बन्धन मुक्ति का राजमार्ग

इस संसार को माया इसलिए कहा गया है कि यहाँ भ्रान्तियों की भरमार है। जो जैसा है, वैसा नहीं दीखता। यहाँ हर प्रसंग में कबीर को उलट वासियों की भरमार हैं। पहेली बुझौवल की तरह हर बात पर सोचना पड़ता है। प्रस्तुत गोरख धन्धा बिना बुद्धि पर असाधारण जोर लगाए समझ में ही नहीं आता। तिलिस्म की इस इमारत में भूल-भुलैयाँ ही भरी पड़ी हैं। आँख मिचौनी का खेल यहाँ कोई जादूगर खेलता खिलाता रहता है।

प्रस्तुत परिस्थितियों को विधि की विडम्बना नियति की प्रवंचना भी कहा जा सकता है पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर प्रतीत होता है कि मनुष्य की बुद्धिमता परखने के लिये उस चतुर चितेरे ने पग-पग पर कसौटियाँ बिछा रखी हैं, जिनके माध्यम से गुजरने वाले के स्तर का पता लगता रहे। लगता है नियन्ता ने अपने युवराज को क्रमशः अधिकाधिक अनुदान देने की व्यवस्था बनाई है और उपयुक्त अधिकारी को उपयुक्त जिम्मेदारियाँ-विभूतियाँ सौंपते चलने की योजना विनिर्मित की है। दूरदर्शी और अदूरदर्शी का पता इस गुत्थी को सुलझा सकने, न सुलझा सकने से लग जाता है कि सच्चा स्वार्थ साधन किसमें है, किसमें नहीं। बाधक मात्र एक ही प्रवंचना होती है कि तात्कालिक आकर्षणों में यह चंचल मन इतना मचल जाता है कि बुद्धि को उसकी ललक पूरी करने तक का अवसर नहीं मिलता। तरकस से तीर निकल जाने पर पता चलता है कि निशाना जहाँ लगाना चाहिए था, वहाँ न लगकर कहीं से कहीं चला गया। सफलता और असफलता का निर्धारण यहीं हो जाता है। व्यवहार बुद्धि का आश्रय लेने वाले दूरदर्शी इसी कसौटी पर खरे उतरते एवं माया-प्रपंच से बचकर सफलता के साथ आत्मिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त होते देखे जा सकते हैं।


भगवान का सुबोध और सार्थक नाम सच्चिदानन्द

भगवान के यों अगणित नाम हैं। पर उनमें से सबसे सुबोध और सार्थक नाम है- सच्चिदानन्द। सत् का अर्थ है- टिकाऊ। न बदलने वाला न- समाप्त होने वाला।

इस कसौटी पर केवल परमब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वही है परिवर्तनों का सूत्र-संचालक भी वही है। उसी के गर्भ में यह समूचा ब्रह्माण्ड पलता है। सृष्टि तो महाप्रलय की स्थिति में बदल भी जाती है और फिर कालान्तर में नया रूप लेकर प्रकट भी होती रहती है किन्तु नियन्ता की सत्ता में इससे कोई अन्तर नहीं आता। इसलिए परब्रह्म को सत् कहा जाता है।

चित् का अर्थ है- चेतना। विचारणा। जानकारी, मान्यता, भावना आदि इसी के अनेकानेक स्वरूप हैं। मानवी अन्तःकरण में इसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में देखा जाता है। मनोविज्ञानी इस वर्गीकरण चेतन, अचेतन और सुपर चेतन के रूप में करते हैं। जाग्रति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं में भी चेतना अपने मूल स्वरूप में यथावत बनी रहती है। मरने के बाद भी उसका अन्त नहीं होता। बुद्धिमान और मूर्ख सभी में अपने विभिन्न स्तरों के अनुरूप वह विद्यमान रहती है।

जड़ पदार्थ और प्राणि समुदाय के बीच मौलिक अन्तर एक ही है। चेतना का होना न होना। जड़ पदार्थों के परमाणु भी गतिशील रहते हैं। उनमें भी उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है। किन्तु निजी ज्ञान का सर्वथा अभाव रहता है। किसी प्रेरणा से प्रभावित होकर वे ग्रह नक्षत्रों की तरह धुरी एक कक्षा में घूमते तो रहते हैं पर इस सन्दर्भ में अपना कोई स्वयं का निर्धारण कर सकने की स्थिति में नहीं होते प्राणि अपनी इच्छानुसार गतिविधियों का निर्धारण करते हैं।

प्राणियों की चेतना बृहत्तर चेतना का एक अंग अवयव मात्र है। इस ब्रह्माण्ड में अनन्त चेतना का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के द्वारा पदार्थों की व्यवस्था का एवं प्राणियों की चेतना का अनुदान मिलता है। परम चेतना को ही परब्रह्म कहते हैं। अपनी योजना के अनुरूप वह सभी को दौड़ने एवं सोचने की क्षमता प्रदान करती है। इसलिए उसे ‘चित्’ अर्थात् चेतन कहते हैं।

इस संसार का सबसे बड़ा आकर्षण आनन्द है। आनन्द जिसमें जिसे प्रतीत होता है वह उसकी ओर दौड़ता है। शरीरगत इन्द्रियों में अपने-अपने लालच दिखाकर मनुष्य को सोचने और करने की प्रेरणा देते हैं। सुविधा साधन शरीर को सुख प्रदान करते हैं। मानसिक ललक-लिप्सा, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए ललचाती रहती है। अन्तःकरण की उत्कृष्टता वाला पक्ष आत्मा कहलाता है। उसे स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति, समाधि जैसे आनन्दों की अपेक्षा रहती है।

वस्तुतः आनन्द प्रकारान्तर से प्रेम का दूसरा नाम है। जिस भी वस्तु, व्यक्ति एवं प्रवृत्ति से प्रेम हो जाता है। वही प्रिय लगने लगती है। प्रेम घटते ही उपेक्षा चल पड़ती है और यदि उसका प्रतिपक्ष- द्वेष उभर पड़े तो फिर वस्तु या व्यक्ति के रूपवान, गुणवान होने पर भी वे बुरे लगने लगते हैं। उनसे दूर हटने या हटा देने की इच्छा होती है।

अँधेरे में जितने स्थान पर टार्च की रोशनी पड़ती है उतना ही प्रकाशवान होता है। वहाँ का दृश्य परिलक्षित होने लगता है। प्रेम को ऐसा ही टार्च प्रकाश कहना चाहिए। जिसे जहाँ भी फेंका जायेगा वही सुन्दर, प्रिय एवं सुखद लगने लगेगा। वैसे इस संसार में कोई भी पदार्थ या प्राणी अपने मूल रूप में प्रिय या अप्रिय है नहीं। हमारा दृष्टिकोण, मूल्यांकन एवं रुझान ही आनन्ददायक अथवा अप्रिय कुरूप बनाता रहता है।

आनन्द ईश्वर की विभूति है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रिय ही सुखद है। अर्थात् ईश्वर ही आनन्द है। उसी के आरोपण से हम सुखानुभूति करते और प्रसन्न होते हैं। यह स्पष्टतः जानना चाहिए कि परब्रह्म के अनेकानेक नाम हैं। उनमें से उसके प्रमुख तीन गुणों का समन्वय जिसमें है उसे सच्चिदानन्द कहते हैं।


चित्तवृत्ति निरोध का तत्व दर्शन

योग शब्द बहुचर्चित है। इसका सामान्य अर्थ कौतुक कौतूहलों के साथ जोड़ा जाता है। योगी से आशा की जाती है कि वह कोई ऐसा अजूबा पेश करे, जिससे उसकी विलक्षणता सिद्ध होती हो। शरीर से कोई ऐसी हरकत कर दिखाये जिसे सामान्य जन न कर सकते हों। वस्तुओं की कुछ ऐसी उलट-पुलट करे जैसा कि लोक प्रचलन में संगति न होती हो। मदारी, बाजीगर प्रायः ऐसे ही अँगूठे दिखाते रहते हैं। कोई-कोई तो उन्हीं को योगी मान बैठते हैं। पर जब उनके फटे हाल होने और सड़क पर बैठकर कैसा प्रदर्शन करते- पैसा माँगते दीखते हैं तो विश्वास नहीं होता और समझा जाता है कि असल की नकल हो रही है। सिद्धियों के बारे में जो लोक कल्पना प्रचलित है उस कौतूहल के कारण ही लोग उस ओर आकर्षित होते हैं।

महर्षि पतंजलि के अनुसार योग “चित्तवृत्तियों का निरोध” है। मन का स्वभाव चंचल है। यह उसकी संरचना भी है और विशेषता भी। इसी आधार पर अगणित कल्पनाएँ करना और उनमें से ज्ञान अनुभव के आधार पर काट छाँट करके जो उपयुक्त है, उन्हें रोक कर शेष को भगा देना, इसी आधार पर बन पड़ता है। मन में यदि चंचलता न हो तो फिर वह कल्पना करने, निष्कर्ष निकालने तक में समर्थ न हो। तब उसे घटिया जीव-जन्तुओं की तरह प्रकृति प्रेरणा से शरीर यात्रा भर की हलचलें अपना सकना ही बन पड़े। चंचलता दोष नहीं गुण है। जिसकी कल्पना शक्ति जितनी प्रखर होती है, जिसका मन जितना अधिक दौड़ता है वह उतना ही अधिक बुद्धिमान सिद्ध होता है।

चित्त वृत्तियों के निरोध के दो वर्ष हैं। एक यह कि अनावश्यक अन्तर्गत, निरुद्देश्य, कल्पनाएँ न करने के लिए मन को सधाया जाय। उस पर ऐसा अनुशासन लगाया जाय कि वह किसी भी विषय की कैसी ही अनपढ़ कल्पना न करने लगे। उसकी गतिशीलता एक निर्धारित मार्ग पर ही चले। वर्जनाओं का व्यतिक्रम न करे। परिस्थितियों को देखते हुए जो सम्भव नहीं उसके लिए ख्वाबी पुलाव न पकायें। बिना पंख की रंगीली उड़ानें न उड़ें। दिवा स्वप्न न देखें। शेखचिल्ली का उपहासास्पद उदाहरण प्रस्तुत न करें। जो सोचना हो दिशाबद्ध सोचें। सामर्थ्य, परिस्थिति और सम्भावना का तालमेल बिठाते हुए चिन्तन का ऐसा मार्ग निर्धारित करें जिस पर चलने का प्रयास करते हुए किन्तु उपयोगी उपलब्धियों को हस्तगत करने की सम्भावना बने, आशा बँधे।

वस्तुतः चिन्तन को सीमाबद्ध, दिशाबद्ध रखने वाले ही साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, अन्वेषक स्तर के होते हैं। शोध प्रबन्ध लिखने वालों को इसी मार्ग का अवलम्बन करना पड़ता है। आर्चीटेक्ट स्तर के लोग विशाल भवनों में प्रयुक्त होने वाली छोटी से छोटी वस्तुओं का भी विवरण बना देते हैं। महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाने वाले ऐसे ही सधे हुए मस्तिष्क वाले होते हैं। उस विशेषता का अभाव रहने पर सुविकसित स्तर के मनुष्य भी बेसिलसिले की कल्पनाएँ करते रहते हैं। किसी प्रसंग के पूरा होने से पूर्व ही अन्य प्रकार के विचारों में लौट पड़ते हैं। ऐसे लोग कोई काम पूरा करना तो दूर, विवेचन या निर्धारण तक ठीक प्रकार नहीं कर पाते। उन्हें सदा असफलताओं का ही मुँह देखना पड़ता है। अपूर्णता रहने की स्थिति में कोई काम नहीं बन पड़ता। इस कठिनाई से उबरने और सफलता की दिशा में सुनियोजित गति से बढ़ने का लाभ जिस एकाग्रता के सहारे बन पड़ता है उसी को अर्जित करने के लिए योग दर्शन के प्रवक्ता पातंजली ने ‘चित्त वृत्ति का निरोध’ कहा है।

दूसरा अर्थ चित्तवृत्ति का पशु-प्रवृत्तियों के रूप में लिया जाता है। अन्य जीवधारियों की तरह मनुष्य भी पशु वर्ग का एक प्राणी है। उसकी कायिक संरचना बन्दर से मिलती-जुलती है। डार्विन जैसे विकासवादियों ने उसे बन्दर की औलाद ठहराया है। प्राणि समुदाय में कुछ मौलिक प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं उसी के सहारे वे निर्वाह साधन जुटाते और कठिनाइयों से यथासम्भव बचने का प्रयत्न करते रहते हैं। आहार उपलब्ध करने के लिए दौड़−धूप करने और वंश−वृद्धि का अवसर मिलने पर उसके लिए बेचैन हो उठने की प्रवृत्ति इन सभी में समान रूप से पाई जाती है। इसके अतिरिक्त सुविधा साधनों पर लपक पड़ने, साथियों को धकेल कर अपना काम बना लेने की आदत भी उनमें होती है। जिससे अपने क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की आशंका हो, उसमें लड़ पड़ने का स्वभाव भी उनका होता है। घाटा या खतरा दीखने पर पलायन करते भी वे देखे जाते हैं। संक्षेप में यही प्राणि प्रवृत्तियाँ है।

मनुष्य का स्तर अन्य जीवधारियों से ऊँचा है। वह उन्हीं प्रवृत्तियों को अपनाये तो फिर सामाजिक प्राणी न बन सकेगा। स्वार्थों की लड़ाई हर घड़ी बनी रहेगी। समर्थता और बुद्धिमता के रूप में जितना कुछ विशेष मिला है, उसका उपयोग इसी प्रयोजन के लिए होता रहेगा। जिसके लिए कि अन्य प्राणी किया करते हैं। ऐसी दशा में स्नेह-सौजन्य के विकसित होने की आशा नहीं की जा सकती। इस अभाव में सहकार भी चले- आदान प्रदान एवं अनुदान प्रतिदान का क्रम भी बने यह सम्भव नहीं हो सकता।

पशु प्रवृत्तियों को एक शब्द में संकीर्ण स्वार्थपरता कहा जा सकता है। उसमें निर्बलों पर आक्रमण करने की- सुविधाओं को लूट लेने की पूरी छूट है। व्यक्तिगत संयम अनुशासन के लिए जितने प्रतिबन्ध प्रकृति ने लागू कर रखे हैं उतना ही वे पालन करते हैं। सामाजिक विग्रह एवं उत्कर्ष का विचार करके वे कोई नियम निर्धारित नहीं करते और न ऐसे अनुशासन बनाते अपनाते हैं। जिससे समुन्नत स्तर का व्यक्तित्व उगाया या समाज व्यवस्था के माध्यम से बन पड़ने वाला प्रगति क्रम चलाया जा सके। मानवी उत्कर्ष इन्हीं सीढ़ियों पर क्रमिक पदार्पण करते हुए सम्भव हुआ है। यदि पशु प्रवृत्तियों पर नियमन न हो सके तो फिर समझना चाहिए कि आदिम युग के वनमानुषों की स्थिति में वापस लौटने के लिए विवश होना पड़ेगा।

चित्त वृत्तियों के निरोध का दूसरा तात्पर्य यही है कि वैयक्तिक कर्त्तव्यों एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों के लिए उन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया जाय जो वनमानुष काल से लेकर अब तक किसी न किसी रूप में अचेतन क्षेत्र में दबी पड़ी है। नीति धर्म और अनुशासन के अनुयायियों को तोड़कर जो दाँव लगते ही उसी पुराने अभ्यास को कार्यान्वित करने लगती है जिसे मानवी स्तर विकास को देखते हुए हेय ठहराया और दण्डनीय अपराधों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है। इस रोकथाम के लिए आवश्यक है कि ऐसा चिन्तन क्रम अपनाया जाय। ऐसी मान्यता, भावना एवं आकाँक्षा का घेरा बनाया जाय। जिससे पशु प्रवृत्तियों को उच्छृंखलता प्रकट करने से पूर्व ही जकड़ा और मर्यादा में रहने के लिए बाधित किया जा सके।

यही है चित्त वृत्तियों के निरोध का योगानुशासन जिसे अपनाने पर मानसिक बिखराव रुकता और अनौचित्य अपनाने पर अंकुश लगता है। यह प्रयास देखने में निषेधात्मक लगता है। पर वह उतना सीमित है नहीं। बिखराव और अपव्यय की रोकथाम करने पर सहज ही सामर्थ्य का संचय होता है। इस संचय को उपयोगी दिशा में नियोजित करना योग का दूसरा प्रयोजन है। अपव्ययी आलसी दरिद्र के लिए तो उन्नति के सभी द्वार बन्द हैं जबकि जमा पूँजी होने पर उसके सहारे सुविधा एवं प्रगति के अनेकों सरंजाम जुटाये जा सकते हैं। आत्मिक प्रगति का यही एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है।


Quotation

सन्त ज्ञानेश्वर ने सज्जन की पानी के साथ तुलना की है। वह इतना मृदु होता है कि आँखों में रहते या टपकने पर भी कष्ट नहीं देता, किसी पर प्रहार नहीं करता। अपनी नम्रता की शक्ति से जिस पत्थर पर गिरता है उसे भी घिसने और चिकना बनाने में सफल होता है।


नियन्ता की विधि-व्यवस्था का प्रमाण कर्मफल सिद्धान्त

मानव जीवन विचित्रताओं का ऐसा एक समुच्चय है जिसे देखकर कारण समझ न पड़ने पर हतप्रभ होकर रह जाना पड़ता है। ऐसी अनेकों अनबूझ पहेलियाँ जन्म से मरण तक मनुष्य के पल्ले बँधती रहती हैं। सामान्य बुद्धि उन्हें समझ नहीं पाती। समझ नहीं आता कि एक-सी परिस्थितियाँ, समान साधन होते हुए भी एक ही माता-पिता की दो सन्तानें भिन्न प्रकृति की क्योंकर विकसित होती चली जाती हैं। बौद्धिक दृष्टि से एक अत्यन्त विकसित पाया जाता है तो एक मन्दबुद्धि होता देखा जाता है। एक भाव सम्वेदना की दृष्टि से कोमल हृदय का तो दूसरा निष्ठुर प्रकृति का देखा जाता है। एक कायर-भीरु मनःस्थिति का बन जाता है तो एक निडर साहसी सन्तुलित मनःस्थिति का।

वातावरण, आनुवांशिकी एवं अन्यान्य बहिरंग जगत से जुड़ी परिस्थितियों ही सन्तति को भिन्न-भिन्न रूप देती है, ऐसा विशेषज्ञों का मत है। इतना होते हुए भी वे इस प्रश्न का जवाब नहीं दे पाते कि एक-सी परिस्थितियाँ एवं आनुवांशिक घटकों के रहते हुए भी सर्वथा विपरीत विकास क्योंकर होता है? ऐसे कौन से सूक्ष्म घटक हैं जो जन्म-जन्मान्तरों तक आनुवांशिकी के नियमों की अवहेलना कर मानव प्रकृति को गढ़ते चले जाते हैं। प्रत्यक्षतः कारण समझ में न आने पर मनुष्य का ऊहापोह स्वाभाविक भी है।

जन्मजात प्रतिभाओं- ‘प्रोडिजी’ के ऐसे अनेकों उदाहरण आये दिन पढ़ने को मिलते हैं। अन्य बच्चों की तुलना में थोड़े से श्रम व अध्यवसाय से ही उनकी प्रतिभा को निखरते देखा जा सकता है। कई बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टि से विलक्षण मेधा बचपन से ही पनपती देखी जाती है तो कुछ में कला-संगीत की अभिरुचि के गुण नन्हें बीज के रूप में पाये जाते हैं। बिना किसी परिश्रम के अनायास ही ये प्रकट होती व एक समर्थ शिक्षक के हाथों पड़ने पर फलती-फूलती देखी जाती है। इन असामान्य प्रतिभाओं को बिना अधिक प्रयत्न व मनोयोग के अभीष्ट स्तर प्राप्त करते देखकर सभी को आश्चर्य होता है। सामान्य बुद्धि के व्यक्ति इसे मात्र संयोग मानकर सन्तोष भर कर लेते हैं। लेकिन तत्वदर्शी- अध्यात्मवेत्ता अच्छी तरह जानते हैं कि संसार में कोई भी घटना अकारण नहीं घटती। आकस्मिक संयोगों के पीछे भी ऐसे सूक्ष्म कारण सन्निहित हैं जिनका परोक्ष जगत से सम्बन्ध है।

वर्तमान में मनुष्य जीवन के विकास के हर घटनाक्रम को मनीषियों ने पूर्व जन्म के प्रयासों की फलश्रुति माना है। भारतीय अध्यात्म का मर्म समझकर मन्तव्य व्यक्त करने वाले दार्शनिकों का मत है कि कर्मों के सूक्ष्म संस्कार जीवात्मा के साथ मरणोपरान्त भी बने रहते हैं। इन्हीं संस्कारों को बाद के जन्मों में विकसित होते देखा जा सकता है। वे ही जन्मजात विशेषताओं के रूप में प्रकट होते हैं। मनुष्य की प्रकृतिगत विशिष्टताओं के गठन में आनुवांशिक कारणों का जितना योगदान होता है उससे कम पूर्व जन्मों के अर्जित सूक्ष्म संस्कारों का नहीं होता। जन्मजात प्रतिभा के उदाहरण उसी सत्य के प्रमाण हैं। प्रतिभा ही नहीं स्वभाव में अनायास प्रकट होने वाली भली-बुरी विशिष्टताएँ, जिनकी संगति न तो आनुवांशिक कारणों से बैठती है, न शैक्षणिक प्रयासों से और न ही बाह्य परिस्थितियों के प्रभाव से, वे भी वस्तुतः सूक्ष्म संस्कारों की ही प्रतिक्रियाएँ होती हैं, जो स्वभाव का अंग बनी रहती है। व्यवहार विज्ञानी, मनःशास्त्री स्वभावगत इन विशेषताओं का कारण जब वातावरण में पैतृक गुणों में ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं तो कितनी ही बार असफलता हाथ लगती है।

जन्म के साथ ही कितनों को अनुकूल परिस्थितियाँ अनायास ही मिल जाती हैं। बिना किसी पुरुषार्थ के वे सम्पदा और वैभव के मालिक बन जाते हैं। विकसित होने के लिए कुछ को परिवार का सुसंस्कृत वातावरण मिल जाता है। जबकि कुछ को घोर प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ता है। सर्वांगीण विकास के लिए अभीष्ट स्तर के साधन एवं सहयोग नहीं जुट पाते। उनका अपना पुरुषार्थ ही आगे बढ़ने का एक मात्र सम्बल होता है। अपंगता एवं विकलांगता के शिकार बच्चे भी पैदा होते हैं। जिन मासूमों ने जीवन के एक भी वसन्त न देखे हों, जिन्हें पाप पुण्य का, भले-बुरे का कुछ भी ज्ञान नहीं होता, उन्हें अकारण ही प्रकृति के कोप का भाजन बनना पड़े, यह बात तर्क के गले नहीं उतरती। लेकिन नियम एवं व्यवस्था जड़ प्रकृति में भी दिखायी पड़ती है तो कोई कारण नहीं कि वे चेतन जगत पर लागू न हों। जन्मजात विकलांगता, दुर्घटना में मृत्यु, विषम परिस्थितियों में भी बच निकलने का कारण सामान्य बुद्धि समझ नहीं पाती। उसे मात्र संयोग मान लेने से समाधान नहीं हो पाता। संयोग हो तो भी उसका कुछ कारण कुछ आधार होना चाहिए।

कर्मफल सिद्धान्त की आध्यात्मिक मान्यता में उपरोक्त गुत्थियों का हल सन्निहित है। पेड़ पादपों की तरह जीवन का भी शरीर के साथ ही अन्त नहीं हो जाता। आदि और अन्त से रहित वह सतत् प्रवाहित रहता है। मृत्यु शारीरिक परिवर्तन की एक अवस्था है जिसमें नये जीवन की पृष्ठभूमि सन्निहित है। जीवात्मा का वह एक पड़ाव है जहाँ से नयी तैयारी, नयी उमंग के साथ एक नये जीवन की शुरुआत होती है। कर्मों के सूक्ष्म संस्कार उसके साथ चलते हैं। उन्हीं के आधार पर अगले जीवन की भली-बुरी परिस्थितियाँ जीवात्मा उपलब्ध करती है। जन्मजात प्रकट होने वाली भली-बुरी विशेषताएँ पूर्व जन्मों के कर्मों की ही प्रतिफल होती हैं जो अनायास ही प्रत्यक्ष होती दिखायी पड़ती हैं। कर्मों का प्रतिफल तत्काल इसी जीवन में मिले, यह आवश्यक नहीं। कर्मों का फल पकने तथा मिलने की सुव्यवस्था होते हुए भी वह अविज्ञात है। कर्मफल की स्वचालित व्यवस्था एक रहस्य होते हुए भी इस सत्य पर प्रकाश डालती ही है कि अच्छे-बुरे कर्मों का फल मिलना सुनिश्चित है। कब और कितने परिमाण में, यह उस सत्ता ने अपने हाथों में रख छोड़ा है।

गम्भीरता से विचार करने पर सृष्टा की इस कर्मफल व्यवस्था में उसकी दूरदर्शिता का ही आभास होता है। जड़ जगत के विकास एवं मरण के सुनिश्चित तथा ज्ञात क्रम में किसी प्रकार का कौतूहल नहीं होता। ढर्रे की भाँति सब कुछ चलता जान पड़ता है। पेड़, पादप पैदा होते और समाप्त होते रहते हैं? जीव जन्तुओं का भी जीवन शकट ढर्रे की प्रक्रिया से लुढ़कता रहता है। परमात्मा ने मनुष्य को भी उन्हीं की स्थिति में रखा होता तो मानव जीवन का कुछ विशेष महत्व नहीं रह जाता। बुद्धि और पुरुषार्थ को अपना जौहर दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता। चोरी करते ही अपंग हो जाने, झूठ बोलते ही जीभ के गल जाने, व्यभिचार करते ही कोढ़ हो जाने, हत्या करते ही अकस्मात मर जाने की कर्मफल व्यवस्था रही होती तो मनुष्य की स्वतंत्रता एवं कार्य कुशलता का कुछ महत्व नहीं रह जाता। सब कुछ यंत्रवत चलता। कुछ विशेष सोचने तथा विशेष करने की उमंग नहीं रहती। भवितव्य की जानकारी होने पर जीवन क्रम नीरस ही नहीं, भयावह भी होता। चारों ओर अकर्मण्यता छा जाती। सचमुच ही उस नियामक सत्ता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहिए जिसने कर्मफल व्यवस्था को अगणित जन्म शृंखलाओं के साथ जोड़कर मानवी विवेक को अपने वर्चस्व का परिचय देने का स्वतंत्र अवसर प्रदान किया है।

कर्म का उचित न्याय देने में समाजगत व्यवस्था में अन्धेरगर्री चल भी सकती है पर ईश्वरीय व्यवस्था में ऐसी कभी सम्भव नहीं है। उसकी त्रिकालदर्शी आँखों से कुछ भी नहीं छिप सकता। कर्मों का फल मिलना सुनिश्चित है, अच्छे का अच्छा और बुरे का बुरा। सम्भव है, कोई व्यक्ति समाज एवं न्याय की आँखों में धूल झोंककर अपने कुकर्मों तथा पापों का दण्ड पाने से बच जाय पर ईश्वरीय न्याय विधान से बचना सम्भव नहीं है। सम्भव है इस जीवन में उसका फल न मिले पर दूसरे जन्मों में मिलना सुनिश्चित है।

इस तथ्य पर योगदर्शन स्पष्ट प्रकाश डालता है। योगदर्शन साधन पाद सूत्र 13-15 में उल्लेख है- “सति मूले तद्विपाको जात्यायु भोंगा।”

अर्थात्- “कर्म का मूल रहने पर जब वह पकता है तो जाति या जन्म, आयु और योग के रूप में प्रकट होता है।” यह जन्म, आयु और भोग, पुण्य और पाप की अपेक्षा से सुख और दुःख रूपी फल वाले होते हैं।

कर्मफल सिद्धान्त को और भी स्पष्ट करने के लिए प्राचीन ऋषियों ने कर्मों को तीन भागों में बाँटा है- संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध। वह कर्म जो अभी फल नहीं दे रहे हैं- बिना फलित हुए इकट्ठे हो जो हैं, उनको संचित कर्म कहते हैं। कालान्तर में वे फल देने के लिए सुरक्षित रखे हुए हैं। उन्हें फिक्स्ड डिपाजिट की संज्ञा दी जा सकती है। पर समस्त संचित कर्म भी एक जैसे नहीं होते, न ही उनका फल एक ही समय में मिलता है। विभिन्न प्रकार के संचित कर्मों के पकने की अवधि अलग-अलग हो सकती है।

इसी प्रकार जो कर्म वर्तमान में किया जाता है वह क्रियमाण है। संचित कर्मों में से जिनका विपाक हो जाता है अर्थात् जो पककर फल देने लगते हैं उनको प्रारब्ध कहते हैं। जन्म के साथ अनायास भली-बुरी परिस्थितियाँ लिए अथवा जीवन में अकस्मात उपलब्धियाँ लिए वे ही प्रकट होते हैं। कर्मों की शृंखला इस प्रकार है- क्रियमाण कर्म का अन्त संचित में हो जाता है और संचित में जो कर्मफल देने लगते हैं, उनकी प्रारब्ध कहते हैं।

मनुष्य का अधिकार क्रियमाण कर्मों पर है। संचित और प्रारब्ध उसकी ही उपलब्धियाँ हैं जिन पर मनुष्य का कोई अधिकार नहीं। भले-बुरे कर्मों को वर्तमान में करने न करने की मनुष्य को पूरी-पूरी छूट तो है पर वह स्वतंत्रता फल पाने में नहीं। “अवश्यमेव भोत्कव्यं कृतंकर्म शुभाशुभम्”- अर्थात् “किये गये शुभ-अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है”- कर्मफल सिद्धान्त का यह प्रमुख सूत्र है।

जीवन की अगणित गुत्थियों-विचित्रताओं का समाधान कर्मफल सिद्धान्त से ही सम्भव है। आस्तिकता एवं नैतिकता में मेरुदण्ड इस सिद्धान्त को मानने से ही मनुष्य और समाज सत्प्रवृत्तियों के- सत्कर्मों के पक्षधर बने रहे सकते हैं। समाज में सत्परम्परा की प्रतिष्ठापना, मानव जीवन में चरित्र निष्ठा का समावेश उसी स्थिति में सम्भव है जब इस सिद्धान्त को मानते हुए व्यवहार में उत्कृष्टता परिलक्षित होने लगे।


समय और फर्ज (kahani)

महाप्रभु ने धरती पर कोप बरसाने का निश्चय किया। सात दिन प्रलय मेघ बरसाकर सब कुछ को डुबा देने का निर्णय उन्होंने नूह को भी बता दिया।

महाप्रलय के बाद! कुछ न बचेगा तो नई सृष्टि कैसे बनेगी? नूह की उस जिज्ञासा पर महाप्रभु मुस्कराये, उनको दूरदर्शिता को देखकर एक नाव बनाने का आदेश दिया। जिस पर वे खुद भी रहें और अपने साथ-साथ पशु-पक्षियों के भी कुछ जोड़े रख लें। जलयान बनने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया। वर्ष पूरा हुआ। महाप्रभु ने नूह को बुलाया और नाव बनने की बात कही। नूह ने सिर नीचा कर लिया। बोले तीन बढ़ई बीमार पड़ गये। लकड़ी बेचने वाला मुकर गया। मैं क्या करता? चालीस दिन की मुहलत और दी गई। कहा गया कि इस अवधि में काम हो जाना चाहिए। चालीस दिन बीतने पर जब नूह खाली हाथ लौटे, तो महाप्रभु ने गरमाई दिखाई और कारण पूछा। “लुहार यात्रा पर चले गये। मजूरों ने हड़ताल कर दी। दोनों लड़के गाने-बजाने में लगे रहे। किसी ने साथ न दिया में क्या करता? नूह ने विवशता व्यक्त करते हुए कहा। सात दिन का अवसर और दिया गया। पशु पक्षियों के जोड़े भी बटोर लेने की आज्ञा हुई। अन्तिम दिन आया तो भी वह अकेले खाली हाथ खड़े थे। बिना पूछे ही बोले- पशु पक्षी भाग खड़े हुए। पुचकारने से भी नहीं लौटे न वे बिकते हैं और न मेरी पकड़ में आते हैं। महाप्रभु, अब की बार अधिक क्रुद्ध थे। बोले- ऐसी ही गैरजिम्मेदारियाँ देखकर तो में आजिज आ गया हूँ और महाप्रलय बरसा रहा हूँ? यदि धरती वाले समय और फर्ज का समझते तो मुझे उसे डुबाने की जल्दी क्यों पड़ती?


सत्य के प्रकाश को हृदयंगम करें

अध्यात्म क्षेत्र में ज्ञान को प्रकाश कहा जाता है। प्रकाश अर्थात् वह स्थिति जिसमें यथार्थता प्रत्यक्ष दृष्टि गोचर होने लगे। अन्धकार वह जिसमें भ्रान्तियों-भटकावों में मारे-मारे फिरना पड़े। यों दिन में प्रकाश और रात्रि में अन्धकार रहता है, पर तत्वज्ञान की दृष्टि से सत्य के निकटवर्ती पहुँची मान्यताओं को- आत्मबोध कहा जाता है। इसी को सत्यनारायण का परब्रह्म का साक्षात्कार भी कहते हैं। साधना का लक्ष्य यही है। स्वाध्याय और सत्संग-मनन और चिन्तन के सहारे साधक उस स्थिति तक पहुँचने का प्रयत्न करता है जिसमें माया से भ्रान्ति से छुटकारा मिल सके। यही मुक्ति की- जीवन मुक्ति की स्थिति है।

सत्य के लिए तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण आदि के प्रत्यक्षवादी आधार तो चाहिए ही। इसके अतिरिक्त श्रद्धा की आवश्यकता होती है। उसी के सहारे प्रचलन के विपरीत आदर्शवादिता अपनाने के लिए विश्वास जाता और साहस उभरता है।

भय और अज्ञान यह दो अन्ध श्रद्धा के उत्पादन हैं। यह दोनों ही विवेक का कपाट बन्द करते हैं। सत्य तक पहुँचने के मार्ग में भारी बाधा प्रस्तुत करते हैं। ऐसे लोग आमतौर से दुराग्रही होते हैं। ‘मेरा सो सच- और का सो झूँठ’ यही उनकी मान्यता रहती है। अन्धश्रद्धा से पिछड़े लोगों की तरह तो प्रगतिशील भी ग्रसित पाये जाते हैं। अशिक्षितों की तरह शिक्षित भी उसके चंगुल में फँसे पाये जाते हैं। अन्तर इतना ही रहता है कि पिछड़े लोग जहाँ पुरातन को ही सब कुछ मानते हैं। उसी प्रकार तथाकथित प्रगतिशील को अर्वाचीनों का नव कथन ही सब कुछ प्रतीत होता है। आँखें खोलकर देखने और अन्याय प्रतिपादनों को धैर्यपूर्वक सुनने-समझने की विवेकशीलता दोनों की ही आवेशग्रस्त मनःस्थिति में टिक नहीं पाती।

अध्यात्मवादी और अन्धविश्वासी होना, इन दिनों समानार्थ बोधक बन गये हैं। पर वस्तुतः दोनों एक-दूसरे से सर्वथा पृथक हैं। गाँधी जी कहते हैं। “आध्यात्मिकता की पहली शर्त है निर्भयता। डरपोक मनुष्य कभी नैतिक नहीं हो सकता। इसलिए उसका अध्यात्मवादी होना भी कठिन है। विवेकानन्द कहते थे जिसे अपनी गरिमा पर आस्था नहीं वह अब्बल दर्जे का नास्तिक है। आत्मविश्वास ही मनुष्यता की पहली पहचान है। व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं ही है।”

पैराशूट की तरह मनुष्य का मस्तिष्क भी तभी अपना काम ठीक तरह करता है जब वह खुला हुआ है। जिसने पूर्वाग्रहों से अपने को जकड़ लिया है जो दूसरे की सुनना समझना ही नहीं चाहता उसे कोठरी में बन्द कैदी की उपमा दी जानी चाहिए।

श्रद्धा का सहोदर विश्वास है। विश्वास तर्क और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। उसके पीछे नीति और विवेक का समर्थन जुड़ा रहना आवश्यक है। शास्त्र उल्लेख या आप्त वचन विचारणीय तो हो सकते हैं पर उन प्रतिपादनों पर आँखें बन्द करके नहीं चला जा सकता। पक्ष की तरह प्रतिपक्ष की बात भी सुनी जानी चाहिए। न्याय पीठ इसी आधार पर उपयुक्त निर्णय दे सकने की स्थिति तक पहुँचती है।

शास्त्र अपने ही वर्ग के लोगों द्वारा लिखे होने पर मान्य हों और दूसरे वर्ग द्वारा मान्यता प्राप्त झुठलाया दिया जाय? यह कहाँ का न्याय? अपने समुदाय के आप्त जन जो कह गये हैं, वही सत्य है और अन्य वर्गों के आप्त जन झूठे ही बोलते थे, ऐसा क्यों सोचा जाय? सत्य की शोध के लिए मानस पूरी तरह खुला रहना चाहिए और अपने पराये का भेद किये बिना यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि औचित्य क्या कहता है? आदर्शों का समर्थन किस ओर से मिलता है।


हठ योग लाभदायक भी हानिकारक भी

हठ ऐसे आग्रह को कहते हैं जिसमें अपनी बात मनवाने के लिए जिद ठानी गई हो। समझौते या परिवर्तन की गुंजाइश न रहने दी गई हो। हठयोग शब्द से तात्पर्य ऐसे ही साधनों से है जिस में प्रवाह, प्रचलन, अभ्यास की परवाह न करते हुए, जो चाहा है वही कर गुजरने का निश्चय किया गया है। यह दबाव अपने ही शरीर पर, मन पर डालने का हठयोगी प्रयत्न करते हैं।

सामान्यतया यही प्रतीत होता है कि प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न करने से विग्रह एवं संकट खड़ा होगा। ऐसा होता भी है। पर जब इसे वैज्ञानिक विधि के साथ-साथ सम्पन्न किया जाता है तो हानि से बचते हुए अतिरिक्त लाभ उठाने का अवसर भी मिलता है।

कई हठयोगी दिन-रात खड़े रहकर लम्बी आयु गुजार देते हैं। वे एक झूले के सहारे अपनी छाती टिकाकर झपकियाँ लेते और नींद की आवश्यकता पूरी करते रहते हैं। बाबा मौजी साईं का स्वर्गवास 85 वर्ष की आयु में हुआ। कहा जाता है कि उनने 18 वर्ष की आयु में खड़े रहने का व्रत लिया था और उसे आजीवन निभाया।

एक हाथ ऊँचा उठाकर रहने वाले हठयोगी पिछले दिनों तक बहुत जगह पाये जाते थे। उनका जो हाथ ऊँचा उठा रहता था वह एक प्रकार से सूख ही जाता था। यों उसमें रक्त संचार किसी प्रकार थोड़ी मात्रा में चलता रहता था। इस विधा में उन्हें क्या आध्यात्मिक लाभ मिलता था, यह तो विवादास्पद है लेकिन अकारण की गयी ऐसी तितिक्षा के पीछे यदि वास्तव में उद्देश्य छिपा हो तो उसके सिद्धि रूपी परिणाम देखे जा सकते हैं।

सर्दी ओर गर्मी के महीने के सम्बन्ध में यही बात है। ठंड के दिनों में ठण्डे पानी में नहाने की कई लोग साधना करते हैं। मार्ग शीर्ष स्नान, माघ स्नान के व्रतधारी गंगा में प्रभातकाल की तेज हवा और ठण्डक में महीने भर तक स्नान करते हैं। इसी प्रकार गर्मी के दिनों में चारों ओर आग जलाकर धूनी तापने वाले लोगों के सम्बन्ध में भी यही बात है। तेज गर्मी और कड़ाके की सर्दी में भी बिना वस्त्र गुजारा करने वाले साधु सन्त अभी भी देखे जाते हैं। कुछ दिन पहले तक गंगोत्री क्षेत्र में कई महात्मा बर्फ जमने की सर्दी के दिनों में वहाँ निर्वस्त्र निवास करते थे। उत्तरकाशी के विष्णु स्वामी का कुछ दिन पूर्व ही देहावसान हुआ है जो गंगा के ठण्डे जल में प्रातःकाल से लेकर तीसरे प्रहर तक खड़े-खड़े जप ध्यान करते थे।

ब्रह्मचर्य को भी हठयोग का एक अंग माना गया है। यौवन का उभार आने पर हर नर मादा में प्रजनन की उमंग उठती है और यौनाचार के लिए मन चलता है। उस उभार को हठपूर्वक रोक देना, शरीर को उससे वंचित रखना और मन को वैसा न सोचने के लिए बाधित करना, मनोनिग्रह की ही एक प्रक्रिया है।

व्रत उपवासों के सम्बन्ध में भी यही बात है। जब पेट में भूख लगती है और खाने की इच्छा बेचैन करती है तो भी संकल्पपूर्वक उसका दमन करना, निराहार रहना ऐसा कृत्य है जिसे प्रकृति प्रेरणा का प्रतिरोध कहा जा सकता है।

इन उभारों को रोक सकना प्रबल मनोबल के सहारे ही सम्पन्न हो सकता है। अन्यथा अभावग्रस्त स्थिति में भी कुछ न कुछ उपाय खोजा और साधन जुटाने का प्रयास किया जा सकता है।

संकल्प बल का शरीर पर कितना अधिक आधिपत्य हो सकता है, इसके कितने ही विलक्षण उदाहरण कई अभ्यासियों द्वारा प्रस्तुत किये जाते रहते हैं। माँस-पेशियों को अकड़ाकर इतनी कड़ी कर दिया जाता है कि उन्हें धातु पात्र की तरह बजाया जा सके। नाक, कान जैसे कोमल अवयवों को इतना कठोर कर देना, जिससे उन्हें किसी प्रकार भी झुकाया न जा सके, ऐसा ही अभ्यास है जिसे आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। सीने से सटाकर लोहे की छड़ मोड़ देने का करतब प्रोफेसर राममूर्ति दिखाया करते थे। ताराबाई अपने बालों के जूड़े से अपने शरीर जितने वजन का पत्थर उठा लिया करती थीं। मैसूर के हठयोगी रामानन्द अपनी उँगलियों से कैंची का काम लेते थे। कपड़े और टीन की चद्दरें इस प्रकार काट देते थे मानों उनकी उँगलियाँ इसी प्रयोजन के लिए बनी हों।

शरीर के किसी अंग का तापमान असाधारण रूप से गिरा देना, हृदय की धड़कन बन्द या न्यूनतम कर देना ऐसे ही चमत्कार हैं जिनके प्रदर्शनों की चर्चा आये दिन होती रहती है। उनमें कोई जादू भी नहीं होता। प्रयोक्ता इसमें विशुद्ध रूप से बढ़े हुए मनोबल का प्रयोग परिचय देते रहते हैं। जमीन में गड्ढा खोदकर उसमें हफ्तों तक बन्द बैठे रहने वाले, समाधि लगाने वाले इसे अपनी इच्छा शक्ति का चमत्कार कहते हैं, जिसके आधार पर अवयवों को उनकी स्वाभाविक एवं सामान्य क्षमता से भिन्न स्थिति तक जा पहुँचने के लिए सधाया जाता है।

नेति, धोति, वस्ति, वज्रौली, कपाल भाति आदि क्रियाओं में अवयवों से उनके सामान्य क्रियाकलाप से भिन्न प्रकार के कार्य कराये जाते हैं। उनके प्रथम प्रयासों में अड़चन प्रतीत होना, कष्ट अनुभव होना स्वाभाविक है, पर जब मनोबल पूर्वक उन्हें अभ्यास के लिए धीरे-धीरे सधाया जाता है तो वे भी सरकस के जानवरों की तरह ऐसे कृत्य करने लगते हैं जो उनकी प्रकृति या परम्परा में सम्मिलित नहीं है।

मानवी काया का ढर्रा एक क्रम के अनुसार घूमता है। अवयवों की सामर्थ्य भी एक सीमा तक है। पर यह सब अभ्यास क्रम पर निर्भर है। इसे पत्थर की लकीर नहीं समझा जाना चाहिए। बदलने का निश्चय कर लिया जाय और उसके लिए क्रम व्यवस्था का सुनियोजित मार्ग अपनाया जाय तो वैसा परिवर्तन कठिन होते हुए भी असम्भव नहीं है।

उत्तरी ध्रुव क्षेत्र की कड़ाके की ठण्ड में हिरन, कुत्ते, भालू रहते हैं। ऐस्किमो जाति के मनुष्यों ने भी उसी वातावरण में रहने के लिए अपने को अभ्यस्त कर लिया है। कितने ही वनवासी कबीले सघन क्षेत्रों में इस प्रकार निर्वाह करते हैं मानों अभी भी आदिम युग बना हुआ हो।

स्वभाव को नाजुक बना लेने पर वह छुईमुई जैसी भी बन सकती है कि ठण्डा पानी पीते ही छींके आने लगे। इसके विपरीत गड़रिया लुहारों की तरह एक गाड़ी में समूची गृहस्थी लेकर खानाबदोशों की तरह भी जिन्दगी बिताई जा सकती है। सभी मौसमों में खुले में रहकर ऋतु प्रभावों को सहन करते रहने योग्य शरीर एवं स्वभाव ढल सकता है।

भूमिगत समाधि प्रदर्शन में धड़कन बन्द कर लेना शरीर को निःचेष्ट होना या गहन तन्द्रागस्त होना आवश्यक नहीं। यह कार्य अमुक वातावरण में रहने का अभ्यास कर लेने पर भी हो सकता है। जिस गड्ढे में समाधि लगाई जाती है उसमें इतनी खाली जगह रह जाती है। जिसमें साँस लेते रहने पर निर्धारित अवधि तक जिया जा सके। फिर जमीन भी सर्वथा ठोस नहीं होती उसमें हवा रहती है और पोल में आक्सीजन देते रहने का क्रम किसी न किसी रूप में बना रहता है। यदि ऐसा न होता तो छोटे बिलों में दर्जनों चूहे किस प्रकार घुसे रहते हैं। साँप कैसे जीवित रहते हैं?

