परकाया प्रवेश की सूक्ष्मीकरण साधना

आद्य शंकराचार्य का एक विदुषी महिला भारती से शास्त्रार्थ हुआ। धर्म दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य शंकर अन्य विषयों में तो जीत गए, किन्तु एक विषय में उनका अनुभव न होने से शास्त्रार्थ प्रक्रिया को बीच में ही रोकना पड़ा। तत्काल तैयारी न होने से उन्होंने इसके लिये समय माँगा। विषय था- ‘कामशास्त्र’। विदुषी महिला जानबूझकर इस पर अड़ी हुई थीं कि इस विषय पर भी अपनी पूर्ण मर्यादा में शास्त्रार्थ किया जाय।

आद्य शंकराचार्य ने इस अवधि में परकाया प्रवेश सिद्धि का प्रयोग कर मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया और गृहस्थ जीवन सम्बन्धी यौन विज्ञान का अनुभव अर्जित किया। इस बीच उनके अपने स्थूल शरीर को शिष्यों की देखभाल में रखा गया ताकि उसमें पुनः आचार्य समय आने पर प्रवेश कर सकें। जब नियत अवधि पूरी हुई तो उनने राजा की काया में से अपना सूक्ष्म शरीर निकाल कर स्थूल काया में प्रवेश कर लिया। तदुपरान्त शास्त्रार्थ हुआ एवं अर्जित अनुभवों के आधार पर अपने तर्क सम्मत प्रतिपादनों के कारण आचार्य शंकर विजयी घोषित किए गये। यह सूक्ष्मीकरण साधना की सिद्धि का ही एक अंग है। योग विद्या में निष्णात व्यक्ति अपनी चेतन सत्ता को स्थूल काया से कभी भी अलग व सम्बद्ध कर सकते हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।


VigyapanSuchana

आवश्यक सूचना

प्रज्ञा साहित्य एवं पत्र व्यवहार के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ इस प्रकार हैं। अखण्ड-ज्योति पत्रिका, गायत्री साहित्य एवं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद साहित्य हेतु अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा को लिखें। युग-निर्माण योजना मथुरा को जीवन निमार्ण साहित्य, गुजराती एवं उड़िया “युग शक्ति गायत्री” पत्रिका, “युग निर्माण योजना” पत्रिका, स्टीकर्स, फोल्डर्स एवं चित्र प्रचार सामग्री हेतु लिखें। सम्पादन सम्बन्धी, शिविर तथा साधना निर्देश संबंधी समस्त व्यवहार शान्ति-कुँज हरिद्वार से करें। परिजन इस विभाजन को ध्यान में रखेंगे तो साहित्य प्राप्त होने एवं पत्राचार में सरलता रहेगी।

केन्द्र में अनुवादकों की आवश्यकता-

जैसे-जैसे मिशन का विस्तार क्षेत्र बढ़ रहा है, युग साहित्य को अन्यान्य भाषाओं में अनूदित कर प्रकाशित करने की आवश्यकता अनुभव हो रही है। हिन्दी से अंग्रेजी, मराठी, गुजराती एवं बंगाली भाषा में सारगर्भित भावानुवाद कर सकने वाले व्यक्तियों की केन्द्र में जरूरत है। परिजन अपने संपर्क क्षेत्र में व अपने में से ही ऐसे आँशिक या पूर्ण समयदानी ढूंढ़ें जो शान्ति-कुँज रहकर यह कार्य कर सकें।


मौनं सर्वार्थ साधनम्

मौन साधना की अध्यात्म-दर्शन में बड़ी महत्ता बतायी गयी है। कहा गया है “मौनं सर्वार्थ साधनम्।” मौन रहने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं। महात्मा गाँधी कहते थे- मौन में अन्तर्शक्ति को जगाने की प्रभावशाली सामर्थ्य होती है। उनके अनुसार वह व्यक्ति, जो अपने जीवन में निरन्तर अनवरत सत्य की शोध कर रहा हो, मौन साधना का ही पथ पकड़ता है। लांगफेलो के अनुसार मौन और एकान्त, आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं। दार्शनिक बेकन का मत है कि मौन निद्रा के समान है जो विवेक को ताजगी प्रदान करती है।

वस्तुतः मौन एक तितीक्षा है, तप साधना है जो समय-समय पर महामानवों द्वारा अपने साधना पुरुषार्थ के क्रम में अपनायी जाती है। मौनावस्था एक योगी के लिये सर्वाधिक मूल्यवान निधि एवं धरोहर है। इस अवस्था में प्रवेश कर वह परमसत्ता के और समीप जा पहुँचता है। बहिरंग से नाता तोड़ कर अंतःक्षेत्र की गुफा प्रवेश साधना उसके लिये फलदायी सिद्ध होती है। मौनावस्था में की गयी प्रार्थना-तप साधना कभी निष्फल नहीं होती ऐसा विद्वत्जनों का मत है। किसी विद्वान ने कहा है- भय से उत्पन्न मौन जड़ता का प्रतीक है किन्तु संयमजन्य मौन साधुता है, तपस्वी का भूषण है।

इन्द्रिय संयम हेतु सबसे अच्छा प्रतीक मौन को माना गया है। जो मौन साध लेता है, वह सारी इन्द्रियों को वश में कर जितेन्द्रिय कहलाता है। महर्षि व्यास के मुख से निकले वचनों को लिपिबद्ध कर पुराण रचने का पुरुषार्थ गणेश जी द्वारा मौन साधना के बलबूते ही सम्भव हो पाया। यदि इतनी लम्बी अवधि तक यह साधना पुरुषार्थ न निभाया गया होता तो साहित्य सृजन भी सम्भव न हो पाता।

चिन्तक-मनीषी फ्रेंकलिन ने कहा है- “चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता क्योंकि वह मौन रहती है।” मौन का अर्थ है ऊर्जा के बिखराव को समेटना एवं इसे संग्रहित कर उच्चस्तरीय पुरुषार्थ में नियोजित करना। मौन साधना के साधक अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों के समक्ष संसार के सभी प्रकार के वैभवों को तुच्छ मानते हैं। मौन साधक अतीत के अनुभवों से अर्जित ज्ञान सम्पदा को मौन स्थिति के क्षणों में पुनः नियोजित कर एक नवीन विचारधारा को एक कलाकार की तरह मूर्त रूप देता है, ऐसी विचारधारा जो युगानुकूल होती है, सर्वकल्याण कारी होती है। युग प्रवर्तक दृष्टा ऋषिगण इसी कारण मौन का महात्म्य बताते रहे हैं।

वाक् शक्ति की ऊर्जा का सर्वाधिक सुनियोजन मौन साधना में होता है। संग्रहित शक्ति द्वारा ऐसे साधक स्वयं को पूर्णता की दिशा में ले जाते हैं, जीवनमुक्त कहलाते हैं एवं अपनी इस शक्ति द्वारा बहिरंग जगत को भी प्रभावित करते हैं।

‘मैं’ को मिटाने की सर्वश्रेष्ठ स्थिति मौनावस्था है। जब ‘मैं’ (अहं) का ही लोप हो गया तो कौन सोचेगा व कौन बोलेगा ? इस साधना को समर्पण योग की साधना कहा जा सकता है। जो जितना गहरा होता है वह उतना ही मौन होता है। स्थिर जल गहरा होता है, यह उक्ति मौन के सम्बन्ध में सही सिद्ध होती है। जो वाचाल होते हैं, वे उतने ही उथले-बहिर्मुखी होते व तिरस्कार के भाजन बनते हैं। मौन बुद्धिमानी का ही दूसरा नाम है जो मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण है।

घोंसला सोती हुई चिड़िया को आश्रय देता है, गुफा में हिम समाधि प्राणियों में नयी ऊर्जा का संचार करती है, मौन मनुष्य की वाणी को शक्ति से ओत-प्रोत कर देता है।

मौन अवस्था एक ऐसी स्थिति है जिसमें भगवद् सत्ता व्यष्टि सत्ता के ओर समीप आ जाती है। मनुष्य देव-स्वरूप होता व भगवत् सत्ता से एकाकार होता है। मौन एक विराम की स्थिति है जो मनुष्य को भावी तप पुरुषार्थ हेतु पर्याप्त बल देती, ऊर्जा से ओत-प्रोत कर देती है। हर ऋषि स्तर के साधक को मौन का अवलम्बन लेना चाहिए ताकि समष्टि हित साधन सम्भव हो सके।


सद्विचारों का प्रेरणा तंत्र

अज्ञातवास में लम्बे समय तक रहते और विपन्न परिस्थितियों का सामना करते-करते अर्जुन पुरुषार्थ शिथिल हो गया था। भगवान कृष्ण उससे महाभारत का नेतृत्व कराना चाहते थे। किन्तु उसका मन बैठ गया था। उसकी आँखों से देश, जाति, समाज की विषम समस्याएं ओझल हो गई थीं, गुजारे का प्रश्न भर सामने था। कृष्ण ने कई बार उकसाया किन्तु उसके उत्तर इतने भर थे कि पेट पालने के लिये और कुछ न बन पड़ेगा तो भीख माँगकर ही गुजारा कर लेंगे। अज्ञातवास की अवधि में वह भाइयों समेत ऐसे ही छोटे काम करना रहा था। सो प्रश्न पेट भरने भर का सामने रह गया था। उसके लिए छोटे दर्जे की मजूरी से भी काम चल जाता था। अर्जुन इतना ही छोटा रह गया था। अस्त-व्यस्त भारत को सर्व समर्थ महाभारत बनाने की कृष्ण ने जो योजना बनाई थी सो उसके गले ही न उतर रही थी। दोनों पक्ष की सेनाएं तो आमने सामने आ खड़ी हुई थीं, पर अर्जुन का छोटा मन छोटी बातें ही सोच रहा था। कृष्ण की योजना ही अस्त-व्यस्त हुई जा रही थी। तब भगवान ने न केवल उद्बोधन भरे परामर्श दिये वरन् खीज कर गाली-गलौज पर उतर आये। बोले- “कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।” अन्त में उसे डरा धमका कर उस स्थिति पर ले आये जिसमें वह कहने लगा- ‘करिष्ये वचनं तवं?’ यदि कृष्ण ने धमकाया न होता तो कदाचित् वह मोर्चा छोड़कर भाग ही खड़ा हुआ होता। उन्हीं कृष्ण ने यह भी कहा था- “क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते।” सच तो यह है कि उनने मुर्दे में प्राण फूँके थे और जो वह नहीं चाहता था वह भी उससे करा लिया था।

ठीक इससे ही मिलती-जुलती दूसरी घटना है। लंका दहन के समय समुद्र लाँघकर सीता का पता लगाकर लाने की। जामवन्त सभी सेनापतियों से कह रहे थे कि इस कठिन काम को करने के लिये कौन जाएगा। हनुमान समेत सभी ने चुप्पी साध रखी थी। इतने कठिन काम में हाथ डालना और जान गँवाना एक ही बात है। इसे आगे बढ़कर कौन अपनाये? जामवन्त ने हनुमान के सोते हुए साहस को जगाया, और कहा- “तुम आसानी से इस काम को कर सकते हो, फिर क्यों चुप बैठे हो?” आत्मबोध जागा तो ‘तव कपि भयेऊ पर्वताकारा’ शरीर तो शायद ही उतना लम्बा चौड़ा रहा होगा, पर मनोबल जाग पड़ने से वह पहले की तुलना में इतना अधिक विशाल हो गया जितना कि सामान्य मनुष्य शरीर की तुलना में पहाड़ होता है। सामर्थ्य का इतना अधिक स्फुरण होने पर बल की कुछ कमी नहीं रही। समुद्र छलाँगना, सीता का पता लगाना, अशोक वाटिका उजाड़ना, लंका जलाना जैसे कई एक से एक कठिन काम उनने लगे हाथों कर डाले। सुरसा ने परीक्षा ली तो वे उसमें हर दृष्टि से उत्तीर्ण हुए-

जस-जस सुरसा बदन बढ़ावा। तासु दुगुन कपि रूप दिखावा॥

सामान्य वानर जो सुग्रीव का सेवक मात्र था, अपने स्वामी के साथ-साथ अपनी भी जाने बचाये ऋष्य मूक पर्वत पर दिन काट रहा था, राम लक्ष्मण का पता लगाने भेजा गया तो वेश बदलकर गिड़गिड़ाते हुए किसी प्रकार नाम पता भर पूछकर लाया था। किन्तु जब मनःस्थिति बदली परिस्थिति भी बदली। सामान्य वानर हनुमान हो गया और पर्वत उखाड़ लाने का अद्भुत पराक्रम दिखाने लगा।

मनुष्य सामान्य ही होते हैं। हाड़-माँस की दृष्टि से सब एक जैसे ही होते हैं। पर भीतर वाले में जब अन्तर पड़ जाता है तो मनुष्य सामान्य न रहकर असामान्य हो जाता है। हजार वर्ष का गुलामी का दमन उत्पीड़न सहते-सहते सारा देश लुँज-पुँज हो गया था। मुट्ठी भर अंग्रेज इतने विशालकाय देश पर दो सौ वर्ष शासन करते रहे। उनके सामने किसी की हिम्मत चूँ तक करने की न थी। पर जब गाँधी ने हुँकार भरी और मनोबल उभारा तो हजारों लाखों सत्याग्रही जेल जाने, घर लुटाने, गोली खाने और फाँसी का तख्ता चूमने के लिए कटिबद्ध हो गये। 96 पौण्ड के दुर्बलकाय इस व्यक्ति का आत्मबल जब उभरा तो उनके साथियों अनुगामियों की कमी न रही। जिसके राज्य में कभी सूर्य अस्त न होता था, उस ब्रिटेन के सिंह को गाँधी के सामने पराजय माननी पड़ी। और बिस्तर बाँधकर अपने देश को वापस लौट गया। यह चर्चा आत्मबल की हो रही है। यह चेतना होती हर किसी में है। पर जागती तब है जब कोई जगाने वाला हो। अर्जुन की, हनुमान की, गाँधी की चर्चा इसी प्रसंग में हुई है कि जब उनका आत्मबल जगाया गया तो वे सामान्य से असामान्य हो गये और वह काम कर गुजरे जो अद्भुत असम्भव जैसे दिखते थे। इतिहास इसी घटनाक्रम से भरा हुआ है। उद्बोधन की शक्ति महान है, यदि वह छिन जाय तो फिर बलिष्ठ भी दुर्बल हो जाता है।

महाभारत युद्ध में प्रधान सेनापति कर्ण था। उसे हराना असम्भव ठहराया गया था। चतुरता से उसके बल का अपहरण किया गया। कर्ण का सारथी शल्य था। श्रीकृष्ण के साथ तालमेल बिठाकर उसने एक योजना स्वीकार कर ली। जब कर्ण जीतने को होता तब शल्य चुपके से दो बातें कह देता, यह कि- तुम सूत पुत्र हो। द्रोणाचार्य ने विजयदायिनी विद्या राजकुमारों को सिखाई है। तुम राजकुमार कहाँ हो जो विजय प्राप्त कर सको। जीत के समय पर भी शल्य हार की आशंका बताता। इस प्रकार उसका मनोबल तोड़ता रहता। मनोबल टूटने पर वह जीती बाजी हार जाता। अन्ततः विजय के सारे सुयोग उसके हाथ से निकलते गये और पराजय का मुँह देखने का परिणाम भी सामने आ खड़ा हुआ।

सामान्य लोगों में असामान्य मनोबल भर देना किसी किसी प्राणवान का ही काम होता है। भामाशाह पूरे वणिक थे। जीवन में पहले कभी बड़े दान दिये होते तो उनकी जेब कब की खाली हो गई होती। राणाप्रताप के मन्त्री एक दिन उनके पास गये और संग्रहित पूँजी राणा को देने में लाभ और न देने की हानि समझाते रहे। उत्तेजना भरे शब्द लालजी के कलेजे से पार हो गये और आवेश में आकर 30 लाख के लगभग जो पूँजी थी सो सब की सब राजा के चरणों पर अर्पित कर दी। जौहर राणा ने दिखाये। दानवीर भामाशाह बने। परिस्थितियाँ बदल जाने का वर्णन इतिहासकारों ने किया। पर राणा के उन मंत्री की कहीं चर्चा भी नहीं होती, जिसने भामाशाह को नीच-ऊँच समझाकर उस काम के लिए सहमत किया जिसे स्वेच्छापूर्वक वे कदाचित् ही करते।

यह उल्लेख सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में किया जा रहा है। गुरुदेव का सामान्य शरीर भी उतना ही है जितना कि वे विदित पराक्रम दिखा चुके हैं। मनुष्य जो कर सकता है वह चरम सीमा तक उनने कर दिया है। अब उन हजारों लाखों का प्रसंग है जो प्रत्यक्ष सामर्थ्य की दृष्टि से गुरुदेव के समान ही नहीं उनसे अधिक बढ़े-चढ़े भी हैं। किन्तु उनका प्रसुप्त मनोबल पराक्रम एक प्रकार से मूर्छाग्रस्त स्थिति में पड़ा हुआ है। यदि कोई उसे जगा दे तो वे महामानवों की पंक्ति में गिने जा सकते हैं और ऐसे काम कर सकते हैं जिनने भारत के इतिहास को स्वर्णाक्षरों से लिखने योग्य बनाया है। तिलक, गोखले, पटेल, मालवीय, सुभाष जैसों का बचपन या आरंभिक जीवन देखा जाये तो वे सामान्य से बढ़कर और कुछ प्रतीत नहीं होते। किन्तु प्रसुप्त को यदि कोई जगा दे तो वर्तमान परिस्थितियों में भी ऐसे कितने ही दीख पड़ेंगे जिन्हें गेंद की तरह थोड़ा-सा सहारा मिले तो उछलकर कहीं से कहीं पहुँच सकते हैं। आज जो पैसा, पदवी, बड़प्पन के क्षेत्र में बड़े आदमी भर कहला पाते हैं यदि इनकी दिशा में कोई बड़ा-सा मोड़ मरोड़ दे तो वे उनकी जीवन गाथा सामान्य न रहे, कुछ से कुछ हो जाय। प्रतिभावानों की कहीं कोई कमी नहीं है। हर क्षेत्र में ऐसे असंख्य लोग मौजूद हैं जिनने जो काम हाथ में लिये हैं उनमें आश्चर्यजनक सफलताएं पाई हैं। भूखे-नंगे, लोग अरबपति बने हैं। निरक्षर आदमी कालिदास, रणजीत सिंह, अकबर बने हैं। सफलता की हजार धाराएँ हैं। प्रतिभावानों ने इनमें से जिस भी धारा को पकड़ा है, एक के बाद दूसरी सीढ़ी पार करते हुए उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचे हैं। किन्तु यह सफलताएँ हैं विशुद्ध व्यक्तिगत। यदि इनकी दिशा मुड़ी होती तो लोक मंगल के ऐसे काम दिखाते जिसमें उनकी गणना महा-मानवों में हुई होती और उनके पुरुषार्थ ने देश, धर्म, समाज, संस्कृति का ढाँचा ही बदल दिया होता। कठिनाई एक ही है कि ऐसी दिशा में धकेलने वाली प्रेरणा देने वाले शक्ति पुँज निगाह दौड़ाने पर भी दृष्टिगोचर होते नहीं। योरोप के इतिहास में लेनिन से लेकर मार्टिन लूथर तक कितने ही नक्षत्र चमके हैं। लेखकों की कमी नहीं रही पर साम्यवाद के प्रणेता कार्ल मार्क्स और प्रजातन्त्र के जन्मदाता रूसो की तुलना करने वाले बहुत खोजने पर ही थोड़े से मिल सकेंगे। अमेरिका के लिंकन और वाशिंगटन गरीब घरों में पैदा हुए थे पर उस देश का काया-कल्प करने में उनकी महती भूमिका है। भारत में सुभाष, विनोबा मुश्किल से ढूंढ़े मिलेंगे। वे पूर्व जन्मों के वंचित संस्कारों के बलबूते ही महान प्रतीत होते हैं। उन लोगों के नाम दृष्टि में नहीं हैं जिन्हें दूसरों के द्वारा बनाया कहा जा सके। समर्थ के शिवाजी, राम-कृष्ण के विवेकानन्द जैसे उदाहरण कठिनाई से ही मिल पावेंगे।

अपने बलबूते अथवा दूसरों की सहायता से कितने ही लोग विद्वान बने हैं। व्यवसाय में प्रचुर मात्रा में धन कमाने में सफल हुए हैं। सरकारी उच्च पदों पर आसीन होने का उन्हें अवसर मिला है। सेना नायक बनकर वे शत्रु के छक्के छुड़ा चुके हैं। विज्ञान के कई आश्चर्यजनक आविष्कार वे कर चुके हैं। कइयों ने शासन चलाये और कई तरह के सुधार किये हैं। कइयों की प्रशंसाएं छपी हैं और नोबेल पुरस्कार जैसे उपहार मिले हैं। इन सफलताओं के लिए उनकी चर्चा भी होती है। पर इन उपलब्धियों का विश्लेषण करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि यह व्यक्तिगत स्तर की सफलताएँ थीं। धन वालों के सम्बन्ध में अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि उनके कारखाने में कितनों को नौकरी मिली और पेट भरने का इन्तजाम हुआ। कवियों, गायकों, कलाकारों को यश मिला। दर्शकों की भारी भीड़ उन्हें देखने के लिए एकत्रित होती रही। फिर इस कारण समूचे समाज को आदर्शवाद की ओर चलने की कितनी प्रेरणा मिली, इसका लेखा-जोखा लेने पर इतना ही सार निकलता है कि लम्बी पूँछ वाली घोड़ी अपनी मक्खी भर उड़ाती रही। जिनको उनके द्वारा लाभ मिलता रहा वे उनकी चमचागिरी करते रहे। इस बड़प्पन के लिए उस महानता की पदवी उन्हें कैसे दी जाय जिससे समाज में आदर्शवादिता का माहौल बना, वातावरण बदला और उत्कृष्टता की दिशा से जन-साधारण को प्रोत्साहन मिला।

सम्पदा की कहीं कमी नहीं। मनुष्य का श्रम निरन्तर धन कमाता है। मनुष्य जो कमाता है उसे यदि खर्च न किया जाय तो सोने-चाँदी के पर्वत जमा हो सकते हैं। पर वे सब खर्च हो जाते हैं। खर्च किसमें होते हैं, इसकी देखभाल की जाय तो प्रतीत होगा कि आवश्यक की तुलना में अनावश्यक कहीं अधिक होता है। इस अनावश्यक में कटौती की जा सके तो ईमानदारी से कमाने वाला और नितान्त आवश्यक है वही खर्च करने वाला कोई भी व्यक्ति निर्धन नहीं रह सकता। देखा यह गया है कि सही की अपेक्षा गलत खर्च कहीं अधिक होता है। मात्र इस गलत की रोकथाम की जा सके तो मनुष्य के पास इतना पैसा हो सकता है जिसे सदुपयोग में लगाया जा सके तो उसके परिणाम आश्चर्यजनक हो सकते हैं। आवश्यक नहीं कि लोकमंगल के रुके हुए कामों के लिए कहीं चोरी, डाका डाला जाय या गढ़ा खजाना ढूँढ़ा जाय। इसके लिए पूरा श्रम और उचित खर्च करने की नीति बना लेने के उपरान्त हर व्यक्ति के पास उतना पैसा हो सकता है कि उसे योजनाबद्ध उपयोग करके उन कामों को सम्भाला जा सके जो आज पैसे के अभाव में रुके हुए हैं। प्रश्न उस समझदारी का है जो “कमाई को किस काम में लगाया जा सके”, इस समस्या को सही ढंग से हल कर सके। उदाहरण के लिए विवाह शादियों में होने वाले अपव्यय में कटौती की जा सके तो हर हिन्दू परिवार के पीछे इतनी राशि जमा हो सकती है जिसे लोक मंगल के आवश्यक कामों में दान की तरह न सही पूँजी की तरह लगाया जा सके तो उसका परिणाम बहुत ही सुखद हो सकता है।

फिर ऐसे आदमी कम नहीं हैं जिनके पास आवश्यकता से अधिक सम्पदा है। कीमती कपड़े न खरीदे जायें तो ढेरों बचत हो सकती है। जेवरों में लगी हुए रकम निरर्थक न लगे और उसे चालू रखा जाये तो भी उतना पैसा निकल सकता है, जिससे रचनात्मक कामों के लिए पैसे का अभाव प्रतीत न हो। सरकारी शिक्षा के अतिरिक्त जन-समाज की ओर से व्यावसायिक ढंग से एक अलग शिक्षा तंत्र खड़ा किया जा सकता है। बहुत अधिक लाभ कमाने का लालच न हो तो वे कुटीर उद्योग चालू किये जा सकते हैं जिनके द्वारा हजारों व्यक्तियों को नये उद्योग मिल सकें। प्रौढ़ महिला शिक्षा, लड़कों को स्कूलों के अतिरिक्त शिक्षा देने की व्यवस्था आरम्भ करने के लिए पूँजी का जो अभाव इन दिनों प्रतीत होता है उसे कुछ ही समझदार आदमी सहकारी तन्त्र के आधार पर परस्पर मिल-जुलकर जुटा सकते हैं।

यह तो गरीब और मध्यम श्रेणी के लोगों द्वारा जुटाई जाने वाली पूँजी की चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त जमींदार, साहूकार, मिल मालिक, लम्बी चौड़ी जमीन जायदाद के मालिक भी तो हैं, जिनके परिवार विलासिता में ढेरों पैसा खर्च करते हैं। उत्तराधिकार के बँटवारे पर मुकदमे बाजी चलने में ही ढेरों पैसा अदालत कचहरियों में खर्च हो जाता है। इन लोगों की समझ उल्टी से सीधी दिशा में मुड़ सके तो वह बर्बाद होने वाला धन उस पूँजी का काम दे सकता है जिनके बिना प्रगति का काफी काम रुका हुआ है। उपयोगी साहित्य प्रकाशन, उपयोगी फिल्मों का निर्माण यह दो काम ही ऐसे हैं, जो लोगों के मस्तिष्क को उलटकर सीधा कर सकते हैं। बड़े गाँवों में सोलह मिलीमीटर के सिनेमा घर खड़े किये जा सकते हैं। विचार क्राँति की आवश्यकता पूरी करने वाली एक-एक घण्टे दिखाई जाने वाली फिल्में बनाने में कहीं कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। अभी तो भाषा की दृष्टि से हिन्दी की गणना ही उनमें होती है जिनमें विचारोत्तेजक साहित्य उपलब्ध होता है। अन्य भाषाऐं इस दृष्टि से दरिद्र मानी जाती हैं। फिर इस प्रकार का साहित्य महंगा भी बहुत है। इन समस्याओं को हल करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। मात्र समझदार लोगों का दिमाग इस ओर मुड़ने की आवश्यकता है कि समय की आवश्यकता पूरी करने वाली सामग्री तैयार की जानी चाहिए और उसके प्रकाशन, विक्रय का उपयुक्त प्रबन्ध होना चाहिए। ऐसे कामों में सम्पन्न लोग, लिमिटेड कम्पनियाँ खड़ी कर सकते हैं। इससे जहाँ लाखों व्यक्तियों को रोजगार मिलेगा वहाँ उलटे विचारों को सीधे करने का एक अति महत्वपूर्ण तन्त्र खड़ा हो जायेगा।

धर्म के नाम पर अनेकों पाखण्ड चलते हैं। ढेरों पैसा खर्च होता है। इसे रोककर सच्चे धर्म प्रचारक पैदा किये जायें तो प्राचीन काल की तरह साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थों, परिव्राजकों की आवश्यकता सहज ही पूरी होने लगे। ईसाई मिशन का धन योजनाबद्ध रीति से खर्च होता है। कितने पादरी, कितने चर्च, कितने विद्यालय कितने प्रकाशन उस पैसे में चलते हैं। फलतः दो हजार से भी कम वर्षों में संसार की आबादी आधी से अधिक ईसाई हो गई और उस संस्था को, उन्हें दान देने वालों को श्रेय मिलता है सो अलग। हम सब भी यही कर सकते हैं।

सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया का एक वीरभद्र ऐसे ही विचारशील लोग पैदा करने में जुटेगा जो अपना समय और धन लोक-मानस के परिष्कार में लगा सकें। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की बहुमुखी योजना में विचारशील लोग यदि अपना चिन्तन, श्रम और धन लगाने लगें तो समझाना चाहिए कि कल्याण ही कल्याण है।


Quotation

आत्मबल के अभाव में हर कार्य असम्भव ही नजर आता है। अर्जुन, हनुमान, भामाशाह, कर्ण के उदाहरण यही बताते हैं कि अन्तः की सामर्थ्य की जागृति अथवा मूर्च्छना की परिणति क्या हो सकती है। आज की परिस्थितियों में प्रसुप्त मनोबल वाले ऐसे अनेकों हैं जिन्हें यदि जागृति की स्थिति में लाया जा सके तो वे असामान्य पुरुषार्थ कर दिखा सकते हैं। उसी सामर्थ्य को जगाने एवं जन-साधारण के माध्यम से विचारशीलों की पीढ़ी जुटाने का पुरुषार्थ सूक्ष्मीकरण द्वारा सम्पन्न हो रहा है।


साधना संग्रह करने की क्षमता

सत्प्रवृत्तियों को अपनाने पर मनुष्य सहज ही ऐसे कामों में लगेंगे जिनके सहारे मनुष्य की बहुमुखी क्षमताएँ सत्कार्यों में अनायास ही नियोजित होने लगे इसलिए किसी को दबाव डालने, भिक्षा माँगने, तर्क प्रस्तुत करने की आवश्यकता न पड़ेगी। मनुष्य की प्रतिभा का कोई ठिकाना नहीं। यदि उन्हें सत्प्रयोजनों में लगाने की आकाँक्षा जग पड़े तो समझना चाहिए कि सतयुगी वातावरण बनने में देर नहीं रह गई।

सूक्ष्मीकरण के महाप्रयोग में एक वीरभद्र विचार संशोधन में लगेगा दूसरे को साधन जुटाने का काम सौंपा गया है। यों देखने में यह कार्य दो प्रतीत होते हैं, पर वस्तुतः वे एक ही पेड़ की दो शाखायें हैं। जहाँ एकाकी दाल गलेगी वहाँ दूसरा भी अपना चमत्कार दिखाने लगेगा। आदर्शवादी उत्कृष्ट विचार जहाँ भी जिनके पास भी होंगे वे साधनों के अभाव में अपना प्रयास रोके रहें ऐसा नहीं हो सकता। वे अपने स्वल्प साधनों से भी महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगे। अपने पास न होंगे तो कहीं अन्यत्र से आवश्यक साधन खिंचते हुए चले आवेंगे। साधु ब्राह्मणों के पास कोई निजी सम्पदा नहीं थी किन्तु उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व ने दूसरे पर प्रभाव डाला और उन्हें आवश्यक साधन जुटाने के लिए प्रबन्ध कर दिया। आद्य शंकराचार्य का मन चार धाम स्थापित करने का हुआ उनके पास निजी पूँजी एक पैसे की नहीं थी, पर मांधाता के अन्तराल में उनने इतनी उत्कट उमंग उत्पन्न की कि वह बहुमूल्य निर्माण आखिर बनकर ही रहा।

बंगाल से चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन आये। उनने अपनी ध्यानमुद्रा में यह देखा कि कृष्ण भगवान ने कब कहाँ क्या लीलाएँ की थीं। जब वे सब पता लगा चुके तब उन्होंने समर्थ भक्तों से कहा कि उनके स्मारक लीलाओं के आधार पर बनने चाहिए। भक्तों ने अपनी जेबें खाली कर दीं और ऐसे शानदार देवालय बनाये जिन्हें आज भी कोई देखता है आश्चर्यचकित रह जाता है कि करोड़ों रुपये इतनी जल्दी कैसे जुट गये?

भगवान बुद्ध के पास घर का एक चीवर भी न था, पर उनने सारे एशिया में- सारे संसार में बौद्ध मिशन के विस्तार की योजना बनाई। इसके अंतर्गत सैंकड़ों विहार और संघाराम बनने थे। इससे अतिरिक्त दो विश्वविद्यालयों की भी विशाल योजना थी। इसके लिए एक-एक रुपया चन्दा नहीं किया गया वरन् उस विशालकाय योजना को दो व्यक्तियों ने ही सम्पन्न कर दिया। अशोक ने नालन्दा और हर्षवर्धन ने तक्षशिला विश्वविद्यालय बना दिए। वे न केवल शानदार इमारतें खड़ी हुई वरन् तीस-तीस हजार छात्रों और अध्यापकों के निर्वाह की भी स्थायी व्यवस्था हो गई।

रानी अहिल्याबाई को प्रेरणा हुई कि नर्मदा तट के देवालयों का जीर्णोद्धार किया जाय और गंगा तट के जो विशाल मन्दिर बनने शेष थे वे भी उन्होंने बनवाये। महाराजा रणजीत सिंह ने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए अमृतसर के प्रसिद्ध मन्दिर पर स्वर्ण चढ़वाया, वह स्वर्ण मन्दिर कहलाया।

दक्षिण भारत के बालाजी, वेंकट आदि मन्दिरों की शोभा तथा लागत कितनी बड़ी है, इसका विवरण वे लोग जानते हैं जिन्होंने उन्हें आँखों से देखा है। सुदामा की गरीबी सर्वविदित है। किन्तु जब उन्हें आवश्यकता पड़ी तो द्वारिकापुरी उठकर सुदामा पुरी के वैभव में बदल गई। यह आख्यान सर्वविदित है।

रामकृष्ण परमहंस काली मन्दिर में पुजारी थे। पर जब उनकी इच्छा हुई तो रामकृष्ण मिशन के अस्पताल हिन्दुस्तान भर में और विदेशों में बनकर खड़े हो गये। विवेकानन्द का कन्याकुमारी वाला स्मारक और दक्षिणेश्वर का नवीन मन्दिर विवेकानन्द के इशारों पर बनकर खड़ा हो गया।

बाबा जलाराम के सदावर्त में अभी हजारों व्यक्ति नित्य भोजन करते हैं। काली कमली वालों का सदावर्त धर्मशालाएँ, चट्टियाँ जिन्होंने देखे हैं वे इस बात से चकित हैं कि जो बाबा अपना शरीर काली कमली भर से ढ़ककर रहते थे उनकी इच्छा के अनुरूप इतने धर्म स्थान किस प्रकार बनकर खड़े हो गये? अशोक ने कितने कीर्ति स्तम्भ, शिलालेख बनवाये यह सभी जानते हैं।

यह थोड़े से प्रमाण हैं जिनसे प्रतीत होता है कि अध्यात्म का आकर्षण जहाँ भी संकेत करता है वहाँ क्या से क्या इमारतें बनकर खड़ी हो जाती हैं। बुद्ध गया, साँची के स्तूप, कितने कीमती हैं। कम्बोडिया का अंगकोरवाट इन दिनों बुद्ध विहार का खण्डहर है, पर उसकी लागत ताजमहल के समतुल्य मानी जाती है। रंगून का स्वर्ण मन्दिर बुद्ध स्मारकों में अपने ढंग का अनोखा है।

भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक भ्रमण करने तक धर्म स्थानों की सूची बनाने पर प्रतीत होता है कि इनमें से अधिकाँश का निर्माण किन्हीं सन्त महात्मा की इच्छानुसार हुआ है। अभी भी ढेरों देवालय ऐसे हैं जिनका मासिक खर्च लाखों रुपये मासिक का है। वृन्दावन का रंगजी का मन्दिर और त्रिपदा बालाजी के भोग प्रसाद का खर्च इतना बड़ा है जितना राजा महाराजाओं का भी न रहा होगा।

ईसाई मिशन का इंग्लैण्ड, इटली, अमेरिका का मिला हुआ खर्च अरबों रुपया मासिक का है। अपनी युग निर्माण योजना के अंतर्गत 2400 प्रज्ञापीठें बनी हैं और प्रत्येक के पीछे न्यूनतम पाँच कार्यकर्ता काम करते हैं तो पूरा समय देने वाले कार्यकर्त्ताओं की संख्या साढ़े बारह हजार हो जाती है। हर एक का निर्वाह व्यय 100 रु. भी हो तो साढ़े बारह लाख रुपये माह का खर्च बैठता है।

यह थोड़े से संकेत हैं कि अध्यात्म आकर्षण में साधन किस प्रकार खिचे चले आते हैं। युग निमार्ण के लिए कितने साधन चाहिए इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। युग बिगाड़ने के लिए धन कुबेरों का प्रचुर धन लगा है। अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी मकान को बिगाड़ने में जितना धन लगेगा उसकी तुलना में यदि उसे फिर से नये सिरे से बनाना हो तो उसमें कितने पूँजी लगेगी। सौ पशु नित्य काटने के बूचड़ खाने में जितनी लागत आती है। उसकी तुलना में सौ पशु पालने में डेयरी फार्म में सम्भवतः कहीं अधिक खर्च की आवश्यकता होगी।

यह प्रश्न सहज ही उठता है कि युग निर्माण में कितने अधिक साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। पानी रोकने के बाँध, नहर, सड़क, पुल आदि यदि अच्छी किस्म के बनाये जायें तो उनका बजट करोड़ों का बैठता है। नव निर्माण में सब कुछ नया ही नहीं बनना है। जो कुछ अभी बना हुआ है वह ऐसा है जिसने बनाव कम बिगाड़ अधिक किया है। अब जब इससे ठीक उलटा करना है तो उसकी लागत का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इस नवीनीकरण में कितने साधनों की आवश्यकता पड़ेगी इसका अनुमान लगाना किसी के लिए कठिन नहीं होना चाहिए।

बाँध बनाने के लिए जितने इंजीनियर चाहिए, उसकी तुलना में उसमें लगने वाले श्रमिकों की संख्या, साधनों का मूल्य कितना हो सकता है, यह अनुमान लगाने की आवश्यकता है। अब प्रश्न यह उठा है कि इतने साधन आवेंगे कहाँ से? लायेगा कौन? एकत्रित करने के लिए पूँजी कितनी चाहिए और कितने प्रयास करने पड़ेंगे?

