‘प्रज्ञा’ मानव को प्राप्त दैवी अनुदान

सुविधा साधन जो मनुष्य को प्राप्त है, वे विज्ञान के अनुदान हैं। दूसरी और अध्यात्म के वरदान रूप में उसे प्रतिभा मिली हुई है। दोनों की ही प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए अपनी-अपनी उपयोगिता और आवश्यकता है। पदार्थों की अनगढ़ता को मिटाने, उन्हें उपयोगी बनाने में विज्ञान की अपनी भूमिका है। शरीर निर्वाह, उदर पोषण, प्रजनन उमंगों एवं सुरक्षा सुविधा के अन्यान्य साधनों को अपना सकना इसी आधार पार सम्भव हो पाता है। यदि मानवी काया में जन्म लेने का एकमात्र उद्देश्य शरीर यात्रा ही हो तो इन उपलब्धियों से सन्तुष्ट रहा जा सकता है।

विधाता ने मनुष्य को इसी सीमा तक परिबद्ध रहने के लिए इस धरती पर नहीं भेजा। शरीर यात्रा से एक कदम और आगे बढ़कर आनन्द, सन्तोष, सम्मान, श्रेय, कीर्ति, उत्कर्ष जैसी कुछ उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ प्राप्त करनी हों, तो उसी आन्तरिक वरिष्ठता का अवलम्बन लेना होगा, जिसे प्रतिभा एवं अध्यात्म की भाषा में मानवी गरिमा कहा गया है। इसका सीधा सम्बन्ध दृष्टिकोण व्यवहार की उस उत्कृष्टता से है, जिसे व्यक्तित्व कहते हैं। व्यक्तित्व सम्पन्न ही महामानव कहलाते हैं, भले ही सुख सुविधाओं की दृष्टि से वे विपन्न ही क्यों न हों?

यदि सुविधा और प्रतिभा के समन्वय की, समग्रता के स्वरूप और आनन्द की अनुभूति की जा सके तो समझा जाना चाहिए कि आत्म-बोध सही अर्थों में हो गया। इससे दुरुपयोग के सीमा बन्धन का, वैभव के सुनियोजन एवं प्रतिभा चातुर्य के सदुपयोग का लक्ष्य भी सध जाता है। इसीलिए कौशल प्रतिभा एवं वैभव सुख-सुविधा के साथ उस ‘सुमति’ की भी आवश्यकता पड़ती है, जिसे परिष्कृत भाषा में ‘प्रज्ञा’ के नाम से पुकारा जाता है।


आत्मज्ञान की उपलब्धि- अमरत्व की सिद्धि

राजा जनक ने महामुनि याज्ञवल्क्य से पूछा- “देव! अपने ब्रह्मविद्या का अवगाहन करते हुए जो कुछ महत्वपूर्ण समझा हो, उसका सार संक्षेप मुझे सुनाइए।

याज्ञवल्क्य ने ब्रह्म को पाँच प्रकार का बताया और कहा- (1) राजन् वाक् ब्रह्म है। जो वाणी को परिष्कृत कर लेता है, वह ब्रह्मवेत्ता होता है। (2) प्राण ब्रह्म है। जो साहसी पराक्रमी है, उसे किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता। (3) चक्षु ब्रह्म है। जो गहरी दृष्टि से देखता और आवरण में छिपे सत्य को देखता है, वह दिव्यदर्शी बनता है। (4) मन ब्रह्म है। जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बन जाता है। इच्छा से क्रिया, क्रिया से स्थिति और स्थिति से परिणति प्राप्त करते हुए जीव अपना संसार आप बसाता है। (5) हृदय ब्रह्म है। श्रद्धा संवेदन जगाने से मनुष्य जीवन का रस चखता है और भक्ति भावना से ओत-प्रोत होकर परब्रह्म में जा मिलता है।

जनक का समाधान हो गया। उनने ब्रह्म को अन्यत्र ढूँढ़ना छोड़कर अपने भीतर सन्निहित पाया और उसे जगाना आरम्भ कर दिया।

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भौतिक सम्पदाओं के अधिष्ठाता असुरों का शक्ति और सम्पदा से काम चला। न वे सन्तोष पा सके न आनन्द। सुविधाएँ भी अनाचार में प्रयुक्त हुईं तो उलटे संकट खड़े करने लगीं। उन्होंने सोचा व्यक्ति के जीवन में चेतना ही प्रमुख है, अतः उसे परिष्कृत करने वाले आत्म-ज्ञान का लाभ लेना चाहिए।

यही विचार देवताओं के मन में भी आया। उनने तप बल से स्वर्ग सम्पदा तो प्राप्त कर ली थी, पर तृष्णा और ईर्ष्या के कारण चैन उन्हें भी न था। ऋषियों जैसा तत्व ज्ञान पाये बिना वे भी आपने वैभव को अपूर्ण अनुभव करते थे।

देव और दानव दोनों ने ही अनुभव किया कि आत्म विज्ञान में प्रवीण होना चाहिए। सो वे अपने-अपने समय पर प्रजापति के पास पहुँचे। देव वर्ग के प्रतिनिधि इन्द्र और दैत्यों के विरोचन थे। वे सीखकर अपने-अपने समुदायों को शिक्षित करने की योजना साथ लाये थे।

प्रजापति ने कहा- “ज्ञान के अभ्यास में उतरना होगा। अन्यथा जानकारी मात्र से काम चलेगा नहीं। श्रेयार्थी को धैर्यवान होना चाहिए। खाने से पचाने में कई गुना अधिक समय और श्रम लगता है।”

प्रजापति ने आत्मज्ञान के पाँच चरण विभाजित किये और कहा- “हर चरण के सन्दर्भ में दी गई शिक्षा को स्वभाव संस्कार में उतारने के लिए बीस वर्ष चाहिए। समग्र ज्ञान के लिए सौ वर्ष का समय चाहिए।”

आरम्भिक सहमति तो दोनों की थी पर उतावले असुर तुरन्त लाभ के लिए आतुर थे। देर तक ठहरते उनसे न बन पड़ा। विरोचन ने बीस वर्ष अन्नमय और बीस वर्ष प्राणमय कोष की अभ्यास साधना में लगाये और इतने से ही ऊब कर वापस चले गये। किन्तु इन्द्र ने धैर्य न छोड़ा। वे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञान मय और आनन्दमय कोशों का बीस-बीस वर्ष अभ्यास करने के उपरान्त प्रवीणता के स्तर तक पहुँचे और अमरत्व के पारंगत कहलाये।

श्रद्धा और धैर्य अपनाये रहकर देवताओं ने आत्म ज्ञान का अमृतत्व प्राप्त किया। उतावले और शंकाशील होने के कारण विरोचन समुदाय उस दिव्य सम्पदा से वंचित ही रह गया।


Quotation

प्रगतिशील जीवन केवल वे ही जी सकते हैं, जिनने हृदय में कोमलता, मस्तिष्क में तीक्ष्णता, रक्त में उष्णता और स्वभाव में दृढता का समुचित समावेश कर लिया है। -रस्किन


ईश्वर विकास का चरम बिन्दु है।

प्रख्यात पश्चिमी विचारक एडमण्ड लूसेल्ड का कहना है कि “मनुष्य का पूरा जीवन ही एक “इन्टेशनेलिटी” अर्थात् एक गहन तीव्र इच्छा है। वह तीव्र इच्छा जिस भी दिशा में लग जाती है, उसी ओर मनुष्य की गति बन जाती है। यदि एक व्यक्ति चित्रकार होना चाहता है, मूर्तिकार होने की इच्छा रखता है, अथवा उसकी प्रबल आकाँक्षा वैज्ञानिक बनने की है, यदि वह अपनी समस्त प्राण ऊर्जा को अभीष्ट दिशा में नियोजित कर देता है, तो तदनुसार ढल भी जाता है। पर जिसकी आकाँक्षा प्रबल नहीं अथवा जो कुछ बनना नहीं चाहता उसकी गति किसी भी दिशा में नहीं हो पाती। वह अपनी चैतन्य ऊर्जा को संग्रहित करके किसी भी दिशा में गतिमान नहीं कर पाता। जिसके भीतर संकल्प का आविर्भाव ही नहीं होता, उसकी प्रगति कभी सम्भव नहीं हो पाती।” उपनिषद्कारों ने समय-समय पर इसी अभिव्यक्ति को विभिन्न रूपों में उद्धृत किया है।

सृष्टि का स्वयं का अस्तित्व भी किसी सुदृढ़ संकल्प की परिणति ही है। उपनिषद्कारों ने इसे “एकोऽहम् बहुस्यामि” के ब्राह्मी संकल्प के रूप में चित्रित किया है। सृष्टि के बाहर भीतर विकास की प्रक्रिया सतत् चल रही है। यहाँ प्रत्येक वस्तु विकास की प्रक्रिया से गुजर रही है। संसार “स्टैटिक”- ठहरा हुआ नहीं- सतत् चेतनशील- “डायनामिक” है। यहाँ प्रत्येक चीज बढ़ ही नही रही है - क्रमशः ऊपर उठ ही रही है। जो ठहरा गतिहीन प्रतीत हो रहा है, उसमें भी तीव्र वेग है। स्थिरता कहीं भी नहीं है। छोटे-छोटे परमाणुओं में भी तीव्र हलचल है। प्रसुप्त शरीर में भी चेतना की असंख्यों अदृश्य गतिविधियाँ चल रही हैं तथा जाने अनजाने जीवन को गति दे रही हैं। निश्चेष्ट सोये शरीर के भीतर पाचन, परिवहन, श्वसन आदि के रूप में कितने ही तन्त्र हर क्षण सक्रिय हैं।

जगत का एक सुनिश्चित विकास क्रम है, जो सचेतन है। डार्विन ने भी इस सत्य को स्वीकार किया तथा अपने तथ्यों एवं प्रमाणों के आधार पर उस सत्य का वैज्ञानिक शब्दावली में प्रतिपादन किया। विकास की प्रक्रिया यह दर्शाती है कि सारा जड़ चेतन जगत किसी निश्चित मंजिल पर पहुँचना चाहता है। जीवन का सतत् प्रवाह भी किसी गन्तव्य पर पहुँचने का इच्छुक है। निश्चित ही कोई ऐसी मंजिल है, जहाँ जीव की पहुँचने की आकाँक्षा है। सम्भव है उस मंजिल का ही नाम परमात्मा हो। विकास प्रक्रिया के कारण ही यह पता चल पाता है कि संसार किसी गहन इच्छा से प्रभावित होकर गतिशील है।

विकास के चरण में ही मुक्ति का बोध मनुष्य को होता है। बच्चा जब पहली बार जमीन पर चलना शुरू करता है, तो उसकी प्रफुल्लता देखते ही बनती है। हिलते-डुलते-काँपते पैर एक सुदृढ़ आधार की- आत्मविश्वास की खोज करते हैं। कदमों के सँभलते ही वह अर्जित हो जाता है। उसके विश्वास को एक बड़ा सम्बल मिलता है, जीवात्मा को अपनी शक्ति पहचानने का अवसर प्राप्त होता है। उसे पहली बार अनुभव होता है कि वह अपने पैरों से चल सकता है- अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। विकास की एक मंजिल पूरी हुई। अर्जित विश्वास को तब और भी बल मिलता है जब बालक बोलना आरम्भ करता है। तुतलाती भाषा में भावाभिव्यक्ति करते हुए आत्मा एक नयी शक्ति जुटा लेती है। छोटे बच्चे शब्दों की पुनराभिव्यक्ति करते रहते हैं। यह भोली तुतलाहट भी नयी उपलब्धि से अर्जित विश्वास की ही सहज अभिव्यक्ति होती है। उसमें वे प्रसन्न होते व उस प्रसन्नता को अन्यों को जताते हैं।

बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था तक ऐसे अनेकों अवसर आते हैं, जिनमें आत्मविश्वास को सुदृढ़ आधार मिलता है। शारीरिक एवं मानसिक विकास के अनेक चरण पूरे होते हैं। व्यक्ति ही नहीं समस्त सृष्टि विकासमान् है। विकास की अनन्त धाराऐं स्वयं इस बात का प्रमाण हैं कि विकास का जो अन्तिम रूप है, चरम परिणति की जो हम कल्पना करते हैं, वह ईश्वर ही है।

विचारक टेल्हार्ड डि चार्डिन ने एक शब्द का इस सम्बन्ध में प्रयोग किया है- “द ओमेगा पॉइन्ट”। ‘अल्फा’ लैटिन में पहला शब्द तथा ‘ओमेगा’ अन्तिम शब्द माना जाता है। ‘अल्फा’ का अर्थ है- पहला तथा ‘ओमेगा’ का अर्थ है- अन्तिम। डि चार्डिन ने कहा है- ‘गॉड इज दि ओमेगा पॉइन्ट’- अर्थात् ईश्वर विकास का अन्तिम बिन्दु है- विकास की अन्तिम सम्भावना है।

हर विकासवान वस्तु में चेतना का- ईश्वर का अस्तित्व मौजूद है। खिलता हुआ फूल कुरूप भी हो तो भी वह जड़ पत्थर से अधिक कीमती अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि वह विकास की प्रक्रिया से गुजर रहा है- जीवन्त है। पत्थर में विकास की कोई सम्भावना नहीं है, जड़ता उसकी प्रकृति में समाहित है।

डि चार्डिन का यह भी कहना है कि ‘ओमेगा इज आल्सो दी अल्फा’- अर्थात् जो अन्तिम है, वह पहला भी है। यदि ईश्वर विकास की चरम अवस्था- अनुभूति का परम शिखर है, तो निश्चित ही वह आरम्भ में भी मौजूद होना चाहिए।

गीता में भगवान कृष्ण द्वारा कहे गये सत्य की ही उपरोक्त तथ्य वस्तुतः पुष्टि करते हैं।

“सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥”

अर्थात्- “हे अर्जुन! कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं और पुनः कल्प के प्रारम्भ में, मैं उन्हें उत्पन्न कर देता हूँ।”

जिस स्रोत से जीवन का आरम्भ होता अथवा जहाँ से वह आता है, एक चक्र में घूमने के बाद पुनः उसी में जाकर विलीन हो जाता है। वह चक्र जब तक चलता रहता है, जीवन विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति पाता है। कर्मों का सम्बल पाकर वह विकास की अगणित अवस्थाओं से होकर गुजरता है। अपनी पूर्णावस्था में वह उस चक्र को पार कर मूल स्रोत से जा मिलता है।

अतृप्ति, असंतुष्टि अपूर्णता के कारण अनुभव होती है। मनुष्य अपूर्ण है। पूर्णता का बीज उसके भीतर विद्यमान है तथा वह विकसित होने के लिए भीतर ही भीतर छटपटाता रहता तथा अपनी स्थिति का आभास परोक्ष रूप में कराता रहता है। मनुष्य की चेतना अपूर्ण है। पामरों-पशुओं की स्थिति अपने में पूर्ण है। एक कुत्ता अपने में पूरा कुत्ता है। कोई कुत्ता अपने में अधूरा नहीं है। प्रकृति एवं स्वभाव की विशेषता लगभग एक-सी एक वर्ग विशेष जीवों को मिली हुई है। पर मनुष्य के साथ ऐसी बात नहीं है। अन्य जीवों के पास तो पूरा व्यक्तित्व है। पर मनुष्य में पूर्णता की अनन्त सम्भावनाऐं विद्यमान हैं। वह पशु की तरह पैदा होता है पर विकसित भिन्न रूप में होता है। वह गिर भी सकता है तथा इतना ऊँचा भी उठ सकता है कि महानता के विकास के चरम शिखर को छू ले। मनुष्य मनुष्यता की परिधि तक सीमित रह सकता है, नीचे गिरकर पशु अथवा ऊपर उठकर देवता भी बन सकता है। वह दोनों ही दिशाओं में विकास अथवा पतन की ओर उन्मुख हो सकता है।

इस सत्य को सदैव स्मरण रखा जाना चाहिए कि मनुष्य जीवन में ठहराव कभी नहीं आता। ठहराव का- स्थिरता का अर्थ है ‘मृत्यु’। यदि गति ईश्वर की ओर- महानता की ओर नहीं है तो पतन का सिलसिला अपने आप शुरू हो जाता है। विकास कभी भी यथास्थिति में रुकता नहीं, वह सतत् गतिशील रहता है। पतन सरल है स्वाभाविक है, उत्थान उतना ही कठिन है। लेकिन सम्भाव्य भी है। मनुष्य यदि अपनी गरिमा के अनुरूप विकसित नहीं होता- पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त नहीं करता तो इससे बढ़कर दुर्भाग्य कोई और क्या हो सकता है? मानवी चेतना के साथ जुड़ा सहज सौभाग्य वस्तुतः विकास ही है, मुक्ति जिसकी चरम स्थिति है- एवं ईश्वरत्व की प्राप्ति अन्तिम लक्ष्य। यही पुरुषार्थ सतत् किया जाता रहे, यह परब्रह्म को- ब्राह्मी सत्ता को अभीष्ट भी है।


परब्रह्म की सत्ता के कारण और प्रमाण

कार्य कारण का सिद्धान्त तर्कशास्त्र की दृष्टि से, विज्ञान की दृष्टि से मान्यता प्राप्त है। संसार की कोई भी घटना अकारण नहीं है। दुर्घटनाऐं यदा-कदा अपवाद रूप में होती रहती हैं, पर उनका भी कुछ न कुछ कारण होता है। दृश्य और अदृश्य जगत में घटित होने वाली प्रत्येक घटना किसी न किसी कारण से अभिप्रेरित है। कारण के बिना कोई कार्य नहीं होता। कुम्हार एवं मिट्टी के बिना घड़ा नहीं बन सकता, जुलाहे एवं धागे के बिना कपड़ा नहीं बनता, तकनीशियनों एवं प्रारम्भिक उपकरणों को जुटाए बिना औजार-हथियार नहीं बनते।

मनीषियों ने कारणों को भी तीन भागों में विभाजित किया है- निमित्त कारण, उपादान कारण तथा साधारण कारण। उदाहरणार्थ घड़ा बनने के पूर्व कुम्हार तथा मिट्टी दोनों ही का होना पर्याप्त नहीं, कुम्हार और मिट्टी के साथ-साथ दण्ड और चक्र का भी होना भी अनिवार्य है। इस प्रकार घट बनने के लिए तीनों कारक कुम्हार, मिट्टी तथा दण्ड-चक्र, आवश्यक हैं इस निर्माण में कुम्हार निमित्त कारण है, मिट्टी है उपादान कारण और दण्ड चक्र आदि हैं साधारण कारण। संसार की कोई वस्तु इन तीनों कारणों के बिना नहीं बन सकती।

दर्शन शास्त्र का यह सर्वमान्य सिद्धान्त जब संसार की हर वस्तु पर लागू होता है, तो कोई कारण नहीं कि सृष्टि एवं उसकी व्यवस्था पर न लागू हो। पर यह विचित्र आश्चर्य है कि तथाकथित बुद्धिजीवी- नास्तिक स्तर के व्यक्ति संसार की वस्तुओं के निर्माण के सम्बन्ध में तो कार्य-कारण सिद्धान्त को तो स्वीकारते हैं, पर सृष्टि की उत्पत्ति के सन्दर्भ में उसे नहीं मानते। सृष्टि बिना कर्ता के बन गयी, यह निरंकुश बुद्धि का- तर्क रहित दर्शन का निराधार प्रलाप है, जिसमें औचित्य का लेशमात्र भी अंश नहीं है।

वैदिक ग्रन्थों में दर्शन कि त्रैतवाद सम्बन्धी चर्चा है। यह और कुछ नहीं, उपरोक्त तीन कारणों की ही दार्शनिक व्याख्या है। सृष्टि के सम्बन्ध में निमित्त कारण वह है जो स्वयं अदृश्य, अपरिवर्तित रहकर विभिन्न प्रकार के दृश्य घटकों का निर्माण करता है। उपादान कारण वह है जिससे निर्माता किसी पदार्थ का निर्माण करता है। तथा साधारण कारण वह है जो बनाने का माध्यम बनता है। इस कारण सृष्टि का निमित्त कारण परमात्मा है। उपादान कारण प्रकृति है और साधारण कारण जीव। परमात्मा को अध्यात्म ग्रन्थों में एक विशेष विशेषण से सम्बोधित किया गया है, जिसमें सृष्टि निर्माण का तथा त्रैतवाद का समस्त तत्व चिन्तन समाहित हो गया है। वह विशेषण है- ‘सच्चिदानन्द’। इस स्वरूप में ईश्वर, जीव और प्रकृति- तीनों की स्थिति का सम्यक् निरूपण है। प्रकृति केवल सत् है। चेतना का उसमें अंश नहीं है। जीव सत् और चित् का युग्म है। परमात्मा में तीनों ही विशेषताएँ हैं- वह सत् भी है, चित् भी और आनन्द भी। इस प्रकार परमात्मा के सच्चिदानन्द नाम में उन तीनों कारणों का तात्विक वर्णन है, जो संसार और समूची सृष्टि के निर्माण के प्रमुख कारक हैं।

न्याय दर्शन के ऋषि ने भी प्रकारान्तर से ऐसे ही तीन कारणों का वर्णन किया है। वे तीनों कारण हैं- (1) समवायि कारण (2) असमवायि कारण (3) निमित्त कारण।

जो समवेत (पूर्णरूपेण ) कार्य की उत्पत्ति का कारण हो, उसे समवायि कारण कहते हैं-

“यत्समवेतं कार्यमुत्पत्पद्यते तत् समवायि कारणम्।

उदाहरणार्थ कपड़े के निर्माण में धागे की भूमिका समवायि कारण है, क्योंकि वस्त्र निर्माण में जितना उपयोग धागे का है, उतना रंग आदि का नहीं।

जो समवायि कारण के साथ निश्चित रूप से जुड़ा हो उसे असमवायि कारण कहा जाता है।

यत् समवायि कारण प्रत्यासन्नमवधत सामर्थ्य तद् समवायिकारणम्।

उदाहरणार्थ वस्तु निर्माण में तन्तु संयोगों की प्रक्रिया असमवायिकारण है, क्योंकि वस्त्र निर्माण में तन्तु तब तक समर्थ नहीं हो सकते जब तक कि उनका परस्पर ताने-बाने के रूप में क्रमबद्ध संयोग न हो, यदि धागे बिखरे होंगे तो उनसे वस्त्र बन ही नहीं सकता।

निमित्त कारण वह है, जो न समवायि कारण हो न असमवायि कारण, फिर भी एक ऐसा कारण हो जिसके बिना भी कार्य सिद्ध न होता हो।

‘यन्न समवायिकारणं नाप्यसमवायिकारणमथ च कारणं तन्निमित्तकारणम्।’

वस्त्र धागे से तो बनता है परन्तु जुलाहे का उसके निर्माण में अत्यधिक सहयोग होता है। अतएव वह निमित्त कारण कहा जाता है।

न्याय दर्शन के प्रणेता ने सृष्टि की उत्पत्ति में परमात्मा को निमित्त कारण माना है। तर्क की दृष्टि से भी यह बात गले नहीं उतरती कि आकस्मिक विस्फोट से- मात्र संयोगवश यह सृष्टि बनकर तैयार हो गयी। दुर्घटनाएँ कुरुपता और अव्यवस्था को जन्म देती हैं। सुव्यवस्था और सौन्दर्य को नहीं। इतनी सुन्दर- सुव्यवस्थित सृष्टि की उत्पत्ति किसी आकस्मिक सुयोग की परिणति नहीं हो सकती। उसकी गति एवं स्थिति के मूल में भी किसी अदृश्य “सुपर इन्टेलीजेन्स” से युक्त सत्ता का परोक्ष नियन्त्रण है, उसी प्रकार जैसे कि किसी स्वसंचालित कम्प्यूटर पर किसी मनुष्य का होता है।

प्रमाणों में अनुमान भी एक सशक्त प्रमाण है। दैनन्दिन जीवन में अनुमान के आधार पर कितनी ही बातों को सही मानना पड़ता है। प्रत्यक्ष प्रतीत होना- दिखाई पड़ना अथवा अनुभव में आना ही किसी वस्तु के अस्तित्व का एकमात्र प्रमाण नहीं है। किसी कवि ने अपनी रचना में अनुमान के आठ सशक्त प्रमाण दिए- “दूर समीप, इन्द्रिय को हान। मन चंचल, सूक्ष्म, विवधान। तिरोधान, सजाती संग, अष्ट हेत धारो चित अंग॥” इसका भावार्थ है- जैसे पक्षी आकाश में उड़ता हुआ दूर चला जाता है, तब प्रतीत नहीं होता किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि पक्षी नहीं है। समीप- जैसे नेत्रों में अंजन अत्यन्त निकट है पर अपने नेत्रों को दिखायी नहीं पड़ता। इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अंजन नहीं है।

“इन्द्रिय की अक्षमता” को ऐसे समझा जा सकता है। अन्धा रूप को नहीं देखता तो भी रूप का अभाव नहीं कहा जा सकता। “मन चंचल”- अर्थात् चंचल मन को पदार्थ की सता नहीं मालूम पड़ती तो भी उसका अभाव नहीं कहा जा सकता। “सूक्ष्म”- सूक्ष्म परमाणु प्रतीत नहीं होते तो भी उनका अस्तित्व मौजूद है। “व्यवधान” परदे के भीतर बैठा व्यक्ति दिखायी नहीं पड़ता, तो भी उसका अभाव नहीं माना जा सकता। “तिरोधान”- तारे दिन में नहीं दीखते तो भी वे मौजूद रहते हैं, सूर्य प्रकाश के कारण नहीं दृष्टिगोचर होते। “सजातीय संग” वर्षा का जल तालाब या नदी में मिल जाता है, इससे उसकी अलग प्रतीति नहीं होती, किन्तु इससे बरसे हुए जल का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता।

संसार के विषयों एवं पदार्थों की तरह ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के माध्यम से परमात्मा को देखा अथवा अनुभव नहीं किया जा सकता क्योंकि वह इन्द्रियों का विषय नहीं है इन्द्रियातीत है। आँख केवल रूप को देखतीं है- बाह्य सौन्दर्य अथवा कुरुपता का दर्शन करती है। अरूप का अदृश्य, किन्तु शाश्वत सौन्दर्य का वह दर्शन नहीं कर सकती। कान मात्र शब्द को ग्रहण कर सकते हैं। उनकी पकड़ सीमा बैखरी वाणी तक है। परा और पश्यन्ति वाणियों को ग्रहण कर सकने में वह समर्थ नहीं है। जिह्वा रसों की अनुभूति करती है, वह भी सीमित रसों का। रसातीत का वह अनुभव नहीं कर पाती। नासिका की घ्राण शक्ति गन्ध तक सीमित है। गन्धातीत को वह ग्रहण नहीं कर पाती। त्वचा का विषय स्पर्श है, स्पर्शातीत चीजों को वह नहीं अनुभव कर पाती। परमात्मा को ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्’ कहा गया है। वह इन्द्रियातीत है, इन्द्रियगोचर नहीं हो सकता। शरीर की जितनी भी इन्द्रियाँ हैं, वे बहिर्मुखी हैं- “परांचि रवानि व्यतृणत् स्वयम्भूः”, में शास्त्रकार ने इसी सत्य का प्रतिपादन किया है। अपनी सीमा के बाहर इन्द्रियों में जाने की सामर्थ्य नहीं, वे स्थूल वस्तुओं को ही देख तथा अनुभव कर सकती हैं- अरूप, सूक्ष्मतम तथा अदृश्य अस्तित्वमान वस्तुओं को नहीं। जो इन्द्रियगोचर विषयों से परे किसी वस्तु की कल्पना ही नहीं कर सकते वे परमात्मा की अगोचर सत्ता की अनुभूति कैसे कर सकते हैं?

विचारणा एवं भाव सम्वेदनाएँ जीवन्त-तत्व हैं पर वैज्ञानिक शब्दावली में न तो उन्हें व्यक्त किया जा सकता है और न ही विज्ञान के आधारों पर उनकी सत्ता को प्रमाणित करना ही सम्भव है। ट्रिनिटी कालेज फ्लोरिडा के भूतपूर्व प्रो. स्टेनली कौंगडन कहते हैं कि “मैंने अगणित वैज्ञानिकों से पूछा कि वे मुझे विचार का सही रासायनिक फार्मूला बताएँ। उसकी लम्बाई, चौड़ाई वजन, रंग और रूप, निवास स्थली से अवगत करायें। उसकी दिशा एवं गति के स्पन्दन का वर्णन करें। पर न तो कोई वैज्ञानिक ही उसका सही स्वरूप बता सका और न ही ऐसी परिभाषा सामने आयी जो अपने भौतिक फार्मूले अथवा व्याख्याओं से विचार की संरचना को व्यक्त कर सके। जब विचारों की व्याख्या भौतिक विज्ञान की भाषा में कर सकना सम्भव नहीं तो फिर ईश्वर जैसी सूक्ष्म सत्ता की अभिव्यक्ति उस भाषा में कैसे सम्भव हो सकती है।

द्रव्य की परिभाषा करते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि जिसमें भार है तथा जो स्थान घेरता है, वह द्रव्य है। संसार के प्रत्येक पदार्थ पर यह नियम लागू होता है, पर परमात्मा इस नियम के अन्तर्गत नहीं आता। उसे भार एवं स्थानयुक्त पदार्थों की कोटि में नहीं रखा जा सकता। जब भी किसी द्रव्य की उत्पत्ति होती है, किसी न किसी काल (टाइम) और किसी न किसी देश (स्पेस) में होती है। संसार के हर जड़ चेतन पदार्थ टाइम और स्पेस की परिधि के भीतर आते हैं। पर वह परम सत्ता देश और काल के बन्धन में नहीं आती। ऋषि का वेदों में उद्घोष है-

‘यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति। स्वर्यस्व च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥’

अर्थात्- “जो भूत और भविष्य का तथा संसार में पैदा होने वाले हर घटक का अधिष्ठाता है, जो केवल आनन्द स्वरूप है, उस श्रेष्ठ ब्रह्म को नमस्कार है।”

वेब्स्टर विश्वविद्यालय के प्रख्यात दार्शनिक डा. मैरिट स्टेनली अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि “वर्षों पूर्व एकबार मैं पैंसिलवानिया में एक एकान्त सड़क के किनारे से गुजर रहा था कि उस निर्जन स्थान पर मैंने फूलों से लदी एक गुलाब की पौध को देखा। वह काँटेदार झाड़ियों तथा जंगली घास से घिरी हुई थी। मीलों तक किसी मकान का अता-पता न था, न ही वहाँ लोगों की आबादी थी। गुलाब की यह झाड़ी किसी बीज से हवा पानी चिड़िया या किसी जानवर द्वारा लायी गई किसी दूरस्थित गुलाब की कलम से अकस्मात पैदा हो गयी, खिलकर फूलों से लदकर हँसने और सुगन्ध बिखेरने लगी, इस बात को असम्भव मानकर मैं अपनी अंतःप्रेरणा से यह समझ गया कि किसी मनुष्य ने इसे सावधानी पूर्वक लगाया है। उस पौधे को लगाते हुए मैनें अपनी आँखों से तो नहीं देखा पर अन्तर्बोध कि सचाई कि मैं किसी भी हालत में उपेक्षा नहीं कर सका।”

वह आगे लिखते हैं सृष्टि के सन्दर्भ में भी जब गम्भीर चिन्तन करता हूँ तो मुझे तार्किक दृष्टि से भी यह बात शत-प्रतिशत सही जान पड़ती है कि इतनी सुव्यवस्थित संरचना का कोई न कोई समर्थ निर्माता अवश्य होगा। उत्तंग शिखर, विशाल सागर, नदियाँ, झरने, आकाश के टिमटिमाते तारे, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह नक्षत्र, निहारिकाओं जैसी रचनाएँ तथा उनकी सुव्यवस्थित कार्य प्रणाली किसी दुर्घटना की परिणति हो, इस प्रतिपादन को विवेक स्वीकार नहीं करता सुनिश्चित रूप से ये कुशल और समर्थ निर्माता की देन हैं।

आदि ऋषि मनु ने ईश्वर के अंश जीवात्मा की कर्मों का साक्षी मानते हुए उसे ईश्वर का सबसे बड़ा प्रमाण माना है। मनु स्मृति में वर्णन है-

आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः। माऽवयंस्थाः स्वमात्मानं नृणां साक्षिणमुत्तमम्॥

अर्थात्- आत्मा ही आत्मा की साक्षी है, आत्मा ही आत्मा की गति है। ऐसा जानकर तुम मनुष्यों की उत्तम साक्षी देने वाली आत्मा का अपमान न करो।


दैवी अनुदानों का सच्चा अधिकारी कौन?

चरवाहे जब उस ऊँची टेकरी पर जा बैठते, तो अनपढ़ होते हुए भी विद्वानों और दरबारियों जैसी बातें करते। वहाँ कोई करामात गढ़ी होनी चाहिए यह चर्चा सब जगह फैलने लगी। समाचार राजा भोज तक पहुँचा। उन्होंने उस चमत्कार का पता लगाया और सही पाया। कारण ढूँढ़ने के लिए खुदाई आरम्भ हो गई।

नीचे एक स्वर्ण मंडित सिंहासन निकला जिसमें बत्तीस पाये, पुतलियों की आकृति के लगे थे। सिंहासन राजमहल पहुँचाया गया। निर्णय हुआ कि भोज अब इसी पर बैठा करेंगे। शुभ मुहूर्त निकाला गया।

जैसे ही राजा बैठने के लिए बढ़े। वैसे ही सिंहासन की पहली पुतली ने कहा- उतावली न करो, यह विक्रमादित्य का सिंहासन है। उनमें जो गुण थे, वे यदि तुम्हारे में हों तो ही इस पर बैठो अन्यथा अनधिकार चेष्टा न करो।

धातु निर्मित पुतली को मनुष्यों की तरह बोलते देखकर भोज स्तब्ध रह गये। उनने पूछा- “विक्रमादित्य के गुणों के उदाहरण सुनाएँ, तब देखूँ कि वे गुण हैं या नहीं।” पुतली ने एक कथा सुनाई। भोज ने कहा यह गुण तो मेरे में नहीं हैं। उस दिन का मुहूर्त निकल गया। दूसरे दिन बैठने का समय नियत हुआ। आज दूसरी पुतली ने उसी प्रकार रोक-टोक की और विक्रमादित्य के सद्गुणों की दूसरी कथा सुनाई। आज भी भोज ने अपने में वे विशेषताएँ न होने की बात स्वीकारी।

यह क्रम पूरे बत्तीस दिन चला। बारी-बारी एक-एक पुतली विक्रमादित्य की विशेषताओं का बखान करती गई और चेतावनी देती गई कि यदि वैसे सद्गुण न हों तो उस पर पैर न रखें।

राजा भोज अपनी न्यूनताएँ स्वीकारते गये। तब बत्तीसवें दिन पुतलियाँ उस सिंहासन को उड़ाकर आसमान में ले गई। दरबारी देखते ही रह गये।

दैवी विभूतियाँ मात्र सत्पात्रों को ही लाभान्वित करती हैं। कुपात्रों के हाथ में रहने के लिए वे सहमत नहीं होतीं।

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एक सिद्ध पुरुष थे। उनके बारे में किंवदन्ती थी कि ताँबे से सोना बनाने की विद्या जानते हैं। अनेक लोग सीखने आते। महात्मा कहते बारह वर्ष साथ रहकर सेवा करनी पड़ेगी। इसके उपरान्त ही सिखाया जा सकेगा।

शिष्य बनने वालों में से इतना धैर्य किसी में नहीं था। सीखकर जल्दी लौटने वाले सभी थे। थोड़े-थोड़े दिन रहकर सभी लौट जाते। इतनी प्रतीक्षा कौन करे।

एक संकल्पवान शिष्य निकला। वह पूरे बाहर वर्ष तक निष्ठा पूर्वक रहा। न उतावली दर्शाई न किसी प्रकार की आशंका की। निष्ठा को अविचल बनाये रखा।

बारह वर्ष पूर्ण हुए। गुरु ने शिष्य को निकट बुलाया और वचनानुसार सोना बनाने की विद्या सिखाने का उपक्रम आरम्भ किया।

शिष्य ने वह सीखने से इनकार कर दिया और कहा- “आपके साथ रहकर मैं स्वयं ही सोना हो गया हूँ। आपके रास्ते पर चलूँगा। सोना इकट्ठा करके लालच और विलास के नरक में क्यों गिरुँगा।”

गुरु ने उसे सच्चा सत्यान्वेषी बताया व कहा ऐसे ही साधक सुपात्र कहाते व दैवी अनुदान अनायास ही पाते हैं।

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एक किसान के चार बेटे थे। उनकी बुद्धिमता जाँचने लिए बेटों को बुलाकर किसान ने एक एक मुट्ठी चावल दिये, और कहा- इनका जो मर्जी हो सो करना।

एक ने उसे छोटी वस्तु समझा और चिड़ियों को फेंक दिया, दूसरा उन्हें उबालकर खा गया, तीसरे ने सम्भाल कर डिब्बे में रख दिया ताकि कभी पिता माँगे तो उन्हें दिखा सकूँ। चौथे ने उन्हें खेत में बो दिया और टोकरा भरी फसल पिता के सामने लाकर रख दी।

पिता ने बोने वाले को अधिक समझदार पाया और बड़ी जिम्मेदारियों के काम उसी के सुपुर्द किये। भगवान भी यही करता है।


परिवर्तन- सृष्टि की एक शाश्वत विधि व्यवस्था

“परिवर्तन के अतिरिक्त संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं हैं”, किसी विचारक के इस कथन की सत्यता को सर्वत्र परखा जा सकता है। हर क्षण संसार बदल रहा है, स्थिरता कहीं भी नहीं है। जिन्हें हम स्थिर मानते हैं, वे भी तीव्र गति से हलचल कर रहे हैं। नेत्रों का भ्रम उस गति को देखने में अवरोध खड़ा करता है। पैरों के नीचे पड़े मिट्टी के कण गतिहीन प्रतीत होते हैं, पर उनके सूक्ष्मतम घटकों को देखा जा सके, तो प्रतीत होगा, के उनमें भी अत्यन्त तीव्र हलचल हो रही है। गति से रहित शरीर के आन्तरिक संस्थानों के क्रियाकलाप कभी रुकते नहीं है। हर क्षण लाखों कोशिकाएँ मरती तथा लाखों नयी पैदा होकर उनका स्थान ले लेती हैं, प्रत्यक्ष नेत्रों को यह कहाँ दिखाई पड़ता है। गति एवं परिवर्तनों का मात्र स्थूल पक्ष ही नेत्रों को दिखाई पड़ता अथवा अनुभव में आता है। अधिक सूक्ष्म परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होते। पर इससे उस सचाई पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता कि सृष्टि के हर छोटे-बड़े घटक गतिशील हैं तथा उनमें निरन्तर परिवर्तन हो रहे हैं।

पृथ्वी के स्वरूप एवं इतिहास की जानकारी प्राप्त करने वाले भू-भौतिकीविदों का मत है कि आज की तुलना में पृथ्वी की स्थिति पहले भिन्न थी। पृथ्वी की उत्पत्ति के संदर्भ में संकुचन और प्रवाह के दो सिद्धान्त प्रमुख हैं। संकुचन सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी आरम्भ में बहुत गर्म थी, फिर धीरे-धीरे ठण्डी होकर संकुचित हुई। इस संकुचन के फलस्वरूप महाद्वीपों का विस्थापन शुरू हुआ। उन विशेषज्ञों का अभिमत है कि किसी प्रागैतिहासिक युग में आस्ट्रेलिया, दक्षिण एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण अमरीका महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, जो बाद में अलग-अलग हो गये।

अमरीकी वैज्ञानिक डा. राबर्ट एस. दि एज तथा डा. सी. होल्डेन ने महाद्वीपों के तैरने की गति, उनके फिसलने कि दिशा, उनकी वर्तमान स्थिति, समुद्र गर्भीय पर्वत श्रेणियों का विस्तार, चुम्बकीय जल क्षेत्रों कि प्राचीन दिशायें तथा भूगर्भिय संरचना में समानताएँ आदि तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है, कि अब से 25 करोड़ 50 लाख वर्ष पूर्व पर्मियन युग में सभी महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, सात में विभक्ति न थे, मात्र एक महाद्वीप था। उसे तब पैजिया कहा जाता था। उस समय दक्षिण अमरीका अफ्रीका से सटा हुआ था और अमरीका का पूर्वी समुद्री तट उत्तरी अफ्रीका के भू खण्ड से चिपका हुआ था। आस्ट्रेलिया महाद्वीप एण्टार्कटिका का एक भाग था तथा भारत दक्षिण अफ्रीका एवं एण्टार्कटिका के बीच दबा हुआ था।