छोड़ी हुई साँस में भी इतनी आक्सीजन बनी रहती है जिसमें फिर भी अनेक बार साँस ली जाती रहे। ऐसा न होता तो मोटे रुई के लिहाफ ओढ़कर चारों ओर से लपेटकर उसी के भीतर रात भर साँस लेते हुए लोग कैसे सोया करते। प्रश्न या आश्चर्य हवा का रहता है। बिना पानी पिये तो ठण्डे वातावरण में बहुत समय तक रहा जा सकता है। शीत ऋतु में अजगर भालू आदि गहरी नींद में सो जाते हैं और जब मौसम अनुकूल होता है तब बाहर निकलते हैं। इस बीच में वे खाते-पीते कुछ भी नहीं। संचित चर्बी के सहारे मजे में वह अवधि कट जाती है। ऊँट एकबार ही इतना चारा पानी पेट में जमाकर लेता है जिसके सहारे हफ्तों चलकर लम्बे रेगिस्तान पार किये जा सकें। प्रयत्न करने पर मनुष्य आसानी से अपनी प्रकृति वैसी ढाल सकता है।

भूमिगत समाधि में सबसे बड़ी बात है मानसिक संतुलन बनाये रहने की। घबरा जाने वाला व्यक्ति मर सकता है। किन्तु चारों ओर बन्द रहने पर भी जो घबराते नहीं ऐसे भी लोग हो सकते हैं। राकेटों में अन्तरिक्षीय यात्रा पर निकलने वालों को ऐसे वातावरण में रहने का अभ्यास करना होता है। वे जिस कैप्सूल में बन्द रहते हैं उससे सिर निकालने की गुंजाइश नहीं रहती। यात्री पूरी तरह मशीनों से और खास किस्म के कपड़ों से जकड़ा होता है। मलमूत्र विसर्जन भी उसी में करना होता है और सो लेने का काम भी बैठे-बैठे ही करना होता है। हर किसी के लिए यह कठिन है पर जो अभ्यास करले उनके लिए यह सरल प्रतीत होता है। पनडुब्बियों में लोग महीनों गुजार लेते हैं। युद्ध टैंकों में चालक को भीतर ही बैठना होता है और वह शत्रु की गोलियों या बमों से प्रभावित न हों ऐसे अभेद्य बक्से में बन्द रहता है। भूमिगत समाधि का प्रदर्शन करने वालों को इससे अधिक कठिन परिस्थितियों में नहीं रहना पड़ता। अन्तरिक्ष राकेट की ऊपरी परत गरम हो जाती है पर गड्ढे में तो वातावरण पूरी तरह ठण्डा रहता है।

गान्धी मेडिकल कालेज हैदराबाद के प्राध्यापक डा. शंकर राव का एक लेख ‘साइन्स टुडे’ पत्रिका में छपा है। उसमें बम्बई के आर. जे. वकील द्वारा इस सन्दर्भ की गई खोजों का उल्लेख है। श्री वकील ने किसी रामदास नामक प्रदर्शन कर्त्ता की स्थिति के सम्बन्ध में परीक्षणात्मक विवरण छपा है। उनने निष्कर्ष निकाला है कि उतने समय के लिए जितनी हवा आवश्यक है उतनी उस गड्ढे के घेरे में मौजूद थी।

उपरोक्त लेख में यह दर्शाया गया है कि कोई व्यक्ति बन्द जगह में रहने का अभ्यास करले तो समाधि जैसे गढ्ढों में रह सकता है। बम्बई के निकट लोनावला स्थित योगाश्रम में डा. पी. करमवेलकर ने यह सिद्ध कर दिया कि समाधि प्रदर्शन एक सामान्य-सा कौतुक है। उनने इसके लिए दो ऐसे व्यक्ति तैयार किये जिनका योगाभ्यास से दूर का भी सम्बन्ध नहीं था। वे गड्ढे में बैठने की कला में अभ्यस्त हो गये। 18 घण्टे गढ़े रहे और नियत अवधि के उपरान्त हँसते हुए बाहर निकल आये। इस प्रक्रिया का प्रदर्शन करने वालों को अभ्यास कौशल भर होता है। उनमें दैवी शक्ति जैसी कोई बात नहीं होती।

राजयोग विचार प्रधान है। उसमें ध्यान धारणा की प्रधानता है। मनन, चिन्तन पर जोर दिया गया है। ज्ञान और भक्ति उसी क्षेत्र में आते हैं। कर्मयोग के लिए जिस बलिष्ठता और सहन क्षमता की आवश्यकता है उसे उपार्जित करने के लिए तप तितीक्षा का अवलम्बन लेना पड़ता है यह हठयोग है। इसे अनुभवी विशेषज्ञों के संरक्षण में अपनी सहन शक्ति के साथ तालमेल बिठाते हुए ही किया जाना चाहिए। मनमर्जी से कुछ भी हठयोग ठान लेना लाभ के स्थान पर हानिकारक सिद्ध हो सकता है।


ब्राह्मण पद्मनाभ (kahani)

कथा वाचक गरीब ब्राह्मण पद्मनाभ कथायें बाच कर ही अपना निर्वाह करते थे। इस प्रकार जीविकोपार्जन के साथ-साथ सद्ज्ञान प्रचार का पुण्य प्रयोजन भी पूरा हो रहा था। धर्म ग्रन्थ का अध्ययन करते हुए उन्होंने एक स्थान पर पढ़ा- ज्ञानदान का प्रतिफल धन के रूप में ग्रहण नहीं करना चाहिए।

उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि अब तक वे इस नियम की अवहेलना ही करते थे। धर्म प्रचार के लिए जब वे कथायें किया करते तो लोग जो दक्षिणा देते उसी से अपना गुजारा चलाते थे। अब तक जो भूल हो गयी सो हो गयी अब न होने दूँगा। इस संकल्प के साथ उन्होंने जंगल में लकड़ी काटकर अपना गुजारा चलाना आरम्भ कर दिया। दान दक्षिणा में लोग पैसा तो चढ़ाते ही थे, उस धन का उपयोग वे गुरुकुल पुस्तकालय तथा अन्य जनोपयोगी कार्यों में करने लगे।


आखिर मृत्यु भय क्यों?

राजा परीक्षत को भागवत सुनाते हुए जब शुकदेव को छह दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा क्षुब्ध हो रहा था।

शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई- राजन्! बहुत समय पहले की बात है। एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई। वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गन्दे बीमार बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह चल फिर नहीं सकता था इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिये जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गन्दी, छोटी, अन्धेरी और दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर विवशतावश उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।

बहेलिये ने कहा- “आश्रय हेतु कुछ राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते। इसी में रहने की कोशिश करते हैं और अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा।” राजा ने प्रतिज्ञा की- कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है। यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है। सिर्फ एक रात ही काटनी है।

बहेलिये न अन्यमनस्क होकर राजा को झोंपड़ी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किये झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दुहरा दिया। राजा एक कोने में पड़ा रहा। रात भर सोया। सोने में झोंपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सवेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राज-काज की बात भूल गया और वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।

प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिये आग्रह करने लगा तो बहेलिये ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा। उपद्रव और कलह का रूप धारण कर लिया। राजा मरने मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा।”

शुकदेव जी ने पूछा- परीक्षित! बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था? परीक्षित ने कहा- “भगवान वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राज-काज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है।”

शुकदेव जी ने कहा- परीक्षित! वह और कोई नहीं तुम स्वयं हो। इस मल मूत्र की कोठरी देह में जितने समय तुम्हारी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आप थे। इस पर भी आप झंझट फैला रहे हैं। मरना नहीं चाहते एवं मरने का शोक कर रहे हो। क्या यह उचित है?”

राजा ने कथा के मर्म को स्वयं पर आरोपित किया एवं मृत्यु भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की अपनी तैयारी कर ली। अन्तिम दिन का कथा श्रवण उन्होंने पूरे मन से किया।

वस्तुतः मरने के लिये हर मानव हो हर घड़ी तैयार रहना चाहिये। यह शरीर तो कभी न कभी विनष्ट होना ही है। लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती। उसी को ऊँचा उठाने के प्रयास जीवन पर्यन्त किये जाते रहें तो भागी जन्म सार्थक किया जा सकता है।


प्रेत बाधा एक चिकित्सा योग्य मनोरोग

भूत बाधा के नाम से प्रचलित एक प्रकार के आवेश का लक्षण एवं प्रभाव ऐसा होता है जिसे देखते हुए उसे बहानेबाजी या सनक भी नहीं कहा जा सकता। उसके प्रभाव प्रत्यक्ष दीखते हैं। उन कारणों से रोगी का जीवनक्रम ही अस्त-व्यस्त नहीं हो जाता कई बार तो जान पर बन आती है और बुरी तरह बर्बादी उठानी पड़ती है। ऐसी दशा में उसे झुठलाया कैसे जाय। कोई क्यों ऐसी बहानेबाजी करेगा, जिससे उसे कष्ट सहना और बहुत कुछ गँवाना पड़े। दूसरों का ध्यान आकर्षित करने- सहानुभूति पाने के लिए कई लोग कई प्रकार के चित्र-विचित्र आचरण तो करते और मन गढ़न्त करतूतें भी दिखाते हैं। इसमें प्रेत बाधा का खेल भी शामिल हो सकता है। पर हर परिस्थिति में यह बात सही नहीं होती। कई बार कई लोग इस संकट में बुरी तरह फँसे पाये जाते हैं।

फिर ऐसे उपद्रव या आक्रमण प्रेत ही करते हों, आवेश या उन्माद खड़े करते हों, यह बात प्रेत विज्ञान से प्राप्त जानकारियों से सर्वथा भिन्न है। मृतात्माओं का अस्तित्व होना- उनका व्यक्ति विशेष के साथ सम्बन्ध जुड़ना एक बात है। उन्माद या आवेश आना- आवेशग्रस्त का असाध्य रोगी की तरह विपत्ति में फँस जाना सर्वथा दूसरी। फिर यदि प्रेत आदेश सचमुच ही होता है तो फिर वह पिछड़े लोगों या क्षेत्रों में ही क्यों पाया जाता है। समझदार लोगों में वैसा कुछ क्यों नहीं होता?

यह प्रश्न ऐसे हैं जो अपना निश्चित समाधान माँगते हैं। इस सन्दर्भ में विज्ञजनों ने लम्बी खोजों के बाद इस स्थिति की अचेतन मन की विलक्षण विकृति कहा है। ऐसी या इससे मिलती-जुलती विकृतियों संसार भर में देखी गई हैं जिन्हें कोई चाहे तो प्रेत बाधा भी कह सकता है।

शारीरिक रोगों की बढ़ोतरी के इस युग में मानसिक रोगों की भी चित्र-विचित्र किस्में निकली हैं। उन्माद आमतौर से उसे कहा जाता है जिसमें व्यक्ति सामान्य लोक व्यवहार और चिन्तन की मर्यादाओं का व्यतिक्रम करके कुछ भी सोचने और कुछ भी करने लगे। ऐसे लोग कई बार निष्क्रिय हो बैठते हैं, कई बार आक्रामक रुख अपनाते हैं। कुछ घर छोड़कर कहीं भी चले जाते हैं और कुछ भी करते हुए जिधर-तिधर भटकते हैं। किन्तु अब नये किस्म के उन्मादों में ऐसी धाराएँ भी जुड़ी हैं जिनमें व्यक्ति सामान्यतया लोक व्यवहार निभाता है पर कभी-कभी कोई आवेश चढ़ता है और नशेबाजों की तरह अपनी पूर्व धारणा की अभिव्यक्ति करने लगता है। इन्हें एक विशेष प्रकार की सनकें कहा जा सकता है जो यदा-कदा उभरती हैं और कुछ ऐसी भी होती हैं जो स्वभाव में अपने लिए स्थान बना लेती हैं।

उत्तरी ध्रुव पर निवास करने वाले एस्किमो लोगों में कभी-कभी किसी-किसी पर एक भयानक मानसिक रोग चढ़ दौड़ता है। इसमें वह आपे से बाहर हो जाता है और ऐसा लगता है कि कोई उससे यह सब बलपूर्वक करा रहा है।

आँखें लाल हो जाती हैं, माँसपेशियाँ जकड़ जाती हैं, पसीना छूटता है। आवेशग्रस्त मनःस्थिति में पत्नी तक रेन्डियर हिरन जैसी दिखती है और उस पर आक्रमण कर बैठने पर उतारू दीखता है। मुँह से लार टपकती है। भूख से तड़पड़ाता है और जो भी हाथ पड़े, खाने लगता है। स्थिति पूर्णतया उन्मादी जैसी होती है।

यह उस क्षेत्र का प्रख्यात रोग है। इसे उस क्षेत्र में काम करने वाले डॉक्टरों ने “विन्ड्रेगो” नाम दिया है। वहाँ के निवासी इसे ‘हिम दानव’ का आक्रमण कहते हैं। विश्वास करते हैं कि यह उस क्षेत्र के अधिष्ठाता महादैत्य का आक्रमण है जो भूखा होने पर किसी को भी क्षुधा निवृत्ति के लिए चुन सकता है। जिसे पकड़ता है उसे फिर जीवित नहीं छोड़ता।

उन्माद जब अति-स्तर पर होता है तो रोगी किसी को भी मार डालने जैसे आक्रमण करता है। साथ ही यह भी कहता है कि यदि बचना है तो मुझे मिल-जुलकर मार डालो। प्रचलित उपाय भी यही है कि निकटवर्ती एस्किमो उसे पकड़ ले जाते हैं और खुले क्षेत्र में ले जाकर वध कर डालते हैं। समझा जाता है कि ऐसा करने वालों से “हिम-दैत्य” प्रसन्न होता है और अपना वफादार सहयोगी मानकर पुरस्कार भी देता है।

कनाडा के डॉक्टरों ने इस रोग के सम्बन्ध में गहरी छान-बीन की है और उस व्यथा को ‘विन्डिनो साइकोसिस’ नाम दिया है। कुछ समय यह रोग मध्य कनाडा और उत्तरी अमेरिका तक पहुँच गया था। पर जब उसकी रोकथाम के उपाय अपनाये गये हैं तो स्थिति क्रमशः सुधरती जा रही है और घटनाक्रमों का अनुपात कम होता जा रहा है।

मानस रोगों के प्रत्यक्ष कारणों से व्यक्तिगत दुश्चिन्तनों अरुचिकर सामाजिक-प्रचलनों अनपेक्षित दबावों को प्रमुख माना जाता है। अब उसी शृंखला में एस्किमो सम्पर्क के वैज्ञानिकों ने एक कड़ी और जोड़ी है- चुम्बकीय उभारों द्वारा व्यक्ति विशेष पर पड़ने वाले प्रभावों की। वे कहते हैं ध्रुव क्षेत्र की तरह ही कुछ अन्य क्षेत्र भी ऐसे हो सकते हैं जिनकी भौगोलिक एवं वातावरण सम्बन्धी चुम्बकीय परिस्थिति किन्हीं पर अतिरिक्त प्रभाव डाले और उसे इस प्रकार उन्माद में जकड़ दें।

साइकोलाजिस्टों और एन्थोपोलोजिस्टों के एक वर्ग ने इसे हिस्टीरिया की तरह छूत स्तर का माना है एवं वंशानुक्रम में पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले रोगों से इस प्रकार के अनेक मानसिक उन्माद खोजे हैं। भूतोन्मादों के पीछे यही प्रक्रिया काम करती है। वे सर्वत्र नहीं होते। किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय में ही उनकी धूम रहती है। यह व्यथा छूत की तरह एक से दूसरे को लगती है। दुखती आँखों को देखने भर से अच्छी आँखें भी दुखने लगती हैं। जुकाम वालों की समीपता से अन्य दुर्बल प्रकृति के लोग भी वैसी ही शिकायत करने लगते हैं। बड़ों को भूत से आक्रान्त देखकर छोटों के मन पर भी वह कुहासा जमने लगता है जो अनुकूल अवसर मिलने पर फूट निकलता है। जिनके परिवार मुहल्लों में भूत-प्रेतों की घटनाएँ होती रहती हैं। उनमें रहने वाले अन्य दुर्बल मनःस्थिति के लोग भी अनचाहा अनुकरण करने लगते हैं। कोढ़ में खाज की तरह झाड़-फूँक करने वाले और इस मान्यता वालों द्वारा सुनाये जाने वाले कथानकों से प्रभावित ऐसे लोग भी इन व्यथा में फँस जाते हैं, जिनकी मानसिक संरचना में उन्माद प्रकट होने की आशंका नहीं की जाती थी।

मलेशिया की महिलाओं में “लता” नामक भयाक्रान्त रोग होता है, यदि उनसे आग में हाथ डालने को कहा आये तो रोगिणी आग में हाथ डाल देगी। ‘लता’ के आक्रमण होने पर लोगों ने क्या-क्या दुर्व्यवहार उसके साथ किए यह तो उसे याद रहता है। पश्चिमी चिकित्सक इस रोग को हिस्टीरिया, साइकोसिस, न्यूरोसिस तथा ब्रेनमाल कन्वल्शन कहते हैं। मलेशिया में रहने वाली चीनी महिलाओं में यह रोग नहीं होता। ऐसा ज्ञात होता है कि यह रोग परम्परागत होता है जिसकी शुरुआत 1850 में तब से हुई जब से वहाँ गोरे लोग आए और उनसे बचने के लिए उन्हें ‘लता’ रोग घेरा। महिलायें पश्चिमी नकल को बाध्य की गयी थीं ‘लता’ मात्र अन्धाधुन्ध नकल की मानसिक दासता प्रतीक है।

मलेशिया का मानस रोग “एमोक” बड़ा भयानक है। युवा रोगी विक्षिप्त होकर छुरा भोंकता फिरता है। उसका कारण नौकरी से निकाला जाना या परीक्षा की असफलता आदि होती है। अनेक मनुष्यों को घायल होते-होते उस पर काबू पाया जाता है तब तक वह बेहोश होकर गिर पड़ता है। पश्चिमी चिकित्सक इसका कारण बताते हैं- ब्रेन डैमेज, मिर्गी, हिस्टीरिया या डीलेरियम की स्थिति जिसमें आदमी चित्त भ्रमित हो जाता है। एपीलेप्टिक और हिस्टीरिया वाले रोगी तो विश्व के हर कोने में पाये जाते हैं किन्तु एमोक का सम्बन्ध 16 वीं शताब्दी में वहाँ के इतिहास से जोड़ा जाता है जबकि देशभक्त स्वराज्य प्राप्त एमोक पर निकल पड़ते थे और देश के लिए मर मिटने को निकल पड़ते थे। धर्म परिवर्तन के समय वे मरने को अधिक पसन्द करते थे। एमोक से मृत व्यक्तियों का सम्मान 1850 तक था। उसके बाद यह मानस रोग माना जाने लगा है। किन्तु रक्त के संस्कार तो बने ही रहते हैं।

विश्व के विभिन्न स्थानों में मानसिक रोग विभिन्न रूप लेते हैं। स्थान की संस्कृति, जलवायु जल प्रभाव तथा परम्परागत अन्ध विश्वास मानस संस्थान पर छाये रहते हैं। यह बात मात्र पिछड़ी जातियों तक ही नहीं अब सीमित रही वरन् पड़े-लिखे आधुनिक सभ्यता में पले लोगों को भी होती।

इंग्लैण्ड के एक परिवार में पीड़ियों से यह मान्यता चली आयी है कि उसका हर नर सदस्य 50 वर्ष की आयु से पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। पिछले दिनों असोशिएटेड प्रेस के माध्यम से 26 अक्टूबर 1983 के स्टेट्मैन अखबार में एक समाचार छपा कि सातवें अर्ल क्रेवन ने जो गत पाँच वर्षों से आसन्न मृत्यु से भयभीत था, 26 वर्ष की आयु में ही स्वयं को गोली मारकर आत्म-हत्या कर ली। थॉमस राबर्ट डगलस क्रेवन शाही परिवार की सातवीं पीढ़ी के एकमात्र पुरुष सदस्य थे।

कहा जाता है कि इनके पिता 35 वर्ष की आयु में व दादा मात्र 37 वर्ष की आयु में नाव में डूबने से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे। यही इतिहास परिवार के हर सदस्य का है। गाँव वालों को कहना है कि हैम्पस्टेड मार्शल बर्क शायर नामक इस रियासत के एक बुजुर्ग ने 300 वर्ष पूर्व एक कन्या से दुराचार किया था। उसके बाद यह शाप देकर कि इस परिवार का कोई भी पुरुष सदस्य पचास वर्ष तक जीवित नहीं रहेगा व जब तक जियेगा- अवसादग्रस्त मनःस्थिति में रहकर अन्ततः आत्म-हत्या कर लेगा, उस कन्या ने भी आत्म-हत्या कर ली। कहा नहीं जा सकता कि यह किम्वदन्ती कितनी सत्य है किन्तु इतिहास यही बताता है कि हर पीढ़ी के पुरुष सदस्यों को ‘स्कीजोफ्रेनिया’ नामक मानस रोग जन्म से ही रहा व सभी ने आत्म-हत्या की है तथा 40-45 वर्ष की आयु तक पहुँचने के पूर्व ही काल कवलित हो गए। कुछ लोग इसे एक भय की आत्म सम्मोहन की स्थिति कहते हैं जिसमें हर व्यक्ति संभाव्य को सब मानकर ही जिया है व उसने मानो लोकोक्ति को ही सही सिद्ध करने के लिए आत्म हत्या की है।

एन्थोपोलाजिस्ट चार्ल्स लिन्हाम का कथन है कि पिछले क्षेत्रों में पाया जाने वाला भूतोन्माद कहा जाता था, और जिसके प्रति उपेक्षा, व्यंग्य, उपहास का ही प्रयोग होता था। अब वह नये रूप से शिक्षित समुदाय में भी नई-नई सनकों और उचंगों के रूप में दृष्टिगोचर होने लगा है। उसे वे भूतवाद की पुरातन पृष्ठभूमि पर नई परिस्थितियों के अनुसार उगा नये किस्म का किन्तु उसी प्रकृति का पौधा कहा जा सकता है।

प्रेत बाधा या भूतोन्माद को न उपहासास्पद ठहराया जाय और न उसकी उपेक्षा की जाय। यदि बहानेबाजी पाई जाय तो उसका पर्दाफाश किया जाय किन्तु यदि वस्तुतः कोई इस व्यथा से आक्रान्त है तो उसे एक मानसिक रोगी की तरह उपचार किया जाय। खोजने पर जैसे अन्य रोगों के समाधान मिल गये इस प्रकार इस विक्षेप के निराकरणों का भी युक्तिसंगत मार्ग मिल सकता है।


संसार एक छाया ही तो है (kahani)

किसी आदमी ने घर को शीशमहल बनाया। दीवारों और छतों पर काँच जड़ दिए। जिधर भी चेहरा मोड़कर देखता अपना ही चेहरा नजर आता। इस पर उसे प्रसन्नता होती। दीपक जलाता तो चारों ओर दीवाली जगमगाती दीखतीं।

एक दिन बाहर गया तो पालतू कुत्ता कमरे में घुस आया। उसे चारों ओर दूसरा कुत्ता दीखा और वह उससे लड़ने-मरने पर उतारू हो गया। यहाँ तक कि काँचों से टकरा-टकरा कर स्वयं घायल हो गया और कमरे का सामान तोड़-फोड़कर छितरा दिया।

मालिक लौटा तो बोला अपनी छाया कितनी भली और कितनी बुरी लगती है। संसार एक छाया ही तो है।


भरी गृहस्थी उजड़ी

एक व्यक्ति मजूरी करके पेट पालता था। नाम था शेखचिल्ली। अकल कम थी। काम का शऊर भी न था। पर रंगीली उड़ानें-उड़ानें में बेजोड़ था।

एक दिन एक तेली उधर से निकला। बिक्री हुई नहीं। घड़ा ज्यों का त्यों भरा था। सोचता आ रहा था कि कोई मजूर मिले, तो राहत मिले। दिन भर लादे रहने के कारण गरदन दुखने लगी थी।

मजूर खोजने की दृष्टि से एक चबूतरे पर बैठे अध-पगले को अपने काम का समझा और पूछा- मजूरी करेगा क्या? घड़ा दो मील ले चलेगा क्या?

दिन भर से काम न मिलने के कारण, रोटी की चिन्ता थी। सो वह तत्काल तैयार हो गया। चार आने मजूरी तय हो गयी। घड़ा शिर पर रख कर शेखचिल्ली तेली के पीछे-पीछे चलने लगा।

पैरों के साथ-साथ दिवास्वप्नों का सिलसिला चल पड़ा। सोचा अभी एक घण्टे में चार आने मिलेंगे। उनसे लौटते वक्त मुर्गी खरीदता लाऊँगा। मुर्गी हर रोज एक अण्डा देगी तो उससे मजे में गुजारा चलता रहेगा। मजूरी करने की जरूरत न रहेगी।

रंगीले सपनों पर कोई रोकथाम नहीं। वे चलते हैं तो रुकते नहीं। अब नया गणित चल पड़ा। कुछ दिन अण्डे बेचने की अपेक्षा उनसे निकले चूजे पाले जायँ। कुछ ही दिन में तीस मुर्गीयाँ बन जायेंगी। उन सबके अण्डों की आमदनी होने लगी तो मजा आयेगा। मालदार होने का अवसर मिलेगा।

मालदारी का सपना तेजी से दौड़ा। मुर्गियों के बाड़े पर बाड़े बनाने लगेगा। अण्डे टोकरों भर-भर कर बिकने लगे। बिक्री के रुपयों से घड़े भरने लगे। इन रुपयों का अब किया क्या जाय? एक नया प्रश्न सामने आया।

हल निकलते देर न लगी। बढ़िया-सी कोठी खरीदी जायगी। अच्छे कपड़े और बढ़िया सजधज से अमीरों जैसी स्थिति होगी। धनवान को बेटी देने वाले चक्कर काटेंगे। पर शादी तो उसी से करेगा जो सबसे सुन्दर होगी।

शेखचिल्ली अपनी मस्ती में था। शानदार कोठी, अच्छी आमदनी, खूब सूरत बीबी और बच्चों की फौज कमाई करने लायक हो चली थी। वह अब किसी की क्यों सुनता। तेली का पीछा छोड़कर वह गाँव की पगडंडी पर तेजी से चल रहा था। अब उसे बच्चों पर रौब गाँठने और सऊर सिखाने का बड़प्पन जताने की पड़ी थी। लड़के बार-बार घुड़की सहते और गलती की माफी माँगते। बीबी भी उनकी सिफारिश करती। शेख चिल्ली दूनी आड़ दिखाता। आखिर मालदार बाप जो ठहरा।

दिवास्वप्न गहरे होते हैं तो वे बड़े मजेदार होते और वास्तविकता से भी अधिक सच्चे लगते हैं। रौब गाँठने का यही तो अवसर था, वह चूके क्यों? किसी काम पर नाराज होकर उसने बीबी, बच्चों की एक साथ घुड़की दिखाई और डाँट बताई।

डाँट बताने में इतनी तन्मयता थी कि सचमुच गरदन को झटका लगा और तेल से भरा घड़ा जमीन पर जा गिरा। टूटने और तेल के रेत में फैलते देर न लगी।

तेली के क्रोध का बारापार न था। उसने पास में घड़ी लकड़ी उठाई और बेतरह धुनाई शुरू कर दी। तेल के पैसे वसूल करने के लिए मजूर के पास कपड़े, जूते तक तो थे नहीं।

पिटाई से शेखचिल्ली तिलमिला गया। मजूरी के पैसे क्या मिलने थे। रात को खाली पेट सोना पड़ेगा। इसकी चिन्ता तो थी। सड़ासड़ पड़ने वाली सन्टियों से भी अधिक दर्द उसे इस बात का हो रहा था कि उसकी मुर्गीयाँ, कोठी, बीबी और औलाद को कौन सम्भालेगा। क्या उसे फिर अध पगले शेखचिल्ली की पुरानी जिन्दगी में फिर लौटना पड़ेगा?


हम सभी जन्म मरण के चक्र में घूमते हैं।

सृष्टि की उत्पत्ति ओर समाप्ति के सम्बन्ध में भारतीय ज्योतिविदों की मान्यता आधुनिक अन्तरिक्ष विज्ञानियों के लगभग समान जा पहुँचती है। हिन्दू दर्शन के अनुसार ब्रह्माजी सृष्टि रचते हैं और उनका उत्पादन, अभिवर्धन और समापन क्रम सौ वर्ष तक लगातार चलता रहता है। इसके बाद वे निद्राग्रस्त होते और सौ वर्ष तक गहरी नींद में पड़े रहने के उपरान्त जब उठते हैं तब नई सृष्टि रचते हैं। निद्राकाल में उनका सृष्टि विस्तार भी सिमट जाता है और महाप्रलय जैसी स्थिति बन जाती है। इस समापन उत्पादन क्रम की विलक्षणता को अलंकार रूप में शिव ताण्डव नृत्य कहा गया है।

ब्रह्माजी का एक दिन 1 करोड़ बीस लाख वर्ष का माना गया है। तब तक ब्रह्माजी के क्रिया-कलाप में निरत हुए मात्र दो दिन और दो रात बीते हैं। इस काल गणना के हिसाब से ही वर्तमान वैज्ञानिकों का भी अभिमत मिलता है। वे भी महाप्रलय का अनुमान इतने ही दिन बाद होने की बात सोचते हैं।

खगोल विज्ञानियों का मत है कि हमारी मन्दाकिनी प्रति घण्टा 600 किलोमीटर की गति से कन्या राशि वाले अन्तरिक्ष क्षेत्र की ओर भाग रही है। न केवल अपनी वरन् अन्यान्य मन्दाकिनियों की प्रगति यात्रा उसी ओर है। लगता है वे बिखराव से ऊब कर फिर अपने पितृ ग्रह में एकत्रित होने के लिए मचल पड़ी है। सम्भव है बाल्यकाल उन्हें याद आता हो और उसी आँगन में फिर सहेली-सहेली की आँख-मिचौली खेलने के लिए भग चली हो।

ब्रह्माण्ड के फैलने की प्रतिक्रिया अन्ततः सिकुड़ने के रूप में होती है। इन दिनों ब्रह्माण्ड तेजी से फैल रहा है। फिर कुछ ही समय में उसकी गति धीमी हो जायेगी। ठहरने जैसी स्थिति आने के बाद वापसी का सिलसिला चल पड़ेगा और मूल द्रव्य लौटकर अपने पुरातन ध्रुव केन्द्र पर इकट्ठा हो चलेगा।

कार्ल साँगा की बहुचर्चित पुस्तक “कास्मॉस” में अपने ब्रह्माण्ड में उत्पत्ति और समाप्ति के सम्बन्ध में अनेक अनुमान लगाये गये हैं। अनुमानों को उन्होंने तर्क और प्रमाणों के साथ जोड़ा है और सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि अनुमान सर्वथा सत्य न हो तो भी वे यथार्थता के अति समीप है।

ब्रह्माण्ड का आधारभूत द्रव्य एक धक्का के साथ फटा और पदार्थ उसके कारण दूर-दूर तक छितराया गया। उसने कहीं-कहीं तो अपने को सुव्यवस्थित ग्रह गोलकों के रूप में बदल लिया। कहीं वह अधपका पदार्थ ऐसे ही मन्दाकिनियों के रूप में धुँए बादलों की तरह बिखरा पड़ा है। स्वयं इस विचित्र स्थिति में रहते भी उसके उदर में कितने ही नक्षत्र अपनी सत्ता और शक्त बना चुके हैं। कई मन्दाकिनियाँ बहुत छोटी कई बहुत बड़ी हैं। वे सभी अपनी-अपनी कक्षाओं में भ्रमण करती हैं। छितराती भी रहती हैं। कभी वे एक दूसरे के नजदीक से गुजरती हैं, तो कुत्तों की तरह एक दूसरे से झगड़ती और हमला बोलती भी देखी जाती हैं। इसमें कोई किसी का माँस भी नोच लेता है। जेब काटकर चम्पत बनती हैं।

सितारों के श्मशान में उनका अन्त्येष्टि कर्म किस प्रकार होता है यह और भी विचित्र है। अन्ततः उनकी राख इतनी भारी होती है जिसका एक चम्मच भर आकार धरती पर अवस्थित किसी पहाड़ के बराबर वजनदार हो। उस स्थिति में उन्हें सुपरनोवा एवं न्यूट्रान तारा कहते हैं। वे जिस अन्तरिक्ष पथ पर भ्रमण करते हैं उसकी स्थिति ‘ब्लैक होल’ जैसी हो जाती है। धरती पर बारमूडा क्षेत्र के नजदीक एक ब्लैक होल का पता चला है। इस अन्तरिक्षीय भँवर में फँसकर कितने ही जलयान वायुयान अदृश्य होते रहते हैं। ऐसे-ऐसे और भी अगणित भँवर इस अन्तरिक्ष में हैं जो अपने झपट्टे में आने वाले छोटे-छोटे उपग्रहों तक को उदरस्थ करते रहते हैं।

गणितज्ञों के हिसाब से अपना ब्रह्माण्ड प्रायः सात हजार करोड़ वर्ष का प्रौढ़ अधेड़ है। इसके मरने में इतना ही समय और लगना चाहिए। जब यह जन्मा था तब पिछले कल्प वाला ब्रह्माण्ड जरा-जीर्ण हो गया था और सिकुड़ कर एक सघन द्रव्य बनकर रह गया है। सिकुड़न का दबाव अत्यधिक बढ़ा तो वह फट पड़ा और वर्तमान आकाश गंगाएँ तथा तारक मण्डलियाँ बनकर खड़ी हो गईं। फटने से जो गति बनी वह अभी भी चल रही है और ब्रह्माण्ड का विस्तार लगातार फैल रहा है। गति गोलाई में चलती है इसलिए यह सभी ज्ञात अविज्ञात सघन और विरल ग्रह गोलक एक निर्धारित कक्षा बनाकर अनन्त आकाश में परिभ्रमण कर रहे हैं।

ब्रह्माण्ड विज्ञानियों ने निष्कर्ष निकाला है कि- ज्वलनशील तारकों की ऊर्जा, जैसे-जैसे ईंधन समाप्त होता है स्वभावतः मिटने लगती है। हाइड्रोजन ईंधन है और हीलियम उसकी राख। ईंधन की तुलना में राख का अनुपात प्रायः 12 प्रतिशत रह जाता है। इस प्रकार हलकापन बढ़ने से तारा अपना सन्तुलन खो बैठता है। धुरी पर घूमते हुए उसके पैर लड़खड़ाने लगते हैं। कक्षा से घूमते हुए उसके पैर लड़खड़ाने लगते हैं। कक्षा में घूमने की लम्बी यात्रा में भी देरी और थकान लगती है। साथियों का सहयोग घट जाता है फलतः उसकी सत्ता संकट में पड़ जाती है। सूजन के मरीज की तरह वह थुलथुला हो जाता है। आकार तो बढ़ता है, पर दीपक बुझते समय जैसे जोर से चमकता है, प्रभात से पूर्व जैसे अन्धेरा अति सघन होता है उसी प्रकार यह एक बार हारे जुआरी की तरह दाव लगाता है। पर कुछ बनता है नहीं। यह दम तोड़ते समय जोर से हिचकी लेने जैसी प्रक्रिया अन्तकाल को और भी समीप ला देती है। सिकुड़े हुए बुझे हुए तारक को श्वेत वामन कहते हैं। इस स्थिति में पहुँचने से पूर्व वह हिचकी लेने की बेला में ‘लाल दानव’ कहलाता है। मुँह फैलता जाता है और जो कोई ग्रह उपक्रम समेटने में आता है उसी को उदरस्थ करता जाता है।

