा जा सकता है। वह गीली मिट्टी की तरह भी है जिसे किसी भी ढाँचे में ढाला और उसको कोई भी खिलौना बनाया जा सकता है।
सन्त सज्जनों को बाह्य वातावरण और आन्तरिक सुसंस्कार संवर्धन के सहारे जहाँ अपने को ऊँचा उठाते हुए असंख्यों का कल्याणकारी मार्गदर्शन कर सकना सम्भव हुआ है वहाँ दुर्जनों की प्रवृत्ति दृष्टता के ढाँचे में इन्हीं कारणों के आधार पर ढलने में भी देर नहीं लगी है। मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह जैसे संपर्क में रहता है जैसा कुछ सोचता है वैसा ही स्वभाव बनाता और कृत्य करने लगता है। इसलिए जहाँ मनुष्य की निजी संरचना को महत्व दिया जाता रहा है वहाँ वह भी कहा गया है कि वातावरण, संपर्क एवं दिशा निर्धारण करने वाले अन्यान्य कारणों की महत्ता भी कम नहीं है।
मनुष्य जीवन जिस प्रकार ईश्वर प्रदत्त सर्वोपरि है, वहाँ संसार क्षेत्र का सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि उसे उत्कृष्टता के प्रगति पथ पर बढ़ते चलने वाला सुयोग भी मिले। इसके लिए हर व्यक्ति के निजी जीवन में तथा संपर्क समुदाय में यह प्रयत्न करना चाहिए कि अन्न वस्त्र की तरह शालीनता के वातावरण में साँस लेने का भी अवसर मिले। अन्यथा विषैली साँस लेने पर जिस तरह दम घुट जाता है उसी प्रकार अवाँछनीय मार्ग सामने रहने पर मनुष्य आत्म-हनन और पैशाचिक कृत्यों पर उतारू होने जैसे अनर्थ करने में भी प्रेत पिशाचों से पीछे नहीं रहता।
भस्मासुर ने तप तो किया पर आत्म-शोधन पर ध्यान नहीं दिया।
तप से प्रसन्न आशुतोष ने वरदान माँगने के लिए कहा ता उसने माँगा-“जिसके भी सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाय। दुष्टताग्रस्त मानस विनाश के अतिरिक्त सोचेगा भी क्या ? चाहेगा भी क्या ? वरदान मिल गया।”
भस्मासुर ने उस उपलब्धि का तत्काल चमत्कार चाहा और नीति अनीति को ताक पर रख दिया। पार्वती को पत्नी बनाने के लिए विवश करने लगा। शिवजी के सिर पर हाथ रखकर उन्हें ही भस्म करने की धमकी देने लगा। वरदान जो मिल गया था, उसे।
शिवजी पार्वती समेत भागे। विष्णु लोक रक्षा के लिए पहुँचे। कुपात्र को वरदान देने के लिए उनकी प्रताड़ना भी हुई पर सहायता के लिए विष्णु भगवान तैयार हो गये।
विष्णु ने पार्वती का रूप बनाया। भस्मासुर से बोली- “शिव जैसा नृत्य करके दिखाये तो आपके साथ विवाह करूं।”
भस्मासुर मोहग्रस्त होकर नृत्य करने लगा और अपने सिर पर हाथ रख जाने से जलकर भस्म हो गया।
देवताओं ने प्रजापति से पूछा- “तपस्वी की ऐसी दुर्गति क्यों हुई ? प्रजापति ने कहा पराक्रम का प्रतिफल तो मिलता है, पर उससे सही लाभ उठा सकना मात्र उन्हीं के लिए सम्भव है जो दूरदर्शी और चरित्रवान हैं।”
समर्थता कितनी है बढ़ी - चढ़ी क्यों न हो पर यदि वह भटकाव एवं बिखराव के कारण अस्त-व्यस्त होती रहेगी तब उससे कोई कहने लायक प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। प्रकृतिगत शक्तियों के बिखरी रहने पर वे ऐसे ही अस्त-व्यस्त स्थिति में बनी रहती हैं, पर यदि उन्हें केन्द्रित कर दिया जायगा तो आतिशी शीशे द्वारा एकत्रित की गई किरणों की तरह अपनी प्रखरता की परिचय देने लगती हैं। भाप को केन्द्रित करके चलने वाले कई जन और नली में केन्द्रीभूत तनिक-सी बारूद से निशाना बेधने वाले अग्नेयास्त्र यह बताते हैं कि एकत्रीकरण और सुनियोजन के कैसे चमत्कारी परिणाम हो सकते हैं ?
उदाहरण के लिए हर मनुष्य में रहने वाली श्रम शक्ति को लिया जा सकता है वह मात्र निर्वाह उपार्जन भर के काम आती है, किन्तु आदि उसे संगठित और दिशाबद्ध किया जा सके तो इतने बड़े काम सम्पन्न हो सकते हैं जिनकी सम्भावना पर साधारणतः विश्वास भी न किया जा सके।
अब से कोई ढाई हजार वर्ष पूर्व चीन असंगठित और अस्त-व्यस्त स्थिति में था। प्रजाजनों को हूण नामक एक बर्बर जाति के आक्रमणों का शिकार होना पड़ता था। प्रतिरोध योजनाबद्ध न होने से प्रायः असफल रहता और जनसाधारण को धन, जन की भारी क्षति आये दिन उठानी पड़ती।
इस बीच एक विचार उस देश में उभरा कि उत्तरी क्षेत्र में एक मजबूत सुरक्षा दीवार खड़ी की जाय। यह कार्य पीले समुद्र से आरम्भ होकर पेडपिंग होता हुआ मध्य एशिया की गोवी मरुभूमि तक सम्पन्न होना था। शासन के कोष में न इतना धन था और न कर्मचारी कौशल जो इतने विशाल काय निर्माण का साहस कर सके। जन नेताओं ने यह उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाया। प्रस्तावित योजना कार्यान्वित हुई और पत्थरों चट्टानों से बनी 1500 मील लम्बी दीवार के लिए विपुल जन-शक्ति तथा धनशक्ति उपलब्ध होना आरम्भ हो गया। दीवार की ऊँचाई जमीन से 30 फुट ऊँची है। उसके ऊपर बने रास्ते की चौड़ाई 15 फुट है ताकि युद्ध के समय सैन्य दल का आवागमन भली प्रकार होता रहे। उस मार्ग में 100 गज के फासले पर सैनिक बचाव के लिये किले बन्दी जैसी मीनारों का भी निर्माण हुआ है।
पुरातत्व वेत्ताओं का मत है कि इजिप्ट में बना गीजा का विशाल पिरामिड ईसा के 2500 वर्षों पूर्व विनिर्मित हुआ था। उस समय लोगों को चक्का घिरनी आदि तक की जानकारी न थी। पिरामिड के निर्माण में मन्त्रशक्ति का नहीं जनशक्ति का अधिक योगदान है। पिरामिड क्षेत्र लगभग 15 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें चूना, पत्थर व ग्रेनाइट के 23 लाख विशाल खण्ड लगे हैं। दुर्लभ पाषाण खण्डों को ढूंढ़कर लाने में कष्टसाध्य श्रम करना पड़ा क्योंकि भारी प्रस्तर खण्डों को लाने के लिए आज जैसे साधन उन दिनों उपलब्ध नहीं थे। वह कार्य मात्र जन शक्ति के सहयोग से ही सम्भव हो सका।
ग्रीक के राजा खूफू के शासन काल में उसी प्रकार का एक विशाल मकबरा जनसहयोग से बनवाया गया। कहा जाता है कि उस पिरामिड जैसे मकबरे का निर्माण 20 वर्षों में सम्पन्न हुआ तथा निरन्तर एक लाख व्यक्ति उस निर्माण कार्य में संलग्न रहे। पिरामिड की ऊँची गगन-चुम्बी प्रासाद जैसी दूर से ही दृष्टिगोचर होती है। इस निर्माण का कला-कौशल व अन्दर विनिर्मित गुह्य गृह उनमें पहुँचने का मार्ग तथा वायु प्रवेश की सुव्यवस्था बताते हैं कि इन्हें बनाने में मात्र श्रम ही नहीं, कलात्मक बुद्धि का भी भरपूर उपयोग हुआ है।
अमेरिका में न्यूयार्क से सनफ्राँसिस्को केप हार्च का रास्ता उन दिनों 13 हजार मील लम्बा पड़ता था। दो समुद्रों का मिलाने के लिए एक नहर खोदने की योजना बनी और वह संकल्प पनामा नहर के रूप में सन् 1714 में पूर्ण हुआ। अब वह दूरी 13 हजार मील से घटकर मात्र 5 हजार मील रह गई है। स्वेज नगर के निर्माण का इतिहास भी ऐसा ही है जिसने पूर्व और पच्छिम की एक शृंखला में जोड़ने का बहुत बड़ा काम कर दिखाया।
इस कार्य में 16 वर्ष लगे। इसमें सरकारी प्रयासों की तरह प्रचुर जन सहयोग भी नियोजित रहा है। हजारों स्वयं-सेवकों ने नाम मात्र के निर्वाह पर कठोर तम श्रम किया है। 110 डिग्री फारेनहाइट तापमान रहने पर भी उत्साही स्वयं सेवक औसतन 10 घंटा श्रम करने में बिना मुंह मलीन किये निरन्तर जुटे रहे। 1711 के एक दिन का कीर्तिमान 1,66,000 टन मिट्टी तथा पत्थर हटाने का है। जनवरी 1713 में भयंकर भूस्खलन के बावजूद श्रमिकों का इस उत्साह के कचरा साफ करने का परिश्रम भी ऐसा ही है जिसकी तुलना नहीं हो सकती।
श्रम शक्ति की तरह ही भाषाओं और धर्मों की दो सामर्थ्य ऐसी हैं जो मानवी ज्ञान और चरित्र को प्रभावित करने की असाधारण क्षमताओं से सुसम्पन्न है। भाषाओं के आधार पर विचारों का आदान-प्रदान बन पड़ता है और धर्मों का भावनात्मक एकीकरण के साथ सीधा सम्बन्ध है। यदि उनके बीच बिखराव न हो केन्द्रीकरण बन पड़े तो मानवी मस्तिष्क एवं अन्तःकरण को इसका असाधारण लाभ मिल सकता है। भाषाओं की अनेकता यदि दूर हो सके, लोग एक भाषा बोलें व वार्त्तालाप, पत्र-व्यवहार का नया द्वारा खुले और प्रकाशित होने वाला साहित्य देखते-देखते संसार भर से सर्वसुलभ बन पड़े। इतना ही नहीं अधिक संख्या में छपने के कारण सस्ता भी बिके।
एक भाषा में कोई महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाशित हो तो उसका लाभ अन्य भाषा भाषी तभी उठा सकेंगे जब वह अनुदित होकर उस भाषा में भी छप सके। इतना न बन पड़े तो उस ज्ञान का लाभ मात्र उसी भाषा वालों को मिलेगा जिसमें वह प्रकाशित हुआ था। अनेक भाषाओं के अक्षर बनाने-जोड़ने में जो असाधारण व्यय होता तथा झंझट पड़ता है वह एक लिपि का प्रचलन होने पर सहज ही समाप्त हो सकता है। इसके साथ ही संसार के किसी भी क्षेत्र का व्यक्ति कहीं भी जाकर वार्त्तालाप कर सकता है, आदान-प्रदान का क्षर खेल सकता है जब कि अन्य भाषा भाषी क्षेत्रों में जाकर उसे गूँगे बहरे की तरह अपने आपको अपंग असहाय अनुभव करना पड़ता है।
विश्व भर में 2796 भाषाएँ प्रचलित हैं तथा अनेकों प्रकार की बोलियाँ बोली जाती हैं। पाँच अब से भी अधिक विश्व के लोग औसतन 15-15 लाख व्यक्ति एक भाषा के उपयोग कर्त्ता है।
चीनी भाषा के बोलने वाले विश्व में सर्वाधिक हैं, इनकी संख्या 80 करोड़ है। दूसरा स्थान अँग्रेजी भाषा का है। अनुमानतः 35 करोड़ व्यक्ति अंग्रेजी बोलते हैं। 20 करोड़ व्यक्तियों की बोलचाल की भाषा हिन्दी है। लगभग इतनी ही संख्या रूसी भाषा के प्रयोक्ताओं की है। 15 करोड़ व्यक्ति जर्मन और फ्रेंच भाषा में बातचीत करते हैं। स्पेनी भाषा के संपर्क में 20 करोड़ व्यक्ति हैं। लगभग 12 करोड़ व्यक्तियों की भाषा जापानी है। 10 करोड़ व्यक्ति अरबी भाषा-भाषी हैं। इतनी ही संख्या पुर्तगाली भाषाइयों की है। 8 करोड़ के लगभग लोग इटालियन भाषा का प्रयोग करते हैं।
भारत में 600 प्रकार की भाषाएँ प्रचलित हैं। प्रमुख भाषाओं के प्रयोक्ता इस प्रकार हैं-हिन्दी-20 करोड़, तेलगू-5 करोड़, मराठी-3 करोड़, बंगला-3 करोड़, तामिल-3 करोड़ 20 लाख, गुजराती-2 करोड़, मलयालम-डेढ़ करोड़, पंजाबी-गुरुमुखी-1 करोड़ मारवाड़ी-50 लाख कश्मीरी-150 हजार, राजस्थानी 30 लाख, कन्नड़ 25 लाख, उड़िया-20 लाख मेवाड़ी-20 लाख उर्दू -1 करोड़ अन्य भाषाओं के आंकड़े भी अप्राप्य किये गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक भाषाएं भी विभिन्न क्षेत्रों में बोली जानी हैं, इन 600 भाषाओं में से 58 भाषाओं का उपयोग विभिन्न प्रान्तों में शैक्षणिक कार्यों में किया जाता है।
संसार भर में प्रचलित धर्म सम्प्रदायों की गणना प्रायः 600 है। इसमें कबायली सम्प्रदाय सम्मिलित नहीं है क्योंकि वे छोटे-छोटे वर्गों और थोड़े-थोड़े क्षेत्रों में है प्रचलित हैं। प्रख्यात धर्मों में ईसाई, मुसलिम, हिंदू, बौद्ध, पारसी आदि हैं। इनकी शाखा-प्रशाखाओं के रूप में ही अन्य सम्प्रदायों ने अपना पृथक् ढाँचा खड़ा किया है। अकेले हिन्दू धर्म के अंतर्गत विज्ञात जानकारी के अनुसार प्रायः 3800 सम्प्रदाय हैं। अन्य धर्मों में यह बिखराव इतना अधिक नहीं है।
भारत के प्रमुख धर्मों की जन गणना की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है। सन् 1781 की जन गणना में अनुमानतः कुछ 68 करोड़ जनसंख्या में हिन्दू 82 प्रतिशत, मुसलमान 12 प्रतिशत और ईसाई 6 प्रतिशत थे।
सन् 1881-2941 की मध्यावधि में मुस्लिम जनसंख्या में 86 प्रतिशत की तथा ईसाई जनसंख्या में 318 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि हिन्दू मात्र 44 प्रतिशत ही बढ़े। तुलनात्मक औसत वृद्धि दृष्टि से इस 60 वर्षों में पूरे भारत में 56 हिन्दू प्रति हजार घटे और 43 मुस्लिम प्रति हजार बढ़े।
विभाजन के पश्चात् 1951 में हिन्दू-85 प्रतिशत, मुस्लिम-9.91 प्रतिशत तथा ईसाई-2.35 प्रतिशत थे। 1961 की जनगणना के अनुसार हिन्दू 83.50 प्रतिशत, मुस्लिम-10.70 प्रतिशत तथा ईसाइयों की 2.44 प्रतिशत हो गई।
धर्म सम्प्रदायों के इस बिखराव से बौद्धिक और भावनात्मक खाई ही उत्पन्न होती है। कई बार तो कट्टरता के आवेश में इनके अनुयायी अपने धर्मात्मा और अन्यान्यों को अधर्मी ठहराते देखे गये हैं। इतना ही नहीं बलपूर्वक वशवर्ती या पक्षधर बनाने के लिए अत्याचार रक्तपात तक करने में सान्निद्ध तक देखे गये हैं। इन बिखरावों में पृथक-पृथक धर्म संस्थानों की, ग्रन्थों एवं कर्मकाण्ड की विविधता सामने आती है जिसमें असीम धन, श्रम, समय ऐसे ही निरर्थक अस्त-व्यस्त होता रहता है।
