अगले अंक में गुरुदेव का समग्र जीवन-वृतांत

पूज्य गुरुदेव ने अपना जीवनवृत्तांत न कभी लिखा, न किसी को बताया। जिनने पूछा, उन्हें टाल दिया। पर वह है सारा महत्वपूर्ण कि उसका एक-एक शब्द ह्रदयंगम करने योग्य है और एक-एक अक्षर पड़ने योग्य है।

अब गुरुदेव सूक्ष्मीकरण की भूमिका में प्रवेश कर रहे हैं। तो उनने उस जीवनवृत्तांत को स्वयं लिखा है। इसलिए कि जिज्ञासु आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान के रहस्यों को गम्भीरतापूर्वक समझ सके और साधना से सिद्धि का यथार्थवादी रहस्य हस्तगत करके जिन्हें निहाल बनना है, बन सके।

जीवनवृत्तांत जून के आगामी अंक में छप सके, उतना ही सारगर्भित अंश लिखा गया है। यह पाठकों के हाथ में सदा की भांति जून के प्रथम सप्ताह में पहुँच जाएगा। जल्दी लेखन और जल्दी मुद्रण के कारण एक सप्ताह विलंब से प्रकाशित होने की आशंका है।

गुरुदेव से संबंधित व्यक्ति लगभग बीस लाख हैं। अखण्ड ज्योति उतनी नहीं छपती है। प्रतिपादन से यथासंभव जल्दी ही सभी को अवगत करा देने की इच्छा गुरुदेव की है। मौन-एकाकी-साधना एवं किसी से न मिलने के उनके निर्णय की स्थिति में अब यही एक मात्र माध्यम रह गया है। इन पंक्तियों में यही अनुरोध किया जा रहा है कि वर्तमान पाठक जून के अंक की अतिरिक्त तीन प्रतियाँ पाँच रुपया भेजकर और मँगा लें। एक अपनी, तीन अतिरिक्त। कुल तीन को संपर्क क्षेत्र में पढ़ाना आरंभ करें और न्यूनतम बीस विज्ञजनों को पढ़ाएँ। इसे गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सौंपा गया विशेष उत्तरदायित्व समझें और पूरा करें।

नये पाठकों-विज्ञजनों पर स्थायी प्रभाव डालने की दृष्टि से यह और भी उचित होगा कि परिजन इस विशेषांक की अतिरिक्त प्रतियाँ विक्रय हेतु मँगाएँ । इतनी महत्त्वपूर्ण सामग्री पास रखना हर कोई चाहेगा। पड़ने वाली न्यूनतम प्रतियों के अलावा अपने संपर्क के भावनाशील बुद्धिजीवी वर्ग के लिए थोड़ी "सबसीडी" देकर एक रुपये मूल्य पर एक प्रति विक्रय की जा सकती हैं। जितनी प्रतियाँ मँगानी हों, उसकी सूचना एवं राशि परिजन शीघ्र भेज दें। बाद में यह जीवनवृत्तांत जब पुस्तकाकार छपेगा, तो लागत मूल्य पाँच रुपये से कम न होगा।

— अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा


विस्मृति की मूर्च्छना

बनाने और सँभालने वाले को अपनी वस्तु से स्वभावतः अधिक प्रेम होता है। हम मकान बनाते हैं; उद्यान में सुंदर पुष्प लगाते हैं; चित्र बनाते हैं; लेख लिखते हैं, तो उनसे वैयक्तिक लगाव होना एक सहज प्रक्रिया है। ईश्वर ने— सृजेता ने हमें बनाया है, संभाला है और हमारे भविष्य का सारा दायित्व उसी के कंधों पर है। ऐसी स्थिति में उसका हमारे प्रति प्रेम होना कोई अनुग्रह या संयोग नहीं, विधि-व्यवस्था के अनुकूल एक सहज क्रम है।

हम परमेश्वर की संतान हैं। उसे यदि प्राणधारी भी माना जाए, तो भी यह मानना पड़ेगा कि वह सर्वश्रेष्ठ, सुविकसित प्राणी है। यदि ऐसा न होता, तो मनुष्य जैसी सर्वसाधनसंपन्न संतति का जन्म कैसे होता? जन्म देकर ही कोई सहृदय अभिभावक अपनी संतान को भटकने हेतु नहीं छोड़ देता। फिर परमात्मा हमसे विमुख कैसे हो सकता है? जब संतान के प्रति प्रेम सृष्टि का नियम है, तो परमेश्वर का प्यार अपनी सर्वोत्तम कृति— मानव के लिए क्यों नहीं होगा? आस्तिकता का— ईश्वरनिष्ठा का यही तत्त्व दर्शन है। हम भूल जाते हैं कि हम उस परब्रह्म की सृष्टि के उस विराट् परिवार के अंग हैं, जिसकी सुरक्षा-देखभाल का सारा दायित्व उसने अपने कंधों पर ले रखा है। विस्मृति की यह मूर्च्छना ही है, जो हमें स्वयं को पहचानने से, उत्कर्ष और आनंद की उपलब्धियों से वंचित कर देती है। परम पिता का प्रेम यदि हमें याद रहता, तो उसके साथ डोरी भी बँधी होती, हमारे जीवन की पतंग उसके द्वारा संचालित होती। अभाव और आत्महीनता हमें इसी कारण सताती है कि हम भ्रांतिवश अज्ञानांधकार में भटकना अधिक पसंद करते हैं। विवेक का जागरण हो सके, तो हमें वह ज्ञानरूपी प्रकाश उपलब्ध हो सकता है, जो जीवन की सार्थकता याद दिलाए व हमारा हर क्षण उस परम पिता की व्यवस्था को और सुगढ़ बनाने में नियोजित करे।


तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु

रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे— “सब कुछ मन की लीला है। मन से ही मनुष्य बद्ध है और मन से ही मुक्त। मन पर जैसा रंग चढ़ाओगे, उसी रंग में वह रंग जाएगा। एक ही मन विभिन्न भावों से, विभिन्न व्यक्तियों से भिन्न-भिन्न तरह का प्यार करता है। एक स्त्री को एक भाव से तथा संतान को वह दूसरे भाव से स्नेह करता है। ईश्वरप्रेम में मन के भावों का स्वरूप सर्वथा बदल जाता है।”

महर्षि रमण के अनुसार— “सुख और दुःख मन के पहलू हैं। मनुष्य मन और शरीर को ही यथार्थ समझता है तथा अपने सत्यानंदस्वरूप आत्मा को भूल गया है, जिसके कारण ही विविध प्रकार के दुःखों की उत्पत्ति होती है। दुःखों से यदि निवृत्ति पानी है, तो मन की लीलाओं को जानने तथा उससे परे जाने का प्रयत्न करना चाहिए।”

मन का स्थूलरूप मानवी मस्तिष्क है, जो बाह्य जगत से इंद्रियों तथा असंख्य संवेदनशील नाड़ियों द्वारा जुड़ा रहता है। उनके माध्यम से सूचनाएँ एकत्रित करता है। टेलीविजन यंत्र की भाँति मस्तिष्करूपी इलेक्ट्रॉनिक यंत्र में घटनाओं— दृश्यों के चित्र चित्रित होते रहते हैं। मन की स्थूलपरत ही अभिव्यक्त होती है तथा सांसारिक कार्यों में उसकी सामर्थ्य का ही प्रयोग हो पाता है, जबकि अतिसामर्थ्यवान अतिमानस प्रसुप्त पड़ा रहता है। उसको जागृत करना ही परम पुरुषार्थ है। ऋतंभरा प्रज्ञासंपन्न राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा, शंकराचार्य, रामकृष्ण, महर्षि रमण प्रभृति प्रतिभाएँ उस महान जागरण की ही परिणति हैं। उनकी ये विशेषताएँ कहीं बाहर आसमान से नहीं टपकी, वरन मन की सूक्ष्मपरतों के जागरण के फलस्वरूप प्रकट हुईं।

भौतिक संसार में मानसिक शक्ति की अभिव्यक्ति किसी में शौर्य के रूप में प्रकट होती है, किसी में कला के रूप में, तो किसी में प्रतिभा के रूप में। किसी-किसी में वह शक्ति पशुता के रूप में भी अपना परिचय देती है; पर कुछ ऐसे भी महामानव होते हैं, जो उस शक्ति की अंतिम अवस्था को प्राप्तकर प्रकृति के बंधनों से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

रामकृष्ण परमहंस ने उसी महाशक्ति को काली अथवा महामाया के नाम से संबोधित किया है। शक्तिपूजा भी प्रकारांतर से उस महाशक्ति की अभ्यर्थना का ही रूप है। उनका कहना था कि, “किसी ने प्रकृति को— माया को भोग-विलास की वस्तु मान लिया, तो वह मृगमरीचिका की भाँति उसके पीछे भागता फिरेगा तथा असंतुष्टि तथा अतृप्ति की आग में जलता रहेगा। रावण तथा दुर्योधन जैसे प्रतापी राजाओं को भी उस आग में जलकर राख हो जाना पड़ा।”

उस शक्ति का संबंध जब राजसत्ता, वैभव एवं शौर्य से जुड़ जाता है, तो व्यक्ति नैपोलियन, हिटलर, सिकंदर, अर्जुन तथा कर्ण जैसे महाबली बन जाते हैं। वही शक्ति जब प्रज्ञा के रूप में अभिव्यक्त होती है, तो शंकराचार्य, विवेकानंद, कुमारिल, अरस्तू और कान्ट जैसे विद्वान प्रकट होते हैं। जिसने उस प्रकृति को विज्ञान के रूप में परब्रह्म की शक्ति मान लिया, तो वह न्यूटन और आइन्स्टीन हो गया और जिसने प्रस्तर की प्रतिमा को ही काली मान लिया, वह रामकृष्ण परमहंस हो गया। जिसने उस प्रकृति को आदर्श व्यवस्था मान लिया, वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम बन गया। जिसका उस प्रकृति से संयोग हो गया, वह योगीराज कृष्ण हो गया।

ज्ञान का स्रोत वस्तुतः मनुष्य का मन है। कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब कुछ अंदर ही है। आविष्कार का अर्थ— मनुष्य का अपनी अनंत शक्तिस्वरूपा आत्मा पर आच्छन्न आवरण हटा लेना। संसार भर में ज्ञान के क्षेत्र में जो कुछ भी विद्यमान है, वह मन से ही निकला है।


हे मानव! तू पहले अपनी आत्मा को पहचान

जीवन का महत्त्व, स्वरूप और उद्देश्य यदि सही रूप में समझा जा सके, तो वह दूरदर्शिता जगे, जिसके सहारे इस सुयोग के सार्थक बन सकने की संभावना उभरती है। आम आदमी दर्पण में शरीर को ही देखता है और उतने भर को ‘स्व’ अनुभव करता है। लोक-व्यवहार में भी शरीर ही काम करता है और उसी को श्रेय अथवा अपयश का भागी बनना पड़ता है। सुख-सुविधाओं का उपयोग भी इंद्रियाँ ही करती हैं। रोग-शोक भी शरीर को ही त्रास देते हैं। शरीर-व्यवहार के कारण जुड़े हुए लोग ही संबंधी— परिवार कहलाते हैं और उनके साथ शरीर को लक्ष्य रखकर ही वार्त्तालाप चलता है। अनेक प्रकार के आदान-प्रदानों का माध्यम भी शरीर रहता है। चारों और फिरते और चित्र-विचित्र व्यवहार करते हुए भी शरीर ही दीखते हैं। ऐसी दशा में लोक-सम्मोहन के दबाव से यदि सामान्य बुद्धि आत्मसत्ता को शरीर ही मान बैठे, तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात भी नहीं है।

वातावरण का प्रभाव इसी को कहते हैं। भेड़ों के झुंड में रहने वाला सिंह-शावक अपने को भेड़ मानने लगा था। शरीर-समुदायों के बीच घिरा हुआ, शरीरगत आचरणों में निमग्न रहने वाला चिंतन यदि समूची आत्मसत्ता को शरीर मान बैठता है और उसी के लिए सब कुछ करने की बात सोचता है, तो इसे माया की प्रबलता ही कहा जाएगा। ऐसे ही प्रसंगों को देखते हुए ब्रह्म से माया को बलवती कहा जाता है। माया अर्थात भ्रांति। संसार की अनेकानेक भ्रांतियों में सर्वोपरि यह है कि मनुष्य अपने आपको शरीरमात्र मान बैठता है। उसका सूत्र-संचालन करने वाली आत्मा को आँख से न देख पाने की बात ही नहीं, समझ का प्रयोग करके उसकी सत्ता का अनुभव तक न करने की दूसरी कठिनाई भी है।

नितांत बौढ़मपन से काम न लिया जाए और विवेक-बुद्धि का तनिक-सा प्रयोग किया जाए, तो यह प्रतीत हुए बिना न रहेगा कि जीवनसत्ता शरीर पर नहीं, चेतन आत्मा पर अवलंबित है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि आत्मा के निकलते ही शरीर अपना अस्तित्व तक बनाए रहने में समर्थ नहीं रह पाता। मरण के तत्काल बाद काया स्वयमेव सड़ने लगती है और विघटित होकर कलेवर को अतिशीघ्र समाप्त कर डालने के लिए आतुरता दिखाती है। मुरदे को देर तक रखा रहने दिया जाए, तो उसे सड़ते-बिखरते  कृमि-कीटकों का शिकार बनते देखा जाता है। संबंधी लोग विधिवत अंत्येष्टि न करें, तो गिद्ध, कौए, कुत्ते और शृगाल उस निमित्त आ पहुँचते हैं। आत्मा के अभाव से शरीर द्वारा कुछ करना-धरना तो अलग, अपना स्वरूप यथावत बनाए रहना तक संभव नहीं हो पाता है।

सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या मनुष्य के सामने एक ही है कि वह अपने को पहचाने। इस संदर्भ में चले आ रहे भटकाव की अवांछनीय प्रतिक्रिया को समझे और उलटी राह पर न चले। आत्मबोध को सबसे बड़ी उपलब्धि कहा गया है। भगवान बुद्ध को यह लाभ जिस दिन हुआ, उस दिन वे सनकी राजकुमार के रूप में अपना जाना-पहचाना केंचुल छोड़कर सच्चे अर्थों में संत, ऋषि, अवतार भगवान बन गए। आत्मविभ्रम एक जादुई सम्मोहन है। जब सभी अपने को शरीरमात्र मानते हैं और उसी की वितृष्णाओं के लिए खपते दृष्टिगोचर होते हैं, तो कोई एकाकी क्यों झुंड छोड़कर अकेला चलने की बात सोचे और नई राह खोजे। प्रवाह में बहना कितना सरल होता है, इसे सभी जानते हैं। बहती धारा में पड़कर पत्ते भी अविज्ञात की ओर मजे में बहते रहते हैं। साथियों के झुंड में उड़ना पक्षी भी जानते हैं। भेड़ों के बारे में कहा जाता है कि वे एक के पीछे एक चलने में इतनी अभ्यस्त और मस्त रहती हैं कि खाई-खड्ड में गिरते चलने तक में आगा-पीछा नहीं सोचती। हवा के रुख के साथ पतंग दिशा पकड़ती है। धूलि-तिनकों तक को दौड़ लगाने की सूझती है। माहौल का प्रभाव ही कुछ अजीब होता है।

मनुष्य समुदाय भी ऐसे प्रसंगों में सर्वथा रूढ़िवादी सिद्ध होता है। धूम-धाम, दान-दहेज वाली खरचीली शादियों के दुष्प्रचलन से असंतुष्ट-अप्रसन्न रहने पर भी लोग जब प्रचलन के साथ रहने का प्रश्न सामने आता है, तो सिद्धांत सोचना छोड़कर उसी सड़े-गले ढर्रे को अपनाते और उसी तरह का सरंजाम जुटाते हैं। ऐसी दशा में इस वर्ग के प्रचलनवादियों का समूह आत्मस्वरूप समझने में अनुकरण के अतिरिक्त और कुछ कर सकेगा, इसकी आशा नहीं की जाती है। आम आदमी अपने को शरीर ही मानता है और उसी की ललक-लिप्साओं के लिए अन्यान्यों की तरह मरने-खपने लगता है। औचित्य और यथार्थ का विचार कर सकने की विवेकशीलता मुट्ठी भर लोगों में भी तो नहीं होती।

अपने चारों ओर भ्रांतियों का समुद्र लहरा रहा है। पृथ्वी बंदूक की गोली से भी अधिक चाल से दौड़ती और लट्टू से अधिक तेजी से धुरी पर घूमती है, पर सहज बुद्धि को कोई क्या कहे, जो इस लक्ष्य को आँखें न देख पाने पर सहज स्वीकारती नहीं। अदृश्य परमाणु के समुच्चय ही हमें पदार्थों के रूप में दीखते हैं, इसको कौन माने। सूर्य-किरणों के सात रंग होने की बात भी हर किसी को समझाना मुश्किल है। स्वाद मात्र खाद्य पदार्थ का नहीं होता, मुख के स्राव आहार से मिलकर जो प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं, उसी की अनुभूति मनःक्षेत्र में स्वाद के रूप में की जाती है। नीम मनुष्य के लिए ही कड़ुआ है, ऊँट के मुँह में प्रवेश करने पर वह नितांत स्वादिष्ट बन जाता है। रात्रि को ऐसा लगता है, सूर्य समुद्र में डूब गया; पर वस्तुतः वह धरती की दूसरी ओर होने से आड़ में छिपा भर होता है, डूबता नहीं। ऐसी अनेकों अनबूझ पहेलियों में ही एक यह भी है कि मनुष्य की सत्ता चेतन आत्मा होने पर भी शरीर के साथ जुड़ी रहने के कारण शरीररूप में ही प्रतिभासित होती है। इसी भ्रांति को माया कहा जाता है।

तत्त्वज्ञानी इस विडंबना की कठपुतली के नृत्य से तुलना करते हैं और लकड़ी के टुकड़ों का दृश्यमान नाच एक भ्रांति भर मानते हैं। छिपे बाजीगर की अंगुलियाँ न दीख पड़ने वाले तारों के सहारे ही यह बहकाने वाला खेल खड़ा करती है। बालबुद्धि उस दृश्यमान कठपुतलियों का नाच देखकर तालियाँ बजाती है। मृत्यु का दृश्य आमतौर से आँखों के सामने रहता नहीं; अन्यथा यह सहज ही समझा जा सकता था कि जीवन शरीर है या प्राण। इस श्मशान को यदि गंभीरतापूर्वक समझा और देर तक टिकाए रखा जा सका होता, तो फिर बुद्धि पर पड़ा हुआ वह परदा हट सकता था, जिसके अनुसार व्यक्ति अपने को शरीर भर मानता और उसी की अनगढ़ उचंगों पर सर्वस्व निछावर करता रहता है।

कहने-सुनने में तो आत्मा की चर्चा नित्य ही होती रहती है और उसके अनश्वर होने का कथा-प्रवचन, पठन-पाठन एक ढर्रे की तरह चलता रहता है; पर उस तथ्य पर गंभीरतापूर्वक कोई ध्यान नहीं देता। बाजार-मजाक की तरह— उसे भी परीकथाओं की तरह कथन-श्रवण का एक शगल समझकर हवा में उड़ा दिया जाता है। यदि इस संदर्भ में गंभीररतापूर्वक विचार किया जा सका होता, तो फिर उसके साथ जुड़े हुए अनेकों प्रश्न उभरकर सामने आते और वे सभी अपना समाधान पूछने के लिए नाक में दम कर रहे होते। सबसे पहले यह प्रश्न उठता है कि यह मनुष्य आत्मा है, तो उसकी कुछ इच्छा आवश्यक भी है क्या? उसे स्वच्छ रखने ओर पोषण देने के लिए भी कुछ करना पड़ता है क्या? प्रगति और प्रसन्नता के लिए उसे भी अवसर और साधन चाहिए क्या?

यह एक ज्वलंत प्रश्न है, जिसका समाधान खोजने वाले को कम-से-कम शरीर जितना महत्त्व तो आत्मा को भी देना पड़ेगा और उसकी इच्छा, आवश्यकता, स्वच्छता एवं प्रगति के लिए सरंजाम जुटाने, श्रम करने की बात को उभरकर ऊपर आने देना होगा, जबकि इस संदर्भ में मात्र सन्नाटा ही छाया रहता है। यदि विचार में गंभीरता का पुट रहा होता, तो फिर यह भी सोचा गया होता कि आत्मा के निमित्त भी जीवन-संपदा का उतना अंश लगना ही चाहिए, जितना कि शरीर के लिए लगता है। यों आत्मा को सवार और शरीर को सवारी कहा जाता है। सवारी की तुलना में सवार का महत्त्व अधिक है, तो फिर उसकी गरिमा को देखते हुए उसकी प्रतिष्ठा और व्यवस्था भी अधिक ऊँचे स्तर की होनी चाहिए। इतना न बन पड़े, तो भी दोनों को समान महत्त्व और समान साधन तो मिलना ही चाहिए। जीवन को यदि आत्मा और शरीर को संयुक्त व्यवसाय माना जाए, तो उपलब्धियों में दोनों की कम-से-कम बराबर की हिस्सेदारी भी होनी चाहिए। पूँजी और मेहनत आत्मा की— चेतना की लगे और मात्र हलचल करने वाले उपकरण के हिस्से में सारी कमाई लगती रहे, तो इसे अनुचित ही कहा जाएगा। अनुचित को छूट देने वाली बुद्धि को भी उस पद की गरिमा गिराने वाली कहा जाएगा, जिसे न्यायाधीश की न सही, पुलिसमैन की भूमिका तो निभानी ही चाहिए थी। पता चलने पर अन्याय को रोकने के लिए अपनी ओर से कदम बढ़ाया जाना चाहिए था। शरीरगत सुविधाओं के लिए जितना समय, श्रम, मनोयोग लगता है और उससे कम में आत्मा की स्वच्छता, तृप्ति एवं प्रगति के साधन जुटाने में किसी भी प्रकार काम चल ही नहीं सकता। यह विभाजन यदि बन पड़े, तो समझना चाहिए कि जीवनचर्या के क्षेत्र में चल रही अनीति और अव्यवस्था में सुधार-परिवर्तन आरंभ हुआ।

ईश्वर का अंश होने के नाते आत्मा के कंधों पर वे उत्तरदायित्व भी लदे हैं, जिनके कारण उसे अन्य प्राणियों से वरिष्ठ बनाया और विशिष्ट साधनों से संजोया गया है। अतिरिक्त उत्तरदायित्वों के आधार पर ही किसी को अतिरिक्त साधन दिए जा सकते हैं, अन्यथा ईश्वर को अन्यायियों और पक्षपातियों का सरताज कहा जाता। मनुष्य को मौज उड़ाने के लिए इतना साधनसंपन्न बनाने के विरोध में सभी जीवधारी मिल-जुलकर आवाज उठाते और नीति-न्याय की कचहरी में इन मिलीभगत वाले ईश्वर और मनुष्य की चौकड़ी को कड़ी सजा दिलाकर रहते। ईश्वर बड़ा है; पर बड़े का अर्थ यह तो नहीं, वह अपनी ही बनाई मर्यादाओं को तहस-नहस कर दे और मात्र एक ही प्राणी पर स्वेच्छाचार सुख-साधनों का अंबार बरसा दे तथा दूसरे सभी उस सबके लिए तरसते भर रहें।

निश्चित रूप से मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों से अतिरिक्त मिला है, उसके दो ही प्रयोजन हैं। एक आत्मकल्याण अर्थात आदर्शों की दृष्टि से अपने को पूर्णता के स्तर तक पहुँचना। दूसरा विश्वकल्याण अर्थात विश्व-उद्यान को अधिक व्यवस्थित और समुन्नत बनाने में सृष्टा का हाथ बँटाना— क्रियाकुशल माली की भावभरी भूमिका निभाना। इन दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही मनुष्य को युवराज जैसी वरिष्ठता दी गई है। इसकी उपेक्षा करके यदि वह शरीरचर्या में निरत रहकर असंयम बरतता है, तो उसकी विलासिता, तृष्णा और अहंता द्वारा अपनाई गई उद्दंडता अपराध श्रेणी में गिनी जाएगी। महत्त्वपूर्ण पदों पर अवस्थित अधिकारी जब उत्तरदायित्वों की अवहेलना करते हैं, तो उन्हें भर्त्सना एवं प्रताड़ना भी उतनी ही बड़ी मिलती है। सेनानायकों को तनिक-सा प्रमाद बरतने पर कोर्ट मार्शल होते और गोली से उड़ाए जाते देखा गया है। प्रमादी मनुष्य के साथ भी नियति के न्यायालय में इससे कम कठोरता नहीं बरती जा सकती।

माला घुमाकर, धूपबत्ती जलाकर, स्तवन सुनकर, कर्मकांडों से फुसलाकर भगवान को उल्लू बना देने और निर्धारित जिम्मेदारी से मुक्त करके मनमाना स्वेच्छाचार बरतने की छूट पा लेना ऐसे ही लोगों की कुकल्पना है, जिनने छल ही सीखा और सिखाया है। पूजा-पाठ का अपना उद्देश्य और स्वरूप है, पर वह मानवी कर्त्तव्यपालन का स्थान ग्रहण नहीं कर सकता। वह अनुशासन तो चट्टान की तरह अटल है। उसकी अवहेलना के लिए कोई विकल्प नहीं ढूँढा जा सकता। पूजा-पाठ भी नहीं। भक्त और पुजारी का लबादा ओढ़ लेने पर भी कर्त्तव्य की आँखें भी धूलि झोंकने की चाल चलती नहीं। आत्मा को यदि जीवन में भागीदार मानना है, तो ईमानदारी इसी में है कि उसकी आवश्यकता समझी जाए, उपलब्धियों में हिस्सेदारी दी जाए। प्रगति और प्रसन्नता का लाभ शत-प्रतिशत शरीर को ही न मिलता रहे। उसकी व्यवस्था आत्मा के लिए भी होनी चाहिए।


आयु का लेखा-जोखा

नई सृष्टि की रचना हुई। भगवान का दरबार लगा था। सभी प्राणियों में वे आयु का वितरण कर रहे थे। अधिक भीड़ देखकर मनुष्य एक किनारे हटकर बैठ गया। भीड़ समाप्त होने पर वह भगवान के पास पहुँचा। उस समय दूसरे प्राणी तो जा चुके थे, पर वहाँ एक बैल, एक कुत्ता, एक उल्लू मौजूद थे। मनुष्य ने कहा— देव! मेरी आयु?

भगवान के कोष में मात्र पच्चीस वर्ष आयु बची थी। वह उन्होंने मनुष्य को दे दी। मनुष्य गिड़गिड़ाया— भगवन्! इतनी कम आयु? इससे भला क्या होगा?

पास खड़े बैल ने परमात्मा से पूछा— महाराज! आपने मुझे आयु तो अधिक दे दी, पर काम नहीं बताया। भगवान बोले— “तुझे बोझ ढोना होगा। जीवन भर वजन उठाना होगा। खाने को मिलेगा घास-पात। बैल बहुत निराश हुआ। उसने प्रार्थना की— देव! मेरी आयु पच्चीस वर्ष काटकर मनुष्य को देने की कृपा करें। वह आयु की माँग भी कर रहा था। ईश्वर ने उसकी बात मान ली। पर मनुष्य उतने से भी संतुष्ट न हुआ। अधिक आयु के लिए फिर गिड़गिड़ाया।

कुत्ता भी पास में ही खड़ा था। वह बोला— “दयानिधि! आपने इतनी लंबी आयु देकर मुझे काम नहीं बताया।” भगवान ने कहा— “तुझे जीवन भर चौकीदारी करनी होगी, मनुष्य के साथ स्वामिभक्त होकर रहना होगा। बदले में तुझे रोटी का टुकड़ा मिल जाएगा।”

कुत्ता बोला— मेरी आयु में से भी पच्चीस वर्ष काटकर मनुष्य को देने की कृपा करें। भगवान ने कहा— तथास्तु!

पचहत्तर वर्ष की आयु पाकर भी मनुष्य असंतोष व्यक्त कर रहा था। उसने कुछ वर्ष और आयु की माँग की।

उल्लू भी वह बातचीत सुन रहा था। परमात्मा से उसने भी अपने काम के बारे में पूछा? वह बोले— तुझे सारी रात किसी खंडहर में अथवा वृक्ष के कोटर में बैठकर चीखना होगा।”

उल्लू ने कहा— देव! तब तो यह आयु बहुत भारी पड़ेगी। मेरी आयु का पच्चीस वर्ष भी मनुष्य को दे दें। परमात्मा ने उसकी बात मान ली। उधर शतायु पाकर मनुष्य अत्यंत हर्षित हुआ।

बच्चे के रूप में मनुष्य अवतरित हुआ। सबका प्यार मिला। बड़ा हुआ— युवक के रूप में विकसित हुआ। विवाह हुआ, दायित्वों का बोझ बढ़ता गया। बैल की तरह पच्चीस वर्षों तक वह बोझ ढोता रहा। क्षमताएँ खोई— सम्पत्ति कमाई। शक्ति तो समाप्त हो गई; पर चिंताएँ अधिक बढ़ गईं। धन की सुरक्षा की; बेटे-पोतों के देखभाल की। युवा बेटे ने कार्यभार सँभाला; पर उस अधेड़ को चैन कहाँ? कहीं कोई संपत्ति हड़प न ले— बेटे को धोखा न दे, मन में यह आशंका सदा बनी रहती। वफादार कुत्ते की तरह पच्चीस वर्ष जीवन के और गुजारे। बुढ़ापे ने अपना शिकंजा कसा। कमर झुक गई। बची सामर्थ्य भी जाती रही। चलने में पैर लड़खड़ाते थे, आँखों से कम दिखाई पड़ने लगा। दुर्बलता के कारण अनेकों बीमारियों ने शरीर में अड्डा जमाया। उल्लू की आयु आई। वह रात भर न तो स्वयं सोता और न दूसरों को सोने देता। भयंकर यंत्रणा में पच्चीस वर्ष और गुजरे। मृत्यु ने दस्तक दी। असंतुष्ट वह इस संसार से विदा हुआ।

यह कथा है उन सभी मनुष्यों की, जो सचमुच ही भगवान की दी हुई लंबी आयु को निष्प्रयोजन व्यतीत करते हैं। पेट और प्रजनन के इर्द-गिर्द समस्त चेष्टाएँ चलती हैं। जीते और मेहनत भी करते हैं, पर अपने-अपने शरीर और उससे जुड़े संबंधों तक सीमित रह जाते हैं। बैल, कुत्ते और उल्लू की तरह जीवन के दिन किसी तरह पूरे करते हैं। उस स्तर से उबरने का प्रयास नहीं करते। अंततः हाथ मलते हुए इस दुनिया से विदा हो जाते हैं।


नर-पशु नहीं, नर-नारायण बनें

मनुष्य जीवन के दो स्वरूप हैं। एक नर-पशु, दूसरा नर-नारायण। दोनों का बाह्यस्वरूप तो एक जैसा दिखाई पड़ता है, किंतु आंतरिक स्थिति में भारी अंतर पाया जाता है। विचारों, भावनाओं एवं क्रियाकलापों की दृष्टि से दोनों के बीच आसमान-धरती जैसा अंतर होता है। एक की चेष्टाएँ व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ-मोह की आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं, तो दूसरे की धर्म-संस्कृति, समाज तथा प्राणिमात्र के कल्याण के लिए नियोजित रहती हैं। एक का श्रम और मनोयोग शरीर तक सीमित रहता है, तो दूसरा अपनी क्षमता लोक-कल्याण के लिए समर्पित कर देता है। स्वरूप में एकरूपता दिखते हुए भी आंतरिक विभिन्नता एक को नर से नारायण, दूसरे को नर से पशु बना देती है।

मनुष्य की बनावट ऐसी है कि वह ढर्रे का जीवन जीना चाहता है। दूसरे जिस दिशा में चल रहे हैं, मनुष्यों में अधिकांश उसी का अनुकरण करते तथा पानी के प्रवाह में बहते हुए तिनके की तरह बहने लगते हैं। ढर्रे से अलग हटकर नया रास्ता बनाना तथा श्रेष्ठता की ओर बढ़ सकने का साहस उनसे बन नहीं पाता। भेड़ों के झुंड के समान वे बढ़ते जाते हैं। कहने को तो आँखें भेड़ों की भी होती हैं, किंतु तथ्यतः वे अंधी ही होती हैं, क्योंकि उनमें अंधानुकरण की उपहासास्पद प्रवृत्ति ही प्रधान होती है। एक भेड़ जिधर को निकल पड़े, उसी के पीछे सारा झुंड चलने लगता है। पीछे वाली भेड़ें यह नहीं सोचतीं-देखतीं कि आगे वाली भेड़ कोई भूल तो नहीं कर रही है। उसका अनुकरण करके हमें पछताना तो नहीं पड़ेगा।

जीवन की दिशा निर्धारित करना मनुष्य का पहला काम है। इस निर्धारण में यदि भूल हुई, तो पीछे पश्चात्ताप ही हाथ लगेगा। जाना पूर्व को है तथा चल पड़े पश्चिम को। उस पश्चिम दिशा में कितनी ही कुशलता क्यों न दिखाई जाए, कितना ही पुरुषार्थ क्यों न किया जाए, उससे सुख-शांति एवं प्रगति का लक्ष्यप्राप्ति में तनिक भी सहयोग नहीं मिल सकता।

बुद्धिमान लोग यात्रा करने के पूर्व आवश्यक जानकारी तथा रास्ते की दिशा का पता पहले प्राप्त कर लेते हैं और तब अपनी यात्रा आरंभ करते हैं। यदि रास्ते का ज्ञान प्राप्त किए बिना यात्रा पर चल पड़े, तो भटकते रहेंगे। अंततः पश्चात्ताप ही हाथ लगता है।

जीवन-लक्ष्य का निर्धारण अनिवार्य प्रयोजन है। जिसे पूरे सोच-विचार के बाद— प्रतिक्रिया और परिणाम समझने के बाद निश्चित किया जाना चाहिए। क्रियाकलापों का आरंभ विवेकपूर्ण निर्धारण के बाद करना चाहिए।

जीवनरूपी सड़क दो दिशाओं को जाती है— एक पूर्व की ओर और दूसरी पश्चिम की ओर। चौराहे पर मनुष्य खड़ा है। उसे यह स्वतंत्रता मिली है कि वह किसी भी दिशा की ओर बढ़ जाए। एक दिशा में चलते हुए क्रमशः पतन के गर्त में गिरते हुए नर-पशु से नर-पिशाच की स्थिति में जा पहुँचेगा और नारकीय जलन में जलने वाली अंधतमिस्रा के गर्त में जा गिरेगा। दूसरी दिशा में चलते हुए महामानव देव की स्थिति तक पहुँच सकता है। यह निर्धारण तो स्वयं को करना है कि किस दिशा में चलना तथा कहाँ पहुँचना है? भीड़ को देखकर उसके साथ किधर भी चल पड़ने में मनुष्य की समझदारी नहीं है। ऊँट के विषय में कहा जाता है कि उसका मुँह जिधर भी उठ जाए, उधर ही चल पड़ता है, उसे आगा-पीछा सोचने का कुछ भी विचार नहीं रहता। मनुष्य ऊँट नहीं है कि जिधर भी कदम उठे, बिना सोचे चल पड़े। न ही भेड़ के समान उसे अंधानुकरण की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए।

नर-पशुओं की दिशा वह है, जिसमें केवल तात्कालिक लाभ और शरीरसुख ही इष्ट रहता है। दूरगामी परिणामों को सर्वथा भुला दिया जाता है। नशेबाज, अनीति, अत्याचार करने वाले प्रायः इसी प्रवृत्ति को अपनाते हैं। आसुरी विकारों को न रोक पाते हैं। अवसर मिलने पर कुमार्ग पर अंधाधुंध चल पड़ते हैं। यह ध्यान ही नहीं रखते कि इससे शरीर को कितनी क्षति पहुँच रही है। आयु कितनी क्षीण होती है। लोकनिंदा का कितना भाजन बनना पड़ता है। उपार्जन कर्तृत्व में कितनी कमी आती है। घर की बरबादी कितनी होती तथा भविष्य कितना अंधकारमय बनता है। दूर की बात सोचना तथा सही दिशा में चलना दुर्बल मनोभूमि के लिए संभव नहीं होता।

ऐसी मनोवृत्ति के मनुष्य पशु जीवन ही जीते हैं। उन्हें तात्कालिक लाभ इंद्रिय सुख, अहंकार की पूर्ति और वैभव उपार्जन में ही दिखाई पड़ता है। इसी परिधि में उनकी सारी आकांक्षाएँ और गतिविधियाँ सीमित रहती हैं। उपरोक्त प्रयोजनों की पूर्ति में ही उनकी रुचि— प्रवृत्ति होती है। शारीरिक स्वार्थों से जुड़े हुए स्त्री-पुत्र ही मात्र उन्हें प्रिय लगते हैं। बाहरी सभी लोग बिराने दीखते हैं। देने अथवा कुछ करने का दायरा स्त्री-पुत्रों तक ही सिमटकर रह जाता है। पिता-माता, भाई-बहनों तक से उदार व्यवहार कर पाना उनसे संभव नहीं हो पाता। उनसे भी अपना तात्कालिक लाभ की बात ही सोचते रहते हैं। ऐसा लोभ-मोह के, अहंकार और तृष्णा-वासना के बंधनों में जकड़ा स्वार्थी और संकीर्ण जीवन वस्तुतः पशु जीवन ही है।

यह प्रवृत्ति जब अधिक प्रबल और उच्छृंखल होती जाती है, तो वह पैशाचिकता के रूप में विकसित होती चली जाती है। फिर मनुष्य समस्त मर्यादाओं की नीति-अनीति का विचार छोड़कर जिस प्रकार भी अपनी तृष्णा तृप्त हो, वही करने पर उतारू हो जाता है। पाप, अपराध ही उसे आकर्षक और शीघ्र लाभ देने वाले लगते हैं। उन्हें वह निःसंकोच अपनाता है और ऐसे कर्म करता है, जिसे देखकर मनुष्यता भी कलंकित होती है। दूरदर्शिता से रहित स्वार्थ और संकीर्णता से भरी हुई पशु-प्रवृत्ति धीरे-धीरे पैशाचिकता की ओर अग्रसर होती है। इस राह पर चलने वाले व्यक्ति तात्कालिक कुछ लाभ भले ही प्राप्त कर ले, किंतु अंततः उन्हें भी घाटा ही उठाना पड़ता है। आत्मप्रताड़ना, सामाजिक तिरस्कार, राजदंड तथा ईश्वरीय कोप इतना बड़ा है कि तात्कालिक प्राप्त लाभ उसके समक्ष कुछ भी नहीं है। पश्चात्ताप की अग्नि में चिरकाल तक झुलसने के अतिरिक्त ऐसे लोगों के पास और कोई रास्ता नहीं रह जाता है।

दूसरा रास्ता सही दिशा की ओर जाता है। जिस पर चलने से जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है। इस राह पर मनुष्य को दूरदृष्टि अपनानी पड़ती है। उसके मन में यह विचार आता है कि जो विभूतियाँ सृष्टि के किसी प्राणी को नहीं मिलीं, उसे ही क्यों प्रदान की गई हैं। उनका उद्देश्य क्या है? यह तथ्य जानकर जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए विचार करता है। यह सोचता है कि मानव जीवन का सु-अवसर बार-बार कहाँ मिलता है? ईश्वर द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्वों को पूरा करने में ही उसकी सार्थकता है। पेट-प्रजनन, वासनाओं-तृष्णाओं में जीवन-संपदा को झोंककर आत्मप्रताड़ना, सामाजिक तिरस्कार तथा ईश्वरीय दंड का परिणाम प्राप्त करना उसे अविवेकपूर्ण लगता है।

आमतौर से जनप्रवाह लोभ-मोह को सर्वस्व मानकर उसी में भटकता रहता है। उनका अनुकरण करने तथा परामर्श मानने से उन्हीं की तरह कीचड़ में धँसना पड़ेगा। अपना रास्ता आप बनाने तथा श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ चलने वालों को इतना साहस तो करना ही चाहिए कि लोग क्या कहते हैं तथा क्या करते हैं, उससे प्रभावित न हों। पतन के प्रवाह को चीरते हुए आदर्शवादिता की दिशा में चलने का साहस तथा अवरोधों और विरोधों को सहकर ही ईश्वर का पल्ला पकड़ा जा सकता है। एक साथ शैतान एवं भगवान को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

मनुष्य जीवन की सार्थकता देवत्व की ओर बढ़ने में है। नर-नारायण— पुरुष से पुरुषोत्तम, तुच्छ से महान, आत्मा से परमात्मा बनने में है। यदि अब तक उलटी दिशा में चला गया, तो दूरदर्शिता इसमें है कि आदर्शवादी पराक्रम द्वारा अपनी-अपनी दिशा को बदला जाए। आत्मसंतोष-आत्मकल्याण से लेकर विश्वमानव के प्रति अपने महान कर्त्तव्य की पूर्ति के लिए कटिबद्ध होने से ही महानता का—  देवत्व का—  पूर्णता की प्राप्ति का—  लाभ मिल सकता है।


जीवन– एक अनबूझ पहेली

विकासक्रम में मनुष्य ने जितना ज्ञान अर्जित किया है, वह असीम संभावनाओं के सामने अत्यल्प है। जो जानकारियाँ उपलब्ध हुईं, वे भी अपने में परिपूर्ण नहीं। उनके आधार पर बनी मान्यताओं में हेर-फेर की पूरी-पूरी गुंजाइश है। समय की सर्वोच्च महत्ताप्राप्त ज्ञान की शाखा— विज्ञान द्वारा दी गई संसारविषयक परिभाषाओं तथा उनकी व्याख्याओं से किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना प्रायः कठिन हो गया है। पदार्थ के नगण्य से घटक परमाणु के यथार्थ स्वरूप की तो ठीक-ठीक जानकारी भी अब तक भौतिकविदों को मिल नहीं सकी है। अन्वेषणक्रम में उसके संदर्भ में अगणित मान्यताएँ समय-समय पर बनी और कालांतर में उलटती चली गईं। आज भी पदार्थसत्ता का जो स्वरूप विज्ञान-क्षेत्र में मान्यता प्राप्त है, संदिग्ध है।

उलझे प्रश्नों में अगणित ऐसे हैं, जिनका समाधान विज्ञान नहीं दे सका है, जिनमें से एक है— जीवन-मृत्यु संबंधी व्याख्या-विवेचना। जीवन क्या है और मृत्यु का यथार्थ स्वरूप क्या है, इन प्रश्नों का सही उत्तर अभी तक विज्ञान द्वारा नहीं मिल सका है। जीवित कौन है और निर्जीव किसे कहा जाए, ये प्रश्न अत्यंत उलझे हुए हैं, जिनका उत्तर ढूँढने के लिए वैज्ञानिकों को सदियों से माथापच्ची करनी पड़ी है और वर्तमान में करनी पड़ रही है। जड़ और चेतन के बीच, जीवित-निर्जीव के बीच एक निश्चित सीमारेखा खींची नहीं जा सकती है।