अपना सूर्य पाँच अरब वर्ष पूर्व जन्मा था। अभी वह प्रौढ़ है। इससे दूने गुने समय तक मजे में ही जी लेगा क्योंकि उसकी आरम्भिक हाइड्रोजन सम्पदा में से प्रायः 10 प्रतिशत भाग ही हीलियम राख के रूप में परिवर्तन हुआ है। अगले पाँच अरब वर्षों में वह इतना ईंधन गँवा चुका होगा कि धुनी हुई रुई की तरह फूलने लगे। तब वह अब से 30 गुना अधिक बड़ा होगा। उसके पेट में बुध, शुक्र और पृथ्वी समा चुके होंगे। इसके बाद सिकुड़ने की बारी आयेगी। बुझते हुए अंगारे की तरह वह इतना छोटा हो जायेगा जितना कि इन दिनों अपनी पृथ्वी का आकार है। इतने पर भी उसका घनत्व उलट-पुलटकर उतना ही बचा रह जायेगा जितना कि आरम्भ में था।

ब्रह्माण्ड सर्वप्रथम एक सघन द्रव्य पिण्ड था। उसकी भीतरी हलचलें कुछ इस प्रकार घटीं कि स्थिरता न रही। विस्फोट हुआ और पदार्थ छितरण का छोटे-छोटे पिण्डों में बदल गया। यह गति जब थमेगी तो भी स्थिर न रहेगी। फैलाव सिकुड़ने में बदलेगा और फिर घनीभूत होकर पूर्व स्थिति में आ जायेगा।

जब इतनी बड़ी सृष्टि को जन्म-मरण के चक्र से होकर गुजरना पड़ता है और हर पदार्थ प्राणी जन्मता मरता रहता है न जाने क्यों अज्ञानी समुदाय यह नहीं सोचता कि अपना मरण भी निश्चित है। इसलिए समय रहते इस सुयोग का क्यों न सदुपयोग कर लिया जाय।


एकता कहाँ है? (kahani)

इस बहेलिये ने जंगल में जाल बिछाया। संयोगवश उसके छोटे जाल में ही बहुत से पक्षी फँस गये। पक्षी एक साथ फड़फड़ाये तो जाल उखड़ गया। उसे लेकर वे ऊँचे उड़ने लगे। बहेलिया पीछे-पीछे विश्वासपूर्वक चलने लगा। एक राहगीर ने इस कौतुक को देखा तो पूछा- इस उड़ते झुण्ड को भला किस प्रकार पकड़ पाओगे? बहेलिया हँसने लगा। इनमें एकता कहाँ है? एक निर्णय थोड़े ही करेंगे। अपनी-अपनी ओर खींच-तान करेंगे और थककर कुछ ही देर में नीचे गिर पड़ेंगे।

वैसा ही हुआ था। जो किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँच सकते थे और मिल-जुलकर जाल काटने और मुक्त हो सकने में सफल हो सकते थे। वे ही आपाधापी के शिकार बने और बेमौत मरे।


मनुष्य देवता और दैत्य

पौराणिक मिथकों में मनुष्य की ही तरह देवताओं और दैत्यों का भी वर्णन है। मनुष्य भूलोक में, देवता स्वर्ग लोक में और दैत्य पाताल में रहते थे। यह तीनों क्या थे? कहाँ रहते थे? किस आकृति प्रकृति के थे, इस सम्बन्ध में जो वर्णन उपलब्ध है उनमें जितनी कल्पना का मिश्रण और कितना यथार्थता का समावेश है यह कहना कठिन है। फिर भी सामान्यतया यह सोचा जा सकता है कि मनुष्य प्राचीनकाल में भी ऐसी ही आकृति प्रकृति के रहे होंगे जैसे आज हैं। साधन सुविधाओं के अभाव में वन्य क्षेत्र अधिक और जनसंख्या कम होने की परिस्थिति में मनुष्यों को आज की तुलना में अधिक कष्टसाध्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ता होगा तो भी वे निर्वाह की स्वाभाविक आवश्यकताएँ पूरी कर लेते थे और प्रकृति से संघर्षरत रहने के कारण बलिष्ठ भी रहते थे।

सुविधाएँ बढ़ने पर छीन झपट चल पड़ती है किन्तु असुविधाग्रस्तों में परस्पर अधिक सहयोग सद्भाव रहता है। इस आधार पर प्राचीनकाल के मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक पुरुषार्थी सन्तोषी और सहयोगी प्रकृति के रहे होंगे यह कहा जा सकता है।

देवताओं की स्थिति का बुद्धि संगत स्वरूप सोचा जाय तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि अधिक सुयोग्य, समर्थ, बुद्धिमान एवं उदार चेतना प्रकृति वाले देव श्रेणी में गिने जाते रहे होंगे। हो सकता है कि प्रकृति की विशिष्ट शक्तियों को और भावना क्षेत्र को सज्जनता को देवत्व का प्रतिनिधि माना गया होगा। उनके साथ जुड़ी हुई विशेषताओं विभूतियों का अलंकारिक रूप में चित्रित किया गया होगा। देवताओं के वाहन, आयुध, ऐसे ही रहस्यों को अपने में छिपाये हुए हैं। उनकी अनेक भुजाओं, मुखों, नेत्रों का अंकन भी सम्भवतः इसी आधार पर हुआ है। देने वालों को देव कहा जाना स्वाभाविक है। जिन शक्तियों द्वारा सर्वसाधारण का हित साधन होता है उन्हें देव रूप में प्रतिष्ठा एवं मान्यता देना युक्ति संगत भी है।

दैत्य का भावार्थ है- विशाल, समर्थ एवं उद्धत। दैत्य, दानव, असुर यों एक ही अर्थ में लिये जाते हैं पर वे सब हैं वस्तुतः अलग-अलग। सुर समुदाय के अतिरिक्त अन्यान्यों को असुर कहा गया है। मध्य एशिया में बसने वाली एक जाति भी थी- अहुर। जिसे असुर शब्द का अपभ्रंश कह सकते हैं। उन क्षेत्रों में जीवनोपयोगी सामग्री का अभाव रहने से वे दूर-दूर तक आक्रामक धावे बोलते थे। क्रूर प्रकृति के कारण उन्हें यह नाम दिया गया होगा अथवा परम्परागत यही नाम उनके हिस्से में आया होगा। दानव शब्द भी क्रूरता का बोधक है।

‘दैत्य’ शब्द आकार एवं वैभव का बोधक है। अंग्रेजी में उसे ‘जॉइन्ट’ कहा जाता है। रावण, कुम्भकरण, सहस्रबाहु आदि के शरीर सामान्यों की अपेक्षा अधिक बड़े माने जाते हैं। उनकी बलिष्ठता भी उसी अनुपात से बड़ी-चढ़ी होनी चाहिए।

प्रागैतिहासिक काल में, महाराज महासरीसृप, महागरुड़ जैसे विशालकाय प्राणियों का इस धरती पर आधिपत्य था। इन्हीं दिनों मनुष्य स्तर के प्राणियों की उत्पत्ति हुई होगी तो वे नर वानर भी विशालकाय ही रहे होंगे। अब भी साधारण वनमानुषों की तुलना में गोरिल्ला चिम्पाजी नस्ल के बन्दर नहीं अधिक बड़े भारी और बलिष्ठ होते हैं। हिम मानवों के देखे जाने, पाये जाने की चर्चा अभी भी होती रहती है। उन्हें मनुष्य की तुलना में दूनी लम्बाई चौड़ाई का कहा जाता है। पैरों के निशान भी उसी अनुपात के पाये गये हैं।

ऐतिहासिक खोजों में विशालकाय मनुष्यों के अस्तित्व का पता चला है। फ्राँसीसी पुरातत्व वेत्ता लुई बरबलिटा ने अपनी खोजों में किसी समय के विशालकाय मनुष्यों के अवशेष प्राप्त किये हैं। उनकी कृतियों के आधार पर ड्यौढ़े से लेकर दूने तक आकार का उन्हें बताया गया है। सीरिया के सासनी क्षेत्र की खुदाई में चुम्बक पत्थर के बचे आठ पौण्ड भारी हथियार मिले हैं। उत्तरी मोरक्को में भी प्रायः इतने ही भारी और बड़े आकार के शस्त्र मिले है। वे ऐसे हैं जिन्हें 12 फुट से कम ऊँचाई वाले मनुष्य प्रयुक्त नहीं कर सकता।

लेबनान में एक दो लाख पौण्ड भारी विशेष पत्थर मिला है जिस पर कई ओर से बढ़िया नक्काशी की गई है। यह कार्य दैत्याकार मानवों का ही हो सकता है। इस ऐतिहासिक पत्थर का नाम “हज्रएल गुल्ले” रखा गया है। उसे देखने संसार भर के लोग पहुँचते हैं।

इटली और आस्ट्रेलिया के कई दुर्गम शिखरों पर ऐसी ही कलाकृतियाँ पाई गई हैं। इतने ऊँचे पहुँच कर उतने कठिन काम कर सकना विशालकाय मनुष्यों के लिए ही सम्भव हो सकता है मिश्र के पिरामिडों में लगे पत्थर इतने बजनी हैं और इतनी ऊँचाई पर अवस्थित हैं कि उन्हें इस प्रकार जोड़ना वर्तमान आकृति के मनुष्यों के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। दक्षिण अमेरिका में पाये गये पिरामिड खण्डहर इनसे भी अधिक आश्चर्यजनक हैं।

प्राणि विज्ञान के शोधकर्ताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो कहता है कि प्राणि विकास की एक मंजिल ऐसी भी रही है जिसमें मनुष्यों और पशुओं के बीच की विभाजन रेखा पूरी तरह नहीं बन पाई थी और उनके मध्य यौनाचार चलता था। उस संयोग से शंकर प्राणि भी उत्पन्न होते थे और उनमें दोनों के गुण समन्वित रहते थे। मनुष्य की बुद्धिमता और पशुओं की बलिष्ठता के संयोग से उत्पन्न प्राणि दैत्याकार थे।

प्लेटो ने अपने ग्रन्थ ‘सिम्पोजियम’ में मनुष्य और पशुओं के संयोग से दैत्याकार प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। “टैटीक्स एनेल्स” में भी ऐसे ही विवरणों का उल्लेख है जिनमें मनुष्यों और पशुओं के बीच चलने वाला यौनाचार का विवरण मिलता है। इतिहासकार “हैरोयोतस” ने अपने विवरणों में ऐसे ही प्रचलनों का विवरण दिया है। बगदाद और लन्दन के संग्रहालयों में ऐसी कई पाषाण प्रतिमाएँ हैं जिनसे उन दिनों ऐसा प्रचलन रहने की साक्षी मिलती है।

सुमेर सभ्यता के पुराण कथानकों में निपुर क्षेत्र के निवासी ऐनेलिल नामक देव समुदाय में निनलिल नामक मानवेतर मादाओं के साथ संयोग करके अर्ध पशु और अर्ध मनुष्य स्तर की प्रजा उत्पन्न करने का वर्णन है। भारतीय पुराणमिथक इससे भी एक कदम आगे है। उनमें हनुमान पुत्र मकरध्वज, मत्स्य कन्धा आदि का वर्णन है। नृसिंह, हयग्रीव जैसे अवतारों की आकृति अर्ध पशु और अर्ध मनुष्य जैसी दर्शाई गई है। गणेश को भी ऐसा ही चित्रित किया गया है। भीम का एक ऐसा ही पुत्र घटोत्कच भी था जो किसी अविकसित वर्ग की नारी से जन्मा था और सामान्यजनों की अपेक्षा कहीं अधिक बलिष्ठ था।

इतिहासकार पाताल अमेरिका को कहते हैं और वहाँ किसी समय मय सभ्यता का चरमोत्कर्ष मानते हैं। महाभारत में ‘मय’ दानव पारकर है, जो सूर्योपासक था। ज्योतिर्विज्ञान का उसे आविष्कर्ता एवं मूर्धन्य भी माना है। अहिरावण पातालपुरी का ही एक शासक था। भौतिक विज्ञान और बलिष्ठता सम्पन्नता की दृष्टि से बढ़े-चढ़े होने के कारण यह लोग दैत्य कहे जाते थे।

पुरातत्व विशेषज्ञ हैविट्ट, मैकेन्जी, थेड आदि का कथन है कि मय सभ्यता के दिनों में भारतीय सभ्यता के अनुरूप ही मान्यताएँ प्रचलित थीं। नाग जाति के लोग रहते थे अतएव उस क्षेत्र को नागलोक भी कहा जाता था। नागलोक पाताल का ही दूसरा नाम है। मय शासकों को दैत्य कहा जाता था। वे भूलोक में भी आते थे। मायावी कहलाते थे। जल से थल और थल से जल का भ्रम उत्पन्न करने वाला भवन उन्होंने द्रौपदी के मनोरंजन हेतु बनाया था। उसी से भ्रमित होकर दुर्योधन को उपहासास्पद बनना पड़ा था।

देवता और दैत्य यों उपाख्यानों में मनुष्य से भिन्न प्रकार के प्राणी माने गये हैं, पर वास्तविकता यह है कि तीनों ही वर्ग प्रकृति से तो भिन्न होते ही हैं पर तीनों की आकृति एक जैसी ही होती है।


सूर्य की क्षमता और आराधना

सूर्य पृथ्वी से 3,30,000 गुना बड़ा है। सूर्य का सबसे निकटवर्ती और छोटा ग्रह बुध है। उसका व्यास मात्र 3010 मील है। मंगल कुछ बड़ा है अर्थात् 4200 मील। इनकी तुलना में पृथ्वी बड़ी है। उसका व्यास 7913 मील है। इसे शुक्र के समतुल्य कहा जा सकता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार सौर मण्डल के सदस्यों में सबसे बड़ा बृहस्पति है। उसका व्यास 86,800 मील है। अर्थात् पृथ्वी से 11 गुना बड़ा। इसके बाद शनि का नम्बर आता हे। वह 715000 मील व्यास का है। शनिश्चर क दस गुना अधिक चन्द्रमा है। इनमें से टाइटन पृथ्वी के चन्द्रमा से भी बड़ा है।

नये खोजे गये तीन ग्रह यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो है। प्लूटो सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर है। वह अपनी धुरी पर तो छह दिन में ही घूम जाता है पर सूर्य की एक परिक्रमा करने में 248 वर्ष लगते हैं।

अपना सूर्य जिस मन्दाकिनी के गर्भ में है उसमें रहते हुए भी प्रति सेकेण्ड 200 किलोमीटर गति से अपनी निर्धारित कक्षा में भी भ्रमण करता रहता है।

ब्रिटेन के बरमिंघम विश्व विद्यालय के भौतिकीविद डा. एच. वी. वानउर री के अनुसार सूर्य दिन में नौ बार काँपता है। यह कपकपी एक बार में 260 मिनट तक कभी-कभी चलती है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य में हाइड्रोजन ईंधन की भट्टी धधक रही है। सूर्य इतना विशाल है कि इसमें 10 लाख अरब टन हाइड्रोजन ईंधन एक सेकेण्ड मात्रा में फुँक जाता है। यह खुराक खाकर भी उसका पेट नहीं भरता। कहा जाता है कि इतने पर भी कम आहार के कारण वह ठण्डा होता चला जा रहा रहा है।

सूर्य का भौतिक दृष्टि से ही नहीं, आध्यात्मिक दृष्टि से महत्व अपनी जगह अलग ही है। उसे सविता देवता प्राण ऊर्जा का महत् स्रोत कहा गया है। इन दिनों ब्रह्मा विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, दुर्गा, हनुमान आदि देवताओं का बाहुल्य है। सूर्य मन्दिरों की संख्या इनकी तुलना में कम है। तो भी पुरातन काल के देवालयों पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि किसी समय सूर्य ही प्रमुख देवता था और उसी की उपासना की प्रमुखता प्राप्त थी। मन्दिर भी उन्हीं के बनते थे। पाँच सौ से पुराने मन्दिरों में उन्हीं की बहुलता है।

गोपाडि (ग्वालियर) क्षेत्र में एक पुरातन सूर्य मन्दिर था जिसके अब खण्डहर ही शेष हैं। शाकल (स्याल कोट) के सूर्य मन्दिर का उल्लेख ह्वेन सांग ने किया है। मोढेरा (गुजरात) कोणार्क (उड़ीसा), खजुराहो, तिरुपति बाला जी (दक्षिण) मडखेरा (उ. प्र.) के पुरातन सूर्य मन्दिर यद्यपि जराजीर्ण स्थिति में जा पहुँचें हैं तो भी यह साक्षी प्रस्तुत करते हैं कि कभी भारत में सूर्योपासना की प्रधानता रही है।

वृत्ताकार सूर्य को बालाजी कहते हैं। बालाजी के नाम से मध्यकाल में सूर्य की उपासना होती रही है। अब कोई-कोई इस शब्द का अर्थ हनुमानजी से भी लगाते हैं।

कुषाण काल में सूर्योपासना एशिया के अधिकाँश भाग में प्रचलित थी। मिश्र और ईरान में इस्लाम के आगमन से पूर्व सूर्य सम्प्रदाय का आधिपत्य था। उस समय की प्रतिमाओं और शिलालेखों से प्रकट है कि इन क्षेत्रों में उपासना के लिए सूर्य को ही प्रमुख आधार माना जाता रहा है।

ऋग्वेद 1।125।1 में सूर्य को जगत की आत्मा बताया गया है इसका अर्थ हुआ- इस पृथ्वी पर जो चेतना एवं हलचल है उसका उद्गम स्रोत सूर्य है। उसमें हमें गर्मी और रोशनी ही नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त वह भी मिलता है जो चेतना से सम्बन्धित है।

प्रख्यात गायत्री मन्त्र सूर्य उपासना का मन्त्र है। उसका देवता सविता है। सविता के भर्ग की याचना की गई है। उस भर्ग को प्रगतिशील प्रेरणा में नियोजित करने का अनुरोध आग्रह है।

बारह महीनों के कारण सूर्य को द्वादश आदित्य भी कहा जाता है। षट ऋतुएँ उसकी पत्नियाँ मानी गई हैं। ऊषा को उसकी प्रेमिका और संज्ञा या सन्ध्या को पटरानी के रूप में निरूपित किया गया है। यह कथा प्रतिपादन सूर्य की मूलभूत क्षमता के अनेकानेक प्रयोजनों में प्रयुक्त होने की विधा पर प्रकाश डालते हैं।

भगवान राम को सूर्यवंशी माना जाता है। कुन्ती ने पाण्डवों को सूर्योपासना के आधार पर उत्पन्न किया था इसलिए वे भी प्रकारान्तर से सूर्यवंशी हुए। चन्द्रमा भी सूर्य से ही प्रकाश ग्रहण करता है इसलिए चन्द्रवंशी भी सूर्योपासना में वैसी ही अनुरक्ति प्रकट करते हैं।

हिन्दू देवताओं की संख्या विस्तार जितनी तेजी से हुआ है उसे देखते हुए आश्चर्य होता है। सभ्यता के आरम्भ में सूर्य ही एकमात्र उपास्य थे। प्रत्यक्ष देवता के सम्मुख वही सर्वसाधारण के सामने रहता है। उसके कारण मिलने वाली गर्मी रोशनी से न केवल देखने की सुविधा होती है वरन् जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए अनेकानेक प्रयोजन भी पूरे होते हैं, इस तथ्य को जैसे-जैसे अधिक अच्छी तरह समझा गया वैसे-वैसे सूर्य का महत्व भी अधिक अच्छी तरह समझा गया। रात्रि के अन्धकार में होने वाली असुविधा ने इस तथ्य पर तुलनात्मक अध्ययन का अवसर प्रदान किया और लोग सूर्य की गरिमा के प्रति अधिकाधिक श्रद्धावान होते चले गये। अरुणोदय तथा अस्तकाल में उनकी पहुँचाई एवं विदाई के लिए सन्ध्या वन्दन का नियम बना। इसके लिए सूर्योपस्थान का सरल किन्तु भावभरा विधान अपनाया गया। अभ्यर्थना उपचार में सूर्यार्घ दान के रूप में जल चढ़ाने की परम्परा चली। सर्वसाधारण के लिए वह सर्वसुलभ जो थी।

अन्य देवताओं का उद्भव सम्भवतः सूर्य परिवार के रूप में ही हुआ है। सप्त वर्ण सप्त अश्व को जब सूर्य का अविच्छिन्न अंग माना गया तो फिर उनकी पृथक-पृथक स्थापना और अभ्यर्थना की उमंग उठी और व्यवस्था बनी होगी। वैदिक देवताओं में सात प्रमुख हैं। ऋषियों में भी मूर्धन्य सात ही थे। सात लोक- सात महाद्वीप की मान्यता भी सूर्य विज्ञान के भेद-प्रभेदों पर प्रकाश डालने के रूप में आविर्भूत हुई। सुविदित है कि शरीर में रस, रक्त, माँस, मेदा आदि सात धातुएँ हैं। सूक्ष्म शरीर में षटचक्रों और उनके अधिपति सहस्रार को मिलाकर सप्त धाराएँ बनती हैं। रत्नों में सात ही प्रमुख हैं। स्वर सप्तक की तरह इन सभी की संगति सूर्य के सप्त अश्वों के साथ बैठती है। अध्यात्म और विज्ञान की दोनों ही धाराएँ यह बताती हैं कि चेतना और प्रकृति के दोनों ही क्षेत्रों में जिन सप्त धाराओं के प्रवाहित होने की परिकल्पनाएँ की गई हैं वे सूर्य से सम्बन्धित हैं। पुराणों में इन्हें भगवान मन्दिर के सप्त सभासद भी बताया गया। कहीं-कहीं पत्नियाँ भी कहा गया है। योग विज्ञान में जिस प्रमुख सप्त नाड़ियों का वर्णन हैं वे रक्तवाहिनी धमनियाँ नहीं वरन् लोक-लोकान्तरों से आकर मानवी काया को गतिशील एवं समुन्नत बनाने वाली विभूतियाँ ही हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का स्रोत इन्हीं को माना और स्थिरता तथा प्रगति के लिए इनके सहारे मिलने वाले अनुदानों को दैवी अनुग्रह के रूप में गिना गया है। काल गणना में सप्ताह का सर्वाधिक महत्व है। ज्योतिर्विज्ञान का गतिचक्र इन्हीं के आधार पर आगे बढ़ता है।

ऋग्वेद के 1।164।8 में कहा गया है। धरती, आकास्थ सूर्य की पत्नी है। वह उसके प्रति समर्पित है। बादलों के माध्यम से वह गर्भ धारण करती है। उस विवेचन के फल स्वरूप प्राणि वर्ग का प्रजनन करती है।

मन्दिर निर्माण के इतिहास में बाराह पुराण (177 + 59 - 72) के अनुसार राजा शाम्ब ने तीन सूर्य मन्दिरों की स्थापना उदयगिरि एवं शाम्बपुर क्षेत्रों में कराई। इनमें क्रमशः प्रातः मध्याह्न और अस्त कालक सूर्यों की प्रतिमाएँ हैं।

चीनी तीर्थयात्री ‘ह्वेन सांग’ ने अपने यात्रा वर्णन में शाम्बपुर के सूर्य मन्दिर में अवस्थित स्वर्ण प्रतिमा का वर्णन किया है। डानसन ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ इण्डिया’ में इसी प्रतिमा को 230 मन सोने से बनी बताया है। और सन् 712 के मुस्लिम आक्रमण से उसके नष्ट होने का उल्लेख किया है।

वैदिक देवताओं में इन्द्र, अर्वमा, पूषा, मित्र, वरुण, विष्णु, त्वष्ट आदि नामों का वर्णन है। वे प्रकारान्तर से सूर्य के ही अर्थ बोध नाम हैं। इस प्रकार वेदों में पाया जाने वाला बहुदेववाद भी अन्ततः एक ही ब्रह्म को सद्विदों द्वारा ‘बहुधा वर्दान्त’ की मान्यता में समेट लेते हैं।

सविता की उपासना में सूर्योपस्थान और सूर्यार्घ दान की विशेष महत्ता है। हाथ ऊँचे करके सूर्योपस्थान में भी गायत्री जप किया जाता है और सूर्यार्घ के रूप में भी गायत्री मन्त्र का प्रयोग होता है। स्कन्द पुराण 4।9।46 में कहा गया है- “गायत्री मन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित जल को जिसने तीन बार सूर्य के समक्ष अर्घ प्रदान किया उसने तीनों लोकों की भलाई के लिए बहुत कुछ किया। तीन अंजलियों का अर्थ दान तीन लोकों के कल्याण के लिए है। ऐसा अर्घदान गायत्री युक्त होना चाहिए।” यथा-

गायत्रीमन्त्रतोयाढ्य दत्तं येनान्जलित्रयम्।

काले सवित्रे किं न स्यात्तेन दत्तं जगत्त्रयम्॥

स्कन्द पुराण काशी खण्ड पूर्वार्ध 9154 में सूर्य और गायत्री को वाच्य वाचक की कत्थक और कथन की उपमा दी गई है। दोनों की एकात्मता सिद्ध की गई है। यथा-

वाच्यवाचकम्बन्धो गायत्र्याः सवितुर्द्वयीः।

वाच्योडसौसविता साक्षाद् गायत्री वाचिका परा॥

गायत्री उपासक की परम गति सूर्यलोक में पहुँचने के रूप में मानी गई है। पद्म पुराण में कहा गया है- जो जितेन्द्रिय ब्रह्म परायण गायत्री की उपासना करता है वह जीवन मुक्त होकर सूर्य लोक से परम पद प्राप्त करता है। यथा-

तां दैवीमुपतिष्ठन्ते ब्राह्मणा ये जितेन्द्रियाः।

सूर्यलोकं ते प्रयान्ति क्रमान्मुक्तिं च पार्थिव॥

श्रुति वचन है- “यः सन्ध्यामुपासते ब्रह्मैव तदुपासते।”

अर्थात्- जो सन्ध्योपासना करता है वह ब्रह्म की ही उपासना है।

यह परब्रह्म क्या है? इसका उत्तर देते हुए छान्दोग्य में कहा है- “आदित्यो ब्रह्म”- अर्थात् उस ब्रह्म का प्रतीक आदित्य है। तैत्तिरीय आरण्यक में भी इस मत की पुष्टि की है। उसके 2।2 में उल्लेख है- “असावदित्यो ब्रह्म।” अर्थात् यह आदित्य ब्रह्म ही है।

गायत्री विनियोग में उसका देवता- उद्गम स्रोत सविता माना गया है। यह सविता और आदित्य एक ही है। शतपथ ब्राह्मण 6।3।1।20 का कथन है- असौ वा आदित्यो देवः सविता।’ अर्थात्- यह आदित्य- सूर्य ही सविता है। इस मत की पुष्टि दैवत काण्ड 4।31 में भी मिलती है। कहा गया है- “आदित्याऽपि सवितैवोच्यते” अर्थात्- आदित्य को ही सविता कहते हैं।

सारे वैज्ञानिक प्रमाण एवं आप्त वचन सविता की महत्ता का ही प्रतिपादन करते हैं। महाप्रज्ञा गायत्री की उपासना में सविता को ही प्रकारान्तर से आराधना की जाती है एवं उस दिव्य प्रकाश से स्वयं को ही नहीं- सृष्टि के हर प्राणधारी को जीवन, चेतना, सत्प्रेरणा प्रदान किये जाने की प्रार्थना की जाती है। चिन्तन को बहिरंग से मोड़कर अन्तर्मुखी बनाकर हर कोई सूर्य की दिव्य सामर्थ्य का लाभ उठाता रहा रह सकता है।


स्वर्ग का देवता (kahani)

एक भक्त घुटने टेक कर प्रार्थना करने लगा- भगवान! कोई स्वर्ग का देवता यहाँ भेजे, जो हम लोगों की सहायता करे।

भगवान ने प्रार्थना सुन ली और बादल को बरसने के लिए भेजा।

भक्त को सन्तोष न हुआ और फिर वही पिछली प्रार्थना करने लगा कि देवता भेजें।

भगवान दे सन्देश भिजवाया। स्वर्ग में कोई देवता नहीं रहते। धरती के लोग ही भले मानस बनकर यहाँ आते और कुछ दिन ठहरते हैं। बाद में सेवा का अवसर न मिलने पर खिन्न होकर लौट जाते हैं और अपनी धरती को हरी-भरी बनाने के लिए बादल बनकर बरसते हैं।


भूखण्ड भी खिसक और बिखर रहे हैं।

नेतृत्व वेत्ता राबर्ट रिएज और जान होल्डेन की संयुक्त खोजों और निष्कर्षों के अनुसार प्रागैतिहासिक काल में आस्ट्रेलिया-दक्षिण एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के इन दिनों अलग-अलग दीखने वाले महाद्वीप कभी एक थे। उस विशाल भूखण्ड की यात्रा बिना किसी समुद्र के बीच में बाधा उत्पन्न किये पैदल भी हो सकती थी। पृथ्वी एक विशाल महाद्वीप थी। कटाव और बिखराव तो बहुत बाद में पैदा हुआ।

एक समुद्र एक धरातल की स्थिति पृथ्वी के जन्म के बाद 50 लाख वर्ष तक यथावत बनी रही। बिखराव का सिलसिला चला तो वे कटकर दो हो गये। एशिया को उत्तरी और अमेरिका को दक्षिणी खण्ड माना गया है। यह स्थिति भी अधिक दिन न रही। विभाजन चलता रहा और स्थिति यहाँ तक आ पहुँचती जैसी कि इन दिनों अनेक खण्ड उपखण्डों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। समुद्रों का विभाजन भी इसी प्रकार चलता रहा। वे भी इतने टुकड़ों में बँट गये जितने कि इन दिनों दीख पड़ते हैं।

ऐसा क्यों होता है? इसका कारण समझने के लिए पृथ्वी की संरचना पर ध्यान देना होगा। आरम्भ में वह आग के गोले की तरह गरम थी। धीरे-धीरे ठण्डी होने लगी। ऊपर की परत पर मिट्टी जमी, पानी बरसा समुद्र बने और वनस्पतियों तथा प्राणियों का उद्भव आरम्भ हुआ। किन्तु भीतरी गर्भ में अभी भी वह पिघले हुए गरम लोहे जैसी स्थिति बनी हुई है। उसके ऊपर यह ठण्डी परत तैरती रहती है जिससे हम उपयोगी पदार्थ खोद निकालते हैं। जिसकी उर्वरता पर निर्वाह चलाते हैं।

स्थिति को और भी अच्छी तरह समझने के लिए ऊँचे पहाड़ों की उपमा दी जा सकती है। उन पर चिर पुरातन काल से बर्फ की एक ठोस परत जमी है। इसके बाद हर वर्ष सर्दी के मौसम में नई बर्फ जमती है। वह मुलायम होती है। गर्मी आने पर पिघलने लगती है और उपकरण उसकी चट्टानें कटने और फिसलने लगती हैं। ठीक ऐसा ही धरती के मध्य में प्रायः 80 किलोमीटर मोटी गरम परत के बारे में समझा जा सकता है। उसके ऊपर ठण्डी मिट्टी की परत तैरती रहती है। क्रमशः गरम भाग ठण्डा होता और सिकुड़ जाता है। इस सिकुड़न के फलस्वरूप ठंडी परत फटने और बिखरने लगती है। जिधर भी उसे ढलान मिलती है उसी ओर खिसक जाती है। वजन का भारीपन भी हल्की दिशा में धकेलता रहता है।

इस ठेलम पेल में कई बार ऊपरी परत के टुकड़े आपस में टकराने भी लगते हैं। दबाव जिधर का अधिक होता है उधर का मलबा दूसरे कोमल कमजोर पक्ष को दबोच लेता है। दबाव अधिक और पोल गुंजाइश कम रहने ही स्थिति में कूबड़ उभर आता है। इन्हीं को पर्वत शृंखलाएँ कहते हैं। हिमालय जैसे पर्वतों को ऐसे ही कूबड़ समझा जा सकता है जो एक भूखण्ड के दूसरे पर चढ़ बैठने के कारण उभरे हैं।

भूखण्डों की भगदड़ और फिसलने अभी भी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे आधार बन रहे हैं जिनसे प्रतीत होता है कि यह विभाजन अभी और होगा और जितना महाद्वीप भूखण्ड इन दिनों दृष्टिगोचर होते हैं। उसकी तुलना में अधिक बनेंगे। वैज्ञानिकों के एक वर्ग का कथन है कि अगले दिनों न केवल बिखराव की वरन् एकीकरण की भी सम्भावना है। उत्तर अफ्रीका का भूखण्ड भूमध्य सागर को दौड़ता हुआ योरोप से जा मिलेगा। तब भूमध्य सागर एक छोटी झील जैसा रह जायेगा। इसी प्रकार यह भी सम्भावना है कि आस्ट्रेलिया, इन्डोनेशिया आदि चीन के साथ जुड़कर एक नया विशाल महाद्वीप विनिर्मित करें। तब अमेरिका उतना लम्बा न रहेगा जैसा कि अब नक्शे में दीखता है। उस परिवर्तन के प्रभाव से उसका भू-भाग गोला या आयताकार बन जायेगा।

बढ़ने और सिकुड़ने की प्रकृति प्रक्रिया ने अपनी धरती को भी टूटने और सिमटने के लिए बाधित कर दिया है।


जीवन बहुमूल्य है इसे व्यर्थ न गंवायें

किसी वस्तु की कीमत क्या होगी, इसका निर्धारण उथले पर्यवेक्षण से कर सकना सम्भव नहीं है। जब तक उसका स्वरूप एवं उपयोगिता मालूम न हो, तब तक सही मूल्याँकन नहीं किया जा सकता। जानकारियों के अभाव में बहुमूल्य प्रकृति पदार्थ भी पैरों तले सदियों तक रौंदे जाते हैं। आदिम युग में उसकी कीमत दो कौड़ी जितनी थी। धूल कणों में ही सोना, चाँदी, पीतल, अल्यूमीनियम, लोहा, पीतल, ताँबा के अयस्क घुले मिले थे। अधिकाँश व्यक्तियों की नजरों के सामने वे आते भी थे पर किसी को भी विदित न था कि वे इतने कीमती एवं उपयोगी हो सकते हैं। पर जैसे ही उनके विषय में विस्तृत जानकारियाँ मिलीं, उन्हें बहुमूल्य समझा जाने लगा। कोयले के खदानों में ही हीरे के कण भी विद्यमान थे, पर दीर्घकाल तक वे एक अजूबे से अधिक नहीं माने जाते थे। उनकी कीमत उस दिन बढ़ी जब उनका स्वरूप ज्ञात हुआ।

पेट्रोलियम सम्पदा के विपुल भण्डार का परिचय किसी न किसी रूप में तो पहले भी मिलता रहा होगा पर ऊर्जा के रूप में प्रयुक्त करने उससे विपुल धन कमाने का सुयोग हजारों, लाखों वर्षों तक कहाँ बन सका? अभी कुछ सदियों पूर्व तक दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया की आदिम जातियाँ सोने की खदानें पर वैभव से अनभिज्ञ बनी कंगालों की तरह रहती थीं पर उन्हें अपनी बहुमूल्य सम्पदा का जरा भी बोध न था। चेतना उस समय आयी जब अंग्रेज आए और उस पर अपना आधिपत्य जमा कर मालामाल बन गये।

किसी भी वस्तु की सही कीमत लगानी हो तो उसकी विस्तृत जानकारी होनी आवश्यक है। जड़ पदार्थों की तुलना में चैतन्य घटकों की उपयोगिता एवं महता कही अधिक है। कोई भी पदार्थ क्रियाकलाप की दृष्टि से चैतन्य जीवों का स्थानापन्न नहीं बन सकता। मनुष्य चेतना सम्पन्न इस सृष्टि की सर्वाधिक महत्वपूर्ण इकाई है। तत्व दृष्टियों ने अपनी परोक्ष दृष्टि से पाया है कि सामान्य दिखायी पड़ने वाला मनुष्य भी विलक्षणताओं का भाण्डागार है। यदि उसकी प्रसुप्त क्षमताओं को जागृत किया जा सके तो उसी जड़ कलेवर में महाशक्ति सम्पन्न एक नये मानव का प्रादुर्भाव सम्भव है।

भौतिक विज्ञान की यह विडम्बना रही है कि उसने प्रत्यक्ष दिखायी पड़ने वाले पदार्थों अथवा संसार के जड़ उपादानों भर का महत्व समझा। मोटी दृष्टि को जितना दिखायी पड़ा तथा प्रयोग में आया मात्र उतने का ही मूल्याँकन किया गया। परोक्ष भूमिका निभाने वाले घटकों की उपेक्षा हुई अर्थ की भाषा में जीवन की व्याख्या करने वालों ने तो कुछ दशकों पूर्व तक शरीर का भी अत्यन्त उथला मूल्याँकन किया था। कुछ विशेषज्ञों का मत था कि शरीर के विभिन्न तत्वों, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन आदि की बाजारू कीमत लगायी जाय तो वह पचास रुपयों से अधिक नहीं प्राप्त हो सकेगी। परन्तु मानव शरीर की गहराइयों में जाकर खोज करने वालों ने अब उस मान्यता को उलट दिया है। अमरीका के येल विश्वविद्यालय के एक चिकित्सा विशेषज्ञ का मत है कि मानव शरीर से स्रावित होने वाले एन्जाइमों की ही मात्र कीमत लगायी जाय तो लाखों रुपयों से ऊपर होगी। जीवन पर्यन्त शरीर के विभिन्न सूक्ष्म संस्थानों से होने वाले स्रावों की कीमत तो करोड़ों रुपये होगी। कितने ही सूक्ष्म घटक ऐसे हैं जिनकी कीमत ही नहीं लगायी जा सकती। शरीर को स्वस्थ सन्तुलित रखने तथा मानवी विकास को गति देने में पिट्यूटरी तथा पीनियल ग्रन्थियों का जो योगदान है, उनकी कीमत किस तरह आँकी जा सकती है। वफादार नौकर की तरह बिना कहे अपनी-अपनी सक्रिय भूमिका निभाने वाले अंगों-हृदय, गुर्दे, फेफड़े, आँख, नेत्र, कान आदि के कार्यों का मूल्याँकन पैसों में कर सकना कैसे सम्भव है? उक्त विशेषज्ञ का मत है कि मनुष्य में भौतिक शरीर का ही अभी यथार्थ रूप में मूल्याँकन सम्भव नहीं हो पाया है।

बुद्धि और मन की परतें और भी विलक्षण और भी सामर्थ्यवान हैं। बुद्धि की प्रखरता की परिणति ही सर्वत्र वैज्ञानिक आविष्कारों के रूप में दिखायी पड़ रही है। उसी का एक छोटा सा-अनुदान पाकर कोई वैज्ञानिक बन जाता है तो कोई गणितज्ञ। कोई चिकित्सा विशेषज्ञ कहलाता है तो कोई अध्यापक नित नये साधनों का विकास उसी के सहयोग से हो रहा है। भौतिक उपलब्धियों में उसी की प्रमुख भूमिका होती है।

प्रज्ञा स्तर तक पहुँची अन्वेषक बुद्धि ही विचारकों मनीषियों, तत्त्ववेत्ताओं को जन्म देती है। बुद्धि की गहरी परत ‘इन्ट्यूशन’ की है। जबकि बुद्धि का सामान्य तथा लौकिक पक्ष इन्टेलीजेन्स कहलाता है। भौतिक तथ्यों को खोजने वाली ‘इन्टेलीजेन्स’ स्तर की बुद्धि है जबकि पराभौतिक सत्यों की खोज में ‘इन्ट्यूशन’ स्तर की बुद्धि ही काम आती है। अभी मनुष्य ‘इन्टेलीजेन्स’ के धरातल पर है उँगली पर गिने जाने वाले थोड़े से व्यक्ति ही ‘इन्ट्यूशन’ के स्तर पर पहुँच पाते हैं। जिस दिन संसार इस द्वितीय स्तर पर पहुँचेगा, दुनिया का स्वरूप कुछ और ही होगा।

