पत्थर का कोयला एक विशेष स्तर पर पहुँच कर हीरे की उपमा पा लेता है। यों उसका अनगढ़ प्रयोग करने वाले अंगीठी में जलाकर भी कमरे में रख लेते हैं और भोर होने से पूर्व ही विषैली गैस के कारण मर चुके होते हैं। जबकि हीरा उपलब्ध करने वाले सुसम्पन्न भाग्यवान बनते हैं। लोहा, राँगा, सीसा अमुक जैसे सामान्य खनिजों का बाजारू मूल्य तुच्छ होता है पर उन्हें जब भस्म रसायन बनाकर ग्रहण किया जाता है तो वे संजीवनी बूटी का काम करते और महंगे मूल्य पर बिकते हैं। पीने का पानी भाप बनाकर जब डिस्टिल्ड वाटर बना लिया जाता है तब उसकी गणना औषधियों में होती है, उसे कई रासायनिक क्रियाओं एवं सम्मिश्रणों में प्रयुक्त किया जाता है।
भावना समुदाय पर भी यही बात लागू होती है। वे भी यों तो गली-कूचों में भीड़ लगाते और गन्दगी फैलाते देखे जाते हैं पर जब उन्हें संस्कारिता की साधना द्वारा महान बना लिया जाता है तो फिर वे ऋषि-देवता कहाते, अपनी नाव पर चढ़ाकर असंख्यों को पार कराते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है। हर व्यक्ति जन्मता तो साधारण मनुष्य के नाते ही है। कालान्तर में उसकी जीवन साधना ही उसे वह श्रेय दिलाती है जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप माना जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की अपनी महत्ता है। वे प्रसुप्त बीजांकुरों के रूप में विद्यमान तो रहते हैं, पर जो उन्हें कुरेदता-उभारता है वह निश्चित ही अपनी स्थिति से ऊँचा उठते हुए महामानव का पद पाता है। अपना परिशोधन, तप-प्रक्रिया द्वारा संस्कारीकरण तथा साधना उपादानों के माध्यम से भाव संस्थान का उदात्तीकरण ही वे सोपान हैं जिन्हें पास करते हुए यह पद प्राप्त होता है। किसी समझौते की इसमें कोई गुँजाइश नहीं।
ईसा ने उस दिन एक वेश्या का निमन्त्रण स्वीकारा और उसके घर भोजन को गये। सारा शिष्य समुदाय भी साथ चला।
चारों ओर कानाफूसी चल पड़ी। यह कैसा भगवान का बेटा है, जो पापिनी से घृणा तक नहीं करता। शिष्यों में से धनादय और मुखरसिमोन ने अपने मन की बात ईसा से कह भी दी। “उद्धार करना है तो सज्जन ही क्या कम है जो आप दुर्जनों के यहाँ बातें और बदनामी सहते हैं।
ईसा ने उलट कर पूछा- सिमोन यदि तुम चिकित्सक होते तो किसी जुकाम पीड़ित और शस्त्राहत रोगी में से किसे प्राथमिकता देते? तुम्हारा विवेक ऐसी स्थिति में तुम्हें क्या करने को प्रेरित करता?
सिमोन ने शस्त्राहत की प्राण रक्षा के लिए जुकाम पीड़ितों की तुलना में प्राथमिकता देने की बात कही।
ईसा ने फिर पूछा- यदि मैं अधिक पापी को सुधारने के लिए कम अपराधी की तुलना में प्राथमिकता देता हूँ तो उसमें क्या भूल हुई ?
सिमोन चुप हो गए। वेश्या ने यह प्रसंग सुना तो सन्त की करुणा पर भाव-विभोर हो गई। दूसरे दिन वह वेश्या न रहकर सन्त हो गई। यह परिवर्तन जिसने भी सुना, ईसा के प्रति वह सहज ही श्रद्धावनत हो गया।
भगवान बुद्ध अब्बाली गाँव का लक्ष्य बनकर पदयात्रा पर निकले। लक्ष्य एक दरिद्र किन्तु कर्मठ किसान को धर्मोपदेश करना था। उसकी पात्रता का आभास तथागत को मिल चुका था।
किसान ने भगवान के आगमन पर अपना सौभाग्य सराहा। तथागत का उपदेश उनके श्रीमुख से सुनने को उसने चिर आकाँक्षा भी संजोए रखी थी।
दुर्भाग्य ने काम किया। किसान का बैल खो गया। सोचने लगा, बैल ढूँढ़े या उपदेश सुने?
निश्चय बैल ढूँढ़ने का हुआ। सो वह सत्संग का मोह छोड़कर बैल को ढूँढ़ने को निकल पड़ा। एक दिन-रात भटकने के उपरान्त बैल मिला। लौटकर घर आने तक भगवान उसकी प्रतीक्षा ही करते रहे।
लौटा तो बेतरह थका-माँदा। भूख प्यास से पैर लड़खड़ा रहे थे। सूखे मुँह से शब्द भी ठीक से नहीं निकल रहे थे।
तथागत ने मण्डली को निर्देश दिया इसके लिए तुरन्त भोजन का प्रबन्ध करो।
पेट भरने पर किसान शान्त चित्त से बैठा और ध्यान लगाकर उपदेश सुनता रहा।
लौटते समय मार्ग में शिष्यों ने भगवान से ऐसे श्रद्धालु के यहाँ जाने का कारण पूछा। वे गम्भीर रहे। बोले तीस योजन की कठिन यात्रा करके मैं जिस जिज्ञासु के यहाँ पहुँचा था वह लोक धर्म और उपदेश श्रवण में से किस की प्रधानता है इसे जानता था। ऐसी सूक्ष्मदर्शी विवेकशीलता ही मुझे उसके घर चलने के लिए घसीट लाई थी।
विद्वान वे नहीं जो बहुत से अनर्गल प्रसंग जानते हैं वरन् वे हैं जिन्हें काम की बातों का ज्ञान और अभ्यास है।
बुद्धिमान का काम इशारे से चल जाता है, पर मूर्ख के लिए तमाचा भी कम पड़ता है।
भौतिक क्षेत्र की प्रगति में बुद्धि की प्रखरता को महत्व दिया जाता है। उसे बढ़ाने के लिए हर सम्भव उपाय भी किये जाते हैं पर आध्यात्मिक प्रगति में श्रद्धा को प्रमुख स्थान दिया जाता है। एकाँगी बुद्धिमता के सहारे भौतिक जीवन की गाड़ी किसी प्रकार लुढ़कती रह सकती है पर आत्म निकास की ओर एक कदम भी चलना सम्भव नहीं हो पाता। श्रद्धा रूपी धुरी पर ही उपासना एवं आराधना की गाड़ी चलती है। बुद्धि के परिष्कृत स्वरूप विवेक का सम्बल मिल जाने से श्रद्धा एक ऐसी प्राणवान शक्ति बन जाती है जो साधक को सतत् आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उसकी सामर्थ्य की महिमा के गुणगान से शास्त्रों के पन्ने भरे पड़े हैं। “भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा विश्वास रूपिणी”, के रूप में अपना आन्तरिक उद्गार व्यक्त करते हुए मानसकार ने श्रद्धा को साक्षात् भवानी और विश्वास को शंकर मानकर अभ्यर्थना की है। इसी सत्य को इस प्रकार भी व्यक्त किया गया है। “यो यच्छ्रद्धः स एव सः।” जिसकी जैसी श्रद्धा रहती है, वह वैसा ही बन जाता है।
तर्क की पहुँच विचारों तक है। विचारों से परे अनुभूतियों के कितने ही दिव्य क्षेत्र मौजूद हैं जो उनकी पकड़ में नहीं आते। मानवी श्रद्धा ही उन्हें अनुभव कर सकती है। मनुष्य के पारस्परिक रिश्ते श्रद्धा से ही संचालित होते हैं। जीवन से उसे निकाल दिया जाये तो भाई-भाई के, भाई-बहन के, माता-पिता के, पिता-पुत्र के रिश्तों का कुछ विशेष मूल्य नहीं रह जाता। प्यार एवं स्नेह की बहने वाली निर्झपिणी सूखे तर्क के आतप में सूखकर मरुस्थल का रूप ले लेती है। वे परिवार, परिवार न रहकर सराय बन जाते हैं। जब सामान्य जीवन में श्रद्धा के बिना काम नहीं चलता तो आध्यात्मिक क्षेत्र में कैसे चल सकता है ?
पर मानव बुद्धि की सीमा होते हुए भी वह इतनी सक्षम तो है ही कि विराट् को विराट् बना सके। बुद्धि की इस स्वीकारोक्ति से भावों को अपना काम करने का आधार मिल जाता है। तब भावनाओं का ज्वार यदि विराट् के चरणों का अभिनन्दन करता है तो इसमें हानि ही क्या है? इसकी सराहना दर्शन को भी करनी चाहिए और विज्ञान को भी। मानव को बुद्धि का वरदान परमात्मा ने इसीलिए दिया है कि वह अच्छे-बुरे का, शुभ-अशुभ का, पूर्ण-अपूर्ण का, सत्य-असत्य का, श्रेष्ठ-निकृष्ट का भेद कर सके।
यह सच है कि धर्म के लिए श्रद्धा एवं आस्था का आधार आवश्यक है किन्तु इसका तात्पर्य यह भी नहीं है कि तर्क बुद्धि को वह बिल्कुल महत्व नहीं देता। ऐसा रहा होता तो तर्क को ऋषि की संज्ञा देकर उसकी अभ्यर्थना शास्त्रकार नहीं करते। मनुस्मृति में वर्णन है- “यस्तर्केणानुसन्धते स धर्म वेद नेतरः”, अर्थात् तर्क से अनुसन्धान करने वाला धर्म को जानता है- दूसरा नहीं।
पर यदि तर्क मात्र वितण्डावाद है तो वह किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने में मदद नहीं कर सकता। न ही धर्म के मर्म को- उसके वास्तविक प्रयोजन को समझने में ही सफल हो सकता है। सच्चाई यह है कि संसार में ऋषि तुल्य सत्य के जिज्ञासु तार्किक गिने-चुने होते हैं, अधिकाँश तो वितण्डावादी ही होते हैं। जो तर्क जिज्ञासावृत्ति से अभिप्रेरित होगा निश्चित रूपेण श्रद्धा का पक्षधर होगा क्योंकि उसके बिना खोज की राह पर एक कदम भी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं है।
किसी सिद्धान्त, किसी आदर्श अथवा किसी लक्ष्य के प्रति श्रद्धा भी तभी उमड़ती है जब ज्ञान द्वारा उनकी गरिमा की बुद्धि सामर्थ्य के समस्त आवेश के साथ आत्मसात् कर लिया जाता है। एक बार पूरे मन से उनको स्वीकार कर लेने पर तर्क नहीं जन्म लेता। दोष देखने वाली प्रवृत्ति नहीं रहती। “दोष दर्शनानुकूल वृत्ति प्रतिबन्धकवृत्तिः”, श्रद्धा की उपज है पर उसमें भी बुद्धि के पक्ष का सर्वथा अभाव नहीं होता। ऐसा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी असम्भव है। श्रद्धा कभी अकारण नहीं पैदा होती। यह हो सकता है कि उसका कारण समझ में न आये, पर वह होती है कारण से जुड़ी हुई। जहाँ कारण है वहाँ बौद्धिक दृष्टि प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कार्य अवश्य कर रही होगी।
श्रद्धा की वृत्ति वस्तुतः मानव मन की गहरी परतों में आबद्ध है। तर्क को जो सर्वोपरि महत्व देते हैं वे व्यक्ति भी श्रद्धा की सर्वथा उपेक्षा नहीं कर सकते। तर्क को सर्वोपरि मानना भी एक प्रकार से तर्क में श्रद्धा रखना है। उद्भव विद्वान, तार्किक भी अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ होते हैं। यह एक प्रकार की मान्यता निष्ठ श्रद्धा ही है। तर्कशास्त्र एवं दर्शन के महान ऋषि आचार्य शंकर को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि तर्क की एक सीमा है। बिना श्रद्धा के उच्चस्तरीय प्रयोजनों को पूरा कर सकना सम्भव नहीं है।
वस्तुतः मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन श्रद्धा से परिचालित है। पारिवारिक जीवन की सरसता, सफलता पारस्परिक श्रद्धा पर ही अवलम्बित है। श्रद्धा के टूटते ही दाम्पत्य जीवन को टूटते तथा परिवारों को बिखरते देरी नहीं लगती। जो परिवार श्रद्धा से अभिसिंचित होते हैं,उनमें स्वर्गोपम दृश्य दृष्टिगोचर होता है।
श्रद्धा के बिना जब सामान्य जीवन में काम नहीं चलता तो आध्यात्मिक जीवन में कैसे चल सकता है। ऐसी स्थिति में एक साधक अपनी श्रद्धा का विषय किन्हीं श्रेष्ठ सिद्धान्तों को अथवा इष्ट को बनाकर तद्नुरूप कार्यप्रणाली अपनाता है तो इसमें हानि ही क्या है ? अस्वाभाविकता कहाँ है? यह बात अवश्य है कि आध्यात्मिक पथ के साधक को श्रद्धा का विषय कुछ और होगा तथा वैज्ञानिक की श्रद्धा का विषय कुछ और धार्मिक की श्रद्धा वैज्ञानिक की अपेक्षा अधिक प्रगाढ़, दृढ़ तथा आवेगयुक्त होगी। पर यह अन्तर विषयों के अन्तर के कारण होता है। साधना का लक्ष्य है- परमात्मा का साक्षात्कार, जिसकी अनुभूति अपने अंचल में जड़ चेतन की समस्त स्थूल, सूक्ष्म अनुभूतियों को समेटे हुए है। जबकि विज्ञान का विषय इतना विस्तृत- इतना विराट् नहीं है। ब्रह्माण्ड का एक छोटा-सा भाग ही उसका कार्यक्षेत्र होता है।
श्रद्धाविहीन किसी शंकालु व्यक्ति को साधक की अनुभूति एक कपोल कल्पना या पागलपन प्रतीत हो सकती है पर इससे यथार्थता पर कुछ आँच नहीं आती। ईश्वरीय अनुभूति के उच्च लोक में पहुँचने के बाद व्यक्ति का व्यवहार सामान्य लोगों की दृष्टि में असामान्य तथा असंगत प्रतीत होता है तो इसमें कुछ विशेष आश्चर्य नहीं करना चाहिए। संकीर्णता, चिन्ता, उदासीनता आदि मानसिक व्यतिरेकों के ऊपर उठा हुआ व्यक्ति यदि अपने बन्धनों को तोड़ते हुए आगे बढ़ जाता है तथा ‘वासुदेवः सर्वंमिति’- सभी कुछ ईश्वर है मानकर चलता है तो इसमें अस्वाभाविकता ही क्या है?
ऐसे में दिव्य अनुभूतियों से वंचित रहने वाला तथा मनुष्य को अपनी ही सहज प्रवृत्तियों का गुलाम मानने वाला पाश्चात्य मनोविज्ञानी यदि धर्मानुभूति को भ्रम मानता तथा ईश्वर के प्रति दिव्य प्रेम को- ‘इंडिपस काम्पलेक्स’ कहता है इसमें आश्चर्य ही क्या है? अर्थ के आइने में मनुष्य के समस्त जीवन को देखने वाला मार्क्स यदि धर्मानुभूति को गरीबों की अफीम तथा पूँजीपतियों की धूर्त्तता मानता है तो इसे बुद्धि का दुराग्रह ही कहा जायेगा।
वस्तुतः मानव बुद्धि सब कुछ समझने में सक्षम नहीं है। बुद्धि के द्वारा तो केवल मानवीय जीवन स्तर की वस्तुओं को ही जाना जा सकता है। प्रख्यात दार्शनिक डॉ. राधाकृष्णन ने सत्य ही लिखा है कि “मनुष्य की बुद्धि एक ऐसे विषय के सन्दर्भ में विश्वसनीय घोषणा करने में नितान्त अक्षम है जो उसकी सीमा के परे है किन्तु मानवीय हृदय उस पर तत्व को समझने में पूर्ण रूप से सफल होता है।”
रूसो जैसे उद्भट विद्वान ने लिखा है कि- “श्रद्धावान व्यक्ति ईश्वर सम्बन्धी चर्चा को चमकीले तर्क को स्तर से ऊपर उठा लेता है तथा ईश्वर की अनुभूति हृदय की गहराई में अपनी श्रद्धा के सहारे करता है।”
इस सम्बन्ध में महर्षि अरविन्द का कहना है कि- “तर्क अस्तित्व की गहराई नापने में अक्षम है, वह तो सिर्फ इस विश्व के क्षेत्र का मात्र पर्यवेक्षण भरकर कसता है।”
माया और ब्रह्म के सुयोग से मिलकर बनी हुई, इस सृष्टि में दोनों का अपना-अपना अस्तित्व जड़ और चेतन के रूप में पृथक भी दृष्टिगोचर होता है। जड़ पदार्थ प्रकृति वर्ग में आते हैं और प्राणियों की चेतना में ब्रह्म की सत्ता दृष्टिगोचर होती है। इसी युग्म द्वारा गाड़ी के दो पहियों की तरह संसार की विभिन्न हलचलें गतिशील होती रहती हैं। मानवी सत्ता में भी दोनों का यह सघन संयोग प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। शरीर माया की प्रकृति की जड़ संरचना है। आत्मा को परमात्मा का अंशधर, प्रतिनिधि माना जाता है। यह दोनों ही अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण और समर्थ हैं। दोनों की अपनी-अपनी सीमा भी और आवश्यकता भी। इन्हें साथ-साथ जुटाया जा सकता है। दो पैर क्रमबद्ध से उठते और लम्बी मंजिल पार करते हैं। दो हाथों का परस्पर सघन संयोग रखे रहते हैं। गाड़ी के दो पहिये साथ-साथ लुढ़कते हैं। स्त्री पुरुष मिलकर स्नेह सहयोग भरा गृहस्थ चलाते हैं। फिर कोई कारण नहीं कि शरीर और आत्मा की आवश्यकताऐं दूरदर्शी रीति-नीति अपना कर जुटाई न जा सके और प्रसन्नता एवं प्रगति का उभयपक्षीय लाभ उठाते हुए यह जीवन सुखमय न बिताया जा सके।
शरीर रक्षा के लिए अन्न, वस्त्र और आच्छादन की व्यवस्था करनी पड़ती है। प्रसन्नता और प्रगति के लिए इन्द्रियों की क्षमता एवं उत्तेजना का सहारा लिया जाता है। उतने भर से सामान्य प्रत्यक्ष जीवन का काम चल जाता है और निर्वाह चक्र बिना किसी कठिनाई के गतिशील रहता है। व्यतिक्रम अतिवाद अपनाने से आरम्भ होता है। पेट भूखा रहने पर भी परेशानी होती है किन्तु यदि उसमें अनावश्यक ठूँस-ठाँस का भार लदे तो फिर दूसरी तरह का संकट उत्पन्न होता है। इसलिए मध्यवर्ती मार्ग ही श्रेयस्कर माना गया है। जो इस या उस स्तर की अति बरतते हैं वे ही विपत्ति मोल लेते हैं। अनशन पर बैठने से भी मृत्यु हो सकती है, अत्यधिक खा मरने पर अमृत भी विष का काम करता है। अति बरतना ही विपत्तियों का प्रधान कारण है जो सन्तुलन बनाकर चलते हैं वे ही बुद्धिमान कहलाते और सफल जीवन जीते हैं। यदि किसी को अपना स्वार्थ ही प्रिय हो तो उसे शरीर और आत्मा के बीच सन्तुलन बना कर ही चला चाहिए। दोनों में से किसी को अति नहीं अपनाने देनी चाहिए। एक-दूसरे के स्वार्थों में टकराव नहीं होने देना चाहिए वरन् ऐसी रीति-नीति अपनाना चाहिए, जिससे दोनों का समान हित साधन होता रहे। न कोई उपेक्षित अभावग्रस्त रहे और न किसी को दूसरे का भाग भी हड़प जाने की छूट मिले। इसी को सह जीवन-सह अस्तित्व-समन्वय कहते हैं। इसे अपनाने पर वे सभी लाभ भरपूर मात्रा में मिलते हैं जिसे कोई स्वार्थ सिद्धि कहता है कोई आत्मकल्याण। वस्तुतः दोनों एक ही हैं, पर जब अतिवाद अपनाया जाता है तभी चिन्ता और विपत्ति आ खड़ी होती है।
शरीर निर्वाह के लिए मुट्ठी भर साधनों की आवश्यकता है। उसे समस्त जीवधारी कुछ ही समय के प्रयास से- रास्ता चलते पूरा करते रहते हैं। फिर बीस उँगलियों वाला और असाधारण बौद्धिक प्रतिभा वाला आदमी उसे कुछ ही घण्टों के प्रयास से जुटा न सके ऐसा हो ही नहीं सकता। निरन्तर की व्यस्तता अपनाये रहने पर भी जब अभावग्रस्तता की शिकायत करनी पड़े तो उनके दो ही कारण हो सकते हैं- एक पिछड़ेपन की अस्त-व्यस्तता, दूसरे अतिवादी ललक लिप्साएँ। वासना, तृष्णा, अहंता की तीन ललक लिप्साएँ जब मनुष्य पर चढ़ दौड़ती हैं तो फिर इच्छाओं, आवश्यकताओं का स्वरूप इतना बढ़ जाता है कि उस खाई को पाटना समूची प्रतिभा और क्षमता झोंक देने पर भी पाटना सम्भव नहीं होता। आवश्यकताएँ सीमित होने के कारण सरलतापूर्वक पूरी हो सकती है किन्तु लिप्साओं की कोई सीमा नहीं। एक के पूरा होते-होते दस नई एवं बड़ी और उठ खड़ी होती हैं। उन्हें पूरी करने का अवसर आने से पूर्व ही सौ नई और मोटी तगड़ी और सामने आ खड़ी होती हैं। आग में ईंधन डालते रहने पर वह और भी अधिक भड़कती है। समुद्र पाटना सरल है पर तृष्णा की पूर्ति हो सकना सम्भव नहीं। उस प्रयास में रावण और हिरण्यकश्यपु तक असफल रहे और अभाव की शिकायत करते-करते मर गये। सिकन्दर, नैपोलियन तक को अपनी उपलब्धियाँ कम लगती रहीं। फिर सामान्यजनों को इस भस्मक रोग के रहते तृप्ति तुष्टि की आशा नहीं करनी चाहिए।
आम आदमी इसी मनोरोग से ग्रसित पाया जाता है कि वह शरीर निर्वाह के लिए जितना आवश्यक है उतना जुटा लेने भर से सन्तुष्ट नहीं रहता। बड़ा आदमी बनने की लिप्सा अपनाकर इस प्रकार की बौखलाहट अपना लेता है। और-और-और-और की रट लगाते-लगाते ऐसी मनः स्थिति में जा पहुँचता है कि जितने साधन सामने हैं वे बहुत कम प्रतीत होते हैं। उनमें चौगुने-सौगुने पाने की आतुरता भूतोन्माद की तरह चढ़ी रहती है। इसी व्यथा को बोलचाल की भाषा में भौतिक महत्वाकाँक्षा और अध्यात्म चर्चा के ऐषणा या तृष्णा कहा जाता है। निर्वाह के लायक कमाने और सन्तोषपूर्वक दिन गुजारने के हजार रास्ते हैं। इसमें किसी अपंग अविकसित को ही कठिनाई हो सकती है। सामान्य जीवन इतने निर्वाह साधन सुविधापूर्वक उपार्जित कर सकता है जिनसे जीवन चर्या नितान्त सरलतापूर्वक पूरी होती रहे। इतना ही नहीं बहुत करके तो वह अनायास ही इतना होता है कि मिल बाँटकर खाने और बदलने में हँसती-हँसाती जिन्दगी खरीदने की बात सोचनी पड़े। पर उनके लिए क्या कहा जाय जिनके सिर पर अहंकार भरी अमीरी का नशा सात बोतल पी चुकने वाले की तरह चढ़ा है। जिसे अपनी ही रट है, दूसरे की सुनने तक की फुरसत नहीं।
अमीरी की, बड़ा आदमी कहलाने की ललक ऐसी है जिसे नीति नियमों के अन्तर्गत रहकर पूरा नहीं किया जा सकता। उचित साधनों से उचित व्यवसाय एवं उचित परिश्रम करके उचित लाभांश रखने पर किसी भी व्यवसाय में इतना लाभ नहीं मिल सकता जिससे कोई धन कुबेर बन सके। अपने देश में तो ऐसी परिस्थितियाँ है ही नहीं कि साथियों को भागीदारी देते रहने पर भी कोई धनाढ्य बन सके। फिर सहृदयता का तकाजा भी साथ-साथ चलता है, जो कहता है कि इर्द-गिर्द के पिछड़ेपन को घटाने के लिए हर समर्थ को उदारता बरतनी चाहिए। यह उदार सहृदयता जहाँ भी जीवित होगी वहाँ निर्वाह से अधिक की सम्पदा को हाथोंहाथ पीड़ा और पतन के निवारण में लगाना पड़ेगा। अन्तरात्मा की इस पुकार को अनसुनी करने वाले ही जमा करने, ठाट-बाट बनाने, फिजूलखर्ची अपनाने दुर्व्यसनों में लुटाने की बात सोच सकते हैं। कृपणता ही जो बने, उसे सन्तान के निमित्त छोड़ने का निर्णय करती है।
उदारमना सभी को अपना समझते हैं, और परिवार को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाने भर की बात सोचते हैं। उन पर संग्रह को उड़ेल देने का अनर्थ नहीं करते। जो हाथ-पैर से कमा सकता है उसके लिए बाप दादों की दौलत भी हराम की कमाई मानी जायगी और यह सुनिश्चित तथ्य है कि जो भी हराम की कमाई खायेगा। बेमौत मरेगा। जिस प्रकार रोटी कमाने और हजम करने के लिए श्रम की आवश्यकता है उसी प्रकार जीवनचर्या में नैतिकता बनाये रहने के लिए भी यह आवश्यक है कि अपने निजी परिश्रम की कमाई पर गुजारा किया जाये। हराम की कमाई अपनाना और दूसरों के लिए छोड़ना दोनों ही रिश्वत देने और लेने की तरह अपराध है। जो स्वावलम्बी नहीं बन सके, उन आश्रितों को निर्वाह व्यवस्था जुटाने का औचित्य तो है पर जो मजे से कमाते हैं उनके सिर पर भी यदि अभिभावक सन्तान मोह में उत्तराधिकार को दौलत से लादते हैं तो इसमें तीन हानियाँ हैं। एक यह कि हराम की कमाई जब किसी को भी नहीं पचती और दुर्व्यसनों की विपत्ति लदती हो अपनी सन्तान ही उस संकट से कैसे बचेगी ? दूसरी बात यह कि जो धन जरूरत मन्दों के काम आ सकता था, वह उन्हें नहीं मिला। हक छिना। तीसरा यह कि उस कूड़े करकट को कमाने में बहुमूल्य जीवन निरर्थक चला गया। इन तीनों हानियों को देखते हुए बुद्धिमत्ता का तकाजा है कि अमीरी का सपना न देखा जाये। औसत देशवासियों के स्तर का निर्वाह क्रम अपनाया जाय और सादा जीवन उच्च विचार के मार्ग पर चलते हुए हर दृष्टि से कृतकृत्य बना जाये।
अमीरी की एक और सहेली है बड़ा कहलाने की अहंकारिता। इसकी पूर्ति के लिए ठाठ-बाट बनाना पड़ता है। दर्प या आतंक दिखाना पड़ता है। इसकी पूर्ति के लिए अपव्यय करना एक प्रकार से अनिवार्य हो जाता है फिजूलखर्ची ही बड़े आदमी होने की निशानी है। श्रृंगार, फैशन, जेवर से लेकर अनेकानेक ऐसे उपकरण जमा करने पड़ते हैं जो दूसरों के पास नहीं हैं। इसकी तुलना करते हुए पड़ौसी अपने को हीन अनुभव करेंगे और हमें बड़ा समझेंगे यह कल्पना की जाती है। कल्पना कहाँ तक सही है यह तो समझदारी की एक किरण फूटते ही पता चल जाता है। पर उन्माद की स्थिति में लगता यही है कि सम्पदा की बढ़ोतरी और अहमन्यता की अकड़ में ही सार्थकता है। ऊँचे पद पाने की ललक प्रायः इसी निमित्त रहती है अन्यथा सेवा कार्य तो छोटे पदों पर रहते और भी अधिक अच्छी तरह बन पड़ता है। अहंकार की पूर्ति का सीधा तरीका व्यक्ति में पवित्रता और प्रखरता का समावेश करने और समर्थता का उपयुक्त भाव सेवा साधना में लगाते रहने से भली प्रकार बन पड़ता है। किन्तु उन्माद के रहते यह सूझ, सूझे कैसे? उसकी तृप्ति तो साथियों को अपने से हीन सिद्ध करके ही होती है। इसी निमित्त बड़े आदमी ब्याह शादियों में दौलत लुटाते हैं, ताकि अन्य लोग अपने को दीन दयनीय समझें और उन लुटाने वालों के भाग्य को सराहें। दूसरों का व्यंग्य, उपहास, तिरस्कार करके भी कई लोग अपने अहंकार की पूर्ति करते देखे गये हैं। यह समूचा अहंकारी समुदाय एक प्रकार से मनोरोग पीड़ित ही कहा जा सकता है। उनकी मान्यतायें यथार्थता की कसौटी पर कसे जाने से शत-प्रतिशत असत्य निकलती है। न अमीरी बटोरने से किसी का स्वार्थ सिद्ध हुआ है और न बड़प्पन लूटने के लिए अनर्थ पूर्वक धन कमाने और उसे पानी की तरह बहाने से किसी को प्रशंसा या प्रतिष्ठा मिली है। चाटुकारों की बात दूसरी है वे तो किसी को भी उल्लू बनाने के लिए मक्खी को भैंस से बढ़कर बखान सकते हैं।
शरीरगत विलासिता, तृष्णा और अहन्ता के निमित्त आम आदमी अपनी समूची क्षमता एवं बुद्धिमत्ता खपा देता है। बहुमूल्य जीवन इसी कुचक्र के कोल्हू में पिल जाता है। बदले में क्या मिला? यह छाये हुए उन्माद की स्थिति में तो सूझता नहीं पर जब खुमारी उतरती है तो प्रतीत होता है कि भूल ही भूल होता रही। तृष्णाओं की पूर्ति सामान्य उपायों से हो सकना शक्य नहीं। ऐसी दशा में अनीति अपनाने, कुकर्म करने अपराधी दुष्प्रवृत्तियों में निरत रहने के अतिरिक्त और कोई चारा रहता ही नहीं। क्या मनुष्य जीवन इसीलिए मिला था? क्या इन्हीं विडम्बनाओं की पूर्ति में इस सुर दुर्लभ सुयोग की सार्थकता थी? यह सोचने पर आँखों के सामने अन्धेरा छाने लगता है। लोगों से जिस प्रशंसा प्रतिष्ठा की आशा रखी गई थी, वह भी कहाँ पूरी होती है। संकीर्ण स्वार्थपरता में निरत व्यक्ति के अनैतिक और उद्दण्ड आचरण हर किसी के ऊपर बुरी छाप छोड़ते हैं। जीभ से कोई कहे न कहे, पर भीतर ही भीतर इन अहन्ता के अतिवादियों के ऊपर सर्वसाधारण की घृणा ही उफनती है। कई बार तो ईर्ष्यालु लोग उन्हें नीचा दिखाने के लिए अकारण ही आक्रमण कर बैठते हैं। शरीरगत वितृष्णा अपनाने वाले अमीरी और बड़प्पन का सपना देखने वाले, लाभ कमाने के स्थान पर इतना घाटा उठाते हैं जिनकी पूर्ति समय निकलने पर और किसी प्रकार हो ही नहीं सकती।
परिवार बढ़ाते चलना- सदस्यों को राजकुमारों जैसी सुविधाओं का आदी बनाते रहना एक ऐसा व्यामोह है जिसकी भयानक परिस्थिति का पता तब चलता है जब होश वापस लौटता है। आरम्भ में तो नित नये बच्चे उत्पन्न करने और उस कमाई पर फूलकर कुप्पा होने, ढोल बजाने, बधाई बाँटने की ही ऊत सूझती है। दिन गुजरते ही जब उनकी बढ़ती आवश्यकताओं जुटाने का प्रश्न सामने आता है तब बगलें झाँकते हैं और सोचते हैं कि प्रजनन में आँखें मूँदकर प्रवृत्त रहने में कितना बड़ा अनर्थ छिपा पड़ा था।
आत्मिक प्रगति के साथ-साथ सच्ची स्वार्थ सिद्धि की इच्छा रखने वालों को उन भूलों की आरम्भ से ही जानकारी रखनी चाहिए जो आरम्भ में तो आकर्षक लगती है पर पीछे धोबी द्वारा कपड़ा पीटने या धुनिये द्वारा रुई धुनने की तरह पछाड़ती पीटती रहती है। अच्छा हो समझदारी समय रहते उगे और बताये कि शरीर का महत्व इतना ही है कि उसे निर्वाह साधन तो दिये जायें पर वासना, तृष्णा और अहन्ता की उद्दण्डता में हित सोचने की भूल न करने दी जाये। जिनसे इतना बन पड़ेगा, वे ही यह सोच सकेंगे कि जीवन में महत्वपूर्ण भागीदारी आत्मा की भी है और उसकी भी कुछ आवश्यकताएँ हैं। इनकी ओर से सर्वथा आँख बन्द कर लेने का अर्थ है अतिवाद अपनाना जिसमें अन्तराल को आवश्यक परिपोषण न मिलने पर निरन्तर त्रास सहना और रुदन करना पड़ता है।
आत्मा का अस्तित्व भी जीवनचर्या में गुँथा हुआ समझा जा सके और उसकी भी कुछ इच्छा आवश्यकता होने पर ध्यान दिया जा सके तो फिर इसी निर्णय पर पहुँचना होगा कि शरीर पर ही घी के घड़े न लुढ़काते रहा जाय वरन् अन्तरात्मा को क्षुधा को भी समझा जाये और उसे जुटाने के लिए कुछ समय, श्रम एवं मनोयोग एवं साधना भी जुटाए जायँ। यही है सन्तुलन का वह ध्रुव केन्द्र जिस पर दूरदर्शिता नियोजित करने पर किसी उपयुक्त दिशाधारा का अवलम्बन सम्भव हो सकता है। महत्वाकाँक्षाऐं आत्मा की भी तो हैं। उन्हें भी आगे बढ़ने ऊँचे उठने की अभिलाषा आकाँक्षा है। महामानवों की श्रेणी में बैठने, ऋषि कल्प बनने तक की प्रगति करने और अपूर्णता से पूर्णता की ओर चलने के लिए उसका भी मन मचलता रहता है, पर यह कार्य माला घुमाने, धूपबत्ती जलाने भर जैसी खिलवाड़ से सम्भव नहीं हो सकता। इसके लिए उस कार्य पद्धति को अपनाना पड़ता है जिसे लोक साधना अथवा परमार्थ परायणता कहा जाता है। इसे वही कर सकेगा जो अपने समय एवं मनोयोग से शरीरगत वितृष्णाओं को रोककर इस दिशा में मोड़ने की प्राथमिक आवश्यकता समझने एवं उसे करने का साहस जुटाने में समर्थ हो सकेगा।
सच्चा स्वार्थ ही परमार्थ है। संकीर्ण स्वार्थ परायण शरीरगत वितृष्णाओं के जाल-जंजाल में फँसता और बेमौत मरता है जबकि परमार्थी आत्मा की महत्ता और आवश्यकता समझते हुए उस राजमार्ग पर चल पड़ता है जिस पर महामानव चले और कृत कृत्य हुए हैं।
एक ब्रह्मज्ञानी, समग्र सत्य और पूर्ण ब्रह्म को जानने के लिए व्याकुल रहते थे। तर्क असंख्यों उभरते पर समाधान, एक का भी न मिलता। चिन्ता छाई रहती।
एक दिन वे सागर तट पर घूम रहे थे। देखा एक बच्चा हाथ में प्याली लिये निराश बैठा है और उसे इधर-उधर उलटता-पुलटता है।
ब्रह्मज्ञानी ने बच्चे से चिन्ता और प्याली का कारण पूछा- बच्चे ने सहज भाव से कहा- “इस प्याली में समुद्र भरना चाहता हूँ पर वैसा कोई मार्ग दिखता नहीं।”
ब्रह्मज्ञानी उसके भोलेपन पर हँस दिये। बोले, बच्चे यह प्रयत्न छोड़ दो, भला इतना बड़ा समुद्र इतनी छोटी प्याली में कैसे समा पायेगा?
बालक ने हठ छोड़ दिया और घर लौट गया पर ब्रह्मज्ञानी को नया प्रकाश दे गया। भावना में बसने वाला, श्रद्धा से पलने वाला भगवान भला तर्क बुद्धि की प्याली में किस प्रकार समेटा और बिठाया जा सकेगा?