एकता अपने समय की सबसे बड़ी माँग है। इसमें हर दृष्टि से दूरदर्शिता है। शक्तियों को एक दिशा में नियोजित करने का प्रतिफल संयुक्त श्रम के रूप में चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत कर रहा है। आवश्यकता इस बात की भी है कि भाषाओं और धर्मों को भी एक केन्द्र पर केन्द्रित होने-एक लक्ष्य अपनाने और मिल-जुलकर काम करने के लिए सहमत किया जाय। भाषायी सम्प्रदायी बिखराव को समेटने की और अब विज्ञजनों का ध्यान जाना चाहिए। इस आधार पर उत्पन्न होने वाली एकात्मता के आधार पर नव सृजन का प्रयोजन पूरा करने में असाधारण योगदान को सकता है। तथ्य को समझते हुए इस दिशा में सोचा ही नहीं कुछ किया भी जाना चाहिए। धर्माध्यक्ष इसे नहीं करते तो जनशक्ति को इस पुण्य प्रयोजन हेतु आगे आना चाहिए।
भगवान ने आदमी को बनाया और धरती पर रहने का आदेश दिया। मनुष्य अनमना हो गया। स्वर्ग छोड़कर धरती पर क्या मिलेगा! व्यर्थ के झंझट सहने पड़ेंगे। भगवान ने उसका असमंजस समझा और दो हाथों में दो घड़े थमा दिये। उनका सम्बन्ध और उपयोग बताते हुए कहा-“पहले में धर्म है दूसरे में सुख। पहले को सम्भालना दूसरा भरा रहेगा।”
आदमी सन्तोष की साँस लेकर धरती की ओर चल पड़ा। सफर लम्बा था। रात्रि हुई और वह सो गया। घड़े पास में रख लिए कहते हैं कि शैतान ने इसका लाभ उठाया। घड़ों को उठाकर अदल-बदल कर दी। आदमी चला तो उसके पहले हाथ में सुख था, दूसरे में धर्म। सारी विधा उलट गयी। भटकाव ने आदमी से कुछ का कुछ करा दिया। वह सुख को प्रथम मानता है। फलतः दूसरा घड़ा खाली पड़ा रहता है और समन्वय के बिना सब कुछ अस्त-व्यस्त पड़ा रहता है।
यज्ञ को भगवान का साकार स्वरूप माना गया है। निर्जीव प्रतिमाओं की शक्ति पूजन कर्त्ताओं की श्रद्धा पर अवलम्बित है किन्तु यज्ञ की अपनी निजी सामर्थ्य है और वह शारीरिक, मानसिक आरोग्य, आत्मबल संवर्धन व्यक्तित्वों का विकास, वातावरण का परिशोधन, सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक पर्जन्य जैसे कितने ही प्रत्यक्ष लाभ अनुष्ठान प्रस्तुत करता है। उसकी ऊर्जा का समीपवर्ती को सहज ही अनुभव होता है। इसके अतिरिक्त यज्ञाग्नि से कितनी ही परीक्षा शिक्षा प्रेरणाएँ मिलती हैं। ऐसी अनेकानेक विशेषताओं के कारण यज्ञ को परमेश्वर का प्रत्यक्ष शरीर माना गया है और उसके यजन पूजन में भावनापूर्वक तत्पर रहने का शास्त्र अनुशासन है।
कहा गया है-
यज्ञो वै विष्णुः।-शतपथ
यह यज्ञ ही विष्णु है।
अहं क्रतुरहं यज्ञः।-गीता
मैं (भगवान) यज्ञ ही हूँ।
भगवान की उपासना के जो लाभ अध्यात्म तत्व दर्शन-शास्त्र निर्धारण-आप्त वचन एवं योगी तप-स्त्रियों के अनुभव बताते हैं। उन सबको ब्रह्म विद्या के महा मनीषी यज्ञ प्रक्रिया के माध्यम से भी भली प्रकार उपलब्ध होने की बात कहते हैं। उपासनाओं के लिए अन्य इष्टदेवों का भी निर्धारण हो सकता है, पर उन सब प्रक्रियाओं में अग्नि को इष्ट मान लेना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को शास्त्रकार अधिक वरिष्ठता देते हैं। आत्मोत्कर्ष के इच्छुकों को वेद भगवान से यजन कृत्य को प्रमुखता देने के लिए कहा है और उस अवलम्बन को अपनाने का निर्देश किया है।
वेदों में स्थान-स्थान पर ऋग्वेद में कहा गया है- “यज्ञ न वर्धत् जातवेदसमाग्निम्। यज्ञग्वं हविषा तना गिरा।”
अर्थात्-“हे मनुष्यों ! यज्ञ द्वारा इस यज्ञाग्नि को प्रज्वलित करो एवं उत्तम हवियों द्वारा श्रद्धा, भक्ति, उदारता से यजन करो।”
आयुर्यज्ञेन कल्पताम्। -यजु0
जीवन को यज्ञमय बनायें।
अथर्ववेद के अनुसार प्राणि जगत दैवी चैतन्य शक्तियों के जागृत होने पर अगणित लाभ प्राप्त करता है।
“उत्तिष्ठं ब्रह्मणस्पते देवान यज्ञेन बोधय। आयुः प्राणं प्रजाँ पशून कीर्ति यजमानं च वर्धयं॥
अर्थात्-“हे ब्रह्मणस्पते। अब आप उठ खड़े हों।
आलस्य न करें। उठकर यज्ञ द्वारा’ उठकर यज्ञ द्वारा’ विश्व की दैवी शक्तियों को जागृत करें। इन जागृत दैवी शक्तियों से यजमान को सुखमय साधनों से अभिपूरित करें तथा प्राणीमात्र ही आयु, जीवनी शक्ति, उचित प्रजा, अच्छे पशु, यश तथा कीर्ति को भी बड़ा दें।”
वेदों-ब्राह्मण ग्रन्थों आदि में ‘यज्ञ’ को श्रेष्ठतम कर्म माना गया है-
यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म। (शतपथ. 1/7/3/5)
‘यज्ञ निश्चित रूप से श्रेष्ठतम कर्म है।’
यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म। (शतपथ. 3/2/1/4)
‘निश्चित रूप से यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है।
‘न ये शेकुर्यज्ञियाँ नावमारुहम् ईमेर्वे तेन्यविशन्त केपयः।’ (शतपथ. 10/44/6, अथर्व. 20/94/6)
अर्थात्-‘जो यज्ञरूपी नौका पर चढ़ने में समर्थ नहीं होते, वे कुत्सित आचरण वाले होकर, इसी लोक में अधःपतित होते जाते हैं।
‘....यः कामयेत ब्रह्मवर्चसी स्यामिति तर्हि हस जुहुयात्॥ -शतपथ. 2/3/2/13
अर्थात्-‘जो व्यक्ति चाहे कि मैं ब्रह्मवर्चस् से सम्पन्न बन जाऊँ, तो उसे यज्ञ करना चाहिए। क्योंकि यज्ञ से ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति होती है।
आध्यात्मिकं चाधिदैवमाधि भातिकमेव च। एतत् तापत्रयं प्रोक्तमात्मवद्भिर्नराधि प॥ यस्माद् वै त्रायते दुःखाद् यजमानं हुतोऽनलः। तस्माद् तु विधिवत् प्रोक्तमग्निहोत्रमिति श्रुता॥ -महा0 आश्व0 पर्व अध्याय 92
अर्थात्- हे राजन्! आध्यात्मिक, आधि दैविक तथा आधिभौतिक-ये तीन ताप आत्मवेत्ताओं ने कहे हैं। विधिपूर्वक हवन करके पर अग्नि यजमान का इन तीन दुःखों से रक्षा करता है। इसलिए वेदों में इसे अग्निहोत्र कहा गया है।
आग्नेयोऽयं यज्ञः। ज्योतिरग्निः पाप्मनो वग्धा सोऽस्य पाप्मानं दहति स इह ज्योतिरेव श्रिया यशसा भवति ज्योतिरमुत्र पुण्य लोकत्वैतन्नु तद्यस्मादाद्धीत॥ -शतपथ॰ 2/2/3/6
अर्थात्-यह अग्नि का यज्ञ है। अग्नि ज्योति है। वह पापों को जलाती है। यह (यहमान के) पापों को जलाती है। यह ज्योति, शोभा और पुण्य प्रदान करती है। इसलिए अग्निहोत्र करना चाहिए।
अग्निहोत्र के अनेक लाभ बताये गये हैं जिनमें आत्मबल का संवर्धन प्रमुख है। मनुष्य जन्म से शूद्र उत्पन्न होता है। संस्कारों से द्विज अर्थात् मानवी गरिमा को अवधारण करने वाला बनता है। संस्कारों का सामान्य अर्थ वातावरण एवं संपर्क में पड़ने वाले प्रभाव से किया जाता है किन्तु सूक्ष्म अध्यात्म विज्ञान के अनुसार यह प्रक्रिया यज्ञाग्नि के सान्निध्य में सम्पन्न होती है। मनुस्मृति के अनुसार “महा यज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तत्र” अर्थात्- यज्ञों और महायज्ञों के माध्यम से यह नगण्य महल का हाड़-माँस का पुतला-ब्रह्मत्व को उपलब्ध करने में सफल होता है। ब्राह्मण के छह कर्तव्य उत्तरदायित्वों में दो ‘यज्ञ करना-यज्ञ कराना’ भी निर्धारित है। जिनका सूत्र संकेत इस प्रकार किया गया है-
निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्रत्यक्ष देवताओं दिव्य शक्तियों को देवता प्राणों की गणना है। उनसे जीन मिलता-स्थिर रहता और सुविधाएं उपलब्ध करता है। इसलिए जीव जगत के प्रधान अवलम्बन जल, अग्नि, वायु आदि को देव संज्ञा दी गई है और उन्हें शुद्ध संतुलित रखने के रूप में देव पूजन करते रहने का निर्देश किया गया है। इसके अतिरिक्त दैवी प्रवाह की वे लहरे भी हैं जो अपने स्वरूप एवं स्वभाव के कारण अनेक क्षेत्रों के उत्तरदायित्व निभाती है। संपर्क साधने वालों की गुण कर्म, स्वभाव की-चिन्तन चरित्र की-उदास दृष्टिकोण एवं उत्कृष्टता की पक्षधर साहसिकता की विभूतियाँ प्रदान करती हैं। जो इन्हें जितनी मात्रा में ग्रहण साधारण करता है वह उसी अनुपात स्तर का महामानव, ऋषि, मनीषी, सिद्ध पुरुष एवं देवदूत बनाता चला जाता है। देवत्व की उपासना का यही सत्परिणाम है। देवता जिस पर भी प्रसन्न होते हैं इन्हें अपनी गहरी हलकी प्रसन्नता के अनुरूप सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की उमंग भरते हैं। यह दैवी वरदान है। यह जितना जिसे मिलेगा वह उतना ही श्रेष्ठ वरिष्ठ बनता चला जायगा। कहना न होगा कि व्यक्तित्व की विशिष्टता परिष्टता ही लौकिक जीवन में अनेकानेक सफलताएँ प्रदान करती और शक्ति सम्पन्न सफलताएँ प्रदान करती है शक्ति सम्पदाओं का अधिष्ठाता बनाती है।
यज्ञ के माध्यम से देव सान्निध्य एवं अनुग्रह अर्जित करने के सम्बन्ध में शास्त्र कहता है-
सहयगाः प्रजा सृष्ट्ठा पुरोवाच प्रजापति अनेन प्रसविष्यधव में मेष वो।................कामधुक्। गीता
अर्थात्—प्रजापति ने सर्वप्रथम यज्ञ देवता का सृजन किया और जन-साधारण से कहा-“आप लोग इसका यजन अर्चन करें। बदले में यह आपके लिए कामधेनु की तरह फलप्रद सिद्ध होगा।
देवताओं में सर्वप्रथम एवं सर्वे समर्थ अग्निदेव की उत्पत्ति हुई और भी कितने ही प्रमाण उल्लेख मिलते हैं-
ब्रह्मत्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते॥ सृष्टोऽग्निर्मुखतः पूर्वं लोकानाँ हितकाम्यया॥ महाभारत अश्वमेधिक पूर्व, 92 वाँ अध्याय
अर्थात्- श्री भगवान् ने कहा महातेजस्वी राजन्! मैंने सबसे पहले ब्रह्म स्वरूप से लोकों को बनाया। लोगों की भलाई के लिए मुख से सबसे पहले अग्नि को प्रकट किया।
तदग्नि होत्रं सृष्टं वै ब्रह्मणा लोक कतृणा। वेदाश्चाप्याग्निहोत्रं तु जज्ञिरे स्वयमेव तु॥ महा0, आश्व0 पूर्व, अध्याय 92
अर्थात्-सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम अग्निहोत्र प्रकट किया। वेद और अग्निहोत्र स्वयं की पैदा हुए हैं।
यस्मादग्रे स भूतानाँ सर्वेषाँ निर्मितो मया। तस्मादग्रीत्यभिहितः पुराणज्ञैर्मनीषिभिः॥ महा0, आश्व0 पर्व, वैष्णक पर्व, अध्याय 92
अर्थात्-सभी भूतों से पहले अग्नि तत्व मेरे द्वारा पैदा किया गया, इसलिए पुराण ज्ञाता मनीषी उसे ‘अग्नि’ कहते हैं।
यस्मात् तु सर्व कृत्येषु पूर्वमस्मै प्रदीयते। आहुतिर्दीप्यमानाय तस्मादग्नीति कथ्यते॥ महा0 आश्व0 पर्व, वैष्णव पर्व, अध्याय 92
अर्थात्-सभी कार्यों में सबसे पहले प्रज्वलित अग्नि में ही आहुति दी जाती है, इसलिए इसे अग्नि कहा जाता है।
यज्ञ के द्वारा देव शक्तियों के साथ संपर्क सधता है और वह उस आधार पर से यजन कर्त्ता पर उतरती हैं। इसी से यज्ञ को देवों की प्रसन्नता अनुकूलता का कार्य बताया गया है कहना न होगा कि इस अनुग्रह के सहारे आत्मिक और भौतिक क्षेत्र की अनेकों सिद्धियाँ, सफलताएँ प्राप्त होती हैं-
तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानाँ तोषणं भवेत्। तुष्टेषु सर्व देवेषु यज्वा यज्ञ फलं लभेत्॥ -महा0, अनु0, पर्व, अध्याय 145
अर्थात्-यज्ञों से देवताओं को सन्तुष्टि होती हैं, और सर्व देवों के सन्तुष्ट होने पर यज्ञ करने वाले को पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है।
तेन सर्प्तषयः सिद्धाः संयतेन्द्रिय बुद्धयः। गता ह्यमर सायुजयं ते ह्मइर्न्यचन तत्पराः॥ -महा0, आश्व0, पर्व अध्याय92
अर्थात्- इन्द्रियों और बुद्धि पर संयम रखने वाले सिद्ध सप्तर्षिगण ने अग्नि की अर्चना में तत्पर रहने के कारण ही देवताओं के स्वरूप को प्राप्त किया है।
यज्ञ की महिमा शास्त्र वचनों में सतत् वर्णित होती रही है। यज्ञ के अनेकानेक लाभ हैं। आयुष्य में वृद्धि नीरोगता- समस्वरता तो इससे उपलब्ध होती ही हैं- मानवी गरिमा को बढ़ाने वाला देवत्व और वर्चस् भी प्राप्त होता है। व्यक्तित्व में सद्गुणों की वृद्धि मनुष्य को आत्मिक दृष्टि से तो ऊँचा उठाती ही है, भौतिक प्रगति का पथ भी प्रशस्त करती है।
उस दिन ईसा शिष्य मण्डली समेत किसी प्रकार यात्रा पर जा रहे थे। रात्रि हो गयी। भोजन का सुयोग न बना।
ईसा ने कहा-“तुम सबके पास जो है इकट्ठा कर लो और उसी से मिल बाँटकर का चलाओ।”
पाँच रोटी इकट्ठी हुईं। मिल-बाँटकर खायी गईं। हिस्से में आधी-आधी भी ने आयी तो भी सबका पेट भर गया।
सोलोमन ने पूछा - “महाप्रभु यह कैसा आश्चर्य ? इतने कम से इतनी तृप्ति कैसे ?”
