स्थूल प्रत्यक्ष होने के कारण इन्द्रिय-ज्ञान एवं यंत्र उपकरणों की सहायता से देखा जा सकता है। उसका नाम रूप भी होता है तथा विस्तार मूल्य भी। इतने पर भी उसका स्तर सीमित और क्षमता स्वल्प होती है। इस पर भी लोग उसका प्रत्यक्ष परिचय पाते हैं और हानि लाभ का शोक हर्ष अनुभव करते हैं।
सूक्ष्म की प्रकृति भिन्न है वह इन्द्रिय द्वारा बोधगम्य नहीं-प्राण की तरह। शरीर प्रत्यक्ष दीखता है पर प्राण की नाप-तौल-ऊंचाई, चौड़ाई, लम्बाई नापना कठिन है। किन्तु सभी जानते हैं शरीर की बुद्धि शक्ति आदि का आधार भूत कारण प्राण ही है। प्राण निकल जाने पर शरीर का मूल्य कानी कौड़ी भी नहीं रह जाता है।
पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अदृश्य है। पर उसी के सहारे वह सौरमंडल में अपना स्थान बनाये हुए हैं। उसके अभाव में वह तिनके या पत्ते की तरह छितराकर कहीं से कहीं चली जाती है।
मनुष्य पशु वर्ग का प्राणी है। पर उसकी सूक्ष्म क्षमता का कोई आर-पार नहीं। महामानव ऋषि देवता जैसी प्रतिभाएं और किसी कारण नहीं मात्र अपनी सूक्ष्म शरीर की विशेषताओं के कारण ही कुछ से कुछ बन जाते हैं। गाँधी, बुद्ध जैसों की शारीरिक विशेषताएं नहीं उनका आन्तरिक वर्चस्व ही ऐसा था जिससे वे अपने समय का काया कल्प कर सकने में समर्थ हुए।
प्रकृति का सूक्ष्म शरीर अदृश्य है। ताप, ध्वनि, प्रकाश, चुम्बक आदि की किरणें जब किसी से टकराती हैं तब अपने अस्तित्व का बोध कराती हैं। अति शक्तिशाली मानी जाने वाली लेजर किरणें अदृश्य है। परमाणु की विखंडित इकाइयाँ अदृश्य होने पर भी अनन्त शक्ति की भाण्डागार है।
मनुष्य स्थूल स्थिति में हाड़ माँस का पुतला है। किन्तु जब वह परिष्कृत सूक्ष्म के क्षेत्र में प्रवेश करता है तब उसे देवात्मा कहते हैं। उसकी सामर्थ्य लगभग ईश्वर के समान होती हैं।
मई 1984 से हमने अपने स्थूल शरीर से संभव हो सकने वाला स्थूल स्तर का क्रियाकलाप बन्द कर दिया। इसका अर्थ हुआ- भेंट, मिलन वार्तालाप, विचार विनिमय, परामर्श का अब तक चलने वाला सिलसिला एक प्रकार से समाप्त ही हो जाना। कोई विशेष अपवाद हो, तब ही इस प्रक्रिया का व्यक्तिक्रम करेंगे। जड़ नियम जड़ पदार्थों पर लागू होते हैं। चेतना की अपनी विशेष स्थिति है वह जीवित रहते हुए भी मृतक और मृत होते हुए भी जीवितों जैसे आचरण करती पायी जाती है।
हमारी सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया का प्रयोजन पाँच कोशों पर आधारित सामर्थ्यों को अनेक गुनी कर देना है। दो शरीर मिलकर तो गणना में दो ही होते हैं। पर सूक्ष्म-जगत में स्थूल अंक गणित, रेखा गणित, बीज गणित काम नहीं आती। उस लोक का गणना चक्र अलग ही गुणन क्रम से चलता है। स्कूली गणित में 2+2+2+2=8 होंगे। लेकिन सूक्ष्म जगत में 2×2×2×2=16 हो जायेंगे। सूक्ष्मीकृत शक्तियाँ कई बार तो इससे भी बड़े कदम उठाते देखी गई हैं। मनुष्य में पाँच कोश हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय। मोटे तौर से सभी कोशों के जागृत होने पर एक मनुष्य पाँच गुनी सामर्थ्य सम्पन्न माना जाता है। पर दिव्य गणित के हिसाब से 5×5×5×5×5=3125 गुणा हो जाता है। शरीर गत पाँच भौतिक शरीर प्रत्यक्ष गणित के हिसाब से ही कुछ काम कर सकते हैं। चेतना के पाँच प्राण भी शरीर की परिधि में बंधे रहने तक पाँच विज्ञजनों जितना ही होते हैं, पर सूक्ष्मीकृत होने पर गणित की परिपाटी बदल जाती है और एक सूक्ष्म शरीर की प्रखर सत्ता 3125 गुनी हो जाती है।
हनुमान द्वारा रामायण काल में जो अनेकों अद्भुत काम संभव बन पड़े, वे उनके सूक्ष्म शरीर के ही कर्तव्य थे। जब तक वे स्थूल रहे, तब तक उन्हें सुग्रीव का नौकर रहना पड़ा और बातों द्वारा बालि द्वारा सुग्रीव की तरह उन्हें भी अपमानित होना पड़ा। पर सूक्ष्मता का अवलम्बन तो चेतना की सामर्थ्य को कुछ से कुछ बना देता है।
यह कार्य युग परिवर्तन प्रयोजन में भगवान की सहायता करने के लिए मिला है। युग संधि का समय सन् 2000 तक चलेगा। इस अवधि में हमें न बूढ़ा होना है, न मरना। अपनी 3125 गुनी शक्ति के अनुसार काम करना है। कालक्षेत्र के नियमों का भी सीमा बंधन नहीं रहेगा। इसलिए जो काम अभी हाथ में हैं, वे अन्य शरीरों के माध्यम से चलते रहेंगे। लेखन हमारा बड़ा काम है, वह अनवरत रूप से सन् 2000 तक चलेगा। यह दूसरी बात है कि कलम जो हाथ में जिन अंगुलियों द्वारा पकड़ी हुई है वे ही कागज काला करेंगी या दूसरी। वाणी हमारी रुकेगी नहीं। यह प्रश्न अलग है जो जीभ इन दिनों बोलती चालती है, वही बोलेगी या किन्हीं अन्यों को माध्यम बनाकर काम करने लगेगी। अभी हमारा कार्य क्षेत्र मथुरा, हरिद्वार रहा है और हिन्दू धर्म के क्षेत्र में कार्य चलता रहा है। आगे वैसा देश, जाति, लिंग, धर्म, भाषा आदि का कोई बन्धन न रहेगा जहाँ जब जैसी उपयोगिता आवश्यकता प्रतीत होगी वहाँ इन इन्द्रियों की क्षमताओं से समयानुकूल कार्य लिया जाता रहेगा।
सन् 2000 तक किसी अनाड़ी को ही हमारे मरण की बात सोचनी चाहिए। विज्ञजनों को स्मरण रख लेना चाहिए कि इस दृश्यमान शरीर से भेंट दर्शन, परामर्श, हो या नहीं, हमारे अपने कार्य क्षेत्र में उत्तरदायित्वों की पूर्ति में अनेक गुनी तत्परता से काम होते रहेंगे। सहकार और अनुदान क्रम भी चलता रहेगा। हमारे मार्गदर्शक की आयु 600 वर्ष से ऊपर है। उनका सूक्ष्म शरीर ही हमारी रूह में है। हर घड़ी पीछे और सिर पर उनकी छाया विद्यमान है। कोई कारण नहीं कि ठीक इसी प्रकार हम अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सत्पात्रों के लिए सत्प्रयोजनों में लगाने हेतु वैसा ही उत्साह भरा उपयोग न करते रहें। पाठकों-आत्मीय परिजनों को सन् 2000 तक सतत् हमारे विचार ‘ब्रह्मवर्चस’ नाम से पत्रिकाओं पुस्तिकाओं फोल्डरों के माध्यम से मिलते रहेंगे।
भगवान को सृष्टि के आरम्भ में एक से अनेक बनना पड़ा था, तब इतना सृष्टि विस्तार सम्भव हो सका। विश्व में महान परिवर्तन करने वालों को भी अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाकर यही करना पड़ा है।
ऋषि कल्प व्यक्तियों को अपनी निज की क्षमता को ही कई खण्डों में विभाजित करके कई गुना करना पड़ता है। सभी जानते हैं कि चीरने, कूटने, तोड़ने, पीसने की प्रक्रिया द्वारा एक वस्तु के कई टुकड़े हो जाते हैं। आमतौर से इस कूट-पीस द्वारा प्रत्येक टुकड़ा कमजोर पड़ता जाता है, किन्तु अपवाद के रूप में कई बार अधिक सशक्त भी होता है। मिट्टी का ढेला एक होता है, पर यदि उसके अणु परमाणुओं को विखंडित करते चला जाय तो अन्ततः भयंकर ऊर्जा का विस्फोट होता है। छोटा कण बड़े टुकड़ों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।
सभी जानते हैं कि पदार्थ की सूक्ष्म इकाई अणु है जो स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है एवं उसमें पदार्थ के सभी गुण विद्यमान होते हैं। सभी अणुओं की सूक्ष्मता का स्पष्ट अनुमान अभी तक हो नहीं पाया है। अलग-अलग पदार्थों के अणु एक इंच के अरबवें भाग का हो सकता है तो किसी का इंच के दस लाखवें भाग के बराबर। यह तो पदार्थ की बात हुई। द्रव्य रूप में पोटेन्सी बढ़ने से इन सूक्ष्म अणुओं की संख्या व सामर्थ्य और बढ़ जाती है, इसका प्रतिपादन होम्योपैथी के विद्वानों ने किया है एवं प्रयोग परीक्षणों द्वारा उसे सिद्ध भी कर दिया है। द्रव्य से विरल एवं विराट रूप वाला स्वरूप गैस का है। हमारे चारों ओर स्थित अदृश्य हवा का जो जखीरा है, उसके एक घन इंच में लगभग पाँच हजार शंख अणु विद्यमान हैं।
पदार्थ जितना सूक्ष्म होता चला जाता है, इन अणुओं की संख्या भी बढ़ जाती है एवं ऊष्मा-ऊर्जा के कारण उसकी गति में अभिवृद्धि हो जाती है। गैस रूप में अणुओं की गति और तेज हो जाती है।
चूँकि अणुओं में परस्पर आकर्षक बल उन्हें बांधे रहकर अपने स्थान पर रोके रहता है, इसीलिये पदार्थ ठोस रूप में बना रहता है। ज्यों-ज्यों ऊष्मा से इन्हें विखण्डित करने का प्रयास किया जाता है, गति तीव्र हो जाती है एवं आकर्षण बल कम। ठोस-द्रव्य-गैस-प्लाज्मा क्रमशः ये अवस्थाएं इस प्रक्रिया के कारण जन्म लेती हैं एवं पदार्थ को अति सूक्ष्म बना देती हैं।
चेतना का स्वरूप इससे भिन्न है। लेकिन सूक्ष्मीकरण के प्रकरण में सूक्ष्मता के अनुपात में प्रखरता में अभिवृद्धि एवं सर्वव्यापकता का सिद्धान्त उस पर और भी समग्र रूप में लागू होता है। मानवी काया की सूक्ष्म संरचना को विकसित किया जा सकने पर वह उसे अत्यन्त सामर्थ्यवान बना देती है। मानव के अन्तराल में तीन शरीर, पाँच कोश एवं षट्चक्र इसी स्तर के हैं। इन्हें विकसित कर अन्तःसत्ता को विराट् बनाया जा सकता है। ये सभी एक ही शरीर के अंग अवयव होते हुए भी अपना अलग विशिष्ट अस्तित्व प्रदर्शित करने लगते हैं।
मानव की चार अवस्थाओं का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। जागृतावस्था में सामान्य जीवन के क्रियाकलाप- इन्द्रिय व्यापार ही प्रमुख होते हैं। अधिकाँश व्यक्तियों के जीवन का बहुसंख्य भाग इसी में खप जाता है। दूसरी है- स्वप्नावस्था, जिसमें व्यक्ति का मन देखे हुए, स्मरण में संग्रही, सुने हुए अथवा पंच तन्मात्राओं सम्बन्धी सूक्ष्म क्रिया-कलापों में रमण करता है। कभी-कभी इन्द्रियातीत घटनाक्रम भी पूर्वाभास के रूप में इस अवस्था में विचरण करने लगते हैं। स्वप्नावस्था की कुछ बातें स्मरण रहती हैं, शेष विस्मृत हो जाती हैं।
सुषुप्ति वह तीसरी स्थिति है जिसमें बहिरंग जगत व अन्तः जगत दोनों ही से उसका संपर्क कट जाता है। बाह्य व अन्तःकरण दोनों ही सो जाते हैं। इन तीन से इतर एवं सर्वोच्च है- तुरीयावस्था, जिसे आत्म जागरण की स्थिति, आध्यात्मिक चेतना के उत्कर्ष की चरमावस्था माना जाता है। जीवात्मा के मानव से महामानव, ऋषि- देवमानव बनने के क्रम में जीवित अवस्था में जिस स्थिति की विकास पथ में अनुभूति होती है, इसमें यह स्थिति आती है। जितने भी महापुरुष इस पृथ्वी पर हुए हैं, उन्होंने योग साधना के उपक्रम से इस तुरीयावस्था को प्राप्त किया है एवं इस सूक्ष्मीकृत स्थिति में वे और भी विराट्, सर्वव्यापी होते चले गए हैं। विधाता की यह विधि व्यवस्था सृष्टि विकास के क्रम में सहज ही सबको उपलब्ध नहीं हो पाती, लेकिन जो इस स्थिति तक पहुँच पाते हैं, मानव कल्याण का एक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ उनसे सम्पन्न होता है।
शास्त्रों में एक अमैथुनी सृष्टि का वर्णन आता है जो विकास की प्रारम्भावस्था में दृष्टिगोचर होती है। ऐसा वर्णन है कि जिन-व्यक्तियों ने पूर्व कल्पों में संयम साधना और योग-उपासना द्वारा अध्यात्म चेतना की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर लिया होता है, वे जन्मते हैं। ये दिव्यात्माएं ऋषि आत्माएं कहलाती हैं एवं आत्म सत्ता को ऊंचा उठाने वाले धर्म के मर्म का परिचय जन-साधारण को देती हैं। समय-समय पर परिस्थिति विशेषानुसार उनका प्राकट्य होता रहता है एवं उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान-सत्पथ के माध्यम से उस काल के सामान्य पुरुष, जिनका वर्णन प्रारम्भ में जागृतावस्था में समय व्यतीत करने वालों के नाम से किया गया, आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते एवं जीवनमुक्त होते जाते हैं। सृष्टि की कल्प- मन्वन्तर व्यवस्था कुछ ऐसी है कि हर समय ऐसी दिव्यात्माएं सूक्ष्म जगत में अपने क्रिया-कलापों में संलग्न रहती हैं। इसी कारण धर्म का- श्रेष्ठता का- आदर्श निष्ठा का सर्वथा लोप नहीं हो पाता।
उपनिषद्कारों ने कारण शरीर को, जिसे जागृत कर ऋषि कल्प आत्माएं कार्य करती हैं, परिभाषित करते हुए कहा है-
“अनिर्वांच्याऽनाद्यविद्यारूपा स्थूल सूक्ष्म शरीर कारण मात्रं स्वस्वरूपाज्ञानं यदस्ति तत् कारणशरीरम्।”
अर्थात्- “अवर्णनीय, अनादि, अविद्या स्वरूप, स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों शरीरों का कारण मात्र अपने ही स्वरूप की अज्ञानमयी जो सत्ता है, उसे ही कारण शरीर कहते हैं। वस्तुतः यह जड़ कलेवर की काया में विद्यमान होते हुए भी सुषुप्ति की स्थिति में ही रहता है। इसकी जागृति का माध्यम है- सूक्ष्मीकरण।
आध्यात्मिक शरीर संरचना विज्ञान में सूक्ष्म शरीर सत्रह सूक्ष्म उपादानों से बना बताया गया है। पंचदशी में इसका वर्णन निम्नानुसार है -
“बुद्धि कर्मेन्द्रिय प्राण पन्चकैर्मनसाधिया। शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिगमुच्यते॥
अर्थात्- “पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन व बुद्धि इन सत्रह अवयवों से सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है।”
मानव शरीर में ऋषियों, देवताओं, अवतारों का निवास बताया गया है। विभिन्न स्थानों पर उनकी स्थापना है। दिव्य समुद्रों, दिव्य नदियों, दिव्य पर्वतों का निवास भी इस शरीर में है। यह साधारणतया मल-मूत्र की गठरी होते हुए भी उसकी सूक्ष्म सत्ता का पर्यवेक्षण करने पर लोक-लोकान्तरों की झलक झाँकी उनमें मिलती है। शरीर एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला है। इसमें वे सभी यन्त्र उपकरण फिट हैं, जो मनुष्य द्वारा अब तक बनाये जा चुके या भविष्य में जिनके बनने की सम्भावना है। ब्रह्मांड के एक पिण्ड में समग्र ब्रह्मांड सन्निहित है। इसका अर्थ यही हुआ कि विराट में जो विशेषताएं विद्यमान हैं, वे सभी छोटी आकृति बनाकर पिण्ड में भी निवास करती पायी जाती हैं। जो कुछ है प्रसुप्त स्थिति में है। इसे जागृत किया जा सके तो पिण्ड में से ही ब्रह्माण्ड प्रकट हो सकता है।
क्षुद्र को महान बनाने के लिए एक ही उपचार है- वाष्पीकरण। वायुभूत होकर कोई भी वस्तु बहुत फैल जाती है और दूर-दूर तक अपने प्रभाव अस्तित्व का परिचय देती है। जैसे एक मिर्च थोड़ी-सी जगह में ही रखी रहती है, पर यदि उसे आग में जलाया जाय तो वह वायुभूत होकर दूर-दूर तक फैलेगी और उस गंध से दूर-दूर तक के लोगों को खांसी उठेगी। यही सूक्ष्मीकरण हुआ। थोड़ा-सा तेल लेकर पानी की सतह पर डाल दिया जाय तो वह लहरों के साथ-साथ दूर-दूर तक फैल जायेगा।
आयुर्वेद में अधिक समय तक एक औषधि को लगातार घोंटते रहने पर उसमें विशेष सामर्थ्य के उत्पन्न होने का वर्णन है। होम्योपैथी में भी पोटेन्सी सिद्धान्त इसी आधार पर चलता है कि उस मूल द्रव्य को अधिकाधिक बारीक करके अधिक शक्तिशाली बनाया जाता है।
साधना में तपश्चर्या के अनेकानेक प्रयोग हैं। इससे शरीर की स्थिति तथा आदत परम्परा का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। एक ही साधना हर किसी के लिए एक जैसा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकती। इससे उसकी वंश परम्परा- गुरु परम्परा तथा जन्म-जन्मान्तरों तक के संस्कारों का ध्यान रखते हुए निर्धारण करना होता है। ऐसे निर्धारणों में साधक की अपनी निजी बुद्धि ही सब कुछ नहीं होती। इसके लिए अधिक अनुभव और निष्णात मार्ग दर्शन की आवश्यकता पड़ती है। वह जिन्हें उपलब्ध हो सके वे सफल भी होते हैं।
हमारी सूक्ष्मीकरण साधना में क्या उपक्रम चल रहा है? क्या विधि व्यवस्था अपनाई जा रही है? यह पूछने की इसलिए आवश्यकता नहीं कि वह एक विशेष प्रयोग है और उसमें मार्गदर्शक का क्रमिक अनुशासन ही सब कुछ है। दूसरों का पूछना इसलिए व्यर्थ है कि इस विधि का अनुकरण किसी अन्य के लिए उपयोगी न पड़ेगा। उन्हें क्या करना है, किसलिए करना है, इन प्रश्नों के विस्तृत विवरण बताते हुए हमें अपने अनुभवी मार्गदर्शक के परामर्श पर चलना होगा।
मोटे तौर से सूक्ष्मीकरण साधना का एक ही स्वरूप है- वाष्पीकरण। इसमें अपनी ही प्राण ऊर्जा को इतना प्रचण्ड किया जाता है कि उससे अपने ही अन्तराल में सन्निहित पाँच कोश इतने गरम हो सकें कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उनकी सत्ता विनिर्मित हो सके। पानी खौलता है तो उनमें अलग-अलग बबूले उठने लगते हैं। हर बबूला अपनी एक स्वतंत्र इकाई बनाता है और जब तक आवश्यकता रहती है अपना अस्तित्व बनाये रखकर दूसरों के साथ विलीन हो जाता है। कितना बड़ा बबूला किस कार्य के लिए, किस विधि से, कितनी शक्तिशाली बनाया या उठाया जाय यह निर्णय करना ऐसे प्रसंगों में साधक और उसके मार्गदर्शक का काम होता है। उसका सिद्धान्त जान लेना ही पर्याप्त है। विवरण की गहराई में जाना समीचीन न होगा।
सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया वस्तुतः जीवित अवस्था में साधक के सूक्ष्म एवं कारण शरीर की परिष्कृति एवं प्रगति का एक ऐसा राजमार्ग है, जिसे समय-समय पर उच्चस्तरीय आत्माओं ने अपनाया व अपनी मुक्ति हेतु नहीं, अन्यायों के हित साधन हेतु स्वयं को खपाया है।
यह प्रक्रिया ऋषि परम्परा की एक शाश्वत व्यवस्था है। मानव को मिली तीन शरीर रूपी विभूतियाँ ईश्वर प्रदत्त सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ हैं जो विकृति- अनगढ़पन की स्थिति में जीव को दुर्गति की ओर ले जाती है। साधना समर में व्यष्टि और समष्टि के समन्वय एकात्म होने में दैनन्दिन जीवन के कषाय-कल्मष ही बाधक होते हैं। संस्कारों की संचित सम्पदा लेकर जन्मे देवपुरुषों को उनसे मुक्ति पाने हेतु अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता। वे स्वेच्छा से उस पथ पर चल पड़ते हैं। अदृश्य जगत उच्चस्तरीय आत्माएं धरित्री पर अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा करने के लिए उन्हें वाँछित आत्मबल देती हैं, सामयिक मार्गदर्शन देते हुए उनके प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों में परिवर्तन करती रहती हैं। सामान्य बुद्धि सहज ही उन्हें समझ नहीं पाता, जबकि होना वह सब कुछ नियन्ता की विधि-व्यवस्था का एक अंग ही है।
सूक्ष्मीकरण- वाष्पीकरण की हमारी युग साधना से जन समुदाय को क्या कुछ मिलने वाला है, वर्तमान परिस्थितियों में कैसे परिवर्तन आने वाला है, यह असमंजस सहज ही किसी के मन में उठ सकता है। जो हमारे सहयोगी- सहभागी बने हैं, जिन्होंने हमसे साझेदारी की है एवं वह सब कुछ कर दिखाने को निष्ठापूर्वक संकल्पबद्ध हैं जो हमारे मार्गदर्शक ने हमारे माध्यम से कहलवाया, उन्हें यह बताना भी हमारा ही कर्तव्य है। हम उनके लिए क्या कुछ कर पाएंगे, उनका सहयोग भावी समय में कैसे वाँछित है, यह बताना भी अनिवार्य समझते हुए ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं।
इन दिनों हमने अनेकानेक ऐसी गुत्थियाँ गुंथ ली हैं, जिनका इतिहास में कोई प्रमाण, उदाहरण नहीं मिलता। लगभग सभी मौलिक हैं। भले ही उनका आधारभूत कारण एक हो। उनके समाधान के लिए मौलिक सूझ-बूझ और मौलिक साहस की आवश्यकता पड़ेगी। पुरातन उदाहरण और समाधान इस संदर्भ में अधिक काम न आ सकेंगे।
प्रस्तुत गुत्थियों में से एक-एक करके इस क्रम से विचार करें कि कौन अधिक भयावह है और किसकी प्रतिक्रिया अधिक विनाशकारी हो सकती है। इस क्रम में सम्भावित तृतीय विश्वयुद्ध की समस्या सबसे बड़ी है। पिछले दो युद्धों में अपने-अपने ढंग के विशेष आयुधों का विकास हुआ था। इस बार अणु शक्ति सबसे आगे है। अणु बमों, उद्जन बमों की चर्चा अत्यधिक होती है। यों उन्हीं के समानान्तर रासायनिक बम भी कम घातक नहीं हैं और इतनी अधिक संख्या में बन चुके हैं, कि इनके प्रसार होने की सम्भावना निरन्तर सामने रहती है। उनकी घातकता के सम्बन्ध में कहा जाता है, कि एक बम से ही न्यूयार्क, मास्को, इंग्लैंड, पेरिस आदि में से किसी का भी कुछ ही सेकेंडों में सफाया हो सकता है। यदि वे लगातार एक मिनट चलते रहें, तो फिर संसार का एक भी महत्वपूर्ण नगर जीवित न बचेगा। इसके अतिरिक्त उनके कारण जो विषाक्तता फैलेगी, उसके कारण छोटे देहातों तक भी जीवन सुरक्षित न रहेगा। हवा, पानी और खाद्य में इतना विष घुल जायेगा कि उसका आश्रय लेने वाले किसी की भी खैर न रहेगी। यदि यह बम कुछ और अधिक मात्रा में चलते रहे, तो पृथ्वी खण्ड-विखण्ड होकर उस चूरे के रूप में अन्तरिक्ष में उड़ने लगेगी, जैसा कि मंगल और बृहस्पति के बीच में अभी भी कोई कचरा चक्कर काटता रहता है।
पिछले युद्धों में आमने-सामने लड़ने वालों की ही शामत आती थी, छावनियों और राहगीरों पर ही बम बरसते थे, अधिकाँश युद्धरत ही मरते थे। अब की बार वह सीमा बन्धन भी समाप्त हुआ। परमाणु बमों, रासायनिक बमों की लपेट में ऐसे वनवासी आ सकते हैं, जिन्हें युद्ध से कुछ भी लेना-देना नहीं। विषाक्त हवा, और विकिरण की चपेट से कोई भी, कहीं भी रहने वाला सुरक्षित नहीं। ऐसी दशा में समस्त संसार को युद्ध भूमि में खड़ा हुआ माना जा सकता है। इसमें लड़ने वाले, न लड़ने वाले, बाल-वृद्ध, मोर्चे से सैकड़ों मील दूर रहने वालों में से भी किसी की खैर नहीं।
इस प्रकार इन पंक्तियों के पाठकों में से भी प्रत्येक के लिए उतना ही बड़ा संकट विद्यमान है, जितना कि अणु बम बनाने या चलाने वालों के लिए। इसकी चपेट में पृथ्वी के मानवेत्तर प्राणी भी आते हैं और वृक्ष-वनस्पतियों का, जलाशयों का जीवन समाप्त हो जाने की भी पूरी-पूरी आशंका है। इतने बड़े पैमाने पर कोई बचाव का प्रबन्ध भी सम्भव नहीं। ढाल छोटी-सी होती है और वह शत्रु के प्रहार से मात्र सीने और सिर का कुछ भाग बचा सकती है। शेष अंग शत्रु की पकड़ से नहीं बचते। इस प्रकार अणु बमों की मार से खाई-खन्दकों में बचाव छतरियों में कुछ सौ या हजार को बचा भी लिया जाय, तो भी उससे क्या बनेगा। निकलने के बाद भी उन्हें इसी विषाक्त संसार में साँस लेनी पड़ेगी। इतने भर से उनका भी सफाया हो जायेगा।
आज का यह संकट सबसे बड़ा है। भले ही वह प्रत्यक्ष आँखों के सामने खड़ा न दीखता हो और तत्काल अपनी भयंकरता के प्रमाण प्रस्तुत न करता हो, तो भी यह निश्चित है, कि किसी का भी जीवन या भविष्य सुरक्षित नहीं। कोई एक अधपगला स्टोर कीपर इस बारूद के भण्डार में एक तीली फेंक कर- बटन दबाकर वह दृश्य उपस्थित कर सकता है, जिसकी चर्चा इन पंक्तियों में की जा रही है। एक ओर आक्रमण हो और दूसरा चुप बैठा रहे, यह भी नहीं हो सकता। प्रश्न हलके-भारी आक्रमण का नहीं, उसका थोड़ा-सा प्रयोग भी सर्वनाश कर सकता है। उससे न शत्रु पक्ष के लोग बचने वाले हैं और न मित्र पक्ष के। पिछले युद्धों में यह कठिनाई नहीं थी। उसमें प्रति पक्षियों को मारने का ही ताना-बाना बुना जाता था, पर इसमें तो वैसा भेद भी नहीं हो सकता। वायु किसी क्षेत्र में सीमित नहीं रहती। विकिरण फैलने पर उसकी परिणति समस्त क्षेत्र को सहनी पड़ती है भले ही उसमें मित्र-समुदाय ही क्यों न रहता हो। समस्त विश्व के प्रत्येक घटक को अपनी विभीषिका-परिधि में लपेटे हुए इस अणु युद्ध सम्भावना को आज की महती समस्या माना जा सकता है एवं सर्व प्रमुख महत्व की भी।
कुछ दिन पूर्व तक यह जखीरे रूस, अमेरिका के पास ही थे, पर अब वे फ्राँस, ब्रिटेन, चीन, आदि के पास भी हैं। इसलिए कौन, कब, क्या कर बैठे- इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस विस्तार से गुत्थी उलझी ही है।
समाधान सोचने से पूर्व इस संकट के उत्पन्न होने और बढ़ने के कारणों पर तनिक विचार कर लें, तो ठीक होगा। हिटलर हारा तो उसकी पोटली में से अणु बम का नुस्खा निकल आया। अमेरिका ने उसे विकसित किया और जापान के विरुद्ध उसका छोटा उपयोग भी कर लिया। जापान इस बड़े आघात के लिए तैयार न था, उसने आत्म-समर्पण कर दिया। बात यहीं से आरम्भ होती है। हर वरिष्ठ राष्ट्र के मुँह में पानी भर आया, कि वह भी अपने प्रतिपक्षियों के विरुद्ध यही चाल चल सकता है और उसे देखते-देखते नीचे दबा सकता है। जो कर सकते थे, उनने यह होड़ आरम्भ कर दी और रूस एवं अमेरिका इस निर्माण में औरों से आगे निकल गये। अब प्रमुख प्रतिद्वन्द्विता इन्हीं दो के बीच चल रही है। इन्हीं के दो खेमे अब बन गए हैं।
असमंजस इस बात का है, कि न आगे बढ़ते बन पड़ रहा है, न पीछे हटते। आगे बढ़ते चलने में अनेक समस्याएं सामने हैं। जितने बन चुके, वे प्रतिपक्षी को ही नहीं समस्त संसार को धूलि में मिला देने के लिए पर्याप्त हैं। फिर और अधिक बनाकर उनका क्या किया जाय? इतने पर भी यह प्रश्न सामने है, कि इस कार्य में जितने कारखाने, जितने वैज्ञानिक लगे हुए हैं, उनका क्या हो? फिर शत्रु ने कोई और भी बड़ा आयुध निकाल लिया, तो पिछड़ जाने का जोखिम कौन मोल ले?
बन्द करने पर दूसरा पक्ष जारी रखे रहा, तो अन्य प्रकार का ऐसा आयुध ढूंढ़ निकाला जा सकता है, जिसमें अब तक का निर्माण छोटा साबित हो। ऐसी दशा में प्रतिद्वन्द्वियों का आतंक और पिछड़ जाने का भय दोनों ही ऐसे हैं, जो हाथ रोकने की सलाह नहीं देते।
जारी रखने में यह प्रश्न है, कि जो अब तक बन चुका उसका क्या होगा? इस कार्य पर जो असाधारण लागत लग रही है, वह कब तक लगती रहेगी। फिर प्रयोग में दस-पाँच आयुध ही आने के उपरान्त जो बचेंगे, उन्हें रखा कहाँ जायेगा? वे विकिरण फैलाते हैं और अन्त में कहीं न कहीं समापन के लिए जगह माँगते हैं। इन भट्ठियों में से निकली हुई राख कितनी भयानक होती है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। निर्माण जारी रखने पर न केवल विनिर्मित निर्माण का वरन् राख का भी सवाल है, जो उससे भी अधिक पेचीदा है।
इन कारणों को देखते हुए लाभ इसमें है, कि जापान जैसा प्रयोग कोई एक किसी दूसरे के विरुद्ध करले और तत्काल लाभ उठा ले। पर ऐसा कर सकना वर्तमान परिस्थितियों में सम्भव नहीं रहा। जापान के पास बदला लेने के साधन नहीं थे, पर आज तो कोई भी बदला ले सकता है। चीन, ईरान और इजराइल जैसे वैज्ञानिक प्रगति में पिछड़े समझे जाने वाले देश भी बदला लेने की स्थिति में हैं। फिर कोई किसी की सहायता पर भी तो आ सकता है। यही है वह असमंजस जिसके कारण प्रहार करने की हिम्मत भी नहीं पड़ती और पीछे हटने को जोखिम भी उठाये नहीं उठती। इस निर्माण कार्य में जो कारखाने और वैज्ञानिक विपुल पूँजी अपने पेट में समाये बैठे हैं, उस सबका क्या हो? आक्रमण से पूर्व अब बचाव का प्रश्न और भी अहम् है। अपनी ओर से हाथ खींचे तो सामने वाला भी वैसा ही करेगा। इसका कोई भरोसा नहीं। जारी रखा जाय तो कैसे, कब तक? अभी कितनी और पूँजी इस गोरखधन्धे में लगानी पड़ेगी? वह आयेगी कहाँ से?