होल्डेन के अनुसार यह महाद्वीप एक किनारे पर 60 अंश, पश्चिम के देशांतर से 120 अंश पूर्व देशांतर तक अवस्थित था। उस समय पृथ्वी की आयु साढ़े चार वर्ष हो चुकी थी। छोटे-छोटे पौधे तथा जीव-जन्तु अस्तित्व में आ चुके थे, पर ‘पैजिया’ महाद्वीप 50 लाख वर्ष बाद ही कई खण्डों में विभाजित होने लगा। पहले वह दो भागो में बँटा- उत्तरी और दक्षिणी उपखण्डों में जो क्रमशः लारेशिया और गोंडवाना नाम से प्रख्यात हुआ। लारेशिया में उत्तरी अमरीका तथा एशिया सम्मिलित थे तथा गोंडवाना लैंड में दक्षिणी अमरीका और एण्टार्कटिका। लगभग 13 करोड़ वर्ष पूर्व वे दोनों विशाल भू-भाग भी छोटे उपखण्डों में विभाजित हो गये, तथा 6 करोड़ 50 लाख वर्ष पूर्व वे महाद्वीप धीरे-धीरे फिसलते हुये एक-दूसरे से अलग होते गये, और अन्ततः आज की स्थिति में आ पहुँचे।

दोनों भू-भौतिकीविदों का मत है, कि महाद्वीपों तथा महासागरों की स्थिति ठीक वैसी है जैसे पुरानी जमी हुई बर्फ पर नई बर्फ की परत का जमना। जब गर्मी पड़ती है, तो नई बर्फ की परत थोड़ी पिघलती है और पुरानी बर्फ की सतह पर फिसलने लगती है, जबकि पुरानी बर्फ की परत पहले की भाँति जमी रहती है। हमारी पृथ्वी के महाद्वीप तथा महासागर लगभग 80 किलोमीटर या उससे भी अधिक मोटे एक ठोस पदार्थ की परत पर अवस्थित थे। ठोस पदार्थ की वह परत लाखों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है एवं पृथ्वी के गर्भ में तैरती अथवा फिसलती है, तथा महाद्वीपों, महासागरों के फिसलने का कारण बनती है।

महाद्वीपों की गति एवं स्थानान्तरण से नये द्वीप एवं पर्वत भी बनते-मिटते रहते हैं। अमरीकी भूगर्भ शास्त्री डॉ. जान एफ. वर्ड तथा जान. एफ. डेवी के अनुसार फिसलन की प्रक्रिया में भारत उपमहाद्वीप का भूखण्ड एशिया महाद्वीप के भूखण्ड से टकराया, तो एक गहरी खाई बन गयी। दोनों भूखण्ड एक दूसरे को दबाते रहे और उनके किनारे क्रमशः नीचे की ओर धँसते गये ऊपर का पदार्थ नीचे गर्भ क्रोड की तरफ चलता गया। अन्ततः जब दोनों टकराये तब उनका अपेक्षाकृत हल्का पदार्थ मुख्य भूखण्ड से अलग होकर ऊपर उठ गया और उसने बाद में हिमालय पर्वत जैसा आकार ग्रहण कर लिया। पर्वतों के निर्माण की यही प्राकृतिक विधि है।

बीरबल साहनी पुरावनस्पति संस्थान लखनऊ के पुरावनस्पति शास्त्री डॉ. आर. जे. लखनपाल एवं उनके सहयोगी डॉ. एस. गुलेरिया ने अपने अध्ययनों से निष्कर्ष निकाला है, कि भारत के उत्तरी सिरे पर बना बिना पेड़-पौधे व भीषण ठण्ड वाले क्षेत्र लद्दाख की जलवायु पहले गर्म शीतोष्ण हुआ करती थी। यह लगभग डेढ़ करोड़ वर्ष पहले की बात है। लद्दाख के कुछ हिस्से से मिले हिमालयी पाम व गुलाब की प्रजाति के जीवावशेषों के अध्ययन के आधार पर उन्होंने उपरोक्त निष्कर्ष निकाले हैं। खोज में यह बात भी सामने आयी है, कि पिछले डेढ़ करोड़ वर्षों में हिमालय की ऊँचाई तीन हजार मीटर बढ़ गयी है।

प्रख्यात वैज्ञानिक टेलर ने 1910 में बताया, कि पृथ्वी की घूर्णन गति में परिवर्तन के फलस्वरूप महाद्वीपों का विस्थापन दो दिशाओं में हुआ। एक दोनों ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर, और दूसरा अफ्रीका से पश्चिम की ओर। पहले प्रकार के विस्थापन के आल्पस, हिमालय, कैकेशस आदि पर्वत बने तथा दूसरे प्रकार से राकी, ऐण्डीज पर्वत बन गये।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक ब्लेकेट महोदय ने लगातार कई वर्षों तक ध्रुवों के अध्ययन के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला, कि महाद्वीपीय विस्थापन की प्रक्रिया चलती रहती है। उन्होंने यह भी बताया, कि भू-चुम्बकत्व की दिशा में भी परिवर्तन होता रहता है। अनेकों बार पृथ्वी के उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव दक्षिणी में तथा दक्षिणी उत्तरी में बदले हैं। जब ध्रुव बदलते हैं, तो संसार की अन्य भौगोलिक परिस्थितियों में भी विशेष अन्तर आता है। ब्लेकेट महोदय का मत है, कि लगभग सात करोड़ वर्ष पहले भारत भूमध्य रेखा के दक्षिण में था। अमरीका, अफ्रीका, यूरोप व भारत निरन्तर उत्तर की ओर खिसक रहे हैं। तीस करोड़ वर्ष पूर्व पेरिस भूमध्य रेखा पर था, और यूरोप उसके समीप था। द्वीपों के खिसकने की दिशाओं में भी समय-समय पर परिवर्तन आते रहते हैं।

सन् 1960 में डॉ. हैरीहेस ने महाद्वीपों के खिसकने का एक नया हेसके प्लेट-टेक्टॉनिक सिद्धान्त को जन्म दिया। उनका कहना था, कि महाद्वीपों के खिसकने का कारण है- पृथ्वी मैरोडियो एक्टिव तत्वों की उपस्थिति। उससे ही अत्यधिक ऊष्मा पैदा होती, जो संवहन धाराओं को जन्म देती है। ये संवहन धाराएँ अपने प्रवाह में महाद्वीपों की स्थिति को भी प्रभावित करती हैं।

सोवियत विज्ञान अकादमी के भूभौतिकी संस्थान के विशेषज्ञ वैज्ञानिक विगत 25 वर्षों से पामीर की पीटर प्रथम तथा कारातेगीन्सकी पर्वत मालाओं का अध्ययन कर रहे हैं। उनका मत है, कि 25 साल में ये पर्वत मालाएँ एक-दूसरे के आधा मीटर और पास खिसक आयी हैं।

कौन महाद्वीप कब किधर खिसक जायेगा, इसकी सुनिश्चित भविष्यवाणी कर सकना तो असम्भव है, पर पृथ्वी की चुम्बकीय क्षेत्र की विभिन्नता के आधार पर भू-भौतिकविदों के एक दल ने सम्भावना व्यक्त की है, कि निकट भविष्य में महाद्वीपों की स्थिति में परिवर्तन इस प्रकार होंगे-

अफ्रीका उत्तर की ओर खिसकेगा तथा यूरोप के निकट हो जायेगा तथा भूमध्य सागर या तो बहुत छोटा हो जायेगा अथवा समाप्त हो जायेगा। लॉस ऐन्जिल्स सहित कैलीफोर्निया का कुछ भाग उत्तर की ओर खिसकेगा तथा उत्तरी अमरीका से अलग हो जायेगा।

भारतीय विशेषज्ञ डॉ. चौधरी के अनुसार उत्तर प्रदेश और बिहार प्रति वर्ष पाँच से.मी. उत्तर की ओर खिसक रहे हैं। इस प्रक्रिया से एक समय ऐसा आयेगा जब ये दोनों प्रान्त हिमालय के नीचे होंगे। जर्मनी के ज्वालामुखी विशेषज्ञ ‘हेरन ताजिफ’ का कहना है, कि अफ्रीका के इथीमोपिया राष्ट्र का कुछ अंश लाल सागर में डूब जायेगा जिसके बाद एक नया सागर बन जायेगा। दक्षिणी अमरीका के उत्तर में स्थित कैरेबियन सागर में नये छोटे-छोटे स्थल खण्ड द्वीप बन जायेंगे जैसे कि अभी उसके पास-पास सेन्ट लूसिया, जमाइका, प्यूटोरिको, डामिनिका आदि अनेक द्वीप हैं। इस प्रकार अनुमानतः सभी महाद्वीप 10 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से खिसक रहे हैं।

महाद्वीप ही नहीं, सृष्टि के कण-कण में हर क्षण परिवर्तन हो रहा है, स्थिरता कहीं नहीं है। करोड़ों जीव प्रकृति के गर्भ में हर पल पैदा होते, तथा करोड़ों मृत्यु की गोद में जा पहुँचते हैं। एक स्थिति लौटकर कभी नहीं आती। लगता भर है, कि परिस्थितियों की पुनरावृत्ति हो रही है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। संसार की जो स्थिति कल थी, वह आज नहीं है। कल उसका रूप दूसरा ही होगा। सतत् गति एवं अगणित परिवर्तनों ने संसार को एक स्थिर हालत में कभी भी नहीं रहने दिया है।

परिवर्तन के नियमों से मनुष्य भी बँधा है। एक हालत में न तो मनुष्य की शारीरिक स्थिति रहती है, और न ही प्रकृति की। जन्मा हुआ शिशु नित्य नये दौर से गुजरता तथा विकास की एक निश्चित मंजिल नित्य पूरी करता है। किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था आदि से गुजरता हुआ मृत्यु को प्राप्त होता है। शरीर में हुए परिवर्तनों के अनुरूप उसे अपनी मनःस्थिति में भी परिवर्तन करना पड़ता है। जो मनःस्थिति बचपन की होती है, वह युवा वय में नहीं होती। वृद्धावस्था में मन की प्रकृति बदल जाती है।

विचारों एवं मान्यताओं में भी समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है। एक समय की उपयोगी तथा स्वस्थ मान्यताएँ दूसरे समय में अनुपयोगी हो जाती है, जरा-जीर्ण होकर अन्ध विश्वास का रूप ले लेती हैं। विवेक के आधार पर उनका चयन न किया जाय तो हानिकर ही सिद्ध होती हैं। ठीक इसी प्रकार अपना सोचना ही सही है, अपनी जानकारियाँ परिपूर्ण हैं इस तरह का चिन्तन भी एकाँगी है। विचारशीलता इस बात में सन्निहित है कि विवेक के आधार पर औचित्य को अपनाने के लिए सदा तैयार रहा जाय। परिवर्तनशील इस संसार में बदली परिस्थितियों के अनुरूप सामंजस्य बिठा लेना सबसे बड़ी बुद्धिमता है। जो परिवर्तनों को स्वीकार नहीं करते, अपनी मनःस्थिति को जड़वत् बनाये रहते हैं, वे पिछड़ेपन के अभिशाप से लदते एवं प्रगति के अवसर अपने हाथों गँवा बैठते हैं।


सपनों का जमघट (kahani)

एक साधु थे। भिक्षाटन से मजे में दिन गुजारते, और आनन्दपूर्वक भजन करते। एक दिन महत्वाकाँक्षा शिर पर चढ़ी। झोंपड़ी के चूहों से निपटने के लिए बिल्ली पाली। बिल्ली के लिए दूध की जरूरत पड़ी तो गाय खरीद कर लाये। गाय की साज सम्भाल के लिए महिला की आवश्यकता पड़ी। घर बसा लिया। घरवाली ने बच्चे जने और पूरा गृहस्थ कन्धे पर लद गया। सन्त बनकर भगवान प्राप्त करने और लोक-कल्याण करने का लक्ष्य कहीं से कहीं चला गया। भौतिक आकाँक्षाओं का जाल-जंजाल इतना बड़ा है जिसके बढ़ाते चलने पर पुण्य परमार्थ का लक्ष्य पूरा करने के लिए कुछ बन नहीं पड़ता। सारी क्षमता उसी में चक जाती है। सपनों का जमघट ही शेष रह जाता है।


ऊर्जा का संचय एवं सुनियोजन

किसी शिष्य ने पूछा मनुष्य शक्तियों का भण्डार है फिर वह डूबता गिरता क्यों है? गुरु ने इसके उत्तर में अपना कमण्डलु पानी पर फेंक दिया और दिखाया कि वह ठीक प्रकार तैर रहा है। दुबारा उसे लिया और तली में छेद करके फेंका तो वह डूब गया।

गुरु ने बताया कि असंयम के छेद हो जाने से दुर्गुण घुस पड़ते हैं और मनुष्य को डूबा देते हैं। गाय का दूध यदि छलनी में दुहा जाय तो वह जमीन पर गिरेगा गन्दगी उत्पन्न करेगा। पालने का लाभ न मिलेगा। लाभ तभी है जब दुहने का पात्र बिना छेद का हो। इन्द्रिय शक्ति मानसिक शक्ति को यदि कुमार्ग के छेदों में बहने दिया जाय तो मनुष्य की क्षमता भी इसी प्रकार समाप्त होकर रहेगी।

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लोमस ऋषि ने अपने पुत्र शृंगी ऋषि को सच्चे अर्थों में आत्म-संयमी तपस्वी बनाया। विद्वता और योग प्रवीणता तो सीमित थी। संयम तप से उनकी वाणी इस योग्य हो गई थी कि शाप वरदान दे सकें। पिता ने उन्हें आश्रम में उपजा अन्न ही खाने दिया था और स्त्रियाँ संसार में होती भी हैं या नहीं यह जानकारी तक उन्हें लगने नहीं दी थी।

दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में वाक् सिद्धि वाले आचार्य की आवश्यकता पड़ी। यह सिद्धि इन्द्रिय संयम के बिना किसी को उपलब्ध होती नहीं। शृंगी ऋषि को लेने दशरथ और वशिष्ठ लोमश के आश्रम में पहुँचे। दशरथ को वशिष्ठ के इस कथन पर विश्वास न हो रहा था कि आहार और वासना के सम्बन्ध में कोई इतना संयमी हो सकता है।

परीक्षा के लिए अप्सराएँ बुलाई गईं वे मधुर मिष्टान्न लेकर आश्रम में पहुँची। शृंगी ने उन महिलाओं को भी किसी आश्रम के विद्यार्थी ब्रह्मचारी समझा और मिष्ठान्नों को किन्हीं वृक्षों के फल होने का अनुमान लगाने लगे। इस अनभिज्ञता पर दशरथ को विश्वास हो गया कि वे सच्चे अर्थों में इन्द्रिय संयमी तपस्वी हैं।

पुत्रेष्टि यज्ञ के लिए लोमश से अनुरोध करके शृंगी ऋषि को अयोध्या लाया गया। उनके द्वारा उच्चारित मन्त्र सफल हुए। तीनों रानियों के चार पुत्र उसी यज्ञ चरु से जन्मे। इससे पूर्व साधारण ब्राह्मणों द्वारा किये गये कितनी ही बार के यज्ञ, मन्त्र, आशीर्वाद निष्फल हो चुके थे। क्योंकि वे संयमी न थे।

शृंगी ऋषि का वरदान ही नहीं शाप भी वैसा ही अमोघ था। एक बार उनने परीक्षत द्वारा अपने पिता का अपमान देखकर एक सप्ताह में साँप के काटने से मृत्यु होने का शाप दिया था। वह भी कारगर होकर रहा।

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ऋषि तपस्वी ब्रह्मचर्य पूर्वक रहते थे। वासना संयम के कारण वे सामान्य आहार और तितीक्षारत अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहते हुए भी बलिष्ठ, समर्थ, निरोग एवं दीर्घजीवी रहते थे। लक्ष्मण ब्रह्मचर्य साधना से ही अजेय मेघनाद का वध कर सके। भीष्म पितामह को स्वेच्छा मरण की सिद्धि इसी आधार पर उपलब्ध हुई थी। शंकराचार्य, समर्थ रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द आदि को असाधारण क्षमता सम्पन्न कराने में उनका ब्रह्मचर्य ही एक बहुत बड़ा आधार था। गाँधीजी ने तेतीस वर्ष की आयु में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था। उनकी प्रभाव प्रतिभा में इस संयमशीलता का भी बहुत बड़ा योगदान था।


Quotation

दीपक में तेल भरा रहने पर भी हवा का झोंका उसकी ज्योति को बुझा देता है। हर व्यक्ति क्षमताओं से भरा है पर असंयम का झोंका उसे समय से पहले ही बुझ जाने के लिए विवश करता है।


मनोनिग्रह- सबसे बड़ा पुरुषार्थ

मन व्यक्तित्व की केन्द्रीय धुरी है। शुद्ध, निर्मल, फूलों जैसे कोमल मन में कोमल सम्वेदनाएँ, सात्विक विचार, उत्कृष्ट प्रेरणाएँ हिलोरें लेती रहती हैं। इस फूल से सुन्दर, शुद्ध-पवित्र मन का असर मनुष्य के व्यवहार और व्यक्तित्व पर पड़ता है। प्रसन्न मन अस-पास के वातावरण में उसी प्रकार प्रसन्नता भर देता है जैसे ताजा फूल चारों ओर सुगन्धि भर देता है। दूसरी ओर जब मन में घृणा, ईर्ष्या-द्वेष, जलन-कुढ़न, क्रोध-वैमनस्य आदि के भाव उबलते रहते हैं, तो वे दूसरे के मन में भी इसी प्रकार तीक्ष्ण काँटों के चुभन जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। मन के ये भाव छिपाये नहीं छिपते, अपितु उनका असली रूप प्रकट होकर ही रहता है। “उघरहिं अन्त न होइ निबाहू” वाली बात मन द्वारा छिपाये जाने वाली भाव चेष्टाओं के ऊपर बिल्कुल खरी उतरती है। अपने मन से कोई भी चोरी, छल और झूठ नहीं चल सकता। वह अपनी प्रत्येक गतिविधि को नोट करता रहता है और उनके औचित्य-अनौचित्य पर निर्णय भी देता रहता है। इसीलिए मन से बचना सम्भव नहीं। मन सही बात किसी न किसी रूप में जाहिर कर ही देगा। व्यक्ति अपने पवित्र भाव का दावा करते हैं, लेकिन मौका पाते ही उनके मनोभाव चेहरे पर, आँखों में, माँस-पेशियों में उभर आते हैं। कभी वाणी से फूट पड़ते हैं, तो कभी व्यवहार से। उस समय कृत्रिम व्यक्तित्व की सारी दीवारें ढह जाती हैं। परिष्कृत मन के बिना ऊपर से प्रदर्शित किया जाने वाला व्यक्तित्व बालू का महल है, मन के प्रचण्ड चक्रवात के एक ही थपेड़े से वह जाने कहाँ उड़-बिखर जाता है।

मात्र अभिव्यक्ति के इन विविध रूपों में ही नहीं, मौन की स्थिति में मनःस्तर अपना प्रभाव दिखलाता है। मन के विचारों का वातावरण पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। शुद्ध मन वाला व्यक्ति जहाँ रहता है, वहाँ का पर्यावरण भी उस शुद्धता से प्रभावित रहता है। जिस कमरे में सात्विक पुरुष रहते हैं, वहाँ कोई अन्य व्यक्ति विरोधी विचार लेकर भी जाए, तो उसके विचार वहाँ दब जाते हैं। इसके विपरीत, अनुचित क्रियाकलापों के केन्द्रों जुआघरों, शराब खानों आदि का प्रभाव भी इतना तीव्र होता है कि इन अड्डों को समाप्त कर दिए जाने के बाद भी वहाँ का वातावरण तब तक दूषित रहता है, जब तक कि वहाँ कुछ समय तक श्रेष्ठ गतिविधियाँ न चलती रहें।

उत्कृष्ट विचारों वाले व्यक्ति के सान्निध्य में लोग अपना दुःख-दर्द भूल जाते हैं। जबकि हीन विचारों वाले व्यक्ति का सान्निध्य घुटन उत्पन्न करता है।

जिस घर परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है, वहाँ जाते ही लोगों के मन को एक तरह के अवसाद की आघातकारी तरंगें घेर लेती हैं। यज्ञायोजनों, समारोहों, उत्सवों, पर्वों, विवाह के मण्डप आदि स्थलों में प्रवेश करते ही उल्लास की तरंगें मन में उभर आती हैं। ये सब मानसिक स्थितियों के सूक्ष्म प्रभाव हैं। ऐसा ही सूक्ष्म प्रभाव सत्संग का पड़ता है। इसलिए शास्त्रों में सत्संग की महिमा का गान है। सत्पुरुषों का सान्निध्य दिव्य-विचारों की तरंगों से मन को भर देता है।

मन ही इन्द्रियों का शासक इन्द्र है। जब वह लापरवाह और अपव्ययी होता है, तो इन्द्रियाँ उसके खजाने को खुला पाकर, उस धन को यों ही लुटाती रहती हैं। इन्द्रियाँ द्वार हैं, जो मन के जागरुक रहने पर, आवश्यकतानुसार ही खुलते हैं। शेष समय बन्द रहते हैं। दुर्बल, असंयमी मन का इन्द्रियों पर नियन्त्रण नहीं रहता और इस प्रकार वे द्वार हमेशा ही खुले पड़े रहते हैं। व्यक्तित्व की आधारभूत शक्तियाँ इन द्वारों से व्यर्थ ही बहती रहती हैं। जो आन्तरिक ऊर्जा महत् प्रयोजनों में खर्च होनी थी, वह उद्विग्न मन यों ही मथ-मथकर, अकारण बहाता रहता है। ऐसा व्यक्तित्व एकीकृत नहीं रह पाता। यही स्थित मेण्टल ब्रेकडाउन या डिप्रेशन या मधुमेह को जन्म देती है।

मन का साम्राज्य बहुत बड़ा है। यह साम्राज्य सुव्यवस्थित रहे, विचारों, इच्छाओं और क्रियाओं में संतुलन सामंजस्य रहे, तो व्यक्तित्व एकीकृत, परिष्कृत, सुघड़ कहा जाता है। मन के साम्राज्य में अराजकता फैली हो, तो वह कुरूप, अनगढ़ व्यक्तित्व को जन्म देता है। मन का स्वरूप ही व्यक्तित्व का स्वरूप है। मानवी शरीर परम्परावलम्बी हैं, पर नियंत्रणकर्ता मन ही है। कोई व्यक्ति बहुत सुन्दर नाश-नक्श वाला हो, पर उसके विचार और व्यवहार भद्दे हों, तो उसे कोई भी श्रेष्ठ व्यक्तित्व-सम्पन्न न कहेगा। दूसरी ओर संसार में ऐसे लाखों लोग हुए हैं, जिनके शरीर में कुछ भी आकर्षण न था, पर जो महान व्यक्तित्व के स्वामी कहे जाते रहे हैं। स्पष्टतः व्यक्तित्व का सम्बन्ध मुख्यतः मनःस्थिति से है, तन की स्थिति से नहीं।

इसीलिए व्यक्तित्व की साधना का अर्थ है मन की साधना। जिसने मन को साध लिया, उसका व्यक्तित्व सध गया। किन्तु मात्र जागृति की स्थिति में अनुभव में आने वाले भाव ही मन की पहचान नहीं। जागृति, निद्रा, स्वप्न सभी स्थितियों में मन सक्रिय रहता है और चेतन मन से अचेतन-सुषुप्त-मन की परिधि अधिक व्यापक है। अतः मन की साधना का भी प्रधान क्षेत्र अचेतन मन ही है। आध्यात्मिक साधनाओं की विशेषता का रहस्य यही है कि वे अचेतन मन को शुद्ध करती हैं, वहीं पर उत्कृष्टता के अंकुर उगा देती है। तन, चेतन में उनका विकास स्पष्ट देखा जा सकता है। उपनिषद् का ऋषि कहता है-

“चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेश दूषिताम्। तदेवतर्विनिमुक्तं भावान्त इति कथ्यते।” -महोपनिषद् 4।66

अर्थात्-यह चित्त ही संसार है। इस संसार में रागादि दोषों की वृद्धि क्लेशों का कारण बनती है। इन दूषणों से छुटकारा ही मुक्ति कही जाती है।

स्वयं मन को ही ऊँचा उठाना- सर्वश्रेष्ठ मानसिक संकल्प है। मनःस्तर ही व्यक्तित्व है। मुक्त मनःस्थिति मुक्त व्यक्तित्व की परिचायक है और रुग्ण मनःस्थिति व्यक्तित्व की रुग्ण बनाती है। मानसिक विकास को ही व्यक्ति-विकास का पर्याय मनीषियों ने माना है।


व्यामोहग्रस्त का उपदेश (kahani)

नारदजी का एक भक्त था। वे उसे वानप्रस्थ लेने की शिक्षा देते, पर वह जिस-तिस बहाने टालता ही रहता। दिन गुजरे और वह बूढ़ा होकर मर गया। नारद जी उधर से गुजरे और भक्त को न पाया तो दिव्य दृष्टि से खोजा। देखा तो वह बैल बनकर उसी घर में रह रहा था। नारद जी ने का में कहा- “अब तो चलो, इस दुर्गति में पड़े रहने से क्या लाभ है?” बैल ने कहा- “कठिन श्रम करके परिवार पालता हूँ। अभी फुरसत कहाँ?” बहुत दिन बाद नारद जी उधर से गुजरे तो बैल मर चुका था- वह कुत्ते की योनि में पाकर उसी घर में रह रहा था। नारद जी पहचान गये, कहा- अब तो चलना चाहिए। कुत्ता बोला- चोरों के उपद्रव बढ़ गये हैं, घर न रखाऊँ तो परिवार पर क्या बीतेगी? इस बार नारद का चक्कर लगा तो उनने साँप रूप में उसे पाया। कुशल क्षेम पूछी तो कहा- “घर में चूहे बहुत हो गये हैं। अनाज खाकर परिवार को घाटा देते हैं सो उनसे निपटता रहता हूँ।”

नारद जी के पीठ फेरते ही घर वालों ने साँप देख लिया और उसे लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला। साँप की आत्मा नारद जी के पीछे चल रही थी। उसे व्यामोहग्रस्त का उपदेश देते हुए देवर्षि ने कहा- “व्यामोह हमी लोगों के साथ चिपकते हैं लोगों का काम तो अपने बिना भी चलता रहता।”


चिन्तन व्यवस्थित हो, विधेयात्मक हो

विराट् सागरों में आये दिन तूफान, ज्वार-भाटे आते रहते हैं। उनमें यात्रा करने वाले जलपोतों के नाविकों को अद्भुत धैर्य कुशलता, जागरुकता तथा सन्तुलन का परिचय देना पड़ता है। मनः सन्तुलन डगमगाते ही पोत की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है जीवन भी एक लम्बा पथ है जिसमें कितने ही प्रकार के झंझावात आते रहते हैं। कभी संसार की प्रतिकूल परिस्थितियों अवरोध खड़ा करती हैं तो कभी स्वयं की आकांक्षाएँ। ऐसे में सन्तुलित दृष्टि न हो तो भटकाव ही हाथ लगता है। असफलताओं के प्रस्तुत होते ही असन्तोष बढ़ता जाता है तथा मनुष्य अनावश्यक रूप से भी चिन्तित रहने लगता है। सन्तुलन के अभाव में चिन्ता आदत में शुमार होकर अनेकों प्रकार की समस्याओं को जन्म देती है। अधिकाँश कारण इनके निराधार ही होते हैं।

चिन्ता किस प्रकार उत्पन्न होती है, इस सम्बन्ध में प्रख्यात मनोवैज्ञानिक मैकडूगल लिखते हैं कि “मनुष्य की इच्छाओं की आपूर्ति में जब अड़चनें आती हैं तो उसका विश्वास आशंका और निराशा में परिवर्तित हो जाता है। पर वह आयी अड़चनों तथा विफलताओं से पूर्णतः निराश नहीं हो जाता, इसलिए उसकी विभिन्न प्रवृत्तियाँ अपनी पूर्ति और अभिव्यक्ति का प्रयास करती रहती हैं। सामाजिक परिस्थितियाँ तथा मर्यादाएँ मनुष्य के लिए सबसे बड़ी अवरोध बनकर सामने आती हैं तथा इच्छाओं की पूर्ति में बाधक बनती हैं। जिससे उसके मन में आन्तरिक संघर्षों के लिए मंच तैयार हो जाता है। इसी में से असन्तोष और चिन्ता का सूत्रपात होता है। अनावश्यक चिन्ता उत्पत्ति के अधिकाँश कारण मनोवैज्ञानिक होते हैं।”

एक सीमा तक चिन्ता की प्रवृत्ति भी उपयोगी है। पर जब वह मर्यादा सीमा का उल्लंघन कर जाती है तो मानसिक सन्तुलन के लिए संकट पैदा करती है। व्यक्तिगत पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन से जुड़े कर्त्तव्यों के निर्वाह की चिन्ता हर व्यक्ति को होनी चाहिए। बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षण एवं विकास की- उन्हें आवश्यक सुविधाएँ जुटाने की चिन्ता अभिभावक न करें, अपनी मस्ती में डूबे रहें- भविष्य की अपेक्षा करके वर्तमान में तैयारी न करें तो भला उनके उज्ज्वल भविष्य की आशा कैसे की जा सकती है। विद्यार्थी खेलकूद में ही समय गँवाता रहे- आने वाली परीक्षा की तैयारी न करे तो उसके भविष्य का अन्धकारमय होना सुनिश्चित है।

“जो होगा सो देखा जायेगा”, किसान यह नीति अपना कर फसलों की देख-रेख करना छोड़ दे- निराई-गुड़ाई करने की व्यवस्था न बनाये खाद-पानी देना बन्द कर दे तो फसल के चौपट होते देर न लगेगी। व्यवसाय में व्यापारी बाजार भाव के उतार-चढ़ाव के प्रति सतर्क न रहे तो उसकी पूँजी के डूबते देरी न लगेगी। सीमा प्रहरी रातों-दिन पूरी मुस्तैदी के साथ सीमा पर डटे चहल-कदमी करते रहते हैं। सुरक्षा की चिन्ता वे न करें तो दुश्मन- घुसपैठियों से देश को खतरा उत्पन्न हो सकता है। मनीषी विचारक, समाज सुधारक, देशभक्त, महापुरुष का अधिकाँश समय विधेयात्मक चिन्तन में व्यतीत होता है। उन्हें देश, समाज संस्कृति ही नहीं समस्त मानव जाति के उत्थान की चिन्ता होती है। सार्वजनीन तथा सर्वतोमुखी प्रगति के लिए वे योजना बनाते और चलाते हैं। यह विधेयात्मक चिन्ता ही है जिसकी परिणति रचनात्मक उपलब्धियों के रूप में होती है।

मानव जीवन वस्तुतः अनगढ़ है। पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार उसे पतन की ओर ढकेलने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहते हैं। उनकी अभिप्रेरणा से प्रभावित होकर इन्द्रियों को मनमानी बरतने की खुली छुट दे दी जाय तो सचमुच ही मनुष्य पशुओं की श्रेणी में जा बैठेंगे। पर यह आत्म गरिमा को सुरक्षित रखने की चिन्ता ही है जो मनुष्य को पतन के प्रवाह में बहने से रोकती है। मानवी काया में नर पशु भी होते हैं जिनका कुछ भी आदर्श नहीं होता। परन्तु जिनमें भी महानता के बीज होते हैं वे उस प्रवाह में बहने से इन्कार कर देते हैं। सुरक्षा प्रहरी की तरह वह स्वयं की प्रवृत्तियों के प्रति विशेष जागरुक होते हैं। हर विचार की- मन में आये संवेगों की वे बारीकी से परीक्षण करते हैं तथा सदैव उपयोगी चिन्तन में अपने को नियोजित करते हैं।

चिन्ता करना मनुष्य के लिए स्वाभाविक है। एक सीमा तक वह मानवी विकास में सहायक भी है। पशुओं का जीवन तो प्रवृत्ति तथा प्रकृति प्रेरणा से संचालित होता है। शिश्नोदर जीवन वे जीते तथा उसी में आनन्द अनुभव करते हैं। किन्तु मनुष्य की स्थिति भिन्न है। मात्र इन्द्रियों की परितृप्ति से उसे सन्तोष नहीं हो सकता। होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि उसके ध्येय उच्च हैं। उनकी प्राप्ति के लिए उसे स्वेच्छापूर्वक संघर्ष का मार्ग वरण करना पड़ता है। यह मनुष्य के लिए गौरवमय बात भी है कि वह अपनी यथास्थिति पर सन्तुष्ट न रहे।

प्रख्यात यूनानी दार्शनिक सुकरात कहा करता था कि “एक असन्तुष्ट मनुष्य सन्तुष्ट पशु से कहीं अच्छा है।” सचमुच ही मनुष्य पशुओं की तरह शिश्नोदर जीवन की तृप्ति में ही सन्तुष्ट हो जाय तो उसका विकास अवरुद्ध हो जायेगा। मानव संस्कृति का इतिहास वस्तुतः निषेधों और संघर्षों की एक ऐसी गाथा है जो असन्तोष से शुरू हुई पर प्रगति की एक प्रमुख आधार भी बनी। अपनी गयी गुजरी स्थिति से उबरने की चिन्ता मानव को न हुई होती तो आज की प्रगतिशील स्थिति तक पहुँचना सम्भव न हो पाता।

जिस समाज में मनुष्य रहता है उसमें अगणित प्रकार के लोग हैं। उनकी प्रकृति एवं अभिरुचि भी भिन्न-भिन्न है। चाहते हुए भी सबको एक जैसा नहीं बनाया जा सकता। अपने आपे को बदलना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन पड़ता है। दूसरों की अभिरुचियाँ बदल देना और भी कठिन है। सभी अपनी मनमर्जी के अनुकूल ढल जायँ यह ऐसी हवाई कल्पना है जो कभी पूरी नहीं होती। जो ऐसी कल्पना करते अथवा सोचते हैं वे वास्तविकता से सर्वथा अपरिचित हैं। व्यक्ति तथा समाज की अधिकाँश समस्याएँ भी इसीलिए उत्पन्न होती हैं कि मनुष्य सामाजिक मनोविज्ञान को समझ नहीं पाता। अनावश्यक रूप से चिन्तित तथा खिन्न होने का कारण भी यही है कि मनुष्य अपनी कल्पना के अनुरूप समाज और संसार को देखना चाहता है। इस चाह की आपूर्ति कभी नहीं हो पाती।

विभिन्न प्रकृतियों एवं अभिरुचियों वाले व्यक्तियों से मुक्त समाज से जो जितना अधिक तालमेल बिठा लेता है वह जीवन में उतना ही सफल रहता है। तालमेल बिठाने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि अनौचित्य से समझौता किया जाय, वरन् यह है कि अच्छाई का जितना अंश जहाँ दिखायी दे उतने अंश से सामंजस्य स्थापित किया जाय। व्यक्तियों की बुराइयों को सुधारने के लिए प्रयत्न तो किया जाय पर यदि नहीं दूर होती तो उनकी उपेक्षा की जाय। समाज में यदि प्रसन्नतापूर्वक रहना है तो सामंजस्य की प्रवृत्ति विकसित करना होगी। दूसरों को बदलने की अपेक्षा अपने को बदलना सुगम और हितकर है।

ध्यान यह रखा जाना चाहिए कि चिन्ता को इस सीमा से आगे न बढ़ने दिया जाय जिससे कि मानसिक सन्तुलन को ही खतरा उत्पन्न होने लगे। मनः सन्तुलन को किसी भी कीमत पर नहीं गँवाया जाना चाहिए। चिन्ता को उतना ही महत्व दिया जाय जितना कि वह कर्त्तव्य निर्वाह में सहायक है।


Quotation

रावण ने काल को पाटी से बाँध लिया था। इसी सफलता के कारण उसे अनेकानेक सिद्धियाँ सफलताएँ मिली थीं। काल पाटी से बाँध लेने का अर्थ है समय की पाबन्दी। हाथ में घड़ी बाँधने का अभिप्राय भी यही होना चाहिए।


सदाशयता की महत्वाकाँक्षा हर दृष्टि से हितकर

प्रगति की महत्वाकाँक्षा में कोई दोष नहीं। सच तो यह है कि वह एक महत्वपूर्ण उमंग है जिसके सहारे मनुष्य परिश्रम और साहस करता है। कष्ट सहकर भी आगे बढ़ता है। प्राणि समुदाय में ये जिनकी आकांक्षाएँ जितनी प्रबल रही हैं वे उसी अनुपात से प्रगति पथ पर आगे बढ़े हैं। जिन पर आलस्य प्रमाद छाया रहा और यथास्थिति में बने रहने भर से काम चलाते रहे, वे साथियों से कहीं पीछे रह गये। जीवधारियों के प्रगति इतिहास में इस तथ्य को हर पृष्ठ पर स्वर्णाक्षरों में लिखा देखा जा सकता है। अस्तु सूझ-बूझ और साहसिकता की जन्मदात्री महत्वाकाँक्षा की सराहना ही हुई है। विज्ञजनों ने अपने सम्पर्क क्षेत्र में उत्कर्ष का आशावाद उभारा है। प्रगति को प्रोत्साहन दिया है और दिन गुजारने की अपेक्षा जोखिम उठाकर भी बढ़ चलने के पराक्रम को सजग बनाने में कुछ उठा नहीं रखा है। व्यक्ति और समाज का हित साधन भी उसी में है।

महत्त्वाकाँक्षाएँ तब दुःखदायी और विग्रहकारी होती हैं, जब वे तृष्णा भड़काती, स्वार्थी बनाती और निष्ठुरता अपनाने और अनीति बरतने जैसा उन्माद उभारती हैं। शरीरगत सुविधा और परिवार गत सम्पन्नता के लिए वैभव उपार्जन करने तक सीमित रहने वाली महत्वाकाँक्षाओं की निन्दा इसलिए की जाती है कि उनके आवेश में व्यक्ति अहंता के परिपोषण में बेतरह प्रवृत्त होता है। उस होश हवास को गँवा बैठता है जिसमें रहते मानवी गरिमा के अनुरूप आचरण करने का अनुबन्ध है। उचित आवश्यकताओं की एक छोटी सीमा है। प्रकृति ने संसार में साधन सामग्री उतनी ही उत्पन्न की है जिससे सभी का गुजारा मात्र चल सके। जो संचय की बात सोचेगा, अपव्यय अपनायेगा वह दूसरे जरूरतमन्दों का हक छीनेगा। दीवार उठाने के लिए कहीं से मिट्टी खोदनी पड़ती है। बड़े बनने के प्रयत्न में दूसरों से अधिक साधन हथियाने पड़ते हैं। स्पष्ट है कि इस कारण किन्हीं अन्यों को अभावजन्य कष्ट सहना पड़ेगा। समान वितरण होता रहे तो कहीं किसी को कठिनाई न पड़े। कोई दरिद्र, पिछड़ा पीड़ित या पतित न रहे।

महत्वाकाँक्षी जितना वैभव बटोरते हैं, वह उन्हें अहंकारी, दुर्व्यसनी बनाता है। साथ ही ईर्ष्याजन्य अनेकों संकट खड़े करता है। सबसे बड़ी बात है सुविधाओं का एक जगह एकत्रित हो जाने पर अन्यान्यों के हिस्से में उतनी की कमी आती है। प्रकृति को इसके लिए विवश नहीं किया जा सकता कि वह महत्वाकाँक्षाओं के लिए अतिरिक्त उत्पादन करती रहें और सर्व साधारण के निर्वाह का क्रम भी यथावत् चलता रहे। एक अमीर के बनने में सहस्रों पर गरीबी का दुर्भाग्य लदता है। यदि वह अमीरी उपार्जन वितरण के चक्र में घूमा होता तो उससे जरूरतमन्दों को- अभावग्रस्तों को बहुत हद तक राहत मिल सकती थी। हीरे का हार खरीदने में लगने वाली राशि से हजार अन्यों को मोतिया बिन्दु के संकट से छुड़ाया और उन्हें नये सिरे से दृष्टि देकर अर्ध मृतकों से जीवितों की पंक्ति में बिठाया जा सकता है। हीरे का हार खरीदने वाला यह भूल जाता है कि उसकी अहंता के उद्धत परिपोषण ने कितनों को नव जीवन से वंचित रखा। इस तथ्य को ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने समझा था। उनने अपने 500 रु. के वेतन में से सिर्फ 50 रु. में परिवार निर्वाह चलाया और शेष बचत की पाई-पाई निर्धन छात्रों के लिए शिक्षा साधन जुटाते रहने की नीति अपनाई। ऐसा वही कर सकता है जिसने निजी विलास वैभव पर अंकुश लगाने योग्य आदर्शवादिता अपनाई हो।

