चार दिन की सत्र शृंखला अब मार्च, अप्रैल में भी जारी रहेगी

प्रस्तुत बसन्त पर्व उद्घाटन सत्र के रूप में मनाया गया। 2 सत्रों के फरवरी बसन्त पर्व को पाँच सत्रों में बदल दिया गया व अगणित परिजनों को भाषा धर्म महाविद्यालय, पत्रकारिता शिक्षण एवं वीडियो फिल्मांकन स्टूडियो के रूप में आरम्भ हो रही नई प्रवृत्तियों से सम्बन्धित इन सत्रों में स्थान दिया गया। पूज्य गुरुदेव की बहिरंग से निवृत्ति एवं एकाकी तपश्चर्या के इस पर्व से शुभारम्भ पर परिजन को दो प्रतीक सतत् उनके सूक्ष्म संरक्षण व उपस्थिति का बोध कराने हेतु दिये गये।

बढ़ते उत्साह एवं असीम उत्कण्ठा को दृष्टिगत रख इस सत्र शृंखला व परिजनों के क्रियाकलापों के वीडियो फिल्मांकन को मार्च में भी जारी रखने का निर्णय लिया गया। अब मार्च में 3 से 31 तारीख तक चार-चार दिन के कुल 6 सत्र हैं । हर शिविर के बीच में एक दिन का स्थान खाली रखा गया है । इन पंक्तियों के लिखे जाने तक माँग जारी है। अतः अन्य शिविरों के साथ अप्रैल व आवश्यक हुआ तो मई में भी ये सत्र जारी रहेंगे। यह सबको ज्ञात ही है कि प्रतीक मात्र उन्हीं को दिये जा रहे हैं जो इन सत्रों में आएँगे वीडियो, स्टूडियो तो क्रियाशील रहेगा ही । परिजन सुविधानुसार अनुमति मँगा लें।

वर्ष 49 संस्थापक -वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य मार्च 1984 वि.सं. आश्विन कार्तिक-2050 अंक-3 उपासना विशेषाँक वार्षिक चंदा :- भारत में 40/- आजीवन -550/- विदेश में 350/


नीतिमत्ता- एक अनुशासन, एक अनुबन्ध

सहकारिता के आधार पर ही मनुष्य बुद्धिमान, बलवान, सम्पत्तिवान बना है। सहकार को मानवी प्रगति का उद्गम माना जाता है। विचारणीय है कि आखिर यह सहकार है क्या? तनिक-सा विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय ही सहकार है। इस प्रक्रिया को अपनाने पर समृद्धि और प्रगति का वातावरण बनता है। सहकार को समाज की उन्नति एवं संस्कृति का मेरुदण्ड कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति न होगी। इस सत्प्रवृत्ति को अपनाने की प्रथम शर्त यही है कि व्यक्ति औचित्य की मर्यादा में रहे, औसत स्तर की सुविधा से सन्तुष्ट रहना सीखे और वह आधार अपनाए, जिसमें अन्यायों के हित कटते न हों। अपनी भलाई उसी सीमा तक की जाए, जिसमें दूसरों के साथ बुराई करने पर उतारू न होना पड़े। नैतिक अनुशासन इसी के लिये बाधित करता है। धर्मधारणा का विशालकाय कलेवर मनुष्य को इसी परिधि में रहने के लिये- स्वेच्छा-सहमत रखने के निर्मित बनाया-खड़ा किया गया है।

धर्म किसी प्रथा, प्रचलन, कर्मकाण्ड या पूजा विधान को नहीं कहते, वरन् वह एक ऐसा राजमार्ग है जिस पर चलने वाले को बाईं ओर रहना और बिना टकराये चलना पड़ता है। नीतिवान ही धर्मात्मा है। कर्मकाण्डी तो पुजारी भर कहे जा सकते हैं । धर्म और सहकार की एकात्मता पर ही समाज का ढाँचा खड़ा हुआ है। नीति-मर्यादाओं का पालन ही धार्मिकता है। जहाँ भी इनकी उपेक्षा होगी- मनमर्जी बरती जायेगी। अराजकता फैलेगी और समाज संरचना का ढाँचा ही बिखर जाएगा। अध्यात्म अनुशासन का तकाजा व्यक्ति को इसी दृष्टि से नीति-नियमों के बन्धन में रहने हेतु बाधित करता है।


विधि का विधान- कर्म का प्रतिफल

नारद उस बार नैमिषारण्य होकर विष्णुलोक जा रहे थे। मार्ग में दो सरोवर पड़े। जल निर्मल भी था और शीतल भी। पर आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य तो क्या कोई पशु पक्षी तक उनका पानी न पीता था। प्यासे होते हुए भी उन्हें छोड़कर चले जाते।

नारद वहाँ पहुँचे तो देखकर आश्चर्यचकित रह गये। सरोवरें स्वयं बहुत दुःखी थीं। पूछने पर भी वे कोई कारण न बता सकीं। भाग्य का विधान कह कर चुप हो गईं। बोली आप विष्णुलोक जा रहे हैं तो हमारा पाप और उसका प्रायश्चित पूछते आइए।

आगे बढ़े तो नारद ने ऐसा ही एक और आश्चर्य देखा। दो विशालकाय आम्र वृक्ष थे। मधुर फलों से लदे हुए। आश्चर्य इस बात का है कि उस मार्ग से निकलने वाले उस क्षेत्र में रहने वाले मनुष्य तो दूर कोई पक्षी तक उन फलों को नहीं खाता था। तिरस्कार, बहिष्कार का अपमान उन्हें बहुत दुःख दे रहा था।

आश्चर्यचकित नारद ने कारण पूछा तो वृक्ष कुछ बता न सके। उन्हें भाग्य विधान के अतिरिक्त और कुछ विदित ही नहीं था। बोले आप भगवान के यहाँ जा रहे हैं तो हमारे पाप और उद्गार भी पूछते आइए।

आगे बढ़ने पर देवर्षि ने ऐसा ही एक और आश्चर्य देखा। दो गौएँ थीं। हृष्ट-पुष्ट और दुधारू। बछड़े दोनों के साथ। किन्तु मनुष्य तो क्या बछड़े तक उनका दूध नहीं पी रहे थे। यह भी कम विष्मयजनक प्रसंग नहीं था। नारद गौओं के पास गये। पूछने पर वे भी कारण बता नहीं सकीं और उल्टा उद्धार का उपाय पूछने लगीं।

विष्णुलोक में पहुँचने पर नारद ने अन्यान्य वार्ताओं के उपरान्त उन तीनों बहिष्कृत अपमानितों के भाग्य विधान और प्रायश्चित का कारण निवारण बताने का अनुरोध किया।

भगवान ने कहा- “नारद विधि का विधान प्रकारान्तर से कर्म का प्रतिफल ही है। विधाता मात्र न्याय करते हैं। उन्हें न किसी से राग है न द्वेष।”

सरोवरें पूर्व जन्म में दो सगी बहनें थीं। धनाढ्य और दानी भी। पर वे दान-पुष्य अपने ही सम्बन्धी, परिचितों को देती थीं। यह प्रशंसा के लिए मरती थीं। आवश्यकता उपयोगिता पर ध्यान नहीं देती थीं। दान के पीछे भी संकीर्ण बुद्धि रही। उनकी इस मूढ़ता का दण्ड बहिष्कार के रूप मिला। पुण्य के कारण व शीतल और निर्मल तो थीं। उनका उद्धार तभी होगा जब खोदकर नहरें बनें और खेतों की सिंचाई के लिए उनका उपयोग हो।

आम्रवृक्षो का विवरण बताते हुए भगवान ने कहा वे दोनों विद्वान थे। विद्या के बल पर यश भी कमाया और धन भी। पर उस कमाई को परिवार विलास भर के लिए खर्च करते रहे। अपनी विशिष्टता का लाभ शिक्षा विस्तार में करने से विमुख रहे। उसी का त्रास अपमान इसी रूप में सहना पड़ रहा है। उद्धार तब हो जब उनके फलों को ले जाकर कोई अनेक स्थानों में उद्यान लगाये उन उद्यानों से जब असंख्यों को लाभ मिलेगा तभी उनका उद्धार होगा।

अब दो दुःखी गौओं का प्रसंग सामने आया। भगवान बोले। वे दोनों पूर्व जन्मों में महिलाएँ थीं। मात्र अपने बेटों और पतियों का ध्यान रखती थीं। अन्य का नहीं इनका उद्धार तब हो जब कोई उनके दूध को अभावग्रस्त बालकों और रोगियों तक पहुँचाए।

समाधान सुनकर नारद लौटे और सरोवरों से नहर निकाल कर जल खेतों तक पहुँचाने। वृक्षों की गुठलियों से अनेक उद्यान लगाने। गौ दुग्ध को रोगियों तक पहुँचाने की व्यवस्था उनने अपने प्रभाव का उपयोग करके बनाई। और आगे चल गये।

बहुत दिन बाद फिर उधर से लौटे तो सरोवरों, वृक्षों और गौओं को सुख-सम्मान पाते देखकर बड़े प्रसन्न हुए। तब से वे पाप से बचने और करने पर प्रायश्चित अपनाने की शिक्षा जन-जन को देने लगे।


ज्ञान का आदि स्त्रोत- जिज्ञासा

सत्य की उपलब्धि अथवा वैज्ञानिक आविष्कारों को जन्म देने में दार्शनिक एवं वैज्ञानिक चिन्तन का महत्वपूर्ण योगदान होता है ‘अथऽतो ब्रह्म’ जिज्ञासा से सृष्टि के नियामक सत्ता की खोज आरम्भ होती है तथा आत्म साक्षात्कार तक का कारण बनती है।। श्वेताश्वेतर उपनिषद् के उपाख्यान की शुरुआत जिज्ञासा से युक्त प्रश्नों से होती है। “कि कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाय केन क्वच सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिता केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्॥” अर्थात्- हे महर्षियों! इस जगत का मुख्य कारण ‘ब्रह्म’ कौन है, हम लोग किससे उत्पन्न हुए हैं, किससे जी रहे हैं और किसमें पूर्णतः अवस्थित हैं तथा किसके अधीन रहकर हम लोग सुख-दुःख की निश्चित व्यवस्थानुसार जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

आनन्दमय अमृत की कामना सहज जिज्ञासा की कारण बनी। विषय भोगों की क्षणभंगुरता ने मनुष्य को शाश्वत आनन्द की प्राप्ति के लिए अभिप्रेरित किया। बहिर्मुखी चेष्टाओं तथा विषयों के भोग से अतृप्ति तथा असंतुष्टि ही हाथ लगी। आनन्द के अन्तःस्रोत ने मनुष्य को आत्म अन्वेषण के लिए अभिमुख किया। परमानन्द से युक्त अपनी ही आत्म-सत्ता है, जिस दिन यह बोध हुआ, मानव को आध्यात्मिक खोज की दिशा में आगे बढ़ने का एक महत्वपूर्ण सम्बल हाथ लग गया। साधन शरीर और मन है तथा साध्य भीतर बैठा है, जिसका विराट् स्वरूप परब्रह्म के रूप में चारों ओर विद्यमान है, यह ज्ञान होते ही मनुष्य ने सोचा- बाहर भटकने से विषयाकर्षणों में अपनी सामर्थ्य गँवाने से क्या लाभ? अन्तःस्रोत को ही कुरेदा-उभारा जाय तथा उसके अगणित अनुदानों को ही समेटकर अपनी झोली भर ली जाय, इस चिन्तन ने आत्म-विज्ञान को जन्म दिया।

आत्म जिज्ञासा आत्म-विकास की दिशा में बढ़ने की प्राथमिक शर्त है। आत्मा की स्थिति दृष्टा की है जिसका अवचेतन अनुभव मनुष्य को निरन्तर होता तो रहता है पर बाह्य अनुभवों की विविधता के कारण वह अपने पूर्ण शाश्वत स्वरूप को जान नहीं पाती। आत्मानुसन्धान में प्रवृत्त होकर जिस अन्तिम गन्तव्य तक प्राचीन तत्त्ववेत्ता पहुँचे थे, वह एक ऐसी पूर्ण आनन्दमय सत्ता है जिसके ज्ञान से सब कुछ जान लिया जाता है। आत्मज्ञान की उसी परम स्थिति का वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में है- ‘आत्मनो वा अरे दर्शंनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्।’- 2।4।5 अर्थात्- ‘इस आत्मा के ही दर्शन, श्रवण, मनन एवं विज्ञान से इस सबका ज्ञान हो जाता है।’

वह ज्ञान ज्ञाता से भिन्न किसी ज्ञेय का ज्ञान नहीं वरन् स्वयं की सत्ता का है। वस्तुतः ज्ञाता ही ज्ञेय है। वह ज्ञान स्वरूप है। वहाँ द्वैत की कोई सीमा नहीं है। निर्मल, निश्चल, निर्विकल्प आत्मचेतना की वह दिव्यानन्दमयी सत्ता अद्वैत है। उस दिव्य सत्ता के प्रकाश की अनुभूति ही भारतीय तत्व दर्शन का लक्ष्य रहा है।

“भासिरतः भारतः”। प्रकाश या ज्योति में जो रत रहे, वह भारत तथा प्रकाश की खोज में रत रहने की प्रवृत्ति वाला भारतीय कहलाता था। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं का उद्घोष था- ‘तत् त्वम् असि इति जानम् ज्ञानम्।’ “जिज्ञासु! तुम स्वयं ही वह सत्य हो, जिसे जानने की तुम्हें जिज्ञासा है।” वह ज्ञान ही तत्वज्ञान है। कोई भी साधक जिसे सत्य के प्रकाश को पाने की आकाँक्षा रखता है, वह उसकी आत्मचेतना का ही प्रकाश है। जिसे यह बोध हो जाता है वह उस प्रकाश का दर्शन करने में सफल हो जाता है तथा अपने को कृतकृत्य मानता है।

बृहदारण्यकोपनिषद् का उद्घोष है कि आत्मवेत्ता सर्ववेत्ता हो जाता है- ‘य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति।’ इसी सत्य का बोध कराता है। दृष्टा आत्म सता का अनुभव ही विश्व का विस्तार है। जिस प्रकार चैतन्य अवस्था की प्रसुप्त वासनाएँ निद्रावस्था में अवसर पाते ही अपने अनुरूप स्वप्न की सृष्टि कर लेती हैं, उसी प्रकार जन्म-जन्मान्तरों के अनुभवों के संचित संस्कारों द्वारा अनुकूल वासनाओं के उभार होने पर मोहग्रस्त जीवों को संसार के आकर्षण, विषयभोग वास्तविक जान पड़ते हैं। पर निद्रा के टूटते ही स्वप्न की सृष्टि मिटते देरी नहीं लगती, ऐसे ही अज्ञान के नष्ट होने पर संसार विषयक भ्रान्तियाँ भी मिट जाती हैं। जागृत व्यक्ति को यह बोध रहता है कि स्वप्न का संसार उसके स्वयं के मन की उपज है, इसी प्रकार अज्ञान से मुक्त होने पर भी बोध हो जाता है की संसार की सत्ता आत्मसत्ता से बाहर नहीं है- उसकी ही प्रतिबिम्ब है।

वस्तु एवं संसार के अस्तित्व का प्रमाण चेतन व्यक्ति की अनुभूतियाँ हैं। एक वर्णान्ध व्यक्ति संसार के विभिन्न रंगों को नहीं देख पाता, उसे मात्र श्वेत और काला रंग ही दिखता है, जबकि जन्मान्ध को कुछ नहीं दिखाई पड़ता। जिस प्रकार नेत्रों की अक्षमता से दर्शन शक्ति लुप्त हो जाती है उसी प्रकार त्वचा की असमर्थता से स्पर्श शक्ति भी लुप्त हो जाती है। स्वादेन्द्रिय, घ्राणेंद्रिय, श्रवणेन्द्रियों की क्षमताएँ नष्ट हो जाने पर स्वाद, गन्ध तथा ध्वनि की अनुभूति नहीं हो पाती। देखने, सुनने, स्पर्श करने, स्वाद लेने तथा सूँघने की पाँचों इन्द्रियाँ किसी भी चेतन प्राणी में नहीं होतीं तो संसार की विविध रूपाकृतियों के अस्तित्व का प्रमाण क्या होता? पर उल्लेखनीय बात यह भी है कि इन्द्रियों की अनुभूतियाँ भी दृष्टा-आत्मसत्ता के अस्तित्व से ही होती हैं। शरीर से उस सत्ता के तिरोहित होते ही कोई भी इन्द्रिय काम नहीं कर पाती जबकि उनका रूप यथावत् बना रहता है।

मूलतः अनुभूतियाँ दृष्टा आत्मा को होती हैं- इन्द्रियाँ तो मात्र माध्यम हैं। देखने की प्रक्रिया में प्रकाशित वस्तु से विकीर्ण प्रकाश नेत्र की पुतली में प्रवेश करता है जहाँ से प्रतिबिम्बन क्रिया का प्रभाव स्नायु तंत्र की नाडियों द्वारा मस्तिष्क में ले जाया है। यहाँ वस्तु के रूप मनुष्य अनुभव करता है। पर यह क्रिया यांत्रिक फोटोग्राफी जैसी नहीं है, दृष्टा को दृश्य की अनुभूति एक चेतन क्रिया है जो मात्र रूप का ही आभास नहीं कराती वरन् विभिन्न प्रकार के भावों को भी जन्म देती है। चेतन मनुष्य सुन्दर दृश्यों से आह्लादित होता, अरुचिकर से दुःखी एवं भयभीत होता है। ये प्रतिक्रियाएँ फोटोग्राफी के कैमरे में नहीं होती।

अस्तु! ज्ञान का- अनुभूतियों का अस्तित्व ज्ञाता की सत्ता के बाहर नहीं- भीतर है। प्रायः बाह्य वस्तु के स्वतन्त्र अस्तित्व की कल्पना का कारण चेतन मनुष्य के शरीर को निरपेक्ष सत्ता मान लेना है जिसमें चैतन्य को शरीर के भीतर की वस्तु मानकर तथा शरीर की इन्द्रियों से बाहर की भौतिक वस्तुओं के स्वतंत्र अस्तित्व का विचार किया जाता है। यह एक भ्रान्ति है जिसके रहते सत्य के निकट पहुँच पाना संभव नहीं हो पाता। पृथ्वी पर खड़े होकर सिर की ओर ऊपर तथा पैरों की ओर नीचे का भाग समझा जाता है पर असीम अन्तरिक्ष में न कहीं कुछ ऊपर है न कहीं नीचे। दिशाओं की मान्यता भी इसी प्रकार है। शरीर भी एक भौतिक वस्तु है तथा उसका अस्तित्व भी दृष्टा- आत्मा के अनुभव पर आधारित है फिर बाह्य एवं भीतर का प्रश्न नहीं रह जाता। जहाँ तक भी हम कल्पना अथवा चिन्तन करते हैं, वहाँ तक आत्मा ही है। अनुभूतियों का केन्द्र वही है।

जगत को माया मात्र कहकर उसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि साँसारिक ज्ञान की उपेक्षा भी एक प्रकार से आत्म प्रवंचना ही है। संसार की दृश्यमान सत्ता को स्वीकार करते हुए भी शाश्वत सत्य तक पहुँचने के लिये उसी ज्ञान का सहारा लेना होगा जो अन्तः से उद्भूत होता है, जिज्ञासा के रूप में जिसे जाना जाता है। आत्मानुसन्धान द्वारा ही परम सत्य के निकट पहुँचा जा सकता है, यह एक चिरन्तन सत्य है।


Quotation

उपकार सौदे की तरह न करो। उसे कर्त्तव्य मानकर करने से ही तो सन्तोष मिलता है उतना प्रतिफल ही पर्याप्त है। प्रत्युपकार के लिए किया गया उपकार तो खीज और निराशा ही दे सकता है।


दृश्य से परे विचारों की विलक्षण दुनिया

सृष्टि में सब कुछ भरा है अपनी आवश्यकता एवं प्रकृति के अनुरूप जीवधारी प्राणी एवं पेड़ पादप उससे पोषण तथा विकास के लिए साधन प्राप्त करते हैं। वायु मण्डल में आक्सीजन भी है तथा कार्बन डाइआक्साइड भी। जीव-जन्तु आक्सीजन को प्राणवायु के रूप में ही ग्रहण करते हैं, पर वृक्ष वनस्पतियाँ विषाक्त समझी जाने वाली गैस कार्बन डाइआक्साइड का स्वेच्छा से पान करती हैं। जमीन में अनेकों प्रकार के तत्व मौजूद हैं। पर जीव जन्तु तथा पेड़-पादप उससे अलग-अलग प्रकार के तत्व खींचते हैं। एक ही समुदाय की विभिन्न जातियों की तत्वों, खनिज पदार्थों के पृथ्वी से अवशोषण करने में भिन्नता भी दिखाई पड़ती है। वृक्ष-वनस्पतियों की आकृति एवं प्रकृति में- गुण-धर्म में जो भिन्नता दिखाई पड़ती हैं उसका प्रमुख कारण है उनके द्वारा भूमि से विभिन्न तत्वों का ग्रहण किया जाना।

प्राणियों की आकृति-प्रकृति में भी जो मौलिक अन्तर दिखाई पड़ता है उसमें अनुवांशिक विशेषताओं के अतिरिक्त सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यही कार्य करता है कि वे प्रकृति से किस प्रकार के तत्व- पोषण प्राप्त करते हैं। शाकाहारी जीव-वृक्ष वनस्पतियों पर गुजारा करते हैं। माँसाहारी जीव माँस भक्षण करते हैं। आहार की इस भिन्नता से उनकी आकृति एवं प्रकृति में भी अन्तर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। बगीचे में भौरे पहुँचते हैं तथा गुबरीले कीड़े भी। एक फूलों का रसपान करता है दूसरा गोबर पर बैठा मोद मनाता है। केंचुऐ मिट्टी का भक्षण करके जीवित रहते हैं जबकि उसके भीतर लोहा, सोना, फास्फोरस, नाइट्रोजन आदि तत्व भरे होते हैं। वृक्षों की तरह उन्हें अलग से खींच पाना उसके लिए सम्भव नहीं हो पाता।

भू-मण्डल तथा जल मण्डल से भी बहुमूल्य सम्पदाएँ अन्तरिक्ष में भरी पड़ी हैं। पृथ्वी, जल स्थल हैं, आकाश सूक्ष्म। पृथ्वी पर बहुमूल्य अनुदान आकाश से ही होकर बरसते हैं। सूर्य की रोशनी, ताप इसी माध्यम से होकर आता है। पानी इसी के गर्भ में बनता तथा बरसता है। प्राण की, पर्जन्य की, अन्तरिक्षीय अनुदानों की वर्षा इसी तल से होती है। इसका मात्र क्षेत्र ही विस्तृत नहीं है वरन् सम्पदाएँ भी बढ़ी-चढ़ी हैं। ईथर तत्व उसके पोल में भरा है जो संचार तंत्र का प्रमुख स्त्रोत है। ये वे पदार्थ हैं जिनकी जानकारी प्रायः हर विज्ञान वेत्ता को रहती है। तत्त्वदर्शियों ने अन्तरिक्षीय गर्भ में अधिक सूक्ष्म परतों तथा उनमें समाहित अगणित बहुमूल्य तथ्यों का रहस्योद्घाटन किया है। शरीर स्थूल है जो दिखता है। पर सभी जानते हैं कि कार्य कर रही चेतना उस कलेवर में फैली रहती तथा वही काया की संचालक भी है। ठीक इसी प्रकार अन्तरिक्ष की भी अनेकों सूक्ष्म परतें हैं। अदृश्य जीवधारी- भूत, प्रेत, पितर, किन्नर, देवता आदि का अस्तित्व उसी सूक्ष्म क्षेत्र में है। “देवता आकाश में निवास करते हैं, इस तथ्य की संगति भी उपरोक्त तथ्य से बैठती है। मृत्यु के बाद, हलचल करने वाली- प्रेरणा देने वाली अदम्य कार्य कर दिखाने वाली चेतना आखिर कहाँ चली जाती है तथा वह अनायास कहाँ से प्रकट हो जाती है, उसकी खोजबीन करने पर सुनिश्चित रूप से एक अविज्ञात सूक्ष्म दुनिया की सम्भावना को स्वीकार करना पड़ता है। सम्भव है वह सूक्ष्म अन्तरिक्षीय परतों में अपना जाल फैलाये हुए हो तथा दृश्य दुनिया की हलचलों की प्रेरणा स्त्रोत हो।

पदार्थों तथा चैतन्य जीवधारियों के अतिरिक्त विचारों का भी एक संसार है जो और भी अद्भुत है, अति सामर्थ्यवान है। मनुष्येत्तर जीवधारी तो स्थूल जड़ संसार तक ही सीमित रहते, उससे ही जीवनयापन की आवश्यक सामग्री प्राप्त करके किसी तरह गुजारा करते हैं। उनकी पहुँच विचार जगत तक नहीं है। पर मनुष्य उससे भी अधिक बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है। अच्छा भी बुरा भी। देव-दानव का, जड़-चेतन का, रात-दिन का, प्रकाश अन्धकार का, पाजिटिव-निगेटिव का युग्म प्रत्यक्षतः देखा जाता है। विचार जगत में भी दोनों तरह के तत्व विद्यमान हैं। भले एवं बुरे दोनों ही तरह के विचारों का उसमें अस्तित्व है। पदार्थों की दुनिया की तरह इसमें से भी अपनी इच्छा के अनुरूप भले-बुरे विचारों को खींचा एवं संग्रहित किया जा सकता है।

आणविक जीव विज्ञानी जैम्बिसमोनाड नामक विद्वान् ने एक पुस्तक लिखी है- ‘चान्स एण्ड नेसेसिटी’ उन्होंने यह रहस्योद्घाटन किया है कि मैटेरियल वर्ल्ड से जुड़ी बायोस्फीयर की स्ट्रैटोस्फीयर जैसी परतों के अतिरिक्त एक सूक्ष्म परत भी मौजूद है। इस परत का उन्होंने नाम-आइडियो स्फीयर रखा है। उनका मत है कि आइडियोस्फीयर में वैचारिक सम्पदा का वह भण्डार छुपा पड़ा है जो सृष्टि से लेकर अब तक मानव मस्तिष्क द्वारा आविष्कृत हुआ है तथा अपनी समर्थता के कारण समय-समय पर मानव जाति के उत्थान पतन का आधार बना है।” वे लिखते हैं कि “सशक्त विचार कभी भी समाप्त नहीं होते- अचेतन ब्रह्माण्ड में विद्यमान रहते हैं। जीवधारियों की तरह विचार भी अपनी वंश-परम्परा में ही यथावत् न बने रहकर विकास के लिए सतत् आतुर रहते हैं। समधर्मी विचार आपस में मिलते अनुकूल का चुनाव करते तथा धनीभूत होते रहते हैं।”

साथ ही इस तथ्य का भी उन्होंने उल्लेख किया है कि जिन विचारों की आवृत्ति जितनी अधिक होती हैं वे उतने ही सक्षम-समर्थ बनते जाते हैं। उनकी तरंगें आइडियोस्फीयर में मौजूद रहती तथा अपनी प्रेरणाएँ सम्प्रेषित करती रहती हैं। वे तरंगें कई प्रकार की होती हैं। सभी सूक्ष्म वातावरण में प्रवाहित होती रहती हैं। प्रयोग होने पुनरावृत्ति होने अथवा न होने पर उनकी सामर्थ्य बढ़ती या घटती रहती है, पर मूलतः समाप्त कभी नहीं होती।

विचारों की पुनरावृत्ति एवं उनके प्रभाव से तैयार होने वाले वातावरण की भली बुरी अनुभूतियाँ भी किन्हीं-किन्हीं स्थानों पर होती हैं। मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर आदि स्थलों पर पावन सात्विक विचारों का आह्वान किया जाता है। उनकी ही बारम्बार आवृत्ति होती रहती है। उसका स्थानीय प्रभाव अनुभव किया जा सकता है। दर्शन के लिए पहुँचने वालों के मन को शान्ति मिलती, आशा की ज्योति जगती, निराशा की भावना मिटती है। कसाईखानों में पशु मारे जाते हैं। उनके कारुणिक क्रन्दन के सूक्ष्म प्रभावों से वह वातावरण घिरा रहता है। अनायास ही उसकी अनुभूति घृणा एवं भय जुगुप्सा के रूप में होती है। युद्ध भूमि में भय की भावना का संचार युद्धोपरान्त भी होता रहता है। हिमालय का उत्तराखण्ड क्षेत्र आदि काल से ही ऋषियों की तपःस्थली रहा है। जो तीर्थाटन परिभ्रमण अथवा साधना के लिए पहुँचते हैं, उन्हें सहज ही यह अनुभूति होती है, जैसे सात्विक विचारों की वर्षा हो रही हो। मन अपने आप लगने लगता तथा किसी समर्थ सत्ता के अस्तित्व में विश्वास जमने लगता है।

स्थानीय प्रभावों तक ही विचारों की सीमा नहीं है। सूर्य की गर्मी, वायु की नमी की तरह उनका प्रभाव व्यापक क्षेत्र में पड़ता है। जिस तरह वायु के झोंके एवं सूर्य की किरणें गतिशील बने रहते हैं, उसी प्रकार विचार भी व्यापक अन्तरिक्ष में परिश्रमशील रहते हैं। गंगा एवं यमुना दोनों ही नदियों का स्रोत हिमालय है। पर गति एवं दिशा अलग-अलग होने से वे भिन्न-भिन्न क्षेत्रों को अपनी लपेट में ले लेती हैं। जिन्हें गंगा के पावन एवं स्वास्थ्यवर्धक जल का लाभ लेना हो उन्हें गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों में जाने पर अवश्य ही मिलता है।

सूक्ष्म विचार जगत में अस्तित्व तो हर तरह के विचारों का है पर उनमें से उन्हीं का लाभ उठा सकना सम्भव है जिसका आह्वान-अवगाहन किया जायेगा। ग्रहण करने तथा अभीष्ट प्रकार के विचारों से अपनी झोली भर लेने में मनुष्य की मानसिक स्थिति की भी एक बड़ी भूमिका होती है। विचार जगत से आदान-प्रदान का क्रम भी उसी के अनुरूप चलता है। मानवी मस्तिष्क में दोनों तरह के विचार चलते हैं। अच्छे भी, बुरे भी। विधेयात्मक भी, निषेधात्मक भी। सृजनशील भी, विध्वंसक भी। मन पर जिस तरह के विचार हावी होंगे, मनःस्थिति उसी के अनुरूप बनेगी। मनःक्षेत्र में प्रभावी विचारों का आह्वान भी अपने सजातियों के लिए होता है। मस्तिष्क से वे निकलते खोजी दलों की तरह सूक्ष्म अन्तरिक्ष का परिभ्रमण करते तथा प्रवाहित विचार तरंगों में से अपने सजातियों का संग्रह कर लेते हैं।

एक जैसे वातावरण तथा एक-सी परिस्थितियों में रहने के बावजूद भी दो व्यक्तियों का विकास भिन्न स्तर का हो जाता है। एक सन्त ऋषि, महामानव बन जाता है। दूसरा दुष्ट, दुराचारी, नर पिशाच बन जाता है। इस अन्तर का कारण ढूँढ़ना हो तो उसकी मनःस्थिति का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन-पर्यवेक्षण करना चाहिए। समाधान इस बात में मिलेगा कि उसमें किस तरह के विचार हावी थे। विचार जगत से वस्तुतः उसी के अनुरूप पोषण मिला तथा भला-बुरा व्यक्तित्व ढलता गया।

समष्टिगत चिन्तन के अनुरूप ही युग का स्वरूप तथा प्रत्यक्ष वातावरण बनता है। तत्त्वदर्शियों का मत है कि इन दिनों की परिस्थितियाँ अत्यन्त विस्फोटक हो चली हैं। उसका प्रत्यक्ष कारण कुछ भी लगाया जाये पर परोक्ष तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण ध्वंसकारी विचार चक्र की गति एवं स्थिति का तीव्र एवं सुदृढ़ हो जाना है। जिसकी स्थूल प्रतिक्रिया निकृष्ट चिन्तन तथा भ्रष्ट आचरण के रूप में सर्वत्र दिखायी पड़ रही है। युग परिवर्तन में इसी विचार चक्र को तोड़ना तथा क्षीण पड़ गये सृजनधर्मी विचारचक्र को सुदृढ़ करना व गति देना पड़ता है।

जिन विचारों का आह्वान किया जायेगा उसी के अनुरूप विचार जगत से अनुदान मिलेगा। इन दिनों सर्वत्र बोलबाला निषेधात्मक, विध्वंसक विचारों का हो रहा है। फलस्वरूप सूक्ष्म विचार जगत न केवल उसी के अनुरूप प्रेरणाएँ सम्प्रेषित कर रहा है वरन् बारम्बार ध्वंस की आवृत्ति पाकर अपने उस स्तर को मजबूत बना रहा है। यह संकट दूर होने के स्थान पर और भी घनीभूत होता जा रहा है। उसे परिपोषण मानवी चिन्तन द्वारा विभिन्न अभिव्यक्तियों के माध्यम से सतत् मिल भी रहा है। पर ये परिस्थितियाँ उलट भी सकती हैं, यदि सामूहिक चिन्तन को मोड़ा-मरोड़ा जा सके।

विचारों के आधार पर ही मानवी व्यक्तित्व बनता है। तद्नुरूप आचरण प्रस्तुत होता है पर यह खुली छूट है कि मनुष्य किस तरह के विचारों का चयन करे। मूलतः मानव दैवी सत्ता का अंश है। प्रकृति आसुरी तत्वों से युक्त है। सत्ता में दोनों का ही अंश एवं प्रभाव है। जिसका पलड़ा भारी होगा उधर ही मनुष्य का रुझान होगा। उसी के विचारों का चिन्तन होगा तथा विचार जगत से, भी उसी अनुरूप आदान-प्रदान चलेगा, वस्तुतः मानव की संकल्पशक्ति में गज़ब का बल है। वह पतन की ओर ढकेलने वाले मन-मस्तिष्क पर छाये निषेधात्मक विचारों के परिकर को एक झटके से तोड़ सकती है। यह सम्भव हो सके तो विचार जगत से श्रेष्ठ विचारों के आदान-प्रदान का अविराम क्रम आरम्भ हो सकता है। जिसके फलस्वरूप वह सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, जो पदार्थ जगत से भी करतलगत कर सकना सम्भव नहीं हो सका है।


चन्द्रशेखर आजाद (kahani)

फरारी के दिनों में चन्द्रशेखर आजाद को खाने-पीने के मामले में भी बड़ा कष्ट सहना पड़ा था। एक बार उनके पास केवल एक आना था। उससे उन्होंने एक चने वाले से चने खरीदे।

वे चने खा रहे थे कि उन्हें चनों में एक इकन्नी पड़ी मिली। पहले तो उन्होंने सोचा चलो एक दिन के खाने का इन्तजाम हुआ, पर फिर ध्यान आया कि यह तो उस गरीब चने वाले की इकन्नी है। भूल से गिर गई तो क्या? उसने कितने श्रम से कमाई है। इस पर मेरा क्या अधिकार? और वे उसे इकन्नी लौटा आये। देश के लिए डाँका तक डालने वाले इस क्रान्तिकारी का यह आदर्श कितना ऊँचा था।


पूर्व जन्म की स्मृति अवाँछनीय

राजा भोज की रानी उन्हें मल-मल कर स्नान करा रही थी। स्नान से तृप्ति ही न होती। राजा और अधिक देर तक स्नान का आनंद देने का आग्रह करते।

रानी को कुछ स्मरण हो आया और वे ठठाका मार कर हँसने लगीं। राजा को इस अकारण अट्टहास पर आश्चर्य हुआ। उसने पूछा- “किस कारण ऐसी हँसी आई।” रानी चुप थीं। लेकिन रहस्य न बताने से कोई संकट खड़ा होने की आशंका से रानी ने चतुरता बरती। उनने कहा- “मेरी छोटी बहिन जो समीप की नगरी की रानी हैं, उनसे आप पूछ लें। मैं तो बता नहीं सकूँगी।”

राजा का आश्चर्य और असमंजस और भी बढ़ा, वे रहस्य जानने के लिए आतुर हो उठे। प्रभात होते ही घोड़ा कसा और उस नगरी की ओर चल पड़े। आगमन का समाचार सुनकर सभी को बड़ी प्रसन्नता हुई। रानी ने व्यक्तिगत आतिथ्य के लिए उन्हें राजमहल में बुलाया।

कुशल समाचार के प्रश्नोत्तर पूरे भी न हो पाये थे कि रानी ने एकान्त देखकर उस प्रसंग की चर्चा आरम्भ कर दी जिसके लिए उनका यहाँ आगमन हुआ। बिना पूछताछ की प्रतीक्षा किये रानी ने अपनी ओर से ही बात आरम्भ कर दी। उनने कहा- “आप अच्छे समय पर आये। आज बड़ी अद्भुत घटना घटने वाली है। अगले प्रभात मैं पुत्र प्रसव करूँगी। नगर भर में प्रसन्नता सूचक आयोजन चलेगा। रात्रि होते-होते मैं बीमार पड़ूँगी और में दूसरे दिन प्राण त्याग दूँगी।”

राजा के विषय का निवारण रानी ने कहा- आप मेरी बहिन के हँसने का कारण पूछने आये हैं न। सो मैं अभी तो न बता सकूँगी। इसके लिए कुछ प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। मरने के दसवें दिन मेरा जन्म विदर्भ राजा की राजकुमारी के रूप में होगा। मेरा नवजात पुत्र, पाल-पोष लिया जाएगा। बीस वर्ष की आयु होने पर मेरा विवाह इसी नवजात पुत्र के साथ होगा जिसका कल जनम होना है। आप उस विवाह में अवश्य आना। जब वधू बनकर आऊँगी तब उसी स्थान पर उस रहस्य को प्रकट करूँगी जिसे आप अभी जानने आये हैं।

दूसरा दिन आया। घटनाक्रम ठीक उसी प्रकार घटा। पुत्र जन्मा। रानी बीमार पड़ी। उपचार हुआ और कुछ ही समय में मृत्यु हो गई। कथन अक्षरशः सही निकला। भारी मन वे वापस लौट आये और स्नान के समय हँसने का रहस्य जानने के लिए मृत रानी के दिये वचन के अनुसार प्रतीक्षा करने लगे। धारा नगरी में ठीक समय पर जन्म लेने और नवजात पुत्र के जीवित रहने की जानकारी उन्हें मिलती रही।

बीस वर्ष बीते। पूर्व कथन के अनुरूप विवाह निश्चित हुआ। भोज उसमें उत्सुकतापूर्वक सम्मिलित हुए। नए वधू ने ससुराल पहुँचते ही अनुरोध किया, उसे राज भोज से कुछ एकान्त कथन का अवसर दिया जाए। बात न तो अनुचित थी न आशंका की दृष्टि से देखे जाने योग्य। सो स्वीकृति मिल गई।

नव वधू ने भोज से कहा- “मेरी बहिन- आपकी पत्नी पूर्व जन्म में आपकी माता थी। बचपन में स्नान कराते समय आप उसे बहुत हैरान करते थे और कठिनाई से ही नहलाया जाता था। कहाँ यह पुरानी आदत और कहाँ नया परिवर्तन जिसके अनुसार घण्टों स्नान करने पर भी मन नहीं भरता। मेरी बहिन को पूर्व जन्म की वह याद आ गई और आपकी आदतों में भारी अन्तर देखकर हँसने लगी। बस इतनी भर बात थी जिसे तब बताया न जा सका और आप असमय उसे जानने का हठ करने लगे। समय पर ही उसे बताया जा सकता था। असमय बताने में हानि की आशंका जो थी।

नव वधू ने उत्तर दिया। पूर्व जन्मों के रहस्य इसीलिए छिपाकर रखें जाते हैं कि पुरानी स्मृतियाँ नये व्यवहार में समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है। बहिन ने बात उसी समय बता दी होती तो आपका दाम्पत्य जीवन माता पुत्र के सम्बन्धों को याद करने पर गड़बड़ा जाता। मैं भी तो वर्तमान पति को यह नहीं बताऊँगी कि वे पिछले जन्म में मेरे पुत्र थे। पूर्व जन्मों का सम्बन्ध तथा सम्बन्धियों की जानकारी मिलने पर लाभ कुछ नहीं हानि बहुत है। सम्बन्ध गड़बड़ाते जो हैं।


