शान्ति-कुँज गायत्री तीर्थ हरिद्वार में इन दिनों नव सृजन की गतिविधियों के कितने ही नये वर्गों को प्रतिष्ठापना हुई है। युग पुरोहित के निर्माण की बहुमुखी योजनाओं को कार्यान्वित करने के प्रायः उसी स्तर के प्रयास चल पड़े हैं, जैसे नालन्दा आर तक्षशिला विश्वविद्यालयों में किसी समय चलते थे।
कार्य विस्तार को देखते हुए वर्तमान इमारत कम पड़ रही है नई बनने का सुयोग तो बन नहीं रहा है, पर अवाँछनीय भीड़-भाड़ में कटौती करना तो पूर्णतया अपने हाथ की बात है। स्थान की कमी अधिक न अखरे इसलिए उसे पुराने प्रतिबन्ध को नये सिरे से कड़ाई के साथ लागू किया जा रहा है, जिसमें पर्यटकों, घुमक्कड़ों, यात्रियों को यहाँ न ठहरने के लिए बार-बार मना किया जाता रहा। इससे घोर अव्यवस्था, और अराजकता स्तर की अनुशासनहीनता फैलती है, रोकथाम करने पर कटुता उत्पन्न होती है और मनोमालिन्य बढ़ता है। पर्यटन मनोरंजन का दौर मुद्रा स्फीति दिन-दूना रात-चौगुना होता, बढ़ता जा रहा है। हरिद्वार में भी हर समय भारी भीड़ रहती है उनमें से अनेकों शान्ति-कुँज के परिचित भी होते हैं। अनेक सुविधाओं की बात देखकर यहाँ ठहरने की बात सोचते हैं, पर इस दबाव में आश्रम की व्यवस्था का एक प्रकार से सर्वनाश ही हो जाता है।
पर्यटकों के लिये यही उचित है कि वे सर्वप्रथम किसी धर्मशाला, होटल में टिकें। 12 से 4 के बीच शान्ति-कुँज दर्शन परामर्श के लिये आवें। दर्शनीय सभी स्थान नगर में हैं। शान्ति-कुँज नगर से 7 किलोमीटर दूर है। आने-जाने में ढेरों पैसा और समय खर्च होता है अस्तु हर दृष्टि से धर्मशाला आदि ठहरना ही उपयुक्त पड़ता है। शान्ति-कुँज में रहने पर कठोर अनुशासन न पालने का आक्षेप व्यवस्थापकों की ओर से लगता है और आगन्तुक सुविधा ने मिलने की शिकायत करते हैं। दोनों ओर से एक दूसरे पर दोषारोपण होने से मनोमालिन्य बनता है और कटुता उभरती है। परिणामतः जो सद्भाव पहिले था, वह बढ़ने के स्थान पर घटता ही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थित हर दृष्टि से दोनों पक्षों के लिए कष्टकारक सिद्ध होती है।
इस सूचना द्वारा सभी प्रज्ञा परिजनों को पर्यटकों की भीड़ शान्ति-कुँज ठहरने के लिए न भेजने के लिए कड़ाई के साथ निर्देश दिया जा रहा है, जिन्हें आवश्यक काम को वे काम की बात करने जितने समय तक ही रुकें। ठहरने का प्रबन्ध धर्मशाला, होटल आदि में करें। पर्यटकों के झुण्ड यदि ठहरने के लिए शान्ति-कुँज पहुँचेंगे तो उन्हें उसी वाहन में तत्काल वापस लौटा दिया जायेगा जिससे कि वे आये थे इस निर्धारण को सभी परिजन नोट करे लें।
वर्ष-46 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-9
आग के बिना न भोजन पकता है, न सर्दी दूर होती है और न ही धातुओं को गलाना ढालना सम्भव हो पाता है। आदर्शों की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि उनके प्रति निष्ठा की गहराई कठिनाइयों की कसौटी पर कसी और खरे-खोटे होने की यथार्थता समझी जा सके। बिना तपे सोने को प्रमाणिक कहाँ मना जाता है ? उसका उपयुक्त मूल्य कहाँ मिलता है ? यह तो प्रारम्भिक कसौटी है।
कठिनाइयों के कारण उत्पन्न हुई असुविधाओं को सभी जानते हैं, इसलिये उनसे बचने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रयत्न के लिये मनुष्य को दूरदर्शिता अपनानी होती हे, हिम्मत का सहारा लेना पड़ता है और उन उपायों को ढूँढ़ना पड़ता है जिनके सहारे विपत्ति से बचना संभव हो सके। यही है वह बुद्धिमानी जो मनुष्य को यथार्थवादी और साहसी बनाती है। जो कठिनाइयों में प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने के लिये पराक्रम नहीं किया, समझना चाहिए कि उन्हें सुदृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण का अवसर नहीं मिला। कच्ची मिट्टी के बने बर्तन पानी की बूँद पड़ते ही गल जाते हैं। किन्तु जो देर तक अवे की आग सहते रहे हैं, उनकी स्थिरता, शोभा और उपयोगिता कहीं अधिक बढ़ जाती है।
तलवार पर धार रखने के लिए उसे घिसा जाता है। जमीन से सभी धातुएँ कच्ची निकलती हैं। उनका परिशोधन भट्टी के अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्भव नहीं। मनुष्य कितना विवेकवान, सिद्धान्तवादी और चरित्रनिष्ठ है, इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजर कर इस तप-तितीक्षा में पककर ही हो पाती है।
विष्णु भगवान ने लक्ष्मी जी से कहा ‘मनुष्य को बनाये और संसार की सुव्यवस्था का काम सौंपे बहुत दिन हो गये। देखने की इच्छा है कि वह किसी स्थिति में है और क्या कर रहा है। उसे नया मार्गदर्शन देने धरती पर जाने का मन है।
लक्ष्मी जी ने कहा- मनुष्य का बुरा हाल है। उसने कर्त्तव्य को तिलाँजलि दे दी है। लोभ और मोह को छोड़कर और किसी में उसकी रुचि नहीं रहीं। उसके पास जाना व्यर्थ है। सुधरेगा तो है नहीं। उलटे आपको भी जाल में फँसाने का प्रयत्न करेगा। मत जाइए।
विष्णु भगवान अपनी बात पर अड़ गये। लक्ष्मीजी के विरोध का स्वर भी तीखा होता गया। बात का बतंगड़ बना और क्या करना क्या न करना, यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। भगवान ने चलने की तैयारी कर ली। लक्ष्मीजी ने तैश में ताना देते हुए कहा- “मनुष्य को सुधारे बिना लौटना मत।”
धरती पर भगवान का आगमन सुनकर अनेक लोग उनसे मिलने पहुँचे। कर्त्तव्य धर्म की चर्चा कोई सुनने को तैयार न था। सभी एक ही रट लगाये हुये थे। “हमारी मनोकामनाएँ पूरी करो।” भगवान ने बार-बार समझाया - “आप लोगों की आवश्यकताएँ कम हैं और साधन अधिक। फिर निर्वाह में क्या और क्यों कमी पड़नी चाहिए। आप लोग जब साधन सम्पन्न बनाकर भेजे गये हैं, तो लक्ष्य कर्त्तव्य की और ध्यान क्यों नहीं देते ? इस अनुदान को सार्थक क्यों नहीं बनते ?
सभी ने भगवान की बात अनसुनी कर दी और बढ़ी-चढ़ी मनोकामनाएँ पूरी करने का आग्रह करते रहे।
भगवान झल्ला गये और मनुष्य की धूर्त्तता से चिढ़कर कहीं ऐसे स्थान को तलाश करने लगे जहाँ कोई मनुष्य पहुँच न सके। वापस बैकुण्ठ तो जाना नहीं था। लक्ष्मी जी के सामने हेटी जो होती।
छिपने का स्थान उन्हें हिमालय का बद्रीनाथ शिखर देखा, जो चुपके से वहीं खिसक गये। भक्तजनों की चतुरता का क्या कहना। उनने छिपने का स्थान तलाश कर लिया और कठिन रास्ता पार करके भी वहाँ जा पहुँचे। भगवान ने समझा शायद यहाँ भले लोग आते होंगे और ज्ञान ध्यान की चर्चा करेंगे। पर कुछेक से मिलने के बाद ही उन्हें निराशा हो गई। पैसा-बेटा की माँग के अतिरिक्त यहाँ सिद्धि और स्वर्ग की कामना और जुड़ गई। सभी माँगते थे। करने की बात सुनने को कोई तैयार न था। सो खोज हुए भगवान ने वहाँ से भी अन्यत्र जाने का निश्चय किया।
अब की बार वे द्वारिका पहुँचे और समुद्र के बीच एक सुनसान टापू पर रहने लगे। भक्तजनों को न भगवान की परेशानी का ख्याल था न अपनी बेइज्जती का। वे जिस भी कीमत पर पूरा हो सके स्वार्थ सिद्धि के लिए आतुर थे। पता वहाँ का भी लगा लिया और नावों पर सवार होकर भेंट हेतु द्वारिका टापू में जा पहुँचे। रट वही पुरानी। मनोकामना पूर्ति के रूप में हराम की कमाई का भूत सभी पर सवार था।
विष्णु भगवान को चिढ़ अधिकाधिक बढ़ती जा रही थी। वे मनुष्यों से विशेषतया भक्तजनों से सर्वदा के लिये दूर होना चाहते थे। सोचते थे न इन्हें अपना मुँह दिखायें न इनको देखें। पर वैसा स्थान, सूझ नहीं रहा था। इस असमंजस की घड़ी में नारदजी आ पहुँचे। विष्णु ने हैरानी से पूछा -‘देवर्षि ! ऐसा स्था बताइए जहाँ छिपकर रहूँ तो इसी लोक में, पर मनुष्य को पता न चले।”
नारद जी बहुत देर विचार करते रहे। स्थान सूझ पड़ा सो भगवान के कान में कह दिया ताकि किसी अन्य को पता न चले। भगवान सहमत हो गये और उस दिन से आज तक वे वहीं रह रहे हैं लोग जहाँ-तहाँ भटकते फिरते हैं, पर उस स्थान को खोज नहीं पाते। मनुष्यों को ईश्वर खोज-चेष्टा में भटकते देखकर भगवान मुस्कराते और मजा लेते रहते हैं। उसे छिपने के स्थान का नाम है - “मनुष्य का अपना हृदय”, जो उसे सूझ हो नहीं पड़ा।
सृष्टि की सबसे विलक्षण, अद्भुत तथा सामर्थ्यवान संरचना है - मनुष्य। किसी भी वस्तु का सही स्वरूप और सामर्थ्य अविज्ञात हो तो उससे समुचित लाभ उठाते नहीं बनता। प्रकृति की कितनी ही शक्तिधाराओं का ज्ञान मनुष्य को लाखों वर्ष तक न था। फलस्वरूप उनसे लाभ नहीं मिल सका। आज ही नहीं लाखों वर्ष पूर्व भी वे धूल सादृश्य पदार्थ के गर्भ में विद्यमान थे, जिनसे परमाणु बम जैसे घातक आयुध बनते हैं। वस्तुएँ भी मौजूद थीं जिनसे विमानों, राकेटों, अन्तरिक्ष उपग्रहों का निर्माण होता है। ऊर्जा के प्रचुर पेट्रोलियम भण्डार इसी पृथ्वी के भीतर दबे पड़े थे। पर दीर्घकाल तक जानकारियों का अभाव बना रहा। फलतः उनसे मनुष्य जाति को प्रगति में विशेष सहयोग न मिल सका। जैसे उनकी सामर्थ्य का पता, प्राप्त करने की विद्या हाथ लगी, द्रुतगति से प्रगति पथ पर बढ़ चलने का मार्ग-प्रशस्त हुआ।
भौतिक प्रगति के आधारों को ढूंढ़ निकालने वाली मानवी अन्वेषक बुद्धि की जितनी सराहना, प्रशंसा की जाय, कम ही होगी पर उससे भी अधिक प्रशंसनीय, अभिनन्दनीय वह दिन होगा, जिस दिन वह अपनी सत्ता के सामर्थ्यों को समझने एवं उन्हें करतलगत करने की विधा को ढूंढ़ निकालेगा इस क्षेत्र में वह उतना ही पिछड़ा है, जितना कि आदिम युग में प्रकृति के संदर्भ में था। यह पिछड़ापन ही उसकी अनेकानेक भौतिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं, उलझनों का प्रमुख कारण है। मनुष्य क्या है, इसका सही उत्तर जिस दिन मिलेगा, प्रगति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना होगी। उससे भी बड़ी घटना जितनी कि डायनामाइट, आग तथा परमाणु जैसे भौतिक आविष्कारों की थी।
मनुष्य के संदर्भ विज्ञान से जो जानकारियाँ मिली हैं वह मात्र वर्णनात्मक स्थिति तक हैं। उसकी ज्ञान की जितनी धाराएँ हैं, उन सबको एक जगह एकत्रित कर दिया जाय तो भी एक पूर्ण मनुष्य की समग्र व्याख्या करने में समर्थ न हो सकेंगे। सम्बद्ध विषयों के विशेषज्ञों को जितना ज्ञात हुआ है, उससे प्रतीत होता है कि वे मनुष्य की पूर्ण सत्ता को समझने तथा उसमें सन्निहित अद्भुत सामर्थ्यों के लाभ उठाने की विधा से अभी करोड़ों मील दूर हैं। मानव की स्थूल आकृति तथा सूक्ष्म प्रकृति का एक नगण्य हिस्सा ही जानकारियों की पकड़ सीमा में आ सकता है। जिन्हें जानकर मनुष्य उलझता अधिक है। उसे भटकाव ही हाथ लगता है।
विज्ञान की विभिन्न धाराओं से खींचे गये रेखा चित्र के रूप में उसका अस्तित्व सामने आया है। मानव शरीर का पोस्टमार्स्टम करने तथा अध्ययन करने वाले शरीर विज्ञानी उसे एक लाश मानते हैं। इसे रसायन शास्त्री टिश्यू तथा तरल रसायनों के संयोग से बनने वाली संरचना घोषित करते हैं। जीवन विज्ञानियों का मत है कि कोशिकाओं तथा पोषक तरल पदार्थों का मनुष्य एक आश्चर्यजनक योग है। मनःशास्त्रियों के अनुसार एक आश्चर्यजनक योग है। मनःशास्त्रियों के अनुसार वह अपने मन की गहराइयों में झाँकने वाला एक चैतन्य प्राणी है जो अनुकूल वातावरण पाकर विकसित होता है। अध्यात्म शास्त्री उसे एक मूलतः सर्वसमर्थ सत्ता घोषित करते हैं, जो अपने ही बन्धनों के कारण दीन-हीन स्थिति में पड़ी रहती है। फलतः अपनी समर्थता का परिचय नहीं दे पाती। उन बन्धनों को तोड़ सकें तो सन्त सिद्ध, ऋषि, योगी, महापुरुष, सब कुछ बना जा सकता है।
कम आश्चर्यजनक बात यह भी नहीं है कि सर्वाधिक विवादास्पद, अविज्ञात सत्ता यदि है तो वह मनुष्य की ही है। मनुष्य के संदर्भ में विशेषज्ञों के मत अलग-अलग हैं एक भौतिकवादी तथा एक अध्यात्मवादी दोनों ही नमक, चीनी, मिर्च के कणों के रंग, स्वाद रूप का वर्णन एक रूप में ही करेंगे, पर मनुष्य के विषय में ऐसी वैचारिक एकता का सदियों से अभाव रहा है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि अभी कुछ समय तक और रहेगा। स्वयं एक यान्त्रिक शरीर विज्ञानी तथा एक जैविक शरीर विज्ञानी दोनों ही मनुष्य की शारीरिक रचना के सम्बन्ध में भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। मनः शास्त्र मनुष्य की व्याख्या - विवेचन में अपनी ढपली आप बजाता- अपना राग अलग ही निकालता है। भौतिकी की इन विभिन्न धाराओं का विरोधाभास कब तक रहेगा, यह सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। मनुष्य अपनी सत्ता से कब तब अनभिज्ञ बना रहेगा, कुछ भी कहना सम्भव नहीं।
जानयूटनलोव और हेन्सड्रिश जैसे विद्वान मानव शास्त्रियों का वह मत यथार्थ जान पड़ता है कि “प्रगति-क्रम में अनेकानेक वैज्ञानिकों रहस्यवादियों, कवियों तथा विचारकों ने आदिकाल से लेकर अब तक अपने ज्ञान अनुभवों का संचित विशाल भण्डार हमारे लिए उपलब्ध कराया है तो भी उनसे हम अपनी सत्ता की परिपूर्ण जानकारी प्राप्त करने में असफल ही रहे हैं। यह सबसे बड़ी विडम्बना है, जिनके कारण ही आकर्षणों की मृग मरीचिका में मानव भटकता रहता है। फलतः जीवन रूपी गुलशन में शान्ति, सन्तोष आनन्द के पुष्प खिलाने तथा सुरभि आनन्द लेने के स्थान पर उसमें अशान्ति, उद्वेग, असन्तोष लेने के स्थान पर उसमें अशान्ति, उद्वेग, असन्तोष खिन्नता रूपी पौधों का ही बीजारोपण करते और उनकी विषाक्त दुर्गन्ध से अगणित प्रकार से हानि उठाते हैं।”
मानव शरीर की संरचना एवं उसकी प्रकृति से जुड़े हुए कितने ही प्रश्न ऐसे हैं जिनका कोई सटीक उत्तर विज्ञान नहीं दे सका है। शरीर की आन्तरिक संरचना एवं जटिल क्रिया प्रणाली एवं उनसे उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियाओं में से अनेकों विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं है। रासायनिक पदार्थों के अणु जटिल और अस्थायी पेशियों के अवयवों को बनाने के लिए किस प्रकार परस्पर सम्बद्ध होते हैं ? शरीर की कोशिकाएँ क्यों संगठित रहती और क्यों बागी होकर कैंसर जैसे असाध्य रोगों को जन्म देती हैं ? नर, नारी शिशु का निर्धारण, क्रोमोसोम्स के मिलन की आकस्मिक प्रक्रिया का परिणाम है अथवा और कुछ ? अपने आप एक निश्चित प्रकार का क्रोमोसोम ही नारी सेक्स क्रोमोसोम के विशिष्ट क्रोमोसोम से मिलकर ही नारी सेक्स क्रोमोसोम के विशिष्ट क्रोमोसोम से मिलकर कभी पुरुष अथवा कभी मनमाने ढंग से नारी शिशु का निर्माण क्यों करता है ? क्या उसमें मानवी इच्छाओं, आकाँक्षाओं, संकल्पों की भी भूमिका होती है, जो एक निश्चित प्रकार के क्रोमोसोम को मिलने के लिए बाध्य करते हैं ? शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक विकास की प्रक्रियाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण कौन-कौन से हैं ? जीवित पदार्थों की तरह मनुष्य भी ऊतकों व रसायनों का संयोजन मात्र है अथवा और भी कुछ ? चेतना तथा मस्तिष्क के आपसी सम्बन्धों का स्वरूप क्या है ? मनुष्य मनुष्य के बीच जन्मजात बौद्धिक विशेषताओं में इतनी भिन्नता क्यों दिखायी पड़ती है ? स्नायु तन्त्र के सन्तुलन के लिए कौन से तत्व प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं ? मनःशक्ति तथा आत्मशक्ति इन्द्रियों को किस सीमा तक प्रभावित करती हैं ?
स्थायी सुख शांति एवं सन्तोष के लिए परिस्थितियाँ जिम्मेदार हैं अथवा स्वयं की मनःस्थिति ? मनःस्थिति के निर्धारण में किन तत्वों की प्रमुख भूमिका होती है ? साहस शौर्य, पराक्रम जैसी मानसिक शक्तियां तथा दया करुणा, उदारता, सहिष्णुता जैसी भावनात्मक विशेषताओं को मनुष्य के भीतर कैसे पैदा किया जा सकता तथा उन्हें कैसे बढ़ाया जा सकता है ? सौंदर्य बोध, रसानुभूति का केन्द्र बाहर है अथवा भीतर, स्थूल है अथवा सूक्ष्म ? मनुष्य के पतनोन्मुखी प्रवाह को कैसे रोका एवं मोड़ा जा सकता है ? मनुष्य के जीवन से जुड़े हुए ये प्रश्न ऐसे हैं जिनका हल ढूंढ़ना अत्यावश्यक है। इनकी उपेक्षा ऐसे हैं जिनका हल ढूँढ़ना अत्यावश्यक है। इनकी उपेक्षा का अर्थ होगा- अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारना परमाणु युग से छलाँग लगाकर अन्तरिक्ष युग में प्रवेश करने वाले विज्ञान की विविध धाराएँ भी इन प्रश्नों का सटीक उत्तर नहीं दे सकी हैं। मनुष्य का अपने स्वयं के विषय में ज्ञान अभी प्रारम्भिक स्थिति में है।
यह सच है कि संसार में थोड़े से ही व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो पेट-प्रजनन के सीमित दायरे से निकलकर मनुष्य एवं समाज से जुड़ी हुई गंभीर समस्याओं पर गम्भीरता से विचार करते हैं। उनमें से थोड़े से होते हैं जो उनका समाधान ढूंढ़ने के लिए पूरे मनोयोग से जुटते हैं। विचारक, मनीषी, वैज्ञानिक, ऋषि, तत्वदर्शी इसी स्तर के व्यक्ति होते हैं। जो उन समस्याओं की ओर अपना ध्यान लगाते तथा अपनी सामर्थ्यों को खपाते हैं, जो अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है, पर सामान्य व्यक्ति उन्हें महत्व नहीं देते। उनके चिन्तन प्रयास की ही परिणति ज्ञान विज्ञान की धाराओं के रूप में, तत्वज्ञान एवं अध्यात्म के अमृत के रूप में होती है। जिसका लाभ असंख्य व्यक्ति उठाते हैं।
सर्वविदित है कि विज्ञान की परिधि बाह्य संसार- प्रकृति जगत तक सीमित हैं तथा अध्यात्म की चेतना प्रधान जगत तक सीमित है तथा अध्यात्म की चेतना प्रधान है। चेतना अर्थात् सृष्टि का वह संचालक तत्व जिसकी प्रेरणा से जीव-जन्तु, पेड़ जीवन प्राप्त करते, हलचल करते तथा प्रकृति का श्रृंगार सौंदर्य के रूप में काम करते हैं। विज्ञान की उपलब्धियों का लाभ उपभोग के साधनों के रूप में मिलता है, जिसके लिए मनुष्य को विविध रूपों में मूल्य चुकाना पड़ता है। पर उपभोग में सदुपयोग की दूरदर्शी दृष्टि का विकास अध्यात्म ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है। अध्यात्म अर्थात् चेतना का विज्ञान। अधिक स्पष्ट व्यावहारिक परिभाषा देनी हो तो उसे जीवन दृष्टि के रूप में जाना जा सकता है। ऐसी दृष्टि जो स्वयं के स्वरूप के विषय में ज्ञान रखती है तथा उसके प्रकाश में बाह्य संसार तथा वस्तुओं का सही मूल्याँकन करती हो। संसार में उँगली पर गिनने जितने मनुष्य होंगे जो इस दृष्टि से युक्त हैं अन्यथा अधिकाँश बुद्धिमान, विद्वान, प्रतिभावान होते हुए भी उससे शून्य हैं। यही है विष बीज जिससे अगणित मानव समस्याएँ जन्म लेती तथा परिपोषित होती रहती है। समझदार होते हुए भी उनके मूलभूत कारणों की जड़ न उखाड़ने तथा समाधान के लिए बाहर दौड़ते रहने का परिणाम मनुष्य को अशान्ति, असन्तोष तथा असफलता के रूप में भुगतना पड़ता है।
प्रख्यात पुस्तक “मैन दी अननोन” के लेखक तथा नोबेल पुरस्कार विजेता एलेक्सिस केरेल का कहना अक्षरशः सत्य है कि “विश्व के भौतिकवादी सुखों ने मानव मस्तिष्क को अपनी ओर पूरी तरह आकृष्ट कर रखा है। फलस्वरूप मानव अध्यात्मिक जीवन तथा उससे जुड़ी असीम सम्भावनाओं को पूरी तरह भूला बैठा है। वह भौतिक संसार में ही जीता तथा उसका उपभोग करता है। अपनी सत्ता को शरीर एवं मन से अधिक नहीं मानता। यह एक ऐसी भ्रान्ति हैं, जिसके रहते जीवन के उच्चस्तरीय आयामों में प्रवेश करते नहीं बनता।”
आत्म विस्मृति के गर्त में पड़े रहने तथा भौतिक संसार को ही सब कुछ मानकर उसमें डूबे रहने में मनुष्य ने गँवाया अधिक पाया कम है। जो पाया है वे साधन भी उसी के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहे हैं। जड़ की प्रचण्ड शक्ति परमाणु विभीषिकाओं के रूप में मनुष्य के सिर पर मंडरा रही हैं। फूटकर वह कब महाप्रलय के रूप में टूट पड़े, यह कुछ भी नहीं कहा जा सकता। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में तनावों को बढ़ने, व्यक्तिगत, सामाजिक जीवन में विग्रहों को पनपने का कभी अवसर नहीं आता यदि उस सच्चाई का ज्ञान रहा होता कि हम सब एक सत्ता के एक परमात्मा की सन्तान हैं, एक ही अभिन्न सत्ता सब में उसी प्रकार क्रीड़ा कल्लोल कर रही है, जिस तरह एक सूर्य अनेकों किरणों के रूप में चमकता दिखायी पड़ता है। आत्म स्वरूप की अनुभूति युग की एक परम आवश्यकता है। ऐसी जिसकी कि उपेक्षा किसी भी हालत में नहीं की जानी चाहिए। असीम सामर्थ्यों से भरी-पूरी मानवी सत्ता नर-पशु के रूप में विचरती अपनी गरिमा को भूली रहे, इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी ?
समीक्षा एक बात है ओर निन्दा दूसरी। समीक्षा हित कामना से व्यक्ति के सामने की जाती है। उसमें दोष और गुण दोनों का वर्णन किया जाता है। साथ ही गुणों को बढ़ाने और दोषों को एक बारंगी तथा धीरे-धीरे छोड़ने के लिए कहा जाता है। निन्दा में केवल दोष ही दोष होते हैं। वे पीठ पीछे कहे जाते हैं। उसमें गिराने और बदनाम करने का भाव होता है। यदि किसी के गुप्त रहस्य तुम्हें विदित हैं तो उसे अकारण प्रकट न किया जाय। इससे उसका सम्मान घटता ही है, साथ ही अपना विश्वास भी चला जायेगा। फिर कोई भी अपने रहस्यों से अवगत न होने देगा और समझेगा कि जिस प्रकार दूसरों का रहस्य अपने सामने कहा जा रहा है उसी प्रकार औरों के सामने अपनी बात प्रकट करने से भी न चूकेगा। अकारण जिस-तिस के हेय चर्चा करते-फिरने वाले निन्दक कहे जाते हैं और दूसरों को बदनाम करने के स्थान पर स्वयं बदनाम होते हैं।
जब हम दूसरों की हानि करते हैं तो उलटकर सामने वाला भी बदला लेता है। मान-हानि भी धन हानि की ही तरह है। उसे करने वाले अपनी प्रतिष्ठा भी अक्षुण्ण नहीं रख सकते। उलटकर उन पर भी बार होता है। संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें समस्त गुण ही गुण हों। दोषों से सर्वथा रहित तो केवल परमात्मा ही है। गन्दगी को दबाने में ही लाभ है। उसे छितराया जाता है उतना ही वातावरण बिगड़ता है। दोषों के सुधार का यह तरीका नहीं है कि किसी को बदनाम किया जाय। विरोध और संघर्ष तभी किया जाना चाहिए जब किसी की अनीति सार्वजनिक हित के विरुद्ध पड़ती हो या किसी को सताने के लिए कटिबद्ध हो रही हो।
कुत्ते भौंकते रहते हैं और हाथी अपनी राह चला जाता है। मन्दिर के शिखर पर चील कौए बैठते और बाट करते देखे गये हैं। इस प्रकार किसी की महानता न घटती है, न गिरती है। व्यक्ति की अपनी बुराइयाँ ही उसे गिराने का कारण बन सकती हैं। दूसरों की बकवास से यह सम्भव नहीं कि कोई ऊँचा उठे या नीचा गिरे। निन्दा सुनकर असन्तुलित एवं अप्रसन्न होने वाले के सम्बन्ध में समझा जाता है कि चोर की दाढ़ी में तिनका है। इसके विपरीत यदि कोई उस पर कान नहीं धरता है या हँसकर टाल देता है तो समझा यह जाता है कि चट्टान इतनी मजबूत है कि उस पर पानी की बूँदों का असर नहीं पड़ा।
हर व्यक्ति का अपना-अपना दृष्टिकोण एवं स्वभाव है। दूसरों के बारे में कोई अपना कुछ भी अभिमत बना सकता है। जीभ अपनी है, किसी को कुछ भी कहने की छूट है। किस-किस को रोका और किस-किस को समझाया जाय। कितनों का समाधान किया जाय और कितनों के साथ मिथ्या आक्षेप के लिए लड़ा-झगड़ा जाय। अच्छा यही है कि उथले लोगों द्वारा कहे गये भले-बुरे पर ध्यान न दिया जाय। जितना समय प्रतिवाद में लगाया जाता है उतना यदि अपने को अधिक सतर्क रखने और मनोबल और भी अधिक बढ़ाने में लगाया जाय तो फिर अपनी स्थिति ही इतनी मजबूत हो जायेगी जिसमें निन्दा और स्तुति करने वाले निराश वापस लौटने लगें। स्मरण रहे निन्दक जहाँ हानि पहुंचाने के फेर में रहते हैं। वहाँ प्रशंसकों में से भी अधिकाँश की प्रकृति किसी का गर्व फुलाने और बदले में अनुचित लाभ उठाने की होती है। अतएव सतर्क दोनों से ही रहना चाहिए। सतर्कता का अर्थ यहाँ उपेक्षा भी समझा जा सकता है। चाहे कोई हिमालय के समान स्वच्छ क्यों न हो पर उस पर ऊँचा शिर उठाकर रहने और कठोर घमण्डी होने का दोष लगेगा। चाहे कोई समुद्र के समान महान क्यों न हो, पर उस पर खारी होने का कलंक लगेगा। मनुष्यों के सोचने का तरीका कुछ है ही ऐसा कि वे अपने तराजू से सबको तोलते हैं। क्षुद्रजनों के लिए इस संसार में महानता है ही नहीं। काला चश्मा पहन लेने पर हर वस्तु काली दिखती है। किसी को किसी रंग का चश्मा पहनने से किसी प्रकार रोका जाय ?