महत्वाकाँक्षाओं का वास्तविक क्षेत्र सत्प्रवृत्ति संवर्धन है। इन्हें परमार्थिक भी कहा जा सकता है। अन्तराल को सद्भावनाओं से और व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से सम्पन्न करना, मणि मुक्तकों के स्वर्णाभूषणों से भी अधिक आकर्षक और प्रभावोत्पादक है। प्रामाणिकता और प्रखरता के धनी सामान्य परिस्थितियों में जन्मने और पलने पर भी प्रतिकूलताओं अभावों को चीरते हुए आगे बढ़ते ऊँचे उठते हैं। न उन्हें खाई खंदक रोक पाते हैं और न चट्टान अड़ने जैसे व्यवधान भी प्रगति क्रम को देर तक रोके रहने में समर्थ होते हैं। साधनों के बल पर नहीं पराक्रम के सहारे वे आगे बढ़ते और उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं। साथी सहयोगी तलाशने में उन्हें कठिनाई नहीं पड़ती। इसके लिए उन्हें न किसी की खुशामद चापलूसी करनी होती है और प्रलोभन देने, भय दिखाने जैसा कुछ अनुपयुक्त ही करना पड़ता है। सद्गुणों का चुम्बकत्व अपने आप में इतना समर्थ है कि सजातीय उस आकर्षण में अनायास ही खिंचते चले आते हैं। फूल खिलता है तो भौंरों के झुण्ड और तितलियों, मधु मक्खियों के समूह स्वयं ही दौड़ते चले आते हैं। चीनी की गन्ध पाते ही चींटियों का समुदाय स्थान खोजता हुआ स्वयमेव जा पहुँचता है। सद्गुणी व्यक्तित्व का आकर्षण सौन्दर्य मिठास इन सबसे कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही है। गुण पारखी जब तक इस धरती पर मौजूद हैं तब तक व्यक्तित्व सम्पन्नों को- प्रशंसक, समर्थकों, सहयोगियों, मित्रों, आत्मीय जनों की कभी कमी न पड़ेगी। जब चोर-उचक्के, लम्पट और कुचक्री क्रिया कुशल होने के कारण अपने जैसों के गिरोह बना लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि मानवी विशेषताओं से सम्पन्नों को एकाकी, असहाय या उपेक्षित रहना पड़े। बहुत न सही, यदि थोड़े भी वरिष्ठ व्यक्ति मिल-जुलकर ऊँचे उद्देश्य के लिए काम करते हैं तो फिर नीति का पक्षधर वातावरण बनता है और अनुकूलता का अदृश्य प्रवाह चल पड़ता है। नदी बहती है तो इर्द-गिर्द के नाले भी उसमें सम्मिलित होते और चौड़ाई गहराई एवं गति बढ़ाने में सहायक बनते रहते हैं। छोटों को बड़ा बनने का इतिहास इसी आधार पर बना है कि व्यक्तित्व के धनी अपनी सदाशयता और प्रखरता से असंख्यों का मन मोहते और उन्हें मित्र सहयोगी बनाते चले गये। फलतः निजी अभावग्रस्तता अदक्षता न तो टिकी और न बाधक बनी। सहयोगी वातावरण उत्साह बढ़ाता- हिम्मत बढ़ाता और साधन जुटाता चला गया। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व ही पारस कहे जाते हैं जो कार्य या व्यक्ति उनके साथ गुंथते हैं वे सोने की तरह खरे और बहुमूल्य बनते जाते हैं।

वैभव उपार्जन की तुलना में व्यक्तित्व का सम्पादन हजार लाख गुना अधिक मूल्यवान है। इसके लिए मनुष्य को इतना मूल्य तो अनिवार्य रूप से चुकाना होता है कि हेय स्वार्थ परता के साथ जुड़ी हुई दुष्प्रवृत्तियों की शृंखला से मुँह मोड़े और नाता तोड़े। जिन्हें मौज उड़ाने, मजा लुटने, इतराने और कोठे भरने की ललक लगी है उन्हें उन विशेषताओं से हाथ धोना पड़ता है जो सज्जनता की अविच्छिन्न अंग मानी गई हैं। उचित आवश्यकताओं की परिधि बहुत छोटी है। शील सदाचार की कथा कहने वाले को उसी अनुशासन में रहना पड़ता है और व्यामोह के चक्रव्यूह से बचते-बचाते ही आदर्शवादिता को बचाये रहना पड़ता है। प्रलोभनों के दल-दल में जा फँसने वाले अपनी शालीनता तक बचा नहीं पाते फिर वे ऐसा कुछ कैसे करें जिसे व्यक्तित्व की महानता सिद्ध करने में प्रमाण परिचय की तरह प्रस्तुत किया जा सके। चतुरताओं और सफलताओं का पहाड़ जमा हो जाने पर भी कोई इतना समर्थ नहीं हो पाता जितना कि शालीनता सम्पन्न व्यक्तित्व अभावग्रस्तता रहने पर भी होता है।

भौतिक स्वार्थों की ललक लिप्सा में जहाँ आरम्भ में अधिक सफलता की सम्भावना रहती है वहाँ यह खतरा भी है कि कुछ ही समय क्षुद्रता की कलई खुल जाने पर विश्वास और सहयोग दोनों ही घटने लगे और अन्ततः उसे अप्रामाणिक हेय जनों की पंक्ति में जा बैठने पर दर-दर दुत्कारे, ठुकराये जाने की स्थिति में रहना पड़े। सम्पन्नता बनी भी रहे तो इसके सहारे दुर्व्यसन पनपते और अहंकार बढ़ने का वह संकट तो जुड़ा ही रहता, जिसके रहते उच्चस्तरीय कार्य कर सकने की- ऊँचे पद पर पहुँचने की सम्भावना का आधार ही नहीं बनता।

महत्वाकाँक्षाओं में प्रशंसनीय वे हैं जिनमें व्यक्तित्व की पवित्रता और प्रखरता से सुसम्पन्न बनने की अभिलाषा प्रदीप्त रहती है। ऐसी दशा में नीति मर्यादाओं का पालन करना और मानवी गरिमा के अनुबन्ध अनुशासन का निर्वाह करने में कोई कठिनाई अनुभव नहीं होती। सामान्य निर्वाह किसी के लिए भी भारी नहीं पड़ता। परिवार को सीमित रखने और उसे सुसंस्कृत स्वावलम्बी बनाने की नीति अपना लेने पर किसी को भी यह अनुभव नहीं करना पड़ता कि उसके ऊपर कुटुम्ब पालन का भार लदा है। मात्र विलासी, अपव्ययी और खर्चीली कुरीतियों के अनुयायी ही ऐसा सोचते हैं कि परिवार का वजन बहुत भारी है। अन्यथा उस परिवार को भावनाशील विचारशील, मितव्ययी और परिश्रमी बना लेने भर से परिवार का ढर्रा सरलतापूर्वक चलता रहता है। स्नेह सौजन्य के वातावरण में एक दूसरे का हाथ बँटाते हुए उस व्यवस्था को हथेलियों पर उठाये फिरते हैं। ऐसी दशा में किसी विचारशील को यह नहीं सोचना पड़ता है कि उसे कुबेर जैसा धनी और इन्द्र जैसा पदवी धारी बनना चाहिए। ऐसी महत्त्वाकाँक्षाएँ व्यक्ति को भ्रष्ट ओर दुष्ट बनाये बिना नहीं रहती। उसकी गतिविधियों से अनिष्ट विग्रह और अनर्थ ही उपजते फैलते हैं।

इस सचाई को यदि समझा जा सके तो सदाशयता के अभिवर्धन की महत्वाकाँक्षा का फलने-फूलने का सुविस्तृत क्षेत्र खुल जाता है। तब व्यक्ति लोकमंगल और सत्प्रवृत्ति संवर्धन की बात सोचता है। सबके हित में अपना हित समझने- मिल-बाँटकर खाने और हँसते-हँसाते, स्नेह सहयोगपूर्वक जीने की रीति-नीति अपनाकर व्यक्ति स्वयं सुखी सन्तुष्ट रहता और दूसरों की भी सहज सहृदयता कर सकता है। ऐसा दृष्टिकोण अपनाकर कोई भी हल्की-फुलकी जिन्दगी जी सकता है। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की सेवा साधना में निरत रहने का अवकाश पा सकता है जिसमें पुण्य परामर्श का सम्पादन करते हुए तनिक भी अतिरिक्त दबाव न पड़े और वह विषय अच्छे से अच्छे मनोविनोद की तुलना में अधिक सुखद एवं आनन्द-उल्लास से भरा-पूरा प्रतीत होने लगे।

लोक मंगल की सेवा साधना को अपनी दिनचर्या में एक महत्वपूर्ण स्थान देने पर जहाँ यश, प्रशंसा, श्रद्धा, सद्भावना, सहकारिता का हाथों-हाथ लाभ मिलता है वहाँ उससे भी बड़ी बात यह है कि अपनी शालीनता एवं उदारता बढ़ने से निजी व्यक्तित्व का स्तर गगनचुम्बी बनने लगता है। दूसरों को सन्मार्ग पर चलाने का प्रयास करते हुए कर्ता को लोक-लाज भी यह विवश करती है कि वह वैसा बने जैसा कि और से कहता है। नैतिक शिक्षा के अध्यापक को उस विषय में अपने को पारंगत एवं परिपक्व होना चाहिए। जब गणित विज्ञान, इतिहास भूगोल आदि को अपने विषय में विद्यार्थी को समाधान दे सकने योग्य प्रवीणता अर्जित करनी पड़ती है तो नैतिक आचरणों को प्रेरणा देने वाले को भी उसी स्तर का व्यक्तित्व विनिर्मित करना आवश्यक है। बात यदि नीति शास्त्र पढ़ने-पढ़ाने और प्रश्नकाल हल करने नम्बर लाने वाली पढ़ाई तक ही सीमित होती तो काम कथा-प्रवचन के सहारे भी चल सकता था पर जब शिक्षा आचरण को उस ढाँचे में ढलने को दी जा रही है तो उसके लिए निजी उदाहरण प्रस्तुत करना एक प्रकार से अनिवार्य हो जाता है। खिलौना बनाने से पूर्व उसका साँचा विनिर्मित करना होता है। पुर्जे ढालने की बात भी सही साँचे बनने के उपरान्त ही बनती है। नीतिमत्ता का अवलम्बन ही लोक मंगल का एक मार्ग, उपाय है। कष्ट पीड़ितों की सहायता तो अपना धर्म है जिसे यदा-कदा ही आवश्यकतानुसार अपनाना पड़ता है। अन्यथा सदावर्त बाँटने पर तो हरामखोरी पनपेगी और सेवा के नाम पर दुष्प्रवृत्ति फैलाने का नया पाप सिर पर चढ़ेगा। सत्प्रवृत्ति संवर्धन ही एकमात्र वह उपाय है जिसके सहारे किसी को भी सुखी स्वावलम्बी और समुन्नत बनाया जाता है। लोक मंगल का सिद्धान्त और स्वरूप यही है। इस प्रयास से कार्यक्रम तो आवश्यकतानुसार कितने ही बन सकते हैं पर लक्ष्य को ध्यान में रखने पर टस से मस होने की गुंजाइश नहीं है।

परमार्थिक महत्वाकाँक्षाओं को पूरा करने में लोकमंगल के क्रियाकलापों में निरत होना पड़ता है। इस प्रसंग में एक ही महत्वपूर्ण कार्य करना होता है- लोकमानस का परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन। इनका एक है चिन्तन मनन दूसरा है क्रिया परक। दोनों के मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समन्वय करना पड़ता है। लोक सेवा या लोक शिक्षा इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमती है। इससे विरत होने पर भौतिक कार्यों में संलग्न समस्त भौतिक श्रमिक लोकसेवी कहलाने लगेंगे। साधन जुटाने और अभाव पूरे करने में तो कृषकों से लेकर मेहतर तक सभी श्रमजीवी उसी प्रयास में निरत रहते और बदले में वेतन पाते हैं। जिस लोकमंगल की चर्चा परमार्थ प्रयोजन के सन्दर्भ में की जाती है वह और कुछ नहीं मनुष्य के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में घुसी हुई दृष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और उनके स्थान पर शालीनता का संस्थापन ही हो सकता है। लोकमंगल इसी एक आधार पर बन पड़ता है। समस्त समस्याओं का समाधान इसी प्रयास की सफलता पर निर्भर है। महामानवों में से सभी ने अपने लिए इसी मार्ग को चुना और उसी के लिए सर्वतोभावेन तत्पर तन्मय रहते हुए जीवन बिताया है। आज भी इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं। सामयिक परिस्थितियों पर दृष्टिपात करते हुए तो यह एक प्रकार से और भी अनिवार्य हो जाता है कि आस्था संकट से जूझा जाय और प्रचलित दृष्प्रवृत्तियों को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने वाले प्रज्ञा अभियान का सहभागी बनकर अग्रिम मोर्चा सम्भाला जाय। उपक्रम को अपनाते हुए विश्व कल्याण की आशा की जा सकती है।

बात वहाँ लौटकर आती है कि पारमार्थिक महत्वाकाँक्षा अपनाकर यदि लोक मंगल में निरत हुआ जाय तो इससे अपना क्या बना? अपने स्वार्थ की सिद्धि कैसे हुई? यहाँ समझने योग्य रहस्य यह है कि इस प्रयास में सबसे अधिक और सबसे सुनिश्चित लाभ अपना ही होता है। जिन्हें सुधारने उठाने का प्रयत्न किया गया है वे उस सेवा से लाभान्वित होंगे या नहीं इसमें सन्देह की भी गुंजाइश है, पर यह असंदिग्ध है कि संगीत पढ़ाने की जिम्मेदारी अपनाने पर अध्यापक को तो उस सन्दर्भ में प्रवीणता प्राप्त करनी ही होगी। दूसरों के हाथ रचाने के लिए मेंहदी पीसने वाले के अपने हाथ तो अनायास ही रच जाते हैं। गन्धों की दुकान पर बैठने भर से सुगन्ध का लाभ मिलता है तो कोई कारण नहीं कि दूसरों को गर्मी पहुँचाने के लिए आग जलाने वाला स्वयं ठण्ड से सिकुड़ता रहे। बर्फखाने में नौकरी करने वालों तक को जब ठण्डक का मजा आता है। सरकस के कर्मचारी जब मुफ्त में ही खेल का आनन्द लेते रहते हैं तो कोई कारण नहीं कि लोकहित के लिए सत्प्रवृत्ति संवर्धन में निरत सेवाभावियों को उसी चिन्तन एवं कार्य में निरत रहने पर निजी व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का अवसर न मिले। यह एक ही लाभ इतना बड़ा है जिस पर संसार भर के वैभव को निछावर किया जा सके। इस प्रकार परमार्थ परायण को उभयपक्षीय लाभ मिलते हैं तब संकीर्ण स्वार्थपरता में निरत को दोनों से ही हाथ धोना पड़ता है।


रोम की जेल (kahani)

रोम की जेल में कभी कैदियों को अन्धेरी कोठरी में रखा जाता था। बहुत दिन बाद वे छूटते और प्रकाश उन्हें असह्य लगता और अन्धेरे में ही रहना पसन्द करते थे।

गाड़ियाँ लुहारों को अनेक बार जमीन और घर देकर कहीं बस जाने के लिए कहा गया है पर उन्हें वह रुचा ही नहीं। लोहे पीटते हुए गाँव-गाँव फिरते रहना ही उनकी आदत का अंग बन गया है।

वनवासी जातियाँ अभी भी अलग झोंपड़े बनाकर रहती है। मिल-जुलकर साथ बसने में उन्हें उत्साह ही नहीं। विवाह होते ही लड़का अलग झोंपड़ी बनाता और अलग रहता है। नशेबाजों की भी यही बात है। आदत अपना लेने पर बुरी बातें रुचिकर लगती हैं और छोड़ने को मन नहीं करता।


विचार संप्रेषण की अद्भुत शक्ति सामर्थ्य

अप्रत्यक्ष होते हुए भी विचारों की सामर्थ्य एवं प्रभाव प्रत्यक्ष अन्य शक्तियों से कहीं अधिक है। जीवन से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध है। विकास अथवा पतन में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। परा मनोवैज्ञानिकों के अनुसार भौतिक जगत की चुम्बकीय तरंगों से विचार तरंगों की गति एवं शक्ति असंख्यों गुनी है। जिस विज्ञान के अन्तर्गत विचार तरंगों का स्वरूप एवं प्रभाव ज्ञात होता है उसे योग दर्शन में विचार वैगिकी कहते हैं। तत्व दर्शियों का मत है कि संसार में शुभ एवं अशुभ विचार तरंगों का निरन्तर प्रसारण होता है जिनमें त्रिविधि गुण विकार मिश्रित होते हैं। जिस प्रकार प्रकाश तरंगों में तीव्रता, तरंग दैर्ध्य तथा आवृत्ति होती है उसी प्रकार विविध तरह की विचार तरंगों में विविध प्रकार की तीव्रता, तरंग दैर्ध्य एवं आवृत्ति होती है। वे सूक्ष्म अन्तरिक्ष में घूमती रहतीं तथा चैतन्य संसार को प्रभावित करती हैं।

शुभाशुभ विचार तरंगें मनुष्य के मानसिक स्तर में परिवर्तन करने में भी समर्थ हैं, पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनके साथ किस स्तर की प्राण शक्ति जुड़ी हुई है। समर्थ प्रभाव क्षमता, प्रबल प्राण शक्ति पर ही अवलम्बित है। प्राण, शक्ति का संयोग पाकर विचार तरंगें घनीभूत होतीं तथा विचार प्रवाह का रूप ग्रहण कर लेती हैं। प्रवाह बन जाने पर उनकी गति एवं सामर्थ्य असीम हो जाती है। प्राण सम्पन्न व्यक्तियों की प्रभाव क्षमता अन्यों की तुलना में कहीं अधिक होती है। अपनी ओर वे असंख्यों को आकर्षित करते तथा अपने साथ मनचाही दिशा में चलने को विवश कर देते हैं। वह दिशा सृजन और ध्वंस दोनों ही की हो सकती है। महापुरुष अपनी उस सामर्थ्य का उपयोग सृजन में करते हैं जबकि हिटलर, मुसोलिनी जैसे क्रूर अति मानव ध्वंस में उस शक्ति को गँवाते देखे गए हैं।

तत्वदर्शी ऋषियों का मत है कि त्रिगुणात्मक प्रभावों के अनुरूप मनुष्य के शरीर से अनेकों प्रकार की रश्मियाँ निकलती रहती हैं। धर्म ग्रन्थों में इन्हें आभा मण्डल कहा गया है। किर्लियन फोटोग्राफी के माध्यम से विचार तरंगों की फोटोग्राफी सम्भव हो गयी है। उससे पता चला है कि भावनात्मक संवेगों के अनुरूप प्रभा मण्डलों के रंग रूप में भी परिवर्तन होता रहता है। हर व्यक्ति का अपना अलग प्रभा मण्डल एवं स्तर होता है। प्रभा मण्डल में दूसरों को आकर्षित अथवा विकर्षित करने की विशेषता होती है। आन्तरिक संवेगों, विचारों एवं भावों के परिवर्तन से प्रभा मण्डल भी बदलता रहता है। विचार तरंगों में अगणित प्रकार के रंग रूप होते हैं वे अलौकिक और लौकिक स्तरों में विभक्त होती हैं। वासना, घृणा, द्वेष एवं प्रतिशोध की विचार तरंगें काली होती हैं जबकि भय एवं आतंक की विचार तरंगें भूरे रंग की होती हैं। चमकीले लाल रंग की विचार तरंगें क्रोध की होती हैं। प्रेम की विचार तरंगें गहरे लाल रंग की, वासना-जनित प्रेम की तरंगें भूरे लाल रंग की, अहंकार एवं महत्वाकाँक्षा की विचार तरंगें चमकीले नारंगी रंग की, बौद्धिक शक्ति तथा आन्तरिक पवित्रता का भाव दर्शाने वाली विचार तरंगें पीले रंग की, उच्च आध्यात्मिक भाव प्रकट करने वाली चमकीले हल्के नीले रंग की होती हैं। ऐसा विश्लेषण विभिन्न वैज्ञानिकों ने किया है। सूक्ष्म विचार तरंगों के स्वरूप का रहस्य समझना भी एक ऐसी विधा है जिसके विशेषज्ञ मनोविज्ञान के ज्ञाता नहीं, अतीन्द्रिय सामर्थ्य सम्पन्न योगी होते हैं।

समर्थ योगी, सिद्ध पुरुष, व्यक्ति की आकृति देखकर उसकी मनः स्थिति एवं मन में चल रहे विचारों को बिना बताये जान लेते हैं। वस्तुतः इसका परिचय उन्हें उस आभा मण्डल को देखकर मिल जाता है जो उस व्यक्ति के इर्द-गिर्द छाया रहता है जो सामान्यतया अन्य व्यक्तियों को नहीं दिखायी देता। पर योगियों की- सिद्ध पुरुषों की अन्तर्दृष्टि उस ह्यूमन औरा के आधार पर उसके मन में चल रहे भले बुरे विचारों को जानने में समर्थ हो जाती है। कितने ही उसे बता भी देते हैं। जिनका अन्तःकरण निर्मल है उनमें भी विचारों के पढ़ने की सामर्थ्य विकसित हो सकती है। कितनी ही बार तो मनुष्य की बदली आकृति उसकी मनःस्थिति का परिचय दे देती है। क्रोध, भय, आवेश, दुःख, निराशा के भाव मनुष्य के मुखमण्डल पर स्पष्ट तैरते रहते हैं जिसे कोई भी विचारशील थोड़े प्रयत्नों से पढ़ने में सफल हो सकता तथा आन्तरिक स्थिति का चल रहे विचार प्रवाह के स्वरूप का वर्णन करने में समर्थ हो सकता है। कितनी बार तो मानवी आकृति भी उसकी प्रकृति का संक्षिप्त परिचय दे देती है। मनःचिकित्सक भी इसी आधार पर अपना आरम्भिक निदान शुरू करते हैं।

विचार तरंगों का आदान-प्रदान अथवा प्रसारण जिस प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न होता है उसे मनोवेत्ता ‘टेलीपैथी’ कहते हैं। इस प्रक्रिया में बिना इन्द्रियों का सहारा लिए विचार तरंगों को एक मन से दूसरे मन तक प्रेषित किया जाता है। इस क्रिया में देश काल सम्बन्धी भौतिक सीमाएँ आड़े नहीं आ पातीं। टेलीपैथी के सफल सम्प्रेषण में मन की एकाग्रता का असाधारण महत्व है। उस एकाग्रता का सम्पादन ध्यान के विविध आध्यात्मिक प्रयोगों में अधिक सफलता से होता है। प्रायः भौतिक उपचार उस उपलब्धि में अधिक सफल नहीं हो पाते। कारण कि जिस गहरे स्तर की एकाग्रता विचार सम्प्रेषण के लिए चाहिए वह भौतिक प्रयत्नों से नहीं बन पाती। शरीर एवं बुद्धि से परे जाकर मन की विचार तरंगों को प्राण-शक्ति के माध्यम से घनीभूत कर पाना ध्यान साधना के माध्यम से ही सम्भव हो पाता है।

इन दिनों वैज्ञानिक क्षेत्र में भी विविध प्रकार के प्रयोग टेलीपैथी पर चल रहे हैं। सुप्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक त्सियोलको वोस्की ने 1930 में यह कहा था कि निकट भविष्य में सफल एवं सुरक्षित अन्तरिक्ष यात्रा के लिए विचार सम्प्रेषण का ज्ञान आवश्यक होगा। सन् 1959 में अमरीकी आणविक पनडुब्बी नाटिलस द्वारा टेलीपैथी पर एक सफल प्रयोग किया भी गया। उस प्रयोग से यह सम्भावना प्रबल हो गयी कि मानव मस्तिष्कों के बीच मानसिक विचारों का आदान-प्रदान रेडियो संचार व्यवस्था से कहीं अधिक निर्बाध गति से चल सकता है। क्योंकि समुद्र के अत्यन्त निचले तल में रेडियो संचार व्यवस्था भंग हो जाती है पर ऐसा कोई व्यवधान मानसिक सम्प्रेषण में नहीं आने पाता। कारण कि इस संचार व्यवस्था में देशकाल की सीमाओं का प्रभाव नहीं पड़ता।

अमरीकी वैज्ञानिक डगलस डीन ने 1960 में एक नयी खोज की थी जिसका विवरण 1964 में वैज्ञानिकों ने एक सम्मेलन में प्रस्तुत किया। डीन एक विशिष्ट यन्त्र से यह प्रदर्शित किया कि विचार सम्प्रेषण द्वारा जब विचार तरंगों का प्रसारण किया जाता है तो उससे कोश-क्रियाओं पर भी प्रभाव पड़ता है तथा रक्त प्रवाह की गति में भी अन्तर आता है। डीन का कहना था कि प्रयोग की महत्वपूर्ण बात यह है कि विचार संप्रेषण प्रक्रिया अधिक सफलता से उनके बीच सम्पन्न हो सकती है जो भावनात्मक सम्बन्धों से अधिक घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।

विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिक यह स्वीकार करने लगे हैं कि मानव शरीर टेलीविजन प्रणाली से भी अधिक समर्थ एक अद्भुत इलेक्ट्रानिक यन्त्र है। शरीर से भी अधिक सामर्थ्यवान उसकी मन मस्तिष्क की सूक्ष्म परतें हैं जो सूक्ष्म सम्वेदनाओं तथा वैचारिक तरंगों को आकर्षित विकर्षित करते रहते हैं। इस प्रक्रिया का सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर, कारण रूप सूक्ष्म जगत तथा कार्यरूप स्थूल जगत के परस्पर परोक्ष सम्बन्धों से है।

विचार जगत एवं उसकी सामर्थ्य के सम्बन्ध जितनी जानकारियाँ मिली हैं, उसकी तुलना में अविज्ञात का क्षेत्र कहीं अधिक है। जिस दिन उसकी सामर्थ्य व पूरा परिचय मनुष्य को मिलेगा, वह एक अद्भुत समय होगा। यह उपलब्धि परमाणु के नाभिकीय शक्ति के आविष्कार से भी बड़ी होगी।


Quotation

जो प्रगति का रास्ता सच्चे मन से ढूँढ़ता है उसे उपयुक्त अवसर मिलकर ही रहता है। -सम्युअल स्याइल्स


आत्मबोध से ही जीवन सम्पदा की सार्थकता

शारीरिक सामर्थ्य एवं विशेषताओं की दृष्टि से अन्यान्य जीवों से जब मनुष्य की तुलना करते हैं तो उनका पलड़ा कहीं अधिक भारी बैठता है। आकार ही नहीं शक्ति में भी हाथी, ह्वेल, शेर, गैंडा, चीता जैसे जीव मनुष्य से बहुत आगे हैं। अस्तु जो अपने शारीरिक बल का दर्प करते अथवा शरीर की मांसलता को देखकर इतराते रहते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि इस क्षेत्र में तो दूसरे जीव उन्हें अत्यन्त पीछे छोड़ जाते हैं। मनुष्येत्तर जीवों की अन्य विशेषताएँ मनुष्य को कहाँ प्राप्त है? हिरन तीव्र गति से कुलाचें भरता दौड़ सकता है। घोड़े की रफ्तार देखते ही बनती है। बैल कितने ही क्विंटल का वजन अपने कन्धों के सहारे खींचता है। सिंह की स्फूर्ति एवं शक्ति बेमिसाल है। बुलबुल और सारिका के मधुर कण्ठ मनुष्य को भी मात देते हैं। सर्प एवं कच्छप अनेकों वर्षों तक जीवित रहते हैं। मधु मक्खियाँ अपरिमित मात्रा में मधु संचय करती हैं। कुत्ते की घृाण शक्ति अद्भुत होती है तथा वफादारी के क्षेत्र में वह मनुष्य को भी पीछे छोड़ देता है। गिद्ध में अत्यन्त तीक्ष्ण दृष्टि होती है, मीलों दूर मरे पड़े जीवों का वह पता लगा लेता है। ऊँट का आहार कड़वी नीम है, उसी को खाकर वह भारी श्रम करता है। उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की सामर्थ्य तो पक्षियों में ही है। उल्टी धारा को चीरकर तैरती मछलियाँ ही देखी जाती हैं।

कितने ही जीव, पशु पक्षी ऐसे हैं जिन्हें प्रकृति की घटनाओं का, विभीषिकाओं का पूर्वाभ्यास हो जाता है, सुरक्षा की तद्नुरूप व्यवस्था भी वे बना लेते हैं। मौसम की प्रतिकूलताओं का सामना करने की प्रचण्ड जीवट सामर्थ्य भी उन्हें प्रकृति से ही प्राप्त है। हिमाच्छादित प्रदेशों में हिरन-भालू नंग धड़ंग घूमते रहते हैं पर उनका बाल भी बाँका नहीं होने पाता। वनों में घूमने वाले शेर, चीते, रीछ, वानर, हाथी तथा अन्य वनचरों को भीषण सर्दी में कौन गर्म कपड़े प्रदान करता है। शरीर की जीवनी शक्ति ही उनके रक्षा कवच का काम करती तथा सर्दी गर्मी में सुरक्षा प्रदान करती है। आज के विषाक्त वातावरण में भी वे अशक्तता, रुग्णता के अभिशाप से कोसों दूर हैं।

इस प्रकार सृष्टि की इस विलक्षण रचना में अनेकों जीव ऐसे हैं जिन्हें कितने ही क्षेत्रों में मनुष्य से कहीं अधिक विशिष्टता हासिल है। डील-डौल, बल पौरुष, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि की ग्रहण क्षमता, श्रमशीलता, प्रतिरोधात्मक शक्ति सहयोगात्मक वृत्ति, दीर्घायुष्य आदि विशेषताएँ उनकी विशेष स्तर की हैं। उन विशेषताओं की दृष्टि से मनुष्य कहीं पिछड़ा है। पर मात्र शारीरिक क्षमताओं के आधार पर अन्य जीव जन्तुओं पशु पक्षियों की वरिष्ठता सिद्ध नहीं हो जाती। जो बातें अतिरिक्त विशेषताएँ मनुष्य को पशुओं से अलग करती उसका वर्चस्व सिद्ध करती अथवा महान बनाती हैं वे अन्य किसी भी मनुष्येत्तर जीव को प्राप्त नहीं हैं। प्रख्यात विचारक डा. सी. एम. जोड़ ने मानवी विशिष्टताओं को तीन विभूतियों के रूप में विभक्त किया है- बौद्धिक क्षमता, नैतिक भावना तथा सौन्दर्य की अनुभूति होना।

मनुष्य विचार कर सकता है जबकि अन्यान्य जीव ऐसा नहीं कर सकते। अपनी नैसर्गिक जिज्ञासा से अभिप्रेरित होकर वह प्रकृति के अगणित रहस्यों को अनावृत्त करने के लिए प्रवृत्त हुआ। ज्ञान विज्ञान की असंख्यों धाराएँ उसकी ही परिणति हैं। इतिहास भूगोल, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, रसायन शास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र जैसे विषयों के आविष्कार से लेकर युग की अगणित वैज्ञानिक उपलब्धियों के पीछे मानवी बुद्धि की चमत्कारी सामर्थ्य ही काम करती दिखायी पड़ती है। उसका ही अंश पाकर कोई कलाकार बन जाता है तो कोई साहित्यकार, कोई विचारक बनता है तो कोई मनीषी। वैज्ञानिक आविष्कारक प्रभृति प्रतिभाएँ बुद्धि के गर्भ से ही पद होती हैं। संसार का काया पलट कर देने तथा पाषाण युग से आज के परमाणु युग में मानव को ला पटकने का श्रेय यदि किसी को जाता है तो निश्चित ही वह विलक्षण बुद्धि को जाता है। शिश्नोदर जीवन के इर्द-गिर्द घूमते रहने तथा किसी प्रकार शरीर का परिपोषण करते रहने भर की समझ तो अन्य जीवधारियों को भी प्राप्त है। निश्चित ही परमात्मा ने अतिरिक्त बुद्धि का एकमात्र अनुदान मनुष्य को देकर अपनी उदारता का परिचय दिया है। साथ ही यह जिम्मेदारी भी सौंपी है कि वह उस अनुदान का सदुपयोग करें।

मनुष्य की दूसरी विशेषता भावना नैतिक भावना के रूप में मिली हुई है। नैतिक मर्यादाओं का अनुबन्ध पशुओं के लिए कोई महत्व नहीं रखता पर मनुष्य के साथ ऐसी बात नहीं है। बुरे से बुरे व्यक्ति भी अपने सगे सम्बन्धियों पत्नी बच्चों के प्रति कर्त्तव्य परायण होते हैं। न्यूनाधिक रूप से नैतिकता की भावना हर किसी में पायी जाती है। अशिक्षित व्यक्ति को भी अच्छे बुरे का ज्ञान होता है। असभ्य और बर्बर जातियाँ भी अपने समुदाय परिकर में मर्यादाओं का निर्वाह करती देखी जाती हैं। व्यभिचारी भी माँ बहन के रिश्तों का ध्यान रखते हैं। पशुओं के लिए माँ बहन तथा पत्नी के बीच कोई भेद नहीं रहता। नैतिक भावना के बीजांकुर हर मनुष्य में विद्यमान हैं। पोषण एवं विकास के लिए वह छटपटाता रहता है। उस भावना पर कुकृत्यों द्वारा जब भी कुठाराघात होता है, आत्मा की प्रताड़ना भी मिलती है। जो उसकी उपेक्षा करते हैं, आत्म गरिमा से गिर जाते तथा नर पशुओं की श्रेणी में जा पहुँचते हैं।

सौन्दर्य की भावना- रस की कामना मनुष्य की तीसरी विशेषता है जो उस पशु समुदाय से अलग करती है। प्राकृतिक सौन्दर्य तथा रूप-लावण्य उसके मन को मुग्ध कर देता है। उदीयमान रवि, शुभ्र शीतल चन्द्रमा, मोतियों की तरह चमकते सितारे खिलते-महकते पुष्प, कलकल निनादिनी सरिता, कलरव करते पक्षी सभी मानव मन को एक अनिवर्चनीय आनन्द से भर देते हैं। रस की कामना से ही अभिप्रेरित होकर मनुष्य ने संगीत गायन, वादन आदि को जीवन में स्थान दिया। जिस शिश्नोदर परितृप्ति के क्षणिक आनन्द में दूसरे जीव सन्तुष्ट होते देखे जाते हैं। मानव को वह निमग्न सहज ही वह अनुभूति नहीं देता। अपनी सौन्दर्य भावना तथा रस की कामना की परितृप्ति के लिए ही मनुष्य मनोरंजन के विविध सरंजाम जुटाता है। मनुष्य सौन्दर्य उपासना के फलस्वरूप ही ललितकलाओं आविर्भाव हुआ। अजन्ता-एलोरा जैसी अद्भुत कलाकृतियाँ माइकेल एन्जेलो एवं पिकासों के चित्रांकन इस शाश्वत सौन्दर्य साधना की ही परिणति हैं।

उच्चस्तरीय आनन्द प्राप्ति की कामना मूल वृति रूप में हर मनुष्य में पायी जाती है। भ्रमवश वह विषयों की क्षणिक परितृप्ति को ही सच्चा सुख मान बैठता है। अग्नि में घृत डालने की तरह वह अतृप्ति की अग्नि और भी प्रज्वलित होती जाती तथा अपने दावानल में मनुष्य की समस्त क्षमताओं को भस्मीभूत कर डालती है। अन्ततः पश्चात्ताप ही हाथ लगता है। सौन्दर्य की भावना आत्म दर्शन की ओर अभिमुख हो सके तो मनुष्य सौन्दर्य के मूल स्रोत के पास पहुँचकर वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है जिसके लिए जीवन पर्यन्त भटकता रहता है।

मनुष्य को मिली अतिरिक्त विशेषताएँ- अनुदान उसकी विशिष्टता सिद्ध करते हैं पर इस तथ्य का भी बोध कराते हैं कि वह कभी भी आत्म गरिमा को भूले नहीं। पशुओं की तरह वह भी अपनी क्षमताओं को नष्ट करता रहा तो प्राप्त उन विशेषताओं की सार्थकता कहाँ रही? मनुष्य की विशिष्टता क्या रही? निश्चित उनकी सार्थकता इस बात में सन्निहित है कि सुर दुर्लभ जीवन का मनुष्य सदुपयोग करें। क्षमताओं को व्यर्थ न गँवाये। जिन प्रयोजनों के लिए वे मिली हैं उनकी पूर्ति में उन्हें लगाये। इसी में जीवन की सार्थकता है और मनुष्य जीवन की गरिमा भी सन्निहित है।


विलक्षण सामर्थ्य का समुच्चय यह मानव शरीर

मनुष्य की आकृति-प्रकृति ही नहीं बल्कि उसकी समूची कार्य संरचना की अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ व अद्भुत है। बाहर से कोमल दीखने वाला यह शरीर अन्दर से पूर्णतः सशक्त व अनेकानेक सामर्थ्यों का पुंज है। उसमें प्रगति की असीम सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। यदि उन शक्ति स्रोतों को परख लिया जाय और परम पुरुषार्थ द्वारा आत्मोन्नति के लिए कटिबद्ध हुआ जाय तो प्रतीत होगा कि प्रगति के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने हेतु आवश्यक वे सभी विशेषताएँ अपने भीतर ही विद्यमान हैं जिनका पहले अभाव प्रतीत होता था अथवा जिनकी जानकारी ही नहीं थी।

मनुष्य का शरीर पंचतत्वों से बना है। इसके अन्तर्गत मिट्टी, जल, वायु, अग्नि और आकाश आते हैं। वैज्ञानिकों ने भी उपकरणों के माध्यम से शरीर के रासायनिक तत्वों का विश्लेषण करके पाया कि इसमें 65 प्रतिशत ऑक्सीजन, 18 प्रतिशत कार्बन, 10 प्रतिशत हाइड्रोजन, 3 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2 प्रतिशत कैल्शियम, 1 प्रतिशत फास्फोरस, 0.35 प्रतिशत पोटैशियम, 0.25 प्रतिशत सल्फर, 0.15 प्रतिशत सोडियम, 0.15 प्रतिशत क्लोरीन, 0.50 प्रतिशत मैग्नेशियम, 0.04 प्रतिशत लोहा और शेष 0.46 प्रतिशत भाग में आयोडीन, फ्लोरीन तथा सिलिकन है। कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने इन रासायनिक संघटकों को और भी छोटे से घेरे में सीमित कर दिया है। उनके अनुसार शरीर में 64 प्रतिशत जल, 16 प्रतिशत प्रोटीन, 14 प्रतिशत चर्बी, 5 प्रतिशत लवण और 1 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होता है। यह पदार्थ कितनी मात्रा में है और उनका क्या उपयोग हो सकता है, इसका विवेचन करते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि- शकर इतनी है जिससे सौ कप चाय मीठी हो सके। चूना इतना है कि जिससे मुर्गी का एक छोटा दरबा पोता जा सके। लोहा इतना है जिससे 1 इंच लम्बी कील बन सके। मैग्नेशियम इतना है कि जिससे 6 छोटी तस्वीरों में रंग भरा जा सके। पोटैशियम इतना है जिससे बच्चों की बन्दूक का एक पटाखा बन सके। गन्धक इतना है जिससे एक कुत्ते की जूँ मारी जा सके। फास्फोरस इतना कि जिससे बीस माचिस बाक्स बन जाय। चर्बी की मात्रा इतनी है, जिससे एक दर्जन साबुन के बार बनाये जा सकें। ताँबा इतना है जिससे एक पैसा ढल सके। पानी इतना जिससे एक दो माह के शिशु को नहलाया जा सके।”

उपरोक्त रासायनिक संगठनों के आधार पर अर्थशास्त्रियों ने 1936 में मानवी काया की कीमत मात्र 7 रु. 35 पैसे लगाई थी। बाद में इसमें 257 प्रतिशत की वृद्धि हुई, अतः अब 26 रु. 25 पैसे इसकी कीमत लगायी जा रही है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि स्थूल और रासायनिक दोनों ही दृष्टि से शरीर का सचमुच कोई भी मूल्य और महत्व नहीं है। तभी तो भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने विषयासक्त लोगों को बार-बार चेतावनी दी है, हे मनुष्यों! इस स्थूल शरीर का कोई मूल्य नहीं है। इसी के सुखों में डूबे मत रहो। इसमें संव्याप्त आत्म-चेतना की भी शोध और उपलब्धि करो, तभी दुःखों से निवृत्ति हो सकती है और उस परम लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव है, जिसके लिये यह काया मिली है।

मनुष्य शरीर के यन्त्र भाग पर अन्यान्य दृष्टियों से विचार करते हैं तो पता चलता है, कि किसी सम्पन्न व्यक्ति के भव्य भवन के समान मनुष्य को भी यह असाधारण देन- एक अमूल्य वरदान है। यदि उसका उच्च प्रयोजनों हेतु उपयोग किया जा सके तो मनुष्य के इसी शरीर से सभी असम्भव समझे जाने वाले कार्य सम्भव हैं।

मनुष्य के इस नश्वर शरीर में जन्म के समय 270 हड्डियों होती हैं। आयु बढ़ने के साथ-साथ उनमें से कुछ हड्डियाँ आपस में जुड़ने लगती हैं तदनुरूप उनकी संख्या घट जाती है और कुल 206 रह जाती हैं। ये हड्डियाँ आपस में 180 जोड़ों द्वारा जुड़ी हैं। इन्हीं के कारण शरीर का इधर-उधर मुड़ पाना सम्भव होता है। अस्थियों में छोटे-छोटे छेद होते हैं और भीतर से पोली होती हैं। छोटे छिद्रों के माध्यम से रक्त वाहिनियाँ भीतर प्रवेश करती हैं और अस्थियों को आहार-पोषण पहुँचाती हैं। सुरंग की तरह पोले स्थान में तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं। एक वे जो टूटने पर हड्डियों को जोड़ देती हैं। दूसरी वे जो हड्डियों की क्षमता बढ़ाती हैं और उनके कूड़े को साफ करती हैं। तीसरी वे जो रक्त द्वारा प्राप्त आहार से अस्थियों की पोषण व्यवस्था जुटाती हैं। अस्थि संस्थान सम्बन्धी इन तथ्यों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि बाह्य सौन्दर्य के आवरण में छिपे भीतरी कठोर कंकाल रूपी यह ढाँचा कुरूप दीखता भर है। वस्तुतः उसके मुड़ने, भार ढोने, घूमने आदि की अपनी जो विशेषताएँ हैं, वे ऐसी हैं जिनका दृश्यमान न सही, उपयोगिता की दृष्टि से महत्व एवं सौन्दर्य असाधारण है। इसका एक छोटा-सा उदाहरण “आर्चेज ऑफ फुट” के रूप में देखा जा सकता है। लगता है किसी कुशल इंजीनियर ने सोच-समझकर पैरों के मोड़ों पर इन कमानियों को बिठा रखा है।