मानव से जुड़ी परोक्ष जगत की हलचलें

नेत्रों को दृश्य का विस्तार ही नजर आता है। उसे ही जानने तथा उपलब्धियों को हस्तगत करने का प्रयत्न किया जाता है। जबकि दृश्य जगत की परिस्थितियाँ बनाने में परोक्ष की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कितनी बार तो परोक्ष की भूमिका इतनी जबरदस्त होती है कि भू-मण्डल पर भारी उथल-पुथल मचते देखी गयी है, जिनका कुछ भी प्रत्यक्ष कारण समय में नहीं आता। आये दिन भयंकर तूफान आते हैं, ज्वालामुखी फटते हैं, भूकम्प भूस्खलन के विप्लव भयंकर कुहराम मचाते हैं पर इनकी पूर्व यथार्थ जानकारी नहीं मिल पाती। मौसम विज्ञान तथा खगोल विज्ञान के पूर्व कथन तीर-तुक्के जितने ही सही उतरते हैं। अन्तरिक्ष विज्ञान की जानकारियों से भी विशेष मदद नहीं मिल पाती। फलतः अन्तर्ग्रही परिवर्तनों तथा उनसे पड़ने वाले व्यापक प्रभावों की जानकारी न हो पाने से पूर्व सुरक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं बन पाती। इन प्रतिकूलताओं का शिकार मानव जाति का बनना पड़ता है।

अन्तर्ग्रही सम्बन्धों तथा पृथ्वी एवं जीव जगत पर उनकी स्थिति से पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन की एक सर्वांगपूर्ण और समुचित विकसित विधा प्राचीनकाल में थी जिसे ज्योतिर्विज्ञान के नाम से जाना जाता था। उससे जीव, प्रकृति तथा ब्रह्माण्ड के पारस्परिक सम्बन्धों की विस्तृत जानकारी मिल जाती थी। उसने अनुरूप व्यवस्था बनाने तथा अंतर्ग्रहीय प्रतिकूलताओं को अनुकूल करने के उपचार भी चलते थे। वह विद्या कालान्तर में विलुप्त हो गयी। तो भी उसके ध्वंसावशेष किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद हैं। अति उपयोगी उस विधा का पुनर्जीवन यदि सम्भव हो सके तो आज भी अन्तर्ग्रही सम्बन्धों को समझने, उनके पारस्परिक सम्बन्धों से लाभ उठाने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

विज्ञान ने भी अब यह स्वीकार कर लिया है कि जीवन तथा उसके लिए उपलब्ध परिस्थितियाँ मात्र पृथ्वी की देन हैं। उनमें दूसरे ग्रहों का भी योगदान है। जीवन की हर लय उनकी स्थिति से प्रभावित है। जीवों में प्रकृति के अनुरूप चलने वाले जैव चक्र को वैज्ञानिक भाषा में ‘बायोरिदम’ या बायोलाजिकल क्लाक कहा जाता है। इसके अन्तर्गत जीवों की दिशाबोध की क्षमता ऋतुचक्र का पेड़-पादपों तथा प्राणियों पर प्रभाव, उनके व्यवहार में सम्भाव्य परिवर्तन तथा मनुष्य की रासायनिक संरचना एवं मनोभावों के उतार-चढ़ाव का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।

बायोलाजिकलरिद्म को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति सूर्य का प्रकाश है। मनुष्य तथा मनुष्येत्तर जीव समुदाय के शरीरों में विद्यमान जैव घड़ी का नियन्त्रण प्रकाश की ऊर्जा करती है। शरीर की हर कोशिका में भी वायोलाजिकल क्लास सक्रिय है। अनुसंधानों से पता चला है कि प्रत्येक कोशिका को रात-दिन, अन्धेर-उजाला, भूख-प्यास, सुख-दुःख तथा ब्रह्माण्ड की हर गतिविधि की पूरी-पूरी जानकारी रहती है। अरबों कोशिकाओं से बना शरीर तो उन अनुभूतियों को ग्रहण करने में और भी समक्ष है।

मौसम में परिवर्तन, पृथ्वी की चाल तथा सूर्य के कारण होते हैं। यों ये परिवर्तन समूचे जीव जगत की क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। मानव शरीर तथा मन पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। जीवों की जैव घड़ी को सूर्य का प्रकाश एवं ऊर्जा ही एक निश्चित लय एवं ताल से बँधे रहते हैं। प्रकाश सभी जीवों में फोटो कैमिकल प्रक्रियाओं के लिए भी जिम्मेदार है। वह सेकेण्डों में धरती पर पहुँचकर जीवधारियों को प्रकाश संश्लेषण क्रिया के लिए उत्प्रेरित करता है। प्रकाश रश्मियाँ मनुष्य शरीर में त्वचा के माध्यम से रक्त शिराओं में प्रविष्ट हो जैव रासायनिक हलचलें उत्पन्न करती हैं। आँख से होकर प्रकाश ऊर्जा मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस तक पहुँचती है जिससे अनेकानेक रक्त शिराएँ भी जुड़ी रहती हैं। इस प्रकार प्रकाश ऊर्जा हाइपोथैलेमस जा पहुँचती है। जातव्य है कि हाइपोथेलेमस “थर्मोंस्टेट” की भूमिका निभाता है। वातावरण के तापक्रम में होने वाले परिवर्तनों को वह तुरन्त अंकित करके शरीर की ताप स्थिति में तद्नुरूप हेर-फेर की प्रक्रिया शुरू कर देता है।

प्राकृतिक ऊर्जा का एकमात्र स्त्रोत सूर्य है। प्रत्येक जीव-जन्तु, पेड़-पादप जीवनोपयोगी ऊर्जा से प्राप्त करते हैं। धरती पर सर्वत्र तापक्रम एक जैसा नहीं है। विभिन्न गोलार्धों की बनावट में अन्तर होने से उसमें अन्तर पाया जाता है। तापक्रम तथा प्रकाश की अवधि एवं मात्रा में अन्तर के फलस्वरूप धरती के विभिन्न स्थानों पर प्राणियों एवं वृक्ष वनस्पतियों के विकास में भी अन्तर पड़ता है। प्रायः 10 से 40 डिग्री सेण्टीग्रेड तापक्रम जीव जगत के विकास में सहायक होता है। अधिक पर विकास की गति अत्यन्त तीव्र तथा कम पर न्यून हो जाती है। यह दोनों ही स्थितियाँ अनुकूल नहीं मानी गयी हैं।

ऋतु मौसम तथा अन्तर्ग्रही परिवर्तनों के जीवन पर प्रभाव का अध्ययन करने की एक नयी विधा विकसित हुई हैं- “बायोलॉजिकल क्लाइमेटोलॉजी।” इसमें वायुदाब, भू चुम्बकत्व अन्तर्ग्रही विविरणों तथा ब्रह्माण्डीय किरणों के जीव जगत तथा पृथ्वी के वायुमण्डल पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। इस शाखा की अभी बाल्यावस्था है पर अब तक जो निष्कर्ष आये हैं वे कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। सम्बद्ध विषय पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का मत है कि सूर्य तथा चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण का पृथ्वी के चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण, विद्युत तथा प्राणियों की हलचलों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

आर्नल्ड एल.लीवर की पुस्तक “द लूनर ए फेक्ट” रोनाल्ड आफ फीव की पुस्तक “मूडस्विंग” तथा लाइएल वाढ़सन की पुस्तक ‘लाइफ टाइड’ (जीवन के ज्वार-भाटे) में इस विषय पर विस्तृत उल्लेख किया गया है। इन सभी का मत है कि जब भी पृथ्वी सूर्य तथा चन्द्रमा एक सीध में एक दूसरे के निकट स्थित होते हैं, ऐसी विक परिस्थितियाँ उपस्थित होती हैं। जो शरीरगत हलचलों एवं मन के क्रिया-कलापों को प्रभावित करती हैं। मियामी विश्वविद्यालय के मनोरोग चिकित्सक आर्नल्ड डा. लीवर ने चन्द्र कलाओं का सम्बन्ध मानवी व्यवहार एवं क्रिया-कलापों से जोड़ते हुए कहा है कि चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण हमारे आन्तरिक बायोलाजिकल टाइड्स (ज्वार-भाटों) को भी उसी प्रकार प्रभावित करता है जिस प्रकार समुद्री ज्वार भाटों को। उनका मत है कि मनुष्य की आक्रामक प्रवृत्ति का चन्द्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने से गहरा सम्बन्ध है। विशेषकर शराबियों, नशीली दवा खाने के अभ्यस्तों, अपराधियों तथा मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्तियों एवं अति भावुक लोगों के व्यवहार पर चन्द्र कलाओं का अधिक प्रभाव पड़ते देखा गया। है। प्रभावों का कारण स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि “पृथ्वी की सतह की तरह मनुष्य शरीर में भी लगभग 80 प्रतिशत जलीय तथा 20 प्रतिशत ठोस का अंश विद्यमान है। इसी कारण अमावस तथा पूर्णिमा के दिन मानव व्यवहार पर चन्द्रकलाओं का सर्वाधिक असर देखा गया है।

अपने एक अध्ययन में डा. लीवर ने पाया कि चन्द्रमा सूर्य तथा पृथ्वी के एक सीधी रेखा में आने पर मियामी क्षेत्र में हत्या एवं आत्महत्या जैसे अपराधों की बाढ़-सी आ गयी। सन् 1971 में ग्रहों का ऐसा योग पड़ा था जिसके आरम्भिक तीन सप्ताहों में जितनी हत्याएँ हुयीं उतनी पहले कभी नहीं हुयी थीं। उनका अनुपात वर्ष 1972 के जनवरी माह से दुगुना था। अध्ययन में यह भी मालूम हुआ कि पूर्णिमा तथा अमावस्या के दिन इन अपराधों के अतिरिक्त अन्य अपराधों में भी बढ़ोतरी हो जाती है। पुलिस मैन, फायरमैन, एम्बुलेंस चालक इन अवसरों पर ड्यूटी पर सबसे अधिक व्यस्त देखे जा सकते हैं क्योंकि बड़े पैमाने पर आत्महत्या, यौन अपराध आगजनी, राहजनी, लूट-पाट इन्हीं दिनों होते हैं। ये घटनायें दिन की अपेक्षा रात को अधिक घटित होती हैं। रात्रि में तो हिंसक घटनाओं तथा सड़क दुर्घटनाओं का सैलाब आ जाता है।

‘द लूनर इफेक्ट’ में डा. लीवर के अध्ययन निष्कर्षों का सार इस प्रकार है- “ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव हमारे शरीर, हारमोन्स स्राव की जटिल प्रक्रिया द्रव पदार्थों तथा स्नायुतन्त्र को शक्ति देने वाले विद्युत कणों पर पड़ता है। त्वचा ऐसी अर्ध चुम्बकीय है जो दोनों दिशाओं में विद्युत चुम्बकीय शक्तियों को आवागमन का मार्ग प्रशस्त करती है, इससे सन्तुलन बना रहता है। स्नायु की प्रत्येक तरंग, शक्ति की सामान्य विद्युतधारा उत्पन्न करती है। छोटे सौरमण्डल की भाँति हर कोशिका का अपना एक छोटा तथा हल्का विद्युत क्षेत्र होता है। डा. लीवर का कहना है कि ग्रह नक्षत्रों से व्यापक परिणाम में निकलने वाली विद्युत चुम्बकीय शक्तियाँ शरीर तथा उसकी सूक्ष्म कोशिकाओं के सन्तुलन को प्रभावित करती हैं।

उल्लेखनीय बात यह भी है कि सूर्य तथा चन्द्रमा जब-जब शिखर बिन्दु पर होते हैं तब-तब मनुष्य सहित सभी प्राणियों की श्वास दर तेज हो जाती है। दमे वालों की तकलीफ बढ़ जाती है। शीत ऋतु में विशेषकर जनवरी, फरवरी में श्वास की दर बाकी महीनों की तुलना में घटी रहती है जबकि सितम्बर से लेकर नवम्बर तक सबसे अधिक बढ़ जाति है।

पृथ्वी के चारों ओर लिपटा रक्षा कवच का आवरण मैग्नेटोस्फीयर सौर हलचलों से प्रभावित होता है। चुम्बकीय आवरण की स्थिति से मनुष्य की सम्वेदना, नेत्र ज्योति, रक्त संचार, जैव रासायनिक गतिविधियाँ तथा मस्तिष्क कार्यकुशलता आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यदि चुम्बकीय शक्ति में वृद्धि होती है तो शरीर के रासायनिक तत्वों के अणु आवेश बदल जाते हैं। फलस्वरूप मस्तिष्कीय केन्द्रों से स्रवित होने वाले विभिन्न रसायनों का सन्तुलन बिगड़ जाता है। इसका सीधा प्रभाव मनुष्य के चिन्तन एवं व्यवहार पर पड़ता है। अनेकों अध्ययनों में यह पाया गया कि सौर गतिविधि के ग्यारह वर्षीय चक्र में आरम्भिक छः वर्षों में सूर्य धब्बे बढ़ जाते हैं तथा बाद के पाँच वर्षों में उनमें कमी आ जाती है। सौर धब्बों के बढ़ने से दिल के मरीजों की स्थिति गम्भीर होती देखी गयी है। कितने ही व्यक्तियों में दिमागी बीमारियाँ तथा तंत्रिका तन्त्र के विकार भी इसी दौरान तेजी से उभरने लगते हैं।

स्वीडन के तीन वैज्ञानिकों- जी. एग्रेन, ओ. विलैण्डर तथा इ. जोरेस ने 1931 में एक महत्वपूर्ण तथ्य की खोज की। उनका कहना था कि शारीरिक क्रियाओं के जैव रासायनिक चक्रों, जो कि अन्तर्ग्रही प्रभावों के कारण परिवर्तनशील हैं, के अनुसार ही बीमार शरीर की चिकित्सा की जानी चाहिए। उन्हीं ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि डायबिटीज के रोगी का इन्सुलिन से उपचार करते समय दवा से भी अधिक महत्व इस बात है कि उसे कब और किस समय दी जाए? चौबीस घण्टे के रात-दिन के चक्र में रक्त में शर्करा की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। रक्त में हीमोग्लोविन के अनुपात में भी उतार-चढ़ाव इसी प्रकार आता है। उन्होंने पाया कि 24 घण्टे के चक्र में रक्त में पोटेशियम, कैल्शियम सोडियम, मैग्नेशियम तथा फास्फोरस की मात्रा भी बदलती रहती है। चिकित्सकों के लिए शारीरिक रसायनों एवं तत्वों के दैनिक उतार-चढ़ाव की विस्तृत जानकारी का होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि निदान एवं उपचार सम्बन्धी ज्ञान का होना। बायोलॉजिकलरिद्म सौर मण्डल के घटकों की गति लय एवं स्थिति से प्रभावित होती तथा उनसे अन्योन्याश्रित रूप से जुड़ी हुई है। उन सम्बन्धों तथा प्रभावों का ज्ञान होना भी चिकित्सकों के लिये आवश्यक है।

पिछली एक सदी में विज्ञान की विभिन्न शाखा प्रशाखाओं का चमत्कारी विकास हुआ है। मनुष्य की बौद्धिक क्षमता तथा तकनीकी ज्ञान में भी असाधारण वृद्धि हुई है। आवश्यकता इस बात की है कि इनके सहयोग से ज्योतिर्विज्ञान रूपी महान विधा की विलुप्त कड़ियों को ढूँढ़ने का प्रयत्न किया जाय। जिससे दृश्य तथा अदृश्य जगत के के पारस्परिक अंतर्ग्रहीय सम्बन्धों एवं प्रभावों को जानने और तद्नुरूप उससे प्रभाव उठाने की सफल रीति-नीति अपनाने में मदद मिल सकती है। अध्यात्म उपचारों की सहायता से इस कड़ी को कैसे और आगे बढ़ाया जा सकता है, इसे भी शोध का विषय बनाया जाए एवं तदनुसार प्रयास किये जायँ।


सिद्धी का दर्शन और मर्म

एक तपस्वी पेड़ के नीचे बैठे थे। ऊपर से चिड़िया ने बीट कर दी। तपस्वी ने क्रोध भरी आँखों से चिड़िया को देख तो वह जलकर नीचे गिर पड़ी। उन्हें अपनी सिद्धि का अहंकार हो गया और विभूति प्रदर्शन के लिए नगर की ओर चल दिये।

एक सद्गृहस्थ के दरवाजे पर भिक्षा के लिए पुकार लगाई। गृहिणी सास-ससुर की आवश्यक सेवा में संलग्न थी। भीतर से उसने उत्तर दिया- थोड़ी देर बिराजें। इस बहकावे पर उन्हें फिर गुस्सा आया और आँखें तरेरने लगे।

गृहिणी ने हँसते हुए कहा- महात्मा जी, बैठे जाइए। योगाभ्यास पूरा करने दीजिए। आँखें तरेरने से क्या लाभ? मैं चिड़िया थोड़े ही हूँ जिसे आप जला देंगे।

साधू स्तब्ध रह गये। इस महिला को वन में हुई इस घटना का पता कैसे लगा, जिसे मेरे अतिरिक्त और कोई जानता ही नहीं? मिलने पर पूछने की उत्सुकता से वे दरवाजे पर बैठ गये। थोड़ी देर में दरवाजा खुला और उन्हें भोजन मिल गया। जिज्ञासा का उत्तर देते हुए वह महिला बोली गृहस्थयोग भी एक साधना है। मैंने उसी में संलग्न रहकर कितनी ही सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हैं जिसमें से एक दूर की घटनाओं को जान लेना भी है।

साधू इस प्रसंग पर अधिक वार्ता करना चाहते थे। अतः वह स्त्री इतना ही बोली- “मेरे गुरु के पास चले जायँ, वे विद्वान हैं। गुरु ब्रह्मावर्त में रहते हैं उनका नाम तुलाधार वैश्य है। दुकान करते हैं।

साधु चल दिये। पता लगाते हुए वे तुलाधार के पास पहुँचे। दुकानदार ने उन्हें काम करते ही प्रणाम किया। बिठाने की व्यवस्था कराई और कार्य के दौरान ही बोला जरा योगाभ्यास से निवृत्त होलूँ। आपके साथ चर्चा करूँगा। पहला काम अपनी साधना पूरी करना है। आप थोड़ा ठहरें।

सन्त के आश्चर्य का ठिकाना न रहा मेरे आने का कारण इसे कैसे विदित हो गया। वे बैठ गये। दुकान बंद करके तुलाधार बैठा और बिना पूछे ही अमुक स्त्री द्वारा यहाँ भेजे जाने, इससे पूर्व चिड़िया जलाने का विवरण भी बता दिया। साधु का आश्चर्य बढ़ता जा रहा था बिना पूछे ही तुलाधार ने जिज्ञासा का समाधान भी कर दिया। ईमानदारी से लोक-व्यवहार चलाना व्यवहार योग है।

सन्त कुछ और पूछना चाहते थे सो उन्हें अवसर दिये बिना ही तुलाधार ने कहा- मैं अनपढ़ हूँ। शास्त्रीय चर्चा सम्बन्धी दार्शनिक समाधान के लिए मेरे गुरु श्वेनाक चाण्डाल के पास जायें। वे काशी रहते हैं।

साधु को अपनी ओर से कुछ कहे बिना ही उत्तर मिलते ही गये। वे काशी चल दिये। गृहस्थ और व्यवहार योग के सम्बन्ध में उन्हें अधिक विस्तार से जानना जो था।

काशी प्रवेश से पूर्व ही एक व्यक्ति रास्ते में प्रतीक्षा करते हुए मिला। दण्डवत प्रणाम के उपरान्त उसने कहा- मैं ही श्वेनाक चाण्डाल हूँ। आपको मेरा घर ढूँढ़ने में कठिनाई होती तो अगवानी के लिए मैं ही चला आया आइये मेरे साथ चलें।

साधु आवक् थे। पीछे-पीछे चलते रहे। उन्हें गंगा घाट पर बिठा दिया। स्वयं नालियाँ टट्टियाँ साफ करने में लग गया। काम पूरा होने पर उन्हें अपने साथ घर ले गया। वहाँ जाते ही अन्धे मात-पिता को भोजन कराने में लग गया। निवृत्त होने पर कहा- “अपनी कर्म-योग साधना को प्रमुखता देने के कारण आपको प्रतीक्षा करनी पड़ी। इनके लिए क्षमा करें। आज आपकी जिज्ञासा का समाधान करता हूँ। सुने- “मात्र ध्यान योग हठयोग आदि की ही साधना नहीं करते, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ पूरा करते रहने का कर्मयोग भी उतना ही फलप्रद है।” तपस्वी का समाधान हुआ अहंकार और अज्ञान गला। कर्मयोग की महत्ता समझते हुए वे बिदा हो गये।


पारस्परिक सहकार से गतिशील जीवन चक्र

प्रकृति जीव एवं वनस्पतियों का परस्पर एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है। पृथ्वी, जल, वायु तथा अगणित जीवनोपयोगी पदार्थ प्रकृति के घटक हैं। प्राणियों अथवा वनस्पतियों के रूप में गतिशील जीवन का इन सबके सहयोग एवं सन्तुलन के आधार पर ही अपना अस्तित्व है। लगता भर है कि सभी अलग-अलग घटक हैं पर वास्तविकता यह है कि एक अभिन्न चक्र से सभी जुड़े हुए हैं, एक ही माला के मनके हैं। एक ही गति एवं स्थिति से समस्त चक्र प्रभावित होता और तद्नुरूप प्रतिक्रिया दर्शाता है। इकालॉजी के विशेषज्ञों का मत है कि प्रकृति चक्र की अपनी स्वसंचालित प्रक्रिया है। यदि उसमें अनावश्यक हस्तक्षेप न किया जाय तो वह सतत् गतिमान रहते हुए अगणित अनुदानों से जीव जगत की सेवा करता रह सकता है।

इकालॉजी विशारदों के अनुसार जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक तीस से चालीस रासायनिक तत्व प्रकृति में सदा परिभ्रमण करते रहते हैं। उनका परिवर्तन विभिन्न चक्रों में, विभिन्न रूपों में होता रहता है। विज्ञानवेत्ता इस ‘बायोजियोकेमिकल साइकिल’ कहते हैं। यह चक्र प्राणियों एवं वनस्पतियों के जीवन का स्रोत है, जिससे वे अपने-अपने लिए विभिन्न तरह के रासायनिक तत्व रूपी आहार प्राप्त करते हैं। अवशोषित तत्व जीवकोशों में पहुँचते हैं, जहाँ चयापचय क्रिया सम्पन्न होती है। अवशिष्ट पदार्थ उत्सर्जन के बाद अकार्बनिक जगत को लौटा दिए जाते हैं। यही चक्र निरन्तर गतिशील रहकर प्रकृति की सन्तुलन व्यवस्था को सतत् दृढ़ बनाये रखता है।

गैस रूप में विद्यमान वायुमण्डल के रासायनिक तत्व जीवधारियों द्वारा शोषित होकर पोषक तत्वों में बदल जाते हैं। उदाहरणार्थ- कार्बन डाइआक्साइड कार्बोहाइड्रेट में तथा नाइट्रोजन प्रोटीन में। आहारचक्र के अन्तर्गत अन्यान्य घटकों से गुजारते हुए वे अपने मूल स्वरूप में उत्सर्जन, श्वसन इत्यादि प्रक्रियाओं के उपरान्त वायुमण्डल को लौटा दिए जाते हैं। भूमिगत रासायनिक तत्वों का चक्र भी इसी प्रकार संचारित होता रहता है। पत्थरों के अपक्षयन से खनिज उत्पन्न होते हैं जो लवण के रूप में परिवर्तित होकर मिट्टी में जल अथवा समुद्र, झरना, नदी में मिल जाते हैं और जल चक्र के अभिन्न अंग बन जाते हैं। पौधे प्राणी इस खनिज लवण को ग्रहण करते हैं। फिर आहार चक्र की शुरुआत हो जाती है। अवशिष्ट पदार्थों के वियोजन तथा अंगों के अपक्षयन से खनिज तत्व पुनः लवण एवं जल के रूप में हस्तान्तरित कर दिये जाते हैं।

इस ‘बायोजियो केमिकल साइकिल’ द्वारा जीव जगत की विभिन्न प्रक्रियाओं से उत्पन्न अवशेषों का प्रयोग दूसरे समुदाय द्वारा कर लिया जाता है। एक का अवशिष्ट पदार्थ दूसरे का ऊर्जा स्रोत अथवा आहार बन जाता है। प्राणियों के अवशिष्ट पदार्थों में मिली नाइट्रोजन जीवाणुओं का आहार बन जाती है। जीवाणु मरकर भूमि को उर्वरा बनाते हैं। मिट्टी से पौधे पोषण प्राप्त करते हैं। पौधों से पशुओं को आहार मिलता है। इस प्रकार एक अविराम गतिचक्र चलता रहता है। मनुष्य द्वारा उत्सर्जित विष समान कार्बन डाइआक्साइड पौधों का जीवनाधार है।

इसी प्रकार जनन, पोषण, अभिवर्धन, परिशोधन एवं सन्तुलन का स्वसंचालित गतिचक्र प्रकृति में चलता रहता है जो प्रकृति के विभिन्न घटकों के पारस्परिक सहयोग पर आधारित है। जन्म एवं विकास की तरह मृत्यु व विनाश भी उस जीवन चक्र के गति एवं सन्तुलन के लिए आवश्यक है। पदार्थों के गतिचक्र तथा उससे उत्सर्जित होने वाले ऊर्जा प्रवाह पर ही समस्त जीवों का जीवन अवलम्बित है। जिन्हें जड़ समझा जाता है। उनमें भी यह चक्र गतिशील है। जल के वाष्पीकरण, जमाव तथा पत्थरों के उद्भव एवं कटाव के रूप में भी वह चक्र क्रियाशील है। इसी प्रकार पौधों द्वारा भी सूर्य का प्रकाश अवशोषित किया जाता है तथा पुनः ऊर्जा के रूपान्तरण के साथ अन्तरिक्ष में छोड़ दिया जाता है।

प्रत्येक जीवनदायी पदार्थ में जल का अंश होता है। जीवधारी जब उन्हें ग्रहण करते हैं तो उसका जल कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, फास्फोरस व सल्फर कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा तथा अन्य जीवनदायी पोषक तत्वों में बदल देता है। पौधे मिट्टी से पोषक तत्वों के रूप में नाइट्रेट, अमोनिया सल्फेट आदि प्राप्त करते हैं। वे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से आक्सीजन को वायुमण्डल में छोड़ते रहते हैं। वातावरण में प्रचुर परिमाण में विद्यमान नाइट्रोजन एक निष्क्रिय गैस है जो जीवधारियों द्वारा सीधे प्रयोग में नहीं लायी जा सकती, जबकि वह जीवन की एक प्रमुख इकाई है पर प्रकृति की व्यवस्था वस्तुतः विलक्षण है। दूसरी एक प्रक्रिया से वह उस गैस का प्रयोग योग्य बना देती है। वातावरण में जीवाणुओं की जातियाँ तथा कुछ ‘एल्गी’ की प्रजातियाँ इस गैस को उपयोग में लाती हैं तथा वायुमण्डल से खींचकर मिट्टी में छोड़ देती हैं। मिट्टी के जीवाणु नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल देते हैं। कुछ पौधे अमोनिया को सीधे प्रयोग कर लेते हैं, परन्तु अधिकाँश मिट्टी के जीवाणुओं द्वारा इसके नाइट्राइट व नाइट्रेट में परिवर्तित किये जाने के उपरान्त ही ग्रहण करते हैं। कैल्शियम सल्फर, मैग्नेशियम, पोटेशियम तथा बोरोन जैसे खनिज तत्व मिट्टी के माध्यम से पौधों की जड़ों को प्राप्त होते हैं। पौधों के विनष्ट होने पर पुनः मिट्टी में मिल जाते हैं।

प्रकृति में विभिन्न प्रकार के चक्र चलते रहते हैं। अपनी अलग-अलग भूमिका सम्पन्न करते हुए भी वे परस्पर एक-दूसरे से अन्योन्याश्रित रूप में जुड़े हुए हैं। कार्बन एवं आक्सीजन का एक चक्र है। अनुमान है कि पूरे जीव मण्डल में 2×10×16 टन कार्बन संव्याप्त है। यह वायुमण्डल में 7×10×11 टन कार्बनडाइ आक्साइड तथा हरे पौधों में 4.5×10×11 टन कार्बोहाइड्रेट के रूप में पाया जाता है। प्रकाश संश्लेषण तथा पौधों के श्वसन क्रिया से वायुमण्डल के साथ कार्बन डाइआक्साइड का विनियम चलता रहता है जिसके फलस्वरूप इसकी वार्षिक उत्पादकता धरातल पर 2.5×10×10 टन तथा समुद्री क्षेत्र में 2×10×10 टन प्रतिवर्ष होती है। दिन के समय में प्रकाश संश्लेषण से पौधे के समीप के वायुमण्डल में कार्बन डाइआक्साइड 12 प्रतिशत घट जाती है पर रात्रिकाल में जीवाणुओं, पौधों तथा पशुओं के श्वसन के धरातल पर कार्बन डाइआक्साइड की सान्द्रता 15 प्रतिशत बढ़ जाती है। इससे सन्तुलन बना रहता है। यही सन्तुलन पर्जन्य वर्षा का कारण बनता है जिससे वनस्पतियों- खाद्य में प्राणतत्व समाविष्ट होता है अदूरदर्शिता के कारण ही उत्पन्न होता है।

अनुमान है कि ईंधन के जलाये जाने से वायु मण्डल में प्रतिवर्ष 6×10×9 टन कार्बन डाइआक्साइड वायुमण्डल में भरती जा रही है। वाहनों तथा बड़े कारखानों से निकली मात्रा इसके अतिरिक्त है। कार्बन डाइआक्साइड जल भी घुलनशील है। इस विशेषता के कारण वह समुद्र के माध्यम में समस्त संसार में वितरित कर दी जाती है, पर उसका बाहुल्य होने से जलचरों के अस्तित्व के लिए संकट खड़ा हो गया है। यही स्थिति वायुमण्डल की है। उसमें भरी दमघोंटू विषाक्तता अगणित प्रकार के रोगों का कारण बनती है।

आक्सीजन का चक्र भूमण्डल, वायुमण्डल तथा जीव मण्डल के बीच गतिशील रहता है। आक्सीजन की मात्रा सन्तुलित रखने तथा उसके चक्र को गतिशील रखने में पौधों की प्रकाश-संश्लेषण क्रिया का महत्वपूर्ण योगदान है। आक्सीजन के अतिरिक्त भी अन्य गैसों का चक्र क्रियाशील है। वायुमण्डल में नाइट्रोजन लगभग 80 प्रतिशत है, जो अपने मूल स्वरूप अथवा परिवर्तित रूप में जीवधारियों के काम आती है। पर मनुष्य द्वारा कृत्रिम खादों के अधिक प्रयोग से वह चक्र भी बिगड़ता चला गया है।

जल चक्र पृथ्वी, सूर्य और समुद्र के सहयोग से गतिशील है। पृथ्वी एवं समुद्र का जल सूर्य प्रकाश से वाष्पीभूत होकर वायुमण्डल में पहुँचता, घनीभूत होकर बादल में बदलता तथा पुनः वर्षा के रूप में पृथ्वी एवं नदियों को लौटा दिया जाता है जो पुनः समुद्र में जा पहुँचता है। वर्षा की मात्रा किसी देश अथवा द्वीप की बनावट के ऊपर निर्भर करती है। जल के विश्व-व्यापी वितरण का लेखा जोखा लिया जाय तो मालूम होगा कि जलवृष्टि से पृथ्वी को प्राप्त जल की मात्रा वाष्पीकृत हुए जल के ही समतुल्य होती है। आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका में सूखे की स्थिति सदा बनी रहने का कारण यह है कि वहाँ वर्षा के जल का 75 प्रतिशत भाग वाष्पीभूत हो जाता है।

जल एवं गैसों के अतिरिक्त ऊर्जा का चक्र भी सर्वत्र सक्रिय है। गति अथवा विकास के लिए प्रेरणा एवं शक्ति पेड़ पादप तथा जीव-जन्तु उसी से प्राप्त करते हैं। इस चक्र के अध्ययन विश्लेषण की नयी तकनीक रेडियो आइसोटोप, माइक्रोकैलोरीमेट्री, कम्प्यूटर साइन्स तथा एप्लायड गणित के सम्मिलित सहयोग से विकसित हुई है। इकालॉजी प्रणाली में ऊर्जा चक्र को समझने में इस विधि से भारी मदद मिली है। ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सौर विकिरण है। इस विकिरण का कुछ अंश ‘ऑटोट्राफ’ प्रक्रिया द्वारा जैविक पदार्थ में बदल दिया जाता है जिसमें समस्त भू-मण्डल को आहार आवश्यकता की पूर्ति होती है। आहार चक्र में जीवधारियों के एक समुदाय की आहार ऊर्जा परिवर्तित रूप में दूसरे समुदाय को हस्तान्तरित कर दी जाती है।

प्रकृति के इन विभिन्न चक्रों के युग्म एवं पारस्परिक सहकार से सृष्टि में जीवन विभिन्न रूपों में अठखेलियाँ कर रहा है। एक की गति एवं स्थिति में परिवर्तन का सीधा प्रभाव समूचे ‘इकॉलाजिकल चक्र’ पर पड़ता है। पेड़ पादपों, जीव-जन्तुओं, सूक्ष्म जीवाणुओं मनुष्य तथा सम्बन्धित पर्यावरण के सह अस्तित्व एवं सम्मिलित जटिलतम प्रणाली को ‘इकोसिस्टम’ कहा जाता है। इस सन्तुलन के कारण ही समस्त प्रकृति के सभी व्यापार ठीक ढंग से चलते हैं। प्रत्येक इकॉलाजिकल सिस्टम सैकड़ों हजारों जैविक समुदायों के सहयोग से मिलकर बना है, जो ऊर्जा रासायनिक द्रव्यों का हस्तान्तरण एक से दूसरे में करता रहता है। अन्तर्जगत के इकोसिस्टम की प्रक्रिया भी स्वयं में अद्भुत है। इस प्रक्रिया के ध्वंस एवं निर्माण, जन्म और मरण सम्बन्धी विविध क्रियाओं से वातावरण के समीपवर्ती एवं दूरवर्ती क्षेत्रों में विभिन्न रसायनों का आदान-प्रदान चलता रहता है।

प्रकृति के सभी क्रियाकलाप विभिन्न घटकों के परस्पर सहयोग पर गतिशील हैं। सबका अस्तित्व भी इसी सिद्धान्त पर अवलम्बित है। इसमें गतिरोध तब उत्पन्न होता है जब अनावश्यक छेड़छाड़ की जाती और प्रकृति की स्वचालित व्यवस्था भंग की जाती है। प्रकृति ही नहीं समस्त मानव जाति भी एक जीवन चक्र में बँधी हुयी है। एक की स्थिति दूसरे को प्रभावित करती है। सबकी सुख शान्ति भी इसी बात पर आधारित है कि हर व्यक्ति अपने को विराट् परिवार का अभिन्न अंग माने, उसके विकास में सहयोग दे। व्यक्तिगत स्वार्थ की भी स्थायी रूप से आपूर्ति तभी हो सकती है जब समाज सर्वतोमुखी विकास की ओर चले। संकीर्णता जहाँ कही भी पनपेगी। विलगाव को जन्म देगी। हिल-मिलकर रहने- सरकार की नीति अपनाने तभी उपलब्धियों के आदान-प्रदान की उदारता अपनाने पर ही प्रकृति का सन्तुलन बना हुआ है। यही रीति-नीति मनुष्य जाति को भी अपनानी होगी। सबकी उपेक्षा करके एकाकी कोई भी जीवित नहीं रह सकता। अन्ततः उसे भी दम तोड़ना होगा सह अस्तित्व का सिद्धान्त प्रकृति पर ही नहीं मनुष्य के ऊपर भी लागू होता है। मानव जाति की सुख-शान्ति एवं उज्ज्वल भविष्य का इसे संक्षेप में आधार सूत्र समझा जा सकता है।


उदार चेता (kahani)

एक उदार चेता, सभी समुदाय के लोगों को एकत्रित देखना चाहते थे। एक सम्मेलन स्थान बनाना चाहते थे। सो उन्होंने मन्दिर बना दिया। मन्दिर में हिन्दू तो आये पर मुसलमानों ने उसमें पैर भी नहीं रखा। बाद में उन्होंने मस्जिद बनवाई और हिन्दुओं से कहा वे उदारता दिखायें और उसमें जाया करें। उनने भी मस्जिद में जाने से इनकार कर दिया।

दोनों निर्माणों से उद्देश्य पूरा न होते देखकर उनने एक पाठशाला और व्यायामशाला बनाने का तीसरा उपक्रम किया। उसमें सभी वर्ग के लोग पहुँचे। तब कहीं उन्हें सन्तोष हुआ।


आत्मबोध की चमत्कारी परिणतियाँ

सेठजी के एक ही छोटा बच्चा था। माता पिता दोनों ही उस छोटे बच्चे को छोड़कर मरने लगे तो सोचा विदित सम्पत्ति को अन्य लोग छीन लेंगे। इसलिए इसके गले में एक हीरों की लड़ी मैले-कुचैले धागे में लपेट कर बाँध दें। कभी समझदार होगा तो उसके सहारे बड़ा आदमी बन जायेगा।

जैसी आशंका थी छोड़ी, सम्पत्ति दूसरों ने हड़प ली। लड़का भीख माँगकर गुजारा करने लगा। धीरे-धीरे वह बड़ा और समझदार भी हो गया।

एक दिन जौहरी की दुकान के सामने खड़ा था। गले की लड़ी पर उसकी नजर पड़ी तो पास बुलाकर उतरवाया और ध्यानपूर्वक देखा। उसकी कीमत एक हजार देने लगा। लड़का होशियार था समझा कोई कीमती वस्तु है। बाद में आने की बात कहकर घर चला गया।

लड़ी के दाने उसने अलग-अलग कर लिए। एक-एक करके जौहरियों को दिखाता और बेचता रहा। लाखों कीमत में बिके। उस धन के सहारे वह बड़ा व्यवसायी हो गया। जानकारी न होने के कारण वह भिखारी रहा। वस्तुस्थिति का पता चलते ही वह अमीर हो गया।

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खरगोशों ने समूचे जंगल में अपने को सबसे छोटे आकार का पाया और आत्म-ग्लानि से पानी में डूब मरने का फैसला किया।

झुण्ड बनाकर वे तालाब पर पहुँचे तो किनारे पर छोटे-छोटे मेंढक उनके विशाल आकार को देखकर डरे और भाग खड़े हुए।

बुड्ढे खरगोश ने सभी साथियों को समझा लिया कि हमसे भी छोटे आकार के मेंढक मौजूद हैं। फिर इस प्रकार अपने को हेय क्यों माना जाय? योजना रद्द हो गई और घरों को वापस लौट गये।

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सिंह का बच्चा भेड़ों के झुण्ड में पला था। वह अपने को भेड़ ही समझता और वही तौर तरीके अपना कर रहता।

एक दिन एक सिंह उधर से निकला। उसने झुण्ड से अलग होने और अपना स्वरूप समझने को कहा, पर उसकी समझ में न आयी। तब उसे साथ लेकर नदी के पास पहुँचा, और अपनी और उसकी छाया एक जैसी होने का ज्ञान कराया। तब वह भेड़ों का झुण्ड छोड़कर सिंहों की बिरादरी में मिल गया।

आत्मबोध के अभाव में मनुष्य ऐसे ही कुसंग में भटकता और हेय स्तर के स्वभाव प्रचलन अपनाये रहता है।

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हनुमान जब तक अपने को सुग्रीव का सेवक मात्र समझते रहे तब तक दीन दयनीय स्थिति में थे जब जामवन्त ने उनके बल और स्वरूप का बोध कराया तो वे समुद्र छलाँगने, लंका जलाने और पर्वत उठाने में समर्थ हो गये।

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बुद्ध को आत्मबोध हुआ तो उनका दृष्टिकोण और क्रिया-कलापों तुरन्त बदल गया। तब वे राजकुमार से बदलकर भगवान हो गये।

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नारद द्वारा आत्म-बोध कराये जाने पर पार्वती, प्रह्लाद, ध्रुव वाल्मीकि आदि असंख्यों ने अपना स्वरूप बल वैभव एवं लक्ष्य समझा और वे अपनी गतिविधियों में हेर-फेर करके कुछ से कुछ बन गये।