आत्म रक्षा को महत्व देने वाली समर-नीति समझौतों की चर्चा की इजाजत नहीं देती। पुरानी बात अलग थी, जब आन-बान-शान ही सब कुछ थी। अब मूँछें मरोड़ने और तत्काल उन्हें नीची कर लेने में किसी को संकोच नहीं लगता। ऐसी दशा में पहल होना भी कठिन है और हाथ रुकना उससे भी कठिन। क्रम यही चलता रहा, तो इस जखीरे का, उस कचरे-कूड़े का, उसमें लगे साधनों का क्या होगा? यह प्रश्न ऐसे हैं, जिनके उत्तर सरल नहीं हैं। जापान का उदाहरण देखकर जो कल्पनाएं की गई थीं, वे हजारों मील दूर रह गईं।
कोई किसी का राज हड़पना चाहता हो, सो बात भी नहीं है। कभी प्रजातंत्र और साम्यवाद का नशा जोरों पर था। अपने मत का संसार बना लेने की झक कभी थी और इसलिए जिहाद बोल देने का भी जोश था। वह अब ठण्डा पड़ गया। अब प्रजातन्त्र, राजतंत्र, साम्यवाद की मिली-जुली खिचड़ी पक रही है और सभी के मस्तिष्क राष्ट्रवादी संकीर्णता पर आकर अवरुद्ध हो गये हैं। अपने यहाँ कोई किसी सिद्धान्त का पालन करे या दूसरे देशों में उसे चलना ही चाहिए- इसका किसी को आग्रह नहीं। ऐसी दशा में शासन पद्धति अपनी जैसी बनाने के लिए भी कोई बाहरी देशों में जाकर युद्ध जैसी जोखिम उठाने को तैयार नहीं। शीत युद्ध में गुपचुप सहायता इस या उस पक्ष की करता रहे, यह बात दूसरी है। यह समस्त परिस्थितियाँ यह बताती हैं कि न महायुद्ध छेड़ना सरल है, न उससे हाथ खींचना। स्थिति को यथावत बनाये रखना इतना खर्चीला है, कि वह भी लम्बे समय तक इसी प्रकार चलते नहीं रहने दिया जा सकता। आखिर कर देने वाले भी इतना बोझ कब तक वहन करेंगे।
जापान पर हमने के दिनों में सभी को वह प्रक्रिया बहुत लाभदायक लगी थी पर अब वैसी बात नहीं रही। सभी पक्ष पीछे हटना चाहते हैं। जो अपने हाथ हैं, उससे ही बचाये रखने में भलाई देखते हैं। आक्रमण का जोश ठण्डा पड़ता जाता है, पर प्रतिपक्ष के प्रति अविश्वास और भय का भाव इतना अधिक बढ़ा हुआ है, कि कोई निर्णय करते नहीं बन पड़ता। अब वायदों का भी तो कोई मूल्य नहीं रह गया है।
यह स्थिति का विश्लेषण हुआ। समाधान एक ही है कि पैर पीछे हटाना और हाथ समेटना पड़ेगा। इसके लिये भय, आशंका और आतंक इन तीनों का सामना करना पड़ेगा। एक पक्ष को जोखिम उठाना पड़ेगा। दोनों पक्ष सहमत हो जायें तब कहीं राजी-नामा हो, यह कठिन है। फिर वही राजी-नामा चलेगा, इसकी क्या गारण्टी है? यहाँ ऐसा आत्मबल उत्पन्न होने की आवश्यकता है जो यह सोचने पर विवश कर दे कि युद्ध में नष्ट होने की अपेक्षा शान्ति के लिए पहल करने में जो जोखिम है, उसे उठाया जाए। गाँधी जी ने यहाँ कर दिखाया था। अंग्रेजों की शक्ति असीम थी, वे सशस्त्र थे। दमन के द्वारा वे कुछ भी कर सकते थे। पर भयभीत रहकर कुछ न करने की अपेक्षा संकट मोल लेना और आपत्ति को चुनौती देना उन्होंने अंगीकार किया। लड़ाई बराबर की नहीं थी, तो भी वह जीती गयी और यह अनुभव किया गया कि नैतिकता का अपना पक्ष है, उसका अपना बल है। वह जिस पलड़े में भारी पड़े, उसके पराजित होने की आशंका कम ही रहती है। फिर पराजय मिलेगी तो भी युद्ध विनाश की तुलना में तो कम ही रहेगी।
यह समझदारी उत्पन्न करने के लिए हम अपनी सूक्ष्मीकरण द्वारा उपार्जित शक्ति का उपयोग करेंगे। दोनों को पीछे हटने के लिए दबाव डालेंगे और यह विश्वास किसी न किसी प्रकार करा सकेंगे कि आक्रमण की तुलना में पीछे हटने में बुद्धिमता है। इस दबाव से आज का आक्रोश ठण्डा होगा। समझदारी और जिम्मेदारी का नया दौर चलेगा। गरम युद्ध शीतयुद्ध में बदलेंगे और शीतयुद्ध अन्ततः उस स्थिति में जा पहुँचेंगे जिसे लम्बे समय के लिए सदा के लिए युद्ध विराम के रूप में देखा जा सकें।
थोड़ी से थोड़ी उन्नति की और प्रत्येक सफलता की प्रशंसा की जाय। हृदय से प्रसन्नता प्रकट कीजिए और मुक्त कंठ से प्रशंसा कीजिए।
भगवान अनेक दैवी घटकों का समुच्चय है। समुद्र अनेक लहरों से मिलकर बनता है। दैत्य भी एक नहीं वरन् एक समूह होता है। यही बात दैव तत्व के सम्बन्ध में भी है। अनाचार की इस बेला में दैवी शक्तियों का एक समूचा गुच्छक कार्यक्षेत्र में उतर रहा है। उस समुदाय में एक इकाई हम भी हैं। किनका कितना परिचय लोगों को मिला। किनका न मिला इसका कोई महत्व नहीं। महत्व इतना ही है कि विनाश को दैत्य ही सब कुछ नहीं हैं। उससे भी बलिष्ठ देवत्व है, जो समय रहते मैदान में उतरता है और बिगड़ी को बनाकर रहता है। यह समय-समय पर भूतकाल में भी होता रहा है। यही अब भी होने जा रहा है। महान परिवर्तन के लिए देव शक्तियों की एक समूची शृंखला कार्यक्षेत्र में उतर रही है। इसकी गतिविधियों का अनुभव हम सब अगले ही दिनों करेंगे।
भले और बुरे कर्मों के प्रतिफल सभी जानते हैं। बीज बोने और उसके फलित होने में समय लगता है। मनुष्य की भली-बुरी कृतियाँ भी समय लेती हैं। इस बीच सर्वसाधारण को यह शिक्षा भी मिल जाती है कि क्या करने के क्या परिणाम होने चाहिए। यह शिक्षण मनुष्य के बड़े काम आता है। यदि अनायास ही सब काम निपट जाया करें, क्रियाओं की परिणति को गम्भीरतापूर्वक अनुभव करने का अवसर न मिले तो फिर यह संसार अनुभव शून्य होकर ही रह जाएगा।
वर्तमान विपन्नताएं चरम सीमा तक जा पहुँची हैं। मनुष्य अपनी भूल अनुभव करता है। तब महाविनाश को रोकने में दैवी शक्तियाँ बाधित होती हैं। इससे पहले ही सब कुछ सुधार दिया गया होता तो मनुष्य को वह सब सीखने के लिए न मिलता जो पिछले दिनों मिल चुका है या अगले दिनों मिलने वाला है। समय रहते दैवी शक्तियाँ बचाव का काम हाथ में ले रही हैं और हम सब देख ही रहे हैं।
हर काम का एक समय होता है। निर्धारित समय पूरा होने पर काम की उपयोगिता भी है और महत्ता भी। समय से पहले ही काम कर दिया जाय तो हो तो सकता है पर उसकी खूबसूरती चली जाती है। बच्चा एक दिन तो बड़ा होगा ही, बड़ा होने पर उसका विवाह भी होगा। इसलिए जो बच्चा छोटा है उसके विवाह की चर्चा करने में हर्ज नहीं, पर वह कार्य भी यदि अभी कर दिया जाय तो इसे अनुपयुक्त माना जायेगा और बाल विवाह कह कर उसकी निन्दा की जायेगी।
गर्भ में बच्चा नौ महीने तक पककर परिपक्व होता है। कोई उसे एक दो महीने में ही निकालने की कोशिश करे तो उसमें हानि ही हानि है। समय तक उसे पकने देना ही चाहिए। यही बात फसल पकने के सम्बन्ध में भी है। हथेली पर सरसों केवल बाजीगर जमाता है। इतने पर भी उससे तेल कहीं निकलता है। ये सब कपोल कल्पनाएं मिथ्या हैं।
कहा जा सकता है कि यदि दैवी शक्तियाँ रोकथाम करने में समर्थ हैं, तो समय रहते वह सब क्यों नहीं करती। इतनी हैरानी उत्पन्न होने के बाद क्यों चेतती हैं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि प्रत्येक घटनाक्रम के पीछे मनुष्य को सीखने लायक बहुत कुछ होता है। किस मार्ग पर चलने का क्या परिणाम हो सकता है इसे देखने अनुभव करने से भी मनुष्य बहुत कुछ सीखता है। अस्तु दैवी शक्तियों का हस्तक्षेप तभी चलता है जब जन सामान्य की अपनी क्षमताएं चूक जाती हैं।
आशा यही की जाती है कि जब मनुष्य बिगाड़ कर सकता है, तो उसी को बनाना या सुधारना भी चाहिए। बनाने, सुधारने के उपाय पिछले दिनों मनुष्य करता रहा है। इन दिनों भी कर रहा है, पर वे इस स्तर के नहीं जितने के होने चाहिए। ऐसी दशा में जब स्थिति हर दृष्टि से बेकाबू हो जाती है तभी भगवान हस्तक्षेप करते हैं। अन्यथा यही आशा करते हैं कि बिगाड़ने वाले सुधारें भी। सुधारने की प्रक्रिया इन दिनों परोक्ष जगत में चल रही है। समय आने पर सामान्यजन उसका प्रत्यक्ष रूप भी देखेंगे।
तृतीय विश्व युद्ध की तैयारी जिस कारण चल पड़ी और कटारें एक-दूसरे की छाती पर रखकर जिस कारण भिड़ गये उसका कारण है- गुटों का- वर्गों का शासन। यह कब से चला, इसकी चर्चा निरर्थक है। पर होता यह रहा है कि समर्थ गुटों ने अपने कब्जे में जमीन को और वहाँ रहने वाले दुर्बल लोगों का शोषण आरम्भ कर दिया। संक्षेप में यही शासन तन्त्र है। आदिम काल से लेकर अद्यावधि उसका स्वरूप थोड़े हेर-फेर के साथ ऐसा ही चलता रहा है।
जापान पर दो बम गिरने और उससे आत्म-समर्पण करा लेने में जिन शासकों को उत्साह मिला, वे सभी उपरोक्त प्रकार के वर्ग शासन के आधार पर चल रहे थे। यह पद्धति ही विष-बेल है। जब से यह चली है तभी से तत्कालीन साधनों के अनुरूप युद्ध होते रहे हैं और जब तक यह रहेगी, युद्धों का कभी अन्त न होगा। आज चिन्ता अधिक इसलिए है कि अणु आयुधों से व्यापक विनाश की सम्भावना है। यदि वह टल भी जाय तो भी दूसरे साधनों से अगले दिनों युद्ध होते रहेंगे। कारण कि उसके मूल में समर्थ वर्गों द्वारा दुर्बल वर्गों का शोषण उसकी आधारभूत विधि व्यवस्था है। इसी आधार पर देशों की विभाजन रेखाएं बनी हैं। यदि ऐसा न होता तो देशों का विभाजन भौगोलिक सुविधा के आधार पर हुआ होता। उसमें एक और विशेषता होती। पिछड़े समुदाय का वर्चस्व रहता। प्रगतिवान वर्ग उन्हें ऊंचा उठाने और आगे बढ़ाने की अपनी जिम्मेदारी अनुभव करता। समर्थ लोग थोड़े होते हैं। असमर्थ अधिक। इसलिए बहुमत के मार्गदर्शन एवं सुधार परिष्कार की जिम्मेदारी प्रगतिवान अल्पमत को उठानी पड़ती है। पर आज वैसा कहाँ है? मुट्ठी भर समर्थ लोग अपने बुद्धिबल, शासन बल, ज्ञानबल और साधनबल के सहारे जितने क्षेत्र पर चाहें कब्जा कर लेते हैं और उसे अपना कहने लगते हैं। यह जंगल का कानून हुआ। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ हुई। देशों का वर्तमान सीमा विभाजन और उन पर गुटों का आधिपत्य, यह है- संघर्षों का मूलभूत कारण। यह तो छीना झपटी हुई। जो जितना बलिष्ठ होगा वह उसी अनुपात में अपने से छोटों को डराने धमकाने में, शिकंजे में कसे रहने में सफल होगा। इस स्थिति में महत्वाकाँक्षाएं, कुसमुसाती रहेंगी और जब भी अवसर देखेंगी, फूट पड़ेंगी।
सामन्त युग में यही होता रहा है। जिसके पास डकैतों का जमघट जितना अधिक हुआ वह उसी उत्साह से पड़ौसियों पर चढ़ दौड़ता था और उसके राज्य को लूट-खसोट के उपरान्त अपने में मिला लेता था। अब तरीके बदल गये हैं। अब लड़ाइयाँ इतनी खुली नहीं होतीं। उन पर सिद्धान्तवाद के आवरण उढ़ाये गये हैं। फिर भी तथ्य एक ही है कि समर्थ वर्ग, पड़ौसी अथवा दूरवर्ती देशों को किसी न किसी बहाने अपने चंगुल में फंसाये रखना चाहते हैं, ताकि उन्हें अधिक शोषण करने अपने वर्ग को अधिक समर्थ बनाये रहने का अवसर मिलता रहे।
मुद्दतों से देशों की सीमाएं कुछ ऐसी बन गई हैं जो हमें स्वाभाविक प्रतीत होती है। जो जहाँ कब्जा किये बैठा है वही उसका न्यायोचित अधिकार प्रतीत होता है पर यदि वस्तुतः न्याय एवं औचित्य को ध्यान में रखते हुए समीक्षा की जाय तो बात कुछ दूसरी ही प्रतीत होती है। धरती पर उत्पन्न होने वाले सभी धरती पुत्रों के लिए उसके उत्पादन में समान भागीदारी कहाँ है? वरिष्ठ लोग अपनी सुख सुविधाओं को स्वेच्छा से कम करके कनिष्ठों को अधिक सुखी समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्नशील कहाँ रहते हैं? यदि ऐसा रहा होता तो गुट बनाने और क्षेत्रों पर कब्जा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती? सभी भूमि गोपाल की समझी जाती और उसके हर क्षेत्र से हर किसी को समान लाभ लेने का अवसर मिलता। देशों के नाम पर विभाजन रेखायें न होतीं। यदि होती तो उसका कारण वर्गवाद न होकर भौगोलिक यातायात आदि की सुविधाओं को ध्यान में रखा गया होता।
खनिज तेल मध्य पूर्व के कुछेक अरब देशों में बड़ी मात्रा में निकलते हैं। आधिपत्य उन्हीं मुट्ठी भर लोगों का है जबकि भूमि सबकी होने के कारण उस सम्पदा पर स्वामित्व सभी का होना चाहिए। अफ्रीका और अमेरिका की ढेरों जमीन खाली पड़ी है। जबकि चीन और भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों को उसकी कोताही के कारण अनेकों असुविधाएं सहनी पड़ती है। यह संसार एक परिवार होना चाहिए और उसकी भूमि सभी की भूमि। सभी उसके उत्पादन में समान लाभ उठायें। अनीति यहाँ से शुरू होती है कि किसी क्षेत्र के निवासी उस पर अपना आधिपत्य जमाते हैं और वहाँ के उत्पादकों को अपनी ही मुट्ठी में रखना चाहते हैं।
अनीति में सबसे बड़ी बुराई यह है कि बड़ा ताकतवर छोटे को सहन नहीं करता। फलतः किसी बड़े से कोई बड़ा बनता ही रहता है और छोटे को उदरस्थ करने के लिए मचलता रहता है। छोटे या बड़े युद्ध अब तक इसी कारण होते रहे हैं और यदि यह सिलसिला चलता रहा तो उनका अन्त कभी भी नहीं होगा।
पिछले लेख में यह बताने का प्रयत्न किया गया था कि दैवी शक्तियाँ सीने पर गोली रखकर “पीछे हट”- “पीछे हट” कहने वालों से भी किसी पर सामयिक राजी नामा करा देंगी। “आगे बढ़े तो खैर नहीं”- “आगे बढ़े तो खैर नहीं” के उद्घोष दोनों ओर से हो रहे हैं। ऐसी दशा में जिन्हें अपनी हस्ती ‘नेस्तनाबूद’ नहीं करानी है, समझदारी से काम ले सकते हैं और बहादुरी के साथ पीछे हट सकते हैं। फिलहाल का युद्ध टल सकता है। हमारी दावेदारी और भविष्यवाणी सही सिद्ध हो सकती है कि युद्ध सुनिश्चित रूप से टल जायेगा। निशाना सधी लगी हुई अन्तर्महाद्वीपीय मिसाइलें फिलहाल रुक जायेंगी। पर इससे होगा क्या? युद्ध अकेला बारूद से ही थोड़े लड़ा जाता है। असली युद्ध तो आर्थिक लड़ाई है। यह खाई वर्तमान देश विभाजन की सीमा के रहते यथावत् बनी रहेगी और कल न सही, परसों कोई नया स्वरूप लेकर इस प्रकार के न सही, उस प्रकार के युद्ध का मोर्चा खड़ा करेगी। बर्बादी एक तरह की न सही दूसरे तरह की होगी। फिर समाधान क्या हुआ?
अबकी बार समस्याओं का समाधान किश्तों में नहीं एक मुश्त ही होना है। अणु युद्ध ही नहीं रुकेगा, देशों का वह विभाजन रेखा भी हटेगी, जो वर्गों ने, गुटों ने अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार कब्जा जमाकर बना ली है। वर्तमान नक्शे में जो देश जहाँ दिखाई देता है वहाँ उनमें से एक भी न रहेगा। एक ‘विश्व राष्ट्र’ का निर्धारण होगा और यदि उसकी प्रशासनिक, औद्योगिक या यातायात सुविधा के कारण वर्गीकरण की आवश्यकता पड़ेगी तो वह कट या बंट भी जाएगा।
यह सुनने और सोचने वालों को असम्भव जैसा लगता होगा? अमेरिका क्यों इतनी भूमि पर से कब्जा समेटेगा और रूस क्यों अपनी मित्र मंडली के इतने सदस्यों को ढील देगा। चीन क्यों अपने कब्जे के इतने क्षेत्र को वर्गीकृत करेगा? तेल वाले देश क्यों अपने उत्पादन में से दूसरों को हिस्सा देंगे? कदाचित कोई भी स्वेच्छा से इसके लिए तैयार न होगा। खासतौर से समृद्ध और समर्थ देश। गरीबों की वहाँ आवाज ही कौन सुनता है? उनके पास सामर्थ्य ही कहाँ है? जो विश्व के पुनर्विभाजन के लिए दबाव डाल सके। वर्तमान परिस्थितियाँ यही बताती हैं कि ऐसा परिवर्तन- जैसा इन पंक्तियों में लिखा जा रहा है, असम्भव है। पर इससे आदमी अपने समय में जो सोचना है, वहीं भविष्य में होता रहे यह आवश्यक नहीं। देशों की भौगोलिक, आर्थिक और बौद्धिक स्थिति में पिछले दिनों कितना परिवर्तन हुआ है, इसे देखकर चकित रह जाना पड़ता है। प्रथम महायुद्ध के बाद दूसरे में और दूसरे के बाद तीसरे में क्या अन्तर हुआ है, उसे यदि आर्थिक और राजनैतिक विभाजन की दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इस दुनिया में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुये हैं। इतने आश्चर्यजनक जो कदाचित उस समय के लोगों के गले बिलकुल भी न उतर सकते होंगे। हिटलर के उत्थान और पतन के दिनों वाली बात पर ही दृष्टि डाली जाय तो प्रतीत होगा कि उन थोड़े से दिनों में ही इतना कुछ योरोप में बदला, जिसकी इससे पूर्व किसी ने कल्पना तक न की होगी।
युद्धों का निराकरण अबकी बार अन्तिम रूप से किया जाने वाला है। अणु बम रुकें और रासायनिक बम न चले, ऐसी छोटी हेरा-फेरी के लिए दैवी शक्तियों को बीच में क्यों पड़ना था। इतना तो आदमी की मोटी अकल भी कर सकती है। यदि भगवान को हस्तक्षेप करना है कि युद्ध टल जाय तो उसे उतना और भी करना पड़ेगा कि देशों का वर्तमान सीमा विभाजन और उसका आधारभूत कारण भी हटे। अगले दिनों धरती का नक्शा तो यही रहेगा पर उसमें जो अनेकों छोटे-बड़े देश दिखाई पड़ते हैं वे न रहेंगे। एक विश्व की- एक राष्ट्र की कल्पना तो मुद्दतों से की जाती रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का प्रतिपादन तो मुद्दतों से होता रहा है, पर अबकी बार सचमुच की कार्यान्वित होकर रहेगा।
समर्थ गुटों में एक ही सबसे बड़ा गुट है- पिछड़ा वर्ग जो ज्ञान की दृष्टि से- साधनों की दृष्टि से- अनुभव और अभ्यास की दृष्टि से पीछे पड़ता है। बहुमत इसी का है। अस्तु वर्चस्व भी इसी का होना चाहिए। संपत्तिवान- बुद्धिमान संख्या की दृष्टि से अल्पमत हैं, पर वे वर्चस्व की दृष्टि से भारी पड़ते हैं। बड़ों को छोटे बच्चे सम्भालने पड़ते हैं। इस दृष्टि से अब तथाकथित बड़ों को नये ढंग से सोचना पड़ेगा। उन्हें संख्या की दृष्टि अधिक किन्तु क्षमता की दृष्टि से स्वल्प वाले जन-समुदाय को वैसे ही सम्भालना होगा जैसे कि अभिभावक अपने कई छोटे बच्चों को सम्भालते और समर्थ बनाते हैं। अब उन्हें कमजोरी की- विवशता का लाभ उठाने की अभ्यस्त नीति का एक प्रकार से परित्याग ही करना पड़ेगा।
दैवी कृतियों को चमत्कार कहा जाता है। वह घोर अन्धेरे के बीच न जाने कहाँ से सूर्य का गरमागरम गोला निकाल देते हैं। चिर अभ्यास में आ जाने के कारण वे अजनबी प्रतीत नहीं होते। पर वस्तुतः है तो सही। आकाश में न जाने कहाँ से बादल आ जाते हैं और न जाने किस प्रकार बरस कर सारा जल जंगल एक कर देते हैं। यह अचंभा ही अचंभा है। सर्वनाशी युद्ध की खिंची हुई तलवारें यदि म्यान में वापस लौट सकती हों तो समझदारी को अपनी जानकारी में एक बात और भी सम्मिलित करना चाहिए कि देशों का वर्तमान विभाजन कारणों की दृष्टि से भी और परिणामों की दृष्टि से भी जितना अस्वाभाविक और अहितकर है, उसे बदलना पड़ेगा। यह बदलाव इस दृष्टी से नहीं होगा कि कौन सा गुट कितना समर्थ है और माँस का कितना बड़ा टुकड़ा उखाड़ ले जाता है। वरन् इस दृष्टि से होगा कि आदमी को आखिर इसी धरती पर रहना है। चैन से रहना है। देर तक रहना है। यदि सचमुच ऐसा ही है तो रोज-रोज की खिच-खिच करने की अपेक्षा यह अधिक अच्छा है कि एक बार बैठकर शांत चित्त से विचार कर लिया जाय और जो कुछ भी भला-बुरा निश्चित करना हो कर लिया जाय। यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि किश्तों में नहीं एक मुश्त फैसला होना है।
आदमी खण्डित नहीं रहेगा। एक जाति, वर्ग, लिंग की दीवारों में उसे खण्डित नहीं रखा जा सकता। इस प्रकार भूमि के टुकड़े इस दृष्टि से मान्यता प्राप्त नहीं कर सकते कि किस समुदाय ने कितने क्षेत्र पर किस प्रकार कब्जा किया हुआ है। पुरातन की दुहाई देने में अब कोई लाभ नहीं। चिर पुरातन चिर नवान में परिवर्तित किया जाना है। जब धरती बनी और आदमी उगा था तब देश जाति की कोई क्षेत्रीय विभाजन रेखा नहीं थी। आदमी अपनी सुविधानुसार कहीं भी आ जा सकता था। जहाँ जीवनोपयोगी साधन मिलते थे वहीं पर रम सकता था। आदमी की आदत समेटने की है खदेड़ने की नहीं। इसलिए उसने परिवार, मुहल्ले, गाँव बसाना आरम्भ किया। अब क्या ऐसी आफत आ गयी जो आपस में मिलजुलकर नहीं रहा जा सकता, मिल-बाँटकर नहीं खाया जा सकता। जो अधिक समेटने की कोशिश करेगा वह ईर्ष्या का भाजन बनेगा और अधिक घाटे में रहेगा। जिसके पास अधिक है वह ईश्वर का अधिक प्यारा है, अधिक पुण्यात्मा या अधिक भाग्यवान है, यह कथन, प्रतिपादन अब अमान्य ठहरा दिये गये हैं।
बात कठिन है। युद्ध का रुकना भी कठिन है। जिसे इस कठिनाई के सरल हो जाने पर विश्वास हो, उसे उसी मान्यता में एक कड़ी और भी जोड़नी होगी कि संसार का नया नक्शा और नया विधि-विधान बनेगा। यह पुरातन कलेवर तो बहुत पुराना हो गया है। उसकी चिन्दियाँ और धज्जियाँ उड़ गयी हैं। उसे सो सिवा कर काम नहीं चल सकता। यह बहुत छोटी दुनिया का है। अब वह तीन वर्ष की नहीं रही, तेईस वर्ष की हो गयी है। इसलिए समूचे आच्छादन को नये सिरे से बदलना पड़ेगा। शासनाध्यक्षों को नये ढंग से सोचने के लिए हम विवश करेंगे कि वे लड़ाई की बात न सोचें। बढ़े हुये कदम वापस लौटायें। खुली तलवारें वापस म्यान में करें। इसके साथ ही मनीषियों को यह मानने के लिए विवश करेंगे कि दुनिया के वर्तमान गठन को अनुपयुक्त घोषित करें और हर किसी को बतायें कि चिर पुरातन ने दम तोड़ दिया और उसके स्थान पर नित नवीन को अब परिस्थितियों के अनुरूप नूतन कलेवर धारण करना पड़ रहा है। एक दुनिया- एक राष्ट्र की मान्यता अब सिद्धान्त क्षेत्र तक सीमित न रहेगी। उसके अनुरूप ताना-बाना बुना जाएगा और वह बनेगा जिसमें विश्व की एकता- विश्व मानव की एकता का व्यवहार दर्शन न केवल समझा वरन् अपनाया भी जा सके। इसके लिए विश्व चिन्तन में ऐसी उथल-पुथल होगी जिसे उल्टे को उलट कर सीधा करना कहा जा सके।
मान्यता है कि ऊँट रेगिस्तान में इसलिए जीवित बना रहता है कि वह अपनी पानी की थैली में भरपूर आपातकालीन जल संचय कर लेता है। लेकिन यह मिथ्या है। ऊँट की कूबड़ में पर्याप्त मात्रा में चरबी होती है जो आवश्यकता पड़ने पर अपघटित होकर हाइड्रोजन गैस विमुक्त करती है। श्वासोच्छवास से उपलब्ध ऑक्सीजन व हाइड्रोजन मिलकर पानी बनाते व ऊँट की तृष्णा को शान्त किए रहते हैं। है न यह एक विचित्र बात।
नैपोलियन बोनापार्ट तब विद्यार्थी था। उसने रहने के लिए एक नाई का मकान किराये पर ले रखा था। नाई की एक सुन्दर युवती कन्या भी थी। वह किसी प्रकार नैपोलियन को अपने जाल में फाँसना चाहती थी, अतएव उसके सामने सदैव कामुक चेष्टाएं करती रहती। नैपोलियन यह सब देखता तो पर उन बातों की उपेक्षा करके चुपचाप अपनी पढ़ाई में लगा रहता।
बात जहाँ की तहाँ समाप्त हो गई। कुछ दिन पीछे नैपोलियन सेना में चला गया। बाल्यकाल में संयमित जीवन बिताने के कारण शारीरिक शक्ति और बुद्धि कौशल का उसमें अभाव नहीं था इसीलिए वह 25 वर्ष की अल्पायु में ही सेनापति बना दिया गया।
एक बार वह किसी काम से अपने उसी विद्यालय में गया जहाँ उसने शिक्षा पाई थी। प्रसंगवश वह उस युवती से भी मिला और पूछा- इस मकान में कभी एक विद्यार्थी रहता था, तुम उसे छेड़ती रहती थी, याद उसकी। युवती ने रूखेपन से कहा- “था एक नीरस किताबी कीड़ा।”
नैपोलियन ने कहा- “सचमुच बहन! पर यदि वह वासना के आकर्षण में फँस जाता तो आज सेनापति के रूप में तुम्हारे सामने उपस्थित न होता?”
इन दिनों शासन सत्ता की शक्ति समस्त तंत्रों से ऊपर है। उसे प्रगति और अवगति दोनों की ही प्रशंसा-निन्दा शिर पर ओढ़नी होगी। परिवर्तन के इस माहौल में उसी को अपने दायित्व और ढाँचे दोनों ही बदलने के लिए तैयार होना होगा।
राज्य सत्ता में भागीदारी एवं दिलचस्पी लेने वालों को अगले दिनों कुछ प्रवाह तेजी से बहते दिखाई पड़ेंगे। इसलिए अपने को उनके अनुकूल समय रहते ढाल लेने में भलाई है। इस संदर्भ में पहला निर्धारण है- युद्ध से कदम वापस लेने की बात सोचना। जिस विषय में सोचा जाता है उसका रास्ता भी अवश्य मिल जाता है। हर किसी को सोचना चाहिए कि इकट्ठे युद्ध का अर्थ आत्मघात है। न्याय की रक्षा और अनौचित्य के निवारण का यही एक मात्र मार्ग नहीं है। इसके अलावा भी कुछ रास्ते हैं और वे निकलेंगे। हमें इन्हीं के समर्थन की तैयारी करनी चाहिए।
दूसरा विचारणीय प्रश्न राजनीतिज्ञों के सामने यह है कि वे क्षेत्रवाद को समेटें। देश भक्ति की दुहाई न दें। एक राष्ट्र-एक विश्व बनाने की बात सोचें। हमारा अपना मुल्क उसमें कहाँ होगा इसका विचार न करें। अब यह सोचना जरूरी है कि शासन कितने व किसके हाथों में हो। इसके सम्बन्ध में कसौटियां निर्धारित हों। जो इसके योग्य हों, उन्हीं को वह जिम्मेदारी सौंपी जाय। आज की खर्चीली और प्रोपेगैंडा पर अवलम्बित चुनाव पद्धति में ऐसा परिवर्तन आवश्यक है जिसमें समझदार और जिम्मेदार लोग ही संचालक तंत्र बना सकें। सर्व साधारण को स्थानीय पंचायत स्तर की समितियाँ बनाने का हक हो। बड़ी जिम्मेदारियाँ उठाने वालों को वोट देने की योग्यता अनुबंधित हो। बहुमत आवश्यक नहीं। अल्पमत में भी जो विचारशील लोगों के वोट प्राप्त कर सकें, वे भी शासन तंत्र में पहुँचे। चुनाव लड़ने के लिए राशि खर्चने की आवश्यकता न पड़े। सरकार ही उतना प्रबन्ध कर दे अथवा जनता वह खर्च वहन करे। पार्टियाँ चुनाव लड़ें, इसकी अपेक्षा यह अच्छा है कि बिना पार्टी देश में एक ही प्रजा पार्टी रहे और उसके द्वारा चुने हुए संभ्रांत लोग शासन तंत्र चलाएं। महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती करने के लिए परीक्षाएं उत्तीर्ण करना ही पर्याप्त नहीं वरन् उसकी प्रतिभा योग्यता और ईमानदारी कई कसौटियों पर कसी जाने के उपरान्त ही महत्वपूर्ण स्थानों की पूर्ति हो सकती है।
वर्तमान स्थिति में राजनैतिक क्षेत्र में उपरोक्त तीन प्रकार के परिवर्तनों की हवा चलेगी। दैवीसत्ता इसके लिए अनुकूलता उत्पन्न करेगी लोगों के विचार इन सम्भावनाओं की ओर स्वयमेव मुड़ते दिखाई पड़ेंगे। इसमें राजनैतिक क्षेत्र को प्रभावित करने वाले मनीषी-अर्थशास्त्री दोनों ही नये और प्रौढ़ विचार देंगे।
राजनीति के उपरान्त दूसरा समर्थ क्षेत्र है अर्थतंत्र का। इन दिनों अर्थ तंत्र अधिक लाभदायक उत्पादन करने के लिए स्वच्छन्द है। जो रोक थाम है वह नाम मात्र की है। लोगों की कुरुचि को भड़काने और पैसा बनाने में उसे न जनता रोक पाती है न शासन। जन मानस को प्रभावित करने वाले साहित्य, चित्र, फिल्म आदि में कुरुचि वाले उत्पादन की भरमार है। अगले दिनों इस प्रकार के उपार्जन पर रोक लगेगी। नशा उत्पन्न करने की बात कोई मानवी मौलिक अधिकार की दुहाई देकर न कह सकेगा। जो भी उत्पादन हो उसकी उपयोगिता जनहित में सिद्ध करने के पश्चात ही उसके निर्माण की छूट मिला करेगी।
जन जीवन की आवश्यकताएं पूरी करने वाली प्रमुख वस्तुएं कुटीर उद्योग के क्षेत्र में चली जायेंगी, और उन्हें सहकारी तंत्र के अंतर्गत रखते हुए ऐसी स्थिति उत्पन्न की जायेगी कि बड़े उद्योग उनसे प्रतिद्वन्द्विता न करने पाएं। वस्त्र उद्योग-जन-जीवन से सम्बन्धित शिल्प, छोटे कारखानों और छोटे कस्बों में बनाने लगें तो बेकारी की समस्या न रहेगी। बड़े कारखाने मात्र उन्हीं वस्तुओं को बनाएं जो कुटीर उद्योगों के अंतर्गत नहीं बन सकती।
अब निर्यात का सामान बहुत कम रह गया है। जो रह गया है वह भी बहुत जल्द घटेगा या समाप्त होगा। कुछ ही दिनों में सभी देश अपनी जरूरत का सामान बनाने लगेंगे। कच्चे माल की इधर उधर करने की ही जरूरत पड़ा करेगी। इस लिए उचित है कि पहले से ही निर्यात को महत्व न दिया जाय। आयात कच्चा माल ही किया जाय। ऐसा करने से बड़े शहरों में बड़े उद्योग लगाने के कारण घिचपिचजन्य जो समस्याएं उत्पन्न होती हैं, न होंगी। शहरों का मोटापा हल्का होगा और दुबले-गाँव कस्बे बनकर मजबूत दृष्टिगोचर होने लगेंगे।
वर्तमान धनाध्यक्ष प्रायः अधिक आमदनी वाले कारोबार बढ़ाते हैं और बड़े मिल कारखाने जमाने में अधिक लाभ देखते हैं। यह प्रवृत्ति जल्दी ही बदली जानी है। असमंजस उनके सामने है जो बड़े व्यवसायों में फंसे हुए हैं। उन्हें समय के साथ बदलना होगा। अच्छा हो वे हठ न करें और समय रहते बदलने की प्रक्रिया आरम्भ कर दें। अन्यथा एक साथ झटका पड़ने पर वे संभल न सकेंगे। सरकारी, बैंक अभी तो उन्हें बड़े उद्योगों के लिए बड़ी सुविधाएं देती हैं पर अगले दिनों यह भी सम्भव न रहेगा। आने वाले दिनों में कुटीर उद्योग ही प्रमुख होंगे। वे कस्बों में चलेंगे और सहकारी समिति स्तर पर उनका ढाँचा खड़ा होगा। धनाध्यक्षों को समय की चेतावनी इतनी ही है कि सीमित लाभाँश में काम चलाएं। जो कमाएं उसमें लाभाँश का सीमा बंधन हो। इसी समिति में वे श्रमिकों को भी भागीदार रखें। इस प्रकार समय बदल भी जायेगा और वे हैरान भी न होंगे अगले दिनों अर्थ तंत्र चलेगा इसी तरह, मुड़ेगा इसी तरफ। इसलिए इस सम्भावना को भविष्यवाणी मानकर नोट कर लिया जाय और जिनसे इसका सम्बन्ध है वे अपना ढर्रा अभी से बदलना आरम्भ कर दें।
अर्थ तंत्र की बात चल पड़ी तो यहाँ एक और बात भी नोट करनी चाहिए कि समाज को जन साधारण के ऊपर लदे हुए आज के उत्तरदायित्व भी अपने ऊपर लेने होंगे। तथा शिक्षा, चिकित्सा व्यवसाय आदि। आज धनिक अपने परिवार के लिए निर्वाह से अधिक जुटा लेते हैं। निर्धन मारे-मारे फिरते हैं। उनके स्तर में जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है। अगले दिनों सर्व साधारण की अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ समाज तंत्र को ही वहन करनी पड़ेगी। इसलिए आवश्यक होगा कि वहीं व्यक्ति उत्पादन का स्वामित्व ग्रहण करें। सरकार जिम्मेदारियाँ उठाये। कमाने वाले पूँजी जेब में रखें यह व्यक्ति को सामर्थ्य भर काम करने पर बाधित होना होगा और औसत स्तर के अनुरूप गुजारा करने के लिए आदत डालनी होगी। आज कोई कितना ही धन जमा कर सकता है और मन मर्जी के कार्यों में खर्च कर सकता है। किसी को भी दे सकता है। किन्तु कल वैसी स्थिति न रहेगी। पूँजी एक तंत्र के पास जमा होगी। व्यक्ति की हर उचित आवश्यकता उसी से पूरी होगी। निजी संचय की और मनमाने अपव्यय की तब किसी को भी छूट न रहेगी। इससे दुर्व्यसनों और अपराधों का पत्ता कटेगा। चाहे जितना धन पास रखने और चाहे जिस तरह खर्च करने की सुविधा ने ही समाज में अनेकों दुष्प्रवृत्तियों उत्पन्न की हैं। इन्हें मिटाने के लिए पुलिस, सेना, अदालत पर्याप्त नहीं। वरन् धन सम्बन्धी प्रचलित अराजकता पर भी अंकुश लगाना होगा। भावी अर्थ तंत्र का यही स्वरूप होगा।
आज संसार में अनेक प्रकार की अर्थ पद्धतियाँ प्रचलित हैं पर अगले दिनों वह एक ही रहेगी। बृहद् परिवार व्यवस्था इसी को कहते हैं। परिवार के सभी कमाऊ लोग जो कमाते हैं, एक स्थान पर जमा करते हैं। उसी में से हर छोटे बड़े का उसकी स्थिति तथा आवश्यकता के अनुसार काम चलता है। संसार अगले दिनों एक कुटुम्ब की तरह। इसे साझे की दुकान कहना चाहिए सभी देश अपनी भूमि, सम्पदा बड़े विश्व परिवार में विसर्जित करेंगे। यही काम व्यक्तियों को भी समाज के भण्डार में जमा करते हुए करना होगा। यह भविष्यवाणी अथवा सम्भावना या आवश्यकता जो भी है पर भवितव्यता के रूप में इसे सुनिश्चित समझा जाना चाहिए।
यह कब तक पूरा होगा? इस संदर्भ में युग संधि के भाषी 16 वर्षों की चर्चा प्रायः होती रहती है। वह निरर्थक नहीं है। जो अनुपयुक्त है वह गलती चलेगी और जो उपयुक्त है वह ढलती चलेगी। समझदार परिवर्तन का पूर्वाभास पा लेते हैं तो समय रहते अपने चिन्तन-व्यवहार और व्यवसाय-क्रियाकलाप में तद्नुरूप हेर फेर करना आरम्भ कर देते हैं। उन्हें सुविधा रहती है। आकस्मिक टकरावों की मुसीबत नहीं सहनी पड़ती। जो अड़ियल प्रकृति के हैं, जो चल रहा है उसी को अनादि और अनन्त मान बैठते हैं, उनके लिए बदली परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना कठिन पड़ता है।
प्रस्तुत दुनिया बहुत ऊबड़ खाबड़ हो गई है। विगत तीन सौ वर्षों में वैज्ञानिक आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तन इतनी तेजी से हुए हैं कि इसे जादू तिलस्म कहा जा सकता है। अब से तीन सौ वर्ष पुराना कोई व्यक्ति कहीं जीवित हो और प्रकट होकर आज की परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करे तो उसे पग-पग पर आश्चर्य चकित रहना पड़ेगा। रेल, मोटर, जलयान, वायु यान, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो, बिजली आदि का जितना प्रचलन हो चुका है इसे देखते हुए पुराना- इन सभी वस्तुओं से सर्वथा अपरिचित व्यक्ति अवाक् ही रह जायेगा।
अगले बीस वर्ष इससे भी अधिक आश्चर्यजनक होंगे। इन दिनों लोग क्या सोचते क्या चाहते, क्या करते रहते हैं, उन सब को नोट करके रक्खा जाय और बीस वर्ष बाद की दुनिया के साथ उसकी संगति बिठाई जाये तो प्रतीत होगा कि दोनों की दिशा धारा में जमीन आसमान जैसा अन्तर पड़ गया। नासमझ आदमी अपनी सम्पदा और बुद्धिमता की अकड़ में जिन प्रचलनों को उत्साह अहंकारपूर्वक अपनाए हुए हैं उनमें से प्रत्येक को वह इस बीच परख चुका होगा। इतना ही नहीं जो अनुपयुक्त है उसे छोड़ने की तैयारी भी कर चुका होगा। मस्तिष्कीय हेर फेर से विचार पद्धति से जब हेर-फेर होना आरंभ हो जाता है तो फिर क्रिया रूप का परिवर्तन कोई बहुत अधिक कठिन नहीं होता। कठिनाई आकस्मिक परिवर्तनों से आती है। जो कभी सोचा ही नहीं गया था। वह सामने आ खड़ा है तो आदमी हड़बड़ा जाता है। और लगता है या तो किसी स्वप्न लोक से आया है या जादूगरों की दुनिया में प्रवेश कर रहा है।
