कोई भी परिजन इस वर्ष इस श्रेय सौभाग्य से वंचित न रहें

विगत एक वर्ष में परिस्थितियों ने बड़ी तेजी से मोड़ लिया है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे परिवर्तन हुए हैं जिनके विषय में प्रत्यक्षवादी बुद्धिजीवी समुदाय को कभी अनुमान भी नहीं था। आने वाले दिन और भी विषम होंगे। तब सृजन की तैयारी के साथ-साथ जटिलताएँ, प्रतिकूलताएँ भी बढ़ती चली जाएँगी। प्रज्ञा परिजनों के लिये अखण्ड-ज्योति प्रतिपादन एक प्रकार की आत्मिक पोषण-अभिपूर्ति की भूमिका अपने जन्मकाल से निभाते चले आए हैं। विषमताओं के मध्य संकल्प बल बढ़ाने, दैनन्दिन जीवन में व्यावहारिक मार्गदर्शन देने की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इस पत्रिका ने प्रारम्भ से ही उठायी व निष्ठा पूर्वक निभायी है। इसमें परिजनों का भी योगदान है जिन्होंने इस प्रतिपादनों को अन्य अनेकों तक पहुँचाकर पाठकों की संख्या लक्षाधिक पहुँचा दी है।

यह वर्ष पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना का वर्ष रहा है। उनकी लेखनी का प्रसाद जिस प्रकार परिजनों को मिलता रहा है, उसमें पिछले अन्य वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष विशिष्ट भूमिका निभाई है। यह क्रम रुकने वाला नहीं है, अनवरत चलेगा। साधना से सिद्धि के रहस्यों का उद्घाटन, मानवी अन्तराल में देवत्व का जागरण, संव्याप्त परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन, सन्धिकाल की बेला में निभाए जाने वाले उत्तरदायित्वों सम्बन्धी मार्गदर्शन आगे उनकी मनीषा के माध्यम से ही प्राप्त होता रहेगा। प्रत्यक्षतः दर्शन देने का, परामर्श का क्रम जो पहले चलता था, उस पर अब पटाक्षेप पड़ चुका है। उनसे वार्तालाप करने, मार्गदर्शन पाने एवं संरक्षण अनुदान ग्रहण करने का माध्यम अब “अखण्ड-ज्योति” एवं “युग निर्माण योजना” ये दो ही पत्रिकाएँ हैं। जो परिजन जितने अधिक व्यक्तियों तक इस लेखनी प्रसाद को पहुँचाएँगे, वे प्रकारान्तर से पूज्यवर की वाणी एवं परोक्ष शक्ति सामर्थ्य के प्रसार-विस्तार के जन-जन तक इसे पहुँचाने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। इस तरह उन्हें भी गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में सहभागी बनने का सौभाग्य मिलेगा।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि व्यावहारिक अध्यात्मिक का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देने वाली एवं परिवार- समाज- राष्ट्र निर्माण की दिशाधारा देने वाली इन दोनों पत्रिकाओं की तुलना में अन्य कोई विचारोत्तेजक साहित्य सामग्री इन दिनों और कोई है नहीं। प्रयास तो यह भी किया जा रहा है कि जहाँ हिन्दी मुख्य संपर्क भाषा नहीं है, वहाँ भी प्रज्ञा आलोक फैले। यदि बन पड़ा तो आगामी बसन्त से ही अन्यान्य भाषाओं में इस नवनीत का अनुवाद कर उन क्षेत्रों में मिशन की विचारणा को व्यापक बनाने का प्रयास किया जाएगा, जहाँ भाषा की कठिनाई के कारण यह सम्भव नहीं हो पाया है। गुजराती व उड़िया भाषा में तो इन पत्रिकाओं का सार प्रकाशित होता ही रहा है। इंग्लिश, बंगला, पंजाबी, तेलगू एवं तमिल ये पाँच अन्य ऐसी भाषाएँ हैं जिनमें विस्तार की असीम सम्भावनाएँ हैं।

परिजनों ने वर्ष 1984 में बढ़ी हुई सामग्री एवं बदले कलेवर में अखण्ड-ज्योति पत्रिका को देखा, सराहा एवं अपनी सम्मतियाँ केन्द्र को भेजी हैं। पाठ्य सामग्री में सम्मिलित कई नए विषयों की गुणवत्ता की प्रशंसा करते हुए लागत मूल्य में प्राप्त होने वाली इस सामग्री को बढ़े हुए चन्दे के साथ सभी ने सहर्ष स्वीकार किया है। आगामी वर्षों में इस सामग्री को और भी सरस, बोधगम्य बनाने का प्रयास किया जाता रहेगा एवं यथा सम्भव इसी वार्षिक मूल्य व कलेवर में परिजन पत्रिका को पाते रहेंगे। अब पत्रिका अड़तालीसवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। ऐसी प्रौढ़ परिपक्व, ठोस एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शक प्रेरणाप्रद सामग्री का लाभ अन्य अनेकों को भी मिले, इसका प्रयास हर परिजन को करना चाहिए। नये ग्राहक बनाना व पुरानों से चन्दा वसूल करके शीघ्र भिजवा देना प्रारम्भ से ही पूज्य गुरुदेव के जन्मदिवस बसन्त पर्व की श्रद्धाँजलि के प्रतीक रूप में माना जाता रहा है। यह वर्ष तो कई कारणों से विशिष्ट भी है। चौबीस जीप गाड़ियाँ इन दिनों ढाई हजार कार्यक्रम सारे देश के ग्रामीण कस्बाई क्षेत्रों में सम्पन्न कर रही हैं। इससे मिशन का कार्यक्षेत्र बढ़ा है। नये संपर्क में आये सभी व्यक्तियों को पत्रिका की पाठ्य सामग्री से लाभान्वित करने का श्रेय प्राप्त करने का सबसे अच्छा अवसर यही है।

वर्ष 47 संस्थापक -वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दिसम्बर 1984 वि.सं. आश्विन कार्तिक-2050 अंक-12 उपासना विशेषाँक वार्षिक चंदा :- भारत में 40/- आजीवन -550/- विदेश में 350/


तप :- जो सार्थक सिद्ध हुआ


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वे बड़ी मुसीबतों के दिन थे। गृह कलह में फँसा भागीरथ का परिवार अभिशप्त होकर यन्त्रणाओं में जल रहा था। कई वर्षों से दुर्भिक्ष पड़ रहा था। जनता एक-एक बूँद पानी के लिए तरस गई थी। गंगा नाराज होकर स्वर्ग पधार गयी थी। राजकोष खाली पड़ा था। भागीरथ निन्दा और चिन्ता से बेचैन थे। प्रजाजन उस इलाके को छोड़कर कहीं और बसने जा रहे थे। वातावरण भय और आतंक से भरा था।

महर्षि भारद्वाज का परामर्श लेकर भागीरथ एकाकी तप करने के लिए हिमालय एकान्तवास को चले गए। गंगोत्री के समीप सुमेरु शिखर के नीचे भागीरथ शिला पर उनने कठोर तप आरम्भ कर दिया। लक्ष्य एक ही था- रूठी गंगा को वापस बुलाना। वे जुट पड़े। शिवजी ने उनका तप सार्थक बनाने में सहायता की। बड़ी कठिनाई से गंगा वापस लौटीं। समय बदला, संकट टला और दुर्भिक्ष पीड़ितों ने सन्तोष की साँस ली।

भागीरथ के पीछे भागीरथी चल पड़ीं। तप में जो न्यूनाधिक कमी शेष थी उसकी पूर्ति सप्तर्षि मिलकर एक साथ सप्त सरोवर में करने लगे।

सुख शान्ति का समय लौटा, सप्तर्षियों का प्रयास पूर्ण हुआ। भागीरथ की तपश्चर्या ने सारा वातावरण बदल दिया। सबने तप की महिमा और एकाकी पुरुषार्थ की गरिमा जागी। शान्ति को लौटाने का यही एक मार्ग था।


अतीन्द्रिय क्षमता बनाम प्रचण्ड आत्मशक्ति

परा मनोविज्ञान शाखा के अंतर्गत अतीन्द्रिय क्षमताओं के कई अचरज भरे प्रदर्शन देखने को मिलते हैं। दूरदर्शन, दूरश्रवण, स्वप्नसन्देश, प्रेतसंपर्क, भविष्य कथन, पुनर्जन्म विषयक ऐसी अनहोनी अनेकों घटनाएँ हैं, जो सामान्यतया देखने को मिलती हैं।, इन्हीं की खोजबीन होती रहती है और यह पता लगाने का प्रयत्न किया जाता रहता है कि मस्तिष्क में क्या और क्यों ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न होती हैं जो सामान्यजनों में देखने को नहीं मिलती। इन दिनों भौतिकवाद की दृष्टि में इतना ही छोटा अध्यात्मवाद है। इन सब में जो अतीन्द्रिय क्षमता के नाम से देखा जाता है उसमें एक तथ्य समान रूप से काम करता है कि किसी व्यक्ति विशेष में यह क्षमताएँ उत्पन्न हुई देखती जाती हैं, उसे निजी रूप से चमत्कारी अनुभव होते हैं। वह उनका विवरण दूसरों को सुनाता है। जाँच करने पर वह कथन सही पाया जाता है। आश्चर्य प्रकट किया जाता है और कारण की खोज पर माथा-पच्ची होती रहती है। अब तक यही होता रहा है।

इस विधा से एक चरण और बढ़ना चाहिए था तभी बात दूसरों तक पहुँचती। जो अनुभव स्वयं होते हैं, वे दूसरों को भी कराये जाते। अपने अन्दर जो विशेषता प्रकट हुई है, वह दूसरों में भी प्रकट कराई जाती। विवरण को सुनने वालों से जो बात सम्बन्धित है उसका वे लाभ उठा लेते। पर इससे आगे बढ़कर वे अपना कार्यक्षेत्र नहीं बढ़ा सकते। उस शक्ति से अन्यान्यों को सम्पन्न नहीं कर सकते। जो अनुभव अपने को होते हैं उससे घनिष्ठ लोगों का ही सम्बन्ध होता है। ऐसा नहीं होता कि जो उस मण्डली में नहीं हैं वे भी उस विशेष वेत्ता की सहायता से वैसी ही जानकारियाँ प्राप्त कर सकें अथवा लाभ उठा सकें।

आँख में पट्टी बाँध कर मोटर साइकिल चलाने में मात्र इतना ही आश्चर्य है कि जो कार्य खुली आँखों से किया जा सकता है, उसे दूसरा आदमी आँखें बन्द करके कर सकता है। अच्छा होता ऐसे व्यक्ति किन्हीं अन्धों की दृष्टि खोल देते और वे सामान्य लोगों की तरह देखना आरम्भ कर देते। तब तो यह भी कहा जा सकता था कि इस जादुई शक्ति का कोई वास्तविक लाभ भी है। जादूगर अपनी हाथाफेरी से कई तरह के तमाशे दिखाते रहते हैं। वर्तमान विज्ञात अतीन्द्रिय क्षमता को लगभग उसी स्तर की कहा जा सकता है और इस प्रकार के व्यक्ति को एक खास किस्म का जादूगर समझा जा सकता है। मृतकों का आह्वान करने वाले अपने मित्र सम्बन्धियों को ही बुलाते और घर गृहस्थी की ही बातें पूछते देखें गये हैं। अभी तक किसी ने यह हिम्मत नहीं की कि राष्ट्रीय गुत्थियों को सुलझाने के लिए सरदार पटेल, पं. नेहरू, महात्मा गाँधी जैसे सुलझी हुई आत्माओं का परामर्श प्राप्त करें और सिद्ध करें कि यह परामर्श सचमुच उतने सुलझे हुए स्तर के लोगों का ही हो सकता है।

तांत्रिक हवा में हाथ मारकर लौंग, इलायची के कुछ दाने मँगा सकते हैं। ऐसा नहीं कर सकते कि एक बोरी लौंग नित्य मँगा दिया करें अथवा हीरा-पन्ना आदि बहुमूल्य रत्न नित्य मँगाकर किसी महत्वपूर्ण कार्य की पूर्ति हेतु आर्थिक कठिनाई का चिरस्थायी समाधान कर दें। शाप वरदान भी उनके छोटे स्तर के ही होते हैं। भविष्य कथन भी अनिश्चित। किसी विषय में यहाँ तक कि तेजी मन्दी तक के सम्बन्ध में भी छाती ठोंक कर कुछ नहीं कह सकते। लाटरी के नम्बर या सट्टे के उतार-चढ़ाव तो क्या बताएंगे। शाप-वरदान भी वे मुहल्ले, पड़ौस वालों को ही दे पाते हैं। राष्ट्रों की बदलती राजनीति को मनचाही दिशा में मोड़ देने की सामर्थ्य किसी अतीन्द्रिय क्षमता का दावा करने वाले में नहीं देखी गई।

इन सब बातों को दृष्टि में रखते हुए परामनोविज्ञान शाखा के अंतर्गत जिस अतीन्द्रिय क्षमता के प्रामाणिक सबूत भी पाए गए हैं उनमें इतना ही निष्कर्ष निकलता है कि वह जादूगर स्तर का कोई खेल तमाशा भर है। इसके सहारे किन्हीं बड़ी सार्वजनिक समस्याओं का हल निकालने की आशा नहीं की जा सकती। ऐसी दशा में उसे अध्यात्मिक शक्ति भी नहीं कहा जा सकता। बहुत हुआ तो मानसिक विकास का एक चरण भर कह सकते हैं। हिप्नोटिज्म सम्मोहन का खेल मात्र उनसे हो सकता है। वे लोगों को अचम्भे में डाल सकते हैं। उनकी गतिविधियाँ कुछ ही व्यक्तियों तक सम्बन्ध साधने या प्रभावित करने की हो सकती हैं। ऐसी दशा में किसी महत्वपूर्ण भूमिका की भी उनसे आशा नहीं की जा सकती।

यह चर्चा गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण प्रयास के संदर्भ में कही जा रही है। इसे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहने वाले जादुई घटनाक्रमों से सर्वथा भिन्न समझा जाना चाहिए। उसका प्रभाव मित्र-पड़ौसियों को कोई छोटी हानि लाभ पहुँचाने जैसा होगा, यह भी नहीं सोचना चाहिए। ऐसा तो उनके जीवन में सदा ही होता रहा है। लोगों ने ध्यान दिया नहीं, वरन् हर दिन उनके क्रियाकलापों में विलक्षणता देखी जा सकती थी। उन्हें कुछ बड़ा काम करना है व्यापक काम करना है, इसलिए अतीन्द्रिय क्षमताओं में उनके सभी संकल्प, प्रयास एवं कार्यक्रमों को नहीं ही गिनना चाहिए। वे बड़े कदम उठाने जा रहे हैं उसी की तैयारी में उनकी मौन एकान्त साधना इन दिनों चल रही है।

युग परिवर्तन से सम्बन्धित कदमों में वातावरण को बदलना प्रमुख है। वातावरण को बदलने के लिए व्यक्तियों का स्तर बदला जाना है। इसके साथ-साथ सार्वजनिक गतिविधियों में उथल-पुथल होना आवश्यक है। यही तीनों ही काम ऐसे हैं। जिसके लिए विशिष्ट कार्य पद्धति अपनानी होगी और उसके लिए विशेष क्षमता चाहिए। बुद्धकाल में जन-साधारण की मनोवृत्ति धर्म के नाम पर कुकर्मों में निरत और प्रसन्न रहने की थी। उस वातावरण को बुद्ध द्वारा बदला गया। कुछ ही दशाब्दियों में न केवल भारत का वरन् समूचे एशिया का कायाकल्प हो गया। इतने बड़े परिवर्तन की सहज आशा न थी। गाँधी काल अद्भुत था। दो हजार वर्षों की पराधीनता भोगते-भोगते मनुष्य का रोम-रोम गुलाम हो गया था। अंग्रेजों के सात समुंदर तक फैले हुए शासन का आतंक ऐसा था जिसमें किसी के हाथ-पाँव चलना तो दूर मुँह तक नहीं खुलता था। पर वातावरण ऐसा बदला कि गाँधी की आँधी पत्तों और धूलि कणों को उड़ाकर आसमान तक ले गई और परिस्थितियाँ इतनी बदलीं कि अँग्रेजों को पैर जमाए रहना मुश्किल हो गया। उनने सलाह मशविरा करके सत्ता हस्तांतरित कर दी।

रावण का आतंक पूरी तरह छाया हुआ था। सीता को वापस लाने के युद्ध में एक भी राजा सहयोगी न बना। सबको अपनी-अपनी जान प्यारी थी। उस जमाने में रामराज्य की स्थापना का माहौल बना। न केवल सोने की लंका वाला दसशीश बीस भुजा वाला रावण मरा, उसके एक लाख पूत सवा लाख नाती वाला कुटुम्ब भी सफाचट हो गया। उन दिनों कोई आशा नहीं करता था कि 14 वर्ष के वनवास काल में इतनी बड़ी उथल-पुथल सम्भव हो जायेगी।

यह वातावरण की बात हुई। व्यक्तियों के पुरुषार्थ का प्रसंग भी देखने ही योग्य है। तान्त्रिक अनाचार के विरुद्ध जहाँ किसी की भी जीभ नहीं खुलती थी वहाँ देखते-देखते लाखों चीवर धारी भिक्षु-भिक्षुणी मैदान में कूद पड़े और भारत एशिया समेत विश्व में धर्म चक्र प्रवर्तन की असम्भव प्रक्रिया को सम्भव कर दिखाने लगे। यह आँधी-तूफान का काम था। उपदेश सुनाने भर से इतने लोग किस प्रकार इतने बदल जाते और जो कार्य जीवन भर में कभी सुना सीखा तक नहीं था उसे कैसे कर दिखाते। सत्याग्रहियों की सेना में लाखों निहत्थे लोग जेल जाने, घर बरबाद करने, गोली खाने, फाँसी पर चढ़ने के लिए तैयार हो गए। इन्हीं कहीं फौजी ट्रेनिंग नहीं मिली थी। जिन्हें वर्षों खर्चीली ट्रेनिंग मिलती है उनमें से भी बहुत से पीठ दिखाकर भागते देखे गए हैं, पर गाँधी के सत्याग्रही रातों रात न जाने कहाँ से ढलकर आ गए और ऐसा कमाल दिखाते रहे जिससे सारी दुनिया दाँतों तले उँगली दबाए रह गई। यह व्यक्ति निर्माण है। गोवर्धन पहाड़ का वजन उठाने वाले इतने वजन के नीचे पिचक कर मर सकते थे, पर हिम्मत का कमाल देखा जाये कि गोवर्धन उठाना था तो उठा करके ही दम लिया। लंका युद्ध तो छिड़ गया पर सैनिक कहाँ से आएँ। दैत्य कुंभकरण जैसों के मुँह में चारा बनने की हिम्मत किस समझदार में उत्पन्न हो। रीछ, वानर रातों रात दौड़ते चले आये और निहत्थी स्थिति में अस्त्र-शस्त्रों वाले असुरों से भिड़ पड़े। रीछों में इंजीनियरों की शानदार भूमिका निभाकर रख दी। इसे कहते हैं दैवी चमत्कार।

इस प्रक्रिया में पराक्रम और साधनों का अगला चरण है। अंगुलिमाल जैसे दुर्दान्त दस्यु ने उस दिन युद्ध का सिर उतार लेने की योजना बनाई थी। निहत्थे साधु के सामने पहुँचा तो शक्ति हीन हो गया। थर-थराकर काँपने लगा और शत्रुता छोड़कर मित्रता के बन्धन में बँध गया। साधनों की बारी आई तो बिना झोली पसारे ही काम चल गया। आम्बपाली का तीस लाख का खजाना एक ही दिन में मिला और ढेरों संघाराम वाला विहार बनकर तैयार हो गया। काम बढ़ा सो बड़े साधनों की आवश्यकता पड़ी। नालन्दा विश्वविद्यालय के संचालन का काम अशोक ने और तक्षशिला का उत्तरदायित्व हर्षवर्धन ने अपने कन्धे पर उठा लिया। चीन के समूचे क्षेत्र में अवरोधों का ढाँचा सहयोगियों में बदल गया। गाँधी का युद्ध, राणा प्रताप के युद्ध से बड़ा था। तब एक भामाशाह निकलकर आए थे। अब जमुनालाल बजाजों की भीड़ लग गई। पराक्रमियों में क्रान्तिकारियों की गदर पार्टियाँ देश विदेश में तहलका मचाने लगीं। सुभाषचन्द्र बोस, भगतसिंह और चन्द्रशेखरों की कमी न रही। धन के बिना साधनों के बिना भी वह काम रुका कहाँ? विनोबा जैसे अकिंचन पचास लाख एकड़ जमीन माँग लाए। गाँधी स्मारक निधि पर एक करोड़ और कस्तूरबा निधि पर साठ लाख रुपया बरस पड़ा। खादी उद्योग, सर्वोदय जैसी गाँधी द्वारा आरम्भ की गई अतिरिक्त प्रवृत्तियों में अरबों रुपया लग गया। यदि समूचे स्वतंत्रता संग्राम का कोई अनुमान लगाए तो प्रतीत होगा कि उसमें न साधन कम लगे, न पराक्रम में न्यूनता पड़ी। राम इधर से नंगे पैरों वनवास गये थे, उधर से पुष्पक विमान में बैठकर आए। कृष्ण वन में गौयें चराते थे, पर पीछे उनके साथी द्वारिकापुरी वासी और वे स्वयं द्वारिकाधीश कहलाए। पराक्रम तो उन्हें भी बचपन से ही करना पड़ा।

यह इतिहास की कुछेक प्रतिभाओं की चर्चा है। जिनने वातावरण बदला-सुयोग्य सहकर्मियों की मण्डली जुटाई और पराक्रम तथा साधनों की आवश्यकता पड़ी तो दौड़ती चली आई। जमाने की प्रतिकूलता एक ओर और एक व्यक्ति का पौरुष एक ओर। घनघोर अन्धेरे में प्रकाश उत्पन्न करने वालों को अध्यात्मवादी कहा जा सकता है। जिनने अपनी अथवा दूसरों की आत्मशक्ति के सहारे समूचे समय को बदल डालने वाले चमत्कार दिखाये, उनके सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि उनमें आत्मशक्ति की और उसके सहारे उन्होंने ऐसे काम कर दिखाये जो आत्म-शक्ति की गरिमा को बताते और बढ़ाते हैं।

प्रश्न प्रचलित अतीन्द्रिय क्षमताओं का है जो इन दिनों परामनोविज्ञान के नाम पर तथाकथित अतीन्द्रिय क्षमताओं के नाम पर शोध का विषय बनी हुई हैं। ऐसे कितने ही व्यक्तियों की- उनके चमत्कारों की चर्चा होती रहती है और समझा जाता है कि आत्मशक्ति नाम की यदि कोई वस्तु होती है तो उसकी इतनी ही छोटी सीमा है। यहाँ इन पंक्तियों में यह बताया जा रहा है कि आत्मबल इससे सर्वथा भिन्न है। उसमें कौतुक कौतूहल नहीं है। वरन् वैयक्तिक न होकर सार्वजनिक उपयोग का अति महत्वपूर्ण भण्डार है। उसका उत्पादन आड़े समय में होता है। महामानव उसे उत्पन्न करते हैं और उसका सुनियोजन वातावरण को बदलने में- सहयोगी- महामानवों की सेना जुटाने में होता है। पराक्रम पौरुष की आवश्यकता उसी के बलबूते पूरी की जाती है और साधनों को इस प्रकार जुटाया जाता है जैसे सूखे आसमान में से घटाटोप वर्षा होती है और हरीतिमा का दृश्य देखकर आँखें अचंभे से चकित रह जाती है।


सामयिक गतिविधियों में तत्परता

मनुष्य के स्थूल शरीर में सभी अंग अवयव अपने महत्वपूर्ण दायित्व निबाहते हैं। योगाभ्यास के बलबूते कभी-कभी वे अपनी विलक्षण क्षमता का परिचय देने लगते हैं। श्वास क्रिया की साधना करने पर नाड़ी की गति न्यूनाधिक हो जाती है। हृदय की साधना करने से धड़कन रुक जाती है और योग तन्द्रा में समाधि जैसी स्थिति बन जाती है। मस्तिष्क इन सबसे विलक्षण है। उसकी सात प्रतिशत क्षमता ही दैनिक प्रयोजन में काम आती है। शेष सोई पड़ी रहती है। अभ्यास से अथवा पूर्ण संस्कारों से इनमें कुछ अविज्ञात अनभ्यस्त शक्तियाँ एक सीमा तक जीवित हो जाती हैं।

आत्मबल की साधना सूक्ष्म शरीर के बलबूते ही सम्भव होती है। जिस प्रकार शरीर में बहिरंग और अन्तरंग अवयव होते हैं उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर की संरचना के साथ गुँथे हुए अनेकों अदृश्य अवयव भी हैं और वे सभी अपनी-अपनी विशेषताओं से भरे हुए हैं। इनमें से कुछ का परिचय इस प्रकार है- (1) पंचकोश (अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश), (2) षट्चक्र (मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूरित चक्र, अनाहत चक्र, आज्ञाचक्र, एवं सहस्रार चक्र), (3) त्रिग्रन्थि- (हृदय ग्रन्थि, नाभि ग्रन्थि, मस्तिष्क ग्रन्थि), (4) ब्रह्मरन्ध्र, (5) कुण्डलिनी (प्राण सर्पिणी), (6) तीन नाड़ी- (इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना)। इन सबके स्थानों और कार्यों का वर्णन करना यहाँ सम्भव नहीं। इसके लिए सूक्ष्म शरीर का पूरा ढाँचा बताना पड़ेगा और साथ ही यह विवेचन करना पड़ेगा कि इनमें प्रत्येक की क्या विशेषता और क्या साधना है। आवश्यक नहीं कि उनमें सभी की एक साथ साधना की जाय और सभी को बलिष्ठ एवं जागृत बनाया जाय। यह समूचा साधना विज्ञान समय साध्य है। इसमें से जिसकी जब आवश्यकता होती है तब उनका प्रयोग आवश्यक तप संयम अपनाने के बाद किया जाता है।

यह समस्त जानकारी शरीर विज्ञान से कहीं अधिक बढ़ कर है। एम.बी.बी.एस. करने में पाँच वर्ष लगते हैं। इसके आगे दो साल सीखे को पचाने व तीन वर्ष एम.डी. या एम.एस. की डिग्री प्राप्त करने में लगते हैं। कुल मिलाकर शरीर विज्ञान की पूर्णता के लिए नौ वर्ष चाहिए। इससे आगे सीखना हो तो कोई सीमा बन्धन वर्षों का नहीं। सूक्ष्म शरीर के अवयवों का स्वरूप वर्णन और कार्यक्रम समझने के लिए इससे कम नहीं वरन् और भी अधिक समय लगना चाहिए। चूँकि इस विषय पर अभी तक कोई साँगोपाँग अनुभूत ग्रन्थ नहीं छपा है। इसलिए प्रचलित परम्पराओं में से किसी का आश्रय लेकर आगे बढ़ने की ही प्रथा है। किसी पारंगत प्रवीण मार्गदर्शक के मिल जाने पर मार्ग सरल हो जाता है। अन्यथा भटकना पड़ता है और गलत रास्ते पर चल पड़ने से कई बाल उल्टी हानि होने की आशंका रहती है। यह परम्परागत शास्त्रीय निर्धारित मार्गों का संकेत है। गुरुदेव ने इन दिनों मार्ग अपनाया है उसे पंचकोशों और षट्चक्रों की साधना का सम्मिश्रण कहा जा सकता है। दुर्गम हिमालय स्थिति दादा गुरु के मार्गदर्शन में यह प्रक्रिया चल रही है। आरम्भ में 24 गायत्री महापुरश्चरणों की साधना 24 वर्षों में उन्हीं के निर्देश में हुई। इसके उपरान्त युग परिवर्तन की कार्य पद्धति पूरी करते रहने में 34 वर्ष लग गए। अब एक वर्ष की एकान्त साधना इस निमित्त है कि अपने प्रसुप्त पाँच वीर भद्रों को जागृत करके उन्हें अपने-अपने जिम्मे के क्रिया-कलाप सौंप दिए जायें। इसके उपरान्त वर्तमान स्थूल शरीर जब तक भी रखा जाना अभीष्ट है। तब तक एक घोंसले का काम करता रहेगा। एक बड़े घोंसले में कई अण्डे बच्चे रहते हैं। जब तक उसमें काम चलता है, निर्वाह करते रहते हैं। आवश्यकतानुसार हर पक्षी अपना अलग घोंसला भी बना सकता है।

शिवजी के पास कुछ वीरभद्र थे उनमें से एक ने निर्देशानुसार दक्ष का यज्ञ विध्वंस किया था। अन्य सभी निर्देश की प्रतीक्षा में रहते थे और अपने-अपने बताए कार्यों की आज्ञाएँ पालन करते थे। गुरुदेव अपने घोंसले में जिन वीरभद्रों को इस वर्ष पका रहे हैं, वे पाँच प्रमुख देवताओं से सम्बन्धित हैं- (1) सूर्य (2) इन्द्र (3) वरुण (4) अग्नि (5) पवन। कुन्ती ने भी दुर्वासा के मार्गदर्शन में अश्विनी कुमार सहित पाँच देवताओं की पृथक-पृथक साधना की थी और पाँच पाण्डवों एवं कर्ण को पुत्र रूप में जन्म दिया था। गुरुदेव के और कुन्ती के देवताओं में भी अन्तर है और साधना विधान में भी। प्रजनन की प्रक्रिया सरल और सर्वविदित है। पर बिना इस प्रक्रिया के जन्म देना हो तो कार्य कठिन जान पड़ता है।

शरीर में रक्त, माँस, अस्थि, नाड़ी, और चर्म यह पाँच प्रधान भाग हैं। इनमें से हर एक को अलग-अलग निकालना हो और उनका स्वतन्त्र समुच्चय खड़ा करना हो तो वह कठिन पड़ेगा। एक शरीर के टुकड़े किए जायें तो हर टुकड़े में उपरोक्त पाँचों वस्तुएँ सम्मिश्रित मिलेंगी। पर यदि हर एक को सर्वथा पृथक् करके उनकी सर्वथा स्वतंत्र संरचना करनी पड़े तो वह कठिन पड़ेगा। दधीचि को केवल अस्थियाँ निकालनी पड़ी थीं। उन्हीं का वज्र बनना था इसलिए उन्हें यह कार्य अधिक कठिन पड़ा।

शरीर में पाँच कोश और पाँच चक्र परस्पर उसी प्रकार गुँथे हुए हैं जिस प्रकार स्थूल शरीर में रक्त, माँस, हड्डी, नाड़ी और चर्म। हर एक को अलग करने की साधना अत्यधिक कठिन है। पाँच कोश और पाँच चक्र सर्वप्रथम अलग किए जायें फिर दोनों का नर-नारी जैसा युग्म बने, इनमें पाँच देवताओं की स्थापना की जाये और नियत अवधि तक इन्हें पकने दिया जाये तब पाँच वीर भद्रों के पकने की समर्थ होने की प्रक्रिया पूरी होती है। गुरुदेव को दादा गुरु के संरक्षण में यह सारी विधा उसी प्रकार एकाकी रहकर निपटानी पड़ रही है।

इसके लिए एक वर्ष नियत था जो समाप्ति की ओर है। इस अवधि में पूरा काम निपट जाय तो ठीक। अन्यथा अधूरा रह जाने पर अधूरे वीरभद्र ही काम करने लग जायेंगे और जो काम बचेगा उसे अगले किसी कलेवर में पूर्ण करेंगे। कोयल बच्चे नहीं पालती तो अपने अण्डे कौवे के घोंसले में रख जाती है। कौवा इन्हें अपने समझकर पाल लेता है। बच्चे बड़े होकर कोयल के झुण्ड में जा मिलते हैं।

साधना की दृष्टि से गुरुदेव के लिए यह एक वर्ष अत्यधिक कठिन रहा है। विघ्नकारी शक्तियाँ उद्देश्य को खण्डित करने के लिए विविध-विधि आक्रमण कर रही हैं। गत बसन्त से पूर्व ही आसुरी शक्तियों का एक आक्रमण हो चुका है। अभी अगला बसन्त आने में काफी समय है। इस बीच भीतरी और बाहरी कोई भी आक्रमण हो सकता है। इससे वीर भद्रों के पकने में नई अड़चन आ सकती है। ऐसी दशा में जो कच्चापन रह जायेगा वह दूसरे पक्षी के नीचे रखकर पका लिया जायेगा। हल हालत में जो काम हाथ में लिया है उसे पूरा करके ही रहा जायेगा। परिस्थितियाँ बदलने पर क्या परिवर्तन और क्या व्यवस्था क्रम अपनाना पड़ सकता है इसकी व्यवस्था और तैयारी समय रहते कर ली गई है।

अपने वीर भद्रों को पालना और निर्धारित कार्यों में जुटाए रहने का काम इतना बड़ा है कि गुरुदेव को उसी में व्यस्त रहना पड़ेगा। लोगों से मिलने जुलने का जैसा सिलसिला पहले चला करता था अब उसका अन्त ही समझना चाहिए। उनका वही पुराना शरीर अभी है, इसके प्रमाण स्वरूप इतना बन सकता है कि किन्हीं विशेष पर्वों पर दर्शन कभी भी हो जाया करें। कुछ कहना हो तो मानसिक संकेतों से कह लिया जाये। अरविन्द या रमण में से किसी की शैली अपनाई जा सकती है। किन्तु वार्तालाप की कहीं कोई गुँजाइश न होगी।

गुरुदेव को जन-साधारण का मार्गदर्शन करना है, इसके लिए लेखनी सतत् चलती रहेगी। इस सन् 2000 तक कौन लेखनी पकड़े रहेगा इसका प्रबन्ध भी कर दिया गया है। सन् 2000 तक अखण्ड ज्योति गुरुदेव के तात्कालिक सन्देश लेकर एवं उसके बाद भी यथा समय निकलती रहेगी। वाणी को विराम देने हेतु पहले से ही शान्ति-कुँज के कार्यकर्ता प्रशिक्षित कर दिए गए हैं। इस प्रकार भेंट मिलन का अभाव किसी को अखरेगा नहीं। जो कुछ सेवा सहायता चिरकाल से चलती रही है। उसमें कमी न आने देने का ऐसा प्रबन्ध किया गया है कि प्रस्तुत शरीर कैसी भी दृश्य अथवा अदृश्य स्थिति में रहेगा, किसी को भाव अभाव खटकेगा नहीं।


वीरभद्रों का स्वरूप और उपक्रम

पंच ज्ञानेन्द्रियों, पंच कर्मेन्द्रियों तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय वाला स्थूल शरीर प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता और व्यवहार में आता है। इसके अधिष्ठाता को प्राणी कहते हैं। प्राणी तभी तक जीवित रहता है जब तक स्थूल शरीर सक्रिय है। लोक व्यवहार इसी के सहारे चलते हैं। दैनन्दिन जीवन व्यापार से आगे चलकर अन्य चार शरीर और रह जाते हैं। वे अध्यात्म प्रयोजनों में काम आते हैं। कहीं इन्हें तीन, कहीं पाँच माना गया है। तीन ग्रन्थियाँ, ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रंथि एवं रुद्र ग्रंथि हैं। इसके आधार पर भी ऋषियों ने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर माने हैं। किन्तु दूसरे मत द्वारा पंचकोशों को प्रधानता दी गयी है और साथ ही हर कोश को एक स्वतन्त्र शरीर भी माना है। ये हैं अन्नमय कोश- प्राणमय कोश- मनोमय कोश- विज्ञानमय कोश एवं आनन्दमय कोश। इस मान्यता के अनुसार पाँच शरीर बन जाते हैं। यह पाँच तत्वों से भिन्न हैं, पाँच प्राण भी इनसे पृथक् हैं। यहाँ पाँच कोश पाँच दैव शक्तियों से अनुप्राणित होते हैं। सूर्य, इन्द्र, अग्नि, पवन और वरुण इन पंचकोशों के अधिष्ठाता हैं।

सूक्ष्मीकरण प्रयोजन में इन कोशों को ऐसी विशिष्ट विधि से जागृत किया जाता है कि छह चक्रों में से पाँच इन कोशों के साथ लिपट जाते हैं। इन गुंथित शरीरों को वीरभद्र कहा गया है। इनमें से पाँचों का एक स्वतंत्र शरीर भी है जिन्हें क्रमशः फिजीकल बॉडी, ईथरीक बॉडी (डबल), एस्ट्रल बॉडी, मेण्टल बॉडी एवं कॉजल बॉडी थियोसॉफी मान्यतानुसार कहा जाता रहा है। इन्हें पाँच लोक भी कहते हैं। जिनकी आत्मा सूक्ष्म शरीर की जिस स्थिति में स्व्यं को सक्षम एवं मजबूत बना लेती है, तब उस लोक में वास करने लगती है, ऐसा माना जाता है। हर लोक की शक्तियाँ, सिद्धियां और उनकी चमत्कारी फलश्रुतियाँ पृथक्-पृथक् हैं। भिन्न-भिन्न प्रसंगों में ये शक्तियाँ परस्पर मिलकर तीसरी अभिनव क्षमता को जन्म देती हैं। कब किस कोश को क्या पुरुषार्थ करना पड़ सकता है, इस क्रम से उनके सम्मिश्रण गुँथते और टूटते रहते हैं। यह प्रकृति की उसी विधि व्यवस्था के समान होता है जिसमें ऊर्जा एक, स्थिर, अविनाशी होते हुए भी भिन्न रूपों में होती है एवं परिस्थितियों के अनुसार अपना रूप बदलती रहती व कभी एक समुच्चय के रूप में विद्यमान होती है।

इन पाँच वीरभद्रों का कार्यक्षेत्र अत्यन्त व्यापक एवं सार्वजनिक है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ व्यक्तिगत चमत्कार कर दिखाती हैं किन्तु कोशों की क्षमता एक ही समय में प्रकृति के हजारों व्यक्तियों को उनकी पात्रता के अनुरूप प्रभावित करती हैं, उन्हें एक जैसी प्रेरणा देती हैं और एक दिशा में- एक मार्ग पर चलाती हैं। जो वीरभद्र के साथ संपर्क साधने में समर्थ हो जाते हैं, वे अनुभव करते हैं कि उन्हें किसी विशेष प्रयोजन के लिये- किसी दिशा विशेष में बलपूर्वक धकेला जा रहा है। सामान्यतया लोक-शिक्षण, प्रवचन, परामर्श, दबाव, प्रलोभन एवं आतंक बल से ही किसी के विचार परिवर्तित किए जाते हैं और पुराना अभ्यास- निज का स्वभाव न होते हुए भी वह करा लिया जाता है जो सशक्त कराने वाला कराना चाहता है।

इसके लिए स्थूल शरीर वाली पाँच शक्तियाँ स्थूल शरीर में तो सामान्य रहती हैं परन्तु सूक्ष्म स्थिति में जाकर अपनी विशिष्टता दिखाने लगती हैं। इनके प्रभाव थोड़ी मात्रा में स्थूल शरीर में भी परिलक्षित होते हैं किन्तु सूक्ष्मशरीर में जब उनकी आवश्यकता अधिक पड़ती है तब वे प्रचण्ड हो जाती हैं। पाँच वीरभद्रों की ये पाँच स्वतन्त्र शक्तियाँ इस प्रकार हैं- बायोइलेक्ट्रीसिटी (जैव विद्युत), बायोमैग्नेटिज्म (जैव चुम्बकत्व), रेडिएशन (विकिरण), क्रिएशन-रिप्रोडक्शन (प्रजनन- नव निर्माण), इम्युनिटी (प्रतिरोधी क्षमता) सक्रिय होने पर सूक्ष्म शरीर द्वारा पाँचों का प्रयोग प्रभाव डालने में नियोजित होता है। युग परिवर्तन की इस प्रक्रिया में प्राणवान व्यक्तियों की जिन्हें महती भूमिका निभानी है, आन्तरिक परिवर्तन किया जाना है। उनके गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसे तत्वों का प्रवेश कराया जाना है जो प्रचलन के हिसाब से तो अभ्यास में नहीं थे परन्तु महान् प्रयोजन के निमित्त उनकी अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार परिवर्तन टिकाऊ होता है।

स्वभाव बदलने में तो हल्के दबावों से भी काम चल जाता है किन्तु जब उन्हें किसी उच्चस्तरीय मोर्चे पर बढ़ाया जाता है और कुछ कर गुजरने की स्थिति तक पहुँचाया जाता है तो उन प्राणवानों की नसों में नए सूक्ष्म इन्जेक्शन दिये जाते हैं। यह प्रक्रिया कहाँ सम्पन्न हो? इसके लिये उपयुक्त स्थान है- सूक्ष्म शरीर में अवस्थित नाड़ी गुच्छक। यों गुच्छकों (प्लेक्सस) को चक्र भी कहते हैं, पर वे वस्तुतः दो अलग-अलग सत्ताएँ हैं। गुच्छक नजर आ जाते हैं। परन्तु सूक्ष्म विद्युतप्रवाह दृष्टिगोचर नहीं होता। लड़ने के लिये शराब पिलाकर मोर्चे पर भेजा जाता है तो वह सूक्ष्म सत्ता इतना पराक्रम दिखाती है कि आदमी अपने मरने-जीने की बात भूल जाता है। ठीक इसी प्रकार वीरभद्र क्षमता द्वारा किन्हीं से जटायु, हनुमान, जामवंत जैसे आवेश भरे कार्य कराने होते हैं तो उनके प्लेक्सस उत्तेजित किए जाते हैं। हर प्लेक्सस की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिये किससे क्या कराना है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उनमें से अमुक की छेड़छाड़ की जाती है। ये प्लेक्सस हैं- सेक्रल, सोलर, कार्डियक, फेरिन्जियल एवं कैवर्नस। यदि इनकी संगति सूक्ष्म चक्र उपत्यिकाओं से बिठाई जाय जो इड़ा-सुषुम्ना-पिंगला के दोनों ओर होती हैं, तो इन्हें मूलाधार, मणिपूरित, अनाहत, विशुद्धि एवं आज्ञाचक्र से सम्बन्धित माना जा सकता है। ये पाँचों सूक्ष्म शरीर में प्रभावी होते हैं। स्थूलतः तो इनके चिन्ह मात्र नजर आते हैं। पर वे कोई महत्वपूर्ण कार्य करते दिखाई नहीं पड़ते। किन्तु जब भी किन्हीं के द्वारा महामानव स्तर के पराक्रम किए जाते हैं तो प्रतीत होता है कि वे उत्तेजित हो रहे हैं। महापुरुषों के किस मार्ग पर कौन चल रहा है या चलाया जा रहा है, इस संदर्भ में किस प्लेक्सस की तैयारी किस प्रकार की जाये, किस मात्रा में उन्हें उत्तेजन की आवश्यकता होगी, इसका नियन्त्रण वीरभद्र प्रणाली के विशेषज्ञों द्वारा बड़ी बारीकी से किया जाता है।

