आनन्दानुभूति के अपने-अपने रूप

आनन्द की प्राप्ति आदिकाल से मानव का लक्ष्य रहा है। परमेश्वर की अन्तःकरण में अनुभूति जिन अनेकानेक रूपों में हो सकती है आनन्द उनमें सर्वोपरि है। सुख भौतिक है तो आनन्द आध्यात्मिक। भौतिक उपादानों का ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से अनुभव प्रायः सभी को एक-सा ही होता है। फूल की गन्ध, वस्तुओं का सौंदर्य, फलों के स्वाद से जो अनुभूति हमें होती है, लगभग स्वस्थ इन्द्रियों वाले सभी व्यक्तियों को एक समान ही होती है। लेकिन आनन्द इससे नितान्त भिन्न है। इसका रसास्वादन हर व्यक्ति को अलग-अलग रूपों में होता है। मीरा ने जिस आनन्द रस का पान किया, जिसके लिए सामाजिक मर्यादाएं तोड़ी एवं विष का प्याला पिया उसे कौन अपने अन्तः में उसी प्रकार अनुभव कर सकता है। मीरा की तरह प्रेम बेलि बोना और आनन्द फल पाना सबके लिए सहज नहीं। किसी के लिए मिलन में आनन्द है तो किसी के लिए विरह में। कबीर इसी विरह सुख की अभिव्यक्ति करते हुए कहते हैं।

“विरह कमण्डल कर लिए बैरागी दो नैन। माँगे दरस मधूकरी छके रहें दिन रैन॥”

वस्तुतः यह आनन्द अध्यात्म वेत्ताओं की दृष्टि में उस पूर्णता का पर्याय है। जिसकी प्राप्ति की पुरुषार्थ साधना हेतु ऋषि मनीषियों ने गहन मन्थन किया है एवं उसे योग की चरम उपलब्धि घोषित किया है। उपनिषद्कारों के अनुसार ज्ञान, भक्ति एवं कर्मयोग की सभी धाराएँ अन्ततः इसी आनन्द रूपी अमृत समुद्र में समा जाता है। हमारे अध्यात्म दर्शन की सभी धाराएं चाहे वे किसी वाद का समर्थन करती हों, हैं अन्ततः आनन्दवाद ही। इसी कारण मुण्डकोपनिषद् में विद्वान ऋषि कहते हैं- तद्विज्ञाने न परिपश्यन्ति धीरा आनन्द रूपमर्भृतम् यद्विभाति।” अर्थात् ज्ञानी लोग विज्ञान से अपने अन्तर में स्थित उस आनन्द रूपी ब्रह्म का दर्शन कर लेते हैं एवं ज्ञानियों में भी परम ज्ञानी हो जाते हैं।” आनन्द हर साधक की साधना की चरम उपलब्धि है, चाहे उसकी अनुभूति के रूप भिन्न-भिन्न हों।


भोगलिप्सा की दुःखदायी परिणति

महाभारत में राजा ययाति की कथा का वर्णन है। जीवन के सौ वर्ष कितनी शीघ्रता से पूरे हुए, इसका उन्हें अनुभव नहीं हुआ। वासना के आतप में जलकर शरीर एवं मन की समस्त शक्तियाँ क्षीण हो चुकी थीं। सौ बेटे तथा अनेकों पत्नियाँ। पर इस आयु में भी मन की वासना ज्यों की त्यों थी। घोर अतृप्ति-असन्तुष्टि की अनुभूति वे कर रहे थे। न तो राज-पाठ में मन लगता था और ना ही धर्म कर्म में। मन की गुलामी ने उन्हें इतनी बुरी तरह जकड़ा हुआ था कि कभी यह सोचने का भी अवसर न मिला कि जीवन का प्रयोजन क्या है? आत्मगरिमा के बोध से वंचित रहने से चन्दन वृक्ष जैसे अमूल्य सुवास बिखेरने वाले जीवन को कोयला बनाकर- वासना की अग्नि में जलाकर नष्ट कर रहे थे।

होश तब आया जब मृत्यु ने दरवाजे पर दस्तक दी। महाकाल ने आदेश दिया “ययाति। तुम्हारी आयु पूरी हुई। कर्मों की गठरी बाँधों और यमलोक चलने की तैयारी करो?”

“पर इतनी जल्दी कैसे प्रभो! अभी तो मेरी सभी इच्छाएँ अधूरी हैं। कुछ भी तो नहीं भोगा है ,” ययाति गिड़गिड़ाये। भीतर की वासना याचना के रूप में मुखर हुई- “देव! मुझे जीवन दान देने की कृपा करें।”

“ऐसा सम्भव नहीं है। हर व्यक्ति को निश्चित आयु भोगने के बाद यहाँ से विदा होना पड़ता है। यह तो सृष्टि का शाश्वत नियम है।” यम देवता बोले।

“आप समर्थ हैं- महाकाल हैं, कुछ उपाय करें, ययाति के दीनता भरे स्वर पुनः गूँजे।

यम देवता ने परीक्षा लेने हेतु एक प्रस्ताव रखा “है राजन्! तुम्हारे सौ बेटे हैं। उनमें से कोई यदि अपनी आयु- अपना यौवन देने को सहमत हो जाता है तो तुम्हारी मंशा पूरी हो सकती है तथा मैं वापस लौट सकता हूँ।”

कामग्रस्त ययाति विवेक शून्य हो चुके थे। सभी पुत्रों को सामने बुलाया,निर्लज्ज होकर यौवन की भीख माँगी। वृद्धावस्था में भी राजा की मनःस्थिति को देखकर पुत्रों को भारी आश्चर्य हुआ, आक्रोश भी आया।

अन्य सभी ने तो इंकार कर दिया पर सबसे छोटा अधिक विचारशील था उतना ही पितृ-भक्त भी। उसे पिता की स्थिति पर ग्लानि हुई- दया भी आयी। अपनी आयु वह राजा को देने के लिए तैयार हो गया।

मृत्यु देवता को उस छोटे किशोर के अद्भुत त्याग पर भारी अचरज हुआ। असमय अपना सर्वस्व सौंपकर मृत्यु को गले लगाने का उन्होंने कारण पूछा।

किशोर ने कहा- “यह तो मेरे लिए सौभाग्य की बात है। साँसारिक भोगों की आसक्ति अत्यन्त बुरी होती है, इसका परिचय मुझे पिताश्री की स्थिति देखकर हो चुका है। जब सौ वर्षों तक विषयों के भोग से भी राजा को तृप्ति न हो सकी तो मैं क्यों व्यर्थ में अपना जीवन गवाऊँ।” कालदेव ने उस बालक के वैराग्य से प्रसन्न होकर जीवन-मुक्ति का आशीर्वाद दिया।

उधर सौ वर्षों बाद फिर मृत्यु देवता प्रस्तुत हुए। ययाति के सैकड़ों लड़के और पैदा हो चुके थे। ययाति पुनः जीवन दान के लिए पहले की भाँति गिड़गिड़ाये। पैदा हुए बच्चों में से एक ने पुनः अपने त्याग का प्रमाण देकर ययाति को अपनी आयु भोग हेतु दे दी।

पौराणिक कथा के अनुसार इस तरह दस बार ययाति को अपने पुत्रों से जीवन दान मिला तथा वे हजार वर्ष तक जीवित रह विलास में निरत रहे। अंतिम बार मृत्यु देवता प्रस्तुत हुए तो ययाति ने पश्चात्ताप व्यक्त करते हुए कहा- “देव! मेरा जीवन व्यर्थ चला गया। पापों की गठरी सिर पर लिए मैं यह अनुभव करते हुए जा रहा हूँ कि भोगो से वासनाओं की तृप्ति कभी नहीं हो सकती। उन्हें अन्ततः नरक के आतप में विक्षुब्ध हो अपनी नियत अवधि पूरी करनी ही पड़ी।


आध्यात्मिक विकासवाद एवं जीवनमुक्ति तत्त्व दर्शन

जीवात्मा का चरम लक्ष्य है उस परमतत्व से तादात्म्य स्थापित करना जिसका कि वह एक अंश है। उसकी संरचना, कार्य पद्धति एवं जीवनचर्या का निर्धारण ही कुछ इस प्रकार हुआ है मानो सृजेता ने विकास की चरमावस्था को प्राप्त करने के लिए ही इस धरती पर भेजा हो। उपनिषदों में जीवनमुक्ति एवं पूर्णता संबंधी जितनी धारणायें व्यक्त की गयी हैं, उनसे आध्यात्मिक विकासवाद की एक प्रगतिशील झलक मिलती है। उपनिषद्कार का कथन है कि “मानव की जीवात्मा निरन्तर यह कामना करती रहती है कि वह स्वच्छन्द हो, समग्र बने एवं पूर्णता को प्राप्त करे।” लघु से महान बनने, बीज रूप से विराट् में विकसित होने की यह परिकल्पना मिथ्या नहीं। इसे दैनन्दिन जीवन के क्रिया-कलापों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

विकास के संबंध में विज्ञान मात्र स्थूल दृष्टि रखते हुए दो ही प्रकार की स्थितियाँ जानता है। एक शारीरिक एवं दूसरे मानसिक विकास की। नृतत्व विज्ञानी एवं अन्यान्य आधुनिक दर्शन के समर्थक इससे इतर कुछ सोचना भी नहीं चाहते। वे कहते हैं कि एक नवजात शिशु जन्म के समय लगभग सात पौण्ड भार लिये होता है। माता के दूध एवं वातावरण जन्य परिस्थितियों से उसका क्रमशः विकास होता है। धीरे-धीरे वह एक विकसित किशोर अथवा युवा लड़की के रूप में विकसित होकर एक स्पष्ट रूप ले लेता है। यह शारीरिक विकास है जो प्रत्यक्षतः सबको दिखाई देता है, जिस पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाता है एवं जिसके तनिक भी व्यतिक्रम से चिन्ता होने लगती है। मानवी विकास का दूसरा पक्ष मानसिक है- जो परोक्ष है, जिसे चर्म चक्षुओं से देखा नहीं जा सकता, किसी यंत्र द्वारा जिसकी मॉनीटरिंग नहीं की जा सकती। बहिरंग की शिक्षा एवं संस्कार रूपी विद्या के माध्यम से शिशु में क्रमशः स्वावलम्बन, आत्मविश्वास, सतर्कता,आत्मरक्षा, प्रतिभा, स्व-मूल्याँकन जैसी विशेषताएँ होने लगती हैं। इस क्षेत्र में विकास की संभावनाएँ अनन्त हैं, जबकि शारीरिक विकास एक सीमा से परिबद्ध है। असामान्य, मेधा, जीवट, संकल्पबल, प्रखरता, अन्वेषण बुद्धि का विकास ही मानस क्षेत्र की उपलब्धियाँ हैं। इस कार्य में मनुष्य का स्वयं का पुरुषार्थ तो सहयोग करता ही है, वातावरण भी इसमें एक महती भूमिका निभाता है। अपवाद स्वरूप ही कुछ प्रतिभा सम्पन्न ऐसे निकल आते हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों के होते हुए भी मानसिक दृष्टि से विकसित हुए होते हैं एवं पूर्व जन्म की संचित संपदा के उचित दिशा में मोड़ मिलते ही वे प्रगति के परम शिखर पर जा पहुँचते हैं।अल्पायु में भी अतिमेधावान बालकों को “प्रोडिगी” कहा जाता है व इनकी संख्या भी कम नहीं होती। यह क्यों व कैसे होता है, इस सम्बंध में वैज्ञानिक अभी मौन हैं एवं उन्हें विलक्षण मनाकर संयोगों की शृंखला में बिठा भर देते हैं।

मानसिक विकास में बहिरंग जगत की परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शिक्षा, सुरुचिपूर्ण संस्कारी वातावरण, स्वाध्याय, सत्संग-सान्निध्य के सहारे अनेकों व्यक्ति प्रतिभा सम्पन्न होते देखो जा सकते हैं। जहाँ ऐसा वातावरण नहीं उपलब्ध हो पाता, उल्टे कुरुचि भड़काने वाली, पतन के गर्त्त में गिराने वाली परिस्थितियों का प्राधान्य होता है, वहाँ कमजोर मनोबल वाले प्रखरता के अभाव में गिरते हैं, अविकसित नर-पामरों की श्रेणी में शामिल होते देखे जा सकते हैं।

शारीरिक एवं मानसिक ये दो ही पक्ष ऐसे हैं जिनके विकास- पराभव की जानकारी विज्ञान जगत को है। उनकी परिभाषायें भी इसी परिधि में घूमी नजर आती हैं। डार्विन के विकासवाद के समर्थक, लोमार्क के पक्षधर एवं जाति-प्रजातियाँ का गंभीर अध्ययन करने वाले एन्थ्रपोलाजिस्ट शरीर एवं मन के विकास के इस सीमित परिकर में ही ऊहापोह करते दृष्टिगोचर होते हैं।

अध्यात्म की विकासवाद की परिभाषा में एक और तीसरा पक्ष भी आता है जो शरीर एवं मन से कहीं और उच्च स्थान लिए हुए है।आत्मिकी के प्रतिपादक इसे आध्यात्मिक विकास कहते हैं जो मनोआत्मिक विकास कम से आरम्भ होकर पूर्णता पर समाप्त होता है। यही जीवात्मा का चरम लक्ष्य भी है, इसी की खोज-प्राप्ति हेतु वह अवतरित भी हुई है। यह आयाम व्यक्ति के ‘स्व’ का सर्वव्यापी सर्वश्रेष्ठ, असीमित आयाम है जिसमें वेदान्त के प्रतिपादनों के अनुसार व्यष्टि को समष्टि के साथ एकाकार हुआ देखा जा सकता है। इसकी बहिरंग रूप में अभिव्यक्ति, नैतिक एवं सामाजिक विकास के रूप में- सुसंस्कारिता, सहकारिता, पारिवारिकता की भावना के उत्कर्ष के रूप में देखी जा सकती है।

क्राइस्ट ने इसे परफेक्शन कहा है जो पूर्णता का बोधक है। मेथ्यू (वा. 45) के अनुसार “तुम इसलिये पूर्ण बनो क्योंकि तुम्हें जन्म देने वाला स्वर्ग स्थित परमपिता भी पूर्ण है।” बुद्ध ने इसी चरम उद्देश्य की प्राप्ति को आत्मबोध- ज्ञानोदय कहा है। अन्तः में निहित सत्य को जान लेना ही विकास की अन्तिम परिणति है, ऐसा बुद्ध का मत है। वेदान्त के अनुसार ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होने पर मनुष्य सन्देह जीवनमुक्त हो जाता है। ‘अविद्या लेश’ सिद्धाँत का हवाला देते हुए वेदान्त समर्थक कहते हैं कि ज्ञान से अविद्या का आवरण हटते ही मानव पूर्णता को प्राप्त होता है।

सभी धर्म सम्प्रदाय, पंथ, मतावलंबी इस पर एक मत हैं कि शारीरिक एवं मानसिक विकास तो उस पूर्णता की प्राप्ति के मध्य की अवस्थाएं हैं। मानसिक अनुशासन, धार्मिक कर्मकाण्ड मात्र मस्तिष्क रूपी ज्ञानेन्द्रियों पंच तन्मात्राओं के नियमन हेतु बनाई गयी विधि-व्यवस्थायें हैं, जो अन्ततः पूर्णता की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होती हैं। मनोसामाजिक, मनोआत्मिक एवं आत्मिक विकास वस्तुतः वे अवस्थाएं हैं जो जीवात्मा को क्रमशः इस चरम लक्ष्य पर पहुँचाती हैं।

‘अहम्” जिसने मनुष्य को प्रकृति पर आधिपत्य हेतु समर्थ बनाया, मनुष्य का यथार्थवादी रूप नहीं है, उसका सच्चा व्यक्तित्व नहीं है। वह तो चट्टान के, हिमखण्ड के उस छोटे से अंश के समान है जो कि गहन जलराशि के ऊपर दिखाई पड़ता है लेकिन अपना अधिकाधिक बृहद् अंध पानी में अदृश्य रूप से छिपाये रखता है। भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य का यथार्थवादी रूप, सच्चा व्यक्तित्व उसकी ‘आत्मा’ है जो कि इन्द्रियातीत है। यही मानव की सच्ची संपदा है जिसके परिपूर्ण विकास हेतु वह इस काय कलेवर में धरित्री पर आता है। सर जूलियन हक्सले ने अपने विचार लगभग उपनिषद्कार की भाषा में ही व्यक्त करते हुए कहा है कि- “अन्तर्मुखी चिन्तन द्वारा नितान्त एकान्त में अनेकों बार चिन्तन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ‘स्व’ के विकास क अभाव में जीवन निरुद्देश्य है। आत्मा निरन्तर अपने प्राकट्य का बोध हमें कराती रहती है लेकिन उसका अहसास हमें तभी हो पाता है जब हम गहराई से अन्तः पर्यवेक्षण करें, अपने अहम् से मुक्ति पाएँ।”

मनीषियों का मत है कि आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया में अहम् रूपी क्षणिक लेकिन सुखदायी भ्रान्ति से मुक्ति दिलाकर उसे वास्तविक व्यक्तित्व की श्रेणी में पहुँचाने में नैतिक अनुबंधों एवं आत्मिक अनुशासनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अहम् का जाला एक प्रकार से भव-बन्ध नहीं हैं जिनसे मुक्ति पाकर मनुष्य अपने यथार्थवादी रूप को पहचान लेता है। भक्ति-उपासना, जीवन साधना अथवा समाज सेवा की आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्यों अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।

भगवान श्री कृष्ण ने पूर्णता की प्राप्ति के इस प्रसंग को गीता के ग्यारहवें अध्याय में इस प्रकार वर्णित किया है।

मत्कर्म कृन्मत्परमो मद्भक्तः संग वर्जितः। निवैरः सर्वभूतेषु यः समायेति पाण्डव॥ अर्थात्- “हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए संपूर्ण कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति रहित है, सम्पूर्ण भूत प्राणियों से बैर भाव से मुक्त है, वह मुझको ही (पूर्णता को ही ) प्राप्त होता है।”

वस्तुतः जीवन रूपी कर्मशाला में मनुष्य को अपनी काया रूपी उच्चस्तरीय प्रयोगशाला को सुनियोजित रूप से संचालित करने के लिए पूर्ण अवसर प्राप्त है। शेष समस्त साधना अनुशासन तो मन के प्रशिक्षण, परिशोधन एवं अग्रगमन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन गतिशील यन्त्रों को कौन कितनी कुशलतापूर्वक संचालित कर पाता है, इसी पर उसका आध्यात्मिक विकास निर्भर है।

यह विकास की प्रक्रिया जैव समाज वैज्ञानिकों (सोशियोबायोलॉजिस्ट) एवं विकासवादियों की मान्यता से कितनी भिन्न है किस प्रकार मनुष्य को अन्यान्य जीवों से श्रेष्ठ, प्रारम्भ से ही विकसित प्राणी बताती है, इसका निरूपण श्रीमद्भागवत में इस प्रकार हुआ है-

“उस दिव्य परम सत्ता ने अपनी निहित शक्ति के द्वारा अनेक प्रकार के चेतन आकारों को जन्म दिया जैसे कि पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, रेंगने वाले जीव, कीट, मछली आदि। किन्तु उसे अपने मन में इन आकारों से सन्तोष नहीं हुआ। तब उसने मानव को विनिर्मित कर उसे ब्रह्म को अर्थात् सार्वभौम दिव्य सत्ता को प्राप्त करने की पात्रता से विभूषित किया। अपनी इस कृति को बनाकर ही उसे प्रसन्नता प्राप्त हुई।”

ऋषिगणों, मनीषियों की प्रज्ञा को मानव और प्रकृति के यथार्थवादी स्वरूप को मात्र अनुमान एवं अटकल से ही जानकर सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने अपने ज्ञान के उत्तरोत्तर विकास की शृंखला को सतत् जारी रखा। “बृहदारण्यक उपनिषद् (1-4-7) के अनुसार- “उन्होंने जब गहराई में प्रवेश किया तो समय की परिधि में आबद्ध ससीम सत्ता के पीछे उन्हें एक असीम शाश्वत वास्तविकता की उपलब्धि हुई। इस प्रकार उन्होंने विशुद्ध चेतना के स्वरूप एवं जीवात्मा के विकास की चरम परिणति को जाना।”

वस्तुतः विकासवाद की यही अद्वितीय मान्यता भारतीय दर्शन को अन्यान्य प्रतिपादनों से ऊँचा सिद्ध करती हुई, आधुनिक मतों का खण्डन करती है। वह जीवात्मा की चेतना के विकास क्रम के रहस्यों का उद्घाटन करती हुई उसे अपने परम लक्ष्य का बोध कराती है ताकि वह मायावी भ्रम जंजाल से बचकर मुक्ति पथ पर अग्रसर हो सके।


मनुष्य कितना स्वतन्त्र! कितना परतन्त्र!

एकबार एक मनुष्य ने हजरत अली से पूछा कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है या परतन्त्र। उन्होंने उत्तर दिया- दोनों। उसने पूछा कैसे? हजरत अली ने इसके उत्तर में उसे अपना एक पैर उठाने को कहा। उस मनुष्य ने एक पैर ऊपर उठा लिया। ‘हजरत’ ने उससे दूसरा पैर भी उठाने को कहा। इसमें उस व्यक्ति ने असमर्थता व्यक्त की। ‘अली’ ने उसके आरम्भिक प्रश्न का स्पष्टीकरण किया कि मनुष्य की यही स्थिति है।

मानवी स्वतंत्रता की एक सीमा है। प्रत्येक कार्य को कर सकने में मनुष्य स्वतन्त्र नहीं है। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ एवं ज्ञान का विकास संभव नहीं हो पाता मनुष्य जड़ हो जाता। स्वतंत्रता, परतन्त्रता किस प्रकार जीवन में सम्मिश्रित है इसको एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। एक बड़े पुस्तकालय में पहली कक्षा से लेकर अन्तिम कक्षा तक की पाठ्य पुस्तकें हैं। एक लड़के को पुस्तकालय का अध्यक्ष बना दिया जाता है उसे सौंपते हुए कहा जाता है कि उसके ही पढ़ने के लिए सभी पुस्तकें हैं। उस पर नियंत्रण करने वाला कोई नहीं है। यह उसकी इच्छा पर निर्भर करता है कि वह पहले किस पुस्तक को पढ़े। यदि वह आरंभ पहली कक्षा की पुस्तकों के अध्ययन से करता है तथा इस क्रम में आगे बढ़ता जाता है तो पुस्तकों का सही उपयोग कर सकने में तथा समझ पाने में समर्थ होता है। इस क्रम की अवहेलना करके वह यदि ऊँची कक्षा की पुस्तकों को अध्ययन के लिए उठाता है तो समझ पाना तो दूर रहा, उल्टे दिग्भ्रान्त हो जाता है। जबकि निर्धारित क्रम से अध्ययन करने वाला अपने ज्ञान में अभिवृद्धि करता जाता है। ज्ञान की वृद्धि के साथ उसकी स्वतंत्रता भी बढ़ती जाती है। अपने श्रम एवं विवेक का प्रयोग करके वह ज्ञानी बन जाता है।

सृष्टि से प्राप्त साधन पुस्तकालय के तुल्य हैं। इसमें विभिन्न प्रकार की पुस्तकें नहीं हैं। विराट् प्रकृति एक खुली पुस्तक के समान है। जिसमें विभिन्न श्रेणियों के जीव अपने स्तर के अनुरूप उस पुस्तक का अध्ययन करते एवं समझाने का प्रयास करते हैं। जीवों की योग्यताओं में भिन्नता होने के कारण प्रत्येक को भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रतीत होती है। सबके अध्ययन के लिए सृष्टि रूपी पुस्तक खुली पड़ी है। एक क्षुद्र जीव अपनी क्षमता के अनुसार उससे उपयोगी ज्ञान एवं सामर्थ्य प्राप्त करता है। उच्चतर जीव अधिक ज्ञान संचित करता है। एक जंगली मनुष्य अपने स्तर से समझने का प्रयास करता है तथा विकसित सभ्य मनुष्य अपने स्तर से। पाठ्य-सामग्री एक होते हुए भी दोनों के अध्ययन एवं उससे मिलने वाले अनुभवों में महान अंतर है। अपने ज्ञान में वृद्धि करते हुए मनुष्य अपनी स्वतन्त्रता बढ़ाता जाता है। प्रकृति के जड़ परमाणु अन्य प्राणियों के लिए व्यर्थ हैं जबकि मनुष्य उन्हीं को सुगठित, व्यवस्थित करके अनेकानेक रचनायें कर डालता है। अपनी विकसित बुद्धि के कारण नगण्य समझे जाने वाले धूल के कणों में भी असीम शक्ति सामर्थ्य ढूँढ़ निकालता है। उनका सदुपयोग करते हुए स्वतंत्र जीवन यापन करता है। स्वतन्त्रता निम्न जीवों में सीमित है जबकि मनुष्य में उसका क्षेत्र बढ़ जाता है। यह स्वतंत्रता प्रयत्न करने पर बढ़ जाती है। वस्तुओं संसार के आकर्षण के स्वतन्त्र उपभोग से हटकर जब दुष्प्रवृत्तियों से स्वतंत्र होने का जीव प्रयास करता है तो इसे ही मुक्ति कहा गया है। स्वतन्त्रता की यही पराकाष्ठा है।

मुक्ति को परमपद- जीवन का लक्ष्य माना गया है। इससे अभिप्राय यह है कि मुक्ति एक भौतिक अवस्था नहीं जीवात्मा की एक स्थिति है जिसमें वह अपने को कर्म, भोग एवं ज्ञान के बंधनों से मुक्त अनुभव करता है। मानसिक दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना ही मुक्ति है तब साँसारिक बंधनों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। सामान्यतया लोगों के मन में यह भ्रान्ति बनी हुई है कि मुक्ति किसी स्थान विशेष का नाम है जहाँ जीवात्मा को भेज दिया जाता है। ऐसा जानकर उस स्थान विशेष को ढूँढ़ने तथा वहाँ पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। फलस्वरूप आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों के परिष्कार तथा आत्म-विकास का प्रयत्न किया नहीं जाता। मान्यता की यह भ्रान्ति तथा मुक्ति का प्रयास उसी प्रकार है, जैसे कोई विद्यार्थी मात्र सर्टीफिकेट प्राप्त करने के लिए भटकता रहे तथा मानसिक विकास के लिए श्रम करना छोड़ दे। वस्तुतः सर्टीफिकेट एक विशिष्ट प्रकार के कागज के मिलने का नाम नहीं वरन् आन्तरिक शक्तियों की विकसित अवस्था का नाम है। विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उचित श्रम करता है न कि सर्टीफिकेट प्राप्त करने की चिन्ता में अनावश्यक भटकता रहता है। सफलता के साथ सर्टीफिकेट का मिलना तो सुनिश्चित है। मुक्ति की उपलब्धियाँ स्वर्गीय परिस्थितियों के रूप में परिलक्षित होती हैं। यह मिलना तो सुनिश्चित है किन्तु अपने विकास के श्रम-साध्य कार्य को छोड़ कर यदि मुक्ति की परिस्थितियों को ढूँढ़ने का प्रयास किया जाये तो असफलता ही हाथ लगेगी।

मुक्ति का मार्ग बाहर नहीं अन्दर है। यह मार्ग बच्चों के साँप-सीढ़ी के खेल के समान है। सतर्कता एवं विवेक के अभाव में खिलाड़ी को असफलता ही हाथ लगती है। सीढ़ी कभी तो ऊपर ले जाती है। सतर्कता के अभाव में साँप को अवसर मिल जाता है तथा सारे प्रयत्न को नष्ट कर देता है। साँप आलस्य, प्रमाद, लोभ, मोह का परिचायक है, जो मनुष्य की प्रगति को, स्वतन्त्रता की ओर बढ़ने में बाधक है। थोड़ी भी असावधानी बरती गई तो ये बंधन मनुष्य को जकड़ लेते तथा आबद्ध कर लेते हैं। फलस्वरूप मनुष्य इनका गुलाम बनकर किसी प्रकार जीवन के दिन पूरे कर लेता है। भौतिक आकर्षणों में आबद्ध जीवात्मा मुक्ति का आनंद लेने से वंचित रह जाती है।

इस मार्ग में अनेक योनियों से होकर गुजरना पड़ता है। कीट से लेकर मनुष्य तक की मध्यवर्ती दशाएं मुक्ति रूपी चोटी पर पहुँचने के लिए विभिन्न मार्ग हैं। भिन्न-भिन्न प्राणी विभिन्न स्टेशनों पर हैं। कुछ प्रयत्नों से आगे बढ़ते तो कुछ नीचे गिरते हैं। संसार चक्र का यही राजमार्ग है। प्राणियों की विभिन्न प्रवृत्तियाँ इस मार्ग में आगे बढ़ने अथवा पीछे हटाने में सहायक होती हैं। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मुक्ति मार्ग के अवरोध हैं जो प्राणियों को आगे बढ़ने से रोकते तथा उस श्रेष्ठ आनंद से सदा वंचित रखते हैं। जबकि परोपकार, दया, करुणा, सेवा की प्रवृत्तियाँ सहायक मानी जाती है। इनका अवलम्बन लेकर जीव क्रमशः अपना विकास करता जाता है।

स्वतन्त्रता की पराकाष्ठा ही मुक्ति है। मानव योनि उस परमपद तक पहुँचने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। अन्य जीव तो प्रकृति प्रेरणाओं के अनुरूप जीवन यापन करते तथा मरते-खपते देखे जाते हैं जबकि परमात्मा ने मनुष्य की अतिरिक्त क्षमताओं के साथ विवेक भी दिया है। इसका एकमात्र उद्देश्य है कि वह पशु-प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करते हुए अपने मुक्त स्वरूप को अनुभव कर सके। आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियाँ ही भव-बंधन हैं। यही अंतरात्मा के स्वरूप के दशन से मनुष्य को वंचित रखती हैं। जब मन की दुष्प्रवृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं तो जीवात्मा अपने को मुक्त अनुभव करती है तथा अपने शाश्वत दिव्य आलोक के साथ प्रकट होती है। यहाँ है स्वतंत्रता परतंत्रता का वास्तविक स्वरूप, जीवात्मा के विकास पराभव का तत्वदर्शन।


Quotation

घोर अँधेरी रात, जब हाथ को हाथ नहीं सूझता था। झरना अपने अविरल प्रवाह से कल-कल करता हुआ एकान्त निर्जन विजन में बहता चला जा रहा था।

एक पहाड़ी उपत्यिका ने पूछा- निर्झर! तुम्हें थकावट नहीं आती क्या? तनिक रुको, कुछ विश्राम भी तो कर लिया करो।

एक स्नेह दृष्टि डालते हुए झरने ने उपत्यिका को उत्तर दिया- बहन! मुझे जिस महासागर से मिलना है, उसकी दूरी अनंत है। रुकूँगा तो इधर-उधर भटकूँगा। चलते रहने से तो वह दूरी कुछ कम ही होगी। यह कहकर झरना आगे बढ़ चला।


इन्द्रियों के गुलाम तो न बनें

शरीर, इन्द्रियाँ एवं मस्तिष्क के रूप में मनुष्य को परमात्मा से जो अनुदान मिले हैं, वे अद्भुत हैं। उनके सदुपयोग तथा सुनियोजन की फलश्रुतियाँ भी उतनी ही विलक्षण हो सकती हैं। पर उतना ही सच यह भी है कि इंद्रियां एवं ज्ञानेन्द्रियाँ उच्छृँखल हो जायें- मनमाना बरतने लगें तो पतन-पराभव का मार्ग प्रशस्त होने लगता है। वे वरदान या अभिशाप दोनों ही सिद्ध हो सकती हैं। चयन की स्वतन्त्रता मनुष्य को पूरी तरह मिली हुई है कि वह इन्हें किस दिशा में नियोजित करे। विषयों की आसक्ति से विरत रहकर उनका स्वाभाविक उपयोग मनुष्य के विकास में सहायक हो सकता है। आत्मिक विकास में भी शरीर एवं इन्द्रियों का उपयोग है। साधना के उपादान शरीर की इन्द्रियाँ तथा मन ही है। वे सहचर बन जायें तो कठिन से भी कठिन मंजिल पर पहुँचना सुगम हो सकता है।

मन के नियम अद्भुत हैं। जिससे मनुष्य भयभीत होता है, उससे गहरे में प्रभावित भी होता है। सौंदर्य को देखकर आंखें बंद कर लेने वाला उससे अधिक प्रभावित होता है जो नेत्रों को खोले हुए है वस्तुतः आँखें बंद करने वाला सौंदर्य की वासना से इतना भयभीत है कि कहीं वह आकर्षण उसे जकड़ न ले। पर आँखें बंद कर लेने से विचारों पर लगाम तो लगती नहीं। मन के भीतर और भी तीव्र वेग से सौंदर्य का चिन्तन शुरू हो जाता है।

बहुत से लोग संसार से भयभीत होकर स्वप्न के संसार में प्रविष्ट हो जाते हैं। जिस बाह्य रस से मुख मोड़ा था, वह मन के भीतर ही भीतर और भी प्रगाढ़ होने लगता है। स्वप्न में तो मन और भी उन्मुक्त होकर अपना संसार स्वयं निर्मित कर लेता है। मन की अतृप्त वासनायें और भी प्रबल रूप में सामने आती हैं। बहिरंग जगत जो संकोचवश अवरोधक बना हुआ था, वह भी दूर हो जाता है।

रस परित्याग का अर्थ- इन्द्रियों को नष्ट कर देना नहीं- उनके प्रति मन की आसक्ति का परित्याग है। इन्द्रियाँ अत्यंत उपयोगी हैं। उनसे प्राप्य जानकारियाँ अद्भुत हैं। सूचनायें सम्वेदनाएँ बाह्य जगत से लेकर वे ही आती तथा अनुभूति का माध्यम बनती हैं पर यदि मन उन अनुभूतियों में लीन नहीं होता, सजग बना रहता है तो किसी प्रकार का खतरा नहीं है। मन जब रसों में डूबा रहता है, तो इन्द्रियाँ चेतना की मालिक हो जाती हैं। यहीं इन्द्रियाँ जब चेतनसत्ता के मार्गदर्शन पर चलती हैं तो त्याग की प्रवृत्ति चल पड़ती है। इंद्रियाँ जब चेतना की सहयोगी बन जाती हैं तो आसक्ति का डर नहीं रहता।

हमारी इन्द्रियों से हमारा जो संबंध हैं, वह मालिक का है या गुलाम का, इस तथ्य पर ही चेतना का विकास या पतन निर्भर करता है। इन्द्रियों के संकेत पर चेतना यदि गतिशील है, तो इसका अर्थ, वासना से हम जकड़े हुए हैं। यदि चेतना उनकी मालिक है तो रसों का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। इन्द्रियाँ ऐसी स्थिति में शुद्ध हालत में रहती हैं।

जिस योगी की इन्द्रियाँ परिशुद्ध हैं, उसके देखने, सुनने, स्पर्श करने आदि का ढंग अन्य व्यक्तियों से भिन्न स्तर का होगा। वासना से रहित महावीर, बुद्ध, कृष्ण, ईसा की आँखों में जो तेज था वह अन्यों में नहीं होता। ऐसे व्यक्तियों के स्पर्श में भी दिव्यता का समावेश रहता है, जिसका लाभ समय-समय पर उपयुक्त पात्रों को भी मिलता रहता है।

अधिकाँश व्यक्तियों की इन्द्रियाँ अपना मार्ग भूल जाती हैं। मूर्च्छित मालिक के नौकर सम्यक् नहीं रहते। उसकी इन्द्रियों के बीच कोई तालमेल नहीं रहता। भोगी की सभी इन्द्रियाँ उसे विपरीत दिशाओं में खींचती हैं। आँखें कुछ देखना चाहती हैं, कान कुछ सुनना चाहते हैं, हाथ कुछ स्पर्श करना चाहते हैं। इन सबके बीच परस्पर विरोध है। यह विक्षिप्त चेतना के- खण्डित व्यक्तित्व के लक्षण हैं। इससे जीवन में अगणित विसंगतियाँ पैदा होती हैं।

अधिकाँश व्यक्ति आँख की बात मानकर चलते हैं। जीवन व्यापार में वह बड़ी प्रभावशाली है भी। चुनावों में प्रायः नब्बे प्रतिशत काम आँख करती हैं। दूसरी इन्द्रियों की बिना परवाह किये लोग आँख की बात मान भी लेते हैं। फलतः दूसरे ही दिन से कठिनाई शुरू हो जाती है। आँख कहती हैं, चेहरा सुन्दर है पर उसकी अभिव्यक्ति को नाक और कान भी स्वीकार कर लें, आवश्यक नहीं। आँख का आधिपत्य मानने को वे तैयार नहीं होते।

पाँच इंद्रियों को जोड़ने वाला केन्द्र मन स्वयं मूर्च्छित हालत में पड़ा रहता है। रसों के भोग में सदैव शराबी की तरह डूबा रहता है। चेतना प्रसुप्त पड़ी रहती है, कोई निर्णय नहीं ले पाती है। पाँचों इन्द्रियों के अलग-अलग वक्तव्य इतनी जटिलता पैदा कर देते हैं कि मन द्वंद्वों से भर जाता है। भीतर की चेतना जगी रहने पर वह असंगति नहीं पैदा होने पाती। इन्द्रियों की ढपली अलग-अलग नहीं बजती। इन्द्रियों की गति में एक दिशा एक लय आ जाती है जबकि मूर्च्छित मनुष्य इन्द्रियों के द्वारा विभिन्न रास्तों पर खींचा जाता है। निरर्थक भाग-दौड़ में ही उसकी सारी सामर्थ्य नष्ट हो जाती है। जीवन निष्फल, निष्प्रयोजन चला जाता है।

आद्य शंकराचार्य ने रसों को इन्द्रियों का आहार माना है। कान जो सुनते हैं, वह कान का भोजन है, मुँह जो ग्रहण करता है वह उसका आहार है, दृश्य आँख का भोजन है पर उन सब में चुनाव का होना आवश्यक है। हर बात सुनी जाय, हर चीज देखी जाय, हर स्वाद ग्रहण किया जाये, यह आवश्यक नहीं। जो सार्थक, उपादेय तथा आत्मविकास में सहायक हैं, उन रसों को भीतर जाने दिया जाय, निरर्थक को बाहर ही छोड़ दिया जाये।

पर उपयोगी अनुपयोगी का चुनाव करे कौन? आँखों में देखने की तो क्षमता है पर चुनने की नहीं। कान सुन सकते हैं पर उचित अनुचित के बीच भेद नहीं कर सकते। स्वादेन्द्रिय सार्थक-निरर्थक के बीच भेद नहीं कर पाती, वह मात्र स्वाद की अनुभूति भर कर पाती है जिसे चुनाव करना चाहिए वह चेतना तो प्रसुप्त-मूर्च्छित पड़ी रहती है। फलतः इन्द्रियाँ सार्थक निरर्थक सभी सम्वेदनाओं को भीतर भरती रहती हैं। मन के भीतर निरर्थक अनुभूतियों एवं विचारों का कबाड़ एकत्रित होता जाता है। मन का यदि किसी प्रकार आपरेशन कर सकना संभव हो सके तो अधिकाँश के भीतर अनर्गल विचारों के कूड़े का अम्बार जमा दिखाई देगा। देखने, सुनने, स्वाद लेने, पढ़ने आदि में चुनाव दृष्टि के न होने से ही ऐसा होता है।

मन में क्या-क्या विचार भरे हुए हैं, कैसी अनुभूतियाँ भरी पड़ी हैं, किस तरह की आकाँक्षायें उठ रही हैं, इसे किसी प्रकार कागज पर नोट किया जा सके तो मालूम होगा कि एक मोटी-सी बुक तैयार हो गयी। उन्हें मन में जमा करने में विभिन्न इन्द्रियों की कितनी शक्ति लगी, इसका लेखा-जोखा लिया जा सके तो मालूम होगा कि अधिकाँश मानसिक ऊर्जा तो सचमुच ही व्यर्थ में नष्ट हो गयी। सही चुनाव करके यदि उसे उपयुक्त दिशा में लगाया गया होता तो उपयोगी- सार्थक परिणाम भी सामने आते। इन्द्रिय- संयम का अर्थ न केवल इन्द्रिय निग्रह से है वरन् यह भी है कि शक्ति को सही दिशा में नियोजित भी किया जाये।

शक्तियों को फेंकते रहने से वार्धक्य एवं फिर मृत्यु भी जल्दी आ धमकती है, कुछ सृजन का कार्य नहीं हो पाता। मृत्यु जो आत्म संतोष का कारण- परम आनंद का सुअवसर बन सकती थी, वह आत्मघात-सी प्रतीत होती तथा उतनी ही पीड़ादायक सिद्ध होती है। असन्तुष्ट जीवात्मा को ऐसा प्रतीत होता है जैसे सब कुछ व्यर्थ चला गया।