ईसा ने कहा - “यह मिल-बाँटकर खाने का चमत्कार है।”
शतपथ ब्राह्मण के प्रथम काण्ड के अंतर्गत छठे अध्याय के तीसरे ब्राह्मण की 35 वीं-36 वीं काण्डिका में उल्लेख मिलता है कि सर्वप्रथम जब प्रजापति को सृष्टि-संरचना का कार्य सौंपा गया तो बड़े प्रयत्न और पुरुषार्थ से उन्होंने अपना कार्य सम्पन्न किया। इस भारी गुरुतर कार्य करने से उनके जोड़ों-सन्धियों-में दर्द होने लगा। उन्हें उठने-बैठने में कष्ट होने लगा, जिसे देखकर देवों का चिन्तित होना स्वाभाविक ही था। सोच-विचार के बाद देवताओं को एक उपाय सूझा। उन्होंने ‘प्रजापति’ के कष्ट निवारण के लिए एक यज्ञ किया। इस यज्ञ के प्रभाव से ‘प्रजापति’ का सन्धिगत कष्ट दूर हो गया और वे अपना सम्पूर्ण कार्य यथावत् करने में सक्षम हो गये।
सन्धियों में दर्द क्यों हुआ ? शरीर के अन्य अवयवों को वैसी व्यथा क्यों उत्पन्न नहीं हुई? इस अनायास ही उठने वाले प्रश्न का समाधान शतपथ ने आगे चलकर स्वयं ही कर दिया है।
श्रम करने का दबाव सबसे अधिक हड्डियों के जोड़ों पर पड़ता है, वे ही चरमराते हैं। गठिया आदि के कारण उन्हीं में दर्द होता है। बुढ़ापे में वे ही अकड़ जाते हैं। यह सामान्य लोगों पर लागू होने वाली सामान्य बात हुई। फिर प्रजापति तो देवाधि देव ठहरे, उन्हें किस कारण सन्धिपात हो गया। यह कठिनाई जिस कारण उत्पन्न हुई उसका उल्लेख उसी काण्डिका में इस प्रकार किया गया है-
‘प्रजापतेर्ह वै प्रजाः ससृजानस्य। पर्वाणि विसस्त्र सुः स वै संवत्सर एवं प्रजापतिस्तस्यैतानि पर्वाण्य हो रात्रयाः सन्धी पौर्णमासी चमावस्या चऽर्त्तुमुखानि।
‘प्रजापति जब प्रजा बना चुके तो उनके जोड़ सन्धि स्थल ढीले पड़ गये। संवत्सर ‘प्रजापति’ हैं और उस जोड़ हैं, रात-दिन की सन्धियाँ, पूर्णमासी, अमावस्या और ऋतुओं का आरम्भ।
‘स विस्त्रस्तैः पर्वभिः। न शशाक सं हातं तमेतैर्हवियज्ञैर्देवा अभिषज्यन्नग्नि होत्रेणैवाहोरात्रयोः सन्धी तत्पर्वांभिषज्यंस्तत्समदधुः पौर्णमासेन चैवामावास्येन च पौर्णमासी चामावास्याँ च तत्पर्वाभिषज्यंस्तत्स मदधुश्चातुर्मांस्यैरेवऽर्त्तु मुखानि तत्पर्वाभिषज्यंस्तत्समदधुः ॥36॥
वह (प्रजापति) थके हुए सन्धि-स्थल होने से उठ नहीं सकते थे। देवों ने हवियों एवं यज्ञों द्वारा वह कष्ट दूर किया। अग्निहोत्र द्वारा उन्होंने रात-दिन की सन्धि वाले जोड़ को ठीक किया। पौर्णमास और अमावस्या के यज्ञ से पूर्णमासी और अमावस्या के जोड़ के कष्ट दूर किया और चातुर्मास-यज्ञ से उन्होंने ऋतु के आरम्भ वाले जोड़ को नीरोग बनाया।’
यहाँ पर स्वयं ब्राह्मणकार ने ‘प्रजापति’ को एक सम्वत्सर-वर्ष -के रूप में कल्पित करके सर्दी-गर्मी और बरसात की ऋतुओं के सन्धिकाल को ऋतु-सन्धि, प्रत्येक माह की पूर्णमासी और अमावस्या के सन्धिकाल को, पूर्णमासी और अमावस्या की सन्धि तथा रात-दिन के सन्धिकाल (प्रातः सायं की संध्या) को अहोरात्रि की सन्धि के रूप में कल्पित किया है। ‘देवों’ ने इन्हीं दिनों यज्ञ कार्य सम्पन्न करके अपने कार्य में सफलता प्राप्त की थी। इस कथन द्वारा मानव मात्र को इन्हीं सन्धिकालों में यज्ञ करने की प्रेरणा प्रदान की है।
यह तथ्य सुविदित ही है कि ऋतुओं का सन्धिकाल, महीनों का सन्धिकाल तथा दिन-रात का सन्धिकाल विशेष महत्वपूर्ण होता है। इस समय के दिव्य ब्राह्मी-चेतना से लाभान्वित होने के उद्देश्य से ही ऋतुओं के सन्धिकाल के समय नवरात्रियों का, मासों के सन्धिकाल पूर्णमासी व अमावस्या के व्रतादिकों का तथा दिन-रात के संधिकाल प्राप्तः सायं सन्ध्या करने का विधान किया गया है।
सन्धि दो वस्तुओं के जोड़ को कहते हैं। दिन और रात के दोनों मिलन प्रभात-संध्या एवं सुबह सायं के नाम से जाने और उपासना प्रयोजनों में प्रयुक्त किये जाते हैं। यही सन्धिकाल विग्रह, व्यथा एवं उथल-पुथल का समय होता है और बहुधा कष्ट कर असुविधा उत्पन्न करता है। जन्म के समय बालक तथा प्रसूता को कष्ट होने की-मरण काल में प्राणी तथा सम्बन्धियों की छटपटाहट देखते ही बनती है। कन्या जब पितृ ग्रह को छोड़कर ससुराल जाती है तो उसका असमंजस भी विचित्र होता है। अफसरों की बदली होती है तो उठक-पठक का झंझट कितना असुविधाजनक लगता है। राज्य बदलने, कानून उलटने, व्यवस्था में परिवर्तन होने पर भी ऐसी ही कष्टकर अनुभूतियाँ होती है। भले ही वे लाभदायक हों या हानिकारक। उपयोगी हों या अनुपयोगी।
सृष्टि निर्माण कार्य का पहला चरण पूरा करने के उपरान्त प्रजापति को दूसरे चरण में प्रवेश करना था। व्यवस्था बनाने और नियन्त्रण रखने का तन्त्र खड़ा करना था। ढर्रे का काम समाप्त हुआ तो अभिनव संयोजन का उत्तरदायित्व कन्धे पर आ गया। यही परिवर्तन बेला सन्धिकाल कहलाती है और अनभ्यस्त होने के कारण असुविधा, चिन्ता भी उत्पन्न करती है और झंझट भरी कष्ट कर भी लगती है। यह सभी के लिए होता है तो प्रजापति को क्यों न होता? सन्धिकाल में उनकी सन्धियों में दर्द होने लगा है, जकड़न का माहौल बन गया हो तो इसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। विश्व-व्यवस्था तो मनुष्यों की तरह देवताओं पर भी लागू होती है।
समस्या का समाधान कैसे हुआ ? यह देखने ही योग्य है। देवताओं ने यज्ञ किया और उतने भर से उपयुक्त चिकित्सा हो गई। यहाँ यज्ञोपचार से रोग निवारण की सामर्थ्य होने का जहाँ संकेत है वहाँ संकेत है वहाँ यह भी प्रतिपादन है कि उथल-पुथल के-परिवर्तन के अवसरों पर उत्पन्न हुआ असमंजस आदर्शवादी अवलम्ब स्वीकार करके किया जाना चाहिए। सुविधा को गौण और आदर्श अनुशासन को प्रमुख माना जाय तो इतने भर से अभ्यस्त ढर्रे को छोड़ने और नये क्षेत्र में प्रवेश करने की प्रक्रिया कष्टकर नहीं होती। उलटे साहसिक पराक्रम की परीक्षा देने के लिए उत्साह भरती है। और असमंजस ग्रस्त लोगों पर भी लागू होता है। शतपथ ब्राह्मण को उपरोक्त काण्डिका का यही सारगर्भित प्रतिपादन है।
ब्रह्मा जी की दो पुत्रियाँ थीं एक सुन्दरता दूसरी लज्जा। वयस्क हुई तो उनका मन लोक-लोकान्तरों में घूमने का हुआ। प्रजापति ने वैसा ही प्रबन्ध कर दिया, पर साथ ही सुन्दरता से कहा वह अकेली न रहे-लज्जा को साथ लेकर चले। वे चल दी। सुन्दरता की सबने सराहना की अभ्यर्थना की और उपहारों के ढेर लगा दिये। लज्जा बीच-बीच में रोक-टोक करती तो दूसरी को बुरा लगा। उसने कुट्टी कर दी और अकेली घूमने लगी। लज्जा क्या करती वह पीछे तो चलती पर चुप रहती।
सुन्दरता का शोषण होता रहा। वह निचोड़े नीबू की तरह छूँछ हो गई। अशक्तता बढ़ी और शोभा चली गई। मनुहार करने वालों ने भी मुँह मोड़ लिया। निराश सुन्दरता ने वापस लौट चलने का निश्चय किया लज्जा भी साथ लौटी। उसे साथ रहने का निर्देश जो था।
प्रजापति ने अपनी पुत्री की इस असामयिक जर्जरता को देखा तो बहुत दुःखी हुई। स्थिति समझने में देर न लगी। उन्होंने सुन्दरता से कहा, “बेटी भविष्य में लज्जा का साथ न छोड़ना। जहाँ भी जाओ उसे साथ रखना। संकट उसका साथ छोड़ने से ही उत्पन्न हुआ है।”
गायत्री उपासना के दो पक्ष हैं एक ज्ञान पक्ष और दूसरा विज्ञान पक्ष। इन्हें ब्रह्मविद्या और ब्रह्मशक्ति भी कह सकते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए इन दोनों पक्षों पर समान रूप से ध्यान देना पड़ता है। सामान्य जीवन क्रम में भी शक्ति और ज्ञान का समन्वय हुए बिना अभीष्ट दिशा में कोई प्रगति नहीं होती। केवल ज्ञान हो और शक्ति न हो तो भी अभीष्ट दिशा में कदम नहीं बढ़ाये जा सकते और केवल साधन शक्ति हो किन्तु उनके उपयोग की कला न आती हो तो भी कोई परिणाम प्राप्त नहीं किये जा सकते।
आत्मिक जीवन में भी यही नियम लागू होता है। आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के लिए, जीव और ब्रह्म के मिलन के लिए जिस विद्या की जानकारी आवश्यक है उसे ब्रह्मविद्या कहते हैं। तथा अन्तःकरण को शुद्धि, चेतना के परिष्कार के लिए जो क्रिया कृत्य किये जाते हैं उन्हें तम कहते हैं। दोनों का समवेत प्रयोजन ब्रह्मज्ञान और आत्मबल अर्जित करना है। इन दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इनकी आवश्यकता बताते हुए कहा गया है-
यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यंचौ चरतौ सह। तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषंयत्र देवाः सहाग्निना। -यजुर्वेद 20/25
“जहाँ ब्रह्म शक्ति और क्षत्र-शक्ति साथ-साथ रहती हैं, वही लोक पुण्यशाली होता है।” इस मन्त्र में आये हुए ‘ब्रह्म’ और ‘क्षत्र’ पद क्रमशः ज्ञान और कर्म के वाचक हैं। ये दोनों शक्तियाँ जहाँ होंगी वहीं प्रगति के आधार बनेंगे।
ब्रह्मणि खलुवै क्षत्रं प्रतिष्ठितम् क्षत्रे ब्रह्म। -अथर्व08/12
ब्रह्म में क्षत्र की स्थिति होती है और क्षत्र में ब्रह्म की।
ब्रह्म च क्षत्रं च संश्रितें -अथर्व ॰ 3/11
ब्रह्म और क्षत्र परस्पराश्रित होते हैं।
द्रोणाचार्य के शास्त्र और शस्त्र धारण की आवश्यकता ब्रह्म और क्षत्र-ज्ञान और कर्म दोनों की समान उपयोगिता के रूप में इस प्रकार बताई गयी है।
अग्रतः चतुरो वेदा पृष्ठतः शस धुन। इदं ब्राह्म इदं क्षात्र शास्त्रादपि शरादपि॥ -महाभारत
हम वेदों को आगे रखकर लोगों को समझाने, सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्न करते हैं। साथ ही पीठ पर धनुष बाण भी रखते हैं। यह धर्म शिक्षा ‘ब्राह्म’ है और यह शस्त्र धारण ‘क्षात्र’ है। दोनों शक्तियों के समन्वय से ही समस्याएँ सुलझती हैं।
नाब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाक्षत्र ब्रह्म वर्धते। ब्रह्म क्षत्रं च संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते॥
ब्रह्म-शक्ति के बिना क्षत्र-शक्ति नहीं बढ़ती और क्षत्र-शक्ति के बिना ब्रह्म-शक्ति और क्षत्र-शक्ति नहीं बढ़ती। परस्पर मिली हुई ब्रह्म-शक्ति और क्षत्र-शक्ति ही इस लोक और परलोक में वृद्धि को प्राप्त होती है।
ब्रह्म शक्ति और क्षत्र शक्ति से तात्पर्य ज्ञान और कर्म से है ब्रह्मविद्या और आत्म बल से है गायत्री के ज्ञानपक्ष को उद्घाटित करते हुए शास्त्रों में कहा गया है-
सर्व वेदोद्धतः सारो मन्त्रोऽयं समुदोहृतः। ब्रह्मादेवादि गायत्री परमात्मा समीरितः॥
“ यह गायत्री मन्त्र समस्त वेदों का सार कहा गया है। गायत्री ही ब्रह्मा आदि देवता है। गायत्री ही परमात्मा कही गई।” -गायत्री तन्त्र
सर्वशास्त्रमयी गीता गायत्री सैव निश्चिता। गयातीर्थ च गोलोकं गायत्री रुपमद्भुतम्॥
‘गीता में सब शास्त्र भरे हुए हैं। वह गीता निश्चय ही गायत्री रूप है। गया तीर्थ और गोलोक यह भी गायत्री के ही रूप हैं।”
इस स्थिति को प्राप्त करने के साथ ही साधक में वह तेजस् धारण करने की पात्रता भी विकसित होती है। जिसे आत्मबल, ब्रह्मवर्चस् आदि नामों से पुकारा जाता है। शास्त्रों में इस तत्व की चर्चा ब्रह्माग्नि के नाम से स्थान-स्थान पर हुई है।
ब्रह्माग्नि चर्चा शास्त्रों में स्थान-स्थान पर हुई है-
द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति। आर्द्रचैव शुष्कं च यदाद्रं तंत सौम्यं यछुष्कं तदाग्नेयम्। -शतपथ
यह संसार दो पदार्थों से मिलकर बना है-(1) अग्नि, (2) सोम। इनके अतिरिक्त तीसरा कुछ नहीं है।
अग्नि र्वा अहः सोमारात्रिरथ यदन्तरेण तद् विष्णु। श॰ प॰ 3/4/4/25
अग्नि और सोम के मिलन को विष्णु कहते हैं।
इमौ तै पक्षावजरौ पतत्रिणौ याश्याँ रक्षाँस्यप-हस्यग्ने। ताश्याँ पतेम सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः। यजु0 18/52