प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए अनवरत प्रयत्नशील रहना जीवधारी की एक स्वाभाविक वृत्ति है। जीवन के प्रारम्भ से अब तक की प्रगति का यदि लेखा जोखा लिया जाय तो यही तथ्य अधिकाधिक उजागर होता है। अमीबा जीवन का आदि स्वरूप माना जाता रहा है। एक कोषीय जीवधारी इस प्रकृति के घटक ने क्रमिक विकास करते-करते कई-कई इन्द्रियाँ और काया की कई-कई इकाइयाँ विकसित की हैं। यह सब अनायास ही सम्भव नहीं हो गया। इसके लिए प्राणियों की इच्छा शक्ति ने अन्तःचेतना एवं स्फुरणा ने असाधारण भूमिका निभाई है। वस्तुतः अह उनका चेतनात्मक पुरुषार्थ है। जिससे उनकी जैविक क्षमताओं का विकास हुआ है।
प्रकृति ने जीवधारियों के निर्वाह की सुविधा स्वेच्छापूर्वक प्रदान की है। ऐसा न होता तो जीवन के लिए अपना अस्तित्व बनाये रहना अपनी प्रगति के साधन सामग्री उपलब्ध कर सकना ही सम्भव न होता। तब उन्नति करने और समर्थ सुयोग्य होने की बात ही कैसे बनती? इतने पर भी यह मानकर चलना होगा कि जीवधारी का अपना निजी स्वभाव अग्रगमन के लिए- अभ्युदय के लिए अनवरत पुरुषार्थ करना है। इसी को इच्छा, आकाँक्षा अभिलाषा कहते हैं। इसे अंतःप्रेरणा भी कहा जा सकता है। यही है जीवधारी की वह मौलिक विशेषता जिससे वह प्रगति पथ पर लाखों करोड़ों वर्षों तक चलते-चलते इस स्थिति पर पहुँचा है जिसमें जीव जगत के अगणित प्राणियों को पाया जाता है। यह सृष्टि के आरम्भ काल की तुलना में असंख्य गुनी अधिक परिष्कृत है। आदिमकाल की अनगढ़ स्थिति और आज की स्थिति का कोई मुकाबला नहीं है। उस समय के और आज के जीवधारियों की चेतना, कुशलता एवं क्षमता में आश्चर्यजनक अन्तर पाया जाता है। अनगढ़ जीव सत्ता में आज की सुगढ़ स्थिति प्राप्त करने में असाधारण प्रयास पुरुषार्थ का परिचय दिया है। इस प्रगति में प्रकृति एवं परिस्थितियों का योगदान न रहा हो सो बात नहीं किन्तु जिसे भौतिक पृष्ठभूमि कह सकते हैं वह अन्तराल की वह उमंग ही है जो आगे बढ़ने की निरन्तर प्रेरणा देती और उसके लिए पुरुषार्थ करने की बेचैनी बनाये रहती है।
इस संदर्भ में दो प्रवाह सामने आते हैं। एक चेतना पक्ष का ऊँचा उठना। दूसरा काय वैभव का आगे बढ़ना। ऊँचा उठने से तात्पर्य है चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का अभिवर्धन। आगे बढ़ने का अर्थ है- समर्थता और सम्पदा का उपार्जन। उपभोग से इन दोनों के समन्वय से जीवन की दिशाधारा बनती है। मान्यता और आकाँक्षाओं का स्तर श्रेष्ठ या निकृष्ट होना व्यक्ति का अपना चुनाव है। जो जिसे वरण करेगा वह उस दिशा में अग्रसर अवश्य होगा। जिनकी गति धीमी होती है उन्हें आलसी, प्रमादी आदि नामों से भर्त्सना की जाती है। ऐसे ही लोग पिछड़े वर्ग में गिने जाते हैं और अभाव उपहास के भाजन बनते हैं। जिनकी दिशाधारा सही होती है वे वैभव सम्मान पाते और श्रेय सन्तोष के अधिकारी बनते हैं। यह समस्त उपलब्धियाँ उस आकाँक्षा तत्व की हैं जो न्यूनाधिक मात्रा में सभी में पाई जाती हैं।
प्रगति की आकाँक्षा स्वाभाविक भी है और उचित उपयोगी भी। उसमें व्यक्ति का निजी लाभ भी है और समाज का समग्र हित साधन भी। इच्छा का त्याग वाली उक्ति जिन अध्यात्म ग्रन्थों में पाई जाती है वहाँ उसका प्रयोजन प्रतिफल का आतुरता का परित्याग करने भर से है। शब्दावली में जिन शब्दों का प्रयोग हुआ है उससे किसी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। बुरे कामों के परिणाम तो तत्काल भी मिल जाते हैं पर भले कामों का उपयुक्त प्रतिफल मिलने में क्षमता एवं पुरुषार्थ की निर्धारण एवं साधन की- परिस्थितिजन्य अनुकूलता की कमी रहने पर अभीष्ट सत्परिणामों की मात्रा तथा अवधि में व्यतिरेक हो सकता है। ऐसी दशा में कर्त्ता को जो खीज़, निराशा एवं अनास्था उत्पन्न होती है उसी की रोकथाम के लिए यह सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया है कि सत्कर्म से मिलने वाले सन्तोष एवं सन्मार्ग पर चलने के गौरव को ही पर्याप्त प्रतिफल मान लिया जाय और समयानुसार जब भी सत्परिणाम उपलब्ध हो तब उसे अतिरिक्त उपहार भर माना जाय। इस मान्यता को अपनाने से सन्तुलन बना रहता है और मार्ग से विचलित होने में उद्विग्नताजन्य अवरोध बाधक नहीं बन पाता।
सृष्टि के आदि में सृष्टा ने इच्छा की कि “मैं एक से अनेक बन जाऊँ और अपने अनेक रूपों के साथ रमण की क्रीड़ा कल्लोल में निरत रहूँ” यह इच्छा ही परा और अपरा प्रकृति के रूप में प्रादुर्भूत हुई और सृष्टि क्रम चल पड़ा। प्राणियों में यह इच्छा प्रगति की अभिलाषा के रूप में पाई जाती है और पदार्थों में गतिशील रहने का पराक्रम अनुशासन बनकर रहती है। गति इसी का नाम है। यही सुनियोजित होने पर प्रगति कहलाती है। उद्भव, परिष्कार और परिवर्तन का नियति चक्र इसी धुरी पर घूमता है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र इसी गोलाकार परिभ्रमण का नाम है। ब्रह्माण्ड के छोटे-बड़े सभी क्रियाकलाप इसी दैवी निर्धारण अनुशासन के अन्तर्गत चल रहे हैं।
प्रगति के लिए प्रेरणा देने वाली आकाँक्षा जीव सत्ता के साथ अनादिकाल से जुड़ी हुई है और अनन्तकाल तक जुड़ी रहेगी। उसे उपयुक्त दिशा देना ही मानवी बुद्धिमत्ता का चरम कौशल है। इसी को परम पुरुषार्थ कहते हैं। आत्म निरीक्षण, आत्म निर्माण, आत्मसुधार, आत्म विकास के नाम से जिस आत्मोत्कर्ष एवं आत्म-कल्याण का ऊहा-पोह होता रहता है उसमें करने योग्य पराक्रम एक ही है कि आकाँक्षाओं का चेतना को सुसंस्कृत बनाने वाली उत्कृष्टता अपनाने के लिए बाधित करने वाली मान्यताओं से जकड़ दिया जाये। इन मान्यताओं को ही श्रद्धा कहते हैं। यह आप्त कथन अक्षरशः सत्य है कि जीवात्मा का स्वरूप श्रद्धामय है। जो जैसी श्रद्धा रखता है वह वैसा ही बन जाता है।
प्रकृति प्रदत्त आकाँक्षाऐं शरीर पर छाई रहती हैं और भूख, प्रजनन, अस्तित्व रक्षा के रूप में तृष्णा, वासना, अहंता के विविध रूपों में प्रकट परिलक्षित होती रहती है। यह सामान्य प्रवाह की बात हुई जिसे समस्त जीवधारी अपनाते और सृष्टि का गतिचक्र चलाते रहने के लिए विभिन्न प्रकार की चेष्टाएँ करते हुए जीवन लीला समाप्त करते हैं। इससे आगे का पक्ष वह है जिसे आत्मा या चेतना को उच्चस्तरीय प्रगति की ओर ले चलने वाला निर्धारण कह सकते हैं। इसमें देवी प्रवाह को अपनाना पड़ता है। आस्थाओं को आस्तिकता के साथ- बुद्धि को अध्यात्मिकता के साथ और पौरुष को धार्मिकता के साथ नियोजित करना पड़ता है। यही अध्यात्म दर्शन एवं साधना का सारभूत सिद्धान्त है। आत्मा की चेतना की प्रगति इसी पर निर्भर है।
उपरोक्त कथन प्रतिपादन से यह निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि जीव सत्ता की मूलभूत प्रवृत्ति आकाँक्षा वर्तमान स्वरूप का पर्यवेक्षण किया जाय और देखा जाय कि वह शरीर को आगे बढ़ने और आत्मा के ऊँचे उठने की प्रवृत्ति को साथ-साथ लेकर चल रही है या नहीं? दोनों के बीच असन्तुलन तो नहीं बन रहा है। असन्तुलन से ही प्रगति अवगति या दुर्गति बनती देखी जाती है।
मनुष्य यदि सचमुच ही बुद्धिमान हो तो उसे समग्र प्रगति का दूरदर्शी निर्धारण करना चाहिए। यदि वह इतना कर सके तो समझना चाहिए कि वास्तविक ज्ञान चेतना का वह अधिष्ठाता अधिपति हो गया। उस सम्पदा का ही उपयोग जो भी कर सकता है वह प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचा है और हर दृष्टि से कृत-कृत्य बना है। हमें प्रगति और अवगति के अन्तर को समझना चाहिए और अपनी वर्तमान परिस्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए औचित्य का अनौचित्य का विवेक सम्मत पर्यवेक्षण करना चाहिए। आत्मोत्कर्ष की परम श्रेयष्कर आकाँक्षा को सुनियोजित करने में ही व्यक्ति का अभ्युदय और समाज का कल्याण है जो इतना समझने, स्वीकारने में समर्थ हो सकेगा उसका भविष्य सुनिश्चित रूप से उज्ज्वल बनकर रहेगा।
संकल्प शक्ति का चमत्कारों में एक यह भी है कि व्यक्ति अपनी काया पर इच्छित नियन्त्रण प्राप्त करले और उनके अवयवों का इच्छित प्रयोग कर सके।
आमतौर से ऐसा होता नहीं है। सचेतन मस्तिष्क का शरीर पर सीमित आधिपत्य है। यों हाथ-पैर की हलचलें उसी के आदेश से होती हैं। कमाने खाने से लेकर दिनचर्या से सम्बन्धित कार्य उसी की योजना से चलते हैं। इतने पर भी यह कहा जा सकता है कि अवयवों की आन्तरिक गतिविधियों पर विचार मस्तिष्क का कोई नियन्त्रण नहीं है। वे अचेतन के निर्धारण का अनुगमन करती है। रक्त संचार ,श्वास-प्रश्वास, आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष पर विचार मस्तिष्क का कोई नियन्त्रण नहीं। वह उनमें से किसी को भी स्वसंचालित गतिविधियों को न तो रोक सकता है और न बढ़ा सकता है। पाचन तन्त्र, मल-विसर्जन, स्वेद जैसी गतिविधियाँ किसी की अनुमति की प्रतीक्षा नहीं करती। वरन् इनके दबावों के अनुरूप सचेतन को इनकी आवश्यकतानुसार व्यवस्था बनाने को बाधित होना पड़ता है। मल-मूत्र, छींक, हिचकी, खाँसी आदि का वेग उभरने पर उसे रोक सकना नहीं बन पड़ता वरन् तद्नुरूप आचरण करने के लिए अवयवों को बाधित होना पड़ता है।
मनुष्य शरीर का स्वामी है, यह बात जितनी सच है उतनी ही यह भी सही है कि शरीर की आवश्यकताओं और उचंगों को पूरा करने के लिए विचार तन्त्र को बल पूर्वक बाधित होना पड़ता है। पेट में भूख लगी हो, नींद की खुमारी चढ़ी हो तो मस्तिष्क को उसकी व्यवस्था जुटाने के लिए विवश होना पड़ता है। ऐसी दशा में उसे शरीर का गुलाम भी तो कहा जा सकता है।
प्रत्यक्ष कर्म ही सचेतन की इच्छानुसार हो सकते हैं। पर इस समूची मशीन की निजी व्यवस्था पर आन्तरिक हलचलों पर किसी का कोई नियन्त्रण नहीं। पाचक रस उत्पन्न न हो तो अपच का मरीज दवा-दारू खोजने के अतिरिक्त और क्या करे? रक्तचाप, मधुमेह, अनिद्रा, तनाव आदि को कोई चाहता बुलाता थोड़े ही है। वे तो अनचाहे मेहमान की तरह अनायास ही आ धमकते हैं। आश्चर्य यह कि यह कहीं बाहर से नहीं आते भीतर से ही उपजते हैं। अपने ही खेत में अनचाही फसल उगने का यह कौतुक आये दिन देखना पड़ता है। इससे विदित होता है कि खेत अपना होने पर उसमें खर-पतवार उगना या कृमि कीटकों का उपज पड़ना किसी दूसरी ऐसी व्यवस्था के अन्तर्गत चलता है जो मालिकी का दावा करने वाले की परवाह किये बिना अपनी मर्जी करता है।
आत्म नियन्त्रण को योगाभ्यास का मूलभूत उद्देश्य माना गया है। इसके तीन पथ हैं। एक वह जिसे स्वभाव, आदत, अभ्यास कहते हैं। सभ्यता, संस्कृति इसी को कहते हैं। शिष्टाचार, सज्जनता, नियमितता आदि सद्गुणों को आत्म नियन्त्रण की परिधि में ही गिना जायेगा। इस क्षेत्र का अनुशासन जिनने नहीं सीखा वे आलसी, प्रसादी, गन्दे, असभ्य स्तर के होते हैं और ऐसे आचरण करते हैं जिससे कुरुचि उत्पन्न हो और भर्त्सना प्रताड़ना सहनी पड़े। आत्म नियन्त्रित व्यक्ति इन दुर्गुणों से बचे रहते हैं और प्रतिष्ठित नागरिकों में गिने जाते हैं।
आत्म नियन्त्रण का दूसरा पथ है विचारों पर नियन्त्रण। मस्तिष्क का लिव-लिवा पदार्थ यों अपनी ही खोपड़ी की पिटारी में कसा जकड़ा होता है फिर भी उसमें उठने वाली विचार तरंगें हिरनों की तरह किसी भी दिशा में कुलाचें भरती और बन्दरों की तरह कुछ भी उचक-मचक करती रहती हैं। बेसिर पैर से विचार उमड़ते रहते हैं। उनमें कितने ही अनर्गल, असम्भव, उपहासास्पद तक होते हैं। उनके कारण मस्तिष्कीय शक्ति का अपव्यय भी बहुत होता है और कई बार तो उद्वेग, उन्माद तक उठ खड़ा होता है। ऐसे बेतुके लोग जब किसी प्रसंग में सही सोचने तक में समर्थ नहीं होते तो फिर कुछ महत्वपूर्ण काम आरम्भ या पूरा कर सकेंगे इसकी आशा ही कैसे की जाय?
विचारों पर नियन्त्रण को मनोनिग्रह कहते हैं। मन को वश में करने के लाभों का अध्यात्म शास्त्र में सुविस्तृत माहात्म्य बताया गया है। मनोविज्ञान की दृष्टि से भी इस नियमन के लिए प्रशिक्षण एवं वातावरण बनाने के लिए प्रयत्न किया जाय। ‘ब्रेन वाशिंग’ के नाम से इस क्षेत्र की धुलाई के वैज्ञानिक प्रयास भी चल रहे हैं। साहित्य और कला के प्रशिक्षण और प्रचार के अनेकानेक उपचार उसी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होते रहते हैं। सभ्यता के विकास में शिक्षा का कितना बड़ा योगदान है इसे सभी जानते हैं। शिक्षा और कुछ नहीं विचार क्षेत्र को विस्तृत करने की विधि व्यवस्था मात्र है।
आत्म नियन्त्रण का तीसरा क्षेत्र है अचेतन की गहराई तक सचेतन की पहुँच। स्थिति को समझने और आवश्यकतानुरूप उसमें हस्तक्षेप एवं परिवर्तन का कौशल। इसे हठयोग कहा जाता है। हठयोग अर्थात् शरीर के आन्तरिक क्रिया-कलापों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन परिवर्धन।
सामान्यतया शरीर संचालन का क्रम प्रकृति प्रेरणा के अनुसार ठीक ही चलता रहता है पर उनमें कई बार विकृतियाँ ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं जिनको सुधारना चिकित्सा या शल्य क्रिया द्वारा भी नहीं बन पड़ता। उसमें परिवर्तन करने के लिए अचेतन के साथ जुड़े हुए तारों को हिलाना-जुलाना पड़ता है। चूँकि यह क्षेत्र विचार बुद्धि की प्रभाव परिधि से बाहर है उसमें हेर-फेर करने के लिए अचेतन क्षेत्र का आश्रय लेना पड़ता है। यह हर किसी के बस की बात नहीं। इसे कर सकना उन्हीं के लिए सम्भव है जो योगाभ्यास के माध्यम से इस स्तर की क्षमता अर्जित कर लेते हैं।
दीर्घ जीवन के लिए- जीवकोषों को विश्राम देने की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य हृदय और मस्तिष्क की गतिविधियों को कुछ समय के लिए रोक देने से ही सम्पन्न हो सकता है। यह विराम सामान्यतया मनुष्य के बलबूते से बाहर है फिर भी समाधि के अभ्यास से उस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है जिसे अर्धमृत्यु के समतुल्य ठहराया जा सके। समाधि साधना से योगीजन पुराने शरीर में रहते हुए भी उसे समय-समय पर बार-बार नवीन कर लेते हैं। एक ही जन्म में कई जन्मों की जीवन यात्रा का लाभ लेते हैं।
समाधि स्थित में बाह्य मस्तिष्क का दबाव अचेतन पर से हठ जाता है। ऐसी दशा में उन्हें महा चेतन के साथ सम्बन्ध जोड़ने से सरलता मिल जाती है। इस स्थिति में उसे वह जानने, देखने, सुनने, समझने का अवसर मिलता है, जो इन्द्रिय शक्ति के सहारे सम्भव नहीं। इस स्थिति को दिव्य दर्शन या अवरोधानुभूति कहते हैं।
अतीन्द्रिय क्षमताओं का क्षेत्र अचेतन है। उसे यदि अवसर मिले तो इन्हें जगाने, उभारने में अपनी सामर्थ्य को केन्द्रित करे पर कठिनाई यह है कि अवयवों की आन्तरिक व्यवस्था सम्भालने में निरन्तर व्यस्त रहते उसकी अधिक शक्ति चुक जाती है। इस व्यस्तता से समय-समय पर छुटकारा दिलाना और निर्वाह शकट खींचने से आगे बढ़कर कुछ ऊँचा पराक्रम करना जिस स्थिति में होता है उस विश्रान्ति को समाधि कहते हैं। आत्म नियन्त्रण की यह सर्वोच्च स्थिति है।
अचेतन पर प्रभुत्व जमा सकने के लिए जैसी प्रचण्ड संकल्प शक्ति की आवश्यकता है उसे अर्जित करने के लिए कई प्रकार की तितिक्षाएँ करनी होती हैं। तपश्चर्या विधान में ऐसे कितने ही कृत्यों का समावेश है जिनमें दैनिक अभ्यासों में गतिरोध उत्पन्न करने जैसी लड़ाइयाँ अपने आप से लड़नी पड़ती हैं। हठयोगी तपस्वी यही करते रहते हैं और अन्ततः समाधि स्थित तक पहुँचते हैं।
समाधि की चरम स्थिति वह है जिसमें हृदय और मस्तिष्क अपना शरीरगत क्रिया-कलाप घटाकर न्यूनतम कर लेते हैं। पर यह आवश्यक नहीं है कि हर किसी को इसी स्थिति तक पहुँचना पड़े। भाव परक ध्यान जैसे उपायों से सामान्य जन भी अन्तः क्षेत्र को एक सीमा तक शिथिल कर सकते हैं और उतने से भी समाधि का आँशिक लाभ ले सकते हैं।
योगाभ्यासों को दो भागों में विभाजित किया गया है- एक ध्यानयोग। दूसरा क्रिया योग। ध्यानयोग वर्ग में अभ्यास आते हैं जिनमें अन्तर्मुखी होकर अन्तःक्षेत्र में गुहा प्रवेश किया किया जाता है और गहराई में उतरकर समुद्र तली में छिपे मणि मुक्तक ढूँढ़ने जैसा प्रयत्न किया जाता है। इस प्रक्रिया को खदान खोदने और बहुमूल्य खनिज निकालने की भी उपमा दी जा सकती है। चिन्तन का बिखराव होते रहने पर उसकी सामर्थ्य का पता नहीं चल पता, पर जब उसे एकाग्र कर लिया जाता है तो बन्दूक की नली से बारूद दागने और गोली के निशाना बेधने जैसी परिणति हाथ लगती है केन्द्रीभूत चिन्तन कितना सशक्त होता है इसे मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म आदि प्रयोगों के रूप में प्रत्यक्ष भी देखा जा सकता है। उसके परोक्ष परिणाम तो और भी अधिक आश्चर्यजनक पाये गये हैं।
क्रियायोग वह है जिसमें शरीरगत चेष्टाओं की सहायता से मन के निरोध का अभ्यास किया जाता है। काम करते समय उसमें लगे श्रम मनोयोग के सहारे उद्देश्य पर भी ध्यान जमता है और उस जमाव की छाप से मनःक्षेत्र प्रभावित होता है। विचार और कर्म के समन्वय से संस्कार बनने के तथ्य को मनःशास्त्र के विद्यार्थी भी जानते हैं। मात्र चिन्तन से भी स्वसम्मोहन और स्वसंवेदन, अनुशासन, स्व निर्देशन सम्भव तो है पर इसके लिए मनःशक्ति की प्रखरता अर्जित करनी होती है, अन्यथा कल्पना की उड़ाने उड़ने भर से बात बनती नहीं। अपने आपको दबोचने-घसीटने के लिए संकल्प शक्ति चाहिए। इसके अर्जित करने पर भी ध्यान द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली सफलताओं का द्वार खुलता है। इसलिए ध्यानयोग को उच्चस्तरीय साधना माना गया है। इससे पहले की बाल कक्षा, क्रियायोग के रूप में ही सम्पन्न करनी पड़ती है।
क्रिया योग के सरल साधनों में तीर्थयात्रा, परिक्रमा आसन, प्राणायाम, जप, हवन, पूजा, अर्चा, दान-पुण्य, व्रत, उपवास आदि की गणना होती है। उच्च उद्देश्यों के निमित्त अपनाई गई शारीरिक हलचलों को क्रियायोग कहा गया है। श्रम नियोजन के पीछे उच्च उद्देश्यों का समावेश रहे तो फिर उस मानसिक एकीकरण का प्रतिफल संकल्प शक्ति विकसित होने के रूप में हस्तगत होता है। इस बढ़े हुए मनोबल का उपयोग ध्यानयोग की परिधि में आने वाली साधनाओं के निमित्त किया जा सकता है।
कुछ साधनाएँ ऐसी हैं जिनमें क्रिया परक साधनाओं के साथ अपेक्षाकृत अधिक मनोयोग लगाना होता है। तीर्थयात्रा, व्रत, उपवास में शरीर को अधिक और मन को कम काम करना होता है। किन्तु कुछ योगाभ्यासों में झूलने भर से काम नहीं चलता उनमें मात्रकृत्यों की ही प्रधानता नहीं है साथ में अधिक मनोयोग लगाने की भी आवश्यकता पड़ती है। बँध और मुद्राओं का स्वरूप ऐसा ही है। खेचरी मुद्रा में यदि तालु से जीभ भर सटा ली जाय तो ब्रह्मरन्ध्र से अमृत टपकने के रसास्वादन पर मनोयोग केन्द्रित न हो सके तो समझना चाहिए कि प्रयास अधूरा रहा और श्रम निरर्थक चला गया। सोहम् साधना के सम्बन्ध में भी यही बात है उसमें श्वासोच्छास के सन्तुलित रखने के साथ-साथ महाप्राण के परब्रह्म स्वरूप प्रवेश की भावभरी अनुभूति भी होनी चाहिए, साथ ही अहंता के निष्कासन का भी श्वास के बहिर्गमन के साथ-साथ सघन विश्वास जुड़ना चाहिए। क्रिया की सार्थकता इससे कम में बनती नहीं।
विशुद्ध ध्यान योग में शारीरिक हलचलों का उपयोग नहीं के बराबर ही करना पड़ता है। इसमें अधिकाँश प्रयास भावना स्तर का ही होता है। एकाग्रता और संकल्प के समन्वय से प्रचण्ड आत्मशक्ति का प्रादुर्भाव होता है और उसका प्रहार अन्तराल के प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों पर करते हुए उन्हें जागृत करने का प्रयत्न किया जाता है। षट्चक्र वेधन और कुण्डलिनी जागरण की साधना इसी आधार पर सम्पन्न होती है।
मन्त्र जप के साथ इष्ट का ध्यान आवश्यक है। मात्र शब्दों को रटने दुहराने भर से काम नहीं चलता। यह कार्य तो तोता भी कर सकता है और टेप रिकार्डर द्वारा भी किन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति कराई जा सकती है। इतने भर में मंत्र फल उत्पन्न हो सकना सम्भव नहीं। जप के समय मन जहाँ-तहाँ भागता रहे तो एकाग्रता नहीं सधेगी। भावना का समन्वय न हो तो श्रद्धा कैसे जागेगी। ज्वाला जलने, लपटें उठने के लिए आग-ईंधन और हवा तीनों ही चाहिए। इनमें से एक तो हो पर दूसरे दो न हों तो उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। इसी प्रकार मन्त्रोच्चार में इष्ट की छवि पर कल्पना जुड़नी चाहिए और साथ ही उसके साथ स्नेह समर्पण का श्रद्धा का भी गहरा पुट रहना चाहिए। भावना, विचारणा के साथ-साथ जप प्रक्रिया का समन्वय सधे तो समझना चाहिए कि कृत्य समग्र हुआ और उसके उपयुक्त प्रतिफल की सम्भावना बनी। मन्त्र की शब्द रचना और उच्चारण प्रक्रिया का अपना महत्व है तो भी उसके साथ ध्यान और श्रद्धा का समन्वय आवश्यक है। अधूरी चिन्ह पूजा करने वाले प्रायः असफलता की शिकायत करते पाये जाते हैं।
इसके विपरीत हानि में आवश्यक पवित्रता एवं सतर्कता बरतने भर से काम चल जाता है। प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं के सही होने- विधि विधान की सतर्कता एवं समग्रता रहने से वैसा वातावरण बनने लगता है जिसके सहारे अग्निहोत्र के सम्बन्ध में वर्णित माहात्म्य को प्रत्यक्ष किया जा सके। यों प्रसंग के अनुरूप भावना का होना तो प्रत्येक धर्म कृत्य एवं साधना विधान में आवश्यक है पर, क्रियायोग प्रधान प्रसंगों में उनकी मात्रा कम होने पर भी काम चल जाता है।
भावना प्रधान लोगों के लिए भक्तियोग, बुद्धिवादियों के लिए ज्ञानयोग और पुरुषार्थ परायणों के लिए कर्मयोग रुचिकर भी होता है और सरल भी पड़ता है। आत्मीयता, घनिष्ठता, एकात्मता को रस कहा गया है दाम्पत्य-जीवन में इसी आधार पर दो शरीर एक आत्मा की उक्ति चरितार्थ होती है। मित्र मित्रों पर जान निछावर करते हैं। माता और बच्चे के बीच कुलकन इसी कारण छाई रहती है। परमात्मा सत्ता के साथ दीप-पतंग जैसा, नदी-नाले जैसी सिन्दु-बिन्दु जैसी, दूध चीनी जैसी एकात्मता स्थापित करने की भाव सम्वेदना में भक्त जा खोता है उससे अधिक पाता है। ईंधन का समर्पण उसे अग्निवत् बना देता है। भक्त भी अपनी अहंता को विराट् की महानता में घुलाकर अपने को तत्सम अनुभव करता है।
ज्ञानी को दूरदृष्टि और दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है। दूरदर्शिता के आधार पर वह इस जीवन से पूर्व वाले भूत और पश्चात् वाले भविष्य को देखता है। दोनों के मध्य सुखद संगीत बिठाने वाले वर्तमान का निर्धारण करता है। दिव्य दृष्टि मिलने पर ज्ञानी को कलेवर की कठपुतली को नचाने वाली आत्मा दिखती है जबकि सामान्यजनों को मात्र काया की ही प्रतीति और प्रीति रहती है। ज्ञानी दृष्टा होता है उसे भव-बंधनों से मुक्ति मिलती है और इसी विश्व उद्यान में परिभ्रमण करते हुए, तृप्ति तुष्टि और शान्ति का रसास्वादन करने की स्वर्ग सम्पदा हस्तगत होती है।
कर्मयोगी का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार कर्त्तव्य पालन के आधार पर विनिर्मित होता है। वह सामाजिक उत्तरदायित्व को पहचानता और मर्यादा का अनुशासन पालते हुए उदारता की रीति-नीति अपनाता है। गरिमा का बोझ रहने से वह भटकता नहीं। शालीनता के राजमार्ग पर बिना भटके ठहरे अनवरत गति से चलता रहता है। ये सभी साधनापरक योगाभ्यास हैं। इन योगों को ज्ञान और कर्म दो में भी बाँटा जा सकता है। ध्यानयोग से व्यक्तित्व का परिष्कार बन पड़ता है। क्रियायोग से जीवन प्रवाह ऐसे प्रयासों के साथ जुड़ता है जिनमें आत्मकल्याण और लोकमंगल के दोनों ही लक्ष्य समान रूप से सध सकें। ध्यानपूर्वक सतर्कता के साथ जीवनचर्या की क्रिया-प्रक्रिया अपनाने पर कोई भी व्यक्ति योगी बन सकता है।
बौद्धिक दृष्टि से आज का मानव प्राचीन काल की तुलना में कई गुना आगे है। प्रतिभा के चमत्कार सर्वत्र दिखायी पड़ रहे हैं। एक सदी की वैज्ञानिक उपलब्धियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानवी प्रगति ने सदियों आगे की बड़ी छलाँग लगा ली हो। एक सदी पूर्व के मनुष्य जब बीते जमाने की तुलना आज के अन्तरिक्षीय युग से करते हैं तो उन्हें सब कुछ चमत्कारी प्रतीत होता है और सहज ही यह विश्वास नहीं होता कि बदले रूप में यह पुरानी ही दुनिया है। एक ओर बौद्धिक विकास और उसकी असाधारण उपलब्धियों को देखकर पुलकन होती है तथा मानवी पुरुषार्थ की अनायास ही प्रशंसा करनी पड़ती है। पर दूसरे ही क्षण मानव की वर्तमान स्थिति पर नजर जाती है तो उस प्रसन्नता के निराशा में बदलते देरी नहीं लगती।
बाह्य परिस्थितियों की दृष्टि से संसार में बहुत कुछ परिवर्तन-प्रतिकूलताओं का अनुकूल हुआ है। पर मनुष्य के साथ उल्टा ही हुआ है। मानसिक सन्तुलन की दृष्टि से बीसवीं सदी का आदमी एक सदी पूर्व के मानव की तुलना में अधिक असन्तुलित है। उसकी प्रसन्नता सरसता, प्रफुल्लता, सुख और चैन जाने कौन ले गया? उत्तेजित उद्विग्न, चिन्तित, विक्षिप्तों-अर्धपागलों की ही पीढ़ी बढ़ती और चहुँ ओर डोलती दिखायी पड़ रही है। श्मशान में जलते रहने वाले उद्विग्न भूतों की तरह बहुसंख्यक आबादी की मानसिक चिन्ता एवं असन्तोष की अग्नि में जलते सहज ही सर्वत्र देखा जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे-जैसे साधन सुविधाएँ बढ़ रही हैं, उसी अनुपात में मनुष्य की सुख-शान्ति भी छिनती जा रही है। यह इस बात का परिचायक है कि प्रगति रूप में कहीं कोई भारी भूल हो रही है।
विगत कुछ दशकों में चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। निदान एवं उपचार की नयी तकनीकें विकसित हुई हैं। अधिकतम वैज्ञानिक यन्त्रों ने वे कार्य सम्भव कर दिखाये हैं जो पहले असम्भव समझे जाते थे। एक्सरे द्वारा भीतरी अंगों की टूट-फूट तथा आन्तरिक अवयवों में आये व्यतिरेकों की जानकारी प्राप्त कर लेना अब बीते युग की बात हो गयी। उस प्रणाली में कितनी ही नयी तकनीकें जुड़ चुकी हैं। कम्प्यूटर युक्त एक्सियल टोमोग्राफी द्वारा उससे भी सूक्ष्म जानकारियाँ प्राप्त करना सम्भव हो गया है। एक्सरे को टी.वी. कैथोड के ट्यूब तथा कम्प्यूटर से संलग्न कर देने पर शरीर के भीतरी अंगों तथा प्रणालियों में आयी गड़बड़ियों, ब्रेन ट्यूमर, रक्त क्षति, पित्त वाहिनी की बाधाओं आदि का पता लगाया जा सकता है। चिकित्सक एलेक्ट्रानिक मानीटरिंग द्वारा तीन माह तक के गर्भस्थ भ्रूण को भी अब देख सकता है। अल्ट्रा साउण्ड सिस्टम पर आधारित प्रणाली द्वारा गर्भ में पल रहे भ्रूण का प्रगति क्रम मालूम किया जा सकता है।
‘कोरोनरी बाई-पास सर्जरी’ के विकास के रुग्ण हृदय धमनी वालों को नवजीवन मिला है। कृत्रिम हृदय आरोपण में आशातीत सफलता मिली है। आँखों के सफल प्रत्यारोपण के अन्धों को भी नेत्र ज्योति मिलने लगी है। अल्ट्रासोनिक तरंगों से सही निदान एवं समर्थ उपचार की विधियाँ खोज निकाली गयी हैं। अब अल्ट्रा साउण्ड स्कैन में हाइ फ्रीक्वेन्सी पर ध्वनि तरंगों द्वारा चिकित्सकों को सूक्ष्मतम जानकारियाँ प्राप्त करना सुलभ हो गया है।
क्रायो एवं माइक्रो सर्जरी के क्षेत्र में आशातीत सफलताएँ मिली हैं। तीन आयामीय दृश्य दर्शाने वाले माइक्रोस्कोपों के सहयोग से सर्जरी की पहुँच शरीर के उन मर्मस्थलों तक हो चुकी है जिसे पहले असम्भव समझा जा रहा था। पहले प्रायः मस्तिष्क के ट्यूमर, पिट्यूटरी ग्लैण्ड तथा रीढ़ के आपरेशन इस भय से नहीं किये जाते ये कि अधिक उग्र समस्याएँ न पैदा हो जायें। पर ऐसे नाजुक आपरेशन भी अब होने लगे हैं। उनमें सफलताएँ भी मिलने लगी है।
बायोमेडिकल क्षेत्र में हुई इन शोधों से नयी सफलताएँ वैज्ञानिकों को हस्तगत हुई हैं। कोलम्बिया प्रेस विटेरियन मेडिकल सेन्टर न्यूयार्क सिटी के प्रो. सी. एण्ड्रिव तथा एल. वैसेट ने टूटी हड्डियों को जोड़ने में इलेक्ट्रिक हिलिंग की नयी तकनीक विकसित की है। यह विलक्षण प्रयोग हजारों व्यक्तियों पर किया जा चुका है। इन वैज्ञानिकों का मत है कि खतरनाक सर्जिकल आपरेशनों की तुलना में यह प्रविधि कहीं अधिक सुरक्षात्मक तथा सफल है। क्लीण्टन कैम्पेयर नामक चिकित्सा शास्त्री का कहना है कि आर्थोरीडिक सर्जरी के क्षेत्र में यह नई खोज वरदान सिद्ध हुई है।
कम्प्यूटरों का प्रयोग विगत दिनों तक गणनाओं के लिए होता रहा है पर अब वे चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सक जैसी भूमिका निभाने जा रहे हैं। इलेक्ट्रानिक डाक्टर्स के रूप में कम्प्यूटरों का विकास विशेषज्ञों द्वारा कर लिया गया है। पिट्स वर्ग विश्व विद्यालय के विशेषज्ञों ने ‘सेड्रेसियस’ नामक ऐसे इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर का निर्माण किया है जो अधिक तीव्रता तथा कुशलता से चार हजार रोगों का निदान, लक्षण, शारीरिक पहचान आदि कर सकता है। इस प्रकार के आविष्कारक डॉ. जैकमैयर का कहना है कि इसे पूर्णतया विकसित होने तथा प्रभावशाली बनने में कुछ वर्ष और भी लग सकते हैं। पर इस खोज से चिकित्सा जगत में एक क्रान्तिकारी शुरुआत होने जा रही है।
कुछ इलेक्ट्रानिक चिकित्साविदों ने सांख्यिकी विश्लेषण पद्धति के नये प्रयोगों द्वारा पेट के तीव्र दर्द के कारणों का पता लगाने में सफलता पायी है। जन्मजात हृदयरोग तथा आत्महत्या के इच्छुक रोगी की पहचान भी इस प्रणाली से हो सकती है। समय रहते आने वाले संकटों से सुरक्षा भी हो सकती है। प्रायः बड़े, सुविधा सम्पन्न चिकित्सालयों में अब तक कम्प्यूटर्स का अधिकतम उपयोग रोगी को प्रवेश दिलाने तथा खर्चे का बिल बनाने तक सीमित रहा था पर उनका कार्यक्षेत्र अब निदान एवं औषधि निर्धारण में भी होने की सम्भावनाऐं बन गयी हैं।
कम्प्यूटर अब मनोवैज्ञानिक परीक्षण का कार्य भी सम्भालेंगे। पिट्सवर्ग के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक खोज निकाली है जिससे मिनेसोटा मल्टीफेजिक पर्सनालिटी इन्वेन्टरी (एम.एम.पी.आई.) जैसे समय साध्य मनोवैज्ञानिक परीक्षण भी अत्यन्त कम समय तथा खर्च में सम्पन्न हो सकेंगे। इस परीक्षण के लिए एक चिकित्सक को हजारों मनोवैज्ञानिक साहित्यों के सन्दर्भ ढूँढ़ने तथा याद रखने होते हैं जो उसके लिए कठिन है। पर कम्प्यूटर्स के लिए यह सब कठिन नहीं रहा।
सारा विवेचन यही तथ्य दर्शाता है कि आज के युग के मानव की शारीरिक देख-भाल एवं सुविधा विकास के लिए अगणित प्रकार के प्रयास चल रहे हैं। विज्ञान क्षेत्र की मूर्धन्य प्रतिभाएँ इस प्रयोजन में लगी हुई हैं। पर एक भयंकर भूल यह होती चली आ रही है कि मानवी व्यक्तित्व के सूक्ष्म घटकों- मन और अन्तःकरण की भारी उपेक्षा होती रही है। मनुष्य को विभिन्न इन्द्रियों से युक्त शरीर मात्र मान लेने की गलती ही है जिसने जीवन से जुड़ी अगणित समस्याओं को जन्म दिया है। मानसिक समस्वरता एवं गुणों के विकास पर ध्यान न देने- अन्तःकरण की भाव-सम्वेदनाओं को पोषण न मिलने से वे स्त्रोत खते चले जा रहे हैं जिसके कारण मनुष्य सही अर्थों में देव पुत्र माना जाता रहा है। अच्छा तो यह हो कि विज्ञान के प्रयास अध्यात्म विवेचनों से संगति बिठाते हुए भाव क्षेत्र में भी चल पड़ें। उसे मात्र मशीनी मानव नहीं सत्प्रवृत्तियों की पक्षधर सद्गुणों की समुच्चय इकाई बनाने हेतु अग्रसर हो।
ज्ञानियों का अधिकार भी है और उत्तरदायित्व भी कि वे अज्ञानियों को समझायें और घसीटकर सही रास्ते पर लायें।
अन्तरात्मा वह न्यायाधीश है जो दुष्कर्मों का दण्ड दिये बिना तो नहीं रहता। पर न करने की चेतावनी इससे पूर्व अनेक बार दे चुका होता है।
उद्योग व्यवसाय से धन कमाया जाता है। अध्ययन अभ्यास से बुद्धि बढ़ती है। व्यायाम से पहलवान बना जाता है। साहस और पराक्रम से प्रगति का द्वार खुलता है। इन तथ्यों के प्रति जिस प्रकार हम सब आश्वस्त हैं उसी प्रकार यह भी जाना और माना जाना चाहिए कि मस्तिष्क के अन्तराल में भरे हुए विभूति भण्डार में कुरेदने और बटोरने के प्रयत्न में भी परिपूर्ण सफलता की गुँजाइश है।