इस मूर्च्छना से बाहर निकलने के लिए आवश्यक है कि अब तक जो इन्द्रियों का प्रवाह था- मन की गति थी, उन्हें उलट दिया जाये। इसके लिए आवश्यक है कि इन्द्रियों को साधन माना जाये- उन्हें अपना गुलाम समझा जाये। चंचल मन भी आत्म चेतना पर किसी प्रकार हावी न होने पाये, वह भी अनुचर बना रहे। साथ ही वस्तुओं को कभी भी अतिशय महत्व न दिया जाय, उन्हें कभी भी साध्य न समझा जाये, साधन तक ही सीमित रहा जाये। सदा इसके लिए सचेष्ट रहें कि अपनी मालकियत वस्तुओं अथवा इन्द्रियों के हाथों न सौंप दी जाये।


“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”

दृश्यमान इस जगत में विद्यमान प्रत्येक वस्तु का अपना कुछ न कुछ गुण-धर्म अवश्य होता है। उसी गुणधर्म के आधार पर किसी वस्तु की उपयोगिता आँकी जाती है। उत्पादकता पृथ्वी का धर्म है तो शीतलता जल का। अग्नि में प्रखरता पायी जाती है और वायु में व्यापकता। नदी अपने जल को स्वच्छ एवं उपयोगी रखने लिए सतत् गतिशील रहती है। बादलों के निर्माण तथा पर्जन्य वर्षा हेतु समुद्र अपने जल को सदा समर्पित करते रहना अपना धर्म मानता है। वृक्ष मँडराते बादलों से वृष्टि कराने तथा पर्यावरण चक्र को संतुलित रखने की जिम्मेदारी सतत् निभाते हैं। प्राणी वर्ग में सभी अपने विशेष गुण धर्म को अपनाये रहते हैं। इस धर्म-चक्र में कहीं राई-रत्ती भी अवरोध उत्पन्न हो जाय, तो सामूहिक विनाश की स्थिति पनप सकती है। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि यह जगत धर्म के सिद्धाँतों के परिपालन पर ही अवलंबित है।

मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना गया है। परन्तु सृष्टा ने उसके अन्दर की इच्छा शक्ति को प्रबल कर, दो रास्ते बना दिये हैं। उसे इस बात में स्वतंत्र बना दिया गया है कि वह चाहे तो अधोगामी प्रवृत्ति अपनाकर पशुतुल्य जीवन जिये अथवा उत्कृष्ट जीवन अपनाकर देवोपम एवं सर्वश्रेष्ठ जीवन को अंगीकार करे। अतः विवेकशीलता ही मनुष्य का परम धर्म है। इसके आधार पर ही वह भले-बुरे के बीच अंतर समझकर श्रेष्ठता, महानता के मार्ग पर अग्रसर होता है। मनुष्य अपने विवेक के आधार पर ही जीवन के रहस्यों को समझता है। शरीर को ही सब कुछ न मानकर वह आत्मा के अस्तित्व को भी स्वीकार करता है। शरीर उपभोग हेतु मिला है, परन्तु आत्मा आदर्श को अपनाती है। उपभोग और आदर्श दोनों में सन्तुलन बिठाना ही धर्म का लक्ष्य है, विवेक की परिणति है। दूसरे शब्दों में सदाचरण, आदर्शवादी व्यक्तित्व ही धर्म का पर्याय है।

मानव जीवन को देवोपम बनाने के लिए धर्म विशेषज्ञों व महा-मनीषियों ने कुछ सिद्धाँतों, दर्शनों को प्रतिपादित किया है। उनने वह मार्ग सुझाये हैं, जिससे व्यक्ति द्रुतगति से श्रेष्ठता की दिशा में अग्रसर हो सकता है। हर राष्ट्र व समाज में ऐसे व्यक्ति होते आये हैं। उन सबने प्रायः एक ही तरह के सिद्धाँतों को पूरे विश्व समुदाय के लिए प्रस्तुत किया है। आँशिक विभिन्नतायें मात्र कर्मकाण्ड परक हैं, जो विभिन्न परिस्थितियों व सामाजिक संरचनाओं के आधार पर निर्धारित की गई हैं। मुख्य उद्देश्य सबों का एक ही है।

आज संसार में प्रमुख ग्यारह मजहब अथवा धर्म मत हैं। वे इस प्रकार हैं-जापान का शिन्तो मत, चीन का ताओ मत, चीन का ही कन्फ्युशियस मत, हिन्दुस्तान का वैदिक मत, बौद्ध मत, जैन मत, सिक्ख मत, पारसी मत, यहूदी मत, ईसाई मत तथा इस्लाम मत। ये सब वस्तुतः एक ही धर्म-संदेश को विभिन्न रूपों में समझाने का प्रयास है। ये सभी मत हैं, स्वयं धर्म नहीं। धर्म तो मूलतः व्यक्ति के मनुष्यत्व में, उसकी विवेकशीलता में सन्निहित है। धर्म का वास्तविक अर्थ है- कर्त्तव्य निष्ठा- आकृष्ट चिंतन- आदर्श कर्त्तव्य। प्रकारान्तर से इन्हीं सिद्धाँतों की पुष्टि विभिन्न मतों के माध्यम से की जाती है।

जापान का शिन्तों मत पवित्रता को धर्म का प्रधान गुण मानता है। उसके अनुसार निश्छलता पवित्रता का प्रमुख अंग है तथा ईश्वर प्राप्ति का राजमार्ग भी। इस मतानुसार निर्धारित दैनिक प्रार्थना का भाव इस प्रकार है- ‘हमारी आँखें भले ही अपवित्र वस्तु देखें, किन्तु हे भगवान! हृदय में अपवित्र बातों का उदय न हो। हमारे कान भले ही अपवित्र बात सुनें, किन्तु हमारे चित्त में अपवित्र बातों का अनुभव न हो। अपनी पूजा पद्धति में भी शिन्तो संप्रदाय ने मनोनिग्रह हेतु ध्यान तथा पवित्रता हेतु मंत्रोच्चार को व्याहृत किया है।

ताओ मत के अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिए पवित्रता, विनय, संतोष, करुणा, प्राणि मात्र के प्रति दया, सच्चा ज्ञान और आत्म संयम मुख्य माध्यम हैं। इनकी प्राप्ति हेतु ध्यान और प्राणायाम उपयोगी प्रक्रियाएं हैं। ताओ मत में लोगों के लिए संदेश इस प्रकार प्रकट किये गये हैं- “मेरे पास तीन वस्तुयें हैं, जिन्हें मैं दृढ़तापूर्वक जगाता रहता हूँ- सौम्यता (दयालुता), मितव्ययिता तथा नम्रता।”

कन्फ्युशियस चीन के सुविख्यात धर्म प्रचारक एवं सिद्ध पुरुष हो चुके हैं। उन्होंने अपने दर्शन में मुख्यतः मानव जीवन को उत्कृष्टतम बनाने की बात कही है। वे प्रायः कहा करते थे- ‘जब तुम्हें यह ज्ञान नहीं कि मनुष्य की सेवा किस प्रकार की जाय, तब देवों की सेवा के संबंध में कैसे पूछ सकते हो?’ उनका एकमात्र संदेश मानव मात्र के प्रति यही था कि ‘वैयक्तिक उन्नति जीवन का लक्ष्य नहीं, वह तो सामाजिक उन्नति का फल है।’ उनके अनुसार पूर्ण धर्म वह है, जब तुम बाहर निकलो तो प्रत्येक से यह समझकर मिलो मानो, वह तुम्हारा बड़ा अतिथि है। उनका उपदेशामृत यह था कि- सदाचार के प्रति निष्ठा, सौंदर्य के प्रति अनुराग की तरह हृदय से होना चाहिए। मनुष्य का हृदय आइने के सदृश होना चाहिए, जिस पर समस्त वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ता है, किन्तु उससे उसमें मैलापन नहीं आता।

वेदान्त दर्शन यह सिद्धाँत प्रतिपादित करता है कि मूल में सारा जगत एक है। जिसे इस एकत्व का दर्शन हो जाता है, उसकी दृष्टि में स्वार्थ और परमार्थ में भेद नहीं रह जाता है। इस दिव्य दृष्टि की परिणति सबको अपने में तथा अपने को सबमें देखने के रूप में होती है। उसके हृदय से ‘आत्मवत सर्व भूतेषु तथा वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अनतर्नाद गुँजित होने लगता है। वह व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर हो जाता है तथा सबके कल्याण में अपना कल्याण समझने लगता है। तभी तो वैदिक काल के ऋषियों ने यह घोषणा की थी। सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भ्रदाणि पश्यन्तु मा कश्चिद् मा दुखमापुन्यातं। जो इतना परमार्थ परायण होगा वह अवश्य पवित्र होगा। उसका जीवन अवश्य आदर्शवान् होगा। अथर्ववेद (3-30-1) की उक्ति यहाँ उल्लेखनीय है-

सहृदयं सामनस्य माविद्वेषं कृणोमि वः। अन्योअन्यम मिहर्यत वत्सं जात मिवाहन्या॥

अर्थात्- हे मनुष्यों! मैंने तुमको सहृदय और बुद्धिमान तथा दोष रहित बनाया है। तुम एक दूसरे के साथ इस प्रकार बर्ताव करो जैसे गाय अपने नवजात बच्चे के साथ करती है।

भगवान बुद्ध ने स्वयं के जीवन को उदाहरण रूप में प्रस्तुत करके लोगों को पवित्र व श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा दी थी। उनके अनुसार आर्य सत्य चार हैं- दुःख, दुःख का हेतु, दुःख निरोध का उपाय, तथा दुःख का निरोध। दुःख के निरोध हेतु वे तृष्णा को सर्वतो भाव से परित्याग करने का संदेश देते थे। उनका कहना था कि राग के समान आग नहीं, द्वेष के समाना ग्रह नहीं, मोह के समान जाल नहीं और तृष्णा के समान अगम नदी नहीं। अतः बुद्ध सदाचरण को ही महत्व देते थे। उनने कहा भी था कि ‘धर्मग्रन्थों का कितना ही पाठ करें’ लेकिन यदि प्रमाद के कारण मनुष्य उनके अनुसार आचरण नहीं करता तो दूसरे की गौयें गिनने वाले ग्वाले की तरह वह श्रमणत्व (ब्राह्मणत्व) का भागी नहीं होता।

जैन मत का सिद्धाँत मुख्य रूप से यह है कि किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है- श्रद्धा, ज्ञान और क्रिया। जैन शास्त्रों में इसे सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के रूप में उल्लेखित किया गया है।

गुरु नानक देव ने सिक्ख धर्म रूपी ऋषि परम्परा का शुभारंभ किया था तथा गुरु गोविंद सिंह जी ने इसे प्रगतिशील बनाया था। तत्कालीन राष्ट्रीय समस्या को देखते हुए गुरू गोविन्दसिंह जी ने प्रत्येक अनुयायियों को राष्ट्र व मानवता हेतु अपनी आहुति, अपना बलिदान प्रस्तुत करने को कहा था। उस परम्परा को आगे भी बनाये रखने के लिए उनने प्रत्येक सिक्ख को शास्त्रादपि शरादपि का “माला और भाला” साथ रखने का, अनीति से सदैव जूझते रहने का संदेश दिया।

पारसी धर्म केे प्रवर्तक जरथुश्त्र हुए हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित धर्मनीति के मुख्य चरण हैं- हुमत अर्थात् उत्तम विचार, हुख्त अर्थात् उत्तम वचन और हुश्वर्त अर्थात् उत्तम कार्य। ईश्वर के साक्षी व प्रेरक रूप हेतु उन्होंने अग्नि को स्वीकृत किया तथा अग्नि की तरह प्रखर, प्रकाशवान, ऊर्ध्वगामी व परोपकारी वृत्ति का बनने की प्रेरणा दी।

यहूदी मत का मूल दर्शन- ईश्वर के एकत्व, ईश्वर की पवित्रता तथा उसकी निराकारिता, में सन्निहित है। संसार के दो मुख्य मत- ईसाई और इस्लाम इसी से प्रस्फुटित हुए हैं।

ईसाई मत के अनुसार प्रेम ही परमेश्वर है। प्रेम ही पूजा-आराधन है, उसकी परिणति है। अपनी प्रार्थना में हर ईसाई यह कहता है- ‘परमात्मन्! मुझे अपनी राह दिखा। अपने संबंध में ज्ञान करा और सत्य मार्ग पर मुझे चला। मेरी मुक्ति का ईश्वर तू ही है। मेरा ज्ञान चक्षु खोल, जिससे मैं तेरी प्रेम पूर्ण आश्चर्यजनक कृतियों का समझ सकूँ। ईसाई मत के मूलाधार तो स्वयं ईसा हैं, जिन्होंने मानवता एवं आदर्श हेतु अपना बलिदान प्रस्तुत किया था।

इस्लाम मत के संस्थापक हजरत मुहम्मद ने प्रत्येक मुसलमान को सदाचारी व कर्त्तव्य-परायण बनने का उपदेश जीवन भर दिया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की तरह उनकी घोषणा की थी कि- ‘हर इंसान अल्लाह का कुनबा है।’ तभी तो वे पुनः यह कहते पाये जाते हैं कि- आओ! तुम और हम मिलकर उन चीजों पर मेल कर लें, जो हम दोनों में एक-सी हैं।

इन तथ्यों के आधार पर धर्म के मूलभूत दर्शन में कहीं भी कोई भिन्नता नहीं नजर आती। आज धार्मिक मान्यताओं के नाम पर होने वाले संघर्ष तथा आपा-धापी को अज्ञानताजन्य कृत्य ही कहा जा सकता है। यह एक विडम्बना ही है कि लोग अपने मतों तथा धर्म-प्रवर्तकों की दुहाई तो देते हैं, पर उनके दर्शन तथा आदर्श को अपने जीवन में ढाल नहीं पाते। यदि चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता तथा व्यवहार में शालीनता का समन्वय किया जा सके तो धर्म का वह स्वरूप प्रकट होगा जहां विभेद नहीं, एकत्व स्थापित होगा। संघर्ष नहीं वरन् सर्वत्र प्रेम, सहकार, उदारता, व समर्पण का साम्राज्य होगा।


सन्त पुरुष की सेवा में निरत (kahani)

एक शिष्य किसी सन्त पुरुष की सेवा में निरत था और ऐसा मंत्र चाहता था, जिसके सहारे वह ऋद्धि-सिद्धियाँ दिखा सके। पर संत थे, जो सबको रामनाम ही बताते थे। शिष्य को चमत्कारी मन्त्र चाहिए था। रामनाम तो मामूली बात है। उसे निराशा होने लगी। गुरु ने मनःस्थिति को ताड़ लिया।

एक दिन गुरु ने उस शिष्य को एक चिकना पत्थर दिया ओर कहा- ‘इसे सब्जी वालों से पूछकर आओ, कितने में खरीदेंगे। शिष्य दिन भर घूमा। बटखरे के काम में आ सकता है, यह सोचकर उनने दो-चार पैसे भर की कीमत लगाई।

दूसरे दिन वही पत्थर लेकर सुनारों के मुहल्ले में भेजा। वहाँ उसका दाम एक हजार तक लगाया गया। तीसरे दिन उसे जौहरी बाजार में उसकी कीमत मालूम करने को कहा गया। कइयों को दिखाने पर उसकी कीमत बढ़ते-बढ़ते एक लाख तक पहुँच गई।

गुरु ने शिष्य को समझाया- “पत्थर तो वही था, पर पारखियों ने अपनी-अपनी जानकारी के आधार पर उसका मोल बताया। रामनाम है तो एक ही, पर पात्रता के अनुरूप उसका मोल और महत्व घटता-बढ़ता रहता है।


अपरिग्रह की गरिमा

अरब के एक खलीफा थे। जब मरने का समय आया तो वे पैसे का हिसाब-किताब करने बैठे।

‘अब तक राज्यकोष से मैंने कितना लिया? हिसाब लगाने पर पता चला। छह हजार दिरहम ले चुके।

खलीफा ने अपने उत्तराधिकारियों को बुलाया और कहा- मेरा घर बेचकर यह पैसा राजकोष में जमा कर देना।

दूसरा प्रश्न उनने अपने परिवार वालों से पूछा- खलीफा बनने के बाद मेरी निजी सम्पत्ति में कितनी वृद्धि हुई?

हिसाब लगाने पर पता चला ‘एक गुलाम, एक ऊँटनी और एक दुशाला।

खलीफा ने वसीयत की कि इन्हें हजरत उमर के पास भेज दिया जाय।

तीसरी वसीयत उन्हें और करती थी- दफनाते समय मेरे जिस्म पर सिर्फ तीन कपड़े हों। दो वे धोली जायं जो इस समय मेरे जिस्म पर लिपटी हैं। तीसरा टुकड़ा ही नया खरीदा जाय।

मित्रों ने पूछा- तीनों नये कपड़े हम लोग आसानी से खरीद सकते हैं फिर पुराने क्यों इस्तेमाल करें।

खलीफा ने कहा- नये कपड़ों की मुर्दों की बनिस्बत जिन्दों को अधिक जरूरत है।

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तथागत समेत बुद्ध संघ राजा उदयन के घर भिक्षा के निमित्त गया। अतिथि सत्कार के उपरान्त रानी ने 500 चीवर भेंट किये।

राजा ने हँसते हुए पूछा- देव! आप इतने चादरों का क्या करेंगे? बुद्ध ने कहा- जिन भिक्षुओं के चीवर फट जाया करेंगे, उन्हें देते रहेंगे।

राज ने फिर पूछा- उन फटे चीवरों का क्या होगा? उत्तर मिला उनके टुकड़े काट कर बिछौने बना लेंगे।

फिर पुराने गद्दों का क्या होगा? उत्तर मिला झाड़न में काम लेंगे। अन्ततः उनके भी निरर्थक हो जाने पर किसी खेत में गाड़कर खाद बना दिया जायगा।

उदयन बुद्ध संघ की अर्थ नीति से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने ऐसे श्रेय सदुपयोग के लिए अपना सारा खजाना खाली कर दिया।

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हजरत अबूबकर, उन दिनों अपने क्षेत्र के बादशाह भी थे। पर प्रजा के धन का उपयोग उसी की सुख सुविधा में करते। अपने परिवार के लिए दो दिरहम जैसी छोटी रकम ही लेते।

एक दिन हजरत की पत्नी ने कहा- इतने धन पर रूखा सूखा ही भोजन बनता है। साथ में कुछ मीठा भी रहता तो अच्छा था। उनका मतलब खर्च की राशि बढ़ा देने से था।

हजरत तैयार नहीं हुए। बोले अन्य खर्चों। में कटौती करके मिठाई का प्रबंध करो। वैसा ही किया गया। ज्यों-त्यों करके खर्च का तालमेल बिठाया गया और भोजन में मिठाई भी रहने लगी। आधे दिरहम की दूसरे सदी से कटौती कर ली गई थी।

अगले महीने से हजरत ने अपना वेतन डेढ़ दिरहम कर दिया कि जब आधे की बचत हो सकती है तो वह क्यों न की जाय और पहले की तरह बिना मिठाई के ही काम क्यों न चलाया जाय।


Quotation

निर्धन होना दुर्भाग्य है, पर सबसे अभागे वे हैं जो कृपणता से ग्रस्त हैं। संकीर्णता का अभिशाप साधनों का सदुपयोग नहीं करने देता और वैभव को संकट और पतन का कारण बना देता है।


आध्यात्मिक प्रगति के चार प्रमुख आधार स्तम्भ

दृढ़ आधारों के बिना विकासक्रम आगे नहीं बढ़ सकता। बड़े-बड़े भवन, बाँध एवं ऊँची अट्टालिकायें मजबूत नींव के सहारे ही खड़ी हो पाती हैं। शरीर को जल, वायु, प्रकाश के साथ ही पोषक आहारों की आवश्यकता होती है। इसका अवलम्बन पाकर ही वह बढ़ता, शक्ति संपन्न बनता है। चेतना का विकास- आध्यात्मिक उन्नति भी ठोस आधारों के बिना संभव नहीं है। वे आधार भौतिक-स्थूल न होकर सूक्ष्म आध्यात्मिक हैं। चेतना को विकसित करने के चार प्रमुख उपादान ऐसे हैं जो सामान रूप से सबके लिए उपयोगी हैं। ये हैं आध्यात्मिक प्रगति के चार प्रमुख आधार स्तम्भ, विवेक, जागरुकता, चरित्र निष्ठा एवं प्रेम। यह चारों आधार ऐसे हैं जो अध्यात्म पथ पर साधक को उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचा सकने में समर्थ हैं।

विवेक को आध्यात्मिक उन्नति का मूल आधार माना जा सकता है। विवेक की जागृति से ही मनुष्य आध्यात्मिक पथ की ओर मुड़ता है। सत्य, असत्य, औचित्य, अनौचित्य के बीच भेद दृष्टि उदय होते ही मनुष्य अनित्य संसार की आसक्ति में लिप्त नहीं होता। काय-संरक्षण एवं चेतना के विकास के लिए वह संसार का उतना ही उपयोग करता है जितना कि आवश्यक है। विवेक इस पथ में केवल प्रवेश ही नहीं कराता वरन् प्रत्येक पग पर साधक की सच्ची मार्ग-दर्शक की भूमिका सम्पन्न करता है। शरीर की इन्द्रियाँ तो अपनी सजातीय जड़ तत्वों, विषयों की ओर आकर्षित होकर लुढ़कती हैं। उन पर अंकुश रखने, विषयों की निस्सारता का बोध कराने का कार्य विवेक ही करता है।

मानवी प्रवृत्ति ‘प्रेय’ को अधिक महत्व देती है। ‘श्रेय’ में प्रत्यक्ष लाभ न देख सकने के कारण वह उसकी अवहेलना कर देती है। विवेक का आलोक ही श्रेष्ठता के दूरगामी परिणामों से अवगत कराता है। साँसारिक योग्यता, प्रतिभा कितनी भी बढ़ी-बढ़ी क्यों न हो, चेतना को विकसित दूर कर सकने में इनका योगदान नगण्य है। योग्यताएँ साँसारिक वस्तुओं की जानकारी दे सकती हैं। भौतिक प्रगति का आधार बन सकती हैं किन्तु चेतना की उन्नति का साधन नहीं बन सकतीं। यह ज्ञान तो विवेक बुद्धि द्वारा ही संभव है। एक बार चेतना की महत्ता एवं परम चेतना के साथ उसका संबंध जान लेने पर उससे तादात्म्य स्थापित किए बिना अन्तः तुष्टि नहीं होती। ईश्वरीय विश्वास की परिणति वस्तुतः कर्मनिष्ठा के रूप में ही होती है।

विवेक के अभाव में तो साधना पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य निरपेक्ष नहीं होते वरन् परिस्थितियों के अनुसार उनके स्वरूप बदलते रहते हैं। विवेक न हो तो परिस्थितियों का विश्लेषण एवं सत्य असत्य का निर्धारण नहीं हो पाता। तटस्थ बुद्धि तो सत्य को घटनाक्रमों के साथ बाँध भी देती है जबकि वह इनसे परे है। निश्चय कर सकने के अभाव में तो सत्य भी असत्य और असत्य भी सत्य मालूम पड़ता है। ऐसी स्थिति में विवेक ही सही निर्णय लेने में समर्थ होता है।

साधना पथ में आगे बढ़ने के लिए विवेक का अवलम्बन अनिवार्य है। इसके प्रकाश में ही हम ईश्वरीय ज्ञान को अपने अन्दर अधिक स्पष्ट रूप में व्यक्त कर पाते हैं यह कारण है कि विवेक शक्ति की महत्ता का प्रतिपादन सभी शास्त्र करते हैं। उसके जागरण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। इस पथ पर चलने वाले आत्मविकास के इच्छुक प्रत्येक साधक के लिए विवेक का अवलंबन अनिवार्य हो जाता है। साधना की पृष्ठभूमि यहीं से बनती है।

आध्यात्मिक प्रगति का दूसरा चरण है- “जागरुकता” मानवी चेतना की सूक्ष्म परतों में जन्म-जन्मान्तर के पाशविक कुसंस्कार जुड़े हैं, जो मनुष्य की प्रगति में बाधक हैं। निम्नतर योनियों के संस्कार श्रेष्ठता की ओर बढ़ने में रोकते तथा वैसा क्षुद्र जीवन जीने के लिए प्रेरित करते हैं। विवेक द्वारा इसका अनुभव तो होता है किन्तु आत्म-निरीक्षण में जागरुकता का अभाव होने से अभ्यासगत संस्कार आग नहीं बढ़ने देते। लक्ष्य पर ध्यान देने एवं अपनी वर्तमान गतिविधियों एवं विचारणा का सतत् निरीक्षण करते रहने से ही आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन पाता है। जागरुकता का अवलंबन ही मनुष्य को अपनी क्षमताओं के सदुपयोग के लिए समर्थ बनाता है। अनावश्यक कार्यों, अचिन्त्य चिन्तन में शारीरिक एवं मानसिक क्षमता का एक बड़ा भाग नष्ट होता रहता है। समझा यह जाता है कि समय, श्रम एवं चिन्तन का उपयोग हुआ। जबकि एक बड़ा भाग अस्त-व्यस्त जीवन क्रम के कारण यों ही बेकार चला गया। भौतिक जीवन में सफल होने वाले व्यक्ति भी इस गुण के कारण ही सफलता के शिखर पर पहुँच पाते हैं। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक पथ में भी इसका अवलम्बन उतना ही आवश्यक है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह के विकार मानवी चेतना के पतन के, कारण बनते हैं। उनके प्रति जागरुक बने रहना तथा अपने को बचाये रखना साधक के लिए अति-आवश्यक है। चिन्तन की दिशा क्या है? तथा गतिविधियाँ अभीष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ रही हैं या नहीं। इसका निरीक्षण करते रहना कुशल माली के समान आवश्यक है। अन्यथा निगरानी के अभाव में बगीचे में उगने-बढ़ने वाले झाड़-झंखाड़ जिस प्रकार पौधों की अभिवृद्धि में बाधक होते हैं, ठीक उसी प्रकार विकृतियों के प्रति जागरुकता का अभाव आत्मोत्कर्ष का मार्ग अवरुद्ध कर देता है। इसके लिए सद्विचारों का पोषण एवं निकृष्ट विचारों का निष्कासन जरूरी हो जाता है। माली पौधों में अनावश्यक वृद्धि की काँट-छाँट, कीड़ों से सुरक्षा की व्यवस्था, के साथ-साथ उसकी वृद्धि के लिए खाद, पानी, प्रकाश की और भी ध्यान देता है। इस दोहरे प्रयास से ही पौधे बढ़ते तथा आकर्षक लगते हैं। चिन्तन के क्षेत्र में भी यही विधेयात्मक रुख अपनाना पड़ता है।

विवेक और जागरुकता जहाँ विचारों को प्रभावित करते हैं वहाँ व्यवहार में उतर कर वे चरित्र निष्ठा का स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। संसार के परदे पर जितने भी महामानव उभरे हैं उनमें यह विशेषता अनिवार्य रूप से जुड़ी रही है। निर्मल एवं उदात्त चरित्र ही साधक को साधना मार्ग में आगे बढ़ाता तथा साँसारिक विक्षोभों से रक्षा करता है। आने वाले प्रलोभनों, आकर्षणों में यह शस्त्र की भूमिका संपादित करता है। आदर्शों एवं सिद्धाँतों को अपनाये रख सकना, श्रेष्ठ मार्ग पर दृढ़ बने रहना चरित्रवान के लिए संभव हो पाता है।

चरित्र की उदात्तता दृढ़ संयम के रूप में परिलक्षित होती है। इन्द्रियों तथा मन पर संयम एवं श्रेष्ठ कार्यों में उनका नियोजन ही इसका लक्ष्य होता है। चिन्तन में उत्कृष्टता, भावनाओं में पवित्रता, कर्मों में श्रेष्ठता ही इसकी चरम परिणति है। ये त्रिविधि प्रयास ही साधक को साध्य के निकट पहुँचाते हैं। ईश्वरीय प्रकाश निर्मल हृदय में ही अवतरित होता है। इसके लिए अपने चिन्तन एवं कर्म पर सतत् निगरानी रखनी होती है।

चेतना के विकास के लिए चौथा एवं सबसे अनिवार्य तत्व है- ‘प्रेम’। इसके बिना तो अन्य तीन आधार अधूरे रह जाते हैं। अन्तरात्मा के उत्कर्ष तथा उसे परमात्मा से जोड़ सकने में अन्यान्य कोई भी उपाय सफल नहीं हो पाते। यह आत्मा का प्रकाश है। उदात्त भाव-सम्वेदनाएं अन्तःकरण से ही उत्पन्न होती हैं। प्रेम में स्वार्थ का लेशमात्र भी स्थान नहीं है। त्याग इसका गुण है। यह जितना विस्तृत होगा आत्म विकास की उतनी ही अधिक संभावनायें होंगी। प्रेम की पराकाष्ठा “आत्मवम् सर्वभूतेषु” की भावना के रूप में होती है। ‘बाइबल’ में प्रेम को ही परमेश्वर कहा गया है। इसका आरम्भ तो व्यक्ति से होता है किन्तु विस्तृत होकर प्राणि मात्र से आगे बढ़कर समष्टि तक जा पहुँचता है। सृष्टि सृष्टा की अनुकृति है। प्रेम से भरा हृदय सम्पूर्ण सृष्टि में ईश्वरीय सौंदर्य का दर्शन करता है। सौंदर्य के रूप में समस्त सृष्टि में वही व्याप्त है। ‘ईशावस्यकमदं सर्वम्’ में इसी तथ्य का उल्लेख किया गया है। प्रेम की परिणति आदर्शों- सिद्धाँतों के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा के रूप में होती है।

सभी चेतन प्राणी उस परमात्मा की सृष्टि के ही अविच्छिन्न अंग हैं। सब में एक ही चेतना समाहित है। इस तथ्य की अनुभूति मात्र निश्छल प्रेम से भरा हृदय कर पाता है। हृदय जितना प्रेम तत्व से लबालब होगा, परमात्मा की उतनी ही गहरी अनुभूति अन्तःकरण में होगी। सम्वेदनाओं से रहित शुष्क हृदय ईश्वर सत्ता के दिव्य आलिंगन की अनुभूति कभी नहीं कर सकता। वस्तुतः ऐसा शुष्क हृदय उस मरुभूमि के समान है जिसमें उपासना, साधना के बीच पुष्पित, पल्लवित हो ही नहीं सकते। इस दृष्टि से प्रेम तत्व के विकास के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। यह पर पीड़ा निवारण, समाज में संव्याप्त दुःख-क्लेशों की निवृत्ति के लिए किया जाने वाले प्रयोग द्वारा ही संभव है।

शारीरिक विकास के चार प्रमुख आधार- अन्न, जल, वायु एवं प्रकाश के समान चेतना के विकास के लिए उपरोक्त चार प्रमुख आधारों का अवलंबन आवश्यक हो जाता है। आध्यात्मिक प्रगति, विवेक के जागरण, जागरुकता, चरित्रनिष्ठा, एवं निश्छल प्रेम जैसे आधारों पर ही अवलम्बित है। उपासना, साधना की सफलता एवं चेतना को परमसत्ता के समीप पहुँचाकर उसके दिव्य अनुदानों का रसास्वादन करा सकने में ये चारों आधार प्रमुख भूमिका संपादित करते हैं। इनका अवलम्बन लेकर कोई भी साधक प्रगति के उच्चतम शिखर पर पहुँच सकता है।


बड़प्पन का व्यावहारिक मापदण्ड

एक राजा थे। बन-विहार को निकले। रास्ते में प्यास लगी। नजर दौड़ाई एक अन्धे की झोपड़ी दिखी। उसमें जल भरा घड़ा दूर से ही दीख रहा था।

राजा ने सिपाही को भेजा और एक लोटा जल माँग लाने के लिए कहा। सिपाही वहाँ पहुँचा और बोला- ऐ अन्धे एक लोटा पानी दे दे।

अन्धा अकड़ू था। उसने तुरन्त कहा- चल-चल तेरे जैसे सिपाहियों से मैं नहीं डरता। पानी तुझे नहीं दूँगा। सिपाही निराश लौट पड़ा।

इसके बाद सेनापति को पानी लाने के लिए भेजा गया। सेनापति ने समीप जाकर कहा अन्धे! पैसा मिलेगा पानी दे।

अन्धा फिर अकड़ पड़ा। उसने कहा, पहले वाले का यह सरदार मालूम पड़ता है। फिर भी चुपड़ी बातें बना कर दबाव डालता है, जा-जा यहाँ से पानी नहीं मिलेगा।

सेनापति को भी खाली हाथ लौटता देखकर राजा स्वयं चल पड़े। समीप पहुँचकर वृद्ध जन को सर्वप्रथम नमस्कार किया और कहा- ‘प्यास से गला सूख रहा है। एक लोटा जल दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।’

अंधे ने सत्कारपूर्वक उन्हें पास बिठाया और कहा- ‘आप जैसे श्रेष्ठ जनों का राजा जैसा आदर है। जल तो क्या मेरा शरीर भी स्वागत में हाजिर है। कोई और भी सेवा हो तो बतायें।

राजा ने शीतल जल से अपनी प्यास बुझाई फिर नम्र वाणी में पूछा- ‘आपको तो दिखाई पड़ नहीं रहा है फिर जल माँगने वालों को सिपाही सरदार और राजा के रूप में कैसे पहचान पाये?’

अन्धे ने कहा- ‘वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के वास्तविक स्तर का पता चल जाता है।’

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एक थे सेठ। वे गुरु की तलाश में थे। पर चाहते ऐसा थे, जो पहुँचा हुआ हो, ज्ञानी हो। बहुतों को जाँचा परखा पर कोई खरा न निकला। तलाश का अन्त न हुआ।

सेठानी ने कहा- ‘यह काम मेरे ऊपर छोड़ दें। जो मिला करे उसे मेरे पास भेज दिया करें। सेठ जी सहमत हो गये। एक झंझट टला।’

सेठानी ने पिंजड़े में एक कौआ पाला। जो भी महात्मा आया, उनसे यही कहतीं, देखिए मेरा पाला कबूतर अच्छा है न?

सन्त लोग आते। कबूतर कहाँ है? कैसा है? कहते। जब सेठानी अपनी बात पर अड़ी ही रहतीं, तो वे क्रोध में भरकर उलटी-सीधी बातें कहते और वापस चले जाते।

यही क्रम चलता रहा। बहुतेरे आये और सभी चले गये। कोई खरा उतरा नहीं। जो आवेश ग्रस्त हो चले, वे सन्त कैसे? जो सन्त नहीं वह गुरु योग्य कहाँ?

एक दिन एक वयोवृद्ध सन्त आये। सत्कार करने के उपरान्त सेठानी ने वही कौआ-कबूतर का सिलसिला चला दिया।

यह सन्त आवेश में नहीं आये। कौए और कबूतर का अन्तर समझाते रहे। न समझ पाने पर इतना ही कहकर चले गये- बेटे, हठ मत करना। तथ्य का पता लगाना। कोई सर्वज्ञ नहीं। हमसे आपसे भूल हो सकती है। सत्य को समझने के लिए मन के द्वार खुले रखने चाहिए। वे हँसते हुए चल दिये। क्रोध था न आवेश न मानापमान का भाव।

सेठानी ने सन्त को द्वार से वापस लौटा लिया। नमन किया और कहा- “जैसा चाहती थी, वैसा आपको पाया। कृपया हमारे परिवार के गुरु का उत्तरदायित्व ग्रहण करें।”


मन को सुधारा-सधाया जा सकता है।

जल्लाद अपनी जिन्दगी में कई व्यक्तियों को फांसी के फंदे पर चढ़ाकर मौत के घाट उतार देता है। फाँसी की टिखटी से लटकी काया, पीड़ा से ऐंठता शरीर और लम्बाती गर्दन देखकर भी उसके मन में कोई दुःखदाई प्रतिक्रिया नहीं होती। इसके विपरीत कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनमें किसी का कराहना, दर्द से बिलबिलाना भी नहीं देखा जाता। कसाई अपने व्यवसाय में सैंकड़ों ही नहीं हजारों पशुओं की गर्दन छुरी से रेत देता है। उन जानवरों की छटपटाहट, चीखने चिल्लाने का उन पर कोई असर नहीं होता, पर कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनसे किसी प्राणी के चोट लगने पर उनके शरीर से बहता हुआ खून भी नहीं देखा जा सकता। वे किसी पशु की कराह या आर्तनाद सह नहीं सकते।

इस प्रसंग की यह चर्चा का यही मन्तव्य है कि प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूतियां सभी परिस्थितियों में एक समान नहीं रहती। इसलिए किस व्यक्ति के मन पर, कौन सी घटना का अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ेगा? इसका कोई मोटा सिद्धान्त स्थिर कर पाना कठिन है। मानसिक आघात किन कारणों से पहुँचते हैं? इसका सामान्य विवेचन भी नहीं किया जा सकता। कई व्यक्ति आए दिन अपमान सहते रहते हैं और उसके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उसका उनके मन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। पर कई व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो छोटी-सी बात को बहुत ज्यादा महत्व देकर तड़प उठते हैं। बदला लेने की सोचते हैं। द्रौपदी ने दुर्योधन से एक निर्दोष और छोटा-सा मजाक ही किया था कि “अन्धों के अन्धे होते हैं।” दुर्योधन ने उस मजाक को अक्षम्य अपराध मान लिया और मन में ऐसी गाँठ बाँध ली कि प्रतिशोध की चरम सीमा तक जा पहुँचा। एक निर्दोष परिहास ने उसके मन मस्तिष्क पर जो चोट पहुँचाई होगी, इन शब्दों वे उसे जिस बुरी तरह तिलमिला दिया होगा उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। तभी तो उस आघात की गहराई के समतुल्य प्रतिशोध चुकाकर उसने अपने आघात को हलका करने का प्रयास किया। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति घटनाओं और प्रसंगों की अलग-अलग ढंग से व्याख्या करता है और हर घटना को प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि से देखता तथा उसकी प्रतिक्रिया ग्रहण करता है।

इसीलिए कहा गया है, कौन किस घटना प्रसंग को किस दृष्टि से देखेगा, उसकी क्या व्याख्या करेगा और उससे क्या प्रतिक्रिया ग्रहण करेगा? इसका कोई निश्चित मापदण्ड नहीं हो सकता। कानून और न्याय व्यवस्था में इस तरह के मापदण्ड निर्धारित हैं कि अमुक तरह के आचरण असामाजिक और अपराध है तथा दण्डनीय है, लेकिन इनमें भी अपराधी की नीयत, परिस्थिति, प्रतिक्रिया आदि का ध्यान रखा जाता है। सम्भव है अपराध गलती, गफलत या भ्रांत स्थिति में बन पड़ा हो, इस स्थिति में दण्ड हलका भी किया जाता है, लेकिन मन के लिए ऐसी कोई आचार संहिता या मापदण्ड नहीं है कि वह किस घटना को किस रूप में ग्रहण करेगा?