हे अग्नि ! तेरे दोनों पंख फड़फड़ाते हैं। उनसे पाप और तम का हनन होता है। इन्हीं पंखों के सहारे हम उस पुण्य-लोक तक पहुँचते हैं जहाँ पूर्ववर्ती ऋषि पहुँचे थे।
अग्नेऽभ्यावर्तिन्नभि मा निवर्तस्वायुषा वर्चसा प्रजया धनेन सन्या मेधया रय्या पोषेण। यजु0 12/7
अर्थात्- हे अग्नि तू आयु, वर्चस् प्रजा, धन, दान, मेधा, रयि और पुष्ट बनकर अपना अनुग्रह हमें प्रदान करें।
गायत्री के 24 अक्षरों में सन्निहित 24 शक्तियों की व्याख्या करते हुए शास्त्र कहता है।
आजश्शक्ति बल प्रभाव सुषमाँ तेजस्सु वीर्यप्रभा। ज्ञानैर्श्वय महस्सहो जय यशस्स्थैर्य प्रतिष्ठाश्रियः॥
विज्ञान प्रतिभा मतिस्मृ तिधृति प्रज्ञाप्रथस्सु ज्वलाः वणैस्त्वन्मानुगै स्त्रिरषभि रहो बर्ध्यन्त एवात्रमे॥
(1) “ओज, (2) शक्ति, (3) बल, (4) महिमा (5) कान्ति, (6) तेज, (7) पराक्रम (8) प्रकाश, (9) ज्ञान, (10) ऐश्वर्य, (11) विकास, (12) सहनशक्ति, (13) जय, (14) कीर्ति, (15) स्थिरता, (16) प्रतिष्ठा, (17) लक्ष्मी, (18) विज्ञान, (19) प्रतिभा, (20) मति, (21) स्मृति, (22) धृति, (23) प्रज्ञा, (24) ख्याति- यह चौबीस गुण हे माता ! तुम्हारे मन्त्र में रहने वाले चौबीसों वर्णों द्वारा मुझमें अभिवृद्धि पा रहे हैं।”
बड़प्पन बड़ा हो गया। घोंसले से बाहर शिर निकालने लगा। तब तक उसका एक पंख उगा था कि उड़ने के लिए मचल पड़ा। कुछ ही दूर बढ़ा होगा कि आँधी आयी और जमीन पर गिर पड़ा। चिड़िया ने उसे वापस बुलाया और कहा-“दूसरा पर उगने तक ठहरो।” सामर्थ्य एक पर है और समझदारी दूसरा, दोनों के सहारे ही लम्बी उड़ान उड़ी जाती है।
इस सावित्री शक्ति की गरिमा को भगवान् मनु सशक्तता के क्षेत्र में सर्वोपरि मानते हैं।
सावित्र्यास्तु परान्नास्ति। -मनु0 2/89
कहा जा चुका है कि ज्ञान को ब्रह्म और विज्ञान को क्षेत्र माना गया है। भारतीय धर्म में दोनों का समान महत्व है और भारतीय संस्कृति की जननी है तो उसमें यह दोनों पक्ष की आवश्यकता परी करती है। अतः आत्मिक प्रगति की समग्र आवश्यकता गायत्री साधना से पूरी हो जाती है।
निद्रा सामान्यतः शरीर के लिए अपरिहार्य है। परिश्रम से क्लान्त को पूर्ण विश्राम तथा नवीन स्फूर्ति प्रदान करने में गहन निद्रा ही समर्थ है। यह प्रकृति की उन महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक है- जो शरीर यन्त्र की स्वचालित प्रक्रिया द्वारा सुव्यवस्थित बनाये रखती है। प्रत्येक स्वस्थ शरीर को साधारणतः छः से आठ घण्टे तक की नींद जरूरी होती है। स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मनःस्थिति होने पर इतनी नींद आ ही जाती है। यह स्वाभाविक और बाध्यतामूलक होती है।
कार्याधिक्य के कारण कई बार नींद की समय-सीमा को घटाना पड़ता है। जबकि कई बार मानसिक तनावों के बढ़ जाने पर नींद चाहने पर भी नहीं आती। अनिद्रा का रोग और नींद की गोलियाँ लेने की विवशता इसी स्थिति चाहे कार्य की अधिकता के कारण नींद पूरी न ली जा सके और चाहे मानसिक तनाव के कारण नींद न आये, शरीर-यन्त्र पर प्रतिकूल और हानिकर प्रभाव पड़ता है। कई दिनों तक लगातार कम सोने पर अपच, स्फूर्तिहीनता और स्मृति शैथिल्य का सामना करना पड़ता है। अनिद्रा रोग हो गया, तब तो शरीर टूटता, कमजोर होता ही चला जाता है।
इस स्थिति का विकल्प है-योग निद्रा। इसके अभ्यास से थोड़े ही समय में पर्याप्त स्फूर्ति प्राप्त की जा सकती है। मानसिक तनावों से उत्पन्न होने वाली अनिद्रा या न्यून निद्रा तो योग निद्रा के अभ्यासी को कभी सता ही नहीं सकती। क्योंकि ऐसा कष्ट उन्हीं लोगों को होता है, जो मन पर नियन्त्रण रखने तथा घटनाक्रम में मन में उभरने वाली प्रतिक्रियाओं के प्रभाव से मुक्त होने में असमर्थ रहते हैं। योग निद्रा के अभ्यास का आरम्भ की मन पर नियन्त्रण के अभ्यास के साथ ही होता है। अतः योगनिद्रा के आरम्भिक अभ्यासी में भी इतना कौशल तो आ ही जाता है कि वह मन को बार-बार अप्रिय घटनाओं की प्रभाव-प्रतिक्रियाओं की स्मृति की ओर दौड़ने से रोक सके। इस प्रकार चाहने पर भी नींद न आ पाने की विवशता रह नहीं जाती। पर, कई बार, विशेषकर उन लोगों को, जिनके उत्तरदायित्व बढ़े-चढ़े हैं, और बहुमुखी हैं, काम के दबाव के कारण नींद के समय में बरबस कटौती करनी पड़ती है। इस विवशता से शरीर पर जो अस्वाभाविक दबाव पड़ता है, उससे मुक्त होना आवश्यक है। अन्यथा शरीर सामर्थ्य का लड़खड़ा उठना सुनिश्चित हैं।
निद्रा मात्र शरीर का विश्राम नहीं है। वह चेतन मन का भी विश्राम है। निद्रा के क्षणों में, दिन भर की उछल-कूद और जिम्मेदारी के निर्वाह से थका चेतन मन, अचेतन के द्वारा डाँट-डपटकर, पकड़ धकेलकर चुपचाप सोने के लिए उसी प्रकार विवश कर दिया जाता है, जिस प्रकार कि किसी दीठ चपल शिशु की ममतामयी माता रात होने पर जबरन बिस्तर में लिटाकर, दुलार-प्यार भरी थपकियाँ देकर सोने को बाध्य कर देती है। उसके बाद अचेतन की अठखेलियाँ शुरू होती हैं। बीते हुए दिन की तथा भूतकाल की भली-बुरी स्मृतियाँ अचेतन परतों में दबी रहती हैं। भय एवं आवेश के पीछे ये दबी पीड़ा की अनुभूतियाँ ही कार्य करती हैं। स्वाभाविक इच्छायें तथा वासनाएँ अचेतन अवस्था में पड़ी रहती हैं। जो चेतन के माध्यम से व्यक्त होना तथा अपनी तुष्टि चाहती हैं। यह न होने पर तनाव एवं आवेश की स्थिति प्रकट होती है। निद्रा से दबी हुई वासनाओं-इच्छाओं की स्मृतियों का एवं सुख-दुःख को जटिल अनुभूतियों से प्रभाव का निष्कासन स्वप्नों के रूप में होता है।
स्मृति के संकेत संग्रहित करने वाला टेम्पोरल कार्टेक्स हाइपोथैलेमस से जुड़ा होता है। हाइपोथैलेमस भावना को नियन्त्रित करता है। प्रत्येक स्मृति एक भावनात्मक प्रवाह के साथ प्रकट होती है। दमित भावनात्मक उद्वेग निद्रा की स्थिति में बार निकालते हैं। तनावों के निष्कासन एवं मानसिक विक्षेपों के दूर होने से नस-नाड़ियों में एक विशेष स्मृति की अनुभूति होती है। मन प्रफुल्ल एवं शान्त हो जाता है। अचेतन मन में दबे विक्षोभों, आवेगों एवं तनावों को दूर करने का निद्रा सशक्त माध्यम है। भावनात्मक असन्तुलन के निवारण में निद्रा वस्तुतः एक नैसर्गिक उपचार है। यही कारण है कि निद्रा नई स्फूर्ति, नई ताजगी देती है।वह शरीर तथा मन, दोनों को हर दिन नये सिरे से सन्तुलित करने का कर्त्तव्य पूरा करने वाली स्वयंसेवी परिचारिका है।
किन्तु निद्रा ऐच्छिक नहीं होती। उसका दबाव अनिवार्य होता है। उसे टाले जाने पर, उसकी प्रतिक्रिया भी अनिवार्य होती हैं। निद्रा के लाभों से इच्छानुसार लाभ उठाने तथा उसके निर्धारित समय में होने वाली कटौती की प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं से बचने के लिए योग-निद्रा का अवलम्बन आवश्यक होता है।
सचेत भाव से किया जाने के कारण शिथिलीकरण एवं योग निद्रा वशवर्ती होती हैं। वे जब तक इच्छा हो तब तक किये जा सकते हैं। जबकि नींद पर ऐसा नियन्त्रण नहीं रहता। गहरा शिथिलीकरण योग निद्रा का अंग है वह जितना की गहरा होगा, उतने ही कम समय में शरीर की आवश्यकता की पूर्ति सम्भव होगी।
इसके साथ ही योग निद्रा से मानसिक शक्ति भी प्राप्त होती है। योग निद्रा द्वारा शारीरिक धरातल से चेतना को अलग किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में सक्रिय रहने वाला मस्तिष्क का भाग पीनियल तथा पिट्यूटरी ग्लैण्ड से सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। इसके स्रावित होने वाले हारमोन्स समूचे व्यक्तित्व, चेतनात्मक स्तर को भी प्रभावित करते हैं। पीनियल ग्लैण्ड के निकट ही योगियों ने आत्मा का निवास स्थान बताया है। तृतीय नेत्र इसी को कहा गया है। इसके पूर्ण जागरण से मनुष्य सूक्ष्म जगत की हलचलों को भी पकड़ने एवं समझने लगता है। पिट्यूटरी ग्लैण्ड को व्यक्तित्व का केन्द्र बिन्दु माता गया है। यह न्यूरोनल तथा हार्मोनल सिस्टम को जोड़ता है। समस्त भावनात्मक क्रियाओं पर नियन्त्रण करता है। चयापचयी क्रियाएँ भी इसी के द्वारा संचालित होती हैं। योग ग्रन्थों में इसको सहस्रार चक्र का स्थूल केन्द्र बिन्दु माना गया है। योग निद्रा का विकसित रूप इस केन्द्र को समर्थ बनाता है। इस प्रकार योग निद्रा से शिथिलीकरण वाले लाभ तो प्राप्त होते ही हैं, शारीरिक-मानसिक ताजगी तो आती है, साथ ही चेतना का स्तर भी विकसित होता है। सन्तुलन की सामर्थ्य एवं अंतर्दृष्टि का विकास होता है। यह योग-निद्रा की उच्चस्तरीय प्रक्रिया है। किन्तु उसकी आरम्भिक प्रक्रिया भी कम समय में पूरी और गहरी नींद का लाभ प्रदान करती है। इसका यह अर्थ नहीं है कि यह नींद का आजीवन विकल्प बन सकती है। उच्चस्तरीय योगियों को छोड़कर शेष लोगों को नियमित पर्याप्त नींद लेनी ही चाहिए। यदा-कदा आवश्यकता पड़ने पर उसमें होने वाली कटौती की कमी को पूरा करने के लिए निद्रा का सहारा अवश्य लाभकारी होता है। इसी प्रकार, कार्य व्यस्तता में समय मिलने पर शिथिलीकरण का कुछ क्षणों का अभ्यास नई स्फूर्ति प्रदान करता है। शारीरिक स्वास्थ्य व मानसिक प्रफुल्लता के लिए ये प्रक्रियाएँ अत्यधिक लाभकारी हैं।
अकबर के दरबार में एक पेशकार थे- बलीराम। बादशाह से अपमानित होने पर उन्होंने वैराग्य की ठानी और घर का सारा माल असबाव गरीबों को दे दिया। स्वयं जमुना की रेती में लम्बे पैर पसारकर ऐंठने लगे। बादशाह ने बुलाया तो आये नहीं। अकबर स्वयं ही उन्हें मनाने पहुँचे। कुशल प्रश्न के बाद अकबर ने पूछा- “पैर पसारना कब से शुरू हुआ।” बलीराम ने कहा-“जिस दिन से हाथ समेटे उसी दिन से पैरों का फैलाना आरम्भ हो गया।”
प्राचीनकाल में तीर्थों की स्थापना, ऐतिहासिक कारणों तथा प्रकृति विशिष्टताओं के आधार पर ही नहीं हुई थी वरन् उन स्थानों पर बने ऋषि आश्रमों की गतिविधियों ने वहाँ की गरिमा तथा मान्यता बढ़ाई थी। ऋषि आश्रमों में बालकों के लिए गुरुकुल, व्यस्तजनों के लिए तीर्थसेवन तथा परमार्थियों के लिए आरण्यकों की त्रिविध व्यवस्था रहती थी। तीनों की स्तर के लोग वहाँ साधना करते, प्रशिक्षण पाते तथा प्रेरणाप्रद वातावरण का असाधारण लाभ लेते थे। ऐसे कारणों से ही तीर्थों की स्थापना हुई थी। उन कसौटियों पर कसने के उपरान्त ही कल्प साधना जैसे परिष्कार-उपचार की बात सोचनी चाहिए।
ऐसे वातावरण में निवास करने का जिन साधकों को सुयोग मिले, उन्हें इस सौभाग्य का समुचित लाभ उठाना चाहिए।इस अवसर को ऐसे ही असमंजस में नहीं गँवा देना चाहिए। असमंजस यह कि मन कहीं और शरीर कहीं रहे। जो बताया या कराया जा रहा है उसे उथले रूप में लिया गया और उपेक्षापूर्वक बेगार भुगतने के लिए, लकीर पीटने के लिए जैसे-तैसे, आधे-अधूरे, काने-कुबड़े रूप में निपटाया जाता रहे। ऐसी स्थिति उन लोगों की होती है। जिनका मन घर पर पड़ा रहता है और शरीर जेल के कैदी की तरह लोक-लाज में बँधकर किसी प्रकार समय काटता रहता है। ऐसी दशा में वह लाभ मिलना सम्भव ही नहीं जिसके लिए यह व्यवस्था बनाई गई हैं और सम्मिलित होने के लिए आया गया है।
साधना शारीरिक श्रम को नहीं कहते। श्रम करते रहने में श्रमिक बेमन से भी समय काटते और पैसा कमाते देखे गए हैं, पर विचारणा और भावना के क्षेत्र में वैसा बन सकना सम्भव नहीं है। कोई विद्यार्थी किताब पढ़ता-सुनता तो रहे पर समझे कुछ नहीं तो उसका उत्तीर्ण होना कठिन है। भावना क्षेत्र तो उससे भी ऊँचा है। उसमें क्रिया, विचारणा और भावना तीनों का समुचित समावेश होना चाहिए। तत्परता ही नहीं तन्मयता भी बढ़ती जानी चाहिए।