सूक्ष्मीकरण द्वारा उत्पन्न दूसरे वीरभद्र के जिम्मे यही काम सौंपा गया है कि नवनिर्माण के लिए जितने प्रचुर साधनों की आवश्यकता है उन्हें कहीं से भी, किसी भी कीमत पर जुटाया जाना चाहिए। इतने साधन जो जुटा सके सो कितना समर्थ होगा यह अनुमान लगाने में किसी को भी चूक नहीं करनी चाहिए। थोड़े से साधन जुटाने के लिए लोगों को एड़ी से चोटी तक का पसीना एक करना पड़ता है। धूम-धमाके भरी शादी में खर्च होने वाली रकम- एक अच्छा कोठी, बंगला खड़ा करने की जुगाड़ जिन्हें बिठाना पड़ता है उनसे पूछा जाय कि इस हेतु उन्हें अपनी पराई जेब किस प्रकार खाली करनी पड़ी है सूक्ष्मीकरण द्वारा उत्पन्न किये गये दूसरे वीरभद्र के सम्बन्ध में भी अनुमान होगा कि उसकी शक्ति कितनी प्रचण्ड होगी, वह कितने महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करेगा।


वृत्रासुर हनन का इन्द्रवज्र

सूक्ष्मीकरण द्वारा जो पाँच वीरभद्र उत्पन्न किये जा रहे हैं उनमें से एक के जिम्मे लोक सेवी उत्पन्न करने का काम सौंपा गया है और दूसरों के जिम्मे सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए साधन एकत्रित करने का। तीसरे के जिम्मे उलटी चल रही गाड़ी को उलट कर सीधा करने का है। जन सामान्य की मनोदशा वासना, तृष्णा, अहंता के दलदल में सिर से पैर तक डूबे रहने की है। इसे स्वार्थ और अनर्थ का संयोग कहा जा सकता है।

न्यूनाधिक मात्रा में शान्ति और सामर्थ्य हर किसी के पास होती है। प्रतिभा से सर्वथा शून्य कोई भी नहीं है। प्रश्न एक ही है कि उसका उपयोग किस निमित्त किया जाय। इन दिनों मनुष्यों का ढलान और झुकाव जिस ओर है उसे पास परक अनर्थ मूलक कहा जा सकता है। सोचने के लिए जब मस्तिष्क चलता है तो उसकी दिशा एक ही होती है कि दूसरों को हानि कैसे पहुँचाई जाये। सीधे रास्ते चलते आदमी को पतन के गर्त में कैसे गिराया जाय। सलाह देने का अवसर आता है तो पूछने पर अथवा बिना पूछे भी ऐसा कुछ बताया जाता है जिससे स्वयं गिरे और दूसरों को गिराये। गिरते को उठाने की शिक्षा देने वाले कदाचित ही कोई होते हैं। परमार्थ की दिशा में कदम न बढ़ा सकें तो कम से कम इतना तो करें कि चलने वाले को सही बात बतावें, सही रास्ता दिखावें।

जिस प्रकार अधिकाँश लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य खराब हैं, उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य- नैतिक स्वास्थ्य भी बिगड़े हुये हैं। सोचने की मशीन उलटी चलती है अपनी बुद्धिमता इसमें मानी जाती है कि चालाकी बेईमानी से किसी प्रकार धन प्राप्त किया जाये। कोई कठिनाई सामने न होने पर भी गरीबी, तंगी, मुसीबत होने की दशा में कोई ऐसा कुछ सोंचे तो बात समझ में भी आती है पर जो अच्छे खासे सम्पन्न हैं, पैसे की जिन्हें कोई कमी नहीं है, उनकी भी नीयत यही चलती रहती है कि कुछ न कुछ बेईमानी बदमाशी जैसा किया जाये। शौकों में नशेबाजी ही एक ऐसी दिखाई पड़ती है जिसे अपनाने में बुद्धिमत्ता दीखती है। बीड़ी सिगरेट की बात बहुत पीछे रह गयी अब शराब के बिना काम नहीं चलता। इसमें ही शान, शेखी और प्रगतिशीलता दिखाई पड़ती है। नशे खोरी से मदिरा पान और फिर व्यभिचार यह एक विष-बेल है जो एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को, तीसरे से अनेकों की आदत खराब करती है फिर यह एक फैशन चल पड़ता है और दुष्टता करते लज्जा आने के स्थान पर मूँछों पर ताव देते देखा गया है कि उसे मारा- उसे बिगाड़ा, इसे गिराया- इसे सताया। स्त्रियों के प्रति दुर्बुद्धि उत्पन्न करने के फलस्वरूप अपने और दूसरों के परिवार बुरी तरह बर्बाद होते हैं।

स्त्री को जूती समझने में अपना बड़प्पन देखने के फलस्वरूप ही दहेज की प्रथा चली है। दूसरे का घर बर्बाद करने में कैसा मजा आया यह भी दुष्टता का एक व्यसन है। दहेज के न मिलने पर नव वधुओं के सताये जाने उन्हें जलील करने की बातें अब आये दिन सुनी जाती हैं। तेल छिड़क कर जला देने की घटनाओं से इन दिनों अखबार भरे रहते हैं। फाँसी लगा देने, जहर खिला देने, गला घोंट देने, कुएँ तालाब में पटक देने के पैशाचिकता भरे कुकृत्य रोज ही होते रहते हैं। इनमें सास ससुर तक हाथ बंटाते देखे गये हैं।

बलात्कारों और सामूहिक बलात्कारों की घटनाओं की इन दिनों धूम है। किसी की बहू बेटी को फुसलाकर अपहरण कर लेना, वेश्यालयों में बेच आना, इस प्रकार की घटनायें अब नये किस्म के अपराधों में सम्मिलित हुई हैं। कुछ दिन पहले तक दूसरों की बहू बेटी अपनी बहू बेटी मानी जाती थी, पर लगता है कि वे रिश्ते ही समाप्त हो गये। जानवरों में जिस तरह माता, बहिन, बेटी का रिश्ता नहीं होता ठीक वैसा ही मनुष्यों में चल पड़ा है। एक के यहाँ से दहेज लेकर उस लड़की को मार देना और दूसरी तीसरी लड़की वालों से उसी प्रकार की रकम ऐंठते रहना अब यह एक नया धन्धा चला है।

अपहरण की घटनाओं में खेलते बच्चों को पकड़ ले जाना और मनमानी फिरौती न मिलने पर उन्हें मार डालना यह भी एक नया धन्धा चला है। लोगों ने जान से मारने का एक पेशा नया बनाया है। किसी को भी पैसा देकर किसी की भी जान ली जा सकती है। ऐसे लोगों के लिए देशी पिस्तौलें गाँव-गाँव के लुहार बनाने लगे हैं। लगता है अब आदमी की शक्ल में भेड़िये, साँप हर जगह खून की प्यास बुझाते फिरते हैं। इस व्यवसाय में पढ़े और बिना पढ़े सब समान हैं। जबान से मीठी बातें करने वाले भी ऐसे कुकृत्य करते देखे जाते हैं, जिनकी करतूतें देखकर प्रेत, पिशाच, जिन्न- मसान, दैत्य, दानव आदि का सहज स्मरण हो जाता है।

इनका निराकरण कैसे हो यह अब पुलिस के बस से बाहर की बात है। उनमें से भी अनेकों ऐसे हैं जो इनसे मिले रहते हैं, और बँटाई लेते हैं। फिर इनसे निपटा कैसे जाय? प्रत्यक्ष लड़ाई में इनसे जीतना कठिन है। परोक्ष लड़ाई ही कारगर हो सकती है। इनको सुधारने से लेकर दण्ड दिलाने के कोई अन्य तरीके ही कारगर हो सकते हैं। ऐसा ही कोई प्रबन्ध किया जा रहा है।

अपने लाभ की दृष्टि हर व्यापारी की होती है। अपना लाभ हो, किन्तु दूसरे का अनर्थ न हो- यह व्यापार बुद्धि है। किन्तु अनर्थ बुद्धि के व्यवसाय हैं- बूचड़ खाने में साझेदारी, शराब खाना, व्यभिचार के अड्डे चलाना, ब्ल्यू फिल्में दिखाना, चोरी डकैती का माल लाना, बच्चों का फिरौती के लिए अपहरण, लड़कियाँ भगाना और वेश्यालयों को बेचना, नशे की वस्तुएँ यहाँ से वहाँ पहुँचाना, खाद्य-पदार्थों में मिलावट- जैसे कार्य ऐसे हैं इसमें लाभ तो सीमित ही होता है, पर अनर्थ बहुत होता है, यह बात इसलिए कहीं जा रही है कि चोरी बदमाशी के कार्य में बीसियों साझेदार होते हैं। उन सबको खुश रखना पड़ता है। एक को भी नाखुश किया जाय तो जो कमाया है उससे कहीं अधिक जेब से देना पड़ता है। ऐसे लोग चाहें तो सामान्य व्यवसाय में भी काम चलाऊ काम सकते हैं। टैक्स चोरी, कम नाम तोल आदि से भी उतना ही मिल जाता है। पर उन्हें ऊंचे दर्जे की बदमाशी करने में मजा आता है। उसमें अपनी बहादुरी प्रतीत होती है। लोगों पर आतंक जमाने में- कानून के धुर्रे उड़ाने में विशेष मजा आता है। हत्यारे किस्म की एक खास मनोवृत्ति होती है। यही लोग राज सत्ता में हों तो युद्ध छेड़ते हैं या युद्ध छेड़ने वालों में से किसी पक्ष के भागीदार बनते हैं। लड़ाई का सामान बनाने और बेचने का व्यवसाय करके धन कमाते और रौब गाँठते हैं।

परमाणु युद्ध से लेकर सामान्य युद्धों के पीछे मूल बात ऐसी नहीं होती, जो पंच फैसले से तय न हो सके। फिर भी युद्ध में जो मजा है सो दूसरा ही है। हजारों व्यक्तियों का मरना-मारना, कराहना, बिलखना भी उनके लिए मजेदार दृश्य है। इसमें संलग्न रहकर अपने को तीस मारखाँ बनना भी कितनों को ही एक शानदार काम लगता है।

यह अनर्थ व्यवसाय जब मनोवृत्ति में सम्मिलित हो जाता है तो वैसा कुछ किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। सौम्य स्वभाव के उनसे मुकाबला नहीं कर पाते फलतः वे दुष्कर्म बढ़ते ही जाते हैं।

इस प्रवृत्ति के साथ जूझना अपने आप में एक बड़ा काम है। गुरुदेव का तीसरा सूक्ष्म शरीर इन आततायियों से जूझेगा और समझाने बुझाने से लेकर जैसे को तैसे वाली नीति अपनाकर प्रस्तुत आतंकवादी वातावरण को निरस्त करने में एक सूक्ष्म शरीर संलग्न रहेगा। महायुद्ध की विभीषिका-विश्व विनाश का आतंक प्रत्यक्ष सामने है। यह यदि कार्यान्वित होता है तो संचित मानव सभ्यता और प्रगति का सर्वनाश होकर रहेगा। ऐसा न हो तो इस प्रति युद्ध को असामान्य ही समझना चाहिए। दो विश्व युद्ध होकर ही चुके हैं। वर्तमान पीढ़ी ने उन्हें प्रत्यक्ष आँखों से देखा है। इसके अलावा छोटे-छोटे लम्बे और कम समय चलने वाले स्थानीय क्षेत्रीय युद्ध भी इसके अंतर्गत आते हैं। वे भी इन्हीं आँखों से देखे गये हैं। ऐसा समय संसार में शायद ही कभी बीता हो, जब युद्ध की मार काट या तैयारी न चल रही हो। अब युद्ध भी संसार की एक आवश्यकता बन गया है। स्थिति इसी प्रकार बनी रही तो लोग न चैन से बैठेंगे और न बैठने देंगे। जब दिमागों में यह आतंक छाया हुआ हो, उसका सामना करने को लोगों के दिमाग उलझे हुए हों तो शान्ति की बात कौन सोचे, प्रगति का ताना-बाना कौन बुने ? नवनिर्माण को कार्यान्वित करने का सुयोग कैसे बने ?

आमने सामने की लड़ाई देवासुर संग्राम के रूप में प्राचीन काल में होती रही है। वह तरीका काम देगा। तो उसे काम में लाया जायेगा। मन बदलने के तरीके और भी हैं। तुलसी, सूरदास, वाल्मीकि, अंगुलिमाल, आंबपाली आदि के अन्तःकरणों में ऐसी प्रेरणा उत्पन्न हुई कि उनने वह पुराना व्यवसाय ही नहीं छोड़ा वरन् परिवर्तन करके नया जीवन ऐसा बदल डाला जिससे पुरानी धूर्त्तता के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रही। यह भी एक तरीका है।

प्रेत पिशाचों ने अपनी योनियाँ छोड़ीं और सन्त ऋषियों ने अपनी काया पलटी है। सांप केंचुली बदलता है तो घोर आलसी से बदलकर स्फूर्तिवान हो जाता है। बदलाव के अनेक तरीके हैं। साम, दाम, दण्ड, भेद इन चारों ही तरीकों को दुष्टजनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। तीसरे वीरभद्र को इनमें से जो तरीका जब जैसा प्रतीत होगा उसे काम में लायेगा और परिवर्तन का ऐसा माहौल उत्पन्न करेगा जिसे देखकर लोग चकित हो जाएंगे।

सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया में से उत्पन्न होने वाला तीसरा वीरभद्र अपने युग के इस महादैत्य से लड़ेगा जो अब तक के सभी असुरों से अधिक व्यापक, विस्तृत और भयंकर है। देवासुर संग्राम के अनेकानेक विवरणों में एक से एक भयंकर असुरों का वर्णन है। उन्हें मनुष्यों ने भी नहीं मारा था, देवताओं से भी वे नहीं मरे थे। उन्हें निरस्त करने के लिए भगवान को अवतार लेने पड़े थे। इस संदर्भ में वृत्रासुर का प्रसंग याद आता है, जिसका देवताओं के अधिपति इन्द्र भी सामना न कर सके थे। भगवान के अवतार का सुयोग बन नहीं रहा था। तब मनुष्यों में से एक ने यह उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर ओढ़ा था। ऋषि दधीचि की अस्थियों से वज्र बनने की योजना बनी और उसी से उस महा असुर का निरस्त हो पाना निश्चित समझा गया।

दधीचि ने इस पुण्य प्रयोजन के लिए अपनी अस्थियाँ दे दी। उससे वज्र बना। इसी महान अस्त्र के सहारे वृत्रासुर का वध सम्भव हुआ आज भी यही होने जा रहा है। वृत्रासुर ने एक वृत्त बना रखा है। उसकी नृशंसता के अनेकानेक स्वरूप हैं। इनसे जूझने के लिए दधीचि की अस्थियाँ ही कारगर होंगी। गुरुदेव का तीसरा वीरभद्र इस मोर्चे पर लड़ेगा और भूतकाल की विनाश लीला को समाप्त करने वाला पुनरावृत्ति आधार बनेगा।

तीसरा वीरभद्र दुरात्माओं के लिए भय का वातावरण उत्पन्न करेगा। वे जो करना चाहते हैं, वह बन न पड़ेगा। कोई विघ्न खड़ा होगा, लाभ के स्थान पर हानि होगी। कोई ऐसा संकट आवेगा, जो इच्छित दुर्भावना को उलट कर निराशा में बदल देगा। ऐसा सोचने का प्रवाह बहाएगा और जो करना चाहते हैं उससे हाथ रोक लेंगे। इस प्रकार कोई न कोई कारण ऐसा उत्पन्न करेगा जिससे दुरात्मा जो करना चाहते हैं ऐसा न कर सकें।


Quotation

आज की परिस्थितियों में सबसे बड़ी आवश्यकता है- जन साधारण के नैतिक स्वास्थ्य में सुधार की। जब तक उस दिशा में प्रखर प्रयास नहीं किये जाते, सारे बहिर्मुखी उपचार व्यर्थ हैं। दुर्भावना एवं कुविचारों का घुन समाज को धीरे-धीरे नष्ट करता चला जा रहा है। सूक्ष्मीकरण साधनाजन्य तीसरा वीरभद्र उस प्रचण्ड पुरुषार्थ में जुटेगा जिसे विचारों की विचारों से काट, नैतिक बौद्धिक क्रान्ति नाम दिया गया है।

आवेश में आदमी एक बार कुछ भी कर सकता है किन्तु निरन्तर छोटे-बड़े कामों में आदर्शों का समावेश करते रहना मात्र सिद्धान्तवादियों का काम है।


मुक्तिदायिनी गुफा में स्थिर प्रवेश

साधु टी.एल. वास्वानी ने एक स्थान पर लिखा है- मैं स्वर्ग का राज्य पाना चाहता हूँ। पर इस दुनिया का निवास छोड़ना नहीं चाहता। क्या मुक्ति प्राप्ति में गुफा का निवास कुछ सहायक होगा? ऐसी मुझे कुछ आशा नहीं है। क्योंकि सारा खेल मन का है। वह गुफा में बैठे-बैठे महल बना सकता है और यह भी हो सकता है कि महलों में रहते हुए राजा जनक की तरह उसी में अपने लिए गुफा की संरचना कर ली जाय।

मैंने अपनी गुफा बना ली है और जहाँ चाहूँ वहाँ अपने साथ लिये-लिये फिरता हूँ। इसे मन के अतिरिक्त और कोई मुझसे कभी छीन नहीं सकता। अपने मन के अन्तराल की गहराई में बैठकर मैं जिस मुक्ति का सपना देखता हूँ वह जन सेवा पर आधारित है। वह जन सेवा आन्तरिक पवित्रता का वातावरण बन जाने के उपरान्त ही बन पड़ती है।

मन की गुफा में लालसाएं भरी पड़ी हैं, तो उस गन्दगी के रहते जो कुछ भी सोचा जायेगा, मात्र कल्पना लोक होगा। ऐसा कल्पना लोक जिसका यथार्थता से कोई सीधा सम्बन्ध न होगा। यह ठीक है कि आरम्भ कल्पना में होता है पर उसके साथ-साथ वे होनी ऊँची स्तर की चाहिए। ऊँचे स्तर से तात्पर्य है- मनुष्य मात्र की सच्ची सेवा, और उस सेवा की सम्भावना को सार्थक करने के लिए लक्ष्य और चरित्र की पवित्रता अभीष्ट है।

साध्य ऊँचा हो तो भी साधनों के भ्रष्ट होने पर वह बन नहीं पड़ता। मकड़ी का जाला भर बनकर रह जाता है। जिन सपनों में सच्चाई और संभावना है उन्हीं का कोई मूल्य है। जहाँ इन दोनों का अस्तित्व न हो वहाँ जो कुछ रचा जा रहा होगा, वह कल्पना का महल मात्र होगा। ऐसी मुक्ति के प्रति भी मुझे अरुचि है जो रंगीन सपने लेकर सामने खड़ी हो किन्तु यथार्थता के साथ उसका सीधा सम्बन्ध न हो तो समझना चाहिए कि एक काल्पनिक मुक्ति अपनी टोकरी में जमा कर ली है।

लोक सेवा की कार्य पद्धति अपनाते ही मुझे अपने लक्ष्य की समीपता और यथार्थता दिखती है। अन्तरात्मा में तत्क्षण सन्तोष होता है कि अपने से कुछ भलाई बन पड़ी। वह भलाई काल्पनिक तो नहीं थी, इसकी यह कसौटी रखी है कि चिन्तन और चरित्र में पवित्रता का संचार करती है या नहीं।

बड़ों ने कहा है कि मुक्ति के लिए गुफा का निवास आवश्यक है। उनके कथन को मैंने झुठलाया नहीं है। गुफा का शब्द और स्वरूप दोनों ही मुझे भले लगे हैं। किन्तु उस भलाई को सेवा धर्म को अपनाने पर ही कसौटी पर खरा पाया है। जब तक मुक्ति की बात सोचता रहा और उसके लिए कल्पना की गुफा बनाता रहा तब तक समाधान हुआ नहीं और प्रतीत होता रहा कि कोई कल्पना लोक गढ़ लिया है और उसमें विचरण करते हुए मन के मोदक खाये जा रहे हैं।

अब मुझे विश्वास हो गया है कि सचाई के साथ अपनाई गई सेवा की रीति-नीति मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ है। इसलिए भटकाने की अपेक्षा इसी गुफा में प्रवेश करना और सदा सर्वदा के लिए उसी में रहना मुझे भला लगा है।


Quotation

धर्माडम्बर ऐसे परमेश्वर की कल्पना करता है जो मनुष्य को दुर्बल बना देता, आत्म-विश्वास नहीं जगने देता और स्वतंत्रता का अपहरण कर लेता है।


सामर्थ्य एवं सुरक्षा देने वाली शक्ति

सूक्ष्मीकरण के चौथे और पाँचवें उत्पादन के लिए दो कार्य पहले से ही निजी प्रयोजन के लिए सुरक्षित रखे गये हैं। इन क्रियाशीलता के साठ वर्षों में जिनके साथ संपर्क साधे गये हैं, उन प्रज्ञा परिजनों की संख्या प्रायः 24 लाख है। उनका स्तर सामान्य लोगों से कहीं ऊँचा है। मात्र गायत्री उपासना ही इन्हें सिखायी नहीं गयी है, वरन् उनके चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उन उत्कृष्टताओं का समावेश किया गया है, जो व्यक्तित्व को वरिष्ठता की दिशा में उभारती उछालती है। इनकी गतिविधियों में कुछ नवीनताएँ आयी हैं। ऐसी नवीनता जो देश, धर्म, समाज और संस्कृति के बारे में लगनशील विचार कर सके। न केवल विचार वरन् उसके लिए कुछ कहने लायक पराक्रम भी दिखा सके। ऐसा पराक्रम जो दूसरों को भी अपनी ओर आकर्षित कर सके, जो अन्यान्यों को भी कुछ ऐसा करने की प्रेरणा दे सके।

इन प्रज्ञापुत्रों को जो भूमिका निभानी चाहिए, वह तो अभी नहीं निभ रही है, पर यह भी नहीं कहा जा सकता, कि यह सर्वथा छूँछ है। केवल कथनी ही जिनके हाथ हो, करनी का प्रसंग आये, तो बगलें झाँकने लगे। प्रज्ञा परिजनों ने अब तक क्या किया है, यह एक आश्चर्यजनक कहानी है। बूँद-बूँद कर घड़ा भरता है। कण-कण से मन तौला जाता है। प्रज्ञा परिवार के इन 24 लाख परिजनों द्वारा लोक मानस के परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की दिशा में अब तक जो कुछ हुआ है, इन्हीं सब की सहायता से हुआ है। अपने आप में हम सन्तुष्ट नहीं हैं, उसे कम मानते हैं, पर अन्यान्य लोगों की दृष्टि से देखा जाय तो लोक-मंगल में संलग्न अन्य और संगठनों को हमने बहुत पीछे छोड़ दिया है। एक व्यक्ति का काम कम हो सकता है, एक प्रज्ञा पुत्र का उत्पादन कम समझा जा सकता है पर प्रस्तुत प्रज्ञापुत्रों का सम्मिलित कार्य रचनात्मक क्षेत्र में और सुधारात्मक क्षेत्र में मिलकर इतना अधिक हो जाता है कि उस पर दृष्टिपात करते हुए सन्तोष की साँस ली जा सके।

इस समुदाय को बैटरी बराबर मिलती रहनी चाहिए। मार्गदर्शन मिलते रहना चाहिए। प्रोत्साहन देने में कमी नहीं पड़नी चाहिए। यह काम थोड़ा या छोटा नहीं है। इसे अब तक जिस लगन एवं तत्परता से किया गया है उसमें कमी नहीं आना चाहिए। कमी आने पर 60 वर्ष का प्राण-पण से किया गया परिश्रम बेकार हो जायेगा।

अब तक जो किया गया है वह एक स्थूल शरीर का प्रतिफल है वह शरीर अब जवाब दे रहा है। आयु 75 वर्ष हो जाने पर जराजीर्ण स्थिति का प्रभाव प्रत्यक्ष दीखने लगा है। एक आसुरी आक्रमण छुरा लेकर हो चुका है। बारह भयंकर घाव उसने हँसते-हँसते झेल लिए। पर इससे आगे कोई और आक्रमण न होंगे इसकी क्या गारण्टी? असुरता को जहाँ से भी अपने लिए खतरा दीखता है वहाँ वह चढ़ दौड़ती है। उसके आक्रमण स्थूल शरीर पर ही तो होते हैं। जरा-जीर्ण 75 वर्ष का शरीर इस या उस प्रकार के आक्रमणों को सहन करता ही रहेगा, इसकी कोई निश्चिन्तता नहीं। फिर अत्यधिक परिश्रम में जिसे संलग्न रहना पड़ा है वह उसी मुस्तैदी से अगले कितने दिन काम करता रहेगा, इसका कोई भरोसा नहीं। एक ओर यह गिरती दशा दूसरी ओर बढ़ता हुआ काम और उसकी बढ़ती हुई जिम्मेदारियों को देखते हुए निराशा होती है और आशंका होती है कि कहीं ऐसा न हो कि छकड़ा बीच में ही चरमरा जाय, गाड़ी पटरी से उतर जाय। यदि ऐसा हुआ तो 60 वर्ष की उपलब्धियाँ हाथ से निकल जायेंगी। यह इतनी बड़ी हानि है जिसकी क्षतिपूर्ति सहज ही न हो सकेगी।

सूक्ष्मीकरण का एक वीरभद्र इसलिए सुरक्षित रखा गया है और प्रशिक्षित किया जा रहा है कि जराजीर्ण शरीर का स्थान ग्रहण कर सके। गुरुदेव का वर्तमान शरीर न रहे अथवा और भी अधिक दुर्बल हो जाए तो 24 लाख व्यक्तियों को जो प्रेरणापूर्ण मार्गदर्शन चाहिए उसमें किसी बात की कमी न पड़ने पावे। प्रस्तुत प्रज्ञा परिवार अपने आपको अनाथ अनुभव न करे। इन सभी गाड़ियों में एक रक्त संचार होता रहना चाहिए। समय से पहले यह प्रबन्ध होना चाहिए कि धड़कने वाला वर्तमान तन्त्र यदि अपनी हरकत बन्द कर दे तो उसका स्थानापन्न तत्क्षण उस स्थान पर फिट किया जा सके। सच तो यह है कि उस नए प्रतीक से काम लेना अभी से आरम्भ कर दिया गया है। विगत बसन्त पर्व से उसे एक प्रकार से पूर्ण अवकाश दे दिया गया है। एकान्त सेवन, मौन साधना, किसी से न मिलना, जो शारीरिक गतिविधियाँ अभी भी हो सकती थीं उन सबसे निवृत्ति लेने का तात्पर्य यही है कि जराजीर्ण शरीर को पूर्ण अवकाश देकर उसके स्थान पर नव-निर्मित वीरभद्र को प्रशिक्षित किया जाय और देखा जाय कि वह अपना नवीन उत्तरदायित्व ठीक तरह निभा सक रहा है या नहीं। प्रसन्नता की बात है कि इस नवीन शरीर ने इतनी जल्दी अपनी जिम्मेदारियाँ उठाना आरम्भ कर दिया है, जिसकी कि आशा नहीं थी। चौबीस लाख परिजनों की देखभाल उनकी उलझी समस्याओं का समाधान, आवश्यक क्षमता की नई माँग को पूरा करना, मार्गदर्शन विश्वास में कभी न पड़ने देना, हिम्मत हारने न देना, यह कार्य नवीन शरीर को सौंपे गये थे और 6 महीना होते-होते उसने वे सभी कमियाँ पूरी कर ठीक तरह अंजाम देना शुरू कर दिये हैं। मनुष्य का बच्चा 6 महीने की अवधि में कुछ भी नहीं सीख पाता। पशुओं के बछड़े भी इतने कम समय में कुछ सीख नहीं पाते। कुछ पक्षियों में यह बात जरूर देखी गई है कि वे छह महीने में स्वावलम्बी हो जाते हैं पर अपने नए बच्चे उत्पन्न करने और पालने में वे भी समर्थ नहीं होते,किन्तु सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न एक वीरभद्र चौबीस लाख पेड़ पौधों वाले उद्यान की ठीक तरह रखवाली ही नहीं सिंचाई भी करने लगा। यह आश्चर्य की बात भी है और प्रसन्नता की बात भी। आशा की गई है कि अगला बसन्त आने तक यह वीरभद्र पूर्ण प्रौढ़ हो जायेगा और पुराने स्थूल को पूर्णतया छुट्टी मिल जायेगी। उसे किसी से वार्ता तक न करनी पड़ेगी। कोई किसी प्रकार की आशा उससे न रखेगा। मोहवश कोई कभी उसके दर्शन-झाँकी करना चाहे तो उतने भर की छूट भले ही मिल सके। जिम्मेदारियाँ सम्भालने और पराक्रम करने का काल इस नए उत्पादन द्वारा ही होने लगेगा। कोई भाग्यवान बुड्ढे ही यह आनन्द भोग पाते हैं कि निवृत्ति की चारपाई पर पड़े रहें और उनके प्रौढ़ बच्चे सारा काम धन्धा सम्भालने लगे। गुरुदेव का जराजीर्ण शरीर आगामी बसन्त तक पूरी तरह इस स्थिति में पहुँच जाएगा कि उन्हें पिछले 60 वर्षों से किये जाते रहे घनघोर परिश्रम में से एक भी न करना पड़े। साथ ही काम में राई रत्ती भी फर्क न पड़े। इतना ही नहीं बढ़ी हुई जिम्मेदारियों का निर्वाह और भी अच्छी तरह होने लगे।

जितने प्रज्ञा परिजन अब हैं, उतने ही सीमित रहें यह नहीं हो सकता। अब उनकी संख्या बढ़ेगी। साथ ही उनकी आवश्यकताओं में भी अभिवृद्धि होगी। उनके कन्धों पर नई जिम्मेदारियाँ महाकाल के द्वारा सौंपी जायेंगी। फिर उनकी प्रौढ़ता भीतर से उमंगें मारेंगी। ऐसी दशा में नये काम करने होंगे और उनकी मात्रा भी बढ़ी-चढ़ी होगी। साथ ही नई समस्याएँ भी सामने होंगी और वे अपना समाधान खोजने के लिए किसी का सहारा तकेंगी। प्रज्ञा परिजनों की व्यक्तिगत समस्याओं में गुरुदेव का योगदान अभी तक चलता रहा है। जिनसे नवसृजन का नया काम लेना है वे बैल घास भी माँगते हैं। उन्हें लोकमंगल के लिए सार्वजनिक सेवा करने की क्षमता तो चाहिए ही, साथ ही उन्हें व्यक्तिगत सहायता देने का क्रम भी चलता रहता है। 24 लाख प्रज्ञा परिजन अगले वर्षों में 48 लाख या 50 लाख भी हो सकते हैं। इनमें से कुछ तो बिल्कुल ही नौसिखिये होंगे। उनसे सार्वजनिक काम कम बन पड़ेगा किन्तु निजी उलझनों के समाधान, निजी कठिनाइयों में सहायता अधिक मांगेंगे। इन्हें प्रोत्साहन मार्गदर्शन ही नहीं, प्यार दुलार का सहयोग देने और हाथ बँटाने की आवश्यकता अब की अपेक्षा अगले दिनों और भी ज्यादा होगी। सूक्ष्मीकरण से उत्पन्न चौथे वीरभद्र को प्रस्तुत एवं भावी प्रज्ञा परिजनों को दृष्टि से अधिक समर्थ बनाने के लिए सुरक्षित छोड़ दिया है।


स्थूल शरीर की वर्तमान एकान्त साधना

अध्यात्म स्तर की सामर्थ्य अर्जित करने के लिए तपश्चर्या ही प्रमुख उपाय है। सिद्ध पुरुषों की जेब खाली नहीं होती। वे बहुत कुछ संग्रह कर चुके होते हैं। उसी भण्डार में से खर्च भी करते रहते हैं। इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि पिछले संग्रह से ही काम चलता रहेगा उन्हें नई तपश्चर्या करनी होती है। आरम्भिक साधक साधना करते हैं। इसके लिए उन्हें अनुभवी पारंगतों से मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त करना होता है। ऋषि कल्प सिद्ध पुरुष इस स्थिति से आगे बढ़ चुके होते हैं। वे बिना सहारे के अपने पैरों खड़े हो सकते और चल सकते हैं। जो रास्ता कई बार चल कर देखा है उसके लिए मार्ग पूछने की तो आवश्यकता नहीं पड़ती। पर पूँजी संचित रखने और भण्डार बढ़ाने के लिए करना तो कुछ उन्हें भी पड़ता है। ऋषि निश्चिन्त नहीं हो जाते तपश्चर्या में संलग्न उन्हें भी रहना पड़ता है। वे आगे के महत्वपूर्ण कार्य इसी संग्रह के आधार पर सम्पन्न करते रहते हैं।

गुरुदेव की प्रथम साधना 24 वर्षों में 24 गायत्री महापुरश्चरण पूरे करने पर सम्पन्न हो गई थी, पर इसके बाद भी प्रातः 1 बजे से 5 बजे तक 4 घण्टे का साधना क्रम उस समय से लेकर अब तक अनवरत रूप से चलता रहा। यदि निर्धारित पुरश्चरणों को करने के उपरान्त वे शान्त बैठ गए होते तो प्रज्ञा परिवार के लाखों व्यक्तियों को नव सृजन के लिए नई सामर्थ्य दे सकना सम्भव ही न हुआ होता। फिर परिवार बनाया बसाया है, उसे काम सौंपना ही एक काम नहीं है। उनकी निजी आवश्यकताएँ भी हैं। उनकी पूर्ति के लिए तपश्चर्या का नया सिलसिला भी जारी रखना होता है। इसके बिना आये दिन की चित्र-विचित्र आवश्यकताओं की पूर्ति कहाँ से हो? कैसे हो?

अब तक विनिर्मित प्रज्ञा परिवार द्वारा जो महत्वपूर्ण कार्य कराये गए हैं या कराये जाने हैं, उनका ही उत्तरदायित्व प्रधान था। अब प्रज्ञा परिवार के अतिरिक्त करोड़ों को नई प्रेरणा एवं नई चेतना देना है। अब तक जो हुआ है वह सीमित था। इसके आगे जो किया जाना है वह असीम होगा। स्पष्ट है कि इस निमित्त तपश्चर्या की पूँजी का भी अधिक नियोजन करना होगा।

सूक्ष्मीकरण से उत्पन्न चार वीरभद्रों को असाधारण काम सौंपे गए हैं। उनके लिए खुराक कहाँ से आए? इसके निमित्त एक पाँचवाँ वीरभद्र विशुद्ध तपश्चर्या में ही निरत रहेगा। चारों में से कोई दुर्बल तो नहीं पड़ रहा है ? किसी के कन्धे पर इतना वजन तो नहीं हो गया जो उससे उठ नहीं रहा हो। इसकी देखभाल करना भी एक बड़ा काम है। इसके लिए एक इकाई को विशुद्ध रूप से तप साधना में ही निरत रहने की आवश्यकता पड़ेगी।

इस प्रकार की उपयुक्त तप साधना के लिए हिमालय ही उपयुक्त स्थान है। मात्र गंगा तट एवं देवभूमि होने के कारण ही नहीं उस क्षेत्र में सिद्ध पुरुषों का जमघट भी है। सूक्ष्म शरीर की विशिष्ट तपश्चर्या उसी क्षेत्र में सम्भव है। विशिष्ट सिद्धियाँ, विभूतियाँ वहीं उपार्जित की जाती हैं।

अब तक गुरुदेव को तीन बार थोड़े-थोड़े दिनों के लिए हिमालय आना-जाना पड़ता रहा है। वे स्थूल शरीर समेत जाते रहे हैं। इसलिए उन सब साधनों का प्रबन्ध करते रहे हैं जिनकी शरीर को आवश्यकता पड़ती है। साधक स्थूल शरीर से साधना करते हैं। उसे जीवित रखने के लिए अन्न, जल, निद्रा, सुरक्षा आदि सभी की जरूरत पड़ती है। उन्हें भी उस सामग्री का प्रबन्ध करना पड़ता रहा है। गंगोत्री, गोमुख, तपोवन, शिवलिंग क्षेत्र में कई योगी, तपस्वी पाए जाते हैं। वे कठिन साधना तो करते हैं पर शरीर रक्षा के लिए आवश्यक निर्वाह सामग्री का प्रबन्ध करते हैं। किन्तु सिद्ध पुरुषों की स्थिति दूसरी होती है। उनका स्थूल शरीर नहीं सूक्ष्म शरीर साधना करता है। सूक्ष्म शरीर को अन्न जल की, सर्दी गर्मी से बचाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। दादा गुरू की स्थिति ऐसी ही है। अन्य कितने ही सिद्ध पुरुष हिमालय के हृदय केन्द्र में रहते हैं। उनके लिए निर्वाह का कोई उपकरण नहीं चाहिए। बचपन, यौवन, वृद्धावस्था, मरण यह सभी स्थूल शरीर से सम्बन्धित हैं। जिनकी स्थिति सूक्ष्म शरीर में रहने की है, वे वायुभूत होते हैं। आवश्यकतानुसार अपने पुरातन अभ्यस्त शरीर में कभी-कभी को दर्शन दे सकते हैं, पर उसमें भी वे बँधे नहीं रहते। थियोसोफिकल सोसायटी की मान्यता के अनुसार ऐसे कितने ही सिद्ध पुरुष हिमालय में रहते हैं। उनकी तप साधना, अपने निज के लिए नहीं होती, वरन् ईश्वरीय प्रयोजनों में से जो जब उन्हें पूरे करने होते हैं उनके लिए आवश्यकता शक्ति संग्रहित करने के लिए वे ऋषि कल्प साधक सतत् साधना करते रहते हैं। उसके लिए भी वे बाधित नहीं होते। स्थूल शरीर धारियों को जिस प्रकार शरीर धारण की दिनचर्या करती रहनी पड़ती है। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर धारियों का अपना समय क्षेप करने के लिए इच्छानुसार साधनायें करती रहनी होती हैं। ऐसा वे अभाव की पूर्ति या कामना के लिए नहीं करते। वह उनका सात्विक स्वभाव या विनोद होता है। जहाँ भी रुचिकर स्थान अनुकूल पड़ता है वहाँ रम जाते हैं। कोई कुटी, गुफा आदि निश्चित नहीं करनी पड़ती।

अब तक गुरुदेव का हिमालय आवागमन का सिलसिला चलता रहा है। वे दादा गुरू की सिद्धियों का प्रसाद प्राप्त करते और अपना काम चलाते रहे हैं। अब उस प्रयोजन को उनका अपना पाँचवाँ सूक्ष्म शरीर ही पूरा कर दिया करेगा। एक गृह स्वामी कमाता है और उसी से पूरे परिवार का निर्वाह होता रहता है। भविष्य में पाँच शरीरों का समुच्चय ही गुरुदेव का पूरा परिवार होगा। इसमें नाती-पोते, बाल-बच्चे भी बहुत होंगे। इसके लिए कमाने वाला वीरभद्र एक होगा, जो हिमालय के गुह्य केन्द्र में एकाकी रहेगा।

यह क्रम अभी से आरम्भ कर दिया गया है। स्थूल शरीर की कम से कम खींचतान हो- उसकी गतिविधियाँ पाँचों सूक्ष्म शरीर के प्रयासों में बाधक न बनें, इसलिए एकान्त सेवन, एकान्त निर्वाह का अभ्यास किया गया है। इन दिनों यही क्रम चला है। स्थूल शरीर रहेगा तो सही पर वह एक तरह से निरर्थक ही समझा जाना चाहिए। आवश्यकता उसकी इतनी भर है कि पाँचों सूक्ष्म शरीरों का संचालन क्रमबद्ध रूप से चलता रहे। किसी में कोई गड़बड़ी पड़ती हो तो उसे सम्भाला सुधारा जा सके। पाँचों शरीरों को एक सूत्र में बाँधे रहने भर के लिए वर्तमान स्थूल शरीर की आवश्यकता समझी गई है। जब प्रतीत होगा कि ऐसी कोई आवश्यकता शेष नहीं रही तो प्रस्तुत शरीर को छोड़ा भी जा सकता है अथवा इच्छानुसार रखा भी जा सकता है।

सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया अति कठोर है। एक को पाँच में विभाजित करना सरल नहीं है। इस कठिन प्रयोजन की पूर्ति में गुरुदेव इन दिनों लगे हुए हैं इसलिए हर किसी को विक्षेप डालने के लिए मना किया गया है। जिन्हें कौतुक कौतूहल वश दर्शन-झाँकी की बहुत ललक है उन बाल-बुद्धि वालों को यही समझा दिया जाता है कि महान प्रयोजन पूरे होने हैं, इसमें विक्षेप डालने की बालहट न करें।

गुरुदेव से मिलना-जुलना कब से आरम्भ होगा। इस संदर्भ में पिछले वर्षों जैसी स्थिति आने की आशा अब इस जीवन में कभी भी नहीं करनी चाहिए। अधिक से अधिक इतनी आशा की जा सकती है कि पांडिचेरी के अरविन्द घोष या अरुणाचलम् वाले रमण महर्षि जिस प्रकार कभी-कभी दर्शन दिया करते थे, पर रहते मौन ही थे, वैसी स्थिति का सुयोग बन जाय। पर अभी निश्चित कुछ भी नहीं है। न कुछ घोषित किया जा रहा है?


भगवान को प्राप्त करने का सुनिश्चित मार्ग

भगवान को प्राप्त करने में दो बड़े व्यवधान हैं। इन्हें पार कर लिया जाय तो समझना चाहिए कि मंजिल पार हो गयी। गीता में भगवान ने कहा है-

मय्येव मन आधत्स्व; मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिस्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्व न संशयः॥

अर्थात्- “मुझ में अपना मन रख, अपनी बुद्धि को भी मुझ में सँजो। इन दो कामों को कर लेने के उपरान्त है पार्थ! तू मुझ में ही समा जाएगा, इसमें सन्देह नहीं है।”

मन और बुद्धि ये दो वैतरणियाँ ऐसी हैं जिन्हें लोग सामान्यतया पर नहीं कर पाते। इन्हीं में डूब जाते हैं। पार ही न कर पाये तो भगवान तक पहुँचना कैसे हो? यह कैसे होता है, इसे समझने के लिये मानव मनोविज्ञान व उसमें घुस-पैठ करने वाली विकृतियों पर दृष्टि डालनी होगी।

असंस्कृत मन सतत् वासना, तृष्णा और अहन्ता में ही डुबकी मारता रहता है। इन्द्रियाँ उसे तरह-तरह के रस लोभों में ललचाती रहती हैं। इसके अतिरिक्त मनोविकार उस पर छाये रहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर ये दुर्गुण उसके स्वभाव हैं। जन्म-जन्मान्तरों की अभ्यस्त पशु-प्रवृत्तियाँ एक-एक करके उछलती मचकती रहती हैं। इनमें उसकी चंचलता हर घड़ी बनी रहती है। क्षण भर के लिये स्थिरता नहीं मिलती। कामनाएँ असीम हैं। उनकी पूर्ति का प्रयास सफल होता नहीं। आग में ईंधन डालने से वह और भी अधिक भड़कती है। पानी मिले तो बुझने की बात बने। पर वासनाएँ तो तेल वाले ईंधन का काम करती हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिये प्रयत्न किया गया वह पूरी होने के पूर्व ही नई कामना जग पड़ती है। जब तक अभाव है तब तक ललक लिप्सा है। यह अभाव सतत् बना रहता है। क्योंकि जैसे ही उसकी तृप्ति का सुयोग बनता है, उससे पूर्व ही नई उपज उठकर खड़ी हो जाती है। धन, यश, पद, बल आदि में से एक भी ऐसा नहीं, जिसकी सीमा मर्यादा हो। अमुक मात्रा में अमुक-अमुक वस्तुएँ मिल जायेंगी तो मन भर जाएगा, ऐसा कहाँ होता है?