यही कारण है कि एक ही परिस्थिति में कोई व्यक्ति सुखी, सन्तुष्ट और प्रसन्न दिखाई पड़ता है तो दूसरा उसी परिस्थिति के सामने आने पर नाटकीय यन्त्रणा भोगता दीख पड़ता है। वस्तुतः किसी भी घटना का आघात या प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर है कि सहने वाले व्यक्ति की भावुकता एवं विचार शक्ति का समन्वय किस रूप में हुआ? सम्पन्न और समृद्ध व्यक्तियों को जिनका व्यापार व्यवसाय करोड़ों रुपयों का चलता है, कुछ लाख का घाटा हो जाता है तो उनकी स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता। वे उसी तरह वैभव सम्पन्न जीवन जीते हैं और सुख सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। किन्तु तुलनात्मक दृष्टि से तनिक से घाटे के कारण उनके मन में जो-जो व्यथा अनुभव होती है, जो पीड़ा होती है, उसे मनोशारीरिक रोगों के रूप में देखा जा सकता है। इसके विपरीत एक साधारण स्थिति का व्यक्ति, जो निर्वाह भर कमा पाता है कभी कुछ भी न कमा पाने के बाद भी उतना खिन्न नहीं होता है। क्या कारण है? एक ही उत्तर है- मनः स्थिति की बनावट।

आमतौर पर समझा जाता है कि इच्छित परिस्थितियां प्राप्त होने पर ही मनुष्य सुखी होता है। पर वस्तुस्थिति सर्वथा इसके विपरीत होती है। मनःस्थिति को, दृष्टिकोण को यदि परिष्कृत कर लिया जाय तो सोचने समझने का तरीका इतना सरल और सुखद बन जाता है कि व्यक्ति किन्हीं भी परिस्थितियों में सुखी सन्तुष्ट रह सकता है। अन्धकार में रखी हुई सभी वस्तुएँ काली जान पड़ती हैं परन्तु जब उन पर प्रकाश की किरणें पड़ती हैं और उनका पूरा स्वरूप सामने आता है तो अलग-अलग चमकने लगती हैं। उसी प्रकार सोचने समझने की प्रकाशवान प्रक्रिया को एक ऐसा दिव्य आलोक कहा जा सकता है, जिसके प्रकाश में सारा समीपवर्ती क्षेत्र अन्धकार की कालिमा से मुक्त हुआ आभायुक्त देखा जा सकता है।

प्रसिद्ध जर्मन चिकित्सा पत्रिका “मेडिजिनेस क्लीनिक” में छपे एक विस्तृत लेख में कई शरीर विज्ञानियों के अनुभव का सारांश छापा है। इसमें अनेक प्रसिद्ध चिकित्सकों ने अपने अनुभव लिखे और बताया कि पीड़ा का जितना अंश शारीरिक कारणों से जन्मता है उससे कहीं अधिक मानसिक कारणों से रोग और पीड़ा अनुभव होते हैं।

एक डॉक्टर ने अपना अनुभव लिखते हुए बताया है कि कुछ प्रयोगों में उन्होंने विशुद्ध पानी की सुई लगाकर रोगी को बताया कि यह गहरी नींद की दवा है। उसी से दर्द के कारण बेहाल हुए जा रहे व्यक्तियों की पीड़ा खत्म हो गई और वे चैन की नींद सोने लगे। इसके विपरीत मार्फिया के इन्जेक्शन देकर यह कहा गया कि इस दवा से शायद दर्द थोड़ा बहुत हल्का पड़े और सम्भव है थोड़ी नींद आए। दवा हलकी ही है। यह कहकर सन्देह पैदा कर दिए जाने से उनकी प्रतिक्रिया वैसी नहीं हुई, जैसी कि होनी चाहिए। इसी तरह के प्रयोगों में विपरीत व्याख्या करते हुए भिन्न दवा बताकर जब एक ही दवा रोगियों को दी गई तो सब पर अलग-अलग प्रतिक्रिया का कारण शरीर और मन की अलग-अलग संरचना होना भी समझा गया। इस स्थिति में एक ही रोगी पर एक ही बीमारी में एक ही दवा का अलग-अलग प्रभाव बताकर प्रयोग किया गया तो उसके भी भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़े।इन सब प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि रोग की अपेक्षा मनःस्थिति रोगी को अधिक पीड़ा पहुँचाती और कष्ट देती है।

रोगी को ही क्यों, स्वस्थ व्यक्ति के सम्बन्ध में भी यही नियम लागू होता है। इस सम्बन्ध में पर्याप्त परीक्षण करने के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि एक ही तरह के दर्द को भिन्न-भिन्न मनःस्थिति के व्यक्ति अलग-अलग तरह से अनुभव करते हैं। डरपोक रोगी एक ही तरह के दर्द से बेतरह चीखते चिल्लाते हैं। साधारण मनःस्थिति वाले हलके-हलके कराहते रहते हैं और साहसी लोग इसी कष्ट को बहुत हलका मानते हैं। युद्ध के मोर्चे पर घायल होने वाले सैनिक अपनी वीरता के आवेश में रहने के कारण बहुत कम कष्ट अनुभव करते हैं, जबकि उतने ही कष्ट में सामान्य व्यक्ति कई गुना बढ़-चढ़कर चीखते चिल्लाते हैं।

शरीर पर ही जब मनःस्थिति का इतना प्रभाव पड़ता है तो सुख-दुःख, हर्ष शोक जो मानसिक धरातल पर ही अनुभव किए जाते हैं, मनःस्थिति की बनावट के अनुसार उनका बढ़ा या घटा हुआ स्वरूप अनुभव होना स्वाभाविक ही है अस्तु हर स्थिति में अपनी मनोभूमि को शान्त और संतुलित रखा जाय। घटनाओं को घटने से रोक पाना मुश्किल है, दूसरे व्यक्ति कैसा व्यवहार करें कि वह अपने को प्रिय लगे, इस पर भी किसी का कोई वश नहीं। क्यों नहीं, अपने आप को ही इस प्रकार सामंजस्य बिठाना सिखाया जाए कि हर परिस्थिति में सुखी और सन्तुष्ट रहा जा सके। यदि अपने कष्टों, समस्याओं, कठिनाइयों और परेशानियों को सन्तुलित और परिष्कृत दृष्टिकोण के प्रकाश में रख कर उनका विश्लेषण किया जाए तो आधी से अधिक कठिनाईयाँ आधारहीन, मिथ्या और निर्मूल सिद्ध होंगी। इस सन्तुलित और परिष्कृत दृष्टिकोण को अपनाकर कोई भी व्यक्ति प्रत्येक परिस्थितियों में प्रसन्न रह सकता है।

मन एक शक्तिशाली किन्तु अनगढ़ तन्त्र है, उसे जिस प्रकार सिखाया जाय उसमें आरम्भिक आना-कानी के उपरान्त आरोपित ढाँचे में ढलने के लिए सहमत हो जाता है। सरकस में काम करने वाले जानवर इसके उदाहरण हैं, वे अपनी अभ्यस्त आदतें छोड़कर ऐसे करतब करने लगते हैं मानो उनने अपनी बिरादरी से अथवा परम्परा से रिश्ता तोड़कर नये स्तर का स्वभाव एवं अभ्यास अपना लिया हो। ऐसे ही आश्चर्यजनक परिवर्तन मनुष्यों के स्वभावों में भी होते रहते हैं। कितने ही भली परम्परा छोड़कर बुराई और बुरी आदतें छोड़कर भलाई की नीति अपनाते देखे गये हैं। इसका आधारभूत कारण एक ही है कि मनुष्य फौलाद पत्थर का नहीं, मोम जैसी मुलायम वस्तु का बना हुआ है, जिसे आत्म-चिन्तन संगति प्रभाव एवं परिस्थितियों के दबाव से सरलतापूर्वक बदला जा सकता है।

देखना यह होगा कि मन को किस प्रकृति में ढालना है, दूरदर्शी विवेकशीलता से अपनाकर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि किस स्तर की मनःस्थिति उपयोगी सिद्ध होगी। उसी स्तर का अध्ययन, सान्निध्य, मनन, चिन्तन आरम्भ कर दिया जाय तो क्रमश मनोभूमि निर्धारित ढाँचे में ढलने लगेगी और अभ्यस्त ढर्रा बदलने लगेगा। परायों को अनगढ़ों को जब प्रयत्न पूर्वक सुधारा, सिखाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि अपना मन और स्वभाव अवांछनीय प्रवाह में बहने से रोककर उपयोगी दिशाधारा अपनाने के लिए सहमत न किया जा सकेगा। आत्म निर्माण ही, भविष्य निर्माण है। उसी को भाग्य निर्माण भी कहते हैं। यह लगता तो अपने बस से बाहर है किन्तु वास्तविक यह है कि प्रयास पूर्वक यह कठिन काम भी सरल बनाया जा सकता है।


एक मजदूर रहता था (kahani)

सेठ के पड़ोस में एक मजदूर रहता था। जो कमाता उसे सन्तोषपूर्वक खाकर चैन की जिन्दगी बिताता। सेठानी महल पर से झाँककर मजदूर परिवार की मस्ती देखती रहती और पति को उलाहना देती, तुम कोल्हू के बैल की तरह पिलते रहते हो। कभी न चैन, न फुरसत, न खुशी न मस्ती।

सेठ ने कहा- इस मजदूर को निन्यानवे के फेर में नहीं फँसना पड़ा है। अन्यथा सारी हँसी-खुशी चली जाती। सेठानी ने पूछा- ‘निन्यानवे का फेर क्या होता है?’ सेठ ने उसे दिखा देने का वायदा किया।

रात्रि को सेठ ने एक पोटली रुपयों की बाँधकर चुपके से मजूर के आंगन में फेंक दी। उठकर सवेरे पोटली खोली तो परिवार बहुत प्रसन्न हुआ? विचार होने लगा कि जो एक कम है उसे भी मिलाकर पूरा सौ कर लिए जायं। इसके लिए एक ही उपाय था अधिक श्रम करना और खाने में से बचाना। सो ही किया गया। सौ पूरे हो गये तो इच्छा और भड़की। अनेकों योजनाएँ बनीं और पूँजी बढ़ाने का निश्चय हुआ। फलतः अकेला मजदूर ही नहीं उसकी स्त्री बच्चे तक कमाने बचाने के फेर में व्यस्त रहने लगे। रात्रि को देर में आते और थके-माँदे सो जाते। सवेरा होते-होते उन्हें फिर कमाने के लिए दौड़ना पड़ता।

सेठ जी सेठानी को ऊपर से सारे परिवर्तन दिखाते रहते और कहते देखा निन्यानवे का फेर। अब इन लोगों का घर सुनसान पड़ा रहता है न? कहीं मस्ती दीखती है क्या? सेठानी समझ गई कि पैसा पाकर आदमी और अधिक लालची हो जाता है।


पुरुषार्थ देव की अभ्यर्थना-आराधना

बीमारियों को सभी ने दुत्कारा तो वे पहाड़ के पास गईं और वे बोलीं, आपकी सहनशीलता और उदारता प्रख्यात है। हमें सभी दुत्कारते हैं, आप हमें आश्रय दें, तो यहीं रहकर दिन गुजारें।

पहाड़ ने स्वीकार कर लिया। वे चैन से रहने लगीं। रोज ही पूछती, पिताजी कोई सेवा हो तो बताना। पहाड़ हँस भर देता।

एक बार उस क्षेत्र के किसानों का मन आया कि पहाड़ काटकर खेत बनाये और नई जमीन हथियाएँ। एक ओर से किसानों की सफलता देखकर चारों ओर लोग चिपट गये और पहाड़ का बहुत-सा हिस्सा कट गया। बीच का टीला भी गिरने जैसा हो गया।

पहाड़ चिन्ता में बैठा था। बीमारियों ने चिन्ता का कारण पूछा और कोई सेवा हो तो बतायें, सदा की भांति पूछा।

पहाड़ को एक सूझ सूझी। बीमारियों से कहा। तुम लोग इन काटने वालों से चिपट पड़ो और यहाँ से भाग दो। नहीं तो हमारा सफाया हो जायगा। तुम्हें भी भगाना पड़ेगा।

बीमारियाँ बहुत दिन से ठाली बैठी थीं। उत्साह पूर्वक चल पड़ीं और पहाड़ काटने वालों से पूरी तरह चिपट गईं। फिर भी पहाड़ कटता रहा। काटने वालों ने हार नहीं मानी।

कितने ही दिन बीत गये। पहाड़ ने बीमारियों से पूछा- लड़कियों, इतने दिन में क्या किया? एक भी बीमार नहीं पड़ा और खुदाई ज्यों की त्यों चलती रही।

बीमारियों ने अपनी हार पर बड़ी लज्जा प्रकट की और कहा- यह लोग इतना पसीना बहाते हैं कि उनके साथ साथ हमें भी बाहर निकलना पड़ता है, ठहरने की जगह ही नहीं मिलती।

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एक श्रमिक पत्थर काटते-काटते थक गया तो सोचने लगा कि किसी बड़े मालिक का पल्ला पकड़े ताकि अधिक लाभ मिले और कम मेहनत पड़े।

सोचते-सोचते वह पहाड़ पर चढ़ गया और शिखर अवस्थित देवों की प्रतिमा से याचना करने लगा। उसने भी बात सुनी नहीं, तो सोचा बड़े देवता की आराधना करें। बड़ों में बड़प्पन अधिक होता है।

बड़ा कौन? यों उसे सूर्य सूझा। सूर्य की आराधना करने लगा। एक दिन बादल आये और सूर्य को अपने अंचल में छिपा लिया। श्रमिक सोचने लगा- सूर्य से बादल बड़ा है। यों उसने अपना इष्ट देव बदला और बादलों की अभ्यर्थना करने लगा।

फिर सोचा बादल तो पहाड़ से टकराते और सिर फोड़कर वहाँ समाप्त हो जाते हैं। इसलिए पहाड़ का भजन क्यों न करें।

बाद में सूझा कि पहाड़ को तो रोज हमीं काटते हैं। अपने आपको सबसे बड़ा क्यों न माने।

इसके बाद वह सबको छोड़कर अपने आप को सुधारने लगा और कुछ दिन बाद पुरुषार्थ के सहारे उस क्षेत्र के बड़ों में गिना जाने लगा।

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देवता, चिरकाल से अनुरोध करते रहे कि लक्ष्मी जी असुरों के यहाँ न रहें। पर लक्ष्मीजी ने असुर परिकर छोड़ा नहीं। एक दिन अनायास ही लक्ष्मी जी देवलोक में आ गईं। देवताओं ने असमंजस व्यक्त किया कि वे असुरों को छोड़कर चल क्यों पड़ीं।

लक्ष्मी ने कहा- सुर और असुर होने का पुण्य पाप भगवान देखते हैं। मेरा काम पराक्रम और पुरुषार्थ की जाँच पड़ताल करना है। अब वे बदल गये हैं आलस्य और दुर्व्यसन अपनाने लगे हैं। ऐसे लोगों के साथ मेरा निर्वाह कैसे हो सकता था।


जीवन सत्ता की आधारभूत सत्प्रवृत्तियाँ

मानव के समस्त चेतन क्रिया-कलाप किन्हीं मूलभूत भावनाओं पर आधारित हैं। चेतन सत्ता के मूल में क्रीड़ा-कल्लोल करने वाली ये प्रवृत्तियाँ ही काय-कलेवर का सारा जीवन- व्यापार संचालित करती हैं। इन्हीं की दिशाधारा के अनुरूप अनेकों जैव रसायन क्रियाएँ शरीर में स्वयमेव चलती रहती हैं। शरीर क्रिया विज्ञानी इनका स्थूल रूप तो जानते हैं एवं फिजियोलॉजी के रूप में वह पढ़ाया भी जाता है लेकिन ऐसा क्यों होता है? इस प्रश्न का उत्तर उनके पास है नहीं। भ्रूण (एम्ब्रियो) एक कोशीय स्थिति से बढ़ते-बढ़ते एक स्थिति पर जाकर रुक जाता है। यह अबाध वृद्धि दर रुक क्यों जाती है एवं भ्रूण गर्भाशय में ही जीवन पर्यंत क्यों नहीं पड़ा रहता, इसका कोई समाधान एम्ब्रियालॉजीस्ट्स के पास नहीं है। माँ के गर्भ में पल रहा जैव-भ्रूण नितान्त सुरक्षित पड़ा रहता है। न उसे जीवाणुओं से बचाव की व्यवस्था जुटानी पड़ती है, न ही सर्दी-गर्मी का उसे भय होता है। ऐसी स्थिति में अनेकानेक सुविधाओं को छोड़कर क्यों तो वह बाहर आये एवं क्यों आफत मोल ले?

इस प्रश्न का उत्तर शरीर विज्ञानियों के पास नहीं है। उत्तर मात्र आत्मिक परक ही हो सकता है। जीव चेतना अपूर्ण है। वह पूर्णता की ओर विकसित होना चाहती है। पराधीन न बनी रहकर स्वाधीन होना चाहती है, साथ ही जीवनचर्या से जुड़े अनेकानेक भावनात्मक अनुभवों का रसास्वादन भी करना चाहती है।

शरीर संस्थान में चल रही अनेकानेक क्रियाओं के पीछे छिपे प्रश्न “क्यों” का उत्तर ढूंढ़ना हो तो जीवन का आधारभूत उन भावनाओं का अवलम्बन लेना होगा जो मानव के गहन अन्तराल में- उसके कण-कण में विद्यमान है। इन भावनात्मक सिद्धान्तों पर ही शारीरिक क्रियाएँ तथा मनोगत आकांक्षाएं गतिशील रहती हैं। जिन मूलभूत भावनाओं पर जीवन सत्ता का आधिपत्य है, उनमें से सात को प्रमुख माना जा सकता है। ये वे सत्प्रवृत्तियाँ हैं जो सतत् जीवन चेतना को उत्प्रेरित करती हैं, जिनके आधार पर काय-कलेवर में प्राण का स्पन्दन होता रहता है।

ये सात भावना घटक हैं- (1) सहकारिता (2) संघर्ष (3) सामंजस्य (4) पराक्रम (5) प्रत्यावर्तन (6) अनुशासन (7) एकात्मभाव। इन्हीं के आधार पर विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से काय संस्थान के समस्त क्रिया-कलापों को गतिशील रहते देखा जा सकता है।

इनमें पहली प्रवृत्ति सहकारिता की है। सहयोग की भावना के आधार पर ही खरबों कोश मिलकर एक शरीर बनाते हैं। पारस्परिक सहकार द्वारा ही वे अपने को विभिन्न ऊतक समूहों में वर्गीकृत कर लेते हैं। ऊतक मिलकर एक अवयव बनाते हैं एवं कई अवयव मिलकर एक संस्थान अथवा तन्त्र बनाते हैं। विभिन्न तन्त्रों का समुच्चय ही मानवी काया है। इस प्रकार लगभग साढ़े सात सौ खरब इकाइयों का एक शरीर बनता है।

यदि सहकारिता के इस गुण को हटा दिया जाय तो हम देखते हैं कि शरीर क लगभग सभी कोश स्वतन्त्र जीवन जीने में भलीभांति समर्थ हैं। शरीर का एक कोश भी यदि जीवित अवस्था में उपयुक्त “सेल कल्चर” में रखा जाता है तो वह स्वाभाविक जीवन अवधि पूर्ण करता रह सकता है। वह सभी क्रियाकलाप पूरे कर सकता है, जो कि वह पूर्ण शरीर में करता था। प्रश्न यह उठता है कि जब हर कोश स्वयं में पूर्ण है तो क्यों वह अपनी स्वतन्त्रता त्यागता है? क्यों नहीं वह अमीबा जैसे एक कोशी जीव की तरह एकाकीपन का आनन्द लूटता?

वस्तुतः एक-दूसरे के सहयोग सहकार ने ही ज्यादा समर्थ जीवन जीने की- प्रतिकूलताओं से जूझकर बहुकोशीय जीव के निर्माण की स्थिति उत्पन्न की है। पारस्परिक सहकार ही ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है जिसमें उपलब्ध साधनों का श्रेष्ठतम सदुपयोग हो सके।

यह गुण शरीर के अंग-प्रत्यंग में समाया देखा जा सकता है। अनेकों एन्जाइम्स मिलकर भोजन पचाते हैं। प्रोटीन रूप में विद्यमान इन एन्जाइमों का बनना स्वयं सैकड़ों सहयोगी एन्जाइमों पर निर्भर है। इस प्रकार मात्र भोजन का पाचन प्रक्रिया में कई सौ एन्जाइम अपनी भूमिका निबाहते हैं। यदि इनमें से एक भी अपनी ड्यूटी पूरी करने के लिए मना कर दे, बागी हो जाय तो शरीर अस्वस्थ हो जाता है।

अपनी इस काया में स्वार्थ व परमार्थ का अनूठा संगम मिलता है। जो बाँटता है उसे स्वयं भी मिलना चाहिए इस आदर्श को हृदय-रक्तवाही संस्थान में फलीभूत होते देखा जा सकता है। हृदय का काम है- सारी काया में रक्त पम्प कर लगभग 99 प्रतिशत वितरित कर देना, परिशोधित रक्त को स्वस्थ ऊतकों तक पहुँचाना। बदले में उसे भी एक प्रतिशत रक्त पोषण के लिए कोरोनरी धमनियों के माध्यम से मिल जाता है। जीवन जीने की यह स्वर्णिम समन्वय नीति है।

हड्डियों का अपना भार तो मात्र बाहर प्रतिशत है। इतने पर भी वे 88 प्रतिशत भार दूसरे अवयवों का ढोती हैं। जिन पर कम भार पड़ता है। वे पतली रहती हैं। अपना आकार विस्तार वे वहीं बढ़ाती हैं, जब उन्हें किसी स्थान पर विशेष भार वहन करना पड़ता है। रीढ़ की हड्डियों को देखा जाय वे कितनी पतली तथा पोली होते हुए सारे शरीर का वजन सन्तुलन सम्भालती हैं। पैरों की मोटी और गले की पतली हड्डियाँ वजन ढोने के अनुपात से ही हैं। उनमें से किसी को भी इस बात की शिकायत नहीं है कि उन्हें क्यों पतला रहना पड़ रहा है और दूसरी क्यों बड़ी तथा भारी हैं। अधिक उत्तरदायित्व उठाने वालों को अधिक सुविधा मिले तो इसमें बराबरी की ईर्ष्या करने की किसी को क्यों शिकायत होनी चाहिए। जोड़ो पर उनकी संरचना देखते ही बनती है। परस्पर सहयोग से ही वे कई दिशाओं में मुड़ने घूमने में सफल हो पाती हैं।

दूसरी मूलभूत सत्प्रवृत्ति है- संघर्ष की। विकृति से जूझना जीवन के लिए नितान्त अनिवार्य है। जीवकोश से लेकर समग्र काया तक इस प्रखर प्रवृत्ति को क्रियाशील देखा जा सकता है।

एक कोश को ही लें। प्रत्येक कोश में सोडियम, पोटैशियम, जल, अमीनो अम्ल, विटामिन, हारमोन्स आदि रसायन-आयन्स की मात्रा एक निश्चित परिमाण में पाई जाती है। किसी एक की मात्रा इधर-उधर होने पर कोश का जीवन खतरे में पड़ सकता है। इसलिए कोश की “सेलमेम्ब्रेन” में पाये जाने वाले एनजाइम्स निरन्तर उन कणों से जूझते रहते हैं जो अवांछनीय गतिविधि अपनाते हुए अन्दर घूमने का प्रयास करते हैं। यदि किसी कोश का ‘सोडियम पम्प’ बिगड़ जाय तो मानना चाहिए कि सोडियम की सान्द्रता बढ़ने से वह शीघ्र ही मर जाएगा। किसी तरह कोशीय झिल्ली के रक्षकों को धोखा देकर कोई बाह्य कण अन्दर प्रवेश कर जाता है तो लाइसोसोम नामक कोशीय अवयव उससे जूझकर उसे छिन्न-भिन्न करके छोड़ते हैं।

रक्त में पानी की मात्रा तनिक भी बढ़ जाय तो तुरन्त एण्टी डाययूरेटिक हारमोन्स सक्रिय हो जाते हैं और अनावश्यक जल की मात्रा को गुर्दे के माध्यम से निकाल बाहर करते हैं। कोई अवांछनीय पदार्थ अन्दर जाते ही ऊर्ध्व पाचन संस्थान के अवयव उल्टी द्वारा उसे बाहर खदेड़ देते हैं। वातावरण में ठण्डक बढ़ते ही शरीर ऊर्जा की उत्पत्ति भी बढ़ जाती है एवं वातावरण से सामंजस्य बैठ जाता है। रोगाणुओं के शरीर में प्रवेश करते ही शरीर अपने रक्तकणों एवं जैव रसायन आधारों के माध्यम से तब तक उनसे लड़ता रहता है जब तक कि वे मर नहीं जाते। यदि यह संघर्षशीलता तनिक भी गड़बड़ा जाय तो मनुष्य रोगी हुए बिना न रहेगा।

यह चेतना का ही गुण है जिसके माध्यम से शरीर का हर कोश एक सैनिक की भूमिका निभाता है। यदि कोश मात्र रसायनों की पोटली, होता तो वह जीवाणु आदि से लड़ने का झंझट क्यों उठाता? विकृतियों से जूझने की इस प्रवृत्ति को “सेल मिडीएटैड इम्यूनिटी” क माध्यम से भलीभांति समझा जा सकता है। इस प्रक्रिया में इम्यून (प्रतिरोधी) कोश अवांछनीय तत्वों को मारते हैं। डा. रोज, मिलीग्राम एवं वैन आस अपनी पुस्तक “प्रिसीपल्स आफ इम्युनालॉजी” में लिखते हैं कि परस्पर सटने के बावजूद इम्युनकोष व आक्रामक कोशों के मध्य कोई रासायनिक आदान-प्रदान नहीं होता। इससे निष्कर्ष यही निकलता है कि इम्यून कोश जीवनी शक्ति बढ़ाने में किसी अरासायनिक प्रक्रिया को अपना माध्यम बनाते हैं। यह सचेतन संघर्षशीलता ही जीवकोश का मुख्य धर्म है।

इससे चिकित्सा प्रक्रिया में मनुष्य का मूल भावनाओं की अभिवृद्धि चेतनात्मक आधार पर करने की ओर ध्यान अब वैज्ञानिकों का गया है। संक्रमण एवं कैन्सर जैसे घातक रोगों का कारण अब संघर्षशीलता के अभाव को ही माना जाने लगा है। मात्र औषधि उपचार ही नहीं, जीवनी शक्ति संवर्धन की इस भावनात्मक प्रवृत्ति को भी उतना ही प्राधान्य मिलना चाहिए, ऐसा अभिमत अब जड़ पकड़ता जा रहा है।

तीसरी प्रवृत्ति है सामंजस्य। अर्थात् तालमेल बिठाना, परिस्थितियों के अनुरूप अपने अपने स्वरूप व अपनी जरूरतों को बढ़ा-घटा लेना। दीर्घायुष्य बने रहना इसी आधार पर सम्भव है। शरीर की यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि जो जीवाणु “फ्लोरा” के रूप में त्वचा पर विराजे होते हैं एवं सतत् झड़ते रहने वाले मृत कोशों को खाकर ही अपना पेट भर लेते हैं उनसे वह भली-भाँति तालमेल बिठा लेते हैं। शरीर की गर्मी के साये में वे भली-भाँति चलते रहते हैं एवं उसे कोई हानि नहीं पहुँचाते। जब भी वे ऊतकों में प्रवेश करने का प्रयास करने का प्रयास करते हैं, श्वेतकण उन्हें बाहर धकेल देते हैं। पारस्परिक सामंजस्य जीवकोशों का एक सीमा तक ही स्वीकार्य है। सहयोगी जीवाणु आँतों में बैठे-बैठे विटामिन बी-12 बनाते रहते हैं, बदले में उन्हें पोषण मिलता है। जब भी मारक औषधियों (टेट्रासाइक्लीन, क्लोरेम्फेनिकाल आदि) का प्रयोग होता है, ये जीवाणु नष्ट हो जाते हैं एवं शरीर को घातक रोगों के रूप में दण्ड भुगतान पड़ता है।

जब शुद्ध वायु नासिका के माध्यम से फेफड़ों में प्रविष्ट होती है तो श्वास नलिकाएँ चौड़ी हो जाती हैं फेफड़ों में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है ताकि अधिक से अधिक शुद्ध वायु रक्त के संपर्क में आकर अन्दर प्रवेश कर सके। फेफड़ों के ऊपर की झिल्ली व उसके नीचे के खाली स्थान (ब्लूरल केवाटो) में भी दबाव घट जाती है ताकि फेफड़े फैल सकें, अधिक से अधिक शुद्ध वायु अन्दर प्रवेश कर सके। यह सामंजस्य का प्रकरण हुआ। लेकिन यदि कोई दूषित वायु नासिक में से प्रवेश करने का प्रयास करती है तो श्वास नलियाँ सिकुड़ जाती हैं, जोरों से खाँसी आती है व सारी अवाँछनीय गैस बाहर कर दी जाती है। आक्रोश और शान्तिपूर्ण सहयोग की यह दुहरी नीति शरीर के हर क्रिया-कलाप में देखी जा सकती है।

इसी प्रकार हर कोश, ऊतक, अवयव तथा तन्त्र में परस्पर तालमेल बिठाने की इतनी अधिक सामर्थ्य है जो देखते ही बनती है। यदि किसी व्यक्ति का एक गुर्दा या फेफड़ा निकाल भी दिया जाय तो दूसरा परिस्थितियों से तालमेल बिठाकर सारा काम अकेला कर लेता है। जो काम दो अवयव कर पाते थे, वह एक ही अवयव फैलकर बड़ा रूप लेकर अकेला ही कर लेता है। यह वृत्ति नारी के गर्भाशय में तो उदारता-सहिष्णुता की चरम सीमा पर पहुँच जाती है। गर्भ रहित अवस्था में जो गर्भाशय मात्र डेढ़ या दो इंच घड़ा होता है, भ्रूण के बढ़ने के साथ ही फैलता जाता है एवं प्रसव के समय तक लगभग 12 इंच लम्बा आकार ले लेता है जिसमें ढाई-तीन किलोग्राम का शिशु प्लेसेण्टा व पानी के आवरण सहित पल रहा होता है। गर्भाशय ग्रीवा का छिद्र जो कुछ मिलीमीटर का ही होता है, प्रसव से कुछ घन्टे पूर्व लगभग पच्चीस गुना फैल जाता है, ताकि परिपुष्ट शिशु इसमें से बाहर निकल सके।

शरीर से बीस प्रतिशत रक्त निकल भी जाए, जैसा कि दुर्घटना में होता है अथवा किसी रोगी के लिए निकाला जाता है तो भी रक्त आयतन यथावत बना रहता है। लगभग 10 घण्टे के अन्दर शेष की पूर्ति मज्जा कोशों द्वारा कर दी जाती है। ऐसे कई उदाहरण हैं। जो बताते हैं कि शरीर बाह्य व आन्तरिक परिस्थितियों से समुचित तालमेल यदि न बिठाता तो अनेकों रोगों का घर होता। संक्षेप में यही कह सकते हैं कि शरीर के अवयव अत्यन्त विकट परिस्थितियों में भी सामंजस्य बिठाने में समर्थ हैं। इस क्षमता के क्षीण होते ही शरीर रोगी हो जाता है। (क्रमशः)


जीवन रूपी चलती तस्वीर की चौखट का नाम मृत्यु

एक सुन्दर युवती पड़ोसी युवक के प्रेम पाश में बंध गई। दोनों ने लोक भय से कहीं अन्यत्र जा बसने का निश्चय किया और रात्रि में घर छोड़ दिया। युवक अपरिचित जगह में निर्वाह साधन कठिनाई से ही जुटा पाता, फिर भी दांपत्य जीवन चला और तीन वर्ष में ही दो बच्चों का बाप बन गया।

दोनों ने सोचा घर वापस लोट चलें। परिवार का क्रोध शान्ति हो गया होगा। वहीं गुजारा करेंगे। लम्बा रास्ता पार करना था। दो बच्चों को गोद में लेकर दोनों बीहड़ के रास्ते घर लौट रहे थे। रास्ते में एक विषधर ने युवक को काट लिया और वह वहीं ढेर हो गया।

युवती पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। पर करती क्या? उसने लाश को नदी में बहाया और किनारे पर पड़े लट्ठे के सहारे पार उतरने का प्रयास करने लगी। एक हाथ में लट्ठा रहने के कारण एक ही बच्चे को साथ ले जा सकती थी। सो उसने छोटे को पत्तों के ढेर में छिपा दिया ओर बड़े को कंधे पर बिठाकर लट्ठे के सहारे पार उतरी। दूसरे फेर में दूसरे को ले जाने की उसकी योजना थी।

पर होने पर बड़े बच्चे को खेलने के लिए बिठाया और वापस लौटकर छोटे को लेने चली। पर दुर्भाग्य का क्या कहना। देखा तो छोटे को शृंगाल खा चुका था। शिर धुनती लौटी तो देखा कि माँ से मिलने की आतुरता में बड़ा नदी तट पर पहुँचा ओर प्रवाह में बह गया। अब उसका पूरा परिवार पूरा संसार लुट चुका था। रोती कलपती एकाकी पितृ गृह की ओर चलती रही।

घर पहुँचने पर नजारे दूसरे ही दीखे। माता पिता मर चुके थे। सास श्वसुर बीमार पड़े थे। एक भाई था सो भी ठीक उसी दिन मरा जिस दिन घर पहुँच गया।

इतनी विपत्तियाँ इतनी जल्दी एक साथ उस अल्हड़ लड़की पर टूटीं तो वह सन्तुलन गँवा बैठी और पागल हो गई।

उस पगली की उदात्त गतिविधियों से क्रुद्ध होकर पड़ोसियों ने उसे भगवान बुद्ध के आश्रम में पहुँचा दिया। उस वातावरण में देर तक रहने के बाद शोक घटा और उसकी समझ फिर से लौटने लगी।

अवसर देखकर भगवान ने उसे बुलाया, पास बिठाया और स्नेह पूर्वक उसे नया नाम दिया-पट्टाचारा। गंभीर मुद्रा में बोले भद्रे! यह संसार जलती आग की तरह है। हम सब इसमें ईंधन की तरह जलते रहते हैं। जन्मने वाले के लिए मरण एक ध्रुव सत्य है। रोने से भी वह नहीं रुकता है। कर्म चक्र में बंधे हम सभी मर्माहत की तरह रह रहे हैं।

तथागत के अमृत वचन पट्टाचारा के अन्तराल को छू गये। उसने शोक के परिधान उतार फेंके और महासत्य के शरण में जाने वाली चीवरधारी तपस्विनियों की पंक्ति में जा बैठी।

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रास्ते में ईसा के शिष्य मैथ्यू का गाँव था। तलाश किया तो पता चला, उसके पिता मर गये हैं और लाश को ठिकाने लगाने में वह जुटा है।

महा प्रभु को आया देखकर मैथ्यू विलाप करने लगा और बोला- अब मैं क्या करूं?

ईसा ने कहा- जो मर गया वह भूत का साथी हुआ। तू वर्तमान को समझ और भविष्य का ध्यान दे। मेरे साथ चल। समय ने असंख्यों का ठिकाने लगाया है। इस लाश को भी लगा देगा।

मैथ्यू चल पड़ा। अगले पड़ाव पर ईसा ने मैथ्यू को वापस लौटा दिया और क्रिया कर्म करने के बाद आने को कहा। शिष्यों के असमंजस पर ईसा ने समझाया उस दिन उसे मोह छोड़ने के लिए कहा गया था। आज कर्त्तव्य पालने के लिए। क्रिया दो थीं पर परिस्थिति के अनुसार लक्ष्य एक होते हुए भी उन्हें अलग-अलग समय में सम्पन्न करना पड़ा। यही जीवन-योग है।


हँसिये अथवा जी खोलकर रोइये

जीवन की सरसता इस बात पर अवलम्बित है कि सहजता और स्वाभिकता को सदा अपनाये रहा जाय। विचारों एवं भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर यथासम्भव मिलता चले। उन्हें इस ढंग से पोषण मिलता रहे जिससे उनकी क्षमता सत्प्रयोजनों में नियोजित हो सके। मनःशास्त्री मानवी विकास प्रक्रिया में उपरोक्त सत्य को असाधारण महत्व देते हुए कहने लगे हैं कि मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन की बढ़ती समस्याओं का एक सबसे प्रमुख कारण है- उसका “रिजर्व नेचर”। मानवी स्वभाव में यह विकृति तेजी से बढ़ रही है। यही कारण है कि संसार में मनोरोगियों का बाहुल्य होता जा रहा तथा कितने ही प्रकार के नये रोग पनप रहे हैं।

नदियों के पानी को बाँधकर रोक दिया जाय तो वह महाविप्लब खड़ा करेगा। रास्ता न पाने से फूट-फूट कर निकलेगा तथा अपने सीमावर्ती क्षेत्र को ले डूबेगा। भावनाओं को दबा दिया जाय तो वे मानवी व्यक्तित्व में एक अदृश्य कुहराम खड़ा करेंगे, जो नेत्रों को दिखायी तो नहीं पड़ता पर मानसिक असन्तुलन के रूप में उसकी प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं। अपना आपा खण्डित होता प्रतीत होता है। दिशा दे देने पर नदियों के पानी से विभिन्न कार्य किए जाते हैं। बिजली उत्पादन से लेकर सिंचाई आदि का प्रयोजन पूरा होता है। भावों एवं विचारों को दिशा दी जा सके तो उनसे अनेकों प्रकार के रचनात्मक कार्य हो सकते हैं। कला, साहित्य, कविता, विज्ञान के आविष्कार इन्हीं के गर्भ में पकते तथा प्रकट होते हैं।

भावनाओं एवं विचारों में से कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी अभिव्यक्ति हानिकारक है। पर उन्हें दबाने से तनाव की स्थिति आती है। उससे बचाव का तरीका यह है कि भावनाओं को दूसरे रूप में अभिव्यक्त होने दिया जाय। मनोविज्ञान ने इस संदर्भ में नये निष्कर्ष निकाले हैं। न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में डा. फ्रैंक ने यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि रोना एक उत्सर्जन प्रक्रिया है। श्वसन, मल निष्कासन, स्वेदन की भांति इस एक्सोक्राइन प्रक्रिया में भी शरीर के कितने ही टाक्सिक पदार्थ बाहर निकलते हैं। तनाव एवं दबाव जैसे मानसिक कारणों से शरीर में उत्पन्न होने वाले विषाक्त रासायनिक पदार्थों को रोने से बाहर निकलने का अवसर मिलता है।

डाक्टर फ्रैंक लम्बे समय से साइकोजेनिक अश्रुपात के ऊपर शोध कार्य कर रहे हैं। वर्षों पूर्व उनके मन में विचार उठा कि मनुष्य आखिर रोता क्यों है? इससे प्रेरित होकर उन्होंने कई वर्षों तक खोजबीन की। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आँसू तनाव मुक्ति में सर्वाधिक सहायक हैं।

डा. फ्रैंक एक बायोकेमिस्ट हैं तथा मेनिसोटा स्थित सेंट पाल रैमजे मेडिकल सेंटर के साइकिआट्री रिसर्च लैबोरेटरी के डायरेक्टर हैं। उनका कहना है कि भावोद्वेग को अधिकाँश व्यक्ति दबा देते हैं। कुण्ठा, अवसाद, द्वन्द्व जैसे मानसिक व्यतिरेक इसी कारण पैदा होते हैं। आवेश की स्थिति में जो विषाक्त रसायन पैदा होते हैं उनको यदि आंसुओं के माध्यम से बह जाने दिया जाय तो किसी प्रकार के मानसिक असन्तुलन के उत्पन्न होने का खतरा नहीं रहता।

माक्विटे यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ नर्सिंग के डाक्टर मार्गरेट केप्यू ने मानसिक दाब से पीड़ित 100 व्यक्तियों का अध्ययन किया। उनमें से 50 पेप्टिक अल्सर के रोगी थे तथा पचास अल्सरेटिव कोलाइटिस के। तुलनात्मक अध्ययन के लिए उन्होंने पचास अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को चुना जो परिस्थितियों की दृष्टि से लगभग उन रोगियों की ही स्थिति में थे। अपने अध्ययन निष्कर्ष को उन्होंने अमरीकन साइकोलॉजिकल ऐसोसिएशन के एक मीटिंग में प्रस्तुत करते हुए कहा रोगियों के पूर्व इतिहास से पता चला है कि उनकी बीमारियों के अधिकाँश कारण मनोवैज्ञानिक हैं। अपनी बात किसी से व्यक्त न करने तथा भीतर ही भीतर घुटते रहने के कारण ही उनकी अन्य शारीरिक क्रिया प्रणालियों में गड़बड़ी पैदा हुई, जिसने विभिन्न प्रकार के रोगों को जन्म दिया। स्वस्थ व्यक्तियों का पिछला जीवन वृत्तांत बताया है कि वे हर परिस्थितियों में तनावों एवं द्वन्द्वों से मुक्त रहे। जब कभी भी प्रतिकूल अवसर आये उसे सहज रूप से स्वीकार किया तथा उसके अनुरूप सामंजस्य स्थापित कर लिया।”

चिकित्सकों ने एक रोग की खोज की है- “फैमिलियलडिसटोमिया”। यह एक बच्चों का वंशानुगत रोग है। इस रोग का लक्षण यह है कि जब बच्चे रोते हैं तो उनके आँसू नहीं निकलते। यद्यपि इसके रोगी तो कम पाये जाते हैं पर है यह अत्यन्त खतरनाक रोग। शरीर शास्त्रियों तथा मनःशास्त्रियों का मत है कि जो बच्चे इस रोग से ग्रसित होते हैं उनका मानसिक विकास समुचित रूप से नहीं हो पाता बड़े होने पर उसमें आक्रामक प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। ऐसे बच्चों के अपराधी निकलने की सम्भावना अधिक रहती है। उनका भाव संस्थान अत्यन्त शुष्क पड़ जाता है। प्रायः यह धारणा भी सर्वत्र प्रचलित है कि जन्मोपरान्त जो बच्चे रोते नहीं, उनके जीवित बचने की सम्भावना कम रहती है। जो बचते भी हैं तो उनका भलीभांति विकास नहीं होता।

नेतृत्व विज्ञानी ऐश्लेमाटेगु ने निष्कर्ष निकाला है कि नारियाँ पुरुषों से अधिक रोती हैं। उनके भावोद्वेग दबते नहीं, आंसुओं से बाहर निकल जाते हैं। यही कारण है कि वे पुरुषों से अधिक स्वस्य तथा मानसिक दृष्टि से अधिक सन्तुलित होती हैं।”

मिनेसोटा (अमरीका) से प्रकाशित एवं मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट में कहा गया है कि “महिलाएँ पुरुषों से पाँच गुनी अधिक रोती हैं, जिसके 40 प्रतिशत कारण निजी सम्बन्धों से उत्पन्न मन-मुटाव होते हैं जबकि 27 प्रतिशत कारण सामाजिक होते हैं। भावातिरेक भी महिलाओं के रोने का एक प्रमुख कारण है। पर उनके रोने का कुल मिलाकर प्रभाव अच्छा ही पड़ता है।” प्रायः देखा भी जाता है कि नारियाँ पुरुषों की अपेक्षा तनावग्रस्त कम रहती हैं। इसका कारण बताते हुए मनःशास्त्री कहते हैं कि वे अपनी भावनाओं को दबाने की अपेक्षा किसी न किसी रूप में व्यक्त कर देती हैं।