सामान्य प्रतिभा या व्यक्तित्व हर काम में विशिष्टता प्रमाणित करता है। शरीर से दुर्बल और आकार में छोटा, वजन में हल्का होते हुए भी कोई व्यक्ति प्रतिभावान हो सकता है। इसके विपरीत शरीर से हृष्ट-पुष्ट, बलिष्ठ भारी होते हुए भी कोई प्रतिभाहीन हो सकता है। कोई कठिन काम सामने आते ही घबरा जाता है और बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है। प्रतिभावान होने के लिए स्थूल शरीर की बनावट या अच्छी तंदुरुस्ती ही सब कुछ नहीं है। इसके लिए सूक्ष्म शरीर में पाए जाने वाले एन्जाइमों की बड़ी भूमिका होती है। एन्जाइम अनेक हैं पर इस प्रसंग में जो कहने लायक भूमिका निभाते हैं वे मस्तिष्क से स्रवित न्यूरोह्यूमोरल रस स्राव हैं। इनमें डोपामिन, एण्डार्फिन, एनकेफेलीन, मात्रा एवं हिस्टामिन विशेष हैं। ये सीधा सम्बन्ध मन से रखते हैं एवं चिन्तन क्रिया को उत्तेजित करके मनुष्य को तेजस्वी, मनस्वी बनाते हैं। इस प्रक्रिया से सम्बन्धित मनःक्षेत्र को बलिष्ठ बनाने वाले पाँच न्यूरोलॉजिकल सिस्टम हैं- (1) रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम (2) कार्टीकल न्यूकलाई (3) थेलेमस (4) हाइपोथेलेमस (5) मेड्युला-स्पाइनल कॉर्ड। यों ये शरीर में ही पाये जाते हैं पर इनका संचालन ढर्रे में ही होता है। स्थूल प्रयासों से इन्हें प्रभावित नहीं किया जा सकता। जबकि सूक्ष्म सामर्थ्य के स्पर्श मात्रा से इनमें हलचल मच जाती है और प्रसुप्त की जागृति होते ही मनुष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में भी अपनी विशेष बलिष्ठता का परिचय देने लगता है।

ये प्रयोग वे हैं जिनके सहारे सार्वजनिक हित प्रयोजन के लिए आदर्शों पर सुदृढ़ और महत्वपूर्ण कार्यों के लिए मनुष्य अपना पराक्रम दिखाने लगता है। इन गुह्य शक्तियों को थपथपाने और विशिष्ट बनाने के लिए महा बलशाली वीरभद्रों की आवश्यकता पड़ती है। इन प्रयोगों के सहारे कमजोर स्तर के परन्तु निष्ठावान्- सुपात्र भी बलवानों जैसी भूमिका निभा सकते हैं। इनका प्रयोग संक्षेप में एक छोटे स्तर पर पिछले दिनों सीमित मात्रा में किया जाता रहा है। पर समय की आवश्यकता अब उन वरिष्ठ लोगों का दरवाजा खटखटाने को विवश कर रही है।

इतिहास में ऐसे अनेकों घटनाक्रम देखने को मिलते हैं, जिनमें शक्ति, साधन और अवसर होते हुए भी व्यक्ति आदर्शवाद की, पराक्रम की परीक्षा होने पर सिटपिटा गए। दूसरी ओर ऐसी भी घटनाएँ हुई हैं कि शरीर सामान्य और अवसर समन होते हुए भी शारीरिक, मानसिक स्फूर्ति एवं सूझ-बूझ के बलबूते वे इतना कुछ कर सके जिसे देखकर दर्शकों को दंग रह जाना पड़ा। बुद्ध और गाँधी के दो उदाहरण ऐसे ही हैं, जिनमें उनके अनुयायी-पक्षधर सामान्य होते हुए भी असामान्य कर दिखा पाने में सफल हुए। इस भिन्नता का कारण बहिरंग में नहीं, अन्तरंग में है। ऐसे अन्तरंग हेतु दूसरों के द्वारा भी उत्पन्न किये जा सकते हैं। युग परिवर्तन जैसे अवसरों पर ऐसी विशिष्टता की तो विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है।

सामयिक परिवर्तन एक बात है और स्वभाव में स्थायी परिवर्तन ला देना नितान्त भिन्न प्रकरण है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अजामिल आदि जन्मजात दुष्ट प्रकृति के थे पर उनमें असाधारण, आश्चर्यजनक और स्थायी परिवर्तन आया। ऐसे परिवर्तन ब्राह्मी चेतना चेतना की प्रेरणा से होते हैं एवं सीधे मनुष्य की सूक्ष्म विद्युत धाराओं पर प्रभाव डालकर उन्हें कुछ का कुछ बना देते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से बायोइलेक्ट्रीसिटी से सम्बन्धित इन परिवर्तनों को पाँच विद्युतक्षेत्रों में क्रियाशील देखा जा सकता है। ये हैं- प्लेक्स इलेक्ट्रीसीटी, न्यूरोलन इलेक्ट्रीसीटी, सेल्युलर इलेक्ट्रीसीटी, कण्डक्शन इलेक्ट्रीसीटी एवं फेशियल आक्युलन इलेक्ट्रीसीटी। सीधी सादी भाषा में समझना हो तो इन्हें क्रमशः चक्र-उपत्यिकाओं से सम्बन्धित विद्युत, स्नायु संस्थान में सतत् प्रवाहित, जीवकोशों में सक्रिय विद्युत, हृदय के विशिष्ट कोशों व पेसमेकर में क्रियाशील, विद्युत एवं चेहरे-आँखों से निस्सृत विद्युतप्रवाह माना जा सकता है। विशिष्ट उपकरणों द्वारा इन्हें बनाया भी जा सकता है। इन्हीं को साय या की एनर्जी कहते हैं एवं अध्यात्म क्षेत्र में यही ओजस्, तेजस्, मनस्, वर्चस् जैसे नामों से जानी जाती हैं। इनकी मात्रा का शरीर में होना- रक्त, माँस, आदि की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इनकी क्षीणता ही व्यक्ति को प्रभावहीन, दुर्बल, निस्तेज बना देती है।

सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों, सन्मार्ग गमन के लिए आवश्यक पराक्रमों को जहाँ बढ़ाया जा सकता है वहाँ दुर्गुणों, दुष्कर्मों के प्रति बढ़े हुए उत्साह को घटाया और शान्त समाप्त भी किया जा सकता है। इसके लिए हारमोन चाबी का काम करते हैं। ये वे रसस्राव हैं जो ग्रन्थियों से सीधे रक्त में स्रवित होकर अपना प्रभाव परिचय देते हैं। वे बढ़ाने और घटाने के दोनों ही प्रयोजनों में काम आते हैं। शरीरगत हारमोन्स को प्रभावित करने वाली प्रधान ग्रन्थियाँ व उनसे स्रवित रस-द्रव्य इस प्रकार हैं- पीनियल (मेलेटोनिन), पिट्यूटरी (सोमेटोट्रापिक हारमोन), थाइराइड (थायरॉक्सिन), एड्रीनल (ए.सी.टी.एच.), मोनेड्स (टेस्टोस्टेरॉन-इन्ट्रोजन)। इनमें पाँचवीं अन्तिम का एक भाग पुरुषों से सम्बन्धित एवं दूसरा नारी सम्बन्धी है। इन हारमोन्स को ठण्डा कर देने से मनुष्य शारीरिक, मानसिक और प्रजनन की दृष्टि से निःसत्व हो जाता है। उसका उत्साह हर कार्य में ठण्डा हो जाता है। अन्यान्य हारमोन्स के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे मूलतः मनुष्य को कर्मठ, ओजस्वी, स्फूर्तिवान, परिपक्व बनाने के निमित्त अपने क्रिया-कलाप चलाते हैं। मानव की किस दुष्प्रवृत्ति को शान्त करने के लिए कब किस हारमोन को, किस प्रकार छोड़ा जाये, वह कार्य अनुभवी प्रयोक्ता का है। आत्मिक चेतना की स्थिति के अनुरूप, पात्रता को देखते हुए वाँछित परिवर्तन किये जाते हैं।

जैसा कि पहले बताया गया मनुष्य में जो कुछ शक्ति दिखाई पड़ती है वह उसके रक्त-मांस एवं स्नायु संस्थान पर निर्भर नहीं है वरन् पाँच प्रकार की जैव विद्युत के सूक्ष्म प्रवाहों पर निर्भर है। इन्हीं पाँच विद्युतप्रवाहों पर मानवी प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का निर्माण निर्भर करता है। शत्रु पक्ष का तेज हरण करने हेतु इन्हीं आकर्षण शक्तियों को खींच लिया जाता है। ताँत्रिक प्रयोगों में शत्रु की इन्हीं शक्ति धाराओं को दुर्बल कर दिया जाता है।

किसी को वंश परम्परा को समर्थ या दुर्बल बनाने के लिए उनकी जीन्स को प्रभावित किया जाता है। जीन्स में दो प्रमुख हैं। डी.एन.ए. एवं आर.एन.ए.। इन्हीं से मिलकर जीन्स बनते हैं। जीन्स क्रोमोसोम बनाते हैं। क्रोमोसोम ही वंश परम्परा का निर्धारण व पीढ़ी दर पीढ़ी संचालन करते हैं। लंका में इसी आधार पर एक ही प्रकार के अनेकों दानव बनाने का कार्य सम्पन्न हुआ था। कौरवों का जन्म गाँधारी के कोख से महर्षि व्यास द्वारा जीन याँत्रिकी के प्रयोग से ही किया गया था। शृंगी ऋषि द्वारा चरु के माध्यम से ही जीन्स के सूक्ष्म घटकों को प्रभावित कर राम, भरत एवं लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म होने की क्रिया सम्पादित हुई थी।

वंशानुक्रम के आधार पर ही देश-देशान्तरों के व्यक्तियों की विशेषताएँ निर्भर करती हैं। उजबेकिस्तान के दीर्घायु, बलूचिस्तान के पठान एवं नीग्रो, मंगोल आदि नस्लें जीन्स जैसे सूक्ष्म घटकों पर ही निर्भर हैं। अगले दिनों युग परिवर्तन के निमित्त महामानवों की जब आवश्यकता पड़ेगी तो इस प्रक्रिया को जीन्स के स्तर तक ही ले जाना पड़ेगा।

मन और स्वभाव में परिवर्तन के लिए शिक्षण प्रक्रिया भर से ही काम नहीं चलेगा। सके लिए चेतना की पाँच परतों में आवश्यक उथल-पुथल करनी होगी। चेतना के ये पाँच आवरण हैं- चेतन, अचेतन, सुपर चेतन, अवचेतन एवं प्रसुप्त। किसी के चिन्तन की श्रेष्ठता-निकृष्टता, बुद्धिमत्ता, मूढ़ता का आधार बहुत कुछ इन पर निर्भर है।

स्थूल वस्तुएँ- दृश्यमान पदार्थ किस अनुपात में घटे बढ़े, इसका आधार है निखिल ब्रह्मांड के धरातल में संव्याप्त सूक्ष्म किरणों का संसार। ये भी पाँच प्रकार की हैं- अल्ट्रा वायलेट, इन्फ्रारेड, कॉस्मिक, रेडियो किरणें तथा इन्टरस्टेलर किरणें। इन्हीं के आधार पर वातावरण विनिर्मित होता, बनता-बिगड़ता है। युद्धोन्माद, शान्ति-सौजन्य, शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य, विभीषिकाएँ पदार्थों का आविर्भाव जैसी अनेकों वातावरण से सम्बन्धित पक्ष इन किरणों के अनुपात एवं प्रवाह पर निर्भर करता है। इन्हीं से सम्बन्धित ब्रह्मांडीय पाँच कण भी हैं- (1) न्यूट्रीनो (2) क्वार्क्स (3) पल्सार्ज (4) फोटॉन्स (5) लेप्टॉन्स। इनकी उथल-पुथल से पदार्थ जगत एवं वातावरण प्रभावित होता है, वस्तुओं के उत्पादन- अभिवर्धन में घट-बढ़ चलती है। जीव जगत भी उससे अप्रभावित नहीं रहता।

समझाने बुझाने में प्रचार तन्त्र बहुत थोड़ा ही काम आता है। वाणी, कान और दृश्य दिखाकर मनुष्य की मनःस्थिति बहुत थोड़े अंशों में प्रभावित की जा सकती है। सूक्ष्म ध्वनि तरंगें न केवल मस्तिष्कों को बदलने में वरन् और भी अनेकानेक प्रयोजनों में अपनी चमत्कारी भूमिका निभाती हैं। ध्वनि तरंगें पाँच प्रमुख हैं- (1) सोनिक (2) अल्ट्रा सोनिक (3) इन्फा सोनिक (4) हाइपर सोनिक (5) सुपर सोनिक। भौतिक विज्ञानी इनसे शक्ति परक काम लेते हैं। पर अध्यात्मवेत्ता इनसे समूचे वातावरण को प्रशिक्षित, परिवर्तित करने का काम ले सकते हैं। वे किस वेवलेंग्थ या फ्रींक्वेसी पर काम करते हैं, यह वैज्ञानिकों के लिये जान पाना तो कठिन है परन्तु सूक्ष्मीकरण साधना से आन्दोलित एक व्यापक जन समुदाय में परिवर्तन अवश्य देखा जा सकता है। परिणति को देखकर ही शक्ति का अनुमान लगाया जा सकना सम्भव है।

ध्वनि तरंगों के साथ-साथ ब्रह्मांडीय कण न्यूट्रीनो, क्वार्क्स, प्रल्सार्ज, फोटॉन्स, लेप्टान भी ब्रह्मांडीय शक्तियों के आकर्षण, अपकर्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पृथ्वी और ब्रह्मांड के बीच सौर मण्डल तथा अन्यान्य तारकों, निहारिकाओं का प्रत्यावर्तन चलता रहता है। उसे संतुलित बनाने के लिये इन्हीं को माध्यम बनाया जाता है।

दृश्य और अदृश्य वातावरण- प्रत्यक्ष लोक और सूक्ष्म लोक का स्थान पृथ्वी पर एवं पृथ्वी से ऊपर उन परतों से मिला-जुला अवस्थित है जिन्हें सफीयर नाम से जाना जाता है। पृथ्वी से सम्बन्धित वातावरण के- 5 अंग हैं लीथोस्फियर, हाइड्रोस्फीयर, बायोस्फीयर, पीडोस्फीयर एवं एटमॉस्फीयर। इनसे ऊपर आयन मण्डल है जो पृथ्वी सतह से 500 किलोमीटर ऊपर तक चला गया है। कोई भी बड़े और व्यापक परिवर्तन जब धरित्री पर करने होते हैं तो इन परतों में जमी गन्दगी को पूरी तरह साफ करना पड़ता है। आयन मण्डल की पाँच परतें इस प्रकार हैं- एण्डोस्फीयर, ट्रोपोस्फीयर, स्ट्रेटोस्फीयर, आयनोस्फीयर एवं एक्जोस्फीयर। बादल, धूलि किरणें, जेट स्ट्रीम, आदि स्ट्रेटोस्फीयर व पृथ्वी के बीच होते हैं जबकि ओजोन परत, रेडियो किरणें, कॉस्मिक किरणें, सूक्ष्म किरणें, कण व तरंगें इसके व एक्जोस्फीयर के मध्य फैले होते हैं। खगोल भौतिकविदों द्वारा छोटे-मोटे परिवर्तन ही इन परतों में सम्भव हो पाते हैं। पर जब विकृतियाँ प्रलय या खण्ड प्रलय जैसी बन पड़ें, अणु-आयुधों की व्यापक विषाक्तता जैसे संकट आ खड़े हों, जो इन परतों में उथल-पुथल मचाकर विभीषिका का दृश्य खड़ा कर दें तो उसका संशोधन सशक्त अध्यात्म विज्ञान के सहारे ही बन पड़ता है। उस स्तर के वैज्ञानिक वीरभद्र कहलाते हैं। इन्हें चेतन जगत की सशक्त क्षमता के रूप में ही जाना एवं माना जाना चाहिए।

मानव शरीर एक छोटा पिण्ड है किन्तु इसमें ब्रह्माण्ड का सार संक्षेप पूरी तरह समाहित है। शरीर की पाँचों सामर्थ्यों को जिनको पूर्व में वर्णित किया गया, ब्रह्माण्डव्यापी समष्टिगत शक्तियों का संक्षिप्त संस्करण माना जा सकता है। ये हैं जैवविद्युत, जैवचुम्बकत्व, सृजनात्मकशक्ति, विकिरण एवं प्रतिरोधी शक्ति। इन्हीं की पचाने योग्य विधेयात्मक सामर्थ्य को व्यक्ति-व्यक्ति में, समग्र समुदाय में सूक्ष्मीकरण साधना द्वारा पात्रता परखते हुए गुरुदेव विकसित कर रहे हैं। इन्हीं पाँचों को उन्होंने इस एक वर्ष की अवधि में विकसित पंच वीर भद्रों का नाम दिया है। यह जितने परिमाण में जागृत सशक्त हो सकेंगे, जिस अनुपात में उपयोगी पात्र उन्हें मिलते जायेंगे, उसी अनुपात में विश्व परिवर्तन के- युग परिवर्तन के अनेकानेक प्रयोजनों में इनका सुनियोजन हो सकेगा।

देवमानवों का सृजन, वातावरण का संशोधन, कषाय कल्मषों का उन्मूलन, नव सृजन के उपयोगी साधनों का उत्पादन, छाए हुए संकट- घटाटोपों से परित्राण जैसे कितने ही काम हैं जो जागृत वीरभद्रों के द्वारा समयानुसार आवश्यकतानुसार सम्पन्न होंगे। कब, किस प्रयोजन को, कितनी मात्रा में कर सकना सम्भव हो सकेगा, यह समय ही बताएगा।

अभी इस जागरण की साधना चल रही है। एक को पाँच में विभाजित किया जा रहा है। कार्य इतना कठिन है कि सब ओर से ध्यान समेट कर एकान्त एवं मौन का उपक्रम अपनाया गया है। आशा की गयी है कि आगामी बसन्त तक इतनी प्रगति सम्भव हो सकेगी कि उसके सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ कहने लायक कदम बढ़ सकें।


गुरु का सहयोग (kahani)

एक नाव नदी के किनारे बँधी थी। जाने-वाले कई थे। सोचने लगे, जब एक मल्लाह खेकर पार ले जाता है तो हम इतने मिल-जुलकर इसे पहुँचा नहीं सकते। सभी उत्साहपूर्वक नाव में सवार हो गये। नाव चली। बीच मझधार में जाकर चक्कर खाने लगी। पर जाने के कई प्रयत्न किये पर एक भी कारगर न हुआ। आखिर नाव डूब गई और एक भी न बचा।

एक, दूसरे घाट पर दूसरी घटना हुई। मल्लाह भी था और नाव भी। जाना कहाँ है, यह भी निश्चय था, पर उसने नशा पी रखा था। पेड़ से बँधे हुए रस्से को खोलने की याद ही न रही। मुसाफिर खुशी-खुशी बैठ गये और मल्लाह में डांच चलाना आरम्भ कर दिया। नाव हिलती-डुलती भर रही। रात के अन्धेरे में लगता ऐसा रहा कि नियत स्थान की ओर तेजी से बढ़े जा रहे हैं। सभी खुश थे। किन्तु सवेरा होते-होते देखा कि जहाँ से बैठे थे वहाँ वे वहीं हैं।

एक नाव का मल्लाह था ही नहीं, दूसरे का था तो पर उसके बददिमाग होने से मुसाफिरों को ही हैरानी सहनी पड़ी। यह कथा जीवन का लक्ष्य पार करने वाली उस नाव के सम्बन्ध में है, जिसके लिए कुशल प्रवीण गुरु का सहयोग मिले बिना कुछ बात बनती ही नहीं। हैरानी ही हैरानी हाथ लगती है।


ब्रह्माण्ड का पंचकोशी शरीर

ब्रह्मांड को परम सत्ता का शरीर रूप माना गया है एवं इसमें संव्याप्त चेतन सत्ताओं को उसी का एक घटक माना जाता है। मान्यता है कि जिस प्रकार सारे वृक्ष की सत्ता एक बीज में, मानवी सत्ता शुक्राणु में तथा पदार्थ की सत्ता अणु में छिपी होती है, उसी प्रकार इस निखिल ब्रह्मांड का संक्षिप्त संस्करण हर चेतन सत्ता में देखा जा सकता है। मानवी चेतन सत्ता के सूक्ष्म शरीर में पाँच कोश अवस्थित बताये गए हैं। आप्त वचनों के अनुसार क्रमशः अन्नमय कोश से विकसित होते-होते चेतना का ऊर्ध्वारोहण होता जाता है एवं आनन्दमय कोश की स्थिति में वह मुक्ति की स्थिति में पहुँच जाता है।

योगीराज अरविन्द ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से सारे ब्रह्मांड के विकास में व्यष्टि सत्ता का विकास मानते हुए समष्टि के भी पाँच भाग किए हैं। उनके अनुसार वनस्पति जगत एक विशेष योनि है जिसे हम ब्रह्मांड का अन्नमय कोश कह सकते हैं। प्राणी जगत इससे ऊँची योनि है जिसे ब्रह्मांड का प्राणमय कोश नाम दिया गया है। मनुष्य के अवतरण के रूप में मनोमय कोश विकसित हुआ है। सृष्टि के विकास की दृष्टि से सोचा जाय तो अभी तीन ही कोश सक्रिय हैं। चौथा विज्ञानमय कोश उन्होंने अति मानस की सत्ता के रूप में माना है जिसका अवतरण होना बाकी है। अन्तिम आनन्दमय कोश ब्रह्मांड के पूर्ण विकास की स्थिति होगी, मानव में देवत्व तथा धरती पर स्वर्ग का वातावरण होने से सतयुगी परिस्थितियाँ होंगी।

वस्तुतः योगीराज की विकासवाद की यह परिभाषा अपने में विलक्षण है एवं विज्ञान सम्मत है। पौधे-वनस्पति, पशु-पक्षी, मनुष्य ये तीनों इस जगत में एक साथ आए किन्तु उनका स्तर अलग-अलग था। मनुष्य स्वभावतः शाकाहारी है। उदर पूर्ति वह वनस्पति समुदाय से करता है। ब्रह्मांड के प्रथम कोश- अन्नमय कोश के रूप में इस प्रकार वनस्पति जगत ने स्थान लिया। पादप-वनस्पतियों में चेतना होते हुए भी हलचल नहीं होती, इसी कारण वे प्रारम्भिक योनि के स्तर पर माने गए।

प्राणियों में चेतना है- हलचल भी। दैनन्दिन जीवन के उदरपूर्णा एवं प्रजनन सम्बन्धी क्रिया-कलाप भी वे चलाते रहते हैं। प्राण विद्युत का स्थूल नियोजन भर कर पाने वाले इन जीवों- पशु पक्षियों को ब्रह्मांड का प्राणमय कोश माना गया। इससे ऊँची स्थिति तक वे पहुँच नहीं पाते।

श्री अरविन्द के अनुसार मानवी चेतना के अन्तराल में ही ब्राह्मी चेतना की परम सत्ता से अतिमानस का अवतरण होगा। तब सभी मनुष्य देवपुरुष होंगे। उनकी भावनाएँ उदात्त होंगी, वे संकीर्ण स्वार्थपरता, कुतर्कवाद, द्वेष-कलह, मनोविकारों से मुक्त होंगे एवं अन्ततः मोक्ष का द्वार खोलेंगे जो आनन्दमय कोश की स्थिति होगी।

सूक्ष्मीकरण प्रकरण में व्यष्टि सत्ता की चर्चा के अंतर्गत पाँच वीर भद्रों के रूप में पाँच कोशों की चर्चा स्थान-स्थान पर की गई है। ये हर व्यक्ति के अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी चेतन जगत के भाण्डागार की बहुमूल्य निधि है, जिनकी जागृति हेतु साधना पुरुषार्थ का अवलम्बन लिया जाता है। अभी हम चेतना के बोध के तीन आयामों को ही जान पाये हैं। समष्टिगत स्तर पर ब्राह्मी चेतना के पाँच आयामों की जानकारी इसी कारण हमें विलक्षण लगने लगती है। योगी दिव्य दृष्टि सम्पन्न होते हैं। योगीराज अरविन्द ने मानवी विकास की जिन पाँच योनियों का वर्णन ब्रह्माण्डीय पंचकोशों के रूप में किया है, वह एक अभूतपूर्व किन्तु यथार्थ प्रतिपादन है। जिस दिन मानव अति चेतना, अति मानस की स्थिति को प्राप्त कर लेगा, वह चतुर्थ आयाम में पहुँच जाएगा। प्रस्तुत सन्धिकाल मानवी सत्ता के अति मानवी सत्ता में हस्तान्तरित होने का संक्रान्ति काल है। आनन्दमय कोश की स्थिति, मानव में देवत्व के जागरण की स्थिति इसी का उत्तरार्ध है जो नियन्ता द्वारा निर्धारित मानव के विकास का चरम बिन्दु है।


भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की तुलना

जीवन की समग्र समस्याओं का स्वरूप और समाधान समझने के लिए हमें उसके दोनों पक्षों को समझना होगा। एक वह, जो शरीर से सम्बन्धित है दूसरा वह जो अन्तरात्मा पर निर्भर है।

शरीर की समस्याओं- आवश्यकताओं का सीधा सम्बन्ध सुविधा साधनों से है। भोजन, वस्त्र और निवास की सुविधाएँ तथा इन्द्रियों के अपने-अपने सुविधा साधन यह सब शरीर से सम्बन्धित हैं। यह वस्तुएँ उचित समय पर उचित मात्रा में जब मिलती रहती हैं तो शरीर की तुष्टि होती रहती है। मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है। उसके विषय हैं- लोभ, मोह और अहंकार। इन तीनों को जितनी मात्रा में तुष्टि होती है, उतना ही मन प्रसन्न रहता है। शरीर और मन इन दोनों का युग्म सन्तुष्ट करने के लिए मनुष्य सामान्यतया प्रयत्न करते रहते हैं। शारीरिक जीवनचर्या का सारा प्रयास प्रायः इन्हीं कृत्यों में लगा रहता है। मन अपने तीन विषयों का समाधान ढूँढ़ता रहता है और शरीर को अन्न, वस्त्र और निवास के अतिरिक्त अपने तीन विषयों में जोते रहता है। कहा जा चुका है कि मन की तुष्टि लोभ, मोह और अहंकार की तृप्ति पर निर्भर है। यही उसके तीन विषय हैं। शरीर तुष्टि में इन्द्रिय तुष्टि भी एक विषय है। आँख, कान, जीभ और जननेन्द्रिय इनके अपने-अपने विषय हैं। इनकी ललक लिप्सा ऐसी है जो भोगों की थकाने वाली मात्रा मिल जाने पर भी तुष्ट नहीं होती। ललक लिप्सा का कोई अन्त नहीं।

यह शरीर की आवश्यकता और मन की लिप्सा की परिधि हुई। साधारणतया इन सबकी आवश्यकताएँ बहुत थोड़े साधनों से पूर्ण हो जाती हैं। चार रोटी में पेट भर जाता है। छह गज कपड़े में आच्छादन हो जाता है। तीन गज लम्बी और एक गज चौड़ी जमीन या चारपाई पर सोने की आवश्यकता पूरी हो जाती है। इससे अधिक दिया जाय तो उसका उपयोग सम्भव नहीं। दस रोटी थाली में परोसी जाय तो पेट में उसके लिए जगह ही नहीं। दूने चौगुने आकार की चारपाई सोने के लिए दी जाय तो वह खाली पड़ी रहेगी। इतना ही नहीं उठाने रखने में अनावश्यक जगह घेरेगी और कठिनाई उत्पन्न करेगी। उसे रखा कहाँ जाएगा? उपयोग कौन करेगा? शरीर की तनिक-सी आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए दो चार घण्टे का परिश्रम पर्याप्त होना चाहिए।

यह बात इन्द्रियों के सम्बन्ध में है। कितने ही सुन्दर दृश्य क्यों न हों, उन्हें थोड़ी देर तक देखने में आँखें थक जाती हैं। कानों को कितना ही मधुर स्वर सुनने को मिले वे भी ऊबने लगते हैं। जीभ स्वाद चखने में कुछ मिनट ही लगाती है। जननेंद्रियों का स्वाद भी कुछ मिनटों का ही है। इसके बाद उससे भी विरति हो जाती है। इंद्रियजन्य लिप्साओं की भी सीमा है। इस सीमा से आगे बढ़ने पर इन्द्रियाँ थक जाती हैं, ऊबने लगती हैं।

केवल मन ही ऐसा है जिसकी आशा, आकाँक्षा तो लगी रहती है पर जितना चाहा गया था, वह सीमित होता है उसके तृप्त होते ही नई आकाँक्षा संजोनी पड़ती है। कल्पना कीजिए कि हजार रुपये की ललक है। जब तक वह पूर्ण नहीं हुई है, तब तक मन उसके लिए ललचाता रहता है। जिस क्षण हजार रुपये हाथ में आते हैं वे कम प्रतीत होने लगते हैं। जब तक वे नहीं मिले थे तभी तक उनमें आतुरता थी। मिलते ही वे बेकार प्रतीत होते हैं, दस हजार पाने की नई ललक उठ बैठती है। पुरानी हजार की आकाँक्षा बेकार ही नहीं लगती, भारभूत भी प्रतीत होती है। इन्हें कहाँ रखा जाय? किस काम में लगाया जाय? रखवाली का क्या प्रबन्ध हो? आदि चिन्ताएँ उठ बैठती हैं। इस प्रकार लाभ का अभाव ही आकर्षक है। उसकी उपलब्धि बेकार हो जाती है। मात्रा बढ़ती जाने में रस आता है। वह मात्रा मिल जाय तो वह भी निरर्थक प्रतीत होती है।

मोह के सम्बन्ध में भी यही बात है। सन्तान नहीं हुई थी, तब तक उसकी आतुरता थी पर हो जाने के उपरान्त उसके लालन-पालन, शिक्षा, चिकित्सा एवं दुर्गुणी निकलने पर खीज उठती है सो अलग। मोह का अभाव ही आकर्षक है। पूर्ति होने पर वह भी भारभूत हो जाता है। बहुत बच्चे हो जायें, बहुत मोह की पूर्ति होने लगे तो उतना ही जंजाल सिर पर बँधा प्रतीत होता है।

अहंकार के सम्बन्ध में भी यही बात है। ऊँचा पद मिल जाने पर उससे बड़ा चाहिए। ढेरों ईर्ष्यालु हो जाते हैं। कई चुनौती देते हैं। उनका सामना करना पड़ता है। पदवी, सफलता मिलने पर भी सन्तोष कहाँ होता है? इससे अधिक चाहिए। गिराने वाले, कुढ़ाने वाले ढेरों होते हैं वह अहंकार जान का बवाल बन जाता है।

शरीर की आवश्यकता इतनी स्वल्प है कि दो चार घण्टे के परिश्रम में कोई भी उनकी पूर्ति कर सकता है। इन्द्रिय लिप्सा की पूर्ति कुछ क्षणों तक सीमित है। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति कभी भी हो नहीं सकती। जब तक इच्छित वस्तु मिली नहीं है तभी तक उसकी ललक है। मिलते ही पुरानी बेकार हो जाती है। रखवाली की चिन्ता लदती और नई लिप्सा पैदा करती है। इस प्रकार इन तीनों को भी मन मोदक ही कहना चाहिए। दिवास्वप्न की तरह वे हैरान बहुत करते हैं। झलक झाँकी दिखाकर गायब हो जाते हैं।

यही है शरीर पक्ष की आवश्यकताओं, इच्छाओं और लिप्साओं का स्वरूप, जो हैरान तो बहुत करता है- पर तृप्ति का नाम भी नहीं लेता। जीवन इसी जाल-जंजाल में व्यतीत होता है। मृग तृष्णा में भटकते-भटकते सारा समय निकल जाता है, सारा श्रम चुक जाता है। फिर भी असन्तोष ही बना रहता है। जो मिलता है, जितना मिलता है उससे असन्तोष की आग ही भड़कती है। आग में जितना ईंधन डाला जाता है, उतनी ही वह तीव्र होती है, बुझने का नाम नहीं लेती।

सर्व साधारण की जीवनचर्या यही है। कार्य पद्धति एवं आकाँक्षा की रूप रेखा यही है। इसकी पूर्ति के प्रयास करते-करते सारा जीवन निकल जाता है। हाथ कुछ आता नहीं। सन्तोष कोसों दूर बना रहता है। यह हुआ शरीर परायण जीवन।

जीवन का दूसरा पक्ष है- अन्तरात्मा। इसे अपनाने में शान्ति ही शान्ति है, सन्तोष ही सन्तोष है, आनन्द ही आनन्द है, लाभ ही लाभ है। शरीरगत आवश्यकताएँ सीमित रखने पर ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का आदर्श सधता है। भोजन पेट से कम रखा जाय तो आरोग्य और दीर्घजीवन का लाभ हाथों-हाथ मिलता है। वस्त्र सादा और कम पहनने पर सज्जनता का उपहार मिलता है। तड़क-भड़क के- खर्चीले-फैशन वाले वस्त्र पहनने पर विज्ञजनों की आँखों में अपना मूल्य गिरता है। ओछा, बचकाना, फिजूल खर्च कहलाने के अतिरिक्त यह भी भी कहा जाता है कि फालतू पैसा खर्च करने पर यह चोरी करता होगा। ऋण लेता होगा। पैसे की तंगी सहता होगा। इन्द्रियों का स्वाद जिसे जितना प्रिय है उसका स्वास्थ्य उतना ही गया गुजरा होगा। जीभ का चटोरा व्यक्ति अपना पेट खराब कर लेता है और बीमारियों का शिकार होता है। आँख और कान के रसिया इन दोनों इन्द्रियों का अपव्यय करके उनकी शक्ति को अल्पकाल में ही चुका लेते हैं। कामुक प्रकृति वाले ब्रह्मचर्य से क्षीण होकर खोखले हो जाते हैं। किन्तु जिनका इन सब इन्द्रियों पर नियन्त्रण है वे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अक्षुण्ण बनाये रहते हैं। उन्हें चरित्रवान कहा जाता है और सम्मान मिलता है। आत्मिक पक्ष अपनाने वाले को संयमी और सन्तोषी बनना पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों को कभी आर्थिक तंगी नहीं भुगतनी पड़ती, ऋणी नहीं बनना पड़ता और चोरी-बेईमानी करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह एक प्रत्यक्ष लाभ है जो अध्यात्म पक्ष अपनाने पर हाथोंहाथ मिलता है।

सन्तोषी यह सोचता है कि हमसे कम में जब लाखों व्यक्ति गुजारा करते हैं, तो हमें ही लालच बढ़ाने की क्या आवश्यकता है। ईमानदारी से जितना कमाया जा सके उसी से व्यवस्थापूर्वक खर्च चलाया जा सके तो श्रीमन्त बनने की मृग तृष्णा क्यों अपनानी पड़े और उसके लिए कुमार्ग क्यों अपनाना पड़े। स्मरण रहे ईमानदारी से सीमित पैसा ही मिल सकता है। दीवार खड़ी करने के लिए कहीं गड्ढा खोदना पड़ेगा। अमीर बनने के लिए बहुतों को गरीब बनाना पड़ेगा।

मोह रखना हो तो सारे संसार को ही अपना क्यों न माना जाय? वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श क्यों न अपनाया जाय? जब सभी अपने हैं तो सभी के साथ प्रेम का सेवा-सहानुभूति का व्यवहार क्यों न किया जाय। कुटुम्ब के दो चार व्यक्तियों के लिए ही क्यों मरते-खपते रहा जाय। स्मरण रहे जिनके साथ अनावश्यक दुलार किया जाता है, उनकी आदतें बिगड़ती हैं और वे अपने लिए तथा मोह कर्त्ता के लिए अन्ततः दुःखदायी बनते हैं।

अहंकारी की तुलना में नम्र, विनयशील, सज्जन का मूल्य और महत्व कहीं अधिक होता है। विनयशील को कोई चुनौती नहीं देता जबकि अहंकारी से लड़ने मरने को ईर्ष्या रखने वाले अनेकों सामने आते रहते हैं। अहंकार दिखाकर अपना बड़प्पन सिद्ध करने वाले की अपेक्षा विनयशील सज्जन का कहीं अधिक सम्मान होता है। उसका मूल्य कहीं अधिक समझा जाता है।

आत्म पथ अपनाने वाले का सादगी से भरा हुआ जीवन बहुत ही सस्ता और सादा होता है। उसके पास पैसा, समय श्रम, सभी अपव्यय से बच जाते हैं और वह उसे सेवा, पुण्य-परमार्थ में लगा सकता है। महामानवों को यही रीति-नीति अपनानी पड़ती है कि अपना काम न्यूनतम में चलाते हैं। फलतः उनके पास साधनों की बचत होती रहती है। इन बचत वाले साधनों को ही वे परमार्थ में लगाते रहते हैं। फलतः लोकमंगल के लिए उनसे निरन्तर काम बन पड़ता है। सेवा धर्म के लिए किये गये उनके थोड़े-थोड़े काम मिलकर इतने अधिक हो जाते हैं कि उन्हें लोकसेवी, परमार्थी, पुण्यात्मा कहा जा सके। आत्म पक्ष का अपनाया गया जीवन सदा प्रसन्न पाया जाता है। सत्कर्मों की मात्रा उन्हें यश और सन्तोष प्रदान करती रहती हैं। गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता की मात्रा बढ़ी चढ़ी रहने के कारण सभी उनके मित्र, प्रशंसक एवं सहायक होते हैं। यह कमाई ऐसी है, जिस पर स्वार्थी, लालची लोगों द्वारा कमाया गया वैभव निछावर किया जा सकता है।

आत्म पथ अपनाने वाले को आत्मा और परमात्मा का आशीर्वाद निरन्तर मिलता रहता है। यह कमाई ऐसी है जिसे प्राप्त करने के उपरान्त और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।

शरीर पथ को प्रधानता देने वाले और उसी के लिए मरते-खपते रहने वाले लोक और परलोक बिगाड़ लेते हैं। जिस शरीर के लिए सब कुछ निछावर किया गया था वह भी सुखी नहीं रहता। बीमार, बदनाम और गुत्थियों में उलझा हुआ रहता है। उनकी तुलना में बुद्धिमान हैं जिनने आत्मपथ अपनाया। शालीनता और सज्जनता का जीवन जीने वाले जिस सन्तोष को अपनाते हैं उसके बदले में उन्हें निरन्तर प्रसन्नता मिलती है। प्रेम, सहानुभूति और सद्भावना जो-जो लोग प्राप्त कर सकें समझना चाहिए कि उनने अपना जीवन धन्य बना लिया। ऐसे लोग अपने संपर्क में आने वालों को भी धन्य बनाते हैं। इसी उपलब्धि को सच्चे अर्थों में बुद्धिमत्ता कहा जा सकता है।


प्रकाश का अभाव (kahani)

एक जिज्ञासु किसी दार्शनिक के पास गया और मृत्यु के सम्बन्ध में अनेकों प्रश्न पूछने लगा।

दार्शनिक ने उत्तर दिया- “कुछ काम की बात पूछो मृत्यु नाम की वस्तु इस संसार में नहीं है। मात्र परिवर्तन और प्रगति का क्रम ही यहाँ चलता है। आज की वस्तु का स्वरूप कल बदल जाता है। इसी को मृत्यु कहना चाहो तो कहो।”

बात को और अधिक आगे बढ़ाते हुए कहा- “प्रकाश के अभाव का नाम ही अन्धकार है। उसका अलग से कोई अस्तित्व नहीं। जीवन का चले जाना ही मृत्यु है। पूछना हो तो जीवन के बारे में पूछो।”


मुक्ति का मर्म

प्रथम धर्म-चक्र प्रवर्तन में कुछ जिज्ञासुओं को जीवन की सही दिशा में अभिप्रेरित कर तथागत ने आत्म-कल्याण के लिए सभी मुमुक्षजनों का आह्वान किया, और हजारों लोग ‘धर्मं शरणं गच्छामि’, की प्रतिज्ञा कर आगे आये। इस आह्वान को घर-घर पहुँचाने के लिए जो उत्साही जन कृत संकल्प हुए, उन्होंने समस्त पारिवारिक और साँसारिक दायित्वों से उपराम होकर स्वयं को लोक-कल्याण के लिए समर्पित करने को आत्मदान किया।

इन्हीं लोक-सेवी उत्साही और संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर लोक मंगल का कार्य करने के लिए उद्धत मनस्वी साहसियों का एक संगठन बना- भिक्षु संघ और संघ के सदस्य भिक्षु कहे जाने लगे।

एक-एक भिक्षु का तथागत को ध्यान था और यह भी कि कौन-कैसा है? एक बार उन्हें किसी भिक्षु का समाचार नहीं मिला और न ही वह दिखाई दिया। अपने समीप खड़े भिक्षु भदन्त आनन्द से उन्होंने पूछा कि अमुक भिक्षु कहाँ है तो भदन्त-आनन्द ने उत्तर दिया- ‘वह अतिसार से पीड़ित है।’

सुनते ही तथागत बोले- ‘चलो उसे देख आयें।’

भदन्त आनन्द और कुछ अन्य भिक्षु भी बुद्ध के साथ हो लिए। बुद्ध ने देखा रुग्ण भिक्षु अपनी कुटिया में अकेला बेसुध पड़ा है। किसी के द्वारा परिचर्या न किये जाने के कारण वह कुटिया में ही मल-मूत्र से लिपटा सना पड़ा था। भगवान् ने उसे देखकर कहा- ‘भाई तुम्हें क्या कष्ट है।’

‘मुझे अतिसार है भगवन्’- भिक्षु ने कहा।

‘क्या? कोई भी तुम्हारी परिचर्या को नहीं आया?

‘नहीं आया भगवन्।

‘तो भिक्षु ऐसा क्यों हुआ कि भिक्षुभाल तुम्हारी देखभाल नहीं करते?’