आमतौर से मस्तिष्कीय क्षमताओं के सम्बन्ध में लोग भाग्यवादियों जैसी उदासीनता अपनाये रहते हैं और सोचते हैं भगवान ने जिसे जैसी प्रतिभा बुद्धिमत्ता दी है उसी से काम चलाना पड़ेगा। उस क्षेत्र की खामियों को सुधारने और विशिष्टताओं को उभारने में लोग अपने को असहाय असमर्थ मानते हैं पर वस्तुतः वैसी बात है नहीं। जिस प्रकार व्यायाम से बलिष्ठता, शिक्षा से बुद्धिमत्ता, व्यवसाय से सम्पन्नता अर्जित की जा सकती है ठीक उसी प्रकार मनः संस्थान का जादुई-भानुमती का पिटारा भी समुन्नत बनाया जा सकता है। कहना न होगा कि मानसिक क्षमता की अभिवृद्धि ऐसी सफलता है जिसे संसार की हर सम्पदा की तुलना में अधिक वरिष्ठ विशिष्ट मानना पड़ेगा।
मनोविज्ञान-रसायन विशेषज्ञ डॉ. स्किनर के अनुसार 20 करोड़ तन्त्रिका कोशिकाओं वाले तीन पौण्ड वजन के विलक्षण मानवीय मस्तिष्क में रसायनों एवं विद्युत धाराओं के प्रयोग से इसके रहस्यों को अब जल्दी ही समझा जाने लगा है, जिससे मानवीय सत्ता को देवता अथवा असुर बनाना सम्भव है। क्या सुविकसित मस्तिष्क की प्रतिभा का स्वल्प विकसित अथवा इसके ठीक विपरीत परिवर्तन सम्भव है? जर्मनी के मस्तिष्क विद्या विज्ञानी डॉ. ऐलन जैक तथा मार्क रोजन बर्ग कुछ ऐसा ही प्रयोग कर रहे हैं।
एलेक्ट्रियल स्टीमुलेशन ऑफ ब्रेन पद्धति के अनुसार कई प्रयोगशालाओं में आँशिक रूप से मस्तिष्क की धुलाई (ब्रेन वाशिंग) में सफलता प्राप्त कर ली है। अभी तक तो बन्दर, कुत्ते , बिल्ली, खरगोश, चूहे जैसे छोटे स्तर के जीवों पर ही प्रयोग किये गये हैं। आहार की रुचि, शत्रुता, मित्रता, भय, आक्रमण आदि के सामान्य स्वभाव को जिन परिस्थितियों में जिस प्रकार चरितार्थ किया जाना चाहिए उसे वे बिल्कुल भूल जाते हैं और चित्र−विचित्र प्रकार का आचरण करते हैं। बिल्ली के सामने जब एक चूहा छोड़ा गया तो वह आक्रमण करना तो दूर उससे डरकर एक कोने में जा छिपी। क्षण भर में एक दूसरे पर खूनी आक्रमण करना, एक आधे मिनट बाद परस्पर लिपटकर प्यार करना- यह परिवर्तन उस विद्युत क्रिया से होता है जो उनके मस्तिष्कीय कोशों के साथ सम्बद्ध रखती है। वैज्ञानिकों का कथन है कि कुछ ऐसा ही परिवर्तन बाह्य इलेक्ट्रोडों के माध्यम से मनुष्य में भी सम्भव है।
मिशीगन विश्वविद्यालय के डॉ. बर्नार्ड एग्रानोफ ने सुनहरी मछलियों पर यह प्रयोग किया कि उन्हें यदि भोजन के बाद प्यूरोमाइसिन नामक औषधि खिला दी जाय तो वे यह भूल जाती हैं कि वे भोजन कर चुकी हैं। कुछ कुत्तों का स्मृति नाशक दवा खिलाई गयी तो वे अपने और उस मालिक को भी भूल गये जिसे वे बहुत प्यार करते थे।
राकलैण्ड स्टेट हास्पिटल न्यूयार्क के डॉ. नाचान क्लाइन ने सर्पगन्धा बूटी से ‘एजिमेलीन’ नामक रसायन निकाला था। इससे उद्दीप्त मस्तिष्क को शान्त करने में बहुत सफलता मिली। पीछे इस रसायन को और भी परिष्कृत करके पिप्राडोल, क्लोरप्रोमेजीन मेप्रोबमेट जैसी दवाओं का ताँता बंध गया। अब इन शामक रसायनों के सहारे मस्तिष्क पर छाई चिन्ता, भय, उद्वेग, आवेश जैसी परेशानियों को एक गोली के साथ गले से नीचे उतारा जा सकता है और आराम के साथ चैन की नींद सोया जा सकता है। यह तो पाश्चात्य शोध की बात हुई, आयुर्वेद में अनेकों ऐसी जड़ी-बूटियाँ हैं, जिन्हें शामक, निद्राजनक, आक्षेपहर के रूप में बड़ी सफलता के साथ प्रयोग किया जाता रहा है। रसायनों से उद्भूत प्रतिक्रिया से परिचित वैज्ञानिक समुदाय अब धीरे-धीरे मानस पर हितकर प्रभाव डालने वाली इन वनौषधियों की ओर लौट रहा है। चरक एवं सुश्रूत ऋषियों के आविष्कारों के पुनर्जीवन का ही क्रम अब फिर चल पड़ा है।
प्रयोग निरापद चूँकि जानवरों पर ही हो सकते हैं, मस्तिष्कीय शोध के क्षेत्र में सीधे मनुष्यों पर हाथ नहीं डाला जाता। मानव-रसायनों के प्रत्यारोपण के प्रयोगों से अब मान्यता बनने लगी है कि यह प्रयोग अगले दिनों मनुष्यों पर भी सम्भव हो सकेंगे।
कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के डॉ. एलन जेकवसन ने प्रशिक्षित चूहों के मस्तिष्क से आर.एन.ए. रसायन निकालकर अनाड़ी चूहों के मस्तिष्क में पहुँचाया तो अनाड़ी भी प्रशिक्षितों की तरह व्यवहार करने लगे। इस सन्दर्भ में मिशीगन विश्व विद्यालय के डॉ. ओटो शिमल ने घोषणा की है कि अब हमारे हाथ में मानव-मस्तिष्क को नियन्त्रित करने की शक्ति आ गई है, पर आशा की जानी चाहिए कि उसका प्रयोग केवल अच्छाई के लिए ही होगा, किन्तु साथ ही इस खतरे को भी ध्यान में रखना होगा कि इस नव-उपार्जित शक्ति का प्रयोग महत्वाकाँक्षी राष्ट्र अपनी चिन्तनधारा के जबरन विस्तार के लिए भी कर सकते हैं।
चिकित्सा शास्त्र का नोबुल पुरस्कार तीन प्रमुख वैज्ञानिकों को न्यूरॉलाजी में शोध हेतु मिला था। ये थे प्रोफेसर हाजकिन, हक्सले एवं एक्लिस। इस त्रिगुट ने ज्ञान तन्तुओं में एक विद्युत आवेश की खोज की और बताया कि यह बिजली किस तरह तन्तुओं और मस्तिष्कीय कोशों के बीच दौड़ती है और टेलीफोन की तरह स्थिति का संवाद-संकेत पहुँचाती लाती है। ज्ञान तन्तु एक प्रकार के बिजली के तार हैं जिन पर विद्युत आवेगों के साथ सन्देश दौड़ते रहते हैं। एक-एक तन्तु की लम्बाई एक लाख मील से भी अधिक होती है। इनकी मोटाई एक इंच के सौवें भाग से भी कम होती है। इन तथ्यों से मस्तिष्क की विराटता एवं शोध की असीम सम्भावनाओं का एक अनुमान होता है।
अठारहवीं सदी के अन्त में सर विलियम पैनफील्ड ने ब्रेन सेण्टर्स को जानने के लिए जो प्रयोग आरम्भ किए, उनकी श्रृंखला अभी चल ही रही है।
मस्तिष्क विज्ञानी कहते हैं कि स्थूल मस्तिष्क के दो भाग होते हैं- एक पुराना एनीमल ब्रेन (पूर्व संचित पाशविक कुसंस्कारों एवं अंतःप्रवृत्तियों से युक्त) तथा दूसरा ऊँचे स्तर का नया मस्तिष्क जो मात्र मनुष्य को ही मिला है। पहले में दर्द, भय, भूख, यौन, इच्छा, थकान, आक्रमण आदि के केन्द्र होते हैं जो मुख्यतः जीवन को बनाये रखने एवं नस्ल को जीवित रखने के लिए जरूरी हैं। जो दूसरा नया मस्तिष्क है उसमें और भी अधिक विकसित, प्रिफाण्टल लोब होते हैं जिनका कार्यक्षेत्र विशुद्धतः बौद्धिक है। तर्क बुद्धि, सिविकसेन्स, आपसी व्यवहार, योजनाबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण, आदि यहीं निश्चित किए जाते हैं। भावनात्मक आवेगों पर नियन्त्रण यहीं से होता है।
उदाहरणार्थ प्रयोगशाला में विद्युतीय इलेक्ट्रोडों के माध्यम से बिल्ली की मानसिक स्थिति ऐसी बना दी गई कि वह चूहे पर आक्रमण का स्वभाव भूलकर उनसे डरने लगी। खरगोश और शेर की कुश्ती कराई गई तो शेर दुम दबाकर एक कोने में जा बैठा और खरगोश ने इस प्रकार हमला बोला मानो उसे अपनी बहादुरी जीत का पूरा पक्का विश्वास हो। आमतौर से पशु अपने सजातियों से ही यौन सम्बन्ध स्थापित करते हैं पर इलेक्ट्रोडों से प्रभावित जीवों ने अन्य जाति वालों के साथ यौन सम्बन्ध स्वीकारने में उत्साह दिखाया। इसी प्रकार वे अपने अभ्यस्त आहार को छोड़कर अन्य प्रकार का आहार अपनाने लगे। अधिक नींद लाने या बिना सोये ही बहुत समय तक स्वेच्छापूर्वक कार्यरत रहने में भी सफलता मिल गई।
विद्युतीय उपचारों के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के प्रयोग भी पिछले दिनों चलते रहे हैं। इनमें से एक है प्राण प्रहार- हिप्नोटिज्म। दूसरी है रासायनिक उपचार। मस्तिष्क को एक सीमा तक इन दोनों साधनों से प्रभावित करने में सफलता बहुत दिनों से मिलती आ रही है। अब उन साधनों को नये ढंग से नये प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने की बात सोची गई है। हिप्नोटिज्म से प्रभावित व्यक्ति अपनी स्वाभाविक मनःस्थिति को भूल जाते और प्रयोक्ता के सन्देशों को शिरोधार्य करते हुए वैसा ही सोचते वैसा ही करते हैं।
मस्तिष्कीय क्षमता को ही व्यक्तित्व का विकास समझने वाले वैज्ञानिकों ने इन दिनों इस सन्दर्भ में कई दृष्टियों से विचार किया और कई उपाय सोचे हैं। वे यह भी मानते हैं कि परिवार एवं समाज के वातावरण का मनुष्य के चिन्तन एवं स्वभाव पर असर पड़ता है इसलिए शिक्षा तथा परम्परा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य कल की अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान, साहसी और सद्गुणी हो सके।
इसके अतिरिक्त उनका विशेष ध्यान इस बात पर है कि ‘ब्रेन वाशिंग’ के कोई कारगर उपाय ढूँढ़ निकाले जायें। इस सन्दर्भ में कम्यूनिस्ट देश सबसे आगे हैं। उन्होंने अपने विरोधियों का सफाया करके सिर दर्द से छुटकारा पाने के उपायों में अत्यधिक उत्साह दिखाया है। वहाँ हल्का-फुलका यह प्रयोग भी किया है कि प्रतिपक्षी मान्यता वालों पर ऐसे मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जायें ताकि वे अपनी पूर्व मान्यता को छोड़कर नये निर्देशों को हृदयंगम करने के लिए स्वेच्छापूर्वक सहमत हो जायें।
रूस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर एनोरबीन ने कई प्रयोग करके यह दिखाया कि मनुष्य को सुख या दुःख की अनुभूति कराने वाले मस्तिष्क से स्रवित होकर रक्त में मिल जाने वाले दो विभिन्न प्रकार के रस हैं। इन रसों का स्राव स्वतः नहीं होता वरन् अच्छे-बुरे विचार एवं भावनाओं के कारण होता है। उन्होंने बताया कि मस्तिष्क में ऐसे सूक्ष्म संस्थान हैं जिनका सम्बन्ध ‘रेटी-कुलर कार्मेशन’ से है। वहीं से कुछ रसों का स्राव होता रहता है। एक प्रकार के रस से प्रसन्नता, प्रफुल्लता, मुस्कान, हँसी, मृदुलता, शिष्टता, सौम्यता आदि गुण फूटते रहते हैं, दूसरे प्रकार के रस से मनुष्य चिन्तित, दुःखी निराश और उद्विग्न बना रहता है।
यह अनुसन्धान और प्रतिपादन यह सिद्ध करते हैं कि मस्तिष्क के रूप में एक अलौकिक सामर्थ्य से भरा-पूरा देवता हमारे भीतर ही सिंहासनारूढ़ है। वह अदृश्य होते हुए भी सर्व समर्थ है पर मनःसरंजाम को समुन्नत बनाने की साधना ऐसी है जिसे निष्ठापूर्वक करते रहने वाले निहाल होकर ही रहते हैं।
एक सनकी लड़का था। उसे अपनी परछाई से भूत का आभास होता और पैरों की चाप सुनकर डरने लगता था। सोचता कोई उसका पीछा करता है।
आशंका बढ़ती तो वह तेज कदम उठाता ताकि पीछा करने वालों से बच सके। बहुत समय तक यही क्रम चलता रहा। इतने पर भी डर घटा नहीं। तेजी से चलने पर विपत्ति भी पीछे दौड़ती प्रतीत होती।
अन्त में वह थककर बैठ गया। बैठते ही छाया रुक गई और पदचाप की आवाज ने डराना बन्द कर दिया।
सनक दूर होते ही, डर दूर हुआ। आशंका मिटी और समाधान हो गया। देर से सही पर अन्त में यह समझ लिया गया कि डर अपनी ही छाया या पदचाप उत्पन्न करती थी।
विद्यार्थी धन्वन्तरि की पीठ में विषैला व्रण हो गया। उपचार के लिए संजीवनी बूटी की आवश्यकता थी। उसे पहचानने और खोजने की आवश्यकता थी। उन दिनों तक प्रमाद वश चिकित्सक उसे पहचानना तक भूल गये थे।
आरोग्यश्राम के अधिष्ठाता ने कहा- “धन्वन्तरि तुम स्वयं ही जाओ और इस समूची आरण्यक को खोज डालो। उपचार का यही मार्ग है। व्रण और किसी औषधि से भरेगा नहीं।”
धन्वन्तरि चल पड़े। पूरा एक वर्ष लगा। आरण्य का कोई कोना उनने छोड़ा नहीं। प्रायः एक सशस्त्र बूटियों की खोज और परीक्षा उनने की। पर संजीवनी का कहीं पता न चला। फोड़ा बढ़ता ही जा रहा था। इतने दिन भटकते और कठोर श्रम करते वे निढाल भी होने लगे थे। सो हारे हुए सेनापति की तरह वापस लौट पड़े।
आचार्य ने छात्र की असफलता ताड़ ली। सिर पर हाथ फेरते हुए उदासी दूर करने और धैर्य रखने को कहा। वे स्वयं चलेंगे और औषधि खोज निकालेंगे। छात्र आश्वस्त होकर उस दिन गहरी नींद सोया।
दूसरे दिन प्रातः आचार्य ने छात्र को साथ लिया और एक निश्चित दिशा में चल पड़े। एक पल भी बीता न था कि औषधि मिल गई। उखाड़कर लाया गया। उपचार हुआ और कुछ ही दिन में घाव अच्छा हो गया।
अवसर पाकर छात्र ने गुरु के सम्मुख जिज्ञासा की ‘जब आपको औषधि का पता ही था तो मुझे एक वर्ष तक क्यों भटकाया गया?’
आचार्य गम्भीर हो गये। बोले- ‘यदि ऐसा न किया जाता तो तुम्हारी शोध प्रवृत्ति कैसे निखरती और एक सशस्त्र नई औषधियों का पता लगने से असंख्य पीड़ितों का हित साधन कैसे होता।”
धन्वन्तरि का समाधान हो गया। आयुर्वेद के ज्ञाता जानते हैं कि वनौषधियों के अनुसन्धान ने चिकित्सा जगत में कितनी बड़ी क्रान्ति की। इस अन्वेषण कर्त्ता को देवतुल्य मानते हुए अभी भी उनकी वार्षिक स्मृति कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धन्वन्तरि जयन्ती के रूप में मनायी जाती है।
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उन दिनों के मूर्धन्य वैज्ञानिक नागार्जुन को अपने शोध कार्यों के लिए एक उपयुक्त सहायक की आवश्यकता पड़ी। घोषणा कराई गई और इच्छुकों के आवेदन आने आरम्भ हो गये।
नागार्जुन इस पद के लिए मेधावी और स्फूर्तिवान ही नहीं, ऐसा भी चाहते थे जो भावनाशील हो। भावना के अभाव में उच्चस्तरीय कार्यों की जिम्मेदारी उठती भी तो नहीं।
इच्छुकों को चित्र-विचित्र काम सौंपें जाते और यह पता चलाया जाता कि किस की क्या प्रवृत्ति है। कसौटी पर खरे न उतरने के कारण अनेकों को वापस लौटना पड़ा।
एक छात्र को किसी काम से बाहर भेजा गया। जितने समय में लौटता था उसकी तुलना में उसने अधिक समय लगा दिया। विलम्ब का कारण पूछने पर उसने बताया। एक जगह दुर्घटना घटित हुई। कितने ही घायल हो गये। उनकी सेवा सुश्रूषा में लग गया और तब चला जब उनके उपचार की उपयुक्त व्यवस्था हो गई। ऋषि प्रवर नागार्जुन ने इस छात्र में मेधा एवं स्फूर्ति के साथ भाव सम्वेदना की उपयुक्त मात्रा देखी और उसे उस पद पर नियुक्त कर दिया गया।
शोध मात्रा तार्किक गवेषणात्मक बुद्धि के सहारे नहीं, सरस अन्तःकरण का पुट मिलने पर ही सफल होती है।
परामनोविज्ञान के अनुसार विश्व मानस (यूनीवर्सल माइन्ड) एक समग्र विचार सागर है और वैयक्तिक चेतना उसकी अलग-अलग लहरें। जो अलग-अलग दीखते हुए भी परस्पर एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं। इस चेतना के विराट् सागर में उठने वाली विचार तरंगें एक कोने से उठकर समूचे सागर में फैल जाती हैं। घटनाओं का सूक्ष्म स्वरूप इसी महासागर में पहले तैयार होता तथा पकता रहता है। सूक्ष्मदर्शी इसी से सम्पर्क स्थापित कर भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता लगा लेते हैं। भविष्य ही नहीं भूत और वर्तमान की घटनाओं का सूक्ष्म स्वरूप सूक्ष्म जगत में बना रहता है। भविष्य की भाँति ‘भूत’ का भी पता लगाया जा सकता है।
समग्र भविष्य भूत दर्शन की क्षमता तो दिव्यदृष्टि सम्पन्न किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों को प्राप्त होती है पर भविष्य दर्शन का एक छोटा अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को स्वप्नों आदि के माध्यम से कभी न कभी प्राप्त होता है। जिन व्यक्तियों अथवा वस्तुओं से अपनापन जुड़ा होता है प्रायः भावी संकेत उन्हीं से सम्बन्धित होते हैं। स्वप्नों में सचेतन मन के सो जाने पर अचेतन अपने से जुड़े व्यक्तियों एवं वस्तुओं के इर्द-गिर्द घूमता रहता है उससे जुड़े घटनाक्रमों का पूर्वाभास भी उसे मिल जाता है। जिनका मन अधिक संवेदनशील निश्छल और पवित्र होता है उन्हें जागृत अवस्था में भी सुदूर सगे-सम्बन्धी जिनसे आत्मीयता जुड़ी रहती है से सम्बन्धित घटनाक्रमों का पूर्व बोध हो जाता है। समाचार पत्रों में पूर्वाभास दुरानुभूति, दूरदर्शन से सम्बन्धित अनेकों घटनाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं। जिसे पढ़कर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है तथा यह मानना पड़ता है कि अदृश्य जगत तथा अदृश्य घटनाक्रमों की पूर्व जानकारी प्राप्त करने की सामर्थ्य मानवी मन की अचेतन परतों में प्रसुप्त स्थिति में विद्यमान है।
प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्र ‘न्यू टाइम्स’ में एक घटना का उल्लेख इस प्रकार था व्यूचैम्प नामक एक बारह वर्षीय लड़की विक्टोरिया स्टेशन पर मेन्स्टन सिटी जाने वाली ट्रेन की बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। साथ में उसके माता-पिता भी थे। अचानक वह अपनी माँ से बोली “माँ! मुझे ऐसा लगता है कोई बड़ी दुर्घटना होने वाली है। मेरा मन कहता है कि यात्रा रद्द कर देना चाहिए। माता-पिता ने इसे पहले लड़की के मन का वहम माना पर बारम्बार आग्रह किये जाने पर उन्होंने अपनी यात्रा निरस्त करनी पड़ी। दूसरे दिन जाने की योजना बनी। अभी वे लड़की सहित घर पहुँचे ही थे कि सूचना मिली कि जिस ट्रेन से उन्हें यात्रा करनी थी वह स्टेशन से कुछ ही किलोमीटर आगे पड़ने वाली एक नदी में दुर्घटनाग्रस्त होकर गिर पड़ी। एक भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा।
अमेरिका के बोस्टन शहर में जैक सुलीवान नामक एक मजदूर खाइयों में लगे पानी के पाइप ठीक करने का काम करता था। एक दिन वाशिंगटन स्ट्रीट पर अकेले ही खाई में बेल्डिंग का काम कर रहा था। तभी खाइयों को बन्द करने वाला एक दस्ता आया और बिना भीतर देखे खाई को बन्द करके चलता बना। सुल्लीवान उसी खाई में दब गया और जीवन मृत्यु के झूले में झूलने लगा। उस स्थान से पाँच मील दूर उसका एक घनिष्ठ मित्र वेल्डरटामी विकटर रहता था। उसे अचानक बोध हुआ कि उसका मित्र सुल्लीवान खतरे में है तथा खाई में दब गया है। वाशिंगटन स्ट्रीट पर शीघ्राति शीघ्र पहुँचने की बारम्बार भीतर से प्रेरणा उठने पर वह चल पड़ा। वहाँ जाकर देखा कि सचमुच ही सुल्लीवान खाई में दबा पड़ा है जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिन रहा था। कुछ मिनट का ओर विलम्ब हो जाता तो शायद उसे बचा सकना सम्भव नहीं हो पाता।
जर्मनी में अपने समय की प्रख्यात मनोचिकित्सक मेडम डि फेरीम ने सन् 1896 ने अनायास बैठे-बैठे एक हृदय विदारक दृश्य देखा जो एक खान दुर्घटना से सम्बन्धित था। दृश्य यह था कि क्रिसमस के दिन चैकोस्लोवाकिया के ब्रुक्स के पास डस्क स्थित कोयले की खान में एक भयंकर विस्फोट होता है और सैकड़ों लोग पहले भूरे और बाद में काले रंग में बदल जाते हैं। हजारों लोग घायल अवस्था में पड़े कराह रहे होते हैं जिन्हें उपचारार्थ अस्पतालों, चिकित्सालयों में भर्ती किया जाता है। दुर्घटनाग्रस्त सभी लोग बोहेमियन जाति के हैं। “उन्होंने इस घटनाक्रम को एक समाचार पत्र के सम्पादक को नोट करा दिया। तीन वर्ष बाद 1899 में उस जर्मन समाचार पत्र ने मेडम फेरीम के इस पूर्वाभास को एक कथानक रूप में प्रकाशित किया। अगले वर्ष 1900 ई. में यह घटना सत्य साबित हुई। चैकोस्लोवाकिया में ब्रुक्स के समीपस्थ डस्स की एक कोयला खान में हुए एक विस्फोट से सैकड़ों लोग काल कलवित हो गये और हजारों व्यक्ति, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी सम्मिलित थे-घायल हो गये।
रीडर्स डायजेस्ट (अप्रैल 1965) में प्रकाशित एक घटना के अनुसार सैम बैन्जोन नामक एक बच्चे ने ओहायो में अपनी माँ से कहा कि जिस ट्राम से पिताजी आ रहे हैं वह दुर्घटनाग्रस्त हो गई है तथा वे घायल अवस्था में पड़े हैं। माँ इस अशुभ बात के लिए डाँटकर चुप कर दिया। पर कुछ घन्टे बीते होंगे कि कुछ व्यक्ति घायल अवस्था में सैम बैन्जोन के पिता को लेकर पहुँचे। उसकी माँ यह देखकर आवाक् रह गई कि बच्चे का पूर्व कथन शत-प्रतिशत सही निकला।
“बियॉण्ड टेलीपैथी” पुस्तक में प्रसिद्ध परामनोवैज्ञानिक डॉ. एण्डरीना पुहरिच ने ऐसी अनेकों घटनाओं का संकलन किया है। एक घटना इस प्रकार है- सालिनांस (कैलीफोर्निया) निवासी एक महिला श्रीमती हायेस का पुत्र दूरवर्ती एक नगर में काम करता था। अचानक उन्हें बोध हुआ कि उनका पुत्र जान हायेस एक कार दुर्घटना में घायल पड़ा है। अपने पति से वास्तविकता का पता लगाने के लिए आग्रह किया। खोजबीन करने पर ज्ञात हुआ कि ठीक उसी समय जब श्रीमती हायेस को दुर्घटना का पूर्व संकेत मिला था तभी जान हायेस की कार एक दूसरी कार से टकरा गई। दुर्घटना में उसे गम्भीर चोटें आयी।
सरविंस्टन चर्चिल जो द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के लौह पुरुष के रूप में ख्याति प्राप्त प्रधानमन्त्री रहे हैं के विषय में कई ऐसी घटनाएँ प्रकाशित हुई हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि भविष्य में सम्भाव्य घटनाओं को उनके मन का एन्टेना पहले ही पकड़ लेता था। ऐसे ही एकबार वे अवसर अरुणोदय होने से पूर्व दूरस्थ टुकड़ियों को निरीक्षण करने के उद्देश्य से समीप खड़ी अपनी कार पर बैठने जा रहे थे। कार का दरवाजा खोलते ही उन्हें अपने अन्तः से आवाज सुनाई दी कि अभी कार में दायीं ओर बैठना सिर पर खतरा मोल लेना है। चर्चिल ने सीट बदल ली और बायीं ओर बैठकर स्वयं ही कार ड्राइव करने लगे। कार अन्धेरी सड़क पर तेजी से जा रही थी। कुछ ही मिनटों में कार के दायीं ओर एक बम दुश्मन के खेमे की ओर से आकर फट गया और कार की खिड़की का दाहिना हिस्सा चकनाचूर हो गया। चर्चिल बच गये और कार तेजी से दौड़ाते हुए सुरक्षित स्थान पर पहुँच गये।
ये सारे घटनाक्रम साधारण से लेकर सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्तियों के जीवन से सम्बन्धित हैं और एक ही तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हैं। मन के विशाल सागर में सतत् जो तरंगें उफनती रहती हैं, उनमें भवितव्य की घटनाएँ भी निहित होती हैं। अध्यात्म मान्यता भी यही है कि व्यष्टिमन समष्टिगत ब्राह्मी चेतना का एक अविच्छिन्न घटक है- उस समुद्र की एक बूँद है। जानकारी भर तक सीमित रहने वाला तर्क प्रधान मन तो बाहरी परत भर है। अविज्ञात एक क्षेत्र मन का ऐसा भी है जिसे उभारा विकसित किया जा सके तो दिव्य अतीन्द्रिय सामर्थ्यों से सम्पन्न बना जा सकता है। साधना उपचार के अवलम्बन हेतु इसी कारण निर्देश दिये जाते हैं ताकि ये मात्र कौतूहल तक सीमित न रहकर मानव समुदाय के लिये हितकारी भी हो।
मानवी काया का स्थूल रूप उतना ही है जो खाने पीने सोने के काम आता है, जो रोने-हँसने और मरने-जीने के गतिचक्र में बँधा हुआ अपना समय व्यतीत करता है। मस्तिष्क का मन और बुद्धि भाग इस गाड़ी को धकेलता रहता है। कल पुर्जे अन्न, जल का ईंधन पाकर गतिशील बने और निर्वाह विनोद के साधन जुटाने में लगे रहते हैं। इससे आगे की गहराई वहाँ से प्रारम्भ होती है जहाँ ‘चित्त’ (अचेतन मन) और अहंकार अन्तःकरण (सुपर चेतन) का क्षेत्र आरम्भ होता है। यह मनःक्षेत्र की बात हुई। कार्य क्षेत्र में षट्चक्र, ग्रन्थि त्रय, नाड़ी त्रय, चतुर्विशत् उपत्यिकाएँ, पंचकोश, कुण्डलिनी, सहस्रार के रहस्यमय शक्ति भण्डारों की साज सज्जा है।
यह समूचा क्षेत्र सामान्यतः निष्क्रिय पड़ा रहता है। न मनःक्षेत्र की अचेतन, सुपर चेतन क्षमताएँ काम आती हैं और न षट्चक्र, पंचकोश आदि से कोई वास्ता पड़ता है। अप्रकट अस्तित्व को ही रहस्य कहते हैं। इसलिए मनःक्षेत्र और कार्य क्षेत्र की इन सर्वसाधारण की पहुँच से बाहर की अविज्ञात विशिष्टताओं को भी रहस्य लोक दिव्य लोक कहा जाता है। इसे ही प्राचीन काल में शोध प्रयत्नों के लिए प्रयुक्त किया जाता था। खर्चीले, कष्ट साध्य और आये दिन ईंधन मरम्मत माँगने वाले वैज्ञानिक यन्त्रों का निर्माण करने की अपेक्षा यह अच्छा समझा गया कि ईश्वर प्रदत्त सर्वांगपूर्ण काया में ही जब प्रकृति लोक ही नहीं ब्रह्म लोक को भी खोजने-खींचने, घसीटने की क्षमताएँ विद्यमान हैं तो बाहर क्यों भटका जाय? कस्तूरी हिरन की तरह क्यों उपहासास्पद बना जाय।
ऋषियों का समग्र प्रयास एक ही रहा है कि काय कलेवर को एक सर्वांगपूर्ण, समग्र, सुन्दर सहज उपलब्ध प्रयोगशाला माना जाय। साथ ही उसी क्षेत्र में सन्निहित सृष्टा के उत्तराधिकार में उपलब्ध अनन्त ऋद्धि-सिद्धियों को बीज रूप में ही पड़े न रहने देखकर उन्हें उगाने और विशाल वृक्ष में परिणत करने का प्रयास किया जाय। इस प्रयास को योग एवं तप की संज्ञा दी गई है। उसमें किसी अन्यत्र रहने वाले देवी देवता की मनुहार नहीं है वरन् आत्मदेव के अंग−उपाँगों का ही न्यास उपचार करने का विधान है। वृक्ष की खुराक आसमान से नहीं, जड़ों से मिलती है। मानवी सत्ता का चरम विकास उसके अन्तःक्षेत्र को उभारने से ही सम्भव होता है। आकाश के देवताओं को किसी का मनुहार सुनने और निहाल करने के लिए उपहार का टोकरा लिए-लिए फिरने की फुरसत कहाँ है ?
पेट भरने के लिए अपना ही मुँह चलाना पड़ता है। पढ़ने के लिए अपनी ही बुद्धि लड़ानी पड़ती है। दूसरे के मुँह से किसका पेट भरा है, दूसरों की बुद्धि का सहारा लेकर कौन विद्वान बना है। आत्मिक प्रगति की आकाँक्षा भी अपने ही साधनात्मक पुरुषार्थ से पूरी होती है। उसमें बेचारे देवताओं को अनुग्रह ही एक सीमा तक पात्रता के अनुरूप में हो सकता है। बात पात्रता पर आई तो उसे भी पुरुषार्थ ही कहा जायेगा। आत्म क्षेत्र के गहन मन्थन को ही साधना, उपासना आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है।
प्राचीन काल में अनेकों दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होता था। तन्त्र शास्त्र में प्रायः इसी प्रकार के उपचारों की भरमार है। उसी क्षेत्र में ऐसी उपलब्धियों की भरमार थी जो क्षमताओं, सुविधाओं और सफलताओं के भण्डार सामने ला खड़ी करती थी। इस प्रकार के उपायों को योग-तप कहा जाता था। उनके द्वारा भौतिक क्षेत्र में ऋद्धि-सिद्धियों को हस्तगत किया जाता था। साथ ही अन्तःक्षेत्र को आनन्द-उल्लास से भरे रहने वाले स्वर्ग मोक्ष का लाभ मिलता था। यह समूचा उपार्जन अन्तःक्षेत्र का है। विशाल ब्रह्माण्ड में जो कुछ है वह अपने कायपिण्ड में बीज रूप में विद्यमान है। उसमें उसे उपयोगी हो उसे उभारने का पुरुषार्थ करना ही आत्म साधना का उद्देश्य रहा है। जहाँ तथ्यों का ध्यान रखते हुए- विद्या को निष्ठापूर्वक अपनाते हुए प्रयास चले हैं वहाँ अभीष्ट सफलता भी मिली है। ऋषि युग का इतिहास इसका साक्षी है।
कायिक और मानसिक क्षेत्र की संरचना एक सर्वांगपूर्ण यन्त्र उपकरणों से भरी-पूरी प्रयोगशाला के समान है। उसे अभीष्ट उत्पादन में समर्थ फैक्टरी भी कहा जा सकता है। इस तथ्य से अवगत होने के उपरान्त दूसरा प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस कारखाने को चलाने के लिए ऊर्जा कहाँ से मिले? ईंधन कहाँ से जुटे। बिजली, भाप, ताप आदि का कोई स्त्रोत साधन तो होना ही चाहिए। अन्यथा बहुमूल्य मशीनें भी तनिक सी हलचल नहीं कर सकती। उपकरणों को ऊर्जा ही तो चलाती है। इस ऊर्जा के लिए भी कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। वह भी प्रचुर परिमाण में उसी समर्थ सृष्टा ने हस्तान्तरित कर दी है, जबकि इतना बहुमूल्य शरीर क्षेत्र रूपी बहुमूल्य अनुदान मनुष्य को बनाया गया।
यह ऊर्जा ईंधन क्या है? इसका संक्षिप्त किन्तु समग्र उत्तर है- “शब्द शक्ति”। काया से जो शब्द निकलते हैं। सामान्यतया वे विचारों के आदान-प्रदान में काम आते हैं। यही उसका मोटा काम चलाऊ उपयोग है। इससे ऊँचे स्तर की शब्द शक्ति वह है जो जीभ से नहीं मुखाकृति, मस्तिष्क एवं अन्तःकरण से निकलती है। इन्हें मध्यमा, परा और पश्यन्ति कहते हैं। वार्तालाप परामर्श में प्रयुक्त तो बैखरी वाणी ही होती है पर उसकी नगण्य-सी क्षमता में समर्थता, प्रखरता तब उत्पन्न होती है, जब मध्यमा, परा, पश्यन्ती का भी उच्चारण के साथ ही समन्वय समावेश होता रहे। इसके लिए परिष्कृत वाणी चाहिए। जो समूचे व्यक्तित्व के हर पक्ष को उत्कृष्टता से अनुप्राणित कर सके। यदि वक्तृता का आनन्द लेना हो, उसे चमत्कारी सफलता प्रस्तुत करने में समर्थ देखता हो तो फिर जिह्वा तक सीमित न रहकर अन्य तीन रहस्यमयी वाणियों को मुखर करने के लिए साधनात्मक अभ्यास की आवश्यकता समझनी चाहिए। वाणी की कला भी अपने स्थान पर उपयोगी है, पर उठने भर से लोक-मानस की दिशाधारा निकृष्टता से उलटकर उत्कृष्टता की ओर मोड़नी हो तो उसके लिए उच्चस्तरीय शब्द शक्ति चाहिए।
साधना क्षेत्र में शब्द शक्ति के बारे में अधिक गम्भीरता के साथ सोचा जाना चाहिए एवं उस प्रतिपादन पर ध्यान देना चाहिए जिसमें ‘शब्द और नाद ब्रह्म’ की महिमा शास्त्रकारों के अनन्त रूपों में और गम्भीरता के साथ प्रस्तुत की है। शब्द ब्रह्म अर्थात् गद्य उच्चारण, नाद ब्रह्म अर्थात् ताल स्वर पर आश्रित गीत वाद्य। मन्त्र विज्ञान को इसी क्षेत्र की महान उपलब्धि कहा जा सकता है। मन्त्र में शब्द गुन्थन की विशेषता भी एक तथ्य है पर उससे भी कहीं अधिक विशिष्टता मांत्रिक की निजी जीवनचर्या के साथ जुड़ी रहती है। मन्त्र शक्ति में वाणी का उच्चारण विधान ही पर्याप्त नहीं माना जाता। इसकी प्राण-प्रतिष्ठा उस साधना द्वारा होती है जिसमें मन्त्र को सिद्ध करने के लिए भाव भरे पुरश्चरण किए जाते हैं। इस प्रक्रिया का तात्विक स्वरूप इतना ही है कि मांत्रिक को, साधक को अपनी जीवनचर्या में उत्कृष्टता का सघन समावेश करना चाहिए। उसे ऋषिकल्प होना चाहिए। यहाँ दशरथ की पुत्र प्राप्ति अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए किए गए पुत्रेष्टि यज्ञ का स्मरण करना चाहिए जिसमें वशिष्ठ ने राज्यधान्य खाने के कारण मन्त्र शक्ति उत्पन्न करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी। वाणी की प्रखरता वाले शृंगी ऋषि उस कार्य के लिए बुलाये गये थे तब प्रयोजन पूर्ण हुआ था। मन्त्र का रहस्य, साधक की जीवन साधना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
सामान्य लोग जीभ चलाते और बकवास करते रहते हैं। वरिष्ठ व्यक्ति सारगर्भित, आदर्शों का पक्षधर, जीवन में प्रयुक्त-अनुभूत, श्रद्धा विश्वास से भरा-पूरा शब्दोच्चार करते हैं। वस्तुतः यह मन्त्र प्रयोग ही होता है। मन्त्र विचार को ही कहते हैं। तपः पूत उच्चारण को मन्त्र कहा जाता है। यह जप अनुष्ठान में, शाप-वरदान में भी काम आते हैं पर सामान्यतया उन्हें सम्भाषण के रूप में भी प्रयुक्त किया देखा जाता है। लेकिन यदि परिवर्तन भावना क्षेत्र का होना है, लोक मान्यताओं में घुसी हुई अवांछनीयता को उलटकर उस क्षेत्र में औचित्य की नये सिरे से प्राण-प्रतिष्ठा होनी है तो ऐसी दशा में उसके उपयुक्त साधन सामग्री ही खोजनी होगी। वह भी ऐसी जिसके लिए जहाँ-तहाँ हाथ पसारते न फिरना पड़े। मानव मात्र का काय कलेवर एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला की तरह प्रयुक्त करने के लिए परिष्कृत स्तर का बनाना पड़ेगा। परिष्कृत अर्थात् पवित्र, प्रखर। उसके लिए संयम साधना और परमार्थ परायणता के दोनों ही प्रयोग साथ-साथ चलने चाहिए। इस अवलम्बन के बिना आत्मसत्ता इस योग्य नहीं बनती कि वह उच्चस्तरीय शक्तियों का अवतरण एवं अवधारण सहन कर सके।
जीवन साधना से मानवी काया एक उच्चस्तरीय यन्त्र उपकरणों से भरी प्रयोगशाला का काम देने लगती है। ऊर्जा की आवश्यकता शब्द शक्ति होगी। उच्चारण को मन्त्र स्तर तक पहुँचाना पड़ेगा। परिष्कृत जीवन अर्थात् गाण्डीव। मन्त्र अर्थात् शब्द बेधी बाण। अर्जुन की तरह इन सभी उपकरणों के प्रयोग का अभ्यास करने और प्रवीण होने के लिए हर साधक को कटिबद्ध, अग्रसर होना चाहिए। ऐसी प्रयोगशाला हर मनुष्य में सृष्टा की अनुकम्पा से अनायास ही उपलब्ध है।
एक बूढ़ा राहगीर था। रात हो गई, थक कर कहीं टिकने का स्थान खोजने लगा। एक महिला को दया आयी। उसने बाड़े में पेड़ के नीचे ठहरने को स्थान बता दिया। बूढ़ा चैन पूर्वक सो गया। गहरी नींद आई।
सबेरे चलने से पूर्व उसने सोचा-अच्छी जगह है। खिचड़ी पका लें। खाकर चलेंगे। सो वहीं उसने लकड़ी बटोरकर खिचड़ी पकाने लगा। बटलोई उसी महिला से माँग ली।
गृह स्वामिनी अपने काम-काज में लगी थीं। बूढ़े ने उसका ध्यान बँटाते हुए पूछा- “एक बात पूछूँ? बाड़े का दरवाजा कम चौड़ा है। अगर सामने वाली मोटी भैंस मर जाय तो फिर उठाकर बाहर कैसे ले जाया जायेगा?”