विद्वान अर्डिस विटमैन लिखते हैं कि “सामान्य व्यक्ति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने से डरते हैं। जबकि महान व्यक्ति बड़ी सहजता से उन्हें व्यक्त कर देते हैं। जिन्दगी की तमाम विचित्रताओं और विषमताओं को वे इतने सहज ढंग से लेते हैं जैसे कुछ असामान्य बात ही न हुयी हो। उनकी सरसता, प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता का यही रहस्य है।” विटमैन कहते हैं कि “भावाभिव्यक्ति से डरने का एक सबसे बड़ा करण है व्यक्तित्व का विखण्डित होना। इससे धीरे-धीरे भाव संस्थान शुष्क पड़ जाता है तथा भावनाओं के अमृतपान से आदमी वंचित रह जाता है। यह कैसा दुर्भाग्य है कि हम जीवन के सबसे सजीवतम गुण का जान-बूझकर गला घोंट देते हैं।”

अभिव्यक्ति के अभाव में भावनाओं की सम्वेदना शीलता तथा लालित्य धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। आखिर इससे कैसे बचें तथा आये अवरोध की परख कैसे करें, विचारक आर्डिस इस सम्बन्ध में कहते हैं कि अपना आपा स्वयं ही उसका परिचय दे देगा। जीवन की शुष्कता स्वयमेव प्रमाण है कि भावाभिव्यक्ति के मार्ग में कही चट्टान आ खड़ी हुई है जो दिखाई तो नहीं पड़ती पर अवरोध रूप में अनुभव तो होती है। स्वयं के प्रति पूर्वाग्रह, अड़ियल स्वभाव तथा अहम् ही उस मार्ग के सबसे प्रमुख और सबसे बड़े अवरोध हैं। इन्हें हटाते ही अपने उद्गम स्रोत से भावनाओं के अमृत को निर्विरोध निस्सृत होने का अवसर मिल जाता है। गंगा में स्नान करने के बाद जैसी शीतलता एवं शान्ति मिलती है लगभग ऐसी ही मानसिक प्रफुल्लता भाव गंगा में अवगाहन करने से मन और अन्त करण को प्राप्त होती है।”

हैम्बर्ग के मनोरोग विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि दूषित भावनाएँ हृदय रोग तथा कैंसर जैसे रोगों का कारण बन सकती हैं। मनोरोगों पर आयोजित एक सम्मेलन में 35 देशों में मनःचिकित्सा विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा उपरोक्त तथ्य की पुष्टि की। प्रो. एडोल अर्नेस्ट मेयर के अनुसार “संसार में जितने व्यक्ति धूम्रपान तथा शराब के कारण हृदय रोग के रोगी बनते हैं, उससे भी अधिक दूषित भावनाओं के कारण होते हैं।”

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. क्लास वेन्सन का कहना है कि “कैंसर रोग को जन्म देने में भी मन की प्रमुख भूमिका हो सकती है। असन्तुलित निरुत्साहित कुंठित तथा जीवन से हारे हुए लोग दूसरे व्यक्तियों की तुलना में कैंसर की गिरफ्त में शीघ्र आ सकते हैं।”

बलात् शान्त रहने तथा मनोभावों को दबाये रखने की स्थिति में थकान आती है। यह थकान भी शारीरिक श्रम से आयी थकान जैसी मालूम पड़ती है पर श्रम से आयी थकान की अपेक्षा स्वास्थ्य की दृष्टि से यह मानसिक थकान अधिक हानिकारक है। यदि यह स्थिति लम्बी अवधि तक बनी रहे तो मनुष्य का मनोबल टूट जाता तथा आत्म विश्वास समाप्त हो जाता है। वह मन में परिस्थितियों से लड़ने का साहस गवां बैठता और पराजय स्वीकार कर लेता है। संघर्ष की निरर्थकता स्वीकार कर लेने पर पलायन की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। अकर्मण्यता के आते ही असफलताओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। ऐसी हालत में व्यक्ति की क्षमता पंगु हो जाती है। वह कुछ विशेष कार्य नहीं कर पाता, जबकि प्रतिभा कौशल की दृष्टि से वह किसी से कम नहीं होता।

भावोद्वेग तथा मानसिक उत्तेजनाओं से बचने का सर्वोत्तम उपाय है- हँसना। यह एक ऐसा टानिक है जो मन की सभी गांठें खोल देता है। खिलखिलाकर हँसने से सभी कुण्ठाएँ समाप्त हो जाती हैं। यूरोपियन वैल्यूज ग्रुप ने कुछ समय पूर्व 20 यूरोपीय देशों का सर्वेक्षण किया। इस योजना पर बीस लाख डालर खर्च आया। अध्ययन करने वालों का निष्कर्ष है कि ब्रिटेन के निवासी सबसे अधिक प्रसन्न रहते हैं। हँसने में दूसरे देशों के लोगों की अपेक्षा वे अधिक समय लगाते हैं। उनके उत्तम शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं सन्तुलन का कारण भी यही है।

ब्रिटिश चिकित्सा संस्थान के शोध विभाग की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार “मनुष्य के स्वभाव तथा भावनाओं का सर्दी-जुकाम से गहरा सम्बन्ध है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मानसिक तनाव की स्थिति में शरीर में स्टेराइड नामक एक तत्व बनने लगता है जो शरीर में मौजूद संक्रमण नामक तत्वों को कमजोर बनाता है। फलतः जीवनी शक्ति नष्ट होने लगती है तथा बीमारियों को चढ़ दौड़ने का अवसर मिल जाता है।”

संस्थान के विशेषज्ञों का परामर्श है कि जो नजला, सर्दी-जुकाम एवं दमे से बचना चाहते हैं वे तनाव से बचें। अपनी भावनाओं को दबाने का प्रयास न करें। अभिव्यक्ति के लिए या तो हँसे अथवा हँस नहीं सकते तो जी खोल कर रोयें। उनका मत है कि अन्तर्मुखी स्वभाव के व्यक्ति सर्दी के रोगों से अधिक पीड़ित होते देखे गये हैं।

कुछ ऐसी प्रकृति के लोग भी होते हैं जो अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में सकुचाते हैं। किसी के सामने अपनी बात कही जाय, यह समस्या भी आड़े आती है। जीवन में कितनी गल्तियाँ होती हैं जिसका पश्चाताप तो मनुष्य मन ही मन करता रहता है पर किसी के सामने कह नहीं पाता। इस असमंजस में उपयुक्त व्यक्तियों का अभाव भी एक कारण होता है। ऐसे थोड़े से व्यक्ति होते हैं जो दूसरों की भावनाओं को ठीक प्रकार समझते तथा अपनी सहानुभूति दर्शाते हैं। जीवन में हुई भूलों को उथले व्यक्तियों के समक्ष व्यक्त करने से वे उल्टे उपहास ही करते हैं। भावावेश में उनसे कहना उचित नहीं। आदिकाल से ही परम्परा यह रही है कि समर्थ मार्गदर्शक के समक्ष मन की उन बातों को कह दिया जाय जिन्हें दूसरों के सामने कहने में संकोच लगता है। गल्तियों के परिशोधन, दुर्भावनाओं के परिष्कार तथा भावी निर्धारण में समर्थ मार्गदर्शक के मार्गदर्शन का सम्बल मिल जाय तो व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास का मार्ग प्रशस्त होने लगता है। सर्वतोमुखी प्रगति के लिए यह अत्यावश्यक है कि भावाभिव्यक्ति का पूरा अवसर मिले। उनमें जो अनुपयोगी अहितकर है उनका परिशोधन किया जाय। जो उत्कृष्टता की पक्षधर है उनको सतत् पोषण मिले। मानसिक असन्तुलनों से बचने, सरसता एवं प्रसन्नता युक्त सफल जीवन जीने के लिए उपरोक्त महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।


नियमित जीवन की प्रकृति प्रेरणा

दृश्य जगत की समस्त गतिविधियां क्रियाकलाप और हलचलें एक नियम व्यवस्था के अंतर्गत चल रही हैं। नियमितता उसमें सर्वोपरि है। कहा जाये कि नियमितता संसार का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होती। प्रकृति की इच्छा है कि हर प्राणी अपना कार्य नियत समय पर किया करे। सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी ग्रह उपग्रह नियत निर्धारित गति से नियमपूर्वक अपना काम करते हैं और निर्धारित कक्षा पर घूमते हैं। वृक्ष अपने समय पर फलते-फूलते हैं। कहा भी गया है। ‘समय पाए तरुवर फले केतिक सींचों नीर।’ ऋतुएँ अपने क्रम में बदलती हैं। प्रत्येक नियत कार्य नियत समय पर करने के लिए प्रकृति ने इस नासमझ कहे जाने वाले वृक्ष वनस्पतियों तथा जीव-जन्तुओं को जाने कौन-सी ऐसी घड़ी दी है कि वे अपना हर काम नियत निर्धारित समय पर कर ही लेते हैं। अपने चारों ओर जिधर भी दृष्टी पसार कर देखा जाए उधर ही समय की पाबन्दी और नियमितता का बोलबाला दीखेगा।

सृष्टि का हर प्राणी अपना जीवनयापन नियमित क्रम पद्धति के आधार पर ही व्यतीत करता दिखाई देता है। उदाहरण के लिए चींटियाँ अपना विवाह रचने के लिए वर्ष में एक निश्चित दिन ही अपने बिलों से निकलती हैं और दिन उसका यह एक ही धंधा रहता है। वर-वधू की तलाश करने से लेकर सुहागरात मनाने तक के सारे रस्म रिवाज इस एक ही दिन में निपट जाते हैं और चींटियां अण्डे देने, उन्हें सेने के आगामी क्रिया कलापों में दत्त-चित्त हो जाती हैं। चींटियों का यदि कोई पंचाँग रहता होगा तो निश्चित ही उसमें विवाह की एक नियत तिथि रहती होगी और वे उसी के अनुसार विवाह के लिए उद्विग्न होती हुई खाने-पीने के सामान्य ढर्रे को बदल कर ब्याह शादी के गोरख धन्धे में उलझ जाती होंगी।

मधुमक्खी, तिलचट्टे, केकड़े, चूहे, चींटी, मक्खी आदि की दिनचर्या उनके निर्धारित समय क्रम से ही आरम्भ होती है। उनके क्रिया कलापों में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए चाहे जितने प्रयास किए जाएँ वे इस भूल भुलैया में नहीं उलझते। कृत्रिम प्रकाश या कृत्रिम अन्धकार उत्पन्न करके उनकी अन्तःचेतना को भुलावे में डालने के वैज्ञानिकों ने कितने ही प्रयोग किये पर उनमें से एक भी सफल नहीं हुआ। इन कीड़ों ने अपने कार्यक्रम अपनी अभ्यस्त चेतना के आधार पर ही आरम्भ किया और चतुरता के साथ रचे गये उस भुलावे में फँसने से इन्कार कर दिया।

फ्राँस के वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में एक प्रयोग किया कि कुछ मधुमक्खियों को सवा आठ बजे शरबत का घोल चाटने के लिए दिया जाने लगा। कुछ दिनों तक यह क्रम चलने से मधुमक्खियाँ इसकी अभ्यस्त हो गई। अब उस छत्ते को, जिसकी मधुमक्खियों को सवा आठ बजे शरबत का घोल दिया जाता था, हवाई जहाज से पेरिस भेज दिया गया। पेरिस में जब सवा आठ बजते हैं तो अमेरिका में रात के सवा तीन बजते हैं। साधारणतया मक्खियां उस समय विश्राम किया करती हैं पर देखा गया कि रात के सवा तीन बजे उन मक्खियों के छत्तों में भिन-भिनाहट शुरू हुई और वे पास में रखे शरबत के घोल पर टूट पड़ी। तीन हजार मील की दूरी मक्खियों के समय ज्ञान सम्बन्धी चेतना को भुलावे में नहीं डाल सकी।

मधुमक्खियों को दिशा भुलाने का एक प्रयोग जर्मनी में किया गया। आरम्भ में उन्हें नियत स्थान पर भोजन दिया जाता रहा। वे नित्य वही आहार पाने की अभ्यस्त हो गईं। अब उनका भोजन कुछ ही दूर पर विपरीत दिशा में रखा गया। मक्खियां नियत स्थान पर ही भूखी मंडराती रही और अन्य दिशा तलाश करने की जल्दी उन्होंने नहीं दिखाई।

समुद्र तट पर पाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का केकड़ा दिन के उतार-चढ़ाव के साथ अपने रंग बदलता है। इन्हें पकड़कर घोर अन्धेरे में रखा गया ताकि उन पर सूर्य का प्रभाव न पड़े तो भी उनका रंग समय के हिसाब से बदलने का क्रम जारी रहा। इसके साथ-साथ उस केकड़े का रंग गहरा होने में कृष्णपक्ष और शुक्ल-पक्ष के हिसाब से 50 मिनट का अन्तर आता रहता है। उस केकड़े को समुद्र में एक हजार मील दूर पहुँचाया गया और वायुयानों में अधिक ऊंचाई पर रखा गया ताकि समुद्री ज्वार-भाटे का उस पर असर न पड़े। तब भी उसकी प्रकृति नहीं बदली और अँधेरी उजेली रातों में 50 मिनट के अन्तर से जो रंग में गहरा हलकापन आया करता था वह यथावत् जारी रहा केकड़े के भीतर जैसे कोई घड़ी लगी हुई हो जो बिना बाहरी परिवर्तन किये अपने ढंग और क्रम से चलती ही रही।

कई पक्षी प्रतिवर्ष लम्बी यात्राओं पर निकलते हैं। उन्हें यह मालूम रहता है कि कब कहाँ आहार-विहार की सुविधा रहती है तथा कहाँ असुविधा रहती है? उसी के अनुसार वे अपनी परिव्रज्या का कार्यक्रम बनाते हैं। उनके पर्यटन पर निकलने और वापस आने का समय इतना सुनिश्चित रहता है जैसे पंचांग कैलेण्डर देखने और मुहूर्त निकालने में उन्होंने ज्योतिषियों से बाजी लगा रखी हो।

कई पक्षी तैरने और उड़ने में समान रूप से पारगत होते हैं। कुछ के लिए रात भी दिन की तरह सुविधाजनक होती है। इंग्लैण्ड के पक्षियों में एक जाति ऐसी भी है जो लम्बे पर्यटन पर चली जाती है किन्तु उसके बच्चे घोंसले में ही रह जाते हैं। वे जब बड़े होते हैं तो अपने अभिभावकों के रास्ते पर ही उड़ते हैं और वहीं जा पहुँचते हैं जहाँ उनके जन्मदाता निवास कर रहे होते हैं। पर्यटक पक्षी जो झुण्ड बनाकर उड़ते और उनकी यात्रा वर्ष में नियत समय पर आरम्भ होती है। इसी प्रकार उनके वापस लौटने का समय भी होता है।

घरों में रहने वाली गौरैया चिड़िया खेतों में अनाज की फसल पकते ही गाँवों की ओर उड़ जाती है और जब तक वहाँ दाने मिलते हैं। तब तक उधर ही गुजारा करती है और वह पुनः अपने घर बसेरों में वापस लौट आती है।

जो पक्षी निश्चित समय पर सुदूर प्रदेशों की यात्रा पर निकलते हैं और निश्चित समय पर वापस आते हैं उनके संबंध में कई तरह के प्रयोग परीक्षण किये गये। डा. सेवरा न इन परिव्राजक पक्षियों के पैरों में ऐसे छल्ले पहना कर छोड़ा जिन पर उनके समय निवास आदि का वर्णन अंकित था। अन्य देशों के लिए चले जाने पर जब वे पकड़े गए तो पता चला कि वे दो हजार से लेकर 25 हजार मील तक की यात्रा कर चुके हैं। वे अपना उड़न पथ ऐसा बनाते हैं, जिससे दुर्गम पर्वत से टकराना भी न पड़े और रास्ता भी सीधा बैठे। उनकी उड़ान 24 घंटे में 240 मील अर्थात् 10 मील प्रति घंटा आंकी गई है। इसमें उन की यात्रा के बीच का विश्राम काल भी शामिल है।

प्रसिद्ध जन्तु विज्ञानी डा. केनाफिग्न ने पक्षियों और छोटे जीव जन्तुओं के क्रिया कलापों का लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद जो विवरण प्रस्तुत किया है, वह निश्चित ही आश्चर्यजनक है, उनका कहना है कि मनुष्य घड़ी के सहारे समय का और कम्पास के सहारे दिशा का ज्ञान प्राप्त करता है। आकाश के सूर्य, चंद्र तारे आदि भी दिशा का ज्ञान कराने में सहायक होते हैं परन्तु छोटे जंतुओं के पास इस प्रकार के कोई उपकरण नहीं होते फिर भी वे अपनी आवश्यकता के अनुरूप दिशा और समय संबंधी ज्ञान अपनी अतींद्रिय चेतना के आधार पर प्राप्त करते हैं। इसे उन्होंने बायोलोजिकल क्लोक कहा है जो कि “सरकेडियन रिदम” के आधार पर चलती है।

उत्तरी ध्रुव में असह्य सर्दी की ऋतु आने से पूर्व उसे क्षेत्र के हंस तथा मुर्गाबियाँ उड़कर उष्ण कटिबन्ध के देशों में चल देती हैं। साइबेरिया के पक्षी भारत में उड़ आते हैं और ऋतु प्रतिकूलता दूर होते ही अपने-अपने देशों को लौट जाते हैं। प्रशाँत-सागर की सालमन मछली बसंत ऋतु आते ही अपने उपयुक्त नदियों में उलटी चल देती है और प्रजनन कार्य में निरत होती है। अंडे वह समुद्र में नहीं नदियों में ही देती है।

कैलीफोर्निया और औरेगोन के निकट समुद्र तट पर पाई जाने वाली मछली बसंत ऋतु के शुक्ल पक्ष में ही अंडे देती हैं। सामोन द्वीप में पलोले नाम का कीड़ा अक्टूबर नवम्बर की खास तारीखों को ही अंडे देता है। किसान खेती संबंधी सब काम छोड़ कर उन अंडों को साफ करने में लग जाते हैं और अपनी खेती की रक्षा करते हैं।

समुद्र में नियत तिथियों पर ज्वार भाटे आते हैं और कुछ समय के अन्तर से जल हमेशा ऊंचा नीचा होता रहता है। लगता है समुद्र को भी घड़ी घंटों और तिथियों की जानकारी किसी ने सिखा दी हो। कलियों और पुष्पों का रात में सिकुड़ना तथा दिन में फैलना रात में कम और दिन में अधिक बढ़ना इस बात का प्रतीक है कि उन्हें समय का ज्ञान रहता है। पक्षियों का शाम होते ही घोंसले में लौटना और प्रभात होते ही उड़ जाना प्रातः सायंकाल का चहचहाना बताता है कि मानों उन्होंने कलाई में घड़ी बाध रखी हो। उड़ते हुए अमुक दिशा में जाना और लम्बी उड़ान के बाद बिना भटके अपने घर घोंसले पर आ जाना इस बात का प्रमाण है कि उनका दिशा ज्ञान असंदिग्ध होता है, जिसके आधार पर वे आकाश में भी अपना मार्ग निश्चित करते हैं। मनुष्य को समय ज्ञान के लिए घड़ी चाहिए और दिशा ज्ञान के लिए कम्पास, पर इन पक्षियों की चेतना में ही मानों प्रकृति ने घड़ी और कंपास जैसी क्षमता सहज ही जोड़ दी हो।

इस संदर्भ में पक्षितीर्थ का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा महावलिपुरम् से मद्रास जाते समय कोई सात मील आगे एक छोटा सा नगर है पक्षितीर्थम्। यहाँ पहाड़ी पर एक मंदिर स्थित है जिसमें अनेक देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। मंदिर के पिछवाड़े लगभग 150 फीट लम्बी और पंद्रह फीट चौड़ी ढलवाँ चट्टान है। इस पर 11-12 बजे के बीच दो सफेद गिद्ध पक्षियों का जोड़ा नित्य ही मन्दिर का प्रसाद ग्रहण करने आता है। प्रतिमाओं के दर्शन से कहीं अधिक उत्सुकता दर्शकों को इन पक्षियों को देखने की होती है इसलिए वे बड़ी संख्या में दस बजे तक इकट्ठे हो जाते हैं। दर्शकों की भारी भीड़ के बीच मन्दिर का पुजारी दोनों हाथों में दो प्रसाद की कटोरियां लेकर खड़े हो जाते हैं। सफेद गिद्ध नियत समय पर निश्चित मुद्रा में आते हैं और चोंच में प्रसाद भर कर पुनः आकाश में उड़ जाते हैं।

इस तरह के अनेकों उदाहरण और प्रमाण हैं जिनसे सिद्ध होता है कि काल और दिशा के संबंध में अन्य प्राणधारी अत्यंत अनुशासन प्रिय हैं वे प्रकृति प्रेरणा की तनिक भी अवज्ञा नहीं करते फलस्वरूप उनकी जीवन प्रक्रिया सहज ढंग से चलती रहती है। यह मनुष्य ही है जिसने नियमित दिनचर्या की उपेक्षा करने की रीति-नीति अपना रखी है। उसका परिणाम अस्वस्थ होने, दुःखी रहने, पीड़ा और व्यथा अनुभव करते रहने के रूप में मिलता है। यह ध्रुव सत्य है कि जो प्रकृति प्रेरणा की अवज्ञा करेगा उसे उसका दंड भोगना ही पड़ेगा।


तीन वर्ष के लिए निकला (kahani)

एक बूढ़ा तीर्थ यात्रा पर तीन वर्ष के लिए निकला। चारों बेटों को बुलाकर अपनी जमा पूंजी उनके हाथों सौंप दी। कहा लौटने पर ले लूँगा। न लौटा तो तुम्हारी। चारों को सौ-सौ रुपये सौंप दिये।

एक ने उन्हें सुरक्षित रख लिया। दूसरे ने उसे ब्याज पर उठा दिया। तीसरे ने रुपयों को शौक-मौज में उड़ाया। चौथे ने उनसे व्यवसाय करना आरम्भ कर दिया।

तीन साल बाद बूढ़ा लौटा और धरोहर वापस माँगी। एक ने ज्यों की त्यों लौटा दी। दूसरे ने थोड़ी सी ब्याज भी सम्मिलित कर दी। तीसरे ने खर्च कर देने की कथा सुनाई और मजबूरी बताई। चौथे ने व्यवसाय किया, और मूल धन चौगुना करके लौटाया। बाप ने चौथे की सबसे अधिक प्रशंसा की और उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया। इसके बाद उसकी बुद्धिमानी सराही गई जिसने कम से कम ब्याज तो कमाया।


आहार निर्धारण में यह कैसी नासमझी?

नमक अकेला नहीं खाया जा सकता। चीनी और चिकनाई के सम्बन्ध में भी यही बात है उनके सहारे पेट नहीं भरा जा सकता और न उन्हें उस रूप में पचाया ही जा सकता है। इससे प्रकट है कि वे अपने आहार में स्वाभाविक स्थान नहीं पा सकते। स्वाभाविक न सही और पोषक आहार की पहचान एक ही है कि वह जिस प्राकृतिक रूप में उत्पन्न होता है उसे उसी रूप में खाया पचाया जा सके। इस दृष्टि से हरे शाक और पके फल ही मनुष्य का वास्तविक आहार हैं। उनका उत्पादन कम और जनसंख्या के विस्तार को देखते हुए अन्न पर आश्रित रहने की बात भी परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने वाली एवं युक्ति संगत समझी जा सकती है।

अन्न को धक-पकी स्थिति में फल शाक की तरह ही खाया पचाया जा सकता है। गेहूँ, जो, बाजरा, मक्का, ज्वार, मटर, चना आदि को पूरी तरह पकने से पूर्व खाया जाय तो वह उससे भी उपयुक्त पोषण मिलेगा। संग्रह करने की बात सामने आने पर सूखे अन्न यदि लेने पड़ते हैं तो उन्हें अंकुरित किया जा सकता है। उबाल कर नरम या सुपाच्य भी बनाया जा सकता पर उसमें बाहरी मिश्रणों की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। हर वस्तु को उसके स्वाभाविक स्वरूप में ही ग्रहण किया जाय।सृष्टि के सभी प्राणी यही करते और निरोग रहते हैं। मनुष्य के लिए भी यही उपयुक्त है।

अखाद्यों में सर्वाधिक प्रचलन नमक का है। उसके बिना किसी का काम ही नहीं चलता। यह बुरी आदत है। यह एक हलका विष है जो शरीर की किसी भी आवश्यकता को पूर्ण नहीं करता। वरन् उलटी अनेकानेक हानियाँ पहुंचाता है। आश्चर्य है कि उसका प्रचलन कैसे बढ़ा और कैसे आज जैसी स्थिति तक आ पहुँचा।

छटी शताब्दी तक नमक का प्रचलन नहीं के बराबर था। वह दूर से ढोकर लाया जाता था फलतः बहुत महंगा भी पड़ता था। अमीरों के लिए ही वह सुलभ था। गरीब तो उसे कभी-कभी थोड़ी मात्रा में ही प्रयोग कर पाते थे। बाद में व्यवसाय के लिए संग्रह किये जाने वाले मूल्यवान पदार्थों में एक गणना नमक की भी होने लगी। रोम में उसे फौजियों के वेतन के साथ-साथ एक सीमित मात्रा में उपहार की तरह भी दिया जाने लगा था। आरम्भ से ही आदत न होने से उसकी तब बहुत आवश्यकता भी नहीं समझी जाती थी। इत्र-फुलेल की तरह ही उसे जब तब स्वागत सत्कार या हर्षोत्सवों में इस्तेमाल किया जाता था।

नमक कई बार इतिहास प्रसिद्ध घटनाओं का सूत्रधार बना है। फ्राँस में बहुत समय तक वह सरकार की सिफारिश या परमिट के आधार पर ही विरलों को उपलब्ध होता था। परन्तु माँग उसकी और भी बढ़ती जा रही थी पर शासन उस पर भी प्रतिबन्ध ढीले करने और उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से कुछ कर नहीं रहा था। इस पर प्रजा का असन्तोष भड़का और कुछ समय तक चिनगारी सुलगने की तरह बाद में फ्रांसीसी क्रान्ति बनकर भड़का।

गान्धी जी ने सन् 1930 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मोर्चे बन्दी नमक सत्याग्रह के रूप में आरम्भ की थी। जो बढ़ते-बढ़ते ‘करो या मरो’ के रूप में विकसित हुई। देश की स्वतन्त्रता दिलाने का आधारभूत कारण बनी।

आक्सफोर्ड डिक्शनरी में बड़े साइज के 4 पन्ने, नमक के सम्बन्ध में प्रचलित मान्यताओं के सम्बन्ध में छपे हैं। इससे विदित है कभी वह कितना अधिक लोक चर्चा का विषय बनकर रहा होगा।

शरीर को जिन क्षारों की प्राकृतिक आवश्यकता है, वे सभी प्रचलित खाद्य पदार्थों में विद्यमान हैं। अनुपात भी सन्तुलित है। इसके बाद ऐसी कोई आवश्यकता शेष नहीं रह जाती कि ऊपर से नमक और मिलाया जाय। यही बात चीनी के सम्बन्ध में भी है। वह सामान्य खाद्यपदार्थों में इतनी घुली रहती है कि शरीर की आवश्यकता भली प्रकार पूरी होती रहे। न अलग से नमक आवश्यक है और न स्वास्थ्य सन्तुलन की दृष्टि से अतिरिक्त चीनी की ही आवश्यकता है।

रासायनिक विश्लेषण के अनुसार नमक सोडियम क्लोराइड का सम्मिश्रण है। यह एक प्रकार का हलका विष है। धीमे विष तत्काल तो किसी को नहीं मार डालते पर ऐसा प्रभाव उत्पन्न अवश्य करते हैं जिससे स्वास्थ्य धीरे-धीरे बिगड़ता चले और मनुष्य रोगग्रस्त होकर अकाल मृत्यु के मुँह में जा घुसे। पर्यवेक्षकों के अनुसार इन दिनों बढ़ते हुए रक्त चाप और मानसिक तनाव में नमक की मात्रा अधिक लिया जाना एक बड़ा कारण है। ऐसे रोगियों तथा हृदय रोगों से पीड़ितों को विशेष रूप से परामर्श दिया जाता है कि वे नमक या तो बिलकुल छोड़ दें या उसकी मात्रा घटा दें। जिनने यह परामर्श माना उनमें से आधे लोग बिना इलाज के रोगों छुटकारा पा गये।

चटोरापन बढ़ने के साथ-साथ नमक का प्रयोग इतनी मात्रा में होने लगा है, जिसे स्वास्थ्य संकट की पूर्ण भूमिका कहा जा सके। अब औसत दो ढाई चम्मच रोज तक का जा पहुँचा है। मनुष्य का पाचन तन्त्र जितनी मात्रा किसी प्रकार इस आफत को सहन कर सकता है उसकी तुलना में वर्तमान प्रचलन बीस गुना अधिक है।

चीन और जापान में अन्यत्र की तुलना में नमक का उपयोग अधिक होता है फलतः उन देशों में रक्तचाप की शिकायत दिन-दिन बढ़ती ही जा रही है। इसके विपरीत न्यूगिनी, आमेजन मलेशिया, युगाण्डा जैसे देशों में जहां नमक की मात्रा बहुत थोड़ी ली जाती है यह संकट अपेक्षाकृत कहीं कम है।

तमाखू के विरुद्ध पिछले दिनों विचारशीलों ने आन्दोलन किया और उसे जन स्वास्थ्य के लिए निश्चित रूप से हानिकारक बताया है। तदनुसार कितने ही देशों में हर सिगरेट पर यह छापने का कानून बनाया है कि ‘सिगरेट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’। अगले दिनों जब तथ्यों की ओर ध्यान दिया जायगा और प्रचलनों में उचित अनुचित की विवेचना करने का अवसर मिलेगा तो नमक विक्रेताओं की दुकानों पर तथा पैकिंग की थैलियों पर यह उल्लेख करना पड़ सकता है कि “नमक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।” आवश्यकता इस बात की है कि इस हानि से जन-जन को अवगत कराया जाय और प्रतिबन्ध लगाने के लिए आवश्यक वातावरण बनाया जाय।

बाव कमिग्स अपने रोगियों को ही नहीं मित्रों को भी एक परामर्श दिया करते थे। “खाने में जल्दी मत करो। उसमें समय लगाओ, मजा लूटो। भोजन का महत्व समझो, उसकी आवश्यकता और क्षमता पर ध्यान दो। खाते समय इस तथ्य को विस्मृत न होने दो कि अवयवों में जीवनी शक्ति भर पाना इसी वरदान से सम्भव है जो मुंह के द्वार पेट तक पहुँचाया जाता है।”

अखाद्यों से जितना बचा जा सके उतना ही उत्तम है। स्वाभाविक भोजन अपनाने की आदत बदल कर ही हम खोये स्वास्थ्य का वापस लौटा सकने में समर्थ हो सकते हैं। दैनन्दिन जीवन में ही नहीं, साधना के क्षेत्र में आत्मिक प्रगति का जब भी प्रसंग चलता है खाद्य-अखाद्य का प्रश्न पहले आता है। इसका निर्धारण जहाँ तक सम्भव हो, रुचि के आधार पर नहीं, खाद्य की सौम्य प्रकृति के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।


महावीर उधर से गुजर रहे थे (kahani)

भगवान महावीर उधर से गुजर रहे थे। रास्ते में मिले एक ग्रामीण ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया। उत्तर में अर्हत ने भी उसके चरणों पर मस्तक टेका।

ग्रामीण सकपकाया- बोला- आप तपस्या के भण्डार हैं, उस विभूति को मैंने नमन किया। पर मैं तो कुछ नहीं हूँ, मेरा नमन किस लिए।

अर्हत ने कहा- तेरे भीतर जो परम पवित्र, आत्मा है, मैं उसी को देखता हूँ और नमता हूँ। मेरे ‘तप’ से तुम्हारा ‘सत्य’ बड़ा है।


मानवी पराक्रम सम्भावनाएँ उलटने में समर्थ

सम्भावित कठिनाई की जानकारी प्राप्त होना आवश्यक है। इसी अनुमान के आधार पर मनुष्य बचाव का प्रबन्ध करते और उसमें बहुत हद तक सफल होते हैं। जो अनजान रहते हैं तथा प्रमाद बरतते हैं उन्हें योग्यतम की सुरक्षा वाला नियम तोड़-मरोड़ कर रख देता है। शीत प्रकोप से अपरिचित और बचाव के उपाय करने में असमर्थ मक्खी मच्छर जैसे कृमि कीटकों में से असंख्यों को हर वर्ष प्राण दण्ड सहना पड़ता है। इसके विपरीत जो जागरुकता हैं वे प्रकृति प्रवाह की अवाँछनीयता से अपने आपको बचाते और सुख-पूर्वक जीवित रहते हैं।

ठण्डे देशों की चिड़िया उन दिनों लम्बी यात्रा करके भारत जैसे उष्ण देशों में चली आती हैं और मौसम बदलते ही अपने देशों को लौट जाती हैं। हिम प्रदेशों के भालू, अजगर, कन्दराओं में लम्बी तानकर सोते रहते हैं और गर्मी आते ही जग पड़ते हैं। ऐसे ही प्रयास अन्य प्राणियों द्वारा भी किये जाते रहते हैं। यह विपत्ति के पूर्वाभास से अवगत होकर तद्नुरूप उपाय बरतने का उपक्रम है। इसे आत्म-रक्षा और बुद्धिमत्ता का संयुक्त उपाय कहना चाहिए जिसे जीवन का महत्व समझने वाले सभी प्राणी अपनाते हैं।

मनुष्य शरीर संरचना की दृष्टि से अन्य प्राणियों की तुलना में दुर्बल पड़ता है। उसकी आवश्यकताएँ और महत्वाकाँक्षाएँ भी अपेक्षाकृत अधिक बढ़ी-चढ़ी हैं। इस लिए प्रकृति प्रवाह के साथ तालमेल बिठाने को उसे और भी अधिक प्रयास करने होते हैं। इसके लिए खतरों की सम्भावना के प्रति उसे अधिक अनुमान लगाने पड़ते हैं। यह प्रवृत्ति न रही होती तो संकट सिर पर आ खड़ा होने के उपरान्त कुछ करते-धरते न बन पड़ता। मकड़ी, दीमक, चींटी जैसे छोटे कीड़े-मकोड़े तक खतरों की पूर्व जानकारी अपनी अन्तःक्षमता के आधार पर प्राप्त करते हैं और विपत्ति आने से पूर्व ही सुरक्षा प्रयत्नों में तत्परतापूर्वक जुटते हैं। भूकम्प जैसे दुर्घटनाओं से पूर्व कुत्ते बिल्ली जैसे प्राणी जिस प्रकार सुरक्षा प्रयास करते हैं वह देखने ही योग्य है।

मनुष्य के सम्मुख खतरे कम नहीं हैं। उन्हें जानने के कारण ही वह अनेकों कठिनाइयों से बचने के प्रयास करता और बहुत कुछ सफल भी होता है। रात्रि में उसे कम दीखता है। अस्तु उसे ठोकर लगने से लेकर निशाचरों तक से उस अवधि में अनेक खतरों की आशंका रहती है। अस्तु बचाव का ध्यान रखते हुए प्रकाश जलाने, मकान बनाने, चौकसी करने जैसे उपाय अपनाये जाते हैं। शीत ऋतु की चपेट से प्राण बचाने के लिए भी आवश्यक वस्त्रों से लेकर आग जलाने तक के सरंजाम जुटाये जाते हैं। मूसलाधार वर्षा से सिर छिपाने का प्रबन्ध न हो तो शरीर से लेकर संचित साधनों में से कुछ भी बच सकना सम्भव न होगा।

ऋतु प्रभाव, आक्रमणों का भय, अभावजन्य संकट, प्रकृति प्रकोप जैसे संकटों का अनुभवजन्य ज्ञान रहने से लोग उनसे बचने और समय रहते सुरक्षा प्रबन्ध करने में सफल रहते हैं। आकस्मिक विपत्तियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। युद्ध, महामारी, बाढ़, भूकम्प, तूफान, दुर्भिक्ष जैसे संकट न जाने कब, किस रूप में, कहाँ आ धमकें इसकी पूर्व जानकारी प्राप्त करने के सम्बन्ध में विज्ञजनों द्वारा निरन्तर माथा-पच्ची की जाती रहती है। बदलते मौसम की जानकारी देने वाली वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ इस संदर्भ में बहुमूल्य उपकरणों का प्रयोग करती हैं। उन संग्रहित पूर्व सूचनाओं के आधार पर सुरक्षा के प्रयत्न चल पड़ते हैं उस आधार पर संकटों से निपटने में बहुत कुछ उपाय भी बन पड़ता है। युद्धकाल में राडार प्रभृति उपकरणों से शत्रु के आक्रामक वायुयानों का पता चलता है और उस आधार पर तत्काल रोकथाम का प्रबन्ध होता है। यह पूर्वाभास विज्ञान के विकसित स्वरूप का ही प्रतिफल है।

अदृश्य जगत के अन्तर्ग्रही प्रभावों और मानवी गतिविधियों से प्रभावित अदृश्य वातावरण से संबंधित ज्योतिर्विज्ञान की तरह ही प्रत्यक्ष जगत की परिस्थितियों पर अवलम्बित सम्भावना विज्ञान भी है। इसी आधार पर विकास की योजना बनती है और रोकथाम के कार्यक्रम बनते हैं। यदि अनुमानों में कोई तथ्य न रहा तो भविष्य निर्धारण की दृष्टि से कोई महत्वपूर्ण कदम उठ ही नहीं सकता था। अनिश्चितता की स्थिति में दवा लगाना तो मात्र जुआरी सट्टेबाजों का ही काम है। बुद्धिमत्ता की यह विशेषता है कि वह भूत से शिक्षा ग्रहण करती- वर्तमान का विवेचन, विश्लेषण करती और भविष्य का ऐसा अनुमान लगाती है जो सत्य और तथ्य के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटता है। भविष्य की योजनाओं का सारा ढाँचा इसी आधार पर खड़ा किया जाता है। संसार के राजनेता, अर्थ शास्त्री, समाज संचालक, विज्ञान वेत्ता, बुद्धिजीवी प्रायः इन्हीं पूर्वानुमानों का महत्व स्वीकारते हुए भी भावी प्रयासों की रूपरेखा विनिर्मित करते हैं। इसी वर्ग में मौसम विज्ञानियों एवं अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को भी गिना जा सकता है।

भविष्य चिन्तन एवं भविष्य वक्ता वर्ग में, खगोलवेत्ता ज्योतिषी- अदृश्य जगत के पर्यवेक्षण अध्यात्म तत्वदर्शी तथा तथ्यों के सूक्ष्म विवेचन बुद्धिजीवी दूरदर्शी यह तीन वर्ग प्रमुख हैं। इनकी निर्धारणाओं एवं घोषणाओं पर बहुत कुछ विश्वास भी किया जाता है। लोग तद्नुरूप अपनी भावी योजनाएँ बनाने में भी संलग्न होते हैं। इतने पर भी इस मूलभूत मान्यता पर विश्वास किया जाता है कि सम्भावनाओं का अनुमान अटल या अकाट्य नहीं है। उनमें परिस्थिति वश भी हेर-फेर हो सकता है और मानवी पुरुषार्थ से उसमें असाधारण उलट-पुलट होने की भी सम्भावना हो सकती है। भूलते भटकते वे लोग हैं जो भविष्य अनुमान को, कथन को, अकाट्य मान बैठते हैं। इस भ्रम-जंजाल के कारण ही लोग निराश होते पाये जाते हैं अथवा किसी अप्रत्याशित लाभ की कल्पना करते हुए आकाश से सोना बरसने जैसी कल्पना करते रहते हैं। शेख-चिल्ली को ऐसा ही चिन्तन अपनाने पर उपहासास्पद बनना पड़ा था। उत्तम भविष्य की सम्भावना का फलित होना भी बरते गये पराक्रम पर निर्भर है। इसी प्रकार अनिष्ट का निराकरण भी प्रयत्न परायणता पर बहुत कुछ निर्भर है। सम्भावनाओं का अनुमान कितना ही सही क्यों न हो उनका निर्धारण किन्हीं के द्वारा भी क्यों न किया गया हो। समझा जाना चाहिए कि उनके साथ मानवी पराक्रम की शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है। पत्थर की लकीर यहाँ कुछ भी नहीं है।