मन की परतें कोई कम विलक्षण नहीं हैं। मनुष्य इच्छाओं, आकाँक्षाओं तथा कल्पनाओं के उभार को तो अनुभव करता था पर एक सदी पूर्व तक उनके स्वरूप एवं सामर्थ्य से अपरिचित था। बीसवीं सदी में विज्ञान के साथ-साथ मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी प्रगति हुयी है। अब अनुभव किया जाने लगा है कि मन की शक्ति शरीर से कम नहीं कहीं अधिक ही है। मनुष्य को अभीष्ट साँचे में ढालने के लिए मनोवैज्ञानिक प्रयोगों का सिलसिला भी चल पड़ा है। मनः क्षेत्र को अब महत्वपूर्ण उपलब्धियों एवं सम्भावनाओं का आधार समझा जा रहा है।

शरीर, मन और बुद्धि के प्रत्यक्ष पक्षों एवं उनकी सामर्थ्यों का जितना परिचय मिला है, उसी के आधार पर मनुष्य का मूल्याँकन किया गया है पर अधिकाँश परतें अभी भी अविज्ञात हैं जो प्रत्यक्ष की तुलना में कहीं अधिक सामर्थ्यवान हैं। जिस दिन उन पक्षों का रहस्योद्घाटन होगा उस दिन मनुष्य अनुभव करेगा कि तत्त्ववेत्ता ऋषियों की वह उक्ति अक्षरशः सही है कि “मनुष्य से महान एवं श्रेष्ठ इस संसार में और कुछ भी नहीं।”

जीवन का यथार्थ मूल्याँकन वस्तुतः वही कर सकते हैं जो उसकी गरिमा से परिचित हों। पशु-पक्षियों की दृष्टि में बहुमूल्य पदार्थों की भी कीमत दो कौड़ी के बराबर होती है। जो अविकसित एवं पिछड़े हैं अथवा पक्षु प्रवृत्तियों में संलग्न रहते हैं, उनके लिए मनुष्य जीवन कुछ विशेष महत्व नहीं रखता। निरुद्देश्य भटकने पर प्रजनन जितने प्रयोजनों में जीवन गँवा देने, मरने और मारने पर उतारू साधारण व्यक्ति जीवन का मूल्य कहाँ समझते हैं। वे तो उस ना समझ की तरह हैं, जिसे अनायास ही चन्दन का उद्यान हाथ लग गया था और वह उससे अनजान बना उसे कोयला बनाकर बाजार में कोड़ियो के मोल बेचता रहा है। अधिकाँश व्यक्ति आत्मगरिमा से अपरिचित होने से अपनी सामर्थ्यों को कोयला बनाते रहते थे और हाथ मलते हुए इस दुनिया से पश्चाताप के आँसू बहाते चल बसते हैं। अधिक अच्छा हो कि जीवन को जैसे तैसे काटने की अपेक्षा उसके स्वरूप पर गम्भीरता से विचार कर लिया जाय। इतना सम्भव हो सके तो निरर्थक भटकावों से बचने तथा सामर्थ्यों को सुनियोजित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।


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परिस्थितियाँ सदा अनुकूल ही रहे ऐसी आशा न करो। यह संसार तुम्हारे लिए ही नहीं बना है। जो परिस्थिति एक के लिए अनुकूल पड़ती है वह दूसरे के लिए प्रतिकूल भी पड़ती है। सृष्टा ने सभी की सुविधा को ध्यान में रखते हुए यह संसार रचा है।


मृत शरीरों में भी प्राण ऊर्जा की झलक झाँकी

आमतौर से शरीर मृत्यु के उपरान्त तेजी से सड़ने लगता है और स्वयमेव बिखर जाने के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। भीतर से कृमि कीटक उत्पन्न होते हैं और वे उसे खा-पीकर समाप्त कर देते हैं। यह कार्य और भी जल्दी हो इसके लिए प्रकृति ने कुछ ऐसे प्राणी उत्पन्न किये हैं जो मृत शरीरों की तलाश करते रहते हैं और जहाँ कहीं वे मिलते हैं रुचिपूर्वक उन्हें समाप्त कर देने के कार्य में जुट जाते हैं। पक्षियों में गिद्ध और चील इसी वर्ग के हैं। सियार और कुत्तों को भी किसी मृतक पशु की काया का अस्तित्व समाप्त करने की जल्दी पड़ती है और वे गन्ध पाते ही दौड़ कर वहाँ जा पहुँचते हैं। कुटुम्बी लोग अपने ढंग से इस कार्य को पूरा करते हैं प्रचलनों के अनुसार उन्हें जलाया, गाढ़ा या बहाया जाता है।

यह प्रकृति व्यवस्था की बात हुई। मृत शरीर को सुरक्षित रखने का प्रयास मनुष्य भी करता रहा है। मिश्र के पिरमिडों में मसाले से लिपटे हुए ऐसे शरीर पाये गये हैं जो हजारों वर्ष बीत जाने पर भी पूरी तरह नष्ट नहीं हुए और पहचाने जाने योग्य स्थिति में बने रहे। इस सन्दर्भ में रूसी वैज्ञानिकों का वह प्रयास भी अनुपम है जिसके अनुसार लेनिन के शरीर को उसी रूप में सुरक्षित रखने का प्रयत्न हुआ है। इस मृत काया को देखने के लिए अभी भी सुदूर देशों के लोग पहुँचते हैं और इस मानवी कौशल पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं।

प्रकृतिगत और मनुष्य कृत उपरोक्त उपाय उपचारों के अतिरिक्त इस सन्दर्भ में कभी-कभी आत्म शक्ति को भी कुछ विलक्षणता प्रकट करते हुए देखा गया है। ऐसी घटनाएँ सामने आती रही हैं जिनमें लम्बे समय तक मृत शरीरों का अस्तित्व इस रूप में बना रहा जिसमें उनमें किसी ऐसी प्राण चेतना की सम्भावना पाई गई जिसने उन्हें सड़ने नहीं दिया। सामान्य कब्र में दबे रहने पर भी जब उन शरीरों का पुनर्निरीक्षण किया गया तो पता चला कि वे इस तरह नष्ट नहीं हुए जैसे कि सामान्य तथा मृत शरीर सड़-गल कर नष्ट हो जाते हैं। यों उनमें प्रत्यक्ष जीवन नहीं पाया गया। फिर भी आरोगी विशेषता का कोई अंश अवश्य बना रहा जिसने वैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी जैसी कि सभी मृत शरीरों की होती है। ऐसी घटनाओं में सन्त स्तर के शरीरों की ही प्रमुखता रही है। इन में गोवा के सन्त फ्राँसिस का उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है जहाँ लाखों क्रिश्चियन नर-नारी उनके दर्शन करने पहुँचते हैं। एक निश्चित दिन ही दर्शन हेतु सबके लिए चर्च खोला जाता है।

अनाया, लेबनान के सेंट मेरोन मठ के मठाधीश चार्बेल मेकोफ की 1898 ई. में मृत्यु हो गई। मठ के नियमानुसार अन्य मठाधीश की तरह उन्हें भी एक कब्र में दफना दिया गया। उनकी कब्र के चारों तरफ एक विशेष प्रकाश कई सप्ताह तक बना रहा। एक दिन तीव्र मूसलाधार वर्षा के कारण चार्बेल का शव उफनता हुआ कब्र से बाहर आ गया। शरीर पर सड़ने गलने के नामोनिशान तक नहीं पाये गये। शव को धोकर साफ किया गया और लकड़ी के एक ताबूत में बन्द करके मठ के प्रार्थनालय में सुरक्षित रख दिया गया। कुछ दिनों बाद उस शरीर से एक विलक्षण तैलीय तरल पदार्थ बाहर निकलने लगा और इससे रक्त और मीठे की सम्मिश्रित सुगन्ध निकलकर वातावरण में चारों ओर फैलने लगी। इस तरल पदार्थ से शरीर पर ढँके कपड़े भीग जाते थे जिससे एक सप्ताह में उन्हें दो बार बदल कर पहनाया जाने लगा।

सन् 1927 में चार्बेल की मृत्यु के 29 वर्ष बाद उनके शरीर का चिकित्सकों द्वारा निरीक्षण किया गया और उसे निर्दोष पाया। चिकित्सकों की रिपोर्ट और उपस्थित जन समुदाय के साक्षात्कार को लिपिबद्ध करके जिन्क के एक ट्यूब में बन्द करके ताबूत को सामने वाली दीवाल में रखकर ईंटों से चिनाई करा दी गयी।

सन् 1950 में रक्षकों ने सूचित किया कि ताबूत के सामने मठ की दीवाल से एक विचित्र सा तरल द्रव बाहर निकल रहा है। कब्र को तोड़ कर ताबूत को बाहर निकाला गया और पादरी तथा चिकित्सा अधिकारियों के सामने शरीर का निरीक्षण किया गया। चार्बेल के शरीर को देखने पर लगता था जैसे चार्बेल गहन निद्रा में सो रहे हों। शरीर पर ढँके कपड़े फट गये थे और विशेष प्रकार के एक तैलीय द्रव में भीगे हुए थे। ताबूत में तीन इंच मोटी तैलिय परत जम गई थी। जिसे निकाल कर ताबूत की सफाई की गई। ताबूत के पास दफन की गई जिंक की ट्यूब को खोला गया जिसमें वर्णित पूर्व घटना की तुलना वर्तमान घटना से की गई तो दोनों में समानता ही मिली। चार्बेल के शव को फिर से ताबूत में बन्द करके वहीं दफना दिया गया।

ईसाई महिला मारिया अन्ना का शरीर उसकी मृत्यु के 107 वर्ष बाद सन् 1731 में एक खुदाई में प्राप्त हुआ। मूर्धन्य चिकित्सकों और सर्जनों की ग्यारह सदस्यीय टीम ने मारिया के मृतक शरीर का परीक्षण किया। शरीर पर कहीं सड़ने गलने के नामोनिशान तक नहीं थे। सम्पूर्ण शरीर कोमल, सुनम्य, ओज से परिपूर्ण एवं एक विशेष प्रकार की खुशबू से सुवासित था। शरीर के बाह्याँगों एवं अंतरंगों में एक प्रकार की चिकनाई लगी हुई थी।

अनुसंधान की कड़ी में कुछ नया पाने के लालच में चिकित्सकों ने शरीर का शवोच्छेदन किया। कोई नई कड़ी तो उनके हाथ नहीं लगी परन्तु विशेष प्रकार की खुशबू से उनके हाथ कई दिनों तक सुगन्धित बने रहे। सुगन्ध के गायब हो जाने के भय से डाक्टरों ने कई दिनों तक अपने हाथ तक नहीं धोये।

पोलैण्ड के जेसूइट सन्त एण्ड्यू बोबोला रूस में रूढ़िवादियों के मध्य अपने मिशन का प्रचार प्रसार बड़ी सफलता पूर्वक कर रहे थे। अपने इस कार्य के लिए वे प्रतिष्ठित हो चुके थे। सर्वत्र अनेक कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही थी। सन् 1657 में 67 वर्ष की अवस्था में छापामार कोसैक्स ने सन्त की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी और क्षतिविक्षत शरीर को पिंस्क के जेसूइट चर्च के पास गोबर के ढेर में दफना दिया।

हत्या के 44 वर्ष बाद जेसूइट कालेज के प्राचार्य को स्वप्न में एक आदेश मिला जिसके अनुसार फादर बोबोला का शरीर गोबर के ढेर से खोदकर निकाला गया। सन्त का शरीर बेदाग बिना सड़े हुए ताजा, मुलायम, लोच युक्त उसी हालत में मिला जिस स्थिति में उनके शरीर को दफनाया गया था। देखने पर जीवितों जैसा प्रतीत हो रहा था।


Quotation

जीवन की पवित्रता इस तरह की सर्वोपरि कला है। कला कौशल वह है। जो मनुष्य को सहज ऊँचा उठाये। जिससे प्रतिमा की प्रेरणा है। इसे तो कला के नाम पर नंगा नाच नचाने वाले की भर्त्सना ही कहना चाहिये।

मृत्यु के 73 वर्ष बाद 6 पादरियों और 5 मेडिकल विशेषज्ञों के एक दल ने फादर बोबोला के शरीर का निरीक्षण किया और इस प्रकार के शरीर के सुरक्षित रहने को अप्राकृतिक परीक्षण की संज्ञा दी। इस तथ्य की पुष्टि के लिए बहुत से व्यक्तियों ने उस स्थान का सूक्ष्म निरीक्षण किया और पाया कि अन्य किसी व्यक्ति या जीवधारी का शरीर गोबर के इस ढेर में सुरक्षित नहीं रह सकता था। यह विलक्षणता मात्र उस शरीर के ही कारण थी, यह निष्कर्ष निकाला गया।

पैडुआ के सन्त एन्थनी (1195-1231) 12 वीं सदी में फ्रांस के गणमान्य ब्रह्मविज्ञानी एवं धर्मोपदेशक माने जाते थे। वे न केवल अपनी पवित्रता वरन् अपनी वाक्पटुता और विद्वता के लिए भी विख्यात थे। मृत्यु के एक वर्ष बाद सन् 1232 में इन्हें सन्त की पदवी प्रदान की गयी। मृत्यु के 400 वर्ष बाद कब्र से उनकी ताबूत खोदकर बाहर निकाली गई और उसे खोलकर अवलोकन करने पर भूरे रंग की धूल में सन्त एन्थनी के शरीर के अवशेष यथावत् पाये गये। उसी धूल में एक किनारे सन्त की कोमल, गुलाबी, ताजी जीवित जिह्वा भी मिली जिसे देखकर लोग अचम्भित रह गये।


जीव जगत पर वातावरण की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रतिक्रियाएँ

अच्छा सूत कातने के लिए वातावरण में एक निश्चित मात्रा में नमी की आवश्यकता होती है। सामान्य स्तर पर चर्खों से सूत कातते समय न तो उसकी उतनी आवश्यकता अनुभव की जाती है और न हर जगह वह स्थिति पैदा करना ही सम्भव है, किन्तु कताई मिलों में जहाँ महीन किस्म का सूत बड़ी तेजी से काता जाता है, वहाँ वायु में निश्चित आर्द्रता पैदा करनी ही पड़ती है। जहाँ फोटो ग्राफिक फिल्में डेवलप की जाती हैं, उस स्थान पर तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाय तो सारे साधनों के होते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना सम्भव नहीं हो सकता। विशेष औषधियों एवं रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी इसी प्रकार विशेष परिस्थितियाँ बनाकर रखी जाती हैं। किसी प्रयोगशाला चिकित्सालय, शोधसंस्थान की योजना बनाते समय भी उपयुक्त परिस्थितियों की खोज की जाती है। क्षेत्र विशेष के संस्कारों की अपनी महत्ता है। किसी स्थान के व्यक्तियों का स्तर कैसा होगा, यह वहाँ के दृश्यमान तथा परोक्ष वातावरण को ध्यान में रखते हुए बताया जा सकता है।

मनुष्य के शरीर में ही नहीं उनके स्वभावों में भी क्षेत्रीय विशेषता के अनुरूप अन्तर रहते हैं। संस्कृतियों दो आधारों पर बनती हैं- एक तो उस क्षेत्र के निवासियों का चिन्तन एवं रहन-सहन, दूसरे उस क्षेत्र की प्रकृतिगत भिन्नता विशेषता। इन दोनों प्रभावों को कारण उस क्षेत्र के निवासियों का एक विशेष ढर्रा बन जाता है और वह गुण, कर्म, स्वभाव में गहराई तक अपनी जड़े जमा लेता है। संस्कृतियों की भिन्नताओं के यही दो प्रमुख आधार हैं। यों मनुष्य स्वतंत्र और समर्थ है, वह अपनी संकल्प शक्ति के बल पर परम्परागत सभी दबावों को बदल सकने में सैद्धान्तिक दृष्टि से पूर्णतया सक्षम है। पर व्यवहार में होता यही है कि वातावरण अपने प्रभाव से उस क्षेत्र के मनुष्यों को ढालना चला जाता है।

व्यक्ति की मौलिक विशेषताओं को मान्यता देते हुए भी यह स्वीकार करना ही होगा कि उन समाज की बहू संख्या विचारणा से नहीं वातावरण के प्रभाव से जीवनयापन करती है। व्यापक क्रान्तियाँ कुछ लोगों को बदलने से सम्पन्न नहीं होती वरन् वातावरण में ऐसा परिवर्तन लाना पड़ता है कि जिसके प्रभाव से जन साधारण को परिष्कृत ढंग से सोचने और उपयोगी क्रिया-कलाप अपनाने का साहस एवं अवसर उपलब्ध हो सके।

जातियों और वंशों में कई प्रकार की अपनी-अपनी विशेषताएँ पाई जाती है। ब्राह्मणों में धार्मिकता, क्षत्रियों में अक्खड़ता-प्रखरता, वैश्यों में अर्थ दृष्टि, शिल्पकारों में क्रिया कुशलता जैसी विशेषताएँ दूसरों की अपेक्षा कुछ अधिक मात्रा में पाई जाती है। कायस्थ समाज में शिक्षा का बाहुल्य पाया जाता है। पिछड़े वर्गों में प्रायः अस्वच्छता, अशिष्टता और अस्त-व्यस्तता संव्याप्त पाई जाती है। कुछ में चोरी, उठाईगीरी की आदत जातीय विशेषता के रूप में होती है। कुछ कायरता और बेवकूफी के लिए बदनाम हैं। इनके कारणों की खोज करने पर एक यही तथ्य सामने आता है कि अमुक वर्ग के व्यक्तियों को अमुक प्रकार के वातावरण में रहने का अवसर मिलता है जिससे उसी के अनुरूप विशेषताएँ उनमें विकसित हो जाती हैं। वातावरण प्रयास पूर्वक बनाया गया या काल प्रभाव से संयोगवश बना। यह बात भिन्न है, किन्तु उसके प्रभाव का महत्व तो हर स्थिति में स्वीकार करना ही पड़ता है।

वनवासी जनजातियों में चित्र-विचित्र रिवाज पाये जाते हैं। उसके स्वभाव और अभ्यास भी अपने ढंग के होते हैं। सुधारकों के प्रयास उनमें परिवर्तन लाने के होते हैं पर वैसा कुछ अधिक प्रभाव हो नहीं पाता क्योंकि उनके चारों ओर घिरा हुआ वातावरण उन्हें यत्किंचित् सुधार स्वीकार करने की ही छूट देता है। परिवर्तन के लिए वातावरण बदलना आवश्यक है। बहुत से अफ्रीकी नीग्रो बहुत समय से अमेरिका में बस गये हैं। उनकी और उनके अफ्रीकी वंशधरों की आकृति में थोड़ा-सा ही फर्क पड़ा है, पर प्रकृति में भारी परिवर्तन आ गया है। अमेरिकी नीग्रो प्रायः अमेरिकी गोरों के स्तर का ही जीवनयापन करते हैं। उत्तरी ध्रुव के एस्किमो लोगों में से बहुत से कनाडा में आ बसे हैं। उस वर्ग के मूल निवासियों और केनेडियन एस्किमो वर्ग में आश्चर्यजनक अन्तर आ गया है। इसी प्रकार अन्यान्य देशों में जा बसने वाले अपने मूल देश की अपेक्षा नई परिस्थितियों में नये ढंग में ढलते-बदलते देखे जाते हैं। वातावरण के प्रभाव से बचे रहना आग्रहशील लोगों के लिए सम्भव है। सामान्य लोग तो परिस्थितियों के अनुरूप ढलते-बदलते चले जाते हैं। वस्तुतः मनुष्य जाति के शारीरिक मानसिक विकास में वातावरण की भूमिका असाधारण है।

वातावरण को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- स्थूल एवं सूक्ष्म। स्थूल वातावरण का परिचय स्थानीय जलवायु की विशेषताओं के रूप में मिलता है। सूक्ष्म वातावरण वह है जो मनुष्य की प्रकृति-स्वभाव को स्वाभावित करता है जिसमें विचारों एवं घटनाओं के सूक्ष्म संस्कार बने रहते हैं। जाने अनजाने उनकी भली-बुरी प्रेरणाओं को ग्रहण किया जाता है। जलवायु तथा वातावरण का स्थूल पक्ष मनुष्य की आकृति एवं प्रकृति की विशिष्ट संरचना के लिए भी एक सीमा तक जिम्मेदार है। विभिन्न समाजों में रहने वाली अगणित जातियों के विभिन्न प्रकार के रंग, रूप, शारीरिक गठन आकार आदि का सीधा सम्बन्ध जलवायु की विशेषता से जोड़ा जाता है।

श्वेत तथा गुलाबी वर्ण के लोग उत्तर-पश्चिमी योरोप के प्रारम्भिक निवासियों के वंशज हैं तथा वे शीतल जलवायु क अभ्यस्त होते हैं। सूर्य की तीव्र किरणों को उनकी त्वचा सहन नहीं कर पाती। दूसरी ओर भूरे तथा कोल वर्ण के लोगों की त्वचा सूर्य की तीव्र किरणों को सहन करने में सक्षम होती है। प्रायः अफ्रीका तथा एशिया महाद्वीप और ट्रापिकल मरुभूमि क्षेत्रों के लोगों में वह विशेषता पायी जाती है। तीसरे प्रकार के वर्ण के व्यक्ति वे होते हैं जिनका रंग पीला जैतून के रंग-सा अथवा पीला मिश्रित सफेद होता है। इसका वर्ण धूप के प्रभाव से शीघ्र ही ताम्र रंग का अथवा भूरा हो जाता है।

आकार एवं वजन पर भी जलवायु की स्थानीय विशेषताओं का प्रभाव पड़ता है। प्रायः ठण्डे क्षेत्र में रहने वाले गर्म प्रदेशों के निवासियों से अधिक लम्बे होते हैं। उत्तरी योरोप के लोगों को औसत वजन 70 से 80 किलोग्राम (150 से 175 पौंड) तक होता है। अपवाद स्वरूप इससे कम और अधिक वजन के व्यक्ति भी इन क्षेत्रों में पाये जाते हैं। अरब तथा दक्षिणी एशिया के निवासियों का वजन औसतन 50 से 60 किलोग्राम तक होता है।

ठण्डे प्रदेशों के मूल निवासियों का शारीरिक गठन लम्बा तथा गठीला होता है। जबकि अत्याधिक गर्म प्रदेश के लोग पतले तथा लम्बे होते हैं। उनकी उँगलियाँ पैर तथा हाथ भी लम्बे पाये जाते हैं। अरब देशों के निवासी प्रायः इन्हीं विशेषताओं से मुक्त होते हैं।

अफ्रीका के नीग्रो, योरोप के गोरे, चीन के मंगोल, अरब के तगड़े, कांगों के बौने एकत्रित करके यह जाना जा सकता है कि उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति में भी भारी अन्तर पाया जाता है। चेहरा, नाक, आँख, होंठ, बाल, नाखून जैसे अंगों को देखकर ज्ञात होता है कि वे विभिन्नताएँ उन समुदायों की निजी विशेषता है। इन विशेषताओं को पैदा करने में आनुवांशिक तथ्य तो जिम्मेदार हैं ही, भौगोलिक परिस्थितियों की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। एक विशिष्ट प्रकार के वातावरण एवं जलवायु में पीढ़ी दर पीढ़ी रहने पर विशेष प्रकार की शारीरिक विशेषताओं को पैदा हो जाना तथा आगामी अनेकों पीढ़ियों के आनुवांशिक स्तर तक को प्रभावित कर देना एक ऐसी सच्चाई है जिसका समर्थन विकासवादी तथा एन्थ्रापालिस्ट्स भी करते आए हैं।

संसार की विभिन्न वर्ण एवं रूपों की अनेकानेक जातियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी कुशल चित्रकार ने अपनी तूलिका से उनमें विशेष प्रकार का रंग भरा हो। त्वचा के विभिन्न रंग बालों की संरचना, शरीर का गठन, मुखाकृति विभिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न तरह की पायी जाती है। अधिकाँश विशेषज्ञों का मत है कि आनुवांशिक कारणों के अतिरिक्त उन भिन्नताओं का सबसे प्रमुख कारण भौगोलिक है।

शरीर शास्त्री काल्टनकून ने 1965 में ‘लिविंग रेसेस आफ मेन’ नामक पुस्तक में शारीरिक गठन को आधार मान कर जातियों का विभाजन पाँच भागों में किया था। 1-काकेसाॅइड 2-मंगोलाॅइड 3-आस्ट्रेलाॅइड 4-कांगोआइड 5-केपोआइड। श्रीकूल का मत है कि अब से 35 हजार वर्ष पूर्व मानव की मात्र एक ही जाति थी जो बाद में विभिन्न भू-भागों पर वितरित होकर विभिन्न वातावरण के कारण पाँच भागों में विभक्त हो गयी। सन् 1500 तक ये पाँचों जातियाँ विशुद्ध रूप से विद्यमान थीं। पर यूरोपियन उपनिवेशवाद के विस्तार से जातियों की शुद्धता मारी गयी।

विद्वान डा. क्रिस्टीजीटर्नर का कहना है कि दाँतों की बनावट के आधार पर भी जातियों की भिन्नता जानी सकती है। दन्त संरचना के आधार पर उन्होंने मनुष्य जाति को 28 जातियों में बाँटा है। रेड इंडियंस के अगले दाँत फावड़े जैसे होते हैं। उनके दाँतों का मध्य भाग कुछ दबा होता है। यूरोपियन्स के दाँत सीधे होते हैं। सामान्यतः एशियाई लोगों के अगले काटने वाले चार दाँत होते हैं। जबकि रेडइण्डियन तथा उत्तर एशिया की जातियों में काटने के लिए पाँच दाँत प्रयुक्त होते हैं। अमेरिका के एस्किमो तथा उत्तर एशिया के बर्फीले प्रदेश में रहने वाले एस्किमो के दाँत भी एक जैसे पाये जाते हैं। उनकी तीसरी ऊपर की की दाढ़ खूँटी के आकार की होती है। दक्षिण एशिया में रहने वालों के दाँत प्रायः चिकने और सीधे होते हैं।

विभिन्न जातियों की इन अलग-अलग विशेषताओं के आधार पर उन्हें पहचाना जा सकता है। पर साथ ही इस सत्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि संसार की अगणित जातियों स्थान परिवर्तन भी करती रहीं हैं। उनके रक्त में सम्मिश्रण भी होता रहा है। साँस्कृतिक आदान-प्रदान विवाह, जलवायु, परिवर्तन आदि कारणों से उनकी जन्मजात विशेषताओं में भी अन्तर आया है। इन सबके बावजूद भी स्थानीय जलवायु का अपना महत्व अपना प्रभाव है।

यह भी एक विचित्र सत्य है कि एशिया, यूरोप, अफ्रीका हर महाद्वीप में उत्तरी भाग की अपेक्षा दक्षिण में रहने वालों का रंग अधिक गहरा होता है। जलवायु का प्रभाव आनुवंशिक स्तर तक हावी रहता है। यही कारण है कि एक वातावरण में जन्मे पले व्यक्तियों, जीवों तथा वनस्पतियों के लिए दूसरे भिन्न प्रकार की जलवायु के अनुकूलन में कठिनाई होती है। कठिनाई ही नहीं कितनी बार तो उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना अस्तित्व तक गँवाना पड़ता है। प्रायः देखा जाता है कि काला रंग सूर्य की तीक्ष्ण किरणों से शरीर का बचाव करता है। यही कारण है कि काले लोग उष्ण कटिबंध में रहने के बावजूद भी स्वस्थ बने रहते हैं जबकि गोरी नस्ल के लोगों के लिए ऐसी जलवायु अनुकूल नहीं पड़ती। उनमें स्क्रीन कैंसर होने की संभावना बनी रहती है। काले व्यक्तियों के अधिक ठण्डे प्रदेशों में रहने से विटामिन डी की कमी पड़ने तथा ‘रिकेट्स’ रोग होने की गुंजाइश रहती है। कोरियाई युद्ध में काले हब्शिटयों में ‘फ्रोस्ट वाइट’ नामक रोग फैला। इसका कारण चिकित्सकों ने बताया कि अनभ्यस्त बर्फीले प्रदेश में रहने के कारण ही उन्हें यह रोग हुआ। मनुष्य ही नहीं अन्य जन्तुओं तथा वनस्पतियों के साथ भी यही बात है। ट्रापिकल क्षेत्रों में पहाड़ी प्रदेशों में रहने वाले रीछ, खरगोश यदि गरम प्रदेशों में पाले जायें तो वे मर जाते हैं। कितनी ही जड़ी-बूटियाँ ऐसी हैं जो हिमालय के वातावरण में ही पलती तथा अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सकती हैं। नागपुरी सन्तरे, भुसावल के केले, महाराष्ट्र के अमरूद, कश्मीर के सेब यदि भिन्न जलवायु में उगाये जायें तो उनकी मौलिक विशेषताएँ नहीं आ पातीं। स्वाद एवं मिठास की दृष्टि से उनकी अपनी निज की विशिष्टता है।

हिमालय के मध्य में हजारों किस्म की पुष्पों की घाटियाँ हैं। फूलों की घाटी के नाम से प्रख्यात प्रकृति के वे सुरम्य स्थान तीर्थ यात्रा, तप, पर्यटन के लिये जाने वाले अगणित व्यक्तियों को आकर्षित करते तथा मन को अपने अद्वितीय सौन्दर्य से पुलकित करते हैं। वहाँ से विभिन्न प्रकार के दुर्लभ फूलों की पौध ले जाकर दूसरे ऐसे स्थानों पर लगाने के प्रयास कितने ही व्यक्तियों ने किये जहाँ का वातावरण अनुकूल न था। पर उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। किसी तरह वे पौध उग आये और फूल देने लगे तो भी उनमें वह सौन्दर्य, वह सौरभ नहीं जन्म ले सका जो हिमालय क्षेत्र के पुष्पों में पाया जाता है।

जीवों एवं वनस्पतियों की आकृति एवं प्रकृति को बदलने तथा उनमें निश्चित प्रकार की विशिष्टताएँ पैदा करने के लिए ‘क्रास ब्रीडिंग’ के जेनेटिक इंजीनियरिंग के विभिन्न प्रयोग पिछले दिनों चले हैं। पेड़, पौधों, वनस्पतियों तथा मनुष्येत्तर जीवों पर उनसे न्यूनाधिक सफलताएँ भी मिली हैं पर वे ऐसी नहीं है कि सन्तोष व्यक्त करते हुए कहा जा सके कि पूर्ण सफलता मिल गयी। प्रायः देखा यह गया है कि ऐसे प्रयोगों के उपरान्त उन घटकों की मौलिक विशेषताएँ मारी जाती है। एक उपलब्धि हासिल होती है तो दूसरी तरह की समस्या को भी जन्म देती है।

वस्तुतः जलवायु एवं आनुवांशिकी एक सीमा तक ही मानवी प्रकृति एवं आकृति के निर्धारण हेतु जिम्मेदार है। वातावरण के इन स्थूल पक्षों का अपना महत्व एवं प्रभाव है। उन प्रभावों में परिवर्तन कर करना थोड़ा-बहुत ही सम्भव है, पूर्णतः बदल सकना मुश्किल है। पर वातावरण का एक और भी पक्ष है जिसका महत्व पहले की तुलना में कम नहीं अधिक ही है। वातावरण तो मानवी चिन्तन, विचारणा एवं गतिविधि के समन्वय से उत्पन्न होता है, मानवी प्रकृति प्रायः उससे ही अधिक प्रभावित होती है। वातावरण के इस पक्ष के विनिर्मित करना पूर्णतः मनुष्य के हाथों में है। जिस परिवेश में वह रहता है उसके सूक्ष्म प्रभावों एवं संस्कारों को ग्रहण करके उसी के अनुरूप ढलता जाता है। उसके गुण-कर्म स्वभाव वैसे ही बन जाते हैं। जैसी भी पीढ़ियाँ बनानी हों, जैसा भी समाज का ढाँचा खड़ा करना हो, उसके अनुरूप ही वातावरण बनाना होगा। वैसा ही चिन्तन देना और शिक्षण चलाना होगा। इसमें वे ही सफल हो सकते हैं जिनने उन विशेषताओं को अपने व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बना लिया है। अवांछनीयताओं की विषाक्तता से भी वर्तमान वातावरण के बदलने तथा ऐसे माहौल को विनिर्मित करने- जिसमें श्रेष्ठ मानवों की ढलाई होती चले, जाज्वल्यमान व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो आगे आएँ, साँचे की भूमिका निभाएँ। जब-जब भी महामानवों की पीढ़ियाँ जन्मी हैं, ऐसे सूक्ष्म घटकों के आधार पर ही विकसित हुई हैं। आगे भी अब आवश्यकता पड़ेगी ऐसे ही वातावरण की जरूरत पड़ेगी।


बुद्धि की परीक्षा (kahani)

नानक ने सोचा कबीर की बुद्धि की परीक्षा करनी चाहिये। उन्होंने एक चवन्नी कबीर के पास भेजी और कहला भेजा कि इस चवन्नी की कोई ऐसी वस्तु लेनी चाहिये जिसे खाकर एक सौ व्यक्ति तृप्त हो जायें?

कबीर ने चवन्नी ले ली, बाजार गये और चार आने की बढ़िया वाली हींग लाये। उसी दिन नगर के एक सेठ भोज कर रहे थे। चार आने की हींग लेकर कबीर के पास पहुँचे और उसकी छोंक लगवा दी। वह दाल जिस-जिसने खाई हींग की बधार ने सब को तृप्त किया। कबीर की हींग की सबने प्रशंसा की।

अब कबीर ने सोचा नानक की बुद्धि की परीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने एक रुपया नानक के पास भेजा एक रुपये की औषधि से सारे संसार के रोगियों को अच्छा कर दो। नानक ने गम्भीरतापूर्वक विचार किया सारे संसार में 3 अरब तो मनुष्य ही हैं उन्हीं को एक स्थान पर बुलाना कहाँ सम्भव है? फिर भेड़, बकरी, चूहे, खरगोश, मछली, कछुए न जान कितने जन्तु इस पृथ्वी पर हैं। एक रुपये में सब की औषधि किस प्रकार हो?

उन्होंने एक रुपये की गुग्गल, छार छबीला तालीस पत्र, कपूर कचरी, पृश्विपर्णी आदि औषधियाँ मँगाईं और हवन करने लगे। औषधियाँ जल कर नष्ट नहीं हुईं वायु भूत होकर सारे संसार में फैल गईं। जलचर, थलचर, नभचर, सबने साँस ली औषधि सब के शरीर में पहुँची सब के शरीरों के रोग कीटाणु नष्ट हो गये। सब स्वस्थ हो गये।

कबीर ने नानक की भूरि-भूरि प्रशंसा की तो नानक ने कहा- कबीर यह श्रेय तो उन ऋषियों का है जिन्होंने संसार के स्वास्थ्य के लिये यज्ञ जैसे महान् विज्ञान की शोध की थी।


विज्ञान को पथ भ्रष्ट होने से रोका जाय

एक बार आइन्स्टाइन अत्यधिक विषम बीमारी के चंगुल में फँस गये। बचने की आशा कम ही रह गई थी। बाद में दैवयोग वश जब वे अच्छे हो गये तो बीमारी के दिनों में बन पड़े चिन्तन और अनुभव को बहुत महत्वपूर्ण मानते रहे। वे कहते थे कि आन्तरिक अनुभूतियों की दृष्टि से उन दिनों जो मैंने अनुभव पाये, वह जीवन भर के अनुसंधानों से किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।

वे तत्वज्ञानियों की भाषा बोलने लगे थे और कहते थे कि- “मैं समस्त चेतन जगत से अपने को इतना अधिक तादात्म्य अनुभव करता हूँ कि मरने और जीने की स्थिति में कोई विशेष अन्तर मुझे प्रतीत नहीं होता।”

कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी की लारेन्स वर्कले प्रयोगशाला के कई मूर्धन्य भौतिक विज्ञानियों ने पिछले दिनों मिलजुल कर ऐसी कांफ्रेंस बुलाई जिसमें दार्शनिक स्तर के भौतिक विज्ञानियों की एक बड़ी मण्डली सम्मिलित हुई।

इसमें भौतिकी के मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से अनेकों की अभिव्यक्तियों का समावेश सम्भव हो सका था। एलिजावेथ रॉशर-माइकेल मर्फी-फ्रिटजाफ काप्रा-डेविड फिन्सेल्टाइन, गैरी जुकैव आदि ने इस विषय पर विचार व्यक्त किये कि- “क्या भौतिक विज्ञान अपने चरम लक्ष्य की दिशा में बढ़ रहा है? क्या हम वर्तमान रीति-नीति अपनाये रहकर वहाँ पहुँच सकेंगे, जहाँ पहुँचना विज्ञान के लिए उचित है? यदि नहीं तो इसकी वैकल्पिक दिशा धारा क्या हो सकती है?