गृह स्वामिनी को इस व्यर्थ की कड़ुई बात का बुरा तो बहुत लगा पर यह सोचकर चुप रह गई। बूढ़ा जाने ही वाला है इसके मुँह क्यों लगा जाये।
खिचड़ी आधी ही पक पाई थी कि दूसरी बार गृह स्वामिनी फिर उधर से निकली। इस बार बूढ़े ने फिर दूसरा प्रश्न पूछा- “आपके हाथों का चूड़ा बहुत कीमती है। यदि विधवा हो जायँ तो इसे तोड़ना पड़ेगा और बहुत हानि होगी न?
अब की बार महिला से न सहा गया। उसने बुड्ढ़े के गमछे में अधपकी खिचड़ी उलट दी। चूल्हे की आग बुझा दी। बटलोई छीन ली और धक्के देकर घर के बाहर निकाल दिया।
गमछे में अधपकी खिचड़ी का पानी टपकता रहा और बुड्ढ़े के सारे कपड़े उससे लथ-पथ होते रहे। इसी स्थिति में वह आगे चलता रहा।
रास्ते में लोगों ने कपड़ों पर कीचड़ चिपकी और मक्खियाँ भिनकती देखी तो पूछा- यह सब क्या है?
बुड्ढे ने तथ्य का सार बताते हुए कहा- “यह मेरी जीभ का रस टपका है, जिसने भूखा रखा, तिरस्कार किया और अब घिनौनी वेष-भूषा में उपहासास्पद बनाया है।
शारीरिक परिपक्वता की आयु सीमा निर्धारित है। प्रायः बीस वर्ष की आयु तक हर व्यक्ति वयस्क हो जाता है। पच्चीस से तीस की आयु वालों को शारीरिक दृष्टि से परिपक्व माना जाता है। प्रौढ़ता की अवधि इसके बाद शुरू होती है तथा लगभग चालीस तक चलती है। आयुष्य से जुड़े शारीरिक सम्बन्धों का यह मोटा विभाजन है। पर मानसिक दृष्टि से कितनी आयु वालों को परिपक्व माना जाय, निर्धारण में कठिनाई यहाँ आती है। कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं जो लम्बी आयु के बाद भी बचकानी हरकतें करते रहते हैं, कितनों का बचपन जीवनपर्यन्त नहीं समाप्त होता तथा ऐसे आचरण प्रस्तुत करते रहते हैं, जिसमें उनकी नादानी ही झलकती है। जबकि कुछ ऐसे भी देखे जाते हैं जो अल्पायु में ही प्रौढ़ों का कान काटते हैं। अद्भुत सूझबूझ का परिचय देते तथा बड़े दायित्व निभाते पाये गये हैं। बुद्धिमत्ता, योग्यता एवं प्रतिभा का भी सुनिश्चित, सीमा सम्बन्ध आयु से नहीं दिखायी पड़ता। मनःशास्त्रियों द्वारा निर्धारित पैमाने भी सम्बन्धित विषय पर स्पष्ट तथा विस्तृत व्याख्या नहीं कर पाते।
मानसिक परिपक्वता की जाँच के लिए प्रचलित तरीका है- बुद्धिलब्धि का परीक्षण। परीक्षण पद्धति के अनुसार बालक की मानसिक आयु में उसके वास्तविक उम्र से भाग दिया जाता तथा प्राप्त अंक को 100 से गुणा कर दिया जाता है। इस तरह यदि किसी बच्चे की मानसिक आयु 10 तथा वास्तविक आयु भी 10 हो तो बुद्धिलब्धि 100 होगा। औसत बुद्धिलब्धि भी 100 मानी गयी है। अपनी आयु से अधिक प्रतिभा का परिचय देने वाले बच्चे की मानसिक आयु अधिक होती है। यदि एक बालक की शारीरिक आयु 10 वर्ष तथा मानसिक आयु 15 वर्ष हो, उसका आई.क्यू. 150 होगा। मनःशास्त्रियों ने जो सर्वेक्षण एवं परीक्षण किये हैं, उसका निष्कर्ष है कि कुल जनसंख्या में दो प्रतिशत लोगों की बुद्धिलब्धि इस स्तर की होती है। अपवाद के रूप में थोड़े से व्यक्ति ऐसे पाये गये हैं जिनकी बुद्धिलब्धि 200 तक थी। सामान्य वयस्क 100 से 150 बुद्धिलब्धि सीमा के भीतर आते हैं। 100 से कम को मानसिक दृष्टि से अविकसित तथा 150 से अधिक को ‘सुपर’ माना जाता है।
मनःशास्त्र द्वारा बौद्धिक क्षमता मापने का यह मोटा निर्धारण है जिनके आधार पर लोगों की प्रतिभा मालूम की जाती है। पर बौद्धिक क्षमता मापने का यह सिद्धान्त अपूर्ण है। ऐसे अगणित प्रमाण भी मिले हैं जिसमें मानसिक प्रखरता के उपरोक्त कसौटियों पर अनेकों व्यक्ति खरे नहीं उतरे पर गम्भीरता से अध्ययन करने पर वे असाधारण प्रतिभा के धनी निकले। मूर्धन्य वैज्ञानिक सापेक्षवाद के आविष्कारक आइन्स्टीन विद्यार्थी जीवन में मन्दबुद्धि वाले माने जाते थे। एक दिन उन्हें विद्यालय से निष्कासित भी कर दिया गया। कारण था क्लास में हाजिर जवाबी का अभाव। विषयों, प्रश्नों की गहराई में वे इस हद तक चले जाते थे कि तुरन्त उत्तर नहीं सूझता था। अध्यापक तथा विद्यार्थीगण इसी कारण उनकी क्षमता का मूल्याँकन नहीं कर पाते। पर सभी जानते हैं कि आरम्भ में मन्दबुद्धि समझा जाने वाला यह बालक इतिहास प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना, जिसकी बुद्धि का लोहा सभी मानते हैं।
विलक्षण प्रतिभा के ऐसे अगणित प्रमाण मिले हैं जिनका कोई सीधा सम्बन्ध बुद्धिलब्धि (इन्टेलिजेन्स क्वोशेण्ट) से नहीं है। वह मान्यता भी पुरानी पड़ती जा रही है कि प्रतिभा प्रकृति प्रदत्त एक स्थायी जन्मजात अनुदान है। “इन्टेलिजेन्स कैन वी टॉट” पुस्तक के लेखक आर्थर लिण्डा के अनुसार कई व्यक्तियों में उनके जीवन के दौरान आई.क्यू. स्तर बढ़ता देखा गया है जबकि स्कूल में आई.क्यू.परीक्षण के आधार पर अति मेधावी घोषित छात्र आगे चलकर निष्फल सिद्ध हुए हैं। प्रतिभा के मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को चुनौती देने वाले ऐसे उदाहरण भी हैं जो बताते हैं कि यह पद्धति कितनी अपूर्ण और एकाँगी है। घोषित मन्दबुद्धि पर अद्भुत मेधा सम्पन्न व्यक्तियों के प्रमाण इस क्षेत्र में नये सिरे से सोचने तथा अनुसंधान करने की प्रेरणा देते हैं।
न्यूयार्क में 1636 को भ्रूण के परिपक्व होने के तीन माह पूर्व ही जुड़वे बच्चों ने जन्म लिया। नाम पड़ा चार्ल्स और जार्ज। तीन वर्ष की आयु में उनका बौद्धिक परीक्षण किया गया। परीक्षण कर्त्ताओं ने उन्हें मन्द मति का घोषित किया गया। इनकी आई.क्यू. 60 से 70 के बीच थी जो सामान्य से भी कम थी। न्यूयार्क स्टेट साइकेट्रिक इन्स्टीट्यूट के डा. विलियम हार्विज ने सन् 1963 में इस युग्म का परीक्षण किया। उन्हें इनमें विलक्षणता का आभास मिला। उन्होंने जार्ज से एक जन्म तिथि बताकर उस पर पड़े दिन तथा उस क्रम में आगे पड़ने वाले विभिन्न तारीखों तथा दिनों का ब्यौरा पूछा। कुछ ही सेकेण्ड में उनसे सही-सही विवरण प्रस्तुत कर दिया सैकड़ों हजारों वर्ष पूर्व अमुक दिन को कौन सी तारीख तथा माह था पूछे जाने पर बिना अधिक समय लगाये चार्ल्स तथा जार्ज दोनों ही बता देते थे। आने वाले सैकड़ों वर्षों बाद की जानकारियाँ भी शत-प्रतिशत सही देते थे। जबकि उन्हें कैलेण्डर के नियमों का कुछ भी ज्ञान न था। लम्बे समय तक डॉ. हार्विज कारणों की खोजबीन करते रहे पर विलक्षणता का रहस्योद्घाटन न हो सका। अन्ततः वे यह कहकर चुप हो गये कि “प्रतिभा के अविज्ञात स्रोत मानव मस्तिष्क में विद्यमान हैं जिसकी कोई जानकारी विज्ञान एवं मनोविज्ञान को नहीं है।”
इंग्लैण्ड का जेडेदिया बक्सन नामक व्यक्ति भी चार्ल्स, जार्ज की तरह ही अद्भुत मेधा का धनी था। बचपन में वह इतना मूर्ख समझा जाता था कि उसके माता-पिता ने पढ़ाना ही उचित न समझा। अक्षर ज्ञान की भी उसे शिक्षा न मिली। पर आश्चर्य यह कि कुछ ही वर्षों बाद वह गणित के जटिल प्रश्नों को हल करने लगा। उसकी स्मृति विलक्षण थी। एक बार वह थियेटर में ड्रामा देख रहा था। एक घन्टे के भीतर अभिनेता ने जितने संवाद बोले, उनके शब्दों की सही संख्या तथा नर्तकी द्वारा नृत्य में उठाये गये कदमों की कुल संख्या बताकर उसने सबको आश्चर्यचकित कर दिया। जुबान पर सभी संवाद ऐसे रटे जान पड़ रहे थे जैसे कि उनका पूर्ववत् अभ्यास किया गया हो। प्रमाणिकता की परीक्षा कितनी ही बार विशेषज्ञों द्वारा की गयी, पर हर बार उन्हें ‘बक्सन’ की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ा। एक बार उसे 364, 364, 364, 364, 364 जैसी संख्या का एक साथ गुणा करने को दिया गया। एक मिनट में ही उसने सही गुणा करके सबको हैरत में डाल दिया। उल्लेखनीय बात यह थी उसे गणित के आधुनिक नियमों का आरम्भिक ज्ञान तक न था।
अपने परीक्षण के दौरान डॉ. डी.सी. रीफ तथा एल.एच. स्नीडर ने एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण प्रस्तुत किया जो 4 अंकों के वर्गमूल तथा 6 अंकों के घनमूल को क्रमशः चार सेकेण्ड तथा छः सेकेण्ड में हल कर देता था। यह घटना सन् 1931 की है।
1970 में डेविड एस.विस्कोट नामक एक विद्वान ने बोस्टन की एक महिला हैरियर का अध्ययन किया। वह विलक्षण प्रतिभा की धनी निकली। मोजार्ट, वीथोवन स्कवर्ट, डेबूसी, प्रोकोफियेव वर्डी जैसे विश्वविख्यात तथा अन्य भी अगणित संगीतज्ञों के समकक्ष उन्हीं जैसी हैरियट संगीत की धुनें निकाल लेती थी। आश्चर्य की बात यह है कि उसने संगीत का कभी अभ्यास नहीं किया है, न ही उसे लय, ताल, स्वर, रागनियों का ही कुछ ज्ञान ही था।
जॉन वॉन न्यूमेन नामक विद्वान को मूर्धन्य गणितज्ञ की पदवी मिली है। वह कठिन से कठिन गणित के प्रश्नों का उत्तर बिना गुणा भाग किये, बिना किसी यन्त्र का प्रयोग किये, देने के लिए प्रख्यात है। योरोपीय विद्वान समय-समय पर उनसे गणित की समस्याओं पर विचार-विमर्श करने आते रहते हैं। भारत की सुप्रसिद्ध शकुन्तला देवी की तरह अमरीकी चीफ जस्टिस चार्ल्स इवान ह्यूजेस के मस्तिष्क को भी इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर माना जाता है। एक बार उन्होंने अपने स्टेनोग्राफ़र को एक भाषण दो घन्टे नोट कराया। दो घन्टे बाद उसे बिना पढ़े ही बिना एक भी गलती किये क्रमबद्ध दुहरा दिया। उनकी अद्भुत मेधा अमरीका में चर्चा का विषय है।
वैज्ञानिक क्षेत्र में मस्तिष्क की विलक्षणताओं के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की अटकलें लगायी जा रही हैं। कुछ वैज्ञानिक इसका सम्बन्ध मस्तिष्क के प्रोटीन रसायन से जोड़ते हैं। कुछ का मत है कि मस्तिष्क के अन्तराल में कम्प्यूटर जैसी कोई अविज्ञात प्रणाली भी कार्यरत है। दूसरी ओर पेलो अल्टो स्कूल ऑफ प्रोफेसनल साइकोलॉजी के डॉ. टी. एल. ब्रींक ने प्रतिभा का सम्बन्ध मस्तिष्क के वाम भाग से जोड़ते हुए कहा है कि यह क्षेत्र असीम सम्भावनाओं का छुपा भण्डार है जिसका अध्ययन गम्भीरतापूर्वक करना होगा।
वैज्ञानिकों की अटकलों तथा मनोवैज्ञानिक क्षेत्र के प्रयोग परीक्षणों से निकले निष्कर्षों के आधार पर मानसिक प्रतिभा के कारणों की स्पष्ट व्याख्या कर सकना मुश्किल है। बुद्धि विश्लेषण एवं प्रखरता के निर्धारण के लिए बनाये गये बुद्धिलब्धि जैसे मापदण्ड अत्यन्त बौने सिद्ध होते हैं। यथार्थता यह है कि इन परीक्षणों से बुद्धि चातुर्य का प्रत्यक्ष स्थूल पक्ष ही पकड़ में आता है। इन्टेलीजेन्स का वह पक्ष जो महान तथा महत्वपूर्ण आविष्कारों का जन्मदाता है किसी भी तरह इन परीक्षणों की सीमा में आ नहीं पाता। सशक्त कल्पनाओं, प्रखर विचारों का इनसे परिचय नहीं प्राप्त किया जा सकता। हिमनदों में बर्फ के शिलाखण्डों का तीन चौथाई हिस्सा पानी के भीतर डूबा रहता है, एक चौथाई ऊपर दिखायी पड़ता है। प्रतिभा की भी लगभग ऐसी ही स्थिति होती है। एक मोटा और अत्यन्त छोटा पक्ष ही बुद्धि का व्यक्त रूप में सामने आता है। उसी को लेकर मनुष्य अपने दैनन्दिन जीवन के क्रिया-कलापों को गतिशील रखता है। अधिकाँश भाग तो प्रसुप्त स्थिति में दबा पड़ा रहता तथा उपयोग में नहीं आ पाता है।
जन्मजात प्रतिभा की विलक्षणता का कुछ सुनिश्चित कारण मनःशास्त्री तथा न्यूरोलाजिस्ट नहीं बता पाते। आनुवांशिकी से जोड़े जाने वाले तीर-तुक्कों की भी अब सटीक संगति नहीं बैठती। आनुवांशिकी के नियमों को झुठलाने वाले विपरीत तथ्य एवं प्रमाण भी देखें जाते हैं। मूर्ख माता-पिता से मेधावी तथा मेधावी के मूर्ख पैदा होने के उदाहरण भी समय-समय पर मिलते हैं। सबसे अधिक रहस्यमय तथा चौंकाने वाली वे घटनाएँ होती हैं जिनमें बिना शिक्षण प्राप्त किये विशिष्ट स्तर की प्रतिभा किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में अकस्मात उभरती दिखायी पड़ती है।
अध्यात्म विज्ञानी इनका सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों से जोड़ते हुए कहते हैं कि अनायास प्रतिभा के रूप में दिखायी पड़ने वाली विशेषता पूर्व जन्मों की उपार्जित होती है। शरीर का मरण होते हुए भी कृत्यों के संस्कार सूक्ष्म रूप से बने रहते तथा नये जन्म के साथ प्रकट होते हैं। सम्भव है इस जीवन में उस प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति को कोई शिक्षण न मिला हो, न ही उसने किसी प्रकार का प्रयास किया हो पर उसको मिला यह अनुदान पूर्व जन्म के संचित ज्ञान की ही अभिव्यक्ति हो।
आरम्भ में चन्द्रमा बहुत सुन्दर था। हर घड़ी हँसता रहता। चेहरा खिला कमल जैसा सुन्दर लगता। कुछ दिन बाद वह उदास रहने और खीजने लगा। अतएव कलाएँ घटने लगी। चेहरा मुरझाया और सिकुड़ने क्षीण होने लगा।
दिन बीतते गये, अमावस आते-आते वह काल कुरूप हो गया। कलाएँ समाप्त हो गई और अन्धेरी कोठरी में दिन काटने लगा।
ब्रह्मा जी इस दुर्दशा को देखकर बोले- मूर्ख, हँसना-मुस्काना फिर आरम्भ कर। उसके बिना किसी की जिन्दगी पार नहीं होती। खीजने से तो बेमौत मरेगा। चन्द्रमा ने अपनी भूल सुधारी। उसने प्रसन्नता बिखेरना आरम्भ किया और बढ़ते-बढ़ते फिर पूर्णिमा को खिले कमल जैसा हो गया।
प्राण विद्या को पंचाग्नि साधना का वर्णन एवं विधान वस्तुतः चेतना क्षेत्र की ऊर्जा का ही प्रयोग परिचय है। प्राणायाम के अनेकानेक विधानों में उसी क्षमता के अनेक रूपों का उत्पादन एवं प्रयोग की रीति-नीति का विवरण बताया एवं विस्तार सिखाया जाता है।
चेहरे पर आँखों में इसी की चमक होती है। वाणी में मिठास भी इसी की होती है और सिंह जैसी गर्जन भी। दूसरों पर प्रभाव डालना इसी के माध्यम से बन पड़ता है। प्राण विद्युत सम्पर्क में आने वालों को चुम्बक की तरह खींचती और अपनी विशेषताओं से प्रभावित करती है। ऋषि आश्रमों के इर्द-गिर्द उनमें निवासियों का प्राण छाया रहता है और उसका प्रभाव हिंस्र पशुओं तक पर पड़ता है। सिंह गाय एक घट पानी पीने की घटनाऐं ऐसे ही क्षेत्रों में दृष्टिगोचर होती हैं। नारद के प्रभाव से वाल्मीकि और बुद्ध के सान्निध्य में अंगुलिमाल का काया-कल्प हो जाना ऐसे ही प्रचण्ड प्राण प्रहार का प्रतिफल है। कुसंग और सत्संग में यही प्राण ऊर्जा विशेष रूप से काम करती है।
यह प्राणाग्नि होती तो हर किसी में है किन्तु उसकी न्यूनाधिकता प्राणि विशेष की स्थिति पर निर्भर है। आचरणों और साधनों से उसे घटाया बढ़ाया भी जाता है। अनाचारी असंयमी उसे घटाते-घटाते जीवित रहते हुए निष्प्राण स्तर के दीन-दुर्बल बनते चले जाते हैं जबकि संयमी ब्रह्मचारी तपस्वी उसे बढ़ाते चलते हैं और अभिवृद्धि का परिचय बढ़ी-चढ़ी प्रतिभा प्रखरता के रूप में देते हैं।
यह प्राणाग्नि कई बार प्रयत्नपूर्वक प्रकट की जा सकती है और कई बार अनायास ही अप्रत्याशित रूप से उभरती है। पौराणिक गाथा के अनुसार शिव पत्नी सती ने पितृगृह में अपने शरीर से ही योगाग्नि प्रकट करके शरीर दाह किया था। अन्य योगियों के बारे में भी ऐसी ही गाथाएँ मिलती हैं जिनने शरीरान्त के समय अन्य किसी के द्वारा अन्त्येष्टि किये जाने की प्रतीक्षा न करके अपने भीतर से ही अग्नि प्रकट की थी। और काया को भस्मसात् कर लिया था। शाप देकर दूसरों को भस्म कर देने के तो कितने ही कथानक हैं। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था और दमयंती के शाप से व्याध जल बनकर भस्म हो गया था। भस्मासुर ने तो इस विशिष्टता को अपनी तपस्या के सहारे एक सिद्धि के रूप में ही प्राप्त कर लिया था वह किसी पर भी हाथ रखकर उसे भस्म कर सकता था।
यह प्राणाग्नि के प्रयत्नपूर्वक किये गये प्रयोग हुए। इसके पीछे कुछ उद्देश्य और प्रयोग भी हैं पर आश्चर्य तब होता है जब यह कायिक ऊर्जा अनायास ही किसी किसी के शरीर से फूट पड़ती है और अपनी काया को ही नहीं समीपवर्ती सामान को भी जलाने लगती है। ऐसे प्रमाणों के सरकारी अभिलेखों में कितने ही विवरण उपलब्ध हैं जिनमें बिना किसी दूसरे द्वारा वैसा कुछ किये जाने या स्वयं भी आत्मघात जैसा प्रयत्न न करने पर भी अनायास ही व्यक्ति विशेष के शरीर से अग्नि प्रकट हुई और उसने अग्निकाण्ड जैसा दृश्य उपस्थित कर दिया। कड़ी जाँच-पड़ताल से भी यह प्रामाणित न हो सका कि यह दुर्घटना बाहर से जलाई गई किसी अग्नि के द्वारा हो सकी।
स्वतः किसी शरीर में से प्राणाग्नि प्रकट होने की घटनाओं का विवरण सत्रहवीं सदी के बाद में खोजा और पंजीकृत किया गया है। उनमें कितनी ही घटनाएँ प्रकाशित पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। जहाँ इस प्रकार की जाँच-पड़ताल की व्यवस्था नहीं है वहाँ भी कुछ ऐसा ही होता रहता होगा, पर उसका प्रामाणिक उल्लेख न होने से ऐसी चर्चा का विषय नहीं बनाया जा सकता जिसके सहारे किसी तथ्य तक पहुँचने का प्रयास किया जा सके।
प्रामाणिक घटनाओं में से कुछ उल्लेख उपलब्ध हैं-
13 जनवरी 1943 को 52 वर्षीय एलन एम. स्माल का जला हुआ शरीर डियर इस्ले, मेन स्थिति उनके मकान से बरामद किया गया। शरीर के नीचे बिछा हुआ कार्पेट झुलस गया था। इसके अतिरिक्त कमरे की किसी भी वस्तु पर आग का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
29 जुलाई 1938 को श्रीमती मेरी कार्पेन्टर अपने पति एवं बच्चे के साथ नाव पर सवार होकर नारफाक इंग्लैण्ड में छुट्टियाँ व्यतीत करने जा रही थीं। नाव पर ही अचानक उनका शरीर चारों तरफ से अग्नि ज्वाला से घिर गया और कुछ ही मिनटों के अन्दर जीता जागता शरीर जले हुए शव में परिणित हो गया। नाव पर बैठे किसी अन्य व्यक्ति को आँच तक नहीं लगी और नाव की भी कोई क्षति नहीं हुई। निरीक्षण करने वाले आफीसर ने कहा- “माना उसके कपड़े से आग लगी, परन्तु मेरे समझ में नहीं आता यह सब कैसे घटित हुआ।”
सन् 1904 के अन्त में इंग्लैण्ड के लिंकन शायर प्रांत में स्थिति बिन ब्रूक पुरोहिताश्रम में दिसम्बर महीने में एक अजीबोगरीब घटना घटित हुई। पुरोहिताश्रम के इस विशाल भवन में अचानक तीन बार आग लगी जिससे भवन का बहुत सा हिस्सा जलकर नष्ट हो गया। आग लगने के कारणों का पता अज्ञात ही बना रहा। एक महीने बाद बिन ब्रूक का एक किसान अपने रसोई घर में गया जहाँ नौकरानी लड़की झाडू लगा रही थी। उसके पीठ से लम्बी-लम्बी लपटें निकल रही थीं। किसान ने आवाज लगाई और तुरन्त ही उस लड़की पर झपट पड़ा। आग निकलने वाले स्थान पर हाथ से ढक दिया और आग बुझ गई। परन्तु तब तक लड़की बुरी तरह से जल चुकी थी।
प्रोफेसर जेम्स हैमिल्टन ‘टेनेसी’ प्रान्त के नशेवाइल विश्वविद्यालय में कार्यरत थे। 5 जनवरी 1835 को विश्वविद्यालय से वापस घर आये जो तीन चौथाई मील की दूरी पर था। घर के बाहर दीवार पर टँगे हुए हाइग्रोमीटर को देखा उस समय शून्य से भी 8 डिग्री तापमान कम था।
अचानक हैमिल्टन को बायें जंघे पर बिच्छू के डंक मारने जैसी वेदना महसूस हुई। उस स्थान पर गर्मी भी अत्यधिक लग रही थी। नजर पड़ते ही उन्होंने देखा कि उस स्थान से कई इंच लम्बी चमकीली लपटें निकल रही थीं। हैमिल्टन को उपाय सूझा और उस स्थान को हाथ से ढ़ककर आक्सीजन की सप्लाई को रोक दिया। थोड़ी देर बाद ज्वाला शान्त हो गयी।
घर जाकर कपड़े उतारे और घाव का निरीक्षण किया। तीन चौथाई चौड़ा और तीन इंच गहरा घाव था। घाव वाले स्थान पर पैंट के जल जाने से उसमें एक छोटा सा छिद्र हो गया था। घाव की मरहम पट्टी टेनेसी के प्रख्यात डॉ. जान आवर्टन एम.डी. की देख-रेख में सम्पन्न हुआ। इस छिद्र को भरने में 32 दिन लगे।
सन् 1847 में फ्राँस में एक 71 वर्षीय बूढ़े की मृत्यु स्वतः प्रवर्तित अग्नि में जल जाने के कारण हुई। कोर्ट ने इसे हत्या का मामला मानकर मृतक के पुत्र और जमाई को गिरफ्तार कर लिया। दोनों पर वृद्ध को मार डालने और जला देने का संगीन अपराध थोपा गया।
लड़के और जमाई का कहना था कि उसके पिता रात्रि के समय अपने बिस्तर पर सो रहे थे। अचानक उनका शरीर अग्नि की सफेद लपटों से घिर गया और चन्द मिनटों में ही राख के ढेर में परिणित हो गया। हाथ और पैरों के निचले हिस्से को छोड़कर शेष कुछ नहीं बचा। अवशिष्ट राख भी बहुत थोड़ी थी। सम्पूर्ण कमरा गहरे धुँए से भर गया था।
लड़कों के इस कथन की पुष्टि के लिए कोर्ट ने डॉ. मैसन के एक दलीय आयोग को नियुक्त किया। डॉ. मैसन ने छान-बन करने पर पाया कि लड़के और जमाई का कथन सत्य है। कोर्ट ने स्वतः प्रवर्तित अग्निकाण्ड का मामला मानकर दोनों अभियुक्तों को बरी कर दिया।
19 फरवरी 1888 को रविवार के दिन कोलचेस्टर, इंग्लैण्ड में एक बूढ़ा सिपाही शराब पीकर सूखी घास के गट्ठरों पर सोने के लिए चढ़ गया। लेटते ही उसके शरीर के चारों तरफ उठती ज्वाला की लपटों ने शरीर को भस्मीभूत बना दिया। आश्चर्य यह था कि सूखी घास का एक तिनका भी नहीं जला।
इंग्लैण्ड में साउथम्पटन शहर के पास बुटलाक्स हीथ गाँव में श्रीमान जान किले नामक दम्पत्ति निवास कर रहे थे। 26 फरवरी 1905 को सुबह जान के मकान से खड़खड़ाहट की आवाज सुनकर पड़ौसियों ने उनके मकान के अन्दर प्रविष्ट किया। अन्दर आग की लपटें फैली हुई थी। मि. किले फर्श पर पड़े राख के ढेर में परिणत हो गये थे। श्रीमती किले उसी कमरे में कुर्सी पर बैठी बुरी तरह जलकर कोयले में बदल गई थी। परन्तु जिस कुर्सी पर श्रीमती किले बैठी थी उस पर आँच तक नहीं लगी थी। थोड़ी दूर फर्श पर तेल का लैम्प लुढ़का पड़ा था जिसे देखकर पुलिस को आग लगने के कारणों का पता लगाने के लिए कहा गया। लैम्प से आग लगाने का अर्थ था कमरे के फर्नीचर, कपड़े आदि सभी जल जाने चाहिए थे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ था। अतः दम्पत्ति को “एक्सीडेन्टलडेथ” का प्रकरण मानकर जाँच-पड़ताल को वहीं समाप्त कर दिया गया।
सन् 1932 में जनवरी के ठंड के दिनों में नार्थ कैरोलिना के ब्लैडैनबोरो शहर में निवास करने वाली महिला श्रीमती चार्ल्स विलियम्सन के रुई के कपड़े में अचानक आग धधकने लगी। उनके आसपास कहीं कोई आग नहीं थी और न ही उनका ड्रेस किसी ज्वलनशील पदार्थ के सम्पर्क में ही था। उनके पति और लड़की ने जलते हुए कपड़ों को उतारकर उनकी प्राण रक्षा की। इस तरह की घटना उनके साथ तीन बार घट चुकी थी। इसके बाद श्रीमान् विलियम्सन का एक जोड़ी पैन्ट एक आलमारी में टंगा था। उसमें भी आग लग गई और जल कर भस्म हो गया। इसके बाद बिस्तर और पर्दे में आग लग गई। कमरे के बहुत से सामान न नीली लौ में जलते देखे गये परन्तु उनके समीप पड़े किसी अन्य वस्तु को आग की लपटों ने छुआ तक नहीं। इस ज्वाला में न तो कोई गन्ध थी और न ही किसी प्रकार का धुँआ था। जिस वस्तु को आग लगी वह पूर्णतया भस्मीभूत हो गया।
विभिन्न हस्तियाँ- आर्सेन एक्सपर्ट, पुलिस दस्ते, गैस और विद्युत कम्पनी के विशेषज्ञ सभी बुलाये गये। परन्तु आग लगने का कारण रहस्यमय ही बना रहा। चार दिनों तक यह अग्निकाण्ड चलता रहा और पाँचवें दिन अचानक अपने आप समाप्त हो गया। अदृश्य हाथों द्वारा संचालित इस अग्निकाण्ड का उत्तर किसी के पास नहीं था।
सन् 1907 में भारतवर्ष के दीनापुर जिले के मनेर गाँव से एक जली हुई महिला का शव ले जाते हुए दो व्यक्तियों को दो पुलिस वालों ने पकड़ लिया। महिला का शव जिला मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया गया। कपड़े के अन्दर शरीर से तब भी लपटें निकल रही थीं। महिला के कमरे का निरीक्षण किया गया। वहाँ बाहरी आग लगने के कोई चिन्ह नहीं मिले।
ये घटनाएँ बताती हैं कि मानवी सत्ता मात्र रासायनिक पदार्थों की नहीं बनी है उसमें प्राण ऊर्जा की प्रचण्डता भी विद्यमान है। यह विद्युत भण्डार सामान्यतया शरीर निर्वाह भर के काम आता है। इसका बहुत बड़ा अंश प्रसुप्त स्थिति में निरर्थक पड़ा रहता था। प्राणाग्नि के ऐसे असंख्य उपयोग हो सकते हैं जिनके सहारे मनुष्य अबकी अपेक्षा कहीं अधिक समर्थ वरिष्ठ सिद्ध हो सके।
सन्त त्यागराज की एक कविता है- मैनें एक नदी देखी, जो बाढ़ के द्वारा तटवर्तियों को उजाड़ने के उपरान्त वैभव गँवा बैठी और सूखकर बालू मात्र रह गई। एक दिन मैंने समुद्र देखा। वह गहरा भी बहुत था और जल सम्पदा से भरपूर भी पर वह ज्वार-भाटों में सिर पटकने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं कर पा रहा था। मैनें एक कुआँ देखा जो असीम संचय की लालसा से स्रोतों से जल खींचता, पर नियति उसका साथ न देती। नियति उसे निश्चित सतह से ऊपर उठने ही नहीं दे रही थी।
इन विडम्बनाओं को देखकर सोचता हूँ कि कहीं जीवन भी तो ऐसा ही मखौल नहीं है।
राज दरबार में एक बहरूपिया आये दिन बदल-बदल कर स्वाँग बनाकर जाया करता था। इनाम भी लाता।
राजा ने एक दिन कहा- ‘ऐसा स्वाँग बनाओ, जिसमें पहचाने न जाओ। ऐसा कर सकने पर एक स्वर्ण मुद्रा इनाम में मिलेगी।’
बहरूपिया वायदा करके चला गया। उसका फिर कुछ पता न चला। कुछ दिन बाद चर्चा फैली कि पास के जंगल में एक महात्मा आये हैं जिनकी तपस्या चकित करने वाली है। वे किसी का दिया कुछ लेते नहीं।
चर्चा राजा तक पहुँची। वे दर्शनों के लिए लालायित हो उठे। परिवार समेत वहाँ पहुँचे और बहुमूल्य भेंट पूजा साथ ले गये। साथ में सौ स्वर्ण मुद्रा भी थीं। तपस्वी को देखकर दंग रह गये। उसकी तितीक्षा, मौन साधना और निस्पृहता वैसी ही थी जैसी कि सुनी गई थी। राजा ने चरण रज मस्तक पर लगाई और बहुमूल्य भेंट सामग्री सामने प्रस्तुत की।
तपस्वी ने लेने से इंकार कर दिया और उसे गरीबों में बाँट देने का निर्देश किया। राजा इस दर्शन लाभ से अपने भाग्य को सराहते हुए वापस लौट आये।
दूसरे दिन बहरूपिया दरबार में पहुँचा और इनाम की एक स्वर्ण मुद्रा माँगने लगा।
राजा ने आश्चर्य से पूछा- ‘तुमने क्या स्वाँग बनाया?’ बहरूपिये ने अपने तपस्वी बनने की कथा कह सुनाई और उलट कर पूछा- आप मुझे पहचान तो नहीं सकें?
राजा ने वचनानुसार एक स्वर्ण मुद्रा दे तो दी, पर साथ ही यह भी पूछा- उस दिन जब इतनी बहुमूल्य भेंट सामग्री हमने प्रस्तुत की थी। उस दिन उसे क्यों लौटाया?