‘भगवन् वे सब योग साधनाओं में निरत रहते हैं मैंने यही सुना है। इसलिए उन्हें मेरी चिन्ता नहीं है, यह भी वे लोग कहते हैं।’

अपने पास खड़े भिक्षुओं से कुछ न कहते हुए तथागत ने भदन्त आनन्द से कहा- ‘जाओ आनन्द, जल ले आओ। हम इस भाई की सेवा करेंगे।

‘हाँ भगवान्!’ आनन्द ने कहा और जल लेने को चल दिया। जब जल कलश आ पहुँचा तो भगवान् ने स्वयं जल डाला और अपने ही हाथों से भिक्षु का सारा शरीर धोया। तथागत को स्वयं परिचर्चा करते देख वहाँ खड़े भिक्षुगण भी परिचर्या में हाथ बँटाने लगे। तथागत ने किसी से कुछ कहा नहीं।

संध्या होने को थी। संध्या कालीन प्रार्थना के लिए सभी भिक्षुगण एकत्र हो रहे थे। परिचर्या के उपरान्त तथागत बैठक में पहुँचे और उन्होंने बिना किसी भूमिका के भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए कहा- भाइयों, क्या हममें से कोई एक भिक्षु रोगी है।’

‘हाँ भगवन् है तो!’

‘उसे क्या कष्ट है।’

‘भगवन् उस भाई को अतिसार है।’

‘उसकी देखभाल कौन कर रहा है?’

‘कोई नहीं।’

‘क्यों?’

सब चुपचाप थे। थोड़ी देर सन्नाटा छाया रहा फिर बुद्ध ही बोले- “मैं जानता हूँ। तुम सबको अपने आत्मकल्याण की चिन्ता है, पर याद रखो योग साधनाओं से वह सम्भव है या नहीं यह तो मुझे ज्ञात नहीं, पर जो सच्चे हृदय से दुःखी जनों की सेवा निष्काम भाव से करते हैं उनकी स्वर्ग मुक्ति आत्म-कल्याण सर्वथा अक्षुण्ण है, उसे काई भी उससे विचलित नहीं कर सकता।


स्वाध्याय में प्रमाद न करें

गुरुकुल में प्रवेश के समय शिष्य को आचार्य तीन शिक्षाएँ देता है और इन्हें नियमित रूप से पालन करने के लिए निर्देश देता हे। “सत्यं वद्” अर्थात् सत्य ही बोलो। “धर्मं चर” अर्थात् धर्म का ही आचरण करो और “स्वाध्यायानना प्रमदः” अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करो। सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा अनेक हैं, पर उनमें तीन ही प्रमुख हैं। जो उन्हें पालन करता है, समझना चाहिए कि धर्माचरण का सार उसने हृदयंगम कर लिया।

यहाँ स्वाध्याय पर प्रकाश डाला जा रहा है। उसकी तुलना सत्य और धर्म के समतुल्य ही की गई है। उपनिषद् वचन है कि जो जिस दिन स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी तुलना चाण्डाल जैसी हो जाती है। शरीर को नित्य स्नान कराना आवश्यक है अन्यथा मैल जम जाएगा। बदबू निकलेगी, अनेकों रोग उपजेंगे। ठीक उसी प्रकार मन को स्नान कराने के लिए स्वाध्याय की व्यवस्था है। उसमें प्रमाद करने से मन के ऊपर विकारों की परत जम जाती है। मनोविकार उपजते हैं। मानसिक रोगों का उद्भव होता है। मन की मलीनता से शरीर तो रुग्ण होता ही है। कषाय कल्मषों का अम्बार जमा हो जाता है। यह इतनी बड़ी हानि है जिसे असाधारण ही कह सकते हैं। शरीर का स्वास्थ्य गँवा बैठना बुरा है। इससे भी बुरा मन का स्वास्थ्य गँवा बैठना है। स्वाध्याय की उपेक्षा करना, उसमें प्रमाद बरतना मन को रोगी बनाने के समान है।

स्वाध्याय क्या है? यह समझने की बात है। स्व माने अपने आपका। अध्याय माने अध्यापन करना। अपने आपको पढ़ना अर्थात् अपने को समझना। अपने को समझना अर्थात् अपनी समस्याओं को समझना और उनकी जानकारी प्राप्त करना।

पाठशालाओं में जो पढ़ाया जाता है। उसमें बाह्य संसार का विवरण होता है। भूगोल, इतिहास, भाषा, गणित आदि ऐसे प्रसंग हैं जिनका सम्बन्ध बाह्य संसार से है। अपने निज के सम्बन्ध में उसमें कोई जानकारी नहीं होती। स्कूल शिक्षा का उद्देश्य निर्वाह की समस्या हल करना है। पढ़ने के बाद अधिकाँश छात्र नौकरी तलाश करते हैं। इसके अतिरिक्त जो बचते हैं वे पैतृक व्यवसाय से रोजी रोटी कमाने का प्रबन्ध करते हैं। शिक्षा का प्रयोजन ही यही है। इसीलिए पढ़ते हैं, इसीलिए पढ़ाए जाते हैं। शिक्षा और आजीविका एक ही बात है। जो पुस्तकीय ज्ञान विद्यालयों में पढ़ाया जाता है वह आजीविका का, निर्वाह का उद्देश्य भर पूरा करता है, पर होना चाहिए ‘निर्माण’ की समस्या का हल। निर्वाह सामान्य बात है उसे बिना पढ़े भी कमा लेते हैं। इन दिनों बढ़ई, राज, मोची आदि को प्रायः पचास रुपये रोज मिलते हैं फेरी खोमचा लगाने वाले इससे भी अधिक ही कमा लेते हैं। चोरी उठाईगीरी करने वाले इससे भी अधिक कमाते हैं। जिनके पास कोई पैतृक व्यवसाय है वे उससे भी ज्यादा कमाते हैं। निर्वाह ही सब कुछ नहीं है। महत्वपूर्ण बात है- ‘निर्माण’। जीवन का निर्माण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का निर्माण। गुण-कर्म स्वभाव का निर्माण। विद्या का उद्देश्य यही है। मनुष्य जीवन के साथ जुड़ी हुई अगणित समस्यायें हैं। उनका कारण, स्वरूप और समाधान समझा जा सके तो समझना चाहिए कि व्यक्तित्व का निर्माण सीखा गया। जिसे यह आता है, समझना चाहिए कि उसे सब कुछ आता है। जिसे यह नहीं आता, समझना चाहिए कि उसे कुछ भी नहीं आता।

मनुष्य का मूल्याँकन उसके व्यक्तित्व के आधार पर होता है। व्यक्तित्व के आधार पर मनुष्य महान अथवा क्षुद्र बनता है। प्रामाणिक अथवा अप्रामाणिक ठहरता है। जिनका भरोसा नहीं उसे कोई पास तक नहीं बैठने देता। कोई बड़ी जिम्मेदारी का काम नहीं सौंपता। ऐसे व्यक्ति प्रतिष्ठा रहित होते हैं। जहाँ-तहाँ ठोकरें खाते फिरते हैं। जिनका निर्माण नहीं हुआ है वे अनगढ़ रह जाते हैं। निर्माण किसका? चरित्र का। आदमी का असली मूल्य यही है। अन्यथा कमाने की योग्यता झटका लगते ही बिखर जाती है। स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगे तो समझना चाहिए कि निर्वाह की समस्या समाप्त हुई। किन्तु जिसका व्यक्तित्व उच्चस्तरीय है वह स्वास्थ्य के गड़बड़ाने पर भी मजबूती से अपने स्थान पर खड़ा रहता है। आद्यशंकराचार्य को भगंदर का फोड़ा हो गया था उसी कारण उनका 32 वर्ष की आयु में निधन हो गया। किन्तु बीमार रहते हुए भी उनके व्यक्तित्व को कोई आँच नहीं आई।

स्कूलों में आदमी बहुत कुछ पढ़ लेते हैं। मेकेनिक, इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर आदि हो जाते हैं और अपने काम में कुशलता दिखाते हुए समुचित आजीविका भी कमाते हैं। पर अपने निज से सम्बन्धित समस्याओं का स्वरूप और समाधान समझने के कारण व्यक्ति निरन्तर खिन्न, उद्विग्न बना रहता है। भगवान ने सभी को अच्छा खासा शरीर दिया है। इसे कितने आदमी जानते हैं। फिर बीमार होने पर हकीम, डॉक्टरों के यहाँ झक मारते फिरते हैं। वह तौर तरीका मालूम नहीं होता जिससे अपना रहन-सहन, आहार-विहार बदले देने के कारण खोए हुए स्वास्थ्य को फिर से लौटाया जा सके।

मनुष्य के पास सबसे बहुमूल्य सम्पदा उसका मस्तिष्क है। मन, बुद्धि, चित्त के सन्तुलित होने पर मनुष्य अपनी समस्याओं को हल कर लेता है, उलझनें सुलझा लेता है ओर प्रगति का द्वार खोल लेता है। जिसका चिन्तन अस्त-व्यस्त है वह चरित्र खो बैठता है। दुश्चरित्र से हर किसी के साथ दुर्व्यवहार ही बन पड़ेगा। दुर्गति अपनाने पर दुर्गति ही होती है। इसके विपरीत जिसका दृष्टिकोण सुलझा हुआ है उसे गुत्थियों का सामना नहीं करना पड़ता। उसका व्यवहार ऐसा होता है जिससे जीवन शान्ति के साथ व्यतीत होता रहे और जिन लोगों के साथ सम्बन्ध संपर्क हो वे भी सदा प्रसन्न और सन्तुष्ट रहें। सहानुभूति बातें और सहायक सिद्ध होते रहें। यह मानसिक स्वच्छता और प्रखरता का प्रतिफल है।

आदतें आदमी की निज की डाली हुई होती हैं। फिजूल खर्च, तुनक मिज़ाजी, जल्दबाजी की आदतें भी ऐसी हैं जो आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न करती हैं और जिनके साथ सम्बन्ध हैं उनसे कटुता उत्पन्न कर लेती हैं। आलस्य, प्रमाद की आदत ऐसी है जो आदमी को निकम्मा बना कर रख देती है। इन आदतों से कैसे बचा जाय और यदि वे पीछे लग गई हैं तो उनसे कैसे पीछा छुड़ाया जाय, यह तक लोगों को नहीं आता। नशेबाजी के शिकार होने पर स्वास्थ्य, पैसा, इज्जत और परिवार का सत्यानाश कर लेते हैं, पर उन्हें छोड़ नहीं पाते। इसे व्यक्तित्व की हीनता ही कहा जाएगा।

परिवार में कई व्यक्ति होते हैं। उनके साथ प्रेमपूर्वक सहयोग के साथ कैसे रहा जाय। आपस में कोई झंझट खड़ी होती है तो उसे कैसे सुलझाया जाय। यदि इतना भी आदमी को नहीं आता तो उसे अनपढ़, अनाड़ी ही कहा जाएगा। भले ही उसने ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन की परीक्षा, फर्स्ट डिवीजन से ही क्यों न पास कर ली हो।

एक आदमी अपने गुण, कर्म, स्वभाव के कारण महापुरुषों की श्रेणी में गिना जाता है और दूसरा इन्हीं बातों में खोट रहने के कारण जन-जन द्वारा दुत्कारा जाता है और पग-पग पर असफलताएँ प्राप्त करता है। इसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है। व्यक्तित्व बिगाड़ लेने का ही परिणाम है कि अवसर सामने होते हुए भी व्यक्ति ठोकरें खाता-फिरता है। यदि अपना दृष्टिकोण परिष्कृत हो तो गई-गुजरी परिस्थितियाँ होते हुए भी आदमी निरन्तर ऊँचा उठता जाता है।

इसी को निर्माण कहते हैं। इसके लिए जीवन निर्माण में सहायता करने वाला साहित्य पढ़ना तो आवश्यक ही है, इसके अतिरिक्त उच्चस्तर वाले व्यक्तियों का सान्निध्य संपर्क रखना भी आवश्यक है। स्वाध्याय में मनन चिंतन भी शामिल है। अपनी समस्याओं का सही स्वरूप समझना और उन्हें विवेकपूर्ण ढंग से सुलझाना, यह भी स्वाध्याय है।

कई व्यक्ति शास्त्र पुराणों का पाठ करते रहना ही स्वाध्याय समझते हैं। उसकी चिन्ह पूजा कर लेने से कोई काम नहीं बनता। साहित्य पढ़ना हो तो जीवन की समस्याओं का स्वरूप और समाधान बताने वाला साहित्य पढ़ना चाहिए। इसके लिए विचारशील दूरदर्शी लोगों का लेखन ही चयन करना चाहिए। स्वाध्याय के नाम पर उलटी-सीधी पुस्तकें पढ़ लेने से काम नहीं चलता भले ही थोड़ा पढ़ा जाय पर उसे चिन्तन मनन पूर्वक पढ़ा जाय। साथ ही यह परखते चला जाय कि आदर्शों का हम अनुकरण कर रहे हैं या नहीं। यदि नहीं तो भूल को तुरन्त सुधारा जाय। यदि कर रहे हैं तो उस दिशा में और भी दृढ़ता अपनानी चाहिए। इस मनःस्थिति के साथ समाधान परक साहित्य पढ़ा जाये। यही स्वाध्याय है। आत्म निर्माण की, व्यक्तित्व के विकास की प्रेरणा देने वाली विचार पद्धति ही स्वाध्याय है। स्वाध्यायशील दिन-दिन ऊँचे उठते हैं। इसलिए उसे नियमित रूप से अपनाये रहने के लिए शास्त्रकारों ने निर्देश दिया है। उसमें प्रमाण नहीं ही करना चाहिए।.


Quotation

जब कभी दोष ढूँढ़ने का मरा मन होता है तो उसे अपने से आरम्भ करता हूँ और उस समीक्षा को इससे आगे नहीं बढ़ने देता।


चरित्र और ज्ञान की अनंतता (kahani)

एक बार एक धनी व्यक्ति ने एक ऊँची बल्ली पर रत्न जटित कीमती कमंडलु टाँग दिया और घोषणा की कि जो कोई साधु इस बल्ली पर सीधा चढ़कर कमंडलु उतार लेगा उसे यह कीमती पात्र ही नहीं बहुत दक्षिणा भी दूँगा। बहुत से त्यागी और विद्वान साधुओं ने भी प्रयत्न किया पर किसी को सफलता न मिली। अन्त में कश्यप नामक नट विद्या में बहुत-सा जीवन बिताकर साधु बने एक बौद्ध भिक्षु ने उस बल्ली पर चढ़कर कमंडलु उतार लिया। उसकी बहुत प्रशंसा हुई और धन भी मिला।

जब यह समाचार भगवान् बुद्ध के पास पहुँचा तो वे बहुत दुःखी हुए। उन्होंने सब शिष्यों को बुलाकर कहा- भविष्य में तुम में से कोई भिक्षु इस प्रकार का चमत्कार न दिखाये और न उन लोगों से भिक्षा ग्रहण करे जो साधु का आचार नहीं चमत्कार देखकर उसे बड़ा मानते हैं।

चमत्कार नहीं चरित्र और ज्ञान ही साधुता की कसौटी है।

* * * * *

भगवन् बुद्ध एक बार आनन्द के साथ एक सघन वन में से होकर गुजर रहे थे। रास्ते में ज्ञान चर्चा भी चल रही थी।

आनन्द ने पूछा- देव! आप तो ज्ञान के भण्डार हैं। आपने जो जाना क्या आपने उसे हमें बता दिया।

बुद्ध ने उलटकर पूछा- इस जंगल में भूमि पर कितने सूखे पत्ते पड़े होंगे? फिर हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं उन पर चिपके सूखे पत्तों की संख्या कितनी होगी? इसके बाद अपने पैरों तले जो अभी पड़े हैं वे कितने हो सकते हैं?

आनन्द इन प्रश्नों का उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे। मौन तोड़ते हुए तथागत ने स्वयं ही कहा- ज्ञान का विस्तार इतना है जितना इन वन प्रदेश में बिछे हुए सुखे पत्तों का परिवार। मैंने इतना जाना जितना ऊपर वाले वृक्ष का पतझड़। इसमें भी तुम लोगों को इतना ही बताया जा सका जितना कि अपने पैरों के नीचे कुछेक पत्तों का समूह पड़ा है।

ज्ञान की अनन्तता को समझते हुए उसे निरन्तर खोजते और जितना मिल सके उतना समेटते रहने में ही बुद्धिमत्ता है।


दृष्टा बनाम सृष्टा

मनुष्यों के वर्गीकरण में उनके दो विभाजन सहज ही हो जाते हैं। एक दृष्टा दूसरा सृष्टा। दृष्टा जिनका मनोविनोद देखने तक सीमित है, जो तरह-तरह के दृश्य देखते, मनोरंजक गतिविधियों का पर्यवेक्षण करते और मन बहलाते हैं। अन्यत्र होने वाली घटनाएँ उन्हें रुचिकर लगती हैं। घटनाओं की विचित्रता उन्हें सुहाती है। अधिक बारीकी से उनके विवरण सुनते हैं। कहानियाँ सुनने, रेडियो सुनने, उपन्यास पढ़ने, सैर करने से उनका दृष्टा मन प्रसन्न होता है।

दृष्टा पर कोई भार नहीं पड़ता उसे जो घटित होने वाला है उसे देखकर कौतूहल युक्त विनोद करना है। अच्छे शब्दों में इसे जानकारी बढ़ाना भी कह सकते हैं।

सृष्टा वे हैं जिनका मन किसी सृजन कार्य में लगा रहता है। करने के लिए कुछ कार्य निर्धारित करते हैं, उसकी रूपरेखा बनाते हैं। साधन जुटाते हैं। बाने में जो भूल-चूक होती है उसे सुधारते हैं। सफलता को और भी अच्छी बनाने की दृष्टि से सोचते हैं कि इसमें क्या परिवर्तन किया जाना चाहिए और उसके लिए साधनों, क्षमताओं और परिस्थितियों को किसी प्रकार सुगढ़ बनाया जाना चाहिए।

मनमौजी दृष्टा लोग जब अपने साथ सृष्टा की तुलना करते हैं तो उन्हें जमीन आसमान जैसा अन्तर दीखता है। स्कूल में साथ पढ़ने वाले फिसड्डी लड़के कहाँ से कहाँ पहुँच गये। जबकि उनके पास विपुल साधन होते हुए भी अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने का अवसर नहीं आया। कारण एक ही रहा- दिमाग की कमजोरी रहते हुए भी उत्कण्ठा अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने की लगी रही ओर समय का ऐसा कार्यक्रम निर्धारित करते रहे जिसको अपनाये रहकर वे प्रगति पथ पर निरन्तर बढ़ते रहे।

दृष्टा का मानस विनोद प्रिय होता है। उसे विनोद के चित्र विचित्र आधार चाहिए। प्रत्यक्ष न मिले तो कल्पना लोक में उड़ना और दिवा स्वप्न देखना भी एक रुचिकर काम बन जाता है पर इसी जाल जंजाल में समय, शक्ति, चिन्तन की वह सारी पूँजी चुकती जाती है, जिसे यदि किसी योजनाबद्ध प्रयास में लगाया गया होता तो उसके परिणाम सामने आते। सर्वथा शेख-चिल्ली की रीति-नीति अपनानी हो तो बात दूसरी है। अन्यथा इस कुचक्र में उनकी शक्ति पूँजी घटती ही चली जाती है।

सृजन कम आकर्षक, मनोरंजक एवं रुचिकर नहीं है। क्योंकि उसके पीछे किसी संकल्प को साकार करने की उत्कण्ठा काम करती है। यह रूखा कार्य उन्हीं के लिए हो सकता है जिनके ऊपर कोई काम बेगार की तरह थोपा गया हो। जिसके लाभ हानि में, जिसकी सफलता असफलता में सृष्टा की कोई सीधी दिलचस्पी न हो। किन्तु यह ऐसा नहीं है तो उससे सृष्टा की योग्यता निरन्तर बढ़ती है। असफलता के बिन्दु को ढूँढ़ना और उसे सुधारना कम आकर्षक नहीं है। उसमें प्रतिभा बढ़ाने के गुण हैं।

यदि सफलता मिलती है तो उसका प्रतिफल हाथों-हाथ प्रशंसा के रूप में मिलता है। काम अपना है तो यश अपना है किन्तु यदि काम सार्वजनिक है या अन्य किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा सौंपा हुआ है तो उसकी चर्चा मण्डली में होती है और कुशलता की प्रशंसा होती है।

सृजन ही वह क्रिया है जिसमें व्यक्ति ओर संसार की उन्नति हुई है। वैज्ञानिकों, साहित्यकारों से लेकर साधारण शिल्पियों तक जिनने कुछ रचनात्मक कार्य कर दिखाये हैं, उन्हें अगली उन्नति के अवसर मिले हैं। उन्हें अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण काम सौंपे गये हैं।

जो लोग सोचते हैं कि मनोरंजन में जिन्दगी का मजा है वे यह भूलते हैं कि दृष्टा को ठाली समझा जाता है। वह अपने साथी ढूँढ़ता है और एक ठलुआ क्लब बना लेता है। इस कुटेव की आदत वह दूसरे को भी लगा देता है। जैसे अनेक व्यसन संसार में बदनाम हैं उसी प्रकार खाली रहना, इधर-उधर की बातों में बेकार समय गँवाना भी एक ऐसा काम है जिससे किसी को प्रसन्नता नहीं होती। यहाँ तक कि अपने को भी सन्तोष नहीं होता। इसलिए दृष्टा वर्ग की तुलना में सृष्टा वर्ग को ही श्रेष्ठ माना गया है।


“कर्मण्ये वाधिकारस्ते”

मनुष्य का अधिकार कहाँ तक है और अनाधिकार कहाँ तक? इसका विश्लेषण करते हुए गीता में भगवान् कहते हैं-

कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।

अर्थात्- “तेरा अधिकार कर्म तक ही सीमित है। फल तक नहीं। इसलिए फल की आकाँक्षा करते हुए कर्म न कर।”

यों हर आदमी किसी फल की इच्छा से, परिणाम की आकाँक्षा से कर्म करता है। यह उचित भी है और आवश्यक भी। कोई वज्र मूर्ख या योगी परमहंस ही बिना विचारे काम कर सकता है। जो करेगा सो पीछे पछताता फिरेगा। कहा भी है- “बिना विचारे जो करे सो पीछे पछताय।” काम करने से पूर्व कई बातों पर विचार करना पड़ता है। अपनी योग्यता उतनी है या नहीं। उसके लिए आवश्यक साधन हैं या नहीं। अवसर है या नहीं। कृषि से लेकर व्यवसाय तक में हाथ डालने से पूर्व इन बातों पर विचार करना पड़ता है। जमीन न हो, बीज न हो, बोने का मौसम न हो तो जो भी कृषि करने का साहस करेगा वह मूर्ख कहलायेगा। यही बात व्यवसाय के सम्बन्ध में है। अनुभव, पूँजी, ग्राहक आदि का विचार करना पड़ता है तभी कोई व्यवसाय में हाथ डालता है। ऐसा कुछ भी विचार न करे और चाहे जब, चाहे जो व्यवसाय करने लगे तो पूँजी गँवाने, उपहास कराने के अतिरिक्त और क्या हाथ आने वाला है। सभी छोटे बड़े कामों की योजनाएँ बनती हैं और उसके उपरान्त ही उसका सरंजाम जुटाया जाता है। यही उचित और उपयुक्त भी है। अभीष्ट परिणाम की इसके बिना कोई आशा नहीं करता।

किन्तु प्रश्न वहाँ पेचीदा होता है, जहाँ यह मानकर चला जाता है कि यह प्रतिफल तो निश्चित रूप से हस्तगत हो ही जायेगा। इतना ही नहीं, आतुरता इतनी बढ़ी चढ़ी होती है कि जितनी बड़ी आशा की गई है उतनी हस्तगत न हो तो मानसिक सन्तुलन गँवा बैठा जाय। इतना शोक किया जाय कि विचार तन्त्र ही गड़बड़ाने लगे और यह भी न सूझ पड़े कि अब क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए?

उदाहरण के लिए कोई छात्र परीक्षा देने जाता है। उसके लिए आवश्यक तैयारी भी करता है पर किसी कारणवश उत्तीर्ण नहीं होता तो इतना शोकाकुल होने लगता है कि आत्म-हत्या की बात सोचता है या अगले वर्ष पढ़ने का विचार ही छोड़ देता है अथवा जिस-तिस पर दोषारोपण करने लगता है। अभिभावकों पर, अध्यापकों पर, प्रश्न पत्र बनाने या जाँचने वालों पर दोष मढ़ता है। गृह दशा खोटी बताता है। भाग्य को दोष देता है। यह सब विचार ऐसे हैं, जो उस विचार शक्ति को नष्ट कर देते हैं जो यह बता सकती है कि ऐसी दशा में क्या करना चाहिए।

सफलता मिलने पर आगे क्या करना चाहिए यह सोचने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होती, पर असफलता मिलने की दशा में अगला कदम क्या हो, इसका निर्णय करने के लिए बढ़ी-चढ़ी सूझ-बूझ चाहिए। जो धक्का लगा है उसे सहन करने, सम्भालने और पहले से भी अधिक सावधानी के साथ काम को नये सिरे से आरम्भ करने के लिए सन्तुलित मस्तिष्क की आवश्यकता है अन्यथा शोकाकुल, अर्ध विक्षिप्त मनःस्थिति में किये गये काम के सम्बन्ध में पहले की भाँति ही असफलता मिलने की सम्भावना है। ऐसी दशा में दूनी चोट लगेगी और सम्भावना यहाँ तक हो सकती है कि कोई विद्यार्थी पढ़ना ही छोड़ बैठे। कोई व्यापारी दुकान ही उठा दे और काम को छोड़ बैठने पर बेकारी की स्थित में जो नाना प्रकार के कुविचार मस्तिष्क में आते हैं, उस स्थिति में कोई अनर्थ ही कर बैठे।

सफलता की आशा करना बहुत अच्छी बात है। उसके लिए पूरी सामर्थ्य भर कोशिश करना और भी अधिक आवश्यक है। इतने पर भी ऐसे कितने ही कारण है जिनके कारण असफलता हाथ लगे। प्रश्न पत्र ऐसा आ जाय जो विषय पढ़ा ही नहीं था या अध्यापक ने लापरवाही से पढ़ाया ही नहीं था। पर्चा जाँचने वाले का या बनाने वाले का अपना काम करते समय मूड खराब रहा हो। उत्तर लिखते समय बात को सही रीति से समझने में अपन में ही भूल रही हो। उस समय तबियत खराब हो गई हो या किसी लड़ाई झगड़े की वजह से मूड गड़बड़ा गया हो। ऐसे में से अनेक कारण अनुत्तीर्ण होने के हो सकते हैं। जो हो गया सो हो गया। महत्व की बात यह है कि बिगड़ी को बनाया कैसे जाय। लांगफेलो कहते थे कि हर असफलता के बाद सोचा जाना चाहिए कि पहले की अपेक्षा दूनी तत्परता के साथ काम करने की आवश्यकता है।

असफल होने पर उस राजा की कहानी याद करनी चाहिए जो बारह बार लड़ाई हारा था और छिपकर गुफा में बैठा था। उसने देखा मकड़ी जाला बुन रही है आर वह हर बार टूट जाता है। बारह बार असफल रहने के बाद उसे तेरहवीं बार सफलता मिली। राजा ब्रूसो ने उस घटना से प्रेरणा ली कि जब मकड़ी न तेरहवीं बार सफलता प्राप्त कर ली तो वह क्यों नहीं वैसा करेगा? तेरहवीं बार उसने फिर तैयारी की और इस बार जीत गया।

सफल होने पर अगला कदम उठाने के लिये जितनी बुद्धिमानी और हिम्मत की जरूरत है, हार जान- असफल हो जाने पर नये कदम का फैसला करने के लिए उससे कहीं अधिक समझदारी चाहिए।

सफलता किसी भी काम में सुनिश्चित नहीं है। जो चाहा है, वह हस्तगत हो ही जायेगा इसका कोई भरोसा नहीं। ऐसी दशा में अपना भविष्य ही बिगाड़ बैठना, हिम्मत छोड़ बैठना, समझदारी नहीं है। एक बुद्धिमान का कहना है कि भविष्य के लिए अच्छी से अच्छी आशा करनी चाहिए किन्तु बुरी से बुरी सम्भावना के लिए तैयार रहना चाहिए। अच्छा यही है कि पहले से ही बढ़चढ़कर आशा न की जाय।

अच्छा तरीका यह है कि जो करना चाहिए उसे पूरी मेहनत, लगन और दिलचस्पी के साथ किया जाय। अपने काम में इतना अधिक रस लिया जाय कि उसे करते समय इतना आनन्द आये कि हम जो कर सकते थे पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ किया है। प्रसन्न होने के लिए इतना ही पर्याप्त है।

जो असफलता मिलने पर चेहरे पर उदासी नहीं आने देता, मन को मलीन नहीं होने देता, हिम्मत को टूटने नहीं देता, वस्तुतः वही सच्चा समझदार और बहादुर है। दूसरे आदमी सहानुभूति दिखाने आयें तो उनसे कहना चाहिए हमने पूरी मेहनत से काम किया फिर अपना क्या कसूर जिसके लिए कोई सहानुभूति दिखाये। यदि मेहनत या सावधानी में कमी रखी है तो कहना चाहिए कि अपनी भूल का नतीजा सामने है। इसके लिए सहानुभूति न दिखायें, वरन् हिम्मत बढ़ाइये कि अगली बार अच्छे स्तर की सफलता प्राप्त कर सकें। जो लड़के एक साल फेल हो जाते हैं वे अच्छी मेहनत करने पर अगले वर्ष प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं। क्योंकि उन्हें एक ही कक्षा में दो वर्ष पढ़ने का अवसर मिला, मनोबल उन्होंने खोया नहीं। अच्छा डिवीजन आना सौभाग्य का चिन्ह है। इससे हर काम में भविष्य उज्ज्वल बनता है। खराब डिवीजन मिलने की अपेक्षा फेल होना अच्छा। क्योंकि डिवीजन खराब होने से भविष्य में कोई अच्छा अवसर मिलने की आशा नहीं की जाती।

अपनी प्रसन्नता सदा सुरक्षित रखने के लिये अच्छा यह है कि अपनी मेहनत और कोशिश को ही सफलता माना जाय। उसी पर सन्तोष किया जाय। ऐसी मनःस्थिति रखने पर सफलता मिले तो भी प्रसन्नता और असफलता मिले तो भी प्रसन्नता। गीताकार ने इसलिए कहा है कि कर्म पर ही अपना अधिकार है, फल पर नहीं। इस मान्यता को अपना लेने पर आदमी कभी उदास नहीं होता और अगला कदम उठाने में कभी खिन्नता अनुभव नहीं करता।


Quotation

कट जाने पर भी चन्दन सुगन्ध नहीं छोड़ता। कोल्हू में मिलने पर भी ईख मिठास नहीं छोड़ती। विपत्ति आने पर भी सज्जन शील नहीं छोड़ते।


कबीर की उलटबांसियां

कबीर की उलटबांसियां बड़ी अचम्भे की रही हैं। उनको पढ़ने-सुनने से उनके पीछे लगे रहस्यवाद को जानने की सहज जिज्ञासा होती है, पर वह इतना सरल नहीं है। आन्तरिक ढाँचे की बनावट और नाथ सम्प्रदाय से सम्बन्धित हठयोग का जिन्हें गहरा ज्ञान है, वे ही उनका अर्थ और प्रयोजन समझने में किसी सीमा तक समर्थ हो सकते हैं।

कबीर का उद्देश्य इन उलटबांसियों के पीछे एक ही प्रतीत होता है कि इनके अर्थ कौतुक-कौतूहल को समझने के साथ-साथ साधना से सम्बन्धित रहस्यों को भी जानने और स्मरण रखने का प्रयत्न करते हुए साधक पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचे। उद्देश्य उत्तम है पर कठिनाई एक ही रही है कि रहस्यवाद का उद्घाटन करने के पीछे जो माथा पच्ची करनी पड़ती है और उस मार्ग पर चले हुए लोगों की सहायता लेनी पड़ती है उसकी ओर उदासीनता अपनाने के कारण रहस्यों को भुला देने की भूल होती रही है।

यहाँ कुछ उलटबांसियां दी जाती हैं और उनका शब्दार्थ तथा रहस्योद्घाटन का पक्ष भी दिया जाता है।

मँड़ये के चारन समधी दीन्हा, पुत्र व्यहिल माता॥

दुलहिन लीप चौक बैठारी। निर्भय पद परकासा॥

भाते उलटि बरातिहिं खायो, भली बनी कुशलाता।

पाणिग्रहण भयो भौ मुँडन, सुषमनि सुरति समानी,

कहहिं कबीर सुनो हो सन्तो, बूझो पण्डित ज्ञानी॥

शब्दार्थ- चारण का काम समधी ने किया। विवाहों में वंशावली तथा यश कीर्ति गाने वाले चारण आते हैं, पर जिस विवाह का उल्लेख कबीर कर रहे हैं। उसमें माँडवे के पास जाकर समधी ने चारण का काम किया समधी (लड़के या लड़की के बाप को कहते हैं) और पुत्र के साथ माता ने ब्याह का सरंजाम जुटाया। मण्डल के नीचे लीप, पोत कर दुलहन को बिठाया। यह बात छिपाकर नहीं रखी गई वरन् निर्भय होकर सबसे कह दी गई।

बरातियों के लिए जो भात बनी था उसने उलटकर बरातियों को ही खा डाला। व्यंग्य की भाषा में कहा गया है कि यह अच्छा कुशल क्षेम हुआ। जिस समय पाणिग्रहण होना चाहिए था उस समय मुण्डन हुआ- सिर मूड़ा गया। सुषुम्ना-सुरति में समा गई। कबीर सन्तों को सुना कर कहते हैं कि जो कोई इस पहेली को बूझे वह ज्ञानी पंडित है। अब इसके रहस्य पर विचार किया जाय।

आत्मा और परमात्मा के मध्य का द्वैत मिटाने के लिए दोनों को एक करने के लिए जिस मंडप की व्यवस्था की गई थी उसमें चित्त को दो काम करने पड़े। एक समधी का- दूसरा काम गाने वाले चारण का। योग साधना में समस्त वृत्तियों का उत्पादक चित्त है। वह निग्रहित न होने पर अपने क्रिया-कलाप का ढिंढोरा भी पीटता फिरता है। दो काम उसे नहीं करने चाहिए थे पर आश्चर्य है कि करता है। माता को पुत्र से ब्याह करना पड़ता है अर्थात् मन के साथ गठजोड़ करना पड़ता है। दोनों का संग न सधे तो कोई प्रयोजन ही पूर्ण न हो। इसके लिए मन तो सहज सहमत नहीं होता पर चौक को लीप-पोत कर विवाह के लिए पुते चौक के नीचे बिठाना पड़ता है। वह समझदार है इसलिए बैठ जाती है। मन नासमझ है सो आना-कानी और उछल-कूद करता है। इस तथ्य को गुप्त रखने में कोई लाभ नहीं। निर्भय होकर प्रकट करना पड़ता है कि दुलहन आत्मा को ही इस विवाह में उत्सुकता, आतुरता थी। मन तो बंधन में बँधने से अन्त तक आना-कानी ही करता रहता है।

कषाय-कल्मष- दोष-दुर्गुण बाराती हैं। वे तमाशा देखने बराती बनकर आते हैं और तरह-तरह के उपहार पाने की, सम्मानित होने की, अपेक्षा करते हैं, पर बात उल्टी ही हो जाती है। प्रीति-भोज में जो भात परोसा जाता है उसने ही उलट कर बरातियों को खा लिया। अध्यात्म के उपहार श्रेय के रूप में होते हैं। वे इस विवाह के फलस्वरूप जब ज्योनार में परोसे जाते हैं तो उलटकर बरातियों को ही खा जाते हैं अर्थात् उस दिव्य उपलब्धि के कारण दोष-दुर्गुणों का ही सफाया हो जाता है। यहाँ भी व्यंग्य है कि अच्छी कुशल क्षेम निकली। बराती अपने अस्तित्व को ही गँवा बैठे।

पाणिग्रहण संस्कार के समय केशों का शृंगार होता है, पर यहाँ बिलकुल ही उलटा हुआ। सिर मूंड़ा गया यह मुँडन संस्कार की रस्म पूरी की गई। विवाह में सभी को कुछ मिलने की आशा होती है, वह तो पूरी हुई नहीं उलटा शिर मूँड़ लिया गया। सिर मूँडने से तात्पर्य यहाँ त्याग, वैराग्य से है। जो कुछ कमाया हुआ था वह भी गँवा दिया गया। इस क्रिया कृत्य के करने पर सुषुप्त नाड़ी ध्यानयोग की गम्भीरता में- समाधि अवस्था में चली गई। इस प्रकार द्वैत-अद्वैत बन गया। दूल्हा-दुलहन का जोड़ा मिलकर एकाकार हो गया। भक्त और भगवान का अन्तर समाप्त हो गया।

कबीर अपने साथी साधु समुदाय से पूछते हैं कि उलटबांसी के रूप में जो रहस्य बताया गया है उसका अर्थ प्रकट करो तो तुम्हें ज्ञानी पण्डित समझा जाय?

एक दूसरी उलटबांसी और भी आकर्षक एवं रहस्यमय है। इसके शब्दार्थ कितने व्यंग भरे और तत्वार्थ कितने सारगर्भित हैं। यह देखने ही योग्य है-

देखि-देखि जिय अचरज होई यह पद बूझें बिरला कोई॥

धरती उलटि अकासै जाय, चिउंटी के मुख हस्ति समाय।

बिना पवन सो पर्वत उड़े, जीव जन्तु सब वृक्षा चढ़े।

सूखे सरवर उठे हिलोरा, बिनु जल चकवा करत किलोरा।

बैठा पण्डित पढ़े कुरान, बिन देखे का करत बखान।

कहहि कबीर यह पद को जान, सोई सन्त सदा परबान॥

शब्दार्थ- देख-देखकर जी में आश्चर्य होता है। इस रहस्य को कोई बिरले ही बूझ पाते हैं।

धरती ने उलट कर आकाश को खा लिया। चींटी के मुँह में हाथी चला गया। बिना पवन के पर्वत उड़ने लगे। सारे जीव जन्तु इस समय वृक्षों पर चढ़ गये।

सूखे सरोवरों में जल की हिलोरें उठने लगीं। पानी नहीं था तो भी चकवा कलोल करते देखा गया।

पण्डित कुरान पढ़ रहे थे और उसका बखान कर रहे थे जो देखा ही नहीं।

कबीर कहते हैं कि जो इस कथन का रहस्य जानता है, उसी की बात सदा प्रामाणिक मानी जायगी।

इस उलटबांसी में योगी की अन्तरंग और बहिरंग स्थिति का वर्णन है। गीता में कहा गया है कि जब संसार जागता है तब योगी सोता है। जब योगी सोता है तब संसार जागता है। अर्थात् मायाग्रस्त संसारी और माया मुक्त योगी की स्थिति एक दूसरे से सर्वथा उलटी होती है। उसका मायावी संसार सर्वथा हेय होता है, किन्तु जो मोह ग्रस्त हैं वे उसी में हर घड़ी तल्लीन रहते हैं। उनकी मनोवृत्तियाँ- प्रवृत्तियाँ भी ठीक उलटी चलती हैं। इसी तथ्य का इस पद में दिग्दर्शन कराया है। संसार की उलटी स्थिति देखकर आश्चर्य होता है, पर उसका कारण और रहस्य कोई बिरला ही जान पाता है।

धरती पर फैली हुई माया की मृग-मरीचिका ब्रह्माण्डव्यापी परब्रह्म को निगल जाती है। अर्थात् जो दृश्यमान है वही सब कुछ बन जाता है और अदृश्य की सत्ता ही दृष्टिगोचर नहीं होती। लेकिन योगीजन ब्रह्माण्ड-व्यापी ब्रह्म का दर्शन करते हैं और स्थूल पदार्थों के रूप में आकर्षक लगने वाली धरती की उपेक्षा कर देते हैं।

आत्मा सूक्ष्म है, चींटी से भी छोटी, अणुओं की भी परमाणु किन्तु जब वह ज्ञानवान बनती है तो महतो महीयान् यही दृश्य संसार उसके पेट में समा जाता है। तुच्छ रह जाता है। अविचल बन जाता है। चींटी इस हाथी को ज्ञान द्वारा निगल जाती है। सुरसा के मुँह में हनुमान उससे भी बड़े होकर घुसे थे पर मच्छर बनकर बाहर निकल आये थे। सुमेरु पर्वत सोने का बना है। देवताओं के स्वर्ग लोक का उस पर निवास है, किन्तु उसे नगण्य बना देने के लिए किसी आँधी तूफान की आवश्यकता नहीं पड़ती। विवेक दृष्टि ही उसकी सत्ता और महत्ता को समाप्त करके रख देती है। जीव-जन्तु ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं। जिन योनियों में हैं उनसे ऊपर उठना चाहते हैं। एक मनुष्य का जीवन ही ऐसा है जो उच्च स्थिति में होते हुए भी नीचे गिरने, पाप पतन में घुसने की मूर्खता करता है। संसार का अस्तित्व नहीं, वह भ्रम जंजाल मात्र है। स्वप्नवत् है फिर भी अज्ञानी की उसमें कामनाओं की हिलोरें उठती दिखाई पड़ती हैं। मल-मूत्र के शरीर में आनन्द कहाँ? फिर भी मोह-ग्रस्त मन इन्द्रिय लिप्साओं में, तृष्णाओं और वासना में काल्पनिक किलोलें करता है। यह कैसे आश्चर्य की बात है कि जो जिसने समझा नहीं है, जिस बात का जिसे अनुभव नहीं है, वह उसका व्याख्याता, उपदेशक और निष्णात बनता है। पण्डित को अरबी तक तो आती नहीं पर कुरान का व्याख्याता बनकर अनजानों को झूठी प्रवंचना में बहकाता फुसलाता रहा है। जो रास्ता खुद तो देखा नहीं है, पर औरों को चलाने का ठेकेदार बनता है। धर्मोपदेशकों की यह कैसी विडम्बना है।

कबीर का कहना है कि जो तत्व ज्ञान से अवगत है, प्रमाणिकता को जो अपनाते हैं। ऐसे ही सन्त प्रामाणिक माने जाते हैं और उन्हीं की नाव पर बैठकर राहगीर पार उतरते हैं।

रहस्यों, अध्यात्म तत्वदर्शन के गुह्य तथ्यों से भरी ऐसी उनकी अनेकों उलटबांसियां हैं। स्थूल दृष्टि से देखने वाले उस तत्वदर्शन को हृदयंगम कर नहीं पाते जबकि समग्र धर्म शास्त्र का मर्म इनमें छिपा पड़ा है। ऐसी ही एक और रचना उनकी है जिसमें आत्मा के समर्पण की चर्चा प्रतीक रूपों में की गयी है।

एकै कुँवा पंच पनिहारी। एकै लेजु भरै नो नारी॥

फटि गया कुँआ विनसि गई बारी। विलग गई पाँचों पनिहारी॥

शब्दार्थ- एक कुएँ पर नौ पनिहारी पहुँची। रस्सी तो एक थी, पर नौ नारियाँ पानी भर रही थीं। कुँआ फट गया और बारी का खेत नष्ट हो गया। पाँचों पनिहारी अलग-अलग चली गईं।

तात्पर्य- अन्तःकरण रूपी कुआँ एक है। इसमें से नौ कषाय-कल्मष पनिहारी की तरह पानी भरती हैं।

आत्मा का भगवत् समर्पण होने पर वह मोह ग्रस्त अन्तःकरण फट जाता है। इस कुएँ में से पानी खींचकर पनिहारियों ने जो शाक-भाजी की क्यारी उगाई थी सो नष्ट हो जाती है। सारा खेल बिगड़ जाने पर पाँच पनिहारी पाँचों इन्द्रियाँ अलग-अलग चली जाती हैं।

(क्रमशः)


झुरमुट की नम्रता (kahani)

पहाड़ की चोटी पर एक बड़ा-सा बरगद का दरख्त था। मुसाफिर उसके नीचे सुस्ता कर आगे बढ़ गया। दरख्त के विस्तार वैभव की वह प्रशंसा करता गया। आगे चलकर बैंत का एक झुरमुट मिला। मुसाफिर व्यंग्य करता गया, कि कैसा है यह नाचीज। इसके पास न डालियाँ हैं, न पत्ते। कई दिन बाद मुसाफिर वापस लौटा। देखा तो बरगद का पेड़ नदारद था। लकड़ी काटने वालों से उसने पूछा- ‘माजरा क्या है? उस बड़े दरख्त का क्या हुआ?