मानव शरीर खनिज पदार्थों की एक समग्र खान है। अन्य रासायनिक पदार्थों की तरह उसमें खनिजों की मात्रा व भिन्नता भी अच्छी-खासी है। आर्सेनिक, क्रोमाइड, कैल्शियम, क्लोरीन, कोबाल्ट, ताँबा, फ्लोरिन, लोहा, मैग्नेशियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सिलीकॉन, सोडियम, गन्धक, जस्ता, एल्युमीनियम, आयोडीन इत्यादि में से कोई थोड़ी मात्रा में होता है कोई अधिक, पर आवश्यकता उन सबकी अनिवार्यतः शरीर को होती रही है। निर्धारित मात्रा में तनिक-सी कमी पड़ जाने से देह का सूक्ष्म ढाँचा ही लड़खड़ाने लगता है।

कुल मिलाकर शरीर में लगभग साढ़े 6 पौण्ड खनिज पदार्थ होते हैं। आयोडीन सम्पूर्ण शरीर में एक राई के बराबर होगी, पर व्यक्तित्व के विकास, मानसिक सक्षमता में वृद्धि में उसकी सहायता से ही गाड़ी चलती है। एल्युमिनियम की जो थोड़ी-सी मात्रा रहती है, मस्तिष्क की क्रियाशीलता को मात्र उतने से ही बड़ी गति मिलती है। लोहा 1/10 औंस ही है, पर आक्सीजन ग्रहण करके सम्पूर्ण शरीर में पहुँचाने ओर वापस कार्बन-डाई-आक्साइड लेकर फेफड़ों तक पहुँचाने का कार्य लाल रक्त कण इस लोहे की शरीर द्रव्यों में उपयुक्त मात्रा होने पर ठीक तरह कर पाते हैं। एक वर्ग मिलीमीटर जगह में लाल रक्त अणुओं की संख्या 50 लाख रहनी चाहिए। यदि यह संख्या घट जाय तो शारीरिक और मानसिक थकान घेर लेगी और चेहरा पीला पड़ जायेगा। इस संकट से बचाने में यह थोड़ा-सा लोहा ही गज़ब करता है। जन्म के समय 6 महीने तक की निर्वाह व्यवस्था का जुगाड़ तो बालक अपने बलबूते बिठाकर इतना लोहा अपने साथ माँ से लेकर आता है। पीछे उसकी मात्रा खुराक से पूरी की जाती है कमी उसमें भी नहीं पड़नी चाहिए। हड्डियों का ढाँचा कैल्शियम और फास्फोरस पर खड़ा है। कैल्शियम की मात्रा 3 पौण्ड व फास्फोरस की लगभग दो पौण्ड होती है। शरीर के समस्त जीव कोण कैल्शियम रूपी सीमेन्ट से ही तो जुड़े हैं।

गन्धक की अल्प-सी मात्रा पर बालों और नाखूनों का स्वास्थ्य निर्भर है। कोबाल्ट रक्त बनाने की प्रणाली में आवश्यक भूमिका निभाता है। चमड़ी की कोमलता अन्यान्य घटकों के अलावा सिलीकॉन पर निर्भर है। दाँतों को सफेद और चमकदार बनाने में फ्ल्युरीय एवं फ्ल्युरॉइड की उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है। ये सभी खनिज प्रायः हमें अपने नित्य के शाकाहारी भोजन से ही प्राप्त हो जाते हैं। भोजन में सब खनिजों की समुचित मात्रा न भी हों तो भी हमारे पाचक रस उन्हें परिवर्तित करके इस योग्य बना लेते हैं कि अभीष्ट मात्रा में उपरोक्त खनिजों की आवश्यकता पूरी होती रहे।

योगियों की गणनानुसार शरीर में 72000 नाड़ियाँ हैं। चिकित्सकों के हिसाब से इनकी लम्बाई 5 हजार फीट है। सन्देश लाने और ले जाने की दौहरी व्यवस्था के लिये शरीर में 20 हजार फुट तो केवल नसों का जाल बिछा है। एक फीट बिजली का साधारण तार 25 पैसे में आता है। अतः इतनी लम्बाई का तार बिछाने का मूल्य ढाई हजार होता है। यदि इस लागत में गुर्दों के रूप में कार्यरत जल फिल्टर करने का संयन्त्र, हड्डियों के बीच-बीच में विद्यमान डिस्क रूपी शॉक एब्जार्बर, शरीर में ही लीवर तथा हारमोन ग्रन्थियों में पाचक रस तथा एन्जाइम्स रूपी औषध निर्माण क्रेन जैसी माँसपेशियों की शक्ति, वातानुकूलित और प्रकाशदायक त्वचा तथा कैमरे रूपी आँखों का सम्मिलित मूल्य जोड़ा जाय तो हर शरीर अरबों-खरबों रुपये की लागत का बैठेगा। इसे बना सकना मनुष्य के बस की बात नहीं।

मात्र मनुष्य के मस्तिष्क को ही लें तो इसे तो और भी विलक्षणताओं से भरा हुआ हम पाते हैं। इस जैसा टेप रिकार्डर, मूवी कैमरा और एक समग्र विलक्षण कम्प्यूटर न आज तक संसार में कोई बना और न आगे बन सकना सम्भव है। मानव निर्मित ‘टेप रिकार्डर’ की क्षमताएँ सीमित हैं। वह चारों तरफ की विभिन्न आवृत्तियों को अलग-अलग नहीं पहचान पाता, न ही पकड़ सकता है। उसकी मशीन अपनी इच्छा से नहीं चल सकती। शब्द के साथ दृश्य का स्मरण नहीं करा सकती। इसके विपरीत मनुष्य के मस्तिष्क में पाये जाने वाले ईश्वर प्रदत्त टेप रिकार्डर कम्प्यूटर की क्षमता का मापन एवं उसका मूल्याँकन कैसे किया जाये?

एक साधारण कम पढ़े-लिखें व्यक्ति की मस्तिष्कीय याददाश्त को लिपिबद्ध किया जाये तो 10 रामायणों के बराबर पुस्तक बन जायेगी। लिथूयानिया निवासी रेवी के बारे में कहा जाता है कि उसने 2000 पुस्तकें रट कर कण्ठस्थ कर ली थीं, जबकि शैक्षणिक योग्यता उसकी अधिक नहीं थी। अमेरिका का हैरी नेल्सन एक बार में 20 खिलाड़ियों से अकेले की शतरंज खेलता और हमेशा विजय पाता था। लन्दन का कोलाबर्न जब 8 साल का था तभी 268, 336 और 125 के क्यूबरूट गुणनफल उसने एक सेकेण्ड से भी कम समय में बना दिये। भारत की शकुन्तला देवी अपनी विलक्षण प्रतिभा तथा रामानुजम गणित में प्राप्त अपनी अद्भुत विभूति के कारण प्रख्यात है।

मनुष्य की जीवनी शक्ति का उदाहरण तो और भी अचम्भित कर देने लगता है। कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के भौतिकी प्राध्यापक डा. क्रेशटेलर ने स्वयं अपने ऊपर प्रयोग करके यह सिद्ध किया कि संसार के सबसे अधिक गरम क्षेत्र में रहकर भी औसत स्वास्थ्य वाला आदमी 100 दिन तक जीवित रह सकता है। यदि स्नायु संस्थान अपेक्षाकृत अधिक समर्थ हो तो 200 दिन तक भी जिया जा सकता है। आमतौर से अत्यधिक गर्मी वाले स्थानों के बारे में अब तक यह मान्यता प्रचलित है कि वहाँ कोई 24 घण्टे से अधिक नहीं जी सकता। डॉक्टर टेलर ने 220 डिग्री तक की गर्मी देर तक सहन करके दिखाई और वे 250 डिग्री तापमान को भी 15 मिनट तक सहन करने में सफल रहे।

ऑपरेशनों के दौरान कितने ही लोगों का एक फेफड़ा एक गुर्दा, जिगर का एक भाग, आँतों का बड़ा भाग काट कर अलग कर दिया जाता है। पर जो शेष बचा रहता है उतने से ही शरीर अपना काम चलाता रहता है और जीवित रहता है। 90 प्रतिशत गुर्दे का भाग भी यदि समाप्त हो जाय तो भी काम चलता रह सकता है।

इंग्लैण्ड का एक विमान चालक टेड ग्रीनवे, द्वितीय महायुद्ध के दौरान विपत्ति में फँस गया। भयंकर शीत व बर्फीले प्रदेश में उसे भूखे-प्यासे 10 दिन तक गुजारने पड़े। कपड़े भी गरम न थे। फिर भी वह बिना किसी विकलांगता के जीवित वापस लौटने में समर्थ हो सका।

सृष्टा ने यदि मनुष्य को इतना जीवट भरा, समर्थ और सहने की शक्ति से सम्पन्न शरीर दिया है तो वह अपना कर्त्तव्य है कि इस बहुमूल्य काया की सुदृढ़ता को आहार-विहार के व्यतिक्रम से नष्ट न करें। यह उसका अपना प्राथमिक कर्त्तव्य है कि अवरोधों से लड़ने की क्षमता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये वह सतत् परिश्रम करता रहे। मनुष्य यदि अपने मनोबल को ऊँचा रखे, हिम्मत न हारे, निराशा को पास न फटकने दे एवं मानसिक दुर्बलताओं से बचा रहे तो उसका शरीर हारी, बीमारियों से जूझते हुए भी लम्बी जिन्दगी जी सकता है तथा अवरोधों से दिल्लगी मजाक करते हुए सफल व समर्थ जीवन की दिशा में उत्तरोत्तर बढ़ता रह सकता है। इसके लिये उसे समर्थ काया मिली है। कर्त्तव्य धर्म से वह यदि च्युत न हो- तप-योग का सम्बल लेकर मनीषियों द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन पर चले तो चेतना की सामर्थ्य को ऊर्ध्वगामी बनाकर और कुछ भी पा सकता है, जो उसे मेधा सम्पन्न, अतीन्द्रिय शक्ति सम्पन्न बना सके।


सिद्धान्त व्यवहार में उतरे तो ही सार्थक

किसी साधु के पास एक महिला अपने बच्चे को लेकर गई और उसकी दिन भर गुड़ के लिये मचलते रहने की आदत छुड़ा देने का आग्रह किया।

साधु ने दस दिन बाद आने को कहा। उपदेश दिया तो बच्चा कहना मानने लगा। आदत छूट गई।

कुछ दिन बाद वह महिला उधर फिर किसी काम से आई और पिछला असमंजस पूछते हुए कहा- ‘आपने दस दिन बाद आने को क्यों कहा था, उसी दिन वैसा उपदेश आशीर्वाद क्यों नहीं दे दिया?’

इस पर साधु ने कहा- “पहले मुझे भी गुड़ खाने की आदत थी। दस दिन उसे पूरी तरह छोड़ दिया। तब उपदेश दिया। प्रभाव तभी पड़ता है जो उपदेश वाली बातों का पहले स्वयं निर्वाह किया जाय।

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राजा भोज को किसी सच्चे ब्राह्मण के मुख से कथा पुराण सुनने की इच्छा हुई। सो उसने उपयुक्त वाचन कर्ता की तलाश कराई।

एक महा पण्डित थे। दक्षिणा के लालची उन्हें पुराण कण्ठस्थ थे। सो अपनी महिमा बखानते हुए राजदरबार में पहुँचे। राजा ने उन्हें नीचे से ऊपर तक देखा और सुनने से इन्कार कर दिया।

बहुत दिन बीत गये। उस पण्डित में भारी परिवर्तन हुआ। लोभ के लिए कथा कहने की प्रवृत्ति उनने छोड़ दी और पुराण के रहस्य जानने में तन्मय हो गये। बाहर जाना-आना तक बन्द कर दिया। परिश्रमपूर्वक कमाते और मुफ्त में कथा सुनाते।

बात राजा के कानों तक पहुँची। वे स्वयं गये और अनुरोधपूर्वक राजमहल में कथा सुनाने के लिए लाये।

एक बार तिरस्कार और दूसरी बार आग्रह का रहस्य बताते हुए उन्होंने सभासदों को बताया कि धर्मोपदेश का अधिकार एवं प्रभाव उसी का होता है जिसने लोभ-मोह पर निजी जीवन में अंकुश लगा लिया।

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राजा परीक्षत को शाप वश एक सप्ताह में सर्प दंश से मरना था। उनने बचे समय का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने में बुद्धिमता समझी। विचार क्षेत्र में आदर्श भर लेने की दृष्टि से पुराण कथा सुनने की व्यवस्था बनाई गई।

कथा वाचक व्यास जी ने ही इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए उनने उनके पुत्र शुकदेव जी को आमन्त्रित किया। व्यास के चरित्र में नियोग जैसे कई लाँछन थे, पर शुकदेव का चरित्र सर्वथा निर्मल था। वाणी का कथन मात्र से ही उपदेश का प्रयोजन नहीं सधता। धर्मोपदेशक का चरित्र व्यक्तित्व भी पवित्र होना चाहिए।

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गुरुकुल में कौरवों और पाण्डवों ने एक साथ प्रवेश पाया। द्रोणाचार्य ने विद्यारम्भ संस्कार के समय विद्या बोध कराने वाले कुछ सूत्र याद कराये। सत्यंवद- धर्मचर- स्वाध्यामान् या प्रमद आदि। इन्हें याद कर लेने का आदेश हुआ।

सभी छात्रों ने उन्हें एक ही दिन में याद कर लिया। एक युधिष्ठिर ही ऐसे रहे जो याद न होने की बात कहते रहे और मौहलत माँगते रहे।

कई दिन बीत जाने पर भी याद न होने की बात से द्रोणाचार्य को हैरानी हुई और उसका कारण पूछा।

युधिष्ठिर ने नम्रता पूर्वक पूछा- ‘देव! अक्षरों को याद करने में तो किसी को कोई देर न लगेगी। प्रश्न सिद्धान्तों को जीवन में उतारने का है। मैं सत्यमय जीवन बनाने का ताना-बाना बुनने में लगा हुआ। जब उसका उपक्रम और अभ्यास ठीक बन जायेगा तभी कहूँगा कि पाठ याद हो गया।


ओजस्विता, तेजस्विता और मनस्विता का आन्तरिक भाण्डागार

काया की बलिष्ठता पर आरोग्य और दीर्घ जीवन निर्भर है। यह भी एक प्रकार का विशेष वैभव है। इस उपलब्धि की समस्त सम्भावनाएँ मनुष्य अपने अन्तःक्षेत्र में छिपाए बैठा है। उस अप्रकट को प्रकट करना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। जो एक के लिये सम्भव हो सकता है, वह दूसरे के लिए असम्भव रहे, इसका एक ही कारण है- पुरुषार्थ की कोताही। परिस्थितियों को- भाग्य को इसके लिए दोष देना व्यर्थ है। क्योंकि परिस्थितियाँ मनःस्थिति की ही प्रतिक्रियाएँ हैं। हर मनुष्य अपना भाग्य, अपना संसार और अपना भविष्य स्वयं ही विनिर्मित करता है। जिसे भाग्य या संयोग कहा जाता है, वह भी पिछले पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। आरोग्य एवं दीर्घ जीवन के वरदान भी आत्म-निर्माण की साधना के फलस्वरूप ही उपलब्ध होते हैं।

इसके अतिरिक्त भी मनुष्य की एक ओर ऐसी ही विशेषता है जिसे जीवट या जीवनी शक्ति कहते हैं। इसका बाहुल्य रहने से मनुष्य प्राणवान, स्फूर्तिवान, ओजस्वी, प्रतिभाशाली बनता है। साहस, पराक्रम, उत्साह और स्फूर्ति का समन्वय ‘जीवट’ के रूप में जाना जा सकता है। यह हो तो सामान्य काया भी कम समय में ऊँचे स्तर के कार्य अधिक सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकती है। तत्परता शरीरगत है और तन्मयता मनोगत। दोनों का सुयोग-संयोग जब भी- जहाँ भी- होता है वहाँ बिजली के दोनों तार जुड़ जाने पर प्रवाहित होने वाले ‘करण्ट’ की तरह जीवट का उभार भी दृष्टिगोचर होता है। इसके अभाव में बलिष्ठ और दीर्घजीवी मनुष्य भी कुछ महत्वपूर्ण कर सकने में समर्थ नहीं होता। नीरोग लम्बी जिन्दगी जी लेना एक बात है और लक्ष्य पर बिजली की तरह टूट पड़ने वाली- सफलता पाने से पूर्व न रुकने, न झुकने वाली ओजस्विता दूसरी। मनस्वी, तेजस्वी व्यक्ति शरीर की दृष्टि से भले ही सामान्य दीखे पर वे काम इतना अधिक इतने ऊँचे स्तर का कर गुजरते हैं कि सामान्य स्तर के व्यक्ति उसे किसी देवता का वरदान या भाग्य का अनुदान मानने लगते हैं। वस्तुतः यह जीवट ही है जिसके होने पर मनुष्य का पराक्रम अत्यधिक बढ़ जाता है और जिसके अभाव में बलिष्ठ व्यक्ति भी गन्दा मोटा-सोटा अजगर बना ज्यों−त्यों करके दिन गुजारता रहता है।

ओजस्विता के बीजांकुर हर किसी के अन्तराल में समान रूप से विद्यमान हैं। प्रतिभा की किसी में कमी नहीं। स्फूर्ति कहीं आसमान से नहीं टूटती, अभ्यास द्वारा स्वभाव का अंग बनानी पड़ती है। जो ऐसा कर लेते हैं उनकी जीवट- जीवनी शक्ति अपने चमत्कार पग-पग पर दिखाती है। यह आन्तरिक विशेषता नस-नाड़ियों में बिजली की तरह दौड़ती है जो क्षमता को इस स्तर का बना देती है मानो कि देव-दानव की भूमिका निभ रही हो। ऐसे प्रमाण उदाहरणों की कहीं कोई कमी नहीं। अतीत के संस्मरणों में ऐसे अगणित उल्लेख हैं। कोई चाहे तो अभी भी ऐसे प्रमाण-उदाहरण अपने ही इर्द-गिर्द तलाश कर सकता है।

राजनीति के क्षेत्र में विन्सटन चर्चिल, बेंजामिन फ्रेंकलिन, डिजरैली, ग्लेडस्टोन आदि ऐतिहासिक पुरुषों का नाम आता है जो अपनी वृद्धावस्था की चुनौतियों के बावजूद बहुत सक्रिय बने हुए अपने देश की अमूल्य सेवा में अनवरत रूप से लगे रहे।

पश्चिम एवं भारत के वे कुछ महान पुरुष उल्लेखनीय हैं, जिनकी रचनात्मक शक्ति का हास उनकी ढलती उम्र के कारण कतई नहीं हुआ था और जिन्होंने अपने बुढ़ापे में बड़े महत्वपूर्ण एवं उपयोगी काम करके मानवता की अपूर्व सेवा की।

ऐसे महान पुरुषों में कुछ हैं- दार्शनिक सन्त सुकरात, प्लेटो, पाइथोगोरेस, होमर आगस्टस, खगोल शास्त्री गैलीलियो, प्रसिद्ध कवि हेनरी वर्ड सवर्थ, वैज्ञानिक थामस अलमा एडीशन, निकोलस, कोपरनिकस, विख्यात वैज्ञानिक न्यूटन, सिसरो, अलबर्ट, आइन्स्टीन, टेनिसन, बेंजामिन, फ्रेंकलिन, महात्मा टालस्टाय, महात्मा गाँधी तथा जवाहर लाल नेहरू। इन सभी ने कभी भी अपनी जिजीविषा को वार्धक्य आने पर कम नहीं होने दिया।

महात्मा सुकरात सत्तर वर्ष की उम्र में अपने अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्त्वदर्शन की विशद व्याख्या करने में जुटे हुए थे। यही बात प्लेटो के सम्बन्ध में भी थी। वे अपनी अस्सी वर्ष की आयु तक बराबर कठोर परिश्रम करते रहे। इक्यासी वर्ष की अवस्था में हाथ में कलम पकड़े हुए उन्होंने मृत्यु का आलिंगन किया।

पं. जवाहरलाल नेहरू अस्सी के करीब ही जा पहुँचे थे, पर उन्होंने न कभी अपने को वृद्ध कहा और न किसी को कहने दिया।

यूनानी नाटककार सोफोक्लीज ने 90 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक ‘ईडीपस’ लिखा था। अंग्रेजी कवि मिल्टन 44 वर्ष की उम्र में अन्धे हो गये थे। इसके बाद उन्होंने सारा ध्यान साहित्य रचना पर केन्द्रित कर दिया। 50 वर्ष की उम्र में उन्होंने ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखा। 62 वर्ष में उनका ‘पैराडाइज रीगेन्ड’ प्रकाशित हुआ। जर्मन कवि गेटे ने अपन ग्रन्थ ‘फास्ट’ 80 वर्ष की आयु में पूरा किया। 92 वर्ष का अमेरिकी दार्शनिक जानडेवी अपने क्षेत्र में अन्य सभी विद्वानों में अग्रणी था।

दार्शनिक ‘कैन्ट’ को साहित्यिक ख्याति 74 वर्ष की आयु में मिली जब उसकी ‘एन्थ्रो पोलोजी’ ‘मेटा फिजिक्स आफ ईथिक्स’ और “स्ट्राइफ आफ फैकल्टीज” प्रकाश में आईं। होब्स ने 88 वर्ष की उम्र में ‘इलियड’ का अनुवाद प्रकाशित कराया था। चित्रकार टीटान का विश्व विख्यात चित्र ‘वैटिल आफ लिमान्टो’ जब पूरा हुआ तब वे 98 वर्ष के थे।

अलबर्ट आइन्स्टीन की तरह ही थे जो कि अपने अन्तिम दिनों तक बराबर काम करते रहे, सेमुअल मोर्स ने टेलीग्राफ आविष्कार की अपनी प्रसिद्धि के बाद अपने को व्यस्त रखने के लिए अनेकों महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों में लगाये रखा। जिनके लिये उन्हें ख्याति प्राप्त है। महात्मा टालस्टाय अस्सी वर्ष की अवस्था के बाद भी इतनी चुस्ती, गहराई और प्रभावशील ढंग से लिखते रहे कि उसकी बराबरी आधुनिक यूरोप के किसी लेखक द्वारा नहीं हो सकती।

विक्टर ह्यूगो तिरासी वर्ष की आयु तक मृत्यु पर्यन्त लिखते रहे। वृद्धावस्था उनकी अद्भुत शक्ति तथा ताजगी पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकी। टेनीसन ने अस्सी वर्ष की प्रौढ़ावस्था में अपनी सुन्दर रचना “क्रासिंग द वार” दुनिया को भेंट की। राबर्ट ब्राऊनिंग जिन्हें कवि के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है अपने जीवन के सन्ध्याकाल में भी सक्रिय बने रहे। उन्हें छियत्तर वर्ष की उम्र में मृत्यु से कुछ पूर्व ही अपनी दो सर्व सुन्दर रचनाएँ “टेबेरी” एवं एपीलाग टू आसलेण्डी लिखी थी।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक यूटोपिया लेखक एच. जी. वेल्स ने सत्तर वर्ष का जन्मदिन मनाने के उपरान्त भी पूरी चुस्ती और कर्मठता के साथ एक दर्जन नयी पुस्तकों की घोषणा की। व उसे पूरा कर दिखाया। महान साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशा की 93 वीं वर्षगाँठ मनाई गई तो उनने बताया कि इन दिनों वे इतना अधिक लिखते हैं जितना कि 40 वर्ष की आयु में भी नहीं लिख पाते थे। दार्शनिक वेनैदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रूप से 10 घण्टे काम करते थे। उनने दो पुस्तकें तब पूरी कीं जब वे 85 वर्ष के थे। वटेन्ड रसैल को जब नोबुल पुरस्कार मिला तब वे 78 वर्ष के थे। मारिस मैटर लिंक का देहावसान 88 वर्ष की आयु में हुआ। मरने के दिनों ही उनकी अन्तिम पुस्तक ‘दि एवाट आफ सेतुवाल’ प्रकाशित हुई जिसे उनकी रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ब्रिटेन के प्रख्यात पत्र ‘डेली एक्सप्रेस’ के संचालक लार्ड वीवन वर्क लगभग 80 वर्ष की आयु तक पहुँचते हुए भी अपने दफ्तर में जमकर दस घण्टे बैठते थे।

महारानी विक्टोरिया ने अपनी बहुत बड़ी जिम्मेदारियों को ब्यासी वर्ष की अवस्था तक कुशलता के साथ निभाया। मेरीसमरबिले ने ब्यासी साल की आयु में परमाणु (मालेक्यूलर) तथा अणुवीक्षण यन्त्र सम्बन्धी (माइक्रोसकोपिकल) विज्ञान पर अपनी उपयोगी एवं बहुमूल्य रचना प्रकाशित की। मिसेज लूक्रेरिया सत्तासी वर्ष की उम्र तक महिलाओं को ऊपर उठाने तथा विश्वशान्ति के लिये अथक रूप में निस्वार्थ सेवा कार्यों में जुटी रहीं।

पेरिस की 80 वर्षीय महिला सान्द्रेवच्की पिछले दिनों सारवोन विश्वविद्यालय की विशिष्ट छात्रा थी। उन्होंने 60 वर्ष पूर्व छोड़ी हुई अपनी कक्षा की पढ़ाई जब आरम्भ की तब इस महिला के तीन पुत्र, सात नाती नातिन और एक ‘परनाती’ थे। भारत की कोकिला कही जाने वाली श्रीमती सरोजिनी नायडू एवं श्रीमती एनी बेसेण्ट ने वृद्धावस्था में भी राष्ट्र, धर्म तथा मानवता की जो सेवाएँ कीं, वे चिरस्मरणीय रहेंगी।

सिसरो ने अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व तिरेसठ वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक “एट्रीटिज ऑन गोल्ड एज” की रचना की। कीरो ने अस्सी साल की उम्र में ग्रीक भाषा सीखी थी। प्रसिद्ध दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, लेखकों के ये उदाहरण इस तथ्य की साक्षी हैं कि इच्छा शक्ति जब तक है तब तक आयु भी साथ देती है। व्याधिग्रस्त विवेकानन्द, भगंदर के फोड़े से कष्ट भुगत रहे शंकराचार्य जब अन्तिम क्षणों तक कार्य करते जी सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि एक स्वस्थ मनुष्य सब कुछ सामान्य, सामर्थ्य अद्भुत होते हुए भी अपने हाथ-पाँव पसार दे, प्रमादग्रस्त जीवन जिए। ऐसे अनेकों उदाहरण और भी हैं, जब अपने आयु के उत्तरार्ध में महामानवों ने विलक्षण कहे जाने वाले कार्य सम्पन्न किए।

प्लूटार्क यूनान के माने हुए साहित्यकार हुए हैं। उन्होंने पचहत्तर वर्ष की आयु के बाद लैटिन भाषा पढ़नी आरम्भ की थी। इटली का प्रख्यात उपन्यासकार वोकेशियो को ढलती उम्र में साहित्यकार बनने की बात सूझी। उस ओर वह पूरी दिलचस्पी के साथ जुटा और अन्ततः मूर्धन्य कथाकार बनकर चमका।

दार्शनिक फ्रेंकलिन की विश्वव्यापी ख्याति है। वे पचास वर्ष की आयु तक दर्शन शास्त्र से अपरिचित रहे। दर्शन के प्रति रुझान इसके बाद ही उत्पन्न हुआ और वह उन्हें विश्व विख्यात बनाकर ही रहा। इस काल में रचित उनका साहित्य आज भी दर्शन शास्त्र की गीता माना जाता है।

पण्डित दामोदर सातवलेकर का उदाहरण तो प्रख्यात है। स्वाध्याय मण्डल पारदी के संस्थापक इस महापुरुष ने पैंसठ वर्ष की आयु के बाद अपना आन्दोलन चलाया एवं आर्ष ग्रन्थों की सटीक, व्याख्या पर वैदिक साहित्य का नवीनीकरण आधुनिक सन्दर्भ में किया। सुकरात के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध है कि वे मात्र दार्शनिक ही नहीं, संगीतज्ञ भी थे। उन्होंने साठ वर्ष पार करने के उपरान्त यह अनुभव किया कि बुढ़ापे की थकान और उदासी को दूर करने के लिए संगीत अच्छा माध्यम हो सकता है। अस्तु उन्होंने गाना सीखना आरम्भ किया और बजाना भी। यह क्रम उन्होंने मरते दिनों तक जारी रखा। अपनी स्फूर्ति व योगी मनःस्थिति का वे इसे मूल आधार मानते थे।

सर हेनरी स्पेलमैन अग्रगन्य विज्ञानवेत्ता हुये हैं। वे 60 वर्ष तक दूसरी तरह के काम करते रहे। इस उम्र में उन्हें वैज्ञानिक बनने की सूझी सो उन्होंने साइन्स की पुस्तकें पढ़नी आरम्भ कीं और उस दिशा में उनकी बढ़ती दिलचस्पी ने उन्हें उच्चकोटि की वैज्ञानिक सफलताऐं प्रदान की।

न्यूजीलैण्ड निवासी एक 85 वर्षीय वयोवृद्ध एल्फ्रेड एन. रीड ने लम्बी यात्रा अनवरत जारी रखने का कीर्तिमान स्थापित किया। उसे नार्थकेप से दक्षिणी न्यूजीलैण्ड के छोर तक की 2700 मील लम्बी यात्रा पैदल करनी थी। वह चलता ही रहा और जवानों की गति से नियत स्थान पर आशा से बहुत पहले ही जा पहुँचा। इतना ही नहीं उसने 90 वर्ष की आयु में भी सिडनी से मेलबोर्न तक की 630 मील की यात्रा सफलतापूर्वक सम्पन्न की और रास्ते में ऊँचे पर्वत लाँघे।

जीवट वाली लड़कियों में स्विट्जरलैंड की फुटिजर का नाम अविस्मरणीय रहेगा। उसने सदा बर्फ में ढके रहने वाले एल्लैलिन हार्न पर्वत की 13234 फुट चढ़ाई बिना थके चढ़कर दिखाई। तब वह मात्र आठ वर्ष की थी। अभी-अभी पिछले दिनों कुछ किशोरवय की लड़कियों ने नन्दादेवी की चढ़ाई पूरी कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म सफलता समूची जीवन साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है, वह कम है, उन्हें सफल जीवन जीने के लिए अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिए। सो वे कालेज जाने लगीं और 69 साल की उम्र में कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय की स्नातिका बन गईं। इसके बाद उन्होंने हालीवुड का दरवाजा खटखटाया। जिस आत्म-विश्वास के साथ वे बातें करती थीं उसे देखकर डायरेक्टरों ने उन्हें छोटा काम दे दिया। उनके परिश्रम, मधुर-स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व ने उस क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम करने का अवसर दिया अस्तु उन्होंने लगातार तेरह वर्षों तक प्रख्यात फिल्मों में काम किया।

82 वर्ष की उम्र में वे एक विद्वान शरीर-शास्त्री से यह परामर्श लेने गईं कि उनके पेट का माँस थुलथुला हो गया है। यह कसा हुआ कैसे हो सकता है। डॉक्टर गोलार्ड हाजर ने उपचार बताये। तद्नुसार उनका पेट भार मुक्त हो गया। साथ ही डाक्टर ने उनकी इतनी लम्बी आयु और चुस्ती का कारण पूछा तो उनने बताया कि आहार सम्बन्धी सतर्कता- व्यायाम में नियमितता और जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण ही उनकी वृद्धावस्था को जवानी स्तर की बनाये रहने में समर्थ हुआ है। उनका कथन था कि वे जिन्दगी को प्यार करती हैं और हर दिन को बहुत ही आनन्द का रसास्वादन करते हुए जीना चाहती हैं। मोटेतौर से यही था उनकी वृद्धावस्था को जवानी की स्थिति में बनाये रहने वाला कारण।

अमेरिका के प्रख्यात तेल व्यवसायी अरबपति राक फेलर पूरे 100 वर्ष जिये। उन्हें कभी बेकार समय गुजारते नहीं देखा गया। एक दूसरे व्यवसायी कोमोडोर विन्डरविट ने 70 वर्ष की आयु में व्यापार क्षेत्र में प्रवेश किया और दस वर्ष के भीतर ही वे सफल उद्योगपतियों की श्रेणी में जा पहुँचे। मोटर उत्पादक हैनरी फोर्ड 82 वर्ष आयु में भी उतने ही चुस्त पाये जाते थे। जितने कि वे जवानी में थे।

आमतौर से जवानी की क्षमता प्रधान मानी जाती है और कहा जाता है कि जरा-जीर्ण मनुष्य अशक्ति हो जाते हैं, कुछ कर नहीं पाते। इसी प्रकार कम आयु वाले के सम्बन्ध में भी यही मान्यता है कि शारीरिक मानसिक विकास न होने के कारण वे कच्ची उम्र में कुछ महत्वपूर्ण काम करने- बड़ी जिम्मेदारी उठाने के अयोग्य रहते हैं। किन्तु बात ऐसी है नहीं। क्षमता आयु से सम्बन्धित नहीं जीवट पर निर्भर है। लगन से गहराई में उतरने और समान श्रम मनोयोग के साथ अनवरत कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। जहाँ यह विशिष्टता उभरी वहाँ न तो योग्यता की कमी रहती न क्षमता में न्यूनता रह जाती है। वृद्धों की तरह कम उम्र के व्यक्तित्वों द्वारा सम्पन्न किये गये महान कार्यों के भी अनेकानेक उदाहरण उपलब्ध हैं।

जवानी और प्रौढ़ता में सम्पन्न इन पुरुषार्थियों की सारी साक्षियाँ बताती हैं कि मनुष्य के अन्दर अनन्त शक्ति सामर्थ्य है। पुरुषार्थ द्वारा उन्हें जगाकर कोई भी श्रेयाधिकारी बन सकता है। न केवल भौतिक क्षेत्र में, अपितु आत्मिक जगत में भी ये ही सिद्धान्त लागू होते हैं। अन्दर का वर्चस् जगाने- उभारने के लिये योगाभ्यास किए जाते हैं। बीज रूप में प्रसुप्त पड़ी सारी विभूतियाँ हर किसी को करतलगत हो सकती हैं चाहे उस व्यक्ति के लिए परिस्थितियाँ कितनी ही प्रतिकूल हों। यह कथन सर्वथा मिथ्या है, एक भ्रान्ति है कि महापुरुष कोई विशेष लोक से आते व प्रकट होते हैं। हर व्यक्ति ओजस् और वर्चस् शक्ति पुँज है। आत्मबोध होने व पराक्रम पुरुषार्थ हेतु जुटने भर की कमी ही होती है जो व्यक्ति को ऊँचा नहीं उठने देती है।


गोताखोर (kahani)

समुद्री यात्रा से लौटे हुए एक यात्री ने एक गोताखोर से पूछा- “बन्धु! मैं तो हजार मील यात्रा कर आया पर मुझे तो कहीं, एक भी मोती न मिला, तुम तो एक दिन में ही ढेरों मोती ढूँढ़ लेते हो?”