विशेषज्ञ विलक्षणों के कितने ही निर्धारणों में पिछले दिनों भारी परिवर्तन सम्भव हो सके। अनिष्ट टल गये और सुयोग के अकल्पनीय अवसर उपलब्ध हुए। इस प्रकार पूर्व निर्धारणों के बदल जाने में उन भविष्य वक्ताओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उन दिनों परिस्थितियाँ ठीक वैसी ही थीं जैसी कि बताई गईं। किन्तु समय रहते लोग चेते- अभीष्ट हेर-फेर में प्राणपण से जुटे और सम्भावना के साथ जूझते हुए अन्ततः उसे बदलकर ही रहे। इस प्रकार वे भविष्य वाणियां यथावत् घटित न होने पर भी पूर्व सूचना देने के रूप में अतीव उपयोगी ही सिद्ध हुईं। यदि वह कथन सामने न होता तो बेखबर लोग गफलत में भी पड़े रहते और उसी विपत्ति में पिस मरते जो दूरदर्शियों ने सम्भावनाओं के रूप में व्यक्त की थीं। इस प्रकार वे भविष्य वाणियां गलत सिद्ध होने पर भी वस्तुतः सही सिद्ध होने की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण समझी गई।

अंक शास्त्रियों ने धरती की उर्वरता, बढ़ती हुई जनसंख्या और वर्षा असन्तुलन का विवेचन करते हुए इन दिनों भयंकर खाद्य संकट उत्पन्न होने की भविष्यवाणियां की थीं। पर वैसा कुछ हुआ नहीं। क्योंकि उस चेतावनी को गम्भीरतापूर्वक लिया गया है और उत्पादन के लिए भूमि बढ़ाने से लेकर खाद-पानी के नये आधार ढूंढ़ निकालने के अप्रत्याशित प्रयत्न किये। फलतः खाद्य संकट टल गया और स्थिति ऐसी न बनी जिसके कारण दुर्भिक्ष पड़ने- भूखों मरने का त्रास सहना पड़ता।

विश्व क मूर्धन्य तथ्यान्वेषी विचारकों में से प्रमुख लेस्टर ब्राऊन, पाल एलिच एवं हार्डिन ने एक स्वर से उन 16 वर्षों में निर्वाह साधनों की कमी की दृष्टी से अत्यधिक भयंकर घोषित किया था जो इस वर्ष समाप्त हो गये। ऐसी दशा में मोटी दृष्टि से उन कथनों का उपहास उड़ाया और असत्य ठहराया जा सकता है। इतने पर भी सचाई अपनी जगह पर अडिग है। यदि रोकथाम के असाधारण प्रयत्न न चले होते तो विलक्षणों के अनुसार यह विपत्ति निश्चित रूप से उतरती जिसे चेतावनी के रूप में प्रकट किया गया था।

सन् 1600 में इंग्लैण्ड के अंक शास्त्रियों ने जलाऊ लकड़ी का भयंकर अभाव होने की घोषणा की थी और इस कारण उस देश की जनता तथा सरकार बुरी तरह भयभीत हो उठी। पर समय आने पर वह संकट टल गया। क्योंकि कोयले का नया विकल्प खोज लिया गया। अतएव न घरेलू ऊर्जा की कमी पड़ी और न ईंधन के अभाव में कारखाने बन्द हो जाने कि विपत्ति टूटी। अठारहवीं सदी में भी इंग्लैण्ड के प्रख्यात अर्थशास्त्री और उच्च पदासीन तथ्यान्वेषी विलियम स्टैनली जीवेन्स ने ऊर्जा संकट की नये सिरे से घोषणा की थी और देश में उद्योग अवरोध आने की आशंका व्यक्त की थी। उस चेतावनी की गम्भीरता को देखते हुए इंग्लैण्ड ने महत्वपूर्ण के क्षेत्रों पर पैर पसारे और वहाँ से खनिज तेलों के दोहन का नया आधार हस्तगत कर लिया। अब आशंका के विपरीत इंग्लैण्ड न केवल अपनी ईंधन आवश्यकता पूरी करता है वरन् तेल और कोयले का निर्यात भी करता है। जीवेन्स का कथन असत्य सिद्ध होने पर भी उन्हें किसी ने झूठा नहीं ठहराया। वरन् संकट की सामयिक चेतावनी देने और साथ ही उससे उबरने का उपाय बताने के लिए उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा ही की गई।

सन् 1880 में जनसंख्या वृद्धि और सस्ते मछली तेल की कमी से तेल संकट इंग्लैण्ड के सामने आया। वह तेल महंगा हो जाने से घरों में अन्धेरा रहने की आशंका व्यक्त की गई। विशेषज्ञों की उस चेतावनी से कोई घबराया नहीं वरन् दूसरे तेलों के उत्पादन का एक नया माहौल बना। फलतः अलसी, अरंडी, सरसों, तिल आदि का उत्पाद तो अत्यधिक मात्रा में किया ही गया इसके अतिरिक्त देवदारु, चीड़ जैसे पेड़ों से भी तेल निकाला जाने लगा। यहाँ तक कि ऐसे चट्टान खोज निकाले गये जिनसे केरोसिन आयल निकला। आज मिट्टी के तेल का सर्वत्र प्रचलन है इस खोज का श्रेय व्हेल मछली का तेल न मिलने की संकट चेतावनी के साथ जोड़ा जा सकता है।

सन् 1973 में विशेषज्ञों ने यह तथ्य उजागर किया था कि खनिज तेल की समाप्ति सन्निकट है। पैट्रोल पम्प सूखे पड़े होंगे। पेट्रोल अत्यधिक महंगा होने पर भी सीमित मात्रा में ही मिलेगा। इस घोषणा से अन्य सभी तो चिन्तित थे, पर बड़े व्यापारियों ने पेट्रोल महंगा होने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए तेल कुओं के साथ लम्बे अनुबन्ध कर लिए। बाद में जब समुद्रों और रेगिस्तानों से तेल निकाला जाने लगा तो संकट टल गया। पेट्रोल की कमी न पड़ी और अनुबन्ध करने वाले व्यापारी दिवालिया हो गये।

अमेरिका में यह चर्चा बहुत दिनों तक व्यवसायी वर्ग में होती रही कि अगले दिनों खाद्यान्न की कमी पड़ेगी और उस विश्व संकट से वह देश अनेक प्रकार के लाभ उठा सकेगा, पर समय की कसौटी पर वह बात खरी नहीं उतरी। सर्वत्र खाद्यान्न अधिक उत्पादन की सतर्कता बढ़ी फलतः अनाज और भी अधिक सस्ते हो गये। इस संदर्भ में सन् 1967 में प्रकाशित पाल पैड काक की पुस्तक ‘फैमाइन 1975’ बहुचर्चित रही जिसमें इस अवधि से संसार भर में भयंकर अकाल पड़ने और करोड़ों अरबों के भूख से मरने की सम्भावना व्यक्ति की गई थी। ऐसी ही एक पुस्तक 1968 में प्रकाशित पाल एर्लिच की ‘पाप्युलेशन बाम्ब’ है जिसमें दो दशकों के अंतर्गत जनसंख्या इतनी बढ़ जाने की बात कही गई थी कि मानवी निर्वाह साधनों में भयंकर संकट उत्पन्न होगा और लोग मक्खियों की मौत मरेंगे। किन्तु समय की कसौटी पर वह आशंका भी सही सिद्ध नहीं हुई। जनसंख्या की बढ़ोतरी पर मनुष्य द्वारा तथा प्रकृति द्वारा कितने ही अंकुश लगे और जितनी बढ़ोतरी हुई वह परिस्थिति में खप गई। सन् 1971 से 1980 के बीच खाद्यान्न की भारी कमी रहने की घोषणाएं विश्व के मूर्धन्य विशेषज्ञों ने की थी पर वे सभी गलत सिद्ध हुई। इस अवधि में उत्पादन पहले की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में हुआ। इस प्रकार लेस्टर ब्राउन की “सस्टेनेबल मोसायटी” घोषणा एक प्रकार से असत्य ही सिद्ध हुई। बाद में इन्हीं लेखक महोदय ने “सीड्स आफ चैलेंज” ग्रन्थ में यह बताया कि पूर्व घोषित भविष्य कथन क्यों असत्य सिद्ध हुआ।

पाल एलिंच ने कुछ भयंकर कथन अगणित तथ्यों की साक्षी देते हुए घोषित किये थे। उनमें उनने निकट भविष्य में, अकाल, महामारी, युद्ध के अतिरिक्त समुद्र सूखने, मछलियों की कमी पड़ने और 50 मिलियन मनुष्यों के भूखों मरने की सम्भावना व्यक्त की थी। घोषित समय निकल गया। सन् 1980 तक इन संकटों में से एक भी भयावह स्तर का नहीं उभरा। इस प्रकार दावे के साथ किये गये- सप्रमाण भविष्य कथन असत्य सिद्ध होते रहे हैं।

युग सन्धि के इन बीस वर्षों के सम्बन्ध में कितने ही दिव्यदर्शियों, महामनीषियों द्वारा ऐसी भविष्यवाणियां की जाती रही हैं। धर्मशास्त्रों, आप्त पुरुषों, दिव्यदर्शियों महामनीषियों ने एक स्वर से इस अवधि में अनेकानेक संकटों की संभावनाएं व्यक्त की हैं। कारण गिनाते और प्रतिफलों की संगति बिठाने पर वे कथन हर दृष्टि से तथ्य पूर्ण भी दीखते हैं। इतने पर भी यह नहीं मान बैठना चाहिए कि जो कहा गया है वह पत्थर की लकीर है और उसे टाला या बदला नहीं जा सकता। मानवी पराक्रम इस संसार में सर्वोपरि है। वह किन्हीं भी भली-बुरी सम्भावनाओं को बदलने में समर्थ है। वह राम का सिंहासनारूढ़ होने के स्थान पर वनवास भी भिजवा सकता है। कैकयी और मन्थरा की दुरुभि सन्धि ने वातावरण उलट दिया। इसी प्रकार हनुमान ने वह कर दिखाया जिसे असम्भव के स्थान पर सम्भव की स्थापना कहा जा सकता है।

भूतकाल में अवतारी महामानवों ने वह कर दिखाया जिसे सामान्य दृष्टि से अप्रत्याशित और असम्भव ही समझा जाता था। इस बार भी ऐसा हो सकता है। युग सन्धि की बेला में जहाँ एक ओर विनाश विभीषिकाएं सामने हैं वहाँ दूसरी ओर सतयुग की वापसी वाले युग परिवर्तन की- उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना भी विद्यमान है। निराशा की कोई आवश्यकता नहीं। संसार की कोई भली-बुरी सम्भावना या परिस्थिति ऐसी नहीं है जिसे मानवी पराक्रम सुधार कर बदल न सके।

विनाश के आसुरी तत्व जहाँ इन दिनों अपना मरण देखकर विभीषिकाएँ उत्पन्न करने में कमी नहीं रहने दे रहे हैं वह देवत्व की तत्परता शान्ति और प्रगति की स्थापना के लिए भी कम नहीं है। हमें निराश के अन्धकार में भी प्रगति की स्वर्णिम किरणों का सपना संजोना चाहिए और उसे फलित होने के लिए सृजनात्मक पराक्रम का पूरा-पूरा उपयोग करना चाहिए।


जेब में कुछ न निकला (kahani)

भिखारी ने हाथ आगे बढ़ाया पर जेब में कुछ न निकला। अश्वपति कुछ दुःखी से होकर घर गये और एक बर्तन उठाकर ले आये और भिखारी को दे दिया।

थोड़ी देर में अश्वपति की पत्नी आई और वह बर्तन न पाकर चिल्लाई अरे चाँदी का बर्तन भिखारी को दे दिया, दौड़ो-दौड़ो उसे वापस लेकर आओ।

अश्वपति ने आगे बढ़कर भिखारी को रोककर कहा- भाई! मेरी पत्नी ने बताया है कि यह गिलास चाँदी का है। उसे सस्ता मत बेच देना।

एक पड़ौसी ने पूछा- अश्वपति! जब तुम्हें पता हो गया था कि गिलास चाँदी का है तो भी उसे गिलास क्यों ले जाने दिया।

अश्वपति ने हँसकर कहा- मन को इस बात का अभ्यास कराने के लिए कि वह बड़ी से बड़ी हानि से भी दुःखी और निराश न हो।


मानवी मन एक जादूगर, विचित्र चित्रकार

परामनोविज्ञान मानवी मस्तिष्क की विलक्षणताओं को दैवी नहीं मानता वरन् यह प्रतिपादित करता है कि ये विभूतियां मनःसंस्थान के प्रसुप्त केंद्रों को जागृति से उत्पन्न होती हैं। उन्हें जगाने भर से मनुष्य इस स्तर की विशिष्टता प्राप्त कर सकता है जिसे आज की तुलना में विलक्षण कहा जा सके।

आमतौर से मनुष्य बाहर देखता और बाहर की बातों पर सोचता है। खोजता और चाहता भी वह है जो अपने आपे से बाहर है किन्तु यदि आत्म सत्ता केंद्रीय भूत ईश्वर प्रदत्त दिव्य सामर्थ्यों के भाण्डागार को देखा खोजा जा सके तो प्रतीत होगा कि जो बाहर है उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में भीतर विद्यमान है सुख साधन प्रायः बाहर ही सोचे और खोजे जाते हैं। यदि थोड़ा पीछे मुड़कर थोड़ा गहरे उतर कर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि अपने उपयोग की अपनी प्रसन्नता सुविधा और प्रगतिशीलता में सहायक सिद्ध होने वाली सामग्री प्रचुर परिमाण में अपने भीतर ही मौजूद है।

बहिर्जगत में अपने ढंग की शान्ति और सम्पन्नता विद्यमान है। उपयोगिता उसकी भी है पर यह नहीं सोचा जाना चाहिए हम खाली घड़े की तरह हैं। अपना आन्तरिक वैभव इतना प्रचुर और महत्वपूर्ण है कि यदि उसे खोजा संजोया और समेटा जा सके तो प्रतीत होगा कि तृप्ति तुष्टि और शान्ति के साधन भीतर खोजे जाने चाहिए। बाहरी साधन तो उसका शृंगार भर करते हैं। वास्तविक क्षमताएँ और सम्पन्नता तो भीतर ही खोजनी उभारनी पड़ती है।

अपना सुधार परिष्कार अपने प्रयत्नों से किया जा सकता है। साधन, स्वाध्याय सत्संग आदि के सहारे यह कार्य सम्पन्न होते देखे जाते हैं। किन्तु यदि मस्तिष्कीय संरचना के मूल स्रोतों तक दबाव डालना और उनका परिवर्तन परिष्कार करने वाला वैधानिक उपाय उपचार काम में लाया जाय तो जड़ सींचने का प्रयत्न पूरा हो सकता है। मानसिक क्षमता सम्पन्नता से शिक्षात्मक उपाय ही आमतौर से काम में लाये जाते हैं। इन्हें पत्रों द्वारा हमसे साँस ग्रहण करने की तरह समझा जा सकता है किन्तु बड़ा काम जड़ों को खाद पानी उपलब्ध कराना है। मनःसंस्थान भी गहन संरचना को प्रभावित करने वाली कार्य पद्धति को बहिरंग शिक्षा दीक्षा से कम नहीं अधिक मूल्यवान, महत्वपूर्ण ही माना जाना चाहिए।

फ्रांसीसी वैज्ञानिक प्रो. देल्गादो ने कभी यह सम्भावना प्रकट की थी कि नसों में रक्त चढ़ाने की तरह मस्तिष्क में इच्छानुकूल आदतों का प्रवेश भी कराया जा सकता है और इससे दुष्प्रवृत्तियों के स्थान पर सत्प्रवृत्तियां आरोपित की जा सकने में सहायता व सुगमता मिलेगी। मालूम नहीं उनकी इस उक्ति में कितना दम था। इस संदर्भ में मस्तिष्क के उस केन्द्र की खोजबीन भी की गयी जहां गहरी दबी स्मृतियां प्रसुप्त पड़ी रहती हैं। कनाडा के न्यूरोलॉजिस्ट डा. डब्लू. जी. पेन फील्ड ने तो ऐसे इलेक्ट्रोड भी खोज निकाले थे जिनका विशेष कोशिकाओं से सम्बन्ध करने पर अतीत की घटित घटनाएं विवाद, संवाद चर्चा, परिचर्चा ऐसी प्रतीत होती थी जैसे अभी तत्काल सम्पन्न हो रही हैं। इसी आधार पर बीसवीं सदी के वैज्ञानिकों को मस्तिष्क का नक्शा बनाने, केंद्रों का निर्धारण करने में काफी कुछ मदद मिली।

मस्तिष्क रसायनों पर शोध करने वाले विशेषज्ञ डॉ. कैमरान के अनुसार मस्तिष्कीय कणों का मध्यवर्ती न्यूक्लिक एसिड इस विद्युत संवेग का उत्पादन एवं नियंत्रणकर्ता है। रासायनिक बैटरी की तरह यह एसिड ही मस्तिष्क में विभिन्न स्तर के संवेदन संवेग उत्पन्न करता है। इस प्रक्रिया से विभिन्न न्यूरोह्यूमरल सिक्रीशन यया “एनकेफेलिन, “एण्डोरफिन्स, “सिसेटेनिन, गाबा आदि का रसस्राव होता है व यही समुदाय सारी क्रियाओं का निर्धारण करता है। मस्तिष्क को रीढ़ की हड्डी से जोड़ने वाले रेटिक्युलर फार्मेशन की हरकतों को समझना और उसे प्रभावित करना जब जितनी मात्रा में संभव होता चला जायेगा, उसी अनुपात से मनुष्य कृत्रिम रीति से हर्ष शोक की अनुभूतियों से आच्छादित किया जा सकेगा।, ऐसा विभिन्न वैज्ञानिकों का कथन है।

वैज्ञानिकों का कथन है कि न्यूरोन्स की सिनेप्टिक हलचलों में हेर-फेर करके भी मानसिक स्तर का हेर-फेर किया जा सकता है। इसके लिए नियत स्थान पर उपयुक्त मात्रा में विद्युत प्रवाह पहुँचा देने का कौशल हाथ में आ जाने से बहुत काम चल सकता है। यहाँ तक कि मानसिक संरचना, भावुकताजन्य रोग, द्विमुखी व्यक्तित्व, तक को बदला जा सकना संभव है।

एक शोध के अनुसार रिवोन्यूक्लिक एसिड (आर. एन. ए.) नामक रसायन मस्तिष्कीय चेतना का आधार स्तम्भ ठहराया गया है। स्वीडन के डा. हाल्गर हाइडन के प्रयोगों में इस रसायन की मात्रा विभिन्न चेतना परतों में घटा बढ़ाकर प्राणियों के सोचने के तरीके को बदलने में अच्छी सफलता प्राप्त हुई है।

इस सदी के पूर्वार्ध में जीवशास्त्री जेम्स ओल्डस ने चूहों के मस्तिष्क पर आँशिक नियंत्रण प्रक्रिया खोज निकाली थी। इससे उन्हें बिल्लियों का भय जाता रहा और वे बिल्ली की पीठ पर बच्चों की तरह कुलाचें भरते और अपना हितैषी समझते थे।

डा. डी. एलबर्ट ने चूहों की ऐसी जाति पैदा करने में सफलता प्राप्त की जिनकी रूप, रंग, आकृति तो वैसी ही थी किन्तु प्रकृति भिन्न थी। डा. राबर्ट थामसन ने तिलचट्टों पर प्रयोग किये एवं रेडियो संकेतों से उन्हें मन चाहे अनुसार कराया गया। उनका कथन है कि यही प्रयोग मनुष्यों पर भी संभव है।

अध्यात्म क्षेत्र के सूक्ष्म शरीर को ऋषि प्रतिपादित अलौकिक ऋद्धि सिद्धियों की चर्चा यहाँ नहीं हो रही है। मनःशास्त्र की संरचना और उसमें सन्निहित सम्भावनाओं में से जितना अंश प्रामाणिक पाया गया है उसे विज्ञानवेत्ताओं ने मैटाफिजिक्स की परिधि में बाँधा है और उस क्षेत्र को जिन सम्भावनाओं को अनुसंधान का विषय माना है, वे भी कम चमत्कारी नहीं हैं। यदि मनुष्य प्रयत्नपूर्वक इस अन्तरंग रत्न राशि की खोज, खाद, और संग्रह कर सके तो उसका सदुपयोग निश्चित रूप से उसे असामान्य महामानवों की श्रेणी में खड़ा कर सकता है।

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने क्षमताएँ खोजी हैं, वे उन्हें चार वर्गों में विभक्त करते हैं- (1) क्लेयर आयेन्स (परोक्ष दर्शन) अर्थात् वस्तुओं या घटनाओं की वह जानकारी जो ज्ञान प्राप्ति के सामान्य आधारों के बिना ही उपलब्ध हो जायें। (2) प्रीकाग्नीशन (भविष्य ज्ञान) बिना किसी मान्य आधार के भविष्य की घटनाओं का ज्ञान (3) रेट्रोकाग्नीशन (भूतकालिक ज्ञान) बिना किन्हीं मान्य-साधनों से अविज्ञात भूतकालीन घटनाओं की जानकारी। (4) टेलीपैथी (विचार-सम्प्रेषण) बिना किसी आधार या यन्त्र के अपने विचार दूसरों के पास पहुंचाना तथा दूसरों के विचार ग्रहण करना। इस वर्गीकरण को और भी अधिक विस्तृत किया जाय तो उन्हें 11 प्रकार की गतिविधियों में बाटा जा सकता है। इनका स्थूल वर्गीकरण इस प्रकार है। (1) बिना किन्हीं ज्ञातव्य साधनों के सुदूर स्थानों में घटित घटनाओं की जानकारी मिलना। (2) एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की मनःस्थिति तथा परिस्थिति का ज्ञान होना। (3) भविष्य में घटने वाली घटनाओं का बहुत समय पहले पूर्वाभास। (4) मृतात्माओं के क्रिया-कलाप जिससे उनके अस्तित्व का प्रत्यक्ष परिचय मिलता हो। (5) पुनर्जन्म की वह घटनायें जो किन्हीं बच्चों, किशोरों या व्यक्तियों द्वारा बिना सिखाये समझाये बताई जाति हों और उनका उपलब्ध तथ्यों से मेल खाता हो। (6) किसी व्यक्ति द्वारा अनायास ही अपना ज्ञान तथा अनुभव इस प्रकार व्यक्त करना जो उसके अपने व्यक्तित्व और क्षमता से भिन्न और उच्च श्रेणी का हो। (7) शरीरों में अनायास ही उभरने वाली ऐसी शक्ति जो संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती हो। (8) ऐसा प्रचण्ड मनोबल जो असाधारण दुस्साहस के कार्य विनोद की साधारण स्थिति में कर गुजरे और अपनी तत्परता के अद्भुत पराक्रम कर दिखाये। (9) अदृश्य आत्माओं के संपर्क से असाधारण सहयोग सहायता प्राप्त करना। (10) शाप और वरदान जिससे दीर्घकाल तक व्यक्तियों व वस्तुओं पर प्रभाव बना रहता है। (11) परकाया प्रवेश या एक आत्मा में अन्य आत्मा का सामयिक प्रवेश।

इन क्षमताओं को अर्जित करने में अपना बल वैभव तो बढ़ता ही है। साथ ही दूसरों का हित साधन बन पड़ने की सम्भावना भी बहुत है। दृष्टिकोण और जीवन प्रवाह बदल देना, कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाकर महानता के मार्ग पर धकेल देना इतना बड़ा काम है कि उसे वास्तविक कायाकल्प की संज्ञा दी जा सकती है। जरा जीर्ण शरीर को नये यौवन में बदल देना सामयिक सुविधा की दृष्टि से सभी को प्रिय लगेगा किन्तु यदि गहराई में उतर कर देखा जाय तो व्यक्तित्व की पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों से बचकर महानता के स्वर्ग लोक तक उछला जा सके तो उसे सर्वोत्कृष्ट स्तर का का परमार्थ कहा जायगा।

यह उच्चस्तरीय सेवा सहायता की बात हुए। साधारण जीवन क्षेत्र में शारीरिक और मानसिक आदि व्याधियों का ऐसा दौर छाया रहता है कि उनका दबाव भी कम कष्टकारक कम अधिक सिद्ध नहीं होता। बढ़ी हुई आन्तरिक क्षमता के सहारे इस प्रकरण की रुग्णताओं से अनेकों को मुक्ति दिलाई जा सकती है। अहसान उपकार अपने साथ में एक उच्चस्तरीय चिकित्सा शास्त्र है।

अमेरिका में कैन्टुकी नगर के पास एक छोटे से गाँव में एडगर केसी नाम का युवक बीमार पड़। उसकी माँस पेशियों में जकड़न और दर्द उठा तो बढ़ता ही गया। कैन्टुकी से योग्य डाक्टर बुलाए गये वे रोग का निदान भी न कर पाये तो दवा कहाँ से देते। अतः डाक्टर परामर्श कर ही रहे थे कि सहसा एडगर ने आंखें खोलीं और डाक्टरों को रोग का नाम तथा औषधियों के मरहम के सभी के नाम पते बता दिये। एडगर ने जिस भाषा में औषधियों के नाम बताए थे वह विशुद्ध लैटिन भाषा थी किन्तु एडगर तो निपट ग्रामीण था वह लैटिन का एक शब्द भी नहीं जानता था। किन्तु कुछ दिन के उपरान्त यह आश्चर्य भरी घटना शान्त हो गई। केसी ठीक हो गया। किन्तु पुनः कुछ दिनों के बाद एडगर का मित्र बीमार पड़ा। डाक्टर बुलाए गये। इस बार भी डाक्टरों के समक्ष चमत्कार हुआ। एडगर वहीं था कुछ देर तड़ित तन्द्रा में चला गया और लैटिन में डाक्टरों को जो कुछ बताया वह रोग और निदान औषधि और पथ्य सब कुछ सही और पूर्ण था। इस पर डाक्टरों को आश्चर्य बढ़ा और ख्याति फैलने से एडगर के समक्ष असाध्य रोगियों को लाया जाने लगा।

ब्राजील का “एरिगो” नामक एक प्रसिद्ध चिकित्सक हुआ है जो ऐसी ही प्रक्रियाओं द्वारा चिकित्सा उपचार करता था। मिश्र के प्राचीन शिला-चित्रों में रोगियों के पेट पर एक हाथ तथा पीठ पर दूसरा हाथ रखे हुए चिकित्सक दर्शाए गये हैं। वहाँ के साहित्य में भी प्राण चिकित्सा का उल्लेख मिलता है, कि सन्त पैट्रिक ने आयरलैण्ड के एक अन्धे के आँख पर हाथ रखकर उसे नेत्र-ज्योति दी थी। सन्त-वर्नाड के विषय में भी कहा जाता है कि उन्होंने एक दिन में ही 10 अंधों और 12 अपाहिजों को अच्छा कर दिया था।

सत्रहवीं सदी में लन्दन के लेन्हर्ट नामक एक माली को अंगुलियों से छूकर रोग विमुक्त करने में अद्भुत ख्याति मिली। उन्नीसवीं सदी के आरम्भ से सिलसिया के केरिचर नामक चौकीदार ने हजारों रोगियों को अपने स्पर्श मात्र से आरोग्य प्रदान करने में सफलता पायी। प्राचीन यूनानी वैद्य प्राण चिकित्सा के लिए प्रख्यात रहे हैं।

वस्तुतः ये समस्त विभूतियाँ लगती असाधारण हैं, लेकिन उद्भूत उसी मस्तिष्क से होती हैं जो दैनन्दिन जीवन में काम करता दीख पड़ता है। इनके प्रसुप्त स्थिति में पड़े होने से, अपनी ही विलक्षणताओं की जानकारी न होने से बहुसंख्य व्यक्ति साधारण जीवन जीकर किसी तरह निर्वाह पूरा करते देखे जाते हैं। योग साधन का राज मार्ग ऐसा है जो एक सुनिश्चित दिशाधारा मनुष्य को समझाता है ताकि प्रसुप्त भाण्डागार की रत्न राशि से लाभान्वित हुआ जा सके। इसकी खोज हेतु पाश्चात्य देशों के जिज्ञासु भारत आकर पूर्वार्त्त दर्शन को समझने का प्रयास करते देखें जा सकते हैं। लेकिन चमत्कारों तुर्तफुर्त सिद्धि मिलने के जंजाल में उलझा भारतीय जनमानस उनसे अनजान ही नजर आता है। यदि आत्मजाग्रति की चेतना क्रियाशील बनाई जा सके तो इस काया रूपी प्रयोग शाला से ही बहुमूल्य उपलब्धियाँ हस्तगत की जा सकती हैं।


दान बड़ा या ज्ञान

श्रद्धाँजलि पक्ष चल रहा था। धर्म चक्र प्रवर्तन की बढ़ी हुई आवश्यकता का अनुमान करते हुए बुद्ध के सभी शिष्य अपने-अपने अनुदान प्रस्तुत कर रहे थे।

जमा राशि का लेखा जोखा लिया गया। किसका धन सबसे अधिक है। इस की प्रशंसा सुनने के लिए सभी उत्सुक थे। विम्बसार की राशि सबसे अधिक थी।

चर्चा गोष्ठी में बुद्ध ने एक वृद्धा का सौंपा हुआ जल पात्र हाथ में उठाया और कहा- यह इस वर्ष का सबसे बढ़ा अनुदान है। वृद्धा के पास जो कुछ था वह उसने सभी सौंप दिया अब उसके पास तन के कपड़े और मिट्टी के पात्र ही शेष हैं। जबकि औरों ने अपनी सम्पदा के थोड़े-थोड़े अंश ही प्रस्तुत किये हैं।

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विवाद यह चल रहा था कि दान बड़ा या ज्ञान। दान के पक्षधर थे वाजिश्रवा और ज्ञान के समर्थक थे याज्ञवल्क्य। निर्णय हो नहीं पा रहा था। दोनों प्रजापति के पास पहुंचे। वे बहुत व्यस्त थे सो निर्णय करने के लिए शेष जी के पास भेज दिया।

दोनों ने अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत किये। शेष जी ने कहा मैं बहुत थक गया हूँ। सिर पर रक्खा पृथ्वी का बोझ बहुत समय से लदा है। थोड़ी राहत पाऊं तो विचार पूर्वक निर्णय करूं। आप में से कोई एक आगे आये और एक घड़ी मेरे बोझ को अपने सिर पर रख ले। इसी बीच निर्णय हो जायगा। वाजिश्रवा आगे आये। अपनी दानशीलता को दाव पर लगाकर उनने धरती का बोझ अपने सिर पर रखने का प्रयत्न किया पर वे उसमें तनिक भी सफल न हुए।

याज्ञवल्क्य को आगे आना ही पड़ा उनने अपने ज्ञानबल का प्रयोग किया और देखते-देखते भूभार कँधों पर उठा लिया।

निर्णय हो गया। शेष भगवान बोले। ज्ञान बड़ा है। उस अकेले के बलबूते भी अपना और असंख्यों का उद्धार हो सकता है। जब कि दान अविवेकपूर्वक दिया जाने पर कुपात्रों के हाथ पहुँच सकता है और पुण्य के स्थान पर पाप बन सकता है।

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समुद्र में बहुत पानी था। सो पथिक अधिक लाभ की आशा से उसके तट पर पहुँचा। किन्तु अंजलि होठों तक ले जाते ही देखा- वह तो बहुत खारी है। प्यासा लौट गया।

कुछ दूर एक छोटी नदी थी जल पिया तो पाया मीठा और ठण्डा जल।

बड़े के पास खारी, छोटे के पास मीठा। इस भेद को समझने के लिए उसने बुद्धि दौड़ाई।

नियति ने कहा- जो बाँटते हैं उनकी मिठास सराही जाती है। जो समेटते हैं वे बड़े होने पर भी भर्त्सना सहते हैं।


बहुत धन था (kahani)

एक कंजूस के पास बहुत धन था। उसने उसे जमीन में गाड़ रखा था। किसी प्रकार चोरों ने उसका पता लगा लिया और अवसर पाकर उसे खोद ले गये।

कंजूस ने यह देखा तो वह दहाड़ मार कर रोने लगा। पड़ौसी भी कौतूहल वश इकट्ठे हो गये। कारण विदित होने पर छोटे लड़के ने कहा लाला जी वह धन न आपके किसी काम आ रहा था और न किसी और के। निरर्थक पड़े रहने की अपेक्षा यदि वह चोर के काम आने लगा तो क्या हर्ज हुआ।

बच्चों की बात का हल्का सा समर्थन खड़े हुए अन्य लोगों ने भी किया और एक बूढ़ा बोला- धन तभी तक धन है जब वह किसी उद्योग उपयोग में लगा रहे अन्यथा उसमें और कूड़े करकट में क्या अन्तर।


काया का अद्भुत अविज्ञात चेतन एवं संसार

अनुसंधानकर्ताओं के अनेकानेक विषयों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं रोचक विषय रहा है- मनुष्य की काया। जब से आधुनिक विज्ञान का जन्म हुआ तब ही से शरीर शास्त्रियों से लेकर शरीर क्रिया विज्ञानियों एवं मनोवैज्ञानिकों से लेकर दार्शनिकगण अपनी धारणाएँ बनाते आए हैं। यह विचार मंथन अभी पिछली कुछ शताब्दियों से आरम्भ हुआ हो, यह सत्य नहीं। यह तो अनादिकाल से चली आ रही आत्मानुसन्धान की प्रक्रिया है, जिसके प्रवर्तकों में हम बड़ी प्रसन्नता से ऋषिगणों का- आप्त वचनों के निर्धारकों का नाम लिख सकते हैं।

आनुवाँशिकी पर शोधरत चिकित्सा शास्त्रियों एवं विकासवादियों के लिए यह एक मूल चुनौती रही कि जीवन का विकास कैसे हुआ? मनुष्य कहाँ से आया? व इस यात्रा का समापन बिन्दु कहाँ है? क्या जीवन के लिए उत्तरदायी कुछ रासायनिक घटकों के संश्लेषण द्वारा प्रयोगशाला में, मानव गढ़ने का ब्रह्मा जैसा पुरुषार्थ सम्भव है, इस सम्बन्ध में काफी ऊहापोह प्रारम्भ से ही चलता आया है, अगणित शोधकर्ताओं ने स्वयं को इस साधना में नियोजित किया भी है। लेकिन उपनिषद् एवं अन्यान्य आर्ष ग्रन्थ आत्मिकी सम्मत विकासवाद के आधार पर एक पूर्ण पुरुष के, सारी सुविधाओं एवं अवसरों को लेकर जन्मे सृष्टा के उत्तराधिकारी के रूप में मनुष्य का वर्णन करते हैं। उपनिषद्कार का कथन है- कि “ब्रह्म की पूर्णता से विश्व की पूर्णता आई। जो शेष रहा, वह भी पूर्ण है।” (ईशोपनिषद)। आगे ऋषि शिष्य से बार-बार कहता है-

“सत्य एषोऽणि मैतदात्यमिदं सर्वं। तत्सयँ स आत्मा तत्वमसि श्वेतकेतो॥” (छान्दोग्य)

अर्थात्- संसार की समस्त वस्तुओं का सूक्ष्म तत्व यह आत्मा है, वह सत्य है, वह आत्मा है और तू वह ही है, श्वेतकेतु।”

मात्र उसके अवतरण पर ही नहीं, मनुष्य की चेतना की संरचना एवं जड़ प्रकृति से बने काय-कलेवर पर भी आर्ष ग्रन्थ प्रकाश डालते हैं। उनके अनुसार मनुष्य सतत् प्रवाहित होने वाले गतिशील सूक्ष्म घटकों का समुच्चय है। ब्रह्मांडीय संरचना एवं मानव की संरचना में एकरूपता तथा कण-तरंग समुच्चय का आदान-प्रदान एक ऐसा वैज्ञानिक सत्य है जो मनुष्य रूपी पिण्ड में, लघु में, अणु में- ब्रह्मांड के, महान के, विभु के समाए होने का प्रतिपादन करते हैं।

मनुष्य का जो कुछ भी दृश्यमान रूप है, वही सब कुछ नहीं है। जो अदृश्य है, अगोचर है, इन्द्रियातीत है- वह और भी विलक्षण है। विद्युत्चुम्बकीय तरंगों एवं स्नायु रसायनों की ऐसी अविज्ञात दुनिया मानवी काया में विद्यमान है जिसका प्रकटीकरण उसे असामान्य बनाने की सामर्थ्य रखता है। आर्ष ग्रन्थों की मान्यताओं को एक ‘थ्योरम’ मानकर एक गणितज्ञ की तरह यदि हम विज्ञान के समीकरण द्वारा उसे हल करने का प्रयास करें तो सम्भवतः यह अधिक श्रेयस्कर होगा। पूर्वाग्रहों से मुक्ति हेतु, अन्तः सत्ता के रहस्यों पर से पर्दा हटाने के लिए इससे इतर तर्क सम्मत कोई और मार्ग है भी नहीं। ईशोपनिषद् का ग्यारहवाँ मन्त्र कहता है- “जो विद्या और अविद्या को एक साथ जानता है, वह अविद्या द्वारा मृत्यु को जीतता है और विद्या द्वारा अमृतत्व अनुभव करता है।” वस्तुतः अंतर्जगत से सम्बन्ध बनाये रखते हुए विज्ञान के अध्ययन की यही सही तकनीक है।

चर्चा मानवी अन्तराल के अदृश्य पक्ष की जानकारी के विषय में चल रही है जिसे एक प्रकार से चेतना का सूक्ष्मीकृत रूप भी कह सकते हैं। जीन्स एवं न्यूरोपेप्टाइड्स की खोज करने वाले विज्ञान-विशारदों ने कुछ सूक्ष्म रसायनों में मनुष्य के प्राण शरीर की संरचना को खोज निकाला है। उनका कथन है कि मानवी काया के लगभग सभी ऊतकों में अति सामर्थ्यशाली स्थायी विद्युत क्षेत्र पाया जाता है। ये विद्युत क्षेत्र मस्तिष्क में तंत्रिका कोशों को एवं सारे शरीर के स्नायु कोशों व जीवकोशों की झिल्लियों की संवेदनशीलता को प्रभावित कर काया को विद्युत्पुंज बना देते हैं। सारे क्रिया-कलाप इनकी उत्तेजना से उत्सर्जित होने वाले न्यूरोपेप्टाइड्स से संचालित होते हैं जिनकी मात्रा अत्यल्प होती है।

विद्युत संपदा से भरी-पूरी यह काया द्विधुरीय चुम्बक की भूमिका निभाती है जिसका उत्तरी ध्रुव मस्तिष्क में एवं दक्षिणी ध्रुव मूलाधार में अवस्थित होता है। वैज्ञानिकों का कथन है कि सृष्टा की कुछ विधि-व्यवस्था ऐसी है कि यह ध्रुवीकरण की प्रक्रिया जो कि ठीक पृथ्वी की भाँति होती है, उसी समय से शुरू हो जाती है जबकि उसका अस्तित्व मात्र एक कोशीय निषेचित डिम्बाणु के रूप में होता है। ध्रुवीकरण तत्पश्चाहीत् मायटोसिस मिओसिस विभाजन के माध्यम से भ्रूण के द्रुत विकास का कारण बनता है। जब बच्चा जन्म लेता है तो भी वह एक डाइपोल मैग्नेट होता है एवं सूक्ष्म छायाँकन द्वारा “हैलो” अर्थात् आभा मण्डल को मस्तिष्क एवं मूलाधार (मल-मूत्र छिद्रों का मध्य भाग ) के आस-पास घनीभूत देखा जा सकता है। बैटरी एक “इलेक्ट्रिक डापोल”, जिनके दोनों सिरों पर विपरीत गुणधर्मिता समुचित मात्रा में देखी जा सकती है। काया के सहस्रार रूपी मस्तिष्क स्थित तथा मूलाधार रूपी कुंडलिनी के निचले छोर पर स्थित तथा ध्रुव चेतन सत्ता के सशक्त केन्द्र माने जा सकते हैं, जिनसे सूक्ष्म जगत का सारा व्यापार चलता रहता है।

जीवन का जहाँ से आरम्भ होता है, उस एक कोशीय निषेचित डिम्बाणु के विषय में अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के डा. सेक्सटन बर्र ने अपनी एक पुस्तक “दी फील्ड्स आफ लाइफ” (जॉन विली- 1672) में लिखा है कि “इन कोशों के दोनों ध्रुवों के मध्य विद्युत विभव का जो अन्तर पाया जाता है व जिस कारण यह एक द्विध्रुवीय चुम्बक” (डाइपोल मैग्नेट) की भूमिका निभा पाता है, वह अकल्पनीय है। इतना विद्युत विभव इतने सूक्ष्म कण में होना यह बताता है कि काया विद्युत्पुँज है एवं भावी जीवन में भी उसकी सारी गतिविधियाँ उसी प्रकार संचालित होनी हैं।”

वे आगे लिखते हैं कि “शुक्राणु की संरचना में यह ध्रुवीकरण इतना स्पष्ट होता है फिर भी सामान्यतया उसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। शुक्राणु का सिर एक ध्रुव है जो नाभिक को धारण करता है एवं सूचना केन्द्र है। पूँछ दूसरा ध्रुव है जो सूचना को अपनी ऊर्जा द्वारा गन्तव्य स्थान तक पहुँचाता है। सूचना केन्द्र व ऊर्जा स्रोत रूपी ये ध्रुव ही अन्ततः जीवकोश में आर. एन. ए., डी. एन. ए. का रोल सम्भाल लेते हैं।”