पूर्व कल्पना की आकाँक्षा जब तक पूरी नहीं होती है, तब तक उसके लिए ललक बनी रहती है। जैसे ही वह पूरी होने के समीप आती है उससे पूर्व ही नई इच्छा इससे भी बड़ी जग पड़ती है। यह सिलसिला चलता ही रहता है। यह एक नहीं, पर व्यक्ति के साथ ही गुजरने वाला सिलसिला है। वस्तुतः इस संसार में आज तक किसी की भी मनोकामना पूर्ण नहीं हुई। आज जितना चाहा गया है, कल उससे भी बड़ी इच्छा सामने होगी। यह तो शेख-चिल्ली के स्वप्न की कथा प्रसंग के समान है अथवा सर्व मनोकामना सिद्धि करने वाले कल्पवृक्ष की कथा गाथा की एक झलकी। जब तक इच्छा पूरी नहीं होती तब तक अभावजन्य दुःख बना रहता है। जैसे ही इच्छित सामग्री मिलती है, वैसे ही उसकी रखवाली का, क्या उपयोग करना है, कहाँ करना है, इसकी योजना बनाने की हैरानी आ खड़ी होती है। यह जंजाल निपट नहीं पाता कि इससे अधिक पाने की चाहना उपज पड़ती है। इस प्रकार मन को कभी चैन नहीं। हर घड़ी वह भूत, पिशाच की तरह अतृप्त ही बना रहता है। ऐसा अशान्त-अस्थिर मन लेकर कोई शान्ति के सागर भगवान की शरण में बस सके, यह सम्भव नहीं।

इसके लिये प्रथम मंजिल यही पार करनी पड़ती है कि मन को तृष्णा रहित किया जाय। शरीर यात्रा के लिए जितना आवश्यक है, उतना ही यथेष्ट मानकर उतने में ही सन्तोष किया जाय। औसत नागरिक को जितने में काम चलाना पड़ता है, अन्न-वस्त्र और निवास की न्यूनतम आवश्यकताओं को जितने में पूरा किया जाता है, उतने में उसे पूरा किया जाय। सन्तोष सबसे बड़ा धन है। भगवत् भक्त को अपरिग्रही बनना पड़ता है। संग्रह से मुँह मोड़ना पड़ता है। ललक और लिप्सा को शत्रुवत मानना होता है। वासना, तृष्णा और अहन्ता को प्रारम्भ से ही त्यागना पड़ता है। इतना किए बिना मन की एकाग्रता सम्भव नहीं। एकाग्रता बिना निष्ठा कहाँ? जहाँ एक निष्ठा नहीं, वहाँ भगवान का सान्निध्य सम्भव नहीं। इसलिए कठोपनिषद् कहता है- तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा। (4ः8) अर्थात्- “इस ज्ञान (परमात्मा सम्बन्धी) का आधार तप, दम एवं निस्वार्थ कर्म है।” आगे कठोपनिषद् कहता है- (1,3,12)- “दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः- “जो सूक्ष्म सत्य को देख सकते हैं, उन साधकों के एकाग्र मन अवश्य ही आत्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं।

श्रुति के निर्देशानुसार इसी कारण भगवत् भक्तों को साधु और ब्राह्मण की तरह रहना पड़ता है। लक्ष्य दोनों का ही एक है। उसकी पूर्ति के लिए मन ही सबसे बड़ा औजार है। उसे खाली रखना होता है। तभी तो आदर्शवादी उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए आवश्यक कार्य करने का अवसर मिलता है। मन को वश में करने एकाग्र चित होने का तात्पर्य इतना ही है कि शरीर यात्रा के लिए जितने न्यूनतम में गुजारा हो सकता है, उतने से ही गुजारा किया जाय। आकाँक्षाओं का पोटला सिर पर न लादा जाय। मन को बस में करने का यही एक तरीका है। जिसकी महत्वकांक्षाऐं बढ़ी-चढ़ी हैं, वह मन को न तो एकाग्र कर सकता है और न ही एकनिष्ठ कोई न कोई कामना उठती फुदकती रहेगी।

मन के उपरान्त दूसरा आधार है- बुद्धि। बुद्धि को निर्णय करना पड़ता है कि क्या करें, क्या न करें? इसके लिए उसे इर्द-गिर्द के वातावरण की साक्षी चाहिए, जो चारों ओर हो रहा है। जो समीपवर्ती लोग कर रहे हैं उसी को बुद्धि सही मान लेती है। स्वतन्त्र निर्णय करने के लिए बुद्धि को बहुत साहसी होना चाहिए। बिना बहुमत की साक्षी के एकाकी निर्णय की अकेले चलने की साहसिकता होनी चाहिए। वैसी किन्हीं बिरलों में ही होती है अन्यथा लोग अन्धी भेड़ों की तरह एक दूसरे की नकल करते रहते हैं। पड़ौसी नशा पीते हैं तो अपनी बुद्धि भी उसी का अनुकरण करती है। विवेक के अभाव में यह जाँच पड़ताल नहीं हो पाती कि यह लोग इस दुर्व्यसन द्वारा अपने शरीर, धन, यश, घर और सन्तान का कितना अहित कर रहे हैं। ऐसी दशा में हमें उनकी नकल क्यों करनी चाहिए। कुरीतियों के अनुकरण में हर दृष्टि से हानि ही हानि है। विवेक कहता है कि जिनका अनुकरण करने को जी कर रहा है, उनने गलत मार्ग अपनाकर हानि ही उठाई है। ऐसी दशा में स्वतन्त्र प्रखर बुद्धि का अवलम्बन क्यों न लिया जाय? जो उचित है उसी को क्यों न अपनाया जाय?

आज ऐसी प्रखर बुद्धि वालों का अभाव है। कुमार्ग पर चलकर तुरन्त लाभ उठाने वालों की ही संसार में भरमार है। बस, वे ही सब कुछ दीखते हैं। वे ही गवाह हैं, जिनके आधार पर बुद्धि फैसला करती है। अपनी भ्रमग्रस्त बुद्धि झूठे गवाहों की उपस्थिति में वैसा ही निर्णय भी लेती है अन्धी भेड़ें एक के पीछे एक चलती हैं और खड्डे में गिरती जाती हैं। यही स्थिति अपनी बुद्धि की भी है। स्वतन्त्र बुद्धि से विवेक पूर्ण निर्णय लेने वाले और जो उचित है, उसी को अपनाने वाले इस दुनिया में कम ही हैं, जिन्हें आत्मा और परमात्मा दो की गवाहियाँ ही पर्याप्त होती हैं। जिन्हें महापुरुषों का अपनाया हुआ मार्ग ही उचित प्रतीत होता है, भले ही उस पर उँगलियों पर गिनने लायक व्यक्ति ही चले हों, ऐसी प्रखर बुद्धि वाले इस संसार में कहाँ हैं?

बुद्धिमान उन्हें कहते हैं जो उचित और अनुचित का सही निर्णय कर सकें। ऐसी प्रखर बुद्धि को मेधा, प्रज्ञा एवं विवेक कहते हैं। जिन्हें यह प्राप्त है, वे सच्चे अर्थों में कहे जाने वाले बुद्धिमान भगवान तक सरलता पूर्वक पहुँच जाते हैं। अन्यथा वासना युक्त मन की तरह अन्धानुकरण करने वाली, बहुमत को ही सब कुछ मानने वाली बुद्धि ही एक खाई खन्दक है। ऐसे लोग बुद्धिमान कहलाते हुए भी वस्तुतः होते मूर्ख ही हैं।

कामनाग्रस्त मन और भ्रमग्रस्त बुद्धि जिन्हें मिली है, वे इन्हीं दो जाल-जंजालों में उलझे-फँसे रहकर चिड़िया, मछली, हिरन की तरह अपनी दुर्गति कराते रहते हैं। वैसी ही दुर्गति मलीन मन और दुर्बुद्धिग्रस्तों की होती है। इन दोनों को भगवान के बारे में सही सोचने का अवसर तक नहीं मिलता, फिर उसकी उपलब्धि कैसे हो? वे पूजा-पत्री, उपहार, मनुहार के खेल-खिलवाड़ करके भगवान को बहकाने-फुसलाने का प्रयत्न करते रहते हैं और उस विडम्बना को करते रहने पर भी खाली हाथ रहते हैं।

गीता में भगवान की उक्ति है कि मुझे निश्चित रूप से प्राप्त करने वालों को मन मेरी गोद में रखना चाहिए। बुद्धि मेरे आँचल में डालनी चाहिए। यह दो काम कर लेने के उपरांत मुझे प्राप्त कर सकना निश्चित रूप से सम्भव हो जाता है। जिसका मन भटकता है, जिनकी बुद्धि भ्रमित है, वे कर्मकाण्डों के बलबूते भगवान को प्राप्त कर सकें ऐसा कदापि सम्भव नहीं हो सकता। जिनका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार आदर्शों से समाविष्ट नहीं है, जिन्हें केवल क्रिया-कृत्य ही सब कुछ प्रतीत होते हैं, वे मृगतृष्णा में भटकते हैं। भगवान इतने भोले नहीं हैं कि वे मनुष्य का जीवन क्रम न देखें, केवल नाम-जप, धूप-दीप, नैवेद्य-अक्षत मात्र से प्रसन्न होकर किसी को अपना भक्त समझ लें और वह सद्गति प्रदान करें जो सच्चे भक्तों को प्राप्त होती है। गीता में कही हुई भगवान की उक्त ही उन्हें प्राप्त करने का सच्चा मार्ग है। जो मन और बुद्धि को उन्हें समर्पित करते हैं, उनका स्वल्प कर्मकाण्ड भी निश्चित रूप से उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति करा देता है।


झोलियों की अदला-बदली (kahani)

सृष्टि का निर्माण कार्य पूरा हो गया तो ब्रह्माजी ने सभी प्राणी बुलाये और उनकी संरचना में जो कमी रह गई हो उसे पूरा करा लेने के लिए कहा।

प्राणियों ने अपनी-अपनी कमियाँ बताईं। फलतः ब्रह्माजी ने किसी का पूरा किसी का अधूरा सुधार कर दिया।

अब मनुष्य की बारी आई। उनमें से पहले नारी को बुलाया गया। उसने कहा- मैं रूपवान् तो बहुत हूँ पर जब कभी अपने जैसी दूसरी किसी को देखती हूँ तो जल भुन जाती हूँ। ऐसी कृपा करें कि मेरी जैसी और कोई न हो।

ब्रह्माजी ने उसे सान्त्वना दी और एक दर्पण हाथ में थमा दिया। कहा- बस, एक ही सहेली तुम्हारे जैसी इस सृष्टि में रहेगी। जब इच्छा हुआ करे। इस पर दृष्टि डालकर उस सहेली से भेंट कर लिया करो। अन्यथा वह भी तुमसे ओझल रहेगी।

अब पुरुष की बारी आई। उसने कहा- मैं बुद्धिमान तो बहुत हूँ और भी आगे बढूं और ऐसा रहूँ जिसकी समता और कोई न कर सके।

ब्रह्माजी ने उसे दो झोलियाँ दीं और कहा- उन्हें गले से लटकाये रहना। दूसरों की विशेषतायें ढूंढ़ना और उन्हें आगे वाली झोली में भरते जाना। अपनी विशेषताओं पर ध्यान न देना- उन्हें दृष्टि से ओझल पीछे की झोली में रखना। तुम्हारी बुद्धिमता बढ़ती चलेगी।

मनुष्य प्रसन्न तो रहा, पर मात्र अपनी दृष्टि में। दूसरों ने उसे मूर्ख ही ठहराया। यह गड़बड़ झोलियों की अदला-बदली के कारण हो गई।


Quotation

मनुष्य मुक्ति के अपने लक्ष्य तक तो पहुँचना चाहता है किन्तु आत्म-परिशोधन की शत उसे मंजूर नहीं। भगवान को पाने का अर्थ है, उसकी विशेषताओं से अभिपूरित हो जाना। जब तक मन कामनाओं से, वासना-तृष्णाओं से मुक्त रहता है तब तक श्रेष्ठता के पथ पर कदम रख पाना कैसे संभव हो? स्वतन्त्र प्रखर बुद्धि ही विवेक का पथ चुनती है। जब तक मन और बुद्धि की इन दो वैतरणियों से मानव पार नहीं होता, वह भटकता ही रहता है। जो इन्हें भगवत् सत्ता को समर्पित कर देता है, उसे लक्ष्य प्राप्ति होकर ही रहती है।


ईश्वरार्पण अर्थात् श्रेष्ठता को अपनाना

आप जो सफलता प्राप्त करते हैं उसे ईश्वर अर्पण करें। इसका अर्थ होता है, जो मिला है वह ईश्वर की कृपा से मिला है। इससे वह अहंकार न होगा जिससे व्यक्ति घमण्डी हो जाता है और किये हुए पर अभिमान करने लगता है। अभिमानी व्यक्ति अपनी आँखों में बड़ा बनने की तो कोशिश करता है, पर दूसरों की आँख में उतना ही छोटा हो जाता है।

जो काम ईश्वर अर्पण किये जाते हैं वे अच्छे ही हो सकते हैं। कोई अपने माननीय मेहमान को जो परोसेगा, उसके बारे में पहले से ही ध्यान रखेगा कि वे शुद्ध और बढ़िया हों। ईश्वर अर्पण का ध्यान आते ही व्यक्ति सबसे पहले यह सोचता है कि जो काम अर्पित किये गये हैं वे उच्चकोटि के हैं या नहीं। सत्कर्म और ईश्वरार्पण कर्म एक ही बात है। बुरे काम करें और उन्हें ईश्वर को अर्पण करें ऐसा तो हो ही नहीं सकता।

जिस प्रकार बैंक में जमा कर देने पर राशि ब्याज समेत बढ़ती है और कुछ ही समय में कई गुनी हो जाती है। उसी प्रकार ईश्वरार्पण किये कर्म जितने किये गये थे उतने ही नहीं रहते वरन् कई गुने हो जाते हैं।

ईश्वर सत्कर्म ही ग्रहण करता है और उसे सत्कर्म ही समर्पित किये जाते हैं। सत्कर्म अर्थात् जन कल्याण के लिए किये गये काम। सत्कर्म माने वे काम जो उच्चस्तरीय और आदर्शवादी हों।

ईश्वर ने हमें इतना दिया है कि हम अपने कृत्यों का एक अंश यदि उसे समर्पित करते हैं तो उसके अनन्त अहसानों में से एक अंश चुकाते और हल्के होते हैं। ईश्वर श्रेष्ठता के समुच्चय को कहते हैं। श्रेष्ठता की अपने में अभिवृद्धि- इस संसार में सत्प्रयोजनों की अभिवृद्धि- इन सबका परिणाम होता है- लोककल्याण। लोक कल्याण से दूसरों का जितना भला होता है उससे अनेक गुना अपना होता है। क्योंकि परमार्थ से अपने ही गुण कर्म और स्वभाव की मात्रा बढ़ती है। यह लाभ अपने लिये ही तो हुआ। ईश्वरार्पण शब्द कह देने मात्र से कुछ बनता नहीं। ऐसे तो कोई दुष्ट दुरात्मा अपने पाप कर्मों के दण्डों से बचने के लिए जीभ की नोंक से यह कह सकता है कि किये हुए कर्म ईश्वर को समर्पित कर दिये। अब हमारे किये दुष्कर्मों का दण्ड ईश्वर भोगे। यह धूर्तता की चरम सीमा है। ऐसा ईश्वर समर्पण तो उलटा पापों का बोझ बढ़ाता है। ईश्वर भक्ति इस प्रकार नहीं हो सकती। ईश्वर भक्ति के लिए निर्मल मन चाहिए। निर्मल मन उन्हीं का हो सकता है जो पुण्यात्मा और परमार्थ परायण हैं। ईश्वर भक्ति के- उसके प्रति समर्पण भावना उत्पन्न होने के चिन्ह यही हैं कि मन, बुद्धि और चित्त में पवित्रता का परमार्थ परायणता का- श्रेष्ठ कर्म करने का भाव हो।

पूजा उपासना के किये गये उपचार इसी हेतु हैं कि धूप, द्वीप, नैवेध अक्षत, चन्दन, पुष्प आदि उपादेय पवित्र वस्तुएं भगवान को समर्पित करने का प्राथमिक समर्पण करने का अभ्यास करके अपने सद्गुणों की माला ईश्वर के गले में पहनावें और सत्कर्म करते हुए सच्चे अर्थों में ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करें।

उनकी पूजा पाखण्ड मात्र है जो करने को तो दुष्कर्म करते हैं, मन में दुर्गुण भरे रहते हैं। जो सोचते हैं कि नाम जप या पूजा उपचार का कुछ क्रिया-कृत्य करके भगवान को बहका लेंगे और अपने दुष्कर्मों के पापों को ईश्वर से क्षमा करा लेंगे।

पूजा उपचार का सीधा सच्चा तरीका एक ही है कि हम अपने कर्मों को इस योग्य बनावें कि वे ईश्वर को समर्पित कर सकने योग्य बन सकें। ईश्वर अर्थात् श्रेष्ठता उसके प्रति स्वयं को, अपने कामों को समर्पित करना- प्रकारान्तर से श्रेष्ठता को अपनाना ही है।


सम्पदा महानता के पीछे-पीछे चलती है।

स्वार्थ और परमार्थ में संघर्ष तब रहता है जब वे पृथक रहते, भिन्न दिशा अपनाते, विवाद में फँसते और परस्पर टकराते हैं। दोनों में एकात्मता पूर्णतया सम्भव है। पति-पत्नी की आकृति और प्रकृति भिन्न होती है। फिर भी जब तादात्म्य होते हैं तो अभिन्न बनते और दो शरीर एक प्राण होकर रहते हैं। आग और ईंधन के स्तर में भिन्नता स्पष्ट है तो भी वे जब घनिष्ठता स्थापित करते हैं तो अन्तर रहता ही नहीं। जलती लकड़ी में अग्नि देवता की समस्त विशेषताएँ मूर्तिमान दीखती हैं। दूध-पानी मिल कर एक भाव बिकते हैं। स्वार्थ और परमार्थ के बीच भी ऐसा ही तादात्म्य बन पड़ना पूर्णतया सम्भव है। उनकी सम्मिलित प्रक्रिया ऐसी हो सकती है। जिसके लौकिक सम्पदाओं और आत्मिक विभूतियों की उपलब्धि साथ-साथ होती चले।

महामानव न दरिद्र होते हैं न कंगाल। वे निर्धनों की तरह रहते भर हैं ताकि वे विलासिता और निष्ठुरता के लाँछनों से बच सकें। साथ ही खाने की अपेक्षा खिलाने में जो असाधारण आनन्द मिलता है उसका रसास्वादन कर सकें। आदर्शवादिता की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि वह सादगी के परिधान ही पहनती है। कारण कि शालीनता ने उसी की सराहना की है और मान्यता दी है। सम्पन्नता का लबादा इतना भारी है कि उसे ढोने में व्यक्तित्व की कमर टूटती है। सम्पदा की मदिरा पीकर आम आदमी बदहवासों की तरह उद्धत आचरण करता और बेतुके वचन बोलता है। दुर्व्यसनों के मक्खी-मच्छर इन्हीं मैले-कुचैले लोगों से चिपट पड़ते हैं। ईर्ष्या एक ओर चिकोटी काटती है तो सुरक्षा की चिन्ता में जहाँ-तहाँ जान बचाते फिरना पड़ता है। नरक में जोंकों का अस्तित्व है या नहीं, ठीक पता नहीं पर श्रीमन्तों के मित्र सम्बन्धी ही अपने-अपने ढंग से चूसने-निचोड़ने की घात लगाए बैठे रहते हैं। इस जंजाल में नासमझ ही फँसते हैं। समझदार समय रहते इस कुचक्र में फँसने से पूर्व ही किनारा कर लेते हैं और औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपना कर हँसती-हँसाती, खिलती-खिलाती जिन्दगी जीते हैं। परमार्थी पर कंगाली की लानत बरसती नहीं। वह तो उसकी स्वेच्छापूर्वक ओढ़ी हुई सन्त स्तर की चादर भर होती है।

परमार्थी बन सकना हर किसी के लिए सम्भव नहीं। इसके लिए उसे पूर्व भूमिका शालीनता की निभानी पड़ती है। जो संयमी होगा वही गाढ़ी पसीने की कमाई को अपव्यय से बचाकर परमार्थ में लगा सकेगा। समय, श्रम, मनोयोग और धन जैसे साधनों के द्वारा ही परमार्थ सधता है। वे उन्हीं के पास हो सकते हैं जो सादगी अपनायें और लिप्सा से बचें। यह सब अनायास ही नहीं बन पड़ता इसके लिए सद्गुणों का समुच्चय स्वभाव और अभ्यास में सम्मिलित करना पड़ता है। सूर्य एक होते हुए उसमें सात रंग की सात किरणें होती हैं। शील भी एक है पर उसके साथ उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, श्रमशीलता, जागरुकता, मितव्ययिता, सुसंस्कारिता, मर्यादा के सात सद्गुणों की शृंखला रहती है। जिसके पास इतनी विभूतियाँ हों वह अनगढ़ों जैसा दरिद्र कभी रह ही नहीं सकता, महामानवों में से किसी ने लाभकारी व्यवसाय नहीं किया तो भी न तो उन्हें निजी रूप से दरिद्रों जैसा कष्ट सहना पड़ा और न खर्चीली परमार्थिक योजना बना लेने पर भी अर्थ संकट के कारण कोई काम रुका। सद्गुण सम्पन्नता एक प्रकार की हुण्डी है जिसे कहीं भी भुनाया जा सकता है। परमार्थ परायणता की पृष्ठभूमि में सज्जनता की चरित्रनिष्ठा अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहती है। और वह इतनी बहुमूल्य है कि उसके रहते दरिद्रता का पास फटकना असम्भव है।

जिस सम्पदा के लिए स्वार्थी लोग निरन्तर पिसते-खटते और कर्म कुकर्म करते हैं फिर भी अभावों और संकटों का रोना रोते रहते हैं। वह सम्पदा महानता के पीछे छाया की तरह लगी रहती है और उपेक्षा बरतने पर भी विलग नहीं होती। गाँधी, बुद्ध से लेकर सुदामा, नरसी तक किसी को धन का अभाव नहीं अखरा। शंकराचार्य, विवेकानन्द, चाणक्य, समर्थ, नानक, दयानन्द, प्रताप, शिवाजी आदि ने अपने-अपने समय में खर्चीली योजनाएँ हाथ में लीं और इस प्रकार पूरी कर दिखाईं मानों उनके पास पहले से ही कारूं का खजाना जमा रहा हो। सुग्रीव, विभीषण को सिंहासनारूढ़ कराने में उनका पराक्रम नहीं सौजन्य ही काम आया। लिंकन और वाशिंगटन की जन्मजात दरिद्रता से सभी परिचित हैं पर वे उस स्थिति में पड़े नहीं रहे। अपनाई गई महानता ने उन्हें राष्ट्रपति पद पर आसीन कराने के बाद ही दम लिया। शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने में उनकी योग्यता नहीं विशिष्टता ही काम आई।

इस दुनिया में प्रामाणिकता एक प्रकार से उठ गई है। फिर भी उसकी सर्वत्र प्यास और माँग है। बुरे लोग भी अच्छे साथी चाहते हैं। बेईमान मालिक को भी ईमानदार नौकर चाहिए। व्यभिचारी पिता भी अपनी कन्या को सदाचारी के हाथों सौंपना चाहता है। नशेबाज भी चाहते हैं कि उनकी सन्तान नशा न पिये। सारा संसार भी यदि असत्य आचरण करने लगे तो भी सत्य अकेला अपने पैरों खड़ा रह सकता है और समूचे बहुमत को दुत्कार कर भगा सकता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखने से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रामाणिकता कितनी मूल्यवान है। उस पर हजार टोकरे भरकर हीरे निछावर किये जा सकते हैं। प्रामाणिकता अपने चारों ओर विश्वास का वातावरण बनाती है। सच्चा सम्मान ऐसे ही लोगों के लिए सुरक्षित है जिन्हें प्रामाणिक समझा और भरोसा किया जा सकता है। ऐसे लोग हर उपयुक्त स्थान पर फिट बैठते हैं। जिम्मेदारी के काम प्राप्त ही नहीं करते, उन्हें पूरा करके भी दिखाते हैं। फलतः उन्हें एक से एक बढ़कर बड़े काम सम्भालने का अवसर मिलता है। इसी पदोन्नति क्रम पर चलते हुए वे उन्नति के चरम शिखर तक जा पहुँचते हैं।

प्रामाणिकता की प्रतीति कैसे हो? किसी के व्यक्तिगत जीवन में कोई कैसे प्रवेश करे? चिन्तन और चरित्र की गहराई में उतरकर किसी की यथार्थता समझने-परखने की फुरसत किसे है? इस पर भी हर किसी का मन शंकाशील रहता है कि संपर्क में आने वाला व्यक्ति प्रामाणिक है या नहीं? जब तक इस सम्बन्ध में किसी निश्चय पर न पहुँचा जाय तब तक भरोसा कैसे हो? उसके बिना बड़ा काम सौंपने और बड़ा सहयोग देने के लिए कोई क्यों तैयार हो? इन सभी असमंजसों का निराकरण व्यक्ति की दृश्यमान परमार्थ परायणता से ही हो सकता है।

इस रहस्य का पता दुर्जनों ने भी लगा लिया है और वे छद्म के रूप में परमार्थी सेवाभावी का आवरण ओढ़ कर लोगों को ठगने फुसलाने में लगे रहते हैं। इन दिनों धर्म-ध्वजियों, देशभक्तों, सुधारकों, लोकसेवियों की बड़ी धूम है। अभिनेताओं से अधिक संख्या में स्वयंभू नेताओं का समुदाय बढ़ता चला जाता है। उनके द्वारा लोक सेवा के नाम पर रचे हुए आडम्बर भी देखते ही बनते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? वस्तुस्थिति से सर्वथा विपरीत यह आडम्बर दिन-दिन क्यों गगनचुम्बी होता जा रहा है? इसका एक ही उत्तर है कि लोगों को अपने बारे में लोक सेवी होने का विज्ञापन किया जाय और उस आधार पर प्रामाणिक समझे जाने का लोक मानस बनाया जाय। इतना बन पड़ा तो उन्हें समझना चाहिए कि सहयोगी विश्वस्त बढ़ेंगे और उनका निजी व्यवसाय चल पड़ेगा। ऐसे कितने ही नये वकील और हकीम आमतौर से किसी संस्था के प्रमुख बनते और आदर्शवादी सेवा भावी के रूप में अपना परिचय परिकर बढ़ाते रहते हैं। इस चतुरता के आधार पर वे बहुत करके अपना अभीष्ट उद्देश्य पूरा करते भी देखे गए हैं।

यह परमार्थ के आडम्बर की चर्चा हुई। यदि वह वास्तविक है तब तो उसे बहुमूल्य सच्चा हीरा ही समझा जाना चाहिए। सोचा जा सकता है कि जब काँच का नग धूम में हीरे जैसा चमक सकता है और दर्शकों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न कर सकता है तो असली हीरे का हार कितना आकर्षण एवं बहुमूल्य होगा। परमार्थ परायणता को यदि स्वार्थ की कसौटी पर कसा जाय तो भी वह खरा सिद्ध होता है। महामानवों में से प्रत्येक का दो प्रकार से विश्लेषण किया जा सकता है। एक वह रूप जिसमें वे अन्यान्यों की तरह स्वार्थरत रहकर परमार्थ से सर्वथा दूर रहे होते हैं। दूसरा वह जिसमें उनने सेवाधर्म अपनाया और घाटा सहा। दोनों की अन्तिम परिणति का भी अनुमान लगाया जा सकता है कि किसने क्या खोया और क्या पाया? स्वार्थ परायणों ने जो कमाया, उसकी तुलना में परमार्थ परायणों का उपार्जन हर दृष्टि से हजारों गुना अधिक रहा। गाँधी, नेहरू, पटेल, मालवीय यदि वकील का धन्धा भर अपनाये रहते तो वे वह सब कहाँ पाते जो उनने परमार्थ परायण होने के बदले पाया।

श्रेष्ठ कार्यों के लिए यों सदा ही शुभ दिन है। पर कभी ऐसे समय भी आते हैं जब राई रत्ती परमार्थ पर्वत जितने सत्परिणाम उत्पन्न करते हैं। ऐसे संयोगों की लाटरी खुलने से संगति बिठाई जाती है गिलहरी ने तनिक सी बालू समुद्र में डाली थी पर वह विशिष्ट अवसर की सूझ इतिहास प्रसिद्ध हो गई। शबरी के बेरों, सुदामा के तन्दुलों का बाजारू मूल्य नगण्य जितना है फिर भी उपयुक्त समय पर उपयुक्त अधिकारी के हाथों सुपुर्द किये जाने के कारण वे तनिक से अनुदान लोक चर्चा के विषय बने। रीछ-बावरों का, ग्वाल-बालों के श्रम सहयोग का बाजारू मूल्य मुट्ठी भर ही आँका जा सकता है पर वह ठीक समय पर, ठीक प्रयोजन के लिए लग पड़ने से अमर गाथा बन गया। इसी को कहते हैं समय की पहचान और उपयुक्त अवसर पर प्रस्तुत किया गया अनुदान।

चर्चा का आरम्भ स्वार्थ सिद्धि से किया गया था व यह बताया गया कि परमार्थ करते-करते स्वार्थ स्वयमेव निभ जाता है। इस वास्तविकता को जिनने भली-भाँति समझा हैं, उन्हें अनायास ही श्रेय साधन सहयोगी मिलते चले गए हैं। वे कभी घाटे में नहीं रहे, युग पुरुष के रूप में अपना नाम लिखा गये। यदि किसी को सही मार्ग चुनना हो तो उसके लिये भी यह राजमार्ग खुला है। कुँजी मात्र एक ही है- परमार्थ में ही अपना हित साधन।


Quotation

प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे उतरे सज्जनता के पक्षधर महान व्यक्तियों को सम्पदा के लिए कभी तरसना नहीं पड़ा। वह तो उनके पीछे छाया की तरह साथ चली और सम्पन्न बनाती चली गयी। दारिद्रय का चोला तो वे स्वेच्छापूर्वक ओढ़े रहते हैं। सम्पन्नता का नशा आम आदमी को बदहवास कर देता है, दुर्व्यसनों का उसे गुलाम बना देता है, पर समझदार जानते हैं कि परमार्थ नियोजन में ही उनका स्वयं का भी हित साधन है।


कार्लमार्क्स का साम्यवाद

एक युवक सिर झुकाये अपने काम पर तेजी से जा रहा था। रास्ते में एक मजदूर को दीवार पर पेन्ट करते देखा। युवक कुछ समय रुका और मजदूर के पास जाकर बोला- “दोस्त! इससे भी कम समय और कम रंग में इससे अच्छी रंगाई हो सकती है। क्या तुम उस तरकीब को सीखना चाहोगे।” मजदूर भौंचक्का रह गया। पास ही मालिक भी खड़ा था। दोनों ने कहा- “भाई ऐसी कोई तरकीब हो सकती है तो कर दिखाओ न”।

युवक आस्तीन ऊँची करके मजदूर का ब्रुश और रंग डिब्बा हाथ में लेकर काम पर जुट गया। शाम होने से पहले ही उसने अपनी बात सही सिद्ध करके दिखा दी। चलते समय मालिक ने इस युवक के हाथ में पारिश्रमिक और इनाम थमाया तो उसने उसे काम पर लगे मजदूर को दे दिया। कहा- करना तो इन्हीं को है- मैंने तो ऐसे ही थोड़ी अकल लगा दी।

यह युवक था- कार्लमार्क्स। जिसकी अकल ने दुनिया को अधिक अच्छी, कम समय और कम परिश्रम में बना देने की तरकीब बताई और वह साम्यवाद के रूप में सबके सामने आई।


जो दीन है सो प्रेमी कैसा?

योगी अरविन्द का कथन है- प्रेम में असीम बल होता है। वह किसी के सामने हारता नहीं। कठिनाइयाँ उसे झुकाती नहीं। परीक्षा का तापमान उसे गला नहीं पाता, चाहे कितना ही उग्र क्यों न हो?

सच्चे प्रेम में विरह की गुंजाइश नहीं। सच्चे से तात्पर्य है ईश्वरीय प्रेम। मानवी प्रेम स्वल्प होता है साथ ही आकाँक्षाओं से भरा हुआ। इन आकाँक्षाओं के मार्ग में अड़चन आती है उसी का नाम विरह होता है। जहाँ विरह के लक्षण उभर रहे हों, समझना चाहिए कि वह मानवी है। समझा उसे कुछ भी गया हो। ईश्वरीय प्रेम में जहाँ विरह आड़े आये समझना चाहिए वहाँ मानवी को ईश्वरीय समझने की भूल हुई है।

प्रेम में अनुदान की विपुलता होती है। प्रतिपादन की न उसने इच्छा होती है न शिकायत। भगवान से प्यार करने का तात्पर्य है उसकी दुनिया के पीड़ित पक्ष की सेवा करना। सेवा अपनी एकाँगी कृति है। उसे मनुष्य कभी भी- कितनी भी बार कर सकता है। उसे, जब जो जितना भी करता है उसका प्रेम उतनी ही परिपक्व होता जाता है। परिपक्व प्रेम स्वयं तो बलिष्ठ होता ही है साथ ही प्रेमी को भी शक्ति प्रदान करता है।

ईश्वरीय प्रेम अपने आपमें सामर्थ्य का पुंज है। वह मनुष्य से भी किया जा सकता है। व्यापक सत्ता से भी। आदर्शों से भी और उनसे भी जो उठाने में सहायता देने की अपेक्षा करते हैं। हर हालत में प्रेमी अपने कर्तृत्व पर गर्व करता है। उसे बल की अनुभूति होती है। कठिनाइयों में तपकर वह खरा उतरता और अधिक चमकता है। उसे प्रतिपक्ष से कुछ आशा नहीं होती क्योंकि वह स्वयं भी सामर्थ्यवान है।

प्रेम को स्वीकारा या सराहा नहीं गया, जो ऐसी इच्छा करता है उसी को प्रेम काँटों पर चलना प्रतीत होता है। विरह भी उसी को सहन करना पड़ता है। विरह और इच्छा एक ही बात है। प्रेम करने वाले इच्छा नहीं करते। वे सदा देने की बात सोचते हैं। क्योंकि सच्चे प्रेम में असीम बल होता है। जो स्वयं सामर्थ्य का पुंज है वह दूसरे से क्या माँगेगा और क्यों माँगेगा?

प्रेम का स्वरूप समझा जाना चाहिए और उसकी प्रकृति का अनुभव करना चाहिए कि वह देने के अतिरिक्त और कुछ चाहता ही नहीं। देने वाले के मार्ग में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता। करना चाहे तो भी यह सम्भव नहीं। क्योंकि प्रेम की सामर्थ्य असीम है। उसका जितना सुयोग किया जाय उतनी ही बलिष्ठता की अनुभूति होती है। ऐसी बलिष्ठता जो न हारती है और न शिकायत करती है।

विरह प्रकारान्तर से शिकायत करना है। जिससे जो चाहा गया था वह उसने उतनी मात्रा में नहीं दिया, इसी का नाम विरह है। जब लेने का, माँगने का, चाहने का प्रश्न ही नहीं तो कितना भी किया जायेगा आनन्द ही मिलता रहेगा। यह हो सकता है कि कम दिया गया हो, कच्चे मन से दिया गया है, तब आनन्द की मात्रा में कमी हो सकती है। कम दर्जे का प्रेम कम आनन्द दे यह बात समझ में आने की है। किन्तु विरह किस बात का? रुदन क्यों? यह तो दीनता का चिन्ह है। प्रेमी दीन नहीं हो सकता। जो दी है वह प्रेमी कैसा?


Quotation

मैंने चार गुरु चुने हैं और उन्हें हर दिन याद रखा है। एक भगवान, दूसरे मौत। तीसरे नेकी करने वाले और खुश रहने वाले, चौथे बुराई की रह पर कदम बढ़ाने वाले और पग-पग पर ठोकरें खाने वाले।


वैज्ञानिक अध्यात्मवाद बनाम वैज्ञानिक मानसिकता

विज्ञान और अध्यात्म के प्रसंग में जब भी चर्चा चलती है, उन्हें दो विपरीत खेमों का पक्षधर माना जाता है। कहा जाता है कि दोनों में पारस्परिक तालमेल सम्भव नहीं। एक प्रत्यक्षवाद को प्रधानता देता है तो दूसरा परोक्ष को। किन्तु यह ऊहापोह भी स्थूल स्तर पर सोचने वालों के दिमाग की उपज है। आज वैज्ञानिक एवं अध्यात्मवादी भी क्रमशः इस मत के समर्थन में पर्याप्त सबूत जुटा चुके हैं कि दोनों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। सरजेम्स, जीन्स एवं मैक्सप्लांक जैसे विद्वानों का मत है कि अध्यात्म अनुशासनों से सम्बल की विज्ञान को आवश्यकता है, साथ ही वैज्ञानिक मनोवृत्ति का आरोपण अध्यात्म के लिये अनिवार्य है। इसके अभाव में अध्यात्म दर्शन मात्र आप्त वचनों का तर्क-तथ्य-व्याख्या रहित पारायण करता व अश्रद्धा का कोपभाजन बनता देखा जाता है। दूसरी ओर अध्यात्म मूल्यों से रहित विज्ञान अनास्था को पोषण देता, विध्वंस को जन्म देता दीख पड़ता है।

वस्तुतः वैज्ञानिक मनोवृत्ति का होना एक अलग बात है एवं वैज्ञानिकों का प्रचार-प्रसार होना नितान्त अलग प्रकरण है। वैज्ञानिक मनोवृत्ति ज्ञान के विकास को बढ़ावा देती है। इस तरह वह दर्शन के समीप आ जाती है। इस प्रकार की मनोवृत्ति तर्क, तथ्य सम्मत प्रतिपादन के प्रति आग्रह रखती है एवं समाज की हर विधा से सम्बन्धित समस्याओं के विषय में हमारे चिन्तन को प्रबल रूप से प्रभावित करती है।

धार्मिक या आध्यात्मिक मनोवृत्ति भी इसी प्रकार धार्मिकता आध्यात्मिकता से एक अलग बात है। आध्यात्मिकता कहते हैं- ईश्वर के प्रति विश्वास को, श्रेष्ठता को, आदर्शों की पराकाष्ठा को। ऐसी आदर्श पारायण वृत्ति के प्रति जो झुकने के लिये जन साधारण को आंदोलित करने लगे वह आध्यात्मिक मनोवृत्ति है। जिसके पास वैज्ञानिक मनोवृत्ति है, वह धर्म दर्शन- अध्यात्म के मूल्यों को कहीं अधिक गहराई से सोच समझ सकता है। वह परम्पराओं एवं अशाश्वत मूल्यों के बंधन में नहीं बँधता। जो मात्र आध्यात्मिक मानसिकता का है, वैज्ञानिकता को महत्व नहीं देता, उसका चिन्तन एकाँगी है- अधूरा है।

इस तरह ज्ञान प्राप्ति के लिये, सत्य की ओर पहुँचने के लिये दो राजमार्ग स्पष्ट दिखाई देते हैं- एक विज्ञान से प्रारम्भ होकर दर्शन पर समाप्त होने वाला। दूसरा अध्यात्मवाद से प्रारंभ होकर वैज्ञानिक मानसिकता तक ले जाने वाला। दोनों एक ही बिन्दु पर समाप्त होते हैं, जिसका नाम है, वैज्ञानिक अध्यात्मवादी जब तक विज्ञान और अध्यात्म रूपी दोनों विधाओं का ऐसा समन्वयात्मक रूप स्थापित नहीं होता, तब तक दोनों ही अधूरे, लंगड़े लूले अपाहिज के समान हैं।

वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का मूल है- जिज्ञासा की भावना का होना। किसी भी वस्तु, घटनाक्रम, चमत्कार इत्यादि को देखकर जो मनुष्य को ‘क्या’, ‘कैसे’ व ‘क्यों’ का प्रश्न पूछने को प्रेरित करे, ऐसी मानसिकता वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का मूल प्राण है। इसमें शंका उठाने का मौलिक अधिकार मनुष्य को मिल जाता है ताकि उपलब्ध सिद्धान्त, परम्पराएँ, मान्यताएँ, सामाजिक स्थिति को वैज्ञानिकता के चश्मे से देखकर भली-भाँति उनका विश्लेषण किया जा सके। वैज्ञानिक मनोवृत्ति के रहते हम अध्यात्म पर चढ़े अनेकों आक्षेपों को निरस्त कर उसका शोधन कर सकते हैं। वैज्ञानिक मनोवृत्ति यह स्वीकार करने को बाध्य कर देती है कि ज्ञान का उत्थान एवं वास्तविकता का बोध हमेशा पूर्व धारणाओं, विश्वासों, सिद्धान्तों तथा नियमों को गलत सिद्ध करके ही होता है। यही कारण है कि विज्ञान की प्रगति के क्रमिक इतिहास में हम पग-पग पर अनेकों पिछली मान्यताएँ टूटते व नयी बनती पाते हैं।

कई वैज्ञानिक जिन गवेषणाओं पर पुरस्कार पाते हैं कुछ ही वर्षों बाद अन्य अनेकों उनके ही अनुयायी उन सिद्धान्तों का खण्डन करने पर पुरस्कार प्राप्त करते देखे जाते हैं। फिजिक्स, केमिस्ट्री, मेडिसिन जैसे क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ नित नये अनुसंधान होते व पिछली मान्यताओं के किले ढहते देखे गये हैं। यही वैज्ञानिक मानसिकता है। जब इसका आरोपण अध्यात्मदर्शन के क्षेत्र में किया जाता है। तब लक्ष्य भले ही आत्म-तत्व की खोज, परोक्ष का अनुसंधान, आध्यात्मिक मूल्यों की विज्ञान सम्मत व्याख्या करना हो, मूल आधार एक ही रहता है- तर्क संगत, तथ्य सम्मत, विवेक प्रधान मानसिकता- वैज्ञानिक मानसिकता।

इतने स्पष्टीकरण के बाद प्रसंग पुनः वहीं आ जाता है अध्यात्म अपने विशुद्ध रूप में एवं विज्ञान अपने मूल रूप में। अध्यात्म- अन्तरंग जीवन की शोध, आत्मसाधना द्वारा उसके साक्षात्कार तथा आत्मिक प्रगति के आयामों को खोजने का प्रयास करता है। विज्ञान पदार्थ जगत की- दृश्य प्रकृति- ब्रह्मांडीय जगत की शोध करता है। विज्ञान के पास दृश्य आयामों को जानने के लिये भिन्न-भिन्न साधन हैं बहुमूल्य प्रयोगशालाएं हैं। जबकि अध्यात्म साधना प्रक्रिया के माध्यम से मानवी काया रूपी प्रयोगशाला में ब्राह्मी चेतना तथा अंतर्जगत के रहस्यों को जानने का प्रयास करता है। परम सत्ता की विधि-व्यवस्था को दृश्य आयामों द्वारा समझा भी तो नहीं जा सकता। दोनों के नजरिए अलग-अलग हैं- लक्ष्य एक ही है। दोनों को ही एक स्थिति तक स्थूल साधन प्रयुक्त करने पड़ सकते हैं। एक स्थिति ऐसी आती है जहाँ कुछ सिद्धान्त मानकर चला जाता है एवं यात्रा पूरी करने हेतु तर्कों, तथ्यों का आश्रय लेना पड़ता है। यह भी पूर्णतः विज्ञान सम्मत तकनीक है जिसे हम वैज्ञानिक मानसिकता का विज्ञान व अध्यात्म पर आरोपण कह सकते हैं।

यदि अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही इस दुराग्रह पर अड़ जाएँ कि उनके अपने ही सिद्धान्त सही हैं, उन्हें किसी बैसाखी की आवश्यकता नहीं, तो प्रगति पथ ही अवरुद्ध हो जाएगा। इसे रूढ़िवादी मनोवृत्ति कहेंगे जहाँ पूर्वाग्रहों से चिपके रहने की मौलिक भूल होती है। चाहे वह विज्ञान का दर्शन हो अथवा अध्यात्म का तत्वदर्शन, उसे मूल्य निर्धारण करना ही पड़ेगा। जो क्वालिटी कण्ट्रोल (मूल्य नियंत्रण-गुणवत्ता-मूल्याँकन) की प्रक्रिया अन्यान्य क्षेत्रों पर लागू की जाती है, लगभग वैसी ही विज्ञान एवं अध्यात्म के क्षेत्रों पर यदि नहीं की गयी तो मानव जाति दोनों से ही अर्जित हो सकने वाले महत्वपूर्ण अनुदानों से वंचित हो जायेगी।

वास्तविकता तो यह है कि दोनों ही विधाएँ अपने अपने क्षेत्र में प्रगति तो कर रही हैं किन्तु पारस्परिक “लिंक” का अभाव है। अध्यात्म को जब सम्प्रदायवादी संकीर्ण धार्मिकता से जोड़कर देखा जाता है तो वह एक त्रुटिपूर्ण आँकलन माना जाना चाहिए। इसी प्रकार विज्ञान को जब विध्वंसात्मक अनुसन्धानों, कट्टर मान्यताओं से जोड़ दिया जाता है तो वह भी एक विकृत दृष्टिकोण से देखा गया पक्ष कहा जाना चाहिए। यदि विशुद्ध मनोवृत्ति का सहारा लिया जा सके तो दोनों ही गुणवत्ता की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं। औदार्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाकर दोनों ही महाशक्तियों की परस्पर ‘सिन्थेसिस’ का सुयोग यदि बिठाया जा सके तो इसे अपने युग का प्रचण्डतम एवं सर्वोपयोगी पुरुषार्थ माना जाना चाहिए। किसी समय वैज्ञानिक दृष्टा आइन्स्टीन ने कहा था- “केवल विज्ञान के क्षेत्र में गम्भीरता से लगे कार्यकर्ता पूर्णरूपेण आध्यात्मिक माने जाने चाहिए।” इसी प्रकार युग पुरुष विवेकानन्द की उक्ति थी कि “आधुनिक विज्ञान वस्तुतः अध्यात्म भावना की ही अभिव्यक्त है क्योंकि इसमें ईमानदारी के साथ सत्य को समझने का प्रयास किया जाता है।” क्या यह सम्भव नहीं कि वर्तमान परिस्थितियों में समस्याओं के निवारण एवं उज्ज्वल भविष्य को लाने के लिए अध्यात्म और विज्ञान को नयी मानसिकता के परिप्रेक्ष्य में परस्पर मिलाने का पुनः प्रयास किया जाये ?