हजारों लाखों वर्षों से यों हर क्षेत्र में प्रगति प्रयास होते रहते हैं और एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी कुछ अधिक समझदारी का परिचय देती रही है। पर अबकी बार जो हुआ है होना है उसे तो एक प्रकार से अद्भुत ही कहना चाहिए, अभूत-पूर्व भी। पिछले तीन सौ वर्षों में दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई और अब अगले बीस वर्षों में उसका क्या स्वरूप बनने जा रहा है इसे तुलनात्मक दृष्टि से देखते हुए भयंकर भूकम्प की ही उपमा दी जा सकता है। यह उभय पक्षीय परिवर्तन ऐसा है जिसे भयानक ज्वार भाटे के समतुल्य कहा जाय तो भी कुछ अत्युक्ति न होगी।
मनुष्य विद्युत शक्ति का पुँज माना गया है और उस पर भी इसका एकत्रीकरण मस्तिष्क पर सर्वाधिक माना जाता है। लेकिन इसका बिखराव तेजोवलय के रूप में इतना अधिक होता है कि किसी भी समय मस्तिष्क से प्रवाहित होने वाली विद्युत एक स्थान पर मापे जाने पर एक वोल्ट के पचास करोड़वें भाग के बराबर होती है। यदि एक फ्लैश लाइट जलानी पड़े तो 60 हजार व्यक्तियों के “स्कैल्प” पर इलेक्ट्रोड्स लगाने पड़ेंगे। इसी विद्युत शक्ति को यदि एक स्थान पर सघन बनाया जा सके तो मनुष्य चलता फिरता अति शक्तिशाली बिजलीघर माना जा सकता है।
किसी समय, मुनि, मनीषी और दार्शनिक समाज के सर्वोच्च वर्ग में गिने जाते थे क्योंकि उन्हीं के प्रतिपादन शासनाध्यक्षों, धनाध्यक्षों तथा अन्यान्य विशिष्ट वर्गों को मान्य होते थे। उनकी अवज्ञा करने का दुस्साहस कोई करता नहीं था क्योंकि समय के अनुरूप राह बताने और निर्धारण करने की उनकी क्षमता असाधारण भी होती थी और उनका वर्चस्व भी था।
दार्शनिक इसी श्रेणी में आते थे। वे शास्त्र रचते थे और सामयिक समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करते थे। प्रवचन के लिए व्यास पीठों पर उन्हीं का अधिकार था। राजा से लेकर रंक तक उनकी असामान्य मान्यता थी। आज भी यह वर्ग लेखकों, कवियों, कलाकारों के रूप में है तो सही पर अपनी गरिमा गंवा बैठा है। उसका अपना न तो स्तर है, न लक्ष्य। इनमें से अधिकाँश को धनाध्यक्षों की सेवा में चारणों की तरह निरत रहना पड़ता है। जो उनसे सोचने के लिए कहते हैं सो ही वे सोचते हैं, जो लिखने का निर्देश मिलता है सो ही लिखते हैं। चूँकि प्रेस प्रकाशन एक व्यवसाय बन गया है और व्यवसाय सदा धनिक चलाते हैं। जो संचालक है उसी की नीति भी चलेगी। इन दिनों अनेकों पत्र-पत्रिकाएं निकलती हैं। पुस्तकें भी छपती हैं। पर उनमें लेखक की अपनी कोई स्वतंत्र आवाज नहीं। प्रकाशक को जिसमें अपना लाभ दीखता है, लेखक वही लिखता है। क्योंकि पैसा उसे अपने मालिक की मर्जी के अनुरूप लिखने का मिलता है। अब स्वतंत्र लेखक रह नहीं गये हैं, जो अपनी मर्जी से लिखें। यदि मर्जी हो भी तो वह मालिक की मर्जी से भिन्न नहीं होनी चाहिए। अन्यथा मालिक ऐसे धन्धे में पैसा क्यों लगावेगा जिसमें उसे लाभ नहीं दीखता। लेखक का अपना निज का कोई प्रेस नहीं। जो कहीं, जहाँ, तहाँ है, वे प्रतिस्पर्धा में ठहर न पाने के कारण लंगड़े-लूले- ज्यों-त्यों करके चलते हैं। उन्हें न ग्राहक मिलते हैं और न खपत का जुगाड़ बनता है। ऐसी दशा में स्वतंत्र प्रेस का अस्तित्व प्रायः नहीं के बराबर है। लेखक, चिन्तक या दार्शनिक अब घटते या मिटते जा रहे हैं।
मनीषियों का दूसरा वर्ग वैज्ञानिकों का है। पुरातन काल में वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की जिम्मेदारी एक ही वर्ग उठाता था। जिनकी रुचि भौतिक क्षेत्र में होती वे चरक, कणाद, नागार्जुन, याज्ञवल्क्य, द्रोणाचार्य आदि की तरह भौतिक अनुसंधानों को हाथ में लेते थे। अन्यथा व्यास, कपिल, वशिष्ठ, गौतम की तरह युग दर्शन में नये अध्याय जोड़ते रहते थे।
इन दिनों दोनों की ही दुर्गति हुई है। वैज्ञानिक आविष्कारकों की एक पीढ़ी बहुत ही प्रसिद्ध और कृत-कृत्य हुई थी। उसने सामान्य योग्यता रहते हुए भी ऐसे आविष्कार किये थे जिससे जन-साधारण को असीम और असाधारण लाभ पहुँचा। बिजली का आविष्कार उसमें सर्वाधिक महत्व का है। अब वह मनुष्य जीवन की अविच्छिन्न अंग बनकर रह रही है। इसके बाद वाहनों का नम्बर आता है। साइकिल से लेकर रेल, मोटर, जलयान, वायुयान, इसी स्तर के हैं जिनने लम्बी यात्राएं सरल बना दीं। भार वाहन का खर्च भी बहुत कम कर दिया। फलतः व्यापार तेजी से पनपने लगे। टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन की उपयोगिता ऐसी ही है। एक युग था जब मनुष्य जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने में वैज्ञानिकों ने- उनके आविष्कारों ने असाधारण सेवा सहायता की। उत्पादन में काम आने वाले अनेकों छोटे-बड़े यन्त्र भी ऐसे हैं, जिनके लिए मनुष्य जाति उनकी सदा कृतज्ञ रहेगी। कोल्हू, चक्की, पम्प आदि की गणना ऐसे ही संयंत्रों में होती है।
किन्तु वह वर्ग भी अपनी गरिमा दार्शनिकों की तरह अक्षुण्ण बनाये न रह सका। आविष्कारकों का अपना कोई उत्पादन क्षेत्र न था। उन्हें उत्पादक धनाध्यक्षों के लिए काम करने के लिए बाधित होना पड़ा। बात यहीं से गड़बड़ी की आरम्भ होती है। फिल्म उद्योग लोक शिक्षण का एक उपयोगी माध्यम हो सकता था पर उसके उत्पादनों को देखकर दुख होता है। प्रेस भी एक अनूठी शक्ति है पर उस क्षेत्र में भी काम का कम और बेकाम का अधिक छपता है। फिल्म दर्शक और साहित्य पाठक अन्ततः इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यदि इनसे दूर रहते तो भ्रम जंजाल से बचकर कहीं अधिक नफे में रहते।
इन दिनों प्रायः पचास हजार ऊंची श्रेणी के वैज्ञानिक मात्र युद्ध आयुध बनाने की नई-नई विधियाँ खोजने में निरत है। उन्हें इसके लिए पूरा सम्मान और पूरा पैसा दिया जा रहा है। इतना वे अन्यत्र कहीं नहीं पा सकते। इसलिए मौलिक चिन्तन के सुनियोजन का रास्ता ही बन्द है। सरलता और सुख-सुविधा हर किसी को प्रिय लगती है। चाहे दार्शनिक हो या वैज्ञानिक। स्थिति को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि दोनों ही क्षेत्रों में मौलिक विचारकता समाप्त प्रायः हो गई। दोनों को ही अपने मालिकों के लिए धनाध्यक्षों के लिए काम करना पड़ रहा है।
यह दुर्भाग्य पूर्ण दुर्गति है। इससे उबरा कैसे जाय? उबारे कौन? वैज्ञानिक के लिए कुटीर उद्योग से सम्बन्धित अगणित यन्त्र ऐसे बनाने के लिए पड़े हैं जिन्हें बनाया जा सके तो असंख्यों को बेकारी से त्राण पाने का अवसर मिले और अभावजन्य कठिनाइयों से पीछा छूटे। घरेलू आटा चक्की, घरेलू तेल कोल्हू, घरेलू चरखा, करघा, लुहारी, बढ़ईगिरी की मशीनें, कुम्हार के चाक जैसे यन्त्र ऐसे निकल सकते हैं, जिनके सहारे सामान्य जीवन की सुविधा भी बढ़े और आमदनी भी। सस्ते पम्प सेटों की हर जगह आवश्यकता है। कागज बनाने का उद्योग हर देहात में चल सकता है। सूर्य की गर्मी से चालित भट्टी एवं चूल्हें से मुफ्त में गरम पानी मिलने और वस्तुएं पकाने-सुखाने का काम हो सकता है।
ऊपर कुछ उदाहरण काम के बताये गये हैं। बैल-गाड़ियों में सुधार की भारी गुँजाइश है। मोटरें और साइकिल भाप से चल सकती हैं और महंगे पेट्रोल का स्थान ले सकती हैं। इन सब कार्यों में अपने वैज्ञानिक पूरी तरह समर्थ हो सकते हैं और उन यन्त्रों के उत्पादन का एक नया बड़ा उद्योग चल सकता है। पर ऐसा कुछ हो नहीं रहा है। जो कुटीर उद्योग के नाम पर बना है- हुआ है वह इतना लंगड़ा लूला है कि लगाने वालों की कमर तोड़ कर उसे मजा चखा देता है। इन सभी उपकरणों को अभी आधे अधूरे मन से बनाया गया है। इन यंत्रों के निर्माताओं का- आविष्कारकों का पारस्परिक सहयोग यदि सच्चे मन से हुआ होता और उसके लिए आवश्यक पूँजी जुट सकी होती। प्रयोक्ताओं की व्यावहारिक शिक्षा मिल सकी होती। सहकारी माध्यमों से कच्चा माल देने और बनी वस्तुएं लेने का उपयुक्त मण्डियों में बेचने का यदि प्रबन्ध हुआ होता तो परिस्थितियाँ कुछ और हुई होतीं। तब हम मात्र कृषि पर निर्भर न रहते। गोबर के अतिरिक्त दूसरे सस्ते वानस्पतिक खाद भी आविष्कृत कर रहे होते। पशुओं के लिए खेतों में सस्ती और अधिक फसल वर्ष भर देने वाली घास उगाते और पशुपालन घाटे का सौदा न रहा होता।
शिकायतें कौन किसकी करे? पर गुँजाइश इस बात की पूरी-पूरी है कि देश को कुटीर उद्योग स्तर पर योजना बद्ध ढंग से खड़ा किया जाय। यों चलने को तो यह सब कुछ अभी भी चल रहा है पर उसे अपर्याप्त और असन्तोषजनक ही कहा जा सकता है। जापान जैसी लगन हमारे वैज्ञानिकों, निर्माताओं उपभोक्ताओं की लगी होती तो अपने देश के मनीषी ही इस क्षेत्र में चमत्कार करके दिखा सकते थे। पर बने कैसे? जबकि सबको अधिक कमाने की- हाथों-हाथ सुविधा समेटने की पड़ी है। प्रतिभाएं विदेशों को पूँजीवादी राष्ट्रों की ओर भागती चली जा रही हैं। कुटीर उद्योग जहाँ भी चल रहे हैं, घाटा दे रहे हैं। जिनने पैर बढ़ाया उनका जोश ठण्डा कर रहे हैं।
यही बात दार्शनिकों-मनीषियों के सम्बन्ध में भी है। समय जिस तेजी से बढ़ा है, उसी तेजी से समस्याएं भी उपजी तथा उलझी हैं। वे सभी अपने समाधान चाहती हैं- बुद्धि संगत, व्यावहारिक और तथ्यों पर निर्धारित। ऐसे मार्गदर्शन का साहित्य लिखा गया होता, छपता, और पाठकों तक उचित मूल्य में पहुँचता तो कैसा अच्छा होता। पर दीखता इस क्षेत्र में भी अन्धेरा ही है।
पुस्तकों के नाम पर पहाड़ के बराबर हर दिन कागज काला होता है। पत्र-पत्रिकाएं भी आये दिन एक गोदाम खाली कर देती हैं। वह छपता भी है और बिकता भी है। इसे कोई न कोई लिखता भी है पर आदि से अन्त तक इस मुद्रण प्रकाशन की समीक्षा की जाय तो निराशा ही हाथ लगती है।
जिन व्यावहारिक जानकारियों की जन-साधारण को आवश्यकता है, क्या वे गम्भीरतापूर्वक सोची-समझी गई हैं और इन पर पिछड़े देश की परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए कुछ ऐसा प्रस्तुतीकरण हुआ है, जिसे ‘काम का’ कहा जा सके? अंग्रेजी किताबों के पन्ने उलट-पुलट कर उनका भाषान्तर होता रहता है और लोग अपने नामों से छापते रहते हैं। कम समय में अधिक पारिश्रमिक प्राप्त करने की दृष्टि से यही तरीका सरल भी पड़ता है। अब उन मनीषियों की पीढ़ी मिटती चली जा रही है जो जन समस्याओं पर सामयिक, व्यावहारिक एवं तथ्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण अपना कर्तव्य समझते थे। अब वे कार्ल मार्क्स कहाँ हैं, जो सत्रह वर्ष की निरंतर परिश्रम साधना कर एक ग्रन्थ लिखें। अब वे परिवार, पत्नी, बच्चे कहाँ हैं, जो पुराने कपड़ों को काटकर नये कपड़े बतायें और अपना पेट पालते हुए लेखक को अपनी तपस्या में लगा रहने दें।
दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का क्षेत्र सूना हो जाना अथवा उनका अपने स्तर से नीचे उतर आना, भटक जाना बहुत ही बुरी बात है। इस स्तर के ब्रह्मचेता लोग जब लटकते हैं और दिशा भ्रमा देने वाला- हैरानी में धकेलने वाला कर्तृत्व रचते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया अत्यन्त भयंकर होती है। पुराने जमाने में उन्हें ‘ब्रह्म राक्षस’ कहा जाता था। अब वैसा कोई नया नामकरण हुआ है या नहीं, इसका पता नहीं पर पीढ़ी निस्सन्देह उन्हीं की बढ़ रही है।
यह वस्तुस्थिति का पर्यवेक्षण हुआ। इतने भर से बात क्या बनती है। समीक्षाएं, भर्त्सनाएं आये दिन होती रहती हैं। उन्हें इस कान सुनकर उस कान से निकाल देते हैं। होना तो कुछ ऐसा चाहिए, जिससे काम बने। हम अब वही करने जा रहे हैं। वैज्ञानिक और दार्शनिक हमारी एक मुहिम हैं। वैज्ञानिकों को भड़कायेंगे कि युद्ध के घातक शस्त्र बनाने में उनकी बुद्धि सहयोग देना बन्द कर दे। गाड़ी अधर में लटक जाय। दोनों पक्ष इसी फिराक में हैं कि उनके वैज्ञानिक ऐसे अमोघ उपाय निकाल लेंगे जिससे अपनी जीत निश्चित रहे और सामने वाला अपंग होकर बैठा रहे। सूक्ष्मीकरण के उपरान्त अब हम वैसा न होने देंगे। उच्चस्तरीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा और सूझ-बूझ उन्हें वैसा न करने देगी जैसा कि अपेक्षा की जा रही है। अब उनका मस्तिष्क ऐसे छोटे उपकरण बनाने की ओर लौटेगा जिससे कुटीर उद्योगों को सहायता देने वाला नया माहौल उफन पड़े। इसका उदाहरण देने के लिए एक नमूना हम अपने सामने बनाकर जायेंगे।
लेखकों दार्शनिकों का अब एक नया वर्ग उठेगा। वह अपनी प्रतिभा के बलबूते एकाकी सोचने और एकाकी लिखने का प्रयत्न करेगा। उन्हें उद्देश्य में सहायता मिलेगी। मस्तिष्क के कपाट खुलते जायेंगे और उन्हें सूझ पड़ेगा कि इन्हीं दिनों क्या लिखने योग्य है और मात्र वही लिखा जाना है।
क्या बिना सम्पन्न लोगों की सहायता लिए, बिना वर्तमान पुस्तक विक्रेताओं की मोटे मुनाफे की माँग पूरी किये, ऐसा हो सकता है कि जन-साधारण का उपयोग लोक साहित्य लागत मूल्य पर छपने लगे और घर-घर तक पहुँचने लगे। हमारा विश्वास है कि यह असम्भव नहीं है। समय अपनी आवश्यकता पूरी कराने के लिए रास्ता निकालेगा और छाये हुए अंधेरे में किसी चमकने वाले सितारे का प्रकाश दृष्टिगोचर होगा।
दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही मुड़ेंगे। इन दोनों खदानों में से ऐसे नर रत्न निकलेंगे जो उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में आश्चर्यजनक योगदान दे सकें ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करने में हमारा योगदान होगा, भले ही परोक्ष होने के कारण लोग उसे अभी देख या समझ सकें।
मनुष्य अपनी अन्तःशक्ति के सहारे प्रसुप्त के प्रकटीकरण द्वारा ऊंचा उठता है, यह जितना सही है, उतना ही यह भी मिथ्या नहीं कि तप-तितिक्षा से प्रखर बनाया गया वातावरण, शिक्षा, सान्निध्य-सत्संग, परामर्श-अनुकरण भी अपनी उतनी ही सशक्त भूमिका निभाता है। देखा जाता है कि किसी समुदाय में नितान्त साधारण श्रेणी के सीमित सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति एक प्रचण्ड प्रवाह के सहारे असम्भव पुरुषार्थ भी सम्भव कर दिखाते हैं। प्राचीन काल में मनीषी-मुनिगण यही भूमिका निभाते थे। वे युग साधना में निरत रहकर लेखनी वाणी के सशक्त तन्त्र के माध्यम से जन-मानस के चिन्तन को उभारते थे। ऐसी साधना अनेकों उच्चस्तरीय व्यक्तियों को जन्म देती थी- उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को उजागर कर उन्हें सही दिशा देकर समाज में वाँछित परिवर्तन लाती थी। शरीर की दृष्टि से सामान्य दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति भी प्रतिभा-कुशलता-चिन्तन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।
सर्वविदित है कि मुनि एवं ऋषि ये दो श्रेणियाँ अध्यात्म क्षेत्र की प्रतिभाओं में गिनी जाती रही हैं। ऋषि वह जो तपश्चर्या द्वारा काया का चेतनात्मक अनुसन्धान कर उन निष्कर्षों से जन-समुदाय को लाभ पहुँचाएं तथा मुनिगण वे कहलाते हैं, जो चिन्तन-मनन स्वाध्याय द्वारा जन-मानस के परिष्कार की अहम् भूमिका निभाते हैं। एक पवित्रता का प्रतीक है तो दूसरा प्रखरता का। दोनों को ही तप साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है ताकि अपना स्वरूप और विराट् व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल सम्पन्न कर वे युग चिन्तन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते- सुसंस्कारित बनाये रख सकते हैं।
लोक व्यवहार में मनीषी शब्द का प्रायः अर्थ उस महाप्राज्ञ से लिया जाता है जिसका मन उसके वश में हो। जो मन से नहीं संचालित होता अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है, उसे मनीषी एवं ऐसी प्रज्ञा को मनीषा कहा जाता है। शास्त्रकार का कथन है- “मनोषा अस्ति येषाँ ते मनीषी नः।” लेकिन साथ ही यह भी कहा है- ‘‘मनीषी नस्तु भवन्ति, पावनानि न भवन्ति”- अर्थात्- मनीषी तो कई होते हैं, बड़े-बड़े बुद्धिमान होते हैं परन्तु वे पावन हों- पवित्र हों, यह अनिवार्य नहीं”। प्रतिभाशाली-बुद्धिमान होना अलग बात है एवं पवित्र-शुद्ध अन्तःकरण रखते हुए बुद्धिमान होना दूसरी। यह कथन आज की परिस्थितियों में नितांत सही है। आज सम्पादक, बुद्धिजीवी, लेखक, अन्वेषक, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक तो अनेकानेक हैं, देश देशान्तरों में फैले पड़े हैं लेकिन वे मनीषी नहीं हैं। क्यों? क्योंकि तप शक्ति द्वारा अन्तःशोधन द्वारा उन्होंने पवित्रता नहीं अर्जित की।
साहित्य की आज कहीं कमी है? जितनी पत्र-पत्रिकाएं आज प्रकाशित होती हैं, जितना साहित्य नित्य विश्व भर में छपता है उस पहाड़ के समान सामग्री को देखते हुए लगता है, वास्तव में मनीषी बढ़े हैं, पढ़ने वाले भी बढ़े हैं। लेकिन इन सबका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? क्यों एक लेखक की कलम कुत्सा भड़काने में ही निरत रहती है एवं क्यों उस साहित्य को पढ़कर तुष्टि पाने वालों की संख्या बढ़ती चली जाती है, इसके कारण ढूंढ़े जायें तो वहीं आना होगा, जहाँ कहा गया था- “पावनानि न भवन्ति”। यदि इतनी मात्रा में उच्चस्तरीय, चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने वाला साहित्य रचा गया होता एवं उसकी भूख बढ़ाने का माद्दा जन-समुदाय के मन में पैदा किया गया होता तो क्या ये विकृतियाँ नजर आतीं जो आज समाज में विद्यमान है। दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का समाधान यदि सम्भव हो सकता है तो वह युग-मनीषा के हाथों ही होगा।
जैसा कि हम पूर्व में भी कह चूके हैं कि नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं विचारों की काट द्वारा होगी, समाज का नव-निर्माण होगा तो वह सद्-विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा। अभी तक जितनी मलिनता समाज में प्रविष्ट हुई है, वह बुद्धिमानों के माध्यम से ही हुई है। द्वेष-कलह, नस्लवाद-जातिवाद, व्यापक नर-संहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते, उनके अन्तःकरण पवित्र होते, तप, ऊर्जा का सम्बल उन्हें मिला होता तो उन्होंने विधेयात्मक चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता, ऐसे आन्दोलन चलाए होते। हिटलर ने जब नीत्से के सुपरमैन रूपी अधिनायक को अपने में साकार करने की इच्छा की तो सर्वप्रथम सारे राष्ट्र के विचार प्रवाह को उस दिशा में मोड़ा। अध्यापक-वैज्ञानिक वर्ग नाजीवाद का कट्टर समर्थक बना तो उसकी उस निषेधात्मक विचार साधना द्वारा जो उसने “मीन केम्फ” के रूप में आरोपित की। बाद में सारे राष्ट्र के पाठ्यक्रम, अखबारों की धारा का मोड़ उसने उस दिशा में मोड़ दिया जैसा कि वह चाहता था। जर्मन राष्ट्र नस्लवाद के अहं में सर्वश्रेष्ठ जाति का प्रतीक कोने के गर्वोन्माद में उन्मत्त हो व्यापक नर संहार कर स्वयं ध्वस्त हो गया। यह भी मनीषा के के एक मोड़ का परिणति है, ऐसे मोड़ की जो सही दिशा में होता तो ऐसे समर्थ सम्पन्न राष्ट्र को कहाँ से कहाँ ले जाता।
कार्लमार्क्स ने सारे अभावों में जीवन जीते हुए अर्थशास्त्र रूपी ऐसे दर्शन को जन्म दिया जिसने समाज में क्रान्ति ला दी। पूँजीवादी किले ढहते चले गये एवं साम्राज्यवाद दो तिहाई धरती से समाप्त हो गया। “डास कैपीटेल” रूपी इस रचना ने एक नवयुग का शुभारम्भ किया जिसमें श्रमिकों को अपने अधिकार मिले एवं पूँजी के समान वितरण का वह अध्याय खुला जिससे करोड़ों व्यक्तियों को सुख-चैन की, स्वावलम्बन प्रधान जिन्दगी जी सकने की स्वतंत्रता मिली। रूसो ने जिस प्रजातन्त्र की नींव डाली थी, उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के पक्षधर शोषकों की रीति-नीति ही उसकी प्रेरणा स्रोत होगी। मताधिकार की स्वतंत्रता, बहुमत के आधार पर प्रतिनिधित्व का दर्शन विकसित न हुआ होता, यदि रूसो की विचारधारा ने व्यापक प्रभाव जन समुदाय पर न डाला होता। “जिसकी लाठी- उसकी भैंस”की नीति ही सब जगह चलती, कोई विरोध तक न कर पाता। जागीरदारों एवं उत्तराधिकार के आधार पर राजा बनने वाले अनगढ़ों का ही वर्चस्व होता। इसे एक प्रकार की मनीषा प्रेरित क्रान्ति कहना चाहिए कि देखते-देखते उपनिवेश समाप्त हो गए, शोषक वर्ग का सफाया हो गया। इसी संदर्भ में हम कितनी ही बार लिंकन एवं लूथर किंग के साथ-साथ उस महिला हैरिएट स्टो का उल्लेख करते रहे हैं जिसकी कलम ने कालों को गुलामी के चंगुल से मुक्त कराया। प्रत्यक्षतः यह युग मनीषा की भूमिका है।
बुद्ध की विवेक एवं नीतिमत्ता पर आधारित विचार क्राँति एवं गांधी-पटेल-नेहरू द्वारा पैदा की गयी स्वातंत्र्य आन्दोलन की आँधी उस परोक्ष मनीषा की प्रतीक है जिसने अपने समय में ऐसा प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न किया कि युग बदलता चला गया। उन्होंने कोई विचारोत्तेजक साहित्य रचा हो अथवा विशेष वक्तृता की हो, यह भी नहीं। फिर यह सब कैसे सम्भव हुआ। यह तभी हो पाया जब उन्होंने मुनि स्तर की भूमिका निभायी, स्वयं को तपाया, विचारों में शक्ति पैदा की एवं उससे वातावरण को प्रभावित किया।
परिस्थितियाँ आज भी विषम हैं। वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिये आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और मानवी गरिमा को उभारने, दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचण्ड पुरुषार्थ करना होगा। साधन इस कार्य में कोई योगदान दे सकते हैं, यह सोचना भ्रांतिपूर्ण है। दुर्बल आस्था अन्तराल को तत्त्वदर्शन और साधना प्रयोग के उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्म वेत्ता इस मरुस्थल की देखभाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते व समय-समय पर संव्याप्त भ्रान्तियों से मानवता को उबारते हैं। अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है।
अध्यात्म ही व्यक्ति के अन्तराल में विकृतियों के माहौल से लड़ सकने- निरस्त कर पाने में सक्षम तत्वों की प्रतिष्ठापना कर पाता है। हमने व्यक्तियों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को ही अपना माध्यम बनाया एवं उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा है।
हमने अपने भावी जीवनक्रम के लिए जो महत्वपूर्ण निर्धारण किए हैं, उनमें सर्वोपरि है लोक चिन्तन को सही दिशा देने हेतु एक ऐसा विचार प्रवाह खड़ा करना जो किसी भी स्थिति में अवांछनीयताओं को टिकने ही न दे। आज जन समुदाय के मन-मस्तिष्क में जो दुर्मति घुस पड़ी है, उसी की परिणति ऐसी परिस्थितियों के रूप में नजर आती है जिन्हें जटिल, भयावह समझा जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने के लिए व्यास की तरह, बुद्ध, गाँधी, कार्लमार्क्स की तरह, मार्टिन लूथर, अरविन्द, महर्षि रमण की तरह भूमिका निभाने वाले मुनि व ऋषि के युग्म की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार क्रान्ति का प्रयोजन पूरा कर सके। यह पुरुषार्थ अन्तःक्षेत्र की प्रचण्ड तप साधना द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है जो अपनी लेखनी शक्ति द्वारा उस उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके जिसे युगान्तरकारी कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जो संकल्प हमने आज से सैंतालीस वर्ष पूर्व लिया था, उसे अनवरत निभाते रहने का हमारा नैतिक दायित्व है।
युग ऋषि की भूमिका अपने परोक्ष रूप में निभाते हुए उन अनुसंधानों की पृष्ठभूमि बनाने का हमारा मन था जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रत्यक्ष रूप इस तर्क, तथ्य, प्रमाणों को आधार मानने वाले समुदाय के समक्ष रख सकें। आज चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधान यदि उनसे कुछ दिशा लेकर सही मार्ग पर चल सके तो हमारा प्रयास सफल माना जाएगा। आत्मानुसंधान के लिये अन्वेषण कार्य किस प्रकार चलना चाहिए, साधना-उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन कर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है, गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति सम्पन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है, ज्योतिर्विज्ञान के चिर पुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है, ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषि परम्परा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों में अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिये हैं। हमने उनका शुभारम्भ कर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है, आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत् पोषण देते रहेंगे। सारे वैज्ञानिक समुदाय का चिन्तन इस दिशा में चल पड़े, आत्मिकी के अनुसंधान में अपनी प्रज्ञा नियोजित कर वे स्वयं को धन्य बना सकें, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा। सारी मानव जाति को अपनी मनीषा के द्वारा एवं शोध अनुसंधान के निष्कर्षों के माध्यम से लाभान्वित करने का हमारा संकल्प सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या की स्थिति में और भी प्रखर रूप लेगा इसे आने वाला समय बताएगा।
चीन के धर्मोपदेशक हुई पेंगे, दीवार की तरफ मुँह करके प्रवचन करते थे। श्रोताओं की तरफ उनकी पीठ रहती थी।
पूछने पर वे कहते थे- ‘‘आप लोग दीवार की तरह हैं- सफाचट। उनके भीतर प्रवेश करने के लिए खिड़की तक नहीं है। ऐसी दशा में यह आशा बँधती नहीं कि वे जो सुनेंगे उसे समझने और अपनाने को भी तैयार होंगे।”
हुई का कथन था कि इतने पर भी मैं निराश नहीं हूँ। दीवार को सुनाता हूँ ताकि मेरा अभ्यास बढ़े और यदि दीवार के कहीं कान हों तो वे मेरी बात सुने। आखिर कभी तो किसी के कान खुलेंगे।
रामचरित मानस में राम जन्म से लेकर उनके लंका दमन और राज्यारोहण तक का वृत्तांत है। पर इतने में सम्पूर्ण रामायण नहीं बनती। भगवान दो उद्देश्य लेकर अवतरित हुए थे। एक अधर्म का नाश, दूसरा धर्म का परित्राण। तुलसीकृत रामचरित मानस में असुरता से परित्राण का विवरण ही लिखा गया है। धर्म की स्थापना कैसे हुई। यह एक स्वतंत्र विषय है। उसमें परिश्रम कम न लगा होगा। योजना छोटी न बनी होगी, साधन कम लगे होंगे और थोड़े नल-नीलों से काम न चला होगा। पर उस सब का वर्णन उस ग्रंथ में नहीं है। रामराज्य की स्थापना को धर्मराज्य की स्थापना या सतयुग की वापसी कहा जाता है। यह कार्य ऐसे ही जादू की छड़ी घुमाते न हो गया होगा। असुरता उन्मूलन में जितना पुरुषार्थ अपेक्षित है उतना ही देवत्व की स्थापना हेतु भी अभीष्ट है।
सभी जानते हैं कि ध्वंस सरल है और निर्माण कठिन एक तीली से समूचा गाँव जल सकता है किन्तु उसे फिर से उसी रूप में या उससे भी अच्छे ढंग से बनाना हो तो इसके लिए कितने बड़े कितने समर्थ प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ेगी। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। रामराज्य की स्थापना को कम महत्व नहीं दिया जा सकता है क्योंकि वस्तुतः वही लक्ष्य था। मात्र असुरों को मार डालना भर लक्ष्य रहा होता तो उतने भर से क्षणिक राहत की ठंडी साँस लेने का अवसर न मिलता। वह सब कहाँ दृष्टिगोचर होता जिसकी याद अभी भी आती रहती है लंका दहन के उपरान्त वहाँ मात्र मरघट जैसे दृश्य दिखाई पड़ते। जले भवन, छितराई लाशें, दुर्घटित कबाड़ देखकर कौन यह अनुमान लगा पाता कि रामचन्द्र जी ने कोई कहने योग्य पुरुषार्थ किया।
बात लंका की हो- अयोध्या की हो- या सम्बन्धित इलाके की। प्रशंसा की बात तभी कही जा सकती है, जब वहाँ कुछ ऐसा बन पड़ा हो जो पुराने की तुलना में और अधिक शानदार रहा हो। यह किस प्रकार सम्पन्न हुआ। इसका उल्लेख रामायण में नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि रामचरित मानस के प्रमुख सूत्र संचालक का उसमें बहुत बड़ा भाग न रहा होगा। वह सम्भवतः दूसरों ने किया होगा।
सूक्ष्मीकरण को उद्देश्यों में एक पक्ष वह है जिसे आक्रमणात्मक कहा जा सकता है। उलटे को उलट कर सीधा करना। यह गिरी हुई रेलगाड़ी को क्रेन द्वारा पटरी पर से उठाकर खड़ी कर देना हुआ। इतने भर से रेलगाड़ी चलने थोड़े ही लगेगी। उसकी मरम्मत भी लाको वर्क शाप में ले जाकर करनी होगी। भयंकर अग्नि-काण्ड को दमकलें अथक परिश्रम से बुझाती हैं। लपटें ठंडी होने पर सन्तोष की साँस ली जाती है। फिर भी जो घर जले हैं उनके निवासियों को यथास्थिति पहुँचाने का कार्य फिर भी बाकी रह जाता है। लड़ाई के दिनों शत्रु का आक्रमण रोकने के लिए नदी के पुल तोड़ दिये जाते हैं। पर वे सदा टूटे ही थोड़े पड़े रहते हैं। उन्हें फिर से बनाना पड़ता है अन्यथा आवागमन रुक जाने से उस क्षेत्र की जनता त्राहि-त्राहि कर उठेगी। शत्रु का मार्ग रोकने के लिए पुल किसने तोड़ा इसकी चर्चा प्रमुख रूप से होती है। पर पीछे उसे नये सिरे से बनाने में कितने इंजीनियर ठेकेदार, श्रमिक आदि लगे। उसका उल्लेख प्रायः कम ही होता है।
इन दिनों ध्वंस, विनाश, विग्रह और पतन की शक्तियों का तूफानी उभार है। इन्हें रोकना आज का प्रमुख काम है। इसके लिए जो कुछ किया जाता है उसे रोकथाम करना कहना चाहिए। यह आवश्यक है। तात्कालिक उपाय भी है। इसके बिना गाड़ी आगे बढ़ती ही नहीं । इसलिए प्राथमिकता या प्रमुखता भी इसी को देना अनिवार्य समझ हमें यह अवलम्बन अपनाना पड़ा है।
पिछले पृष्ठों पर जिन मूर्धन्य वर्गों के माध्यम से क्या कुछ किया जाता है, किया जा रहा है उसका संक्षिप्त ऊहापोह हुआ है। अपना निज का संबद्ध अदृश्य जगत का एक विशाल परिकर है। यह किस प्रकार क्या करेगा इसकी चर्चा से सर्वसाधारण को यह विदित हो सकेगा कि भावी महान परिवर्तन में वे किस-किस प्रकार अपनी भूमिकाएं सम्पन्न कर सकेंगे।
इसी प्रकार दूसरा परिकर वरिष्ठों का है जिसमें शासनाध्यक्ष और मनीषी आते हैं। मनीषियों में दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही की गणना होती है। इन्हें विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है और यह आशा की जाती है कि वे जिस प्रकार समाज के अन्यान्य लोगों को प्रभावित करते हैं उसी प्रकार सामयिक समस्याओं के समाधान में भी अपना योगदान प्रस्तुत करेंगे तो किसी प्रकार उनसे बल पूर्वक कराया जाएगा।
परोक्ष जगत, जहाँ अदृश्य आत्माएं रहती हैं जिनके सहचर सहयोगी हम बनने जा रहे हैं को छोड़ दिया जाय तो अब एक वर्ग और रह जाता है जागृत आत्माओं का। इन्हें युग प्रहरी, अग्रगामी, वर्चस्व सम्पन्न आदि नाम भी दिये जाते रहे हैं। यह समाज का मेरुदण्ड है जो अपनी सत्ता एवं प्रभुता का परिचय हर जगह देता है। समाज के सभी सुधारात्मक एवं निर्माणात्मक कार्य इसी के बलबूते सम्पन्न होते हैं।
बड़े आदमी और दरिद्र दोनों ही एक प्रकार से निरर्थक गिने जाने योग्य हैं। बड़ों की तृष्णाएं इतनी बढ़ी-चढ़ी होती हैं कि उन्हें अपने गोरख धंधे के बाहर की कोई बात सोचने तक का अवसर नहीं मिलता। कर पाना तो बाद की बात है। संग्रह, विलास, प्रदर्शन, यही इतने भारी पड़ते हैं कि उनका भार वहन करने के उपरान्त और कुछ कर सकने की स्थिति में ही वे नहीं रहते। कुछ करना भी चाहें तो इर्द-गिर्द घिरी हुई चाण्डाल-चौकड़ी उन्हें अपने चंगुल से न निकलने देने में सावधान रहती है और किसी ऐसे काम में हाथ नहीं डालने देती जिसका अंतिम परिणाम उन्हीं का पत्ता काटने के रूप में सामने आए।
दरिद्रों का कहना ही क्या? वे पहले से इतना लम्बा चौड़ा और कुसंस्कारी परिवार जमा कर चुके होते हैं कि जिसके लिए उदरपूर्ति तक कठिन पड़ती है। अन्न, वस्त्र तक के साधन नहीं जुट पाते, शिक्षा, चिकित्सा आदि के प्रसंग आने पर लाले पड़े रहते हैं। अतिथि सत्कार और विवाह शादियों के खर्च और भी रही बची कमर तोड़ डालते हैं। वे अपने लिए ही जिस-तिस की सहायता चाहते रहते हैं। फिर आदर्शों के परिपालन में सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण में वे किस प्रकार क्या कर पाएं?