“भ्रूण विकास की एवं उसके शरीर रूप में विकसित होने की सारी कुँजी सम्भवतः उन विद्युत धाराओं में छिपी पड़ी है जो निरन्तर विकसित हो रहे भ्रूण में दोनों ध्रुवों के बीच सतत् बहती रहती है।” “साइन्स” (अमेरिकन एसोशिएशन फार एडवाँसमेण्ट आफ साइन्स की शीर्ष पत्रिका) के मार्च 1981 के प्रथम अंक में डा. जीन मार्क्स अपना यह अभिमत व्यक्त करते हुए कहते हैं कि “प्रयोगशाला में सम्पन्न होनी वाली “इलेक्ट्रोफोरेसिस” प्रक्रिया की ही तरह सारे शरीर के समस्त जीवकोशों में यह विद्युत्धारा का प्रवाह जारी रहता है। यहाँ तक कि रक्त व अन्य रस द्रव्यों में परिभ्रमण करने वाले घुमक्कड़ कोश जो जीवनी शक्ति के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं एवं श्वेतकण भी विद्युत उत्तेजन से रस स्राव कर अपना कार्य करते देखे जा सकते हैं।”

सबसे अधिक कार्य इस क्षेत्र में हृदय के पेसमेकर एवं ‘कन्डक्टिंग टीथ्यू’ जिससे उसकी सारी पंपिंग गतिविधि संचालित होती है, पर हुआ है। उसके अतिरिक्त सुषुम्ना व साथ-साथ चलने वाली सिम्पेथेटिक एवं पैरा सिम्पेथेटिक गैंगलियानों की मण्डली में भी इस विद्युत लीला को सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से देखा जा सकता है। पाया गया है कि विद्युत आवेशधारी कैल्शियम के आयन्स का कोश (स्नायु अथवा गैंगलियान्स अथवा कण्डक्टिंग टीथ्यू) से बाहर आना-जाना ही विद्युत विभव पैदा करके कोश को एक विद्युत्चुम्बक बनाने की अहम् भूमिका निभाता है।

पृथ्वी के चुम्बकत्व की बल रेखाएँ ब्रह्मांड से आती व उत्तरी ध्रुव से प्रविष्ट हो दक्षिणी ध्रुव से बाहर निकल जाती हैं। ब्रह्मांडीय किरणों (कॉस्मिक रेज) का भी सर्वाधिक आदान-प्रदान पृथ्वी के ध्रुवों पर ही होता है। सौर किरणें जब विद्युत आवेश धारण कर सैकड़ों किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से पृथ्वी की ओर आती हैं तो उत्तरी ध्रुव पर ही उनका संग्रहण होता देखा जाता है जबकि दक्षिणी ध्रुव पर उनकी दिशा पृथ्वी से बाहर जाती हुई दृष्टिगोचर होती है। दक्षिण ध्रुव पर ऊष्मा का सर्वाधिक उत्सर्जन होता देखा जाता है एवं उतरी ध्रुव पर संव्याप्त पर्यावरण प्रदूषण को बड़े अचम्भे से दक्षिणी ध्रुव पर एकत्र हुआ देखा जाता है मानो पृथ्वी ने उन्हें निष्कासित कर परे फेंक दिया हो। ये सारे उदाहरण उस ध्रुवीकरण को समझाने के लिए दिए जा रहे हैं जो सहज रूप में इस मानवी काया में संजोया रखा है। इसके क्रमशः विकसित होने एवं विद्युत चुम्बकत्व द्वारा हर जीवकोश में इसके संव्याप्त होने के प्रसंगोपरान्त इन दोनों ध्रुवों को भी समझ लिया जाय जिन्हें बहिरंग में आभा मण्डल के रूप में प्रकाशित हुआ बताया गया है।

सुषुम्ना नाड़ी (स्थाइनल कार्ड) शरीर की सबसे सामर्थ्यवान विद्युत्सम्पदा से भरी संरचना है जो मस्तिष्क के स्नायु प्रवाह को अंग-प्रत्यंग तक एवं ज्ञान तन्तुओं से मस्तिष्क तक वाँछित सन्देश पहुँचाने का कार्य एक सेकेंड के हजारवें भाग में करती है। इस नाड़ी की संरचना कोलेजन ऊतकों से हुई जो कि घनीभूत प्रोटीन अणुओं का समुच्चय है। इसका ऊपरी सिरा धन आवेशधारी तथा निचला रिण आवेगमय है। स्नायु संरचना की दृष्टि से सुषुम्ना यहाँ एक जालीनुमा गुच्छक बनाती हुई मस्तिष्कीय परतों में अण्डाकार वृत के रूप में रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम के नाम से फैल जाती है। सारी विद्युत्सम्पदा यहीं घनीभूत रहती है। अधिक गहरे में होने एवं अति सूक्ष्म स्थिति में होने के कारण तथा इनके आवेशों के परस्पर निरस्तीकरण (नलीफिकेशन) की वजह से इलेक्ट्रो एनेसेफेलोग्राफी जैसे यन्त्रों से इन विद्युत तरंगों को सही अवस्था में मापा जाना असम्भव है। यही कारण है कि ई. ई. जी. को मस्तिष्क का तेरह प्रतिशत प्रतिनिधि करने वाला मापन मात्र माना जाता है। योग साहित्य में इस सारे विद्युत्मण्डल तथा “पीनियल-हाइपोथेलेमस-पीटुटरी” रूपी स्नायुधारा व रस स्रावों के समुच्चय को सहवार चक्र की उपमा दी गयी है, जहाँ पर पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की ही तरह सूक्ष्म जगत से अनुदान बरसते हैं। चेतन सत्ता का पारस्परिक आदान-प्रदान इसी ध्रुव के माध्यम से होता बताया गया है। देवाराधन द्वारा वस्तुतः प्रामाणिकता सिद्ध कर जीव सत्ता ब्राह्मी चेतना से अपने अनुदान इसी उत्तरी ध्रुव से ग्रहण करती एवं सामर्थ्यानुसार उन्हें पचाती हुयी शेष को दक्षिणी ध्रुव अर्थात् मूलाधार से निष्कासित करती रहती है।

ब्रह्मांडीय ऊर्जा प्रवाह जिस प्रकार पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से टकराकर आभा मण्डल विनिर्मित करता हुआ भूमध्य भाग से दक्षिण ध्रुव से निस्सृत हो जाता है, लगभग उसी प्रकार काया के इस डायपोल मैग्नेट सुषुम्ना के सर्वोच्च अधिष्ठाता केन्द्र ब्रह्मरंध्र एवं सहस्रार से टकराते हुए व्यक्ति विशेष की जागृत अन्तःस्थिति एवं साधना अर्जित उपलब्धियों के अनुरूप एक विशिष्ट प्रभा मण्डल बनाता है एवं उछाल खाता हुआ मेरुदण्ड मार्ग से गुजरता हुआ मलाधार से अधोगामी हो काया से बहिर्गमन कर जाता है। मूलाधार एक कुण्ड है, सहस्रार एक दुर्गम पर्वत जिसकी उपमा कैलाश से दी जा सकती है। दोनों की समस्वरता ही आत्मा-परमात्मा का मिलन-ब्रह्मानंद की रसानुभूति है।

प्रश्न पूछा जा सकता है कि जिस प्रकार ध्रुव प्रभा को उत्तरी ध्रुव पर अनेकानेक वर्णों- विलक्षणताओं के रूप में देखा व चित्राँकित किया जा सकता है, क्या उसी प्रकार मानवी काया के प्रभा मण्डल को देखा-परखा नहीं जा सकता। शास्त्रों में तो विभूतियों के अनुरूप भिन्न-भिन्न देवताओं की आकृतियों के चहुं ओर आभा मण्डल (हैलो) दर्शाया जाता है। इस प्रकाश वृत को वैज्ञानिकों ने महत्ता दी है एवं फोटोग्राफी के विशिष्ट प्रयोगों के माध्यम से उसका छायाँकन करने में भी सफलता प्राप्त की। चेतना की सूक्ष्म संरचना की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण शोध उपलब्धि है। “साइकिक डिस्कवरीज बिहाइण्ड आयरन करटेन” एवं बाद में इसके द्वितीय भाग में किर्लियन फोटोग्राफी सम्बन्धी कार्य प्रकाशित हुआ है। समय-समय पर अखण्ड-ज्योति में भी इस “माइक्रोसटलर” पक्ष को लगातार उभारा जाता रहा है। पिछले दिनों “मद्रास मेडिकल कॉलेज” के स्नायुविज्ञानी डा. नरेन्द्रन् ने पत्तियों, अँगुलियों की पोरों के आभा मण्डल से आगे बढ़कर समस्त शरीर का आभा मण्डल अंकित करने में सफलता प्राप्त की है। मानवी ऊष्मा को “थर्मोग्राम” द्वारा तथा विद्युत्चुम्बकत्व को “इलेक्ट्रो मैग्नेटोग्राम” द्वारा माप सकने में तो पिछले एक दशक में वैज्ञानिकों को काफी सफलता मिली है। लेकिन समग्र सूक्ष्म आयन मण्डल को माप लेना एक भारी उपलब्धि है।

डा. नरेन्द्रन् का कथन है कि यह “आँरा” प्राण शक्ति से भरी-पूरी जीव सता में तेजोमय, गतिशील एवं ज्योतिर्मय होता है जिसे एक विशेष प्रविधि द्वारा फोटो ग्राफिक प्लेट पर अंकित किया जा सकता है। निर्जीव वस्तुओं, वृक्ष-वनस्पतियों में भी यह विद्यमान होता है पर इसकी ज्योति (इन्टेन्सीटी) कम होती है। मानवी काया से निरन्तर उत्सर्जित प्राण ऊर्जा का विकिरण मापने के लिए जितने “हाई वोल्टेज प्रोजेक्शन रिकार्डिंग” की आवश्यकता पड़ती है, उसे देखते हुए 1949 में डा. किल्नर द्वारा बनाये उपकरण को काफी कुछ संशोधित कर इस भारतीय चिकित्सक ने शास्त्र वचनों एवं प्रकृत साहित्य का अनुमोदन करने की आत्मिकी दिशा में काफी कुछ योगदान दिया है। उनका कथन है कि निषेधात्मक एवं विधेयात्मक चिन्तन को, भावी व्याधि की सम्भावना वाले एवं शीघ्र ठीक होने वाले व्यक्ति के आयन मण्डल को स्पष्टतः अंकित कर यह निर्धारण किया जा सकता है कि चिकित्सकों की, मनोरोग विशेषज्ञों की भावी दिशाधारा क्या हो? इसे उन्होंने अतीन्द्रिय ज्ञान नहीं अपितु अविज्ञात आयाम की खोज कहा है जिसे विज्ञान, लेसर, मेसर एवं होलोग्राफी के माध्यम से जानता तो था पर विस्मृति की विडंबना से ग्रसित भी था।

डायसायनीन स्क्रीन का प्रयोग कर डा. किल्नर ने यह बताया था कि जैसे मानव शरीर से जीवकोश झड़ते हैं, ठीक उसी प्रकार आयन्स आस-पास के वातावरण में सतत् गतिशील रहते हैं। अपनी पुस्तक “ह्यूमन एटमॉसफियर” में डा. किल्नर ने लिखा है कि सूक्ष्मतम होने के कारण ही ये आँखों से नहीं दिखते लेकिन दिव्य शक्ति सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति न केवल इस सूक्ष्म आभा मण्डल को अपितु भूत, वर्तमान, भविष्य को भी इसके माध्यम से जान लेते हैं।

आभा मण्डल या आँरा को जानने-समझने की वैज्ञानिक तकनीक एवं वास्तविक आभा मण्डल की शास्त्र मान्यताएँ- अन्यान्य प्रतिपादन आगामी लेखमालाओं में प्रस्तुत की जाती रहेंगी। अभी तो सूक्ष्मीकरण के प्रसंग में इतना ही कहना अभीष्ट होगा कि वैज्ञानिक उस स्थिति तक पहुँच गए हैं जहाँ वे कह सकें कि ‘लिफाफा देखकर हम मजमून पहचान लेते हैं।” भले ही यह जानकारी अत्यल्प हो एक रहस्यलोक का द्वार तो खोलती है।

काया की चेतन सत्ता जितनी विलक्षण एवं सूक्ष्म है उतनी ही सृष्टा की अद्भुतता की परिचायक भी। इस महासागर में जो जितनी डुबकी लगाता है उतनी ही रत्नराशि उपलब्ध करता है। सूक्ष्मीकरण की साधना चेतन सत्ता के चरम बिन्दु तक पहुँचने एवं विराट् रूप में परिवर्धित होने कि प्रक्रिया है। जैसे-जैसे इस विधा के नये आयाम खुलेंगे, साधना से सिद्धि के सार्थक सिद्धान्तों से जन-साधारण लाभान्वित होंगे एवं यथार्थता को पहचानेंगे।


Quotation

चेतना के सूक्ष्मीकृत रूप पर, मानवी विद्यत्चुम्बकत्व पर आप्त वचनों की साक्षी देने हेतु अब वैज्ञानिक आगे आए हैं एवं उन्होंने इस संरचना की झाँकी को देखने, इसका छायाँकन करने का भी प्रयास किया है। विद्यत्तरंगों की समुच्चय यह काया अन्ततः है- क्या? एवं इसे और भी सूक्ष्म बनाकर क्या विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं।


भौतिकी का सूक्ष्मीकरण- चेतन सत्ता से एकीकरण

शरीर एक जड़ पिण्ड मात्र नहीं चेतन सत्ता का समुच्चय है जिसे काया को कलेवर रूप में ओढ़कर चलना पड़ता है। वैज्ञानिकों की स्थूल दृष्टि अभी तक प्रत्यक्ष को प्रमाण मानकर चलती रही है, इसी कारण चेतना के अस्तित्व को जान-बूझकर नकारा जाता रहा। लेकिन जैसे-जैसे भौतिकी भी सूक्ष्मीकरण की गहराइयों में प्रवेश करने लगी, चेतना के आयाम सम्बन्धी कई नये क्षेत्र ऐसे प्रकाश में आने लगे, जिन्हें स्वीकार करने पर उन्हें अब विवश होना पड़ रहा है।

आइन्स्टीन कहा करते थे “अनिश्चितता के सिद्धान्त पर टिकी “पार्टीकल फिजीक्स” के आधार लूले-लंगड़े हैं। ईश्वर कभी पासे नहीं फेंका करता। दुनिया एवं इसमें रहने वाले जीवधारियों का समुदाय भले ही ऊपर से कितना ही अव्यवस्थित क्यों न लगे, उसके पीछे एक सुलझी हुई चेतना है जो लीलामयी तो है, झक्की नहीं है।” अन्यान्य वैज्ञानिकों से विपरीत उन्होंने विचार तरंगों के आधार (प्योर थॉट) “यथार्थता” को पकड़ने एवं तद्नुसार सृष्टि की परिकल्पना करने को कहा था। वास्तव में सारे बलों के एकीकरण के सिद्धान्त के माध्यम से विभिन्न प्रतिपादनों को प्रस्तुत कर अब वैज्ञानिकों के कदम सत्य की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं।

भौतिकी का यह सूक्ष्मीकरण आखिर है क्या? जो मानवी बुद्धि के लिए अगम्य है? सम्भवतः इसे बहुत पहले आद्यशंकराचार्य ने विवेक चूड़ामणि में उद्धृत करके रख दिया था-

ऐक्यं तयोर्लक्षितयो र्न वाच्यय। निगद्यतेन्योन्य विरुद्ध धर्मिणोः। खद्योत भान्योरिव राजभृत्ययौः। कूपाम्बुराश्योः परमाणुमेवोः ॥ -244। वि. चू.

अर्थात्- उन दोनों, जीव एवं ब्रह्म की एकता को लक्ष्यार्थ में ही समझना चाहिए, वाच्यार्थ में नहीं, क्योंकि उनके आचार-व्यवहार एक न होकर अलग-अलग हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। उनकी इस एकता को वैसा ही समझना चाहिए “जैसे जुगनू और सूर्य की एकता को, राजा और भृत्य की, कुएँ और समुद्र की तथा परमाणु और पर्वत की एकता को।”

इस एकीकरण की दिशा में बढ़ता हर कदम क्रमशः भौतिकी के अविज्ञात आयामों को खोलने में तथा उसे आत्मिकी के समीप ला पाने में समर्थ हुआ है। आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व अलवर्ट आइन्स्टीन ने देश (स्पेस) की परिकल्पना दो बलों के एकीकरण के रूप में की थी- एक गुरुत्वीय (ग्रेविटेशनल) एवं दूसरा विद्युत्चुम्बकीय (इलेक्ट्रो मैग्नेटीक)। दोनों ही चार मूल बलों में से दो प्रमुख बल हैं। अन्य दो बल हैं ‘वीक फोर्स’ एवं “स्ट्रांग फोर्स” जिनकी खोज बाद में हो पाई। आज वैज्ञानिक इन चार बलों के एकीकरण के माध्यम से एक “यूनिफाइड फील्ड” की परिकल्पना भर करते हैं लेकिन उस समय, जब कि इनकी अत्यल्प जानकारी भर उपलब्ध थी, “फोर डाइमेंशनल कर्व्ड स्पेस टाइम” को प्रयोगों के माध्यम से आइन्स्टाइन जैसे दृष्टा वैज्ञानिक ने प्रामाणित कर दिखाया था। यह उनकी सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है कि गुरुत्व रूपी ज्यामितीय विचार एवं विद्युत्चुम्बकत्व रूपी देशकाल संरचना का एकीकरण उन्होंने उसी समय सोच लिया था। उनका तबका एकीकरण सिद्धान्त सूक्ष्म भौतिकी अर्थात् ब्रह्मांड की चेतन सत्ता के मूल प्रेरक बल की गहराइयों में जाने हेतु आने वाली वैज्ञानिक पीढ़ी को ऐसी दिशाएँ दे गया जो कि शाश्वत सनातन हैं। यही कारण है कि आज आइन्स्टीन को विज्ञान जगत में वही स्थान प्राप्त है जो आर्ष साहित्य में व्यास एवं साधना के क्षेत्र में पतंजलि एवं विश्वामित्र को।

चर्चा सूक्ष्मीकरण के सन्दर्भ में चल रही थी एवं यह समझाने का प्रयास किया जा रहा था कि अन्ततः यह सूक्ष्म जगत है क्या? कणों-प्रतिकणों की दुनिया की इतनी चर्चा होती है। कहीं शास्त्र वर्णित लोकोत्तर जीवन इन प्रतिकणों की दुनिया में तो छुपा नहीं है, जिसे भौतिकी और आत्मिकी के तालमेल के अभाव में जाना जा सका हो।

सत्य के प्रति प्रेम एवं निर्भीकता से उसकी खोज उपनिषदों की एक विशेषता रही है। राबर्ट अर्नेस्ट ह्यूम अपने ग्रंथ “द थर्टीन प्रिंसीपल उपनिषद्स” में लिखते हैं- “सत्य की खोज करने की उत्सुकता, उपनिषदों की एक आनन्ददायी और प्रशंसनीय विशिष्टताओं में से एक है।” मैक्समूलर जैसे प्रख्यात पूर्वार्त्त दर्शन के अध्येता का मत रहा है कि “उपनिषदों के रचयिताओं ने किसी भी ऐहिक या पारलौकिक सुख को सत्य की खोज के मार्ग में बाधक नहीं बनने दिया। इस अन्वेषण में वे सदैव पूर्वाग्रहों से मुक्त रहे हैं। यही कारण है कि पूर्वार्त्त अध्यात्म के माध्यम से ऋषियों ने कुछ ऐसे रहस्यों का उद्घाटन किया है जो आज के वैज्ञानिकों के लिये दिशा निर्देशक सूत्र की भूमिका बखूबी निभा रहे हैं।” (“लेक्चर्स आन द वेदान्त फिलासफी”- मैक्समूलर द्वारा लिखित पुस्तक से उद्धृत)।

ईशोपनिषद् के प्रारम्भ में कही जाने वाली ऋचा “पूर्णमदः पूर्णमिदं” वह पूर्ण है- यह भी पूर्ण है के माध्यम से ब्रह्मांडव्यापी व्यक्त एवं अव्यक्त सत्ता के उसी स्वरूप को प्रकाशित करती है जिसे आइन्स्टीन ने अपने सूत्रों में इस सदी के प्रारम्भ में कहा था। वेदान्त में भी तकनीकी भाषा का प्रयोग हुआ है एवं उपनिषद्कार जब ‘वह’ तथा ‘यह’ उनकी पूर्णता का उद्घोष करता है तो ‘वह’ परोक्ष सत्ता- परब्रह्म के तात्पर्य में तथा ‘यह’ एक ऐसी वस्तु की ओर संकेत करता है जो इन्द्रिय गम्य है। यह मंत्र देश, काल और परिणाम की अभिव्यक्ति के प्रतीक इस व्यक्त जगत का बोधक है।

इस प्रकार जहाँ तक परोक्ष जगत की सूक्ष्मीकृत संरचना एवं उसके विभिन्न आयामों के प्रकटीकरण का प्रश्न है, भारतीय चिन्तन और आधुनिक वैज्ञानिक चिन्तन दोनों एक मत हैं। दोनों इस प्रत्यक्ष जगत की विविधता के पीछे परोक्ष में निहित मूल एकता को मानते हैं। लेकिन न ही उपनिषद् एवं न ही प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक बहिरंग से सन्तुष्ट होकर रह जाते हैं। दोनों ही वस्तुओं के अन्तस् को, सत्य के चैतन्य पहलू को जानना चाहते हैं। भौतिकी को दार्शनिक ढंग से समझने- समझाने वालों ने यह प्रयास पूर्वार्त्त दर्शन के सहयोग से भली प्रकार किया है।

1674 में आइन्स्टीन की एकीकरण की मान्यता को मूर्त रूप देने का प्रयास योगेशपति एवं नोबुल पुरस्कार विजेता अ-दुस्सलाम (दोनों ही एशियन किन्तु अमेरिका के नागरिक) ने एक ओर तथा होबर्ड जार्जी एवं शेल्डन ग्लाशोब ने दूसरी ओर आरम्भ किया। इसे उन्होंने ग्राण्ड यूनिफिकेशन नाम दिया। क्वार्क्स एवं लेप्टान कणों की गहराई में हम प्रवेश न करें तो भी भारत की पुणे के समीप कोलाई स्वर्ण खान में पकड़े गये दीर्घजीवी प्रोटानों एवं न्यूट्रिनों कणों के आधार पर द्रव्य (पदार्थ) की वर्तमान अवस्था प्रतिद्रव्य का उसके ऊपर हावी होना तथा इसके माध्यम से एक पाँच आयामीय जगत की कल्पना करना अब आसान हो गया है। अब प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि इलेक्ट्रान- न्यूट्रिनों का भार शून्य से अधिक है। प्रो. ग्लाशोव इस आधार पर कहते हैं कि चार मूल बलों का एकीकरण अब सिद्ध किया जा सकता है एवं यह भी कि आइन्स्टीन अपने इस कथन में असत्य नहीं कह रहे थे कि इस विराट् जगत के मूल में चेतन सत्ता कार्यरत है। आइन्स्टीन ने भौतिकी से अधिक महत्व ज्यामिती को दिया जो कि किन्हीं निश्चित सिद्धान्तों पर तो आधारित है। वे कहते “क्वाण्टम फिजीक्स” में अनिश्चयता को महत्व दिया गया है जबकि “पार्टीकल फिजीक्स” (कण भौतिकी) में सम्भाव्यता के सिद्धान्त को। उन्हें ये दोनों बातें पसन्द नहीं थीं। उन्होंने ‘सपोज’ के आधार पर नहीं बल्कि “प्योर थॉट” के आधार पर परोक्ष के रहस्यों को जानने हेतु प्रयास करने पर बल दिया।

अब उन्हीं दो मूल बलों से चार बल, उनके एकीकरण एवं तद्नुसार भौतिकी के सूक्ष्म परिसर की परिकल्पना के बाद पिछले 6 वर्षों में परागुरुत्व (सुपर ग्रेविटी) एवं प्रति गुरुत्व (एण्टी ग्रेविटी) का सिद्धान्त एकीकरण की नींव को और भी मजबूत करने को आ खड़ा हुआ है। सम्भव है इसी एण्टी ग्रेविटी में सूक्ष्म जगत का सारा ढाँचा निहित हो, जिसमें कण-प्रतिकण प्रकाश की गति से भी तीव्र परिभ्रमण करते हों- सारा पारलौकिक गतिक्रम यहीं संचालित होता हो। परागुरुत्व भौतिकी का नवीनतम अजूबा है एवं सम्भव है आत्मिकी के समीप आने का एक माध्यम भी। इसके प्रमुख प्रवक्ता प्रो. न्यूवेन ह्यजेन का कथन है कि पूर्वार्त्त दर्शन वर्णित सभी “गप्पबाजियाँ” (जैसा कि वे पूर्व में मानते थे) सम्भवतः परा एवं प्रति गुरुत्व के माध्यम से वैज्ञानिकों को समझ में आने लगे एवं आइन्स्टाइन का वह कथन सत्य लगने लगे कि “ईश्वर समझदार है, वह कभी उल्टे सीधे पासे नहीं फेंकता। काल विवर (ब्लैक होल्स) आदि की कल्पना सत्य हो सकती है पर है वह भी तर्क सम्मत वैज्ञानिकता का ही एक अंग, न कि अनिश्चितता के आधार पर की गयी परिकल्पना।”

1934 से लेकर अब तक भौतिकीविद् दार्शनिकता वैज्ञानिकता के पलड़े में झूलते रहे हैं और यह भूलते रहे हैं कि वह ‘विज्ञान के दर्शन’ का एक ही पलड़ा है। सर जेम्स जीन्स इसीलिए कहते थे कि “भौतिक जगत की समस्त घटनाएं सामंजस्य पूर्ण हैं, यहाँ तक कि वे भी जिन्हें हम संयोग मान बैठते हैं। इन सामंजस्यपूर्ण घटनाओं को गणित की भाषा में सही ढंग से व्यक्त किया जा सकता है। भौतिक जगत में सामंजस्यपूर्ण घटनाओं को रचने वाली अवश्य ही कोई विचार बुद्धि युक्त सत्ता है। वह महान गणितज्ञ प्रतीत होती है अतः उसे परमेश्वर कहना अत्युक्तिपूर्ण नहीं है।”

भौतिक जगत में पग-पग पर हर पहलू में हमें गणितीय प्रति रूप दिखाई पड़ते हैं। अतः इसे किसी भी हालत में यान्त्रिक जगत जड़ जगत नहीं कहा जा सकता। जो भी कुछ दृश्य रूप में घटित होता है, वह विराट् चेतन सता की ही अभिव्यक्ति मात्र है। मस्तिष्क यदि उन्हें स्थूल रूप में देखे तो वे उसी सीमा में उसे दिखाई देंगी लेकिन चेतना के जागरण द्वारा- सूक्ष्मीकृत मानवी चेतन सत्ता के माध्यम से अदृश्य- पराभौतिक घटनाक्रमों को देख सकना उनमें भाग ले सकना भी पूर्ण रूपेण सम्भव है। वस्तुतः मानवीय न जो स्थूल मस्तिष्क का चेतन प्रतिबिम्ब है, अपनी जागृति की पराकाष्ठा की स्थिति में जड़ व चेतन भौतिक सत्ताओं का अन्तर भूलकर सूक्ष्म जगत का ही एक अंग बन जाता है।

भौतिकी के माध्यम से क्लिष्ट शब्दावली को भी सरल करते हुए यहाँ यह समझाने का प्रयास किया गया कि इस काय-कलेवर में निवास करने वाली चेतन सता अन्ततः जीवित अवस्था में कैसे वह भूमिका निभा लेती है जो दृश्यमान नहीं है, मात्र अणु-परमाणुओं, कण-प्रतिकणों पर ही लागू होती है। सूक्ष्म मन सूक्ष्म विराट् सत्ता का ही एक अंग है। दोनों का एकीकरण सम्भव है एवं इसी में परोक्ष का सारा लीला सन्दोह चलता रहता है।


ईसा की विदाई का अन्तिम (kahani)

आइन्स्टीन एक दृष्टा ऋषि थे जिन्होंने “ग्राण्ड यूनिफिकेशन आफ फोर्सेस (समस्त जड़-चेतन सत्ताओं के एकीकरण की परिकल्पना आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व करती थी। सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में वह अविज्ञात भौतिकीय आयाम कौन-सा है एवं व्यष्टि-समष्टि का एकीकरण सम्भव है तो कैसे, इसे विज्ञान की भाषा में समझें।

ईसा की विदाई का अन्तिम दिन था। उस रात उनने अपने प्रमुख शिष्यों को बुलाया और सभी के पैर धोये।

शिष्यों ने इस पर आश्चर्य किया तो वे बोले- “जो तुम्हें पूजे उनके प्रति तुम भी पूज्य भाव रखना। क्योंकि वे ही तुम्हें श्रेय प्रदान करते हैं। ऐसा न हो कि सम्मान पाकर इतराओ और अहंकार दबाव से अपनी श्रद्धा गँवा बैठो।”


दर्शन मात्र से वरदान मिलने की ललक

किसी के घर में प्रवेश करने के लिए उसका द्वार खोलने और देहरी लाँघने की आवश्यकता पड़ती है। इसके पूर्व अपरिचित होने के कारण खटखटा कर अपना परिचय भी देना पड़ता है। इसी प्रकार किसी नये व्यक्ति से संपर्क साधने का सिलसिला दर्शन से आरम्भ होता है। अभीष्ट उद्देश्य के लिए सत्संग, सान्निध्य, परामर्श, मार्गदर्शन के लिए यह प्रारंभिक सूत्र है। किसी को देखे बिना उससे आदान प्रदान का सिलसिला कैसे चले? बाजार से कुछ खरीदना हो तो सर्व प्रथम उसे भली भाँति देख-परख लिया जाता है। हर प्रकार की नियुक्ति में साक्षात्कार अनिवार्य होता है। लिखित उत्तर भर ही काफी नहीं होता। विवाह संबंध निश्चित करने के लिए सर्व प्रथम वर कन्या एक दूसरे को देखते हैं। छवि देखने भर से किसी का पूर्ण परिचय तो नहीं मिलता तो भी छवि, परिधान, आच्छादन, वातावरण स्वभाव की इतनी जानकारी तो मिल ही जाती है कि अगले कदम उठने-न उठने की आवश्यकता का अनुमान लग सके।

दर्शन इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। पूर्व परिचय या संबंध की धुँधली स्मृति दर्शन मात्र से हरी हो जाती है। जिनके संबंध में सुना भर था उन्हें देख लेने से कल्पना निर्धारण में वास्तविकता का समावेश होता है। ऐसे-ऐसे अनेकों कारण हैं, जिनके आधार पर सन्त सज्जनों के दर्शनों की भी आवश्यकता समझी जाती है। अपनी अभिलाषा पूरी करने लोग दूर-दूर से दौड़ते भी हैं। नेताओं, अभिनेताओं, विशिष्टता सम्पन्न जिन अन्य लोगों के नाम सुने जाते रहे हैं, उन्हें देखने का मन होता है। कौतूहल समाधान हेतु अनेकों जगह जाया जाता है। चेतन ही नहीं, जड़ वस्तुओं में छिपे सौंदर्य को देखने- मन की आस पूरी करने हेतु लोग ताज महल कुतुबमीनार, गुलमर्ग, मसूरी, समुद्र तट की ओर दौड़ पड़ते हैं। हिमालय का प्राकृतिक सौंदर्य मन को ललचाता है भव्य देवालयों, किलों, राज महलों को देखने को इच्छा भी इसी कारण होती है। पौराणिक आख्यानों से जुड़े तीर्थों की यात्रा व पुण्य कमाने की आस भी दर्शन हेतु खींच ले जाती है। पर्यटन उद्योग की पृष्ठभूमि में इस ‘दर्शन’ पक्ष की बड़ी महत्ता है।

इतने पर भी विचारणीय है कि दर्शन से पुण्य या अनुग्रह मिलने की लोक मान्यता में कोई दम है या नहीं? आमतौर से लोग अलौकिक विशेषता, सम्पन्न व्यक्तियों को देखने इस लिए दौड़ पड़ते हैं कि छवि देखने भर से पुण्य मिलेगा पाप कटेगा। भले ही चरण स्पर्श न करना संभव हो सके दूर से देखभर लेने से आँखें तृप्त हो जाएँगी अन्तःकरण कृत-कृत्य हो उठेगा। ऐसे सिद्ध पुरुषों (तथा-कथित” से जुड़े कई स्थान ऐसे भी हैं जिनके दर्शन की मनौती मानी जाती है। इसी प्रकार कई व्यक्ति बाजार के सौदे की तरह सशर्त दर्शन करते हैं। पुत्र उत्पन्न होगा तो नौचंदी देवी का दर्शन करेंगे। मंशा पूरी होगी तो अमुक देवी को प्रसाद चढ़ाएंगे। यदि मुकदमा जीतेंगे तो बालाजी हनुमान पर प्रसाद चढ़ाएँगे। आकस्मिक विपत्ति को टालने के लिए सशरीर दण्डाय मान लेटकर प्रणाम हेतु जाने की सनक भरी मनौती भी मानी जाती है।

ऐसी मनोभूमि वाले व्यक्तियों की वस्तुतः कमी नहीं। वे सन्त-महात्माओं-योगी जनों से यह अपेक्षा रखते हैं कि दर्शन करने वालों को इतने भर से अपना भक्त मानेंगे और अपनी मनोकामना की पूर्ति का आशीर्वाद देंगे। संभवतः दर्शन देने वालों की भीड़ से उन्हें कुछ लाभ होता होगा, अतः इस विडम्बना से जान बूझकर ये मुक्ति पाने का प्रयास नहीं करते एवं अपने चारों ओर जमघट बनाये रख सिद्धि चमत्कार का आश्वासन देते रहते हैं। सट्टे का नंबर बताने और पूछने वाले फकीर-मुरीदों के यहाँ इसी कारण भीड़ जमी देखी जा सकती है जो यह सोचने को विवश कर देती है कि क्या ‘दर्शन’ इतना सस्ता है? और आगे की सोचें तो देवालयों में अमुक पर्व या स्नान आदि जैसे अवसरों पर होने वाली भीड़ में सच्ची भक्ति भावना वाले नहीं के बराबर और वरदान पाने के इच्छुक अधिकाँश होते हैं। वह पौराणिक कथा तो सुविख्यात है जिसमें शंकर-पार्वती धरती वासियों का पर्यवेक्षण करने हेतु मानवी काया धारण कर एक तीर्थ स्थान पर पहुँचते हैं एवं कोढ़ी बने शंकर जी पार्वती जी के उस असमंजस का समाधान करते हैं कि मन्दिरों-भक्ति स्थानों के आसपास लगी भीड़ किस मनःस्थिति में वहाँ आती है? पार्वतीजी के सौंदर्य पर अभिभूत दर्शन हेतु जाते, कटाक्ष करते व्यक्तियों को देखकर उनके मन का भ्रम मिट जाता है कि भक्ति भावना का आंकलन लोगों के दर्शन हेतु जमघट से किया जाना कितना औचित्य पूर्ण है? यहाँ तक कि मन्दिरों में पैसा, प्रसाद चढ़ाने की रिश्वत के पीछे भी काम करा लेने की शर्त जुड़ी रहती है। पूरी न होने पर अमुक मन्दिर या देवता के प्रति अनास्था बढ़ती है किन्तु औरों के पीछे भागने का क्रम नहीं टूटता।

देखना यह चाहिए एवं बुद्धिमत्ता पूर्वक सोचा जाना चाहिए कि इस लोक मान्यता में कुछ दम भी है या ऐसे ही अन्धविश्वास ग्रसित लोग एक का अनुकरण करते हुए, दूसरे भेड़ चाल की तरह नकल करते और भीड़ के पीछे भीड़ के चलने का उदाहरण बनाते हैं। दर्शन पक्ष की वैज्ञानिकता को परखा जाना चाहिए ताकि अन्ध श्रद्धा मिटे, अनास्था दूर हो एवं समय, धन, मनःशक्ति अपव्यय भी न हो।

तर्क, तथ्य और विवेक का प्रतिपादन यह है कि दर्शन से परिचय का उद्देश्य भर पूरा होता है। लाभ मिलना होगा तो इसके उपरान्त हुई घनिष्ठता, उत्कृष्टता के साथ तद्रूपता एवं आदान-प्रदान की क्रिया द्वारा ही सम्भव होगा। व्यक्ति या प्रतिमा की आकृति भर देख लेने पर भी किसी जादू-चमत्कार की आशा नहीं ही की जानी चाहिए, चाहे इसके सम्बन्ध में कितनी ही अटकल बाजियाँ सम्बन्धित व्यक्तियों द्वारा अनुभूति, घटना क्रम के रूप में बखानी जाती रही हों।

जिनके पास कुछ देने योग्य होता है, उनमें विवेक बुद्धि भी होना चाहिए कि पात्र-कुपात्र का विचार करें। आँखें मूँदकर किसी भी दर्शन करने वाले पर वे अर्जित आत्मबल सम्पदा को लुटाते नहीं फिरते। संसार में कोई भी विचारशील ऐसा नहीं है जो हर माँगने वाले को निहाल कर सके। उसकी इच्छा के पीछे औचित्य अनौचित्य की जाँच-पड़ताल न करे। यदि ऐसी अन्धेरगर्दी चली होती तो बैंकों में धन माँगने वालों की भीड़ लग जाती और रिजर्व बैंक का दिवाला निकल गया होता। अफसर का पद पाने के लिए “थ्रू प्रापर चैनेल” जाने के बजाय, लोग नियुक्त कर्त्ताओं की मनुहार करते-फिरते और हल्की-फुल्की भेंट पूजा करके उच्चतम पद पाने का अपना मनोरथ पूरा कर लेते। कोई भी कुपात्र किसी की सुयोग्य कन्या को पत्नी रूप में पाने के लिए जा पहुँचता और दर्शन करते ही निहाल होकर- सब कुछ पाकर लौटता। पर ऐसा कहीं होता नहीं है, हो भी नहीं सकता।

देवताओं या सन्तों की दर्शन-झाँकी करने वालों में से कितने सफल मनोरथ हुए, कितनों की मनोकामना पूरी हुई, इसका लेखा-जोखा यदि लिया जा सके तो उत्तर पूरी तरह निराशाजनक, असमंजस भरा निकलेगा। कारण स्पष्ट है। देवताओं, सन्तों की भी नियन्ता की तरह कुछ विधि-व्यवस्था-मर्यादाएँ होंगी। देने से पूर्व वे भी तो याचक के व्यक्तित्व और उद्देश्य को देखना चाहेंगे। अन्यथा मुफ्तखोर कुछ भी माँगने और बदले में पान लगेंगे तो पात्रता और पुरुषार्थ का कहीं कोई प्रतिबंध ही न रहेगा। लूट खसोट की इस रेलमपेल में अवाँछनीय व्यक्ति सबसे आगे होंगे और अनुचित से अनुचित मनोकामना पूरी करने के उपरान्त ऐसी अंधेरगर्दी खड़ी करेंगे जिसमें भ्रष्टाचार के अतिरिक्त और कुछ शेष ही न रहेगा। सज्जन तो औचित्य की बात सोचकर सन्तोष भी कर सकते हैं, पर ढीठ-मनचलों-बेशर्मों को इसमें लज्जा आने जैसी कोई कठिनाई नहीं पड़नी चाहिए।

यह स्पष्टतः समझ लेना चाहिए कि वरदान देने के साथ सन्तों को अपना अर्जित तप या पुण्य भी देना पड़ता है। इसके बिना मात्र शब्दोच्चारण भर से किसी का कोई भला नहीं हो सकता। तप और पुण्य का उपार्जित धन कमाने से भी अधिक कष्टसाध्य है। इस बहुमूल्य सम्पदा को कोई चापलूसी भरी मनुहार द्वारा या पत्र-पुष्प जैसे रास्ते उपहार लेकर ऐसे ही मुफ्त में लुटा देना और लुटेरों को स्वेच्छाचार बरतने का अवसर देगा यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। मुफ्तखोरी को प्रश्रय देकर- कुपात्रों के हाथ मजबूत करके उन्हें भ्रष्टाचार की छूट देने के लिए किन्हीं सन्त तपस्वी का पुण्य खर्च हो चले तो इसे अध्यात्म जगत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।

देवताओं की वरदान परम्परा में पौराणिक आख्यान यही बताते हैं कि उन्हें प्रसन्न करने के लिए तप-तितिक्षा का मार्ग अपनाना पड़ा है। इसके उपरान्त ही उनने पात्रता परखी और आवश्यक सहायता दी है। प्रतिमा दर्शन भर से- सन्तों के चेहरे को चर्म-चक्षुओं से देखने मात्र से वह लम्बी मंजिल ऐसे ही चुटकी बजाते पूरी हो जाया करे तो फिर देवाराधन में से तपस्वी होने- तपश्चर्या करने की शर्त ही समाप्त हो जाएगी। सैलानी लोग राशि के हिसाब से पंक्ति बद्ध हो प्रतिमा को झाँक भर लेने एवं पैसा-अनुदान फेंककर इच्छित मनोरथ प्राप्त कर लिया करें तो समझना चाहिए कि यह लाटरी सट्टे की तरह सस्ते सौदे का नया धन्धा चल पड़ा।

यह चर्चा इस संदर्भ में विशेष ध्यान देने योग्य है, जहाँ श्रद्धालुजन अमुक सन्त- महामानव के अपनी आँखों से दर्शन कर लेने व उससे कृत-कृत्य होने की सोचते हैं। जो विचार वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं, जीवन जीने की दिशा साहित्य संजीवनी के रूप में दे जाते हैं उसे इस दर्शन- अभिलाषा के पीछे गौण मानना आज के मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है। दर्शन का अर्थ है- तत्व-ज्ञान। इसका अगला कदम अध्यवसाय भी है। गाँधी का तत्वदर्शन जिनने समझा व अपनाया, वे बिनोवा, राजेन्द्र बाबू, नेहरू, पटेल, राजगोपालचार्य, जयप्रकाश, कालेल कर जैसे हो गए और जिनने रेल से गुजरते या प्रवचन मंच पर बैठे बापू को देखा भर, उनके पल्ले कौतूहल निवारण के अतिरिक्त और कुछ क्या पड़ा होगा?