कांफ्रेंस में व्यक्त किये गये विचारों का सार संक्षेप यह था कि हमने प्रारम्भ तो अच्छे उद्देश्य से किया और उसे देर तक सही दिशा में अपनाये भी रखा। पर अब आकर भटकने लगे हैं। मानवी प्रगति ही नहीं, शान्ति भी विज्ञान का लक्ष्य है। शान्ति विहीन प्रगति से काम चलेगा नहीं। हमें प्रकृति के रहस्योद्घाटन की तरह ही मानवी गरिमा के अनुरूप उपलब्धियों के उपयोग की मर्यादा बनानी चाहिए।

दूसरा विचार कांफ्रेंस का यह था कि अब प्रकृतिगत पदार्थ सत्ता ही सब कुछ नहीं मानी जा सकती। चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व भी प्रामाणित हो रहा है। अतएव चिन्तन को प्रभावित करने वाला तत्त्वदर्शन भी वैज्ञानिक शोध प्रयोजनों में ही सम्मिलित रहना चाहिए।

विज्ञान को पथ भ्रष्ट होने से रोकने के लिए कितने ही मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने आवाज उठाई है और कहा है कि हमें अन्धी दौड़ नहीं दौड़नी चाहिए वरन् यह देखना चाहिए कि जो कमाया जा रहा है उसे ठीक तरह खाया और सही रूप में पचाया भी जा रहा है या नहीं।

इस संदर्भ में प्रोफेसर काप्रा की पुस्तक “दि ताओ आफ फिजिक्स” और प्रो. जुकैव को “दि डान्सिग आफ मास्टर्स” विशेष रूप से पठनीय हैं। वे अब से पाँच वर्ष पूर्व ही प्रकाशित हुई थीं पर अपने प्रतिपादनों के सारगर्भित होने के कारण ही बहुत लोकप्रिय हुईं और देखते-देखते लाखों की संख्या वाले कई संस्करण बिक गये। इससे प्रतीत होता है कि विचारशील वर्ग की सहानुभूति किस और है। कोई नहीं चाहता कि विज्ञान को ऐसे अनुपयुक्त कार्य करने दिये जाय जैसे कि उसके द्वारा इन दिनों किये जा रहे हैं।

जॉर्जिया स्कूल आफ टेक्नोलाजी के फिजिक्स डायरेक्टर प्रो. फिन्सेन्टाइन ने अपने प्रतिपादनों में इस बात पर बहुत जोर दिया है कि कुछ समय के लिए आविष्कारों को विराम देकर यह सोचा जाय कि उन्हें किन के लिए- किन प्रयोजनों के लिए नियोजित किया जाय। बिना पर्यवेक्षण किये और उद्देश्य निर्धारित किसे ऐसे ही घुड़दौड़ मचाने का परिणाम ऐसा भी हो सकता है जिसके कारण जन-साधारण को- विज्ञान क्षेत्र ही नहीं, स्वयं वैज्ञानिकों को भी विपत्ति में फँसना पड़े।

सत्य और तथ्य को खोजना भी विज्ञान का विषय होना चाहिए। उपलब्धियों का उपयोग किस प्रयोजन के लिए हो, उन पर आधिपत्य किन का हो, अनुचित प्रयोगों की रोकथाम कैसे हो? यह प्रसंग भी विचारणीय हैं उनकी उपेक्षा होने पर जिसे उत्कर्ष में लगना चाहिए था, वह वह विनाश में जुट सकता है।

विज्ञान को अब भौतिकी तक ही सीमित न रहकर आत्मिकी के क्षेत्र में प्रवेश करना होगा। यह मन्थन विश्व मनीषा के मस्तिष्क में दिनों दिन अधिकाधिक गतिशील होता जा रहा है। प्रोफेसर काप्रा को एक विचारोत्तेजक लेख प्रख्यात अमेरिका पत्रिका “सटर्डे रिब्यू” में छपा है। वे कहते हैं- “प्रकृति के रहस्योद्घाटन में अब तक मनुष्य की तार्किक बुद्धि ने काम किया है। अब बदलती परिस्थितियों में एक नया आधार अपनाया जाना आवश्यक हो गया है। वह है इन्ट्यूशन अर्थात् अन्तःप्रज्ञा। अब तक अन्तःप्रज्ञा की- नीतिमत्ता और भाव सम्वेदना की उपेक्षा होती रही है। समय आ गया है कि उसे उसकी समुचित प्रतिष्ठा प्रदान की जाय।” उनके विचारों को स्वामी रंगनाथानन्द ने अपनी पुस्तक “साइन्स एण्ड रिलीजन” में बड़ी भाव कुशलता से व्यक्त किया है।

प्रगतिशील मनीषा के सामने कुछ नये तथ्य और नये संकल्प हैं। उसे खोजना है कि क्या मानवी प्रगति पदार्थ सम्पदा के माध्यम से ही हो सकती है अथवा उसमें नीतिमत्ता और भाव सम्वेदनाओं के समावेश की भी आवश्यकता है? सोचना होगा कि क्या सामर्थ्य साधनों से ही मनुष्य बलिष्ठ बन सकता है, अथवा उसके व्यक्तित्व में शालीनता की मात्रा भी बढ़नी चाहिए।

पदार्थजन्य सुविधा साधनों का कितना ही महत्व क्यों न हो, उनका सदुपयोग माइन्ड स्टफ-मनःतत्व में उत्कृष्टता उत्पन्न किये बिना सम्भव नहीं हो सकता। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बनता है। कपड़ा सीने वाली सुई प्राण घातक अस्त्र बन सकती है। विज्ञान सुविधाएँ उत्पन्न करे, इसमें उसकी सराहना है, पर साथ ही इसमें निन्दा भी कम नहीं कि उसके कारण मनुष्य विलासी, लालची और आक्रामक प्रकृति के बनते जायँ, छीना-छपटी का मत्स्य न्याय अपनाये और प्रतिशोध की आग जलाकर अपने को ही भस्मसात् कर लें। इस स्तर की दुर्गति उत्पन्न करने में यदि विज्ञान का उपयोग होने लगा तो समझना चाहिए कि उसने उस उद्देश्य का परित्याग कर दिया जिसमें उसे सत्य और तथ्य को ढूँढ़ना ही नहीं उपलब्धियों का विवेकपूर्ण उपयोग भी कराना था।

विज्ञान का काम है कि वह अन्धविश्वासों से मुक्ति दिलाये। साथ ही उस श्रद्धा का उत्पादन अभिवर्धन भी करे जो मानवी गरिमा को अक्षुण्य रखने में सहायता कर सके। आइन्स्टाइन कहते रहते थे कि “विज्ञान के बिना धर्म अन्धा है और धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा।” अन्धे और पंगे ने मिलकर नदी पार की थी। इन दोनों का परस्पर सघन सहयोग और भी अधिक आवश्यक हो गया है।

कार्य कुछ भी क्यों न हो उसके पीछे उद्देश्यों का समावेश होना चाहिए। उपलब्धियाँ किसी भी स्तर की क्यों न हों उनका उपयोग सही प्रयोजन के लिए सही मनुष्यों द्वारा होना चाहिए। अन्यथा उपयोगी भी अनुपयोगी घातक बन सकता है। प्रकृति के रहस्योद्घाटन से कितनी ही चमत्कारी क्षमताएँ विज्ञान क्षेत्र में उपलब्ध हुई हैं। उनके सहारे सुविधा साधनों का संवर्धन भी हुआ है। पर साथ ही यह संकट भी सामने है कि दुरुपयोग होने पर जलाई गई माचिस की तीली इस विश्व वैभव को भस्मसात् भी कर सकती है, जिसके निर्माण में अनेकानेक मनीषियों की श्रमशीलता एवं बुद्धिमता का सुनियोजन हुआ है। विचारशीलता वैज्ञानिक क्षेत्र के सूत्र संचालकों को इस तथ्य पर नये सिरे से विचार करने के लिए बाधित कर रही है कि उनके प्रयासों का उपयोग मानवी प्रगति एवं सुख-शान्ति के निमित्त हो, न कि दुष्टता के परिपोषण और पिछड़े वर्ग को अधिक गिराने निचोड़ने में उसे प्रयुक्त किया जाने लगे।


दृश्य की तरह एक अदृश्य भी है।

प्रत्यक्ष जगत जिसमें कि हम वस्तुओं के स्वरूप देखते और गुण कर्म स्वभाव से अवगत रहते हैं, सर्वविदित है। उसी में हम रहते और उसी की परिधि में व्यवहार करते हैं। उसके साथ ही जुड़ा हुआ एक अदृश्य जगत भी है जिसकी प्रत्यक्ष अनुभूति तो नहीं होता, पर उसके अस्तित्व का परिचय समय-समय पर अनेकानेक प्रमाणों से मिलता रहता है।

प्रकृति पदार्थों को ठोस और द्रव परिस्थितियों में ही देखा जाता है। पदार्थ का तीसरा स्वरूप गैस है। इस वायुभूत स्थिति में पदार्थ दृष्टि से ओझल हो जाता है। धुँए या भाप का रूप तभी तक रहता है जब तक कि उसके साथ ठोस या द्रव बना रहे। शुद्ध वायु की उपस्थिति प्रत्यक्ष नहीं देखी जा सकती। उसके द्वारा हलचलें ही अनुभव में आती हैं।

आकाश पोला दीखता तो है पर वह शून्य नहीं है। उसमें हलकी भारी गैसों के रूप में असीम पदार्थ भरा पड़ा है। वही परिस्थितिवश ठोस या द्रव बनता और अनुभव में आता रहता है। दृश्य जगत की तुलना में अदृश्य का विस्तार और महत्व कहीं अधिक है।

मरने के उपरान्त आत्माएँ अदृश्य जगत में विचरण करती रहती हैं। शरीर धारियों की दुनिया जैसी है उसमें बड़ी और विचित्रता युक्त दुनिया वह है जो अदृश्य जगत में निवास करती है। दोनों के बीच आदान-प्रदान भी चलता रहता है। पदार्थों का ही नहीं प्राणियों का भी आवागमन अदृश्य और दृश्य जगत के बीच चल सकता है। प्रयत्नपूर्वक एक क्षेत्र से दूसरे में इन्हें उतारा या भेजा जा सकता है।

जानकारियाँ प्राप्त करने में प्रधानतया हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ही प्रमुख माध्यम होती हैं। उन्हीं के सहारे प्रत्यक्ष पदार्थ दीखते और मस्तिष्कीय ज्ञान भण्डार में सम्मिलित होते जाते हैं। यन्त्र उपकरणों के माध्यम से इन्द्रिय शक्ति में तनिक और वृद्धि हो जाती है। खुली आँखों से जो दिखाई नहीं देता उसे माइक्रोस्कोप-टैलिस्कोप आदि उपकरणों के माध्यम से देख लेते हैं। इन सबमें आधार इन्द्रियों का ही रहता है। इन्द्रिय शक्ति प्रत्यक्ष तक ही सीमित है। इसलिए आमतौर से मनुष्य की जानकारी उतने तक ही सीमित है जितना कि प्रत्यक्ष है। इस मस्तिष्क में दृश्य संसार मात्र की ही कल्पना रहती है। उसे उतना ही सीमित माना जाता है।

इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि जो इन्द्रिय शक्ति की पकड़ से बाहर है, उसका अस्तित्व ही नहीं है। आत्मा को देखा नहीं जा सकता और न अन्य इन्द्रियों के सहारे उसे पकड़ा जा सकता है। तो भी वह काया में समाहित नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता है। उसके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित सभी माध्यम इसी स्तर के हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से विनिर्मित अन्तःकरण को किस प्रकार प्रत्यक्ष देखा जाय। भावनाएँ, मान्यताएँ, किस प्रकार देखी जायँ?

मरणोत्तर जीवन को इन्द्रिय शक्ति के सहारे देखा जाना नहीं जा सकता। तो भी यह नहीं कहा जा सकता है कि मरने और जन्मने के मध्य वाली स्थिति में जीवात्मा की सत्ता रहती ही नहीं या उसे उस अवधि में कुछ करना-सहना ही नहीं पड़ता। अदृश्य का भी अस्तित्व है। अस्तु अदृश्य लोक की मान्यता भी किसी न किसी रूप में स्वीकारनी पड़ती है। अतीन्द्रिय क्षमता द्वारा जो कार्य होते हैं, उन गतिविधियों का कार्य क्षेत्र अदृश्य जगत ही होता है। शाप-वरदान की प्रक्रिया किस प्रकार सम्पन्न होती है इसे जानना हो तो अदृश्य जगत की मान्यता के बिना कोई समाधान सम्भव न होगा। फलित होने वाले सार्थक स्वप्नों की पृष्ठभूमि समझने के लिए भी अदृश्य जगत की मान्यता आवश्यक है। विचार संचार-प्राण विनिमय-अशरीरी प्राणधारी आदि का कार्यक्षेत्र वही है। प्रकृति का स्थूल पक्ष बुद्धि के लिए बोधगम्य है। उसकी सूक्ष्म शक्तियों का अनुमान गणितीय आधार पर उनके फलितार्थों को देखते हुए ही लगाया जाता है।

बारमूडा (अटलांटिक महासागर) का ब्लैक होल अब ब्रह्माण्ड क्षेत्र में पाये जाने वाले महा विवरों में से एक माना जाने लगा है। अभी इससे भी बड़े रहस्यों पर पर्दा उठना शेष है। एन्टी यूनीवर्स- एन्टी मैटर- एन्टी एटम एवं एन्टी पार्टीकल की चर्चा अब कल्पना क्षेत्र से आगे बढ़कर यथार्थता बन गई है और उसकी शोध गम्भीरता पूर्वक हो रही है। यह अदृश्य का ही पर्यवेक्षण है।

इस संदर्भ में उन घटनाओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता, जिनमें कितने ही व्यक्ति देखते-देखते रहस्यमय रूप से अदृश्य होते रहते हैं। ढूँढ़ने पर भी कोई अता-पता नहीं लगता। मन समझाने के लिए इसे किसी अदृश्य सत्ता अन्तर्ग्रही शक्तियों द्वारा किया गया अपहरण मान लिया जाता है। फिर भी असमंजस तो बना ही रहता है। सम्भावनाएँ और आशंकाएँ कुछ और भी हो सकती हैं।

अदृश्य लोक से पृथ्वी पर उतरने वाली जीवात्माओं और उनकी कारगुजारियों का विस्तृत वर्णन देखना हो तो जे. एच. ब्रेनन की “दि अल्टीमेट एल्सव्हेयर” पुस्तक पढ़नी चाहिए। यह वर्णन योग वाशिष्ठ में वर्णित लीला प्रसंगों से कुछ कम नहीं है। उसमें ऐसे सैकड़ों प्रमाणों का संकलन है जिनसे सिद्ध होता है कि अदृश्य लोक के प्राणी समय-समय पर पृथ्वी पर आते और अपनी चित्र-विचित्र कार गुजारियाँ दिखाते रहे। उनके आगमन और प्रयोजन कार्यक्रम पर भी इस पुस्तक में ऐसे अनुमान लगाये गये हैं, जिन्हें सहज ही अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।

खलनायक हिटलर विश्व विजय के सपने देखता था। इसके लिए उसने युद्ध को- प्रचार को- षड़यन्त्र उपक्रम को ही माध्यम नहीं बनाया था वरन् वह अभीष्ट की पूर्ति के लिए अदृश्य सहायता भी चाहता रहता था। इसके लिए तांत्रिक उपचारों के लिए भी प्रयत्नशील था। इस तथ्य की जानकारी उसके सम्बन्ध में लिखी गई बहुचर्चित पुस्तक “दि अर्किल्ट राइख” को पढ़कर जानी जा सकती है।

गुह्य विज्ञान के मूर्धन्य शोधकर्ता ब्रेनन ने अपने उपरोक्त ग्रन्थ में पुलिस रिकार्डों में दर्ज संसार भर की ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया है जिनने बहुत लोगों के अचानक अदृश्य हो जाने के विवरण हैं। उनने कुछ भी ऐसे सूत्र नहीं छोड़े जिनके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सके कि वे कहाँ और क्यों चले गये? उनके सम्बन्ध में यही सोचा गया कि किन्हीं अदृश्य शक्तियों ने उनका अपहरण किया होगा।

वियतनाम सन् 1885 में फ्रेंच इण्डोचीन के नाम से जाना जाता था। उस वर्ष 600 फ्राँसीसी सैनिक केन्द्रीय छावनी से सैगोन के लिए भेजे गये। निर्दिष्ट स्थान जब 15 मील की दूरी पर था तो तब सारा जत्था अचानक इस प्रकार गायब हो गया मानो वह वहाँ था ही नहीं। भारी खोज मुद्दतों तक होती रही पर ऐसा एक भी सुराग न मिला जिससे उनके अदृश्य होने का कारण समझा जा सके। न वे किसी ने पकड़े, न मरे, न भागे, न कोई शस्त्र, वस्त्र, पदचिन्ह ही ऐसे छोड़ गये, जिनके सहारे खोजी लोग किसी सम्भावना की कल्पना कर सकें। अदृश्य अपहरण ही लोगों की जबान पर बना रहा।

द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारम्भ काल की ही बात है। चीन के दक्षिण नानकिंग प्रान्त में 10 दिसम्बर 1939 की एक विलक्षण घटना घटी। 3000 सैनिक तीसरे पहर अपनी छावनी में मौजूद थे। एक घण्टे बाद उन्हें ड्यूटी पर बुलाने के लिए बिगुल बजाया गया तो पाया गया कि उनमें से एक भी मौजूद नहीं था। उनके हथियार, कपड़े, जूते आदि जहाँ के तहाँ रखे थे पर उनके शरीर का कहीं अता-पता न था। उनके घर-परिवार, सम्बन्धी मित्र सभी खोज डाले गये। सारे चीन का चप्पा-चप्पा छाना गया पर इन 3000 में से एक भी जीवित या मृतक स्थिति में कहीं नहीं पाया जा सका। इतने वर्ष बीत जाने पर भी वह रहस्य अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। जापानियों द्वारा अपहरण की आशंका भी निर्मूल सिद्ध हुई। युद्धकाल बीत जाने पर जापानी रिकार्डों में पाया गया था कि उस स्थान पर आक्रमणकारी पहुँचे ही नहीं थे और न कोई जत्था भागकर वहाँ पहुँचा था।

उत्तरी कनाडा के चर्चित पुलिस स्टेशन से पचास मील दूर एस्किमो लोगों का एक गाँव था ‘अंजिकुनी’। सन् 1930 में प्रकाशित नक्शे में इस गाँव की आबादी तथा लम्बाई चौड़ाई का विवरण छपा है। किन्तु 1930 के अगस्त मास में ऐसी कुछ अनहोनी हुई कि उस पूरे गाँव के मनुष्यों, जानवरों का ही नहीं मलबे तक का अस्तित्व पूरी तरह गायब हो गया। भूमि ऐसी हो गई मानों वहाँ कभी किसी आबादी का अस्तित्व था ही नहीं। इससे भी बढ़कर आश्चर्य की बात एक और थी कि वहाँ के कब्रिस्तान में पूर्व से गढ़े एक भी मुर्दे के अवशेष नहीं पाये गये। लगता था कि उन्हें भी उखाड़ कर ले जाया गया। उस सारे प्रदेश को छान डालने पर भी इसका कोई कारण या निशान उपलब्ध नहीं हुआ। यह रहस्य अभी तक अविज्ञात ही है।

क्या उद्देश्य लोक में जाने के बाद कोई फिर वापस लौटता है? इसका मात्र एक ही प्रमाण ब्रेनन की पुस्तक में संकलित है। जर्मनी के न्यूरेम वर्ग नगर में सड़क पर घूमता हुआ एक पागल पाया गया। वह देखने में तो धरती निवासी गोरा ही प्रतीत होता था पर उसकी जानकारियाँ विचित्र प्रकार की थीं। वह किसी विचित्र भाषा के दस शब्द भर बोल पाता था। रोशनी उसकी आँख सहन नहीं कर पाती थीं। जलती आग को देखकर वह ऐसा आश्चर्य करता था जैसे उसने पहली बार ऐसा देखा हो।

उसे कौतूहल तो माना गया पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। कुछ दिन वह ऐसे बदहवासी की स्थिति में घूमता रहा। एक दिन उसकी किसी ने पार्क में घूमते समय हत्या कर दी। ऐसे अनगढ़ अपरिचित का न तो कोई शत्रु था और न धन प्रलोभन की स्थिति थी, जिसके कारण उसे कोई मारता। समझा गया कि‍ वह किसी अपहरण किये गये मनुष्य की अदृश्य लोक से वापसी की घटना थी। वापसी किन परिस्थितियों में हुई, उसका अनुमान तो नहीं लगा, पर यह समझा गया कि भेद न खुलने के भय से शायद उसी लोक वालों ने उसकी हत्या की जिनने कि उसका कभी अपहरण किया होगा।

ये सारे घटनाक्रम बताते हैं कि हमारी जानकारियाँ दृश्य जगत तक सीमित हैं। इसलिए हमारी दृष्टि एवं क्रिया भी सीमित रहती है। यदि अदृश्य को समझा जा सके और उसके साथ परोक्ष रूप से सम्बन्ध जोड़ा जा सके तो हमारा दृष्टिकोण वैभव, व्यक्तित्व एवं पराक्रम भी अब की अपेक्षा अनेकों गुना सुविकसित समुन्नत स्तर का हो सकता है।


पण्डित गंगाधर शास्त्री (kahani)

मिथिला के पण्डित गंगाधर शास्त्री एक विद्यालय में पढ़ाते थे। उनका लड़का गोविन्द भी उसी में पढ़ता था। गोविन्द भी पिता की तरह बड़ा शिष्ट ओर अनुशासन प्रिय था। सहपाठी उसे बहुत स्नेह और सम्मान देते थे।

एक दिन शास्त्री जी के साथ गोविन्द विद्यालय नहीं पहुँचा। स्कूल बन्द करके जब वे चलने लगे तो विद्यार्थियों ने पूछा- गोविन्द आज क्यों नहीं आया?

शास्त्री जी ने भारी मन से कहा- गोविन्द को अचानक दौरा पड़ा और वह वहाँ चला गया जहाँ से फिर कोई नहीं लौटता।

विद्यार्थी स्तब्ध रह गये। साथी के निधन का भारी दुःख हुआ। साथ ही इस बात का आश्चर्य भी कि ऐसी दुर्घटना होने पर भी शास्त्री जी पढ़ाने कैसे आ सके और बिना माथे पर शिकन लाये किस प्रकार रोज जैसी कक्षा चलाते रहे। अपना असमंजस लड़कों ने शास्त्री जी के सामने व्यक्त भी किया।

पण्डित जी ने उत्तर दिया- “बच्चों! पिता के हृदय से गुरु का कर्त्तव्य बड़ा होता है।”


अन्तर्ग्रही परिस्थितियों का मानवी स्वास्थ्य पर प्रभाव

जिन दिनों सूर्य में धब्बे अधिक बढ़ते हैं। उन दिनों धरती के वातावरण पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। यों सूर्य पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर है फिर भी उसकी प्रखरता इतनी है कि पृथ्वी को वही सबसे अधिक प्रभावित करता है। ऋतु परिवर्तनों से लेकर प्रकृति प्रकोपों और पदार्थों के उत्पादनों पर उसके कारण ही अनपेक्षित हेर-फेर होते रहते हैं।

मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर सूर्य की सक्रियता का सीधा प्रभाव पड़ता है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए उस कारण हृदय रोगों की वृद्धि होती देखी जा सकती है। इन्फुल्ऐंजा जैसी बीमारियाँ फैल सकती हैं। मानसिक सन्तुलन गड़बड़ाने से ट्रैफिक दुर्घटनाओं की संख्या अनायास ही बढ़ जाती है।

पिछले दिनों इंटर नेशनल फिजीकल वर्ष मनाया गया था। उस अवधि में सभी देशों के चिकित्सकों ने सूर्य धब्बों से मानवी स्वास्थ्य का सम्बन्ध जुड़ने की बात स्वीकारी थी। मनोरोगों की घट-बढ़ के साथ इन धब्बों की संगति जुड़ते देखकर इसे शोध प्रसंगों में भी सम्मिलित किया गया है। हैलियो-बायोलॉजी और कासमॉस साइकोलॉजी (ब्रह्माण्डीय मनोविज्ञान) जैसी विज्ञान की नवीन धाराएँ इसी निर्मित विकसित हो चली हैं। क्लीनिकल इकालॉजी भी पिछले दिनों उभर कर आयी हैं जिसमें मौसम के प्रभावों का पर्यवेक्षण किया जाता है।

चन्द्रमा की घट-बढ़ का मानवी स्वास्थ्य में आने वाले उतार-चढ़ावों के साथ सम्बन्ध एक सुविदित तथ्य है। शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों में इस कारण आश्चर्यजनक परिवर्तन होते देखे गये हैं। समुद्र में अमावस्या पूर्णिमा को ज्वार-भाटे आते हैं। प्रायः ऐसा ही प्रभाव मस्तिष्क पर भी पड़ते देखा गया है। पागलखानों के कार्यकर्ताओं को सचेत रखा जाता है कि‍ वे इन दिनों विशेष रूप से सतर्कता बरतें, क्योंकि उन दिनों मन स्थिति में असाधारण हेर-फेर होते पाये गये हैं।

अस्पतालों के रिकॉर्ड से विदित है कि मृगी, चर्मरोग, उन्माद, भयाक्रान्त रोगी प्रायः अमावस्या के आसपास ही अधिक भर्ती होता है। सूर्य और चन्द्र जब 280 अंश पर होते हैं तब उनका बड़ा हुआ चुम्बकत्व दबे हुए रोगों को उभारता है।

स्वीडन के विज्ञानी सेन्टीअर होनिस ने आँकड़ों के आधार पर सिद्ध किया है कि अधिकांश स्त्रियों का मासिक धर्म अमावस्या पूर्णिमा के इर्द-गिर्द हो होता है। अमेरिका की “जनरल आफ गायनोकालोजी” पत्रिका में छपे एक लेख में ऐसे तथ्य प्रकाशित किये गये हैं, जिनसे ऋतु स्राव के उतार-चढ़ावों की संगति चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं के साथ जुड़ती है।

प्रसिद्ध सर्जन डा. एडीसन एन्ड्रीज ने अपने ऑपरेशन अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा है कि पूर्णिमा के आसपास हुए ऑपरेशनों में अधिक रक्त प्रवाह हुआ और कठिनाई से रुका। मेयोक्लिनिक एवं अन्य बड़े हास्पिटलों की नर्सों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की।

ईसा से 460 वर्ष पूर्व महामनीषी हेपोक्रेटस ने कहा था- “जिस चिकित्सक को ज्योतिष का ज्ञान नहीं, उसे चिकित्सक कहलाने का अधिकार नहीं।”

सत्रहवीं सदी का प्रसिद्ध डॉक्टर निकोलस क्लेवीयस अपने समय का माना हुआ खगोलविद् भी था। उसने अपने निजी अनुभवों से यह विवरण प्रकाशित किया है कि किस प्रकार के रोग किन तिथियों में घटते-बढ़ते रहते और उपचार में उनका ध्यान रखने से किस प्रकार चिकित्सक को रोग निवारण में सफलताएँ एवं श्रेय मिलता है।

यह समय भी कुछ ऐसा ही विषम है जिसमें अन्तर्ग्रही परिस्थितियाँ मानवी स्वास्थ्य पर अवाँछनीय प्रभाव डाल सकती हैं। ऐसी दशा में हमें सामान्य से अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए और आहार-विहार की उपयुक्तता का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।


दूरवर्ती वातावरण को प्रभावित करने की प्रक्रिया

सामान्यतया आवाज एक सीमित दूरी तक ही सुनाई पड़ती है। जैसे-जैसे दूरी बढ़ती जाती है, ध्वनि भी घटती या समाप्त होने लगती है। यही बात गर्मी के सम्बन्ध में भी कहीं जा सकती है। वह समीपवर्ती क्षेत्र को गरम करती है। निकट रहने पर ताप अधिक होता है और दूर हटने पर गर्मी भी घटने लगती है।

किन्तु विशेष उपाय उपचारों के माध्यम से आवाज, गर्मी, रोशनी आदि को भी दूर-दूर तक भेजा जा सकता है। तार, रेडियो, टेलीविजन आदि उपकरणों द्वारा यह तथ्य निरन्तर सामने आता रहता है। रेडियो स्टेशन से प्रसारित हुए शब्द संवाद क्षण भर में सहस्रों मील की यात्रा करते हुए कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। बिजली के तारों द्वारा गर्मी-रोशनी भी कहीं से कहीं पहुँचाई जा सकती है।

अब इस सन्दर्भ में कुछ नये आविष्कार सामने आये हैं। किसी स्थान से प्रसारित तरंगें किसी विशेष क्षेत्र में भेजी जा सकती हैं और वे वहाँ रहने वालों के मस्तिष्कों में इच्छित उथल-पुथल पैदा कर सकती हैं। अभी तक यह प्रयोग मात्र किन्हीं को रुग्ण या विक्षिप्त बनाने के सम्बन्ध में किये जाते रहे हैं। उसे शत्रु पक्ष की कार्य क्षमता नष्ट करने में मनःस्थिति विकृति के काम में लाया गया है, पर इस आधार पर यह सम्भावना भी बनती है कि यह प्रयोग उत्कर्ष और समाधान के हितकर एवं उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए किया जाय तो उससे श्रेष्ठ स्तर का प्रयोजन भी सध सकता है। अभी प्रयोग किस निमित्त हुआ, इस पर अधिक ध्यान न देकर सोचना यह चाहिए कि इस माध्यम को श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए नियोजित करने से कल्याणकारी प्रयोजनों की पूर्ति भी तो हो सकती है।

कुछ समय पूर्व संसार भर के अखबारों में एक ऐसी रूसी आविष्कार का समाचार छपा था जिसमें एक विशेष प्रकार की रेडियो किरणों द्वारा कनाडा के उत्तरी भाग में बसे व्यक्तियों के मस्तिष्कों को ध्वनि आवृत्ति के माध्यम से अक्षम बना देने की चर्चा की।

यह शिकायत कनाडा ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उठाई। इस राष्ट्र के कई क्षेत्रों में ऐसा माहौल बना कि हर आदमी उदासी से ग्रसित हो गया। अपने को अस्वस्थ और अक्षम अनुभव करने लगा। इन लोगों को अपने दैनिक कार्य निपटाने की क्षमता भी घट गई और कारखानों दफ्तरों में नियत समय पर न पहुँच कर गैरहाजिर रहे।

कनाडा के दो खदान नगरों के श्रमिकों पर लगातार कई दिन तक यह शामत छाई रही। अधिकाँश काम पर गये ही नहीं। जो गये वे अपनी ड्यूटी सही तरह देने के स्थान पर कुछ का कुछ करने लगे। सिर दर्द, अनिद्रा, थकावट, बेचैनी, मितली, उदासी, उन पर बेतरह छाई रही। कुछ को चित्र-विचित्र आवाजें कानों में सुनाई पड़ती रहीं।

एक साथ लाखों लोगों का एक ही प्रकार की विपन्न मनोदशा से ग्रसित हो जाना, आश्चर्य की बात थी। कनाडा ने अनुमान लगाया कि यह रूस द्वारा छोड़ी गयी किसी रेडियो विकिरण की तरंगों का प्रभाव है। यों इसके पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत कर सकने जैसा कुछ उसके पास नहीं था। फिर भी अनुमान ने अफवाह का रूप धारण किया और वह संसार भर के समाचार पत्रों में छपा। ऐसा हो सकने की सम्भावना पर अनेक अनुमान लगाये गये और वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत किये गये।

एक बार ऐसी ही शिकायत अमेरिका ने भी की थी। उत्तर-पश्चिम के एक क्षेत्र अलास्का पर रूस ने ऐसा ही प्रयोग परीक्षण किया है। एक बार दोनों देशों में इसी कारण तनाव बढ़ गया व युद्ध की-सी स्थिति आ गयी थी।

इस सन्दर्भ में कहा जाता है कि शत्रु क्षेत्र को निष्क्रिय बनाने के लिए इस प्रकार की रेडियो तरंगों का प्रयोग परीक्षण बहुत समय से चला आ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति लिण्डन जानसन के समय में भी वहाँ ऐसा ही आविष्कार होने की चर्चा छपी थी। चौकन्ना होकर रूस भी उस दिशा में मुड़ा और एक ऐसे अस्त्र का अन्वेषण करने में जुट गया जिससे किसी क्षेत्र विशेष के सैनिकों व नागरिकों को अस्थायी रूप से शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से अक्षम बना दिया जाय। वे साहस खो बैठें। अस्वस्थता अनुभव करें और आत्मसमर्पण की बात सोचें। उत्साह और साहस गिर जाने पर- शरीर और मस्तिष्क के साथ न देने पर प्रायः ऐसी ही स्थिति हर किसी की हो सकती है।

अब तक के युद्ध आयुधों में यह सबसे कम हानिकारक हथियार है। बड़े युद्धों में धन-जन की तात्कालिक हानि तो होती ही है, उससे भी बड़ी समस्या होती है अपंगों और अनाथों के निर्वाह की। नष्ट−भ्रष्ट इमारतें तथा कारखाने फिर खड़े करने की। यह सब युद्ध से भी महँगा पड़ता है। प्रस्तुत रेडियो विकिरण के आधार पर यह हो सकता है कि शत्रु पक्ष को अस्थायी रूप से असमर्थ बना दिया जाय। आत्मसमर्पण को पूरा करा लिया जाय। इसके उपरान्त उन्हें निर्वाह योग्य स्थिति में रहने देकर उस झंझट से बचा जाय जो युद्धोपरान्त की समस्याओं के रूप में संकट बनकर सामने आते हैं। अस्तु इस अस्त्र को सामान्य होते हुए भी असामान्य महत्व का माना जा रहा है और उसके प्रहार से बचने या लाभ उठाने के लिए सभी पक्ष चौकन्ने हैं।

इस गुप्त अस्त्र के बारे में कहा गया है कि आविष्कृत तरंगें रेडियो स्तर की तो हैं, पर है उससे सर्वथा भिन्न। वह वेरी हाई फ्रीक्वेंसी- अल्ट्रा हाई फ्रीक्वेंसी- माइक्रो फ्रीक्वेंसी एवं रेडार टेलीविजन तरंगों से भी भिन्न है। वे बिना मध्यवर्ती परावर्तकों के भी किसी भी वांछित क्षेत्र पर सीधी फेंकी जा सकती हैं।

रेडियो तरंगों में यह कठिनाई है वे किसी ट्रांजिस्टर जैसे माध्यम से ही पकड़ी जा सकती हैं। यह माध्यम न हो तो फिर प्रसारणों को सुन सकना कठिन है किन्तु यह बात इन नवीन आविष्कृत तरंगों के सम्बन्ध में नहीं है। उन्हें मानव मस्तिष्क की विद्युतीय क्षमता एवं तरंगों की आवृत्ति से तालमेल बिठाते हुए इस प्रकार का बनाया गया है कि जिस क्षेत्र विशेष में वे पहुँचें वहाँ के सभी निवासी इन्हें अनिच्छुक होते हुए भी अपनाने के लिए बाधित हों। रेडियो का बटन बन्द करके उसकी आवाज बन्द की जा सकती है, किन्तु मस्तिष्क को ऊपर चढ़ाने योग्य ऐसा कोई आवरण नहीं खोजा जा सका जो इन प्रेरित तरंगों के आक्रमण से बचाव कर सके।

यह तरंगें क्या हो सकती हैं, इस सम्बन्ध में लास-ऐन्जल्स के विकिरण विशेषज्ञ जोसेफ टॉड ने कहा है कि यह इन्फ्रा रेडियो स्तर की तरंगें हैं और किसी भी क्षेत्र को हल्के रूप में अथवा पूरी तरह अशक्त अक्षय बना सकता है। वे कम समय के लिए अथवा सर्वदा के लिए ऐसे रोग उत्पन्न कर सकती हैं जिनसे मनुष्य जीवित रहने पर भी कोई बड़ा पुरुषार्थ न कर सके।

मनुष्य शरीर एक समूची वैज्ञानिक प्रयोगशाला के समान है। उसमें प्रकृति को प्रभावित करने वाले सभी उपकरण भली-भाँति सुसज्जित हैं। वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिए जो उपकरण काम में लाये जाते हैं वे सभी प्रसुप्त स्थिति में मानवी काय-कलेवर के अन्तर्गत विभिन्न शक्ति संस्थानों में विद्यमान हैं।

महामानवों ने समय-समय पर अपनी प्रचण्ड शक्ति से वातावरण बदला है और लोक चिन्तन के प्रवाह को आश्चर्यजनक मोड़ दिया है। सम्पर्क क्षेत्र के व्यक्तियों को परामर्श एवं दबाव से सुधारे बिगाड़े जाने की बात सभी जानते हैं। उसी जानकारी में यह तथ्य भी सम्मिलित किया जाना चाहिए कि दूरवर्ती कुछ लोगों को ही नहीं, व्यापक क्षेत्र के निवासियों को भी दिशा विशेष में चलने बदलने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।

मनस्वी महामानवों में यह शक्ति पुरातन काल से प्रखर रही है अब उस शक्ति को फिर से उभारने की आवश्यकता है ताकि बिगड़े हुए लोक चिन्तन को सुधारा और सत्प्रयोजन के लिए उभारा जा सके। रूस के आविष्कारक क्षेत्र विशेष के लोगों को जिस आधार पर अस्त-व्यस्त करने में एक सीमा तक सफल हुए हैं, उसी आधार पर मानवी सत्ता की समर्थ प्रयोगशाला में लगे उपकरणों द्वारा व्यापक क्षेत्र के जनमानस को सुधारा सम्भाला भी तो जा सकता है।


निद्रा आवश्यक तो है पर अनिवार्य नहीं

नींद की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता है। पोषण जुटाने के लिए जिस प्रकार आहार की आवश्यकता रहती है, ठीक उसी प्रकार थकान मिटाने के लिए निद्रा की गोद में विश्राम लेना होता है। नींद न आने पर भारी थकान बढ़ती है और न केवल मानसिक तंत्र गड़बड़ाने लगता है वरन् शरीर के लिए भी सामान्य श्रम तक करना कठिन हो जाता है। अनिद्रा ग्रसित रोगी कुछ ही समय में अर्ध विक्षिप्त अथवा उन्मादग्रस्त होते देखे गये हैं। नींद की आवश्यकता वे लोग भी समझते हैं जिनके श्रम-समय का मूल्य अत्यधिक है। वे लोग भी सोने के घण्टों को अनुत्पादक कहकर कटौती करने की बात नहीं सोचते वरन् गहरी नींद आने को सौभाग्य सूचक मानते और अर्थ उपार्जन से भी बढ़कर सुखद अनुभव करते हैं।

इतने पर भी नींद के स्वरूप के सम्बन्ध में लोग बहुत कम जानते हैं। आहार के सम्बन्ध में जितनी जानकारी आम लोगों की होती है आश्चर्य है कि उतनी भी उन्हें नींद के सम्बन्ध में नहीं होती जबकि आहार की तुलना में निद्रा का महत्व कुछ कम नहीं वरन् बढ़कर ही है।

गहरी नींद के लिए पेट का हलका होना- वातावरण में कोलाहल का न होना- मक्खी मच्छरों खटमलों से बचना- सर्दी-गर्मी का बचाव रहना जैसी आवश्यकताएँ सभी अनुभव करते हैं। पर यह बात कम ही लोग सोचते हैं कि मानसिक उद्विग्नताओं- चिन्ता, निराशा, भय आक्रोश जैसे मनोविकार किस प्रकार नींद आने में बाधक होते हैं। यदि निश्चित और सन्तुलित रहने की कला सीखी जा सके तो समझना चाहिए कि निद्रा अवरोध के मार्ग की एक बड़ी चट्टान हट गयी, मानसिक क्षमताओं के अभिवर्धन का मार्ग खुल गया।

निद्रा के समय मस्तिष्क सर्वथा शान्त, निस्तब्ध या निष्क्रिय होता हो, सो बात नहीं। पाचन तंत्र, रक्त संचार तंत्र की तरह मस्तिष्क भी अपना काम निरन्तर करता रहता है। सोते समय में यही स्थिति बनी रहती है। ऐसी दशा में इस रहस्य को भी समझा जाना चाहिए कि निद्रा की आवश्यकता बाह्य मस्तिष्क पर चिन्तन का दबाव कम करके भी बहुत हद तक पूरी की जा सकती है। कारण कि नींद का प्रभाव क्षेत्र मात्र सचेतन मस्तिष्क ही है। अचेतन तो जन्म के दिन से लेकर मरण पर्यन्त अनवरत रूप से कार्यरत रहता है। उसे विश्राम देने के लिए तो मरण या समाधि के दो ही रूप अभी तक जाने जा सके हैं। यदि मात्र सचेतन को विश्राम देने का नाम ही नींद है तो ऐसे अन्यान्य उपाय भी हो सकते हैं जो निद्रा का विकल्प बन सकें और अनिद्रा ग्रसितों को राहत दे सकें। इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि किन्हीं आपत्तिकालीन क्षणों में बिना सोये भी उन कार्यों में संलग्न रह सके जिन्हें एक प्रकार से अपरिहार्य स्तर का ही समझा गया है।

स्वप्नावस्था में श्वसन प्रक्रिया अनियमित हो जाती है, और यहाँ तक कि कुछ सेकेण्ड के लिए वह रुक भी सकती है, ब्रेन का तापमान घटता-बढ़ता रहता है, मस्तिष्क के सेरिब्रम भाग में जहाँ सभी केन्द्र अवस्थित हैं, रक्त-प्रवाह कम-ज्यादा होता रहता है। यह सभी प्रक्रियाएँ कुछ घण्टे तक रुक-रुककर लगातार जारी रहती हैं। इस प्रकार नींद कोई शारीरिक अथवा मानसिक विश्राम की स्थिति नहीं होती, वरन् उस वक्त भी ये दोनों अवयव उसी प्रकार क्रियाशील होते हैं, जैसे जागरण की स्थिति में। इस तरह 6-7 घण्टे के इस लम्बे निद्राकाल में लोग देश-देशांतर की लम्बी यात्रा कर लेते हैं। अधिकाँश लोगों के लिए यात्रा काल अर्थात् निद्राकाल 7-7 घण्टे का होता होता है, किन्तु कुछ लोगों की निद्रावधि अत्यन्त छोटी होती है। एशिया के फ्रेडरिक महान, टामस एडीसन तथा महात्मा ये सभी 3-4 घण्टे की अल्प किन्तु आरामदेह निद्रा लेते थे। स्कॉटलैंड के निद्रा विषयक शोध विज्ञानी डॉ इयोन ओस्वाल्ड ने दो स्वस्थ व्यक्तियों का अध्ययन किया तो अत्यन्त नींद के बावजूद भी उनका स्वास्थ्य सन्तोषजनक पाया। एक सप्ताह के इन प्रयोग में उसने देखा कि 54 वर्षीय उक्त व्यक्ति जिस पर प्रयोग किया जा रहा था प्रति रात औसतन 2 घण्टा 47 मिनट तक सोया, जबकि दूसरे 30 वर्षीय प्रयोगार्थी का औसत निद्राकाल पहले वाले व्यक्ति से कुछ ही मिनट कम रहा।

जैसे ही हम निद्रा की गोद में प्रवेश करते हैं, हमारे शरीर के कुछ विशेष अंग-अवयव के क्रिया-कलाप में परिवर्तित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, यौन-परिपक्वता लाने वाले हारमोनों का प्रवाह, ग्रोथ हारमोन, कैल्शियम, एवं फास्फोरस की मात्रा तथा थाइराइड की क्रियाशीलता में स्पष्ट वृद्धि देखी गई है।

इस अवधि में यद्यपि शरीर के कुछ अवयवों की क्रियाशीलता बढ़ जाती है, किन्तु कुछ अन्य की घट भी जाती है। पाचन और आन्तरिक गतियाँ इस अवस्था में जाग्रतावस्था की तरह रहती है, जबकि नाक, मुँह और गले से स्रवित होने वाले रस आश्चर्यजनक ढंग से कम हो जाते हैं, आँख की पुतली सिकुड़ जाती है, हृदय की गति प्रति मिनट 10 धड़कन घट जाती है, कभी-कभी तो 30 धड़कन तक की घटोत्तरी देखी गई है, रक्तचाप कम हो जाता है तथा बैसल मेटाबोलिज्म (शरीर की विरामावस्था में उत्पन्न चयापचय गति) में दस प्रतिशत की कमी आ जाती है एवं शरीर का तापमान निम्नतम हो जाता है। (ऐसा प्रायः प्रातःकाल में होता देखा गया है।)

इस आधार पर यह विचार किया जा रहा है कि निद्राकाल में उत्पन्न होने वाले शारीरिक मानसिक उतार-चढ़ावों में यदि अन्यान्य उपायों से नींद जैसी स्थिति उत्पन्न की जा सके तो काम चल सकता है। नींद की प्रतिक्रिया शरीरगत अमुक हलचलों को न्यूनाधिक करके यदि थकान मिटाने का प्रयोजन सधता है तो फिर वही कार्य अन्यान्य उपायों से क्यों नहीं हो सकता है?