गोताखोर ने डुबकी लगाने से पूर्व कहा- “भाई! मैं अपने जीवन को संकट में डालकर गहरे में उतरता भी तो हूँ, तुम्हारी तरह चलता ही नहीं रहता।”


मनुष्येत्तर प्राणियों में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमताएँ

मनुष्य सहित हर प्राणी में उससे कहीं अधिक क्षमता विद्यमान है जितना कि वह अपने शरीर और मन के द्वारा कार्यान्वित कर पाता है। शक्तियों का स्वरूप ऐसा है जिसमें जब जिन्हें काम में लाया जाता है तब वे उतनी मात्रा में सक्षम रहती हैं और जब उनका प्रयोग-उपयोग नहीं होता तो वे फिर ऐसे ही निरर्थक पड़ी-पड़ी प्रसुप्त स्थिति में चली जाती हैं। बीज नाश तो नहीं होता किन्तु क्रियान्वित न किये जाने पर उनका शिथिल या विस्मृत हो जाना स्वाभाविक है। साथ ही यह भी सम्भव है कि यदि उन्हें प्रयत्नपूर्वक जगाया जाय तो वे सजीव सक्रिय ही नहीं प्रखर भी हो उठती है। अभ्यास इसी का नाम है। साधन भी इसी प्रयत्नशीलता को कहते हैं।

मनुष्यों की अतीन्द्रिय क्षमता का आभास समय-समय पर मिलता रहता है। जो कार्य प्रत्यक्ष इन्द्रियों के द्वारा नहीं हो सकता उसे अतीन्द्रिय क्षमता जागृत होने पर किया जा सकता है। दूर श्रवण, दूरदर्शन, विचार संचालन, भविष्य कथन, पूर्वाभास, जैसी अनेक अतीन्द्रिय क्षमता को मनुष्य में पाया गया है। उनका कारण ढूँढ़ने तथा जगाने का उपाय ढूँढ़ने में विज्ञजन संलग्न हैं। आशा की गई है कि निकट भविष्य में मनुष्य उसी प्रकार चेतनात्मक रहस्यों से भी लाभान्वित होने लगेगा। जिस प्रकार पदार्थ विज्ञान की सहायता से कुछ दिन पूर्व तक के अविज्ञात प्रकृति शक्तियों का भरपूर लाभ उठ रहा है।

अब प्रमाण मिल रहे हैं कि मनुष्य की तरह विभिन्न प्राणियों में भी अतीन्द्रिय क्षमता पाई जाती है और वे भावी सम्भावनाओं का बहुत कुछ पूर्वाभास प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य की तरह उन्हें भी प्रशिक्षित किया जाय तो वे इन सामर्थ्यों को विकसित कर सकते हैं और उस का लाभ मनुष्य को दे सकते हैं। इस प्रकार सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में मनुष्येत्तर प्राणी भी सम्मिलित हो सकते हैं। इस सफलता का लाभ उठा सकने में मनुष्य समाज की भी हिस्सेदारी हो सकती है। जबकि अभी इस विशेषता का लाभ वे अपनी ही आत्मरक्षा के लिए उठा पाते हैं।

अन्यान्य पशु-पक्षियों में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमता का आभास, प्रमाण समय-समय पर मिलता रहता है।

प्रकृतिगत दुर्घटनाओं तथा अशुभ सम्भावनाओं के सम्बन्ध में अब एक भी ऐसा माध्यम निकल कर नहीं आया है जो सही भविष्यवाणी कर सके। किन्तु पशु-पक्षियों द्वारा दी गई पूर्व सूचनाओं में से एक भी अवसर ऐसा नहीं गया जो मिथ्या सिद्ध हुआ है। चीनी विशेषज्ञों ने पिछले दिनों हुए 11 भूकम्पों के विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि ऐसी भविष्य वाणियों जहाँ भी- जिन दिनों भी दी गई वे सभी सही सिद्ध हुईं। इस सम्बन्ध में पांडा (विशेष किस्म की बिल्ली) याक (सुरागाय) जैसे जानवरों ने तो न केवल चिल्लाना आरम्भ किया था वरन् भूखे होने पर भी चारा लेने से इन्कार कर दिया था। यहाँ तक कि चींटियाँ भी अपनी हलचलें बन्द करके स्तब्ध हो गई थीं।

चीन के तांग शान क्षेत्र में सन् 1976 में भयंकर भूकम्प आया था। जिसमें लाखों व्यक्ति मारे गये। किन्तु साथ ही यह भी सच है कि मात्र पशु पक्षियों द्वारा दी गई चेतावनी के आधार पर प्रायः 10 लाख व्यक्तियों ने भाग में अपनी जाने बचा ली थी।

स्टेन फोर्ड अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष डॉ. विलियम काट्स का निष्कर्ष है कि भूकम्प तूफान जैसी घटनाओं से एक दो दिन पूर्व वायुमण्डल में विद्युतीय सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं। उन्हें मशीनें तो नहीं पकड़ पाती पर अधिक संवेदनशील इन्द्रियों वाले प्राणी पकड़ लेते हैं। क्योंकि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ मशीन की तुलना में इन प्राणियों को संवेदन शक्ति प्रायः एक हजार गुनी अधिक पाई गई है।

सन् 1963 में यूगोस्लाविया के स्कोटजी क्षेत्र में भयानक भूकम्प आया था। उस दुर्घटना में प्रायः वह सारा नगर ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया। इसका पूर्व अनुमान किसी को भी नहीं था किन्तु देखा गया था कि दुर्घटना से कई घन्टे पूर्व उस क्षेत्र के जानवर बुरी तरह स्थान छोड़कर सुरक्षित दिशा में भग चले थे। जो रस्सियों से बँधे थे या चिड़ियाँ घर में कैद थे उन्होंने कुहराम मचा रखा था और बन्धन से छूटने का प्राणपण से प्रयत्न कर रहे थे। उनने बुरी तरह चिल्लाना आरम्भ करके सभी को हैरान कर दिया था। उस समय तो इस कुहराम का कारण न समझा जा सका किन्तु बाद में जाना गया कि इन प्राणियों को भूकम्प की सूचना उनकी अतीन्द्रिय क्षमता ने बता दी थी और वे आत्मरक्षा के लिए न केवल प्रयत्नशील थे वरन् दूसरों को भी चेतावनी दे रहे थे।

जर्मनी फ्री वर्ग इन्स्टीट्यूट के इन्स्टीट्यूट ऑफ पैरासाइकालोजी के अध्यक्ष हेन्स बैण्डर ने प्राणियों में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमता अनेकों प्रमाणों का उल्लेख किया है। उसमें दूसरे महायुद्ध काल की उस घटना को भी उद्धत किया गया है जिसमें भयानक बमबारी से पूर्व एक बतख ने फ्री वर्ग पार्क में गलाफार्ड कुहराम मचाया था। उसे नागरिकों ने विपत्ति की पूर्व सूचना समझा और इतनी देर में बचाव का जो उपाय सम्भव था वह उनने कर लिया। बतख मरते दम तक शोर मचाती रही और अन्ततः उसी बमबारी की शिकार हो गई। बाद में वहाँ के नागरिकों ने उसे कृतज्ञतापूर्वक स्मरण रखा और एक दर्शनीय स्मारक बनाया।

शेप्यूलिन (फ्रांस) में जीन ड्यूजी नामक व्यक्ति का एक पालतू कुत्ता था- स्पेवियल। ड्यूजी पर डाकुओं ने आक्रमण किया और उसे मारकर लाश को पास की नदी में फेंक दिया। ढूँढ़ खोज होती रही। पर ड्यूजी का कहीं पता न चला। पर कुत्ते ने अपने मरे हुए मालिक की लाश को खोज निकाला। उसने छह दिन और छह रात गाँव के परिचित लोगों के पकड़े खींचकर नदी तट तक ले जाने का प्रयत्न किया। कई दिन तक तो इस विचित्र व्यवहार का कोई कारण न समझा जा सका पर जब लोग कुत्ते के आग्रह पर वहाँ तक गये तो उन्होंने नदी में डूबी हुई लाश को निकाल लिया।

अपराधियों की खोज में कुत्तों की भूमिका सर्वविदित है। इस प्रयोजन के लिए पुलिस विभाग के लिए उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है। वे जासूसी के लिए मनुष्य की तुलना में अधिक सुयोग्य पाये गये हैं। यह कठिन कार्य वे अपनी घ्राण शक्ति की विशेषता के कारण ही कर पाते हैं। इस ढूँढ़ खोज में उनकी आँखों का- सूझबूझ का प्रयोग नहीं होता वरन् वे अपराधी के शरीर से निकलने वाली एक विशेष गन्ध की दिशा का अनुसरण करते हुए पीछा करते हैं और वहाँ जा पहुँचते हैं जहाँ अभीष्ट व्यक्ति रह रहा होता है। स्मरण रहे हर व्यक्ति की अपनी एक विशेष गन्ध होती है। जैसे किसी का चेहरा किसी दूसरे से नहीं मिलता उसी प्रकार यह गन्ध भी हर किसी की अलग-अलग होती है। कुत्ते को सर्वप्रथम उस गंध से परिचित कराया जाता है जिसका कि उसे पीछा करना है। यह कार्य अपराध हुए स्थान पर कुछ समय ठहर कर यह प्रशिक्षित कुत्ते भली प्रकार का लेते हैं और अपराधी की खोज पर टेड़े-मेड़े रास्तों को पार करते हुए निकल पड़ते हैं।

बुलन्द शहर (उ.प्र.) के निकटवर्ती गाँव मनरेजपुर में दीवार ढहने के कारण एक व्यक्ति उसके नीचे दब गया। उसके पालतू कुत्ते को यह जानकारी सबसे प्रथम प्राप्त हुई और उसने वहाँ कुहराम मचाना आरम्भ कर दिया। जब तक लोग पहुँचे और खोद कर लाश निकाली तब तक कुत्ता धाड़ मार कर रोता रहा और जब देखा कि उसका मालिक मर चुका तो उसने भी उस दृश्य को देखकर छटपटाते हुए प्राण त्याग कर दिये।

‘दि साइकिक पावर आफ एनीमल्स’ ग्रन्थ के लेखन विलशूल ने ऐसी अनेकों घटनाएँ उद्धृत की हैं जिनसे प्रतीत होता है कि पशुओं में बुद्धिमत्ता भले ही कम हो पर वे अतीन्द्रिय क्षमताओं की दृष्टि से मनुष्य की तुलना में कहीं आगे होते हैं। पुस्तक में 1929 की उस घटना का उल्लेख जिसमें सड़क पर सटपट दौड़ता हुआ घोड़ा यकायक ठिठका और बहुत धमकाने पर भी एक कदम आगे न बढ़ा। बाद में कुछ ही मिनट बाद उसी सड़क पर आकाश से बिजली गिरी और पेड़ पौधे तक जल गये। यदि घोड़ा बढ़ गया होता तो उसे सवार समेत दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है।

ऐसी ही एक और घटना का उस पुस्तक में उल्लेख है। सिंगसिंग की जेल में एक कोठरी के सामने वहाँ रहने वाला कुत्ता बेतरह चिल्लाने लगा। बार्डरों ने आकर देखा तो पाया कि एक कैदी आत्म हत्या कर रहा था। कुत्ते ने सूचना देकर उस दुर्घटना को होते-होते बचा दिया।

शूल ने चूहों में भी यह क्षमता पाई है। उन्होंने मैन हटन की एक विशालकाय पुरानी कोठी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उसमें से चूहे झुण्ड बना कर तीन किश्तों में भागे और सैकड़ों की संख्या में अपना पुराना निवास छोड़कर एक समय पलायन कर गये। इसके उपरान्त उस कोठी में रहने वालों पर लगातार अप्रत्याशित विपत्तियाँ आईं और किसी न किसी कारण बड़ी संख्या में एक-एक करके मौत के मुँह में चले गये।

जलयानों में अब से कुछ समय पूर्व चूहे पाले और खुले रखे जाते थे। इसलिए कि तूफान आने की पूर्व सूचना वे दे सकें। जब कभी तूफान आने को होते हैं चूहों को उसकी पूर्ण जानकारी मिलती है और वे अन्यत्र भाग जाने का उपक्रम करते हैं। इस आधार पर जलपोतों के संचालक सावधान हो जाते थे और बचाने का प्रयत्न करते थे।

पशुओं की विशिष्ट क्षमताओं का अनुसंधान करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक जे.वी. राईन ने ऐसे अनेकों प्रमाण एकत्रित किये हैं जिनमें वे इन प्राणियों को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न मानते हैं। उनने अपने अनुसंधान प्रकाशन में कैलीफोर्निया के प्रिंसिपल स्टेसी वुड्स की बिल्ली का उल्लेख किया है। जो मालिक से बिछुड़ जाने पर उन्हें 24 महीने लगातार खोजती रही और एण्डरसन से ओकलाहोमा के बीच की 2400 मील दूरी को पार कर किसी प्रकार भटकते-भटकाते उन तक जा पहुँचने में सफल हुई थी। मालिक को स्वप्न में भी इसकी आशा नहीं थी कि द्रुतगामी बहनों द्वारा सफर करने पर भी बिल्ली उन्हें खोज निकालेगी और संकट भरे रास्ते पार करने का तथा सही स्थान ढूँढ़ निकालने में सफल होगी।

मेड फोर्ड में मकान की अदला बदली के सिलसिले में मार्टिन रास की लूपी बिल्ली कहीं गायब हो गई। बिल्ली कहीं इधर-उधर होगी कि मालिक अपना असवाव बाँध कर घर से बहुत दूर नये मकान में चला गया। बिल्ली ने मालिक को और मालिक ने बिल्ली को खोजा, पर कोई किसी का पता न पा सका।

बिल्ली ने आखिर मालिक को खोज ही निकाला। सैकड़ों मील दूर सर्वथा अपरिचित इलाके में वह वहीं जा पहुँची जहाँ मालिक ने नया मकान लिया था। उसने किस प्रकार पता पाया और इतना लम्बा अपरिचित रास्ता किस प्रकार पार किया, इस पर मार्टिन आश्चर्यचकित रह गया।

राइन ने ऐसी ही एक और घटना एक कबूतर की अंकित की है। वर्जीनिया के समर्सबिले नगर के एक पकिन्स नामक लड़के ने एक कबूतर पाला था। पहचान के लिए उसके पैर में एक छल्ला पहना दिया जिस पर ‘186’ लिखा था। कबूतर पलता रहा। एक बार लड़का दुर्घटनाग्रस्त हुआ और उसे 120 मील दूर अस्पताल में आपरेशन के लिए भर्ती कराना पड़ा। कई दिन बीतने पर जिस समय बाहर घोर बर्फ पड़ रही थी। एक कबूतर अस्पताल कर्मचारियों के प्रतिरोध की परवाह न करता हुआ लड़के के बिस्तर पर जा बैठा। ऐसा वहाँ पहले कभी नहीं हुआ था- सभी स्तब्ध थे। लड़के ने हाथ बढ़ाकर देखा तो यह उसका वही पालतू कबूतर था जिसके पैर में ‘186’ अंकों वाला छल्ला पहना रखा था।

वर्षा आने से पूर्व काली चींटियाँ अपने अण्डे लेकर ऊँचे या छाया वाले ऐसे स्थानों की ओर चल पड़ती हैं जहाँ सुरक्षा सम्भव हो सके। मेंढ़कों का लगातार टर्राना भी वर्षा के आगमन की पूर्व सूचना है।

विभिन्न प्राणियों में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमता को देखते हुए लगता है कि वे भी अपने क्षेत्र में अपने किस्म के सिद्ध पुरुष हैं। यह विशेषताएँ उनके लिए तो उपयोगी हैं ही, यदि मनुष्य चाहे तो वह भी उनका इन विशेषताओं से अब की अपेक्षा भविष्य में कहीं अधिक लाभ उठा सकता है।


मानवी पुरुषार्थ और कर्मफल के सिद्धान्त

एक भविष्य वक्ता थे। लोगों की उनकी नियति बताते साथ ही कर्म द्वारा उसमें घट-बढ़ होने की सम्भावना से भी अवगत करते।

एक दिन दो मित्र उनके पास आये। भविष्य पूछने लगे। उनने एक को एक महीने बाद फाँसी होने तथा दूसरे को राज्य सिंहासन मिलने की भवतव्यता बताई।

जिसे राज सिंहासन मिलना था वह अहंकार में डूबा और मनमाने आचरण करने लगा। इस अवधि में कुकर्मों की अति कर दी। एक महीना होने को आया तो सड़क पर रुपयों की एक थैली पड़ी मिली। उसे उसी दिन सुरा सुन्दरी के घर पहुँचा दिया।

जिसे फाँसी लगनी थी उसने शेष थोड़ी-सी अवधि को दिन-रात सत्कर्मों में निरत रहने के लिए लगा दिया। पुण्य परमार्थ जो सम्भव थे उसमें कमी न रहने दी। महीना पूरा होने को आया तो पैर में एक काँटा चुभा और थोड़े दिन कष्ट देकर अच्छा हो गया।

महीना निकल गया पर न एक को फाँसी लगी और न दूसरे को सिंहासन मिला तो वे भविष्य वक्ता के पास पहुँचे और कथन मिथ्या हो जाने का कारण पूछा।

उत्तर में उनने कहा- “भवतव्यता को कर्मों से हलका भारी भी किया जा सकता है। फाँसी, काँटा लगने जितनी हलकी हो गई और सिंहासन हलका होकर रुपयों की थैली जितना छोटा रह गया।

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एक देश का रिवाज था कि जो राजा चुना जाता उसे दस वर्ष राज्य करने दिया जाता। इसके बाद से ऐसे निर्जन द्वीप में उतार दिया जाता जिसमें निर्वाह के कोई साधन न थे। बेचारा भूखा प्यासा दम तोड़ता। अनेकों राजा इसी प्रकार दुर्गतिग्रस्त होते रहे।

एक बुद्धिमान राजा उस गद्दी पर बैठा। पता लगाया दस वर्ष बाद किस द्वीप में जाना है। अगले ही दिन में उसने उसमें सुविधाएँ उत्पन्न कर दी। इस अवधि में वह द्वीप सुविधा सम्पन्न देश हो गया। नियत समय पर राजा को वहाँ बसने में कोई कठिनाई नहीं पड़ी।

परलोक ही वह द्वीप है जहाँ हर किसी को जाना पड़ता है। वहाँ सुविधा उत्पन्न करने वाला परमार्थ कमाया जाता रहे तो जीवन के उपरान्त भी सुख शान्ति की कमी न रहे।

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एक ब्राह्मण ने बगीचा लगाया। नजर बचाकर उसमें एक गाय घुस गई और कितने ही हरे-भरे पौधे चर लिये।

देखा, तो ब्राह्मण आग बबूला हो गया। आवेश में जोर से ऐसा लट्ठा मारा कि गाय चक्कर खाकर गिर पड़ी और वहीं उसका प्राणान्त हो गया।

उन दिनों गौ-हत्या को बहुत बड़ा पाप माना जाता था। प्रायश्चित्त का दण्ड विधान भी बहुत कठोर था। सो ब्राह्मण डर गया और दण्ड से बचने के लिए वेदान्त झाड़ने लगा। जो पूछता उससे कहता- हाथों का अधिष्ठाता इन्द्र है। उसका प्रेरणा से हाथ काम करते हैं तो दोष मेरा नहीं इन्द्र का है वही इस गौहत्या का पाप ओढ़ेगा।

गौ हत्या एक राक्षसी का रूप बनाकर खड़ी थी। ब्राह्मण ने उसे स्वीकार नहीं किया तो वह इन्द्र के पास चली गई। सारा विवरण सुनाया और कहा दोष आपका हो तो आप ही मुझे स्वीकार कीजिए।

इन्द्र इस विचित्र आक्षेप पर क्षुब्ध थे। वे गौ-हत्या को साथ लिए वेष बदलकर बगीचे में राहगीर बनकर पहुँचे। बगीचे की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। जिसने कितने परिश्रम और कौशल से इसे लगाया है उसके दर्शन की इच्छा व्यक्त करने लगे।

प्रशंसा सुनकर ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और सामने आकर विस्तारपूर्वक वह सब बताने लगा कि उसने किस प्रकार इस बगीचे को लगाया और धन कमाया।

इन्द्र असली रूप में प्रकट हुए और बोले- जब हाथों के परिश्रम का श्रेय और लाभ आपको मिला तो इन्हीं के द्वारा किये गये पाप कर्म का फल इन्द्र क्यों भोगे?

ब्राह्मण से कुछ उत्तर देते न बन पड़ा और गौ-हत्या उस पर सवार हो गई।


परोक्ष से सम्पर्क स्थापित कर बहुत कुछ हस्तगत किया जा सकता है।

दृश्य जगत में सज्जनता और सहायता की सद्भावनाएँ भी अनेक स्थानों पर अनेक व्यक्तियों द्वारा चरितार्थ की जाती हैं। दुर्घटनाग्रस्त लोगों की सहायता के लिए कितने ही उदार चेता दौड़ पड़ते हैं और पीड़ितों की सहायता करने को सामर्थ्य भर प्रयत्न करते हैं। भूकम्प, बाढ़, दुर्भिक्ष, महामारी जैसी विपत्तियाँ आती हैं। उनमें जहाँ एक ओर धन-जन की अपार हानि होती है वहाँ दूसरे प्रकार की सेवाभावी गतिविधियाँ भी दृष्टिगोचर होती हैं। मनुष्य के स्वभाव में भी कम नहीं किन्तु उदारता एवं सद्भावना से भी उस क्षेत्र को रिक्त नहीं कहा जा सकता।

आपत्ति काल न सही सामान्य अवसरों पर भी सद्भाव सम्पन्न व्यक्ति दूसरे की सेवा सहायता करने का प्रयास करते हैं। इसमें उन्हें आत्म-सन्तोष मिलता है। दूसरों को आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने का लाभ मिलता है। सुकृत्यों की प्रशंसा होती है और वैसा अनुकरण करने का अनेकों में उत्साह उत्पन्न होता है। प्याऊ, धर्मशाला, सदावर्त, तालाब, उद्यान, छात्रवृत्ति, अस्पताल, विद्यालयों आदि के सत्कृत्यों में कितने ही व्यक्ति अपना श्रम, समय और धन लगाते देखे गये हैं।

यह उदारता अदृश्य जगत में निवास करने वाली दिव्य आत्माओं में होती है, वे अपनी अहैतुकी कृपा बरसा कर अनेकों को कष्टों से छुड़ाती, सुखी बनाती तथा परामर्श सहयोग देकर समुन्नत बनाने का पुण्य परमार्थ करती रहती हैं। ऐसे अनुग्रह किस प्रकार प्राप्त किये जा सकते हैं, किन्हें मिलते हैं, कहाँ से मिलते हैं, क्यों मिलते हैं, इसका सुनिश्चित कारण तो अभी भी रहस्य के गर्भ में छिपा पड़ा है किन्तु ऐसी घटनाओं का घटित होते रहता सुनिश्चित है। उन्हें सुयोग, संयोग, वरदान आदि कुछ भी कहा जाय पर ऐसा घटित अवश्य होता रहता है। उसे किन्हीं अदृश्य आत्माओं की अहैतुकी कृपा अनुकम्पा का नाम दिया जा सके।

सोने की खान से सम्बन्धित एक स्वप्न 4 जुलाई 1891 की रात्रि नो दक्षिण अफ्रीकी विनफील्ड स्कॉट स्ट्राटन नामक व्यक्ति को दिखाई पड़ा। पिनफील्ड स्कॉट अपना व्यापार का धन्धा करता था, किन्तु दुर्भाग्यवश उसे व्यापार में इतना घाटा हुआ कि वह एक कौड़ी का भी आदमी नहीं रहा। दुःखी और उद्विग्न मन से इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन इसी प्रकार भटकते हुए वह कोलेरेडो क्षेत्र के एक मैदान में जा पहुँचा और रात्रि वहीं बिताने का निश्चय किया। रात्रि को जब वह सो रहा था तो उसे एक स्वप्न दिखाई पड़ा। सपने में उसने देखा कि एक फरिश्ता आया है और उसे वैटिल पहाड़ पर जाने का रास्ता बता रहा है। एक जगह पर निशान लगाकर बता रहा है कि यहाँ सोने की खदान है, तुम इसे पाकर मालदार बन सकते हो।

स्ट्राटन के पास पैसा बिल्कुल ही नहीं था। अतः उसने इस अद्भुत स्वप्न की चर्चा अपने सम्पन्न मित्रों से की और उसे जमीन को खरीद लेने का आग्रह किया, किन्तु सभी ने उसका उपहास उड़ाया और मदद करने से इन्कार किया। इससे स्ट्राटन निराश नहीं हुआ। वह अकेला ही वहाँ पहुँचा। हाथ से खोदने पर ही उसे सोने का डला मिल गया। इसके बाद उसने किसी प्रकार धन जुटाया, वह क्षेत्र खरीदा और खुदाई शुरू कर दी। वहाँ पर विपुल सोने का भण्डार था। इससे स्ट्राटन अरबपति बन गया।

स्वप्न में पूर्वाभास की एक सशक्त घटना 4 जुलाई 1891 में संसार का प्रख्यात धनपति और सोने की खान के स्वामी विनफील्ड स्ट्राटन के साथ घटी। उन्होंने स्वप्न में स्पष्ट देखा कि वह सोये हुए स्थान से बैटल पहाड़ की ओर चला है और एक स्थान पर थोड़ा ही खोदा कि सोने की खान मिल गयी। स्वप्न में देखे गये उस स्थान तक विनफील्ड तत्काल चल दिया और निश्चित स्थान पर पहुँचकर वहाँ थोड़ा ही खुरचा था कि सोने की झलक मिल गयी। इस प्रकार जो सोने की खदान की पट्टिका स्ट्राटन के हाथ लगी, वह संसार में दूसरे नम्बर की खदान है।

हालैण्ड की ‘डच सोसाइटी फार साइकिक रिसर्च’ ने स्वप्नों की सत्यता पर काफी शोध की है। इनकी फाइलों में एक सामान्य व्यक्ति की घटना यों उल्लिखित है- 1947 के नवम्बर मास में उक्त डच नागरिक ने 3784 का अंक स्वप्न में कई बार देखा। इसका कुछ रहस्य न समझ में आने से वह बड़ा परेशान रहा। एक दिन वही नम्बर उसने एक लाटरी के टिकट पर देखा और वह टिकट खरीद लिया। मार्च 1948 में उसी टिकट पर लाटरी का प्रथम पुरस्कार मिला। तब उसे स्वप्न का रहस्य समझ में आया। वस्तुतः दमित वासनाओं की अभिव्यक्ति ही नहीं इसके आगे कुछ और है वह है चेतना का पूर्वाभास।

पुरातत्व वेत्ता प्रो. ह्विल प्रिक्ट एक प्राचीन शिलालेख का अर्थ समझने का जी तोड़ कोशिश करते किन्तु विफल रहते। स्वप्न में उन्होंने देखा कि बेबीलोन का पुरोहित उस शिलालेख का अर्थ समझा रहा है। नींद से उठकर वह अर्थ नोट कर लिया और संगति बैठ गयी।

वाणभट्ट की प्रसिद्ध पुस्तक “कादम्बरी” की रूप रेखा तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर को गीतांजली की कविताओं का आभास स्वप्न में ही मिला था।

सन् 1509 में आस्ट्रिया का शासक था वान मैकाऊ। रोम के दौरे पर जाते समय उसकी मृत्यु हो गई। शव प्रजाजनों के दर्शनार्थ रखा गया। इसी बीच पहरेदारों में से एक ने सपना देखा कि मृतक अपने साथ बहुत-सी सम्पत्ति लिये जा रहा है। डरते-डरते उसके यह सपना राज्य के उत्तराधिकारी को सुना दिया। जगह-जगह तलाशी होने के साथ-साथ मृतक के पहने हुए कपड़ों की भी जाँच पड़ताल हुई। आस्तीन के कफ में सिली हुई एक रसीद मिली। उससे पता चलता था कि उसने जर्मनी के एक बैंक में तीन लाख सोने के सिक्के गुप्त रूप से जमाकर रखे हैं। वह राशि उन दिन के हिसाब से 20 लाख डालर की थी। रसीद के आधार पर वह राशि उत्तराधिकारी को मिली। स्वप्न बहुत मूल्यवान् साबित हुआ।

सन् 1883 में इटली के सैन बुर्ज क्षेत्र में एक विचित्र भूकम्प युक्त विस्फोट हुआ। इससे अगणित इमारतें टूटीं ओर धन-जन की क्षति हुई। आश्चर्य की बात यह है कि नगर के प्रधान प्रार्थना कक्ष को चाक पर चड़े बर्तन की तरह घुमाया और बिना किसी क्षति पहुँचाये दूसरी जगह ज्यों का त्यों खड़ा कर दिया। जबकि मठ का अन्य भाग टूटकर विस्मार हो गया।

ट्यूविन नामक एक जर्मनी नागरिक सन् 1657 में पैदा हुआ और 1724 में मरा। इन 67 वर्षों में उसे अनेक बार प्राण घातक दुर्घटनाओं को सामना करना पड़ा पर वह हर बार सकुशल बच गया।

एक बार जंगली सुअर की मुठभेड़ में वह चारों खाने चित्त गिरा और खड्ड में गिर जाने पर किसी प्रकार बचा। एक बार बाढ़ क्षेत्र में दौरा करते समय उसका घोड़ा कीचड़ में फँसने पर गिरा। घोड़ा ऊपर, सवार नीचे। मुश्किल से प्राण बचे। एक बार डाकुओं ने उस पर दस गोलियाँ चलाईं पर लगी एक भी नहीं। एक बार बर्फीले पहाड़ के नीचे से गुजरते समय एक भारी हिमखण्ड ऊपर गिरा और तब तक दबा रहा जब तक कि बर्फ पिघल कर वह नहीं गयी। एक बार वह अन्धड़ में फँसा और राइन नदी में डूबने उतारने लगा। एक बार एक भारी पेड़ उस पर गिरा, पता चलने पर जब लकड़ी उठायी गयी तब वह नीचे से निकला। एक बार एक नाव से नदी में गिर पड़ा। ऐसी-ऐसी और भी अनेक दुर्घटनायें उस पर से गुजरीं पर हर बार मौत को चुनौती देते हुए वह जीवित बच गया।

वियना के प्रख्यात चित्रकार जोसेफ आयनागर के पीछे-पीछे मौत का साया फिरता था जाने अनजाने उसे कई बार मौत ने घेरा पर उसका अदृश्य एवं अपरिचित सहचर उसे हर बार बचाता रहा। सन् 1880 में वुडापेस्ट में उसने फाँसी लगाकर आत्म-हत्या की। बचाने के लिए वह अदृश्य सहचर पहुँचा और रस्से से नीचे उतार लिया। सन् 1848 में क्रान्तिकारियों के रूप में शासन ने उसे मृत्यु दण्ड दिया। तब भी उस अपरिचित कैमूनियन भिक्षु ने राजा से मिलकर रद्द कराया। अन्ततः उसने 68 वर्ष की आयु में अपने सीने में आप गोली मार कर आत्महत्या कर ली। अन्तिम संस्कार कराने के लिए भी वहीं भिक्षु उपस्थित रहा।

सन् 1953 की बात है फ्राँसीसी डयूक डिगाइज की हत्या के अपराध में जान पाल ट्रोट नामक एक व्यक्ति को मृत्यु दण्ड दिया गया। मारने का तरीका यह निश्चित किया गया कि उसके दोनों हाथ दोनों पैर चार अलग-अलग मजबूत घोड़ों से बाँध दिये जायें। घोड़े एक साथ दौड़ाये जायें ताकि अपराधी के चार टुकड़े हो जायें। नियत व्यवस्था के अनुसार सेना के बलिष्ठ घोड़ों को घुड़सवारों द्वारा दौड़ाया गया पर आश्चर्य यह है कि घोड़े आगे न बढ़ सके। कैदी इतना मजबूत था कि उसका कोई अवयव न तो उखड़ता था न ढीला पड़ता था। घोड़े तीन बार बदले गये। बारहों घोड़े जब असफल रहे तो उसे रिहा कर दिया गया।

मैसूर के राजा ने नई तोप के उद्घाटन के अवसर पर उस क्षेत्र के एक प्रख्यात साधु से आशीर्वाद माँगा। इनकार किये जाने पर राजा बहुत क्रुद्ध हुआ और साधु को उसी तोप की नली से बाँधकर उड़ा देने का हुक्म दिया। वैसा ही किया भी गया। पर साधु मरा नहीं। पहली बार जब उसे बारूद भरी नली ने उड़ाया तो 800 फुट ऊँचाई पर उछलकर वह दूर खड़े हाथी की अम्बी पर जा गिरा। पकड़कर लाया गया और दुबारा फिर उसे उसी प्रकार तोप से कसा और उड़ाया गया। इस बार वह एक दूरस्थ झोंपड़ी के छप्पर पर जा गिरा और साधु बच गया। तीसरी बार उसे फिर नहीं बाँधा गया।

फ्रांस के प्लोइरसैल नगर का निवासी कैसिमीर पालेमस नामक व्यक्ति अपने जीवन में तीन बार जलपोत की दुर्घटना में फँसा और तीनों बार अकेला बच गया। वह साधारण व्यापारी था और काम चलाऊ तैरना जानता था। 11 जुलाई 1875 में ‘जीएन्ने कैथेरिम’ नामक जहाज के जल समाधि लेने पर वह अकेला ही बच पाया। इसी प्रकार 4 सितम्बर 1880 में ट्रीयज फ्रेरीज और 1 जनवरी 1882 के एल. ओडियन जहाज डूबे। उनके भी सारे यात्री डूब गये किन्तु अकेला वही व्यक्ति किसी प्रकार अपनी जान बचा सकने में सफल हुआ।

लिली ने हर्बर्ट को लाख समझाया कि उसे बहुत बड़े संकट की आशंका है वह यात्रा न करे। किन्तु हर्बर्ट जलपोत रवाना होने वाला था। वह किसी का नौकर था अतः उसे जाना ही था। अतः कप्तान हर्बर्ट लिली से विदा लेकर आफिस पहुँचा आवश्यक कागजात लेकर जहाज पर गया और जहाज दमिश्क के लिए चल पड़ा आधी रात की नीरवता, अचानक तूफानी हवाओं ने जहाज को आ घेरा, तूफान की तेज रफ्तार ने जहाज चरमरा कर रख दिया था। अब जान बचाने का एक ही रास्ता था कि किसी तरह जहाज के पाल खोल दिये जायँ तो विपरीत दिशा में जहाज चला जायेगा जिससे तूफान का आघात नहीं लगेगा और जहाज डूबने से बच जायेगा किन्तु जो भी पाल खोलने जायेगा उसी को मौत के मुँह में गया समझो। हर्बर्ट ने सोचा कि मरना यों भी है अतः साहस बटोरकर डेक पर गया और पाल की तरफ बढ़ा ही था कि एक छाया रास्ता रोककर खड़ी हो गई ठहरो हर्बर्ट ऊपर गये तो प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा और देखते देखते उस छाया ने पाल खोल दिये जहाज की दिशा बदल गयी वह विपरीत दिशा में चलने लगा। आकृति हर्बर्ट के पास गुजरी और कहती निकल गयी कि “मैं तुम्हारी लिली हूँ” और अदृश्य हो गयी। जहाज का अफसर और साथी सभी हैरान थे कि इतनी आसानी व शीघ्रता से पाल इस भयंकर तूफान में कैसे खुल गये और हर्बर्ट भीगा भी नहीं किन्तु हर्बर्ट ने यह रहस्य किसी को नहीं बताया। दमिश्क से लौटने पर हर्बर्ट ने लिली को बताया कि तुम्हारे रोकने पर मैं नहीं रुका तूफान में तुमने हमारी सबकी जान बचा ली। लिली ने कहा कि तुम्हारे जाने के बाद मेरा अन्तःकरण व मन तुम्हारे साथ ही लगा रहा था।

सन् 1919 में लिवरपूल में जेम्स नामक एक व्यक्ति के साथ जो पहले कभी फौज में रह चुका था- एक घटना घटित हुई। लड़ाई के दौरान तोपों की भयंकर गर्जना के कारण उसके कान के पर्दे फट गए और वह बहरा हो गया था। पेंशन पर आ जाने के बाद एक रात उसने स्वप्न में देखा कि वह लिवरपूल के पवित्र सेंट विनिफ्रेड कुएँ के पास खड़ा होकर उसमें से जल निकालकर स्नान कर रहा है। जैसे ही पानी शरीर पर पड़ा कि शीत की सी कँपकँपी लगी और उसी क्षण उसकी नींद टूट गयी। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। पास में सो रहें उसके घर वालों ने पूछा- कौन? यह शब्द सुनते ही उसके जीवन में नया प्रकाश आ गया। उसने आश्चर्यपूर्वक बताया- मैं जैम्स, पर यह क्या हुआ, कैसे हुआ- जिस बहरेपन को डॉक्टर नहीं ठीक कर पाये वह एक स्वप्न ने ठीक कर दिया।

रेवरेण्ड फ्रीमैन विल्स की लंगड़ी टाँगें भी इस तरह स्वप्न में ठीक हुई थी। स्वप्न में विल्स ने देखा कि कोई एक फरिश्ता ने आकर उनकी टूटी हुई टाँगों पर प्रकाश की किरण इस तरह फेंकी जैसी कोई प्लाज्मा लाइट बेल्डिंग करते समय किसी धातु पर फेंकी जाती है। स्वप्न टूटते ही उसने अपनी टाँगों को पूर्ण स्वस्थ पाया। यह घटना भी स्वप्न सत्ता की सर्व समर्थता का बोध कराती है।

एक बार प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारों एक होटल में ठहरे हुए थे। उस होटल का स्वामी मर चुका था। उसकी सम्पत्ति की वसीयत न होने के कारण बड़ा लड़का सब हड़प जाना चाहता था, जिससे उसका छोटा लड़का बहुत दुखी था। उसने अपना दुख-दर्द नोवारो को सुनाया पर वह कुछ भी मदद करने में असमर्थ था। एक दिन रात को स्वप्न में उसने देखा कि एक आदमी होटल के उसी कमरे के एक आले की ओर इशारा कर लकड़ी से उस स्थान पर ठक्क-ठक्क कर रहा है। नोवारो की नींद टूटने पर उसने समझा कि चूहे गड़बड़ कर रहे होंगे। पर पुनः सोने पर वही दृश्य दिखाई दिया। नींद खुलने पर इस बार उसने आले के कागज हटाकर देखे तो एक कागज में वसीयत लिपटी रखी मिली। उसने वह वसीयत होटल के मालिक के छोटे लड़के को दे दी और तद्नुसार वह भी आधी जायदाद का स्वामी बन गया और बड़े लड़के की मनसा अपूर्ण ही रह गयी।

कुछ दिन पूर्व शिकागो के एक वकील का आश्चर्यजनक समाचार छपा कि जब वह अपने बिस्तर के पास जाता है तो उसे अजीब तरह की संगीत की आवाजें सुनाई देती हैं। अभी इसी आश्चर्य का विश्लेषण नहीं हो पाया था कि एक ऐसे व्यक्ति का पता चला, जिसे चलते-फिरते सर्वत्र संगीत ध्वनियाँ सुनाई दिया करती थीं। एक मनोवैज्ञानिक ने उसकी विस्तृत खोज की। उसने बताया कि यह युवक एक ऐसे कारखाने में काम करता है, जहाँ वस्तुओं में निकिल की पॉलिश की जाती है। निकिल के कुछ कण साँस द्वारा शरीर में चले जाते हैं और आपस में इस तरह सम्बन्ध स्थापित करते हैं, जिससे विद्युत तरंगें पैदा होने लगी हैं। यह तरंगें किसी निकटवर्ती रेडियो स्टेशन के प्रसारणों को पकड़ने लगती हैं। शरीर में मात्र पकड़ने वाली विशेषता ही बढ़ी इसलिए पकड़ में वैसे ही प्रवाह आये। हो सकता है कि किसी अन्य व्यक्ति में किसी अन्य प्रकार की पकड़ जागृत हो और उसे तद्नुरूप शब्द अनन्त आकाश में से सुनाई पड़ने लगें।

‘स्काटलैंड’ के ‘इनवर्नेस’ स्थान पर 5 फरवरी 1866 को एक लड़का पैदा हुआ। जिसका नाम रखा गया विलियम मैकफर्सन। वह जन्मान्ध होने के साथ ही हस्तहीन भी था फिर भी वह मून टाइप के उभरे हुए अक्षरों को जीभ की नोक से पढ़ लेता था।

फ्रांस की एक लड़की एनेट फ्रेलन की विचित्रता अपने समय में बहुचर्चित रही। अविज्ञात प्रश्नों के उत्तर उसकी त्वचा पर इस प्रकार उभर आये थे जैसे स्याही से लिखे गये हों। बारह वर्ष की अवस्था में ही उसके शरीर में इस प्रकार की अद्भुतता प्रकट होने लगी। अक्षर स्वयं ही उभरते जब उससे कोई गूढ़ प्रश्न पूछा जाता और कुछ ही मिनटों में अदृश्य हो जाते थे।

इस प्रकार की घटनायें न मनुष्य के अपने पुरुषार्थ का प्रतिफल है और न उसकी शरीर संरचना में उस प्रकार की सम्भावनायें हैं। इससे आगे बढ़कर एक अदृश्य लोक भी ऐसा है जहाँ से समय समय पर मनुष्य को आकस्मिक अप्रत्याशित सहायतायें उपलब्ध होती रहती हैं।


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जीवन न अभिशाप है और न वरदान। वह एक परख और कसौटी है जिसमें अपनी सामर्थ्य का परिचय देने पर ही कुछ पा सकना सम्भव होता है। -टाकविल


मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है।

घासपात की तरह मनुष्य भी माता के पेट से जन्म लेता है। पेड़ पौधों की तरह बढ़ता है और पतझड़ के पीले पत्तों की तरह जराजीर्ण होकर मौत के मुँह में चला जाता है। देखने में तो मानवी सत्ता का यही आदि-अन्त है। प्रत्यक्षवाद की सच्चाई वहीं तक सीमित है, जहाँ तक इन्द्रियों या उपकरणों से किसी पदार्थ को देखा नापा जा सके। इसलिए पदार्थ विज्ञानी जीवन का प्रारम्भ व समाप्ति रासायनिक संयोगों एवं वियोगों के साथ जोड़ते हैं और कहते हैं कि मनुष्य एक चलता-फिरता पेड़-पादप भर है। लोक परलोक उतना ही है जितना कि काया का अस्तित्व। मरण के साथ ही आत्मा अथवा काया सदा-सर्वदा के लिये समाप्त हो जाती है।

बात दार्शनिक प्रतिपादन या वैज्ञानिक विवेचन भर की होती तो उसे भी अन्यान्य उलझनों की तरह पहेली बुझोअल समझा जा सकता था और समय आने पर उसके सुलझने की प्रतीक्षा की जा सकती थी। किन्तु प्रसंग ऐसा है जिसका मानवी दृष्टिकोण और समाज के गठन, विधान और अनुशासन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि जीवन का आदि-अन्त- जन्म-मरण तक सीमित है तो फिर इस अवधि में जिस भी प्रकार जितना भी मौज-मजा उड़ाया जा सकता हो क्यों न उड़ाया जाय? दुष्कृतों के फल से यदि चतुरतापूर्वक बचा जा सकता है तो पीछे कभी उसका दण्ड भुगतना पड़ेगा, ऐसा क्यों सोचा जाय? अनास्था की इस मनोदशा में पुण्य परमार्थ का- स्नेह सहयोग का-भी कोई आधार नहीं रह जाता। तब मत्स्य न्याय अपनाने, जंगल का कानून बरतने और “जिसकी लाठी तिसकी भैंस” वाली मान्यता का सहज ही बोलबाला होता है। यह जीवन दर्शन मनुष्य को नैतिक अराजकता अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। समाज के प्रति निष्ठावान रहने की तब कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

जीवन-मरने के बाद भी बचा रहता है, इस मान्यता को अपनाने से ही कर्मफल के सिद्धान्तों की पुष्टि होती है। नरक स्वर्ग का दण्ड पुरस्कार मिलने- यश-अपयश की चिन्ता करने पर ध्यान जाता है। अन्यथा जब मरण के साथ ही जीवन का अन्त होना हो तो फिर नीति मर्यादा का बाँध टूटे बिना रहता नहीं। तब आक्रमण, आतंक की अपराधी रीति-नीति अपनाने और सरलतापूर्वक अधिक लाभ उठाने के मार्ग पर चल पड़ना ही बुद्धिमता पूर्ण प्रतीत होता है। नास्तिकता का यही दर्शन व्यक्ति को पतित और समाज को न्याय रहित बनने की खुली छूट देता है।

जब दृश्य ही सब कुछ है तो न आत्मा की मान्यता टिकती है और न ईश्वरीय न्याय, विधान, अनुशासन का कोई महत्व प्रतीत होता है। यही है परोक्ष की अवमानना जिसे अनास्था या नास्तिकता कहा जाता है। यह दर्शन की एक शैली नहीं, वरन् सर्वतोमुखी पतन का राजमार्ग है। जो इसे अपनायेंगे तो वे सच्चे मन से नीति निष्ठा की आवश्यकता अनुभव न करेंगे। दबाव से जितना अंकुश सहन कर सकेंगे उतने तक ही वाँछित रहेंगे। अवसर मिलते ही दुष्टता एवं भ्रष्टता अपनाने से चूकेंगे नहीं। इसकी आत्यन्तिक परिणति क्या हो सकती है, उसकी कल्पना करने भर से दिल दहलने लगता है।

मरणोत्तर जीवन का विश्वास ही कर्मफल की पुष्टि करता है। उस मान्यता को जीवित रखकर ही सदाचार और परोपकार की लोकोपयोगी गतिविधियाँ जीवित रखी जा सकती है। यह दार्शनिक आवश्यकता नहीं एक सुनिश्चित सचाई भी है जिसे हर आधार पर सिद्ध किया जा सकता है।