आत्मा शरीर से भिन्न है और स्वतंत्र भी

वैज्ञानिक क्षेत्रों में कुछ समय पूर्व तक मनुष्य को एक चलता-फिरता पेड़ कहा जाता था और समझा जाता था कि उसका अस्तित्व शरीर के साथ ही समाप्त हो जाता है। शरीरगत रासायनिक पदार्थों के सम्मिश्रण से जो चेतना उत्पन्न होती है- वही आत्मा है। शरीर का मरण होते ही आत्मा की भी समाप्ति हो जाती है।

उन दिनों के वैज्ञानिक जीव कोशों की मध्यवर्ती नाभिकीय सत्ता को ही जन्मने बढ़ने, बुढ़ियाने और मरने के लिए उत्तरदायी मनाते थे, उसी के उभार और ढलान के साथ जीवन मरण की संगति जोड़ते थे। आधुनिक कायशास्त्र में ऐसी ही विवेचना भी मिलती है।

कहा जाता रहा है कि मानव शरीर जिन अगणित जीवकोशों से बना है। उनके भीतर एक लिबलिबा पदार्थ पाया जाता है। इसके भीतर जो सारतत्व है उसे विज्ञान की भाषा में प्रोटो प्लाज्मा कहा जाता है। इस द्रव्य में तैरने वाले नाभिकीय अंश को ‘न्यूक्लियस’ नाम से जाना जाता है। मरण के सम्बन्ध में शरीर विज्ञानियों का मत है कि जब प्रोटोप्लाज्मा का न्यूक्लियस निर्बल पड़ जाता है तो कोशिकाएँ सूखने लगती हैं, उनका वजन घट जाता है और कार्य समता भी कम हो जाती है। यही बुढ़ापे की पृष्ठभूमि है। स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते यहाँ तक पहुँचती है कि शरीर तंत्र के संचालन में व्यवधान खड़े हो जाते हैं और मृत्यु की घड़ी आ पहुँचती है।

पर अब वैसी बात नहीं रही। नवीनतम मान्यताओं ने शरीर में समाई हुई किन्तु उससे सर्वथा भिन्न ऐसी एक स्वतंत्र सत्ता का प्रत्यक्ष दर्शन किया है जो मरने के उपरान्त भी अपना अस्तित्व बनाये रहती है और शरीर के बिना भी शरीर धारियों जैसे स्वभाव और कर्म का परिचय देती है।

पदार्थ विज्ञानी विलियम मैग्डूगल ने यह जानने का प्रयत्न किया कि मरने पर शरीर में क्या कमी हो जाती है। उनने कई मरणासन्न रोगियों को इसी प्रयोजन के लिए विशेष रूप से बनाई गई तराजू पर रखा। मरने के साथ-साथ उनमें से प्रत्येक का वजन तत्काल प्रायः एक डेढ़ ओंस घट गया। इस आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मरने के साथ-साथ कोई विशेष वस्तु निकल भी जाती है। मात्र क्रिया-कलापों का अन्त नहीं होता।

जीवित और मृत शरीर में क्या अन्तर होता है, इनकी जाँच पड़ताल का एक विशेष तरीका डा. गेट्स ने अपनाया। उनने इसी प्रयोजन के लिए कत्थई रंग की एक विशेष प्रकार की किरणें उत्पन्न करने वाला यन्त्र बनाया। यह किरणें हर निर्जीव पदार्थ को एक्सरेज लेसररेज की तरह पार कर जाती थी। वे जीवित पदार्थ को पार नहीं कर पाती थी।

उसने कुछ छोटे प्राणी इस प्रयोग के लिए लिये। जब तक वे जीवित रहे तब तक वे विशेष किरणें पार न हो सकीं। पर जैसे ही प्राणान्त किया गया किरणें तत्काल आर-पार जाने लग गई। इस आधार पर उनने पाया कि मृतक और जीवित शरीरों में रासायनिक पदार्थ ज्यों के त्यों रहने पर भी कोई विशेष तत्व निकल जाता है। इसे उन्होंने प्राण से मिलता-जुलता नाम दिया है।

फ्राँसीसी डाक्टर हेनरी बाराहुक के निजी परिवार में दो मृत्यु हुईं। एक बार उनका बच्चा मरा, दूसरी बार पत्नी। दोनों की मृत्यु के होने से पूर्वक उन्होंने परावर्तित किरणों की हलचल देखने वाले कैमरे फिट कराये। मृत्यु के समय उन यंत्रों ने बताया कि इन क्षेत्रों में साधारण तरंग प्रवाह में भारी उथल-पुथल उत्पन्न हुई।

डा. एफ.एम.स्ट्रा ने मरण के समय की स्थिति जाँचने के लिए विद्युत तरंगों का आँकलन करने वाले नव आविष्कृत उपकरणों का प्रयोग किया। उनने पाया कि मरते समय मनुष्य शरीर से बाहरी क्षेत्र में कुछ विशेष प्रकार की हलचल मचती है।

अमेरिका के इन वैज्ञानिकों ने क्लाइड चेम्बर में एक प्रकार का रासायनिक कुहरा प्रविष्ट किया। उसके भीतर जीवित मेंढक रखे गये। तब कोई खास बात नहीं थी। पर जैसे ही मेंढक को बिजली का झटका देकर मारा गया वैसे ही उसकी आकृति चेम्बर कुहरे में तैरती हुई देखी गई। यह धीरे-धीरे धूमिल होती गई और कुछ देर में पूरी तरह समाप्त हो गई। इस छाया को उन्होंने फोटोग्राफीक प्लेट पर अंकित भी किया है।

लंदन के शरीर विज्ञानी डा.डब्ल्यू. जे. किल्नर ने अपनी पुस्तक “दि ह्यूमन एटमोस फियर” में अपने कितने ही मरण काल की स्थिति पर प्रकाश डालने वाले प्रयोगों का वर्णन किया है। सैन्ट जैम्स अस्पताल में उन्होंने मरण काल में रोगियों के शरीर में एक आभा मण्डल ऊपर उठता और उड़ता देखा, जो प्रायः एक फुट ऊँचा उठने के बाद विलीन हो गया।

सोवियत विज्ञानी ग्रिश्चेन्को ने एक विशेष जैव प्लाज्मा की खोज की है। यह ठोस, द्रव, गैस और सामान्य प्लाज्मा की चार स्थितियों से भिन्न है। यह पाँचवीं स्थिति है। इसे वे परमाणु संगठनों से भिन्न मानते हैं। उसके अन्तर्गत ऐसे स्वतन्त्र इलेक्ट्रान ओर प्रोटान पाये गये हैं, जो सामान्य पदार्थों की स्थिति से भिन्न प्रकार के होते हैं। इस आधार पर जीव सत्ता का एक स्वतंत्र अस्तित्व बनता है। इसे फिलहाल बायोप्लाज्मा नाम दिया गया है। प्रकारान्तर से यह जीव सत्ता के स्वतंत्र अस्तित्व जैसी मान्यता है।

परामनोविज्ञानी प्रो. मुलडोन ने अपने अन्वेषणों का सार संक्षेप “दि प्रोजेक्शन आफ एस्ट्रल बॉडी” में प्रकाशित किया है। उनका कथन है कि- “शरीर के कलेवर में एक स्वतंत्र चेतना का अस्तित्व है। वह इच्छानुसार इस परिधि से बाहर भी भ्रमण कर सकती है और जान सकती है कि दूरस्थ प्रदेशों में भी कहाँ क्या हो रहा है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर परस्पर एक दूसरे से गुँथे रहने पर भी पृथक-पृथक अपनी सत्ता बनाये रहते हैं। वे अपना काम मिल-जुलकर भी करते हैं और स्वतंत्र रूप में भी।” कई घटना प्रसंग भी आत्मा के अस्तित्व सम्बन्धी इन प्रतिपादनों की पुष्टि करते हैं।

बात सन् 1944 की है। प्रख्यात मनोविज्ञानी कार्ल जुंग को दिल का दौरा पड़ा। दौरा बहुत भयानक था। किसी प्रकार उन्हें आक्सीजन और कपूर के इन्जेक्शनों के सहारे जीवित रखा जा रहा था। इस बीच उन्हें अनुभूति हुई कि प्राण शरीर से निकलकर हजारों मील ऊपर चला गया है। बिना पंखों के ही वे इच्छा मात्र से किसी भी दिशा में उड़ सकते हैं। थोड़ी ही देर में उन्होंने यरुसलम तथा दूसरे नगरों के ऊपर से चक्कर काट लिये। इसके बाद वे शरीर में वापस आय गये। कुछ समय बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई।

जुंग ने इस अनुभूति का विवरण विस्तारपूर्वक अपनी पुस्तक में लिखा है और कहा है कि इस घटना के उपरान्त मेरे दृष्टिकोण एवं जीवनक्रम में परिवर्तन हुआ है। मृत्यु का भय तो एक प्रकार से पूरी तरह ही निकल गया।

गुह्य विद्या के विशेषज्ञ प्रो. कीरो अपने युवाकाल तक आध्यात्मिक रहस्यवाद का मजाक उड़ाते और उसे अन्ध-विश्वास बताते रहे। पर कुछ घटनाएँ उनके जीवन में ऐसी घटीं जिनके कारण उन्हें अपनी पूर्व मान्यताएँ बदलने के लिए विवश होना पड़ा।

मार्च 1796 में कीरो दक्षिण अमेरिका में थे। इंग्लैण्ड से उन्हें पिता की भयंकर बीमारी का तार मिला और वे तत्काल चल पड़े। 6000 मील की दूरी पार करने में वायुयान को भी समय तो लगा ही। पहुँचने पर उनने पिता को मरणासन्न पाया। सारा जोर लगाकर वे इतना ही कह पाये कि “कुछ आवश्यक आर्थिक कागजात एक सालीसीटर्स फर्म के पास रखे हैं। उन्हें सम्भाल लेना।” फर्म का नाम बहुत याद करते रहे पर स्मृति ने साथ नहीं दिया। बता न पाये और प्राण छूट गये।

प्रायः तीन वर्ष बाद इंग्लैण्ड में एक मित्र से मिलते समय उनके घर में प्रेतात्माओं के आह्वान का आयोजन देखने को मिला। कीरो चुपचाप बैठे देखते रहे। उसी माहौल में उन्हें ऊपर उड़ती हुई एक धुँधली आकृति दिखी। क्रमशः तस्वीर अधिक साफ होती गई वह उनके पिता की थी। वह बोलने भी लगी। इतना ही कहा- मरते समय जिस फर्म का नाम नहीं बता पाया था वह “डेविड एण्ड सन्स” है। बात समाप्त हो गई। आकृति गायब थी। दूसरे दिन कीरो उस फर्म में पहुँचे। सभी कागजात उन्हें सुरक्षित मिल गये। उस दिन से उन्हें मृतात्माओं के अस्तित्व पर भरोसा हो गया।

कीरो ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘ट्रू घोस्ट स्टोरीज’ में ऐसे ही अपने ऊपर बीते और दूसरों के साथ घटित हुए विवरण लिखें हैं। और उनकी सच्चाई में सन्देह न होने की बात कही है।

एक बार वे एक भुतहे मकान में किरायेदार बने। प्रेतात्मा से उन्होंने एक मंजिल उसके लिए छोड़ देने का समझौता कर लिया और आये दिन के भयंकर उत्पातों से छुटकारा पा गये।

दिलचस्पी बढ़ने पर वे इस और विशेष ध्यान देने लगे। प्रेतात्माओं से सम्पर्क साधने के प्रयत्न करने लगे। इस प्रयास में उन्हें सफलता भी मिली। कितनी ही मृतात्माओं का उनके सम्बन्धियों से वार्त्तालाप कराने में वे माध्यम बने। इस आधार पर उनने कितने ही ऐसे विवरण बताये जो मृतकों के साथ लुप्त हो गये थे पर बाद में उन जानकारियों को प्राप्त कर सम्बन्धियों ने भारी लाभ उठाये।

सेन्ट ल्यूकस हास्पिटल के निर्देशक डा. शनमेकर डेवकर ने मरणासन्न रोगियों की मनःस्थिति का अनुसंधान करने में पूरे उन्नीस वर्ष लगाये। इस अवधि में उन्होंने 2300 रोगियों का पर्यवेक्षण किया। जिनमें 1400 ऐसे थे जिनकी मनःस्थिति जानी जा सके। शेष मूर्छित या अस्त-व्यस्त स्तर की ऐसी मनोदशा में थे जो कुछ सही बात बता सकने के योग्य न थे।

चिकित्सीय मृत्यु का आधार है- मस्तिष्क में प्राण वायु का न पहुँचना और उस क्षेत्र की हलचलों का समाप्त हो जाना। इसमें हृदय की धड़कन बन्द हो जाना भी सम्मिलित है। इस आधार पर मृतक घोषित किये गये व्यक्तियों में से कुछ ऐसे भी निकले जिनकी चेतना तीन घण्टे बीत जाने के बाद भी फिर लौट आई और वे मृत से जीवित हो गये। यह कैसे हुआ इसका कारण शरीर विज्ञान के आधार पर शोधकर्ताओं को ज्ञात न हो सका। फिर भी उन मृत्यु से वापसी वालों ने आने सुखद अनुभव सुनाये। इस मध्यान्तर काल में वे भयभीत उद्विग्न नहीं वरन् अपेक्षाकृत प्रसन्न रहे।

नटलाँटा के एमोरी विश्व विद्यालय के प्रो. माइकेल सेवम ने भी अपनी खोजों में ऐसे लोगों का उल्लेख किया है जो मरने के बाद जी उठे और उस बीच उन पर जो बीती उसका विवरण सुनाते रहे। इनमें से एक भी ऐसा नहीं था जिसने उस बीच किसी प्रकार का त्रास मिलने की बात की हो। सभी सूक्ष्म शरीर के सहारे वे पक्षी की तरह आकाश में उड़ते रहे और चित्र-विचित्र दृश्य देखते रहे। इस बीच उन्हें सुखद अनुभूतियाँ ही होती रहीं।

“इन्टर नेशनल एसोसियेशन फार नियर डेथ” संस्था के निर्देशन समाज शास्त्री जान आडिट का कहना है कि भौतिक विज्ञानियों की यह मान्यता सही नहीं है कि मरने के साथ ही मनुष्य की सत्ता समाप्त हो जाती है और काया के साथ ही मनुष्य मर जाता है। मरते समय लौट-लौट के जीवन मरण के झूले में झूलते रहने वालों ने जो अनुभूतियाँ व्यक्त की हैं उनसे प्रकट होता है कि शरीर रहित स्थिति में भी जीव किसी ऐसे अदृश्य लोक में विचरण करता है जो आँखों से न देखते हुए भी अपने संसार जैसा ही है। साथ ही अति निकट भी।

इन अन्वेषणों में से एक भी ऐसा नहीं है जिसे अविश्वस्त कहा जा सके। ऐसे अनेकानेक प्रमाणों के आधार पर अब वैज्ञानिक जगत भी आत्मा की स्वतंत्र सत्ता की स्वतन्त्र सत्ता स्वीकारने के लिए बाधित हो रहा है।


व्यक्ति चारपाई पर बैठा (kahani)

एक व्यक्ति चारपाई पर बैठा भजन कर रहा था। देखने वाले ने चारपाई पर बैठकर भजन करने को अश्रद्धा बताया। चारपाई पर बैठकर भजन करने वाले ने भर्त्सना करने वाले से पूछा- आप कहाँ बैठकर भजन करते हैं। इस पर उसने कहा- हमें तो अवकाश ही नहीं मिलता। इस पर पहला व्यक्ति हँसा और बोला- फिर आप से हमीं अच्छे हैं। कुछ भी न करने से कुछ करना अच्छा।


स्वप्नों से होती है आगत की जानकारी

स्वप्न सदा तो सच नहीं होते पर अनेक बार उनमें मिले पूर्वाभास ऐसे पाये गये हैं जो समयानुसार खरे उतरे। उसे मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। इनके पीछे चेतना की उस विशिष्ट क्षमता का आभास मिलता है जो अदृश्य जगत में चल रही हलचलों के सहारे यह जानने में समर्थ हो सकती है कि कुछ ही समय उपरान्त क्या होने जा रहा है।

प्रभात होने के पूर्व जानकारी मुर्गे को मिल जाती है और वह बाँग लगाने लगता है। बादलों का रुख देख कर वर्षा होने न होने का अनुमान किसान लगा लेते हैं। चेतना में भी यह क्षमता है कि भावों सम्भावनाओं से सम्बन्धित अदृश्य जगत के घटनाक्रम का पूर्वाभ्यास प्राप्त कर सके।

इटली के सामन्त क्रोसू ने सपना देखा कि उसके पुत्र ऐथिस की हत्यारों ने हत्या कर दी। उसने पुत्र का बाडी गार्ड कुछ विश्वस्त सशस्त्र कर्मचारी नियुक्त कर दिये। एक दिन उन्होंने मालिक के बेटे को मारने का असफल प्रयास किया। इस प्रकार सपने की सूचना सच निकली।

मनोविज्ञानी प्रो. साइमन ने लगभग 3500 सपनों का एक ऐसा विवरण ग्रन्थ प्रकाशित किया है जिससे प्रतीत होता है कि कुछ सपने तो सर्वथा निरर्थक होते हैं पर कुछ ऐसे भी होते हैं जिनमें महत्वपूर्ण सम्भावनाओं की पूर्व सूचनाओं का समावेश रहता है।

मिस्र के राजा फराऊन ने स्वप्न देखा कि नील नदी के किनारे सात सफेद गायें चर रही हैं। इतने में सात काले रंग की गायें कहीं से भागती हुई आईं और उन घास चरती गायों को देखते-देखते खा गईं।

इस विचित्र सपने का अर्थ उसने गुणी लोगों को दरबार में बुलाकर पूछा। उनने कहा- “अगले सात वर्ष सुख-शान्ति के रहेंगे और इसके बात सात वर्ष विपत्तियाँ सहनी पड़ेगी। इसकी यह पूर्व सूचना है।”

ऐसा ही हुआ भी। सात वर्ष बहुत खुशहाली के कटे इसके बाद भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा जो सात वर्षों तक लगातार चला। उसमें राजा प्रजा सभी तबाह हो गये।

छत्रपति शिवाजी ने एक सपने में किसी स्थान पर खजाना गढ़ा देखा। अगले दिनों उनने चुपके से उस स्थान की खुदाई अपने विश्वस्तजनों से कराई और वैसी ही सम्पदा पाई जैसी कि सपने में देखी थी।

आन्ध्र के राजा विक्रम देव ने सपने में विष्णु भगवान को देखा। वे कह रहे थे। “एक रथ बनाओ। स्वयं खींचो। रायली गाँव की सड़क पर चलो। जहाँ रथ की धुरी टूट जाय वहाँ रुको। खोदकर देखो मेरी मूर्ति गढ़ी है। उसे निकालकर मन्दिर बना देना। तुम्हारा कल्याण होगा।” राजा ने वैसा ही किया। नियत स्थान पर मूर्ति मिली। वहाँ केशव भगवान का मन्दिर अभी भी बना हुआ है।

नैपोलियन का एक विश्वस्त सेनापति था स्टीगल। मौरंगो के युद्ध मोर्चे पर उसे जाना था। जाने से एक दिन पहले उसने देखा। शत्रु के सेनाधिकारी ने हसिये से उसका सिर काट लिया है। वह बात उसने नैपोलियन से कही तो उसने डरपोक मन की सनक बताया और मोर्चे पर भेज दिया। तीसरे दिन समाचार मिला कि स्टीगल लड़ाई में मारा गया। सपनों का मजाक उड़ाने वाले नैपोलियन को भी अपनी राय बदलनी पड़ी।

अमेरिका के कार्लोमेपल्स स्थान में एक सरकारी अफसर ने सपना देखा कि कल का दिन उसकी मृत्यु का दिन है। सवेरे उठने पर उसने पत्नी से सपना कहा। दोनों ने निश्चय किया कि आज काम पर न जाया जाय। घर ही रहा जाय। दिन बीत गया। शाम होते-होते पड़ौसी मित्र की बीमारी का समाचार मिला देखने के लिए पास ही जाना था सो वह चला। घर से निकलते ही दरवाजे पर एक गुजरती जीप से उसकी टक्कर हुई और वही प्राण पखेरू उड़ गये।

प्रस्तुत स्वप्न संकलन पुस्तक में ऐसी ही अनेक घटनाओं का उल्लेख है।


चेतना जगत की सुलझती गुत्थियाँ

मरणोत्तर स्थिति के सम्बन्ध में अनुसंधानकर्ताओं का कथन है कि जीव चेतना जिस प्रकार जीवित स्थिति में अपने अनेकानेक आवश्यकताओं की तथा समस्याओं की पूर्ति करती रहती है उसी प्रकार वह स्वसंचालित पद्धति से मरणोत्तर स्थिति में भी स्थिति के अनुरूप तालमेल बिठा लेती है।

ग्रहण विसर्जन के उपक्रम आये दिन चलते रहते हैं। उनमें से कोई भी कष्टकारक नहीं होता है। अन्न, जल और श्वास का ग्रहण करने का क्रम निरन्तर चलता रहता है। इसी प्रकार मल विसर्जन का कार्य अनेक छिद्रों द्वारा स्वतः सम्पन्न होता रहता है। करवट लेने और कपड़ा बदलने में कोई कष्ट नहीं होता। एक घर से दूसरे घर में प्रवेश करने- एक सड़क छोड़कर दूसरी पर चलने में जब कोई कष्ट नहीं होता और सामान्य अभ्यास ही उन कार्यों को निपटा लेता है तो फिर शरीर त्याग के समय कष्ट होने की बात समझ में नहीं आती।

जरा-जीर्ण होने पर अंगों की गतिशीलता में व्यवधान आने पर होने वाला कष्ट अलग बात है। चोट लगने या बीमार पड़ने की व्यथा का अपना ढंग और स्वरूप है। या उसे मरण के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। मरण से पूर्व रुग्णता एवं जीर्णताजन्य कष्ट होते हैं उन्हें जीवन में आते रहने वाले उतार-चढ़ावों में ही सम्मिलित रखना चाहिए। मरणकाल की स्थिति और रुग्णता की व्यथा को एक-दूसरे से सर्वथा पृथक समझना ही उचित है।

मरने के समय मस्तिष्क समेत सभी अवयव काम बन्द कर देते हैं। ऐसी दशा में कष्ट की अनुभूति का भी कोई तुक नहीं। यह कार्य उसी प्रकार का है जैसा कि ईंधन के अभाव में आग का बुझ जाना। ऐसी दशा में मरण काल का कष्ट पीड़ा परक नहीं हो सकता है। मोह के कारण बिछोह से तिलमिलाहट होना तो बात दूसरी है।

मरने के बाद स्वभावतः दूसरे स्तर का जीवनयापन करने की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रकृति ने हर जीवधारी के शरीर, मन और साधनों का ऐसा सन्तुलन बिठाया है कि वह उस परिधि में रहकर बिना खिन्नता अनुभव किये अपनी जीवनचर्या चलाता रहा। यदि ऐसा न होता तो एक भी प्राणी न स्वयं चैन से रहता न दूसरों को रहने देता। देखा जाता है कि सभी जीवधारी अपनी-अपनी परिस्थितियों में सुखपूर्वक निर्वाह करते हैं। शरीर छोड़ने के लिए सहमत नहीं होते। वरन् ऐसा कुछ सामने होने पर उससे बचने का प्रयास करते हैं ताकि उपलब्ध सुख सुविधा से विरत न होना पड़े। मरणोत्तर काल में भी चेतना के लिए नियति ने ऐसी ही व्यवस्था बना रखी होगी जिसमें वह जब तक उस स्थिति में रहे तब तक बिना किसी कठिनाई के समय गुजार सके।

जन्म और मरण की मध्यवर्ती अवधि को चेतना विज्ञानी विश्राम की अवधि मानते हैं। बहिरंग मस्तिष्क को तो नींद लेकर थकान मिटाने का अवसर मिल जाता है पर शरीर यात्रा के लिए मूलतः उत्तरदायी अचेतन मन को कभी भी चैन नहीं मिलता। निद्रा काल में भी अचेतन मन के क्रिया-कलाप जारी रहते हैं। स्वप्नलोक में वह विचरण करता रहता है और समूचे शरीर को समस्त क्रिया-कलापों को अनवरत रूप से संभालता रहता है। रक्त-संसार, श्वास-प्रश्वास, निमेष, उन्मत्त आकुंचन प्रकुंचन आदि में अचेतन मन में निद्रावस्था में भी उतना ही सक्रिय रहना पड़ता है जितना कि जागृत स्थिति में। ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि चेतना को समुचित विश्राम का अवसर जीवनकाल में कभी मिलता ही नहीं। उसके लिए मरणोत्तर काल का अवसर ही एक मात्र सुयोग है। ऐसी दशा में जीवात्मा का इन दिनों इतनी सुविधा मिलनी चाहिए जिसमें वह बिना किसी विक्षेप की थकान मिटा सके और भविष्य के लिए नई स्फूर्ति अर्जित कर सके।

इस सन्दर्भ में कई मनोविज्ञानियों डाक्टरों ने गहरी खोज की है। उनने मरणासन्न रोगियों की मनोदशा, शारीरिक स्थिति, वार्ता तथा संकेतों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि उन पर क्या बीत रही है। वे परिवर्तन से कैसा अनुभव कर रहे हैं।

इसके अतिरिक्त इन शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से उनके साथ सम्पर्क साधा जो मृतक घोषित कर दिये गये थे। पर कुछ समय बाद उनकी चेतना लौट आई। और इस मध्यकाल के अनुभव बता सकने की स्थिति में थे। ऐसे शोध कर्ताओं द्वारा एकत्रित किये गये प्रमाण तथा निकाले गये निष्कर्ष सामान्य जनों की जिज्ञासा के समाधान में बहुत कुछ सहायता करते हैं।

वर्जिनिया मेडिकल कालेज के प्रोफेसर डा. इयान स्टीवेन्सन का निष्कर्ष है कि मृत्यु अनचाही अतिथि है। तो भी वह डरावनी नहीं है। वह एक परिवर्तन भर है, जिन्हें प्रवास के आनन्द की स्मृति है उन्हें यह भी जानना चाहिए कि मरणोत्तर जीवन में आत्म सत्ता बनी रहती है और वह विश्रान्ति के लिए नियति व्यवस्था के अनुरूप ऐसी परिस्थितियाँ मिलती हैं जिसमें थकान उतर सके और भविष्य के लिए स्फूर्ति मिल सके।

यह सामान्य स्थिति की बात हुई। पर असामान्य स्थिति में मरने वाले लोगों की मनःस्थिति जब विपन्न होती है तो उन्हें मरने के समय विछोह, पश्चाताप के अतिरिक्त अपनी विवशता पर भी खेद होता है और आँखों से आँसू बहाते हुए बिलखते हुए मरते हैं। ऐसे अनुभव उन पादरियों के मुँह से सुने गये हैं। जिनके पास मरणासन्न स्थिति में निर्धारित धर्मकृत्य कराने के लिए जान पड़ता रहा है। उनमें से सन्तुलित मनःस्थिति वाले तो प्रसन्नचित्त रहे किन्तु विक्षुब्ध प्रकृति वालों को व्याधिजन्य कष्ट की अनुभूति न होते हुए भी मृत्यू के क्षणों घबराने और रुदन करते पाया गया।

प्रेतों के सम्बन्ध में किये गये परामनोविज्ञान अनुसंधानों से भी ऐसा ही पता चला है कि उद्वीप्त मनःस्थिति ही मरणोत्तर समय पर मनुष्य को आक्रोशग्रस्त रखती है। एक जैसा जीवन व्यतीत करते रहे लोगों के बीच भी प्रेत जीवन में पाई गई भारी भिन्नता का कारण यह समझा गया है कि किसी दण्ड पुरस्कार के अन्तर्गत नहीं वरन् उन्हें अपने ही स्वभाव संस्कार के आधार पर उन दिनों सुख-दुख का अनुभव होता रहता है। अस्तु प्राणी की निजी मनःस्थिति को ही परलोक में उपलब्ध होने वाली भली-बुरी परिस्थितियों का निमित्त कारण माना जा सकता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी इस तथ्य को अब स्वीकारने लगे हैं, जबकि पूवर्त्ति अध्यात्म दर्शन तो प्रारम्भ से ही इस मान्यता का पक्षधर रहा है।


चाणक्य की संकल्प शक्ति (kahani)

चाणक्य की संकल्प शक्ति अद्भुत थी। बचपन में किसी ज्योतिषी ने उनके बड़े दाँत देखकर कह दिया- यह बड़ा होकर राजा बनेगा और युद्धों में लिप्त रहेगा। माँ अपने बच्चे को जीवन भर पास देखना चाहती थी। सो इकलौते बच्चे के बिछुड़ जाने की कल्पना करके रोने लगी।

माता के रोने का कारण प्रतीत हुआ तो उनने एक पत्थर लेकर अपने बढ़े हुए दाँत तोड़ डाले और कहा- इन दाँतों पर ही मेरा भविष्य निर्भर है तो मैंने इन्हें तत्काल तोड़ दिया। भविष्य तो मुझे बनाना है। दाँत यदि आड़े आते हैं तो उन्हें तोड़ देना ही ठीक था। माता उनके इस दुस्साहस को देखकर दंग रह गई।


सब कुछ लुट गया

एक लकड़हारा था। नित्य की तरह लकड़ी काटने जंगल गया। काम की लकड़ी दिखी नहीं। तीसरा प्रहर हो चला। थक कर एक पेड़ की छाया में सुस्ताने लगा। लेटते-लेटते नींद आ गई। फिर भी वह गहरी न थी। सपनों की दौड़ चल पड़ी।

देखा कि वह कंकरीली जमीन में भटक रहा है। बैठने लायक कहीं जगह न दिखी तो पत्तों का आसन बनाकर उस पर सुस्ताने की बात सोचने लगा।

पूरे पत्ते जमा भी न होने पाये थे कि एक विचार उसके दिमाग में आया। क्यों न लकड़ी बीन कर चारपाई बनाई जाय और उस पर लम्बे पैर करके मजे में सोया जाय।

उसने पत्ते बटोरना छोड़ दिया और लकड़ी काटने लगा। चारपाई का सपना उसकी अभिलाषा को दूनी कर रहा था।

चारपाई के लिए लकड़ी पूरी भी न हो पाई थी कि मन बदला और सोचने लगा सामने वाले पहाड़ पर कब्जा क्यों न कर लिया जाय। इसमें ढेरों चट्टानें, कितनी ही गुफाएँ और पेड़ों की भरमार है। उस पर रहते हुए। लकड़ी पत्थर काटने बेचने का भी लाभ मिलेगा। टूटे झोंपड़े में रहने की अपेक्षा किसी बढ़िया गुफा में परिवार समेत रहने का प्रबन्ध भी हो जायेगा।

सपना सघन होता चला गया। उसने कुल्हाड़ी फेंक दी। धनुष बाण बनाया और उस पहाड़ी पर रहने वालों को परास्त करने कब्जा करने की योजना में जुट गया।

सपना तो सपना ही ठहरा। पत्ते का आसन- लकड़ी का पलंग- हवा में उड़ गये। अब धनुष बाण बन रहा था और पहाड़ी पर कब्जा करने- उस क्षेत्र की प्रचुर सम्पदा हस्तगत करने को मन ललक रहा था। आधी घड़ी बीतने न पाई थी कि उसने पहाड़ी पर कब्जा कर लिया। अब वह उस क्षेत्र का राजा था। खुशी से फूला न समा रहा था।

राजा पत्ते के आसन, लकड़ी की चारपाई पर थोड़े ही बैठते हैं। दरबारी क्या कहेंगे। शानदार सिंहासन चाहिए। चाँदी का। पूछने पर किसी ज्योतिषी ने बताया, यहाँ से तीस योजन दूर एक चाँदी की खदान हेमकूट पर्वत पर है। वह पर्वत संगमरमर का है। ग्रह दशा अच्छी है। इसी मुहूर्त में चल पड़ा जाय तो उस पर अधिकर करने में कोई बाधा न पड़ेगी। राजमहल बनाने को चमकीला पत्थर और सिंहासन के लिए चाँदी मिलेगी। चाँदी बेचकर राजमहल बनाने हाथी घोड़े खरीदने और फौज भर्ती करने में देर न लगेगी।

ललक ने बेचैनी उत्पन्न कर दी। वह हवा में उड़ा और हेमकूट पर्वत पर आसमान में उड़ता हुआ पहुँचा और बादल की तरह समूचे क्षेत्र पर छा गया। बिना प्रयास के किए उस पर्वत की सारी सम्पदा उसके हाथ आ गई। चाँदी और संगमरमर की खुदाई शुरू हुई। विश्वकर्मा आसमान से उतरे और देखते-देखते उनने संगमरमर का महल और चाँदी का सिंहासन बना दिया।

लकड़हारा, सपने का राजा था। दरबार लगा। राज्याभिषेक की तैयारी चल पड़ी। रत्न जटित पोशाक बन गई। पर मुकुट चाँदी का, सिंहासन चाँदी का होना कुछ फव नहीं रहा था। सम्राट के लिए सोने का सिंहासन और सोने का मुकुट चाहिए। इसके लिए सात मन सोना चाहिए। सपने का राजा इस कमी को पूरा करने के लिए बेचैन हो उठा।

आसमान से चार परी उतरीं। बोलीं आप हम चारों से विवाह कर लें। आप जैसे प्रतापी राजा की खोज में हम चारों अभी तक कुमारी फिर रही हैं। संसार भर में भ्रमण करने के उपरान्त आप ही मनचाहे मिले हैं। आप हम चारों को रानी बना लीजिए। हम सहेलियाँ हैं साथ रहेंगी। तीस मन सोना हम लोगों के पास है सो आपको दहेज में देंगी।

राजा अपने भाग्य को सराहने लगा। उसने बिना मुहूर्त दिखाये ही तत्काल विवाह कर लिया। अप्सराएँ रानियाँ थीं। सोने का मुकुट और सिंहासन बनते देर न लगी। अभिषेक समारोह की शहनाइयाँ बजने लगीं। चारों रानियाँ च्योवर ढुला रही थीं। अभिषेक का कृयाकृत्य चल पड़ा। प्रजानन उपहारों के थाल लिये खड़े थे। किले के बाहर रथों और हाथियों की पंक्ति खड़ी थी। अभिषेक के उपरान्त राजा की नगर में शोभायात्रा निकालनी थी। घटना चक्र तूफानी गति से आगे बढ़ रहा था। सालों का काम मिनटों में निपट रहा था।

शोभायात्रा चल पड़ी। सज-धज वाला जुलूस किसी चक्रवर्ती के विजयोत्सव से कम न था। लकड़हारा सोया तो धरती पर था पर कल्पना के विमान पर चढ़कर वह सातवें स्वर्ग में उड़ रहा था। सफलता और सौभाग्य के गर्व से उसकी महत्त्वाकाँक्षाएँ कृत-कृत्य हुई जा रही थीं। जुलूस गाजे-बाजे के साथ चल रहा था।

मच्छर मस्ती पर आये गये। उनके झुण्ड पीठ और कन्धे पर जम गये। गर्मी की अधिकता से कान खजूरे भी रेंगते हुए वहीं आ गये और लकड़हारे की गदेली जैसी देह पर सैर करने लगे। खुजली चल पड़ी। नींद तो ऐसे ही अधूरी थी। इन दुष्टों ने उसे भी हराम कर दिया। खुजलाने को हाथ उठा तो करवट भी बदलना पड़ा। इतने भर उलट-पुलट में नींद खुल गई। देखा तो दिन छिपने जा रहा था।

नींद टूटी। वास्तविकता सामने आ खड़ी हुई। कितना मीठा सपना। कहाँ चला गया। फिर देखने लगे यह सोचकर उसने फिर से आँखें बन्द करने और लेटने का प्रयास किया। पर यर्थाथता प्रबल थी। उसने अन्धेरे का खतरा- और घर की दूरी बताई और झटपट चल पड़ने के लिए बाधित कर दिया।

लकड़हारा, सब कुछ गँवा चुका था। भारी पैर से बड़ी कठिनाई से गिरता पड़ता भारी मन लेकर खाली हाथ घर पहुँचा। उस दिन लकड़ी भी नहीं काटी गई। धान भी पोटली में न था। घरवाली चिन्तित हो उठी। उदासी किस कारण छाई। धान की पोटली क्यों खाली आई। जैसे प्रश्न उसने उत्सुकता से पूछे।

लकड़हारे के होठ सूख रहे थे। सिर पर हाथ रखकर वह एक कोने में निढाल बैठ गया। उसका सब कुछ लुट चुका था।

किसी समझदार ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा- “यह संसार भी एक प्रकार से चला-चली का मेला है। जितना भी जीवन है उसे परिश्रम से- ईमानदारी से काटना अच्छा है। सपने तो शेखचिल्ली देखते हैं।”


शराब की लत से बेतरह डूबा (kahani)

गुजरात का एक जमींदार शराब की लत से बेतरह डूबा था, साथ ही उससे होने वाली हानियों भी उसे कम दुःखी नहीं कर रही थीं। एक दिन उस क्षेत्र के सन्त रविशंकर महाराज पधारे। उनसे जमींदार ने लत छूटने का उपाय पूछा और आशीर्वाद माँगा।

महाराज ने इसके लिए दूसरे दिन अपने डेरे पर बुलाया। नियत समय पर पहुँचा भी। पहुँचने पर अजीब दृश्य देखा। महाराज खम्भे को दोनों हाथों से जकड़े खड़े थे।

जमींदार ने बैठने और बात करने के लिए कहा, तो उनने विवशता जताते हुए कहा- क्या करें, खम्भे ने जकड़ लिया है, यह छोड़ता ही नहीं।

जमींदार ने कहा- ‘आप कैसी अजीब बात कहते हैं। कहीं बेजान खम्भा जानदार आदमी को जकड़ सकता है।’

महाराज ने खम्भा छोड़ दिया और जमींदार के कन्धे पर हाथ रखते हुए पूछा- ‘शराब बेजान और आप जानदार हैं न? लत आपकी है या शराब की? शराब को आप छोड़ेंगे या शराब आपको छोड़े?

जमींदार को नया प्रकाश मिला। उसने उसी दिन से संकल्पपूर्वक शराब छोड़ दी और फिर जिन्दगी भर छुई तक नहीं।


अतीन्द्रिय क्षमताएँ अभ्यास की देन

परामनोविज्ञान की वर्तमान शोधों में अध्यात्म रहस्यवाद के कुछ ही तथ्यों तक पहुँच सम्भव हो सकी है। क्लेयरवायन्स (अतीन्द्रिय ज्ञान) टेलीपैथी (विचार सम्प्रेषण) फ्रीकॉगनीशन (पूर्वाभास) साइकोकाइनेसिस (प्राणियों तथा पदार्थों को प्रभावित करना) इनके अतिरिक्त अब पुनर्जन्म की मान्यता को भी उसमें सम्मिलित कर लिया गया है।

वैज्ञानिक क्षेत्रों में मानवी चेतना को शरीर तंत्र पर आधारित और उसी की परिधि में ज्ञान सम्पादन तथा कार्य संलग्न रहने की बात कही और समझी जाती रही है पर अब यह प्रतीत हो रहा है कि अतीन्द्रिय क्षमताओं के जो प्रमाण उपलब्ध हो रहे हैं, उन्हें झुठलाया कैसे जाय? और यदि झुठलाया नहीं जाता तो यह संगति कैसे बैठे कि चेतना शरीर के माध्यम से काम करती और उसी परिधि में सीमित रहती है।

मस्तिष्क विद्या के निष्णान्तों ने इस सन्दर्भ में कुछ अपने ढंग से सोचा है। पिनियल और पिट्यूटरी ग्रन्थियों के स्राव एड्रीनल को प्रभावित करते हैं। उन प्रभावों से मस्तिष्क का हाइपोथेलेमस भाग उत्तेजित होता है और अचेतन मन को उन्मुक्त रूप से काम करने का अवसर प्रदान करता है। सामान्य स्थिति में वह सचेतन के प्रभाव से दबा रहता है और शरीर यात्रा के स्वसंचालित समझे जाने वाले क्रिया-कलापों का ही ताना-बाना बुनता रहता है। किन्तु उस पर से सचेतन का दबाव हट सके तो अचेतन की रहस्यमयी गतिविधियों को विशेष काम करने का अवसर मिल सकता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का स्रोत अचेतन पक्ष है।

सचेतन को शान्त सीमित एवं मूर्छित करने की साधनाएँ ध्यानयोग कहलाती हैं। उसके कितने ही प्रयोग ऐसे हैं जो सचेतन को शान्त और अचेतन को उत्साहित करने का दुहरा प्रयोजन पूरा कर सके। यह स्थिति जिसमें जितनी मात्रा में बन पड़ती है वह अतीन्द्रिय क्षेत्र की प्रगति में उतना ही अधिक सफल हो सकता है।

इतने पर भी यह प्रश्न यथावत् बना रहता है कि गुह्य विद्या प्रसंगों में शरीरगत चेतना का ही विकास हुआ अथवा इसके अतिरिक्त किसी स्वतंत्र आत्म सत्ता की सिद्धि हुई?

एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्सन (अतीन्द्रिय क्षमता) यदि शरीरगत है तो इससे आत्मा की स्वतंत्र सत्ता कहाँ सिद्ध हुई और इसके बिना अध्यात्मवाद के सिद्धान्त का समर्थन कहाँ हुआ? दूर-दर्शन, दूर-प्रवण, दूर-आश्वादन, दूर-स्पर्शन जैसी अनुभूतियाँ इन्द्रिय चेतना का क्षेत्र विस्तार मात्र है। सामान्य स्थिति में इन्द्रियाँ एक सीमित क्षेत्र में काम कर पाती हैं जबकि अतीन्द्रिय स्तर के अभ्यासों में उनका कार्यक्षेत्र बढ़ जाता है। खुली आँखें साधारणतया मध्यवर्ती आकार एवं दूरी को ही देख सकती है, पर वे माइक्रोस्कोप के सहारे ऐसा भी देख सकती हैं जो खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता है। यही बात टेलिस्कोप के सम्बन्ध में भी है वे इतनी दूरी तक देख सकती हैं, जितना कि सामान्यतया दीख नहीं पड़ता। यह कृत्य आये दिन होते रहते हैं, इन्हें अध्यात्म कैसे माना जाय? और उससे आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व की सिद्धि कैसे हो?

बौद्धिक प्रखरता के आधार पर लोग ऐसे अनुमान लगा लेते हैं जिन्हें अदृश्य, अश्रुत, अघटित स्तर का कहा जा सके। किन्तु विलक्षण प्रतिभाएँ ऐसे अनुमान लगाती और निष्कर्षों पर पहुँचती देखी गई हैं जिन्हें दिव्य ज्ञान कहा जा सके। फलित ज्योतिष वाले ऐसे ही तर तुक्के बिठाते रहते हैं जिनमें से अधिकाँश अनायास ही ठीक बैठ जाते हैं। परामनोविज्ञान की पूर्वाभास शाखा के सम्बन्ध में भी ऐसा ही कुछ सोचा जा सकता है।

सन् 1851 में फारस निवासी सुलैमान सौदागर भारत आये थे। उनने अपने संस्मरणों में कितनी ही अद्भुत घटनाओं का वर्णन किया है उनने प्रयाग कुम्भ मेले में आकर्षण का केन्द्र बने हुए एक साधु का वर्णन किया है जो निरन्तर खुली आँखों से सूर्य की ओर देखता रहता था। उनके लिए भी यह एक अजूबा ही था।

अनेक देशी-विदेशी पर्यटकों ने हिमालय के स्वामी रामानन्द अवधूत के सम्बन्ध में लिखा है कि वे सूर्य पर घण्टों खुली आँख से त्राटक करते थे। सौ वर्ष से अधिक आयु के थे और शरीर की दृष्टि से कुछ भारी होते हुए भी निरोग थे। सदा निर्वस्त्र रहते थे।

अंग्रेज इतिहासकार विसेन्ट पर्ल ने अपने ग्रन्थ “रिलीजस हिस्ट्री आफ इण्डिया” में उज्जैन कुम्भ के अवसर पर आये एक हठयोगी का विवरण लिखा है- वे बिलकुल नंगे रहते थे। अपने पतले शरीर को गुब्बारे की तरह फुलाकर कई गुना कर लेते थे लोहे की मोटी छड़ को उन्होंने हाथों से मोड़कर दिखाया। गुप्तेन्द्रिय को बढ़ाकर दो फुट लम्बा कर दिखाया। “शरीर सम्बन्धी ये कौतुक ही उनकी दृष्टि में आत्म-शक्ति का चमत्कार था लेकिन अध्यात्म विज्ञान की दृष्टि से इनको महत्व नहीं दिया जा सकता।

परामनोविज्ञान क्षेत्र में पिछले दिनों संसार की कितनी ही संस्थानों ने महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। “प्रोसीडिग्स आफ दि सोसाइटी फार सायफिकल रिसर्च एवं फाउन्डेशन फार रिसर्च इन टू दि नेचर आफ मैन” संस्थानों ने जो कार्य किये हैं उनके प्रमाणों और निष्कर्षों का समय-समय पर प्रकाशन होता रहा है। इनसे सिद्ध होता है कि मनुष्य की क्षमता उतनी ही नहीं है जितनी कि कार्यों से प्रकट होती है। मस्तिष्कीय प्रभाव आमतौर से सोच विचार में कल्पना एवं निर्णय में काम आता दीखता है। इतने पर भी परिधि इतनी छोटी भर मान बैठना ठीक नहीं।

सन् 1882 से लेकर अब तक के सौ वर्षों में इन संस्थानों के माध्यम से इंग्लैण्ड को हेनरी रिजावक एफ मायर्स-एडमंड गर्नी और अमेरिका के जे. बी. राइन अपनी पत्नी लुइसा समेत इस सन्दर्भ में आजीवन जुटे रहे हैं। इन लोगों ने मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमताओं के सम्बन्ध में अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये हैं और सिद्ध किया है कि यदि इन प्रसुप्त क्षमताओं को बढ़ाया और काम में लाया जाने लगे तो उनके विकसित होने की वैसी ही सम्भावना है जैसी कि एकाग्रताजन्य अनेकों मानसिक क्षमताएँ उपलब्ध हुई और प्रगतिक्रम में सहायक बनी हैं।

डा. बार्नेट द्वारा प्रकाशित एक अतीन्द्रिय पर्यवेक्षण में भारत के एक मिलट्री मेजर का उल्लेख है जिसके मरणकालीन विचार तत्काल उनकी पत्नी के पास पहुँचे। घटना 9 सितम्बर 1842 की है। मेजर मुलतान के सैनिक शिविर में घायल पड़ा था। मरते समय उसने अपने एक मित्र अफसर को कहा- “मेरी उँगली से यह अँगूठी निकाल लो, इसे मेरी पत्नी के पास पहुँचा देना।” इसके बाद उसकी मृत्यु हो गई।

ठीक उसी समय फिरोजपुर में सोती हुई उसकी पत्नी ने ठीक वही दृश्य देखा और शब्द सुनाई पड़े। गहरी नींद से वह हड़बड़ा कर उठी और उसने अशुभ स्वप्न का विवरण घरवालों को सुनाया। सभी ने उसे मन का भ्रम कह कर टाल दिया। पर तीसरे दिन वह मित्र अफसर जब मृतक की अँगूठी लेकर पहुँचा तो उस पूर्वाभास की वास्तविकता पर सभी दंग रह गये।

अंग्रेज महाकवि शैली को अक्सर अपना ही प्रतिबिम्ब सामने खड़ा दीखता था। प्रत्यक्ष बात तो वही करता था, पर उँगली के इशारे से कुछ संकेत करता था। इन संकेतों पर ध्यान देने से शैली को कई बार कई रहस्य भरी जानकारियाँ भी मिली थीं।

एकबार शैली ने अपने छाया पुरुष को समुद्र किनारे का एक विशेष स्थान दिखाया और वहाँ गड्ढा खोदने लगा। यह घटना कवि ने अपनी डायरी में नोट कर ली। ठीक एक वर्ष बाद शैली उसी स्थान पर कारणवश पहुँचे और देखते-देखते मर गये।

हालीवुड की अभिनेत्री शर्ल मैकलिन कुछ समय पूर्व भूटान आदि पर्वतीय क्षेत्रों के पर्यटन पर आई थी। उनने अपने प्रकाशित संस्करणों में भूटान क्षेत्र में एक पीत वस्त्रधारी लामा को आकाश में उड़ते हुए अपनी आँखों देखी घटना का वर्णन किया है। आँखों को धोखा होने की बात को उन्होंने नहीं माना है और इस आकाश गमन के इस प्रत्यक्ष दर्शन पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- “काश! न्यूटन मेरे साथ होते तो अपने प्रतिपादित गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त में अवश्य ही कोई सुधार परिवर्तन न करते।”

एलेक्जेन्ड्रा डेविल नील नामक एक योरोपियन महिला ने चौदह वर्ष तक तिब्बत में रहकर वहाँ के रहस्यवादियों की गतिविधियों का अध्ययन किया है। उनने अपने संस्मरणों में ‘लुंग गाम्या’ वर्ग के सिद्ध लामाओं का वर्णन किया है जो हिरनों की तरह लम्बी कुचालें लगाते हुए आकाश गमन करते थे। उन्होंने ‘जूमो’ वर्ग के ऐसे वर्ग का भी वर्णन किया है जिनके शरीर आग जैसे गरम हो जाते थे और बर्फीले झरनों में बैठकर अपनी साधना करते थे।

सन्त फ्राँसिस का जन्म इटली के एक कृषक परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके जीवन की अनेकों चमत्कारी घटनाएँ लोगों को देखने को मिलती थी। आग के शोलों से खेलना उनका प्रिय विनोद था। अग्नि में तप्त लाल लोहे की सलाकें हाथ में लेकर वे कहा करते थे कि इससे मैं अपने को गरम करता हूँ। 1507 में पओला के सन्तफ्राँसिस की मृत्यु हो गयी। उनका शव अभी तक यथावत स्थिति में रखा है, सड़ा नहीं। प्रतिवर्ष एकबार दर्शन के लिये उसकी शव पेटिका को खोला जाता है।

पाकिस्तानी नागरिक खुदाबक्श ने अमेरिका के पत्रकारों की एक कांफ्रेंस में आँखों में पट्टी बाँधकर अखबारों के पन्ने पढ़कर सुनाये थे और उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया था। आँखों से पट्टी पत्रकारों ने बाँधी थी और मोटे कपड़े की कई परतें इस प्रकार घुमाई थीं कि उनमें होकर कहीं से भी दीख पड़ने जैसी गुंजाइश न रहे। यहाँ तक कि नीचे की ओर जो थोड़ी-सी ढील रह जाती है उसमें भी रुई इस प्रकार भर दी गई कि उधर से भी कुछ दीख न सके।

फ्रान्सिस स्टोरी द्वारा लिखित ‘रीवर्स एज डोक्ट्रो इन एण्ड एक्सपीरियन्स’ पुस्तक में परा मनोविज्ञान से सम्बन्धित अनेक तथ्य पर प्रमाणों समेत प्रकाश डाला है और बताया है कि टेलीपैथी, क्लेअर वायन्स- साइकोटेलीपेट्री टेलिकिनेसिस आदि के नाम से जानी जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमताओं का कारण क्या हो सकता है? इन दिनों वैज्ञानिक जगत में मानवी चेतना की रहस्यमयी परतों को खोजने के लिए नया उत्साह उभरा है और ‘साइकिक फिनामीना’ को भी खोज की मान्यता प्राप्त विषय स्वीकार किया गया है। जबकि कुछ समय पूर्व तक इन बातों को अन्धविश्वास कहकर मजाक में उड़ाया जाता था।

मानवी काय सत्ता के अन्तराल में असीम क्षमताएँ एवं विभूतियाँ प्रसुप्त सिद्ध में- बीज रूप में भरी पड़ी हैं। इनमें से प्रकट एवं फलित वे ही होती हैं। जो दैनिक जीवन के प्रयोग अभ्यास भी आती हैं। जो उपेक्षित रहती हैं। उनका पता भी नहीं चलता पर यदि उन्हें भी जगाया और कार्य रूप में परिणत करने का अभ्यास किया जाय तो उन्हें भी जागृत करने की ऐसी ही सुविधा हो सकती है जैसी कि बोलने, सोचने आदि की अन्य प्राणियों से भिन्न स्तर की विशेषताएँ जागृत हो गई हैं। अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी इन्द्रिय क्षमताओं का ही परोक्ष एवं सूक्ष्म पक्ष है। उन्हें जगाना और काम में लाना भी मनुष्य की बात है। बाहर की नहीं।

स्पेनिश कलाकार जान नीरो कहते थे- कला का मूल्याँकन इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि उसने अपने समय के लोगों को कितना आकर्षित किया और कितनी सराहना पाई। वरन् देखा यह जाना चाहिए कि उसने क्या बोया। इस बीजारोपण पर भावी पीढ़ियों का भविष्य निर्भर रहता है। आज तो जो उत्तेजना दे या भविष्य की कटीली बल्लरियाँ उगाये उसकी सामयिक सराहना भी, भर्त्सना और असफलता के समतुल्य है।


अन्य प्राणी सर्वथा पिछड़े हुए ही नहीं हैं।

मनुष्यों सृष्टि का मुकुट मणि कहलाता और प्रकृति का अधिष्ठाता होने का दम भरता है तो भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि अन्य प्राणियों को सृष्टा ने कोई विशेषताएँ नहीं दी हैं। वे अनेक प्रसंगों विशेषतया अतीन्द्रिय क्षमताओं के सम्बन्ध में मनुष्य से कहीं आगे हैं।

सूर्यग्रहण की जानकारी मनुष्य अपनी बुद्धि के बल पर वर्षों पूर्व पहले ही जानने में समर्थ हो गया है किन्तु दुष्प्रभावों को समझने में अभी तक असमर्थ रहा है, जबकि जंगल के पशु-पक्षी सूर्यग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए उसके चौबीस घण्टे पूर्व से ही शोर-गुल करना बन्द कर देते हैं। सबसे चंचल कहा जाने वाला बन्दर सूर्यग्रहण के पूर्व ही खाना-पीना त्यागकर एकान्तप्रिय संन्यासी की भूमिका अदा करने लगता है।

जापान में पायी जाने वाली एक चिड़िया जिसे चीवी कहते हैं भूकम्प आने के चौबीस घण्टे पूर्व ही वह स्थान त्यागकर दूरस्थ उड़ जाती है। इसी प्रकार चीन में अनेकों भूकम्पों के पूर्व देखा गया कि वहाँ के पालतू, गाय, बैल आदि अपनी-अपनी रस्सी तुड़ाकर घरों के बाहर हो जाते हैं। जबकि मानवीय बुद्धि भूकम्पीय झटकों को चौबीस घण्टे पूर्व भी जानने में असमर्थ है।

ऊँची पहाड़ियों पर बसने वाले पक्षी बर्फ पड़ने के ठीक एक माह पूर्व पहाड़ियाँ त्यागकर सुरक्षित स्थानों में चले जाते हैं जबकि मनुष्य अभी तक शत-प्रतिशत रूप से बर्फ गिरने की भविष्यवाणी करने में असमर्थ रहा है। अनेकों प्रयोगों के बाद पाया गया कि आकस्मिक रूप से पड़ने वाली बर्फ के भी ठीक एक माह पूर्व ये पक्षी स्थान खाली कर दूर दराज देशों में चला जाता है। इस प्रक्रिया को “माइग्रेशन” कहा जाता है।

तिब्बत और दार्जलिंग में पायी जाने वाली पहाड़ी सारस वर्षा के 10-15 मिनट पूर्व ही पर्वतों की गुफाओं अथवा चट्टानों की आड़ में चली जाती हैं जिसे देखकर तिब्बती लोग अपना माल असवाब बाँधकर वर्षा से बचने का प्रबन्ध करने लगते हैं। कभी-कभी तो देखा गया कि आकाश में एक भी बादल नहीं है और पानी बरसने के कोई आसार न होते हुए भी जब यह पक्षी छिपने लगें तो उसके कुछ ही समय बाद ही बादल संगठित होकर वर्षा होने लगती है।

जीव विज्ञानी मछलियों के इस भविष्य ज्ञान से हैरत में पड़ गए हैं कि मछलियाँ समुद्र तट पर ठीक तभी अण्डे देती हैं जब समुद्री लहरें उतर जाती हैं और दुबारा उठने की सम्भावना नहीं रहती। यदि मछलियों के इस भविष्य ज्ञान में एक मिनट का भी अन्तर पड़ जाये तो उनके सारे अण्डे गहरे समुद्र में जाकर नष्ट हो जायँ। मछलियों के इस भविष्य ज्ञान को सम्बन्धी शोध के तत्व वैज्ञानिकों ने मछलियों को झील, तालाब और प्रयोगशालाओं में रखकर बनावटी प्रकाश, अन्धकार और बनावटी चन्द्रमा तक का आकर्षण दिया किन्तु इन प्रकृति प्रेमी मछलियों को रंचमात्र भी भ्रम में नहीं डाला जा सका। इन सभी स्थानों पर रखी गई मछलियों ने ठीक उसी समय अण्डे दिए जब सागर में रहने वाली मछलियों ने दिए अर्थात् लहरों के उतरते ही इन मछलियों ने अपने भविष्य ज्ञान के आधार पर उक्त क्रिया की। इनकी इस विद्या की जानकारी में लाखों करोड़ों वर्षों से आज तक रंचमात्र का अन्तर नहीं आया अन्यथा इनका वंश ही नष्ट हो गया होता।

इन वैज्ञानिकों ने पक्षी राज मयूर की दिनचर्या का भी गहन अध्ययन किया और पाया कि मयूर बादलों की गड़गड़ाहट में प्रसन्नता व्यक्त करते और एक प्रकार की संगीत ध्वनि निकालने लगते हैं किन्तु यदि घनघोर वर्षा होने वाली हुई तो यही पक्षी एक प्रकार का करुण क्रन्दन करते हुए इधर-उधर बेतहाशा भागते रहते हैं। इनका यह भविष्य ज्ञान मनुष्य के लिए एक प्रकार की चुनौती है जो अभी तक शत-प्रतिशत रूप से मौसम की भविष्यवाणी तक करने में असमर्थ रहा है। कभी-कभी यह भविष्यवाणी की भी जाती है तो बहुधा उससे विपरीत ही घटता है।


वरिष्ठता विस्तार में नहीं स्तर में है।

बड़प्पन किसी के वैभव, विस्तार, बल, पद, चातुर्य, कौशल आदि के आधार पर नहीं आँका जाना चाहिए। वरन् देखा यह जाना चाहिए कि उसने मानवी गरिमा के अनुरूप अपने को ढालने में कितनी सफलता पाई। अपने समर्थता एवं सम्पदा का किस स्तर के प्रयोजनों में उपयोग किया।

विस्तार और अन्य प्राणियों की वरिष्ठता बताने की दृष्टि से ध्यान योग्य माना जा सकता है किन्तु मनुष्य के सम्बन्ध में यह बात लागू नहीं होती। उसकी विशिष्टता मानवी गरिमा के अनुरूप आदर्शवादिता अपनाने में है। यदि वह इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो फिर यही कहना पड़ेगा कि अन्य प्राणियों की तुलना में वह कहीं पिछड़ा हुआ है। आकाश, विस्तार और पराक्रम की दृष्टि से सृष्टि के कितने ही प्राणी मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक बढ़े-चढ़े पाये जाते हैं।

थलचरों में सबसे बड़ा अफ्रीकी हाथी होता है। वह 13 फुट तक ऊँचा पाया गया है। वजन में 90 क्विन्टल तक।

ऊँचाई के हिसाब से जिराफ़ सबसे ऊँचा होता है वह 20 फुट तक का देखा गया है।

दौड़ने वालों में चीता अपनी शानी नहीं रखता। यों चीते संसार के अधिकाँश मध्य ताप वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं पर दौड़ने की दृष्टि से ईरान, तुर्कमानिया और अफगानिस्तान में पाये जाने वाले अधिक तेज हैं वे 65 से 70 मील की दौड़ हर घण्टे के हिसाब से लगा सकते हैं। किन्तु साथ ही यह भी तय है कि वे इस चाल से दस मिनट से अधिक नहीं दौड़ सकते हैं। इतने में ही वे बेतरह थककर चूर हो जाते हैं और हाँफने सुस्ताने लगते हैं।

लम्बी दौड़ लगाने वालों में पश्चिमी अमेरिका का हिरन- ‘एटिलोप’ सबसे आगे है। वह 35 मील प्रति घण्टे की चाल से लगातार दिन भर दौड़ता रह सकता है।

स्तनधारी प्राणियों में हाथी को सबसे अधिक समय तक माता के गर्भ में रहना पड़ता है। यह अवधि 760 दिन की होती है।

एक साथ अधिक बच्चे जनने की दृष्टि से मेडागास्कर के बन-विलाव टेनरेक का है जो एक बार में 32 तक बच्चे जनता है। इस घुड़-दौड़ में अमेरिकी चूहे भी पीछे नहीं। वे भी 30-35 बच्चे एक समय में जनते देखे गये हैं।

जलचरों में सर्वाधिक विशालकाय प्राणी ब्लू व्हेल है जिसे बेलिनोप्टेरा मस्कुलस भी कहते हैं। यह अधिकतम कितनी बड़ी होती होगी यह तो नहीं कहा जा सकता पर मछुआरों द्वारा पकड़ी गई ब्लू व्हेलों में सबसे लम्बी 110 फीट 2।। इंच थी। इसका भार प्रायः 2000 क्विन्टल था इसे 35 प्रौढ़ अफ्रीकी हाथियों के बराबर माना जा सकता है।

ब्लू व्हेल जन्म समय में ही 30 फुट लम्बी और 30 क्विन्टल भारी होती है। उसका वृद्धि क्रम भी असाधारण है। इस वर्ष में वह बढ़कर दस गुनी अर्थात् 300 क्विन्टल हो जाती है।

शार्क व्हेल 60 फुट लम्बी और 45 क्विन्टल भारी पाई गई है। इसका अण्डा 12 इंच लम्बा 5।। इंच चौड़ा और 3 इंच ऊँचा होता है।

एक साथ सर्वाधिक अण्डे देने वाली मछली सनफिश है वह 30 लाख अण्डे एक बार में देती है। उनका व्यास आरम्भ में 0.05 इंच होता है।

शरीर से विद्युत तरंगें फेंकने वाली मछली इलेक्ट्रो फोरस ब्राजील कोलम्बिया के समुद्रों में पाई जाती है उसके शरीर से निकलने वाली 650 वोल्ट तक विशेष परिस्थितियों में पहुँच जाती है। साधारण स्थिति में भी वह 400 वोल्ट फेंकती रहती है। आक्रमण के लिए ही वह इस बिजली को हथियार के रूप में प्रयोग करती है। खूँखार मछलियों में दक्षिण अमेरिका की व्हाइट शार्क मशहूर है वह मनुष्यों पर आँखें मूँदकर आक्रमण करती है।

अधिक समय तक जीने वाले प्राणियों में कछुए को रिकार्ड किया गया है। वह 152 वर्ष तक जिया। इसी प्रकार एक जापान के सिराप्रकाण नगर के तालाब में पाली गई रंगीन मछली 228 वर्ष की होकर सन् 1974 में मरी।

एगलर मादा मछलियाँ नरों की तुलना में कई गुनी बड़ी होती हैं। नर उनके आश्रित रहते हैं। शिकार वे ही मारती हैं, नर उसी को खाकर काम चलाते हैं। थक जाते हैं तो पत्नी की पीठ पर बैठकर सुस्ताते भी रहते हैं। इन मछलियों को अपने नर भी बच्चों की तरह ही पालने पड़ते हैं।

पक्षियों में विशालकाय शुतुरमुर्ग होता है। वह 9 फुट ऊँचा और डेढ़ क्विन्टल तक भारी होता है। अण्डे की लम्बाई 8 इंच और चौड़ाई 6 इंच तक पाई गई है। वजन दो किलोग्राम। वह इतना मजबूत होता है कि एक प्रौढ़ मनुष्य उस पर खड़ा हो जाय तो भी टूटेगा नहीं।

तेजी से पंख हिलाने वाली चिड़िया हमिंग है जो उड़ते समय एक सेकेण्ड में प्रायः 100 बार पंख हिलाती है। इस तेजी के कारण उसकी उड़ान से भौंरे की गूँज जैसी आवाज आती है।

आकाश में लगातार उड़ते रहने वाली चिड़िया स्वेफ्टएपरू है। यह नौ महीने लगातार उड़ सकती है। इसी अवधि में वह खाते-पीने का भी जुगाड़ बिठाती रहती है। यही हाल सूटी टर्न का है। वह सिर्फ अण्डे देने और बच्चे पालने के लिए ही जमीन पर उतरती और घोंसला बनाती है। बच्चे समर्थ होते ही फिर आकाश में उड़ते रहने के लिए चल पड़ती है। गर्भ धारण भी वह उसी स्थिति में कर लेती है। इसकी उड़ानें एक वर्ष से भी अधिक की होती है।

फोरिडा में एक चील का घोंसला सबसे बड़ा पाया जाता है वह अपने आकार और बच्चों को निर्वाह का ध्यान रखते हुए 8 फुट चौड़ा और 20 फुट गहरा घोंसला बनाती है जो वजन में लगभग 23 क्विन्टल होता है। पेड़ इतना वजन नहीं उठा पाते तो वह झाड़ियों के बीच बिना खतरे वाली जगहों में घोंसले बना लेती है।

तेज दौड़ने वाले पक्षियों में ‘काउटा कूटा’ है जो एक घण्टे में 150 मील तक उड़ सकता है। उससे कुछ कम उड़ान भरने वाली चिड़िया फलकोन है जिसकी चाल 80 मील प्रति घण्टा आँकी गई है।

अजगरों में अफ्रीका तथा इन्डोचीन में पाया जाने वाला पायबोन है जो 33 फुट तक लम्बा देखा गया है। दौड़ने में इसी बिरादरी का मम्बा मशहूर है वह सिर्फ अफ्रीका में पाया जाता है और समतल भूमि पर 15 मील प्रति घण्टे की चाल से सपाटा भरता रहता है। वजनी अजगर दक्षिण अमेरिका का एनकोडा है जो सवा दो सौ क्विंटल तक का पकड़ा जा चुका है।

फिलाडेल्फिया में पाये जाने वाली वाइपर के विष दन्त दो इंच तक के होते हैं और फन से बाहर निकले रहते हैं। एक बार उस देश के चिड़ियाघर में उसने किसी कारण क्रुद्ध होकर अपनी ही पीठ में दाँत गढ़ा दिये थे और अपने ही विष से खुद मर गया था।

समुद्री सर्प विष नाग भी अत्यन्त जहरीला होता है। शार्क जैसी विशालकाय मछलियाँ तक उसकी गन्ध पाते ही भाग खड़ी होती हैं। वह चाहे तो फुसकार भर आस-पास के जलचरों का सफाया कर सकता है पर आमतौर से वैसा करता नहीं, विषधर होते हुए भी सौम्य प्रकृति का होता है।

मेंढकों में अमेरिका का बुलकाया डेढ़ फुट तक लम्बा होता है। इससे भी बड़ा पश्चिमी अफ्रीका का नियामोवा है जो तीन फुट लम्बा और 13 पौण्ड तक भारी पाया गया है। लम्बी छलाँग भरने वाले आक्सरिका मेंढक दक्षिणी अफ्रीका में पाये जाते हैं। उनकी छलाँग 30 फुट तक की देखी गई है।

मनुष्य इनमें से एक का भी मुकाबला नहीं कर सकता ऐसी दशा में उसका अन्य प्राणियों की तुलना में वरिष्ठ होने का दावा सहज ही रद्द हो जाता है। मानवी गरिमा के अनुरूप स्तर विनिर्मित कर सके तो ही उसकी विशिष्टता को मान्यता मिलेगी।


उसने हिम्मत और उम्मीद नहीं छोड़ी

यह एक ऐसे ट्रैक्टर चालक की जीवन गाथा है जो लम्बे समय तक एक के बाद दूसरी दुर्घटनाओं का शिकार होता रहा। सभी को हिम्मत के साथ सहता रहा। बिना पिछली सुविधाओं और भावी संकटों का स्मरण किये हर परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाता रहा और दैवी अनुग्रह ने ऐसे जीवट वाले को इस प्रकार उबारा कि वह पहले जैसी स्थिति में ही लौट आया।

ट्रैक्टर चालक एडीरोविनसन अपनी 19000 किलोग्राम भारी गाड़ी को लेकर राजमार्ग पर चला जा रहा था। 12 फरवरी 71 सवेरे की बात है सामने से आती हुई एक कार फिसली और सड़क पर लुढ़क गई। उसने ट्रैक्टर को रोका भी और बचाया भी, पर बैलेन्स सधा नहीं। वह पुल के जंगलों को तोड़ती हुई बारह मीटर नीचे गिरा और गाटरों में फँस गया। उसका सिर बुरी तरह फट गया। खून की धारा बह रही थी और माँस लटक रहा था तो भी वह घबराया नहीं, किसी प्रकार अपने को सम्भाला और निकाला। पंजों के सहारे रेंगता हुआ बाहर आया और पास के अस्पताल में ज्यों-त्यों करके जा पहुँचा। डाक्टरों ने अधिक ध्यान न दिया। ज्यों-त्यों मरहम पट्टी करके घर वापस भेज दिया। इतने पर भी उसका दर्द कम न हुआ।

अस्पताल से फिर बुलावा आया। दुबारा मुआयना हुआ। उसकी पसलियाँ टूटी मिलीं। खोपड़ी और कूल्हे की हड्डियों में भारी टूट फूट थी। इलाज चलता रहा। पर स्वास्थ्य दिनों-दिन गिरता ही गया वह घर लौट आया।

मस्तिष्क की गहराई तक में आघात पहुँचे थे। धीरे-धीरे उसकी नेत्र-ज्योति चली गई। अब वह क्या करे। सोचने लगा उसे अन्धों के स्कूल में भर्ती होना चाहिए। सो उसने स्पर्श लिपि के सहारे कुछ पढ़ना-लिखना भी सीख लिया। मन बहलने लगा।

अब नई मुसीबत खड़ी हुई। दाहिने हाथ ने भी जवाब दे दिया। उसे लकवा जैसा मार गया। बात यही समाप्त नहीं हुई उसके कान भी बहरे हो गये। अब उसने एक कान में लगने वाली मशीन का प्रबन्ध किया इससे बहुत जोर से बोलने पर वह मतलब की बात सुन लेता था। इन परिस्थितियों में घिरा रहने पर भी वह हताश नहीं हुआ। कुशल पूछने वालों से इतना ही कहता- “ईश्वर को धन्यवाद है, संसार में अनेक संकटग्रस्तों की अपेक्षा अभी भी मैं अच्छा हूँ।”

बेकार बैठा-बैठा क्या करे? काम के बिना चैन न पड़ता था। सो उसने पत्नी के घरेलू काम-काज में हाथ बटाना आरम्भ कर दिया। इससे पत्नी का समय बचा और वह उतनी देर में कुछ कमा लेने का प्रयत्न करती। सामने पार्क जैसा मैदान था उसमें घास काटने का काम उसने प्राप्त किया। उसके लिए उसने एक तरकीब निकाली। बीच-बीच में खूँटा गाड़ा उससे रस्सी लपेटी उसे थामने से यह पता चलता रहता कि कितने घेरे की घास कट रही है। एक घेरा साफ हो जाता तो रस्सी को कुछ और खोल कर घेरा बढ़ा लेता और उसमें घास काटने लगता। इस प्रकार पूरे पार्क की घास मशीन के सहारे काटने का अभ्यास उसे हो गया। सीढ़ी के सहारे छत पर चढ़कर टूटी खपरैलों को सम्भालने का अभ्यास भी उसे हो गया। काम से लगे रहने पर व्यर्थ की चिन्ताओं से बचा रहता और थक जाने पर गहरी नींद सोता।

अब उसने एक नया शोक अपनाया। चिड़ियों की बोली की नकल करना। इस कारण कितने ही पक्षी उसके पास दौड़ आते और हाथ रखा भोजन निर्भय होकर खाते। एक अच्छा मनोरंजन हाथ लग गया।

एक दिन कोई मुर्गियों से लदा ट्रक पास में ही उलट गया। उसकी एक घायल मुर्गी रोत्रिन सन के घर में घुस गई। टाँगें कट जाने पर भी वह कुछ दिन में अच्छी हो गई और प्यार-दुलार के वातावरण में सहेली बन गई। बिना पैरों के भी किस तरह चला जा सकता है और कला सिखाई गई तो मुर्गी ने सीख भी ली। दोनों की खूब पटती। नाम रख लिया- “टुक-टुक” ऐसा ही कुछ वह बोलती जो थी। दर्द उसके सीने में अभी भी होता रहता था पर भगवान को यही धन्यवाद देता रहता कि “मैं जीवित तो हूँ।”

4 जून 1980 की बात है। शाम होते-होते घटा उठी और तेज वर्षा होने लगी। मुर्गी को पास न देखकर वह उसके किसी संकट में फँस जाने की आशंका से ढूँढ़ने घर से बाहर निकला और टुक-टुक की आवाज लगाकर उसे खोजने का प्रयत्न करने लगा। इस प्रयास में वह भीगता भी जा रहा था।

अचानक आसमान में बिजली गिरी। दिल दहलाने वाली भयंकर गर्जना हुई। चौधियाने वाले प्रकाश से वह सारा क्षेत्र भर गया। रोबिनसन को भयानक झटका लगा। वह धड़ाम से गिरा और बेहोश हो गया। आधा घण्टे में होश आया तो प्यास से गला सूख रहा था। सारा शरीर काँप रहा था। पड़ौसी का घर सामने था वह उसी में घुस गया और माँगकर कितने ही गिलास पानी पीता चला गया। प्यास अभी भी शान्त नहीं हो रही थी। पड़ौसियों ने उसे घर पहुँचा दिया।

आश्चर्य यह कि उसकी दृष्टि लौट आई। सामने दीवार पर टंगे पोस्टरों को वह पड़कर सुनाने लगा। पत्नी ने घड़ी का समय बताने को कहा तो उसने देखकर वह भी सही बता दिया।

कान में लगने वाली मशीन भी इस झटके में कहीं गिर गई थी। पर अब वह बिना उसके ही सुनने लगा। पत्नी से सामान्य काल की तरह वार्तालाप करते हुए उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न था। सीने का दर्द भी बन्द था और लँगड़ाकर चलने में सहायता करने वाली छड़ी की भी आवश्यकता नहीं रह गई थी।

दूसरे दिन रविवार था वह गिरजाघर बिना किसी सहायता के पत्नी के साथ पहुँचा और सामान्य लोगों की तरह बैठा तो उपस्थित लोगों को आश्चर्य से चकित रह जाना पड़ा।

चर्चा दूर-दूर तक पहुँची। टेलीविजन पर उसने अपना विवरण सुनाया और कहा- मुसीबत के दिनों में मैंने उतना जाना और जितना कि पिछली पूरी जिन्दगी में भी नहीं सीख पाया था। मैंने कभी भी हिम्मत और उम्मीद नहीं छोड़ी।’ सर्वोत्तम पत्रिका में छपी यह घटना मानव की अपराजेय सामर्थ्य- उसकी संकल्प शक्ति का ही सत्यापन करती है और सिद्ध करती है कि कोई भी व्यक्ति प्रतिकूलताओं से जूझकर परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना सकता है।


एक साधु थे (kahani)

एक साधु थे, योग साधना करते थे और प्रतिदिन सायंकाल ग्रामवासियों को एकत्रित कर उन्हें ज्ञान दान भी दिया करते थे। साधु का ही प्रभाव था कि गाँव में न कोई चोरी करता था और न छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष और बेईमानी। सब लोग प्रेम पूर्वक रहते थे।

एक दिन गाँव के कुछ मनचले लड़कों को शरारत सूझी। कई लड़के इकट्ठा होकर साधु के पास गये ओर बोले- महात्मन्! अपने गाँव के पास जो गंगाजी का पुल है, नाराज होकर कहता है, मुझे दस हजार रुपये दो तो यहाँ पर रुकूँगा, नहीं कहीं दूर चला जाऊँगा। हम लोगों ने बहुत मनाया, मानता ही नहीं। हारकर गाँव वाले चन्दा इकट्ठा कर रहे हैं कुछ आप भी दान दीजिये। साधु ने ध्यान से सब बात सुनी, बच्चों की ओर देखा- थोड़ा मुस्कराये, भीतर कुटी में गये और पाँच रुपये लाकर लड़कों को देते हुये बोले- “लो शीघ्र जाओ और पुल को कहीं बाहर जाने से रोको।” लड़के तब तो चले गये पर दूसरे दिन आकर उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और पूछा- “महाराज! आप तो इतने ज्ञानी हैं, फिर आप इतना भी नहीं समझ सके कि पुल भी कहीं रूठता है?” साधु हँसे और बोले- ‘बेटा! वह तो मैं भी समझ गया था पर आप लोगों की परोपकार की भावना की रक्षा तो करनी थी।” बालकों ने सज्जनता की सच्ची प्रतिमूर्ति उस साधु में देखी, और स्वयं उस मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।


वरिष्ठ आत्माओं के इस धरती को विशिष्ट अनुदान

मिश्र में बने पिरामिडों के सम्बन्ध में अनेकों जन श्रुतियाँ प्रचलित हैं। इन कथा किंवदन्तियों में उनके अलौकिक चमत्कारी प्रभावों का वर्णन है। उनमें से एक यह भी है कि लोकान्तर वासी देव मानवों ने इन्हें अपने आवागमन के लिए डाक बंगले की तरह बनाया। अपने लोकों के वे जिस वातावरण के अभ्यस्त हैं तथा जिन ऊर्जा तरंगों के सहारे अपना काम चलाते हैं उनका उत्पादन धरती पर भी करने के लिए इन्हें एक प्रयोगशाला के रूप में बनाया गया है।

साधारणतया ऐसी मान्यताओं को अन्धविश्वास कहा और उपहास भी उड़ा दिया जाता है। पर खोजबीन की गहराई में उतरने पर ऐसी अनेकों विशेषताएँ पाई गई हैं जो बताती हैं कि इनके निर्माणों में ऐसी वस्तु कला एवं भौतिकी का प्रयोग हुआ है जिसका धरातल पर विकसित विज्ञान का कोई सुराग नहीं मिला है।

विज्ञान की अनेक धाराओं की तरह अब ‘पिरामडोलॉजी’ को स्वतंत्र विषय माना जाने लगा है और उन इमारतों में सन्निहित रहस्यों पर से पर्दा उठाने का मूर्धन्य वैज्ञानिकों द्वारा प्रयत्न किया जा रहा है। इस शोध में इमारत निर्माण की विधा, शवों को सुरक्षित रखने के मसाले और सामान्य विषयों का ही समावेश नहीं है वरन् यह ढूँढ़-खोज भी शामिल है कि सामान्य नियमों से विभिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ इनके भीतर क्यों पाई जाती हैं?