Quotation

हमारा कर्त्तव्य है कि हम जिसे सही समझते हैं, निर्भय होकर करते रहें। जिसे गलत समझते हैं, उसके आगे किसी भी कीमत पर न झुकें।


मानवी मन का मायावी ‘रसायन शास्त्र’

सृष्टा ने काया सबको एक सी दी है एवं मस्तिष्क भी समान भार व बनावट का है। गोरे व काले, अनपढ़ एवं पढ़े लिखों में आकृति की दृष्टि से कोई महत्वपूर्ण भिन्नता नहीं होती। फिर भी देखा यह जाता है कि कोई मेधा की दृष्टि से विलक्षण होता है व कोई दैनन्दिन जीवन व्यापार तक को चलाने में अक्षम होता है। किसी में करुणा, स्नेह, दया, परोपकार की भावना पायी जाती है तो कोई भावनाओं की दृष्टि से नितान्त निष्ठुर, कठोर हृदय का देखा जा सकता है। कोई रोजमर्रा के कार्यों में अत्यधिक स्फूर्तिवान, खेलकूद में कुशल, चपल-चंचल देखा जाता है तो कोई इसके विपरीत नितान्त अकर्मण्य, खेलकूद के मनोरंजन के साधनों के प्रति अरुचि दिखाता, आलसी जीवन जीता, शरीर ढोता दिखाई देता है। आखिर यह भिन्नता क्यों व कैसे होती है, यह व्यवहार मनोविज्ञानियों एवं स्नायु रसायन शास्त्रियों के लिये आदिकाल से ही शोध का विषय रहा है। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के विभिन्न आयाम जैसे-जैसे वैज्ञानिकों की समझ में आते जा रहे हैं, नये-नये रहस्यों का उद्घाटन होता जा रहा है।

प्रत्यक्ष हलचलों को ही शरीर व मनोगत शोध का विषय मानने वाले वैज्ञानिकों का मत है कि शरीर व मन की सूक्ष्म गतिविधियों का संचालन करने वाले कई संदर्भ ऐसे हैं जिन्हें रहस्यों के पर्दे के पीछे होने से अभी तक जाना नहीं जा सकता है सूक्ष्म शरीर की शक्ति, सत्ता का प्रभाव परिचय देने वाली सूक्ष्म हारमोन ग्रन्थियों की अब काफी कुछ जानकारी वैज्ञानिक समुदाय को है। इनकी बूँद से भी कम मात्रा में स्राव शरीर में किस प्रकार अद्भुत परिवर्तन ला देता है यह देखकर चकित रह जाना पड़ता है। अब स्नायु रसायन शास्त्री एवं व्यवहार मनोवैज्ञानिकों ने इससे भी ऊँची छलाँग लगाकर भाव सम्वेदनाओं का रसायन शास्त्र खोज निकाला है एवं शरीरगत स्फूर्ति- चंचलता से लेकर, स्नेह दया की भावना एवं प्रफुल्लता प्रसन्नता के लिये उत्तरदायी घटकों को स्नायु कोशों की सूक्ष्म परतों में खोज निकाला है। हारमोन ग्रन्थियों को जादुई स्राव बताने वाले एण्डो क्राइनोलाजिस्ट इन मस्तिष्कीय स्नायु रसायनों की प्रतिक्रियाओं को देखकर हतप्रभ हर जाते हैं।

आश्चर्य यह है कि इस रसायन शास्त्र की जानकारी इन रोगों के माध्यम से मिली जिसमें मस्तिष्क या तो अवसादग्रस्त हो जाता है या क्रमशः स्मृति-मेधा लुप्त होने से जड़ होता चला जाता है। अमेरिका के नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेण्टल हेल्थ के चिकित्सक वैज्ञानिकों का यह निष्कर्ष है कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के व्यवहार में पाये जाने वाला अन्तर उन व्यक्तियों के मस्तिष्क में पाये जाने वाले एन्जाइम मोनो अमीर ऑक्सीडेस (जिसे माओ भी कहा जाता है) की सक्रियता निष्क्रियता पर निर्भर करता है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की भाव-सम्वेदनाओं की सामान्य एवं असामान्य अभिव्यक्ति, प्रफुल्लता एवं बेचैनी, सक्रियता एवं जड़ता इस मस्तिष्कीय रसायन जिसे न्यूरोह्यूमरल रस स्राव माना गया है, की मात्रा में अन्य एन्जाइमों द्वारा की गई न्यूनाधिकता पर निर्भर है। इसे समझाते हुए व्यवहार मनोविज्ञानी डॉ. एण्ड्रयू बैपटिस्ट के अनुसार मस्तिष्क में दो प्रकार के रसायन समूह पाए जाते हैं। एक मोनोअमीन ऑक्सीडेज एन्जाइम्स दूसरे न्यूरो ट्रांसमीटर्स जिनमें एप्रीनेफ्रीन, डोपामीन एवं सिरोटोनिन प्रमुख हैं। प्रथम समूह न्यूरोट्रांसमीटर्स की सक्रियता को समाप्त करने की ही भूमिका मुख्य रूप से निभाता है। जबकि एक तीसरा समूह इनकी सक्रियता व रक्त स्तर को बनाये रखने का काम करता है। इनमें एन्डार्फिन समूह के एन्जाइम्स आते हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि मस्तिष्क में जब माओ रस स्राव अधिक होता है, अकर्मण्यता, प्रमाद, निरुत्साह, बेचैनी, तनाव का प्राधान्य देखा जाता है। जब द्वितीय समूह प्रभावशाली होता है तो वह माओ की सक्रियता को कम करके जागृति, प्रफुल्लता, स्फूर्ति, तनाव शैथिल्य की स्थिति लाता है। तीसरा समूह जिसमें एन्डार्फिन ग्रुप के एनकेफेलीन अदि हारमोन्स प्रमुख हैं- द्वितीय समूह की सक्रियता को बढ़ाकर प्रसन्नता एवं आनन्द की मनःस्थिति को पराकाष्ठा पर ले जाते हैं। व्यक्ति हर कार्य में तल्लीन होकर प्रमुदित मन से काम करते व मुस्तैद देखे जाते हैं।

वैज्ञानिक द्वय डॉ. क्राफ्ट्समैन एवं जॉन क्रुकशैंक (बाल्टीमोर यूनिवर्सिटी) जिन्होंने व्यवहार मनोविज्ञान एवं मनोरोगों पर विशद् शोध कार्य किया है, अपने शोध कार्य में कहते हैं कि जब-जब भी मस्तिष्क में ‘माओ’ की सक्रियता बढ़ जाती है एवं न्यूरोट्राँसमीटर्स का मस्तिष्क रस स्राव कम हो जाता है, व्यक्ति खिन्न, उदास, बेचैन देखे जाते हैं। ऐसी परिस्थितियाँ पर्यावरण में संव्याप्त विषाक्तता के कारण भी बनती है एवं चिन्तन की अस्तव्यस्तता के कारण भी। एन्डार्फिन द्रव्य समूह को उन्होंने माओ इनहिबिंटर (सक्रियता को नष्ट करने वाला) माना है। जिन व्यक्तियों में इस समूह की अधिकता होती है, वे प्रसन्न, खुली मनोवृत्ति के, कुण्ठा-ग्रन्थि रहित होते हैं तथा वातावरण से प्रभावित नहीं होते। यह निष्कर्ष उन्होंने एक औषधि के प्रभाव को देखकर निकाला। चिकित्सकों द्वारा दी जाने वाली एण्टीडिप्रेसेन्ट औषधियाँ (अवसाद शामक) न्यूरोट्रान्समीटर्स को उत्तेजित करती एवं माओ को निष्क्रिय करती हैं।

औषधियों के अतिरिक्त परामर्श, सम्मोहन, वायो-फीडबैक द्वारा भी व्यवहार मनोवैज्ञानिकों ने यह प्रयास किया है। उनका मत है कि औषधियाँ दुष्प्रभाव रहित नहीं हैं। वे अवसाद के रोगी को प्रसन्न तो कर देती हैं, पर अन्य कई ऐसे प्रभाव छोड़ जाती हैं। जिनके लिये पुनः औषधि की आवश्यकता पड़ जाती है। इसी कारण उनका प्रयास रहा है कि स्वतः अपने मस्तिष्क में अवस्थित माओ इनहिबिटर्स हारमोन्स को सक्रिय बनाया जाय ताकि सतत् प्रफुल्ल मनःस्थिति बनाये रखना सम्भव हो सके। आज की तनाव भरी परिस्थितियों में, जहाँ बहुसंख्य की मनःस्थिति गड़बड़ा रही है, यह और भी अनिवार्य हो जाता है।

स्टेनफोर्ड रिसर्च सेन्टर यू.एस.ए. में पूर्वार्त्त ध्यान साधनाओं की मनःसंस्थान पर प्रतिक्रियाएँ जाँचने की शोध हेतु एक अलग ही विभाग की स्थापना की गई है। इस संस्थान के वैज्ञानिकों का मत है कि प्रसन्नता विषाद के लिये उत्तरदायी ये तीनों ही रसायन समूह पिट्यूटरी ग्रन्थि एवं हाईपोथेलेमस के माध्यम से भावनाओं की प्रतिक्रिया दर्शाते हैं। इनके स्रावों का नियन्त्रण ध्यान साधना, एकाग्रता की ध्यान धारणा एवं योग निद्रा जैसे उपायों से भली प्रकार सम्भव है।

अभी तक वैज्ञानिक स्थूल रूप से रक्त में स्रवित होकर अपनी क्रिया-प्रभाव दर्शाने वाले कुछ हारमोन्स से ही अचम्भित थे। शारीरिक बनावट, लावण्य-रूप-सौंदर्य, यौवन एवं वार्धक्य, यौन ग्रन्थियों की सक्रियता-निष्क्रियता तनाव के प्रत्युत्तर में फाइट ऑफ फ्लाईट (“लड़ो या भाग जाओ”) की प्रतिक्रियाएँ ही एण्डोक्राइन ग्रन्थियों के सम्बन्ध में शोध का विषय रही हैं। मस्तिष्क एवं स्नायु रसायनों की खोज ने व्यवहार एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी अनेकों ऐसे नये रहस्य वैज्ञानिकों के समक्ष उद्घाटित किये हैं जिनके बारे में पूर्व की जानकारी सीमित थी। योग-मनोविज्ञान अवश्य इन सम्भावनाओं का वर्णन करता है, किन्तु प्रत्यक्ष साक्षियों के अभाव में वैज्ञानिकों का असहमत होना स्वाभाविक ही था।

न्यूरो हिस्टोपैथोलाजी एवं न्यूरो केमिस्ट्री के विशारदों के अनुसार मस्तिष्क का रसायन शास्त्र बड़ा विलक्षण विचित्र है। वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसे कई हारमोन्स जो पहले पाचन संस्थान आदि से सम्बन्धित ग्रन्थियों से उत्सर्जित माने जाते थे एवं उनकी मात्रा भी वहीं पायी जाती थी, अब मस्तिष्क में भी पा ली गयी है। इनमें ए.सी.टी.एच. एसिटाइल वोलीन एवं नार-इपीने-फ्रिन जैसों के नाम लिये जाते हैं। आमाशय के अम्ल रस स्राव का नियंत्रण करने वाले कोलसीस्टीक्निन एवं एड्रीनल ग्रन्थियों से स्रावित होने वाले ग्लूकोकार्टीवकॉइड्स की उल्लेखनीय मात्रा मस्तिष्क में भी पाली गयी है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये सम्भवतः स्नायु संकेत सम्प्रेषक (न्यूरोसिग्नल ट्राँसमीटर) की भूमिका निभाते व अधिक मात्रा में मनोशारीरिक रोगों को जन्म देते हैं। पेट का अल्सर, हृदयावरोध, इरिटेबुल बॉवेल सिन्ड्रोम, अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे साइकोसोमेटिक रोक सम्भवतः इन्हीं हारमोन्स के असन्तुलन के कारण होते हैं। ज्ञातव्य है कि आज इन रोगों का प्रतिशत विकसित व विकासशील राष्ट्रों में तीन चौथाई है।

डोपामीन, गाबा, सिरोटोनिन जैसे स्नायु रसायनों की स्राव मात्रा में जब भी थोड़ी बहुत फेर बदली होती है तो संवेदनशील केन्द्रों में विकृति आ जाती है एवं फलस्वरूप स्मृति लोप हो जाना, सठिया जाना, पार्किन्सन्स डीसिज (माँस-पेशियों का तनाव व जड़ता की प्रधानता), डेमेन्शिया जैसे रोग जन्म लेने लगते हैं। अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा बहुमुखी प्रतिभा वाला एक विद्वान अपनी आयु के मोड़ पर जरा से स्नायु स्राव असन्तुलन से स्मृति व मेधा खो बैठता है। जो व्यक्ति अपने को सदैव सक्रिय बनाये रखते एवं अन्तः के माओ इनहिबिटर्स के स्राव में असन्तुलन नहीं आने देते, उनके समक्ष ऐसी परिस्थितियाँ नहीं आतीं।

स्नायु रसायनविदों का मत है कि पीनियल व पीटुचरी की सक्रियता से स्रवित हारमोन्स मात्र यौन गतिविधियों का ही नियन्त्रण नहीं करते वरन् व्यक्ति के सोचने निर्णय लेने की क्षमता को, दिग्-काल सम्बन्धी उसकी धारणा को भी संचालित एवं नियंत्रित करते हैं। यौवन लाने के लिये उत्तरदायी ये हारमोन्स इस प्रकार बहुमुखी भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि एण्ड्रोजन (जो पुरुषत्व के लिये उत्तरदायी हारमोन है), टेस्टिस का आकार एवं मनुष्य की दिग्काल सम्बन्धी योग्यता, ज्ञानार्जन क्षमता में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। एण्ड्रोजन की मात्रा जितनी कम होगी, नपुसंकत्व उतना ही अधिक होगा एवं ज्ञानार्जन क्षमता उतनी ही कम होगी। यही तथ्य नारी सम्बन्धी रस स्रावों पर भी लागू होता है।

वस्तुतः मानवी मस्तिष्क का स्नायु जंजाल रसायनों सम्बन्धी इतनी जटिलताएं लिए है कि अभी उसका कुछ प्रतिशत भाग ही वैज्ञानिकों की समझ में आ पाया है। व्यवहार, मनोवैज्ञानिकों, स्नायु रसायनविदों एवं स्नायु रोग वैज्ञानिकों के पारस्परिक समन्वित प्रयास से कई ऐसे सूत्र हस्तगत हो सकते हैं जिनसे मस्तिष्क में निहित अविज्ञात केन्द्रों की गतिविधियों की जानकारी एक दिन हासिल हो सके। शिकागो के माइकेल रीज हॉस्पिटल, मेसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल एवं स्टैन फोर्ड रिसर्च सेंटर के समन्वित प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध हो रहे हैं। आशा करनी चाहिए कि सहस्रार, ब्रह्मरंध्र, आनन्दमयकोश, आज्ञाचक्र जैसी योग विज्ञान में वर्णित अनेकों सूक्ष्म संरचनाओं की जानकारी व उनके जागरण का लाभ वैज्ञानिक भाषा में ही शीघ्र उपलब्ध हो सकेगा। ऐसी स्थिति में उनकी प्रसुप्ति एवं जागृति से मानवी पतन या विकास की, व्यवहार में परिवर्तन ला सकने की, टाले जा सकने वाले मनोशारीरिक रोगों की जानकारी भी बढ़ेगी।

अन्तः जागरण के लिये किये जाने वाले साधनात्मक पुरुषार्थ किस तरह अपनी भूमिका निभाते होंगे, इसका एक मोटा अन्दाज मस्तिष्कीय रसायन शास्त्र की जानकारी से लगाया जा सकता है। इन सर्वसुलभ, सुगम अध्यात्म साधनाओं का अवलम्बन लेकर हम वर्तमान की तुलना में अनेकों गुनी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं, प्रफुल्लता एवं अक्षुण्ण आनन्द का रसास्वादन करते रह सकते हैं।


Quotation

मस्तिष्क विलक्षण है, बहुरंगी है। इसके क्रियाकलाप अभी भी रहस्यमय हैं। मस्तिष्कीय स्नायु जंजाल से स्रवित होने वाले अत्यन्त मात्रा के रसायन भावनाओं की पूर्व भूमिका बनाते हैं। शुष्कता, सरलता के रूप में व्यक्ति-व्यक्ति में पाये जानें वाला अन्तर किस कारण है व कैसे प्रसुप्त को जगाकर प्रफुल्लित मस्ती भर जिन्दगी जी सकना संभव है, इसका विश्लेषण आज के व्यवहार विज्ञानियों ने किया है।

ज्ञान का जितना भाग व्यवहार में लाया जा सके वही सार्थक है, अन्यथा वह गधे पर लदे बोझ के समान है।


लक्ष्य सिद्धि का चरम सोपान

घर बार और राज परिवार छोड़कर सिद्धार्थ ने सत्य की खोज में स्वयं को समर्पित किया तो स्वाभाविक ही था कि अनेकों कष्ट, कठिनाइयों से मुकाबला पड़ा हो। राजसी सुविधाओं के अभ्यस्त सिद्धार्थ के लिए अरण्यवास वैसे ही असुविधाजनक रहा था और फिर ऊपर से कठिन तितिक्षा, साधनायें और कठोर व्रत उपवास। भोजन की मात्रा घटाते-घटाते एकदम निराहार रहने लगे, वस्त्र इतने कम हो गये कि दिशायें ही वस्त्र बन गयीं। फिर भी प्राप्तव्य दूर ही रहा। तो लगा कि मन की शान्ति ही मृगतृष्णा है। संसार असार तो है ही परन्तु सत्य भी यही है। जिस धैर्य का सम्बल पकड़ कर वे साधना समर में उतरे थे वह जवाब देने लगा और इस भ्रम से स्वयं को निकालने के लिए उठने लगे। बुद्ध घर वापस लौटने की तैयार करने लगे।

जब वे घर की ओर लौट रहे थे तो रास्ते में एक ठण्डे जल की झील पड़ी ‘झील’ के किनारे खड़े होकर वे उसे देखने लगे। उनकी दृष्टि एक गिलहरी पर पड़ी जो बार-बार झील में डुबकी लगाती, बाहर आती, रेत में लोटती और पुनः झील में डुबकी लगाने के लिए दौड़ पड़ती। बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ। देर तक वे उसे देखते रहे जब गिलहरी की क्रिया में कोई अन्तर नहीं आया तो आखिर वे पूछ ही बैठे- ‘नन्ही गिलहरी यह क्या कर रही हो तुम।’

‘इस झील ने मेरे बच्चों को खा लिया है अब मैं इसे खाली करके ही रहूँगी।’

हंसी आ गयी सिद्धार्थ को- ‘तो क्या तुम सोचती हो कि तुम्हारी पूँछ को पानी में डूबोने से इतनी बड़ी झील खाली हो जायेगी।’

‘यह तो मैं नहीं सोचती परन्तु जब तक झील खाली न हो जाये तब तक ऐसी ही करती रहूँगी।’

‘भला बताओ तो अनुमानतः यह कितने समय में हो सकेगा।’

‘इसका अनुमान लगाने का मेरे पास समय नहीं है।’

‘इस जन्म में तो सम्भव नहीं है।’

‘भले ही न हो। मेरा सारा जीवन ही इसमें लग जाय परन्तु इतना तो निश्चित है कि इस प्रकार चुल्लू-चुल्लू भर पानी निकाल कर मैं अपना काम तो पूरा करने की ओर बढ़ती ही रहूँगी।’- और गिलहरी यह कहकर अपने काम में पुनः लग गयी कि- ‘मेरे पास बातें करने का समय नहीं है, मुझे काम करने दो।

गिलहरी की इन बातों को सिद्धार्थ ने कानों से तो कम, हृदय से अधिक सुना और उनका खोया हुआ आत्म-विश्वास पुनः लौट आया। उनकी अन्तः चेतना से यह आवाज आयी कि- यह नन्ही-सी गिलहरी भी अपनी सामर्थ्य, समय और क्षमता का विचार किये बिना आजीवन इस बोझिल कार्य को पूरा करने के लिए सन्नद्ध है तो मैं ही क्यों इतनी जल्दी हार मान लूँ जबकि मेरा लक्ष्य तो सुनिश्चित है और उसके पथ भी काफी हद तक बढ़ चुका हूँ। उन्होंने बीच में ही अपना इरादा बदल दिया और खोया हुआ धैर्य पुनः जुटाकर तपःस्थली की ओर लौट गये।

बुद्ध यह निश्चय कर लौटे कि- जब तक मैं अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लूँगा तब तक कोई बात मन में नहीं लाऊँगा, नहीं कोई निर्णय लूँगा, अपने मार्ग के सम्बन्ध में। इस गिलहरी ने मेरे जीवन का एक नया अध्याय खोल दिया है। यह मेरी गुरु है और सफलता के लिए अन्तिम साँस तक प्रयत्न करूंगा।

सिद्धार्थ फिर ध्यानावस्थित हो गये और उस समय तक साधना में लगे रहे जब तक कि उन्हें निर्वाण प्राप्त नहीं हो गया।


आइए! आपका प्रेतों से साक्षात्कार करायें।

भूत-प्रेतों के कहानी किस्से मूलतः अन्ध विश्वासियों द्वारा कहे सुने जाते हैं, इसलिए वे अविश्वसनीय एवं किम्वदंती जैसे माने जाते हैं। किन्तु कई बार सुशिक्षित समझदारों एवं सम्भ्रान्त व्यक्तियों की साक्षी में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं तो इनकी यथार्थता पर अविश्वास करना कठिन हो जाता है।

अमेरिका के पश्चिमी छोर पर लॉस ऐंजेल्स महानगर में हालीवुड नामक सुप्रसिद्ध फिल्म नगरी है। यहाँ कितने कलाकारों एवं संचालकों का बाहुल्य है। सभी सुशिक्षित एवं सुसम्पन्न वर्ग के हैं एवं कला की सुरुचिपूर्ण महत्ता के पक्षधर हैं। वे लोग झूठे किस्से कहानियां गढ़ेंगे, भ्राँतियाँ फैलाएंगे ऐसा मानने को जी नहीं करता।

इस नगरी में कई मकान अभिशप्त माने जाते हैं एवं प्रेतों के उत्पात के कारण उनमें रहने को बहुसंख्य व्यक्ति सहमत नहीं होते। उनमें आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जिन्हें प्रेतों की करतूत के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। इस अच्छे खासे मोहल्ले में मकान ढेरों खाली पड़े हैं। जिस उपनगर में स्थान प्राप्त करने के लिए लोग तरसते हैं, उसमें कुछ मकान मात्र इसी कारण लावारिस पड़े रहे कि उनमें प्रेतों का निवास है, सचमुच आश्चर्य की बात है।

इस नगरी में एक नृतत्वविज्ञानी रहते हैं। नाम है- रिचर्ड सीमेट। उन्होंने ऐसे अभिशप्त मकानों में घटित होने वाली असाधारण घटनाओं का स्वयं अन्वेषण किया है और साक्षी में ऐसे लोगों को लिया है जिन्हें अन्धविश्वासी या अप्रामाणिक नहीं का जा सकता। इन मकानों में यदा-कदा घटित होने वाले घटनाक्रमों की जानकारी इन लोगों के माध्यम से वैज्ञानिक जगत के समक्ष प्रस्तुत की है और इस बात की जाँच-पड़ताल कराई है- कि कोई छल-कपट तो इसके पीछे नहीं है। कई बार कौतूहल फैलाने के लिए भी कुछ व्यक्ति ऐसी अचम्भे वाली घटनाओं की चर्चा करने लगते हैं। किन्तु जब इनकी बारीकी से जाँच पड़ताल की जाती है तो पोल खुल जाती है और कोई प्रपंच रच गया होता है तो वह खुलकर सामने आ जाता है। इस सम्भावना के स्पष्टीकरण हेतु श्री सीमेट ने अपने साथ लॉस ऐंजेल्स के प्रामाणिक अखबारों के पत्रकार भी साथ लिए और हालीवुड के कई मकानों में समय-समय पर घटित होने वाली प्रेत लीलाओं की तर्क सम्मत जाँच पड़ताल आरम्भ की।

ऐसे मकानों में 911, आक्सफोर्ड, 10001 नार्थ आक्सफोर्ड ड्राइव, 1143 सम्मिट ड्राइव, 10050 सीपली ड्राइव, 1433 वेलाड्राइव 9820 ईस्टर्न ड्राइव आदि कई हैं, जिनमें रात्रि के समय, प्रत्यक्ष कोई प्रतिभाएं न दीखते हुए भी उनके द्वारा किये जाने वाले कृत्यों को प्रत्यक्ष आभास मिलता है। हंसना, रोना, उछलना, कूदना, धमाचौकड़ी, वस्तुओं का उठना-गिरना, सामान को बिखेरना- समेट देना- बटोर लेना जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि यहाँ अदृश्य मानवों की उपस्थिति काम कर रही है। वे या तो आपस में लड़ते-झगड़ते हैं, मद्यपान करते दिखाई देते हैं अथवा गाली गलौज देते, अवाँछनीय कृत्यों में निरत देखे जाते हैं। सभी कृत्य ऐसे है जिन्हें असभ्य, अनगढ़, बेतुके व्यक्ति शिष्टाचार का उल्लंघन करते देखे जाते हैं। उनकी उपस्थिति एवं हरकत का परिचय इस आधार पर मिलता है कि वस्तुएं हिलती डुलती हैं, विचित्र आवाजें आती हैं, छतों या दीवारों पर धमाचौकड़ी होने से इमारतों में हलचल का आभास होता है। फर्नीचर तथा छोटी-बड़ी वस्तुएं लड़खड़ाती इधर-उधर हटती, इकट्ठी होती हैं। यह सब बिना मनुष्यों की उपस्थिति तथा हरकत किए बिना नहीं हो सकता। इतने पर भी आश्चर्य इस बात का है कि हरकतें करने वाले मनुष्यों की उपस्थिति का आभास मिलते हुए भी उनका दृश्य आकार नहीं प्रत्यक्षीकृत होता एवं परोक्ष पर विश्वास न करने वालों को हतप्रभ कर देता है।

मात्र इन्हीं मकानों में ये उपद्रव किसलिए होते हैं, इसका इतिहास ढूंढ़ निकालने पर विदित हुआ है कि इन मकानों में प्रकारान्तर से भूतकाल में कभी न कभी हत्याएं, आत्म-हत्याएं, मारधाड़, उपद्रव, चोरी, डकैती, बलात्कार, व्यभिचार जैसे दुष्कर्म होते रहे हैं। कुख्यात अपराधियों के ये अड्डे बने रहे हैं। सम्बन्धित व्यक्ति इन दुष्कर्मों के कारण पीड़ित होते रहे हैं। उन घटनाओं की पुनरावृत्ति करने अथवा बदला चुकाने, रिहर्सल करने जैसी कोई बातें रही होंगी, जिस कारण उस प्रकार की उठा-पटक का आभास मिलता है।

जो व्यक्ति इस उठा-पटक को देखने उन मकानों में जाते हैं, उन्हें डराने-भगाने के उद्देश्य से उपद्रवों की गतिविधियाँ तेज हो जाती हैं और जब दर्शक लोग वहाँ से चले जाते हैं, तो उठा-पटक धीमी पड़ जाती है और लगता है कि अब वे लोग निर्भय होकर शान्तिपूर्वक अपनी हरकतें कर रहे हैं।

जब-जब भी किन्हीं साहसी व्यक्तियों ने इन मकानों को स्थायी निवास हेतु लेने का प्रयत्न किया है, तब तब उपद्रव बढ़ गए हैं और ऐसा लगा है कि उन्हें अज्ञात उपद्रवियों द्वारा जिनकी धूमिल आकृति सामान्य मनुष्यों जैसी ही मिलती-जुलती है, उठाया-धकेला या खदेड़ा जा रहा है। ऐसे उपद्रवों के बीच किसी का ठहरना कठिन पड़ता है और जैसे-तैसे करके जान-बचाते हुए भागते ही बनता है। इन परिस्थितियों में वे मकान मुद्दतों से खाली पड़े हैं। कुछ हिम्मत वालों ने चार-चार छह-छह की मण्डली बनाकर वहाँ पैर जमाने का प्रयास किया है, पर हर बार असफलता ही हाथ लगी है। फलतः सर्वत्र यह बदनामी हो चुकी है कि इन मकानों में रहना खतरे से खाली नहीं है।

इन मकानों में होने वाली हरकतों और सम्बन्धित पूर्व घटनाओं की खोज करने हेतु इतिहास विशेषज्ञ, नृतत्व विज्ञानी प्रो. रिचर्ड सीमेट बड़ी दिलचस्पी के साथ इन्हीं मकानों के इर्द-गिर्द डेरा डाले रहते हैं। जिन्हें भूत प्रेतों की लीलाओं को देखने की दिलचस्पी होती है, उन्हें इनमें से किसी मकान की चाबी मालिकों से प्राप्त कर जितनी देर हरकतें देखने की इच्छा हो, दिखाकर वापस लौटा देते हैं। प्रवेश करने वाले हिम्मत वाले रहे हैं तो बिना घबराए सब कुछ देख-सुनकर लौट आए हैं जो डर के मारे परेशानी होती है, वह बात दूसरी है पर धक्का-मुक्की-मारपीट जैसी हानि किसी को नहीं उठानी पड़ी।

एक बार उनके साथ एक पत्रकार एक प्रेत ग्रस्त मकान में गए और उन्होंने जो कुछ वहाँ देखा, उसे थोड़ी देर के अनुभव को अपने अखबार में छापा भी। पढ़ने वालों के अनेकों पत्र रिचर्ड के पास आए जिनमें से अधिकाँश प्रत्यक्षतः इस प्रेत लीला को देखना चाहते थे एवं परोक्ष जगत मरणोत्तर जीवन पर विश्वास रखते थे। प्रो. रिचर्ड सीमेट के लिये तो प्रेत विद्या शोध का विषय है। दिलचस्पी रखने वालों को वे अपने अनुभव सुनाते हैं तथा प्रेतों के क्रिया-कलापों के माध्यम से अपने वर्तमान जीवन को सुधारने की शिक्षा भी देते हैं। प्रेतों से संपर्क साधना उनकी हॉबी के रूप में विकसित हो गया है।

अमेरिका की तुलना में इंग्लैण्ड में प्रेतों पर विश्वास रखने वालों की संख्या अधिक है। राजघराने के समस्त पुराने किले (कैसल्स) वहाँ अभिशप्त बताये जाते हैं। 9 वीं से लेकर 18 वीं शताब्दी तक बने ऐसे अनेकों किले हैं जिनमें प्रेत लीला का ताण्डव नृत्य देखा- अनुभव किया गया है। ऐसा ही चिलहम नामक 12 वीं शताब्दी का बना एक किला उ. इंग्लैण्ड में है जहाँ अक्सर फिल्मों की शूटिंग हुआ करती है। रात्रि में सामान्यतया वहाँ कोई नहीं ठहरता। एक बार एक नर्तकी किमनोवाक रात्रि विश्राम हेतु वहीं रुक गयी। उस दिन रात्रि को उन्होंने एक विचित्र धुन सुनी और ऐसा लगा बलात् कोई उन्हें पकड़कर नृत्य करने पर विवश कर रहा हो। घबराकर वे बीच शूटिंग से लौट आईं। आस-पास वालों ने बताया कि इस किले का शासक किंग जान द्वितीय था जो दुश्मनों द्वारा पीछा किये जाते समय यहीं खाई में डूबकर 11 अक्टूबर 1216 ई. को मर गया था। तभी से ऐसे घटनाक्रम होते रहते हैं।

मरणोत्तर जीवन पर विश्वास रखने वालों के लिये तो ऐसे लीला प्रसंग अविश्वसनीय नहीं लगते। विज्ञान जगत के लिये ये चुनौती अवश्य बन जाते हैं। अभी उस आयाम की जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं हो पायी है, जिसमें ऐसी प्रेत लीलाएं घटती रहती हैं।


“स एको मानुष आनन्दः”

उपनिषद्कार कहता है कि मनुष्य पूर्ण है, पूर्ण ही रहेगा। ईश्वर का स्वरूप ही आनन्द है एवं मनुष्य उसकी एक इकाई। ऐसी स्थिति में दार्शनिक भ्रान्तियों एवं मनोवैज्ञानिक भटकावों से दिग्भ्रान्त मनुष्य को आप्त पुरुष सही दिशा देते व यह बताते हैं कि वह निम्न स्थिति से ऊपर नहीं आया अपितु श्रेष्ठ का ही अंग बनकर अवतरित हुआ है। यह मान्यता विकसित करने पर ही वह सर्वांगपूर्ण विकास की ओर उन्मुख हो सकता है।

आज से एक शताब्दी पूर्व डार्विन के विकासवाद का सिद्धान्त नृतत्व विज्ञानियों के एक खेमे द्वारा तर्कों एवं तथ्यों के साथ शोर मचाता जनमानस को आन्दोलित करता चला गया। इस सिद्धान्त ने जन साधारण के चिन्तन पर असामान्य प्रभाव डाला। “सृष्टि का विकास किसी परम सत्ता की प्रेरणा से विशिष्ट उद्देश्यों के लिये हुआ है” इस मान्यता को नकारा जाने लगा।” जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाले सिद्धान्त पर आधारित सखाइवल ऑफ द फिटेस्ट के सूत्र को मूल मन्त्र माना जाने लगा।

मान्यता यह बनी कि अतीत का कोई महत्व नहीं क्योंकि मनुष्य बन्दर से विकसित सभ्य प्रजाति है। नृतत्व विज्ञानियों एवं विकासवादियों की मान्यता थी कि मानव पूर्व की तुलना में बौद्धिक दृष्टि से प्रखर एवं साधनों की दृष्टि से सम्पन्न है। वैज्ञानिकों द्वारा इन उपलब्धियों पर सन्तोष व्यक्त किया जाने लगा है। शरीर की दृष्टि से समर्थ, बुद्धि की दृष्टि से प्रखर तथा साधनों की दृष्टि से बेहतर स्थिति को बुद्धिजीवी समाज द्वारा मानवी प्रगति का चरम लक्ष्य माना जा रहा है। यही कारण है कि सुविधाओं के आधिक्य के लिए अगणित प्रयत्न किये जा रहे हैं तथा मात्र शारीरिक एवं बौद्धिक दृष्टि से अति मानवी पीढ़ी के निर्माण के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसे दुस्साहसी, पर जोखिम भरे प्रयोग वैज्ञानिक क्षेत्र में चल रहे हैं। श्रेष्ठता का मापदण्ड भौतिक सामर्थ्य की उपलब्धि को माना जाने लगा। मानव जीवन को गौरवान्वित करने वाली व्यक्तित्व की महानता तथा मानवी अन्तःकरण की उदात्तता जैसी उपलब्धियों का चरम लक्ष्य आज के बुद्धिजीवी समाज में उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा। उल्टे चिन्तन तथा उल्टे दर्शन से होने वाले लक्ष्य भटकाव का परिणाम सामने है- नयी पीढ़ी नैतिक मर्यादाओं तथा मानवी उदात्त अनुशासनों के बन्धन स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वे अंकुश हटते-टूटते जा रहे हैं। जो व्यक्ति एवं समाज की सुव्यवस्था एवं शालीनता के लिए आवश्यक हैं।

“अस्तित्व रक्षा के लिए संघर्ष” तथा “शक्तिशाली के ही जीवित रहने” के विकासवादी सिद्धान्तों ने एक ऐसी प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया जो प्रायः जंगली जीवों अथवा आदिम समाज में देखी जाती हैं प्रतिस्पर्धा सही अर्थों में आत्मविकास के लिए होती तो सार्थक भी थी, पर वह तो भौतिक महत्वकाँक्षाओं की पूर्ति तक ही सीमित रह गयी। परिणाम वही हुआ जो होना था। वैयक्तिक सुखोपभोग के लिए साधनों के संग्रह में दुनिया बेतरह पागलों की तरह दौड़ी चली जा रही है। जीवन लक्ष्य शान्ति, सन्तोष, आत्मतुष्टि न रहकर, इन्द्रिय तृप्ति तथा मानसिक ऐषणाओं की पूर्ति मात्र बनकर रहा गया है। इस विडम्बना के रहते मनुष्य द्वारा विकास की उच्चतम मंजिलों पर चढ़ने की कल्पना की भी कैसे जा सकती है? अपनी यथास्थिति में संतुष्ट मानव ऊँचा उठने- महानता को वरण करने की आकाँक्षा करे भी तो कैसे?