इस सन्दर्भ में फोनोग्राफी, प्रकाश के बल्ब के आविष्कर्ता टामस एडीसन ने अत्यन्त बोधगम्य प्रकाश डालते हुए अपनी पुस्तक “द अल्टीमेट साइन्स” में लिखा है। “प्राणी की सत्ता उच्चस्तरीय विद्युत कण गुच्छकों के रूप में तब भी बनी रहती है जब वह शरीर से पृथक् हो जाती है। मृत्यु के उपरान्त यह गुच्छक विधिवत् तो नहीं होते, पर वे परस्पर सम्बद्ध बने रहते हैं। ये बिखरते नहीं वरन् आकाश में जिस प्रकार मधुमक्खी छत्ता छोड़कर विचरती है उस प्रकार विचरते हैं। मधुमक्खियाँ पुराना छत्ता भी एक साथ छोड़ती हैं, नया भी एक साथ बनाती हैं। इसी प्रकार पुनः जीवन चक्र में प्रवेश करते और नया जन्म धारण करते समय उच्चस्तरीय विद्युत कणों के गुच्छक अपने साथ स्थूल शरीर से आस्थाओं, सम्वेदनाओं का समुच्चय साथ लेकर परिभ्रमण करते रहते हैं।” एक भौतिकविद् के परोक्ष जगत सम्बन्धी ये विचार निश्चित ही कोई सनक या भ्रांति युक्त मान्यता नहीं है, अपितु एक सच्चाई की साक्षी में व्यक्त अभिव्यक्तियाँ हैं। इसी तथ्य को प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अब्राहम मेस्लोव ने इस प्रकार लिखा है- “भौतिकशास्त्र और जीवशास्त्र के क्षेत्र में आने वाले स्थूल शरीर के अतिरिक्त जीवधारियों का एक सूक्ष्म शरीर भी है जो अलौकिक क्षमताओं से भरा पड़ा है। यह शरीर मृत्यु के बाद भी बना रहता है।

अमेरिका में “क्लिसा क्लाउड चैम्बर” द्वारा आत्मा के अस्तित्व सम्बन्धी अनेकों प्रयोग किये गये हैं। यह चैम्बर एक खोखला पारदर्शी सिलेण्डर है। इसके भीतर से हवा पूरी तरह निकालकर, भीतर रासायनिक घोल पोत देते हैं। इससे सिलेण्डर में एक मन्द कुहरा छा जाता है। इस कुहरे से यदि एक भी इलेक्ट्रान गुजरे तो फिट किये गये शक्ति सम्पन्न कैमरों द्वारा उनका फोटो ले लिया जाता है। सिलेण्डर में होने वाली हर हलचल का चित्र आ जाता है।

इस चैम्बर में जीवित चूहों और मेंढ़कों को रखकर बिजली की धारा प्रवाहित कर उनको प्राणहीन किया गया। देखा गया कि मरने के बाद चूहों या मेंढ़कों की हूबहू वही अनुकृति उस रासायनिक कुहरे में तैर रही है। उस आकृति की गतिविधियाँ संबंधित प्राणी के जीवन काल की ही गतिविधियों के अनुरूप थीं। क्रमशः यह सत्ता धुँधली होती चली गई और विलुप्त होकर कैमरे की पकड़ से बाहर हो गई।

परामनोवैज्ञानिक विलियम मैकडूगल ने आत्मा के बारे में अनेकों प्रयोग परीक्षण किये हैं जिनमें मरणासन्न रोगी का मृत्यु से पूर्व भार लिया गया और मरणोपरान्त तौल की गई तो उस भार में एक औंस अर्थात्- 30 ग्राम तक की कमी पायी गयी। इससे मैकडूगल इसी निष्कर्ष पर पहुँचा कि शरीरस्थ कोई सूक्ष्म तत्व ही जीवन का आधार है। जिसके न रहने पर भार में कमी हुई है। सम्भवतः जानकारी न रहने अथवा मृत्यु को ही मानवी काया की चरम परिणति मानने वालों ने ‘ऑकल्ट’ की इस खोज को मान्यता न दी हो, फिर भी इससे मरणोत्तर जीवन संबंधी आर्ष मान्यताओं की प्रतिष्ठा कम नहीं होती।

थियोसोफिकल सोसायटी की जन्मदात्री मैडम ब्लावटूस्की के बारे में कहा जाता है कि वे अपने को कमरे में बन्द करने के उपरान्त भी जनता को सूक्ष्म शरीर से दर्शन और उपदेश देती थीं। कर्नल टाउन शेंड के बारे में भी ऐसे ही प्रसंग कहे जाते हैं। पाश्चात्य योग साधकों में से हैवर्टलमान, लिण्डर्स, एण्ड्र जैक्शन, डॉ. माल्थ, जेल्थ, कारिंगटन, डुरावेल मुलडोन, आलिवर लाज, पावर्स, डा. मेस्मर, एलेक्जेण्ड्रा डेविड नील, पाल ब्रण्टन आदि के अनुभवों और प्रयोगों में सूक्ष्म शरीर की प्रामाणिकता सिद्ध करने वाले अनेक प्रमाण उपस्थित किए गए हैं। जे. मुलडोन अपने स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर को पृथक करने के कितने प्रदर्शन भी कर चुके थे। इनने इन सबकी चर्चा अपनी पुस्तक “दि प्रोजेक्शन ऑफ एस्ट्रल बॉडी” में विस्तार पूर्वक की है।

शरीर के न रहने पर भी आत्मा का अस्तित्व बने रहने के बारे में जिन पाश्चात्य दार्शनिकों और तत्ववेत्ताओं ने अधिक स्पष्ट समर्थन किया है उनमें राल्फ वाल्डो ट्राइन, मिडनी फ्लोवर, एला ह्वीलर, बिलकाक्स विलिमय वाकर, एटकिंसन, जेम्स, केनी आदि का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। पुराने दार्शनिकों में से कार्लाइल, इमर्सन, काण्ट, हेगल, थामस, हिलमीन, डायसन आदि का मत भी इसी प्रकार का था। डेल्कार्ट सील को पीनियल में अवस्थित मानते थे एवं मृत्यु के बाद उसके नयी काया में अवतरित होने की मान्यता के समर्थक थे।

इस संबंध में सामान्य व्यक्तियों की अनुभूतियाँ भी कम विलक्षण नहीं हैं। न्यूयार्क (अमेरिका) की एक दस वर्षीय बालिका डेजी ड्राइडन पेट की खराबी और टाइफ़ाइड की बीमारी से कृशकाय हो गई थी। इसा अवस्था में पहुँचने पर अचानक कभी-कभी अपने चारों ओर के भौतिक जगत के अतिरिक्त एक अन्य अलौकिक जगत की बातें करने लगती।

दसवें वर्ष जिस दिन उसकी मृत्यु हुई उस दिन उसने अपना चेहरा देखने के लिए दर्पण माँगा। दर्पण में अपना चेहरा देखने के बाद वह अपनी माँ से बोली- “मेरी यह देह जर्जर हो गई है। यह उस खूँटी पर टंगी पुरानी पोशाक की तरह हो गई है जिसे मम्मी तुमने पहनना छोड़ दिया है। मैं भी इस पुरानी देह को उतार कर एली की भाँति दिव्य देह धारण करूँगी।”

एली कौन है? - माँ के पूछने पर डेजी ने बताया यह वही व्यक्ति है जो हवा में तैरता हुआ सा आता है और उसे मृत्यु के बारे में बताता है। आज रात तक मैं भी चली जाऊँगी।” अगले दिन ठीक ऐसा ही हुआ। ठीक दिन के साढ़े ग्यारह बजे उसने अपनी बाहें फैलाई व चिरनिद्रा में सो गयी।

गत शताब्दी का विज्ञान आत्मा के अस्तित्व से इन्कार करने में जितना कट्टर था अब उतना नहीं रहा। शरीर शास्त्र के मूर्धन्य ज्ञाता अब यह मानने लगे हैं कि मरण थकान की परिणति है। भीतरी जीवनी शक्ति के अत्यधिक असमर्थ हो जाने पर मृत्यु के मुख में जाना पड़ता है। इतने पर भी बहुत समय तक शरीर की स्थिति ऐसी बनी रहती है कि यदि उसे समुचित विश्राम देकर थकान मिटाने का उपचार बन पड़े तो कुछ समय उपरान्त मरी हुई काया में फिर जीवन संचार हो सकता है। गहरी थकान को मिटाने के लिए जिस प्रकार समाधि निद्रा का उपाय अपनाया जाता है उसी प्रकार भौतिक विज्ञान में शीत समाधि का सिद्धान्त स्वीकार किया गया है। यदि थोड़ा-सा भी जीवन किसी शरीर में शेष हो तो उसे हिम समाधि में लम्बे समय तक रखने के उपरान्त थकान मिटते ही पुनर्जीवन का आशा की जा सकती है।

दो दशक पूर्व समाचार पत्रों में पश्चिमी जर्मनी की एक घटना प्रकाशित हुई थी। एक अधेड़ महिला ने विष खा लिया था। उसके यकृत और गुर्दो ने काम करना बन्द कर दिया, मात्र हृदय की धड़कन में जीवन के कुछ चिन्ह दिखाई दे रहे थे। डा. लैम्फल ने उसके मृत प्रायः शरीर को पारदर्शी काँच के बक्स में रखकर बर्फ भर दी। 42 दिन उसी अवस्था में रखने के पश्चात् उन्होंने लाश को बाहर निकाल कर धीरे-धीरे गर्मी देना शुरू किया तो उसमें कुछ हलचल मालूम पड़ी। तीन दिन तक इस प्रकार के क्रम से वह महिला जीवित हो उठी। वैज्ञानिकों को इस बात पर सबसे अधिक आश्चर्य हुआ कि कुछ दिनों बाद वह महिला पहले से भी अधिक स्वस्थ एवं सुन्दर दिखाई दे रही थी।

कोश विघटन प्रक्रिया को रोकने के लिए कोश विश्राम पद्धति से शरीर को अति शीत में जमाकर यू.एस.ए. स्थित लाइफ एक्स्टेंशन सोसायटी (जीवन वृद्धि संस्थान) द्वारा अनूठे प्रयोग किये गये हैं। उनका विश्वास है कि इस पद्धति से कोशों को नव जीवन जैसी गतिविधि अपनाने के लिए सधाया जा सकेगा। इसके लिए चूहों को 5 डिग्री से.ग्रे. पर जमाकर बाद में सामान्य ताप देकर पुनर्जीवित करने में सफलता प्राप्त कर ली गई है। बिल्ली और कुत्तों को 203 दिन बाद पुनर्जीवित करने में भी सफलता प्राप्त कर ली गयी है। अब ये प्रयोग मनुष्य की आयु बढ़ाने जीवकोशों की मरण प्रक्रिया को निरस्त कर उनकी क्रियाशीलता बढ़ाने के रूप में भी किये जा रहे हैं। “एजींग” पर की जा रही यह शोध सम्भवतः मानव को अमर बनाने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण योगदान दे।

लेकिन मृत शरीर को पुनर्जीवित करने के प्रयास में रत पदार्थ विज्ञानी वर्तमान परिस्थितियों में यह मानने के लिए भी अब विवश हैं कि मरने के उपरान्त भी आत्मा की सत्ता बनी रहती है और उस स्थिति में भी उसकी जीवनचर्या किसी न किसी रूप में चलती रहती है।


जीवेम् शरदः शतम्

अब तक बुढ़ापा नियति मानकर सहज स्वीकारा जाता था। किन्तु वैज्ञानिक शोध निष्कर्षों के आधार पर इसे एक प्रकार का रोग ठहराया गया है जो आनुवांशिक विरासत में मिलता है। इस रोग की रोकथाम सम्भव है- और इसे लम्बे समय तक टाला जा सकता है। भारत में 50 वर्ष की आयु के उपरान्त लोग इसे सहज स्वीकारने लगते हैं, इसके रोकथाम के उपायों से अनभिज्ञ होने के कारण इसके समक्ष समर्पण कर देते हैं किन्तु अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों में इस रोग के कारणों और निराकरण के उपायों की शोध बड़े पैमाने पर की जा रही है और सफलता की सम्भावना भी बनी है क्योंकि इस व्याधि की शोध के लिए लम्बे समय की आवश्यकता है। अतः वैज्ञानिकों की भी कितनी ही पीढ़ियाँ लग सकती हैं। इस दुरुतर कार्य के लिए धैर्यवान वैज्ञानिकों की एक पूरी पीढ़ी ही अमेरिका व पश्चिमी जर्मनी में इन शोध कार्यों में लगी हुई है।

अमेरिका वैज्ञानिक बेरौज ने समुद्री जन्तु रोटीफर पर जल का तापमान 10 डिग्री से. ग्रेड कम कर प्रयोग किया तो उसकी आयु दुगुनी हो गई। सामान्यतः उसकी आयु 18 दिन से अधिक नहीं होती।

हिमालय के योगियों, संन्यासियों के लम्बे जीवन का रहस्य भी सीमित आहार एवं निम्न तापमान ही है। क्योंकि इसी प्रकार के प्रयोग अन्य जीव जन्तुओं पर भी किये गये तो उनकी आयु भी लम्बी हो गई। यों जीव-जन्तु मनुष्य की भाँति असंयमी जीवन नहीं जीते फिर भी तापमान की गिरावट से उनकी उम्र में वृद्धि हो गई।

वैज्ञानिकों की एक शोध के अनुसार एक अजीब निष्कर्ष सामने आया है कि जो कोशिकाएँ शरीर की रक्षात्मक पंक्ति में कार्यरत रहती हैं उन्हीं की बगावत, का परिणाम बुढ़ापा है। क्योंकि रक्षात्मक कोशिकाएँ ही सामान्य कोशिकाओं को खाने लगती हैं। तभी बाल पकने लगते हैं, झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं, नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जाती है, अनेकों उदर विकार पनपते और दन्त क्षय तथा श्रवण शक्ति कम हो जाती है। माँस पेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं। रक्त नलिकाएँ मोटी पड़ जाती हैं यकृत एवं गुर्दे की कार्यशक्ति भी क्षीण होने लग जाती है।

रक्षात्मक कोशिकाओं की बगावत का स्पष्ट उदाहरण उन लोगों में देखा जा सकता है जो असंयमी हैं और नशा सेवन करते हैं अथवा आलसी और अकर्मण्य हैं। वे ही समय से पहले बूढ़े होते हैं और उन्हीं की इन्द्रियाँ भरी जवानी में शिथिल पड़ जाती हैं। भारतीय आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि जीवन रक्षक कोशिकाएँ कहीं बगावत न कर बैठे इसके लिए आहार-विहार के संयम के साथ ही नियमित भोजन में तुलसी, आँवला, विधारा, अश्वगंधा जैसी औषधियाँ एवं गाय का दूध सेवन करते रहने से यह संकट लम्बे समय तक टाला जा सकता है।

यज्ञीय वातावरण में निवास करने वालों का यही मत है कि यज्ञ हवन में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों के धूम्र में वह अमोघ शक्ति है जिससे जीवन रक्षक कोशिकाएँ बगावत नहीं करने पातीं। मन्त्र विज्ञानियों का निष्कर्ष है कि मन्त्रों की ध्वनि से शरीर की विभिन्न ग्रन्थियों से ऐसा स्राव निकलता है जो कोशिकाओं के असमय क्षरण को रोक देता है।

अमेरिकी आयुशास्त्र वैज्ञानिक- डेंकला के अनुसार आयु नियन्त्रक केन्द्र मस्तिष्क में विद्यमान हैं जो आयु बढ़ने के साथ-साथ अधिक सक्रिय होता है। इसकी सक्रियता सामान्य बनाए रहने के लिए आहार-विहार की नियमितता आवश्यक है। माँस-मदिरा, अनियमित दिनचर्या, क्रोध, भय, चिन्ता आदि कारणों से यह केन्द्र अधिक सक्रिय होने लगता है इसी कारण ऐसे लोगों को असमय में बुढ़ापा घेरने लगता है।

बुढ़ापे को लम्बे समय तक टालने और अनेक रोगों से छुटकारे के लिए नैसर्गिक जीवन पद्धति का अनुसरण किया जाना चाहिए, जिससे मस्तिष्क पर तनाव और शरीर दबाव न पड़े। तब शतायु हो सकने की और निरोग बने रहने की सम्भावना है।


सृजन शक्ति का प्रेरणा श्रोत- काम

सामान्य व्यक्तियों की दृष्टि में काम-प्रजनन अथवा वासना तृप्ति का साधन है। अधिकाँश उस शक्ति का उपयोग भी उन सीमित कार्यों के लिए ही करते देखे जाते हैं पर तत्त्वदर्शियों का मत है कि काम जीवन की समस्त हलचलों का आधार है। अभिनव सृजन की प्रेरक शक्ति है। प्रकृति में सौन्दर्य की जो सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है, वह काम का ही रूप है। विपुला, शस्य श्यामला प्रकृति काम के गर्भ से ही उत्पन्न होती तथा अगणित जीवन्त सुन्दर घटकों के रूप में विकसित होती है। पुष्प के सौन्दर्य में काम का ही उभार है। प्राणियों की जीवट, शौर्य पराक्रम, उत्साह एवं उमंग में काम की अभिप्रेरणा ही कार्यरत होती है। प्रकृति की समस्त गतियों में काम की ही स्फुरणा है।

गीता में अपनी दैवी विभूतियों का उल्लेख करते हुए भगवान कृष्ण कहते हैं- “प्रजनश्चास्मि कर्न्दप.......” अर्थात्- ‘सन्तान की उत्पत्ति का हेतु मैं कामदेव हूँ।’ वस्तुतः जीवन की समस्त उत्पत्ति काम से है। संसार की सृष्टि में भी काम की प्रेरणा ही काम कर रही है। कामना से अभिप्रेरित होकर ही ब्रह्म ने सृष्टि की रचना की। सृष्टि के मूल में काम का प्रवाह है। काम शक्ति का एक रूप प्रजनन के रूप में सामने आता है तो दूसरा ज्ञान के रूप में- अभिनव कल्पनाओं एवं सृजनात्मक विचारों के रूप में। कोई भी सृजन काम के बिना नहीं हो सकता।

संसार भर में मात्र एक हिन्दू धर्म ही ऐसा है जिसने काम को भी ‘देव’ के रूप में प्रतिष्ठापित करके अभ्यर्थना की है। यह प्राचीन ऋषियों-मनीषियों की सूक्ष्म तथा उस विधेय दृष्टि का बोध कराती है जो तत्वदृष्टि स्तर तक विकसित हो चली थी। उन्हें यह ज्ञात था कि काम ऊर्जा ऊर्ध्वगमन से व्यक्तित्व के असीम विकास की सम्भावना बन सकती हैं।

मानवी व्यक्तित्व की तीन कोटियाँ हैं। नर-पशु हैं जिनकी काम वासना सतत् नीचे की ओर बहती है। देव-मानव वे हैं जिनकी काम शक्ति ऊर्ध्वमुखी अथवा अन्तर्मुखी है। नर-नारायण वे हैं जिनकी काम शक्ति स्थिर हैं- बहती ही नहीं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि यदि तुम देवताओं में खोजना चाहो तो काम में खोजना। क्योंकि काम ही सृजन का आधार है। जगत में जो भी घटित होता है- शुभ, सत्य अथवा सुन्दर के रूप में, वह काम ऊर्जा की परिणति है। खजुराहो कोणार्क के मन्दिरों की दीवारों पर अनूठे भित्ति चित्र खुदे हुए हैं। पर्यटक काम की विधेयात्मक अभिव्यक्ति के दर्शन के लिए ही वहाँ आते हैं। चित्रकला एवं मूर्तिकला के माध्यम से वस्तुतः उनमें कामदेव की प्रतिष्ठापना का आध्यात्मिक भाव सन्निहित है।

मनुष्य के भीतर एक ही जीवन्त ऊर्जा सतत् क्रियाशील है। जब वह नीचे की ओर बहती है तो काम वासना बन जाती है और जब ऊपर की और प्रवाहित होने लगती है तो कुण्डलिनी महाशक्ति बन जाती है। काम ऊर्जा दो स्थानों पर विलीन होती है- जननेन्द्रिय, मूलाधार अथवा मूर्धा- सहस्रार। ये दो चक्र व्यक्तित्व के दो छोर हैं। काम केन्द्र से मनुष्य प्रकृति से जुड़ा हुआ है पर सहस्रार के माध्यम से परब्रह्म से सम्बद्ध है। पर यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि अधिकाँश व्यक्ति काम ऊर्जा का सामान्य- नगण्य-सा उपयोग ही कर पाते हैं। जिस व्यक्ति को आग का मात्र इतना ही परिचय हो कि वह किसी वस्तु को जला सकती है- दावानल खड़ा कर सकती है, उसे दुर्भाग्यशाली समझा जायेगा और तरस खाया जायेगा। क्योंकि रोटी पकाने, पानी गरम करने, प्रकाश देने- गर्मी प्रदान करने जैसे वह अगणित काम भी तो करती है। जीवनी शक्ति के क्षय के रूप में- काम वासना के रूप में जो काम शक्ति का एकाँगी परिचय जानते हैं, सचमुच ही वे अविवेकी हैं। कई दशकों तक परमाणु शक्ति का उपयोग परमाणु बमों के निर्माण जैसे ध्वंसक प्रयोजनों तक सीमित रह गया था। महा विनाश के रूप में पिछले महायुद्ध में उस प्रचण्ड शक्ति का परिचय भी मिला। पर वैज्ञानिकों के समझ में वर्षों बाद वह समझ में आया कि परमाणु शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों में भी हो सकता है। फलस्वरूप अब परमाणु शक्ति से संचालित थर्मल पावरों से ऊर्जा उत्पादन जैसे कितने ही काम लिये जा रहे हैं। काम ऊर्जा भी उस परमाणु ऊर्जा की तरह है जिसका महत्व अभी ठीक तरह समझा नहीं जा सका है, न ही वह शक्ति अगणित सृजन कार्यों में प्रयुक्त हो सकी है।

फ्रायड और उनके समकक्ष अगणित मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य की सारी उद्विग्नता समस्त विक्षिप्तता का निन्यानवे प्रतिशत कारण काम वासना है। उनका निदान सही हो सकता है पर जो उपचार वे बताते हैं वह भ्रामक हैं- पूर्णतः गलत हैं। वे कहते हैं कि समस्याओं की जड़ काम वासना है। उसकी परितृप्ति का ठीक उपाय न हो तो आदमी विक्षिप्त होता चला जायेगा। पर उनका प्रतिपादन इसलिए गलत है कि काम वासना की तृप्ति कभी भी सम्भव नहीं है। काम वासना के रूपान्तरित किये बिना तृप्ति-सन्तुष्टि एवं शान्ति की उपलब्धि हो नहीं सकती। प्रमाण एवं उदाहरण भी सामने है। फ्रायड के विचारों तथा कामू के दर्शन से पनपे स्वच्छन्दवाद ने यौनाचार की खुली छूट पश्चिमी जगत को दे दी। पर काम तृप्ति न हो सकी। सभी तरह के बन्धनों- सामाजिक मर्यादाओं से मुक्त रहने वाली ‘परमिसिव सोसाइटी’ का जन्म हुआ। स्वच्छन्दता के प्रयोग तो चले पर असफलता ही हाथ लगी। काम वासना की अतृप्ति घटी नहीं बढ़ती ही चली गयी, अग्नि में घृत डालने की तरह वह भभकती गयी।

फ्रायड का गन्तव्य वस्तुतः अधूरा- एकाँगी था। उस आधार पर किये गये प्रयोगों ने यूरोपीय समुदाय की समस्याएँ अधिक बढ़ा दी हैं। फ्रायड के निदान के साथ योग का उपचार जुड़ा होता तो पाश्चात्य जगत की आज की स्थिति कुछ ओर ही होती। काम को रूपान्तरित होने का अवसर मिल गया होता। शास्त्रों में जिसे एक महाशक्ति मानकर अभ्यर्थना की गयी है, उसका हेय रूप देखने को नहीं मिलता। यौनाचार का निकृष्ट स्वरूप नहीं सामने आता। स्वतन्त्रता स्वच्छन्दता के स्तर तक पहुँच कर निर्क्तज्ज अट्टहास नहीं करती। मर्यादाओं- शालीनताओं के बन्धन इस तरह नहीं टूटते। हिप्पियों का समुदाय न पनपता।

काम का निम्नगामी प्रवाह मनुष्य को खोखला बना देता है। जवानी में बुढ़ापा इस खोखलेपन का ही नाम है। बूढ़ा आदमी भीतर से खालीपन अनुभव करता है। यह स्थिति प्रकृति की दी हुई- आसमान से टपकी हुई नहीं, वस्तुतः स्वयं की आमन्त्रित है। काम वासना ने समस्त शक्तियों को अवशोषित करके अशक्तता का अभिशाप लाद दिया। युवा व्यक्ति भीतर से भरा-पूरा अनुभव करता है। यौवन शरीर से छलकता उभरता है। यह वस्तुतः काम शक्ति का ही उभार है। वृद्ध की रिक्तता काम ऊर्जा की समाप्ति का ही परिचायक है। जो युवावस्था में भी ऐसी रिक्तता का- जीवट का- उत्साह एवं उमंग का अभाव अनुभव करते हैं वे भी वृद्ध तुल्य ही हैं, जिनने असमय ही अपनी बहुमूल्य जीवन सम्पदा को कौड़ी के मोल गँवा दिया है। जबकि जो वृद्धावस्था में भी जीवट सम्पन्न है- उत्साह उमंग से भरे हैं, वे युवा कहे जाने योग्य हैं।

काम ऊर्जा का प्रवाह बाहर होने के स्थान पर जब अन्दर की ओर होने लगता है तो उसके वास्तविक स्वरूप एवं प्रयोजन का परिचय मिलता है। तब यह बोध होता है कि आत्म-विकास में जिस काम को हेय समझा अथवा अवरोध माना गया था, यह मात्र एक भ्रान्ति थी। जिसे जहर समझा गया था वह अमृत था। जिसे नरक का द्वार माना गया था वह मुक्ति का- मोक्ष का साधन भी है, यह समझ आने पर वास्तविक प्रगति का द्वार खुल जाता है।


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दुःख सहने और हानि उठाने का एक बड़ा लाभ यह है कि मनुष्य उद्धता छोड़कर नम्र बन जाता है। -औरेलियस


उद्विग्नता मनुष्य की प्राण घातक शत्रु

इन दिनों रोगों की और रोगियों की संख्या में दिन-दिन अधिकाधिक वृद्धि होती चली जा रही है। अस्पतालों और चिकित्सकों का तेजी से विस्तार हो रहा है। नित नई औषधियों के आविष्कार भी सामने आ रहे हैं। इतने पर भी बीमारियों पर अंकुश लगने जैसे कोई लक्षण नहीं दीखते।

कारणों को तलाश करने से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनुष्य मानसिक दृष्टि से अधिक दुर्बल होता चला जा रहा है। साधन सुविधाओं की इन शताब्दियों में अभिवृद्धि हुई है। शिक्षा और सम्पन्नता में बढ़ोत्तरी हुई है। इतने पर भी हँसता-हँसाता जीवन क्रम हाथ से छूटता चला जा रहा है। आदर्शों का परित्याग करने के उपरान्त उद्विग्नता, अनिश्चितता और एकाकीपन में भी बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है। इसकी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया बढ़ती हुई उद्विग्नता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से खोखला होने और बीमारियों के चंगुल में फँसने का इसे प्रमुख कारण माना जा सकता है।

जर्मनी के डॉक्टर राएक हैमर ने कैन्सर के मरीजों पर लम्बे समय तक शोध की है कि इसका कारण क्या हो कसता है। प्रचलित मान्यताओं में विषैले वातावरण, विषाणु, एवं आनुवांशिकी खराबियों की वजह से यह रोग पनपते हैं। किन्तु हैमर के अनुसार उसका अधिक व्यापक और गहरा कारण है- मानसिक विक्षोभ। जो लोग चिन्तित, उद्विग्न, खिन्न रहते हैं, उनका स्नायु संस्थान गड़बड़ा जाता है एवं उस प्रभाव से प्रभावित किसी क्षेत्र विशेष में कोशिकाएँ परस्पर उलझकर इस रोग की पृष्ठभूमि बनाती हैं। हैमर ने अपने देश के सरकारी ओर गैर सरकारी अस्पताल में दौरा करके इन रोगियों से जो पूछताछ की इससे इस सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ है कि कैन्सर का सबसे बड़ा कारण मानसिक उद्वेग है।

टैक्सास हैल्थ साइन्स विश्व विद्यालय के प्रो. माईके लर्स्टन ने अपनी खोजों में बढ़ते हुए रोग की औद्योगिक समाज की देन कहा है। कुछ समय पूर्व हृदय रोगियों में से मात्र 25 ही मरते थे पर अब जिन्हें यह रोग पकड़ता है उनमें से 55 प्रतिशत की जान लेकर ही छोड़ता है। अमेरिका में इन दिनों हर वर्ष 10 लाख नये हृदय रोगियों की वृद्धि होती चली जा रही है।

वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार समृद्ध प्रमुख देशों में आधी मृत्युएँ हृदय रोग से होने लगी हैं। इस बढ़ोतरी में साधनों की कमी या परिस्थितियों की विपन्नता उतना बड़ा कारण नहीं है जितना कि मनुष्य का खिन्न उद्विग्न रहना। खीज ओर उदासी आदमी को तोड़ कर रख देती है और वह कभी भी हृदय रोग जैसी किसी विपत्ति में फँस सकता है।

कैलीफोर्निया के मनोरोग विशेषज्ञ डा. हिल्स का कथन है कि चिन्ता के कारण तो अनेकों हो सकते हैं पर उनका दबाव समझदारी नासमझी के आधार पर कम या अधिक किया जा सकता है। एक दूसरे विशेष मार्मर ने इस अभिमत की पुष्टि की है। वे कहते हैं कि- चिन्तित रहना एक बुरी आदत है। जिसे दुर्बल प्रकृति के लोग स्वभाव का अंग बना लेते हैं। इसके लिए कारण भी उन्हें कुछ न कुछ मिल ही जाते हैं। सुखी समझे जाने वाले लोगों को भी कोई न कोई कारण ऐसा लगा रह सकता है जिसमें उन्हें चिन्ता करनी पड़े। इसलिए वैसे कारणों को समाप्त करना कठिन है। दृष्टिकोण सुधारने पर ही यह हो सकता है कि झंझटों के बीच रहते हुए भी मनुष्य हलका मन रखे रहे और हँसते-हँसाते समय गुजारे।

डॉ. फाक्स के अनुसार चिन्ता करना एक थकाने वाले गति चक्र में भ्रमण करते रहना है। चिन्ता करना- चिंतक का मस्तिष्क उपहृत होना- उद्विग्न मस्तिष्क द्वारा कारण और समझाना समझ न पाना- गतिरोध से खीज उपजना और फिर चिन्ता का वेग और दूना चौगुना बढ़ जाना। यही है थकाने वाला गतिचक्र जिसमें अनेकों को घूमते देखा जाता है। वे ऐसे दलदल में फँसे रहते हैं जिसमें से दृष्टिकोण के सुधार परिवर्तन से अन्य बाहर निकलने का और कोई उपाय है नहीं।

चिन्ता का वास्तविक कारण उतना जटिल नहीं होता जितना कि व्यक्ति समझता है। दृष्टि दोष से कई बार बड़ी चीजें छोटी और छोटी बड़ी भी दिखाई पड़ती हैं। कुछ लोग छोटी को बड़ी मानकर देखने के आदी होते हैं। उन्हें आशंकाएँ दीखती रहती हैं और आगत संकट की कल्पना बढ़ा-चढ़ाकर करने के कारण वे पर्वत जैसी विशालकाय प्रतीत होती हैं। ऐसे लोग तनिक-सा अन्धेरा होते ही झाड़ी को भूत की शकल में देख लेते हैं। आशंकाओं पर कल्पना का समर्थन पुट चढ़ाते रहने पर वे तिल से बढ़कर ताड़ बन जाती हैं। इसके विपरीत बड़ी चीज को हलकी करके देखने से नशा उतर जाता है और चिन्ता का वास्तविक कारण रहते हुये भी निर्भय जी सकने योग्य मनोबल मिल जाता है।

वनवासी लोग छोटी-छोटी झोंपड़ियों में बिखरे हुये रहते हैं। उस क्षेत्र में हिंस्र पशुओं के झुण्ड घूमते रहते हैं। सर्प बिच्छुओं की भी कमी नहीं रहती। इतने पर भी वे गहरी नींद सोते और दिन भर भोजन की तलाश अकेले दुकेले घूमते रहते हैं। पीड़ियों से इसी जीवनचर्या को अपनाये हुये हैं। उन्हें डर नहीं लगता कि इन हिंस्र पशुओं के बीच रहते हुये किस प्रकार गुजारा होगा। निर्भयता, और निश्चिन्तता अच्छे स्वभाव का चिन्ह है। जिसे अपनाकर वास्तविक कठिनाइयों के बीच भी सरलतापूर्वक रहा और जिया सकता है। इसके विपरीत डरपोक तो सपने में भी भूत देखकर हड़बड़ाते और चीख पुकार करते देखे गये हैं। सर्प सिंह की कल्पना जितनी डरावनी है उतनी उसकी समीपता नहीं सपेरे और सरकस वाले उन्हीं के साथ रहकर जिन्दगी गुजार देते हैं।

दार्शनिक कवि उमर खय्याम ने अपनी एक सवाई में कहा है- “भूत को भूल जाओ क्योंकि वह मर चुका, अब फिर कभी लौटने वाला नहीं है। भविष्य में रंगरेलियाँ न करो क्योंकि अभी उसके जन्मने तक में देर है। मात्र वर्तमान पर ध्यान केन्द्रित करो, क्योंकि उसी का सदुपयोग करने पर वैसा कुछ मिल सकता है, जिसकी कि चाहना है।”

चिन्तित वे रहते हैं जो अपने को एकाकी अनुभव करते हैं। उन्हें लगता है कि कठिनाइयों का पर्वत मुझे अकेले ही उठाना पड़ेगा। जबकि बात वस्तुतः वैसी है नहीं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसने प्रगति मिल-जुलकर की है। एक दूसरे को सहारा देने के विचार अपनाकर ही परिवार और समाज का व्यवस्था-क्रम चलता है। ग्राहक और दुकानदार के सहयोग से व्यवसाय होता है। एक घर की लड़की दूसरे घर जाकर नया परिवार बसाती है यह सब सघन सहयोग के सहारे ही सम्भव होता है। इस तथ्य पर विश्वास रखा जाना चाहिए कि जब हम अपनी खुशियाँ बाँटते रहते हैं तो दूसरे भी कठिन समय आने पर सहायता करेंगे। बोझ बँटाने वाले सहयोगी भी कहीं न कहीं से निकल ही आयेंगे।

अच्छा हो, चिन्तित व्यक्ति दूसरे समझदारों से अपनी घुटन खोले और उनसे निराकरण सम्बन्धी परामर्श माँगे। यों गिरे को खड्डे में धकेलने वाले भी कम नहीं हैं पर अभी यह दुनिया समझदारों से रहित नहीं हुई है। जिनसे परामर्श प्राप्त किया जा सके। ऐसे विश्वस्त लोगों से सम्पर्क सध सके और विचार विनिमय बन पड़े तो ऐसे परामर्श मिल सकते हैं जिनसे कुकल्पनाओं से पीछा छूटे और जो संभव है उसे करने के लिए रास्ता मिले। एकाकी बुड़-बुड़ाते रहने और जाल में फँसे पक्षी की तरह फड़फड़ाने पर और कड़ी जकड़ में फँसते चलने से कोई बात बनती नहीं। यह स्पष्ट समझा जाना चाहिए कि गलती जहाँ से आरम्भ होती है, सुधार वहीं होना चाहिए। पानी जहाँ से रिसता है, छेद बन्द करने के लिए उसी स्थान तक पहुँचा जाना चाहिए।


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बुद्धिमत्ता किसी को भी उत्तराधिकार या उपहार के रूप में नहीं मिली, उसे प्रयत्नपूर्वक बुद्धिमानों के सहचरत्व से अर्जित करना पड़ता है। -वेक्रन


स्मरण शक्ति की न्यूनता से चिन्तित न हों।

आयु के साथ स्मरण शक्ति में न्यूनता आने की शिकायत प्रायः सुनने को मिलती है। अनेकों व्यक्ति अपनी स्मरण शक्ति में वृद्धि करने के लिए प्रयत्नशील देखे जाते हैं। स्मरण शक्ति में वृद्धि लाने हेतु हजारों पुस्तकें लिखी गई हैं किन्तु उनका आधार मनोवैज्ञानिक न होने के कारण उनका अपेक्षित प्रभावी उपयोग न हो सका। इस पर 50 वर्षों से भी अधिक समय से शोध कार्य किया जा रहा है किन्तु फिर भी किसी सर्व सम्मत निर्णय पर वैज्ञानिक नहीं पहुँच पाये हैं।

यदि आप प्रतिदिन टेलीफोन के नम्बरों को याद करने के लिए दस मिनट का समय व्यय करते रहेंगे तो कुछ दिनों बाद आपको अनेकों टेलीफोनों के नम्बर याद हो जाएँगे। किन्तु इससे आपकी लोगों के चेहरे पहिचानने की, उनके नाम को याद रखने की, और आपके व्यस्तता के दिनों की सूची को याद रखने की शक्ति में वृद्धि नहीं होगी। कहा जाता है कि एक प्रकार के कार्य में दीक्षित होने पर दूसरे कार्य को करने क्रियाशीलता में वृद्धि होती है। किन्तु यह तभी सम्भव होता है जबकि उन कार्यों में समानता के लक्षण अधिक हों। उनमें जितनी विभिन्नता होगी उनके प्रशिक्षण की कार्य विधि भी भिन्न होगी। स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए कभी-कभी शारीरिक एवं मानसिक व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। यह उचित नहीं है क्योंकि कोई व्यायाम किसी के लिए हानिकारक भी हो सकता है। व्यायाम का चुनाव भी शारीरिक स्थिति के अनुसार ही किया जाता है।

फ्रायड का मत है कि जिन बातों को हम याद रखना नहीं चाहते उन्हें भुला देते हैं। यदि मनुष्य की समस्या कुछ भुगतान किये जाने वाले बिल, पत्रों और सामाजिक नियुक्ति से सम्बन्धित स्मरण शक्ति से है तो उसमें सुधार आने की संभावना क्षीण ही है। इस हेतु कुछ चिन्हों को अपनाना होगा जो कि मनुष्य को समय-समय पर सुझाने का काम करें। इसके लिए वह किसी अन्य पर विश्वास न करें कि कोई आपको उचित समय पर स्मरण करवाने में सहायता करेगा। संभव है कि उसका सहायक स्वयं ही उस बात को भुला दे। अतः व्यक्ति को अपना उत्तरदायित्व स्वयं ही संभाल लेना चाहिए। दूसरों पर अपना भार डालना उचित नहीं कहा जा सकता। यदि भूलने की आदत में कोई सुधार नहीं होता है, तो इसके लिए कुछ प्रयोगों का सहारा लिया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि आप एक कागज पर पूर्ण विवरण अपने को ही सम्बोधित कर लिखिये और किसी विशेष स्थान पर पिन लगाकर उसे टाँग दीजिये। पश्चिम में कुछ लोग स्नान गृह के शीशे पर लिपस्टिक से कुछ चिन्ह बनाकर अपनी स्मृति को ताजा बना लेते हैं। कुछ लोग दीवार घड़ी पर एक बड़ा कागज लगाकर अपनी भूलने की आदत से त्राण पाते हैं। वास्तव में इसका अर्थ नहीं कि आपकी स्मरण शक्ति का लोप हो गया है। यह स्थिति तो उसके प्रेरक तत्वों के अभाव के कारण है।

जन्म दिन की तिथियाँ, पते, नाम आदि को याद रखने में असमर्थ होने पर भी व्यक्ति को अपनी स्मरण शक्ति के प्रति निराश नहीं होना चाहिए। क्योंकि यह एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है जो किसी के भी साथ घट सकती है। आप किसी स्थान पर दुबारा जाने में भटकने के डर से जाना पसंद नहीं करते क्योंकि वहाँ आप केवल एक बार ही गये हैं और मार्ग आपको ठीक से मालूम नहीं। ऐसा इस कारण संभव हुआ है क्योंकि आपने मार्ग को ध्यान देकर नहीं देखा था। अब जब आप वहाँ दुबारा जाएँ तो उन मार्गों को और नामों को याद रखने का प्रयास करें। आपकी स्मरण शक्ति में इससे पर्याप्त सुधार होगा। जब आप कुछ नये व्यक्तियों से मिलें तो उन्हें गौर से देखें। और उनके नामों को मन ही मन दौहरा लें। यदि आपने उनका नाम ठीक से नहीं सुना है तो उनसे फिर से दौहराने को कहिये जिससे आप उसे न भूल सकें। जटिल सूचनाओं को आप देर तक अपनी स्मृति में नहीं बनाये रख सकते क्योंकि उनकी आवश्यकता बहुत ही कम रहती है और आप उसको एकाग्रता से याद रखने का प्रयास भी नहीं करते।

मानव अपनी स्मृतियों का संग्रह वर्णनात्मक और द्रव्यात्मक रूप से करता है। किन्तु कुछ लोग ही इन दोनों विधियों में निपुणता प्राप्त कर पाते हैं। अधिकाँश लोग इनमें से किसी एक में ही प्रवीण होते हैं। यदि आप स्थानों और चेहरों को देखकर पहिचान लेते हैं और नाम याद रखने में कठिनाई का अनुभव करते हैं तो आप बहिरंग दृष्टिकोण से अधिक योग्य हैं। आप अपनी इस योग्यता का उपयोग अपनी स्मरण शक्ति को सशक्त बनाने में कर सकते हैं। आप जिस व्यक्ति का नाम भूल जाते हैं उसका नाम लिखे चित्र का फोटोग्राफ पास रख लें। इससे आपको नाम याद रखने में पर्याप्त सहायता मिलेगी। कुछ नामों के आप कूट संकेत भी बना सकते हैं। यह भी एक प्रभावशाली विधि है और वर्णनात्मक विधि से स्मृति संग्रह करने वालों के द्वारा इसका प्रयोग वाँछनीय है।