इन शोध प्रयोगों में लगे हुए को वरिष्ठ विज्ञानियों ने संग्रहित जानकारियों का कुछ अंश प्रकाशित किया है, इनसे कोई प्रत्यक्ष समाधान तो नहीं मिलता पर इस अभिमत की पुष्टि अवश्य होती है कि यह निर्माण किन्हीं ऐसे विज्ञान विशेषज्ञों द्वारा हुआ है जैसे कि अभी तक विज्ञान इतिहास में कभी भी नहीं जाने गये। इन दो वैज्ञानिकों के नाम हैं- विलसुल और एड पेटिट। इनके द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री में ऐसी ही विलक्षणताओं का उल्लेख है।

पिरामिडों के भीतर धातुओं के सिक्के या बर्तन रखने से उन पर अपने आप पालिश करने जैसी चमक आ जाती है। प्रदूषण से प्रभावित वस्तुएँ रख देने पर उनका विष स्वमेव समाप्त हो जाता है। दूध रख देने पर बहुत समय तक ताजा बना रहता है फटता नहीं। फूल रख देने पर कुछ समय बाद उसका पानी तो सूख जाता है पर मुलायमी एवं सुन्दरता में कोई अन्तर नहीं आता। छाले, जख्म आदि अपेक्षाकृत जल्दी अच्छे हो जाते हैं। बीमारियों का दर्द भीतर घुसते ही बंद हो जाता है। बन्द जगह में आमतौर से जो पौधे मर जाते हैं वे भी भीतर हरे बने रहते हैं। खाद्य पदार्थ बहुत समय तक रखे रहने पर भी खराब नहीं होते। तनावग्रस्त-अशान्त व्यक्तियों को भी उनमें भीतर प्रवेश करने पर राहत मिलती है।

यह सब क्या होता है? ऐसी क्या विशेषता है? जिनके कारण वह विचित्रतायें दृष्टिगोचर होती हैं। उसका समाधान उनमें भीतर किन्हीं विशेष स्तर की ऊर्जा तरंगों के साथ जोड़ा गया है। जो इनके भीतर हो सकती हैं किन्तु उनका स्तर, स्वरूप एवं प्रभाव कभी भी नहीं जाना जा सका है।

भवन निर्माण कला की दृष्टि से भी इनमें प्रयुक्त हुई विधा, आज के विशेषज्ञ की समझ के बाहर है। इनमें एक-दो टन से लेकर सत्तर टन तक की भारी चट्टानें लगी हैं। वे जितनी ऊँचाई तक लगाई गयी हैं जिस प्रकार सही कोण से लगाई गयी हैं। उन्हें आज के विकसित साधनों से भी कर सकना सम्भव नहीं। मनुष्य बेचारा तो इतना पराक्रम कैसे करेगा? विशालकाय क्रेनों से भी ऐसा करने में सम्भव नहीं। इस सन्दर्भ में एक प्रयोग हो भी चुका है। आश्वासन दिलाने वाले इंजीनियरों ने दो छोटे पिरामिडों का दूसरे स्थान पर स्थानान्तरण करने का प्रयत्न किया था। टुकड़ों में उधेड़ना और भेजना भी जब किसी प्रकार सम्भव न हो सका तब वह विचार छोड़ देना पड़ा।

पिरामिडों की संरचना सही उत्तर-दक्षिण की जानकारी के आधार पर बनी है जिससे पृथ्वी के ध्रुवीय प्रवाह का आवागमन ठीक प्रकार होता है। अंतर्ग्रहीय कास्मिक किरणों को आकर्षित करने के लिये इनमें विशेष प्रकार के पत्थर लगे हैं जो ग्रेनाइट पत्थर इनमें स्टोरेज बैटरी जैसी विलक्षणतायें पायी गयी हैं। भीतर निर्माण इन्हीं विशेष पाषाणों से हुआ है। मात्र बाहरी घेरा ही चूने से बनाया गया है। सम्भवतः यह भीतरी भण्डार को सुरक्षित रखने के लिए किलेबन्दी के रूप में किया गया है।

गीजा के बड़े पिरामिड के भीतर बनी हुई सुरंगों में कुछ विशेष कोण और छेद हैं जो ऊपर आसमान की स्थिती देखने के लिए दूरबीनों का काम करते हैं। इसे बेधशाला स्तर की विशेषता माना जाता है। न केवल ग्रह नक्षत्रों की गति जानने के लिये वरन् उनकी विशेष किरणें आकर्षित करने के लिए प्रतीत होती है। इन पिरामिडों में ध्वनि करने से न केवल देर तक गूँजती रहती हैं वरन् उपस्थित लोगों के शरीरों में एक प्रकार की झनझनाहट भी उत्पन्न करती है, ऐसा अन्यत्र नहीं होता। इससे प्रतीत होता है कि इनके भीतर किसी विलक्षण ऊर्जा तरंगों का वातावरण है। ऐसा वातावरण बनाने की किन्हीं को क्या आवश्यकता पड़ी फिर इसके लिए ऐसा विकसित विज्ञान किस प्रकार प्रयुक्त हुआ जो इन दिनों विकसित विज्ञान की पकड़ से सर्वथा बाहर है।

इन प्रश्नों का सहज उत्तर अब कहीं से नहीं मिलता तो यह सोचने से कुछ समाधान मिलता है कि हो सकता है कि पुरातन काल में अन्यलोकवासी अपने ठहरने और कार्य करने के लिए कोई धर्मशाला बना रहे हैं और उसके लिए यह पिरामिड स्तर की संरचना अपने विशिष्ट ज्ञान के अनुरूप बनाकर चले गये हैं।

जिनके साथ उनने सम्पर्क साधा हो और आदान-प्रदान का सहयोग चलाया हो पुनः सम्भव है। वे आश्वासन दे गये हों कि जब दुबारा वापस लौटेंगे तब उन्हें पुनर्जीवित करके आगे की योजना चलायेंगे। इसलिये जब वे मरे तब अपने शरीरों को सुरक्षित रखने का प्रबन्ध कर दें। पिरामिडों पर चढ़े हुए मसाले भी इस सन्दर्भ में एक रहस्य है वैसे रसायन अभी भी मनुष्य के द्वारा बन नहीं पा रहे हैं मिस्र के पिरामिडों की नकल पर दक्षिण अमेरिका, चीन, साइबेरिया, मैक्सिको, कम्बोडिया, फ्रांस, इंग्लैण्ड में भी कुछ जरा-जीर्ण खण्डहर पाये गये हैं। उनमें मिस्र के तीन प्रमुख पिरामिडों जैसी विशेषता तो नहीं हैं फिर भी वे आज के वस्तुकला विशेषज्ञों को चुनौती देते हैं कि उस स्तर के निर्माण कर दिखाये। लगता है कि उनकी संरचना अपेक्षाकृत कम विकसित लोकवासियों ने की है। यह भी हो सकता है कि इन दिनों के क्रिया कुशल लोगों ने नकल करने में अपनी अकल दौड़ाई हो और आँशिक सफलता पाई हो।

अपनी धरती पर ईश्वरीय अनुदानों की अनुकम्पा तो रही है पर उसे इस स्थिति में पहुँचाने और साधारण से मनुष्य प्राणी का स्तर आश्चर्य जनक ऊँचाई तक पहुँचाने में कुछ उत्कृष्ट स्तर के महामानवों का भी हाथ रहा है। वे अन्य लोक से आये या इसी धरती पर जन्मे यह विवाद का विषय भी हो सकता है पर इतना असंदिग्ध है कि अपने भूलोक के मनुष्य को विकसित करने में किन्हीं विशिष्ट स्तर की आत्माओं का हाथ अवश्य रहा है।


प्रौढ़ावस्था- प्रगति एवं परिपक्वता की अवधि

उठते यौवन का उत्साह और सौन्दर्य विदित है। उसमें मस्ती भी रहती है। इतने पर भी अनुभव और व्यक्तित्व विकसित न हो पाने के कारण उनके ऐसे सुनिश्चित कदम नहीं उठते जो कठिनाइयों का घना रास्ता पार करते हुए भी लम्बी मंजिल तक विश्वासपूर्वक पहुँच सके। प्रौढ़ावस्था प्रकारान्तर से परिपक्वता की स्थिति में है जिसमें अधिक जानकारी और अधिक जिम्मेदारी जुड़ी रहती है। आत्म विश्वास और व्यवहार कौशल भी तब तक बहुत बढ़ चुका होता है। ऐसी दशा में बड़े वजन उठाने और बड़े लाभ अर्जित करने की सम्भावना भी अधिक रहती है। प्रौढ़ता को दृढ़ता और परिपक्वता का पर्याय माना जाता है। यह मान्यता बहुत हद तक सच भी है। यौवन का अल्हणपन और आकर्षण अपनी जगह पर ठीक है। पर जहाँ तक समर्थता का सम्बन्ध है वह अधेड़ स्थिति की तुलना में हलका ही पड़ता है। यही कारण है कि महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते समय प्रौढ़ता का भी ध्यान रखा जाता है।

इतना होते हुए भी देखा जाता है कि प्रौढ़ आयु के लोग वृद्धावस्था की ओर तेजी से दौड़ते हुए पाये गये हैं। आधी उम्र होने से पूर्व ही लोग वृद्धों जैसे दीखने लगते हैं। शारीरिक सुन्दरता और बलिष्ठता गँवा बैठते हैं। बूढ़ों जैसी बोली बोलते और निराशा असमर्थता जैसी बातें करते सुने जाते हैं। उसका कारण एक ही है कि प्रौढ़ावस्था के लिए जो संचय करना चाहिए था उसकी उपेक्षा की होती है। क्षमता का असमय अनावश्यक अपव्यय करके अपने को छूँछ बना लिया होता है। ऐसे ही लोग रोगों से संत्रस्त और दुर्बलता से ग्रसित दृष्टिगोचर होते हैं। लगता है असमय में ही जीवन अध्याय पूरा किया जा रहा है।

“दी साइकालॉजी आफ ह्यूमन एजिन्ग” के लेखक डी. वी. व्रायले ने अग्रिम चौथाई शताब्दी तक और जी लेने के लिए पुरुषों के जीवन का मध्य काल 45 से 50 तथा महिलाओं के लिए 50-55 की अवस्था को माना है जबकि बाइबिल 34 वर्ष को ही जीवन का मध्यकाल कहता है।” नवीनतम धारणा के अनुसार व्यक्ति तब तक मध्य जीवन के दहलीज तक नहीं पहुँचता जब तक वह अपने को अधेड़ न मान ले और यह 60 वर्ष तक पहुँच सकती है। हन्ट और हन्ट के शब्दों में “अधेड़ावस्था मृत्यु का लेबल नहीं है, यह जीवन का महत्वपूर्ण भाग है।” मात्र थोड़े ही अधेड़ जो बीमारियों से अक्षम होकर जीवन शैली बदलने को बाध्य होते हैं और भविष्य के प्रति शंकाशील रहते हैं, इस वर्ग वालों की जीवनचर्या व्यवस्थित सुस्थापित एवं परिपक्व पायी जाती है।

मेट्रोपोलिटन जीवन बीमा रिपोर्ट के अनुसार अवस्था वृद्धि के अनुपात से रोगवृद्धि नहीं बढ़ती। जहाँ 15-55 वर्षीय लोगों में पुरातन रोगियों की संख्या 40 प्रतिशत थी वहीं 45-64 वय वालों में 60 प्रतिशत ही हो पायी। 1976 के अमेरिकी शिक्षा-स्वास्थ्य-कल्याण विभागीय आख्यानुसार 45 या अधिक वर्षीय काले लोगों में रक्तचाप दोष जहाँ 50 प्रतिशत व्यक्तियों में पाया गया वहीं गोरों में मात्र 30 प्रतिशत ही रहा। अधेड़ अनेक सेक्स रोगों से पीड़ित होते हैं किन्तु ये रोग आँशिक काल वाले ही होते हैं। डी. वी. ब्रामली के अनुसार 45 या अधिक वय वाले काम पर से बीमारी के कारण ही हटते हैं। इस अवस्था वाले पुरुष स्वास्थ्य के प्रति विशेष जागरुक रहा करते हैं। स्त्रियाँ तो अपनी उपेक्षा करके पति के स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखने की प्रवृत्ति रखती हैं। अपेक्षाकृत इस वय वालों में कम और महिलाओं में और भी कम आत्महत्या प्रवृत्ति पायी गयी।

जीवन सम्पदा के अपव्यय में आतुर लोग अपेक्षाकृत जल्दी अपनी क्षमता गँवा बैठते हैं और बुढ़ापे को असमय ही न्योन्त बुलाते हैं। जबकि सन्तोषी और धैर्यवान जो उपलब्ध है उसी का हँसते हँसाते खर्च करने की नीति अपनाकर लम्बे समय तक निरोग एवं सक्षम बने रहते हैं। अमेरिकी गोरों की तुलना में वहाँ बसने वाले काले लोग अधिक सुदृढ़ और दीर्घजीवी पाये जाते हैं। इसमें वंशानुक्रम नहीं उनका शान्त सुगम जीवन प्रवाह ही आधारभूत कारण है।

ई. बेलविन के अनुसार मध्य आयु वर्गीय लोगों को रेटिना तक प्रकाश पहुँचाने के लिए 33 प्रतिशत अधिक प्रयास की आवश्यकता पड़ती है। पी.एस. टिमराज की पुस्तक “डिवलपमेटल फिजियोलाजी ऐन्ड एजिन्ग” में बताया गया है कि यद्यपि 20-40 वय में ही 10 प्रतिशत श्रवण शक्ति घट जाती है किन्तु अफ्रीकी लोगों में वातावरणीय प्रभाव के कारण लम्बी अवस्था तक श्रवण तन्त्र निष्प्रभावित रहते हैं। घ्राणेंद्रिय की बहुत सी घटी क्षमताओं का पुनः विकास मध्य आयु में हो जाना सरल होता है।

‘मिडिल एज’ के लेखक आर.एम.बेलविन ने दावा किया है कि 40-50 वर्षीय दक्ष कारीगरों की कार्यकुशलता जागरुकता के कारण अधिकाधिक उत्पादक रही है। मेकलार लैन्ड आदि ने बताया है कि ड्राइविंग जैसी जटिल तकनीकी कार्यकुशलता अधेड़ वय में पहले की अपेक्षा इसलिए विकसित हो पाती है कि वृद्धता के कारण जो क्षति होती है उससे अधिक लाभ अवस्थाजन्य अनुभवों के कारण जुटता जाता है।

“प्राइम टाइम” में एम.हन्ट और वी.हन्ट ने चिट्ठी की सार्टिग करने वालों का उदाहरण प्रस्तुत किया है। 45-44 वर्षीय लोगों ने 35-44 आयु वर्ग वालों से अच्छा धैर्यपूर्ण कार्य सम्पादित किये। अनुभव के कारण इस आयु वर्ग वालों ने शारीरिक अपंगता उन जटिल कार्यों में भी नहीं पाई जिसमें उचित निर्णय के अभाव में अनेकानेक नवयुवक अंग भंग कर डालते हैं।

कान्गाज तथा ब्रैडवे ने स्कूल जाने से पहले, माध्यमिक शालाओं, नवयुवकावस्था और अधेड़ावस्था में 48 व्यक्तियों के बुद्धिलब्धि लिये और सभी को विकासोन्मुख पाया। डी. पैपैलिया ने 30-64 वय वर्ग में संख्या स्मृति सम्बन्धी परीक्षा 1982 में किये। इसमें उच्च लब्ध्बांक 55-64 वर्षीय लोगों ने ही अर्जित किये। बेल्बी तथा पैपैलिया की नैतिकता सम्बन्धी प्रयोग में 35 से 49 वर्षीय लोगों के प्राप्तांक उच्च रहे।

कलात्मक प्रतिभावानों और कृत्यों की सूची में शिकागो के रोवुल हाउस की डिजाइनिन्ग करने वाले 40 वर्षीय फ्रैन्क लायड राइट से आरम्भ की जा सकती है। “अप्पालैशियन स्प्रिन्ग” का रचनाकार ऐरन कोप्लान 44 वर्ष का उन दिनों था। ‘मोना लिसा’ की पेन्टिन्ग 52 वर्ष की अवस्था में लीओनार्डो डा. बिन्की ने तथा गुएर्निका की 56 वर्षीय पिकासो ने की थी। मोसिआह की रचना हैन्डेल ने 57 की आयु में की थी।

‘20 से 80 वय वालों में विधायिका उत्पादकता’ में डब्लू.डेनिस ने पाया कि अधिकाधिक आउटपुट 40 या उसके अनन्तर वालों में होता है। “एज ऐण्ड एचीवमेंट” के लेखक एम.सी. लेहमन ने विभिन्न प्रकार की कलाओं में सर्वोत्कृष्टता विभिन्न वय वालों में पायी है।

“अर्ली ऐन्ड मिडिल एडल्टहुड” में एल.ट्राल ने पृष्ठ 39 पर इस तथ्य का प्रतिपादन किया है कि विधायक कार्य सब प्रकार के सञ्जीभूत विकासों के समुच्चय पर ही आश्रित होते हैं, जो जीवन के उत्तरार्द्ध वर्षों में ही हो पाते हैं।

बहुत से उच्चपदासीन अधिकारी, व्यापारी, सर्वोच्च शिक्षा सम्पन्न या अन्य लब्ध प्रतिष्ठ सज्जन वृन्द अधेड़ वय के ही होते हैं। हन्ट और हन्ट के अनुसार परम्परागत पुरातन समाजों में शक्ति सूत्र धारक सर्वाधिक वय प्राप्त ज्ञान वृद्धि ही होते थे किन्तु आधुनिक अनेकानेक समाज में शक्ति, धन और सम्मान मध्य वय वालों के हाथों में ही केन्द्रित है।

स्टेन्स तथा मैककुलो के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि तीस वर्षों से ऊपर वाले कर्मियों में 90 प्रतिशत लोग अपने कार्यों से सन्तुष्ट रहा करते हैं। यह प्रतिशतता आयु के साथ बड़ी पाई गई। “चेन्ज आफ इन्टरेस्ट विध एज” पुस्तक में ई.के.स्ट्रान्ग के उस प्रयोग का वर्णन है जो 40 वर्षीय आयु वर्ग पर थे। इन लोगों ने अपने कार्य में उतनी ही रुचि दिखाई जितनी नौकरी खोजते समय एक विद्यार्थी युवक दिखाता है। व्यवसाय बदलने तथा नये हस्तगत करने में भी उनके उत्साह चार्ल्स लकमैन की तरह आए दिन दिखाई पड़ते हैं जिन्होंने 40 वर्ष की अवस्था में लीवर ब्रदर्स के प्रेसीडेन्ट जैसा पद त्यागकर स्थापत्य कला की ओर रुझान बढ़ा। ली.बी. न्यूगार्टेन ने 40-50 वय वालों को खतरा उठाने में 50-60 वय वाले अन्तर्निरक्षण करने में, 60-70 वर्षीय वर्ग वालों में विश्व की जटिलता परखने में पटु पाया। 1967 के एक दूसरे प्रयोग में उन्होंने 40-60 वर्षीय 100 सफल व्यक्तियों को लिया और उन्हें एक ऐसे पुल की भाँति पाया जो किशोरावस्था को वृद्धावस्था से जोड़ता है। हन्ट और हन्ट ने इसमें निरीक्षण करने और सही अर्थ निकालने की, आत्म विश्वास की और परिस्थितियों से सामना करने की प्रचुर शक्ति बताई है।

न्यूगार्टेन और मूर ने बताया है कि आर्थिक रूप से पिछड़े लोग जल्द काम शुरू करते, शीघ्र शादी रचाते, जल्द बाप और दादा बन जाते हैं और ऐसे लोग अपने को शीघ्र ही अधेड़ मान बैठते हैं।

इरिकसन ने 40 से ऊपर वाली वय वालों को “संस्थापना और अगली पीढ़ी का नेतृत्व” वाला बताया है। ए.स्टोर की पुस्तक “अधेड़ अवस्था का नवीन जीवन” 35 वर्ष तक व्यक्ति की एक तमन्ना लगभग पूरी हो जाने और नये मंजिल नई समस्यायें गढ़ लेने का” रहस्योद्घाटन करती है। उसे “नवीन कठिनाइयों को खोजने तथा उन्हें परास्त किए बिना उसे चैन कहाँ?”

अत्याधुनिक खोजों में लेविन्सन तथा सहयोगियों की “दी साइकोलाजीकल डिवलपमेंट आफ मेन इन अर्ली एडल्टहुड ऐण्ड दी मिडिल ट्रैडिशन” के अनुसार “एक ने कितने इनाम पाये, महत्व नहीं रखता। महत्वपूर्ण है जीवन के ताने बानों से आत्मा का सामञ्जस्य स्थापन कितना हुआ।...... एक व्यक्ति अच्छा प्रकार से जीवनयापन करता हुआ आदर्शों तक पहुँचता है किन्तु उसे अपनी सफलता उथली एवं तिक्त प्रतीत होती है। “फायड तथा गान्धी जैसे लोगों ने जहाँ अधेड़ावस्था में अपने को बना लिया वहीं डाइलन टामस तथा स्काट फिजराल उतना नहीं बना पाए। बैइलैन्ट तथा मैकआर्थर के शब्दों में “चाहे मध्य जीवन कितना ही बिगड़ा हुआ, निराशामय एवं अशान्त क्यों न हो, प्रायः यह व्यक्ति के लिए नब्य जीवन की घोषणा किया करता है। “इतना ही नहीं इन विद्वानों ने अधेड़ अवस्था को द्वितीय किशोरावस्था” कहकर सम्बोधित किया है।

“ह्यूमन डिवलपमेंट” पुस्तक में इस तथ्य को सँवारा गया है कि आधी शताब्दी के लोग अपने पति अथवा पत्नी, बच्चे तथा स्वयं अपने से स्वीकृति प्राप्त करते हैं। जीवन की व्यापकता, अनन्तता देखकर वे सोचते हैं कि उनका जीवन कितना उपयोगी है और वे संसार को क्या उपहार दे सकते हैं।”

यौवन में अपनी तरह का आकर्षण तो है पर उसकी तुलना में प्रौढ़ावस्था भी किसी प्रकार भी हेटी नहीं पड़ती, उसमें परिपक्वता के लक्षण उभरते हैं और वे इतने समर्थ होते हैं कि व्यक्ति अधिक पराक्रम कर सके एवं अधिक सफल बन सके कठिनाई एक ही है कि असंयम अपनाकर प्रौढ़ता उत्पन्न होने से पहले ही उसे जर्जर बना दिया जाता है। ऐसा भी होता है कि कई व्यक्ति उन दिनों अधिक परिपक्वता के आधार पर बन पड़ने वाले पराक्रम की योजना बनाने की उपेक्षा वयोवृद्धों की बिरादरी में बैठने की उतावली करते हैं और मरने के दिन गिनने लगते हैं। समर्थ का सदुपयोग बन पड़े तो कहा जा सकता है कि प्रौढ़ावस्था मनुष्य के विकास एवं सौभाग्य का सर्वोत्तम काल है।


स्वार्थ सिद्धि एवं औचित्य की मर्यादा

स्वार्थ तराजू के उस काँटे की तरह है, जिसका तनिक सा इधर-उधर झुक जाना लाभ-हानि का विजय-पराजय का- निमित्त कारण बन जाता है। बराबर संख्या में वोट पड़ने पर निर्णायक का वोट भी सारी तसवीर उलट देता है। स्वार्थ के नाम पर खरा-खोटा सभी धकता है। तत्काल लाभ की ऐसी दृष्टि से भविष्य के परिणामों से आँख मूँद लेती है, प्रचलित स्वार्थ सिद्धि के रूप में गिनी जाती है। वस्तुतः इसे अनर्थ कहा जाना चाहिए। नशेबाज क्षणिक आतुरता का समाधान करने के लिए नशा पीते हैं। इसकी प्रतिक्रिया हाथों-हाथ धन की बर्बादी, परिवार की दुर्गति, बदनामी एवं दुर्बलता बीमारी की बढ़ोत्तरी के साथ-साथ अकाल-मृत्यु का लानत शिर पर आ धमकती है। कहने वाले तो नशे को भी मन की मौज कह कर स्वार्थ-सिद्धि में सम्मिलित कर सकते हैं। पर वस्तुतः वैसी बात है नहीं।

पेट से अधिक खाकर मरने वाले पेटू खाते समय तो चयेरपन पर अंकुश नहीं कर पाते हैं और सोचते हैं स्वादिष्ट व्यंजनों को जितना अधिक खाया जा सके, उसमें कमी नहीं रहने देना चाहिए। खाते समय लगता भी ऐसा ही है कि मानो जन्म-जन्मान्तरों का पुण्य उदय हुआ हो और सुयोग आसमान से टूटा हो। पर, कुछ ही समय बाद जब पेट फूलने, दर्द उठने, उल्टी होने, दस्त लगने जैसे संकट आ धमकते हैं और गरदन मरोड़ते हैं, तब पता चलता है कि कुछ घड़ी पूर्व जिसे सौभाग्य समझा जा रहा था वस्तुतः उसके पहिचानने में भूल हुई और वह छद्मवेश बन कर दुर्भाग्य ही सिर पर चढ़ा था।

बढ़ती जवानी में, कामुकता में अति बरतने वाले, उन दिनों तो इतराते-इठलाते फिरते हैं, पर कुछ ही समय उपरान्त जब यौन रोगों का आक्रमण होता है और असमय में बुढ़ापा आ घेरता है, तब पाता है कि आवेश के उन्माद में अतिवाद अपनाकर भूल की गई। जो बात उन दिनों स्वार्थ सिद्धि प्रतीत हो रही थी, वह वस्तुतः आत्मघात के लिए प्रयुक्त की गई एक जायकेदार भर थी। खाते समय उसके दुष्परिणामों पर विचार कर लिया गया होता तो अच्छा रहता। मन मारना पड़ता और ललक पर अंकुश लगाना पड़ता, तो ही भला था। किन्तु किया क्या जाय? विधाता भी अजीब मसखरा है, उसने आदमी को जितनी समझदारी दी है, साथ ही उससे अधिक बेवकूफी भी लाद दी है। आश्चर्य है कि स्वार्थसिद्धि के लिए आतुर मनुष्य इतना तक समझ नहीं पाता कि तत्काल ही सब कुछ नहीं है। अगले क्षणों सामने आने वाली परिणति का भी कुछ महत्व है।

चासनी पर आँखें बन्द करके टूट पड़ने और पर फँसा कर बेमौत मरने वाली मक्खी की बुद्धिहीन स्थिति को दयनीय माना जा सकता है। पर आदमी के सम्बन्ध में तो ऐसी बात नहीं है उसे तो अगले क्षणों काम के भले-बुरे परिणाम का अनुमान लगाने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। वंशी की डोरी में आटे की गोली का प्रलोभन मछुए ने किस हेतु सँजोया है, उसे मछली न समझ पाये, तो उसे उसकी समझ संरचना में घुसी जन्मजात त्रुटि कहा जा सकता है। चिड़िया यदि बिछे हुए जाल और उस पर छिटके हुए दानों के पीछे की दुरभिसन्धियों को न समझ सके, तो भी उसके मानसिक विकास को देखते हुए उसे निर्दोष भी कहा जा सकता है, पर मनुष्य को क्या कहा जाय जिसकी विशेषता ही कार्य-कारण की संगति बिठाते हुए किसी निर्णय पर पहुँचने की है, जिसने प्रगति पथ पर चलते हुए इतनी लम्बी यात्रा पूरी की है, वह किस कारण आज के कृत्यों की उस परिणति को समझ नहीं पाता, जो आये दिन घटित होती और सर्वत्र समान रूप से दृष्टिगोचर होती रहती है।

स्वार्थ सिद्धि के लिए क्या करना चाहिए, इसका निर्धारण इतना कठिन नहीं है, जिससे यथार्थवादी व्यवहार बुद्धि का आश्रय लेकर निश्चित किया जा सके। बाधा तत्काल लाभ के- क्षणिक आकर्षणों के लिए अगले ही दिन आने वाले संकट को न समझ सकने की है। बच्चे इसी भोलेपन में आग से खेलने और बिच्छू पकड़ने का प्रयत्न करते हैं। अभिभावक सजग रहते हैं कि कहीं यह सलौने छौने आकर्षण के पीछे छिपे अनर्थ को समझने में भूल न कर बैठे। इसलिए हर घड़ी उनकी गतिविधियों पर ध्यान रखते हैं और संकट की ओर बढ़ते ही उन्हें रोक देते हैं, पर वयस्कों के लिए तो वैसी व्यवस्था भी नहीं। प्रकृति ने उन्हें इस योग्य माना है कि वे आवेश में भी होश-हवास कायम रखेंगे और तनिक भी उमंग या उत्तेजना उभरते ही आत्म हत्या जैसा अनर्थ न करेंगे। किन्तु आश्चर्य तब होता है, जब तथाकथित समझदारी में से अधिकाँश को नासमझी का परिचय पग-पग पर देते देखा जाता है।

आरम्भ में कुछ कठिनाई या हानि उठाकर भी अगले दिनों सत्यपरिणाम उपार्जित करने के लिए कदम बढ़ाना पड़े तो इसमें झिझकने जैसी क्या बात है? किसान को खेत बोते-जोतते देख कर तत्काल तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि किया गया श्रम और बोया हुआ बीज निरर्थक चला गया। जो हथेली पर सरसों जमाने की बालबुद्धि अपनाकर तुर्त-फुर्त लाभ के बाजीगरी चमत्कार देखने के लिए आतुर हैं, उन्हें किसान की गतिविधियों में मूर्खता भी प्रतीत हो सकती है, किन्तु जानकारों को इसमें कुछ भी हैरानी नहीं लगती। आरम्भ में निजी पूँजी लगाये या गँवाये बिना कोई व्यवसाय नहीं चलता। बीज गलने से इन्कार कर दे तो वह पड़ा-पड़ा सड़-घुन जायेगा, पर विशाल वट वृक्ष बनने का सुयोग कभी भी प्राप्त न कर सकेगा। पल्लवों, और फल-फूलों से लदे शानदार भविष्य की कल्पना यदि सुदृढ़ हो तो कोठे में से निकालकर जमीन पर लेटने और अंकुरित होने से पूर्व अपना प्रस्तुत कलेवर गला देने की हिम्मत सँजोनी ही पड़ेगी। मध्यवर्ती और कोई मार्ग ऐसा है नहीं, जिसमें पूँजी तनिक सी लगे और आसमान से सोना बरसाने वाला व्यवसाय चल पड़े।

माली को लम्बे समय तक मनोयोगपूर्वक श्रम करना पड़ता है और साथ ही उपयुक्त समय पर उपयुक्त फल आने का इन्तजार भी करना होता है। विद्यार्थी तक इस तथ्य को शिरोधार्य करते और अपनाते देखे गये हैं। ग्रेजुएट बनने के लिए बारह-चौदह वर्षों तक निरन्तर सिर खपाते रहने की आवश्यकता पड़ती है। पुस्तकें कापियाँ खरीदने, फीस जमा करने जैसी हानि उठाते रहने की बात भी बिना आनाकानी किये, गले उतारनी पड़ती है। जो इतनी साधना कर सकते हैं, उन्हीं को अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने और अफसर बनने का सुयोग मिलता है। जिन्हें आवारागर्दी ही पसन्द है, जो मटरगश्ती करते, ताश-शतरंज में समय गुजारते, किताब बेच कर सिनेमा देखते और फीस जमा करने के लिए मिले पैसों से यारबाजी से सुगल पूरे करते हैं, वे तत्काल तो मस्ती दिखाते और इतराते हुए खुशमिज़ाज दीखते हैं, पर कुछ ही समय बाद यह संकट आ धमकता है, जिसमें भर्त्सना, प्रताड़ना, लज्जा और दुर्गति के प्रहार पर प्रहार होने लगते हैं। अप्रामाणिक ठहरते और जहाँ जाते वहीं दुत्कारे जाते हैं। कुसंग में भटकने वाले बालक किस प्रकार अपना भविष्य बिगाड़ते हैं, इसके ढेरों उदाहरण अपने इर्द-गिर्द ही दृष्टि पसार कर देखे जा सकते हैं। समझदारी ही बताती है कि दूरदर्शिता अपनाने में लाभ है या तत्काल लाभ की आतुरता में कुमार्ग अपनाने में।

स्वार्थ का तात्पर्य यदि अपना हित साधन हो तो इसके लिए चिरस्थायी सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिनमें भले ही संयम बरतना, श्रम करना, और यत्किंचित् कष्ट भी सहना पड़े तो उसे प्रसन्नतापूर्वक अंगीकार किया जाय। यह बात गिरह बाँध लेने जैसी है कि सज्जनता, सद्भावना, जागरुकता और तत्परता जैसी सत्प्रवृत्तियों का सघन समावेश रखते हुए, जो कदम उठाये जाते हैं, वे ही चिर स्थायी सत्परिणाम उत्पन्न करते हैं। नीतिमत्ता ही फलती-फूलती है। आदर्श अपनाकर ही कोई महान बनता है। जिन्हें उज्ज्वल भविष्य अभीष्ट हो। उन्हें शालीनता के राजमार्ग पर चलना चाहिए। भले ही यह विद्या अपनाने पर ‘सादा जीवन-उच्च विचार’ के सनातन निर्धारण अपनाने पड़ें।

आतुर, उतावले लोग ओछी दृष्टिकोण अपनाते और वितृष्णा की पूर्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने को आतुर रहते हैं। यह अदूरदर्शिता, फुलझड़ी की तरह चमकती, झाग की तरह उफनती और बबूले की तरह मचलती तो है, पर यह भी स्पष्ट है कि ढोल की पोल खुल कर ही रहती है। काठ की हाँडी में बार-बार खिचड़ी पकती रहेगी- यह सोचना व्यर्थ है। अदूरदर्शिता अपनाकर, सस्ती सफलता पाने के लिए कुमार्ग की पगडंडी पकड़ना ऐसा ही बाल-विनोद है, जिसमें उथले मनोरंजन की अतिरिक्त और कुछ सार है नहीं। इस पगडंडी का जिनने भी अवलम्बन लिया है, वे झाड़ियों में भटके, काँटों से छिदे और रोते-कलपते वापस लौटे हैं। यदि यह कठिनाई न होती, तो हर कोई इसी राह पर चलता। तब आदर्शवाद अपनाने के लिये किसी में संकल्प साहस उठता ही नहीं।

स्वार्थसिद्धि शब्द बदनाम इसी लिए हुआ है कि उसमें अदूरदर्शिता घुस पड़ी और किसी भी कीमत पर तत्काल लाभ पाने का लालच, औचित्य की मर्यादा पार कर गया। यदि ऐसा न होता तो उसे आत्मकल्याण-आत्मोत्कर्षण-लक्ष्य की प्राप्ति-पूर्णता की उपलब्धि आदि नामों से पुकारा जाता। महामानव सर्वथा निःस्वार्थ- निस्पृह रहे हों ऐसी बात नहीं। जब सभी अपना हित और लाभ चाहते हैं, प्राणि मात्र की प्रकृति ही यह है तो फिर महापुरुषों का नियति क्रम से बाहर रहने से गुजारा कैसे हो सकता है। निजी लाभ की बात सोचने में न अनौचित्य है और न अधर्म। यह स्वाभाविक भी है- सरल भी और सुखद भी। असमंजस वहाँ खड़ा होता है, जहाँ भाषी परिणामों की ओर से आँखें मूँद कर तत्काल लाभ के लिए, कुछ भी करने के लिए कटिबद्ध हुआ जाता है और ऐसा कदम उठाया जाता है, जिसमें आत्म प्रवंचना के साथ-साथ आत्म-प्रताड़ना की दुहरी मार पड़े और चौबे का छब्बे बनने की फिराक में डूबे भर रहने का व्यंग्य सहना पड़े।

स्वार्थ के साथ औचित्य भी रहना चाहिए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे लोकहित के विपरीत निजी हित की बात नहीं सोचना चाहिए। यह मात्र धर्मोपदेश ही नहीं है, इसके पीछे सृष्टा की वह नियति व्यवस्था भी है, जो मर्यादा तोड़ने वाले- वर्जनाओं की अवज्ञा करने वालों की खबर मोटे डंडे से लेती, कान मरोड़ती और मुर्गा बना कर धूप में खड़ा करने में भी नहीं चूकती।


बादशाह का अँगूठा चाकू से कट गया (kahani)

एक दिन अकबर बादशाह का अँगूठा चाकू से कट गया। बीरबल पास ही में बैठे थे उनने दार्शनिक जैसी मुद्रा बना कर कहा- “ईश्वर जो कुछ करता है अच्छा ही करता है।” बादशाह को इस पर बुरा लगा किन्तु उस समय चुप रह गये। कुछ नहीं कहा।

बहुत दिन बाद बादशाह बीरबल वन विहार को गये। प्यास लगी। कुँआ निकट देखकर बादशाह ने बीरबल से कहा- ‘पानी खींच लाओ।’ वे खींचने लगे तो बादशाह ने पीछे से धक्का दिया और वे कुँए में गिर पड़े। ऊपर से बादशाह ने कहा- “ईश्वर जो करता है अच्छे को ही करता है” यह कहकर वे अकेले ही आगे बढ़ गये।

वे थोड़ी ही दूर आगे बढ़े होंगे कि जंगलियों के झुण्ड ने उन्हें पकड़ लिया और देवी पर बलि चढ़ाने के लिए घसीट ले गये। सिर कटने वाला ही था कि झुण्ड के मुखिया ने यह देखने को कहा- “कोई अंग भंग तो नहीं है।” बादशाह का अँगूठा कटा हुआ पाया गया अतः बलि अयोग्य समझ कर उन्हें छोड़ दिया गया।

बादशाह लौटकर उसी कुँए पर आये और प्रयत्नपूर्वक बीरबल को निकाला। पूछा- “मेरा अँगूठा कटना तो सचमुच ही ईश्वर का अनुग्रह निकला पर तुम्हें जो इस कुँए में गिराने का कष्ट सहना पड़ा, इस ईश्वर की मर्जी से क्या लाभ हुआ।”

बीरबल ने कहा- ‘यदि आप कुँए में न गिराते तो जंगली मेरे सभी अंग पाकर मुझे ही बलि पर चढ़ा देते। कुँए में पड़ा रहने पर मैं बच तो गया।

दोनों हँसते हुए लौटे रास्ते में कहने लगे असमंजस और दुःख के प्रसंग आने पर इस नुक्से से काम लेना चाहिये कि ईश्वर जो करता है अच्छे को ही करता है। वस्तुतः कर्ता-धर्ता तो मनुष्य स्वयं ही है असमंजस के क्षणों में राहत देने वाली यह अच्छी दवा है कि ईश्वर को बीच में ढालकर मन हलका कर लिया जाय।


उपयोगी ज्ञान वृद्धि विवेक बुद्धि के सहारे

मस्तिष्कीय ज्ञान विकास एवं धारणा परिपक्व करने के लिए अध्ययन अध्यापन की आवश्यकता पड़ती है। आवश्यक नहीं कि वह पुस्तकों के आधार पर ही अर्जित की जाय और अध्यापक ही उसे पढ़ाते, स्कूल में भर्ती हुए बिना काम न चले।

यह समूचा संसार एक पाठशाला है। इसमें रहने वाले मनुष्यों और प्राणियों की घटनाएँ निरन्तर कुछ न कुछ सिखाती रहती हैं। इस सम्पर्क क्षेत्र की विभिन्नताएँ और विचित्रताएँ ही हमारी ज्ञान सम्पदा को निरन्तर बढ़ाती रहती है। भले-बुरे, कडुए-मीठे अनुभव बताते हैं कि किन परिस्थितियों में कितना किस सीमा तक सहयोग करना चाहिए और किनसे बचकर आत्म रक्षा की घेराबंदी करनी चाहिए।

घटनाएँ घटती रहती हैं। इनके साथ जुड़े तो प्राणी भी रहते हैं पर उनमें भी प्रमुखता परिस्थितियों की ही होती है। परिस्थितियों को भी एक बहुमुखी व्यक्तित्व वाले मनुष्य कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। घटनाक्रमों के साथ अनेकों उतार-चढ़ावों का सम्मिश्रण होता है। इसलिए उनके सम्पर्क में आने वाले एक साथ ही कितनी संगतियों और विसंगतियों का अनुमान लगा लेते हैं। ज्ञान वृद्धि में जन सम्पर्क की बहुलता और घटनाक्रमों की विभिन्नता बहुत सहायक होती है। इस प्रयोजन के लिए पर्यटन भी एक बड़ा माध्यम है। स्कूली अध्ययन जहाँ सीमित परिधि की जानकारियों का विकास करता है वहाँ पर्यटन उसमें बहुमुखी ज्ञान अनुभव संचित करने का अवसर प्रदान करता है।

प्राचीन काल के गुरुकुल चलते-फिरते होते थे। ऋषि-मनीषी अपनी शिष्ट मण्डली को लेकर परिभ्रमण करते रहते थे। थोड़े-थोड़े समय एक-एक स्थान पर रुकते थे। फिर आगे बढ़ जाते थे। इसमें अध्ययन अध्यापन में कोई व्यतिरेक नहीं पड़ता था। व्यक्तियों और परिस्थितियों की भिन्नता से अवगत होते रहने वाले विद्यार्थी अपेक्षाकृत अधिक व्यवहार कुशल होते थे। जबकि छात्रालयों या घर परिवारों की चहार दीवारी तक सीमित रहने वालों को मात्र पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित रहना पड़ता था।