यों तो सामान्य ज्ञान की दृष्टि से सजीव एवं निर्जीव के बीच एक मोटा विभाजन किया जा सकता है; पर गहराई में प्रविष्ट करके खोज करने पर वह विभाजनरेखा टूटती दिखाई पड़ती है। एक रोचक विषय पर खोज करने वाले कोलंबिया विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर ‘सर गेराल्ड फेनवर्ग’ का कहना है कि, “मोटा वर्गीकरण सजीव-निर्जीव के बीच यह है कि मनुष्य, जीवजगत, पेड़-पादप तथा जीवाणु सहज ही पत्थर, बालू, मिट्टी आदि पदार्थों से भिन्न दीखते तथा प्रतिक्रियाएँ दिखाते पाए जाते हैं।” पर उपरोक्त वर्गीकरण में दोष तब ज्ञात होता है, जब निर्जीव समझे जाने वाले पदार्थों में भी जीवन जैसी आकस्मिक हलचलें दृष्टिगोचर होती हैं।

‘साइंस डाइजेस्ट’ (मार्च 83) पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के अनुसार एक वैज्ञानिक ने समुद्र तल का ‘टाइम लैप्स’ फोटोग्राफी विधि से फोटो लेकर अध्ययन किया, जिसका आश्चर्यजनक परिणाम सामने आया। पत्थर जैसी एक निर्जीव वस्तु तीन माह तक तल से चिपकी रही, अचानक एक दिन अपने आप उठी तथा एक फुट की ऊँचाई तक जाकर स्थिर हो गई। पुनः कुछ घंटे बाद वह नीचे जाकर अपने पूर्व स्वरूप में जम गई। एक दूसरे पत्थर में एक भुजा जैसी संरचना अंकुरित हुई, 12 घंटे तक लहराती रही तथा इसके बाद छह माह तक गतिहीन बनी रही।

‘प्रोफेसर गेराल्ड फेनवर्ग’ ने एक दूसरा उदाहरण प्रस्तुत किया है— टार्डिग्रेड समुदाय के जीवों का। “ये नग्न आँखों से छोटे कीड़े की आकृति जैसे दिखाई पड़ते हैं; पर इन्हें बॉटल में कई वर्षों तक सुखाकर सुरक्षित रखा जा सकता है। इतने समय बाद भी यदि उसमें जल मिलाया जाए, तो वह निर्जीव दिखाई पड़ने वाला जीव अपनी सामान्य स्थिति के रूप में हलचल करने लगता है। यह ‘क्रिप्टोबायोसिस’— गुप्त जीवन का जीता-जागता एक ऐसा उदाहरण है, जो वैज्ञानिकों के लिए आज भी रहस्यमय बना हुआ है। कौन जीवित है, कौन निर्जीव यह एक विवादास्पद प्रश्न है, जिसका कोई सुनिश्चित हल अब तक नहीं निकल सका है।”

टार्डिग्रेड वर्ग की तरह ही अन्य कई वाइरस पाउडर अवस्था में वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं। वे जल के प्रभाव से अपनी क्षमता को हासिल तो नहीं कर सकते, पर परजीवी कोशों की सहायता से पुनः अपनी जीवन-प्रक्रिया आरंभ कर सकते तथा प्रजनन कार्य में भी संलग्न हो सकते हैं।

उपरोक्त की तरह अनेकों ऐसी संरचनाएँ हैं, जिनके विषय में निश्चित रूप से यह कहना मुश्किल है कि उन्हें जीवित की श्रेणी में रखा जाए अथवा निर्जीव की।

जीवविज्ञानियों ने उन्हें सजीव माना है, जिनमें न्यूक्लिक एसिड तथा प्रोटीन जैसे यौगिक हों; पर कुछ वैज्ञानिकों ने इस परिभाषा को अपूर्ण मानते हुए यह कहा है कि, “यह जरूरी नहीं कि जीवन के आवश्यक घटक पृथ्वी की परिस्थितियों के लिए अनिवार्य हैं, दूसरे ग्रहों के लिए भी हों। संभव है, वहाँ जीवन का कोई और स्वरूप हो। यह भी हो सकता है कि अन्यान्य ग्रहों पर जीवन की खोज-बीन करने वाले वैज्ञानिकों की मूलभूत दिशाधारा ही गलत हो। कारण कि उन पर किसी और रूप में जीवन क्रीड़ा-कल्लोल कर रहा हो और मनुष्य अपनी सीमित जानकारियों के कारण उन्हें देखने-समझने में असमर्थ सिद्ध हो रहा हो।” इस तथ्य को और भी अच्छी प्रकार एक उदाहरण से स्पष्ट करते हुए ‘प्रो. गेराल्ड’ लिखते हैं— “हम एक ऐसे शहर की कल्पना करें, जहाँ मात्र पीले रंग की कारें ही चलती हैं, इस शहर के लिए कार की पहचान पीला रंग ही हो सकता है; पर अन्य शहरों के लिए भी यह निर्धारण सही साबित हो, यह आवश्यक नहीं। जीव विज्ञान द्वारा प्रतिपादित जीवन का स्वरूप महत्त्वपूर्ण होते हुए भी परिपूर्ण तथा सर्वसम्मत परिभाषा नहीं बन सकता।”

कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि हमारा जीवन संबंधी निर्धारण इतना संकुचित न हो कि भू-क्षेत्र के अतिरिक्त जीवन की परिकल्पना ही न की जा सके, न ही इतना अतिवादी हो कि वह निरर्थक जान पड़े। उदाहरणार्थ मात्र गति के आधार पर किसी पदार्थ को जीवित मान लेना उचित नहीं। हलचल तो परमाणु में भी होती रहती है। इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन भी गति करते हैं। इससे समूचा ब्रह्मांड ही सजीव की परिभाषा में आ जाता है; पर यह मान्यता भी उपयुक्त नहीं लगती।

कुछ वैज्ञानिकों ने जीवन का संबंध शरीर-रचना तथा उसकी हलचलों से जोड़ा है। उनके अनुसार, “सजीव वह है, जो गति, विकास, प्रजनन तथा उत्तेजना जैसी क्रियाएँ संपन्न कर सकता हो; पर अन्यान्य ग्रहों पर जीवन का अस्तित्व मानने तथा उसके भिन्न रूप की कल्पना करने वाले विशेषज्ञों ने इस परिभाषा को संकुचित माना तथा कहा है कि, “गति, विकास एवं उत्तेजना की क्रियाएँ तो जलती अग्नि में भी दिखाई पड़ती हैं। ईंधन डालने पर वे भभक उठती हैं, आँधी तथा तूफान में उसकी लपटें और भी तेज हो जाती हैं, पर मात्र इन विशेषताओं के आधार पर उसे सजीव कैसे कहा जा सकता है।”

वैज्ञानिकों का एक समुदाय जीवन को जीवमंडल की क्रियाशीलता के रूप में स्वीकारता है तथा मानता है कि जीवमंडल पदार्थ व ऊर्जा की समन्वित व सुव्यवस्थित प्रणाली है, जो अपना संतुलन वातावरण में एक ऊर्जाचक्र द्वारा बनाए रखता है। परामनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति में ऐसे जीवित प्राणियों का— आत्माओं का भी अस्तित्व है, जो अशरीरी हैं; किंतु समय-समय पर विभिन्न रूपों में अपना प्रमाण— परिचय देती रहती हैं। अतएव जीवन को जीवमंडल की क्रियाशीलता तक मानना एक अपूर्ण तथा अधूरी मान्यता होगी।

जीवन की तरह मृत्यु का यथार्थ स्वरूप अब तक नहीं प्रस्तुत किया जा सका है। एक अनबूझ पहेली के रूप में वह विज्ञान के समक्ष चुनौती बना हुआ है। प्रश्न के उलझने तथा संबद्ध विषय पर विवाद के बढ़ने का कारण वे घटनाएँ रही हैं, जिनमें कितने ही व्यक्ति हृदय की धड़कन बंद होने, श्वास गति रुकने अथवा मस्तिष्क के ठप्प हो जाने के आधार पर मृत घोषित किए गए; पर बाद में चिता अथवा श्मशान से जीवित उठ बैठे। ऐसी घटनाएँ भी प्रकाश में आई हैं, जिनमें कितने ही व्यक्ति कई दिनों बाद भी मृत्यु से वापस लौट आए तथा पूर्ववत् जीवन जीने लगे। ‘रेमंड मूडी’ की ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’, ‘श्रीमती रेनारुथ’ की ‘रिइनकार्नेशन एंड साइन्स’ तथा इस विषय पर लिखी अन्यान्य पुस्तकों में ऐसी अगणित घटनाओं का विस्तृत उल्लेख है।

‘साइंस’ अगस्त 1980 पत्रिका में प्रकाशित एक लेख ‘पैनल आस्क्स-ह्वेन इज ए परसन डेड’ में विभिन्न देशों के मूर्धन्य वैज्ञानिकों, चिकित्सकों बायोमेडिकल विशेषज्ञों, पुरोहित-पादरियों की संपन्न हुई एक संयुक्त बैठक की चर्चाओं का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया गया है, जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है तथा यह बताता है कि वर्तमान समय में भी मृत्युविषयक धारणाएँ अत्यंत उलझी हुई हैं। विशेषज्ञों के परस्पर विरोधी मत मृत्यु की एक निश्चित परिभाषा देने में अक्षम सिद्ध हो रहे हैं।

इस विषय पर वाशिंगटन में संपन्न हुई गोष्ठी में विस्तृत चर्चा हुई तथा अनेकों प्रकार के मत सामने आए। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मस्तिष्कीय क्रियाकलापों का पूर्णतः ठप्प पड़ जाना, हृदय की धड़कन का बंद हो जाना तथा श्वसनतंत्र  की गतिविधि का रुक जाना, किसी की मृत्यु का चिह्न माना जाता है; पर परिचर्या में सम्मिलित हुए विशेषज्ञों ने इस परिभाषा को परिपूर्ण नहीं माना। अमेरिका के विभिन्न प्रांतों में भी मृत्युविषयक निर्धारणों में अंतर है। पच्चीस प्रांतों में मान्यता है कि मस्तिष्कीय क्रियाशीलता का बंद होना मृत्यु का लक्षण है, जबकि पच्चीस अन्य प्रांतों में हृदयगति तथा श्वसनतंत्र की गति का पूर्णतः बंद हो जाने को मृत्यु माना गया है। कानून द्वारा भी यह निर्धारण मान्यताप्राप्त है। तीन अन्य प्रांतों में कानूनी तौर पर ब्रेन डेथ को मृत्यु की संज्ञा दी गई है।

पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय के कानून अध्यापक तथा ‘ब्रेन डेथ इशू’ के विशेषज्ञ ‘एलेक्जेंडर क्रेपन’, जो गणित मृत्यु आयोग के अध्यक्ष भी हैं, ने अपना अभिमत व्यक्त करते हुए कहा है कि, “मृत्यु का सर्वमान्य निर्धारण होना चाहिए, जिसमें ब्रेन डेथ, हृदय का बंद होना आदि की समन्वित प्रक्रिया सम्मिलित हो।”

मूर्धन्य वैज्ञानिक तथा विचारक ‘रुबी जे. डेविड’ ने कहा है कि, “ब्रेन डेथ को मृत्यु मानकर चिकित्सा उपक्रम बंद करा देना, एक अमानवीय प्रक्रिया होगी। यह एक प्रकार की मानव हत्या है। चेतना की संज्ञाशून्यता को मृत्यु मानना एक भारी भूल होगी। कारण कि चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे असंख्यों प्रमाण मौजूद हैं, जिसमें कितने ही व्यक्ति संज्ञाशून्यता अथवा ब्रेन डेथ की स्थिति में भी जीवित बने रहे। साथ ही ऐसे रहस्यमय योगियों का भी उदाहरण मिलता है, जो अपनी शारीरिक हलचलों, मस्तिष्क, हृदय, श्वसन आदि तंत्रों के क्रियाकलापों को स्वेच्छापूर्वक रोकने में समर्थ होते हैं। भौतिक प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर भी ऐसे प्रमाण मिल चुके हैं।

उटाह विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक ‘मोसेस टेलर’ का कहना है कि, “किसी को मृत घोषित करने के पूर्व सभी लक्षणों का सूक्ष्म अध्ययन करना आवश्यक है, तभी किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना संभव है। प्रचलित मृत्यु की परिभाषा अपने आप में अपूर्ण है। उसका कोई सुनिश्चित निर्धारण नहीं है। उदाहरणार्थ ‘ई. ई. जी.’ यंत्र ब्रेन हलचलों के मापन हेतु सर्वश्रेष्ठ माना जाता है; पर मूर्च्छना आदि की स्थिति में उसकी रिपोर्ट गलत भी हो सकती है।

अध्यात्म दर्शन जीवन-मरण को एक अविच्छिन्न चेतना-प्रवाह की दो भिन्न स्थिति भर मानता है तथा कहता है कि मरण तो शरीर परिवर्तन की एक सामान्य प्रक्रिया मात्र है। मूलतः जीवनसत्ता कभी नहीं मरती, उसका अस्तित्व सदा बना रहता है। अभ्यासक्रम में न होने के कारण ही वह अटपटा, असामान्य तथा भयानक प्रतीत होता है। उसी तरह जिस प्रकार कि अनजाना सफर। मृत्यु जीवनयात्रा का एक पड़ावमात्र है। जीवन का अस्तित्व शाश्वत है। उसके प्रवाह में मृत्यु तो एक मोड़मात्र है।


परमात्मा की नजर (कहानी)

फकीर जुन्नैद आँखों में आँसू भरकर परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे— “मैंने सब कुछ छोड़ दिया, अब एक तेरे ऊपर नजर टिकी है; पर प्यारे यह तो बता कि तेरी नजर भी मेरी तरफ है या नहीं?”

भीतर का परमात्मा बोला— “जब तक दूसरे की नजर अपनी ओर होने, न होने में संदेह है, तब तक दूरी बनी ही रहती है। अपनी नजर जमाए रहने में ही संतोष कर। फिर देख!”


सत्य के तीन पहलू

भगवान बुद्ध के पास एक व्यक्ति पहुँचा। बिहार के ‘श्रावस्ती’ नगर में उन दिनों उनका उपदेश चल रहा था। शंका-समाधान के लिए— उचित मार्गदर्शन के लिए लोगों की भीड़ उनके पास प्रतिदिन लगी रहती थी।

आगंतुक ने पूछा— क्या ईश्वर है? बुद्ध ने एकटक उस युवक को देखा, बोले— “नहीं है।” थोड़ी देर बाद एक दूसरा व्यक्ति पहुँचा। उसने भी उसी प्रश्न को दुहराया— क्या ईश्वर है? इस बार भगवान बुद्ध का उत्तर भिन्न था। उन्होंने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा— “हाँ ईश्वर है।” संयोग से उसी दिन एक तीसरे आदमी ने भी आकर प्रश्न किया— क्या ईश्वर है? बुद्ध मुस्कराए और चुप रहे— कुछ भी नहीं बोले। अन्य दोनों की तरह तीसरा भी जिस रास्ते आया था, उसी मार्ग से वापस चला गया।

आनंद उस दिन भगवान बुद्ध के साथ ही था। संयोग से तीनों ही व्यक्तियों के प्रश्न एवं बुद्ध द्वारा दिए गए उत्तर को वह सुन चुका था। एक ही प्रश्न के तीन उत्तर और तीनों ही सर्वथा एकदूसरे से भिन्न। यह बात उसके गले नहीं उतरी। बुद्ध के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा— अविचल निष्ठा थी, पर तार्किक बुद्ध ने अपना राग अलापना शुरू किया, आशंका बढ़ी। सोचा, व्यर्थ आशंका-कुशंका करने की अपेक्षा तो पूछ लेना अधिक उचित है।”

आनंद ने पूछा— “भगवन्! धृष्टता के लिए क्षमा करें। मेरी अल्प बुद्धि बारंबार यह प्रश्न कर रही है कि एक ही प्रश्न के तीन व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न उत्तर क्यों? क्या इससे सत्य के ऊपर आँच नहीं आती?

बुद्ध बोले— “आनंद! महत्त्व प्रश्न का नहीं है और न ही सत्य का संबंध शब्दों की अभिव्यक्तियों से है। महत्त्वपूर्ण वह मनःस्थिति है, जिससे प्रश्न पैदा होते हैं। उसे ध्यान में न रखा गया— आत्मिक प्रगति के लिए क्या उपयुक्त है, इस बात की उपेक्षा की गई, तो सचमुच ही सत्य के प्रति अन्याय होगा। पूछने वाला और भी भ्रमित हुआ, तो इससे उसकी प्रगति में बाधा उत्पन्न होगी।

उस सत्य को और भी स्पष्ट करते हुए भगवान बुद्ध बोले— “प्रातःकाल सर्वप्रथम जो व्यक्ति आया था, वह था तो आस्तिक, पर उसकी निष्ठा कमजोर थी। आस्तिकता उसके आचरण में नहीं, बातों तक सीमित थी। वह मात्र अपने कमजोर विश्वास का समर्थन मुझसे चाहता था। अनुभूतियों की गहराई में उतरने का साहस उसमें न था। उसको हिलाना आवश्यक था, ताकि ईश्वर को जानने की सचमुच ही उसमें कोई जिज्ञासा है, तो उसे वह मजबूत कर सके, इसलिए उसे कहना पड़ा— “ईश्वर नहीं है।”

दूसरा व्यक्ति नास्तिक था। नास्तिकता एक प्रकार की छूत की बीमारी है, जिसका उपचार न किया गया, तो दूसरों को भी संक्रमित करेगी। उसे अपनी मान्यता पर अहंकार और थोड़ा अधिक ही विश्वास था। उसे भी समय पर तोड़ना जरूरी था। इसलिए कहना पड़ा— “ईश्वर है।” इस उत्तर से उसके भीतर आस्तिकता के भावों का जागरण होगा। परमात्मा की खोज के लिए आस्था उत्पन्न होगी। उसकी निष्ठा प्रगाढ़ है। अतः उसे दिया गया उत्तर उसके आत्मविकास में सहायक ही होगा।

तीसरा व्यक्ति सीधा-साधा, भोला था। उसके निर्मल मन पर किसी मत को थोपना उसके ऊपर अन्याय होता। मेरा मौन रहना ही उसके लिए उचित था। मेरा आचरण ही उसको सत्य की खोज के लिए प्रेरित करेगा तथा सत्य तक पहुँचाएगा।”

आनंद का असमंजस दूर हुआ। साथ ही इस सत्य का अनावरण भी कि महापुरुषों द्वारा एक ही प्रश्न का उत्तर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न क्यों होता है? साथ ही यह भी ज्ञात हुआ कि सत्य को शब्दों में बाँधने की भूल कभी भी नहीं की जानी चाहिए।


तर्क— विवेकसम्मत हो तो ही श्रेयस्कर

बुद्धिमत्ता को इन दिनों बहुत श्रेय मिला है। तर्क को सर्वाधिक प्रधानता मिलने लगी है और समझा जाने लगा है कि इसी आधार पर तथ्य तक पहुँचा जा सकता है। दावेदार यहाँ तक कहते हैं कि सत्य को समझना या प्राप्त करना तर्क द्वारा ही संभव हो सकता है, इसलिए वह सत्य से भी बढ़कर है।

यदि यह प्रतिपादन सही हो, इसमें एक कड़ी और जोड़नी पड़ेगी और कहना पड़ेगा कि तर्क का मूलभूत आधार औचित्य एवं विवेक होना चाहिए। इस सम्मिलन को भाव-संवेदना की— मानवी गरिमा की पक्षधर श्रद्धा-सद्भावना भी कहा जा सकता है। अध्यात्म भाषा में इसी को ‘प्रज्ञा’ कहते हैं और सत्य तथा तथ्य को समझने में इसी को अपनाने पर जोर देते हैं।

इस आवश्यकता की पूर्ति मस्तिष्कीय कलाबाजी से उत्पन्न तर्कों द्वारा नहीं हो सकती है। ऐसी कलाबाजी तो अदालतों में जाकर उन बहसों में भी सुनी जा सकती है, जो वकीलों द्वारा अपने-अपने यजमान को विजयी बनाने के लिए जोरदार शब्दों में प्रस्तुत की जाती रहती है। सुनने वाला इन तर्कों में एक पक्ष की दलील सुनकर सही मान सकता है कि तथ्य यही हो सकता है; किंतु दूसरे ही क्षण जब विपक्षी वकील अपनी बात, अपने ढंग से— अपने तर्कों के सहारे कहने लगता है, तो पूर्वप्रतिपादन से सर्वथा विपरीत होते हुए भी बात उसकी भी वजनदार लगती है और उसकी बात पर विश्वास करने को भी जी करता है। ऐसी दशा में सहज असमंजस यह उत्पन्न होता है कि तर्क को किस हद तक मान्यता दी जाए। इस संदर्भ में न्यायाधीश की विवेक बुद्धि से अधिक दम-खम दीखता है, जो तर्कों को मान्यता नहीं देता, वरन गहराई में उतरकर तथ्य तक पहुँचने का प्रयत्न करता, वस्तुस्थिति समझने की चेष्टा करता है।

तर्क से ईश्वर सिद्ध नहीं हो सकता, इसे पुरातनकाल से लेकर अर्वाचीन दार्शनिक तक स्वीकार करते हैं। इसी प्रकार नीति और उदारता का समर्थन भी असंदिग्ध रूप से इस आधार पर नहीं किया जा सकता है। राजनीति में कूटनीति ही प्रधान होती है और नीति में छद्म के लिए पूरी-पूरी छूट है। गुप्तचर विभाग को अपनी स्थिति सर्वथा छिपाकर रखनी पड़ती है। जानकारी देने वाले सूत्रों को गोपनीय रखा जाता है। सेना भी अपने साधनों और कार्यक्रमों को गुप्त रखते हैं। ऐसी दशा में तर्क के सहारे तथ्यों तक किस प्रकार पहुँचा जाए, जब सूचनाएँ ही गलत हैं, तब तर्क का आधार ही डगमगा जाता है।

तर्क की स्थिति गेंद जैसी है, जो भावना या मान्यता की ठोकर लगते ही दिशा बदलती और कहीं-से-कहीं पहुँचती रहती है। अनीति बरतने वाले भी अपने कृत्य को उचित ठहराने के लिए कई बार ऐसे-ऐसे तर्क उपस्थित करते हैं, जिन्हें सामान्य बुद्धि से काटना कठिन पड़ता है। पशुवध और मांसाहार के पक्ष में पिछले दिनों तर्कों के पहाड़ खड़े किए जाते रहे हैं। स्वच्छंद यौनाचार के समर्थन में भी इतना मसाला प्रस्तुत किया जा चुका है कि औसत स्तर का मस्तिष्क उससे पूर्ण न सही, अर्धसहमत तो हो ही सकता है। वृद्ध पशुओं को समाप्त करने के पक्ष में प्रस्तुत किया जाने वाला तर्क वृद्धजनों के साथ भी वही नीति अपनाने के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। ऐसी दशा में मानवी गरिमा की पक्षधर आदर्शवादिता को मान्यता देने पर ही ऐसे तर्क निरस्त हो सकते हैं, जो पशु-प्रवृत्तियों की ओर बहते और जिसकी लाठी उसकी भैंस वाले मत्स्य-न्याय का समर्थन करते हैं।

उदाहरणों के लिए पिछले दिनों तथाकथित बुद्धिमानों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले उन तर्कों का पर्यवेक्षण किया जा सकता है, जो गोरे-काले वर्ण वालों के बीच ऊँच-नीच का अंतर बरते जाने के समर्थन में प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। कहा जाता रहा है कि गोरी चमड़ी वाले ऐसी विशेषताओं से युक्त हैं कि वे स्वामी बनकर रहें। साथ ही कालों का निर्धारण ही ऐसा हुआ है कि वे मुलायम बनकर रहें या उन्हें इसके लिए विवश किया जाए। जर्मन में नाजीवाद के समर्थकों ने अपनी जाति को ऐसी ही विशेषताओं से युक्त घोषित किया था। अभी भी दक्षिण अफ्रीका के शासक इसी बात को पूरे जोर-शोर के साथ दुहराते हैं। दबी जुबान से तो अमेरिका जैसे देश के वे लोग भी उसी मनोभूमि के हैं, जो प्रत्यक्षतः उसका खुला समर्थन नहीं करते। भारत के संविधान में छूत-अछूत की प्रथा समाप्त कर दी गई है और उसका व्यवहार दंडनीय घोषित किया गया है। फिर भी कितने ही लोग उसे येन-केन प्रकारेण अपनाए हुए दीखते हैं। इतना ही नहीं, अपनी बात को किन्हीं तर्कों के सहारे समर्थन भी करते हैं। स्त्रियों को उपासना न करने देने एवं नागरिक अधिकार देने में व्यवहारतः अभी भी रूढ़िवादियों का एक बड़ा वर्ग अपनी हठधर्मी को उचित ठहराने में चित्र-विचित्र तर्क प्रस्तुत करता देखा जाता है।

तथाकथित बुद्धिमान, विद्वान, मूर्धन्य कहे जाने वाले तार्किकों ने अपनी चिंतन की प्रखरता को यदि श्रेष्ठ कार्यों में नियोजित किया होता, तो स्थिति कुछ और ही होती। विज्ञान व समाज का जो वर्तमान स्वरूप है, वैसा नहीं दिखाई पड़ता। यह तर्क ही तो है, जो विश्वशांति के नाम पर दो महाशक्तियों की मिसाइलें एकदूसरे के सामने कर तनाव भरी स्थिति पैदा करता है। गोरे-काले वर्ण की उत्कृष्टता-निकृष्टता का समर्थन करते हुए वही दासप्रथा को उचित ठहराने, पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने एवं बंधुआ श्रमिकों के रूप में मानव को पददलित करने की बात पर जोर देता है। तर्क का सहारा लेकर मनीषी समुदाय मातृशक्ति को दूसरे दरजे पर बने रहने के लिए सहज ही बहुमत एकत्र कर लेता है।

लेकिन समय हमेशा एक-सा नहीं रहता। कालांतर में जब तर्क उपहासास्पद लगने लगते हैं, मनीषा जागती है, तो जनमत भी इन तर्कों को नकारने हेतु तत्पर हो जाता है। विडंबना यही है कि अध्यात्म-क्षेत्र इन विकृत तर्कों से इस बुरी तरह घिर गया है कि यह किलेबंदी किसी के टूटे नहीं टूटती। वैज्ञानिक मानचित्र में पूर्वार्त्त आध्यात्मिक अनुभवों को स्थान न मिल पाने का एक कारण भौतिकवाद का उपेक्षापूर्ण रुख ही नहीं, अध्यात्म-क्षेत्र में घुसे वे भ्रांतिपूर्ण कुतर्क भी हैं, जिनका कोई औचित्य नहीं। ये आदिकाल से थे अथवा मध्यकाल में जबरन ठूँस दिए गए, इस विवाद में न पड़कर यदि इस विधा के सर्वांगपूर्ण अनुसंधान की बात सोची जाए, तो वह अधिक उपयुक्त होगी।

वैज्ञानिक विधि से अध्ययन किया जाए, तो प्रत्येक धर्म के, विशेषकर श्रेष्ठ रूप से विकसित विश्वधर्म के दो आयाम होते हैं— प्रथम आयाम सामाजिक अभिव्यक्ति के रूप में एवं द्वितीय उस मार्ग के रूप में, जो हमें ईश्वर अथवा उसके समकक्ष सत्ता का आभास कराता है। प्रथम आयाम के अंतर्गत धर्म के सभी आवश्यक, अनावश्यक तत्त्वों को गूँथ दिया गया है, जिसमें सामाजिक अनुशासन, पौराणिक आख्यान, परम्पराएँ— रीति-रिवाज इत्यादि आते हैं।

धर्म का द्वितीय आयाम वह है, जिसे हम आध्यात्मिक विज्ञान या आत्मिकी के रूप में जानते हैं। यह वैयक्तिक नैतिकता, जीवन-साधना, आत्मनियंत्रण एवं समाज-आराधना पर विशेष बल देता है। यह धर्म का एक अपरिहार्य, अपरिवर्तनशील, सार्वभौम रूप है, जिसमें किसी मिलावट— विकृति की कोई संभावना नहीं। यही वह शाश्वत अध्यात्म है, जिसे पूर्वार्त्त दर्शन के नाम से जाना जाता है। तर्कवाद ने इसे अपनी लपेट में लेने का कभी प्रयास नहीं किया; क्योंकि शाश्वत नैतिक मूल्यों में अपने पैर जमाने का उसे कभी कोई अवसर नहीं मिला। धर्म का पहला आयाम परिवर्तनशील है; लेकिन सुसंगत भी है; किंतु तभी, जबकि इसका स्वरूप शीशे के समान साफ हो। कुतर्कों के माध्यम से परंपराओं को विकृत न बना दिया गया हो, समाज के शोषण हेतु उसमें वांछित मिलावट न कर दी गई हो।

भारतीय अध्यात्म दर्शन में पहले आयाम को स्मृति और दूसरे को श्रुति के रूप में धर्म का अंग माना गया है। श्रुति को शाश्वत, सार्वभौमिक रूप से वैध माना गया है, जबकि स्मृति को स्थानीय, सीमित और सामयिक दृष्टि से उपयोगी माना गया है। तदनुसार श्रुति सनातन धर्म का— शाश्वत धर्म का प्रतिनिधित्व करती है और स्मृति युगधर्म का— एक विशेष युग या काल का, जो कि परिवर्तनशील है, प्रतिनिधित्व करती है। अतएव भारतीय दर्शन युगधर्म को धर्म का एक अंग तो मानता है, किंतु उसे सार्वभौमिक और सर्वकालिक नहीं मानता। यहाँ तक कि इसे परिपक्व लोगों के लिए भी अनुपयोगी मानता है; क्योंकि व्यक्तिविशेष की परिस्थितियों में आयु के अनुसार परिवर्तन अपेक्षित ही है। अतएव भारतीय अध्यात्म में स्मृति और युगधर्म के परिवर्तित सामाजिक परिस्थितियों में उपयोगी बनाने और उसे तर्कवाद के द्वारा हानिकारक बनने से बचने के लिए उचित परिवर्तन की विशेष व्यवस्था है।

उपनिषद् काल से वर्तमान समय तक भारत ने धर्म के विषय में अपनी खोज को सतत जारी रखा व किसी प्रकार के परिष्कृत धार्मिक विधि-विधान पर विश्वास न करके उसने केवल उसी प्रणाली और माध्यम को अपनाया, जिसके द्वारा मनुष्य और प्रकृति के पीछे छिपी हुई चिरस्थायी यथार्थता के आवरण के भीतर झाँककर उसका मर्म समझा जा सके। अनुभव के सूक्ष्म अध्ययन के द्वारा भारतीय विवेक की सत्य खोज और उसकी प्राप्ति की लालसा को उपनिषद् बड़ी ही प्रफुल्लता से पंजीबद्ध करते हैं। इसे अमेरिकन मिशनरी के ‘राबर्ट अरनेस्ट ह्यूम’ ने ‘द थर्टिन प्रिंसिपल उपनिषद्’ में उद्धृत करते हुए प्रशंसा भरे शब्दों में कहा है कि, “सत्य की खोज की तीव्रता— गंभीरता ही उपनिषदों की एक आह्लादकारी एवं मौलिक विशेषता है। इसे अन्यान्य किसी धर्मग्रंथ में नहीं देखा जाता।”

‘रोमांरोलां’, ‘टेलहार्ड दि कार्डिन’ एवं ‘जूलियन हक्सले’ जैसे पाश्चात्य विद्वान कहते हैं कि, “तर्क के मूल आधार ‘विवेक’ को यदि कहीं सही स्थान मिला है, तो वह है— उपनिषद् शास्त्र। गहराई से देखते हैं, तो हम पाते हैं कि जब एक ऋषि अपनी आंतरिक सृष्टि के संधान किए तथ्यों के एकत्रित निष्कर्षों को प्रकट करता है, तो दूसरा आवश्यकतानुसार उसे अपर्याप्त भी कहता है, जिससे आगे भी खोज का द्वार खुला रहे। इससे और अधिक गहरी खोज को आमंत्रण और प्रोत्साहन मिलता है। इसे कभी न थकाने वाली आह्लादकारी खोज और उनसे होने वाले प्रतिभासंपन्न मनीषियों के विचार-द्वंद्व के कारण ही इन सनातन तथ्यों को विस्तार मिलता रहा। इसमें अवरोध उत्पन्न करने अथवा इसे समाप्त करने के लिए न तो कोई राष्ट्रीयता, धार्मिक क्रियाविधि ने बीच में व्यवधान डाला, न ही कोई अधिकारवादी पुरोहित वर्ग ही मार्ग में आड़े आया। यह संपूर्ण प्रणाली मनुष्य की अनाशवान आत्मा और उस ब्रमांड की समष्टिगत आत्मा— ब्रह्म से आत्मिक एकत्व की गंभीर खोज की पूर्णता पर पहुँचने में सफल हो सकी, इसका श्रेय उन आर्ष विद्वानों को जाता है। आगे वे कहते हैं कि, “उपनिषदों की वाणी विवेक के आधार पर अनुसंधान की एक आह्लादकारी यात्रा है। ऋषिगणों ने मुड़कर देखा और पाया कि जो सोपान पीछे छूट गए थे, वे भी वैध थे, अतः उन्हें भी स्वीकारा जाना चाहिए। वे अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य अपनी यात्रा भ्रांति से आरंभकर चरम सत्य तक नहीं पहुँचता, वरन वह सत्य से ही सत्य तक जा पहुँचता है, जो पूर्व से हमेशा और अधिक श्रेष्ठ एवं प्रखर होता है।”

हम किसी भी क्षेत्र को ले लें, ये सनातन सिद्धांत सभी पर एक समान लागू होंगे। तर्क और प्रतिपादनों की उपयोगिता— आवश्यकता से कौन इनकार करता है? लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि मानवी गरिमा के अनुरूप आदर्शवादिता का भी तर्कों को समर्थन प्राप्त हो। इसके बिना कोरे तर्क बेपैंदी के लोटे हैं, जो अनीति को नीति और असत्य को सत्य सिद्ध कर दिखाने में, अपनी कलाबाजी दिखाने में कमाल प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसा हुआ भी है एवं आगे भी बौद्धिक दुराचार ऐसे कुकृत्य कराता रहेगा, जिससे नैतिकता के भी वे ही पक्ष उभरकर आएँ, जिनसे कुतर्कों के संपुट द्वारा अनीति को ही बल मिलता हो। श्रेष्ठ यही है कि बुद्धिवाद भावनात्मक आदर्शवाद से समन्वित रहें— दोनों एकजुट हो काम करें। तभी वह श्रेय संभव है, जिसे सच्चे अर्थों में ‘अनुसंधान’ कहा गया है।


मन का दर्पण स्वच्छ होना चाहिए

एक जंगल के निर्मल सरोवर में देवकन्याएँ निर्वस्त्र स्नान कर रही थीं। राजा परीक्षित प्यासे तो थे, पर युवतियों को इस प्रकार स्नान करते देखकर पेड़ की आड़ में छिप गए।

इतने में उधर से युवा शुकदेव वस्त्ररहित स्थिति में निकले, पानी पिया और नहाए भी। लड़कियों ने उन्हें देखा तो, पर स्नान उसी प्रकार करती रहीं।

शुकदेव के चले जाने पर थोड़ी देर बाद व्यास जी उधर से निकले। उन्हें देखते ही देवकन्याएँ कपड़े समेटकर भागीं और दूर चली गईं।

प्रसंग समाप्त होने पर परीक्षित सरोवर तट पर आए और लड़कियों से पूछा— “व्यास वृद्ध भी थे और वस्त्र पहने भी। जबकि शुक निर्वस्त्र और युवा थे। आप लोग युवक के साथ नहाती रहीं और वृद्ध को देखकर भागीं, इसका क्या कारण?

कन्याओं ने कहा— हे राजन्! हमने व्यास की दृष्टि में दोष देखा और शुक के नेत्रों में निर्मलता। इसी परख के कारण हमें भी व्यवहार निर्धारित करना पड़ा। दोष मनुष्य के शरीर में नहीं, मन में रहते हैं। परीक्षित का समाधान हो गया। आत्मसंयम की सच्ची परिभाषा देवकन्याओं से सुनकर वे वहाँ से लौट पड़े।

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दक्षिणेश्वर मंदिर में ‘रामकृष्ण परमहंस’ पुजारी थे। मंदिर की निर्मात्री रानी ‘रासमणि’ के जमाता ‘मथुरादास’ एक दिन घुमाते-फिराते वेश्या के कोठे पर ले पहुँचे। नाच-गान ठना और मथुरा बाबू के इशारे पर वेश्याओं ने परमहंस जी को जकड़ने का उपक्रम आरंभ कर दिया।

परमहंस जी गद्गद हो गए और सभी के चरण पकड़कर वंदन करने लगे। रोज एक निश्चल माता की पूजा करता था, आज तो वे इतने रूप बनाकर सचल दीखती हैं और प्रत्यक्ष दुलार करती हैं। धन्य है माँ! आपकी लीला।

वेश्याएँ सकपका गईं। मथुरा बाबू परीक्षा लेने चले थे, पर वे स्वयं लज्जित होकर रह गए।

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उन दिनों ‘वेगवती’ नदी में इस प्रकार बाढ़ आई कि ‘श्रावस्ती’ नगर के भीतर पानी भर गया और लगा कि पानी न घटा, तो पूरा नगर और सारा क्षेत्र डूब जाएगा।

बाढ़ घटाने का उपाय बताया गया कि कोई पूर्ण पतिव्रता जल में कमर तक घुसे, तो नदी का चढ़ाव उतरे।

पतिव्रताओं को खोजा गया, तो कितनी ही आगे आईं और पानी में घुसीं पर बाढ़ उतरी नहीं।

अंत में एक वेश्या आई। उसने अपने को पूर्ण पतिव्रता होने का दावा किया और पानी में घुस गई। देखते-देखते पानी उतर गया, सभी ने संतोष की साँस ली।

वेश्या कैसे सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता रही। यह पूछे जाने पर उसने एक ही उत्तर दिया। जिस दिन जिसकी संपर्कसाथिनी होने का अनुबंध किया, उसी दिन से सच्चे मन से उसकी पत्नी बनकर रही। अन्य किसी का ध्यान तक न लाई। वचन और दायित्व को ठीक तरह निभाने के कारण ही कदाचित में पतिव्रता सिद्ध हो सकी।

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एक पतिव्रता और वेश्या आमने-सामने मकानों में रहती थी। वेश्या पतिव्रता के भाग्य को सराहती, अपनी विवशता के आँसू बहाती। पतिव्रता का चिंतन दूसरी तरह का था। वह अपनी पुण्यात्मा होने का गर्व करती और वेश्या को निरंतर गालियाँ देती रहती।

मरने के बाद दोनों परलोक पहुँची। उनके कृत्यों का कम और दृष्टिकोण का लेखा-जोखा अधिक रखा गया था। चिंतन की उत्कृष्टता के कारण वेश्या को पतिव्रता से ऊँचे स्वर्ग में भेजा गया।

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विराट मन ही इस विश्व का नियामक

अदृश्य जगत न अब उतना अविश्वस्त रहा है और न अप्रामाणिक, जैसा कि एक शताब्दी पूर्व वैज्ञानिकों द्वारा कहा जाता था। कभी उसे कपोल-कल्पित एवं उपहासास्पद ठहराया जाता था और कहा जाता था कि प्रकृति की परिधि से बाहर और कुछ नहीं है। यहाँ तक कि मानवी चेतना भी कुछेक रासायनिक पदार्थों एवं विद्युत-तरंगों का सम्मिश्रण होने के कारण प्रकृति का ही एक अनोखा घटक है। उन दिनों इसी आधार पर आत्मा और परमात्मा के स्वतंत्र अस्तित्व से भी इनकार किया जाता था, पर अब समय बहुत आगे बढ़ गया। प्रकृति का लघुतम घटक कभी परमाणु माना जाता था; पर उसके अंतराल में भी एक अणु परिवार स्वीकृत हो चुका। इतना ही नहीं, अणु की स्वतंत्र सत्ता भी समाप्त हुई और उसे विद्युत-तरंगों का एक गुच्छकमात्र स्वीकार किया गया।

प्रकृति अनुसंधान की गहराई में उतरने वालों ने एक समानांतर विश्व का— समानांतर परमाणु का अस्तित्व खोज निकाला है, जो प्रत्यक्ष उपकरणों की पकड़ में तो नहीं आता, पर गणितीय सिद्धांतों के आधार पर उसे जो मान्यता मिली है, उससे इनकार भी नहीं किया जा सकता। पदार्थ का प्रतिद्वंद्वी प्रतिपदार्थ— एंटी मैटर अब एक तथ्य है। इसी प्रकार विश्व के प्रतिद्वंद्वी प्रतिविश्व— एंटी युनिवर्स की जो जानकारी मिली है, उसे कपोल-कल्पना ठहराने का साहस कोई भी नहीं कर सकता है। अदृश्य जगत का यही क्षेत्र है। वह काया और छाया की तरह परस्पर घनिष्ठ है। दृश्य जगत और अदृश्य जगत दोनों ही जुड़वा भाई बनकर विज्ञान-जगत की नवीनतम मान्यताओं में सम्मिलित हो चुके हैं।

विज्ञान-जगत में अब ‘न्यूट्रिनो एवं साइकोट्रॉन’ नामक ऐसे विद्युतीय कणों का पता चल गया है, जिनकी गति निर्बाध है, पदार्थ की कोई भी दीवार उसे रोक नहीं पाती। संभवतः इन्हीं कणों के सहकार से मस्तिष्क के न्यूरॉन्स में अतींद्रिय चेतना की सामर्थ्य आ जाती है। परामनोवैज्ञानिक भी अब धीरे-धीरे इसी निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे हैं।

‘प्रो. फ्रेंक ब्राउन’ की लंबी शोधें इस निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि चारों ओर हवा की तरह एक ब्रह्मांडव्यापी ऊर्जा विद्यमान है, जिससे अपनी पात्रता के अनुसार सभी का संपर्क जुड़ा रहता है। सभी आवश्यकतानुसार एवं अपनी आकर्षण सामर्थ्य के अनुरूप उससे शक्ति खींचते और सामर्थ्यवान बनते हैं।