बहरूपिये ने कहा- ‘उस समय सन्त का वेष धारण किये था। उसे कलंकित नहीं करना था। उस आवरण को ओढ़ने के बाद सच्चा त्यागी ही शोभा देता है।’
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एक राजा कोढ़ी हो गया। वैद्यों ने उपचार बताया। राजहंसों का माँस खाया जाय। हंस मान सरोवर पर रहते थे। वहाँ तक कोई पहुँचता न था। साधु सन्तों की ही वहाँ तक पहुँच थी। कोई सन्त तो पाप कर्म के लिए तैयार न हुआ पर बहेलिया ने सन्त का बाना पहनकर वहाँ जाना और पकड़ना स्वीकार कर लिया।
मानसरोवर के हंस साधुओं से हिले रहते थे। उन्हें देखकर उड़ते नहीं थे। बहेलिया की बात लग गई और हंस पकड़ लिये। राजा के सामने प्रस्तुत कर दिये।
राजा सोच में पड़कर सन्त श्रद्धा से अभिप्रेत इन भावुक हंसों का स्वार्थवश वध करना अनुचित है। दया उमड़ी और हंसों को मुक्त कर दिया गया। राजा का दूसरा उपचार चलने लगा।
इस घटना का बहेलियों पर भी प्रभाव पड़ा। वे सोचने लगे जिस सन्त वेष के लिए हंसों तक में इतनी श्रद्धा है उसे ऐसे हेय प्रयोजनों के लिए कलंकित नहीं करना चाहिए। बहेलियों ने संन्यास ले लिया और वे सब सन्त बन गये।
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ईसा शिष्य मंडली के बीच विराजमान थे। उस दिन उनने एक किसान के बीज बोने की कथा सुनाई जिसमें से थोड़े ही उगे और सब नष्ट हो गये।
कुछ दानों को चिड़ियों ने चुग लिया। कुछ कड़ी धूप में झुलस गये। कुछ कीचड़ में सड़े और कुछ झाड़ियों के बीच पड़ने से धूप-रोशनी न मिलने से उगे ही नहीं। थोड़े-से वे पौधे ही बढ़े और फले जो उपयुक्त भूमि पर बोये और सावधानी के साथ सींचे रखाये गये थे।
ईसा ने कहा उपदेश और पूजा भी तभी फलित होती है जब साधक का चरित्र और चिन्तन भी उपयुक्त स्थिति में रहे और अनुकूलता उत्पन्न करने में योगदान करे।
वैरागी की तरह रहें। सन्त की तरह जिऐं। सम्पन्न जैसे उदार बनें और योद्धाओं जैसा जीवन अपनायें। प्रसन्नता और सफलता की कमी न रहेगी।
षट्चक्रों और 24 उपत्यिकाओं का वर्णन योग−विज्ञान में विस्तारपूर्वक किया गया है। दिव्य शक्तियों के भाण्डागार के रूप में इनका निरूपण हुआ है। सृष्टा ने अमोघ शक्तियाँ बीज रूप में अपने युवराज मनुष्य को प्रदान की हैं। साथ ही उन्हें छिपाकर भी रखा है। प्रसुप्त स्थिति में रहने दिया है ताकि आवश्यक परिपक्वता पात्रता विकसित होने पर ही वह इन्हें उपलब्ध कर सके और सही समय पर सही रूप में उपलब्ध कर सके।
षट्चक्रों को आत्मिक शक्तियों का भण्डार माना गया है। सातवाँ सहस्रार है। यह सप्तलोक है। यह लोक एक से एक ऊपर है। इनकी विभूतियाँ सिद्धियाँ भी एक के बाद दूसरे में अधिक हैं। इन्हीं पर चढ़ते हुए आत्मा परब्रह्म तक पहुँचता और पूर्णता को प्राप्त करता है। यह षट्चक्र स्थूल शरीर में नहीं वरन् सूक्ष्म और कारण शरीरों में है। उन्हें इन्द्रियों या उपकरणों की सहायता से नहीं देखा जा सकता।
इसके अतिरिक्त अध्यात्म विज्ञान के अनुसार 24 उपत्यिकाओं का उल्लेख है। इन्हें गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों के साथ जोड़ा गया है। इन्हें 24 देवता, 24 ऋषि, 24 अवतार भी कहा गया है। यह स्थूल शरीर में विद्यमान रहस्य भरी ग्रन्थियाँ हैं जिन्हें प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। कुछ समय पूर्व तक इनके सम्बन्ध में विशेष जानकारी नहीं थी। वे माँस क्षेत्र में अवस्थित साधारण सी फुटकियाँ मानी जाती हैं। ऐसी और भी कितनी ही हैं। गर्दन के आसपास उनकी भरमार है। कभी-कभी वे फूल या सूज जाती हैं तब मुसीबत पैदा करती हैं। गलगंड, कन्ठमाला, विषवेल आदि नामों से इनका विकृत स्वरूप प्रसिद्ध है। उनके निवारण के लिए सेंक, लेप, आपरेशन जैसे उपचार काम में लाये जाते हैं।
उपत्यिकाओं में से कुछ का विशेष विवरण थोड़े समय पूर्व ही प्राप्त हुआ है। इनमें से जो भली प्रकार जानी जा सकीं उन्हें अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ कहा जाता है। इनमें से विशेष प्रकार के स्राव अत्यन्त स्वल्प मात्रा में निकलते हैं और वे अपने ढंग से रक्त में मिल जाते हैं। इन स्रावों की न्यूनाधिकता तथा उत्कृष्टता-निकृष्टता के ऐसे विचित्र परिणाम होते हैं जिन्हें देखते हुए आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
शरीर में अनेक प्रकार के स्रावों और शोषक किण्वकों की व्यवस्था है। पाचन प्रक्रिया को समग्र बनाने के लिए मुख से, आमाशय से, यकृत से, आँतों से कितने ही प्रकार के स्राव निकलते हैं। दिन-रात में उनका परिणाम भी काफी हो जाता है। जबकि अंतःस्रावी ग्रन्थियों के स्राव, जिन्हें हारमोन कहा जाता है नगण्य-सी मात्रा में निकलते हैं। इतने पर भी वे इतने अद्भुत परिणाम प्रस्तुत करते हैं जिन्हें देखते हुए उन्हें जादू के पिटारे से उपमा दी जाती है। मनुष्य विशेषताओं की कितनी विशेषताओं को घटाने और बढ़ाने में इनका असाधारण योगदान होता है। पतलापन, मोटापा, लम्बाई बौनापन आदि विचित्रताओं में यह हारमोन ही जादू की छड़ी घुमाते रहते हैं। प्रजनन अवयवों की निष्क्रियता सक्रियता में इनकी अद्भुत भूमिका रहती है। इन्हें के व्यतिरेक लिंग परिवर्तन के घटनाएँ भी होती रहती हैं।
हारमोन ग्रन्थियों में अभी थोड़ी सी ही विदित हो सकी हैं। किन्तु सम्भावना अभी औरों के भी प्रकाश में आने की है। कभी सूर्य, चन्द्र दो ही आकाश के अधिष्ठाता थे। पीछे नवग्रहों का पता चला। अब उनमें प्लेटो, नेप्च्यून, यूरेनस भी शामिल हो गए हैं। अनुसंधान की इतिश्री नहीं हुई है और सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों की शृंखला पर नया प्रकाश पड़ता जा रहा है और उनकी संख्या तथा स्थिति की जानकारी मिल रही है। अंतःस्रावी ग्रन्थियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। कभी उन्हें पुरुष के अण्डकोश और नारी के स्तन के रूप में ही समझा जा सकता था। पीछे शुक्राणुओं और डिम्बकोशों की थैलियाँ भी प्रजनन प्रयोजन की आन्तरिक उथल-पुथल में भाग लेती देखी गई। अब इन्हें अंतःस्रावी ग्रन्थियों के रूप में खोज निकाला गया है। इनमें से छह प्रमुख मानी गई हैं। उनकी गतिविधियों की रूपरेखा भी बहुत कुछ स्पष्ट हो चुकी है।
इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि जो जाना गया है वह अन्तिम है। अभी उस शृंखला में और भी कितनी ही कड़ियाँ जुड़ने की सम्भावना है। आशा की जानी चाहिए कि वह दिन दूर नहीं जब रहस्यों पर से पर्दा उठता जायेगा और उन 24 उपत्यिकाओं पर प्रकाश पड़ेगा जो विज्ञात अंतःस्रावी ग्रन्थियों के ही समतुल्य सशक्त सिद्ध होगी वरन् उनसे भी बढ़ी-चढ़ी रहस्य भरी भूमिकाएँ सम्पन्न कर रही है।
शरीर की गतिविधियों के संचालन में कभी हृदय, यकृत, आमाशय, आँत, गुर्दे आदि को ही सब कुछ माना जाता था और इन्हीं के सही रहने पर आरोग्य निर्भर माना जाता था। पर अब बारीकियों में उतरने की सुविधा हुई है तो रुग्णता दुर्बलता के कारण उन सूक्ष्म संस्थान भी खोजे जाने लगे हैं जिनकी कुछ समय पहले तक चिकित्सकों को कोई खास जानकारी न थी।
उपत्यिका विज्ञान के अनुसार अंतःस्रावी प्रणाली शरीर के सभी प्रमुख क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। इसके अन्तर्गत शरीर का विकास, प्रजनन, पोषण, रोग के विरुद्ध रक्षात्मक व विभिन्न परिस्थितियों में अनुकूलता स्थापित करने की क्षमता विद्यमान है। शरीर की उत्तम क्रियाकलापों हेतु सभी वाहिनी ग्रन्थियाँ सुसंचालित होनी चाहिए।
वैज्ञानिक अब तक इस अंतःस्रावी प्रणाली को समझने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि इससे स्रवित होने वाले रासायनिक तत्व इतने अल्प मात्रा में होते तथा इतनी शीघ्रता से क्षरित होते हैं कि उनका जैव रासायनिक विश्लेषण अत्यन्त कठिन होता है।
पुरुष प्रजनन अंतःस्रावी प्रणाली में प्रमुख ग्रन्थि तथा टेस्टिस होती है। गोनेड्स (टेस्टिस) की दो प्रमुख क्रियाएँ है- शुक्राणु कोश की रचना तथा पुरुष यौन हारमोन एन्ड्रोजन्स को स्रवित करना, जो पुरुष की सहायक यौन विशेषताओं को प्रकट करता है। दाढ़ी व छाती पर के बाल, गम्भीर आवाज, लम्बी अस्थियाँ व पेशियाँ बालक को मनुष्य के रूप में परिवर्तित कर डालती हैं।
नारी प्रजनन विशेषताओं का भी नियन्त्रण अंतःस्रावी प्रणाली द्वारा होता है, जो नर की तुलना में अधिक जटिल होता है। सहायक यौन विशेषताओं के साथ-साथ नारी का मासिक धर्म तथा गर्भधारण प्रक्रिया भी हारमोन्स से प्रभावित होता है। स्त्रियोचित कोमलता भी इसी पर निर्भर करती है। इसी प्रकार यौवनारम्भ के समय इस्ट्रोजन्स नारी में स्तन के विकास, मासिक धर्म की शुरुआत तथा अन्य मादा विशेषताओं को प्रकट करते हैं।
एड्रीनल मेडुला अर्थात् एड्रीनल ग्रन्थि का आन्तरिक हिस्सा दो मुख्य हारमोन एड्रीनेलिन व नॉर-एड्रीनेलिन को उत्पन्न करता है। यह व्यक्ति को भागने अथवा युद्ध करने में प्रयुक्त करता है। क्रोध अथवा भय, दुर्घटना, दर्द अथवा रक्तस्राव तथा अधिक तापमान की स्थिति में ये हारमोन्स सामान्य अवस्था की तुलना में एक हजार गुना अधिक उत्पन्न होता है तथा रक्त में वितरित होकर अंगों ऊतकों को आपत्तिकालीन स्थिति में तत्पर होने का संकेत देता है।
वैज्ञानिक अब यह बताते हैं कि व्यक्ति में आक्रामक प्रवृत्ति का निर्धारण एड्रीनेलिन एवं नारएड्रीनेलिन के अनुपात के ऊपर आधारित होता है। एक दब्बू व्यक्ति में एड्रीनेलिन रसस्राव कम होता है तथा आक्रामक व्यक्ति में नार एड्रीनेलिन की मात्रा कम होती है।
गले के निचले हिस्से में स्थित है। इस हारमोन की समुचित मात्रा के अभाव में व्यक्ति मानसिक दृष्टि से मन्द सुस्त व कमजोर होता है। उसकी चयापचय प्रक्रिया भी कमजोर हो जाती है। हृदय की गति मन्द पड़ जाती है। इसके विपरीत थाइराइड हारमोन्स के अधिक स्राव से हृदय की गति तीव्र हो जाती है, चयापचय दर बढ़ जाता है, अधिक भूख लगने लगती है, मानसिक दृष्टि से अत्यन्त विचलित होता है।
पीनियल ग्रन्थि जो मस्तिष्क में स्थित है, एक अत्यन्त अद्भुत ग्रन्थि है। इसे व्यक्ति का तृतीय नेत्र तथा आत्मा का स्थान बताया जाता है। पिट्यूटरी ग्रन्थि से विकास हारमोन्स का नियन्त्रण होता है। यह ऊतकों के विकास में सहायक होता है। इस हारमोन की कमी से व्यक्ति नाटा और अधिक स्राव से लम्बे कद का होता है।
अंतःस्रावी ग्रन्थियों के स्रवित होने वाले रसायनों में ऐसी क्या विशेषता है जो मनुष्य के स्वभाव, स्तर, विकास एवं शरीर को असाधारण रूप से प्रभावित करती है। इसका कारण अभी ठीक से नहीं जाना जा सका। उपलब्ध जानकारियों से इतना भर पता चलता है कि वे शरीर को, उसके प्रकट और अप्रकट अवयवों को प्रभावित करती हैं। स्वभाव और व्यक्तित्व को उठाने-गिराने में सहायक होती है। किन्तु ऐसा क्यों होता है? इस स्रावों में ऐसी क्या विशेषता है? इस सम्बन्ध में किसी सुनिश्चित निष्कर्ष तक पहुँच सकना सम्भव नहीं हुआ। जो कहा जाता है उसे अनुमान पर ही आधारित समझा जाना चाहिए।
अध्यात्म विज्ञान के सूक्ष्म दर्शियों ने इन रहस्य संस्थानों की विशिष्टता को बहुत पहले ही समझ लिया था और उन्हें उपत्यिका नाम देकर यह प्रयत्न किया था उन्हें ध्यानयोग एवं साधना विधानों के माध्यम से नियन्त्रित, परिमार्जित एवं उत्तेजित करने में सफलता प्राप्त की जाय और उस आधार पर शरीर को वैसा बनाया जाय जैसा कि अभीष्ट है।
चक्र की साधना, कुण्डलिनी विज्ञान के अन्तर्गत आती है। वह चेतना क्षेत्र की प्रतिभा, प्रखरता एवं उत्कृष्टता को बढ़ाने के लिए प्रयुक्त की जाती है। उपत्यिका साधनाओं का क्षेत्र इससे कुछ हटकर है। उन्हें स्थूल शरीर को परिष्कृत बनाने के लिए जागृत एवं समुन्नत किया जाता है। इसके लिए आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा, जप, ध्यान जैसे कृत्यों का अवलम्बन लिया जाता है।
अंतःस्रावी हारमोन ग्रन्थियों के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए शरीर-संरचना की बारीकियों को समझने वाले अब इस खोज में हैं कि खोज को और आगे बढ़ाया जाये। सभी उपत्यिकाओं के स्थान, स्वरूप एवं क्रियाकलाप को इस प्रकार समझने-समझाने का प्रयत्न किया जाये, जिससे प्रत्यक्षवादियों की भी वस्तुस्थिति समझने में कठिनाई न हो। समग्र अरोग्य के इच्छुकों को अब यह आवश्यकता अनुभव होने लगी है कि खाद्य-औषधियों के सहारे रक्त-माँस को प्रभावित करने की प्रचलित चिकित्सा पद्धति में नया अध्याय जोड़ा जाय और देखा जाय कि उपत्यिका संस्थान को प्रभावित करके शरीर और मस्तिष्क की निरोगता एवं समर्थता से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान किस प्रकार किया जा सकता है।
पौधों को संवेदनशील सिद्ध करने वाले जगदीश चन्द्र बसु अपने प्रतिपादन को सही सिद्ध करने के लिए इंग्लैण्ड गये। उनका प्रदर्शन वैज्ञानिकों की भरी सभा में होने वाला था। एक पौधे को इन्जेक्शन लगाकर वे उस विष के कारण पौधे पर होने वाली प्रतिक्रिया सिद्ध करना चाहते थे।
इन्जेक्शन लगाया गया। पर पौधे को कुछ नहीं हुआ। वह जैसे का तैसा बना रहा। इस पर आत्मविश्वासी बसु ने कहा- यदि पौध पर यह इन्जेक्शन काम नहीं कर सकता तो मेरे ऊपर भी नहीं करेगा। यह कहकर इसी जहर की दूसरी सुई अपनी बाँह में लगा ली सभी स्तब्ध थे। जहर का इन्जेक्शन लगाने पर क्या दुर्गति हो सकती है यह सभी जानते थे।
बसु को भी कुछ नहीं हुआ। इस पर इन्जेक्शन की जाँच पड़ताल की गई। पता लगा कि गलती से विष के स्थान पर निर्विष इन्जेक्शन का प्रयोग हो गया है।
दूसरी बार सही सुई लगाई गई। पौधे पर तत्काल प्रतिक्रिया हुई। अपनी खोज वे पूरी गम्भीरता पूर्वक करते थे और प्रतिपादन से पूर्व प्रमाणिकता की भली-भाँति जाँच−पड़ताल कर लेते थे। आत्म-विश्वास इसी कारण उपलब्ध हुआ था।
यों हर व्यक्ति का अस्तित्व पृथक-पृथक है। रक्त माँस आदि का स्वरूप एक जैसा दिखने पर भी उनके रासायनिक पदार्थों में न्यूनाधिकता पाई जाती है। इसी आधार पर आकृति और प्रकृति की भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। सृष्टा के काल-कौशल का यह एक अद्भुत प्रयोग है कि एक ढाँचे में उसने किसी भी घटक को नहीं ढाला। सबसे थोड़ा बहुत अन्तर रहता है। एक ही पेड़ की पत्तियाँ मोटी दृष्टि से देखने में एक जैसी लगती हैं पर बारीकी से देखने पर उनमें से हरेक के बीच अन्तर पाया जाता है।
भेड़ें एक जैसी लगती हैं। अजनबी के लिए उनमें अन्तर करना कठिन है, किन्तु बड़ेरिया अपने झुण्ड की हर भेड़ का अन्तर पहचानता है। उनमें सके कोई किसी अन्य के झुण्ड में जा मिले तो उससे सहज ही पहचान कर पकड़ निकालता है। मनुष्यों की आकृति और प्रकृति के सम्बन्ध में भी यही बात है। सर्वथा एक जैसे कोई दो कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होते। कितने ही समान क्यों न लगते हों पर अन्तर अवश्य रहेगा। हाथ के अंगूठे की छाप लेने के पीछे भी यही कारण है कि संसार में किन्हीं भी दो व्यक्तियों के अंगूठे की त्वचा पर रहने वाली लकीर एक जैसे आकार−प्रकार की नहीं होती।
इतने पर भी कभी-कभी संयोगवश ऐसे लोग मिलते हैं, जिनके बीच असाधारण साक्य पाया जाता है। न केवल उनके स्वरूप एवं स्वभाव में समानता होती है। वरन् कई बार तो उनके साथ घटित होने वाले घटनाक्रम भी इस प्रकार साम्य लिए होते हैं कि उस कथन पर सहज विश्वास नहीं होता और इस संयोग का कारण समझ में नहीं आता। फिर भी जो प्रत्यक्ष है उसे झुठलाया भी कैसे जाय? ऐसे प्रसंग कई बार अनबूझ पहेली जैसे जटिल प्रतीत होते हैं। ऐसे विचित्र संयोगों की घटनाओं में कुछ का विवरण प्रामाणिक उल्लेखों में इस प्रकार मिलता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति थामस जेफर्सन ‘डिक्लेरेशन ऑफ इन्डिपेन्डेन्स’ पुस्तक के प्रख्यात लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त है और जान आदम्स उनके मुख्य शिक्षकों में से एक थे। आदम्स यूनाइटेड स्टेट्स के द्वितीय राष्ट्रपति चुने गये और जेकर्सन तृतीय राष्ट्रपति बने। इन दोनों व्यक्तियों की प्रगाढ़ आत्मीयता बेमिसाल थी। दोनों महान विभूतियों की मृत्यु 50 वर्ष की आयु में 4 जुलाई 1826 को हुई। जेफर्सन की वह इच्छा सदैव बलवती बनी रही कि वह आदम्स के साथ निरन्तर घनिष्ठतम सम्बन्ध बनाये रहें। अपने अन्तिम क्षणों में जेफसर्न ने उपस्थित लोगों से यही पूछा था- क्या आज चौथी तारीख है।
राष्ट्रपति जान आदम्स 1801 में अपने सामाजिक जीवन से अवकाश ग्रहण कर चुके थे, फिर भी वे राष्ट्रपति जेफर्सन से अपने अन्तिम दिनों तक जीवन सम्पर्क बनाये रहे। जीवन के अन्तिम क्षणों में उनके वाक्य थे। जेफर्सन सुनिश्चित रूप से जीवित होंगे। हम साथ-साथ जाएँगे। और सचमुच उनका हमसफर 5 घन्टे बाद मृत्यु को प्यारा हुआ।
25 जुलाई 1900 में इटली के राजा अम्बेर्टो प्रथम अपने परिसहायक जनरल एमीलिओ पोन्जिओ वैग्लिया मिलान शहर से कुछ मील दूर स्थिति मोन्जा नामक कस्बे में पहुँचे। अगले दिन वहाँ उन्हें खिलाड़ियों को पुरस्कार वितरण करना था। रात्रि के समय राजा अपने सहायक के साथ एक रेस्टोरेन्ट में भोजन करने गये। रेस्टोरेन्ट के मालिक को आर्डर देते हुए अम्बेर्टो ने बताया कि एक ही नाम और शकल सूरत में दो व्यक्ति अलग हैं। दोनों का जन्म एक ही दिन एक ही समय में 14 मार्च 1844 को एक ही कस्बे में हुआ था और दोनों के नाम अम्बेर्टो रखे गये थे। दोनों का विवाह 22 अप्रैल 1868 के दिन मार्थेरिता नाम की दो अलग-अलग लड़कियों के साथ सम्पन्न हुआ। दोनों को एक-एक पुत्र हुआ जिनका नाम विक्टोरियो रखा गया। जिस दिन राजा अम्बेर्टो का राज्याभिषेक हुआ ठीक उसी दिन दूसरे द्वितीय अम्बेर्टो ने अपना रेस्टोरेन्ट खोला।
जुलाई 1900 में जिस दिन अम्बेर्टो मोन्जा के उस रेस्टोरेन्ट में ठहरे थे उसी दिन एक हत्यारे ने गोली चला कर रेस्टोरेन्ट मालिक अम्बेर्टो की हत्या कर दी। रेस्टोरेन्ट मालिक के दाह संस्कार में भाग लेने गये राजा अम्बेर्टो भी एक अज्ञात हत्यारे की गोली का निशाना बन गये और वहीं उन्होंने दम तोड़ दिया। दोनों की शव यात्रा साथ-साथ निकाली गयी।
1979 में रीडर डाइजेस्ट के जर्मन संस्करण ‘दास बेस्टे’ ने एक प्रतियोगिता आयोजित की। विषय था- दास वेस्टे के पाठकों द्वारा निजी अनुभवों से सम्बन्धित सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ प्रेषित करना। पुरस्कार वितरण का समय 6 दिसम्बर को रखा गया।
सम्पादक के पास लगभग 7000 कहानियों का पुलिन्दा एकत्र हो गया जिनमें से म्यूनिख के वायुयान चालक वाल्टर केल्नर की कहानी को सर्वश्रेष्ठ कहानी के रूप में चुना गया। वाल्टर की उनके अपने जीवन में घटित घटना से सम्बन्धित थी। वाल्टर का जहाज- सेसना- 421, 10000 फीट गहरे टाइरेनियन समुद्र में गिर कर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। दैवयोग से वाल्टर रबर की एक डोंगी पर सवार होकर सुरक्षित समुद्र से निकल आये थे। पुरस्कार वितरण के समय वाल्टर उस डोंगी को अपने साथ लेकर सम्पादक के कार्यालय पर उपस्थित हुए। उसी समय आस्ट्रिया के वाल्टर केल्नर नाम के दूसरे पायलट ने उस पुरस्कार पर अपना अधिकार जाहिर किया। उसे भी उसी कहानी के लिए उक्त आवश्यक का पत्र मिला था। दोनों पायलट थे और एक ही नाम व नम्बर के जहाज लेकर उड़ानें भरते थे। दोनों के वायुयान टाइरेनियन समुद्र में एक ही ऊँचाई से गिरकर एक ही स्थान पर डूबे थे। दोनों के चालकों को वायुयान की इंजन की बराबरी के कारण विवश होकर नीचे सारडिनिआ के पास समुद्र में उतारने पड़े थे। दोनों ही भाग्यशाली थे और इस विचित्र संयोग के आधार पर दोनों को पुरस्कृत किया गया।
सन् 1975 की एक घटना है। इन्स्टेबल, बेडफोर्ड इंग्लैण्ड के मेल्किस नामक भवन में एक परिवार के सभी सदस्य इकट्ठे थे। अचानक छत को तोड़ता हुआ बर्फ का एक बहुत बड़ा टुकड़ा नीचे फर्श पर आ गिरा। खोज करने पर मालूम हुआ कि सभी व्यक्तियों के मन में ठीक उसी समय तीव्र गर्मी के कारण बर्फ खाने की इच्छा हो रही थी।
16 वर्षीय फ्रैंज रिचर आस्ट्रियन ट्रांसपोर्ट कोर में कर्मचारी था। प्रथम विश्वयुद्ध के समय प्रस्तुत विषाक्त वातावरण से उसे न्यूमोनिया हो गया और अस्पताल की शरण लेनी पड़ी। उसी अस्पताल में फ्रैंज रिचर नाम का एक दूसरा रुग्ण व्यक्ति भी भर्ती था। उसकी उम्र 19 वर्ष ही थी और वह भी न्यूमोनिया से पीड़ित था। वह नवयुवक भी ट्रांसपोर्ट कोर में ही कर्मचारी था। दोनों युवक साइलेशिया के रहने वाले थे।
40 वर्ष पूर्व ओहियो शहर में एक दम्पत्ति के यहाँ समान रूप रंग के दो जुड़वा बच्चों ने जन्म लिया। बाल्यावस्था में ही दोनों अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा गोद ले लिए गये। 39 वर्ष बाद 1979 में वे फिर से मिले। खोज करने पर पाया गया कि दोनों के नाम जेम्स थे और दोनों ने मेकेनिकल ड्राईंग और कारपेन्ट्री में डिप्लोमा ले रखा था। दोनों की पत्नियों का नाम लिष्डा था और दोनों को एक-एक पुत्र था, जिनके नाम क्रमशः जेम्स एलन और जेम्स एलन था। दोनों ने अपनी पत्नियों को तलाक देकर दूसरा विवाह किया। संयोग से दोनों की नव विवाहिताओं का नाम बेट्टी था। दोनों के पास ‘टाय’ नामक एक-एक कुत्ता था। दोनों पीटर्सबर्ग, फ्लोरिडा में निवास कर रहे थे। यों दोनों के बीच कोई नियमित सम्पर्क या स्नेह सम्बन्ध या आदान-प्रदान का सिलसिला नहीं चला तो भी इस प्रकार के अद्भुत साम्य का घटनाक्रम घटित हुआ।
20 अप्रैल 1978 के ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ में एक ही नाम की दो महिलाओं की कहानी प्रकाशित हुई थी। दोनों का नाम वान्डामेरी जान्स था। इनमें से एक महिला एडेल्फी, मेरीलैण्ड, प्रिंस जार्ज काउन्टी की रहने वाली है और इस समय वाशिंगटन के यूनियन स्टेशन में वैगेज क्लर्क हैं। दूसरी महिला सूइटलैण्ड, मेरीलैण्ड प्रिंस जार्ज काउन्टी की रहने वाली और वाशिंगटन के डी.सी. जनरल हास्पिटल में नर्स का काम कर रही है।
दोनों वान्डा मेरी का जन्म 15 जून 1956 को वाशिंगटन शहर में हुआ था और दोनों ही इस शहर को छोड़कर प्रिंस जार्ज काउन्टी चली गई। दोनों के दो-दो बच्चे हैं जिनका जन्म एक ही अस्पताल में हुआ। दोनों महिलाओं के पास अपनी-अपनी फोर्ड कार हैं, जिनका नम्बर भी 11 की संख्या में अन्तिम तीन अंकों को छोड़कर समान है।
ऐसी घटनाएँ यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि सृष्टि के अन्तराल में कोई ऐसा सूत्र है, जो प्राणियों को एक-दूसरे के साथ बाँधने के अतिरिक्त उनके बीच समानता ही नहीं एकात्मता के भी सूत्र जोड़ता है। स्वभाव और व्यक्तित्व की दृष्टि से तो कितने ही लोगों के बीच बहुत कुछ समता पाई जाती है। सन्त सज्जनों भी अपने समुदाय होते हैं और दुष्ट दुरात्मा भी अपनी खलमंडली जुटा लेते हैं। यह समीपता संगठन स्वभाव साक्य के आधार पर ही बन पड़ती है। यह साधारण बात हुई। विशेषता का आरम्भ वहाँ से होता है, जहाँ दो व्यक्तियों के मध्य घटनाक्रम भी एक ही प्रकार से घटित होता और जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए विशेष प्रसंगों में आश्चर्यजनक साक्य संयोग बिठा देता है।
जुड़वा बच्चों के बीच कई बार असाधारण समता पाई जाती है। उनकी जीवनचर्या का तारतम्य भी एक जैसा चलता है। इसका कारण एक ही माता के उदर से एक ही समय एक ही ढंग से पालन होने को माना जाता है, पर जो लोग भिन्न स्थानों में जन्मे, उनके बीच साम्य संयोग का क्रम कैसे चला? इसका समाधान इसी प्रकार होता है कि प्रकृति माता की उदर गुहा में भी कुछ अदृश्य परिपालन में असाधारण समीपता और घनिष्ठता जुड़ी हो सकती है और वे एक ही उँगली में बंधे कई धागों द्वारा कई कठपुतलियों के नाचने जैसा दृश्य प्रस्तुत कर सकते हैं। यह संयोगवश होने वाले घटनाक्रम बताते हैं कि प्रयत्नपूर्वक भी ऐसे साम्य बनाये जा सकते हैं और एक ही व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व कइयों द्वारा किया जाना भी सम्भव हो सकता है।
सतयुग में वृषभाचल पर्वत सबसे ऊँचा और दुर्लघ्य माना जाता था। चक्रवर्ती राजा वह माना जाता जो उस पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर चढ़ने और वहाँ अपना नाम लिखने में सफलता प्राप्त करता।
चिरकाल में कोई चक्रवर्ती बना न था। इस बार सप्त भूखण्डों पर विजय प्राप्त करके राजा भरत चक्रवर्ती बन रहे थे। पुरातन निर्धारण के अनुसार वृषभाचल के सर्वोच्च शिखर पर उन्हें अपना नाम अंकित करना था।
दुर्गम यात्रा का सरंजाम जुटाया और चढ़ाई करते-करते सोचने लगे कैसे सौभाग्यशाली हैं वे, जो इस पुरुषार्थ का कीर्तिमान स्थापित करेंगे।
नियत स्थान पर पहुँचे तो स्तब्ध रह गये। उस शिखर पर कोई स्थान ही खाली न था। पूर्ववर्ती चक्रवर्तियों के नामावली से वह शिखर पूरी तरह घिरा हुआ था।
भरत का गर्व गल गया और सोचने लगा इस संसार में न जाने कब-कब क्या-क्या होता रहा है। सर्वोच्च कहलाने का अहंकार निरर्थक है।
व्यावहारिक जीवन में मनुष्य एक-दूसरे की सहायता करते रहते हैं। इस सहकारी प्रवृत्ति के कारण ही मनुष्य बुद्धिमान बना और प्रकृति सम्पदा पर आधिपत्य कर सका है। सर्वथा एकाकी मनुष्य तो निजी सामर्थ्य को देखते हुए अन्यान्य प्राणियों से भी गया-बीता और दुर्बल असमर्थ सिद्ध होता है। सहकार ही स्वभावगत वह वैभव है, जिसका अभ्यास होने के कारण मनुष्य क्रमशः अधिक ऊँचा उठता और आगे बढ़ता चला गया है।
मनुष्यों में से जो जितने घटिया हैं, वे उतने ही संकीर्ण स्वार्थपरता से ग्रसित देखे जाते हैं, उन्हें अपने काम से काम एवं अपने मतलब से ही मतलब रहता है। दूसरों का दुःख दर्द समझने और उदार सहकार देने जैसी भावना उठती ही नहीं, सूझ जगती ही नहीं। ऐसे में कोई दुःखी जरूरतमन्द है या नहीं- यह सोचने-देखने की उन्हें फुरसत ही नहीं होती। किन्तु सभी ऐसे नहीं होते। बौद्धिक पिछड़ेपन की तरह यह भावनात्मक अधःपतन पाया तो अनेकों में जाता है, पर सब वैसे नहीं होते। अनेकों की प्रकृति में मानवी गरिमा के अनुरूप आत्मीयता एवं उदारता का भी बाहुल्य होता है और वे मिल-बाँटकर खाने की नीति पर विश्वास करते हैं। औरों का दुख बँटा लेने और अपना सुख बाँट देने की ललक जगी रहने से वे सेवा-साधना के अवसर ढूँढ़ते रहते हैं और जब भी, जहाँ भी सम्भव होता है अपनी उत्कृष्टता का परिचय देते हैं। सेवा धर्म अपनाने वालों को देवता कहा जाता है। देवोपम अन्तःकरण प्राप्त कर लेना मनुष्य का सर्वोपरि सौभाग्य माना गया है।
शरीर न रहने पर भी आत्मा का अस्तित्व अक्षुण्ण बना रहता है। मरण और जन्म के मध्य ऐसी ही स्थिति रहती है। इसमें प्रत्यक्ष पंच भौतिक कलेवर न रहने पर भी उनमें क्षमता विद्यमान रहती है, जिसके सहारे अपनी उदारता का परिचय दे सके और सेवा-साधना की दृष्टि रखकर दूसरों की सहायता कर सकें। ऐसी ही आत्माएँ देवता कहलाती हैं और ये अपनी स्थिति में रहते हुए भी लोक-कल्याण के लिए कुछ न कुछ करती रहती हैं।
कितने ही अवसरों पर किन्हीं-किन्हीं को अदृश्य सहायताएँ मिलती रहती हैं। इन्हें दैवी अनुदान या वरदान माना जाता है। ऐसी उपलब्धियाँ जिन्हें प्राप्त हुई हैं, उनके उदाहरण समय-समय पर सामने आते रहते हैं।
सन् 1837 की घटना है। बेल्जियम के पियरे डिरूडर नामक व्यक्ति का पैर पेड़ पर से गिरने के कारण टूट गया। हड्डी जुड़ी नहीं वरन् नासूर की तरह रिसने लगी। जख्म किसी तरह भरता ही न था। बड़ी कठिनाई से ही वे किसी प्रकार दर्द से कराहते पट्टी बाँधे थोड़ी दूर चल सकते थे। जहाँ से पैर टूटा था, वह जगह टेढ़ी-कुबड़ी हो गई थी। ऐसी स्थिति तक पहुँचे हुए मरीज को ठीक कर देने का वायदा किसी सर्जन ने भी नहीं किया।
निराश पियरे के मन में एक दिन उमंग उठी, वे सन्त लारेन्स की समाधि तक घिसटते-घिसटते पहुँचे। घुटने टेककर देर तक रोते और दिवंगत सन्त की आत्मा से सहायता की प्रार्थना करते हुए दिन भर बैठे रहे।
सन्ध्या होते-होते वापस लौटने का समय आया तो वे सामान्य मनुष्यों की तरह उठकर खड़े हो गये और सही पैर लेकर घर लौट आए। परिचितों में से किसी को भी इस घटना पर विश्वास न हुआ। प्रत्यक्ष देखने वालों की भारी भीड़ लगी रही। सभी की जीभ पर अदृश्य वरदान की चर्चा थी।
सन् 1945 में फ्रांस के राजा लुईस चौदहवें के विरुद्ध जनता ने विद्रोह कर दिया। 1702 में जगह-जगह गुरिल्ला युद्ध होने लगे। सेना नायक क्लैरिस नामक एक प्रोटेस्टैन्ट विद्रोही था। राजा का परास्त करने और अपने को वरिष्ठ, योग्य घोषित करने के लिए उसने अग्नि परीक्षा देने की बात कही।
लकड़ियों से ऊँची चिता बनाई गई और क्लैरिस भाव समाधि की स्थिति में उस पर चढ़कर खड़ा हो गया। चिता में आग लगा दी गई। धीरे-धीरे आग की लपटों ने क्लैरिस को चारों तरफ से घेर लिया और क्लैरिस मैदान में उपस्थित 600 लोगों की भीड़ को सम्बोधित करता रहा। लकड़ियाँ जलकर राख हो गईं। आग बुझ गई तब तक क्लैरिस का भाषण चलता रहा। क्लैरिस अग्नि परीक्षा में विजयी रहा। उसे आँच तक नहीं आई।
दक्षिण इटली के फोगिया कस्बे में एक दम्पत्ति के यहाँ नौ वर्षीय बालक जियावेनियो-लिटिल जान रीढ़ की बीमारी के कारण नन्हें बच्चों जैसा घिसट-घिसट कर हाथ-पैरों के बल चला करता था। एक दिन जियोवेनियो फोगिया की सड़कों पर घिसटता चल रहा था, अचानक उसे अपने पीठ पर दिव्य स्पर्श का अनुभव हुआ। नजर उठाकर ऊपर देखा तो बगल में पादरी पैड्रेपियो खड़े थे। कुछ पूछने से पहले ही पादरी चले गये और जियावेनियो कृतज्ञता से पादरी की कृपा को मन ही मन सराहता रहा। उसकी अपंगता दूर हो गई थी। उठ खड़ा हुआ और दौड़ता हुआ अपने घर आया। पादरी पैड्रेपियो की कृपा से वह कृतार्थ हो चुका था।
सन् 1881 के मध्य में कैप्टन नीलकरी अपने दो बच्चों के साथ लारा जहाज को लेकर लीवरपूल से सान फैन्सिस्को की ओर समुद्री लहरों के साथ आँख मिचौली खेलते गन्तव्य की ओर बढ़ते चले जा रहे थे। मैक्सिको की पश्चिमी खाड़ी से 1500 मील पूर्व लारा में आग लग गई। कैप्टन नील अपने परिवार तथा 32 अन्य जहाज कर्मियों के साथ जान बचाने के लिए लारा को छोड़कर तीन छोटी लाइफबोटों पर सवार हो गये।
लम्बी जलयात्रा तय करते हुए सभी व्यक्तियों को प्यास सताने लगी। दूर-दूर तक फैले अथाह समुद्र में पीने योग्य मीठे पानी का कहीं कोई चिन्ह नहीं दिखाई दे रहा था। प्यास के मारे 36 सदस्यीय यात्रियों में से 6 जहाजकर्मी बेहोश हो गये।
कैप्टन करी को निद्रा आ गई और स्वप्न में देखा कि पास में कुछ दूरी पर समुद्र के छोटे से घेरे में हरा पानी है जो पीने योग्य है। निद्रा भंग हुई और कैप्टन का जहाज हरे पानी पर तैर रहा था। थोड़ा-सा पानी एक वेसल में लेकर कैप्टन ने पिया तो पाया स्वप्न में देखे पानी से अधिक मीठा एवं स्वच्छ जल था। सभी ने पानी पिया और जीवन की सुरक्षा की। कैप्टन नील ने इसे एक समुद्री नखलिस्तान की संज्ञा दी यह कैसे किस प्रकार उन्हें उपलब्ध हुआ, इसकी पूर्वापर संगति बिठा सकने में कोई समर्थ नहीं था।
ऐसे अनुदान कभी-कभी किन्हीं को अनायास भी मिल जाते हैं, यह अपवादों की बात हुई। उनके पीछे निश्चित आधार यह है , कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व को वैसा बनाये जैसा देव वर्ग को प्रिय है। आत्म-परिशोधन की तपश्चर्या में तथा लोक-मंगल की सेवा-साधना में संलग्न ऋषि-कल्प व्यक्तियों को ऐसे अनुदान अपनी पात्रता के आधार पर विपुल परिमाण में उपलब्ध होते रहते हैं। ऐसे प्रमाणों की एक लम्बी शृंखला है। पात्रता विकसित की जा सके तो हर कोई दैवी अनुकम्पा पाकर अदृश्य जगत से लाभान्वित हो सकता है।
बगदाद के खलीफा हांस रसीद धर्मात्मा और उदार भी थे। कितने ही जरूरतमन्द उनके यहाँ पहुँचते और सहायता पाकर वापस लौटते। इतने पर भी वे पात्र कुपात्र का ध्यान रखते थे।
एक दिन नौजवान फकीर का बाना पहनकर खलीफा के पास धन माँगने पहुँचा। उनने कहा- एक दिन की भीख से क्या काम चलेगा। गुजारे का स्थायी समाधान बन सके तो क्या बुरा है। युवक इसके लिए प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गया। फकीर के पास एक बड़ा-सा पीतल का लौटा था हांस रसीद ने उसे माँग लिया और बेचा तो दो रुपये में बिका। एक रुपये की कुल्हाड़ी और एक रुपये का सत्तू उसे देते हुए कहा- “जंगल से लकड़ी काटो और बेचो। नसीहत के अनुसार काम किया गया। लकड़ी काटने बेचने का धन्धा अपनाकर फकीर उपासना भी करता रहा और स्वावलम्बी बनकर सम्मान पूर्वक दिन गुजारने लगा।
अन्तरिक्ष में दृष्टिगोचर होने वाली- चमत्कारी हलचलों को पिछले दिनों उड़न तश्तरियों का नाम दिया और उन्हें भूत की करतूत जैसे कौतुक कौतुहलों में गिना जाता रहा है। इनके अस्तित्व से तो इनकार नहीं किया गया और न दृष्टि भ्रम कहकर महत्वहीन ठहराया गया है फिर भी वैज्ञानिक यह अनुमान लगाते रहे हैं कि प्रकृति प्रवाह में उत्पन्न होते रहने वाले व्यक्तिक्रमों से भी ऐसा आभास हो सकता है।
अनुमानों का यह सिलसिला अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। प्रतिपादनकर्त्ता अपने अनुमानों के पक्ष में कितने ही तर्क प्रमाण प्रस्तुत करते रहते हैं फिर भी इस सम्भावना को सर्वथा अमान्य नहीं ठहराया गया कि यह लोकान्तर निवासियों का भूलोक वालों के साथ सम्पर्क स्थापित करने का प्रयास भी हो सकता है।
धरती वाले अन्तरिक्ष क्षेत्र में प्रवेश पाने और उस पर आधिपत्य करने से मिलने वाले लाभों को बटोरने के लिए तत्परतापूर्वक प्रयत्नशील है। इस दृष्टि से वे बड़ी राशि भी झोंकते और वैज्ञानिक परामर्शों के अनुरूप प्रचुर साधन जुटाने में भी जुआरी जैसे दाँव लगा रहे हैं। धरती अब मनुष्य की बढ़ती महत्वकाँक्षाओं की तुलना में कम पड़ती है। खारा समुद्र भी इतना वैभव प्रदान करने की स्थिति में नहीं जिससे बढ़ती संख्या और आकाँक्षा की पूर्ति हो सके। इस निमित्त आकाश को अधिक व्यापक और समृद्ध पाया गया है। अस्तु! उस क्षेत्र के अनुसन्धान और आधिपत्य के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा जा रहा है। इस दिशा में रूस और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा और सफलता के समाचार पढ़ने पर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है।
हो सकता है ऐसा ही उत्साह अन्य लोक वासियों में हो सकता है उन्हें ब्रह्माण्ड में पृथ्वी को विशेष स्थिति का परिचय मिला हो और वे कोलम्बस जैसा साहस जुटाकर यहीं उतरने तथा सम्बन्ध साधने की सम्भावनाओं का पता लगा रहे हों। हो सकता है उड़न तश्तरियों के पीछे ऐसा ही कुछ रहस्य हो।
उड़न तश्तरियों के रहस्य का सबसे बड़ा दृश्य पायलट केन अर्नोल्ड ने वाशिंगटन के समीप माउन्ट रैनर में देखा। तश्तरीनुमा 3 प्रकार के दृश्य उनको पर्वत के ऊपर घूमते हुए स्पष्ट दृष्टिगोचर हुये। घटना 1987 की है।
कोलोराडो विश्वविद्यालय के डाक्टर ऐडवर्ड यू. कंडन ने सरकारी सहयोग के आधार पर 1969 में “प्रोजेक्ट ब्लू बुक” नामक एक प्रकाशन में उड़न तश्तरियों के वैज्ञानिक अनुसंधान के कुछ आँकड़े प्रस्तुत किये।
सन् 1973 में उड़न तश्तरियों के वास्तविक तथ्यों को रहस्योद्घाटन हुआ है। म्युचुअल यू.एफ.ओ. नेटवर्क रिसर्च योजना के अन्तर्गत ओहियो में 750 घटनाओं का सविस्तार वर्णन किया गया है।
मार्च 1954 में तश्तरियों को रूप और अमेरिका के गुप्तचर विभाग के हथियार नहीं समझा जाने लगा। फ्रैन्क एडवर्ड ने वाशिंगटन में म्युचुअल ब्राडकास्टिंग योजना के अन्तर्गत 1 करोड़ ऐसे श्रोताओं को पत्र-व्यवहार किया जिन्होंने तश्तरियों के सम्बन्ध में कुछ सुना देखा। एक सप्ताह के भीतर बाक्स नम्बर 1855 में 6000 की संख्या में प्रामाणिक पत्र मिले। जिससे इन उड़न तश्तरियों का अस्तित्व समझ में आने लगा। 9 सितम्बर 1955 को हवाई सेना के कैप्टन ह्यू एमसीनैजे, जो कोलम्बिया (ओहियो) के निवासी हैं, ने उड़न तश्तरियों के सिद्धान्त की पहली बार पूरी तरह व्याख्या की।