स्वाभाविक नींद का आना, न आना प्रायः अपने हाथ में नहीं रहता। ऐसी दशा में कई बार अनिच्छित रूप से भी देर तक जगना पड़ता है। यह समय काटे नहीं कटता और खोज उत्पन्न होती है। उपलब्ध उपचारों में नींद की गोलियाँ निगलना ही ऐसा उपाय रह जाता है जिससे कृत्रिम नींद उत्पन्न की जा सके। कुछ हद तक यह कार्य नशे के द्रव्य पीकर भी पूरा किया जाता है, फिर भी इतना तो स्पष्ट ही है कि नींद की गोलियाँ या नशे प्रकारान्तर से और भी अधिक हानि करते देखे गये हैं जो अनिद्रा के त्रास से किसी प्रकार कम कष्टकर नहीं होते हैं। इन परिस्थितियों में शरीर के विभिन्न अवयवों को शिक्षित या उत्तेजित करने वाली मालिश का उपयोग करके निद्रा न आने पर भी थकान मिटाने एवं क्षतिपूर्ति करने की आवश्यकता पूरी हो सकती है।

इससे सरल और अच्छा उपाय शिथिलीकरण मुद्रा का है। इसे योग निद्रा या शवासन भी कहते हैं। शरीर के मृतक जैसी स्थिति में अनुभव करने और निष्क्रियता लाने का अभ्यास करने या थकान मिटाने का कार्य एक सीमा तक पूरा हो जाता है। नैपोलियन के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह पेड़ के सहारे थोड़ा खड़ा करके उस पर चढ़े-चढ़े ही झपकियाँ ले लेता था और कई घण्टे सोने जैसी स्फूर्ति उतने भर से अर्जित कर लेता था। अर्जुन को ‘गुडा केश’ कहा जाता है। इस संस्कृत वाक्य का अर्थ है “नींद जीत लेने वाला” वह कम सोकर भी उत्साहपूर्वक अपना काम मुद्दतों तक करता रहता था।

शरीर का 24 घण्टे का जागरण चक्र हमारा एकमात्र बायोलॉजिकल ब्लॉक है। इसके अतिरिक्त एक 90 मिनट का भी चक्र है। 100 से अधिक प्रकार की हमारी शारीरिक गतिविधियाँ, जिसमें निद्रा से लेकर पेट संकुचन एवं हारमोन-स्राव सम्मिलित हैं, सभी इस चक्र का अनुशासनपूर्वक पालन करते हैं।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि निद्रा आवश्यक होने पर भी अनिवार्य नहीं है। उसके अन्य विकल्प भी हो सकते हैं। इनसे मालिश और शिथिलीकरण के अतिरिक्त यह विश्वास भी एक महत्वपूर्ण आधार है कि मनोगत संरचना जिस प्रकार अचेतन हलचलों को बिना विश्राम चलाती रहती हैं उसी प्रकार सचेतन को भी बिना निद्रा लिये भी थकान दूर करने का कोई न कोई आधार अपना सकती है। बिना सोये भी मनुष्य स्वस्थ रह सकता है, इसका प्रमाण कितने ही योगियों ने लम्बी प्रसुप्त एवं जागृत समाधियों के रूप में दिया भी है।


बुढ़ापे की रोकथाम सम्भव भी और सरल भी

नियति व्यवस्था में उत्पादन, अभिवर्धन, अवसान और समाधान की चार प्रवृत्तियाँ चलती हैं। यह निर्धारण सभी प्राणियों और पदार्थों पर समान रूप से लागू होता है। उत्पादन के उपरान्त अभिवृद्धि का क्रम चलता है। यह एक सीमा तक पहुँचकर परिपक्व हो जाता है। इसके उपरान्त ढलने की बारी आती है। क्षीणता चल पड़ती है। दुर्बलता बढ़ती है और अन्ततः वह समय आ पहुँचता है जब उसका स्वरूप बदले। वस्तुतः आमूल-चूल परिवर्तन को ही मरण कहते हैं। वही पदार्थ फिर नया रूप लेता है। इस प्रकार कबाड़े को गलाने और नये उपकरण ढालने के गोरख-धन्धे में प्रकृति का लुहार लगा रहता है। उसकी भट्टी गरम ही रहती है। इतने पर भी इस परिवर्तन क्रम की गति को शिथिल रखना या अधिक ईंधन झोंककर खेल जल्दी खतम कर देना बहुत कुछ मनुष्य की बुद्धिमता और संयमशीलता पर निर्भर है।

मनुष्य सदा स्वस्थ या प्रौढ़ रहना तो चाहता है पर व्यवस्था उसकी इच्छानुरूप बन नहीं पाती। यौवन देर तक ठहरता नहीं और अनपेक्षित बुढ़ापा आ धमकता है। इस स्थिति में कुरूपता भी बढ़ती है और असमर्थता भी। अन्त क्या होता है इसे सभी जानते हैं। बूढ़े के लिए मृत्यु के मुख में जाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।

फिर भी इच्छा तो बनी ही रहती है कि बुढ़ापा देर में आये और अधिक दिन जीने का अवसर मिले। जिन्दगी में ऐसा ही कुछ रस और आकर्षण है कि उसे सहज छोड़ते नहीं बनता। अब तक बुढ़ापे को रोकने और मरण का दिन अधिक आगे धकेलने के लिए अनेकानेक प्रयास होते रहे हैं। उनमें आँशिक सफलता ही मिली है फिर भी आशा बलवती है- प्रयत्न क्रम भी रुका नहीं है। जितना कुछ हाथ लगे, उतना ही सही, इस दृष्टि ने उस प्रयास में अभी भी विराम नहीं लगने दिया है। दीर्घ जीवन की बुढ़ापा रोकने की शोध एवं चेष्टा अभी भी चल रही है।

इस सन्दर्भ में खोज करने वालों ने जो तथ्य ढूँढ़ निकाले हैं उनमें चार प्रमुख हैं (1) शरीर का तापमान कम करना (2) ठण्डे वातावरण में रहना (3) प्रजनन में अति न बरतना (4) मस्तिष्कीय उद्विग्नता में बचना। यह चार अवलम्बन ऐसे हैं जिन्हें अपनाकर प्रकृति व्यवस्था के साथ सहयोग करते हुए समर्थता को देर तक बनाये रहा जा सकता है। इन चारों प्रयोगों को भारत के ऋषि कल्प व्यक्ति अपनी जीवनचर्या में सतर्कतापूर्वक समाविष्ट करते रहे हैं। फलतः उन्हें सामान्यजनों की तुलना में कहीं अधिक लम्बा जीवन जीने का अवसर मिला है। हिमालय के शीतल क्षेत्रों को उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र चुना। स्वल्पाहार, उपवास अपनाया। पेट पर भार लदने और तापमान बढ़ने जैसा प्रसंग न आने दिया। ब्रह्मचर्य को साधना का आवश्यक अंग माना और स्थित प्रज्ञ जैसा निस्पृह स्वभाव बनाकर सन्तुष्ट रहने एवं हँसते-हँसाते समय गुजारने का अभ्यास किया। प्रकृति से विद्रोह करने की अपेक्षा सहयोग देने की दूरदर्शिता अपनाकर उन्होंने जीवन सम्पदा का समुचित लाभ उठाया। उन्हीं लाभों में एक बुढ़ापे को देर तक रोके रहना और कम से कम कष्टदायक बनने देना भी है। वह राजमार्ग अभी भी उन सब के लिए खुला है जो जादुई तरीके अपनाने की अपेक्षा प्रकृति क्रम के साथ तालमेल बिठाकर अधिक नफे में रहने की नीति पर विश्वास करते हैं। आधुनिक विज्ञान ने इस सन्दर्भ में रसायन ढूँढ़ने और शल्यक्रिया की असफलता देखते हुए प्रकृति सहयोग से बुढ़ापा रोकने पर जोर देना आरम्भ किया है।

शरीर का तापक्रम घटा देने से बुढ़ापा देर में आता है, यह सिद्धान्त विज्ञान क्षेत्र में अब मान्यता प्राप्त करता जा रहा है। इस तापक्रम के सन्दर्भ में दो बातें कही जाती हैं एक यह कि वातावरण ठण्डा हो, दूसरी यह कि शरीर में पाई जाने वाली स्वाभाविक गर्मी सामान्य तापमान से घटाकर किन्हीं उपायों से कम कर दी जाय। दोनों ही सुयोग मिल सके तब तो उसे सोना सुगन्ध का संयोग कहा जायेगा।

कैलीफोर्निया युनिवर्सिटी के किये प्रयोगों में सिद्ध हुआ है कि शरीर का तापमान तीन डिग्री घटा दिया जाय तो आयुष्य तीस वर्ष बढ़ सकती है।

जीव कोषों की संरचना पर अनुसंधान करने वाले बुढ़ापे के पीछे प्रकृति व्यवस्था के उद्देश्य छिपे पाते हैं। प्रकृति हर प्राणी को तब तक ही सहन करती और पोषण देती है जब तक वह वंशवृद्धि में समर्थ रहता है। वह अपने उद्यान को हरा-भरा देखना चाहती है। इसलिए प्रजनन क्रम चलता रहे, यह उस अभीष्ट है। इसके लिए न केवल प्रजनन तंत्र समर्थ रहना चाहिए वरन् परिपक्वता भी इस स्तर की होनी चाहिए ताकि वह इस हेतु बलिष्ठ शुक्राणु और डिम्बाणुओं की सत्ता बनाये रहे। जब जीव कोश घिसते-घिसते हल्के और दुर्बल हो जाते हैं तो प्रकृति इस बात पर उतारू होती है कि ऐसे निकम्मे शरीरों को हटाकर उनका स्थान नये परिपुष्ट शरीरों को दिया जाय। स्थान देने से तात्पर्य है- पोषण एवं व्यवस्था का होना। आवश्यक नहीं कि अन्न-वस्त्र जैसे साधनों की कमी को ही पोषण कहा जाय, पाचन तंत्र दुर्बल पड़ जाने जैसी अक्षमताओं को भी पोषण का अभाव कहा जा सकता है। प्रकृति झटके की नीति नहीं अपनाती। उसे हलाल का सिद्धान्त पसन्द है। उसकी कसौटी पर जो उपयोगी सिद्ध नहीं होते, उन्हें वह बूचड़खाने में भेजने की अपेक्षा वनवास देती है और अपनी मौत मरने के लिए खुला छोड़ देती है। संक्षेप में यही बुढ़ापा है। उस स्थिति में ऐसे अनेकों लक्षण प्रकट होते हैं, जिनसे शरीर यात्रा क्रमशः अधिक कष्टसाध्य होती जाती है। लँगड़ा लूला धकड़ा आखिर ऐसी स्थिति में कब तक जिये? उसमें प्रकृति व्यवस्था से लड़ने की क्षमता कहाँ? ऐसी दशा में वह समय कुसमय दम तोड़ने के लिए विवश होता ही है।

प्रजनन क्षमता सही और देर तक बनी रहे इसके लिए आवश्यक यह है कि उस तंत्र का अनावश्यक रूप व्यतिक्रम न हो। यौनाचार में अति न बरती जाय। बच्चे बहुत न हों। रति कर्म में संयम बरता जाय। लम्बी आयुष्य पाने वालों और जल्दी मरने वालों के बीच यह प्रमुख अन्तर पाया जाता है। दीर्घ जीवी प्राणी प्रजनन में उपेक्षा बरतते हैं। इसके विपरीत जिन्हें जल्दी मरना है, वे जल्दी-जल्दी उस काम को निपटाते हैं, उतावली बरतते हैं और शक्ति का भण्डार समाप्त करते हैं जीवन लीला समाप्त करते हैं। मनुष्यों के लिए भी यही बात है। जवानी में बुढ़ापे के दृश्य उपस्थित करने में सबसे बड़ा कारण अपरिपक्व स्थिति में ही यौनाचार पर उतारू होना- कम आयु में ही कई बच्चे पैदा कर लेना है। इस प्रयास में स्त्रियाँ पुरुषों से भी अधिक घाटे में रहती हैं। उन्हें भ्रूण पालने और दूध पिलाने में अपने को अपेक्षाकृत अधिक निचोड़ना पड़ता है। यौनाचार में उन्हीं को अधिक घाटा पड़ता है।

अमेरिकी जीव विज्ञानी डा. बैरोज ने इस प्रयोग के लिए स्वरूप जीवी समुद्री जन्तु रोटिकर को चुना। वह मात्र 18 दिन जीवित रहता है। उसके निवास जलाशय का तापक्रम 10 डिग्री घटा दिया। इससे इसका जीवन काल दूना हो गया। इसके अतिरिक्त उसी प्राणी पर यह प्रयोग भी किया गया कि एक को भरपूर भोजन की सुविधा दी गई किन्तु दूसरे को आधे पेट रहने जितना सामग्री दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि बाहरी तापमान कम रहने और पाचन में ईंधन कम जलने की स्थिति में उसका जीवनकाल तीन गुना हो गया। इससे इस रहस्य पर से पर्दा उठा कि अधिक खाने से भीतरी गर्मी बढ़ती है। यदि स्वल्पाहार का स्वभाव डाला जाय तो पाचन भी ठीक हो और अनावश्यक भार वहन में जो जीवनी शक्ति का अपव्यय होता है, वह भी रुके। तापक्रम कम रखने का उपयुक्त तरीका कम भोजन से काम चला लेना है। कम भोजन करने पर ठीक प्रकार से पचा हुआ आहार कहीं अधिक शक्ति प्रदान कर देता है जबकि बहुत खाने वाला पचाने के लिए पेट के अखाड़े में मल्लयुद्ध लड़ता रहता है।

सी. क्लाइव मैकी के प्रयोगों से भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि हुई है। उसने प्रयोग के लिए चूहों को दो स्थानों पर रखा। एक वर्ग को भरपूर भोजन की सुविधा दी गई। दूसरों को आधे पेट रहने जितना ही साधन मिला। अधिक खाने वाले तगड़े तो जल्दी हुए पर उनका जीवनकाल लम्बा न रहा। इसके विपरीत कम खाने वालों के शरीरों पर अनावश्यक भार भी नहीं लदा, फुर्ती भी नहीं घटी और जिन्दगी भी अपेक्षाकृत अधिक लम्बी मिली।

लोग बहुधा आवश्यकता से बहुत अधिक खाते हैं। जो खाते हैं वह भी स्वाद के लोभ में इस स्तर का बना लिया जाता है जो पोषण देने की अपेक्षा पाचन की जटिलता के कारण उल्टा प्राण सोखने लगे। उत्तेजित पाचन प्रक्रिया अनावश्यक तापमान की वृद्धि करती है और दीर्घजीवन में भारी व्यतिरेक खड़ा करती है। विशेषज्ञों का कथन है कि जितना खाया जाता है उससे आधे में ही काम चल सकता है। इससे अधिक बचत और समय की बर्बादी रुकने का अतिरिक्त लाभ मिलता है।

आयुष्य विज्ञान के संशोधकों ने जीवन और मरण का सम्बन्ध मस्तिष्कीय सक्रियता के साथ जोड़ा है। उनने अपने प्रयोगों में पाया कि मरने के दिन निकट आने पर मनुष्य की मस्तिष्कीय उद्विग्नता बढ़ जाती है, वह अधिक सोचता और अधिक परेशान रहता है। इसका प्रभाव नाड़ी संस्थान पर पड़ता है। जीव कोशों का नया प्रजनन घट जाता है। नये जीवकोश बनाने में असमर्थ रहने पर वे कुछ काम ढूँढ़ते हैं और आपस में ही लड़भिड़ कर एक दूसरे को कुतरने-निगलने लगते हैं। यह मरण की पूर्व भूमिका है। चिन्तित मनःस्थिति में जीवनकाल जल्दी समाप्त होता है जबकि प्रसन्न और अलमस्त रहने वाले अभावों के बीच रहकर भी लम्बी जिन्दगी जी लेते हैं। शक्ति भण्डार के जल्दी चुकने में मस्तिष्कीय सक्रियता का अधिक होना भी बुरा है। इसी कारण तथाकथित बुद्धिजीवी सामान्य जनों की अपेक्षा जल्दी मरते हैं।

समाधि, अभ्यास एवं प्राण नियमन के सहारे भी क्षरण की अति रोकी जा सकती है, पर वे उपचार विशेषज्ञों से ही बन पड़ते हैं। समाधि तो और भी कठिन है। उसमें हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है और तापमान बहुत ही कम रह जाता है ऐसी दशा में जीवकोशों को रात्रि शयन जैसा विश्राम मिल सकता है और वे नये सिरे से नई स्फूर्ति के साथ काम करना आरम्भ कर देते हैं। हर समाधि को एक काया कल्प माना जाता है। यों औषधि उपचार के सहारे भी छोटे-बड़े कल्प चलते हैं पर समाधि का स्तर उन सबमें ऊँचा है। इतने पर भी वह सब विशेषज्ञों के संरक्षण में चलने वाला- मनस्वी लोगों द्वारा अपनाया जा सकने वाला उपक्रम ही है।

प्राणायामों के कुछ ऐसे उपचार हैं, जिनसे श्वास क्रम के व्यतिक्रम से उत्पन्न होने वाली क्षति को रोका जा सकता है। इस आधार पर भी तापमान के नियमन में सहायता मिल सकती है।

जिन पर बुढ़ापे का प्रभाव न्यूनतम हुआ है और जो मरण पर्यन्त सक्षम बने रहे उनकी जीवनचर्या का पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि जीवनी शक्ति के भण्डार को चुका देने वाली उद्धत आतुरता न बरती जाय। आहार-विहार का समय रखा जाय तो अजर-अमर होने जैसी बात न बनने पर भी मनुष्य लम्बे समय तक निरोग जीवन जी सकता है और अपनी क्षमता इस स्तर की बनाये रह सकता है जिसमें बुढ़ापे को कुरूप, कष्टदायक एवं अभिशाप न कहना पड़े।


नया द्वार खोला और नई राह दिखाई (kahani)

तुकनेव का एक गद्य काव्य है- मैं जा रहा था सुनसान सड़क पर। देखा एक विमुक्षित भिखारी को बहुत ही दुर्बल था- वह। याचना थी उसकी आँखों में। देना चाहा पर मेरी जेब में कुछ भी नहीं था, एक पैसा भी नहीं, रूमाल तक नहीं। क्या करूँ? क्या है?

अन्त में मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उठाया और सिर पर हाथ फिराया। आशा दिलाई। मैं न सही कोई दूसरा मदद करेगा। आप हताश न हों।

भिक्षुक के होठ हिले। बोला- मेरे ठण्डे हाथों को अपने गर्म हाथों से पकड़कर जो गर्मी दी, उससे भी बहुत राहत मिली। आपका अहसान भूलने वाला नहीं हूँ।

मैं धीमे पैरों आगे बढ़ा। सोचता था उस भिक्षुक ने मुझे नया प्रकाश दिया। नया द्वार खोला और नई राह दिखाई।


विवाह और प्रजनन की नई समीक्षा

गृहस्थ व्यवस्था में विवाह, यौनाचार और प्रजनन को प्रमुखता मिलती रही है। यों दाम्पत्य-जीवन का वास्तविक उद्देश्य गंगा-यमुना जैसी थोड़ी अन्तर वाली धाराओं को एक में मिलाकर एक आत्म सम्पदा सम्पन्न संगम बनाना था। पर वह आदर्श व्यवहार में कम ही उतर सका।

इन दिनों विवाह की अभ्यस्त एवं पुरातन परिपाटी पर नये सिरे से विश्लेषण आरम्भ हुआ है। उसकी परिणतियों पर नये दृष्टिकोण से सोचा जा रहा है। इस सन्दर्भ में सबसे अधिक प्रमुखता प्रजनन सम्बन्धी विवाह को मिली है। कभी सन्तानोत्पादन ही दाम्पत्ति जीवन की सफलता का चिन्ह माना जाता था। पर अब बात वैसी नहीं रही। सोचा जा रहा है कि प्रजननजन्य असुविधाओं और समस्याओं के रहते विवाह की उपयोगिता भी है कि नहीं।

प्रजनन की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह पिछले दिनों अर्थ शास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों ने लगाया है। इस सम्बन्ध में शुरुआत हुए थोड़ा ही समय हुआ है, पर बात कहाँ से कहाँ जा पहुँची।

माल्थस का ग्रन्थ “ऐसे आन दि प्रिंसिपल आफ पापुलेशन” सन् 1789 में प्रकाशित हुआ। उससे संसार भर के विचारशील वर्ग को झकझोर कर रख दिया। ग्रन्थ का प्रतिपादन विषय था बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण गरीबी समेत अनेकानेक समस्याओं का उद्भव। उनने तथ्य, प्रमाण और आँकड़े प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि नियन्त्रण न करने पर जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ेगी कि उसके लिए खाद्य, शिक्षा, वाहन, चिकित्सा जैसे आरम्भिक साधन तक न जुटाये जा सकेंगे। इसलिए जैसे भी हो समय रहते जनसंख्या वृद्धि की रोकथाम की जानी चाहिए।

आरम्भ में इस प्रतिपादन का धार्मिक क्षेत्रों में विशेष रूप से विरोध हुआ। लेखक को धर्मद्रोही ठहराया गया किन्तु विचारशीलों ने उस पर गम्भीरता से ध्यान दिया और समस्या को वास्तविक बताया।

प्रतिपादन ने जोर पकड़ा तो उसके कार्यान्वयन के लिए भी कदम बढ़ा। डा. चार्ल्स ड्राईस डेल तथा चार्ल्स बाडलाफ ने मिलकर सं. 1861 में सन्तति निग्रह का प्रचार करने एवं उसके उपाय बताने के लिए एक संस्था स्थापित की और मन्तव्य को व्यावहारिक रूप देने के लिए ‘एप्रीवोमित्स बुक’ नामक पुस्तक प्रकाशित की। इसके लेखक थे रिचर्ड कारलाइल। उनने ने केवल आर्थिक समस्याओं की अभिवृद्धि का कारण अनियन्त्रित प्रजनन को बताया वरन् नारी की दुर्दशा, अस्वस्थता, पराधीनता के लिए भी इस दबाव को दोषी ठहराया। उनका कथन है कि यह अनावश्यक भार लादकर नारी का नर द्वारा उत्पीड़न किया जा रहा है। इस पुस्तक को देखते-देखते लाखों प्रतियाँ बिक गईं। उसका प्रभाव शिक्षित नारियों पर गहरा पड़ा। उनने प्रजनन भार से अपने को बचाने के लिए असहयोग और आना-कानी का रुख अपनाना आरम्भ कर दिया।

योरोप की औद्योगिक क्रान्ति से इस आन्दोलन को और भी अधिक बल मिला। 17 वीं शताब्दी में तेजी से कल-कारखाने खुले। कितने ही नये उद्योग व्यवसाय आरम्भ हुए। उनमें श्रमिकों की बढ़ी हुई आवश्यकता पूरी करने के लिए पुरुषों से काम न चला तो महिलाओं की भर्ती चल पड़ी। इससे उनमें स्वावलम्बन, स्वाभिमान और साथ ही बराबरी का दावा करने जैसा उत्साह उभरा। इस कारण भी वे प्रजनन से बचने का प्रयत्न करने लगी। कारखाने, दफ्तर जहाँ थे वहाँ निवास की कमी पड़ती थी। बढ़ा हुआ परिवार वहाँ कैसे रहे? बिना आजीविका कमाये खर्चीली निर्वाह व्यवस्था की संगति कैसे बैठे? नित नये बच्चों की बाढ़ को सम्भालने वाली औरत को घर से बाहर निकलने और कुछ कमाने का अवसर कहाँ मिले? यह सभी प्रश्न ऐसे थे जिनने व्यक्तिगत कारणों से भी उस आर्थिक प्रतिपादन का समर्थन किया जिसके अनुसार राष्ट्रीय अर्थ समस्या के समाधान में परिवार नियोजन की अनिवार्य आवश्यकता बताई गई थी।

विवाह में सदा से नर और नारी दोनों की सुविधा मानी जाती रही है। दो की घनिष्ठता एक नई सशक्त इकाई का सृजन करती है। स्थिर सहकारिता लाभदायक परिणाम प्रस्तुत करती है। यह सब सही होने पर भी जब विवाह के उपरान्त उन्मुक्त यौनाचार की छूट मिली और उनके फलस्वरूप बच्चों की भरमार से घनिष्ठता घटी और दरिद्रता असुविधा बड़ी तो नये सिरे से विचार आरम्भ हुआ कि कहीं विवाह अवाँछनीय तो नहीं है। विशेषतया तब जबकि नारी को बहुप्रजनन के भार से लादकर एक प्रकार से जर्जर, बाधित और अपंग बना दिया जाता है। इस विचार से पुरुषों की अपेक्षा नारी को अधिक आन्दोलित किया। फलतः वे स्वतंत्र व्यक्तित्व की रक्षा के लिए बिना विवाह के रहना अधिक पसन्द करने लगी। नारी स्वतंत्रता आन्दोलन का आरम्भ तो उनके घटे हुए दर्जे के विरोध में असम्भव हुआ था। प्रथम चरण में इतना ही कहा गया था कि उन्हें भी मनुष्य समझा जाय और नर की तरह उन्हें भी मानवी अधिकारों से लाभान्वित होने दिया जाय। वह माँग पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गई है। उसमें नारी को अविवाहित जीवन पसन्द पड़ता है। विवाह हो तो वह ऐसा हो जिनमें स्वतंत्रता में बाधा न पड़े और प्रजनन की कष्टसाध्य अग्नि परीक्षा से होकर बार-बार न गुजरना पड़े।

इस सन्दर्भ में कुछ पुस्तकें बहुत ही उत्तेजनात्मक वातावरण उत्पन्न करती हैं। बेटी फ्रिडेन की पुस्तक “फेमिमिनिस्टिक” की योरोप और अमेरिका में बड़ी धूम रही। वह सन् 1963 में छपी थी। उसमें विवाह को वासना तृप्ति का कानूनी रूप बताकर अनावश्यक ही नहीं अनैतिक भी ठहराया गया था। विवाह को कुआँ बताया गया था। और उसमें न गिरने की सलाह दी गई थी।

नारी स्वतंत्रता की माँग ने उन्हें कई क्षेत्रों में समान अधिकार प्राप्त करने का आँशिक अवसर प्रदान किया है। अमेरिका के श्रमिकों में 40 प्रतिशत महिलाएँ हैं, पर वे सभी कम महत्व के और कम वेतन के कामों पर नियुक्त हैं। महत्वपूर्ण पदों पर तो उनमें से मात्र 5 प्रतिशत को ही स्थान मिला है। इससे अच्छी स्थिति रूस की है जिसमें श्रमजीवी महिलाओं में से 70 प्रतिशत को डॉक्टर-इंजीनियर जैसे बड़े महत्वपूर्ण पद मिले हुए हैं।

यों सामान्यतया पुरुष ही हर क्षेत्र में समर्थ समझा जाता है पर नारी में भी अपनी कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो पुरुष की तुलना में उसे वरिष्ठ सिद्ध करती हैं। प्रजनन के लिए जिन क्रोमोजोन्स की अनिवार्य आवश्यकता है वह मात्र नारी में ही होती है। नारी का हृदय पुरुष की तुलना में अधिक बलवान होता है। दीर्घ जीवन की दौड़ में भी वे अनेक असुविधाओं के रहते हुए भी आगे रहती हैं। जीवनी शक्ति की वे धनी होती हैं। महिलाएँ अधिक संवेदनशील, सहनशील और कल्पनाशील होती हैं। अध्ययन में वे अग्रिणी रहती और अच्छे नम्बर प्राप्त करती हैं। ये सभी तथ्य बताते हैं कि अपने को श्रेष्ठ समझने वाला पुरुष नारी के सामने कितना बौना है।

नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन आन सोशलाजिकल रिसर्च के फैली डा. जान्स बर्नार्ड के अनुसार विवाह करके पुरुष नारी की अपेक्षा अधिक नफे में रहता है। इस आधार पर उसे जो सुविधाएँ मिलती हैं इसके कारण वह अविवाहितों की तुलना में अधिक दिन जीता और अधिक स्वस्थ रहता है। उसे बच्चे भी पैदा नहीं करने पड़ते हैं। चौकी दारिन, रसोई दारिन, धाय जैसे अनेकों कार्य वह बीबी से रोटी कपड़े की कीमत पर वसूल करता है। उनका कथन यह भी है कि अविवाहित नारी की तुलना में विवाहित नारी शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अधिक दुर्बल और दुःखी रहती है।

जार्ज बर्नार्डशा तक ने प्रचलित विवाहों पर कटु व्यंग करते हुए उन्हें कानून सम्मत व्यभिचार की संज्ञा दी थी। क्योंकि उसके पीछे आदर्शों का बुरी तरह अभाव पाया जाता है।

इस शताब्दी के उपरोक्त विचार मन्थन ने कई प्रकार की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न की हैं। अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन विद्वेष भरा उठ खड़ा हुआ है। उसमें पुरुष से पृथक रहने और अपनी स्वतंत्रता तथा प्रतिभा को अपने बलबूते विकसित करने का परामर्श है। विवाह भी वे समलिंगी करने को सुविधाजनक कहती हैं।

इसके विपरीत चीन से दूसरे ही तरह के दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं। वहाँ लिबास पोशाक, काम धन्धे, जिम्मेदारी व्यवस्था आदि में नर और नारी के बीच का भेद समाप्त कर दिया गया है। उत्तेजक वेषभूषा और शृंगारिकता का नाम भी नहीं दीखता। दोनों वर्ग कन्धे से कन्धा मिलाकर निर्धारित कार्यों में जुटे रहते हैं। परिवार नहीं बढ़ाते वरन् हँसते-हँसते दिन गुजारने की सादगी और तत्परता से भरी जिन्दगी गुजारते हैं।

अपने समय की अनेकानेक नव उद्भूत समस्याओं में से एक यह भी है कि नर और नारी के बीच जो खाई चलती आ रही है पारस्परिक निर्भरता का वर्तमान परिपेक्ष में निर्वाह कैसे हो? इस सन्दर्भ में सर्वाधिक विचारणीय है, विवाह को न करा जाय अथवा उसे किन अनुबन्धों के साथ स्वीकारा जाय।

उभरती हुई चेतना ने सुझाया है कि विवाह सहकारिता का एक सुविधाजनक समन्वय रहे। दो मित्र मिल-जुलकर जीवनचर्या के विभाजित उपक्रमों में अपनी-अपनी भूमिका निबाहें पर दोनों में से कोई किसी पर हावी न हो। स्वतन्त्रता के साथ भी आत्मीयता निभ सकती है। अलग व्यक्तित्व बनाये रहकर भी मित्रता बनाये रहने और मिल-जुलकर काम करने में कोई कठिनाई नहीं होती। इसे नये प्रयोग और अनुभवों से सीखा जा सकता है।

इसके साथ ही प्रजनन की समस्या पर फिर भी विचार करना शेष रह जाता है। उससे जितना बचा जाय उतना ही उत्तम है। न्यूनतम सन्तति रखने से ही स्वास्थ्य रक्षा, सुविधा एवं अर्थ व्यवस्था बनी रह सकती है। बालकों के विकास की दृष्टि से भी यह आवश्यकता है कि जितनों को सही रीति से समुन्नत बनाया जा सकता है। जितने को दुलार और संस्कार दिया जा सकता है उससे अधिक एक इंच भी आगे न बड़ा जाय। सुसंस्कारिता सम्वर्धन तथा आत्मबल बढ़ाने की दृष्टि से यही उचित है, इसमें कोई सन्देह नहीं।


महर्षि उद्यालक (kahani)

महर्षि उद्यालक ने उस गुरुकुल प्रवीण छात्रों को बुलाया और परीक्षा लेने के लिए उनके आहारों को एक-एक मास के लिए बदल दिया। अवधि पूरी होने पर सभी को बुलाया गया और उनकी स्थिति जाँची गई।

जिसे एक महीने सूखा रहा गया था। वह सब कुछ भूल गया। आँखों के सामने अन्धेरा छाने लगा था। स्मृति जवाब दे रही थी। जिसने तामसिक वस्तुएँ खाईं उसकी चंचलता बड़ गई और पढ़ने से मन उचट गया। जिसके आहार में मादक द्रव्यों का समावेश था उसने अध्ययन में अरुचि दिखाई और घर लौटने की आज्ञा माँगने लगा। इसी प्रकार किसी को झगड़ालू, किसी को शान्त, किसी को सौम्य, किसी को उद्धत पाया गया। अध्ययन पर भी इस बदली मनः स्थिति का वैसा ही प्रभाव पड़ रहा था।

प्रस्तुत परिवर्तन का रहस्य बताते हुए उद्यालक ने छात्रों से कहा- “अन्न से ही प्रकारान्तर से बुद्धि और चित्त बनता है। जैसा अन्न खाया जाता है वैसा ही मन बनता है। विद्या को जितना महत्व दिया जाता है उतना ही अनुकूल आहार पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।”


भूत और वर्तमान का भविष्य में विलयन नवयुग का आगमन

इन दिनों धन और शस्त्र को सामर्थ्य की प्रधानता मिल रही है। लालच का आकर्षण और आतंक का दबाव किसी से कुछ भी करा सकता है। यह बात लोगों के मनों में घर करती जा रही है। प्रत्यक्ष प्रचलन में ऐसा ही कुछ दीखता भी है।

कुछ समय पहले बलिष्ठता और बुद्धिमता का बुलवाना था। शरीर बल जिसमें होता था वह मनमानी करता था और डरा धमकाकर दूसरों से भी मनमर्जी पूरी करा लेता था। यही बात बुद्धिमता के सम्बन्ध में भी थी। वे कुछ भी कहते, लिखते और किसी को किसी भी दिशा में फुसलाकर धकेल देते थे। जनसाधारण को चतुरता के जाल में इस प्रकार फँसाते थे कि जाल में जकड़े हुए पक्षी की तरह न वे निकल सकते थे और न उस स्थिति में सन्तुष्ट रह सकते थे। बलिष्ठों को पंडित कहा जाता था। दोनों की पटरी मध्यकाल के अज्ञानान्धकार में खूब बैठी। उनने मिल-जुलकर भी और अलग-अलग से भी ऐसे माहौल खड़े किये कि जमाना कुछ से कुछ हो गया। सामन्तवादी युग की यह परिचर्चा है। उसमें किले भी खड़े हुए और स्वर्ण छत्र लगाकर चलने वाले महन्तों के ठाट-बाट भी उन्हीं जैसे हो गये। इन दोनों युगों का समाधान अभी भी नहीं हुआ है। वे जमे अभी भी हुए हैं और अपनी सामर्थ्य का परिचय देने के लिए मोर्चे पर डटे हैं। शासन के पास शासन बल और श्रीमन्तों के पास धन बल के भण्डार बढ़ते ही जा रहे हैं।

शरीर बल हेटा पड़ा है उसका स्थान सौन्दर्य शृंगार ग्रहण करता जा रहा है। अभिप्राय, गायन आदि की कलाओं को भी इसी आकर्षण में सम्मिलित कर लिया जाय तो अत्युक्ति न होगी। यह शरीर बल की बात हुई। बुद्धिमता अब साहित्य क्षेत्र के ऊपर केन्द्रित हो रही है। पत्रकार-साहित्यकार, प्रकाशक एक सशक्त वर्ग के रूप में विकसित हो रहे हैं। वे शिक्षित समुदाय को अपने इच्छित तरीके से सोचने और ढलने के लिए सहमत या विवश कर रहे हैं। साहित्य में भी दबाव होता है। उससे भी बन्दूक की नली की तरह ही क्रान्तिकारी वातावरण बनाता है। विज्ञान ने इस वर्ग को प्रेस के साथ-साथ फिल्म का भी एक नया आधार प्रदान किया है। इन दोनों के समन्वय से जनमानस को एक विशेष प्रकार के प्रवाह में बहने के लिए वाँछित होना पड़ रहा है। आज के लोकचिंतन पर लेखन और अभिनय की गहरी छाप है। लोग इस प्रवाह के साथ बहने के लिए सहज सहमत हो रहे हैं। आज के लोकमानस को इस वर्ग का विधाता भी कहा जा सकता है।

उपरोक्त शक्तियाँ अपनी सामर्थ्य का प्रभाव परिचय भली−भाँति दे रही हैं। उनकी क्षमता के प्रभाव परिणाम को हम सब आँखों से देख रहे हैं। शक्तियाँ पिछले दिनों की तुलना में प्रबल से प्रबलतर होती जा रही हैं। उनके प्रभाव परिणाम को देखकर सभी चमत्कृत हैं। विज्ञान ने इन सभी को पूर्वकाल की तुलना में असंख्यों गुना समर्थ बना दिया है। लगता है इन क्षमताओं से सम्पन्न लोग भले ही मुट्ठी भर क्यों न हो समय और प्रचलन को इच्छानुरूप ढालने में सफल होते चले जा रहे हैं।

चिन्ता का विषय एक ही है कि सामर्थ्य सम्वर्धन और प्रवाह प्रचलन मानवी गरिमा के अनुरूप नहीं बन पड़ा। जानबूझ कर या अनजाने उसने ऐसी दिशाधारा अपनाई जिससे मनुष्य उठा नहीं गिरा, बढ़ा नहीं, उलटा। यदि ऐसा न हुआ होता तो आज की बढ़ी हुई सर्वांगीण समर्थता मानवी प्रगति, समृद्धि और सुख शान्ति को न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा चुकी होती।

दुर्भाग्य की भी प्रतिक्रिया होती है। ध्वंस भी नये सृजन का उत्साह उत्पन्न करता है। अन्धकार का स्थान प्रकाश ग्रहण करे, ऐसी क्रिया-प्रतिक्रिया की व्यवस्था नियति के विधान में पहले से ही मौजूद है। पेण्डुलम की गति एक तथ्य है। उत्थान नहीं टिका तो पतन के ही पैर कैसे सदा जमे रह सकते हैं। शक्तियों के स्रोत अपना चमत्कार दिखा चुके। वे खरे सिद्ध न हुए तो उनका स्थान ग्रहण करने के लिए अन्य तथ्य उभर कर आकर रहेंगे। सन्तुलन बिगड़े, विनाश जीते और शक्तियों का दुरुपयोग यथावत् चलता रहे, यह भी सम्भव नहीं। देखते हुए कुछ नई शक्तियों का उद्भव हो रहा है और वे विश्व के भाग्य भविष्य को नया मोड़ देने की तैयारी कर रही हैं।

देखने वाले देख सकते हैं कि एक शक्ति का उद्भव हो रहा है। उसका नाम है- भाव सम्वेदना। मनुष्य मूलतः दैवी कृति है। कषाय-कल्मषों के कुसंस्कार तो उस पर ऊपर से चढ़ते लिपटते रहते हैं। बहुमूल्य स्फटिक मणियाँ भी कीचड़ में लिपटने से काली कुरूप दीखती हैं। इतने पर भी अवसर मिलते ही वह अपने शुद्ध स्वरूप का परिचय देने लगती हैं। मनुष्य भावनाशील है। उसके अन्तराल की यह एक विशेष संरचना है। आत्मा का अपना अस्तित्व है और उद्देश्य, स्वरूप, पौरुष एवं प्रवाह भी। दबाव, आकर्षण, भटकाव उसे धकेलते घसीटते तो हैं, परन्तु सतर्कता उदय होती है। उसमें इतनी क्षमता भी है कि अपने स्थान पर मजबूती से खड़ी हो सके और अपने रास्ते, अपने पैरों, अपने विवेक से स्वयं ही चल पड़े।