यह ठीक है कि अधिक घनिष्ठ एवं समीप रहने वालों की प्रभाव प्रतिक्रिया अधिक होती है, पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सब कुछ उतने पर ही निर्भर है। बाहर का वातावरण भी कम प्रभावित नहीं करता। इसलिए न केवल ज्ञान वृद्धि का श्रेय या दोष सम्पर्क क्षेत्र को ही नहीं दिया जा सकता। सम्पर्क क्षेत्र से तात्पर्य अपने परिवार से है। हर परिवार में भले-बुरे स्वभाव के होते हैं। सभी एक जैसे हों यह कठिन है। ऐसी दशा में अपरिपक्व आयु के बालक उनमें से किससे अधिक प्रभावित हों और किन-किन का किस सीमा तक अनुकरण करने लगे यह कहा नहीं जा सकता। स्कूल जाने या पास-पड़ौस के बच्चों के साथ खेलने का समय आने पर तो प्रभाव ग्रहण का क्षेत्र और भी अधिक विस्तृत हो जाता है। अपनी तथा दूसरी कक्षाओं के अध्यापक- अपने और साथियों के अभिभावक- सेवक शिक्षकों की भूमिका निभाते हैं और पाठ्यक्रम में न सही, भले-बुरे अनुभवों की अभिवृद्धि में योगदान देते हैं। यह समूचा क्षेत्र मिलकर ज्ञान वृद्धि की शृंखला को मोटी और लम्बी करता चला जाता है।

यह उस समय की चर्चा है, जिन दिनों बालक घर से निकलकर स्कूल तक के आवागमन का क्रम आरम्भ करता है। इसे सम्पर्क क्षेत्र का विस्तार कहना चाहिए। यह सम्पर्क ही वास्तविक अध्ययन अध्यापन है। अनुभव एवं प्रभाव ग्रहण भी अपने ढंग की ज्ञान वृद्धि है। मात्र पुस्तकों या अध्यापकों तक ही उसे सीमित नहीं समझा जाना चाहिए।

यह ज्ञान वृद्धि आगे चलकर और भी अधिक विस्तृत होती है। पुस्तकों में वर्णित ऐतिहासिक घटनाक्रमों एवं अगणित विचारशीलों के प्रतिपादनों को उनके द्वारा पढ़ने समझने का अवसर मिलता है। पाठ्यक्रम मात्र शब्दकोश, भाषाज्ञान एवं विषय परिचय भर तक सीमित नहीं रहते। उस माध्यम से जो पढ़ा गया है वह एक प्रकार से सम्पर्क स्तर का बनाता जाता है। प्रत्यक्ष न होने पर भी पुस्तकीय ज्ञान परोक्ष सम्पर्क क्षेत्र बना है ओर पढ़ने वाले पर प्रभाव छोड़ता है। साहित्य की तरह ही अब सिनेमा टेलीविजन भी एक प्रकार से देखने वालों के लिए स्कूलों की अध्यापकों की भूमिका निभाते हैं। हाट बाजार में- मेले-ठेलों में- विवाह शादियों में सहज ही अनेक आकृति-प्रकृति के- स्वभाव आचरण के नर-नारियों को देखना बन पड़ता है। इन सबके साथ हलका भारी प्रभाव सम्पर्क जुड़ता है आदान-प्रदान का क्रम चलता है।

दैनिक समाचार पत्र संसार भर की परिस्थितियों के साथ सम्पर्क जोड़ते हैं। मासिक, साप्ताहिक पत्रिकाएँ विचार प्रधान होती हैं। पुस्तकालयों में हर स्तर की पाठ्य सामग्री मिल जाती है। सत्संग समारोहों में किसी विशेष विचारधारा का बाहुल्य छाया रहता है। कुल मिलाकर हमारा समूचा जीवन ही सीखते हुए जाता है। उसमें सिखाना भी सम्मिलित है। हम न केवल सीखते ही हैं वरन् सिखाते भी हैं। न केवल विद्यार्थी होते हैं वरन् कितनों के ही लिए अध्यापक भी बनते हैं। यह भी एक जीवन साधना है। आवश्यक नहीं कि बड़े या बहुत ही कम आयु समझ वालों को सिखाये। बहुत बार छोटे और अनपढ़ भी बड़ों को इतना अधिक सिखा देते हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

यहाँ उस मान्यता पर प्रश्न चिन्ह लगता है जिसके अनुसार यह कहा जाता रहा है कि उपयोगी शिक्षण संस्थानों में भर्ती करने से या सुसंस्कृत परिस्थितियों में पलने से बालक या व्यक्ति का ज्ञान एवं चरित्र बढ़ता है। यह प्रतिपादन एक सीमा तक ही सही है। बार-बार सम्पर्क में आने वालों का अधिक प्रभाव पड़ता और अनुकरण प्रिय प्रकृति मिलने के कारण अधिक सीखने समझने का अवसर रहता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। किन्तु इससे बाहर जो कुछ घटित हो रहा है या जो हो चुका है, उसके प्रभाव से अछूता रहने के लिए कोई चहार दीवारी नहीं खिंच सकती।

घर में अंगीठी जला लेने पर भी सर्दी का मौसम प्रभाव न छोड़े और अँगीठी छोड़ने के बाद अपना प्रभाव प्रदर्शित न करे, यह कैसे हो सकता है? घर में बुहारी लगाने पर भी जब अन्धड़ के साथ उड़ता हुआ गर्द गुवार आँगन व रास्ते में ढेरों रेत कचरा बखेर देता है तो उसकी रोकथाम कैसे हो? अनचाहे मेहमान भी कई बार ऐसे होते हैं जो प्रवेश निषिद्ध का प्रतिबन्ध पढ़ते तक नहीं और दनदनाते हुए घर के भीतरी कोने तक जा धमकते हैं। मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू मनचाही घुसपैठ करते रहते हैं। अधिक से अधिक कुत्ते, बिल्ली ही रोके या भगाये जा सकते हैं।

बाहरी प्रभाव के सम्बन्ध में भी यही बात है। जीवन निर्वाह के क्षेत्र में ऐसा किया जा सकता है जिसमें इच्छित अनुकूलता रहे किन्तु मनुष्य पिंजड़े का पक्षी तो नहीं है। उसका सम्पर्क आवागमन अनेकों के साथ जुड़ता है। फिर जो पढ़ा या सुना जाता है उसे किस प्रकार भले-बुरे की छलनी में छाना जाय। नाक के द्वार खुले हैं तो नथुनों में सुगन्ध ही नहीं दुर्गन्ध भी घुसेगी ही। आँखें यदि खुली हों तो उन्हें भले ही नहीं बुरे दृश्य भी दीखेंगे ही। भले दृश्य आँखें देखें और बुरे सामने आते ही कपाट बन्द कर लें ऐसा सोचा भर जा सकता है, व्यवहार में उतारना सम्भव नहीं। गाँधी जी के तीन बन्दर एक परिकल्पना है। कोई आँखें बन्द किये, कानों में उँगली लगाये और मुँह पर पट्टी बाँधे कहाँ तक बैठा रह सकता है। जीवितों में से किसी के लिए भी वह सम्भव नहीं। आदर्शों के प्रतीक लोक शिक्षण के लिए बना लेने में हर्ज नहीं, पर उन्हें व्यावहारिक मानकर नहीं चला जा सकता।

तब किया क्या जाय? क्या विवशता समझकर दैवेच्छा पर निर्भर रहा जाय? प्रयास पुरुषार्थ की राय न देने वाली भाग्यवादी मान्यता अपनाने की आवश्यकता नहीं। समझना इतना भर है कि जीवनचर्या का क्षेत्र बहुत बड़ा है। उसकी विशालता और व्यापकता अत्यधिक विस्तृत है। बुरे के साथ भला और भले के साथ बुरा इतना अधिक गुथा है कि अनुकूल वातावरण या परिस्थितियों की घेराबंदी कर सकना सिद्धान्त सही होने पर भी व्यवहारतः असम्भव है। हमें यथार्थवादी होना चाहिए और संसार भर के काँटे बीनने या बिना ठोकर कंकड़ों से बचते हुए, कालीनों पर ही चलने की कल्पना छोड़ देनी चाहिए। अच्छा है कि पैरों में जूता पहनें और हर भले-बुरे रास्ते को रौंदते हुए बेखटके चलते रहें।

तात्पर्य उस विवेक बुद्धि के जागरण से है। जो एकाकी नहीं होती वरन् भले-बुरे का भेद करना जानती है। उसी को विकसित और परिपक्व करने की जरूरत है। खतरा एकाकीपन में पड़ता है। विश्वासी ठगे जाते हैं और अविश्वासी आशंकाग्रस्त रहकर अलग-थलग पड़ते और घाटे में रहते हैं। सज्जनों की संगति बहुत अच्छी बात है पर यदि दुर्जनों की कुटिलता से अपरिचित रहा जाय तो वह दुर्दिन देखना पड़ेगा जिसमें किसी पाखण्डी के कुचक्र में फँसकर जेब कटानी और मुसीबत उठानी पड़े। ठीक इसी प्रकार दुर्जनों से सारा संसार भरा होने की मान्यता बना लेने पर सज्जनों से सम्पर्क साधना और सहयोग के आदान-प्रदान का द्वारा ही नहीं खुलेगा। इसीलिए नीर-क्षीर विवेक की नीति को बुद्धिमत्तापूर्ण बनाया, सराहा और अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

अपनी बालकों की- प्रभाव सम्पर्क में आने वालों की ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ इस तथ्य को भी हृदयंगम किया और कराया जाना चाहिए कि यहाँ भलाई और बुराई दोनों ही एक साथ गुँथी हैं। वे इतनी दूरी पर नहीं रहतीं कि उन्हें अलग-अलग पंक्तियों में नहीं खड़ा किया जा सकता वरन् हर प्रसंग में उनके ग्राह्य और अग्राह्य स्तर का वर्गीकरण किया जाना चाहिए। छलनी आटा छानती है और भूसी का ढेर अलग से लगा देती है। सूप के फटकने का भी यही क्रम है कि वह करकट और अनाज अलग-अलग करता रहता है। पानी छानकर पीने के पीछे भी यही नीति काम करती है। इस संसार में सर्वथा सज्जन या सर्वथा दुर्जन कोई भी नहीं है। इसलिए न तो किसी का आत्म समर्पण किया जाना चाहिए और न किसी को सर्वथा अप्रामाणिक, अनुपयोगी ठहराया जाना चाहिए। अतिवाद के दोनों ही सिरे खतरनाक हैं।

ज्ञानवृद्धि एक ऐसी आवश्यकता है जो जन्म से ही आरम्भ होती है और मरण पर्यन्त चलती रहती है। इसमें पठन-पाठन के अनेकों माध्यम हैं। परिवार स्कूल, साहित्य, सम्पर्क आदि द्वारा यह क्रम चलता ही रहता है। इनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसे सर्वथा निर्दोष या ग्राह्य कहा जा सके। ऐसा भी नहीं हो सकता कि एक वर्ग के साथ ही सम्पर्क रहे ओर दूसरे से बचा या बचाया जा सके। इस झंझट में न पड़कर हमें इतना ही सोचना चाहिए कि बुराइयों के दुष्परिणाम समझे और अच्छाइयों की सुखद सम्भावनाओं का सही रीति से मूल्याँकन करना सीखें। हर सज्जन में कोई दुर्जन जैसा दुर्गुण हो सकता और हर दुर्जन में कुछ न कुछ विशेषता हो सकती है। हमें औचित्य को ही मान्यता देनी चाहिए। तर्क बुद्धि से काम लेना चाहिए। यथार्थता का पर्यवेक्षण कर सकने वाली विवेकशीलता विकसित करनी चाहिए। नीर-क्षीर का भेद करने वाली प्रथा अपनानी चाहिए। यही है- ज्ञान वृद्धि की दूरदर्शितापूर्ण अवधारणा। जिसका आश्रय लेकर बुरे लोगों और बुरी परिस्थितियों में भी सतर्कता और सुरक्षा के कितने ही महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग सकते हैं। यही है वह कौशल जिसके आधार पर सज्जनता को ढूँढ़ना और उसके उपयोगी अंश को उपयोगी मात्रा में ग्रहण कर सकना सम्भव हो सकता है।


राजकुमारी का स्वयंवर रचा गया (kahani)

एक अति सुन्दरी राजकुमारी का स्वयंवर रचा गया। पिता की घोषणा थी कि जिसे वरा जायेगा उसे आधा राज्य दहेज में मिलेगा और शेष उसके मरने के उपरान्त। नारद उधर से निकले तो इस दुहरे प्रलोभन पर मुग्ध हो गये। भगवान के पास पहुँचे और अति सुन्दर रूप प्रदान करने की कामना व्यक्त करने लगे। विष्णु स्तब्ध रह गये। नारद ने समझा भगवान की मौन स्वीकृति मिल गई स्वयंवर में पहुँचे तो कुरुपता ज्यों की त्यों बनी रही। विवाह किसी दूसरे से हुआ। नारद को अत्यन्त दुःखी और कुपित देखकर कहा- मैं जिन पर अनुग्रह करता हूँ उनकी कामनाएँ पूरी नहीं करता वरन् लोभ मोह से छुड़ाने का उपाय करता हूँ। इसी में भक्तों का हित छिपा रहता है।


जिन्दगी चालीसवें साल से शुरू होती है।

जिन्दगी चालीस साल से आरम्भ होती है। इस कथन के पीछे तात्पर्य इतना ही है कि चढ़ते खून में अल्हड़पन अधिक रहता है। अनुभव के अभाव में व्यक्ति गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अनगढ़ रहता है। इस लिए उन दिनों दूरदर्शी निर्णय करने और उपलब्ध क्षमताओं का अधिक उत्तम उपयोग करने की समझदारी की कमी बनी रहती है। यह स्थिति जब भी बदले तभी से जिन्दगी आरम्भ हुई, यह समझी जानी चाहिए। हो सकता है कि ऐसी विवेक बुद्धि छोटी आयु में ही जाग पड़े। हो सकता है कि अस्सी-सौ वर्ष बीत जाने पर भी मरने के दिन तक बच्चों जैसी चंचलता और अदूरदर्शिता छाई रहे। ऐसी दशा में यही कहा जायेगा कि जिन्दगी का आयु से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। फिर भी अनुभव एकत्रित करने और उत्तरदायित्व समझने में देर तो लगती ही है। इस देरी का मोटा अनुमान चालीस वर्ष जितना लगाया गया है।

मनुष्य ऐसे ही दिन काट ले तो उसकी विशेषता क्या रही और अन्य प्राणियों से अधिक सुयोग इतना भर ही रहा कि वह दो टाँगों के सहारे खड़ा होकर चल सका और हँसने, रोने, बोलने और सोचने भर की विशेषता दिखा सका।

विचारशीलों का कथन है कि “जिन्दगी चालीसवें साल से आरम्भ होती है।” इस उक्ति का तात्पर्य यह है कि इतने दिन पापड़ बेलने के उपरान्त उस समझदारी का उदय होता है जो साधनों के सदुपयोग और उत्तरदायित्व का अनुभव करती है। समय सबसे बड़ी सम्पदा है। उसे ज्यों-त्यों करके काट लेने का अभ्यास तो पशु-पक्षियों को भी होता है। गेंद की तरह ठोकर खाने पर इधर से उधर लुढ़कते रहने वालों को भी तो जीवित ही कहा जायेगा, पर इससे कुछ पल्ले नहीं पड़ता। मनुष्य जीवन का सुयोग्य ऐसा नहीं है कि उसे भारभूत होकर ढोया या ज्यों-त्यों करके किसी पर ढोया-घसीटा जाय। उसकी उपलब्धियाँ शानदार होनी चाहिए। यदि यह उमंग उमंगें तो समझना चाहिए कि समझदारी का अरुणोदय दीखा।

विवेकानन्द मात्र 36 वर्ष ही जिये। शंकराचार्य की मृत्यु 32 वर्ष की आयु में ही हो गई। ज्ञानेश्वर उठती उम्र में ही स्वर्ग चले गये, पर इतनी अवधि में ही उनने इतने महत्वपूर्ण कार्य इतनी कुशलता के साथ सम्पन्न कर लिये कि उस अल्पायु को भी सदा सराहा जाता रहेगा। इसके विपरीत ऐसे भी ढेरों लोग होते हैं जो अस्सी या सौ वर्ष तक जीवित रहें पर खाने-सोने में ही दिन काटते रहे। कोल्हू के बैल की तरह किसी तरह समय पूरा करते रहे। जीवन को सार्थकता के साथ जोड़ने की उनकी इच्छा उठती ही नहीं। जीवन का महत्व और उसका सदुपयोग उनने जानने समझने का प्रयत्न ही नहीं किया।

जिन्दगी और समझदारी एक ही बात है। कौन कितने दिन जिया इसका लेखा-जोखा, वर्ष महीने गिनकर नहीं वरन् यह देखते हुए लगाना चाहिए कि किसने कितना समय किस स्तर के कार्यों में, कितनी कुशलता पूर्वक लगाया। जिन्दगी के वर्ष तो सीमित होते हैं, पर उन्हें रबड़ की तरह खींचकर लम्बा या गुब्बारे की तरह फुलाकर छोटे से बड़ा बनाया जा सकता है।

समझदारी का अर्थ है अधिक महत्वपूर्ण कार्यों का चुनाव और जो करना है उसे पूरे मनोयोग के साथ करने का कौशल। यह समझ जिस भी आयु में उग पड़े, समझना चाहिए कि वास्तविक जिन्दगी उसी दिन से आरम्भ हुई।


प्रगति और कर्मठता एक ही तथ्य के दो पक्ष

क्षेत्रफल जनसंख्या एवं प्रकृति सम्पदा के आधार पर कोई देश समर्थ एवं समृद्ध हो सकता है यह मान्यता आँशिक रूप से ही सही कही जा सकती है। जिसके पास पूर्वजों की छोड़ी विपुल सम्पदा हो उसे ठाट-बाठ से रहने में क्या अड़चन हो सकती है? विशिष्टता के तथ्य तब उभर कर आते हैं जब सामान्य अथवा हेय परिस्थितियों के बीच भी ऊँचा उठने- आगे बढ़ने का प्रयत्न सफल करके दिखाया जाता है। इसमें तत्परता और तन्मयता की ही प्रधान भूमिका रहती है। परिस्थिति ही सब कुछ नहीं होती। साधनों का बाहुल्य ही प्रगति का एकमात्र कारण नहीं है। देखा यह भी जाता है कि कर्मठता और सूझ-बूझ के सहारे विपन्नता के बीच भी सम्पन्नता उत्पन्न करने के सुयोग बनते हैं।

कितने ही राष्ट्र इस बात के प्रमाण हैं कि उनने प्रतिकूलताओं के बीच भी पराक्रम के बल पर अनुकूलता उत्पन्न की है और आश्चर्यचकित करने वाली सफलता उपलब्ध की है।

द्वितीय महायुद्ध में हारने के उपरान्त जर्मनी, इटली, जापान आदि की स्थिति दयनीय हो गई थी, पर वहाँ के नागरिकों ने कठोर श्रम और प्रचण्ड संकल्प के आधार पर कुछ ही वर्षों में पुरानी समर्थ स्थिति पुनः प्राप्त कर ली। जीतने वाले देशों में भी रूस ब्रिटेन जैसे देशों में बुरा हाल था। मनोबल गँवा दिया होता तो शताब्दियों तक उन्हें दयनीय स्थिति में पड़ा रहना पड़ता। कठोर, श्रम और भावभरा उत्साह ही है जिसके सहारे वे न केवल उठ खड़े हुए वरन् पहले से भी अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त कर सके।

योरोप के कुछ बहुत छोटे देशों की स्थिति और प्रगति के बीच तालमेल बिठाने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। स्वल्प साधनों और प्रतिकूलताओं के बीच रहते हुए उनकी प्रगति और समृद्धि इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती है कि साधनों की तुलना में संकल्पों की परिणति कहीं अधिक चमत्कारी होती है।

नीदरलैण्ड का क्षेत्रफल बारह हजार पाँच सौ अट्ठाइस वर्गमील है। उसकी वर्तमान जनसंख्या 1 करोड़, 38 लाख 98 हजार है। अर्थात् प्रति वर्गमील में औसतन नौ सौ व्यक्ति निवास करते हैं। इसका 40 प्रतिशत भू-भाग समुद्र सतह से नीचे है। आये दिन इन्हें समुद्र का प्रकोप झेलना ही पड़ता है, पर मेहनत, मनोबल, साहस के धनी डचों ने, नीची सतह युक्त भूमि को चारों ओर से मजबूत बाँधों से घेर दिया है। जनसंख्या वृद्धि दर प्रति वर्ष 1-3 प्रतिशत है। यहाँ की औसत आय प्रति व्यक्ति, प्रतिवर्ष 6200 डालर है (लगभग 55800 रुपये) है। इनकी औसत आयु 82 वर्ष होती है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसकी कमर बुरी तरह टूट गई थी। चार वर्ष तक उसे जर्मन सेना के अधीन रहना पड़ा। आर्थिक व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई, किन्तु पुरुषार्थ के धनी डच जर्मनी के चंगुल से निकलने के बाद तुरन्त ही फिर से राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा कर देने में समर्थ हो गए। वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षेत्रों में द्रुतगति से विकास हुआ। कृषि की वैज्ञानिक प्रणाली का विकास किया गया। देश की 18 प्रतिशत श्रमशक्ति कृषि कार्य में संलग्न है। कृषि योग्य भूमि कम होते हुए भी उपज इतनी अधिक हो जाती है कि खाद्यान्न बाहर निर्यात भी किए जाते हैं। यह उनके प्रचण्ड पुरुषार्थ का ही परिणाम है।

बेल्जियम, नीदरलैण्ड की तुलना में अत्यन्त छोटा देश है- विस्तार और आबादी दोनों मामलों में। क्षेत्रफल 10886 वर्गमील है। आबादी करीब एक करोड़ है। 20 प्रतिशत लोग कृषि कार्य में संलग्न रहते हैं। कुल राष्ट्रीय आय का 10 प्रतिशत कृषि से प्राप्त होता है। 80 प्रतिशत जनशक्ति खानों, कारखानों, निर्माण कार्यों, व्यापार एवं यातायात में लगी है। यहाँ प्रति व्यक्ति की वार्षिक आय औसतन सात हजार डालर (साठ हजार रुपये) है। द्वितीय विश्व युद्ध में यह राष्ट्र भी बुरी तरह थक चुका था। अर्थतन्त्र बेतरह लड़खड़ा गया था, पर अपने परिश्रम, निष्ठा, लगन व देश के प्रति सच्ची आस्था ने इन्हें पुनः कुछ ही दिनों में उस स्थान पर ला खड़ा किया, जहाँ वे पहले थे।

स्विट्जरलैंड का क्षेत्रफल 15 हजार 5 सौ 41 वर्ग मील है। सन् 1989 में वहाँ की कुल आबादी 62 लाख 98 हजार थी। प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय सन् 1976 में 8 हजार 880 डालर थी। सन् 1982 में यह आय 9 हजार तक पहुँच चुकी थी। पहाड़ी प्रदेश होने के कारण कृषि योग्य भूमि अत्यल्प है। आय का प्रमुख स्रोत लघु उद्योग व व्यापार है। इस राष्ट्र के साथ विडम्बना यह है कि इसके समीप न तो कोई बन्दरगाह है, न समुद्री किनारा। किन्तु फिर भी उसका व्यापार प्रतिवर्ष 5 अरब डॉलर से भी अधिक है। प्रति व्यक्ति आय भी समृद्ध देशों जितनी है। ऊर्जा का किसी प्रकार का कोई खनिज स्रोत वहाँ मौजूद नहीं। कारखाने व रेलगाड़ियाँ जल विद्युत से चलती हैं, जिसका उत्पादन पहाड़ी जलधाराओं से किया जाता है। इस प्रकार अभावग्रस्तता होने के बावजूद भी अपने को विकासशील स्तर का बना लेना वहाँ के नागरिकों की देश के प्रति सच्ची निष्ठा एवं परिश्रमशीलता का ही परिणाम है। यहाँ 50 प्रतिशत लोग श्रमिक हैं इनमें से आधे कारखानों में एवं अन्य उद्योगों में लगे हुए हैं। इस प्रकार वहाँ की प्रगति देशवासियों के श्रमनिष्ठ होने का परिचायक है।

स्वीडेन को विश्व में सर्वाधिक संगठित देश माना जाता है। इसके लगभग 80 प्रतिशत श्रमिक व्यापार संगठन में शामिल हुए पाये गये हैं। साथ ही यहाँ की एक विशेषता यह है कि कर्मचारी व मालिकों के बीच अच्छा सुदृढ़ सम्बन्ध कायम है। किसी माँग की पूर्ति की समस्या को अशान्त वातावरण में नहीं वरन् मिल बैठकर आपसी विचार विमर्श द्वारा सुलझा लिया जाता है।

67 वर्ष की आयु के उपरान्त व्यक्ति को राष्ट्रीय पेन्शन प्रदान की जाती है। अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा योजना से हर नागरिक प्रभावित होता है। स्वीडिश लोगों का अच्छा स्वास्थ्य वहाँ की अच्छी जलवायु तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण निःशुल्क चिकित्सा प्रबन्ध का एक प्रमाण है।

पुरुषों व महिलाओं के बीच समानता का आन्दोलन स्वीडेन में लम्बे समय से चला आ रहा है। परिणाम स्वरूप श्रमिक केन्द्रों, उच्च शिक्षा तथा राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की अधिक संख्या में भागीदारी दृष्टिगोचर होती है। उन्हें मजदूरी में भी समानता मिली हुई है। यहाँ रोजगार में संलग्न विवाहित महिलाओं का प्रतिशत 1950 के 25 से बढ़कर 1970 में 50 तक एवं 1982 में 62 तक पहुँच गया है।

स्वीडिश शिक्षा व्यवस्था की यह एक विशेषता है कि प्रत्येक व्यक्ति जो कार्यरत होने के उपरान्त भी शिक्षा चालू रखना चाहता है उसे सुविधा प्रदान की जाती है।

डेनमार्क भी एक छोटा देश है। क्षेत्रफल 19 हजार 557 वर्गमील है। जनसंख्या उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार लगभग 61 लाख। राष्ट्रीय आय का 25 प्रतिशत भाग व्यापार एवं यातायात से प्राप्त होता है। कृषि कार्य में 20 प्रतिशत लगे रहते हैं। 30 प्रतिशत औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत हैं। लघु कुटीर उद्योग बड़ी संख्या में हैं। आय का एक बड़ा भाग छोटे उद्योगों से प्राप्त होता है खेती एवं पशुपालन की दृष्टि से यह राष्ट्र बहुत आगे है। डेरी फार्मों की संख्या भी सर्वाधिक है। अनुमान है कि स्विट्जरलैंड की तरह डेनमार्क भी कुल दुग्ध उत्पादन का चालीस प्रतिशत दूसरे देशों को निर्यात करता है। खनिज पदार्थों का अत्यन्त अभाव है। इनका आयात करना पड़ता है। फिर भी निर्यात लगभग 5 अरब डालर का होता है।

यदि देशवासियों का पुरुषार्थ जीवन्त हो तो सीमित साधनों द्वारा भी असामान्य प्रगति की जा सकती है- इसका अच्छा उदाहरण डेनमार्क है। सन् 1948 में यहाँ प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 800 डालर थी, जो बढ़कर सन् 1960 में 1200 डालर हो गई। सन् 1976 में और भी बढ़ी और 7 हजार छह सौ डालर जा पहुँची। लगातार बढ़ती वार्षिक आय इसी बात का परिचायक है कि वहाँ के नागरिकों में श्रमशीलता अभी भी शेष है।

फिनलैण्ड स्वीडेन के पूर्व में स्थित अत्यन्त छोटा राष्ट्र है। 1939 में रूस ने युद्ध में उसके एक बड़े भाग पर कब्जा कर लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के शोषण का शिकार बना। आर्थिक व्यवस्था बुरी तरह डगमगा गई थी। युद्ध में शरणार्थियों का भरण-पोषण एवं निवास का अतिरिक्त बोझ कन्धे पर आ पड़ा, फिर भी देशवासियों ने अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया और दुगुने उत्साह से परिश्रम करना आरम्भ कर दिया। इसी कारण उसकी स्थिति अब इतनी अच्छी बन पायी है।

यहाँ का कुल क्षेत्रफल एक लाख 30 हजार 120 वर्गमील है। आबादी 48 लाख। 50 प्रतिशत व्यक्ति श्रमिक है। सन् 1948 में वार्षिक आय प्रति व्यक्ति औसतन 800 डॉलर थी। अब 6300 डालर के निकट है।

जापान की कुल जनसंख्या 11 करोड़ 30 लाख है। द्वितीय विश्वयुद्ध में इसकी भी बुरी गति हुई। हिरोशिमा और नागासाकी में गिराये बमों का दुष्प्रभाव अब तक बना हुआ है। अर्थव्यवस्था बुरी तरह गड़बड़ा गई थी, किन्तु राष्ट्र प्रेम, लगन व अथक परिश्रम के बल पर आज पुनः वह औद्योगिक रूप से विकसित देशों की पंक्ति में आ खड़ा हुआ है। इलेक्ट्रानिक्स में भी कॉटेज इन्डस्ट्री का बहुत प्रचलन है। जापानियों की श्रमनिष्ठा से ही विगत दो दशकों में देश की आमदनी 5 गुनी बढ़ी। वहाँ प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष औसत आय 7730 डॉलर है।

इजराइल भी जापान की तरह एक छोटा-सा देश है। संयुक्त कौटुम्बिक प्रणाली का यहाँ अनुकरणीय उदाहरण देखने को मिलता है। इसका प्रथम प्रयोग फिलिस्तीन में 1910 में आरम्भ किया गया। संयुक्त रूप से कृषि फार्मों में काम करने तथा आवश्यकतानुसार उपयोग करने का यह अभिनव प्रयोग छोटे स्तर पर सीमित व्यक्तियों को लेकर किया गया, पर वह अत्यन्त सफल रहा। यहाँ इस कम्यून (संयुक्त कौटुम्बिक) व्यवस्था को ‘क्वुत्सा या दर्गेगिया’ कहा जाता है।

इस व्यवस्था के प्रयोग अन्यत्र भी चल पड़े। 1960 तक ऐसे गाँवों की संख्या 500 तक जा पहुँची। अनुमान है कि इजराइल के 100 गाँव संयुक्त कौटुम्बिक प्रणाली की व्यवस्था द्वारा परिचालित हैं।

क्यूबा में भी कम्यून प्रणाली के पर्याप्त उदाहरण उपलब्ध होते हैं। उनके सदस्य एक साथ रहते, साथ-साथ काम करते तथा उपार्जित सम्पदा का, मिल बाँटकर उपभोग करते हैं।

इन उदाहरणों से एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि कर्मठता संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। उसका उपयोग जहाँ भी जिस मात्रा में हो रहा होगा वहाँ पग-पग पर सफलता मिलेगी। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी की कमी पड़ने पर ही अवगति की लानत सहन करनी पड़ती है। इसी कारण व्यक्ति पिछड़े रहते हैं और देशों को अवगतिजन्य कष्ट सहने पड़ते हैं। राष्ट्रों सम्बन्धी ये सभी तथ्य मानव पर उसके एकाकी जीवन में भी लागू होते हैं। जो इन सिद्धान्तों का परिपालन करता है, वह उतना ही आगे बढ़ता है अपने समाज परिकर के विकास में सहायक सिद्ध होता है।


सराय में पहुँचा (kahani)

भिखारी दिन भर भीख माँगता-माँगता शाम के एक सराय में पहुँचा और भीतर की कोठरी में भीख की झोली रखकर सो गया।

थोड़ी देर पीछे एक किसान आया उसके पास रुपयों की एक थैली थी। बैल लेने आया था। रात को वह भी उसी सराय में रुका, जहाँ भिखारी था और वह पोटली सिराहने रख कर सो गया। भीख की झोली रुपयों की थैली से बोली- “बहन! हम तुम एक बिरादरी के हैं, इतनी दूर क्यों हैं, आओ हम तुम एक हो जायें?”

रुपयों की थैली ने हँस कर कहा- “बहन! क्षमा करो, यदि मैं तुमसे मिल गई तो संसार में परिश्रम और पुरुषार्थ का मूल्य ही क्या रह जायेगा।


मुस्कान- एक औषधि एवं समग्र उपचार

स्वादिष्ट व्यंजन की कल्पना मात्र से मुँह में पानी भर आता है। शोक समाचार पाकर उदासी छा जाती है, चेहरा लटक जाता है। प्रफुल्ल मुखाकृति से आन्तरिक प्रसन्नता का पता चलता है। इस प्रकार अदृश्य होते हुए भी मन की हलचलों का भला और बुरा प्रभाव जीवन में पग-पग पर अनुभव होता है।

मनुष्य अपने मानस का प्रतिबिम्ब है। मानसिक दशा का स्वास्थ्य के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। नवीनतम शोधों के आधार पर तो यह भी कहा जाने लगा है कि रोग शरीर में नहीं, बल्कि मस्तिष्क में उत्पन्न होता है। यही कारण है कि उत्तम और समग्र स्वास्थ्य के लिए मन का स्वस्थ होना सबसे जरूरी है।

राबर्ट लुई स्टीवेन्सन ने अँग्रेजी में कई साहसिक उपन्यास लिखे हैं। उन्हें पढ़ने वाले सोचते थे कि लेखक भी योद्धा जैसा दिखने वाला कोई भारी भरकम कद्दावर होगा। जबकि वास्तविकता यह थी कि उनने अपनी अधिकाँश प्रसिद्ध कृतियाँ रुग्णावस्था में चारपाई पर पड़े हुए लिखीं। शंकराचार्य अपने जीवन के उत्तरार्ध में भगन्दर के मरीज रहे। वैद्य ने उनकी स्थिति को देखते हुए शारीरिक श्रम करने तथा चलने-फिरने की मनाही की थी। परन्तु उस जर्जर काया को लेकर ही उनने चारों धामों की स्थापना, शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय तथा प्रस्थानमयी के भाष्य आदि का गुत्तरुर कार्य सम्पन्न किया।

यहाँ शारीरिक स्वास्थ्य के नियमों की अवहेलना करने अथवा उन्हें नगण्य बताने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। कहने का आशय केवल इतना है कि स्वस्थ शरीर का सदुपयोग जिस मनस्विता के आधार पर सम्भव होता है उसके विकास भी भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए, मनःस्थिति हल्की-फुल्की रहनी चाहिए।

प्रसन्नचित्त रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। उदासीन रहने वालों की अपेक्षा खुशमिज़ाज लोग अक्सर अधिक स्वास्थ्य, उत्साही और स्फूर्तिवान पाए जाते हैं। गीताकार ने प्रसन्नता को महत्व पूर्ण आध्यात्मिक सद्गुण माना है और कहा है कि प्रसन्न चित्त लोगों को उद्विग्नता नहीं सताती एवं वे उन्हें जीवन में दुःख कभी सताते नहीं।

अकारण भय, आशंका, क्रोध, दुश्चिन्ता आदि की गणना मानसिक रोगों में की जाती है। जिस प्रकार शारीरिक रुग्णता का लक्षण मुख-मण्डल पर दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार मन की रुग्णता भी चेहरे पर झलकती है। मनोविज्ञानी डॉ. लिली एलन के अनुसार- “मुस्कान वह दवा है जो इन रोगों के निशान आपके चेहरे से ही नहीं उड़ा देगी, वरन् इन रोगों की जड़ भी आपके अन्तः से निकाल देगी।”


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आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मयुमेव तितिक्षतः। आक्रष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य निन्दति॥

अर्थात्- कटु वचन कहने वाले पुरुष से भी कभी स्वयं कटु वचन नहीं कहें और उस समय समुत्पन्न क्रोध को भी सहन कर लेना चाहिए। इससे विपक्षी नष्ट हो जायेगा और उसके पुण्य क्षीण हो जायेंगे।

कुछ लोग बोझिल मन से परेशान रहते हैं। ऐसे लोगों को प्रसन्न रहने की कला सीखनी चाहिए। यह अभ्यास करने के लिए आज और अभी से तैयार हुआ जा सकता है। दैनिक जीवन में जिससे भेंट हो उससे यदि मुस्कराते हुए मिला जाय तो बदले में सामने वाला भी मुस्कराहट भेंट करेगा। उसे हल्की-फुल्की बात करने में झिझक नहीं महसूस होगी और इस तरह अपने मन का भारीपन काफी दूर होगा।

अगर कोई चेहरे पर चौबीसों घण्टे गमगीनी लादी रहे तो धीरे-धीरे उसके सहयोगियों की संख्या घटती चली जाती है। यदि प्रति क्षण प्रसन्नता बाँटते रहने का न्यूनतम संकल्प शुरू किया जाय तो थोड़े दिनों के प्रयास से ही आशातीत परिणाम मिलने लगेंगे।


गर्मी और रोशनी से दूर न भागें

इन दिनों तथाकथित बड़े लोगों अमीरों को गर्मी से बचने की धुन सवार रहती है। प्रयत्न यह करते हैं कि ठण्डक में रहें और तेज धूप से बचें। घर के हर कमरे में पंखा लगा होता है। वातानुकूलित कमरों में ठण्डक बनाये रहने वाले उपकरण लगाये जाते हैं। गर्मी का मौसम आया नहीं कि बर्फ की खपत आसमान चूमने लगती है। इसके बिना आतिथ्य ही नहीं बनता। खाद्य पदार्थों को फ्रिज में जमा रखा जाता है। बच्चों तक को खाने चाटने की जेब खर्च मिलते ही वे चुस्की की बर्फ वाले की तलाश करते हैं।

यह बुरी आदत है। गर्मी हमारी जीवन संगिनी है। उसकी अति मात्रा से सीमित बचाव करने की बात समझ में आती है पर उसे विपत्ति मान बैठना गलत है। गर्मी के बिना कोई वस्तु पकी नहीं। पेट में बच्चे गर्मी के वातावरण में रहकर ही विकसित होते हैं। अण्डे को पक्षी छाती की गर्मी से ही सेते और पकाते हैं। कुम्हार यदि आँवा न लगाये तो उसका एक भी बर्तन काम में न आ सके।

गर्मी और रोशनी प्रायः दोनों ही साथ-साथ जुड़े रहते हैं। प्रकाश भी कम लाभदायक नहीं। जो गर्मी से बचते हैं वे प्रकाश के लाभों से भी वंचित रहते हैं फलतः शारीरिक और मानसिक दृष्टि से दुहरे घाटे में रहते हैं। खुली धूप एवं हवा में रहने वाले उनकी अपेक्षा अधिक स्वस्थ रहते हैं जो ठण्डक ही तलाशते रहते हैं और धूप में रहने की अपेक्षा अँधेरे तहखानों को पसन्द करते हैं।

श्रुति उद्गाता अन्तरात्मा ने परमेश्वर से प्रार्थना की है- “अन्धकार से प्रकाश” की ओर ले चल। उसका अभिप्राय ज्ञान, उल्लास, पराक्रम, उत्साह से है। इन उमंगों को प्रकाश का प्रतीक माना गया है। निष्क्रियता, निराशा को अन्धकार का।

यह दिव्य प्रकाश की विवेचना हुई। देखना यह है कि प्रत्यक्ष प्रकाश में से भी इन प्रवृत्तियों का कुछ सम्बन्ध है क्या? क्या दृश्यमान परिस्थितियों के साथ भी इसकी संगति बैठती है। रात्रि का अन्धकार होते ही सभी को निद्रा आ घेरती है। चिड़ियाँ घोंसलों में घुस जाती हैं पशु समुदाय आश्रय खोजते हैं जिनके नियत स्थान हैं, वे उनमें बैठकर सुस्ताने लगते हैं। पौधों तक का यही हाल है। उनकी अभिवृद्धि रुक जाती है। मनःक्षेत्र में उदासी छाने लगती है। उत्साह ठंडा पड़ जाता है और इसी प्रकार समय गुजारने की विधा अपनाई जाती है।

इसके विपरीत प्रकाश का प्रत्यक्ष प्रभाव सूर्योदय होते ही दृष्टिगोचर होने लगता है। सोतों की नींद खुल जाती है। उठने, बिस्तर समेटने और नित्यकर्म से निबटने की इच्छा होती है। भूख जागती है और चूल्हे गरम होने लगते हैं। अपने-अपने कामों पर जाने की तैयारी करते हर किसी को देखा जा सकता है।

चिड़ियाँ घोंसले छोड़कर जमीन पर उतरती और चहचहाती-फुदकती दीखती हैं। वन्य पशुओं को आहार की तलाश में जिधर-तिधर चल पड़ते देखा जाता है। कलियाँ खिलने लगती हैं और पौधों में बढ़ोत्तरी का क्रम चल पड़ता है। यह प्रकाश के विस्तार का प्रभाव है। उससे गर्मी और रोशनी दोनों का ही समन्वय रहता है। दोनों का अपना-अपना महत्व है। साथ ही उनका समन्वय भी। जहाँ एक है वहाँ न्यूनाधिक मात्रा में दूसरे को भी जुड़ा रहना पड़ेगा।