निश्चय ही दोनों ही वर्ग, समाज के लिए समान रूप से निरर्थक और भारभूत हैं बहुत ऊंचे भी बहुत नीचे भी। काम का समुदाय मध्यम वर्ग होता है। उसे ही थोड़ा अवकाश भी रहता है, थोड़े साधन भी बचते हैं। दीन दुनिया की ओर ध्यान दे सकना उसी के लिए संभव भी होता है। यहाँ इस मध्यम वर्ग में से उनकी चर्चा की जा रही है जिसे विचारशील, भावनाशील, लोकहित के प्रयोजनों में रुचि लेने वाला कहा जा सके। जाति-वंश से कोई मतलब नहीं सभी ऐसे नहीं होते किन्तु इतिहास का लम्बा अध्ययन करने के उपरान्त इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि देश, धर्म, समाज संस्कृति की सेवा साधना में मध्यवर्ती समुदाय के लोग ही काम आए हैं। उनमें भी प्रौढ़ स्थिति को प्राप्त व्यक्ति लड़के नई जवानी में अस्थिर रहते हैं, उनमें जोश तो होता है पर होश नहीं। अनुभव की कमी से वे महत्वपूर्ण परिवर्तन जैसे कार्यों को उतना नहीं कर पाते जितना अभीष्ट होता है। यही बात बुजुर्गों के सम्बन्ध में भी है। ढलती वायु में शारीरिक-मानसिक क्षमताएं चुकने लगती हैं। तब दूसरों का सहारा तकना पड़ता है। फिर गृहस्थी के कितने ही काम लिपटे-चिपटे होते हैं। आदतों के अभ्यस्त ढर्रे को बदलना उनके लिए भी कठिन पड़ता है। मध्यवर्ती स्थिति के मध्य वायु के व्यक्ति ही प्रायः ऐसे आदर्शवादी कार्यों में कुछ शौर्य पराक्रम दिखा पाते हैं, जिनकी कि इन पंक्तियों में चर्चा हो रही है।
हमारा विश्वास है कि यह शक्ति समुदाय समूचे संसार में फैला पड़ा है। धर्म, सम्प्रदायों, भाषाओं, देशों के विभाजन ने मनुष्य को एक दूसरे से बहुत हद तक अलग अवश्य कर दिया है तो भी हम देखते हैं कि समझदारी का माद्दा अभी भी इस समुदाय में अधिक है और वह इस आड़े समय में कुछ कहने लायक भूमिका निभा सकता है।
प्रज्ञा परिवार में कोई बीस लाख के लगभग सदस्य हैं, जिनमें से अधिकाँश भारतवर्ष में हैं और हिन्दू धर्मानुयायी हैं। किन्तु यह मध्यवर्ग तो समस्त विश्व में फैला हुआ है, जिसके साथ अभी हम प्रत्यक्ष संपर्क नहीं साध सके। न अपना साहित्य उन तक पहुँचा है और न उन्हें इस विचारधारा से अवगत होने का अवसर मिला है। सीमित साधनों में यह संभव भी नहीं था। अब अभीष्ट साधनों की उपलब्धि होने से इस समुदाय के साथ हम सघन संपर्क बना सकेंगे। आवश्यक नहीं कि इसके लिए प्रज्ञा अभियान का, गायत्री परिवार का नाम वे जाने पर वे निश्चित रूप से यह अनुभव करेंगे कि कहीं से- किन्हीं के माध्यम से- ऐसी विचारधारा बहती हुई आती है जो उन्हें अनायास ही अपनी लपेट में लेती है। कुछ कहती है और कुछ करने के लिए मजबूर करती है।
इस वर्ग के पास अपने निज के साधन नहीं होते तो भी वे निज की प्रतिभा द्वारा साधन संपन्नों को प्रभावित कर लेते हैं और उन्हें सहयोग देने के लिए उत्साहित उत्तेजित करते हैं। साधन सम्पन्न एक तरह के छकड़े के समान हैं कि उनके नीचे मजबूत बैल जोत दिए जाएं तो ही उन्हें इधर से उधर से जा सकते हैं अन्यथा जहाँ के तहाँ जड़भरत बने बैठे रहते हैं।
अगले दिनों सामाजिक क्रान्तियों में कई बड़ी क्रान्तियाँ सम्पन्न होनी हैं। नर और नारी का भेद-भाव मिटना है। श्रृंगार-सज्जा ने कामुकता बढ़ाई है और नारी का अवमूल्यन हुआ है। अगले दिनों नर-नारी भाई-भाई की तरह और बहन-बहन की तरह रहना सीखेंगे। सहयोग के हजार क्षेत्र खुले पड़े हैं उनमें वे एक दूसरे की भरपूर सहायता करेंगे। यौन कार्य अत्यंत जिम्मेदारियों से लदा हुआ माना जाएगा, उसमें हाथ डालने से पहले दोनों पक्षों को सौ बार विचार करना पड़ेगा कि आखिर हम क्या करने जा रहे हैं और इसका परिणाम हम दोनों को दो परिवार वालों को- सारे समाज को कितने दिन तक कितनी कष्टसाध्य प्रक्रिया के साथ भुगतना पड़ेगा। कामुकता का वर्तमान माहौल गैर जिम्मेदारी की चरम सीमा है। इस संदर्भ में नए विचार नए प्रचलन करने में क्या-क्या करना पड़ेगा, किन-किन कठिनाइयों में किस-किस प्रकार निपटना पड़ेगा, यह एक बड़ी बात है। मध्य वर्ग ही इस संदर्भ की अनेक योजनाएं हाथ में लेकर उसे कार्यान्वित कर सकेगा।
शिक्षा की दूसरी समस्या है। न केवल भारत में वरन् समस्त संसार में तीन-चौथाई लोग अनपढ़ हैं। इनमें अधिकाँश प्रौढ़ हैं। इन्हें पढ़ाने के लिए सरकारी स्कूल-कॉलेज काम नहीं देंगे। जनसेवा का माध्यम लेकर इसके लिए तंत्र खड़ा करना पड़ेगा। शिक्षा के विषयों का निर्धारण बिल्कुल नई बात होगी। आज जो पढ़ाया जाता है वह प्रायः वही है जो लार्ड मैकाले “काले बाबू” ढालने के लिए पढ़ाना चाहते थे। समर्थ नागरिक को क्या जानना चाहिए अभी तो ऐसा पाठ्यक्रम तक निर्धारित नहीं हुआ है, फिर उसे पढ़ाने वाले तंत्र का ढाँचा खड़ा करना तो और भी आगे की बात है। अगले दिनों जनशिक्षा का विशालकाय ढांचा खड़ा होगा और उसे सहकारिता के बल-बूते मिलजुल कर ही पूरा किया जाएगा।
कुटीर उद्योग तीसरा तंत्र है। बेरोजगारी मिटाने के लिए देहात कस्बों में छोटी-छोटी मशीनों के सहारे चलने वाले कुटीर उद्योग ही काम देंगे। सहकारी समितियाँ उनके उत्पादन और विकास का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाएंगी। यह कार्य सरकारी अफसरों द्वारा हो सकने वाला नहीं है। भले ही पंचायत समितियाँ उन्हें पूरा करें- सहकारी समितियाँ अथवा कर्मठ कार्यकर्ताओं द्वारा गठित हुए सेवा संगठन। यह कार्य नई पीढ़ी को ही करने होंगे। नई से मतलब है मध्यवर्ती मनःस्थिति का जन सेवी समुदाय।
अपने देश में ही नहीं सारे संसार में सामूहिक श्रमदान से किए जाने योग्य कितने ही काम हैं। मनुष्यों और पशुओं के मल-मूत्र को खाद रूप में बदलना। घर आँगन और छत पर शाक-वाटिका उगाना। वृक्षारोपण के लिए सार्वजनिक उत्साह उभारना, यह ऐसे काम हैं जिसके लिए देवता स्वर्ग से उतर कर नहीं आवेंगे और न अफसरों के इशारों पर वे बन पड़ेंगे। इसके लिए अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर पीछे अनेकों को अनुकरण प्रेरणा देनी होगी।
बुराइयों में कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें एक दिन भी सहन नहीं किया जाना चाहिए। नशेबाजी इनमें प्रमुख है। स्वास्थ्य, पैसा, इज्जत और अक्ल यह चारों ही वस्तुएँ इस कारण बर्बाद होती हैं। पीढ़ियाँ खराब होती हैं और रुग्णता बढ़ती है। नशा न कोई उगाए न कोई पिए इसके लिए प्रायः गाँधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन जैसा ही रोकथाम कर सकने वाला मोर्चा खड़ा करना होगा।
विवाह-शादियों में होने वाला अपव्यय-दहेज अपने देश में एक बुरी किस्म का अभिशाप है। उसी से मिलती-जुलती मृतक-भोज जैसी अन्य कुरीतियाँ प्रचलित हैं। इन सबको एक बार में ही एक साथ उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है। भिक्षा-व्यवसाय भी एक ऐसी ही लानत है जिसके कारण समर्थ व्यक्ति भी स्वाभिमान खोकर वेश्या वेष की आड़ में भिखारियों की पंक्ति में जा बैठता है। तलाश करने पर हर क्षेत्र में अपने अपने ढंग की चित्र-विचित्र कुरीतियों का प्रचलन है। आलस्य और प्रमाद ऐसा दुर्गुण है जिसके कारण अच्छे-खासे प्रगतिशील मनुष्य भी अपंग असमर्थों की स्थिति में जा पहुँचते हैं और दरिद्रता का पिछड़ेपन का अभिशाप भुगतते हैं। इन मुद्दतों से जन-जीवन में घुसी हुई बुराइयों की जड़ उखाड़ फेंकना एक व्यक्ति का काम नहीं है। इसके लिए मोर्चा बंदी करनी होगी और देखना होगा कि इस कुचक्र में फँसे हुए जन-जीवन को किस तरह मुक्त कराया जाए।
सृजन से संबंधित हजारों काम हैं और उससे भी अधिक उन्मूलन स्तर के। इन्हें कर सकना मात्र जीभ चलाने या विरोध व्यक्त करने भर से नहीं हो सकता। कितने लोगों द्वारा व्यवहार में लाए जाने पर यह कुरीतियाँ प्रथा बन चुकी हैं। इन्हें स्थानांतरित करने के लिए उससे कम नहीं वरन् अधिक ही पुरुषार्थ की अपेक्षा होगी।
अपने भारत की तरह ही हर देश की हर क्षेत्र की अपने-अपने ढंग की अनगिनत समस्याएँ हैं। उनके समाधान में आगे आगे कदम बढ़ा सकने वाले शूरवीरों की पग-पग पर आवश्यकता पड़ेगी। यह कहाँ से आएँ? आज तो उनका अभाव दीखता है। रात्रि के सन्नाटे को चीरती हुई प्रातःकाल में जिस प्रकार चिड़ियों की चहचहाट सुनाई पड़ती है वैसा ही कुछ अगले दिनों सर्वत्र माहौल बनेगा। जन-जन को इसका पाठ कौन पढ़ायेगा? हर किसी को स्वार्थ में कटौती करके परमार्थ में हाथ डालने के लिए कौन विवश करेगा? इसका उत्तर आज तो नहीं दिया जा सकता। किन्तु कल-परसों ऐसा समय अवश्य ही आवेगा जिसमें सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रकृति उन्मूलन की आँधी-तूफान जैसी हवा चलेगी। आँधी चलती है तो तिनके, पत्ते और धूल कण तक आकाश चूमने लगते हैं। अगले ही दिनों ऐसी बासंती बयार चलेगी जिससे ठूंठ कोपलें फोड़ने लगें और कोपलों पर फूल आने लगें।
इस संसार को इतना विकास अनायास ही नहीं हो गया है। इनमें असंख्य लोगों ने- जिसमें समझदार भी बड़ी संख्या में रहे हैं, अपना अमूल्य सहयोग दिया है। अब बचाव की बारी है तो उसके लिए भी भाव-भरी जनशक्ति चाहिए। इसका उत्पादन समय-समय पर अनेकों रचनात्मक आँदोलन करते रहे हैं। अबकी बार फिर से परोक्ष जगत से कुछ ऐसी ही पावस आने वाली है जो सुखे धरातल को हरियाली से भर सके। प्यासी धरती को जलाशयों से लबालब कर सके।
हमने भविष्य की झाँकी देखी है एवं बड़े शानदार युग के रूप में देखी है। हमारी कल्पना है कि आने वाला युग प्रज्ञायुग होगा। ‘प्रज्ञा’ अर्थात् दूरदर्शी विवेकशीलता के पक्षधर व्यक्तियों का समुदाय। अभी जो परस्पर आपाधापी, लोभ-मोहवश संचय एवं परस्पर विलगाव की प्रवृत्ति नजर आती है, उसको आने वाले समय में अतीत की कड़वी स्मृति कहा जाता रहेगा। हर व्यक्ति स्वयं में एक आदर्श इकाई होगा एवं हर परिवार उससे मिलकर बना समाज का एक अवयव। सभी का चिन्तन उच्चस्तरीय होगा। कोई अपनी अकेले की ही न सोचकर सारे समूह के हित की बात को प्रधानता देगा।
प्रज्ञायुग में हर व्यक्ति अपने आपको समाज का एक छोटा-सा घटक किन्तु अविच्छिन्न अंग मानकर चलेगा। निजी लाभ-हानि का विचार न करके विश्व हित में अपना हित जुड़ा रहने की बात सोचेगा। सबकी महत्वाकाँक्षाएँ एवं गतिविधियाँ लोकहित पर केन्द्रित रहेंगी न कि संकीर्ण स्वार्थपरता पर। अहंता को परब्रह्म में समर्पित कर आध्यात्मिक जीवन-मुक्ति का लक्ष्य अगले दिनों इस प्रकार क्रियान्वित होगा कि किसी को अपनी चिन्ता में डूबे रहने की- अपनी ही इच्छा पूर्ति की- अपने परिवार जनों की प्रगति की न तो आवश्यकता अनुभव होगी, न चेष्टा चलेगी। एक कुटुम्ब के सब लोग जिस प्रकार मिल-बाँटकर खाते और एक स्तर का जीवन जीते हैं वही मान्यता व दिशाधारा अपनाये जाने का औचित्य समझा जायेगा।
ऋषि-मुनिगण परिवार बसाकर पर्ण कुटियों में रहते थे, लेकिन समाज से कटे हुए नहीं थे। उन दिनों लोभ-मोह के बन्धनों को काटने के प्रयास साधना-तप पुरुषार्थ द्वारा संपन्न होते थे एवं सुनियोजन सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन हेतु होता था। अब उसी कार्य को चिन्तन की उत्कृष्टता, जीवनक्रम के निर्धारण एवं वातावरण के दबाव से सम्पन्न कराया जाएगा। सभी वैसा ही जीवन जीकर सहकारी प्रयासों में निरत होंगे।
प्रज्ञा युग के नागरिक बड़े आदमी बनने की नहीं- महामानव बनने की महत्वाकांक्षा रखेंगे। सच्ची प्रगति इसी में समझी जायेगी कि गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ समुन्नत बनाया। कोई किसी के विलास वैभव की प्रतिस्पर्धा नहीं करेगा। वरन् होड़ इस बात की रहेगी कि किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ सज्जन एवं श्रद्धास्पद बनाया। वैभव इस बात में गिना जायेगा कि दूसरे को अनुकरण करने के लिए कितनी कृतियां और परंपरायें विनिर्मित कीं। आज के प्रचलन में सम्पदा को सफलता का चिन्ह माना जाता है। अगले दिनों यह मापदंड सर्वथा बदल जायेगा और यह जाना जायेगा कि किसने मानवी और गौरव गरिमा को किस प्रकार और कितना बढ़ाया।
शरीर यात्रा के निर्वाह साधनों के अतिरिक्त प्रज्ञा युग का मनुष्य दूसरी आवश्यकता अनुभव करेगा- सद्ज्ञान की। इसके लिए आजीविका उपार्जन एवं लौकिक जानकारियां देने वाली स्कूली शिक्षा पर्याप्त न मानी जायेगी। वरन् यह खोजा जायेगा कि दृष्टिकोण के परिष्कृत करने- सद्गुणों की परंपरा बढ़ाने एवं व्यक्तित्व के प्रखर प्रामाणिक बनाने की रीति-नीति सीखने अपनाने का अवसर कहां से किस प्रकार मिल सकता है। इस प्रयोजन के लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन की उच्चस्तरीय दिशाधारा कहां से मिल सकती है। इसे खोज पाने का प्रयास निरंतर जारी रखा जायेगा। यह कार्य ईश्वर उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।
संचित कुसंस्कारिता के शमन, समाधान, प्रतिरोध, निराकरण पर प्रज्ञा युग के विचारशील व्यक्ति पूरा-पूरा ध्यान देंगे। संयम बरतेंगे और संतुलित रहेंगे। शौर्य साहस का केन्द्र-बिन्दु यह बनेगा कि किसने अपने दृष्टिकोण, स्वभाव, रुझान एवं आचरण में कितनी उत्कृष्टता का समावेश किया। प्रतिभा, पराक्रम एवं वैभव को इस आधार पर सराहा जायेगा कि उस उपार्जन का जनकल्याण एवं सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में कितना उपयोग हो सका। विचारशील लोग इसी आधार पर आत्मा-निर्माण करेंगे और पुरुषार्थ का क्षेत्र चुनते समय निजी सुख सुविधाओं की पूर्ति का नहीं विश्व उद्यान को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने की महानता को महत्व देंगे। अमीरी को नहीं गरिमा को अपनाया सराहा जायेगा। संकीर्ण स्वार्थपरता में संलग्न व्यक्ति तब प्रतिभा के बल पर कहीं कोई श्रेय सम्मान प्राप्त नहीं करेंगे वरन् भर्त्सना के भाजन बनेंगे। श्रमशीलता को बेइज्जती या दुर्भाग्य का चिन्ह न समझा जाय वरन् प्रतिभा-विकास- उपलब्धियों का उपार्जन एवं प्रखरता का परिचायक माना जाय तो ही भौतिक विकास की सम्भावना सुनिश्चित हो सकती है। श्रम का असम्मान परोक्ष रूप से दरिद्रता एवं पिछड़ेपन का आह्वान है। निठल्लेपन के साथ एक दुःखद दुर्भाग्य और जुड़ा रहता है। “खाली दिमाग शैतान की दुकान” का युक्ति चरितार्थ करता है। जिनके पास काम नहीं होगा उनका दिमाग दुश्चिंतन में और शरीर दुर्व्यसनों में निरत होगा। ठाली लोगों में क्रमशः दुर्गुण बढ़ते हैं। समय काटने के लिए वे दोस्तों की तलाश में रहते हैं और जो भी उनके चंगुल में फँस जाता है उसे अपने जैसा बना लेते हैं। नई पीढ़ी की बर्बादी में इन दिनों दोस्तबाजी का एक प्रकार से भयानक दुर्व्यसन बन चला है। आवारा लोगों की चाण्डाल चौकड़ी ही इन दिनों मित्र मण्डली कहलाती है। यह समस्त अभिशाप खाली बैठने के हैं। इस तथ्य को जितनी गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके उतना ही उत्तम है।
प्रज्ञा युग में चिन्तन, आचरण एवं व्यवहार के सभी पक्षों में काया-कल्प जैसा हेर-फेर होगा। यही युग परिवर्तन है। इस परिवर्तन का आधार दूरदर्शी विवेकशीलता का कसौटी पर कसकर अपनाया गया औचित्य ही होगा। पिछले दिनों का क्या सोचा माना या किया जाता रहा है। इसे भावी रीति-नीति का आधार नहीं माना जायेगा वरन् तर्क, तथ्य, प्रमाण न्याय एवं लोकहित की हर कसौटी पर कसने के उपरान्त जो खरा पाया जायेगा उसी को अपनाया जायेगा। न किसी को भूत का आग्रह होगा और न कोई भविष्य की अवज्ञा करेगा। वर्तमान का निर्धारण करते समय आज की आवश्यकता और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को ही महत्व दिया जायेगा। यह निर्धारण पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाये हुए अन्तःकरण ही कर सकेंगे। अगले दिनों उन्हीं को युग ऋषि माना जायेगा और उन्हीं का निर्धारण लोक-मानस द्वारा श्रद्धापूर्वक अपनाया जायेगा।
महत्वाकाँक्षाओं का सही आधार है पवित्रता एवं प्रखरता की उच्चस्तरीय अभिवृद्धि। निजी जीवन में गुण कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अधिक उत्कृष्ट बनना और लोकोपयोगी कार्यों में अपनी क्षमताओं को नियोजित करके दूसरों के सामने अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करना किसी व्यक्ति की गौरव-गरिमा का मानदण्ड बनेगा। लोग सादा जीवन उच्च विचार की भावनाओं से प्रेरित होंगे। जीवन की गरिमा एवं सफलता इस बात में अनुभव करेंगे कि आदर्शवादी प्रगति में कितना साहस दिखाया तथा पराक्रम किया गया। अगले दिनों लोग अपनी चतुरता व सम्पदा तथा सफलता का उद्धत प्रदर्शन करने को छिछोरापन मानेंगे और उच्चस्तरीय प्रतिभा का विकास एवं सदुपयोग करने में सन्तोष तथा सम्मान अनुभव करेंगे।
युग परिवर्तन का मूलभूत आधार होगा प्रस्तुत लोक-मानस के अवाँछनीय प्रवाह को मोड़-मरोड़कर सही सीधी-सी दिशा में गतिशील किया जाना। इसमें से सर्वप्रथम उस व्यक्तिवादी लोभ लालच पर प्रहार होगा जो अनेकानेक स्तर की महत्वाकांक्षाएं- ललक लिप्साएं उत्पन्न करता है। दूसरों की तुलना में अधिक सुविधा साधन समेटने और बड़प्पन दिखाने वाले सरंजाम जुटाने में लिप्त रहना ऐसी दृष्टि है जो चिन्तन और चरित्र में बेतरह निकृष्टता भरती जाती है। वासना, तृष्णा, अहन्ता पर आधारित भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण उन्हीं से बन पड़ते हैं जिनके सोचने में संग्रह, उपभोग और प्रदर्शन की निकृष्टता अनावश्यक मात्रा में घुस पड़ी हैं। व्यक्तित्व के इस स्तर को सर्वत्र गर्हित ठहराया जायेगा और इस आधार पर आगे बढ़ने को पीछे हटने के लिए विवश किया जायेगा।
प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देगा। कोई ऐसा काम न करेगा जिससे मानवी गरिमा एवं समाज व्यवस्था को आँच आती हो। शिष्टाचार, सौजन्य, सहयोग, ईमानदारी, वचन का पालन, निश्छलता जैसी कसौटियों पर पारस्परिक व्यवहार खरा उतरना चाहिए। अनीति का न तो सहयोग किया जाय और न प्रत्यक्ष परोक्ष समर्थन। सामाजिक सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि मूढ़ मान्यताओं का, अवाँछनीय प्रचलनों का, हानिकारक कुरीतियों का, विरोध किया जाय। इस प्रकार छल, शोषण उत्पीड़न जैसे अनाचारों से भी असहयोग, प्रतिरोध एवं संघर्ष का रुख अपनाया जाय। अनीति आचरण एवं अनुपयुक्त प्रचलनों को समान रूप से अहितकर माना जायेगा और उन्हें अपनाना तो दूर कोई उनका समर्थन तक करने को सहमत न होगा।
प्रज्ञा युग में शारीरिक और मानसिक व्याधियों से सहज ही छुटकारा मिल जायेगा। क्योंकि लोग प्रकृति के अनुशासन में रहकर आहार-बिहार को संयम बरतेंगे और अन्य प्राणियों की तरह अन्तःप्रेरणा का अनुशासन मानेंगे, फलतः न दुर्बलता सताएगी न रुग्णता। असमय बुढ़ापा आने तथा अकाल मृत्यु से मरने का भी तब कोई कारण न रहेगा। मानसिक विक्षोभ, चिन्ता, भय, कृपणता, संकीर्णता, द्वेष, छल, कपट, लोभ, मोह, अहंकार जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न होते हैं। उन्हीं के कारण लोग तनाव, असन्तुलन, सनक, मतिभ्रम, आवेश उद्वेग उन्माद, अर्ध-विक्षिप्तता जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित रहकर अंतर्द्वंद्वों की प्रताड़ना सहन करते हैं, ऐसे ही लोग भूत-पलीतों की तरह विक्षुब्ध पाए जाते हैं।
प्रज्ञा युग में सभी संतोषी, नीतिवान, उदार एवं सरल सौम्य जीवन पद्धति अपनायेंगे, मिल-बाँटकर खायेंगे- हँसती-हँसाती जिन्दगी जियेंगे। फलतः उन्हें हर परिस्थिति में आनन्द उल्लास से भरा-पूरा पाया जायेगा। सभी के शरीर निरोग और मस्तिष्क शान्त सन्तुष्ट पाये जायेंगे।
मनुष्य की संरचना सामाजिक प्राणी के रूप में हुई है। उसे जो कुछ मिला है समाज के सहयोग एवं अनुदान द्वारा ही उपलब्ध हुआ है। अस्तु समाज को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने में भी उसका योगदान होना चाहिए। यह कार्य परिवार रूपी छोटे समाज से आरम्भ किया जाना चाहिए। आवश्यक नहीं कि अपने स्त्री बच्चों को ही परिवार माना जाय। जिस समुदाय में खाने, सोने एवं मिलजुल कर रहने का प्रसंग बनता है, वह परिवार ही है।
इस समुदाय को अपने अवयवों की तरह माना जाय और उसे समाज का एक छोटा रूप मानकर उद्यान के माली की तरह सेवारत रहा जाय। हिल−मिलकर रहने बाँट-बाँटकर खाने से हँसती-हँसाती जिन्दगी ही पारिवारिकता है। प्रज्ञा युग का हर मनुष्य शरीर निर्वाह की तरह पारिवारिकता में भी पूरा रस लेगा और प्रयत्नरत रहेगा।
धरती के उपार्जन शक्ति से कहीं अधिक इन दिनों जनसंख्या का भार बढ़ गया है। अब सन्तान भार बढ़ाने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं रही। पिता पर अर्थ संकट, माता पर रुग्णता और अकाल मृत्यु का आक्रमण, अभावग्रस्त बालकों का दयनीय भविष्य, प्रस्तुत परिवार का हक बँटाना- राष्ट्रीय प्रगति और विश्व व्यवस्था में भयानक गतिरोध जैसे अनेकों अभिशाप इन दिनों सन्तान बढ़ाने की मूर्खता के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं।
कभी प्रजनन को सौभाग्य कहा और प्रोत्साहन दिया जाता रहा होगा पर आज तो उसे विपत्ति को प्रत्यक्ष आमन्त्रण देना ही कहा जा सकता है। प्रज्ञायुग का हर विचारशील सन्तानोत्पादन से बचेगा और यदि वात्सल्य आनन्द लेने का मन होगा तो किसी को गोद लेने की अपेक्षा अनेकों असहाय बालकों को पालने और सुयोग्य बनाने का भार ग्रहण करेगा।
त्रिवेणी संगम की तरह सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की समग्र साधना व्यक्ति, परिवार और समाज की त्रिविधि संरचना से ही सम्भव होती है। तीनों के बीच सघन तालमेल रहने और परस्पर सहयोगी बने रहने से ही सुख, शान्ति और प्रगति की भूमिका बनती है। इस तथ्य से अवगत होने के कारण प्रज्ञा युग का मनुष्य आज की तरह संकीर्ण स्वार्थपरता में ही निरत न रहेगा। वरन् व्यक्तित्व को प्रखर प्रामाणिक एवं परिवार को सुसंस्कारी स्वावलम्बी बनाने के लिए गम्भीरतापूर्वक ध्यान देगा। और उसके लिए भावभरी तत्परता के साथ प्रयत्न करेगा। परिवार निर्माण के माध्यम से संचालक लोग संयमी दूरदर्शी एवं उदारमना बनते हैं साथ ही उस वातावरण में पलने वाले को नर-रत्न बनने का अवसर मिलेगा। व्यक्तित्व और परिवार को एक-दूसरे का अगले दिनों पूरक माना जायेगा और संयुक्त परिवार की वैज्ञानिक आचार संहिता विकसित होगी।
प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति परिवार बसाने से पहले हजार बार विचार करेगा कि क्या उसमें साथी की प्रगति तथा सुविधा के लिए समुचित साधन जुटाने की सामर्थ्य है। क्या उसमें नये बालकों को सुसंस्कारी, सम्भ्रान्त एवं स्वावलम्बी नागरिक बना सकने की योग्यता है। यदि है तो समय एवं धन की कितनी मात्रा साथी तथा नई पीढ़ी के लिए लगा सकने की स्थिति बन सकती है। इन सभी बातों का गम्भीरतापूर्वक पर्यवेक्षण करने के उपरान्त ही विवाह का साहस किया जाया करेगा और सन्तान उत्पन्न करने से पूर्व हजार बार विचार किया जाया करेगा कि इन नई जिम्मेदारी को वहन करने के लिए पत्नी का स्वास्थ्य, पति का उपार्जन, घर का वातावरण उपयुक्त स्तर का है या नहीं। जितनी निश्चित स्थिति होगी उससे अधिक बड़ा कदम बढ़ाने का कोई दुस्साहस न करेगा। समुचित परिपालन की क्षमता न रहने पर भी बच्चे उत्पन्न करना अपना, पत्नी का, बच्चों का तथा समूचे राष्ट्र का भविष्य अन्धकारमय बनाने वाला अभिशाप गिना जायेगा।
विवाह कामुकता की तृप्ति के लिए, रूप सौंदर्य से खेलने के लिए नहीं- वरन् साथी को स्नेह, सहयोग, सम्मान, देकर जीवन की अपूर्णता दूर करने, एवं मिल-जुलकर अधिक उच्चस्तरीय प्रगति करने की आदर्शवादिता से प्रेरित होकर ही किये जाया करेंगे।
एक दूसरे को निभाएंगे, सहिष्णु रहेंगे। मिल-जुलकर किसी निर्णय पर पहुँचेंगे। अधिकार या आग्रह न थोपेंगे। मतभेद सामान्य हो और उनके कारण कोई बड़ा विग्रह उत्पन्न न हो तो इतनी उदारता भी रहनी चाहिए कि भिन्न प्रकृति की भिन्नताओं को दरगुजर किया जाता रहे। इन दिनों स्त्रियों को दासी की तरह प्रयुक्त किया जाता है यह प्रथा उलटकर उन्हें समानाधिकार वाली सहयोगिनी का सम्मान भरा स्थान मिलेगा। शृंगार सज्जा को नारी की आन्तरिक हीनता तथा दुर्गति का चिन्ह मानकर उसे अनुपयुक्त ठहराया जायेगा।
प्रज्ञा युग में हर गृहस्थ को धरती के स्वर्ग की तरह स्नेह, सद्भाव, एवं उत्साह, उल्लास से भरा-पूरा पाया जायेगा। क्योंकि उसके सभी सदस्य श्रमशीलता, सुव्यवस्था मितव्ययिता, उदार- सहकारिता और सुसंस्कारी सज्जनता के पंचशीलों को सुख-शांति का आधारभूत कारण होने की बात पर सच्चे मन से विश्वास करेंगे। संयुक्त संस्था के रूप में भी सभी परिजन उसे समुन्नत बनाने में अपने-अपने हिस्से का अनुदान प्रस्तुत करने की बात सोचेंगे, न कि जिसके पल्ले जो पड़े उतना ले भागने का उचक्कापन बरतेंगे। सभी मिलकर परिवार में सुव्यवस्था एवं सद्भावना का ऐसा वातावरण बनायेंगे जिसके द्वारा वर्तमान से भी अधिक प्रसन्नता क अनुभव करें और उसमें रहते पलते हुए उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ स्पष्ट रूप में झाँकती अनुभव करें। ऐसे सुसंस्कृत परिवार ही नर-रत्नों की खदान बनते और उसके संचालकों को धन्य बनाते हैं।
परिवार के सदस्यों की शरीर यात्रा अर्थ व्यवस्था, सुख-सुविधा एवं प्रगति सुरक्षा का प्रबन्ध तो प्रज्ञा युग में भी चलेगा पर एक विशेषता अनिवार्य रूप से जुड़ी रहेगी कि अधिकार घटाने, और कर्त्तव्य पालन बढ़ाने की दृष्टि से हर सदस्य अपने-अपने ढंग से प्रयास करे और पिछड़ने में लज्जा अनुभव करें। परिवारों को सुसंस्कारिता प्रशिक्षण की पाठशाला बनाया जायेगा और उस कारखाने में ढल-ढलकर नर-रत्न निकला करेंगे। परिवार का सारा ढाँचा, कार्यक्रम एवं विधि-विधान इस प्रकार बनेगा कि उसके सभी सदस्यों को श्रम-शीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, सज्जनता, सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव में सम्मिलित करने का अवसर मिलता रहे। परिजन उदात्त दृष्टिकोण, सघन आत्मभाव, शालीन- सद्व्यवहार और सघन सहयोग देखकर ही परिवारों की सार्थकता और प्रगति का मूल्याँकन किया करेंगे।
अभिभावक न तो सन्तान से वंश चलने, पिण्डदान मिलने, सेवा सहायता पाने की अपेक्षा रखें और न सन्तान अपने अभिभावकों की छोड़ी सम्पदा के सहारे गुलछर्रे उड़ाने की बात सोचें। दोनों के बीच विशुद्ध स्नेह सद्भाव का रिश्ता हो और एक-दूसरे के प्रति कर्त्तव्य पालन करते हुए अपनी श्रद्धा शालीनता बढ़ाने का अभ्यास करेंगे। कन्या और पुत्र के बीच कहीं कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। दोनों को समान स्नेह सम्मान एवं महत्व मिलेगा। सन्तानों के विवाह की तब तक जल्दी न की जायेगी जब तक वे स्वावलम्बी और नये गृहस्थ के अनेकानेक उत्तरदायित्वों का भार उठाने में समर्थ न हो जायें। सन्तान में अमीरों की महत्वाकाँक्षा न भड़काई जाय। और न आलसी, विलासी, अहंकारी बनने जैसी सुविधा प्रदान की जाय। सुसंस्कारिता प्रदान करना ही सन्तान की सबसे बड़ी सेवा सहायता मानी जायगी।
कुछ अपवादों को छोड़कर हर काम नियत समय पर पूरा करना, वस्तुओं को यथास्थान सुरक्षित एवं सुसज्जित रखना, फैशन को छिछोरपन मानकर उससे बचना, दूर रहना, सादगी और स्वच्छता से सुरुचि का परिचय देना, बजट बनाकर आमदनी से कम खर्च करना ओर बचत की थोड़ी गुंजाइश रखना, एक-दूसरे का हाथ बँटाना सहानुभूति और सहयोग का रुख रखना, नम्रता और मिठास भरा व्यवहार करना, चरणस्पर्श और अभिवादन का परिपालन, शिष्टाचार, अनुशासन का निर्वाह स्वच्छता और सुसज्जा के लिए मिल-जुलकर प्रयास करना, टूट−फूट की मरम्मत एक उपयोगी कला-कौशल के रूप में सीखना और प्रयुक्त करना, घर में जहाँ भी स्थान हो पुष्प, बेलें एवं शाक भाजी उगाना जैसी प्रथा परम्परा घर में डालना जैसे प्रचलन अभ्यास में उतर सकें तो हर घर में स्वर्गीय वातावरण बन सकता है। रात्रि को कथा प्रवचन, प्रातः सायं पूजा आरती, सहगान कीर्तन जैसे धर्म-कृत्यों से भी परिवार को आस्थावान बनने को अवसर मिलता है।
एक नया गृह-उद्योग “लार्जर फैमिली” सुसंचालित परिवार- के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। आज के संयुक्त परिवार तो अनुशासनहीनता और आचार संहिता के अभाव में स्वार्थों की खींचतान के अखाड़े बन गये हैं। उत्तराधिकार की ललक तथा काम न करने में बड़प्पन समझा जाने के कारण एक प्रकार से अवैज्ञानिक एवं दुर्दशाग्रस्त हो गई है। जिस स्वरूप में संयुक्त परिवार इन दिनों चल रहे हैं वे अपनी प्रतिगामिता और अस्तव्यस्तता के कारण अधिक दिन न चल सकेंगे और संयुक्त परिवार पद्धति पाश्चात्य देशों की तरह समाप्त हो जाने का संकट बढ़ेगा, पर उसे वैज्ञानिक शास्त्रीय, व्यावहारिक एवं सुविधाजनक बनाने का दूसरा नया तरीका “लार्जर फैमिली” एक सहकारी संस्था के रूप में विकसित हो सकेगी। मोहल्ले के सभी काम मिल-जुलकर एक स्थान पर सम्पन्न हों। भोजन बनाना, कपड़े, धोना, बच्चे खिलाना, साझे की दुकान, ट्यूशन, स्कूल, मनोरंजन आदि दैनिक जीवन की सभी आवश्यकताएं अलग-अलग पूरी करते रहने के स्थान पर यदि संयुक्त रूप से पारस्परिक श्रम नियोजित करके पूरी की जाने लगे तो स्थान, समय, श्रम, पैसे की भी भारी बचत हो सकती है एवं अनेकों उपयोगी कार्य सम्पन्न होते रह सकते हैं। व्यक्तिगत सुविधा स्वतन्त्रता तो इसमें है ही, पारिवारिकता एवं सहकारिता का लाभ भी मिलता रहेगा। ऐसा प्रचलन चल पड़ने पर सारे समुदाय की शक्ति का अपव्यय बचेगा एवं उसे राष्ट्र के रचनात्मक कार्यों में लगाया जा सकेगा।
व्यक्ति परिवार और समाज की ऐसी आदर्श संरचना को मात्र कल्पना या यूरोपिया न माना जाय, एक द्रष्टा की ऐसी भविष्यवाणी मानी जाये जो आगामी कुछ दशकों में ही साकार होकर रहेगी। इसे कौन सम्पन्न करेगा? यह प्रश्न गौण है। हर वह व्यक्ति जिसमें उच्चस्तरीय भावनाएँ बीज रूप में विद्यमान हैं, परोक्ष जगत की सहायता से प्रज्ञायुग को अवतरित करने की भूमिका निभाने हेतु पुरुषार्थ करेगा। वे कषाय-कल्मष, लोभ-मोह के बन्धन जो उसे आज घेरे हैं, आने वाले कल में अपने पाश से मुक्त कर चुके होंगे। ऐसी पीढ़ी जन्म ले चुकी है एवं विकसित हो रही है। हमारी सूक्ष्मीकरण साधना उसे वैसा ही पोषण देने में नियोजित होगी जैसा अपेक्षित है।
अध्यात्म शास्त्र के प्रवक्ता समय-समय पर यही उद्बोधन देते रहे हैं- अपने को जानो, उसे पहचानो, ऊँचा उठाओ- ‘‘आत्मानं सिद्धि”, “आत्मावारे ज्ञातव्य”। इन संकेतों से तात्पर्य यही है कि मनुष्य को अपने काय-कलेवर के उस अविज्ञात पक्ष की बहुत ही कम जानकारी जिसके माध्यम से वह आत्मिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकता था। जब भी यह बोध होता है उसे सूक्ष्म की परतों का पता चलता है वह जीवनमुक्त स्थिति को प्राप्त हो जाता है। सिद्धार्थ का उदाहरण सामने है जो मनन साधना द्वारा बोध होते ही बुद्ध बन गए। लेकिन समझ में यह नहीं आता कि अपने बारे में ऐसा क्या है, जो मनुष्य नहीं जानता पूछने पर तुरन्त नाम, गोत्र, वंश व्यक्ति बता देता है। काया अलग है, व उसका प्राण आत्मा अलग, जो उसकी नियामक सत्ता है, यह भी अधिसंख्य व्यक्ति जानते हैं। इस प्रसंग का ऊहापोह करने के लिए लोग जाने कितने शास्त्र पढ़ते, पुराण-कथाओं का श्रवण करते देखे जाते हैं, लेकिन इससे क्या आत्मबोध हो पाता है?