इस संदर्भ में यह मान्यता विकसित करनी चाहिए कि यह सुयोग दैवी अनुग्रह से ही मिला है। इस सौभाग्य का लाभ पूरी तरह उठाया जाय। इन दिनों न मन बिखरने दिया जाय न शरीर को आलस्य-प्रमाद में समय गँवाने दिया जाय। घर का चलता रहे और शरीर यहाँ घिसटता रहे तो इस उपहासास्पद स्थिति में दोनों ही क्षेत्रों की हानि होगी। घर की हानि इसलिए कि शान्ति-कुँज आकर घर का काम छोड़ा गया। यदि घर ही रहते तो घर का काम किया जा सकता था। चले आने पर तो वह भी नहीं हो सकता। यही बात युग तीर्थ में सम्पन्न की जा रही कल्प साधना के सम्बन्ध में भी। यदि मन को भी यहीं रोक रखा गया होता तो श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का भी समावेश रहता है और क्रिया के साथ विचारणा भावना का समुचित संयोग रहने से दोनों तार मिलने पर बिजली की धारा बहती, दो पहिए की गाड़ी आगे चलती है।
होना यह चाहिए कि जितने दिनों साधना के लिए स्थान विशेष में रहा जाय, उतने दिनों अपने आपको गृह निवृत्त, एकान्त सेवी, योगी-तपस्वी की मनोभूमि बनाकर रहा जाय। अपने कमरे को एक गुफा माना जाय और जिस प्रकार तपसी अपनी गुफा में एकान्त सेवन करते हैं लगभग उसी स्तर की मनोदशा अपनाकर रहा जाय। इन दिनों साँसारिक समस्याएँ सुलझाने, लोगों के साथ उलझने, लिपटने से दूर रहकर आत्म-समीक्षा में निरत रहा जाय। संचित कुसंस्कारों से छूटने और उज्ज्वल भविष्य का ढाँचा खड़ा करने की योजना बनाने में संलग्न रहा जाय। इसके लिए चिन्तन, स्वभाव, समय निर्धारण, कार्यक्रम, व्यवहार में जो परिवर्तन अभीष्ट है उसका शुभारंभ इन्हीं दिनों किया गया जाना चाहिए और इस अवसर को अभीष्ट प्रयोजन के लिए सर्वोत्तम मुहूर्त मानना चाहिए।
क्षुद्र और महान व्यक्तियों के बीच जो महत्वपूर्ण अन्तर पाया जाता है उसमें ढर्रा ही प्रमुख अवरोध और वही प्रधान संयोग होता है। अभ्यस्त ढर्रा कुछ ऐसा विलक्षण होता हे कि समूची जीवनचर्या उसी धुरी पर घूमती रहती है। महान परिवर्तनों के सन्धिकाल में मनस्वी लोग अपना ढर्रा ही बदलते हैं। पुरानी आदतें तथा रुचि भिन्नताएँ उसे स्वीकारने में जो आना-कानी करती हैं। उनसे कुछ दिन संकल्प और साहस के सहारे ही जूझना पड़ता है। इसके बाद तो सब कुछ इतना सरल स्वाभाविक हो जाता है कि अपनाई हुई रीति-नीति दिशाधारा ऐसी लगती है मानो सदा से इसी ढर्रे के बीच गुजारा होता रहा है। जेल के कैदी, अस्पताल के मरीज, खानाबदोश, शिकारी, आवारागर्दी और जहाँ-तहाँ छिपते फिरने वाले चोर डकैत तक जब अभ्यस्त ढर्रे में दिन काटते हुए किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव नहीं करते तो फिर कोई कारण नहीं कि उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अनुरूप उज्ज्वल भविष्य की जो प्रगतिशील रूपरेखा बनाई जा रही है, वह कुछ ही दिन में सुगम एवं व्यावहारिक न बन जाय। भावी जीवनचर्या का निरूपण इन्हीं दिनों होना चाहिए। जब भी अवकाश मिले तब यही ताना-बाना बुनते रहना चाहिए। अपने आपको सर्व-साधारण की, नर पशुओं की श्रेणी से ऊँचा उठाकर असाधारण, जागृत एवं महान प्रयोजन के लिए अवतरित हुआ व्यक्तित्व अनुभव करना चाहिए। सामान्य को असामान्य, क्षुद्र को महान बनाने में जिस सूझ-बूझ और साहसिकता के साथ निर्धारण करना और ढर्रा बदलना पड़ता है। उसके लिए ठीक यही समय है जो साधना की इस अवधि में ईश्वर की असीम कृपा से हस्तगत हो रहा है।
निर्धारित साधनाओं में से प्रत्येक में पूरा मनोयोग लगाना चाहिए और निर्धारित विधि विधान को भली-भाँति समझकर उसे यथावत् करने का प्रयत्न करना चाहिए। जितनी रुचि जागेगी उतना ही मन लगेगा और उतना ही आनन्द तथा प्रतिफल उपलब्ध होगा। प्रमुख बात है- अनुशासन का परिपालन, समय का निर्धारण तथा हर घड़ी व्यस्त रहने का उपक्रम। आलस्य-प्रमाद को हटा दिया जाय। जो भी काम सामने हो उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर भली प्रकार सम्पन्न करने का प्रयत्न किया जाय।
मूल प्रश्न है साधना अवधि पूरी करने के उपरान्त घर पहुँचने पर यही कैसे सिद्ध किया जाय कि ‘कल्प परिवर्तन’ सार्थक हुआ या व्यंग-विनोद का निमित्त कारण बना। शरीर संरचना में अन्तर आना कठिन है किन्तु गुण, कर्म, स्वभाव में भाव संरचना में महत्वपूर्ण हेर-फेर करना निश्चित रूप से सम्भव है। साधकों को यही करना चाहिए। इस संदर्भ में कुछ प्रसंग ऐसे हैं जिनमें यदि थोड़ा-सा परिवर्तन स्थायी रूप से करने का निश्चय कर लिया जाय तो उसका आश्चर्यजनक सत्परिणाम सामने हाथों-हाथ उपलब्ध होने लगेगा।
व्यक्ति, परिवार और समाजगत जीवन का पुनः निर्धारण इन तीनों क्षेत्रों के लिए निर्धारित पंचशीलों के आधार पर करने का प्रयत्न किया जाय। तीनों के निर्धारित सूत्र एवं अनुशासन ऐसे हैं जिन पर दिन में कम से कम एक बार तो बैठकर विचार कर ही लिया जाया करे कि इनमें से किन्हें कितनी मात्रा में किस प्रकार कार्यान्वित किया जाना सम्भव है। सब न सही, पूरी तरह न सही, उनमें से जितने बन पड़ें जितनी मात्रा में सम्भव हो सके उतना कार्यान्वित करने में तत्परता बरती जाय। संकल्प इतना सजग रखा जाय कि पुरानी आदतों के दबाव में बार-बार फिसलन उत्पन्न न करे। श्रेष्ठ निश्चयों को निबाहने में सत्संकल्प बढ़ता है। उसी को मनोबल या आत्मबल कहते हैं। यही है वह क्षमता जिसके सहारे सामान्यों का असामान्य, क्षुद्रों को महान बनने का सौभाग्य हस्तगत हुआ है।
जिस दिव्य प्रवाह के कन्धों पर युग विभीषिकाओं को निरस्त करने एवं सतयुगी वातावरण वाले उज्ज्वल भविष्य का पथ-प्रशस्त करने की जिम्मेदारी है, उसकी समर्थता और व्यापकता द्रुतगति से बढ़नी ही चाहिए। इस संदर्भ में मत्स्यावतार की पौराणिक गाथा अनायास ही स्मरण हो आती है, जिसने ब्रह्मा के कमण्डलु में अवस्थित छोटे से कीड़े के रूप में जन्म लिया था, किन्तु विस्तार इतनी द्रुतगति से किया कि उसका घड़े में तालाब सरोवर में निर्वाह न हुआ और अन्ततः पूरे समुद्र को अपने कलेवर से भर दिया। इसी संदर्भ में ऋषिवर अगस्त्य द्वारा तीन चुल्लू में समुद्र सोखने की गाथा सामने आ खड़ी होती है। युग विभीषिकाएँ क्या समुद्र जितनी गहरी है और क्या उन्हें कोई अगस्त्य अभी भी सोख सकेगा ? इस प्रश्न का उत्तर समय देगा। क्या समाधान के लिए अवतरित हुए प्रयास आरम्भ अत्यन्त तुच्छ और असहाय दीखने पर भी मत्स्यावतार की तरह द्रुतगति से विश्वव्यापी बन सकेंगे ? इसका उत्तर भी भविष्य के गर्भ में ही सन्निहित है, फिर भी वैसी आशा करने की पूरी सम्भावना प्रज्ञा अभियान की प्रस्तुत प्रगति को देखकर प्रतीत होती है।
बाल्यकाल में भी कृष्ण ने बन्दी ग्रह के प्रहरियों को तन्द्राग्रस्त करके वसुदेव के लिए भादों की उफनती यमुना को सहज तैरने योग्य बनाकर अपनी अलौकिकता का परिचय दिया था। छोटा बालक पूतना, अघासुर, बकासुर कालिया जैसे दैत्यों को खेल-खेल में ही धराशायी बना सके, यह कठिन प्रतीत होता है। फिर भी हुआ। दो बालकों का चाणूर, मुष्टिकासुर, कुवलिया से ही नहीं कंस, जरासिंध जैसों से भिड़ जाना और परास्त करके रहना समझ से बाहर की बात है। वैसे तो यह बात भी सामान्य समझ से बाहर की है कि सामयिक विकृतियों में परिवर्तन सम्भव हो सकेगा। युग प्रवाहों में अवतारों की यही विशेषता रही है कि वे असम्भव को सम्भव बनाते रहे हैं। समुद्र पर पुल बाँधना और उँगली पर गोवर्धन उठाना भी बुद्धि और तर्क का गणित सही सिद्ध नहीं कर सकता।
जान बचाकर ऋष्यमूक पर छिपे हुए सुग्रीव के चरण सेवक हनुमान यदि सचमुच बजरंगबली रहे होते तो अपने स्वामी की वैसी दुर्दशा ने देखते रहते। उनका निजी व्यक्तित्व इस योग्य न था कि लंबा जलाते और पर्वत उठाते। पाण्डव भी निजी रूप में सामान्य थे, अन्यथा क्यों जुआ खेलते, क्यों पत्नी हारते, क्यों उसका लज्जा हरण भरी सभा में देखते और क्यों वनवास की अवधि में जिस-तिस की चाकरी करते छिपते फिरते। किसी तूफान सहचर बनकर ही वे तनिक पत्तों की तरह आकाश में छाये और महाभारत के विजेता कहलाये। ऐसे असम्भवों को सम्भव करना ही अवतार काल की विशेषता रही। बुद्ध की आँधी आई तो उसने देखते-देखते समूचे एशिया का आँगन बुहार दिया। अदालत में बहस करते समय काँपने वाले गाँधी का वही परिवर्तन पराक्रम देखते ही बनता है, जिसमें उन्होंने कोटि-कोटि मानवों में प्राण फूँके और जिनके राज्य में कभी सूर्य अस्त न होता था, ऐसे महाबली अँग्रेजी के पैर उखाड़ दिये। भगवान के चमत्कार इसी रूप में देखे जाते हैं। निराकार को साकार बनने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बाजीगर की पर्दे के पीछे उँगलियाँ काम करती रहती हैं और कठपुतलियों का ऐसा नाच बन पड़ता है कि देखने वालों को आश्चर्यचकित होना पड़े।
युग परिवर्तन सामान्य बुद्धि के लिए अति कठिन है। 500 करोड़ मनुष्यों के शिर पर चढ़े हुए अनास्था रूपी असुर द्वारा जिस महाप्रलय का साज सँजोया गया है। उसे देखते हुए हर किसी को आतंकित पाया जाता है। अनौचित्य का आवेश महामारी की तरह समूचे वातावरण को विक्षुब्ध कर रहा है। आस्था संकट ने सुख-शान्ति और प्रगति की बुरी तरह कमर तोड़ दी है। छेड़खानी से क्रुद्ध प्रवृत्ति मदोन्मत्त हाथी की तरह आकाश से कहर बरसाने और सब कुछ कुचल मसलकर रख देने वाला रौद्र रूप धारण किया है। ऐसे अवसर पर महादैत्य की दुरभिसन्धियों को निरस्त करने में किन्हीं महा वाराह या महानृसिंह से ही आशा की जा सकती है।
विकृत मस्तिष्कों को उलट देने ओर देव चिन्तन को स्थानापन्न करने की सामर्थ्य सामान्य साधनों में कहाँ हो सकती है ? ऐसे महान प्रयोजन में परशुराम का फरसा ही अभीष्ट की पूर्ति कर सकता है। जलते धरातल और प्राणि समुदाय की प्यास कुछ बूँदों में बुझती न थी। उसकी परितृप्ति तभी हो सकती थी जब स्वर्ग से उतर कर गंगा धरती पर विचरे। इतने बड़े प्रयोजनों की पूर्ति में बादलों में बाँस से छेद करने की कपोल कल्पना बाल योजना काम नहीं दे सकती। इतना बड़ा कार्य भागीरथ की तप साधना ने ही सम्भव कर दिखाया। प्रस्तुत नरक जैसी विपन्नताओं को स्वर्गोपम सतयुगी सुसम्पन्नता में बदलने के लिए व्यक्ति तो अपनी विवशता भी व्यक्त कर सकते हैं। पर उस सृष्टा को असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के वचन से मुकरना नहीं है। जो बात मनुष्य के वश से बाहर की होती है, उसकी अनिवार्यता देखकर भगवान स्वयं आते और चमत्कारी परिवर्तन कर दिखाते हैं।
विपन्न परिस्थितियां सृष्टि के इतिहास में पहले भी अनेकों बार प्रस्तुत होती रहती हैं। जब मनुष्य द्वारा प्रस्तुत किये बिगाड़ विभीषिका के रूप में प्रकट हुए हैं और सुधार ने अपने को असमर्थ पाया है तो फिर कोई दैवी शक्ति ही उलटे को उलट कर सीधा करने के लिए अन्धकार को चीर कर ऊषा काल की तरह उभरी है। एक बच्चा भी आग का खेल करके खेत खलिहानों को जला देने वाला दावानल प्रकट कर सकता है पर जब उस अग्नि काण्ड को बुझाने के लिए साधारण प्रयत्न काम नहीं करते, तब शक्तिशाली अग्नि शामक दल सशक्त फायर ब्रिगेड सहित अथक परिश्रम से उसे काबू में लाते हैं। जब प्रान्तीय सरकारें ठीक तरह काम नहीं करतीं, तब राष्ट्रपति शासन लागू होता है और केन्द्रीय सत्ता के आधीन नये सिरे से नये निर्धारण होते?, नये कार्यक्रम चलते हैं। प्रस्तुत परिस्थितियों में दैवी उपाय उपचार ही यह आश्वासन प्रदान करते हैं कि निराश न हुआ जाय। आशा बँधाने वाले आधार अभी भी विद्यमान हैं। अन्धकार कितना ही सघन क्यों न हो, प्रभात उससे बड़ा है। जब दिनमान उगता है तो तमिस्रा के पलायन में देर नहीं लगती है भले ही वह कितनी ही काली, डरावनी व्यापक क्यों न हो ?