साधारणतया परमाणु में भार, घनत्व, विस्फुटन, चुंबकीय क्षेत्र आदि भौतिक परिचय देने वाले लक्षण होते हैं; पर अब विज्ञान की पकड़ में ऐसे सूक्ष्म विद्युतीय कण आ गए हैं, जिनमें भौतिक परमाणुओं में पाया जाने वाला एक भी लक्षण नहीं है। फिर भी वे प्रकाश की गति से शरीरों के भीतर और पोले आकाश में निर्बाध परिभ्रमण करते हैं। वे भौतिक परमाणुओं को वेधकर आर-पार निकल जाते हैं। पदार्थ की कोई दीवार उन्हें रोक तो नहीं पाती, पर यदा-कदा उनमें टकराव उत्पन्न होते देखा गया है। इस टकराव के अवसर पर ही उनका अस्तित्व अनुभव में आता है। अब यह सोचा जा रहा है कि संभवतः पल्सर्स से आने वाले न्यूट्रिनों एवं साइकोट्रॉन जैसे कण ही मस्तिष्क के सामान्य न्यूरॉन कणों के साथ साँठ-गाँठ करके अतींद्रिय चेतना उभारने का पथ-प्रशस्त करते हैं। अब न्यूट्रिनो कणों का प्रभाव मनुष्य की मस्तिष्कीय चेतना और तंतु समूह पर क्या हो सकता है, इसकी गहरी खोजें चल रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार मानसिक चेतना पर वे जो प्रभाव डालते हैं और जिन नई जाति के ऊर्जा-कणों का जन्म होता है, उस क्रम से उन्हें ‘माइंजेन’ नामक नाम दिया जाना चाहिए। अनुमान है कि यदि इनका उद्भव और विकास मस्तिष्क में होने लगे, तो मनुष्य का अवचेतन मन ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ संबद्ध होकर अपनी ज्ञान-परिधि और क्रियाशक्ति असीम कर सकता है। तब शरीर-बंधनों के कारण उसकी सीमित क्षमता के असीम बनने में कोई कठिनाई न रहेगी।

जीव विज्ञानवेत्ता ‘प्रो. फ्रेंक ब्राउन’ की लंबी शोधें इस निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि जिस प्रकार हमारे इर्द-गिर्द हवा भरी है, उसी प्रकार ब्रह्मांडव्यापी ऊर्जा के समुद्र से सृष्टि का प्रत्येक प्राणी जीवन प्राप्त करता है। उस महान प्रसारण को प्रत्येक प्राणी एक छोटे रेडियो रिसीवर की तरह अपनी पात्रता के अनुरूप ग्रहण करता है और उसमें अपना उपार्जन सम्मिलित करता है। इस प्रकार हर प्राणी अथवा पदार्थ अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखते हुए भी एक ही संयुक्त सत्ता का अंश है। भिन्नता के बीच एकता के शास्त्रवर्णित सिद्धांत को अब क्रमशः विज्ञान के क्षेत्र में भी मान्यता मिलती जा रही है।

ब्रह्मांड विराट है, पिंड स्वल्प— सीमित। इतने पर भी विभु की समग्र सत्ता अणु में विद्यमान है। दावानल की विकरालता कैसी ही क्यों न हो, चिनगारी में उसकी मूलभूत क्षमता का अस्तित्व पूरी तरह समाविष्ट है। विराट मन ही इस विश्व का सृजेता एवं नियामक है। काया में सीमाबद्ध मन भी उन समस्त संभावनाओं से भरा-पूरा है, जिन्हें परमात्म सत्ता में देखा एवं पाया जाता है।

मन की अद्भुत और अलौकिक सामर्थ्य इतनी है कि वह सामान्य व्यावहारोपयोगी बुद्धि से कहीं अधिक ही क्षमतासंपन्न स्वयं को बना सकता है। इस दिशा में काफी अन्वेषण कार्य चल रहा है। कैलीफोर्निया की ‘स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी’, नीदरलैंड की ‘ग्रोनिगन युनिवर्सिटी’, ‘हारवर्ड युनिवर्सिटी’, ‘शिकागो युनिवर्सिटी’, ‘ड्यूक युनिवर्सिटी’ इत्यादि स्थानों पर इस संबंध में बड़े स्तरों पर शोध-प्रयत्न जारी हैं। वस्तुतः, अतींद्रिय सामर्थ्य मनःशक्ति की ही दृश्यमान हो सकने वाली सामर्थ्य है, जिसे इतना असंभव— दुर्लभ नहीं मानना चाहिए, जितना कि समझा जाता रहा है।

यह एक अद्भुत एवं विचारणीय तथ्य है कि जितने हमारी आकाशगंगा में तारे हैं, लगभग उतने ही स्नायुकोश हमारे मस्तिष्क में भी फैले हुए हैं। पिछले दिनों वैज्ञानिकों का सर्वाधिक ध्यान इन स्नायुकोशों को परस्पर मिलाने वाले संधिकेंद्रों (सिनेप्सों) पर स्रवित होने वाले रसायन पदार्थों न्यूरो ट्रान्समीटर्स पर गया है। अब प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित किया जा रहा है कि सिरोटोनिन, डोपामीन, एसिटाइल कोलीन तार, एड्रीनेलिन के रूप में विराजमान ये रसायन ही सारी विद्युत-संचार-प्रणाली के लिए जिम्मेदार हैं। बौद्धिक क्षमता की घट-बढ़ में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है।

इसी के साथ-साथ एक और विद्युत-स्फुल्लिंग के फव्वारे की मस्तिष्क में अवस्थित होने की ऋषिगणों द्वारा वर्णित सहस्रार की कल्पना अब वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा प्रमाणित की जाने लगी है। उनके अनुसार एसेंडिंग रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम (ए. आर. ए. एस.) नामक यह तंतुजाल रसायन संदेशवाहकों एवं प्रसुप्त पड़े केंद्रों को उत्तेजित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

समझा जाता है कि मस्तिष्क की सीमा स्वल्प है और वह थोड़े से श्रम में थक जाता है; पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। वह लंबे समय तक बिना विराम— विश्राम के अनवरत श्रम कर सकता है और यथावत स्वस्थ— सक्षम बना रह सकता है। कुछ व्यक्ति मस्तिष्क की उपयोगिता मात्र रोजमर्रा के काम आने हेतु व्यवहार तथा निद्रा तक सीमित मानते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इसकी अपनी भी एक महती भूमिका है। नींद आहार की तरह ही आवश्यक मानी जाती है। थकान उतारने का यही एक प्रमुख साधन है।

आवश्यकता है ईश्वरप्रदत्त अनंत विभूतियों के भांडागार—  इस सृष्टि के अनुपम उपहार मस्तिष्क को विकारग्रस्त— असंतुलित न होने दिया जाए और उपयुक्त दिशाधारा में नियोजित करके वह लाभ उठाया जाए, जिससे मानवी काया में देवत्व की संभावनाओं का प्रत्यक्ष दर्शन संभव हो सके।


प्रत्यक्ष एवं परोक्ष के मध्य सघन संपर्क स्थापित हो

यदि मनुष्य शरीर चेतनशक्ति और पदार्थसत्ता के सम्मिश्रण से बना पिंड है, तो ठीक उसी प्रकार यह ब्रह्मांड भी दोनों ही शक्तियों के समन्वय का विराट स्वरूप है। ब्रह्मांड में हर व्यक्ति के लिए— जीवधारी के लिए स्तर के अनुरूप ढेरों पदार्थ-संपदा व अनंत चेतन-सामर्थ्य भरी पड़ी है। पिंड व ब्रह्मांड में परस्पर आदान-प्रदान चलता रहता है। अदृश्य जगत में सूक्ष्म जीवधारियों की अपनी अनोखी दुनिया है। पृथ्वी पर विचरण कर रहे जीवधारियों के साथ उनके संपर्क, आदान-प्रदान के उदाहरण बहुधा मिलते रहते हैं। क्रुद्ध, असंतुष्ट, दुर्गतिग्रस्त आत्माओं के रूप में ‘प्रेत’ तथा श्रेष्ठ समुन्नत जीवन जी रही आत्माओं के रूप में ‘पितर’ आत्माएँ इस अदृश्यलोक में सतत भ्रमण करती रहती हैं।

अदृश्य जगत की इन सूक्ष्मशरीरधारी आत्मा३ओं से किसी को भय नहीं होना चाहिए। जीवित या दिवंगत दोनों ही प्रकार की आत्माओं को पारस्परिक संपर्क का अनुभव न होने से जीवधारियों का कभी-कभी आतंकित होना स्वाभाविक है, लेकिन यह एक ऐसा प्रकरण है, जिसे आत्मिकी के आधार पर सुनियोजित रूप में अधिक अच्छी तरह— अधिक व्यापक एवं योजनाबद्ध प्रयोजनों के लिए खोला जा सकता है। यदि अदृश्य आत्माएँ किसी सुनिर्धारित आचार संहिता के आधार पर मानव जगत के साथ संपर्क साधें, तो दो लोकों के बीच महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान चल सकता है। मृतकों व जीवितों के बीच पुरातनकाल में भी ऐसा ही परस्पर उपयोगी प्रत्यावर्तन चलता था। आज भी ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं, जिनसे पितरों के अदृश्य सहायक के रूप में सहयोगी होने के सिद्धांत की पुष्टि होती है। इनसे कम-से-कम उन भ्रांतियों को मिटा सकने में तो मदद मिलती ही है, जो इस विषय में जनमानस में बुरी तरह संव्याप्त हैं।

दृश्य एवं अदृश्य जगत के मध्य संपर्क एवं आदान-प्रदान के ऐसे कई प्रसंग, कई विख्यात विभूतियों से जुड़े हुए हैं, जिनसे उनके विवादास्पद होने का संदेह होने की गुंजाइश रह ही नहीं जाती। इन सभी से यह स्पष्ट होता है कि इन व्यक्तियों ने देवस्तर की आत्माओं का सहयोग प्राप्तकर उनसे लाभ उठाया।

‘महर्षि अरविंद’ के संबंध में यह प्रसिद्ध है कि वे जब अलीपुर जेल में थे, तब दो सप्ताह तक लगातार विवेकानंद की आत्मा ने उनसे संपर्क किया था। स्वयं अरविंद ने लिखा है— “जेल में मुझे दो सप्ताह तक कई बार विवेकानंद की आत्मा उद्बोधित करती रही और मुझे उनकी उपस्थिति का भान होता रहा। उस उद्बोधन से मुझे आध्यात्मिक अनुभूति हुई। भावी साधनाक्रम हेतु महत्त्वपूर्ण निर्देश भी मिले।”

सन् 1901 में जब अरविंद प्रेतात्माओं के संपर्क का अभ्यास किया करते थे, इस अभ्यास में एक बार ‘रामकृष्ण परमहंस’ की आत्मा ने भी अरविंद को समष्टि की साधना हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए थे। अरविंद जिन दिनों बड़ौदा में रह रहे थे, उन दिनों का एक अनुभव बताते हुए उन्होंने लिखा है कि, “एक बार जब वे कैंप रोड शहर की ओर जा रहे थे, तब एक दुर्घटना से किसी ज्योतिपुरुष ने उन्हें बचाया।”

श्री अरविंद के जीवन-चरित्र के ‘श्रीमाँ प्रकरण’ में इस प्रकार की घटनाओं का विवरण देते हुए लिखा गया है— “वे (श्रीमाँ) जब छोटी-सी बालिका थीं, तब उन्हें बराबर भान होता रहता था कि उनके पीछे कोई अतिमानवी शक्ति है, जो जब-तब उनके शरीर में प्रवेश कर जाती है और तब वे बड़े-बड़े अलौकिक कार्य किया करतीं।” इस प्रकरण में उस दिव्यशक्ति द्वारा श्रीमाँ के कई काम संपन्न करने की अनेक घटनाएँ वर्णित हैं। ‘पांडिचेरी’ आकर रहने व अरविंद से संपर्क करने का निर्देश भी उन्हें एक अदृश्य ज्योतिसत्ता से ही मिला था।

अदृश्य और उदार आत्माएँ कितनी ही बार स्थूल सहायता भी करती हैं। ‘द्वितीय महायुद्ध’ के समय ‘मोन्स’ की लड़ाई में ब्रिटिश सेनाओं की बुरी तरह हार हो गई। मात्र 500 सैनिक बचे। वे भी बुरी तरह हौसलापस्त हो चुके थे। दूसरी ओर जर्मनों की 10 हजार की संख्या वाली विशाल सेना, जिसकी कोई समानता न थी। तभी ऐसे आड़े समय में ब्रिटिश सेनाधिकारी को अपने स्वर्गीय सेनानायक ‘सेंट जार्ज’ का स्मरण हो आया। उसने अपने सभी साथियों सहित इस महान सेनानायक का ऐसी परिस्थिति में भावनापूर्वक एक साथ स्मरण किया। सभी सैनिक तन्मय स्मरण में व्यस्त थे कि अचानक एक बिजली-सी कौंधी। पाँच सौ सैनिकों को पीछे शुभ्र आभा प्रकट होती दिखाई दी, कि कुछ ही क्षणों में रणभूमि में सभी जर्मन सैनिक खेत हो गए। न गोला-न बारूद, न अस्त्र-न शस्त्र। फिर सैनिक कैसे मरे, यह आज तक अचरज बना हुआ है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ‘अब्राहम लिंकन’ को प्रेतात्माओं पर इतना विश्वास था कि वे अक्सर एक प्रेत विद्याविशारद कुमारी ‘नैटिकोलन वर्ग’ को व्हाइट हाउस में बुलाया करते थे और उसके माध्यम से प्रेतात्माओं से संपर्ककर महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते थे। गृहयुद्ध के दिनों में तो प्रेतात्माएँ उनकी विश्वस्त हो गई थीं। उनकी मदद से लिंकन को उपद्रवियों के ऐसे-ऐसे रहस्यों का पता लगा, जिन्हें जासूसी विभाग द्वारा प्राप्त करना संभव नहीं था। यह तो एक सुविदित तथ्य है ही कि अपने जीवन के दुःखद अंत को उन्होंने अपने प्रेतरूप के गोली द्वारा मारे जाने के रूप में स्वप्न में देखा था। राष्ट्रपति का शासकीय निवासगृह व्हाइट हाउस ऐसी संदेश देने वाली प्रेतात्माओं की कथाओं से अभी भी जुड़ा हुआ है।

‘थियोसोफिकल सोसाइटी’ की जन्मदात्री ‘मैडम ब्लैवटस्की’ को चार वर्ष की आयु में ही देवात्माओं का सहयोग-सान्निध्य प्राप्त होने लगा था। वे अचानक आवेश में आकर ऐसी तथ्यपूर्ण बातें बताया करती थीं, जिन्हें कह पाना किसी विशेषज्ञ के लिए ही संभव था। मैडम- ब्लैवटस्की के कथनानुसार उनके अदृश्य सहयोगियों की एक पूरी मंडली थी, जिनमें सात प्रेत थे। वे समय-समय पर उन्हें उपयोगी परामर्श दिया करते और सहायता करते थे। उनके बचपन से ही ये प्रसंग उनके साथ ऐसे जुड़ गए थे कि उन्हें ‘ऑल्काट’ का पर्यायवाची ही समझा जाने लगा था।

एक बार जब वह सोई हुई थीं, तो एक प्रेतात्मा ने उसके शरीर के कपड़े ही मजाक में बिस्तर के साथ सिल दिए। बाद में जब सिलाई उधेड़ी गई, तभी वह उठ सकीं। एक अवसर पर उनके सहयोगी कर्नल ‘हैनरी ऑल्काट’ उनसे मिलने आए, तब ‘ब्लैवटस्की’ मशीन से तौलिये सिल रही थीं और रह-रहकर धरती पर पैर पटकती जाती। ऑल्काट को उनकी यह क्रिया कुछ विचित्र-सी लगी। उसने इसका कारण पूछा, तो ‘ब्लैवटस्की’ ने बताया कि एक छोटी प्रेतात्मा बार-बार मेरे कपड़े खींचती है और कहती है कि मुझे भी कुछ काम दे दो। कर्नल ने उसी मजाक में उत्तर दिया कि उसे कपड़े सिलने का काम क्यों नहीं दे देतीं। इसके बाद उनने कपड़े समेटकर आलमारी में रख दिए और कर्नल से बातचीत करने में दत्तचित्त हो गईं। वार्त्तालाप की समाप्ति पर जब आलमारी खोली गई, तो सभी कपड़े सिले मिले। ‘कर्नल ऑल्काट’ ने अपने अनुभवों में से ऐसे कई प्रसंग उद्धृत किए हैं।

‘सर ओलीवर लॉज’ ब्रिटेन के ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिकों में से एक थे। उन्हें कई विश्वविद्यालयों से अनेकों डिग्रियाँ मिली थीं और स्वर्ण पदक भी प्राप्त थे। उन्होंने विज्ञान के लिए आत्मा के अस्तित्व को एक आवश्यक अन्वेषक पक्ष माना था और स्वयं आगे बढ़कर इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। इसके लिए उनने ‘साइकिक रिसर्च सोसाइटी’ की स्थापना की और आत्मा व मरणोत्तर जीवन के संबंध में विशद खोजकर उनकी यथार्थता स्वीकारने की स्थिति में पहुँचे थे, साथ ही अनेक प्रेतात्माओं से संबंध स्थापितकर मरणोत्तर संसार से संबद्ध अनेक नई बातों का पता लगाया। इन मृतात्माओं में उनका प्रिय पुत्र ‘रेमंड’ भी सम्मिलित था, जिसकी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान मृत्यु हो गई थी।

‘सर लॉज’ द्वारा स्थापित इस ‘साइकिक रिसर्च सोसायटी’ ने मरणोत्तर जीवन पर अनुसंधान सतत जारी रखा है एवं ऐसे सभी घटना-प्रसंगों को सत्यापित करने का प्रयास किया है, जिनमें अदृश्य आत्माओं से सहयोग स्थापित करने का दावा किया गया था।

महाकवि ‘विलियम ब्लैक’ के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वे अर्धरात्रि में मृतात्माओं से संपर्ककर उनसे वार्त्तालाप किया करते थे। वे आत्माएँ उन्हें अनेक विषयों पर महत्त्वपूर्ण सलाह व मार्गदर्शन दिया करती थीं। अमेरिका की ‘श्रीमती रुथ मोंट गुमरी’ के अनुसार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द वर्ल्ड बियोंड’ उनकी स्वयं की रचना नहीं है, अपितु ‘स्वर्गीय आर्थर फोर्ड’ की आत्मा द्वारा लिखवाई गई है। उन्होंने तो सिर्फ उसे कलमबद्ध भर किया था।

‘आर्थर एडवर्ड स्टिल बैक’ अमेरिका का एक दरिद्र व्यक्ति था और कुलीगिरी की छोटी-सी कमाई पर अपना जीवनयापन करता था। वह कहा करता था कि छः प्रेतों की एक मंडली 20 वर्ष की उम्र से हर काम में उसकी सहायता करने लगी। इनमें इंजीनियर, लेखक, कवि व अर्थशास्त्री की आत्माएँ सम्मिलित थी। प्रेतों ने कहा कि तुम यदि हमारा कहना मानोगे, तो बड़े आदमी बन जाओगे। उनने उसकी अच्छी-खासी नौकरी छुड़वा दी और कहा तुम अपना रेलमार्ग बनाओ, नहर खोदो तथा बंदरगाह बनाओ, तुम्हें इनसे बहुत लाभ होगा। बेचारा आर्थर स्तब्ध था कि नितांत दरिद्रता की स्थिति में ऐसे काम कैसे संभव हो सकेंगे; पर जब प्रेतों का आश्वासन मिला, तो उसने कठपुतली की तरह सारे काम करते रहने की सहमति दे दी और असंभव दीखने वाले साधन जुटने लगे।

आर्थर पूरी तरह प्रेतात्माओं पर आश्रित था। उसके पास न तो ज्ञान था, न अनुभव और न साधन, फिर भी उसके शेखचिल्ली जैसे सपने एक के बाद एक पूरे होते चले गए। जब वह मरा, तो अरबों की संपत्ति छोड़ गया।

इटली की प्रसिद्ध नायिका ‘जूलियट’ की मृत्यु के बाद आने वाले हजारों पत्रों के उत्तर लोगों के पास पहुँचते रहे। जिनके पास पत्र पहुँचे, उनके पत्र पूर्व पत्रों की बिलकुल संगति में थे। कई में पूर्व पत्रों का उल्लेख भी रहता था। यह कहानी भी बड़ी विचित्र है कि जूलियट की जहाँ समाधि थी, वहीं पर दो लैटर बॉक्स टाँगे गए थे। एक में पत्र आते थे, दूसरे में डाले जाते थे, जिन्हें डाकिया नियमित रूप से ले जाता था। समाधि का रक्षक ‘इटोरे सोलोमिनी’ उत्तर लिखता था; पर उसका कहना था कि पत्रों के उत्तर ‘जूलियट’ की आत्मा लिखाती थी। उस अवधि में उसे कुछ भी ज्ञान नहीं रहता था।

विश्वविख्यात भविष्यवक्ता ‘कीरो’ के पिता का देहांत हो गया। कुछ महीने बाद ‘कीरो’ के पिता की आत्मा का संदेश मिला। कीरो कुछ गुम दस्तावेजों को लेकर अत्यंत परेशान थे। प्रेतात्मा ने उन्हें बताया कि दस्तावेज लंदन के ‘डेविस एंड सन सालिसिटर’ के यहाँ रखे हैं। उनका दफ्तर स्ट्रेंड में गिरजाघर के पास एक तंग सड़क पर है। बताए गए संकेतों के आधार पर कीरो उस व्यक्ति के पास पहुँचे, तो सचमुच वे दस्तावेज मिल गए। कीरो ने इस घटना का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया है।

ऐसे एक नहीं, अनेकों घटना-प्रसंग हैं, जो एक अदृश्य लोक की जानकारी देते हैं, जहाँ से आदान-प्रदान के क्रम से लाभान्वित हुआ जा सकता है। जो दृश्यमान है, मात्र वही सत्य नहीं है। यह ब्रह्मांड विराट पुरुष का सुविस्तृत काय-कलेवर है, जिसमें असीम पदार्थ एवं अनंत चेतन सामग्री भरी पड़ी है। दोनों की मिलीभगत ही है, जो इस सृष्टि-व्यवस्था को चला रही है। परोक्ष जगत के इस सूक्ष्म वैभव का परिचय देने हेतु यदा-कदा घटना-प्रसंग घटते रहते हैं। जो मृतात्माएँ पृथ्वी पर स्थित अपने प्रियजनों से स्नेह-सौजन्य एवं सहयोग का सिलसिला बिठाना चाहती है, उनका मंतव्य निश्चित ही मनुष्य को डराना नहीं है। आत्मिकी इतनी सामर्थ्यवान है कि वह प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों लोकों में भावनात्मक सहयोग एवं क्रियान्वयन का मार्ग खोल सकती है। निश्चित ही इससे दोनों ही पक्ष लाभान्वित व संतुष्ट होंगे। मनुष्य की अपनी कार्य-परिधि बढ़ेगी एवं पारस्परिक प्रत्यावर्तन का एक महत्त्वपूर्ण उपक्रम चल पड़ेगा, जिसकी कल्पनामात्र से रोमांच हो आता है।


वातावरण में छाए संस्कारों की महत्ता

व्यक्तियों की तरह क्षेत्रों की भी सुसंस्कारी-कुसंस्कारी होने की दो घटनाएँ ‘सूत’ जी ने ‘शौनक’ को सुनाई—

‘श्रवण कुमार’ अपने माता-पिता को कंधे पर बिठाकर तीर्थयात्रा कराने निकले। मध्य प्रदेश आने पर उनकी श्रद्धा डगमगाई। दोनों को उतारकर बोले— “आप लोग पैदल चलिए। हम लाठी के इशारे से रास्ता भर बताते चलेंगे।”

पिता अपने पुत्र की यशगाथा अजर-अमर बनाना चाहते थे। इसी से एक आदर्श उपस्थित करने की आज्ञा दी थी। पुत्र का उत्साह भी इसलिए उमगा था। आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि पुत्र में इतना बड़ा परिवर्तन अकस्मात कैसे हो गया। ध्यान से देखा, तो रहस्य समझ में आया कि यह भूमि बहुत समय तक ‘मय’ दानव के कब्जे में रही है। उसने अपने माता-पिता का वध करके राज्य प्राप्त किया था। भूमि का वह कुसंस्कार ही श्रवण कुमार में इतना आश्चर्यजनक परिवर्तन करने का निमित्त कारण बना।

कंधे की यात्रा पैदल पूरी की गई। जैसे ही वह क्षेत्र समाप्त हुआ, श्रवण कुमार की श्रद्धा लौटी और उसने क्षमा माँगते हुए माता-पिता की तीर्थयात्रा पुनः कंधों पर बिठाकर आरंभ कर दी।

सूत जी ने दूसरी कथा सुनाई— महाभारत के लिए कृष्ण ऐसी भूमि तलाश रहे थे, जहाँ भाई-भाई के बीच निष्ठुर व्यवहार चलता है। ऐसा क्षेत्र तलाशने के लिए उनने सब दिशाओं में दूत भेजे। अभीष्ट क्षेत्र एक मिला। दूतों ने सगे भाई को भाई द्वारा इसलिए वध किए जाते आँखों से देखा कि वे खेत को सींचने जाने में आनाकानी कर रहा था। समाचार कृष्ण तक पहुँचे, तो उन्होंने उस कुरुक्षेत्र को ही युद्धस्थल चुना, ताकि भाई-भाई बीच में ही संधि न कर बैठें। भूमि की कुसंस्कारिता दोनों पर अपना प्रभाव डालती रही।

विशिष्ट कार्यों की सफलता-असफलता का अविज्ञात, किंतु महत्त्वपूर्ण कारण इस क्षेत्र पर छाए अदृश्य संस्कारों के साथ भी जुड़ा रहता है। तीर्थों की स्थापना में एक कारण यह भी रहा है। उनमें पुरातन महान कार्यों की भाव-प्रेरणा का बाहुल्य पाया जाता है।

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‘कृष्ण’ का परिवार संपन्न था। वे लोग बच्चे को पढ़ाने के लिए अध्यापक-नौकर भी रख सकते थे; पर वातावरण की महत्ता के दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए उन्हें ‘संदीपन’ ऋषि के आश्रम में दूरवर्ती ‘उज्जैन’ में पढ़ने भेजा गया। वहाँ से वे गोपाल से योगेश्वर बनकर लौटे।

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सीता-वनवास का एक दूरदर्शी कारण यह भी था कि गर्भावस्था से लेकर युवक बनने तक बच्चे ऋषि संरक्षण और उच्चस्तरीय वातावरण में रहे। स्वयं राम को महान उपलब्धियाँ इसी आधार पर मिली थीं। उनने सीता को इसके लिए सहमत किया और वाल्मीकि आश्रम में रहकर संतान को अपने ही समान व्यक्तित्व वाली बनाने का कष्टसाध्य निर्णय लिया।

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एक बालक को भेड़िए उठा ले गए। उसे खाया नहीं, पाल लिया। चार वर्ष का हो चला, तब शिकारियों ने उसे भेड़ियों की माँद से पकड़ा। वह भेड़ियों की तरह ही चलता, गुर्राता और खाता-पीता था। उसे ‘लखनऊ मेडिकल कालेज’ में दस वर्ष तक पाला गया। नाम ‘रामू’ रखा गया। आरंभिक जीवन का संपर्क-प्रभाव अंत समय तक बना ही रहा। सुधार बहुत थोड़ा-सा हो सका। कारण था— वह वातावरण, जिसमें वह पला।

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ऋषियों के आश्रमों में गाय, सिंह एक घाट में पानी पीते थे, जब तक वे उस वातावरण में रहते, डरने और डराने का स्वभाव ही भूल जाते। यह वातावरण का प्रभाव है।****


योग विज्ञान एवं तंत्रशास्त्र एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ

यदि किसी जिज्ञासु को हृदय, रक्तवाही संस्थान की क्रियापद्धति एवं उससे संबंधित रोगों के कारण संबंधी जानकारी प्राप्त करनी है—  इस विद्या में निष्णात होना है, तो उसे यह विकल्प नहीं सौंपा जा सकता कि वह मात्र उस संस्थान संबंधी एनाटॉमी पढ़कर- क्रिया-प्रणाली के सिद्धांत समझकर उसका विशेषज्ञ बनने का प्रयास करें। शरीर का हर अंग-अवयव एकदूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। हरेक की कार्यपद्धति का परस्पर एकदूसरे से तालमेल है, तभी तो शरीर-व्यापार चल पाता है। किसी भी विधा की शाखा में रुचि रखने वाले को उस समूचे विज्ञान के हर पहलू को भली-भाँति समझना होगा। तंत्रशास्त्र पर भी यही बात लागू होती है। भ्रांतिवश सामान्यजन इसे आत्मिकी से इतर एक अलग विधा मान लेते हैं और जानकारी प्राप्ति के लिए तरह-तरह के उपाय अपनाते हैं। इस भटकाव भरी यात्रा में पल्ले कुछ पड़ता नहीं, उलटे अपना अहित और कर बैठते हैं।

तत्त्वज्ञानी ब्रह्मवेत्ताओं का अभिमत है कि सारी सृष्टि जड़ व चेतन का युग्म है। दोनों के सम्मिश्रण से ही इसकी संरचना हुई है। पदार्थ विज्ञान जड़ वस्तुओं की रचना, आकृति-प्रकृति एवं प्रयोग के विधि-विधानों से संबंधित एक विधा है। चेतन जगत अपने आप में पूरा एक अलग ही संसार है, जिसमें गति है, जिसकी अपनी सत्ता है एवं जिसमें असीम संभावनाएँ निहित हैं। इसे हम अध्यात्म विज्ञान नाम से जानते हैं। ये दोनों ही शाखाएँ अपनी भूमिका अलग-अलग रूपों में निभाती रहती हैं; पर हैं परस्पर गुँथी हुईं।

पदार्थ विज्ञान के प्रयोग-अनुसंधान ही अनेकों रूपों में आज प्रयोगशालाओं में क्रियाशील नजर आते हैं। एप्लाइड फिजिक्स, केमिस्ट्री, न्यूक्लियर साइंस जैसी अनेकानेक शाखाओं में बँटी भौतिकी यंत्र-उपकरणों की मदद से इस सदी के प्रारंभ से अब तक मानव समुदाय को अनेकों उपलब्धियों से लाभान्वित कर चुकी। इसके लिए उसकी जितनी सराहना की जाए, कम है। अध्यात्म विज्ञान के प्रयोग-अनुसंधान एक ही यंत्र के माध्यम से संपन्न होते हैं। यह यंत्र है— जड़-चेतन के सम्मिश्रण से बनी मानवी काया। स्थूलशरीर जो दिखाई पड़ता है, वही सब कुछ नहीं है। गहराई से देखने पर इस काया की दो अदृश्य परतें और दृष्टिगोचर होती हैं, जिन्हें ‘सूक्ष्मशरीर’ एवं ‘कारणशरीर’ नाम से पुकारा जाता है। दृश्यमान काया का तो मात्र उदरपूर्ति, मल विसर्जन, प्रजनन आकांक्षा एवं दैनिक जीवन-व्यापार भर से नाता रहता है; लेकिन अन्य दो परतों का संबंध उस अदृश्य लोक से है, जिससे स्थापित कर चेतनसत्ता समष्टि का एक अंग बन जाती है एवं वे कार्य संपादित करने लगती है, जिन्हें अद्भुत-अलौकिक माना जाता है, जबकि होते वे भी सुगम एवं प्रकृति अनुशासन की मर्यादा में ही हैं।

यह अदृश्य जगत कैसा है? कहाँ है? इसकी खोज-बीन भौतिकी के चश्मे से नहीं की जा सकती। इसके लिए योग एवं तंत्र विज्ञान की धाराओं को— उनके रहस्यों को मनीषी स्तर के चिंतन के माध्यम से समझना होगा। मानवी काया, जिसे इस अदृश्यलोक का यंत्र-उपकरण बताया गया है, का सूक्ष्म कलेवर इस दृष्टि से दो भागों में विभक्त माना जा सकता है। एक मस्तिष्क के ऊर्ध्व भाग में स्थित ब्रह्मरंध्र, सहस्राररूपी विद्युत-स्फुल्लिंगों के निर्झर एवं आज्ञाचक्र का समुच्चय। दूसरा निचले छोर पर स्थित प्राणाग्नि का सघन पुंज, जिसे मूलाधार, कुंडलिनी एवं प्राण-संस्थान कहा गया है।

काया के निचले छोर पर स्थित मूलाधार केंद्र की आलंकारिक दृष्टि से तुलना अधःलोक— पाताल लोक से की गई है। पृथ्वी को शेषनाग पर विराजमान माना गया है। वह कल्पना आत्मिकी की भाषा में काया पर मूलाधार या कुंडलिनी के रूप में अवस्थित सर्पिणी के माध्यम से समझाई जाती है। यह काय-कलेवर में प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाला केंद्र है। जड़-प्रकृति के सारे क्रियाकलाप गति एवं शक्ति पर आधारित हैं। काया का दक्षिणी ध्रुव इन्हीं दोनों प्रयोजनों को पूरा करता है।

इन दोनों केंद्रों— चेतनसत्ता एवं जड़ प्रकृति को परस्पर मिलाने— दोनों के मध्य आदान-प्रदान का प्रयोजन जिस उपकरण से पूरा होता है, उसे मेरुदंडरूपी देवयान मार्ग के रूप में समझा जा सकता है। अधोलोक के माध्यम से निर्वाह प्रयोजन— उदरपूर्ण एवं प्रजनन जैसी गतिविधियाँ सधती हैं। काया की निरोगता, दीर्घायुष्य, जीवनीशक्ति इसी पर निर्भर है। अध्यात्मविज्ञानियों ने इन स्थूल पक्षों को जनसमुदाय के लिए स्पष्टकर चेतना विज्ञान के उन अदृश्य-क्षेत्रों पर और अधिक प्रकाश डालने का प्रयास किया है, जो इन केंद्रों व इन्हें जोड़ने वाली सुषुम्ना नाड़ी-प्रवाह से संबंधित है।

अनंत सामर्थ्यसंपन्न विश्व-ब्रह्मांड की दैवी चेतना से संपर्क जोड़ने के लिए जहाँ ब्रह्मरंध्र एवं सहस्रार का योग विज्ञान के माध्यम से प्रयोग होता है, वहाँ प्रकृति-वैभवरूपी दैत्य शक्तियों के प्रचंड प्रवाह से लाभ उठाने के लिए तंत्र विज्ञान का आश्रय लेना होता है। ऊर्ध्वलोक का नेतृत्व जहाँ परब्रह्म— सदाशिव करते हैं, वहाँ अधोलोक की अधिष्ठात्री हैं— महाकाली कुंडलिनी। मध्यव्यापी देवयान मार्ग दोनों के बीच सघन संपर्क बनाए रखने की महती भूमिका निभाता है।

स्वर्गलोक— ऊर्ध्वलोक— मस्तिष्क में अवस्थित सहस्रार को जगाने हेतु योग-साधना के विभिन्न उपक्रम हैं, जब कि पाताललोक— अधोलोक— मूलाधार में अवस्थित कुंडलिनी में स्पंदन पैदा करने के लिए तंत्र-साधना के अनेकों उपक्रम शास्त्रों में वर्णित हैं। ये दोनों मिलकर आत्मिकी की विधा को पूर्ण बनाते हैं। एक शिव है एवं दूसरी शक्ति। दोनों मिलकर संपूर्ण बनते हैं।

योगी ब्रह्मपारायण होते हैं; दिव्यलोक में विचरण करते हैं; भाव-साधना के माध्यम से दैवी संपर्क स्थापित करते हैं, जबकि तांत्रिक शक्ति के उपासक होते हैं। वे प्रकृति में विद्यमान अपरिमित शक्ति-स्रोतों से अपना संपर्क स्थापितकर कुंडलिनी केंद्र को जगाने व प्रकृति से आदान-प्रदान का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार शरीर की ये दोनों ही सूक्ष्मपरतें अदृश्य रूप में ब्रह्म एवं प्रकृति से घनिष्ठता स्थापित कर वांछित अनुदान अपने लिए प्राप्त करते, अंतः को बलिष्ठ बनाकर अन्यान्यों को लाभान्वित करते देखे जा सकते हैं। योग एवं तंत्र के समूचे विज्ञान को इस रूप में भली-भाँति समझकर ही साधना उपक्रमों को आरंभ किया जाना चाहिए।

तंत्रविज्ञानी प्रकृति के परिकर में छिपी अनेकों ज्ञात-अविज्ञात शक्तियों का अपने लिए उपभोग कर सकते हैं। माध्यम उपकरण काय-कलेवररूपी यंत्र ही है। ईश्वर द्वारा अनुदान रूप में मिली काया की इस प्रयोगशाला का लाभ बिना किसी लागत के उठाया जा सकता है, बशर्ते कि तप-तितीक्षा के अध्यात्म अनुशासनों को पूरी तरह निभाया गया हो एवं बदले में प्राप्त ऋद्धि-सिद्धिरूपी अनुदानों के दुरुपयोग न होने देने का समुचित आश्वासन उस दैवी सत्ता को दे दिया गया हो। आत्मशोधन की संयम-साधना के बिना, कषाय-कल्मषों को हटाए बिना ये चमत्कारी विभूतियाँ हस्तगत होती नहीं। ये कुछ प्रारंभिक शर्तें हैं। जिन्हें पूरी किए बिना न योग-साधना सध पाती है, न तंत्र-साधना ही संभव हो पाती है। योगी अपने प्रचंड आत्मबल के सहारे इस दीवाल को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं। इसी प्रकार तांत्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं, जो उन्हें अभीष्ट होता है।

दोनों ही क्षेत्रों की अपनी-अपनी मर्यादा है, लेकिन दोनों परस्पर अविच्छिन्न रूप से जुड़े भी हैं। योगी, शिव का— आदर्शवाद की समर्थक शक्तियों का उपासक होता है एवं तांत्रिक शक्ति का— भौतिक क्षेत्र की सामर्थ्यों का आराधक, जिनके माध्यम से प्रकृति-संपदा के वैभव का लाभ वह सारे परिकर को दे सकने में समर्थ बनता है। दोनों ही समान महत्त्व के, लेकिन तभी, जब दोनों का मानव-कल्याण हेतु उपयोग हो।


सशक्त ध्रुवकेंद्रों की अधिष्ठात्री– कुंडलिनी

पृथ्वी को जो भी सामर्थ्य प्राप्त है, उसका मूल आधार सूर्य है। पृथ्वी जिन मर्मकेंद्रों से सूर्य का शक्ति-प्रवाह ग्रहण करती है, उसे उत्तरी ध्रुव कहते हैं। जैसे भोजन मुँह द्वारा किया जाता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी शक्ति-सामर्थ्य सूर्य से उत्तरी ध्रुव के माध्यम से प्राप्त करती है। चिड़िया जैसे अपने बच्चों को दाना खिलाती है, सूरज भी भू-पिंडरूपी अपने नन्हें शिशु को वह सारा वैभव प्रदान करता है, जिससे उसका जड़-चेतन परिकर इतना सुरम्य बना हुआ है।

भूलोक जिस मुख-गह्वर में सामर्थ्य ग्रहण करता है, उसे ‘ध्रुव’ कहते हैं। मानवी कायारूपी धरती का मुख ब्रह्मरंध्र है, जिसका चुंबकीय केंद्रबिंदु ‘सहस्रारचक्र’ है। धरती पर अनायास ही प्रकृति क्रमानुसार सूर्य की सामर्थ्य बरसाती और प्रविष्ट कराती है। उसी प्रकार ‘ब्रह्मरंध्ररूपी’ सूर्य अपने प्राप्त अनुदान को ‘दक्षिण ध्रुवरूपी’ प्रतिनिधि ‘मूलाधारचक्र’ को प्रदान करता रहता है। मनुष्य की अगणित प्रकट-अप्रकट क्षमताएँ इसी प्रकाशपुंज के कारण जागृत होतीं एवं प्रतिभा-मेधा-जीवटरूपी विभूतियों के रूप में अपनी गरिमा दर्शाती हैं। इन क्षमताओं— उच्चस्तरीय शक्तियों को दीप्तिमान ‘अग्निपिंड’ के रूप में माना गया है, जिसे ‘कुंडलिनी’ कहते हैं। यद्यपि इसका निवासस्थान ‘मूलाधार’ है, तथापि इसका मूल स्रोत ‘सहस्रार’— ब्रह्मरंध्ररूपी उच्चस्तरीय केंद्र ही है, जिसे ‘प्राणाग्नि’ का ‘ऊर्जाकेंद्र’ कहा गया है, जो समष्टिगत प्राण से सीधे संपर्क स्थापित करने में सक्षम है।

कुछ दिन पूर्व तक वैज्ञानिक यह समझते थे कि अपनी कक्षा में घूमने से तथा सूर्यताप सम्मिश्रण से ही ध्रुवीय चुंबकत्व उत्पन्न होता है; पर अब ‘कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय’ (सांतादियागो) के खगोलविज्ञानी ‘डॉ. डब्ल्यू एक्सफर्ड’ ने अपनी दीर्घकालीन शोध के उपरांत उसे सूर्य से प्रवाहित हो रहे एक निर्झर के रूप में प्रतिपादित किया है। उन्होंने वाशिंगटन की ‘इंटरनेशनल मैग्नेटोस्फियर कॉफ्रेंस’ में अपना शोध-निबंध पढ़ते हुए कहा था कि सूर्य का शक्ति-प्रवाह समस्त धरती पर नहीं, वरन उत्तरी ध्रुव के एक विशेष स्थल पर बरसता है, जो ध्रुवप्रभा के रूप में खुली आँखों से भी देखा जा सकता है। वहाँ से वह प्रकाश फिर पृथ्वी के वायुमंडल तथा अंतर्गर्भ में प्रवेश करके धरती में जीवन उत्पन्न करता है। यह शक्ति-प्रवाह इतना तीव्र होता है कि यदि धरती उसे अपने व्यापक-क्षेत्र में तत्काल वितरित कर दे, तो वह क्षण भर में जलकर भस्म हो जाए।

मानवी काया की ठीक यही स्थिति है। चेतना के प्राण सूर्य— ‘सविता’ से उसकी दिव्य किरणें ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करती हैं। वहाँ से वह प्रपात दक्षिण ध्रुव तक बहता चला आता है और वहाँ नियंत्रित— परिष्कृत होकर विभिन्न दिव्य नाड़ियों द्वारा शरीर और मन के विभिन्न क्रियाकलापों का संचालन करने के लिए वितरित हो जाता है। कुंडलिनी शक्ति का यही क्रम है। शक्ति वितरण का वही प्रत्यक्ष केंद्र जननेंद्रिय मूल में अवस्थित ‘अग्नि गह्वर’ कामबीज ही है। इसी को संग्रहभंडार कहना चाहिए। इसी को अंतः में प्राणाग्नि एवं बहिरंग में तेजोवलय— दीप्तिमान अग्नि पुंज के रूप में देखा जा सकता है।