लकड़हारों ने कहा- ‘बड़े बरगद की जड़ें खोखली हो गयी थीं, पर उसकी अकड़ कम न हुयी। आँधी के एक ही झोंके ने उसे उलट-पुलट कर रख दिया। राहगीर ने पूछा- ‘जब आँधी इतनी तेज थी, तो यह झुरमुट कैसे बच गया? लकड़हारों ने एक स्वर में कहा- उसकी जड़ें गहरी थीं, बोझ कुछ नहीं था, और आँधी के आते ही झुरमुट ने नम्रता से गरदन नीची कर ली।


पारस्परिक सहकार ही सुव्यवस्था का आधार

कथा है कि एक बार देवता और असुर अपने बड़प्पन का निर्णय कराने ब्रह्माजी के पास पहुँचे। उन्होंने परीक्षा के उपरान्त अपना अभिमत बताने की बात सुरक्षित रखी। दूसरे दिन दोनों वर्गों को पृथक्-पृथक् स्थानों पर भेज दिया गया। जब खाने की घड़ी आई तो ब्रह्माजी ने दोनों पंक्तियों की कोहनियाँ न मुड़ने का मन्त्र पढ़ दिया। अब खाया कैसे जाय, मुँह से हाथ तो बहुत दूर होता है। असुरों ने हाथ ऊपर उठाकर मुँह में ग्रास पटके पर वे इधर-उधर गिरे, मुँह में एकाध ग्रास ही पहुँचा मुँह तथा कपड़े बुरी तरह खराब हुए। दूसरी ओर देवताओं ने इस स्थिति में सहयोग बरता। एक ने अपनी थाली का भोजन अपने हाथ से दूसरे को खिलाया। दूसरे ने तीसरे को इस प्रकार सभी का पेट भर गया। जबकि संकीर्ण स्वार्थपरता की आपाधापी में निमग्न सभी असुर भूखे उठ गये। निर्णय हो गया। पदार्थों देवता श्रेष्ठ घोषित हुए। यही सहयोग चक्र सदा सर्वदा से मनुष्यों के बीच कार्यान्वित होता रहा है। इसी आधार पर सार्वजनिक प्रगति सम्भव हुई है। इसमें व्यवधान पड़े तो फिर आदिमकाल की ओर लौटने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहेगा।

कथा से सार यह निकलता है कि पारस्परिक सहयोग पर ही सुव्यवस्था निर्भर है। इस सहयोग तन्त्र को हम हर ओर क्रियाशील देख सकते हैं। प्रकृति की सन्तुलन प्रक्रिया का एक पक्ष कर्मफल भी है। क्रिया की प्रति क्रिया इसी को कहते हैं। परिश्रम करने पर पसीना निकलता है। दौड़ने पर दम फूलता है। विष खाने पर मरण संकट आ सकता है। यह क्रिया का प्रतिक्रिया का सामान्य क्रम है। भले-बुरे विचारों की परिणति भी उत्थान पतन के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इतिहास के पन्ने-पन्ने पर ‘करना सो भोगना’ का प्रमाण विद्यमान है। बुरा करते हुए भी कोई यह नहीं चाहता कि उसे उस बुराई का प्रतिफल मिले। किन्तु नियति की विधि व्यवस्था हर किसी को उसके लिए विवश करती है। भले यदि भलाई के बदले का सत्परिणाम नहीं भी चाहें, नहीं भी माँगे तो भी वह उनके पल्ले अनायास ही बँध जाता है। जन्म और मरण का- दिन और रात का- जिस प्रकार युग्म है, उसी प्रकार इस संसार में करने और भोगने की क्रिया प्रक्रिया का निर्धारित क्रम यथावत् चलता रहता है।

कर्मफल की सुव्यवस्था में किसी बाहरी नियन्त्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती, यह सब कुछ स्वसंचालित प्रक्रिया के आधार पर अनायास ही सम्पन्न होता रहता है। अनाचार का आरम्भ विकृत विचारों से होता है। मनोविकारों का चेतना क्षेत्र से विग्रह खड़ा करना- अंतर्द्वंद्व उभारना सर्वविदित है। इससे दुरावजन्य ग्रन्थियाँ बनती हैं। भय, लज्जा, संकोच की आत्म प्रताड़ना शरीर और मन के मध्य चल रहे व्यवस्था तन्त्र को लड़खड़ा देती है। फलतः चित्र विचित्र प्रकार के शरीर एवं मन के रोग असन्तुलन उत्पन्न करते हैं। इन आधि-व्याधियों के फलस्वरूप व्यक्तित्व भोंड़ा पड़ता है। न चिन्तन सही रहे पाता है न व्यवहार की शालीनता स्थिर रहती है। फलतः अविश्वास और असन्तोष का वातावरण भीतर भी दीखता है और बाहर भी। ऐसी दशा में मनुष्य के ऊपर दुःख दारिद्रय ही लदेंगे। मनोविकारों की इस परिणति का मनःशास्त्र पूरी तरह समर्थन करता है और अनेकानेक प्रमाणों से सिद्ध करता है कि सरल, सात्विक, सोम्य, सदाचारी चिन्तन चरित्र के सहारे ही व्यक्तित्व सुसंयत बना रह सकता है। उसे अपनाने में ही भलाई है। जो अनीति की राह पर चलेंगे वे अपने पैरों आप कुल्हाड़ी ही मारेंगे।

कर्मफल के दण्ड पुरस्कार का शासन तन्त्र में पूरा विधान है। समाज में भी निन्दा, प्रशंसा, सहयोग, असहयोग का दौर इसी आधार पर चलता है। प्रामाणिकों को समर्थन मिलता है और वे आगे बढ़ते हैं जबकि अनाचारी अप्रामाणिक व्यक्ति का तिरस्कार के भाजन बनते और असहयोग, प्रतिरोध के कारण गई गुजरी स्थिति में पड़े दिन गुजारते हैं। जिसका अहित किया है उसके द्वारा प्रतिशोध लिये जाने की सम्भावना जो रहती है। इस समूची व्यवस्था पर दृष्टिपात करने से सिद्ध होता है कि कर्मफल की सुव्यवस्था प्रकृति की कार्य पद्धति का एक सुनिश्चित अंग है।

रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, मारीच, अहिरावण आदि की समर्थता चतुरता में कोई कमी नहीं थी। किसी विरोधी का सामना करने की उनमें शक्ति भी कम न थी। शरीर, बल, शस्त्र, बल वैभव बल की दृष्टि से भी वे कमजोर नहीं पड़ते थे। इतने पर भी उनकी अनीति उन्हें ले बैठी। कुकर्मों का प्रतिफल मिला। यह दण्ड व्यवस्था प्रकृति ने स्वयं की। रीछ वानर और सामान्य स्तर के मनुष्य तो उनके नित्य के आखेट थे। वे उन्हें क्योंकर परास्त करते। मत्स्य न्याय ही यहाँ सब कुछ रहा होता तो इन दुर्द्धर्ष लोगों की तूती बोलती, इस प्रकार परिवार समेत नष्ट होने का अवसर ही न आता।

इससे पूर्व भी समय-समय पर ऐसे दुर्दान्त महाबली हो चुके हैं जिनकी मनमानी को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। हिरण्यकश्यपु, हिरण्याक्ष, वृत्रासुर, महिषासुर, भस्मासुर, रक्तबीज जैसे कितने ही नाम हैं जिनकी बलिष्ठता और क्रूरता असीम थी। उनके विनाश का उन दिनों कोई आधार या साधन भी नहीं था। फिर भी ऐसे निमित्त कारण बने जो देखने में नगण्य उपहासास्पद लगते थे पर उन्होंने अपराजय समझी जाने वाली शक्तियों को धराशायी कर दिया। हिरण्याक्ष को एक बाराह वेशधारी ने ही अपने दाँतों से क्षत-विक्षत कर दिया। दूसरी ओर के अमोघ अस्त्र एक कोने में रखे रह गये। यह विश्वव्यापी कर्मफल व्यवस्था ही है जो भले-बुरों को को यथोचित प्रतिफल देने की व्यवस्था इस या उस प्रकार बनाती रहती है।

गाँधी, बुद्ध, नानक, चाणक्य, विवेकानन्द आदि सत्पुरुषों के पास साधनों का अभाव था। पर समय ने उनको साधनों की कमी नहीं रहने दी, न सहयोग कम पड़ा, न अवरोध ही देर तक आड़े आये। वे जिस महान पथ पर बढ़ रहे थे उसमें कोई ऐसा व्यतिरेक उत्पन्न नहीं हुआ। जिसके कारण वे लक्ष्य तक पहुँच न पाते। उन्हें भरपूर सफलता मिली। जापान के गाँधी कागाबा, फ्लोरेंस नाइटिंगेल, बेडन पावेल आदि के उपयोगी प्रयास विश्वव्यापी बने और आश्चर्यजनक रीति से सफल हुए। विनोबा, बाबा साहब आमटे, हीरालाल शास्त्री, कमला, हास्पेट, कर्वे आदि के द्वारा आरम्भ किये गये छोटे-छोटे शुभारम्भ किस प्रकार अनायास सहायता के सहारे अग्रगामी बने और सफलता की मंजिलें पार करते हुए कहाँ से कहाँ जा पहुँचे, यह किसी से छिपा नहीं है। यह क्रिया की प्रतिक्रिया है जो सदाशयता का अविज्ञात सूत्रों से परिपोषण करती और उन्हें सफल बनाने में योगदान करती है।

व्यक्तियों की तरह भले-बुरे वातावरण का भी तद्नुरूप प्रभाव होता है। जिस प्रकार सड़न के ढेर से किसी क्षेत्र का वायुमण्डल दुर्गन्धित विषाक्त हो जाता है और वहाँ हैजा जैसी छूत की बीमारियों का दौर चल पड़ता है, उसी प्रकार व्यापक वातावरण की भी वैसी ही स्थिति होती है। जिन दिनों सज्जनता, सद्भावना, सहकारी शालीनता का प्रचलन होता है उन दिनों व्यापक वातावरण भी सर्वसाधारण के लिए सुख-शान्ति से भरा रहता है। प्रकृति अनुकूल रहती है और धन धान्य, वर्षा, ऋतु प्रभाव आदि में किसी प्रकार का व्यतिक्रम नहीं होने देती। सतयुग में सज्जनता का बाहुल्य था तब वृक्ष फलों से, खेत फसलों से, बादल विद्युत जल से भरे रहते थे और किसी को किसी प्रकार का अभाव या कष्ट अनुभव नहीं होने देते थे। न अकाल मृत्युएं होती थीं और न ही रोग, शोक, विग्रह जैसी विपत्तियाँ ही दृष्टिगोचर होती थीं।

पारस्परिक स्नेह सहयोग इस सृष्टि का स्वाभाविक क्रम है इसी आधार पर सारी विश्व व्यवस्था सुनियोजित ढंग से चल रही है। इसमें जहाँ भी व्यतिक्रम होता है वहीं सन्तुलन डगमगाता और व्यवस्था बिगड़ने पर विग्रह खड़े होते हैं। इस दृष्टि से शरीर चक्र, जलचक्र, वनस्पति चक्र, दृष्टव्य हैं। हाथ कमाता है। उस कमाई को भोजन रूप में मुँह को देता है। मुँह चबाने का श्रम जोड़कर उसे पेट के सुपुर्द करता है। पेट उसमें अपने पाचक रस मिलाकर आँतों की गुर्दों की और धकेलता है, वहाँ से वह उपार्जन, हृदय में रक्त बनकर पहुँचाता है।

जल चक्र भी ऐसा ही है। समुद्र से बादलों को- बादलों से धरातल को- धरातल से नदी नालों, कुँए तालाबों को मिलता है। इसके बाद वह घूमता फिरता फिर समुद्र में पहुँचता है। यह पारस्परिक स्नेह सहकार का भाव भरा आदान-प्रदान है।

जमीन से वृक्ष वनस्पतियों का परिपोषण। वनस्पतियों से प्राणियों का निर्वाह। प्राणियों के मलमूत्र से धरती की उर्वरता। उस उर्वरता के सहारे फिर वनस्पति उगने का उपक्रम। इस क्रम की कोई कड़ी बीच में टूटे तो समझना चाहिए कि वनस्पतियों और प्राणियों में से एक का भी जीवित रहना सम्भव न होगा। यह वनस्पति चक्र है। मनुष्य कार्बन गैस उगलता है, उसे वृक्ष खाते हैं। वृक्ष आक्सीजन उगलते हैं, उससे मनुष्यों को प्राण वायु उपलब्ध होती है।

इकॉलाजी के सारे सिद्धान्त इसी एक नाभिक के चारों ओर घूमते हैं कि प्रत्येक वस्तु का एक दूसरे से सघन सम्बन्ध है। जो देता है, वह पता है, जो जैसा करता है, वह वैसा भोगता है। प्रकृति जगत में मनुष्य द्वारा किया गया असन्तुलन विभीषिका के रूप में उसी के ऊपर संकट बनकर आता है। निर्वनीकरण, औद्योगीकरण से पर्जन्य-चक्र का जो असन्तुलन बना है, उसका प्रतिफल मनुष्य ने ही भोगा है। यही असन्तुलन जब व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन में आ धमकता है तो अपनी प्रतिक्रिया उन्हीं पर दिखाता है जो इसके कर्त्ता होते हैं।

मनुष्य की स्वाभाविक प्रतिक्रिया कारणों को बहिरंग में ओर कहीं ढूँढ़ने की होती है। अपने शरीरगत रोगों व मनोविकारों के लिये जैसे वायरस एवं परिस्थितियों को दोषी ठहराया जाता है, उसी प्रकार प्रकृतिगत अव्यवस्था के लिये भी अन्तर्ग्रही असन्तुलन, दैवी विपत्ति को प्रमुख कारण बता दिया जाता है। वस्तुतः ये मनुष्य के दुष्कर्म ही हैं जो दुर्गति के रूप में असाध्य व्याधि, असमय जरा, अकाल मृत्यु के रूप में निकलते हैं। मनोरोगों का मूल कारण अपना ही दुष्चिन्तन है। समष्टिगत दुष्प्रवृत्तियों का प्रतिफल ही प्रकृति का रौद्र रूप है। यह इकॉलाजी सिद्धान्त की एक ऐसी शाश्वत नियम व्यवस्था है जो अटल, सुनिश्चित है। इससे मुक्त कोई नहीं। सुव्यवस्थित प्रकृति के अनुकूल निर्धारित जीवन क्रम जीते हुए हर कोई सुख-शान्ति का रसास्वादन लेते रह सकता है। यही विधाता को अभीष्ट भी है।


जिज्ञासु कात्यायन (kahani)

जिज्ञासु कात्यायन ने देवर्षि नारद से पूछा- भगवन्! आत्म-कल्याण के लिए विभिन्न शास्त्रों में विभिन्न उपचार उपाय बताये हैं। गुरुजन भी अपनी-अपनी मति के अनुसार कितने ही साधन विधानों के माहात्म्य बताते हैं। जप, तप, त्याग, वैराग्य, योग, ज्ञान, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान, धारणा, समाधि आदि के अनेक उपायों में से सभी को कर सकना एक के लिए सम्भव नहीं। फिर सामान्य जन यह भी निर्णय नहीं कर सकते, कि इनमें से किसे चुना जाय। कृपया आप ही मेरा समाधान करें, कि सर्वसुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकाल कर मुझे सरल अवलम्बन का निर्देश कीजिए।

उत्तर देते हुए नारद ने कात्यायन से कहा- ‘हे मुनि श्रेष्ठ! सद्ज्ञान और भक्ति का एक ही लक्ष्य है, कि मनुष्य सत्कर्मों में प्रवृत्त हो। स्वयं संयमी रहे और अपनी सामर्थ्यों को गिरों को उठाने और उठों को उछालने में नियोजित करे। सत्प्रवृत्तियाँ ही सच्ची देवियाँ हैं। जिन्हें जो जितनी श्रद्धा के साथ सींचता है, वह उतनी ही विभूतियाँ अर्जित करता है। आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण की समन्वित साधना करने के लिए परोपकाररत् रहना ही सर्वश्रेष्ठ है।

स्कन्द पुराण के इस वार्ता प्रसंग में कात्यायन की तरह अन्याय जिज्ञासु जनों का भी समाधान विद्यमान है।


विलक्षण प्रतिभाएँ- जिनका रहस्य कोई जान न पाया

मनुष्य का मस्तिष्क इस संसार की सबसे सामर्थ्यशाली कृति है जो विधाता ने बनाई है। इसकी समग्र सम्भावनाओं का पता तो क्या अनुमान लगाना भी कठिन है। वैज्ञानिकों के अनुसार मानव के स्मृति कोष में सौ अरब सूचनाएँ संग्रहित रखने की क्षमता होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि “एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका” के सम्पूर्ण खण्डों में जितनी सूचनाएँ रहती हैं, उससे भी पाँच सौ गुना अधिक सूचनाएँ एक वयस्क मानवी मस्तिष्क अपने अन्दर रख सकता है।

मस्तिष्क लगभग दस खरब न्यूटान कोशिकाओं से बना होता है। यदि एक कोशाणु की गिनती करने में एक सेकेंड का समय भी लगे तो सभी की गिनती करने में कुल 300 सदियाँ लगेंगी।

इसमें से बहुत थोड़ा अंश ही काम आता है। पर जो अंश काम करने लग जाय, वह चमत्कार दिखाता है जो अंश निष्क्रिय पड़ा रहे, उसमें मूर्च्छना छाई रहती है। पर जो सक्रिय हो उठे उसकी करामात देखकर दाँतों तले उँगली दबाना पड़ती है। ऐसा भी हो सकता है कि एक ही व्यक्ति के मस्तिष्क का थोड़ा-सा भाग विशेष जागृत या थोड़ा भाग सर्वथा ठप्प हो।

साधारणतः मस्तिष्क की सक्रियता-निष्क्रियता का मापन उसकी दक्षता दर्शाने वाले परीक्षणों के माध्यम से किया जाता है। इसमें आय.क्यू. (बुद्धि-लब्धि परीक्षण) एप्टीट्यूड, लर्निंग, मेमोरी इत्यादि आते हैं। किन्तु अपवाद रूप में कभी-कभी देखा जाता है, कि इन परीक्षणों में आय.क्यू. के कम होने पर भी मस्तिष्क का कोई एक केन्द्र विशेष जागृत होने से वह व्यक्ति असाधारण विभूति सम्पन्न बन जाता है। ऐसे कई घटनाक्रम प्रकाश में आए हैं, जिनमें व्यक्ति मानसिक दृष्टि से असामान्य प्रतिभाशाली निकले जबकि शारीरिक विकास उनका सामान्य से कम था।

न्यूयार्क, अमरीका के लेचवर्थ गाँव में चार्ल्स और जॉर्ज दो जुड़वा भाई सन् 1929 में पैदा हुए। दोनों भाई एक-दूसरे से अत्यंत मिलते-जुलते थे, किन्तु जब वे पैदा हुए तब उनका गर्भकाल पूरा नहीं हो पाया था। वे 3 माह पूर्व ही, अर्थात् जब वे छः माह के थे तभी माँ के पेट से बाहर आ गये। अतः उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें दो महीने तक ‘इन्क्यूबेशन’ की स्थिति में रखा गया। जब वे तीन साल के हुए तो डॉक्टरों ने उन्हें मानसिक रूप से कमजोर घोषित कर दिया और 9 वर्ष की अवस्था में उन्हें इसकी चिकित्सा के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। जब उनके आई.क्यू. की जाँच की गई तो वह 60-70 के बीच पाया गया। आई.क्यू. का यह स्तर सामान्य से भी कम है। वे अपने अधिकाँश कामों में आई.क्यू. का उपरोक्त स्तर प्रदर्शित करते, किन्तु कार्यालयों में सन्देशवाहक के रूप में उनकी निपुणता व दक्षता देखते ही बनती थी।

न्यूयार्क स्टेट साइकियेट्रिक इन्स्टीट्यूट के डॉ. विलियम होरविज जब सन् 1963 में उन दोनों जुड़वा भाइयों से मिले तो उन्हें उनमें कुछ विलक्षणतायें नजर आयीं। इसकी जाँच के लिए उनने उनसे कुछ गणितीय सवाल पूछे पहला सवाल अत्यन्त सरल था। होरविज ने उन भाइयों से 20 में से 10 घटाने को कहा तो उनने प्रश्न को कठिन बताते हुए इसका उत्तर दे पाने में अपनी असमर्थता जाहिर की। इसी प्रकार कुछ अन्य छोटे-छोटे किन्तु सरल प्रश्न किये पर इनमें से किसी का भी उत्तर वे नहीं दे पाये। तब डॉ. विलियम होरविज ने कैलेण्डर गणना सम्बन्धी एक अत्यन्त कठिन सवाल पूछा। डॉ. होरविज ने उन भाइयों को एक जन्म तिथि बतायी और उनसे यह बताने को कहा कि उक्त व्यक्ति अपने अन्तिम जन्म दिन तक कितना समय गुजार चुका और आगामी जन्म दिन तक और कितना समय गुजार लेगा। दोनों भाइयों ने अपने विलक्षण मस्तिष्क द्वारा कुछ ही सेकेंडों में इस प्रश्न को हल कर दिया। यही नहीं वे गणना द्वारा कुछ ही क्षणों में यह बता देते थे कि उक्त तारीख किन-किन वर्षों में रविवार के दिन पड़ेगी अथवा उक्त वर्ष का कौन-सा महीना सोमवार दिन से आरम्भ होगा। दोनों ही भविष्य तथा भूत की गणनाओं को भी बड़ी सरलता से सेकेंडों में बता देते थे, यथा- सन् 7000 के अमुक सप्ताह के अमुक दिन में कौन-कौन-सी तारीख पड़ेंगी अथवा वर्तमान से 100 वर्ष पहले फलां सप्ताह के फलां दिन कौन-कौन सी तारीखें आयेंगी। यद्यपि उन्हें जुलियन अथवा जाँर्जियन कैलेंडर अन्तर का जरा भी ज्ञान नहीं था, फिर भी उनके उत्तर बिल्कुल सही होते थे, हाँ, उनके उत्तर को एक से दूसरे में परिवर्तित करने की आवश्यकता पड़ती थी, पर होते वे अत्यन्त सही थे।

अन्ततः डॉ. विलियम उन्हें अपने साथ न्यूयार्क ले आये जहाँ एक वर्ष तक उन पर गहन अध्ययन परीक्षण किया गया, तरह-तरह के कठिन सवाल पूछे गये, पर सभी का उत्तर वे सही देते। वहाँ जब कभी कोई सवाल उनसे पूछा जाता तो वे सर्वदा यही कहते पाये गये कि, “हाँ, मैं इसे हल कर सकता हूँ” अथवा “इसका उत्तर मेरे दिमाग में है।” जब उनकी विलक्षण क्षमता की जाँच मनोवैज्ञानिकों, मनःचिकित्सकों, एवं गणितज्ञों से करवाने के बाद डॉ. होरविज को यह स्वीकारना पड़ा- “हम लोगों के पास इस रहस्य का कोई जवाब नहीं है।”

सन् 1963 में डॉ. होरविज की ये जो दो पोंगा पण्डित हाथ लगे वे उस पूरी शताब्दी में अपनी जादुई गणना, जटिल मशीनों, व मॉडलों की विलक्षण डिजाइनों, अपनी आकर्षक कलाकारिता द्वारा धूम मचाते रहे किन्तु आश्चर्य की बात कि वे अधिकाँश सामान्य कार्यों में विफल होते देखे गये। “पोंगा पण्डित” की संज्ञा उनके अनुकूल नहीं है क्योंकि वस्तुतः ये जुड़वा भाई न तो मूर्ख ही थे न ही पण्डित-विद्वान, मूर्ख इसलिए नहीं, कि बड़े-बड़े वे कठिन सवालों को मिनटों में हल कर जाते और विद्वान इसलिए नहीं, क्योंकि छोटे-छोटे व सामान्य प्रश्नों में वे पिछड़ जाते। उनकी विलक्षण स्मरण शक्ति तथा एकाग्रता अब तक रहस्य बनी हुई है।

इन जुड़वा द्वय के पहले भी ऐसे अनेक विलक्षण मस्तिष्क वाले पैदा हो चुके हैं। इनमें से जदेदिया बक्सटन नामक एक व्यक्ति इंग्लैंड में पैदा हुआ। इसकी मस्तिष्कीय क्षमता जॉर्ज व चार्ल्स जैसी ही थी। यद्यपि इसने गणित कहीं नहीं पढ़ा, पर वह लम्बी-लम्बी जटिल गणनाएँ एक बार में दो-दो ढाई-ढाई महीने तक मानसिक रूप में करता रहता। एक बार जब उसे एक थियेटर में ले जाया गया तो वहाँ पर उसने लोगों को थियेटर के पात्रों द्वारा बोले गये संवादों में अक्षरों की सही-सी संख्या व नर्तकियों द्वारा नृत्य के वक्त चले गये कदमों की संख्या बताकर लोगों को अचम्भे में डाल दिया।

इन्हीं से मिलते-जुलते अद्भुत मानसिक क्षमता वाले एक व्यक्ति का उल्लेख डॉ. श्रीमती डी.सी. राइरन और एल.एच.स्नाइडर करते हैं। वे लिखते हैं कि सन् 1931 में उनके पास एक ऐसा रोगी आया जो चार अंकों वाली संख्या का वर्गमूल व छह अंकों की संख्या का घनमूल मौखिक रूप से क्रमशः चार सेकेंड एवं छः सेकेंड में निकाल लेता था।

यद्यपि अधिकाँश मस्तिष्कीय विलक्षणतायें व प्रतिभाएँ जटिल गणनाओं एवं तरह-तरह की गणितीय समस्याओं के क्षेत्र में ही दिखाई पड़ते हैं, ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं जिनने दूसरे क्षेत्रों में ऐसी ही महारत हासिल की। इनमें एक हैं, 19वीं सदी में तहलका मचाने वाले, “जीनियस ऑफ अर्ल्सवुड एसिल्म” के नाम से जाने जाने वाले जे.एच.पुलेन। ‘दि ग्रेट इर्स्टन’ के नाम से प्रख्यात 10 फुट का विशालकाय जलयान का एक अत्यन्त जटिल डिजाइन। वे मॉडल उसने तीन वर्ष के अनवरत प्रयास द्वारा तैयार किया। इस्टर्न जलयान का पुर्जा-पुर्जा उसको पहले से ही तैयार डिजाइन एवं मॉडल के आधार पर अत्यन्त सावधानी पूर्वक बनाया गया। इसके अतिरिक्त पुलेन ने जलयान के फ्रेम में तख्तों को ठोकने के लिए काम आने वाली करीब सवा दस लाख टन लकड़ी की पिनों के निर्माण के लिए एक विशेष प्रकार की मशीन का निर्माण किया।

डॉ. मार्टिन डब्ल्यू. बार ने सन् 1898 में एक 22 वर्षीय एपिलेप्टिक रोगी का अध्ययन किया। उसके सामने ग्रीक, जापानी अथवा डेनिश भाषा में क्लिष्ट-से-क्लिष्ट अंश भी पढ़ा जाता हो वह तत्क्षण उसे हूबहू अन्दाज में दोहरा देता।

गोटफ्रीड माइन्ड भी इसी प्रकार की विलक्षण प्रतिभाओं में से एक था। उसकी बिल्लियों व बच्चों की आकर्षक तस्वीरों ने तत्कालीन यूरोप में खूब धूम मचा रखी थी। उसकी बनायी एक तस्वीर राजा जॉर्ज (छठे) ने भी खरीदी थी। इनके चित्र आज भी बर्लिन, ज्युरिक और बर्न के म्यूजियमों में लटक रहे हैं।

डॉ. होरविज द्वारा चार्ल्स और जॉर्ज की खोज से पहले, ऐसे विलक्षण क्षमता सम्पन्नों के बारे में लोगों की धारणा थी कि वह सिर्फ विभिन्न प्रकार के चित्रों को ही याद रख सकते हैं, इसके अतिरिक्त वे कोई अन्य विलक्षण कौशल नहीं दिखा सकते, किन्तु इन जुड़वा भाइयों ने इस मान्यता को खत्म कर दिया। सिद्धान्त के अनुसार जॉर्ज और चार्ल्स अपने मस्तिष्क में अंकित कैलेण्डर टेबल को सवाल हल करने के सिलसिले में उत्तेजित करते और कठिन-से-कठिन सवालों का हल मिनटों में प्रस्तुत करते। यह सही था कि जार्ज और बाद में चार्ल्स घण्टे-घण्टे भर पंचाँगों और कैलेण्डरों से उलझे रहते, पर जॉर्ज ही वर्तमान से 200-400 वर्ष आगे पीछे के सवालों को हल कर पाता। अब प्रश्न यह है कि यदि दुरूह गणितीय सवालों के हल जॉर्ज के मस्तिष्क में स्वतः उभर आते थे तो सामान्य प्रश्नों के हल जॉर्ज क्यों नहीं दे पाता था। जिसमें उसे सर्वदा असफल होते देखा गया।

यह भी कुछ समय तक आम मान्यता बनी रही कि विलक्षण मस्तिष्कीय क्षमता सम्पन्न व्यक्ति सामान्य रूप से सोच नहीं सकता। किन्तु इस मान्यता को तब गहरा आघात पहुँचा जब सन् 1970 में बोस्टन निवासी महिला हैरियट ने इस दिशा में अपने कौशल दिखाये। ‘हेरियट की प्राकृतिक संगीत क्षमता बहुत अद्भुत थी। वह किसी संगीत को सुन कर न सिर्फ उस संगीत-काल के बारे में बता देती, जिस काल में उसकी रचना हुई, वरन् उससे सम्बन्धित और अनेक स्तम्भित करने वाली बातें बताती। उदाहरण के लिए- वह पियानो पर किसी संगीतकार की धुन इस प्रकार बजाती मानों वह किसी दूसरे संगीतज्ञ द्वारा रचित हो, यथा- “हैपी बर्थ डे” की धुन को बदल-बदल कर भिन्न-भिन्न प्रकार से बजा सकती थी, वह इसे मोजार्ट, बीथोवन, स्क्यूबर्ट, डेबूसी, प्रोकोफीव, वेर्डो एवं अन्य संगीतज्ञों के अन्दाज में उस धुन को बजा सकने में समर्थ थी।

आविष्कारों की दुनिया में ग्राह्मबेल का ना प्रसिद्ध है जिन्होंने बीस वर्ष की आयु में अपने यन्त्र का आविष्कार कर मात्र 29 वर्ष की आयु में टेलीफोन का पेटेण्ट करा लिया था। इसी प्रकार वायुयान के आविष्कारक विल्वर राइट और ऑर्विल राइट जिन्हें राइट बम्धु नाम से जाना जाता है, बीस और तीस वर्ष की आयु के बची ही वायुयान बनाकर उस पर उड़ने का परीक्षण करने लगे थे। शक्ति चालित हवाई उड़ान धरने का लक्ष्य जब इन दोनों बन्धुओं ने निर्धारित अवधि में पूरा किया तो सारा संसार आश्चर्यचकित रह गया। तब आर्विल की आयु 32 वर्ष थी एवं विल्वर की मात्र 36 वर्ष।

ऐसे ही वैज्ञानिक आविष्कारों की बिरादरी में फ्रांसीसी ब्लेस पास्कल का अनोखा स्थान है। सन् 1642 की बात है। तब वह मात्र 19 वर्ष का था वे एक दुकान में मुनीम का काम करता था। उसकी सूझ-बूझ ने गणित की मशीन ज्यामिती के आधार पर बनाने की ठानी। घर पर कुछ ठोंक-पीठ उधेड़ बुन करता रहा और अन्ततः संसार का प्रथम परिकलन यंत्र बनाने में इतनी छोटी आयु में भी सफल हो गया।

मनुष्य की मस्तिष्कीय सामर्थ्य उसकी जिजीविषा पर निर्भर है जो सतत् मस्तिष्क को प्रसुप्त को जगाने हेतु उकसाती रहती है। जब तक वह जीवित है तब तक कालिदास के समान हर व्यक्ति में प्रतिभाशाली होने की सामर्थ्य विद्यमान है।


Quotation

जापान के सासवो नगर का एक नाविक नियमित रूप से बाइबिल का पाठ करता है। जिस पृष्ठ पर वह पाठ छोड़ता उसमें एक हरी पत्ती का विराम संकेत लगा देता। वह अपने जीवन भर इसी पत्ती का उपयोग करता रहा। वह कभी सूखी नहीं, सदा हरी ही बनी रही। वह पत्ती अभी तक सुरक्षित है ओर हरी बनी हुई।


समृद्धि कर्मठता की चेरी

शुक और शुकी एक वृक्ष की डाल पर सुखपूर्वक बैठे विश्राम कर रहे थे। कोटर में उनके बच्चे सोये थे। प्रातः काल होने में अभी कुछ देर थी। तभी शुकी ने जिज्ञासु स्वर में शुक से पूछा- स्वामी! भगवान् की इस सृष्टि में साधन और सम्पत्ति का कहीं भी अभाव नहीं है फिर भी कितने ही लोग दुःखी, साधनहीन और संकटग्रस्त क्यों हैं? मैं कुछ समय नहीं पाती।

शुक एक दार्शनिक हँसी-हँसा और यह कथा कहनी प्रारम्भ की- साँझ होने को थी शुकी! तभी एक दम्पत्ति अपने तीन बच्चों के साथ इधर से ही निकले, देखने से लगता था कि ये लोग दिन भर के थके-माँदे हैं, और चल सकने की उनमें हिम्मत नहीं थी। सभी रुक गये और इसी वृक्ष के नीचे डेरा डाल दिया। उन दिनों मैं भी बालक ही था, तुम्हारे साथ विवाह तो अभी हुआ है, मैं अकेला ही बैठा बड़े ध्यान से इन नवागन्तुकों के क्रियाकलाप देखने लगा।

बच्चे बोले पिताजी! भूख लग रही है खाने को दो नहीं तो प्राण निकलते हैं। माँ तो यह सुनकर चिन्तित हो उठी पर पिता था उत्साही, उसने कहा- बच्चों! जाओ थोड़ी सूखी लकड़ियाँ काट लाओ अभी भोजन तैयार करते हैं। पिता की बात सुनते ही बड़ा लड़का उठ खड़ा हुआ बोला- मैं जाता हूँ अभी सूखी लकड़ियाँ काट लाता हूँ। अभी वह उठ भी नहीं पाया था कि दूसरा लड़का खड़ा होकर बोला- पिताजी लकड़ियाँ तो मैं ही लाऊँगा मुझसे चुपचाप बैठा नहीं जायेगा, तब तक तीसरा उठकर चल भी पड़ा वह कह रहा था- मैं छोटा हूँ लकड़ियाँ लाने का अधिकार तो मुझे ही है।

उनकी इस प्रकार की बातें सुनकर मुझे हँसी आ गई प्रिये!