इस सृष्टि का नियन्ता इस भूमण्डल और मनुष्य समुदाय से कहीं बड़ा और कहीं सशक्त है। इस धरती का निर्माण उसने अपनी सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में किया है। मनुष्य को अपनी दृश्यमान प्रतिमा के रूप में गढ़ा है। उसे अपना युवराज और सृष्टि का मुकुट मणि भी बनाया है। यह कैसे हो सकता है कि वह धरती और मानवी सत्ता को इस प्रकार नष्ट हो जाने दे, जिस प्रकार कि वह इन दिनों होती दिखाई पड़ती है। नियन्ता को ऐसी विभिन्नताओं को समय-समय पर आते रहने की जानकारी थी इसलिए उसने सर्वसाधारण को आश्वस्त किया कि विभीषिकाओं का घटाटोप कितना ही सघन क्यों न हो उसे प्रलयंकर न बनने दिया जायेगा। सर्वनाश की घड़ी आने से पहले ही उसे रोक दिया जायेगा, यह सुनिश्चित है।
“यदा-यदाहि धर्मस्य ...................” वाले वचनों में सृष्टा का आश्वासन अभी भी यथावत् विद्यमान है कि अधर्म की बढ़ोत्तरी जब चरम सीमा पर जा पहुँचेगी और सुधार नियन्त्रण मनुष्य के काबू से बाहर प्रतीत होगा तो वे अवतार धारण करेंगे और उलटी परिस्थितियों को उलटकर सीधा करेंगे। यह मात्र वचन ही नहीं तथ्य भी है और प्रमाण भी। ऐसा समय-समय पर होता भी रहा है। भगवान के गत 9 अवतारों एवं भावी अवतार से सम्बन्धित कथाओं में इसी आश्वासन के चरितार्थ होने का सुविस्तृत वर्णन विद्यमान है। भगवान के समयानुकूल अवतरण की आशा पर ही मानवी गरिमा युग-युगान्तरों से जीवित है। अन्यथा राहु केतु का प्रकोप अब तक सूर्य चन्द्र को कब का उदरस्थ कर चुका होता।
स्पष्ट है कि निराकार परब्रह्म स्वयं साकार नहीं हो सकता। सर्वदेशी, सर्वव्यापी, एक देशी, सीमित कैसे बनकर रहे? पवन का घरौंदा किसी घोंसले पर कैसे बने ? सत्य व्यापक एवं निराकार है तो भी उसका सामयिक प्रमाण परिचय हरिश्चन्द्र जैसों के माध्यम से मिलता है। परमात्मा की इच्छा, योजना और प्रेरणा का परिवहन करने के लिए सदा जागृत आत्माओं को अग्रिम भूमिका निभानी पड़ती हे, तो भी वे मात्र निमित्त कारण ही रहते हैं और अपने पराक्रम के अनुरूप श्रेय पाते हैं। इतने पर भी यह स्मरण रखा जा सकता है कि महान कार्यों के लिए महान स्तर का महान पुरुषार्थ करने वालों की उत्पत्ति किसी महान के सूत्र संचालन पर होती है। इन दिनों प्रज्ञा पुत्रों के रूप में वरिष्ठ और विशिष्ट आत्माएँ युग चेतना के अवतरण को धारण करती और उसकी इच्छा योजना को कार्यान्वित करती देखी जा सकती हैं। फिर भी जिन्हें तथ्य तक पहुँचना हो उन्हें यही मानकर चलना चाहिए कि सामान्य बुद्धि तो पेट प्रजनन के चक्र में ही कोल्हू के बैल की तरह जीवन खपा देने को अभ्यस्त है। चौरासी लाख योनियों में रहते रहते जो उसने सीखा है, उसे वह अचानक भुला भी तो नहीं सकता। पानी को ऊँचे से नीचे की ओर बहने की आदत है। ऊपर की ओर उछालने के लिए कोई विशेष शक्ति चाहिए। प्रचलन संकीर्ण स्वार्थपरता का होने की दशा में कोई अनुकरणीय आदर्शों का स्वरूप प्रस्तुत करने में किससे प्रेरणा प्राप्त करे। एकाकी चलने वालों का जिस आस्था पर अडिग विश्वास होता है वस्तुतः उसी को युगावतार का अनुग्रह अनुदान कहना चाहिए। ऐसा सुयोग सौभाग्य इन दिनों प्रज्ञा पुत्र अर्जित करते दीखते हैं।
प्रभात की पूर्व सूचना सर्व साधारण को देने के लिए अग्रिम भूमिका निभाने का काम मुर्गी सम्पन्न करता है, तो भी वह प्रभात नहीं है। सूर्य की प्रथम किरण पर्वत शिखरों पर चमकती है तो भी इन शिखरों को किरण नहीं कहा जाता। अवतार तो प्रेरणा प्रवाह का नाम है। जागृत आत्माएँ समय को पहचानती और विजेता के साथ लगकर सहज श्रेय पाने का सौभाग्य दिलाने वाली दिव्य मेधा का- महाप्रज्ञा का अवलम्बन बिना आना कानी किये ग्रहण करती है। अवतारों की क्रिया परम्परा इसी रूप में सम्पन्न होती रही है। दिव्य प्रेरणाओं का परिवहन ऋषि कल्पों एवं महामानवों द्वारा सम्पन्न होता रहा है। उसी की पुनरावृत्ति इन दिनों भी होती देखी जा सकती है। युग परिवर्तन में निरत युग शिल्पियों की साहसिकता, तत्परता और सफलता को देखते हुए यह समझने में भी किसी को कठिनाई नहीं होनी चाहिए। कि ऐसी आदर्शवादिता का परिचय दे सकना किसी महान सत्ता का ही कार्य है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस महानता का प्रत्यक्ष स्वरूप उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है।
बिजली एक व्यापक प्राकृतिक शक्ति है, तो भी उसका प्रत्यक्षीकरण बल्ब, पँखे, हीटर, कूलर आदि की गतिविधियों को देखकर ही किया जाता है। ये उपकरण स्वयं में बिजली नहीं है तो भी उस शक्ति के परिवहन की विशिष्टता का परिचय देकर उपयोगी सिद्ध होते और श्रेयाधिकारी बनते हैं। वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों को तनिक सा श्रेय साहस अपनाने पर जो आत्म सन्तोष लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह का त्रिविध लाभ मिल रहा है उसका अनुसरण न बन पड़े तो भी विवेक साहस एवं कौशल की सराहना तो करनी ही चाहिए। समय निकल जाने पर सुयोग खो देने का पश्चाताप तो कितने ही करते रहते हैं, पर प्रशंसा उनकी है जो ऐसे सुयोगों को सौभाग्य मानते। युग धर्म कहते और उसे किसी भी मूल्य पर हाथ से नहीं जाने देते।
दैवी प्रयोजनों में छोटी छोटी भागीदारी लेकर भी अनेकों ने असाधारण लाभ अर्जित किये हैं। सुग्रीव विभीषण ही नहीं केवट, शबरी और गिलहरी भी छोटे बड़े सहयोग देकर कृतकृत्य हो गये। स्वतन्त्रता सैनिकों में से अनेकों को सत्त, पेन्शन एवं जन प्रशस्ति का लाभ मिला है। नरसी मेहता, सुदामा क्या घाटे में रहे ? बुद्ध अशोक, शंकराचार्य, मान्धता, समर्थ रामदास-शिवाजी, रामकृष्ण विवेकानन्द, प्रताप भामाशाह, विरजानन्द-दयानन्द, चाणक्य-चन्द्रगुप्त, गाँधी, बिनोवा आदि के ऐसे अनेकों युग्म भी हैं जिन्होंने मिल जुलकर युग चेतना का परिवहन किया और घाटे के सौदे में हाथ डालकर भी प्रचुर वैभव उपार्जित करने में सफल रहे। यह बीज सा गलने और वृक्ष सा फलने जैसी दूरदर्शिता जिन्हें भी उपलब्ध हुई है वे अनन्तकाल तक अपनी आत्म प्रेरणा को ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुकम्पा मानते और सदा सर्वदा असीम उल्लास के साथ उसका स्मरण करते रहे हैं।
प्रज्ञा पुत्रों का समुदाय ही इन दिनों प्रज्ञा अभियान का युक्तिपूर्ण सूत्र संचालन कर रहा है। विजयी तो सेना की देशभक्ति और साहसिकता ही होती है। चर्चा पड़े। प्रज्ञा अभियान की युगान्तरीय चेतना एक प्रकार की आँधी है जिसमें सहभागी बनकर तिनके पत्ते और धूलिकण भी गगनचुम्बी भूमिका निभाते देखे जा सकते हैं। युग चेतना एक बाढ़ है जिसके साथ चल पड़ने वाला कूड़ा करकट भी लहरों पर सवारी गाँठकर महासागर तक बिना प्रयास ही जा पहुँचने का आनन्द लाभ प्राप्त कर लेता है। आत्म पूँजी में इतना बड़ा श्रेय लाभ लेने वाले युग शिल्पियों की तुलना लाटरी जीतने वालों से ही की जा सकती है। लागत कम और मुनाफा अधिक मिलने के कारण व्यवसाय अवसर तलाशने में तो कोई कोई सफल होते हैं, पर प्रज्ञा पुत्रों के समुदाय को यह लाभ सर्वत्र मिल रहा है या मिलने के आसार बन रहे हैं।
युग सृजन में संलग्न होने और असीम श्रेय पाने के व्यवसाय में तनिक सी पूँजी लगती है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार करने मात्र से हर घड़ी जी को जीने वाली तृष्णा, महत्वाकांक्षा की आग पर ही पानी डालना पड़ता है। इसके उपरान्त समाधान हो जाता है। अन्न, वस्त्र की निर्वाह आवश्यकता जुटाने में जब केंचुए जैसे बिना हाथ, पैर, आँख, कान वाले प्राणी सफल हो जाते हैं तो मनुष्य ही क्यों भूख रहेगा ? परिवार को स्वावलंबी और सुसंस्कारी भर बनाने और उसका विस्तार सीमित रखने की सूझबूझ काम कर सके तो फिर किसी को भी यह न कहना पड़ेगा कि वह परिवार पोषण की व्यवस्था से पिसा जा रहा है और युग धर्म के निर्वाह हेतु कुछ भी कर सकने में असमर्थ है।
इस समय का सुयोग, परिवर्तन का सौभाग्य, मानव गरिमा का नव जागरण, दैवी चमत्कार आदि कुछ भी कहा जा सकता है कि इस विषम बेला में प्रज्ञा पुत्रों की भागीरथी आराधना चल पड़ी है। वे बसन्ती फूलों की तरह खिलते ओर लदते चले जा रहे हैं। आशंका थी कि इस घोर स्वार्थपरता के माहौल में वे उगेंगे नहीं बढ़ेंगे पनपेंगे नहीं, पर वह असमंजस अब दूर होता जा रहा है। प्रज्ञा परिजनों के रूप में युग शिल्पियों का एक नया समुदाय न केवल संख्या की वरन् स्तर की दृष्टि से भी युग चुनौती स्वीकारने के लिए अदृश्य आमन्त्रण के सहारे कार्य क्षेत्र में आ खड़ा हुआ है और कुछ कर गुजरने जैसा पराक्रम प्रकट कर रहा है।
स्वामी रामकृष्ण बगीचे में बैठे हुए ईश्वर चिन्तन में लीन थे। इतने ही में डा. महेन्द्रनाथ सरकार उधर आये और उन्होंने स्वामीजी को बाग का माली समझकर फूल तोड़ लाने को कहा। स्वामी जी मान अपमान से परे निर्मल स्थिति में थे, उन्होंने तत्काल फूल तोड़कर डाक्टर साहब को दे दिए। दूसरे दिन ये डाक्टर साहब स्वामी जी को देखने आये तब उन्हें अपनी भूल मालूम हुई और उनकी निराभिमानता पर द्रवित हो गये।
वस्तुतः महान, सन्त साधु व्यक्तियों की पहचान उनके अभिमान शून्य विनय युक्त, स्वभाव से ही की जाती है।
प्रज्ञा पुत्रों ने युग अवतरण के रूप में प्रज्ञा अभियान को युगान्तरीय चेतना को समझा और अपनाया है। ऐसे लोगों की मान्यता को क्रमशः बल ही मिलता आया है। प्रमाण परिणामों ने उनके विश्वास की पुष्टि की है। इन थोड़े से दिनों में सीमित साधनों से जितना कुछ कर सकना सम्भव हुआ हे उसका पर्यवेक्षण करने पर सभी गणितीय आधार गलत सिद्ध हो जाते हैं। सभी जानते हैं कि ऊँचे अनुभव, निष्णातों का सहयोग और समुचित साधनों का त्रिविधि सुयोग मिलने पर ही कोई बड़ी योजना चलती और सफल होती हे, पर जहाँ इन तीनों का अभाव हो वहाँ भी चमत्कारी परिणतियाँ सामने हो तो फिर उसी दैवी संयोजन का स्मरण करना पड़ेगा जिसके रहते “मूक होंहि वाचाल, पंगु चढ़हि गिरवर गहन” की उक्ति चरितार्थ होती है। इतने स्वल्प समय में, इतने स्वल्प साधनों में प्रज्ञा अभियान की हर क्षेत्र में हर घड़ी प्रकट होने वाली उपलब्धियों का सम्भव हो सकना सामान्य कार्य कारण सिद्धान्त के अनुसार सही नहीं बैठेगा। छोटे-मोटे प्रयासों की बिखरी हुई परिणतियों का लेखा जोखा ले सकता तो सम्भव नहीं पर बड़े प्रयासों से मिली बड़ी सफलता जो सर्वविदित है, उनका स्मरण तो सहज ही किया जा सकता है।
बीस लाख प्रज्ञा परिजनों के समुदाय में एक लाख वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों की सृजन शृंखला किन प्रयत्नों के आधार पर बन सकी, इसका एक ही उदाहरण है-वर्ष होते ही सूखी धरती पर एकाध सप्ताह के भीतर ही हरीतिमा की मखमली चादर बिछ जाती है। और उद्भिजों का समुदाय इतनी तेजी से प्रकट होता है मानों वे आकाश से बूँदों के साथ ही बरस पड़े हो।
प्रज्ञा अवतरण के लिए प्रथम सृजन और बड़ा प्रकटीकरण तन्त्र चाहिए। यह कहाँ से जुटा इसका उत्तर सामान्य बुद्धि के पास नहीं है। व्यास और गणेश से मिलकर अठारह पुराण रचे थे। पर उससे अनेक गुण समूचा आर्ष साहित्य जन-जन के सम्मुख प्रस्तुत कर देने में एक की लेखनी समर्थ हो गयी। इससे मानवी क्षमता की संगति कैसे बैठे? ईसाई मिशनों में अरबों-खरबों की पूँजी और लाखों करोड़ों की जनशक्ति मिलकर जितनी उपलब्धियाँ अर्जित कर सकीं, उसकी चुनौती मिट्टी के तेल वाली लैम्प के बीच बैठकर रात-रात भर लिखने वाली नगण्य सी समझी जाने वाली लेखनी कैसे कर सकी इसे कौर किसको समझाये और किस तरह इस अनबूझ पहेली को सुलझाये ?