भाव सम्वेदना की शक्ति का उद्भव इसी स्थिति में समझा जा सकता है। इन दिनों अदृश्य के अन्तराल में कुछ ऐसा ही पक रहा है, जिससे भाव-शक्ति के उदय उद्भव का पूर्वाभास मिलता है। ऊषाकाल की अरुणिमा देखकर यह अनुमान लगते देर नहीं लगती है कि अब व्यापक अन्धकार के पैर उखड़ने ही वाले हैं। अरुणोदय के साथ-साथ सारा वातावरण बदलने वाला है। उस माहौल से नव जागरण का माहौल बनता है और निशाचरों की फौज को अपनी माँद से बिना भगाये ही घुसने छिपने का मन करता है। ऐसे माहौल में पक्षियों की चहचहाहट ही नहीं प्राणि मात्र को कार्यरत होते और फूल पल्लवों तक को खिलते विकसित होते देखा जा सकता है। संक्षेप में भाव सम्वेदना के उदय उद्भव का तात्पर्य यही है।

भावना अर्थात् मानवी गरिमा के अनुरूप उठती उत्कण्ठा। उसे उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, श्रद्धा, शालीनता आदि नामों से भी जाना जा सकता है यह अपने आप में एक बड़ी शक्ति है। इतनी बड़ी जिसके सम्मुख धन, शस्त्र, बल और कौशल की अवांछनीयता कितनी ही सशक्त होने पर भी टिक नहीं पाती। उसे दिशा बदलने के लिए विवश होना पड़ता है। सरकस के रिंग मास्टर का हन्टर बबर शेरों और उन्मत्त हाथियों को भी धरती से नाक रगड़ने के लिए विवश कर देता है। भाव शक्ति का उद्भव ऐसे ही हन्टर की भूमिका सम्पन्न करने लगे तो किसी को भी इसे अप्रत्याशित या असम्भव नहीं मानना चाहिए।

इन दिनों अदृश्य में मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई मौलिक सामर्थ्य भाव श्रद्धा के रूप में प्रकट होने के लिए मचलती देखी जा सकती है। भीतर ही भीतर कुछ ऐसा उबल रहा है जिसे प्रसव पीड़ा की उपमा दी जा सकती है। न जाने कहाँ से- न जाने कैसे-कैसे इतने व्यक्ति एक साथ भाव सम्वेदनाओं का प्रतिनिधित्व करने अनायास ही दीखने लगे हैं। उनकी उमंगें प्राचीन काल के ऋषि, मनीषियों की तरह सोचने और देवताओं जैसे पराक्रम करने के लिए सान्निध्य हो रही है। वातावरण बदलने का यह पूर्व संकेत है।

भाव शक्ति का जब भी उदय हुआ है तो उसकी प्रखर प्रचण्डता देखते ही बनी है। इतिहास साक्षी है कि कुछेक महामानवों ने समय के उलटे प्रवाह को उलट कर सीधा कर दिया। इन दिनों भी भावनाशीलों की संख्या बढ़ रही है उनके चिन्तन और पौरुष में भी प्रखरता का अनुपात बढ़ रहा है। प्रज्ञा परिजनों की गतिविधियों पर दृष्टिपात करने से इस भवितव्यता का पता सहज ही चल जाता है। इस आधार पर यह अनुमान लगाने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि शक्तियों का उद्भव और दुरुपयोग का जो क्रम पिछले दिनों चलता रहा है उससे भिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने में अब देर नहीं है।


प्रार्थना की प्रचण्ड शक्ति सामर्थ्य

ब्रिटेन निवासी बावन वर्षीय एलेन थॉयर नामक महिला की परमात्मा में गहरी आस्था है। वह धर्म के कार्यों में पूरी श्रद्धा के साथ लगी रहती हैं। अपने शारीरिक स्वास्थ्य के परीक्षण के लिए वह हर वर्ष डा. विलियम ए. नोलेन के पास पहुँचती हैं। नवम्बर माह के एक दिन वह अपने चिकित्सक के पास निदान के लिए पहुँची। डॉक्टर को धर्म में किसी प्रकार की श्रद्धा न होने पर भी वह एलन के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित था।

डा. नोलेन का अन्य शारीरिक परीक्षणों के उपरान्त मलाशय के परीक्षण में यह सन्देह हुआ कि एलन को एक विशेष प्रकार का कैंसर हो सकता है। मलाशय में उस तरह के ट्यूमर का उभार भी मौजूद था उस उभार का एक छोटा-सा टुकड़ा काटकर उन्होंने हिस्टोपैथालॉजिकल परीक्षण के लिए भेजा। रिपोर्ट लेने के लिए तीन दिन के बाद वापस आने के लिए चिकित्सक ने परामर्श दिया।

तीन दिनों बाद पैथालॉजिस्ट की रिपोर्ट आयी जिसका निष्कर्ष था कि उभार एक प्रकार के असाध्य कार्सीनाइड नामक ट्यूमर का है जो प्रायः आमाशय, छोटी आँत अथवा बड़ी आँत में पैदा होता है। जबकि एलन के केस में वह मलाशय में उत्पन्न हुआ था। डा. विलियम ने बिना किसी संकोच के एलेन थॉयर को कैंसर एवं उसकी प्रकृति के विषय में विस्तृत रूप से बता दिया। साथ ही यह चेतावनी भी दे दी कि शीघ्र उपचार की व्यवस्था बनायी भी गयी तो भी यह ट्यूमर पूरे मलाशय में तुरन्त फैलकर अधिक गम्भीर संकट खड़ा कर सकता है तथा जान तक ले सकता है।

आमाशय, छोटी आँत आदि में भी तो कोई दूसरा ट्यूमर नहीं है, यह जाँचने के लिए चिकित्सक ने उन अवयवों का विशेष एक्स-रे लिया पर सन्देह निराधार निकला। ट्यूमर के ऑपरेशन की तिथि देकर डॉक्टर ने एलेन को घर वापस भेज दिया।

निर्धारित तिथि को प्रातः डेढ़ बजे डा. नोलेन की निद्रा फोन की घण्टी सुनकर भंग हुई। हॉस्पिटल की रात्रिकालीन ड्यूटी पर नियुक्त नर्स ने सूचना दी कि श्रीमती एलेन वहाँ भर्ती हैं तथा छाती के तेज दर्द से परेशान हैं। दर्द एवं सोने की तेज दवा देने का भी कुछ परिणाम नहीं निकला है। तुरन्त आने को कहकर डा. ने टेलीफोन का चोंगा रख दिया।

हॉस्पिटल के बेड पर पड़ी श्रीमती एलेन दर्द की पीड़ा से छटपटा रही थीं। डॉक्टर को देखते ही उनके होठों पर हल्की मुस्कान तैरने लगी। दर्द के विषय में पूछे जाने पर एलेन ने बताया कि इस तरह की पीड़ा पहले कभी नहीं हुयी थी, यह प्रथम अवसर है।

हृदय एवं फेफड़े की गति और लय को सुनने के बाद डा. विलियम ने पाया कि फेफड़ों की सतह पर द्रव्य एकत्रित होता जा रहा है जो हार्ट फैल्योर को जन्म दे सकता है। हृदय की धड़कन 70 प्रति मिनट से बढ़कर 100 प्रति मिनट हो गयी थी। जबकि रक्तचाप सामान्य दर 230।84 से घटकर 82।58 हो गया था। ये सभी संकेत इस बात के प्रमाण थे कि स्थिति ठीक नहीं है। इलेक्ट्रो कार्डिग्राम मशीन द्वारा इ. सी. जी. लेने पर भी इसकी पुष्टि हुयी।

यह स्थिति देखकर डॉक्टर ने ऑपरेशन का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बदल दिया तथा प्रस्तुत हुए नये संकट को दूर करने के लिए हृदय की गति सामान्य लाने के लिए दवाएँ तथा श्वासावरोध के लिए ऑक्सीजन दी। उन्होंने पूरी तरह आराम करने का परामर्श एलेन को दिया। सहयोगी दूसरा चिकित्सक जो हृदय रोग विशेषज्ञ था, समय-समय पर रोगी की स्थिति का अवलोकन करने जाता रहा। कुछ ही दिनों में एलेन की हालत सामान्य हो गयी। हृदय एवं फेफड़े सामान्य ढंग से कार्य करने लगे।

तीसरे सप्ताह डा. विलियम ने पुनः श्रीमती एलेन का परीक्षण किया। उन्होंने यह पाया कि मलाशय में ट्यूमर का उभार पहले से बढ़ने के स्थान पर कम हो गया है। हृदय को पूर्ण विश्राम तथा उपचार के लिए समय मिलना चाहिए, यह सोचकर उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए रोगी को बताया कि “कम से कम दस सप्ताह बाद ट्यूमर का ऑपरेशन करना अधिक अच्छा होगा।”

इस कथन पर श्रीमती एलेन बोली- “डॉक्टर! मुझे ऐसा लगता है कि अब ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। परमात्मा की कृपा से मैं अब अच्छी हो जाऊँगी।” लगता है, भगवान ने बड़ी आपदा को छोटे में बदलकर नया जीवन दे दिया है।” डॉक्टर को यह मालूम था कि श्रीमती एलेन एक धर्मनिष्ठ महिला हैं तथा उनकी ईश्वर के प्रति गहरी आस्था है। सम्भव है भावातिरेक में वे ऑपरेशन कराने से इन्कार कर रही हों। यह सोचकर निर्णय बाद के लिए उन्होंने छोड़ दिया। पर डॉक्टर विलियम को यह अच्छी तरह मालूम था कि बिना उपचार के इस कैंसर का ट्यूमर किसी भी तरी गल नहीं सकता। उल्टे वह बढ़ता हुआ शरीर के दूसरे अंगों को भी अपनी लपेट में ले सकता है।

कुछ सप्ताह बाद श्रीमती एलेन डा. विलियम के पास पुनः परीक्षण के लिए पहुँची। पहुँचते ही उन्होंने कहा- “डॉक्टर! मैं अब पूरी तरह स्वस्थ और नीरोग अनुभव कर रही हूँ तथा मुझे लगता है मलाशय का वह ट्यूमर भी अब समाप्त हो गया है।” शुरु में तो डॉक्टर ने उनके इस कथन को वहम मात्र माना पर उस समय आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब परीक्षण के उपरान्त ट्यूमर का कहीं कोई नामोनिशान न मिला। डा. विलियम के चिकित्सा क्षेत्र के जीवन का यह एक ऐसा अनुभव था जो शत-प्रतिशत सच होते हुए भी अविश्वसनीय जान पड़ रहा था। वैज्ञानिक मस्तिष्क कारणों के बिना सन्तुष्ट नहीं होता पर जो कुछ सामने था उस सच्चाई से भी कैसे इन्कार किया जा सकता।

स्वस्थ परिहास करते हुए श्रीमती एलेन ने उनसे पूछा- “अब ऑपरेशन की क्या तिथि होगी?” डॉक्टर विलियम थोड़ा सकुचाते हुए बोले- “ऑपरेशन की आगे कभी जरूरत नहीं पड़ेगी। ट्यूमर किन्ही अविज्ञात कारणों से मिट गया।”

“नहीं डॉक्टर! यह ईश्वर की कृपा का प्रतिफल है। हृदय रोग के रूप में मुझे किसी अपने अविज्ञात बुरे कर्म का दण्ड मिल गया। मुझे संकेत मिल गया था कि उसकी सहायता अवश्य मिलेगी। यह सब उसका ही चमत्कार है।”

साइन्स डाइजेस्ट (दिसम्बर 82) में ‘दी वुमन हू सेड नो टु कैंसर’ शीर्षक से प्रकाशित एक लेख में उपरोक्त घटना का विवरण देते हुए डा. विलियम स्वयं लिखते हैं कि कैंसर सम्बन्धित विशेषज्ञों के एक दल का विचार है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति असाध्य रोगों के उपचार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है पर कैंसर ग्रस्त होने पर वह स्वयं भी अत्यन्त कमजोर हो जाती है। सम्भव है उस महिला के ट्यूमर उपचार में जीवनी शक्ति अपरिमित मात्रा में बढ़ गयी हो और उससे रोग मुक्ति में मदद मिली हो। पर वह किस तरह घटी, हृदय रोग का उससे क्या सम्बन्ध था, यह रहस्य अभी भी रहस्य ही है।

वे आगे लिखते हुए कहते हैं कि “किसी ईश्वरीय सत्ता में विश्वास न होते हुए भी मेरे पास उस धर्मनिष्ठ महिला के कथन को स्वीकार न करने का कोई ठोस आधार नहीं था कि किसी दिव्य सत्ता की कृपा से ही वह ठीक हुई। विगत ग्यारह वर्षों में उसे दुबारा फिर कभी रोग ने नहीं सताया। उस महिला का हँसता मुस्कुराता चेहरा जब कभी भी मैं देखता हूँ तो सोचना हूँ कि अपने वैज्ञानिक तथ्यों का मुझे एक बार नये सिरे से विश्लेषण करना चाहिए तथा उस विश्वास को पाने का प्रयत्न करना चाहिए जिसके द्वारा उक्त महिला ने असम्भव को भी सम्भव कर दिया।


अनुनय विनय पर भगवान पिघले (kahani)

बहुत अनुनय विनय पर भगवान पिघले और कठिनाई से ही तनिक दर्शन झाँकी देकर अन्तर्ध्यान हो गये। जाते समय कहते गये- “मैं पीड़ितों और पतितों में बसता हूँ। वहाँ जा, सेवा कर- और हाथों हाथ आत्मसन्तोष का प्रसाद ले।”


प्राणशक्ति के ऊर्ध्वगमन की चमत्कारी परिणतियाँ

प्राण जीवन का आधार है। उसका एक रूप तो वह है जिससे दैनन्दिन जीवन के यांत्रिक कार्य सम्पन्न होते हैं। शरीर को, इन्द्रियों को वह ही गति देता है। मन भी सूक्ष्म प्राण की प्रेरणा से चंचल रहता तथा शरीरगत हलचलों पर नियन्त्रण रखता है। श्रम से लेकर प्रजनन जैसे स्थूल कार्यों में प्राण की ही भूमिका होती है अधिकाँश व्यक्तियों के जीवन में इस अमूल्य प्राण शक्ति का उपयोग मात्र शारीरिक चेष्टाओं तथा मन की निकृष्ट आकाँक्षाओं की पूर्ति तक ही हो पाता है जबकि उससे असम्भव स्तर के कार्य भी सम्पन्न किये जा सकते हैं। प्राण विद्या के माध्यम से अन्तर्निहित सूक्ष्म शक्ति संस्थानों का जागरण भी सम्भव है जो प्रायः प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। प्राण की गति को ऊर्ध्वगामी बनाकर असीम शक्ति तथा दिव्य आनन्द की महान उपलब्धियाँ करतलगत की जा सकती है।

साँसारिक मनुष्य की तुलना शास्त्रों में सनातन अश्वत्थ से की गयी है। कठोपनिषद् में वर्णन है- ऊर्ध्वमूलोऽवाक् शावएषोऽश्वत्थः सनातनः देहयुक्त संसारी जीव मनुष्य सनातन अश्वत्थ वृक्ष है जिसका मूल ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं। अलंकारिक रूप में अश्वत्थ का अर्थ है- अस्थायी। ‘छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्’ (गीता) महर्षि व्यास के अनुसार उस वृक्ष के पत्ते छन्द हैं। जीव का मूल ब्रह्म है। जिसके ऊर्ध्व स्थान लक्ष्य को इंगित करने के लिए ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर सिर में शिखा रखते हैं। जिन शाखाओं के माध्यम से ब्रह्म जीव बनकर इस संसार में अवतरित होता है, वे हैं रीढ़ में नीचे उतर कर शरीर में फैलने वाली सम्वेदन नाड़ियाँ। इनमें इन्द्रियों को गति देने वाले प्राणों के जो स्पन्द हैं, वे ही अश्वत्थ वृक्ष के पत्ते हैं। सामान्य से लेकर असामान्य हर पुरुष को पूर्णता के उच्चतम शिखर पर पहुँचने के लिए शरीरगत प्राण की निम्नतम गतियों से अपनी यात्रा आरम्भ करनी पड़ती है तथा अपनी समस्त चेष्टाओं को सुषुम्ना के माध्यम से ही उर्ध्वमूल की ओर आरोहण करना पड़ता है।

सामान्यतः नाड़ियों में दैनन्दिन जीवन की इन्द्रियों की सम्वेदनाओं एवं निर्देशों का लक्ष्य है- समस्त शाखा प्रशाखाओं सहित प्रमुख प्राण का केन्द्रीय नाड़ी-सुषुम्ना में ऊर्ध्वगमन। प्रायः जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की वृत्तियाँ प्राण के प्रचण्ड प्रवाह को अपनी मनमर्जी से घुमाती तथा निम्न दिशा में बहने के लिए प्रेरित करती हैं। उसके अनुरूप जीवन शकट को घूमते रहने से कुछ विशेष करते नहीं बनता। प्राण प्रवाह का उल्टी दिशा में उर्ध्व की ओर गमन कराना एक कठिन कार्य है पर असम्भव नहीं। इसके लिए सतत् अभ्यास, दृढ़ निष्ठा तथा धैर्य की आवश्यकता होती है। विषयों के निम्नगामी प्रलोभनों से इन्द्रियों को विरत करके उन्हें ऊर्ध्वगामी बनाना ही योग का प्रमुख लक्ष्य है। यह एक प्रचण्ड आध्यात्मिक पुरुषार्थ है जिसके बिना योग का प्रयोजन पूरा नहीं होता।

‘नायत्मा बलहीनेन लभ्यः’, अर्थात्- बलहीन को आत्मोपलब्धि- सत्य की प्राप्ति नहीं होती। मुण्डकोपनिषद, की यह उक्ति साधन को शक्ति संचय की प्रेरणा देती है और यह पुरुषार्थ आत्म प्रवृत्तियों के उन्नयन के बिना सम्भव नहीं हो पाता। स्नायुतंत्र की सूक्ष्म परतों में प्राण का अधोप्रेरित तीव्र संवेग जिसे बोलचाल की भाषा में काम शक्ति कहा गया है, की गति को उलटकर उर्ध्व दिशा में प्रवाहित कर देने के चमत्कारी परिणाम सामने आते हैं। सुषुम्ना में मुख्य प्राण इस तीव्र पूर्ण प्रवाह को ही हठयोग में कुण्डलिनी शक्ति कहा गया है। कठोपनिषद् में वर्णन है- त देव शुक्रं तद ब्रह्म तदेवामृत मुच्यते, अर्थात्- कुण्डलिनी का ही अधोमुख प्रवाह का कामशक्ति और ऊर्ध्वमुख प्रवाह आत्मशक्ति है। मात्र दिशा बदल देने से शक्ति का स्वरूप बदल जाता है और तदनुरूप मनुष्य का स्तर भी है।

एक ही शक्ति अधोगामी बनकर मनुष्य को पशु चेष्टाओं में निरत करती है, भव-बन्धनों के पाश में बाँधती है, जबकि ऊपर उठकर जीवन मुक्ति प्रदान करने वाली बन जाती है। इन दोनों में से हर किसी के तीव्र प्रवाह के समक्ष शरीर से लेकर बुद्धि तक की सभी वृत्तियाँ गौण पड़ जाती है। इस प्रवाह के चरम संवेग का नाम ही यौवन है। जब तक वह संवेग शरीर में विद्यमान है, तभी तक कुछ विशेष करने की आशा की जा सकती है। योग मार्ग पर चलना भी ऐसी ही स्थिति में सम्भव है।

भूमध्य से लेकर रीढ़ के आधार बिन्दु-मूलाधार तक सुषुम्ना में छह चक्र अथवा कुण्डल हैं। भूमध्य के पीछे कपाल में आज्ञाचक्र, कण्ठ में विशुद्धाख्य चक्र, हृदय में अनाहत चक्र, नाभि में मणिपूर चक्र, उपस्थ में स्वाधिष्ठान तथा रीढ़ के आधार में मूलाधार चक्र हैं। सुषुम्ना के ऊपर मस्तक की मूर्धा में अवस्थित चेतना के सर्वोच्च केन्द्र का नाम सहस्रार है। ऊपर से नीचे की ओर अवतरित होते हुए प्राण की दिव्यता प्रत्येक चक्र या कुण्डल को पार करने में घटती चली जाती है। कुण्डलों में होकर प्रवाहित होने के कारण ही प्राण के संवेग का नाम कुण्डलिनी शक्ति है। शरीर शास्त्रियों का मत है कि सुषुम्ना में अवस्थित ये चक्र महत्वपूर्ण स्नायु केन्द्र हैं जहाँ से सूक्ष्म स्नायु प्रवाह निकल कर फैलते हैं। स्नायु तंत्र की सम्वेदनाएँ भी इन्हीं केन्द्रों से नियन्त्रित होती है।

मुख्य प्राण ही सुषुम्ना से निकलने वाली नाड़ियों के द्वारा सम्पूर्ण शरीर में वितरित होकर शरीर की गतिविधियों का संचालन करता है। उसका प्रवेग जब अधोगामी दिशा में तीव्र होता है तो मन, बुद्धि तथा अन्य इन्द्रियों की वृत्तियाँ गौण हो जाती हैं पर काम का उभार अधिक हो जाता है। मनुष्य काम के वशीभूत हो जाता है। वृहद उपनिषद् में वर्णन है- ’सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनम्’ अर्थात् उस स्थिति में मुख्य प्राण के प्रवाह में सभी स्नायविक संवेदनों के सुख एकत्रित हो जाते हैं। तब कामोपभोग में ही मनुष्य को सबसे बड़ा आनन्द मानने लगता है। यह एक ऐसी भ्रान्ति है जिससे सामान्य व्यक्तियों को प्रायः निकलते नहीं बनता।

सुषुम्ना के माध्यम से प्राण की गति को ऊर्ध्वगामी बना देने पर जैसे-जैसे वह ऊपर उठता है, प्रत्येक चक्र के बाद उसका तेज बढ़ता जाता है। फलस्वरूप शरीर की निम्नतम वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। चक्रबेधन के साथ शक्ति की धारा फूट पड़ती है। ब्रह्मरन्ध्र में प्राण के प्रवेश तथास्थित हो जाने से समाधि की दिव्य स्थिति प्राप्त होती है। सहस्रार से आनन्द की निर्झरिणी ऐसी ही स्थिति में प्रवाहित होने लगती हैं जिसकी मस्ती में साधक डूबा रहता रहता तथा अनुभव करता है कि उस दिव्य आनन्द के समक्ष संसार के सभी सुख तुच्छ हैं।

प्राण के ऊर्ध्वगमन की स्थिति में उसकी दिव्यता बढ़ने का अभिप्राय भौतिकी की भाषा में यह है कि प्रत्येक चक्र के बाद प्राण की तरंग दीर्घता घटती तथा ऊर्जा बढ़ती है। सहस्रार में पहुँचकर वह प्रचण्ड सामर्थ्यवान दिव्य-ज्योति के रूप में परिणित हो जाती है अर्थात् वहाँ प्राण की ऊर्जा अनन्त हो जाती है। समाधि की स्थिति में पहुँचे साधकों की नाड़ी एवं हृदय की धड़कन इसी कारण निम्नतम हो जाती है। सुषुम्ना में ऊपर की ओर उठती कुण्डलिनी शक्ति चित्त के कुसंस्कारों को भी परिशोधित करती जाती है। जैसे-जैसे चित्त निर्मल होता जाता है, वैसे-वैसे उसमें सत्य का प्रकाश स्वयं ही प्रदीप्त होने लगता है। साधकों को अदृश्य के गर्भ में निहित परोक्ष अनुभूतियाँ ऐसी ही स्थिति में होने लगती हैं।


कागज (kahani)

कागज पर कुछ लिखने के लिए कलम पहुँची तो उसने अकड़कर कहा- ‘मेरे गोरे चिट्ठे शरीर पर तुझ काली-कलूटी का स्पर्श क्या शोभा देगा। दूर हट, तेरे साथ अपना गौरव मैं भी क्यों घटाऊँ?’

स्याही बिना कुछ कहे वापस चली गई। कागज सफेद तो बना रहा पर मिलन के सौभाग्य से उसे वंचित ही रहना पड़ा। सफेदी उसकी बनी रही पर पत्र के रूप में परिणत होने को अवसर सदा के लिए हाथ से चला गया।


वेदों में यज्ञ चिकित्सा का प्रतिपादन

अथर्ववेद 1।2।31, 32, 4, 37, 5।23, 29 में अनेक प्रकार के रोगोत्पादन कृमियों का वर्णन आता है। वहाँ इन्हें यातुधान, क्रव्यात्, पिशाच, रक्षः आदि नामों से स्मरण किया है। ये श्वास वायु, भोजन, जल आदि द्वारा मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट होकर या मनुष्य को काटकर उसके शरीर में रोग उत्पन्न करके उसे यातना पहुँचाते हैं, अन्तः ये ‘यातुधान’ हैं। शरीर के माँस को खा जाने के कारण ये ‘क्रव्यात्’ या ‘पिशाच’ कहलाते हैं। इनसे मनुष्य को अपनी रक्षा करना आवश्यक होता है, इसलिए ये ‘रक्षः’ या राक्षस हैं। यज्ञ द्वारा अग्नि में कृमि-विनाशक औषधियों की आहुति देकर इन रोग कृमियों को विनष्ट कर रोगों से बचाया जा सकता है। अथर्व 1।8 में कहा गया है-

इदं हविर्यातुधानात् नदी येन मिवावहत्।य इदं स्त्री पुमानकः इह स स्तुवतां जनः॥1॥

यजैषामग्ने जनिमानि वेल्थ गुहासतामन्त्रिणां जातवेदः।ताँस्त्वं ब्राह्मणा वावधानो जह्योषां शततहमग्ने॥4॥

“अग्नि में डाली हुई यह हवि रोग-कृमियों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है, जिस प्रकार नदी पानी के झागों को। जो कोई स्त्री या पुरुष इस यज्ञ को करे उसे चाहिए कि वह हवि डालने के साथ मन्त्रोच्चारण द्वारा अग्नि का स्तवन भी करे। हे प्रकाश अग्ने! गुप्त से गुप्त स्थानों में छिपे बैठे हुए भक्षक रोग-कृमियों के जन्मों को तू जानता है। वेद मन्त्रों के साथ बढ़ता हुआ तू उन रोग-कृमियों को सैकड़ों बन्धों का पात्र बना।”

इस वर्णन से स्पष्ट है कि मकान के अन्धकारपूर्ण कोनों में, सन्दूक, पीपे आदि सामान के पीछे, दीवार की दरारों में एवं गुप्त से गुप्त स्थानों में जो रोग कृमि छिपे बैठे रहते हैं, वे कृमि हर औषधियों के यज्ञीय धूम्र से नष्ट हो जाते हैं। अथर्ववेद 5।29 में इस विषय पर और भी अच्छा प्रकाश पड़ता है।

अक्ष्यो निविध्य ह्रदयं निविध्य,जिह्वा नितृन्द्धि प्रदशाता मृणीही।

पिशाचो अस्य यतमो जघास- अग्ने यविष्ठ प्रति तँ शृणीही॥

“हे यज्ञाग्ने! जिस माँस भक्षक रोग कृमि ने इस मनुष्य को अपना ग्रास बनाया, उसे तू विशिष्ट कर दे। हृदय चीर दे, जीभ काट दे।”

आमे सुपम्वे शबले विपम्कवे, यो मा पिशाचो अशने ददम्न।तदात्मना प्रजया पिशाचा,वियातयन्तामगदोऽयमस्तु॥

क्षीरे मा मन्थे यतमो ददम्भ-अकृष्ट पन्चे अशने धान्ये यः।अपां मा पाने यतमो ददम्भः,कृव्याद् यातूनां शयने शयानम्॥

दिवा मा नक्तं यतमो ददम्भ-क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्।तदात्मना प्रजया पिशाचा,वियातयन्ता भगदोऽयमस्तु॥

“कच्चे, पक्के, अधपके या तले हुए भोजन में प्रविष्ट होकर जिन माँस भक्षक रोग-कृमियों ने इस मनुष्य को हानि पहुँचाई, वे सब रोग-कृमि, हे यज्ञाग्नि! तेरे द्वारा सन्तति सहित विनष्ट हो जायें, जिससे कि हम निरोग हों। दूध में, मठे में, बिना खेती के पैदा हुए जंगली धान्य में, कृषि जन्य धान्य में, पानी में, बिस्तर पर सोते हुये दिन में या रात में जिन रोग-कृमियों ने इसे हानि पहुँचाई है, वे सब, हे यज्ञाग्ने! तेरे द्वारा सन्तति सहित विनष्ट हो जायें, जिससे कि यह मनुष्य समुदाय निरोग हो।”

न तं तक्ष्त्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते।य भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते॥

अर्थात्- “जिस मनुष्य को गूगल औषधि की उत्तम गन्ध की प्राप्ति होती है, उसे रोग पीड़ित नहीं करते और अभिशाप या आक्रोश उसे नहीं घेरता।”

प्राचीन काल में महारोग फैलने के समय में बड़े-बड़े यज्ञ किये जाते थे और जनता उनसे आरोग्य लाभ करती थी। उन्हें भैषज्य-यज्ञ कहते थे। गोपथ ब्राह्मण में लिखा है-

भैषज्य यज्ञाः वा एते यच्चातुमास्मानि। तस्माद् ऋतुसन्धिषु प्रयुज्यन्ते। ऋतु सर्न्धिष वै र्व्याधिर्जायते। -गी. ब्रा.। उ. 1।19

“जो चातुर्मास्य यज्ञ हैं वे भैषज्य यज्ञ कहलाते हैं, क्योंकि वे रोगों को दूर करने के लिए होते हैं। ये ऋतुसन्धियों में किये जाते हैं, क्योंकि ऋतुसन्धियों में ही रोग फैलते हैं।”

जिस क्षय चिकित्सा में आधुनिक विज्ञान इतनी विवशता प्रकट करता है उसी की चिकित्सा का वेद भगवान आशापूर्ण शब्दों में आदेश देते हैं-

मुंचामि त्वा हविसा जीवनाय कमज्ञात,मक्ष्यायुत राजक्ष्मात्।ग्राहिर्जग्राह यद्यैतदेव तस्या इन्द्राणि,प्रभुमुक्तयेनमृ॥1॥अथर्व का. 3 सू 10 मन्त्र

अर्थ- हे व्याधिग्रस्त। तुमको सुख के साथ चिरकाल तक जीने के लिए गुप्त यक्ष्मा रोग और सम्पूर्ण प्रकट राजयक्ष्मा रोग से आहुति द्वारा छुड़ाता है। जो इस समय में इस प्राणी का पीड़ा ने या पुराने रोग ने ग्रहण किया है, उससे वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुड़ावे। इससे अगला मन्त्र इस प्रकार है-

यदि दिक्षितायुयदि वा परे तो यदि,सृत्योरत्तिकं नीत एवं।तमा हरामि निऋते रुपस्थाद,रुपार्शमेवं शतशारदाय॥1॥-अथर्व का. 3 सुक्त 11 मन्त्र

अर्थ- यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा इस संसार के सुखों से दूर हो, चाहे मृत्यु के निकट आ चुका हो, ऐसे रोगी को भी मैं महारोग के पाश से छुड़ाता हूँ। इस रोगी को सौ शरद ऋतुओं तक जीने के लिए प्रबल बनाया गया है।

विसवैते जामान्य जानं यतो जामान्य जायसे।

कथह तत्र तवं हनो यस्य कृणयो हविगृहे॥

अर्थ- “हे क्षय रोग! तेरे उत्पन्न होने के विषय में हम निश्चय से जानते हैं कि तू जहाँ ये उत्पन्न होता है वहाँ किस प्रकार हानि कर सकता है? जिसके घर में हम विद्वान नाना औषधियों से या रोग-नाशक हवि, चरु या अन्न द्वारा क्षय-रोग को निकाल देते हैं, वहाँ से सब प्रकार से क्षय रोग दूर हो जाता है।”

प्रयुक्तया यथा चेष्टया राजयक्ष्मा पुराजितां।तां वेद विहिता मिष्ट मारोग्यार्थी प्रायोजयेत्॥

“जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था, आरोग्य चाहने वाले मनुष्य को उसी वेद-निहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए।”

प्राकृतिक नियमों के साथ नित्य-प्रति नियमपूर्वक हवन करने वाला कदापि रोगी नहीं हो सकता, यह वेदवर्णित सुनिश्चित मत है और क्षय रोग तो उसके घर के निकट आने से घबरायेगा, क्योंकि श्रुति का आदेश है-

न यं यक्ष्मा अरुन्धते नैन शपथ का अश्नुते।यं मेषजस्य गुग्गुलो, सुरभिर्गन्धो अश्नुते॥

विष्यं चस्तस्माद् यक्ष्मा मृगाद्रश्ला द्रवेरते॥ आदि-अथर्व. का. 19 सू. 38 मन्त्र 12

अर्थ- “जिसके शरीर को रोगनाशक गूगल का उत्तम गन्ध व्यापता है, उसको राज-यक्ष्मा की रोग पीड़ा नहीं होती। दूसरे को शाप भी नहीं लगता। उससे सब प्रकार के यक्ष्मा रोग शीघ्रगामी हरिणों के समान काँपते हैं, डरकर भागते हैं।”

यज्ञ प्रक्रिया में किस रोग में, किस विधान से किस मन्त्र एवं औषधि का उपयोग किया जाय, इसकी रहस्यमयी विद्या का मन्थन आज फिर से किया जाना जरूरी है। जब उसके सत्परिणाम सामने आयेंगे तो निश्चय ही यह चिकित्सा-पद्धति संसार की सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति होगी।


तारक मंत्र गायत्री

गायत्री मन्त्र का एक नाम तारक मन्त्र भी है। कई साधना ग्रन्थों में इसका उल्लेख इसी नाम से हुआ है। तारक अर्थात् तार देने वाला, पार करा देने वाला, तैरा कर पार निकाल देने वाला। गहरे जल प्रवाह को पार करके- निकल जाने को डूबते हुए को बचा लेने को तारना कहते हैं। यह भव सागर ऐसा ही है, जिसमें अधिकाँश जीव डूबते हैं। तरते तो कोई बिरले ही हैं। जिस साधन से तरना सम्भव हो सके, उसे ही तारक कहा जायेगा। गायत्री मन्त्र में यह सामर्थ्य है, उसी से उसे तारक मन्त्र कहा जाता है।

तारक मन्त्र की विशेषता और गायत्री मन्त्र में उसका समावेश होने से पूर्व यह समझना होगा कि चह कौन-सी शक्ति है जो मनुष्य को समर्थ-असमर्थ, सफल-असफल और जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में सशक्त या अक्षम सिद्ध करती है। उस शक्ति को थोड़े ही शब्द में समझना चाहें तो कहा जा सकता है कि प्राणशक्ति ही मनुष्य सत्ता की जीवनी शक्ति है। वह यदि कम हो तो मनुष्य समुचित पराक्रम कर सकने में असमर्थ रहता है और उसे अधूरी मंजिल में ही निराश एवं असफल हो जाना पड़ता है। क्या भौतिक, क्या आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में अभीष्ट सफलता के लिए आवश्यक सामर्थ्य की जरूरत पड़ती है। इसके बिना प्रयोजन को पूर्ण कर सकना, लक्ष्य को प्राप्त कर सकना असम्भव है। इसलिये कोई महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए उसके आवश्यक साधन जुटाना आवश्यक होता है। कहना न होगा कि भौतिक उपकरणों की अपेक्षा व्यक्तित्व की प्रखरता एवं ओजस्विता कहीं अधिक आवश्यक है।

साधनों का उपयोग करने के लिये भी शौर्य, साहस और सन्तुलन चाहिए। बढ़िया बन्दूक हाथ में, पर मन में भीरुता, घबराहट भरी रहे तो वह बेचारी बन्दूक क्या करेगी? चलेगी ही नहीं, चल भी गई तो निशाना ठीक नहीं लगेगा, दुश्मन सहज ही उससे इस बन्दूक को छीन कर उल्टा आक्रमण कर बैठेगा। इसके विपरीत साहसी लोग छत पर पड़ी ईंटों से और लाठियों से डाकुओं का मुकाबला कर लेते हैं। ‘साहस वालों की ईश्वर सहायता करता है’ यह उक्ति निरर्थक नहीं है। सच तो यही है कि समस्त सफलताओं के मूल में प्राण-शक्ति ही साहस, जीवट दृढ़ता, लगन, तत्परता ही प्रमुख भूमिका सम्पादन करती है और यह सभी विभूतियाँ प्राण-शक्ति की सहचरी हैं।

प्राण ही वह तेज है जो दीपक के तेल की तरह मनुष्य के नेत्रों में, वाणी में, गतिविधियों में, भाव-भंगिमाओं में, बुद्धि में, विचारों में प्रकाश बन कर चमकता है। मानव जीवन की वास्तविक शक्ति यही है। इस एक ही विशेषता के होने पर अन्यान्य अनुकूलताएँ तथा सुविधाएँ स्वयमेव उत्पन्न, एकत्रित एवं आकर्षित होती चली जाती हैं। जिसके पास यह विभूति नहीं उस दुर्बल व्यक्तित्व वाले की सम्पत्तियों को दूसरे बलवान् लोग अपहरण कर ले जाते हैं। घोड़ा अनाड़ी सवार को पटक देता है। कमजोर की सम्पदा- जर, जोरू, जमीन दूसरे के अधिकार में चली जाती है।

जिसमें संरक्षण की सामर्थ्य नहीं वह उपार्जित सम्पदाओं को भी अपने पास बनाये नहीं रख सकता। विभूतियाँ दुर्बल के पास नहीं रहतीं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विचारशील लोगों को अपनी समर्थता- प्राण शक्ति बनाये रखने तथा बढ़ाने के लिए भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रयत्न करने पड़ते हैं। आध्यात्मिक प्रयत्नों में प्राण शक्ति के अभिवर्धन की सर्वोच्च प्रक्रिया गायत्री उपासना को माना गया है। उसका नामकरण इसी आधार पर हुआ है।

शरीर में प्राण शक्ति ही निरोगता, दीर्घ-जीवन, पुष्टि एवं लावण्य के रूप में चमकती है। मन में वही बुद्धिमता, मेधा, प्रज्ञा के रूप में प्रतिष्ठित रहती है। शौर्य, साहस, निष्ठा, दृढ़ता, लगन, संयम, सहृदयता, सज्जनता, दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता के रूप में उस प्राण-शक्ति की ही स्थिति आँकी जाती है। व्यक्तित्व की समग्र तेजस्विता का आधार यह प्राण ही है। शास्त्रकारों ने इसकी महिमा को मुक्त कण्ठ से गाया है और जन-साधारण को इस सृष्टि की सर्वोत्तम प्रखरता का परिचय कराते हुए बताया है कि वे भूले न रहें, इस शक्ति-स्रोत को- इस भाण्डागार को ध्यान में रखें और यदि जीवन लक्ष्य में सफलता प्राप्त करनी हो तो इस तन्त्र को उपार्जित, विकसित करने का प्रयत्न करें।

गायत्री साधना मनुष्य को प्राणयुक्त बनाती और उसमें प्रखरता उत्पन्न करती है। गायत्री का अर्थ ही है प्राणों का उद्धार करने वाली। इस प्रकार प्राणवान और विभिन्न शक्तियों में प्रखरता उत्पन्न होने से पग-पग पर सफलताएँ, सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। प्राण की न्यूनता ही समाज विपत्तियों का, अभावों और शोक-संतापों का कारण है। दुर्बल पर हर दिशा से आक्रमण होता है, दैव भी दुर्बल का घातक होता है। भाग्य भी उसका साथ नहीं देता और मृत लाश पर जैसे चील, कौए दौड़ पड़ते हैं वैसे ही तत्वहीन मनुष्य पपिवरत्तियाँ टूट पड़ती हैं। इसलिए हर बुद्धिमान को प्राण का आश्रय लेना ही चाहिए। कहा गया है-

प्राणो वै बलम्। प्राणो वै अमृतम्। आयुर्नः प्राणः राजा वै प्राणः। -बृहदारण्यक

प्राण ही बल है, प्राण ही अमृत है। प्राण ही आयु है। प्राण ही राजा है।

यो वै प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः -सांख्यायन

जो प्राण है, सो ही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है, सो ही प्रण है।

यावद्धयास्मिन् शरीरे प्राणोवसति तावदायुः। -कौषीतकि

जब तक इस शरीर में प्राण हैं तभी तक जीवन है।

प्राणो वै सुशर्मा सुप्रतिष्ठानः। -शतपथ

प्राण ही इस शरीर रूपी नौका की सुप्रतिष्ठा है।

एतावज्ज्न्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत्सदा॥

“प्राण, अर्थ, बुद्धि और वाणी द्वारा केवल श्रेय का ही आचरण करना देहधारियों का इस देह में जन्म साफल्य है।”