23 अगस्त 1955 को एक घटना घटी। जेट विमान की आकृति की एक उड़न तश्तरी कोलम्बिया में ही 20 हजार फीट की ऊँचाई पर उड़ती हुई दृष्टिगोचर हुई। जो 12 मिनट तक एक ही स्थान पर यथावत् स्थिर बनी रही।
सन् 1957 में सिविल रिसर्च इन प्लेनेटरी फ्लाइंग आवजेक्ट ने ‘ओर्विट’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया। वस्तुतः इन प्रयासों ने आत्मा-परमात्मा की विलक्षणताओं के सम्बन्ध में तथ्यों का उद्घोष किया है। उसी तरह का एक और अनुसन्धान केन्द्र उड़न तश्तरियों की जानकारी हेतु बना जिसे नेशनल इनवेस्टीगेशन कमेटी और ऐरियल फैनोमिना के नाम से जाना जाता है। इसका प्रमुख कार्य मैरीमोन्ट हाईस्कूल में युफौलाजी (उड़न तश्तरी विज्ञान) की सायंकालीन कक्षाओं की व्यवस्था करना है जिससे हर व्यक्ति को इस विज्ञान की जानकारी मिल सके।
डॉ. हाइनेक की अध्यक्षता में अमेरिकी इन्स्टीट्यूट ऑफ ऐरोनौटिक्स एण्ड ऐस्ट्रोनाटिक्स की एक संयुक्त गोष्ठी 27 सितम्बर 1975 को लाज ऐन्जिल्स में सम्पन्न हुई, जिसमें यूफोलाजी विज्ञान के रहस्यों का सांगोपांग पर्यवेक्षण किया गया।
सुप्रसिद्ध ज्योतिर्विद् जैक्स बैली को हाइनेक के समतुल्य ही समझा जाता है। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेकानेक पुस्तकें लिखी हैं।उनकी अन्तिम पुस्तक डॉ. हाइनेक के सहयोग के आधार पर लिखी गयी है जिसका नाम है “दी इन विजिबुल कालेज”। इसमें उन्होंने उड़न तश्तरियों के विलक्षण रहस्यों को लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया है। “साइको फिजिकल नेचर ऑफ दी यूफो” विषय पर विस्तृत विवेचन करते हुए वैली ने विज्ञात तीन आयामों के अतिरिक्त कई अन्य आयामों का अस्तित्व सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। यह एक कपोल कल्पना नहीं है अपितु विज्ञान सम्मत सिद्धान्त है जिसे मान्यता भी दी जाने लगी है।
सबसे अलौकिक घटना लिंस वर्ग (ओहियो) की समझी जाती है। डैन रिचले नामक नवयुवक, जो ज्योतिष विद्या में अभिरुचि रखता था, ने 26 सितम्बर 1974 की रात्रि में 10 बजे आकाश की ओर से एक बहुत चमकीला प्रकाश देखा। इस घटना से भयभीत होकर लड़का अपने पिता वाल्टर रिचले की तरफ दौड़ा। प्रकाश इतना चमकीला था जितना कि 132000 मोमबत्तियों को जलाया जाय। एकाएक प्रकाश सफेद रंग से लाल होता गया और उनके नजदीक पहुँचने लगा। रिचले के साथ दो पालतू कुत्ते भी थे। कुत्तों ने यह दृश्य देखा तो एक की गर्दन झुकी ही रह गयी और दूसरा खड्डे में जा गिरा।
11 बजे डैन रिचले अपने कमरे में पढ़ने के लिए बैठा तो एक हैलिकाप्टर उसके दरवाजे पर उतरने लगा। उसकी ध्वनि बड़ी तेज थी। उसकी बहुत सी खिड़कियाँ चाँदी की लगी हुई देखी गईं। थोड़ी ही देर में डैन ने देखा कि उसके दरवाजे पर कोई भी वेहिकिल नहीं है। श्रीमान् रिचले ने सरकार से दावा किया कि इस विलक्षण घटना से जो क्षति उठानी पड़ी उसकी पूर्ति अविलम्ब की जाय। एन. ड्रफैल ने तत्काल “मिस्ट्रीज ऑफ हैलिकाप्टर” लिखी। फरवरी 1975 में इसी को “स्काईलुक” नाम दिया गया।
7 अगस्त 1970 को इथोपिया के सलाडेन गाँव में एक उड़न तश्तरी के गिरने से घर जल गये, पेड़ उखड़े, घास जली तथा सड़कें पिघलने लगीं। पत्थर के पुल चकनाचूर हो गये। 50 इमारतें बिलकुल समाप्त हो गयीं। आठ व्यक्ति बुरी तरह घायल हो गये और एक बच्ची को तो अपनी जीवन-लीला ही समाप्त करनी पड़ी।
डॉ. ऐरेन्को करेनूटो बोटा इटली के नागरिक हैं। उनकी आयु 50 वर्ष है। अप्रैल 1955 में सर्वप्रथम उन्होंने एक ऐसे अलौकिक दृश्य को बताया जो लोगों की आँखों को चकाचौंध कर देने वाला था। यह घटना होरेसियो गोंजाल्स सरासस की है। डॉ. वोटा ऐवान्स वार पायलट, ऐरोनॉटिक इंजीनियर थे। अब सरासस में आर्चीटैक्टचर इंजीनियर के पद को सम्भाल रहे हैं।
रोबर्ट सी. गार्डनर को उड़न तश्तरी विज्ञान का विशेषज्ञ माना जाता है। वे कैलीफोर्निया में ही प्रवक्ता एवं लेखक का कार्यभार सम्भालते हैं। उन्होंने तश्तरियों के अनेकों ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता।
कौमेट जेट लाइनर विमान की दुर्घटना सर्वविदित है। 2 मई 1953 को दमदम हवाई अड्डा कलकत्ता से इस विमान ने उड़ान भरी। 5 मिनट के बाद ही हवाई जहाज एक फेयरी हेवी बाडी उड़न तश्तरी से टकरा गया। विमान इतनी बुरी तरह से जला कि 53 यात्रियों की जीवन-लीला समाप्त हो गयी। रिकार्ड किये गये संवादों में इस दृश्य की पुष्टि होती है कि यह दो विमानों की टक्कर नहीं थी।
अमेरिका के 95 प्रतिशत लोगों का पूर्ण विश्वास है कि उड़न तश्तरियों के अस्तित्व को विस्मृत नहीं किया जा सकता। डेढ़ करोड़ अमेरिकावासी लोगों ने इन उड़न तश्तरियों को घूमते हुए स्पष्ट देखा है लेकिन वे उन घटनाओं को उल्लेख करने में असमर्थ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव श्री कुर्ट वाल्डहेम ने भी अपनी स्वीकृति प्रदान की थी और कहा था कि उड़न तश्तरियों के अस्तित्व को गलत साबित नहीं किया जा सकता।
ओटावा के पास नेशनल रिसर्च काउंसिल के अन्तर्गत ऐटमास्फीयरिक रिसर्च केन्द्र की स्थापना की गयी जो ऐसे दृश्यों के तथ्य उजागर कर सकने में सक्षम रहे।
धरातल, भूगर्भ, समुद्रतल की गहरी खोज-बीन करने के उपरान्त मनुष्य ने अन्तरिक्ष को खोजने और हथियाने के लिए कदम बढ़ाये हैं। उसके लिए उड़न तश्तरियाँ एक अनबूझ पहेली बन रही हैं। सोचने वाले यह भी सोचते हैं कि अन्तरिक्ष का क्षेत्र असीम है, उस पर सभी लोकान्तरवासियों का समान अधिकार है। धरती का मनुष्य उसे हथियाने की जिस अनाधिकार चेष्टा में प्रवृत्त है, उससे हो सकता है अन्य लोकों में खलबली मची हो और समय रहते निपटने के लिए उड़न तश्तरियाँ भेजना शुरू किया है।
राजा को दयालु कहलाने और दानवीर की प्रशंसा सुनने की ललक लगी। सो उसने एक दिन ऐसा निश्चय किया, जिस पर पक्षी पकड़ने वाले लोग दरबार में आयें और बन्दी पक्षियों के मूल्य लेकर उन्हें छोड़ दें।
राजा की दयालुता का यश फैला। निश्चय दिन पर हजारों पिंजड़े खाली होते और राज्य कोष से उन्हें धन मिलता। कीर्ति बढ़ती गई साथ-साथ पकड़े और छोड़े जाने वाले पक्षियों की संख्या भी।
एक मुनि मनीषी वहाँ पहुँचे। दृश्य देखा तो बहुत दुःखी हुए। पक्षी मुक्ति समारोह समाप्त होने पर मुनि ने राजा को समझाया। आपकी यश कामना इन निरीह पक्षियों को बहुत महँगी पड़ती है। लालच की पूर्ति के लिए असंख्यों नये बहेलिया पैदा हो गये हैं और पकड़े जाने के कुचक्र में अगणित पक्षियों को त्रास मिलता है। और प्राण जाता है। यदि दयालुता का प्रदर्शन नहीं, पालन अभीष्ट है तो आप पक्षी पकड़ने पर प्रतिबन्ध लगायें।
राजा ने अपनी भूल समझी और दयालुता का प्रदर्शन छोड़कर वह नीति अपनाई जिसमें वस्तुतः दया धर्म का पालन होता है। कई बार विरोध प्रतिबन्ध दयालु प्रदर्शन की अपेक्षा कहीं अधिक वास्तविक होता है।
रंगों को साधारणतया सौन्दर्य एवं सज्जा के निमित्त प्रयुक्त किया जाता है। उनके कारण सामान्य वस्तुएँ भी असाधारण एवं आकर्षक लगने लगती हैं। यही कारण है कि बिकने वाले कपड़ों में सफेद के स्थान पर रंगीन अधिक होते हैं। सज्जा के हर प्रयोजन में रंगों का उपयोग किया जाता है। इतने पर भी इस खर्चीले उपक्रम के बारे में यह रहस्य अभी सर्वसाधारण को विदित नहीं हो सका है कि उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ कितना गहरा सम्बन्ध है। अच्छा हो, इस जानकारी से सर्वसाधारण को अवगत कराया जाय और उस कारण होने वाले लाभ तथा हानि के सम्बन्ध में आवश्यक तथ्यों को सर्वसुलभ बनाया जाये।
मैक्सिको विश्वविद्यालय के खेल निर्देशकों ने रंगों का खिलाड़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव को जाँचने के लिए बहुत सिर खपाया है। उन्होंने खिलाड़ियों के कपड़े तथा फुटबाल जैसे उपकरणों को भिन्न-भिन्न रंगों में रंगवा कर यह देखा कि इसका हार जीत पर क्या कुछ प्रभाव पड़ता है। इस आधार पर किये गये परीक्षणों से पता चला कि रंग मात्र नेत्रों को ही सुरुचिपूर्ण कुरुचिपूर्ण नहीं लगते, वरन् उनका प्रभाव मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। फलतः हार-जीत के साथ उसका सम्बन्ध जुड़ता है। लाल रंग वाला पक्ष प्रायः शिथिल रहा, जबकि पीला रंग सफलता दिखाता रहा।
शिकागो के खेल निर्देशकों ने खिलाड़ियों की थकान उतारने के लिए रंग से कमरे पुतवाये और उनमें उन्हें ठहराया। मैदान में जाते समय उन्हें नारंगी रंग वाले कमरे में कपड़े बदलने और चाय पीने के लिए बुलाया जाता था। उससे उनमें स्फूर्ति और उत्तेजना का अनुपात बढ़ता पाया गया।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी रंग के प्रभाव रोगियों पर जाँचने के लिए बार-बार परीक्षण किये हैं। उनमें निष्कर्ष निकाला है कि जिन रोगियों को शान्ति एवं शीतलता की आवश्यकता थी, उनके लिए नीले रंग से पुते, नीले पर्दे रंगे कमरे अधिक लाभदायक सिद्ध हुए। मानसिक रोगियों को तो इससे विशेष रूप से राहत मिली।
काले या नीले रंग का प्रभाव जी मिचलाने, चक्कर आने, ऊब लगने जैसा देखा गया है। जिन जलयानों या वायुयानों के कमरे इन रंगों में रंगे थे, उन्हें परेशानी रही। किन्तु जब उनकी रंगाई बदल दी गई तो यात्री प्रसन्नता अनुभव करने लगे। उन्हें उन्हीं कमरों में अधिक अच्छा लगने लगा। पीला रंग विचार शक्ति और स्मरण शक्ति बढ़ाता देखा गया है। विद्यार्थियों के लिए तो वह विशेष रूप से उपयोगी होता है। बुद्धिजीवी वर्ग को विशेषतया हल्के पीले रंग के वस्त्रों तथा उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए। इससे वे उद्विग्न होने से बचे रहेंगे और एकाग्र रहने में सहायता मिलेगी।
रंगों के प्रभाव पर गम्भीर शोध करने वाले हावड फीच का कहना है कि- “उपयुक्त रंग हमें ताजगी, स्फूर्ति प्रदान करते हैं, जबकि अनुपयुक्त रंगों से उद्विग्नता उत्पन्न होती और थकान आती है। आहार में जो महत्व स्वाद का है, वह दृष्टि क्षेत्र में रंगों का। वे मात्र नयनाभिराम ही नहीं होते, वरन् शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी सीधा असर डालते हैं।”
कीच के प्रयोग प्रकाशन में कितनी ही ऐसी घटनाओं का उल्लेख है, जिससे रंगों की प्रभाव क्षमता पर प्रकाश पड़ता है। एक केन्टीन को उनने नीले रंग से पुतवाया, जिससे जलपान के लिए आने वाले आगन्तुक ठंडक लगने की शिकायत करने लगे। जब उसी केन्टीन को उसी ऋतु में नारंगी रंग से रंगवा दिया गया, तो ठंडक लगने की शिकायत दूर हो गई और ग्राहक ऋतु बदलने की चर्चा करने लगे।
एक कारखाने के मजदूर काले डिब्बे उठाने में उनके बहुत भारी होने की शिकायत करते थे। उठाते हुए जल्दी ही थकान भी अनुभव करते थे। पर जब वे पीले रंग से रंगवा दिये गये तो श्रमिकों ने बताया कि उनमें भार कम है और उन्हें ढोते रहने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती।
लॉस ऐन्जिल्स के डॉक्टर डा. ब्राइट हॉस ने अनेक विद्यार्थी पर उनकी शारीरिक क्षमता एवं बौद्धिक प्रखरता घटाने-बढ़ाने के रंगों का परिणाम जाना है। इसके लिए उन्होंने एक जैसी स्थिति के छात्रों को तीन वर्गों में बाँटकर उन पर लाल नीले और पीले रंग के प्रभावों को देखा। उनने पाया कि आलसी और मन्दबुद्धि वालों में उत्तेजना लाने के लिए लाल रंग अच्छा रहा, जबकि चंचल और आवेश ग्रस्त रहने वालों को नीले रंग से शान्ति मिली। पीले रंग की प्रतिक्रिया उन्होंने मध्यवर्ती पायी। मध्यवर्ग के विद्यार्थी अपनी कुशलता और प्रसन्नता में पीले रंग से अभिवृद्धि होने की बात कहते थे। अधिकाँश को वही रुचिकर भी लगा।
यह प्रयोग कामकाजी व्यापारी वर्ग के लोगों पर भी हुए। उनकी घड़ियाँ ले ली गई और कई रंगों के कमरों में बैठकर वार्त्तालाप करने के लिए उनके कई वर्ग योजनानुसार बिठा दिये गये। लाल रंग वाले कमरों में बैठकर बात करने वालों ने दो घन्टे काटे, पर उन्हें चार घन्टे जितने थकाने वाले लगे। उनमें गर्मी-गर्मी होती रही और किसी निष्कर्ष पर पहुँचे बिना ही उठ गये। उसके विपरीत नीले रंग वालों ने वार्ता के समय को वास्तविक के विपरित आधा बताया। साथ ही वे हँसते-मुस्कुराते बाहर निकले। उनने घनिष्ठता बढ़ाई और दुबारा ऐसे ही मिलन की आवश्यकता बताई। पीले रंग वाले कमरों को समय का अनुभव उतना ही हुआ, जितना कि वस्तुतः बीता था। उनने उतनी ही अवधि में कितनी ही समस्याएँ सुलझाई और कितने ही सौदे पक्के कर लिये। सभी सफलता पर प्रसन्न देखे गये।
एम.जी. हिब्बन ने अपने प्रयोगों में भोजन के रंगों का पाचन पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है। एक बहुमूल्य व्यंजनों वाले भोज में उनने रंगीन बल्ब इस प्रकार जलाये कि पदार्थों का रंग कुछ से कुछ प्रतीत होने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि मेहमानों की भूख मर गई। मन बदल गया और वे आधी झूठन छोड़कर उठ खड़े हुए। इसके विपरीत उन्होंने एक दूसरी पार्टी नियोजित की, जिसमें सामान्य मूल्य के पदार्थ परोसे गये, किन्तु रंगी प्रकाश ऐसा अच्छा था कि थालियाँ, कटोरियाँ जिन वस्तुओं से सजी थी वे सभी बहुमूल्य और सुस्वादु लगने लगीं। फलतः मेहमानों ने आशा से अधिक खाया और दावत की हर वस्तु को सराहा।
आमतौर से हल्के रंग ही अधिक उपयुक्त पड़ते हैं। गहरे रंगों की प्रतिक्रिया भी गहरी होती है, जो प्रतिकूल पड़ने पर कई बार अधिक हानिकारक भी सिद्ध होती है।
काला रंग गर्म इसलिए माना जाता है कि उसमें ताप सोखने की अधिक शक्ति है। थोड़ी-सी धूप में वह गर्म हो जाता है और उस गर्मी को देर तक अपने में धारण किये रहता है। ठंडे देशों या ठंडे मौसम में उसकी उपयोगिता हो सकती है, किन्तु गर्मी के दिनों में या गर्म देशों में उनका उपयोग हानिकारक ही होता है। मैल छिपाने, धोने के झंझट से बचने के लिए तो गहरे रंगों का उपयोग करना भी बुरा है। इससे गन्दगी से समझौता करने, मैलेपन को सहन करने की बुरी आदत पड़ती है, जो स्वास्थ्य और स्वभाव दोनों के लिए ही अहितकर है।
सर्दी लगने के कारण उत्पन्न हुई बीमारियों का उपचार लाल रंग के उपयोग से हो सकता है। जिन्हें लो ब्लडप्रेशर, जुकाम, सर्दी, छींक, जकड़न आदि की शिकायत हो, उनके लिए लाल रंग के कपड़े, जूते आदि पहनना लाभदायक रहता है।
जिगर तिल्ली की बीमारियों में अपच या दस्त होने की दशा में पीला रंग का उपयोग उत्तम है। इससे हड्डियों की मुलायमी भी दूर होती है और उनके जरा भी चोट से टूट जाने का खतरा नहीं रहता।
गर्मी के कारण उत्पन्न होने वाली बीमारियों में नीले रंग का उपयोग ठीक है। उससे शीतलता अनुभव होती है और शान्ति मिलती है। लू लगने, जलन, बुखार सिर दर्द जैसे उष्णता प्रधान रोगों में नीले रंग की वस्तुओं का उपयोग किया जाय, तो इससे रोग निवारण में सहायता मिलेगी।
रंग हमारे दैनिक जीवन में कई प्रकार के प्रभाव डालते हैं और कई परम्पराओं के प्रतीक बन गये हैं। खुले नीले आकाश के नीचे बैठकर सभी को प्रसन्नता होती है। संसार सुखद प्रतीत होता है। हरे-भरे खेतों में पुष्प उधानों में बैठकर हर कोई शान्ति शीतलता अनुभव करता है। काला रंग मुर्दनी का प्रतीक माना जाता है। वह डरावना भी होता है। शोक प्रदर्शित करने के लिए काले कपड़े पहने और काले पट्टे बाँधे जाते हैं। पीले रंग का अरुणोदय कितना सुहावना लगता है। उषाकाल की नारंगी लालिमा नया उत्साह उभरती और काम में जुटने की उमंग उत्पन्न करती है। इन्द्रधनुष का सुहावना दृश्य देखते-देखते मन नहीं भरता। नाचते मोर के रंग-बिरंगे पंख देखकर रास्ते चलने वालों की गति ठहर जाति है। और उसे देखते ही रहने का जी करता है। उद्विग्न व्यक्ति भी रंग-बिरंगे फूलों के बीच बैठकर नया उल्लास उपलब्ध करता है। उसमें उनकी शोभा सुषमा, सुगन्ध के अतिरिक्त रंगों का उतार-चढ़ाव भी बहुत बड़ा कारण है।
बच्चों और महिलाओं को रंगीन कपड़े पहनने का चाव होता है। खिलौनों से तब तक मन नहीं भरता, जब तक उनका रंग लुभावना न हो। छोटे बच्चों की पुस्तकों में रंगीन चित्रों का होना आवश्यक है। इसके बिना पढ़ने के लिए उनका उत्साह ही नहीं उठता।
कमरे पर्दे, टेबल, क्लॉथ, जूते, चित्र आदि में किन रंगों का समावेश हो? पहनने के कपड़ों और बिस्तरों, कम्बलों को किस रंग का रंगा जाय? इसकी जानकारी सर्वसाधारण को नहीं होती। आमतौर से चटकीले और सुहावने रंग आकर्षक लगते और खरीदे अपनाये जाते हैं। होना यह चाहिए कि रंगों को शोभा सज्जा के लिए ही प्रयुक्त न किया जाय, वरन् उनके प्रभावों, परिणामों को भी ध्यान में रखते हुए प्रयोग किया जाये।
देवताओं के चरणों में पुष्प चढ़ाये जाते हैं। उन्हें पुष्प हारों से सजाया जाता है। स्वागत एवं हर्षोल्लास के समय चौक पूरने, झण्डियाँ लगाने, ध्वजा पताका फहराने, मण्डप बनाने का रिवाज है। उनमें भी रंगों की भरमार होती है। यह सब करते हुए, देखा यह भी जाना चाहिए कि रंगों को व्यक्ति तथा वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण विज्ञान है, जिसकी जानकारी रहने पर सामान्य जीवन को अधिक सुखद एवं प्रसन्न बनाया जा सकता है।
धुन के धनी हैक डेकर की आँखें 1972 में चली गई थी। अन्धे होने के बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी, और दुस्साहस भरे कामों के लिए अपना साहस पहले की तरह ही बनाये रखा। आँखें चली जाने के दो वर्ष बाद उसने सन् 1980 में नाविक का काम सीखना आरम्भ किया और दो वर्ष में उसमें प्रवीणता प्राप्त कर ली। गत वर्ष उसने समुद्र यात्रा का अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया है। सान फ्रांसिस्को से लेकर होनोलूलू तक 3000 किलोमीटर की यात्रा एक महीना लगातार समुद्र में रहकर उसने पूरी की है। दिशा निर्देशक यन्त्र उसने ऐसा बनाया है जिसकी सुई ध्वनि बजाकर दिशा और गति का बोध कराती है। रास्ते में उसका रेडियो सम्पर्क यन्त्र भी खराब हो गया और संचालक केन्द्र के साथ सम्बन्ध न रह जाने के कारण अलग-थलग पड़ गया। तो भी बिना घबराये उसने यात्रा पूरी कर ली। 42 वर्षीय हैक डेकर को रात का सितारा कहते हैं। चारों ओर अन्धेरा रहने पर भी वह अपनी रोशनी से आप चमकता है।
शारीरिक चिकित्सा में प्रायः औषधियों का- शल्य चिकित्सा का उपयोग होता रहा है। मनोरोगों के सम्बन्ध में कोई सुनिश्चित पद्धति हस्तगत नहीं हुई है। मस्तिष्क को शरीर का एक अवयव मात्र मानकर उसे भी सुन्न, निद्रित करने, बिजली के झटके लगाने या शल्य कृत्य करने तक ही उपाय उपचारों की खोज-बीन हुई है। व्यथाओं के निवारण में इसी स्तर की जाँच पड़ताल या विधि−व्यवस्था का प्रयोग होता जा रहा है।
किन्तु बात इतने से भी बनती नहीं। सन्तोषजनक परिणाम स्वल्प मात्रा में हस्तगत होते हैं। शेष उपचारों में निराशा ही हाथ लगती है। क्योंकि मनोरोग वस्तुतः चिन्तन क्षेत्र के होते हैं। उनमें भावनाएँ, मान्यताएँ आकाँक्षाऐं ही प्रधान रूप से अपनी हलचलें प्रस्तुत करती है।
मानसोपचार के लिए उसी स्तर की क्षमता चाहिए जो विक्षुब्ध या विकृत हो चली है। शरीर पंचतत्वों का बना है इसलिए उसके लिए आहार और उपचार भी वैसा ही होना युक्ति संगत है। पर मन तो चेतन है। उसे ठीक करने में सचेतन व्यक्ति का मानसिक प्रयोग ही काम आ सकता है। व्यक्ति के माध्यम से ही व्यक्ति की मनोभूमि बनती बिगड़ती है। उत्थान-पतन में मानवी सम्पर्क ही प्रधान भूमिका निभाता है।
सशक्त मानसिक क्षमता का मनोरोगों के लिए प्रयोग किया जाय तो उसका प्रभाव उपयुक्त हो सकता है। होता भी है। दुर्जनों को सुधारने में सत्संग काम देता है। भलों के साथ रहकर बुरे भी सुधरते हैं। इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि प्राणवानों के प्राण-प्रवाह का लाभ लेकर मानसिक रोगी भी भ्रान्तियों और विकृतियों से मुक्त हो सकते हैं। अध्यात्म चिकित्सा का वही आधार भी है।
सर ‘अलेक्सिस’ कैरेल ने प्रार्थना की शक्ति पर भी प्रकाश डाला है और उसके पीछे प्रयोक्ता के श्रद्धा विश्वास को काम करते हुए पाया है। वे कहते हैं “सच्चे मन से विश्वासपूर्वक की गई प्रार्थना भी किसी के व्यक्तित्व में ऐसे तत्व उभार सकती है जो व्यक्त की गई भावना में बल प्रदान करे और सफल होने की स्थिति तक पहुँचाये।”
कनाडा के डॉ. सी. अलबर्ट यों हैं तो शल्य चिकित्सक और औषधि उपचारकर्ता, पर वे साथ ही प्रार्थना शक्ति पर भी विश्वास करते हैं। चिकित्सा के साथ-साथ वे रोगमुक्ति की प्रार्थना भी करते हैं और रोगी को भी वैसा ही करने का परामर्श देते हैं। उनका अनुभव है कि इस आधार पर रोग मुक्ति से दूनी सहायता मिली है। जिन रोगियों ने अविश्वास किया और उपेक्षा दिखाई वे अपेक्षाकृत देर में अच्छे हुए।
इन्हीं नोबुल पुरस्कार विजेता डॉ. अलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक ‘मैन दि अननोन’ में मानवी मस्तिष्क में सन्निहित अविज्ञात एवं विलक्षण क्षमताओं पर सुविस्तृत प्रकाश डाला है। उनका कथन है कि जिस प्रकार व्यायाम द्वारा शरीर को सुविस्तृत किया जा सकता है उसी प्रकार साधना व्यायामों द्वारा मानसिक शक्ति का भी असाधारण विकास किया जा सकता है। क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में तभी चली जाती हैं जब उनका प्रयोग नहीं होता। अभ्यास से उन्हें जगाया जा सकता है और प्रयोग करने पर उन्हें असाधारण रूप से विकसित भी किया जा सकता है।
इलेक्ट्रा मैगनेटिक पावर के आधार पर गठिया-सूजन जैसे रोगों पर पिछले दिनों प्रयोग होता रहा है और चुम्बक के प्रभाव का शरीरगत हलचलों को घटाने-बढ़ाने में काम लाया जाता रहा है। अब उसी का विकसित रूप चमत्कारी चिकित्सा के रूप में सामने आ रहा है। यह समझने और समझाने में बहुत कठिनाई नहीं पड़ रही है कि चुम्बक शक्ति यदि रोग निवारण के लिए काम आ सकती है तो फिर मानवीय विद्युत एवं चुम्बक का भी असर होना चाहिए और उस आधार पर पीड़ितों को राहत मिलनी चाहिए। वह चुम्बकत्व मनुष्य में भी है। एक सशक्त चुम्बकत्व वाला व्यक्ति दुर्बल प्राण व्यक्ति की ऐसी ही सहायता कर सकता है जैसा कि कोई वयस्क व्यक्ति बच्चे की गोद में उठाये फिरता है।
अमेरिका में पिछले दिनों एक चमत्कारी चिकित्सक ऑस्कर इस्टेवनी की बहुत ख्याति थी। वे रोगी के अंग विशेष पर हाथ फिराकर कष्ट मुक्त करते थे। इसका कारण वे अपनी प्राण विद्युत को बढ़ाकर रोगी में प्रवेश कराते बताते थे। अच्छे होने वालों की संख्या दिन-दिन बढ़ती गई तो व्यक्तिगत अनुभव बताने वालों के आधार पर बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक भी आने लगे। वे चिकित्सा कराने नहीं वरन् यह देखने पहुँचते थे कि इसमें तथ्य कितना है और वास्तविक कारण क्या है। मनोवैज्ञानिकों ने इसे इच्छा शक्ति का प्रयोग और रोगी की भाव श्रद्धा का सहयोग बताया। फिर भी मानना यही पड़ा कि जिन पर प्रयोग होता है उन्हें लाभ मिलता है। पीड़ितों को राहत मिलने की बात सच पाई गई।
रूस की कजाकिस्तान स्टेट विश्वविद्यालय की जैव प्रयोगशाला के निर्देशक डॉ. ईन्यूशिन ने अपने शोध पत्र में बायो प्लाज्मा के सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डाला है। उनने कीर्लियन फोटोग्राफी के आधार पर ऐसे चित्र भी लिये हैं जो जीवित प्राणियों के इर्द-गिर्द एक विशेष आभामण्डल घिरा रहने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। यह प्रकाश, मुख मण्डल पर उंगलियों के छोरों पर विशेष मात्रा में देखा गया। रक्त की तुलना में वह स्नायु केन्द्र में अधिक पाया गया।
डॉ. ईन्युशिन के अनुसार यह बायोप्लाज्मा मात्र प्रकाश नहीं है। उनमें विद्युतीय चुम्बकीय विशेषताएँ भी हैं और वे सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित भी करती हैं। इससे पदार्थ और व्यक्ति दोनों ही प्रभावित होते हैं।
जर्मनी के विज्ञान वेत्ता प्रो. विलहेम रॉख में मानवी काया में एक विशेष प्रकार की सजीव विद्युत का अस्तित्व पाया है। उसे उन्होंने आर्गोन नाम दिया है। उनका कहना है कि यह बिजली समर्थ क्षेत्र से असमर्थों की ओर दौड़ने और उनकी सहायता करने में पूरी तरह समर्थ है।
प्रार्थना की शक्ति को वे प्रयोक्ता की सद्भावना,सच्चाई एवं व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का मिश्रण मानते हैं। इन तीनों का संयोग जो प्रतिफल उत्पन्न करता है उसी को दूसरे शब्दों में ईश्वरीय अनुकम्पा का नाम दिया जाता है। यही वस्तुतः भारतीय अध्यात्म का मूल प्रतिपादन है। किसी अदृश्य सत्ता के अनायास ही प्रसन्न होकर कुछ बरसा देने की कामना करने वाले तो आत्म प्रवंचक ही कहे जाते हैं।
एक व्यक्ति था जो बहुत देवताओं को पूजता और बहुत गुरु बनाकर, किसी न किसी से कुछ पाने की फिराक में रहता।
वह एक गुरु के पास बैठा था। इतने में एक अन्य भक्त आया और बताया उसने अपने खेत में चार दस-दस हाथ गहरे गड्ढे खोदे। किसी में भी पानी न निकला। “पाँचवाँ गड्ढा खोदने जा रहा हूँ। बताइये पानी निकलेगा या नहीं।”
पहले से बैठा चतुर व्यक्ति गुरु को उत्तर देने तक न ठहर सका। आवेश में बोला- “इतने गड्ढे खोदने के स्थान पर यदि एक ही स्थान पर पचास हाथ गहरा गड्ढा खोदते तो इतनी जमीन भी खराब न होती और पानी भी मिल जाता।”
बात समझदारी की थी सो उसने मान ली। नया कुँआ खोदने के स्थान पर पिछले गड्ढे को ही गहरा करने की बात समझ में आई और सिखावन को क्रियान्वित करने के लिए वापस लौट गया। अब गुरु ने उस चतुर व्यक्ति से कहा- “तुम भी बहुत देवता और गुरुओं को तलाश न करके यदि एक पर ही श्रद्धा जमा लेते तो अच्छा होता।”
मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया कई सीढ़ियों को पार करते हुए ऊँची उठती आगे बढ़ती है। मनःशास्त्र विशेषज्ञों ने इसे चार भागों में विभक्त किया है-
1. लर्निंग (शिक्षा) 2. रिटेन्शन (धारणा) 3. री काल (पुनरावाहन) 4. रिकाग्नीशन (प्रत्याभिज्ञा)
किसी बात को सांगोपांग आद्योपान्त समझने के लिए उसका पूर्वापर संगतियों के साथ अध्ययन आवश्यक होता है। इसे गुरुजनों द्वारा भी सुना, समझा और सीखा जा सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि पुस्तकों के सम्पर्क और घटनाओं के सहारे जाना समझा जाय। इसके लिए बाह्य माध्यम आवश्यक होते हैं। दृश्य और श्रव्य साधनों को इसमें प्रधान योगदान होता है। यह साधन उपलब्ध न हों तो ज्ञान अत्यन्त सीमित स्तर का रहेगा। भेड़िये की माँद में पले बालक जब पकड़े गये तो उनका ज्ञान और स्वभाव अपने पालनकर्ताओं से अधिक ऊँचा न था। वनवासी आदिवासी जन सम्पर्क से दूर रहते हैं। अपने सीमित लोगों के साथ ही घुलते मिलते हैं। फलतः उन्हें अन्यत्र चल रही प्रवृत्तियों की न तो जानकारी होती है और न अभिरुचि। ऐसे में उनका परम्परागत पिछड़ापन भी यथावत् बना रहता है। पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ इसी प्रकार गुजर जाती हैं।
एक ही नगर गाँव में प्रगतिशील और पिछड़े लोग पाये जाते हैं। इसका कारण अध्ययन का अन्तर है। इस वर्ग को इसके लिए उपयुक्त अवसर मिला होता है जबकि दूसरा उससे वंचित रहा या रखा गया। शिक्षा की उपयोगिता इतनी ही नहीं है कि उसके सहारे चिट्ठी-पत्री या हिसाब-किताब रखना बन पड़े। वरन् इसलिए है कि उसके सहारे घर बैठे व्यापक क्षेत्र की जानकारियाँ अर्जित की जा सकें। इतिहास द्वारा पढ़ाए गये मीठे कडुए पाठों को पढ़ा और उसके सहारे उपयोगी अनुपयोगी का अन्तर कर सकना सम्भव हो सके। यह शिक्षण-अध्ययन, सम्पर्क, प्रवास, दृश्य आदि के सहारे उपलब्ध होता है। यदि यह क्रम ठीक प्रकार चला है तो मनुष्य ज्ञानवान विचारशील बनेगा और बुद्धिमान बनने की दिशा में अग्रसर होगा। इन्हीं तथ्यों को देखते हुए शिक्षा को उदरपूर्ण की तरह आवश्यक माना गया है। उसके बिना मस्तिष्क को क्षुधार्त की तरह दुर्बल रहना पड़ता है।
मस्तिष्कीय विकास का अध्यापन प्रथम और अवधारणा दूसरा चरण है। जो सुना, समझा, देखा या सुना गया, उसमें से कितना महत्वपूर्ण समझा और उसे कितनी गम्भीरतापूर्वक लिया गया यह अवधारणा है। आये दिन असंख्यों दृश्य आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं। कानों के छेद से कितने ही शब्द टकराते रहते हैं। यह सब कौतूहल भर होता है और क्षण मात्र में इधर से उधर उड़ जाता है। मन बहलाने भर में यह हलचलें काम आती हैं। उपेक्षा की मनःस्थिति में इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जब प्रभाव ग्रहण करने की मनःस्थिति होती है तो उन दृश्यों या श्रव्यों पर अधिक ध्यान दिया और अधिक विचार किया जाता है। कुछ निष्कर्ष निकाला जाता है और जो महत्व प्रतीक होता है उसे स्मृति पटल पर अंकित किया जाता है। यह अवधारणा सुरक्षित रहती है और समयानुसार चिन्तन को सहायता देकर किसी उपयोगी निर्णय तक पहुँचाने का माध्यम बनती है। यह विशेषता जिनमें होती है। उन्हीं को बाहुज्ञ कहते हैं। धारणा की यही विशेषता है कि जो चुना और देखा गया है उसका महत्वपूर्ण अंश संचित संस्कार में जमा होता रहे और समयानुसार काम में आये। इस उपलब्धि को संस्कार कहते हैं।
यह संस्कार या संस्मरण कई बार तो उथले होने के कारण समयानुसार विस्मृत भी हो जाते हैं। किन्तु व्युत्पन्नमति की प्रखरता होने पर ऐसा सुयोग जगता है कि किन्हीं समस्याओं के समाधान में जब आवश्यकता पड़े तो तुरन्त उभर आये और संचित अनुभवों के आधार पर नये निर्धारण को अपनी साक्षी का स्मरण दिलाते हुए कहने लायक योगदान करे। यही है पुनरावाहन। ‘री काल’ की व्युत्पन्नमति में विचारणा का सही स्तर काम आता है।
भूतकाल के अनुभवों को वर्तमान के साथ मिलाकर भविष्य निर्धारण में उसका उपयोग करने की समग्रता को बुद्धिमत्ता कहा गया है। इसे व्यक्तित्व का मस्तिष्कीय सार संक्षेप कहा जा सकता है। गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर इसी आधार पर विनिर्मित और विकसित होता है। कौन क्या है? यह उसकी मान्यता, भावना आकाँक्षा और विचारणा का प्रवाह देखकर जाना जा सकता है। इसी पर्यवेक्षण से यह जाना जा सकता है कि व्यक्ति वर्तमान में कितना वजनदार है और भविष्य में उसका क्या हश्र होने जा रहा है। विधाता द्वारा भाग्य लेखन की बात कही जाती है। कर्माक्षरों की विचित्रता को समझ सकना, बस से बाहर की बात मानी जा सकती है। किन्तु यदि किसी को प्रत्यभिज्ञा (रिकाग्नीशन) को समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि उसकी मान्यताओं ने किस पृष्ठभूमि पर परिपक्वता प्राप्त कर ली है। प्रेरणाओं का उद्गम कहाँ जम गया। यही है वह मनःस्थिति जो किसी का भाग्य और भविष्य निर्माण करती है।
व्यक्तित्व को ढालने वाला प्रशिक्षण क्या होना चाहिये, कैसा होना चाहिए। इसका विवेचन तो किया जा सकता है पर वैसे साधन नहीं जुटाये जा सकते। इच्छित वातावरण कहाँ मिले? यह सब कुछ घुला मिला है। ईमान के क्षेत्र में भगवान की ही स्थापना नहीं, इसमें शैतान की भी साझेदारी है। जड़−चेतन से मिलकर बनाये गये इस संसार में उत्कृष्टता का प्रवाह श्वास प्रश्वास की तरह चलता है। प्राणवायु खींचने और विषवायु फैंकने की प्रक्रिया साथ-साथ ही चलती है। पौष्टिक आहार का ग्रहण ही होता रहे यह सम्भव नहीं, मल विसर्जन की जुगुप्सा भी जीवनचर्या का ही अंग है। रात्रि के अंधकार को कितना ही भयानक अनावश्यक क्यों न कहा जाय, वह दिनमान के पीछे-पीछे चलता ही रहेगा। काया से छाया को कैसे पृथक किया जाये।
इन खटमिट्ठी परिस्थितियों में एक ही उपाय शेष रह जाता है कि उच्चस्तरीय आत्म शिक्षण के लिए अपनी अलग दुनिया बसाई जाय और उस एकान्त पाठशाला में पढ़कर अभीष्ट स्तर की आवश्यकता पूर्ण की जाये। वंश−वृद्धि के लिए प्रजनन कार्य में एकान्त की आवश्यकता पड़ती है। आत्मशिक्षा के साधना का मंच भी ऐसा है जिसमें गुरु और शिष्य दो को ही साथ रहना चाहिए। प्रसव में जननी और शिशु दो पर ही आफत बीतती है और सब तो परिचर्या, सहानुभूति भर के बाहरी लोकाचार को ही निभाते रहते हैं।
बात आत्म शिक्षा के लिए साधना प्रसंग की चल रही थी। उसके लिये शिक्षण, धारण, स्मरण और प्रत्यावर्तन के चारों आधारों का समावेश आवश्यक होता है। यह व्यवस्था एकान्त उपासना के आधार पर ही बन पड़ती है। भक्त और भगवान दो के बीच ही उस स्थिति में आदान प्रदान चलता है। कथा पाठ के आधार पर दिव्य और चरित्रों का दिव्य गुणों का चित्रण मानस पटल पर बनता है। इसके लिये संसारी घटनाक्रम के साथ सम्बन्ध जोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् दिव्य लोक में चलते रहने वाले दैवी प्रवाहों के साथ सम्बन्ध जोड़ लेने से काम चल जाता है। भगवान को सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय माना गया है। उसका समूचा क्रिया कृत्य धर्म संस्थापना और अधर्म निवारण भर के लिए होता है। व्यक्ति विशेष से न उन्हें राग है न द्वेष। श्रेय ही उन्हें प्रिय है। दिव्य ही उनका चयन है। अतएव साधना के क्षणों में ईश्वरीय विधि व्यवस्था गतिविधियों का स्मरण करने भर से शिक्षण और धारण के उभय पक्षीय प्रयोजन पूरे होते रहते हैं। यहाँ उन पौराणिक उपाख्यानों की अवहेलना भी करनी चाहिये जो किसी नीति निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाते और महिमा बखानने के लिए ऐसे कुलावे मिलाते हैं जिनमें उत्कृष्टता की कसौटी पर चरित्र नायकों को भी खोटा सिद्ध होना पड़े। पौराणिक उपाख्यानों में भगवान का ऐसा बेतुका चित्रण भी कम नहीं है। ग्रन्थ विशेष को महत्व देकर ऐसी भगवत् कथाओं को भी दूध के साथ मक्खी निगलने की भूल विचारशील को नहीं ही करना चाहिए। भगवत् कथा में उत्कृष्टता के परिपोषण और निकृष्टता के उन्मूलन के अतिरिक्त अन्य कोई घटनाक्रम जुड़ता ही नहीं।
साधना की ध्यान धारणा के पूर्वार्द्ध में दैवी क्षेत्र में संव्याप्त सत्प्रवृत्तियों की गरिमा की व्यापक विवेचना के लिये परिपूर्ण गुंजाइश है। चिन्तन और मनन की प्रक्रिया इसी आधार पर चलती है। प्रार्थना, मनुहार, पूजन सान्निध्य, समर्पण, विलय के रूप में भगवान से तादात्म्य स्थापित करने के आधार पर आत्म शिक्षण का अध्ययन तथा धारण का उभय पक्षीय प्रयोजन पूरा होता है।
स्मृति के लिए चित्र स्थापना और मान्यता के लिए उपचार ऊर्जा की परिपक्वता से इष्ट का स्मरण अनायास ही हो आता है, उसकी छवि दिव्य चक्षुओं के सम्मुख आकर बिना किसी प्रयत्न के खड़ी हो जाती है किन्तु आरम्भिक दिनों में वैसा नहीं हो पाता। इसके लिए प्रतीक स्थापना की आवश्यकता होती है। प्रतिभाएँ इसी निमित्त गढ़ी जाती हैं। चित्रों के सहारे अथवा मूर्ति स्थापना से स्मरण को प्रखर किया जाता है। मन को इधर-उधर भागने से रोकने के लिए भी यह एक बड़ा अवलम्बन है। मन की प्रवृत्ति जल्दी-जल्दी स्थान बदलने की है। प्रतिमा के अंग अवयवों, वाहनों, अस्त्रों वस्त्रों की परिधि इतनी विस्मृत होती है कि उतने क्षेत्र में मन को भागने दौड़ने की छूट भी मिल सकती है और साथ ही इतना प्रतिबन्ध भी रहता है कि उसे आगे न बढ़े, अन्य प्रसंगों की ओर कदम न बढ़ाये। उपासना का इष्ट भगवान है। इसलिए उतने समय तक उसी पर चित्त को बाँधकर रखा जाये तो भविष्य में ऐसा मानस बनता है जिसे यथा समय आत्म शिक्षण के लिए नियोजित उपक्रमों में संलग्न किया जा सके।
रीकाग्नीजेशन का तात्पर्य मान्यता है। प्राण प्रतिष्ठा के आरम्भिक संस्कार से यह भावना परिपक्व की जाती है कि प्रतिमा मात्र पाषण नहीं है उसमें भगवान के प्राण का प्रवेश हो चुका है। वह जीवन्त तुल्य है। इसी मान्यता को परिपक्व करने के लिए षोडशोपचार या पंचोपचार से आतिथ्य सत्कार के निमित्त प्रयुक्त होने वाले शिष्टाचार सम्पन्न किये जाते हैं। पाद्य, अर्ध, आचमन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, भारतीय शिष्टाचार के अन्तर्गत मान्यजनों के सत्कार में आवश्यक अंग माने गये हैं। भगवान के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति हेतु ऊर्जा उपचारों का प्रयोग किया जाता है। यह मान्यता को अधिकाधिक परिपक्व करने के लिए है। जिसके जीवन्त प्राणवान होने पर विश्वास न होगा, उसका पूजा सत्कार करेगा ही क्यों?