क्यों, आपको हँसी क्यों आई? शुकी ने पूछा तो शुक ने बताया- मैंने उनसे कहा- मूर्खों तुम्हारे पास न तो अन्न है और न शाक या फल लकड़ियाँ लाकर क्या अपने हाथ-पाँव पकाकर खाओगे? इस पर तीनों लड़कों ने मेरी ओर देखकर कहा- “अपने हाथ-पाँव नहीं- औरे! पक्षी हम तो तुझे खायेंगे।” उनका यह निश्चय सुनकर मैं डर गया शुकी! और बोला भाई तुम लोग मुझे मत खाना। चलो मैं तुम्हें खजाना बताता हूँ तुम उसे खोद लो और अपना अभाव दूर करो। यह कहकर मैंने उन्हें गन्धमादन पर ले जाकर रत्नों का ढेर दिखाया जिसे पाकर वे सब बहुत प्रसन्न हुए और अपने घर चले गये।

इससे निष्कर्ष क्या निकला? शुकी ने प्रश्न किया तो पक्षी बोला- निष्कर्ष अभी कहाँ शुकी- यह लोग अपने घर गये तो पड़ौसियों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह लोग इतने शीघ्र धनवान् कैसे हो गये। लोगों ने पूछा तो उनने सारी बातें बता दीं। दूसरे ही दिन मैंने देखा कि इसी वृक्ष के नीचे वैसे ही एक और दम्पत्ति भी आ टिके हैं।

उनके बच्चों ने भी खाना माँगा। पिता बोला- बच्चों जाओ और लकड़ियाँ ले आओ अभी भोजन तैयार करेंगे। लड़के आपस में झगड़ने लगे। स्वयं जाने को कोई तैयार न था सब एक दूसरे को आज्ञा दे रहे थे। मैंने कहा झगड़ो मत, लकड़ियाँ लाकर ही क्या करोगे- तुम्हारे पास रखा ही क्या है लकड़ियां ले भी आये तो खाओगे क्या? इस पर वे बनावटी स्वर में बोले- तुझे खायेंगे? मैं हँसा और बोला- मुझे खाने वाले तो पहले आये थे वह धन-दौलत ले भी गये तुम तो जैसे खाली हाथ आये वैसे ही खाली हाथ जाओगे। हुआ भी यही शुकी! वे बेचारे वैसे ही लौटे।

हँसते हुये शुक ने कहा- प्रिये अब कहो तो निष्कर्ष बताऊँ? नहीं स्वामी! शुकी बोली मैं समझ गई जिनके जीवन में क्रियाशीलता होती है, एकता और पौरुष में विश्वास होता है, लक्ष्मी उनका वरण अपने आप करती है।

अब तब उनके बच्चे भी जग चुके थे और रात भी बीत चुकी थी। पक्षी कोटर से निकले और चहचहाते हुये भोजन की तलाश में निकल पड़े।


विचार शक्ति के चमत्कार

जड़ जगत की शक्तियों में कोयला, भाप, तेल, बिजली आदि के उत्पादन शक्तिशाली माने जाते हैं। रसायन, शस्त्र और मशीनों की क्षमता भी इसी गणना में आती है। यों पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु भी शक्ति पुँज से भरी हुई है। इस प्रकार जड़ जगत दृश्य रूप से स्थिर होते हुए भी उपरोक्त साधनों की सहायता से इतना शक्तिशाली बन जाता है कि उसकी कल्पना तक से दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है।

आमतौर से जड़ शक्ति का ही लोगों को परिचय है। उसी का उपयोग करके लोग शक्तिशाली बनते हैं। किन्तु रात इतने तक ही सीमित नहीं है। एक दूसरी शक्ति चेतना की भी है। उसका प्रयोग तो होता है पर अनुभव नहीं। शरीर में प्राण हैं उसे सभी जानते हैं। प्राण निकल जाने पर युवा शरीर भी निरर्थक हो जाता है। पशु-पक्षियों में- जीवधारियों में प्राण है, इतनी जानकारी होते हुए भी इस तथ्य को एक प्रकार से विस्मृत ही रखा गया है कि प्राण का उत्कर्ष- उद्दीपन कैसे हो सकता है और उसके सहारे कोई सामान्य से असामान्य कैसे बन सकता है। प्राण का सामान्य उपयोग शरीर से काम लेना है। मानवी चेतना आमतौर से इतने तक ही सीमित रहती है। इन्द्रियों का, बुद्धि का, उपलब्ध साधन सामग्री का उपयोग करने में प्राण चेतना का उपयोग सीमित रहते देखा जाता है। इससे कुछ कदम आगे बढ़ा जा सके तो फिर चमत्कार ही चमत्कार है।

पदार्थ अपने सामान्य रूप में अति सामान्य है उनका निर्वाह शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी करने मात्र के लिए होता है। विशेष प्रयत्नों से ही वह असामान्य सामर्थ्य का परिचय देता है। वैसा कुछ न किया जाय तो पदार्थ का बाजारू मूल्य अत्यल्प है। यही बात प्राण चेतना के सम्बन्ध में भी है। उसे शरीर निर्वाह का ताना-बाना बुनने में संलग्न देखा जाता है। उसकी विशेष क्षमता देखनी हो तो ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी व्यक्तियों के पौरुष पराक्रम में देखी जानी चाहिए। सामान्य स्थिति में मनुष्य भी एक जानवर है। उसे नर पशु भी कहा जाता है। पेट प्रजनन के दैनिक कार्यों में वह भी लगा रहता है किन्तु जब कभी प्राण का विशेष उत्कर्ष या उपयोग किया जाता है तो ऐसा ही चमत्कार उत्पन्न होता है, जैसा मिट्टी के ढेले में सन्निहित अणु-शक्ति का विशेष उपयोग होने पर देखा जाता है।

चेतना क्षेत्र की विशिष्ट सामर्थ्य को विचार शक्ति कहा जाता है। इसी के आधार पर मनुष्य शरीर का उपयोग करता, योजनाएँ बनाता और उन्हें पूरी करता है। विचारशील व्यक्ति सामर्थ्यवान माने जाते हैं। विचारहीनों की गणना नर पशुओं में होती है। विचार, शक्ति को बढ़ाने के लिए स्वाध्याय, चिन्तन, परामर्श, पर्यटन आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूप मण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारांतर से उसे विचार शक्ति का विशेष उपयोग कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।

आश्चर्य इस बात का है कि पदार्थ विज्ञान का जितना महत्व समझा जाता है उतना विचार विज्ञान का- आत्मविज्ञान का नहीं। होना यह चाहिए कि पदार्थ जगत की तुलना में असंख्यों गुने शक्तिशाली प्राण विज्ञान का महत्व समझा जाता और विचार शक्ति के स्वरूप रहस्य एवं उपयोग के सम्बन्ध में ध्यान केन्द्रित किया जाता। जो ऐसा कर पाते हैं वे उस केन्द्रीकरण का समुचित लाभ भी उठाते हैं। अनपढ़, अनगढ़, असभ्य मनुष्य की तुलना में किसी विचारशील सुसंस्कृत व्यक्ति के स्तर में कितना अन्तर होता है, इसे सहज ही समझा जा सकता है। यही कारण है कि विचार शक्ति कह महिमा की चर्चा समय-समय पर स्थान-स्थान पर होती रहती है।

विचार विज्ञान पर प्रकाश डालते हुए उसे दो वर्गों में विभाजित करना होगा- एक साधारण- दूसरा असाधारण। साधारण वह, जिसे शारीरिक तृप्ति या उन्नति तक सीमित समझा जाना चाहिए। यह वक्रिक बुद्धि सभी चतुर-कुशल कहलाने वाले व्यक्तियों में पाई जाती है। चोर उचक्के इस कला में प्रवीण होते हैं। ठगी इसी के सहारे सम्भव होती है। धनी, विद्वान, विशेषज्ञ बुद्धि के इसी पक्ष का उपयोग करके अपने-अपने क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करते हैं। बहुज्ञ और अनुभवी व्यक्ति इसी के कारण सराहे जाते हैं।

विचार शक्ति का दूसरा पक्ष यह है- जिसे आदर्श कहा जाता है। आदर्शवादिता भी एक गौरवशाली सफलता है, जिसके लिए अन्य क्षेत्रों के सफल व्यक्तियों की तरह अपने आपको विशेष रूप से तैयार करना पड़ता है।

संसार के महामानव भी अन्य क्षेत्र के दुस्साहसी लोगों की तरह होते हैं। महत्वपूर्ण खोजें एवं यात्राएँ करने वाले सराहे जाते हैं। महत्वपूर्ण खोजें एवं यात्राएँ करने वाले सराहे जाते हैं। आविष्कारकर्ताओं को भी ऐसा ही श्रेय मिलता है। युद्ध जीतने वाले भी ऐसी ही विजयश्री का वरण करते हैं। प्रतियोगिताओं में पुरस्कार पाने वाले भी सराहे जाते हैं। यह विचार शक्ति और पराक्रम का सम्मिश्रण है।

आदर्शवादी अपने आपको इसके लिए तैयार करते हैं। आकाँक्षाओं, विचारणाओं, भावनाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालते और संकल्प द्वारा उसे परिपक्व करते हैं। उनके सामने महामानवों की जीवन गाथाएँ रहती हैं। भले ही ऐसे व्यक्ति सामने दिखाई न पढ़ते हों। इतिहास की गाथाओं का स्मरण करके भी वे उनसे उतनी प्रेरणाएँ प्राप्त कर लेते हैं जितनी सामने उपस्थित व्यक्ति सामने बैठकर सलाह और प्रोत्साहन दे रहे हों।

आदर्शवादी मार्गावलम्बन में साधारण कल्पना शक्ति या विचार शक्ति अपनाने से काम नहीं चलता। इसके लिए संकल्प शक्ति चाहिए। मनोबल का गहरा पुट लगना चाहिए। निष्ठा उतनी चाहिए जितनी की महाकवि रवीन्द्र के प्रख्यात गीत में व्यक्त की गई है- “एकला चलो रे-एकला चलो रे।”

विनोबा, अमृतलाल ठक्कर, कालेलकर जैसे सर्वोदयी और नेहरू, पटेल जैसे काँग्रेसी दृढ़ निश्चय करके एक मार्ग पर चले और जब तक जीवित रहे तब तक दूसरी कोई बात ही दिमाग में न आने दी। इन दृढ़ निश्चयी लोगों ने जिधर कदम उठाया उससे कभी दाँये बाँये मुड़कर नहीं देखा। यही कारण है कि इन आदर्शों को देखकर जिनमें कच्चापन था, वह भी पक्का हुआ। वे एक उदाहरण बने और समुद्र में खड़े प्रकाश स्तम्भ की तरह अनेकों को डूबने से बचाते और सीधी राह चलाते रहे। जहाँ दृढ़ निश्चयी लोगों में अनेकों को राह दिखाने की शक्ति होती है वहाँ पथ भ्रष्ट लोग भी एक उदाहरण बनते हैं। भगोड़े सिपाही जहाँ दो चार मैदान छोड़कर भागते हैं वहाँ उनकी देखा-देखी और भी बहुतों के पैर उखड़ जाते हैं और वे उस कायरों की भीड़ में शामिल हो जाते हैं।

उदाहरण प्रस्तुत करना एक बड़ा काम है। अच्छा हो या बुरा, दृढ़ निश्चयी मनस्वी लोग जहाँ खड़े होते हैं। जिधर चलते हैं उधर ही कमजोर मन वालों की पंक्ति चल पड़ती है। सामान्यजनों की बात दूसरी है पर जहाँ अन्तिम पंक्ति में चलने वाले प्रतिभाशाली लोगों का प्रश्न है वहाँ एक बड़ी बात यह भी है कि वे अनेकों का मनोबल बढ़ाते या गिराते हैं। आदर्शवादी लोगों को मनस्वी माना जाता है। सामान्य जन तो रोटी खाते, कपड़ा पहनते हैं उन्हें अपने मतलब से मतलब होता है। आदर्शों से उन्हें कुछ लेना देना नहीं होता। उनका उदाहरण किसी को प्रभावित नहीं करता। महत्व उन लोगों का है जिनने आदर्शों के पथ पर चलने का निश्चय किया है उनकी मनस्विता जहाँ असाधारण रूप से सराही जाती है वहां यदि वे पथ भ्रष्ट होते हैं तो निन्दनीय भी कम नहीं होते। भीड़ में भगदड़ मचाने वाले कुछ ही लोग होते हैं। वे भागते हैं तो दूसरे लोग भी बिना कारण पूछे उन भागने वालों के साथ भागने लगते हैं।

आदर्शवादिता मनुष्य जाति की मुकुट मणि है। महान कार्य उन्हीं के बलबूते सम्पन्न होते हैं। वे आगे चलते हैं, तो पीछे चलने वाले भी कम नहीं रहते। भूदान जैसे अनेकों आन्दोलनों में कुछ ही लोगों ने आगे चलकर अनेकों को उस मार्ग पर चलाया है इसलिए उन अग्रगामियों को सदा सराहा और श्रेय दिया जाता है। साथ ही वे लोग एक खतरा भी उत्पन्न करते हैं। सरकस दिखाने वाले कलाकारों की प्रशंसा भी होती है पर साथ ही यदि रस्सी पर से गिरते हैं तो चोट भी अधिक लगती है और उपहास भी अधिक होता है।

चर्चा यहाँ आदर्शवादियों की हो रही है उनका व्यक्तित्व सामाजिक उत्कर्ष की रीढ़ है। वे तनकर खड़े रहें तो सत्प्रवृत्तियों का ढाँचा भी ठीक से खड़ा रहता है पर यदि वे झुकते या टूटते हैं तो फिर शरीर के ऊपर कुरूपता छा जाती है और काय-कलेवर निकम्मा हो जाता है।

मानवी आदर्श अपनाये, यह समूची मानव जाति का सौभाग्य है पर साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य है कि बुरा उदाहरण उपस्थित करने वाले अग्रगामी अपना ही उपहास नहीं कराते समूची परम्परा को ही लड़खड़ाते हैं। इसलिए अनुकरणीय कदम उठाने से पूर्व अपने भीतर दृढ़ता का समावेश कर लेना भी आवश्यक है। विचार शक्ति के चमत्कार इसी प्रकार प्रस्तुत किये जाते हैं। विचारों के चमत्कार सदैव मनस्वी ही प्रस्तुत करते हैं।


सुधन्वा और अर्जुन (kahani)

महाभारत में सुधन्वा और अर्जुन के बीच भयंकर द्वन्द्व युद्ध छिड़ा। दोनों महाबली थे और युद्ध विद्या में प्रवीण-पारंगत भी। घमासान लड़ाई चली। विकरालता बढ़ती ही जा रही थी। निर्णायक स्थिति आ नहीं रही थी। अन्तिम बाजी इस बात पर अड़ी, कि फैसला तीन बाणों में ही होगा। या तो इतने में ही किसी का वध हुआ अन्यथा युद्ध बन्द करके दोनों पक्ष पराजय स्वीकार करेंगे।

जीवन-मरण का प्रसंग सामने आ खड़ा होने पर कृष्ण को भी अर्जुन की सहायता करनी पड़ी। उनने हाथ में जल लेकर संकल्प किया- “गोवर्धन उठाने और ब्रज की रक्षा करने के पुण्य को अर्जुन बाण के साथ जोड़ता हूं।” आग्नेयास्त्र और भी प्रचण्ड हो चला।

काटने का सामान्य उपचार हल्का पड़ रहा था, सो सुधन्वा ने भी संकल्प किया कि एक पत्नीव्रत पालने का मेरा पुण्य भी इस अस्त्र के साथ जुड़े।दोनों अस्त्र आकाश मार्ग से चले। दोनों ने दोनों के अस्त्र बीच में काटने का प्रयत्न किया। दोनों के अस्त्र मध्य मार्ग में कट गए।

दूसरा अस्त्र फिर उठाया। अबकी बार कृष्ण ने अपना पुण्य उसके साथ जोड़ा और कहा ग्राह से गज को बचाने और द्रौपदी की लाज बचाने का मेरा पुण्य अर्जुन के बाण के साथ जुड़े। दूसरी ओर सुधन्वा ने भी वैसा ही किया और कहा- ‘मैंने नीति पूर्वक ही उपार्जन किया है और चरित्र के किसी पक्ष में त्रुटि न आने दी है तो मेरा पुण्य इस अस्त्र के साथ जुड़े।

इस बार भी दोनों अस्त्र आकाश में टकराये और सुधन्वा के बाण से अर्जुन का बाण आकाश में ही कटकर धराशायी हो गया। तीसरा अस्त्र और शेष था। इसी पर अन्तिम निर्णय निर्भर था। कृष्ण ने कहा- ‘मेरे बार-बार अवतार लेकर धरती का भार उतारने का पुण्य अर्जुन-बाण के साथ जुड़े। दूसरी ओर सुधन्वा ने कहा- ‘यदि मैंने स्वार्थ का क्षण भर भी चिन्तन किये बिना मन को निरन्तर परमार्थ में निरत रखा हो, तो मेरा पुण्य बाण के साथ जुड़े।

इस बार भी सुधन्वा का बाण ही विजयी हुआ। उसने अर्जुन का बाण काट दिया। दोनों पक्षों में से कौन अधिक समर्थ है, इसकी जानकारी देवलोक तक पहुँची, तो सुधन्वा पर आकाश से पुष्प वृष्टि होने लगी। देवगण आकर सुधन्वा को सहर्ष स्वर्ग ले गए।


इस सुन्दर दुनिया को बर्बाद न करें

परमात्मा को सौंदर्य का भण्डार ओर आनन्द का समुद्र कहते हैं। क्यों? इसलिए कि उसने इस विश्व को बनाने में असीम श्रम किया है और अपनी कलाकारिता का परिचय दिया है। यदि वह कुछ भी न बनाता तो कदाचित ही कोई उसे जान पाता।

सृष्टा परमेश्वर का बड़ा भाव-भरा नाम है क्योंकि उसने सृष्टि को सृजा। कितनी सुन्दर है उसकी यह कलाकृति जिसे ध्यान पूर्वक देखने से पुलकन होती है। सृजन किसी की शक्ति और गरिमा का सबसे बड़ा चिन्ह है। जिसने इस संसार में जितने महान निर्माण कार्य किये हैं उन्हें उतना ही सराहा जाता है।

छोटा-सा बया पक्षी एक-एक तिनका बीन कर जहाँ-तहाँ से लाता है। क्रमबद्ध रूप से मनोयोग पूर्वक संजोकर एक सुन्दर घोंसला बनाता है। वह स्वयं उसमें सुखपूर्वक रहता है, गर्व से सिर उठाता और चहचहाता है। उसे देखने भर से दर्शकों की बाँछें खिल जाती हैं। संसार का हर सुन्दर सृजन ऐसा ही आनन्ददायक और सराहनीय होता है। सृष्टा का गुणगान करने में सबसे बड़ी उसकी यह विशेषता है कि कैसी सुन्दर दुनिया उसने बनाई। कैसे अद्भुत प्राणियों की संरचना उसने की। कैसे फूल खिलाये और कैसे हरे-भरे पेड़ पौधे उगाये।

मनुष्यों में सराहनीय वे हैं जिनने उपयोगी सृजनकर दिखाये। रचनाओं में जिसने कला और सौंदर्य का समावेश कर दिखाया। जो बोता है, उगता है और हरियाली का माहौल बनाकर दिखाता है। उसे सराहनीय कृतियों के लिए सदा याद रखा जाता है।

शैतान बदनाम है। क्यों? इसलिए कि वह बने को बिगाड़ता है। बिगड़े का सर्वनाश कर दिखाता है। मनुष्यों में से ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्हें शैतान कहा जा सके और उनकी शैतानी के लिए उन्हें धिक्कारा जा सके।

बिगाड़ना सरल है। माचिस की एक तीली से समूचे गाँव को स्वाहा किया जा सकता है, किन्तु उसे बनाकर खड़ा करना टेढ़ा काम है।

सृष्टा के इस सुन्दर सृजन को कुरूप या बर्बाद कर देना तीली जैसी नाचीज आदमी के लिए भी सम्भव है। किसी विद्वान की हत्या करना कठिन काम नहीं है। किन्तु बुद्धिमान सृजनशील बनने या बनाने में कितना श्रम और समय लगता है इसे वही जानते हैं जिन्हें वैसा करना पड़ा है।

मनुष्यों में कितने ही ऐसे हैं जिन्हें शैतान की तरह बिगाड़ना ही आता है, जो सुन्दर को कुरूप करने में सिद्ध हस्त हैं। पर उन्हें स्मरण कौन रखे? सराहेगा कौन? कितनों ने अपने लिए यही व्यवसाय चुना है कि बर्बादी में लगे रहें और जो कुछ इस दुनिया में अच्छा दीखता है उसे तोड़-फोड़कर विस्मार करते रहें।

जो लोग एक सुन्दर तितली नहीं बना सकते, वे ऐसा क्यों करते हैं कि बतखों के झुण्ड का शिकार खेलें और विनोद को क्रन्दन में बदल दें। जो लोग एक चींटी नहीं बना सकते वे हाथियों के बच्चों को बर्बाद करने की योजनाएँ क्यों बनाते हैं। जो जिन्दगी भर में एक सच्चा दोस्त नहीं बना सकते वे आये दिन जानी दुश्मनों के गिरोह अपने लिए क्यों तैयार करके खड़े रखते हैं।

छोटे बच्चों के मिट्टी के खिलौने तोड़ डालने पर वे कितने मचलते हैं और तोड़ने वाले से बदला लेने के लिए किस तरह दौड़ते हैं। ईश्वर की कलाकृतियों को जो बिगाड़ने भर का ताना-बाना बुनते रहते हैं उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि वे ऐसा अनर्थ करते हैं जिसका दुष्परिणाम उन्हें भुगतना ही पड़ेगा। एक भला आदमी बनाने में कितनों को कितनी मेहनत करनी पड़ती है, फिर जो बुरी शिक्षा देने, बुरे बढ़ाने ओर बुरे कृत्य करने- कराने में लगेंगे, उन्हें आत्मा-परमात्मा और विश्वात्मा का कोप भाजन बनना ही पड़ेगा।


वंशानुक्रम निर्धारण हेतु उत्तरदायी अविज्ञात चेतना शक्ति

दृश्य रूप में मनुष्य का अस्तित्व देखने वाले यह नहीं जानते कि इस स्थिति तक आने में किसी अविज्ञात तंत्र द्वारा कितना प्रबल पुरुषार्थ किया है। शुक्राणु के मूल में छिपी गुण सूत्र की सत्ता किसी मनुष्य की आकृति-प्रकृति-स्वभाव का निर्धारण करती है एवं शुक्राणु-डिम्बाणु के साथ-साथ शरीर की विलक्षण हलचल एवं मिलन की आकाँक्षा इस प्रक्रिया में योगदान देती है, यह तथ्य अब सबको विदित है। आनुवाँशिकी, प्रतिक्रिया, भ्रूण विकास सम्बन्धी तथ्यों की भली-भाँति जानकारी होते हुए भी वैज्ञानिक अभी एक तथ्य के सम्बन्ध में अन्धेरे में भटक रहे हैं। वह है एक अविज्ञात चेतन शक्ति जो गर्भाशय में उपयुक्त पर्यावरण के होते हुए भी डी. एन. ए. (डिसॉक्सीरी बोन्यूकलीफ एसिड) को प्रेरणा देती है कि वह अमुक रीति से अमुक प्रकृति के जीवकोषों को अंगों के रूप में संजोएं। यह मूल प्रेरक बल क्या है? कहीं यह वही प्रेरणा प्रवाह तो नहीं जो संस्कारों को माँ से गर्भस्थ शिशु में संप्रेषित करता है, जो गर्भकाल की परिस्थितियों का गर्भस्थ बालक की मनःस्थिति एवं संरचना पर प्रभाव डालता है?

इस सम्बन्ध में एक नयी परिकल्पना कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बायोकेमीस्ट्री एवं सेल बायोलॉजी विभाग के निदेशक डा. रुपर्ट शेल्ड्रेक ने प्रस्तुत करके वैज्ञानिकों के समक्ष एक चुनौती रख दी है। उनका मत है कि भ्रूण का विकास गुण सूत्रों के मौलिक घटक डी.एन.ए. जो आनुवाँशिकी के सन्देशवाहक एवं भ्रूण निर्माता माने जाते हैं, तथा गर्भाशय के भौतिक पर्यावरण में पारस्परिक सम्बन्धों से नियन्त्रित नहीं होता। इस प्रक्रिया के मूल में एक पराभौतिक सक्रिय बल कार्य करता है जिसे उन्होंने मार्फीजेनेटिक फील्ड नाम दिया है। जिस प्रकार एक चुम्बक की उपस्थिति के कारण आस-पास एक विशेष प्रकार का ऊर्जा क्षेत्र सक्रिय हो जाता है एवं वहाँ उपस्थित लोहे के कण परस्पर गुँथकर एक हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार रति क्रिया व भ्रूण की गर्भाशय में स्थापना के साथ ही एक चेतन प्रेरक बल गर्भाशय में सक्रिय हो जाता है जो शरीर एवं मन को वाँछित रूप एवं आकार दे सकने में सक्षम होता है। इस रहस्यमय अभौतिक ऊर्जा स्रोत के बारे में अपनी परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए वे आगे लिखते हैं कि गर्भस्थ भ्रूण तथा माफोजेनेटिक बल के बीच जो लयबद्धता (मार्फिक रेजोनेन्स) विकसित होती है, वही शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंगों की संरचना एवं मस्तिष्कीय बुद्धि कौशल, स्मृति तथा जन्मजात विलक्षण क्षमताओं के लिये उत्तरदायी है।

यह परिकल्पना एक प्रकार से जीन याँत्रिकी पर कार्यरत डी. एन. ए. गुण सूत्र इत्यादि में परिवर्तन लाने हेतु संकल्पित वैज्ञानिकों के लिए एक प्रहार है क्योंकि इससे उनकी मूलभूत मान्यता पर ही कुठाराघात हो जाता है। जीन की कलमों द्वारा नये विलक्षण प्रकृति के मनुष्यों को बनाने वाले वैज्ञानिकों के लिए सन्देश देते हुए यह चालीस वर्षीय वैज्ञानिक कहता है कि मनुष्यों और पशुओं में मौलिक अन्तर है। प्रयोग पशुओं में किए जा सकते हैं व सम्भवतः नयी भिन्न-भिन्न किस्म की आकृति प्रधान नस्लें उनकी बनायी भी जा सकती हैं पर यह कार्य मनुष्य में सम्भव नहीं क्योंकि उसके कई क्रिया-कलाप अभी भी अविज्ञात एवं रहस्यमय हैं।

अपनी मान्यता पर कुठाराघात होने से वैज्ञानिकों का सकपकाना स्वाभाविक है। यही कारण है कि एक वर्ग ने उनकी इस पुस्तक, जिसमें इस परिकल्पना को प्रस्तुत किया गया है- “ए न्यू साइन्स ऑफ लाइफ दी हाइपोथीसिस ऑफ फार्मेटिव काजेशन”, की जमकर आलोचना की है। जबकि एक वर्ग जो अपेक्षाकृत अधिक उदारवादी विचारकों ने इसे एक क्रान्तिकारी कल्पना कहा है। ग्लासगो विश्वविद्यालय के दार्शनिक- वैज्ञानिक डा. स्टीफन क्लार्क ने शैंल्ड्रेक की मान्यता का समर्थन करते हुए इसे पूर्वार्त्त दर्शन की उस मान्यता के अनुकूल बताया है जिसमें संस्कारों के माँ से बालक में गर्भकाल की अवधि में स्थानान्तरित होने का वर्णन किया जाता है। शारीरिक आकृति-प्रकृति का निर्धारण तो इस अवधि में होने वाले चिन्तन से प्रभावित होता ही है, बालक के चिन्तन, क्रिया-कौशल, प्रतिभा एवं भाव संवेदनाओं तक के लिये वह मार्फोजेनेटिक बल जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जो परोक्ष रूप से माँ के गर्भाशय में चिन्तन व भावना के अनुरूप क्रियाशील रहता है, ऐसी उनकी मान्यता है। इसी प्रकार कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के भूतपूर्व उपकुलपति एवं जीव विज्ञानी सर एरिक एस्बी ने शैंल्ड्रेक के प्रतिपादन को गम्भीरता पूर्वक लिया है व कहा है कि “वनस्पति एवं प्राणी विकास सम्बन्धी परम्परागत मान्यताओं की दृष्टि से यह एक चुनौती भरा रहस्योद्घाटन है। हमें मानवी विकास, उसके चिन्तन एवं व्यवहार के लिये भ्रूण विज्ञान की गहराई तक जाकर ‘फार्मेटिव काजेशन’ के इस सिद्धान्त पर भली-भाँति मनन-चिन्तन करना चाहिए ताकि बाद में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए कारण को मूल रूप में ढूँढ़ा जा सके।”

शैंल्ड्रेक द्वारा प्रतिपादित मार्फोजेनेटिक ऊर्जा क्षेत्र न तो रासायनिक है, न ही विद्युतचुम्बकीय। यदि यह वास्तव में लेखक की मान्यता के अनुरूप एक पराभौतिक बल है तो यह प्रकृति में विद्यमान चार मूल बलों से नितान्त अलग एक नया ही विलक्षण बल होगा। आनुवाँशिकी की थ्योरी के अनुसार परम्परागत रूप में स्थानान्तरित होने वाले गुणों के लिए शैंल्ड्रेक के इस अभौतिक बल को उत्तरदायी ठहराना उचित होगा, जहाँ कोई भी कारण ऐसा नहीं मिलता जिसके लिए डी.एन.ए. को मूलभूत स्रोत माना जा सके।

कठिनाई यह है कि भ्रूण विज्ञानियों, जीवविज्ञानियों एवं व्यवहारवैज्ञानिकों में परस्पर समन्वय नहीं बैठ पाता। जहाँ पहला वर्ग आकृति एवं स्थूल प्रक्रियाओं को ही सब कुछ मानता है, वहाँ दूसरा वर्ग विचार करने की शक्ति एवं परिधि, मानसिक दक्षता, सीखने की क्षमता एवं संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं के व्यवहार रूप को अधिक महत्व देता है। दोनों ही प्रकार की प्रक्रियाएँ आनुवाँशिकी द्वारा ही माँ से पुत्र या पुत्री में आती हैं पर जहाँ आकृति के लिए माँ व पिता के क्रोमोसोम कुछ हद तक उत्तरदायी ठहराये जा सकते हैं, वहाँ प्रकृति एवं व्यवहार के लिये माँ का चिन्तन, भाव-सम्वेदना का स्तर, गर्भकाल में आस-पास का वातावरण अधिक उत्तरदायी है। पूर्वार्ध मनोविज्ञान एवं दर्शन इसी कारण गर्भकाल में माता के अहार, मानसिक स्वास्थ्य से लेकर उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं पर जोर देता रहा है। जैसा संकल्प बल इन दिनों माता के अन्दर विकसित होता है, वैसी ही सन्तति होती है। पुँसवन संस्कार के पीछे भी यही मूलभूत मान्यता है कि भ्रूण में वे संस्कार प्रविष्ट हों जो अभीष्ट हैं। गर्भस्थ भ्रूण पर इस अभौतिक बल के क्या प्रभाव पड़ सकते हैं, इसके कई उदाहरण मिलते हैं।

मिनीसोटा विश्वविद्यालय के डा. फाउलर ने गर्भावस्था में चिन्तन के बच्चे पर प्रभाव के अध्ययन हेतु कई माताओं का अध्ययन किया। एक घटना पत्रिका “न्यू साइन्टिस्ट” में उद्धृत करते हुए वे लिखते हैं कि एक स्त्री अपने बच्चे को बेचैन देखकर नींद लाने वाला सिरप देकर काम पर चली गयी। दुर्योगवश डोज कुछ अधिक हो गया, इस कारण बच्चा मर गया। लौटकर यह देखने पर उसके मन पर गहरा सदमा पहुँचा। इसी अवस्था में उसे दूसरा गर्भ ठहर गया। पहले बच्चे का दुःख तब तक बना रहा जब तक दूसरा उसकी गोद में न आ गया। यह दूसरा बच्चा मानसिक रूप से रोगी निकला। माँ का दुःख और बढ़ गया। तीसरा बच्चा जिद्दी व सनकी पैदा हुआ। चौथे बच्चे के जन्म के समय तक घर की आर्थिक स्थिति भी काफी ठीक थी व चिकित्सा की सुविधा भी उसे मिली। मनोवैज्ञानिकों ने उसका विश्लेषण कर उसे प्रसन्न रहने की सलाह दी व इसके लिये कई प्रकार के क्रियात्मक परामर्श दिये। चौथा बच्चा पूर्ण स्वस्थ, नीरोग एवं कुशाग्र बुद्धि का पैदा हुआ। इस केस का हवाला देते हुए डा. फाउलर लिखते हैं कि ऐसे मामलों में आनुवाँशिकी नहीं अपितु व्यवहार-चिन्तन को प्रधानता दी जानी चाहिए, जिसकी कि बहुधा उपेक्षा कर दी जाती है।

ऐसी अनेकों घटनाएँ मिलती हैं जिनमें जैसा पति-पत्नी ने चाहा, जैसी मनोभूमि विनिर्मित की, वैसी ही सन्तति जन्मी। एडमकोल्ट डेनमार्क का फ्रेडरिक 22 सन्तानों का पिता था। दोनों पति-पत्नी ने उन्हें गुणवान, चरित्रवान, प्रतिभाशाली बनाने हेतु कोई कसर नहीं छोड़ी व इसका अभ्यास गर्भस्थ स्थिति से ही आरम्भ कर दिया। फलतः 22 में से 4 बालक राजदूत, 2 सेनाध्यक्ष, 5 राज्यमंत्री तथा 11 राज्यपाल जैसे उच्च पदों पर आसीन हुए, उन्होंने पिता के गौरव को बढ़ाया। ट्यूक्सवरी के प्रसिद्ध चिकित्सक बेंजामिन किट्ज अपने व्यवसाय अपने व्यवसाय के प्रति अत्यन्त निष्ठावान थे। उन्होंने प्रत्येक सन्तान को चिकित्सक बनाने का लक्ष्य रखा, वैसा ही वातावरण बनाया। फलतः आठों सन्तानें जन्म से ही वे विलक्षणतायें लेकर जन्मीं जो उनके पिता ने चाही थीं। सभी चिकित्सक बने। वेल्स के लॉनपॉम्प सेण्ट के परिवार में जन्मे पाँचों बालक प्रसिद्ध सन्त बने। पाँच सन्तों के गिरजाघर उनके नाम से बने अभी भी प्रसिद्ध हैं। पाँचों भाई- सेण्ट ग्वाइन, सेण्ट सीथो, सेण्ट सेलाइमन, सेण्ट ग्वाइनो, एवं सेण्ट ग्वाईचीरो की समाधि वहाँ बनी है।

भारत में राणा साँगा व वीर हम्मीर का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है। अन्य भाइयों में वैसी प्रतिभा न थी पर उनके जन्मकाल के पूर्व माँ के मन में जैसा संकल्प उभरा, वैसी ही सन्तति जन्मी।

वंशवाद की हठधर्मिता रखने वाले अंग्रेजों एवं जर्मनों में यह मान्यता जड़ जमाए बैठी है कि ये जातियाँ श्रेष्ठ वंश की हैं। इनमें रक्त सम्मिश्रण नहीं होना चाहिए। हिटलर इसी चिन्तन के परिणाम स्वरूप विकसित हुआ था। किन्तु भौतिक दृष्टि से वंश की श्रेष्ठता पर जोर देने वाले, आनुवाँशिकता को महत्व देने वाले उस मूल प्रेरक बल को भूल जाते हैं जो गर्भस्थ बालक की मनोभूमि बनाता है। सम्भवतः डा. रुपर्ट शैंल्ड्रेक की मार्फोजेनेटिक फील्ड वाली मान्यता क्रमशः वैज्ञानिकों के गले उतरने लगे एवं गर्भस्थ शिशु पर चिन्तन-भावना का विचार पड़ने का प्रतिपादन उन्हें विज्ञान सम्मत लगने लगे। तब फिर आकृति पर नहीं, प्रकृति पर-पीढ़ियों की श्रेष्ठता पर जोर दिया जाने लगेगा। अध्यात्म दर्शन की इस मान्यता को मानने पर वैज्ञानिक विवश होंगे कि जीन याँत्रिकी द्वारा श्रेष्ठ कलमें बनाने के स्थान पर उदात्त-उत्कृष्ट चिन्तन करने वाली भावना सम्पन्न सन्ततियाँ जन्म लें। इससे ह्यूमन जेनेटिक इंजीनियरिंग की वर्तमान मान्यताओं को तो चोट पहुँचेगी किन्तु उन्हें सही दिशा मिलेगी व भावी पीढ़ी श्रेष्ठ स्तर की होगी।


साहसी नेपोलियन (kahani)

नेपोलियन आल्पस पहाड़ पर से सेना गुजारने की फिराक में था और रास्ता खोजने स्वयं आया था। पास ही पहाड़ की तलहटी में एक पहाड़ी बुढ़िया रहती थी। उसके पास नेपोलियन उतरा और रास्ते से संबन्धित बात करने लगा।

बुढ़िया ने कहा- “मूर्ख, तेरे जैसे कितने ही इस दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने के प्रयास में जान गँवा बैठे। बेमौत मत मर, वापस लौट जा।”

नेपोलियन ने मुस्काते हुए कहा- “माताजी, आपने कठिनाइयों से अगाह कर दिया है इससे मेरा हौसला बढ़ा है और अधिक समझदारी के साथ सजग बनने का उत्साह जगा है। आपकी कृपा से मैं एक दिन अवश्य इसे पार करके रहूँगा।”

बुढ़िया दंग रह गई। जोखिमों को इस तरह चुनौती देने वाला कोई असाधारण ही हो सकता है। उसने आशीर्वाद दिया- “साहसी के लिए संसार का कोई काम असम्भव नहीं।

नेपोलियन ने आल्पस पार करने में सफलता पाई। पर वह बुढ़िया के उन शब्दों को समय-समय पर दुहराता रहा, जिनमें कहा गया कि- “साहसी के लिए संसार में कोई काम असम्भव नहीं है”


लिंग परिवर्तन- एक सम्भावना

आस्ट्रेलिया के ग्रेटबेरियर रीफ सागर में चमकीली मछलियों की क्लीनर नामक प्रजाति होती है। इस देश में एक खास किस्म की मछली पाई जाती है- लेवरोइस। मादा मछलियाँ 3 मीटर और नर 5 मीटर तक लम्बी होती हैं। नर झगड़ालू प्रकृति के और मादा सौम्य प्रकृति की होती हैं। इनका प्रजनन क्रम ऐसा है जिसकी तुलना संसार भर के कदाचित ही अन्य किसी प्राणी से की जा सके। इनकी गणना उभय लिंगी प्राणियों में होती है। आरम्भ में वे सभी मादा होती हैं। जीवन का दो तिहाई भाग वे मादा के रूप में ही बिताती हैं। प्रौढ़ हो जाने पर वे ही नर बन जाती हैं और नर की भूमिका निभाती हैं।

नर एक हरम बनाता है जिसमें दस तक रानियाँ होती हैं। नर को हर समय चौकस रहना पड़ता है। कभी-कभी कोई दूसरा नर इस हरम पर धावा बोलकर जितनी हाथ पड़े उतनी झपट ले जाता है। कभी-कभी कुछ मनचली मादाएँ एक ही बाड़े में रहते-रहते ऊब जाती हैं और नये घर का आनन्द लेना चाहती हैं। दोनों ओर से रखवाली करना नर का काम है, पर वह इतनी बड़ी जिम्मेदारी अकेले नहीं निभा पाता। इस कार्य में एक मुखिया मछली उसका हाथ बँटाती है। नर के सुरक्षा कार्य में और कई बार युद्ध कार्य में उसे आगे बढ़कर हाथ बँटाना पड़ता है।

समयानुसार मादा मछलियाँ अण्डे देती हैं तो उनकी रखवाली में भी मादाओं की सहायता के लिये नर और मुखिया मिलकर सहायता करते हैं। मुखिया का चुनाव नहीं होता, वह आयु की बढ़ती हुई प्रौढ़ता के कारण अनायास ही युवराज का पद ग्रहण कर लेती है। नर का पौरुष जब तक काम देता है तब तक वह अपना पद सँभाले रहता है पर जैसे ही मुखिया मछली प्रौढ़ होती है यह मादाओं को दुलारने से लेकर धमकाने तक के तरीके काम में लाती है। साथ ही नर से प्रतिद्वन्द्विता करने लगती है। उसकी मनोवृत्ति में यह परिवर्तन होना इस बात का प्रमाण है कि वह नर का पद सम्भालने की तैयारी कर रही है। इन बदली हुई परिस्थितियों में उसकी नर जननेंद्रिय विकसित हो जाती है और मादा अंग सिकुड़कर लुप्त प्रायः हो जाते हैं।

कहा जाता है कि नर की प्रकृति अलग होती है- मादा की अलग। जो एकबार जिस प्रकार के प्रजनन अंगों में और स्वभाव में ढल जाता है वह वैसा ही बना रहता है, पर उपरोक्त मछली इसका अपवाद है। यह न केवल अपना लिंग बदलती है वरन् स्वभाव भी बदल लेती है। मनुष्यों में नपुँसक तो होते हैं, पर वे नपुँसक प्रजनन में सफल नहीं होते। एक ही शरीर में दोनों लिंग की सफल भूमिका निभा सकना प्रकृति का एक विशेष चमत्कार परन्तु अपवाद है।

द्विलिंगी जीव जन्तु कितने ही पाये जाते हैं, पर इस प्रकार की विचित्र परम्परा केवल इनल्डेण्ड्रीयरस जाति की मछलियों में ही पाई जाती हैं। उनमें न कोई पूर्णतया नर होती है और न मादा। आयु वृद्धि के साथ उनका कद और वजन भी बढ़ता है। इस प्रकार मुखिया राजकुमार बनाने की प्रतिद्वन्द्विता में जो आगे रहती है वह कुलपति कहलाती है और शेष कमजोर जैसी-तैसी जिन्दगी गुजारती रहती हैं।

इस विलक्षणता को देखते हुये अनुमान लगता है कि नर और मादा का वर्गीकरण स्थायी नहीं है। बदलती मनःस्थिति और परिस्थिति से उसमें उलट-पुलट होती रहती है। मनुष्यों में लिंग परिवर्तन होते रहते हैं। प्रवृत्ति बदल जाने पर अगले जन्मों में तो यह अन्तर सुदृढ़ भी हो सकता है।


Quotation

चाहे संसार भर के उपदेशकों के प्रवचन सुनें, चाहे ईश्वर ही आपको धर्मज्ञान सुनायें। पर तब तक उनसे कुछ भी लाभ न होगा जब तक कि आप अपने आपको सन्मार्ग पर चलने की स्वयं प्रेरणा न दें।


तेजोवलय- एक बहुमूल्य आत्मिक विभूति

देवताओं, अवतारों के चेहरे के चारों ओर एक प्रभा मण्डल चित्रित किया जाता है। श्रद्धावश महापुरुषों और सन्त- सिद्ध पुरुषों के चेहरे पर भी यह अंकन होता है। खुले नेत्रों से देखने पर जीवित महामानवों के चेहरों पर ऐसा कुछ दिखाई नहीं पड़ता। तब यह सन्देह होता है कि जिनने अवतारी शरीरधारियों को देखा होगा उन्हें वह प्रकाश दृष्टिगोचर होता होगा या नहीं, जो चित्रों में अंकित किया जाता है।

यह उनकी आध्यात्मिक विशिष्टता का परिचय है। यह तेजोवलय खुली आँखों से नहीं देखा जाता पर सूक्ष्म नेत्र जिनके भी खुल सके होते हैं, उन्हें प्रतीत होता है कि दैवी महामानवों का देवत्व उनके चेहरे पर विशिष्ट रूप से देखा जाता है। यह उनकी आन्तरिक शक्तियों का बहिरंग में परिचय है। यों वह होता तो समस्त शरीर के इर्द-गिर्द है, पर उसकी अधिक मात्रा चेहरे के आस-पास ही प्रधान रूप से परिलक्षित होती है।

अध्यात्म रहस्योद्घाटनों में नेत्रों को सूर्य-चन्द्र की उपमा दी गई है। वाणी को सरस्वती की, नासिका को पवन की और कानों को आकाश की। चेहरे के भीतरी भाग में भृकुटी के स्थान पर दिव्य तृतीय नेत्र माना गया है, जिससे अदृश्य को देखा जा सकता है। उसका तेजस् प्रत्यक्ष नेत्रों की तुलना में कहीं अधिक होता है। इसी को खोलकर शिवजी ने कामदेव को जलाया था। त्रिकाल दर्शी उसी की सहायता से दूर-दर्शन ही नहीं भूत और भविष्य को भी देख पाते हैं। मस्तिष्क के भीतर ब्रह्मरन्ध्र सहस्रार चक्र है। विष्णु के उपासक इसे क्षीर सागर में सोया हुआ सहस्र फण वाला शेषनाग मानते हैं और शिव उपासकों के लिए यह ब्रह्मरंध्र ही कैलाश और उसके इर्द-गिर्द का क्षेत्र मानसरोवर है। गुरुत्व का ध्यान यहीं किया जाता है। इस प्रकार मस्तिष्क का भीतरी भाग भी दिव्य शक्तियों से भरा है। ज्ञानेंद्रियां यदि परिशोधित स्थिति में हों तो वे भी देवतुल्य हैं। इस प्रकार चेहरे का बाहरी और मस्तिष्क का भीतरी भाग देव शक्तियों का निवास स्थान माना गया है और उन सबका प्रतीक चेहरे के इर्द-गिर्द फैला हुआ तेजोवलय माना गया है। प्राचीनकाल में तेजोवलय दिव्यता का- दिव्य शक्तियों के भण्डार का सूचक माना जाता था और चित्रों में उसका अंकन इसी आधार पर होता था। सन्तों और महामानवों को भी जो लोग वही पदवी देना चाहते थे वे उनके चेहरे पर भी वैसा ही अंकन करते थे। बुद्ध, राम, कृष्ण आदि के चेहरों पर तो यह प्रकाश अति प्राचीन काल से चला आता रहा है। ईसा मसीह के चित्रों में भी तात्कालिक चित्रकारों ने इसका समावेश करना आरम्भ किया।

अब वैज्ञानिक शोधों ने इस संदर्भ में नया कदम उठाया है। उनने अपनी शोधों में पाया कि प्रत्येक व्यक्ति में यह प्रकाश तीव्र अथवा क्षीण रूप में पाया जाता है। वे इसे प्राण ऊर्जा का प्रतीक मानते हैं। ऐसे यन्त्र विनिर्मित हो चुके हैं जो किसी भी व्यक्ति के चेहरे के इर्द-गिर्द फैले हुए इस प्रकाश की छाया ले सकते हैं। समस्त शरीर के इर्द-गिर्द भी यह होता है पर वह क्षीण रहता है। क्योंकि चेहरे के भीतर और बाहर विद्युत सम्पदा का भण्डार है। गले से नीचे के अवयवों में प्राण ऊर्जा- गर्मी अथवा विद्युत का कितना भाग है, इसी का पता चलता है।

इसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक शारीरिक दूसरा मानसिक। शरीर से सीधा साधा प्रकाश निकलता है। प्रकाश सफेद होता है। मानसिक तेजोवलय इसी में घुला होता है। उसमें रंगों की झलक होती है। जिस प्रकार इन्द्र धनुष में हल्के भारी कई रंगों की झलक मिलती है, उसी प्रकार तेजोवलय का श्वेत भाग शरीरगत समर्थता का प्रमाण प्रस्तुत करता है। इसमें रंगों की झलक मिले तो उसे मानसिक विशेषता का परिचायक माना जाएगा।