धर्म तन्त्र को पुनः जीवित करने के लिए 2400 प्रज्ञा पीठों का निर्णय दो वर्ष के अंतर्गत हो जाना कितना कठिन रहा होगा। उसका उत्तर इस दिशा में योजना बनाने वाले विहारों संघारामों का ढाँचा खड़ा करने वाले बुद्ध अशोकों से चारों धाम खड़े करने वाले मान्धाता शंकराचार्य और निर्माण जीर्णोद्धार का ताना बाना बुनने वाली अहिल्याबाई जैसों से ही उतर प्राप्त किया जा सकता है।
जन-जागृति के लिए जन-संपर्क, जन संपर्क के लिए जन समर्थन, जन समर्थन से जन सहयोग उपलब्ध करने से ही यह सम्भव है कि जन-मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन करते हुए मनुष्य में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग अवतरण का समग्र विश्व कल्याण प्रयोजन पूरा किया जा सके। इस निमित्त कभी धर्म प्रचार की पदयात्रायें निरन्तर चलती थी। सुयोग्य युग पुरोहितों के नेतृत्व में धर्म प्रेमियों की मण्डलियाँ गाँव-गाँव पहुँचती और कथा कीर्तन के आधार पर जन-जन को धर्म धारणा जीवन्त रखती थीं। घर-घर अलख जगाने का उपक्रम भी इसी आधार पर गतिशील रहता था। उस जराजीर्ण मृत परम्परा को अब नये सिरे से पुनर्जीवित किया गया है। पदयात्राएँ भी जब तब किन्हीं राजनैतिक संस्थाओं द्वारा आत्म-ख्याति और जन आकर्षण के लिए की जाती है पर धर्म प्रचार की तीर्थ यात्राओं का जहाँ तहाँ क्षेत्र विशेष की पर्व परिक्रमाओं के रूप में जब तब जहाँ तहाँ छोटा सा स्वरूप दीख पड़ता है। वह प्रवाह एक प्रकार से अवरुद्ध ही हो गया जिसके द्वारा भारतीय जन-मानस में देव संस्कृति ने जड़ जमाई थी और जिसका लाभ समस्त में देव संसार ने उठाया। सन्तकाल तक यह परंपरा जीवित रही। भगवान बुद्ध ने इस प्रक्रिया को धर्म चक्र प्रवर्तन के हेतु अपने ढंग से कार्यान्वित किया और प्रायः एक लाख धर्म भिक्षु दीक्षित करके देश देशान्तरों में भेजे।
इसी हेतु उनके संकेतों पर नालन्दा और तक्षशिला में दो विश्व विद्यालय विनिर्मित किये गये। नालन्दा में भारत के भाषाई क्षेत्रों के लिए और तक्षशिला में संसार भर के भाषा भाषी क्षेत्रों के आधार पर युग प्रवक्ता तैयार किये जाते थे। उस महा क्रान्ति ने अपने यौवन काल में संसार की काया पलट दी थी जो समय की आवश्यकता देखते हुए उन दिनों अनिवार्य भी थी।
उसी बुद्ध परम्परा का उत्तरार्ध इन दिनों प्रज्ञा अभियान द्वारा सम्पन्न किया गया है। सहस्रों पदयात्रा टोलियाँ जीपों, मोटर साइकिलों, साइकिलों पर आवश्यक साधन उपकरण लादकर गाँव-गाँव पहुँचने लगी। युग कीर्तन और प्रज्ञा पुराण प्रवचनों द्वारा जन-मानस को झकझोरती और समय के अनुरूप बदलने के लिए संपर्क क्षेत्र को वह अवगत अनुप्राणित कर रही हैं। हर दिन लाखों व्यक्ति इस आधार पर अभिनव आलोक से दिशा प्राप्त करते और युग परिवर्तन के परिवर्तन प्रवाह में सम्मिलित होते हैं।
युग शिल्पियों का उत्पादन बौद्ध भिक्षुओं और ईसाई प्रचारकों की तरह संख्या और स्तर की दृष्टि से इतना हो रहा है, जिस पर गर्व नहीं तो सन्तोष अवश्य ही किया जा सकता है। भाषाई क्षेत्रों में काम करने वाले विभिन्न धर्म-संस्कृतियों के अनुरूप प्रचार प्रतिपादन करने वाले युग पुरोहितों का निरन्तर उत्पादन प्रशिक्षण शान्ति कुँज गायत्री तीर्थ में होता रहता है कभी इस प्रयोजन के लिए तीर्थ आरण्यकों द्वारा महती भूमिका सम्पन्न की जाती थी अब सीमित किन्तु तीखे रूप से उसी पुण्य प्रक्रिया की गायत्री तीर्थ हरिद्वार में अभिनव प्राण प्रतिष्ठा की गई है। यहाँ जन साधारण के लिए आत्म शोधन और आत्म परिष्कार की सामयिक साधना व्यवस्था भी वैसी ही उपलब्ध है, जैसी कि थके माँदों को सेनिटोरियमों में राहत मिलती है।
बुद्ध शरणं गच्छामि धम्मं शरणं गच्छामि संघ शरण गच्छामि के पुरातन उद्घोष अब बौद्धिक क्रान्ति नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति के रूप में नये सिरे से नई समस्याओं के संदर्भ में कार्यान्वित होते देखे जा रहे हैं। यह बस कैसे हो रहा है, इसकी पृष्ठभूमि में तो हर्षवर्धन, बिम्बिसार, अशोक जैसे श्रीमन्त और आनन्द मौदगल्यायन, कुमार जीव जैसे महाप्राज्ञ भी नहीं है, फिर भी उपहासास्पद गणेश वाहन मूषक किस प्रकार विश्व परिक्रमा की चुनौती जीतने निकल पड़ा इसे टिटहरी के समुद्र पाटने जैसे दुस्साहस की संज्ञा दी जाय तो तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
भौतिक विज्ञान झाग की तरह उफना तो सही, पर बबूले की तरह बैठने में उसे देन भी नहीं लग रही है। लकड़ी, कोयला तेल जैसे ईंधन समाप्त होने के गिने चुनो रह गये। अब वह दिन निकट है, जब बैल गाड़ियों द्वारा मोटरें खींची जाया करेगी, और रेलवे इंजन रेल के टीलों की तरह जहाँ तहाँ खड़े दिखाई देंगे। मनुष्य को अतिशय विलासी अहंकारी, और उद्दण्ड बनाने के उपरान्त अब वह अणु आयुधों, विकिरणों द्वारा हिरण्याक्ष की तरह धरती को रसातल में पहुँचा देने की योजना बना रहा है। चरम सीमा तक पहुंची हुई कृत्रिमता तथार्थता को निगल जाने के प्रयास में साँप छछून्दर जैसे असमंजसों में फँस गई है। विज्ञान का भस्मासुर न जाने कब क्या कर बैठे, इस आशंका से सर्वत्र आतंक छाया दीखता है।
इस असमंजस की बेला में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान ने शक्ति भण्डार के उच्चस्तरीय तीन शक्ति स्रोत खोज निकालने का निश्चय किया है। एक मानवी अन्तराल की उत्कृष्टता योगाभ्यास द्वारा मन्त्र शक्ति के माध्यम से अतीन्द्रिय क्षमता के रूप में एक ऐसी प्राण ऊर्जा सिद्ध हो सकती है, जिससे अन्तरिक्ष पर आधिपत्य स्थापित किया जा सके। दूसरा मानवी काय कलेवर में काम करने वाली विद्युत शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति के रूप में इस प्रकार सर्व सुलभ बनाने का प्रयास जिससे भूलोक में कहीं भी सामर्थ्य की कमी न रहे। मानव शरीर ही बहुमूल्य यन्त्रों की भूमिका निभाने लगे और सामर्थ्य के अभाव में कहीं किसी का काम रुके नहीं। तीसरा पदार्थ की अदृश्य शक्ति को अग्निहोत्र के सहारे इस योग्य बनाया जा रहा है कि वह इस धरातल को सरसता प्रदान करने वाले समुद्र की तरह विभूतियों की अक्षय भण्डार सिद्ध हो सके, शारीरिक और मानसिक रोगों पर विजय पायी जा सके। आकाश से सम्पदा का भण्डार प्राणपर्जन्य के रूप में बरसाया जा सके, और प्रस्तुत प्रदूषण को नील कण्ठ की तरह पचाकर विनाश के महासंकट से त्राण दिलाया जा सके। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के उपरोक्त तीन संकल्प यदि पूरे होते हैं, तो यह भी कहा जा सकता है, कि भौतिक विज्ञान के अद्यावधि बन पड़े प्रयासों की तुलना में यह अकेला ही कहीं अधिक भारी बैठेगा।
इतनी बड़ी भूमिकाएँ पिछले दिनों किसी प्रकार सम्पन्न हुई ? उनका उत्तर श्रम, कौशल, और साधनों की मात्रा के आधार पर लगाने से किसी भी प्रकार नहीं मिल सकता। सन् 1965 में सम्पन्न हुआ मथुरा का सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ अभी भी लोगों की स्मृति में है, जिसमें देश के चुने हुए 4 लाख प्रगतिशील धर्म परायण व्यक्ति एकत्र हुए थे और मिशन का ढाँचा खड़ा किया गया था। इतने लोगों के लिए निवास भोजन, सफाई आदि की बहुमुखी व्यवस्था में कितना श्रम और कितना धन लगा था। इसे देखकर दर्शकों की आंखें फटी रह गयी थीं। कर्ता की योग्यता और क्षमता के साथ इतने बड़े सरंजाम की कोई संगति न बैठते देखकर हर किसी ने उसे दैवी चमत्कार कहा था। वह दृश्य घटना थी अदृश्य योजनाओं, उनकी गतिविधियों, प्रतिक्रियाओं और सफलताओं की जिन्हें निकटवर्ती जानकारी है वे अभी भी यह अनुभव करते हैं कि इसके पीछे कोई अदृश्य सत्ता का नियमन होना चाहिए।
मिशन की अगणित गतिविधियों के निमित्त पग-पग पर अर्थ साधनों की आवश्यकता पड़ती थी। इसका स्रोत दस-दस पैसे जमा करने वाले ज्ञान घट और एक-एक मुट्ठी अनाज संग्रह करने वाले धर्मघट हो सकते हैं इस बार पर कौन विश्वास करेगा ? जन-सहयोग की व्यवस्था और गम्भीरता रहने पर बूँद बूँद सहयोग से घड़ा भर सकता है यह बात लोकोक्ति के रूप में ही सुनी गयी है। किसी ने अब तक इसका प्रयोग नहीं किया। ऐसे संग्रह की कल्पना तो कई करते रहे हैं पर किसी ने उसे व्यवहार में उतारा हो और इस स्तर तक सफल बनाया हो, यह अब तक कहीं भी देखने में नहीं आया लोगों श्रीमन्तों के सम्मुख पल्ला पसारते रहे। सरकारी सहायता के लिए ताने बाने बुनते रहते हैं, पर जन शक्ति के सहारे इतना सुदृढ़ ढाँचा खड़ा कर दिखना यह सिद्ध करता है कि जन सहयोग की शक्ति ही प्रत्यक्ष दुर्गा है। उस सिंहवाहिनी की अनुकम्पा अर्जित कर लेने पर महिषासुरों, मधुकैटभों, सुन्द-उपसुन्दों के द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले संकटों का निराकरण होने में देर नहीं लगती। वह जिस पर अनुग्रह करती उसे निहाल कर देती है। जन सहयोग एवं शक्ति की गरिमा पौराणिक काल में समुद्र सेतु बाँधने और गोवर्धन उठाने वालों ने देखी थी। पिछले दिनों उसे बुद्ध गाँधी ने प्रत्यक्ष कर दिखाया था। वर्तमान में उसका अभिनव प्रयोग प्रज्ञा अभियान के रूप में किया गया है। वह पूर्व परीक्षाओं की तुलना में किसी प्रकार पीछे नहीं रहा है। यही है वह दैवी चमत्कार जिसे युगान्तरीय चेतना भी कहा जा सकता है। इसी को प्रतीक चिन्ह बनाकर “लाल मशाल’ की कल्पना और निर्धारण की गयी है।
युग समस्याओं के समाधान में मूर्धन्यों को आगे आना चाहिए। क्योंकि यह विनाश उत्पादन उन्हीं के द्वारा हुआ है। अस्तु प्रायश्चित भी उन्हीं को करना चाहिए था और खोदी हुई खाई को पाटने में अपनी भलमनसाहत का परिचय देना चाहिए था। किन्तु वैसा कुछ बनते दीखता नहीं समर्थ यदि चाहते तो जिस शक्ति को विनाश के लिए नियोजित करते रहे हैं उसे पलटकर सृजन के लिए भी लगा सकते थे और प्रस्तुत कठिनाइयों का हल करने में बहुत हद तक सफल हो सकते थे। पर लगता है उनने अपने द्वार ही नहीं कान भी बन्द कर लिये हैं और अपनी उपेक्षा एवं असमर्थता को एक प्रकार से स्पष्ट ही कर दिया है।