सन्त देवताओं की छवि देखने में हर्ज नहीं। पर उसका महत्व इतना ही माना जाना चाहिए कि इससे एक महत्वपूर्ण भवन में प्रवेश करने का द्वार खुलेगा। खुलने और प्रवेश पाने के बाद भी कुछ कार्य तो करना ही होगा। वह जाकर ऐसा कुछ किया जाय जिसके बदले में कारगर अनुग्रह या अनुदान उपलब्ध हो सकें। जो दरवाजे की दहलीज पर पैर रखते ही उस भवन में विद्यमान सम्पदा को बटोर लाने का स्वप्न देखते हैं, वे भूल करते हैं। ऐसा बन पड़ना तर्क, विवेक एवं औचित्य की कसौटी पर कहीं भी सही नहीं माना जा सकता।

नियति व्यवस्था ऐसी अन्धेरगर्दी का समर्थन कर नहीं सकती। जिन्हें मुफ्तखोरी ही सब कुछ दीखती है, जिन्हें देवता या सन्त विक्षिप्त स्तर के दीखते हैं, वे ही ऐसी कामनाएँ सँजोते, समय श्रम गँवाने के उपरान्त निराश होते, खीजते, अनास्था व्यक्त करते देखे जाते हैं। अध्यात्म तत्वज्ञान के अनुसार आत्म-परिष्कार एवं लोक-मंगल के लिए की गयी तप साधना ही एकमात्र वह राह है, जिस पर चलते हुए दिव्य अनुदान या विभूतिवान् वरदान किसी को उपलब्ध हो सकें। गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना की स्थिति में उनके दर्शन न हो पाने पर निराश होने वालों को इस तत्वज्ञान को भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए।


Quotation

तीर्थ अथवा किसी विभूतिवान् पुरुष के मात्र चर्मचक्षुओं से दर्शन से क्या व्यक्ति निहाल हो जाता है? स्पर्श का अपने स्थान पर महत्व होते हुए भी एक तथ्य अधिसंख्य व्यक्ति भूल जाते हैं कि दर्शन इतना ‘सस्ता, नहीं होता इसके लिए अन्तः चक्षुओं को खोलना अनिवार्य है। फिर प्रत्यक्ष दर्शन का अभाव खलता नहीं।


मरणोत्तर जीवन का सूक्ष्म शरीर

काल के अनन्त प्रवाह में सतत् प्रवाहशील जीवनधारा का प्रेतयोनि एक नया मोड़ मात्र है। मनुष्य की सीमित इन्द्रिय संरचना, बोध जगत की दृष्टि से भले ही वह जीवनधारा खो गई प्रतीत होती हो, पर है वह सदा से ही अविच्छिन्न। शास्त्र कथन है कि मनुष्य का संस्कार क्षेत्र मरणोत्तर जीवन में पूर्णतः सक्रिय रहता है। अन्तःकरण चतुष्टय मरणोपरान्त भी यथावत् बना रहता है। जिनकी मनःस्थिति अशान्त विक्षुब्ध-सी बनी रही थी- वह अपना स्वभाव उसी रूप में बनाए रखती है। दुष्ट जीवन क्रम की स्वाभाविक परिणति जीवात्मा को जिस अशान्त मनःस्थिति में रहने को बाध्य करती है, उसका ही नाम प्रेतदशा है। वे जीवित अवस्था में तो रोते-कलपते-दुःख पाते ही हैं, मृत्यु के बाद भी अपना आतंक उन लोगों पर जमाने का प्रयास करते हैं, जिनका आत्मबल अविकसित हो। हिंसक व्यक्तियों की कलुषित मनोवृत्तियां प्रेत जीवन में भी अपनी क्रूर आकाँक्षाओं की किसी प्रकार पूर्ति करने का प्रयास करती है एवं मनोबल रहित व्यक्तियों को अनायास ही सताती रहती हैं।

यह विषय मात्र वाक् विलास का नहीं, अपितु गहन शोध का है क्योंकि इससे परीक्षा जगत का रहस्योद्घाटन होता है, मरणोत्तर स्थिति में जीवन की गति की जानकारी मिलती है। डा. सी. डी. ब्राण्ड सहित अनेकों वैज्ञानिकों- परामनोवैज्ञानिकों ने ‘मीडियम्स’ (प्रेत के प्रभाव में आए व्यक्तियों) पर अध्ययन कर एक निष्कर्ष निकाला है। उनका कथन है कि मस्तिष्कीय संरचना जटिल है। वह शरीर के सम्मिलित संयोगों का ‘प्रोडक्ट’ है जिसमें एक अभौतिक चेतन तत्व भी शामिल है। इसे वे “साइकिक फैक्टर” कहते हैं। व्यक्ति के मरने पर उसका शरीर समुच्चय बिखर जाता है किन्तु मस्तिष्क स्थित यह फैक्टर जो कि द्रव्य नहीं है नष्ट नहीं होता क्योंकि यह अभौतिक है। यह अवशिष्ट “साइकिक फैक्टर” सूक्ष्म जगत में परिभ्रमण करता रहता है लेकिन ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क को पाते ही उसमें प्रविष्ट हो जाता है, जो इन परिव्राजक घटकों के प्रति ग्रहणशील हो। ऐसे मस्तिष्क सामान्यतया कमजोर मनोभूमि वालों के होते हैं।” मालूम नहीं डा. ब्राँड का यह मन कहाँ तक विज्ञान सम्मत है लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं कि भूत-योनि जिस सूक्ष्म स्थिति में रहती होगी, सम्भवतः वह कुछ इसी प्रकार की होगी।

आत्मबल का सम्यक् विकास न होने एवं विघटित मनःस्थिति वाले व्यक्तियों पर ही प्रेतात्माओं का प्रभाव पड़ता है। प्यार का अभाव, असुरक्षा की आशंका, मूर्खतापूर्ण कठोरता से भरा नियन्त्रण, अत्यधिक चिन्ता, कुसंग से उत्पन्न विकृतियाँ व्यक्ति के विकास क्रम को जब तोड़-मरोड़कर रख देती हैं तो ऐसा व्यक्ति मनोविकृतियों का शिकार बन जाता है। प्रेतात्मायें दुर्बल, दूषित मनःस्थिति वाले व्यक्तियों को अपना क्रीड़ा-क्षेत्र न भी बनायें तो भी वह मानसिक विकारों का शिकार होता या अन्य उन्मत्त आचरण करने के लिए प्रेरित या बाध्य होता है। उसका जीवन अन्ततः अनगढ़ बन जाता है।

पतंजलि ऋषि योगदर्शन के द्वितीय पाद में कहते हैं-

क्लेश मूलः कर्माशयो दृष्टादृष्ट जन्मवेदनीयः। सविमूले तद्विपाको जात्यायर्भागाः ॥

अर्थात्- “सब प्रकार के क्लेशों के मूल में जीव द्वारा किये गए कर्म ही प्रधान हैं। उन्हीं के द्वारा उसकी जाति, आयु एवं सुख-दुख भोग का निर्धारण होता है।”

इसी बात को योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम को समझाते हुए शुभाशुभ कर्मों और तद्नुरूप योनि प्राप्त होने के वर्णन के रूप में विस्तार से कहा है-

एवं जीवाश्रिता भावा भवभावन मोहिताः........ कालेन पदमागत्य जायन्ते नेह ते पुनः॥

इस संदर्भ में एक पक्ष और भी विचारणीय है। वह यह की जीव सत्ता अपनी संकल्प शक्ति का स्वतन्त्र घेरा जीव के चारों ओर बनाकर खड़ा कर देती है और जीव को अन्य योनि प्राप्त होने के उपरान्त भी वह संकल्प सत्ता उसका कुछ प्राणांश लेकर अपनी एक स्वतन्त्र इकाई बना लेती है। वह इस प्रकार बनी रहती है, मानो कोई दीर्घजीवी सूक्ष्मजीवी ही वहाँ पर विद्यमान हो। अति प्रचण्ड संकल्प वाली ऐसी कितनी ही आत्माओं का परिचय समय-समय पर मिलता रहता है। लोग इन्हें ‘पितर’ नाम से देव स्तर की संज्ञा देकर पूजते पाये गये हैं।

पदार्थ का प्रेत “प्रति पदार्थ”, विश्व का प्रेत “प्रति विश्व छाया पुरुष की तरह साथ-साथ विद्यमान रहता है। उसकी चर्चा विज्ञान जगत में इन दिनों प्रमुख चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का भी प्रेत होता है, यह अब माना जाने लगा है एवं कई ऐसे नए तथ्य प्रकाश में आए हैं जिनसे महत्वपूर्ण घटनाओं के, महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प सत्ताओं के भी प्रेत होने की बात सच प्रतीत होती है। स्थूल रूप नष्ट होने पर सूक्ष्म के रूप में उनका अस्तित्व बना रहता है।

वस्तुतः भौतिक संसार की भाँति ही इस लोक के इर्द-गिर्द एक अन्य संसार का भी अस्तित्व है। यह सूक्ष्म-लोक कहलाता है। मरणोत्तर जीवन व्यक्ति इसी लोक में गुजारते हैं, किन्तु व्यक्ति के गुण-कर्म-स्वभाव और व्यक्तित्व के स्तर के आधार पर इसके भी कई विभाजन हैं। योगी यति स्तर के व्यक्तियों को लोक श्रेष्ठतम माना गया है। जीवनमुक्त स्थिति में वे इसी लोक में निवास करते और भौतिक दुनिया की ही तरह सुखोपभोग करते रहते हैं। यहाँ भी वे वैसा ही शांतिमय जीवन जीते हैं, जैसा कि सशरीर अवस्था में।

क्षुद्र और निकृष्ट स्तर के वासना और तृष्णा में लिप्त व्यक्तियों की अशरीरी दुनिया भी उसकी सशरीर। दुनिया की भाँति ही क्षोभपूर्ण और दुःखदायी होता है। यहाँ भी वे अपने उन कुकृत्यों से विलग नहीं रह पाते, जिसने उनका भौतिक जीवन कुमार्गगामी नरक तुल्य बनाया। वे हर वक्त वासना और प्रतिकार की अग्नि में जलते, दूसरों को जलाते-प्रताड़ित करते शाँति की खोज में दर-दर भटकते रहते हैं। यही अतृप्त आत्माएँ प्रेत-पिशाच के नाम से जानी जाती हैं, जिनका एकमात्र लक्ष्य दूसरों को नुकसान पहुँचाना होता है।

सूक्ष्म शरीर में रहने के कारण इन्हें कुछ शक्ति तो अवश्य प्राप्त होती हैं, पर उतनी नहीं, जिससे बड़े-बड़े काम कर सकें। शक्ति उतनी ही होती है, कि वे यदा-कदा अपना अस्तित्व प्रकट कर कुछ उलटी-सीधी हरकतें कर सकें। इसी क्षणिक अस्तित्व और अत्यल्प शक्ति से वे अपने दुष्टतापूर्ण कुकृत्य सम्पन्न करते और क्षण भर में विलोप होते देखे जाते हैं। कभी-कभी वे अपनी इच्छा पूर्ति के लिए दूसरे व्यक्ति के शरीर का भी उपयोग करते देखे जाते हैं। दूसरों को माध्यम बनाकर अपनी वासना-तृप्ति भी कर सकते हैं, अथवा कभी किसी को कोई आवश्यक सूचना देनी हो, तब भी वे ऐसे ही क्रिया-कृत्यों का अवलम्बन लेते हैं। परन्तु इन कार्यों के लिए वे प्रायः दुर्बल मनःस्थिति वाले व्यक्तियों का ही सहारा लेते हैं। सबल और दृढ़ इच्छा शक्ति उनकी अधीनता नहीं स्वीकारती।

प्रेतों की ऐसी उत्पातों की घटनाएँ समय-समय पर प्रकाश में आती ही रहती हैं। कुछ वर्ष पूर्व एक ऐसी ही घटना ब्राजील के इटापिका शहर में एक किसान परिवार में घटित हुई। एक दिन अचानक सिडकाण्टो के घर में पत्थरों की बारिश होने लगी। परिवार वालों ने इसे आरम्भ में किसी की शरारत समझी, पर गहरी छान-बीन के बाद भी जब स्रोत का पता नहीं चला और पत्थर लगातार बरसते ही रहे, तो अन्ततः पुलिस को इसकी सूचना दी गई। पुलिस आयी, मगर वह भी कुछ कर न सकी। हर क्षेत्र के अनेक विशेषज्ञ इस घटना की परख करने आये, पर रहस्य पर से पर्दा कोई भी नहीं उठा सके, और अन्त तक यह रहस्य बना ही रहा।

इस बारे में सुप्रसिद्ध परा मनोविज्ञानी और दार्शनिक सी.एम.जॉड.ने बी.बी.सी. पर एक परि संवाद में भाग लेते हुए कहा था- “मैं भूतों पर विश्वास नहीं करता था, पर एक दिन जब मेरे ऊपर प्रयोगशाला में बैठे-बैठे चारों ओर से साबुन की टिकिया बरसनी आरम्भ हो गईं और खोज करने पर उसका कोई आधार नहीं सूझ पड़ा तो मेरा विश्वास बदल गया और मैं अब भूतों के अस्तित्व को मानता हूँ। साथ ही इनकी दुनिया के बारे में और विस्तार से जानने हेतु शोधरत भी हूँ।”

ब्रिटेन में प्रेत-सम्बन्धी विज्ञान सम्मत प्रतिपादन हेतु जितने परामनोवैज्ञानिकों-वैज्ञानिकों ने अपने संस्थान बनाये अथवा विश्व विद्यालयों में इनकी फैकल्टी खुली, यह अपने आप में एक कीर्तिमान है। न्यूयार्क से प्रकाशित पत्रिका “बियॉण्ड रियलिटी” के अनुसार इस समय लगभग छह सौ से अधिक शोध प्रतिष्ठान पाश्चात्य जगत में अदृश्य जगत की इसी एक विधा के रहस्यों की खोज में लगे हैं।

थियोसॉफिकल सोसायटी की जन्मदात्री मैडम ब्लैवेट्स्की को चार वर्ष की आयु से ही देवात्माओं का सहयोग प्राप्त होने लगा था। वह उनकी सहायता से इस प्रकार के कार्य कर डालती थीं, जो साधारण लोगों के वश की बात नहीं होती।

एक बार कर्नल हैनरी आल्काट उनसे मिलने आये तो वे मशीन से तौलिए सिल रही थीं और रह-रहकर कुर्सी पर पैर पटकतीं। आल्काट ने पैर पीटने का कारण पूछा तो उनने कहा कि एक छोटी प्रेतात्मा बार-बार मेरे कपड़े खींचती है और कहती कि मुझे भी कुछ काम दे दो। कर्नल ने मजाक में कहा कि- “उसे कपड़े सीने का काम क्यों नहीं दे देतीं?” ब्लैवेट्स्का ने कपड़े समेट कर आलमारी में रख दिए और उनसे बातें करने लगीं। बात समाप्त होने पर जब आलमारी खोली गई तो सभी कपड़े सिले पड़े थे।

श्रीमती ब्लैवेटस्की एक बार अपने सम्बन्धियों से मिलने रूस गईं। वहाँ उनके भाई के कानों तक उनके विलक्षण कार्यों की चर्चा पहुँच चुकी थी, किन्तु उनके भाई मैडम पर विश्वास नहीं कर सके। तब ब्लैवेट्स्की ने अपने भाई को एक हल्की सी मेज उठा लाने को कहा। वह ले आया। अब उन्होंने फिर कहा कि इसे जहाँ से लाये हो वहीं रख आओ। भाई ने भरपूर जोर लगाया पर वह इतनी भारी हो गई कि किसी प्रकार न उठ सकी। इस पर घर के अन्य लोग भी आ गये और सब मिलकर उठाने लगे। इतने पर भी वह उठी नहीं। जब सब लोग हार गये तो मैडम ने मुस्करा कर कहा चलो भाई! अब मेज को छोड़ दो।” इतना कहकर वे भाई से बोली, “अब मेरे साथियों ने उसे यथावत् कर दिया है। मेज फिर पहले की तरह हल्की हो गई। उसे उठाकर आसानी से जहाँ का तहाँ रख दिया गया। मैडम ब्लैवेटस्की अक्सर कहा करती थीं कि ऐसे कार्यों में सात प्रेत समय-समय पर उनकी सहायता करते थे। सुकरात भी हमेशा अपने प्रिय अदृश्य साथी “डेमन” की चर्चा करते थे जो उन्हें खतरों से बचाता, सहयोग देता रहता था, वे कहते थे वस्तुतः यह डेमन मेरे सुविकसित अन्तः करण का ही दूसरा नाम है। गेटे को भी ऐसी ही अनेकों अदृश्य अनुभूतियाँ होती थीं जो प्रायः सत्य सिद्ध होती थीं।

एक घटना 1956 की है। भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर तब एक मामूली किसान थे। वे सपरिवार जार्जिया के ग्रामीण परिसर में एक पुराने मकान में रहा करते थे। वह मकान पुराने ढंग का था और चारों ओर लंबे वृक्ष लगे हुए थे। सुना जाता है कि उस मकान का निर्माण सौ वर्ष पहले 1850 में हुआ था। जिमी कार्टर सन् 1956 से 1960 तक इस मकान में रहे। एक रात्रि उन्होंने मकान के एक कमरे में किसी की चीख सुनी। कौन चीखा था? क्यों चीखा था? यह जानने के लिए कार्टर और उनकी पत्नी ने घर का कोना-कोना छान मारा परन्तु कहीं कुछ नहीं मिला बाद में सामान गायब होने की घटनायें भी घटीं। अतः घर उन्होंने छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद उस मकान में और भी किरायेदार आए। एक दिन एक किरायेदार के कमरे से मध्यरात्रि में उसका बिस्तर ही गायब हो गया। वह तो सोया का सोया ही रहा किन्तु उसके नीचे का बिस्तर इस तरह गायब हो गया जैसे बिस्तर बिछाया ही न हो। यह देखकर सब आश्चर्यचकित रह गए, यदि कोई चोर आया भी था तो वह बिस्तर कैसे ले गया? और बिस्तर ही क्यों ले गया? जबकि अन्य किसी कीमती सामान छुए तक नहीं गए थे? यह गुत्थी अन्त तक किसी भी तरह नहीं सुलझ सकी।

पिछले दिनों ब्राजील के एक दैनिक पत्र ‘ओ क्रू जीरो’ के प्रतिनिधियों ने आँखों देखा और जाँचा हुआ समाचार छापा था कि साओपाओलो राज्य के ‘इटापिका’ नगर के एक किसान ‘सिडकान्टो’ के घर पर न जाने कहाँ से पत्थर बरसने लगे थे और घर में रहने वालों को घायल करते थे। भूत उपचारकों से लेकर अन्य सभी प्रकार के उपाय जब इसकी रोकथाम में विफल रहे तो पुलिस को सूचना दी गई। वे लोग भी रहस्य पर से पर्दा न उठा सके तो विषय सर्व साधारण की चर्चा का बन गया और देश ही नहीं विदेशों से भी लोग इस तथ्य का पता लगाने के लिए पहुँचे, किन्तु न तो घटनाक्रम को झुठलाया जा सका और न उसका रहस्योद्घाटन किया जा रहा। अन्त में वह स्थान निर्जन ही रहा।

विश्व विख्यात “लाइट” पत्रिका के सम्पादक जार्ज लेथम की अपने पत्र में एक लम्बी लेखमाला “मैं परलोकवादी क्यों हूँ” शीर्षक से कई अंकों में प्रकाशित हुई है। उनका पुत्र जॉन फैलडर्स के मोर्चे पर युद्ध में मारा गया था। तोप के गोले ने उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े उड़ा दिये थे, फिर भी उसकी आत्मा बनी रही और अपने पिता की आत्मा के साथ संपर्क बनाए रही। लेथम ने लिखा है- “मेरा पुत्र जॉन स्वर्गीय माना जाता है पर मेरे लिए वह अभी भी उसी प्रकार जीवित है जैसे वह किसी अन्य नगर में रहते हुए पत्र, फोन आदि के माध्यमों से सन्देशों का आदान-प्रदान करता हो!” उन्होंने अपनी मान्यताओं को भावावेश अथवा भ्रम जैसा न समझ लिया जाए, इसके लिए ऐसे प्रमाण किए हैं जिनके आधार पर सन्देह करने वालों को भी इस संदर्भ में प्रामाणिक जानकारियाँ प्राप्त करने और तथ्यों तक पहुँचने में सहायता मिल सके।

एक घटना अभी-अभी सन् 1971 की ही है। प्रसिद्ध पुरातत्वविद् और लेखक ‘डॉ. रोज’ दो कटी हुई खोपड़ियों का अध्ययन कर रहे थे जो एक पुराने खण्डहर की खुदाई करते समय मिली थी। जब वे इन खोपड़ियों को लेकर अपनी प्रयोगशाला में लौट रहे थे तो उन्होंने रात्रि को करीब दो बजे अचानक ठण्ड बढ़ गई है, ऐसा अनुभव किया। उस समय डॉ. रोज सो रहे थे। ठण्ड बढ़ जाने के कारण उनकी नींद खुल गई और उन्होंने अपने आस-पास एक छाया मँडराती हुई देखी उस छाया को उन्होंने बिस्तर से उठकर देखना चाहा तो वह बाहर निकल गई। डॉ. रोज ने उसका पीछा किया तो वह छाया कारीडोर को पार करती हुई बाहर निकल गई। जब तक उनके पास वे कटी हुई खोपड़ियाँ रही, तब तक उन्होंने छाया को अपने आस-पास मँडराते हुए देखा। जब उन्होंने खोपड़ियों का अच्छी तरह विश्लेषण कर लिया और उसे वापस विश्व-विद्यालय के पुरातत्व संग्रहालय में पहुँचा दिया तब छाया का दिखाई देना स्वतः बन्द हो गया।

वस्तुतः अदृश्य जगत के अनेकानेक पहलू अभी भी वैज्ञानिकों की मशीनी परिधि के बाहर है। चतुर्थ-पंचम आयाम की चर्चाएँ चला करती हैं लेकिन इन्हें किसी ने देखा नहीं। सूक्ष्म-अदृश्य जीवात्माएँ, जीवनमुक्त आत्माएँ अपने क्रियमाण कृत्यों के आधार पर नयी योनि प्राप्त होने तक इसी में विचरण करती रहती हैं। यदा-कदा वे अपने अस्तित्व का परिचय भी दे देती हैं। यह विधा जितनी विलक्षण-विचित्रताओं से भरी पूरी है, उतनी ही अन्वेषण की विशाल सम्भावनाओं से भरी हुई भी।


Quotation

आत्मा अनादि है, शाश्वत है, अनन्त है। उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। काय-कलेवर की समाप्ति ही मृत्यु नहीं है। मरणोत्तर जीवन के प्रसंग एवं जीवनमुक्त शरीर धारियों के सूक्ष्मीकरण के घटनाक्रम इनकी साक्षी देते हैं। सूक्ष्म लोक है एवं उसका अस्तित्व पूर्णतः तर्क सम्मत है, गुह्य विद्या के विशारदों का ऐसा अभिमत है।


फूल के मन में फल की (kahani)

फूल के मन में फल की भक्ति उमंगी। विलाप करते हुए उसने कहा- ‘जीवन धन, इष्ट देव, तुम कहाँ हो। तुम्हारे पाने के लिए मैं कितना छटपटा रह हूँ।’

फल दीखा भी नहीं और बोला भी नहीं, किन्तु अपनी मौन वाणी से कान में कहा- देखते नहीं, तुम्हारे अन्तर में ही तो छिपा बैठा हूँ।


यज्ञाग्नि एवं शब्द शक्ति का सूक्ष्मीकरण

गायत्री को देव संस्कृति की माता और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता कहा गया है। दोनों का युग्म है। गायत्री अनुष्ठान की पूर्ति यज्ञ का शतांश पूरा करने पर हुई मानी जाती है। पूज्य गुरुदेव के चौबीस लक्ष पुरश्चरणों की पूर्णाहुति सन् 1958 में सहस्रकुंडी गायत्री यज्ञ के साथ ही सम्पन्न हुई थी। गायत्री साधना को उन्होंने अपनी तपश्चर्या का केन्द्र बनाया एवं चिर पुरातन काल में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वारा सम्पन्न पुरुषार्थ को आज के युग में साकार कर दिखाया, इसे जन सुलभ बनाने का प्रयास किया। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार “स यत्कृत्सनां गायत्रीमन्वाह, तत् कृत्स्नंप्राणं दधाति” अर्थात्- “जो व्यष्टिगत एवं समष्टिगत जगत की व्यवस्था बिठाती एवं सामंजस्य स्थापित करती है, वही गायत्री है।” गायत्री मन्त्र का मनन करने वाले सिद्ध साधक इसी ऊँचे उद्देश्य के साथ भूःलोक से भुवः एवं स्वः लोक में ऊर्ध्वगमन करते एवं अपने सूक्ष्म किन्तु विराट् रूप द्वारा समष्टि का कल्याण करते हैं।

गायत्री यहाँ त्रिपाद है वहाँ यज्ञ अपने भावार्थ के कारण त्रिष्टुप भी है। त्रिष्टुप का अर्थ है- “तीनों की स्तुति।” योगत्रयी का एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण यज्ञ है जिसमें मानवी व्यक्तित्व के उदात्तीकरण हेतु उसे कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीवित रहने की कामना की जाती है- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविशेच्छता” समा (ईशोपनिषद्) कर्मयोग की इसी धारणा को परिपक्व करने हेतु मनीषी गणों ने अग्नि देवता की गतिशीलता, सक्रियता, ऊर्ध्वगमन की सहज वृत्ति को ही प्रधान माना एवं उसे श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा देने वाले यजुर्वेद के साथ जोड़ दिया है।

गायत्री साधना एवं यज्ञ के माध्यम से उसकी पूर्णता के मूल में दोनों के मध्य पारस्परिक सम्बन्धों को अच्छी तरह समझना होगा। यज्ञ की समूची प्रक्रिया ही सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया है। गायत्री की पूर्णता भी सूक्ष्मीकरण के साथ ही सम्पन्न होती है। गायत्री स्थूल वहाँ तक है, जहाँ तक कि उसके साथ यज्ञोपवीत और शिखा धारण वाले द्विजत्व संस्कार का सम्बन्ध है। यह स्थूल पक्ष है जिसे धूमधाम के साथ मनाया जाता है पर गायत्री की दिव्यता इतने से सम्पन्न नहीं हो जाती। उसके माध्यम से देवत्व प्राप्त किया जाता है। देवत्व कैसे मिले? इसके लिए मनु ने कहा है- “महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मी यं क्रियते तनुः।” अर्थात्- महायज्ञों एवं यज्ञों के द्वारा ब्राह्मण बनाया जाता है। ब्राह्मण जन्म से ही पैदा नहीं होता। इसका अर्थ यह हुआ कि जो-जो कार्य गायत्री को करना चाहिए, वह उसके उत्तरार्ध यज्ञ के द्वारा सम्पन्न होता है। इस प्रकार गायत्री और यज्ञ देवत्व एवं द्विजत्व प्रदान कर एक दूसरे के पूरक अन्योन्याश्रित हो जाते हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं अव्रती की आहुति को देव ग्रहण नहीं करते एवं “अमानुष इव वा एतद् भवति यद्त्र्तमुपैति” (शतपथ 1।2।3।23) के अनुसार जो व्रत धारण करता है वह देव तुल्य बन जाता है।” व्रत से तात्पर्य है गुण, कर्म एवं स्वभाव में श्रेष्ठता का संवर्धन एवं विचारों से अवाँछनीयताओं का निष्कासन।

गायत्री व यज्ञ दोनों सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद के समन्वित रूप के कारण परस्पर अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। सामवेद में याज्ञिक कर्मकाण्ड की नहीं, सूक्ष्मता की महत्ता है। यहाँ स्थूल हवि के स्थान पर भावनात्मक धरातल पर सूक्ष्म शब्द ऊर्जा से अभिपूरित मानसिक हवि का प्रयोग होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में शास्त्रकारों ने इस सूक्ष्मीकरण की बड़ी महत्वपूर्ण फल-श्रुतियाँ बतायी एवं गायत्री यज्ञ की महत्ता का प्रतिपादन इसी वैज्ञानिक रूप में किया है।

यहाँ चर्चा यज्ञ की विधा के सूक्ष्मीकरण पर प्रकाश डालने की की जा रही है। यज्ञ अपने आप में एक सूक्ष्म विज्ञान है। अध्यात्म सूक्ष्म को- चेतना को, कहते हैं। इसलिए उसका विज्ञान भी चेतनात्मक ही होना चाहिए। जड़ पदार्थ विज्ञान से तो सभी परिचित हैं। भौतिक विज्ञान को आजकल पाँचवीं कक्षा में पढ़ाया जाता है। उसे आवश्यक विषय माना गया है। यदि किसी को अध्यात्म विज्ञान को जानना हो तो उसकी शुरुआत यज्ञ से करनी होगी। यज्ञ में भौतिक विज्ञान के साथ-साथ जड़ का सूक्ष्मीकरण भी सम्मिलित है। इसलिये अध्यात्म विज्ञान को यज्ञ विज्ञान कहा जाय तो यह उचित ही होगा।

यज्ञ प्रक्रिया के सूक्ष्म रूप की इसी अभिव्यक्ति को यजुर्वेद की इस ऋचा में देखा जा सकता है- “यजमानः स्वर्ग लोकं याति” अर्थात् यज्ञ से यजमान (श्रेष्ठ आत्मा) स्वर्ग लोक को (अमरत्व को) प्राप्त होता है। वस्तुतः जीव के शुभाशुभ कर्म एवं गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही आत्मा को फलोपभोग प्रदान करते हैं। अग्नि में यजन किया गया या नहीं, यह स्थूल कर्मकाण्ड हुआ या नहीं, इस पर नहीं, अपितु यजनकर्त्ताओं का व्यक्तित्व एवं यज्ञ का प्रयोजन, प्रयुक्त साधनों का संस्कारी करण एवं सामूहिकता द्वारा बहुलीकरण की भावना जब तक न हो, यज्ञ को सम्पन्न हुआ नहीं माना जाना चाहिए।

यही बात मन्त्रों के सम्बन्ध में है। मन्त्र वही होते हैं जो प्रेस में कर्मचारियों द्वारा किताबों में छापे जाते हैं। उन अक्षरों को कोई भी साक्षर संस्कृत समझने वाला व्यक्ति पढ़ता चला जा सकता है किन्तु यदि सिद्ध मन्त्र बोलना है तो सिद्ध व्यक्तित्व सम्पन्न उद्गाता होना चाहिए। तब ही वह प्रभाव उत्पन्न हो सकेगा, जिसके बारे में शास्त्रों में शाप-वरदान-इत्यादि सन्दर्भों के रूप में वर्णन मिलता है। न केवल उद्गाता वरन् ब्रह्मा, ऊध्वर्यु, आचार्य, उद्गाता की पूरी टीम सामर्थ्य सम्पन्न होनी चाहिए ताकि सूक्ष्मीकृत प्रभावोत्पादकता उत्पन्न हो। शब्द शक्ति के परा, पश्यन्ति, मध्यमा, बैखरी के चार रूप प्रख्यात हैं किन्तु प्रवक्ता के लिए जो दो शर्तें जरूरी हैं, जिनसे सचमुच वाक् सिद्धि हुई मानी जाती है- वे हैं- काल कलेवर की तप संयम से परिष्कृत एवं व्यक्तित्व में निखारने योग्य शब्द ऊर्जा की उपलब्धि। शब्द शक्ति वस्तुतः एक सूक्ष्मीकृत ईंधन है। अगले दिनों जिस प्रकार ऊर्जा संकट मानवता के लिए समस्या बनने जा रहा है, लगभग उसी प्रकार शब्द शक्ति रूपी ईंधन का अभाव भी एक त्रासदी भरा संकट बनेगा। नवयुग के सृजन प्रयोजनों में अगले दिनों अनेकों बहुमुखी उत्पादनों की आवश्यकता पड़ेगी।

गायत्री व यज्ञ दोनों के ही सूक्ष्मीकृत रूपों की महत्ता उपादेयता शास्त्रों में वर्णित है। गायत्री मंत्र से ही यज्ञ कर्म किये जाने को प्रधानता देते हुए इन ऋचाओं का स्वर कहता है -”वागेव रिक् प्राणः समः” (छांदोग्य- 1-4) एवं आगे कहा है- श्रृचं वाचं प्रपद्ये, मनोयजुः प्रपद्ये, साम प्राणं प्रपद्ये। चौथा अथर्ववेद है जिसके मन्त्रों की प्रेरणा साधक को स्थित प्रज्ञ बनाकर आत्मशक्ति के उद्भव में सहायक भूमिका निभाती है। आत्म वचनों में सूक्ष्मीकरण का दर्शन निहित है, समग्र जीवन दर्शन को आत्मोत्कर्ष के स्वरूप एवं प्रक्रिया को इनमें पिरो दिया गया है।

गायत्री साधना एवं यज्ञ विधान दोनों में ही स्थूल की नहीं सूक्ष्म की महत्ता है। वही उस प्रभाव के लिए उत्तरदायी मानी जा सकती है जो साधक को अदृश्य के अधिकाधिक निकट लाने, देवत्व एवं द्विजत्व प्रदान करने तथा उसे ऋषि-महामानव स्तर के पद तक ऊँचा उठाने की महती भूमिका निभाती है।


Quotation

वाक् शक्ति ऊर्जा का अपरिमित स्रोत है। व्यक्तित्व के परिष्कार एवं नवयुग की ढलाई हेतु अगले दिनों गायत्री महाशक्ति के इस सूक्ष्मी कृत रूप को ही ईंधन रूप में प्रयुक्त किया जाना है। यज्ञ का दर्शन एवं सूक्ष्मीकृत रूप भी यही दर्शाता है कि पदार्थ की कारण शक्ति के उभार हेतु दोनों का युग्म देव-संस्कृति के विकास की दिशा में अभूतपूर्व भूमिका निभाता रहा है, आगे भी उसे ही निभाना है।


सूक्ष्मीकरण साधना में सहभागी बनने हेतु तीन अनिवार्य चरण

मनुष्य दो हिस्सों में बँटा हुआ है एक काया। दूसरा चेतना। काया को वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है और चेतना को चिन्तन की। काया भौतिक है। चेतना अध्यात्म। दोनों की अपनी-अपनी आवश्यकताएँ हैं। शरीर को अन्न, जल, वायु की- भोजन, वस्त्र, निवास की- आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार चेतना का निर्वाह एवं कार्यक्षेत्र चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार पर अवलम्बित है। शरीर को सुविधाएँ उपयुक्त मिलेंगी तो वह सुदृढ़ एवं दीर्घजीवी रहेगा। इसी प्रकार आत्मा के सम्मुख यदि चिन्तन परक परिस्थितियाँ उच्चस्तरीय रहें तो उन्हें समुन्नत होने का अवसर मिलेगा।

आत्मिक उत्कर्ष के लिए इन त्रिविधि सुयोगों की व्यवस्था रखी होती है। भावना- विचारणा एवं तत्परता को- गुण, कर्म, स्वभाव के नाम से जाना जाता है। इन्हें ही आस्तिकता- आध्यात्मिकता और धार्मिकता कहते हैं। उन्हें परिष्कृत करने की दार्शनिक विधि-व्यवस्था को कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग कहा गया है। शरीर को कर्म योग, मन को ज्ञानयोग और अन्तःकरण को- भक्तियोग द्वारा परिष्कृत किया जाता है। इन्हीं तीन वर्गीकरणों को स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की संज्ञा दी गई है। प्रकृति, जीव और ईश्वर के तीन भेदों में भी तत्वदर्शी इसी ब्रह्मांड की व्याख्या करते रहे हैं। भावना को परिष्कृत करने के लिए श्रद्धा- विचारणा को प्रज्ञा और तत्परता को निष्ठा द्वारा उच्चस्तरीय बनाया जाता है। दार्शनिक क्षेत्रों में इसी प्रकार के ऊहापोह, चेतनात्मक विश्लेषण के संदर्भ में होते रहते हैं। जिनके पास अधिक समय है, जिनकी विचारणा अधिक तीव्र है वे अनेक दार्शनिक प्रचलनों के अनुसार इन प्रतिपादनों पर विस्तृत विचार विनिमय करते रहते हैं। बुद्धि विलास की दृष्टि से यह उपयोगी भी है। और आकर्षक भी। जिन्हें अध्यात्म विज्ञान के संदर्भ में अधिक अभिरुचि है। वे इन सभी प्रसंगों पर विस्तारपूर्वक पठन, श्रवण, चिन्तन मनन एवं ऊहापोह करते रह सकते हैं।

जिन्हें काम चलाऊ सार संक्षेप भर जानना हो, उनके लिए इतना समझने भर से काम चल जायगा कि चेतना के तीन स्तर हैं। तीनों परस्पर गुँथे हुए हैं। तीनों को ही साथ-साथ विकसित करना होता है।

उपरोक्त तीनों क्षेत्रों को परिष्कृत करने के लिए जो विधा प्रचलित है उसके तीन भाग हैं- (1) उपासना (2) साधना (3) आराधना। उपासना के भाव क्षेत्र को साधना से चरित्र को और आराधना से व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश किया जाता है। यह तीनों साथ-साथ चलती हैं। जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का साथ-साथ सेवन क्रम चलता रहता है उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को अपने-अपने ढंग से उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।

अन्तःकरण में श्रद्धा की अभिवर्धन करने के लिए उपासना की जाती है। क्षुद्र को महान में- जीव को ब्रह्म में- परिवर्तित करने का यही उपाय है। उपासना करने से साधक तद्रूप बनता है। भगवान के गुण, भक्त में बढ़ना आरम्भ हो जाते हैं। समर्पण भावना से एकात्मता स्थापित होती है और अद्वैत स्थिति बनती है। इसके लिए बिन्दु सिन्धु जैसा ईंधन आग जैसा, पतंगे दीपक जैसा- बेल पेड़ जैसा- पतंग उड़ाने वाले जैसा ध्यान करने में, नदी सरोवर के मिलन में यही भाव है। सीमित ‘स्व’ के विराट् ‘त्वम्’ में विसर्जित करने से क्षुद्रता मिटती और महानता प्रकट होती है।

सभी प्रज्ञा परिजनों को नियन्त्रित उपासना करनी चाहिए। स्नान बन पड़े तो प्रातःकाल नियम से बैठकर न्यूनतम पन्द्रह मिनट आद्य शक्ति युग शक्ति गायत्री की उपासना करनी चाहिए। जिनसे इतना न बन पड़े वे आँख खुलते ही बिस्तर ही पर बैठे गायत्री का जप एवं सविता का ध्यान करते रह सकते हैं।

उपासना के माध्यम से आत्मा का परमात्मा के साथ ऐसा सघन सम्बन्ध सूत्र जुड़ता है जिससे दोनों के बीच आदान-प्रदान का तारतम्य जुड़ सके। यह वस्तुतः भावना क्षेत्र है। इसमें भक्ति की- रस सम्वेदना की उमंगें काम करती हैं। एकता और एकात्मता के लिए आत्मीयता आवश्यक है। एकता और आत्मीयता दोनों एक साथ रहती हैं। परमात्मा के साथ आत्मा को जोड़ना एकात्मता के सहारे ही सम्भव है। दोनों के बीच इस आधार पर जितनी घनिष्ठता उत्पन्न कर ली जायगी। उतना ही आदान-प्रदान चल पड़ेगा।

ईश्वर महान है- जीव इसका अंशधर होते हुए भी स्वल्प। स्वल्प में जितना अंश महानता का बढ़ता या भरता जाता है उतना ही वह पूर्ण एवं समर्थ बनता जाता है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए उपासना का अवलम्बन लिया जाता है।