वस्तुतः मनुष्य जन्म से ही अज्ञानी पैदा होता है। क्रमिक प्रगति के माध्यम से वह उतना ही सीख पाता है, जितना कि जिन्दगी की गाड़ी चलाने, परिवार का पेट भरने एवं समाज संपर्क में काम आता है। इस व्यावहारिक ज्ञान को वातावरण से अर्जित हुआ समझा जा सकता है, सुसंस्कारों, पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप कुछ व्यक्ति मात्र इतने तक ही सीमित नहीं रहते, इससे ऊँचा उठते व चेतना के क्षेत्र में ऊहापोह करते देखे जाते हैं। उपयुक्त मार्गदर्शन मिलने पर वे आत्म वैभव की सम्पदा सम्बन्धी अपने अज्ञान के अन्धकार को दूर कर ज्ञान की शलाका से नयी ज्योति जलाते हैं। ऐसे ही व्यक्ति नर-पशु की योनि से निकलकर, भव-बन्धनों से छूटकर ब्राह्मीचेतना के आनन्द का रसास्वादन करते हैं। जीवनमुक्त इन्हीं को कहा जाता है।
अपने आप के बारे में न जान सकने की यह विडम्बना बहुसंख्य व्यक्तियों के साथ घटती देखी जा सकती है। प्रत्यक्ष को ही सब कुछ मान बैठने वाले ये जड़मति जीव अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं होते। चार अंधों की वह कथा प्रख्यात है- जिसमें अपने दायरे की जानकारी को ही सब कुछ मानकर हरेक ने हाथी को अपने-अपने चिन्तन के अनुरूप वैसा ही मानो था। हर मनुष्य के अन्दर फेफड़ों का विस्तृत क्षेत्र होता है। गहरी साँस ले सकने के अभाव में वे उसके थोड़े से ही अंश से गुजारा कर तो लेते हैं लेकिन उथली साँस के परिणाम स्वरूप क्षय रोग, दमा आदि के शिकार भी होते देखे जाते हैं। मस्तिष्क की अपरिमित सामर्थ्य सम्पदा का मात्र तेरह प्रतिशत ही सामान्य से कुछ अधिक असामान्य स्तर वाले व्यक्ति सदुपयोग कर पाते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि शेष का अस्तित्व नहीं।
यहाँ प्रसंग मनुष्य की आत्म विस्मृति सम्बन्धी उस विडम्बना का चल रहा है जिसके चलते वह स्वयं की सूक्ष्म परतों से, उस वैभव साम्राज्य से अनभिज्ञ बना रहता है जो जगाये एवं विकसित किए जाने पर उसे असामान्य बना सकती है। यह इस कारण है कि स्थूल को महत्व देने वाले नजरिये को बदलने का कभी प्रयास ही नहीं किया गया। यही मानकर चला गया कि जो प्रत्यक्ष है, सो सामने है। जो नहीं दिखाई पड़ता, उसका अस्तित्व ही नहीं है। जब आत्म-चेतना निष्क्रिय पड़ी है।- उच्चस्तरीय सक्रियता में विकसित नहीं हो पा रही, आत्मसत्ता रूपी अन्धेरी कोठरी में विषाक्त तत्व पलते रहेंगे एवं व्यक्तित्व पतन पराभव के गर्त्त में गिरता चला जाएगा।
एनाटामी के छात्रों को शरीर की चीरफाड़ द्वारा अन्दर अवस्थित अंगों की जानकारी भर करायी जाती है। चेतना की एनाटामी भला वे कैसे समझ पाएँ। काया के अन्तराल में विराजी पंचकोशों, षट्चक्रों, उपत्यिकाओं की वैभव सम्पदा को ढूंढ़ पाने के अभाव में वे कैसे मानें कि अमुक स्थान पर अमुक का अस्तित्व है। जहाँ इनकी सीमा मर्यादा है, वहीं फिजियोलॉजी के जानकारी की भी अपनी एक परिधि है। रस स्राव जो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होते हैं, शारीरिक अवयवों का संचालन जिस प्रकार होता रहता है, उसे ही वे समग्र मान बैठते हैं। शरीर में बहती विद्युतधारा, जैव चुम्बकत्व इत्यादि को मापने वाले उपकरण भी एक स्थूल सीमा रेखा तक जानकारी दे पाते हैं। इससे परे उनके यन्त्र भी असफल हैं एवं जानकारी भी अपूर्ण है।
अध्यात्म वेत्ता स्वयं को काया के सीमा बन्धन में बँधा नहीं मानते। वे परोक्ष जगत के अस्तित्व को स्वीकारते हैं एवं व्यष्टि तथा समष्टि में संव्याप्त इस ब्राह्मीचेतना को ‘इकॉलाजी’ के रूप में- परम सत्ता के साम्राज्य के रूप में पहचानते हैं। वे आत्म सत्ता रूपी प्रयोगशाला में योग साधनाओं ध्यान धारणा आदि के माध्यम से खोजबीन कर अन्तः की परतों तथा प्रकृति के सूक्ष्म अन्तराल के मध्य आदान-प्रदान का मार्ग खोज निकालते हैं। शास्त्र निष्कर्षों और आप्त वचनों में इसी रहस्य रोमाँच का उद्घाटन किया गया है जो उतना ही सत्य है जितना कि प्रत्यक्ष दृश्यमान हमारा ब्रह्माण्ड व उसका सौर मण्डल।
स्थूल शरीर निर्वाह प्रयोजन में लगने के कारण जल्दी थकता है लेकिन सूक्ष्म शरीर भार रहित है। वह प्रकाश की गति से भी तीव्र वेग से क्वाण्य-तरंगों के समुच्चय सूक्ष्म जगत में परिभ्रमण करता रह सकता है एवं अनेकों ऐसे प्रयोजन सिद्ध करता है जो प्रत्यक्ष रूप में स्थूल शरीर से सम्भव नहीं हो पाते। यही कारण है कि सभी आयामों की परिधि से परे विभिन्न लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करती सूक्ष्म शरीरधारी जीवात्माएं ऐसे कई प्रयोजन पूरी करती दिखाई देती हैं जिनका कारण ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलता। बहुधा उसे संयोग अथवा देवी घटनाक्रम मानकर आत्म-सन्तोष कर लिया जाता है। आत्म सत्ता के सूक्ष्मीकरण की यह विधि स्वयं में अद्भुत है एवं ऋषि, देव मानव, महामानव स्तर के प्रज्ञावानों द्वारा कई बार जीवित रहते हुए भी ऐसे असम्भव पुरुषार्थ करते देखा जाता है। जीवनमुक्त स्थिति में सशरीर इस धरित्री पर रहने वाले इस महापुरुषों की कोई आयु मर्यादा नहीं होती, तथापि अपवाद रूप में कुछ देवपुरुष देह त्यागकर भी सूक्ष्म रूप में वही कार्य करते रहते हैं। जो मानवता के कल्याण हेतु वे जीवित स्थिति में करते थे।
यह चर्चा हमारे सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में प्रासंगिक होने के नाते की जा रही है। प्रत्यक्ष रूप में- इस स्थूल काया से जो कार्य हमसे हो सका, उसका मूल्याँकन अभी तो नहीं बाद में हो सकेगा। लेकिन सूक्ष्मीकृत रूप में क्या कुछ होने जा रहा हैं, क्या किया जाना है, इसकी चर्चा हमने प्रारम्भिक पृष्ठों पर की है। यह एक अकाट्य तथ्य है कि आत्मिकी के माध्यम से ही वे सारे प्रयोजन पूरे हो सकेंगे जिनका आज की युग सन्धि की विषम बेला में आस्था संकट के निरस्त्रीकरण हेतु आवश्यकता है। हमने अपने चौबीस वर्ष की उच्चस्तरीय गायत्री साधना एवं दैनन्दिन उपासना- आराधना के क्रम से जो प्रत्यक्ष भूमिका बनायी है, उसके कई अध्याय पूरे हो चुके। अब उपसंहार भर शेष है। यही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा जो वर्तमान को आमूल-चूक बदल डालेगा। आत्मसत्ता के सूक्ष्मीकृत रूप में प्रकटीकरण की क्या चमत्कारी परिणतियां हो सकती हैं इसे अगले दिनों स्पष्टतः देखा जा सकेगा।
प्रश्न उठ सकता है कि प्रत्यक्ष स्थिति में ही इतने असम्भव कार्यों को जब किया जा सका तो परोक्ष भूमिका में उतरने की आवश्यकता क्यों आ पड़ी। इसका एक ही उत्तर है कि समस्याओं की विषमता और विराट् रूप को देखते हुए उसे दैवी चेतना, सूक्ष्म शरीर में विद्यमान अनेकों देवात्माओं के माध्यम से सम्पन्न कराना चाहती है। जैसी व्यवस्था स्थूल रूप में समाज तन्त्र की है वैसी ही कुछ परोक्ष जगत की भी है जहाँ सतत् अदृश्य सहायक पितरगण सूक्ष्म रूपधारी आत्माएँ दिक्-काल के परे परिभ्रमण करती रहती हैं वे अपने क्रिया-कलापों से समष्टि जगत को प्रभावित करती हैं, भले ही दृश्य रूप में उन्हें न देखा जा सके। सूक्ष्मीकरण साधना के उपरान्त साधक उसी श्रेणी में आ जुड़ता है और पृथ्वी पर शरीर रूप में रहते हुए भी उनमें प्रत्यक्ष सम्बन्ध बनाये रखता है।
जीवित रहते हुए भी तन्त्र शास्त्र के वेत्ता अपनी ही एक अदृश्य अनुकृति गढ़ डालते हैं एवं वे उससे उसी प्रकार काम लेते हैं जैसे बच्चों की कहानियों में अलादीन के चिराग से जिन्न पैदा होकर अजूबे कर दिखाता है। सुकरात का डेमन भी सम्भवतः ऐसा ही रहा होगा। सूक्ष्म शरीर की जागृति वस्तुतः प्रत्यक्ष व परोक्ष जगत के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया सम्पन्न कर दिखाती है एवं आत्मसत्ता के उन रहस्यों पर से पर्दा हटाती है जिनकी जानकारी मनुष्य को नहीं है।
सूक्ष्म शरीर के जागरण हेतु साधक को योगाभ्यास में कई प्रकार की ध्यान धारणाओं का समावेश करना होता है। षट्चक्र, पंचकोश, तीन ग्रन्थियों, इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना रूपी नाड़ियाँ किस स्तर की हैं। व इस सारे अविज्ञात वैभव के जागृत होने पर साधक किस प्रकार अगणित विभूतियों का स्वामी बन जाता है, इसे विस्तार से कुण्डलिनी महाशक्ति एवं उसकी संसिद्धि विषय के अंतर्गत विस्तार से हम समझाते रहे हैं। अतीन्द्रिय सामर्थ्य जिनका आज सारे विश्व में खूब प्रचार किया जा रहा है, उस जागृति की प्रक्रिया की एक छोटी सी झाँकी भर है। इससे इतर, उच्चस्तरीय भी कई ऐसी श्रेणियाँ हैं जिनमें सिद्धियों की नहीं आत्मिक विभूतियों की प्रधानता होती है। मनश्चेतना का सुनियोजन कर ऐसे सिद्ध साधक कितने ही ऐसे कार्य कर डालते हैं जो प्रत्यक्ष रूप में शरीर द्वारा सम्भव नहीं जान पड़ते। यह सारी चमत्कृतियाँ सूक्ष्मीकरण- जन्य है।
कारण शरीर चेतना का वह सूक्ष्म आयाम है जहाँ देव स्तरीय आत्माएँ कार्यरत देखी जा सकती हैं। सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया की चरम स्थिति में जब मानव की व्यष्टि चेतना एवं समष्टिगत देव चेतना में समन्वय स्थापित होता है तब कारण शरीर का जागृति मानी जाती है। इस श्रेणी तक पहुंचे महापुरुष की अपनी कोई वैयक्तिक इच्छा नहीं रह जाती। अन्तःकरण की सूक्ष्म परतों से बना कारण शरीर आध्यात्मिक फिजियोलॉजी की दृष्टि से धरातल से उठी चेतना की समष्टि चेतना से तादात्म्य स्थापित कर लेने की प्रक्रिया का ही विशिष्ट नामकरण है। इसके जागने से देव शक्तियाँ भीतर से जागती व कार्यरत होती बतायी जाती हैं। जिन पंचदेवों को शरीर में उपस्थिति पाँच देवताओं का प्रतिनिधि बताया जाता है, वे पंचकोशों के रूप में इसी काया में विद्यमान है। वस्तुतः वे मानवी चेतना के पाँच स्तर हैं जिनमें अन्तिम स्थिति के आने तक उसका देवचेतना से मिलन होता बताया गया है। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष एवं आनन्दमय के नाम से संबोधित चेतना के इन पाँच आयामों को अपने नियन्त्रण में कर लेने वाला व्यक्ति देव पुरुषों की श्रेणी में जा बैठता है। पदार्थ विज्ञानी तो तीन आयामों से ही परिचित हैं। आइन्स्टीन ने दिक्-काल के रूप में चेतना के चतुर्थ आयाम की कल्पना की थी जिसमें प्रतिपदार्थ, प्रतिकणों का अस्तित्व माना गया है। इस चौथे आयाम से ऊपर भी कोई पांचवां आयाम है। जिसमें कोई चेतन सत्ता विद्यमान है अथवा भौतिकी की दृष्टि से जिसमें कुछ कणों को पहचाना पकड़ा जा सकता है, इसकी कोई जानकारी वैज्ञानिक जगत को नहीं। अध्यात्म वेत्ता बताते हैं कि यह अन्तिम आयाम ही चेतन सत्ता का अस्तित्व बताने वाला आयाम है, जहाँ सूक्ष्मीकृत व्यष्टि चेतना संव्याप्त देखा जा सकता है।
मानवी काया में परोक्ष जगत का सूक्ष्म ढाँचा विधाता ने बड़ी कुशलतापूर्वक पिरो रखा है। यह स्वतन्त्रता भी दे रखी है कि उस सूक्ष्म शरीर को जागृत जीवन्त बनाकर वह बहुमुखी कार्य भी सम्पन्न कर सके। सिद्ध पुरुष यही करते हैं एवं स्थूल से सूक्ष्म तथा सूक्ष्म से कारण शरीर की जागृति हेतु साधना पुरुषार्थ कर आप्त वचनों की प्रामाणिकता भी सिद्ध करते हैं। जो काम नीरोग, सुघड़, स्फूर्तिवान स्थूल काया कर सकती है, उससे अधिक अनुपात में विचारणा एवं भावना के आयामों द्वारा सूक्ष्म एवं कारण शरीर कर दिखाते हैं।
सूक्ष्मीकरण का साधना वस्तुतः आत्म जागृति की ही योग साधना है। इससे जहाँ व्यक्ति स्वयं में विभूतियों का स्वामी बनता है, वहाँ परोक्ष से आदान-प्रदान का- अन्यान्य व्यक्तियों, वातावरण एवं समस्त समुदाय को लाभान्वित करने का हित साधन भी सम्भव होता है। हमारी साधना उन्हीं उच्चस्तरीय उद्देश्यों के निमित्त चल रही है।
आत्मसत्ता जिस प्रकार चेतन शक्ति एवं पदार्थ सम्पदा के समन्वित रूप में बताई जाती रही है, समष्टिगत ब्रह्माण्डव्यापी सत्ता को भी जड़ प्रकृति एवं ब्राह्मी चेतना के समुच्चय के रूप में समझा जा सकता है। यह परोक्ष जगत वस्तुतः उस विराट् पुरुष की ही अनुकृति है जिसका दिग्दर्शन कभी राम ने कौशल्या एवं काकभुसुंडि को तथा कृष्ण ने यशोदा एवं अर्जुन को दिव्य चक्षु देते हुए कराया था। इस विशाल महासागर में अपरिमित पदार्थ एवं अनन्त चेतन सम्पदा समाई हुई है। सारा सृष्टि का व्यापार व्यष्टि और समष्टि की मिली भगत से ही चलता है। परमाणु के सूक्ष्मतम कणों एवं तरंग-क्वाण्टा समुच्चय से लेकर ब्रह्माण्ड के अनेकानेक सौर मण्डलों से बने प्रकृति जगत के विशाल कलेवर को सृष्टा का स्थूल शरीर कहा जा सकता है। यह भौतिकी की परिधि में आता है। विधाता का एक सूक्ष्म शरीर भी है जिसमें वे कार्य कारण, क्रिया-प्रतिक्रियाएँ घटते रहते हैं जिन्हें प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों के लिये उत्तरदायी माना जा सकता है। सृष्टि में समय-समय पर घटने वाले घटना प्रवाह, आकस्मिक न समझ में आने वाले परिवर्तन भूतकाल के क्रिया-कृत्य एवं आगत का स्वरूप इस सूक्ष्म शरीर में ही विद्यमान होता है। इसे सूक्ष्मदर्शी दृष्टा ही देख या समझ सकते हैं। प्रकृति का यह चेतन अविज्ञात पक्ष ऐसा है। जिसे मनुष्य अभी अपनी आत्मसत्ता की ही भाँति जान नहीं पाया है।
इस परोक्ष जगत में ही सूक्ष्मीकृत दिव्यात्माएँ प्रेत-पितर विषाणु इत्यादि निवास करते हैं। यह स्वयं में एक अनोखी दुनिया है। काया रूपी चोला त्यागने के बाद नया जन्म प्राप्त होने की स्थिति तक मनुष्य को इसी दुनिया में सूक्ष्म रूप में परिभ्रमण करना पड़ता है। लोक-लोकान्तरों, स्वर्ग-नरक आदि की चर्चा मरणोपराँत अनुभूतियाँ व पुनर्जन्म की घटनाएँ जो सुनने में आती हैं, वह इसी अदृश्य जगत का लीला सन्दोह है। इसे कौन देख पाता है, इस सम्बन्ध में महाभारत के अश्वमेध पर्व में एक उल्लेख आता है।
यथान्धकारे खद्योतं लीयमानं इतस्ततः। चक्षुष्मन्तः प्रपश्यन्ति तथा च ज्ञान चक्षुषः॥
पश्यन्त्येवंविधं सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषाः। च्यवन्ते जायमानं च योनि चानु प्रवेशितम्।
अर्थात् “जिस प्रकार आँख वाले व्यक्ति अन्धेरी रात में जुगनू को यत्रतत्र उड़ते-फिरते देखते हैं, उसी प्रकार दिव्य दृष्टि सम्पन्न सिद्ध पुरुष अपने दिव्य चक्षुओं द्वारा जीवों का शरीर त्यागना, उनका पुनः शरीर धारण करना तथा दूसरी योनि में प्रवेश करना यह सब भली-भाँति देख व जान सकते हैं।”
आत्मिकी की परिभाषा के अनुसार “दर्शन” शब्द का अर्थ स्थूल आंखों से देखना नहीं प्रत्युत सूक्ष्म नेत्रों से परोक्ष जगत का- घटने वाले, घटने जा रहे एवं भूत-कालीन घटनाक्रमों का अवलोकन अनुशीलन करना है। सम्भवतः यही कारण था कि काया रूपी प्रयोगशाला में अनुसन्धान करने वाले वैदिक ऋषिगण योग साधनाओं तप-तितीक्षा के सहारे परोक्ष जगत की सभी जानकारी रखते थे। अनुमान नहीं, अपितु दिव्य चक्षुओं द्वारा प्रत्यक्ष जानकारी रखते हुए वे बिना सृष्टि व्यवस्था में व्यतिक्रम डाले स्वयं भी उससे लाभान्वित होते थे एवं जन समुदाय को भी उसके चमत्कारी फलितार्थों से अवगत कराते थे। सूक्ष्मीकरण की साधना वस्तुतः इस परोक्ष जगत के दिग्दर्शन, उसमें परिभ्रमण एवं उसके माध्यम से विराट् समुदाय को लाभ पहुँचाने की ही उच्चस्तरीय प्रक्रिया है।
उपनिषद्कार का कथन है-
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्वं पूषन्नपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये॥
अर्थात् “उस स्वर्णमय मण्डल के पात्र से सत्य का मुख ढका है, हे जगत के पोषक! आप उसे दूर कीजिए जिससे कि सत्य-निष्ठ मैं आपका दर्शन कर सकूँ। क्योंकि -
“योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि”
-जो (विराट्) पुरुष तुम में है, वह मैं हूँ”
वेदान्त की यही मान्यता प्रत्यक्ष एवं परोक्ष के बीच घनिष्ठ एकात्मता स्थापित करती है। ऋषिगण इस तथ्य से अवगत थे कि जो स्थूल है, दृश्यमान है, वही सत्य नहीं है। अतः वे भावना से भर कर बस यही कहते हैं कि “हे विराट् पुरुष! मैं आजीवन वस्तुओं के बाह्य पहलुओं के सौंदर्य को देखता आया हूँ, अब साधना पुरुषार्थ द्वारा वस्तुओं की गहराई में अवस्थित उस चिरस्थायी अक्षर सौंदर्य का दर्शन करना चाहता हूँ जो आप की ही कृति है।” सत्य की खोज, विराट् का अनुसंधान, परोक्ष की शोध एवं अन्ततः उस सूक्ष्म दृष्टि की प्राप्ति उनका सदैव चरम लक्ष्य रहा है।
परोक्ष जगत की सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में जब चर्चा चली तो उसकी संरचना के बारे में ऊहापोह भी अपरिहार्य है। इन्द्रियाँ जैसा कि सभी जानते हैं, तन्त्रिका आवेग द्वारा परिचालित है। मानवी नेत्र अति सूक्ष्म तरंगों को देख पाने में कहाँ समर्थ है? मात्र गणितीय आधार पर उनका अनुमान भर लगाया जाता है। भौतिकी में प्रकाश की गति तीव्रतम मानी जाती रही है लेकिन उससे भी तेज गति के कण-प्रतिकणों की परिकल्पना की जाने लगी है। सापेक्षिकता के सिद्धान्त के बाद भी भौतिकी में बड़ी तेजी से परिवर्तन हुए हैं। “रिलेटीविटी रिविजिटेड” पुस्तक में विद्वान लेखक ने लिखा है कि मन या विचार की तरंगें इन सबसे तीव्रतर हैं। ये इन्द्रियातीत हैं। अतः इन्हें देखा जाना अथवा उनकी गति की नाप-तौल कर पाना मानवी बुद्धि द्वारा शक्य नहीं। स्नायु विज्ञानी कहते हैं कि स्पर्शेन्द्रियों द्वारा मस्तिष्क को प्रेषित आवेग छुए गए स्थान से दूर अवस्थित मस्तिष्क तक पहुँचने में मात्र 0.01 सेकेंड का समय लेता है। किन्तु यह गति तो एक जेट विमान से भी धीमी है। विचारणा की तरंगों में जो “मोटिव फोर्स” होता है। वह सूक्ष्मतर है, अति बलशाली है। भावना का बल एवं संवेग सबसे तीव्र है। इसे यो समझा जा सकता है कि ज्यों-ज्यों जीवात्मा का सूक्ष्मीकरण होता जाता है- उसकी चाल इन्द्रियों से, प्रकाश से तथा मन से भी तीव्रतर होती चली जाती है। ऐसी शुद्ध चित् रूपी आत्मा के लिये आद्यशंकराचार्य कह गए हैं- ‘‘तस्मिन मनसि ब्रह्मलोकादीन द्रुतं गच्छति सति, प्रथम प्राप्त इव आत्म चैतन्याभासो ग्रह्यते अतो मनसो जवीय इत्याह।”
अर्थात् “मन जब ब्रह्मलोक जैसे दूर अवस्थित लोकों की ओर तेजी से चलता है तो वह शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा को वहाँ पहले से ही उपस्थित पाता है, इसीलिये कहा गया है कि सूक्ष्मीकृत आत्मा मन से भी तीव्रतम है।”
सर जेम्स जीन्स ने इन्हीं आप्त वचनों को इस रूप में कहा है कि “जीवात्मा तरंग समुच्चय से भरे ब्रह्माण्ड समुद्र में निवास करती है और उसी में परमसत्ता का भी अस्तित्व होता है। दोनों के मध्य अति सूक्ष्म रूप में पारस्परिक आदान-प्रदान क्रम चलता रहता है।” वस्तुतः ब्रह्माण्डीय ऊर्जा अथवा ब्राह्मी चेतना जिसमें प्रकृति की सब शक्तियाँ समाहित हैं, आत्मा का ही अपने भीतर एक अति सूक्ष्म विलास मात्र है। इसे अपने ही ऊपर प्रयुक्त कर उसे विराट् बना पाना योगी स्तर के महामानवों के लिये कदापि असम्भव नहीं।
मनस की इस सामर्थ्य के विषय में उपनिषदों के चिन्तन में स्वर मिलाते हुए अनेकों दार्शनिकों-वैज्ञानिकों ने अपने-अपने मत व्यक्त किए हैं। सर जूलियन हक्सले कहते हैं कि “अपने पास एक मन होने के कारण ही मनुष्य इस जगत के भावी विकास के लिये उत्तरदायी माना जा सकता है। यह स्थिति अन्यान्य जीवों के साथ नहीं है। समष्टि में समाये इस व्यष्टि मन को सर्वव्यापी बनाकर ही वह अपने दायित्व को सही ढंग से निभा सकता है।”
जीवाश्म शास्त्री पियरे टेलहार्द-द-शारडिन कहते हैं कि कभी विज्ञान ने संसार को बहिरंग के अतिरिक्त अन्य किसी दृष्टि से देखने का प्रयास नहीं किया। प्रत्येक पदार्थ के कण-कण में “बाह्य” के साथ-साथ एक अन्तस् भी है। वेदान्त का ब्रह्म इसका समुचित उत्तर देता है। जिसमें प्रत्यक्ष के भीतर परोक्ष को जानने-समझाने का प्रयास किया गया है।”
पदार्थ विज्ञानियों की दृष्टि में परोक्ष की संरचना को समझने के उपरान्त उसके क्रिया कलापों के बारे में भी कुछ जान लेना अभीष्ट होगा। पूर्वार्त्त-दर्शन के अनुसार इस ब्रह्माण्ड में सात लोक हैं। नीचे से ऊपर क्रमानुसार स्थूल- भौतिक जगत, शक्ति प्रधान- काम जगत, मनस् जगत, बुद्धि, निर्वाण, अनुतदक एवं आदि जगत। इनका आप्त वचनों में उल्लेख मिलता है। प्रत्येक के सात उपलोक एवं इन उपलोकों के अपने सात-सात पुनर्विभाजन बताये गए हैं। आदि तथा अनुतदक लोग मात्र अतिमानवी शक्तियों की पहुँच में आते हैं, जबकि अन्य पाँच लोक अन्तरिक्ष का ही एक अंग होने के कारण मानवी पहुँच में है। दृष्ट ऋषियों द्वारा रचित साहित्य के अनुसार प्रत्येक लोक में विशेष प्रकार के प्राणी निवास करते हैं एवं उनकी शारीरिक संरचना अलग-अलग होती है। इन लोकों में दिवंगत आत्माएँ, सूक्ष्म रूप में अपना समय बिताती हैं एवं जहाँ तक सम्भव हो, प्रत्यक्ष जगत के जीवधारियों की सहायता करती एवं वातावरण का परिशोधन करती हैं।
पूर्वार्त्त-दर्शन के अनुसार जीवित या दिवंगत आत्माओं में से किसी को भी यह अनुभव नहीं होता कि पारस्परिक संपर्क कैसे साधा जाय? ऐसे प्रयत्न असफल होने पर कई प्रेतात्मायें सूक्ष्म शरीर में रहते हुए ही अनगढ़ क्रिया-कलापों में सतत् संलग्न रहती हैं। इनसे भयभीत न होकर इनसे संपर्क साधने हेतु तत्परता दिखाना, अधिक श्रेयस्कर है। मरणोत्तर जीवन सम्बन्धी भारतीय धर्म के कर्मकाण्ड इसी उद्देश्य हेतु कराये जाते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी सर्वथा सत्य है कि अध्यात्म विज्ञान इतना सामर्थ्यशाली है कि आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति दोनों लोकों के बीच सद्भाव एवं सहयोग का द्वार खोल सकते हैं, जीवित रहते हुए भी सूक्ष्म लोक में परिभ्रमण कर सहयोगी श्रेष्ठ आत्माओं से वे कार्य करा सकते हैं जो सर्व हितार्थाय अभीष्ट हैं। गुह्य विद्या के विशारदों का मत है कि हर व्यक्ति इतना सामर्थ्य सम्पन्न है कि वह सूक्ष्म जगत से आदान-प्रदान का क्रम आरम्भ कर सके। उनके अनुसार हर व्यक्ति में पाँच नहीं वरन् सात ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, परंतु दो अतिरिक्त इंद्रियां असामान्य योग पुरुषार्थ द्वारा ही विकसित हो पाती हैं।
विराट् ब्रह्म के साथ संपर्क जुड़ने पर सामान्य स्तर के मनुष्य भी असामान्य स्थिति में पहुँचते पाए जाते हैं। महापुरुषों का व्यावहारिक जीवन पवित्रता, प्रखरता, औदार्य के बल पर असाधारण होता है। लेकिन इनसे ऊँचे स्तर के ऋषि कल्प योगी अपनी अन्तःचेतना को परिष्कृत कर इस स्तर तक पहुँचा देते हैं कि परब्रह्म की शक्ति उनमें अवतरित हो सके एवं उसके प्रतिनिधि के रूप में सूक्ष्मीकृत भूमिका वे निभाते रह सकें। यह मानवी काया में रहते हुए ही सम्भव हो सकता है, शरीर छोड़ना इसके लिए अनिवार्य नहीं। इसी कारण मनस्वी, ब्रह्म तेज सम्मत तपस्वी भूसुर कहलाते हैं। उनकी यह उपलब्धि आत्मिकी के विज्ञान सम्मन विधान के आधार पर ही सम्भव हो पाती है। परोक्ष से संपर्क बिठाकर रहस्य रोमाँच का खेल रचाने वालों की नहीं, अपितु अपनी तप शक्ति से सूक्ष्म एवं सूक्ष्म से विराट् बनने वालों की आज जितनी आवश्यकता है, उतनी पहले कभी नहीं रही। अपनी साधना का प्रयोजन भी यही है।
उत्साहात्साहसाद् धैर्यत्तत्व ज्ञानाच्च निश्चयात्। जनसंगपरित्यागात्षउभिर्योग प्रसिद्धयति। -हठयोग प्रदी. 1।16
योग सिद्धि के लिये ये 6 बातें आवश्यक हैं- प्रचण्ड उत्साह, प्रखर साहस, अविचल धैर्य, तत्व-ज्ञान, निश्चय तथा भीड़भाड़ के प्रति आकर्षण का लोगों में आसक्ति का परित्याग।
चिरकाल से प्रचलित एवं बहुसंख्य व्यक्तियों से व्यवहृत मान्यताएँ मस्तिष्क के चारों ओर एक घेरा बना लेती हैं और एक सच्चाई की तरह प्रतीत होने लगती हैं। मनुष्य की विचार तरंगें पृथ्वी पर छाये आयन मण्डल की तरह की मस्तिष्क के चारों ओर एक आयडियोस्फियर बना लेती हैं जो अपना प्रभाव सतत् मानवीय चिन्तन पर डालता रहता है। वैज्ञानिकों का कथन है कि हर व्यक्ति अपना विचार मण्डल (आयडियोस्फियर) बनाने के लिये पूर्ण रूपेण स्वतन्त्र है। वह चाहे तो इसे विधेयात्मक रूप देकर मनःशक्तियों को विकासोन्मुख कर सकता है, साथ ही निषेधात्मक विचार प्रवाह उसे पतन के गर्त्त में भी ढकेल सकता है। लेकिन इसी आयडियोस्फियर से सम्बन्धित एक और प्रकरण ऐसा है जो दैनन्दिन जीवन क्रम में मानवी व्यवहार में देखने को मिलता है। वह है- कुकल्पनाओं से गढ़ा हुआ विचित्र जगत- जिसमें भूत-पलीत, डायन-चुड़ैल आदि बसते हैं।
वंश परम्पराओं से विभिन्न समाजों में देवी-देवता पूजे जाते रहते हैं। उनके वंशधर वैसा ही देखते-सुनते रहते हैं जो उन्हें उनके बड़े-बूढ़ों ने बताया है। उनकी कथा-गाथाएँ घरों में चला करती हैं। इन कथनोपकथनों से उनके अस्तित्व ओर क्रिया-कलाप की पुष्टि होती रहती है और फलतः छोटेपन से ही उन मान्यताओं को इतनी मजबूती से पकड़ लेती है कि वे लगभग सच्चाई जितनी गहराई तक मनःक्षेत्र में अपनी जड़ें जमा लेती हैं। मान्यताएँ जड़ें पकड़ लेने पर सच्चाई बन जाती हैं अथवा सच्चाई बहुत दिनों तक कार्यान्वित होते रहते पर लोक-मान्यता बन जाती है, यह कहना कठिन है। सन्देह इसलिये उठता है कि विभिन्न स्थानों पर कितनी ही मान्यताएँ एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते हुए भी सच्चाई समझी जाती है। विशेषतया यह बात देवी-देवताओं के सम्बन्ध में- भूत-प्रेतों के सम्बन्ध में विशेष रूप से लागू होती है। अवास्तविकता की ऐसी प्रतिक्रिया जो वास्तविकता से किसी भी प्रकार कम नहीं होती, आश्चर्यजनक है। साथ ही जिन क्षेत्रों में जो भूत-प्रेत माने या देवी देवता पूजे नहीं जाते रहे हैं, वहाँ उनके सम्बन्ध में चर्चा की जाय तो उन बातों की मजाक उड़ा दी जाती है और अविश्वास व्यक्त किया जाता है। इसके विपरीत जिन परिवारों में जो देवी देवता माने या पूजे जाते रहते हैं वहाँ उनके अस्तित्व के बारे में सन्देह उत्पन्न करने वाली बातें सर्वसाधारण द्वारा उपहास में उड़ा दी जाती हैं एवं आक्रामक प्रतिरोध भी किया जाता है।
ऐसी ही और भी कितनी ही मान्यताएँ हैं। उदाहरणार्थ जैन धर्म के अनुयायियों के सम्मुख देवताओं द्वारा बलि माँगे जाने और न देने पर रुष्ट होने की बात कदापि गले न उतरेगी इसके विपरीत आदिवासी- वनवासी लोग तनिक-तनिक सी बात की भूल में भूत का आक्रोश समझते ओर उसके निराकरण के लिए पशुबलि ही एकमात्र उपाय मानते हैं। दोनों ही अपने-अपने पक्ष में इतने कारण प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं कि अपने स्थान पर दोनों ही सही प्रतीत होते हैं। यदि ऐसा न होता तो अपनी क्षेत्र को सही सिद्ध करने के लिए वे इतना जोर ही क्यों देते और विपरीतगत प्रकट करने पर आक्रोश क्यों व्यक्त करते?
सत्य क्या है? अभी तक इसका सही विवेचन नहीं हो सका। अन्तःकरण जैसे-जैसे उदार और निर्मल होता जाता है, वैसे-वैसे सत्य की उदात्त परिभाषा होने लगती है। मान्यताओं का आवरण हट जाता है। किन्तु साथ ही यह बात भी सच है कि यदि अन्तरात्मा का स्तर गिरने लगे, दुष्टता का पक्षधर बनने लगे तो भी कुकर्म करते समय कोई ग्लानि न अनुभव होगी। वरन् वह कार्य हर दृष्टि से सही प्रतीत होने लगेगा। जिनका कार्य प्रतिदिन ढेरों जीवों की हिंसा करते रहना है, उन्हें अपना कार्य कुछ ही समय पश्चात् स्वाभाविक मनोरंजक ही नहीं, उपयोगी भी प्रतीत होने लगता है। वे तब अपने कार्य के पक्ष में ऐसी दलीलें भी देने लगते हैं जिससे तार्किक दृष्टि से अपनी बात का औचित्य भी ठहराया जा सके।
यहाँ चर्चा भूत-पलीतों के सम्बन्ध में हो रही है। जिक्र चल ही पड़ तो मनुष्य जैसे स्वभाव एवं आकृति प्रकृति के भूत-पलीतों को भी देवी-देवता कहा जा सकता है। बड़े रूप में देखा जाय तो अति सामर्थ्यवान प्रकृतिगत शक्तियों को भी देवता का रूप दिया जा सकता है- जैसे सूर्य, चन्द्र, पवन, अग्नि, वरुण आदि।
संसार में अनेकों प्रकार की अनेकों क्षेत्रों में अनेकानेक मान्यताएँ प्रचलित हैं और उन सभी के अभ्यस्त अनुयायी अपनी बात पर उतना ही जोर देते हैं, मानों पूर्ण सत्य ही जिम्मेदारी या ठेकेदारी उन्हीं के हिस्से में आई हो। यदि ऐसा न होता तो धर्म सम्प्रदायों के नाम पर अब तक जो लम्बे समय से भयानक रक्तपात होता रहा है, वह क्यों होता? इतनी गुँजाइश या सहनशीलता किसी भी धर्म में नहीं है जो यथार्थता का पता लगाने के लिए अपनी मान्यता का भी एक पक्ष मानने की उदारता बरत सके। हर धर्मावलम्बी अपने मन्तव्य को पूर्ण सत्य और अन्यान्य मतावलंबियों को भटके हुए मानकर पूर्वाग्रहों से भरकर विवाद क्षेत्र में उतरना चाहता है। यहाँ कठिनाई एक ही है कि पूर्वाग्रहों के आधार पर जमी हुई मान्यता इतनी प्रबल होती है कि अपने सिवाय अन्य किसी के तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण को वह गम्भीरता से लेना नहीं चाहती। फलतः शास्त्रार्थ का कभी कोई निर्णय नहीं निकलता, मात्र वितण्डावाद बनकर यह जाता है।
चर्चा का मूल विषय सूक्ष्मीकरण है। शरीर का अन्त हो जाने के उपरान्त आत्मा का अस्तित्व शरीर के रूप में रहता है या नहीं अथवा शरीर रहते हुए भी कई आत्माएँ अपने सूक्ष्म शरीर से असम्भव समझे जाने वाले प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप कर सकती हैं या नहीं, इसके लिये तर्क, तथ्य का कौन-सा आधार अपनाया जाय? मूल प्रसंग यही है। अपना पक्ष प्रस्तुत करने पर भी इन पंक्तियों के पाठकों ने कई मान्यताएँ दृढ़तापूर्वक अपना ली होंगी तो फिर वे उन्हीं पर हठधर्मी बने रहेंगे और सूक्ष्मीकरण प्रसंगों को उथली कल्पना भर मानते रहेंगे।
मान्यता का सत्य ही एक विशेष प्रकार का सत्य है, जो लगभग पूर्ण सत्य के समतुल्य ही जा पहुँचता है। हो सकता है। कि पुराना मत बदलने पर पूर्वाग्रहयुक्त सभी तर्क गलत भी प्रतीत होने लगें पर जब तक उन पर हठधर्मिता का आवरण है तब तक तो वे उनकी अपनी दृष्टि में पूर्ण सत्य ही प्रतीत होंगे। न केवल प्रतीत होंगे वरन् परिणाम भी वैसे ही प्रस्तुत करेंगे। यह श्रद्धा का क्षेत्र है। श्रद्धा जब सृजनात्मक एवं सघन होती है, तब वह जैसी है अपने साथ वातावरण, परिस्थितियाँ एवं घटनाएँ भी बदलकर रख देती हैं।
“शंका डायन मनसा भूत” की उक्ति पूरी तरह सत्य है। यदि मरघट की, समीपवर्ती झाड़ी की मान्यता भूत-चुड़ैलों से जुड़ी हुई हो तो उधर से निकलने पर हिलती हुई पत्तियाँ भी असली डायन की तरह खूँखार प्रतीत होंगी और उस व्यक्ति को भयाक्राँत कर देंगी। मन में भूत उत्पन्न होना भी उतना ही सत्य है। रात्रि के निविड़ अन्धकार में जग रहे व्यक्ति को पूर्व मान्यतानुसार दरवाजों या खिड़कियों का खड़खड़ाना भी भूत द्वारा की गयी गड़बड़ी का प्रमाण देता है। अब तक भूत-प्रेतों के चंगुल में फँसे सहस्रों व्यक्ति जीवन गँवा चुके हैं, तान्त्रिकों के चंगुल में फँसकर धन, स्वास्थ्य एवं मनोबल खो चुके हैं। उनके मिथ्या विश्वास ने ही उन्हें असली भूत की उपस्थिति की तरह डरा दिया पर वह डर उनका जान लेकर ही विदा हुआ।
भूत वस्तुतः होता है या नहीं, यह शोध का विषय है पर पिछड़े वर्गों में जो भूतोन्माद की बीमारी पाई जाती है उसके मूल में कुछ तो उनके मिथ्या विश्वास ही जड़ जमाए बैठे होते हैं, कुछ अवसर आ पड़ने पर आसपास के वातावरण के कारण भूत रूप में उन पर छा जाते हैं। वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं, मानो भूत उन पर सवारी गाँठकर कुछ कहलवा रहा हो या करा रहा हो। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति मिथ्या विश्वास पर अवलम्बित होते हुए भी रोगी को जीवन भर आतंकित किए रहती है। यह शोधकर्ताओं का विषय है कि वे देखें कि कोई भूत था भी या नहीं। केवल विश्वास और पूर्वाग्रह ही स्वसम्मोहित करके रोगी के लिए घातक स्थिति उत्पन्न करने न लगें।
प्रश्न यहाँ शोध का ही नहीं, इसका भी है कि ऐसी स्थिति में फँसे हुए रोगी के प्राण बचाने के लिए क्या किया जाय? उत्तर एक ही है- काँटे से काँटा निकाला जाय। भूत-प्रेत भगाने वाले कई तरह के उपचार करते हैं व जताते हैं कि भूत को पकड़कर घड़े में या बोतल में बन्द कर दिया गया और उसे कहीं जमीन में गाड़ या जला दिया गया। इससे रोगी को विश्वास हो जाता है कि भूत सचमुच ही नष्ट कर दिया गया एवं उसे राहत मिलती है। यदि रोगी समझदार है और उसे वस्तुस्थिति समझाई जा सकती है। तो उसे यह समझाया जा सकता है कि आत्म-विश्वास स्वसम्मोहन कितना जबरदस्त तथ्य है और किसी को भ्रमित कर काया व मस्तिष्क की यह क्या से क्या दुर्गति कर सकती है।
फ्राँस के एक राजा ने मृत्युदंड पाए रोगी को मनोवैज्ञानिक एवं विचित्र ढंग से फाँसी दी। उसकी आँखों पर पट्टी बाँध दी गई एवं एक पात्र से जल टपकाते हुए सुई चुभोकर कहा कि तुम्हारी एक नस काट दी गयी है। जल के गिरने की आवाज को उसने इतना स्वाभाविक समझा कि इतना भर कहे जाने पर कि तुम्हारा रक्त धीरे-धीरे निकल रहा है, वह भयाक्राँत होकर मौत को प्राप्त हो गया। एक व्यक्ति को एक जहरीले साँप ने काटा। जिसने देखा उसने कह दिया, जरा सी खरोंच भर आई है। बात टल गयी। बहुत दिनों बाद उसने भेद खोला कि उसे असली साँप ने काटा था। तुरन्त जहरीले साँप के काटे जाने की स्मृति उसे हो आई एवं भयभीत हो वह मर गया। जहर के चढ़ने का प्रश्न ही नहीं उठता था। मन्त्र-तन्त्रों में प्रायः प्रयोक्ता का आत्म विश्वास एवं दृढ़ मनोबल ही काम करता है। जिस पर मन्त्र चलाया जाता है उसका भी प्रयोक्ता पर विश्वास होना चाहिए तभी चमत्कारी परिणाम भी निकलने हैं।
भूत-प्रेत के प्रसंग प्रायः निर्मूल आशंका पर आधारित होते हैं। लेकिन कभी-कभी भूत-प्रेतों का वास्तविक अवतरण भी होता है। कभी-कभी कोई सहानुभूति रखने वाली आत्मा विशुद्ध सहायता की दृष्टि से किसी से संपर्क साधती है पर लोग भूत-प्रेत का नाम मात्र सुनकर इतने भयभीत हो जाते हैं कि हितैषी और हानिकारक तक का अन्तर नहीं समझ पाते। परोक्ष जगत के सम्बन्ध में संव्याप्त अज्ञान ही इस भूतोन्माद का कारण है। पिछड़े, अनगढ़, अनगढ़, सनकी लोगों की शारीरिक मानसिक अवस्था को सूक्ष्मधारी आत्माओं से अलग समझा जाना चाहिए व इस अज्ञान को मिटाया जाना चाहिए कि कोई देवी देवता या भूत-पलीत किसी के ऊपर आते हैं। मस्तिष्क पर छाया अज्ञान ही हिस्टीरिया के उन्माद रूप में निकलता है। किन्तु यदि उत्कृष्टता के मार्ग पर ले चलने वाली सहायक आत्माएँ परोक्ष जगत से आदान-प्रदान का क्रम स्थापित करना चाहेंगी तो सदैव श्रेष्ठ परामर्श के रूप में अविज्ञात सहयोग के रूप में वह प्रकट होगा, चाहे उसे अदृश्य होने के कारण देखा या समझा न जा सके एवं अविज्ञात या मात्र संयोग का नाम दे दिया जाय।
राहगीर को काशी जाना था। सो रास्ता चलने समय उसकी दृष्टि मील के पत्थर पर पड़ी, काशी की दूरी और दिशा का संकेत उस पर खुदा था।
राहगीर रुक कर वहीं बैठ गया। अंकन गलत नहीं हो सकता। प्रामाणिक लोगों ने लिखा है। काशी आ गई अब आने जाने की जरूरत क्या रही?