दीप्तिमान अग्नि एवं कायगत प्राणाग्नि ये दो ही अग्नियाँ शरीर एवं मन के माध्यम से विविध क्रियाकलाप करती देखी जाती हैं। यह अग्नि-संतुलन यदि अस्त-व्यस्त हो जाए, तो मनुष्य निराश, टूटा हुआ, हतवीर्य दिखाई पड़ता है। जीवित होते हुए भी उसमें आशा और स्फूर्ति की चमक समाप्त हो चुकी होती है। ओजस्, तेजस्, मनोबल, आत्मबल, ब्रह्मवर्चस् की दीप्तिमान चिनगारियाँ, जो मनुष्य के क्रियाक्षेत्र में एवं भावना-प्रवाह में दिखाई पड़ती हैं, वे मूलतः इन्हीं दिव्य अग्नियों की अभिव्यक्ति हैं। आत्मिकी की भाषा में इसे कुंडलिनी शक्ति की प्रस्फुटित आभा कहकर संबोधित करते हैं।

जिस प्रकार ध्रुवीय चुंबकत्व सूर्य से प्रवाहित ऊर्जा-निर्झर के उत्तरी ध्रुव पर केंद्रित शक्ति-प्रवाह के रूप में अपना अस्तित्व प्रकट करता है, उसी प्रकार मानवी तेजस् जैव चुंबकत्व भी सहस्राररूपी उत्तरी ध्रुव के माध्यम से सुषुम्ना के प्रवाह-पथ में गतिशील होता है। पूरा सुषुम्ना का पथ एक आयनिक क्षेत्ररूपी चेतन-प्रवाह से घिरा होता है, जिसमें सघन ऋणावेशित एवं धन आवेश वाले आयन्स का परिभ्रमण होता रहता है। इनकी तुलना हम तालाब में उठने वाली जल-तरंगों से कर सकते हैं। जिसमें केंद्र से उठने वाला प्रवाह क्रमिक गति से चारों ओर के क्षेत्र में तरंगें फैलाता रहता है। मूलाधारचक्र वह केंद्र है, जहाँ अंतःइड़ा एवं अंतःपिंगला नाड़ी आकर मिलती हैं। सामान्य ऊर्जा सतत नष्ट करने वाले व्यक्तियों में सूक्ष्म रूप से जुड़ी होने पर भी आयन्स का प्रवाह इनमें नहीं होता, न ही उच्च आवेश वाले आयामों को धारण करने की क्षमता ही विकसित हो पाती है। इस केंद्र की सुषुप्ति से जागृति एवं स्फुरणा तब होती मानी जाती है, जब योग-साधना का आश्रय लेकर इड़ा-पिंगला की आयानिक सघनता बढ़ाई व ऊर्ध्वगमन की प्रतिक्रिया गतिशील बनाई जाती है। यह क्षेत्र जिसकी संज्ञा दक्षिणी ध्रुव से दी जाती है, एक प्रकार का बायो-कंडेंसर है, जहाँ चुंबकीय बल सम मात्रा में केंद्रित एवं सघन होता है।

भौतिकी के ज्ञाता जानते हैं कि कंडेंसर एक विद्युत उपकरण होता है, जो निश्चित क्षमता के अनुसार विद्युत-ऊर्जा संग्रह करने में समर्थ है। जैसे चिनगारी के रूप में ऊर्जा प्रस्फुटित होती है, उसी प्रकार कंडेंसर की प्लेट के मध्य स्थित डाय इलेक्ट्रिक दो विद्युत-ऊर्जाकेंद्रों के बीच स्पार्क का काम करता है। इड़ा, पिंगला के आयोनिक विभव के मध्य स्थित मूलाधारचक्र का यह बायो- कंडेंसर ऊर्जा के एकीकरण— सघनीकरण— ऊर्ध्वगमन में महत्त्वपूर्ण उपकरण की भूमिका निभाने लगता है। वह ऊर्जा-प्रवाह उतना ही ऊँचा जाता है, जितनी कि मात्रा से ऊर्जा विनिर्मित होती है। इस प्रवाह का स्फुरण उन्नयन ही प्रसुप्त कुंडलिनी का जागरण है, जिसकी चरम परिणति सहस्राररूपी उच्चकेंद्र पर जाकर आनंदमयकोश के जागरणरूपी उच्चस्तरीय उपलब्धि के रूप में होती है।

मानव का शरीर ऊर्जा का पुंज है। इसके अंदर स्नायुतंतुरूपी नेटवर्क इतना जटिल है कि किसी भी यंत्र को इसका विकल्प नहीं बनाया जा सकता है। योगतंत्र विज्ञान के ज्ञाता यह जानते हैं कि समष्टि में संव्याप्त प्राण-ऊर्जा के प्रवाह को कैसे अपने अंदर संग्रहितकर इस नेटवर्क को जंजाल मात्र न रहने देकर एक डायनेमो बना दिया जाए, जो सूक्ष्म शक्तिसंपन्न केंद्रों को जगाने की भूमिका संपन्न कर सके।

तंत्रवेत्ताओं ने वैज्ञानिक आधार पर वह परिकल्पना की है कि सुषुम्ना के मध्य ब्रह्मनाड़ी पर शक्तिशाली चुंबकीय प्रवाह होता है। नीचे से ऊपर तक मुख्यतः 6 चक्र विद्यमान हैं। प्रत्येक दो चक्र के मध्य एक ऊर्जा पैकेट तब बनता है, जब नीचे का डायनेमो जैव चुंबकीय प्रभाववश चलने लगता है। हर दो चक्र के मध्य का केंद्रबिंदु एक प्रकार से ‘इलेक्ट्रो डायनेमो कॉइल’ होता है, जिसका मध्य भाग अपार ऊर्जा से भरा होता है। इड़ा व पिंगला नाड़ियाँ, सिंपेथेटिक व पैरा सिंपेथेटिक स्नायु संस्थान एक प्रकार से इसी प्रकार के शक्तिशाली दो कॉइल हैं, जिनके मध्य सुषुम्ना एवं षट्चक्र तथा छोटे-छोटे ऊर्जा पैकेट विद्यमान हैं। यौगिक क्रियाएँ जो क्रियायोगमात्र नहीं, अपितु उच्चस्तरीय भावयोगपरक होती हैं, अन्यान्य अध्यात्म अनुशासनों— तप-तितीक्षा के द्वारा इस क्षेत्र की तीव्रता को बहुत बढ़ा देती है और यह कॉइल सक्रिय होकर सर्पिल गति से ऊपर की ओर चल पड़ता है। यही इस ऊर्जाकेंद्र का जागरण है, जिसे कुंडलिनी योग नाम से पुकारा जाता रहा है। सारी प्रक्रिया विज्ञानसम्मत है, जटिल भौतिकी के सिद्धांतों पर आधारित है। अतः किसी प्रकार के संदेह की कहीं गुंजाइश नहीं रह जाती।

कुंडलिनी-साधना में नादबिंदु योग के उपक्रम के विस्तार में जब आज्ञाचक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है, तो रंग-बिरंगी झिलमिल किरणें उपजती, उड़ती और विलीन होती दिखती हैं। यह दिव्यशक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिह्न माना जाता है। यह झिलमिल ऊर्जा-प्रवाह उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरंध्र में चुंबकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करता है। ज्ञातव्य है कि सूर्य इन दोनों ध्रुवों को ही अपनी अत्यधिक शक्ति प्रदान करता है। फिर भी वे इसलिए ठंडे हैं कि वहाँ सूर्य की रोशनी तथा गरमी फैलकर नष्ट हो जाती है। लगभग पचास लाख वर्गमील से अधिक क्षेत्र का उत्तरी ध्रुव और तीन लाख वर्गमील से भी अधिक क्षेत्र का दक्षिणी ध्रुव एक प्रकार का दर्पण-क्षेत्र है, जहाँ से सूर्य-किरणें परावर्तित होकर लौट आती हैं अथवा इन ध्रुव प्रदेशों की बरफ और नम वायुमंडल में ऊर्जा जज्ब होकर रह जाती है, इसलिए यह क्षेत्र जहाँ अत्यधिक शीत वाला है, वहाँ इसके अंदर शक्ति की मात्रा भी बहुत अधिक है— अपरिमित है।

भगवान मनुष्य को जो भी अनुदान, वरदान और अनुग्रह प्रदान करते हैं, उनका 80 प्रतिशत भाग इन दोनों ध्रुवों को— सहस्रार एवं मूलाधार को ही प्राप्त होते हैं; पर इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हमारी ठंडक, प्रमाद, उपेक्षा, अकर्मण्यता, मोहग्रस्तता, वीर्यक्षय में वह सभी दिव्य अनुदान-वरदान निरर्थक चले जाते हैं। उस अनुदान का सदुपयोग कैसे किया जा सकता है और उस माध्यम से सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है। यह विज्ञान कुंडलिनी योग में भरा पड़ा है।

अपना मनःक्षेत्र यदि सांसारिक विषय— विकारों का ज्वलनशील भाग से विरत करके शून्य तापमान तक ले जाया जा सके, तो इस संसार में कहाँ क्या हो रहा है, कौन क्या कर या सोच रहा है, इसकी सूक्ष्म ध्वनि बहुत स्पष्ट से सुनाई पड़ सकती है और भूतकाल एवं वर्तमान की घटनाओं— परिस्थितियों को ही नहीं, भविष्य की संभावनाओं को भी जाना जा सकता है। यदि अपना मन तपश्चर्या की— योगाग्नि की गरम पट्टी को आकाश से आच्छादित कर ले, तो फिर संसार के आकर्षण, प्रलोभन, कौतूहल, भय, मनोविकार के ढोल ही क्यों न बजते रहें, उनका एक भी शब्द कान में नहीं आता और घोर कोलाहल भरे वातावरण में रहते हुए भी चित्त को समाधिस्थ जैसा बनाकर रखा जा सकता है। यह ध्रुवों जैसी परिस्थितियाँ, कुंडलिनी-साधना द्वारा उपलब्ध की जा सकती हैं; क्योंकि वस्तुतः शरीरगत ध्रुवों का ज्यों-का-त्यों लेखा-जोखा ही कुंडलिनी विज्ञान में सन्निहित है।

साधना ग्रंथों, उपनिषदों में पवित्र जीवन-अग्नि, पंचाग्नि के रूप में कुंडलिनी शक्ति का वर्णन है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को उष्ण एवं प्रकाशवान बना देती है, वैसा ही प्रकाश कुंडलिनी जागरण का भी होता है। मंडल ब्राह्मणोपनिषद् में ऋषि लिखते हैं—

मूलाधारादा ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं सुषुम्ना सूर्याभा।

तन्मध्ये तटित्कोटिसमा मृणालतन्तु सूक्ष्मा कुण्डलिनी।

तत्र तमोनिवृत्तिः।

तद्दर्शनात्सर्वपापनिवृत्तिः॥   (1/2)

अर्थात मूलाधार से लेकर ब्रह्मरंध्र तक सूर्य के प्रकाश जैसी सुषुम्ना नाड़ी फैली हुई है। उसी के साथ कमलतंतु समान सूक्ष्म कुंडलिनी शक्ति बँधी हुई है। उसी के प्रकाश से अंधकार दूर होता है और पापों से निवृत्ति होती है।

इस दिव्य प्रकाश की उपलब्धि और अंधकार की निवृत्ति में योग-साधना से बड़ा महत्त्वपूर्ण सहयोग मिलता है। कहा जा सकता है कि कुंडलिनी-साधना ही वह सुगम और सहज-सुलभ मार्ग है, जिसके माध्यम से समष्टिगत प्राण से स्वयं को ऊर्जावान— प्रकाशवान बनाया जा सकता है।


कायाकल्प एक सतत क्रियाशील प्रक्रिया— एक वैज्ञानिक कथन (सद्विचार)

कायाकल्प की हम नित्य चर्चा करते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तो एक सतत क्रियाशील प्रक्रिया है। अनुमानतः प्रति व्यक्ति में औसतन 98 प्रतिशत जीवकोशों का ‘टर्न ओवर’ प्रतिवर्ष होता रहता है अर्थात पुरानों का स्थान नए सेल्स ले लेते हैं।


सत्य को न समझ पाने की आत्मघाती विडंबना

किसी गाँव में कन्फ्यूशियस शिष्यों सहित पधारे। गाँव के पाँच युवक एक अंधे को पकड़कर उनके पास लाए। उनमें से एक बोला— “भगवन्! एक समस्या हम सबके लिए उत्पन्न हो गई है। यह व्यक्ति आँख का तो अंधा है, पर है बहुत मूर्ख एवं हद दरजे का तार्किक। हम इसको सतत समझा रहे हैं कि प्रकाश का अस्तित्व है। प्रकृति के दृश्यों में सौंदर्य की अद्भुत छटा है। दुनिया में कुरूपता एवं सुंदरता का युग्म सर्वत्र विद्यमान है। सूर्य, चाँद, सितारे प्रकाशवान हैं। समस्त संसार उनसे प्रकाशित-आलोकित होता है। रंग-बिरंगे पुष्पों में एक प्राकृतिक आकर्षण है, जो सबका मन मोह लेता है। बसंत के साथ प्रकृति शृंगार करके अवतरित होती—  सबको मनमोहित करती है।”

“हमारी हर बात को यह अंधा अपने तर्कों के सहारे काटकर रख देता है। कहता है कि, “प्रकाश की सत्ता कल्पित है। तुम लोगों ने मुझे अंधा सिद्ध करने के लिए प्रकाश के सिद्धांत गढ़ लिए हैं। वस्तुतः, प्रकाश का अस्तित्व ही नहीं है। यदि है, तो सिद्ध करके बताओ। मुझे स्पर्श कराके दिखाओ कि प्रकाश है। यदि स्पर्श के माध्यम से संभव नहीं है, तो मैं चखकर देखना चाहता हूँ। यदि तुम कहते हो, वह स्वादरहित है, तो मैं सुन सकता हूँ। प्रकाश की आवाज संप्रेषित करो। यदि उसे सुना भी नहीं जा सकता, तो तुम मुझे प्रकाश की गंध का पान करा दो। मेरी घ्राणेंद्रियाँ सक्षम हैं, गंध को ग्रहण करने में। मेरी चारों इंद्रियाँ समर्थ हैं। इनमें से किसी एक से प्रकाश का संपर्क करा दो। अनुभूति होने पर ही तो मैं मान सकता हूँ कि प्रकाश की सत्ता है।”

उन पाँचों ने कन्फ्यूशियस से कहा—  “आप ही बताएँ, इस अंधे को कैसे समझाएँ? प्रकाश को चखाया तो जा नहीं सकता, न ही स्पर्श कराया जा सकता है। उसमें से गंध तो निकलती नहीं कि इसे सुँघाया जा सके, न ही ध्वनि निकलती है, जिसे सुना जा सके। आप समर्थ हैं, संभव है आपके समझाने से उसे सत्य का ज्ञान हो।

कन्फ्यूशियस बोले—  “प्रकाश को यह नासमझ जिन इंद्रियों के माध्यम से समझना— अनुभव करना चाहता है, उनसे कभी संभव नहीं है कि वह प्रकाश का अस्तित्व स्वीकार ले। उसको बोध कराने में तो मैं भी असमर्थ हूँ। तुम्हें मेरे पास नहीं, किसी चिकित्सक के पास जाना चाहिए, जब तक नेत्र नहीं मिल जाते, कोई भी उसे समझाने में सफल नहीं हो सकता। इसलिए कि आँखों के अतिरिक्त दृश्य प्रकाश का कोई प्रमाण नहीं है।”

महान दार्शनिक का निर्देश पाकर पाँचों उस जन्मजात अंधे को एक कुशल वैद्य के पास लेकर पहुँचे। विशेषज्ञ वैद्य बोला—  ‘‘इस रोगी को तो और पहले लाना चाहिए था। इसका रोग इतना गंभीर नहीं है। बेकार में यह अपनी आयु की इतनी लंबी अवधि अंधेपन का भार लादे व्यतीत करता रहा।”

वैद्य ने शल्यक्रिया द्वारा आँखों की ऊपरी झिल्ली हटा दी, जिससे प्रकाश को आने का मार्ग मिल गया। अल्पावधि के उपचार से ही वह अंधा ठीक हो गया। उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उसके सारे तर्क अपने आप तिरोहित हो गए। अपनी भूल तिरोहित हो गई। अपनी भूल उसे समझ में आ गई। कन्फ्यूशियस ने शिष्यमंडली से कहा— “तुम्हें उस अंधे की मूर्खता तथा तर्कशीलता पर हँसी आ सकती है, पर उन तथाकथित बुद्धिमानों को किस श्रेणी में रखा जाए, जो ईश्वर जैसी अगोचर, निराकार, इंद्रियातीत सत्ता को प्रत्यक्ष इंद्रियों के सहारे समझने का प्रयास करते हैं। उसमें असफल होने पर ऐसे असंख्यों अंधे उद्घोष करते दिखाई देते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, वह तो आस्तिकों की मात्र कल्पना है।”

सचमुच ही अंतःकरण पर छाए कषाय-कल्मषों को धोकर परिमार्जित किया जा सके, उसे निर्मल बनाया जा सके, तो उसमें ईश्वरीय प्रकाश को झिलमिलाते देखा— अनुभव किया जा सकता है।


मानवी सभ्यता का नवोन्मेष सुनिश्चित

इस धरित्री पर मानवरूपी जीव कब अवतरित हुआ, इस पर विकासवादियों से लेकर पुरातत्त्वविदों ने अपने-अपने समर्थन में ढेरों प्रतिपादन प्रस्तुत किए हैं। कुछ का कथन है कि पहले कभी जीवन योग्य परिस्थितियाँ इस ग्रह पर नहीं थीं। यहाँ का वातावरण जीवन योग्य विनिर्मित होने पर अन्य ग्रहों से देहधारी आए और उन्होंने मानव जाति को जन्म दिया। क्षुद्र अमीबा से— क्रमिक गति से विकसित होकर मानव इस स्थिति में पहुँचा है, यह विकासवादियों का मत है। आर्ष मान्यता अपने स्थान पर है कि मनुष्य प्रारंभ से ही ईश्वर की एक श्रेष्ठ कलाकृति के रूप में जन्मा व उसी ने सभ्यता के विकासक्रम को आज की स्थिति में पहुँचाया।

अब ‘फ्यूचरॉण्टालाजिस्टो’ (भविष्य विज्ञानियों) की एक नई पीढ़ी उभरकर आ रही है, जो कहती है कि यह पृथ्वी अब रहने योग्य रही नहीं। मनुष्य के विकास की अंधाधुंध गति एवं संसाधन-दोहन की स्वार्थपरता की नीति ने ऐसी परिस्थितियों को जन्म दे दिया है कि आवास हेतु मनुष्य को अन्य ग्रहों पर निवास का कोई विकल्प सोचना पड़ेगा। इसके लिए वे अंतरिक्षीय बस्तियों के बजाय ग्रहों को अधिक उपयुक्त मानते हैं व कहते हैं कि पृथ्वी की तरह ही वहाँ का वातावरण बदला जाना भी संभव है।

‘यूटोपिया’ की इस मृगमरीचिका में उलझने के स्थान पर अच्छा होगा कि हम यह विचार करें कि देव संस्कृति की आदर्शवादी मान्यताओं को देने वाली, उसी के आधार पर विकास की इस स्थिति में पहुँचने वाली मानव जाति इसी ग्रह को सुव्यवस्थित— सुरम्य बनाए। जनसंख्या विस्फोट एवं युद्धोन्माद की विकृत मनःस्थिति अध्यात्म मान्यताओं के अवलंबन से बदली भी जा सकती हैं एवं कोई जरूरी नहीं कि इस ग्रह का अंत वैसा हो, जैसा कि निराशावादी स्वरों में वैज्ञानिक बताते हैं। यदि मनःस्थिति ऐसी ही रही, तो क्या वह अन्यान्य ग्रहों को भी वैसा नहीं बना देगा, जो उसने पृथ्वी के साथ किया है। यह भी एक सोचने योग्य प्रश्न है?

ऐसा अनुमान है कि लगभग पचास करोड़ वर्षों पूर्व इस धरती पर जीवन का उद्गम हुआ था, लेकिन चौदह करोड़ वर्षों तक की ही जानकारी संकलित फॉसिल्स आदि के आधार पर प्राप्त कर पाए हैं। चट्टानों पर पाए गए कंकालों के निशान से उनकी आयु का पता चलता है एवं यह जानकारी मिलती है कि उस काल का मनुष्य पूर्णतः विकसित एवं सभ्यता की पराकाष्ठा पर था। उस समय जो यहाँ के मूल निवासी थे, उन्होंने अन्य ग्रहों से आदान-प्रदानकर स्वयं को सुविकसित बनाया।

सुप्रसिद्ध विद्वान लेखक ‘एरिक वान डेनिकेन’ ने इस तथ्य को प्रतिपादित करने के लिए कि ‘मनुष्य मूलतः देव पुत्र है’, सहस्रों मील यात्राकर अनेकों प्रमाण एकत्र किए व चित्रों के माध्यम से पुस्तकें प्रकाशित की। उन्होंने ‘चेरियट्स ऑफ गॉड्स’, ‘द एन्शीएंट गॉड्स’  नामक पुस्तकों में यही प्रमाणित किया है कि अंतरिक्ष यान पर सवार होकर मनुष्य सुनियोजित क्रम से इस ग्रह पर आया और उसने सभ्यता का विकासकर अपनी संतानें यहाँ छोड़ दीं। वे इसे एक सुनिश्चित तथ्य मानते हैं कि मानव देवताओं की संतति है— प्रारंभ से ही श्रेष्ठ रही है, कालांतर में उसने भले ही वर्तमान स्वरूप ले लिया हो। एक परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए वे लिखते हैं कि, “जहाँ प्रस्तरयुग की परिस्थितियाँ हों, वहाँ जब ये देवपुत्र उतरे, तो उनके डील-डौल, सुविकसित यान एवं अन्यान्य उपलब्धियों को देखकर देवता ही समझा गया। उनके यान, प्रक्षेपास्त्र तथा अन्य विकसित वैज्ञानिक उपकरण यहाँ के निवासियों को मनुष्य की दैवीशक्ति के प्रतीक ही लगे। इस कल्पना के आधार पर उन्होंने सुदूर अतीत में झाँकते हुए लिखा है कि अब से कुछ हजार वर्ष पूर्व इस तरह की घटनाएँ निश्चित रूप से पृथ्वी पर भी घटित हुई होंगी और अन्य ग्रहों पर निवास करने वाले लोग, जिनका उल्लेख देवताओं के रूप में किया जाता है, भारत, पश्चिम एशिया, अमेरिका तथा मिस्र आदि देशों में उतरे होंगे और वहाँ के निवासियों ने उनको देवता कहकर संबोधित किया होगा।

अनेकों उदाहरणों तथा पौराणिक कथाओं का विश्लेषणकर लेखक ‘डोनिकेन’ ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय धर्म के अनुसार ब्रह्मा तथा मनु के नेतृत्व में सुमेरु पर्वत और सागर में दूसरे ग्रहों से देवताओं का अवतरण हुआ। मिस्र, बेबीलोन आदि देशों में नूह, जर्मनों में ट्यूटनों के अनुसार मनस इत्यादि आदि पुरुषों का अवतरण, इसी प्रकार अन्य ग्रहों से देवताओं का आगमन हुआ। एनी बेसेंट ने अपनी पुस्तक ‘थियोसॉफी एंड रिलीजन’ में लिखा है कि, “आर्यों का अस्तित्व पृथ्वी पर दस लाख वर्षों से है।” भूगर्भशास्त्रियों और पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार भी आर्यों के समान, मेधावी और प्रतिभासंपन्न जाति के प्रमाण इससे अधिक पुराने समय से पहले के नहीं मिलते। प्रश्न उठता है कि दस लाख वर्ष पूर्व क्या मनुष्य एकदम सभ्य, सुसंस्कृत तथा मेधावी हो उठा?

भारतीय धर्मग्रंथों में पिछड़े, असभ्य या कम सभ्य लोगों के बीच इस प्रकार की अतिमानवी क्षमता वाले असाधारण पुरुषों के आने और उनसे संपर्क स्थापित करने के अनेकानेक उदाहरण मिलते हैं। इन विवरणों का विश्लेषण करते हुए सुप्रसिद्ध विद्वान ‘प्रो. हार्क्सटेवर’ ने लिखा है कि, “अन्य ग्रहों से जब देवता इस पृथ्वी पर आए, तो उन्होंने अपने ज्ञान तथा पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य जैसे सर्वगुणसंपन्न प्राणी की सहायता से पृथ्वी के गर्भ में विभिन्न स्थानों पर मूल्यवान खनिज भंडारों को ढूँढ निकाला। भारत में उन्होंने भील, काले, गोरे आदि जातियों को प्रशिक्षित किया तथा द्रोणाचार्य, भीम अर्जुन जैसे प्रशिक्षित व्यक्तियों को दिव्यास्त्र प्रदान किए। महाभारत में उल्लेख आता है कि अर्जुन को दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए हिमालय की यात्रा करनी पड़ी और भगवान शंकर को प्रसन्न करना पड़ा था। इस विवरण की गवेषणा करते हुए ‘प्रो. हार्क्सटेवर’ ने लिखा है कि, “प्रशिक्षित पृथ्वीवासियों को दिव्यास्त्र देते समय देवतागण उन्हें सतर्क कर देते थे कि इनका उपयोग केवल संकटकाल में ही किया जाए। इतना ही नहीं, देवता लोग अपने आपको तथा दिव्यास्त्रों को साधारण मनुष्यों से दूर ही रखते थे।

ज्ञान के धीरे-धीर विकास होने की मान्यता के स्थान पर प्रशिक्षण और अभ्यास द्वारा उसके अर्जन की संभावना पर प्रकाश डालते हुए ‘डॉ. ई. आ. एलाड’ ने लिखा है कि, “ज्ञान का आकस्मिक स्फोट या क्रमशः विकास नहीं होता। आरंभ में उसका बीजारोपण करना ही पड़ता है, जो प्रशिक्षण द्वारा ही संभव है। बाद में अभ्यास से उसे विकसित किया जा सकता है।” इस सिद्धांत की पुष्टि में ‘डॉ. एलाड’ का कथन है कि, “यदि एक मनुष्य के बालक को मानव समाज से अलग कर दिया जाए, जंगल में छोड़ दिया जाए अथवा किसी ऐसे स्थान पर, इस ढंग से उसका पालन किया जाए कि मनुष्यों से उसका संपर्क ही न हो, तो वह मनुष्यों जैसा व्यवहार कर ही नहीं सकेगा।”

प्राचीन इतिहास के कई उदाहरण भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। जिस समय यूरोप के लोग पाषाणयुग की भूमिका में थे, उस समय अर्थात अब से करीब 10 हजार वर्ष पूर्व मिस्रवादी सभ्यता के उच्च शिखर पर पहुँच गए थे। इसी तरह जिस समय यूनानी लोग काँस्ययुग में थे, उस समय इटालियन काँस्ययुग में प्रवेश कर चुके थे। इस तरह के अनेकानेक उदाहरण देते हुए ‘डॉ. जॉन्स’ बोसन’ ने लिखा है कि, “यदि मनुष्य जाति का इतिहास क्रमशः विकसित हुआ है, तो क्या कारण है कि चीनी लोग ईसा के पूर्व ही बारूद और कपास का उपयोग करना जानते थे, जबकि पृथ्वी के अधिकांश भागों में रहने वाले लोग वृक्ष की छालों और पत्थर तथा लोहे के औजारों से ही अपना काम चलाते थे।

इस तरह के उदाहरणों और प्रमाणों के आधार पर यह तथ्य प्रमाणित किया गया है कि प्राचीनकाल में अन्य ग्रहों से आने वाले देवताओं ने अपने क्षेत्र के लोगों को न केवल तकनीकी ज्ञान से परिचित कराया, बल्कि उन्हें मानसिक शक्ति के प्रयोगों और चमत्कारों से भी अवगत कराया। इस आधार पर वे प्रमाणित करते हैं कि मंत्र, योग, तप आदि द्वारा अपनी अंतर्निहित शक्तियों का पृथ्वीवासी इस प्रकार विकास कर सकें कि वे अष्टसिद्धियों और नवनिधियों के स्वामी बनें। ऋषि-मुनियों द्वारा शाप और वरदान देने तथा उनके पूरे होने का उल्लेख भी प्राचीन ग्रंथों में आता है। यह शब्द शक्ति का ही चमत्कार है। अब वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा भी यह सिद्ध हो चुका है कि शब्द किसी भी पदार्थ के माध्यम से गतिवान हो सकता है तथा उसके लिए स्थान और काल की सीमाएँ कोई बाधा नहीं पहुँचाती।

अब जबकि मनुष्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में चरमोन्नति के शिखर पर पहुँच गया है, तो उसके द्वारा अर्जित उपलब्धियों के दो ही परिणाम संभावित हैं। एक तो यह कि वह इन उपलब्धियों का उपयोग अपने आपको अधिक सुखी, संपन्न और शांत-संतुलित बनाने में करे तथा दूसरा यह कि इन उपलब्धियाँ के उपयोग द्वारा सामूहिक आत्मघात का आयोजन कर डाले। परिस्थितियों का जो अवलोकन और विश्लेषण कर पाने में समर्थ हैं, वे दूसरी संभावना को ही अधिक बलवती बताते हैं।

संभव है, जैसे प्राचीनकाल में पृथ्वी पर किन्हीं अन्य लोकों से पधारे देवताओं अथवा विकसित, उन्नत सभ्यता के स्वामी मेधावी व्यक्तियों ने मानव जाति को प्रगति-पथ पर बढ़ाया था, उसी प्रकार फिर किन्हीं और ग्रहों, अंतरिक्ष में विद्यमान अनेकानेक सौरमंडलों की निहारिकाओं में बसी सभ्यताओं से उन्नत मेधा के प्राणी आएँ, धरती के असंतुलन को संतुलन में बदलें। यहाँ की व्यवस्था में हस्तक्षेप करें व समझदारी की ओर अग्रसर होने के लिए मानव को विवश कर दें। पृथ्वी पर जिस प्रकार दो राष्ट्र लड़ते हैं और कोई तीसरा देश शांति स्थापना के लिए मध्यस्थता करता है अथवा दो व्यक्तियों की लड़ाई में तीसरा समझदार व्यक्ति बीच-बचाव करता है अथवा किसी अशांत, और असंतुलित और आत्मघात करने के लिए उतारू व्यक्ति को कोई बुद्धिमान व्यक्ति समझा-बुझाकर सही रास्ते पर लाता है, उसी प्रकार अन्य ग्रहों के विकसित प्राणी, जिन्हें देवता ही कहा जाना चाहिए, हस्तक्षेप करेंगे और मनुष्य को और अधिक उन्नत बनाएँगे। सन् 1982 में अमेरिका के ‘वेस्टन शहर’ में विश्वविख्यात वैज्ञानिकों और चिंतकों का एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें इस विषय पर विचार किया गया था कि अन्य लोकों के प्राणियों से संपर्क स्थापित होने पर क्या प्रभाव या परिवर्तन संभावित है।

कुछ भी हो, तथ्य अपने स्थान पर है कि मनुष्य समझदारी के बल पर ही आगे बढ़ा है एवं जिम्मेदारी के निर्वाह में अनौचित्य का समावेश होने पर प्रस्तुत परिस्थितियों ने जन्म लिया है। मेधावी, प्रतिभासंपन्न अपने लोक में अभी भी हैं। हम कहीं और स्थान तलाशें, इससे अच्छा होगा कि मानवी चिंतन को परिष्कृतकर इस ग्रह की सभ्यता का ही कायाकल्प करें। देव संस्कृति के मूल्यों की अवधारणा, अध्यात्म मान्यताओं का अवलंबन, आदर्शवाद की पक्षधर स्थापनाओं के द्वारा वह लक्ष्य प्राप्त कर सकना संभव है, जिसे धरती पर स्वर्ग कहकर पुकारा गया है। यह स्मरणीय है कि यह मनःस्थिति से ही उद्भूत होगा, साधन-सामग्री की प्रचुरता एवं वैभव द्वारा नहीं। यह समय समीप है, ऐसा दिव्यदर्शियों का अभिमत भी है।


झूठी बिल्ली (कहानी)

एक बिल्ली की गरदन दूध के बरतन में फँस गई। मुश्किल से बरतन टूटा, फिर भी उसका घेरा गले में फँसा था।

उसने चूहों से कहा— वह केदारयात्रा से लौटी है। प्रमाण के लिए यह केदार-कंगन गले में बँधा है। तुम लोग निर्भय रहो और मेरा सत्संग सुनने आया करो।

मूर्ख चूहों ने विश्वास किया और वे आने लगे। बिल्ली उनसे पीछे वाले एक को पकड़ लेती और पेट भरती। इस प्रकार एक-एक करके सभी घटते गए। उनमें से एक कटी पूँछ का सरपेच था, वह भी उदरस्थ हो गया। तब चूहों की आँखें खुलीं— सच्चा बोध हुआ। बिल्ली की असलियत समझी और दूर से ही नमस्कार करने लगे।


बड़प्पन का मापदंड— संगतिकरण

सफलता का श्रेय किसे मिले, इस प्रश्न पर एक दिन विवाद उठ खड़ा हुआ। ‘संकल्प’ ने अपने को, ‘बल’ ने अपने को और ‘बुद्धि’ ने अपने को अधिक महत्त्वपूर्ण बताया। तीनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। अंत में तय हुआ कि ‘विवेक’ को पंच बनाकर इस झगड़े का फैसला कराया जाए।

तीनों को साथ लेकर विवेक चल पड़ा। उसने एक हाथ में लोहे की टेढ़ी कील ली और दूसरे में हथौड़ा। चलते-चलते वे लोग ऐसे स्थान पर पहुँचे, जहाँ एक सुंदर बालक खेल रहा था। विवेक ने बालक से कहा कि, “बेटा, इस टेढ़ी कील को अगर तुम हथौड़ी से ठोंककर सीधी कर दो, तो मैं तुम्हें इनाम दूँगा।”

बालक की आँखें चमक उठीं। वह बड़ी आशा और उत्साह से प्रयत्न करने लगा; पर कील को सीधा कर सकना तो दूर, उससे हथौड़ा उठा तक नहीं। भारी औजार को उठाने लायक उसके हाथों में बल नहीं था। खिन्न बालक ने हथौड़ा रख दिया।

निष्कर्ष निकालते हुए विवेक ने कहा कि सफलता प्राप्त करने को अकेला ‘संकल्प’ अपर्याप्त है। अब फिर चारों आगे बढ़े, तो थोड़ी दूर जाने पर एक श्रमिक दिखाई दिया। वह खर्राटे लेता हुआ सो रहा था। विवेक ने उसे झकझोरकर जगाया और कहा कि, “इस कील को हथौड़ा मारकर सीधा कर दो। तुम्हें भरपूर पारिश्रमिक मिलेगा।” उनींदी आँखों से श्रमिक ने कुछ प्रयत्न भी किया, पर वह नींद की खुमारी में ही बना रहा। उसने हथौड़ा एक ओर रखकर कहा— “जाइए! मुझे नहीं चाहिए आपका पारिश्रमिक।” और वहीं लेटकर खर्राटे भरने लगा।

विवेक ने कहा— “अकेला ‘बल’ भी काफी नहीं है।” सामर्थ्य होते हुए भी संकल्प न होने से श्रमिक जब कील को सीधी न कर सका, तो यह निष्कर्ष उचित ही था।

चारों आगे बढ़े। सामने से एक कलाकार आता दिखाई दिया। विवेक ने प्रार्थना की कि, “अगर आप इस कील को सीधी कर सकें, तो एक अशरफी आपको भेंट की जाएगी।” कलाकार तैयार हो गया। उसने रेतीली जमीन पर कील को रखा और जोर से हथौड़े की चोट मारी। धमाके के साथ धूल ऊपर उड़ी और पाँचों की आँखों में भर गई। अब वे कील को सीधा करना तो भूल गए और आँखों के बचाव की चिंता करने लगे। कलाकार हथौड़ा पटककर अपनी राह चला गया।

विवेक ने कहा— “अब आप लौट चलें। समाधान हो गया। संकल्प, बल और बुद्धि का सम्मिलित रूप ही सफलता का श्रेय प्राप्त कर सकता है। एकाकी रूप में आप तीनों ही अधूरे— अपूर्ण हैं।”

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एक दिन कर्म और भावना दोनों इकट्ठे हुए। बातचीत में विवाद चल पड़ा कि दोनों में कौन बड़ा है। दोनों ही अपनी-अपनी बड़ाई बखानने लगे। कोई छोटा बनने को तैयार न हुआ। जब विवाद बढ़ा, तो निर्णय कराने उन्हें ब्रह्माजी के पास जाना पड़ा।

ब्रह्माजी ने दोनों की बात सुनी और मुस्कराए। उनने कहा— परीक्षा से ही वास्तविकता का पता चलेगा। तुम दोनों आकाश छूने का प्रयत्न करो। जो पहले आकाश छू सकेगा, वही बड़ा माना जाएगा।

भावना ने उछाल लगाई, तो आकाश तक जा पहुँची। छूने में भी सफल हो गई; पर आकाश की ऊँचाई इतनी अधिक थी कि बेचारी को अधर में लटकना पड़ा। पैर धरती से बहुत ऊपर थे।

अब कर्म की बारी थी। उसने आकाश तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनानी शुरू कर दीं। कई दिनों वह लगातार लगा भी रहा। पर उत्साह के अभाव में उसे उदासी ने आ घेरा और अपने औजार पटककर वह सुस्ताने सरोवर के तट पर चला गया।

ब्रह्माजी पता लगाने गए, तो देखा कि भावना अधर में लटकी है और कर्म एक घने वृक्ष की छाया में औंधे मुँह पड़ा सुस्ता रहा है। उन्होंने दोनों को बुलाकर कहा— “तुम दोनों ही अकेले अपूर्ण हो। बड़प्पन तभी है, जब तुम दोनों एक साथ रहो। उसी में तुम्हारी उपयोगिता भी है।


हर व्यक्ति प्रतिभावान बन सकता है

मस्तिष्क की संरचना और कार्यपद्धति पर कुछ अधिक प्रकाश पड़ने से यह समझने में सरलता होती है कि किस प्रकार इस पारसमणि का उपयोग अपनी दरिद्रता-दुर्बलता को निरस्त करने में किया जा सकता है, किस प्रकार समस्त विभूतियों और सफलताओं के इस भांडागार का स्वरूप एवं उपयोग समझने के साथ-साथ मनःस्थिति— परिस्थिति का कायाकल्प किया जा सकता है। एक शब्द में यही मानव जीवन की महानतम उपलब्धि है।

न्यूरोलॉजी के विद्वानों के अनुसार मस्तिष्क के बाह्य धूसर पदार्थ में स्नायु कोशिकाओं की संख्या 10 अरब है। सेरिबेलम, जो संतुलन के लिए उत्तरदायी माना जाता है एवं पृष्ठ भाग में अवस्थित होता है तथा मेरुदंड की कोशिकाएँ इसके अतिरिक्त हैं, इन्हीं की सहचर सहेलियाँ ग्लाया ऊतकों के रूप में लगभग एक खरब कोशिकाओं की संख्या में इन्हें परस्पर बाँधे विद्यमान रहता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन सबका सम्मिश्रित प्रयास ही मस्तिष्कीय चेतना को— न्यूरल कांशसनेस को जन्म देता है।

मस्तिष्कीय संरचना का अभी बहुत बड़ा हिस्सा अविज्ञात ही है। एनाटॉमी की दृष्टि से यह छान-बीन तो कर ली गई है कि कौन-सा अंग क्या है, लेकिन क्रियापद्धति, कार्यकारी मोटिव फोर्स एवं उनकी परिणतियों की कार्य-कारण संगति बिठा पाने में न्यूरोफिजियोलॉजिस्ट स्वयं को असमर्थ पाते हैं। सभी इस तथ्य से अवगत हैं कि मस्तिष्कीय जानकारियाँ असीम होती हैं। एक मस्तिष्क इतना ज्ञानसंग्रह कर सकता है, जिसकी तुलना में पाँच सौ ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ भी ओछे पड़ें। मानवकृत कंप्यूटर को ही यदि यह काम सौंपा जाता, तो उसे धरती के क्षेत्रफल को घेर सकने में समर्थ इलेक्ट्रोमैगनेटिक टेप की आवश्यकता पड़ती। यह सूक्ष्म-सा डायनेमो कैसे इतना सब कर पाता है, इस संबंध में शोध-अनुसंधान जारी है, फिर भी इस विलक्षणता पर हतप्रभ होने के अलावा वैज्ञानिक कोई कारण बता सकने में असमर्थ हैं।

इस विलक्षण संयंत्र की चमत्कारी परिणतियाँ प्रतिभा, स्मरणशक्ति जैसे दृश्य रूपों में समय-समय पर प्रकट होती रहती हैं। प्रतिभा उपार्जन के अवसर कभी-कभी वातावरण, परिस्थिति, पूर्वसंचय, प्रशिक्षण, आंतरिक उत्साह, लगन, पराक्रम आदि से किसी-किसी को इस प्रकार भी मिल जाते हैं कि देखने वाले उसे चमत्कार मानने लगें। फिर भी ऐसे उदाहरणों के पीछे यह संभावना तो विद्यमान रहती है कि जो एक के लिए संभव हो सका, वह दूसरों के लिए भी शक्य हो सकता है। जो संयोगवश मिल सका, उसे प्रयत्नपूर्वक भी किया जा सकता है। विज्ञान की प्रगति का यही क्रम रहा है, कोई विलक्षण घटना घटी और विलक्षणों ने उसका अनुसंधान आरंभ कर दिया। न्यूटन द्वारा पेड़ से सेब नीचे गिरने की घटना से पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ढूँढ निकालना ऐसा है, जिसका अनुकरण शोधकर्त्ताओं ने आरंभ से ही किया है और अनंतकाल तक करते रहेंगे।

‘न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय’ में ‘अल्बुकर्क’ द्वारपाल था। उसने अपनी योग्यता बढ़ाई और कुछ ही समय में अध्यापक बन गया। इतना ही नहीं, संचालक समिति का वह बहुत समय तक सदस्य भी रहा। अंधा और वृद्ध हो जाने पर उसने पुस्तकालयाध्यक्ष की सेवा स्वेच्छापूर्वक करनी आरंभ कर दी। वह पुस्तकालय के हजारों सदस्यों को उनकी आवाज सुनकर ही पहचान लेता था और पुस्तकें देने, वापस लेने से लेकर उनके विषयों और मर्म स्थानों के संबंध में भी आवश्यक परामर्श देता था।