दिव्यता विहीन मोटे-तगड़े शरीरों में तेजोवलय धुँधले कुहरे जैसा होता है। उसमें शुभ्रता का अंश बहुत कम होता है। मानसिक दृष्टि से जो गये, बीते, पतित हैं उनके प्रकाश में कालेपन की बहुलता रहती है। दोनों मिलाकर जो स्थिति बनती है उसे धुंधलापन कह सकते हैं। उसका चित्रण नहीं हो सकता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह प्रभामण्डल किसी की दिव्यता का परिचायक है। उसमें विशिष्टताएं होनी ही चाहिए। ऐसा प्रकाश दिव्य चक्षुओं से ही देखा जा सकता है। जिस प्रकार कर्णेन्द्रियों को जागृत करके नादयोग सुना जाता है, जैसे अंतर्दृष्टि से अन्तर्मुखी होकर ध्यान योग द्वारा सूक्ष्म शरीर के, अन्तरंग के किसी भाग के दर्शन किये जाते हैं उसी प्रकार ज्ञान चक्षुओं से दैवी विभूति सम्पन्न पुरुषों का तेजोवलय देखा जाता है ओर यह अनुमान लगाया जाता है कि किसके भीतर कितनी दिव्यता है।

अब इस क्षेत्र में विज्ञान ने कुछ कदम आगे बढ़ाये हैं और शरीरगत प्राण ऊर्जा को विशिष्ट यन्त्रों से आभा मण्डल के रूप में प्रत्यक्ष देखना आरम्भ किया है। उस आधार पर किसी सशक्त या दुर्बल होने का स्वस्थ या रुग्ण होने का पता चलता है। भौतिक विवेचन का क्षेत्र भी यही है। विज्ञानी किसी की आध्यात्मिक स्थिति का पता नहीं लगा सकते, तो भी शरीर या मन की स्वस्थता- दुर्बलता का आकलन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

शरीर में रक्त माँस ही नहीं होता उसमें विद्युत शक्ति भी होती है। इसके भी दो भाग हैं। एक वह जो हृदय और मस्तिष्क से विनिर्मित होकर नाड़ी संस्थान का संचालन करती है। दूसरी वह जो निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त रहते हुए प्रत्येक शरीरधारी, वनस्पति एवं पदार्थ को प्रभावित करती है। दोनों के सम्मिश्रण से जो विद्युत बनती है, उसी को वैज्ञानिक देख या समझ पाते हैं। उसी आधार पर किसी की स्थिति का विश्लेषण करते हैं। वैज्ञानिक तेजोवलय विशुद्धतः भौतिक होता है। वही यन्त्र गम्य है। आध्यात्मिक प्रभामण्डल मशीनों से नहीं देखा जा सकता उसे ज्ञान-चक्षुओं से ही ध्यानयोग द्वारा देखा जा सकता है।

अब तक तेजोवलय के सम्बन्ध में कुछ निश्चित अभिमत नहीं था, पर अब प्राण विद्युत के रूप में उसका आकलन होने के उपरान्त यह आशा बँधती है कि दिव्य आभा मण्डल का भी किसी न किसी आधार पर दर्शन आकलन किया जा सकेगा।

प्रभामण्डल के सम्बन्ध में वैज्ञानिक खोजबीन आरम्भ हुए अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं। तेजोवलय का मापन सबसे पहले डा. किल्नर ने 1911 में किया। उन्होंने हाइवोल्टेज लाइट स्रोत का प्रयोग कर यह पाया कि हर जीवित वस्तु के चारों ओर एक प्रभा मण्डल होता है। बैग्नेल (लन्दन) के 1937 तथा रिगस (अमेरिका) के 1974 में किये गये कार्यों से यह पता चला है कि कुछ व्यक्तियों के आसपास का प्रभामंडल विशिष्ट आभा लिए होता है। उसमें विद्यमान किरणों का स्पेक्ट्रम भी अन्य जीवों की तुलना में भिन्न होता है। इसे उन्होंने पहले कीर्लियन तथा बाद में शेर्लियन फोटोग्राफी द्वारा फोटो प्लेट पर अंकित किया। उँगलियों के पोरों, चेहरे के चारों ओर एवं सुषुम्ना के निचले भाग पर इसकी सघनता को मात्रा भिन्न-भिन्न पायी गयी। इन्हीं वैज्ञानिकों का मत था कि ऑरा का मापन करके पहले से बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति किस मनोविकार या ग्रन्थि का शिकार है एवं इसे आगे चलकर क्या रोग हो सकते हैं। मस्तिष्क में रक्त, स्राव, दमा, हृदयाघात, कैंसर जैसे रोगों में निदान की इस विधि में साठ से अस्सी प्रतिशत सफलता पायी गयी। निषेधात्मक चिन्तन वाले व्यक्ति एवं विधेयात्मक व्यक्तित्व में अन्तर उनके ऑरा के विश्लेषण से हो सकता है, यह डा. श्रोडिंजर ने 1976 में बताया।

आभा मण्डल के 3 स्पष्ट भाग वैज्ञानिकों ने किए हैं। पहला शरीर तक सीमित विद्युत विभव, दूसरा शरीर से एक इंच बाहर तक निकला तेजोवलय एवं तीसरा शरीर को कवच की तरह चारों ओर से लपेटे 6 से 8 इंच व कभी-कभी कई फीट तक शरीर से बाहर तक फैला हुआ- विशेष कर चेहरे, उंगलियों व जननेन्द्रियों पर। इस तीसरे आभा मण्डल को जार्जमीक ने ‘जोन ऑफ एनर्जी’ माना है। पहले में बिन्दु होते हैं, दूसरी में रेखाएँ तथा तीसरे में सघन आयनों का समुच्चय। पहले को वे स्थूल शरीर व बायोप्लाज्मा का सम्मिश्रण कहते हैं, दूसरे को प्लाज्मा तथा तीसरे को विकिरण जिसमें वास्तव में ही लिंग (चिकित्सा) की क्षमता होती है।

भारतवर्ष में यह कार्य सबसे पहले डा. पी. नरेन्द्रन् ने किया है। वे भारत सरकार के विज्ञान और तकनीक मन्त्रालय के अनुदान के अंतर्गत अपना काम चला रहे हैं। सन् 1983 में उन्होंने हाँगकाँग में एशियन एण्ड आस्ट्रेलियन काँग्रेस में अपनी शोध का प्रदर्शन किया था जिसमें उपस्थित वैज्ञानिकों ने बहुत रुचि ली, प्रतिपादन यह किया गया है कि दूसरा “ऑरा” प्रकाश के आधार पर शारीरिक और मानसिक स्थिति का अधिक गहराई से विश्लेषण किया जा सकता और जाना जा सकता है कि इन क्षेत्रों में किन्हीं रोगों का प्रवेश हो चुका है या होने वाला है। समय रहते इस प्रकार की जानकारी मिल जाने से उपचार कहीं अधिक सरल पड़ेगा।

डा. नरेन्द्रन् का ध्यान इस विषय में पहले हो चुकी शोधों ने विशेष रूप से आकर्षित किया और वे उस कार्य को अपने ढंग से आगे बढ़ाने में लगे गये। लन्दन के सेन्ट जोन्स थामस हॉस्पिटल के प्रमुख सर्जन डब्ल्यून जे. किल्नर ने ऐसे प्रकाश की जानकारी प्राप्त की थी और अपनी शोधों का विवरण “दी ह्यूमन एटमॉसफियर” में विस्तार पूर्वक लिखा है।

सन् 1939 में रूसी वैज्ञानिक किरलियन ने इलेक्ट्रोथेरेपी की शोध करते हुए पाया कि उनके शरीर में से रंग-बिरंगी विद्युतीय चिनगारियाँ निकल रही हैं। फिर उन्होंने दूसरे शरीरों की जाँच-पड़ताल की और पाया कि यह उनकी निजी विशेषता नहीं है वरन् न्यूनाधिक मात्रा में दूसरों के शरीरों में से भी ऐसा ही प्रकटीकरण होता है।

मद्रास इन्स्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजी के अध्यक्ष पी. नरेन्द्रन् को इसी आधार पर अपने प्रयास आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिली। उनने एक ऐसी मशीन बनाने में भी सफलता पाई जो उँगलियों के फोटोग्राफ प्रभा मंडल सहित खींच लेती है।

इस प्रभामण्डल को इन्फ्रारेड फोटोग्राफी के सिद्धान्तों से मिला देने पर घोर अँधेरे में घूमते हुए किसी आदमी का फोटो खींचा जा सकता है और अँधेरे में चोरी करने वालों का भी पता लगाया जा सकता है। उस व्यक्ति के चले जाने पर भी इन्फ्रारेड फोटोग्राफी से यह विदित होता रह सकता है कि कुछ समय पूर्व यहाँ कौन था और क्या कर रहा था क्रिया-कलाप समाप्त हो जाने पर भी यह निशान बने रह सकते हैं कि किसने क्या किया था।

यही सिद्धान्त अध्यात्मिक क्षेत्र में विकसित होने पर यह जानकारी दे सकते हैं कि किस चरित्र एवं व्यक्तित्व का व्यक्ति किस स्थान पर कितने समय रहा है और उसने उस स्थान को किस दिशा में प्रभावित किया है?

प्रभा मण्डल एक प्रकार का छाया पुरुष है, जो प्रकाश रूप होते हुए भी यह बताता है कि जिसका यह प्रकाश है, उसके गुण, कर्म, स्वभाव, उद्देश्य एवं कृत्य क्या थे। इस प्रकार यह विज्ञान विकसित होने पर किसी व्यक्ति के न रहने पर भी उसके निवास स्थान से संपर्क साधकर बहुत समय तक यह जाना जा सकेगा कि यहाँ किसी मनुष्य की प्राण ऊर्जा अपना कैसा और कितना प्रभाव छोड़ गई है।

प्रभा मण्डल एक प्रकार से किसी व्यक्ति का अदृश्य व्यक्तित्व है जो उसके प्रभाव से उस क्षेत्र को देर तक प्रभावित करता रहता है। तेजोवलय के चित्रण का महत्व ऐसी ही अनेक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए समझा जा सकता है।


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वह ज्ञानी जो किसी की पीड़ा पर रो न सके, जो प्रसन्नता की घड़ी में भी हँस न सके, जो इतना आत्मकेन्द्रित हो कि दूसरों की चिन्ता न करता हो, वह अज्ञानी से भी बढ़कर है।


जन्मजात अर्जित अतीन्द्रिय सामर्थ्य

अमेरिका के लासएंजेल्स नगर में एक सामान्य व्यक्ति रहते हैं- रॉज। वे कोई योगी महात्मा नहीं हैं, साधारण गृहस्थ हैं। उन्होंने अतींद्रिय क्षमता प्राप्त करने के लिए कोई योगाभ्यास भी नहीं किया है। परन्तु अनायास ही उनके भीतर से ऐसी क्षमताएँ उद्भूत हुई हैं जिसके आधार पर वे गड़ी हुई वस्तु का विवरण बता देते हैं। यह बताये हुए विवरण इतने सही होते हैं कि जिनका खनिज व्यवसाय से सम्बन्ध हे, वे उनकी सेवाओं का भरपूर लाभ उठाते हैं।

अपने गुजारे के लिये वे किसी दान-दक्षिणा, इनाम उपहार पर भी निर्भर नहीं रहते। वरन् फीस के रूप में 50 डॉलर की फीस वसूल कर लेते हैं ताकि अवाँछनीय तत्व उनकी घेरा बन्दी कर एकाग्रता न भंग कर दें। इतना होते हुए भी प्रश्नकर्ताओं की इतनी भीड़ रहती है कि उत्तर प्राप्त करने के लिए कई-कई महीनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। आमतौर से प्रश्नकर्ताओं में जमीन में कहाँ पानी का स्रोत है, कहाँ नहीं है, यह पूछने वाले ही अधिक होते हैं। उनके बताये हुए उत्तरों में 85 प्रतिशत सही निकलते हैं।

एक बार एक विचित्र घटना हुई। एक व्यक्ति के यहाँ चोरी हो गयी। चोरी में कीमती हीरे थे। कुछ अता-पता नहीं चल पा रहा था। पूछताछ के लिये वे लोग रॉजबार्मेई के पास गए। उन्होंने उत्तर देने के लिए 3 दिन माँगे। इसके बाद उन्होंने वे हीरे जमीन में जहाँ गढ़े थे, उस स्थान को बता दिया। इतना ही नहीं, जिन लोगों ने चोरी की थी, उन्हें पुलिस द्वारा पकड़वा दिया। ऐसे कार्य वे कई बार करके पुलिस की प्रशस्ति पा चुके हैं।

एक तेल खोदने वाली कम्पनी ने उनकी सहायता ली और पूछा कि इस इलाके में तेल कहाँ मिल सकता है? उनने अपनी अतीन्द्रिय क्षमता के सहारे वह स्थान बताया जहाँ अभीष्ट मात्रा में तेल निकलने की आशा थी। वहीं खुदाई की गयी। इस स्थान से न केवल बड़ी मात्रा में तेल मिला वरन् सोना, यूरेनियम आदि कीमती धातुओं का भण्डार भी मिला। यह करोड़ों की संपत्ति थी। इस पर कम्पनी ने कुछ अतिरिक्त उपहार उन्हें देना चाहा। उसे लेने से उनने स्पष्ट इन्कार कर दिया और कहा- निर्धारित फीस लेने के उपरान्त मेरा इनाम लेने का कोई हक नहीं रह जाता।

बार्मेई अपनी इस विशेषता को जन्मजात बताते हैं। इसके लिए उन्हें कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ा। उनकी माँ खेल-खेल में ही यह पूछती रहती थी कि बता मेरी मुट्ठी में क्या है? उत्तर अस्सी प्रतिशत सही निकलते थे। कुछ दिन ऐसे ही खेल-खेल चलता रहा। पीछे उनकी माँ को विश्वास हो गया कि मेरा लड़का किसी कारण अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न है। परिवारजनों ने उसका व्यावसायिक प्रयोग आरम्भ कर दिया। इसका ईमानदारी से उपयोग करने पर सभी ने राजी-खुशी से निर्धारित फीस देकर भूगर्भ की छिपी जानकारियाँ लेना जारी रखा।

एक दिन एक व्यक्ति ने पूछा कि वह चाँदी की खदान के लिए जहाँ खुदाई चला रहा है वहाँ चलाये या नहीं। इसके उत्तर में वे उसे एक दूर स्थित जगह पर ले गए और कहाँ आप वहाँ नहीं, यहाँ खोदें। कथन सही निकला और नई जगह पर अनुमान से अधिक चाँदी निकली।

बढ़ती हुई ख्याति को सुनकर खदान खोदने की मशीनों में कहीं खराबी हो जाती तो वे लोग भी पहुँचते। अतीन्द्रिय क्षमता के आधार पर वे यह भी बता देते कि मशीन का कौन-सा पुर्जा खराब हो गया है और क्या करने पर वह ठीक हो सकता है?

बार्मेई अपने को सदा एक साधारण व्यक्ति बताते रहे और बिना अनुचित लाभ उठाये अपनी अतीन्द्रिय क्षमता का लाभ सबको देते रहे। वे कहते थे- यह जन्मजात, बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त निधि है, इसका उपयोग सभी के लिये सामान्य रूप से होना चाहिए।


स्वप्नों में पूर्वाभास की सम्भावनाएँ

आमतौर से स्वप्न निरर्थक होते हैं। उनका कोई माने मतलब नहीं होता। बेसिलसिले की घटनाएँ दीख पड़ती हैं। उस समय वे ऐसी लगती हैं मानो यथार्थता देखी जा रही है। पर आँख खुलने पर पता चलता है कि रात को जो देखा गया था, वह निरर्थक था।

इतने पर भी कुछ स्वप्न ऐसे होते हैं जिन्हें सार्थक सकारण कहा जा सकता है उनका वास्तविकता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। पर यह नहीं समझा जा सकता है इनमें से कौन घटित हो चुका या घटित होने वाला है। इसकी एक मोटी कसौटी यह है कि जो स्वप्न मन में बेचैनी- उथल-पुथल पैदा करें, उनके साथ घटित होने की सम्भावना जुड़ी हो सकती है।

लन्दन में परामनोविज्ञान शोधकर्ता डा. जे. सी. वार्कर ने इस सम्बन्ध में गहरी दिलचस्पी ली है और स्वप्नों की सार्थकता से सम्बन्धित अनेकों घटनाक्रमों का संकलन किया है। इस प्रयोजन के लिए उन्होंने ब्रिटिश प्रिमोनीशन्स ब्यूरो नामक एक संस्था स्थापित की और उसकी शाखाएँ योरोप अमेरिका के प्रायः सभी प्रमुख देशों में स्थापित कीं। इनका काम था महत्वपूर्ण स्वप्नों का आकलन करें और यह पता लगाये कि उनमें सच्चाई से भी कुछ सम्बन्ध था क्या? इस संग्रह संकलन में दो तथ्य एकत्रित किये गये कि सार्थक स्वप्नों में से कितने भूतकाल से सम्बन्धित थे और कितनों में भविष्य की जानकारी थी। इसके अतिरिक्त एक नई शोध यह भी इस संकलन में एकत्रित की गई कि क्या कोई स्वप्नदर्शी अपनी शारीरिक, मानसिक रुग्णता की सम्भावना है यदि वह किसी व्यथा से ग्रसित है तो उसका निदान और चिकित्सा सम्बन्धी कुछ आभास प्राप्त कर सकता है?

21 अक्टूबर 1966 की एक घटना है कि ब्रिटेन के एवरफन गाँव में पहाड़ी पर स्थित कोल माइन्स के धसक जाने से उसके नीचे बना हुआ एक स्कूल पूरी तरह दब गया। वर्षा लगातार बहुत भयानक रूप से होती रही। इसलिए ऐसा उपाय न बन पड़ा कि स्कूल की इमारत खोदी जा सकती और उसमें दबे हुए 140 बच्चे निकाले जा सकते। वर्षा रुकी तब दबी हुई लाशें निकाली जा सकीं।

इस घटना की सूचना बच्चों के अभिभावकों को ही नहीं दूरस्थ सम्बन्धियों को भी स्वप्न के माध्यम से मिल गई थी। लाशें निकलने से पूर्व ही उन सभी को दुर्घटना सूचक स्वप्न दीख चुके थे।

न्यूयार्क के थामस कैसस नामक व्यक्ति ने स्वप्न देखा कि एक वायुयान दुर्घटनाग्रस्त हो रहा है उसका नम्बर 1290 है। तीन महीने बाद सचमुच ही वह दुर्घटना घटित हुई और उसमें 80 व्यक्ति मर गये।

अमेरिका के एक करोड़पति चार्ल्सलिण्डन वर्ग के बच्चे का डाकुओं ने अपहरण किया। वह कहाँ है उसका पता हार्वर्ड विश्व विद्यालय के दो स्वप्न विज्ञानी शोधकर्ताओं ने लगाने का प्रयत्न किया और वे यह बताने में समर्थ हुए कि लाश किस स्थिति में कहाँ पड़ी है?

सन् 1955 में ब्रिटिश वायु सेनाध्यक्ष विक्टर गोगार्ड ने स्वप्न देखा कि उनका छोटा वायुयान दुर्घटनाग्रस्त हुआ किन्तु उसके सातों सवार बचा लिए गए। स्वप्न की आधी बात इस प्रकार सच हुई कि संघाई से टोकियो जाता हुआ एक छोटा जहाज चौथे दिन दुर्घटनाग्रस्त हुआ पर सभी यात्री बच गये।

अंग्रेजों के हाथ टीपू सुल्तान की एक डायरी लगी जिसमें स्वप्न में मिले एक आदेश का वर्णन था कि वह आक्रमण का चक्रव्यूह इस तरह बनाए। उसने उसी योजना के अनुसार सफल आक्रमण किया था।

मार्टी नीम्यू निवासी प्राउण्ट वेली को एक विस्फोट की पूर्व सूचना मिली थी। उसने उसकी जानकारी लोगों को भी दुर्घटना के पूर्व दे दी थी। उस दुर्घटना में 4000 व्यक्ति मारे गये थे। फ्री वर्ग विश्व विद्यालय के परा मनोविज्ञानी डा. हेन्स वेन्डर को द्वितीय विश्वयुद्ध में घटित होने वाले घटनाक्रम का पूर्वाभास हुआ था वे घटनाएँ ठीक उसी क्रम में घटित हुईं। एक फिल्म अभिनेत्री क्रिस्टराइन मीलियस ने अपने 200 स्वप्नों का विवरण भेजा जो उसके निजी जीवन से तथा अन्यान्यों से सम्बन्धित थे उनमें से प्रायः आधे स्वप्न सत्य हुए।

‘गेस्टाल्ट साइकोलाजी’ ग्रन्थ में मानसिक संरचना और उनमें स्वप्नों की भूमिका के सम्बन्ध में विस्तृत विज्ञान पर प्रकाश डाला है और लिखा है कि सच होने वाले स्वप्न उत्तेजना भरे होते हैं और सामान्य स्वप्न ऐसे ही हँसी मजाक जैसे निरर्थक लगते हैं। उस ग्रन्थ में इस पर भी प्रकाश डाला है कि शरीर अपनी वर्तमान तथा भावी बीमारियों सम्बन्धी विवरण भी प्रकट करता है और कभी-कभी स्वयं ही आभास होता है कि निवारण के लिए क्या उपचार करना चाहिए।

अचेतन मन की कितनी ही परतों का ‘गेस्टाल्ट थ्योरी’ में विवेचन है। स्वप्न किस परत से उठ रहे हैं इसका पता सर्वसाधारण को अनायास ही नहीं लगता पर अभ्यास से उस जानकारी का पता लग सकता है।

सेन्ट विल्सन अस्पताल (यू. के.) के डा. ग्लैडिका को मरणासन्न रोगियों में बहुत दिलचस्पी रही है। वे उनके वार्तालाप करके इस सम्भावना का पता लगाते रहे हैं कि किस रोगी की मृत्यु का समय कब हो सकता है। वे लिखते हैं कि अधिकाँश रोगी सूर्योदय से पूर्व प्रभात काल में अथवा रात्रि को जब गहरी नींद सोने का समय होता है, तब मरते हैं। उनने ऐसे भी कुछ रोगियों का वर्णन किया है जो पहली जाँच पड़ताल में मृतक घोषित कर दिए गए थे पर वस्तुतः उनका मस्तिष्क गहरी निद्रा में चला गया था। वह नींद जैसे ही हटी वे जीवित हो उठे।

“दि बुक ऑफ ड्रीम्स” में ऐसे कितने ही रोगियों का विवरण है जो डॉक्टरों की राय के विपरीत अपने रोग का नाम और कारण भिन्न बताते रहे। गहरी जाँच पड़ताल करने, निद्रा की स्थिति में ले जाने पर रोगी का कथन सही निकला। इसी प्रकार चिकित्सा के परामर्श में डॉक्टर जो दवा दे रहे थे उसकी अपेक्षा रोगी की सलाह लेकर जो परिवर्तन किया गया वह ठीक निकला और उस आधार पर मरीज अच्छा हो गया।

यहूदी कथा पुराणों में ऐसे विवरण भी मिलते हैं जिनमें स्वप्नों के माध्यम से किन्हीं व्यक्तियों को अपने पूर्व जन्मों का विवरण ज्ञात हुआ है और जाँच पड़ताल करने पर ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे यह जाना जा सका कि वह व्यक्ति पूर्व जन्म में वही था जिसकी कि स्वप्न में जानकारी मिली थी।

हिन्दू कथा पुराणों में भी ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख है जिसमें भविष्य की ऐसी सम्भावनाओं का वर्णन है जिनके सही होने की उस समय कोई सम्भावना नहीं थी। पर समय बीतने पर अचानक परिस्थितियाँ बदली और वैसी सम्भावनाएँ बन पड़ीं जिसकी इससे पूर्व किसी को आशा नहीं थी।

कइयों ने अच्छी खासी स्थिति में बिना किसी भयंकर बीमारी के अपने मरण का समय बताया और वह समय आने से पूर्व ही ऐसी व्यवस्थाएँ बना दीं मानों वे सचमुच ही मरने जा रहे हों। समय आया और उनका कथन सही सिद्ध हुआ। इसी प्रकार कई लोगों की स्वप्न के आधार पर दूसरों के सम्बन्ध में की हुई भविष्यवाणियाँ सही सिद्ध हुई हैं। लोगों ने उन कथनों का आश्चर्य इसलिए माना है कि इससे पहले ऐसी कोई सम्भावना या आशंका नहीं थी जैसी कि देखे गये स्वप्न के आधार पर प्रकट की गई थी।

कदाचित् कभी किसी के स्वप्न अनायास भी सही सिद्ध होते हैं पर वस्तुतः यह मनोयोग की एक विद्या है जिसके आधार पर भविष्य की सम्भावनाओं को जानने का अभ्यास किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सभी स्वप्न सार्थक ही होते हैं। अनेकों व्यक्तियों के अनगढ़ स्वप्न आमतौर से निरर्थक ही होते हैं। उनका कोई महत्व नहीं होता। फिर भी इनसे अचेतन की गहन परतों की एक जानकारी तो मिलती है।


उपयुक्त रंग चुनिये, मनोविकारों से बचिये

प्रकृति का सौंदर्य रंगों की विविधता के कारण ही है। रंगों का सम्पुट लगने पर साधारण वस्तुएँ भी आकर्षक, सुन्दर लगने लगती हैं। मनुष्य ने सम्भवतः इसी कारण कृत्रिम शृंगार साधनों के निमित्त प्रकृति से रंगों की निधि उधार में ली और सज्जा के निमित्त उसे प्रयुक्त किया। किन्तु यह पक्ष अभी भी बहुत व्यक्तियों को ज्ञात नहीं कि रंगों का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। यदि यह जानकारी उपलब्ध हो सके कि कौन सी ऋतु में, किस स्वभाव के व्यक्ति के लिये कौन-सा रंग उचित रहेगा, तो उससे सर्वसाधारण को वाँछित वर्ण चुनकर लाभान्वित होने का अवसर भी मिलेगा एवं अवाँछनीयता से होने वाली हानि से वे बच भी सकेंगे।

सबसे पहले एक जिज्ञासा का समाधान कौन? रंग वस्तुतः है क्या? भौतिकी दृष्टि से देखा जाय तो उन्हें हम कैसे निरूपित करेंगे? आधुनिक भौतिकी के अनुसार रंगों का यह सारा खेल इलेक्ट्रानों और विकिरणों की तरंगों की न्यूनाधिक लम्बाई के कारण उपजता है। प्रत्येक परमाणु को नाभिक के बाहर चक्कर लगाते इलेक्ट्रान विशिष्ट लम्बाई की रेडियो तरंगों को सोखने की क्षमता रखते हैं। ये बाहरी इलेक्ट्रान स्थिति विशेष में उत्तेजित हो उठते हैं एवं बाहरी कक्षाओं में कूद जाते हैं। ये स्थितियाँ तब उत्पन्न होती हैं जब वे पराबैंगनी प्रकाश किरणों को अवशोषित करते हैं। यह उत्तेजना की स्थिति थोड़ी देर बनी रहती है, वापस सामान्य स्थिति होती रहती है। इस मध्यावधि में परिवर्तन प्रक्रिया से एक निश्चित तरंग लम्बाई के फोटोन कण उत्सर्जित होते हैं। इस प्रकार के उत्सर्जित विकिरण की तरंग लम्बाई ही सात रंगों में से किसी एक रंग का निर्धारण करती है जिन्हें मस्तिष्क का विजुअल कार्टेक्स पहचानता व मस्तिष्क को यह बताता है कि यह कौन-सा रंग है।

सूर्य की किरणें सात रंगों की बनी होती हैं। सफेद रंग इन सबका सम्मिश्रित रूप है। प्रकृति जगत रंगों की विविधता से भरा-पूरा है, इतनी विविध कि मानवी कल्पना उसकी थाह नहीं पा सकती। इन रंगों को संश्लेषित करना भी मनुष्य के लिये सम्भव नहीं। होली में प्रयुक्त गुलाल भी वस्तुतः पौधों से ही निकला है।

सौर किरणों एवं प्रकृति में विद्यमान रंगों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का मत है कि भिन्न-भिन्न रंग व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति के आधार पर अनुकूल एवं प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। रंगों को अवसर विशेष के अनुरूप किस प्रकार चुना जाय इसका आधार उनसे उत्पन्न संवेदन प्रतिक्रिया ही है। प्रकृति के अनुरूप रंगों के प्रति आकर्षण-विकर्षण होता है। किसी को लाल रंग के कपड़े पहनने से चक्कर आने लगता है तो किसी को काले कपड़े पहनते ही मानसिक अवसाद आ घेरता है। मनश्चिकित्सक इस प्रतिक्रिया के आधार पर उन्हें उपयुक्त सुझाव देते हैं। यू. सी. एल. ए. के डा. हॉस का कथन है कि प्रयोगों से पता चला है कि प्रमादी अल्प मन्दता ग्रस्त विद्यार्थियों के कमरों में लाल रंग पुतवा देने व उसी ढंग के पर्दे लगा देने से उनकी कार्यक्षमता भी बढ़ी व उनमें स्फूर्ति-उत्साह के साथ-साथ उनका आय. क्यू भी बढ़ता देखा गया। चपल, आतुर प्रकृति के विद्यार्थियों पर इसी प्रकार उन्होंने नीले रंग का प्रयोग किया। इससे शामक प्रतिक्रिया हुई व उनकी चंचलता, तनाव में कमी आयी। सामान्य प्रकृति के, मनोविकार ग्रन्थि रहित व्यक्तियों में हल्का पीला- बसंती रंग प्रयुक्त करने पर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पायी गयी।

वैज्ञानिक डा. अलबर्ट कॉहन (स्टैन फोर्ड रिसर्च सेण्टर) का मत है कि कई मनोविकार ग्रस्त, तनाव पीड़ित बेचैन व्यक्तियों का उपचार मात्र उनके आसपास के रंगों को बदलकर किया जा सकता है। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि भली-भाँति मनोविश्लेषण कर यदि सही रंग सबको पहले से ही सुझा दिये जायें तो अनेकों मनोरोगों को टाला जा सकता है।

रंगों के आधार पर मनोविज्ञान परक विश्लेषण कैसे सम्भव है, इसे लक्ष्य बनाते हुए पश्चिम जर्मनी के मनःचिकित्सक डा. मैक्सल्यूशर ने व्यक्तित्व विश्लेषण की एक पद्धति विकसित की है जिसमें कुल आठ रंगों में से व्यक्ति को अपनी पसन्दगी-नापसन्दगी के अनुसार रंग चुनने होते हैं। ये आठ रंग हैं- जामुनी, नीला, हरा, लाल, पीला, कत्थई, भूरा और काला। डा. ल्यूशर के अनुसार नीला रंग शान्तिपूर्ण सात्विक प्रभाव डालने के कारण शान्त सौम्य सतोगुणी व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। हरा रंग सक्रियता, काम के प्रति गहरी आसक्ति और गतिशीलता का द्योतक है। ऐसे व्यक्ति जो हरा रंग पसन्द करते हैं, जीवन में खतरा मोल लेकर कार्य करते हैं व कर्मठता के बलबूते ऊँचे उठते चले जाते हैं। इसी प्रकार लाल रंग स्फूर्ति और आवेश का प्रतीक है। ऐसे व्यक्ति उत्साही तो होते हैं, किन्तु बहुत शीघ्र आवेशग्रस्त हो जाते हैं। पीला रंग प्रफुल्लता, हल्की-फुल्की मस्ती भरी जिन्दगी का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे व्यक्ति अल्हड़ काम में रस लेने वाले किन्तु कभी चिन्तित न होने वाली प्रकृति के होते हैं।

जामुनी रंग मानसिक अपरिपक्वता, कच्चेपन एवं बचकानेपन का द्योतक है। जबकि कत्थई रंग इन्द्रिय लिप्सा, भोगों में रुचि व असंयम का प्रतीक है। भूरा रंग, तटस्थता और निरपेक्ष भाव का परिचायक है जबकि काले रंग को पसन्द करने वाले अधिकाँश व्यक्ति निषेधात्मक चिन्तन के होते हैं। जैसे ही उनकी बाह्य परिस्थितियों से इस रंग के प्रभाव को हटा दिया जाता है, उनमें विधेयात्मक वृत्ति उभरने लगती है।

डा. ल्यूशर सामान्य व्यक्तियों एवं असामान्य मनोविकारग्रस्त रोगियों से अपनी पसन्द के रंग चुनने को कहते हैं। प्राथमिक चुनाव के आधार पर उस रंग के प्रति संवेदनशीलता का परिचय मिलता है। उसके साथ चुना गया द्वितीय वरीयता का रंग उसकी पसन्दगी- मनोवृत्ति को स्पष्ट कर देता है। नापसन्दगी अर्थात् इस क्रम में रखे गए अन्तिम वर्ण इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि उस व्यक्ति को किन-किन वृत्तियों से परहेज है।

पाश्चात्य जगत में रंग विज्ञान के मनोवैज्ञानिक पक्ष के प्रति रुचि जागी तो है, पर है वह मूलतः मनुष्य की अन्तःवृत्ति पर आधारित। जुंग, एडलर एवं मैस्लो जैसे मनोवैज्ञानिकों ने उपरोक्त परीक्षण के प्रति सन्देह व्यक्त किया था क्योंकि यह निर्णय मस्तिष्क की उथली परतों द्वारा लिया गया होता है। विशेषकर जुंग इस विषय में पूर्ववर्ती मनोविज्ञान के प्रति संकेत करते हुए कहते हैं कि देवी-देवताओं, पंच तत्वों के प्रतीक एवं सूर्योपासना, अग्नि आराधना के पीछे मूलतः वर्ण विज्ञान के सिद्धान्त हैं। मानव मूलतः श्रेष्ठ वृत्तियों वाला है तथा वह उन्हीं को उत्तेजना देने वाले आयामों को बहिरंग में ढूंढ़ता है। आधुनिक तड़क-भड़क में श्रेष्ठता को बढ़ावा देने वाले पक्ष तो गुम हो गए हैं एवं “वीजुअल पॉल्युशन” को जन्म देने वाले चटकीले उत्तेजक तत्व बहिरंग में प्रचुरता में हैं। इन्हीं के कारण चिन्तन को निषेधात्मक फटकार मिलती रहती है। सतत् ऐसे पोषण से तनाव, बेचैनी का होना स्वाभाविक है।

वर्णों के आधार पर चिकित्सा की पद्धति भारत में प्राचीनकाल से ही प्रचलित रही है। योग साधना में भी सूर्योपासना एवं रंग चिकित्सा की अनेकों विधाओं का उपयोग साधक की मनःस्थिति को दृष्टिगत रख समर्थ मार्गदर्शकों द्वारा किया जाता रहा है। यह प्रभाव उथली संवेदनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर आध्यात्मिक विकास में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने लगता है।

ध्यान साधना में भारतीय दर्शन के प्रवक्ताओं द्वारा भिन्न-भिन्न रंग सम्वेदनाओं का प्रयोग किया जाता रहा है। इन प्रभावों को आज भी भली-भांति समझकर उनका लाभ उठाया जा सकना सम्भव है। रंगों के प्रभाव से स्वयं रंग जाने के स्थान पर उनका इच्छानुकूल और मनःस्थिति के अनुरूप प्रयोग करना ही औचित्यपूर्ण है, इसमें कोई सन्देह नहीं। क्यों न हम उचित वर्ण चुनकर उनसे समुचित लाभ उठाए एवं न केवल दैनंदिन जीवन में, अपितु आत्मिक जीवन में भी प्रगति-पथ पर बढ़ने हेतु उनका सदुपयोग करें?


धरती की टोह लेने वाली ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ

अब यह एक कपोल कल्पना मात्र नहीं रही कि मानव का उद्भव इस धरित्री पर नहीं हुआ अपितु जीव जगत की यह विशिष्ट सत्ता परोक्ष जगत अवस्थित किसी अन्य लोक से यहाँ आई है। जैव विकास सम्बन्धी अनुसंधानों से ये पूर्वाग्रह मिटते जा रहे हैं क्योंकि अनेकानेक ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे शोधकर्ताओं के इस दावे को बल मिलता है कि अन्यान्य ग्रहों में भी जीवन है। सम्भव है मनुष्य का आगमन ऐसे ही किसी ग्रह से यहाँ हुआ हो एवं यहाँ उसने सभ्यता का विस्तार कर यह दुनिया विनिर्मित कर ली हो। प्रख्यात लेखक एरिक वॉन डैनिकेन ने जो पुरातत्वविद् भी हैं, अपना सारा जीवन ही इस मान्यता को दृढ़ बनाने के निमित्त खपा दिया कि मानव देवपुत्र है। उनका कथन है कि बहुत समय पूर्व किसी अति विकसित अन्तरिक्षीय ग्रह गोलक से देवमानव पृथ्वी पर आए और अपनी विकसित तकनीक द्वारा उन्होंने पृथ्वी को रहने योग्य बनाया। “चेरिअट्स आफ गॉड्स,” “गॉडस् ऑफ गॉड्स”, “इन सर्च ऑफ दी एन्शीएण्ट गॉड्स” जैसी बेस्ट सेलर पुस्तकों के सृजेता इस जर्मन मनीषी का मत है पृथ्वी से इतर अन्यान्य ग्रहों में निश्चित ही कोई अति विकसित सभ्यता निवास करती है। अपने कथन की पुष्टि हेतु उन्होंने वैदिक विज्ञान की विकसित तकनीक का इतिहास, आर्यों का पृथ्वी पर अवतरण तथा तात्कालीन सतयुगी परिस्थितियों का भी वेदों के माध्यम से हवाला दिया है।

साइन्स डाइजेस्ट (जुलाई 82) में प्रकाशित एक शोध प्रबन्ध में डा. नेल्सन विगनर ने यह प्रामाणित करने की कोशिश की है कि भले ही पृथ्वी स्थित वैज्ञानिक इस विराट् अन्तरिक्ष में सभ्य विकसित ग्रहों द्वारा सम्प्रेषित सन्देशों को “डिकोड” कर पाने (मूल अर्थ समझ पाने) में सफल न हो पाए हों, अन्तरिक्ष में जीवन अवश्य है। इसके लिए उन्होंने आज से बीस वर्ष पूर्व सुझाव दिया था कि हमारे वैज्ञानिकों को भी प्रकाश से अधिक सम्प्रेषण गति वाले सन्देश भेजना चाहिए। यूफॉलॉजी में रुचि रखने वाले डा. मिल्टन बेर्ली जो खगोल भौतिकीविद् हैं, इस सुझाव से सहमत हुए व उन्होंने 1966 में रेडियो तरंगों द्वारा सम्प्रेषण कार्य आरम्भ कर दिया। डा. नेल्सन का मत है कि गत 6 वर्षों में राडार पर देखी जाने वाली उड़न तश्तरियों की संख्या, में तथा बाहर से आने वाले रेडियो संकेतों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। उनके अनुसार सम्भवतः ये घटनाक्रम उन सन्देशों के प्रत्युत्तर में है जो यहाँ से भेजे गए थे। अब तक बीस से भी अधिक तारों, जिन पर जीवन होने की सम्भावना वैज्ञानिकों को प्रतीत होती है, तथा पृथ्वी से भेजे सन्देश पहुँच चुके हैं। यह परिकल्पना सत्य प्रतीत होती है कि अन्यान्य ग्रह वासी उत्सुकता वश खोज खबर लेने अपने सन्देश ही नहीं, सन्देश वाहक भी भेज रहे हैं ताकि पृथ्वी वासियों से संपर्क शृंखला जारी रहे। पारस्परिक आदान-प्रदान की उनकी अभिरुचि को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि न केवल राडार पर उन्हें देखा गया अपितु मनुष्यों पर भी उन्होंने घात लगायी है। कई ऐसे घटनाक्रम प्रकाश में आए हैं जिनमें कुछ व्यक्ति या समूहों द्वारा उन्हें प्रत्यक्ष आँखों से देखा गया है।

23 अगस्त 1983 को स्टाक होम से प्रकाशित “ऑकलैण्ड स्टार” नामक पत्र में स्वीडन के कैप्टन लेनर्ट बर्ग स्टोर्म की उड़न तश्तरी सम्बन्धी एक आँखों देखी घटना प्रकाशित हुई थी। उन्होंने 17 दिसम्बर 1982 की सन्ध्या 5 बजे एक विचित्र दृश्य देखा। पृथ्वी की ओर गतिशील एक चपटा सा यान तेज चमचमाते प्रकाश के साथ उनके सामने से गुजरा व लगभग 3 किलोमीटर दूर जंगल में जाकर रुक गया। प्रारम्भ में उन्होंने इसे मिलिटरी ट्रांसपोर्ट हैलिकाप्टर समझा। किन्तु ध्वनि रहित इस यान को देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। जब इसमें से दो छोटे-छोटे यान निकलकर उनके समीप से गुजरे व कुछ दूर जाकर रुक गए। थोड़ी देर वहीं रहकर दोनों यान मूल यान से जुड़कर दूर आकाश में उड़ गए। कैप्टन का कहना है कि “मेरी आंखें 25 वर्ष का सेना का अनुभव होने के कारण धोखा नहीं खा सकती। यह स्पष्टतः दूरस्थ आकाशगंगा से आयी हुई एक उड़न तश्तरी है जो सम्भवतः जीवन के चिन्ह तलाशने यहाँ आई थी।”

अन्यान्य वैज्ञानिक जो पृथ्वी से इतर जीवन में दिलचस्पी रखते हैं अपना मत व्यक्त करते हुए कहते हैं कि पृथ्वी पर गिरे उल्का पिण्डों का विश्लेषण करने पर अन्यत्र जीवन की सम्भावना प्रबल प्रतीत होती है। डा. कैल्विन तथा उनके सहयोगियों ने उल्का पिण्डों में ऐसे फॉसिल्स (जीवाष्मों) तथा न्यूकलीयर अम्लों को पाया है जो पार्थिव जीवन के अंश नहीं हो सकते। यह एक संयोग ही है कि जहाँ-जहाँ उड़न तश्तरियाँ पायी गयी हैं, उस स्थान से लिये गए नमूनों का विश्लेषण करने पर रेडियो धर्मिता के साथ-साथ न्यूक्लियर अम्लों को प्राचुर्य भी पाया गया है।

अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) संस्था ने पृथ्वी से इतर सभ्यता की खोज की दिशा में काफी कदम उठाए हैं। यूफॉलाजी नामक एक विद्या ही इस क्षेत्र में विकसित हो गयी है। यहाँ कार्यरत एक वैज्ञानिक का कथन है कि पृथ्वी पर कहीं कालपात्र के छिपे होने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। इससे पुरातन सभ्यता के रहस्यों को उजागर कर पाना भी सम्भव हो सकेगा। सम्भवतः इस काल पात्र की खोज में ही ये अन्तरिक्ष यान आते हैं। चूँकि अधिकतम उड़न तश्तरियाँ इंग्लैण्ड के पश्चिमी तट, अमेरिका के पूर्वी किनारे एवं मध्य पूर्व एशिया में देखी गयी हैं, प्रतीत होता है कि अपनी विकसित तकनीक के बलबूते उन्होंने यह जान लिया है कि यह कालपात्र कहाँ छिपा है?