जो भूल नृतत्व विज्ञान के क्षेत्र में हुई, लगभग उसी से मिलती-जुलती एक दूसरी भूल मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुई। विज्ञान ने कहा कि ‘मनुष्य वानर की सन्तान है’ तो मनोविज्ञान ने राग अलापा- “मनुष्य अपनी मूल प्रवृत्तियों का गुलाम है। पराधीनता उसकी प्रकृति में जन्म से ही है। उसकी समस्त बाह्य एवं आँतरिक चेष्टाएं सेक्स से अभिप्रेरित हैं। शारीरिक एवं मानसिक हलचलों का एकमात्र उत्प्रेरक यौनवृत्ति ही है।”

प्रो. जॉन इक्लिस का कहना है कि पिछले दशकों में एक वैज्ञानिक भूल यह हुई कि मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान का सही स्वरूप बदलकर उसे नियतिवादी तथा वस्तुनिष्ठ बना दिया। नया मनोविज्ञान व्यक्ति परक चेतना की मुक्ति को अवास्तविक और अर्थहीन बताते हुए कहता है कि पूर्वार्त्त मनोविज्ञान से मनुष्य के सामान्य व्यवहार के सम्बन्ध में कुछ विशेष जानकारी नहीं मिलती। उसमें कल्पनाओं की उड़ान अधिक है। यह आज के मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में घुसी एक ऐसी भ्राँति है जो सचमुच ही मनःशास्त्रियों को चिन्तन के सीमित क्षेत्र से बाहर निकलने नहीं देती। तथाकथित आधुनिक मनोविज्ञान वस्तुतः आनुवाँशिकी तथा परिस्थितियों द्वारा संचालित है। इस नये मनोविज्ञान के एकाँगी तथा अपूर्ण प्रतिपादनों से लोगों की अकर्मण्यता को परिपोषण मिला है। जब वृत्तियों के अनुरूप जो होना है सो होगा ही, फिर कर्म से श्रेष्ठ बनने का आधार ही लड़खड़ा गया।

मनुष्य को पशु-प्रवृत्तियों का- सेक्स का गुलाम मानने तथा उस समर्थन में मनोवैज्ञानिक तथ्य प्रस्तुत करने वाले फ्रायडवादी विचारकों ने अपने तर्कों द्वारा सामान्य व्यक्तियों के चिन्तन को मनोवैज्ञानिक जंजीरों से बुरी तरह बाँध दिया है। विकास पशु-प्रवृत्तियों के परिपोषण एवं उनकी परितृप्ति में सन्निहित है, इस प्रतिपादन ने विकासवादियों से भी जबरदस्त दार्शनिक कुठाराघात जनमानस के चिन्तन पर किया। विकास के लिए सहज सूत्र हाथ लगते ही अवशेष मर्यादाओं के वे बन्धन भी एक झटके से तोड़ दिये गये, जो मनुष्य की निम्नगामी प्रवृत्तियों पर थोड़ा अंकुश रखे हुए थे। कहना न होगा कि विश्व के वर्तमान नैतिक अवमूल्य में यौन वृत्तियों का समर्थन करने वाले चिंतन का विशेष योगदान है। इस कारण संसार में विशेषकर पाश्चात्य जगत में नैतिक पतन का जो सिलसिला चल पड़ा है उसका अन्त कहाँ जाकर होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। पर यह तो सुनिश्चित है कि मनुष्य के उल्टे चिन्तन को तथा प्रचलित मान्यता प्राप्त एकांगी किन्तु निरर्थक दर्शन को उल्टा न गया तो परिणति एक ऐसी विभीषिका के रूप में प्रस्तुत होगी जो अत्यन्त कष्टदायी हो सकती है।

विचारक पॉपर तथा मैक ने आधुनिक मनोविज्ञान की समीक्षा करते हुए कहा है कि “फ्रायड के मनोविज्ञान में मनुष्य का बहिर्मुखी व्यवहार वंशानुक्रम और अनुकूलन द्वारा निर्धारित माना जाता है। इसमें मनुष्य की सूक्ष्म शक्तियों तथा उसकी असीम संभावनाओं का कहीं भी उल्लेख नहीं है। संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति के प्रत्यक्ष तथा अतीन्द्रिय सामर्थ्य के परोक्ष कितने ही स्रोत मानव के अचेतन मन में विद्यमान है। इन सामर्थ्यों की जानकारी आधुनिक मनोविज्ञान में कहीं नहीं है।”

मनुष्य की असीम सम्भावनाओं पर विश्वास करने वाले मनःशास्त्री शेरिंगटन का कहना है “बिहेवियोरल साइकोलॉजी तथा न्यूरोलॉजी दोनों ही विषयों का अध्ययन एक साथ किया जाना चाहिए। वे लिखते हैं कि न्यूरोलॉजी केवल मस्तिष्क के न्यूरोनल क्रिया-कलाप की आरम्भिक जानकारी भर देता है जबकि विचारों का मस्तिष्क से घनिष्ठ सम्बन्ध है। विचारों के उठते ही न्यूरानों की गतिविधियाँ भी बदल जाती हैं पर विचारों का उद्गम स्रोत आज भी अविज्ञात बना हुआ है। शेरिंगटन का मत है कि सेरिब्रल कार्टेक्स तथा सबकार्टिकल न्यूकिल आई के वृहद तन्त्रिका जाल में चेतनात्मक अनुभवों का उद्गम स्रोत छिपा हुआ हो सकता है। सम्भव है निश्चित प्रकार के विचारों को जन्म देने में उन अनुभवों की भूमिका रहती है।”

पिछले दो दशकों में वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क की संरचना, उसकी कार्यपद्धति पर बहुत अधिक कार्य किया है। तन्त्रिका तन्त्र, तन्त्रिका कोशिकाओं के कार्य व्यवहार, उनके द्वारा सूचनाओं का आदान प्रदान, साइनेप्सेस आदि के सम्बन्ध में बहुत कुछ अनुसन्धान कार्य हुआ है, पर आज भी अरबों कोशिकाओं के माया जाल से परिपूर्ण मस्तिष्क एक रहस्य ही बना हुआ है। यह रहस्य अभी भी अविज्ञात है कि वैचारिक गवेषणाओं अथवा इच्छाशक्ति के चमत्कारों में मन-मस्तिष्क की समन्वयात्मक भूमिका किस तरह की है। किस परिवर्तनों अथवा व्यतिरेकों से संतुलन गड़बड़ाता, मस्तिष्क पगलाता, अथवा पतन पराभव की ओर ले जाता है।

यह जानकारी आज भी अप्राप्य है कि मस्तिष्क का वह कौन-सा केन्द्र है जो जागृत होकर किसी को मेधा सम्पन्न बना देता है जिसके प्रसुप्त रह जाने पर दूसरे व्यक्ति सामान्य ढर्रे की जिन्दगी व्यतीत करते रह जाते हैं। इन प्रश्नों पर गम्भीरतापूर्वक शोध न होने का ही परिणाम है कि आधुनिक मनोविज्ञान मानवी व्यवहार के बाह्य पक्ष के अध्ययन विश्लेषण से कुछ आगे नहीं पहुँच पाता। इससे जो परिणाम सामने आते हैं, वे भी अत्यंत उथले स्तर के होते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास का अवलोकन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मन के स्वरूप एवं कार्य के ऊपर जितना अनुसंधान हुआ है वह इतना कम है कि असीम संभावनाओं से युक्त मन के विराट स्वरूप की उसके द्वारा कुछ भी जानकारी नहीं मिलती। रोगग्रस्त व्यक्तित्वों के परीक्षणों के निष्कर्षों से मनोविज्ञान के पन्ने तो भरे हैं, पर सुरपरनार्मल व्यक्तित्वों का विश्लेषण आदि कहीं देखने में नहीं आता।

आज मनुष्य की विचारशीलता में कहीं गत्यावरोध उत्पन्न हो गया लगता है। कारणों की खोज करने पर एक ही तथ्य उभर कर सामने आता है कि गवेषणात्मक बुद्धि ने अपना आत्मविश्वास गंवा दिया है। आत्म गरिमा को वह भूल बैठा है। बात यहीं तक सीमित नहीं रही, मनुष्य को अपनी अविनाशी अस्तित्व तक पर सन्देह होने लगा है। इस महाविनाशक चिन्तन की परिणति विवेकहीनता, अदूरदर्शिता से भरे कृत्यों के रूप में सर्वत्र देखी जा सकती है। जीवन की इतिश्री जब शरीर के साथ ही होने वाली है, तो फिर अगले जन्म की बात ही क्यों सोची जाय? जैसे भी बने अधिकाधिक उपभोग क्यों न किया जाय? चार्वाक के ‘ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत्’ के सिद्धान्त को अपनाने में हर्ज क्या?

मूलतः मनुष्य श्रेष्ठ है, अध्यात्म की इस मान्यता को स्वीकार किये बिना मनुष्य को विस्मृति के गर्त से निकाल सकना सम्भव न हो सकेगा। डार्विन के विकासवाद एवं फ्रायड के नियतिवाद मनोविज्ञान से आज का प्रबुद्ध मानव बुरी तरह प्रभावित है। उसका चिन्तन एवं क्रिया-कलाप उच्चस्तरीय प्रेरणाओं से नहीं उपरोक्त चिन्तन से अभिप्रेरित है। फलतः वह न तो कभी महान सत्ता पर विचार करता है, न ही महानता की ओर बढ़ने की उसकी आकाँक्षा जागती है। पशु-प्रवृत्तियों के परिपोषण में ही उसकी सामर्थ्य खपती रहती है। मल-विक्षेपों से आत्म सत्ता का प्रकाश धूमिल हो गया है, उन्हें हटाकर आत्मा की दिव्यता को अभिव्यक्त करना जीवन का, विकास का परम लक्ष्य है, यह आकाँक्षा चिन्तन की पराधीनता के कारण जगने नहीं पाती। फलतः महानता की अभिव्यक्ति के लिए अवसर नहीं मिल पाता।

वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक दर्शनों के प्रतिपादन बुद्धि विलास तथा ज्ञान सम्वर्धन के लिए उपयोगी हो सकते हैं, पर मानवी जीवन के साथ उन्हें जोड़ा नहीं जा सकता। हर वैज्ञानिक सिद्धान्त को इस कसौटी पर कसना चाहिए कि उसका मूल लक्ष्य क्या है। दर्शन एवं मनोविज्ञान यदि मानवी चिन्तन को मूल उद्देश्यों से भटकाते हों, पतन की ओर धकेलते हों तो प्रभावशाली तर्कों से युक्त होते हुए भी उन्हें नकारा जाना चाहिए। जो मानवी गरिमा को ऊँचा उठाए, उसमें छिपी महान सम्भावनाओं पर विश्वास रखता हो, वहीं वैज्ञानिक दर्शन वरणीय है।


बाँटने वालों की मिठास सराही जाती है (kahani)

समुद्र में बहुत पानी था। सो पथिक अधिक लाभ की आशा में उसके तट पर पहुँचा। किन्तु अंजलि होठों तक ले जाते ही देखा- वह तो बहुत खारी है। प्यासा लौट गया।

कुछ दूर एक छोटी नदी थी। पिया तो पाया- मीठा और ठण्डा जल।

बड़े के पास खारी और छोटे के पास मीठा। इस भेद को समझने के लिये उसने बुद्धि दौड़ाई। नियति ने कहा- जो बाँटते हैं, उनकी मिठास सराही जाती है। जो सिमेटते हैं वे बड़े होने पर भी भर्त्सना सहते हैं।


युग-ऋषि “आइन्स्टाइन”

अपने युग के ऋषियों में एक हैं- ‘आइन्स्टीन’। उनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी रही है। अणु विज्ञान का उन्हें पितामह कहा जाएगा। इसकी खोज के सूत्र उन्होंने ही ढूंढ़ निकाले। आज अणु विज्ञान का जो वैभवशाली भवन दृष्टिगोचर होता है, उसकी नींव इस ऋषि प्रवर ने ही डाली थी। जितनी भी उपलब्धियाँ आणविक शक्ति एवं बलों के एकीकरण सम्बन्धी कण भौतिकी के सिद्धान्त की है उनका सूत्रपात उन्होंने ही किया। जो लौ भौतिकी के क्षेत्र में उन्होंने आज से पचास वर्ष पूर्व प्रज्वलित की, उसी का दृश्यमान विराट रूप आज वैज्ञानिकों के समक्ष है।

आइन्स्टीन उच्चस्तरीय दार्शनिक भी थे। उनने गणित की चरम सीमा तक पहुँचकर उस सापेक्षवाद के सिद्धांतों को प्रकट किया, जिन्हें आज के मूर्धन्य गणितज्ञ भी ठीक तरह से समझ नहीं पा रहे हैं। प्रकृति और ब्रह्म के संयुक्तिकरण में उनने जो खोजपूर्ण विचार व्यक्त किए, उन्हें पढ़ने पर उन्हें आस्तिक-नास्तिक अथवा नास्तिक आस्तिक भी कहा जा सकता है। वे कहते थे प्रकृति जैसी भी है, उनके निर्माण में जिस सत्ता को काम करना पड़ा है उसे ब्रह्म से कम नहीं कहा जा सकता। वे पूजा-पाठ नहीं करते थे तो भी उनकी आस्था ब्रह्म पारायण ऋषियों से कम नहीं थी।

योग दर्शन का प्रथम सूत्र है- चित्त वृत्तियों का निरोध। वे सतत् अपने लक्ष्य में इतने तादात्म्य रहे कि लोक व्यवहार में उनसे भूल पर भूल होती थी। साज-सज्जा से लेकर बाहर आने जाने तक के क्रम में कहीं कृत्रिमता नहीं थी। एक बार वे एक स्वागत समारोह में पहुँचे। उनने स्थान ग्रहण ही किया था कि उनका नाम पुकारते ही श्रोताओं ने खड़े होकर प्रसन्नता से ताली बजाना आरम्भ कर दिया। इन उठ खड़े होने वालों और ताली बजाने वालों में आइन्स्टीन भी थे। लोकाचार के सर्वथा विरुद्ध वे कर रहे हैं और उपहासास्पद वे बन रहे हैं, इसका उन्हें कोई ध्यान कभी नहीं रहा। ऐसी एक नहीं बीसियों घटनाएं हैं जिनकी चर्चा उनकी व्यवहार कुशलता पर व्यंग्य करते हुए व्यक्त की जाती थी। पर वे वस्तुतः ऐसे थे नहीं। उनकी मेधा चरम मूर्धन्य थी। जिस विषय पर भी उनने प्रकाश डाला, जो भी खोजा, वह अद्भुत अनुपम है। उनके प्रतिपादित सिद्धान्तों की ठीक तरह व्याख्या कर सकने वाले संसार भर में मुट्ठी भर ही आदमी हुए हैं।

उनके ऋषि कल्प जीवन के ढेरों उदाहरण हैं। जिस विद्यालय में उन्हें प्रधानाध्यापक का स्थान दिया गया, वहाँ पूछा गया कि आपको कितना वेतन दिया जाय? खर्च का अनुमान जो उन्होंने बताया उस पर हंसते हुए पाँच गुने वेतन पर उनकी नियुक्ति की गयी। घरेलू खर्च व मेहमानों के आतिथ्य आदि का कार्य उनकी पत्नी ही सम्भालती थीं। उन्हें तो इसकी जानकारी तक न थी।

आइन्स्टीन को नोबुल पुरस्कार मिला। इसकी न उन्होंने खुशी मनाई, न दावत दी। न डायरी में उसका कोई हिसाब-किताब रखा। वह राशि सीधे पत्नी के हवाले कर दी व कहा- जिनका उधार है, उन्हें चुका दें। जब वे बीमार हुए, मरणासन्न स्थिति आ पहुँची तो डॉक्टरों ने ऑपरेशन की अनिवार्यता बतलाई। उन्होंने यह कहकर इन्कार कर दिया कि जब तक प्रकृति को मेरी जरूरत है, तब तक उसके साथ जबर्दस्ती करने की जरूरत नहीं है। आखिर आपरेशन नहीं हुआ।

निस्पृह, सन्त, योगी, अनासक्त, अपने विषय में तन्मय, लोकान्तर से हजारों मीलों दूर रहते हुए भी आइन्स्टीन ने जितने विषयों पर जितनी शोध की है, जितना प्रकाश डाला है, उसकी विवेचना करने में नई पीढ़ियों को लम्बी अवधि लगेगी।

ईश्वर और प्रगति की संगति बिठाने वाले ऋषि श्रेष्ठ आइन्स्टीन की यह उक्ति प्रसिद्ध है कि “ईश्वर मजबूर था, ऐसी दुनिया बनाने के लिए और प्रकृति को इससे अच्छा निर्माता मिल नहीं सकता था। दोनों की अपनी-अपनी मजबूरी से ही सृष्टि का यह रूप बना है।”


आयुर्वेद की गौरव-गरिमा अक्षुण्ण रहे

आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरकसंहिता के सूत्र स्थान में एक उद्धरण आया है-

तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय कल्पते। सचैव भिषजां श्रेष्ठों रोगेभ्यो यः प्रमोचयेत्॥ 1-135

अर्थात्- “औषधि वही श्रेष्ठ है जो रोग को दूर कर आरोग्य प्रदान कर सके और कोई दूसरी व्याधि पैदा न करे। वही वैद्य श्रेष्ठ है जो रोगी को रोग से सर्वथा मुक्त कर स्वास्थ्य लाभ दे सके।”

यह एक स्मरणीय तथ्य है कि आप्त पुरुषों द्वारा रचित ये ग्रन्थ देव संस्कृति की अमूल्य थाती के रूप में हमारे मध्य विद्यमान है, वनौषधि समुदाय के रूप में जड़ी-बूटियों का विलक्षण भाण्डागार हमारे राष्ट्र में है, फिर भी न जाने क्यों हम उस एलोपैथी को आँख मूँद कर स्वीकार कर लेते हैं जो सेवन करने पर चरक के कथन के विपरीत एक नहीं कई व्याधियाँ उत्पन्न कर देती हैं सारी जीवनी शक्ति को निचोड़ डालती है।

आज आयुर्वेद मृत प्रायः स्थिति में है। ग्रन्थ वही है, प्रयोग विधान भी वही हैं, फिर क्या कारण है कि रोगों पर उनका प्रभाव होता नहीं देखा जाता। इसके कई कारण हो सकते हैं। या तो रोगी को इस पद्धति पर आस्था नहीं रही अथवा औषधि गलत, बासी-पुरानी, वीर्यगुण रहित दी गयी अथवा वैद्यों की ज्ञान सम्पदा का भण्डार चुक गया एवं वे सही निर्णय करने में असफल रहे हैं। तीनों में से कोई एक या तीनों ही बातें सत्य हो सकती हैं। जन-साधारण को तुरन्त आराम देने वाली एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की ओर उन्मुख होना भी इस कारण हो सकता है कि वे निराश करने वाले प्रयोगों की स्थिति में नहीं है। फिर क्या हार मान ली जाये? एवं वर्तमान ढर्रा जो चल रहा है, उसे ही चलने दिया जाये? क्या यही मानव की नियति है? अन्तःप्रेरणा कहती है- नहीं। ऐसा नहीं होना चाहिए। आयुर्वेद को पुनः गरिमा पूर्ण स्थान देकर मानव जाति को स्वास्थ्य लाभ देना चाहिए।

अक्षुण्ण स्वास्थ्य, जीवनी शक्ति एवं दीर्घायुष्य के रूप में मनुष्य को ऐसे तीन वरदान मिले हैं जिनके बलबूते वह जीवन व्यापार चलाता तथा साहित्य, कला, विज्ञान प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करता है। स्वास्थ्य यदि कमजोर हो तो अर्जित सफलताओं का कोई महत्व नहीं। बीसवीं सदी की मानव जाति को सबसे बड़ी देन यह कही जा सकती है कि उसने चिकित्सा के सम्बन्ध में आधुनिक चिन्तन विकसित कर लिया है। निदान उपचार में आज जिन जटिल उपकरणों का उपयोग होता है, उससे रोग को प्रारम्भिक स्थिति में ही पकड़ लेने दुष्कर कार्य नहीं। व्यक्तियों में रोग एवं उनके लक्षणों के प्रति जागरुकता भी बढ़ी है। एक और पक्ष जो साथ-साथ अभिवृद्धि करता चला गया है, वह है सभ्यता के अभिशाप के रूप में नये-नये रोगों की उत्पत्ति एवं उनका असाध्य होते चले जाना। बढ़ते औद्योगीकरण प्रदूषण, रेडियो धर्मिता एवं निर्वनीकरण ने समस्या को और भी जटिल बना दिया है। जीवनी शक्ति के क्षेत्र में मनुष्य क्रमशः विपन्न होता चला गया है।

आयुर्वेद आप्त पुरुषों द्वारा प्रणीत वेदाश्रित वैज्ञानिक विद्या है। इसे अथर्ववेद के एक उपाँग के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। ऋषि श्रेष्ठ चरक के अनुसार अक्षुण्ण स्वास्थ्य के तीन स्तम्भ हैं- “नयः उपस्तम्भा शरीरस्य, आहारः स्वपन्तो ब्रह्मचर्यमीति।” अर्थात्- युक्ताहार, युक्ता निद्रा एवं ब्रह्मचर्य। ये तीन ऐसे आधार हैं जिनका अवलम्बन लेकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। आहार पर नियंत्रण न होने से ही आज ओबेसीटी (स्थूल विकार), हृदय रोग, मस्तिष्कीय रक्त स्राव, मधुमेह जैसी व्याधियाँ बढ़ती चली गयी हैं। एलोपैथी की लगभग 60 से 80 प्रतिशत शक्ति इन्हीं रोगों पर नियंत्रण पाने में नियोजित होती है। रोग तो पूरी तरह कभी ठीक नहीं हो पाते। मात्र लक्षणों की रोकथाम हो पाती है। निद्रा में असन्तुलन बीसवीं सदी का एक ओर महारोग है। अनिद्रा के कारण करोड़ों टन तनाव शामक औषधियों का सेवन प्रति वर्ष विश्व में किया जा रहा है। तनाव, बेचैनी, आतुरता जैसे मनोविकारों ने ही शरीर रोगों को जन्म दिया है, ऐसी मान्यता अब दृढ़ होती जा रही है। ब्रह्मचर्य अब तो मात्र चर्चा प्रसंग का विषय हैं। कामुक उच्छृंखलता पाश्चात्य देशों में गत 40 वर्षों में जिस तेजी से बढ़ी है, उसी का कारण है कि जीवन शक्ति को खोखला कर देने वाले असाध्य रोग पनपे व सारे विश्व में फैल गए हैं। ए.आय.डी.एस. (एक्यूट इम्युनॉलाजीकल डेफीसिएन्शी सिन्ड्रोम) इसी की देन है जिसमें रोगी की प्रतिरोधी सामर्थ्य निरन्तर चुकती जाती है एवं क्रमशः वह मृत्यु के ग्रास में चला जाता है।

आयुर्वेद शास्त्र का वचन है- सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपित भला।

तत्प्रकोपस्ततु प्रोक्तं विधिवाहि सेवनम्॥

अर्थात्- “अनेक प्रकार के अहितकारी पदार्थों के सेवन से मलों का संचय हो जाने से रोग पैदा हो जाते हैं।” मूल कारण इस प्रकार आयुर्वेद ने मलों का संचय माना है एवं उसी की निवृत्ति को चिकित्सा का प्राण बताया है। इसके लिए ऋषियों ने विज्ञान समस्त विधि से निदान व्यवस्था बनाई है। “नाडी परीक्षा” नामक ग्रन्थ कहता है कि “रोगी के शरीर के आठ स्थानों का निरीक्षण करके वैद्य को रोग की परीक्षा करनी चाहिए- ये हैं नाड़ी, मूत्र, मल, जीभ, शब्द, स्पर्श, नेत्र तथा आकृति।”

आज भी निदान के लिये पाश्चात्य एवं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में 75 प्रतिशत इन्हीं लक्षणों पर निर्भर रहा जाता है। औषधि प्रकरण जब आता है तो विचित्र स्थिति पैदा हो जाती है। विशुद्धतः आयुर्वेद से चिकित्सा करने वाले वैद्य अब रहे नहीं। हैं तो बहुत ही कम हैं। भारत से ही यह चिकित्सा प्रणाली जन्मी एवं यहीं के वैद्य कन्डेन्स्ड कोर्स की शिक्षा प्राप्त कर पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करते देखे जा सकते हैं। वैद्य कहलाने में उन्हें लज्जा आती होगी इसलिए डॉक्टर कहलाते हैं। निर्गुण्डी, सौंठ, अश्वगंधा रोगी को देने में शर्म आती है इसलिए ‘कार्टीसोन’ का इन्जेक्शन लगाते हैं यह स्थिति बहुसंख्य चिकित्सकों की है जो कहने को तो आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त हैं पर चिकित्सा पाश्चात्य ढंग की कर रहे हैं।

आयुर्वेद के रस चिकित्सा, भस्म-खनिज चिकित्सा प्रकरण की तो यहाँ चर्चा नहीं की जा रही, किन्तु वनौषधियों का प्रयोग इतना निरापद एवं लाभकारी है कि उसका कोई मुकाबला नहीं। इन्हीं जड़ी बूटियों पर लट्टू हो आज विश्व के बहुसंख्य राष्ट्र अपनी चिकित्सा पद्धति का मूल आधार उन्हें बना रहे हैं। “वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन” ने अल्टरनेटिव सिस्टम ऑफ मेडिसिन के अंतर्गत वनौषधि चिकित्सा को ऊँचा स्थान दिया है व इन पर शोध हेतु भरपूर सुविधाएं भी। इनसे तृतीय विश्व की सीमित साधनों में शरीर व मन सम्बन्धी सारी व्याधियों का उपचार सम्भव है, यदि ताजी, सही पहचानी गयी औषधियों का प्रयोग सही समय पर आरम्भ कर दिया जाय। विदेश से आयातित आयुर्वेद का स्तुति गान करने के स्थान पर अपनी ही सम्पदा को सही ढंग से प्रयोग करना हम सीख लें तो सफल उपचार पद्धति विकसित हो सकती है।

प्रसन्नता की बात है कि पिछले दिनों चीन, प. जर्मनी, कोरिया, आदि देशों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के माध्यम से वैज्ञानिकों द्वारा किये जा रहे अनुसंधान के साथ-साथ हमारे अपने राष्ट्र में भी औषधीय पौधों पर आधुनिक ढंग से यह कार्य होने लगा है। 1959 में लखनऊ में स्थापित सेण्ट्रल ड्रम रिसर्च इन्स्टीट्यूट एवं जम्मू, हैदराबाद, बेंगलोर स्थिति रिजनल रिसर्च लेबोरेट्री में गत दो दशकों में काफी पौधों पर कार्य हुआ है। विजय सार (टेरोकार्पस मार्सुपियम), मधुनाशिनी (जिम्नेमा सिल्वेस्टर), से मधुमेह उपचार, पुष्कर मूल (इनुला रेसिमोसा), अर्जुन (टर्मिनेलिया अर्जुना) से हृदय रोग उपचार एवं सदाबहार (लोकेनेरा रोजिया) से रक्त कैंसर के उपचार हेतु औषधियाँ बनाने के क्षेत्र में काफी तेजी से प्रगति हुई है। नेशनल बॉटनीकल गार्डन (कलकत्ता) के विद्वान वनस्पतिविदों के अनुसार कुल चार लाख प्रकार की प्रजाति के पौधों में से अभी आठ हजार ही पहचानी जा सकीं व उनके गुण-धर्मों का निर्धारण हो पाया है।

देखा जाय तो चीन ने अपने राष्ट्र की समस्याएँ यदि पाश्चात्य ढंग से सुलझाने का विचार किया होता तो वह सम्भवतः अपनी एक प्रतिशत जनसंख्या को आधुनिक सुविधाएं दे पाता। अपनी परिस्थितियों व उपलब्ध औषधि सम्पदा को दृष्टिगत रख वहाँ तिब्बत में संग्रहित भारतीय आयुर्वेद ग्रन्थों के आधार पर “बेयर फुटेड डॉक्टर” (नंगे पैर चिकित्सक) स्कीम बनाई गई एवं एक निश्चित जनसंख्या के लिये ऐसे पेरामेडीकल स्टाफ का निर्धारण कर दिया। इस तरह वह अपनी एक अरब से भी अधिक जनसंख्या के स्वास्थ्य संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य पूरा कर पाया है। कोरिया (उत्तरी एवं दक्षिणी), मंगोलिया, रूस के पठारी व मैदानी क्षेत्र तथा हंगरी, रुमानिया, बेल्जियम एवं पश्चिमी जर्मनी में भी वनौषधियों की बहुतायत है। वहाँ सामान्य उपचार हेतु इन्हीं का प्रयोग किया जाता है। बड़े-बड़े अस्पतालों में भी आपातकालीन उपचारों तक के लिए अब वनौषधियों से बनी दवाएं ही प्रयुक्त होती हैं, संश्लेषित नहीं। डिजिटेलिस, रोवेल्फिया की ही शृंखला में अब कई औषधियाँ ऐसी ढूंढ़ी गयी हैं। जिनके प्रभावों के सम्बन्ध में आधुनिक प्रयोगशालाओं में पूरी तरह सन्तुष्टि कर ली गयी है।

आवश्यकता इन प्रयासों को और भी बढ़ाने की है ताकि अधिसंख्य जनता को रोगमुक्त किया जा सके। औषधि के क्षेत्र में परावलम्बी यह राष्ट्र यदि अपने गौरव को पुनः स्थापित करना चाहता है तो आधुनिक उपकरणों के माध्यम से वनौषधि अनुसन्धान कर उनके गुण धर्मों से जन-जन को अवगत कराना होगा। तभी वे वैज्ञानिकों को एवं रोगियों को स्वीकार्य होंगी। यह कार्य कठिन नहीं है, प्रयासों में प्रखरता भर लाना है। योगीराज भर्तृहरि ने वैराग्य शतक में सही ही कहा है कि- “जब तक शरीर स्वस्थ और रोग रहित है, जब तक वृद्धावस्था दूर है, जब तक सभी इन्द्रियों की शक्ति भरपूर है, प्राण शक्ति क्षीण नहीं हुई है- तभी तक बुद्धिमान को चाहिए कि वह आत्मिक प्रगति हेतु प्रयासरत रहे अन्यथा घर में आग लग जाने पर कुँआ खोदने से क्या लाभ?”


Quotation

आयुर्वेद ऋषि प्रणीत चिकित्सा विधा है, जो आज उपेक्षा के गर्त्त में पड़ी सिसक रही है। वैज्ञानिकता के इस युग में इसका पुनर्जीवन अपरिहार्य है ताकि पीड़ित मानवता को विराट वनौषधि समुदाय के माध्यम से राहत दी जा सके। रोग के निदान एवं औषधि के परीक्षण हेतु आधुनिक एवं चिकित्सा हेतु पुरातन सिद्धान्तों का समन्वय कर निश्चित ही एक तथ्य सम्मत प्रामाणिक चिकित्सा पद्धति विकसित की जा सकती है जो मनुष्य को सर्वांगपूर्ण विकास की ओर अग्रसर करे।


प्रतिकूलताएँ (kahani)

एक छोटी लड़की को सपने में शेर दिखाई देता और वह बेतरह डर जाती । हालत बिगड़ते देखकर उसे एक मनःचिकित्सक के पास ले जाया गया।

सारी बात समझने के बाद मनोविज्ञानी ने लड़की से कहा- वह शेर तो मुझे भी रोज सपने में दिखता है। वह तो बहुत भला है। काटता बिलकुल नहीं। खिलाड़ी प्रकृति का होने के कारण वह साथी ढूंढ़ता है और इसलिए सपने में आता है। अब की बार आये तब तुम उससे दोस्ती जोड़ना फिर देखना कितना भला और हंसोड़ है वह।

लड़की का समाधान हो गया। वह प्रसन्न होकर लौटी। सपना तो अब भी आता पर वह रात में हंसती मुस्कुराने लगती। डर मन में से बिल्कुल चला गया था।

प्रतिकूलताओं को यदि दुश्मन न मानकर दोस्त मान लिया जाय और उनके कारण अपनी प्रतिभा निखारने का लाभ सोचा जाय तो फिर वे डरावनी नहीं हंसाने वाली प्रतीत होंगी।


बड़ों के बड़े अन्धविश्वास

तुर्की में मुसलमान अमीरों के बड़े-बड़े हरम होते हैं। वे चाहते थे कि औरतें न केवल उनकी वासना पूर्ति किया करें वरन् साथ-साथ प्रेमिका की भूमिका भी निभाया करें। पर ऐसा होता नहीं था। बाल-बच्चों की संख्या वृद्धि, उपेक्षा से स्वास्थ्य की गिरावट और पारस्परिक कलह और अविश्वास के वातावरण में प्रेम नाम की वस्तु दुर्लभ हो जाती थी जबकि अमीर दुहरा फायदा उठाना चाहते थे।

इस कमी की पूर्ति के लिए वे हकीमों और लाल बुझक्कड़ों से तरह-तरह की तरकीबें- जादू मन्त्र पूछा करते थे। इस फेर में राज-घरानों में भी अन्ध विश्वासों का अम्बार लगा रहता था। इस मर्ज की दवा शहद में डुबाकर अंगूर खाने से लेकर गधी के दूध को पीना और उसमें नहाना भी एक नुस्खा था। और भी कई प्रकार की जड़ी-बूटियों की प्रशंसा होती थी, जिसमें हकीम तवीबों की चाँदी रहती थी, पर फायदा किसी को कुछ न होता था। अन्धविश्वास पिछड़े लोगों में जितना था उसकी तुलना में अमीर घरों में कुछ अधिक ही था, कम नहीं।

आदमी बहुत समझदार माना जाता है यहाँ तक कि समझदारों का एक विषय वर्ण भी होता है जो रहस्यमय बातों के कारण बताया करते हैं। साधारण आदमी उनके बताये पर विश्वास कर लेते हैं। विज्ञ होने का दावा करने वालों की बातों में जो दावा किया जाता है उसके बारे में सामान्यजनों की अनुकरण इच्छा होती हो तो इसमें अचम्भे की कोई बात नहीं।

टमाटर योरोप में पैदा हुआ उसे जहरीला फल घोषित किया गया। इस भय से प्रायः सौ वर्ष तक उसकी खेती रुकी रही। आम आदमी उसकी खेती करने से डरते थे कि उसे खाकर हमारे घर के लोग बीमार पड़ने या मरने न लगें। कीमियागरों ने उसको शुद्ध करने की तरकीब निकाली। जैसे भिलावा, गंधक आदि को शुद्ध किया जाता है। उसी तरह टमाटर का भी शोधन किया गया और बताया गया कि शुद्ध टमाटर में रक्तमाँस के से गुण होते हैं। क्योंकि तोड़ने पर उसमें रक्तमाँस जैसा गूदा निकलता है।

आलू जब नया उत्पन्न हुआ तो गुणी लोगों ने इसके बारे में घोषणा की कि यह ताकत का भण्डार है। ताकत की जरूरत योद्धाओं को होती है इसलिए उसकी खेती सरकारी नियंत्रण में होने लगी। और जो जितने महत्व का योद्धा था उसके लिए उसी अनुपात से आलू का कोटा मिलने लगा। उन दिनों एक सेर आलू का भाव सौ रुपया था। सौंदर्यता बढ़ाने और कामुकता भड़काने के लिए गधी का दूध बहुमूल्य माना गया। उन जमाने में गधे वजन ढोने के काम आते थे, पर गधियों का दूध निकाला जाता था और वह राजा रईसों के राजमहलों में ही खपता था।

आलू, टमाटर मामूली शाक तरकारी हैं। इनमें कोई विशेष गुण नहीं है, वह वहम प्रायः एक सौ वर्ष चलने के बाद समाप्त हुआ तब उसकी साधारण किसान खेती करने लगे और कौड़ी के मोल बिकने लगे। टमाटर के जहरीला होने का वहम भी इसी तरह समाप्त हुआ। काम वासना भड़काने और सौंदर्य विकसित करने के लिए गधी के दूध में कोई विशेषता है। यह वहन भी जल्दी ही समाप्त हो गया। लाल बुझक्कड़ों के यह प्रतिपादन वैज्ञानिक खोजबीनों के सामने गलत सिद्ध हुए और एक बड़ा वहम झकमार कर हट गया।

अशिक्षितों और देहातियों के अन्धविश्वास हंसी मजाक में उड़ा दिये जाते हैं और उन्हें तर्क से बाहर कह कर अमान्य ठहरा दिया जाता है पर राजा, रईस,अमीर, हकीम, तबीब जब मिथ्या कल्पनाएं गढ़ते हैं, और उन्हें सर्वसाधारण के गले उतारते हैं तो आश्चर्य होता है। आज कोई साधारण आदमी भी टमाटर, आलू के सम्बन्ध में वैसी मान्यताएं नहीं रखता, जैसी तुर्की में सैंकड़ों वर्षों तक प्रचलित रही और किसानों को इन्हें उगाने से वंचित रहना पड़ा।


मूक, किन्तु विलक्षणता सम्पन्न ये पशु-पक्षी

जन्म के समय मनुष्य पशु से अधिक बेहतर स्थिति में नहीं होता। पोषण एवं संरक्षण की तुरन्त व्यवस्था न बने तो अधिक समय तक जीवित रहना मानव शिशु के लिए कठिन हो जायेगा। नौ माह के पूर्व तो वह अपने पैरों न तो चल सकता और न ही अपने हाथों आहार ग्रहण कर पाता है। पूर्णतः वह माता-पिता पर आश्रित होता तथा उनकी ही कृपा पर जीवित रहता है। शरीर की दृष्टि से पशु अधिक समर्थ होते हैं। जन्मने के कुछ ही घण्टे बाद अपने पैरों चलने लगते तथा अपने आप आहार ढूंढ़ने लगते हैं। समर्थ, बुद्धिमान, विचारवान तो मनुष्य प्रशिक्षण-शिक्षण के आधार पर बनता है। उसका अवसर न मिले- ज्ञानार्जन के लिए समाज का संपर्क न प्राप्त हो तो मनुष्य की स्थिति पशुओं से अधिक अच्छी न होगी।

कार्य कुशलता तथा अद्भुत मेधा शक्ति का आधार वह शिक्षा है जो उसे विभिन्न रूपों में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष माध्यमों से मिलती रहती है। मनुष्येत्तर विकसित जीवों को भी प्रशिक्षित किया जा सके तो वे अनेकों काम ऐसे कर सकते हैं। जिनके लिए आधुनिक टेक्नालाजी का प्रयोग अथवा मनुष्यों का उपयोग किया जाता है। प्रकृति ने मनुष्य जितनी तो नहीं पर उन्हें भी काम चलाऊ बुद्धि दी है जिसका प्रयोग वे अपने दैनन्दिन कार्यों के लिए करते हैं। पर उनके सामान्य ढर्रे से अलग हटकर ऊंचे स्तर का काम भी लिया जा सकता है। श्रम के लिए परम्परागत रूप में कुछ पशुओं का उपयोग सदियों पूर्व से होता भी रहा है। उसमें कुछ नयी कड़ियाँ दूसरे जीवों की भी जोड़ी जा सकती हैं। आवश्यकता इतनी भर है कि जीव जन्तुओं की सामर्थ्य को परखा तथा उनकी साँकेतिक भाषा को समझा जा सके तथा उसके आधार पर उनके शिक्षण की व्यवस्था बनायी जा सके।

बातचीत की कला में मनुष्य विशेष रूप से दक्ष है। यह उस भाषा का चमत्कार है जो मनुष्य को विरासत के रूप में अपने पूर्वजों से मिली है। बच्चे को भाषा ज्ञान विशेष रूप से नहीं कराना पड़ता। परिवार के लोगों के संपर्क से ही वह सीख लेता है। हिन्दी भाषी परिवारों के बालक हिन्दी, अंग्रेजी भाषी परिवारों के बच्चे अंग्रेजी तथा अन्य भाषी परिवारों के बालक पैतृक भाषा सहज ही सीख लेते हैं। बच्चे के माँ-बाप गूँगे तथा बहरे हों तथा उसे समाज का संपर्क न मिले तो वह भी बोलना नहीं सीख सकेगा। देखा जाता हे कि जो बच्चे सुन नहीं पाते वे बोल भी नहीं सकते और अन्ततः वे गूँगे हो जाते हैं। भाषा की जानकारी उन तक नहीं पहुँच पाती। संकेतों के आधार पर ऐसे बालक किसी तरह अपना काम चलाते हैं।