अभावग्रस्तता, असमर्थता, अन्तर्बोध के अभाव के कारण अनुभव होती है। कीमती वस्तुएँ तिजोरी में रखी जाती हैं। प्रकृति प्रदत्त बहुमूल्य रत्न भी भूगर्भ में छिपे रहते हैं। जिन्हें पुरुषार्थी शूरवीर ही प्राप्त कर पाते हैं। दुर्लभ कीमती मोती समुद्र की अथाह गहराई में पड़े रहते हैं जिन्हें दुस्साहसी गोताखोर जान हथेली पर रखकर प्राप्त करते हैं। इन भौतिक उपलब्धियों को प्राप्त करने का सुअवसर हर किसी के लिए सुलभ है किन्तु आत्म-विश्वासी, साहसी ही उनका लाभ उठा पाने में सफल होते हैं। प्रकृति प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों की भाँति परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को अन्तःविभूतियों से सुसम्पन्न करके भेजा है। अन्तरतम केन्द्र-आत्म में एक से बढ़कर एक विशेषताएँ विद्यमान हैं। किन्तु अपने आपे से अनजान होने के कारण उसमें सन्निहित विशेषताओं का मनुष्य लाभ नहीं उठा पाता और उसकी स्थिति वही होती है जो गली में बँधे हीरे से अपरिचित भीख माँगने वाले बालक की हुई थी।
अपने को असहाय, असमर्थ, अयोग्य, अभावग्रस्त महसूस करने एवं दूसरों से सहयोग, सहकार, अनुदान, वरदान की याचना करने और आगे बढ़ने ऊँचे उठने की बात सोचते रहने वालों के साथ एक ही मानसिक तत्व काम करता है कि उन्हें अपनी शक्तियों-विशेषताओं का भान नहीं होता। अपने को वे क्षुद्र हेय मानते रहते हैं और यह सोचते हैं कि वे अमुक कार्य के लिए अयोग्य हैं। सन्त इमर्सन कहा करते थे कि मनुष्य जैसा भी दिखायी पड़ता है अपने प्रति बनाई गई मान्यता का प्रतिफल मात्र है। मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में भी इस तथ्य की पुष्टि हो चली है कि व्यक्तित्व को गढ़ने में मनुष्य की अपने प्रति बनायी गई मान्यताओं का बहुत बड़ा योगदान है।
तत्वदर्शी ऋषि इस सूक्ष्म रहस्य से पूर्णरूपेण परिचित थे। वे आरम्भ से ही यह उद्घोष करते आये हैं कि जीव अपना स्वरूप बना सकने में पूर्णतः सक्षम विभूति सम्पन्न है। जिन वैचारिक रहस्यों पर मनोवैज्ञानिक आज शोध कर रहे हैं उनके मनोवैज्ञानिक प्रभावों से ऋषि बहुत समय पूर्व से ही परिचित थे। विडम्बना तो यह है कि प्रत्यक्षवाद की दुहाई देने तथा मनुष्य को सर्वोपरि घोषित करने वाले भौतिकवादी जब यह कहते हैं कि मनुष्य जीवन और कुछ नहीं जड़ अणुओं का संयोग मात्र है जिनके बिखरते ही जीवन का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है - तो भारी निराशा होती है। मनुष्य भी जड़ तत्वों का संयोग मात्र है प्रचलित मान्यता यह होगी तो भला चैतन्य विशेषताओं आत्म विभूतियों का लाभ उठा सकना किस प्रकार सम्भव हो सकेगा ? अपना आपा कितना समृद्ध -कितना सामर्थ्यवान है, यह तथ्य रहस्य के गर्त में ही पड़ा रहेगा और उन विशेषताओं से लाभ उठा सकना भी सम्भव न हो सकेगा।
समर्थता भौतिक शक्ति को ही नहीं कहते, वरन् उन विशेषताओं को भी कहते हैं जिनके सहारे मनुष्य अपने को अधिकाधिक सन्तुष्ट पाता हो। हमारी अन्तरात्मा शुद्ध, बद्ध, शान्त, पूर्ण एवं प्रचण्ड शक्ति से ओत- प्रोत है। यह विश्वास स्वयं में एक सर्वोपरि शक्ति है तथा हर प्रकार की परिस्थितियों में मनुष्य को सदा अतृप्त, अशान्त ही बनाये रखती है। भले ही उसके पास कितनी भी भौतिक शक्ति क्यों न एकत्रित हो गई हो। साधन एवं शक्ति का संचय सुख शान्ति की प्राप्ति के लिए किया जाता है। समस्त विश्व में इसी के निमित्त विभिन्न प्रकार की मानवी चेष्टाएँ चल रही हैं किंतु वह स्थिति भी किसी से नहीं छिपी है कि जितना अधिक शक्ति साधन जुटते जा रहे हैं मनुष्य शान्ति एवं सन्तोष की उपलब्धियों से उतना ही दूर हटता जा रहा है। अतृप्ति, असंतोष एवं अशान्ति की स्थिति उतनी ही अधिक बढ़ती जा रही है।
यह आत्म विस्मृति का ही परिचायक है जिसके रहते मनुष्य आत्म विभूतियों से सदा अपरिचित ही वन रहता है। यह जड़वादी दृष्टिकोण की ही परिणति है कि वह जड़ तत्वों में-साधन सुविधाओं में विषयों के सेवन में तृप्ति, संतुष्टि एवं शान्ति की खोज करता है। जीवन के प्रति इस भौतिकवादी दृष्टिकोण को बदलना होगा तथा ऋषियों के उसी उदात्त उद्घोष को दुहराना होगा जिसमें वे कहा करते थे - ‘सोऽहम्’ - ‘सच्चिदानंदोऽहम्’ अह ब्रह्मास्मि’। हमारे भीतर ब्राह्मी शक्ति का-चेतना का सागर लहलहा रहा है। “वाह्य परिस्थितियों के निर्माता हम स्वयं हैं।”
विस्मृति को हटाने एवं आत्म शक्ति से परिचित होने के लिए आत्म विश्वास के साथ दूसरा चरण उठाने की आवश्यकता होगी साधना पुरुषार्थ करने की। समुद्र में से मोती निकालने में सफल दुस्साहसी गोताखोर होते हैं जबकि समुद्र के अन्तराल में मोती होने के तथ्य से सुपरिचित होते हुए भी साहस एवं पुरुषार्थ के अभाव में गहराई में मोती के लिए गोता लगाते नहीं बनता है। अपने आपे का स्वरूप जानने एवं उसमें सन्निहित शक्तियों को प्राप्त करने के लिए जो साधना पुरुषार्थ का अवलम्बन लेकर दृढ़ता से आगे बढ़ने के लिए कटिबद्ध होते हैं क्रमशः एक से बढ़कर एक विभूतियों के करतलगत करते जाते हैं। तब से यह अनुभव करते हैं कि उस दयालु परम पिता परमात्मा ने एक से बढ़कर एक विभूतियों से सुसम्पन्न करके जीवात्मा को भेजा है। यह मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि विस्मृति की चादर ओढ़कर असहाय असमर्थ स्थिति में जीवन व्यतीत करे अथवा आत्म गठरी को खोलने का पुरुषार्थ करने उसमें छिपी आत्मिक विभूतियों का लाभ उठाये। विस्मृति से आत्म जागृति की दिशा में अग्रगमन करते ही मनुष्य की दरिद्रता, असमर्थता के दूर होते एवं समर्थ सम्पन्न बनते देरी नहीं लगती।
अध्यात्म दर्शन का अवलम्बन मनुष्य को सदैव यही प्रेरणा देता आया है कि वह अपने अन्दर झाँके, अपनी सम्पदाओं के भाण्डागार को टटोले, याचना न कर अपने ही पुरुषार्थ से प्रगति के पथ पर चलता रहे। महापुरुषों ने भी सदैव यही मार्ग अपनाया है व स्वयं को-सारी मानवता को कृतार्थ किया है। सामर्थ्य को पहचानते ही हनुमान जब समुद्र पार करने के समान दुस्साहस कर सकते हैं, अर्जुन अपने अभिन्न सखा का परामर्श मानकर मोह की विडम्बना से मुक्त हो अजेय, अमर वन सकते हैं तो मनुष्य अपने व्यावहारिक जीवन में दीख पड़ने वाली समस्याओं को क्यों नहीं सुलझा सकता ? वह भी उठते-उठते उसी स्तर पर पहुँच सकता है जहाँ देवदूत, ऋषि, महामानव पहुँचकर इस वसुधा को गौरवान्वित करते रहे हैं।
काशी नरेश एक दिन वेष बदलकर प्रजा संपर्क के लिए निकले। साथ में पुरोहित भर थे। दोनों थक कर एक गाँव के निकट वृक्ष तले सुस्ता रहे थे। पुरोहित पास के सरोवर पर स्थान को गये। राजा को झपकी आ गई।
एक ग्रामवासी ने भूखा अतिथि पेड़ के नीचे सोया देखा सो वह घर जाकर उसके लिए एक थाली भोजन ले आया।
थाल राजा के सामने था। इतने में पुरोहित आ गये। राजा ने उसे पुरोहित के आगे खिसका दिया। पुरोहित इधर-उधर नजर दौड़ाने लगा। देखा तो एक साधु आ रहा था। पुरोहित ने भोजन उसे दे डाला। साधु ने भी उसे खाया नहीं, दरिद्र भिक्षुक आता देखा तो उसे सौंप दिया। किसान यह कौतुक देख रहा था। उसने पूछा-भोजन में कोई दोष था क्या, जिस कारण वह एक से दूसरे के हाथों खदेड़ा गया।
राजा ने उसका समाधान किया और कहा- ‘बन्धु ! मैं साधारण व्यक्ति हूँ। मुझसे पुरोहित की गरिमा अधिक है उनकी आवश्यकता पहले पूरी होनी चाहिए। पुरोहित ने कहा विद्वान से तपस्वी श्रेष्ठ है उसके द्वारा समाज हित अधिक है इसलिए उसका अधिकार पहला है। फिर साधु से भी वह बड़ा है, जिसका प्राण अन्न के बिना जा रहा है।
इस सदी की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक द्वितीय विश्वयुद्ध भी है, जिसमें देखते-देखते विश्व की जानी-मानी महाशक्तियों ने नवोदित शक्ति जर्मन-सत्ता के समक्ष घुटने टेक दिए। विश्व युद्ध पोलैण्ड में भेजे गये जर्मन सैनिकों द्वारा छल से आरम्भ किये गये एक छोटे से छापामार हमले में शुरू हुआ। लेकिन सारे विश्व ने कुछ ही दिनों में सुना कि ‘ग्रेट ब्रिटेन’ के बाद विश्व की सबसे बड़ी शक्ति माने जाने वाला राष्ट्र फ्राँस बिना किसी प्रतिरोध के आत्म समर्पण कर रहा है। यूनाइटेड किंगडम के बाद फ्राँस ही था जिसके उपनिवेश सुदूर पूर्व में दक्षिण एशिया से उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका तक फैले हुए थे। नेपोलियन जिस राष्ट्र में पैदा हुआ- जहाँ की राज्य क्राँति ने विश्व की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया, उनका ऐसा पराभव देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक ही था।
मनीषियों को यह निष्कर्ष निकालने में अधिक समय नहीं लगा कि इसका कारण क्या है ? उन्होंने पाया कि असंयम ने तो जनशक्ति को खोखला बनाया। भोग प्रधान उच्छृंखल जीवन क्रम ने उस राष्ट्र को छूँछ बनाकर रख दिया था। गर्भ धारण के भय से मुक्त विलासी फ्राँसीसियों को परिवार नियोजन के साधन मानो वरदान रूप में मिले थे। शराब की कोई कमी नहीं थी। जो राष्ट्र सारे विश्व की तीन चौथाई महंगी शराब की पूर्ति करता हो, वह स्वयं कैसे उससे अछूता रहता। नैतिक मर्यादाएँ भंग हो जाने से जर्मनी को फ्राँस को पराजित करने में कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा। वस्तुतः भोग विलास की ज्वाला में जल रहे फ्राँस का पतन नहीं किया गया - उसने स्वयं अपने को निर्बल बनाकर आक्रान्ताओं को निमन्त्रण दे दिया था।
भारतीय अध्यात्म का युगों-युगों से यह शिक्षण रहा है कि मनुष्य यदि अदूरदर्शी क्षरण को रोक सके तो उस बचत से इतना बड़ा भण्डार जमा हो सकता है जिसके बलबूते विपुल विभूतियों का अधिपति बन सके। संयम ही यह है। तपाये जाने पर लोहा सोना आदि धातुएँ परिशोधित होती और बहुमूल्य बनती हैं। असंयम की परिणति वही होती है जैसी दुधारू गाय को पालने व टूटे बर्तन में उसका दूध दुहने पर होती है। इससे मनुष्य अपने पूर्व संचित तथा अबकी उपार्जित क्षमताओं को भी गँवा नहीं बैठता, इस दुरुपयोग का दुष्परिणाम भी भोगता है। रीतिकाल के रूप में हमारे देश ने भी मध्यकाल का वह विकृतियों भरा अन्धकार युग देखा व गुलामी भरा जीवन जिया है जैसाकि फ्राँस के विषय में ऊपर वर्णित किया गया। हर राष्ट्र की समर्थता-नागरिकों की प्रखरता इस व्यावहारिक अध्यात्म सिद्धान्त पर निर्भर है जिसे तप संयम, चरित्र निष्ठा, काम का सृजनात्मक स्वरूप जैसे पर्याय दिये गये है।
मेघनाद स्वयं ब्रह्मचारी था। उसे मारने में मात्र वही समर्थ था जो स्वयं चौदह वर्ष ब्रह्मचारी रहा हो। लक्ष्मण जी ने उसी प्रधान अस्त्र को उपलब्ध किया और लम्बी अवधि तक ब्रह्मचर्य निभाया। दशरथ जी का पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराने में उन दिनों के परम संयमी शृंगी ऋषि ही समर्थ हुए जबकि असंयमी अन्य ऋषि ही समर्थ हुए जबकि असंयमी अन्य ऋषि उस स्तर का मन्त्रोच्चारण करने में सफल नहीं हो सके। अर्जुन को गाण्डीव पुरस्कार उर्वशी प्रकरण में परीक्षा द्वारा ही मिला था। भवानी ने शिवाजी को कभी न चूकने वाली तलवार प्रदान की थी, पर इससे पूर्व उसकी पात्रता एक सुन्दरी को सम्मुख करके जानी गयी थी। खरा सिद्ध न होने पर तो ऐसे वरदानों से सदा वंचित रहना पड़ता है। सत्पात्र की परख करने में देवताओं की प्रधान कसौटी संयमशीलता ही रहती है।
दो सांडों के टकराव को रोकने के लिए ब्रह्मचारी दयानन्द ने उन दोनों के सींग एक हाथ में पकड़ करमरोड़ और धकेल कर दूर पटक दिए थे। अपनी संयम शक्ति के बल पर ही उन्होंने एक राजा की बग्घी रोककर दिखाई थी। प्रसिद्ध पर्वतारोही ने जब गंगा में उसकी दिशा के विपरीत नाव द्वारा गंगा सागर से देव प्रयाग तक यात्रा का दुस्साहस किया तो एक भारतीय योगी ने वाराणसी के समीप उनकी डेढ़ सौ हार्स पावर की नौका को एक पतली रस्सी से बाँधकर रोक दिखाया था। सारा जोर लगाया गया लेकिन नाव अपनी ही जगह धड़धड़ाती रही, आगे नहीं बढ़ सकी। आँखों से पट्टी बाँधकर कुदृष्टि का प्रतिरोध करने वाली गान्धारी ने जब आँख खोलकर अपने पुत्र को देखा तो उसका शरीर लौह बल से मुक्त हो गया। यह संयम की ही शक्ति थी कि इन्हीं आँखों से बरसती आक्रोश भरी चिनगारियों ने भगवान कृष्ण के पैरों पर प्रभाव डाला था। भीष्म, अनुमान शंकराचार्य आदि की विशिष्ट प्रतिभाओं के पीछे उन लोगों का ब्रह्मचर्य संयम ही प्रधान कारण रहा है। ये सारे दृष्टान्त इसी एक तथ्य का प्रतिपादन करते हैं कि अधोगामी प्रवृत्तियां रोककर शक्ति संचय किया जाय तभी ऊर्ध्वगमन- प्रगति पथ पर चल सकना सम्भव है।
इस मार्ग से पथ भ्रष्ट होने पर समर्थों को भी नीचा देखना पड़ा है। अभिमन्यु- उत्तरा संवाद पढ़ने से प्रतीत होता है कि चक्रव्यूह भेदन से एक दिन पूर्व अभिमन्यु अपना ब्रह्मचर्य गँवा बैठा और सन्तानोत्पादन को महत्व दे बैठा। परिणाम स्पष्ट है कि चक्रव्यूह तोड़ने में वह समर्थ न हो सका। यदि वैसा न हुआ होता तो जैसा उसका अनुमान था, वह विजयी होकर ही लौटता। नहुष का तप साधना ने उसे स्वर्गलोक तो दिया, पर अप्सराओं के प्रलोभन को देख उस सम्पदा को देखते-देखते गँवा बैठा और सर्प बनकर दुर्गतिग्रस्त हुआ। ययाति जैसे पुण्यात्मा इसी प्रसंग में अपयश और भर्त्सना के भागी बने। पाण्डु की रुग्णता को देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें ब्रह्मचर्य पूर्वक रहने का कहा था। वह मर्यादा उन्होंने पाली नहीं। फलतः अकाल ही काल के ग्रास बने।
कालजयी महाप्रतापी रावण की दुर्गति का कारण उसका असंयम ही था। अन्याय महाबली असुरों की दुर्गति भी इसी आधार पर हुई। भस्मासुर का पार्वती पर आसक्त हो जाना ही उसके भस्म होने का कारण बना। सुन्द-उपसुन्द एक ही सुन्दरी पर आसक्त होने के कारण लड़ मरे। मनोनिग्रह-लोभ निग्रह-ब्रह्मचर्य का निर्वाह न कर पाना ही असुरों की कठोर तपश्चर्या को दुर्गतिग्रस्त बनाता रहा है। वे लोग यदि संयमी रहे होते, सदाशयता के मार्ग पर चलते तो साहस और कष्ट सहन की दृष्टि से भारी पड़ने के कारण देवताओं से भी वरिष्ठ रहे होते। मर्यादाओं का व्यतिरेक और उपयोग का असंयम ही समर्थों की समर्थता को दुर्गतिग्रस्त बना देता है।
ये सारे उदाहरण आज की परिस्थितियों में पूरी तरह लागू होते हैं। शक्ति ह्रास से सामर्थ्य-बौद्धिक प्रखरता में कमी को भौतिकता की अन्धी दौड़ में द्रुतगति से भाग रहे जापान, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क जैसे राष्ट्रों ने अब समझा है कि धीरे-धीरे पूरे समाज परिकर का वातावरण बदलने का प्रयास किया है। इन्हीं राष्ट्रों में 1-2 वर्ष पूर्व तक यौन-स्वेच्छाचार, कामवाद पूरी तरह संव्याप्त था। सिंगमंड फ्रायड के सिद्धान्तों ने तो मात्र नींव ही डाली थी पर नियो-फ्रायडिज्म के सिद्धान्तवादियों ने असंयम का उद्घोष करने उसी की जीवन मूल्यों का मूलभूत आधार बनाने का कार्य जोर-शोरों से चालू किया। परिणति आज सबके समक्ष है। कामुकता का रुझान जो कभी फ्राँस को अपने ग्रास में लिया था—सारे विश्व में फैला हुआ है। न्यूड कालोनी बसाई जा रही है, नैतिक मूल्यों को एक ताक पर रखकर उपभोग को ही सब कुछ बताया जा रहा है। यह किसी भी समाज को जर्जर कर देने भर के लिए पर्याप्त है।
दुर्भाग्य की बात तो यह है कि संयम का गुणगान करने वाले- तप साधना के दर्शन को जन्म देने वाले भारत में भी यही प्रचलन आधुनिकता के नाम पर शनैः शनैः फैले रहा है।
अमेरिका में पिछले दिनों एक पुस्तक की काफी चर्चा हुई। “द न्यू सेलीबेसी” अर्थात् नया ब्रह्मचर्य। वहाँ इस किताब का काफी हंगामा है। इस पुस्तक में ब्रह्मचर्य के सिद्धान्तों की आवश्यकता और उन्हें जीवन में उतारने पर तनाव, रोगों से मुक्ति तथा प्रसन्नता की प्राप्ति जैसे प्रकरणों पर चर्चा की गयी है। पश्चिम के एक ऐसे राष्ट्र में जहाँ पिछले दो दशकों में सैक्स के ‘सुखों’ का वर्णन करने वाली पुस्तकों का ही प्रचलन रहा हो, इस पुस्तक की बढ़ती लोकप्रियता ने मनो वैज्ञानिकों को यह सोचने पर विवश किया है कि मनुष्य स्वभाव की दृष्टि से पाशविक वृति प्रधान नहीं, अपितु देवत्व प्रधान है। यदि उसे वातावरण ऊपर उठने का मिलें, वह स्वयं प्रयास करे तो बहुमुखी प्रतिभा का धनी हो सकता है।
काम का यही स्वरूप अभिनन्दनीय है। आत्मिक एवं सर्वांगीण प्रगति के लिये मनोनिग्रह के इस तितीक्षायुक्त पुरुषार्थ को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग मान कर उसे व्यवहार में उतारा ही जाना चाहिए।
वह बात तो बहुत पुरानी हो गई जब मस्तिष्कीय द्रव्य के आधार पर किसी की बुद्धिमत्ता का मूल्याँकन किया जाता था। यह जाँच पड़ताल होती थी कि किसकी मानसिक संरचना में कोशों और तन्तुओं की कितनी संख्या तथा पेचीदगी है ? यह बात अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं रही। विशेषता अब अभ्यास पर निर्भर आँकी गई है। किसी विचारधारा में रुचि पूर्वक निमग्न रहने पर सामान्य बनावट के मस्तिष्क को भी इतना प्रशिक्षित किया जा सकता है कि उसे अपने विषय का विशेषज्ञ होने का अवसर मिल सके। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी मस्तिष्क अपने उत्तरदायित्व का सही ढंग से निर्वाह कर सकने में समर्थ है।
मस्तिष्क का बड़ा, भारी या परिपुष्ट होना इस बात का चिन्ह नहीं है कि उतने भर से किसी की बुद्धिमत्ता समुन्नत स्तर की बन जायेगी। इवान, तुर्णनेव, क्रामवेल, ओलिवर, वायरन जैसे मनीषियों के मस्तिष्क शरीर विज्ञान के अनुसार परिपुष्ट पाये गये। किन्तु अलबर्ट आइन्स्टीन का मस्तिष्कीय भार और प्रभाव कम आँका गया था फिर भी उनकी बौद्धिक क्षमता की तुलना अन्य किसी के साथ नहीं की जा सकी। कई वर्षों तक उनका मस्तिष्क सुरक्षित रखा गया ताकि उस पर अध्ययन किया जा सके। लेकिन निष्कर्ष कुछ निकला नहीं स्त्रियों के मस्तिष्क का भार और क्षेत्रफल कम होना है इतने से ही यह नहीं कहा जा सकता कि वे बुद्धिमान नहीं होती।
मस्तिष्कीय संरचना पर ध्यान देते हैं तो उसके दृश्य विभाजन को क्षमता स्तर वर वर्गीकृत करने पर तीन नये विभागों में बाँटा जा सकता है। आदि मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क और वर्तमान मस्तिष्क। आदि मस्तिष्क को जड़ मध्य को तना और वर्तमान को डालियों पत्तियों एवं कलियों के रूप में चित्रित किया जा सकता है। आदि मस्तिष्क वह है जो प्रगति क्रम में अनादि काल से लेकर अब तक की विभिन्न योनियों में संचित की गई जानकारियों आदतों को संजोये रहता है। मध्य मस्तिष्क वह है जिसकी अविज्ञात या अतीन्द्रिय क्षेत्र के रूप में विवेचना की जाती है। वर्तमान मस्तिष्क वह है जो गर्भाधान से लेकर, भ्रूण, शैशव अवधि के आधार पर बनता और विकसित होता है। एक के ऊपर दूसरा, दूसरे के ऊपर तीसरा यह क्रम प्याज की परतों के समान है। इनमें सबसे अधिक सशक्त छोटा होने पर भी आदि मस्तिष्क ही है। इसे जीव समुदाय का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है। वास्तविक व्यक्तित्व इसी केन्द्र में केन्द्रीभूत रहता है।
मानवी मस्तिष्क में सक्रिय घटक जिन्हें ‘नर्व सैल’ कहते हैं। प्रायः 10 अरब पाये जाते हैं जब कि संसार भर में मनुष्य की संख्या लगभग साढ़े चार अरब है। हर नर्वसैल आकार-प्रकार में नगण्य होते हुये भी सामर्थ्य और संरचना की दृष्टि से उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि दृश्यमान एक परिपूर्ण मनुष्य। संसार भर के मनुष्यों को सही रास्ते पर चलाया जा सकते तो विश्व व्यवस्था का स्वरूप इसी धरती पर स्वर्ग से बढ़कर दृष्टिगोचर होने लगे। ठीक इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य अपने मस्तिष्कीय घटकों को अनुशासन में रखने और उन्हें मस्तिष्कीय घटकों को अनुशासन में रखने और उन्हें अधिक सुयोग्य सक्षम बनाने में जुट पड़े तो इतने भर से उसे उन्हीं परिस्थितियों में देवतुल्य सुविकसित स्थिति प्राप्त कर सकने का अवसर मिल सकता है।
संसार भर के साढ़े चार सौ करोड़ मनुष्यों के बिखराव और स्वेच्छार को देखते हुए उनका नियमन कठिन है, पर किसी मनस्वी व्यक्ति के लिए यह सरल है कि अपनी मानसिक सम्पदा का महत्व समझे और उसे अधिक प्रखर बनाने तथा सत्प्रयोजनों में लगाये रहने में सफल सिद्ध हो सकें। इस दिशा में प्रयत्नरत मनुष्य को विश्व शासन की व्यवस्था सम्हालने वाले चक्रवर्ती राजा के समतुल्य माना जा सकता है। इतना ही नहीं वरन् उससे अधिक भी। क्योंकि 411 करोड़ मनुष्यों की तुलना में 10 अरब मानसिक घटकों की संख्या ढाई गुनी के लगभग है। जो लगभग इतनी ही बैठती है जितनी कि तथा कथित तीन लोकों की समझी जाती है।
खोपड़ी के घेरे में कैद मानवी मस्तिष्क का भार तो तीन पौण्ड से भी कम है। पर उसमें 10 अरब कोशिकाओं की ऐसी बालू बिखरी पड़ी है जिसकी तुलना किसी गीले रेगिस्तान से की जा सके। मटमैले लिबलिबे इस माँस पिण्ड में कोई विशेषता दिखाई नहीं पड़ती और उसे मुड़े तुड़े दो गोलार्धों में विभाजित देखा जा सकता है। देखने में सामान्य किन्तु विश्लेषण करने पर असामान्य प्रतीत होने वाले इस अवयव की महिमा असीम है। आम व्यवहार में उसका सात प्रतिशत भाग ही काम आता है और शेष निष्क्रिय पड़ा रहता है। यह निष्क्रिय अंश जागृत की तुलना में अत्यधिक रहस्यमय और महत्वपूर्ण है। काम-काजी विभाग को तो शरीर यात्रा के लिए आवश्यक उपार्जन और व्यवहार का तनिक सा काम करना पड़ता है। पर वह प्रसुप्त अंश ऐसा है जिसका जहाँ-तहाँ से छोटा-मोटा विकास भी सम्भव हो सके तो व्यक्ति में ऐसी अगणित क्षमताएँ जग सकती हैं जिसके आधार पर उसे भौतिक क्षेत्र का दैत्य या आत्मिक क्षेत्र का देव कहा जा सके।
मस्तिष्क की विशेषता उसके भार या विस्तार पर निर्भर नहीं होती वरन् इस बात पर निर्भर रहती है कि उसके घटकों की संख्या, सूक्ष्मता एवं ऊर्जा की स्थिति क्या है ? भार दृष्टि से ह्वेल का मस्तिष्क 7000 ग्राम होता है। मनुष्यों में नर का 1400 ग्राम और नारी का 1300 ग्राम के लगभग होता है। इस आधार पर किसी कुशलता या विशिष्टता का मूल्याँकन नहीं किया जा सकता। वह तो सूक्ष्म संरचना पर आधारित है। इस दृष्टि से भी मनुष्य को अतिरिक्त रूप से भाग्यवान कहा जा सकता है कि उसने न केवल अनेक विशेषताओं से भरा पूरा शरीर पाया है वरन् इस स्तर का मस्तिष्क भी उपलब्ध किया है जिसे विश्व सम्पदा का बीजाणु कहा जा सके। और मण्डल की हलचलों को तथा वैभवों का सार संक्षेप परमाणु के छोटे से कलेवर में भरा हुआ है इसी प्रकार विश्व चेतना की समस्त सम्भावनाओं को मानव मस्तिष्क के तनिक से क्षेत्र में केन्द्रीभूत समझा जा सकता है। उसका जागृत भाग भी कम आश्चर्यजनक नहीं, फिर प्रसुप्त की परतें यदि उघाड़ी जा सकते तो उस तिजोरी की बहुमूल्य रत्नराशि की तुलना कुबेर के वैभव से कम नहीं आँकी जा सकती।
संसार में अगणित व्यक्ति विलक्षण मेधावान हुए हैं। कितनों की स्मरण शक्ति आश्चर्यजनक थी। किन्हीं में दूरदर्शिता, प्रतिभा, सूझ-बूझ एवं सम्भावनाओं का सही अनुमान लगा सकने जैसी विशेषताओं का बाहुल्य पाया गया है। ऐसे असाधारण मेधावी लोगों का अपना इतिहास और कीर्तिमान है। कभी ऐसे प्रसंगों को दिव्य वरदान का भाग्योदय जैसे कारण बताकर समाधान किया जाता था अब पर्यवेक्षण ने सिद्ध कर दिया है कि यह मनःक्षेत्र की प्रसुप्ति में जहाँ-तहाँ जागरण होने उभरने भर का चमत्कार है। उस आधार पर मानसिक और शारीरिक क्षमताओं की दृष्टि से वह अपनी स्थिति असामान्य स्तर की बना सकता है। कभी हनुमान का समुद्र छलाँगना, रावण का दश शिर बीस भुजाओं वाला होना-सहस्रार्जुन को हजार भुजा वाला कहा जाना, पौराणिक उपाख्यान समझा जाता रहा होगा किन्तु अब ऐसी विशेषताओं से सम्पन्न होना सम्भव की परिधि में आ गया है। मानवी मस्तिष्क असाधारण रूप से विलक्षण है। उसके रहस्यमय कोष्टक यदि अपना-अपना काम आँशिक रूप से भी करने लगें तो व्यक्तित्व में ऐसी विचित्रताएँ उभर सकती हैं, जिन्हें चमत्कारी ऋद्धि−सिद्धियों में गिना जा सके।
मानसिक क्षमता के अभिवर्धन में तीन तत्व काम करते हैं। एक सात्विक आहार जिससे रक्त में अनावश्यक उत्तेजना उत्पन्न न होने पाये और मस्तिष्क शान्त सौम्य बना रहे। दूसरों उद्विग्नताओं से बचाव, चिन्ताओं एवं मनोविकार से छुटकारा। यदि चिन्तन विधेयात्मक रहे और आवेशों से परहेज रखे तो सीधी सादी, सरल, सन्तोष और सही जिन्दगी आसानी से गुजर सकती है। ऐसी दशा में विक्षोभ रहित मस्तिष्क सही काम को सही ढंग से करते हुए क्रमिक प्रगति करता रहेगा। तीसरा आधार है - प्रशिक्षण। अभ्यास के आधार पर शरीर के किसी भी अवयव को परिपुष्ट किया जा सकता है। फिर मस्तिष्क भी शरीर का एक अंग ही है। उसे अभीष्ट विषय में रस लेने, महत्व समझने, एकाग्र रहने और नियम पूर्वक और अभ्यास करने से किसी की भी प्रतिभा अभीष्ट क्षेत्र में बिखर सकती है।
अपना या दूसरों का मस्तिष्क दुर्बल है, ऐसी हीन भावना किसी के भी मन पर सवार नहीं होने देनी चाहिए। जब पशु पक्षियों को सिखाने वाले उन्हें मनुष्यों जैसी समझदारी का परिचय देने के लिए सधा लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि अपना या दूसरों का मस्तिष्क प्रयत्नपूर्वक अधिक विकसित न किया जा सके। इस दिशा में अब तो मानवी प्रयासों के साथ-साथ कम्प्यूटर लर्निंग क्रम भी खूब चल गया है। परन्तु पुरुषार्थपूर्वक अध्यवसाय से कमायी गयी मस्तिष्कीय सम्पदा का महत्व अपने स्थान पर रहेगा।
जापान की प्रयोगशाला में वानरों के अनेकों प्रसंगों में खरे खोटे की पहचान करने और ढेर में से उपयुक्त सामग्री बीन-बीन कर कायदे करीने के साथ रख देने की शिक्षा में प्रवीणता प्राप्त कर सकने जैसा योग्य पाया गया है। प्रयोग यह भी चल रहा है कि क्या वे उन कराये गये अभ्यासों को अपनी भावी पीढ़ियों के लिए भी हस्तान्तरित कर सकते हैं। सम्भावना इस बात की है कि जिस प्रकार वया पक्षी सुन्दर घोंसला बनाने की कला अपनी पीढ़ियों को देता चला आ रहा है, इसी प्रकार उपयोगी जानवरों की प्रशिक्षित बिरादरी भावी सन्तानों में भी उन विशेषताओं को जन्मजात रूप से हस्तान्तरित कर सकेगी।
फ्राँस के महा मनीषी मोन्टेन ने डाल्फिन मछलियों और चिम्पांजी वानरों का उदाहरण देते हुए कहा है कि उनकी प्रकृति मनुष्य से बहुत कुछ मिलती जुलती है। इसका कारण वर्तमान वातावरण नहीं वरन् उसके विकास क्रम का इतिहास है जो मानवी विकास क्रम की दिशाधारा में कितने कदम साथ-साथ मिलाते हुए आगे बढ़ा है, उन्हें मनुष्य जैसा उच्चारण तो नहीं सिखाया जा सका पर भी, मूक बधिकों जैसी साँकेतिक भाषा को समझते और उससे प्रभावित होते, प्रत्युत्तर देते, तथा अपनी ओर से तद्नुरूप प्रयोग करते देखे गये हैं। अमेरिका के जन्तु शिक्षण केन्द्रों में लूसी, लाना, वाशू जैसे कितने ही चिंपांजी है जो 200 से भी अधिक शब्दों का अर्थ समझते हैं। तद्नुसार उनने अपनी पुरानी आदतों को बदला है और नये निर्देशन के अनुसार काम करना आरम्भ किया है।
मानसिक विकास की यदि उपयोगिता समझी जा सके और उसे नशेबाजी की कामुकता, उत्तेजना, उदासी उपेक्षा आदि दुर्व्यसनों से नष्ट न किया जाय तो अपने की तथा दूसरों की अपेक्षाकृत अधिकाधिक बुद्धिमान बनाते चलने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। विशेषकर इसलिए भी कि वे सारी सम्भावनाएँ विद्यमान है, अनेकों उदाहरण सामने हैं। मनः दक्षता बढ़ाते चलना पूरी तरह से मानव के हाथ में है। इसकी फल श्रुतियाँ अपरिमित हैं।
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा, नान्यैर्देवैस्तरसा कर्मणा वा। ज्ञान प्रसादेन विशुद्धसत्वस्ततस्तु, तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः। - मुण्डक 3। 1। 8
अर्थात् - वह परमेश्वर वाणी, नेत्र आदि इन्द्रियों से नहीं देखा जाता। न उसे बाह्य क्रियाकृत्यों से ही पाया जा सकता है। निर्मल अन्तःकरण वाले ज्ञानवान ही उसे ध्यानावस्था में उसका दर्शन करते हैं।