पिछले दिनों स्टेन फोर्ड यूनिवर्सिटी एवं नासा के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कम्प्यूटराइज्ड यन्त्र बनाया है जो एक बड़ी रेडियो फ्रीक्वेंसी को स्कैन कर सकता है। इस मल्टीचैनल इलेक्ट्रानिक स्कैन से अन्य ग्रहों से प्रसारित सन्देशों को पकड़ सकने में मदद मिल सकेगी। एक करोड़ चैनल वाले इस उपकरण को रेडियो स्पेक्ट्रम वर्तमान एक हर्ट्ज से एक हजार गुना से भी कम है। इतने प्रयास चलने पर भी उड़न तश्तरियों के आने व संकेतों के प्रसारण का क्रम जारी है। अभी तक यह ज्ञात नहीं हो पाया है कि कौन सा या कौन से ग्रह ये विशिष्ट यान पृथ्वी पर भेज रहे हैं।

नासा के वैज्ञानिक कुतुबमीनार व यहाँ की लाट, पेरु की प्रसिद्ध नाज्का लाइन तथा मिश्र के पिरामिडों को पुरातन काल के वैज्ञानिकों द्वारा प्रयुक्त अंतर्ग्रहीय सभ्यता से आदान-प्रदान का माध्यम मानते हैं। इन तीनों के ही रहस्यों को अभी सुलझाया नहीं जा सका है। उड़न तश्तरियाँ अभी ही आती हों, ऐसी बात नहीं। पहले भी आती रही होंगी व आदान-प्रदान का क्रम चलता रहता होगा। कहीं-कहीं ये आरोप लगाया गया है कि ये मानव विनिर्मित हैं। इसके प्रत्युत्तर में ‘नासा’ के वैज्ञानिक कहते हैं कि इन्हें सामान्य पृथ्वी वासियों ने ही नहीं, एरोनॉटिक्स के ऐसे विशेषज्ञों ने देखा है जो कभी धोखा नहीं खा सकते। इनका एकदम स्थिर हो जाना, कभी-कभी गोल घूमना, फिर घूमकर अदृश्य हो जाना, राडार की चैनल्स को ब्लॉक कर देना यह बताता है कि ये कदापि मानव विनिर्मित नहीं हैं। सेटी (सर्च फॉर एक्सट्राटेरेस्ट्रियल इन्टेलीजेन्स) के निदेशक जान बगिंघम का कहना है कि प्रबुद्ध जीवन समग्र अन्तरिक्ष में फैला पड़ा है एवं अन्यान्य ग्रहों से सतत् पृथ्वी की निगरानी की जा रही है।

किसी अपरिचित स्थान पर वहाँ की भाषा न जानने वाला जा पहुँचे तो सकपकाना स्वाभाविक है। ऐसी ही कुछ स्थिति सम्भवतः ग्रहों से आने वाले यानों की हुई है, जो कुछ व्यक्त तो करना चाहते हैं पर संपर्क माध्यम के अभाव में न कह सकने पर अपनी कौतुक लीला दिखाकर वापस लौट जाते हैं। इसे मात्र प्रकृति की लीला, उल्कापात, अदृश्य किरणों का दृश्य रूपांतरण मात्रा कहकर नहीं टाला जा सकता। घटना क्रमों की समीक्षा करने पर लगता है कि कहीं न कहीं कोई विधिवत् योजना इसके मूल में निहित होनी चाहिए।

इंग्लैण्ड की ज्योतिर्विज्ञान विद्या के निदेशक सर बर्नार्ड पावेल, जो रेडियो, टेलिस्कोप से निरन्तर किसी भूले भटके अंतरिक्षीय यान की टोह लगाते रहते हैं, का कहना है कि मात्र हमारी आकाश गंगा में लगभग पाँच प्रतिशत तारे ऐसे हैं जिन पर जीवन की सम्भावना है। ब्रह्माण्ड तो अत्यन्त विराट् है। पूरे ब्रह्माण्ड में हमारा सौर परिवार तो एक जुगनू के समान है। हमारी आकाश गंगा जैसी नौ खरब आकाश गंगायें और भी हैं जिनकी हमें कोई जानकारी नहीं। यदि हम इतना भर मान लें कि आकाश गंगा के पाँच नहीं, एक प्रतिशत में जीवन है तो 100 अरब तारों में से 1 अरब तारों के ग्रहों पर जीवन की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। अन्यान्य आकाश गंगाओं की बात सोची जाय तो दिमाग चकरा ही जाएगा।

किन्तु मानवी प्रयास जारी हैं। अन्यान्य ग्रहों पर जीवन के प्रमाण स्वरूप प्रकट होने वाले यानों से उन्होंने काफी निष्कर्ष निकाले हैं। अब तक लगभग 1600 से भी अधिक ऐसी घटनाओं की जानकारी मिली है जिनसे अन्यान्य ग्रहों पर जीवन का अस्तित्व सिद्ध होता है। आने वाले इन अन्तरिक्षीय यानों से किसी प्रकार की हानि मानव जाति को पहुँची हो, ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। दूसरे “पृथ्वी पर जीवन कैसे आया’, इस गुत्थी को सुलझाने में वैज्ञानिकों को काफी मदद मिली है। “इकैरस” नामक जापानी पत्रिका में प्रकाशित हिरोमित्सू योकू एवं तैरो ओशिमा नामक दो वैज्ञानिकों ने लिखा है कि “बैक्टीरियोफाज एक्स 174 डी. एन. ए.” अन्तरिक्षीय सभ्यता का सन्देश वाहक है एवं यह भूमण्डल पर पाया जाता है, इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पृथ्वी में जीवन का उद्भव अन्तरिक्ष से आयी विकसित सभ्यता द्वारा हुआ है। इन कणों के परीक्षण से ज्ञात होता है कि जटिल कार्बनिक अणु मानवेत्तर ग्रहों से यहाँ आए हैं, साथ ही जीवन भी।

जीवन के अस्तित्व का एक प्रधान प्रमाण है डी. एन. ए. का पाया जाना। जीव संरचना के इस मूल आधार के अन्तरिक्ष में होने, प्रमाण मिलने, उड़न तश्तरियों के आते-जाते रहने तथा उन स्थानों पर जहाँ वे ठहरी हों- डी. एन. ए. के कार्बनिक अणु व रेडियो धर्मी विकिरण के पाये जाने से अन्यान्य ग्रहों पर जीवन के प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते हैं। डा. नार्लीकर जो एस्ट्रोफिजिक्स के जाने माने विद्वान हैं, लिखते हैं कि “अति मानवी सभ्यता को मानवी चिन्तन के ज्ञात आयामों से परे जाकर ढूँढ़ना देखना होगा। उनके अनुसार जिस प्रकार हम चिड़िया घर के पशु पक्षियों पर निगाह रखते हैं, ठीक उसी प्रकार अन्य ग्रहों के जीव पर हम अपनी निगाह जमाए हुए हैं। उनका इरादा पृथ्वी पर हमला बोलने का नहीं लगता। ये तो पृथ्वी वासी ही हैं जो आपसी टकराव हेतु आयुधों का भण्डार जमा किए बैठे हैं।

हमें अन्तरिक्षीय सभ्यता के विषय में सोचना भी चाहिए तो न केवल तकनीकी दृष्टि से, वरन् चिन्तन भावना की दृष्टि से भी सुविकसित देवमानवों के विषय में धारणा बनानी चाहिए। पुरातन काल में जैसे मनुष्य इस पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, वैसे ही विकसित सभ्यता के सन्देशवाहक ये दूत भी टोह लगाने, संपर्क माध्यम बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इनसे भयभीत होने के स्थान पर हम स्वयं को देवोपम बनाने का प्रयास करें ताकि विकसित तकनीकी के बलबूते आगे कभी संपर्क बनाने- उनकी भाषा समझ पाने का पुरुषार्थ सफल हो सके तो वे हमें उस स्थिति से श्रेष्ठ ही पायें जिस स्थिति में करोड़ों वर्ष पूर्व हमें पृथ्वी पर छोड़ गए थे।


ईरान और तुर्की (kahani)

ईरान और तुर्की में लम्बी लड़ाई चली। असंख्यों हताहत हुए। इसी बीच किसी तरह सन्त फरीरुद्दीन तुर्कों के हाथ पड़ गये। उन पर जासूसी का इल्जाम लगाया गया और फाँसी की सजा सुना दी गई। सन्त उन दिनों अत्यधिक लोकप्रिय थे। जन-जन उन्हें प्यार करता था। बचाने के लिए कई उपाय किये गये। धनिकों ने कहा- हम उनके बराबर सोना दे देंगे। सन्त को छोड़ दिया जाय। इस पर भी तुर्क तैयार न थे। वे उन्हें मारने पर उतारू थे।

अन्त में ईरान के बादशाह ने सन्त को छुड़ाने के बदले अपना सारा राज्य तुर्कों को देने का प्रस्ताव रखा। सन्त की गरिमा काम कर गई। लड़ाई बन्द हो गई और सन्त भी वापस लौट आए।


सर्पों में अधिकाँश भले होते हैं।

सर्प को सब लोग काल रज्जु के नाम से जानते हैं। चलती-फिरती मौत दीखता है। साँप को देखते ही होश उड़ जाते हैं। हक्का-बक्का हुआ आदमी भी साँप को एक प्रत्यक्ष संकट दीखता है। दोनों के बीच में भय की भयंकरता आ खड़ी होती है। इस भयंकरता के दबाव में ही कितने ही अपने प्राण खो बैठते हैं। कुछ सर्प दंशन से मरते हैं और कुछ आशंका कुकल्पना के शिकार बनकर अपनी धड़कन बन्द कर लेते हैं। हाथ-पैर सुन्न होते देर नहीं लगती।

संसार में छह इंच से लेकर 15 गज तक के चित्र-विचित्र साँप पाये जाते हैं। इनमें से सिर्फ 15 प्रतिशत जहरीले होते हैं। बाकी तो रस्सी का खिलौना जैसे कीड़े-मकोड़े जैसे प्रकृति के प्राणी मात्र होते हैं।

साँप के काटने से संसार भर के वर्ष भर में पन्द्रह इलाज आदमी मरते हैं। किन्तु आदमी एक साल में 50 हजार साँप मार डालता है। 15 हजार जहरीलों में से भी कितने काटने के लिए कुसूरमन्द थे, यह नहीं कहा जा सकता। साँप बेकसूरों को काटता है यह कहना बहुत अंशों में सही है। पर यह कथन और भी अधिक सत्य है कि अधिकाँश बेकसूर साँप डरे हुए आदमियों द्वारा मारे जाते हैं।

साँप शिकार को निगलता है। चबाने लायक उसके दाँत नहीं होते। छोटे साँप एक बार का निगला हुआ एक सप्ताह में पचा पाते हैं। बड़े साँप भी हिरन या बकरी जैसे बड़े शिकार पकड़ लेते हैं पाँच महीने में पचा जाते हैं। बाकी दिन वे ऐसे ही लोट-पोट करने में गुजारते हैं। कोबरा जैसे जहरीले और क्रोधी साँप भी तब हमला बोलते हैं, जब सामने से किसी छेड़छाड़ का खतरा देखते हैं। औसत साँप एक घण्टे में दो तीन मील की चाल से दौड़ सकता है। यदि होश हवाश दुरुस्त हो तो कोई भी दौड़ में उसे पीछे छोड़ सकता है। उसकी डरावनी सूरत अथवा काल रज्जु की मान्यता ही ऐसी है जो डरे हुए आदमी को खड़ा कर देती है ताकि वह मजे में उसे काटकर भाग जाय।

बुरे साँपों की अपेक्षा भले साँप अपेक्षाकृत अनेक गुने अधिक होते हैं। दक्षिण अमेरिका के रैड इण्डियनों का साल में एक दिन सर्प पर्व होता है। वे जहाँ भी साँपों का निवास समझते हैं वहाँ चावल लेकर निमन्त्रण देने जाते हैं। पत्थर की एक छोटी गद्दी उनका पूजा स्थान है। पर्व के दिन सैकड़ों सर्प उस पत्थर के आस-पास जमा हो जाते हैं। उन्हें रैड इण्डियन हाथ से पकड़कर बाहर निकालते हैं और मक्का के दाने से बनी हुई खीर खिलाते हैं। दिन भर यह क्रम चलता है। इस अविश्वसनीय दृश्य को देखने के लिए उस क्षेत्र के गोरे अपने ट्रकों और मोटर गाड़ियों में बैठ कर आते हैं। दिन भर दृश्य देखकर शाम को लौटते हैं। तब साँप भी विदा हो जाते हैं। दूसरे दिन ढूंढ़ने पर भी एक नहीं मिलता। यह पर्व सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है पर आज तक एक भी दुर्घटना नहीं हुई।

ग्रीक द्वीप सीफालोनिया में मार्कोपोलों एवं अर्जीनिया नामक गाँव के समीपस्थ होली स्नेक गिरजे में 6 अगस्त की निश्चित तिथि को, जो वर्जिन मेटी का दिन है बिना बुलाये ही सैकड़ों सर्प मरियम के चित्र का दर्शन करने आते हैं और 15 अगस्त, जो ईसामसीह का दिन है, तक वहाँ रहते हैं। मूर्ति के चरणों पर लौटते रहते हैं। दर्शकों में से कितने ही वहाँ आयें, वे उनमें से किसी की ओर ध्यान नहीं देते।

इस आश्चर्य पर उस देश में भी अविश्वास करने वाले कम नहीं हैं। इसलिए कुछ पूर्व इस दृश्य की एक फिल्म बनाई गई है, ताकि 10 दिवसीय इस आश्चर्यजनक दृश्य को अविश्वासी लोग भी देख सकें।

भारत में नाग पंचमी सर्दी का त्यौहार है। शेष नाग के फन पर पृथ्वी रखी हुई है, ऐसी मान्यता है। उस दिन सर्प का दर्शन शुभ माना जाता है। कहते हैं कि नाग पंचमी को कोई सर्प किसी को नहीं काटता। सर्पों से भय वस्तुतः अवास्तविक है। वे भी भले जीव हैं इस प्राणी जगत के ही एक अंग हैं।


भुतहा मकान जो आखिर गिराना ही पड़ा

16 सितम्बर 1979 की बात है। उस घर में पति-पत्नी दो ही थे। दोनों ने अनुभव किया कि उनके मकान की सीढ़ियों पर कोई ऊपर चढ़ता आ रहा है। चढ़ना थके हुए आदमी जैसा था। रुकना हुआ तो रोने की आवाज आने लगी। पति का नाम था एडवर्ड। पत्नी का सूसन। पहले तो वे नवागन्तुक की टोह लेते रहे। फिर हिम्मत बाँधकर उसका परिचय और आने का कारण पूछते रहे। पर जो कुछ जानकारी मिली वह असंगत और भयावह थी। रात को वे उस घर में ही इधर-उधर टकराते रहे और सवेरा होते-होते पागल जैसी स्थिति में पहुँच गये। दरवाजा खुला था। परिचितों ने उन्हें अलबर्टो सिविल अस्पताल पहुँचाया। वहाँ वे प्रलाप तो करते रहे पर किसी चिकित्सा से अच्छे न हुए। दूसरे दिन उनकी मृत्यु हो गई।

जिस मकान की चर्चा की जा रही है उसका नाम था ‘दि सिलवर ओक’, वह अतीव सुन्दर था, इसलिए जिनको भी मकान की आवश्यकता होती, इतना सुन्दर और सस्ता मकान देखकर वे ललचा जाते और बिना बहुत ढूँढ़-खोज किये उसे खरीद लेते। सब पर न्यूनाधिक एक जैसी मुसीबत बनती और सभी को जान से हाथ धोना पड़ता। वह मकान अपने जीवन काल में 52 व्यक्तियों को निगल चुका था। अलबर्ट दम्पत्ति 53वें थे।

यह इमारत सन् 1880 में बनी थी। शिकागो की इस बिस्कुटी रंग से रंगी इमारत का डिजाइन किसी ने बड़े कलात्मक ढंग से बनाया था और लागत का ख्याल किये बिना जी खोलकर उसमें पैसा लगाया था। ईंट सीमेंट ही नहीं उसमें चाकलेटी पत्थर भी बहुत लगा था। इसे उस समय के माने हुए नक्षत्र विद्या विशेषज्ञ अलेक्जेन्डर वेयरिंग ने बड़ी तबीयत से बनवाया। नक्शानवीस, कारीगर, रंगसाज उन्होंने ढूँढ़-ढूँढ़कर इसमें लगाये थे। उसे सर्वांग सुन्दर बनाने में पैसा पानी की तरह बहाया था। लेकिन वे ज्यादा दिन इस कोठी में रह नहीं पाये। अक्टूबर 1887 को वे अपने इस घर में मरे हुए पाये गये। आधी रात उनके नौकरों ने सुना कि अपने शयनकक्ष में भीतर ही भीतर वे कुछ बुदबुदा रहे हैं। आवाज दी पर कोई जवाब न मिला। इस पर वे उनके परिचितों को बुलाकर लाये। दरवाजा खटखटाने पर कोई जवाब न मिला तो किवाड़ तोड़ी गईं और मालूम पड़ा कि वे मरे पड़े थे।

उनके मरने के कई वर्ष बाद तक मकान बन्द पड़ा रहा। मौत की घटना लोग भूल गये। ऐसे अच्छे-खासे और बिल्कुल नये मकान को देखकर ग्राहकों के आने का सिलसिला शुरू हुआ। इसे सन् 1897 में एक धनी युवती मेथिल्डी ने बड़े चाव से खरीद लिया। उन्हें अपने नाना की अपार सम्पत्ति उत्तराधिकार में मिली थी। ऐसे ही शौक-मौज में दिन गुजारती थीं। एकान्त उन्हें पसन्द था सो मकान को उन्होंने अपने अनुरूप पाया और सस्ते मोल मिलते देखकर सहज ही उनने खरीद लिया। उसके नाना काल्विन सोने की खदानों के व्यापारी थे सो विरासत में अपनी इस इकलौती धेवती के लिए अकूत सम्पत्ति छोड़कर मरे थे। मेथिल्डी के साथ उसका प्रेमी वेलिन्यूव भी रहने लगा। वे लोग शादी करना चाहते थे, पर इसके लिए उन्हें जल्दी न थीं।

सफाई करते समय सिलवर ओक में एक कुआँ मिला। उसमें एक नर कंकाल, जंग लगी बन्दूक और कुछ ऐसे निशान मिले जो उसका समय अमेरिका के गृह युद्ध के दिनों का बताते थे। मालिकों ने इसका पता लगाने के बजाय इसको बन्द करा देना ज्यादा अच्छा समझा। उनने कुएँ के निशान पूरी तरह मिटा दिए।

वेलिन्यूव भी सोने की खदानों का कारोबार करता था। कुछ सौदे निपटाने के लिए उसे एक सप्ताह बाहर रहना पड़ा। लौटा तो उसकी प्रेमिका उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। वह घर की देहली में घुसा ही था कि उन्मादियों जैसी हरकतें करने लगा। उसने कमर में से छुरा निकाला और प्रेमिका के सीने में भोंक दिया। यह मरणासन्न स्थिति में जमीन पर गिर ही पाई थी कि छुरे का दूसरा वार उसने अपनी छाती में किया और आत्महत्या करके अपना भी अन्त कर लिया।

घटना आई गई हो गई। लोगों ने इसे साधारण प्रेम विग्रह समझा। मकान की मालिकीयत अब प्रख्यात ‘शिकागो ट्रिब्यून’ पत्र के सम्पादक जान सिमिल्टन के हाथों आ गई। यह खरीद सन् 1909 में हुई। सिमिल्टन अनीश्वरवादी थे, भूत-प्रेतों की बातों पर जरा भी विश्वास नहीं करते थे। 11 जनवरी, 1910 को उनके यहाँ एक पारिवारिक उत्सव था। किसी बच्चे का जन्म दिन मनाया जा रहा था। कुल मिलाकर छोटे-बड़े 38 मेहमान एकत्रित थे। प्रीतिभोज हुआ। भोज के बाद दरवाजा तो खुला था पर मालूम पड़ा कि 38 व्यक्ति मरे हुए पड़े हैं। कारण तलाश करने पर इतना ही कहा जा सका कि जहरीला खाना खाने से यह मौतें हुईं।

इसके बाद सन् 1915 में यह मकान सैक्युअल ओची नामक व्यक्ति ने खरीदा। वह शोधकर्मी था, साथ ही दिलेर भी। इन दिनों मिस्र के पिरामिडों सम्बन्धी कुछ दस्तावेजों की खोज कर रहा था। उसे कई रातों से बरामदे में कुछ परछाइयाँ टहलती और चीख पुकार करती सुनाई पड़ी। यह सब उसने देखा सुना तो सही पर घबराया नहीं। दूसरे दिन अपने जैसे कुछ और दिलेर मित्रों को बुलाकर लाया कि माजरा क्या है? कई दिन यह डरावनी बातें देखकर उसने निश्चय किया कि वह इस मकान को छोड़ देगा। रात को ही उसने अपनी डायरी में लिखा- “दो डरावनी आँखें मुझे हर समय घूरती रहती हैं। इस मकान में रहते हुए खतरा है। मकान छोड़ देने का मेरा पक्का इरादा है।”

सन् 1920 में एक सौदागर थामसन प्रेयरी ने यह इमारत खरीदी। उस परिवार को रहते एक सप्ताह भी न बीतने पाया था कि चमड़े की बेल्ट से किसी ने उन सबका गला घोंट दिया।

सन् 1922 में वह मकान दो विधवा महिलाओं ने मिलकर खरीदा। इनमें से एक का नाम था एलिजावेथ दूसरी जैकसिन। वे जिस दिन से इस मकान में आईं उसी दिन से जीने में किन्हीं के चढ़ने उतरने की, हँसने रोने की आवाजें सुनने लगीं। पूछने पर कोई जवाब न मिलता। वे दस दिन में ही सुखकर काँटा हो गईं। उस बस्ती के नगरपालिका अध्यक्ष श्री अल्बर्टो शिष्टाचार के नाते इन नये निवासियों की कुशल क्षेम पूछने आए। तो उनसे कहा गया कि आरम्भ के दिन से ही कोई दुष्ट आत्मा उन्हें बुरी तरह डरा रही है और जान से मार देने की धमकी दे रही है।

अध्यक्ष ने अधिक विवरण पूछा तो उनने बताने से इन्कार कर दिया और कहाँ- “हमें कहा गया है कि कुछ भी बताने पर उनकी जान ले ली जाएगी”।

बातें करते-करते कुछ देर हो गयी। काल्विन विदाई लेते हुए बाहर खड़ी अपनी गाड़ी तक आये तो लगा कि उन्हें किसी ने जकड़ लिया है। वे हाथ फड़फड़ाकर उस जकड़न से छूटने की कोशिश करने लगे पर उल्टे किसी जाल में कसते जाने का अनुभव करने लगे। फिर वे बेहोश हो गए। होश आया तो उनकी स्थिति पागलों जैसी हो चुकी थी। उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया, तो वे इतना ही कह सके- “मैंने उन्हें देखा है- मैंने उन्हें देखा है।” जिस रात वे अस्पताल थे उसी रात उन दोनों विधवाओं की घर में मृत्यु हो गई। दोनों की लाशें रेशमी रस्सी से बँधी हुई छत पर लटक रही थीं। तब से पचपन वर्ष तक अर्थात् सन् 1979 तक वह मकान खाली ही पड़ा रहा। किसी की हिम्मत इसे लेने की नहीं हुई।

सबसे आखिरी किरायेदार थे एडवर्ड और सूसन। उनका भी अंत ऐसी ही दुर्दशा में हो चुका था। इस तरह कुल मिलाकर 52 मृत्युएं इस अवधि में हो चुकी थीं। शिकागो प्रशासन ने इस मकान को अभिशप्त घोषित कर दिया और सन् 1980 में उसे जमींदोज करा दिया। यों अब कोई मकान नहीं है तो भी भूतही आवाजें जब-तब उधर से गुजरने वालों को सुनने को मिलती हैं। इस अभिशप्त मकान का रहस्य यथावत् बना हुआ है। अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र में ऐसी बातें उपहासास्पद मानी जा रही हैं। किन्तु वैज्ञानिक स्वयं हतप्रभ हैं कि यह वस्तुतः है क्या?


तृतीय युद्ध अब अन्तरिक्ष में लड़ा जाएगा

मध्यकालीन युग के युद्ध तीर, तलवार, फरमा और भाले जैसे भुजवल से चलाये जाने वाले शस्त्रों के सहारे लड़े जाते थे। मुगलकाल में तोपों और बन्दूकों का प्रयोग आरम्भ हुआ। वैज्ञानिक आधार पर बमों का, डायनामाइट का प्रयोग निकला। यह समय परमाणु अस्त्रों का है। जापान में दो बमों का प्रयोग होने के उपरान्त अब हरेक के दिमाग में उन्हीं के प्रयोग की बात है। जब तक रूस, अमेरिका के हाथों इन दो की निर्माण कला सीमित थी, तब तक दोनों के बीच समझौता हो जाने, एक-दूसरे से डरते रहने आदि के विकल्प थे, पर अब वह जानकारी अनेक देशों के हाथ लग गयी है। रूस, अमेरिका के अतिरिक्त अब वह आयुध फ्राँस, चीन, कनाडा, ब्रिटेन, इजराइल, दक्षिण अफ्रीका आदि ने भी हस्तगत कर लिये हैं। इसलिए आशंकाएँ और भी बढ़ गयी हैं। फिर दूसरी बात यह है कि उसकी विनाशलीला इतनी भयानक है कि एक स्थान पर प्रयोग करने के उपरान्त अन्यत्र उसका विकिरण दूर-दूर तक चिरकाल तक छाया रहेगा। उसे किसी क्षेत्र तक सीमित भी नहीं रखा जा सकता। शत्रु क्षेत्र पर प्रहार करने के उपरान्त उससे लगे हुए मित्र क्षेत्र भी चपेट में आयेंगे। मात्र जन हानि ही नहीं होगी भूमि, जल और वायु के प्रदूषण से यह पृथ्वी रहने लायक भी न रह जायेगी। फिर जितना भण्डार इन सब के पास एकत्रित हो गया है, वह इतना है कि समूचे भूमण्डल का अस्तित्व मिटा देने के लिए पर्याप्त है। विजेता को भी सोचना पड़ेगा, कि पराजित के साथ-साथ वह भी अपना अस्तित्व बचा सकेगा या नहीं।

इन कारणों से तीर-तलवारों की तरह, तोप-बन्दूक की तरह अब परमाणु बम भी बेकार जैसे हो चले हैं। उनका स्थान अन्तरिक्ष आयुध ग्रहण कर रहे हैं। प्रक्षेपास्त्रों का भी अब अतिशय विस्तार हो गया। इसलिए इस समय को उपग्रह-युग कह सकते हैं। इस घुड़दौड़ में अन्य देशों ने तो प्रवेश ही किया है, पर रूस, अमेरिका अभी भी सबसे आगे हैं। समूचे आकाश में लगातार 3 हजार उपग्रह इन दिनों भ्रमण कर रहे हैं। इनमें से अधिकाँश के पास पृथ्वी के चप्पे-चप्पे को भेद देने वाले खोजी उपकरण हैं पर अनेकों के पास ऐसे आयुध भी हैं जो बहुत ऊपर जाकर नीचे निशाने पर बिना किसी चूक के चोट कर सकते हैं और शत्रु को नुकसान पहुँचा कर खुद पाक-साफ बच सकते हैं।

इतना होते हुए भी इस क्षेत्र की जो प्रतिस्पर्धा चल रही है, उसे देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि कौन बाजी जीतेगा। हार-जीत से पहले एक प्रश्न नया उठ खड़ा हुआ है कि पृथ्वी का निकटवर्ती अन्तरिक्ष क्षेत्र कितने उपग्रहों का मलबा अपने पेट में रोक सकेगा। उनके कारण मेघ-संचार, वायु प्रवाह आदि में बाधा पड़ती है। फिर इस बढ़ती भीड़ के कारण नये उपग्रहों के मार्ग में भी बाधा पड़ती है।

यह कचरा अधिक अशक्त होने पर पृथ्वी पर गिरने-बरसने की आशंका भी है। पाठक भूले न होंगे, कुछ समय पूर्व “स्काइलैब” नामक उपग्रह का कचरा जमीन पर गिरा था। किसी काम की जगह गिरा, तो हाहाकार मचा देगा, इस आशंका से सारे संसार को चिन्तित रहना पड़ा। जब वह आस्ट्रेलिया के समीपस्थ समुद्र में गिर गया तब चैन आया। यह समस्या अन्य छितराये हुए कचरा उपग्रह भी पैदा कर सकते हैं और उनमें से किन्हीं महत्वपूर्ण नगरों पर गिरे, तो उनको भी चौपट करके रख सकते हैं।

अब आकाश युद्ध की तैयारी है। अस्त्र के रूप में लेसर और उसी बिरादरी की दूसरी किरणें बरसायी जाने की तैयारी है। लेसर किरणें एक अन्तरिक्ष यात्री कितने ही बड़े क्षेत्र पर गिरा सकता है और उस क्षेत्र को भून कर रख सकता है। अब तक के विज्ञान और विनिर्मित आयुधों में प्रयोक्ता के लिए सबसे सुरक्षित और जिस पर प्रयोग किया जायेगा, उसके लिए सबसे भयानक ‘लैसर’ ही है। वह प्रत्यक्ष दीख भी नहीं पड़ती। इस लिए उससे बचाव करना भी आसान नहीं। परमाणु बमों की तुलना में यह सस्ती भी है। कम जगह घेरती है। कम वजन ढोना पड़ता है। फिर अभी इसका प्रयोग प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी रूस, अमेरिका के अतिरिक्त अन्य देशों में विदित भी नहीं हो पाया है। इतने द्रुतगामी और अतिविघातक लैसर आयुध बना भी नहीं पाये हैं। ऐसी दशा में प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी यह आशा करते हैं कि वे लैसर आयुधों की पहल करके नफे में रह सकते हैं।

यों यह सर्वथा गोपनीय जानकारियाँ हैं, पर जो बताया गया है, उसके अनुसार अमेरिका हर महीने तीन नये उपग्रह अन्तरिक्ष में छोड़ता है और रूस बीस। यह जरूरी है कि देर तक टिकने का लाभ अमेरिका को मिलेगा तो सामने उनके एक विशाल घटाटोप खड़ा कर देने की क्षमता रूस के हाथ में अधिक है। कोई व्यावसायिक प्रयोजन हो तो स्थायी का महत्व है, पर जब मारधाड़ करनी हो तो उसके लिए जो करना होगा, मिनटों में हो जायेगा। उसके लिए टिकाऊपन की आवश्यकता न होगी।

वास्तविकता क्या हे, इसकी जानकारी प्राप्त करना इतना सरल नहीं है कि गोपनीयता की सात परतें उखाड़ कर स्थिति को सही रूप में जाना जा सके। इतने पर जो पता चलता है, उससे स्पष्ट है कि महामरण का आयोजन निकट आता जा रहा है और वह पैंतरे भी बदल रहा है। थल युद्ध में काम आने वाले तीर-तलवार अब किस्से कहानी जैसी पुराने युग की बातें हो गयीं। अमेरिका तलाशने से लेकर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना तक जलयानों का प्रभुत्व रहा। अंग्रेजी सेना अपने समय में सर्वसमर्थ इसीलिए मानी जाती थी कि उसके पास जलयानों की शक्ति अधिक थी। दूसरे युद्ध में पनडुब्बियाँ भी अपना कमाल दिखाने लगी थीं। अब अणु शक्ति चालित पनडुब्बियों पर लदे हुए प्रक्षेपणास्त्रों और छोटे अणु बमों ने नौ सेना को मालवाही काम के लिए छोड़ा है। वे कोई बड़ा युद्ध जीतने में कारगर नहीं हो सके। इसके बाद नभ युद्ध की चर्चा आती है। दूसरे महायुद्ध में वायुयानों ने प्रमुख भूमिका निबाही थी। अब समय इतनी तेजी से आगे बदल रहा और आगे बढ़ रहा है कि परमाणु अस्त्रों और प्रक्षेपणास्त्रों को मात्र डरावने खिलौनों की स्थिति में रख दिया गया है। जापान पर उनका प्रथम और अन्तिम प्रयोग हो चुका। उनकी विभीषिका का वर्णन तो होता रहता है कि अब तक इतने अणुबम बन चुके, इतने उनके पास हैं और इतने उसके पास। इनमें से इतनों का प्रयोग हो सका, तो इतने समय में समूची धरती का सफाया हो जायेगा। किन्तु समय को पहचानने वाले कहते हैं कि वह बात बहुत पुरानी हो गयी। जो बन चुके वे ही बहुत हैं। अपनी शेखी बघारने और शत्रु को डराने को कोई प्रयोजन इतने भर से सिद्ध होता होगा तो हो जायेगा, अन्यथा इनके प्रयोग की कोई सम्भावना नहीं है। लड़ने वाले लोग इतने मूर्ख नहीं हैं कि सामने वाले को नष्ट करने के साथ-साथ अपना अस्तित्व भी मटियामेट कर लें। अपनी सुरक्षा पहले शत्रु का विनाश बाद में, इस नीति को समझाने वाले कदाचित् ही अणुबम की छेड़खानी करेंगे।

समझा जाना चाहिए कि हम अन्तरिक्ष युद्ध के समय में आ गये। ‘लैसर’ और उसकी सहेली किरणें ही अबकी बार प्रमुख अस्त्र होंगे। इसके लिए एक उपग्रह में बैठकर जाने वाला इतना भण्डार लादकर ले जाएगा कि पृथ्वी से 15 मील ऊँचाई पर पहुँच की निर्धारित लक्ष्य पर प्रहार करेगा और नक्शे में जितने क्षेत्र को जलाने के लिए कहा गया होगा उतने को कुछ सेकेंडों में ही भून कर रख देगा। अस्तु सर्वसाधारण को तृतीय महायुद्ध की कल्पना करनी हो तो वह अन्तरिक्ष से होगा और लैसर किरणों का उनमें प्रयोग होगा यह अनुमान लगा लेना चाहिए।

विजय के आकाँक्षी सोचते हैं कि एक बार आकाश को उपग्रहों से साफ कर दिया जाय। सबको जला देने या गिराकर समुद्र में डुबो देने का प्रबन्ध किया जाय। इसके बाद पूरे आकाश पर आधिपत्य जमाकर जितने भूभाग का विनाश करना हो कर दिया जाय। चक्रवर्ती बनने के यही मनसूबे लोगों के दिमाग में हैं। समय बतायेगा कि भवितव्यता क्या है? पर इतना अनुमान लगाने में हर्ज नहीं कि थल और जल के युद्धों का समय चला गया। अब वे आकाश में लड़े जायेंगे।


दुराचरण से जन्मी महामारी महाविनाश लाएगी?

इकालॉजी का एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जैसी क्रिया होती है, वैसा ही उकसा प्रतिफल भी होता है। प्रकृति के सामान्य क्रम में तनिक भी व्यतिरेक आने पर उसकी विक्षुब्ध प्रतिक्रिया तुरन्त देखने को मिलती है। मानवी काया भी इन नियमों से बँधी हुई है। आहार-विहार के क्रम में जहाँ त्रुटि होती है, तुरन्त उसकी प्रतिक्रिया रुग्ण काया के रूप में सामने आती है। असंयम से अनेकों रोग जन्म लेते हैं एवं अचिन्त्य चिन्तन से तनाव, मनः दौर्बल्य, अवसाद, आवेश जैसे मनोविकारों की उत्पत्ति होती है। जब भी सामान्य क्रिया-कलापों में अति का समावेश हो जाता है, उसका फल काया एवं मन एक साथ भुगतते हैं।

प्रस्तुत विवेचन आज की सन्धि बेला में और भी महत्त्व रखता है, क्योंकि मानव जाति इन दिनों विभीषिकाओं की गहन तमिस्रा से घिरी हुई है। दैवी आपदाएँ, महामारियाँ एवं अभाव की परिस्थितियों ने दुष्कर्मों में निरत मानव समुदाय पर गत तीन-चार वर्षों में जिस प्रकार हंटर बरसाए हैं, उससे प्रतीत होता है कि प्रकृति की व्यवस्था क्रम में बिगाड़ नियन्ता को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं है। इन सबके बावजूद अदूरदर्शिता का चोला ओढ़े मानव समुदाय परिस्थितियों से अनभिज्ञ बना हुआ है। संयम अब मात्र कहने-पढ़ने भर का प्रसंग बन गया है। व्यवहार में उसका प्रतिपालन अनिवार्य नहीं माना जा रहा। यौन उच्छृंखलता अपनी चरम सीमा पर है। इस जबरन छीनी गयी स्वतंत्रता ने इतना विकृत रूप ले लिया है कि स्वयं विधाता भी इसे देखकर शर्म से अपना मुँह छिपा लें। प्रारम्भ में पाश्चात्य जगत तक सीमित यौन स्वातंत्र्य अब छूत की तरह सारे विश्व में फैल गया है। इसकी प्रतिक्रिया जो सामने आयी है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

आज से लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व जन्में भविष्य वक्ता नोस्ट्राडेमस ने अपनी पुस्तक में एक अजीबोगरीब पूर्वानुमान लिपिबद्ध कर दिया था, जिसे इस सदी में अनूदित किए जाने पर मनीषी वर्ग हतप्रभ होकर रह गया। ज्ञातव्य है कि इस भविष्य वक्ता के कोई भी कथन कभी झूठे नहीं निकले। समय की कसौटी पर उनकी सभी भविष्यवाणियाँ सही उतरीं। इस विचित्र भविष्यवाणी में यह कहा गया था कि बीसवीं सदी के अन्तिम दो दशकों में मनुष्य के दुराचरण के कारण एक ऐसी महामारी जन्म लेगी जो असमय काल के ग्रास में अनेकों व्यक्तियों को खींच ले जाएगी। इस व्याधि से लोगों की प्रतिरोधी सामर्थ्य नष्ट हो जाएगी व क्षीण शक्ति वाले ये मनुष्य अल्पावधि में ही वेदना सहते हुए मृत्यु के मुख में चले जाएँगे। उनका कथन था कि अमर्यादित काम सेवन एवं विकृत यौनाचार ही इसका मूल कारण होगा।

स्वास्थ्य विज्ञानियों का मत है कि गत तीन वर्ष में ऐसी व्याधि जन्म ले चुकी है एवं वह बड़ी तेजी से सारे विश्व में फैल रही है। मात्र 6 माह की अवधि में कष्ट भरा जीवन जीकर रोगी मृत्यु को प्राप्त होने लगे हैं। प्रारम्भ में तो यह बीमारी चिकित्सकों की समझ में भी नहीं आई, नामकरण क्या किया जाता? अन्ततः निदान-परीक्षण के बाद प्रतिरोधी संस्थान पर इसका प्रभाव देखते हुए इसे नाम दिया गया- ए. आय. डी. एस. अर्थात् “एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएन्सी सिन्ड्रोम”। इसका शब्दार्थ हुआ ऐसी ग्रहण की गयी व्याधि जिसमें जीवनी शक्ति सहसा कम होती चली जाती है व रोगी इसके अभाव में संक्रमण का शिकार हो मौत की गोद में चले जाते हैं। जिस तेजी से भयावह रूप में यह रोग पहले विकसित देशों में व अब सारे विश्व में फैला है, उसने चिकित्सकों एवं साधारण जन समुदाय को चिन्तित, भयभीत कर दिया है। रोग का निदान होने पर भी चिकित्सा की व्यवस्था न होने अथवा उनके कारगर न होने की विवशता ने परिस्थितियों को और भी विषम बना दिया है। किसी समय प्लेग जैसी महामारी, ने जो भययुक्त परिस्थितियाँ खड़ी की थीं, लगभग वैसी ही आज हैं। आने वाले एक-दो वर्षों में इसके और भी विकराल रूप में प्रकट होने की सम्भावना है।

उन्मुक्त यौनाचार के समर्थक कामू के चिन्तन के पक्षधर पाश्चात्य जगत के बहुसंख्य व्यक्ति अब यह अनुभव करते हैं कि स्थिति उनके बस में नहीं रही। आधुनिक तकनीकी के क्षेत्र में प्रगति करने वाले इन राष्ट्रों की यह गति क्यों कर हुई, कैसे नासमझी इन पर हो गयी, इसका कारण ढूँढ़ना हो तो हमें इस शताब्दी के प्रारम्भ में प्रतिपादन करने वाले कुछ पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों एवं स्वास्थ्य विज्ञानियों के तर्कों पर दृष्टि डालनी होगी। पूर्वार्त्त मनोविज्ञान एवं दर्शन के सीमित-संयत यौन संपर्क से सर्वथा विपरीत उक्ति व्यक्त करने वाले इन मनीषियों ने काम प्रवृत्ति पर अंकुश को एक कृत्रिम बलपूर्वक किया गया निरोध बताया व कहा कि सारी कुण्ठाओं, तनाव तथा मनोविकारों से मुक्ति पाने के लिये उन्मुक्त यौनाचार की छूट मिलना चाहिए। अन्धे को क्या चाहिए, बस दो आँखें। काम प्रवृत्ति बड़ी बलवती होती है। क्षणिक आनन्द जब मनःरोगों से मुक्ति की गारण्टी देता हो तो फिर प्रतिबन्ध किस बात का? नियन्त्रण क्यों? यही कारण है कि न्यूड क्लबों, मसाज थैरेपिस्टों के रूप में यौन पिपासा शान्त करने हेतु सर्वसाधारण को एक मान्यता प्राप्त मार्ग मिल गया।

अतिवाद हर दृष्टि से हानिकारक है। यौनाचार पर यह विशेष रूप से लागू होता है क्योंकि इससे जीवनी शक्ति का अपव्यय तो होता ही है, अनेक प्रकार के शारीरिक रोग एवं मनोविकार जन्म लेने लगते हैं। नयी उम्र के किशोरावस्था में पहुँचे बालक जब यौन स्वातंत्र्य अथवा परिपक्व होने के पूर्व विवाह के कारण जब इस स्थिति का सामना करते हैं तो जानकारी के अभाव में दुरुपयोग होने के कारण क्रमशः क्षीण होते चले जाते हैं व एक विकसित व्यक्तित्व बनने के पूर्व ही टूट जाते हैं।