पूजा पद्धति से भगवान को क्या मिला? उनकी प्रसन्नता किस कारण हुई? इन प्रश्नों का यथार्थवादी उत्तर दे सकना कठिन है। क्योंकि सामान्य व्यक्तियों की तरह खुशामद करने पर रिश्वत देने का शिष्टाचार निभाने से भगवान प्रसन्न अप्रसन्न नहीं होते। निराकार, समदर्शी होने के कारण किसी व्यक्ति विशेष से उसका राग द्वेष भी नहीं हो सकता। पूजा उपचार की समूची विधि व्यवस्था आत्म शिक्षण के निमित्त बनाई गई है। आदर्शों के प्रति आस्थावान होना ही आत्मोत्कर्ष का एक मात्र आधार है। इस प्रयोजन की पूर्ति में पूजा उपचार के साधना विधानों का मनोवैज्ञानिक महत्व है इस तथ्य को सहज ही समझा और समझाया जा सकता है।
राजा जनक को उस समय के बड़े ब्रह्मज्ञानी रैक्य का पता चला। उनकी तलाश में सब ओर दूर दौड़ाये गये। बहुत दौड़ धूप करने पर भी कुछ पता न चला तो वे निराश वापस लौट आये।
राजा ने सब दूतों से यात्रा व खोज के समाचार पूछे। वे सभी बड़े नगरों में घूमते और ढूँढ़ते फिरे थे। जनक हँसे और बोले- “ब्रह्मवेत्ता छोटे देहातों या वन प्रदेशों में रहते हैं। बड़े नगरों में विलासी संग्रही रहते हैं।” दूत दुबारा गये और एक छोटे देहात में रैक्य को ढूँढ़ निकाला।
महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उपयुक्त स्थान एवं सुसंस्कारित वातावरण का चयन एक ऐसा सूक्ष्मदर्शी सिद्धान्त है जिसकी उपयोगिता सामान्य बुद्धि की समझ से परे है। फिर भी फलश्रुतियों को देखते हुए उसके पीछे ठोस तत्वों का समावेश पाया जाता है। साधनादि के क्षेत्र में समय समय पर वातावरण के चयन के सम्बन्ध में महामानवों ने दूरदर्शिता बरती है। ऐसी स्थिति आने पर स्थान विशेष के संस्कारों को परखा एवं तदुपरान्त ही स्वयं को विशिष्ट बनाने वाली तप साधनाओं हेतु वहाँ शेष रूप से योगाभ्यास सम्पन्न किये हैं। उत्तराखण्ड हिमालय का हृदय कहा गया है। लगभग सभी अवतारों, देवदूतों, महामानवों एवं इस सदी मध्यकाल के महापुरुषों ने यहाँ कुछ विशिष्टता पायी एवं आत्मबल सम्पादन हेतु इसी परिधि के विभिन्न स्थानों को चुना और आने वाली पीढ़ी के लिये भी उस स्थान को संस्कारित किया है। ऐसे ही उदाहरण कुसंस्कारी वातावरण के श्रवणकुमार के मय प्रदेश में माता-पिता की अवहेलना तथा कुरुक्षेत्र को महाभारत हेतु श्रीकृष्ण द्वारा चयन किये जाने के रूप में मिलते हैं।
पुराणों में ऐसी अनेकानेक घटनाओं का वर्णन है जिसमें बताया गया है कि क्षेत्र विशेष में अपनी-अपनी प्रभाव क्षमता पाई जाती है। ऐतिहासिक या प्रकृति सम्बद्ध कितने ही कारण ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव किन्हीं स्थानों पर छाया रहता है। फलतः वहाँ के निवासियों के विचारों और कार्यों पर उनका भला बुरा असर पड़ता है। इसी सूक्ष्म वातावरण को ध्यान में रखते हुए ये महत्वपूर्ण कार्यों के लिए कर सकें। व्यासजी ने पुराण लिखने के लिए जो स्थान चुना था, वह बद्रीनाथ के आगे व्यास गुफा के नाम से प्रख्यात है। गंगा अवतरण से लेकर ऋषि दधीचि की वज्र साधना इसी क्षेत्र में सम्पन्न हुई। सातों ऋषियों की बहुमुखी गतिविधियाँ इसी परिधि में चलती रहीं। आध शंकराचार्य केरल में जन्मे थे तो उनने अपना कार्य क्षेत्र हिमालय चुना और केदारनाथ के समीप शरीर का समापन किया। अभी भी इस क्षेत्र में सरलता, सज्जनता, सात्विकता अन्यत्र की तुलना में वहीं अधिक है। शाँति कुँज के लिए उद्देश्य के अनुरूप स्थान चयन इसी सूक्ष्म पर्यवेक्षण के आधार पर हुआ है।
वैज्ञानिकों ने भी अनेक स्थानों को अनेक प्रकार की विभिन्नताओं से सम्पन्न पाया है। अमेरिका में वाहनों को नीचे से ऊपर की ओर घसीटने वाली चुम्बकीय पहाड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। बारमूडा त्रिकोण में कितने ही जलयानों वायुयानों के अदृश्य होते रहने की बात सभी जानते हैं। ध्रुव प्रदेशों के विचित्र परिस्थितियों और दृश्यावलियों को देखकर अनजान दर्शकों को वह परीलोक सा लगता है। छह महीने का दिन और छह महीने की रात आकाश में उड़ते रहने वाली रंग-बिरंगी ज्योतियाँ विचित्र प्रति ध्वनियों को देखते हुये सामान्य बुद्धि उसे जादू तिलिस्म जैसा क्षेत्र ही मान सकती है। रोती-हँसती और गाती हुई बालू के समीप पहुँचकर मनुष्य हतप्रभ रह जाता है।
स्थान विशेष की यह विचित्रताएँ बताती हैं कि वहाँ के वातावरण में कुछ न कुछ अद्भुत होना चाहिए। ऐसी विलक्षणताओं में एक नई कड़ी आसाम क्षेत्र के साथ जुड़ती है। कारण तलाशने वाले उस रहस्य को अनबूझ पहेली कहकर मौन पाये गये हैं।
आसाम प्रान्त में बरले पहाड़ियों पर हांफलाँज के निकट समुद्र तल से 736 मीटर ऊँचाई पर बसा एक गाँव है जातिंगा। शिलांग पठार के दक्षिणी सिरे पर पूर्व की दिशा में विरल पहाड़ियाँ हैं। ये वर्मा भारत सीमा पर अवस्थित लुशारी पर्वत शृंखला में जाकर विलीन हो जाती हैं। जतिंगा गाँव इसी क्षेत्र में बसा है। उसका व्यास दो वर्ग किलोमीटर है। सभी जानते हैं कि पहाड़ों पर बसावट बिरल होती है। घर एक दूसरे से दूर बनते हैं इसलिए क्षेत्र अधिक घिरने पर भी आबादी कम ही रहती है।
इस गाँव के इर्द-गिर्द एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें रात्रि के समय तेज प्रकाश जलाने पर उस क्षेत्र की चिड़ियाँ अनायास ही दौड़ पड़ती हैं। दीपक पर जल मरने वाले पतंगों जैसा उपक्रम तो नहीं करती पर प्रकाश के इर्द-गिर्द चक्कर काटने के उपरान्त जमीन पर आ गिरती है और फिर छूने छेड़ने पर भी उठने भागने का प्रयास नहीं करती। अर्ध मूर्छित स्थिति में पड़ी रहती हैं। चीखने चिल्लाने, बचने भागने जैसा प्रयास उनका तनिक भी नहीं होता। प्रकाश में कभी-कभी कोई टकरा भी जाती हैं पर उनसे ऐसा कुछ नहीं होता जिसे जलने-झुलसने जैसा कहा जा सके।
ऐसा क्यों होता है? उसी गाँव के इर्द-गिर्द ऐसा घटनाक्रम क्यों चलता है? उस क्षेत्र में अन्यत्र ऐसा क्यों नहीं होता? इन प्रश्नों का विगत अस्सी वर्षों से कोई समाधान कारक उत्तर नहीं मिल सका है।
जातिंगा गाँव सन् 1895 में एक बर्मी नस्ल के सुचिंग नामक व्यक्ति ने बसाया था। उसके निमन्त्रण पर समीपवर्ती गाँववासी जयंतिया पुर से आकर वहाँ अधिक सुविधा देखकर बसने लगे और आबादी इतनी हो गई जिसे गाँव कहा जा सके।
सन् 1905 के सितम्बर की बात है। गाँव के लोग खोई भैंसों की तलाश के लिए निकले थे। अँधेरी रात में मशालें जलाकर चलना आवश्यक था। वही किया गया। भैंस ढूँढ़ने के प्रयास को अवरुद्ध करता हुआ एक नया घटना क्रम इसी बीच घटित होने लगा। रात्रि के सन्नाटे में अपने घोसलों से निकलकर ढेरों चिड़ियाँ उन मशालों के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी और कुछ देर मँडराने के बाद धरती पर ढेले की तरह गिरने लगीं।
ऐसा कौतुक उन लोगों ने पहले कभी नहीं देखा था। समझे कोई प्रेतात्मायें उन्हें डराने के लिए इस प्रकार प्रकट हो रही हैं। इसलिए और कुछ तो न सूझा जोर-जोर से हल्ला मचाकर उन्हें भगाने का प्रयत्न करते रहे। उलटे पैरों भागे और घरों में जाकर छिप गये। सवेरा होने पर रात्रि वाले स्थान पर वे लोग कारण का पता लगाने की दृष्टि से फिर पहुँचे। देखा कि कितनी ही चिड़ियाँ उस स्थान पर मूर्च्छित जैसी पड़ी हैं। उलट-पुलट कर देखने पर जब प्रेतात्मायें न होकर मात्र चिड़ियाँ ही मान ली गई। तब यह सोचा जाने लगा आखिर ऐसा होता क्यों है। प्रकाश को देखकर पतंगे उड़ने लगने की बात तो देखी हुई है पर घोंसले छोड़कर चिड़ियाँ रात्रि का विश्राम छोड़कर इस प्रकार दौड़ पड़ें और मूर्छित होकर गिर पड़े इसका कारण तब भी समझ से बाहर ही बना रहा।
सोच विचार होता रहा। अन्त में यह बात जमी कि देवता इस गाँव वालों पर प्रसन्न है और उनकी भूख बुझाने के लिए घर बैठे इन चिड़ियों को आहार उपहार के रूप में भेजते हैं। तब से जातिंगा निवासी समय समय पर मशाल जलाकर रात्रि के समय उस क्षेत्र में पहुँचने लगे और जितने चिड़ियाँ आवश्यक होती उतने टोकरों में भरकर घर लौट आते। चिड़ियाँ टोकरे में चुपचाप बैठी रहती उन्हें ढकने रोकने की भी आवश्यकता न पड़ती जब जितनों की तरकारी बनानी होती तब उस टोकरी में से उठा ली जाती। यह आश्चर्य यह भी कहता है कि जीवित होने पर भी जब उनके सामने दाना पानी रखा जाता तो उसकी ओर तनिक भी आकर्षित नहीं होती।
सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा। इस जादुई घटनाक्रम की चर्चा तो दूर-दूर तक फैलती रही पर किसी ने इसे छोटी बात समझकर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता न समझी। फिर भी अचम्भे की बात तो थी ही विवरण जब दूर-दूर तक पहुँचा तो इनका रहस्य जानने के लिए प्रकृति अन्वेषणकर्ताओं का ध्यान उधर गया।
सन् 1977 में डॉ. सुधीर सेन गुप्ता के नेतृत्व में एक दल इस सम्बन्ध में तथ्यों का पता लगाने के लिए पहुँचा। उसने विभिन्न स्थानों पर बाँस गाढ़ कर उस पर रात्रि के समय गैस की लालटेन टांगी और चिड़ियों के अनायास ही टूट पड़ने का दृश्य आँखों देखा। जैसा सुना गया था ठीक वैसा ही दृश्य सामने आया। चिड़ियाँ पेड़ों से उतर कर आतीं, मंडरातीं और अर्धमूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़तीं।
अनुसंधान अठारह दिन तक चलता रहा। कारण की तलाश में स्थानों एवं उपक्रमों में अदल-बदल करते रहने का प्रयास भी हुआ। एक अर्धमूर्छित चिड़िया को वे लोग वापसी में अपने साथ लाये। वह कंधे पर यथा स्थान बैठी रही और 124 मील की यात्रा के बाद मर गयी इस बीच में उसने दाना-पानी सामने रखने पर उसे लेने की कोई चेष्टा नहीं की और न उड़ने की ही।
अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि ऐसा वातावरण वहाँ एक सीमित क्षेत्र में ही है सर्वत्र नहीं। जातिंगा रेलवे स्टेशन के गाँव के स्वास्थ्य केन्द्र तक प्रायः एक किलोमीटर लम्बी पट्टी में ही यह विलक्षणता देखी गयी। सो भी जब बादल हों और अंधेरी रात हो। चाहे जब और चाहे जहाँ घटना क्रम घटित नहीं होता।
अनुसंधानकर्ता किसी निश्चित निर्णय पर तो नहीं पहुँचे पर उनने कई अनुमान लगाये हैं। एक यह कि उन परिस्थितियों से उत्पन्न प्रकाश में कोई इन्फारेड किरणों जैसी विशेषता रहती है और वह चिड़ियों की संवेदनशीलता को प्रभावित करके अपनी ओर खींचती है। यह भी हो सकता है कि क्षेत्र में कोई ऐसी चुम्बकीय पट्टी है जो उपरोक्त परिस्थितियों में प्रकाश जलने पर सक्रिय बनती हो और उस आधार पर विशेष संरचना वाली चिड़ियाएँ प्रभावित होकर खींचती हैं। एक विचार यह भी है कि प्रकाश से दृष्टि भ्रम उत्पन्न होता है और पतंगों के दीपक की और दौड़ने जैसी मनःस्थिति में जा फँसती हो। यह भी हो सकता है कि उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति चुम्बकीय बल-आकर्षण में कुछ विलक्षणता हो।
इन अनुमानों से भी उस आश्चर्य का समाधान नहीं होता कि उस क्षेत्र में पाई जाने वाली सभी चिड़ियाँ क्यों इस प्रकार का आचरण नहीं करतीं। कुछ सीमित जातियों की चिड़ियाँ ही क्यों इस प्रकार के व्यामोह में फँसती हैं। फिर एक और भी अनबूझी पहली यह है कि वे आरम्भ से लेकर मरण पर्यन्त सम्मोहित जैसी स्थिति में किस कारण बनी रहती हैं। जीवन के सभी चिन्ह उनमें विद्यमान रहते हुए भी वे अपनी स्वाभाविक चेष्टायें क्यों गँवा बैठती हैं। इसका कोई उत्तर नहीं है।
सही निष्कर्ष न निकल सकने पर यथावत् है कि क्षेत्र विशेष में कुछ अद्भुत प्रभाव पाये जाते हैं। इसके कारण प्रकृति परक भी हो सकते हैं और किसी सचेतन स्थिति के कारण शाप-वरदान स्तर के भी हो सकते हैं। जो हैं अनेक स्थानों में समाहित स्थानीय विलक्षणताओं का होना असंदिग्ध है। उनका कारण विदित न होने पर भी इतना मानना ही पड़ेगा कि कुछ स्थानों में ऐसी विशेषतायें पाई जाती हैं जहाँ कुछ महत्वपूर्ण कार्य अधिक अच्छी तरह हो सकते हैं। इस दृष्टि से उपयुक्त कार्यों के लिए उपयुक्त स्थान एवं वातावरण का चयन भी एक ऐसी आवश्यकता है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता।
सुधीर वोस रामकृष्ण परमहंस के मुँह लगे शिष्य थे। वे बिना संकोच के कई बार ऐसी बातें कह बैठते थे जिससे पीछे नीची आँखें करनी पड़ें। एक दिन इन्होंने परमहंस जी से पूछा- “जब आप विवाहित ही हैं तो पत्नी के साथ दाम्पत्ति जीवन का निर्वाह क्यों नहीं करते?
परमहंस गम्भीर हो गये बोलें- “मैं नारी मात्र में मातृशक्ति का दर्शन करता हूँ।” शारदा माता भी उसी समुदाय में से एक है इसलिए मुझे माता तुल्य प्रतीत होती है। माता के साथ दम्पत्ति जीवन कैसे बने। सुधीर ने आँखें नीची कर लीं परमहंस की महानता का पहली बार अनुभव हुआ।
हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डैनियल वैल ने उद्योगोत्तर समाज के विषय पर गम्भीर चिन्तन किया है। उनके लेखों और ग्रन्थों में सर्वसाधारण का ध्यान इस ओर खींचा गया है कि बदलते समय की ओर से आँखें बन्द न की जायँ। जो हो चुका उसका प्रभाव वर्तमान पर पड़ा है और वर्तमान की प्रक्रिया भविष्य को प्रभावित किये बिना रहेगी नहीं। इसलिए हमें वर्तमान की ही तरह भूत और भविष्य का भी पर्यवेक्षण करना चाहिए। डैनियल वैल की दृष्टि में अगले दिनों इतने बड़े परिवर्तन होंगे जिन्हें विगत एक हजार वर्ष की प्रगति की तुलना में कहीं अधिक आश्चर्यजनक ठहराया जा सकता है।
भौतिक विज्ञान की प्रगति का उत्साह और सिलसिला तो धीमी गति से पिछले हजार वर्ष से चलता आ रहा है पर उसमें योजनाबद्ध और सामूहिक विकास आरम्भ हुए तीन सौ वर्षों से अधिक नहीं हुए। विज्ञान ने बिजली, भाप, तेल जैसे माध्यमों से शक्ति उत्पन्न करने के तरीके खोजे। बड़े उत्पादन यन्त्र बने। उनके लिए यातायात, पानी, खपत आदि की दृष्टि से शहर सुविधाजनक प्रतीत हुए। वे बढ़े। देहात खाली हुए। पूँजी ने पूँजी को समेटा। धनियों को अधिक धन कमाने का अवसर मिला। यह कमाई निर्धनों का शोषण किए बिना और किस प्रकार होती। संक्षेप में यही है वह औद्योगिक क्रान्ति जिसने संसार का एक प्रकार का नक्शा ही बदल दिया। पाँच सौ वर्ष पूर्व का कोई व्यक्ति कहीं जीवित हो और वह तव की तथा अब की स्थिति की तुलना करने लगे तो आश्चर्यचकित हुए बिना न रहेगा। परिस्थितियों और प्रचलनों में जमीन-आसमान जैसा अन्तर दिखाई देगा। ऐसा लगेगा जैसे जादूगरों ने कोई तिलस्म खड़ा कर दिया हो। अकल्पनीय सुविधा-साधन जुट गये हैं। जलयान, वायुयान, रेल, मोटर, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन जैसे साधनों से सर्वसाधारण को लाभ उठाते देखा जाता है। पूँजीपतियों ने बड़े मिल कारखाने खड़े कर लिए हैं। सरकारों के पास प्रक्षेपास्त्रों और अणु आयुधों के भण्डार भर चले हैं।
पर्यवेक्षकों का मत है कि यह औद्योगिक क्रान्ति के नाम से जानी जाने वाली भूत विद्या की चरम परिणति है। उसके अभ्युदय के दिन लद गये। ढलान का बुढ़ापा लद चला है। मरण का दिन तेजी से समीप आ रहा है। जिन साधनों से यह तिलस्म बढ़ा था, अब उसके साधन चुकते जा रहे हैं। तेल, कोयला समाप्त होने जा रहा है। विद्युत उत्पादन के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है वे भी जवाब दे रहे हैं। लोहा जैसी धातुओं का भण्डार खाली कर लिया गया। बढ़ी हुई आबादी के लिए जमीन की उर्वरता एवं परिधि जवाब देती जा रही है। पीने का पानी कम पड़ रहा है। बढ़ते हुए प्रदूषण ने बीमार रहने और बेमौत मरने की स्थिति बना दी है। सुविधा की आड़ में खड़ी विभीषिकाओं का नग्न नर्तन अट्टहास अब प्रत्यक्ष होता जा रहा है।
अधिक वैभव उपार्जित करने के लिए समर्थ देशों ने उपनिवेशवाद की नीति अपनाई। मंडियाँ हथियाने के लिए समर्थों में परस्पर विग्रह खड़े हुए। पिछली दशाब्दियों में ही दो विश्वयुद्ध हो चुके हैं। छुटपुट क्षेत्रीय लड़ाइयाँ तो इस बीच सहस्रों की संख्या में हो चुकीं। इनके पीछे अन्य कारण गौण मंडियाँ हथियाने की ललक प्रमुख रूप से काम कर रही है। तीसरे महायुद्ध की तैयारियाँ हैं। कोई एक सिरफिरा बारूद में आग लगा कर इस धरती को धूल बनाकर उड़ा सकता है।
वैयक्तिक और सामाजिक क्षेत्र में प्रस्तुत औद्योगिक क्रान्ति ने कम विष के बीज नहीं बोये हैं। नशेबाजी के दुर्व्यसन, यौन मर्यादाओं का समापन, अभक्ष्य भक्षण, अपराधों की भरमार जैसे प्रचलनों ने स्थिति विषम से विषमतर बना दी है। उद्योगपतियों और श्रमिकों के बीच चलने वाली ‘टसल’ विग्रह बनकर खड़ी हो गई है। लगता है उच्छृंखलता की अव्यवस्था की खुली छूट मिल चली है। सरकारें और लोकसेवी संस्थाएँ अपना विश्वास खोती रही हैं। इनकी नेकनीयती पर उँगलियाँ उठने लगी हैं। आतंक, अविश्वास, आशंका, असुरक्षा और अनिश्चितता की स्थिति में हर कोई उद्विग्न-सा दीखता है। शारीरिक और मानसिक रोगों की तूफानी बाढ़, लगता है मनुष्य की विशिष्टता को उदरस्थ करने जा रही है।
यह सब कैसे हुआ? क्यों हो रहा है। इसका कारण जानने पर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि जिस औद्योगिक क्रान्ति को उसके आरम्भ काल में वरदान समझा जा रहा था वही अभिशाप सिद्ध हो रही है। पुनर्विचार के लिए परिस्थितियों ने लोक मानस को बाधित किया है। पर्यवेक्षण से अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि यह स्थिर देर तक नहीं चल सकेगी। उसका अन्त होकर रहेगा। मनुष्य की मूर्खता कितनी बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, उसकी समझदारी भी समाप्त नहीं हो सकती। छप्पर में आग लगा देने का आदेश देर तक नहीं ठहरता। बुझाने के लिए भी वहीं दौड़ता है। सर्वनाश से पहले समझदारी का उदय भी होता रहा है। अब भी उसकी पुनरावृत्ति होगी।
क्रान्तियों की प्रतिक्रान्तियाँ भी होती हैं। पेण्डुलम घण्टा आगे जाने के साथ-साथ पीछे भी लौटता है। नशे का सदा उभार ही नहीं रहता, समयानुसार उतार भी आता है। औद्योगिक क्रान्ति ने सब्जबाग दिखाकर जो विनाश विग्रह खड़े किये हैं उसे देखते हुए विश्वमनीषा के मन में उसके प्रति अश्रद्धा ही नहीं जगी वरन् विरोध भावना भी उभरी है। बदलने की, बदले जाने की परिस्थितियाँ बन रही हैं। इस दिशा में प्रकृति भी काम कर रही हैं और मानवी प्रवृत्ति का रुख पहचान कर बदलाव की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रही है।
उत्पादन के सामने संकट है कि कहाँ खपायें? उपभोक्ताओं के सामने संकट है कि खरीदने के साधन कहाँ से जुटायें ? दोनों के सामने अपने-अपने ढंग के अवरोध अड़ गये हैं। जुगुत्सुओं के लिए न लड़ना बन पड़ रहा है न पीछे हटना। मिलें, तेल-कोयले और खनिज की सम्पदा चुक जाने पर चलेंगी कैसे? पर्वतों जितना उत्पादन, निर्धन समुदाय द्वारा खरीदा कैसे जायेगा? सम्पन्नता के विरुद्ध निर्धनता ही नहीं ईर्ष्या-प्रतिद्वंद्विता भी खम ठोंक सामने आ गई है। इस मल्लयुद्ध का समापन दो ही प्रकार होगा। या तो योद्धा लड़ मरेंगे या बहादुरी समझदारी के साथ पीछे हटेंगे। दोनों ही परिस्थितियों में औद्योगिक क्रान्ति के चमत्कारों का अन्त सुनिश्चित है।
वैज्ञानिक आविष्कारों के साथ-साथ सम्पन्न हुई औद्योगिक क्रान्ति ने जहाँ एक ओर सुविधा साधनों को बढ़ाया वहाँ उसने समर्थों को अधिक सम्पन्न बनाने के साथ-साथ असंख्यों को बेकारी, भुखमरी और बदकारी के गर्त में भी धकेल दिया। इसकी प्रतिक्रिया समाजवाद, के रूप में सामने आई। यह क्रान्ति की प्रतिक्रान्ति है। शोषक आपस में भी लड़ते-मरते रहे हैं। यह प्रतिक्रिया भी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और ठण्डे-गरम युद्धों के रूप में आये दिन फूटती रहती है।
युद्ध, विद्रोह, अपराध, बिखराव प्रकृति प्रवाह जैसे अनेक कारण सामने हैं जिनसे यह आभास मिल रहा है कि औद्योगिक क्रान्ति के रूप में जो सभ्यता और प्रगतिशीलता का ढिंढोरा पीटने वाला बबूला जोर-शोर के साथ उगा था वह अब चूल्हें की आग घटने पर बैठने वाले झाग की तरह तली में बैठने ही जा रहा है।
बुखार के उतरने, खुमारी के घटने के लक्षण स्पष्ट हैं। प्रश्न एक ही है कि भविष्य में क्या होगा। ‘उद्योगोत्तर समाज’ की स्थापना कैसी होगी। इस सन्दर्भ में डैनियल वैल जैसे मूर्धन्य समाजशास्त्रियों का मत है कि लोगों ने इन दो शताब्दियों में जो अनुभव एकत्रित किए हैं वे मूल्यवान हैं। उनके सहारे क्रिया और प्रतिक्रिया के जो परिणाम सामने आये हैं उसे भुलाया नहीं जायेगा। गलती तभी तक चलती है जब तक उसके दुष्परिणाम सामने नहीं आते। जलने के उपरान्त आग से खेलने का प्रमाद- प्रायः बन्द ही हो जाता है। मर्यादाओं का व्यक्तिक्रम करते रहने पर समाज क्रम चल नहीं सकेगा और बिना सुनियोजित समान के उच्छृंखलता पर उतारू मनुष्य जीवित न रह सकेगा। इस तथ्य को इन दो शताब्दियों में मनुष्य ने पहले की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह समझ लिया है।
सर्वनाश से पूर्व ही मनुष्य संभल जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर इसके अगणित प्रमाण विद्यमान है। इस बार भी ऐसा ही होना है। अणुयुद्ध, प्रदूषण, प्रजनन, विस्फोट, पूँजी का एकत्रीकरण, अपराधों का अभिवर्धन, प्रमाद और विलास का विस्तार जैसी अनेकों समस्याऐं औद्योगिक क्रान्ति की देन है। इसे इस रूप में नहीं चलना है जैसे अब तक चलती रही है। कटु अनुभव को बार-बार दुहराते नहीं रहा जा सकता।
अगले दिनों महान परिवर्तन की प्रक्रिया प्रचण्ड होगी। उसे दैवी निर्धारण, साँस्कृतिक पुनरुत्थान, विचार क्रान्ति आदि भी कहा जा सकता है, पर वह होगी वस्तुतः समाजक्रान्ति ही। समाज, जन समुदाय को एक सूत्र में बाँधे रहने वाली व्यवस्था को कहते हैं। यह व्यवस्था बदलेगी तो प्रचलन और स्वभावों में समान रूप से एक साथ परिवर्तन प्रस्तुत होंगे।
व्यक्ति सादगी सीखेगा। सरल बनेगा और सन्तोषी रहेगा। श्रमशीलता गौरवास्पद बनेगी। हिल−मिलकर रहने की सहकारिता और मिल बाँटकर खाने की उदारता बदले हुए स्वभाव की विशेषता होगी। महत्त्वाकाँक्षाएँ उद्विग्न न करेंगी। उद्धत प्रदर्शन का अहंकार तब बड़प्पन का नहीं पिछड़ेपन का चिन्ह समझा जायेगा। विलासी और संग्रही भी अपराधियों की पंक्ति में खड़े किये जायेंगे और उन्हें सराहा नहीं दबाया जाएगा। कुटिलता अपनाने की गुंजाइश जागृत एवं परिवर्तित समाज में रहेगी ही नहीं। छद्म आवरणों को उघाड़ने में ऐसा ही उत्साह उभरेगा जैसा कि इन दिनों विनोद मंचों के निमित्त पाया जाता है।
औद्योगोत्तर समाज की संरचना ग्राम्य जीवन प्रधान होगी। पूँजी की तरह शहरी आबादी को भी दूर-दूर तक बखेर दिया जायेगा। ग्राम और शहर के बीच कस्बों का प्रचलन होगा। बड़े कारखाने छोटे कुटीर उद्योगों में बदल जायेंगे। हर गाँव आत्मनिर्भर बनने के प्रयास में होगा और हर हाथ को काम मिलेगा। परिवार-वृद्धि के दुष्परिणामों को लोग सहज बुद्धि से समझेंगे और छोटे परिवार सहकारिता की नीति अपनाकर बृहत्तर परिवारों के रूप में रहने के अभ्यस्त होंगे। स्वतन्त्रता और संयुक्तता की मिली-जुली पद्धति सस्ती भी पड़ेगी और सरल सुखद भी रहेगी।
इन दिनों अधिक कमाने, अधिक उड़ाने और ठाट-बाट दिखाने की जिस दुष्प्रवृत्ति का बोलबाला है उसे भविष्य में अमान्य ही नहीं, हेय भी ठहरा दिया जायेगा। थोड़े में निर्वाह होने से कम समय में उपार्जन के साधन जुट जायेंगे। बचा हुआ समय तब आलस्य-प्रमाद में नहीं वरन् सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा करेगा। सार्वजनिक सुव्यवस्था और मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले तब ऐसे अनेकानेक कार्य सामने होंगे जिनमें व्यस्त रहते हुए व्यक्ति हर घड़ी प्रसन्नता, प्रगति और सुसम्पन्नता का अनुभव करता रहें।
एक राजा था। राजमहल में एक सन्त पधारे। राजा ने अपना महल, शस्त्रागार, खजाना, वैभव आदि सभी गर्वपूर्वक दिखाया। सबसे पीछे वे उस तिजोरी के पास ले गये, जिसमें बहुमूल्य रत्न भरे पड़े थे।
सन्त ने अनजानों की तरह पूछा- भला इन रत्नों से आपका क्या प्रयोजन सधता है? क्या लाभ मिलता है ?