आप किसी कविता को अथवा नाटक के एक अंश को याद करना चाहते हैं। यह तो संभव नहीं होता कि आप सारे को एक बार के प्रयत्न में ही याद कर लें विशेषकर जबकि वे अंश अधिक बड़े हों। किन्तु आप उसको एक बार तो पूरा पढ़ ही लीजिये और उसकी शब्द रचना को विशेष रूप से ध्यानपूर्वक देख लें। इससे आपकी उसे स्मरण रखने में सहायता मिलेगी। अभ्यास अथवा काम के पश्चात् विश्राम, इस प्रक्रिया को दौहराते रहिये। याद करने के पश्चात् यदि आप उसकी स्मृति बनाये रखना चाहते हैं तो सबसे बढ़िया उपाय है कि आप सो जाइये। नयी जानकारियों को याद रखने के लिए उन्हें दौहराना उचित होगा। यदि आप उनको नहीं दौहरायेंगे तो समय पर वे विस्मृत हो जायेंगे और उन्हें स्मरण करना कठिन होगा। हाँ आप उन्हें कभी पढ़ेंगे तो आपको याद आ जायेगा किन्तु आपकी स्मरण शक्ति के द्वारा उनको मस्तिष्क में से प्राप्त करना एक जटिल समस्या होगी।

आयु की वृद्धि के साथ स्मरण शक्ति में न्यूनता का होना एक मानवी प्रवृत्ति है। इसका एक कारण यह भी है कि जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, हमारे मस्तिष्क पर भी स्मरणीय संग्रहों का बोझ बढ़ता जाता है और उनमें भी भिन्न-भिन्न प्रकार की स्मृतियाँ रहती हैं जिनमें कई परस्पर विरोधी भाव की भी होती हैं। यदि कुछ मस्तिष्कीय विकृति और मस्तिष्क सम्बन्धी दुर्घटना वाले व्यक्तियों को छोड़ दें तो व्यक्तियों की स्मरणीय संग्रह क्षमता को बड़ी प्रभावशाली पायेंगे। किन्तु जब इस संग्रह की परतों पर और अधिक परतें मस्तिष्क में बढ़ती जाती हैं तो मस्तिष्क की योग्यता का ह्रास होना स्वाभाविक है। यदि उन सूचनाओं को, जो कि हमारे मस्तिष्क में संग्रहित है, बीच-बीच में प्रेरित करने का प्रयास किया जाय तो विस्मृति के अवसर क्षीण ही होंगे। कभी-कभी लोग भूल जाने का बहाना बनाकर अनुचित लाभ अथवा अपनी अयोग्यता छुपाने का प्रयास करते हैं। यह किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। लोग ऐसे व्यक्ति पर विश्वास खो देते हैं।

स्मरण शक्ति बढ़ा सकने के मानसोपचार सम्बन्धी कुछ अभ्यास बड़ी जल्दी सीखे जा सकते हैं। वस्तुतः यह एक मानसिक व्यायाम है, जिसे सतत् करते रहने से स्मरण शक्ति कभी भी क्षीण नहीं होती। यह एक भ्रान्ति भर है कि सठियाने के साथ-साथ स्मृति भी मंद पड़ जाती है। यदि आहार-विहार का व्यतिक्रम न हो, स्वाध्यायशीलता का अभ्यास जारी रखा जा सके तो कोई कारण नहीं कि अपने मस्तिष्कीय भण्डार में स्मरण शक्तियों की अकूत सूचना सामग्री एकत्र रखी जा सकती है। कोई औषधि नहीं, मानसिक व्यायाम ही इसमें सहायक हो सकते हैं।


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बुद्धिमता पर यदि आदर्शों का अंकुश न हो तो वह उद्दण्ड उन्माद का रूप धारण करेगी।

-पाल व्रन्टन


आत्म-विश्वास जगायें- सफलता पायें

स्वामी रामतीर्थ कहते थे- “धरती को हिलाने के लिए धरती से बाहर खड़े होने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है आत्मा की शक्ति को जानने-जगाने की।” इस उक्ति में आत्म शक्ति की उस महत्ता का प्रतिपादन किया गया है, जिसका दूसरा नाम आत्म-विश्वास है। जिसका साक्षात्कार करके कोई भी व्यक्ति अपने परिवार में तथा अपने आशातीत परिवर्तन कर सकता है। विवेकानन्द, बुद्ध, ईसा, सुकरात और गान्धी की प्रचण्ड आत्मशक्ति ने युग के प्रवाह को मोड़ दिया। अभी हाल के स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गान्धी ने सशक्त ब्रिटिश साम्राज्य की नींव उखाड़ दी। उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प शक्ति तथा आत्मविश्वास के सहारे अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश किया। स्वामी विवेकानन्द एवं रामतीर्थ जब संन्यासी का वेष धारण कर अमेरिका गये तो उपहास के पात्र बने किन्तु बाद में उन्होंने अपने आत्मविश्वास के सहारे विश्वास को जो कुछ दिया वह अद्वितीय है।

आत्मविश्वास के समक्ष विश्व की बड़ी से बड़ी शक्ति झुकती है और भविष्य में भी झुकती रहेगी। इसी आत्मविश्वास के सहारे आत्मा और परमात्मा के बीच तादात्म्य उत्पन्न होता है तथा अजस्र शक्ति के स्त्रोत का द्वार खुल जाता है। कठिन परिस्थितियों एवं हजारों विपत्तियों के बीच भी मनुष्य आत्मविश्वास के सहारे आगे बढ़ता जाता है तथा अपनी मंजिल पर पहुँच कर रहता है।

मानव जाति की उन्नति के इतिहास में महापुरुषों के आत्म-विश्वास का असीम योगदान रहा है। भौतिक दृष्टि से तात्कालिक असफलताओं को शिरोधार्य करते हुए भी उन्होंने विश्वास न छोड़ा और अभीष्ट सफलता प्राप्त की। आत्मविश्वास का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। लौकिक एवं अलौकिक सफलताओं का आधार यही है। उसके सहारे ही निराशा में भी आशा की झलक दीखती है। दुःख में भी सुख का आभास होता है। इससे बड़े से बड़े कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं, किए गए हैं। चीन की दीवार पिरामिड, पनामा नहर एवं दुर्गम पर्वतों पर विनिर्मित सड़कें व भवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं।

वस्तुतः समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों का आधार आत्मविश्वास ही है। इसके अभाव में अन्य सारी शक्तियाँ सुप्तावस्था में पड़ी रहती हैं। जैसे ही आत्मविश्वास जागृत होता है अन्य शक्तियाँ भी उठ खड़ी होती हैं और आत्मविश्वास के सहारे असम्भव समझे जाने वाले कार्य भी आसानी से पूरे हो जाते हैं।

वैयक्तिक जीवन में भी आत्मविश्वास ही सम्पूर्ण सफलताओं का आधार है। विश्वास के अभाव में ही श्रेष्ठतम उपलब्धियों से लोग वंचित रह जाते हैं असफलताओं का कारण है- अपनी क्षमता को न पहचान पाना और अपने को अयोग्य समझना। जब तक अपने को अयोग्य, हीन, असमर्थ समझा जायेगा, तब तक सौभाग्य एवं सफलता का द्वार बन्द ही रहेगा।

व्यक्ति जब अपने अन्दर छिपी हुई शक्तियों के स्रोत को जान लेता है तो वह भी देव तुल्य बन जाता है। विश्वास के जागृत होने ही आत्मा में छुपी हुई शक्तियाँ प्रस्फुटित हो उठती हैं। हमारे अन्दर के श्रेष्ठ विचार महत्वपूर्ण कार्य के रूप में परिणत हो जाते हैं। इसके विपरीत अपने प्रति अविश्वास से तो शक्ति के स्रोत सूख जाते हैं और लोग भण्डार के होते हुए भी दीन तथा दरिद्र ही बने रहते हैं।

अपने विषय में जैसी मान्यता बनायी जाती है, इसके द्वारा भी वैसा ही व्यवहार किया जाता है। जो व्यक्ति अपने को मिट्टी समझता है, अवश्य कुचला जाता है। धूल पर सभी पाँव रखते हैं किन्तु अंगारों पर कोई नहीं रखता। जो व्यक्ति कठिनतम कार्यों को भी अपने करने योग्य समझते हैं, अपनी शक्ति पर विश्वास करते हैं, वे चारों ओर अपने अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर लेते हैं। जिस क्षण व्यक्ति दृढ़ता पूर्वक किसी कार्य को सम्पन्न करने का निश्चय कर लेता है तो समझना चाहिए आधा कार्य पहले ही पूर्ण हो गया। दुर्बल प्रकृति के व्यक्ति शेखचिल्ली के समान कोरी कल्पनाएँ मात्र किया करते हैं किन्तु मनस्वी व्यक्ति अपने संकल्पों को कार्य रूप में परिणत कर दिखाते हैं।

विराट् वृक्ष की शक्ति छोटे से बीज में छुपी रहती है। यही बीज खेत में पड़कर उपयोगी खाद पानी प्राप्त करके बड़े वृक्ष के रूप में प्रस्फुटित होता है उसी प्रकार मनुष्य के अन्दर भी समस्त सम्भावनाएँ एवं शक्तियाँ बीज रूप में छुपी हुई हैं जिनको विवेक के जल से अभिसिंचित कर तथा श्रेष्ठ विचारों की उर्वरा खाद देकर जागृत किया जा सकता है। यदि व्यक्ति अपने अन्दर की अमूल्य शक्ति एवं सामर्थ्य को जान लेने में सफल हो जाय तो वह सामान्य से असामान्य और असामान्य से महान हो सकता है।

मनुष्यों की संगठित शक्ति यदि श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़े तो विश्व का काया-कल्प ही पलट सकती है। शक्ति के उदित होते ही असम्भव समझे जाने वाले कार्य भी सम्भव हो जाते हैं जिनको पूर्ण हुए देखकर आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता।

मानव जीवन ईश्वर का दिया हुआ सर्वोपरि उपहार है। इसका महत्व एवं गरिमा तभी है जब व्यक्ति इन पंगु विचारों को अपने मन में स्थान न दे। उनसे शक्ति का प्रवाह बन्द हो जाता है। ईश्वरीय अनुदान एवं दी हुई शक्ति का महत्व जीवन के सदुपयोग में है। अपने को उठाना तथा दूसरों को भी ऊँचा उठाने में सहयोग करने में ही मानव जीवन की सार्थकता है।

जब तक हम किसी कार्य में अपनी समस्त शक्तियाँ लगा नहीं पाते, मन एकाग्र नहीं करते तब तक वह कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। कार्य जितना कठिन है उसके लिए उतने ही दृढ़ विश्वास एवं योगी की तरह तन्मय होकर निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता होती है। ईश्वरीय सत्ता भी उन्हीं की सहायता करती है जो स्वयं प्रयत्नशील हैं।

आत्मविश्वास, सतत् परिश्रम एवं दृढ़ निश्चय के समक्ष कुछ भी असम्भव नहीं है। इन्हीं गुणों के प्रकाश में ऐतिहासिक कार्य संसार में सम्पन्न हुए हैं। विद्वानों महापुरुषों धर्म प्रवर्तकों, योद्धाओं, सृजेताओं, शोधकर्ताओं के ज्वलन्त उदाहरण इस बात के साक्षी हैं कि उन्होंने आत्मविश्वास के आधार पर क्या नहीं कर दिखाया?

छोटी-छोटी बैटरियों की शक्ति शीघ्र ही समाप्त हो जाती है किन्तु जिन बत्तियों का सम्बन्ध पावर हाउस से होता है वह निरन्तर जलती रहती हैं। आत्मविश्वास वह सम्पर्क माध्यम है जिसके सहारे अकूत शक्ति के भण्डार परमात्मा के साथ सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने विचारों को कार्य रूप में परिणति करे। स्वार्थ से दूर रहकर अपनी दृष्टि का विकास करें। सद्गुणों को धारण कर इसी जीवन में गौरवान्वित एवं सम्मानास्पद बना सकता है।

श्रेष्ठ मार्ग पर नियोजित व्यक्तियों की शक्तियाँ श्रेयस्कर परिणाम उपस्थित करती हैं, जिसे लोग भाग्य चमत्कार समझते हैं। वास्तव में वे व्यक्ति की दृढ़ निष्ठा एवं आत्मविश्वास का परिणाम ही होती हैं। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण स्वयं कर सकता है। यदि वह अपनी प्रसुप्त शक्तियों को प्रयत्न पूर्वक जगा सके। जिस दिन मनुष्य इस तथ्य को समझ लेगा, वह अनन्त शक्ति का भण्डार बन जायेगा। सुख एवं सफलता का मूल आधार एक ही है- उसका आत्मविश्वास।


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दो किरणें चलीं एक जा पड़ी कीचड़ में दूसरी एक पुष्प में। पुष्प वाली किरण ने दूसरी किरण से कहा- देखो! जरा दूर रहना छूकर मुझे भी अपवित्र मत कर देना।

ऐसा न कहो बहिन दूसरी किरण बोली- हम इस कीचड़ को सुखायें और साफ न करें तो इस फूल की रक्षा कैसे हो। दूसरी किरण अपने दम्भ पर बड़ी लज्जित हुई और शर्म के मारे रह गई।


आसार बताते हैं कि हिमयुग आने वाला है।

सौरमण्डल विराट् ब्रह्माण्ड का एक विशाल परिवार है और ग्रह नक्षत्र उसके सदस्य। एक परिवार के सदस्य होने तथा अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े होने के कारण वे अपनी गति एवं स्थिति से परस्पर एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। चक्र सन्तुलन में जब किसी कारण व्यतिरेक अधिक बढ़ता है तो व्यापक स्तर पर परिवर्तन होते हैं। कभी-कभी वे परिवर्तन इतने भीषण भी होते हैं कि जीव जगत् के अस्तित्व को चुनौती देते और भारी संकट पैदा करते देखे जाते हैं। प्रस्तुत होने वाली उन विभीषिकाओं में से एक है- हिम युग का पृथ्वी पर आगमन।

प्रमाणों से इस बात की पुष्टि हुई है कि विगत एक अरब वर्षों में पृथ्वी पर तीन बार बड़े हिमयुग विभिन्न अवधियों के लिए आये हैं। सबसे निकटवर्ती पिछला हिमयुग धरती पर बीस लाख वर्ष पूर्व प्रस्तुत हुआ था। प्रत्येक प्रमुख हिमयुग अनेकों छोटे हिमयुगों से बना होता है जो गर्भकाल द्वारा विभाजित रहता है। विगत सात लाख वर्षों में सात बड़ी बर्फ की परतें भूमध्य रेखा की ओर सरकी हैं। प्रत्येक भूमण्डलीय शीत नौ हजार वर्षों तक उसके प्रभाव से रहती हैं तथा उसके बाद दस हजार बर्फ का मध्यवर्ती, बर्फ युग आता है।

वैज्ञानिकों का अभिमत है कि हम सब उन सबमें से एक गर्भ मध्यवर्ती हिमयुग की अवधि में रह रहे हैं। पिछली सबसे विशालकाय तथा भारी बर्फ की परत एक लाख वर्ष पूर्व ध्रुव की ओर सरक कर चली गयी। ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी का मौसमी लोलक पुनः अगले सौ वर्षों में एक हिमयुग की स्थिति में जा पहुँचेगा।

हिमयुग पृथ्वी पर क्यों आता है उस सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के सिद्धान्त दिए हैं, जिनमें से एक है- ‘मिलांकोविच का सिद्धान्त’। भूभौतिकविद् मिल्यूटिन मिलांकोविच के अनुसार सूर्य के वितरित प्रकाश को पृथ्वी धारण करती है जिसके अनुसार ग्रह समय-समय पर ठण्डे होते रहते हैं। प्रकाश वितरण की उस प्रक्रिया में समय-समय पर परिवर्तन आता रहता है, जब पृथ्वी सूर्य की ओर सरकती-हटती रहती है। खिसकने की यह प्रक्रिया जटिल गति सम्बन्धों पर आधारित है, पर उसका पूर्वानुमान लगाना सम्भव है।

‘क्रस्टल वान्डरिंग थ्यौरी’ के अनुसार महाद्वीप लाखों वर्षों के भूमण्डल के चारों ओर एक से पन्द्रह सेन्टीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से गति करते रहे हैं। इसे महाद्वीपीय प्रवाह कहते हैं। जब यह किसी भू-भाग को किसी उच्च ठण्डे अक्षांश पर उत्तर या दक्षिण में अवस्थित कर लेता है जहाँ कि शीत की बर्फ पूरी तरह गल नहीं पाती, तो वहाँ बर्फ की परतें एक के ऊपर एक क्रमशः जमा होने लगती हैं तथा हिम नदी का रूप ले लेती हैं। हिम नदी तब समुद्र तट की ओर बढ़ती हैं जहाँ कि बर्फ की चट्टानें स्वतन्त्र रूप से टूटकर समुद्रों को ठण्डा करने लगती हैं। ऐसी स्थिति में बर्फ की मोटी चादरें चारों ओर व्यापक क्षेत्र में फैल जाती हैं।

इस प्रतिपादन के समर्थन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि एक करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवाना नामक उपमहाद्वीप जिसके अन्तर्गत अब दक्षिणी अमरीका, अफ्रीका, भारत, आस्ट्रेलिया तथा अन्टार्टिका आते हैं, के अधिकाँश भाग बर्फ से ढक गये। बर्फ बाद में दक्षिणी ध्रुव के ऊपर एकत्रित हो गयी। प्रमाण यह भी दर्शाते हैं कि अन्टार्टिका की भूमि पुनः सबसे बाद के हिमयुग में बर्फ से ढक गयी। यह घटना गोंडवाना उपमहाद्वीप की भूमि के विभक्त होने तथा अन्टार्टिका के ध्रुव के ठण्डे अक्षांश पर छोड़ देने के बाद घटी।

‘ग्रीन हाउस इफेक्ट सिद्धान्त’ के समर्थन वैज्ञानिक कहते हैं कि वायुमण्डल में कार्बनडाइ-आक्साइड ग्रीन हाउस के शीशे की भाँति कार्य करती है। यह विकिरण के विषाक्त प्रभाव को पृथ्वी पर आने से रोकती है तथा सूर्य की किरणों को पृथ्वी पर आने तो देती है, पर पृथ्वी की गर्मी को अन्तरिक्ष में उड़ने से रोकती है। पौधों का जीवन तथा विकास कार्बनडाइ-आक्साइड के कारण तेजी से होता है। कार्बनडाइ-आक्साइड की अत्यधिक खपत से वायुमण्डल में इस गैस की मात्रा अत्यल्प अथवा समाप्त हो जाती है। फलस्वरूप वह रक्षा कवच टूट जाता है, जिससे पृथ्वी की गर्मी तेजी से वायुमण्डल की ओर चली जाती है और पृथ्वी ठण्डी होने लगती है। तापक्रम के घटने तथा कार्बनडाइ-आक्साइड की मात्रा में कमी पड़ने से पौधे सड़ने और मन लगते हैं। इस प्रकार वायुमण्डल में कार्बनडाइ-आक्साइड की घटोत्तरी का चक्र हिमयुग लाने का उत्प्रेरक बनता है।

‘मैग्नेटिक पोल रिवर्सल सिद्धान्त’ के आविष्कारक वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुव सदा एक स्थिति में नहीं रहते। पृथ्वी के इतिहास में ऐसे अनेकों अवसर आये हैं जब उसके चुम्बकीय ध्रुव परिवर्तित हुए हैं- उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव दक्षिणी में तथा दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव उत्तरी में बदले हैं। अनुमान है कि विगत सात लाख 60 हजार वर्षों में इस तरह के परिवर्तन 171 बार हुए हैं। यह सुनिश्चित रूप से तो नहीं कहा जा सकता कि इस तरह का परिवर्तन क्यों होता है पर ऐसे परिवर्तनों का प्रमाण मध्य अटलांटिक सागर तटों पर फैले पत्थरों के अध्ययन से मिला है।

उन विशेषज्ञों का विचार है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र किसी न किसी रूप में मौसम से जुड़ा हुआ है। जब भी पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन न होता है, उसका प्रभाव मौसम के परिवर्तन के रूप में होता है, जो किसी एक हिमयुग को जन्म देने तथा उसकी समाप्ति का कारण बनता है। वैज्ञानिकों का पूर्वानुमान है कि निश्चित रूप से निकट भविष्य में चुम्बकीय ध्रुवों का एक परिवर्तन और होने वाला है जो हिमयुग का कारण बनेगा जिसे स्पष्ट देखा जा सकेगा।

एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार एक हिमनद के धरातल पर उच्च दाब तथा पृथ्वी के उच्च ताप के कारण पानी के जमने की सम्भावना कम रहती है। एक बर्फ की चादर की सतह के 6 हजार फीट नीचे का तापक्रम उसके ऊपरी हिस्से से 25 डिग्री फारेन हाइट अधिक होता है। उच्च दाब बर्फ के गलनांक बिन्दु को 29.3 डिग्री फारेन हाइट तक घटा सकता है। वैज्ञानिकों ने रेडियोइको-साउन्डिग तकनीक के द्वारा पता लगाया है कि उपरोक्त प्रक्रिया से पश्चिमी अन्टार्टिक सागर के नीचे बर्फ की परतों में विशालकाय झीलें बन गयी हैं।

‘प्रो. जे. के. चार्ल्सवर्थ’ हिमयुग सम्बन्धी सिद्धान्तों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि “वे सिद्धान्त अपने में पूर्ण नहीं हैं तथा परस्पर एक दूसरे के विरोधी भी हैं पर इस सत्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि निकटवर्ती हिमयुग को लाने में अनेकों प्रकार की भौतिक शक्तियाँ कारण बनेगी। पर ऐसी स्थिति भी नहीं आयेगी कि अफ्रीका एवं कनाडा के शहरों पर बर्फ की चट्टानें तैरने लगें और संसार के सारे विशालकाय प्रासाद बर्फ नदी से ढक जायँ। पर इतना सुनिश्चित है कि धीरे-धीरे पृथ्वी ठण्डी होती जा रही है। संसार में शीत की अवधि अन्य मौसमों की तुलना में अधिक दिनों तक रहेगी और क्रमशः वह बढ़ती ही जायेगी। सम्भव है कुछ दशकों में उत्तरी ध्रुव जैसी परिस्थितियाँ विभिन्न भू-भागों पर दृष्टिगोचर होने लगें।”

11 जून 1983 को लगे- पूर्ण सूर्य ग्रहण के अवसर पर यूनिवर्सिटी आफ लन्दन के वैज्ञानिक जॉन पार्किन्सन तथा डगलस गोध ने अपने अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि सूर्य सिकुड़ रहा है। सन् 1916 के बाद अब तक सूर्य के घेरे में 480 कि.मी. सिकुड़न आ चुका है। सन् 1962 में प्रख्यात खगोलविद् राबर्ट लाइटन ने भी यह निष्कर्ष निकाला था कि सूर्य पाँच मिनट की समयावधि के हिसाब से गैस के गुब्बारे की तरह सिकुड़ता-फैलता हुआ दोलन करता है। सूर्य के सिकुड़ने की प्रक्रिया दोलन क्रिया से सर्वथा भिन्न है।

सूर्य तथा अन्य ग्रह गोलकों के मध्य कार्यरत दोनों विपरीत गुरुत्वाकर्षण बलों के दबाव से सभी ग्रह पिण्ड अपने स्थान पर सन्तुलन बनाये हुए गतिमान हैं। गुरुत्वाकर्षण बल ग्रहों के पदार्थ को केन्द्र की ओर दबाए उनके कोरों से निस्सृत होने वाले दबाव को रोकता है। सूर्य की कोर का तापमान दो करोड़ डिग्री सेन्टीग्रेड है जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से सूर्य को सिकुड़ने से बचाता है। पर विगत कुछ दशकों से यह तापक्रम कम हो गया है जिससे विकिरण दबाव घट गया है। फलस्वरूप गैर की परतें सिकुड़ने लगी हैं तथा सूर्य का व्यास भी घट गया है।

ग्लोबल तापक्रम का अध्ययन करने वाले मौसम विज्ञानियों का कहना है कि पिछले 50 वर्षों से वायु मण्डलीय तापक्रम क्रमशः गिरता जा रहा है। सन् 1940 से लेकर अब तक निरन्तर ह्रास हुआ है। सन् 1980 में 1940 की तुलना में 4 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम कम रहा। विशेषज्ञों का मत है कि यदि सूर्य के सिकुड़ने की रफ्तार यही रही तो उसके कार क्रमशः ठण्डे होते जायेंगे। इस क्रम से एक सदी के भीतर ही दूसरा हिमयुग आ धमकेगा।

संसार के विभिन्न देशों से जो समाचार मिल रहे हैं उनसे भी इस बात की पुष्टि हो रही है कि प्रकृति का इकॉलाजिकल चक्र बुरी तरह से असन्तुलित हो चुका है। एक क्रुद्ध हाथी की तरह प्रकृति व्यवहार कर रही है। औसतन संसार का आधा वर्ष ठण्ड का है। कितने ही रेगिस्तानी इलाकों में भी इस बार भीषण सर्दी पड़ी तथा ओले बरसे। मौसम विज्ञानी इसे इतिहास की एक असाधारण घटना मानते तथा किसी अशुभ समय की शुरुआत कहते हैं।

गत वर्ष दिसम्बर में वाशिंगटन से प्राप्त समाचार के अनुसार एक हफ्ते से भी अधिक समय तक अमरीका के पश्चिमी, दक्षिणी भाग में कड़ाके की ठण्ड पड़ती रही। ऐसी ठण्ड विगत सौ वर्षों में कभी नहीं पड़ी है। दक्षिणी पश्चिमी हिस्से के अनेकों स्थानों पर तापमान शून्य से भी बहुत नीचे रिकार्ड किया गया। टैक्सास, तथा प्रशान्त महासागर के तटवर्ती उत्तरी पश्चिमी इलाके में बर्फीली बारिश हुई। सड़कों पर बर्फ जम जाने के कारण पोर्टलैण्ड, सालेम सहित कई अन्य नगरों में सभी राजमार्गों पर यातायात बन्द रहा। 17 दिसम्बर 83 से उत्तरी राज्यों में भयंकर शीत लहर हफ्तों चलती रही। उत्तरी पश्चिमी क्षेत्रों में हुयी हिम वर्षा के कारण विमान सेवाओं को भी बन करना पड़ा। इस ठण्ड के कारण पाँच सौ से भी अधिक व्यक्ति मारे गये।

इसी शीत लहर के दौरान दक्षिण अमरीका के कई हिस्सों में बर्फ की दो इंच मोटी परत जम गयी। इस इलाके में अरबों रुपयों के फलों, सब्जियों तथा फसलों के बर्बाद होने का अनुमान है। नलों में पीने का पानी जम जाने से नगरों में पानी की सप्लाई ठप्प हो गयी। टमाटरों के भीतर तक बर्फ जम गयी थी। सेना, पुलिस तथा स्वयं सेवकों की मदद से ठण्ड से ग्रस्त क्षेत्रों में राहत कार्य पहुँचाया गया।

दिसम्बर 1983 में भारत के उत्तरी पूर्वी तथा उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में भीषण सर्दी पड़ी। शिमला, मन्सूरी, अम्बाला तथा हिमाचल प्रदेश के विभिन्न भागों में भयंकर बर्फ पड़ी। म. प्र. आन्ध्र प्रदेश, गुजरात आदि में भी अन्य वर्षों की अपेक्षा पिछले वर्ष ठण्ड अधिक पड़ी। पश्चिम जर्मनी, रूस कनाडा आदि के विभिन्न भागों में इस वर्ष पड़ी ठण्ड से पिछले सैकड़ों वर्षों के रिकार्ड टूट हैं।

जिन कारणों से हिम युग की परिस्थितियाँ बन रही हैं उनमें से अधिकाधिक मानवजन्य भी हैं। वायुमण्डल में भरता प्रदूषण, कोलाहल, वनों का विनाश आदि औद्योगीकरण की अदूरदर्शी नीतियों के परिणाम हैं। परस्पर सभी घटकों के जुड़े होने के कारण प्रभावित होने के कारण प्रभावित तो सम्पूर्ण सौर मण्डल ही होगा। प्रतिक्रिया स्वरूप यदि असन्तुलन बढ़ता तथा प्रकृति का आक्रोश हिमयुग जैसी परिस्थितियों के आगमन के रूप में बरसता है तो कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। अधिक अच्छा हो, मनुष्य अपनी अदूरदर्शी नीतियों को बदले। सम्भव है जिस विभीषिका के आने का संकेत विशेषज्ञ कर रहे हैं उसकी पूर्णतः रोकथाम न सही पर प्रकोप को कम करने में मदद अवश्य मिल सकती है। इस दिशा में सामूहिक प्रयास चलना चाहिए एवं सभी को सभी के हित की- भावी पीढ़ियों के भविष्य की भी चिन्ता करते हुए उन कारणों को निरस्त करने की योजना बनानी चाहिए।


नजरें जो बदलीं तो नजारे बदल गये

मस्जिद में एक अमीर नमाज पढ़ने आया। उसके पैरों में कीमती सोना जड़ें जूते थे। मालूम हुआ कि साल में एक बार नमाज पढ़ता है।

शेखसादी मन में दुःखी हुए। मैं रोज नमाज पढ़ता हूँ तो भी फटे जूते और इसे सोने वाले। हे ईश्वर! यह कैसा अन्याय?

थोड़ी देर में एक अपाहिज पंगा घिसटते हुए नमाज पढ़ने आया। उसे देखकर शेखसादी ने अपने विचार बदल दिये और ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहा- ‘मुझे पैर तो दिये यह क्या कम अनुग्रह है।’

पिछले से तुलना करके सन्तोष की साँस ली जाती है। सम्पन्नों के साथ तौलने से असन्तोष होता और ईर्ष्या उभरती है।

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एक अमीर किसी अपरिग्रही सन्त के यहाँ गया। सुविधा साधन नाममात्र के थे फिर भी सन्त बड़े सन्तुष्ट प्रसन्न और कार्य में तत्परतापूर्वक निरत मिले।

अमीर ने घर के हर कोने में दृष्टि दौड़ाई और कहा- इतनी गरीबी में तो आप दुःखी भी रहते होंगे।

सन्त ने कहा- ‘गरीबी में मनुष्य हलका रहता है। दुःखी तो अज्ञानी और लोलुप रहते हैं। बताइए यहाँ आपको कोई दुःख का चिन्ह दीख पड़ता है क्या?

अमीर सिटापिटा गये उनके सम्पदा और प्रसन्नता के अन्तर को समझा और नया प्रकाश लेकर वापस लौट गये।

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एक व्यक्ति सम्पन्न होते हुए भी अपने को दुःखी अनुभव करता था। उसे अधिक वैभव भी मिलने पर सुखी होने की कल्पना थी। वह मनोकामना पूर्ति के लिए एक सिद्ध पुरुष के पास गया।

सन्त ने कहा- ‘तुम सर्वसुखी मनुष्य का कुर्ता माँग लाओ। उसे मन्त्रित कर दूँगा। उसे पहनते ही तुम भी सर्वसुखी हो जाओगे।’

यह व्यक्ति दर-दर भटकता रहा पर किसी ने भी अपने को सर्वसुखी न बताया। मुद्दतों तक ठोकरें खाते रहने पर वह निराश घर लौटने लगा।

रास्ते में एक अलमस्त मिला। उसने अपने को सर्वसुखी कहा। पर जब कुर्ता माँगा गया तो उसने कहा- मैं तो मुद्दतों से नंगा रहता हूँ। कुर्ता मेरे पास कहाँ से आया?

समझा गया कि सुख एक मानसिक स्थिति है। उसका धन होने न होने से कोई सम्बन्ध नहीं।

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एक निर्धन किसी सिद्ध पुरुष के पास पहुँचा और अपनी दरिद्रता की चर्चा करते हुए किसी प्रकार धन दिलाने की प्रार्थना करने लगा।

सिद्ध पुरुष ने कहा- ‘तुम्हारे पास बहुमूल्य सम्पदा है उसका सही उपयोग करके दरिद्रता दूर क्यों नहीं कर लेते।

दरिद्र ने कहा- ‘मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।’

सन्त ने एक-एक करके प्रश्न पूछे। एक हाथ काटकर बेचने के लिए दो हजार में और दोनों हाथ देने के लिए पाँच हजार में तैयार हो क्या? उस व्यक्ति ने इन्कार कर दिया।

अब प्रश्नों का दूसरा दौर चला। नाक का- आँख का- पैरों का- हृदय का- सिर का मोल भाव होने लगा। कीमत एक से एक बढ़ी-चढ़ी थी। समस्त अवयवों की मिल-जुली कीमत लाखों तक पहुँच गई। पर वह व्यक्ति बेचने से इनकार ही करता रहा? यहाँ तक कि वह अपनी जवानी, किसी के बुढ़ापे के साथ बदलने तक को तैयार न हुआ।

इस पर सन्त ने कहा- “शरीर का मूल्य समझो। मस्तिष्क में भरी ज्ञान सम्पदा की ओर ध्यान दो। इन्हें सम्भालो, उभारो और पुरुषार्थ में जुट पड़ो। दरिद्रता तुम्हारे पास फटकने तक की हिम्मत न करेगी।”


शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार एवं उसकी चमत्कृतियाँ

शब्दाद्वैतवाद के अनुसार शब्द ही ब्रह्म है। उसकी ही सत्ता है। सम्पूर्ण जगत शब्दमय है। शब्द की ही प्रेरणा से समस्त संसार गतिशील है। महती स्फोट प्रक्रिया से जगत की उत्पत्ति हुई तथा उसका विनाश भी शब्द के साथ होगा। इन्द्रियों में सबसे अधिक चंचल तथा वेगवान मन को माना गया है। ‘मन के तीन प्रमुख कार्य हैं’- स्मृति, कल्पना तथा चिन्तन। इन तीनों से ही मन की चंचलता बनती है। लेकिन यदि मन को शब्द का माध्यम न मिले तो उसे चंचलता नहीं प्राप्त हो सकती। उसकी गति शब्द की बैसाखी पर निर्भर है। सारी स्मृतियाँ, कल्पनाएँ तथा चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।

दैनन्दिन जीवन में काम आने वाले शब्दों को दो भागों में बाँटा जा सकता है- व्यक्त और अव्यक्त। जैन पंन्थी इन्हें अपनी भाषा में जल्प और अन्तर्जल्प कहते हैं। जो बोला जाता है उसे जल्प कहते हैं। जल्प का अर्थ है- व्यक्त स्पष्ट मन्तव्य। जो स्पष्टतः बोला नहीं जाता, मन में सोचा अथवा जिसकी मात्र कल्पना की जाती है वह है- अन्तर्जल्प। मुँह बन्द होने होठ के स्थिर होने पर भी मन के द्वारा बोला जा सकता है, जो कुछ भी सोचा जाता है, वह भी एक प्रकार से बोलने की प्रक्रिया है तथा उतनी ही प्रभावशाली होती है जितनी की व्यक्त वाणी।

शब्द अपनी अभिव्यक्ति के पूर्व चिंतन के रूप में होता है। अपनी उत्पत्ति काल में वह सूक्ष्म होता है पर बाहर आते-आते वह स्थूल बन जाता है। जो सूक्ष्म है वह हमारे लिये अश्रव्य है। जो स्थूल है वही सुनाई पड़ता है। ध्वनि विज्ञान ने ध्वनियों को दो रूपों में विभक्त किया है-श्रव्य और अश्रव्य। अश्रव्य- अर्थात्- अल्ट्रा साउण्ड- सुपर सोनिक। हमारे कान मात्र 20000 कम्पन आवृत्ति को ही पकड़ सकते हैं। वे न्यूनतम 20 कम्पन आवृत्ति प्रति सेकेण्ड तथा अधिकतम 20 हजार कम्पन आवृत्ति प्रति सेकेण्ड को पकड़ने में सक्षम हैं। पर उनसे कम तथा अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों का भी अस्तित्व है। श्रवणेन्द्रियों की मर्यादा अपनी सीमा रेखा को चीर नहीं पाती। फलस्वरूप वे ध्वनियाँ सुनाई नहीं पड़तीं। कान यदि सूक्ष्मातीत ध्वनि तरंगों को पकड़ने लगें तो मालूम होगा कि संसार में नीरवता कहीं और कभी भी नहीं है। कमरे में बन्द आदमी अपने को कोलाहल से दूर पाता है। पर सच्चाई यह है कि उसके चारों और कोलाहल का साम्राज्य है।

समूचा अन्तरिक्ष ध्वनि तरंगों से आलोड़ित है। उनमें से थोड़ी-सी ध्वनियाँ मात्र मनुष्य के कानों तक पहुँच पाती हैं। प्रकृति की अगणित घटनाएँ सूक्ष्म जगत में पकती रहती हैं। घटित होने के पूर्व भी उनकी सूक्ष्म ध्वनि तरंगें सूक्ष्म अन्तरिक्ष में दोलयमान रहती हैं। उन्हें पकड़ा और सुना जा सके तो कितनी ही प्रकृति की घटनाओं का पूर्वानुमान लगा सकना सम्भव है। मनुष्येत्तर कितने ही जीव ऐसे हैं जिन्हें प्रकृति की घटनाओं का भूकम्प, तूफान आदि विभीषिकाओं का पूर्वाभास हो जाता है। सूचना मिलते ही उनका व्यवहार बदल जाता है। अपनी आदत के विरुद्ध वे अस्वाभाविक आचरण करने लगते हैं। कितने ही सुरक्षा के लिए सुरक्षित स्थानों की ओर दौड़ने लगते हैं। सूक्ष्म ध्वनि स्पन्दनों के आधार पर ही वे सम्भाव्य विभीषिकाओं का अनुमान लगा लेते हैं।

जो कुछ भी बोला अथवा सोचा जाता है वह तुरन्त समाप्त नहीं हो जाता, सूक्ष्म रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान रहता, तरंगित होता रहता है। हजारों-लाखों वर्षों तक ये कम्पन उसी रूप में रहते हैं। ऐसे प्रयोग भी वैज्ञानिक क्षेत्र में चल रहे हैं कि भूतकाल में जो कुछ भी कहा गया है ईथर में विद्यमान है उसे यथावत् पकड़ा जा सके। सदियों पूर्व महा-मानवों ऋषि कल्प देव पुरुषों ने क्या कहा होगा, उसे प्रत्यक्ष सुना जा सके ऐसे अनुसन्धान प्रयोगावधि में हैं। अभी सफलता तो नहीं मिल पायी है पर वैज्ञानिक आश्वस्त हैं कि आज नहीं तो कल वह विद्या हाथ लग जायेगी। निस्सन्देह यह उपलब्धि मानव जाति के लिए महत्वपूर्ण तथा अद्वितीय होगी अब तक की वैज्ञानिक उपलब्धियों में वह सर्वोपरि होगी। सम्भवतः इसी आधार पर कृष्ण द्वारा कही गयी गीता, एवं राम रावण संवादों को अपने ही कानों से सुनना सम्भव हो सकेगा।

रेडियो, टेलीविजन, राडार की भाँति प्राचीन काल के आविष्कारों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथा चमत्कारी खोज थी- मन्त्र विद्या। मन्त्र ध्वनि विज्ञान का सूक्ष्मतम विज्ञान था। इसके अनुसार जो कार्य आधुनिक यन्त्रों के माध्यम से हो सकते हैं वे मन्त्र के प्रयोग से भी सम्भव हैं। पदार्थ की तरह अक्षरों तथा अक्षरों से युक्त शब्दों में अकूत शक्ति का भाण्डागार मौजूद है। मन्त्र कुछ शब्दों के गुच्छक मात्र होते हैं पर ध्वनि शास्त्र के आधार पर उनकी संरचना बताती है कि एक विशिष्ट ताल, क्रम एवं गति से उनके उच्चारण से विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है। प्राचीन काल में ऋषियों ने शब्दों की गहराई में जाकर उनकी कारण शक्ति की खोज-बीन के आधार मन्त्रों एवं छन्दों की रचना की थी। पिछले दिनों ध्वनि विज्ञान पर अमेरिका पश्चिम जर्मनी में कितनी ही महत्वपूर्ण खोजें हुई हैं। साउण्ड थैरेपी एक नयी उपचार पद्धति के रूप में विकसित हुई है। ध्वनि कम्पनों के आधार पर मारक शस्त्र भी बनने लगे हैं। ब्रेन वाशिंग के अगणित प्रयोगों में ध्वनि विद्या का प्रयोग होने लगा है। अन्तरिक्ष की यात्रा करने वाले राकेटों, स्पेस शटलों के नियन्त्रण संचालन में भी शब्द विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान है। पर वैज्ञानिक क्षेत्र में ध्वनि विद्या का अब तक जितना प्रयोग हुआ है, वह स्थूल है, सूक्ष्म और कारण स्वरूप अभी भी अविज्ञात अप्रयुक्त है जो स्थूल की तुलना में कई गुना अधिक सामर्थ्यवान है। मन्त्रों में शब्दों की स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म एवं कारण शक्ति का अधिक महत्व है। मानवी व्यक्तित्व की गहरी परतों- मन एवं अन्तःकरण को मन्त्र की सूक्ष्म एवं कारण शक्ति ही प्रभावित करती है। व्यक्तित्व का रूपान्तरण- विचारों में परिवर्तन उसके प्रभाव से ही होता है।