मनुष्येत्तर जीवों के पास भी भाषा की कोई विरासत नहीं है, पर वे वार्तालाप गूँगे व्यक्तियों की तरह साँकेतिक आधारों पर करते हैं। विभिन्न प्रकार की सूचनाएं देने के लिए अन्य जीव विभिन्न तरह की आवाजें करते हैं। चिड़िया खतरे की सूचना देने के लिए एक तरह की तथा प्रसन्नता अभिव्यक्ति में दूसरे तरह की आवाज करती है। कुत्ते के भौंकने में वार्तालाप छिपा होता है जिसका प्रत्युत्तर दूसरे कुत्ते उसी भाषा में देते हैं। बन्दर अपनी इच्छा को ध्वनियों एवं अभिव्यक्तियों से दर्शाते हैं।

वर्षों पूर्व नोमचौम्सकी नामक एक विद्वान ने कहा था कि बोलना अन्य जीवों के लिए प्रकृति ने सम्भव नहीं बनाया है, अब वह कथन गलत सिद्ध हो चुका है। मनोवैज्ञानिकों को अब दूसरे जीवों के संपर्क प्रशिक्षण में आशातीत सफलता मिली है। पक्षियों, कबूतरों, चिम्पैंजी, बन्दरों, तोता, मैना तथा कुत्ते को साँकेतिक भाषा सिखाने में विशेष रूप से सफलता मिली है।

तोते की स्मरण शक्ति अन्य पक्षियों की तुलना में तीव्र होती है। फ्रांसीसी भाषाविदों का निष्कर्ष है कि तोता 100 शब्द आसानी से सीख सकता है। जे.एम. रिचार्ड सन नामक एक विद्वान ने एक तोते को बाइबिल का एक अध्याय पूरा कंठस्थ कराने में सफलता पायी थी। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि “विस्टन चर्चिल” की पुत्री “सारा चर्चिल” ने एक मैना पाली थी जो ब्रिटिश राष्ट्र गान के कुछ अंश मधुर स्वर में गा लेती थी। द्वितीय महायुद्ध के दौरान वह मित्र राष्ट्र के घायल सैनिकों का मनोरंजन अपने गायन से करती थी।

प्रख्यात उपन्यासकार थोमसमान की पुत्री एलिजावेथमान ने एक ‘पेगी’ नामक कुतिया को प्रशिक्षित किया। भौंकने के माध्यम से ही उसे भाषा ज्ञान कराने में एलिजावेथ ने सफलता पायी। पेगी कोई भी बात सुनकर उसका अर्थ समझ लेती थी। उसके उतर की अभिव्यक्ति प्लास्टिक के अक्षरों के माध्यम से होती थी। अक्षर उसके आगे रख दिए जाते थे तो वह उन्हें जोड़कर अपना उत्तर प्रस्तुत करती थी।

कुछ दशकों पूर्व जर्मनी के सिल्वर हेस घोड़े की बहुत चर्चा हुयी। वह किसी भी प्रश्न का उत्तर अपने टापों के आधार पर देता था। एशियन विज्ञान अकादमी ने सच्चाई की परख के लिए एक जाँच कमीशन बिठाया तो उसके विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि घोड़ा प्रश्नकर्ता के चेहरे एवं निगाहों को भापने में दक्ष था। वह प्रश्न समझ कर उत्तर के लिए तब तक टापें बजाना जारी रखता था जब तक प्रश्नकर्ता की निगाहों में सन्तोष या निराशा की चमक न देख लेता।

वर्जीनिया में लेडी वडर नामक घोड़े ने चीनी भाषा बोलने में सफलता पा ली थी। वह प्रश्नों का उत्तर लकड़ी के अक्षर खण्ड जोड़कर दिया करता था जिसे उसके प्रशिक्षक सामने रख देते थे। एक अंग्रेजी दैनिक में उस घोड़े की विशेषताओं का विस्तृत विवरण छपा था।

संसार के कितने ही देशों में संचार उपग्रह के इस युग में भी कबूतरों के माध्यम से सन्देश प्रसारण का कार्य लिया जा रहा है। रूस, जर्मनी जैसे राष्ट्र उनमें प्रमुख हैं। कबूतरों को अब वैज्ञानिक भी विश्वस्त सन्देश वाहक समझने लगे हैं। भारत के उड़ीसा प्रान्त में विगत 38 वर्षों से सन्देश पहुँचाने का कार्य ग्रामीण पुलिस विभाग द्वारा लिया जा रहा है। राज्य के पुलिस उप महानिरीक्षक आर.एम. पटनायक ने बताया कि आधुनिक संचार प्रणाली के तीव्र विकास के बावजूद पुलिस विभाग के लिए कबूतर सबसे अधिक विश्वसनीय तथा बेहतरीन वैकल्पिक सन्देशवाहक सिद्ध हुए हैं। राज्य के सुदूर पर्वतीय तथा घने जंगलों वाले क्षेत्रों में तो प्रायः इन कबूतरों की मदद से दुर्गम पुलिस चौकियों से संपर्क रखने में मदद मिलती है।

पुलिस संचार मुख्यालय के निरीक्षक जे.के. राय के अनुसार राज्य पुलिस ने सेना से 1946 में कुछ कबूतर लिये थे। उनके वंशज अब एक हजार से भी अधिक संख्या में सन्देशों को पहुँचाने का काम कर रहे हैं। श्री राय का कहना है कि सन्देशवाहक कबूतर तेज दौड़ाक एवं सतर्क होते हैं। वे बहुत कठिन उड़ानें भरने में भी सक्षम हैं। अनुकूल मौसम होने पर वे औसतन 60 किलोमीटर की गति से उड़ान भर सकते हैं तथा बिना रुके 15 से 20 घण्टे तक उड़ते रह सकते हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि कबूतरों के माध्यम से जितने भी सन्देश भेजे गये हैं वे सही समय पर तथा सकुशल पहुँचे हैं। किसी प्रकृति प्रकोप में अपनी जान गंवा बैठने की स्थिति में ही सन्देश पहुँचने में व्यतिरेक आने का प्रमाण मिला है अन्यथा उनकी वफादारी तथा मुस्तैदी में कभी भी किसी प्रकार की शिकायत नहीं मिली है। अमरीका तथा रूस में तो कबूतरों के माध्यम से गुप्तचरी कराने के भी प्रमाण मिले हैं।

विभिन्न जीवों में मूक भाषा-संपर्क के भी कई उदाहरण मिलते हैं। सर्वोत्तम मासिक पत्रिका में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार दक्षिणी अफ्रीका के नेटाल ड्रंकजवर्ग के लोटेनी अभयारण्यक के 40-50 वैबून बन्दरों ने एक बकरे को अपना अभिन्न सहचर बनाया है। वे उसका बराबर ध्यान रखते हैं। बकरा भी बन्दरों के समुदाय में अत्यन्त घुल-मिल गया है। उन्हीं के साथ खाता-पीता तथा उन्हीं के साथ सोता है। बन्दर बकरे की पीठ पर सवारी करते हैं। कई बार तो दुर्गम पहाड़ी पर बकरे को अपनी पीठ पर वानरों को बैठाये चढ़ते देखा गया है। अभयारण्य के वरिष्ठ प्रभारी रेंजर का कहना है कि बैबून बन्दर अत्यन्त संवेदनशील होते हैं, उनमें ममता भी बहुत होती है।

प्रशिक्षित किया जा सके तो दूसरे जीव मनुष्य के कितने ही कार्यों में सहयोग भी कर सकते हैं। परम्परागत रूप में बैल, घोड़े, खच्चर, गधे, बकरियों, ऊंट आदि से श्रम का काम लिया जाता है। हाथी भी सवारी गाँठने के अतिरिक्त भारी गट्ठर आदि ढोने के लिए कहीं-कहीं प्रयोग में लाये जाते हैं। पर अन्य छोटे जीवों से भी कितने ही प्रकार के काम लिये जा सकते हैं। जापान असेम्बली लाइन में जाँच पड़ताल का काम कबूतरों से लिया जाता है। बिना कोई हड़ताल किये अथवा वेतन भत्ता बढ़ाने की माँग किये वे मात्र चुगने के लिए थोड़े से चावल के दानों के बदले पूरी मुस्तैदी से सौंपा गया कार्य करते हैं।

रूस यूराल के मोईविंस्क खण्ड में धरती के गर्भ में धातुओं का पता लगाने के लिए शेफर्ड और एअरडेल जाति के कुत्तों का उपयोग किया जाता है। उनकी घ्राण शक्ति इतनी प्रबल होती है कि 17 मीटर की गहराई तक की धातुओं को सूँघ लेते हैं। इस कार्य के लिए उन्हें मात्र थोड़ा प्रशिक्षण भर देना होता है।

भूतकाल के ऐतिहासिक युद्धों में भी जानवरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। घोड़े एवं हाथी तो प्राचीन काल में सैन्य बल के समतुल्य ही गिने जाते थे। पर कितनी ही बार दूसरे जानवरों ने भी युद्ध विजय में ऐतिहासिक भूमिकाएं निभायी हैं। कोडाना दुर्ग अविजित बना हुआ था। शिवाजी के लिए उसे जीतना आवश्यक था। सीधी पहाड़ी पर बना होने के कारण सेनापति तानाजी को दुर्ग पर चढ़ना असम्भव प्रतीत हो रहा था। तब उन्होंने एक सैनिक की सलाह से गोह नामक जन्तु का प्रयोग किया। रस्सी में बाँधकर गोह को ऊपर फेंका गया। वह चट्टान से जाकर चिपक गया। सैनिक उसके सहारे आसानी से रात्रि के अन्धकार में दुर्ग पर जा चढ़े। उन्होंने दुर्ग पर कब्जा कर लिया।

आधुनिक मनुष्य की स्वाद लिप्सा एवं बर्बरता के कारण कितने ही पशु पक्षियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। उपयोगिता के आधार पर अन्य जीवों को निरर्थक ठहराया जाता है पर यदि उन्हें भी संरक्षण, भावनात्मक पोषण एवं प्रशिक्षण मिल सके तो उपयोगिता की कसौटी पर वे भी खरे एवं मानव समुदाय के लिए हितकारी साबित हो सकते हैं।


सुख और बड़प्पन की खोज (kahani)

एक सिद्ध पुरुष नदी में स्नान कर रहे थे। एक चुहिया पानी में बहती हुई आई। उनने उसे निकाल लिया। कुटिया में ले आये और वहीं वह पलकर बड़ी होने लगी।

चुहिया सिद्ध पुरुष की करामातें देखती रही, सो उसके मन में भी कुछ वरदान पाने की इच्छा हुई। एक दिन अवसर पाकर बोली- मैं बड़ी हो गई, किसी बड़े से मेरा विवाह करा दीजिए।

सन्त ने उसे खिड़की में से झाँकते सूरज को दिखाया और कहा- इससे करा दें। चुहिया ने कहा- यह तो आग का गोला। मुझे तो ठंडे स्वभाव का चाहिए। सन्त ने बादल की बात कही- वह ठंडा भी है और सूरज से बड़ा भी। वह आता है तो सूरत को आँचल में छिपा लेता है। चुहिया को यह प्रस्ताव भी रुचा नहीं। वह इससे बड़ा दूल्हा चाहती थी।

सन्त ने पवन को बादल से बड़ा बताया जो देखते-देखते उसे उड़ा ले जाता है। इससे बड़ा पर्वत बताया जो हवा को रोककर खड़ा हो जाता है। जब चुहिया ने यह दोनों भी अस्वीकार कर दिये तो सिद्ध पुरुष ने पूरे जोश के साथ कहा- चूहा पर्वत से बड़ा है, वह बिल बनाकर पर्वतों की जड़ खोखली करने और उन्हें इधर से उधर लुढ़का देने में समर्थ रहता है।

चुहिया रजामन्द हो गई। एक मोटा चूहा बुलाकर सन्त ने शादी रचा दी। उपस्थित दर्शकों को सम्बोधन करते हुए सन्त ने कहा- सुख और बड़प्पन की खोज लोग अपने स्तर और दृष्टिकोण के अनुरूप ही करते हैं।


“संगत बुरी असाधु की- आठों पहर उपाधि”

सम्राट चमूपति ने राजपुरोहित महामंत्री और अनेक विद्वान व्यक्तियों से परामर्श किया किन्तु वे राजकुमार श्रीवत्स की उद्दण्डता न छुड़ा पाये। महामंत्री के सुझाव पर उन्होंने राजकुमार का विवाह कर दिया- सोचा यह गया था कि नये उत्तरदायित्व राजकुमार के स्वभाव में परिवर्तन ला देंगे किन्तु स्थिति में कुछ परिवर्तन के स्थान पर राजकुमार का स्वभाव और भी उग्र हो गया। जबकि दूसरे सभी राजकुमारों की- सौम्यता, सौजन्यता के घर-घर गीत गाये जाते थे श्रीवत्स का स्वभाव राज-कुल का कलंक सिद्ध हो रहा था।

उन्हीं दिनों महर्षि श्यावाश्व ने वाजि- मेधयज्ञ का आयोजन किया था। सम्राट चमूपति उस आयोजन के प्रमुख यजमान के रूप में आमंत्रित किये गये। आचार्य प्रवर का सन्देश पाकर एक दिन वे आश्रम की ओर चल पड़े। प्रथम विराम, उन्होंने राजधानी से 5 योजन की दूरी पर स्थित अरण्यजैत ग्राम में किया। महाराज का विराम-शिविर प्रमुख परिचारकों के साथ- ग्राम के बाहर एक देव स्थान के पास किया गया। दिनभर के थके परिचारकों को जल्दी ही नींद आ गई किन्तु सम्राट किसी विचार में खोये अब भी जाग रहे थे।

तभी किसी विलक्षण आवाज ने उन्हें चौंका दिया। आवाज एक नन्हें से तोते की थी। वह मनुष्य की बोली में अपनी स्वामी से बोला-तात! आज तो बहुत अच्छा शिकार पास आ गया। इसके पास तो सोने का मुकुट, रजत की अम्बारियाँ और मणि-मुक्ताओं से जड़ित बहुमूल्य वस्त्र भी हैं- एक ही दाव में जीवन भर का हिसाब पूरा कीजिए स्वामी- ऐसा समय फिर हाथ नहीं आयेगा।

तोते का मालिक- अरण्यजीत का खूँखार दस्यु नायक- महाराज को पहचानता था। उसने तोते को चुप करना चाहा किन्तु ढीठ तोता- चुप न रहा- फिर बोला- आर्य! महाराज हैं तो क्या हुआ डरो मत सिर धड़ से अलग कर दो और चुपचाप इनका सारा सामान अपने अधिकार में ले लो।

सम्राट चमूपति- रात के अन्धकार की नीरवता से पहले ही सहमे हुए थे तोते की भयंकर मन्त्रणा ने उन्हें और डरा दिया- उन्हें नीति वचन याद आया “जहाँ मनुष्य को कुछ आशंका हो उस स्थान का तत्काल परित्याग कर देना चाहिए” सो उन्होंने अंग रक्षकों को जगाया और अविलम्ब वहाँ से चल पड़े।

प्रातःकाल होने को थी महाराज ने श्यावाश्व के आश्रम में प्रवेश किया उधर भगवान रश्मि-माल ने अपनी प्रथम किरण से उनका अभिषेक किया। आश्रम के द्वार पर महाराज पहुँचे ही थे कि एक अति मधुर ध्वनि कानों में पड़ी- आज के मंगलमूर्ति अतिथि- आइये, पधारिये आपका स्वागत है, आपका स्वागत है। आश्चर्य से महाराज श्री ने दृष्टि ऊपर उठाई। समीप के वृक्ष पर बैठा एक नन्हा सा शुक बोल रहा था।

महाराज ने ऊपर की ओर देखा और रात की घटना सजीव हो मानस पटल पर गूँज उठी- सम्राट बोले- तात! तुम्हारा स्वर कितना मधुर, कितना मोहक है और एक वह स्वर था जिसने मुझे रात में डरा ही दिया।

शुक के पूछने पर महाराज ने रात का सारा वृत्तांत कह सुनाया। वेदनासिक्त प्रच्छ्वास छोड़ते हुये शुक ने कहा- तात! अरण्यजैत का वह शुक मेरा सगा ही भाई है उसके कृत्य के लिये क्षमा याचना करता हूँ।

महाराज बोले- वत्स! एक ही उदर से जन्मे तुम दोनों भाइयों में यह विसंगति कैसी? नन्हे शुक ने उत्तर दिया- महाराज! सब संगति का फल है। मेरा भाई दस्युओं के गाँव में रहता है सो स्वाभाविक ही है कि उसमें वहाँ के लोगों जैसी क्रूरता हो, मुझे जो ज्ञान मिला वह महर्षि श्यावाश्व के इस संस्कार भूत आश्रम के वातावरण का प्रतिफल है। महाराज- श्री राजकुमार श्रीवत्स के बुरे होने का कारण समझ गये और उन्हें सुधारने का सूत्र भी मिल गया- सत्संगति।


अभागा हीरा

कोहिनूर हीरे की अभिशप्त कथा सर्वविदित है। वह जहाँ भी रहा है वहाँ सर्वनाश के बीज बोकर आगे बढ़ा है। अब दूसरे ऐसे ही एक ओर हीरे की गाथा सामने आई है। वह भी दुर्भाग्यपूर्ण होने में कोहिनूर से किसी प्रकार कम नहीं है।

इसे अब से 500 वर्ष पूर्व किसी ने नर्मदा तट पर वेंकट भगवान के मुकुट में लगाने के लिए चढ़ाया था। पुजारी के मन में लालच आया। उसने उसे उड़ा लिया। भक्तजनों को पता चला तो उनने पत्थर मार कर उसके प्राण ले लिए।

इसके बाद तस्करों द्वारा उसे फ्राँस पहुँचा दिया गया। जिनके हाथ में वह पड़ा वे एक दिन जंगल में फँस गये और जंगली कुत्तों के शिकार बन गये। फ्राँस के राजा के पास यह हीरा था। एक दिन दरबारी ने उसे पहनने के लिये उधार माँगा। घर से बाहर निकला ही था कि एक षड़यंत्र का शिकार हो गया और जान गंवा बैठा। इसके बाद वह लुई 14 फ्राँस के बादशाह के हाथ आया। वह भी ज्यादा दिन उसे पहन न सका। राजकुमारी को उसे पहनने का शौक था। वह भी कुछ ही दिनों में षड्यंत्रकारियों के चंगुल में फंस गई और मारी गई।

वहाँ से हीरा दूसरे ने उड़ाया। वहाँ भी वह बहुत दिनों तक पहना नहीं जा सका और षड्यंत्रकारियों का शिकार हो गया। यहाँ से एक जौहरी के हाथ लगा। उसने ऊँची कीमत पर बेचा। पर जिसने खरीदा था वह भी उसे अपने कब्जे में बहुत दिन न रख सका। शत्रुओं ने उसे भी बन्दूक का निशाना बना दिया।

इसके बाद यह हीरा घूमते-घूमते फ्राँस के राजा लुई 16 के हाथ पहुँचा। उसे उसने अपनी बीवी को दे दिया। दोनों के बीच भारी मुहब्बत थी। पर वह मुहब्बत जरा सी तू-तू मैं-मैं होने पर समाप्त हो गई और राजा ने रानी को गोली मार दी।

इसे राजकुमारी बड़े चाव से पहनती थी कि उसे भी प्रेम प्रसंग में जान गंवानी पड़ी। अब यह हीरा महारानी कैथराइन के हाथों पहुँचा। सन् 1980 की राजक्रान्ति में इसके समूचे परिवार का कत्ल कर दिया गया।

इसके बाद एक दो जगह और यह बिका अन्त में एक ऐसे जौहरी के पास पहुँचा जो उसे बहुत प्यार करता था। उसकी खूबसूरती पर मुग्ध था। दिनभर आँखों के आगे रखता। उसकी सुन्दरता थी ही ऐसी।

किन्तु जब से उसे हीरे का इतिहास मालूम पड़ा तो वह डर गया। उसने उसे अमेरिका के राष्ट्रपति संग्रहालय में सुरक्षित रखवा दिया। अब वह होप डायमण्ड के नाम से वहीं सुरक्षित है।

जिन वस्तुओं के साथ जितने लोभ, लालच, अपहरण, षड्यंत्र जुड़ते हैं वह उतनी ही उन भावनाओं से अभिशप्त हो जाती है। कोहिनूर हीरे का इतिहास ऐसी ही है। वह जितने भी लोगों के पास गया और रहा है उसको बेमौत मरना पड़ा है। होप डायमंड का दूसरा इतिहास ठीक उसी प्रकार का सामने आया है। बहुमूल्य होने के कारण हर किसी का मन उसे कब्जे में रखने के लिए ललचाता रहा है। ऐसी कीमती वस्तुएं प्रायः खरीदी बेची नहीं जातीं, उसका अपहरण किया जाता है, वह भी चुपचाप उसे सौंपता कहाँ है? जान रहते वह भी उसे अपने कब्जे में बनाये रखना चाहता है।

षड़यंत्र, दुरभि सन्धियाँ जुड़ते-जुड़ते वह वस्तु अभिशप्त हो जाती है। दुर्भावनाएं उस वस्तु से भी जुड़ जाती हैं। फलतः वह वस्तु जहाँ भी रहती है ऐसे ही कुचक्र आरम्भ कर देती है।

अन्तिम जौहरी ने बुद्धिमत्ता का काम किया कि उसे किसी के अधिकार में नहीं रहने दिया, राष्ट्रीय संग्रहालय में जमा कर दिया। वस्तु भी सुरक्षित रही और उसके कारण जो आये दिन दुर्घटनाएं होती थीं, उससे भी बचाव हो गया।


नर और नारी के मध्यवर्ती अनुदान प्रतिदान

स्त्री के व्यक्तित्व की बनावट ऐसी है, कि अपने पति, बच्चे एवं परिवार के साथ घुल-मिल जाती है। पुरुष के लिए इसमें जितनी कठिनाई पड़ती है, स्त्री को उतनी नहीं। इसका अर्थ है, आत्मीयता का विस्तार। जिस घर में बचपन, किशोरावस्था पार कर यौवन की देहली पर पहुँचती है, जिन सहेलियों के साथ खेलती और जिन कुटुम्बियों के साथ इतनी आयु बिताती है, उसे छोड़कर सर्वथा नये परिवार में जा पहुँचना और सर्वथा अपरिचित लोगों को अपना बना लेना, सर्वथा अपने को उनमें घुला देना, असाधारण बात है। पति का एक दिन का परिचय दूसरे दिन इतनी घनिष्ठता में बदल जाना, मानो उसी के साथ पालन-पोषण हुआ हो, वस्तुतः आश्चर्य की बात है। पुरुष को उस सीमा तक इतनी जल्दी जा पहुँचना कठिनाई की बात है। आत्मीयता के क्षेत्र में इतनी जल्दी इतनी प्रगति करना पुरुष के लिए कठिन है।

यदि परिचय न हो और पिछले दिनों से घनिष्ठता न चल रही हो, तो स्त्री के प्रति पुरुष के मन में कौतूहल आश्चर्य अजनबीपन और अविश्वास बना रहता है। उसे दूर करने में देर लगती है।

नारी का निर्माण कुछ ऐसे तत्वों से हुआ है कि वह समर्थ और सुयोग्य होते हुए भी समर्पण कर सकती है। यह समर्पण परावलम्बन नहीं है। बच्चों को वह प्राणप्रिय मानने लगती है। इसका अर्थ यह नहीं, कि वह उनके आश्रित है या उनसे कोई प्रतिदान प्राप्त करती है। यही बात पति या समूचे परिवार के प्रति है। उसका श्रम, समर्पण इतना बहुमूल्य है कि उसका मूल्याँकन पैसों में नहीं किया जा सकता है।

पति पत्नि के प्रति जो भोजन, वस्त्र के अनुदान प्रस्तुत करता है, उसका लेखा-जोखा मजूरी के हिसाब से नहीं लगाया जा सकता। दिन और रात शारीरिक और मानसिक ही नहीं, आत्मिक अनुदानों को प्राप्त कर सकना कितनी ही बड़ी राशि के बदले नहीं हो सकता। फिर कपड़ा तो पति ही देता है। बच्चे क्या देते हैं? वे तो पति से भी अधिक प्राप्त करते हैं। पूरा परिवार जो स्नेह-सम्मान प्राप्त करता है, उसका कौन आर्थिक मूल्य चुका पाता है। दर्द के समय इतनी कष्टसाध्य सेवा कर सकना किसी वेतन भोगी कर्मचारी से सम्भव नहीं। मानापमान का ध्यान न करते हुए एक रस आत्मीयता। बनाये रखना देवता जैसे सौजन्य के लिए ही सम्भव है।

परिवार से नारी भी कुछ प्राप्त करती है। इससे आँशिक पूर्ति वह भी करती है। बच्चे उसकी गोदी में बैठकर आँचल की छाया में कलोल करते हुए माता को जो देते हैं, उसका मूल्याँकन धाय के वेतन की तरह नहीं चुकाया जा सकता। प्रणय-क्रीड़ा में पत्नी को जो मिलता है, पति उससे कहीं अधिक पाता है। दाम्पत्य जीवन में यह विवेक राई-रत्ती के बराबर ही है। हर घड़ी एक अभिन्न साथी की भूमिका पत्नी ही निभा पाती है। ऐसी आशा किसी लाभदायक मित्र से भी नहीं की जा सकती।

पति अपने स्नेहिल अनुदान जितने गहरे प्रदान करता है, उसकी तुलना में वह पाता कहीं अधिक है। पत्नी एक शोभायमान उद्यान है, जिसे पति सींचता भर है, पर उससे जो पत्र, पल्लव, पुष्प, फल, छाया और प्राणवायु प्राप्त करता है उसकी नाप-तोल प्रतिपादन के रूप में नहीं की जा सकती।

जहाँ पुरुष दुर्बल पड़ता है, वहाँ स्त्री की शक्ति प्रकट होती है। पुरुष बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है, पर स्त्री सब कुछ दे सकती है। पुरुष के लिए अप्राप्य कुछ भी नहीं और स्त्री के लिए अदेय। पुरुष स्त्री को गिरा कर खड़ा रहता है और स्त्री गिरकर भी पुरुष की रक्षा करती है। यही है दोनों के मध्य सात्विक सहयोग अनुदानों का क्रम।


Quotation

व्यक्ति का अन्तःकरण वह न्यायालय है, जिसमें परमेश्वर न्यायाधीश बनकर विराजमान रहता है।


शब्द शक्ति के दुरुपयोग का दुष्परिणाम

शब्द की शक्ति सर्व विदित है। उससे भी अधिक है संगीत का प्रभाव। मन्त्र में प्रकारान्तर में शब्द ब्रह्म ओर नाद ब्रह्म का ही चमत्कार है। शब्द ब्रह्म अर्थात् कथन, नाद ब्रह्म अर्थात् गायन वादन। इनकी सामर्थ्य में कोई सन्देह नहीं। प्रश्न यह है कि क्या इनका मात्र श्रेष्ठ परिणाम ही होता है या हानिकार भी। शक्ति माने शक्ति। उसका भला और बुरा दोनों ही प्रतिफल हो सकता है। चाकू कलम बनाने, शाक काटने जैसे उपयोगी कामों ही आमतौर से उसका उपयोग होता है या हो यह भी सकता है कि किसी का अंग भंग करने के लिए उसका कुप्रयोग किया जाय।

कुछ समय पूर्व संगीत सर्व सुलभ नहीं था। कलावन्त कहीं दूर-दूर होते थे। फिर उन्हें भी आजीविका चाहिए। सुनने सुनाने के लिए उन्हें सम्पन्न व्यक्ति तलाश करने पड़ते थे। जिनके पास रोजी-रोटी के अतिरिक्त कलावन्तों को पालने के लिए समय और धन हो, ऐसे कहीं-कहीं जहाँ-तहाँ होते थे। ऐसी दशा में गायक वादक भी थोड़े ही होते थे। लाउडस्पीकर थे नहीं, सो सुनने के लिये दस-बीस की मण्डली ही जम पाती थी। उतनों से ही जिनकी आजीविका पूरी हो जाय, ऐसे गुणी लोग थोड़े ही होते थे।

देहाती भजन मण्डलियों के अतिरिक्त गुणी कलाकार कही-कहीं ही देखने सुनने को मिलते थे। ऐसी दशा में उनकी लाभ-हानि भी थोड़ों तक ही सीमित थी।

अब समय बदल गया। गायन-वादन का यन्त्रीकरण हो गया। ग्रामोफोन रिकार्ड, टेप रिकार्डर, फिल्म संगीत इस कदर व्यापक हुए हैं कि गली-कूँचों में उनकी धूम है। इनका विषय मात्र कामुकता है। प्रेमी, मैत्री, विछोह जैसी निम्न भावनाओं को उत्तेजित करने वाले यन्त्र गायन इतनी अधिक मात्रा विकसित हुए हैं कि रास्ता चलते वे जबरदस्ती कानों में घुस पड़ते हैं।

इस उथले संगीत का बाहुल्य जन-मानस में निरन्तर निकृष्टता भर रहा है। इस सुनने के लिए पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता। कहीं गली-चौराहे पर खड़े हो जाइए, प्रेम गीत अनायास ही सुनने को मिलेंगे। छोटे, बड़े बच्चे इन्हें याद कर लेते हैं। बड़ों को तो वे भली प्रकार याद हैं। इसका प्रभाव पड़े बिना रहता नहीं। छवि समेत गाने सुनने हों तो सिनेमा मौजूद हैं। रिक्शा चलाने वाले भी दो रुपये का टिकट लेकर ढाई घण्टे अश्लील दृश्य देखते और मजे में गाने सुनते हैं।

लगातार इन गीतों के सुनने का प्रभाव मस्तिष्क को अवाँछनीय ढाँचे में ढालता है। इतना ही नहीं उनसे मनोविकार और मनोरोग भी उत्पन्न होते हैं। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार पर असर पड़ता है। कामुकताजन्य अपराधों की इन दिनों धूम है। चोरी ठगी, डकैती जैसे अपराधों की तुलना में कामुकता के अपराध कहीं अधिक बढ़ते जा रहे हैं। यह छूत की बीमारी एक से दूसरे को लगती है। दूसरे से तीसरे को। धीरे-धीरे सारे समाज का मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य बिगड़ता जाता है।

सिनेमा के गायकों को प्रत्यक्ष देखने और उनके मुँह से गाने सुनने के लिए महंगी टिकट वाले संगीत सम्मेलन की धूम रहती है। निकृष्ट चिन्तन का प्रतिफल मनोविकार और मनोरोगों के रूप में बढ़ता जा रहा है। कामुकता के विचार इतने सुलभ और सस्ते मिल रहे हैं। इसके साथ-साथ अन्याय अपराधों के घटनाक्रम और दृश्य देखने को मिलते हैं। इसका प्रभाव चारित्रिक अधःपतन के रूप में सामने आता ही है। इसके साथ-साथ मनोरोगों की अभिवृद्धि का सिलसिला भी चल पड़ता है। तनाव, अनिद्रा, मृगी, सिर दर्द, दुःस्वप्न, जैसी मानसिक बीमारियाँ बढ़ते-बढ़ते कितने ही शरीर रोग उत्पन्न करती है। प्रमेह मधुमेह बहुमूत्र, रक्तचाप, हृदय की धड़कन जैसी बीमारियों का सिलसिला चलने के बाद लोग ऐसी बीमारियों से ग्रसित होते हैं जो अब असाध्य रोग बनकर जीवन की अवधि घटाती और आदमी को बेमौत मरने के लिए विवश करती है।

संगीत सुनने सुनाने, गाने और बजाने का भी शौक चलता है। इन दिनों संगीत सुनने के साथ-साथ गाने बजाने और गायकों की मंडलियां देखने का प्रचलन चलता और बढ़ता जा रहा है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि शब्द ब्रह्म और नाद ब्रह्म जिसके प्रभाव से आत्मा का उत्कर्ष, चरित्र का अभ्युत्थान और शारीरिक, मानसिक विकास के सुयोग मिलते थे। वही अब व्यक्ति के चरित्र, चिन्तन और व्यवहार को नीचे गिराता जा रहा है। इस स्थिति को बदलने में ही कल्याण है।

संगीत के स्कूल खुल रहे हैं। गायन-वादन का शौक बढ़ रहा है। यदि यह कलाकारिता के अभ्युदय की दिशा में हुआ होता, गायन वादन के साथ-साथ चिन्तन की उत्कृष्टता का भी समावेश हुआ होता तो कितनी प्रसन्नता की बात रही होती।

हर वस्तु भली और बुरी है। सदुपयोग करने पर वह भली बनती है। दुरुपयोग होने पर वही बुरी बन जाती है। नाद ब्रह्म संगीत का यदि सदुपयोग हो तो उसी का प्रतिफल अमृत सदृश होता है। बुरे उपयोग में वही विष बन जाती है। संगीत का दुरुपयोग कामुकता भड़काने के निमित्त हो तो शरीर और मन दोनों का सर्वनाश कर देती है। उसी को यदि मन्त्र विनियोग में- सृजनात्मक प्रयोजनों में किया जाय तो परिणाम कितना श्रेयस्कर होता है, यह प्रत्यक्ष है।


क्रोध की चुनौती (kahani)

वन बिहार के लिये वासुदेव, बलदेव और सात्यकि अपने घोड़ों पर चढ़कर निकले। रास्ता भटक जाने से वे एक ऐसे वन में जा फंसे जिसमें न पीछे लौटना सम्भव था, न आगे बढ़ना। निदान रात्रि एक पेड़ के नीचे बिताने का निश्चय किया। घोड़े बाँध दिये गये। तीनों ने एक-एक प्रहर पहरा देने का निश्चय किया ताकि सुरक्षा होती रहे और दो साथी होते रह सकें।

पहली पारी सात्यकि की थी। वे जागे, दो सो गए। इतने में पेड़ से एक पिशाच उतरा और मल्लयुद्ध के लिए ललकारने लगा। सात्यकि ने उसके कटु वचनों का वैसा ही उत्तर भी दिया और घूँसे का जवाब लात से देते रहे। पूरे प्रहर मल्लयुद्ध होता रहा। सात्यकि को कई जगह चोट लगी, पर उस समय साथियों से उस प्रसंग की चर्चा न करके सो जाना ही उचित समझा। अब बलदेव के जगने की बारी थी पिशाच ने उन्हें भी चुनौती दी। जवाब में वैसे ही गरमागरम उत्तर मिले। प्रेत का आकार और बल पहले की तरह ही बढ़ता रहा और बलदेव की बुरी तरह दुर्गति हुई। दूसरा प्रहर इसी प्रकार बीत गया।

तीसरी पारी वासुदेव की आई। उन्हें भी चुनौती मिली। वे हंसते हुए लड़ते रहे और कहते रहे- बड़े मजेदार आदमी हो तुम। नींद और आलस से बचाने के लिए मित्र जैसा मखौल कर रहे हो।

पिशाच का बल घटता गया आकार भी छोटा होने लगा। अन्त में वह झींगुर जैसा छोटा रह गया तब वासुदेव ने उसे दुपट्टे के एक छोर से बाँध लिया।

प्रातः नित्यकर्म से निपटकर जब चलने की तैयार होने लगी तो सात्यकि और बलदेव ने पिशाच से मल्लयुद्ध होने की घटना सुनाई और चोटों के निशान दिखाये। वासुदेव हंसे और पिशाच को दुपट्टे के छोर में से खोलकर हथेली पर रख लिया।

आश्चर्यचकित साथियों को देखकर वासुदेव ने बताया- वह प्रेत पिशाच और कोई नहीं ‘क्रोध’ था। जो वैसा ही प्रत्युत्तर देने पर बढ़ता और उग्र होता है पर जब उपेक्षा की जाती है तो दुर्बल और छोटा हो जाता है।


शाप और वरदान का दैवी उपक्रम

वाणी में अमोघ शक्ति है। उच्चारण करने वाले के व्यक्तित्व के स्तर के अनुसार उसका प्रयोग होने पर वह अपना प्रभाव भी दिखाती है। वाक् शक्ति की प्रखरता प्रचण्ड प्रभावी सामर्थ्य का हवाला शास्त्रों में शाप-वरदान सम्बन्धी अनेकों प्रसंगों में मिलता है। परा, पश्यन्ति, मध्यमा, बैखरी के रूप में इसके चार रूपों की चर्चा समय-समय पर की जाती रही है। जब तपःपूत व्यक्तित्व सम्पन्न वक्ता उच्चारित शब्दों का नियोजन करते हैं तो उसके सुनिश्चित परिणाम देखने को मिलते हैं।

शाप-वरदान के प्रसंग आर्ष साहित्य में ही नहीं, अन्यान्य सभ्यताओं प्रजातियों में भी देखने को मिलते हैं। अफ्रीका का काला जादू और कुछ नहीं मन्त्र शक्ति का विनियोग ही है। जब वाक् ऊर्जा का पुट ओझा द्वारा उसमें लगा दिया जाता है तो भोक्ता को दुःखदायी परिणामों का सामना करना पड़ता है। मुस्लिम फकीरों के सम्बन्ध में भी ऐसे ही शाप प्रयोगों का विवरण मिलता है। हजरत निजामुद्दीन जिनकी समाधि दिल्ली में बनी है, एक सूफी फकीर थे जिनके काम में विघ्न डाले जाने पर तात्कालिक राजा गयासुद्दीन खिलजी को मृत्यु का शाप मिला था। वह अपने ही दरबारियों की दुरभि सन्धियों के कारण दिल्ली पहुँचने के पूर्व ही मंच ढह जाने के कारण मारा गया। कराँची में एक शापग्रस्त स्थान पर अमेरिकन एम्बेसी की इमारत बनी है जो खाली पड़ी है। वहाँ कभी किसी फकीर का निवास था। बेदखल किए जाने पर उसने शाप दे दिया एवं तत्पश्चात उस भवन में कोई रह नहीं पाया। अपना कौनसुलेट दफ्तर अन्धविश्वास के कट्टर विरोधी अमेरिकनों को कहीं और बनाना पड़ा।

इंग्लैण्ड की एक काउण्टी काउण्ड्रे के राजा सर एन्थोनी ने अपने अधीनस्थ इलाके के धर्माचार्यों से अप्रसन्न होकर उन सभी को देश निकाल दे दिया। निकलने वाले साधुओं में से एक ने विवाद किया तो उसे विशेष रूप से प्रताड़ित किया गया।

उसने राजा को शाप दे दिया कि उसके परिवार के सदस्यों-सम्बन्धियों की व उसकी स्वयं की मौत आग लगने या पानी में डूबने से हुआ करेगी। देखा गया कि इसके कुछ ही दिनों बाद श्रमिकों की लापरवाही से महल में आग लग गयी। राजा निकल भी नहीं पाया और अपने बच्चों-पत्नि सहित झुलसकर मर गया। राजा के छोटे भाई को शासनारूढ किया गया पर वह भी अधिक दिन न टिका। उसका नाम था काउण्ट मान्टेग्यू ह्वाइट। वह एक नदी पार करते समय नाव उलट जाने से डूबकर मर गया। ये दोनों ही घटनाएं एक वर्ष के भीतर हुईं। सभी ने उन्हें साधु का शाप माना। कहते हैं कि उस परिवार में और भी कितनी ही ऐसी दुर्घटनाएं आगे घटित होती रहीं।

शाप की तरह वरदान की भी ऐसी ही विलक्षण शक्ति मानी गयी है। पुराने राजाओं की प्रथा थी कि वे सिंहासनारूढ़ होते थे तो विद्वानों को आशीर्वाद हेतु समारोह में सम्मान आमंत्रित करते थे।

सिकन्दर को भारत पर आक्रमण करना था। रास्ता दुर्गम था, अजेय होने की महत्वाकांक्षा मन में थी। विजय की सम्भावना सैनिकों के मनोबल को देखते हुए कम ही नजर आती थी। वह लम्बी यात्रा कर अपने गुरु सुकरात के पास गया और जाने की तैयारी तब आरम्भ की जब गुरु का आशीर्वाद भारत की सीमा क्षेत्र तक मात्र पहुँचने का मिल गया। इतिहास साक्षी है कि सिकन्दर ने कितनी ही प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए हिमालय के दुर्गम दर्रों को पार कर यहाँ तक विजय अभियान चलाया। इसके आगे वह सफल न हो सका क्योंकि वरदान सशर्त था।

पुरातन काल में गुरुकुलों में रहकर जब शिक्षार्थी घर आते थे तब गुरु का शुभाशीष लेकर आते थे। वह न मिले तो छात्र को तब तक वहाँ ठहरना पड़ता था जब तक कि गुरु सच्चे मन से आशीर्वाद न दे दें। विद्या की सफलता तब तक मानी नहीं जाती थी। शिष्य के चरित्र, मनोबल एवं व्यक्तित्व की कड़ी परीक्षा लेकर गुरुजन शिष्य को कई बार ऐसे आशीर्वाद देते थे जिससे वे धन्य हो जाते थे। आरुणी को 100 गौएं देकर अकेले जंगल में भेज दिया गया और जब तक हजार गौएं न हो जायें, तब तक वापस न लौटने के निर्देश दे दिये गये। विद्याध्ययन के मध्य यह कठिन पुरुषार्थ भरा व्यवधान उसने सहर्ष स्वीकार किया। पढ़ाई में हर्ज होने की शिकायत किए बिना वन की सारी कठिनाइयों को समझते हुए भी वह चल दिया। सौंपा हुआ काम मनोयोग पूर्वक अल्पावधि में ही पूरा कर वह वापस लौटा। गुरु का आशीर्वाद उसे मिला। इस बल से उसकी विद्या इतनी उच्च श्रेणी की हुई जितनी कि और किसी की भी नहीं थी। उसने ऋषि पद पाया और इतिहास में अमर हो गया।

मानवों को स्वर्गलोक का अधिकारी बनाने- श्रेष्ठता के पराकाष्ठा पर पहुँचाने में देवताओं के वरदान ही बराबर कारगर होते रहे हैं। असुरों ने तप के आधार पर असाधारण वरदान प्राप्त किए एवं वे इसी आधार पर देव शक्तियों पर विजय पा सके। अपनी मनोवृत्ति के कारण ही वे वरदान उनके लिए अन्ततः शाप सिद्ध हुए।

प्राचीन काल की मान्यता थी कि अपने पुरुषार्थ के समान ही सशक्त गुरुजनों का आशीर्वाद भी सहायक होता है। इसलिए तत्कालीन विज्ञजन पुरुषार्थरत होते हुए भी इस बात का प्रयास जारी रखते थे कि किन्हीं महापुरुषों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो सके। कालिदास जन्मजात मूर्ख थे किन्तु सरस्वती की आराधना ने उन्हें उच्चस्तरीय विद्वान बना दिया।

मध्यकाल के अन्धकार युग में जब नकली गुरुओं की भरमार हुई तब नकली शिष्यों ने स्वार्थ भरे प्रयोजन के लिए गुरुजनों को लोभ-लालच दिखाकर नकली वरदान प्राप्त करना आरम्भ कर दिया। यह प्रथा सर्वप्रथम ईसाई धर्म में शुरू हुई। इस धर्म में पापों को क्षमा कराने व स्वर्ग में टिकट रिजर्व कराने हेतु भारी दक्षिणा लेकर आशीर्वादों का क्रम आरम्भ हो गया। पादरी इसके बदले में लिखित रसीद देते थे और मूर्ख शिष्य अपने परलोक में रिजर्वेशन के प्रति आश्वस्त हो जाते थे। ईसाई धर्म की देखा-देखी अन्य धर्मों में भी यही प्रथा चल पड़ी। हिन्दू धर्म में भी बल्लभकुल गुसाईंयों की ऐसी प्रथा चली कि जो कुछ गुरु को दिया जाएगा, वह परलोक में जाकर कई हजार गुना मिला जाएगा। आगाखान गुरु के अनुयायियों में यही मान्यता है कि गुरु को दिया धन परलोक में कई गुना होकर मिलेगा।

गुरुओं के आदेश से किसी महत्वपूर्ण लोकहित के कार्य के लिए कोई बड़े अनुदान प्रस्तुत करने की बात समझ में तो आती है पर गुरु के व्यक्तिगत लाभ के लिये धन देना और उन्हें देव शक्तियों का एजेण्ट या परलोक का ठेकेदार मान बैठना आदि से अन्त तक गलत है।

आडम्बर का समावेश होते हुए भी इतना सत्य है कि पात्रता के अनुरूप उच्चस्तरीय आत्माएं किसी सत्प्रयोजन के लिए सत्पात्रों को सच्चे मन से आशीर्वाद देती हैं तो वह फलित होता है। इसी प्रकार यह भी सही है कि कुकर्मों के प्रतिरोध में दिया गया शाप भी ऐसा ही शक्तिशाली होता है, जिससे भयंकर हानि हुए बिना नहीं रहती।


यह सितारे गिनने के लिए नहीं (kahani)

एक दिन, दो दिन और लगातार कई दिन तक भी रात-रात भर तारों की गिनती करते देखकर आखिर माँ ने अपने बच्चे से पूछ ही लिया- “बेटे! तुम रात भर आकाश की ओर मुँह किये क्या गिना करते हो?”