प्रकृति के गर्भ में निरन्तर स्पन्दन हो रहा है, पर उसमें कुछ ही कर अनुभव मनुष्य अपनी इन्द्रियों अथवा भौतिक यन्त्रों के माध्यम से कर पाता है। मौसमी परिवर्तनों, प्रकृति विपदाओं आदि जैसी मोटी घटनाएँ ही पकड़ में आ पाती हैं। हवा का चलना, बिजली का कड़कना, सूर्य का निकलना, गर्मी, वर्षा तथा शीत ऋतुओं का आना जैसे परिवर्तन प्रत्यक्ष देखें एवं अनुभव किये जा सकते हैं। पर असंख्यों सूक्ष्म घटनाएँ प्रकृति के अन्तराल में निरन्तर घटित हो रही हैं। जिनकी कोई जानकारी मनुष्य को नहीं मिल पाती। विप्लव, भूकम्प भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्रकृति विभीषिकाएँ भी अकस्मात प्रस्तुत होती जान पड़ती हैं, पर विशेषज्ञों का मत है कि बहुत समय पूर्व इनकी पृष्ठभूमि बन चुकी होती है। प्रकृति रूपी हाँडी में वे पकती रहतीं तथा अपने समय पर कहर बरसाती प्रकट होती हैं। उनके जन्म लेने व पकने तथा अन्ततः सामने आने की एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है जिसकी यथार्थ जानकारी न होने से मनुष्य उनसे अपनी सुरक्षा नहीं कर पाता। इन्द्रियों की बनावट भी कुछ ऐसी है किस उनके अनुभव क्षेत्र में सीमित बातें ही आ पाती हैं। अधिकाँश की जानकारी नहीं मिल पाती।
जिस तत्वों में ब्रह्माण्ड की रचना हुई, उन्हीं से पिण्ड भी बना है। पिण्ड ब्रह्मांड के रूप में वर्णन किया है। दोनों अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। ब्रह्माण्ड में जो भी हलचल होती है, उसका सूक्ष्म प्रभाव पिण्ड सत्ता पर भी पड़ना सुनिश्चित है। पर किन्हीं वाह्य व्यतिरेकों के कारण ब्रह्माण्डीय स्पन्दनों की अनुभूति नहीं हो पाती। किन्हीं-किन्हीं को प्रकृति की हाँडी में पकने वाली घटनाओं का उन सूक्ष्म स्पन्दनों के सहारे पूर्वाभास भी हो जाता है। सामान्य व्यक्तियों की तुलना में उनकी चेतना अधिक सुविकसित तथा इन्द्रियाँ सूक्ष्म अनुभूतियों को ग्रहण करने में अधिक सक्षम होती हैं ऐसे ही व्यक्ति भविष्य वक्ता के रूप में प्रख्यात होते देखे गये हैं। चेतना को विकसित करके प्रकृति घटनाओं की पूर्व जानकारी प्राप्त करने की सामर्थ्य विकसित कर सकना सम्भव है, उसके बीज मानवी सत्ता में विद्यमान हैं, यह एक सत्त में विद्यमान है, यह एक सत्य है।
प्रकृति ने यह क्षमता मनुष्येत्तर जीवों को भी दी है कि वे प्रकृति घटनाओं की पूर्व जानकारी प्राप्त करके अपनी सुरक्षा कर सकें। एक विलक्षण बात यह है कि उनकी इन्द्रियों का ग्राह्य क्षमता मनुष्य की तुलना में कई गुनी अधिक बढ़ी- चढ़ी है। जिन बातों का ज्ञान मानव भौतिक यन्त्रों के माध्यम से अर्जित करता है उनका बोध बिना किसी बाह्य यन्त्र के जीव जन्तुओं को मात्र उनकी इन्द्रियों के सहारे हो जाता है। फलतः समय रहते वे अपने व्यवहार, क्रिया-कलाप में परिवर्तन करके आने वाले संकटों की पूर्व सूचना देते देखे गये हैं।
जीव-जन्तुओं पर विगत वर्षों में की गयी शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि उन्हें भूचाल का पूर्वानुमान हो जाता है। यह जानकारी उन्हें भूगर्भ में चल रही भूकम्पीय गतिविधियों से उत्पन्न मन्द ध्वनि तरंगों, दुर्गन्ध, झटकों तथा ऐसे अनेकों सूक्ष्म संकेतों से मिल जाती है। जन्तुओं की इस विलक्षण क्षमता पर सर्वप्रथम शोधकार्य चीन से आरम्भ हुआ जो अब काफी गति पकड़ चुका है। लियाओनिंग प्रान्त के उत्तरपूर्वी क्षेत्र में सन् 70 और 74 में आये दो भूकम्पों के दौरान स्थानीय पशु पक्षियों के व्यवहार में असामान्य परिवर्तन देखा गया।
प्रायः सर्प गर्मी, बरसात के मौसम में अपने बिलों से निकलते-विचरते तथा आक्रमण करते देखे जाते हैं। पर दिसम्बर 74 की तेज ठंड में लियाओनिंग प्रान्त के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में अचानक सर्प भिन्न तरह का बाहर करने लगे। कड़कड़ाती ठंड में उन्हें अपने बिलों से निकलकर उन्मादी रूप में बिलबिलाते देखा गया। चूहे दिन के उजाले में गली, चौराहे पर निर्भीक भागदौड़ मचाने लगे। इसके कुछ ही देर बाद उस क्षेत्र में भूकम्पीय झटकों की शृंखला शुरू हुई। फरवरी 74 में भी जन्तुओं का ऐसा ही परिवर्तित व्यवहार देखा सुअर परस्पर लड़ने भिड़ने लगे तथा अपने बाडे को तोड़कर निकल भागे। गाय, बैल जैसे सीधे जानवर भी रस्सियाँ तोड़ कर मुक्ति का प्रयास करने लगे। कुत्ते जमीन को सूँघते तथा अकारण ही भौंकते देखे गये। इसके तुरन्त बाद ही भूकम्प झटकों की दूसरी शृंखला प्रारम्भ हुई 4 फरवरी 75 की सुबह जन्तु जगत की यह विचित्र गतिविधियाँ जब चरमोत्कर्ष पर पहुँच गयीं, तो चीनी अधिकारियों ने पूर्व अनुभवों के आधार पर आने वाले भूकम्प का अनुमान लगाकर हैंचेग शहर को तुरन्त खाली करने का आदेश दिया। खाली होने के कुछ ही घन्टे बाद एक विनाशकारी भूकम्प आया जिसने पूरे नगर को कुछ ही क्षणों में धराशायी कर दिया।
इतिहास में ऐसे अन्य उदाहरण भी मौजूद हैं जिसमें भूचाल आने के पूर्व जीव-जन्तुओं के व्यवहार में इसी प्रकार का अद्भुत आकस्मिक परिवर्तन देखा गया। प्राचीन ग्रीक के चूहों, बिल्लियों, साँप-बिच्छुओं तथा दूसरे जानवरों को शहर छोड़कर बाहर सड़कों पर भागते, रेंगते देखा गया। सन् 1835 में चित्नी के कन्शिप्सन क्षेत्र में जब भूकम्प की विनाश लीला मची, तो उनके कुछ दिन पूर्व समुद्री चिड़ियों का एक विशाल झुण्ड उस क्षेत्र में ऊपर कलरव मचाता-मँडराता देखा गया। सन् 1906 में सैन फ्राँस्सिको में आये प्रचण्ड भूकम्प के पूर्व कुत्ते जहाँ-तहाँ लगातार भौंकते पाये गये थे। जापानी नदियों में कैटफिश के बड़े-बड़े झुण्ड का अकारण ही जी में उछलते रहना आदि घटनाएँ देखी गयीं।
इन घटनाओं के आधार पर जीव वैज्ञानिकों के मन में यह विश्वास सुदृढ़ होता जा रहा है कि जन्तुओं में अवश्य ही कोई ऐसा एन्टेना या सम्वेदी तन्त्र है जो भूकम्पीय तरंगों को पकड़ने में सक्षम है। दूसरी और भू-भौतिकी शोधों में ऐसे सूत्र संकेत मिले हैं जो बताते हैं कि भूकम्प आने के पूर्व भूगर्भ में अनेकों प्रकार की सूक्ष्म हलचलें होती हैं। सम्भवतः उन्हीं को अपने सम्वेदी अंगों द्वारा ग्रहण करके जीव परिकर भूकम्प का पूर्वाभास कर लेता है और भावी विनाश लीला को देखते हुए चित्र-विचित्र हरकतें करता है। भूचाल आकस्मिक नहीं होता, अपनी विनाशलीला प्रकट करने के पूर्व अनेकों चरणों में होकर गुजरता है। भूचाल से पूर्व धरती काँपती है। यह कम्पन पृथ्वीगत चट्टानों के पारस्परिक टकराव के कारण होता है। इसके बाद भूगर्भीय हलचलें तीव्रतम होती चली जाती हैं। भूकम्पीय तरंगें भूगर्भीय चट्टानों से होती हुई पृथ्वी सतह तक पहुँचती और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में भारी फेर बदल उत्पन्न करती हैं। ये सब घटनाएँ इतनी सूक्ष्म होती हैं कि यन्त्र उपकरणों की पकड़ में नहीं आतीं, जीव-जन्तुओं के अत्यन्त संवेदनशील अंग उन्हें पकड़ लेते हैं।
पृथ्वी का सूक्ष्म चुम्बकीय क्षेत्र परिवर्तन एक ऐसी ही घटना है जो सर्वोत्तम दिशा ज्ञान रखने वाले पक्षी पालतू कबूतरों के ही अनुभव में आते हैं। ध्रुवों पर पृथ्वी का भू-चुम्बकीय क्षेत्र औसतन 60 हजार गॉस (गॉस-चुम्बकत्व माप की इकाई) तक पाया जाता है, विषुवत रेखा पर यह लगभग 30 हजार गॉस होता है कॉर्नवेल युनिवर्सिटी के जीवन विज्ञानी एस. लारकिन्स तथा उनके दिवंगत सहयोगी विलियन कीटन के अनुसार अति सुग्राहक चुम्बकीय सुई की भाँति पालतू कबूतर 30 गॉस जैसे अति सूक्ष्म चुम्बकत्व परिवर्तन को भी आसानी से पकड़ लेता है। यह विशेषता मात्र कबूतरों में ही नहीं मधुमक्खियों, गुबरैलों, दीमकों तथा अन्य छोटे जीवों में भी पायी जाती है।
कहा जा चुका है कि जिस प्रकृति को मनुष्य शांत, स्थिर मानता है, वह ऐसी है नहीं, उसमें निरन्तर स्पन्दन हो रहा है। उन स्पन्दनों में भली-बुरी घटनाओं के बीज विद्यमान हैं। उसमें ऐसी ध्वनियों निकलती रहती हैं तो हमारी श्रवण क्षमता के परे हैं। अपनी अद्भुत श्रवण क्षमता के बल पर वे नगण्य जीव-जगत उन्हें सुन लेते प्रकृति के गर्भ में पल रही आपदाओं-विभीषिकाओं से जीवन रक्षा करने की पूर्व व्यवस्था बनाते तथा तद्नुरूप सन्देश सम्प्रेषित करते देखे जाते हैं। मनुष्य की श्रवण क्षमता सीमित है। कान 1000 से 4000 साइकिल्स प्रति सेकेंड की ध्वनियों को ही पकड़ सकते हैं। 10,000 साइकिल्स प्रति सेकेंड वाली ध्वनियों के लिए हम बहरों के समान हैं, जबकि कुत्ते, बिल्ली लोमड़ी 60, साइकिल प्रति सेकेंड की ध्वनि को भी आसानी से सुन सकते हैं। चूहे, चमगादड़ तथा ह्वेल, डाल्फिन जैसी मछलियाँ तो 1000,000 साइकिल प्रति सेकेंड तक की ध्वनियों को न केवल सुन सकते हैं । वरन् वैसी ध्वनि तरंगें उत्पन्न भी करने में भी सक्षम हैं।
इस स्तर की ध्वनियों को अल्ट्रा सोनिक तरंगें कहते हैं। इनके अतिरिक्त एक अन्य प्रकार की ध्वनि तरंग भी होती है जो भूगर्भीय चट्टानों के मन्दगति से फटन तथा भूगर्भीय गैसों से आकस्मिक प्रस्फुटन से पैदा होती है। ये ध्वनि तरंगें पूर्णतः मानवी श्रवण क्षमता से परे हैं। “सिस्मोग्राफ जैसे श्रवण यन्त्रों के माध्यम से भी इन्हें नहीं सुना जा सकता। पशु पक्षियों को इन्फ्रा ध्वनि तरंग ग्रहण सामर्थ्य सम्बन्धी एक पर्यवेक्षण में जीव विज्ञानी मेलविन क्रीथेन एवं उनके सहयोगियों ने पाया कि पालतू कबूतर 3 साइकिल प्रति मिनट जैसी अत्यन्त मन्द ध्वनि तरंग को भी आसानी से पकड़ लेते हैं। इसी प्रकार का तरंग ग्रहण तन्त्र काँड मछली में भी पाया जाता है, जो भूकम्प से पूर्व उन्मादियों जैसी इधर-उधर उछलती-कूदती दिखायी देती हैं।
सूक्ष्म ध्वनि तरंग श्रवण सम्बन्धी शोध अत्यन्त कठिन कार्य है क्योंकि परिष्कृत तथा संवेदनशील यन्त्रों के बावजूद सूक्ष्मतम को पकड़ने वाले नहीं बन सके हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि इन्फ्रा ध्वनि तरंगों से भी सूक्ष्म स्तर की ध्वनियाँ प्रकृति भूगर्भ में स्पन्दित होती रहती हैं जिनकी कोई जानकारी नहीं मिल पाती जबकि कबूतर आदि उन्हें आसानी से सुन लेते हैं। माइक्रोफोन स्टेशन द्वारा पता लगायी जाने वाली कोलाहल जैसी कृत्रिम ध्वनियाँ भी कबूतर पकड़ लेते हैं जिसके लिए मीलों लम्बे हवा कोलाहल फिल्टर रूपी जटिल तकनीकी व्यवस्था बनानी पड़ती है, यह व्यवस्था कबूतरों में प्रकृति ने फिट की है ताकि वे श्रवणातीत ध्वनियों को सुन सकें।
अल्ट्रा तथा इन्फ्रा ध्वनि तरंगों के अतिरिक्त मन्द भूकंपीय कम्पनों को भी पकड़ने में पशु पक्षी सक्षम होते हैं। शोध निष्कर्षों से ज्ञात हुआ है कि कबूतर की टाँग में सम्वेदी तन्त्रों का एक ऐसा जाल बिछा होता है जो अत्यन्त मन्द कम्पनी के प्रति भी अति संवेदनशील होता है। एक प्रयोग में देखा गया कि भूकम्प के पूर्व पालतू कबूतरों का झुण्ड यकायक उड़ गया जबकि दूसरे पालतू कबूतरों, जिनके सम्वेदी अंगों से सम्बद्ध स्नायु काट दिये गये थे, बिना घबराये दाना चुगते रहे। वे भूगर्भीय भूकम्पों के कम्पनों को नहीं पकड़ सके। कबूतरों की तरह मछलियों को भी मन्द कम्पनों का ज्ञान होता जाता है। मछलियों तथा अन्य जलचरों में एक विशेष प्रकार का लेटरल लाइन सिस्टम होता है। यह तन्त्र न केवल अपने निकटवर्ती शत्रुओं का पता लगा लेता है वरन् समुद्र के माध्यम से लम्बी दूरी तय करके हल्की भूकम्पीय तरंगों को ग्रहण करने में सक्षम होता है।
प्रकृति के भीतर क्या सूक्ष्म प्रक्रिया चल रही है तथा उससे किस प्रकार के संकेत मिल रहे हैं, इसकी जानकारी मनुष्येत्तर जीवों को आसानी से मिल जाती है। सर्वसमर्थ होते हुए भी मनुष्य इस क्षेत्र में उन नगण्य जीवों में भी पिछड़ा हुआ है। असम्भव कुछ भी नहीं है। सूत्र एवं विद्या हाथ लग सके तो वह सामर्थ्य मनुष्य अपनी ही कायिक प्रयोगशाला में विकसित कर सकता है। वह विद्या क्या हो, यह विज्ञान के समक्ष शोध का विषय है। अपनी हठधर्मिता छोड़कर अध्यात्म की विभिन्न धाराओं का सहयोग लिये जा सकें तो इस दिशा में बढ़ने तथा कुछ महत्वपूर्ण करने का संकेत मार्गदर्शन अध्यात्म विज्ञान दे सकता है। ऐसा सम्भव हो सके तो सचमुच ही प्रकृति रहस्यों को समझने तथा उनसे समय पर लाभ उठाने के वे सूत्र हाथ लग सकते हैं जिनसे प्रकृति के अन्य जीव अनायास ही लाभान्वित होते रहते हैं। इससे समय से पूर्व विभीषिकाओं से बचने अनुकूलताओं से लाभ उठाने तथा श्रवणातीत ध्वनियों से अन्तः सामर्थ्य को विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
अन्तरिक्ष में अन्यत्र भी जीवन होने की संभावना अब असंदिग्ध होती जा रही है । उन प्रमाणों का बाहुल्य बढ़ रहा है जो यह सिद्ध करते हैं कि हम इस ब्रह्माण्ड में अकेले ही बुद्धिमान प्राणी नहीं है, हमारे समतुल्य और भी अधिक समर्थ शक्तिवान अन्यत्र हो सकते हैं । ऐसे प्रमाणों ने अब उस अन्धविश्वास को दूर कर दिया है जिसके अनुसार यह दावा किया जाता है कि मात्र पृथ्वी का ही वातावरण ऐसा है जिसमें जीवन स्थिति रहे और प्रगति कर सके । वैसी परिस्थितियां अन्य लोकों में होने के सम्बन्ध में ऐसे प्रमाण मिलते चले जा रहे है। जिन्हें प्रमाणिक एक महत्वपूर्ण कहा जा सके ।
अन्य ग्रहों पर जीवन होने न होने का अनुमान इस आधार पर लगाया जाता है कि वहाँ उसके निर्वाह के लिये खाने को वनस्पति, पीने को पानी एवं साँस लेने के लिये आक्सीजन है या नहीं । यह अनुमान धरती धरती के प्राणियों की आवश्यकता को देखते हुए लगाया गया है । किन्तु यह आवश्यक नहीं कि धरती जैसी बनावट वाले प्राणी ही अन्य लोकों में भी हों । जीवन के असंख्य स्वरूप हो सकते हैं । उनमें से एक वह भी है जो पृथ्वी पर पाया जाता है ।
कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के प्रोफेसर हेज होवेर ने ऐसे जीवों का अस्तित्व भी सिद्ध किया है जो उपरोक्त तीन प्रकार के साधनों के अभाव में भी दूसरे माध्यमों से अपना निर्वाह क्रम चलाते हैं । वे कहते हैं शुक्र जैसे आवासीय वातावरण में भी उसी प्रकार का जीवन हो सकता है जैसाकि धरती पर उन्हीं परिस्थितियों में आरम्भ वाले दिनों में वाष्पीय समुद्रों के बीच पनपा। यह परिस्थितियाँ जैसे जैसे बदलती गई वैसे-वैसे प्राणियों के आकार प्रकार ही नहीं आहार विहार भी बदलते गये ।
प्रोफेसर होवेर कहते हैं कि अन्य ग्रहों से भी वहाँ की परिस्थितियों में निर्वाह कर सकने योग्य शरीरों वाले तथा उन्हीं साधनों पर निर्वाह कर सकने वाले प्राणी हो सकते हैं । अपने सौर मण्डल में मंगल और शुक्र की परिस्थितियां ऐसी मानी जा सकती है । जहाँ धरातल पर न सही भूमिगत या उड़नशील जीवन हो सकता है । संभव है कि वहाँ हवा में तैरते हुए नगर हो तथा उनमें उसी प्रकृति के जीवधारी निर्वाह कर रहे हों । धरती पर उड़नतश्तरियों का आधार खोजने वाले एक कारण यह भी यह भी सोचते हैं कि किसी ग्रह के उड़नशील नगरों के नभचर प्राणी किसी प्रयोजन के लिये धरती पर आवागमन की सुविधा बनाने का प्रयत्न कर रहे हों ।
अपने सौर मण्डल में अधिक तापमान और आक्सीजन का अभाव होते हुए भी यह माना जा रहा है कि वहाँ की परिस्थितियों में फलने फूलने वाला जीवन जीवन पाया जा सकता है । बृहस्पति पर भी ऐसी संभावना प्रतीत होती है । शनि के चन्द्रमा टाइटन पर भी ऐसी परिस्थितियां पाई गई हैं जिनमें मनुष्य लोक से भिन्न प्रकार के जीवन की संभावना हो सकती है ।
कार्लसाँगों की विश्व विख्यात और बहुचर्चित पुस्तकों में खगोल विद्या के अति महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डालते हुए प्रतिपादित किया है कि इस ब्रह्माण्ड में निश्चय ही ऐसे ग्रह नक्षत्र होंगे जिनमें मनुष्यलोक जैसा या अन्य प्रकार का जीवन विद्यमान हो । उनकी ‘दि ड्रेगन्स ऑफ ईडन और ‘ब्रोकाज ब्रेन’ में उन्होंने बहुत कुछ लिखा है और ‘कास्मोस’ ग्रन्थ में भी ऐसे ही कारण एवं प्रमाण प्रस्तुत किये है ।
खगोल विद्या के विश्वविख्यात विज्ञानी कास्टेन्टिन राइडिन ने अन्तरिक्ष में भ्रमणशील महा उद्घोषों को टेप किया है । इन शब्द धाराओं की अपनी अपनी फ्रीक्वेंसी है । जो समाप्त नहीं होती, वरन् चक्कर काटती और अपने परिभ्रमण क्षेत्र की जानकारियां समेट-समेट कर घसीटती फिरती है । राइडिन ने प्रायः 72000 ऐसे अन्तरिक्ष ध्वनि प्रवाह पकड़े और टेप किये हैं । संसार भर के भौतिकविदों, इलेक्ट्रिक इंजीनियरों, खगोलवेत्ताओं तथा परामनोवैज्ञानिकों ने इसके अर्थ अपने अपने ढंग से लगाये है । पर उनका अस्तित्व सभी ने स्वीकारा है। भ्रमजन्य नहीं ठहराया । कई बार तो यह शब्द किन्हीं जीवधारियों की चीख पुकार से मिलते-जुलते और भावनाओं का प्रतिनिधित्व तक करते प्रतीत होते हैं ।
सुने गये अन्तरिक्षीय ध्वनि प्रवाहों में क्रमबद्ध संकेत-बीप-बीप-बीप के रूप में उपलब्ध होते हैं । आश्चर्य यह है कि इनके मध्य ठीक 316 सेकेंड का अन्तर होता है । यदि वे किसी प्राकृतिक घटना कारण होता तो यह अन्तर यथावत न बना रहता उसमें अन्तर पड़ता । अनुमान लगाया गया है कि यह किसी तारक पर निवास करने वाले बुद्धिमान प्राणियों का प्रयास है जो हम तक साँकेतिक भाषा में कुछ संदेश पहुँचाने-संबंध साधने के लिये इस संकेत आधार का उपयोग कर रहे है।
अन्तरिक्ष वासी पृथ्वी पर आते रहें है और यहाँ की परिस्थितियों को जीवन विकास के लिये उपयुक्त बनाने का प्रयास करते रहें है । इसके कितने ही प्रमाण पुरातत्त्ववेत्ताओं को मिले है । उनमें से बहुतों का विश्वास है कि पृथ्वी को वर्तमान स्तर तक पहुंचाने में अन्तरिक्षवासियों का योगदान चिरकाल तक चलता रहा है । उन्होंने अपने हाथ तब खींचे जबकि यह विश्वास कर लिया कि विकसित मनुष्य के हाथों इस भूमण्डल का भाग्य सुरक्षित है ।
स्विट्जरलैंड के जीव विज्ञानी डा. डैनिकेन का प्रतिपादन है कि धरती पर जीवन किसी विकसित ध्रुव तारे से उतरा है । कोई अंतरिक्ष से यहाँ आये और जीवन का बीज बिखेर गये उन्हीं की धरती पर विभिन्न जीवधारियों की फसल उगी और फैली है । वे अपने कथन की पुष्टि से केवल ब्रह्माण्ड विद्या का वरन् पौराणिक आख्यानों का भी सहारा लेते हैं ।
श्रीलंका के खगोलशास्त्री प्रो0 विक्रम सिन्धे ने भी तथा कार्डिफ विश्वविद्यालय के सर फ्रेड मोले के संयुक्त अन्वेषण ने भी इसी संभावना की पुष्टि की है कि पृथ्वी को जीवन किसी अन्य विकसित सौर मण्डल के अनुदान से मिला है। इतना ही नहीं उसे विकसित करने से अन्य लोक निवासियों ने बहुत समय तक बहुत कुछ करने रहने का उत्तरदायित्व वहन किया है ।
बर्लिन की स्टेट लाइब्रेरी में एक ऐसा मानचित्र रखा हुआ है जिस पर संसार के अनेकानेक मूर्धन्य मस्तिष्कों ने ने भारी माथा पच्ची की है और उन्हें प्रामाणिक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना है । यह मानचित्र अठारहवीं सदी के प्रारम्भ में तुर्की नौसेना के एडीमरल पीटी के केईस में प्राप्त हुआ था । इसके साथ दो एटलस भी प्राप्त हुए थे । इसमें ‘डैड सी’ तथा ‘मेड्रीट्रेनियम’ क्षेत्रों का सारगर्भित चित्रण है।
अमेरिका मानचित्र विशेषज्ञ अलिन्यटन एच मैलरी ने इसमें धरती की सही परिस्थितियों की अधिक अच्छी जानकारी प्राप्त की । नौ-सेना के नक्शा नवीस वाल्टर्स की इस कार्य में सहायता ली गई और पाया कि न केवल समुद्री भाग का वरन् अमेरिका के बाहरी और भीतरी भागों की भी उसमें सही जानकारी विद्यमान है। वेधशाला निर्देशक फादर लिनहेम ने पाया कि इनमें दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र की उन पहाड़ियों के भी चित्र है जो अब से कुछ समय पूर्व तक बर्फ से ढकी थी और अभी ही वे प्रकट हुई है । सन 1952 तक इनकी किसी को कोई जानकारी नहीं नहीं थी ।
अन्वेषक चार्ल्स होपगुड़ और रिसर्च स्ट्राचन का कथन है कि ऐसे सही चित्र आये आकाश से ही लिये जा सकते हैं । धरती से नहीं । यह ऊंचाई भी किसी ग्रह उपग्रह के स्तर की होनी चाहिये । वर्तमान अन्तरिक्ष यानों में लगे शक्तिशाली कैमरे भी मात्र 5000 मील की परिधि के चित्र सही खींच पाते हैं । इसमें भागों की सीमा के चित्र कैमरे की पकड़ एवं पृथ्वी की गोलाई के कारण बिगड़ जाता है । ऐसी दशा में इतनी लम्बी परिधि के इतने सही चित्र खींचने के लिये किसी बहुत ऊंचे ग्रह पर बैठकर ही सही जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अठारहवीं शताब्दी में तो कोई इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था ।
पेरू के कुचक्री क्षेत्र में अति पुरातन ‘तिआहुन’ को सभ्यता के प्रमाण मिले है । वह 13000 फुट ऊँचाई का क्षेत्र है। समुद्र की सतह से वातावरण का दबाव प्रायः आधा है। आक्सीजन की मात्रा बहुत कम है। ऐसी दशा में वहाँ पहुँचकर कोई बड़ा शारीरिक परि म कर सकना सम्भव नहीं। फिर भी वहाँ के अवशेष बताते हैं कि वहाँ कभी बुद्धिमान शिल्पियों को निवास और पुरुषार्थ भली प्रकार सक्रिय रहा है।
इतिहास की वर्तमान साक्षियां मात्र 6 हजार वर्ष पूर्व तक ही कुछ प्रमाणित कर सकने में समर्थ है। प्रस्तुत इतिहास इतना ही पुराना है। पर ‘तिआहुन की’ सभ्यता के चिन्ह अवशेष इससे कहीं अधिक पुराने हैं। कभी के इस सुविकसित रहे नगर की चहार दीवारी 100 टन भारी पत्थरों पर 60 टन के पत्थर रख कर बनाई गई है। इनका धरातल इतना चिकना है मानो किसी सुविकसित स्तर के यन्त्र द्वारा घिसा गया हो। पत्थरों के जोड़ और खाँचे इतने सही हैं कि उनमें राई रत्ती भी अन्तर नहीं दीखता। यह काम पाषाण युग का मनुष्य नहीं कर सकता था। इतना कर सकने में तो आज के विकसित साधन में हिम्मत नहीं कर सकते। इस खण्डहर में एक 24 फुट ऊँची और 20 टन भारी ऐसी मूर्ति भी है जो एक ही पत्थर की बनी है। उसकी कलाकृति इतनी सुन्दर है कि आज के मूर्तिकारों को भी चुनौती दे सके।
इन निमार्णों पर प्रकाश डालने वाली पुस्तक एच. वेलसी और पी. एलन के संयुक्त प्रयास से लिखी गई थी। इसका नाम है- ‘दि ग्रेट आइडल ऑफ तिआहुनकी’ यह सन् 1656 में प्रकाशित हुई उसमें प्रमाणों सहित यह सिद्ध किया गया है कि इन अवशेषों में खगोलीय जानकारियाँ रहस्यमय ढंग से अंकित हैं। इससे पता चलता है कि चित अतीत में पृथ्वी ने किसी अन्तरिक्षीय उपग्रह को अपनी पकड़ में जकड़ लिया था। इस उपग्रह पर 282 दिन का वर्ष होता था और साल में पृथ्वी की 425 परिक्रमा करता था। अन्त में वह छितरा गया और उसका मलबा वर्तमान चन्द्रमा के रूप में विद्यमान है। यह घटना 28 हजार हर्ष पुरानी बताई गई है।
चिली से प्रायः 2500 मील दूर ईस्टर द्वीप में सैकड़ों की संख्या में ऐसी पाषाण प्रतिमाएँ पाई गई हैं जो 33 से लेकर 66 फुट तक ऊँची और 50 टन तक भारी हैं। वह किसने बनाई? किन साधनों से बनाई? क्यों बनाई? जैसे प्रश्न इसलिए और भी अधिक रहस्यमय हो जाते हैं कि यह टापू भूमि से 2000 मील दूर निपट जशराशि के बीच घिरा पड़ा है। साधनों का सर्वथा अभाव। वहाँ मुश्किल से 2000 आदिवासी रहते हैं। इससे अधिक के लिए उस क्षेत्र में वनस्पति भी नहीं है। ज्वालामुखियों का कठोर लावा ही वहाँ पत्थर के रूप में पड़ा है। उसे कौन काटे? कैसे काटे? इतनी भारी मूर्तियाँ कैसे बने? फिर एक चट्टान से इतनी बारीक कलाकृतियाँ किस प्रकार विनिर्मित हों? इन प्रश्नों का सही उत्तर तो नहीं मिलता, पर उसकी विवेचना में कुछ प्रामाणिक पुस्तकें छपी हैं। इनसे तत्कालीन स्थिति पर थोड़ा प्रकाश पड़ता है और अनुमान लगता है। “आकू वाकू” - “चरियट्स ऑफ गाइड” - गाइड फ्राम दी आउटर स्पेस” ग्रन्थों में अन्यान्य अनुमान के साथ-साथ यह सम्भावना भी व्यक्त की गयी है कि किसी अन्य लोकवासियों ने धरती पर आकर इस प्रकार अपने कौशल का परिचय दिया हो।
सन् 1638 में चीन तिब्बत सीमा पर पहाड़ी की गुफाओं में एक सीधी कतार में आश्चर्य जनक कब्रें पाई गई। खुदाई करने पर गढ़े मनुष्यों के शिर बहुत बड़े और शरीर छोटे थे। समीपवर्ती चट्टानों पर कुछ अभिलेख एवं चित्र हैं। जिनका रहस्योद्घाटन करते हुए एकेदमी ऑफ फ्री हिस्टोरिक रिसर्च पीकिंग के प्रो. तस्नुम उनतुई ने किसी अन्य लोकवासियों के साथ इनकी संगति बिठाई थी। उनका प्रतिपादन चीन में तो नहीं छपा पर सोवियत यूनियन की पत्रिका ‘स्पूर्तिनिक’ में वह प्रकाशित हुआ है कि तुई की मान्यता थी कि 12 हजार वर्ष पूर्व कोई अन्तरिक्षवासी धरती पर आये थे। यह उन्हीं के अवशेष हैं। उनके यान धरती पर आकर खराब हो गये। जिनकी वे मरम्मत नहीं करा सके। इनने धरती वासियों के साथ मित्रता करने और तालमेल बिठाने का भी प्रयत्न किया पर वे सफल न हो सके।
अभी कुछ समय पूर्व अमेरिका में एक विशेष प्रकार की उड़न तश्तरी का प्रसंग चर्चा का विषय बना रहा है जिसके बारे में कहा जाता है कि अन्तरिक्ष यात्रियों की लाशें तथा उनके एक विशेष यानों का मलबा मनुष्य के हाथ लग गया है।
उड़न तश्तरियों का लम्बा इतिहास है। वे पृथ्वी के अनेक भागों में परिभ्रमण करती देखी हैं। उनका आभास भर मिला है और दृश्यों के आकाश में विलीन होते रहने के कारण यह पता नहीं चला कि वे कोई ऊर्जा भ्रमर अथवा दृष्टि भ्रम तो नहीं है। ऐसी घटनाएँ बहुत कम हुई हैं जिनमें इनसे सीधे टकराने प्रभावित होने का प्रत्यक्ष अवसर किसी को मिला हो। जिन्हें मिला है उन्हें भी उन घटनाओं को किन्हीं अन्य कारणों से सम्बद्ध होने का भी तारतम्य बिठाया गया है।
इन दृश्यों और घटनाओं में एक घटना ऐसी है जिसे असाधारण रूप से विस्मयकारी और अब तक के घटनाक्रमों में अद्भुत कहा जा सकता है। उसमें अन्तरिक्ष यान का मलबा और प्राणियों के शव हाथ लगने की बात कही जाती है। यों इस घटना को अनेक कारणों से गोपनीय रखा गया होने की बात जनश्रुति के रूप में प्रख्यात है। वस्तुस्थिति क्या है। इसका सही रहस्योद्घाटन तो तथ्यों के स्पष्टतया सामने आने पर ही हो सकेगा पर अभी तक उस सम्बन्ध में जो अटकलें है उन्हें देखते हुए किसी नई उपलब्धि की आशा अवश्य की जाती है।
चार्ल्स वर्लिट्स और विलियम भूर ने इस सम्बन्ध में जो तथ्य एकत्रित किये है उन्हें उन दोनों ने संयुक्त रूप से एक पुस्तक में लिखकर प्रकाशित किया है। इस पुस्तक घटनाक्रमों के अनुसार न्यू मैक्सिको के निकटवर्ती क्षेत्र में 7 जुलाई 1640 की शाम के 4 बजे एक अन्तरिक्ष यान का मलबा टूटकर जमीन पर गिरा उनमें कुछ ऐसे मृतकों के शरीर भी मिले जो धरती निवासियों से सर्वथा भिन्न प्रकार के थे।
रुजवेल प्रक्षेयणास्त्रों और अणुबमों की शोध तथा निर्माण का गुप्त नगर था। सुरक्षा के लिए उस क्षेत्र पर वायु सेना का 506 वाँ जत्था सदा मंडराता रहता था।
अन्तरिक्ष यान का मलबा देखने वाले प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वह ऐसी बहुत पतली चमकीली धातु का बना था जो कपड़े जैसी मोटाई के होने पर हथौड़ों से नहीं मोड़ी जा सकती थी। मलबा एक सवा मील के घेरे में बिखरा पड़ा था। उसका मध्य भाग तीस फुट घेरे की तश्तरी जैसा था। उससे निकलकर जो शव बाहर गिरे मनुष्यों से मिलते-जुलते तो थे पर मनुष्य नहीं थे। उनके सिर गेंद जैसे गोल, आँखें छोटी, बाल बिल्कुल नहीं। एक ही सिलेटी रंग का कपड़ा वे ओढ़े हुए थे। औसत मनुष्य से उनके सिर बड़े और दोनों आँखों के मध्यवर्ती दायरे अधिक फैले हुए थे।
भयभीत, आश्चर्यचकित और कौतूहलग्रस्त लोगों में से कुछ ने हिम्मत करके उस क्षेत्र तक पहुँचने का प्रयत्न किया और सूचना बड़े अफसरों तक पहुँचाई। वे साज-सामान के साथ आये और सारे मलबे को समेट कर गुप्त स्थान को ले गये। उसमें क्या था, इस सम्बन्ध में अधिक जानने के उत्सुक कितने ही पत्रकार तथा वैज्ञानिक वहाँ पहुंचे पर सेना विभाग ने उस रहस्य को बताया नहीं। ऐसे ही गुब्बारा गिरने जैसा कुछ बहाना बताकर उन्हें टरका देने की कोशिश की। सभी जानते थे कि गुब्बारा होने की बात गलत है। इन दिनों दूर-दूर तक कोई गुब्बारा छोड़ा भी नहीं गया था। वाशिंगटन ‘पोस्ट’ जैसे जिम्मेदार पत्र ने इस आशंका की पुष्टि की कि वस्तु कोई रहस्यमय थी और उसका विवरण छिपाया गया है।
कहा जाता है कि अन्तरिक्ष रहस्यों के सम्बन्ध में इस मलबे के आधार पर ऐसी जानकारियाँ मिल सकती हैं जिन्हें अमेरिका अन्य देशों के हाथ न लगने देकर उस क्षेत्र पर अपना एकाधिकार करने का उत्सुक है।