काम-तृप्ति को परम लक्ष्य व सम्भोग से समाधि जैसे नारे लगाने वाले एक धर्म गुरु अपनी मैथुन-क्रान्ति के कारण हमारे अपने देश में बदनाम भले हुए हों, बाहर जहाँ यौनमुक्त वातावरण है, उन्हें खूब ख्याति मिली है। लेकिन अब अपनी ही उत्पन्न की गयी सृष्टि को उन्हें समझाना पड़ रहा है कि इस यौनाचार के दुष्परिणाम ए. आय. डी. एस. जैसे घातक रोगों के रूप में सामने आएँगे व समाधि तो नहीं, इस दुनिया से वेदना भरी मुक्ति चढ़ती आयु में ही दिला देंगे। पता नहीं, कितने समझदार व्यक्ति उनकी इस बात को अब उतनी ही अक्लमन्दी से अपनी गिरह में बाँधेंगे, जितनी कि उन्होंने यौन मुक्त जीवन वाली बात बाँधी थी। फिर भी यह एक सत्य है, निर्विवाद तथ्य है एवं आँकड़ों से भरी एक दर्दनाक तस्वीर है जो अमेरिका से लेकर जापान आस्ट्रेलिया तक के नागरिकों की आँखों के समक्ष घूम रही है। यह नोस्ट्राडेमस के तीन शताब्दी पूर्व के कथन को प्रामाणित भी कर रही है। संस्कृति विनाश की इस बेला में मानव समुदाय तो नहीं चेता, चिकित्सकों ने इस रोग की भयंकरता को जनमानस के समक्ष रखना आरम्भ कर दिया है।

यह रोग मूलतः समलिंगी यौन सम्बन्धों से फैला है। प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस काम विकृति ने अमेरिका व यूरोप में बड़ी तेजी से विस्तार किया। अरब की खाड़ी के देशों में किशोरावस्था के लड़के शेखों के हरमों में सैकड़ों की संख्या में अभी भी देखे जा सकते हैं। एकाकी नीरस जीवन बिताने वाले मनोविकारग्रस्त युवकों में यह मनोवृत्ति अधिक पायी जाती है। पुरुषों व स्त्रियों दोनों में ही यह पायी जाती है। जहाँ यौन तृप्ति ही लक्ष्य हो वहाँ स्त्री हो या पुरुष कोई अन्तर नहीं पड़ता, ऐसी उनकी मान्यता है। अमेरिका में तो दो पुरुषों ने परस्पर विवाह कर उसे फेडरल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से वैध भी स्वीकार करा लिया। वियतनाम युद्ध जहाँ अमेरिकी सैनिकों को कई वर्षों तक विषम परिस्थितियों में रहना पड़ा, यह विकृत यौनाचार खूब फैला। तब तो किसी ने इस सम्बन्ध में कल्पना भी नहीं की थी कि इसके क्या परिणाम होंगे। किन्तु प्रकृति की पाठशाला में अनुशासन हीनता के लिये दण्ड की पर्याप्त व्यवस्था है। जिस अप्राकृतिक कृत्य में मानव निरत हुआ, उसकी परिणति एक ऐसे रोग के रूप में उभर कर आयी जिसके उभरने व मृत्यु को प्राप्त होने के बीच मात्र 5-6 महीने की वेदना युक्त अवधि थी। अमेरिकन एसोशिएशन फॉर एडवान्समेन्ट ऑफ साइन्स ने एक सर्वेक्षण कर 1983 में यह पाया कि यह कैंसर से भी अधिक घातक रोग है, जिसे यदि प्रारम्भिक स्थिति में पहचान भी लिया जाय तो उपचार सम्भव नहीं है। इस रोग में “सेल्युलर इम्युनिटी” का ह्रास होता चला जाता है व शरीर से प्रतिरोधी संस्थान सम्बन्धी जीवकोष चुक जाते हैं। प्रति रक्षा के अभाव में शरीर संक्रमण व कभी-कभी व ठीक हो सकने वाले लसिका ग्रन्थियों के कैंसर, कैपोसी सारकोमा जैसे रोगों का शिकार हो जाता है। 6 माह से कम में ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।

सबसे भयावह पक्ष यह है कि कोई आवश्यक नहीं कि रोग फैलने के लिये यौन संपर्क ही जरूरी हो। यह रोगी का रक्त अन्य किसी व्यक्ति को दिए जाने पर अथवा प्रयुक्त इन्जेक्शन सुई कहीं और उपयोग में लाई जाने पर भी एक से दूसरे तक पहुँच सकता है। मादक औषधियों का सेवन करने वाले बहुसंख्य व्यक्ति इसके रोगी हो सकते हैं व रक्त बेचने में भी वे अग्रणी होते हैं। रोग फैलाने व एक महाद्वीप व राष्ट्र से दूसरे में रोग को पहुँचाने में सहायक सिद्ध होते हैं। यही कारण है कि मात्र 2 वर्ष की अल्पावधि में इसके लगभग सभी बड़े विकसित व विकासशील राष्ट्रों में प्रकट होने की रिपोर्ट मिली हैं।

यह समझा जाना चाहिए कि अप्राकृतिक जीवन क्रम विधाता को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं। यौनाचार पर प्रतिबन्ध नहीं, लेकिन एक मर्यादा है। जब भी इसका उल्लंघन होगा, दण्ड हाथों-हाथ मिलेगा। अभी तक गनोरिया, सिफिलिस जैसे रोग ही व्यभिचार जैसे कृत्यों के कारण आगे थे किन्तु इस नयी व्याधि ने इन सबसे बाजी मार ली है। जितनी शीघ्रता से यह फैलता है उससे अकाल मृत्यु तो अल्पायु में होती ही है, अन्य संपर्क वाले व्यक्ति भी अछूते नहीं रहते।

अध्यात्मिक दर्शन मर्यादित संयमित जीवन जीने का आदेश देता है। इस विज्ञान सम्मत विधा के सारे सिद्धान्त क्रिया की प्रतिक्रिया के इकालॉजी के नियम पर आधारित हैं। विभीषिकाएँ मनुष्य की स्वयं की न्यौत दी गयीं विपदाएँ हैं। उनका स्वरूप चाहे परिस्थिति की असंतुलन के रूप में हो अथवा काया व मन के रोगी होने के रूप में, वे बारम्बार यही चेतावनी देती हैं कि अच्छा हो! मनुष्य समय रहते सम्भल जाए। नहीं तो हश्र वही होना है जो नोस्ट्राडेमस ने पहले ही लिखकर रखा है कि “महामारी जो यौनाचार से जन्मेगी मनुष्यों के शरीरों को गला-गलाकर रातों-रात नष्ट कर देगी।” मनुष्य की समझदारी पर भरोसा किया जा सके तो विश्वास रखना चाहिए कि ऐसा समय नहीं आएगा।


संयम साधना (kahani)

सन्त एकनाथ के साथ तीर्थयात्रा पर एक चोर भी चल पड़ा। साथ लेने से पूर्व सन्त ने उससे रास्ते में चोरी न करने की प्रतिज्ञा कराई।

यात्रा मण्डली को नित्य ही एक परेशानी का सामना करना पड़ता है। रात को रखा गया सामान कहीं से कहीं चला जाता। नियत स्थान पर न पाकर सभी हैरान होते और जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ से ढूँढ़कर लाते।

नित्य की इस परेशानी से तंग आकर कारण की खोज शुद्ध हुई। रात को जागकर इस उलट-पुलट का वजह ढूँढ़ने का जिम्मा एक चतुर यात्री ने उठाया।

खुराफाती पकड़ा गया। सवेरे उसे सन्त एकनाथ के सम्मुख पेश किया गया। पूछने पर उसने वास्तविकता कही। चोरी करने की उसकी आदत मजबूत हो गई है। चोरी न करने की यात्राकाल में कसम निभानी पड़ रही है पर मन नहीं मानता तो तुम्बा पलटी- इधर से उधर सामान रख आने से उसका मन बहल जाता है। इससे कम में काम चल नहीं सका तो वह कौतूहल करने लगा।

सन्त एकनाथ ने मण्डली के साथियों को समझाया कि मन भी एक चोर है उसे बाहरी दबाव से एक सीमित मात्रा में ही काबू में रखा जा सकता है। आत्म सुधार तो हृदय परिवर्तन से ही सम्भव है और उसे स्वयं ही संयम साधना के आधार पर करना होता है।


सामूहिक आत्मघात पर उतारू मानव समुदाय

माल्थस ने प्रतिपादित किया था कि “अन्य जीव-जन्तुओं की तरह मनुष्य पर भी इकालॉजी के वे सिद्धान्त लागू होते हैं, जिनके अनुसार इस धरती पर उपस्थित जनसंख्या का अनुपात बढ़ने एवं परस्पर विग्रह उत्पन्न होने पर उनका स्वतः नाश होने लगेगा।” मनुष्य, सृष्टा के राजकुमार की भाँति इस धरती पर जन्मा है। वे सभी साधन जो उसे उत्तराधिकार में मिले हैं तथा अक्षुण्ण नीरोग मानवी काया सदुपयोग किया जाने पर तो उसका गौरव बढ़ाती व जीवन को सार्थक बनाती है, किन्तु यदि अदूरदर्शितावश वह स्वयं क्षमताओं के दुरुपयोग पर उतारू हो तो प्रकृति का दण्ड विधान उस पर भी लागू होता है।

पृथ्वी का कुल क्षेत्रफल जितना है उसमें बहुत बड़ा भाग जल से ढका है। कुल 51 करोड़ 2 लाख वर्ग किलो मीटर के क्षेत्र में 20 प्रतिशत से कम ही ऐसा है, जिस पर आराम से रह सकने, उपलब्ध साधनों का समुचित उपयोग कर सकने, उपलब्ध साधनों का समुचित उपयोग कर सकने की गुंजाइश है। शर्त यही है कि अमर्यादित प्रजनन से मानव समुदाय की संख्या अधिक न बढ़ने पाए एवं वे सभी अपनी सीमा मर्यादा में बने रहकर शालीनता-उत्कृष्टता भर जीवन जी सकें। जब भी इन वर्जनाओं का उल्लंघन होता है, महाकाल का हण्टर परोक्ष रूप से मानव जाति को दण्ड देने हेतु गतिशील हो जाता है।

प्रौद्योगिकी एवं आधुनिक सभ्यता के विकास ने सुख सुविधाएँ तो दी हैं पर मनुष्य की शान्ति उससे छीन ली है। असंयम के कारण काया जर्जर होती चली जा रही है एवं मानसिक तनाव-बेचैनी के कारण उन्मादग्रस्तों, निराश मनःस्थिति के व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सबसे भयावह परिणति यह हुई है कि एकाकी अथवा सामूहिक आत्महत्याओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। जो मानव जीवन देवों के लिये भी दुर्लभ माना गया है, उसे पल भर में नष्ट कर असमय मृत्यु वरण कर लेना ऐसी विचित्र विडम्बना है जिसे मानवता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहा जा सकता है। आज के युग की मानसिकता का परिचय यौन स्वेच्छाचार, सामूहिक बलात्कार, क्रूर हत्याओं व्याधियों व आत्मघातों के बाहुल्य, पारिवारिक विघटन, जाति-सम्प्रदाय गत अलगाव एवं युद्धोन्माद जैसी विषम परिस्थितियों से मिलता है। क्या कारण है कि प्राकृतिक संसाधनों, दैवी अनुदानों एवं स्वस्थ शरीर-मन के होते हुए भी ऐसी स्थिति आ पहुँची कि मानव जाति सामूहिक आत्मघात पर उतारू हो गयी? इसे समझने के लिये हमें जीव मनोविज्ञान एवं मन पर परिस्थितियों के सम्भावित प्रभावों का अध्ययन करना होगा।

आत्म रक्षा मनुष्य व सभी जीव जन्तुओं में पाई जाने वाली सर्वाधिक पुरातन एवं महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है। इसके लिये जीव जन्तु तरह-तरह के उपाय अपनाते हैं। उन्हें हिंसक प्राणियों के बीच रहना पड़ता है जो अपना शिकार उन्हें बनाने के लिये सतत् तलाशते रहते हैं। प्रकृति ने उन्हें कैमोफ्लेज के समस्त साधन दिए हैं जिसके माध्यम से वे अपना बचाव प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कर लेते हैं। किन्तु ये ही जीव-जन्तु एक स्थिति विशेष आने पर स्वेच्छा मृत्यु का वरण करने जैसा विचित्र व्यवहार करने लगते हैं। यह तब होता है, जब इनकी संख्या आनुपातिक क्रम में बढ़ जाती है अथवा कुछ अन्तर्ग्रही परिवर्तन इनके अन्दर की प्रसुप्त जैविक घड़ी को उत्तेजित करते हैं। स्कैण्डीनेवियन राष्ट्र नार्वे एवं स्वीडन में लेमिंग नामक चूहे जो टुण्ड्रा क्षेत्र के बर्फीले प्रदेश में निवास करते हैं, प्रति पाँचवें वर्ष सामूहिक रूप से आत्म हत्या करते देखे जाते हैं। इस वर्ष को “लेमिंग ईयर” कहा जाता है। अत्यल्प भूमि व भोजन के अभाव में चक्र वृद्धि ब्याज की दर से बढ़ती इनकी जनसंख्या पांचवें वर्ष अपनी चरम सीमा पर होती है। चूहे भोजन की तलाश में स्थान छोड़ कर चल देते हैं। गाँव, कस्बे, शहरों को पार करते हुए ये एटलाँटिक महासागर में कूदकर अपने प्राण दे देते हैं। मार्ग में भोजन मिल भी जाय तो ये रुकते नहीं। इनके अन्दर की घड़ी इन्हें “माइग्रेशन” की प्रेरणा देती रहती है व अन्ततः प्रजनन योग्य सीमित प्रजाति को छोड़कर ये सामूहिक आत्मघात कर डालते हैं। ऐसा हर पांचवें वर्ष होता है। इस दृश्य को देखने हजारों व्यक्ति समुद्र तट पर एकत्र होते हैं। विचित्र बात यह है कि यदि कोई इनके मार्ग में बाधा पहुँचाये तो ही ये चोट पहुँचाते हैं, नहीं तो अपनी यात्रा अनवरत जारी रखते हैं। जैसे-जैसे समुद्र तट समीप आता है, इनकी अवस्था पागलों जैसी हो जाती है। जीवविज्ञानी उस व्यवहार को समझ पाने में अक्षम रहे हैं। एक तर्क नेतृत्व विज्ञानियों का यह है कि सम्भवतः आदिकाल में अटलांटिक महासागर इनका “फीडिंग ग्राउण्ड” रहा होगा। उस अन्तःप्रवृत्ति की प्रेरणा ही इन्हें इस स्थिति तक पहुँचाती है। कुछ का मत है कि जनसंख्या वृद्धि के साथ चलने वाली विनाश की यह एक सहज प्रक्रिया है।

दक्षिणी अफ्रीका के एण्टे लोप स्प्रिंगबुक नामक हिरनों के ऐसे ही विचित्र व्यवहार का वर्णन 19वीं सदी के उत्तरार्ध में देखने को मिला है। सवान्ना के घास के मैदानों में ये सैकड़ों मील लम्बे झुण्ड बनाकर समुद्री किनारे की ओर चलते देखे गए। इनमें से आधे, रास्ते में ही समाप्त हो जाते थे व शेष समुद्र में डूबकर मर जाते थे। 1880 से 1899 तक यह प्रक्रिया जीव वैज्ञानिकों द्वारा प्रत्यक्ष देखी जाती रही। बाद में घास के मैदान भी नष्ट हो गए व मनुष्य की आबादी बढ़ने के कारण ये घने जंगलों में लुप्त हो गए। सम्भवतः किसी और रूप में उनकी यह आत्म हत्या की परम्परा जीवित हो।

ब्रिटिश द्वीप के समुद्री किनारों एवं अमेरिका के तटीय प्रदेश फ्लोरिडा में ह्वेल मछलियों की बहुत बड़ी संख्या हर वर्ष स्वेच्छा मृत्यु का वरण करती देखी जाती है। ज्वार-भाटे क साथ-साथ ये मछलियाँ किनारे आ लगती हैं व वापस समुद्र में जाने का प्रयास नहीं करतीं दम घुट जाने से उनकी वहीं मृत्यु हो जाती है। असम के वराइल पर्वत शृंखला में जटिंगा घाटी में अक्टूबर माह का घनी अँधेरी रातों में प्रकाश द्वीपों से टकराकर आ गिरने व प्राण त्याग देने वाले पक्षियों का विवरण तो सर्वविदित है। अभी तक इस रहस्य का सुलझाया नहीं जा सका है।

बढ़ती जनसंख्या कम हो एवं नस्ल बनी रहे, इस कारण जीव-जन्तुओं में स्वयं को नष्ट करने की यह प्रवृत्ति जाग उठती है, यह तथ्य थोड़ा बहुत गले उतरता है किन्तु मनुष्यों के बारे में क्या कहा जाय जिसमें एकाकी अथवा सामूहिक रूप में ये प्रवृत्तियाँ बीसवीं सदी के इस उत्तरार्ध में प्रकाश में आ रही हैं। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार दस वर्ष से पचपन वर्ष की उम्र में मरने वाले व्यक्तियों में जो पाँच कारण प्रमुख माने जाते हैं, उनमें से एक आत्महत्या है। 1974 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार एक हजार व्यक्ति पूरे विश्व में प्रतिदिन आत्महत्या द्वारा मृत्यु का वरण करते थे, जबकि 1983 के सर्वे के अनुसार यह संख्या बढ़कर चौबीस सौ व्यक्ति प्रतिदिन हो गयी। अकेले अमेरिका में ही 27 से 31 हजार व्यक्ति प्रतिवर्ष आत्महत्या करते देखे जाते हैं। इनमें से बहुसंख्य व्यक्ति वृद्ध, एकाकी, विधुर अथवा अविवाहित, शारीरिक व मानसिक दृष्टि से असाध्य रोगों से ग्रस्त एवं नशीली दवाओं के आदी पाये गये हैं। व्यवहार वैज्ञानिकों का मत है कि जीवन जीने का ढर्रा जिस तेजी से गत दो दशकों में बदला है, उसने जीने व आगे बढ़ने की होड़ में अनेकों व्यक्तियों को एकाकी व निराशाग्रस्त बना दिया है। अधिकाँश आत्महत्याओं के पीछे यह सामाजिक कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता देखा गया है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार तीन प्रकार की श्रेणियाँ आत्म हत्या करने वाले व्यक्तियों की मानी जा सकती हैं। एक इगोइस्टिक- जिसमें व्यक्ति अकेला, इक्कड़ किस्म का होता है, अपने अलावा किसी और के विषय में नहीं सोचना। ऐसे व्यक्ति आधुनिक सभ्य समाज में बढ़ते जा रहे हैं। दूसरा एनोमिक- जिसमें समाज किसी व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा कर पाने में असफल होता है एवं इस कारण पैदा हुए व्यवहार सम्बन्धी मनोविकारों का उचित समाधान परक उपचार नहीं हो पाता। तीसरा है- एलट्रूइस्टिक- जिसमें सामाजिक परम्पराएँ अथवा प्रचलन प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इस वर्ग में आत्महत्या को शानदार मृत्यु माना जाता है।

एक विचित्र तथ्य इस अन्तिम आत्महत्या के प्रकार से गुँथा हुआ मिलता है कि बहुसंख्य व्यक्ति धार्मिक अन्धविश्वास के कारण मृत्यु को गले लगाते हैं। भारत की जौहर व सती प्रथा का उदाहरण क्रिश्चियन समाज में भी देखने को मिलता है। जीसस के क्रूस पर चढ़ने के बाद जूड़ास इस्केरियॉट ने मोक्ष प्राप्ति हेतु आत्महत्या कर आनन्ददायक मृत्यु का पथ-प्रशस्त किया था। 960 व्यक्तियों ने मसादा के किले में रोमन लोगों द्वारा तीन वर्ष तक घेराबन्दी के बाद सामूहिक आत्महत्या कर ली ताकि वे जीसस के समीप पहुँच सके। जापानी समुदाय में हाराकिरी एक सम्मान जनक मृत्यु मानी जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध में कामीकाजे पायलट अपने वायुयान सहित अमेरिकन व ब्रिटिश पोतों पर आत्मघाती हमला करते व दुश्मन को मारकर स्वयं मरते देखे गए। सभी को हीरो का सम्मान मिला। हाराकिरी या सिधुकू कई ऐसे व्यक्तियों ने अपनाई जिनकी आत्महत्या के पीछे कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं था।

सामूहिक आत्महत्या का एक लोमहर्षक उदाहरण गत दशक में अमेरिका के जॉन्सटाऊन में धर्मगुरु जोन्स के आदेश पर सैकड़ों धर्मान्ध शिष्यों द्वारा जहर पीकर आत्मघात के रूप में जब संसार के समक्ष आया तो सब स्तब्ध रह गए। आज के विकसित सभ्य कहे जाने वाले समाज में ऐसा भी सम्भव है, यह कल्पना किसी को न थी। पिछले दिनों एक और अटकल समाचार पत्रों के माध्यम से प्रकाश में आई है। “वाशिंगटन पोस्ट” के संवाददाता विलियम रास्पबैरी के अनुसार अमेरिका के ओरेगाँव स्थित रजनीशपुरम, जहाँ भारत से भागे तथाकथित भगवान रजनीश ने अपना अड्डा जमाया है, में जोन्स टाउन की पुनरावृत्ति होने की आशंका है। धर्मान्ध शिष्यों से भरे इस छोटे से शहर पर रजनीश सम्प्रदाय का पूर्ण नियंत्रण है। बेकार, आवारा, नशीली दवाओं के आदी यौन स्वेच्छाचार की छूट प्राप्त इस समुदाय के विषय में अमेरिका के नागरिकों का मत है कि अपने तथाकथित ‘भगवान्’ के आदेश पर ये फेनेटिक कभी भी सामूहिक आत्महत्या कर सकते हैं।

प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य, जिसे एक गौरवशाली जिन्दगी जीने के लिये यह अलभ्य अवसर क्या इसीलिये मिला है कि वह उसे असमय ही नष्ट कर डाले। आँकड़े बताते हैं कि आधुनिकता के विकास के अनुपात में ही निराशा, तनाव व आत्महत्याओं की दर बड़ी है। जो निराशा से बचने के लिये विकल्प तलाशते हैं, वे धार्मिक अन्धविश्वासों की जकड़ में आ जाते हैं। विद्वान लेखक द्वय टॉम व्यूचैम्प एवं पार्लिन सैमूर ने अपनी पुस्तक “एथीकल इश्यूज इन डेथ एण्ड डाईंग” में लिखा है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति मनुष्य की पाशविक आदिम प्रवृत्तियों के उभरने का संकेत देती है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य अपने परिकर एवं परिस्थितियों से सामंजस्य बिठा पाने में असमर्थ रहा है।

दृष्टा, भविष्य वक्ता एवं लेखक श्री जूलवर्न ने आज से 60 वर्ष पूर्व लिखा था कि “इस शताब्दी के अन्त में जनसंख्या तो बढ़ेगी पर लोग महामारी से जितना नहीं मरेंगे, उतना मनोविकारों एवं आत्महत्या के कारण स्वयमेव मृत्यु को प्राप्त होंगे। सभ्यता के विकास के साथ-साथ आत्मघातों की महामारी भी बढ़ती चली जाएगी और अन्ततः एक सन्तुलित समझदार समुदाय ही शेष बचा रहेगा, जब इंसान अपनी औकात भूलकर स्वयं भगवान बनने लगे, स्वच्छन्द व्यभिचार संस्कृति का एक अंग बन जाये तो कथन अतिशयोक्ति पूर्ण न होगा कि मानव जाति किसी के द्वारा युद्ध में मारे बिना ही स्वयमेव नष्ट हो जाए।”

अच्छा हो मनुष्य जाति समय रहते चेते एवं ईश्वर प्रदत्त जीवन सम्पदा का सदुपयोग करना सीखे। यह जीवन जीने के लिए मिला है, मरने के लिये नहीं। वैज्ञानिक अपनी ओर से मनुष्य को नीरोग एवं दीर्घायु बनाने के सारे प्रयास कर रहे हैं किन्तु उसी गति से मनोविकार एवं आत्मघाती प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। ऐसे में वे सारे प्रयास व्यर्थ ही हैं। मनुष्य देव पुत्र है एवं उसका चरम लक्ष्य है अपने सृजेता से एकाकार हो विराट् बन जाना। यह कितनी बड़ी विडम्बना होगी कि यह विकसित आधुनिक सभ्यता देखते-देखते असमय ही नष्ट हो जाय। यदि मनुष्य ने समझदारी का प्रयोग नहीं किया तो आसार कुछ ऐसे नजर भी आते हैं।


क्या सचमुच महाप्रलय की घड़ी आ गई?

तीस जून 1908 की प्रातः पृथ्वी के उत्तरी-गोलार्ध में साइबेरिया के सुनसान बर्फ ढके भूक्षेत्र तुगस्का के समीप एक अंतर्ग्रही गोला आ टकराया जिससे आस-पास के हजार से भी अधिक वर्ग मील दूर तक धरती काँप गयी एवं वहाँ एक विशाल गह्वर बन गया। इसका भली-भाँति पर्यवेक्षण करके वैज्ञानिकों ने इस ऐतिहासिक अभूतपूर्व घटना को किसी लाखों टन वजनी तारे (एस्टेरॉइड) अथवा पुच्छल तारे का कमाल बताया। उनका मत था कि यदि यह उल्का पिण्ड या ग्रहों का चूरा किसी आबादी भरे क्षेत्र पर गिरता तो पृथ्वी की एक चौथाई आबादी तुरन्त नष्ट हो गयी होती एवं इससे उत्पन्न ऊर्जा से वातावरण अत्यन्त गर्म हो उठता। इस एस्टेरायड के टकराने से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई थी वह 12 मेगाटन हाइड्रोजन बम द्वारा छोड़े जाने वाली ऊर्जा से भी अधिक थी। यह तथ्य स्मरणीय है कि हिरोशिमा पर इस सदी के 40वें दशक में छोड़ा गया परमाणु बम सामर्थ्य में इससे एक हजार गुना कम था। जापान में इसने जो तबाही मचायी थी उससे कल्पना की जा सकती है कि 1908 जैसी घटना की पुनरावृत्ति होने पर महाविनाश का क्या स्वरूप होगा?

खगोल वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी के सौर मण्डल में ऐसे घातक एस्टेरॉइड एवं पुच्छल तारे सतत् चक्कर लगा रहे हैं जो कभी भी दिशा बदलकर पृथ्वी से टकराकर धरती पर तबाही मचा सकते हैं। आधे वर्ग मील से लेकर 600 वर्ग मील तक के आकार वाले ये ग्रह पिण्ड मंगल तथा बृहस्पति के बीच एक निर्धारित परिधि में चक्कर लगाते हैं जिसे “एस्टेरॉइड बेल्ट” कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मत है कि कोई आवश्यक नहीं कि ये एस्टेरॉइड इसी परिधि में घूमते रहें। वे कभी भी मार्ग से भटकते हुए पृथ्वी से आ टकरा सकते हैं। हिदाल्गो, एडोनिस, अपोलो एवं इकॉरस नामक चार ऐसे एस्टेरॉइड हैं जिनकी आने वाले 25 वर्षों में कभी भी धरती से आ टकराने की सम्भावनाएँ व्यक्त की जा रही हैं।

परमाणु युद्ध के बारे में दो दशकों से कुछ चर्चाएँ होती रही हैं, काफी कुछ लिखा भी जा चुका है। सबसे भयावह सम्भावनाएँ बताते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि 10 हजार मेगाटन के विस्फोट से जलवायु पूर्णतः बदल जाएगी एवं इस “परमाणु ठण्ड” से कोई भी व्यक्ति या जीव अछूता न रहेगा। किन्तु नासा के ही वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी पर आकर टकराने वाला इन चारों में से एक भी ग्रह पिण्ड इतनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न करेगा कि सारी सृष्टि मलबे में बदलकर अन्तरिक्ष में चक्कर लगाने लगेगी। जैसी अन्तर्ग्रही परिस्थितियाँ बन रही हैं, उससे इस सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता।

इन्हीं ग्रह पिण्डों की शृंखला में पुच्छल तारों की भी चर्चा होती है जो हर 76 वर्ष बाद उदय होते व पृथ्वी के निकट आकर अपनी विषाक्त धूलि से यहाँ के वातावरण को प्रभावित करते हैं। इसी क्रम में अगले दिनों 80 हजार किलोमीटर प्रतिदिन की गति से चलने वाला “हैली धूमकेतु” 1985 के प्रारम्भ में गुरु की कक्षा में प्रवेश कर जाएगा एवं 1986 में पृथ्वी की कक्षा में आ जाएगा। इसे नवम्बर 85 से जनवरी 86 तक उत्तरी गोलार्ध में दूरबीन द्वारा देखा जा सकेगा एवं नंगी आँखों से फरवरी से अप्रैल 1986 तक, जब यह अपनी विशालकाय पूँछ का घेरा लिए पृथ्वी के सर्वाधिक समीप से गुजरेगा। दक्षिणी गोलार्ध में जून 86 तक दृश्यमान रह यह लुप्त हो जाएगा।

आखिर इस तारे में क्या विशेषता है, जो खगोल वैज्ञानिक एवं अन्तरिक्ष विज्ञानी इतने निश्चित हैं? वस्तुतः 6 किलोमीटर व्यास, साढ़े आठ करोड़ किलोमीटर लम्बी पूँछ वाला यह तारा पिछले अन्य धूमकेतुओं की तुलना में कहीं अधिक बड़ा एवं विषाक्त मलबा अपने अन्दर समाए एक आसन्न विभीषिका के रूप में प्रकट होने जा रहा है। “सावधान! धूमकेतु आ रहा है (विवेयर, हैली इज कमिंग)” नामक पुस्तक में विशेषज्ञ विद्वानों ने अपने मत प्रकट करते हुए कहा है कि इस धूमकेतु की अनेकों भयावह प्रतिक्रियाएँ सम्भावित हैं। इसके प्राकट्य के दिनों में भूकम्प, बाढ़, महामारी, मानसिक विक्षोभ एवं महायुद्ध होने तक की सम्भावनाएँ बतायी गयी हैं। लेखकों का मत है कि पृथ्वी के समीप आते ही इसका सड़ा मलबा जो विषाक्त गैसें छोड़ता है, वे सारे पर्यावरण को दूषित करती हैं। इनसे ऐसे विषाणु- जीवाणु जन्म ले सकते हैं जिनकी रोकथाम अत्याधुनिक साधनों के होते हुए भी मानवी प्रयासों द्वारा सम्भव न हो सकेगी। अँग्रेजी शब्द “डिजेस्टर” (महाविनाश) की व्युत्पत्ति धूमकेतु के कारण ही हुई है। यह लैटिन व ग्रीक दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है “इविल स्टार” (खतरनाक तारा)। शताब्दियों से यह मान्यता रही है कि यह अशुभ तारा है। इसके प्रकट होने का अर्थ ही विपत्तियों का बरसना हैं।

इन धार्मिक मान्यताओं एवं अभिमतों के पीछे कितना तर्क सम्मत आधार है, यह नहीं कहा जा सकता, किन्तु उनके प्राकट्य एवं प्रकृति प्रकोपों के साथ-साथ घटित होने के संयोगों को झुठलाया नहीं जा सकता। घूमकेतुओं और उल्काओं के मध्य परस्पर गहरा सम्बन्ध है। अधिकाँश वैज्ञानिकों का मत है कि जितना भी उल्कापात पृथ्वी पर होता है अथवा एस्टेराइड्स के पृथ्वी के समीप आने व टकराने की सम्भावनाएँ हैं, उनके लिये मूलतः धूमकेतु ही जिम्मेदार हैं। वे भले ही पृथ्वी की कक्षा से दूर बने रहते हों पर अपने दूरगामी प्रभाव से सतत् उल्का पिण्डों व कॉस्मिक किरणों की बौछार पृथ्वी पर करते रहते हैं। खगोल वैज्ञानिकों का यह भी मत है कि सूर्योदय के कुछ पूर्व व सूर्यास्त के बाद स्वच्छ आकाश में धुँधली लालिमा (जोडिएकल लाइट) दिखाई पड़ती है, वह धूमकेतु द्वारा बिखेरे गए छोटे-छोटे कणों के कारण ही उत्पन्न होती है। वे यहाँ तक कहते हैं कि प्रसुप्त पड़े ज्वालामुखियों का सहसा फूट पड़ना तथा भू-चुम्बकीय उत्पातों के कारण प्रकृतिगत असन्तुलन भी पृथ्वी पर पड़ने वाले धूमकेतुओं के प्रभाव के कारण है।

धूमकेतु सौर परिवार के सबसे प्राचीनतम एवं सर्वाधिक सुरक्षित ग्रह पिण्ड हैं। यही कारण है कि वे सतत् भटकते व सौर मण्डल में चक्कर लगाते रहते हैं। जब भी वे सूर्य के अत्यधिक समीप आते हैं, उनकी नाभिक इस विपुल ऊर्जा से नष्ट हो जाती है एवं वे निष्क्रिय हो जाते हैं। जो धूमकेतु विशाल व बड़ी परिधि लिए होते हैं, वे सुरक्षित बचे रह अपना प्रभाव अन्तरिक्ष में सुनिश्चित रूप से छोड़ते हैं जो विषाक्त धूम्रों के रूप में होता है। अगले दिनों आने वाला हैली धूमकेतु कुछ इसी श्रेणी का होगा एवं अपने दुष्प्रभावों से पृथ्वी के वायु मण्डल को पहले से अधिक अनुपात में प्रभावित करेगा।

वैज्ञानिक अपने-अपने ढंग से सोचते हैं एवं अभी से उन्होंने इस सम्भावित अतिथि का परीक्षण व उसके माध्यम से ग्रहों के विषय में पुरातन तम जानकारी प्राप्त करने की तैयारी आरम्भ कर दी है। ऐसे उपग्रह अन्तरिक्ष में छोड़े जा रहे हैं जो इस ग्रह पिण्ड का अध्ययन कर विश्लेषित कम्प्यूटराइज्ड जानकारी धरती पर भेजेंगे। फिर भी इतिहास को झुठलाया नहीं जा सकता कि पुच्छल तारे का आगमन विशेषकर युग सन्धि की इस विषम वेला में एक अशुभ संकेत है। इसके पृथ्वी से टकराने की कोई सम्भावना नहीं है किन्तु इसके पृथ्वी के आयनमण्डल में प्रवेश करते ही प्रभाव क्षेत्र में घातक किरणों की जो बौछार होगी, उसके दुष्परिणाम अवश्यम्भावी हैं। पहले जब-जब भी प्रकट हुआ है, युद्ध महामारी, दैवी विपदाएँ, अकाल, चक्रवात जैसी परिस्थितियाँ बनी हैं। इन्हें संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता। मौसम का असन्तुलन, मनोविकार एवं असाध्य व्याधियाँ जो इन दिनों दृश्यमान हैं, वे यही संकेत देती हैं कि अभी से अन्तर्ग्रही प्रभावों की शृंखला आरम्भ हो गयी है। आने वाले दिन और भी विषम होंगे। ऐसी स्थिति में मानवी पुरुषार्थ सफल नहीं हो पाता। वह परिस्थिति का विश्लेषण कर सकता है, उपचार नहीं। सृष्टा ने इस धरित्री को विनाश के लिये नहीं बनाया, यह स्पष्ट माना जाना चाहिए। अदृश्य जगत के परिमार्जन-परिशोधन हेतु विश्वव्यापी स्तर पर अध्यात्म अनुशासनों के परिपालन की आवश्यकता अब अनिवार्य प्रतीत होती है ताकि प्रतिकूल को निरस्त कर विभीषिकाओं से जूझा जा सके।


दर्शन झाँकी का बाल-विनोद बन्द करें

जिस महान प्रयोजन के लिए सूक्ष्मीकरण की अति दुरूह योजना को गुरुदेव ने अपने हाथ में लिया है, वह केवल इन दिनों अपने जाल बिछा रहा है वरन् सन् 2000 तक कह विकट सम्भावनाओं से जूझ सकने के लिए आवश्यक एवं समर्थ शक्ति का उत्पादन भी कर रहा है। अपनी इस सृजन प्रक्रिया को अधिक बढ़ाने के लिए उन्होंने अपनी भट्टी दूने वेग से गरम करना आरम्भ कर दी है ताकि समयानुसार किसी अभाव का अनुभव न हो और बगलें न झाँकनी पड़ें। उनकी साधना का स्तर तथा अनुपात अब निर्धारित योजना की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र हो गया है, साथी ही कार्यक्रम अधिक व्यस्त भी। समस्याओं की उग्रता बढ़ रही है। समाधान की रक्षात्मक शक्ति उसकी तुलना में सन्तोषजनक मात्रा में उत्पादित नहीं हो पा रही। इसलिए थोड़ी राहत दे सकने वाली जिस सुविधा के मिलने की सम्भावना थी, वह अवसर अब मिल नहीं सकेगा।

गुरुदेव अब दर्शन देने की स्थिति में सम्भवतः किसी पर्व पर नहीं रहेंगे। माताजी को ही उनका प्रतिनिधि मानकर स्वजनों को अपनी भावना का समाधान एवं सन्तोष करना पड़ेगा।

माताजी के समय में भी अब कटौती की गई है। वे रात्रि की साधना तो गुरुदेव के साथ पूर्ववत् करेंगी ही, शाम को भी तीन साढ़े तीन बजे से उन्हें गुरुदेव के साथ उस क्रम में बैठना होगा। बाहर से आने वालों एवं दर्शनार्थियों-आश्रमवासियों के लिये वे भेंट-परामर्श हेतु शाम तीन बजे तक ही उपलब्ध रहेंगी। प्रातः से बारह बजे तक वे आश्रम व्यवस्था देखती और स्थायी कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करती रहेंगी।

यह क्रम कब तक चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। जितने समय तक जितने अधिक प्रचण्ड स्तर का सूक्ष्मीकरण और पाँच वीरभद्रों का अभीष्ट जिम्मेदारियाँ सम्भाल सकने योग्य स्वरूप निखरता है, तब तक तो वर्तमान तपश्चर्या के स्वरूप में कोई कमी होना तो दूर, उल्टे अधिकाधिक अभिवृद्धि होती ही रहेगी। माता जी को अपनी मिशन व्यवस्था में कमी करके गुरुजी के साथ अधिक समय देना पड़ेगा। काम बड़ा है। इतना बड़ा भूतकाल में पहले कभी कदाचित ही बन पड़ा हो। उसे गोवर्धन उठाने, समुद्र सेतु बनाने और दधीचि अस्त्र से इन्द्र वज्र के ढलने की उपमा दी जा सकती है।

पाठकों को विदित ही है कि गुरुदेव ने सब उत्तरदायित्वों से निवृत्त होकर गंगा के उद्गम गोमुख पर रहने के लिए बहुत पहले से ही भूमि की व्यवस्था कर ली है। काम निवृत्ति और शरीर की स्थिरता रहने पर वे गंगोत्री से आगे गोमुख चले जाएँगे।

अब दर्शन झाँकी की कामना किसी को भी नहीं संजोनी चाहिए। इस बाल बुद्धि का आग्रह उनकी तब साधना में विक्षेप करेगा। जो शान्ति कुंज आएँ, वे उनके संकल्प के बिखरे विराट् रूप का दर्शन करें। आश्रम के कण-कण में उनका व्यक्तित्व, तप, प्राण शक्ति तथा संकल्प बिखरा पड़ा है। वही दर्शनीय है। जो भावनापूर्वक शांतिकुंज-गायत्री तीर्थ का दर्शन करेंगे, उन्हें वही प्रेरणा सतत् मिलती रहेगी जो शरीरधारी गुरुदेव का दर्शन करके तथा प्रत्यक्ष आशीर्वाद मिलने से प्राप्त होती थी।

गुरुजी सर्वसाधारण से मिलने के लिए कब उपलब्ध होंगे, यह बिल्कुल अनिश्चित है माताजी से मिलने का समय 12 से 3 ही रहेगा। परिजनों आत्मीयों को प्रणाम दर्शन की अपेक्षा मिशन के कार्यों में भागीदार बनकर वास्तविक पुण्य और सच्चे आशीर्वाद के भागी बनना चाहिए।


Quotation

जब तुम्हारा मन टूटने लगे, तब भी यह आशा रखो कि प्रकाश की कोई किरण कहीं न कहीं से उदय होगी और तुम डूबने न पाओगे, पार लगोगे।


गीतकारों से

(माया वर्मा)


गीतकारों से (kavita)

गीत उस घर का लिखो दीवार जिसकी ढह रही है। पीर गाओ उस नयन की धार जिससे बह रही है॥

क्या हुआ जो बौर फूले आम पर कोयल न बोली। क्या हुआ जो आँख कलिका ने सुबह होते न खोली।

फूल डरते हैं कि बाँटें गन्ध कैसे पवन को हम। लता ने भी वृक्ष का एहसान लेना कर दिया कम॥

गीत उस ऋतु का लिखो मधुमास में जो दह रही है॥ सत्य की साँसें रुकीं ईमान घटता जा रहा है।

आदमी का- स्वार्थ में अन्तर सिमटता जा रहा है॥ है बहुत लम्बी कहानी, द्वेष, हिंसा, वासना की।

धर्म डूबा, हो गयी अन्त्येष्टि सेवा- साधना की॥ गीत उस भू का लिखो जो भार ऐसे सही रही है॥

आज फूलों को नहीं अधिकार- प्रभु के चरण पायें। विष अमृत बनता नहीं- कैसे भजन मीरा सुनायें॥

साधना सहमी खड़ी है- प्रार्थना के पाँव ठिठके। बाँसुरी बजती नहीं है प्राण सिसके यमुन तट के।

गीत उस हवि का लिखो जो यज्ञ के बिन रह रही है॥ किन्तु कवि की कलम यह सब देखती कैसे रहेगी।

बेजुबानों की कहानी, लेखनी उसकी कहेगी॥ इसलिये ओ गीतकारों! इस व्यथा के गीत गाओ।

और युग के प्रति बड़ा दायित्व अपना तुम निभाओ॥ मौत संस्कृति की सदा अपने लिये दुःसह रही है।

*समाप्त*