“आकाश के सितारे माँ! बहुत प्रयत्न करता हूँ। किन्तु आकाश इतना विराट और नक्षत्र इतने अधिक हैं कि वे गिनने में ही नहीं आते।”

माँ ने थपकी दी और बोली- “बेटा, देर हुई जा रही है। सो जा, यह सितारे गिनने के लिए नहीं हैं वरन् इसलिए बनाये गये हैं, कि लोग उन्हें देखकर वैसा ही चमकीला और झिलमिलाता जीवन जीना सीखें।”


मुस्कराना सीखें- सदा स्वस्थ रहें

जिन्हें शारीरिक स्वास्थ्य की महत्ता एवं उपयोगिता के साथ-साथ उसकी सुरक्षा तथा अभिवृद्धि का रहस्य भी समझना है, उन्हें जानना चाहिए कि यह कार्य पौष्टिक आहार या टॉनिक रसायनों के बूते का नहीं है जैसा कि पिछले दिनों समझा जाता रहा है। वह समय चला गया जिसमें उस्ताद पहलवान या हकीम डॉक्टर किसी को निरोग या बलवान बना देने का दावा किया करते थे। आहार-विहार में सतर्कता को महत्व देते हुए भी अब नवीनतम तथ्य यह उभर कर आये हैं कि मानसिक स्तर ही किसी का स्वास्थ्य सुधारने या बिगाड़ने के लिए उत्तरदायी है। दुर्बलता या समर्थता अंग, अवयवों में नहीं, वरन् उन मस्तिष्कीय ज्ञान तन्तुओं पर अवलम्बित है जो विचार ऊर्जा तथा भाव सम्वेदना से प्रभावित होते हैं। अब रक्त संचार केन्द्र को नहीं मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाह को प्रमुखता मिली है और समझा गया है कि जीवन के अनेक पक्षों में प्रगति अवगति का ताना-बाना बुनने की तरह ही यह केन्द्र शारीरिक स्वस्थता अस्वस्थता के लिए भी बहुत कुछ उत्तरदायी है।

लम्बे प्रयोग अनुसन्धानों में शरीर शास्त्री और मनोविज्ञान वेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मस्तिष्क पर अवाँछनीय दबाव पड़ने से तनाव बढ़ता है और वह तनाव ही शक्ति क्षय का प्रमुख कारण है। जीवन शक्ति का भण्डार घटने से ही दुर्बलता आती है और पाचन तन्त्र, रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास आदि में गतिरोध बढ़ने से भीतर उत्पन्न होती रहने वाली गन्दगी का निष्कासन नहीं हो पाता। पोषण की कमी और गन्दगी की अभिवृद्धि होने से दुर्बलता ही रुग्णता बन जाती है। इस स्थिति में निरोधक शक्ति घट जाने से विषाणुओं के बाहरी आक्रमण भी जड़ जमाकर बैठ जाते हैं। उन्हें खदेड़ने वाली सामर्थ्य कम पड़ी तो बाहरी हमलों की रोकथाम भी नहीं हो पाती और जमी हुई जड़ उखड़ भी नहीं पाती। रोग पलने और बढ़ने लगते हैं। संक्षेप में यही है कि वह शृंखला जिसके कारण मानसिक विकृतियाँ ही अनेकानेक शरीरगत रोगों की निमित्त कारण बनती हैं।

मनोविकारों से अस्वस्थता उत्पन्न होने की जानकारी थी तो पहले भी। पर अब उसे वैज्ञानिक मान्यता मिल गई है। विचारशील चिकित्सक अब रोगी का शारीरिक ही नहीं मानसिक पर्यवेक्षण भी करते हैं और उसकी उलझनों तथा आदतों पर भी पूरा-पूरा ध्यान देते हैं। औषधि उपचार से भी अधिक महत्व मनःक्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों को हटाने और उनके स्थान पर नई स्थापनाएं करने पर जिन चिकित्सकों ने ध्यान दिया है। वे अपने रोगियों में अपेक्षाकृत अधिक जल्दी और अधिक स्थाई सफलता प्राप्त कर सके हैं। विश्वास किया जाता है कि अगले दिनों अंग परीक्षण की ही तरह मनोविश्लेषण और मानसिक परिष्कार चिकित्सा विज्ञान के प्रमुख अंग बन कर रहेंगे। इस स्थापना के लिए प्रयत्नशील मूर्धन्यों का विश्वास है कि रुग्णता के निराकरण में यह प्रक्रिया, यह पद्धति निश्चित रूप में सफल सिद्ध होगी।

मनोविकारों के दो स्तर हैं एक वे जिन्हें नैतिक क्षेत्र से सम्बन्धित कहा जा सकता है। छल, प्रपंच, द्वेष, अपहरण जैसे अचिन्त्य चिन्तन ही व्यभिचार, अनाचार, चोरी, ठगी, आक्रमण, आघात आदि अपराधों के रूप में प्रकट होते हैं। दूसरा स्तर सनकों का है। चिन्ता, भय, आशंका, अविश्वास, उद्वेग, कामुक, कुदृष्टि, विक्षोभ, निराशा, खीज जैसी अनेकों कुकल्पनाएं है जिन्हें लोग किसी न किसी बहाने उगाते, बढ़ाते और छाती से चिपकाये रहते हैं। वास्तविक कारण तो रंच मात्र होते हैं, पर सनक को स्थापना बनाकर उस पर ऐसा रंग चढ़ाते हैं कि उन्हें स्वयं वस्तुस्थिति जैसी प्रतीत होने लगती है भले ही वह अन्यान्यों को निरर्थक एवं उपहासास्पद प्रतीत होती हो। इन्हीं मनोविकारों में एक उदासी भी है। अपने को एकाकी अनुभव करने वाले, दूसरों के प्रति उपेक्षा बरतते हैं और साथ ही तिल को ताड़ बनाकर रंचमात्र कठिनाइयों को भारी संकट समझते और तनावग्रस्त रहने लगते हैं।

इन दिनों दोनों ही स्तर के मनोरोग की भरमार है। जान-बूझकर या अनजाने लोग इस दलदल में फँसते जाते हैं। आरोग्य क्षेत्र का सबसे बड़ा निमित्त कारण यही है। तनावग्रस्तों में अधिकाँश को आये दिन चित्र-विचित्र रोग बने रहते हैं। औषधि उपचारों की मरहम पट्टी होते रहने पर भी वे हटते या मिटते नहीं हैं। जड़ सींची जाती रहे तो पत्ते तोड़ने भर से उस विष वृक्ष के सूखने की आशा कैसे की जा सकेगी। चिकित्सा किसी भी पद्धति के अनुरूप क्यों न की गई हो उसका प्रभाव अत्यन्त क्षणिक होता है। इतना ही नहीं यदि वे औषधियाँ मारक प्रकृति की हैं तो फिर उसके पश्चात् प्रतिक्रिया ऐसी होती है जो रोग घटाने में मिले हुए तनिक से लाभ की तुलना में कहीं अधिक महंगी या भारी पड़े। यही कारण है कि इन दिनों रोगी एक से दूसरे चिकित्सक पर झक मारते और दवाएं बदलते- जेब कटाते और खीजते खिजाते जहाँ-तहाँ फिरते रहते हैं।

स्वास्थ्य सुधार के निमित्त आहार-विहार की प्रकृति के अनुरूप सदा और सात्विक बनाने के अतिरिक्त दूसरी आवश्यकता यह है कि मानसिक दबाव एवं तनाव घटाये जायें। इनमें से जो नैतिक स्तर के हैं उनका निवारण तो दृष्टिकोण और चरित्र में आदर्शों के समावेश से ही हो सकता है, पर जो सनकी स्तर के हैं उनके लिए मात्र स्वभाव में थोड़ा सा हेर-फेर करने से भी काम चल सकता है।

हर रोगी को- हर स्वास्थ्य सुधार के इच्छुक को इतना समझना, समझाया जाना आवश्यक है कि यह बेमौत मरने की जल्दी नहीं है तो जीवनचर्या को सौम्य शालीन बनायें। छल, प्रपंच और व्यभिचार अनाचार से सर्वाधिक चिन्तन और आचरण में जितना सुधार परिष्कार हो सके, करें। सादगी और सात्विकता अपनायें। सज्जनता और शालीनता के साँचे में अपने को ढालें। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाने और वासना, तृष्णा, अहंता की आग में अपनी जीवन-सम्पदा को न जलायें। उच्चस्तरीय सफलताओं के लिए व्यक्तित्व की गरिमा को सम्पन्न बनाया जाना चाहिए। मनोबल इसी आधार पर बढ़ता है। साहस इसी मनःस्थिति में सुदृढ़ होता है। लम्बे समय तक सुनिश्चित और अनवरत पराक्रम करने वाले प्रायः चरित्र निष्ठ होते हैं। उचक्के और लफंगे डग्गेमारी करते, तिकड़म अपनाते और ठगते-ठगाते कुछ कमा तो लेते हैं, पर वह शेखीखोरी की ललक सुहलाने के अतिरिक्त और किसी काम नहीं आता। चिरस्थायी प्रगति और सफलता के लिए जन सम्मान और जन सहयोग ही काम आता है।

प्रसंग यहाँ समग्र स्वास्थ्य सुधार का चल रहा है। मानसिक विक्षोभों का निराकरण शालीनता अपनाने और मर्यादाएं पालने से ही सम्भव है। नैतिकता ही समग्र आरोग्य और दीर्घ जीवन की गारन्टी है। अस्तु इस दिशा में जो जितना अनुशासन अपना सके, जो जितना आत्म सुधार कर सके, उसमें कमी न रहने दे। जो अनुपयुक्त बन पड़ा है उसके परिमार्जन का उपाय प्रायश्चित ही हो सकता है। खोदी गई खाई को पाटा जाना चाहिए। दुष्कृतों से समाज को जो हानि पहुँचाई गई है उसकी पूर्ति के लिए परमार्थपरक सत्कर्मों का एक सुनिश्चित व्रत धारण करना चाहिए। पाप का प्रायश्चित पुण्य को दूसरे पलड़े में रखने से ही बन पड़ता है। मात्र पंचामृत पीने और गंगा नहाने भर से वह भार उतरता नहीं जो विश्व व्यवस्था में अनीति का विक्षोभ उत्पन्न करके सिर पर लादा गया है। धर्म शास्त्रों में रोग निवारण का एक उपचार पुण्य-परमार्थ भी बताया गया है। यह आडम्बर नहीं वरन् मनःचिकित्सा विज्ञान के सर्वथा अनुरूप है।

रुग्णता का दूसरा मनोवैज्ञानिक कारण सनकों का समुच्चय है। निराशा, आशंका, चिन्ता जैसी सनकें चाहे अकारण हो चाहें सकारण उनका प्रभाव मानसिक तनावों के रूप में निश्चित रूप से होता है। उतने भर से अनिद्रा स्वल्प निद्रा जैसी अनेकों व्यथाऐं उठ खड़ी होती हैं। इतना ही नहीं अपच रहने लगता है, रक्त संचार और श्वास-प्रश्वास में शिथिलता आने के कारण छुट-पुट रोग उपजते हैं और वे देर तक बने रहने पर जड़ जमा लेते हैं। सनकजन्य उद्वेगों का समाधान अपेक्षाकृत सरल है। चूँकि उनका कारण चरित्र की गहराई में छिपा नहीं होता। मात्र चिन्तन की अनगढ़ता के कारण स्वभाव की उथली परतों पर बिखरा होता है। उसे आसानी से कुरेदा और बुहारा जा सकता है। इतना बन पड़े तो भी समझना चाहिए कि रुग्णता पर आधी विजय मिल गई।

मन हलका हो तो मुस्कराहट आये यह बात सच है, पर यह भी झूठ नहीं है कि मुस्कराते रहने की आदत डाल लेने पर मन हलका रहने लगता है, और भ्रान्तजन्य विक्षोभों का भार बहुत हद तक उतर जाता है। कृत्रिम मुस्कुराहट का अभ्यास दर्पण के सामने खड़े होकर हर दिन एक नियमित साधन की तरह करते रहने पर भी हो सकता है।

मुस्कुराते हुए मनुष्य सौंदर्य तत्काल दूना हो जाता है। क्रुद्ध व्यक्ति भी यदि मुस्कुराने लगे तो उसका चेहरा कमल जैसा खिला हुआ दिखेगा और पीले उखड़े दाँत भी मोतियों की माला जैसे सुन्दर लगेंगे। मुस्कुराहट कितनी ही बातों का परिचय देती है। उससे आत्मविश्वास एवं आन्तरिक सन्तोष उल्लास झलकता है। होठों पर टंगी हुई यह तख्ती बताती है कि इस व्यक्ति को सन्तोष और उल्लास उपलब्ध है, वही सफल होता और प्रगति करता है। अभावग्रस्त और दुःखी दरिद्र न होने की जानकारी भी दर्शकों को मुस्कराता हुआ चेहरा देता है। एक अर्थ में मुस्कुराहट सफल और सुखी जीवन की घोषणा है। इस परिचय से किसी की भी प्रामाणिकता सिद्ध हो सकती है।

जब हम हंसते हैं तो साथ देने के लिए अनेकों साथ हो लेते हैं, पर जब रोते हैं या रोने जैसी सूरत बनाते हैं तो नयों का आकर्षित होना तो दूर पुराने भी घटते और हटते जाते हैं, रोने वाला अकेला ही रोता है। किसी के मन में लोग लोकाचार की तरह ही सम्मिलित होते हैं। देर तक साथ देकर कोई भी अपने प्रसन्नता में कटौती नहीं करना चाहता। इसके अतिरिक्त निराशा असफल व्यक्ति से यह भी भय रहता है कि कहीं पैसे की अथवा दूसरे प्रकार की सहायता न माँगने लगे। प्रसन्न चित्त को सुखी समृद्ध समझकर लोग उसके समर्थ सम्पन्न होने की बात सोचते हैं और यह समझकर साथ देते हैं कि उस प्रसन्नता में से समय पड़ने पर उन्हें भी कुछ हिस्सा मिल सकता है।

मुस्कराने वाला, हंसी-खुशी के वातावरण में अधिक काम कर लेता है साथ ही उनसे भी अधिक काम करा लेता है जो साथ में काम करते हैं। मुस्कुराहट थकान मिटाने की अचूक दवा है। उसका सेवन करने वाला न केवल स्वयं तरोताजा रहता है वरन् समीपवर्तियों को भी ऐसी ताजगी प्रदान करता है जिसके सहारे वे भी थकान और तनाव से मुक्ति पा सकें।

बहुत सी भली-बुरी आदतें आदमी अभ्यास करते-करते सीख लेता है। दर्पण के सहारे मानव मित्र मण्डली में हास्य कथाएं चलाते हुए इस सद्गुण को कोई भी अपने स्वभाव में ढाल सकता है। इससे स्वास्थ्य लाभ की बात तो निश्चित रूप से बनती है साथ ही ऐसी अनेक उपलब्धियाँ भी हस्तगत होती हैं जो बहुमुखी सफलताओं का पथ-प्रशस्त कर सकें।


पुजारी का सपना (kahani)

एक पुजारी ने रात को सोते समय सपना देखा कि देवता ने प्रसन्न होकर मन्दिर के कोठे को लड्डुओं से भर दिया। सोते-सोते वह सोचना लगा- इतने लड्डुओं का क्या होगा? निर्णय हुआ कि सारे गाँव को दावत दी जाय। मजा आयेगा। भोर होते-होते नींद खुली तो वह आंखें मलता हुआ, गाँव के गली-कूँचों में दौड़ पड़ा और घर-घर दोपहर का भोजन मन्दिर में करने का निमंत्रण देता चला गया।

पुजारी की प्रसन्नता का ठिकाना न था। देवता का अनुग्रह और प्रीति भोज का गौरव यह दो ही बातें उसके सिर पर सवार थीं। सपने मिथ्या भी हो सकते हैं, उतावली के निर्णय उपहास भी करा सकते हैं। यह बात उसे सूझी ही नहीं। दोपहर को सारा गाँव जमा हो गया। पर खाने को कुछ भी नहीं था। मन्दिर खाली पड़ा था। पुजारी को भूल समझ में आई तो गाँव वालों से बोला आप लोग थोड़ी देर कुछ और काम कर लें। मैं अभी अभी फिर से सोने का प्रयत्न करता हूँ ताकि देवता अबकी बार सचमुच ही लड्डुओं से कोठे भर सकें।


पशु-पक्षियों पर मुकदमे

योरोप में एक जमाना ऐसा भी रहा है जब पशु-पक्षियों पर भी अदालत में मुकदमे चलते थे। उनके लिए वकील नियुक्त होते थे। आदमियों की तरह अभियुक्त पशु-पक्षियों को भी दण्ड दिये जाते थे। उनके बयान उनका चेहरा देखकर कल्पित कर लिए जाते थे। ऐसे कुछ विचित्र मुकदमें नीचे प्रस्तुत हैं-

(1) सन 1559 ई. में इटली की अदालत में अनाज खाने वाले कीड़ों के नाम सम्मन जारी किए गए कि उन्होंने जान-बूझकर दूसरों की सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया। सम्मन कीड़ों ने नहीं लिए तब वे पेड़ों पर चिपका दिए गए। अदालत में एक भी कीड़ा उपस्थित नहीं हुआ तो भी उन्हें हुक्म दिया गया कि इस इलाके से चले जायें और किसी दूसरे इलाके में अपने पेट भरने का इन्तजाम करें।

(2) सन् 1642 ई. में म्यूनिख की अदालत में एक भेड़िये के विरुद्ध मुकदमा चला कि उसने दो लड़कियों को घायल कर दिया था। चूँकि भेड़िया पकड़ा न जा सकता इसलिए उसका चित्र अदालत में लाया गया और उसे मौत की सजा दी गई। असली के बदली उसी चित्र वाले नकली भेड़िये को मौत का दण्ड मिला।

(3) इसी प्रकार सन् 1477 ई. में एक सुअर को छोटी बच्ची को काट लेने के अपराध में मौत की सजा मिली। चूँकि वह पकड़ लिया गया था इसलिए उसे विधिवत फाँसी दी गई।

(4) सन् 1540 ई. में ऐसे 62 मामले योरोप की विभिन्न अदालतों में पेश हुए जिनमें जानवरों ने मनुष्यों को नुकसान पहुँचाया था सभी के वकील अदालत में आते रहे और मुकदमे के फैसला होने में कई वर्ष लगे। इन अभियुक्तों में से अधिकाँश को मृत्युदण्ड मिला।

(5) 1561 ई. में एक इलाके के चूहों के खिलाफ मुकदमा चला कि उनने जान-बूझकर मनुष्यों की सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया है। वकीलों ने चूहों को निर्दोष सिद्ध किया क्योंकि उनका गुजारा सदा से इसी आधार पर होता रहा है। अदालत ने चूहों की गैर हाजिरी में भी यह हुक्म सुनाया कि वे इस इलाके को छोड़ दें और कहीं अन्यत्र मुकाम करें।

(6) एक बन्दर के मुकदमें में गवाह की जरूरत पड़ी। उसी पेड़ पर रहने वाले एक तोते को पकड़ा गया ओर उसकी मुखाकृति को देखकर सहमति-असहमति का अनुमान लगाया गया और बन्दर को दण्ड दिया गया।

उपरोक्त मुकदमों की सुनवायी में तीन से पाँच वर्ष तक का समय लगा। सबसे बड़ी कमी यह थी कि मुजरिम अदालत में हाजिर नहीं होते थे। मात्र वकील ही उनकी ओर से सफाई देने आते थे। इन वकीलों को सरकारी खजाने से फीस दी जाती थी इसलिए वे मुकदमें को लम्बा खींचने की कोशिश करते थे। यह प्रथा सन् 1600 में बन्द हुई। सन् 1400 से 1600 तक ढेरों मुकदमें इस प्रकार के चलते रहे, ढेरों धन इन सनक में खर्च हुआ।

पिछले दिनों न्याय या अन्याय की ठीक परिभाषा नहीं हो सकी थी। राजा का हुक्म ही न्याय था। वे जिस पर चाहें थोड़े से कारण पर अपनी मनमर्जी का बड़े से बड़ा दण्ड दे दिया करते थे। किसी पर खुश हों तो किसी को भी क्षमा कर देते थे। न्याय उनकी मुट्ठी में रहता था। कोई दण्ड विधान या आचार संहिता नहीं थी। यदि थी तो नाम मात्र को और फिर उनका कोई पालन भी नहीं करता था।

जब न्यायालय बने और दण्ड विधान बने तो ऐसे अधूरे थे जिनमें मनुष्य और पशु का अन्तर तक भुला दिया गया था। मुकदमे की खाना पूरी करने के लिए वकीलों की चढ़ बनी थी। पशु पक्षियों के नाम भी सम्मन भेजे जाते और उन्हें अदालत में जवाब देने के लिए कहा जाता। जबकि ये बोल तक नहीं सकते थे। उसी जमाने के कुछ मुकदमे मनोरंजनार्थ ऊपर दिए गए, जो मानव की एक ओर मूर्खता के परिचायक हैं।


शाकाहार और निद्रा का पारस्परिक सम्बन्ध

महाचुसेट्स इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नालाजी, के ‘सेन्टर फॉर ब्रेन साइन्सेज एण्ड मेटाबॉलिज्म’ प्रभाग द्वारा शाकाहार और माँसाहार पर किये गये अध्ययनों से ज्ञात होता है, कि माँसाहार हमारे शरीर फिजियोलॉजी के अनुकूल नहीं है, यह शरीर को बुरी तरह अस्त-व्यस्त व सुस्त बना देता है। शरीर के अंतर्गत स्रवित होने वाले विभिन्न प्रकार के हारमोनों तथा एन्जाइमों पर यह प्रतिकूल प्रभाव डालता एवं उनकी मात्रा को असामान्य बना देता है, जिससे तरह-तरह की गड़बड़ियाँ फैलने लगती हैं, जो अन्ततः रोग का निमित्त कारण साबित होती हैं।

प्रयोगों के दौरान पाया गया है कि माँस-भक्षण से हमारे शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा असामान्य रूप से बढ़ जाती है, जो अंततोगत्वा हृदय रोग का कारण बनती है।

अध्ययनों में देखा गया है कि आहार न सिर्फ शरीर को प्रभावित करता है वरन् मस्तिष्क से स्रवित होने वाले हारमोनों की मात्रा को प्रभावित कर शरीर के अन्दर चलने वाली विभिन्न प्रकार की फिजियोलॉजिकल गतिविधियों को भी प्रभावित करता है। इस संदर्भ में अध्ययन फिलाडेल्फिया विश्वविद्यालय के डॉ. बर्टमन व उनके साथियों ने आज से दस वर्ष पूर्व आरम्भ किया था। पशुओं पर किये गये प्रयोगों में उनने पाया कि आहार की प्रकृति मस्तिष्क के जैव रासायनिक तत्वों यथा- सेरोटोनिन, डोपामिन, नारएपिनेफ्रिन, एसिटाइलकोलिन, हिस्टामिन तथा ग्लाइसिन के संश्लेषण को बड़े पैमाने पर प्रभावित करता है। प्रयोगों में देखा गया है कि विभिन्न शरीर-क्रिया-प्रणाली के अतिरिक्त माँसाहार निद्रातंत्र को भी प्रभावित करता है तथा व्यक्ति में उनींदापन लाता है।

हार्वड विश्वविद्यालय के बोनीस्प्रिंग एवं उनके सहयोगियों ने एक प्रयोग के दौरान 184 व्यक्तियों में से आधे को उच्च कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थ का शाकाहार तथा शेष आधे को माँसाहार दिया। भोजन के कुछ काल पश्चात सभी व्यक्तियों को कुछ विशेष निर्देश दिये गये और उन्हें पालन करने का उनको आदेश दिया गया। प्रयोग के मध्य पाया गया कि जिन व्यक्तियों ने उच्च कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार ग्रहण किया था, उनमें से 85 प्रतिशत लोग निर्देश परिपालन में असफल रहे, जबकि माँसाहार लेने वाले शत-प्रतिशत व्यक्तियों को प्रयोग में सफलता मिली। प्रयोग के उपरान्त जब उनसे असफलता का कारण पूछा गया, तो उनने एक स्वर से कहा कि भोजनोपरान्त उन्हें अत्यन्त शान्ति का आभास हुआ, जम्हाई आने लगी और तदुपरान्त निद्रा ने धर दबोचा। इसी कारण वे निर्देश का पालन नहीं कर सके। इसके विपरीत जब माँसाहारियों से तत्सम्बन्धी पूछताछ की गयी, तो उनका कथन इसके ठीक विपरीत पाया गया। सभी ने उनींदेपन व थकावट की शिकायत की। इस पर वैज्ञानिकों ने जब माँस पर परीक्षण किया, तो पाया कि माँस में पाया जाने वाला प्रोटीन की उच्च मात्रा ही इसके लिए जिम्मेदार है।

ज्ञातव्य है, कि माँस में विद्यमान प्रोटीन दाल में पाये जाने वाले प्रोटीन से कुछ भिन्न होता है, जिससे इसका पाचन भली-भाँति नहीं हो पाता। साथ ही माँस प्रोटीन की अति उच्च मात्रा के कारण रक्त व मस्तिष्क में एक विशेष रसायन की अभिवृद्धि होने लगती है। ‘टायरोसिन’ नामक यह रसायन मस्तिष्क की क्रियाशीलता को बढ़ा देता है, अस्तु नींद में बाधा उत्पन्न होती है और व्यक्ति उनींदापन महसूस करता है।

सन् 1970 में कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोध विज्ञान हर्टमन ने इस तथ्य को परखने के लिए एक प्रयोग किया। सन्ध्याकाल में स्वस्थ व्यक्तियों के दो दलों पर प्रयोग किया। कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार सेवन करने वाले व्यक्ति माँसाहारियों की तुलना में दो घण्टे अधिक व गहरी नींद सोये। उठने के बाद वे तरोताजा थे।

हार्वड मेडिकल स्कूल के माइकल योगमन महिलाओं के दूध पर शोध कार्य कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, कि भिन्न-भिन्न महिलाओं के दूध में विद्यमान कार्बोहाइड्रेट की भिन्न-भिन्न मात्रा शिशुओं की निद्रावधि को उसी अनुपात में प्रभावित करती है।

एल-ट्रिप्टोर्फेन के माध्यम से शरीर तन्त्रिका कोशाओं में एक अन्य रसायन का निर्माण करता है। यह ‘सेरोटोनिन’ कहलाता है। सेरोटोनिन तन्त्रिका तन्त्र के सम्पूर्ण क्रिया-कलापों को नियन्त्रित करने के साथ-साथ मानसिक क्षमताओं को भी प्रभावित करता है। चूँकि न्यूरान सेल्स ही नींद नियंत्रक रसायन सेरोटोनिन स्रवित करते हैं, इसलिए नींद नहीं आने की बीमारी न्यूरान सेलों की क्षति से सीधे सम्बद्ध है। इसकी क्षति पूर्ति सेरोटोनिन की अतिरिक्त मात्रा लेकर की जा सकती है जो दूध एवं शाकाहार से पूरी हो सकती है।

एक प्रयोग के दौरान शोधकर्मी वैज्ञानिकों ने जब पशुओं के मिडब्रेन रेफ की न्यूरान कोशिकाओं को नष्ट कर दिया तो उनकी निद्रावधि में काफी कमी पायी गई। जब वैज्ञानिकों ने पशुओं को एक ऐसे रसायन का इन्जेक्शन दिया, जो सेरोटोनिन संश्लेषण को अवरुद्ध करता था, तो निद्राकाल और भी कम होता देखा गया।

इस प्रकार अब यह निर्विवाद रूप से साबित हो चुका है, कि नींद को नियन्त्रित करने वाला पदार्थ मस्तिष्क में स्रवित होने वाला सेरोटोनिन ही है। अध्ययनों से यह भी ज्ञात हुआ है कि सेरोटोनिन एक अच्छा दर्द निरोधक रसायन भी है। यह एनकेफेलीन समूह के तनाव शामक एन्जाइमों का सहयोगी है। टेम्पल विश्वविद्यालय के डोरोथी डीवर्ट व उनके सहयोगियों ने सिर व गर्दन के चिरकालिक दर्द से पीड़ित रोगियों को जब टिप्टोफैन प्रदान किया, तो दर्द में आश्चर्यजनक कमी पायी गयी।

इस तरह सेरोटीनिन नींद व दर्द नियंत्रण की दोहरी भूमिका सम्पादित करता है। प्रयोग-परीक्षणों में देखा गया है कि माँसाहार में विद्यमान प्रोटीन की अति उच्च मात्रा इस रसायन को उद्दीप्त नहीं कर पाती। जबकि चावल, रोटी, आलू एवं विभिन्न प्रकार की हरी शाक-सब्जियों का कार्बोहाइड्रेट सेल्युलोज युक्त आहार इस कमी की भली भाँति पूर्ति करता है और शरीर के लिए आवश्यक परिणाम में सेरोटोनिन संश्लेषित करता है।

शाकाहार का दूसरा लाभ यह है कि इससे पाचन संस्थान पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता और विभिन्न प्रकार के तत्वों का सरलतापूर्वक पाचन हो जाता है। इससे शरीर को सभी आवश्यक तत्व भी मिल जाते हैं और सभी शरीर तन्त्र सन्तुलित नियन्त्रित बने रहते हैं। इसी कारण आहार शास्त्री निरामिष आहार पर जोर देते देखे जाते हैं। इसी कारण हमारे प्राचीन ऋषियों ने इसका अवलम्बन लिया और उनके सुखी-स्वस्थ जीवन का यही राज था। आज के बढ़ते माँसाहार प्रचलन एवं मनोरोगों का उपचार एक ही हो सकता है कि शाकाहार के समर्थन में जनमत जुटाया जाए।


वस्तुओं का पूरा सदुपयोग (kahani)

बापू का उस दिन मौन व्रत था। वे प्रातःकाल आश्रम के बच्चों को साथ लेकर टहलने गए।

रास्ते में एक तीन इंच लम्बा सुई का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। गाँधीजी ने एक छोटी लड़की से उसे उठा लेने का इशारा किया।

लड़की ने उसे उठा तो लिया पर उलट-पुलट कर देखने पर उसे निरर्थक पाया और आगे चलकर फेंक दिया।

शाम को मौन टूटा तो गाँधीजी ने लड़की से वह टुकड़ा माँगा। पर वह तो उसे निरर्थक समझकर फेंक चुकी थी। गाँधीजी नाराज हुए और ढूंढ़ लाने के लिये उसे भेजा।

टुकड़ा मिल गया और उसे साफ करके गाँधीजी ने सूत काता। और कहा- वस्तुओं का पूरा सदुपयोग करने की आदत सभी को डालनी चाहिए। बर्बादी हम तनिक भी न करें।


गायत्री और सावित्री का देवता सविता

गायत्री को चारों वेदों की जननी के रूप में वेदमाता कहा गया है। वेदों में मन्त्र अनेकों हैं किन्तु सर्वोच्च स्थान गायत्री महामन्त्र को ही प्राप्त है। वेद के हर मन्त्र का एक छन्द, एक ऋषि, एक देवता होता है। उनका स्मरण विनियोग के समय किया जाता है। गायत्री मन्त्र का छन्द गायत्री, ऋषि विश्वामित्र और देवता सविता है। सविता को बोल चाल की भाषा में सूर्य कहते हैं। सविता देव की अधिष्ठात्री होने के कारण गायत्री का एक नाम सावित्री भी है। यों सविता परब्रह्म- परमात्मा को भी कहते हैं एवं प्रेरक, विधेयक चेतना शक्ति को गायत्री कहा जाता है। यह हुई ज्ञान दृष्टि। विज्ञान की दृष्टि से सविता को तेज पुँज- ‘ब्रह्म’ बताया गया है, जिसके प्रभाव और प्रकाश में यह सारा दृश्य जगत सक्रिय रहता है। उस सविता की समग्र क्षमता एवं प्राण प्रक्रिया को ही गायत्री नाम दिया गया है।

यों मोटे अर्थ में यह प्रातः उदय होने वाला, सायंकाल अस्त होने वाला, प्रकाश और गर्मी देने वाला, अग्नि पिण्ड भी सूर्य है- सविता है। उसकी भी अपनी शक्ति एवं क्षमता है। इस संसार का सारा क्रिया-कलाप उसी के प्रभाव से हो रहा है। इसलिये उसकी स्थूल जगत् में विभिन्न प्रकार की हलचलें उत्पन्न करने वाली क्षमता को लौकिक सावित्री कहा जा सकता है। वैज्ञानिक इसी अदृश्य और अविज्ञात महाशक्ति सावित्री के विभिन्न पक्षों का अनुसन्धान आविष्कारी करने में सृष्टि के आदि से लेकर अद्यावधि पर्यन्त प्रयत्नशील हैं। उन्होंने बहुत कुछ पाया भी है।

आज तो बिजली, भाप, ईथर, अणु आदि क्षेत्रों में काम करने वाली सहस्रों शक्तियों को जान लिया गया है और उनके आधार पर विज्ञान के चरण द्रुतगति से अग्रसर हो रहे हैं। अन्यान्य ग्रह, नक्षत्रों पर चढ़ाई करने की योजनायें बन रही हैं, इस धरती पर एक से एक अद्भुत आविष्कारों की तैयारी है, मनुष्य शरीर का काया-कल्प करके उसे चिरस्थायी बनाने की योजना है। यह सावित्री शक्ति के कतिपय पक्षों की जानकारी का परिणाम है। सावित्री- प्रकृति चेतना के बारे में जितना अब तक जाना जा सकता है उससे अभी असंख्य गुना जानना शेष है। सीमित बुद्धि वाला मानव प्राणी अनन्तकाल तक नई-नई उपलब्धियाँ प्राप्त करता रहे, तो भी प्रकृति की असीम शक्तियों की पूरी तरह जानकारी प्राप्त कर सकना सम्भव न हो सकेगा। सावित्री का भाण्डागार अपरिमित है। इतना अपरिमित-जिसका कल्पना भी हम पूरी तरह नहीं कर सकते।

सविता का एक अर्थ सूर्य भी है। इसका स्वरूप धर्म चक्षुओं से देखा और अन्य इन्द्रियों की सहायता से जाना जा सकता है। पंच भौतिक जगत में यह उदीयमान सूर्य ही सविता है और उसके प्रभाव से उत्पन्न होने वाली अगणित शक्तियों के पुँज को सावित्री कहा गया है। श्रुतियों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। उसी से वह प्राण प्रादुर्भूत होता है जिसके कारण प्राणियों के लिए शरीर धारण कर सकना, वनस्पतियों का उगना और पंचतत्वों का सक्रिय रह सकना सम्भव है। यदि सूर्य ठण्डा हो जाय तो देखते-देखते यह धरती हिमपिण्ड की तरह ठण्डी हो जाय और वहाँ सब कुछ निर्जीव हो जाय, जीवन का किंचित लक्षण भी यहाँ दिखाई न पड़े। इसलिए इस अग्नि पिंड सविता का भी हमारे भौतिक जीवन में असाधारण महत्व है।

गायत्री माता का ध्यान सदा सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान महाशक्ति के रूप में किया जाता है। “सूर्य मण्डल मध्यस्था” विशेषण के साथ ही उसे समझा और समझाया जाता है। साकार उपासना करने वाले पुस्तक, पुष्प, कमण्डल, मालाएं धारण किये हुए मातृशक्ति का सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान ध्यान करते हैं। निराकार उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मण्डल के रूप में उस का ध्यान करते हैं। उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्यमण्डल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना ही गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता इसलिए शास्त्रों में कहा गया है।

गायत्री भावयेद्देवी सूर्यासारकृताश्रयाम। प्रातर्मध्याह्वे ध्यानं कृत्वां जपेत्सुधीः॥

बुद्धिमान मनुष्य को सूर्य के रूप में स्थिति गायत्री देवी का प्रातः मध्याह्न और सायं त्रिकाल ध्यान करके जप करना चाहिए। (शाकानन्दतरंगिणी 3।4।1)

सविता सर्वभूतानां सर्वभावाश्च सूर्यते। सवनात्प्रेरणाच्चैव सविता तेन चोच्यते॥

सब प्राणियों में सब प्रकार के भावों को सविता ही उत्पन्न करता है। उत्पन्न और प्रेरणा करने से ही यह सविता कहा जाता है।

वरेण्य वरणीयंच संसार भय भीरुभिः। आदित्यान्तर्गतं यच्च भर्गाख्यं वा मुमुक्षु भि॥

संसार के भय से भीत और मोक्ष की कामना वालों के लिये सूर्य मण्डल के अंतर्गत जो श्रेष्ठ तेज है वह वन्दनीय है।

देवस्य सवितुर्यच्च भर्गमन्तर्गत विभुम्। ब्रह्मवादिन एवाहुर्वरेण्यम् तच्च धीमहि॥

सविता देव के अंतर्गत तेज को ब्रह्मज्ञानी वरेण्य अर्थात् श्रेष्ठ कहते हैं; उसी का हम ध्यान करते हैं।

सन्ध्यायोग में इसका और भी अधिक स्पष्टीकरण किया गया है और बताया गया है कि जिस भावना का हम ध्यान करते हैं वह मन को एकाग्र करने के लिये कोई प्रकाश गोलक मात्र नहीं वरन् वह परम तेजस्वी परमात्मा है जो हमारी बुद्धि, अन्तःचेतना, भावना एवं आस्था को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है।