कारण जो भी हो, यह रहस्य अभी भी अपने स्थान पर यथावत् है कि 6 जुलाई को जो मलबा आकाश से गिरा वह रहस्यपूर्ण था और उसे गहरे अनुसन्धान के लिए अभी तक छिपाकर रखा गया है और उस आधार पर अन्तरिक्ष के रहस्य जानने तथा उस पर एकाधिकार रखने का प्रयत्न चल रहा है। पूछताछ करने के लिए गये मूर्धन्य लोगों को जिस प्रकार निराशाजनक ढंग से टरका दिया गया उससे उनने भी ऐसे ही किसी रहस्य के होने की संभावना व्यक्त की है।
जो हो, वह घड़ी दिन-दिन निकट आती जा रही है जिसमें मनुष्य के लिए अन्तरिक्षवासी सुविकसित मनुष्यों देवताओं के साथ संपर्क साधने - आदान - प्रदान का द्वार खोलने और सामान्य से असामान्य बनने का अवसर मिलेगा।
खगोल विज्ञानियों के अनुसार अपनी पृथ्वी को एक गैस बादल से समुद्र का - पिण्ड गोलक का - रूप धारण करने वाले समय को प्रायः 11 अरब वर्ष हुए हैं। सौर मण्डल के अन्य सदस्यों का जन्म भी प्रायः एक साथ हुआ इससे उनकी आयु भी वही मानी जायेगी इसके अपवाद भिन्न-भिन्न ग्रहों में भिन्न-भिन्न संख्या में देखे गये। चंद्रमा हो सकते हैं जो बाद में बनते रहे हैं। पृथ्वी के चन्द्रमा के सम्बन्ध में कहा जाता है कि समुद्र वाले गड्ढे से टूट कर अन्तरिक्ष में विचरण करने वाला पदार्थ भरा है। जो गिर तो पड़ा पर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण परिधि को लाँघ न सकने के कारण उसी के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करने लगा। यही बात अन्य ग्रहों के चन्द्रमाओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
हमारी पृथ्वी सौर मण्डल के मध्य में नहीं है वरन् एक कोने में पड़ी है। ठीक इसी प्रकार अपना सौरमण्डल भी मन्दाकिनी आकाश गंगा के ठीक मध्य में अवस्थित न होकर एक कोने में पड़ा है। सूर्य प्रति सेकेंड 220 किलोमीटर की गति से अपने सौर मण्डल सहित आकाश गंगा केन्द्र का परिक्रमा करता है। इस संदर्भ में समझा जा सकता है कि जब से धरती पर मनुष्य का जन्म हुआ है तब से लेकर अब तक उस केन्द्र की परिक्रमा भी पूरी नहीं हो पाई है। अपनी आकाश गंगा के केन्द्र से यह सौर मण्डल 30 हजार प्रकाश वर्ष हट कर है।
अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों की तरह ही अपने इस सौर मण्डल का भी सृजन हुआ है। वाष्पीय महामेघ न केवल अपने केन्द्र में फटा वरन् उसके टुकड़े भी उसी क्रम से फटते चले गये। अपने-अपने उद्गम केन्द्र के इर्द-गिर्द उसकी आकर्षण शक्ति के कारण परिभ्रमण करने की स्थिति में फँसते चले गये। विस्फोट के जिस क्रम से वितरण विकिरण फैलता है उसी अनुपात से आकर्षण भी उत्पन्न होता है। वह अपने परिकर को एक सीमा तक ही बिखरने देता है। इसके बाद सभी को एक सूत्र में समेट लेता है और परिवार क्रम के अनुरूप निर्वाह करने लगता है। ब्रह्माण्ड में विद्यमान अनेकानेक सौर-मण्डलों के सम्बन्ध में यह घटनाक्रम घटित हुआ है।
अपने सौर मण्डल के सदस्यों में कुछ ग्रह हैं कुछ उपग्रह। ग्रहों में सूर्य को छोड़कर नौ ग्रह हैं। इनमें से कुछ तो खुली आँखों से देखे जा सकते हैं और कुछ ऐसे हैं जो अधिक दूरी तथा रोशनी की कमी के कारण विशेष उपकरणों से ही देखे जा सकते हैं। इन ग्रहों की दूरी, परिधि, भ्रमण कक्षा तथा प्रति सेकेंड चाल का लेखा-जोखा इस प्रकार है-
बुध - सूर्य से अधिकतम दूरी 267 ला सूर्य की परिक्रमा 88 दिन में, अपनी धुरी पर परिभ्रमण 59 दिन। दौड़ की गति प्रति सेकेंड 476 किलोमीटर।
शुक्र - सूर्य से अधिकतम दूरी 1090 लाख कि.मी. सूर्य की परिक्रमा 224.7 दिन। अपनी धुरी पर एक चक्कर 244 दिन। गति प्रति सेकेंड 35 कि.मी.।
पृथ्वी - दूरी 1521 लाख कि. मी. परिक्रमा 335.26 दिन। धुरी पर चक्कर 23 घण्टा 56 मि. 4 सै.। गति 26.8 कि. मी.।
मंगल - दूरी 2461 लाख कि. मी. परिक्रमा 6847 दिन। चक्कर 24 घण्टा 37 मि. 23 सै.। गति प्रति सेकेंड 24.1 कि.मी.।
बृहस्पति - दूरी 8657 लाख कि. मी.। परिक्रमा 11.86 वर्ष। धुरी भ्रमण 10 घण्टा 14 मि.। गति प्रति सेकेंड 13.1 कि. मी.।
शनि - दूरी 15070 लाख कि. मी.। परिक्रमा 2946 वर्ष। धुरी भ्रमण 10 घण्टा 14 मि.। गति 6.6 कि. मी. प्रति सेकेंड।
यूरेनस - दूरी 30040 लाख कि. मी.। परिक्रमा 84.1 वर्ष। धुरी 11 घण्टे। गति 6.8 सेकेंड।
नेपच्यून - दूरी 45370 लाख कि. मी.। परिक्रमा 164.8 वर्ष। धुरी 16 घण्टे। गति 5.4 सेकेंड।
प्लूटो - दूरी 73750 ला कि. मी. परिक्रमा 247.7 वर्ष। धुरी 6 दिन 6 घण्टे। गति 5.7 प्रति सेकेंड।
सौर मण्डल के चन्द्रमाओं की खोज में क्रमशः वृद्धि होती रही है। धरती का एक चन्द्रमा सर्वविदित है। उसे आँखों से देखा जा सकता है पर सौर मण्डल के अन्य ग्रहों में किसके इर्द-गिर्द कितने चन्द्रमा परिभ्रमण करते हैं। इसका पता खोजबीनों के सहारे धीरे-धीरे ही हस्तगत होता रहा है।
इस संदर्भ में नवीनतम जानकारी देने वाला एक नक्शा वैज्ञानिक पत्रिका “नेशनल ज्योग्राफी” में कुछ दिन पूर्व ही प्रकाशित हुआ है। जिसमें पृथ्वी के एक चन्द्रमा के अतिरिक्त मंगल के 2, बृहस्पति के 16, शनि के 16, यूरेनस के 5, प्लूटो का 1, नेपच्यून के 2, चन्द्रमा दर्शाये गये है। इस प्रकार सौर परिवार का चन्द्र समुदाय 43 सदस्यों का हो जाता है। यह अपने मूल ग्रहों से महत्वपूर्ण आदान-प्रदान करते रहते हैं। आमतौर से वे लेते अधिक और देते कम हैं, पर बृहस्पति का ‘इओ’ चन्द्रमा इसका अपवाद भी है। वह अपनी विशेष परिस्थिति के कारण 20 हजार एम्पीयर का एक विद्युत धारा अपने बृहस्पति की और भेजता है। इस कारण वहाँ एक प्रकार का सायरन सदा बजता रहता है।
अन्य ग्रहों के विशेषतया सौर मंडल के अनुदान अपनी पृथ्वी को निरन्तर मिलते रहते हैं। इनमें से कुछ प्रत्यक्ष हैं कुछ अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष उपहार उल्काओं के रूप में प्राप्त होते रहते हैं। धरती पर उल्काएँ निरन्तर बरसती रहती है। उनमें से कुछ तो वायु मण्डल में प्रवेश करते समय ही जल-भुन जाती हैं कुछ बचे या भुने रूप में धरातल पर बरसती रहती है। उनसे न केवल पृथ्वी के भार में अभिवृद्धि होती है। वरन् और भी बहुत कुछ मिलता रहता है।
मंगल और बृहस्पति के बीच एक उल्का पिण्डों की शृंखला परिभ्रमण करती है। इसे एस्टेरायड मण्डल कहते हैं। उसमें कुछ बहुत छोटे आम, अमरूद जैसे और कुछ एक हजार किलोमीटर व्यास तक के उल्का खण्ड हैं। इनमें से कुछ कभी-कभी पथ भ्रष्ट होकर पृथ्वी की और चल पड़ते हैं। फलतः उसके वायुमण्डल में प्रवेश करते समय उन्हें भयंकर घर्षण का सामना करना पड़ता है। इसमें वे बुरी तरह जल भुन जाती हैं उनके अधजले खण्ड कभी-कभी पृथ्वी पर भी गिरते हैं। इन्हीं को उल्कापात या टूटते हुए तारे के रूप में देखा समझा जाता है। गणितीय आधार पर जाना गया है कि प्रायः एक हजार टन उल्का धूलि धरती पर गिरती है उसके वजन में यह वृद्धि हर वर्ष होती चली जाती है।
भूतकाल में उल्कापात जितना होता था अब उतना नहीं होता। इसका कारण पृथ्वी का वायु मण्डल क्रमशः अधिक सघन होते चले जाना है। चन्द्रमा पर वायु मण्डल के अभाव में उस पर भयंकर उल्कापात होता है। उसके धरातल में पाये जाने वाले गड्ढे इसी कारण बने है। पृथ्वी पर अनेक सरोवर इसी कारण बने है। खड्डों में उल्कापात होने से पृथ्वी की गहरी सतह भी प्रभावित होती रही है और उस कारण भूकम्पों और ज्वालामुखियों का नया आधार खड़ा होता रहा है।
उल्काओं ने जहाँ धरती को लातें मार कर-चिकोटी काट-काट कर उत्तेजित किया और परिवर्तन प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया है, उस दृष्टि से उन्हें श्रेय भी दिया जा सकता है। यों अपने समतल गोलक को चेचक जैसा दाग-दगीला और कुरूप भी उन्हीं ने बनाया है। अणुओं का परिवर्तन और सम्मिश्रीकरण में भी इस प्रहार प्रक्रिया से बहुत सहायता मिली है। सामान्य निर्जीव अणुओं का सूक्ष्म जीवी स्तर तक विकसित होना एवं फफूंदी शैवाल से बढ़ते-बढ़ते वनस्पति स्तर तक विकसित होना एवं फफूंद शैवाल से बढ़ते-बढ़ते वनस्पति स्तर तक पहुँचने में भी परिवर्तन गति को बढ़ाने में उल्काओं की अच्छी खासी भूमिका रही है।
जीन्स ढाँचे को सुनिश्चित रूप देने फ्रान्सिस क्रिक का कथन यह भी है कि धरती का जीवन उल्कापातों के माध्यम से धरती पर उतरा है।
स्वीडन के दार्शनिक स्वान्त आहेर्नियस ने भूतकाल की तरह इन दिनों भी आकाश से धरती पर जीवन की अनेक धाराओं के उतरने की बात कही थी। उनका आधार दर्शन था इसलिए उस पर ध्यान नहीं दिया गया पर अब उनके मत को वैज्ञानिक प्रश्रय मिल रहा है और यह विश्वास बढ़ता जा रहा है कि अन्तरिक्ष और धरातल के बीच न केवल पदार्थों और ऊर्जाओं का आदान-प्रदान होता है वरन् जीवन की विशिष्ट धाराएँ उतरने का भी अनुभव होता है।
सूर्य के अनुदान में व्यवधान या व्यतिरेक उत्पन्न होने से धरती निवासियों के लिए अनेक कठिनाईयाँ उत्पन्न होती हैं। अनावृष्टि, अतिवृष्टि, भूकंप, बाढ़, महामारी जैसी दुर्घटनाओं को गिना जाता है। वनस्पति के उत्पादन एवं गुण धर्म में अन्तर पड़ना, वातावरण में उलट-पुलट होने के कारण देखा जाता है। प्राणि जगत की प्रवृत्तियों के सामान्य क्रम में अन्तर आने और प्रवाह उलटने पर सम्बन्धित व्यवस्थाएँ भी ऐसी ही उथल-पुथल में गड़बड़ाती हैं कुल मिलाकर सूर्य द्वारा उगले गये अव्यवस्थित उफान पृथ्वी के सामान्य क्रम से व्यतिरेक ही उत्पन्न करते हैं और उनके कारण अभ्यस्त ढर्रे में व्यतिरेक होने के कारण चिन्ताजनक परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। एक ग्रह से दूसरे ग्रह के बीच जो आदान-प्रदान सामान्य चलते रहते हैं सन्तुलन बने रहने में सहायता करते हैं, उनमें भी इस कारण अव्यवस्था फैलती है और उस कारण विशेष रूप से विकसित और प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों के साथ अधिक घनिष्ठ होने के कारण मनुष्य ही अधिक प्रमाणित होता है।
सौर कलंकों के उभार वाले वर्षों में पिछले दिनों सर्वविदित दुर्घटनाएँ विनाशकारी युद्धों के रूप में सामने आई है। 2750 से 1950 तक के दो सौ वर्षों की घटनाओं पर इस संदर्भ में दृष्टिपात करने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि सौर विवरण का प्रभाव मनुष्यों की युद्धोन्माद प्रवृत्ति के रूप में किस प्रकार उबल पड़ता है और किस तरह भयानक मार काट मचती है।
1763 ब्रिटेन युद्ध, 1786 फ्रांसीसी क्रांति, 1805 ट्रेफलगर, युद्ध 1815 वाटरलू युद्ध, 1857 भारत गदर, 1865 अमेरिकी गृहयुद्ध, 1604 रूस, जापान युद्ध 1614 प्रथम विश्वयुद्ध, 1634 द्वितीय विश्वयुद्ध, 1647 भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम। यह सभी समय ऐसे थे जिनमें सूर्य कलंक चरम ऊर्जा उगल रहे थे। कुछ ऐसी ही स्थिति अगले तीन वर्षों में भी होने जा रही है, जब ये अपनी चरम स्थिति पर होंगे।
सौर कलंकों की विशालता का एक अधिक प्रामाणिक और स्पष्ट चित्र स्काइलैब यान से धरती पर भेजा था। उसमें 5 लाख 60 हजार मील ऊँचाई तक उठती और चारों और फैलती हुई दिखाई गई है। इससे पूर्व भी और बाद में भी ऐसे अनेक अवसर आते रहते हैं जिनमें इन ज्वालाओं की ऊँचाई की ऊँचाई तथा चौड़ाई इससे भी कहीं अधिक थी।
ऐसे वर्षों में चर्म रोग से लेकर केन्सर आर्वुदों में असाधारण वृद्धि होती है। आत्महत्याओं का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक बढ़ जाता है। बलात्कार, अपहरण, आक्रमण एवं अपराधों का दौर रहता है। उत्तरी ध्रुव की गतिविधियाँ असामान्य हो उठती हैं। चुंबकीय तूफान आते हैं और रेडियो टेलीविजन जैसे संचार साधनों में गड़बड़ी होती है।
सौर ज्वालाएँ छोटी भी होती हैं और बड़ी भी। थोड़ी देर में ही उछलकर आकाश में विलुप्त भी हो जाती है और देर तक उनकी शिखा यथावत् बनी रह कर लहराती रहती है। कुछ मिनटों से लेकर कुछ घण्टों तक अपने एक रूप में बनी रहती है बाद में उनका स्वरूप घटता या बढ़ता रहता है। इन्हीं अव्यवस्थित परिस्थितियों में नैपोलियन, चंगेज खाँ, सिकन्दर, हिटलर जैसे दुर्दान्त व्यक्ति जन्म लेते हैं।
उस अवधि में सर्वत्र उत्तेजना छाई रहती है। इसका कई क्षेत्रों को तो कुछ लाभ भी होता किन्तु मनुष्यों में विशेष रूप से आवेश दृष्टि रहती हैं, उनका सन्तुलन शिथिल पड़ जाता है और उद्धत कार्य करने लगते हैं। अपराधी प्रवृत्तियाँ पनपती हैं और विग्रह खड़े होते हैं।
पृथ्वी सौर परिवार का एक सदस्य है। इस पर रहने वाले प्रणी भी उसी के नाती, पोती-परपोते हैं। हम सभी इस पारिवारिकता के अनुदानों और उत्तरदायित्वों को समझना चाहिए। साथी ही आत्मनिर्भरता के सिद्धान्तों को समझना चाहिए। जिन्हें अपनाकर अनुकूलता का लाभ उठाया और प्रतिकूलता का सामना किया जाता है।
आज की परिस्थितियों में व्यक्ति, परिवार और समाज का जो स्वरूप विश्व मानस के सामने है उसे अवाँछनीय, जराजीर्ण काया वाले ऐसे वयोवृद्ध की तरह समझा जा सकता है जो अपनी दुर्गतिपूर्ण स्थिति के कारण न स्वयं प्रसन्न है, न दूसरों को चैन से रहने दे रहा है। ऐसे वृद्ध के काया कल्प की क्या आशा की जाय। वे तो घिसे पिटे—टूटे बर्तन, कबाड़ी के समान के समकक्ष हैं जिन्हें बड़ी बेरहमी से भट्टी में गलने के लिये झोंक दिया जाता है। ढलाई जब भी होती है, सुखद स्वरूप सामने आता है। ढलाई जब भी होती है, सुखद स्वरूप सामने आता है। लेकिन उसके पहले गलाई का निर्दयतापूर्वक कार्य अनिवार्य है। रंगाई का निर्दयतापूर्वक कार्य अनिवार्य है। रंगाई के पहले धुलाई जरूरी है। जुताई पहले की जाती है। रंगाई के पहले धुलाई जरूरी है। जुताई पहले की जाती है तभी बुवाई की बात बनती है। महाकाल का प्रस्तुत क्रिया-कलाप कुछ इसी ढंग का है।
क्रुद्ध उन्मत्त प्रकृति के क्रिया-कलाप मानवी बुद्धि की समझ में ही नहीं आ पाते। कुछ उसे तात्कालिक परिस्थितियों के साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं, कुछ उसे संयोग भर मानते हैं। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। यह तो इकॉलाजी रूप दैवी अनुशासन की अवज्ञा अवहेलना का सामूहिक दण्ड है, जिसे बड़ी गम्भीरता से समझना चाहिए। ध्वंस और विनाश के दृश्य होते तो बड़े भयावह हैं, लेकिन यह सारा प्रयास सुखद सृजन की पूर्व भूमिका मात्र है।
इन दिनों एक ओर तो रोंगटे खड़े कर देने वाले नृशंस अपराधों सामूहिक बलात्कारों पारस्परिक विग्रह विद्वेषों की बाढ़ है तो दूसरी और अतिवृष्टि, अनावृष्टि भूकम्प, महामारी, नयी-नयी मारक व्याधियों, तूफान बवण्डरों की भरमार है। यह क्रिया की प्रतिक्रिया मात्र है। प्रत्यक्ष एवं परोक्ष - दृश्य एवं अविज्ञात सूक्ष्म वातावरण से उद्भूत प्रकृति प्रकोप मनुष्य की दुर्गति की ही परिणतियाँ हैं। लगते तो ये अप्रिय, कष्टकर हैं। सभी ज्योतिर्विद्, भविष्य विज्ञानी, वैज्ञानिकगण और भी अधिक बुरे समय की सम्भावनाएँ व्यक्त करते हैं तो जी और भी धक-धक करने लगता है। लेकिन इस पर भी निराश और अधीर होने की कोई आवश्यकता नहीं। यह मात्र झाड़ी-झंखाड़ समाप्त कर एक सुरम्य उद्यान लगाने की नियन्ता की एक योजना का एक अंग मात्र है। दूरदर्शिता बड़े आत्मविश्वास से यह कह सकती है कि जो भी कुछ घटित हो रहा है, किसी उद्देश्य से प्रेरित होकर ही नव-सृजन के निर्मित किया जा रहा हैं,
जो व्यक्ति समझदारी-जिम्मेदारी अपनाते हैं, उन्हें यह अनुमान लगाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि हमें कौन-सा मार्ग चुनना है। एक में सृजन का सहयोगी बनने का सौभाग्य मिलता है तो दूसरे में भर्त्सना प्रताड़ना। दूसरा वर्ग उन भेड़ों-नरपामरों का कहा जा सकता है जो तात्कालिक लाभ में ही अपना हित देखता है। ऐसों को एक ही लाठी से हाँकना पड़ता है। ये अनुरोध की भाषा नहीं समझते मात्र दण्ड-प्रताड़ना से सुधरते हैं। ये औचित्य-अनौचित्य में भेद नहीं कर सकते। बहुसंख्य समुदाय इन्हीं का है जो सुविधा-लाभ में, मात्र अपना हित देखने में अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। यदि ये भी उचित को अपना सके होते तो महाकाल को अपनी आँखें ऐसी टेढ़ी न करनी पड़ती।
युग परिवर्तन की बेला 1980 से 2000 तक की बतायी गयी है। इस अवधि में बहुत कुछ तो घट चुका, कुछ ऐसा होने जा रहा है जिसे भविष्य के गर्भ में पकने वाले घटनाक्रमों के रूप में स्पष्ट देखा जा सकता। इस अवधि में आस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन होना है। इस प्रयोजन हेतु विशिष्ट पुरुषार्थ अभीष्ट है। अवांछनीयता की लपेट में कहीं सज्जनता भी न आ जाए, यह ध्यान रखते हुए सामूहिक प्रगति के प्रयत्न चलने चाहिए।
जागृत समुदाय को मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ भर रहना है, सामाजिकता का निर्वाह करते हुए युग पुरश्चरण में सामूहिक अनुष्ठान में भी भाग लेना है। यह आपत्ति धर्म है जिसमें विश्व-विनाश की सम्भावनाओं की रोकथाम हेतु हिस्सा बँटाने हर किसी को आगे आना है।
आइन्स्टीन ने एक बार कहा था कि “प्रकृति प्रकोपों विक्षोभों से संसार का उतना विनाश नहीं होगा, जितना कि आगामी तृतीय विश्वयुद्ध से सम्भव है पुनः मनुष्य को आदिम युग से नये जीवन की शुरुआत, पाषाणीय उपकरणों से करना पड़े और उस आरम्भ के लिए आदम और हब्बा जैसे मानव ही सन्तति निर्माण हेतु शेष बचें।”
बात कुछ अटपटी तथा अतिरंजित-सी लगती है, पर आइन्स्टीन जैसे कितने ही मनीषी संसार की सतत् बिगड़ती विस्फोटक परिस्थितियों को देखकर यह निष्कर्ष निकालते रहे हैं कि महाविनाश को साथ लिये तृतीय विश्वयुद्ध की काली घटाएँ संसार के ऊपर सतत् उमड़, घुमड़ रही हैं। वे किसी भी क्षण बरस कर पृथ्वी पर महामरण का हृदय विदारक दृश्य प्रस्तुत कर सकती हैं। सभ्यता के इतिहास में पहली बार मनुष्य अपने ही आविष्कारों से इतना अधिक भयभीत हुआ है। हिरोशिमा नागासाकी पर गिराये गये परमाणु बमों ने जो तबाही मचायी थी उसकी स्मृति अभी ताजी बनी हुई है। उससे सबक लेने के बजाय संसार के मूर्धन्य देशों ने शक्ति संचय को ही अधिक की संख्या में परमाणु बम इस समय सारे संसार में मौजूद हैं जिनकी सामर्थ्य हिरोशिमा पर गिराये गये बम से पचास हजार गुनी अधिक है। परमाणु बम ही नहीं, ऐसी मारक गैसों नापाम बमों - विषाणु कीटाणुओं युक्त बमों - का भी आविष्कार हो चुका है, जिन्हें किसी भी क्षेत्र में चुपके से छोड़कर, महामारी पैदा की जा सकती है तथा कुछ ही मिनटों में एक बड़ी आबादी को घुट-घुटकर मरने को विवश किया जा सकता है। इस विध्वंसक कार्यों में विश्व सम्पदा तथा जनशक्ति का एक बड़ा हिस्सा हर वर्ष नियोजित हो रहा है।
सोवियत सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार विगत कुछ दशकों में से विश्व के अधिकाँश देशों ने औसतन विकास कार्यक्रमों की अपेक्षा नब्बे गुनी अधिक अर्थ शक्ति शस्त्रों के लिए खर्च की है। यू.एस.ए., कनाडियन तथा ब्रिटिश सर्वे के संयुक्त निष्कर्षों ने आँकड़ा प्रस्तुत किया है कि दो वर्षों पूर्व सम्पूर्ण विश्व का हथियारों के निर्माण पर खर्च पाँच सौ अरब डॉलर अर्थात् लगभग चार हजार अरब रुपये था, जबकि विश्व की आबादी चार अरब थी अर्थात् इस भूमण्डल पर निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए शस्त्रों पर खर्च किया जाने वाला औसत 125 डॉलर था जो रुपयों में लगभग एक हजार आता है। वर्तमान में विश्व की जनसंख्या साढ़े चार अरब से भी ऊपर जा पहुँची है। अनुमान है कि शस्त्रों पर खर्च बढ़कर 6 सौ 75 अरब डॉलर अर्थात् 5 हजार 4 सौ अरब रुपये प्रतिवर्ष तक जा पहुँचा है। अर्थात् विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से शस्त्रों का औसत खर्च 1250 रुपये प्रतिवर्ष हो रहा है।
रुमानिया के अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में औसतन एक मिनट में अस्सी लाख रुपये आयुधों के निर्माण में खर्च किये जाते हैं। इस धन से लगभग 4 हजार टन दूध या पाँच हजार टन गेहूँ की व्यवस्था हो सकती है। इतना मात्र एक मिनट के शस्त्रों पर लगी धनराशि से सम्भव हो सकता है। कुपोषण से ग्रस्त करोड़ों बच्चों के पोषण तथा करोड़ों व्यक्तियों के लिए रोटी की व्यवस्था हो सकती है। मात्र एक मिनट की बचत राशि से सौ परिवारों की आजीविका के स्थायी स्त्रोत निकल सकते हैं। उससे तीन सौ छोटे-छोटे मकान बन सकते हैं।
एक सामान्य रायफल बनाने में चार हजार रुपये खर्च होते हैं। इससे दो आधुनिकतम यन्त्रों से सुसज्जित अथवा पचास पुरातन किस्म के कृषि हल तैयार किये जा सकते हैं। एक मशीन गन पर बीस हजार की लागत आती है। उतने मात्र से एक ट्रैक्टर बन सकता है, जिससे सैकड़ों एकड़ भूमि की खेती निरन्तर होती रह सकती है। एक युद्धक बम बनाने में एक अरब खर्च आता है। इस धन से आधुनिक यन्त्रों एवं सुविधाओं से सुसज्जित बीस अस्पताल खोले जा सकते हैं।
धनशक्ति ही नहीं संसार की मूर्धन्य प्रतिभाशाली जनशक्ति भी विध्वंसक शस्त्रों के निर्माण कार्य में लगी है। सोवियत अध्ययन का निष्कर्ष है कि मात्र नाभिकीय शस्त्रों के निर्माण में बीस हजार ऐसे वैज्ञानिक तथा तकनीशियन लगे हुए हैं, जिन्हें बौद्धिक प्रतिभा की दृष्टि से सर्वोपरि कहा जा सकता है। इनके सहायकों की संख्या लाखों में है। यू.एन.ओ. से प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार संसार के वैज्ञानिकों एवं तकनीशियनों में से पच्चीस प्रतिशत युद्ध आयुधों के निर्माण एवं आविष्कार कार्य में लगे हुए हैं। विज्ञान का पचास प्रतिशत व्यय सैनिक उपकरणों को विनिर्मित करने में होता है। अन्तरिक्ष में छोड़े जाने वाले अंतर्ग्रहीय उपग्रहों में तीन चौथाई युद्ध गतिविधियों की टोह लेने तथा गुप्त जानकारी देने वाले होते हैं। आय.एल.ओ. के अनुसार पूरे विश्व में लगभग बीस करोड़ व्यक्ति सेना में हैं। उनकी संख्या हर वर्ष बढ़ती ही जा रही है। ऐसा अनुमान है कि विश्व श्रम शक्ति में चार हिस्सा सामाजिक कार्यों में निरत है तो तीन हिस्सा सैनिक क्षेत्र में नियोजित है। एक और इतनी अधिक धनशक्ति, जनशक्ति विध्वंसक कार्यों में लगी हुयी है, जबकि दूसरी और धन के अभाव में संसार की अधिकाँश आबादी को विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
अगले दिनों क्या परिस्थितियाँ होगी, इसका विस्तृत विवरण पिछले दिनों एक पुस्तक में छपा हैं। नाम है “द थर्ड वर्ल्ड बार” लेखक हैं- सरऑन हैकेट। उनकी परिकल्पना के अनुसार तीसरा विश्वयुद्ध 2685 में शुरू होगा। युद्ध की शुरुआत अन्तरिक्ष से होगी। विस्फोटक पदार्थों तथा घातक रासायनिक गैसों द्वारा हवाई अड्डों को नष्ट कर दिया जायेगा। युद्ध के प्रथम चरण में ही ऐसे विषैले तत्वों का उपयोग किया जावेगा, जिसके कारण कुछ ही क्षणों में बड़ी संख्या में लोग घातक अविज्ञात रोगों के शिकार होकर मरने लगते हैं। कुछ ही समय बाद परमाणु युद्ध छिड़ेगा। कुछ ही क्षणों में विश्व की अधिकाँश आबादी भयंकर यन्त्रणा सहते हुए समाप्त हो जावेगी। लेखक की कल्पना है कि तृतीय विश्वयुद्ध के दुष्परिणामों से पिछले सभी रिकार्ड फीके पड़ जायेंगे। जबकि विगत युद्धों के इतिहास तथा उनके परिणाम ही कम रोमाँचक नहीं हैं।
युद्धों में जनशक्ति ही नहीं विपुल धन शक्ति भी नष्ट होती है। औसतन एक व्यक्ति एक व्यक्ति को युद्ध में मारने के खर्च में उत्तरोत्तर वृद्धि हुयी है। दो हजार वर्ष पूर्व प्रति व्यक्ति को मारने में लगभग आधा डालर अर्थात् आज के मूल्य के अनुसार चार रुपये खर्च आता था। नेपोलियन के समय तक बढ़कर अचानक 3 हजार डालर अर्थात् 24 हजार रुपये तक हो गया। प्रथम विश्वयुद्ध में एक सैनिक को मारने में औसत खर्च 21 हजार डालर अर्थात् 1 करोड़ 68 हजार रुपये आया।
इतनी धन-शक्ति तथा जन-शक्ति रचनात्मक कार्यों में लगी होती तो आज संसार का स्वरूप ही कुछ और होता। जिस स्वर्ग की कल्पना की जाती है, वह प्रत्यक्ष इसी भूमण्डल दिखायी पड़ने लगता। जितने साधन संसार में मौजूद हैं, वे जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त हैं।
विनाश को रोकने के लिये राजसत्ता के किये गये प्रयास कितने व्यावहारिक रहे हैं, इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि मानव इतिहास में तीन हजार वर्षों में 1500 बी. सी. से लेकर 1860 ए.डी. तक, आठ हजार युद्ध विराम सन्धियों पर तथा 1860 से लेकर अब तक निरस्त्रीकरण के सैकड़ों छोटे बड़े प्रतिवेदनों पर अनेकों देशों के समय-समय पर हस्ताक्षर हुए हैं। हरेक में यह निर्णय लिया गया कि इसके बाद स्थायी शाँति रहेगी, पर वह स्थिति कभी भी नहीं आने पायी। स्थायी शान्ति यदि सम्भव है तो अध्यात्म प्रधान प्रयोगों द्वारा ही सत्य को समझना जरूरी होगा। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का स्वप्न तभी सार्थक होगा, जब विभूतियाँ स्वयं इन प्रयासों में संलग्न होंगी। ऐसा न हुआ तो विनाश सुनिश्चित है।
पृथ्वी, जल एवं वायु के अगणित अनुदानों से भूलोक पर जीवन गतिशील है। सौर मण्डल के अन्यान्य ग्रहों का भी इसमें महत्वपूर्ण सहयोग हैं। उनके अनुदान न मिलें तो मनुष्य का पुरुषार्थ भी कुछ काम न कर सकेगा और असमय मरने की स्थिति आ जायेगी। मनुष्य ने जो कुछ भी भौतिक क्षेत्र में उपलब्ध किया है उसमें उसके स्वयं के पुरुषार्थ का कम, प्रकृति की अनुकूलता का अधिक योगदान है, पर ऐसा लगता है कि मानव उस सत्य को भुला बैठा है कि सन्तुलन की हालत में ही प्रकृति से लाभ उठाया जा सकता है। प्रगति की अन्धी दौड़ से समस्त वातावरण ही विषाक्त हो उठा है, प्रकृति चक्र का असन्तुलन बढ़ता जा रहा है। बढ़ती विषाक्तता से वायुमण्डल की पोषक विशेषता समाप्त होती जा रही है। अगणित प्रकार के संकट उभर रहे है।
पृथ्वी के वायुमण्डल में 21 प्रतिशत आक्सीजन तथा .032 प्रतिशत कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा का सन्तुलन माना गया है। यह अनुपात 650 तथा 1 का पड़ता है। पर मनुष्य की अदूरदर्शिता के कारण अब कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा वायुमण्डल में निरन्तर बढ़ती जा रही है। यह सूर्य के प्रकाश तथा विद्यमान विकिरण को अपने में शोषित कर लेती है। पृथ्वी की गर्मी को अन्तरिक्ष में जाने से रोकती है। फलस्वरूप विश्व का तापक्रम निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अनुमानतः सारे संसार में वार्षिक ईंधन की खपत में 5 प्रतिशत की वृद्धि होने से आगामी दस वर्षों में विश्व के तापक्रम में 4 डिग्री फारेनहाइट की बढ़ोत्तरी हो जायेगी।
1676 में किये गये एक पर्यवेक्षण के अनुसार अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में 14 करोड़ 70 लाख टन कार्बन मोनोक्साइड, 2 करोड़ 50 लाख टन धूलिकण, 3 करोड़ 40 लाख टन सल्फर डाइआक्साइड, 2 करोड़ 30 लाख टन नाइट्रोजन आक्साइड और 3 करोड़ 50 लाख टन हाइड्रोकार्बन वायुमण्डल में फेंके गये। ये विजातीय विभिन्न माध्यमों से विपुल परिणाम में निकलते हैं। उद्योगों की बाढ़ ने गत, तीन वर्षों में यह स्थिति और भी विकट बनादी है।
कार्बन मोनोक्साइड, सल्फर डायऑक्साइड हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन आक्साइड, कार्बनडाइ आक्साइड जैसी अनेकों गैसें वायुमण्डल में मिलकर विषाक्तता पैदा करती हैं। कार्बन मोनोक्साइड एक रंगहीन, गंध हीन पर विषैली गैस है जो दहन प्रक्रिया के अंतर्गत ईंधन में कार्बन के पूर्णतः जलने की स्थिति में आक्सीकृत होकर पैदा होती है। सल्फर डायऑक्साइड की उत्पत्ति तेल व कोयला जलाने से होती है। 60 प्रतिशत सल्फर डायऑक्साइड का उत्पादन कोयला जलाने से ही होता है। हाइड्रोकार्बन अधजला अवशिष्ट ईंधन से पैदा होता, ऑटोमोबाल्स इसके प्रमुख स्रोत हैं। इसी प्रकार विषैली गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड की उत्पत्ति जीवाश्म ईंधन को अत्यधिक तापमान पर जलाने से होती है। यातायात साधनों तथा भारी उद्योगों से यह पैदा होती है।
कार्बन मोनोक्साइड को एक धीमा विष कहा जाता है, जो शरीर में प्रवेश करके ऊतकों में विद्यमान जीवनदायी आक्सीजन की मात्रा में ह्रास उत्पन्न करती है। इससे शारीरिक शिथिलता तथा मानसिक अवसाद की अनुभूति होती है। स्वस्थ व्यक्ति की भी कार्य क्षमता घट जाती है। मानसिक विक्षोभ के कारण दुर्घटनाग्रस्त होने की सम्भावना बढ़ती है। श्वास तथा स्नायु सम्बन्धी क्रानिक रोगों को बढ़ावा देने में इस गैस की प्रमुख भूमिका होती है।