ज्ञानपिपासा के धनी ‘मेल्शियोर सेविस’ चिकित्सा शास्त्र में मूर्धन्य बनना चाहते थे। उनने चिकित्सा कार्य प्रारंभ करने से पूर्व यह आवश्यक समझा कि अपने विषय में निष्णात बनने के उपरांत किसी की चिकित्सा करने का उत्तरदायित्व सँभाले। इसके लिए उन्होंने प्रायः समूचा जीवन विद्यार्थी की तरह खपा डाला। वे एक-एक करके फ्रांस के 27 विश्वविद्यालयों में भर्ती हुए और वहाँ उन्होंने उस विषय में विशेषता प्राप्त की, जिनकी कमी अनुभव होती थी। अंत तक वे अपनी परिपक्वता में कमी ही अनुभव करते रहे। फलतः उन्होंने आजीविका के लिए फ्रांस के ‘स्ट्राम्सवर्ग विश्वविद्यालय’ में प्रोफेसर का काम अपना लिया, पर रोगियों की चिकित्सा में अपने ज्ञान की कमी बताते हुए उनने हाथ नहीं डाला।

न केवल नाटक लिखने में, वरन उन्हें प्रदर्शित करने की व्यवस्था बनाने में भी पैरिस का ‘मेरी डी. लेम्बर्ट थ्यूलान’ प्रख्यात था। उसने एक वर्ष में 50 तीन-तीन खंडों वाले नाटक लिखे। जिस दिन ये लिखकर पूर्ण किए गए, उसी दिन उन्हें प्रदर्शन के लिए भी व्यवस्था बनानी पड़ी। जनता का अत्यधिक आग्रह देखकर उसे कई नाटकों में स्वयं भी अभिनय करना पड़ा। अपने विषय में पूरा रस लेने और गहराई तक उतरने की विशेषता के कारण ही उसमें ऐसी सफलता और प्रतिष्ठा अर्जित की।

‘सीडर रैपिड्रस आइडोवा’ अमेरिका का एक प्रतिभावान व्यक्ति एक साथ कई उत्तरदायित्व सँभालता था। हर उत्तरदायित्व को इस प्रकार पूर्ण करता, मानों उसने इसी में विशेषता प्राप्त की हो।

वह वकील, वैज्ञानिक, अध्यापक, विधायक, संपादक, न्यायाधीश, मेयर, नर्सरी संचालक, होटल मालिक, और स्टीम वोट निर्माता है। हर काम में उसने चोटी की सफलता और ख्याति पाई। इसके अतिरिक्त वह 6 बैंकों, 17 कंपनियों का, 10 रेल लाइनों तथा 4 कालेजों का अध्यक्ष भी था। इनमें से किसी ने भी उसकी उपेक्षा, व्यस्तता या अयोग्यता की शिकायत नहीं की।

उपन्यास लेखन के क्षेत्र में ‘वैरोनस डी. मियर’ का अपना स्तर और कीर्तिमान है। वह पूरे 40 वर्ष तक उपन्यास-लेखन-कार्य में ही दत्तचित्त से जुटा रहा। इस अवधि में उसने 420 उपन्यास लिखे। सभी मूर्धन्य प्रकाशकों ने उन्हें प्रकाशित किया। करोड़ों की संख्या में वे उसके जीवनकाल में ही बिक गए। यह रिकार्ड अभी तक बरकरार है।

बैंगलोर की एक भारतीय महिला शकुंतला ने संसार में कठिन गणित के उत्तर देने में असाधारण ख्याति पाई है। सिडनी (आस्ट्रेलिया) में उनने एक करोड़ों की लागत वाले कंप्यूटर से बाजी वदकर गणित के उत्तर और आगे रहने में सफलता पाई। कंप्यूटर जितनी देर में उत्तर बताता था, शकुंतला उससे पहले ही प्रस्तुत कर देती थी। उन्हें गणित की जादूगरनी कहा जाता है, जो गलत नहीं है।

संप्रति हैदराबाद के रामकृष्ण मिशन मठ के ‘स्वामी रंगनाथानंद’ के बारे में प्रसिद्ध है कि 8 वर्ष की आयु में एक बालक कर्मचारी के रूप में अपना कार्य आरंभकर उन्होंने मात्र अपनी प्रखर प्रतिभा के सहारे न केवल पूर्वार्त्त दर्शन साहित्य, अपितु भौतिकी एवं पाश्चात्य दर्शन के विभिन्न पक्षों में स्वयं को पारंगत बनाते हुए अल्पायु में ही मठ अध्यक्ष का पद ग्रहण किया। अनपढ़ के रूप में आए स्वामी जी को, अब न केवल अनेकों विश्वविद्यालयों की डिग्री प्राप्त है, अपितु उनकी हर विषय में गहरी पैठ के कारण— संदर्भों की असीम जानकारी के कारण एक विद्वान वक्ता के रूप में विश्व भर में ख्याति प्राप्त है। बड़े विनम्र भाव से इसे वे अपनी साधना-पुरुषार्थ का प्रतिफल ही बताते हैं।

ये सारे उदाहरण बताते हैं कि यदि इन प्रतिभाओं और क्षमताओं को उपलब्ध करने का सुनिश्चित मार्ग मिल सके और उनका श्रेष्ठतम सदुपयोग बन पड़े, तो निश्चित ही मनुष्य आज की तुलना में कहीं अधिक सुयोग्य एवं समर्थ बन सकता है। साधनों की तलाश में ही हमें अपनी सारी शोध- क्षमता नहीं खपा देनी चाहिए, वरन प्रयत्न भी करना चाहिए कि व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने वाले अध्यात्म विज्ञान के साथ जुड़ी हुई विभूतियों को किस प्रकार हस्तगत किया जाए और किस प्रकार सच्ची समृद्धि के आनंद का उपयोग किया जाए।


दृढ़ संकल्प की सुनिश्चित परिणति

मनुष्य को बुद्धिबल एवं साधनों के अतिरिक्त संकल्पबल का इतना बड़ा अनुदान मिला है, जिसके द्वारा वह असंभव को भी संभव करके दिखा सकता है। ब्रह्म की इच्छा ‘एकोऽहम् बहुस्यामि’ की हुई। उभरे उस प्रचंड संकल्प की परिणति चराचर सृष्टि बनकर सामने आई। मनुष्य उस सत्ता का अंश ही तो है। संकल्पशक्ति इस प्रकार उसे विरासत में मिली है, लेकिन प्रायः अधिकांश व्यक्ति उसका उपयोग नहीं कर पाते, न ही उसकी सामर्थ्य से परिचित ही होते हैं।

संकल्पबल ही है, जिसके आधार पर महान लक्ष्य को लेकर साहसिक यात्राएँ संपन्न की गई हैं। ‘नेपोलियन’ ने इसी के सहारे अजेय आल्पस पर्वत को सेना सहित पैदल पारकर संसार में अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया। ‘शेरपा तेनजिंग’ और ‘हिलेरी’ ने संसार के सर्वोच्च पर्वत शिखर ‘गौरीशंकर’ (एवरेस्ट) पर जा पहुँचने का दुस्साहस किया था और वहाँ अपनी विजय पताका फहराते हुए यह उद्घोष किया था कि इस संसार में कुछ भी ऐसा दुष्कर कार्य नहीं है, जिसे संकल्पबल से निरस्त न किया जा सके।

आत्मिक-क्षेत्र में उच्चस्तरीय लक्ष्य तक जा पहुँचने वालों में ‘ध्रुव’ और ‘सप्तऋषियों’ की गणना होती है, जो अभी भी आकाश में ज्योतिपुंज बनकर चमकते हैं। दिशासूचक ध्रुव और आत्मबल की सर्वोच्च सिद्धि करने वाले ऋषिमंडल अभी भी अपनी गरिमा की ओर जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करते हैं और कहते हैं कि सामान्य स्थिति में जन्मे और पले मनुष्य को हमारी तरह अजस्र श्रेय साधने में निश्चित रूप से सफलता मिल सकती है; पर आवश्यकता मात्र एक ही वस्तु की है, और वह है— साहसिक सत्संकल्प की।

पूर्व अभ्यासों, आदतों एवं कुसंस्कारों को बदलना कठिन तो है, पर इतना नहीं, जिसे प्रचंड संकल्पशक्ति के सहारे निरस्त न किया जा सके। ‘तुलसीदास’, ‘सूरदास’ युवाकाल तक कामुकता तथा नैतिकता की मर्यादाओं की दृष्टि से हेय जीवन जीते रहे; किंतु जब उनने अपने को बदल डालने का दृढ़ निश्चय कर लिया, तो पुरानी आदतों तथा मान्यताओं को बदलते देरी न लगी। आंतरिक परिवर्तन प्रस्तुत करने में दृढ़ संकल्प के अतिरिक्त और कोई शक्ति काम नहीं करती। सामान्य लोग असमंजस में पड़े रहते तथा आत्मनियंत्रण में सफलता न मिलने का रोना रोते रहते हैं; पर दृढ़ संकल्प का आश्रय लेने वाले मनस्वी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। ‘वाल्मीकि’ तथा ‘अंगुलिमाल’ जैसे डाकू संत बने हैं। किसी समय का महान क्रूर शासक ‘अशोक’ जब बदला, तो उसने धर्मचक्र-प्रवर्तन की मूर्धन्य भूमिका निभाई। वासना के दलदल में पड़ी ‘अंबपाली’ बदली, तो बौद्ध धर्म की महान प्रचारिका बन गई। आंतरिक परिवर्तन से वह परम साध्वी कहलाई तथा ऋषियों-से श्रद्धा के साथ सराही गई। ‘अजामिल सदन’ जैसे अगणित व्यक्तियों के समय-समय पर ऐसे ही आंतरिक परिवर्तन उनकी संकल्पशक्ति के माध्यम से ही संभव हो सके हैं।

असफलताएँ सिर्फ यह सिद्ध करती हैं कि सफलता के लिए तत्परता बरती जानी चाहिए, उसमें कहीं कोई कमी रह गई है। मनस्वी हारते नहीं, वे हर असफलता के बाद दूने साहस— चौगुने उत्साह के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। ‘अब्राहम लिंकन’ 17 बार पराजित होने के उपरांत चुनाव जीत पाए थे। कठिनाइयों के साथ पग-पग पर संघर्ष करते हुए आगे ही बढ़ते चले गए। ‘जार्ज वाशिंगटन’ अमेरिका के श्रद्धापात्र राष्ट्रपति बने। जन्म से ही उन्हें घोर गरीबी का सामना करना पड़ा, पर अपने पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ते गए।

व्रतशील अपने संकल्पों के प्रति दृढ़ रहते तथा हर हालत में उन्हें पूरा करते हैं। ‘भीष्म’ ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया और उसे पूरा कर दिखाया। गिरता शरीर नहीं, मन है। मनोबल ऊँचा रहने पर मानसिक दुर्बलताओं की दाल नहीं गलती। पशु-प्रवृत्तियाँ भी सिर पर चढ़ बैठने का साहस नहीं करती हैं। ‘भागीरथ’ को गंगावतरण अभीष्ट था। वे प्रचंड तपश्चर्या में संलग्न होकर उसे पूरा करने में सफल हुए। ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ की आरंभिक परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थी, जिनमें उनके द्वारा किसी बड़े उपक्रम की आशा की जा सके; किंतु उन्होंने अपनी प्रचंड प्रतिभा का उपभोग किसी महान प्रयोजन में करने का निश्चय किया और उसमें सफल रहे।

‘कोलंबस’ अपनी नाव लेकर भारत की खोज में निकला। समुद्र यात्रा की प्राणघातक चुनौतियों का सामना करते हुए नई दुनिया ‘अमेरिका’ को खोज निकालने में सफल हो सका। यह उसके प्रचंड संकल्प की ही परिणति थी। अंधी, गूँगी, बहरी ‘हेलन केलर’ का विधा का मूर्ति-भांडागार बन सकना, सत्रह विश्वविद्यालयों से डॉक्टर का सम्मान दिला सकना, उसकी संकल्पशक्ति का ही चमत्कार है। इसके विपरीत साधनसंपन्न छात्र भी अपनी असफलता का रोना रोते रहते हैं। इसमें अन्य कारण कम और मनोबल की दुर्बलता ही प्रमुख अवरोध उत्पन्न कर रही होती है।

प्रख्यात अँग्रेजी साहित्यकार ‘एच.जी. वेल्स’ की माता घरों में बरतन माँजने की मजूरी करके अपना और अपने बच्चे का पेट पालती थी। ऐसी विकट परिस्थितियों में भी वे बड़े उत्साह से शिक्षा अर्जन के हर अवसर ढूँढते रहे और उस प्रयास से उच्चकोटि के साहित्यकार बने। वैज्ञानिक ‘एडीसन’ की जीवनगाथा भी वेल्स से मिलती-जुलती है। ढूँढने पर ऐसे अन्य भी प्रमाण देश-विदेश में मिल सकते हैं, जिसमें विषम परिस्थितियों से जूझते हुए मनस्वी लोगों ने इतनी बड़ी-बड़ी सफलताएँ पाई हैं, जिन्हें चमत्कार कहा जा सकता है। वस्तुतः, संकल्पशक्ति ऐसा दैवी अनुदान है, जिसकी अनुकंपा से लाभान्वित हो सकना हर किसी के लिए संभव है।

नर हो या नारी— बालक हो या वृद्ध— स्वस्थ हो या रुग्ण— धनी हो या निर्धन, परिस्थितियों से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, महत्त्व शक्ति का है। मनस्वी अपने लिए परिस्थितियाँ स्वयं बनाते तथा सफल होते हैं। समय और श्रम कितना लगा, उसमें अंतर हो सकता है, पर आत्मनिर्माण के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति अपनी आकांक्षा को प्रयत्नों के अनुरूप देर-सबेर पूरा कर लेते हैं। नर की तुलना में नारी की परिस्थितियाँ, कई दृष्टियों से न्यून मानी जाती है; पर यह मान्यता वहीं तक सही है, जहाँ तक कि उनका मनोबल गया-गुजरा बना हुआ है। अपनी गरिमा को समझकर यदि वे संकल्पशक्ति को जगा लें, तो कोई कारण नहीं है कि वे पुरुष से किसी क्षेत्र में पीछे रहें।

विद्वान ‘कैमट’ व्याकरण शास्त्र की संरचना में लगे थे। उसकी पत्नी ‘भामती’ मूँज की रस्सी बँटकर उससे गुजारे का प्रबंध करती थी। साम्यवाद के जनक ‘कार्लमार्क्स’ भी कुछ कमा नहीं पाते थे। यह कार्य उनकी पत्नी ‘जैनी’ करती थी। पुराने कपड़े खरीदकर उनमें से छोटे बच्चों के कपड़े बनाती तथा फेरी लगाकर बेचती थी। आदर्शों के लिए पतियों को इस प्रकार कष्ट उठाकर भी प्रोत्साहित करने एवं सहयोग देने में उनका उच्चस्तरीय संकल्पबल ही कार्य करता था। बंगाल के निर्धन विद्वान प्रतापचंद्र राय ने अपनी सारी शक्ति और संपत्ति को लगाकर महाभारत का अनुवाद कार्य हाथ में लिया, पर बीच में ही चल बसे। उनकी पत्नी ने अवशेष कार्य को अपना संस्कृत ज्ञान बढ़ाकर पूरा किया।

संकल्पशक्ति के रूप में मनुष्य को मिला वरदान इतना सामर्थ्यवान है कि वह भौतिक अथवा आत्मिक, किसी भी क्षेत्र में प्रगति मार्ग में संपन्न होने वाली प्रत्येक बाधा को पैरों तले रौंदकर आगे बढ़ाता तथा सफलताओं को मनुष्य के कदमों में बिछाता देखा जा सकता है।


शस्त्रों से भी अधिक सामर्थ्यवान मन की शक्ति

सन् 1910 में जर्मनी की एक ट्रेन में एक सोलह वर्षीय किशोर यात्रा कर रहा था। घर से भागकर वह कहीं दूर जाना चाहता था। पैसे के अभाव में वह टिकट न ले सका। टिकट निरीक्षक को देखते ही उसने सीट के नीचे छिपने की कोशिश की; पर वह टिकट निरीक्षक की निगाहों से बच न सका। उसने किशोर से टिकट माँगा। टिकट तो उसके पास था नहीं। पास में अखबार का टुकड़ा पड़ा था। किशोर ने उसे हाथ में उठाया, मन में संकल्प किया कि यह टिकट है और उसने टिकट निरीक्षक के हाथों में वह टुकड़ा थमा दिया। मन-ही-मन यह संकल्प दुहराता रहा— हे परमात्मा! उसे वह कागज का टुकड़ा टिकट दिखाई पड़ जाए। उसके आश्चर्य का तब ठिकाना न रहा, जब देखा कि निरीक्षक ने उस कागज के टुकड़े को वापस लौटाते हुए यह कहा कि, “क्या तुम पागल हो गए हो। तुम्हारे पास जब टिकट है, तो सीट के नीचे छिपने की आवश्यकता क्या है?

‘एबाउट माई सेल्फ’ पुस्तक में ‘बुल्फ मेंसिंग’ नामक एक रशियन परामनोवैज्ञानिक उपरोक्त घटना का उल्लेख करते हुए लिखता है कि, “उस दिन से मेरा पूरा जीवन बदल गया। पहले मैं अपने आप को असमर्थ, असहाय तथा मूर्ख मानता था, पर उस घटना के बाद यह विश्वास पैदा हुआ कि मेरे भीतर कोई महान शक्ति सोई पड़ी है, जिसे जगाया— उभारा जा सकता है। उन प्रयत्नों में मैं प्राणपण से लग गया तथा सफल भी रहा।”

सन् 1910 से 1950 तक ‘मैसिंग’ को दुनिया भर में ख्याति मिली। उसकी संकल्पशक्ति की विलक्षणता का परीक्षण अनेकों बार विशेषज्ञ-वैज्ञानिकों के समक्ष किया गया। ‘स्टालिन’ जैसा मनोबलसंपन्न व्यक्ति भी मैसिंग से डरने लगा। भयभीत होकर स्टालिन ने उसे गिरफ्तार करा लिया। स्टालिन को सुनी हुई बातों पर विश्वास न था। मैंसिंग की परीक्षा उसने स्वयं ली। उसने मैंसिंग से कहा— “तुम मेरे सामने अपनी सामर्थ्य का परिचय दो। वह सहर्ष इसके लिए राजी हो गया।

स्टालिन ने आदेश दिया— “बंद कमरे से कल दो बजे तुम्हें छोड़ा जाएगा। एक व्यक्ति तुम्हें मास्को के एक बड़े बैंक में ले जाएगा। तुम्हें बैंक के कैशियर से एक लाख रुपये निकलवाकर लाना होगा। पर ध्यान रहे, तुम मात्र अपनी वाणी का प्रयोग कर सकते हो, किसी शस्त्र का नहीं।”

दूसरे दिन पूरे बैंक को सैनिकों से घिरवा दिया गया। दो व्यक्ति पिस्तौलें लिए छद्म वेश में मैंसिंग के पीछे-पीछे चल पड़े, ताकि वह किसी प्रकार की चाल न चल सके। ट्रेजरर के सामने उसे खड़ा कर दिया गया। मैंसिंग ने जेब से एक कोरा कागज निकाला, एकाग्र नेत्रों से देखा तथा ट्रेजरर को दे दिया। ट्रेजरर गौर से उस कागज को उलट-पुलटकर देखकर आश्वस्त हो गया कि वह एक चैक है एवं सही है। उसे अपने पास रखकर उसने एक लाख रुपए मैंसिंग को दे दिए। उसे लेकर वह स्टालिन के पास पहुँचा तथा सौंप दिया। सारा विवरण जानकर स्टालिन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

इतने पर भी ‘स्टालिन’ को उसकी संकल्पशक्ति पर पूर्ण विश्वास न हुआ। उधर मैंसिंग वह धनराशि लेकर खजानची के पास पहुँचा, पूरी बात बताई। उसने चैक समझकर रखे हुए कागज को दुबारा देखा, तो वह अब मात्र कोरा कागज था। धनराशि को वापस करते हुए मैंसिंग ने खजानची से कहा— “महोदय! क्षमा करें, यह संकल्पशक्ति का एक छोटा-सा प्रयोग था। आपको इसका दंड न भुगतना पड़े, इस कारण लौटाने आया।” वह क्लर्क इस घटना से इतना अधिक हतप्रभ हुआ कि उसे हार्ट अटैक का दौरा पड़ा और कई दिनों तक भयावह सपने आते रहे।

इस रहस्य को और भी पुष्ट करने की दृष्टि से उधर स्टालिन ने मैंसिंग को दूसरा आदेश दिया कि सैनिकों की देख-रेख में बंद कमरे से निकलकर वह ठीक बारह बजे रात्रि को स्टालिन से मिले। स्टालिन के लिए सैनिकों की कड़ी सुरक्षा वैसी भी रखी जाती थी, लेकिन यह व्यवस्था और कड़ी कर दी गई, ताकि किसी प्रकार मैंसिंग निकलकर स्टालिन तक पहुँचने न पाए; पर इन सबके बावजूद भी निर्धारित समय पर वह स्टालिन के समक्ष पहुँचकर मुस्कराने लगा। स्टालिन को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था, पर जो सामने घटित हुआ था, उससे इनकार भी कैसे कर सकता था।? भयमिश्रित स्वर में उसने मैंसिंग से पूछा कि, “यह असंभव कार्य तुमने किस प्रकार, किस शक्ति के सहारे किया, थोड़ा विस्तार में बताओ।

मैंसिंग बोला— “यह और कुछ भी नहीं, संकल्पबल का एक छोटा चमत्कार है। मैंने मात्र इतना किया कि मन को एक विचार, एक लक्ष्य के लिए एकाग्र किया। तत्पश्चात दरवाजे पर आकर सैनिक से निर्देश के स्वर में बोला— “मैं वेरिया हूँ।” ज्ञातव्य है कि तब वेरिया को रूसी फौज का सबसे बड़ा अधिकारी— स्टालिन के बाद सर्वशक्तिमान अधिकारी माना जाता था।

“आपसे मिलने की इच्छा जाहिर करते ही सैनिकों की पहली कतार ने मुझे एक कमरे का नंबर बताया। वहाँ पहुँचने पर मैंने पुनः अपना परिचय पहले की भाँति दिया। सुरक्षा पर तैनात सैनिकों ने एकदूसरे दिशा वाले कमरे की ओर संकेत किया। वहाँ भी सशस्त्र सैनिकों की एक टोली मौजूद थी। जनरल वेरिया का नाम सुनकर व उन्हें प्रत्यक्ष सामने देखकर उन सैनिकों ने भी अभिवादन करते हुए आगे का रास्ता बताया। इस प्रकार सैनिकों की सात टोली पार करने के बाद निश्चित रूप से यह मालूम हुआ कि आप कहाँ है? अपना पूर्व की भाँति परिचय देकर मैं यहाँ आ सकने में सफल हुआ।

मैंसिंग के द्वारा स्टालिन को एक नया सूत्र हाथ लगा कि मनुष्य के भीतर कोई ऐसी अविज्ञात शक्ति विद्यमान है, जो प्रत्यक्ष सभी आयुधों से भी अधिक समर्थ है। उसके द्वारा असंभव स्तर के कार्य भी पूरे किए जा सकते हैं। स्टालिन ने मैंसिंग की अतींद्रिय सामर्थ्य के परीक्षण के लिए ‘नामोर’ नामक एक मनःशास्त्री को नियुक्त किया, जो अपने समय का मनोविज्ञान का मूर्धन्य विशेषज्ञ माना जाता था। लंबे समय तक उसने मैंसिंग का अध्ययन किया। अंततः उसने घोषणा की कि, “मन की अचेतन शक्ति, चेतन की तुलना में अधिक सबल है। उसे उभारकर अच्छे-बुरे दोनों ही तरह के काम लिए जा सकते हैं। मैंसिंग के भीतर का अचेतन प्रचंड रूप से जागृत है। उसी के माध्यम से वह प्रचंड संकल्प की प्रेरणा देकर दूसरों को सम्मोहित कर लेता है तथा अपने प्रयोजन में सफल हो जाता है।”

संकल्पशक्ति के एक छोटे-से भाग को जागृत करके मनःशास्त्री अगणित प्रयोग करते हैं। इन दिनों सम्मोहन के माध्यम से उपचार की एक नई पैथी विकसित हुई है। बच्चों के मानसिक विकास के लिए भी उसका प्रयोग मानसविद् करने लगे हैं। विचार-संप्रेषण की प्रक्रिया में भी संकल्पशक्ति की ही प्रयोग निहित है। दैनंदिन जीवन में भी उस सामर्थ्य का एक छोटा पक्ष देखने को मिलता है। कितने ही व्यक्ति दूसरों को अपनी बातों, अपने विचारों से प्रभावितकर असंभव कार्य करा लेते हैं। इच्छानुरूप दिशा में दूसरों को मोड़ने में भी सफल हो जाते हैं, यह इस बात का प्रमाण है कि वे प्रभावित व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक संकल्पवान हैं।

वह शक्तिबीज प्रत्येक में विद्यमान है। उसे अंकुरित एवं विकसित किया जा सकता है। साधना के— तप-तितीक्षा के छोटे-बड़े प्रयोग इसलिए किए जाते हैं कि किसी प्रकार संकल्पशक्ति के जगने एवं सुदृढ़ होने का अवसर मिले। भौतिक-क्षेत्र में अभीष्ट स्तर की सफलता के लिए तदनुरूप प्रयास करने पड़ते हैं। मनःक्षेत्र आत्मिकी की परिधि में आता है। किसी-किसी में संस्कारोंवश सहज ही उभार आता है, जबकि किसी-किसी को पुरुषार्थ— साधना करनी पड़ती है। आवश्यकता अपनी पुरुषार्थ को पहचानने, आत्मशोधन एवं आत्मविकास के प्रयोजन पूरेकर संकल्पशक्ति के सुनियोजन भर की है।


आवेशग्रस्त न रहें, सौम्य जीवन जिएँ

मस्तिष्कीय तनाव की परिणति समूची काया के गतितंत्र को अस्त-व्यस्त कर देती है, इसकी जानकारी चिकित्सकों को द्वितीय महायुद्ध के उपरांत मिली। देखा गया कि मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिक वहाँ की डरावनी परिस्थितियों के कारण लगातार उत्तेजित रहे। शांति और संतोष का अवसर नहीं मिला। हलके, निश्चिंत एवं प्रसन्न भी न रह सके। अतएव मनःसंस्थान आवेशग्रस्त रहा और उसकी परिणति शरीर के अन्यान्य अवयवों की गतिविधियों से अस्त-व्यस्तता उत्पन्न करने लगी। सैनिकों के स्नायु संस्थान स्वाभाविक नहीं रहे। रक्तचाप बढ़ा, पाचनतंत्र गड़बड़ाया और उत्साह घटने, अन्यमनस्कता बढ़ने के लक्षण उभरने लगे। तात्कालिक उपचार तो टॉनिकों की मात्रा बढ़ाकर किया गया, पर यह प्रश्न विचारणीय ही बना रहा कि उत्तेजित मनःस्थिति के शरीर के अन्याय अवयवों पर भी प्रभाव पड़ता है। मात्र अनिद्रा, सिरदरद आदि तक ही सीमित नहीं रहता।

तनावजन्य बीमारियों को ‘साइको सोमेटिक’ कहा जाता है। मनःचिकित्सकों का मत है कि उत्तेजनात्मक वातावरण के कारण मस्तिष्क का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष हायपोथेलेमस आवेशग्रस्त रहने लगता है। कारटैक्स के अतिरिक्त स्नायु संस्थान के अन्यान्य क्षेत्र भी इससे प्रभावित होते हैं।

‘जॉन कौलहन’ ने उत्तेजनात्मक वातावरण का प्रभाव चूहे, खरगोश जैसे छोटे जानवरों पर जाँचा और पाया कि अविश्रांति की स्थिति में विक्षिप्त रहने लगे और असामान्य गतिविधियाँ अपनाने लगे। उनका स्वभाव भी वैसा न रहा और वजन भी घटा।

शहरी आबादी की पिच-पिच, गंदगी, शोर, व्यस्तता एवं अभक्ष्य-भक्षण के कारण लोग तनावजन्य रोगों से ग्रसित होते हैं। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत दृष्टिकोण, स्वभाव एवं जीवनयापन का क्रम भी इस विपत्ति को बढ़ाने में बड़ा कारण बनता है। क्रोध, आवेश, चिंता, भय, ईर्ष्या, निराशा की मनःस्थिति ऐसी उत्तेजना उत्पन्न करती है, जिसके कारण तनाव रहने लगे। इस स्थिति में नाड़ी-संस्थान और मांसपेशियों के मिलन केंद्रों पर ‘सोसिटिल कोलेन’ नामक पदार्थ बढ़ने और जमने लगता है। कार्बन और कोगल की मात्रा बढ़ने से लचीलापन घटता है और अवयव अकड़ने-जकड़ने लगते हैं। यह एक प्रकार की गठिया के चिह्न हैं, जिसके कारण हाथ-पैर साथ नहीं देते और कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ता।

इन दिनों हर स्तर का व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से घिरा रहता है, जिससे उसका मनःसंस्थान खिन्न— उद्विग्न रहने लगे। बच्चे अभिभावकों से समुचित स्नेह प्राप्त नहीं कर पाते और असुरक्षा अनुभव करके निराश एवं खीजते रहते हैं। युवा वर्ग के सामने कामाचार की ललक, रोजगार की अनिश्चितता तथा पारिवारिक सामंजस्य की समस्याएँ उद्विग्नता बनाए रहती हैं। यार-दोस्तों की धूर्तता से भी वे परेशान रहते हैं। बूढ़ों की शारीरिक अशक्तता, रुग्णता ही नहीं, परिजनों द्वारा बरती जाने वाली अवमानना भी कम कष्टदायक नहीं होती। वे कमा तो कुछ सकते नहीं। बेटों के आश्रित रहते हैं। अपनी कमाई पर से भी स्वामित्व खो बैठते हैं। मित्रता भी इस स्थिति में किसी को हाथ नहीं लगती। फलतः वे एकाकीपन से ऊबे और भविष्य के संबंध में निराश रहते हैं। मौत की समीपता अधिकाधिक निकट आती प्रतीत होती है। किसी अविज्ञात के अंधकार में चले जाने और दृश्यमान संसार-संबंध छूट जाने की कल्पना भी उन्हें कम त्रास नहीं देती। इन परिस्थितियों में यदि तनाव का आक्रमण हर किसी पर छाया दीखता है, तो इसमें आश्चर्य भी क्या है?

संवेगों में स्नेह, क्रोध और भय प्रमुख हैं। इनकी विकृति मोह, आक्रमण एवं हड़कंप के रूप में देखी जाती है।

भय के वास्तविक कारण कम और काल्पनिक अधिक होते हैं। भूत, चोर, साँप, बिच्छू आदि की उपस्थिति एवं आक्रामकता के कल्पित चित्र इतना परेशान करते हैं, मानों वे सचमुच ही सामने उपस्थित हों और बस हमला ही करने जा रहे हैं।

कोई व्यक्ति आक्रमण करने वाला हो, षड्यंत्र रच रहा हो, जादू-टोना करके हानि पहुँचाने जा रहा हो, ऐसा डर अकारण ही उठता रहता है। आमतौर से ऐसा होता नहीं है। ऐसी दुर्घटनाएँ कभी-कभी ही घटित होती हैं। उनमें से 90 प्रतिशत आशंकाएँ काल्पनिक पाई जाती हैं।

रात के अंधेरे में अविज्ञात का डर लगता है। प्रकाश होने पर वस्तुस्थिति का पता चल जाता है और साथ ही डर भी नहीं रहता। एकाकी रास्ता चलते मनुष्य अपनी अशक्तता की अनुभूति से डरता है। कोई साथ चलने लगे, तो वह अपडर भी नहीं रहता। श्मशान में भूत-पलीतों की उपस्थिति मान्यता क्षेत्र पर छाई रहती, तो उधर से गुजरते हुए दिल धड़कता है; किंतु देखा यही गया है कि उसी क्षेत्र में काम करने वाले या बसने वाले लोग बिना किसी प्रकार का जोखिम उठाए निश्चिंततापूर्वक समय बिताते रहते हैं। भय का बाहरी कारण कम और भीतरी अधिक होता है। अंधेरे में झाड़ी भी भूत की तरह डरावनी लगती है।

दुर्बल के लिए दैव भी घातक होता है, जो हवा आग को जलने में सहायता करती है, वही कमजोर दीपक को बुझा भी देती है। बढ़ती हुई ज्वाला के लिए पवन सहायता करता है और देखते-देखते दावानल बना देता है।

भय में अपनी दुर्बलता की अनुभूति प्रथम कारण है और दूसरा है, हर स्थिति को अपने विपरीत मान बैठना। आशंकाग्रस्त व्यक्ति भोजन में विष मिला होने की कल्पना करके स्त्री द्वारा बनाए— परोसे जाने पर भी शंकाशील रहते हैं। ग्रह-नक्षत्रों तक के प्रतिकूल होने, दूरस्थ होने पर भी विपत्ति खड़ी करने की कल्पना करते रहते हैं। जैसा-का-तैसा मिल भी जाता है। डरपोकों को और अधिक डराने वाली उक्तियाँ बताने और घटनाएँ सुनाने वाले भी कहीं-न-कहीं से आ टपकते हैं। अपने ऊपर भूत के आक्रमण की आशंका हो, तो वैसी चर्चा करते ही ऐसे लोग तत्काल मिल जाएँगे, जो उस भय का समर्थन करने वाले संस्मरण सुनाने लगे। भले ही वे सर्वथा कपोल-कल्पित ही क्यों न हों। हाँ-में-हाँ मिलाने की आदत आम लोगों की होती है। भ्रांतियों का खंडन करके सही मार्गदर्शन कर सकने योग्य बुद्धिमानों और सत्याग्रहियों की बेतरह कमी हो गई है। गिरे को गिराने वाले ‘शाह मदारों’ की ही भरमार पाई जाती है। फलतः भ्रमग्रस्तों को और अधिक उलझन में फँसा देने वाले ही राह चलते मिल जाते हैं। भ्रांतियों के बढ़ने का सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है।

ताओ धर्म के प्रवर्त्तक ‘लाओत्स’ ने एक दृष्टांत लिखा है— “यमराज ने प्लेग को दस हजार व्यक्ति मार लाने के लिए हुक्म दिया। वह काम पूरा करके लौटे, तो साथ में एक लाख मृतकों का समुदाय था। यमराज ने क्रुद्ध होकर इतनी अति करने का कारण पूछा। मौत ने दृढ़तापूर्वक कहा— ‘उसने दस हजार से एक भी अधिक नहीं मारा। शेष लोग तो डर के मारे खुद ही मर गए हैं।”

मस्तिष्क को शांत रखने में इच्छित परिस्थितियों की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। उसके लिए अपने सोचने का तरीका बदल देने और तालमेल बिठाते हुए सौम्य और शांत स्तर का जीवनयापन करने की कला सीखने और अभ्यास में उतारने भर से काम चल सकता है।


सद्विचार

विनम्रता एक संकेत है, जिसे पवित्रता और शालीनता का परिचय देने के लिए चेहरे पर लटका हुआ देखा जा सकता है।

—    सेम्युआल


समस्याओं का समाधान दृष्टिकोण के परिष्कार पर निर्भर

कोई आदमी अच्छा है या बुरा? यह उसकी आदतों का स्तर देखकर पता चलता है। ये आदतें कहीं बाहर से आकर नहीं चिपटतीं। मनुष्य की विचारणा और क्रिया ही दीर्घकालीन अभ्यास से स्वभाव का अंग बन जाती है।

विख्यात मनोविज्ञानवेत्ता ‘विलियम जेम्स’ ने आदतों का विश्लेषण करते हुए एक स्थल पर लिखा है कि, “किसी प्रक्रिया की बार-बार आवृत्ति से हमारे मस्तिष्क में एक मनोवैज्ञानिक खाँचा बन जाता है। उस कार्य अथवा विचार की आवृत्ति उस खाँचे को और गहरी करती रहती है। यह खाँचा जितना गहरा होता जाता है, मन को उससे विरत करना उतना ही कठिन लगने लगता है।

आदतों की उत्कृष्टता-निकृष्टता ही जीवन में उत्थान-पतन की परिस्थितियाँ रचा करती हैं। अच्छी आदतें अंतरंग सहयोग की तरह हर जगह अनुकूलता प्रदान करती हैं। इसके विपरीत बुरी आदतें हमेशा अपने पालक के अनगढ़पन की चुगली करती फिरती हैं। बने-बनाए कामों तथा मधुर संबंधों में खटाई डाल देना इस दुष्प्रवृत्ति का प्रिय व्यसन है।

कुछ बुरी आदतें स्वभाव में जड़ जमाकर इतनी पक्की हो जाती हैं कि उनके दुष्परिणाम भुगतने वाला भी उससे अनभिज्ञ बना रहता है। उदाहरण के लिए, जो दाँतों से नाखून काटता रहता है, चाहे किसी रूप में, आमतौर पर ‘नर्वस’ समझा जाता है। जो सदा देर से कहीं पहुँचता हो, वह लोगों की नजर में स्वार्थी और दूसरों का ख्याल न करने वाला होता है। टालमटोल करने वाला व्यक्ति अविश्वस्त माना जाता है, उसे कोई दायित्व वाला काम नहीं सौंपा जाता। यदि प्रयास किया जाए, तो इन प्रवृत्तियों से मुक्ति भी पाई जा सकती है। अपने चिंतन एवं व्यवहार में दैनंदिन स्वयमेव समीक्षा करते रहने से यह दुष्कर लगने वाला कार्य भी संभव हो सकता है।

मनुष्य उज्ज्वल भविष्य की मनोरम कल्पनाएँ किया करता है। सुखमय जीवन का स्वप्न देखता है। उन्नति की योजनाएँ बनाता है। सफलता के सूत्र ढूँढता है। लक्ष्य की दिशा में अग्रसर होने के लिए हर तरह की कोशिशें करता है; पर जब वह पीछे मुड़कर उपलब्धियों का मूल्यांकन करना चाहता है, तो पता चलता है कि उसकी मनचाही योजनाएँ या तो मन में धरी रही गईं अथवा उनका क्रियान्वयन आधा-अधूरा हो पाया। इससे इसे अपने पुरुषार्थ पर खीज भी आती है व आक्रोश भी। कारण ढूँढ पाने में वह सफल नहीं हो पाता।

असफलताजन्य खीज की प्रतिक्रियाएँ प्रायः दो अतिवादी स्वरूपों में अभिव्यक्त होती हैं। एक व्यक्ति अपने को नितांत अयोग्य मानकर घोर निराशा में निमग्न हो जाता है एवं सारा दोष भाग्य, भगवान अथवा परिस्थितियों के मत्थे मढ़कर निश्चिंत हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्तियों के जीवन में सफलता की संभावनाएँ क्रमशः धूमिल होती जाती हैं।

दूसरा वर्ग सफल व्यक्तियों का है। असफलता के कारणों की छान-बीन करते समय इनका दृष्टिकोण संतुलित रहता है। अपनी गतिविधियों का पर्यवेक्षण निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह करने पर पता चलता है कि स्वयं के भीतर पल रही अवांछनीय और अनुपयुक्त विचार ही असफलताओं का मूल कारण है।

आदतें क्रियात्मक नहीं, मूलतः विचारात्मक होती हैं। अतः सुधार की प्रक्रिया बहिरंग के साथ अंतरंग में भी चलनी चाहिए। चिंतन और व्यवहार का अन्योन्याश्रय संबंध है, इसलिए सुधार-परिवर्तन के लिए दोनों मोर्चों पर समान रूप से तैनाती की आवश्यकता रहती है। इस उभयपक्षीय प्रयोजन की पूर्ति का सरल उपाय यह है कि विचारों को विचारों से ही काटा जाए। लब्धप्रतिष्ठ मनोचिकित्सक ‘सर नार्मन विंसेंट पील’ के प्रयोग इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं—

अपने एक मरीज का हवाला देते हुए सर पील ने लिखा है कि, “उस व्यक्ति का बचपन भयंकर गरीबी में बीता था। किसी सहायक की छत्रच्छाया नहीं थी। उन दिनों हुए कटु अनुभवों के कारण वह अधिक-से-अधिक पैसा कमाने और मालदार बनने की ओर प्रेरित हुआ। समय बीता और उसकी गणना धनकुबेरों की श्रेणी में होने लगी; परंतु इसी अवधि में एक ऐसी लत लग गई, जो लाख कोशिश करने पर भी उसका पिंड नहीं छोड़ रही थी। होता यह था कि बातचीत के सिलसिले में दो-चार ऐसी कटु बातें उसके मुँह से बरबस निकल पड़ती थीं, जिन्हें सुनकर सामने वाला व्यक्ति भीतर-ही-भीतर तिलमिलाकर रह जाता। बाद में उसे अपने इस कृत्य पर काफी पछतावा होता। यह लाचारी उसके लिए कई बार अच्छी-खासी परेशानी खड़ी कर देती थी। वह जानता था कि यह आदत उस समय की दुःखद स्मृतियों का परिणाम है, जब निर्धनता के कारण उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी थी। यह पता होने के बावजूद उसका बस नहीं चलता था कि इस आदत से कैसे छुटकारा पाए।

नार्मम पील ने सारा इतिहास गौर से सुनने के बाद पूछा— “यदि मैं कुछ परामर्श दूँ, तो अमल में लाना पसंद करेंगे।” उसका स्वीकारात्मक उत्तर पाकर श्री पील ने सलाह दी कि वह तीन महीने तक अपनी आय का एक निश्चित अंश जरूरतमंदों की सहायता पर खरच किया करे। रोग का निदान बताने के बाद की प्रतिक्रियाओं का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है— “यह सुनते ही उसकी कृपणवृत्ति सजग हो उठी और वह पूछ बैठा कि, “निश्चित अंश की क्या सीमा है।” मैंने कहा— “दस प्रतिशत।” उसने दुबारा प्रश्न किया— “टैक्स देने के बाद या पहले?” मैं जानता था कि पैसे के प्रति इसका लगाव कंजूसी की हद तक है। ऐसी हालत में उसके लिए न्यूनतम निर्धारण से प्रारंभ करना उचित है। यह तथ्य है कि एक बार दान देने की प्रवृत्ति जहाँ उसमें जगी, वह रुकेगा नहीं, क्योंकि दान की प्रवृत्ति के साथ आय बढ़ाने की प्रवृत्ति भी जुड़ी है। यह सब विचार करके मैंने उसकी समूची आय का दस प्रतिशत निकालते रहने के लिए कहा। इतनी छोटी रकम खरच करना उसके लिए हँसी-खेल जैसा काम था। अपनी समस्या का ऐसा सरल समाधान सुनकर उसकी बाँछें खिल उठीं और सहर्ष यह नियम अपनाने का संकल्प उसने ले लिया। वह छोटी-सी शुरुआत उसके जीवन का अविच्छिन्न अंग बन गई। उसने दान देना शुरू किया, उसके फलस्वरूप दूसरों का दिल दुखाने वाली बातें कहते रहने की उसकी आदत बहुत कुछ जाती रही।”