कोई समझदार उधर से निकला ओर पत्थर के पास आसन जमाकर बैठने का कारण जाना तो कहा- “पत्थर पर संकेत भर है- काशी पहुँचना है तो पैरों से चलकर दूरी पार करनी होगी।”
भोले व्यक्ति ने अपनी भूल मानी और बिस्तर समेट कर चल पड़ा। बात समझदारी की समझाया जाना कठिन है। वे शास्त्र को पढ़ते और सुनते रहते हैं और सोचते रहते हैं कि इतने भर से धर्म धारण का- आत्म-कल्याण का उद्देश्य पूरा हो जाएगा।
सृष्टा की नियति व्यवस्था ने न केवल जीवन का सृजन किया है, वरन् उसका निर्वाह ठीक प्रकार होता रहे, इस निमित्त अन्न, वनस्पति, जलवायु आदि का भी प्रचुर भाण्डागार मानव समुदाय हेतु उपलब्ध किया है। जिन साधनों के आधार पर हम जीवित हैं और अनेकानेक गतिविधियों का संचालन करते हैं, वे अपने पुरुषार्थ से नहीं उगाए गये वरन् दैवी अनुग्रह से पाए गए हैं। पुरुषार्थ अपने स्थान पर सराहनीय है किन्तु यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि जो उपलब्ध है उसमें परोक्ष से किसी अदृश्य सहायक का योगदान भी कम मात्रा में सम्मिलित नहीं है।
यह सामान्य जीवन व्यवस्था की बात हुई। इसके अतिरिक्त अनेकों बार ऐसी घटनाएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं जिन्हें अदृश्य सत्ता की विशिष्ट सहायता कहा जा सकता है। बहुधा ऐसे प्रसंगों को संयोग कहकर टाल दिया जाता है पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह मात्र संयोग नहीं है। प्रकृति व्यवस्था में ऐसे संयोगों के लिए गुंजाइश नहीं है जो साधारण नियमों का व्यतिक्रम करके किसी विशेष व्यक्ति को- विशेष अवसर पर- विशेष प्रकार की- सहायता पहुँचा सकें।
शास्त्रों में विभिन्न लोकों का वर्णन मिलना है जिनमें जीवनमुक्त आत्माएँ विचरण करती रहती हैं एवं शरीरधारी पृथ्वी वासियों की मदद हेतु सतत् तत्पर रहती हैं। इन लोकों को भौतिकी के “डायमेन्शन” के आधार पर नहीं समझा जा सकता क्योंकि सूक्ष्म होने के कारण इनकी स्थिति चतुर्थ आयाम से भी परे होती है। किन्तु साधना पुरुषार्थ से अर्जित दिव्य दृष्टि सम्पन्न शरीरधारी साधक स्वयं को सूक्ष्म रूप में बदलकर अथवा स्थूल स्थिति में इन आयामों के रहस्यमय संसार का दिग्दर्शन कर सकते हैं। इस संसार में अपने कर्मों के अनुरूप सूक्ष्म आत्माएँ फल पाती हैं एवं उसी आधार पर एक निश्चित अवधि तक उन्हें उसमें रहना पड़ता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
शास्त्रों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में घूमता हुआ जीव स्वर्ग-नरक, प्रेत-पिशाच, पितर, कृमि-कीटक पशु एवं मनुष्य योनि प्राप्त करता है। इस दौरान उसे जो-जो गतियाँ प्राप्त होती हैं, शास्त्रों में उन्हें दो भागों में बांटा गया है- कृष्ण या शुक्ल गति। इन्हें घूमयान तथा देवयान भी कहा गया है। छान्दोग्योपनिषद् में इन गतियों ओर जीवात्मा की विभिन्न स्थितियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। गीताकार ने भी कहा है-
त्रैविद्या माँ सोमपाः पूत पापा। यज्ञैरिष्टा स्वर्गति प्रार्थयन्ते॥
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्र लोकमश्नन्ति। दिव्यान दिवि देवभोगान॥
ते तं भुक्तवा स्वर्ग लोकं विशालं। क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति॥
अर्थात्- “वैदिक कर्मकाण्ड कर सकाम यज्ञों के द्वारा यज्ञ भगवान की पूजा द्वारा यज्ञ शेष के सोमपान से निष्पाप बनकर श्रेष्ठ व्यक्ति स्वर्ग प्रयाण करते हैं एवं वहाँ विभिन्न प्रकार के देव भोगों को भोगते हैं। उस विशाल स्वर्गलोक में अनेकानेक भोगों को भोगने के उपरान्त जब पुण्य कर्म समाप्त हो जाता है तो जीव पुनः इसी मृत्युलोक में आते हैं।” यहाँ यज्ञ से तात्पर्य प्राणाग्नि के स्फुरण एवं व्यक्तित्व के उदात्तीकरण से है। भजन प्रक्रिया के कर्मकाण्ड अनिवार्य तो हैं, पर प्रधान नहीं।
अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति पृथ्वी पर बैठे-बैठे ही समस्त लोकों व उनमें निवास कर रही सूक्ष्म आत्माओं से संपर्क साधने में समर्थ होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ सूक्ष्म सत्ताएँ अन्तरिक्षीय लोकों में ही नहीं प्रत्युत पृथ्वी पर भी निवास करती हैं। वे अपनी ओर से शरीर धारियों से संपर्क स्थापित करने का पूरा प्रयास करती हैं, परन्तु सूक्ष्म जगत से अनभिज्ञ मनुष्य समुदाय के भयभीत होने से वे संकोच करती हैं, जबकि दृष्टा साधक उनसे पूरा सहयोग लेते हुए स्वयं को नहीं अपितु जीवधारी समुदाय को परोक्ष के वैभव से लाभान्वित कराते हैं।
थियासाफी समुदाय का मरणोत्तर जीवन पर पूरा विश्वास है एवं उनके मतानुसार जीवात्मा का सतत् विकास होता रहता है। इस कार्य में सृष्टा की विधि−व्यवस्था में सहयोग देने हेतु महान सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है जिसका केन्द्र हिमालय के हृदय उत्तराखण्ड में हैं। यहाँ दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल शरीरधारी सामान्यतया नहीं पहुँच पाते किन्तु अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म जीवात्माएँ प्रवेश पाती रहती हैं। जब भी पृथ्वी पर कोई संकट आता है, श्रेष्ठ व्यक्तियों को सहयोग देने हेतु वे पृथ्वी पर आती हैं।
मुण्डकोपनिषद् में उल्लेख आता है-
“एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्च्चसः सूर्य्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वदन्ति, प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्च्चयन्त्यः एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः॥”
अर्थात्- “यज्ञ कर्म के फल से जो दिव्यलोक के अधिकारी होते हैं, ऐसे पुण्यात्मा पुरुष के मृत्युकाल में ज्योतिष्मति आहुतियाँ “आवो-आवो” कहकर पुकारती है तथा सूर्य किरणों की सहायता से दिव्यलोक में ले जाती है। वहाँ मधुर वचनों से उनकी अभ्यर्थना अर्चना करती हैं। ऐसे पुण्यात्माओं की दिव्य लोकों में गति होती है।”
इस प्रकार शास्त्र वचनों में परोक्ष जगत एवं वहाँ रहने वाली अदृश्य सूक्ष्म आत्माओं के अस्तित्व के समर्थन में तो प्रतिपादन मिलते ही हैं, पृथ्वी पर बसने वाली श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा उनसे संपर्क स्थापित कर आदान-प्रदान के क्रम का प्रसंग भी प्रकाश में आता है। वैज्ञानिकों के अनुसार सूक्ष्म शरीर धारियों में एक्टोप्लाज्म नामक एक सूक्ष्म द्रव्य विद्यमान होता है जो पदार्थ के चतुर्थ आयाम से ऊपर की स्थिति है। सम्भवतः जीवात्मा उसी का उपयोग कर भौतिक आकार ग्रहण करती हैं जैसा कि अनेकानेक उदाहरणों से सिद्ध होता है। इसे “परसोनीफिकेशन” नाम दिया गया है व परामनोवैज्ञानिक इस पर अनुसन्धान भी कर रहे हैं।
प्रसिद्ध भौतिकविद् मार्टिन गार्डनर ने लिखा है कि “इस संसार में नित्य हजारों व्यक्ति के साथ ऐसी छोटी बड़ी घटनाएँ नित्य घटती रहती हैं। इनमें से कुछ को संयोग मान भी लिया जाय तो भी कुछ ऐसी विलक्षण होती हैं कि उन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता।”
प्रत्यक्षवाद को ही प्रमुख मानने वाले अन्य वैज्ञानिकों के परिहास की उपेक्षा कर कतिपय परामनोवैज्ञानिकों एवं भौतिकविदों ने ऐसी घटनाओं का संकलन कर विश्लेषण किया व पाया कि कोई अदृश्य शक्ति जिसकी अभी तक खोज नहीं हो पायी है, ऐसे प्रसंगों का कारण बनती है जिन्हें परोक्ष अनुदान-सहायता के रूप में देखा जाता है लेकिन संयोग या अपवाद करार दिया जाना है।
ब्रिटेन के भौतिकशास्त्री एवं सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एड्रियन डॉब्स ने विभिन्न परीक्षणों के उपरान्त निष्कर्ष निकाला है कि “इस विश्व ब्रह्माण्ड में ऐसी सूक्ष्म सन्देशवाहक शक्ति धाराएं निरन्तर प्रवाहित होती रहती हैं जो मानवी ज्ञानेन्द्रियों से संपर्क स्थापित करती हैं। इन तरंगों की वेव-लेंग्थ लगभग एक समान होती है।” अपनी पुस्तक “द रूट्स आफ काइन्सीडेन्स” में डा. डॉब्स की इन खोजों पर टिप्पणी करते हुए आर्थर कोसलर ने लिखा है कि “इस माध्यम से ब्रह्माण्डव्यापी अदृश्य शक्तियाँ शरीरधारी मनुष्यों से संपर्क साधतीं, उन्हें पूर्वाभास करातीं एवं संकट के समय मनोबल बढ़ाने वाला उत्कृष्ट चिन्तन देती हैं। इन्हीं को अदृश्य सहायक की उपमा भी दी जा सकती है। सम्भवतः उच्चस्तरीय सहायक आत्माएँ सूक्ष्म जगत का प्रत्यक्ष जगत से संपर्क जोड़ने के लिए यही माध्यम अपनाती हों।”
ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जिनमें व्यक्तियों को ऐसे अप्रत्याशित लाभ मिले जो कि प्रयत्न करने पर सम्भवतः न मिल पाते। इन्हें दैवी अनुग्रह, भाग्य, पूर्व पुण्य अथवा वैज्ञानिकों की भाषा में संयोग कहा जाय पर वे हैं ऐसे जिनकी मानवी प्रयत्न पुरुषार्थ से कहीं कोई संगति नहीं बैठती। वैसी आशा-अपेक्षा भी नहीं रखी जाती पर जब विचित्र संयोग सामने आता है तब वह उलझन उठना स्वाभाविक है कि प्रयत्न की परिणति वाला सिद्धान्त यहाँ क्यों उलट गया?
वास्तव में अदृश्य जगत अपने आप में परिपूर्ण रहस्य रोमाँच से भरी एक दुनिया है। वह उतनी ही विलक्षण है जितनी कि हमारी निहारिका, सौर-मण्डल एवं ब्रह्माण्ड का यह पूरा दृश्य परिकर है। मनुष्य की स्वयं की अपनी दुनिया एवं समाज व्यवस्था है। उसी तरह जलचरों, सूक्ष्मजीवी, परजीवी, कृमि-कीटकों, वायरस, बैक्टीरिया आदि का भी अपना एक विलक्षण जगत है। उनकी भी अपनी रीति-नीति है एवं मनुष्य की दुनिया से सर्वथा भिन्न आवश्यकताएँ एवं कठिनाइयाँ हैं। जो दृश्यमान नहीं हैं, ऐसा अदृश्य लोक मरणोत्तर जीवनावधि में रह रहे जीवधारियों का भी है जिसके प्रमाण, उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं। पितर एवं अदृश्य सहायक यहीं रहते हुए निर्धारित समय व्यतीत करते हैं एवं समय आने पर समान गुणधर्मी आत्माओं से अपना संपर्क जोड़ कर स्नेह-सौजन्य- सहयोग का सिलसिला चलाते हैं। पितरगण अपने श्रेष्ठ जीवन काल की ही तरह मरणोत्तर स्थिति में भी किसी के काम आने- सहायता पहुँचाने अथवा हितकारी परिस्थितियां बनाने में योगदान करना चाहते हैं। आत्मिकी का यह अध्याय रहस्यपूर्ण तो है ही अपने आप में शोध का विषय भी है।
इस अदृश्य लोक की चर्चा के साथ-साथ यह भी बताना प्रासंगिक होगा कि कोई भी शरीरधारी साधना पराक्रम द्वारा मात्र अपनी इच्छा शक्ति के बल पर सूक्ष्म लोकों के एक छोर से दूसरे छोर तक परिभ्रमण कर इन आत्माओं से संपर्क स्थापित कर सकता है। सूक्ष्म शरीर को क्रियाशील बनाने पर सामान्य काया में कोई अन्तर नहीं दिखाई पड़ता। वेश-भूषा एवं जीवनचर्या यथावत् बनाये रखते हुए भी वे अपने सूक्ष्म शरीर से विभिन्न लोकों में आवागमन का क्रम बनाये रख सकते हैं। सूक्ष्मीकरण साधना के माध्यम से यही प्रयोजन पूरा किया जाता है। संतों, महामानवों, ऋषियों का अस्तित्व सदियों तक उनके इसी स्वरूप के कारण बना रहता है जो होता है विचार तरंगों से बने सूक्ष्म शरीर के रूप में। समय-समय पर जो विकट समस्याएँ मानवी पुरुषार्थ से सुलझती दिखाई देती हैं अथवा अदृश्य अनुदान पृथ्वी वासियों को मिलते हैं उनके मूल में सृष्टा की यही विधि-व्यवस्था काम करती है। अनास्था इसे संयोग कहती हैं पर आस्थावानों को दैवी सत्ता की अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञ होने एवं परोक्ष के प्रति अपना श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने का तथ्य भरा आधार उपलब्ध होता है।
एक सिद्ध पुरुष के पास पारस पत्थर था। एक वरिष्ठ शिष्य उसे हथियाने की फिराक में था। सो जिस-तिस प्रकार उसने गुरु को प्रसन्न करके उसे प्राप्त करने का रास्ता बना लिया।
पत्थर छिपाकर रखा गया था। जब देने का समय आया तो गुरु ने एक सील बन्द लोहे की पेटी उठा लाने का निर्देश किया। शिष्य उसे उठा लाया, पारस उसी में था। चाबी न मिलने पर ताला तोड़ने का प्रयास होने लगा।
शिष्य ने सन्देह व्यक्त करते हुए कहा- “यदि इसमें असली पारस रहा होता तो यह लोहे की पेटी कबकी सोने की हो गई होती?”
गुरु कुछ बोले नहीं। ताला तोड़ने पर पारस निकाला गया, वह कपड़े में लिपटा हुआ था। लोहे के साथ उसका संपर्क बन नहीं सका था दोनों के बीच का व्यवधान ही अभीष्ट परिणाम होने नहीं दे रहा था।
अध्यात्म प्रसंग की चर्चा में एक दिन गुरु ने उस बात का उल्लेख किया और कहा- ‘‘भक्त और भगवान के बीच, गुरु और शिष्य के बीच दुराव और स्वार्थ का व्यवधान ही आदान-प्रदान में प्रमुख बाधा बना रहता है।”
यजुर्वेद में “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” एक उक्ति आती है, जिसका अर्थ होता है- यज्ञ संसार के श्रेष्ठतम कार्यों में से एक है। शास्त्रकार बताते हैं कि जहाँ गायत्री ज्ञान मार्ग के माध्यम से व्यक्ति को अज्ञान की तमिस्रा से हटा कर उसे बन्धन मुक्ति की ओर ले जाती है, वहाँ यज्ञ देव पूजन के माध्यम से भाव योग की, संगतिकरण के माध्यम से ज्ञानयोग की एवं दान के माध्यम से कर्मयोग की एक समग्र साधना का प्रतीक है। यज्ञ को ही क्यों श्रेष्ठ माना गया, इसका कारण जाँचने पर पता चलता है कि इस पुनीत प्रक्रिया में कारण शक्ति का प्रयोग होता है। स्थूल दृश्यमान है, सूक्ष्म ऐसा अदृश्य जो उपकरणों के माध्यम से ही जाना जा सके एवं अन्तिम कारण वह जो बुद्धि के अतिरिक्त अन्य किसी माध्यम या उपकरण से परखा न जा सके। यज्ञ में यही होता है। कारण शक्ति को उभारा और प्रयुक्त किया जाता है। उसके बिना तो पदार्थ मात्र जड़ वस्तु है। इसीलिए यज्ञ को श्रेष्ठ तो कहा ही गया है, वरिष्ठ भी माना गया है। यज्ञ की प्रशंसा में ऐसे अनेकों संदर्भ मिलते हैं जो यज्ञाग्नि की वरिष्ठता का प्रतिपादन करते हैं।
मीमांसाकार ने कहा है कि यज्ञ के परिणाम स्वरूप एक ऐसा सूक्ष्म संस्कार उत्पन्न होता है, जो कभी विनष्ट नहीं होता। यदि यजन कर्ता ने समस्त व्रत-अनुबंधों को निभाया है तो उसका परिणाम देवत्व की प्राप्ति के रूप में मिलकर ही रहता है। मीमांसाकार इस सूक्ष्म संस्कार को अपूर्व या अदृष्ट नाम दिया है। यज्ञ क्रिया से समुत्पन्न यह अपूर्व रूप सूक्ष्म संस्कार व्यक्ति को समयानुसार महत्वपूर्ण लाभों की प्राप्ति कराता है। ब्राह्मणादि ग्रन्थों में यज्ञ का श्रेष्ठतम कर्म के रूप में इसी कारण उल्लेख हुआ है।
यज्ञ का कारण शक्ति को सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में कुछ उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। प्याज के छिलके के भीतर, केले के तने के भीतर एक के भीतर एक परत आती चली जाती है। वस्तुओं एवं प्राणियों के भीतर भी इस आधार पर परतें बनती हैं। मनुष्य के तीन शरीर हैं- स्थूल जो दिखाई पड़ता है, सूक्ष्म-अशरीरी- जिसके अस्तित्व के रूप में भूत-प्रेतों के अनेकों प्रमाण मिलते हैं। कारण देव शरीर है। यह तीनों एक से अधिक शक्तिशाली हैं किन्तु साथ ही सूक्ष्मतम भी।
पदार्थ के भी तीन शरीर होते हैं। तुलसी का मोटा स्थूल रूप मानवी जीवनचर्या में दैनन्दिन दिखाई पड़ता है। इस रूप में वह मक्खी, मच्छरों को भगाती, वातावरण संशोधित करती है। सूक्ष्म में वह और भी प्रखर होकर मनोरोगों को मिटाती है। चरणामृत-पंचामृत में मिल जाने पर वह मन में पवित्रता भर देती है, देव कर्मों के प्रयोजन में प्रयुक्त होती है। रासायनिक संरचना की दृष्टि से तुलसी व करंजवा मिलते जुलते हैं, पर सूक्ष्म एवं कारण स्थितियों में भिन्नता स्पष्ट मालूम होती है।
यज्ञ में चार आधार हैं और वे चारों ही सूक्ष्म बनाने पड़ते हैं। पहला ‘व्यक्ति’, दूसरा ‘अग्नि’, तीसरा ‘वाणी’, चौथा ‘चरु’। यदि ये चारों ही स्थूल रूप में प्रयुक्त किये जायें तो उनका यज्ञीय प्रयोजन पूरा न होगा और जो चमत्कारी परिणाम वर्णित किया गया है। वह हस्तगत न हो सकेगा।
यह प्रक्रिया में चार ऋत्विज् गण भाग लेते हैं- होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा। यह चारों किसी भी व्यक्ति का नामकरण करके नियुक्त नहीं कर दिये जाते। वरन् उन्हें अमुक समय तक अमुक स्तर का त्याग, तप करना पड़ता है। यदि तप साधना का उपक्रम न अपनाया गया हो तो वह प्रभाव उत्पन्न न हो सकेगा जो यज्ञ की सूक्ष्म एवं कारण शक्ति उभारने हेतु अभीष्ट है प्रथम होता ज्ञानकाण्डी ऋग्वेद अनुशासनों पर चलने वाला होता है। अध्वर्यु कर्मकाण्डी यजुर्वेदी एवं उद्गाता गायक सामवेदी होता है, साधारण गाने वाला नहीं वरन् भक्ति भाव का धनी समर्पित साधक। ब्रह्मा चतुर्वेदों का जानकार अथर्ववेदी जो सारी प्रक्रिया का नियमन करने वाला, प्रबन्ध निदेशक, व्यवस्था संयोजक है। यह वर्णन यहाँ व्यक्तित्व के सूक्ष्मीकृत उच्चस्तरीय स्वरूप को दर्शाने के लिए किया गया जो कि याजक गणों ऋत्विजों को हस्तगत करना पड़ता है।
यज्ञ जैसे श्रेष्ठतम कर्म के चारों ऋत्विज् गण साधक स्तर के होने पर ही उस प्रयोजन को पूरा कर पाते हैं। दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न होना था। उसके लिये जिस स्तर के अध्वर्यु की अपेक्षा थी, वह शृंगी ऋषि के माध्यम से पूरा हुआ। इसके पूर्व उसके सभी प्रयास असफल रहे थे। संयम-तपोबल के धनी ऋत्विज् के ऋषि द्वारा यह कार्य सम्पन्न होते ही अभीष्ट कार्य पूरा हो गया। यह व्यक्तित्व के सूक्ष्मीकृत कारण रूप की फलश्रुति है।
ऋत्विजों के बाद यज्ञाग्नि का प्रसंग आता है। यज्ञाग्नि पवित्र है, उसे अभिमन्त्रित किया जाता है। माचिस की तीली से अंगीठी जलाने अथवा हुक्का गुड़-गुड़ाने के लिये अग्नि सुलगाने से वह प्रयोजन पूरा नहीं होता, यों ही आहुतियाँ देना आरम्भ नहीं कर दी जातीं। अग्नि मन्त्र शक्ति द्वारा अभिमन्त्रित कर मन्थन के माध्यम से प्रकट की जाती है। अखण्ड दीप में जो अग्नि सतत् ज्वलनशील रहती है, वह यज्ञाग्नि का ही एक रूप है।
आहुति दी गयी सामग्री को अग्नि ऊपर ले जाती है एवं वायु उसे अंतरिक्ष में ले जाती है। भूमि पर होम होता है लेकिन यज्ञाग्नि की ऊर्ध्वीकरण की शक्ति उसे अंतरिक्ष में तथा फिर अग्नि के द्वितीय किन्तु अद्वितीय रूप विद्युत ऊर्जा के माध्यम से और भी ऊपर ले जाता है। आहुति दी गयी हवि, अग्नि और विद्युत से ऊँची उठती हुई स्थूल से सूक्ष्मतम होती हुई अपने दिव्य रूप को प्राप्त होती है। अपने इस सूक्ष्मीकृत रूप में यज्ञाग्नि न केवल मनुष्य, प्राणी जगत, वनस्पति जगत को प्रभावित करती है वरन् समग्र पर्यावरण एवं परोक्ष वातावरण का नियमन, संशोधन एवं अनुकूलन का प्रयोजन पूरा करती है। यज्ञ ऊर्जा मात्र अग्निहोत्र से उत्पन्न ताप नहीं, अपितु एक अति सूक्ष्म सामर्थ्य सम्पदा है जो व्यक्ति एवं समग्र वातावरण पर प्रभाव डालकर उन्हें शक्ति सम्पन्न बनाती है।
तीसरा पक्ष मन्त्र शक्ति अथवा वाणी का है। कोई भी संस्कृत पढ़ा व्यक्ति, संस्कृत भाषा में सही-सही उच्चारण कर सकता है। पर इससे क्या? इतने भर से तो प्रयोजन पूरा नहीं होता। जो कथा शुकदेव जी ने परीक्षित को सुनाई, वह कोई अन्य ऋषि से सम्भव नहीं हो पाती। जबकि उनके पिता मन्त्रों के दृष्टा माने जाते थे। कोई भी व्यक्ति अक्षरों का स्मरण कर, नाम जप द्वारा ऋषि या दृष्टा नहीं कहा जा सकता। इसलिये कुछेक अपवादों के अतिरिक्त पुरातन काल में हर ऋषि कुछ चुने हुए मन्त्रों के प्रवीण पारंगत एवं दृष्टा कहे जाते थे। इस सम्बन्ध में गायत्री मंत्र के ऋषि-दृष्टा विश्वमित्र का उल्लेख किया जा सकता है, जिनका नाम विनियोग प्रसंग में लिया जाता है।
ज्ञान एवं कर्म की अपनी सीमा है किन्तु भाव व उदात्तीकरण जब वाणी के माध्यम से मन्त्रों द्वारा होता है। तो वह मानवी काया के अन्तराल को ही नहीं, सारे वातावरण को झकझोर डालता है यज्ञ में वाणी का प्रयोग सूक्ष्म रूप में सामगान के रूप में होता है। भावप्रधान संगीत लहरी में गायी गयी ऋचाएँ सारे शरीर को स्पन्दित कर डालती हैं, साथ ही सारा वायुमण्डल आन्दोलित हो उठता है। सामवेद की इस प्राणदायिनी मधुर रस वर्षा को छान्दोग्योपनिषद् ने इस प्रकार कहा है- “वाचः ऋक् रसः, ऋचः साम रसः।”
यह देव संस्कृति का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पक्ष है कि वाक् शक्ति के विस्तृतीकरण हेतु यज्ञाग्नि का एम्पलीफायर के रूप में प्रयोग होता है। परिष्कृत वाणी जब विशिष्ट व्यक्ति के मुख से विशिष्ट प्रयोजन के लिये निकलती है तो मिसाइल का काम करती है। शब्द शक्ति का यह सूक्ष्मीकृत रूप आज अल्ट्रासोनिक तरंगों के रूप में विभिन्न रोगों के निदान एवं चिकित्सा कार्य में प्रयुक्त होता रहा है। किन्तु शाप-वरदान तथा परामर्श-सत्संग के रूप में यह चिरपुरातन काल से प्रयुक्त होता रहा है। ऐसे शब्दबेधी बाण तो आज के युग में देखे नहीं गए जो लक्ष्य बेधकर उसी स्थान पर वापस लौट आयें किन्तु इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में वैज्ञानिक आश्वस्त हैं कि शक्ति सम्पन्न विचार शब्द क्वाण्टा के समुद्र में प्रकाश की गति से दौड़ते हैं एवं लक्ष्य सिद्धि के बाद वापस लौट आते हैं। लेसर व मेसर के माध्यम से वैज्ञानिकों ने वाक् की इस सूक्ष्म शक्ति को ही सिद्ध किया है।
चौथा प्रकरण हविष्य एवं चरु का है। स्थूलतः यह पदार्थ परक होते हैं किन्तु यज्ञ प्रक्रिया में इनकी कारण शक्ति को उभारा जाता है। उपयुक्त याजक द्वारा ही हविष्य का संग्रह, पवित्रीकरण एवं संस्कारीकरण किया जाता है। यज्ञाग्नि में पकाये गये चरु में ही उन अंश का समावेश होता है जो आनुवाँशिकी से लेकर कर्म प्रारब्ध के सूक्ष्म संस्कारों पर प्रभाव डालते हैं। होम किया जाने वाला पदार्थ कितना पवित्र है, शुद्ध है, उसी पर उसकी कारण शक्ति का प्रकटीकरण निर्भर है। पदार्थ तो अपने स्थूल रूप में मात्र एक वनस्पति, खाद्यान्न मेवा अथवा दुग्ध रूप में है। लेकिन यज्ञाग्नि का स्पर्श उसे परिवर्धित कर डालता है। जिस प्रकार प्राणाग्नि का उद्दीपन कुण्डलिनी जागरण के रूप में तथा साधना द्वारा योगाग्नि का प्रकटीकरण ब्रह्मतेजस् के रूप में देखा जाता है। ठीक उसी प्रकार यज्ञ प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाली हर सामग्री की परिष्कृति चमत्कारी होती है। शरीर रोग एवं मनोविकारों के निवारण तथा जीवनी शक्ति सम्वर्धन में इनकी भूमिका को भली-भांति देखा जा सकता है। चरु जो कि मेवे, खाद्यान्न, दुग्ध, शर्करा का सम्मिश्रण होता है एवं यज्ञाग्नि में पकाया, संस्कारित किया जाता है विशेष रूप से महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि इसके प्रभाव न केवल जीवकोश वरन् डी.एन.ए., जीन्स जैसे सूक्ष्मतम घटक पर पड़ते हैं।
इस प्रकार ऋत्विज, यज्ञाग्नि, वाक् शक्ति एवं हविष्य चरु में चारों ही यजन प्रक्रिया के ऐसे प्रसंग हैं जिनमें सूक्ष्मीकरण का प्राधान्य है। वस्तुतः यज्ञ एक ज्वलन प्रक्रिया भाव नहीं है वरन् चारों तत्वों की कारण शक्ति को उभारने की एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। इतना न किया जाय तो यज्ञ प्रयोजन में अभीष्ट सफलता नहीं प्राप्त होती।
यहां यज्ञ के उदाहरण से हम ने यह समझाने का प्रयत्न किया है कि आत्मबल सम्वर्धन एवं शक्ति संचय हेतु सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया कैसे सम्पादित की जाती है एवं प्राणशक्ति का एकत्रीकरण, ऊर्ध्वगमन, बहुलीकरण कर कैसे व्यक्ति अपनी साधना तपश्चर्या से अनगिनत व्यक्तियों को लाभ पहुँचा सकता है। मन्त्र योगी को भी ऋत्विजों की तरह कुछ साधना अनुबन्धों का निर्वाह करना पड़ता है। उसे सीमित समय में सीमित विषय वार्ता का अभ्यास करना होता है। अभीष्ट प्रसंग के अतिरिक्त निरर्थक वार्ता न हो। जहाँ तक सम्भव हो, मौन-एकाकी तप साधना में ही निरत रहा जाय।
किसी की छाया सिद्धि करनी है तो अपनी निज की छायाओं में से जिनकी सिद्धि हस्तगत करनी है, उसी स्तर पर अभ्यास करना होता है। जिस प्रकार स्थूल शरीर को स्नान, शयन, भोजन, व्यायाम आदि करना होता है उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर को साधना उपचारों का पोषण देना होता है। उसे जिस प्रयोजन के लिये अभ्यस्त करना होता है, वैसी ही तप साधना में स्वयं को नियोजित करना होता है।
समाधिस्थ योगी को अपने स्थूल शरीर को गहरी निद्रा की स्थिति में ले जाना पड़ता है और उस स्तर का अभ्यास करना होता है जिसकी कि समाधि अभीष्ट है। षट्चक्र, पंचकोशों, तीनों ग्रन्थियों- इन सबको एक साथ साधा नहीं जा सकता। इनमें से सभी समय साध्य, जटिल एवं भिन्न-भिन्न उपक्रमों से की जाने वाली साधनाएँ हैं। जिन्हें प्राथमिकता देनी हो, सूक्ष्म शरीर उन्हें ही पहल देता है एवं क्रमिक व्यवस्थानुसार शेष को आगे के लिए छोड़ देता है। जिस प्रकार व्यवसाय अनेकों हैं, उसी प्रकार योग के प्रसंग एवं उद्देश्य भी अगणित हैं। साधक को शास्त्र निर्देशानुसार विभिन्न अभ्यासों की प्रयोजन विशेषतानुसार कम व्यवस्था निर्धारित करनी होती है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण चरण साधना का सूक्ष्मीकरण है। जिनमें प्रत्यक्ष क्रियाकलापों पर रोकथाम कर व्यक्तित्व वाणी, प्राणाग्नि एवं आहार आदि के कारण रूप को उभारना-सुनियोजित करना होता है। यज्ञ प्रक्रिया से साधना के सूक्ष्मीकृत रूप का कितना साम्य है, इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।
शक्तियों से सबसे बड़ी शक्ति आत्मबल है। प्रकृति बल सभी अस्थायी है। फिर उनका तनिक भी दुसंग बन पड़ने पर अपने तथा दूसरों के लिए विपत्ति खड़ी होती है। धन, यौवन, सौंदर्य, पद, ज्ञान आदि सभी के सम्बन्ध में यही बात कही जा सकती है। इनके बदले तत्काल सुविधा साधन खरीदे जा सकते हैं। इसलिए वे भी बहुत भाते हैं। सभी उन्हें कमाने, पाने के लिए आतुर रहते हैं। किन्तु साथ ही यह भी निश्चित है कि प्राप्त करने वालों में से सदुपयोग की विधा से अपरिचित रहने के कारण उल्टा अनर्थ मोल लेते हैं। दुर्व्यसनी, कुकर्मी, दुर्गुणी प्रायः सम्पन्न लोग ही अधिक होते हैं। ईर्ष्या की आग में उन्हीं को अधिक जलना और जलाना पड़ता है। फिर इनमें से किसी के भी स्थायित्व का ठिकाना नहीं। इस प्रवाहमान विश्व व्यवस्था में हर वस्तु क्षण-क्षण बदल रही है- अपना मन भी। ऐसी दशा में कौन वस्तु कब तक प्रिय रहने योग्य रहे इसका कुछ कहा नहीं जा सकता।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विज्ञजन सदा से आत्मबल के सम्पादन पर जोर देते रहे हैं। उसके स्थायित्व भी है। चेतना को परिष्कृत करने से व्यक्तित्व निखरता है और वह निखरा हुआ व्यक्तित्व भौतिक एवं आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों की सफलताएँ अर्जित करने में समान रूप से लागू होता है।
आत्मबल के धनी सच्चे अर्थों में धनी होते हैं। वे भौतिक दृष्टि से गरीब दीखते भर हैं वस्तुतः कंगाल नहीं होते। खाने की अपेक्षा उन्हें खिलाने में अधिक रस आता है इसलिए अपव्यय में उड़ाने या ठाट-बाट संजोने की अपेक्षा वे उसे दूसरे जरूरतमंदों को बाँटने रहते हैं। इसलिए व्यक्तिगत जीवन में सादगी अपनाने वाले अध्यात्मवादी गरीब जैसे लगते भर हैं। उनकी भौतिक सम्पदा भी असाधारण होती है। जब उन्हें किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों के लिए असीम जन सहयोग मिलता है तो विदित होता है कि उसका पैसा कितनों की जेब में सुरक्षित रखा था जो आवाज देते ही खिंचता चला आयेगा।
गाँधी जी गरीबी में रहते थे पर उनकी स्मृति में जो गाँधी स्मारक निधि बनी उसमें करोड़ों रुपया एकत्रित हुआ। उनकी धर्म पत्नी के स्मारक में भी साठ करोड़ रुपया एकत्रित हुआ था। महामानवों में से किसी को भी पैसे की कमी से अपनी महती योजनाएँ रोकनी नहीं पड़ी हैं। सुग्रीव, विभीषण, सुदामा, नरसी आदि में से किसी को भी धन का घाटा नहीं पड़ा। यदि वे आदर्शों से दूर मात्र पेट प्रजनन में ही संलग्न रहते। तो शायद वैसे ही बने रहते जैसे कि अपने मतलब से मतलब रखने वाले आमतौर से रहते देखे गये हैं।
आत्मबल सबसे बड़ा बल है। उसे संग्रह करने के लिए विज्ञजनों व हर श्रेयार्थी को सलाह दी है। जिनने ये माना है वह आरम्भ में धूर्तों की बिरादरी में उपहासास्पद भले ही बना हो। कुछ ही समय पश्चात् यह अनुभव किया गया कि इस मार्ग पर चलने वाला, कोई कुछ खोता नहीं कमाता ही है। खोटे नकली अध्यात्म को अपनाने वाले हैं। जो धूप दीप की कीमत पर देवताओं की जेब काटने की फिकर में रहते हैं। घाटा उन्हें ही पड़ता है। असली अध्यात्म में पूँजी गुमने जैसा कुछ है ही नहीं। जो लगाया जाता है वह हजार गुना होकर वापस लौट आता है। जीवन की सार्थकता आत्म-वैभव के सम्पादन में ही है। हम अपने सभी प्रियजनों को यही परामर्श एवं प्रोत्साहन देते रहे हैं। अब भी अपने अनुभव और उदाहरण को सभी प्रस्तुत करते हुए यही कह सकते हैं कि हमारा सीधा संपर्क न रहने पर भी यदि वे हमें- हमारे परामर्श को कोई महत्व दें तो जीवनचर्या ऐसी बनायें जिसमें आत्मिक प्रगति की साधना साथ-साथ चलती रहे। इसमें वे घाटे में नहीं नफे में रहेंगे।
राम रावण युद्ध प्रायः दो महीने चला था। इसके बाद उन रीछ वानरों का क्या हुआ, जो दल-बल समेत ऋष्यमूक क्षेत्र में समेट बटोर कर लाये गये थे। नल-नील ने एक पुल बनाने के बाद पेन्शन ले ली थी क्या? भरत लक्ष्मण चंवर ही ढुलाते रहते थे क्या? नहीं। वे सब सृजनात्मक कार्यों में व्यस्त हुए थे और सतयुग की वापसी की योजनाबद्ध सरंजाम जुटाते रहे थे। कृष्ण कालीन गोप गोवर्धन उठाने के उपरान्त छुट्टी पर नहीं चले गये थे। महाभारत भी प्रायः दो महीने में ही समाप्त हो गया था। उसके बाद उन सब लोगों ने क्या किया? इसका उत्तर भी यही है कि परीक्षित के तत्वावधान में सुव्यवस्थाओं की स्थापना के विशालकाय प्रयत्न हुए थे। यही रीछ-वानर करते रहे थे।
बुद्ध की परिव्राजक दीक्षा और संघारामों के निर्माण का जो वर्णन मिलता है, वह सब मिलाकर बीस-तीस वर्षों का है। इसके उपरांत वह लाखों की बौद्ध मण्डली विसर्जित तो नहीं हो गई थी। जेल से छूटने के उपरान्त भी सत्याग्रही सर्वोदय आदि के रचनात्मक कामों में लगे रहे हैं। इतिहासकारों की कुछ शैली ही ऐसी है कि विवाह की धूमधाम अगवानी भर का उल्लेख करते हैं। उसके उपरांत दोनों परिवारों में क्या हलचल रही, इसका वर्णन करने में उन्हें रुचि नहीं होती। इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि आरम्भिक मारधाड़ प्रधान घटनाक्रम ही सब कुछ होता है। महत्वपूर्ण तो वह रहता है। जो सृजन की दृष्टि से किया जाता और लम्बे समय तक चलता है।
बीज एक दिन में बो दिया जाता है। मुहूर्त उसी का निकालते हैं पर फसल आने तक जो लम्बी व्यवस्था बनानी पड़ती है, उसकी चर्चा तो लोग भूल ही जाते हैं। पर इससे क्या? वर्णन उल्लेख वाले अपनी बात आप जानें, तथ्य तो जहाँ के तहाँ रहेंगे। आपरेशन एक मिनट का होता है पर मरहम पट्टी तो घाव भरने के लिए महीनों करनी पड़ती है।
बात सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में चल रही थी। उसका एक पक्ष ही हमारे जिम्मे है। गाड़ी जहाँ दल-दल में फँस गई है उसे निकाल देने ओर सड़क पर खड़ी कर देने जितनी ही क्षमता और अवधि अपने पास है। पर यह नहीं समझना चाहिए कि इसके बाद कुछ करने को शेष ही नहीं रहेगा। जो करना होगा, वह इतना ही बड़ा होगा जो पन्द्रह मिनट के आपरेशन के उपरान्त रोग को अच्छा करने के लिए महीनों करना पड़ता है। बहुमुखी सृजन उससे कठिन है जितना कि इस बिगाड़ को उत्पन्न करने में करना पड़ा है। लोगों ने व्यक्ति को भटकाने और समाज को गिराने वाले अनेकानेक खर्चीले और श्रमसाध्य प्रयत्न किये हैं और मुद्दतों में दुर्व्यसन पनपाने लोगों के स्वभाव के अंग बनाये हैं। अब उन्हें छुड़ाना ही नहीं उनके स्थान पर नई व्यवस्था बनानी और नई सभ्यता खड़ी भी करनी जो है?