शासनाध्यक्ष कहते हैं- हमें युद्ध की तैयारी, पद की सुरक्षा और तन्त्र को खड़ा रखने से ही फुरसत नहीं धर्माध्यक्ष कहते हैं- चेली चेले मूँड़ने के लिए हमें न जाने कितने पाखण्ड करने पड़ते और जाल बुनने पड़ते हैं उसे सम्भालकर अपना धन्धा जारी रखें कि सृजन की बात सोचें ? श्रीमन्तों का कथन है कि हमें शुद्ध वनस्पति, नशा उत्पादन, सिनेमा होटल जैसे लाभदायक धन्धों में ही रुचि है। समाज सेवा की बात किसी बैरागी से कहिए। साहित्यकार और कलाकारों ने सरस्वती की आराधना करने की अपेक्षा उसे श्रीमन्तों की रखैल बनना स्वीकार का कर लिया है और लेखनी, गायन, अभिनव जैसे कला कौशलों को श्रीमन्तों की कृपा पात्र बनने निमित्त गिरवी रख दिया है। पराक्रमी, दुस्साहसी संघर्षशील योद्धाओं ने अनीति से लड़ने की परम्परा त्याग दी है और वे तस्करों दस्युओं के दलों में सम्मिलित होकर आतंक अपराधों में निरत रहकर अपनी शूर वीरता का परिचय देने लगे हैं। सूर्य-चन्द्र जैसे मूर्धन्यों का सहयोग न मिलने पर इन दिनों कार्तिकी अमावस्या जैसा घनघोर अन्धकार संव्याप्त है। इससे निपटे कौन ? इसमें आशा की किरण एक ही रह गयी है। छोटे दीपकों को जलाने के लिए कटिबद्ध किया जाय उनकी संयुक्त शक्ति से पावन दीप पर्व मनाया जाय।
नव-जागरण का द्वार-द्वार पर अलख जगाते हुए जन-जन से कहा जाता है मानवी गरिमा को मानवी निर्धारणों को छोटी सभी अदालतों ने हरा दिया है उसे न्याय और आश्वासन दिला सकने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी है। अब जनता की अदालत ही सुप्रीम कोर्ट की तरह शेष बच रही है। वही चाहे तो मानवी अस्तित्व और भविष्य के संरक्षण में अपनी भूमिका निभा सकती है। माना कि जन शक्ति इन दिनों हर दृष्टि से जर्जर है उसकी क्षमता का दोहन अनेक वर्गों द्वारा हो रहा है, ऐसी दशा में दीन दुर्बल रहते हुए भी वह क्या करे कैसे करें ? देखने में यह दयनीयता भी वास्तविकता जैसी लगती है, पर वस्तुतः है वह कृपणता ही चिन्तन की विकृति ही है।
सिंहनी के छः थनों से छः बच्चे एक साथ दूध पीते देखे गये हैं। ऐसी दशा में लगता है कि वह बेचारी निचुड़ गई। अब किसी पराक्रम के योग्य नहीं रही, फिर भी देखा जाता है, कि वह छेड़खानी करने वालों पर टूट पड़ने की स्थिति में भी बची रहती है। बच्चों को दूध पिलाने से वह इतनी असमर्थ नहीं हो जाती कि आखेट न कर सके। जन शक्ति को सिंहनी कहा जा सकता है, कि वह शासन को, धर्मतन्त्र को श्रीमन्तों को साहित्य मनीषियों को, कलाकारों को ही नहीं, दस्यु तस्करों तक की उदरपूर्ति करती है। कुरीतियाँ अवाँछनीयताएँ, दुर्व्यसनों, कुप्रचलनों के जोंक कन-खजूरे उसे अलग से चूसते रहते हैं। इस पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए, कि उसकी सामर्थ्य चुक गई, जो बचा है वह ही इतना है कि इतने भर से भी दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण और सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण सम्भव हो सके। विभीषिकाओं के उन्मूलन और उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में अब उसी का दरवाजा खटखटाने का, उसी देहरी पर धरना देने का प्रज्ञा अभियान ने निश्चय किया है और घोषित किया है, कि युग परिवर्तन की महान योजना को पूरी करने के लिए जो कुछ आवश्यक है उसे इसी कल्पवृक्ष की आराधना करके उपलब्ध किया जायेगा।
जिन्हें विभीषिकाओं का उन्मूलन और उज्ज्वल भविष्य का नव सृजन अभी भी कठिन लगता है, वे प्रभातकाल का अरुणोदय का दृश्य देखें और समझे कि नियन्ता की एक स्फुरणा किस प्रकार संव्याप्त अन्धकार को निगल जाने, सर्वत्र आलोक का उल्लास और पराक्रम का वातावरण बना देने का चमत्कार प्रस्तुत कर सकती है। युग परिवर्तन को परिकल्पना नहीं, सुनिश्चित सम्भावना समझा जाना चाहिए।
शीत ऋतु स्वास्थ्य संवर्धन एवं डटकर पढ़ने की तरह आध्यात्मिक साधनाओं के लिए भी सर्वोत्तम मानी जाती है। शीत प्रदेश के निवासी अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर, बलिष्ठ और दीर्घ जीवी होते हैं हिमालय में साधनात्मक सफलताएँ वहाँ की जिन विशेषताओं के कारण उपलब्ध होती हैं उनमें वहाँ का शीत प्रधान वातावरण भी एक बड़ा कारण है।
शान्ति कुँज में यो कल्प साधना सत्र चलते तो निरन्तर है पर गर्मी के दिनों में पर्यटकों की घुस पैठ और अनगढ़ अनुशासन हीनता फैलाते रहने के कारण भी वातावरण अशान्त बना रहता है। ऋतु भी साधना के अनुकूल नहीं पड़ती। इसलिए साधना का प्रतिफल भी अपेक्षाकृत कुछ कम ही रहता है। सर्दी के दिनों में उत्तराखण्ड यात्रा बन्द हो जाने से भीड़ भी स्वभावतः कम हो जाती है। साधना में मन लगना है। वातावरण शान्त रहता है और मार्गदर्शकों को पर्यटकों की हठवादिता से उत्पन्न खोज भी नहीं रहती। ऐसी दशा में साधना की सफलता का अनुपात भी बढ़ा चढ़ा रहना स्वाभाविक है।
अब सर्वत्र तापमान बढ़ गया है। हरिद्वार भी उतना ठण्डा नहीं रहा, जितना कभी था। फिर जिन्हें आवश्यकता होती है, स्नान के लिए गर्म पानी का प्रबन्ध भी रहता है। आश्रम में सारे दिन सर्वत्र धूप रहती है इसलिए सर्दी लगने का उतना खतरा नहीं रहता जैसा कि आम लोग समझते हैं। बिस्तर कपड़े पूरे लेकर चलने और दुर्बलों, वृद्धों, बच्चों को साथ न लाने पर साधना में सुविधा और सफलता अधिक रहती है।
इस वर्ष जिन लोगों को स्वीकृति प्राप्त करके भी कल्प सत्रों में सम्मिलित होना नहीं बन पड़ा अथवा स्वीकृति ही नहीं मिली, उन्हें उस कमी की पूर्ति अब दीवाली से होली के बीच चार माह में कर लेनी चाहिए। इन दिनों इच्छित समय की स्वीकृति सुविधापूर्वक मिल जाती है। यों व्यस्त लोगों के लिए नौ-नौ दिन के छोटे सत्र भी 1 से 9, 11 से 19 और 21 से 29 के चलते रहते हैं पर अच्छा यही है कि एक महीने के समय सत्र में आया जाय। इन दिनों एक महीने के सत्र वालों को अधिक दबाव के कारण नौ दिन में ही निपटाने की जल्दी भी नहीं पड़ती ।
विशेष बात यह है कि अब कल्प सत्रों के साथ युग शिल्पी सत्र भी जोड़ दिये गये है। इसलिए परिश्रम तो आठ दस घण्टे नित्य करना पड़ता है किन्तु एक ही समय में दुहरा लाभ प्राप्त करने का सुयोग भी मिल जाता है। अब सभी प्रज्ञापीठों और चल प्रज्ञा संस्थानों में नई चेतना आई है। सभी में सक्रिय और तत्परता बढ़ी है। कार्यक्रमों का भारी विस्तार हुआ है। अतएव सर्वत्र संचालन में दस प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता भी कई गुनी बढ़ गई है। इसके लिए सभी संस्थान अपने-अपने कार्यकर्ताओं को एक महीने के युग शिल्पी प्रशिक्षण में भेजते हैं। इस निमित्त शीतऋतु ही अधिक उपयुक्त बैठती है उसमें अधिक अभ्यास कर सकना सम्भव होता है। कल्प साधना तो साथ-साथ चलती ही रहती है। यह लाभ अतिरिक्त है।
सुगम संगीत, भाषण कला, जड़ी बूटी उत्पादन एवं उपचार, गायत्री यज्ञ, जन्म दिवसोत्सव, स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन, ज्ञानरथ संचालन आदि की शिक्षा तो युग शिल्पियों को पहले भी दी जाती थी। अब प्रज्ञा पीठों के लिए निर्धारित कार्यक्रम का प्रशिक्षण भी साथ में अतिरिक्त रूप से जोड़ दिया गया है। बाल संस्कारशाला (ट्यूटोरियल क्लास) व्यायामशाला खेल-कूद ड्रिल स्काउटिंग, फर्स्ट एड, (रोगी परिचर्या), हरीतिमा संवर्धन (घरों में शाक वाटिका तथा पुष्पोद्यान लगाना) सामूहिक श्रमदान से स्वच्छता अभियान जैसे कार्यक्रम हर प्रज्ञापीठ की इमारत में चला करेंगे। बिना इमारत बले चल प्रज्ञा संस्थान भी किसी की इमारत माँगकर इन्हें कार्यान्वित करेंगे। इसके लिए अनिवार्यतः प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पड़ेगी। यह अनुभव अभ्यास युग शिल्पी सत्रों में सम्मिलित हुए बिना सम्भव नहीं। यह दुहरा लाभ प्रदान कराने की व्यवस्था इस सर्दियों में अधिक अच्छी तरह चलाई जा रही है। गर्मी आते ही भीड़ भाड़ मौसम एवं खोज अराजकता की स्थिति में असुविधा का माहौल आ धमकेगा और उतना लाभ न होगा जितना इन दिनों सम्भव है।
सुशिक्षित समयदानियों के लिए सर्दी के दिनों में ही शान्ति कुँज में रहकर लेखन अध्यापन जैसे कार्य करने की आवश्यकता रहती है। जो न्यूनतम तीन महीने का समय दें उन्हें ही यहाँ रहने का अवसर मिलेगा। अन्य ऋतुओं में तो प्रवास पर भेजने की व्यवस्था ही उनके लिए रहती है। उपरोक्त प्रयोजनों के लिए आवेदन भेजकर समय रहते अपना स्थान सुरक्षित करालें। इस सम्बन्ध में निर्णय शीघ्र लें।
(लाखनसिंह भदौरिया)
माँ तेरे चरणों में गिर, हम शपथ उठाते हैं। तेरी, प्रेरणा-प्रभा, माथे पर तिलक लगाते हैं॥
तेरा करुणा क्रन्दन सुनकर और न सोयेंगे। बहुत खो चुके हम प्रमाद में और न खोयेंगे॥
भरे हृदय में आग, क्रान्ति का शंख बजाते हैं। तेरी, प्रेरणा-प्रभा, माथे पर तिलक लगाते हैं॥
हम जाग चुके हैं मातु, प्रात है फिर सोना कैसा। यह सारा संसार बदल देंगे अपना जैसा॥
हम प्राणों के दीप, आँधियों बची जलाते हैं। तेरी, प्रेरणा प्रभा, माथे पर तिलक जलाते हैं।
जो तेरे वरदान अकड़ना उन पर फिर कैसा। तेरे हैं अनुदान, प्राण धन ज्ञान-मान पैसा।
जिन्हें नहीं है ज्ञान वही भूले इतराते हैं। तेरी, प्रेरणा प्रभा माथे पर तिलक लगाते हैं॥
मौज मटरगस्ती, मनमानी मस्ती छोड़ेंगे। जीवन रचना में, प्राण को सत्व निचोड़ेंगे॥
गीत नहीं गाते, हिलोर में हम लहराते हैं। तेरी, प्रेरणा प्रभा माथे पर तिलक लगाते हैं॥
प्राण-प्राण का सार, प्यार सब में लहरायेंगे। यह सारा संसार एक परिवार बनायेंगे॥
समय देवता के चरणों में अर्घ्य चढ़ाते हैं। तेरी, प्रेरणा-प्रभा, माथे पर तिलक लगाते हैं॥
हम अनीति की जड़े हिला, दुवृत्ति मिटायेंगे,। शुचिता समता मनुष्यता के दीप जलायेंगे॥
प्रज्ञा प्राण प्रभा फैलाकर, हम मुस्काते हैं। माँ तेरे चरणों में गिर हम, शपथ उठाते हैं॥
*समाप्त*