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रौत्रे या च चक्षुषि। या च मनसि सन्तताशिवां तां कुरुमोत्क्रमीः॥

‘हे प्राण, जो तेरा रूप वाणी में निहित है तथा जो श्रोत्रों, नेत्रों तथा मन में निहित है, उसे कल्याणकारी बना, तू हमारे देह से बाहर जाने की चेष्टा मत कर।’

प्राणस्येद वशे सर्वं त्रिदिवेयत् प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान रक्षस्व प्रज्ञां च विधेहिन इति॥

“हे प्राण, यह विश्व और स्वर्ग में स्थित जो कुछ है, वह सब आपके ही आश्रित है। अतः हे प्राण! तू माता-पिता के समान हमारा रक्षक बन, हमें धन और बुद्धि दे।”

व्यक्ति का व्यक्तित्व ही नहीं, इस सृष्टि का कण-कण इसी प्राण शक्ति की ज्योति से ज्योतिर्मय हो रहा है। जहाँ जितना जीवन है, प्रकाश है, उत्साह है, आनन्द है, सौन्दर्य है वहाँ उतनी ही प्राण की मात्रा विद्यमान समझनी चाहिए। उत्पादन शक्ति और किसी में नहीं, केवल प्राण में ही है। जो भी प्रादुर्भाव, सृजन, आविष्कार, निर्माण और विकासक्रम चल रहा है, उसके मूल में परब्रह्म की यही परम चेतना काम करती है। जड़ पंच तत्वों के चैतन्य की तरह सक्रिय रहने का आधार यह प्राण ही है। परमाणु उसी से सामर्थ्य ग्रहण करते हैं और उसी की प्रेरणा से अपनी धुरी तथा कक्षा में भ्रमण करते हैं। विश्व ब्रह्माण्ड में समस्त ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधियाँ इसी प्रेरणा शक्ति से प्रेरित हैं। उपनिषदकार ने कहा है-

प्राणाद्धये व खल्विमान भूतानि जायन्ते। प्राणानि जातानि जीवन्ति। प्राण प्रयस्त्यभि संविशन्तीति। -तैन्तरीय,

प्राण शक्ति से ही समस्त प्राणी पैदा होते हैं। पैदा होने पर प्राण से ही जीते हैं और अन्ततः प्राण में ही प्रवेश कर जाते हैं।

सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवा। भिशं विशन्ति, प्राणमयुम्युंजि हते॥ -छान्दोग्य,

यह सब प्राणी, प्राण में से ही उत्पन्न होते हैं और प्राण में ही लीन हो जाते हैं।

अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा, च परा च पथिभिश्चरन्तम। स सध्रीचीः स विषूचीर्वसा न आवरीवर्ति भुवनेष्यन्तः॥ (ऋग्. 1-164-31)

“मैंने प्राणों को देखा है- साक्षात्कार किया है। यह प्राण सब इन्द्रियों का रक्षक है। यह कभी नष्ट होने वाला नहीं है। यह भिन्न-भिन्न मार्गों अर्थात् नाड़ियों से आता जाता है। मुख और नासिका द्वारा क्षण-क्षण में इस शरीर में आता है और फिर बाहर चला जाता है। यह प्राण शरीर में वायु रूप में है पर अधिदैवत रूप से यह सूर्य है।”

विश्वव्यापी यह प्राणशक्ति जहाँ जितनी अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है। वहाँ उतनी ही सजीवता दिखाई देने लगती है, मनुष्य में इस प्राणतत्व का बाहुल्य ही उसे अन्य प्राणियों से अधिक बुद्धि विचारवान, अधिक बुद्धिमान, गुणवान, सामर्थ्यवान एवं सुसभ्य बना सका है। इस महान शक्ति पुत्र को केवल प्रकृति प्रदत्त साधनों के उपभोग तक ही सीमित रखा जाय तो केवल शरीर मात्रा ही सम्भव हो सकती है और अधिकांशतः नर-पशुओं की तरह केवल सामान्य जीवन ही जिया जा सकता है पर यदि उसे अध्यात्म विज्ञान के माध्यम से अधिक मात्रा में बढ़ाया जा सके तो गई-गुजरी स्थिति से ऊँचे उठकर उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचना सम्भव हो सकता है। हीन स्थिति में पड़े रहना मानव जीवन में सरलतापूर्वक मिल सकने वाले आनन्द, उल्लास से वंचित रहता, मनोविकारों और उनकी दुःखद प्रतिक्रियाओं से विविध विधि कष्ट-क्लेश सहते रहना, यही तो नरक है। देखा जाता है कि इस धरती पर रहने वाले अधिकाँश नर-तनुधारी नरक की यातनाएँ सहते हुए ही समय बिताते हैं। आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण सभी महत्वपूर्ण सफलताओं से वंचित रहते हैं। इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए प्राण तत्व का सम्पादन करना आवश्यक है।

गायत्री महामन्त्र के माध्यम से इसी प्राणतत्व का प्रचुर मात्रा में उपार्जन किया जाता है, जिससे मनुष्य देवोपम जीवन जीता हुआ स्वयं भवसागर से पार होने के साथ अन्य अनेकों के लिए भी तारक का काम करता है। गायत्री महामन्त्र को इसी सामर्थ्य, विशेषता के कारण तारक मन्त्र कहा गया है। जो विधिवत् उसका आश्रय ग्रहण करते हैं, उसे तत्काल अपने में समग्र जीवनीशक्ति का अभिवर्धन होता हुआ दृष्टिगोचर होता है। जितना ही प्रकाश बढ़ता है। उतना ही अन्धकार दूर होता है। इसी प्रकार आन्तरिक समर्थता बढ़ने के साथ-साथ जीवन को दुःख दारिद्र का घर और संसार को भव सागर के रूप में दिखाने वाले नारकीय वातावरण का भी अन्त होने लगता है।


जनता के दुःख, दर्द में शामिल (kahani)

एक धर्म प्रचारक संघ के अधिष्ठाता से शिकायत कर रहे थे। इतने दिन उपदेश देते हो गये पर लोग न मुझे समझ पाये न मेरे अनुयायी बने। अब मैं क्या करूँ?

अधिष्ठाता ने दूसरे दिन उनके साथ अन्य प्रचारकों को भी बुलाया। दो बर्तन पानी से भरकर रखे। सबके दिखाते हुए एक में तेल डाला और दूसरे में नमक। तेल ऊपर तैर रहा था और नमक पानी में धुल गया था।

तात्पर्य समझाते हुए अधिष्ठाता ने कहा- ‘तेल की तरह जनता के सिर पर छाने की कोशिश मत करो अथवा अलग-अलग ही बने रहोगे। नमक की तरह जन समुदाय के पानी में घुल जाओ तो आत्मसात होकर रहोगे।

प्रचारक मण्डली ने अनुभव किया कि अपनी विशिष्टता की छाप छोड़ने की अपेक्षा जनता के दुःख, दर्द में शामिल होना और उसके साथ घुल जाना अधिक श्रेयस्कर है।


संगीत विनोद ही नहीं उपचार भी

वैदिक ऋचाओं का उच्चारण स्वरबद्ध और तालबद्ध ही किया जाना चाहिए इसका निर्देशन है। समगान के रूप से उसकी सुनियोजित विधि व्यवस्था भी है। कुरान की आयतों के सम्बन्ध में भी ऐसा ही अनुशासन है कि उन्हें निर्धारित स्वर प्रवाह में ही पढ़ा जाय। इनमें सन्निहित अर्थ उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि उनका शब्द गुँथन- स्वर सन्धान। इसी माध्यम से वेद पाठ के द्वारा व्यक्ति और वातावरण में उच्चस्तरीय परिवर्तन होने की बात कही गई है।

कांग्रोव कहते थे- “संगीत अन्तराल के मर्मस्थल का निर्झर है। चट्टानों की कठोरता को कोमल बना सकता है।” उसमें मानवी अन्तराल को झंकृत और प्रकृति प्रवाह को दिशा विशेष में तरंगित करने की विशेष क्षमता है।

गाँधीजी ने अपने अनुभवों में लिखा है- “संगीत मुझे शान्ति देता रहा है। मैंने कठिन प्रसंगों में उससे सहारा लिया है। दक्षिण अफ्रीका में हुए आक्रमण से जब मैं घायल कराहता था तब ओलाइव ने मुझे एक मार्मिक भक्ति गीत सुनाया- “लीड काइण्डली लाइट” मेरी व्यथा शान्त हो गई’। शब्दार्थ की दृष्टि से उस गीत का अर्थ सामान्य था, पर जिस स्वर लहरी के साथ उसे गाया गया उसने सुनने वाले को भाव-विभोर कर दिया।

विद्वान वी. फिजीने कहते थे- संगीत हर जीवित वस्तु का उत्साह प्रदान करता है। तालबद्ध ध्वनियाँ स्नायु तन्तुओं की संवेदनशीलता और गतिशीलता बढ़ाती हैं। संगीत मनोरंजन ही नहीं ऐसा कुछ भी है जो व्यक्ति के अन्तराल को तरंगित, प्रभावित और परिवर्तित कर सके।

ग्रीस के प्रख्यात चिकित्सक हिपोक्रेटीज ने अपनी चिकित्सा पद्धति में संगीत को भी सम्मिलित रखा था इस देश के एक और मनीषी एस्कुलोपियस ने भी रोगोपचार में संगीत को उपयोगी पाया और चिकित्सा विधि में सम्मिलित रखा। प्राचीन काल में मिश्र में संगीत से प्रसव वेदना हलकी होने की मान्यता तथा प्रथा थी। उन दिनों विष उतारने और विक्षिप्तों को सही स्थिति में लाने के लिए विभिन्न प्रकार के संगीतों का उपयोग होता था।

डा. ए. हुगेल के उन अनुसन्धानों की लम्बी शृंखला है जिसमें वे आरोग्य लाभ में संगीत को औषधि उपचार से कम लाभदायक नहीं मानते। वे कहते हैं कि संगीत का आरोग्य से सघन सम्बन्ध है।

दक्षिण भारत तिरुपति की प्रसिद्ध वेंकटेश्वर देवालय की गोशाला में प्रातःकाल सुप्रभात में रिकार्ड बजाया जाता है। साथ ही कई अन्य गायन वादन भी चलते रहते हैं। प्रबन्धकों का कहना है कि इस संगीत को सुनकर गायें जो संगीत नहीं सुनती उनकी तुलना में अपेक्षाकृत अधिक दूध देती हैं। जब संगीत बन्द करके देखा गया तो दूध भी घट गया। एक बार सूखा पड़ने से हरा चारा बन्द करना पड़ा। दुधारू गायें भी सूखे चारे पर ही गुजर करती थीं। इसी दशा में स्वभावतः दूध घटना चाहिए पर देखा यह गया कि संगीत सुनने वाली गायें उतना ही दूध देती रहीं जितना कि हरा चारा खाने पर दिया करती थी। संगीत सुनने वाली गायों में से अधिकाँश ने बछड़े जन्मे और वे बड़े होने पर मजबूत फुर्तीले बैल बने।

जापान के अस्पतालों में इन दिनों मानसिक रोगियों को दिये जाने वाले उपचारों में संगीत को प्रमुखता दी गई है। इस उपचार का वहाँ दन्त चिकित्सा तथा प्रसव कक्षों में भी सफलतापूर्वक प्रयोग हो रहा है।

मनोरोगियों पर संगीत इतना प्रभाव डालता है जितना कि अन्य किसी उपचार विधि से सम्भव नहीं हो सका। अनिद्रा, शिर दर्द, सनक, उन्माद के आवेशग्रस्त रोगियों को विशेष विधि से बजाये गये संगीतों द्वारा तुरन्त राहत मिली।

उद्यानों और खेतों में भी एक विशेष प्रकार की स्वर लहरी लाउडस्पीकरों से बजाते रहने का यह प्रभाव देखा गया है कि पौधे जल्दी बढ़े और अधिक मात्रा में अच्छे फल लगे। सचमुच संगीत एक समग्र उपचार है, मात्र मनोरंजन नहीं।


अपनों से अपनी बात

हर प्रज्ञा परिजन एक समर्थ एवं समग्र स्वाध्याय मण्डल बने

प्रज्ञा परिजनों को स्वाध्याय मण्डल के रूप में विकसित होने का अनुरोध सर्वत्र स्वीकारा गया है यह अतीव प्रसन्नता की बात है। परिजनों द्वारा भेजे गये विवरणों से यह प्रकट है कि अधिकाँश पाठकों का व्यक्तित्व विकसित हुआ है। वरिष्ठता और विशिष्टता का बोध होने पर हर जागृत आत्मा को अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश करना होता है। अन्तःकरण उमंगों और जीवनचर्या में तद्नुरूप विकास परिवर्तन न हो, यह हो ही नहीं सकता। यदि अन्तरात्मा में प्रकाश उभरा है- ईश्वरीय अनुग्रह उतरा है तो कदम भी उस दिशा में बढ़े हैं, जिसमें परमार्थ भी स्वार्थ साधन जैसा प्रिय लगने लगता है।

अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य, अब संकल्प पूर्वक- दस को पढ़ाने सुनाने लगा है। साथ ही युग निर्माण योजना की प्रज्ञा अभियान आन्दोलन पत्रिका को भी मँगाते रहने की व्यवस्था बना ली गयी है। महीने में दो मासिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से दस द्वारा पढ़े जाने का प्रभाव कुछ ही दिनों में स्पष्टतया दृष्टिगोचर होने लगेगा। जब तक किसी प्रसंग पर दृष्टि डाल लेना एक बात है और नियमिततः भावनापूर्वक स्वाध्याय सर्वथा दूसरी। मनोकामना के लिए अनास्थापूर्वक चिन्ह पूजा की तरह किया गया भजन पूजन निरर्थक भी जा सकता है। देवी-देवताओं को फुसलाने की विडम्बना असफल भी रह सकती है, पर आत्म-निर्माण के लिए- व्यक्ति के सुधार परिष्कार के लिए किया गया स्वाध्याय कभी निष्फल जा ही नहीं सकता है।

उपलब्ध सूचनाओं से विदित है कि अखण्ड-ज्योति के अधिकाँश पाठकों ने विकास विस्तार के इस प्रथम चरण को पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकारा है और उसे नियमित रूप से कार्यान्वित करते रहने का व्रत भी धारण किया है। आधे लोग ऐसे हैं जिनने घरेलू प्रज्ञा पुस्तकालय स्थापित करने का एक कदम और आगे बढ़ाया है। पचास पैसा नित्य का बजट इस निमित्त रखा है और प्रज्ञा फोल्डरों के दैनिक स्वाध्याय का विशेष उपक्रम बना लिया है। प्रज्ञा पुराण के कथा माध्यम से उनने अपने घरों में सत्संग चालू कर दिया है। घर में नित्य प्रेरणाप्रद कथा वाचन चल पड़ने से सभी बाल वृद्ध उसमें रस लेने के लिए सम्मिलित होने लगे हैं।

यह सरल आकर्षक और प्रेरक सत्संग क्रम जिन घरों में चला है उनमें से प्रत्येक ने यह अनुभव किया कि यह प्रयास परिवार में स्नेह सौजन्य बढ़ाने की दृष्टि से कितना अधिक महत्वपूर्ण है। सोचते हैं कि अब तक क्यों न इस दिशा में जानकारी मिली। क्यों न यह उपक्रम पहले से ही घर से चला। यदि कुछ समय पूर्व से ही प्रज्ञा पुराण कथा चल पड़ी होती तो उसका प्रभाव अब तक गृहस्थ जीवन में कितना उपयोगी परिवर्तन कर चुका होता। पचास पैसा बजट में घर में स्थापित ‘प्रज्ञा पुस्तकालय’ सर्वत्र एक स्थायी सम्पदा बढ़ने के रूप में अनुभव किया गया है। इस अल्प बचत योजना के बदले में जो रत्न राशि घर में जमा होती चली जा रही है उसे असंख्य गुने लाभ जैसा व्यवसाय अनुभव किया जा रहा है।

यह जूनियर स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना हुई इसमें व्यक्तिगत प्रयास से ही काम चल गया है। इसके लिए किसी बाहरी व्यक्ति के सहयोग की आवश्यकता नहीं पड़ी और न कहीं घर से बाहर जाना पड़ा। घर के शिक्षितों को प्रज्ञा साहित्य पढ़ाने, सुनाने भर से बात बन गई। घर आते-जाते रहने वाले मित्र पड़ौसी भी उससे लाभ उठाने लगे।

नित्य की न्यूनतम उपासना में हर घर परिवार के चौबीस बड़े सदस्य भाग लेने लगे हैं। खड़े-खड़े दस मिनट चौबीस गायत्री मन्त्रों का मानसिक उच्चारण और उदीयमान सूर्य का ध्यान किसी को भी न भारी पड़ा है न अखरा है। स्नान की- समय की अनिवार्यता न रहने से सुविधापूर्वक इतना कर लेने में किसी को भी आपत्ति नहीं हुई है। महाप्रज्ञा के चित्रों की घर-घर स्थापना का क्रम भी तेजी से चल पड़ा है।

अनुरोध की कहाँ क्या प्रतिक्रिया हुई इसका विवरण गत अंक में पूछा गया था। अधिकांश पाठकों ने उसके उत्तर दे दिये हैं। कुछ ही ऐसे हैं जिनके उत्तर अभी नहीं आये हैं। देर सवेर में पहुँचेंगे वे भी। उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यह विदित हुआ है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के दो तिहाई परिजनों ने जूनियर स्तर के स्वाध्याय मण्डल स्थापित कर लिये हैं और ‘एक से दस’ का विकास विस्तार क्रम नियमित रूप से कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया है।

एक चौथाई ऐसे हैं, जिनने सीनियर स्तर के स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित करने का साहस किया है। उत्साह और प्रयास उभरा तो एक सप्ताह की दौड़-धूप अपनाने भर से वह सारी व्यवस्था बन गई जो आरम्भ में अत्यधिक कठिन प्रतीत होती थी। संकोची, आलसी, आत्महीनता ग्रस्तों की बात दूसरी है, अन्यथा प्रतिभावान मिलनसार प्रकृति का हर व्यक्ति दो चार घनिष्ठ मित्रों की मण्डली संजोये रहता है। यह लोग आपस में एक दूसरे को समर्थन करते और हाथ बँटाते रहते हैं। दोस्ती का आखिर कुछ तो दबाव पड़ता है। जब अनुचित कार्यों के लिए भी मित्रों का आग्रह मानना पड़ता है तो उचित, उपयोगी एक महत्वपूर्ण परमार्थ प्रयोजन के लिए मण्डली का सहयोग अर्जित न किया जा सके ऐसा हो ही नहीं सकता। जिनने भी सीनियर स्वाध्याय मण्डल स्थापित करने के लिए उमंग भरा साहस जुटाया है उन्हें दृष्टि दौड़ाते ही अपने घनिष्ठ क्षेत्र में सहयोगी मिल गये हैं। पूरी बात ठीक तरह समझाई गई है तो उस कार्य में हाथ बँटाने वाले दो चार तो अपनों में से ही मिल गये हैं। इतने भर से काम चल गया है।

सीनियर स्वाध्याय मण्डल का प्रधान एवं विशेष कार्य एक ही है- ज्ञानरथ प्रज्ञा संस्थान का ढाँचा खड़ा करना। उसके लिए एक पूरे या अधूरे समय का कार्यकर्ता नियुक्त करना। इसके लिए एक हजार की चल पुस्तकालय धकेल गाड़ी का और एक हजार के साहित्य का प्रबन्ध करना। यह दो हजार की राशि ही इस स्थापना की मूल लागत है।

चूँकि यह धन कहीं बाहर भेजा जाना नहीं है। किसी को दान में दिया जाना नहीं है। सदा हाथ के नीचे और आँख के सामने ही रहना है। इसलिए इस व्यवस्था में बहुत कठिनाई नहीं पड़ी। यह विश्वास किया गया है कि इस पूँजी की कभी आवश्यकता पड़ने पर कुछ ही घाटा देकर हाथों-हाथ बेचा जा सकता है और लागत को वापस किया जा सकता है। ऐसी दशा में दो हजार की पूँजी का जुटाना इतना कठिन कार्य नहीं था, जितना कि प्रतीत होता है। खाते-पीते आदमी एक तोला सोना तो बाल-बच्चों को किन्हीं छोटे-मोटे जेवरों के रूप में लटका देते हैं। यह एक तोले सोने जितनी ही राशि तो है। इसे कोई भी उदारचेता, पैसों की उलट-पुलट करके सँजो सकता है। सँजो भी लिया गया है। कहीं-कहीं मित्र मण्डली ने मिल-जुलकर यह राशि जुटाई है। कइयों ने इसके लिए अपने परिचय क्षेत्र से चन्दा भी किया है। जब कुछ करना ही ठहरा तो उसका प्रबन्ध हो ही जाता है। बेटों के विवाह में सर्वथा खाली हाथ होने पर भी जिधर-तिधर से किसी न किसी प्रकार व्यवस्था बनाई ही जाती है। कार्य की महता समझने वालों के लिए यह कठिन नहीं पड़ा कि वे ज्ञानरथ की लागत पूँजी का प्रबन्ध न कर सकें। उपेक्षा अनास्था और आलस्य के अतिरिक्त यह सरंजाम जुटने में कहीं भी वास्तविक व्यवधान अड़ा नहीं है काल्पनिक कठिनाई तब देखते-देखते तिरोहित हो गई, जब उसके लिए व्यावहारिक कदम उठाये गये।

एक व्यक्ति नियुक्त करना तभी तक कठिन था जब इसके लिए ब्रह्मज्ञानी या वानप्रस्थी ढूँढ़ा जा रहा था। खाली समय वाले उत्साही लड़के इसके लिए हर जगह मिल गये। प्राइवेट पढ़ाई उत्तीर्ण होने के महत्वाकाँक्षी के लिए चार घण्टे उपार्जन के लिए लगाने वाले शिक्षक हर जगह उत्सुक पाये जाते हैं। कठिनाई पूछताछ और ढूँढ़ खोज करने भर की है। घर बैठे कोई पूछता आये यह कठिन है पर पचास चालीस के कान में बात डाल देने या शिक्षा क्षेत्र में एक छोटा पर्चा बाँट देने से ऐसे वयस्क लड़के सहज ही मिल जाते हैं, जिन्हें थोड़ी सी ट्रेनिंग के सहारे कुछ दिन साथ रहकर इस कार्य में निष्णात न बनाया जा सके। आमतौर से ऐसे लड़के 150 रु. मासिक में चार घण्टा काम करने के लिए मिल गये हैं। रिटायर्ड स्तर के ग्राम सेवक अध्यापक लोग भी जहाँ-तहाँ मिले हैं। पूरे समय के लिए वे 300 रु. मासिक पर तैयार भी हो गये हैं। जिन्हें खाना पूरी करने की पुरानी आदत थी वे तो नहीं खप सके पर उनमें से जो परिश्रमी, सेवा भावी एवं ईमानदार थे वे इसे ‘गोरस बेचन हरि मिलन” जैसा सुयोग समझकर खुशी-खुशी इस कार्य में जुट गये।

आरम्भिक पूँजी दो हजार की जुटने के उपरान्त दूसरा प्रश्न यही सामने आया कि अधूरे या पूरे समय के लिए नियुक्त कार्यकर्ता का निर्वाह व्यय कहाँ से- कैसे जुटाया जाय? इसके लिए आमतौर से तीन उपाय काम में लाये गये। (1) बिना मूल्य घर बैठे कुछ दिन नियमित रूप से प्रज्ञा साहित्य पढ़ाते रहने वालों ने चल पुस्तकालय की सदस्यता स्वीकार कर ली और इसके लिए दो या तीन रुपया मासिक देने लगे। (2) पढ़ाने के साथ पुस्तकें- स्टीकर- चित्र आदि बेचने का सिलसिला चल पड़ा और उसके कमीशन से कुछ बचने लगा। (3) कुछ कमी पड़ी तो मित्र मण्डली ने मिल-जुलकर उसकी पूर्ति कर दी। इस प्रकार इस व्यवस्था के जुटाने में कहीं इतनी कठिनाई नहीं पड़ी है कि ज्ञानरथ चलाने के लिए नियुक्त कार्यकर्ता का वेतन न चुक सके। जिनने पूँजी जुटा ली है, उन्हें मासिक वेतन की व्यवस्था बनाने में भी कठिनाई नहीं पड़ी।

ज्ञानरथ को प्रज्ञा संस्थान कहा गया है। वह प्राचीन काल के चल देवालयों की तरह है। जमीन खरीद कर निजी इमारतों वाली प्रज्ञापीठें बनाने में जितना धन और श्रम लगा है उसकी तुलना में यह चल देवालय सौ गुने सस्ते हैं साथ ही कहीं अधिक उपयोगी भी हैं। इमारतों वाले मन्दिर बनाने वाले जानते हैं कि उन्हें कितनी दौड़-धूप करनी और किस-किस प्रकार कितनी राशि जुटानी पड़ी। कितनों का सहयोग माँगना पड़ा। इसकी तुलना में ज्ञानरथ- चल देवालय में लगने वाली दो हजार की राशि इतनी हल्की-फुलकी थी कि वह एक दो के सहयोग से ही जुट गई। साथ ही स्थिर प्रज्ञापीठ की तुलना में कहीं अधिक फलप्रद एवं सरल सिद्ध हुई। सरल इसलिए कि उनमें धन कम लगा- नित्य की पूजा-अर्चा और टूट-फूट मरम्मत का खर्च सिर पर न चढ़ा। मन्दिरों में दर्शक कम पहुँचते हैं। जबकि ज्ञानरथ द्वार-द्वार पहुँचकर महाप्रज्ञा का अमृत बाँटते रहने का पुण्य फल कहीं अधिक मात्रा में कमाता है।

अब नित्य देव दर्शन के लिए मन्दिरों में पहुँचने वालों की संख्या दिन-दिन घटती जा रही है। कुछ की वृद्धजन नित्य पहुँचते हैं। इसके विपरीत महाप्रज्ञा गायत्री का तत्वज्ञान हजारों तक नित्य पहुँचाने में ज्ञानरथ समर्थ रहता है। गायत्री तत्वज्ञान की ही प्रकारान्तर से प्रज्ञा साहित्य के रूप में व्याख्या विवेचना होती रहती है। प्रतिभा के माध्यम से लोक शिक्षण का उद्देश्य जितना पूरा होता है उसकी तुलना में स्वाध्याय के माध्यम से प्रयोजन की पूर्ति कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही होती है। प्रतिमा दर्शन से देवता को वश में करके मनोकामना पूर्ण कराने की बात सोचने की अपेक्षा यह तथ्य अधिक सही है कि प्रज्ञा को अन्तःकरण की गहराई तक पहुँचाया जाय और मनन-चिन्तन के माध्यम से उसे जीवनचर्या में सम्मिलित किया जाय। इस कसौटी पर कसने गायत्री मन्दिर खड़ा करने की तुलना में चल प्रज्ञा संस्थान विनिर्मित करने की उपयोगिता रत्ती भर भी कम सिद्ध नहीं होती। लागत कम और भावी झंझट कम होने की दृष्टि से भी यह अधिक सरल है। देवालयों में पूजा-पुजारी का, बिजली मरम्मत का जितना चालू खर्च बँधता है उसकी तुलना में ज्ञानरथ के लिए नियुक्त कार्यकर्ता कहीं सस्ता पड़ता है। ऐसी ही यथार्थताओं से अवगत प्रज्ञा परिजनों ने बड़ी संख्या में ज्ञानरथ बनाने चलाने का नया उपक्रम अपनाया है। इसे निजी इमारत वाली प्रज्ञा पीठ खड़ी करने के समतुल्य ही महत्वपूर्ण एवं पुण्य परमार्थ का काम माना है। यही कारण है कि उनकी स्थापना इन्हीं दिनों अप्रत्याशित रूप से हुई है। संख्या उससे कही अधिक जा पहुँची, जितनी कि विगत दो वर्षों में बने प्रज्ञापीठों की है।

ज्ञानरथ का प्राथमिक रूप से तो इतने भर से पूरा हो जाता है कि उसे एक कार्यकर्ता आधे दिन या पूरे दिन ऐसे स्थानों, मुहल्लों, दफ्तर, कारखानों, पार्कों, घाटों के समीप घुमाये जहाँ विचारशील लोगों का आवागमन होता है। साहित्य नियमित पाठकों को देने वापस लेने का क्रम भी चलता रहे और जहाँ बिक्री की सम्भावना है वहाँ भी पहुँचते रहा जाय।

इसके उपरान्त यदि उन्हें प्रज्ञा संस्थान के रूप में विकसित होना है तब रात्रि के सत्संग व्यवस्था भी इसी के साथ-साथ जुटानी होगी। सत्संग के लिए अब किसी ज्ञानी प्रवक्ता की आवश्यकता नहीं रही। यह कार्य स्लाइड प्रोजेक्टर, टेपरिकार्डर, लाउडस्पीकर के तीन उपकरणों का त्रिगुट मिलकर भली-भाँति पूरी करते रह सकता है। इन तीनों की लागत भी दो हजार के करीब ही बैठती है। कार्यकर्ता अतिरिक्त नहीं रखना पड़ता। रात्रि के सत्संग क्रम में उपरोक्त उपकरणों द्वारा सम्पन्न किये आयोजन में जितना समय लगे उतना दिन में से कम कर लेने पर यह दुहरा प्रयोजन भी साथ-साथ चलता रह सकता है।

इन त्रिविधि उपकरणों की तथा आरम्भिक ज्ञानरथ पूँजी की समूची राशि चार हजार के लगभग बैठती है। इसके लिए जहाँ सम्भव था वहाँ स्मारिका प्रकाशन की योजना बनी और पूर्णतया सफल हुई है। बीस-तीस व्यापारियों से विज्ञापन संग्रह करने के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति को साथ लेकर निकल पड़ने भर से काम चल जाता है। विज्ञापन मिलना इन दिनों सरल है इससे छपाने वाले को भी इनकम टैक्स से कुछ न कुछ राहत मिलती है। प्रशंसा सभी चाहते हैं। विज्ञापन से व्यापार भी बढ़ता है। इतना विज्ञापन समेटने के लिए तीन-चार दिन की दौड़-धूप से काम चल सकता है और उससे इतना मिल सकता है जिससे छपाई-खर्च काट कर चार हजार की पूँजी बच सके। यह स्मारिका जिन व्यापारियों या प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हाथ पहुँचती है उन तक मिशन का परिचय भी पहुँचता है और नये सहयोग का नया द्वार खुलता है। स्मारिका के लिए लेख एवं छपने जैसा प्रबन्ध शान्ति-कुंज को सौंपा जा सकता है। बाजारू लागत से कहीं अधिक सस्ती सही और जल्दी यह व्यवस्था इस आधार पर बन सकती है।

इसी सन्दर्भ में एक नया प्रकरण मिशन में रुचि लेने वाले विशिष्ट व्यक्ति के जन्म दिवसोत्सव मनाये जाने का है। जिनका जन्मदिन हो, वे अपने मित्र पड़ौसियों के आमन्त्रित एकत्रित भी कर लें। शेष सारी व्यवस्था बनाने एवं खर्च करने की जिम्मेदारी स्वाध्याय मंडल उठा लें। इसके लिए एक छोटा स्थायी यज्ञ मण्डप एवं पूजा उपचार के सारे उपकरण दो ढाई सौ की लागत में बन जाते हैं। आयोजन पर खर्च भी नगण्य जितना आता है पर उस छोटे समारोह से प्रचार कार्य तथा उत्साह अभिवर्धन अत्यधिक होता है। जिसका जन्मदिन मनाया जाए उसके यहाँ ज्ञानघट स्थापित करने के अनुरोध रहे। उसे कोई भी मना न करेगा और बीस पैसा नित्य उससे जमा होते रहने से छह रुपया मासिक की आय होने लगती है। इस आधार पर नियुक्त कार्यकर्ता का वेतन चुकाते रहने में बहुत बड़ी सहायता मिलती है। आजीविका अधिक होने लगे तो एक के स्थान पर दो ज्ञान रथ भी चलाये जा सकते हैं और अन्यान्य उपकरण दूने भी किये जा सकते हैं। इस आधार पर अपना ग्राम, कस्बा ही नहीं दूसरे किसी समीपवर्ती स्थान तक भी आलोक वितरण का उपरोक्त क्रम आगे बढ़ सकता है।

कई स्थानों पर कई स्तर के प्रज्ञा परिजन हैं। कुछ ऐसे हैं जो स्वाध्याय मण्डल के आवश्यक सभी उपकरण जुटाने के लिए 4-5 हजार की व्यवस्था अपने पास से यहाँ जहाँ-तहाँ ये देखते-देखते कर सकते हैं, पर वे समय नहीं दे सकते। कुछ ऐसे हैं जो समय दे सकते हैं, पर पैसे का प्रबन्ध नहीं कर सकते। ऐसे स्थानों पर दोनों स्तर के लोग परस्पर सहयोग करके अन्धे-पंगे के सुयोग से नहीं पार उतरते जैसा उदाहरण बना सकते हैं।

कितनों ने ही समयदान की प्रतिज्ञाएँ की थीं। वे अन्यत्र न सही अपने यहाँ उस समय को ज्ञानरथ चलाने में देते रह सकते हैं। प्रश्न नियमितता और स्थिरता का है। जब उमंग उठी तब कुछ कर दिया, फिर जब उफान उतरा तो पैर पसार दिये। ऐसी अस्थिर मति से कभी कोई महत्वपूर्ण कार्य बन नहीं पड़ते। संसार में कभी कोई ठोस काम कर सके हैं तो उसके पीछे नियमितता और व्रतशीलता का सुनिश्चित समावेश रहा है। सुल्तानपुर के बाबू लखनलाल एडवोकेट का उदाहरण सर्वविदित है। वे वर्षों कचहरी से लौटते ही ज्ञानरथ चल पुस्तकालय की धकेल गाड़ी लेकर युग साहित्य पढ़ाने और बेचने निकलते रहे हैं। इस आधार पर उनने अपने नगर को जागृति का केन्द्र बनाया। अत्यन्त शानदार 51 कुण्डी गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया और सहयोगियों में सक्रियता फूँककर गायत्री शक्तिपीठ का निर्माण कार्य सम्पन्न कराया। अन्यत्र भी लगनशील व्यक्ति इसी प्रक्रिया का अनुसरण कर सकते हैं। वानप्रस्थ, परिव्राजक, समयदानी यदि चाहें तो बिना कोई वैतनिक व्यक्ति नियुक्त किये, अकेले या मिल-जुलकर स्वाध्याय मंडल के साथ जुड़े हुए प्रज्ञाचक्र घुमाने के उपक्रम को सहज ही पूरा करते रह सकते हैं।

स्थानीय वातावरण को मिशन के प्रति अधिक आकर्षित करने का सबसे अच्छा तरीका अपने यहाँ ‘प्रज्ञा आयोजन’ की व्यवस्था करना है। इस तीन दिवसीय सम्मेलन समारोह में जितनी भी उपस्थिति होती है, वह अभियान के उद्देश्य, स्वरूप और कार्यक्रम से अवगत ही नहीं अनुप्राणित भी होती है। इस प्रयोजन के लिए शान्ति-कुंज से प्रचारक मण्डलीयों की जीप व्यवस्था बनी है। उसी में प्रवचन मण्डली, चित्र प्रदर्शनी, यज्ञशाला, लाउडस्पीकर जैसे सभी आवश्यक उपकरण भेज दिये जाते हैं ताकि आयोजन कर्ताओं को कुछ भी साधन जुटाने की आवश्यकता न पड़े। प्रचारक मण्डली के पाँच सदस्य संगीत का भावभरा वातावरण बनाते हैं और प्रवक्ता प्रज्ञा पुराण की कथा इस प्रकार कहते हैं, जिससे पुरातन को अर्वाचीन के साथ जोड़कर युग परिवर्तन की समुचित पृष्ठभूमि बन सके।

ढाई दिन के कार्यक्रम में प्रातः पाँच कुण्डली गायत्री यज्ञ हर दिन होता रहता है। मध्याह्न विचारगोष्ठी एवं चित्र-प्रदर्शनी का कार्यक्रम रहता है। रात्रि को संगीत प्रवचन सभा। इस आयोजन में स्थानीय विचारशील लोगों को यदि घर-घर जाकर आमन्त्रित किया जा सके तो उपस्थिति भी ऐसी होती है, जिसे हर दृष्टि से उत्साहवर्धक कहा जा सके।

समूचे उपकरणों समेत पाँच प्रचारकों की जीप मण्डली का औसत खर्च चार पाँच सौ रुपया आता है। अन्य खर्चों में भी सौ दो सौ से अधिक खर्च नहीं पड़ता। इस प्रकार समर्थ स्वाध्याय मंडल यदि चाहे तो पाँच सात सौ की व्यवस्था करके अपने यहाँ एक प्रज्ञा आयोजन भी सम्पन्न कर सकते हैं। जन जागृति की दृष्टि से इन आयोजनों का प्रभाव अत्यन्त ही उत्साहवर्धक होता है। उससे स्वाध्याय मण्डल का कार्यक्षेत्र बढ़ने एवं जन साधारण का सहयोग मिलने में भारी सुविधा होती है।

घरों में जन्मदिवसोत्सवों की पारिवारिक विचारगोष्टियाँ होती रहें और वार्षिकोत्सवों के रूप में हर स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा आयोजन सम्पन्न करता रहे तो समझना चाहिए वह सारी व्यवस्था छोटे रूप से भली प्रकार बन गई जिसके लिए पिछले दिनों प्रज्ञा पीठों की स्थापना की गई थी। अब नई प्रज्ञा पीठें, चल प्रज्ञा मन्दिर के रूप में ही होनी चाहिए। 2400 प्रज्ञापीठें बन चुकीं। अब 2400 ज्ञानरथ प्रज्ञा संस्थानों के रूप में उस निर्धारण को अधिक सरल और अधिक व्यापक बनाया जाना है।

अखण्ड ज्योति परिजनों में से जो प्रतिभाशील वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्र स्तर के हैं उन्हें सीनियर स्वाध्याय मण्डल के रूप से उपरोक्त कार्यक्रमों को अपनाने के लिए कहा गया था। प्रसन्नता की बात है ऐसी प्रतिभाएँ हजारों की संख्या में इन्हीं दिनों उभर कर आगे आ रही हैं।


Quotation

न इतने कठोर बनो कि करुणा ही गँवा बैठो और न इतने सरल बनो कि धूर्तों का शिकार बनना पड़े।


युग परिवर्तन

(मंगल विजय)


युग परिवर्तन (kavita)

परिवर्तन के बिना न होता, विभीषिका का नाश। मूर्धन्यो जागो मुरदों से, रही न कोई आश॥

मानव के चिन्तन चरित्र में, आज असुरता आई। पाप पतन को कुण्ठा कुत्सा, भावों बीच समाई॥

है अभाव से ग्रसित राष्ट्र, जनसंख्या बढ़ती जाती। अणु युद्धों की होड़ लग रही, मानवता अकुलाती।

प्रकृति क्षुब्ध हो उठी आज फिर, सहा न जाता त्रास। परिवर्तन के बिना न होता, विभीषिका का नाश॥

ऋतु बसन्त आने से पहले, पतझर हो जाती है। नव शिशु को पाने से पहिले, माँ पीड़ा पाती है॥

नये भवन के लिए पुराने, खण्डहर ढाये जाते। ढाये खण्डहर की छाती पर, नये उठाये जाते॥

चन्द्रगुप्त चाणक्य बदलते, इसी तरह इतिहास। परिवर्तन के बिना न होता, विभीषिका का नाश॥

अवतारों की परम्परा है, परिवर्तन लाने को। दिव्य चेतना धारण करती, इस मानव बाने को॥

परिवर्तन हो गया जरूरी, युग की पीड़ा हरने। प्रज्ञा का अवसर हो रहा नई चेतना भरने॥

हम भी शिवा समर्थ सरीखा भरे नया विश्वास। परिवर्तन के बिना न होता, विभीषिका का नाश॥

जन मानस के दृष्टिकोण को फिर बदला जाना है। परशुराम का और बुद्ध का क्रम फिर दोहराना है॥

मानव में देवत्व उदय कर, धरती स्वर्ग बनाना। मानवता को पाप पतन से, अब है मुक्त कराना॥

रहे वहीं अब खिन्न मनुजता, मानव नहीं उदास। परिवर्तन के बिना न होता, विभीषिका का नाश॥

*समाप्त*