शरीर जब तक गरम है तभी तक वह जीवित है। ठण्डा हो जाना मरण का प्रमुख चिन्ह है। ग्रह-नक्षत्रों में प्लूटो जैसों में निस्तब्धता इसीलिए है कि उनमें गर्मी नहीं के बराबर है। यों बुध जैसे अग्नि पिण्ड भी उसकी अति से निरर्थक बनकर रहते हैं पर ऊर्जा का सुसन्तुलन बनाये रहने पर पृथ्वी की शोभा, सुन्दरता असाधारण स्तर की बन पड़ी है। वनस्पतियों और प्राणियों का उत्पादन एवं निर्वाह क्रम भूलोक में इसीलिए उत्साहवर्धक रीति से चल रहा है कि उस पर प्रकाश की स्थिति सन्तुलित बनी हुई है।

प्रकाश यों आग जलाकर या बिजली की सहायता से भी उत्पन्न किया जाता है, पर उसका उद्गम स्रोत सूर्य ही है, उसकी किरणों में जिन सप्त वर्णों और प्रभाव किरणों का समावेश है, वे मात्र उजाला ही नहीं देती, समुचित परिपोषण भी प्रदान करती हैं। विटामिन ‘डी’ विशेषतया इसी आधार पर होने वाला उत्पादन है।

ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जो बताते हैं कि जीवनी शक्ति अक्षुण्ण रखने एवं बढ़ाने के लिए हमें अधिकाधिक समय तक सूर्य प्रकाश में रहना चाहिए। इसके लिए धूप में बैठना आवश्यक नहीं, जहाँ खुला प्रकाश पहुँचता है और रोशनी रहती है वहाँ निवास करने से भी वह पोषण मिलता रहता है जो मनुष्य के शारीरिक और मानसिक आरोग्य के लिए आवश्यक है।

मस्तिष्क के एक छोटे से शिखा केन्द्र पर अवस्थित “पीनियल” ग्रन्थि प्रकाश तरंगों को अन्य अवयवों की अपेक्षा अधिक पकड़ती है। यों आँखों की संरचना ही प्रकाश में वस्तुओं का स्वरूप देखने के लिए हुई है, पर “पीनियल” ग्रन्थि तो अदृश्य प्रकाश तरंगों का अनुभव करती है इसलिए उसे तृतीय नेत्र या आज्ञाचक्र भी कहते हैं। उसे जागृत करने के लिए प्रकाश बिन्दु पर ध्यान एकाग्र रखने की त्राटक प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इस ग्रन्थि से एक विशेष प्रकार का हारमोन स्रवित होता है जिसे ‘मेलाटोनिन’ कहते हैं। इसकी सप्लाई प्रकाश के वातावरण में बढ़ती और अन्धेरा होते ही घट जाती है। जब यह स्राव ठीक मात्रा में रिसते हैं तो मस्तिष्क का ‘हाइपोथैलेमस’ क्षेत्र सक्रिय हो उठता है और उससे सम्बन्धित सभी प्रवृत्तियाँ अपना काम करने में उत्साहपूर्वक जुट जाती हैं। मानसिक विकास की दृष्टि से प्रकाशवान क्षेत्र में रहना आवश्यक माना गया है।

खुले प्रकाश के सम्पर्क में रहने वालों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सही रहता है, पर जिन्हें अन्धेरे में काम करना पड़ता है, जो धूप से जितना दूर रहते हैं, उन्हें उसी अनुपात में दुर्बलता एवं रुग्णता का शिकार बनना पड़ता है उदासी ही उन्हीं पर अधिक छाई रहती है और साथ ही निष्क्रियता भी। गर्मी के दिनों में अधिक काम धन्धा होता है जबकि जाड़े के दिनों में लोग सुकड़े-मुकड़े बैठे रहते हैं और ठण्डे हाथ-पैरों से कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ता। शीत ऋतु और कुछ नहीं, प्रकाश की कमी से ही ठण्डक बढ़ने की प्रक्रिया है। सूर्य जब पृथ्वी से अधिक दूरी पर होता है तब उसकी गर्मी पृथ्वी तक स्वल्प मात्रा में ही पहुँच पाती है। फलतः स्थिति बदल जाती है। पौधे बढ़ना बन्द कर देते हैं। कितनों को ही पाला मार जाता है। शेष के पत्ते झड़ने लगते हैं। इस अभिशाप से पीछा तब छूटता है जब गर्मी का अनुपात बढ़ता है। बसन्त का आगमन यही है। बढ़ते प्रकाश का अभिनन्दन समूचे वनस्पति जगत में होता है। कोपलें फूलती हैं। फूल खिलते हैं और प्राणियों में उमंगें उफनती हैं। वे अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय होते हैं और वंश वृद्धि के विनोद में तत्परता प्रदर्शित करते हैं।


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शेख सादी ने फूलों के सहारे विकसित होने वाली कलादृष्टि की चर्चा करते हुए एक बार कहा था- ‘मेरे पास दो रोटी हों और पास में फूल बिकने आयें तो मैं एक रोटी बेचकर फूल खरीदना पसन्द करूँगा। पेट खाली रखकर भी यदि कलादृष्टि को सींचने का अवसर हाथ लगता होगा, तो उसे गँवाऊँगा नहीं।

अमेरिका के ‘नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेन्टल हैल्थ’ के मनोविज्ञान विभाग का प्रतिपादन है कि ठण्डक वाले क्षेत्रों पर दिनों में उदासी का अनुपात अधिक रहता है। प्रकाश की मात्रा बढ़ने पर उस अवसाद से अनायास ही छुटकारा मिल जाता है। काम करने को जी चाहता है, उमंगें उठने और आँखें चमकने लगती हैं।

असह्य ताप से सीमित बचाव करना एक बात है और गर्मी को देखते ही घबराना दूसरी। हमें ऊर्जा की आवश्यकता पग-पग पर पड़ती है इसलिए गर्मी और रोशनी के सम्पर्क में रहना ही हितकर है। अध्यात्म उपचारों में अग्निहोत्र, धूप, दीपक इत्यादि की, पारसियों में अग्नि की एक थियॉसॉफी वालों में भी अग्निदेव के पूजन-सम्पन्न किए जाने का विधान सम्भवतः इसी कारण है।


विधेयात्मक चिन्तन की फलदायी परिणतियाँ

जीवन की अन्यान्य बातों की अपेक्षा सोचने की प्रक्रिया पर सामान्यतः कम ध्यान दिया गया है जबकि मानवी सफलताओं, असफलताओं में उसका महत्वपूर्ण योगदान है। विचारणा की शुरुआत मान्यताओं अथवा धारणाओं से होती है जिन्हें या तो मनुष्य स्वयं बनाता है अथवा किन्हीं दूसरे से ग्रहण करता है अथवा वे पढ़ने सुनने और अन्यान्य अनुभवों के आधार पर बनती हैं। अपनी अभिरुचि के अनुरूप विचारों को मानव मस्तिष्क में प्रविष्ट होने देता है जबकि जिन्हें पसन्द नहीं करता उन्हें निरस्त भी कर सकता है। जिन विचारों का वह चयन करता है उन्हीं के अनुरूप चिन्तन की प्रक्रिया भी चलती है। चयन किये गये विचारों के अनुरूप भी दृष्टिकोण का विकास होता है जो विश्वास को जन्म देता है। वह परिपक्व होकर पूर्व धारणा बन जाता है। व्यक्तियों की प्रकृति एवं अभिरुचि की भिन्नता के कारण मनुष्य-मनुष्य के विश्वासों, मान्यताओं एवं धारणाओं में भारी अन्तर पाया जाता है।

चिन्तन पद्धति में अर्जित की गयी भली-बुरी आदतों की भी भूमिका होती है। स्वभाव चिन्तन को अपने ढर्रे में घुमा भर देने में समर्थ हो जाता है। स्वस्थ और उपयोगी चिन्तन के लिए उस स्वभावगत ढर्रे को भी तोड़ना आवश्यक है जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल है अथवा आत्म विकास में बाधक है।

प्रायः अधिकाँश व्यक्तियों का ऐसा विश्वास है कि विशिष्ट परिस्थिति में मन द्वारा विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करना मानवी प्रकृति का स्वभाव है पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। अभ्यास द्वारा उस ढर्रे को तोड़ना हर किसी के लिए सम्भव है। परिस्थिति विशेष में लोग प्रायः जिस ढंग से सोचने एवं दृष्टिकोण अपनाते हैं उससे भिन्न स्तर का चिन्तन करने के लिए भी अपने मन को अभ्यस्त किया जा सकता है। मानसिक विकास के लिए अभीष्ट दिशा में सोचने के लिए अपनी प्रकृति को मोड़ा भी जा सकता है।

मन विभिन्न प्रकार के विचारों को ग्रहण करता है, पर जिनमें उसकी अभिरुचि रहती है, चयन उन्हीं का करता है। यह रुचि पूर्वानुभवों के आधार पर बनी हो सकती है। प्रयत्नपूर्वक नयी अभिरुचियाँ भी पैदा की जा सकती हैं।

प्रायः मन एक विशेष प्रकार की ढर्रे वाली प्रतिक्रियाएँ मात्र दर्शाता है, पर इच्छित दिशा में उसे कार्य करने के लिए नियन्त्रित और विवश भी किया जा सकता है। ‘बन्दरों की तरह उछल कूद मचाना उसका स्वभाव है। एक दिशा अथवा विचार विशेष पर एकाग्र नहीं होना चाहता। नवीन विचारों की ओर आकर्षित तो होता है, पर उपयोगी होते हुए भी उन पर टिका नहीं रह पाता। कुछ ही समय बाद उसकी एकाग्रता भंग हो जाती तथा वह परिवर्तन चाहने लगता है, पर अभ्यास एवं नियन्त्रण द्वारा उसके बन्दर स्वभाव को बदला भी जा सकता है। यह प्रक्रिया समय साध्य होते हुए भी असम्भव नहीं है। एक बार एकाग्रता का अभ्यास बन जाने से जीवनपर्यन्त के लिए लाभकारी सिद्ध होता है।

सोचने की प्रक्रिया में विषयों पर एकाग्रता ही नहीं स्वस्थ और सही दृष्टिकोण का होना भी आवश्यक है। किसी भी विषय पर दो प्रकार से सोचा जा सकता है- विधेयात्मक भी, निषेधात्मक भी। परस्पर विरोधी दोनों ही दिशाओं में एकाग्रता का अभ्यास किया जा सकता है। इस महत्वपूर्ण तथ्य को हर व्यक्ति जानता है कि निषेधात्मक चिन्तन से मनुष्य की वैचारिक क्षमताओं का ह्रास होता है। विधेयात्मक दृष्टिकोण से ही चिन्तन का सही लाभ लिया जा सकता है।

निषेधात्मक चिन्तन से बचने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि अपनी गरिमा पर विचार करते रहा जाय तथा यह अनुभव किया जाय कि मानव जीवन एक महान उपलब्धि है, जिसका उपयोग श्रेष्ठ कार्यों में होना चाहिए। निकृष्ट चिन्तन मनुष्य को उसकी गरिमामय स्थिति से गिराता है, यह विश्वास जितना सुदृढ़ होता चला जायेगा विधेय चिन्तन को उतना ही अधिक अवसर मिलेगा।

पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने पर भी सही चिन्तन बन नहीं पड़ता। किसी विचारक का यह कथन शत-प्रतिशत सच है कि “जो जितना पूर्वाग्रही हो वह चिन्तन की दृष्टि से उतना ही पिछड़ा होगा।” परिवर्तनशील इस संसार में मान्यताओं एवं तथ्यों के बदलते देरी नहीं लगती। अतएव मन-मस्तिष्क को सदा खुला रखना चाहिए ताकि यथार्थता से वंचित न रहना पड़े। खुले मन से हर औचित्य को बिना किसी ननुनच के स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। तथ्यों की ओर से आँखें बन्द रखने पर कितनी ही जीवनोपयोगी बातों से वंचित रह जाना पड़ता है।

किसी विषय पर एकाँगी चिन्तन भी सही निष्कर्षों पर नहीं पहुँचने देता। उस चिन्तन में मनुष्य की पूर्व मान्यताओं का भी योगदान होता है। सही विचारणा के लिए यह भी आवश्यक है कि अपनी पूर्व मान्यताओं, आग्रहों तथा धारणाओं का भी गम्भीरता से पक्षपात रहित होकर विश्लेषण किया जाय। पक्ष और विपक्ष दोनों पर ही सोचा जाय। किसी विषय पर एक तरह से सोचने की अपेक्षा विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखकर चिन्तन किया जाय। स्वस्थ और यथार्थ चिन्तन तभी बन पड़ता है। एकाँगी मान्यताओं एवं पूर्वाग्रहों को तोड़ना सम्भव हो सके तो सर्वांगीण प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

विचारों का सही विश्लेषण सतही स्तर पर कर सकना सम्भव नहीं है। घटना अथवा विषय विशेष की परिस्थिति की गहराई में जाये बिना विचारणा के निष्कर्ष भी अधूरे एकाँगी ओर कभी-कभी गलत होते हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि विचारी विश्लेषण की सही प्रक्रिया अपने ही बलबूते सम्पन्न की जा सकती है, न कि दूसरे के सहयोग से, सामयिक रूप से कोई वैचारिक सहयोग सुझाव एवं परामर्श दे भी सकता है पर हर क्षण अपने विचारों का निरीक्षण मात्र मनुष्य स्वयं ही कर सकता है। सही ढंग से उचित अनुचित का विश्लेषण एवं चयन भी वही कर सकता है। कहा जा चुका है कि विचारणा में पूर्व अनुभवों एवं आदतों की भी पृष्ठभूमि होती है। इस तथ्य से दूसरे व्यक्ति नहीं परिचित होते। अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि हर व्यक्ति थोड़े प्रयत्नों से स्वयं पता लगाकर उसमें आवश्यक हेर-फेर कर सकता है। आत्म विश्लेषण के लिए मन एवं उसकी प्रवृत्तियों को विवेक के नेत्रों से देखना पड़ता है। कठिन होते हुए भी यह कार्य असम्भव नहीं है।

क्या उचित है ओर क्या अनुचित? कौन-सा कार्य औचित्य पूर्ण है, कौन-सा अनौचित्य से भरा इसका पता लगाना असम्भव नहीं है। हर कोई थोड़े प्रयास से इसमें अपने को दक्ष कर सकता है।

एक समय में एक से अधिक विषयों पर चिन्तन करने से भी उथले परिणाम हाथ लगते हैं। एकाग्रवान बन पाने से विषय की गहराई में जाना सम्भव नहीं हो पाता। एक से अधिक विषयों पर एक साथ विचार करने से विचारों में भटकाव आता है, किसी उपयोगी परिणाम की आशा नहीं रहती। कई बातों में विचारों को भटकने देने की खुली छूट देने की अपेक्षा उपयोगी यह है कि एक समय में एक विषय पर सोचा जाय और जितना सोचा जाय पूरे मनोयोगपूर्वक। मनीषी, विचारक, वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार कुछ महत्वपूर्ण समाज को इसीलिए दे पाते हैं कि वे अपने विचारों को भटकने-बिखरने नहीं देते, एक ही विषय के इर्द-गिर्द पूरी तन्मयता के साथ उन्हें घूमने देते हैं। सार्थक परिणति भी इसीलिए होती है।

कर्म, विचारों के गर्भ में ही पकते हैं। जैसे भी विचार होंगे, उसी ढंग की गतिविधि मनुष्य अपनायेगा। जो प्रयास को सफल उपयोगी ओर कल्याणकारी बनाना चाहते हैं, उन्हें सर्वप्रथम अपनी विचारणा की प्रक्रिया से अवगत होना चाहिए। अनुपयोगी निषेधात्मक को सुधारने बदलने तथा उपयोगी को बिना किसी असमंजस के स्वीकारने के लिए सतत् तैयार रहना चाहिए।


हम अनिष्ट काल में से गुजर रहे हैं।

उथल-पुथल इन दिनों न केवल अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में हो रही है वरन् समाज व्यवस्थाएँ भी बदल रही है। लोगों की आकांक्षाएँ और आदतें भी। मनःस्थिति में अनेक कारणों से उलट-पुलट हुई है। फलतः उसकी प्रतिक्रिया और परिस्थितियों में भी चकित कर देने वाला परिवर्तन हुआ है।

प्रकृति क्षेत्र एवं धरती का वातावरण भी इससे अछूता नहीं रहा है। मनुष्य का भविष्य अधर में झूल रहा है। भविष्य की सम्भावना चौराहे पर खड़ी है वह उत्कर्ष या विनाश की किसी भी दिशा में कदम बढ़ा सकती है। यह बात पृथ्वी के सम्बन्ध भी लागू होती है। वह ऐसे सन्धिकाल में होकर गुजर रही है जिसमें अपने इस धरातल को विषम विपत्ति में भी फँसना पड़ सकता है।

विज्ञानी राबर्ट डाएत्ज के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में दास हजार वर्ष की अवधि में अनेकानेक असाधारण परिवर्तन होते रहे हैं। उनका बड़ा कारण आकाश से उतर कर किसी बड़े उल्का पिण्ड का धरती से टकराना होता रहा है। साधारण उल्काएँ तो आये दिन पृथ्वी के कवच को चीर कर नीचे उतरती और वायु संघर्ष से जलकर भस्म होती रहती हैं। कुछ अधिक बड़ी और कड़ी होने के कारण जमीन से भी टकराती हैं और जहाँ गिरती है वहाँ बर्बादी खड़ी करती हैं, पर बहुत बड़े पिण्डों की बात दूसरी है। वे टकराते हैं तो पृथ्वी के क्रम एवं प्रवाह में उथल-पुथल उत्पन्न करते हैं। चन्द्रमा को खाई-खड्डों वाला स्वरूप इन उल्का आघातों के कारण ही हुआ है।

पृथ्वी के इर्द-गिर्द कुछ दिनों से ‘इकॉरस’ नामक विशालकाय उल्का पिण्ड चक्कर लगा रहा है। सन् 1968 में यह धरती के बहुत निकट आ गया था। सन् 1983 में भी एक बार फिर लौटा। किन्तु टकराने जैसी परिस्थिति नहीं बनी। परिधि का स्पर्श करते हुए दूसरी ओर चला गया। इसकी आँख मिचौनी समाप्त नहीं हुई है। कभी आ टकराया तो 20 करोड़ मैगाटन के परमाणु बम फटने जैसा विस्फोट उत्पन्न करेगा और जहाँ कहीं टकरायेगा वहाँ का स्वरूप ही बदल देगा। सारी पृथ्वी उसमें प्रभावित होगी।

इकॉरस का छोटा भाई एक और उल्का पिण्ड है- तोरो। यह आकार में छोटा है तो भी ऐसा है कि टकराने पर कोई भयानक दुर्घटना खड़ी कर सके। यह पाँच किलोमीटर व्यास का है, तो भी तेजी से गिरने पर पृथ्वी की धुरी तक को हिला सकता है और उतने भर से जल, थल का वर्तमान नक्शा बदल सकता है। मौसम चक्र में असाधारण परिवर्तन हो सकता है।

ध्रुव क्षेत्र के विशेषज्ञ एच.एन.ब्राउन का अनुसंधान है कि इन दिनों दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ का भार निरन्तर बढ़ रहा है। यह ऐसे ही बढ़ता रहा तो कुछ ही समय में पृथ्वी की धुरी बदल जायगी और कहीं से कहीं जा पहुँचेगी। वर्तमान धुरी सात हजार वर्ष पहले बनी थी। अब हिम भार में असन्तुलन उत्पन्न होने के कारण सन् 2000 के आसपास फिर परिवर्तित हो सकती है। चार्ल्स हैपवुड ने भी इस मत का समर्थन किया है। ध्रुव स्थान बदलते हैं तो उसका प्रभाव धरती की क्रम व्यवस्था में भारी परिवर्तन होता है। अब तक तीन बार ऐसा हो चुका है। इन दिनों ध्रुवों के खिसकने की गति में तेजी आई है। सन् 2000 तक इनकी स्थिति ऐसी हो सकती है जिसका प्रभाव पृथ्वी की धुरी बदलने के रूप में सामने आये और उसके फलस्वरूप भारी उथल-पुथल मचे।

धुरी में राई रत्ती हेर-फेर होने पर भयानक भूकम्पों जैसी स्थिति बनती है। जिन्हें भूकम्पों का इतिहास विदित है वे जानते हैं कि इस आधार पर पिछले दिनों कैसे विचित्र उपस्थित हुए है। चिली के भूकम्प ने समुद्रतल 1000 फुट ऊँचा उठा दिया था। 1950 में हिमालय क्षेत्र में जो भूकम्प आया था उससे चोटियाँ 100 फुट तक ऊँची हो गई थीं। पृथ्वी का सन्तुलन बनाये रहने के लिए हिमालय की चोटियों को जिस सीमा में रहना चाहिए अभी में वे उससे 600 फुट अधिक ऊँची हो गई हैं। यदि भूकम्पों ने उन्हें और भी ऊँचा उठाया तो पृथ्वी का सन्तुलन डगमगा सकता है और महाद्वीपों के स्थान परिवर्तन करना पड़ सकता है। ऐसे अवसरों पर खण्ड प्रलय जैसे दृश्य उपस्थित होते हैं।

सन् 1982-83 में जितनी सर्दी पड़ी है उतनी पिछले सौ वर्षों में कभी भी नहीं पड़ी। सम्भावनाएँ है कि ऐसी अनियमित अव्यवस्थाओं का दौर आगे भी चलता रहेगा और मौसम अपने सामान्य विधि-व्यवस्था का व्यतिक्रमण करके उछल-कूद की- उलट-पुलट की नीति अपनाता रहेगा।

इसका कारण खोजने वालों ने कई प्रकार के अनुमान लगाये और कारणों का पर्यवेक्षण करते हुए कई कतिपय निष्कर्ष निकाले हैं। कैलीफोर्निया जेट प्रोपल्शन लेवोरेटरी के मौसम विशेषज्ञ रिचर्ड विलसन का अभिमत है कि सूर्य कलंकों की वर्तमान स्थिति इसके लिए जिम्मेदार है। सन् 1979 से इस सन्दर्भ में एक विसंगति क्रम चला है और वह 1986 तक इसी प्रकार बेतुके ढंग से चलता रहेगा। इस कारण सूर्य की गर्मी प्रायः एक प्रतिशत धरती पर कम आई और उस कारण सर्दी बढ़ी है।

पिछले दो ढाई सौ वर्ष पूर्व भी ऐसा हो चुका है। सन् 1645 से 1715 तक भी इसी कारण योरोप और अमेरिका में भयानक ठण्ड पड़ी थी और उन दिनों उसे मिनी हििमयुग कहा जाने लगा था। बिगड़ा सन्तुलन उस समय तो सध गया था। पर जब भूत ने घर देख लिया तो फिर कभी भी छप्पर से कूदकर आँगन में आ धमक सकता है।

1982 के मार्च, अप्रैल महीनों में मैक्सिको का अलचिनोन ज्वालामुखी फटा था। इसका मलवा असाधारण था वह आसमान में 30 किलोमीटर ऊँचा उछल गया। इतनी ऊँचाई पर चलने वाली हवाओं ने उसे पकड़ लिया और उत्तरी गोलार्ध के एक बड़े भाग पर उस धूलि को बखेर दिया उससे धूप के पृथ्वी तक आने में रुकावट उत्पन्न हुई। उस कमी के कारण ठण्ड का अनुपात बढ़ गया। माउन्टेन न्यू के नासा अनुसंधान केन्द्र के विज्ञानी ब्रायन ट्रन का कथन है कि यह प्रभाव अभी देर तक बना रहेगा।

ठीक ऐसा ही घटनाक्रम अब से 150 वर्ष पूर्व और भी घटित हो चुका है। सन् 1816 में योरोप में ठंडे मौसम के कारण फसल को पाला मार गया था और उत्तर-पूर्व अमेरिका में जून से अगस्त तक बर्फ गिरी थी जबकि उन दिनों क्षेत्र में गर्मी पड़ा करती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण उन दिनों इन्डोनेशिया के तंवोरा ज्वालामुखी से हुआ भयंकर विस्फोट था। उस शताब्दी का यह अपने ढंग का अनोखा विस्फोट था। उसमें भी ऐसी ही धूलि उछाली थी। फलतः सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आसमान लाल दीखता था। चन्द्रमा पीले के स्थान पर नीला दीखने लगा था।

अमेरिका की नेशनल एकेडेमी आफ साइन्सेज ने इस बदलते मौसम का एक और कारण बताया है। उसने एक नये सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। उसके विशेषज्ञों का कथन है कि जिस प्रकार पृथ्वी और सूर्य के परिक्रमा चक्र में दूरी और समीपता के कारण सर्दी-गर्मी का मौसम बदलता है। ठीक उसी प्रकार अपना सूर्य भी महासूर्य के इर्द-गिर्द परिक्रमा करता है। उसकी कक्षा भी पृथ्वी जैसी चपटी है। इस कारण इसी में अन्तर पड़ता है। इसका सौर मण्डल के ग्रहों पर प्रभाव पड़ता है। पिछले 5000 वर्षों में पृथ्वी समेत सौर-मण्डल अन्तर्ग्रही परिभ्रमण पथ की उष्णता परिधि में रह रहा था अब वह सर्दी के दौर में प्रवेश कर रहा है। फलतः ठण्डक बढ़ रही है।

इन दिनों सूर्य की क्रियाशीलता अधिकतम है। इन्हीं दिनों पृथ्वी के वातावरण में धूमकेतुओं का प्रवेश हो रहा है। इन परिस्थितियों का धरातल पर मनुष्य आदि प्राणियों पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। खगोलविद् फ्रेडहाइल ने पुरातन अनुसंधानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि जब कभी ऐसी परिस्थितियाँ आई हैं तब महामारियाँ फैली हैं। धूमकेतुओं की समीपता से पृथ्वी के वातावरण में भारी परिवर्तन होता है।

आमतौर से सूर्य की सक्रियता 11 वर्ष के साइकिल चक्र के अनुरूप बढ़ती पाई गई है। जब उस पर धब्बे अधिक बढ़ते हैं तब सक्रियता भी बढ़ती है। उस बढ़ोत्तरी से धरती का सारा वातावरण प्रभावित होता है। वस्तुओं से उत्पादन और प्राणियों के स्वभाव एवं स्तर पर उसका प्रभाव पड़ता है।

ब्रिटिश खगोल वेत्ता वाल्टर मौन्डेर ने विगत कई शताब्दियों में हुए सूर्य कलंकों का इतिहास संग्रह किया है। उनके अनुसार जब भी सूर्य सक्रियता बढ़ी है। तब-तब विक्षोभ, उपद्रव एवं प्रकृति प्रकोप होते रहे हैं। इसके विपरीत वे धब्बे जब घट जाते हैं तब अपेक्षाकृत अधिक शान्ति रहती है। अमेरिका में विगत 300 वर्षों में जब-जब सूखा पड़ता रहा है तब तब सूर्य की विपन्नता उसके साथ जुड़ी है। आस्ट्रेलिया के हिमनदों के पीछे हटना उनकी लम्बाई घट जाना अन्तरिक्षीय कारणों से सम्बन्धित माना गया है।

सूर्य धब्बों की संख्या बढ़ती है तो उसकी लपटों की परिधि भी बढ़ती है और विद्युत आवेश वाले कणों की बौछार होने लगती है इसका प्रभाव सौर मण्डल के ग्रहों उपग्रहों पर पड़ता है। अन्यत्र उसका क्या प्रभाव पड़ा इसकी जाँच-पड़ताल के उपयुक्त साधन अभी मनुष्य के पास नहीं है तो भी पृथ्वी पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव अनेक परीक्षणों से भली-भाँति सिद्ध होता है।

फ्राँसीसी वैज्ञानिक निकोलस के अनुसार सूर्य की चुम्बकीय बौछार बढ़ने से धरातल से ऊपर 15 से 50 किलोमीटर ऊपर का स्ट्रेटोस्फीयर एवं ट्राफोस्फीयर कवच अत्यधिक प्रभावित होता है और एक विशेष प्रकार की अल्ट्रावायलेट तथा एक्स किरणें धरातल की ओर उगलने लगता है। इस कारण पृथ्वी पर अदृश्य चुम्बकीय हलचलें उत्पन्न होती हैं। उनका कहना है कि पुरातन काल के विशालकाय महागज, महासरीसृप जैसे प्राणियों के उद्भव और विनाश में सूर्य कलंकों के घट-बढ़ ने एक विशेष भूमिका निभाई है।

प्रस्तुत अन्तर्ग्रही परिस्थितियाँ पृथ्वी की सुस्थिरता ओर सुखद सम्भावनाओं को चुनौती देती हैं। इनसे डरने की तो आवश्यकता नहीं पर हमें जानकारी तो रहनी ही चाहिए और यदि प्रकृति प्रवाह के परिवर्तन में मानवी चेतना के हस्तक्षेप की आशा बँधती हो तो उसके लिए भी प्रयत्नशील होना चाहिए।


पृथ्वी के इर्द गिर्द चल रहीं अवाँछनीय हलचलें

ग्रह नक्षत्रों की दुनिया में आमतौर से मर्यादाओं का पालन ही चलता है। सभी अपने-अपने रास्ते चलते, परिभ्रमण कक्षाओं में घूमते रहते हैं। पर जब कभी वे परस्पर टकराते हैं तो न केवल अपना अस्तित्व गँवा बैठते हैं वरन् सम्बद्ध क्षेत्र में भी अव्यवस्था उत्पन्न करते हैं।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार मंगल और बृहस्पति के बीच किसी ग्रह का चूरा परिभ्रमण कर रहा है। उसमें असंख्यों छोटे-बड़े उल्का खण्ड हैं। समझा जाता है कि सौर मण्डल की कोई दो सदस्य ग्रह किसी कारण आपस में टकराये होंगे और हार-जीत से पहले ही दोनों चूरा बनकर अन्तरिक्ष में छितरा गये हैं। यह कबाड़ा उन्हीं का ध्वंसावशेष बनकर भ्रमण कर रहा है। टकराव के परिणाम प्रायः ऐसे ही होते हैं। इसलिए विज्ञजनों की सहकारिता और मर्यादा पालन के लिए जन-साधारण को प्रशिक्षित एवं सहमत करने के लिए भरसक प्रयास किया जाता है।

पृथ्वी के इर्द-गिर्द एक के बाद एक कवचों की परत लिपटी हुई हैं। उनसे टकराकर अन्तरिक्षीय उल्का पिण्डों से हो सकने वाली क्षति बची रहती है। उल्का पिण्ड धरती पर आक्रमण करते हैं वायु मण्डल में प्रवेश करते-करते जल-भुनकर राख होते रहते हैं। इतने पर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि खतरा बिलकुल टल गया। ढाल इतनी मजबूत नहीं है जिसे कोई भी हथियार बेध न सके। पृथ्वी पर अन्तरिक्षीय विघातक आक्रमण का खतरा बना रहता है। इतना ही नहीं इन दिनों तो उन आशंकाओं का अनुपात बढ़ता ही जा रहा है।

विशाल ब्रह्माण्ड में विद्यमान ग्रह नक्षत्रों के विशाल समुदाय में अपनी पृथ्वी का आकार एक धूलि कण के समान है। अन्तरिक्ष में कितने ही नये तारकों का उद्भव एवं पुरानों का समापन होता रहता है। इस जन्म-मरण की प्रक्रिया में कई बार बड़े टकराव ही निमित्त कारण होते हैं। पृथ्वी की आयु बीस करोड़ वर्ष मानी जाती है। यह ब्रह्माण्ड काल के आयुष्य को देखते हुए चुटकी बजाने जितनी स्वल्प है। फिर भी इसे सौभाग्य ही कहना चाहिए कि उसे किसी अन्तरिक्षीय दुर्घटना का अब तक शिकार नहीं होना पड़ा। तथापि यह नहीं समझा जाना चाहिए कि खतरे की कोई आशंका नहीं है। वह सिर पर मंडराता ही रहता है। कई बार तो वह और भी अधिक सघन होता देखा गया है। अपने समय की ऐसी ही आशंकाओं से घिरा समझा जाय तो उसे अत्युक्ति नहीं कहा जायेगा।

अन्तरिक्ष विज्ञानी बताते हैं कि कई हजार वर्ष पूर्व शुक्र और पृथ्वी की टक्कर होते-होते किसी प्रकार बच गई। दोनों के प्रभाव क्षेत्र इतने समीप आ गये थे कि टकरा जाने जैसा माहौल बन गया था। विपत्ति तो टल गई पर पृथ्वी की धुरी 23 अंश एक ओर झुक गई और इससे मौसम में असाधारण परिवर्तन हुए।

साइबेरिया की पांडकामेन्नाया क्षेत्र में 30 जून सन् 1908 में एक भयंकर उल्कापात हुआ था। उसके कारण वह क्षेत्र बुरी तरह काँप गया था। योरोप और एशिया के अधिकाँश भागों में उसकी रोशनी देखी गई और हजारों मील तक उसकी धमक सुनी गई थी। दूर-दूर का क्षेत्र जल-भुन गया था। यह बड़ी उल्का भर थी। यदि कोई बड़ी आकृति टकराई होती तो उसका क्या परिणाम होता यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

खगोल शास्त्रियों के अनुसार 30 अक्टूबर 1937 में भी ऐसा ही संकट आया था। जर्मन ज्योर्तिविद रीन मथ के अनुसार एक उल्का पिण्ड बीस मील प्रति सेकेण्ड की गति से पृथ्वी की ओर लपकता आ रहा था। उसका व्यास दो मील के लगभग था। बचकर निकल गया तो अच्छा ही हुआ। अन्यथा कोई बड़ी दुर्घटना घटित होती। कुछ घण्टे ही उसकी दिशा बही रहती तो इतना भयानक विस्फोट होता जिसकी तुलना में अणु बमों के एक बड़े समूह का प्रहार भी तुच्छ प्रतीत होगा। वैज्ञानिकों का कथन है कि अन्तर्ग्रही प्रभावों को जानना इसलिए अत्यन्त जरूरी है कि हम सुरक्षा की व्यवस्था कर सकें एवं ऐसे कारण उत्पन्न न करें जो इन विक्षोभों को और भी बढ़ाने में सहायक हों।


प्रकृति की छेड़ छाड़- अवाँछनीय-अहितकर

विज्ञजनों ने ज्योतिर्विज्ञान को “साइन्स ऑफ रेडियेशन” नाम दिया है। यह विज्ञान ब्रह्माण्डीय, अर्न्तब्रह्माण्डीय, चराचर सृष्टि एवं मनुष्य जीवन के हर पक्ष पर प्रकाश डालता है। जीव कोश के पिण्ड से लेकर तारा ब्रह्माण्ड तक के विशाल परिवार में चल रहे आदान-प्रदान को इस आधार पर समझने में बहुत सहायता मिलने की सम्भावना है।

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी कार्ल जुंग ने अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए लिखा है उनने कितनी ही अनसुलझी पहेलियों को एस्ट्रोलॉजिकल डैटा के आधार पर सुलझाया है। वे गुत्थियाँ अन्य किसी प्रकार सुलझने में आ नहीं रही थीं।

साइबेरिया के तुगुस्का क्षेत्र में सन् 1908 में कोई वस्तु पृथ्वी से टकराई थी और उसने 500 मील क्षेत्र में भारी विनाश प्रस्तुत किया था। घटना के बाद कारण खोजने के लिए विशेषज्ञों के दल वहाँ जाते रहे हैं पर अभी तक उल्कापात का कोई चिन्ह वहाँ देख नहीं सके हैं जबकि छोटे-बड़े सभी उल्कापातों के ढेरों अवशेष टकराने वाले स्थान पर मिल जाते हैं। घटना को 75 वर्ष हो गये फिर भी उसका रहस्य अभी भी यथास्थान बना हुआ है और शोधकर्ता अभी भी उतनी ही तत्परता के साथ रहस्य खोजने में लगे हुए हैं।

अब इस सन्दर्भ में प्रति पदार्थ का कोई घटक धरती का कवच बेधकर भीतर आ घुसने की बात कही जाने लगी है। अब उस अनुमान ने मान्यता प्राप्त कर ली है कि विराट के गर्भ में ऐन्टी एटम, ऐन्टीमैटर, ऐन्टी युनिवर्स का भी अस्तित्व है और दूर होते हुए भी निकट है। विश्व और प्रति विश्व के बीच जब तक सन्तुलन बना हुआ है, मध्यवर्ती दीवार का प्रतिबन्ध बना हुआ है तभी तक सब कुछ ठीक है। अन्यथा आक्रमण के लिए कोई छेद खुला तो महाविनाश का दृश्य उपस्थित होगा। और यह समूचा ब्रह्माण्ड वैसा न रहेगा जैसा कि अब है। तुगुस्का दुर्घटना के सम्बन्ध में प्रति पदार्थ का कोई ढेला पृथ्वी से टकराने का अनुमान यदि सही हो तो आशंका बनती है कि भूत ने घर देख लिया तो फिर वह उसको आगे-आगे भी प्रवेश पाने का क्रम बना सकता है।

पृथ्वी का कवच ऐसा ही है जो न केवल उल्का पिण्डों से वरन् अन्तर्ग्रही रेडियो बौछारों से भी धरातल को बनाये रहता है। इस कवच में कहीं छोटा छेद हो जाने पर भी ऐसी आशंका है उसमें होकर धरती पर कोई विघातक तत्व आ सकते हैं और वर्तमान वातावरण में विघातक परिवर्तन कर सकते हैं।

उल्कापातों अन्तर्ग्रही प्रभावों का धरती की ओर उन्मुख होना एक बुरी सम्भावना है। सूर्य के धब्बे- उसमें उठने वाली लपटों के चुम्बकीय प्रभाव, सौर मण्डल के ग्रह गोलकों का बार-बार बिगड़ने वाला असन्तुलन कहीं पृथ्वी के रक्षा कवच को क्षत-विक्षत न कर दे ऐसी आशंका बनती है।

ध्रुवीय बर्फ पिघलने का क्रम इन दिनों बढ़ गया है। इस कारण उस क्षेत्र की हवा अधिक ठण्डी होती जा रही है और जब वह दक्षिण की ओर चलती है तो वहाँ की हवा का भी तापमान गिरा देती है।

अब मौसम सर्वथा प्रकृति चक्र पर अवलम्बित नहीं रहा। मनुष्य ने उसमें असाधारण हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया है। ईंधन का अत्यधिक उपयोग होने लगा है। बढ़ते प्रदूषण और विकिरण ने भी कम गड़बड़ी उत्पन्न नहीं की है। फलतः वायुमण्डल में कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा असाधारण रूप से बढ़ गई है। इस बढ़ी गर्मी ने ध्रुवों के पिघलने की गति बढ़ाई और उसने हवा में ठण्डक अनुपात बढ़ा दिया। कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा पृथ्वी पर आने वाली सूर्य किरणों को भी रोकती है और कोढ़ में खाज का उदाहरण बनती है।

यह सब कारण मिलकर बताते हैं कि हम सुहावने मौसम का एक चक्र पूरा कर चुके और इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं जिसमें ठण्डक की बहुलता रहेगी। मौसम विशेषज्ञों ने पिछले पाँच लाख वर्ष की स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए कहा है कि ऐसा सन्तुलित और सुहावना मौसम मात्र दस हजार वर्ष ही रहा है। पहले तो बार-बार उलट-पुलट होती रही है। अच्छे दस हजार वर्ष गुजार लेने के उपरान्त फिर इस भूलोक को असन्तुलित परिस्थितियों में से गुजरना पड़ सकता है। हो सकता है वे परिस्थितियाँ छोटे-बड़े हिमयुग जैसी भयावह और कष्टकारक हों।

इन दिनों पृथ्वी पर बृहस्पति का प्रभाव भी अत्यधिक है। इस प्रभाव के स्वरूप और प्रभाव पर प्रकाश डालने वाली पुस्तक “जुपीटर इफेक्ट” में बहुत कुछ लिखा गया है। यों यह बात 2 वर्ष पूर्व घट चुकी लेकिन लेखक द्वय डॉ. जान रिविन और डॉ. स्ट्रीफेट के अनुसार इसकी परिणति जलवायु की विषमता के रूप में दृष्टिगोचर होगी। सर्दी-गर्मी का सन्तुलन बिगड़ेगा और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में भूकम्प आते रहेंगे। इस पुस्तक को विवादास्पद मानकर कईयों ने अनावश्यक रूप से डराने पर कड़ी समीक्षा की है। तथापि परिणतियाँ वैसी ही नजर आ रही हैं।