चिन्तायामो वयं भर्गो धियो योनः प्रचोदयात्। धर्मार्थ काम मोक्षेषु बुद्धि वृत्ती पुनः पुनः॥

हम उस तेज का ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि में कर्म,अथ,काम, मोक्ष की बार-बार प्रेरणा करता है।

बुद्ध र्बोधयिता यस्तु चिदात्मा पुरुषे विराट्। सवितुस्तद्वरेण्यन्तु सत्यधर्माणीमीश्वरम्॥

बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाने वाला जो विराट् चिदात्मा पुरुष है, वही सत्य धर्म वाला ईश्वर रूप वंदनीय सविता है।

उस सूर्य को जिसका हम ध्यान करते हैं, वह उदीयमान सूर्य से कहीं ऊँचा, असंख्यों सूर्यों के समकक्ष, परमशक्ति का स्रात, इस सृष्टि का विधाता, नियामक और परिपुष्ट कर्ता विधाता प्रजापति है। उसके साथ सम्बन्ध संपर्क बनाकर यदि सान्निध्य लाभ किया जा सके तो दृश्य सूर्य की अपेक्षा वह आध्यात्मिक सविता हमारे लिए असंख्य गुने सुख साधन प्रस्तुत कर सकता है। परमात्मा की परम शक्ति गायत्री उपासना कर के कोई भी व्यक्ति वह लाभ ले सकता है, जिसके लिए यह मानव शरीर उपलब्ध हुआ है।

गायत्री में जिस वरेण्य, भर्ग, देव, सविता का स्मरण चिंतन किया जाता है वह परम तेजस्वी, सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर सविता प्रसविता परमात्मा ही है और उस परमात्मा की सर्वतोमुखी सर्वोपरि शक्ति को ही गायत्री या सावित्री कहा गया है। गायत्री या सावित्री कोई दो अलग शक्तियाँ नहीं हैं। वस्तुतः अग्नि एक ही है पर मृत शरीर को जलाते समय उसे लोहिता कहा जाता है तो भोजन बनाते समय प्रयुक्त की जाने वाली अग्नि को रोहिता कहते हैं। यह दो नाम प्रयोग में आने वाले विभाजन के अनुरूप हैं। वस्तुतः अग्नि एक ही है। इसी प्रकार गायत्री और सावित्री शक्ति भी अभिन्न हैं। जब वह शक्ति भौतिक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त की जाती है तो उसे सावित्री कहते हैं। और जब वह आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए काम आती है तब उसी को गायत्री कहने लगते हैं। शास्त्रों में सावित्री और गायत्री की एकता का अनेक स्थानों पर उल्लेख किया गया है। कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं-

यश्चैवं विद्वानेव वेदानां मातो सावित्री संपदभुषनिषद् मुपास्ते इति। (गोपथ ब्राह्मण)

इस प्रकार विद्वान वेदमाता को सावित्री के नाम से कहते हैं।

ओंकार पूविका स्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्यया। त्रिपदा चैव सावित्री विजेय ब्राह्मणोमुखम्॥

ओंकार पूर्वक तीनों महाव्याहृतियों तथा त्रिपदा सावित्री मन्त्र वेद का मुख कहा जाता है।

नमो नमस्ते गायत्रि सावित्रि त्वां नमाम्यहम्। सरस्वति नमस्तुभ्यं तुरीये ब्रह्मरूपिणी॥

“हे गायत्री! हे सावित्री! मैं आपको प्रणाम करता हूँ और मेरा आपके चरणों में बार-बार अभिवादन समर्पित है। हे सरस्वती! आपके लिये मेरा नमस्कार अर्पित है। हे तुरीये! आप ब्रह्म के स्वरूप वाली हैं।”

नमस्ते देवि गायत्री सावित्रि त्रिपदेक्षरे। अजरे अमरे मातस् त्राहि मां भगसागरात्॥

“हे तीन पदों वाली गायत्री, सावित्री देवी! हम तुझे नमस्कार करते हैं। हे अजर-अमर माता! मेरी भवसागर से रक्षा करो।”

सच्चिन्मपि परे देवि गायत्रि ब्रह्मरूपिणि।

आज्ञामय तवं सावित्रि परिवारार्चनाय मे॥

“है सच्चित्मयि! हे परे! हे देवि! हे ब्रह्म के स्वरूप वाली गायत्री देवि! हे सावित्री! अब आप मुझ सेवक को परिवारार्चन करने के लिए आज्ञा प्रदान करें।”

समस्त देवताचक्र मुनि पितृ गणावृते। आरात्रिकं गृहाणेदं सावित्रि मम सिद्धये।।

“हे समस्त देवों के समूह- मुनिगण और पितृगण आवृते! हे सावित्री! अब मेरी सिद्धि के लिये इस आरात्रिक (आरती) को ग्रहण कीजिये।”

उपरोक्त प्रमाणों में गायत्री-सावित्री को एक ही माना गया है। यदि इनमें थोड़ा अन्तर किया भी जाय तो वह इतना ही हो सकता है कि भौतिक प्रयोजनों में प्रयुक्त इस ब्रह्म शक्ति को सावित्री और अध्यात्म प्रयोजन में होने पर उसे गायत्री कहा जाय। सावित्री जप का लाभ ‘स्वर्ग’ अर्थात् सुख-सुविधाओं का अभिवर्धन बताया गया है और गायत्री उपासना से मोक्ष लाभ अर्थात् वासना एवं तृष्णा के बन्धनों से छुटकारा मिलना प्रसिद्ध है।

कहा गया है कि-

सावित्री जप्यनिरतः स्वर्गमाप्नोति मानवः॥ गायत्री जप्यानिरतो मोक्षोपायं च विन्दति॥

सावित्री के जप करने वाले को स्वर्ग और गायत्री के जप करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सर्दी के दिनों में अंगीठी सुलगाने के प्रयास में दो छोटे बच्चों ने मिट्टी के तेल के स्थान पर पैट्रोल डाल दिया, आग भड़की। एक तो तत्काल मर गया। दूसरा महीनों अस्पताल में रहने के बाद कुरूप और अपंग हो गया। दोनों पैर लकड़ी की तरह सूख गये। पहियेदार कुर्सी के सहारे घर लौटा तो किसी को आशा न थी कि वह कभी चल सकेगा।

पर लड़के ने हिम्मत नहीं छोड़ी। आज की तुलना में अधिक जल्दी स्थिति प्राप्त करने के लिए वह निरन्तर प्रयत्न करता रहा। निराश या खिन्न होने के स्थान पर उसने प्रतिकूलता को चुनौती के रूप में लिया और उसे अनुकूलता में बदलने के लिए अपने कौशल और पौरुष को दाँव पर लगाता रहा। उसने बैसाखी के सहारे न केवल चलने में वरन् दौड़ने में भी सफलता पाई और पुरस्कार जीते।

इस विपन्नता के बीच भी उसने पढ़ाई जारी रखी। एम.ए.- पी.एच.डी. उत्तीर्ण की, और विश्वविद्यालय में निर्देशक के पद पर आसीन हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध में वह मोर्चे पर भी गया और जहाँ अड़ा, वहीं सफल भी रहा। रिटायर होने पर उसने अपनी जमा पूँजी से अपंगों को स्वावलम्बन देने वाला एक आश्रम खोला, जिसमें इन दिनों आठ हजार अपंगों को पढ़ने, रहने और कमाने का प्रबन्ध है।

अमेरिका का संकल्पवान साहसी ग्लेन कनिंघम का नाम बड़ी श्रद्धापूर्वक लिया जाता है। कठिनाइयों से जूझने के लिए उसका जीवन वृत्तांत पढ़ने सुनने का परामर्श दिया जाता है।


वांछापूरक- गौ दुग्ध कल्प

कालिदास के रघुवंश काव्य में राजा दिलीप की गौ सेवा का सारगर्भित वर्णन आता है। राजा की कोई सन्तान न थी। इसके लिए वे इच्छुक थे। चिकित्सा उपचार कुछ काम न आये तो वे गुरु वशिष्ठ के यहाँ उपाय पूछने गये। उन दिनों ऋषि महर्षि ही राजाओं के गुरु, मार्गदर्शक, चिकित्सक होते थे। कठिन समस्याओं के समाधान के लिए उन्हीं का आश्रय लिया जाता था।

दूरदर्शी वशिष्ठ ने संतान न होने का कारण समझा और उपचार निकाला। उन्हें गौ सेवा का काम सौंपा। ऋषि के पास एक लाल रंग की गौ थी। नाम था उसका नन्दिनी। राजा से कहा गया कि वे सवेरे से शाम तक गाय के पीछे-पीछे चराने जाया करें। गौ को स्वेच्छापूर्वक चलने दें। शाम को जब वह वापस लौटे तभी उसके साथ आवें।

राजा ने यही करना आरम्भ किया। रोकथाम करते तब तो वह थोड़ी सी भूमि में ही पेट भर लेती। पर निर्देश था, स्वेच्छापूर्वक चलने और चरने देने का। उन पर इस अनुबन्ध के कारण गाय दूर-दूर निकल जाती। जहाँ उसका मन होता विचरती। इस प्रयास में दिन भर में वह कई कोस की यात्रा करती। राजा को उसके पीछे चलना पड़ता। इस प्रकार सवेरे से शाम तक की लम्बी यात्रा दिलीप को भी करनी पड़ती। गाय स्वेच्छापूर्वक जब कहीं थोड़ी देर को बैठती तब उतना ही अवसर राजा को भी बैठने को मिलता। इस यात्रा व्यायाम से राजा का स्थूल काय- शरीर कृश हो गया। आराम से दिन काटने की आदम लगातार चलने के व्यायाम में परिणत हो गई। स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि में पैदल चलने की लम्बी यात्रा से अनेक रोगों की चिकित्सा मानी गई है। तीर्थ यात्रा को इस कारण भी पुण्य फलदायक माना गया है। राजा को वही करने का अवसर मिला।

अब भोजन का प्रश्न आया। गुरु वशिष्ठ ने नन्दिनी का दुग्ध भर पेट पीने का आदेश दिया था। सो भी बार-बार नहीं। गाय दो बार दुही जाती थी। राजा को भी प्रातः सांय दो बार ही गौ दुग्ध पीने को मिलता। जिससे वह हजम भी भली-भाँति हो जाता। पाचन में विकृति तब आती है, जब बार-बार कुछ न कुछ खाने की कुटेवें पल जाती हैं। चटोरे व्यक्ति इसी कुटेव से ग्रस्त होते हैं, कुछ न कुछ स्वाद की खातिर निगलते ही रहते हैं। फलतः पेट खराब हो जाता है। नियत समय पर दो बार ही भोजन किया जाय तो पाचन तन्त्र सुधारता है और छोटी बड़ी बीमारियाँ, अनायास ही दूर होती जाती हैं।

आयुर्वेद में गौ दुग्ध कल्प का बड़ा महात्म्य बताया गया है। उससे रक्तमाँस की शुद्धि, दुर्बलता का निवारण रोगों का अन्त जैसे कितने ही लाभों का उल्लेख है। दिलीप को जो उपचार बताया गया था। उसमें दो प्रयोग थे। एक दिन भर पैदल चलने की थकाने वाली यात्रा, दूसरे केवल दूध का दो बार आहार करना। यह दुग्ध कल्प हो गया। रानी को भी यही उपचार अपने एकाकी आवास में करना था। दोनों के शरीर में भरा हुआ विजातीय द्रव्य निकल गया। काया निर्मल हो गई। विकार ही तो शरीर की सामान्य व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करते हैं। नियत अवधि पूरी होने पर राजा घर लौटे तो इच्छित आकाँक्षा पूर्ण होने का लाभ मिला। उन्हें तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ।

गाय के प्रति श्रद्धा भाव रखने से आध्यात्मिक उपचार भी हुआ। राजा नन्दिनी चराते समय उसकी रखवाली देखभाल भी करते थे। एक दिन श्रद्धा की परीक्षा लेने के लिए सिंह वेश में रुद्र आ गये और नन्दिनी पर झपटे। राजा ने धनुष बाण निकाला तो वह चिपक गया। दिलीप समझ गये कि सिंह वस्तुतः देवता रूप है। उनने कहा- आप मुझे खालें, किन्तु ऋषि की उस गौ को छोड़ दें। सिंह ने प्रसन्न होकर दोनों को छोड़ दिया। यह श्रद्धा की परीक्षा है। गौ दुग्ध कल्प की फलदायी साधना में गौ की सेवा ऐसी ही श्रद्धापूर्वक करने का विधान है।


इस शताब्दी के अन्त में भारी उथल-पुथल की संभावना

संसार में समय-समय पर ऐसे दृष्टा भविष्य वक्ता भी होते रहे हैं जिनने व्यक्ति विशेष की लाभ हानि की चर्चा न करके समूचे विश्व को अथवा उसके खण्ड विशेष को बदलने वाली परिस्थितियों का उल्लेख किया है। उन्हें महत्व इसलिए मिला कि अब तक के कथन सही उतरते रहे हैं।

ऐसे प्रामाणिक भविष्य वक्ता फ्राँस में हुए हैं, जो सन् 1566 में स्वर्गवासी हुए और इतने दिन बाद भी अपने कथनों की यथार्थता के कारण प्रामाणिक माने जाते और आदर की दृष्टि से देखे जाते हैं।

फ्राँस के नोस्ट्रादमस को विश्व ख्याति प्राप्त है। उनकी विशेषताएं ऐसी ही हैं जो किशोरावस्था में उदय हुईं और जीवन के अन्त काल तक बनी रहीं। उनका क्रम समीपवर्ती लोगों में चला और बात सच निकली तो उनने पुलिस की सहायता करके अनेकों ऐसे अपराधियों को पकड़वाया, जिनका पकड़े जाना, ऐसा सुराग मिले बिना और किसी प्रकार सम्भव नहीं था। उनके सम्बन्ध में कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था पर जब नोस्ट्रादमस ने उनके अपराधी होने के सम्बन्ध में विश्वासपूर्वक कहा, प्रमाण प्रस्तुत किये तो बात माननी पड़ी और खोज आगे बढ़ी अन्ततः प्रमाणों के आधार पर सच्चाई सामने आई और अपराधियों को दण्ड का भागी बनना पड़ा।

अमेरिकी अन्तरिक्ष कार्यक्रम ‘नासा’ के साथ मिलकर काम करने वाले एक फ्राँसीसी अन्तरिक्ष विज्ञानी चेटेलेन ने नोस्ट्रादमस की रहस्यमय पुस्तकों का सार लेकर एक पुस्तक अभी-अभी प्रकाशित की है। नाम है उसका- ‘लाफ्रिग द मोड’ (विश्व का अन्त)।

मूल पुस्तकों के उल्लेखों के अनुसार पश्चिमी सभ्यता का परोक्ष रूप में पतन 1982 से आरम्भ हो जायेगा। साथ ही पश्चिम एशिया की स्थिति भी बिगड़ती जायेगी। अरबों और इस्रालियों में भीषण युद्ध होगा। फ्राँस के दक्षिण पूर्व वाले भाग में विशेष रूप से अशान्ति उत्पन्न होगी। रूसी व अरब मिलकर यूरोप पर आक्रमण करेंगे। पोप को फ्राँस की शरण लेनी पड़ेगी।

इसके बाद कुछ समय ऐसा आयेगा जिसमें सबको लगेगा कि शान्ति के दिन आ गये और एक नई व्यवस्था कायम हुई। लेकिन यह अस्थायी होगा। 1986 से आरम्भ हुई अशान्ति पूरे 27 वर्ष तक चलेगी। इसमें रूस और चीन के युद्ध की भी सम्भावना बताई है। अरब व खाड़ी के देश एवं अमरीका भी इसमें भागीदार होंगे।

अरबों से उनके तेल क्षेत्र छिन जायेंगे। नोस्ट्रादमस की भविष्यवाणियों की मैरिस ने जो व्याख्या की है उसके अनुसार 21 जून 2001 में विश्व का एक नया नेता उभरेगा। धर्म और जाति की ऐसी स्थापना करेगा जो इस बीच खोये शून्य की पूर्ति करेगा। इस कथन को शुक्र ग्रह के विज्ञान पर आधारित बताया गया है और माया सभ्यता के पंचांगों से मदद ली गई है। इसके अनुसार सन् 2000 में ऐसे भयंकर भूकम्पों की शृंखला का संकेत है जो अमेरिका के अधिकाँश क्षेत्रों में फैला हुआ होगा और उसके प्रभाव से उत्तर ध्रुव की बर्फ पिघलने लगेगी। समुद्री तूफान आयेंगे। सारी दुनिया में जल प्रलय के दृश्य दिखाई देंगे।

इसके उपरांत अन्तरिक्ष से उच्च सभ्यता वाले प्राणी उतरेंगे और 30 अप्रैल सन् 2020 तक ऐसी चिरस्थायी शान्ति उत्पन्न करेंगे, जिसे नवयुग का आगमन कहा जा सके।

इस भविष्यवाणी को अभी भी महत्व इसलिए दिया जा रहा है कि विगत 300 वर्षों में इस भविष्य वक्ता की अधिकाँश भविष्य वाणियाँ सही सिद्ध होती रही हैं। भविष्य वक्ताओं में से अधिकाँश की प्रकृति यह होती है कि वे व्यक्तियों को प्रधान मानकर चलते हैं और उनके निजी जीवन में घटित होने वाली घटनाओं को ही महत्व देते हैं, किन्तु नास्ट्रोदमस इस प्रकृति के अकेले ही हैं, कि वे बदलते समय और घटित होने वाले सार्वजनिक घटनाक्रम पर ही प्रकाश डालते हैं। समय की कसौटी पर उनकी कथनी अधिकतर सही उतरती रही है। इस आधार पर आगे के लिए भी उनकी बातों पर विश्वास किया जाता है।


तप साधना के फलितार्थ एवं परिजनों की अनुभूतियाँ

रामकृष्ण परमहंस के बारे में जितना भी ज्ञात है, ग्रन्थों में पढ़ने को मिलता है उससे विदित होता है कि उन्होंने कभी जमा पूँजी को संग्रहित नहीं किया। जितना भी उन्हें देवी अनुकम्पा से पात्रता के अनुरूप मिला उसे उन्होंने सुपात्रों में बाँट दिया। सबके कष्ट अपने ऊपर लेने व निरन्तर वितरण करने के बावजूद जो भी कुछ बचा, वह तपोबल उन्होंने सीमित छोटे नरेन्द्र को देकर उन्हें विवेकानन्द के रूप में विस्तृत विशाल बना दिया व स्वयं कष्ट ओढ़कर प्रकृति विधान के अनुरूप मृत्यु का वरण किया। महर्षि रमण मौनरत हो दृष्टिपात से आगन्तुकों को, जिज्ञासुओं को परखते थे। जिसकी आकाँक्षा, अभिलाषा जैसी होती थी, वह महर्षि के आशीष से पूरी होती थी, साथ ही उसे उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ भी सूक्ष्म रूप में मिलती थी ताकि वह देवी अनुदानों की कीमत चुका कर ही बदले में कुछ पाएं। योगीराज अरविन्द 20 वर्ष से भी अधिक पांडिचेरी की अपनी कोठरी में एकान्त साधना करते रहे। प्रारम्भ में वर्ष में यदाकदा व बाद में वर्ष में मात्र दो बार दर्शन देने का क्रम चला, वह भी अन्तिम वर्षों में माताजी तक सीमित होकर रह गया था। वहाँ जाने वालों के कोई मनोरथ अधूरे रहे हों, वे महर्षि दर्शन न कर पाने से क्षुब्ध हो लौटे हों, यह बात भी नहीं। सभी यह पाते थे सूक्ष्मरूप में उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी।

गुरुदेव को सूक्ष्मीकरण साधना उनके पिछले समस्त तप उपक्रमों से भिन्न है। परिस्थितियों की विषमता को सभी भली-भाँति समझते हैं। जून व जुलाई के अखण्ड ज्योति अंकों ने परिजनों को झकझोरा, सोये से जगाया है तो अगस्त के अंक ने एक लताड़ सी लगायी है व इस एकाकी तप साधना के फलितार्थों से भी भली−भांति अवगत करा दिया है। सूक्ष्म रूप में गुरुदेव के प्रत्यक्षीकरण को, उन्हें परोक्ष मार्गदर्शन की परिजनों को बड़ी विलक्षण अनुभूतियाँ हुई हैं। चूँकि आह्वान किया गया था, ढेरों पत्र ऐसे विवरणों से भरे इन दिनों शान्तिकुँज आ रहे हैं। परिजनों ने पाया है कि अब शान्ति-कुँज आने पर उन्हें जिस प्राण ऊर्जा युक्त वातावरण का सम्बल मिला है, वह अभूतपूर्व है। इससे पूर्व कभी भी उन्हें इतना सान्निध्य-सामीप्य गुरुदेव का नहीं मिला था, जितना इन दिनों। गुरु पूर्णिमा के बाद क्षेत्रों में तेजी से नव जागृति आयी है। परिजनों को अपने क्रिया-कलापों में, रोजमर्रा की गतिविधियों में सतत् ऐसी अनुभूति होती रही है कि वे शान्ति-कुँज भले न जा पाये हों, उनके ऊपर एक अदृश्य सत्ता का साया है जो किसी भी विपत्ति से उन्हें उबार लेगा, नयी दिशा देगा। उन्हें नव सृजन की दिशा में आगे बढ़ने की एक नयी प्रेरणा मिली है। ऐसे कर्मठ निष्ठावान परिजनों के साथ गुरुदेव हर क्षण हर पल हैं, यह अनुभूति उन्हें सतत् होती रही है। भौतिक मनोकामनाओं, इच्छाओं महत्वकाँक्षाओं की पूर्ति हो, तब हम मिशन का काम करें ऐसा सोचने वालों को सूक्ष्मीकृत सत्ता ने एक झलकी अपनी सामर्थ्य की दिखाई व यह सोचने पर विवश किया है कि कुछ पाना है तो उसके लिये सुपात्र भी बनना पड़ेगा।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तब चौबीस टोलियों में चौबीस जीप गाड़ियों में 120 वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के जत्थे सारे भारत को आन्दोलित करने हेतु रवाना होने की तैयारी में हैं। सूक्ष्मीकरण साधना में जाने से पूर्व गुरुदेव ने लिखा था, वे अपने को अनेकों गुना अधिक सामर्थ्यवान एवं विस्तृत बना लेंगे। इन सौ व्यक्तियों के माध्यम से नव-जागरण का शंखनाद बजाने स्वयं गुरुदेव ही जन-जन तक स्थूल रूप में पहुँच रहे हैं। इन केन्द्रीय प्रतिनिधियों के, जो गुरुदेव-माताजी का सन्देश लेकर पहुँचेंगे, क्षेत्रों में पहुँचने पर जो जन चेतना जागेगी, युगान्तर चेतना के दिव्य सन्देश से जो गर्मी आयेगी, उसकी अभी कल्पना मात्र की जा सकती है। परिजन क्षेत्रों में इसे अनुभव करेंगे कि सूक्ष्मीकरण साधन रूपी युग अनुष्ठान की पूर्णाहुति रूप में आयोजित ये प्रज्ञा आयोजन अपने उद्देश्य में कितने सफल रहे।

व्यक्तिगत रूप से अखण्ड-ज्योति पाठकों, प्राणवान परिजनों को जो अनुभूतियाँ सूक्ष्म रूप में हुई हैं, उन सभी को इन पृष्ठों में देना सम्भव नहीं। कुछ ऐसी हैं जिनके रहस्योद्घाटन के बारे में शुरू से ही प्रतिबन्ध रहा है, अब और कड़ा हो गया है। कुछ खुले अध्याय की तरह है अतः उन्हें प्रकाशित करने में कोई संकोच आड़े नहीं आता। ऐसे अनेकों पत्र आये हैं जिनमें किन्हीं परिजनों ने दुःख भरी परिस्थितियों में, विषम वेला में अपनी व्यथा लिखकर पत्र या तार से शान्ति कुँज भेजी व उसी दिन उन्हें उससे मुक्ति मिल गयी। उनके ऐसे पत्रों के बाद दूसरे पत्र जो पीछे-पीछे चले हैं उससे प्रतीत होता है कि उन्होंने सोचा, अपनी व्यथा गाथा संरक्षक सत्ता तक पहुँचाने का विचार किया व तत्क्षण ही परिस्थितियां ऐसी बदली कि वे स्वयं हतप्रभ होकर रहे गये।

तराना के श्री रामनारायण कछवाहा सतत् असमंजस में रहते कि अभी बच्चे छोटे हैं, शान्ति-कुँज जाने व स्थायी रूप से कार्य करने की अन्दर से उमंग उठती है। कैसे जाना हो सकता है, परिस्थितियाँ कैसे अनुकूल बनें, यही मन सोचता रहता था। एक दिन पत्र शान्ति-कुँज डाला ही था कि रात्रि को स्वप्न आया। पूज्य गुरुदेव स्वप्न में दिखाई पड़े। सन्देश मिला अभी क्षेत्र सोया पड़ा है। वहाँ के बच्चों को संभालो। उचित समय आने पर शान्ति-कुँज रहने का भी सुयोग मिलेगा। उनका समाधान हो गया। वे पूरी कर्मठता से अपनी साधना में जुट गये। इसी प्रकार अनपरा मिर्जापुर के एडवोकेट श्री डी.एन. कुशवाहा, जो वर्षों से आने का ताना-बाना बुन रहे थे, शान्ति-कुँज से बुलावे की प्रतीक्षा में हैं क्योंकि इसी वर्ष उनकी सभी पारिवारिक समस्याएँ देखते-देखते स्वतः हल हो गयीं।

गायत्री मॉडल स्कूल मण्डी आदमपुर हिसार के प्राध्यापक श्री रघुनाथ शर्मा के जीवन क्रम में गत 6 वर्षों में जो घटनाक्रम घटित हुए व उनका पटाक्षेप इस वर्ष जिस प्रकार हुआ, उसे वे एक चमत्कार मानते हैं। स्थूल रूप से उन्होंने गुरुदेव के मात्र दो बार दर्शन किए जबकि सूक्ष्म रूप से सदैव उनका वरद्हस्त अपने ऊपर पाते हैं। 6 वर्ष पूर्व जब वे अध्यापक नहीं थे, जीवन में संघर्ष कर रहे थे तब उन्हें गुरुदेव द्वारा अध्यापक कहकर सम्बोधित किया गया था। परिवार जनों का तिरस्कार, आर्थिक तंगी की स्थिति में नितान्त अपरिचित स्थान पर घर से कोसों दूर डेरा डाला व गुरुदेव की प्रेरणा से एक संस्कार शाला खोली जो आज विशाल रूप ले चुकी है। जून अंक पढ़ने के बाद से वे पाते हैं कि उनके हर क्रिया-कलापों में गुरुदेव साथ हैं, उन्हें मार्गदर्शन दे रहे हैं। राणापुर (म.प्र.) के श्री अम्बालाल जोशी जो पेशे से शिक्षक हैं, मात्र यह लिखकर निश्चिन्त हो गए कि उनका स्थानान्तरण गृह नगर में गुरुदेव के आशीर्वाद से हो जाये। जून के उत्तरार्द्ध में ही उन्हें शासन के इस आदेश ने चौंका दिया। राणापुर आये तो पाया कि वर्षा न होने से बड़ा संकट है। म नहीं मन प्रार्थना कर सो गए कि वर्षा अवश्य होना चाहिए नहीं तो सूखा पड़ जाएगा। रात्रि को स्वप्न में गुरुदेव को देखा व फिर एक दृश्य कि क्षेत्र के सारे नदी नाले उफान पर हैं। निष्कर्ष वे निकाल नहीं पाए। दूसरे ही दिन से जो झड़ी लगी तो अगस्त मध्य उनके पत्र लिखने के समय तक थमी नहीं थी।”

खण्डवा के सुरेशचन्द्र पटेल मिशन के क्रिया-कलापों में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले पाते थे, साधना में अनियमितता थी, घर में वातावरण सुख-शान्ति भरा नहीं था। जून के उत्तरार्द्ध की बात है। उन्हें रात्रि में भोर 3 बजे गुरुदेव ने थपथपाकर उठाया व कहा- “उठकर उपासना करो, साधना का समय हो गया है।” वे तब से नियमित रूप से प्रातः जल्दी उठने लगे, देखते-देखते वातावरण बदल गया। सारा घर उपासना करने लगा है। अब वे कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय होने का प्रयास कर रहे हैं।

कटंगी के शिक्षक श्री के.आर. सेन की उन्हीं के कार्यालय सहयोगियों ने शिकायत कर दी थी कि वे किताबें, फोल्डर दूसरों को पढ़ाते रहते हैं, काम नहीं करते। शिकायत ऊपर पहुँची। इन्क्वारी हेतु जिला शिक्षा अधिकारी आए। पूछताछ हुई। जब इनसे सारा साहित्य दिखाने को कहा गया तो माहौल ही बदल गया। स्वयं वे अधिकारी महोदय इन्हें आरोप से मुक्त कर वह साहित्य पढ़ने को ले गए व पीठ थपथपा गए कि “यह काम उत्तम है। निश्चित होकर करो।” अन्यान्य जाति के लोग शिकायत करते हैं, पर उनका मनोबल बना हुआ है। अब उन्हें प्रेरणा मिली है कि पूर्ण रूप से आने की तैयारी करें। तद्नुसार अपनी मनोभूमि बना ली है, बुलावे की प्रतीक्षा में हैं।

सरसा जिला खेड़ा (गुजरात) के श्री नित्यानन्द जी पटेल को गुरुदेव के सूक्ष्म रूप की जो अनुभूति हुई, उसे वे अपने जीवन का एक नया मोड़ मानते हैं। उन्हें लन्दन होकर अमेरिका जाना था। गुरुदेव से उपासना में आदेश मिला कि वहाँ वे भाई के यहाँ ही ठहरें। लन्दन पहुँचे तो आई का तार मिला कि वहाँ बर्फ गिर रही है, अतः वहाँ न आकर वे बहिन के यहाँ जाएं। उन्होंने जो आदेश सुना था उसी के अनुसार वे सीधे भाई के घर ही पहुँचे 5 सदस्यों का काफिला साथ था। भाई ने उन्हें आश्चर्य से बताया कि वे प्रातः से यही कामना कर रहे थे कि वे सीधे यहीं आएं, बहिन के यहाँ न जाएं क्योंकि उनके तार देने के बाद उनके यहाँ बर्फ गिरना बन्द हो गयी व बहन के यहाँ इतनी जल्दी व इतनी अधिक बर्फ गिरी कि रास्ता, सड़कें सब बन्द हो गयीं। भाई व बहन के बीच 3500 किलोमीटर की दूरी है। नित्यानन्द जी के भाई इसी पर आश्चर्यचकित थे कि किस अन्तःप्रेरणा ने उन्हें 15 दिन पूर्व भारत में ही यह संकेत दे दिया कि उन्हें सीधा वहीं आना चाहिए।

कानपुर के श्रीरामसुन्दर दुबे गुरुपूर्णिमा पर शान्ति कुँज ही थे। 2 दिन बाद ही मुकदमे की पेशी में उन्हें जाना था। सींखचों के पीछे मात्र पादुकाओं के दर्शन हुए पर यह संकेत मिला कि अभी 4 दिन वे यहीं रुकें। मुकदमें की कोई परवाह न कर वे रुक गये। 16 जुलाई को कानपुर वापस पहुँचे, पाया कि मुकदमा स्वतः आगे बढ़ गया था, अगले दिन पेशी थी, वह उन्हीं के पक्ष में गया था। तब से बराबर मिशन के काम में लगे रहने की प्रेरणा उन्हें मिल रही है।

अलीगढ़ के श्री जी.एस. सारस्वत का भानजा संजीव मलिक जो जम्मू मेडिकल कॉलेज में पढ़ता था, उस अपहृत विमान में था जिसे अगस्त माह में दुबई ले जाया गया। पूरा परिवार उपासना में बैठ गया। 24 अगस्त को शाम को उन्हें गुरुदेव के सूक्ष्म रूप में दर्शन हुए। सन्देश मिला कि आज रात्रि को वह व सारे विमान यात्री सकुशल लौट आएंगे वे दिल्ली पहुँचे व विमान तल पर इसी सूचना को उद्घोषक के मुंह से सुना। भिलाई के श्री रामकुमार श्रीवास 22 अगस्त को पूजा स्थली पर निराश मनःस्थिति में आकर बैठे ही थे कि एक लम्बा काला करैत सर्प उनके सामने आकर बैठ गया। देखकर वे भयभीत तो हुए पर गुरुदेव का ध्यान करते ही उनका भय भाग गया। थोड़ी देर में सर्प स्वतः ही चला गया। स्वप्न में तब से कई बार प्रेरणाएं- संदेश उन्हें मिल चुके हैं। वे इसे नया जीवन मानकर सक्रिय हैं। व अब पूर्णतः समर्पित हैं। इसी प्रकार सांडा जिला सीधी (म.प्र.) के पीताम्बर प्रसाद शर्मा का एक अनुभव अगस्त उत्तरार्द्ध का है। उस दिन शाम उनके घर पर एकाएक बिजली गिरी। लेकिन घर में उस समय उपस्थित सभी सम्बन्धी जन बच गए। बिजली एक नाँद को अपना परिचालक बनाती हुई पृथ्वी में समा गयी। जिनने भी उस दृश्य को देखा वे जन-धन की क्षति को बचाने में दैवी सत्ता का हाथ मानते हैं।

ऐसे अनेकानेक पत्रों के आने का क्रम जारी है। सबके विषय में लिखना सम्भव भी नहीं। यहाँ तो कुछ की झलक भर दी गयी है। आत्म सत्ता के अनेकों गुने होकर विराट् हो जाने की गुरुदेव की घोषणा को हर परिजन ने अनुभव किया है। हर व्यक्ति को यह परोक्ष आश्वासन मिला है कि जो भी इस देवी तन्त्र से जुड़ा है, वह कहीं भी हो, उसके संरक्षण व समग्र प्रगति की व्यवस्था का दायित्व उसने स्वयं अपने हाथ में लिया है। ऐसे में किसी को किसी प्रकार का भय, एकाकीपन का अहसास हो भी कैसे सकता है? नवरात्रि ने अभिनव प्राण परिजनों में फूँके हैं। विपन्नता-विषमता भरी इस बेला में हर जागृतात्मा ने अपने अन्दर नयी चेतना का संचार अनुभव किया है। इस दैवी संरक्षण का ऋण वे कभी चुका तो नहीं सकते पर अपनी पूरी सामर्थ्य लगाकर यथाशक्ति नव जागरण के पुण्य प्रयोजन में निरत रहने का संकल्प हर परिजन ने अभिव्यक्त किया है।


पू. गुरुदेव प्रणीत अध्यात्म विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

गायत्री-विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं चालीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों समुचित समाधान मौजूद है।

(1) गायत्री महाविज्ञान सजिल्द (तीनों भाग), (2) गायत्री यज्ञ विधान (प्रथम भाग), (3) सामूहिक गायत्री यज्ञ विधान (द्वितीय भाग), (4) गायत्री चित्रावली, (5) गायत्री मन्त्रार्थ।

गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य-

(अ) छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट- आकर्षक कवरों वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 80 पैसा मात्र 15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 12 रु. ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं।

गायत्री का स्वरूप और रहस्य। 2. गायत्री की गुप्त शक्ति। 3. सर्वसुलभ गायत्री साधना। 4. गायत्री का शक्तिस्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोपवीत। 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।

(ब) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि मू. 1 रु.। (स) दैनिक गायत्री साधना मू. 1 रु.। (द) गायत्री चालीसा मू. 20 पैसे।

अध्यात्म का वैज्ञानिक प्रतिपादन साहित्य :-

प्रस्तुत बुद्धिवादी युग में तर्क, तथ्य, प्रत्यक्ष, प्रमाण एवं विज्ञान को प्रामाणिकता मिली है और शास्त्र, श्रद्धा एवं आप्त वचनों को अमान्य किया गया है। इस मनःस्थिति में पनपने वाले नास्तिकवाद एवं स्वेच्छाचार को निरस्त करने के लिए युग दृष्टा गुरुदेव की लेखनी से अभिनव युग साहित्य सृजा गया है। प्रत्येक पुस्तक विचारशील वर्ग के लिए अत्यन्त प्रेरणाप्रद है। प्रत्येक की छपाई-सफाई सुन्दर। कवर आकर्षक। पृष्ठ संख्या 112। मूल्य तीन रुपया।

1- विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व, 2- ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है? 3- दृश्य जगत के अदृश्य संचालन सूत्र, 4- चेतना की प्रचण्ड क्षमता एक दर्शन, 5- असीम पर निर्भर ससीम जीवन, 6- पाँच प्राण- पाँच देव, 7- दिव्य-शक्तियों का उद्भव प्राण शक्ति से, 8- मानवीय क्षमता- असीम अप्रत्याशित, 9- अणु से विभुगागर में सागर 10- आत्मा न नर है न नारी, 11- मानवीय मस्तिष्क विलक्षण कम्प्यूटर 12- अतीन्द्रिय क्षमताओं की पृष्ठभूमि, 13- जड़ के भीतर विवेक चेतना, 14- शरीर की अद्भुत क्षमताएं और विलक्षणतायें, 15- मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, 16- क्या धर्म अफीम की गोली है? 17- धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं पूरक, 18 विज्ञान को शैतान बनने से रोकें, 19- पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य, 20- स्वर्ग नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया, 21- तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति, 22- मरें तो सही पर बुद्धिमता के साथ, 23- भूत कैसे होते हैं ? क्या करते हैं? 24- पितरों को श्रद्धा दें- वे शक्ति देंगे, 25- सपने झूठे भी सच्चे भी, 26- शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म, 27- आध्यात्मिक काम विज्ञान, 28- संसार चक्र की गति प्रगति, 29- दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियाँ, 30- हम-सब एक दूसरे पर निर्भर, 31- बच्चे बढ़ाकर अपने पैरों कुल्हाड़ी न मारें, 32- युग शक्ति गायत्री का अभिनय अवतरण, 33- ब्रह्मवर्चस् की ध्यान-धारणा 34- कुण्डलिनी महाशक्ति और उसकी संसिद्धि, 35- सर्वोपयोगी गायत्री साधना, 36- गायत्री के पाँच मुख पाँच दिव्य कोश।

-100 ) से अधिक की पुस्तकें मंगाने पर 25 प्रतिशत छूट एवं डाक खर्च अतिरिक्त।

-200) से अधिक साहित्य मंगाने पर पैकिंग, फारवर्डिंग रेल भाड़ा फ्री।

-वी.पी.पी. से पुस्तकें भेजने का नियम नहीं है। अतः सम्पूर्ण राशि अग्रिम भेजी जाय।

अखण्ड ज्योति प्रकाशन, मथुरा


तपोमय जीवन

(माया वर्मा)


तपोमय जीवन (kavita)

सहकर अगणित ताप दमकता, यह ऐसा कुन्दन है। सिन्ध तपा, जगहित जन्मा, यह जीवन ऐसा धन है॥

तपे लोकहित तो कुटियों में जीवन सहज बिताया। कन्द, मूल, फल, फूल मिल गया जब जो वह ही खाया।

जन मंगल के लिए अनेकों अश्वमेध रचवाये। कभी अस्थियाँ दीं, कैसे भी त्राण मनुजता पाये।

कुछ भी करना पड़े, दनुजता होती नहीं सहन है॥ जन जीवन में सत्, शिव, सुन्दर भरने कलम चलाई।

बेद, शास्त्र, उपनिषद् लिखे प्रज्ञापूँजी न गँवाई॥ जो भी पौरुष किया उसे ही ईश्वर अर्चन माना।

मनुज मात्र को दिया दिव्य विद्या का ज्ञान खजाना॥ जिसकी रग-रग में बहता उस जीवन का दर्शन है॥

पड़ी जरूरत जभी शक्ति की, तब भी रहे न पीछे। मातृभूमि की बलिवेदी पर चढ़ता आंखें मींचे॥

बन्दा, राणा, शिवा ताँत्या बनकर आहुति दी है। मुँह में था “हे राम”, वज्र में गोली नहीं घुसी है।

लक्ष-लक्ष जन रहे सुखी तो अपनी वही खुशी है॥ आज पुनः आ पड़ी जरूरत, धर्म मिटा जाता है।

दुष्प्रवृत्ति बढ़ गयी सत्य का रवि न नजर आता है॥ पुनः ज्ञान की गंगा लाने, भागीरथ बनना है।

तजकर भौतिक जड़ता, सूक्ष्म तेज जागृत करना है॥ क्योंकि धरा ही नहीं, विषाक्त हुआ विस्तीर्ण गगन है॥

परम्परा है जलने की, तब कैसे नहीं जलोगे। स्नेह या कि बाती बनकर सर्जन की डगर चलोगे॥

नवयुग का निर्माण कर रहे, तन, मन , धन कर अर्पण। जीवन देकर भी अनीतियों से करते संघर्षण॥ साथ तुम्हारे है वह जिसने गीता में दिया वचन है॥

*समाप्त*