हमारी दो प्रकार की कार्य पद्धति है। एक को ढाल, दूसरी को तलवार करना चाहिए। एक से बचाव करना है और दूसरों को खदेड़ना है। इन दिनों खदेड़ने वाला काम प्रत्यक्षतः बड़ा दीखता है क्योंकि उसने जीवन मरण जैसी समस्या उत्पन्न कर दी है। विनाश अपनी चरम सीमा पर है। उसे अभी और कुछ समय खेल खेलने दिया जाय तो फिर लाखों वर्षों की संचित सभ्यता और प्रकृति का कहीं अता-पता भी न चलेगा। धरातल की दुर्गति श्मशान जैसी होगी और यहाँ कंकाल बिखरे तथा भूत नाचते दृष्टिगोचर होंगे। इस विनाश विभीषिका के उत्पादन केंद्रों पर समय रहते गोलाबारी करनी है ताकि महाप्रलय का अवसर प्राप्त करने से पूर्व ही वे अपने हाथ पैर तुड़ा बैठें और वह न कर सके जो करने की डींग हाँकते और आतंक मचाते हैं। यह एक काम हुआ। यह हमारे अपने जिम्मे है। सूक्ष्मीकरण के उपरान्त हमें विश्वास है कि दधीचि वाला इन्द्रवज्र बन सकेगा जो वृत्तासुर का अहम् चूर्ण कर सके। हमें विश्वास है कि जिस शान्ति और प्रगति की प्यास से धरातल जल रहा है उसे शीतलता प्रदान करने योग्य गंगावतरण हो सकेगा। इसमें किसी भगीरथ का तप काम आ सकेगा।
दूसरा पक्ष नर्सरी उगाने जैसा है। अगले दिनों इसी धरती को स्वर्गोपम बनाना है मानवी गरिमा की टूटी हुई कड़ियों को फिर से जोड़ना है। जो गंवा चुके उसे फिर से प्राप्त करना है। इसलिए अपनी इसी भूमि पर नन्दन वन कल्पवृक्ष उद्यान उगाने की आवश्यकता पड़ेगी। इसकी तैयारी भी साथ-साथ चालू रहनी चाहिए। गोला बारूद की फैक्टरी भी पूरी तत्परता से आवश्यक सामान उत्पादन करने में निरत रहे। किन्तु दूसरी ओर विशालकाय कृषि फार्म में ऐसी नर्सरी भी बोई उगाई जाती रहे, ताकि समय पर खोया हुआ ऊँट, घड़े में न ढूंढ़ना पड़े।
परशुराम परम्परा में ऐसा ही हुआ था। उनने एक बार आततायियों के सिर काटकर समस्त धरती को दुश्चिन्तकों से मुक्ति दिलाई थी। ब्रेन वाशिंग का विचार क्रान्ति का उद्देश्य पूरा किया था। इसके तुरन्त बाद उन्होंने फरसा गंगा सागर के समुद्र में फेंक दिया और नये सिरे से नया अस्त्र- नया फावड़ा उठाया। इस आधार पर वे फलदार उद्यान बोते लगाते चले गये और जो स्तब्धता आई थी उसे नव सृजन के नये उल्लास से भर दिया। उन्होंने सभी दिशाएँ हरियाली से भर दी। उनका दुहरा- परस्पर विरोधी अभियान देखकर लोग आश्चर्यचकित रह गये। युद्ध में शौर्य, पराक्रम और साधनों की आवश्यकता पड़ती है। पर सृजन में तो इससे हजारों गुनी सूझ-बूझ तत्परता ओर साधन सामग्री चाहिए। इसलिए नाम भले ही सेनापतियों का मोटी पंक्तियों में छपता रहा हो, पर वस्तुतः श्रेयाधिकारी वे इंजीनियर ही बनते हैं जिनने निर्माण की विशालकाय योजनाएँ बनाई और प्राण-पण से संलग्न होकर पूरी कर दिखाईं।
अस्पताल में भी मेज पर छुरी कैंची भी सजाई जाती है पर ठीक उसकी बगल में टाँके लगाने की सुई, मरहम, गाज रुई आदि भी तैयार रखी जाती हैं। अन्यथा केवल फाड़-चीर न केवल अधूरी रहेगी वरन् बिना क्षति पूर्ति के नये किस्म के संकट भी उत्पन्न करेगी।
हमें दोनों ही प्रबंध करने पड़ रहे हैं। देवशक्तियों के साथ सम्बन्ध साध कर वह सरंजाम जुटाना पड़ रहा है जिससे कि आतंक की छाती पर ऐसा घूंसा जमाया जा सके कि उसे पीछे ही हटते बनें। इसके लिए हमसे बड़ों की- समर्थों की सहायता अपेक्षित हो रही है सो वह जुटाई जा रही है। जुट रही है और विश्वास है कि जितनी कम है, वह पूरी होकर रहेगी। अगले दिनों महाविनाश की घोषणा हर क्षेत्र से हो रही है। परिस्थितियों को देखने वाले एक ही बात कहते हैं कि महाविनाश अब आया- तब आया।
इतने पर भी हम अकेले का यह कथन अन्य सभी के प्रतिकूल है कि यह दुनिया न केवल जियेगी वरन् और भी अच्छी बनेगी। जिन्हें रुचि हो वे इस भविष्य वाणी को नोट कर लें। युद्ध जहां-तहां- क्षेत्रीय स्तर के ही होते रहेंगे। कोई ऐसी विपत्ति खड़ी न होगी जिससे समूचे संसार भर के मनुष्य समुदाय का भविष्य ही संकट में घिर जाय।
इसके अतिरिक्त दूसरा पक्ष है- सृजन का। उसके लिए ट्यूब वैल खोदना, जनरेटर बिठाना- नर्सरी उगाना है। बीज गोदाम जमा करना है। ट्रैक्टर खरीदने हैं और वह सरंजाम जुटाने हैं जो लहलहाती फसल उगाने में आवश्यक होते हैं। यह साधन क्या हो सकते हैं? कहाँ हो सकते हैं? इसका उत्तर एक ही है कि अन्त तक की हमारी संचित सम्पदा इस प्रयोजन की पूर्ति में अच्छी-खासी सहायता देगी। संचित सम्पदा से तात्पर्य है- संजोया हुआ गायत्री परिवार। इसमें से अधिकाँश छोटे, हलके दीखते हैं। उनकी योग्यता एवं समर्थता हलकी लगती है, तो भी यह विश्वास किया जाना चाहिए कि यह कलियाँ अगले ही दिनों खिलकर फूल बनेंगी। यह अंकुर हरे-भरे पौधे बनकर समूचे कृषि क्षेत्र को लह-लहायेंगे। यह अभी के छोटे बछड़े कल परसों हर चलायेंगे और रथ खींच दिखायेंगे। बच्चे सभी के अनगढ़ होते हैं। उन्हें शऊर कहाँ होता है। फिर भी वे देखने में कितने सुन्दर लगते हैं। उनकी अनगढ़ हरकतें भी सुहाती हैं। उनके अधरों पर भविष्य चमकता है। ऐसा ही कुछ प्रज्ञा परिवार के सम्बन्ध में कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उसमें हनुमान, अंगद निश्चय ही उंगलियों पर गिनने जितने हैं, पर कुरेदकर देखा जाय तो जटायु और केवट-शबरी और गिलहरी भी भक्ति भावना में यह समूचा समुदाय भरा पड़ा है। छोटे होने पर भी वे कहते हैं कि हमसे आशा रखी जा सकती है।
हमारा ध्यान इन दिनों तीन ओर है। एक अपनी ओर जिसे इन्हीं दिनों अधिक दबोचा और अधिक ऊंचे स्तर का सूक्ष्मीकरण किया जाना है। इसके लिए जो कठिन प्रयास करने हैं, उनमें उत्तीर्ण होना है, अन्यथा चूकी गोली निशाना न बेध सकेगी और व्यर्थ ही उपहास होगा।
दूसरा ध्यान विश्व समस्याओं को समझना- विश्व को मूर्धन्य दिव्य सत्ताओं का सहकार एकत्रित करना और उन केन्द्रों पर गोलाबारी करना है जहाँ महाप्रलय के सरंजाम जमा हो रहे हैं। यह समूची प्रक्रिया सूक्ष्म जगत की है। हम अपना ध्वज लेकर कहीं तोप बन्दूक चलाने नहीं जा रहे हैं।
तीसरा प्रयास है उन प्रज्ञा परिजनों के प्रति जो प्राणवान हैं। उन्हें अपने हट जाने के कारण निराश न होने देना- बिखर जाने की स्थिति न आने देना और नर्सरी की पौधों को अपने क्रम से इतना बढ़ने देना कि उन्हें समय आने पर आरोपित किया जा सके और अभीष्ट उद्यान का सुरम्य दृश्य बिना समय गँवाये देखा जा सके।
उपरोक्त तीनों मोर्चों में से एक भी कम महत्व का नहीं है। इनमें से किसी एक के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। साथ ही यह भी निश्चित है कि किसी एक को भी कम महत्व का समझकर छोड़ा नहीं जा सकता। तीनों ही प्रयोजनों के लिए जो बन पड़ रहा है। उसे समग्र तत्परता के साथ सम्पन्न कर रहे हैं। ऐसी दशा में भेंट मिलन का पुराना लोकाचार न निभ पा रहा हो। दर्शन स्पर्श की गतिविधियों को रोक कर एकाकी रहा जा रहा हो तो अप्रिय लगने या अहंकारी स्वार्थी जैसा प्रतीत होने पर भी उसे क्षम्य समझने का अनुरोध करना पड़ रहा है। हमें अपने परिजनों की प्रज्ञा पर पूरा विश्वास है कि वे इस प्रयोजन की उच्चस्तरीय फलश्रुतियों को दृष्टिगत रख हमारी साधना प्रक्रिया में सहभागी ही बनेंगे।
एकाकी तप साधना व लेखनी के योगाभ्यास के इन क्षणों में हमें योगीराज अरविन्द के कुछ कथन सहसा स्मरण हो आते हैं जो उन्होंने परतन्त्र भारत की उन विषम परिस्थितियों में अपने एकान्तवास में व्यक्त किये थे। उन्हें शब्दशः यहाँ उद्धरित कर रहे हैं।
“इतना महान और विराट् भारत जिसे शक्तिशाली होना चाहिए था, युगान्तरकारी भूमिका निभाना चाहिए था, आज दुःखी है। क्या है दुःख इसका? निश्चय ही कोई भारी त्रुटि है। जीवन्त चीज का अभाव है। हमारे पास सब कुछ है, पर हम शक्तिहीन हैं, ऊर्जा रहित हैं। हमने शक्ति की उपासना छोड़ दी, शक्ति ने हमें छोड़ दिया। माँ न अब हमारे दिल में है, मस्तिष्क में है, भुजाओं में है।....... इस विशाल राष्ट्र के पुनर्गठन के कितने प्रयत्न किए गए, जाने कितने आन्दोलन हुए- धर्म, समाज, राजनीति सभी क्षेत्रों में, लेकिन सदैव दुर्भाग्य साथ रहा। हमारी शुरुआतें महान होती हैं। पर न तो उनसे नतीजे निकलते हैं, न कोई तात्कालिक फल ही हाथ लगता है। हमारे अन्दर ज्ञान की कमी नहीं। ज्ञान के उच्चतम व्यक्तित्व हमारे बाच से ही पैदा हुए हैं। लेकिन यह ज्ञान मुरदा है, एक विष है जो हमें धीरे-धीरे मार रहा है। शक्ति के अभाव में, आत्मबल के बिना यह ज्ञान अधूरा है। भक्ति भावना- उत्साह प्रशंसनीय है। लेकिन भक्ति रूपी लपट को भी शक्ति का ईंधन चाहिए। जब स्वरूप स्वभाव ज्ञान से प्रदाप्त, कर्म से अनुशासित और विराट् शक्ति से जुड़ता है तभी वह ईश्वरीय कृपा का अधिकारी बनता है।....... यदि हम गम्भीरता से विचार करें तो पायेंगे कि हमें सबसे पहले शक्ति चाहिए- वह है आत्मबल, आत्मिकी की सर्वोच्च शक्ति। इसके बिना हम पंगु हैं, भारतवासी पंगु हैं, सारा विश्व पंगु है। भारत को उस शक्ति को पुनः पाना ही होगा, पुनर्जन्म लेना ही होगा क्योंकि सारे विश्व के उज्ज्वल भविष्य के लिये इसकी माँग है। मानवता के समस्त समूहों में यह केवल भारत के लिये निर्दिष्ट है कि वह सर्वोच्च नियति को प्राप्त करे जो सारी मानव जाति के भविष्य के लिये अत्यावश्यक है। उस शक्ति को उपासना के लिए सदैव महामानव अवतरित हुए हैं। उसी कड़ी में यदि मुझे एकाकी पुरुषार्थ हेतु नियोजित होना पड़े तो यह मेरा परम सौभाग्य होगा।”
वस्तुतः योगीराज अरविंद द्वारा सन् 1905 के आस-पास लिखे इस वक्तव्य से स्पष्ट हो जाता है कि उनके मन में भारत के उज्ज्वल भविष्य के प्रति कितनी उत्कट उमंग थी। उसकी अन्तःप्रेरणा ने, परोक्ष जगत से आए निर्देशों ने उन्हें क्रान्तिकारी का पथ छोड़ तप साधना में निरत हो वातावरण को गरम करने हेतु विवश किया। यदि हमारी प्रस्तुत सूक्ष्मीकरण दिनचर्या को इसी साधना उपक्रम के समकक्ष समझा जाए तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी। परिजन इसे उतनी ही गम्भीरता से लेंगे भी।
एक बार अरब लोगों का एक काफिला रेगिस्तान से होकर गुजर रहा था। दिन में आग बरसती तो वे सुस्ताते और रात को थोड़ी ठण्डक होने पर चल पड़ते।
एक रात वे देवताओं के इलाके से होकर गुजर रहे थे। सुनसान अंधेरी रात में देवताओं की गरजन भरी आवाज सुनाई पड़ी। वे डरे तो बहुत पर देवताओं की बात सुनने और दिये हुए आदेशों को पालने में ही खैर मानने लगे।
पहली आवाज आई- ‘रुको’। वे सब रुक गये। दूसरी आवाज थी- ‘झुको’। वे झुक गये। तीसरा आदेश मिला- जमीन पर बिखरे कंकड़ बीनो और थैले भरकर चल पड़ो। उनने वैसा ही किया। अन्तिम निर्देश था- सवेरा होने तक कहीं ठहरना मत। बस जब सूरज निकलेगा तो तुम सुखी भी बहुत होगे पर दुःख भी कम न होगा।
आरम्भ में राहगीर डर के मारे काँप रहे थे। देवताओं के आदेश मानने के अतिरिक्त और कोई चारा न था। किसी प्रकार रात पूरी की।
सवेरा होते देखा उनकी जेबों में कीमती हीरे मोती भरे थे। सो वे सचमुच बहुत सुखी हुए। पर जब यह ख्याल आया कि वस्तुस्थिति का उस समय पता क्यों न लगा- इस बात पर दुःख भी कम नहीं हुआ। उस क्षेत्र में हीरे की खदान थी, यह पता चलता तो ऊँटों का असबाब उड़ेलकर वे हीरों से बोरे भर सकते थे।
जिन्दगी का कारवाँ देवताओं के इलाके से गुजरता है पर हम स्तब्ध, भयभीत कुछ सुखी और बहुत दुःखी होकर मंजिल पार करते हैं।
यदि कभी इस पृथ्वी पर साम्यवाद सफलता पूर्वक प्रति स्थापित होता है तो वह आत्मिक बन्धुत्व के आधार पर ही हो सकता है। जिसमें अहंकार का विनाश हो जायेगा। बलात् लादी हुई संघ-बद्धता और मशीनी कामरेडवाद एक न एक दिन विश्वव्यापी टाँय टाँय फिस्स में समाप्त हो जायेगा। -श्रीअरविन्द (थाट्स एंड एफारिज्म्स)
इन दिनों गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र अपनी भूमिका महाप्रज्ञा के रूप में सम्पन्न कर रहे हैं। प्रज्ञा अभियान उसी का रूप है। महा संकट की घड़ियों में वह प्रयोग प्रादुर्भूत होता रहा है। युग सन्धि के इस संकट काल में महाविनाश के लक्षण सामने हैं। भविष्य वक्ताओं से लेकर विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों तक एक ही बात कह रहे हैं कि यह महाविनाश का समय है। युग परिवर्तन की इस विषम विभीषिका में जो कुछ प्रस्तुत है उसमें से बहुत कुछ बदल जायेगा। जो प्रस्तुत है यह अशुभ है। मनुष्य की दुर्गति ने हर क्षेत्र में दुर्गति उपस्थिति की है। बदलाव होगा तो परिस्थिति के साथ-साथ मनःस्थिति भी बदलेगी। गलाई और ढलाई का युग्म दोनों ही प्रयोगों में भयंकर होता है। इन दिनों ऐसा ही कुछ हो रहा है।
प्रज्ञा युग के अवतरण में महाप्रज्ञा की अपनी विलक्षण भूमिका चरितार्थ हो रही है। प्रज्ञा अभियान यही है। जागृत आत्माऐं मिलजुल कर इस महा अवतरण में अपनी भूमिका संवहन कर रही हैं। यह संसार भर में अपने-अपने ढंग से हो रहा है। उन सब का वर्णन तो इन पंक्तियों में सम्भव नहीं, पर उन कुछेक घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है जिनमें भारत क्षेत्र से प्रज्ञा तन्त्र की छत्र छाया में विनाश के कितने ही अवसर टल गये।
कुछ ही समय की बात है पाकिस्तान के अंग बंगला देश में प्रायः एक करोड़ शरणार्थी बंगला देश में भारत आ घुसे थे। लौटाने का अनुरोध करने पर लड़ाई की धमकियाँ ही नहीं दी गई वरन् हिमायती अमेरिका के अणुआयुधों से लदे जलयान भारत की सीमा पर आ धमके। सभी आतंकित थे। उन दिनों गायत्री परिवार ने एक सामूहिक महापुरश्चरण किया था। उसके सदस्यों में हर दिन चौबीस लाख प्रतिदिन का साधना क्रम चलाया था। परिणाम आश्चर्यजनक हुआ। मँडराते बादल टल गए। उतना ही नहीं बंगला देश स्वतन्त्र हुआ और शरणार्थियों की समस्या हल हुई। भारत विपत्ति में फँसने के स्थान पर श्रेयाधिकारी बना।
उस घटना को पाठक भूले नहीं हैं। जब भटका हुआ महाभयंकर उपग्रह स्काईलैव भारत के इर्द-गिर्द गिरने वाला था। भय और आतंक सर्वत्र छाया हुआ था। अमेरिकी सरकार ने आश्वासन तक दिया था कि जो क्षति होगी उसकी पूर्ति हम करेंगे।
उस अवसर पर इसी संकट के निराकरण के लिए गायत्री परिवार के सदस्यों ने सामूहिक गायत्री पुरश्चरण किया। विपत्ति टल गई। उपग्रह आस्ट्रेलिया के समीप समुद्र में एक सुनसान क्षेत्र में गिरा। किसी की राई भर हानि न हुई।
आपत्तिकाल घोषणा के समय भी आतंक का वातावरण बना था। उस समय भी ऐसा ही सामूहिक पुरश्चरण किया गया और अचम्भा तब हुआ जब वे दिन जल्दी ही समाप्त हो गये।
एक पुरश्चरण इन दिनों चल रहा है। इस वर्ष के आरम्भ में ही हर गायत्री परिजन को एक माला नित्य जप करने के लिए कहा गया था। उसका कारण तो नहीं बताया गया किन्तु इतना अवश्य कहा गया कि यह वर्ष अपने देश की प्रगति में भारी बाधक है और उसे टालने के लिए हमें आध्यात्मिक अस्त्र उठाना चाहिए। परिजनों ने उस बात पर पूरा विश्वास किया और इस नये अनुष्ठान को परिपूर्ण श्रद्धा के साथ आरम्भ कर दिया। इस वर्ष देश पर क्या बीती हम सभी जानते हैं। असम की घटनाओं का सभी को स्मरण है। पंजाब की गत डेढ़ वर्ष से चली आ रही अराजकता को कौन भूल सकता ह। इस संदर्भ में मामला बढ़कर कहाँ से कहाँ तक पहुंचा इसे भुलाना नहीं जा सका है। परिस्थिति यहाँ तक पहुँचेगी इसकी किसी को कल्पना भी नहीं थी।
इस आकस्मिक विप्लव को यदि और कुछ दिन सुलगने दिया गया होता तो स्थिति विस्फोटक होती। घटनाचक्र इस तेजी से घूमा कि किसी सामूहिक प्रयत्न की गुंजाइश नहीं थी। इस अवसर पर एक दैवी चेतना के निर्देश पर एक प्रज्ञानिष्ठ साधक ने एकाकी ऐसा महाव्रत ठाना जिसकी किसी को सम्भावना तक न थी। प्रज्ञा तन्त्र के संचालक ने एकान्तवास, मौन और कठिन व्रत उपवास धारण कर लिया। रात्रि तक किसी सगे स्वजन तक को इस प्रकार क आरंभ की भनक न थी। सभी हैरत में थे कि सूत्र-संचालक कभी कोई आकस्मिक कदम नहीं उठाते। जो करना होता है। उसका कारण और समय बता देते हैं। चौबीस दिन में जल उपवास का कारण और समय उन्होंने सभी अपने विरानों तक को बता दिया था पर इस बात का ऐसा अचम्भा हुआ कि इतना कठोर कदम उठाया। जिनके कानों में भनक पड़ी है उनने जाना है कि पंजाब में भारी अनिष्ट की आशंका थी। उसे ही नहीं, देशव्यापी उत्पात को रोकने के लिए सामूहिक कदम उठाने की सम्भावना थी। उनने अकेले ही पूरी सामर्थ्य झोंक दी और अंगद जैसा पैर गाढ़ा कि रोकना या प्राण देना। इस बार भी वैसा ही चमत्कार सामने आया। प्राण नहीं देने पड़े और संकट एक सीमा तक टल गया। इस प्रयास और कारण की चर्चा अभी तक कही नहीं की गई है। इतने पर भी यह नहीं समझना चाहिए कि इस विपत्ति से राष्ट्र उबर गया। सम्भव है हमारा व्रत एकान्त और तब तक चले जब तक सन्तोष की साँस लेने की स्थिति स्पष्ट न हो जाय।
यह भी नहीं समझा जाना चाहिए कि अब चैन की कुछ सांसें लेने का समय आ गया। ईरान-ईराक, इजराइल लेबनान, चीन वियतनाम, रूस-अफगानिस्तान, संयुक्त राज्य-मध्य अमेरिका आदि की घटनाएं नित्य परिजन अखबारों में पढ़ते हैं कि चारों ओर बारूद के ढेर लगे हैं उनमें कोई भी सिरफिरा माचिस की एक तीली फेंक कर सर्वनाश के दृश्य उपस्थित कर सकता है। इसके अतिरिक्त दैवी प्रकोप की ओर भी कितने ही अविज्ञात घटाटोप सिर पर घहरा रहे हैं, जिनकी परोक्ष के पर्दे पर झाँकी हमें सतत् दिखाई देती है।
युग संधि की इस प्रभात बेला में महाकाल का गतिचक्र तेजी से गतिशील हो रहा है। उसका प्रयोजन अवाँछनीयता को गलाना और महानता को ढालना है। प्रसव पीड़ा की तरह नवयुग भी कष्टकारक प्रक्रिया के साथ प्रकट हो रहा है। ऐसा विराट परिवर्तन अपने साथ कुछ न कुछ वेदनाएं साथ लाता है। ला भी रहा है। युग सन्धि के शेष दिन एक में से एक अधिक होंगे। भले ही उनका अन्तिम उद्देश्य सतयुग जैसा महान ही क्यों न हो। संतुलन बनाये रहने के लिए आद्य-शक्ति युग-शक्ति को प्रदीप्त करना आवश्यक है। प्रज्ञा अभियान द्वारा यह अपने ढंग से निरन्तर किया भी जाता रहा है।
यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि गायत्री और यज्ञ का अविच्छिन्न युग्म है। दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। गायत्री की आभा और यज्ञ की ऊर्जा एक दूसरे को बल प्रदान करती हैं। पुरश्चरणों की पूर्ति मात्र जप से नहीं होती वरन् उसके साथ यज्ञ भी जुड़ा रहता है। जिनके पास साधन नहीं वे मात्र समिधाओं में ही अग्निहोत्र करले ऐसा शास्त्र विधान है। गायत्री परिवार के साथ जिनका संपर्क रहा है उन्हें विदित है कि गायत्री तपोभूमि में एक बार सौ कुण्डी, एक बार सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ विशाल रूप में हुए हैं। वहाँ की पुरातन एक कुण्डी यज्ञशाला में और शान्ति-कुँज की नौ कुण्डी तथा ब्रह्मवर्चस् की यज्ञशाला में नित्य यज्ञ होते हैं। इन गायत्री तीर्थों में श्रद्धालु साधक इसीलिए पहुँचते हैं कि वहाँ पुरश्चरण के अनुकूल वातावरण है कि विधिवत् गायत्री जप के साथ-साथ यज्ञ की भी व्यवस्था रहती है जो कि हर साधक को अपने संकल्प की पूर्ति हेतु अभीष्ट है।
भावी परिस्थितियों के पूर्वाभास पर दृष्टि डालते हुए यह आवश्यक हो गया है कि पहले की अपेक्षा अब और अधिक सतर्कता बरती जाय और बड़े कदम उठाये जायें। छोटे प्रयासों से काम न चलेगा। जहाँ तक आध्यात्मिक प्रयोजनों का संबंध है वहाँ सब की दृष्टि पूर्व की ओर एवं एकमात्र भारत की ओर हो जाती है। सोचा गया है कि देश के सात लाख गाँवों में से कम से कम एक लाख गाँव ऐसे अवश्य हों जिनमें नियमित गायत्री और यज्ञ का उपक्रम चलता रहे। युग सन्धि काल सोलह वर्ष अब शेष हैं। इनमें बिना व्यतिक्रम हुए गायत्री पुरश्चरण की शृंखला चलती रहे, व्यक्तियों का प्राण तत्व अधिक मात्रा में सम्मिलित रहे भले ही जप की संख्या कम रहे। यज्ञ में श्रद्धा और नियमितता अधिक भरी रहे, भले ही आहुतियाँ की, चरु-शाकल्य की संख्या न्यून मात्रा में रहे।
आगामी गुरु पूर्णिमा ता. 12 जुलाई से विशिष्ट प्रज्ञा पुरश्चरण का सामूहिक आयोजन आरम्भ किया जा रहा है। इसमें वर्तमान गायत्री उपासक नये गायत्री उपासकों को शिक्षित करेंगे। हर एक के लिए यह कर्त्तव्य निर्धारित होगा कि जिन्हें गायत्री मन्त्र नहीं आता है ऐसे 24 व्यक्तियों को गायत्री मंत्र का उच्चारण सिखायें और एक माला नित्य जप करने का संकल्प निबाहने के लिए तत्पर करें। एक माला प्रायः पाँच मिनट में पूरी हो जाती है। इतना समय घड़ी देखकर या अनुमान से भी लगाया जा सकता है। समय सूर्योदय का सबसे उत्तम है। स्नान करके पूजा-अर्चना के विधान अधिक फलदायक होते हैं। पर जिन्हें इसकी विवशता हो- वे बिना स्नान के भी मौन मानसिक जप कर सकते हैं। बिलकुल ही न करने की अपेक्षा समय प्रातःकाल की अपेक्षा कुछ आगे पीछे भी किया जा सकता है। इस प्रकार अपेक्षा अपेक्षा की गई है कि 24 लाख व्यक्तियों द्वारा 24 करोड़ जप नित्य ही प्रज्ञा पुरश्चरण के अंतर्गत होने लगेगा।
मात्र जप अधूरा माना जाता है। जब यज्ञ समाप्त होता है तभी उसको पुरश्चरण संज्ञा मिलती है। प्रयत्न यह किया जाना है कि जहाँ भी पुरश्चरण की एक माला का जप हो वहाँ वर्ष में इस निमित्त एक बार एक यज्ञ भी अवश्य हो जाया करे।
वहाँ संख्या में बड़े आयोजन समेत अधिक आहुतियों वाला विशालकाय आयोजन होना आवश्यक नहीं। यह छोटे रूप में भी हो सकता है। सोचा गया है कि इस पुरश्चरण योजना के अंतर्गत एक लाख यज्ञ हर वर्ष सम्पन्न हुआ करें। चौबीस करोड़ जाप प्रतिदिन और एक लाख यज्ञ हर वर्ष करने की व्यवस्था बहुत बड़ी है। लगता है यह इन दिनों संव्याप्त अश्रद्धा को देखते हुए किस प्रकार बन पड़ेगा किन्तु जिस महाशक्ति के द्वारा यह प्रेरणा उठी है, उसे देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है। कि वह अधूरा न रहेगा।
इन दिनों पंजीकृत एवं नैष्ठिक गायत्री उपासकों की संख्या प्रायः 24 लाख है। उन सभी से आग्रह किया जा रहा है कि वे नये 24 व्यक्तियों को गायत्री मन्त्र सिखायें और प्रतिदिन पाँच मिनट उपासना उन सब से कराने का संकल्प पूरा करें। लगन और उत्साह जहाँ भी होगा वहाँ इतना बन पड़ना कुछ कठिन नहीं है।
यज्ञ का प्रकरण थोड़ा पेचीदा है। एक लाख छोटे यज्ञ करने से खर्च से लेकर भाग-दौड़ करके व्यवस्था बनाने तक के बहुत झंझट हैं। उन सबका लोगों में उत्साह होना कठिन है। श्रद्धा की कमी रहने पर उतनी जिम्मेदारी कौन उठाता है। इतना होते हुए भी कार्य की महत्ता भी समय की आवश्यकता देखते हुए जो संकल्प किया गया है। उसे निबाहना ही होगा। सर्वविदित है कि प्रज्ञा परिवार का एक भी संकल्प अब तक अधूरा नहीं रहा। जिस प्राण के पीछे महाप्रज्ञा की शक्ति हो, उसके अपूर्ण रहने का कोई कारण नहीं है।
जप कार्य तो हर व्यक्ति स्वयं कर लेता है। गणना उँगलियों पर भी हो सकती है। पर यज्ञ के लिए कितने ही व्यक्तियों की, यज्ञशाला, प्रवचन पंडाल, समिधाशाकल्य प्रवीणता, अनुभव आदि की आवश्यकता चाहिए। इसके लिए लोक उत्साह की कमी को ध्यान में रखते हुए शान्ति-कुँज द्वारा विशाल व्यवस्था की गई है। इस पर दृष्टि रखते हुए सहज गर्णित बुद्धि से भी समझ में आ जाता है कि कार्य उतना कठिन नहीं है जितना कि दिखता है।
पाँच-पाँच याज्ञिकों की ऐसी टोलियां तैयार की गई हैं जो यज्ञ कृत्य विधिवत् करा सकें। साथ ही संगीत प्रवचन में प्रवीण होने के कारण दो दिन तक गायन-वादन का प्रवचन समारोह भी कर सकें। यह टोलियाँ जीप गाड़ियों में भेजी जायेंगी, ताकि साथ में चलने वाला भारी समान भी ले जा सकें और एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी भी सरलता पूर्वक पूरी कर सकें। यज्ञ से सम्बन्धित अनेकों वस्तुएँ होती हैं। उन सभी को इन जीप गाड़ियों में लाद कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाएगा। अर्थ व्यवस्था का सरल सीधा उपाय यह रखा गया है कि गायत्री उपासक एक आदमी के लायक आहार दे तथा पूर्णाहुति के समय जितना बन पड़े उसे अंशदान रूप में देव-दक्षिणा की तरह प्रदान करे। उसे आगे के कार्यक्रम में खर्च कर दिया जाया करे। कम मिले तो अगले आयोजन में कम खर्च किया जाय, अधिक मिल जाय तो अगले आकार प्रकार का यज्ञ हो जायेगा। अन्यथा छोटे आकार का उसे बनाकर काम चलाया जायेगा।
इस बार इस प्रयोजन के लिए जितनी जीप गाड़ियों की व्यवस्था हो सकी है उन सबमें आवश्यक सामान भी हरिद्वार से लादकर भेजा जा रहा है, ताकि उनका खर्च याजकों पर न पड़े। फोल्डिंग यज्ञशाला, फोल्डिंग स्टेज, हवन सामग्री, लाउडस्पीकर, यज्ञ पात्र जैसी वस्तु साथ रहने से इनके लिए प्रबन्धकों को दौड़-धूप न करनी पड़ेगी। भोजन पकाने-वाला अपना स्वयं सेवक होगा। उपासक लोग जो आटा आदि दे देंगे उसी से पका लिया करेंगे। यज्ञ दोनों दिन होगा। उसकी आरती पूर्णाहुति में जो कुछ चढ़ावा आयेगा उससे जीप तेल ड्राइवर आदि का खर्चा निकल जाया करेगा। इतने पर भी कुछ घाटा पड़ेगा तो उसे किसी प्रकार वहन किया जायेगा। प्रज्ञा पुरश्चरण का आकार विशाल है और उसका प्रतिफल महत्तम। उसे देखते हुए धर्मप्रेमी उसे पूरा करते रहेंगे ऐसी आशा है। पर यदि पूरा न हो सका तो योजना की पूर्ति किसी प्रकार पूरी की ही जाएगी। मिशन ने जब कभी जो कुछ संकल्प दैवी प्रेरणा की छत्रछाया में किये हैं, उसकी पूर्ति कभी अपूर्ण नहीं रही है।
प्रज्ञा परिजनों का आत्म-शक्ति के विकास पर आवश्यकता अनुभव होती हो और उसके आधार पर युग सन्धि की अनेकानेक कठिनाइयों के निराकरण की आशा हो तो मिशन द्वारा संकल्पित प्रज्ञा पुरश्चरण की पूर्ति के लिए कुछ न कुछ प्रयत्न करना ही चाहिए। यह प्रयत्न ऐसे हैं जिन्हें मात्र भाग-दौड़ से भी पूरा किया जा सकता है। इसके लिए कोई धन संग्रह की राशि एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं है। सच्चे मन से किया गया श्रम ही कई बार बड़ी पूँजी लगाने से अधिक कारगर सिद्ध होता है।
युग सन्धि के इस ऐतिहासिक पर्व पर करने के लिए अनेकों काम सामने पड़े हैं। उनका विशेष उत्तरदायित्व अग्रिम पंक्ति से खड़े होने वाला जागृत आत्माओं को है। उन्हें अपने को बदलना चाहिए ताकि दूसरे उन्हें देखकर बदलें। उन्हें समय की आवश्यकता देखते हुए लोकहित की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने को खपाना चाहिए ताकि उनके पीछे अन्य अनेकों चलें। अपने स्थान में- अपने तत्वावधान में प्रज्ञा पुरश्चरण को गतिशील बनाने के लिए कुछ न कुछ प्रदान करने का सभी परिजनों से अनुरोध है। वह देखने में किसी को भले ही कठिन लगता हो वस्तुतः वह है अति सरल सामयिक और श्रेयस्कर ही।
सूचना- प्रज्ञा परिजनों में से जिन्हें जन-संपर्क, संगीत, प्रवचन का अभ्यास हो, उनकी देशव्यापी प्रज्ञा आयोजनों की जीप टोलियों में भेजे जाने की आवश्यकता है। जाने से पहले एक महीने की ट्रेनिंग दी जायगी। ट्रेनिंग में संगीत समेत वे सभी प्रवीणताएं सिखाई जायेंगी जिनके आधार पर वे प्रज्ञा पुरश्चरण आयोजनों को सफल बना सकें।
जिनमें शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति होगी उन्हें मोटर ड्राइविंग की शिक्षा भी दी जायगी। हर जीप के पीछे पाँच स्वयं सेवक जायेंगे। सभी को भोजन बनाने, मोटर साफ रखने, यज्ञशालाएं रंगने, तथा अन्य छोटे बड़े कार्य मिल-जुलकर करने होंगे। सभी निरहंकारी होंगे। शिक्षा, परिवार, आदि का कोई ऐसा गर्व न करेंगे- जिससे परस्पर भेदभाव बने।
प्रज्ञा-पुरश्चरण की जीप टोली योजना सन् दो हजार तक इसी प्रकार चलेगी। इसके उपरांत भी अनेकों प्रचारात्मक, रचनात्मक, सुधारात्मक कार्यक्रम आगे भी चलते रहेंगे। इनमें भाग लेने के लिए न्यूनतम पाँच वर्ष का समयदान देना चाहिए। जो आजीवन रहना चाहें, उनका परिवार छोटा हो तो उसके निर्वाह तथा शिक्षा-दीक्षा का भी प्रबन्ध है। जिन्हें रुचि हो शान्ति-कुँज हरिद्वार के पते पर पत्र व्यवहार कर लें।
पिछली पंक्तियों में हमने परिजनों से अपनी तप−साधना में सहभागी बनने हेतु आग्रह किया था। इस उपक्रम में उन्हें पंद्रह-पंद्रह मिनट तान बार की त्रिकाल संध्या के रूप में उपासना, साधना, आराधना के निमित्त सुनिश्चित रूप से निकालना चाहिए।
उपासना :- प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर एक माला गायत्री जप आत्मोत्कर्ष के लिए एवं एक माला वातावरण परिवर्तन के लिए करना चाहिए। साथ ही आत्मा को परमात्मा के साथ लिपट जाने का भाव भी करना चाहिए। ईंधन आग की तरह, नाले नदी की तरह, बिन्दु सिन्धु की तरह, पतंगे दीपक की तरह। आदर्शों के समुच्चय विराट् ब्रह्म के साथ अपनी सत्ता इसी प्रकार विसर्जित करनी चाहिए। बांसुरी वादक की तरह, पतंग उड़ाने वाले की तरह उसी के संकेतों पर चलने का निश्चय करना चाहिए।
साधना :- मध्याह्न काल में जीवन साधना के लिए पन्द्रह मिनट एकान्त चिन्तन मनन हेतु निकालना चाहिए इसमें आत्म समीक्षा-आत्म सुधार की योजना-आत्म निर्माण की विधि और आत्म विकास की स्थिति प्राप्त करने का विचार करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में जो बन सकता हो, उसका ताना बाना बुनना चाहिए। चार संयम ही तप हैं। इन्द्रिय, अर्थ, समय और विचारों में से एक भी विभूति का अपव्यय न किया जाये। न्यूनतम में निर्वाह करने और परिवार छोटा स्वावलम्बी बनाने की नीति अपनानी चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार की रीति-नीति का निर्वाह करने से अपने पास बहुत कुछ बचने लगेगा। आठ घण्टा कमाने के, सात घण्टा सोने के, पाँच घण्टा फुटकर कामों में लगने पर कुल बीस घण्टे निजी कामों में खर्च करने के उपरान्त भी चार घण्टे बचते हैं, जिनका सुनियोजन हो सकता है। यह इस पर निर्भर है कि स्वयं को कितना कसा गया।
आराधना :- सायंकाल सोते समय आराधना का पर्यवेक्षण करने के लिए बिस्तर पर पड़े-पड़े विचार करना चाहिए कि आज के समय, श्रम, वैभव एवं ज्ञान में से कितना अंश लोक मंगल के निमित्त लगा? नहीं लगा तो क्यों नहीं लगा? भविष्य में उन कारणों को दूर करना चाहिए जिनसे कि अपनी विभूतियाँ युगधर्म के लिए लग नहीं पातीं। शरीर से बढ़कर महत्व यदि आत्मा को मिले तो कोई कारण नहीं कि सारा समय और वैभव पेट प्रजनन के लिये ही लगे। समय की पुकार सर्वथा अनसुनी नहीं करनी चाहिए। चारों ओर के परिवेश से स्वयं को न प्रभावित होने देकर आत्मा की पुकार पर चलना चाहिए।
प्रातःकाल आत्मा को परमात्मा से लिपटा देना, मध्याह्न की बचत योजना कार्यान्वित करना और सायंकाल युगधर्म के लिए किये गये पुण्य परमार्थ का लेखा-जोखा लेना। संक्षेप में यही है उपासना, साधना, आराधना की विधा जिसे जीवन चर्या के साथ गूँथने पर जीवन त्रिवेणी संगम जैसा पवित्र, प्रखर, और प्रामाणिक बनता है और फिर काक के पिक एवं बगुले के हंस बनने में कोई बाधा मार्ग में नहीं आती।
युगधर्म हेतु क्या किया जाय, इसके लिये यही पर्याप्त है कि विचार क्रान्ति ही अपने समय का युगधर्म है। इसके लिये समयदान-अंशदान की श्रद्धाँजलि आवश्यक है ताकि झोला पुस्तकालय, ज्ञानघट के रूप में स्वाध्याय क्रम एवं जन्मदिवसोत्सव, कथा पुराण के रूप में सत्संग क्रम चल पड़े। जो पूरा समय दे सकने की स्थिति में हों वे शाँति कुँज को अपना घर बनाने की सोचें एवं समाज सेवा हेतु स्वयं को खपाकर उस ऋण में मुक्त होने की योजना बनायें जो अभी तक उस पर लदा है। उनके लिये क्या कैसी योजना है इसका स्वरूप अगले लेखों में है।
मिलन प्राणायाम :- प्रातःकाल सूर्योदय के समय चौबीस प्राणायाम करते रहने के रूप में प्रज्ञापरिजनों के लिये विशेष संपर्क स्थापना क्रम बनाया गया है। दिव्य प्रेरणा की लहरें उस समय विशेष रूप से संप्रेषित होती हैं। उन्हें खींचने और धारण करने की भावना साँस खीचते समय करनी चाहिए।
इन श्वासों के साथ कुछ विशेष संदेश संकेत हैं। दिव्यसत्ता के साथ मिलन, गुंथन एवं एकात्म अद्वैत स्थिति का अनुभव होगा। दिव्य प्राण समस्त नस−नाड़ियों में संव्याप्त होता प्रतीत होगा। श्वास खींचने और छोड़ने के इस प्राणायाम उपक्रम में भावना करनी चाहिए कि लोभ, मोह और अहंकार के तीनों भव बंधन पलायन कर रहे हैं। आत्मा सद्भावना, सद्विचारणा और सद्क्रिया पारायणता से उल्लसित हो रहा है।
ये सभी उपक्रम इस युग संधि वेला में हमारी परोक्ष साधना के रूप में सतत् निभाये जाते रहें।
मनुष्य शरीर संरचना की दृष्टि से पशु है। शिक्षा जिसे जिस स्तर की जितनी विभिन्न परिस्थितियों में मिली है, वह उसी स्तर का मानव कहला सकने का अधिकारी हुआ है। यदि उसके लिए कुछ भी शिक्षा का प्रबन्ध न किया जाय तो निश्चित ही इस सभ्यता के युग में भी आदिम कालीन वन-मानुषों की तरह आचरण करता हुआ दिखाई देगा। भेड़िये द्वारा पाले गए रामू मनुष्य बालक के बारे में यह गाथा सर्व विदित है कि वह चार पैरों से चलता, मुँह से गुर्राता ओर कच्चा माँस खाता था। गुफा-जंगल में रहना उसे प्रिय था। बहुत प्रयत्न करने के उपरान्त ही मनुष्य जैसी छोटी मोटी आदतें उसे सिखाई जा सकीं थी।
अन्न वस्त्र की प्रधानता सर्वोपरि है पर इसके बाद यदि अगला नम्बर आता है तो वह शिक्षा का ही है। शिक्षा में पुस्तकों और अध्यापकों से सहायता मिलती है पर यह नहीं समझ बैठना चाहिए कि इनके बिना दूसरा कोई उपाय नहीं है। मनुष्य सहजीवी प्राणी है। अनुकरण उसकी मूल प्रवृत्ति है। जिन लोगों के साथ वह रहता है, उन्हें जो कुछ बोलते-सोचते-करते देखता है, उसी को बुद्धि विकास के साथ-साथ सीखने लगता है। वन वासी भी अपनी जीवन शैली सीखने में उतने ही चतुर होते हैं जितने कि सभ्य लोग। अनुचित-उचित का भेद बहुत विकसित मनःस्थिति में आता है। आरम्भ तो नकल को अपनाने से ही होता है। यही है मानवी उत्थान या पतन की विधि व्यवस्था।