राजा ने कहा लाभ तो कुछ नहीं उलटे रखवाली पर खर्च उठाना पड़ता है।
सन्त ने कहा- इन्हें बेचकर आटा पीसने की चक्कियाँ खरीद कर प्रजाजनों को बँटवा दें। बन्द पत्थरों की तुलना में चलने और कुछ कमाने वाले पत्थर अधिक उपयोगी रहेंगे।
प्रगति का क्षेत्र भौतिक हो या आध्यात्मिक उसमें एक ही नियम काम करता है और उसी से ‘अभीष्ट’ सफलता प्राप्त होती है। वह नियम है- तपश्चर्या। भौतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रत्येक शक्ति को अभीष्ट श्रम करना पड़ता है। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, सैनिक, पहलवान, कलाकार, चपरासी, शिल्पी आदि सभी की सफलतायें उनमें प्रयत्न, पुरुषार्थ श्रम और साहस पर निर्भर रहती हैं। इस प्रयत्न परायणता को एक प्रकार से महाप्रज्ञा का तत्त्वदर्शन कहा जा सकता है, जो कि आत्मिक जीवन में भी एक समान लागू होता है। उस क्षेत्र की प्रगति पूरी तरह इस तथ्य पर निर्भर है कि साधन तपश्चर्या का साहसिकता किस मात्रा तक प्रचंड हो सकी है। उपासना और साधना का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा ही प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है। यह ऊर्जा तपश्चर्या के माध्यम से ही उत्पन्न होती है।
व्यक्तित्व की- अन्तः चेतना को ऊपर उठाने के लिए तपश्चर्या से उत्पन्न ऊर्जा के बिना काम नहीं चल सकता है। पैदल चलने को शरीर में शक्ति चाहिए। मोटर चलाना हो तो भी शक्ति की व्यवस्था जुटानी होती है। जीवन को ऊँचा उठाना हो, आगे बढ़ाना हो तो भी समर्थता उत्पन्न करके अपनी पात्रता विकसित करनी होगी।
आत्मिक प्रगति की दिशा में अभीष्ट सफलतायें प्राप्त करने वालों का इतिहास आदि से अन्त तक एक ही तथ्य प्रमाणित करता है कि उनने आवश्यक तपश्चर्या करके अपनी पात्रता विकसित की फलतः उन्हें विभूतियों, सिद्धियों से लाभान्वित होने का अवसर मिला। महामानवों से लेकर ऋषि महर्षियों तक की सफलतायें पूर्णतया उनकी तप साधना पर निर्भर रही है।
यथार्थता यह है कि भौतिक क्षेत्र की तरह ही आत्मिक क्षेत्र में भी आत्मपरिष्कार के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। उन्हीं के आधार पर वह क्षमता विकसित होती है जो अन्तर्गत की प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं को जगाकर किसी को विभूतिवान् बना सके। इसी आधार पर दैवी अनुग्रह भी आकर्षित किये जाते हैं। वृक्षों का चुम्बकत्व बादलों को अपनी ओर खींचता है और उन्हें पानी बरसाने के लिए विवश करता है। धातुओं की खदानें भी इसी आधार पर बनती और बढ़ती है कि जमा हुआ धातु भण्डार अपनी आकर्षण क्षमता से दूर-दूर तक फैले हुए सजातीय कणों को खींचता रहता है और उनके खिंच-खिंचकर जमा होते रहने से खदान का आकार भण्डार बढ़ाता है। फूल खिलता है तो भौंरे प्रशंसा करने, मधुमक्खी याचना करने और तितली शोभा बढ़ाने के लिए अनायास ही जा पहुँचती है यही बात सिद्धान्ततः आत्मिक प्रगति की दिशा में अक्षरशः लागू होती है। साधक की पात्रता का विकास जिस अनुपात से होता है उसी क्रम में उसका वर्चस्व बढ़ता चला जाता है। इन दिव्य उपलब्धियों का उद्गम अन्तःक्षेत्र में भी है और व्यापक ब्रह्म सत्ता से भी अजस्र अनुग्रह बरसते हैं। दोनों ही क्षेत्रों की उपलब्धियों से साधक निहाल होता है। इतने पर भी मूल तत्व जहाँ का तहाँ है। जो पाना है उसका मूल्य चुकाया ही जाना चाहिए।
भौतिक क्षेत्र में पुरुषार्थ और उनके प्रतिफल का कर्म और भाग्य का सिद्धान्त पग-पग पर चरितार्थ होता है। पुरुषार्थी सफलता पाते और अन्य शेखचिल्ली कल्पनाओं के पंख लगाकर कल्पना लोक में उड़ते रहते हैं। आत्मिक क्षेत्र में प्रगति प्रदान करने वाला पुरुषार्थ तपश्चर्या ही है। गायत्री महाशक्ति की उपासना करने वालों के आत्मिक विभूतियों को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त पुरुषार्थ करने का सिद्धान्त सहज ही समझ में आ सकता है, यदि वे यह समझ सकें कि आत्मिक पुरुषार्थ का नाम तपश्चर्या है। इसी मार्ग पर चलते हुए प्राचीन काल में महान आत्मवेत्ता उच्चस्तरीय सफलतायें प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। भागीरथ का गंगावतरण- पार्वती का शिव वरण तप साधना से ही सम्भव हो सका था। तपस्वी दधीचि की अस्थियों से ही व्यापक असुर साम्राज्य को ध्वस्त करने वाला वज्र बना। ध्रुव को परम पद तप से ही मिला। सप्तऋषियों को उच्चस्तरीय गरिमा इसी आधार पर प्राप्त हुई। विश्वामित्र ने इसी शक्ति के आधार पर नई दुनिया बनाने का साहस किया था। परशुराम का तप ही उनके कुठार के रूप संसार भर के अनाचार से लड़ सकने की क्षमता बनकर प्रकट हुआ था। शृंगी ऋषि के तप बल से ही उनकी मंत्र शक्ति इतनी समर्थ हो सकी कि उनके आचार्यत्व में किया गया दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ सार्थक हो सका। मध्यकाल में भी भगवान बुद्ध से लेकर इस सदी के योगी अरविंद तक की परम्परा में तपश्चर्या ही प्रधान रही है।
असुर वर्ग की क्षमतायें भी तपश्चर्या के आधार पर ही उभरी थी। पुराण साक्षी है कि हिरण्यकश्यपु, रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, मारीच, वृत्तासुर, भस्मासुर, सहस्रबाहु असुरों ने प्रचण्ड सामर्थ्य तप के बल पर ही प्राप्त की थी। भले ही वे उन सामर्थ्यों का सुनियोजन न कर पाये हों। गृहस्थ जीवन में रहते हुए कितने ही नर-नारी तप साधना के सहारे उच्चस्तरीय आत्म-शक्ति का सम्पादन कर सके हैं। गान्धारी ने नेत्र शक्ति, संजय की दिव्य दृष्टि, कुन्ती की देव सन्तान, सुकन्या के पति की वृद्धता निवारण, सावित्री का यम संघर्ष अनुसूया द्वारा तीन देवों को बाल स्वरूप जैसे घटनाक्रमों में तप की क्षमता ही उभरती हुई दिखाई पड़ती है। लोक हित के अनेक महत्वपूर्ण कार्य कर सकने वाले महामानवों में विलक्षण क्षमता का विकास साधना शक्ति के सहारे ही हो सका था। चाणक्य, समर्थ रामदास, गुरुनानक, ज्ञानेश्वर, शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस आदि के द्वारा लोकहित के जो महत्वपूर्ण काम बन पड़े उससे उनके तपस्वी जीवन की गरिमा प्रकट होती है। तप साधना के स्वरूप भिन्न-भिन्न हो सकने पर उन सबमें व्यक्तित्व को पवित्र परिष्कृत, प्रखर बनाने वाली कष्टसाध्य जीवनयापन प्रक्रिया का समावेश तो निश्चित रूप से ही रहेगा। सरलतापूर्वक, स्वल्प श्रम में पूजा पाठ करके गायत्री का अनुग्रह और आलोत्कर्ष का लाभ किसी को भी नहीं मिल सका है। भगवद् भक्ति भावुकता मात्र नहीं है। जीवनयापन की रीति-नीति में आदर्शवादिता के लिए कष्ट सहन करने की नीति का समावेश किये बिना उपासना का मूल प्रयोजन पूरा ही नहीं होता।
सामान्य व्यक्तियों में स्वार्थ परायणता, लोक लालसा और विषय तृष्णा ही छाई रहती है जबकि महामानव देवी परम्पराओं को इस प्रखरता के साथ अपनाते हैं कि उसके सम्मुख पशुता को परास्त होते और पलायन करते ही देखा जा सकता है। स्वार्थ और परमार्थ के संघर्ष में कौन विजयी होता है? पशु और देवता में से कौन जीतता है? इसका उत्तर इसी बात पर निर्भर है कि मानवी श्रमशीलता अपना समर्थन और योगदान किस पक्ष को प्रदान करती है। इस सन्दर्भ में धर्म युद्ध होना सुनिश्चित है। उस धर्म युद्ध में जिसको जितना शौर्य साहस एवं त्याग बलिदान प्रस्तुत करना पड़े, उसे उसी स्तर का तपस्वी कहा जा सकता है जिसने जितनी तप शक्ति अर्जित की समझना चाहिए वह आत्मिक प्रगति के लक्ष्य की ओर उतना ही आगे बढ़ा, महाप्रज्ञा का अनुदान उसे उतना ही मिला।
आत्मिक प्रगति का जिन्हें महत्व समझना हो उन्हें उस उपलब्धि का उचित मूल्य चुकाने का भी साहस उत्पन्न करना चाहिए। सिद्धियाँ सदा ही पुरुषार्थियों को प्राप्त रही हैं। विजयश्री शूरवीरों के ही हिस्से में आई है। आध्यात्मिक क्षेत्र का शौर्य साहस- पौरुष पराक्रम तप साधना के रूप में ही जाना जाता है। यहाँ एक बात पूरी तरह स्मरण रखी जानी चाहिए कि अकारण काया कष्ट देने को नहीं। उच्चस्तरीय आदर्शों के परिपालन में शारीरिक और मानसिक कष्ट सहना आवश्यक है। इसी को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना तप साधना कहलाता है। गायत्री की कृपा इससे कम में नहीं मिलती।
फिल्म का प्रभाव इन दिनों साहित्य से भी अधिक बढ़ चला है। युग परिवर्तन प्रयोजन हेतु साहित्य की ही तरह अब फिल्म निर्माण की भी बात सोची गयी है। चिन्तन तो काफी पूर्व से चल रहा था लेकिन उतने महँगे साधन न जुट पाने से उस आवश्यकता को पूरी करने का सुयोग नहीं बन पा रहा था।
इस बार इस इच्छा की पूर्ति का एक सुयोग अनायास बन गया। इन्सेट उपग्रह की सफलता व इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों पर ड्यूटी घटने से टेलीविजन अब सर्वसुलभ हो गए हैं। उन पर अब वीडियो रंगीन एवं बोलती फिल्में दिखाया जा सकना कहीं भी सम्भव हो जायेगा। फिल्म निर्माण का कार्य इस प्रकार वीडियो के माध्यम से कहीं अधिक सरल हो चला। नव निर्माण की फिल्में बनाने और उन्हें घर-घर, गाँव-गाँव लगे टेलीविजनों पर विशेष अटेचमैन्ट के माध्यम से दिखाने की सुविधा सम्भव हो गयी। पूँजी भी इसमें अधिक नहीं लगती।
अब युग निर्माण की विचारधारा को व्यापक बनाने वाली फिल्में बनाने और उन्हें देश के कोने-कोने में विदेश की समस्त शाखाओं में दिखाने का कार्य हाथ में ले लिया गया है। शान्तिकुंज में इसके लिए सुनियोजित स्टूडियो बनाया गया है, कलामंच बन रहा है एवं सभी अनिवार्य यन्त्र उपकरण खरीद लिए गए हैं।
इसका उत्साहवर्धक नए किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली माध्यम का शुभारम्भ उद्घाटन इसी बसन्त पर्व पर होने जा रहा है। पहली फिल्म समर्थ स्वाध्याय मण्डलों पर बनेगी। उनके संचालक फिल्म के पात्र होंगे और बताया जाएगा कि वे किस प्रकार अपने यहाँ इस स्थापना में सफल हो सके। परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी वे किस प्रकार अपने मुट्ठी भर साथियों की सहायता से चल प्रज्ञा संस्थान खड़ा कर सके। इस फिल्म का उद्देश्य सर्वत्र यह उत्साह उभारना है कि अन्यत्र भी इसका अनुकरण चल पड़े और 24000 समर्थ स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञासंस्थानों का संकल्प पूरा करने के लिए सभी वरिष्ठ प्रज्ञापरिजनों में उत्साह उभरे।
वसन्त पंचमी 7 फरवरी की है। शान्ति कुंज में बसन्त पर्व पर परिजनों की संख्या एक तो वैसे ही अधिक रहती है इस बार फिल्म स्टूडियो का उद्घाटन समारोह सम्मेलन होने से आदमियों की संख्या और भी अधिक रहने की सम्भावना को दृष्टिगत रखते हुए उद्घाटन समारोह के दो चरणों में सम्पन्न करने की व्यवस्था की गई है- (1) 4 से 8 फरवरी (2) 10 से 14 फरवरी।
परिजन दो में से किसी एक में सम्मिलित होने की बात ध्यान में रखते हुए शान्तिकुंज से पत्र व्यवहार करके अपने पहुँचने की सूचना दें।
उद्घाटन समारोह में मात्र समर्थ स्वाध्याय मण्डलों के संस्थापक संचालकों को बुलाया गया है। उनका कार्य विवरण ही फिल्माया जायेगा। निर्माण कार्य में ऐसी तत्परता रखी गई है कि उसे हाथों हाथ दिखाया जा सके। सभी आगन्तुकों को ये फिल्म दिखायी जाएँगी।
स्वाध्याय मण्डलों के नाम से संकल्प तो कितनों ने ही लिए लेकिन उनकी लकीर पूजा ज्यों की त्यों करने के प्रयास जिनने किए हैं, उन्हें सामान्य कहा गया है। समर्थ स्वाध्याय मण्डल वे हैं जिन्होंने ज्ञान रथ बनाए, चलाए तथा स्लाइड प्रोजेक्टर दिखाने, जन्म दिन मनाने जैसे प्रज्ञाचक्र घुमाने से संबंधित कार्यक्रम पूरे उत्साह के साथ चलाए हैं। इन लोगों ने स्मारिका प्रकाशन व पूँजी जुटाने का कार्य भी बिना किसी कठिनाई के कर लिया है। गर्मी के दिनों में प्रायः सभी समर्थ मण्डल अपने यहाँ प्रज्ञायोजन सम्पन्न करने की व्यवस्था भी बना रहे हैं ताकि उस क्षेत्र में जन-जागरण का उमंग भरा वातावरण बने और जन समर्थन जन सहयोग में कमी न पड़े। नव सृजन की अन्यान्य गतिविधियों को अगले दिनों इसी उत्साह के आधार पर सम्पन्न किया जा सकेगा।
वीडियो फिल्म स्टूडियो अपना बन जाने का समाचार समूचे प्रज्ञा परिवार में उत्साहपूर्वक सुना जाएगा। उद्घाटन समारोह में मात्र समर्थ स्वाध्याय मण्डल संचालकों को ही आमंत्रित किया गया है। उनकी उपस्थिति प्रथम फिल्म निर्माण हेतु आवश्यक समझी गई है। जो यह स्थापना कर चुके या करने जा रहे हैं, वे अपने पहुँचने की सूचना अविलम्ब शांतिकुंज भिजवा दें। स्त्री बच्चों के साथ न लाएँ। भीड़ अधिक होगी और स्थान कम पड़ेगा। यह प्रतिबंध इसी कारण लगाया गया है।
अकेले न रहें- विस्तार में जुट पड़ें
अखण्ड ज्योति के पाठक परिजनों की गरिमा का मूल्याँकन उसके सूत्र संचालक, उनकी सुरुचि श्रद्धा एवं आदर्शवादिता के स्तर को देखते हुए करते हैं। सामान्यजनों का आदर्शों के प्रति कोई लगाव नहीं जबकि पाठक न केवल उस दिशा में रुचि लेते हैं, वरन् युग धर्म के निर्वाह का यथा सम्भव प्रयास भी करते हैं। उन्हें स्वयं भी अपनी आन्तरिक वरिष्ठता और विशिष्टता का अनुभव इसी रूप में करना चाहिए। साथ ही यह भी ताना-बाना बुनना चाहिए कि इस प्रभात पर्व की पुण्य बेला में उनका अतिरिक्त योगदान भी अनुकरणीय स्तर का होना चाहिए।
मुर्गा ब्राह्मण मुहूर्त की पूर्व सूचना देने और जो जग सकें उन्हें जगाने के लिए बाँग लगाने की जिम्मेदारी निभाने भर से यशस्वी हो गया। उषा सूर्योदय से पूर्व मुस्कराती भर है। पक्षियों का कलरव दिनकर के अभिनन्दन में किसी बड़ी स्वागत समारोह से कम नहीं आँका जाता। फूल खिलते तो अपनी डालियों पर ही हैं पर समझा यह जाता है कि वे दिनमान की अभ्यर्थना में मुखर हो चले। नगण्य का भी अपना महत्व होता है। परमाणु में भी सामर्थ्य होती है। स्वल्प पूँजी वाले दीपक भी देवता की आरती का श्रेय पाते हैं। अखण्ड ज्योति परिजनों की पुष्पमाला बाजारू मूल्य की दृष्टि से उपहासास्पद भी हो सकती है, पर उसके द्वारा युग देवता का जो शोभायमान श्रृंगार होने जा रहा है, उसे अपने स्थान पर अपने ढंग का अनोखा ही कहा जा सकता है।
अब हमें अपने परिवार के विकास-विस्तार की बात सोचनी चाहिए। केला कटने और फलने के साथ ही तने में से सौ पौध विकसित कर देता है, जो उसका वंश चलाती ही नहीं, बढ़ाती भी रहें। बाँस भी यही करता है। उसकी जड़ें भी नये अंकुर फोड़ती रहती हैं। परिपक्व होकर कटने तक की स्थिति तक पहुँचने से पहले ही वह अपने वंशधरों की इतनी संख्या बढ़ा चुका होता है। कि उसका एकाकी अस्तित्व एक शोभायमान झुरमुट रूप में विकसित हो चले।
कहते हैं मनु-शतरूपा या आदम-हब्बा के संयोग से मानवी सृष्टि उत्पन्न हुई। यह विकासक्रम असुरों ने ही नहीं देवताओं ने भी सम्पन्न किया है। अकेले हनुमान ने राम भेंट के उपरान्त सुग्रीव को उकसाया और दूर-दूर तक बिखरे रीछ वानरों को समेट कर समुद्र बाँधने के मोर्चे पर जुटाया। असहाय पाण्डवों का अपना जीवन निर्वाह ही कठिन था, कौरवों से लड़ने के लिए सेना कहाँ से बनती? यह कार्य कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने अपने कन्धों पर उठाया और एक समर्थ सैन्य दल मोर्चे पर ला खड़ा किया। यह देवताओं का वंश वृद्धि क्रम है।
राणाप्रताप और छत्रपति शिवाजी स्वतन्त्रता संग्राम के लिए प्रतिज्ञाएँ लेते समय सर्वथा एकाकी थे। संकल्प के उपरान्त वे सहयोगियों की तलाश में निकले। यों उन दिनों आतंक का साम्राज्य था और हर कोई अपनी प्राण रक्षा के लिए चिन्ताग्रस्त था तो भी गोताखोरों के हाथ मोती लगे और उस माहौल में भी उन्हें साथ मिल गये। जुझारू दल बने। दीपक से दीपक जले और कारवाँ बढ़ता ही रहा। देर तो लगी पर प्रतिज्ञा पूरी होकर रही। भारत स्वतन्त्र है, जैसा कि उन दो संकल्प वालों ने चाहा और व्रत अपनाया।
बुद्ध घर से निकले तो सर्वथा एकाकी थे। तप करने के दिनों भी वे अकेले थे। बुद्धत्व प्राप्त करने के उपरान्त उनकी अन्तरात्मा ने कहा अकेलापन पर्याप्त नहीं तिनके समेटने से रस्सा बटा जायेगा। सींकों से बुहारी बनेगी। ईंटें इकट्ठी किये बिना भवन कैसे बने। जब राम को रीछ बानरों की, और कृष्ण को ग्वाल-बालों की आवश्यकता पड़ी तो एकाकीपन अपनाकर मैं ही प्रभु प्रेरणा को पूरी करने में किस प्रकार समर्थ हो सकूँगा? टोली बनाऊँ। मण्डली जमा करूँ। बुद्ध निकले। था तो सर्वत्र अंधेरा। हाथ को हाथ नहीं सूझा था। फिर भी साहस तो साहस जो ठहरा। बुद्ध हुँकारे तो कुहराम मच गया। एक मुर्गा बोला तो उसके बिरादरी वाले भी चुप न रहे। बाँग पर बाँग लगती चली गई। सोने वालों की नींद हराम हो गई। आखिर प्रभात उग कर ही रहा।
नाविक का साहस ही है, जो नाव को भुजदंडों के बलबूते उफनती नदी की छाती चीर कर देखता है और असंख्यों को पार उतारता है। भुजाएँ उसकी भी वैसी होती हैं, जैसी सामान्यजनों की। विशेषता पराक्रम की होती है।
युगान्तरीय चेतना का आलोक व्यापक बनाना आज अति महत्वपूर्ण कार्य है। प्रज्ञा-परिवार के परिजनों संख्या उत्साहवर्धक तो है, पर सन्तोषजनक नहीं। 500 करोड़ जन समुदाय का चिन्तन चरित्र और व्यवहार बदलने की दृष्टि से हम मुट्ठी भर लोग बहुत ही कम हैं। हमें वंश−वृद्धि करनी चाहिए। अपने जैसे अन्य खोजने, बनाने, उगाने, पकाने के प्रयत्न में हमें लगना चाहिए। अन्यथा बढ़ती हुई भ्रांतियाँ, विकृतियाँ दुष्प्रवृत्तियाँ अगले दिनों अपनी बाढ़ में सब कुछ बहा ले जायेंगी। जो संचित सभ्यता को डुबो देने में समर्थ होंगी। रोकथाम तो होनी ही चाहिए। चोरों की बारात को चुनौती देने के लिए युग प्रहरियों को भी तो कटिबद्ध होना चाहिए। मोर्चा संभालने के लिए मुट्ठी भर सैनिक पर्याप्त नहीं होते। उनका संख्या बल भी बढ़ना चाहिए और स्तर भी। आज की एक महती आवश्यकता है, जिसे पूरा करने के प्रज्ञा परिवार के वर्तमान परिजन भी बहुत कुछ कर सकते हैं।
यों करने को तो इन दिनों एक से एक बड़े काम सामने पड़े हैं। विनाश से जूझने और सृजन को समर्थ बनाने के लिए इतना कुछ करने के लिए पड़ा है, जिसके लिए हजारों परशुराम, भगीरथ, दधीचि, हरिश्चन्द्र भी कम पड़ेंगे, पर उतना न सही हम सभी टिटहरी-गिलहरी जैसे अपने अकिंचन अनुदान तो प्रस्तुत कर ही सकते हैं। केवट की तरह युग देवता के सहयोग में नाव खेने जैसा श्रमदान तो बन ही पड़ सकता है। अन्यत्र जा सकना सम्भव न हो, कोई बड़ा काम करने का साहस न हो तो भी इतना तो करना ही चाहिये कि जहाँ रहते हैं वहाँ बुहारी लगायें, दीपक जलायें और प्रगतिशीलों जैसा वातावरण बनायें। सम्पर्क क्षेत्र को सुविस्तृत बना सकना सम्भव न हो तो उस निमित्त परिवार की चहार दीवारी, तो कार्य क्षेत्र बन ही सकती है।
इन दिनों प्रज्ञा परिवार को स्वाध्याय मण्डलों के रूप में संगठन खड़े करने और प्रकाश वितरण में जुटाने के लिये कहा गया है। विचार क्रान्ति की प्रज्ञा अभियान की व्यापकता इससे कम में बन नहीं पड़ेगी। युग चेतना से अवगत-अनुप्राणित व्यक्ति ही इस योग्य हो सकते हैं कि युग धर्म पहचानें। युगशिल्पी बनें और युग प्रहरी के रूप में जन जागरण का माहौल बनायें। इस सन्दर्भ में सबसे पहला काम समय की पुकार सुनने और परिवर्तन की पृष्ठभूमि समझना है। स्वाध्याय मण्डलों को यही काम सुपुर्द किया गया है।
स्वाध्याय मण्डलों का बड़ा और विस्तृत स्वरूप भी है। उसके अन्तर्गत ज्ञानरथ के रूप में चल देवालय खड़ा करने और बिना इमारत वाले प्रज्ञा संस्थानों का संचालन करने की बात भी है। एक कार्यकर्ता की नियुक्ति से न केवल हर शिक्षित को घर बैठे बिना मूल्य नियमित रूप से स्वाध्याय की सुविधा प्रस्तुत की जा सकती है। वरन् साथ-साथ सत्संग का उपक्रम भी चलता रह सकता है। स्लाइड प्रोजेक्ट, टेप रिकार्डर जैसे उपकरणों से कोई सामान्य व्यक्ति घर-घर में गली-मुहल्लों में प्राणवान सत्संग की व्यवस्था निरन्तर बनाये रह सकता है। पूँजी जुटाने के लिए स्मारिका प्रकाशन की और नियुक्त कार्यकर्ता के निर्वाह के लिए जन्म दिवसोत्सव मनाने और उस अवसर पर ज्ञानघट स्थापित करने की रीति-नीति अपनाई गई है। यह बड़े स्वाध्याय मण्डलों की बात हुई। इसके लिए थोड़ी दौड़-धूप करने, सम्पर्क बनाने और साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ेगी। प्रतिभावानों से कहा गया है कि वे अपने व्यस्त कार्यक्रमों में एक छोटी प्रक्रिया यह भी सम्मिलित करते रहें और निर्वाह क्रम में बिना किसी प्रकार का हर्ज किये इस सरल किन्तु दूरगामी सत्परिणाम प्रस्तुत करने वाली परमार्थ व्यवस्था को भी चलाते रहें। स्वाध्याय मण्डलों का संस्थापन और संचालन ऐसा कार्य है, जिसे कोई भी भावनाशील उत्साही व्यक्ति एकाकी प्रयास से भली प्रकार चलाता रह सकता है।
जो इतना न कर सकें संकोचशीलता अथवा व्यस्तता जिनके आड़े आती हो, वे अपने घर-परिवार की परिधि में चल सकने वाला स्वाध्याय मंडल बनालें। घर के शिक्षितों को प्रज्ञा साहित्य पढ़ाने और अशिक्षितों को सुनाने की यदि नियमित व्यवस्था चल पड़े तो समझना चाहिए कि इससे भी पारिवारिक स्वाध्याय मण्डल बन गया। घर के छोटे-बड़े सदस्यों के सहारे भी यह प्रक्रिया गतिशील हो सकती है। आखिर परिवार भी तो एक छोटा समाज या राष्ट्र ही है। उतने क्षेत्र में भी लोक मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन का प्रयास बन पड़े तो समझना चाहिए कि छोटे खेत में बोया गया बीज भी अगले दिनों टोकरी भर धान्य के रूप में विकसित होगा।
अखण्ड ज्योति पाठक पत्रिका मँगाते और स्वयं पढ़ कर उसे एक कोने में रख देते हैं। अब आगे से यह होना चाहिए उसे घर के शिक्षितों को पढ़ने के लिये दबाव डालें और अशिक्षितों को पढ़ कर सुनाया करें। अखण्ड ज्योति की पूरक दूसरी पत्रिका है युग निर्माण योजना। उसे भी मँगाना आरम्भ कर दें। दो मासिक पत्रिकायें पढ़ने-पढ़ाने से युग चेतना का दीपक अपने छोटे परिवार में प्रकाश वितरण की उत्साहवर्धक भूमिका निभा सकता है। परिवार को आदर्शवादिता की ओर अग्रसर करना भी युग सृजन का ही छोटा किन्तु महत्वपूर्ण अंग है। पत्रिकाओं को घर से बाहर के सम्पर्क क्षेत्र में भी पढ़ाने-लौटाने के लिये भी बिना कुछ अतिरिक्त समय खर्च किये प्रयत्न किया जाता रह सकता है। एक पत्रिका को कम से कम दस पढ़ें, इतना भी नियमित रूप से बन पड़े तो समझना चाहिए कि विचार क्रान्ति की प्रज्ञा अभियान की वंशवृद्ध योजना अग्रगामी हो चली।
इसी प्रक्रिया में थोड़ा और अधिक उत्साह उभरे, तो फिर घरेलू प्रज्ञा पुस्तकालय की स्थापना की जाय। इन दिनों मिशन के सूत्र संचालक प्रतिदिन एक प्रज्ञा फोल्डर लिखते हैं। इसे लिख चुकने के बाद ही जल ग्रहण करते हैं। इस नव सृजित प्रज्ञा साहित्य को नियमित रूप से अपने घर मँगाने का प्रबन्ध करने की व्यवस्था की जा सकती है। हर फोल्डर का लागत मूल्य चालीस पैसा है। यह इतने मजबूत कागज पर छपे हैं कि सौ व्यक्तियों द्वारा पढ़ लिये जाने पर भी स्थिरता-सुन्दरता यथावत् बनी रहती है। चालीस पैसा प्रतिदिन की कटौती अन्य कार्यों में से करके परिवार की प्रज्ञा सम्पदा बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है। इसे पारिवारिक वैभव वृद्धि के लिए बचाई, जुटाई या लगाई गई राशि कहा जा सकता है।
पत्रिकायें तो महीने में एक ही बार आती हैं पर यह फोल्डर हर दिन नई प्रेरणा लेकर लिखे और पहुँचाये जाते हैं। इससे पढ़ने वालों को नित नया पाने की उत्सुकता बनी रहती है और उगा हुआ उत्साह नियमित भोजन मिलते रहने के कारण ठंडा नहीं पड़ने पाता। जिनके लिए सम्भव हो वे घरेलू प्रज्ञा पुस्तकालय स्थापित कर लें और पारिवारिक परिधि में काम करने वाला स्वाध्याय मंडल चलाना आरम्भ कर दें।
स्वाध्याय के साथ-साथ सत्संग का भी अन्न जल जैसा युग्म है। सत्संग के लिए रात्रि को प्रज्ञा पुराण कथा चल पड़नी चाहिये। घर के सभी छोटे-बड़े उसे श्रद्धापूर्वक सुनें। कहने का अभ्यास करने से वक्तृत्व कला का विकास होता है। प्रेरणाप्रद कथायें सुनने की पुरातन परम्परा को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया ऐसी है जिससे भाव चेतना में उत्कृष्टता भरने का उपचार सहज ही चलता रह सकता है और उस आधार पर घर में देव परम्परा के प्रति सभी का श्रद्धा विश्वास बना रह सकता है। यह उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक चिन्ह है। महिलायें प्रज्ञा पुराण कथा तीसरे पहर कथा कहकर परिवारगत अथवा मुहल्ले में सत्संग प्रक्रिया चलाती रह सकती हैं। प्रज्ञा पुराण एक खण्ड छप चुका है दूसरा, तीसरा खण्ड अगले महीनों में छप जाने की आशा है। जिनने प्रथम खण्ड पढ़ा है वे दूसरे और तीसरे खण्डों के लिए के लिए साल भर से प्रतीक्षा कर रहे हैं।
अगले दिनों पारिवारिक सत्संग प्रयोजनों के लिए टेपों की योजना बनी है। उनमें जीवन निर्माण के भक्ति-भावना के नव-सृजन के गीत रहेंगे। बच्चों के लिए, युवकों के लिए, महिलाओं के लिये, वृद्धों के लिये हर स्तर की कथा, संस्मरण एवं प्रेरक प्रसंगों की भरमार रहेगी। जिनके पास टेप रिकार्डर हैं वे इस योजना से लाभ उठाते रहेंगे। अपने तथा दूसरों के घरों में यह सत्संग लाभ प्रस्तुत करते रहेंगे।
प्रतिदिन पच्चीस पैसे का बजट बना दिया जाय तो उतने भर से दोनों मासिक पत्रिकायें, दैनिक प्रज्ञा फोल्डर वार्षिक प्रज्ञा पुराण का युग साहित्य खरीदा और पढ़ाया जा सकता है। पारिवारिक बजट में इतनी राशि और बढ़ानी पड़े और इसके लिए किन्हीं कम महत्व के कार्यों में कटौती करनी पड़े तो समझना चाहिए कि यह एक बुद्धिमत्ता पूर्ण कदम उठा और उपयोगी संतुलन बन पड़ा। घरेलू स्वाध्याय मंडल की स्थापना इतने भर से हो गयी और उस आधार पर स्वाध्याय एवं सत्संग की उभय पक्षीय प्रक्रिया बन पड़ी। इस आधार पर अपने स्वजन सम्पर्क में यह बीजारोपण हो सकता है जिसके लिए प्रज्ञा अभियान के अन्तर्गत मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का उद्घोष किया जाता रहा है।
‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’ ‘हम सुधरेंगे युग सुधरेगा’ का संकल्प पूरा करने के लिये अग्रगामियों को कुछ तो करना ही होगा। आदर्श उपस्थित करके ही अन्यान्यों को अनुकरण की प्रेरणा दी जा सकती है। युग परिवर्तन का वातावरण व्यापक बनाने के लिये उसका श्रीगणेश अपने घर परिवार से किया जा सकता है। उसके लिये किसी से परामर्श की, सहयोग अर्जित करने की आवश्यकता नहीं, इतना तो हममें से कोई भी कर सकता है। भावनात्मक वंश वृद्धि के लिये बाहरी क्षेत्र में प्रवेश करने, कदम बढ़ाने में कठिनाई प्रतीत होती हो तो घर परिवार में तो किसी रोकथाम की व्यवधान की कठिनाई नहीं है।
स्वाध्याय सत्संग की तरह ही भावनात्मक नवनिर्माण का एक माध्यम आस्तिकता अभिवर्धन भी है। धार्मिकता आध्यात्मिकता की तरह आस्तिकता भी भावना, चेतना में उत्कृष्टता अभिवर्धन का एक नितान्त आवश्यक माध्यम है। अखण्ड ज्योति परिजन न केवल विचार विस्तार की आवश्यकता समझें वरन् उसके साथ-साथ घर में आस्तिकता का वातावरण बनाने के लिए प्रयत्न करें। इस आधार पर चरित्र चिन्तन और व्यवहार में देवत्व का अभिवर्धन होकर चिरस्थाई सुख-शांति के लिए इसकी भी महती आवश्यकता है। आस्तिकता का बीजारोपण एवं परिपोषण करने के लिए न्यूनतम उपासना की भी एक मर्यादा बन चले। यह प्रज्ञा युग की अवतरण बेला है। गायत्री महामन्त्र में युग प्रज्ञा के समस्त तत्वों का समावेश है। किसी उपयुक्त स्थान पर महाप्रज्ञा गायत्री का एक चित्र स्थापित किया जाय। पूजा स्थल रहे उस पर चित्र प्रतिमा सजे तो और भी अच्छा अन्यथा दीवार पर चित्र इस प्रकार लगाया जाय कि उसका दर्शन और नमन-वन्दन हर किसी के लिए सम्भव हो सके। अगरबत्ती जला देने से भी यज्ञ पिता की प्रतीक पूजा भी साथ-साथ होती रह सकती है। दीवार पर स्थापित करना हो तो उसके नीचे एक लकड़ी की पट्टी भी लगा देनी चाहिए, अगरबत्ती जलाने के लिए चित्र टीन पर छपे हरिद्वार, मथुरा से मिल जाते हैं।
न्यूनतम उपासना यह हो सकती है कि सिर झुकाकर हाथ जोड़कर आँखें बन्द करके चौबीस बार मन ही मन गायत्री मंच का मानसिक जप कर लिया जाय और साथ ही प्रातःकालीन अरुणोदय के रूप में स्वर्णिम सविता का ध्यान करते रहा जाय। ध्यान का अर्थ छवि दर्शन ही नहीं उसकी प्राण ऊर्जा का व्यक्तित्व के कण-कण में समावेश की भावना करनी भी है। चौबीस मंत्र जपने में तीन मिनट लगते हैं। इतनी ही देर साथ-साथ सविता का ध्यान और दिव्य प्रकाश का अन्तः चेतना में अवतरण की भावना भी करते रहा जाय। इतने भर से न्यूनतम उपासना हो सकती है और उसका भोजन करने से पूर्व कोई भी निर्वाह कर सकता है। इसमें तो स्नान जैसा बंधन भी नहीं है।
स्वाध्याय, सत्संग और साधन की त्रिविधि प्रक्रिया अपने घर परिवार में चल पड़े तो पड़ौसियों मित्रों, परिचितों, सम्बन्धियों तक में भी आलोक वितरण की इस प्रक्रिया को अग्रगामी बनाया जा सकता है। अपने प्रज्ञा पुस्तकालय का लाभ उन्हें भी दिया जाने लगे, इसमें थोड़े से मनोयोग भर की आवश्यकता है। घर में आते-जाते रहने वाले या दफ्तर कारखाने में नित्य ही मिलते जुलते रहने वालों को अपने पुस्तकालय के प्रज्ञा फोल्डर एवं पत्रिकाओं के अंक पढ़ने के लिये दिये जाते रहें तो समझना चाहिए कि ज्ञान यज्ञ को व्यापक बनाने की सेवा साधना का निर्वाह भी साथ-साथ चल पड़ा।
प्रतिभायें सदा अपने सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित करने में सफल होती रही हैं। बुरे लोगों में भी जब मान्यता और क्रिया का समन्वय रहता है तो वे अपने जैसे अनेकों अनुयायी सहचर विनिर्मित कर लेते हैं। व्यसनी, चोर, लवार, लम्पट जब अपने गिरोह खड़े कर लेते रहते हैं। अनेकों को इन दुष्प्रवृत्तियों की ओर ललचाने सिखाने में सफल होते हैं तो कोई कारण नहीं कि आदर्शवादिता यदि जीवन्त स्तर की हो तो अपना विकास विस्तार न कर सके।
इन पंक्तियों में युग चेतना को अग्रगामी बनाने के लिये घरेलू स्वाध्याय मंडल की स्थापना के लिए कहा जा रहा है। अपने परिवारों में से एक भी ऐसा न रहे जिसमें हर छोटे किन्तु दूरगामी परिणाम प्रस्तुत करने वाले प्रयास के लिए उत्साह प्रदर्शित न किया गया हो। भावनात्मक वंश वृद्धि के लिए उन सभी को कहा जा रहा है कि अपने जैसे दस और विचारशील उत्पन्न करें। प्रज्ञा परिजन अगले वर्ष तक एक करोड़ बन कर रहे। 500 करोड़ों को बदलने के लिए इससे कम से काम चल नहीं रहा है।
(माया वर्मा)
स्वयं ही बाँध लो लय में सृजन के गीत को रचकर। किसी का क्या पता दे या न दे संकल्प वाले स्वर॥
स्वयं ही भ्रान्तियों को छोड़कर दुष्कल्पना मेटो, असीमित हो रही हो जो कि ऐसी कामना मेटो।
हरो अज्ञान का तम छा रहा है जो कुहासा बन, कि जिसने कर दिया धूमिल सितारे सा तुम्हारा मन।
स्वयं ही रोशनी के दीप वालो भ्रान्त मानस पर- किसी को क्या, तुम्हारे हित उगाये ज्ञान का दिनकर॥
पगों में शक्ति इतनी हो न हारे पूर्व मंजिल के, स्वयं दृढ़तर करो यदि टूटते हों हौसले दिल के।
चुभें यदि शूल पाँवों में निकालो हाथ से अपने, न टूटें साथ छालों के सफलता के सुखद सपने।
स्वयं लक्ष्य का दिशि ज्ञान करलो हर दिशा लखकर। किसी का क्या पता दे या न दे संकेत भी बढ़कर॥
स्वयं के ही भरोसे पर बनाओ जिन्दगी का क्रम, न दे यदि साथ कोई तो न हो विश्वास अपना कम।
सहारे तो सहारे हैं किसी दिन टूट जायेंगे, किनारे तो किनारे हैं किसी दिन छूट जायेंगे।
स्वयं ही पार तक जाओ भँवर में नाव को खेकर। किसी को क्या बचाये जो तुम्हें मँझधार में पड़कर॥
स्वयं ही दो सहारा टूटती सी मान्यताओं को, स्वयं ही आज सेहला लो हृदय की उन व्यथाओं को।
कि जिनमें है शिकायत विश्व ने हमको नहीं जाना, न सहने योग्य पीड़ा थी, मगर उसको नहीं माना।
स्वयं ही प्यास को सीमित करो जो कर रही जर्जर। किसी का क्या, पता दे या न दे परितृप्ति का निर्झर॥
*समाप्त*