सल्फर डायऑक्साइड श्वसन तन्त्र को उत्तेजित करता तथा उसके सामान्य क्रम में व्यतिरेक उत्पन्न करता है। नाइट्रोजन आक्साइड रक्त विकारों तथा बच्चों में इन्फ्लुएंजा समान रोग उत्पन्न करता है। प्रमुख बात तो यह है कि इन सभी विषैली गैसों की भूमिका मनोविकारों को जनम देने हेतु जितनी उत्तरदायी है, उतनी पर्यावरण सम्बन्धी अन्य कोई परिस्थिति नहीं।
कुछ विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि सन् 1650 के बाद संसार का तापक्रम घटने लगा है। इसका कारण वे वायुमंडल में बढ़ते कोहरे को बता रहे हैं। बढ़ते इस सघन कुहासे के अनेकों कारण हैं- कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा में वृद्धि, कारखानों की चिमनियों से धूम - कोहरे (स्माँग) का बढ़ना, भूगर्भ में आणविक परीक्षण, ईंधन का विपुल परिमाण में दहन आदि।
मौसम विज्ञानियों का मत है कि वायुमण्डल में धूलि कणों तथा एयरोसॉल्स का यदि पचास अरब टन जमाव हो जायेगा। ऐसी हालत में हिमयुग की शुरुआत हो सकती है।
वायु मण्डल के अतिरिक्त भूमण्डल पर विषाक्त रासायनिक तत्वों के मिलते-घुलते रहने से उसकी उर्वरता धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही। रासायनिक तत्वों से फैलते प्रदूषण के कारण यूरोप की लगभग चालीस प्रतिशत जमीन अब कृषि योग्य नहीं रही। फ्राँस में एक करोड़ जमीन बर्बाद हो चुकी है। अनुमानतः रेगिस्तान का क्षेत्रफल हर वर्ष संसार में तीस हजार एकड़ बढ़ता जा रहा है। एक और संसार की बढ़ती आबादी के लिए अधिक कृषि योग्य भूमि चाहिए, दूसरी ओर कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा भाग प्रदूषण की विषाक्तता के कारण उत्पादन क्षमता गँवाता जा रहा है। ऐसी स्थिति में अन्न का संकट अगले दिनों और भी गम्भीर रूप में प्रस्तुत हो सकता है।
जल स्रोतों की स्वच्छता एवं विशेषता अब नष्ट होती जा रही है। झीलों, नदियों में भी वह विष निरंतर घुलता जा रहा है। अछूते समझे जाने वाले सौंदर्य स्थल उनकी चपेट में आ गये है। पर्यावरण मन्त्रालय के अध्ययन की रिपोर्टानुसार “नैनीताल का प्रख्यात झरना अब पूर्णतः प्रदूषण हो चूका है।” अब तक यह झरना लाखों पर्यटकों के मनोरम केन्द्र के रूप विख्यात था। झरने के जल का अध्ययन करने वाले डा. एस.एम.दास तथा अन्य विशेषज्ञों की आम राय है कि “उसमें कॉपर, कोबाल्ट, शीशा, मैंगनीज, जस्ता सोडियम तथा कैल्शियम जैसे धातुओं का प्राचुर्य है। इसके अतिरिक्त जल में अनेकों विषाक्त रासायनिक तत्व तथा जीवाणु पाये गये हैं। प्रदूषण बढ़ने से झील की अधिकाँश मछलियों की प्रजातियाँ अब दम तोड़ रही हैं। जो जीवित बची हैं, वे विषाक्त हैं।
मछली को आहार रूप में प्रयुक्त करने वालों के लिए नदियों में बढ़ती विषाक्तता के कारण गम्भीर संकट आ खड़ा हुआ है। जापान के क्यूशू द्वीप के पूर्व में ‘मीनीमाता’ नामक एक नगर है। उस नगर में एक विशाल फैक्टरी विनाउल क्लोराइड तथा एसीटिल डी हाइड्रेट नामक रसायनों का निर्माण करती है। कुछ वर्षों पूर्व वहाँ एक भयंकर महामारी फैली। एक जैसी रोग से ग्रसित होकर बहुत से लोग मरने लगे। आरम्भ में रोगी के अंग तथा ओंठ शून्य हो जाते तथा एक सप्ताह बाद स्पर्श बोध की, बोलने, सुनने की क्षमता समाप्त हो जाती थी। नेत्र ज्योति भी कुछ ही दिनों बाद नष्ट हो जाती। गम्भीर यंत्रणा सहते हुए अन्ततः रोगी मृत्यु का शिकार बन जाता। इस अविज्ञात रोग से सैकड़ों व्यक्ति मरे, हजारों रुग्ण होकर अपाहिज बन गये।
कारण की खोजबीन करने पर मालूम हुआ कि “मीनीमाता’ खाड़ी की मछलियाँ फैक्टरी द्वारा फैलाये गये प्रदूषण के कारण विषाक्त हो गयी है। उसमें पारे की मात्रा अत्यधिक पायी गयी। तब से खाड़ी में मछली पकड़ना पूर्णतः निषिद्ध कर दिया गया।
स्वीडन के 40 क्षेत्रों, फिनलैंड के 5 तथा यूनाइटेड स्टेट के 17 राज्यों में मछली पकड़ने को कानूनी जुर्म घोषित कर दिया गया है। ऐसा मछलियों के भीतर बढ़ती विषाक्तता को देखते हुए करना पड़ा है।
लॉस एन्जेल्स के निकट यू.एस.ए. की सबसे बड़ी डी.डी.टी. उत्पादक फैक्टरी है। फैक्टरी से निकले कचरे को निकटवर्ती सान्तामोनिका नामक खाड़ी में वर्षों से बहाया जाता रहा है। विगत वर्षों में कितने ही व्यक्तियों की अकस्मात् मृत्यु हो गयी। उनके शवों का परीक्षण करने पर मालूम हुआ कि डी.डी.टी. विषाक्तता युक्त मछलियाँ खाने के कारण उनकी अकाल मृत्यु हुयी है।
पोलैंड की सबसे बड़ी नदी, जो 664 मील लम्बी है, जिसका जल संचार है जिसका जल संचार क्षेत्र 75022 वर्ग मील है, में इतना अधिक प्रदूषण भर गया है कि उसके तटों पर रहने वालों को विभिन्न रोगों का संकट आ खड़ा हुआ है। खनिज उद्योग तथा कागज उद्योग तथा कागज उद्योग के कारण अपनी सुन्दरता के लिए विख्यात ओन्टोरियो-कनाडा की ‘एकीलेक’ अब अपनी सौंदर्य विशेषता गँवा चुकी है। इसी प्रकार अवकाश मनाने वालों द्वारा प्रयुक्त पैसिफिक समुद्र तट का निकटवर्ती क्षेत्र अब तेजी से मरुस्थल में बदलता जा रहा है।
अपनी सुन्दरता के लिए प्रख्यात टोकियो अब संसार का सबसे अधिक प्रदूषित नगर है। यहाँ सुरक्षा चौकियों पर आक्सीजन के सिलेंडर टंगे रहते हैं ताकि श्वास के लिए शुद्ध वायु की कमी पड़ते ही तैनात सिपाही आक्सीजन ग्रहण कर सकें।
एक सर्वेक्षण अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार लन्दन में चार घण्टे ट्रैफिक की ड्यूटी सम्भालने वाले पुलिस कर्मियों के फेफड़े में इतना विष भर जाता है, मानों उनने 105 सिगरेट पीली हों। लन्दन के सत्तर प्रतिशत विद्यार्थियों की आम शिकायत आँख, नाक एवं गले के रोगों की है। जब टोकियो में लोगों से 1676 के चुनाव में पूछा गया कि आप लोगों को बसे अधिक किस चीज की जरूरत है, तो चारों और से एक ही उत्तर मिला-
“शुद्ध हवा और साफ आकाश की”।
कृषि विज्ञानियों का मत है कि पृथ्वी का लगभग एक तिहाई कृषि क्षेत्र पाँच वर्षों के अन्दर ही बेकार हो जायेगा। प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में भारत, पाकिस्तान चीन, पश्चिम एशिया, यू. एस. ए. तथा कनाडा प्रमुख हैं। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी का पाँचवाँ हिस्सा अर्थात् तीन करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पूर्णतः सूखने की स्थिति में पहुँच गया है। अनुमानतः 2 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र प्रतिवर्ष कृषि कार्य हेतु अनुपयुक्त होता जा रहा है। इससे 130 अरब रुपयों की फसल के रूप में क्षति हो रही है।
इसका कारण विशेषज्ञ वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई को मानते हैं। हरीतिमा बादलों को बरसने के लिए आकर्षित करती है। उसके उन्मूलन के कारण पृथ्वी की उर्वरता नष्ट हो रही है। दूसरी ओर वृक्ष पक्ष प्रदूषण रूपी गरल का पान करके वायुमण्डल को दूषित होने से बचाते हैं। उनकी बड़ी संख्या प्रतिवर्ष तम्बाकू रूपी विष के उत्पादन में आहुति स्वरूप दी जा रही है।
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका 1682 के अनुसार 3 लाख 63 हजार टन तम्बाकू के उत्पादन के लिए भारत में मात्र एक वर्ष में 12 लाख 86 हजार एकड़ भूमि में विद्यमान जंगलों को वृक्ष विहीन कर दिया गया। खेत से काटी गयी तम्बाकू की कच्ची पत्तियों सुखाने के लिए वृक्षों के ईंधन का ताप देना पड़ता है। विशेषज्ञों का मत है कि “1000 सिगरेटों की तम्बाकू पकाने के लिए लगभग 100 टन लकड़ी की जरूरत पड़ती है जो औसतन 2 बड़े पेड़ों से प्राप्त होती है। प्रतिदिन भारत में 27 करोड़ सिगरेटें तथा 44 करोड़ बीड़ियाँ बनती हैं। 500 बीड़ी अथवा सिगरेट के तम्बाकू को पकाने में एक पूरा वृक्ष खप जाता है। प्रतिदिन देश में बनने वाली सिगरेट, बीड़ियों को पकाने के लिए अनुमानतः 12 लाख 20 हजार पेड़ों के ईंधन की जरूरत होगी। यह तो मात्र भारत के आँकड़े हैं। समस्त विश्व में तम्बाकू उत्पादन के लिए प्रतिवर्ष एक बड़े भू-भाग की हरीतिमा नष्ट की जा रही है।
प्रदूषण का विषपान करने वाले पेड़ पादपों के घटने तथा निरन्तर वायुमण्डल में विषाक्तता भरने से अब गम्भीर संकट की स्थिति आ खड़ी हुयी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अब से 25 वर्षों बाद सन् 2008 तक वायुमण्डल में बढ़ती कार्बनडाइ आक्साइड गैस की मात्रा के कारण भू-मण्डल का औसत तापक्रम 5 डिग्री सेन्टीग्रेड से भी अधिक बढ़ जायेगा और ऐसी विनाशकारी परिस्थितियाँ पैदा हो जायेंगी जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
अगणित प्रकार के उभरते संकट इस बात का संकेत देते हैं कि यदि मनुष्य ने अपनी अदूरदर्शिता न छोड़ी तो प्रस्तुत संकट और भी गम्भीर होंगे तथा महाविभीषिका के रूप में प्रस्तुत होकर समस्त मानव जाति को घुट-घुटकर मरने को विवश करेंगे। वस्तुतः यह मनुष्य की स्वयं की आमंत्रित की हुई सामूहिक आत्महत्या होगी।
क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम प्रकृति का अकाट्य सिद्धान्त है। इसे सर्वत्र देखा एवं अनुभव किया जा सकता है। प्रकृति के गर्भ में जिन तत्वों का बीजारोपण होगा उन्हीं के अनुरूप प्रतिफल भी सामने आयेंगे। प्रकृति की यह अद्भुत विशेषता है कि उसे जितना दिया जाता है, उसका कई गुना बनाकर लौटाती है। मिट्टी में थोड़े से बीज पड़ते हैं जो पेड़ पादप रूप में गलकर बढ़ते हैं, पर असंख्य गुना बनाकर लौटाती है। मिट्टी में थोड़े से बीज पड़ते हैं जो पेड़ पादप के रूप में गलकर बढ़ते हैं, पर असंख्य गुना होकर लौटते हैं। अपनी मौलिक विशिष्टता को अक्षुण्ण रखते हुए भी बीज परिमाण की दृष्टि से अपने सादृश्य एक बड़ी बिरादरी को साथ लिये लौटते हैं। बीज चाहे आम का हो अथवा मादकता युक्त विषाक्तता भरी अफीम का, उपरोक्त नियम मादकता युक्त विषाक्तता भरी अफीम का, उपरोक्त नियम सबके ही साथ एक जैसा लागू होता है। देने में प्रकृति बनिये जैसी नाप-तौल नहीं करती अत्यन्त उदारता बरतती है। एक से अनेक, सीमित को असीम बनाने में उसकी क्षमता बेमिसाल है। पर यह विशेषता अनिवार्य रूप से जुड़ी हुयी है कि जैसा बीजारोपण होगा प्रतिफल उन्हीं विशेषताओं के अनुरूप मिलेगा।
प्राचीन काल में इस तथ्य को भली-भाँति ध्यान में रखा जाता था कि प्रकृति से समस्त जीवन समुदाय को अगणित अनुदान मिलते हैं। उसे स्वस्थ एवं सन्तुलित न रखा गया तो भारी संकटों का सामना करा पड़ सकता है। इसी कारण प्रकृतिगत संतुलन व परिशोधन हेतु घर-घर यज्ञ किये जाते थे। वातावरण में दैनन्दिन जीवन के कृत्यों से जो गन्दगी घुलती रहती थी उसकी सफाई हो जाया करती थी। त्यौहारों, पर्वों तथा अन्य अवसरों पर सामूहिक विशाल यज्ञ भी किया जाते थे। ताकि वातावरण की विषाक्तता धुलती चले साथ ही प्रकृति चक्र सुदृढ़ बना रहे। फलतः प्रतिक्रिया स्वरूप प्रकृति से जो कुछ भी मिलता था, मनुष्य जाति के लिए लाभप्रद रहता था। तब सूक्ष्म अन्तरिक्ष से प्राणवान पर्जन्य की वर्षा होती थी। जिसमें प्रचुर परिमाण में जीवनदायी प्राण तत्व होते थे। वृक्ष वनस्पतियाँ, जीव जन्तु सभी उसका पान करके स्वस्थ एवं नीरोग बने रहते थे।
यज्ञों की वह परम्परा तो लुप्त हो गयी जो प्रकृति का शोधन करती एवं पोषण देती थी। अन्धाधुन्ध औद्योगीकरण की अदूरदर्शिता से वातावरण में विषाक्तता असीम परिमाण में भरती चली गयी। प्रकृति चक्र चरमरा उठा। अब वह स्थिति अत्यन्त भयावह हो चली है। प्रकृति उस गरल को अब वर्षा के विषाक्त जल के रूप में उगल रही है। प्रकोपों की शृंखला में एक सर्वाधिक गम्भीर कड़ी जुड़ी है- अम्ल वर्षा की। अगणित शोध निष्कर्षों का मत है कि वर्षा जल में तेजाब की मात्रा तेजी से बढ़ती जा रही है। पर्जन्य बरसाने वाली प्रकृति जब तेजाब की वर्षा करेगी तो उपस्थित होने वाले संकटों की सहज ही कल्पना की जा सकती है।
शुद्ध जल का पी.एच. दर (हाइड्रोजन आयनों का जमाव) 7 होता है। इससे कम होने पर पानी में अम्लीयता बढ़ती है। दर अधिक होना पानी में क्षारीय तत्वों के बढ़ने की परिचायक होती है। वर्षा के सामान्य जल का पी. एच. दर प्रायः 507 होता है। ऐसी वर्षा फसलों एवं जीवधारियों के लिए उपयोगी, पोषक मानी जाती है। जीवनदायी सूक्ष्म तत्वों का उसमें बाहुल्य होता है। वर्षा जल में पी.एच. का मान कम होना यह दर्शाता है कि उसमें प्रदूषित तत्व न्यूनाधिक मात्रा में मौजूद हैं। ऐसे निष्कर्ष अनेकों खोजों से प्रकाश में आये हैं कि पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में अब अम्लीय वर्षा होने लगी है जो मानव द्वारा वायुमण्डल में छोड़े गये प्रदूषण का ही परिणाम है।
अम्ल वर्षा में सल्फ्यूरिक एसिड तथा नाइट्रिक एसिड का प्रमुख योगदान होता है। ये दानों ही अम्ल औद्योगिक उत्पादनों में छोड़े गये सल्फर डाइआक्साइड तथा नाइट्रोजन की वाष्प कणों से हुयी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बनते हैं। वे ही जल में घुलकर बरसते हैं। ‘साइन्स टूडे’ मासिक पत्रिका में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार सन् 1866 में टोरन्टो विश्व विद्यालय—कनाडा के जीव विज्ञानियों ने लक्सडन सरोवर में 4 हजार से भी ऊपर की संख्या में युवा सॉलयन मछलियों की गणना की थी किन्तु एक वर्ष बाद ही उनमें से एक भी जीवित नहीं बची जबकि उनकी देख-रेख, सुरक्षा में किसी प्रकार की कमी न रखी गयी। सन्देह होने पर सरोवर के जल का परीक्षण करने पर उसकी अम्लीयता अत्यधिक पायी गयी। 1961 से 1671 के एक दशक के अन्तर में अम्लीयता में 150 गुनी वृद्धि पायी गयी। उस आधार पर होने वाली वर्षा जल का परीक्षण किया गया। वैज्ञानिकों को यह देखकर आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि उस जल में भी पी.एच. की दर सरोवर जितना ही था। उस सरोवर को विषाक्त घोषित कर दिया गया।
कनाडा में किये गये एक अध्ययन के अनुसार ओन्टेरियो क्षेत्र के ढाई लाख सरोवरों में से लगभग पचास हजार अम्ल वर्षा के कारण बुरी तरह से दूषित हो चुके है। उनमें से अधिकाँश मृतप्राय हैं। पूर्वी उत्तरी अमरीका में किये गये परीक्षणों में भी अम्ल वर्षा के प्रमाण मिले हैं। अनुमान है कि वहाँ नाइट्रोजन आक्साइड की 60 प्रतिशत मात्रा आटोमोबाइल्स से, 10 प्रतिशत जीवाश्म ईंधन ऊर्जा प्लान्ट से तथा 30 प्रतिशत अन्य उद्योग से उत्पन्न होता है। कल 30 प्रतिशत अम्ल वर्षा का कारण यह उत्पादन पूर्वी उत्तरी अमरीका में होता है। शेष 70 प्रतिशत सल्फ्यूरिक एसिड के कारण अभिप्रेरित है, जो सल्फाइड जैसी कच्ची धातु के गलने से अन्य धातुओं के परिशोधन प्रक्रिया से तथा जीवावशेष ईंधन को उपयोग में ला रहे थर्मल पावर प्लान्ट से उत्पन्न होती है। यूनाइटेड स्टेट्स में प्रति वर्ष 2 करोड़ 80 लाख टन सल्फर डाइ आक्साइड तथा 2 करोड़ 40 लाख टन नाइट्स ऑक्साइड वायु मण्डल में फेंका जाता है जो जलवाष्प से सौर किरणों के उत्प्रेरण में क्रिया करके सल्फ्यूरिक एवं नाइट्रिक एसिड में बदल जाते हैं और अम्ल वर्षा का कारण बनते हैं। उत्तरी अमरीका के कितने ही क्षेत्रों में अम्ल वर्षा होने से कितनी ही नदियाँ तथा सरोवर विषाक्त हो चुके हैं तालाबों, सरोवरों से जलचर जीव बड़ी तेजी से नष्ट होते जा रहे है।
टोरोंटो- कनाडा से 400 किलोमीटर दूरी पर स्थित एक सदव्युटी क्षेत्र है। यह क्षेत्र विश्व का प्रमुख निकल उत्पादक है। यहाँ कच्चे पदार्थों के रूप में लोहा, कॉपर और निकेल सल्फाइड उपलब्ध है जिनके दहन क्रिया के फलस्वरूप सल्फरडाइ-ऑक्साइड का बादल उस क्षेत्र में सदा छाया रहता है। फलतः होने वाली वर्षा में अम्लीयता अत्यधिक रहती है। उस क्षेत्र की उर्वरा भूमि इस कारण तेजी से अपनी उर्वरता गँवाती जा रही है। एसिड एवं ठोस धातुओं के कारण मिट्टी विषैली हो चुकी है। यहाँ प्रतिदिन 2500 टन सल्फर डाइ आक्साइड वायुमण्डल में फेंकी जाती है। परीक्षण करने वाली वर्षा में अम्ल की मात्रा इतनी बढ़ जायेगी कि वृक्ष वनस्पतियों तथा जीवधारियों का जीवन दूभर हो जायेगा।
उत्तरी बरमाउन्ट के पहाड़ पर कैमेल हम्ल नामक एक सदाबहार जंगल है। बीस वर्षों पूर्व लाल रंग के स्प्रूस वृक्ष तथा सौ फीट से भी ऊँचे देवदारु के सुन्दर वृक्ष पाये जाते थे। इनमें कुछ की आयु तो सैकड़ों वर्ष से भी ऊपर की थी। पर उनमें से अधिकाँश अब मर चुके हैं तथा जो बचे हैं वे भी नष्ट होने वाले है। अब यह क्षेत्र सुनसान-सा दीखता है। पश्चिम जर्मनी, यू. एस. ए. के कितने ही क्षेत्रों की स्थिति भी यही है। केन्द्रीय यूरोप में लगभग 21 लाख से लेकर 50 लाख एकड़ तक वन क्षेत्र नष्ट हो चुके हैं। उल्लेखनीय यह है कि इनका विनाश कटाई से नहीं अम्ल मिश्रित वर्षा जल के कारण हुआ है जो अब अनेकानेक सम्भावित खतरे की ओर ध्यान आकृष्ट कर रहा है। उपरोक्त तथ्यों का रहस्योद्घाटन हबर्ट डब्ल्यू बोगेलमन नामक वनस्पति शास्त्री ने किया, जो यूनिवर्सिटी ऑफ वरमाउण्ड - कनाडा में प्रोफेसर हैं।
एक पर्यवेक्षण रिपोर्टानुसार मथुरा में नव स्थापित तेल शोधक कारखाने से उत्पन्न धुँए के करण आगरा हो गया है। उस क्षेत्र का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि शोधक कारखाने से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण से अगले दिनों आस-पास के सारे क्षेत्र में अम्ल वर्षा की सम्भावना बढ़ गयी है।
अम्ल वर्षा से अनेकानेक खतरनाक सम्भावनाएँ जुड़ी हुयी हैं। अम्ल वर्षा में सनाहित नाइट्रोजन आक्साइड सल्फर डाइ आक्साइड व सल्फेट ऑयन के लम्बी अवधि तक अन्तःश्वसन से एम्फीसेमा तथा इसके समरूप अन्य दमे समकक्ष श्वसन रोग उत्पन्न होते हैं। 1651 में लन्दन में छायी धुन्ध में इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखा गया। उसके दुष्प्रभाव से मात्र दो दिन में पाँच हजार व्यक्ति काल कलवित हो गये। अम्ल वर्षा का जल पीने से अनेकों प्रकार के पाचन सम्बन्धी तथा रक्त सम्बन्धी विकार पैदा होते हैं।
वह वर्षा भूमि की उर्वरता को नष्ट कर देती ऊसर बना देती है। मिट्टी के आवश्यक पोषक तत्व कैल्शियम, मैग्नेशियम, फास्फोरस आदि नष्ट हो जाते हैं। यदि पी.एच. दर अत्यन्त न्यून हो जाय तो नाइट्रोजन, पोटैशियम सल्फर जैसे तत्व भी मिट्टी से समाप्त हो जाते हैं। ऐसी भूमि में पैदावार की जाय तो भी इसमें विषाक्तता आ जायेगी जो अगणित रोगों को जन्म देगी। जर्मनी में हुए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि अम्ल वर्षा से उत्पन्न अल्यूमिनियम की विषाक्तता पौधे के विकास में अत्यंत हानिकार है।
अम्ल वर्षा से प्रभावित क्षेत्रों में अमरीका तथा कनाडा सबसे आगे है। दोनों ने एक दूसरे के ऊपर यह आरोप लगाया है। कि अम्लीय वर्षा के कारक प्रदूषक तत्वों को वायुमण्डल के माध्यम से वे एक दूसरे के देश में फैला हैं। वास्तविकता की जाँच पड़ताल के लिए दोनों ही देशों ने एक संयुक्त कमेटी विशेषज्ञों की बनायी है। वैज्ञानिकों का वह ग्रुप वायु से नमूना एकत्रित करेगा तथा दूसरे देश में होने वाली अम्ल वर्षा में उसकी भूमिका मालूम करेगा। विषाक्त वर्षा से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र वरमोन्ट, न्यू हैम्पशायर, एडीरोन्डैक पर्वत न्यूयार्क तथा कनाडा के उत्तरी क्षेत्र - प्रीकैम्ब्रियन शील्ड भाग के सबसे बड़े झील में प्राकृतिक पोषक तत्व समाप्त हो चुके हैं। जिसमें फसलें जंगल तथा उनमें रहने वाले जलचर, थलचर जीव तेजी से मर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार का इन क्षेत्रों में अम्ल वर्षा से उपरोक्त हानियों के लिए जिम्मेदार है। जबकि अमरीका की तुलना में पाँच गुना कम अम्ल वर्षा के लिए कारक प्रदूषक तत्व कनाडा द्वारा अमरीकी क्षेत्र में फैलाये जाते हैं।
कुछ दिनों पूर्व दिल्ली क्षेत्र में हुयी वर्षा में भी अम्ल की मात्रा पायी गयी। कानपुर के निकट गंगाजल में अम्ल की मात्रा का पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि अब अपने देश के वायुमण्डल की स्थिति दूसरे यूरोपीय देशों जैसी ही विषाक्त बनती जा रही है। आसन्न यह संकट अगले दिनों और भी अधिक गम्भीर होने की सम्भावना कितने ही मौसम विज्ञानियों ने व्यक्त की है।
अम्ल वर्षा के रूप में दिखायी पड़ने वाली विभीषिका मानवी अदूरदर्शी क्रिया की ही प्रतिक्रिया है। प्रकृति के गर्भ में बीजारोपण विष बीजों का किया जा रहा है, प्रतिफल भी उसी के अनुरूप दृष्टिगोचर हो रहा है। जो क्रम चल रहा है, यथावत् चलता रहा तो वे प्रकोप और भी तीव्र होंगे। यह सोचना अविवेकपूर्ण है कि उससे सीमित क्षेत्र अथवा देश विशेष प्रभावित होंगे। कारण कि वायुमण्डल को देश की भौगोलिक सीमा में बाँध सकना तथा उसके भले बुरे प्रभावों से अछूता रखना सर्वथा असम्भव है। समस्त संसार एक प्रकृति चक्र से बँधे होने के कारण देर-सबेर में प्रभावित होगा। गड़बड़ाये सन्तुलन को सुधारने, वातावरण में भरे विष का परिशोधन करने तथा आगे के लिए रोकथाम की अविलम्ब व्यवस्था न बनायी गयी तो वरदायी प्रकृति का दूसरा कुद्ध रूप महाकाल के रूप में प्रकट होकर समस्त मानव जाति को घुट-घुटकर मरने को विवश करेगा।
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा। अलोभ इति मार्गेऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः॥
अर्थात्- धर्म के आठ मार्ग हैं - यज्ञ करना पढ़ना, दान देना, तप, सत्य, धैर्य, क्षमा और निर्लोभ।
आधुनिक युग में सुविधाएँ अपरिमित परिमाण में बढ़ी है। जैसे-जैसे विज्ञान के नये आविष्कार हाथ आते गए, व्यक्ति उतना ही श्रम की दृष्टि से परावलंबी तथा रहन-सहन की दृष्टि से विलासी बनता चला गया है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि जब भी व्यक्ति एकाकी प्रगति करता है उसे कहीं न कहीं तो घाटा उठाना ही पड़ता है। इस घाटे को हम आधुनिक सभ्यता का अभिशाप भी कह सकते हैं। आज दृश्यमान अस्वस्थ मानव समुदाय इसकी जीती-जागती तस्वीर है। शरीर एवं मन दोनों ही दृष्टि से रुग्ण, दुर्बल व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग तक नहीं कर पा रहा। यह एक ऐसी विडम्बना है जिसे देखकर हँसी भी आती है और रोना भी। हँसी इस कारण कि यह स्थिति उसकी स्वयं आमन्त्रित की हुई है। रोना इसका कि स्थिति से भली भाँति अवगत होते हुए भी वह कोई प्रयास इस दिशा में कर नहीं रहा।
अध्यात्म मान्यता यह है कि नीरोग काया एवं तनाव रहित मन ऐसे अनुदान हैं जिन्हें प्रकृति के साहचर्य में रहकर मनुष्य सहज ही प्राप्त कर सकता है। संयम रूपी अनुशासन का पालन कर, आहार-बिहार की मर्यादा निभाते हुए वह निश्चित ही भौतिक एवं आत्मिक दोनों की दृष्टि से प्रगति की दिशा में अग्रसर हो सकता है। जब-जब भी यह अनुशासन तोड़ा जाता है, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की जाती है। उसे आधि-व्याधि के रूप में दण्ड भुगतना पड़ता है। आधि अर्थात् मानसिक संताप, व्याधि, अर्थात् शारीरिक कष्ट। बहुधा ये दोनों साथ-साथ ही होते हैं। यह प्रगति की अंधाधुँध दौड़ का ही दुष्परिणाम है, इसके समर्थन में अनेकानेक प्रमाण तथ्य रूप से ढूंढ़े जा सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रतिवर्ष अपनी प्रगति समीक्षा छापता है। बढ़ते चिकित्सक, निदान चिकित्सा की सुविधाओं को देखते हुए लगता है कि रोग क्रमशः घट रहे होंगे एवं स्वस्थ व्यक्तियों का अनुपात बढ़ा होगा। लेकिन तथ्य कुछ और ही हैं। सद्यः प्रकाशित रिपोर्ट नवजात शिशुओं से सम्बन्धित है। गत तीन वर्षों में विश्व में कुल तीस अरब शिशु जन्मे, जिसमें से एक अरब शिशु जन्मजात विकलाँग लिए हुए थे। मृत्यु दर इनमें और जोड़ जी जाय तो यही आँकड़ा और भी भयावह हो जाता है। विकसित सुविधा सम्पन्न राष्ट्रों में यह औसत प्रति व्यक्ति अधिक है जबकि उनके यहाँ जन्मदर कम है।
जन्मजात शरीर सम्बन्धी ये विकृतियाँ हैं - बड़ा सिर, हाथ पाँवों में अनुपात का व्यतिक्रम, अविकसित यौनांग, आँखों का बाहर की ओर होना, पलकों का परस्पर जुड़ा होना, गालों पर जन्म से ही झुर्री तथा जरा के चिह्न तथा जन्मजात अर्धांग या अल्प मन्दता (सेरिब्रल पाल्सी)। ये कुछ ऐसे शारीरिक प्रकोप हैं जो जन्म के तुरन्त बाद स्पष्ट ही दिखाई पड़ते हैं। रक्ताल्पता, रस स्रावों में असामान्यता, प्रोजेरिया (जल्दी से आने वाला बुढ़ापा) कुछ ऐसी व्याधियाँ हैं जो कालान्तर में ज्ञात होती है। जन्म से स्वस्थ प्रतीत हो रहा बालक किशोरावस्था आने के पूर्व ही असाध्य रोगी घोषित कर दिया जाता है।
यह स्थिति क्या है व कैसे उत्पन्न हुई, इसके मूल में चिकित्सक-मनीषीगण गए तो उन्होंने रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य पाये। उन्होंने पाया कि जहाँ ये बच्चे पैदा हुए- उस स्थान के वातावरण में रेडियोधर्मिता का अंश अत्यधिक था। ये सभी नव विकसित औद्योगिक परिसर में जन्म जबकि प्रकृति की सुषमा में रहने वाले व्यक्तियों में से एक भी अल्प मन्दता या शरीर विकृति के चिह्न वाला रोगी नहीं मिला। जहाँ चिकित्सक गण एवं परिचर्या की सुविधाएँ सर्वाधिक है वहाँ शिशु मृत्यु दर (निओनेटल डेथरेट) अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा दस गुनी है। जहाँ चिकित्सक, नर्स, दाई तक उपलब्ध नहीं, वहाँ न कोई असामान्यता है। नहीं मृत्युदर का औसत अधिक।
शिशु रोग चिकित्सकों, एम्ब्रियोलॉजिस्ट तथा पर्यावरण विशेषज्ञों ने मिलजुलकर यह निष्कर्ष निकाला है कि वातावरण में संव्याप्त प्रदूषण जो कि नगरों व कस्बों में अधिक है, सम्भवतः शिशु की गर्भस्थ स्थिति में प्रगति को अवरुद्ध कर देता है। वायु में घुले ये विषाक्त कण कोशिकाओं के सामान्य विकास को रोक देते हैं। यही नहीं जीन्स में भी ऐसी असामान्यता ला देते हैं कि आगे चलकर कभी भी अवसर पाने पर कोशिकाओं के बागी होकर कैंसर रूप ले लेने के अवसर बढ़ जाते हैं।
पोषण विज्ञानियों का कथन है कि गर्भिणी के आहार में मिलावट युक्त खाद्य पहले ली गयी गर्भ निरोधक औषधियाँ तथा गर्भावस्था में ली गयी एलोपैथीक संश्लेषित दवाएँ चयापचय प्रक्रिया पर गलत प्रभाव डालती हैं। इस प्रकार का कुपोषण विकलाँग बच्चों को जन्म देता है। यह स्थिति सब जगह एक जैसी है। चाहे वह इंग्लैंड की उद्योग नगरी मैन्चेस्टर हो, अमेरिका का मैनहटन अथवा भारत की सर्वाधिक आबादी वाला नगर कलकत्ता। दिनोंदिन बढ़ते जा रहे इस संकट से सभी चिन्तित हैं। गर्भ निरोधक पिल्स के दुरुपयोग अविवेकपूर्ण प्रचलन ने ऐसी आबादी बढ़ाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जो शरीर व मन दोनों ही दृष्टि से रुग्ण परिवार व समाज पर लदा एक जबर्दस्त भार है। अविवाहित स्थिति में इन औषधियों को लिये जाने के दूरगामी प्रभाव होते है। चरित्र की दृष्टि से गिरावट का सूचक तो यह है ही- अष्टावक्रों की बढ़ती संख्या भी कोई शुभ चिह्न नहीं- भावी विनाश का सूचक है।
जीवन विज्ञानी हर्बर्ट वेन्सन का मत है कि “आधुनिक प्रगति के फलितार्थ जन साधारण के अव्यवस्थित जीवन चक्र के रूप में ऐसे प्रकट हो रहे हैं जिन्हें देख कर भावी सम्भावनाओं की कल्पना मात्र से जी दहल जाता है। असंतुलित हारमोन्स-जीन्स चक्र वाले माता या पिता जिस सन्तति को जन्म देंगे- वह मानवता के लिए एक अभिशाप ही सिद्ध होगी।
भारत में विकृत-अपंग सन्तानों या विचित्र आकृति लेकर जन्मने व तुरन्त मरने वालों की सम्बन्धी समस्या तो और भी अधिक जटिल है। अज्ञान अन्धविश्वास गाँव कस्बों से लेकर शहर तक इस तरह हावी है कि इन असामान्य शिशुओं को ‘अवतार” की उपमा दे दी जाती है। खूब चढ़ावा होता है- दर्शनों की पंक्ति लग जाती है। मूर्खता एवं धूर्तता का यह विचित्र संयोग है जो प्रचार साधनों के इस सीमा तक विस्तार के बावजूद हटने का नाम ही नहीं लेता। क्या हमारा ईश्वर इतना बेतुका, ऐसा बेढंगा है जो हर कहीं नरपामरों के बीच अवतरित होता रहे और शीघ्र ही फिर इहलोक गमन कर दे ?