अभी भी न्यूगिनी-अफ्रीका-अडमणन जैसे क्षेत्रों के आदिवासी सभ्यता के इस युग में भी सैकड़ों वर्ष पीछे हैं। इसके विपरीत उत्तरी ध्रुव के घोर शीत वाले सुविधा रहित क्षेत्र में चिरकाल से निवास करने वाले एस्किमो लोगों को जब कनाडा के सुविकसित लोगों के साथ रहने का अवसर मिला तो कुछ ही समय में वे उतने ही प्रगतिशील बन गए जितने कि उस क्षेत्र के अन्य लोग थे। यह शिक्षा का चमत्कार है। इसलिए यदि शिक्षा को जीवनदायिनी कहा जाय तो उसमें अतिश्योक्ति की कोई बात नहीं है। शिक्षा एक बड़े समुदाय के बीच निवास करते हुए उसकी परम्परा उपक्रम का नाम है। इसमें पुस्तकों और अध्यापकों से सहायता तो मिलती है। पर ऐसी बात नहीं कि इनके बिना प्रगति हो ही न सके। समूह का प्रवाह ही शिक्षा का उद्गम स्रोत है। साथ ही यह कहने में भी हर्ज नहीं कि शिक्षा ही मनुष्यता का मेरुदण्ड है। अन्यथा वह नर वानर-वन-पशु ही बनकर रह जाता।
संसार के इतिहास के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का पर्यवेक्षण करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि प्रगति और पिछड़ेपन का वास्तविक एक मात्र कारण शिक्षा का स्तर रहा है। जहाँ यह प्रयोग जितने अंशों में जितने ऊँचे स्तर का हुआ है, वहाँ लोग अपनी व अपने क्षेत्र वासियों की हित साधना करने में सफल रहे हैं। उसके लिये संयोग तथा साधना से सिद्ध वातावरण भी स्तर को ऊँचा उठाने में मददगार सिद्ध हुआ है। उदाहरण के लिये भारत कभी संसार का मुकुट मणि था। इसका कारण यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा नहीं वरन् शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति थी। उसके विपरीत संसार में अधिक सम्पन्न क्षेत्र भी रहे हैं। पर अपने अनाचरण के कारण निरन्तर कलह पराभव के निमित्त कारण बने रहे।
शरीर, धन, शिक्षा ये शरीरगत बल हैं। इनके बदले में पराक्रम खरीदे जा सकते हैं- वैभव कमाया जा सकता है। किन्तु व्यक्तित्व चेतना का गुण है। उसके लिये गुण कर्म, स्वभाव का ऊँचा स्तर चाहिए। यह अध्यवसाय, वातावरण, मनन, चिन्तन और अभ्यास के आधार पर हस्तगत होता है। व्यक्तित्व का मूल्याँकन इसी आधार पर होता है। महत्वपूर्ण कार्य इसी के सहारे बन पड़ते हैं। गौरव गरिमा इसी के आधार पर निखरती है। महा मानवों में गणना कराने वाली विभूति यही है। अपने देश में इसी सुसंस्कारिता को प्रमुख माना गया है। इसके लिए अध्ययन-अध्यापन ऐसे रखा जाता था जिसके सहारे व्यक्ति सभ्य एवं सुसंस्कारी बन सके। इसके लिए ऐसे ही सान्निध्य संपर्क की भी आवश्यकता रहा करती है। अनुकरण प्रिय वृति होने के नाते मनुष्य को ऐसा सान्निध्य चाहिए जिससे सद्गुणों का निरन्तर अभ्यास बढ़ता रहे। साहित्य का अध्ययन चिन्तन, मनन का उपक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे चेतना का स्तर सुविकसित होता हो। यह विभूति जिसे उपलब्ध है वह शरीर से चाणक्य जैसा कुरूप अष्टावक्र जैसा अपंग कालिदास जैसा अशिक्षित, सुदामा जैसा निर्धन होते हुए भी इन कमियों के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र में रुकता नहीं। सफलता की दिशा में द्रुतगति से आगे बढ़ता जाता है।
भारत की देव मानवों की निवास स्थली देव भूमि मानी जाती रही है। इसका कारण यहाँ जन्मने वालों की कायकलेवर सम्बन्धी विशेषता से कोई संबन्ध नहीं रहा है। शरीरों की रचना जैसी पुरातन काल में थी वैसी ही अब भी है। सच तो यह है कि साधन-सुविधाओं की दृष्टि से हम पूर्वजों की तुलना में कही अधिक सुसम्पन्न हैं। कमी है तो मात्र सुसंस्कारिता की। इस सबके कारण ही व्यक्ति हर दृष्टि से दीन हीन हो गया है। धूर्त्तता, लोलुपता, वितृष्णा जैसे दुर्गुणों के कारण व्यक्ति सम्पन्नता और शिक्षा के रहते हुए भी असंतोष और उद्वेग से हर घड़ी घिरा रहता है। स्वयं बेचैन रहता है और संपर्क क्षेत्र में किसी को चैन से नहीं रहने देता।
पुरातन काल के सतयुगी वातावरण को वापस लाने के लिए हमें सुसंस्कारिता का वातावरण पुनः बनाना होगा। यह कहीं बाजार में नहीं बिकती ओर न पेड़ों पर लगती है। उसके लिये व्यक्ति का कार्यक्षेत्र श्रेष्ठ सज्जनों से घिरा और शालीनता की विचार धारा से भरा होना चाहिए। व्यक्तित्व की समग्र प्रगति का यही एक उपाय है। प्राचीन काल में घर-परिवार इसी विशेषता से भरे पूरे होते थे। उनके सामने ऐसा चिन्तन रहा था जिसके कारण सदा आदर्शों के चिन्तन में निरत रहना पड़े। उन दिनों छोटे-छोटे गाँव बसते थे ताकि उनका सुसंचालन भली प्रकार हो सके। एक दूसरे को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने हेतु, समय निकाल सके, ध्यान दे सके। अब मनुष्य बेतरह कट गया है। बड़े गाँव शहरों आदि में रहने व पारस्परिक संपर्क न मिल पाने के कारण मनुष्य जंगली इक्कड़ जानवरों की तरह एकाकी और उच्छृंखल जीवन जीने लगा है। दूसरों के साथ ताल मेल रखने वाली परम्परा एक प्रकार से समाप्त हो गयी।
हमने सदा से सतयुग की वापसी का सपना देखा है। अखण्ड ज्योति परिवार, गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि “परिवार परक” सम्बोधन ही हमें अच्छे लगते रहे हैं। इसीलिये आवश्यक समझा गया कि उनका विस्तार इस असामान्य स्तर का हो कि वे एक दूसरे का प्रभाव ग्रहण कर सकें, प्रभाव दे सकें। इस से तात्पर्य है छोटे नगर। विश्वनिर्माण, युगनिर्माण के लिए हमने ऐसे छोटे नगर बनाने का स्वप्न देखा है जिनमें सुसंस्कारिता के अभिवर्धन के समस्त साधन मौजूद हों। एक दूसरे के साथ पारिवारिकता के संबंध सूत्र में वे बंधें और निरन्तर सर्वतोमुखी प्रगति से लाभान्वित होते रहें।
गायत्री परिवार हमारी सर्व प्रथम एवं गायत्री नगर अंतिम संरचना है। स्थापना हम कर चुके, उन्हें गतिशील बनाना परिजनों का काम है। स्वप्न हमने देखा, साकार उसे आप कर दिखाएँ। सतयुग की नवयुग की कल्पना ही नहीं हमने की उसका विधान, स्वरूप, विवेचन एवं कार्यक्रम भी प्रशिक्षित किया अब बारी परिजनों की है कि वे उस राजमार्ग पर चलें और उस मार्ग पर पहुंचें जहाँ केवल अपनी, अपने परिवार की वरन् समस्त संसार की सुख सम्पन्नता ओर प्रगति की संभावनाएँ छिपी पड़ी है।
हमने शान्ति कुँज की छोटी एवं गायत्री नगर की बड़ी इमारत इतनी जल्दी और इतने भव्य रूप में बना दी कि उसे विश्वकर्मा की कृति कहा जा सकता है। अब बारी है कि उसे हरी-भरी फुलवारी के रूप में सुविकसित कर दिखाएँ।
मानवों सत्ता दो हिस्सों में बँटी हुई है, एक काया, दूसरी चेतना। काया के लिए साधनों की आवश्यकता पड़ती है। साधनों में अन्न, वस्त्र, निवास जैसी वस्तुओं की गणना होती है। चेतना की आवश्यकता दो के साथ जुड़ी हुई है। एक अध्ययन-अध्यापन। दूसरा संपर्क वातावरण। व्यक्तित्व का विकास पूरी तरह चेतना के परिष्कार से सम्बन्धित है। उसका स्तर ऊँचा रहे तो अधिक सस्ते, हल्के और स्वल्प साधनों से काम चल जाता है। ऋषि-मुनियों की मनीषी-योगियों की जीवनचर्या पर दृष्टिपात करने से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि औसत भारतीय स्तर का एवं ब्राह्मणोचित जीवन किस प्रकार मनस्वी लोगों के लिए सम्भव है।
इतने पर भी प्रश्न वहीं का वहीं है कि मनःशक्ति का स्तर केवल ऊँचा उठाने की व्यवस्था बनाते हुए भी शरीरगत आवश्यकताएँ बनी ही रहेंगी और वे जुटानी ही पड़ेंगी। इसके बिना किसी भी प्रकार गुजारा नहीं। ज्ञानविहीन व्यक्ति किसी प्रकार उल्टा-सीधा खाते हुए पशुओं की तरह भी जी सकता है पर ज्ञानवान के लिए अनशन रखकर जीवित रहना शक्य ही नहीं। विनोबा जैसे संत भी अनशन पर जीवित न रह सके।
प्रश्न सतयुग की वापसी का चल रहा है। देव मानवों की पुरातन परम्परा पुनर्जीवित करके धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार करने के लिए शरीर रक्षा की आवश्यकता तो यथावत् रहेगी ही। आग को ईंधन दिये बिना चूल्हा कैसे जले? खेत की सिंचाई का प्रबन्ध किये बिना पौधों की हरियाली कैसे टिके? इस प्रकृति के जड़ नियमों के सामने ज्ञानी-अज्ञानी प्रायः सभी एक से हैं। गाय हो चाहे गधा घास तो सभी को चाहिए।
पिछले पृष्ठों पर गायत्री नगर बसने की ऐसी योजना का स्वरूप विकसित किया गया है। जिसमें परिजनों को सुसंस्कृत बनाने वाले वातावरण, प्रशिक्षण की पूरी-पूरी विधि-व्यवस्था बनाई गई है। शान्तिकुँज की व्यस्त दिन चर्या में संलग्न रहकर मनुष्य अपने गुण-कर्म-स्वभाव को निश्चित रूप से ऊँचा उठा सकता है। यहाँ की दिनचर्या ऐसी है जिसमें अवाँछनीयता की आदतें सीखने की कहीं गुँजाइश है ही नहीं। उठने से सोने तक का व्यस्त कार्यक्रम ऐसा है जिसमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा का पग-पग पर क्रियान्वयन करना पड़ता है। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के उभयपक्षीय क्रिया-कलाप उसमें पूरी तरह गुँथे हुए हैं। इसलिए यह खतरा है नहीं कि जो लोग गायत्री नगर में बसेंगे, वे कायिक दृष्टि से उत्कृष्टता-सम्पादन में पिछड़ जायेंगे।
प्रश्न आजीविका निर्वाह का है। सो भी इस जमाने का जबकि लम्बे समय तक ब्रह्मचारी रहने का प्रचलन चला गया। साथ ही वानप्रस्थ परम्परा भी तिरोहित हो गई, सोलह-अठारह वर्ष के लड़के भी बाप बनने लगे हैं और जब तक काया जीर्ण-शीर्ण होकर साठ तक की नहीं हो जाती, तब तक यह प्रजनन का सिलसिला जारी रहता है। कोई समय था जब इन वर्जनाओं पर पूरा ध्यान दिया जाता था। लक्ष्मण-राम जैसों ने भी दो से अधिक सन्ततियों को जन्म देने का साहस नहीं किया। आज कुत्तों, बिल्लियों और बकरियों की तरह लोग युवावस्था में ही अनेकानेक बच्चों के बाप बन जाते हैं। दुष्परिणाम भी उसके भुगतते हैं। परिवार और घर की दरिद्रता, अभिभावकों पर चिन्ता, बच्चों पर दुर्बलता और सारे समाज पर विपत्ति टूटती है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि माँ-बाप का पूरा स्नेह-सान्निध्य पाये और साँस्कृतिक उत्कर्ष का पूरा प्रबन्ध किये बिना कोई भी बालक सुसंस्कारी नहीं बन सकता। जिसे संस्कार नहीं मिले वह माँ-बाप की कुबेर जैसी दौलत पा जाने पर भी दुर्दशा को ही प्राप्त होगा।
सतयुगी वातावरण में ढेरों व्यक्ति आजीवन ब्रह्मचारी, आजीवन वानप्रस्थ रहते थे। जो गृहस्थ बनते थे, वे विवाह के दिन ही दो बच्चों से अधिक को जन्म न देने की शपथ लेते थे। तब बड़े परिवारों में थोड़े बच्चे आर्थिक भार नहीं बनते थे। वे घर में खिलौना बनकर पूरे परिवार को अपनी उपस्थिति से सद्गुणी अध्यापन के लिए विवश करते थे। फिर उन दिनों कृषि, गो-पालन, शिल्प जैसे उद्योगों के माध्यम से छोटा परिवार भी दस का पेट पाल लेता था। आज तो परिस्थितियाँ उल्टी हो गयीं। आज सतयुग की वापसी का गंगावतरण सम्भव करने के लिए जो व्यक्ति इस प्रयोजन के लिए उत्साह प्रदर्शित करें उनके लिए नये सिरे से नई विचार पद्धति सोचनी पड़ेगी। ऐसे विकल्पों में एक यह हो सकता है कि पढ़ाई पूरी करने और वह आजीविका कमाने के बीच पाँच वर्ष का अन्तर रखा जाय और वह समय सतयुगी नव-निर्माण के लिए संकल्पित कर दिया जाय। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि पैतृक व्यवसाय को सम्भालने योग्य जब बच्चा बड़ा हो जाय तब उसके जिम्मे गृह-व्यवसाय चलाने की जिम्मेदारी सुपुर्द की जाय। इस प्रकार गृहस्वामी वानप्रस्थ के लिए जल्दी निवृत्त हो सकता है। सभी छोटे बच्चों की जिम्मेदारी से निवृत्त होने की प्रतीक्षा किये बिना भी वह प्रायः आधा जीवन सतयुग की वापसी के लिए आवश्यक कार्यों में लगाना आरम्भ कर सकता है।
तीसरा विकल्प यह हो सकता है कि संचित पूँजी से लाभ उठाकर बैंक में इस शर्त पर जमा किया जाय कि बढ़ते खर्च के अनुसार उतने समय पर उतनी मात्रा में पैसा ब्याज या मूलधन मिलाकर मिलता रहे। जवान होने पर बच्चे अपने हाथों कमाने लगें। अभिभावकों की कमाई वयस्क लोग पहले भी नहीं खाया करते थे। उसे श्राद्ध कर्मों में लगा दिया करते थे। अब फिर उस सतयुगी प्रचलन को वापस लौटाया जाय।
चौथी प्राचीनकाल की बड़ी महत्वपूर्ण परम्परा थी दान-दक्षिणा की। यजमान और पुरोहितों की एक परिधि होती थी। यजमान उत्पादन का दसवाँ अंश पुरोहित के लिए निकालता था। इससे ब्राह्मण परिवारों और साधु सम्प्रदायों के अन्न-क्षेत्रों का गुजारा चलता था। सामान्य समय पर दी गयी राशि ‘दान’ कहलाती थी और विवाह, जन्मोत्सव, अंत्येष्टि, श्राद्ध, उपनयन आदि किसी विशेष पर्व पर दिया हुआ धन ‘दक्षिणा’। स्थिर यजमान और स्थिर पुरोहित इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे का परिपोषण किया करते थे। ब्राह्मण अपने यजमानों की सर्वतोमुखी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि का उत्तरदायित्व सम्भालते थे। गुजारे के लिए साधन दान-दक्षिणा में मिल जाता था। तीर्थयात्री, गुरुकुल के विद्यार्थी स्थिर नहीं रहते थे। उनके चलते-फिरते कार्यक्रम रहते थे। इसलिए वे एक रोटी भर भिक्षा माँग कर काम चला लेते थे।
परिस्थितियों को देखते हुए यह पांचों परम्पराएँ इन दिनों कठिन दिखती हैं। भिक्षा एक व्यवसाय बन गया है। कुपात्रों ने इस पर बुरी तरह कब्जा जमा लिया है। इसलिए दान-दक्षिणा माँगना और देना दोनों ही अवाँछनीय बन गए हैं।
गायत्री परिवार बढ़ाने की शान्ति-कुँज योजना में आरम्भ में 240 परिवार बसाने का संकल्प किया गया है। उन सबसे कहा गया है कि वे अपनी अब तक की संचित पूँजी बटोरकर अपने नाम से बैंक में जमाकर दें। उससे जो ब्याज आता है उससे खर्च चलता रहे। जो कमी पड़ेगी, उसकी पूर्ति शान्तिकुँज- गायत्रीनगर से की जाती रहेगी। जो बच्चे अपने पैरों खड़े नहीं हो पाये उनके लिए घर भेजते रहने का भी एक विकल्प है। दूसरा सर्वोत्तम विकल्प यह है कि बच्चे सहमत हों तो उन्हें भी साथ ले आया जाय।
शान्तिकुँज गायत्रीनगर में 240 परिवारों के रह सकने योग्य स्थान की व्यवस्था की गई है। उद्योग आदि भी इसी अनुपात में निर्धारित किये गये हैं। जिन्हें भविष्य में जो बनाना है, उसके निमित्त शिक्षा का समुचित प्रबन्ध भी है। बच्चों की शिक्षा में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि उन्हें नौकरी तलाश करने के लिए ठोकरें न खानी पड़ें। ऐसा क्रम चलता रहे कि वे बड़े होने पर अपने माता-पिता, भाई-बहनों की सेवा सहायता करते हुए उसी प्रकार जीवन निर्वाह करें जिस प्रकार सतयुगी ग्रामीण जीवन में किया करते थे।
प्राचीन काल के ब्रह्म परायणों की तीन पहचान थी। (1) उच्चस्तरीय ज्ञान (2) बढ़-चढ़ कर सेवा साधना करना (3) न्यूनतम में निर्वाह। सतयुग में रहने वाले देव मानव की पहचान इन्हीं तीन गुणों से होती थी। आज तो सब कुछ उल्टा हो गया है। तथाकथित सन्त सोने-चाँदी के छत्रों के आच्छादन ओढ़े हाथियों की सवारी पर हीरे-मोतियों के आभूषण पहनकर निकलते हैं। लोग कुछ भी कहें पर निर्धारित मूल्य तो जहाँ के तहाँ रहेंगे। प्राचीन काल में स्पर्धा इस बात की होती थी कि कौन कितना ज्ञानवान बना, कितना सेवा में निरत रहा और कितने कम में अपना निर्वाह चलाया।
गायत्री नगर में 24 अक्षरों के अनुरूप 240 ब्रह्म परिवार बसाने का अपना निश्चय है। भविष्य में इन्हें एक मण्डल सौंपकर मण्डाधीश बना दिया जायेगा। अभी लगभग 120 परिवार अपना बसेरा डाल चुके हैं। इसी वर्ष सूक्ष्मीकरण का संकल्प पूरा करते हुए इस नगर में 120 ब्रह्म परिवार बसाने का निश्चय है। ब्रह्मचारी ब्रह्मचारिणी सम्मानास्पद तो रहेंगे पर वैसा कोई प्रतिबन्ध नहीं रखा गया है, क्योंकि जिन्हें आश्रम व्यवस्था चलानी है उन्हें धर्मपत्नी का सहयोग चाहिए। जैसा कि इन पंक्तियों के लेखक को मिला। इसलिए हम सदा विचारशील और आदर्शवादी युग्म बनाने के लिए कहते रहे हैं।
अपनी साधना पूर्णाहुति क्रम पूरी करते हुए हमने इतने झोंपड़े बना लिए हैं जिनमें 240 ब्राह्मण परिवार रह सकें। कुछ कमी पड़ रही है। उसके सम्बन्ध में विश्वास है कि परिजन थोड़ी और उदारता दिखा देंगे तो जो कमी है वह भी इस वर्ष पूरी हो जायेगी। बसने वालों में उन वानप्रस्थों को प्रधानता दी गई है जो बच्चों के उत्तरदायित्व से निवृत्त हो चुके। इतना तो करना ही होगा कि यहाँ आकर नया सन्तानोत्पादन बन्द कर दें। नये बच्चे जनने वाले लोक सेवी संस्था का खर्च बढ़ाते हैं। अपना और पत्नी का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य गिराते हैं। इसलिए प्रवेश देने के साथ अब ब्रह्मचारी रहने की तो नहीं, पर नये बच्चे उत्पन्न न करने की प्रतिज्ञा तो लेनी ही होगी।
जो यहाँ रहेंगे, उनकी कार्य पद्धति इस प्रकार निर्धारित की गई है - (1) पाँच घण्टे मिशन के लिए सेवा कार्य, (2) तीन घण्टे निज की ज्ञानवृद्धि, अध्ययन अभ्यास। (3) दो घण्टे श्रमदान- आश्रम व्यवस्था का।
इस प्रकार दस घण्टे व्यस्तता के, चौदह घण्टे विश्राम, नित्यकर्म, भजन-पूजन आदि के। चौबीस घण्टे इस प्रकार जो भी व्यस्त रहेगा उन्हें शैतान के चंगुल में फँसने का अवसर ही न मिलेगा। खाली दिमाग- खाली समय शैतान के कबाड़खाने की दुकान है। सभी आश्रम वासी समय के शिकंजे में कसे रहेंगे तो शारीरिक और मानसिक खुराफातें करने का अवसर ही न मिलेगा, संयमी और सुव्यवस्थित, सन्त-सात्विक जीवन व्यतीत होने लगेगा। साधना का आधार तो सुव्यवस्थित दिनचर्या पर निर्भर रहता है।
व्यक्तिगत दान-दक्षिणा माँग कर निर्वाह करना निषेध है। क्योंकि आज की परिस्थितियों में ऐसे दान पर नियन्त्रण या परीक्षण का कोई कारगर प्रतिबन्ध नहीं है। गायत्री नगर में नौकरी तो किसी को नहीं मिलती पर यहाँ इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाता है कि औसत भारतवासी की तुलना में कोई भूखा-नंगा न रहे। समुन्नत जीवन जी सकने के लिए आवश्यक वस्तुओं से किसी को भी वंचित न रहना पड़े। इतनी ही हमारी परिधि और इतनी ही ईमानदारी की मर्यादा भी। जो अमीरों की तरह गुलछर्रे उड़ाना चाहते हैं, उन्हें देश की परिस्थितियाँ सम्भवतः दिखाई नहीं देतीं। भले ही उनने वह वैसा कानूनी व्यापार या निर्धारित वेतन के द्वारा ही क्यों न कमाया हो यदि हम भारत माता को माँ कहते हैं और उसके सभी बालक अपने सहोदर हैं तो यह हो ही नहीं सकता कि एक कोदों खाए और दूसरे मलाई उड़ाएं।
जिनके पास अपनी संचित संपदा है, वे उसे मात्र बेटों के लिए छोड़कर संस्था में गुजारा पाने का प्रयत्न करेंगे तो यह बेईमानी होगी। प्रत्येक आश्रमवासी का काम चलाऊ खर्च चल जाय, इसके लिए अन्यान्य आवश्यक सुविधाएं देकर उनका खर्च कम दिखाने का प्रयत्न किया गया है। जैसे कि निवास की सुविधा, बिजली आदि का प्रबंध, बच्चों की शिक्षा एवं फीस, एक सेट वस्त्र पढ़ने का एक सेट खेलने का सभी आश्रम की ओर से हैं। इसके लिए अतिरिक्त कुछ खर्च आश्रमवासी को नहीं देना पड़ता, घर में शाक वाटिका लगाने की इतनी जगह है कि प्रतिदिन तरकारी न सही- चटनी का आनंद तो हर दिन लिया जा सकता है। रोजमर्रा की बीमारियों के लिए चिकित्सालय सुविधा फ्री है। इन सब खर्चों की लागत जोड़ ली जाय तो अच्छी-खासी रकम बैठती है। फिर एक स्त्री, एक पुरुष, एक बच्चे वाले परिवार को 330 रु. नकद। परिवार बड़ा होने पर अधिक।
पुरुषों के जिम्मे तीन काम सेवा स्वाध्याय संबंधी हैं- (1) प्रेस, टाइप, साहित्य की ढूंढ़-खोज, अन्य भाषाओं को पढ़ना- यह स्वाध्याय वर्ग हुआ। (2) दूसरे- सत्संग वर्ग में सुगम संगीत, शास्त्रीय संगीत, संभाषण, भाषण, कथा-कीर्तन, दृश्य-श्रव्य माध्यमों से प्रचार कार्य, स्लाइड प्रोजेक्टर, वीडियो आदि के माध्यम से युग चेतना का संदेश। (3) तीसरा- आश्रम की स्थानीय व्यवस्था है जिसमें बागवानी, भोजनालय, सफाई, चौकीदारी, रात्रि का पहरा आदि आते हैं। इन कार्यों में से पांच घंटा आश्रम सेवा के निमित्त करना होता है।
दो घंटा स्वयं के पढ़ने के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न कक्षाओं के बालक बालिकाओं, महिलाओं, पुरुषों को भाषा ज्ञान कराना, संगीत तथा निर्धारित उद्योग का शिक्षण भी देना होता है। जिन्हें ऐसा कुछ नहीं आता, उन्हें प्रथम तो पढ़ाया जायेगा, फिर अध्यापकों की सेवा शृंखला में नियुक्त कर दिया जायेगा।
स्त्रियों में से अधिकांश के पास समय खाली रहता इसलिए उन सबको खाली समय में पढ़ाया जायेगा। समानता एवं सादगी की दृष्टि से सभी पीले वस्त्र पहनती हैं। जेवर पहनने की हर किसी को मनाही है। महिलाओं के लिए कुछ ऐसे गृह उद्योग भी रखे गये हैं जिन्हें वे फालतू समय करती हुई कुछ अतिरिक्त पैसा भी कमा सकती हैं।
गायत्री नगर की शिक्षा प्रणाली सरकारी पाठ्यक्रम से भिन्न इस दृष्टि से बनाई गई है कि बच्चों को न नौकरी करनी है, न करानी है। अब भी जो नौकरी के स्वप्न देखते हैं उन्हें पूरा शेखचिल्ली समझना चाहिए। हर साल जो सरकारी नौकरियां खाली होती हैं वे विशेष स्तर वालों की होती हैं। अच्छे नंबर लाने पर भी जो गरम नहीं कर सकते, वे हाथ मलते रह जाते हैं। हम वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के पक्षपाती हैं। हम चाहते हैं कि मनुष्य के दैनिक जीवन में काम आने वाली समस्याओं के समाधान ही पढ़ाए जायं। साथ ही ऐसे उद्योग-धंधे भी सिखाए जायं जिनकी खपत हर गांव में हो। इस प्रकार नौकरी की मृगतृष्णा से बचा जा सकेगा एवं बर्बाद होने वाला समय तथा धन ऐसे काम में आ सकेगा जो दैनन्दिन जीवन के लिए उपयोगी हो। यहां पहली से लेकर दसवीं तक की शिक्षा पद्धति है। यह सरकारी शिक्षा से एकदम भिन्न है। सोलह अठारह की आयु तक यह पढ़ाई पूरी हो जानी चाहिए। इसके बाद विद्यार्थी आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी हो जाना चाहिए। उन्हें कहीं भी काम खड़ा करने या नौकरी पाने का अवसर मिल जाना चाहिए। इसलिए सबसे पहले गायत्री नगर में अपना औद्योगिक कक्ष बनने जा रहा है जिसमें सर्वप्रथम अपनों को ही जगह दी जा सके। ऐसे उच्चस्तरीय वातावरण में पढ़े हुए लड़की लड़के अपने ही आश्रम में रहें तथा एक-एक प्रज्ञापीठ संभाल ले तो सन् 2000 तक का उत्पादन उसमें पूरी तरह खप सकता है।
गायत्री नगर की इस विद्यालयीन योजना के पीछे ऐसी पीढ़ी उत्पन्न करने का उद्देश्य है जिसमें देवत्व झिलमिलाता दृष्टिगोचर होने लगे। धरती पर स्वर्ग का निर्धारण करने के लिए ऐसी ही शिक्षा पद्धति की आवश्यकता भी है जैसी कि गायत्री नगर के मध्य से सुनियोजित की गई है।
लोग बढ़-चढ़कर अपना नाम चाहते हैं, पर उनका कुछ मूल्य भी चुकाना पड़ेगा, क्या यह वे सर्वथा भूल जाते हैं? समय के बदले स्वास्थ्य, श्रम के बदले धन, सौहार्द के बिना मैत्री की कीमत चुकाये बिना काम नहीं चलता। इतना भर समझ लेने पर भटकना छोड़कर सही मार्ग पर चलने का निश्चय किया जा सकता है और बिना कठिनाई के अभीष्ट लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। हर पिता चाहता है कि उसकी संतान उसकी अपेक्षा सुयोग्य और सुसम्पन्न बने। इतने पर भी वह भूल जाता है कि इसके लिए क्या करना चाहिए। अधिक पैसा खर्च करने से अधिक लाभ उठाये जा सकते हैं, यह बात आंशिक रूप में ही सच है।
लव-कुश का पालन बाल्मीकि के यहां, चक्रवर्ती भरत का कण्व ऋषि के आश्रम में, कृष्ण का प्रशिक्षण संदीपन ऋषि के आश्रम में तथा राम-लक्ष्मण का बला-अतिबला का शिक्षण ऋषिवर विश्वामित्र के पास हुआ था। गुरुकुलों की प्राचीन पद्धति यही थी जिसमें लौह-खण्ड को स्वर्ण बनाने का अवसर मिलता था। ऐसा ही यह गुरुकुल गायत्री नगर को बनाने का अपना मन था पर समय बड़ी जल्दी समापन की ओर आ गया। इसी कारण यह कार्य अपने अनुचर-अनुयायियों के हाथों छोड़ना पड़ रहा है। भले ही अगले 16 वर्षों तक अध्यापन मार्गदर्शन प्रत्यक्ष स्तर का हमारा योगदान न रहे।
आगन्तुकों के लिए आह्वान इन पंक्तियों में भेजा जा रहा है। पिछले पृष्ठों पर लिखी संबंधित शर्तें जिन्हें अनुकूल लगती हों उन्हें छोटे-मोटे व्यवधानों से मुक्त हो, व्यवस्था को जिस-तिस प्रकार समेट कर आने की तैयारी करना चाहिए। आज लोग जिस प्रकार समस्याओं का हल चाहते हैं वह बड़ा बेढव होता है। ‘‘नौ मन तेल जुटने पर राधा का नाच ठनने की प्रतीक्षा’’ कहावत रचने वाले के जमाने में भी हंसी का विषय रही और आगे भी वह उपहासास्पद मानी जाती रहेगी। परिस्थितियां हमारी इच्छानुकूल बनती चली जायं, यह आशा नहीं करनी चाहिए। जैसा भी अवसर सामने है उसी को तोड़-मरोड़कर व्यवस्था बना लेनी चाहिए। ऐसा सोचने वाले कुछ ऐसा मार्ग ढूंढ़ सकते हैं कि एक वर्ष पर्यटन भ्रमण में न सही सेवा-साधना हेतु पांच वर्ष के लिए संलग्न हो सकें। नये युग के अनुरूप नये शिक्षण का, नये निर्माण का एवं अपने तथा दूसरों के जीवन क्रम को ढालने वाले देखने में छोटे किन्तु परिणाम में महान कार्य संपन्न कर सकें ऐसी जीवन-पद्धति के विकास हेतु खपने वाले लोक-सेवी कहीं होंगे तो अवश्य मिलेंगे।
अपना भविष्य जिन्हें किसी भी प्रकार मालदार बनने का- आंखों में छाया रहता है ताकि बच्चे रिश्वत की कमाई खाकर अमीर-धनवान बनें, उन बड़े आदमियों के बड़प्पन के लिए हमें कुछ नहीं, बस एक ही बात कहनी है कि आने वाले समय की लहर ऐसी परिस्थितियों को जीवित नहीं रहने देगी। लोगों को पैसे की दृष्टि से अमीर बनाने वाले सभी साधन देखते-देखते चले जायेंगे। जाते समय लानत और सिर पर थोप जायेंगे। अच्छा हो, बच्चों के वास्तविक शुभ-चिंतक उनके भविष्य एवं निर्वाह के लिए कोई व्यावहारिक योजना बना लें, जिसके आधार पर स्वयं को यशस्वी एवं बच्चों को सम्मानास्पद बनने का अवसर मिले।
कहना न होगा कि इस संबंध में एकमात्र प्रणाली गुरुकुल की ही हो सकती है। जिनमें ज्ञान, व्यवहार और उपार्जन तीनों ही संतुलित ढंग से पढ़ाये जाते थे। ऋषियों के युग में गुरु पिता का और गुरु-माता जन्मदात्री का भी उत्तरदायित्व संभालती थी। इसलिए सारे गुरुकुल सफलतापूर्वक चलते थे। अब चाहे गुरुकुल हों चाहें स्कूल मास्टर लोग पैंतालीस मिनट का लेक्चर झाड़कर चल देते हैं। माँ-बाप को बच्चों को मार्गदर्शन देने का समय है नहीं। ऐसे में शिक्षा का स्तर ऊँचा उठे तो कैसे?
गायत्री गुरुकुल में बच्चे उन्हीं के लिये जायेंगे जिनके अभिभावक भी साथ रहते हों। नवयुग के बालक कैसे बनेंगे, यह प्रशिक्षण बालक, माता-पिता तीनों को एक साथ रहकर लेना होगा। उसी का यहाँ प्रबन्ध भी किया गया है। किसी के अकेले बालक भर्ती न करने का नियम इसलिए है कि जो कार्य तीनों को मिलकर करना है, उसे बालक अकेला हल न कर सकेगा। बच्चों को जितना पढ़ाया जायेगा, उससे अधिक माँ-बाप को पढ़ाना होगा ताकि अपने साथ अधिक समय बिताने वाले बालकों को वे सतत् संस्कार देते रह सकें।
स्मरण रहे, नौकरी का आर्थिक परावलम्बन जीवन के हर क्षेत्र में परावलम्बन की शिक्षा देता है। इससे मौलिक प्रतिभा का विनाश हो जाता है। यह जीवन के साथ विश्वासघात है। मनुष्य श्रमिक तो बने पर नौकर नहीं। श्रमिक एवं नौकर में क्या अन्तर होता है, इसे गायत्री नगर के विद्यालय में कुछ ही दिन रहकर देखा और सीखा जा सकता है।
गाँधीजी ने बुनियादी तालीम पर बहुत जोर दिया था। वे चाहते थे कि बच्चे छोटी आयु से ही उपार्जन की कला सीखें और माँ-बाप पर भार बने बिना अपना शिक्षण और निर्वाह जारी रख सकें। ऐसी पद्धति से ही दारिद्रय और निरक्षरता के चंगुल में फँसे इस देश को पतन-पराभव के दलदल से ऊपर निकाल सकना सम्भव हो सकेगा। इस आदर्श को व्यवहार रूप में परिवर्तित कर सकना, जहाँ तक सम्भव हो सकता था, यहाँ किया गया है।
(1) बच्चे में स्वावलम्बन (2) अभिभावकों का मिनी प्रशिक्षण (3) परिवार का निर्वाह। यह तीनों ही उद्देश्य प्रस्तुत शिक्षा-प्रणाली में पूरे होते हैं और भौतिक जीवन में ही हँसते-हँसते जीने रहने का लाभ मिलता है। इससे भी बड़ा लाभ चेतना-पक्ष की आध्यात्मिक प्रगति से जुड़ा है। (1) गुण-कर्म-स्वभाव का परिष्कार (2) चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश (3) ऐसे वातावरण में रहने का अवसर जिसकी तुलना चन्दन के बगीचे में उगने वाले पौधों से की जा सके।
अब तक शिक्षा के सुधार ओर समर्थन के सम्बन्ध में कितने ही कार्य सोचे और प्रसंग खोजे गये हैं, पर ऐसा एक ही नहीं मिला जिससे अभिभावकों का- परिवार का निर्वाह, विकास भी साथ-साथ चलता रहे और बच्चे स्वावलम्बी शिक्षा प्राप्त कर सकें। परिस्थितियों के अनुरूप मार्ग तो खोज लिया गाय किन्तु लोगों में कमी यही दीख सकती है कि गुरुजी शरीर रूप में अध्यापन कार्य का संरक्षण- मार्गदर्शन नहीं कर रहे। यह सूक्ष्म दृष्टि वालों को तो नहीं लगेगा, किन्तु मोटी नजर रखने वालों को तो यही आभास होगा। शरीर रहित रूप में भी देवशक्तियाँ इस संसार में बड़े-बड़े कार्य कर रही हैं। हम भी गायत्रीनगर की व्यवस्था और शिक्षण-पद्धति को अपने परोक्ष हाथों से चलाते दीख पड़ें तो किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए। स्वावलम्बी शिक्षण-पद्धति की यह एक अच्छी शुरुआत है- एक नमूना है।
सामान्यतः प्रचलित कुरीतियों, दुर्व्यसनों एवं खर्चीले अनुकरण में ही पैसा खर्च होता है। इससे अधिक कमाने वाले भी गरीबों की तरह रहते हैं। जबकि कम उपार्जन करने वाले, सुविकसित जीवन-पद्धति अपनाने वाले उनकी अपेक्षा कही अच्छा जीवन जी लेते हैं। नौकरी पहले तो मिलती ही नहीं। मिलती भी है तो अपेक्षा से निचले स्तर की एवं निरन्तर तब्दीली उसमें होती रहती है। फलतः न ही स्थिर शिक्षा हो पाती है, न किसी के साथ मित्रता सफल हो पाती है। विदेशों की बात अलग है। भारत का अर्थतन्त्र और समाजतन्त्र ऐसा है, जिसमें सामूहिक साहचर्य और प्रसन्नता बनाये रखी जा सकती है।
शिक्षा तन्त्र का यह ढाँचा खड़ा किया गया है। यह एक स्थानीय संस्था में चलने वाला प्रयोग परीक्षण भर नहीं है। वरन् आशा यह की गयी है कि साधनों के अभाव में अभी इसे छोटे रूप में प्रयोगात्मक आधार दिया जाय तो आगे यह निश्चित सफल हो विस्तृत रूप लेगा। इसकी सफलता का अर्थ है- शिक्षा संवर्धन की महती आवश्यकता की पूर्ति।
गायत्री नगर भावी विश्व निर्माण की एक छोटी किन्तु शानदार योजना है। अपने ही पुरुषार्थ से अपनी उचित आवश्यकताएँ पूरी करने, वर्तमान को हँसता-हँसाता बनाने और उज्ज्वल भविष्य की फुलवारी खिलाने के सारे बीज उसमें मौजूद हैं। हर समझदार ऐसी आजीविका चाहता है जिसमें चोरी बेईमानी न करनी पड़े। साथ ही ऐसा काम बन पड़े जिससे देश, धर्म, समाज, संस्कृति को आत्म-सन्तोष और लोक-सम्मान प्रदान करने वाली सेवा साधना भी निभ सके। इन तथ्यों को मिलाकर यह योजना बनी है।
जन-जागरण के गायन, वादन, प्रवचन आदि की झंकार गाँव-गाँव पहुंचनी चाहिए। गायत्री नगर के निवासियों में से जिनकी योग्यता इस प्रकार विकसित हो सकेगी उन्हें आठ महीने जीप गाड़ियों में प्रचार कार्य हेतु बाहर रहना पड़ेगा। चार महीने यहाँ रहेंगे। जिनमें साहित्यिक अभिरुचि होगी, उन्हें प्रेस, टाइपराइटर शिक्षण, साहित्य सृजन सम्बन्धी कार्यों में लगा दिया जायेगा। जिनमें अभिनय के तत्व होंगे, उन्हें वीडियो में स्थान दिया जायेगा। यह वे प्रचार कार्य हैं जिनमें संलग्न होना आमन्त्रित प्रतिभाओं के लिए अनिवार्य है।
समाजसेवियों की, अध्यापनकर्ताओं की, साहित्य सृजन में रुचि लेने वालों की शिक्षा तद्नुरूप ही होगी, पर साथ ही यह भी ध्यान रखा जायेगा कि यह लाभ नौकरी के लिए तो नहीं किया जा रहा है। हमें ऐसे लोकसेवी बसाने हैं जो राष्ट्र-निर्माण के कार्य में लगें और औसत भारतीय के गुजारे पर सन्तोष करें।
नगर की आर्थिक पूर्ति के लिए मुख्य योजना दयालबाग आगरा जैसी है जिससे वहाँ के निवासी, उनके बच्चे बड़ी संख्या में वहीं रहते हुए उद्योग-धंधों से ही अपनी आजीविका चला लेते हैं। यह प्रक्रिया आरम्भ कर दी गयी है।
जिसे उच्चस्तरीय मन को लुभाने वाले उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण होने के साथ-साथ प्रेम और सहयोग से भरे वातावरण में भर पेट सम्मान के साथ साफ-सुथरे कपड़े पहनने ओर भोजन पाने का अवसर हो, वहाँ कौन न रहना चाहेगा। हमारा प्रत्यक्ष तो नहीं, पर परोक्ष संरक्षण यहाँ हमेशा उपलब्ध होते रहने के कारण इस योजना से लाभान्वित होने वाला अपने भाग्य को सराहता ही रहेगा।
फिर यह अपील क्यों छपी? इसका एक कारण है कि सुसंस्कारी, सुव्यवस्थित परिवार बस सकें तो आगंतुकों, दर्शकों को उत्साह मिलेगा और वे भी अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसा ही निर्माण आरम्भ कर देंगे। आरम्भ में ही यदि कूड़ा-करकट भर गया तो संख्या पूरी हो जाने पर भी वातावरण न बन सकेगा। जिन आदर्शों के स्वप्न देखे गये हैं, उनकी पूर्ति यदि हो सकी तो अभी का एक विद्यालय अनेकों गुना विकसित होकर रहेगा।
हमारी इच्छा है कि इस अपील का आलोक उन तक पहुँचे जो शरीर से श्रमशील, मन से बुद्धिमान और चरित्र से प्रखर-पवित्र हैं यह बन पड़ा तो योजना आगे चलकर ऐसी शानदार सिद्ध होगी जिसे देखकर किसी को भी हमारे अदृश्य हो जाने का अभाव खटकेगा नहीं।
आवेदन-पत्र
(इसकी प्रतिलिपि भरकर भेज दें व स्वीकृति की प्रतीक्षा करें।)
(1) कब से कब तक की तिथियों में शिविर में सम्मिलित होने का सोच रहे हैं।
(2) नाम, पता, आयु, शिक्षा, व्यवसाय, जन्म-जाति।
(3) अपना कोई दोष-दुर्गुण हो तो उसका उल्लेख।
(4) अपनी कोई विशेषता हो तो उसका उल्लेख।
(5) अपने परिवार का परिचय।
हस्ताक्षर
*समाप्त*