प्रयत्न-पुरुषार्थ की आवश्यकता ऊर्ध्वमुखी प्रयासों के लिए होती है। ढलान की दिशा में सहज प्रवाह होने की बात सबको विदित है। यही कारण है कि जिन कुटेवों को नगण्य समझकर नजर अंदाज किया जाता है, दीर्घकाल तक अभ्यास में सम्मिलित रहने पर वे स्वभाव में मजबूती से जड़ें जमा लेती हैं। ऐसी स्थिति में उनको संघर्ष करके हटा पाना संभव नहीं। लड़ाई का दृष्टिकोण निषेधात्मक है। लड़ना ही हो, तो बुरे विचारों से लड़ना चाहिए। विकृत दृष्टिकोण से उत्पन्न होने वाला अंतर्द्वंद्व और भी जटिल समस्याएँ खड़ी करता है। सत्प्रवृत्तियों और सद्विचारों को दैनंदिन अभ्यास में शामिल करना, इसके लिए अचूक उपाय सिद्ध हुआ है। जैसे-जैसे अच्छी आदतों की मात्रा बढ़ेगी, बेतुकी आदतों की तरफ रुझान स्वयमेव कम होने लगेगा। आदतों पर विजय पाने का यह तरीका सर्वोत्तम है।

सफलता संसार में सबकी इष्ट है; परंतु दुनिया जिनको असाधारण कर्तृत्व के लिए याद करती है, वे इस तरह का कोई अलौकिक वरदान लेकर अवतरित नहीं हुए होते हैं। ‘हेनरी एडवर्ड्स’ ने अपनी किताब में ऐसे कुंठाहीन लोगों की सफलता का रहस्य बताते हुए कहा है— “ये सच्चे हृदय से अपनी हानियाँ तलाश करते हैं। अपनी कमियों— कमजोरियों को ईमानदारी से स्वीकार कर लेना बहादुरों का काम है। जिस तरह चतुर किसान अपनी फसल की निराई करता है तथा खरपतवारों को निर्ममतापूर्वक उखाड़ फेंकता है, उसी तरह ये अपने व्यक्तित्व में सद्गुणों की खेती करते हैं। असफलता से निराश नहीं होते। धैर्यपूर्वक प्रयत्नशील रहते हैं। रहस्य की बात तो यह है कि उनका परिष्कृत गुण-कर्म-स्वभाव सिफारिशी चिट्ठी की तरह हर जगह उनके लिए कामयाबी की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है।”


सफलता ऐसों के कदम चूमती है

स्वस्थ आकांक्षाएँ ही प्रेरणा की केंद्रबिंदु हैं। आगे बढ़ने— ऊँचा उठने— विकास की ओर निरंतर अग्रसर होने की आकांक्षा न उठी होती, तो मनुष्य आदिम अवस्था में ही पड़ा रहता। आज की प्रगतिशील स्थिति में पहुँच पाना संभव न हो पाता। आकांक्षाओं की प्रेरणा से ही पुरुषार्थ को गतिशील होने का अवसर मिला तथा विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। मनःशास्त्री कहते हैं कि मनुष्य की दृश्यमान हलचलों का कारण आकांक्षाएँ हैं। प्रतिभा, धन, प्रतिष्ठा अथवा श्रेय की आकांक्षा के इर्द-गिर्द ही संसार की गति है। जीवन से वे तिरोहित हो जाएँ, तो कुछ शेष बचता नहीं। निष्क्रिय और निचेष्ट जीवन का अभिशाप लद जाता है। मानव समाज का गहन अध्ययन करने वाले मनोविज्ञानी कहते हैं कि, “जिस समाज अथवा राष्ट्र की आकांक्षाएँ जितनी प्रबल होंगी, भौतिक दृष्टि से वे उतने ही संपन्न होंगे।”

आकांक्षाओं की पूर्ति में अभीष्ट स्तर की प्रतिभा एवं पुरुषार्थ का होना आवश्यक है। अन्यथा वे मात्र ललक बनकर रह जाती है, जिनका कुछ प्रतिफल निकलता नहीं। साथ ही उनकी दिशाधारा का रचनात्मक होना भी उतना ही आवश्यक है, नहीं तो उनकी परिणति स्वयं एवं समाज दोनों ही के लिए अहितकर होती है।

नाम कमाने की आकांक्षा अधिकांश व्यक्तियों के मन में होती है। कुछ संपदासंग्रह का मार्ग चुनते हैं, कुछ प्रतिभार्जन का तथा कुछ शक्तिसंग्रह का। जो अपनी स्थिति का सही मूल्यांकन करके तदनुरूप प्रयास करते हैं, वे सफल भी होते हैं; पर अधिकांश की इच्छाओं का उनकी स्थिति से तालमेल बैठता नहीं, वे अभीष्ट स्तर का पुरुषार्थ नहीं कर पाते हैं। फलतः उन्हें असफलता ही हाथ लगती है।

इसके विपरीत संसार में ऐसे व्यक्ति भी समय-समय पर विभिन्न देशों में पैदा हुए हैं, जिन्होंने अपनी सामर्थ्य को समाज की भौतिक समृद्धि बढ़ाने में खपाया। संपदा, पद एवं प्रतिष्ठा की कामना से दूर रहकर वे योगी की तरह कार्य में लगे रहे। उनके काम ही बाद में उनके नाम बन गए। ऐसे व्यक्तियों में आविष्कारक वैज्ञानिकों की एक बड़ी संख्या है, जिनमें से कुछ मूर्धन्यों का नाम उल्लेखनीय है।

‘गेब्रियल डेनियल फारेनहाइट’ ने दुकानदारी के कार्य में विफल होकर भौतिकी का अध्ययन शुरू किया। व्यवसाय अपनाया— काँच का फुलाना तथा भौतिकी यंत्रों का निर्माण करना। 1724 में उसने 0 डिग्री से 212 डिग्री अक्षांक वाले तापमापी का निर्माण किया। जल के अतिशीत होने तथा दाव बदलने के साथ-साथ उबालबिंदु बदलने का सिद्धांत खोजने का श्रेय भी ग्रेबियल को ही है। उसका नाम ‘फारेनहाइट’ ही तापमान मापने की इकाई बना।

‘जेम्स वाट’ ने सुधरे हुए भाप इंजन का निर्माण किया। अपने अनवरत लगन के कारण विश्वविख्यात वैज्ञानिक बना। ‘वाट’ बिजली को मापने की एक इकाई है, जिसे सभी जानते हैं।

‘एलेसेंड्रो वोल्टा’ अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र था। वह ‘पाविया विश्वविद्यालय’ (इटली) में भौतिकी का अध्यापक नियुक्त हुआ। वहीं कार्य करते हुए वह अनुसंधान कार्य में लगा रहा। उसने स्थिर विद्युत को जमा करने वाले उपकरण इलेक्ट्रो फोटीक सेल, वोल्टेनिक सेल तथा बैटरी का निर्माण किया। ‘धारा-विद्युत सिद्धांत’ की प्रस्तुति वोल्टा ने ही की। भौतिकी विज्ञान के क्षेत्र में ‘वोल्टा’ ‘विभवांतर’ मापन की एक इकाई है।

सोने में मिलावट ज्ञात करने के जिस सिद्धांत का आविष्कार यूनान के महान गणितज्ञ ‘आर्कीमिडीज’ ने किया, वह आज भी ‘आर्कीमिडीज सिद्धांत’ के रूप में विख्यात तथा मान्यता प्राप्त है।

‘ग्रैवियल फेलोपियो’ इटली में चिकित्साशास्त्री थे तथा ‘पैडुआ विश्वविद्यालय’ में शरीर-रचना विज्ञान और वनस्पति शास्त्र विभाग के भी अध्यक्ष रहे। शरीर-रचना विभाग पर उन्होंने एक बृहत ग्रंथ लिखा। गर्भाशय नली एवं कर्णपटल तंत्रिका जैसे आंतरिक अवयवों का पता लगाया। मादा स्तनपायियों के जननांग में पाई जाने वाली एक नली, जिससे होकर अंड या डिंब गर्भाशय में पहुँचता है, की खोज फेलोपियो ने ही की। उसके नाम पर ही उस नलिका का नाम ‘फेलोपियो ट्यूब’ पड़ा।

‘मार्सेलो मैलपिघी’ इटली के ‘बोलोना’ तथा ‘पीसा विश्वविद्यालयों’ में चिकित्सा विज्ञान के प्राध्यापक रहे। भ्रूण विज्ञान, ऊतक विज्ञान तथा पादप शरीर-रचना विज्ञान के विद्वान थे। उन्होंने शरीर विज्ञान पर दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं तथा वनस्पति विज्ञान में अनेकों खोजें की। त्वचा की परत के ठीक बाद पाए जाने वाली बाह्य त्वचा की एक परत की खोज उन्होंने की, जिसमें निरंतर कोशिका का विभाजन होता रहता है तथा त्वचा को गहरा रंग देने वाला रंजक पदार्थ ‘मेलानिन’ पाया जाता है। उस परत का नाम मैलपिघी के नाम पर ‘मैलपिघियन परत’ पड़ा।

‘कार्ल फ्रेडरिक गॉस’ चौदह वर्ष की अल्पायु में ‘गैस्यूकिलडीय ज्यामिती’ और अठारह वर्ष की आयु में गणित की नई ‘परिकलन विधि’ प्रस्तुत करने वाले जर्मन भौतिकविद् थे। उन्होंने ग्रहों की कक्षा का परिकलन करने की विधि का भी आविष्कार किया। चुंबकीय क्षेत्र, घनत्व की इकाई — ‘गॉस’, कार्ल फ्रेडरिक गॉस की ही खोज है।

‘आंद्रे मैरी एंपीयर’ फ्रांस के प्रसिद्ध भौतिकीविद् तथा रसायनशास्त्री थे। वे बारह वर्ष की आयु में ही ‘अवकलन गणित’ के विशेषज्ञ हो गए। एंपीयर ने सबसे पहले यह बताया कि चुंबकीय पदार्थों में चुंबकत्व का मूल स्रोत एक विद्युतधारा होती है, न कि चुंबकीय ध्रुव। धारा-विद्युत की इकाई ‘एंपीयर’ मैरी एंपीयर का ही आविष्कार है।

‘जॉर्ज साइमन ओम’ ‘म्यूनिख विश्वविद्यालय’ में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक थे। उन्होंने विभवांतर विद्युतधारा तथा विद्युत-प्रतिरोध के बीच गणितीय संबंध की खोज की तथा डी.सी. विद्युत परिपथों की गणितीय व्याख्या की। ‘ओम’ विद्युत प्रतिरोध मापने की एक व्यावहारिक इकाई है।

‘जेम्स प्रेस्कॉट जूल’ ब्रिटिश भौतिकीविद् थे। उन्होंने ताप के ‘यांत्रिक सिद्धांत’, गैसों के ‘अणु गणित सिद्धांत’ तथा ‘गैसीय अणु के वेग के ‘आकलन सिद्धांत’ की खोज की। ‘जूल सेंटीमीटर— ग्राम— सेकेंड प्रणाली में ऊर्जा की इकाई के रूप में प्रेस्कॉट का नाम अमर है।

‘लुई पाश्चर’ विख्यात फ्रांसीसी रसायनज्ञ तथा ‘लाइल विश्वविद्यालय’ में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक थे। किण्वन प्रक्रिया पर उन्होंने विशद् अध्ययन-अनुसंधान किया। पास्चराइजेशन— तापोपचार द्वारा दूध आदि तरल पदार्थों में हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने की विधि की खोज पाश्चर की ही देन है। इस खोज से वे तरल पदार्थ अधिक समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं।

‘जेम्स क्लार्क मैक्सवेल’ महान ब्रिटिश भौतिकीविद्, ‘कैंब्रिज विश्वविद्यालय’ में प्राध्यापक थे। उन्होंने विद्युतधारा तथा चुंबकीय-क्षेत्र के बीच परस्पर क्रिया की स्थापना की, जो संवाद- प्रेषण के उपकरणों के विकास का आधार बना। उनका नाम मैक्सवेल—  सेंटीमीटर— ग्राम-सेकेंड प्रणाली में चुंबकीय फ्लक्स की इकाई के रूप में प्रख्यात है।

विज्ञान-क्षेत्र में ऐसे अगणित नाम हैं, जो वैज्ञानिकों के कामों के कारण जाने हैं। न्यूटन, डाल्टन, मैडम क्यूरी, आइन्स्टीन जैसे नामों की लंबी शृंखला है, जिन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा का सुनियोजन करके अद्भुत आविष्कारों को जन्म दिया। जिनसे समस्त मानव जाति किसी-न-किसी रूप में लाभान्वित हो रही है।

श्रेय अर्जित करने के लिए आवश्यक नहीं कि मनुष्य अत्यंत बुद्धिमान हो। ऐसे व्यक्ति तो थोड़े-से होते हैं; पर महानता का मार्ग हर किसी के लिए खुला है। अन्वेषण बुद्धि की कमी किसी में नहीं है। हर कोई अपने ही प्रयत्नों से उस मार्ग में आगे बढ़ता चल सकता है। परहित हेतु प्रतिभा का अवलंबन लेने वाले परमार्थपरायणों का यश इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अमर है। उनका अनुगमनकर श्रेय अर्जित कर सकना हर किसी के लिए संभव है।


“रस्सी साँप या साँप रस्सी”

सर्प को ‘कालरज्जु’ कहा जाता है। ‘नागपाश’ को मृत्यु का आयुध माना गया है। इससे लोकमान्यता का पता चलता है, जिसमें यह समझा गया है कि साँप मृत्यु का पर्यायवाचक है; पर वस्तुतः इस किंवदंती में वास्तविकता कम और भ्रम अधिक है। दर्शनशास्त्र में ‘रस्सी का साँप’ समझे जाने का भ्रम— उदाहरण अक्सर प्रस्तुत किया जाता है। उस कथन का मंतव्य कुछ भी हो, पर बात वास्तविकता से मिलती-जुलती है। साँपों में से काटने पर मृत्यु उत्पन्न करने वाले बहुत ही कम होते हैं। उन अपवादों को छोड़कर शेष तो अन्य छोटे प्राणियों की तरह निरीह ही होते हैं। उनकी चमक, सुंदरता, स्फूर्ति और आकर्षक बनावट को देखकर लगता है प्रकृति ने उन्हें खेलने योग्य खिलौना बनाया है। वे मनुष्य के लिए हानिकारक कम और लाभदायक ज्यादा हैं। वे ऐसे कीड़े-मकोड़ों को खाते और भगाते रहते हैं, जो मनुष्य के लिए तथा उपयोगी पेड़-पौधों के लिए हानिकारक होते हैं। इस प्रकार साँप की उपयोगिता भी है। नागपंचमी को दूध पिलाने और साँप को देवता मानने की प्रथा— प्रचलन इसी प्रयोजन के लिए हुआ है।

साँपों के संबंध में प्रचलित अज्ञान को यदि हटाया जा सके और उनकी प्रकृति एवं उपयोगिता के संबंध में अधिक समझा जा सके, तो प्रतीत होगा कि सृष्टि का यह सुंदर प्राणी अन्य जीवधारियों की तरह ही सृष्टा की सुंदर संरचना का एक आकर्षक प्रमाण है।

विश्व भर में साँप विभिन्न प्रकार के पाए जाते हैं। अकेले भारत में ही 230 प्रकार की जाति के साँप पाए जाते हैं। इनमें केवल 15 प्रकार के साँप जहरीली जाति के हैं। इन जहरीली जातियों में भी केवल 4 या 5 जातियाँ ही अधिक देखने को मिलती हैं।

साँपों की अधिक जातियाँ अंडमान-निकोबार में देखने को मिलती है; क्योंकि वहाँ इनके पलने का पूरा-पूरा अवसर उपलब्ध है। साँपों में बड़े विचित्र किस्म के साँप देखने को मिलते हैं, जिनमें “टाइफ्लस” साँप की विचित्रता यह है कि यह आँखें कमजोर होने से रास्ता खोजने में असमर्थ होता है। यह जीभ और नाक, जो अतिसंवेदनशील होती हैं, के सहारे रास्ता खोज लेता है। पहले यह जीभ को बाहर फेंककर, पुनः उसी जीभ को तालू से लगाकर मस्तिष्क को संदेश भेजकर संग्रहित जानकारी देकर मार्ग एवं आस-पास की वस्तुओं की जानकारी प्राप्त कर लेता है। इन साँपों की आँखें भी संवेदनशील होती हैं, जो धरती  एवं पानी पर कंपनों से दिशासात करके शत्रु अथवा रास्ते की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। साँपों की घ्राणेंद्रियाँ तेज होती हैं, कभी-कभी अपने सताने वालों की गंध लेकर ये अपना बैर पूरा करते भी पाए जाते हैं; लेकिन ऐसा सभी किस्म के साँप नहीं करते।

साँप अंडे जरूर देता है, लेकिन उसका रक्त ठंडा होने से वह उन्हें सेने में समर्थ नहीं है। कई बार साँप स्वयं ही अपने अंडे भी खा जाता है। अब तक यही मान्यता थी कि साँप मात्र अंडे देता है, लेकिन कुछ साँप बच्चे भी देते हैं। जो साँप बच्चे देते हैं, उन्हें 15 से 28 सप्ताह तक का समय लगता है। अंडे देने वाले साँप 4 से लेकर 100 तक अंडे देते हैं। साँप अपने शिकार को तोड़-मरोड़कर निगल जाता है, छोटे-छोटे साँप, चूहे, मेढ़कों, मछलियों को निगल जाते हैं। अजगर साँप हिरन तक को तोड़-मरोड़कर निगल जाते हैं। साँप जहाँ भोजन नहीं चबा सकता है, वहाँ प्रकृति ने उसे पाचन रस इस तरह के प्रदान किए हैं कि शिकार की मजबूत हड्डियाँ, दाँत, माँस सब कुछ पेट में गल जाता है।

विषहीन साँप मेंढ़कों को पकड़ते हैं, जब मेंढक शरीर फुला लेता है। इन्हें ऐसे दाँत प्रकृति ने दिए हैं कि यह इन दाँतों से पंक्चर करके निगलने योग्य बना लेता है। प्रकृति ने इनकी आत्मरक्षा और भोजन प्राप्ति हेतु तेज गति, साहस, सूझ-बूझ, चालाकी, पेड़-पौधों, मिट्टी से मिलता-जुलता रंग देकर इनके वंश को विनाश से बचा लिया है।

नवंबर, 1976 में सर्पविद्या संबंधी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ‘वेनेजुएला’ (दक्षिण-अमरीका) के ‘कैराकास’ नामक स्थान पर हुआ था, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान, यूरोप और कई अरब देशों के 200 से अधिक सर्पविद्याविशेषज्ञ एकत्रित हुए। उसी समय ‘विलियम हास्ट’ नामक व्यक्ति ने भारतीय काले नाग के मुँह में अपनी अँगुली डाली और निकाल लिया। उसे साँपों को पालने की विशेष रुचि है। उसके यहाँ देशी एवं विदेशी कई प्रकार के सर्प देखने को मिलते हैं। एक सौ तेईस बार उसे जहरीले सर्प काट चुके हैं, लेकिन उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

‘पोर्ट एलिजाबेथ’ (अफ्रीका) में ‘जॉन’ नाम का व्यक्ति एक चिड़ियाघर में साँपों की देखभाल करता है। उसने दावा किया है कि मैं साँपों के साथ एक कोठरी में 70 घंटे निरंतर रह सकता हूँ। कोठरी में लगभग 100 साँप होते हैं। 48 घंटे तो वह सर्पों के साथ रह चुका है, लेकिन इससे अधिक समय तक रहने का उसने दृढ़ निश्चय किया है। जॉन को कई बार विषधर सर्पों ने काटा है, लेकिन उसके शरीर पर जहर का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। एक बार तो उसे ‘कोबरा किंग’ ने भी काटा, लेकिन उसकी मृत्यु न हो पाई। यह वस्तुतः आश्चर्य का ही विषय है। एक बार एक व्यक्ति को सर्प ने काटा, तो वह जॉन के पास आया। जॉन ने काटे हुए हिस्से पर अपना मुँह लगा दिया और सारे जहर को खींचने में सफल रहा और उस व्यक्ति को नया जीवन दिया। वह सर्पों के साथ नेकर-बनियान में रहता है, अब तो उसने 100 घंटे सर्पों के साथ व्यतीत करने का निश्चय किया है।

इसी प्रकार आस्ट्रेलिया की ‘कुमारी सैनी’ को साँपों को पालने की बड़ी रुचि है। जहरीले-से-जहरीले सर्पों को भी वह अपने गले में डाले रहती है। कमर में पेटी के स्थान पर सर्प को ही लपेटे मिलेंगी। जब भी कभी उसे देखें, तो छोटा-मोटा सर्प उसकी जेब में पड़ा हुआ मिलेगा। रात को वह अजगर का तकिया लगाकर सोती है। उसने निश्चय किया है कि वह आजीवन सर्पों के समाज में रहेंगी; क्योंकि सर्प भी उसे अपरिमित प्रेम करते हैं।

महाराष्ट्र-पर्यटन विकास निगम में नौकरी कर रहे 28 वर्षीय ‘नीलम कुमार’ ने 72 विषैले सर्पों के बीच 72 घंटे रहकर एक अनूठा कीर्तिमान स्थापित किया। बाद में इस कीर्तिमान को केरल के ही एक युवक ने तोड़ा। इसके पूर्व मई 71 में ‘पीटर स्लेमैन’ ने दक्षिण अफ्रीका के ‘जोहान्सवर्ग’ में 18 विषैले और 6 अर्ध विषैले साँपों के साथ 50 दिन गुजारकर कीर्तिमान स्थापित किया था; लेकिन हर 24 घंटे बाद वे आधे घंटे आराम करने के लिए बाहर निकलते थे। उनका कक्ष 3/2 x 21/4 मीटर माप का था। नीलम कुमार ने इससे 4 प्रतिशत अधिक क्षेत्रफल वाला काँच का कक्ष अपने इस प्रयोग के लिए लिया तथा 72घंटे में एक सेकेंड के लिए भी बाहर नहीं निकले। सर्पों की संख्या भी स्लैमैन से चार गुनी थी। अतः सर्पविशेषज्ञों ने स्लैमैन और नीलम कुमार को क्रमशः 900 और 1512 अंक दिए।

यह प्रदर्शन नीलम कुमार ने 20 से 23 जनवरी 1980 की अवधि में किया। 20 जनवरी को 3 बजकर 55 मिनट पर नीलम कुमार ने जिस काँच के कक्ष में प्रवेश किया, उसमें कलकत्ता सर्प उद्यान के मालिक ‘दीपक मित्रा’ ने 36 नाग, 12 करैत तथा 24 गोनस सर्प छोड़ रखे थे। नीलम कुमार की सुरक्षा के लिए हर तरह के प्रयत्न किए थे। कक्ष के बाहर पुलिस, पत्रकारों तथा दर्शकों की भारी भीड़ रही।

21 जनवरी को एक नाग तथा एक करैत आपस में लड़कर मर गए। मृत सर्पों को निकालकर उन्हीं की जाति के दो साँपों को अंदर किया गया। दोपहर की गरमी बढ़ने पर कई साँप खतरनाक मुद्रा में फन उठाकर नीलम कुमार को घूरने लगे। सर्पों के चलने में गति आ गई। गरमी कम करने के लिए फुहारा दिया गया।

बंबई के दो सर्पविशेषज्ञ ‘श्रीमती नीलिमा’ तथा’ जी. डीसा’ और ‘दीपक मित्रा’ हर क्षण निगरानी करते रहे। नीलम कुमार के सोने पर उनके शरीर पर 32 साँप रेंगकर चढ़े और धीरे से उतर भी गए। 22 जनवरी को दर्शकों में से कुछ ने यह कहा कि साँपों को विषरहित कर दिया गया है। साँपों को विषरहित साबित करने वाले के लिए नीलम कुमार ने 10 हजार रुपये इनाम देने की घोषणा की। लेकिन यह साबित करने की किसी की हिम्मत न हुई। दीपक मित्रा ने एक साँप को उठाकर अपने हाथों से उनका मुँह खोलकर पत्रकारों तथा दर्शकों को उसकी विषग्रंथि दिखाई। 23 जनवरी को 3 बजकर 55 मिनट में नीलम कुमार को एक करैत साँप की माला पहनाकर स्वागत किया गया और कक्ष से बाहर निकाला गया। जहाँ नीलम कुमार की माँ ‘श्रीमती ऊषा ताई’, जो 78 घंटे से घर में बैठकर बेटे की सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर रही थीं, ने अपने बेटे को गले से लगा लिया।

इस समय नीलम कुमार के पास एक अजगर तथा डेढ़ सौ साँप हैं, जिन्हें उन्होंने अपने घर में ही एक सुरक्षित स्थान पर पाल रखा है। साँपों के शौक के बारे में पूछने पर वे बताते हैं कि बचपन में एक बार उनके कमरे में एक जहरीला साँप घुस आया था, जिसे लेकर वे बड़े प्यार से ऑफिस में गए हुए थे। मैनेजर तो घबड़ा गए। नीलम के साँपों को साथी बनाने की यही शुरुआत थी।

‘रस्सी का साँप’ समझने में तो कभी-कभी ही भूल होती है, पर साँपों को मृत्यु का दूत मानने की भ्रांति तो एक प्रकार से लोकमान्यता ही बन गई है। ऐसी-ऐसी अगणित भ्रांतियों का जंजाल मनुष्य के मस्तिष्क पर चढ़ा रहता है। इससे छुटकारा पाया जा सके, तो भय के स्थान पर सौंदर्य के दर्शन करने का आनंद सहज ही उठाया जा सकता है।


कर्ण की नीति-निष्ठा से प्रभावित हुआ अश्वसेन (कहानी)

कर्ण ने अर्जुन को मार गिराने की प्रतिज्ञा की थी। उसे सफल बनाने के लिए खांडव वन के महासर्प अश्वसेन ने, जिसका सारा परिवार पांडवों द्वारा लगाई आग से भस्म हो चुका था, यही उपयुक्त अवसर समझा। अर्जुन से वह शत्रुता तो रखता था, पर काटने का अवसर मिलता नहीं था। वह बाण बनकर कर्ण के तरकस में जा घुसा, ताकि जब उसे धनुष पर रखकर अर्जुन तक पहुँचाया जाए, तो काटकर प्राण हर ले।

कर्ण के बाण चले, अश्वसेन बाण भी। कृष्ण ने वस्तुस्थिति को समझा और रथ के घोड़े जमीन पर बिठा दिए। बाण मुकुट काटता हुआ ऊपर से निकल गया।

असफलता पर क्षुब्ध अश्वसेन प्रकट हुआ और कर्ण से बोला— “अबकी बार अधिक सावधानी बरतना, साधारण तीरों की तरह मुझे न चलाना। इस बार अर्जुन का वध होना ही चाहिए। मेरा विष उसे जीवित न रहने देगा।”

इस पर कर्ण को भारी आश्चर्य हुआ। उसने उस कालसर्प से पूछा— “आप कौन हैं और क्यों अर्जुन को मारने में इतनी रुचि रखते हैं?”

सर्प ने कहा— “अर्जुन ने एक बार खांडव वन को आग लगाकर मेरे परिवार को मार दिया था, सो उसका प्रतिशोध लेने के लिए मैं व्याकुल रहता हूँ। इस आग में मैं निरंतर जल रहा हूँ। उस तक पहुँचने का अवसर न मिलने पर आपके तरकस में बाणरूप से आया हूँ। आपके माध्यम से अपना प्रयोजन पूरा करूँगा।

कर्ण ने उसकी सहायता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वापस लौट जाने के लिए कहा— “भद्र! मुझे अपने ही पुरुषार्थ से नीतियुद्ध लड़ने दीजिए। आपकी अनीतियुक्त छद्म सहायता लेकर जीतने से तो हारना अच्छा।

कालसर्प कर्ण की नीति-निष्ठा को सराहता हुआ वापस लौट गया।


“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतां यत्”

उस दिन लक्ष्मी जी स्वर्ग से धरती पर उतरीं। धरती ने उनका स्वागत करते हुए कहा— “देवि! मेरे परिश्रमी पुत्रों को वरदान मत देना। नहीं तो वे भी स्वर्ग के देवताओं की तरह आलसी हो जाएँगे।”

लक्ष्मी ने दर्प, व्यंगमिश्रित स्वर में कहा— “मेरी कृपा प्राप्त करने को सभी लालायित रहते हैं। मेरे बिना किसी का जीवन आनंदमय नहीं हो सकता, इतना भी नहीं जानती तुम। मैं तुम्हारे पुत्रों को सुखी बनाने आई हूँ, उन्हें वरदान दूँगी। तुम्हारा मूर्खतापूर्ण अनुरोध मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं।”

धरती कुछ और कहती, पर इसका अवसर दिए बिना ही लक्ष्मी जी ने अपना रथ बढ़ा दिया। वे जिधर से भी निकलीं, उधर से ही वरदान बरसा था। देखते-देखते लोगों के घर सोने-चाँदी से भर गए।

अपने सौभाग्य की सराहना करते हुए लोग उल्लास भरे उत्सव मनाने लगे। विपुल धन पाकर उन्होंने आमोद-प्रमोद के अनेक साधन जमा कर लिए। श्रम की ओर अब कौन ध्यान देता?

वर्षा आई। कोई खेतों को जोतने न गया। आमोद-प्रमोद से फुरसत ही किसे थी। न बीज बोया गया, न अन्न उपजा।

दुर्भिक्ष ने विकराल रूप धारण किया। छाती से सोने की ईंट बाँधे क्षुधार्त लोग जहाँ-तहाँ तड़प-तड़पकर प्राण त्यागने लगे व अपने वरदान को कोसने लगे। धरती की आँखों में आँसू आ गए। उसने बचे-खुचे पुत्रों से कहा—  “आकस्मिक लाभ का वरदान वस्तुतः अभिशाप जैसा दुर्भाग्यजनक ही होती है।”

धरती पुत्रों ने वस्तुस्थिति को समझा, श्रम को पुनः अपनाया व सुख-शांति का सही मार्ग पकड़ा।

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एक साधु द्वार पर बैठे तीन भाइयों को उपदेश दे रहे थे—  “वत्स! संसार में संतोष ही सुख है। जो कछुए की तरह अपने हाथ-पाँव सब ओर से समेटकर आत्मलीन हो जाता है, ऐसे ध्यानयोगी पुरुष के लिए संसार में किसी प्रकार का दुःख नहीं रहता।

घर के भीतर बुहारी लगा रही माँ के कानों में साधु की यह वाणी पड़ी, तो वह चौकन्नी हो उठी। बाहर आई और तीनों लड़कों को खड़ा करके छोटे से बोली— “ले यह घड़ा, पानी भरकर ला।” मझले से कहा—  “उठा यह झाड़ू और घर-बाहर की बुहारी कर।” अंतिम तीसरे को टोकरी देते कहा— “तू चल, सब कूड़ा उठाकर बाहर फेंक।”

और अंत में साधु की ओर देखकर उस कर्मवती ने उपदेश दिया— “महात्मन्! निरुद्योगी मैंने बहुत देखे हैं। कई पड़ोस में बीमारी से ग्रस्त, ऋणभार से दबे शैतान की दुकान खोले पड़े हैं। अब मेरे बच्चों को भी वह विषवारुणी पिलाने की अपेक्षा आप ही निरुद्योगी बने रहिए और इन्हें कुछ उद्योग करने दीजिए।”

गाँव वालों ने कहा— “महात्मन्! आपका उपदेश झूठा और इस माँ का उपदेश सच्चा। साधु चलते बने।” साधु उदास मन जंगल की ओर चल पड़े और अपने निरुद्योगी सिद्धांत पर पश्चात्ताप कर स्वयं को श्रमशील बनाने को उद्यत हुए।

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गंधमादन पर्वत पर आत्मकल्याण की इच्छा से तप कर रहे महाराजा ‘अरिष्टनेमि’ के पास जाकर देवदूत ने कहा— “महाराज! मुझे सुरपति इंद्र ने भेजा है। उनका आग्रह है कि आप अभी मेरे साथ स्वर्ग चलें और वहीं निवास करें। “स्वर्ग, महाराज ने आत्मकल्याण की बात सुनी, स्वर्ग बीच में आ टपका, तो उनको पूछना ही पड़ा— “भाई स्वर्ग की विशेषता क्या है, क्या उसमें कुछ दोष भी हैं?” देवदूत बोला— “विशेषता यह है कि वहाँ सुखभोग साधन-सुविधाएँ हर घड़ी उपलब्ध होती हैं। दोष यह है कि वहाँ का हर व्यक्ति सदैव विलास में डूबा हुआ होता है, अतएव जैसे ही पुण्य समाप्त हुआ, वह फिर मृत्युलोक लौटा दिया जाता है। “तब फिर मैं यहीं ठीक हूँ, यहाँ लोगों की श्रमरत हो सेवा करता हूँ, अपने को भी उन्हीं जैसा छोटा व्यक्ति अनुभव करता हूँ। इससे जो आत्मा को शांति मिलती है, स्वर्ग उसके आगे फीका है, कहकर महाराज ने दूत को लौटा दिया।


मानवता को नया जीवन देने वाली दिव्य वनौषधियाँ

सृजेता भी एक अद्भुत कलाकार है। उसके सारे कृत्य निराले हैं। उसने युवराज के रूप में मनुष्य की रचना की, तो उसे विशिष्ट संपन्न अंगों से भरपूर काया दी। कहीं कोई व्यतिक्रम होने पर रुग्णता की संभावना हो, तो निवारण एवं जीवनीशक्ति-संवर्द्धन हेतु धरती पर हरीतिमा की चादर बिछा दी। यह हरीतिमा पोषकतत्त्वों से तो भरपूर है ही, अद्भुत गुणों वाला वनौषधियों का समुच्चय भी इसमें है। अमृतोपम गुणों वाली इन जड़ी-बूटियों को उसने अपने प्राकृतिक रूप में ही जीवित रखा, ताकि आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य उनका प्रयोग कर सके।

नियंता को परब्रह्म के रूप में भी जाना जाता है, जिसका मुख्य कार्य है— विधि-व्यवस्था बनाना, पारस्परिक सामंजस्य बिठाना। जीव-जगत, वनस्पति-जगत, पर्यावरण के मध्य पारस्परिक संतुलन के विज्ञान को ही इकॉलाजी नाम दिया गया है। परब्रह्म की परोक्ष सत्ता का, उसके लीला-संदोह का–  व्यवस्था-अनुशासन का सही मायने में दिग्दर्शन करना हो, तो वनौषधि जगत व मानवी काया के पारस्परिक संबंध के रूप में कर सकते हैं। जड़ी-बूटियों की दुनिया स्वयं में अद्भुत विलक्षण है एवं उसकी जानकारी ने आदिकाल से अब तक मानव जगत को जितना लाभ स्वास्थ्य अनुदान, दीर्घायुष्य, रोगों से संघर्ष की सामर्थ्य के रूप में दिया है, उनका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता।

आज की रुग्णता से भरी मानव समाज की परिस्थितियों को देखते हुए फिर से हमारा ध्यान उसी पद्धति की ओर आकृष्ट होता है, जो मूलतः दिव्य जड़ी-बूटियों के ऊपर आश्रित थी। आज यह बेजान काय-कलेवर रूप में किसी तरह जिंदा है। समय परिवर्तन के साथ ही लोग इस क्षेत्र में अपनी विशेषता खोते चले गए, अन्यथा अपने समय में यही एकमात्र पद्धति लोगों को हर दृष्टि से स्वस्थ– समर्थ रखे रहती थी। रोगों से ही नहीं, वरन बुढ़ापे की जीर्णावस्था से भी मुक्ति दिलाने में यह एक समर्थ विधा है। कई तो ऐसी जड़ी-बूटियों का भी परिचय शास्त्रों में मिलता है, जो लोगों को मृत्यु तक से छुटकारा दिलाती थी।

ऐसी ही जड़ी-बूटियों में से एक को ‘संजीवनी’ के नाम से जाना जाता रहा है। नाम के अनुरूप इसका कार्य भी मृतकों को जिंदा कर देना है। रामायण में जब मेघनाथ के शक्तिबाण से लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं, तो सुषैण वैद्य द्वारा संजीवनी लाने को कहा जाता है। इसकी जानकारी देते हुए उनने इसे रात घने अंधकार में भी चमकने वाली तथा हिमालय-क्षेत्र के ‘सुमेरु’ पर्वत पर उपलब्ध बूटी बताया। हनुमान जी इस बूटी को पहचान तो नहीं पाए थे, परंतु पूरे सुमेरु पर्वत को ही उखाड़कर ले आए थे और उसमें से संजीवनी को प्राप्त करके लक्ष्मण जी को बचा लिया गया था।

आयुर्वेद शास्त्र में इस संजीवनी का सोम औषधि के रूप में उल्लेख मिलता है। इसके विषय में यह वर्णन किया गया है कि, “आरंभ में इसका एक पौधा होता है। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को उसमें एक पत्ते का उद्भव होता है। क्रमानुसार दौज को दो, तीज को तीन तथा पूर्णिमा तक 15 पत्ते निकल आते हैं तथा कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से क्रमशः एक-एक पत्ता नित्य झड़ने लगता है। अमावस्या तक यह पौधा सूखी लकड़ी सदृश रह जाता है; परंतु इस स्थिति में इसकी उपयोगिता बढ़ जाती है। यह घने अंधकार में रेडियम की तरह चमकता है तथा अत्यंत गुणकारी हो जाता है।” शास्त्र  इसके गुणों को इस प्रकार प्रतिपादित करता है:–

अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा।

ईशित्वं च वशित्वं च सर्वकामावशायिताः।।

—    मार्कण्डेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण

अर्थात अणिमा, लघिमा, गरिमा,  प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व एवं वशित्व–  इन आठ ऐश्वर्ययुक्त सिद्धियों को संजीवनी उपलब्ध कराती है। इनको पाकर व्यक्ति देवतुल्य बन जाता है।

शारीरिक स्तर पर संजीवनी अग्नि, जल, विष, वस्त्र आदि का प्रभाव नहीं पड़ने देती है। इसके सेवन से सुदृढ़ मांसपेशी, तेजस्वी दृष्टि, उच्च श्रवणशक्ति तथा नवजीवन की प्राप्ति होती है। व्यक्तित्व में तेजस्विता तथा प्रतिभा का समन्वय होता है तथा व्यक्ति में वह सामर्थ्य आ जाती है, जिससे वह आसमान में उड़ने की क्षमता अर्जित कर लेता है। लघु स्तर पर तपेदिक, बाल रोग, शिरोशूल, मानसिक रोग, भूत-प्रेत बाधा, बुखार, दृष्टिदोष, सर्पदंश आदि से उत्पन्न रुग्णता को दूर करने में इसकी सक्षमता का भी उल्लेख शास्त्रों में मिलता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार संजीवनी का प्राप्ति स्थान हिमालय की पर्वतशृंखला, विंध्याचल पर्वत, देवगिरी, श्रीपर्वत, महेंद्र, मल्लिकार्जुन पर्वत, सह्याद्रि, सिंधु नदी का उद्गम माना जाता है; परंतु वर्तमान समय में तो इसे दुर्लभ जड़ी-बूटी के रूप में जाना जा सकता है। यद्यपि जानकार बताते हैं कि उचित स्थान पर खोजने से इसे अभी भी प्राप्त कर लाभ उठाया जा सकना संभव है। आयुर्वेद के अनुसार चमकने वाली अन्य दिव्य औषधियों के नाम इस प्रकार हैं– त्रिपदा, गायत्री, रैक्त, अनिष्टम, स्वयंप्रभ, एष्टम, पावत, जागत, शाकर अंशवान, करवीर, लालवृत, प्रतानवान, कनकप्रभ, श्वेतान, कनियान, दूर्वा, रजतप्रभ, अंशुमान, मंजुमान, चंद्रमा, महासोम आदि। इनसे संबंधित कुछ विशेष विवरण अब तक अप्राप्य हैं।

अथर्ववेद में अपामार्ग नामक औषधि का भी उल्लेख मिलता है। 17वें सूक्त में 1-8 मंत्र के अंतर्गत इसके सहस्रवीर्य, रक्षोघ्न, कृमिघ्न, रसायन, क्षुधा-तृष्णामारण, विषघ्न, अर्शोघ्न, अश्मरीनाशन तथा ओजोवर्द्धन प्रभाव की जानकारी दी गई है। एक अन्य सूक्त में यह कहा गया है:–

अप (छत्य दोषान् शरीरं) मृज्यते अनेन इति अपामार्गः।

अर्थात दोषों का हरण करके जिसके द्वारा शरीर का संशोधन होता है, वह अपामार्ग है। यजुर्वेद के अंतर्गत इसके चूर्ण से हवन करने पर राक्षसों के अर्थात दुष्ट चिंतनजन्य विकारों के विनाश होने की बात कही गई है। इसका प्रभाव पापनाशन, मृत्युनाशन तथा दुःस्वप्ननाशन के रूप में भी प्रतिपादित किया गया है। शौनकीय अथर्ववेद संहिता (7/65/3) के अनुसार यह कुष्ठ रोगनाशक भी है। ‘याज्ञवल्क्य’, ‘शिक्षा’ तथा ‘विष्णु’ धर्मसूत्र में इसके दंतधावन को अत्यंत उपयोगी बताया गया है। ‘ज्योति विज्ञान’ में कहीं-कहीं बुध ग्रह को सहायक बनाने हेतु भी इसको समिधा रूप में प्रयुक्त करने का विधान बताया गया है। इसे सौभाग्यदायिनी समिधा घोषित किया गया है। अपामार्ग की मंजूरी को सर्प, वृश्चिक आदि के भय से निवृत्ति के लिए भी घर में रखने का विधान है। अपामार्ग अभी भी सर्वसुलभ औषधि है; पर अधिकांश व्यक्ति इसके गुणों से अनभिज्ञ होने के कारण लाभ नहीं उठा पाते।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण वनौषधि ‘अश्वत्थ’ है। इसकी जानकारी ऋग्वेद संहिताओं से मिलती है। विभिन्न आख्यानों एवं सूक्तों से इसके बल्य, आग्नेय तथा मेध्य गुण-धर्म का संकेत मिलता है। अथर्ववेद में शत्रुनाशन हेतु इसके प्रयोग का उल्लेख है। ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ ने तो इसे वनस्पतियों का सम्राट घोषित किया है। उन्माद रोग तथा बृहस्पति एवं शनि को सहकारी बनाने हेतु इसकी समिधाओं को प्रयुक्त करने का विधान है। इसे भी दुःस्वप्ननाशक बताया गया है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है:—