विश्वव्यापी परिस्थितियों पर जब विचार करते हैं तो पाते हैं कि इस जटिल समस्या के मूल में कई कारण हैं जो पर्यावरण प्रदूषण के अतिरिक्त हैं। कृत्रिम संश्लेषित आहार, डिब्बा बन्द भोजन, सैकेरीन युक्त सर्वसुलभ मिठाइयां, शारीरिक श्रम की कमी व बढ़ता तनाव मानसिक थकान कुछ ऐसी मानव कृत परिस्थितियाँ हैं जो मिटने का नाम नहीं लेतीं। फलतः समाज पर भारभूत बनी यह जनसंख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। चिन्तक भविष्य विज्ञानी एल्विन टॉफलर अपनी पुस्तक “फ्यूचर शॉक” में लिखते हैं कि “इसका एक मात्र कारण आधुनिक विकास क्रम की अन्धाधुन्ध गति। विकास की धारा में सामान्य क्रम की अन्धाधुन्ध गति। विकास की धारा में सामान्य क्रम की अन्धाधुन्ध गति। विकास की धारा में सामान्य क्रम से न चलने, प्रकृतिगत जीवन व्यवस्था से अलग हटने का ही यह दुष्परिणाम है कि मनुष्य को इस अभिशाप से जूझना पड़ रहा है।”
गत दिनों समाचार पत्रों में एक खबर छपी कि अमेरिका में एक विचित्र प्रकार का रोग प्रकट हुआ है जिसकी जकड़ में असंख्यों व्यक्ति मृत्यु की गोद में शनैः-शनैः जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इसे नाम दिया है। ए.आय.डी.एस. (“एक्यूट इम्यूनोलॉजीकल डेफीशिएन्सी सिन्ड्रोम”) इसका अर्थ है- जीवन शक्ति का सहसा कम होते चले जाना एवं धीरे-धीरे रोगी का अनेकानेक घातक संक्रमणों से ग्रस्त होकर मौत की गोद में चले जाना। यह क्यों व कैसे होता है इसका कारण चिकित्सक अभी तक नहीं जान पाए, नहीं कोई चिकित्सा पद्धति ही ढूँढ़ सके हैं। न्यूयार्क, वाशिंगटन, कैलीफोर्निया जैसे नगरों में तो स्थिति यह है कि इसे ब्लैक प्लेग (जैसा कि विश्व युद्ध प्रथम व द्वितीय के समय फैला था) की संज्ञा देकर रोगग्रस्त व्यक्ति के वातावरण से लोग दूर भागने लगे हैं। यूरोप में भी अब यह रोग प्रकट होने लगा है।
अमेरिकन ऐसोसिएशन फार एडवान्समेण्ट ऑफ साइन्स के अनुसार विकसित राष्ट्र कैंसर व अन्य एन्जाइम सम्बन्धी रोगों का जल्दी निदान कर चिकित्सा व्यवस्था जुटा सकने में समक्ष हुए तो उन्हें लगा कि उन्होंने कोई तीर मार लिया। लेकिन जीवनी शक्ति का ह्रास करने वाले इस रोग ने तो समस्या को और भी उलझा दिया है। उनका कथन है कि भूगर्भीय आणविक विस्फोटक अन्तरिक्ष में छायी विकिरण की धूल, द्रुतगामी वाहन कृत्रिम रसायनों के अधिकाधिक प्रचलन ने ऐसा रोग मानवता के मत्थे मढ़ दिया है, जिससे छुटकारा पाने के लिए जितना समय लगेगा, उतने में सम्भवतः मानव ही इस धरती पर न बचे।
आधुनिकता का एक अन्य अनुदान है - बढ़ते मनोरोग। ऐसे अनुमान है कि मात्र भारत में ही डेढ़ करोड़ व्यक्ति ऐसे हैं जो किसी न किसी रूप में मानसिक रोग हैं, मनोचिकित्सकों से उपचार करा रहे हैं। जो चिन्ता, तनाव बेचैनी, आतुरता जैसे मनोविकारों से ग्रस्त हैं व जिनका किसी चिकित्सालय में कोई रिकार्ड दर्ज नहीं, उन्हें तो इस संख्या में शुमार ही नहीं किया जाता। पारस्परिक विग्रह, एकाकीपन, मादक द्रव्यों का प्रचलन एवं सतत् बढ़ता मानसिक दबाव ऐसे कारणों में प्रमुख माने गये हैं। अहमदाबाद के मनोचिकित्सक डा. अनिल शाह लिखते हैं कि “मानसिक अस्पताल मात्र “डस्टबिन” (कूड़े की टोकरी) बन कर रह गये हैं जहाँ रिश्तेदार अवाँछित सम्बन्धी को पटक देते हैं। और वहाँ का असहानुभूति पूर्ण व्यवहार ऐसे व्यक्ति को स्थायी रोगी बनाकर छोड़ता है।”
भारत से परे चलें तो विश्व भर के मनोरोगियों के आंकड़े देखकर लगता है, कहीं हम गत तीस वर्षों में किसी अन्य ग्रह पर तो नहीं आ बसे। आँकड़े तो मात्र उन रोगियों के हैं जिनके नाम चिकित्सा शॉक थैरेपी हेतु दर्ज हैं फिर भी इनसे एक अनुमान लगता है कि यह संख्या कितनी है। साठ से पैंसठ करोड़ व्यक्ति परे विश्व में ऐसे हैं जो असाध्य मनोरोगों से ग्रस्त हैं। समाज में उनका कोई योगदान नहीं, उल्टे उन पर की जा रही चिकित्सा का व्यय भार और लदा हुआ है। विभिन्न मनोविकारों हेतु ली जा रही तनाव शामक औषधियों की मात्रा प्रतिदिन हजारों टन में हैं पाश्चात्य देशों में प्रति 20 लिखे गये पर्चों में से 15 में ट्रैक्वेलाइजर्स होती हैं।
ब्रिटेन के एक प्रख्यात मनश्चिकित्सक डा. स्टेनले के अनुसार पिछले बीस वर्षों में वहाँ आत्महत्या करने वालों की संख्या तीस गुनी बढ़ी है। यूरोप व अमेरिका जैसे धन सम्पन्न राष्ट्रों के तीन चौथाई व्यक्ति ऐसे हैं जो अपने जीवन में एक न एक बार आत्महत्या की चेष्टा करते हैं।
आधुनिक प्रगति का पथ छोड़कर वापस अतीत में लौटा जाय, यह कोई विकल्प नहीं लेकिन इस पर तो पुनर्विचार हो सकता है कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही। द्रुतगामी वाहन, ध्वनि प्रदूषण, बढ़ता विकिरण, पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा, आरामतलबी, कृत्रिमता का जीवन के हर क्षण में अवलम्बन, पर्यावरण की विषाक्तता, उन्मुक्त स्वेच्छाचार को प्रश्रय इत्यादि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कारण ऊपर बतायी गयी परिस्थितियों के मूल में मनीषियों ने बताए हैं। अच्छा हो, मनुष्य समय रहते अपनी चाल बदले और प्रकृतिगत अनुशासन में बंधना सीखे। सृष्टि का यह एक शाश्वत नियम है कि जब भी मर्यादा का उल्लंघन होगा प्रकृति तुरन्त पलटकर दण्ड देगी। महाविनाश को आमन्त्रण आज की परिस्थितियों में मात्र युद्धोन्माद, बढ़ती आबादी, पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं दे रहे, मानवी चिन्तन की यह विकृति भी दे रही है, जो उसे परावलंबन, अन्धाधुन्ध औषधि सेवन तथा उन्मुक्त आचरण की ओर प्रेरित करती है। बढ़ती व्याधियों की इस विभीषिका से भी मानवता को त्राण पाना ही होगा।
प्रस्तुत विभीषिकाओं का आत्यन्तिक समाधान है मानवी अन्तराल का परिशोधन परिष्कार, सदाशयतायुक्त व्यवहार। जब तक चिन्तन में भ्रष्टता भरी होगी, मानवी समुदाय में परिवर्तन आने वाला नहीं है। यही वह मूल स्रोत है जहाँ से अपराध, विग्रह-अलगाव, युद्धोन्माद, प्रकृति के साथ अनाचार जैसी विकृतियाँ जन्म लेती हैं। परिस्थितियाँ भी कुछ सीमा तक प्रस्तुत परिस्थितियों के लिये उत्तरदायी ठहरायी जा सकती हैं परन्तु गहराई में विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि यह दुर्गति वस्तुतः दुर्मतिजन्य है। यदि मनीषी समुदाय वस्तुतः सजग रहा होगा तो न पिछले दो विश्वयुद्ध होते, न ही वर्तमान विसंगतिपूर्ण सभ्यता का स्वरूप नजर आता। कला, लेखनी, वाणी, विज्ञान, वैभव जैसी सम्पदा के धनी ये मनीषी यदि चाहते तो सारे विश्व को नयी दिशा दे सकते थे। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के संहार भरे समापन से भी किसी को प्रेरणा नहीं मिल। इसे एक विडम्बना ही का जाएगा।
फिर भी गत पाँच वर्षों में एक समुदाय विशेष में चेतना जागी व उमंगें उठी हैं कि विनाश की सम्भावनाओं को निरस्त करने के लिए सृजनात्मक प्रयास विश्व स्तर पर एकजुट होकर किये जाएँ। हडसन इन्स्टीट्यूट ने प्रायः 100 मूर्धन्य शोधकर्ताओं के सहयोग से ऐसे तथ्य एकत्रित किये हैं जिनमें वर्तमान की गतिविधियों का पर्यवेक्षण करते हुए निकट भविष्य की सम्भावनाओं का प्रस्तुतीकरण किया जा सके। इस संस्थान ने विश्व विख्यात प्रकाशन “दि ईयर 2000 ए. फ्रेम-वर्क फार स्पेकुलेशन” प्रकाशित की है। उसमें कहा गया है कि सुविधा साधनों में तथा कौशल चातुर्य में पिछले दिनों वृद्धि अवश्य हुई, पर साथ ही यह भी उतना ही सही है कि मनुष्य शारीरिक, मानसिक और नैतिक दृष्टि से निरन्तर पतन की दिशा में चला है। नशेबाजी जैसे दुर्व्यसन इतने बढ़े हैं एवं उनका खर्च उतना हो गया है जितने का कि अन्न खपता है। फलतः न केवल रोगों की संख्या बढ़ी है वरन् विक्षिप्त एवं अर्ध विक्षिप्तों की भी अप्रत्याशित बढ़ोतरी हो रही है। नई सन्तति में अविकसितों और विकलाँगों का अनुपात भयावह गति से बढ़ रहा है। तथा दाम्पत्य जीवन टूट रहा है। हर तीन विवाहों में से एक का साल भर के भीतर हो तलाक के रूप में विसर्जन हो जाता है। पाश्चात्य देशों में अवैध सन्तानों और गर्भपातों की धूम को देखते हुए लगता है कि दांपत्ति जीवन की पवित्रता धीरे-धीरे एक मखौल खिलवाड़ बनती जा रही है।
आगे वे लिखते हैं कि वर्तमान ढर्रा तभी बदल सकता है जब समाज का अग्रणी बुद्धिजीवी समुदाय जागे- संघशक्ति के रूप में विकसित हो तथा मानवता को रचनात्मक दिशा बोध कराए। इसके लिए उन्हें अपने वैभव की ललक लिप्सा, स्वजनों सम्बन्धी मोह छोड़कर समाज निर्माण के क्षेत्र में कूदना पड़ सकता है। जब तक यह समूह आगे नहीं आयेगा, परिस्थितियाँ बदलेंगी नहीं। जनता तो अनुकरण भर करती है। जब एक हिटलर अपने नाजीवाद को सारे जर्मन पर थोपकर युद्धोन्माद का वातावरण पैदा कर सकता है तो अगणित -एक विचार वाले मनीषी मिलकर ऐसी परिस्थिति क्यों नहीं कर सकते जहाँ सब शान्ति से एक साथ रह सकें- विभीषिकाओं को निरस्त कर सकें।
लगभग इसी विचारधारा के छह हजार बुद्धिजीवी वैज्ञानिक 3 वर्ष पूर्व टोरोंटो में तथा इससे पहले कोरिया में एकत्र हुये थे। इन दोनों ही अधिवेशनों में वर्तमान की परिस्थिति की समीक्षा की गयी तथा सम्भावना व्यक्त की गयी कि नये सिरे से कटिबद्ध होकर प्रयास करने पर विनाश को टाला जा सकता है। इसके लिए व्यक्ति को अपना चिन्तन आमूल चूल बदलना होगा ताकि वह अपना ही नहीं सबका हित सोचने लगे।
ये शुभ चिन्ह इस बात का संकेत देते हैं कि विनाश अवश्यम्भावी नहीं है। सृजन सुनिश्चित हो सकता है यदि मानव के क्रिया-कलाप उस दिशा में अग्रसर होने लगें।
परिवर्तन की बेला में दोनों ही शक्तियाँ सक्रिय होती हैं। एक चाहती है - महाविनाश, तो दूसरी का लक्ष्य है- नवसृजन। वस्तुतः यह एक सिक्के के दो पहलू हैं। नव निर्माण तभी सम्भव होता है जब अनुपयुक्त-अवाँछनीय को समूल नष्ट कर दया गया हो, सृष्टा की सदा से ही यह कार्य पद्धति रही है। यह बात अलग है कि अपनी-अपनी दृष्टि से किसी ने उसके क्रिया-कलापों को एकाँगी ध्वंस प्रधान ही माना हो।
जहाँ बीसवीं सदी के अब तक के अस्सी वर्षों में महाविनाश की भूमिका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में फलीभूत होती दिखाई पड़ रही हैं, वहाँ चिन्तन एवं व्यवहार की दृष्टि से, सीमित किन्तु प्रचण्ड शक्ति सामर्थ्य से भरे पूरे समुदाय ने जन-मानस को यह आश्वासन भी दिया है कि यह जीर्ण-क्षीण होती जा रही सृष्टि का नूतन कायाकल्प भर है इस चिन्तन से मनीषी समुदाय को अपनी भूमिका प्रखर बनाने एवं महाकाल की योजना में सहभागी बनने की प्रेरणा मिली है, समय समय पर उन्होंने इसे व्यक्त भी किया है ताकि सृजन समर्थक शक्तियाँ एकजुट हो सकें।
नृतत्व विज्ञानियों का ध्यान अब इस ओर गया है कि विश्व की सबसे प्रचण्ड “मन शक्ति का उपभोग अभीष्ट प्रयोजनों के लिये किया जाय। अब तक प्रतिपक्षी को परास्त करके स्वयं लाभान्वित होने की परम्परा ही मान्यता प्राप्त करती रही है। नये स्तर से सोचने पर यह रहस्य भी उजागर हुआ है कि शस्त्र बल, शासन शक्ति से बढ़कर भी मनोबल है जिसने इस अनगढ़ दुनिया और नर वानर मनुष्य को इस स्तर पर पहुँचाया। इन दिनों यह शक्ति प्रायः व्यक्तिगत प्रयोजनों के लिये ही खर्च होती रही है। शरीर-बल, साधन-बल की तरह ही न केवल साधारण लोग, मनीषी समुदाय भी मनोबल को निर्वाह प्रयोजनों में ही लगाते हैं। इस शक्ति का सामूहिक रूप से व्यापक परिवर्तन एवं नव सृजन के लिए जब भी प्रयोग हुआ है, तब वह निरर्थक नहीं गया। बौद्धिक क्रान्तियों का इतिहास भी ऐसा है, जिसने व्यापक स्तर पर परिस्थितियों को उलट देने में आश्चर्यजनक सफलता प्रस्तुत करके रख दी है।
इस संदर्भ में हर्बर्ट आर्मस्ट्रांग, मार्गरेटमीड, जेम्स ओनील, स्वहरमन काहन जैसे मनीषी गण रूसो, कार्लमार्क्स, बुद्ध, गाँधी आदि के समय की बौद्धिक क्रान्तियों की चर्चा उत्साहपूर्वक करते हैं। विश्व की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक क्षेत्र की महाक्रान्तियों की पृष्ठभूमि विचारकों द्वारा ही बनाई गयी थी। बाद में जनता ने बागडोर स्वयं हाथ में लेकर उन्हें सफल बनाया। मार्टिन लूथर, अब्राहम लिंकन, लूथर किंग जैसे महा-मनीषियों के प्रयत्नों ने ऐसा वातावरण बनाया जिसके कारण जन संगठन एवं संघर्ष खड़े हुए और अभीष्ट प्रयोजन पूरा करके रहे। यह मनःशक्ति ही है जो प्रगति, समृद्धि, संस्कृति, कला रहे। यह मनः शक्ति ही है जो प्रगति, समृद्धि, संस्कृति, कला एवं व्यवस्था के अनेकानेक सृजन प्रयोजन खड़े करती और मनुष्य को क्रमशः अधिकाधिक सुखी समुन्नत बनाती रही है।
इतिहास में मनुष्य की मनःस्थिति एवं परिस्थिति में क्रमिक परिवर्तन होते रहने के प्रमाणों की भरमार है कभी का वनचर नर-वानर आज की सभ्य और सम्पन्न स्थिति में यकायक उछलकर नहीं आ गया है। परिस्थितियों और आवश्यकताओं के दबाव से नये प्रकार से सोचने और नये उपाय खोजने से बाधित होकर मनुष्य ने अपने स्वभाव को बदला है। नये ढाँचे में ढलना और नये साधनों का उपयोग सीखा है। इस सदी के आविष्कार इसके प्रमाण हैं। किन्तु यह परिवर्तन क्रम रहा धीमा है। उसकी गति मन्द रही है। पीढ़ियों के उपरान्त इतनी भिन्नता आती रही है जिसे पुरातन की तुलना में कुछ बदला हुआ बताया जा सके।
नृतत्व विज्ञानियों-अन्य मनीषीगणों का ऐसा मत है कि अब वह परिवर्तन चक्र कहीं अधिक द्रुतगामी हो गया है। कुछ समय पूर्व वाहनों की चाल सीमित थी, पर अब ऐसे यान बन गये हैं जो धरती पर—पानी में तथा अन्तरिक्ष में वेगवत दौड़ लगाते तथा पवन पुत्रों की पंक्ति में खड़े होने का दावा करते हैं। अन्तरिक्ष की यह उछलकूद पृथ्वी के आस-पास तक ही नहीं सीमित रही, अन्य ग्रहों तक भी जा पहुँची।
याँत्रिक प्रगति की तरह ही चिंतन, चरित्र, व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहे हैं। आदतों और अभ्यासों में जो हरे-फेर हो रहा है, उसमें भी इतनी तेजी आई है कि सहस्रों वर्षों में हो सकने वाले कार्य को कुछ ही महीनों में होते देखा जा सकता है। रीति-रिवाजों प्रथा परम्पराओं में आश्चर्यजनक क्रान्तिकारी परिवर्तन देखा जा सकता है।
इन समग्र परिवर्तनों पर एक विहंगम दृष्टि डालते हुए विद्वान मार्गरेट भीड़ ने अपनी पुस्तक “न्यू लाइब्ज फॉर ओल्ड” में एक हवाला दिया है। “न्यूगीनि के निकट मैनुस द्वीपवासियों के पाषाण युग में रहने वाले कबीले अब एक ही पीढ़ी में पूरी तरह बीसवीं सदी के बन गये हैं। एक शताब्दी से भी कम समय में ऐसी कायाकल्प जैसी स्थिति का बन जाना ऐसा है जिसे जादुई अचम्भों में से एक कहा जा सकता है। “लगभग ऐसी ही चर्चा” “ताओ ऑफ फिजिक्स” से ख्याति प्राप्त नोबेल पुरस्कार विजेता फिजिसिस्ट फ्रिट जॉफ काप्रा ने अपनी नयी पुस्तक “द टर्निंग पॉईन्ट” में की है आधुनिक सभ्यता के ये विधेयात्मक परिवर्तन न इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि मनीषी समुदाय सृजन पर उतर जाय तो असम्भव भी सम्भव कर दिखा सकता है।
वस्तुतः जनता की समूह शक्ति में प्रचण्ड सामर्थ्य है वह युगान्तरकारी परिवर्तन ला सकने में सक्षम है। अभी तक मनः शक्ति के शानदार इतिहास एवं वर्चस पर लोगों का ध्यान नहीं गया। बड़े प्रयोजनों के लिये उसका सुनियोजन भी नहीं सूझा। अब जबकि इस विश्व विभूति का नये सिरे से पर्यवेक्षण किया जा रहा है। तो मनीषियों का ध्यान भी इस ओर गया है कि लोकमानस को इस स्तर तक विकसित एवं प्रशिक्षित किया जाय जिसके सहारे वह प्रस्तुत विपन्नताओं से निपट सके और सुखद सम्भावनाएँ कल्पना चित्रों में रंग भर सके।
मनः शक्ति का उपेक्षित क्षेत्र अब धीरे-धीरे अधिक महत्वपूर्ण माना जाने लगा है और वह मार्ग ढूँढ़ा जाने लगा है जिस पर चलते हुए इस चेतना शक्ति के बिखराव को रोककर उसे ऐसे केन्द्र बिन्दु के साथ नियोजित किया जा सके जो विपत्तियों से निपटने और समृद्धियों को बढ़ाने में कारगर सिद्ध होता है। निश्चित ही ऐसी सूक्ष्म गतिविधियों के मूल में दैवी चेतन प्रवाह की प्रधान भूमिका है जो सृजनात्मक अभिरुचि व सामर्थ्य वाले मनः शक्ति सम्पन्नों के अन्तराल को झकझोरती, ऐसा चिन्तन करने व व्यवहार में उतारने हेतु प्रखरता का सम्बल भी देती है।
मूर्धन्य मनीषियों का मत है कि यदि मनः शक्ति को बुरी आदतों और दुर्व्यसनों से हटाकर सृजन कार्य में लगाया जा सके तो इतने भर से वर्तमान स्तर के स्वास्थ्य व साधनों से दस गुना उपयोगी उत्पादन बढ़ सकता है। यन्त्रों की सुविधा साधनों की शक्ति का अपना महत्व है। इतने पर भी मानवी उत्साह, श्रम और मनोयोग का परिपूर्ण एवं दिशाबद्ध उपयोग बन पड़ने पर जितनी समृद्धि बढ़ सकती है, उसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।
वैज्ञानिक उपाय ऐसे खोजते हैं कि मानवी मस्तिष्क इलेक्ट्रोडों या रसायनों से पुर्जों की तरह ढलने लगें लेकिन मनीषी उनसे असहमत हैं। सृष्टि के नव सृजन हेतु विचार क्रान्ति का स्वरूप वे साहित्य, परामर्श प्रशिक्षण संगीत, अभिनय, कला आदि विचारोत्तेजक माध्यमों के सहारे बनाते हैं। वे चाहते हैं कि इनके माध्यम से ऐसा प्रवाह बहाया-वातावरण बनाया जाय, जिससे अनुप्रमाणित होकर व्यक्ति शालीनता-सुसंस्कारिता का अभ्यस्त बने और सामर्थ्यों को सृजनात्मक कृत्यों में नियोजित करते हुए सदा प्रमुदित उल्लसित बना रहे।
प्रस्तुत बेला उपयोगी परिवर्तन विचार क्राँति की है, महाविनाश की नहीं। समय आ रहा है जब विवेक जागेगा और अनुपयुक्त का उपयुक्त में बदलेगा। प्रज्ञा अभियान को उसी देवी चेतन प्रवाह का एक अविच्छिन्न अंग माना जा सकता है।
भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्तमोम्ब्रह्म तेषुहि स एव तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेत्ति विचक्षणः॥ -गायत्री स्मृति
शास्त्रों का कथन है कि “भू, भुवः ओर स्वः ये तीन लोक हैं। इन तीनों लोकों में ॐ ब्रह्म व्याप्त है। जो बुद्धिमान उस व्यापकता को जानता है, वह ही वास्तव में ज्ञानी है।”
यह विश्व तीन भागों में विभक्त है। प्रत्येक को लोक की संज्ञा दी गयी है। भूः लोक, भुवः लोक, स्वः लोक ये तीनों प्रसिद्ध है। सामान्य भाषा में इन्हें पृथ्वी, पाताल एवं स्वर्ग कहा जाता है तो अध्यात्म की भाषा में इन्हें साँसारिक, शारीरिक और आत्मिक क्षेत्र मानते हैं। इन तीनों में ॐ नाम का परमात्मा समाया है। गायत्री मन्त्र के आरम्भ में प्रयुक्त प्रवण और व्याहृतियों में यही तत्वज्ञान छिपा पड़ा है।
परमात्मा का वैदिक नाम है। ब्रह्मा की स्फुरण सूक्ष्म प्रकृति पर निरन्तर आघात करती रहती है। सृष्टि में दृष्टिगोचर गतिशीलता इन्हीं आघातों एवं स्पन्दनों के कारण है। ब्रह्म प्रकृति के मिलन स्थल पर सतत् ॐ की झंकार होती रहती है। इसलिये इसे ही परमात्मा का स्वघोषित नाम कहा गया है।
यह ॐ ही तीनों लोकों में व्याप्त है। भूः शरीर भुवः संसार, स्वः आत्मा ये तीनों ही परमात्मा के कार्य क्षेत्र क्रीड़ा स्थल हैं। गायत्री मन्त्र यही प्रारम्भिक शिक्षण देता है कि इन सभी स्थलों को, निखिल ब्रह्माण्ड को भगवान का विराट् रूप समझ कर अभ्यास की उच्चतम भूमिका प्राप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। ॐ भूर्भुवः स्वः का तत्वज्ञान समझ लेने वाला साधक एक प्रकार से जीवनमुक्त हो जाता है। परमात्मा को सर्वज्ञ, सर्वव्यापक देखने वाला मानव माया, मोह, ममता, संकीर्णता, अनुदारता, कुकर्म दुष्चिन्तन की अग्नि में झुलसने से बच जाता है एवं प्रतिपल परमात्मा का दर्शन कर परमानन्द का रसपान करता रहता है। गीत में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को यही विराट स्वरूप दिखाकर माया से मुक्ति दिलाई थी। इसी विशालता की सृष्टि में व्याप्त अपने स्वरूप की झाँकी भगवान राम ने अपने जन्मकाल में कौशल्या को कराई थी। परमात्मा की इसी भूमिका को प्रत्येक द्विज के, मानवता का उत्तरदायित्व समझने वाले व्यक्ति के अन्तःकरण में स्थापित कर देना गायत्री मन्त्र का प्रथम उद्देश्य है।
भगवान के इस स्वरूप को देख सकना हर किसी के लिये सम्भव है। समस्त विश्व ब्रह्माण्ड को परमात्मा की विशालकाय प्रतिभा मानकर उसके अंग प्रत्यंगों के रूप में समस्त पदार्थों को देखने की भावना ही विराट रूप का दर्शन है। स्थूल आँखों से यह दर्शन नहीं किया जा सकता है। इसलिये भगवान के दिव्य ददामि ते चक्षु सम्बोधित कर अर्जुन के लिये इस रूप का दर्शन सम्भव किया था ये दिव्य चक्षु शोर कुछ नहीं पवित्र, निष्पाप अन्तःकरण ही है। मलिनता रहित, कषाय-कल्मषों के आवरण से रहित, रससिक्त अन्तःस्थली में ही प्रभु की प्रतिच्छाया बनती है। विराट् की यह लघु झाँकी हर व्यक्ति के अन्दर विराजमान है। गायत्री का तत्वज्ञान सार्थक को इसका दर्शन कर सकने का पथ दिखाता है, उसे इसका पात्र बनाता है।
भारतीय संस्कृति का मूल है -ईश्वर विश्वास। दर्शन का आरम्भ ही आस्तिकवाद से होता है। भारतीय जीवन के रग-रग में ईश्वर की सत्त धुली हुई है। समस्त विचारधाराओं और परमेश्वर की सत्ता में अटूट विश्वास रहा है। संस्कृति की अक्षुण्णता, परम्पराओं की विविधता हेतु हुए भी परस्पर एकता तथा अनेकानेक मत पथ होते हुए भी समभाव इसी एक सिद्धान्त के आधार पर बने रह सके हैं। जब-जब इसमें कुछ विकृतियाँ, विसंगतियाँ आयीं- तब तब पतन का पथ प्रशस्त होता चला गया ईश्वरीय तथ्य को विचारधारा से पृथक कर दिया जाय तो फिर इस सृष्टि की सारी महत्ता ही समाप्त हो जाती है। संसार को जड़ ईश्वर रहित मानने से उसे भोग्य समझने की स्वयं के लाभ के लिए मनमाना उपयोग करने की इच्छा प्रधान होने लगती है। उपभोग का भौतिक दृष्टिकोण अत्याचार एवं शोषण को जन्म देता है। वस्तुओं को जोड़-जोड़कर उनका संचय एवं सम्पत्तिवान बनने का लोभ असंख्यों अभावग्रस्तों को दुःखी रहने को विवश कर देता है। अनीश्वरवादी भौतिक दृष्टिकोण पदार्थों का मनमाना उपभोग कर स्वसन्तुष्टि की इच्छा पैदा करता है। जबकि इसके विपरीत प्रत्येक जड़-चेतन पदार्थों में, परमाणु में, तीनों लोकों में भूर्भुवः स्व में, सर्वत्र ॐ को परमात्मा को व्याप्त देखने से दूसरे ही दृष्टिकोण की उत्पत्ति होती है।