यों तो वेदों के हर मन्त्र एवं छन्द का अपना महत्व है। देखने में गायत्री महामन्त्र भी अन्य मन्त्रों की तरह सामान्य ही लगता है, जो नौ शब्दों तथा 24 अक्षरों से मिलकर बना है। पर जिन कारणों से उसकी विशिष्टता आँकी गई है वे हैं- मन्त्र के विशिष्ट क्रम में अक्षरों एवं शब्दों का गुँथन प्रवाह, उनका चक्र-उपत्यिकाओं पर प्रभाव तथा उसकी महान प्रेरणाएँ। हर अक्षर एक विशिष्ट क्रम में जुड़कर असीम शक्तिशाली बन जाता है। 24 रत्नों के रूप में अक्षरों के नवनीत का एक मणिमुक्तक बना तथा आदिकाल में प्रकट हुआ। ब्रह्म की स्फुरणा के रूप में गायत्री मन्त्र का प्रादुर्भाव हुआ तथा आदि मन्त्र कहलाया। सामर्थ्य की दृष्टि से इतना विलक्षण एवं चमत्कारी अन्य कोई भी मन्त्र नहीं है। दिव्य प्रेरणाओं की उसे गंगोत्री कहा जा सकता है। संसार के किसी भी धर्म में इतना संक्षिप्त, पर इतना अधिक सजीव एवं सर्वांगपूर्ण कोई भी प्रेरक दर्शन नहीं है जो एक साथ उन सभी प्रेरणाओं को उभारे जिनसे महानता की ओर बढ़ने तथा आत्मबल सम्पन्न बनने का पथ-प्रशस्त होता है।

ब्रह्म की अनुभूति शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म के रूप में भी होती है जिसकी सूक्ष्म स्फुरणा हर पर सूक्ष्म अन्तरिक्ष में हो रही है। गायत्री महामन्त्र नाद ब्रह्म तक पहुँचने का एक सशक्त माध्यम है। प्राचीन काल की तरह सामान्य व्यक्ति को भी अतिमानव- महामानव बना देने की सामर्थ्य उसमें मौजूद है। आवश्यकता इतनी भर है कि गायत्री मन्त्र की उपासना के विधि-विधानों तक ही सीमित न रहकर उसने निहित दर्शन एवं प्रेरणाओं को भी हृदयंगम किया जाय और तद्नुरूप अपने व्यक्तित्व को ढाला जाय। पूरी श्रद्धा के साथ मन्त्र का अवलम्बन लिया जा सके तो आज भी वह पुरातन काल की ही तरह चमत्कारी सामर्थ्यदायी सिद्ध हो सकता है।


सूक्ष्मीकरण पर आधारित यज्ञोपचार पद्धति

स्थूल की तुलना में सूक्ष्म की सामर्थ्य कहीं अधिक होने की बात विज्ञान की कसौटी पर भी कसी जा चुकी है। मनुष्य का दृश्य शरीर पदार्थ निर्मित स्थूल होने के कारण सीमित अवधि तक सीमित काम ही कर पाता है। शक्ति चुक जाने पर थकान आती है और फिर कुछ करते धरते नहीं बनता। यह बात सूक्ष्म शरीर के सम्बन्ध में लागू नहीं होती। वह बिना ईंधन के ही काम करता और चिरकाल तक समान रूप से यथावत् क्रियाशील रहता है। उसकी गति भी बहुत है और सामर्थ्य भी। यही बात पदार्थ के सम्बन्ध में भी है दृश्यमान मिट्टी का ढेला अस्तित्व की दृष्टि से उपहासास्पद है। पर उसी का एक परमाणु अपनी सूक्ष्म शक्ति का जब परिचय देता है तो आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। अणु विस्फोट की भयंकरता का जिन्हें पता है, उन्हें यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि औषधियों को यदि ऐसे ही मोटे रूप में कूटकर उनके प्राकृत स्वरूप में ग्रहण किया जाय तो उसकी तुलना में सूक्ष्म स्तर की औषधि का सेवन कितना अधिक लाभदायक हो सकता है।

होम्योपैथी और यज्ञोपचार में औषधि की सूक्ष्म शक्ति को समझने और उससे लाभान्वित होने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार सैद्धान्तिक दृष्टि से दोनों में असाधारण साम्य देखा जा सकता है। यज्ञ द्वारा शारीरिक एवं मानसिक रोगों के उपचार एवं होम्योपैथी में एक ही अन्तर है कि जहाँ यज्ञ में मुख्यतः पदार्थ के तीसरे रूप गैस का- पदार्थ के वायुभूत रूप का प्रयोग होता है वहाँ होम्योपैथी में ठोस या द्रव्य रूप में सूक्ष्मीकृत औषधियाँ खिलाई जाती हैं। पदार्थ विज्ञान के आरम्भिक छात्र भी जानते हैं कि पदार्थ का- रूपान्तरण सॉलिड, लिक्विड एवं गैस रूपों में होता रहता है। मूलभूत सत्ता यथावत् बनी रहती है लेकिन उनका रूपान्तर इन तीनों में होता रहता है एवं शक्ति सामर्थ्य भी उसी अनुपात में घटती-बढ़ती है।

यज्ञ चिकित्सा में यह आग्रह नहीं है कि उपचार वायुभूत भैषज से ही किया जाय। यज्ञ भस्म, चरु, औषधि क्वाथ, आचमन, मार्जन, मर्दन के माध्यम से ठोस एवं द्रव्य रूप दोनों के ही प्रयोगों का विधान है। इसी प्रकार होम्योपैथी में भी औषधि को सुधाकर, उच्च पोटेन्सी में नासिका, मुखद्वार एवं आँखों की श्लेष्मा झिल्ली से द्रव्य को स्पर्श मात्र कराकर भी शरीर के भीतर पहुँचाया जाता है। इस प्रकार दोनों ही उपचार पद्धतियों में तीनों स्तर के उपचारों की व्यवस्था है। यह बात अलग है कि जहाँ प्रचलन होम्योपैथी में ठोस और द्रव्य रूप का अधिक है, वहाँ यज्ञ में वायुभूत आधार अपनाने की प्रमुखता दी गयी है। आधारभूत सिद्धान्तों की पुष्टि इतने अन्तर के बाद भी हो जाती है एवं यह स्पष्ट पाया जा सकता है कि पदार्थ का सूक्ष्मीकृत रूप हर दृष्टि से अधिक प्रभावशाली होता है।

हैनिमेन के अनुसार सूक्ष्मीकरण से पदार्थ की शक्ति असंख्यों गुनी बढ़ जाती है एवं औषधि का वह शक्तिशाली अंश उभर आता है जिसे कारण तत्व कहते हैं। स्थूल औषधि की तुलना में सूक्ष्म की सामर्थ्य का अनुपात अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा होता है। हैनिमेन ने जिन प्रयोगों को आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व स्वयं पर करके इस उपचार पद्धति की प्रामाणिकता सिद्ध की थी, पिछले दिनों डॉ. डब्ल्यू. ई. बॉयड एवं अन्य कुछ वैज्ञानिकों ने पदार्थ के अन्दर की आणविक शक्तियों पर होने वाली प्रतिक्रिया पर प्रयोगशाला में परीक्षण कर पुनः प्रामाणित किया है। उन्होंने प. जर्मनी के डॉक्टर ओ. लीसर, के. जेनर एवं एच. शीलर आदि ने अपने कार्य द्वारा यह प्रमाणित किया है कि यदि किसी नमक की हैनिमेन द्वारा बताई गयी विधि के अनुसार लैक्टोरा चूर्ण में मिलाकर पोटेन्सीज बनाई जायें तो कुछ ही पोटेन्सीज बनने के बाद नमक एवं लैक्टोस दोनों ही यौगिकों के सामान्य गुण धर्म ढूँढ़ने पर नहीं मिलते। एक्स-रेडिफ्रेक्शन तकनीक द्वारा जब इन लवणों को ढूँढ़ा गया तो पता चला कि उनकी लैटिस-संरचना टूट चुकी थी। इसे समझाते हुए वे आगे लिखते हैं कि किसी भी पदार्थ के अणु-परमाणुओं का त्रिआयामीय ज्यामितीय सम्बन्ध टूट जाने का अर्थ है- ऊर्जा का परिमाण बढ़ जाना।

इन वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि ठोस पदार्थों की लैटीस संरचना टूटने के फलस्वरूप ऐसी विद्युतीय तरंगें निकलती हैं जिनकी दिशा निश्चित होती है, बेधक क्षमता तीव्र होती है तथा वे तन्त्रिका संस्थान, सिनेप्सों (मिलन-बिन्दु) एवं हारमोन स्राव केन्द्रों पर अपना सीधा प्रभाव डालती हैं। ये गुण, ठोस पदार्थ, चाहे वह काष्ठ रूप में हो अथवा धातु के टुकड़े के रूप में, में मूलतः नहीं पाई जातीं। इस प्रकार होम्योपैथी सिद्धान्त कहता है कि पदार्थ की शक्ति असंख्यों गुनी बढ़ाने के लिये, उसके सूक्ष्म पक्ष को उभारने के लिए उसे सूक्ष्मीकृत किया जाना चाहिये। इसे वे पोटेन्टाइजेशन कहते हैं।

यज्ञ चिकित्सा के शास्त्र प्रामाणित सिद्धान्तों पर दृष्टि दौड़ाने पर हम पाते हैं कि इसके प्रणेता पदार्थ के ठोस और द्रव रूप की तुलना में और भी अधिक सामर्थ्यवान वाष्प (गैस) पक्ष को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनकी इस परिकल्पना को कुछ मोटे उदाहरणों से समझा जा सकता है। मिर्च अपने मूल रूप में छोटी परिधि में सीमित रहती है। उसे पीसकर पानी में घोल दिया जाय तो चटपटापन अधिक विस्तृत हो जाता है। यदि उसी मिर्च को जलाया जाय तो वायुभूत होने पर अपना दायरा एवं प्रभाव कहीं अधिक बढ़ा लेती है और प्रतिक्रिया तुरन्त आँखों से पानी आने, छींक व खाँसी उठने के रूप में देखी जा सकती है। तेल अपने पात्र में थोड़ा-सा स्थान घेरता है। हौज में फैला देने पर उसकी पतली परत पूरे विस्तार पर दीखने लगती है। उसी तेल को जलाने पर वह गन्ध दूर-दूर तक पहुँचती व यह परिचय देती है कि कौन-सा पदार्थ कहाँ जलाया गया है। ये साक्षियाँ यही बताती हैं कि ठोस और द्रव की तुलना में गैस की परिधि एवं समर्थता बढ़ती ही है, घटती नहीं। जल की तुलना में भाप अधिक सामर्थ्यवान एवं व्यापक है। एक और अपरिमित मात्रा में जलराशि समुद्र में फैली पड़ी है तो दूसरी ओर उसका एक अंश ठोस रूप में उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों तथा अन्यान्य स्नोबेल्ट्स में पाया जाता है। वाष्पीभूत बादलों की इन्हीं दोनों रूपों का परिष्कृत एवं व्यापक स्वरूप समझा जा सकता है जो मानसून, समुद्री तूफान, झंझावात रूप में आते व बरसते हैं- पृथ्वी को जलमग्न कर देते हैं। यह सूक्ष्म की शक्ति का चमत्कार है।

यज्ञोपचार में यही प्रयोग किया जाता है कि जिस रोग में दिये जाने का विधान है, उसे वायुभूत बनाकर रोगी के शरीर में विभिन्न मार्गों में पहुँचाया जाय। ये मार्ग नासिका रन्ध्रों से होकर फेफड़ों के माध्यम से रक्त तक, त्वचा के रोम-कूपों से रक्तवाही नलिकाओं तक एवं गन्ध के माध्यम से सीधे मानस तक- इन रूपों में हो सकते हैं। यज्ञाग्नि के माध्यम से औषधि की सूक्ष्म शक्ति को उभारा जाता है और रोगी को अधिक से अधिक लाभ पहुँचाने की प्रक्रिया को सम्भव बनाने का प्रयास किया जाता है। यही प्रयोग होम्योपैथी में पोटेन्सी बढ़ाकर औषधि दिये जाने के रूप में सम्पन्न होता है। खरल करके औषधि के कणों को सूक्ष्म बनाकर जहाँ तक सम्भव हो, उनकी प्रभाव क्षमता को उभारा जाता है।

“फिफ्टी रीजन्स फॉर मायबिइंग होम्योपैथ” नामक पुस्तक के लेखक डॉ. जे. सी. बर्नेट अपने समय में इंग्लैण्ड की ख्याति मूर्धन्य ऐलोपैथिक चिकित्सकों में से एक थे। इस पुस्तक में उन्होंने अनेकों ऐसे रोगियों का हवाला दिया है जो एलोपैथी से ठीक न हो पाये किन्तु होम्योपैथी से ठीक हो गए। डॉ. जेम्स टाइलर कैण्ट ने अपनी पुस्तक “लेसर राइटिंग्स एण्ड क्लीनिकल केसेज” में ऐसे अनेकों रोगियों का विवरण है जो विचित्र रोगों से पीड़ित थे या मरणासन्न थे लेकिन सूक्ष्मीकृत औषधियों के प्रयोग से ठीक हो गए।

डॉ. एन.एम. चौधरी से अपनी पुस्तक- “सिस्टेमेटिक मटेरिया मेडीका” में तथा डॉ. नैश ने भी ऐसे अनेकों रोग प्रकरणों का वर्णन किया है जिनमें सामान्यतया उपलब्ध काष्ट औषधियों के सूक्ष्मीकृत प्रयोगों से कई असाध्य रोग ठीक हो गए। “ब्रिटिश होम्योपैथी जरनल” एवं “अमेरीकन केमीकल सोसायटी जनरल” ने भी अपने शोध निष्कर्षों में ऐसे प्रमाण दिये हैं जिनसे सिद्ध होता है कि पदार्थ में छिपा अविज्ञात आयाम इस चिकित्सा प्रक्रिया में उभरकर आ जाता है।

रसायन शास्त्र एवं भौतिकी के ज्ञात नियमों के आधार पर इस सिद्धान्त को नहीं समझा जा सकता। सूक्ष्मीकरण की इस मान्यता को भारतीय दर्शन ने आदिकाल से ही महत्व दिया है एवं अग्निहोत्र-यजन प्रक्रिया के रूप में उसकी स्थूल स्थापना की है। आप्त मान्यता है कि प्रत्येक पदार्थ अपने भौतिक एवं रासायनिक गुणों के अतिरिक्त भी कुछ विशेषताएँ रखता है जो उसके स्थूल- दृश्यमान गुणों से कहीं अधिक समर्थ, सशक्त, बेधक सामर्थ्य वाली है। उन्हें पदार्थ का सूक्ष्म शरीर कहा गया है व इनको निखारने की प्रक्रिया का सूक्ष्मीकरण। अथर्व वेद में स्थान-स्थान पर ऐसे सन्दर्भ मिलते हैं जिनसे इस मान्यता की पुष्टि होती है कि पदार्थ की सभी विशेषताओं का समुच्चय उसका सूक्ष्म शरीर ही है।

होम्योपैथी ने प्रकारान्तर से इसी तथ्य को महत्व दिया है कि पदार्थ की सूक्ष्म शक्ति उसके रासायनिक गुणों पर आधारित नहीं है, अपितु उससे भिन्न व स्वतन्त्र है। सूक्ष्मीकृत करने पर जब दवा में अणुओं का अस्तित्व तक संदिग्ध हो जाता है, तब भी सूक्ष्म गुण उसमें विद्यमान रहते ही नहीं अपितु और भी अधिक प्रखर हो जाते हैं।

होम्योपैथी व यज्ञोपचार का यह अद्भुत मात्र यह प्रतिपादित करने के लिये दर्शाया गया कि पदार्थ अपने सूक्ष्म रूप में कितना प्रभावशाली होता है। स्थूल रोगों- मनोविकारों के उद्गम केन्द्र तक मात्र सूक्ष्म की ही पहुँच हो सकती है। उस दृष्टि से यज्ञोपचार पद्धति पूर्णतः निरापद, अत्यधिक प्रभावशाली है। प्रयोग परीक्षण तो इस दिशा में आधुनिक यन्त्रों की मदद से ब्रह्मवर्चस् में चल ही रहे हैं, इसकी चमत्कारी फलश्रुतियों से अगणित व्यक्ति लाभान्वित होते देखे जा सकते हैं। सूक्ष्मीकरण पर आधारित इस विधा को प्रतिष्ठित स्थान दिलाने के लिए अभी और भी सशक्त प्रयासों की आवश्यकता है ताकि भारतीय संस्कृति के इस महत्वपूर्ण अध्यात्म प्रयोग को वैज्ञानिक मान्यता दी जा सके- सर्वसाधारण के उपचार हेतु इसका प्रचलन सम्भव हो सके।


रवीन्द्र बाबू की हत्या के लिए (kahani)

ईर्ष्यालुओं ने रवीन्द्र बाबू की हत्या के लिए रात्रि के समय एक गुण्डे को भेजा। वह भाड़े पर हत्या करने का व्यवसाय करता था।

समय आधी रात का था। रवीन्द्र बाबू अपने कमरे में बैठे कविता लिख रहे थे। गुण्डे ने छुरा निकाला और वार करने की मुद्रा बनाई।

रवीन्द्रजी का ध्यान बँटा। दृश्य देखते ही वस्तुस्थिति समझ गये। उनने बिना घबराये आक्रमणकारी से उँगली का इशारा करते हुए कहा- ‘अभी उस कुर्सी पर बैठ जाओ। कविता अधूरी है, इसे पूरी कर लूँ तब हमला करना। इतनी रात गये यहाँ कोई है भी नहीं। तुम मजे में अपना काम करना। मुझे मौत का कोई डर नहीं।

गुण्डा इतनी निर्भयता देखकर सकपकाया तो, किन्तु बैठा नहीं। ठिठका अवश्य पर छुरा नीचे नहीं किया, खड़ा ही रहा। वह बैठने और प्रतीक्षा करने के लिए सहमत नहीं हो रहा था।

रवीन्द्र बाबू ने दूसरी मुद्रा बनाई और कड़ककर कहा- चुपचाप बैठो उसी कुर्सी पर, देखते नहीं कविता अधूरी है। जब तक यह पूरी न होगी, मौत कैसे अपना काम करेगी? बैठो चुपचाप। निर्भयता के उपरान्त साहसिकता की दूसरी चोट खाकर आक्रमक का हौसला टूट गया और वह छुरा बगल में दबा के उल्टे पैरों वापस लौट गया।


प्रलोभन की मृग मरीचिका एवं अपरिग्रह का नन्दन वन

महापण्डित कौत्स्य कालिन्दी तट पर बैठकर नित्य प्रवचन करते। उनका प्रधान विषय होता था लोभ से विनाश। कथन, श्रवण ही उन्हें सब कुछ लग रहा था। इतना ही नहीं प्रलोभन और व्यक्तिक्रम का अवसर न आने से वे अपने को आत्मजयी अनुभव करने लगे।

गहरे जल में रहने वाले घड़ियाल ने उनकी वाचालता अपरिपक्वता और अहमन्यता को तोड़ा और एक अतिरिक्त प्रसंग प्रस्तुत किया। अवसर पाकर एक दिन उसने बहुमूल्य मोतियों के दाने तट से लेकर उनके आसन तक बखेर दिये।

ध्यान बटा तो चमकते मोतियों के बटोरने के लिए वे पुस्तक और माला एक ओर रखकर उठ खड़े हुए। एक-एक करके बीनते हुए वे धारा के समीप तक जा पहुँचे।

घड़ियाल ने साष्टांग दण्डवत करते हुए कहा। “जलचर होने के कारण आपके आसन तक पहुँच नहीं पाता था सो मोती बखेर कर आपको ही यहाँ तक पधारना और दर्शन देने का कष्ट किया। मैं धन्य हो गया।”

घड़ियाल की सम्पन्नता और उदारता और श्रद्धा देखकर कौत्स्य बहुत प्रसन्न थे। उसे आशीर्वाद देने लगे। तो घड़ियाल और भी गिड़गिड़ाया बोला- आप तो करुणा निधान हैं। मेरी एक और मनोकामना पूरी कर दें। त्रिवेणी स्थान की मेरी इच्छा है पर मार्ग देखा नहीं। आप मेरी पीट पर सवार होकर वहाँ तक मार्गदर्शन करते चलें तो मेरे पास सहस्र मणि मुक्तकों वाला जो हार है उसे भी भेंट करूँगा।

लोभ के प्रथम आक्रमण, आकर्षण में महापण्डित का पाण्डित्य हवा में उड़ गया। इतना बड़ा लाभ उनसे छोड़ते न बना। सो मगर की पीठ पर जा चढ़े। बीच धारा में पहुँच कर दोनों सुखपूर्वक प्रवाह का आनन्द लेने लगे।

घड़ियाल ने जिज्ञासा की- आप प्रतिदिन लोभ से विनाश का जो उपदेश देते रहते थे वह उतनी जल्दी विस्मृत कैसे हो गया?

उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही घड़ियाल ने करवट बदली और जल में बहते महापण्डित को उदरस्थ कर लिया?

***

सन्त ने सम्राट का आतिथ्य स्वीकार किया। राजा ने उन्हें सत्कारपूर्वक कई दिन ठहराया सत्संग का लाभ लिया। साथ ही राजमहल के अनेक बहुमूल्य पदार्थ दिखाये। रत्न भण्डार में लाये और रखे हुए मणि मुक्तकों का परिचय कराने लगे। सन्त मौन रहकर यह सब सुनते रहे।

एक बार सन्त ने राजा को अपनी कुटिया पर आमन्त्रित किया। समयानुसार वे पहुँचे भी। आतिथ्य के उपरान्त सन्त ने आश्रय की छोटी-छोटी वस्तुओं का दिखाना आरम्भ कर दिया। सस्ती और सामान्य वस्तुएँ देखने में राजा को रुचि नहीं थी तो भी वे शिष्टाचार वश उन्हें उपेक्षापूर्वक जैसे-तैसे देखते रहे।

देर तक जिसकी उपयोगिता बताई गई वह थी आटा पीसने की हाथ चक्की।

राजा की अरुचि अब अधिक मुखर होने लगी वे बोले- “वह तो घर-घर में रहती है। एक दो रुपये मूल्य की होती है। इसमें क्या विशेषता”।

सन्त गम्भीर हो गये। बोले आपके रत्न भी पत्थर के हैं। किसी काम नहीं आते, उल्टे रखवाली कराते हैं। जब कि चक्की जीवन भर उपकार करती और अनेकों का पेट भरती है। रत्न राशि से इसका महत्व कहीं अधिक है।

राजा का विवेक जगा और वे उपयोगिता अनुपयोगिता का अन्तर समझने लगे।


अपनों से अपनी बात

वरिष्ठों की वास्तविक परख इसी विषम वेला में

दूध में घी छिपा रहता है पर आग पर चढ़ाते ही मलाई ऊपर तैरने लगती है। दूध में घी खोजने का कठिन कार्य इसी प्रकार सरल सम्भव हो पाता है। आपत्तिकाल की हानियाँ कितनी ही क्यों न हों, पर उसका एक असाधारण लाभ भी है कि वरिष्ठता उछलकर अनायास ही आगे आ जाती है और भावनाशीलों तथा कृपण कायरों की छाँट होने में तनिक भी देर नहीं लगती।

बसन्त की इस बेला में दसों दिशाओं से वरिष्ठों की पुकार है। मानवी प्रगति और संस्कृति को विकसित होने में लाखों करोड़ों वर्षों का- अगणित प्रतिभाओं की सूझ-सूझ श्रम, साधना एवं दूरदर्शिता का समावेश हुआ है। ऊबड़-खाबड़ धरातल और वनचरों का अनगढ़ प्राणि समुदाय, सभ्य समुन्नत मनुष्य के स्तर तक अनायास ही नहीं आ पहुँचा। क्रमिक प्रगति के बढ़ते हुए चरण, वर्तमान स्तर तक पहुँचने में ना जाने चिन्तन, विकास और साधन सम्पादन में कितनी ठोकरें खाते रहे हैं। उन्हें न जाने कितने खाई-खन्दक पार करने पड़े हैं। स्थिति जब सन्तोष की साँस लेने और अधिक उज्ज्वल भविष्य की आशा करने योग्य बनी है, तो वज्रपात होने जैसा संकट सामने आ खड़ा हुआ है। नगरों और उद्यानों को भस्मसात् करने वाले दावानल की प्रचण्ड लपटें इसलिए भी कलेजा कँपाती हैं कि महाविनाश के उपरान्त जो बचेगा वह कितना वीभत्स और त्रासदी से भरा होगा। उस मरघट में कोई रहेगा कैसे? जो रहेगा सो जियेगा कैसे?

पकी फसल पर जब ओले गिरते हैं, टिड्डी दल जब समूची हरीतिमा निगलते हैं तो उन पर क्या बीतेगी जिनने अहिर्निशि श्रमरत रहकर आशा उल्लास का सपना सँजोया था। उन बच्चों की कातरता कितनी कष्ट कर होगी जो इस विनाश के कारण भुखमरी से ग्रसित होकर काल कवलित होने की आशंका से भयभीत हो रहे हैं। प्रस्तुत विभीषिकाएँ, फुलझड़ियों का- पटाखों का तमाशा नहीं है, जिसे देखने का सुखद कौतूहल सधे। समस्याएँ और विपत्तियाँ काल्पनिक नहीं वास्तविक हैं। सर्वनाश के एक नहीं अनेकों संकट सामने मुँह बायें खड़े हैं। अणु भण्डार में एक माचिस पड़ने भर की देर है। औद्योगिक प्रदूषण से प्राणियों का दम घुटने और मन्द विष पीकर आत्मघात होने की आशंका अवास्तविक नहीं है। बढ़ते विकिरण के प्रभाव और अन्तरिक्ष में संव्याप्त असन्तुलन से खण्ड प्रलय होने की बात जो कहते हैं उन्हें सनकी नहीं कहा जा सकता। बढ़ती जनसंख्या का विस्फोट और निर्वाह साधनों का समापन मिलजुलकर भुखमरी, महामारी अथवा परस्पर लड़ मरने की स्थिति ही उत्पन्न करेगा। अनाचारी अदूरदर्शी जन समुदाय कुकृत्यों के दल-दल में अधिकाधिक गहरा धँसता जायेगा तो फिर उसे उबारने के इतने साधन आयेंगे कहाँ से?

आँख के सामने वाली दुर्घटनाएँ ही सब कुछ नहीं होतीं। विवेक बुद्धि से आगत विनाश को भी देखा समझा जा सकता है। नशा पीने और बहुप्रजनन जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ आरम्भ में कौतुक-कौतूहल जैसी लगती हैं। पर समयानुसार वह विपत्ति भी आये बिना नहीं रहती, जिनमें परिवार के परिवार नष्ट होते चले जाते हैं। धूमधाम और दान-दहेज वाली शादियाँ उत्सव की दृष्टि से मनोरंजन लगती हैं पर किसी भी दूरदर्शी की आँखें यह बता सकती हैं कि इन कुकृत्यों के कुछ ही समय उपरान्त कितने भयानक दुष्परिणाम सामने प्रस्तुत होने जा रहे हैं। आज की परिस्थितियों में भी आम लोगों का भोजन, आच्छादन, व्यवसाय और अभ्यस्त ढर्रा सामान्य जैसा चल रहा हो तो भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि गाड़ी इसी तरह चलती रहेगी। वह दिन दूर नहीं जब परिस्थितियों की विषमता ऐसी होगी जिसमें से न पीछे हटने की गुंजाइश रहेगी, न आगे बढ़ने की। चक्रव्यूह में पूरी तरह फँस जाने पर बचने की आशा नहीं रहती। समय रहते ही कुछ किया जा सके तो बात बनेगी। टालने के नुस्खे से कुछ ही दिन काम चल सकता है। विषमता बढ़ जाने पर फिर प्रमाद भी तो काम नहीं आता।

परिस्थितियों ने हर विचारशील को पुकारा है कि वे आगे आयें। सोतों को जगायें और विपत्तियों से बचने के लिए सामयिक परिवर्तन का उपाय सुझायें। जो लम्बी चादर तान कर सो रहें हैं, खुमारी की गहराई में जिन्हें दीन दुनिया का कुछ पता नहीं, उनसे तो कोई क्या कहे? आफत समझदारों की है। वह भी समय रहते चेतने की उपेक्षा दिखायें तो समझना चाहिए आशा का टिमटिमाता दीपक भी बुझ गया। भले ही सारा गाँव मुहल्ला सोता रहे पर प्रहरी को तो जागना ही चाहिए। सेंध लगने पर सबसे अधिक भर्त्सना उनकी होती है जो जागते हुए भी खतरे की घंटी न बजा सके। चोरी होने पर सबसे पहले पहरेदार के ही कान ऐंठे जाते हैं और इल्जाम लगाया जाता है कि उसी की मिली भगत से अथवा असावधानी से दुर्घटना घटी। समय की विभीषिकाएँ सदा ऐसा ही धर्म संकट उनके सम्मुख उपस्थित करती हैं जिन्हें दूरदर्शिता और सद्भावना मिली है। यह दोनों वरदान ऐसे हैं, जिनके मिलने पर सहज उत्तरदायित्व भी कंधे पर लदता है कि वे विपन्नता को सहन न करें उसे अनदेखी न करें, पर आगे बढ़ कर ऐसा साहस दिखायें जिससे संकट टले और समाधान बन पड़े। वरिष्ठता का सौभाग्य इससे कम में सार्थक नहीं होता। आड़े संकट में कर्त्तव्य-निष्ठा से पीठ दिखाने वाले सैनिकों को कोर्टमार्शल की प्रताड़ना सहनी पड़ती है, जबकि बच्चे, बुड्ढे, पगले या कुली कवाड़े अनजान अनगढ़ होने के कारण दयनीय समझे और क्षमा कर दिये जाते हैं।

प्रज्ञा परिवार की छत्र छाया में वरिष्ठों का समुदाय एकत्रित हुआ है। उसकी जिम्मेदारी आम लोगों की तुलना में हजारों गुनी अधिक है। आड़े समय की इनकारी बड़ी कष्टकारक और तिलमिला देने वाली होती है। पेट प्रजनन भर के लिए समर्पित नर वानरों को जहाँ महत्वपूर्ण श्रेयों से वंचित रहना पड़ता है वहाँ उन पर विशिष्ट कर्त्तव्यों के पालन से उपेक्षा बरतने का भी दोष नहीं लगता। कुली और सेनापति की हैसियत में भी अन्तर है और जिम्मेदारी में भी। गाँव में डकैती होने पर हर कोई उन लोगों से प्रश्न पूछता है कि दुनाली बन्दूक कन्धे पर लटकाये फिरने पर भी आड़े समय में उसका प्रयोग करने के लिए क्यों घर से बाहर नहीं आये?

जिन्हें समझदार, जिम्मेदार, ईमानदार और बहादुर समझा जाता है ऐसे मनस्वी अग्रदूत जब समय की पुकार को अनसुनी करके पेट प्रजनन सम्बन्धी व्यस्तता का बहाना बनाते हुए विवशता व्यक्त करते हैं तो निर्लज्जता को भी लाज आती है। पेट को बिना हाथ-पैर, आँख कान वाले केंचुऐ का भी भरते रहने की सृष्टि व्यवस्था है फिर दस इन्द्रियों और बीस उँगलियों और मस्तिष्क की जादू पिटारी लादे फिरने वाला मनुष्य उस समस्या को रास्ते चलते न सुलझा सके, ऐसा हो ही नहीं सकता। बहु प्रजनन के लिए मक्खी-मछली प्रख्यात है। चींटियों, दीमकों और मधुमक्खियों के भी परिवार होते हैं और उनका विकास-निर्वाह नियति के सुनिश्चित ढर्रे के अनुसार ठीक तरह चलता रहता है। फिर मनुष्य पर ही क्यों आसमान टूटता है जो पारिवारिक पोषण की आड़ में इन जिम्मेदारियों से बचने का प्रयास करें, जिनके न निबाहने पर उसकी गरिमा ही समाप्त हो जाती है। प्रस्तुत चर्चा किसी प्रसंग विशेष में की जा रही है।

गत बसन्त पर्व पर युग तीर्थ में पहुँचे अगणित परिजनों ने देखा अथवा अपने-अपने स्थानों पर वहाँ से लौटे व्यक्तियों के मुँह से सुना होगा कि प्रज्ञा परिवार ने कितने बड़े व्यस्त समुदाय का स्वरूप अब ग्रहण कर लिया है। जो सूत्र संचालक के मात्र चर्म चक्षुओं से दर्शन कर सके एवं प्रतीक- अपने साथ लेकर आए, उन्होंने पाया होगा कि कितनी प्रबल ऊर्जा ग्रहण कर वे लौटे हैं। भले ही प्रत्यक्ष परामर्श व अपनी मनोकामना कह सकने का अवसर उन्हें न मिल पाया हो, उन्होंने यह पाया कि वे जीवन दर्शन के स्वर्णिम सूत्रों को अपने साथ लेकर आए हैं। इस बसन्त पर बड़ी संख्या में सुयोग्य प्रतिभा सम्पन्न लोक सेवियों का उच्चस्तरीय शिक्षण हेतु आह्वान किया गया था। प्रसन्नता की बात है कि अनेकों ने इसे स्वीकारा है। लेकिन एक ऊहापोह और मन में उठता है कि भावावेश में चार माह के लिये आने का दृढ़ संकल्प लेकर जाने वाले इन युग शिल्पियों से क्या यह अपेक्षा रखी जाय कि वे पूरा समय समाज को दे सकेंगे? आवश्यकता आज पूर्ण समय देने वाले कार्यकर्ताओं की ही है। गुणवत्ता की दृष्टि से हलके स्तर के हजारों-लाखों हों तो उससे समाज-राष्ट्र निर्माण के सपनों का ताना-बाना नहीं बुना जा सकता। अपने ही खातिर- अपने निर्वाह आजीविका में सहायक रोजगार का- आय. टी. आय. स्तर का शिक्षण लेने आने वालों के लिये तो ये दरवाजे बन्द ही हैं। लेकिन किया क्या जाय, जब गुण, कर्म, स्वभाव की तौल पर गिने-चुने ही खरे उतरें व इतनी समझदारी बरतने को तैयार हों जिसमें औसत आजीविका भी चलती रहे, धन-परिवार की निर्वाह व्यवस्था भी केन्द्र में होती रहे तथा वे पूरा समय मन लगाकर केन्द्र को दे सकें।

सोचा यही गया कि बहुमुखी प्रशिक्षण की इस विधा में जिस लोकसेवी समुदाय को खपाया जा रहा है, पहले माह से ही परखने की दृष्टि रखी जाय। जिनमें भावनात्मक उमंग, क्रिया-कौशल को हजम करने का माद्दा दीखे, उन्हें क्रमशः एक्सटेन्शन दिया जाता रहे व अवधि पूरी होने पर उनसे महाकाल की झोली में अपनी शेष जीवनावधि समर्पित करने का अनुरोध दुहराया जाय। तुर्त-फुर्त, कुछ सीखकर कुछ स्वयं के लिये करना चाहते होंगे, उन्हें पहले माह के बाद ससम्मान विदा कर दिया जाय व कुछ ऐसे हों जो आँशिक समय अभी व थोड़ा-थोड़ा करके बाद में मिशन के लिये करने की स्थिति में होंगे, उन्हें कुछ दिन और रोककर आवश्यक पाठ्यक्रम पूरा करा दिया जायेगा।

शिक्षण की मुख्य शाखाएँ सभी की जानकारी में हैं ही। संगीत-गायन-अभिनय एवं भाषण-सम्भाषण के माध्यम से लोक शिक्षण, स्वास्थ्य संवर्धन- संरक्षण का चिकित्सक स्तर का अध्यापन, पत्रकारिता मुद्रण कला- साहित्य सृजन एवं सम्पादन का शिक्षण तथा अपनी गतिविधियों को चलाने के लिये दृश्य-श्रव्य साधनों के प्रयोग, ज्ञानरथ- झोला पुस्तकालय संचालन पौरोहित्य एवं जन्म-दिवस गोष्ठियों का आयोजन कैसे हो, यह सब इस पाठ्यक्रम के अंग हैं।

यह किसी को भूलना नहीं चाहिए कि आकर्षण प्रधान होने के नाते आवेदकों की संख्या अपरिमित है। लेकिन आने वाले पहले अपने आपको टटोलें, देखें कि वे कौन-सी खाइयाँ हैं, जो उनके लोकसेवी के रूप में ढलने व वर्तमान स्वरूप में आड़े आ रही हैं। यदि वे इतना चिन्तन, मनन कर लेते हैं तो आधा काम पूरा हो जाता है। फिर वे इस वातावरण में स्वयं को- अपने परिवार को पूरी तरह नियोजित कर सकने में समर्थ हो सकेंगे। यदि कहलवाना ही हो तो निर्वाह- परिवार- व्यवस्था जैसे शब्दों का प्रयोग न करके लोभ और व्यामोह का ही नाम लिया जाना चाहिए। इन खाइयों को हिरण्यकश्यपु, रावण जैसे धन कुबेर और प्रतापी भी पाट सकने में असफल रहे। इस कुचक्र में फँसे हुए ही यह कह सकते हैं कि उन्हें आर्थिक और पारिवारिक परेशानियाँ युग की पुकार सुनने और वरिष्ठ अग्रदूतों की जिम्मेदारी नहीं निभाने देती। ऐसे तो खम्भे को कसकर पकड़ लेने वाले भी यह गुहार मचा सकते हैं कि खम्भा छोड़ता ही नहीं। जाएँ तो जाएँ कहाँ? उपरोक्त दोनों गुत्थियाँ ऐसी हैं जिन्हें चुटकियों में सुलझ लेने के नौ सो निन्यानवे रास्ते हैं। पर जिन्हें लिप्सा, तृष्णा वाला एक ही रास्ता दिखता है और मनोकामनाएँ सधने पर ही राहत मिलने की रट लगी रहती है उन्हें अपनी गणना अभाग्य नर-वानरों में करनी चाहिए। वरिष्ठों के लिए मानवी गरिमा ही सब कुछ है। उसे जब जिसने अपनाया है, उसे न युग धर्म के निर्वाह में कठिनाई पड़ी है और न निर्वाह परिवार की सहज समस्या सुलझाने में कोई मुसीबत का सामना ही करना पड़ा है। अब वरिष्ठों को यह फैसला कर ही लेना है- इस ओर या उस ओर? बीच का कोई मार्ग नहीं, इससे कम में अपने मार्गदर्शक से वे कुछ अपेक्षा रखें भी, तो उन्हें निराश ही होना पड़ेगा। प्रस्तुत शिक्षण आमन्त्रण में सभी यह दृष्टि नितान्त स्पष्ट रखें।


यह धरती पावन बन जाये

(आदर्श)


यह धरती पावन बन जाये (kavita)

जन-जन शुभ संकल्प भरे हों ज्ञान-गिरा लहराये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥

ईश्वर और धर्म के अवलम्बन से श्रद्धा जागे; मात्र बुद्धि ही नहीं, हृदय से हो हम सबसे आगे।

विश्वासों की इसी नींव पर जीवन क्रम को ढालें, इतने ऊँचे उठें कि जग के ज्योति केन्द्र को पालें॥

स्वयं ढूँढ़ता हुआ अमृत अपने आँगन तक आये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥1॥

भरी हुई तेरे कण-कण में पौरुष की गाथाएँ, वह फिर से प्रज्ञा-पुराण बन घर-घर गाई जाएँ।

तेजस्विता जगा हे जननी! राम-लक्ष्मण जैसी, शुनः शेष, भागीरथ जैसे जग के बनें हितैषी॥

हर नारी हो सावित्री, नर सत्यवान् कहलाये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥2॥

कहने को तो अब भी लाखों सन्त-भक्त कहलाते, रामतीर्थ वह कहाँ स्वयं जो तीर्थंकर बन जाते।

सोये हुए आत्मबल को जो यों झकझोर जगाते, आरण्यक वह कहाँ जहाँ जन तुष्टि-तृप्ति पा जाते॥

शान्ति-कुंज की प्राण ऊर्जा हर देवालय पाये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥3॥

मेरे देश तुम्हारे कण-कण से सुगन्ध हो आती, शीतलता बिखेर दे तेरी हवा बहे लहराती।

आज असुरता से लड़ने को बच्चा-बच्चा चल दे, माँ अपने प्रज्ञापुत्रों को इतना पावन बल दे॥

त्याग-तपस्या का नूतन जन-जन इतिहास लिखाये। मेरे देश तुम्हारी यह धरती पावन बन जाये॥4॥

*समाप्त*