उपासना का अर्थ है- समीप बैठना। समीप बैठने से अधिक प्रभावशाली के गुण, कम प्रभावशाली में आना आरम्भ कर देते हैं। चन्दन के समीप उगी हुई झाड़ियों में भी सुगन्ध आने लगती है। स्वाति बूँद पड़ने से सीप में मोती, बाँस में बंसलोचन, केला में कपूर उत्पन्न होने की किम्वदंती है। पारस छूने से लोहा सोना बनता है। सत्संग और कुसंग की अपनी-अपनी महिमा है। टिड्डे हरी घास पर रहते हैं तो हरे रंग के होते हैं पर जब घास सूखकर पोली पड़ जाती है तो उनका रंग भी बदल कर पीला हो जाता है। भगवान की समीपता का- उपासना का- भी वैसा ही प्रतिफल होना चाहिए। दो सरोवरों के बीच में यदि एक नाली बना दी जाय तो पानी ऊँची का नीची में चलने लगेगा और तब तक बहेगा जब तक दोनों का जल लेवल एक नहीं हो जाता। उपासना यदि सच्चे मन से की जाय तो उसका भी ऐसा ही प्रतिफल होना चाहिए। भक्त में भगवान की विशेषताएँ छलकनी चाहिए। हमने अपने उपासना क्रम में सदैव इन भाव तरंगों को अपने मानस पर आरोपित कर ऐसी ही अनुभूति की है एवं स्वयं को समग्र रूपेण इष्ट से घुला देने का प्रयास किया है।

भगवान को सद्गुणों का समुच्चय कहा गया है। मनुष्य के लिए इतना ही अंश उपास्य है, जो श्रेष्ठतम विशेषताओं से भरा-पूरा है। उसको निकट बुलाने की निकट पहुँचने की धारणा उपासना में की जाती है। इसके लिए नाम जप या रूप ध्यान का आश्रय लिया जाता है। भगवान यों सर्वव्यापी होने के कारण निराकार हैं। इसलिए उनका नाम रूप तो नहीं हो सकता पर हमारे मन की बनावट ऐसी है जिसके अनुसार बिना नाम रूप से परिकल्पना एवं ध्यान धारणा नहीं हो सकती। इसके बिना उपासना का योगाभ्यास नहीं बन पड़ता। इसलिए अध्यात्म विज्ञान के मनीषियों ने भगवान के साथ तादात्म्य स्थापित करने के लिए कोई नाम रूप वाला ‘इष्टदेव’ स्थापित करने का निर्देशन दिया है। इस प्रतिमा के साथ समर्पण की एकात्म भावना स्थापित की जाती है और द्विधा का भेद मिटाकर एकात्म स्थिति का ध्यान किया जाता है। नाम भी बार-बार इसीलिए लिया जाता है कि इष्टदेव की स्मृति निरन्तर बनी रहे।

आत्मिक प्रगति का दूसरा चरण है- साधना। पूरा नाम है जीवन साधना। जीवनचर्या को मानवी गरिमा के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से सुसंस्कारी बनाना। संक्षेप में यही है- साधना का उद्देश्य। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को निरन्तर काटते रहने पर ही वह मानवी गरिमा के ढांचे में ढलता है। अन्यथा नर-पशु जैसा अनगढ़ कुसंस्कारी ही बना रहता है। आत्म परिशोधन की आत्म-परिष्कार की प्रक्रिया जीवन साधना कहलाती है।

मदारी रीछ, बन्दरों को सिखाकर नाच दिखाने योग्य साध लेते हैं। सपेरे साँपों को अभ्तस्त करके उनसे अपने परिवार का पेट पालता है। सरकस वाले सिंह हाथी और बड़े-बड़े जानवरों से आश्चर्यजनक कौतूहल कराते हैं। बिना सिखाये तो बैल, घोड़े, ऊँट तक अपने-अपने उपयुक्त काम करना नहीं सीख पाते। फिर नर-पशु के देव मानव बनने की आशा कैसे की जाय। इसके लिए ही आत्म परिष्कार की जीवन साधना करनी होती है।

इसके लिए दो बार तो नियत उपासना के लिए चिन्तन-मनन के लिए बैठना पड़ता है। एकबार (1) आत्म समीक्षा (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म-विकास के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल करने के लिए। दूसरी बात अपने गुण, कर्म, स्वभाव में संयम शीलता का कितना समावेश हो रहा है वह परखने के लिए। चार संयम ही, चार तप कहलाते हैं। इन्हें अपने में बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। (1) इन्द्रिय संयम (2) अर्थसंयम (3) समय संयम (4) विचार संयम। इन चार कसौटियों पर अपने को कसते रहना चाहिए। जो भूलें होती हैं, कमियाँ, रहती हैं, उन्हें सुधारने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। एक साथ सारे दोष-दुर्गुण दूर न हो पाते हों तो भी निरन्तर यह प्रयत्न चलना चाहिए कि तुलनात्मकी दृष्टि से विगत कल की अपेक्षा आज सुधरा हुआ है और आज की अपेक्षा अगला कल अधिक पवित्र और प्रखर रहे। आत्म सुधार के लिए स्वयं प्रयत्नरत रहने का प्रयास ही जीवन साधना है। इसके लिए समय-समय पर अपने से अधिक समुन्नत लोगों से परामर्श भी लेते रहा जा सकता है। साधना के विषय में विस्तृत ऊहापोह पिछले अंक में विस्तार से किया गया है अतः उन्हें दुहराना अनिवार्य नहीं।

उपासना अर्थात्- चिन्तन। साधना अर्थात्-चरित्र। इन दो की चर्चा हो चुकी। अब तीसरी अध्यात्म परिष्कार प्रक्रिया है- आराधना। आराधना किसकी? विराट् ब्रह्म की। यह विराट् विश्व ही दृश्यमान भगवान का स्वरूप है। कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को- राम ने कौशल्या और काकभुसुण्डि को अपने इसी विराट् रूप से दर्शन कराया था। रामायण में उसी की अभिव्यक्ति ‘सियाराम मय सब जग जानी’ वाली चौपाई में की है।

समाज के प्रति मनुष्य के जो कर्तव्य हैं- उनमें उदारतापूर्वक परिपालन ही ‘आराधना’ है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उनका जीवनयापन असंख्यों की सहायता से ही चल पाता है। अस्तु उसका भी कर्तृत्व है कि ऋण मुक्ति के लिए लोक सेवा के कार्यक्रमों में निरत रहे। भगवान ने मनुष्य जन्म जैसा सर्वश्रेष्ठ उपहार इसी लिए दिया है कि वह उस धरोहर का सही प्रयोजन के लिए सही प्रयोग करे। विश्व उद्यान को श्रेष्ठ समुन्नत बनाने के लिए ही यह जन्म मिला है। जो इस अमानत का सही उपयोग करते हैं वे महामानव, ऋषि और देवमानव के उच्च पद प्राप्त करते हुए पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचते हैं। जो इस ओर से उपेक्षा बरतते हैं, सब अपने ही संकीर्ण स्वार्थ साधन में- पेट प्रजनन में निरत रहते हैं। इन पर जीवन सम्पदा के दुरुपयोग का दोष लगता है। कर्तव्य च्युत होने का पाप वहन करते हैं।

आराधना ठीक प्रकार बन पड़े इसके लिए दो उपाय बरतने पड़ते हैं एक है- सादा जीवन उच्च विचार। न्यूनतम में निर्वाह। परिवार को सीमित रखना और स्वावलम्बी बनना। दूसरा उपाय है बचत का अधिकांश भाग सत्प्रवृत्ति संवर्धन में नियोजित करना। इस प्रकार बहुत उपार्जित करने वाला अपना पुरुषार्थ तो भरपूर करता है पर जो कमाता है उसका अधिकाँश भाग लोक मंगल में खर्च कर देता है। सम्पदा जमा करते रहने से अनेक दुर्गुण, दुर्व्यसन उत्पन्न करती है। ईर्ष्या का उत्पादन करती और अपव्यय प्रचलन बढ़ाकर अनेकों को कुमार्गगामी बनाती है। स्वास्थ्य, धन, ज्ञान, प्रभाव यह सभी धन वैभव में सम्मिलित किये जाते हैं इस सबका अधिकाधिक मात्रा में होना तो उचित है, पर संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए विलास, संग्रह, अपव्यय एवं दुष्प्रयोजनों के लिए व्यय नहीं होना चाहिए। आराधना का यही सिद्धान्त है।

शरीर यात्रा के लिए जिस प्रकार अन्न, वस्त्र, निवास आदि का प्रबन्ध किया जाता है। उसी प्रकार आत्मिक समर्थता के लिए उपासना, साधना और आराधना की जीवनचर्या में नित्यकर्म की तरह स्थान देना चाहिए। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार के दोनों प्रयोजन इसी आधार पर बन पड़ते हैं।

शरीर की आवश्यकताएँ पूरी न की जाय तो वह दुर्बल रहेगा और बीमार पड़ेगा। इसी प्रकार आत्मा की उपरोक्त तीनों आवश्यकता पूरी न की जा सके तो फिर मनुष्य आत्मिक दृष्टि से निरन्तर गलता घुलता चला जाता है और अपनी वरिष्ठता खो बैठता है।

उपरोक्त तीन उपचार ही ऐसे हैं जिन्हें समग्र साधना कहा जा सकता है। इनके अन्तराल में समस्त सिद्धियाँ भरी पड़ी हैं। उपासना से दैवी अनुग्रह बरसता है और अदृश्य जगत की अतीन्द्रिय क्षमताओं का लाभ मिलता है।

जीवन साधना से व्यक्तित्व निखरता है। ऐसे व्यक्ति पवित्र, प्रखर और प्रामाणित होते हैं। इस कारण उन्हें सर्वत्र भरपूर सम्मान और सहयोग मिलता है। विभिन्न प्रयोजनों में जो भी ऊँचे उठे और आगे बढ़े हैं उन्हें प्रमुख सहायता जन सम्मान से मिली है। यह मात्र प्रामाणिक व्यक्तियों के लिए ही सुरक्षित है। आतंकवादी अपनी धूर्तता से आरम्भ में जो कमा लेते हैं उससे अनेक गुना घाटा वस्तुस्थिति प्रकट होते ही उठाने लगते हैं।

आराधना तो बीज बोकर सौगुना काटने के समान है। यह समाज भगवान का खेत है इसमें सत्प्रयोजनों के लिए भी अपना समय, श्रम, ज्ञान, वैभव, प्रभाव बोना है वह असंख्य गुना होकर वापस लौटता है। महामानवों के जीवन वृत्तांत इस लक्ष्य की परिपुष्ट में पग-पग पर असंख्यों प्रमाण उपस्थित करते हैं। दूसरों की सहायता कर वे वस्तुतः अपनी ही सहायता करते हैं। बादल बरसते हैं पर खाली नहीं होते। पेड़ फलता है, टूटते हैं, पर हर बार नये सिरे से आते हैं। ऊन कटती है नई उगती है। शरीर के अवयव कमाते पेट को देते और वहाँ से नये रक्त के रूप में नई जीवनी शक्ति प्राप्त करते हैं।

यह बात स्पष्ट समझ ली जानी चाहिए कि भगवान यदि बड़ा है तो भक्त उससे भी बड़ा है। भगवान निरन्तर अन्तरात्मा में बैठकर जीवन अनुदान का चरम अनुदान प्राप्त करने के लिए पुकारता रहता है पर भक्त बहरे कानों से भी नहीं सुनता। दूसरी ओर भगवान है जो सच्चे मन से सच्चे उद्देश्य के लिए पुकारने पर तत्काल दौड़ा आता है। गज-ग्राह, द्रौपदी-दुशासन, प्रहलाद-हिरण्यकश्यपु की कथाएँ जिनने सुनी हैं, उन्हें भक्त वत्सलता पर विश्वास होना चाहिए। सुदामा के पैर धोये और भृगु की उनने लात खाई थी। गोपियों की छाछ और शबरी की झूठन खानें पहुँचे थे। पर भक्त होने, भक्त चाहिए, ठग नहीं। भक्ति की पहचान जीवनचर्या से आदर्शों के समावेश से होती है पूजा-पाठ से नहीं। उपासना, साधना और आराधना की कसौटी पर कस कर यह जाना जा सकता है कि किसकी भक्ति सच्ची है किसकी झूठी?


पादरी अगस्तीन (kahani)

पादरी अगस्तीन ने एक नया गिरजा बनवाया। एक चित्रकार को बुलाकर प्रवेश द्वार पर मृत्यु का बड़ा चित्र बनाने का आदेश दिया। पादरी का कथन था- जो मृत्यु को स्मरण न करेगा वह ईश्वर के दरबार में प्रवेश न कर सकेगा।

चित्र बनकर तैयार हो गया। मौत के हाथ में तेज धार वाला कुल्हाड़ा था। पादरी ने पूछा यह क्यों? चित्रकार ने कहा- ‘मौत सबको काट पीटकर रख देती जो है।’

पादरी ने सुधार का निर्देश दिया और कहा- ‘कुल्हाड़ी हटाकर उसके स्थान पर चाबी भर मौत के हाथ में थमायें। परिवर्तन करते समय चित्रकार ने कारण पूछा तो अगस्तीन ने यही कहा- मृत्यु किसी को नष्ट नहीं करती। परिवर्तन का एक उपयोगी द्वार भर खोलती है।


Quotation

काय चेतना के परिष्कृत एवं विकास हेतु चेतना के तीनों ही स्तर ऊँचे उठाने होते हैं। साधना, उपासना, आराधना का त्रिविधि उपक्रम अपना कर प्रज्ञा परिजन पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना, जो युग धर्म की माँग पूरी करने हेतु उन्होंने प्रचण्ड तप पुरुषों के रूप में आरम्भ की है, के अंग बन सहज की श्रेयाधिकारी बन सकते हैं।


मौन साधना के सिद्ध साधक- महर्षि रमण

मदुरै जिले के तिरुचुपि नामक एक देहान्त में उत्पन्न वैंकट रमण अपनी ही साधना से इस युग के महर्षि बन गये। आत्मज्ञान उन्होंने अपनी ही साधना से उपलब्ध किया। अठारह वर्ष की आयु में उनने अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण कर लिया। दक्षिण भारत में बोली जाने वाली चारों भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। साथ ही अंग्रेजी और संस्कृत का भी। यह भाषा ज्ञान उन्होंने किशोरावस्था में ही प्राप्त कर लिया था। अब आत्म-ज्ञान की बारी थी, जिसके लिए उनकी आत्मा निरन्तर बेचैन थी।

एक दिन जीवन और मृत्यु का मध्यवर्ती अन्तर समझने के लिए उन्होंने अपने मकान की छत पर ही एकाकी अभ्यास किया। शरीर को सर्वथा ढीला करके अनुभव करले लगे कि उनके प्राण निकल गये, काया सर्वथा निर्जीव पड़ी है। प्राण अलग है। प्राण के द्वारा शरीर की उलट-पलट कर देखने की अनुभूति वे देर तक करते रहे। शरीर और प्राण की भिन्नता का उन्हें गहरा अनुभव होता रहा इसके बाद वस्त्र की तरह उन्होंने शरीर को पहन लिया। यह अनुभव उन्हें आजन्म बना रहा।

आत्मानुभूति का आनन्द जीवन भर लेते रहने के लिए वे अरुणाचलम् चल दिये यह पर्वत दक्षिण भारत में पार्वती जी की तपस्थली माना जाता है। तप के लिए यह स्थान निकटवर्ती और परम पवित्र लगा। घर से बिना सूचना दिये यहाँ चले आये थे सो उन्होंने घर वालों के कष्ट का ध्यान रखते हुए एक पत्र भेज दिया। साथ ही सदा यहीं रहकर सदा तपश्चर्या करने का अभिप्राय भी। मौन उन्होंने अपना तप स्वरूप बनाया। घर के सब लोग उनका दर्शन कर गये। वापस लौटने का अभिप्राय भी कहते रहे पर उनने अस्वीकृति सिर हिलाकर ही प्रकट कर दी।

महर्षि मौन रहते थे पर उनके समीप आने वालों और प्रश्न पूछने वालों को मौन भाषा में ही उत्तर मिल जाते थे। उनकी दृष्टि नीची रहती थी। पर कभी किसी को आँख से आँख मिलाकर देखा तो इसका अर्थ होता था, उसकी दीक्षा हो गई। उन्हें ब्रह्मज्ञान का लाभ मिल गया। ऐसे ब्रह्मज्ञानी बड़भागी थोड़े से ही थे।

आरम्भिक दिनों में वे अरुणाचल के कतिपय अनुकूल स्थानों में निवास करते रहे। पीछे उन्होंने एक स्थान स्थायी रूप से चुन लिया। आरम्भ में उनकी साधना का कोई नियत स्थान और समय नहीं था। पीछे वे नियमबद्ध हो गये, ताकि दर्शनार्थी आगंतुकों को यहाँ वहाँ तलाश में न भटकना पड़े।

महर्षि रमण सिद्ध पुरुष थे। मौन ही उसकी भाषा थी। उनके सत्संग में सब को एक जैसे ही सन्देश मिलते थे मानों वे वाणी से दिया हुआ प्रचलन सुन कर उठे थे। सत्संग के स्थान में उस प्रदेश के निवासी कितने ही प्राणी नियत स्थान और नियत समय पर उनका सन्देश सुनने आया करते थे। बन्दर, तोते, साँप, कौए सभी को ऐसा अभ्यास हो गया कि आगन्तुकों की भीड़ से बिना डरे झिझके अपने नियत स्थान पर आ बैठते थे और मौन सत्संग समाप्त होते ही उड़कर अपने-अपने घोंसलों को चले जाया करते थे।

संस्कृत के कितने ही विद्वान उनकी सेवा में आये अपने-अपने समाधान लेकर वापस गये। उन्हीं लोगों ने रमण गीता आदि कतिपय संस्कृत पुस्तकें लिखीं जिनमें महर्षि की अनुभूतियों तथा शिक्षाओं का उल्लेख मिलता है।

वे सिद्ध पुरुष थे पर उनने जान-बूझकर कभी सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं किया। भारत में योगियों की खोज करने वाले पाल ब्रंटन ने बड़े सम्मानपूर्वक उनकी कितनी ही अलौकिकताओं का उल्लेख किया है।

भारत को स्वतन्त्रता दिलाने में जिन तपस्वियों का उल्लेख किया जाता है उनमें योगीराज अरविन्द, राम-कृष्ण परमहंस और महर्षि रमण के नाम प्रमुख हैं।


Quotation

किसी ऐसे आदमी को दुर्भाग्य की शिकायत करते नहीं देखा गया जो मीठा बोलता हो, मेहनत से जी न चुराता हो और ईमानदारी का जीवन जीता हो।


नवरात्रि में शांति-कुंज में साधना करें

उपासना के लिए सभी स्थान सभी समय शुभ हैं। भगवान का नाम लेने में कहीं कोई दोष नहीं है। फिर भी स्थान और काल की विशिष्टता से इन्कार नहीं किया जा सकता। फसल समय पर बोई जाय तो उसका परिणाम अलग होगा और कुसमय बोने पर उतना ही श्रम करने पर भी प्रतिफल स्वल्प रहेगा। यही बात समय या क्षेत्र के सम्बन्ध में भी है। ऊसर और उर्वर भूमि में बीज बोने का अन्तर रहेगा। नागपुरी सन्तरे जितने मीठे होते हैं उतने अन्यान्य के नहीं। वर्षा ऋतु में बोया गया मक्का, बाजरा जितनी पैदावार जितनी जल्दी देता है उतना जाड़े या गर्मियों की ऋतु में बोने पर नहीं। खाद पानी और परिश्रम एक जैसा लगाने पर भी मौसम, क्षेत्र और समय का अन्तर जिस प्रकार फसल में रहता है। उसी प्रकार वह अन्तर उपासना के सम्बन्ध में भी रहता है।

गायत्री उपासना के सम्बन्ध में रोक कभी भी नहीं है, पर आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में उसके लिए विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रकारों ने उसका सौ गुना फल माना है। इसलिए विचारशील उपासक इस समय को चूकते नहीं और नौ दिन का अनुष्ठान कितना ही काम हर्ज होने पर भी करते हैं। साथ ही इसके लिए उपयुक्त स्थान तलाश करते हैं। जिन स्थानों में कुसंस्कार चिपके हैं वहाँ बैठ कर की गई साधना भी स्वल्प फलदायक होती है।

इसलिए इस निमित्त लोग तीर्थ भूमि तलाश करते हैं। यही कारण है कि हर साल गायत्री नगर, गायत्री तीर्थों में अनेकों श्रद्धालु साधक पहुँचते हैं और वहाँ नवरात्रि साधना करके अपेक्षाकृत अधिक लाभ उपलब्ध करते हैं।

गंगा का तट- सप्त ऋषियों की तपोभूमि, हिमालय का प्रवेश द्वार शांति-कुँज ऐसा ही है जिसमें नवरात्रि की अनुष्ठान साधना का अधिक पुण्य फल माना गया है। फिर यहाँ के वातावरण की भी विशेषता है। नित्य 24 लाख जप, नौकुण्डीय यज्ञशाला में 24 हजार आहुतियाँ, अखण्ड दीपक आदि कारणों से यहाँ साधना मय विशिष्ट वातावरण है। गायत्री के दृष्टा ऋषि विश्वामित्र की यह तपस्थली है। किस साधक के लिए क्या विशेषता का समन्वय हो, इसके लिए शारीरिक, मानसिक जाँच-पड़ताल की विशेषज्ञों द्वारा विशेष व्यवस्था है। संरक्षण के लिए उपयुक्त दिव्यात्मा चाहिए। सो यहाँ मौजूद है। अब तो गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण विधा चल रही है, इसलिए उनकी प्राण ऊर्जा भी साधक को चौबीसों घन्टे उपलब्ध रहेगी। यह सुयोग संसार भर में अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। यह असंख्यों का अनुभव है, इसलिए नवरात्रि साधना की बात जिनके मन में आती है, जिनके लिए किसी भी प्रकार सम्भव है, वे नवरात्रि का गायत्री अनुष्ठान करने के लिए शांति-कुँज दौड़ते हैं। भले ही इसके लिए कोई जरूरी काम ही हर्ज क्यों न होता हो।

इस बार आश्विन की नवरात्रि ता. 25 सितम्बर से आरम्भ होकर 3 अक्टूबर को समाप्त होती है। 4 अक्टूबर को विजयादशमी है। तिथि क्षय से कोई अन्तर नहीं पड़ता। अनुष्ठान साधना 9 दिनों में ही पूरी होती है। इस सत्र में जिन्हें आना हो, वे अभी से स्वीकृति प्राप्त कर लें।

हर साल आश्विन में शांति कुँज में दो नवरात्रियाँ मनाई जाती हैं क्योंकि सभी आगन्तुकों को एक में स्थान नहीं मिल पाता। फिर दशहरा, दिवाली के बीच अनेक विभागों की छुट्टियाँ भी रहती हैं। इसलिए एक दिन अपने जाने वालों के लिए खाली छोड़कर 4 से 23 अक्टूबर तक की एक नवरात्रि और मनाई जा रही है। जिन्हें पहली नवरात्रि में आना सम्भव न हो, वे दूसरी में आ सकते हैं। दोनों का ही समान महत्व है।

इस वर्ष एक नई विशेषता यह है कि गुरुदेव का सूक्ष्म शरीर प्रत्येक साधक के संपर्क में प्रत्यक्ष रहेगा। यह लाभ पिछले वर्षों में से कभी किसी को नहीं मिला। प्रत्यक्ष वार्तालाप या प्रवचन का थोड़ा सा समय ही हर साधक के हिस्से में आता था। इस बार दर्शन, परामर्श, प्रवचन, का परोक्ष सुयोग मिलेगा। प्रत्यक्ष वार्त्तालाप माता जी से हो ही जाता है। इस प्रकार विशेष लाभ है।


गुरुदेव का परिजनों से सूक्ष्म संपर्क

जब मनुष्य चारों ओर से अपने को असहाय पाता है, उसका स्वयं का पुरुषार्थ साथ नहीं देता तो एक ही अवलम्बन उसे शेष रहता है- परम सत्ता का। देवी अनुदान सुपात्रों को संकटों से बचाते व प्रगति का पथ प्रशस्त करते हैं। मनुष्य का सहज स्वभाव है कि वह प्रतिकूलताओं के बीच अपनी मनःस्थिति को सन्तुलित नहीं रख पाता। ऐसी स्थिति में उसे जिस ढाढ़स- सहारे की आवश्यकता रहती है, उस दायित्व को सत्पुरुष सदा से निभाते आए हैं। सन्त एवं ऋषि परम्परा का यह एक अपरिहार्य अंग है। भगवत् सता के अग्रदूतों ने सदा-सदा से यह दायित्व निभाया है कि जो दुःखी है उसके आँसू पोंछे जायें, हिम्मत दिलायी जाय, जो अभावग्रस्त है उसे पुरुषार्थ हेतु सामर्थ्य प्रदान की जाये।

प्रज्ञा परिवार पूज्य गुरुदेव के बहुमुखी जीवन क्रम की तपश्चर्याजन्य परिणतियों से जो अनुदान पा सकने में समर्थ हुआ है, उनकी चर्चा परस्पर तो चलती रही है, कभी उनका उद्घाटन नहीं किया गया। इसका कारण था- वह अनुबन्ध जो उनके द्वारा लगाया गया था। इस वर्ष अनायास ही एक मोड़ उनकी जीवनचर्या में आया एवं वे सूक्ष्मीकरण साधना में निरत हो गए। बहुसंख्य व्यक्ति तो सूक्ष्मीकरण का शब्दार्थ एवं भावार्थ भी नहीं समझ पाते। उनकी दृष्टि में तो पूज्यवर का प्रत्यक्ष मिलने-जुलने, अनुदान स्नेह-अनुग्रह बरसाने, हर व्यक्ति से घुलकर आत्मसात् हो जाने का क्रम बन्द हो गया। पहले गायत्री जयन्ती, फिर गुरु पूर्णिमा पर उनके प्रत्यक्ष चर्म चक्षुओं से दर्शनों की आशा भी धूमिल हो गयी। औरों को लगा- अब इस अभिनव निर्धारण से पूज्य गुरुदेव की झलक झाँकी वे देख नहीं पायेंगे।

लेकिन क्या ऐसा सचमुच हुआ कि गुरुदेव हम से दूर चले गए। शांति-कुँज की ऊपर की मंजिल पर अपनी कोठरी में एकान्त साधनारत गुरुदेव बसन्त पर दिए गए अपने आश्वासनानुसार वस्तुतः और भी विराट् हो गए एवं अगणित परिजनों को इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति न केवल युग तीर्थ आकर अपितु अपने-अपने स्थानों पर गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाते समय एवं यदा-कदा भी इस तरह होती रही, मानो वे सशरीर सामने खड़े हो- कष्ट कठिनाइयाँ सुन रहे हों, उनसे उबरने का साहस प्रदत्त कर लोक मंगल हेतु जुटने की प्रेरणा दे रहे हों।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक ऐसी अनेकों अनुभूतियाँ परिजनों ने प्रत्यक्ष सुनाई अथवा पत्रों द्वारा भेजी जिससे विदित होता है कि सूक्ष्मीकृत जीवन क्रम में प्रचण्ड साधनारत गुरुदेव अपने विराट् रूप में अब विश्वव्यापी हो गए हैं एवं पूर्व की ही तरह परिजनों के उतना ही निकट है जितना कि वे उपासना स्थली पर ध्यान की स्थिति में उन्हें पाते थे। उनका कार्यक्षेत्र अब सारा विश्व है एवं अन्यान्य धर्म सम्प्रदायों के अनुयायियों के लक्ष्य, राष्ट्राध्यक्षों- मनीषियों के मध्य सूक्ष्म रूप में विचरण कर उन्हें सतत् सत्प्रेरणाएँ दे रहे हैं ताकि युग विभीषिकाएँ- देवी विपत्तियाँ टाली जा सकें एवं प्रज्ञायुग का स्वप्न साकार हो सके।

जून एवं जुलाई के अखण्ड-ज्योति अंकों ने चर्म चक्षुओं से दर्शनों के आग्रह पर अड़े परिजनों के ज्ञान चक्षु खोले। कभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था- “दिव्यं ददामिते चक्षु” और अपना विराट् रूप दिखाया था। वे ही दिव्य चक्षु इन अंकों में वर्णित सारगर्भित गुरु वाणी सुनकर खुले और अनेकों को उस विराट् रूप के दर्शन हुए। प्रेरणा मिली, दिशा दिखाई दी एवं कदम उठते चले गए।

भुवाली (नैनीताल) के एग्रो साइन्टिस्ट डा. पी. सी. जोशी ने अपनी नियमित साधना क्रम में पूज्य गुरुदेव स्वयं साकार रूप में सामने खड़े हो उन्हें दिशा दे रहे हैं। उनकी पंचकोशी साधना में प्रगति की सूक्ष्म अनुभूति उन्हें होने लगी। प्रेरणा मिली कि अब शेष जीवन लोक-मंगल हेतु ही नियोजित करना है। उपासना, साधना के चरण पूरे हुए, अब आराधना का- समाज सेवा का समय आ गया। उन्होंने जल्दी ही अनिवार्य सेवा निवृत्ति ले युग देवता के चरणों में अपनी श्रद्धाँजलि चढ़ाने का संकल्प लिया है।

चिकित्सा व्यवसाय में पीड़ितों की, दुखियों की प्रत्यक्ष सेवा की जाती है। लेकिन हटा (दमोह) के डा. छुट्टनलाल नेमा मात्र चिकित्सा ही नहीं करते, अपने चारों ओर के क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक का विस्तार भी करते हैं। पूज्य गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण उपक्रम के साथ उन्हें प्रेरणा मिली कि अब कार्यक्षेत्र बड़ा है अतः युग तीर्थ चलकर अपने समय सुमन अर्पित करना चाहिए। मात्र तीस वर्ष की उम्र में स्थायी रूप से समाज सेवा हेतु समर्पित होने के इस संकल्प का मूल वे उस प्रेरणा को मानते हैं जो उन्हें परोक्ष रूप में सतत् आन्दोलित करती रही।

इब्राहिमपुर (म.प्र.) के श्री नारायण त्रिवेदी इसी अभिलाषा को लेकर गुरु पूर्णिमा पर आए थे कि सम्भवतः पूज्यश्री के दर्शन होंगे एवं वे अपनी उस असाध्य व्याधि से मुक्ति पा जाएँगे जो उन्हें गत एक वर्ष से ग्रास में लिए थी। शांति-कुज जाने का निर्णय लेते, उसके पूर्व ही अखण्ड-ज्योति से ज्ञात हुआ- अब उनके दर्शन नहीं हो पाएंगे। सुनी बातों के आधार पर बड़ी आशा लेकर गुरुपूर्णिमा पर आए तो प्रणाम के समय पाया “मानो वेद माताजी के पास छाया रूप में पूज्य गुरुदेव बैठे आशीष दे रहे, मुस्करा रहे हैं। प्रणाम के लिए झुकते ही लगा जैसे किसी ने पीठ को स्पर्श किया हो। व्याधि का सारा कष्ट उस दिन से चला गया।” प्रसन्न मन अपनी अनुभूति प्रकट करते वे चले गए।

औरंगाबाद के श्री दामोजी ने पहले कोई बार प्रवचनों में सुना था “शांति-कुँज से कोई खाली हाथ नहीं गया। जो भी अपनी कुछ आस लेकर आता है, यदि वह अवाँछनीय नहीं है तो पूरी अवश्य होती है।” श्री दामोजी अपने पुत्र का तो मिशन के आदर्शों के अनुरूप सादगी पूर्ण विवाह कर चुके थे। पुत्र एवं पुत्र वधू दोनों ही उन्हें आदर्श सहयोगी के रूप में मिले थे। किन्तु अपनी युवा पुत्री के विवाह की चिन्ता उन्हें गत एक वर्ष से मानसिक दृष्टि से व्यथित कर रही थी। लगता था, इसके लिए पूज्य श्री से कहना क्या उचित रहेगा? वे बसन्त के बाद अप्रैल मध्य में जब शांति-कुंज आए तो उन्हें लगा उनकी आशाओं पर एक तुषारापात और हो गया। पहले ही सीमित दर्शन देने का क्रम था, अब तो दर्शन देना भी बन्द कर दिया। वन्दनीय माताजी के समक्ष जब समूह में बैठे तो उनका बोलना आरम्भ होते ही, लगा- वे मुझे लक्ष्य कर रही हों- सब कुछ ठीक होगा। पीछे लगे चित्र में गुरुदेव मुस्कुराते दीखे और मन का असमंजस दूर हो गया। शांति-कुँज में ही परिजनों से चर्चा करते हुए उन्हें अपनी समस्या का हल मिल गया। उन्हें मध्यम वर्ग के एक उचित वर के विषय में बताया गया, सब कुछ दो माह में ही ठीक हो गया एवं गुरु पूर्णिमा पर वे पुत्री का विवाह कर निवृत्त हो गए।

प्रज्ञा परिजनों की अनुभूतियों का यह क्रम इतना असीम है कि इसे लिपिबद्ध करना सम्भव नहीं। सूक्ष्मीकरण की प्रतिक्रिया से जन-मन को अवगत कराने हेतु यह उचित समझा गया कि एक झलक मात्र ही दे दी जाय, यद्यपि उस पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है। यदि इतने से अन्यों को प्रेरणा मिले तो प्रतिबन्ध के बावजूद उलाहना भरी डाँट भली।

जितने परिजन गुरु पर्व व उससे पूर्व बसन्त के चार-चार दिवसीय सत्रों पर शांति-कुज आए, यही अनुभूति लेकर गए कि उन्हें माताजी के रूप में गुरुदेव के दर्शन हुए हैं। किसी को स्वप्न में गुरुदेव दिखाई दिए व सन्देश दे गए कि आगामी दो-तीन वर्षों में उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में क्या भूमिका निभानी है। जो-जो व्यक्ति जिस समस्या को मन में छुपाए गया था, आया तो स्वयं को उससे मुक्त पाया। श्री रामनिवास पाण्डे (विजय नगर म. प्र.) अपने प्रज्ञा परिवार के अन्तर्विग्रह से बड़े व्यथित थे। शांति-कुज गए तो माताजी के समक्ष मुख से कह तो नहीं सके लेकिन यह आश्वासन सूक्ष्म रूप में मूक स्वर में उन्हें मिल गया कि विग्रह मिटेगा, सहयोग बढ़ेगा। आए तो उन्होंने स्वयं में भी बदलाव पाया व परिजनों में भी। अपने प्रज्ञा परिवार के इस कायाकल्प को वे चमत्कार मानते हैं।

अन्दर पारिवारिक कलह एवं बाहर शत्रुओं से मुकदमें बाजी श्री बृजनारायण श्रीवास्तव (मधुपरुर) के मिशन के कार्य में सतत् बाधा डालती था। ज्ञानरथ था, पर चलाने की उमंग मन में नहीं उठती थी। जून अंक पढ़ते ही शान्ति कुँज आ पहुँचे। रात्रि को स्वप्न देखा। शान्ति-कुँज के जिस भवन में पूज्य श्री रहते हैं, उधर से एक प्रकाश का गोला आकर सामने आता दिखाई पड़ा। लगा- उस प्रकाश पुँज से निकलकर गुरुदेव कह रहे हैं अब तुम्हारी सब मुसीबतें दूर हुईं, निश्चित होकर अपना काम करो। आँखें मलते हुए उठे। देखा सब कुछ गायब हो गया था। घर पहुंचने पर पाया कि उनके शत्रुओं ने कर्ज मुक्ति हेतु समझौते के लिए प्रार्थना दाखिल कर दी थी। घर में भी उन्होंने चमत्कारी परिवर्तन पाया। व अब भी उस स्वप्न को याद कर अपना शाम का ज्ञानरथ चलाने का संकल्प नित्य पूरा करते हैं। वह उस सूक्ष्म सत्ता का कोटि-कोटि धन्यवाद देते हैं, जिसके कारण वे वर्तमान स्थिति को प्राप्त हो सके।

इन दिनों शान्ति कुँज में स्थायी रूप से आ बसने वालों की होड़ मची है। जबलपुर के सिविल सर्जन डा. अमलकुमार दत्ता, झांसी के श्री बालकृष्ण अग्रवाल, अमृतसर से श्री सन्तप्रसाद त्रिपाठी, प्रेमनारायण गुप्ता, मुन्नालाल, कटारे, रामाधार शर्मा, हेतराम पटेल एवं नरेंद्र देव जैसे अनेकों पूर्ण समय के लिए आने वाले जानते व अन्यों को जताते हैं। कि कैसे उनकी अंतःप्रेरणा ने, गुरुदेव की सतत् सूक्ष्म उपस्थिति ने उन्हें चैन से नहीं बैठने दिया एवं शान्ति कुँज आकर लोकमंगल हेतु समर्पित करने को बाध्य कर दिया। ऐसे अनेकों पत्र नित्य आ रहे हैं। सामान्य से लेकर सुशिक्षित उच्च पदस्थ व्यक्ति लिखते हैं कि गुरुदेव उन्हें सूक्ष्म रूप में सतत् अपने समक्ष दिखाई देते व निर्देश देते हैं। कि “झंझटों से लोक जंजाल से मुक्ति पाकर समाज सेवा में- युग धर्म में जुट जाओ। तुम ऋषि आत्मा हो इसीलिए तुम्हें बुलाने मैं स्वयं आया हूँ।”

दूर रहने वालों- देशवासियों व प्रवासी भारतीयों को तो ये अनुभूतियाँ हो ही रही हैं, जो गुरु-पूर्णिमा पर आए, वे अनेकों से कहते सुने गए कि गुरुपूजन के समय, प्रसाद पाते समय उन्हें सतत् यही लगता रहा कि प्रत्यक्ष गुरुदेव उनके साथ हैं। उनके कक्ष की ओर टकटकी लगा कर खड़े अनेकों श्रद्धालुओं ने स्थूल रूप में तो नहीं, अपने सूक्ष्म रूप में अंतश्चक्षुओं से गुरुदेव को देखा और प्रेरणा से अभिपूरित करते पाया। जो भी यहाँ से गया, वह इसी सन्तोष के साथ गया कि सूक्ष्म रूप में तपश्चर्या रत गुरुदेव अब उसके और भी समीप हैं- उसके लिए प्रेरणा स्रोत बनकर अन्दर विराजमान है। अब उसे किसी कमी का कभी आभास न होगा।

छाया पुरुष सिद्धि का लोगों ने नाम सूना था जिनमें आत्म सत्ता कई गुना हो जाती है पर इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति सारे प्रज्ञा परिवार को सतत् उनकी अपने समक्ष उपस्थिति के रूप में, समस्या निवारण से लेकर दिशा निर्धारण तक में हो रही है। ऐसी ही अनुभूतियां यह आश्वासन प्रबल बना देती हैं कि गुरुदेव का अभिनव निर्धारण कितना महत्वपूर्ण सामर्थ्यों से भरा-पूरा है। युग सन्धि की इस विषम बेला में उनकी प्रचण्ड तप साधना के इस पुरुषार्थ की हर परिजन ने अपने ही अन्तः में अनुभूति की है। उन्हें लग रहा है कि वे भी सूक्ष्मीकरण साधना के सहयोगी बन गये हैं ताकि वे अपने लिए निर्धारित भूमिका भली-भांति निभा सकें।

-ब्रह्मवर्चस्


मानव नहीं देवता है वह

(बाबूलाल जैन “जलज”)


सुर, दुर्लभ (kavita)

सुर, दुर्लभ मानव तन पाकर, जो प्रभु के गुण गाये। सत्य सरोवर में जिसका मन शतदल-सा लिख जाये॥

सुनकर करुण पुकार दीन की, तुँर दौड़कर जाते। अपनी बांहों को फैलाकर, हँसकर गले लगाता है॥

पर सेवा जीवन-सुख समझे; आत्म-धर्म पहिचाने। मानव नहीं देवता है, जो पीर पराई जाने॥

जो विशाल वट-तरु-सा सबको, शरण प्रेम से देता। बदले में पर कभी किसी से, कुछ न जन्म भर लेता॥

जो न रौंदता चले पगों से, बिखरे पथ शूलों को। जो फैलाता अखिल-विश्व में आत्मा ज्ञान फूलों को॥

जिसे सुहाते नहीं जन्म भर, भौतिकता के गाने। मानव नहीं देवता है, जो पीर पराई जाने॥

जिसका है विश्वास अलौकिक, अपनी पुण्य कमाई। जिसे सहचरी लगती, अपने जीवन की कठिनाई॥

कथनी के बदले करनी में, जिसे आत्म सुख होता। सुनकर व्यथा-कथा दुःखियों की, जो न चैन से सोता॥

जो न दुखाता हृदय किसी का नहीं मारता ताने। मानव नहीं देवता है, जो पीर पराई जाने॥

जिसका अन्तःकरण न सोता, देह भले सो जाये। मिथ्या माया-जाल बिछाकर, कभी न मन भरमाये॥

लोभ-मोह की कठिन ग्रन्थियाँ, जो न कभी भी पाले। सदाचार की लहरों में जो, ले उत्ताल उछाले॥

कर देता जो प्राण निछावर, विश्व-शान्ति सुख पाने। मानव नहीं देवता है जो, पीर पराई जाने॥

*समाप्त*