विचार पद्धति के संशोधन में ही वर्तमान समस्याओं का हल अंतर्निहित है। प्रत्येक वस्तु में सच्चिदानंद शक्ति का दर्शन, सब प्राणियों में परमात्मा की झाँकी एक ऐसी आत्मिक विचार प्रणाली है जिससे विश्व सेवा, लोक सुरक्षा समस्त सृष्टि की सुव्यवस्था की भावना पैदा होती है। प्रभु की चलती-फिरती प्रतिमाओं को स्वस्थ, सुन्दर और सुखी बनाये रखना ही मनुष्य का प्रयत्न हो ऐसी भावना उठने लगती है। संसार के सभी पदार्थों, प्रकृति वैभव में ईश्वर का निवास है, अतः इसे दैव अमानत मानकर स्वयं के लिये न्यूनतम रखकर शेष को सबके लिये छोड़ देना ही उचित है, यह संकल्प मन में दृढ़ होने लगता है। इस प्रकार विश्व में भूर्भुवः स्वः में परमात्मा की झाँकी करने से संसार के प्रति सृष्टा के प्रति एक श्रद्धामय भावना उत्पन्न होती है जो भोगवादी मान्यता को हटाकर उत्सर्ग की भावना को मुखरित करती है।
मनुष्य की पशुता, पाशविक मनोवृत्तियों पर अंकुश लगाना और उसके स्थान पर सद्प्रवृत्तियों की स्थापना ही अध्यात्मवाद का मुख्य लक्ष्य है। युगों-युगों से इसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु नियामक सत्ता के विराट् स्वरूप का ध्यान करने एवं तद्नुसार अपने चिन्तन को परिष्कृत करने का सन्देश गायत्री मन्त्र देता आया है। इसके व्याहृति भाग की यह प्रेरणा है कि प्रभु की सुरम्य वाटिका के किसी भी कण का दुरुपयोग हम अपनी पाशविक वृत्तियों लिप्साओं को सन्तुष्ट करने में न करें।
कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने ग्रन्थ “मानवसत्य” में लिखा है “मैंने गायत्री मन्त्र को मौखिक भाव में नहीं अन्तः करण से बार-बार दुहराया है। हर बार इसका चिंतन करते हुए मुझे यही लगता कि विश्व के और मेरे अस्तित्व में आत्मीयता है- एकरसता है। भूर्भुवः स्वः- इस भूलोक के साथ अन्तरिक्ष के साथ मेरा अखण्ड योग है। इस विश्व ब्रह्माण्ड का आदि अन्त जो ईश्वर है, उसने ही हमारे मन में चेतना को जागृत किया है। गायत्री मन्त्र के ध्यान द्वारा हम जिसे उपलब्ध करने का प्रयास करते हैं वह विश्वास से हम हमारी आत्मा से चैतन्य के सम्बन्ध में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।”
भूः संसार को, भुवः शरीर को, स्वः अन्तरात्मा को कहते हैं। गायत्री साधक इन तीनों को परम प्रभु की सत्त व प्रकाश से ओत-प्रोत मानता है वह लोक सेवा के माध्यम से संसार की उपासना, शरीर व मन को स्वस्थ, संयत, ऊर्ध्वगामी, सद्गुण सम्पन्न बनाकर कायारूपी प्रभु की साधना तथा अन्तरात्मा को पवित्र, उदार बनाकर अन्तःकरण में विराजमान ईश्वर की प्रतिमूर्ति की पूजा करता है। सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर परिलक्षित होना ही परमानन्द की, ब्रह्मा निर्वाण की, सहज समाधि की स्थित प्रज्ञ की, परमहंस की स्थिति है। जितनी मात्रा में साधक इस तथ्य को हृदयंगम करता चला जाता है उसी अनुपात में वह माया मुक्त होता चला जाता है। इस जीवन में ही वह स्वर्ग का आनन्द उठा लेता है।
समस्त उपासना पद्धतियाँ इसीलिये हैं कि मनुष्य प्रभु की सत्ता को अपने समीप देखें एवं उसे मनोभूमि में प्राथमिकता दे। जो कार्य किसी भी उपासना से सम्पन्न होता है, वह प्रवण और व्याहृतियों में सन्निहित भावनाओं को अपनाने से हो सकता है। इन भावनाओं का मनन-चिन्तन एक आत्मानुशासन स्थापित करता है। व्याहृतियों का दर्शन वस्तुतः मनुष्य की अन्तःभूमि को सुसम्बद्ध रूप से विकसित करने की एक सुव्यवस्थित विद्या है।
अध्यात्म विज्ञानी मन्त्र विद्या तथा उपकरणों की सुसंस्कारिता के आधार पर सामान्य अग्नि को यज्ञाग्नि के रूप में परिवर्तित करते और उसके उपयोग में शारीरिक और मानसिक रुग्णता की निवृत्ति एवं बलिष्ठता की अभिवृद्धि का महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त अन्तरिक्षीय संशोधन-परिष्कृतीकरण का और भी महत्वपूर्ण कार्य इस माध्यम के सहारे सम्पन्न किया जाता रहा है। सर्वविदित है कि अन्न जल से भी अधिक महत्वपूर्ण आधार वर्षा है। वह आकाश से प्राप्त होती है। आकाश का सन्तुलन तभी रहता है जब मनुष्य द्वारा छोड़ी गई विषाक्तता को निगलने के लिए हरीतिमा बनी रहे और उसका उत्पादन प्राण वायु के रूप में मनुष्य को मिलता रहे। इस क्रम में असन्तुलन उत्पन्न होने पर आकाश में विषाक्तता बढ़ती है और वह नीचे उतर कर न केवल प्राणियों का स्वास्थ्य बिगाड़ती है वरन् ओस और बादलों के साथ बरस कर जल, अन्न को तपा कर वनस्पतियों को भी स्वत्व हीन, हानिकारक बनाती है। ऐसे आहार, जल का सेवन करने वाले प्राणी दिन-दिन दुर्बल होते जाते हैं। आज ऐसा ही हो भी रहा है। वाहनों यन्त्रों और कारखानों का धुँआ वातावरण में अन्धाधुन्ध गर्मी और विषाक्तता भर रहा है। बढ़ते हुए कोलाहल से भी अन्तरिक्ष का सन्तुलन बिगड़ रहा है। अणु विस्फोट बारूद का अन्धा धुन्ध प्रयोग तथा दूसरे प्रकार का विकिरण स्वास्थ्य एवं हरीतिमा के लिए समान रूप से विनाशकारी सिद्ध हो रहे हैं। इन सबका निराकरण जितनी अच्छी तरह यज्ञीय ऊर्जा की परिशोधन शक्ति से होता रहता है। उतना और किसी प्रकार नहीं। इस प्रकार ने केवल मनुष्य समुदाय को वरन् समूचे वायुमण्डल की रुग्णता की चिकित्सा करने में यज्ञोपचार समर्थ होता है।
शास्त्रों में यज्ञ का एक माहात्म्य अभीष्ट पर्जन्य बरसने की बात में कहा गया है। आमतौर से समझा भी ऐसा ही जाता है कि यज्ञ होते रहें तो अधिक वर्षा होती है। किन्तु वास्तविकता इससे आगे तक ले जाती है। ‘पर्जन्य’ का तात्पर्य वायु भूत प्राणतत्व से है। यह यज्ञ द्वारा उत्पन्न होता है और आकाश में फैलता है। वर्षा के साथ वह नीचे उतरता है तो अपनी पौष्टिकता से जल को जल के माध्यम से अन्न वनस्पति को भर देता है। इसे मनुष्य ओर पशु खाते हैं तो वे भी परिपुष्ट होते हैं। इस प्रकार पर्जन्य समग्र पौष्टिकता के रूप में प्राण प्रखरता के रूप में -वनस्पतियों और प्राणियों के सुविस्तृत संसार को उपलब्ध होता है। यज्ञ विद्या को रहस्यमयी दयालुता, दानशीलता एवं परिमार्थिता इसी कारण कहा गया है कि उसका सत्परिणाम व्यापक रूप से समस्त संसार को बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध होता है। जबकि अन्य दान व्यक्ति विशेष को नगण्य सा सामयिक लाभ मात्र दे पाते हैं।
मन्त्र शक्ति अध्यात्म विज्ञान की अद्भुत उपलब्धि है। किन्तु सामान्यतः उसका लाभ साधक की अपनी सीमा तक ही सीमित रहता है। प्रसुप्त शक्तियों को जागरण, मनोनिग्रह, अन्तराल का उदात्तीकरण जैसे लाभ जपकर्ता को ही मिलते हैं क्योंकि उस उपचार की हलचलें प्रयोक्ता के अपने शरीर मस्तिष्क तक ही प्रतिक्रिया उत्पन्न कर पाती हैं। यदि इस प्रयोग को व्यापक बनाना हो अन्यान्यों को भी इसका लाभ देना हो तो उसके साथ विस्तृतीकरण का नया माध्यम संयुक्त करना होगा। मनुष्य के मुँह से हल्की सी आवाज निकलती है। लाउडस्पीकर की बिजली साथ में जुड़ जाने से वह असंख्य गुनी बढ़ जाती है। जिसे मुश्किल से पचास सौ व्यक्ति सुन सकते हैं उसे लाखों भली प्रकार सुन लेते हैं। यह आवाज के साथ विद्युत ऊर्जा के समावेश का चमत्कार है। इसी प्रकार रेडियो स्टेशनों पर लगे ट्रान्समीटर वक्ता की आवाज को क्षण भर में समस्त भूमण्डल में बखेर देते हैं। बेतार के तार की यह पद्धति कितनी अद्भुत है। उसके माध्यम से न केवल शब्द वरन् चित्र भी दूर-दूर तक भेजे जा सकते हैं। टेलीविजन पर यह चमत्कार भली प्रकार देखा जा सकता है।
मन्त्रशक्ति का विस्तृतीकरण करने के लिए एंप्लिफायर-ट्रान्समीटर दोनों का काम यज्ञाग्नि के द्वारा सम्पन्न होता है। परिष्कृत वाणी से उत्पन्न की गई मन्त्र शक्ति को किसी विशेष व्यक्ति या व्यक्तियों के लिये भेजना हो तो मिसाइलों की तरह उसे लक्ष्य तक पहुँचाया जा सकता है। शब्द बेधी बाण इसी को कहते हैं। वह जिस तरकस से छोड़ा जाता है। लक्ष्य बेधने के उपरान्त उसी स्थान पर वापस लौट आता है। ऐसी विशेषताओं वाले धनुष बाण को कहीं नहीं देखें गये किन्तु शब्द विज्ञान की इस विशेषता के सम्बन्ध में वैज्ञानिक आश्वस्त हैं कि समर्थ विचार एवं शब्द ईश्वर के माध्यम से प्रकाश गति से दौड़ते हैं। लक्ष्य वेधन कर अन्ततः शब्दबेधी बाण की तरह प्रयोग करना हो तो यह कार्य उसके साथ यज्ञीय ऊर्जा का समावेश करने से ही सम्भव होता है। यज्ञायोजन में दिव्य अग्नि और मन्त्र शक्ति का समन्वय रहने से ऐसी विशिष्ट ऊर्जा उत्पन्न होती है जो समूचे वातावरण के प्रवाह को प्रभावित कर सकें। फलतः उसका लाभ विपत्ति निवारण एवं समृद्धि संवर्धन के रूप में समस्त संसार को मिल सकता है।
संगीत के ताल एवं लयबद्ध स्वर प्रवाह का प्रवाह परिणाम मनुष्यों की भाव सम्वेदना को तरंगित करने में ही नहीं अन्याय क्षेत्रों में भी आश्चर्यजनक कार्य करता देखा गया है। प्राणियों को एक स्थान पर खींच बुलाना उनकी मनः स्थिति बदल देना, प्रजनन शक्ति बढ़ जाना, जैसे सफल प्रयोग थलचरों, जलचरों, नभचरों पर किये जाते रहे हैं। दुधारू पशुओं का दूध इस माध्यम से काफी बढ़ा है। खूँखारों का स्वभाव नरम किया गया है। इसी प्रकार वनस्पतियाँ संगीत सुनकर जल्दी बढ़ी है। वृक्षों ने अधिक फल दिये हैं। प्राचीन काल से संगीत के ऐसे ही लाभों के सम्बन्ध में कितनी ही किंवदंतियां प्रचलित हैं। बीन की आवाज सुनकर साँप एवं हिरन का मोहित हो जाना मेघ मल्हार से बादल बरसने लगना दीपक राग से बुझे दीपक जल जाना आदि अनेकों बातें सुनने को मिलती रहती है। उन्हें छोड़ भी दिया जाये तो भी आज के युग में संगीत की शक्ति से न केवल भावना लहराने का वरन् अन्य प्रकार के भौतिक लाभों को भी प्राप्त किया जा रहा है। रोग निवारण में संगीत ने ध्वनि ऊर्जा ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करनी आरम्भ कर दी है और लगता है कि अगले दिनों औषधि उपचार, शल्य क्रिया आदि की तरह चिकित्सा प्रयोजनों में एक नया प्रयोग संगीत का भी सम्मिलित हो जायेगा। मानसिक रोगों के निवारण में तो उसका और भी अधिक चमत्कारी परिणाम देखा गया है। यह संगीत कण्ठ और वाद्य यन्त्रों के समन्वित उपयोग से निस्तृत होता है अध्यात्म विज्ञान में यही कार्य अधिक शक्तिशाली रूप से मन्त्र शक्ति एवं यज्ञीय ऊर्जा के संयुक्त उपचार से बन पड़ता है। प्रज्ञा पुरश्चरण में मन्त्रोच्चार की सामूहिक शक्ति एवं अग्निहोत्र का अद्भुत समन्वय है। दोनों का लाभ पाने व बहुलीकरण द्वारा उसे विस्तृत कर देने से मानवता पर छायी विपत्तियों का निवारण सम्भव है। यह तथ्य विज्ञान सम्मत भी है एवं शास्त्र प्रतिपादित भी। हर नैष्ठिक उपासक को इस क्रम को अपनाना ही चाहिए।
इहैव नरक व्याधेश्चिकित्साँ न करोति यः। गत्वा निरौषधं स्थानं व्याधिस्थः किं करिष्यति॥
अर्थात्- जो मनुष्य इस जन्म में ही नरक रूपी व्याधि की चिकित्सा नहीं करता, वह रोगाकुल फिर औषध रहित स्थान में जाकर अपनी क्या चिकित्सा कर सकता है। अर्थात् जन्म मृत्यु, जरा आदि व्याधियों की चिकित्सा इस मनुष्य जन्म में ही सुलभ है, अन्यत्र नहीं।
यज्ञ प्रकरण में बहुधा मेधों की चर्चा की जाती है। एवं उनकी अलग-अलग ढंग से व्याख्या भी की जाती है। मध्यकाल में मेघ की संगति बलि से जोड़कर अधर्मियों ने अपना स्वार्थ ही सिद्ध नहीं किया, वरन् यज्ञों पर भी कलंक की छाप डाली। विवेक प्रधान इस युग में मेघों के शास्त्रीय पक्ष की विज्ञान सम्मत व्याख्या अभीष्ट हो गयी है। वस्तुतः मेघ उनके साथ जुड़ी संज्ञा से सन्दर्भित हैं। चार प्रकार के मेध यज्ञ बहुप्रचलित हैं। ये हैं सर्वमेध, नरमेध, अश्वमेध, गोमेध।
सर्वमेध का तात्पर्य है- निजी सम्पदा, प्रतिभा एवं आयुष्य को समष्टिगत सत् प्रयोजनों के लिए अपना वैभव समर्पित कर देना। निजी सम्पत्ति के रूप में कुछ संग्रह परिग्रह पास न रखना। वाजिश्रवा, हरिश्चन्द्र आदि के द्वारा ऐसे ही सर्वमेध समय-समय पर होते रहे हैं।
नरमेध का तात्पर्य है - तपस्वी जीवन। अभ्यस्त लोभ, मोह, अहंता के कुसंस्कारों का परित्याग-पुत्रेषणा, वित्तैषणा, लोकेषणा की कामना अभिलाषाओं से विमुख होना गतिविधियाँ तपश्चर्या युक्त बनाना चिन्तन में आत्मीयता, उदारता का अधिकाधिक समावेश करना अन्तराल में सदाशयता के प्रति श्रद्धा को प्रगाढ़ परिपक्व करना।
अश्वमेध का अर्थ है- सामर्थ्यों को सत्प्रयोजनों के लिए हठपूर्वक नियोजित करना। संचित कुसंस्कारिता क्षुद्र प्रयोजनों में निरत रहने के लिए ललचाती रहती है। कुत्साओं से घिरा हुआ लोक प्रवाह तथा स्वजनों का आग्रह भी ऐसे ही दबाव डालता रहता है। इन समस्त अवरोधों को चीरते हुए उपलब्ध सामर्थ्य में से निर्वाह के लिए न्यूनतम रखने के उपरान्त शेष को वैयक्तिक एवं सामूहिक सत्प्रवृत्तियों में लगा देने की व्रतशीलता अश्व मेध है।
गौमेध का अर्थ - है प्रसुप्त सत्प्रवृत्तियों के जागरण में स्वाध्याय, शिक्षण, कौशल, आदि का विस्तार। दैवी सम्पदाओं से व्यक्ति और समाज को सुसम्पन्न बनाना। समग्र यज्ञ प्रक्रिया इन दर्शन सिद्धान्तों पर ही अवलंबित रही है। यजन प्रक्रिया तो उसका स्थूल दृश्यमान पक्ष भर है।
उपरोक्त प्रयोजन के लिए कई बार व्यक्ति विशेष द्वारा इन चार में से जिसका निश्चय किया हो उसकी सार्वजनिक घोषणा के लिए यह आयोजन सम्पन्न किया जाता था कई बार मूर्धन्य पुरोहितों द्वारा परिव्राजकों की वानप्रस्थ संन्यासियों की दीक्षा के सार्वजनिक समारोह बुलाते थे और उनमें सामूहिक संस्कार होते थे।
अश्वमेध की एक विशेष प्रक्रिया राजसूय स्तर की भी सम्पन्न होती रही है। सामन्तवादी उच्छृंखलता के कारण शासकों के अनाचार प्रजापीड़क न बनने पाये इसलिये उन्हें सर्वतन्त्र स्वतन्त्र नहीं रहने दिया जाता था। उन्हें किसी केन्द्रीय नियन्त्रण के अंतर्गत रखने के लिए समय-समय पर ऐसे आयोजन होते रहते थे। जो स्वेच्छाचारिता का आग्रह करते थे, उन्हें बलपूर्वक वैसा करने से रोका जाता था। इसी प्रकार वाजपेय यज्ञों के अंतर्गत भी दिग्विजय अभियान चलते थे। विचारों, सम्प्रदायों को स्वेच्छाचारिता की आदर्शवादी दिशाधारा के अंतर्गत रखने के लिए समर्थ आत्मवेत्ता ‘दिग्विजय’ के लिए निकलते थे। शास्त्रार्थ जैसे विचार युद्ध ऐसे ही प्रयोजनों के लिए होते थे। जो हारता था उसे पृथकतावादी आग्रह छोड़कर संयुक्त प्रवाह में बहने के केन्द्रीय अनुशासन में रहने के लिए विवश किया जाता था। आज शंकराचार्य जैसे अनेकों समय-समय पर ऐसे ही दिग्विजय अभियानों के लिए निकले हैं। ऐसे सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किये गये धर्म सम्मेलन अश्वमेधों की गणना में गिने जाते रहे हैं। आत्मशोधन एवं परमार्थ समर्पण की प्रक्रिया नरमेध सर्वमेधों के रूप में जानी जाती रही है।
उपरोक्त चार मेध यज्ञों के सम्बन्ध में शास्त्रकारों के कितने ही प्रतिपादन स्थान-थान पर मिलते हैं। शतपथ ब्राह्मण 12।1।2।6।3 में अश्वमेध के सम्बन्ध में कहा गया है -
“श्री वै राष्ट्र वै अश्वमेधः। तस्मात् राष्ट्री अश्वमेधेन यर्जत्। सर्षाः वै देवताः अश्वमेधे अवयताः तस्माद् अश्वमेध याजी सर्व दिशो अभिजयन्ति।”
अर्थात्- वर्चस्व ही राष्ट्र है। राष्ट्र ही अश्वमेध है। अर्थात्- शासन अश्वमेध करे, देवगण यज्ञ में सम्मिलित होते हैं। अश्वमेध का संयोजन सर्वविजयी होता है।
यहाँ अश्वमेध का प्रयोजन राष्ट्र को समर्थ, संगठित एवं अनुशासित बनाना है। साथ ही उच्छृंखलता का नियमन करना भी।
इतिहासकारों का कथन है कि पुरोहित पद ग्रहण करने के अवसर पर वाजपेय और राज्याभिषेक के समय अश्वमेध समारोह किये जाते थे। उस समारोह में इन पदाधिकारियों की प्रस्तुत उत्तरदायित्वों की गरिमा और निर्वाह की विधि व्यवस्था समझाई जाती थी। पदासीन व्यक्ति देव साक्षी में उस गरिमा के निर्वाह की सार्वजनिक घोषणा करते थे।
मेध यज्ञों के प्रसंग में एक बड़ी विडम्बना न जाने कहाँ से आई और सरल सौम्य प्रक्रिया में एक अवाँछनीय झंझट खड़ा कर दिया। यजन कृत्य के हविष्य का निर्धारण करने वाले प्रसंग में कुछ शब्द ऐसे आ गये जिन्हें साहित्य कला की दृष्टि से जान-बूझकर अथवा संयोगवश ऐसे ही प्रयुक्त कर लिया गया जिसके दो अर्थ होते थे ऐसे प्रसंगों में कौतूहल, उपहास तो होता है पर कोई भ्रमित नहीं होता। पहेली बुझोअल में शब्द तो अटपटे होते हैं पर समझदार लोग उसका सही अर्थ बिना किसी कठिनाई के सामान्य बुद्धि से ही जान लेते हैं। शब्दों के अटपटेपन के कारण कोई अर्थ का अनर्थ नहीं करता। किन्तु यज्ञ प्रसंग के अवसर पर ठीक ऐसा अर्थ लगा दिया गया जो मूल तथ्यों के साथ किसी भी प्रकार संगति नहीं खाता।
यज्ञ विवेचना में अश्वमेध, गोमेध, नरमेध, यज्ञों की चर्चा हुई है। इनमें प्रयुक्त हुए दोनों शब्दों का अर्थ अनर्थ किया गया है। मेध का अर्थ समर्पण या संगठन होता है। साथ ही एक अर्थ है ‘बोध’ भी होता है। औचित्य कहाँ है, संगति कहाँ बैठती है उस पर विचार करते ही तात्पर्य समझने वालों का समर्पण, आदि अर्थ ही करने चाहिए न कि हत्याकाण्ड।
इस पहेली बुझौअल में अश्व, गेड, नर नामक प्राणियों को मार-काटकर होम देने की व्याख्या की गई। जबकि अश्व वैभव को, गौ इन्द्रियों को और नर व्यक्तित्व को पवित्र बनाने ईश्वरार्पण करने-इन शब्दों में यहाँ वास्तविक तात्पर्य है।
इसी प्रसंग में कहीं कहीं एक और शब्द आ धमका। ‘आलंभन जिसका एक अर्थ होता है-स्पर्श । दूसरा होता है- मार डालना। देखना यह चाहिए कि जब यज्ञ का नाम ही अध्वर है। अध्वर अर्थात् हिंसा रहित। उस प्रक्रिया में रक्तपात को कहीं भी गुंजाइश नहीं है ऐसी दशा में पशुओं या मनुष्यों को मारकर अग्नि में होम देने की बात किस प्रकार बुद्धि संगत ठहराई जा सकती है।
किन्तु मध्यकाल में अनहोनी को होनी कर दिखाने में कुछ विदूषकों ने उपहासास्पद प्रयत्न किया और ‘उलटा मसी’ का शब्दार्थ कुछ का कुछ करके यज्ञ के मत्थे प्राणि वध का कलंक बाँध देने का प्रयत्न किया गया। मध्यकाल में कुछ ऐसी घटनाएँ हुई थीं। उन्हें पनपते देखकर उन्हीं दिनों भगवान बुद्ध और भगवान महावीर जैसी आत्माएँ सामने आई और विकृति को अंकुरित होते होते ही उनके पैरों तले कुचलकर फेंक दिया। फलतः यज्ञ विद्या पर जिस ग्रहण की काली छाया पड़नी आरम्भ हुई थी वह समय रहते अपने थोड़ी सी करतूत दिखाकर ही पलायन कर गई।
यज्ञ में प्राणियों की हिंसा किये जाने वाली बात तो किसी भी प्रकार शास्त्रानुमोदित नहीं हो सकती। यज्ञ का एक नाम है - ‘अध्वर’ जिसका अर्थ होता है हिंसा रहित कृत्य। उसमें अग्नि का उपयोग तो होता है पर साथ ही पुरोहितों और याजकों में से प्रत्येक को यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं समिधाओं या शाकल्प में कृमि कीटक तो नहीं है और उस गर्मी से किन्हीं चींटी जैसे प्राणियों की जीवन हानि तो नहीं हो रही है। जहाँ इतनी सतर्कता का निर्देश हो वहाँ प्राणि वध की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती।
दो अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग जहाँ होता हो वहाँ बुद्धिमत्ता यह कहती है कि प्रसंग की पूर्वापरि संगति भी बिठाई जाय और यह ध्यान भी रखा जाय कि प्रस्तुत करने वालों का गन्तव्य या उद्देश्य क्या रहा है ? औचित्य का ध्यान रखे बिना दो अर्थ वाले शब्दों का अर्थ कुछ-कूल मान्यता से सर्वथा विपरीत कर देना-अनर्थ कहा जाता है। ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण विडम्बना किसी किसी उद्धत अर्थकर्ता ने मेध शब्द का तात्पर्य एवं स्वरूप प्रस्तुत करने में की है। इतने पर भी मूल मन्तव्य को समझने समझाने वाले शास्त्रकारों की कभी नहीं रही। वे वेदोक्त मेध शब्द का सही अर्थ ही प्रस्तुत करते रहे हैं।
मेध शब्द का अर्थ है - एकता स्थापित करना, जैसा कि धातु पाठ में ‘मेधृ’ धातु का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा गया है।
‘मेध - मेधासंगमनयोहिं सायाँ च।’
अर्थात् - मेधृ’ धातु से निष्पन्न ‘मेध’ शब्द के मेधा (शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना) लोगों में एकता व प्रेम बढ़ाना तथा हिंसा - ये तीन अर्थ होते हैं। व ‘मेध’ शब्द के अन्य अर्थ होते हैं, तो उसको हिंसा वाले अर्थ के प्रति इतना दुराग्रह क्यों किया जाय, जबकि उन-उन स्थलों में उसका हिंसा से भिन्न तात्पर्य ही अभीष्ट है। यहाँ कुछ दृष्टान्त द्रष्टव्य हैं -
पुरुष मेध, पुरुष यज्ञ और नृयज्ञ- ये तीनों शब्द प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते रहे हैं। इन में से नृयज्ञ’ का तात्पर्य बोध कराते हुए मनुस्मृतिकार ने लिखा है -
‘नयज्ञोऽतिथि पूजनम्। (मनु. 3। 70)
अर्थात् - ‘अतिथियों का स्वागत सत्कार ही ‘नृयज्ञ’ है।’
जैसाकि ‘अश्वमेध यज्ञ’ से ‘अश्व’ की बलि देने वाला यज्ञ-तात्पर्य लगाया जाता है जबकि शतपथ ब्राह्मण’ में एक दम विपरीत ही प्रतिपादन है, वहाँ पर उल्लेख है -
‘राष्ट्रं वा अश्वमेधः । वीर्य वा अश्वः।’ - शतपथ. 13।1।6
अर्थात् - ‘पराक्रम ही अश्व है, राष्ट्र का अच्छी प्रकार संचालन ही अश्वमेध है।’
‘अज-मेध’ को बकरे की बलि वाले यज्ञ से अर्थ लगाने वाले को ‘महाभारत’ में कड़ी चेतावनी दी गयी। -
‘अजैर्यज्ञेष यष्टव्यम्’ इति वै वैविकी श्रुतिः। अज संज्ञानि बीजानी, छागान्नों हन्तुमर्हथ। नैष धर्मः सताँ देवाः, यत्र बध्यते वै पशुः॥ - शान्तिपर्व अ. 337
अर्थात् - ‘वेद’ में- ‘अज से यज्ञ करना चाहिए—ऐसा उल्लेख है। ‘अज’ शब्द वहाँ बीज विशेष से है, न कि बकरी से’। अतः उसका तात्पर्य बकरे के वध से नहीं लगाना चाहिए। पशुओं की हिंसा करना अच्छे मनुष्यों का धर्म नहीं है। इसी तथ्य को पंचतन्त्रकार ने भी स्वीकार किया है -
‘एतेऽपि ये याज्ञिका यर्ज्ञकर्मणि पशून् व्यापादयन्ति ते मूर्खाः परमार्थं श्रुतेर्न जानन्ति। तत्र किलैतयुक्तम् अजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति अजास्तावाद् ब्रीहयः साप्तवार्षिकाः कथ्यन्ते न पुनः पशु विशेषाः। उक्तं च— ‘वृक्षान् छित्वा पशून् हत्वा कृत्वारुधिर कर्दमम्। यद्येवं गम्यते स्वर्ग, नरकं केन गम्यते॥”
अर्थात् - ‘जो याज्ञिक यज्ञ में पशुओं की हत्या करते हैं, वे मूर्ख हैं, वे वस्तुतः श्रुति (वेद) के तात्पर्य को नहीं जानते हैं। वहाँ जो अजों से यज्ञ करना चाहिए कहा गया है, उसमें ‘अज’ से तात्पर्य व्रीहि या पुराने अनाज विशेष से है, न कि बकरों से। ‘आप्त कथन भी है कि - ‘यदि पशुओं की हिंसा करके उनकी रुधिर की धारा बहा कर स्वर्ग में जाया जा सकता है तो नकर में जाने का मार्ग कौनसा है ?