“वृक्षाणां अश्वत्थोऽहम्।” इससे प्रतीत होता है कि भगवान ने इसे कितना पवित्र, गुणकारी माना है।

हिमालय-क्षेत्र में अमृत तालाब के निकट ‘कूंठ’ नामक वनौषधि के पाए जाने का उल्लेख ‘अथर्ववेद’ में मिलता है। इसे तक्मनाशक तथा रक्षोदक माना गया है। नेत्र रोग, शिरो रोग, प्राण विकार, यक्ष्मा, कासश्वास, वात विकार, ध्यान के लिए इसका सेवन अत्यंत उपयोगी बताया गया है। रसायन तथा वाजीकरण के रूप में भी इसका प्रयोग अत्यंत गुणकारी रूप में हुआ है। पिप्पलाद संहिता के अनुसार यह शूलहर तथा विषघ्न भी है। केशव पद्धति (28।13) में कूष्ठ चूर्ण को नवनीत में मिलाकर शिरो रोग, राजयक्ष्मा, कुंठ तथा सर्वांग वेदना में लेप करने का विधान प्रतिपादित किया गया है।

ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में ‘पूर्ण’ नामक विशिष्ट बूटी का विवरण मिलता है। पहचान के रूप में इसके त्रिपदा गायत्री के सदृश तीन-तीन पत्ते एक साथ होने की बात कही गई है। इसे ब्रह्म अर्थात ज्ञान का प्रतीक माना गया है। इसको हवन रूप में प्रयुक्त करने से दुश्चिंतनरूपी राक्षसों के विनाश की बात प्रमाणित की गई है। अथर्ववेद में इसे बल, आयु, समृद्धि तथा यशदायक बतलाया गया है। इसके लिए पर्णमणि को शरीर में धारण करने का भी विधान है।

अग्निदाह में शांति प्रदान करने वाली एक वनौषधि को उसके कार्यानुसार ‘शमी’ के नाम से पुकारा गया है। स्त्री को पुंसवन कार्य हेतु शमीगर्भ अश्वत्थ के कोयले को मधुमंथ में मिलाकर पिलाने का विधान अथर्ववेद में दिया गया है। सर्पविष-निवारण हेतु भी इसे पिलाने का विधान है। यह भी उल्लेख मिलता है कि शमीपत्र से मूल नक्षत्र में स्नान करने पर पुत्र की प्राप्ति होती है। यह बताया गया है कि ‘मेषश्रृगी’ के फलकोष को शमी चूर्ण के भात में मिलाकर खिलाने से भूत, ग्रहादि की शांति होती है।

भागवत, दुर्गापाठ, महाभारत तथा अनेकों आयुर्वेद के ग्रन्थों में ‘ब्रह्म कमल’ पुष्प का वर्णन मिलता है। इसका प्राप्ति स्थान सुमेरु पर्वत के आसपास 14000 से 17000 फीट तक बताया जाता है। ये पुष्प सिर्फ 15 अगस्त से 15 सितंबर तक खिले रहते हैं। इनकी विशाल वाटिका के बीच पहुँचकर मनुष्य आनंदमय हो उठता है। उसे लगभग आधे घंटे की हलकी तंद्रा-सी आ जाती है। ग्रंथों में प्राचीनकाल के ऋषियों का उल्लेख मिलता है, जो इस पुष्पवाटिका के मध्य बैठकर स्वाभाविक रूप से शीघ्र ही समाधिस्थ अवस्था में पहुँच जाते थे। शायद इसी कारण इस पुष्प को ‘ब्रह्मकमल’ के नाम से विभूषित किया गया था। ये आज भी उपलब्ध है।

सुमेरु पर्वत पर 11000 से 17000 फीट तक पाई जाने वाली ‘रुदंती’ नामक बूटी प्राचीनकाल में दिव्य रसायन के रूप में अभिज्ञात थी। इससे उस समय सोना बनाया जाता था। इसके लिए राँगा, ताँबा आदि को गलाकर उसे रुदंती के साथ मिलाकर सोना बनाते थे; परंतु इसकी पूर्ण प्रक्रिया का ज्ञान आज उपलब्ध नहीं है। सामान्य रूप से सेवन करने से भी यह बूटी शरीर को महान शक्ति प्रदान करती है। इसे बुढ़ापे की जीर्णता तथा सब रोगनाशक भी बताया गया है। यह आयुवर्द्धक तथा मरणासन्न व्यक्ति को नवजीवन प्रदान करने वाली है। यह गरम बूटी है, अतः इसका जाड़े के मौसम में ही सेवन करने का सुझाव दिया गया है। आयुर्वेद ग्रंथों में इसे भी संजीवनी के रूप में घोषित किया गया है। अतिविशा, कटू-रोहिणी, मीठा जहर, घाव-पूर्णी आदि बूटियाँ भी इसी श्रेणी में आती हैं, जिनसे अनेकों रोगों का निदान संभव हो सकता है। बलि-अतिबला तो इस स्तर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण बूटी है। रामायण में पूज्य विश्वामित्र द्वारा भगवान राम-लक्ष्मण को दिया गया बलि-अतिबला का शिक्षण इसी बूटी के प्रभावशाली पक्ष की ओर संकेत करता है। इस अलंकारिक नामकरण का तात्पर्य यह है कि ये वनौषधियाँ व्यक्ति में अद्भुत सामर्थ्य को विकसित करती हैं।

हिमालय-क्षेत्र चिर पुरातनकाल से अनेकों प्रकार की एवं विभिन्न गुणों वाली बूटियों व वनौषधियों का केंद्र माना जाता रहा है। शास्त्रों में एक आख्यान इस प्रकार आता है कि समुद्रमंथन के उपरांत प्राप्त अमृतकलश को धन्वंतरि देवलोक की ओर ले जा रहे थे। रास्ते में अमृत की चंद बूँदें छलकती हुई भूमि पर गिरती गईं। जहाँ-जहाँ ये बूँदें गिरीं, वहाँ जड़ी-बूटी एवं दिव्य औषधियाँ प्रकट होती चली गईं। इस प्रकार से लाखों-करोड़ों जड़ी-बूटियों के उद्भव की संभावना व्यक्त की जाती है।

अब आवश्यकता इस बात की है, मनुष्य आधुनिकता की अंधी दौड़ में जीव-वनस्पति जगत एवं पर्यावरण के बीच तारतम्य को नष्ट न करे, अन्यथा उसकी भौतिक प्रगति उसकी जीवन-रक्षा न कर सकेगी, इसलिए पुनः नए सिरे से उपयोगी— जीवनदायी वनस्पतियों का आरोपण तथा विकास-प्रक्रिया आरंभ करे। इससे दुहरा लाभ है। एक तो मनुष्य को शक्ति व सामर्थ्यों से युक्त नया जीवन मिलेगा तथा दूसरा वातावरण में संव्याप्त प्रदूषण की समस्या सुधरेगी। आयुर्वेद का पुनर्जीवन यदि इसी माध्यम से संभव हो सके, तो यह आज के समाज की सबसे बड़ी सेवा होगी।


आत्मिकी की एक सर्वांगपूर्ण शाखा — ज्योतिर्विज्ञान

सृष्टि का गतिचक्र एक सुनियोजित विधि-व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। ब्रह्मांड अवस्थित विभिन्न निहारिकाएँ, ग्रह, नक्षत्र आदि परस्पर सहकार-संतुलन के सहारे निरंतर परिभ्रमण-विचरण करते रहते हैं। जिस ब्रह्मांड में मनुष्य रहता है, उसकी अपनी परिधि एक लाख प्रकाश वर्ष है और ऐसे-ऐसे हजारों अविज्ञात ब्रह्मांड विद्यमान हैं।

आधुनिकतम अंतरिक्ष यानों की अधिकतम गति (17 हजार मील प्रति घंटे की चाल) से भी यदि ब्रह्मांड को पार करने का सोचा जाए, तो भी मनुष्य को इस पुरुषार्थ में करोड़ों वर्ष लग जाएँगे। ऐसी स्थिति में अन्यान्य ग्रहों की स्थिति उनके परस्पर एकदूसरे पर प्रभाव तथा सुदूर स्थित ग्रहों के पर्यावरण एवं जीव-जगत पर प्रभावों की कल्पना वैज्ञानिक दृष्टि से तो कठिन ही नहीं, असंभव जान पड़ती है। यही वह बिंदु है, जहाँ एस्ट्रानॉमी (खगोल भौतिकी) एवं एस्ट्रालॉजी (खगोल शास्त्र) का परस्पर टकराव— मतभेद होता देखा जाता है। विज्ञानसम्मत प्रतिपादन फलित ज्योतिष की संभावनाओं को काटते नजर आते हैं, तो ज्योतिष विज्ञान के ज्ञाता भौतिकी के नियमों को अपनी परिधि में न मानकर ग्रह-गणित आदि के आधार पर फलादेश की घोषणा करते दृष्टिगोचर होते हैं। इनमें कौन सही है? कौन गलत? क्या कोई समन्वयात्मक स्वरूप बन सकना संभव है, जिसमें ग्रह-नक्षत्रों की जानकारी से, उनके प्रभावों से बचना, लाभान्वित हो सकना, अपने क्रिया-कलापों को तदनुसार बदलते रह सकना शक्य हो सके? इसका उत्तर पाने के लिए हमें खगोल भौतिकी की कुछ प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करनी होगी।

अपना भूलोक सौरमंडल के बृहत परिवार का एक सदस्य है। सारे परिजन एक सूत्र में आबद्ध हैं। वे अपनी-अपनी कक्षाओं में घूमते तथा सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य स्वयं अपने परिवार के ग्रह-उपग्रहों के साथ महासूर्य की परिक्रमा करता है। यह क्रम आगे बढ़ते-बढ़ते ब्रह्मांड के नाभिक— महाध्रुव तक जा पहुँचता है। इतना सब कुछ जटिल क्रम होते हुए भी सारे ग्रह-नक्षत्र एकदूसरे के साथ न केवल बँधे हुए हैं, वरन परस्पर अतिमहत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान भी करते हैं। इन सबके संयुक्त प्रयास का ही परिणाम है कि ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति अक्षुण्ण बनी रहती है। यदि ऐसा न होता, तो कहीं भी अव्यवस्था फैल सकने के अवसर उत्पन्न हो जाते। ग्रहों का पारस्परिक सहयोग एवं आदान-प्रदान इतना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि इसे ब्रह्मांडीय प्राणसंचार कहा जा सकता है।

इतनी पृष्ठभूमि को समझने के बाद उस विधा की चर्चा की जा सकती है, जिसे ज्योतिर्विज्ञान कहा गया है। विज्ञान के क्षेत्र में इसे उच्चस्तरीय स्थान प्राप्त है। ऋतु परिवर्तन, वर्षा, तूफान, चक्रवात, हिमपात, भूकंप, महामारी जैसी प्रकृतिगत अनुकूलता-प्रतिकूलताओं की बहुत कुछ जानकारियाँ वैज्ञानिक लोग अंतर्ग्रही स्थिति के आधार पर प्राप्त करते हैं। खगोल भौतिकविदों का ऐसा अनुमान है कि मौसमों की स्थिति पृथ्वी पर अंतरिक्ष से आने वाले ऊर्जा-प्रवाह के संतुलन-असंतुलन पर निर्भर होती है। सामान्यतया पृथ्वी के ध्रुवों पर ही अंतरिक्षीय ऊर्जा का संग्रहण होता है। उत्तरी ध्रुव होकर ही ब्रह्मांडव्यापी अगणित सूक्ष्मशक्तियाँ- सम्पदाएँ पृथ्वी को प्राप्त होती हैं। जो उपयुक्त हैं, उन्हें तो पृथ्वी अवशोषित कर लेती है एवं अनुपयुक्त को दक्षिण ध्रुव द्वार से अनंत आकाश में खदेड़ देती है। जिस प्रकार वर्षा का प्रभाव प्राणी-जगत एवं वनस्पति-समुदाय पर पड़ता है, उसी प्रकार अंतर्ग्रही सूक्ष्मप्रवाहों का जो अनुदान पृथ्वी को मिलता है, उससे उसकी क्षेत्रीय एवं सामयिक स्थिति में भारी उलट-पुलट होती है। यहाँ तक कि इस प्रभाव से प्राणी-जगत भी अछूता नहीं रहता। मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थिति भी इस प्रक्रिया से बहुत कुछ प्रभावित होती है। ज्योतिर्विद्या के जानकार बताते हैं कि वर्तमान की स्थिति और भविष्य की संभावना के संबंध में इस विज्ञान के आधार पर पूर्व जानकारी से समय रहते अनिष्ट से बच निकलने और श्रेष्ठ से अधिक लाभ उठाने की विद्या को यदि विकसित किया जा सके, तो मानव का यह श्रेष्ठतम पुरुषार्थ होगा। ऋषिगणों ने इसके लिए समुचित मार्ग भी सुझाया है। आवश्यकता पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस विज्ञानसम्मत प्रणाली के सभी पक्षों को समझने की है।

प्राचीनकाल में ज्योतिर्विज्ञान ज्ञान की एक सर्वांगपूर्ण शाखा थी, जिसमें खगोल विज्ञान, ग्रह-गणित, परोक्ष विज्ञान जैसे कितने ही विषयों का समावेश था। उस ज्ञान के आधार पर कितनी ही घटनाओं का पूर्वानुमान लगा लिया जाता था। आज भी उस महान विधा से संबंधित ग्रंथ तथा ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं, जिनसे उस काल की— ज्योतिर्विज्ञान की विस्तृत जानकारी मिलती है। ऐसे अगणित ग्रंथों एवं ज्योतिर्विदों का परिचय इतिहास के पन्नों में मिलता है।

आर्ष साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं। अनुमान है कि वेदों की रचना ईसा पूर्व 4000 से 2500 ईसा पूर्व वर्ष के बीच हुई है। अनेकों प्रसंग वेदों में हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि प्राचीन ऋषि-मनीषियों को ज्योतिर्विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान था। उदाहरणार्थ— यजुर्वेद में नक्षत्र-दर्श तथा ऋग्वेद में ग्रह-राशि का वर्णन मिलता है। अथर्ववेद के अनुसार ‘गार्ग्य ऋषि’ ने सर्वप्रथम अंतरिक्ष को विभिन्न राशियों में विभाजित करने का प्रयत्न किया था। इसके अतिरिक्त अट्ठाइस नक्षत्र, सप्तर्षि मंडल, वृहत्लुब्धक, आकाशगंगा आदि की भी पर्याप्त जानकारी वेदों से मिलती है। छः ऋतुओं तथा बारह महीनों का नामकरण सर्वप्रथम भारतीय खगोलशास्त्रियों ने किया था। भौतिकविदों को बहुत समय बाद यह जानकारी मिली कि सूर्य की किरणों में सात वर्ण हैं; पर तैतिरीय संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथ में बहुत समय पूर्व ही सूर्य को सप्त-रश्मि कहा गया है। कुछ विद्वानों का अभिमत है कि भौतिकविदों को सूर्य-रश्मियों की जानकारी का आधार वह प्राचीन ग्रंथ ही है।

वैदिक युग के बाद रामायण और महाभारतकाल आता है, जो लगभग ईसा पूर्व 2500 से लेकर ईसा पूर्व 2000 तक माना जाता है। कहा जाता है कि रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि न केवल तत्त्ववेत्ता थे, वरन महान ज्योतिर्विद् भी थे। उन्होंने रामायण में भी तारों एवं ग्रहों की गति एवं उनकी स्थिति का वर्णन करते हुए उनका मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख किया है। रामायण का खलनायक रावण स्वयं महान ज्योतिर्विद् था। ऐसा कहा जाता है कि उस काल में रावण जैसा प्रकांड पंडित तथा ज्योतिर्विद् कोई दूसरा न था। रावण संहिता उसकी विलक्षण ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी का प्रमाण है, जो ज्योतिष शास्त्र का असाधारण ग्रंथ माना जाता है।

गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र, मनु, याज्ञवल्क्य जैसे ऋषि अपने समय के धुरंधर ज्योतिर्विज्ञानी भी थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में तारों और तारा-रश्मियों का विशद् वर्णन है, जो उस समय की खगोल विद्या एवं ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी देता है। महाभारत में भी ऋतुओं एवं ग्रह-नक्षत्रों का वर्णन है। एक स्थान पर उल्लेख है कि कौरव और पांडवों के बीच युद्ध छिड़ने के पूर्व चंद्रग्रहण लगा था। राहु एवं केतु के प्रभावों का भी वर्णन मिलता है।

ईसा पूर्व के अन्य ज्योतिर्विदों में व्यास, अत्रि, पाराशर, कश्यप, नारद, गर्ग, मारीचि, अग्र, लोमश, पौलत्स्य, च्यवन, यवन, भृगु, शौनक भी उल्लेखनीय हैं। विविध विषयों के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ वे ज्योतिर्विद् भी थे।

ईसा पूर्व 500 से लेकर 500 ई. तक की अवधि में विदेशी आक्रमणकारी अत्यधिक सक्रिय रहे। सिकंदर ने इसी बीच आक्रमण किया था। पुरातत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि आततायियों ने न केवल भारत में लूट-पाट मचाई, वरन यहाँ की सांस्कृतिक धरोहरों विशेषकर ज्योतिर्विज्ञान की महत्त्वपूर्ण पांडुलिपियों तथा वेधशालाओं को भी बुरी तरह नष्ट किया। ऐसा भी अनुमान है कि कितने ही बहुमूल्य अभिलेख वे अपने साथ बाँधकर साथ ले गए, जिनका जर्मन, रोम, फ्रेंच आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ व वहाँ के म्यूजियमों में वे अभी भी उपलब्ध हैं।

ज्योतिर्विज्ञान को पुनर्जीवित करने का कार्य आगे चलकर पाटलिपुत्र में ‘आर्यभट्ट प्रथम’ ने किया। सन् 47 में उनका जन्म हुआ। पाटलिपुत्र की विश्वविख्यात विद्यापीठ में उन्होंने ज्योतिर्विद्या का विशद् अध्ययन किया। उन्होंने आर्यभट्टीयम्, तंत्र तथा दशगीतिका नामक तीन प्रख्यात ग्रंथ लिखे। वे सर्वप्रथम खगोलविद् थे, जिन्होंने यह सिद्धांत खोज किया कि पृथ्वी अपनी धुरी व कक्षा पर दैनिक गति करती है। इसी गति के कारण दिन और रात होते हैं।

आर्यभट्ट के बाद ज्योतिर्विद्या पर सबसे अधिक काम आचार्य ‘वाराहमिहिर’ ने किया। उनका जन्म उज्जैन के ‘काल्पी’ नामक स्थान पर हुआ। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग उज्जैन में ही अध्ययन-अध्यापन में बिताया। उनके शोध का नवनीत ‘बृहद्जातक’, ‘बृहत्संहिता’ जैसे महान ग्रंथों में भरा है। बृहत्संहिता में प्राकृतिक विज्ञान का इतना विस्तृत वर्णन है कि कोई भी क्षेत्र ज्योतिर्विज्ञान का बचा नहीं है। ग्रहण, उल्कापात, भूकंप, दिग्दाह, वृष्टि, प्रकृति, ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, गति का प्रभाव आदि विषयों पर विशद् वर्णन है। कुछ विशेषज्ञों का अभिमत है कि विज्ञान की नई शाखा— ‘एस्ट्रोफिजिक्स’ (खगोल भौतिकी), जिसमें ग्रह-नक्षत्रों के चुंबकीय, विद्युतीय, ऊष्मा आदि प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, उसकी उत्पत्ति वाराहमिहिर के ग्रंथों की प्रेरणा से हुई है। उनकी ‘पंचसिद्धांतिका’ कृति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। उसमें वर्णित सूर्य सिद्धांत अद्वितीय है। विषुव-अयन की क्रिया का वर्णन भी वाराहमिहिर ने ही किया है। उन्होंने अपने विशद् अध्ययन से उसका मान 54 विकल्प (सेकेंड) प्रतिवर्ष प्राप्त किया। जिसका आधुनिक मान खगोलविदों ने 54.2728 सेकेंड खोजा है। दोनों खोजों में कितना साम्य है, यह देखकर अचरज होता है। साथ ही इस बात का भी आश्चर्य होता है कि बिना आधुनिक यंत्रों के उस काम में इतनी सूक्ष्म तथा शुद्ध गणना करना, किस प्रकार संभव हो सका?

न्यूटन ने बहुत समय बाद यह खोज की कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। उसके सैकड़ों वर्ष पूर्व ही महान भारतीय वैज्ञानिक, ज्योतिर्विद् ‘भास्कराचार्य’ ने उपरोक्त तथ्य की खोज कर ली थी। उनकी प्रख्यात कृति ‘सिद्धांत शिरोमणि’ में इस बात का प्रमाण भी मिलता है। उसमें वर्णन है:—

आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत्स्वस्थं गुरुं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या।

आकृष्यते तत्पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे॥16॥

— (सिद्धांत. भुवन.)

अर्थात पृथ्वी में आकर्षणशक्ति है, इससे वह अपने आस-पास की वस्तुओं को आकर्षित कर लेती है। पृथ्वी के निकट आकर्षणशक्ति अधिक होती है। जैसे-जैसे दूरी बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे वह घटती जाती है। यदि किसी स्थान से भारी-हलकी वस्तु छोड़ी जाए, तो दोनों एक ही समय पृथ्वी पर गिरेंगी, ऐसा न होगा कि भारी वस्तु पहले गिरे तथा हलकी बाद में। ग्रह और पृथ्वी आकर्षणशक्ति के प्रभाव से ही परिभ्रमण करते हैं।”

आज विज्ञान के पास अद्भुत जानकारियाँ हैं, बेजोड़ राडार, टेलिस्कोप आदि यंत्र हैं, जिनके सहयोग से ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र में मूल्यवान खोजें की जा सकती हैं। आवश्यकता मात्र इतनी भर है कि जड़ संसार की खोज में उलझा विज्ञान अदृश्य जगत की ओर भी अपने कदम बढ़ाए। प्राचीन ज्योतिर्विज्ञान के अगणित सूत्र-संकेत उसे मार्गदर्शन करने में समर्थ हैं। इस महान विधा का पुनरुद्धार किया जा सके, तो अदृश्य जगत से संपर्क साधने, सहयोग पाने तथा परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। यह एक ऐसी उपलब्धि होगी, जिस पर वैज्ञानिक गर्व कर सकते हैं। मारक आयुधों के निर्माण में संलग्न प्रतिभाओं को अब मनीषी की भूमिका निभाते हुए पुरातनकाल के ऋषिगणों की तरह ही ज्योतिर्विज्ञान की इस फलदायी शोध में निरत होकर अपनी बौद्धिक प्रखरता का— सार्थकता का प्रमाण देना चाहिए।


यज्ञ-प्रक्रिया में गंध की उपादेयता एवं प्रभावक्षमता

यज्ञ में यजन किए जाने वाले पदार्थों का चयन करने में यह भी दृष्टि रखी जाती है कि वे सुगंधित हों। यों तो सुगंधि पदार्थ के प्राकृतिक रूप में भी उससे निकलती ही रहती है; किंतु अग्नि द्वारा सूक्ष्मीकृत करने पर तो यह सुगंधि बहुत अधिक फैल जाती है। सुगंध के रोग-निवारक तथा स्वास्थ्य-संवर्द्धक गुणों की चर्चा अनेक चिकित्सा-पद्धतियों में मिलती हैं।

ईसा से लगभग साढ़े चार हजार वर्ष पूर्व प्राचीन अरब में एक ऐसी चिकित्सा-पद्धति प्रचलित थी, जो पूर्ण रूप से सुगंध द्वारा उपचार करने पर आधारित थी। ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन एण्ड सेल्फ हेल्प’ में ऐसी पद्धतियों का विवरण विस्तारपूर्वक दिया है। तिब्बत तथा चीन की परंपरागत चिकित्सा-पद्धतियों में सुगंध द्वारा चिकित्सा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। आयुर्वेदिक भेषज में तो प्रत्येक द्रव्य के गुणों में रस का वर्णन है। रस का तात्पर्य उस पदार्थ के स्वाद तथा उसकी सुगंध से है।

सामान्यतया हर व्यक्ति अपने प्रतिदिन के जीवन में सुगंधित पदार्थों का अधिक-से-अधिक प्रयोग करना चाहता है। मनुष्य की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि वह अच्छी सुगंध को सूँघकर अपने को प्रसन्न व शांत अनुभव करता है। इसी आधार पर विभिन्न धार्मिक कृत्यों में सुगंधित द्रव्यों को विशेष स्थान दिया गया है। कुछ सुगंधें ऐसी भी हैं, जिन्हें सूँघने पर व्यक्ति कामोत्तेजना अनुभव करता है। इनका प्रयोग विश्व के कितने ही वर्ग-समुदायों में इस प्रयोजन के लिए प्रचलित है। कुछ गंधें ऐसी भी हैं, जो तीव्र व उत्तेजक होती हैं। नौसादर व अमोनिया आदि सुँघाकर किसी भी अचेत व्यक्ति को सचेत करने के उपाय का उल्लेख लगभग हर चिकित्सा-पद्धति में मिलता।

बीसवीं शताब्दी में फ्रांस में सुगंध द्वारा चिकित्सा किए जाने पर आधुनिकतम पद्धति से विस्तृत खोजें हुईं हैं। ‘श्रीमती मार्गरेट मौरी’ ने ‘दि सीक्रेट ऑफ लाइफ एंड यूथ’ नामक पुस्तक प्रकाशित की। उनके मतानुसार सुगंध-चिकित्सा द्वारा बुढ़ापा रोका जा सकता है। ‘श्री राबर्ट बी. टिसरेंड’ ने ‘दि आर्ट ऑफ एरोमा थेरेपी’ नामक पुस्तक इन्हीं दिनों प्रकाशित की है, जिसमें अनेकों रोगों में सुगंध द्वारा चिकित्सा का प्रतिपादन किया है। जिन रोगों में सुगंध-चिकित्सा विशेष लाभकारी सिद्ध हुई है, वे हैं मुँहासे (एक्जे) झुर्रियाँ, सिबोरिया, चमड़ी के अनेक रोग, रक्त अभिसरण की शिथिलता, मोटापा, मांसपेशियों की कमजोरी, रोमेटिज्म, साइन्यूसाइटिस तथा मानसिक उदासी।

इन लेखकों के अनुसार सुगंध चिकित्सा के सफल होने का कारण यह है कि सुगंधित पदार्थों में पौधों की ऊर्जा अपने सर्वश्रेष्ठ में विद्यमान होती है तथा सुगंधित पदार्थ (ऐरोमेटिक एसेन्शियल ऑयल) उनका सारतत्त्व कहे जा सकते हैं और यही कारण है कि वे शरीर का पुनरुद्धार करने में समर्थ हैं। प्रसिद्ध भौतिकीविद् ‘रोमाने’ के अनुसार तो एक सुगंधित अणु ही जीवित हार्मोन कहा जा सकता है।’

रासायनिक दृष्टि से सुगंधित पदार्थ वाष्पशील प्रकृति के होते हैं और इसी कारण वे बहुत सूक्ष्म मात्राओं में अपने आस-पास के वातावरण में विस्तृत होते रहते हैं तथा श्वास द्वारा नाक की श्लेष्मा झिल्ली पर अपना प्रभाव डालते हैं। पौधों में पाए जाने वाले सुगंधित पदार्थ उनके फूलों, तने, पत्तियों आदि में पाए जाते हैं। अधिकतर ये पदार्थ उत्पत तैल (एसेन्शियल ऑयल) तथा ‘रेजिन’ प्रकृति के होते हैं। किसी भी पदार्थ की सुगंध उसमें विद्यमान मुक्त इलेक्ट्रॉनों पर आधारित होती है। मुक्त होने के कारण ये इलेक्ट्रॉन रासायनिक दृष्टि से बहुत सक्रिय होते हैं तथा अपना प्रभाव तुरंत दिखाते हैं।

उत्पत तैल शरीर में श्वासमार्ग के अतिरिक्त त्वचा में भी प्रवेश कर सकते हैं। त्वचा तथा अन्य ऊतकों में ये अपना प्रभाव रासायनिक सक्रियता के कारण दिखाते हैं। त्वचा तथा अन्य ऊतकों पर उत्पत तैलों के सीधे रासायनिक प्रभाव का विशद् वर्णन भी उपलब्ध है। शरीर की सूक्ष्मक्रिया-प्रणाली पर उत्पत तैल व्यापक प्रभाव डालते देखे गए हैं। इनकी बहुत स्वल्प मात्रा भी लाभकारी होती है।

सीधे भेषजीय प्रभाव के अतिरिक्त सुगंधित पदार्थ की गंध तथा मस्तिष्क के माध्यम से होने वाला प्रभाव कहीं अधिक लाभकारी है। इस माध्यम से काम करने पर ये पदार्थ मनुष्य के शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालते हैं तथा भावनाओं को विशेष रूप से उल्लसित करते हैं।

सभी जानते हैं कि दुर्गंध से सिर चकराने लगता है, कुरुचि उत्पन्न होती है और जी मिचलाने लगता है। लोग उससे बचना और हटना चाहते हैं। इसी प्रकार सुगंधित वातावरण वाली पुष्प-वाटिकाओं में— बाग-बगीचों में बैठने-टहलने से सभी को प्रसन्नता होती है। भौंरे, तितलियाँ, कोयल जैसे प्राणी तो गंधविभोर होकर उन्मत्त जैसे बन जाते हैं।

देव-प्रयोजनों में सुगंधित पूजा-उपचार सामग्री की भरमार रहती है। पुष्प, धूप, दीप, चंदन, कुमकुम आदि सभी देवस्थानों में प्रयुक्त होते हैं। स्वागत-समारोहों में इत्र-गुलाबजल आदि का खुलकर उपयोग होता है। मेले-उपहारों में हार-गुलदस्ते से लेकर, इत्र आदि भेंट करने की प्रथा है। पान-सुपाड़ी, लौंग-इलायची, सौंफ आदि मुखवास भी सुगंधप्रधान होते हैं।

इस प्रचलन के पीछे विलासिता भी समझी जा सकती है; किंतु साथ ही उनके पीछे यह रहस्य भी है कि विभिन्न गंधों के विभिन्न प्रभाव शरीर तथा मुख्यतया मस्तिष्क पर पड़ते हैं। इतना ही नहीं, कई प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों के निवारण की दृष्टि से भी उनकी उपयोगिता पाई गई है। औषधियों में जहाँ उनके रासायनिक पदार्थों की प्रभावशक्ति काम करती है, वहाँ जड़ी-बूटियों, वृक्ष-वनस्पतियों के माध्यम से चिकित्सा करने वाले औषधि-निर्धारण के समय उसमें रहने वाले रासायनिक पदार्थों की विशेषता एवं मात्रा का ध्यान नहीं रखते हैं, वरन यह भी देखते हैं कि उस नुस्खे में रोगी के लिए आवश्यक गंध भी उसमें है या नहीं।

यज्ञ-प्रक्रिया से अनेकानेक भौतिक और आध्यात्मिक लाभ हैं। उन्हीं में से एक यह भी है कि संपर्क में आने वालों की शारीरिक-मानसिक आधि-व्याधियों का भी निराकरण हो सके। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही हविष्य निर्धारित किए जाते हैं। यजन सामग्री में रहने वाले पदार्थों का चयन करते समय उनकी सूक्ष्मशक्ति के अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि उस सामग्री में उपयोगी है या नहीं। यह सुगंधित भी यजनकर्त्ताओं के शरीर में प्रवेश करती है और उन्हें अन्य सत्परिणामों की तरह समान आरोग्य प्रदान करती है।


व्यर्थ बटोरी संपदा अनर्थ ही करता है (कहानी)

एक उदारमना व्यक्ति ने अपनी संपदा परमार्थ-प्रयोजनों के लिए दान कर दी और लोकसेवा के कार्यों में निरत रहने लगा।

उसकी सर्वत्र प्रशंसा होने लगी। इस परिवर्तन के लिए भूरि-भूमि सराहना करते और बधाई देने आते। उत्तर में उदार व्यक्ति एक प्रश्न करते— “आपके झोलों में कंकड़-पत्थर भरे हैं और अनायास कोई बहुमूल्य वस्तु मिले, तो उन पत्थरों को फेंककर मूल्यवान वस्तु उसमें भरेंगे या नहीं!” लोग उत्तर में सिर हिला देते।

उदारमना समझाते— “मैंने कोई त्याग नहीं किया, मात्र समझदारी का परिचय दिया है। जो व्यर्थ ही बटोर रखा था, वह बोझ बढ़ाता और अनर्थ सिखाता था। अब इस जंजाल को फेंक देने पर मनःस्थिति परमार्थ करने जैसी बन गई और वे कार्य हो सके, जिसकी प्रशंसा आप सब करते हैं। मुझे तो संतोष पाने, भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिलता है, यही मेरा सौभाग्य है।


परिस्थिति परिवर्तन की संधिबेला

सन् 1981 से 2000 तक के बीस वर्षों को युगसंधि कहा गया है। सहस्राब्दियों के अंतिम बीस वर्ष अतिमहत्त्वपूर्ण परिवर्तनों के होते हैं। इस मान्यता के पीछे अनेक शास्त्रीय उल्लेख एवं आप्तवचनों की साक्षियाँ समाहित हैं।

सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग आदि का समय-निर्धारण कालगणना के निमित्त हुआ है। तिथि, वार, पक्ष, मास, संवत् की तरह ही लंबी अवधि को चार युगों में विभाजित किया गया है। इस गणना की ब्रह्मांड-चक्र में अपने सौरमंडल की स्थिति कहाँ होगी और बदलते वातावरणों का क्या प्रभाव धरती पर पड़ेगा? इस संभावना को आँकने के लिए भारतीय ज्योतिर्विज्ञान के अंतर्गत युग मान्यता का निर्धारण हुआ है। उनकी बदलती परिस्थितियों के साथ कोई सीधा संबंध नहीं है।

सन् के आधार पर चलने वाली कालगणना में ऐसे तथ्यों का समावेश है, जिसमें परिस्थितियाँ बदलने के साथ संगति बैठती है। प्रथम सहस्राब्दी बीत चुकी। उस समय भी भारी परिवर्तन हुए हैं। वैज्ञानिक कुसमुसाहट उसी समय से आरंभ हुआ। बुद्धिवाद ने जोर पकड़ा और औद्योगिक क्रांति की नींव पड़ी। प्रकृति के परत कुरेदने और सुविधा-साधनों की अनेकानेक उपलब्धियों की शृंखला उसी समय से चल पड़ी। छोटे-बड़े युद्धों में आग्नेयास्त्रों का प्रयोग चल पड़ने से उनकी भयंकरता भी इसी अवधि में बढ़ी।

दूसरी शताब्दी के अंत और तीसरी के आरंभकाल के बीस वर्षों के संबंध में समझा जा रहा है कि इस बार और भी अधिक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होंगे और वे मानवी भविष्य का निर्धारण करने में महती भूमिका का संपादन करेंगे।

‘चार्ल्स बर्लिट्स’ की प्रसिद्ध पुस्तक ‘डुम्ज डे 1999’ में इस प्रकार की अनेकों संगतियों का संग्रह है, जिनमें इस सहस्राब्दी का अंत डरावनी विचित्रताओं से भरा हुआ बताया गया है। इसमें रहस्यवादियों की भविष्यवाणियाँ हैं, तो ज्योतिर्विज्ञानियों एवं अन्यान्य विशेषज्ञों के अभिमत भी संकलित हैं।

पुराणों में कल्कि अवतार का और युग बदलने का जो वर्णन है, वह कब होगा? इसका संकेत इसी अवधि के साथ तालमेल बिठाता है।

बौद्ध धर्म में एक मान्यता है कि तथागत के 2500 वर्ष उपरांत फिर अधर्म का अंधकार छाएगा। उसके निवारण के लिए दूसरे ‘बुद्ध’ ‘मैत्रेय’ के रूप में आवेंगे।

तिब्बतियों का विश्वास रहा है कि 13वें दलाईलामा अंतिम अवतार होंगे। इसके बाद संसार का यह स्वरूप न रहेगा। नई सृष्टि जैसा नया परिवर्तन होगा।

प्रथम सहस्राब्दी के अंतिम वर्ष भारी विपत्तियों से भरे और उथल-पुथल वाले रहे हैं। सन् 999 का अंतिम दिन इस दृष्टि से आशंका भरा माना गया था कि सन् 1000 न जाने क्या विपत्ति लाए। उसके प्रथम दिन से लेकर वर्ष के भीतर न जाने क्या दैवी संकट उतर आए?

‘पोप सिल्वेस्टर द्वितीय’ की अध्यक्षता में सेंट पीटर चर्च में एक बहुत बड़ी प्रार्थनासभा नियोजित की गई। जिसमें समीपवर्ती क्षेत्रों के अनेकों गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित हुए। सभी सामूहिक प्रार्थना करते रहे— “भगवान्! तू सर्वशक्तिमान है, तू चाहे तो विपत्ति भगा सकता है और हम सबको बचा सकता है।” ऐसी प्रार्थनासभाएँ उस वर्ष अन्यत्र भी होती रहीं। सभी गिरजाघरों ने अपने-अपने ढंग से इस निमित्त धर्मानुष्ठान संपन्न किए।

वह समय टल गया और उसके एक हजार वर्ष बाद सन् 1999 की बारी है। समझा जाता है कि सन् 2000 भी ऐसी ही उथल-पुथल का होगा। अत्युक्ति और अलंकार की भाषा में इसे प्रलय भी कहा जा सकता है। उस कथन का अभिप्रायः होता है, ऐसा परिवर्तन, जो भूतकाल की तुलना में असाधारण रूप से भिन्न हो। आवश्यक नहीं कि उसमें दैवी प्रकोप बरसे ही और धन-जन की हानि होकर ही रहे। उथल-पुथल का अर्थ होता है— क्रांति। राजनैतिक क्रांतियों के समय होती रहने वाली मार-काट को भी इसका उदाहरण नहीं माना जा सकता। बिजली, भाप और तेल की शक्ति हाथ लगने पर जो औद्योगिक क्रांति हुई, उसकी परिणति और भी अद्भुत हुई है। इस आर्थिक या वैज्ञानिक क्रांति को किसी बड़ी राजक्रांति से कम नहीं, अधिक ही माना जाएगा। सहस्राब्दी के अंत में ऐसे ही किसी महान परिवर्तन की बात सोची जाए, तो अधिक उपयुक्त है। दैवी प्रकोप और विनाशलीला को ही प्रलय कहना ठीक न होगा। यदि समग्र विश्व का विनाश न होना हो, तो क्षेत्रीय विपत्तियाँ तो समय-समय पर आती भी रही हैं और भविष्य में भी आती रहेंगी। मनुष्य उनका अभ्यस्त हो चुका है। उसे विदित है कि घाव कैसे भरे जाते हैं?