बृहस्पति पृथ्वी से 300 गुना अधिक भारी है। उसका व्यास 11 गुना है एवं गुरुत्वाकर्षण ढाई गुना अधिक है। यूनानी साहित्य में तो उसे आकाश का राजा कहा गया है। सौर मण्डल में उसकी विशेष स्थिति है। पुच्छल तारों को विशेष रूप से खींचकर चंगुल में जकड़ता रहता है।

गुरु और शनि जब एक सीध में आ जाते हैं तो उनमें मध्य चुम्बकीय आदान-प्रदान बढ़ जाता है। जिन दिनों बृहस्पति सूर्य की सीध में होता है उन दिनों उसके धूलि कण पृथ्वी के वातावरण में अधिक मात्रा में प्रवेश करते हैं। फलतः उस अनभ्यस्त धूलि के उदरस्थ करते समय पृथ्वी को मितली जैसी आने लगती है और कई प्रकार की प्रतिकूल विपन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।

16 सितम्बर 1978 में रूस ने हाइड्रोजन बम का भूमिगत परीक्षण किया था। उसके 36 घण्टे के भीतर ही ईरान में इतना भयानक भूकम्प आया जिसमें पच्चीस हजार मरे और सम्पदा की अपार हानि हुई। संगति बिठाने वाले दोनों घटनाओं के बीच कड़ी जोड़ते हैं और कहते हैं कि दोनों स्थानों में मीलों की दूरी होते हुए भी भीतरी परतों में कोई ऐसी नाली हो सकती है जो एक स्थान का प्रभाव दूसरे स्थान तक पहुँचाये।

मनुष्य द्वारा प्रकृति की छेड़छाड़ अब इतनी अधिक बढ़ गई कि मौसम से लेकर वातावरण तक में संकट भरी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे अवसरों पर प्रकृति क्षेत्र में चलते रहने वाले अनिष्टों को अधिक खुलकर खेलने का अवसर मिलता है।

प्रदूषण के साथ-साथ वातावरण का तापमान बढ़ता रहा है। ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघलने और समुद्र की सतह ऊँची उठने से जल प्रलय की आशंका की जा रही है। हिमयुग की पुनरावृत्ति होने की सम्भावना भी कम नहीं है।

ऐसे ही अनेक कारण एक साथ मिलते जा रहे हैं और उनमें से किसी एक का भी दाँव चल जाने से ऐसा संकट खड़ा हो सकता है जैसा कि पूर्ववर्ती भविष्य वक्ताओं ने निरूपित किया है।

परिस्थितियों की विपन्नता को देखते हुए हमारे लिए उचित है कि प्रकृति के साथ अधिक छेड़खानी करना बन्द कर दें। पृथ्वी को बहुत न खोदें। आकाश में अवाँछनीय कचरा न फेंके। अपने हिस्से की सावधानी बरतने पर भी संकट की सम्भावना टलने में सहायता मिलती है।


कछुआ बच गया (kahani)

एक था कछुआ। दूसरा था खरगोश। दोनों साथ-साथ रहते।

एक दिन शिकारी उधर से आये। खरगोश ने उछल-कूद मचाई। कछुए ने पंजे पेट में सिकोड़ लिये।

खरगोश पकड़ा गया। कछुआ बच गया।

न जाने कौन कह रहा था- “बहिर्मुखी घाटे में रहता है और अन्तर्मुखी नफे में।”


यज्ञ में मन्त्र शक्ति के प्रखर प्रयोक्ता

महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए उपयुक्त साधन जुटाने और उपयुक्त व्यक्ति उस कृत्य में लगाने की आवश्यकता पड़ती है। यज्ञ असाधारण महत्व की प्रक्रिया है उसकी विद्युत उत्पादक संस्थान से तुलना की जा सकती है। उसके लिए सभी साधन सामग्री सही स्तर की होनी चाहिए। सही अर्थात् असली, स्वच्छ और संस्कारिता यह उपकरणों तथा यजन भविष्य के सम्बन्ध में यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि उनसे सम्बद्ध व्यक्तियों की श्रद्धा सद्भावना का- सतर्कता एवं तत्परता का समुचित समावेश हुआ हो। इसके अतिरिक्त उन व्यक्तियों की बारी आती है जो इस प्रयोजन में भागीदार बनकर रहे हैं उनको शरीर की दृष्टि से स्वच्छ स्वस्थ एवं मन की दृष्टि से सन्तुलित समर्थ होना चाहिए। चरित्र की वह सम्पदा है जिसके आधार पर व्यक्ति सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी कहा जा सकता है। वेष, वंश या क्रिया काण्डों के आधार पर कोई चरित्रहीन एवं निकृष्ट चिन्तन वाला व्यक्ति अपने को आत्मवादी माने और ऐसे लोगों को मिलने वाले श्रेय की अपेक्षा करे तो इसे उपहासास्पद ही माना जायेगा।

यज्ञ प्रयोजन में न केवल उस कृत्य को सही रीति से सम्पन्न करा सकने की प्रवीणता ही चाहिए वरन् सूत्र संचालकों को उस स्तर का भी होना चाहिए, जो पुरोहित वर्ग के लिए आवश्यक है। यज्ञ का सारा वातावरण संस्कार युक्त होना चाहिए। यज्ञ कर्त्ता एवं कराने वाले दोनों ही उपयुक्त स्तर के होने चाहिए।

व्यक्तिगत, पारिवारिक यज्ञों में घर कुटुम्ब के लोग ही मिल-जुलकर सारी व्यवस्था बना लेते हैं किन्तु यदि किन्हीं विशिष्ट प्रयोजनों के लिए बड़े यज्ञ आयोजन करने हों तो उनके लिए विभागाध्यक्ष नियुक्त करने होते हैं ताकि सारे क्रिया-कलाप विधिवत् चलते रहें। कार्य विभाजन के अनुरूप ही व्यवस्था ठीक तरह चल पाती है। यों एक व्यक्ति भी अनेक कार्यों को सम्भाल सकता है पर उसके लिए हर विभाग पर समुचित ध्यान दे सकना, बारीकी वे वस्तुस्थिति देखना और तद्नुरूप सुव्यवस्था बनाते चलना कठिन पड़ता है। अतएव महत्वपूर्ण काम में प्रयुक्त होने वाली कार्य विभाजन पद्धति का उपयोग बड़े यज्ञ आयोजनों में भी किया जाता है।

यज्ञ प्रक्रिया को चार भागों में विभक्त किया गया है। उनके विभागाध्यक्षों के नाम (1) ब्रह्मा (2) आध्वर्यु (3) उद्गाता (4) होता, होते हैं।

अत्यन्त विशालकाय आयोजन हो तो इन चारों को अपने एक से लेकर तीन तक सहायक नियुक्त करने का भी अधिकार है। इन अधिकारियों की भी अपनी-अपनी जिम्मेदारी होती है और उनकी पदवी घोषित की जाती है।

ब्रह्मा वर्ग में- (1) ब्राह्मणच्दसी (2) आग्नीघ्र (3) होता।

आध्वर्यु वर्ग में- (1) प्रति प्रस्थाता (2) नेष्टा (3) उन्नेता।

उद्गाता वर्ग में- (1) प्रस्तोता (2) प्रति हर्ता (3) सुब्रह्मण्य।

होता वर्ग में- (1) प्रशस्ता (2) अच्छा वाक् (3) ग्रावस्तोता।

(1) ब्रह्मा-

यज्ञ का प्रधान संरक्षक अध्यक्ष एवं अधिष्ठाता ब्रह्मा कहलाता है। यह सभी कार्यों का मुख्य निरीक्षक होता है। इसे पुरोहित भी कहा जाता था। कहीं-कहीं इसी को ‘अथर्वा’ भी कहा गया है। जब यह कृत्य कुल परम्परा के रूप में चल पड़ता था तब उस प्रयोजनों में पारंगतों की पीढ़ियाँ ‘अंगिरस’ कही जान लगती थी। वैदिक काल से अंगिरसों का विशेष मान था। वे न केवल यज्ञ कृत्य कराने में कुशल होते थे वरन् निजी जीवनचर्या में भी ब्रह्म कर्म का परिपूर्ण समावेश रखते थे।

(2) आध्यवर्यु-

यज्ञों में देवताओं के स्तुति मन्त्रों को जो पुरोहित गाता था उसे ‘उद्गाता’ कहते थे। जो पुरोहित यज्ञ का प्रधान होता था वह ‘होता’ कहलाता था। उसके सहायतार्थ एक तीसरा पुरोहित होता था जो हाथ से यज्ञों की क्रियाएँ होता के निर्देशानुसार किया करता था। यह सदस्य ‘आध्वर्यु’ कहलाता था।

(3) उद्गाता-

सामगान करने वाला याजक ‘उद्गाता’ कहलाता है। हरिवंश में कथन है-

ब्रह्माणं परमं वक्त्रादुद्गातारञ्च सामगम्। होतारमथ चाध्वर्यु बाहुभ्यामसृजव्प्रभुः॥

अर्थात्- प्रजापति ने ब्रह्मा को तथा सामगान करने वाले उद्गाता अपने मुख से और होता तथा आध्वर्यु को बाहुओं से उत्पन्न किया।

वैदिक यज्ञों में विशेषकर सोम यज्ञ में सामवेद के मन्त्रों का गान होता था। गाने वाले पुरोहित को उद्गाता कहते थे। उद्गाता को दो प्रकार की शिक्षा लेनी पड़ती थी। पहली शिक्षा थी- शुद्ध एवं शीघ्र मन्त्रों का गायन, तथा उन सभी स्वरों की जानकारी जो विशेषकर सोम यज्ञों में प्रयुक्त होते थे। दूसरी शिक्षा में इस बात का स्मरण रखना होता था कि किस सोम यज्ञ में कौन-सा सूक्त या मन्त्र गान करना पड़ेगा।

(4) होता-

ऋग्वेद का पाठ करने वाला। अमरकोश (2.7.17) में इसका अर्थ ‘ऋग्वेद वेत्ता’ बताया गया है। ‘दायभाग’ टीका में श्रीकृष्णतर्कालंकार ने इसका अर्थ ‘होमकर्ता’ किया है। उनका कथन है ‘विशिष्ट देशावच्छिन्नप्रक्षेपोपहितहविस्त्यागस्य हेमत्वात् प्रक्षेपस्य तदमिधाननिमिलमित्यर्थः। तेन हुधात्वर्थतावच्छेदक प्रक्षेपानुकूल व्यापारयति ऋत्विजि होता इत्यादि व्यपदेशः॥” होमक्रिया में मुख्यतः ऋग्वेद मन्त्र पढ़कर आहुतियाँ दी जाती हैं। अतः होता ऋग्वेद वेत्ता ही होता है।

यजमान के निमित्त, उसी की ओर से, उसकी इच्छानुसार प्रतिनिधि की तरह यज्ञ कार्य करने वाला भी उन दिनों एक वर्ग था जिसे ऋत्विक् एवं ‘ऋत्विज’ कहा जाता था।

ऋत्विक् (ऋत्विज्) मनु इनके सन्दर्भ में (2.143) में उल्लेख है।

अग्न्याधेयं पाकय ज्ञानग्निष्टोमादिकान्मखान्। यः करोति वृतो यस्य स तस्यर्त्विगिहोच्यते॥

अर्थात्- अग्नि की स्थापना, पाकयज्ञ, अग्निष्टोम आदि यज्ञ जो यजमान के लिए करता है वह उसका ऋत्विक् कहा जाता है। ऋत्विक् के कुछ पर्यायवाची नाम भी हैं- (1) याचक, (2) भरत, (3) कुरु, (4) वाग्यत, (5) वृक्त वर्हिष, (6) यतश्रुच, (7) मरुत्, (8) सबाध और (9) देवयव।

सामान्य मनुष्य वार्त्तालाप से शब्दोच्चार का प्रयोग करते हैं। जीभ ही उनकी अभिव्यक्तियों को प्रकट करती है। यज्ञ पुरोहित अपनी जिह्वा को आहार तथा सम्भाषण का संयम करके सरस्वती स्तर की बनाते हैं। उनके वचन ही मन्त्र होते हैं। मन्त्रों का चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न करने के लिए परिष्कृत स्तर की ऐसी जीभ चाहिए जिसके कथन उच्चारण को ‘वाक्’ कहा जा सके। वाक् को देवता की अभिव्यक्ति कहा गया है। मन्त्राराधन में उसी को माध्यम बनाने से काम चलता है। धनुष सही हो तो ही तीर दूर तक जाता है और निशाना सही साधता है। मन्त्र तीर है और परिष्कृत वाणी ‘वाक्’ को प्रत्यंचा की उपमा दी गई है। कोई संस्कृतज्ञ अथवा कर्मकाण्ड ज्ञाता मन्त्रों का सही उच्चारण भर कर सकता है। इससे उसकी शिक्षा को सही समझा जा सकेगा। मन्त्र का प्रभाव दिखाने में उच्चारण में प्रवीणता नहीं उसकी आत्मशक्ति काम करती है। परिष्कृत स्तर की वाणी ही यज्ञ जैसे अध्यात्म विज्ञान से सम्बन्धित कार्यों में उपयुक्त परिणाम प्रस्तुत कर सकती है। ‘वाक्’ की महिमा शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक बताई है और उसी का प्रबन्ध हो जाने पर यज्ञ की सफलता का विश्वास दिलाया है। शास्त्र कहते हैं-

वागक्षकं प्रथमजाऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभिः। -तैत्त.ब्रा. 2।8।8।5

अर्थात्- कल्याण का प्रथम सूत्र ‘वाक्’ है। वही वेदों की माता है। अमृत की धुरी उसी को कहा गया है।

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदु ब्राह्मणा ये मनीषिणः। गुहा त्रीणि निहिता ने गयन्ति तुरीयं वाचों मनुष्या बदन्ति॥ -ऋग्वेद 1।22।164।40

अर्थात्- यह ‘वाक्’ शक्ति चार चरण वाली है। उसे पूरी तरह केवल ब्रह्मवेत्ता ही जानते हैं। इनमें से तीन तो अन्तःगुफा में छिपे हैं। मात्र वैखरी को ही जिव्हा द्वारा मनुष्य बोलते हैं।

क्लयद्वाग्वदन्त्य विचेतनानि। राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा॥ चतस्रवलर्ज्जदुदुरे पयांसि। क्वल्विदस्याः परमं जगाम्॥ -सरस्वती रहस्योपनिषद्

अर्थात्- यह ‘वाक्’ विश्वव्यापी है। समस्त जड़-चेतन उसके प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। देवताओं का सूत्र संचालन वही करता है। न जाने हम उसका मर्म कब जान सकेंगे।

स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्। सा यदा मृत्युमत्य मुच्यत। सोऽग्निरभवत्। सोऽयमग्निः परेण मत्युमतिक्रान्तोदीप्यते। -वृह.उ. 1।3।12

अर्थात्- प्राण ने ‘वाक्’ के सहारे मृत्यु को पार किया। यह वाक् अग्नि बनकर अमर हो गई, वेद असीम शक्तियों से ओत-प्रोत होकर ज्योतिर्मयी बनी।

यज्ञ कराने वाले पुरोहितों की प्रवीणता, पवित्रता एवं प्रखरता ही वह प्रमुख शक्ति है जिनसे अध्यात्म विज्ञान के प्रत्यक्ष प्रयोग यज्ञ अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं। जिन्हें इस सन्दर्भ में रुचि हो उन्हें यज्ञ प्रयोजन के साधन जुटाने एवं उपयुक्त याजक तो तलाशने ही चाहिए। साथ ही यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि इस सन्दर्भ में जो कुछ भी प्रयुक्त किया जाय वह आध्यात्मिक सुसंस्कारिता से भरा-पूरा हो। यह न बन पड़ने पर प्रयत्न प्रायः निष्फल ही चले जाते हैं। क्योंकि कहा गया है-

जिह्वा दग्ध परान्नेन करौदग्ध प्रतिग्रहात्। मनोदग्धम् परस्त्रीभिः मन्त्र सिद्धि कथं भवेत्॥ -तन्त्रसार

अर्थात्- पराया अन्न खाने से जिह्वा जल गई। दान लेने से हाथ जल गये। कामुकता से मन जल गया। फिर भला मन्त्र की सिद्धि कैसे हो।


राजा विक्रमादित्य (kahani)

राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी, सन्तोषी ब्राह्मण रहता था। वह निर्धन था। स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्त घर से निकला तो जंगल में एक महात्मा से भेंट हुई। उन्होंने इसे चिन्तित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को पत्र लिखा कि तुम्हारी इच्छा पूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहाँ चले आओ।

वह पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य सौंपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य-त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यन्त आनन्द विभोर देखा तो सोचने लगा कि जब राजा ही राज्य सुख को लात मार कर योगी के पास जाने में विशेष आनन्द अनुभव कर रहे हैं तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अतः उसने राजा से कहा कि- ‘महाराज! मैं अभी महात्माजी के पास पुनः जा रहा हूँ लौटकर राज्य लूँगा।’ यह कह कर योगी के पास पहुँचकर बोला कि ‘भगवन्! राजा तो राज्य-त्यागकर आपके पास आने के लिये नितान्त उतावला और हर्ष विभोर हो गया इससे जान पड़ता है कि आपके पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिए।

महात्मा ने प्रसन्न हो उसे पूर्ण योग क्रिया सिखाई और ब्राह्मण पूर्ण तपस्वी होकर मोक्ष-सुख पा गया। मोक्ष-सुख से राज्य-सुख नितान्त तुच्छ है।


अन्धकूप के पाँच प्रेत

आचार्य महीधर अपनी शिष्य मण्डली समेत तीर्थयात्रा पर जा रहे थे। रात्रि में एक सुरक्षित स्थान पर विश्राम के लिए रुक गये। थकी मण्डली गहरी निद्रा में सो गई।

महीधर को नींद नहीं आई। कहीं दूर पर कई व्यक्तियों का संयुक्त करुण क्रन्दन सुनाई पड़ रहा था। वे चुपके से उठे और उधर चल पड़े जिधर से रुदन की ध्वनि आ रही थी। वे एक अन्ध कूप के निकट जा पहुँचे। देखा कि पाँच व्यक्ति उसमें औंधे मुँह पड़े बिलख रहे हैं।

आचार्य ने निकालने का प्रयत्न करने से पूर्व उनसे पूछा- वे कौन हैं, और क्यों कर इस गर्त में गिरकर दुःख पा रहे हैं। निकलने का प्रयत्न क्यों नहीं करते?

उनमें से एक ने कहा- ‘हम पाँचों प्रेत हैं। कर्मफल भोगने के लिए इस गर्त्त में गिराये गये हैं। विधिविधान को तोड़कर निकल सकना हमारे लिए सम्भव नहीं है।’

आचार्य का कौतूहल और भी बड़ा। उनने कहा- ‘भला जानें तो आप लोगों को किस कारण इस दुर्गति में पड़ना पड़ा?’

प्रेतों में से एक-एक ने अपनी दुर्गति का कारण बताया। पहले ने कहा- ‘वह पूर्व जन्म में ब्राह्मण था। दक्षिणा बटोरता और विलास में खर्च करता था। ब्रह्म कर्मों की उपेक्षा करता रहा।’ दूसरे ने कहा- मैं क्षत्रिय था। दुःखियों की रक्षा सहायता से बचता और मद्य माँस, वेश्यागमन, अनाचार जैसे कुकृत्यों में निरत रहा। तीसरा बोला- मैं वैश्य था। अतिशय लाभ कमाने वाला विक्रय वस्तुओं में हेरा-फेरी करने वाला, सम्पन्न होते भी कृपणता बरतने किसी को कुछ न देने की प्रकृति वाला निष्ठुर। चौथे ने कहा- ‘मैं शूद्र था। अहंकारी, आलसी दुर्व्यसनी। किसी की सीख मानी नहीं, जिम्मेदारी जानी नहीं।’

पाँचवें प्रेत की स्थिति विचित्र थी। वह साथियों को भी मुँह नहीं दिखाता था। पीठ फेरकर खड़ा होता और दोनों हाथों से मुँह ढक लेता। महीधर ने उसकी इस विचित्र स्थिति का कारण आश्चर्यचकित होकर इस स्थिति के विषय में पूछा।

रुदन भरे स्वर में वह बोल पड़ा- ‘मैं पूर्व जन्म में साहित्यकार-कलाकार था। पर अपनी कलम से मैंने कभी नीति, धर्म, सदाचार का शिक्षण नहीं किया। अश्लीलता, कामुकता और फूहड़पन बढ़ाने वाला साहित्य लिखकर लोगों को पतित, भ्रमित ही करता रहा। ऐसे संगीत, अभिनय का सृजन किया जिसने कुत्साएँ जगाईं, वासना भड़काई। चित्र व मूर्तियाँ बनाने में प्रवीण-पारंगत होते हुए भी उन्हें कुरुचिपूर्ण गढ़ा। सारे समाज को भ्रष्ट करने के आरोप में यमराज ने मुझे अन्य सभी प्रेतों की तुलना में अधिक कष्टकर स्थिति में रहने- ब्रह्म राक्षस बनाने हेतु इस स्थिति में पहुँचा दिया। यहाँ भी मैं इतना लज्जित हूँ कि अपना मुँह इन प्रेत भाइयों को भी नहीं दिखा सकने की स्थिति में हूँ।” इतना कहते उसकी हिचकियाँ बँध गयीं वह आगे बोल नहीं सका।

अन्ध कूप से निकलने-निकालने के प्रयत्न को व्यर्थ बताते हुए पाँचों प्रेतों ने महीधर से एक ही प्रार्थना की कि यदि वे कर सकें तो इतना भर कर दें कि जन-जन को हमारी दुर्गति का कारण बता दें ताकि अन्य लोग ऐसी भूल न करें। पाप की चर्चा हो चले तो वह हलका पड़ता है। दूसरों को शिक्षा मिलती है।”

महीधर वापस लौट आये। उस दिन से वे अपने प्रवचनों में उन पाँच प्रेतों की कथा को भी सम्मिलित रखने लगे।


Quotation

पहले ईमानदार और नेक बनें। बाद में हो सके तो कुशल विद्वान् और सम्पन्न भी बन दिखायें।


अपनों से अपनी बात

साधनों की महत्ता अपनी जगह है। बिना उन्हें जुटाये कोई कैसे किसी कार्य को- निर्माण को पूरा करता है? यदि ईंट, चूना, लोहा, सीमेन्ट न हो तो भवन कैसे बने? यदि कलम, स्याही, कागज न हो तो लिखा कैसे जाय? किसान के पास खर-पतवार उखाड़ने, सिंचाई आदि के उपकरण एवं बीज न हो तो भूमि होते हुए भी वह खेती का कार्य कैसे करता रह सकता है लेकिन एक पक्ष और भी छूट जाता है। वह है साधनों को बल देने वाली अदृश्य शक्ति का। प्रत्यक्ष तो वह दिखाई नहीं पड़ती लेकिन परोक्ष में उसी की सामर्थ्य काम करती है।

आध्यात्मिक जगत में इस परोक्ष शक्ति को साधना की सामर्थ्य के रूप में जाना जाता है। इस तप बल के अभाव में व्यक्ति शरीर व मस्तिष्क से स्वस्थ होते हुए भी आत्मबल से वंचित ही रहता है, साधना बिना वस्तुतः साधनों की कोई उपयोगिता नहीं। जीवन साधना जहाँ दैनिक जीवन व्यापार में मानवी काया में बन पड़ने वाले अनगढ़ क्रिया-कलापों को सुगढ़ बना देती है। वहाँ अन्तर्गत की तप साधना जब उच्च स्तर की होती है तो साधक की मनःस्थिति को उत्कृष्ट बनाने एवं संव्याप्त अवांछनीयता के निवारण हेतु अभीष्ट बल देंगे में सहायक होती है।

यह सारी चर्चा सन्धिकाल की बेला में समय की बदलती करवटों के साथ बदलने जा रही। पूज्य गुरुदेव की भावी भूमिका के सम्बन्ध में की जा रही है। बसन्त पूर्व उनका आध्यात्मिक जन्म दिवस है। हर वर्ष की तरह यह वर्ष अनेकानेक नये उपक्रम साथ जुड़े जाने के कारण अत्यधिक महत्वपूर्ण है। उनके मार्गदर्शक द्वारा सौंपे गए सभी प्रमुख दायित्व इसी पावन दिवस की बेला में संकल्पित हुए। 24 लक्ष के 24 गायत्री महापुरश्चरण अखण्ड-ज्योति पत्रिका का शुभारम्भ से लेकर चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों का निर्माण जैसे युगान्तरीय कार्य इसी बेला में सम्पन्न हुए। अब अपने मार्गदर्शक के निर्देशानुसार अपने विशाल प्रज्ञा परिकर की प्रचण्ड ऊर्जा से सिंचित करने उन्हें आत्मबल की शक्ति से अनुप्राणित करने हेतु एक नया अध्याय उनके जीवन का आरम्भ होने जा रहा है। बहिरंग जगत से निवृत्ति लेकर वे स्वयं को सूक्ष्मतम बनाने जा रहे हैं। महायोगी अरविन्द एवं महर्षि रमण भारत की उसी ऋषि परम्परा के एक अंग थे, जिसने तप का सम्बल लेकर लोकहित हेतु उस अर्जित आत्मिक सम्पदा का सदुपयोग किया था। उनकी भूमिका भी अब ऐसा ही मोड़ लेने जा रही है जिसमें वे एकाकी साधनारत रह परोक्ष जगत की अपनी प्रचण्ड प्राण ऊर्जा से अभिपूरित करेंगे। चर्मचक्षुओं से दर्शन, मनोकामना की पूर्ति आने वाले इस दृष्टि से निराश होंगे लेकिन वे नहीं जो उनके जीवन दर्शन को समझते हैं। उन्होंने जीवन भर उपासना की है- स्वयं को धोया है- बदले में दैवी अनुकम्पा पाकर उससे अनेकों को अनुदान दिये हैं। अब लगभग अपने पूर्व में सम्पन्न गायत्री महापुरश्चरणों के समकक्ष प्रचण्ड साधना वे जीवन की शेषावधि में पूरी करना चाहते हैं। इसे परोक्षतः महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण सोपान समझा जा सकता है। सूक्ष्मीकृत हो तप साधना से न केवल प्रस्तुत परिकर को, अपितु समस्त मानव समुदाय को युगसन्धि की इस बेला में मथ देने एवं समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए यह अनिवार्य भी था।

स्थूल की तुलना में सूक्ष्म की महत्ता कितनी अधिक होती है, सभी जानते हैं। मिट्टी के ढेले में अपनी कोई सामर्थ्य नहीं लेकिन उसमें छिपे कण-कण में- परमाणु में कितनी अधिक शक्ति प्रचण्ड ऊर्जा होती है, इसे दृश्यमान रूप में परमाणु ऊर्जा के रूप में समझा जा सकता है। समुद्र में ढेरों पानी फैला पड़ा है लेकिन जब यही सूक्ष्मकृत होकर बादलों के रूप में अन्तरिक्ष में पहुँचता व घनीभूत होकर बरसता है, तो उसकी महत्ता समझ में आती है। औषधियाँ जब खरल में घोंटी जाती हैं, सूक्ष्मतम एवं प्रभावशाली होती चली जाती हैं। वायुभूत होने पर वे पर्यन्य-प्राण का निर्माण करती हैं एवं रोम कूपों से प्रवेश कर आरोग्य एवं जीवनी शक्ति का सम्वर्धन का बहुमूल्य वरदान देती हैं। सूक्ष्म वस्तुतः कितना सामर्थ्यशाली होता है इन दृष्टान्तों से इसकी झलक मिलती है।

पूज्य गुरुदेव की भावी रीति-नीति भी अब यही होगी कि गोदी में चढ़कर खेलने हेतु मचलने वालों- खिलौनों की माँग करने वाले बच्चों को अपनी स्थूल काया का दर्शन देने की बजाय सुपात्रों को सूक्ष्म रूप में आत्मबल का दैव अनुदान दें। यह एकाकी तपश्चर्या कुछ को घाटे का सौदा लग सकती है लेकिन वस्तुतः वैसा है नहीं। सूक्ष्म रूप में वे और भी अधिक सामर्थ्यवान, सर्वव्यापी होंगे। इस बसन्त पर उन्होंने अपनी ओर से दो प्रतीक परिजनों को दिये हैं। वे पावन प्रतीक सदैव परिजनों को पूज्यवर के सूक्ष्म संरक्षण का उनकी सतत् उपस्थिति का बोध कराते रहेंगे। अब ये प्रतीक मात्र भी प्राप्त कर सकेंगे जो यहाँ आगामी सत्रों में आएँगे।

सारे प्रज्ञा परिवार पर एक दृष्टि दौड़ा कर प्रस्तुत बसन्त पर उन्होंने यही निर्णय लिया है कि अब अपने बालकों से भी कुछ कर दिखाने हेतु चुनौती दी जाय। कहा तो बहुत कुछ है लेकिन लोभ, मोह, अहंता के बन्धनों ने उन्हें कम ही करने दिया है। समय, धन खर्च करके सस्ती भावुकता की खातिर लोग दर्शन तो करना चाहते हैं लेकिन अपनी केंचुली से मुक्त होना नहीं चाहते यह विडम्बना बड़ी त्रासदी से भरी है। यदि इसी का सुनियोजन कर लिया गया होता तो आत्मा भी सन्तुष्ट होती एवं दैवी अनुकम्पा भी उन पर बरसती। कुछ न मिला, यह तो माना पर क्यों न मिला यह भी तो समझ लें ताकि अपने में परिवर्तन लाया जा सके। समय की विषमता भी यदि वह परिवर्तन जन साधारण में न ला सकी तो यह उनके लिये दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

प्रस्तुत बसन्त से सभी परिजनों को अपने अंशदान व समयदान की मात्रा बढ़ाने एवं शान्ति-कुंज से अप्रैल माह से आरम्भ किये जा रहे सुयोग्य प्रतिभाओं के उच्चस्तरीय शिक्षण हेतु चार माह का समय निकालने के लिए कहा जा रहा है। वे स्वयं यदि इतना समय न दे सकें तो उनसे अपने स्थान पर चार माह के लिये एक जीवट सम्पन्न-युवा-कर्मठ व्यक्ति का चयन कर उसे इस शिक्षण हेतु यहाँ भेजने को कहा गया है। इतना हो सका तो ही वे कार्य चल सकेंगे जिनसे प्रज्ञा-संस्थानों- प्रज्ञा पीठों- स्वाध्याय मण्डलों एवं जागृत शाखाओं में प्राण आ सके, उन्हें वस्तुतः जन-जागृति के केन्द्र माना जा सके। अभी इन प्रज्ञापीठों में हलचल के नाम पर कुछेक अफवाहों को छोड़कर पूजा अर्चा भर होती रहती है। घर-गृहस्थी, दुकान-व्यवसाय, कार्यालय में व्यस्त बहुधन्धी व्यक्ति जो भी कुछ कर पाते हैं, उसे चिन्ह पूजा भर कह सकते हैं। उस अपेक्षा की पूर्ति नहीं हो पाती, जिस प्रयोजन से इन प्रज्ञा संस्थानों को विनिर्मित किया गया था।

अब शान्ति-कुंज- गायत्री तीर्थ एक विश्वविद्यालय के रूप में परिवर्धित होने जा रहा है, जिसमें स्थायी, एक वर्ष के एवं उच्चस्तरीय चार माह के प्रशिक्षण की सुविधा रहेगी। इंजीनियरिंग, मेडिकल, चार्टर्ड अकाउण्टेन्सी के कोर्स भी कम अवधि में पूरे नहीं हो सकते। इसके लिये उपयुक्त व्यक्ति पहले चुने जाते हैं फिर उन्हें लम्बा सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक शिक्षण दिया जाता है। लगभग वैसा ही प्रशिक्षण पाये बिना, हीरे की तरह खरादे-तराशे बिना लोक सेवा क्षेत्र में उतरना सम्भव नहीं। इसी दृष्टि से अब अप्रैल से जुलाई, अगस्त से नवम्बर-दिसम्बर से मार्च चार-चार मास के तीन शिविर वर्ष भर शान्ति-कुँज में विभिन्न विधाओं के चलेंगे। कल्प साधना सत्रों का क्रम यथावत् रहेगा। दस-दस दिन के तीन सत्र हर माह चलते रहेंगे। अपनी बैटरी चार्ज कराने- जनरेटर से अपना स्थायी सम्पर्क जोड़ने के लिए परिजनों को इन सत्रों में वर्ष में न्यूनतम एक या दो बार तो आना ही चाहिए।

जो उच्चस्तरीय शिक्षण आगामी अप्रैल माह से आरम्भ हो रहा है उसमें (1) गायन, वादन, अभिनय (2) भाषण-सम्भाषण-युग नेतृत्व (3) स्वास्थ्य सम्वर्धन का जड़ी-बूटी उपचार, फर्स्टएड,गृह परिचर्या, खेलकूद-व्यायाम, अंग संचालन शिक्षण (4) पत्रकारिता, छपाई, साहित्य सृजन सम्पादन एवं (5) प्रज्ञाचक्र, शिक्षा चक्र घुमा सकते का दृश्य-श्रव्य साधनों द्वारा प्रचार कर सकने का शिक्षण जैसी विधाओं का समावेश है।

सुगम संगीत, एक्शन सांग, ढपली, मजीरा, खड़ताल, घुँघरू, बंगाली तम्बूरे, गिटार, म्यूजीटोन आदि वाद्यों के प्रशिक्षण द्वारा अब स्थान-स्थान पर संकीर्तन मण्डलियाँ अभिनय-टोलियाँ बनायी जाएँगी। आदर्शवादी मान्यताओं को हृदय की गहराई तक पहुँचाने स्थायी रूप से आरोपित करने के लिये भारत के जनमानस हेतु संगीत से श्रेष्ठ और कोई माध्यम नहीं है। इसी बसन्त से वीडियो स्टूडियो का शुभारम्भ केन्द्र में होने पर अब देश-विदेश में कैसेट्स के माध्यम से इनका विधिवत् आयोजन भी हो सकेगा।

भाषण-सम्भाषण का शिक्षण संकोच मिटाने, विभिन्न स्तर के व्यक्तियों में अपनी विचारधारा पहुँचाने के लिये हर लोकसेवी के लिये अनिवार्य है। प्रज्ञा प्रवचन, सम्पर्क गोष्ठी, प्रज्ञा पुराण कथाएँ, जन्म दिवस आयोजन आदि के माध्यम से यह प्रखर शिक्षण सम्भव है।

स्वास्थ्य संरक्षक स्तर का, “नंगे पैर चिकित्सक” बनाने का जो नवीन शिक्षण अब केन्द्र में आरम्भ हो रहा है उसमें व्यायामशालाओं- जड़ी-बूटी की पौद शालाओं व उपचार केन्द्रों, प्राथमिक सहायता, गृह परिचर्या, स्वच्छता, स्काउटिंग आदि विधाओं का समन्वीकरण है। आयुर्वेद का पुनरुद्धार कर औसत नागरिक स्तर पर चिकित्सा साधन जुटाने की यह शिक्षा स्वयं का स्वास्थ्य सुधारने के अतिरिक्त सबसे बड़ी परमार्थ साधना सिद्ध करती है।

‘पत्रकारिता, छपाई, साहित्य सृजन, समाचार-सम्पादन का शिक्षण का नया प्रशिक्षण है जो प्रस्तुत पाठ्यक्रम में जोड़ा गया है। हर प्रज्ञा संस्थान को अब वार्षिक ‘स्मारिका’ प्रकाशन के अतिरिक्त प्रगतिशील मासिक समाचार पत्र निकालना है। इससे सम्पर्क क्षेत्र भी बढ़ेगा एवं मिशन की विचारधारा भी फैलेगी। यह शिक्षण भी यहीं दिया जाना है।

प्रज्ञाचक्र के ज्ञानरथ संचालन, टेप रिकार्डर- स्लाइड प्रोजेक्टरों के द्वारा प्रज्ञा पुराण कथा का नौ दिवसीय आयोजन, घर-घर जन्म दिन की पर्व गोष्ठी आयोजन तथा बाल संस्कार शिक्षण शाला एवं हरीतिमा सम्वर्धन हेतु पौधशालाएँ लगाना इनके अतिरिक्त ऐसा शिक्षण है जो लम्बे समय की माँग करता है।

इन पाँचों विधाओं के अलावा शान्ति-कुँज रहकर स्थायी काम कर सकने वालों को नालन्दा-तक्षशिला स्तर का भाषा एवं धर्म संस्कृति-शिक्षण, अनुवाद-साहित्य लेखन, ब्रह्मवर्चस् की शोध में सहयोग, बाहर जाने वाली जीप टोलियों में हर प्रचारक को मोटर ड्राइविंग, मेण्टेनेन्स का व्यावहारिक शिक्षण भी दिया जाना है।

उत्सुक प्रशिक्षणार्थियों को प्रारम्भ के नौ दिनों में भली-भाँति परख लिया जायेगा। प्रारम्भिक चयन तो परिजन स्वयं कर लें। यहाँ आने पर नौ दिवसीय लघु साक्षात्कार अवधि में उनका पर्यवेक्षकों द्वारा पी.एम.टी. की तरह गम्भीर अध्ययन कर विभिन्न विधाओं में बाँट दिया जायेगा। मिशनरी मनःस्थिति के, लोकसेवा में उतर सकने वाले, जिम्मेदारी से मुक्त, औसत स्तर के निर्वाह में रहने वाले, बीस से पैंतालीस वर्ष तक की आयु वाले कर्मठ व्यक्ति ही इसमें आयें। आयु सीमा में कुछ छूट जीवट के आधार पर दी भी जा सकती है।

इस बसन्त पर पूज्य गुरुदेव ने इस शिक्षण हेतु कार्यकर्ता बनने या भेजने के अतिरिक्त संगठन स्तर पर स्मारिका प्रकाशित करने, टोली स्तर पर ज्ञानरथ चलाने एवं एकाकी प्रज्ञापुत्र स्तर पर अंशदान की मात्रा बढ़ाकर झोला पुस्तकालय चलाने एवं प्रज्ञायोग की साधना करने पर विशेष जोर दिया है। उनका एक ही निर्देश है कि परिजन शरीर दर्शन का मोह छोड़ें, उनका जीवन दर्शन ग्रहण करें। वे स्वयं निवृत्ति परक मोड़ लेकर स्वयं को तप साधना में खपाने जा रहे हैं ताकि प्रज्ञा परिवार में प्रखरता उभरे, सक्रियता आए एवं इस विषम बेला में समुचित दायित्व निभाने हेतु इस मिशन के क्रिया-कलाप और तेजी से चल पड़ें।


कंटकों की राह

(माया वर्मा)


कंटकों की राह (kavita)

सिद्धि की मूर्ति में प्राण हो, इसलिये। कंटकों पर चले साधना के चरण॥

जन्म तो मिल गया था सहज ही कहीं। बढ़ गयी आयु, पर अज्ञता थी वहीं॥

तब कहाँ से विभा ज्ञान की फैलती। चाहिए या उषाकाल-वातावरण।

कंटकों पर चले साधना के चरण॥ की अंतः ज्ञान की मुक्त आराधना।

कल्मषों के समाधान की साधना॥ गति रहे उर्ध्वगामी सदा इसलिये।

कर लिया एक संकल्प का शुभ वरण। कंटकों पर चले साधना के चरण॥

मात अवरोध प्रत्येक खाता रहा। रक्त हर एक छाले से आता रहा॥

पग चले धूप में, धूलि में, रेत में। किन्तु जाना न विश्राम का एक क्षण।

कंटकों पर चले साधना के चरण॥ साथ पग के चलें मन तथा भावना।

मार्ग में ना भ्रमा ले कहीं कामना। तीक्ष्ण होता मनोबल रहे इसलिये।

गुरु-कृपा न किया प्राण का जागरण। कंटकों पर चले साधना के चरण॥

मुड़ गया शेष जीवन उसी राह में। लोक हित-लोक कल्याण की चाह में॥

सिद्धि का द्वारा यों मिल गया प्राण का। औ सफल हो गया देह का अवतरण। कंटकों पर चले साधना के चरण।

*समाप्त*