‘मेध’ शब्द का दूसरा अर्थ संगमन एकत्रीकरण भी होता है। अतः गोमेध, अश्वमेधादि यज्ञों में उन-उन पशुओं की प्रदर्शनियां मेले लगाये जाने का भी विधान हो सकता है। महाभारत द्वारा इसका प्रबल समर्थन भी प्राप्त होता है।
यजुर्वेद में आलभते शब्द प्रयुक्त हुआ है। उसका अर्थ निकाला गया ‘वध करना चाहिए।” जबकि यह अर्थ यहाँ किसी भी प्रकार युक्ति संगत नहीं। ‘आं’ पूर्वक, लभ धातु, से निष्पन्न इस शब्द का अर्थ ‘स्पर्श करना’ होता है। इसके अनेक प्रमाण उपलब्ध हो जाते हैं। दो एक उद्धरण द्रष्टव्य हैं -
‘वरो वध्वा दक्षिणाँसम् अधिहृदयम् आलीते।” - परस्करगृह्य सूत्र 1। 8।8
अर्थात् -‘वर, वधू के दक्षिण कंधे पर हाथ ले जाकर उसके हृदय का स्पर्श करता है।’
जातकर्म-प्रकरण में उल्लेख है -
‘कुकारं जातं पुरान्यैरालम्भात् सर्पिभधुनी हिरण्ययेन प्राशयेत्।’
अर्थात्- ‘बालक के उत्पन्न होने पर और किसी के स्पर्श से पूर्व, उसे स्वर्ण-शलाका से धृत और मधु चटावे।’
भीमाँसा दर्शन के 2।3।17 सूत्र की सुबोधिनी टीका में स्पष्टतः लिखा है -
‘वत्सस्य समीप अनायनार्थम् आलम्भः स्पर्शो भवतीति।’
अर्थात् - उपर्युक्त तीनों उद्धरणों में ‘आलम्भ’ धातु का अर्थ ‘स्पर्श करना’ ही किया गया है। अतएव यज्ञों में ‘आलम्भ’ के प्रयोग से हिंसा का अर्थ लेना नितान्त भ्रान्तिपूर्ण है।
‘नारदीय पुराण’ (पूर्वार्ध, 24।13।16)। तैत्तिरीय ब्राह्मण (3।4।1-19) ने नरमेध की विधि का वर्णन किया है। (ब्राह्मणेब्राह्मणमालभते क्षत्राय राजन्यम्। यरुद्म्यो वैश्यम्। तपसे शूद्रम्) प्राचीनतम उक्तियाँ यह नहीं व्यक्त करतीं कि कोई मानव मारा जाता था, सारी विधियाँ प्रतीकात्मक मात्र हैं। बाजसनेयी संहिता के बहुत से वचन तैत्तिरीय ब्राह्मण के समान है। तै. ब्रा. (3।4।1 = वाज. सं. 30।5) में आया है - “ब्राह्मणत्व ब्राह्मण को दिया जाना चाहिए (अध्यात्मिक शक्ति), क्षत्रियत्व क्षेत्र को (सैनिक शक्ति) वैश्य मरुतों को” आदि। आप. श्रौ. सू. (20।24) के मत में ब्राह्मण या इस यज्ञ को सम्पादित करता है जिसके द्वारा वह शक्ति एवं शौर्य की विभूतियाँ उपलब्ध करता था।
वैदिक यज्ञों में अश्वमेध का महत्वपूर्ण स्थान है। यह महाक्रतुओं में से एक है। ऋग्वेद में इससे सम्बन्धित दो मन्त्र हैं। शतपथ ब्राह्मण (13.1-5) में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण (3, 8, 9) कात्यायनीय श्रौतसूत्र (20), आपस्तम्ब (20) आश्व लायन (10, 6) शाँखायन (16) तथा दूसरे सामन ग्रन्थों में इसका वर्णन प्राप्त होता है। महाभारत (10, 71-15) में महाराज युधिष्ठिर द्वारा कौरवों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् पापमोचनार्थ किए गए अश्वमेध यज्ञ का विशद वर्णन है। अश्वमेध मुख्यतः राजनीतिक यज्ञ था और इसे वही सम्राट कर सकता था, जिसका आधिपत्य अन्य सभी नरेश मानते थे।
‘अश्व’ का तात्पर्य अश्वगन्धा’ औषधि से होता है, जिसके हवन करने से कफ, श्वेत-कुष्ठ, क्षय आदि रोग दूर होते हैं और वीर्य की वृद्धि होती है। इस विषय में भाव प्रकाश का स्पष्ट उल्लेख है -
अश्वगन्धानिलश्लेष्मश्वि. शोधक्षयापहा। बल्या रसायनी तिक्ता, कषायोष्णाति शुक्रला॥ -भावप्रकाश
अर्थात् - यह अश्वगन्धा औषधि, कफ, श्वेत-कुष्ठ, सूजन, क्षय आदि को दूर करने वाली और वीर्य वर्धक, रसायन है। इसीलिए इसके हवन करने का विधान है।
सर्वमेध, गोमेध आदि अन्य मेध यज्ञों के सम्बन्ध में भी यही बात है इनमें विभिन्न प्रकार के त्याग बलिदान करने-सत्प्रयोजनों के लिए उच्चस्तरीय आदर्शवाद प्रस्तुत करने का ही प्रकरण है। इसी भावना से छोटे-बड़े समस्त यज्ञ सम्पन्न किये जाते थे, किये जाने चाहिए।
कारखानों की चिमनियाँ, रेल गाड़ियाँ तथा घरेलू प्रयोग में निकलने वाले धुएँ की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाने से वायु मण्डल में विषाक्तता बढ़ती है। मनुष्यों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाने, वृक्ष कटने, जंगल घटते जाने से भी वायु प्रदूषण बढ़ता है। कोलाहल, तथा अणु विस्फोटों से उत्पन्न विकिरण भी आकाश में घातक तत्वों की भरमार करते हैं। इस अभिवृद्धि का परिणाम मनुष्यों के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा पड़ता है। घुटन से धीमी आत्महत्या जैसी स्थिति बनती हैं। अणु विकिरण से पीढ़ियों के अपंग होते जाने का खतरा है इसके अतिरिक्त एक बहुत ही भयानक बात है- तापमान बढ़ते जाने से ध्रुवीय बर्फ पिघल पड़ने और समुद्र जल में उफान आने का खतरा। इससे निचले धरातल के पानी में समा जाने का भय रहता है। जलीय भार सन्तुलन बिगड़ जाने से धरती डगमगाती है और जल स्थानों में थल उभरता है और थल स्थानों पर अगाध जल भर जाने जैसा खतरा रहता है। धरती के इतिहास में विभिन्न कारणों से ऐसी उथल-पुथल अनेक बार हुई है। प्रकृति सन्तुलन बिगड़ जाने से मौसम में भारी उलट-पुलट हुई है। लम्बे हिमि युग आये हैं और अधिकाँश प्राणी उसी में मर गये हैं। समय बदलने पर बचे खुचे प्राणियों से नया प्रजनन क्रम चला है पुरानी प्रजातियों के कितने ही जीवधारी अपना अस्तित्व गँवा बैठे हैं। इसी प्रकार अग्नि वर्षा के युग भी आये हैं। जिससे जल और वनस्पतियों का ही नहीं प्राणियों का भी सफाया हुआ है। ऐसे-ऐसे अनेकों विग्रह संकट हैं जो अन्तरिक्ष में विषाक्तता बढ़ाने वाले असन्तुलन के कारण उत्पन्न होते हैं। भूत काल के ऐसे घटनाक्रमों को देखते हुए आशंका एवं सम्भावना समाने आती है कि इन दिनों वायु मण्डल से बढ़ती हुई विषाक्तता कहीं ऐसे ही पुरातन खण्ड प्रलयों की पुनरावृत्ति न करने लगे।
समय रहते प्रस्तुत विभीषिका से निपटने के लिए विश्व के शासकों, अर्थशास्त्रियों, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को मिल कर ऐसे उपाय सोचने चाहिए। ऐसे कदम उठाने चाहिए कि संव्याप्त विषाक्तता का परिशोधन हो सके और नई अभिवृद्धि पर कारगर अंकुश लग सके। बड़े कारखानों के स्थान पर छोटी विद्युत संचालित मशीनों का उपयोग हो वे एक स्थान पर न लगें छोटे-छोटे देहातों में बिखरें। बड़े शहरों में बढ़ने से रोका जाय और कस्बों में विकेन्द्रीकरण हो। अणु विस्फोट एवं विकिरण पर रोक लगे। कोलाहल पर रोक लगे। कोलाहल पर अंकुश लगे धुएँ रहित ईंधन प्रयुक्त हो, ऐसे ऐसे अनेक उपचार इस संदर्भ में अपनाये जा सकते हैं। वृक्षों की कटन रोको और हरीतिमा संवर्धन की बात नये सिरे से सोची जा सकती है। इस प्रकार जन संख्यावृद्धि पर आज जैसा स्वेच्छाचार अगले दिनों न चलने दिया जना चाहिए।
यह भौतिक उपाय उपचारों की चर्चा हुई तो बढ़ते वायु प्रदूषण पर अंकुश लगा सकते हैं। प्रश्न तब भी अड़ा रह जाता है कि जितना प्रदूषण अब तक आकाश में भर गया वह भी कम भयानक नहीं है। इसके परिशोधन का भी कोई कारगर उपाय निकलना चाहिए। इस संदर्भ में दो उपचार ऐसे हैं जिन्हें प्रज्ञा अभियान द्वारा अपनाया जा सकता है और प्रज्ञा परिजन उसकी पूर्ति को अपनी कार्य पद्धति में सम्मिलित करने के लिए तत्पर हो सकते हैं।
हरीतिमा सम्वर्धन इस प्रयोजन के लिए सर्वमान्य सिद्धान्त है। वृक्ष है जो विषाक्तता को सोखते और प्राण प्रद वायु का उत्पादन करते हैं। पिछले दिनों वन सम्पदा बेतरह कटी है। नये उत्पादन के लिए प्रयत्न अपेक्षाकृत कम हुए फलतः भूमि क्षरण, रेगिस्तान, बाढ़, सूखा जैसे अनेक संकट उत्पन्न हुए। उस भूल को अब सुधारा जाना चाहिए और वृक्षारोपण के लिए वनस्पति उत्पादन के प्रयत्न नये उत्साह के साथ आरम्भ करने चाहिए।
यह कार्य ऐसा है जिसे सरकार अपने ढंग से जन समुदाय अपने ढंग से -सम्पन्न करते रहते हैं। प्रज्ञा अभियान इस प्रक्रिया को अपने ढंग से कार्यान्वित करने के लिए अग्रसर हो सकता है।
इसके अतिरिक्त एक अध्यात्म उपचार और भी है अग्निहोत्र की प्रक्रिया का अभिनव पुनरुत्थान प्रचलन। विषाणुओं को मारने के लिए जिस प्रकार ‘एन्टी वायोटिक्स’ रसायनों का प्रयोग होता है उसी प्रकार वायु प्रदूषण के निराकरण में अग्निहोत्र प्रक्रिया की अपनी विशिष्ट भूमिका है। जिस प्रकार बड़े कारखानों की छोटे कुटीर उद्योगों में विकेन्द्रीकरण करने की बात सोची जा रही है, उसी प्रकार बड़े यज्ञ आयोजनों के स्थान पर छोटे घर-घर में चलने वाले बलि वैश्व जैसे प्रचलनों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। प्रज्ञा पुरश्चरण के अंतर्गत प्रज्ञा यज्ञों की प्रक्रिया को अतीव सरल एवं सस्ता बना दिया गया है। पाँच धृत दीपक, पाँच-पाँच अगरबत्तियों के पाँच गुच्छक जलाने एवं 24 बार गायत्री मंत्र का सामूहिक पाठ करने भर से ही इस महान प्रयोजन की संक्षिप्त प्रतीक पूजा हो जाती है। जहाँ जिस प्रकार जिस स्तर का यज्ञोपचार सम्भव हो वहाँ उसके लिए तद्नुरूप प्रयत्न चलने चाहिए।
इन पंक्तियों में विशेष महत्व हरीतिमा सम्वर्धन दिया जा रहा है। वृक्षारोपण पर इन दिनों विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। जिनकी अपनी भूमि है वे उस पर निजी पेड़ लगायें। जिनके पास नहीं है वे सरकारी या अन्य किसी की खाली भूमि पर अपनी ओर से पेड़ लगाने का परिश्रम करें और उसका स्वामित्व उन्हीं का माने जिनकी भूमि है। सड़कों के किनारे सरकारी भूमि होती है। अधिकारियों को सूचना देकर उन्हीं के लिए उन्हीं के परामर्श से अपनी ओर से पेड़ लगाने का प्रयास करने में कहीं कोई अड़चन न पड़ेगी। ऐसी भूमि अन्यत्र भी मिल सकती है जहाँ हरीतिमा लगाने के लिए परिश्रम करने में अड़चन अवरोध आड़े न आये।
अपने-अपने पूर्वजों की स्मृति में किसी खुशी या सफलता के उपलक्ष्य में स्मारक बनाने पुण्य परमार्थ कमाने की दृष्टि से भी वृक्षारोपण उपयोगी, महत्वपूर्ण एवं सर्व सुलभ उपक्रम है। इसके लिए जन-जन से उत्साह उत्पन्न करने वाला लोक शिक्षण प्रचार आन्दोलन चलना चाहिए।
एक छोटा किन्तु अति महत्वपूर्ण कार्य प्रज्ञा परिजनों को विशिष्ट रूप से अपने हाथ में लेने चाहिए। घर-घर में हर आँगन में तुलसी का विरबा स्थापित करने का। इस में घर की सीमा में वायु शोधन का क्रम चल पड़ेगा। कृमि-कीटकों का मक्खी मच्छरों से लेकर सर्प बिच्छुओं तक को भगाने का लाभ मिलेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इस थावले के वृक्ष भगवान का खुला देवालय बिना किसी खर्च के थोड़े से परिश्रम भर से सहज ही विनिर्मित किया जा सकेगा। भगवान की प्रतिमाएँ मात्र धातु पाषाण की ही नहीं होतीं वे वृक्ष रूप में भी हो सकती हैं। प्रयाग का अक्षय वट-बुद्ध का वेधि वृक्ष साक्षात भगवान के प्रतीत माने जाते हैं। घरों में तुलसी का थावला उसी प्रयोजन की पूर्ति कर सकता है। सूर्यार्घ के रूप में जल चढ़ाने, अगरबत्ती दीपक जलाने, परिक्रमा करने, मानसिक जप ध्यान करने भर से उसकी पूजा आरती हो जाती है। यह उपक्रम ऐसा है जिसे कोई भी शिक्षित अशिक्षित भली प्रकार कर सकता है। बाल वृद्ध नर-नारी सभी उसमें समान रूप से भाग ले सकते हैं। घर में आस्तिकता का धार्मिकता का वातावरण बने तो उसके परिणाम दूरगामी होते हैं। भाव श्रद्धा और धर्मनिष्ठा का व्यक्तित्व को पवित्र, प्रखर बनाने में असाधारण योगदान रहता है। तुलसी आरोपण को एक सर्वोपयोगी देवालय के रूप में स्थापित करके प्रकारान्तर से सद्भाव सम्वर्धन की आधारशिला रखी और नींव गहरी की जाती है। इसका युग परिवर्तन के साथ सीधा सम्बन्ध है। इस आन्दोलन को अग्रगामी बनाने के लिए प्रज्ञा परिजनों को बीज एकत्रित करने चाहिए। पौध उगानी चाहिए और स्थापना के लिए घर-घर टोली बनाकर पहुँचने की योजना बनानी चाहिए।
तुलसी की रोग निवारक शक्ति से सभी परिचित हैं। अनुपानभेद से उसे सभी रोगों में घरेलू चिकित्सा की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है। तुलसी पत्र की काली मिर्च के साथ गंगाजल में पीस कर गोलियाँ बना ली जाय और उन्हें गायत्री मंत्र से अभिमन्त्रित करके देते रहा जाय तो इस एक ही औषधि से अनेक रोगों के निवारण करने वाली चिकित्सा पद्धति हाथ लग सकती है। वैसे विभिन्न रोगों में विभिन्न उपचारों के साथ तुलसी का प्रयोग करने की विधि व्यवस्था पुस्तक में अलग से छपी है। उसे दो चार बार मनोयोग पूर्वक उलट -पुलट लेने भर से शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों के निवारण में भी आश्चर्यजनक सहायता, सफलता मिल सकती है।
हर व्यक्ति, प्राणी हर पदार्थ के तीन स्तर होते हैं।, स्थूल सूक्ष्म और कारण। स्थूल में गतिविधियाँ, सूक्ष्म में प्रेरणाएँ और कारण में भावनाओं का समावेश रहता है। यह सिद्धान्त वृक्ष, वनस्पतियों पर भी लागू होता है। पशुओं में गाय की जो दिव्यता है वही नदियों। में गंगा, पर्वतों में हिमालय, वृक्षों में पीपल तथा वनस्पतियों में तुलसी विद्यमान है। फलतः इस कारण शक्ति के साथ जहाँ भी संपर्क सधता है वहीं उत्कृष्टता का प्रवाह उमड़ता है। श्रेष्ठता का दिव्य वातावरण बनता है जो उस प्रभाव क्षेत्र में आते हैं वरिष्ठता विशिष्टता की ओर बढ़ते जाते हैं। तुलसी आरोपण आन्दोलन के पीछे इस विशेष रहस्य का समावेश समझा जाना चाहिए।
प्रज्ञा युग में सम्पदा की, समर्थता की चतुरता की, उतनी आवश्यकता नहीं पड़ेगी जितनी आध्यात्मिक दिव्यता की। इसे प्रसुप्त स्थिति से उवार कर जागृत प्रखर ज्योतिर्मय बनाने की दृष्टि से ही प्रज्ञा अभियान की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष गतिविधियों का निर्धारण, संचालन एवं क्रियान्वयन किया जा रहा है। इसी प्रसंग परिकर में तुलसी आरोपण को भी सम्मिलित समझा जाना है। हरीतिमा के प्रति जन-जन का आकर्षण, स्नेह, एवं संवर्धन को मन मचले इस दृष्टि से उसे धर्मक्षेत्र की एक महत्व पूर्ण प्रक्रिया समझा और समझाया जा रहा है।
भारतीय संस्कृति को आरण्यक संस्कृति कह सकते हैं। उसमें गौधन के निर्वाह का सान्निध्य का अविच्छिन्न अंग रखे रहने का निर्धारण है। साथ ही यह मान्यता भी हैं कि वृक्ष वनस्पति को कुटुम्ब परिवार की तरह साथ लेकर चला जाय। हमारे घर भले ही घास फूँस, मिट्टी खपरैल के बने हैं, पर उनके चारों और हरीतिमा अवश्य लहलहाती दृष्टिगोचर हो। वनस्पति उगाने बढ़ाने में भी प्रायः उसी भावना की तत्परता का परिचय देना पड़ता है। जिसके आधार पर परिवारों को समुन्नत सुसंस्कृत बनाया जाता है। उसी सद्भाव सम्पन्न दृष्टिकोण का क्रमिक विकास करते हुए “वसुधैव कुटुंबकम्” के लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सकता है। तुलसी आन्दोलन उसी का ध्वजारोहण है।
पीपल का एक बीज-नीम की कोतर में किसी तरह पहुँचकर अंकुरित हो गया। धीरे-धीरे वह बढ़ने लगा परन्तु उसका अधिक विकास नहीं हुआ। एक अपने बौनेपन के लिए नीम को जिम्मेदार ठहराते हुए पीपल के पौधे ने नीम से कहा- “अत्याचारी! तू मुझे बढ़ने नहीं देता है। मेरे हिस्से का भोजन पानी छीनकर तू आकाश छू रहा है। इस अन्याय का दुष्परिणाम भगवान तुझे कभी तो बतायेगा !”
नीम ने कहा - “मित्र औरों पर आश्रित रहने वाले अपना विकास उतना ही कर पाते हैं जितना कि तुमने किया है। उससे अधिक करना हो तो तुम नीचे जमीन पर जाओ और अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयत्न करो।”
पीपल से यह करते तो नहीं बना वह नीम को ही गालियाँ देता रहा। कुछ दिनों बाद बड़े जोरों की आँधी आयी। नीम का पेड़ थोड़ा हिला था कि पीपल कमजोर होने के कारण धराशायी हो गया। नीम के आश्रय पर पलने से आखिर वह कब तक जिंदा रहता।
प्रस्तुत समय की सबसे विषम सामयिक समस्या है। अदृश्य वातावरण में भरती जा रही विषाक्तता की। अदृश्य वातावरण में भरती जा रही विषाक्तता की। विकिरण-प्रदूषण का भयावह स्वरूप सर्वविदित है। यही नहीं मानवी चिन्तन की निकृष्टता और दुष्कृत्यों ने प्रकृति को भी विक्षुब्ध बना दिया है। फलतः वह गत एक दशक से अनेकानेक प्रकार के प्रकोप बरसा रही है। भविष्य में इस क्षेत्र में और भी भयावह संकटों की सम्भावना विज्ञजन बताते हैं। असंतुलित मौसम, अतिवृष्टि, भूकम्प, अनावृष्टि, महामारी, भूस्खलन, तूफान जैसे संकट प्रकृति प्रकोप स्तर के ही हैं। अपराधों, सामूहिक बलात्कारों, वधू-दहन जैसे प्रकरणों की वृद्धि दुर्बुद्धिजन्य दुरभि सन्धि ही है। इन सभी के निराकरण में प्रत्यक्ष प्रयास अपने-अपने स्तर पर चलने चाहिए।
महाप्रज्ञा गायत्री का स्वरूप युग शक्ति के रूप में है। कम अक्षरों में - सारगर्भित धर्मशास्त्र - तत्वदर्शन के रूप में यह अनादिकाल से उच्चारित किया जा रहा है बुद्धि के आह्वान से भरा मन्त्र है। व्यक्ति के अन्तराल में उतरने पर उसकी त्रिविधि शक्तियाँ स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर को प्रभावित करती हैं। साधक को मनस्वी, ओजस्वी और तेजस्वी बनाती हैं। दूरदर्शी विचारणा और आदर्शवादी आस्था की परिपक्वता में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। जब यही शिक्षा विश्व व्यवस्था के क्षेत्र में लागू की जाती है तो वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना समष्टिगत रूप में कूट-कूटकर भर देती है। इस सम्बन्ध में शस्त्रों - आप्त वचनों का अभिमत तो है ही, आधुनिक काल के मनीषी भी ऐसा मन्तव्य व्यक्त करते रहे हैं।
आर्थर कोस्लर अपने विवादास्पद रूप में काफी ख्याति प्राप्त फिजिसिस्ट रहे हैं। जीवन के मध्यकाल में वे साम्यवादी से लेकर उसके आलोचक के रूप में बहुचर्चित रहे लेकिन अन्तिम वर्षों में पूर्वार्त्त गुह्यवाद आध्यात्म की ओर उनका रुझान काफी बढ़ गया था। विशेषकर गायत्री मन्त्र की शक्ति का उन्होंने एक वैज्ञानिक चिन्तक दार्शनिक की दृष्टि से विवेचन किया और उसे असीम ऊर्जा का स्रोत माना। ‘द योगी एण्ड कमिसार’ रुट्स ऑफ कॉइन्सीडेन्स’ ‘इनसाइट एण्ड आउटलुक” “गॉड दैट फेल्ड”, डार्कनेस एट नून” “ब्रिक्स टू बैवेल” जैसी अनेकानेक पुस्तकों के कारण ख्याति प्राप्त इस चिन्तक ने गायत्री मन्त्र पर विशेष अध्ययन किया था और इसके उच्चारण में निहित असीम सामर्थ्य की जानकारी पाश्चात्य समुदाय को देने का प्रयास भी किया।
युद्धोन्माद से बढ़ते विश्वव्यापी तनाव की सम्भावना को सामने रखते हुए उन्होंने कहा था कि वे इस महाविनाश को देखना नहीं चाहेंगे, इसके पूर्व ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देंगे। भारत के विषय में उन्होंने कहा कि इस राष्ट्र को जो अध्यात्म सम्पदा का धनी है, आयुध निर्माण संग्रह से दूर ही रहना चाहिए। क्योंकि उसके पास, गायत्री मन्त्र के रूप में एक विज्ञान समस्त ऊर्जा शक्ति है। यदि भारतवासी एक साथ इस मन्त्र का उच्चारण आरम्भ करें तो इससे उद्भूत ऊर्जा आणविक विभीषिका को टाल सकती है। समूह शक्ति के साथ जुड़ी इस मन्त्र के अर्थ की विशिष्ट तथा छन्द के रूप में शब्द ऊर्जा का गुँथन सारे विश्व को सम्भावनाओं से मुक्त कर सकता है।’
यह एक ऐसे मनीषी का मत है जो अब इस धरती पर नहीं पर जिसके चिन्तन ने विश्व मानस पर एक अमिट छाप छोड़ी है। सामूहिक उपासना का जो स्वरूप उन्होंने महाप्रज्ञा के अनुष्ठान के रूप में अनुमोदित किया है, वह प्रज्ञा परिजनों द्वारा आरम्भ किया जा चुका । नैष्ठिक साधना के रूप में तो युग सन्धि की उपासना साथ चल ही रही है। जन-मानस से आद्य शक्ति के युग शक्ति के रूप में बदलने की सम्भावना को साकार होते देखने में अब कोई संशय नहीं रहना चाहिए।
कभी धर्म तन्त्र लोक चेतना को सम्भालता था और अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप मनःस्थिति और परिस्थिति में उत्कृष्टता भरे रहने में पूरी तरह समर्थ रहा।
समय ने पलटा खाया आज व्यक्ति और समाज के भाग्य निर्धारण की क्षमता शासन के हाथों चली गई है। निहित स्वार्थों के हाथों पड़ने के कारण धर्म अब भ्रांतियों और विकृतियों का भण्डार बन गया है। पथ भ्रष्ट को पदच्युत होना ही था, सो वह हुआ भी है। अब भावुकता का शोषण करके अपने को जोंक की तरह जीवित रहने के अतिरिक्त और कुछ उससे बन भी नहीं पड़ रहा है। सामयिक समस्याओं के समाधान में उससे कुछ सहयोग मिलने की आशा रह नहीं गई है। खर्चीले खण्डहरों की रक्षा को ही इन दिनों एक शब्द में धर्म रक्षा कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
यह सब प्रस्तुत उन समस्याओं और विपत्तियों के संदर्भ में कहा जा रहा है जो आज व्यक्ति को वितृष्णाओं और समाज को सर्वनाशी विभीषिकाओं के मुँह में घसीटे लिये जा रही है । प्रश्न एक ही है उनके समाधान में किन का आश्रय टटोला जाये । कभी समय था जब इसके लिये समय धर्मतंत्र को उकसाया -उभारा जा सकता था। पर अब उस क्षेत्र में कबाड़खाने का ऐसा ढेर ही शेष रह गया है जिसे नये सिरे से गलाने के ढालने के उपरान्त ही किसी प्रकार की आशा अपेक्षा की जा सके । आज तो शासन तन्त्र ही प्रबल है। जहाँ उसने प्रगति का श्रेय ओढ़ा है, वहाँ समस्याओं को उत्पन्न करने और बढ़ाने की जिम्मेदारी भी उसी के कन्धे पर लदती है।
इन पंक्तियों में किसी देश, धर्म, क्षेत्र,वर्ग भाषा के खण्ड भागों में विचार नहीं किया जा रहा है वरन् बदले हुए समय में विश्व को एक इकाई मानकर कुछ सोचा और कहा जा सकता है। अब दुनिया इतनी छोटी हो गयी है कि 500 करोड़ मनुष्यों का एक परिवार मानकर ही किसी समस्या का समाधान सोचा जा सकता है । देश विशेष के सुधारों का सीमित एक सामयिक परिणाम ही हो सकता है। धर्म के पतन पराभव की चर्चा भी समस्त विश्व की स्थिति की स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए की गई है। उस क्षेत्र पर न्यूनाधिक मात्रा में विश्व जनता को प्रायः उतना ही समय और धर्म खर्चना पड़ता है, जितना कि शासनतन्त्र पर। ऐसी दशा में प्रतिफल की अपेक्षा भी सहज ही की जा सकती है कि इतना पोषण करने वाली विशालकाय तन्त्र, व्यक्ति और समाज आदर्शवादिता बनाये रहने-इस दिशा में बरती गई उपेक्षा से उत्पन्न हुई सड़न को हटाने के लिये कोई कारगर कदम उठाये। समर्थ होते हुए भी जो प्रमाद बरतते हैं क्षमता का दुरुपयोग करते हैं। उन पर क्रोध उबलना स्वाभाविक है। धर्म के प्रति नहीं प्रस्तुत धर्म तंत्र के द्वारा बरती जा रही विडम्बना के प्रति यहाँ आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है ।
दूसरा नम्बर राजतन्त्र का आता है। यदि उसकी स्थिति सही रही तो राजा अश्वपति, जनक, राम, आदि के शासनकाल जैसी सुख शाँति से भरी पूरी - सतयुगी स्थिति रही होती आज की समस्याओं में से तीन चौथाई का निराकरण हो गया होता। विश्व के राजनेता अणुयुद्ध में लगने वाली बुद्धि एवं संपदा का उपयोग सृजनात्मक प्रयोजनों में कर सके होते तो आज कहीं भी बेकारी, बीमारी, अशिक्षा का अता पता भी न मिलता। थोड़ी कठोरता बढ़ा देने भर से अपराधों का पहाड़ फूँक मारने भर से उड़ जाने जितना हल्का हो गया होता। नशेबाजी जैसे कुटेबों में विपुल धनराशि खर्च होती है, स्वास्थ्य और सदाचार की जो भारी क्षति होती है, उसकी रोकथाम शासन सता न कर सके ऐसी बात नहीं है। अन्य विषों की तरह नशे का उत्पादन, विक्रय एवं सेवन प्रतिबंधित किया जा सकता है।
सरकारें चाहें तो साहित्य एवं कला के क्षेत्र में बढ़ते जाने वाले अनाचार, स्वेच्छाचार पर अंकुश लगा सकती है । अश्लील साहित्य पर जो हल्का सा अंकुश है उसे कड़ा भी किया जा सकता है और उसका दायरा भी बढ़ सकता है। पशु प्रवृत्तियों को भड़काने -दुष्टता और भ्रष्टता को को प्रश्रय, प्रोत्साहन देने वाले साहित्य, संगीत, चित्र, अभिनय को निषिद्ध नियन्त्रित किया जा सकता है । यदि ऐसा बन पड़े तो चिन्तन एवं चरित्र में निरन्तर बढ़ती चली जाने वाली गिरावट में आश्चर्यजनक कमी हो सकती है । समर्थ शासन के लिये इन सुधारवादी कदमों को उठाने में कोई अड़चन नहीं होनी चाहिये जिनके निहित स्वार्थों में बाधा पड़ती है। उनकी चिल्लियों को भवें तरेरते ही ठंडा किया जा सकता है।
युद्ध अनिवार्य नहीं है। झंझटों को विश्व अदालतों के द्वारा भी निपटाया जा सकता है । एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति, एक व्यवस्था की दिशा में यदि विश्व विश्व के शासनाध्यक्ष ईमानदारी से सोचें तो और मिलजुलकर हल निकालें तो कोई कारण नहीं कि दूरदर्शी सद्भावना अपनाते ही विश्व विनाश की प्रस्तुत विभीषिकाओं का हल निकाल सकें । ठीक इसी के समान दूसरी समस्या है-उत्पादन का केन्द्रीकरण। बड़े कारखाने स्वचालित यन्त्रों की सहायता से इतना उत्पादन करते हैं जिनके लिये अन्यत्र मण्डियाँ तलाशने के लिए कुचक्री कूटनीति अपनानी पड़ती है। बड़े शहरों में घिचपिच बढ़ती है और देहात उजड़ते हैं। प्रदूषण पर्यावरण की विभीषिका वर्तमान उद्योग को प्रमुखता मिल सके और विशालकाय कारखाने का विकेन्द्रीकरण हो सके तो वायु जल में निरन्तर विष घोलने की प्रक्रिया भी रुक सकती है। साथ ही हर हाथ को, काम मिलने से अर्थ संकट भी दूर हो सकता है।
आत्म-हत्या पर सरकारी अंकुश है। अग्नेयास्त्र रखने पर भी रोकथाम है। कोई अपने घर में आग लगाने के लिए स्वतन्त्र नहीं है। इसी प्रकार अवाँछनीय प्रजनन के लिए भी हर गृहस्थ को बाधित किया जा सकता है। व्यापक और भयावह बुराइयों की रोकथाम के लिए तानाशाही अनिवार्य नहीं प्रजातन्त्र के अंतर्गत भी ऐसे उपयोगी अनुशासन भली प्रकार लग सकते हैं। विग्रह और विभाजन पर उतारू-अपराधी व्यवसायों के संचालक और तस्करों और दस्युओं की तरह ही अवाँछनीय ठहराये जा सके तो प्रबुद्ध जनता का खुला समर्थन मिलेगा। मौलिक अधिकारों की दुहाई देकर दुष्टता अपनाने की छूट मिलती रहे तो समझना चाहिए कि शासनतन्त्र ने अपने मौलिक उत्तरदायित्व से वचने की बहानेबाजी अपना ली। शासन की सुरक्षा और समृद्धि की तरह ही अनौचित्य के उन्मूलन और सत्प्रचलनों के अभिवर्धन को भी अपनी प्रमुख जिम्मेदारियों में सम्मिलित रखना चाहिए। इसके लिए कानून और संविधान में भी सुधार परिवर्तन अभीष्ट हो तो किया जना चाहिए।
धर्मतन्त्र और शासन तन्त्र की समय शक्तियाँ इन दिनों व्यक्ति और समाज के सम्मुख प्रस्तुत समस्याओं के समाधान में इतनी तत्परता के साथ संलग्न नहीं हो रही हैं, जितना कि उन्हें होना चाहिए। विश्व संकट के निराकरण का एक ही उपाय है-लोक मानस की उत्कृष्टता में अभिवर्धन और लोक प्रचलन में आदर्शवादिता का समावेश। इन दोनों कार्यों में धर्मतन्त्र और राजतन्त्र जितनी तो नहीं पर न्यूनाधिक मात्रा में श्रीमतों, मनीषियों तथा कलाकारों की भी जिम्मेदारी है। वे चाहे तो अपनी प्रतिभा और सम्पदा का उपयोग प्रवाह को, अवाँछनीयता की दिशा में मोड़कर सत्परम्पराओं में से सुरक्षा, प्रतिष्ठा एवं प्रगति में लगाकर बहुत कुछ कर सकते हैं। पर लगता है कि धर्मतन्त्र और राजतन्त्र के सूर्यचन्द्रों को धूमिल कर देने वाले कुहासे में इन तारागणों ने भी चमकने का झंझट उठाने से मुँह मोड़ लिया है। लालच के आकर्षण में कला भी वेश्या बन चली और मनीषा ने वैभव की रखैल बनकर रहना अंगीकार कर लिया है ।
गाँधी समर्थक विवेकानन्द, दयानन्द की पीढ़ियां समाप्त होती जा रही है। बुद्ध जैसे संव्याप्त अनौचित्य से एकाकी लड़ पड़ने वाले साहसी भी नहीं रहे। अशोक मान्धाता और भामाशाहों की तरह लोक मंगल की सामयिक आवश्यकताओं को परखने और उनके लिये उत्सर्ग करने वाले भी नहीं दीख नहीं पड़ते । तिलक जैसी लेखनी और मालवीय जी जैसी वाणी ने भी अब कौंधना बन्द कर दिया है । बड़े आदमी उद्विजन की तरह बढ़ते जा रहें है ? पर महामानवों का समुदाय वंश नाश जैसी विपन्नता में फंसता जा रहा है । सुधार के नाम पर उचकने मचकने वाले बबूले तो आये दिन उठते-बैठते और कौतुक - कौतूहल भर उत्पन्न करके तिरोहित होते रहते हैं। ऐसी निराशाजनक और भयाक्रान्त परिस्थितियों में आखिर क्या किया जाये ? किसके पास जाया जाय ? किसका दरवाजा खटखटाया जाय और किसका पल्ला पकड़ा जाय ?
मानवी गरिमा ने अपनी सुरक्षा की माँग समर्थों के दरबार में बलपूर्वक करने में कुछ उठा नहीं रखा है । डर लगता है वह अपना मुकदमा निचली सभी अदालतों में हार गयी है । द्रौपदी का समर्थन करने के लिये कौरव सभा का कोई बलिष्ठ सभासद भी तैयार नहीं हुआ था। औचित्य अनौचित्य का अन्तर समझने वाले भी झंझट में न पड़ने की नीति अपना कर गरदन झुकाये बैठे थे । अन्तिम पुकार सृष्टा तक पहुँची और वे ही लाज बचाने वाले वस्त्र लेकर दौड़े आज भी प्रायः ऐसी ही स्थिति है। धर्म, शासन, मनीषा, कला और सम्पदा के महारथी चाहते तो मिल-जुलकर विश्व-विभीषिका से निपटने का कोई रास्ता निकाल सकते थे, पर वैसा कुछ बनते दीख नहीं रहा है ।
ऐसी दशा में मानवी गरिमा ने जनता के सुप्रीम कोर्ट में अपनी फरियाद पहुँचाने का निश्चय किया है। छोटी अदालतें प्रमाद या पक्षपात बरतें पर जनता के सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलने की उसे अभी भी आशा है । इसलिये नया निश्चय यही हुआ है कि लोक चेतना को अनौचित्य के प्रतिकार और औचित्य के सहकार हेतु सहमत सान्निध्य किया जाय।
जब शक्ति ने ही संसार के महत्वपूर्ण फैसले किये है। राजतन्त्र के स्थान पर जनतन्त्र की स्थापना उसी की मर्जी से हुई है। दास प्रथा, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बहु विवाह, जागीरदारी, जमींदारी जैसी अनेकों कुप्रथाएं उसी के तेवर बदलने से उड़नछू हो गई। अनेकों राज क्रान्तियाँ उसी के इशारे पर हुई है । फिर कोई कारण नहीं की प्रबुद्ध लोक मानस प्रस्तुत विपन्नताओं का निराकरण न कर सकें ।
प्रज्ञा अभिज्ञान में मानवी गरिमा को वकालत करने का उसका मुकदमा जनता के सुप्रीम कोर्ट में लड़ने का निश्चय किया है । इसके लिये आवश्यक तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण, संग्रह किये है और सहसिद्ध करने का निश्चय किया है कि जन शक्ति की तुलना में प्रस्तुत विनाश विभीषिकाओं का घटाटोप भयंकर होते हुए हुए भी तुच्छ है । पवन में तेजी से गरजने वाली घटाओं को उड़ाकर कहीं से कहीं बिखेर देती है, तो कोई कारण नहीं कि जागृत लोक-मानस प्रभातकालीन - अरुणोदय की भूमिका न निभा सके और अकेले ही संव्याप्त अन्धकार के पैर न उखाड़ सके।
जन शक्ति का एक छोटा अंश जिस तिस प्रकार उपलब्ध करके ही धर्म, शासन, कला, मनीषा, सम्पन्नता के क्षेत्र में अपनी हलचलें जीवित रखे हुये है। इसके अतिरिक्त भी जनता के पास और भी बहुत कुछ बच जाता है । भले ही वह आर्थिक और बौद्धिक क्षेत्र में दुर्बल पड़ती है तो भी उसके रुझान में - तेवर में - इतना बल विद्यमान है कि उलटी परिस्थितियों को उलटकर सीधा कर सकें। जनमत को आज की द्रौपदी का कृष्ण कहा जा सकता है। युग चेतना ने अपनी फरियाद अब इसी सुप्रीम कोर्ट में पहुँचाने का निश्चय किया है। जिसका विस्तृत विवरण पाठकों को आगामी अंकों में समय-समय पर मिलता रहेगा।
अश्विन नवरात्रि की सामूहिक साधना
इस बार आश्विन नवरात्रि ता0 7 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक की है। सभी प्रज्ञा पीठों, प्रज्ञा संस्थानों द्वारा उसे सामूहिक साधना सत्र के रूप में उत्साहपूर्वक मनाया जाये। जो लोग अनुष्ठान करें, उनकी सूची शान्ति कुंज भेजकर संरक्षण परिमार्जन का प्रबन्ध करा लिया जाये। जो लोग अपनी नवरात्रि साधना शान्ति-कुंज में करना चाहते हैं। वे समय रहते स्वीकृति प्राप्त कर लें और स्थान सुरक्षित करा लें ।
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(लाखन सिंह भदौरिया)
सुनो - सुनो आवाज दे रही देव, सन्त की वाणी । उतर रहा प्रज्ञा युग भू-पर ले मधु ऋतु कल्याणी॥
आदि अन्त मिलने आये हैं लेकर नव सन्देश । यह युग वेला निकल न जाये, पीड़ा लिये अशेष॥
हैं चुनौतियों पर चुनौतियाँ खड़े हुए भूचाल । प्रज्ञा ज्ञान खड़े पग-पग पर ज्ञान मशाल सम्भाल ।
आज क्रान्ति की गीता गाती, दिग्दिगंत की वाणी । उतर रहा प्रज्ञा युग भू पर ले मधु ऋतु कल्याणी ॥
आदर्शों की कोख न बन्ध्या, सन्ध्या लिये सवेरा । यह प्रकाश का देश यहाँ से होता सदा उजेरा ॥
नतमस्तक हो रहा ध्वंस है दिव्य सृजन के आगे। शाप-ताप हरने को सारा, युग के प्रहरी जागे ॥
कंठ कंठ को सुधा पिलाती ज्योतिवन्त की वाणी । उतर रहा प्रज्ञा युग भू-पर ले मधु ऋतु कल्याणी॥
वह बसन्त आया है जिसमें ज्ञान मशाल जलेगी । बासन्ती जिन्दगी मनुज की, फूले और फलेगी ॥
कोई तन बीमार न होगा, कोई मन बेजार न होगा । सबकी सेवा में सब होंगे, कोई जन बेकार न होगा ।
सबके दुख का अन्त करेगी, गुरु अनन्त की वाणी । उतर रहा प्रज्ञा युग भू-पर ले मधु ऋतु कल्याणी॥
अनगढ़ पाहन, गढ़कर तप से, जीवन देव रचेंगे। मानव में क्षमता अपार बल, हम स्वयमेव रचेंगे ॥
नारी नहीं शिला होकर, अब पड़ी रहेगी घर में। सत्यवान सावित्री होंगे, नर नारी घर-घर में ॥
अपने भाग्य विधाता है हम, युग ज्वलन्त की वाणी। उतर रहा प्रज्ञा युग भू-पर ले मधु ऋतु कल्याणी॥
*समाप्त*