बाइबिल की एक भविष्यवाणी के अनुसार 1999 के करीब इजराइल का सारी दुनिया के साथ युद्ध होगा। भारी विनाश होगा और इसके बाद एक नई दुनिया बसेगी। इस संभावना की संगति इस प्रकार बैठती है कि अरब-इजराइल विग्रह का अंत अभी निकट नहीं दीखता। गुत्थी उलझती ही जाती है और रूस-अमेरिका के पृष्ठपोषण से यह संकट विश्वयुद्धस्तर तक पहुँच सकता है।

खगोलवेत्ताओं के अनुसार विश्व पंचांग 25817 वर्ष का होता है। इसके बाद भारी परिवर्तन होते हैं और प्रकृति-प्रवाह तथा लोक-प्रचलन में असाधारण परिवर्तन उत्पन्न होते हैं। इस स्थिति को नई दुनिया बसने का नाम दिया गया है। बेबीलोन ज्योतिषी किसी समय अपनी विद्वता और प्रामाणिकता के लिए विश्वविख्यात थे। उस समय इनके इस प्रतिपादन पर किसी ने उँगली नहीं उठाई थी और वह कथन एक मान्यता के रूप में चलता आ रहा था। अब नवीन अंतरिक्षविज्ञानी भी विश्व कैलेंडर संबंधी उपरोक्त मान्यता का समर्थन करने लगे हैं। तारामंडल के क्रांतिचक्र के साथ इसकी संगति बैठती है। यह 25817 वर्ष की गणना आगामी 17 सितंबर 2001 को पूरी होती है।

चार शतक पूर्व के एक यहूदी भविष्यवक्ता ‘नास्त्रेदमस’ के कथन उनके समय में तथा बाद में भी सही सिद्ध होते रहे हैं। उनके कथनानुसार— “सन् 1999 के जुलाई मास में चीन द्वारा विश्वयुद्ध खड़ा किया जाना चाहिए।”

‘एडगर’ से लेकर ‘जॉन डिक्सन’ तक के मूर्धन्य भविष्यवक्ताओं की कथन-शृंखला में लगभग ऐसे ही संकेत हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि वर्तमान सहस्राब्दी का अंतिम चरण ऐसा हो सकता है, जिसमें अद्भुत प्रकृतिगत उखाड़-पछाड़ हों, आश्चर्यचकित करने वाले घटनाक्रम घटें और लोक-जीवन में ऐसे परिवर्तन हों, जिससे विज्ञान इतिहास में प्रचलित रहे प्रचलनों की तुलना में असाधारण हेर-फेर दृष्टिगोचर होने लगे।

ज्योतिर्विज्ञानियों का मत है कि, “युग परिवर्तन की इस बेला में प्रकृति में ऐसे कितने ही बाह्य चिह्न प्रकट हो सकते हैं, जो सामयिक रूप से अनिष्टकारी भी हो सकते हैं।

इस बीच प्रकट होने वाले अनिष्टकारी प्रकृतितत्त्वों में से इन दिनों धूमकेतु की चर्चा जोरों पर है।

भौतिकीविज्ञानी ‘जे. एच. उर्टसे’ ने धूमकेतुओं की उत्पत्ति के बारे में परिकल्पना की है। उनका कहना है कि मंगल और बृहस्पति के बीच उल्का पट्टे के रूप में धूमकेतु बादल पैदा होते हैं, जो प्लूटो की परिभ्रमण कक्षा के पीछे स्थित होते हैं। ग्रह बनने से वंचित रहने वाले तथा निहारिका वलय से अवशोषित पदार्थ के पिंडरूप में एकत्रीकृत ऊर्जापुंज को वह क्षेत्र निरूपित करता रहता है। सूर्य से दूर रहने के कारण उसकी गैस जमा रहती है; पर नजदीक आते ही वाष्पीभूत होने लगती है तथा विशालकाय पूँछ के रूप में बदल जाती है। धूमकेतुओं के विस्तृत अध्ययन से 5 अरब वर्ष पूर्व अंतर-आकाशीय गैस व धूलकणों से सौरमंडल के जटिल निर्माण प्रक्रिया की जानकारी प्राप्त करने की संभावना भी कुछ वैज्ञानिक व्यक्त कर रहे हैं।

धूमकेतु की प्रतिक्रियाओं के संबंध में तरह-तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं। प्रायः उसे अपशकुन सूचक माना जाता है। सन् 1980 में ‘हैली’ का प्रसिद्ध धूमकेतु आकाश में उभरा। उसी वर्ष संसार में व्यापक स्तर पर ‘इन्फ्लुएंजा’ रोग फैला। ज्योतिर्विज्ञानियों ने विश्व भर में इस वर्ष आई भयंकर बाढ़ का कारण धूमकेतु को ही बताया।

वर्ष 1980 में खगोलविदों तथा जीवविज्ञानियों ने संयुक्त रूप से कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। उनका कहना है कि धूमकेतु पृथ्वी पर अदृश्य हानिकारक रसायनों की वर्षा करते हैं एवं हवा के माध्यम से कुछ गंभीर रोगों को फैलाने की भूमिका भी निभाते हैं। वे कितने ही नए प्रकार के रोगाणुओं को भी जन्म देते हैं।

इन दिनों प्रकट होने वाले ‘हैली’ धूमकेतु के बारे में खगोलविदों का कहना है कि नवंबर 85 में वह पृथ्वी के निकट आएगा; किंतु इतना नहीं कि नंगी आँखों से देखा जा सके। दिस. 85 के उत्तरार्ध में शक्तिशाली दूरबीनों के माध्यम से सूर्यास्त के बाद इसे देखा जाना संभव हो सकेगा। जनवरी 1986 के तीसरे सप्ताह तक सूर्यास्त के बाद पश्चिमी क्षितिज में यह अत्यंत मद्धिम प्रकाश के साथ प्रकट होगा। फिर धीरे-धीरे वह सूर्य से दूर उत्तर की ओर खिसकना आरंभ करेगा। फरवरी के अंत तक वह पूरब के आकाश में प्रातःकालीन सूर्योदय के ठीक पूर्व दिखाई देने लगेगा। इसके बाद नित्य वह निश्चित समय से कुछ पूर्व उगना आरंभ करेगा और इसी क्रम में धीरे-धीरे दक्षिण की ओर प्रयाण करता जाएगा। 7 मार्च को चंद्रमा के सीध में होगा तथा 11 अप्रैल को यह पृथ्वी के सबसे निकट चमकता हुआ दीखेगा। इसके बाद दक्षिण क्षितिज में शनैः-शनैः झुकते हुए वह अस्त हो जाएगा तथा पुनः उत्तरी क्षितिज में शाम को उदित होना आरंभ करेगा; पर धीरे-धीरे मद्धिम होता चला जाएगा। मई के अंत तक वह पूर्णतः अदृश्य हो जाएगा।

इसी शताब्दी में 30 जून 1908 को पृथ्वी के हैली के पथ से गुजरने पर एक विचित्र घटना घटी थी। हैली द्वारा बिखेरा गया एक बृहद् मलबे का पिंड पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षणीय खिंचाव में आ गया था, जो रूस के मध्य ‘साइबेरिया’ प्रांत के निकट गिरा। उसके दुष्प्रभाव से ‘टूंगुस्का’ नदी के निकट का 2000 किलोमीटर क्षेत्रफल का सफाया हो गया। 800 किलोमीटर दूर से ही वह प्रकोप देखा तथा विकराल ध्वनि सुनी गई।

धूमकेतुओं के प्रकट होने के साथ-साथ कितनी ही ऐतिहासिक घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। सन् 66 ए. डी. में जब धूमकेतु प्रकट हुआ था, तो ‘जेरूसलम’ पर प्रकृति प्रकोपों के पहाड़ टूट पड़े। 1066 में ‘हैस्टिंग के युद्ध’ में भयंकर नरसंहार हुआ। तब भी धूमकेतु प्रकट हुआ था।

इन सब विभीषिकाओं के प्रकट होने की संभावना से यह नहीं सोचना चाहिए कि मानव जाति का अंत निकट आ गया। वस्तुतः, प्रसवकाल में कष्ट भी होता है और दौड़-धूप करके नए किस्म की नई व्यवस्था भी बनानी पड़ती है। इसके उपरांत ही शिशु जन्म का हर्षोल्लास बिखरने लगता है। युगसंधि के इन बीस वर्षों को ऐसा ही माना जा सकता है, इसमें जंग खाए कबाड़ को गलाने और उस पिघले हुए लोहे से नए उपयोगी उपकरण ढलने की आशा की जाती है।


सुविधा नहीं, सुधारने की शिक्षा (कहानी)

ईसा एक गाँव से होकर जा रहे थे। उनने एक आदमी को वेश्या के पीछे भागते हुए देखा, तो रुक गए और उसे अनुचित कार्य न करने की बात समझाने लगे। गौर से चेहरा देखा, तो वह पूर्वपरिचित-सा लगा। स्मरण करने पर पुरानी एक घटना याद आ गई। उनने फिर कहा— “अरे! तू तो वह व्यक्ति है, जिसने दो वर्ष पूर्व अंधेपन से छुटकारा पाने की याचना की थी और मेरी प्रभु से प्रार्थना के आधार पर तुझे ज्योति मिली थी।” उस व्यक्ति ने ईसा को पहचान लिया और बोला— “आप जो कहते हैं, सो ही यथार्थ है। मैंने दृष्टि आपकी कृपा से ही पाई।”

ईसा ने झिड़कते हुए कहा— "क्यों! मैंने तुझे दृष्टि इसीलिए दिलाई थी कि उसका उपयोग ऐसे घिनौने काम के लिए हो?" व्यक्ति कुछ देर चुप बैठा और अपनी भूल पर आँसू बहाता रहा। फिर आगे पैर बढ़ाते हुए महाप्रभु के चरण चूमकर उसने दबी जवान से इतना और कहा— “आपने नेत्रदृष्टि दिलाने की अपेक्षा यदि विवेकदृष्टि पहले दिलाई होती, तो कितना अच्छा होता प्रभु! स्थूल नेत्रों की तुलना में वह विवेक मुझे पतन से तो बचा ही लेता।” ईसा ने आज नया पाठ पढ़ा, वे लोगों को सुविधा न देकर सुधारने की बात को प्राथमिकता देने लगे।


अपनों से अपनी बात: गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना का प्रयोजन, जिज्ञासाएँ एवं उनका समाधान

गुरुदेव की कार्यपद्धति में सूक्ष्मीकरण का नया अध्याय जुड़ जाने से कितने ही पाठकों, परिजनों को असमंजस हुआ है। वे उसमें खिन्नता व्यक्त करते हैं। निजी संपर्क सधते रहने पर परामर्श, वार्त्तालाप, विचार-विनिमय का क्रम चलता रहता था। उससे समस्याएँ भी सुलझती थीं और घनिष्ठता की भाव-संवेदना भी उल्लास अनुभव करती थी। इससे सहज ही उत्साह और बल मिलता था। कइयों को परिस्थितियों की जटिलता जब किंकर्त्तव्यविमूढ़ कर देती थी, तो वे दौड़कर शान्तिकुञ्ज पहुँचते थे और लौटने की घड़ी में ऐसा अनुभव करते थे कि उनका आधा बोझ हलका हो गया। आग की भट्टी के पास बैठकर गरम होने की, बरफ के गोदाम में ठंडक अनुभव करने की अनुभूति हर किसी को गुरुदेव के सान्निध्य में भी होती रही है। जो आया है, बैटरी चार्ज कराकर ले गया है। रोते को हँसा देना उनका प्रमुख गुण रहा है। बिना कुछ दिए दरवाजे पर से वापस न लौटने देने का व्रत वे आजीवन निबाहते रहे हैं। यह सुयोग हाथ से छिन जाने की बात सोचकर आत्मीयजनों का व्यथित होना स्वाभाविक है। वे निर्णय को— दुर्भाग्य को कोसते हैं और उसके प्रति अप्रसन्नता व्यक्त करते हैं, तो इसे अनुचित भी तो नहीं कहा जा सकता।

उपलब्ध पत्रों में, मिलन– विचार-विनिमय में, जिनने गुरुदेव के नए निर्णय पर जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है, उनमें उपर्युक्त दो कारण प्रमुख हैं— व्यक्तिगत संपर्क करने की व्यथा और समाज को क्षति पहुँचने की आशंका। यह दोनों ही तथ्य ऐसे हैं, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता है। जिनके साथ वैयक्तिक या बौद्धिक निकटता रही है, उनका इन दोनों ही आधारों पर खिन्न होना मोटे रूप में उचित ही कहा जा सकता है। मोटे रूप में शब्द इसलिए प्रयोग किया गया, क्योंकि यह सतही चिंतन है।

गोताखोर गहरे समुद्र में डुबकी लगाता है, तो प्रतीत होता है कि उसने आत्महत्या कर ली; पर जानकार जानते हैं कि यह उसका दुस्साहस भरा पराक्रम है और उसके फलस्वरूप बहुमूल्य मणि-मुक्तकों से भरी झोली वापसी में साथ आनी है। लट्टू जब तेजी से घूमता है, तब आँखों को ऐसा भ्रम होता है, मानो वह स्तब्ध खड़ा है। जब उसकी चाल धीमी पड़ती है, तब लड़खड़ाकर गिरते समय प्रतीत होता है कि वह खड़ा नहीं था, तेजी से घूम रहा था। सिंह जब लंबी छलाँग लगाता है, तो तैयारी के क्षण कुछ पीछे हटता है, अँगड़ाई लेता है और शिकार पर टूट पड़ता है। स्थिरता में सन्निहित सशक्तता इसी को कहते हैं। महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा महत्त्वपूर्ण काम किए जाने पर प्रायः उन्हें दूरदर्शी योजना बनाने और सांगोपांग तैयारी करने के लिए प्रायः एकांतवास और एकाग्र चिंतन की आवश्यकता पड़ती है। इस स्थिति का गंभीरतापूर्वक पर्यवेक्षण करने वाले उसे न तो विरक्ति कहते हैं और न अशक्ति, वरन उसे तूफानों के आगे-आगे चलने वाला सन्नाटा कहते हैं।

व्यास जी को महाभारत आदि अठारह पुराण रचने थे। वे उत्तराखंड के बहुत ऊँचे स्थान पर ‘वसुधारा’ के निकट उस प्रयोजन के लिए एक एकांत गुफा तलाश करके जम गए। व्यास जी को बोलना था, इसलिए गणपति ने भी मौन धारण कर लिया और उसी गति से लिखते चले गए जिस गति से कि बोला जा रहा था। यदि वे मुखर रहते, वार्त्तालाप में शक्ति गँवाते, तो शायद महर्षि व्यास के कथन को उसी गति से लिखते चलने में सफल न हो पाते।

बिखराव में बहुमूल्य शक्ति निरर्थक खरच होती है। उसे रोककर यदि केंद्रीभूत किया जा सके, तो इतने भर से असीम सामर्थ्य संग्रहित होती है। सूर्य-किरणों को आतिशी शीशे पर, भाप को एक दिशा में, बारूद को एक नली में केंद्रित करने पर यह पता चलता है कि बिखराव और केंद्रीकरण में क्या अंतर है। बकवास छोड़कर मौन अपनाने— कोलाहल भरी उचक-मचक छोड़कर अंतर्मुखी–  एकांतवासी होने में विचारों की भगदड़ को समाधि— एकाग्रता में निरोध करने पर चमत्कारी परिणतियाँ होती हैं। ब्रह्मचर्य के चमत्कार, कामुक बिखराव का निग्रह करने पर ही अवलंबित हैं। मन का निरोध, गतिविधियों का सीमाबंधन दीखता तो मूढ़ों और आलसियों जैसा है, पर वस्तुतः वह इतना बड़ा पराक्रम है कि उसे साँसें रोकने से कम कठिन नहीं कहा जा सकता। गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण जीवनचर्या वस्तुतः ऐसी असाधारण सामर्थ्य का उत्पादन-संचय है, जिससे समय की महती समस्याओं पर गोलाबारी की जा सके।

अध्यात्म सामर्थ्यों का उद्गम तपश्चर्या है। यह कार्य चौराहों पर जनसंकुल-क्षेत्र में नहीं हो सकता। अंतर्मुखी होने के लिए, एकाग्रता— एकनिष्ठा अर्जित करने के लिए एकांत की आवश्यकता पड़ती है। इतना ही नहीं, भगदड़ और उचक-मचक से भी निवृत्ति लेनी होती है। च्यवन ऋषि के शरीर पर दीमक ने घर और बालों में चिड़ियों ने घोंसले बना लिए थे। इसी कारण राजकुमारी उन्हें देख न सकी और कौतूहल में नेत्र फोड़ने का खिलवाड़ कर बैठी। गुफासेवन, समाधि-साधना आदि में ऐसी ही स्थिरता अपेक्षित होती है। ऐसी उग्र साधनाओं के उपरांत जब तपस्वी उठते हैं, तो वे क्षीण— असमर्थ नहीं होते, वरन पहले की अपेक्षाकृत अधिक समर्थता संचित कर चुके होते हैं।

गंगावतरण जैसे महान प्रयोजन पूरा करने के लिए राजकुमार भागीरथ को राजमहल छोड़कर हिमालय के उच्च शिखर पर जाना पड़ा था। इससे कम में वे गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारने के लिए सहमत न कर सके होते और न शिव जी ने ही उस प्रवाह को सिर पर लेकर सफलता में भरपूर सहयोग देने का कष्ट उठाया होता। इंद्र को पदच्युत करके महादैत्य ‘वृत्रासुर’ ने उसका सारा वैभव हथिया लिया था। उस दानव के विनाश का एक ही उपाय था, तपस्वी की हड्डियों से बना हुआ— ‘वज्र‘। इसके लिए दधीचि ने वह उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाया और घोर तपस्या के उपरांत उस कार्य के लिए अस्थियाँ विसर्जित कर दीं। यह समूचा अनुष्ठान एकांत में संपन्न हुआ था, किसी कौतूहल भरे नगर समारोह में नहीं। दधीचि के जिस अनुदान ने विजेताओं को पराजित और पराजितों को विजेता बना दिया, उसे कोई प्रत्यक्षदर्शी— पूर्वापरि संगतियों से अपरिचित होने की स्थिति में आत्महत्या भी कह सकता है और किसी सिरफिरे की सनक भी; पर जिन्हें उद्देश्य और परिणाम का ज्ञान है, उनके लिए उसे उच्चस्तरीय परमार्थ-पराक्रम कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।

आरंभिक दिनों में गुरुदेव ने चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों द्वारा जो शक्तिसंग्रह किया था, उसी के बलबूते अब तक का उनका आश्चर्यचकित कर देने वाला कर्त्तव्य कार्यान्वित होता रहा है। अब वह भंडार चुकता जा रहा है, जबकि आवश्यकता अपेक्षाकृत कहीं अधिक खरच पड़ने की सामने है। ऐसी दशा में अधिक मात्रा में अधिक उच्चस्तरीय उपार्जन का प्रबंध करना पड़ेगा। कम समय में अधिक उपार्जन के लिए हर किसी को दुस्साहस करने पड़े हैं। गुरुदेव का प्रस्तुत निर्धारण इसी स्तर का समझा जा सकता है। मनीषी-वैज्ञानिकों का जीवन-क्रम भी ऐसा ही रहा है।

अपने युग के मूर्धन्य वैज्ञानिक ‘आइन्स्टीन’ ने परमाणु संरचना और उससे प्रस्फुटित होने वाली ऊर्जा पर अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अनुसंधान किए हैं। इस प्रयोजन के लिए उन्होंने लंबे समय तक अनवरत चिंतन जारी रखा। इस अवधि में उनकी दिनचर्या एकांतपरक रही। उनका निवास, अध्ययन और पर्यवेक्षण जिस विशाल कक्ष में था, उसमें उनके बिना बुलाए किसी का भी प्रवेश न हो सकता था। भेंट के लिए भी किसी का आग्रह करने की अनुमति नहीं थी। ऐसे इच्छुकों के विजिटिंग कार्ड एक विशेष स्थान में जमा कर दिए जाते थे। जब वे चाहते, तभी उसे जाकर देखते। यदि उनके लिए ऐसा विशेष प्रबंध न हुआ होता— यारबासी की— गपबाजी करने वाली भीड़ डेरा डाले पड़ी रहती, तो उस दरबार की चुहलबाजी भर होती रहती। काम की उपलब्धि जीवन बीत जाने पर भी कदाचित ही कुछ हो पाती।

पुरातनकाल के ऋषियों की भी कार्यपद्धति यही थी। वे सभी चेतना विज्ञान और पदार्थ विज्ञान के सूक्ष्मदर्शी अनुसंधानकर्त्ता रहे हैं। इस प्रयोग-परीक्षण के लिए उन्हें अनुकूल मनःस्थिति और परिस्थिति अपेक्षित थी। निश्चय ही वह कोलाहल से घिरे रहने पर संभव नहीं था। अस्तु प्रकृति-समीपता वाले एकांत वन-पर्वतों में उन्हें अपना कार्यक्षेत्र बनाना पड़ा। इसी सुविधा के कारण उन्हें वे विभूतियाँ हस्तगत हुईं, जिन्हें ऋद्धि-सिद्धि के नाम से जाना जाता है। कहने को तो कोई उन एकांतवासी ऋषियों को भी भगोड़ा, आलसी, अकर्मण्य, अर्धजड़ आदि नाम दे सकता है। प्रत्यक्षतः वे वैसा कुछ उपार्जन करते दीखते नहीं थे, जिन्हें देखा, परखा और सराहा जा सके। सूक्ष्मदर्शी ही यह अनुमान लगा पाते थे कि सुविधा-साधनों के अभाव और निस्तब्ध एकाकीपन की नीरसता में भी वे किस कारण प्रसन्न मनःस्थिति में गुजारा करते थे एवं समूची मानवता को वे अनुदान दे सके थे, जिनके लिए कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए शब्द भी नहीं मिलते।

देखने में मनुष्य का एक ही शरीर प्रत्यक्ष है; पर जानकारों को पता है कि उस काय-कलेवर में स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का समावेश है। उसमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय कोशों की ऐसी परतें हैं, जैसी प्याज के छिलकों अथवा केले के तनों में होती है। इन परतों में एक के बाद दूसरी अपेक्षाकृत अधिक सामर्थ्यवान है। आमतौर से वे प्रसुप्त रहती हैं, पर यदि उन्हें साधना द्वारा जगाया जा सके, तो एक ही व्यक्तित्व उतने समर्थ व्यक्तियों की भूमिका एक ही समय में संपन्न करता रह सकता है, जितनी कि उसकी परतें जागृत हो सकी होती हैं। इन पाँच कोशों को पाँच देवता कहा गया है। विक्रमादित्य के पास पाँच अदृश्य वीर थे। कंसमर्दन के समय, रासलीला के समय कृष्ण के अनेक स्तर के, अनेकों शरीर देखे गए। यह वस्तुतः अवतार-प्रक्रिया की लीला होती है। अनेकों ऋषि एक ही समय में कई स्थानों पर कई प्रकार के कार्य एक साथ करते रहने में समर्थ रहे हैं। यह अंतःजागरण अपनी ही सत्ता को अनेकों गुनी कर लेने और उससे कतिपय प्रयोजन एक साथ साधने के समान फलप्रद होता है। छायापुरुष-साधना में— भैरवसिद्धि में वस्तुतः आत्मसत्ता को ही गुणित किया जाता है। ‘सुकरात’ का अदृश्य सहयोगी ‘डेमन’ इसी प्रकार उत्पन्न किया हुआ था।

गुरुदेव की अनेक स्तर की अनेकों प्रवृत्तियाँ एक साथ चली हैं। वे पाँच शरीरों से कार्य करते दिखाई पड़ते हैं। ये सभी प्रयोजन ऐसे सधे हैं— सफल हुए हैं, मानों किसी साधनसंपन्न या निष्णात पारंगत का प्रयत्न हो। वस्तुतः, यह उनकी अदृश्य प्रतिभाओं का दृश्यमान फलितार्थ भर रहा है। यह उपलब्धि उनने आत्मसाधना द्वारा उत्पन्न की है। अब वे इस भांडागार का नए सिरे से समुद्रमंथन करने चले हैं। इस दुस्साहस के पीछे किसी को भी पलायन की गंध भी नहीं सूँघनी चाहिए।

गुरुदेव को जिन्होंने निकट से देखा है, वे उन्हें लौहपुरुष कहते हैं, साथ ही उनके कर्तृत्व की ऊर्जा को इंद्रवज्र के समतुल्य मानते हैं। उनका एक दिन भी आलस्य, प्रमाद में नहीं बीता। हर साँस लोक-मंगल के लिए चली और धड़कन मानवी गरिमा को नवजीवन प्रदान करने के लिए धड़की है। श्रम, समय, मनोयोग का एक कण भी कभी उनने बरबाद नहीं किया है। उपलब्ध अवसर का उन्होंने पूरी तरह सदुपयोग किया है। जो उनके संपर्क-सान्निध्य में रहा है, वे उनकी प्रज्ञा, प्रखरता, प्रतिभा को ही नहीं, जागरुकता और कर्मठता देखकर भी आश्चर्यचकित रहते हैं। यदि ऐसा न हुआ होता, तो जीवन के इन 75 वर्षों में वे इतना न कर पाते, जितना औसत मानव द्वारा 750 वर्षों से कम में नहीं किया जा सकता। ऐसी प्रकृति में ढला व्यक्ति इस युग परिवर्तन की विषम बेला में पलायनवादी बनेगा और उन तथाकथित बैरागियों की माँद में जा घुसेगा, जिन्हें उन्होंने जीवन भर गालियाँ दी हैं। इस शीर्षासन पर कोई किसी भी प्रकार विश्वास नहीं कर सकता। निश्चित ही इस नए निर्धारण के पीछे कोई इतना बड़ा प्रयोजन होना चाहिए, जो अभ्यस्त जीवनचर्या में सध नहीं पा रहा होगा।

बुढ़ापे से थककर वे अशक्तिजन्य आराम की बात सोचते होंगे, यह कल्पना भी व्यर्थ है। अभी-अभी वे एक दुर्दांत दस्यु की रिवाल्वर बेकार कर देने, छुरे की धार मोड़ देने और आक्रमणकारी को हाथों-हाथ मजा चखा देने का पराक्रम प्रकट कर चुके हैं। आयु अपना काम करती है, सो करे। उनकी समर्थता और सशक्तता में राई-रत्ती भी अंतर नहीं आया है। ऐसी दशा में अन्य बूढ़ों की तरह रिटायर होने और आराम से दिन काटने की बात सोचना या अनुमान किसी को भी नहीं लगाना चाहिए।

यह सोचना एक सीमा तक ही सही है कि शरीर या साधनों से ही दूसरों की सेवा-सहायता की जा सकती है। यह दोनों प्रत्यक्ष हैं। इसके लिए इनके द्वारा जो बन पड़ता है, उसकी जानकारी प्राप्त होने से ख्याति मिलने में कठिनाई नहीं होती। इतने पर भी अदृश्य क्षमताओं का अपना कार्यक्षेत्र है और इस आधार पर जो सेवा-सहायता बन पड़ती है, उसका महत्त्व किसी भी प्रकार कम नहीं आँका जा सकता। ज्ञानदान को ही लें, तो उसकी परिणति असाधारण है। ‘कार्लमार्क्स’ ने कितनों की मनःस्थिति में— कितनों की परिस्थिति में जमीन-आसमान जैसा अंतर उत्पन्न कर दिया। संसार के प्रवाह-प्रचलन में कितनी उथल-पुथल उत्पन्न कर दी। वैसे प्रत्यक्षतः कार्लमार्क्स ने न कोई अस्पताल खोले, न सदावर्त चलाए। इतने पर भी उनने जो किया, उसका मूल्य लाखों-करोड़ों मन सोना-चाँदी दान करने की तुलना में अधिक बैठता है। बुद्ध-गांधी आदि द्वारा प्रस्तुत की गई विचारधारा ने लोक-प्रवाह में कितनी उथल-पुथल उत्पन्न की, यह किसी से छिपी नहीं है। ज्ञान अप्रत्यक्ष है, तो भी उसकी महिमा कुबेरभंडार से अधिक है। आत्मबल की प्राण-ऊर्जा की गरिमा, महिमा इससे भी अधिक है। वह किसी के पास हो और किन्हीं को दी जा सके, तो बदले में कितने ही चंद्रगुप्त, शिवाजी, विवेकानंद, दयानंद, विनोबा आदि उत्पन्न किए जा सकते हैं। सद्ज्ञान और आत्मबल को बाँटने योग्य संपदा अर्जित करने के लिए कॉलेज का नहीं, साधना का आश्रय लेना पड़ता है।

गुरुदेव अब तक जो वितरित करते रहे हैं, वह प्रत्यक्ष स्तर का होने से सर्वसाधारण को विदित भी है; पर अगले दिनों वे जो अर्जित एवं वितरित करेंगे, वह सूक्ष्म स्तर का होने से नापा-तौला, देखा-दिखाया तो नहीं जा सकेगा, पर होगा इतना महत्त्वपूर्ण कि व्यक्तित्वों को जमीन से आसमान तक उछाल सके। वातावरण में ऐसी तूफानी उथल-पुथल उत्पन्न कर सकेगा, जिसके सहारे उलटे को उलटकर सीधा किया जा सकना संभव हो सके।

अदृश्य वातावरण में उपयोगी प्रवाह उत्पन्न करने के लिए पिछले दिनों योगीराज अरविंद और महर्षि रमण ने बड़ी असाधारण भूमिका निबाही। उनके कार्यकाल में भारत ने इतने अधिक महामानव उत्पन्न किए, जिनकी तुलना इतिहास के किसी भी काल में नहीं देखी गई। स्वराज्य मिलने का प्रत्यक्ष श्रेय यों नेताओं और स्वाधीनता सैनिकों को जाता है, फिर भी सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि इस संदर्भ में घटित हुआ घटनाक्रम असाधारण एवं आश्चर्यजनक था। मात्र प्रयासों का प्रतिफल ही वह नहीं था, वरन अदृश्य जगत में भी कठपुतलियों को हिलाने और नाट्य को आकर्षक बनाने में वे बहुत कुछ करते रहे। उपरोक्त तपस्वियों ने माहौल इतना गरम किया कि ग्रीष्म ऋतु में उठने वाले चक्रवातों की तरह चकित करने वाली उथल-पुथल का दृश्य दीखने लगा।

सर्वविदित है कि सर्वत्र समस्याओं और विभीषिकाओं की भयंकरता निरंतर बढ़ रही है। दुर्बुद्धिजन्य दुर्गति विनाश के घटाटोप खड़े कर रही है। व्यक्ति खोखला हो चला है और समाज का स्वरूप ढकोसला भर बच रहा है। जनसंख्या-विस्फोट, भूगर्भ के खनिजों का समापन, वायु प्रदूषण, विकिरण, अणुयुद्ध जैसे संकट दिन-दिन घनीभूत होते जा रहे हैं। प्रकृति-प्रकोपों की शृंखला आशंकामात्र न रहकर संभावना और यथार्थता बनती जा रही है। दुष्प्रवृत्तियों की वृद्धि के कारण मानवी गरिमा और संस्कृति के प्राण सिसकने लगे हैं। परिस्थितियाँ बेकाबू होती जा रही हैं। ऐसा लगता है कि माचिस की एक तीली जलाकर बच्चा भी छप्पर से लेकर समूचे गाँव को अग्निकांड की लपेट में ला सकता है। ऐसे भयावह अग्निकांड पर नियंत्रित करने के लिए शक्तिशाली दमकलें चाहिए।

जलते-उबलते समय ने ऐसे ही दमकलों की माँग की है। वे कहाँ से आएँ? गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण प्रयास के साथ आरंभ होने वाले अभिनव साधना-संदोह को इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया प्रचंड प्रयत्न समझा जा सकता है। ऐसे महान उत्तरदायित्वों का सफल निर्वाह हर कोई नहीं कर सकता। किला तोड़ने के लिए डायनामाइट वाली तोप चाहिए। डूबने वाले जहाज को किनारे तक घसीट लाने के लिए शक्तिशाली क्रेन चाहिए। ग्रीष्म से जलते धरातल को शीतल और हरा-भरा बनाने के लिए सावन के बादल को मूसलाधार बरसना चाहिए। गुरुदेव के भावी कार्यक्रम में इसी स्तर की संभावना मुखरित होती हुई देखी जा सकती है।

व्यक्तिगत सेवा-सहायता के लिए आवश्यक नहीं कि भेंट-मिलन आवश्यक हो और गपबाजी सिरफोड़ी में समय गँवाया जाए। महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान इशारों से भी हो सकते हैं। तार, मनीआर्डर, बैंक ड्राफ्ट और टेलेक्स संदेश के द्वारा सहायता कार्य बिना बकवास का आडंबर बनाए भी कुछ ही क्षणों में हो जाता है। दूरवर्ती लोग ऐसे ही आदान-प्रदान करते रहते हैं। मर्द परदेश में नौकरी करता है और स्त्री-बच्चे सुदूर गाँव-बस्ती में रहते हैं। वह दूर रहते हुए भी परिवार का पूरा-पूरा ध्यान रखता है। उनके प्रति स्नेह भी यथावत बनाए रहता है। निर्वाह के लिए पैसा भी भेजता है। आत्मीयता का सूत्र सघन हो, तो शरीरों की दूरी कोई दूरी नहीं मानी जाती। सिर में रहने वाले जुएँ, खाट के खटमल, घर में मक्खी-मच्छर निकट तक रहते हुए भी किसी की क्या भलाई करते हैं?

हम सभी स्मरण रखें, कि गुरुदेव की भावी जीवनचर्या सूक्ष्मीकरण सिद्धांत पर अवलंबित होने से उनके द्वारा लोकहित में किसी प्रकार की कमी न होगी, वरन वे अपेक्षाकृत अधिक व्यापक-क्षेत्र में अपने पराक्रम-अनुदान का बड़ी मात्रा में उपयोग कर सकेंगे। युगसंधि की इस विषम बेला में, जबकि सब ओर अंधकार-ही-अंधकार छाया हुआ है, इस समय यदि वे अपने आपको प्रत्यक्ष लाल मशाल की तरह जलाकर चारों— दसों दिशाओं में प्रकाश उत्पन्न करने चल पड़े हैं, तो उससे साधारणतया सभी संस्कृति प्रेमियों और विशेषतया प्रज्ञापरिजनों को गर्व-गौरव का ही अनुभव करना चाहिए। इसमें मन छोटा करने जैसी कोई बात है नहीं।

अदूरदर्शी मोहग्रस्त अपने बच्चों को आँखों से ओझल नहीं होने देते और दूरवर्ती विद्यालयों में भेजने की अपेक्षा अनपढ़ बनाए रखने में ही दुलार समझते हैं, जबकि दूरदर्शी शिक्षा, व्यवसाय, लोक-मंगल आदि प्रयोजनों के लिए स्वयं भी दुर्गम स्थानों तक जाते और अपने परिजनों को भी वैसा ही परामर्श देते हैं। गुरुदेव के सान्निध्य, सहकार, अनुग्रह का मुझे किसी से कम सुयोग नहीं मिला है। अब तक सघन आत्मीयता का होना भी स्वाभाविक है। इतने पर भी मैंने उन्हें हिमालय जैसे पर्वत पर निकलने, जेल जाने, कठोर साधना करने जैसे कार्यों से रोका नहीं, जो प्रत्यक्षतः वियोग या उदासी की स्थिति उत्पन्न करते थे। सच्चे आत्मीयजनों के लिए भी यही बुद्धिमत्ता है कि वे मन छोटा न करें और उस दुस्साहस को सराहें, जिसके कारण ऋषिपरंपरा के पुनर्जीवित जैसा प्रमाण सामने आ रहा है।

जिन्हें अपने व्यामोह, कौतूहल या सुविधा-सहयोग में कमी पड़ने की आशंका से गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण का दुःख हो रहा हो, उनसे इन पंक्तियों में कुछ नहीं कहना। लोभ और मोह में क्षति पहुँचाने का सृष्टिक्रम चलता ही है और लोग उस कारण शोक मनाते, उदास होते देखे भी जाते हैं। संसार के प्रवाहक्रम को देखते हुए इस अनिवार्यता का निराकरण कोई नहीं कर सकता; पर जिन्हें सच्चा प्रेम हो, उनके लिए एक ही मार्ग है कि गुरुदेव के कंधों पर लदे हुए उत्तरदायित्व का वजन स्वयं उठाएँ और उन्हें उन चिंताओं से मुक्त करें, जो उनके कंधों पर जीवन भर लदी रही हैं और अभी भी— इन दिनों भी हलकी नहीं हुई हैं। मिशन की गतिविधियों में अधिकाधिक मनोयोग, श्रमदान, अंशदान की श्रद्धांजलि जिस स्तर की प्रस्तुत की जा सके, उसी कसौटी पर कसे जाने से यह पता चलेगा कि मजनुओं में से कितने मलाई खाने वाले और कितने रक्त बहाने वाले हैं। उनका हाथ बँटाकर नवसृजन-प्रयोजनों में बढ़ा-चढ़ा सहयोग देकर ही यह सिद्ध किया जा सकता है कि किनकी आत्मीयता कितनी सघन थी और उनका सानिध्य घटने की किन्हें वास्तविक व्यथा हुई है।

वस्तुतः, आत्माओं की निकटता ही आनंद का श्रोत है और वह शरीरों के दूर रहते हुए भी वार्त्तालाप, भेंट, दर्शन का अवसर न मिलने पर भी अपने स्थान पर यथावत बनी रह सकती है। साथ ही इस कारण आदान-प्रदान में भी कोई अड़चन नहीं पड़ सकती। गुरुदेव और उनके मार्गदर्शक के संबंध इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

भक्त और भगवान के— गुरु और शिष्य के— मित्र  और मित्र के बीच भी चंद्र-चकोर जितनी दूरी हो सकती है; पर साथ ही वे अत्यधिक निकटता भी अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं, उनके भाव भरे अनुदान भी परस्पर यथावत चलते रहते हैं। गज और ग्राह, द्रोपदी और प्रहलाद, एकलव्य, मीरा, रामकृष्ण परमहंस, सूर, तुलसी आदि भावनाशीलों की कथा-गाथाओं का स्मरण है, उन्हें यह अनुभव करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि वार्त्तालाप, भेंट-दर्शन पर प्रतिबंध लगने के कारण निष्ठावान को क्या कष्ट या आभाव अनुभव होगा। उनकी बात दूसरी है, जो आँखों से ताक-झाँक करने की विडंबना को ही दर्शन कहते हैं और उतने भर से आकाश-पाताल जैसा प्रतिफल मिलने का शेखचिल्ली—  दिवास्वप्न देखते रहते हैं।

हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गए हैं और न पलायन ही कर रहे हैं, वरन वे सूक्ष्मीकरण की नवीन जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्त्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़ोत्तरी कर रहे हैं। उनके नए पराक्रम का लाभ समय को— समाज को ही नहीं, प्रत्येक भावनाशील परिजन को भी मिलेगा, यह सुनिश्चित है।

— भगवती देवी शर्मा


चीटियों से ली समझदारी की शिक्षा (कहानी)

एक बाप के कई लड़के थे। सभी बहुत चतुर। खराबी इतनी थी कि वे अपने को बहुत बुद्धिमान मानते थे। कुशलता पर अहंकार करते और एकदूसरे से बात-बात में टकराते रहते थे।

बाप ने नशा उतारने की सोची, सो एक कटोरी चीनी और मिट्टी मिलाकर वहाँ रख दी, जहाँ चीटियों का बिल था।

लड़को को बुलाकर कहा, वे लोग चीनी और मिट्टी के कण अलग-अलग कर दें।

लड़के लगे रहे। बहुत समय बीत जाने पर भी अभी चौथाई काम नहीं निपटा, खीजकर चले गए।

रात गए बाप लौटा, तो उनसे उसे अलग करने के काम को निपटाने की बावत पूछताछ की। लडकों ने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी।

बाप वहाँ गया, जहाँ सम्मिश्रण बिखरा पड़ा था। देखा तो उसमें से चीनी नदारद। बाप ने पूछा— “बताओ, तुममें से किसने चीनी निकाली। लड़कों ने फिर अपनी गैर जानकारी व्यक्त कर दी।

बाप ने कहा— “देखो, उसे छोटी-सी चींटियाँ मिल-जुलकर बीन ले गईं। एक तुम हो, जो चींटी जितनी भी अकल नहीं रखते और उनकी तरह मिल-जुलकर काम क्या नहीं कर सकते? यही हाल रहा, तो आगे बड़ी सफलताएँ क्या पा सकोगे?”

लड़कों की अहंता चली गई, वे चीटियों से लगन, समझदारी और मिल-जुलकर काम करने की शिक्षा लेकर तदनुसार चल पड़े।


"काम के लोग"

भीड़ की तो कमी है कहाँ, काम के लोग मिलते नहीं।

प्रार्थी या प्रशंसक बहुत, राह पर साथ चलते नहीं॥

धर्म, शासन, सभा, सम्मिलन, सब जगह भीड़-ही-भीड़ है।

आस्थाएँ कहीं भी नहीं, हर जगह स्वार्थ का नीड़ है॥

स्वार्थी-भीड़ के शोर में, काम के स्वप्न पलते नहीं।

भीड़ की तो कमी है कहाँ, काम के लोग मिलते नहीं॥

भीड़ के भूरि-उन्माद में, दिव्यताएँ कहो क्या करें।

होश तक जिस हृदय को न हो, दिव्य अनुदान कैसे झरें॥

सिंधु हो सीपियों से भरा, रत्न सबमें निकलते नहीं।

भीड़ की तो कमी है कहाँ, काम के लोग मिलते नहीं॥

काम के रीछ, वानर मिलें, तो भले राक्षसी-भीड़ से।

आदमी से जटा-भू भले, जो द्रवित हो उठे पीर से ॥

त्याग से जीतते राम को, नाम से राम छलते नहीं।

भीड़ की तो कमी है कहाँ, काम के लोग मिलते नहीं॥

हर समर जीतते सूरमा, भीड़ इतिहास लिखती नहीं।

क्योंकि बलिदान की राह पर, देर तक भीड़ टिकती नहीं॥

और बलिदानियों के बिना, जीत के दीप जलते नहीं।

भीड़ की तो कमी है कहाँ, काम के लोग मिलते नहीं॥

लो सुनो! आज आवाज वह, जो महाकाल ने बाँग दी।

भीड़ में, पास किसके हृदय, आज फिर देखना है यही॥

कौन पाषाण हैं भीड़ में, जो कि बिलकुल पिघलते नहीं।

भीड़ की तो कमी है कहाँ, काम के लोग मिलते नहीं॥

चल रही आज मंथन क्रिया, शुद्ध मक्खन उछल आएगा।

साधना की सघन ताप में, छाछ कैसे पिघल पाएगा॥

वेदना छलछलाए अगर, प्राण कैसे मचलते नहीं।

भीड़ की तो कमी है कहाँ, काम के लोग मिलते नहीं॥

— मंगल विजय

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*समाप्त*


अगले अंक में गुरुदेव का समग्र जीवन-वृतांत

पूज्य गुरुदेव ने अपना जीवनवृत्तांत न कभी लिखा, न किसी को बताया। जिनने पूछा, उन्हें टाल दिया। पर वह है सारा महत्वपूर्ण कि उसका एक-एक शब्द ह्रदयंगम करने योग्य है और एक-एक अक्षर पड़ने योग्य है।

अब गुरुदेव सूक्ष्मीकरण की भूमिका में प्रवेश कर रहे हैं। तो उनने उस जीवनवृत्तांत को स्वयं लिखा है। इसलिए कि जिज्ञासु आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान के रहस्यों को गम्भीरतापूर्वक समझ सके और साधना से सिद्धि का यथार्थवादी रहस्य हस्तगत करके जिन्हें निहाल बनना है, बन सके।

जीवनवृत्तांत जून के आगामी अंक में छप सके, उतना ही सारगर्भित अंश लिखा गया है। यह पाठकों के हाथ में सदा की भांति जून के प्रथम सप्ताह में पहुँच जाएगा। जल्दी लेखन और जल्दी मुद्रण के कारण एक सप्ताह विलंब से प्रकाशित होने की आशंका है।

गुरुदेव से संबंधित व्यक्ति लगभग बीस लाख हैं। अखण्ड ज्योति उतनी नहीं छपती है। प्रतिपादन से यथासंभव जल्दी ही सभी को अवगत करा देने की इच्छा गुरुदेव की है। मौन-एकाकी-साधना एवं किसी से न मिलने के उनके निर्णय की स्थिति में अब यही एक मात्र माध्यम रह गया है। इन पंक्तियों में यही अनुरोध किया जा रहा है कि वर्तमान पाठक जून के अंक की अतिरिक्त तीन प्रतियाँ पाँच रुपया भेजकर और मँगा लें। एक अपनी, तीन अतिरिक्त। कुल तीन को संपर्क क्षेत्र में पढ़ाना आरंभ करें और न्यूनतम बीस विज्ञजनों को पढ़ाएँ। इसे गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सौंपा गया विशेष उत्तरदायित्व समझें और पूरा करें।

नये पाठकों-विज्ञजनों पर स्थायी प्रभाव डालने की दृष्टि से यह और भी उचित होगा कि परिजन इस विशेषांक की अतिरिक्त प्रतियाँ विक्रय हेतु मँगाएँ । इतनी महत्त्वपूर्ण सामग्री पास रखना हर कोई चाहेगा। पड़ने वाली न्यूनतम प्रतियों के अलावा अपने संपर्क के भावनाशील बुद्धिजीवी वर्ग के लिए थोड़ी "सबसीडी" देकर एक रुपये मूल्य पर एक प्रति विक्रय की जा सकती हैं। जितनी प्रतियाँ मँगानी हों, उसकी सूचना एवं राशि परिजन शीघ्र भेज दें। बाद में यह जीवनवृत्तांत जब पुस्तकाकार छपेगा, तो लागत मूल्य पाँच रुपये से कम न होगा।

— अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा