अन्तः से फूट पड़ने वाला उल्लास ही आध्यात्मिकता का प्रकाश है। यह सदैव उन सभी के मुख मण्डल पर चमकता देखा जा सकता है, जिन्हें आत्म-ज्ञान हो जाता है। आत्मा का सहज रूप परम सत्ता की तरह आनन्दमय है। इसीलिए विद्वानों ने कहा है- ‘आध्यात्मिकता का ही दूसरा नाम प्रसन्नता है। जो प्रफुल्लता से जितना दूर है, वह ईश्वर से भी उतना ही दूर है। वह न आत्मा को जानता है, न परमात्मा की सत्ता को। सदैव झल्लाने, खीजने, आवेशग्रस्त होने वालों को मनीषियों ने नास्तिक बताया है।
संसार रूपी इस जीवन समर में जो स्वयं को आनन्दमय बनाये रखता है, दूसरों को भी हँसाता रहता है, वह ईश्वर का प्रकाश ही फैलाता है। यहाँ जो कुछ भी है, आनन्दित होने- दूसरों को हँसाने के लिये ही उपजाया गया है। जो कुछ भी बुरा या अशुभ है। वह मनुष्य को प्रखर बनाने के लिए विद्यमान है। जीवन में समय-समय पर आने वाली प्रतिकूलताएँ मनुष्य का साहस बढ़ाने, धैर्य की नींव मजबूत करने, शक्ति सामर्थ्य को विकसित करने ही आती हैं।
जो इनसे डरकर रो पड़ता है, कदम पीछे हटाने लगता है, उसकी आध्यात्मिकता पर भला कौन विश्वास करेगा? जिन्दगी सरल तो हो, पर सरस एवं प्रफुल्लता से भरी भी। उसमें संघर्ष का भी स्थान होना चाहिए क्योंकि इसके बिना दुनिया में कोई सफलतापूर्वक जी नहीं सकता।
रोना एक अभिशाप है जो मात्र अविवेकी नास्तिकों को शोभा देता है। हँसना- मुस्कुराना एक ऐसा वरदान है जो वर्तमान में सन्तोष और भविष्य की शुभ सम्भावनाओं की कल्पना को जन्म देकर मनुष्य का जीना सार्थक बनाता है। आइये, हम सही अर्थों में आस्तिक बनें। अपने अनुभवों से अन्यों को भी अवगत करायें एवं सारा वातावरण प्रफुल्लता से ओत-प्रोत कर दें।
कई जन्मों पूर्व बोधिसत्व का जन्म काशी नरेश ब्रह्मभद्र के यहाँ छोटे पुत्र के रूप में हुआ। वे राष्ट्राध्यक्ष बनना चाहते थे। कनिष्ठ पुत्र होने के नाते वैसा अवसर उन्हें मिलने वाला नहीं था। उन्होंने ताँत्रिक महासिद्ध प्रत्यंग से अपनी मनोकामना की पूर्ति का उपाय पूछा। महासिद्ध ने बताया कि आगामी मास में तक्षशिला का सिंहासन रिक्त होने वाला है यदि वे तुरन्त चल पड़ें तो अभीष्ट प्राप्ति में सफल हो सकते हैं। पूर्णिमा के दिन प्रभातकाल में राजद्वार पर खड़े व्यक्ति को ही सिंहासन मिलेगा, यह नियति की व्यवस्था है।
आकाँक्षा तीव्र होने के कारण वे चल पड़े। उनके पाँच घनिष्ठ मित्र भी साथ चलने पर तुल गए। चलते समय वे महासिद्ध प्रत्यंग का आशीष लेने पहुँचे सो उन्होंने सफलता का आशीर्वाद तो दिया, साथ ही यह भी बता दिया कि “मार्ग में यक्ष वन पड़ता है। उसमें रूपसी यक्षिणियों का ही अधिकार है। वे रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श जैसे साधनों से ही राहगीरों को लुभाती, भोगती और अन्त में मारकर खा जाती है। इस विपत्ति से बचकर चलने में ही तुम्हारी भलाई है।”
बोधिसत्व साथियों सहित चल पड़े। जल्दी की आतुरतावश विराम पर कम और यात्रा पर अधिक ध्यान था। समय पर यक्ष वन आया। राजकुमार तो सतर्क थे, पर साथी उन कसौटियों पर खरे नहीं उतरे। एक ने पैर की मोच का बहाना लिया व एक रूपसी के यहाँ विराम हेतु रुक गया। दूसरे दिन दूसरा शब्द जाल में बँधा, तीसरे-चौथे-पाँचवें मित्र भी एक-एक करके इन क्षणिक आकर्षणों में मोहित हो बँधते चले गए। एक दिन छूंछ होकर प्राण गँवा बैठे।
धुन के धनी बोधिसत्व किसी प्रलोभन में रुके नहीं, आगे बढ़ते ही चले गए। यक्ष समुदाय के लिये यह प्रतिष्ठा का प्रश्न था कि कोई उनके जाल में फँसे बिना निकल जाये। एक चतुर यक्षिणी उनके पीछे लगा दी गयी। उपेक्षा करते हुए बोधिसत्व बढ़ते रहे, वह पीछे चलती रही। राहगीरों के पूछने पर वह बताती- “ये मेरे जीवन प्राण हैं। उपेक्षिता होने पर भी छाया की तरह साथ चलूँगी।” राहगीरों के समझाने पर राजकुमार वस्तुस्थिति बताते तो भी कोई उनका विश्वास न करता। यक्षिणी जब स्वयं को गर्भिणी, असहाय कहती विलाप करती तो उसका पक्ष और भी प्रबल हो जाता।
ज्यों-त्यों करके बोधिसत्व तक्षशिला समय पर पहुँच गए एवं मुहूर्त की प्रतीक्षा में एक कुँज में निवास करने लगे। किन्तु उस सुन्दरी की चर्चा सर्वत्र दावानल की तरह फैल गयी। ऐसा सौंदर्य किसी ने देखा न था। खबर राजमहल तक पहुँची। राजा ने देखा तो होशो-हवास गँवा बैठे। यक्षिणी को पटरानी बनाने का प्रस्ताव रखा एवं उसकी यह शर्त भी मान ली कि महल के भीतर रहने वाली सभी अन्तःवासियों पर उसका अधिकार होगा।
अब यक्षिणी ने बोधिसत्व को भुला दिया और नए अधिकार क्षेत्र में अभीष्ट लाभ उठाने में जुट गयी। उसने यक्ष वन में अपने सभी सहेलियों को बुलावा भेज दिया। सभी एक-एक करके महल के घरों में रहने वालों के साथ लग गईं व एक-एक करके सभी को छूंछ बनाती चलती गयी एवं अन्ततः उदरस्थ कर गईं। नियत मुहूर्त से एक दिन पहले ही राजमहल का घेरा अस्थि पिंजरों से भर गया। राजा-प्रजा में से कोई न बचा। बाहर स्थित नगरवासियों द्वारा जब किले का फाटक तोड़ने और भीतर की स्थिति देखने की तैयारी हुई तो वहाँ बोधिसत्व खड़े हुए थे। उन्होंने स्तम्भित प्रजा जनों को आदि से अन्त तक सारी कथा कह सुनाई।
नगर को यक्षिणी के त्रास से मुक्ति दिला सकने योग्य बोधिसत्व ही लगे सो उन्हें राज सिंहासन पर आरुढ़ कर दिया गया। प्रचण्ड पुरुषार्थ- मनोबल सम्पन्न राजा के कारण यक्षिणियों की मण्डली को भी पलायन करना पड़ा।
सिंहासनारूढ़ बोधिसत्व ने कुछ समय उपरान्त प्रबुद्ध प्रजाजनों की एक संसद बुलाई और कहा- “शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की पाँच यक्षिणियों इन्द्रिय लिप्साओं के रूप में जहाँ भी आधिपत्य करेंगी, वहाँ के नागरिकों का सर्वनाश होकर रहेगा। जो भी इतना मनोबल जुटा ले कि इन दुष्प्रवृत्तियों से जूझ सके, वह जीवन संग्राम में निश्चित ही विजय पाता है।”
सूक्ष्मीकरण का संबंध सूक्ष्म शरीर एवं प्राण शक्ति से है। इस विशेष सामर्थ्य के सहारे परोक्ष जगत की कई ऐसी गुत्थियां हल होती हैं जिन्हें दृश्यमान शरीर से कर सकना सम्भव नहीं। छाया पुरुष की सिद्धि द्वारा अपने सूक्ष्म शरीर को ही शक्ति सम्पन्न बनाया जाता है ताकि अनेकों प्रयोजन एक साथ सम्पन्न हो सकें। विघटन में निरत समाज की शक्तियों को नव सृजन के प्रयोजन में लगाने हेतु ही गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना सम्पन्न हो रही है।
पत्थर का कोयला जलाये जाने पर छोटे-मोटे काम कर सकता है। हलवाई की अंगीठी में वह दिन भर जलता रहता है। उसकी सामर्थ्य इतनी भर है कि थोड़े से पकवान भर बना सके। अंगीठी के ऊपर लोहे का तवा रख दिया जाय या जरा-सा पानी डाल दिया जाये, तो उसके बुझने में भी देर नहीं लगती।
पानी का क्या मूल्य है, यह सभी जानते हैं। जमीन पर फैला देने पर मिट्टी उसे सोख लेती है। धूप में रखा रहने दिया जाय तो वह भाप बनकर उड़ जाता है। कोयले की आग और बाल्टी का पानी बाजारू भाव की दृष्टि से अपना कोई मूल्य नहीं रखते, पर जब विधि विशेष से रेलगाड़ी के इंजन में इन दोनों का संयोग मिलाकर भाप बनायी जाती है और उसे इधर-उधर छितराने न देकर इंजन के पिस्टन के साथ सम्बद्ध किया जाता है तो उतने भर से शक्तिशाली इंजन दौड़ने लगता है। न केवल स्वयं दौड़ता है वरन् अपने साथ भारी बोझ लदे हुए ढेरों डिब्बों को भी द्रुतगति से घसीटता ले जाता है। यही है सूक्ष्मीकरण का प्रयोग जिसकी सामर्थ्य देखते हुए दांतों तले उँगली दबाकर रह जाना पड़ता है।
आग और पानी जैसे स्वल्प मूल्य की वस्तुओं की तरह जो, चावल, गुड़ जैसी वस्तुएँ भी हैं, जिनका बाजार भाव अत्यन्त स्वल्प है। इन्हें मिलाकर विधि विशेष से भाप बनाने पर शराब बन जाती है। उसकी सामर्थ्य देखते ही बनती है। थोड़ी मात्रा में पीने पर भी नशे में धुत कर देती है। आदमी होशो-हवास खो बैठता है और उन्मादियों जैसी चेष्टाएं करता है। इसकी मात्रा अधिक पी ली जाय तो प्राण जाने का संकट सामने खड़ा होता है। अलग-अलग अपनी स्वाभाविक स्थिति में इन वस्तुओं का क्या मूल्य है? किन्तु इनका प्रयोग विशेष ऐसे चमत्कारी परिणाम दिखाता है कि आश्चर्य से चकित होना पड़ता है। संक्षेप में यही है सूक्ष्मीकरण का प्रयोग।
मनुष्य क्या है? उसकी सत्ता नगण्य है। शरीर को मलमूत्र की गठरी सच ही कहा जाता है। वह जिन पदार्थों से मिलकर बना है। उनका बाजारू मोल छह रुपये से अधिक नहीं है। अब प्राण का लेखा-जोखा लिया जाय? आमतौर से उसे प्राण वायु कहा जाता है। वायु अर्थात् साँस। गरदन दबाकर साँस चलना रोक दिया जाय तो पाँच मिनट के भीतर प्राण निकल जाते हैं और चलती हुई मशीन देखते-देखते ठण्डी पड़ जाती है। ऐसे भी कोई ठिकाना नहीं कि न जाने कब साँस चलना बन्द हो जाय और अच्छे-खासे आदमी का दम निकल जाये। किन्तु प्राण और शरीर के सम्मिश्रण से जो जीवन बनता है उसकी सामर्थ्य का क्या ठिकाना? महामानवों के जीवन कितने महत्वपूर्ण होते हैं यह उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है।
प्रतिभा सूक्ष्म शक्ति का ही एक बाह्य रूप है। कितने ही लोगों में ऐसी आकर्षण शक्ति होती है जो दूसरों को अपनी ओर खींच लेती है। इसका सौंदर्य से सीधा सम्बन्ध नहीं है। कुछ नर-नारियों की नख-शिख बनावट ऐसी होती है जो आँखों को सुहाती है पर प्रतिभा के अभाव में दूसरों को आकर्षित करने की क्षमता का अभाव रहता है। कई लोगों में डरावनी प्रतिभा होती है। डाकुओं के शरीर सामान्य होते हैं पर उनकी प्रतिभा ऐसी होती है जिससे सामने वालों को हक्क-बक्का कर देते हैं। यह उनके अन्तरंग की विशेषताएँ हैं। इनका रूप सौंदर्य से सीधा सम्बन्ध नहीं है। कई कुरूप भी प्रभावशाली होते हैं और कई रूपवान भी जहाँ जाते हैं, उपेक्षा के भागी बनते हैं।
सूक्ष्मीकरण का सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर से है। दृश्य शरीर हाड़-माँस का होता है। इसमें देखने योग्य, आँख, दाँत, होंठ, चेहरा आदि होते हैं। हाथ, पैर, माँसपेशियाँ भी स्थूल शरीर की बनावट से ही सम्बन्धित हैं। किन्तु सूक्ष्म शरीर के साथ प्राण शक्ति प्रतिभा जुड़ी होती है। षट्चक्र, उपत्यिकाएँ, कुण्डलिनी, आदि का सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर से है। उनके भीतर विशेष प्रकार की विद्युत शक्ति होती है। इस विशेष क्षमता के सहारे मनुष्य का भला या बुरा व्यक्तित्व भीतर से बाहर उभर कर आता है।
हर वस्तु में सूक्ष्म शक्ति होती है। उसे उभारने के लिए विशेष प्रयोग करने पड़ते हैं। धातुएँ बाजार से मोल पर खरीदी जा सकती हैं। पर उनका खाने में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। किन्तु जब उनका शोधन, मारण, जारण किया जाता है तो बहुमूल्य भस्में बन जाती हैं। लौह भस्म, स्वर्ण भस्म, आदि सूक्ष्म स्वरूप है। वे खाने में काम आती हैं। पच भी जाती हैं। उनके चमत्कारी परिणाम भी होते हैं। पारा ऐसी धातु है जिसे कच्चा खा लेने पर देह में से फूट निकलता है। उसकी संज्ञा विष में गिनी जाती है। अन्य विष भी शोधन करके औषधि रूप बन जाते हैं। पारा मकरध्वज बन जाता है जिसे अत्यन्त शक्तिशाली टॉनिक कहा जाता है। सूक्ष्मीकरण से कितनी ही वनौषधियों को विशेष प्रयोग से अमृतोपम बनाया जाता है। छोटी पीपल को विभिन्न रसों के पुट देकर 64 पहर ( आठ दिन ) लगातार घोंटते हैं। बीच में विराम का अवसर नहीं आने देते। इस प्रकार वह पीपल भी इतनी गुणकारी हो जाती है कि अनुपान भेद से उसे शत रोग निवारिणी बना लिया जाता है।
डीरोन औषधि विक्रेता भी यही करते हैं। वे एक वनौषधि की लगातार इतनी अधिक घुटाई पिसाई करते हैं कि मूल औषधि की तुलना में उसके गुण बहुत अधिक बढ़ जाते हैं।
होम्योपैथी के सिद्धांतों में भी सूक्ष्मीकरण की विधा काम करती है। साधारण वस्तुओं को वे इतनी अधिक पोटेन्सी की बना देते हैं कि इनका मदर टिंचर शकर या पानी में मिलाते जाने पर और भी अधिक सामर्थ्यवान बनता जाता है।
यही बात मनुष्यों के सम्बन्ध में भी है। सामान्य स्थिति में वे सामान्य स्तर के मनुष्य ही होते हैं। पर यदि उनकी प्रसुप्त क्षमताओं को किसी साधना या विधि विशेष से सूक्ष्म शक्ति सम्पन्न बना लिया जाय तो फिर वे असाधारण हो जाते हैं और ऐसी सामर्थ्य का परिचय देते हैं जिसे अद्भुत कहा जा सके।
तन्त्र या योग के माध्यम से मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को विशिष्ट सामर्थ्य सम्पन्न बनाया जाता है। किसी देवी देवता की सिद्धि में किसी बाहर की सामर्थ्य को आकर्षित करके धारण करने की बात भ्रान्तिपूर्ण है। मनुष्य के शरीर के भीतर ही ऐसी सामर्थ्य विद्यमान हैं, जिन्हें देवी-देवता का नाम दिया जा सके। वे हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में विद्यमान हैं। पर रहती प्रसुप्त स्थिति में है। इन्हें जागृत किया जा सके तो सात्विक अथवा तामसिक प्रकृति के देवी देवता अपने भीतर से ही जागृत हो जाते हैं और ऐसे काम करने लगते हैं मानो उन्हें कहीं बाहर से बुलाया या वशवर्ती किया गया है।
छाया पुरुष सिद्धि का विज्ञान एवं विधान जिन्हें मालूम है, वे जानते हैं कि ठीक अपनी ही जैसी आकृति-प्रकृति का एक अन्य देवता सिद्ध हो जाता है और वैसे ही काम करने लगता है मानो अपने ही जैसा एक दूसरा शरीरधारी, भूत-प्रेत अपने साथ रहता हो और अज्ञानुवर्ती काम करता हो। इसमें अपनी ही छाया की साधना करनी पड़ती है। अपना शरीर यथावत् रहते हुए भी छाया की सिद्धि होने पर एक दूसरी शक्ति साथ रहने और काम करने लगती है। यही बात अन्य देवी देवताओं के सम्बन्ध में भी है। वे भीतर से उदय होते हैं, कहीं बाहर से नहीं आते। तामसिक तत्व भी अपने भीतर हैं और राजसिक-सात्विक भी। उनकी उपासना करने में उसी स्तर के देवताओं के दर्शन होने लगते हैं। किन्तु वह झाँकी मात्र ही होती है। उनमें सामर्थ्य उसी स्तर की होती है। जितना की साधक का व्यक्तित्व होता है। झलक झाँकी देखने से कौतूहल का समाधान भर होता है पर उसे देव दर्शन से कुछ काम नहीं बनता। वे इतने समर्थ नहीं होते कि कुछ प्रयोजन सिद्ध कर सकें। इसके लिए देव उपासना मात्र पर्याप्त नहीं। साधक को अपना निजी व्यक्तित्व सबल समर्थ बनाना होता है। क्योंकि शक्ति भीतर से उगती है। बाहर की वस्तुएं- जिनमें देवता भी सम्मिलित हैं, झलक झाँकी दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं। छाया पुरुष के सम्बन्ध में यह बात नहीं है। वह प्रायः अपने ही सदृश्य होता है। उसमें बल, पराक्रम प्रायः अपने जितना ही होता है।
विक्रमादित्य के पाँच वीर सिद्ध थे। यह उसके ही पाँच कोश थे। वह स्वयं जितना पराक्रम कर सकता था, पांचों वीर उतना-उतना ही कार्य करते थे। अन्तर केवल इतना ही होता था कि अदृश्य छाया पुरुषों के लिए चर्म शरीर के साथ जो बन्धन होते हैं वे नहीं होते। चर्म शरीर एक घण्टे में तीन मील चलता है पर अदृश्य शरीरों के लिए ऐसा बन्धन नहीं। वह एक घण्टे में पचास मील या अधिक भी चल सकता है। दृश्य शरीर की गतिविधियाँ दूसरों के चर्म चक्षु प्रत्यक्ष देखते हैं किन्तु वीर स्तर के उत्पन्न किये गये सहयोगी अदृश्य रहने के कारण अपने काम तो करते रहते हैं किन्तु वे काम दूसरों को दृष्टिगोचर नहीं होते। प्रत्यक्ष शरीर इन्द्रियों के माध्यम से अपना प्रभाव दूसरों तक पहुँचाते हैं। कान के माध्यम बात सुनाते हैं। आँख के माध्यम से घटनाक्रम का प्रभाव दूसरों तक पहुँचाते हैं। किन्तु अदृश्य शरीर बिना वाणी सुनाये या घटना दिखाये भी दूसरों के मन पर अपनी छाप छोड़ सकते हैं। दृश्य शरीर की प्रभाव शक्ति उतने ही लोगों तक सीमित होती है जो प्रभाव परिधि की सीमा में होते हैं। आँख से देखने और कान से सुनने वालों की संख्या एक सीमा तक ही होती है। दृश्य शरीर उतनी परिधि को ही प्रभावित करता है। किन्तु अदृश्य शरीर के लिए ऐसा कोई बन्धन नहीं है। वह दो पाँच हजार को भी एक साथ प्रभावित कर सकता है। जो बात कहनी है- सुनानी है उसे बिना कानों की सहायता से भी सीधा मस्तिष्क तक पहुँचा सकता है। अंतःकरण की गहराई तक उतार सकता है। इस प्रकार अदृश्य होने के कारण उसका कार्य क्षेत्र, प्रभाव क्षेत्र सैकड़ों गुना अधिक बढ़ जाता है। इतने पर भी यह बात समझ रखने की है कि मूल व्यक्तित्व जितना समर्थ एवं प्रभावी होगा अदृश्य शरीर की कार्यशक्ति न्यूनाधिक उसी के समतुल्य होगी, विक्रमादित्य का प्रत्यक्ष व्यक्तित्व जितना बलिष्ठ था उसके उपार्जित पाँचों वीरों में से प्रत्येक उतना-उतना ही पुरुषार्थ कर सकने में समर्थ थे। कोई घटिया स्तर का व्यक्ति उपासना विशेष के विज्ञान का आश्रय लेकर अपने छाया पुरुष उपार्जित करले तो उनकी सामर्थ्य उतनी ही स्वल्प होगी। वे दूसरों पर उतना ही सीमित प्रभाव छोड़ सकेंगे।
अलाउद्दीन के चिराग की कथा जिसने सुनी है, वे उसकी वास्तविकता जानना चाहें तो सम्भवतः यह ज्ञात हो कि चालीसों उसे चोरी उठाईगीरी के काम में ही मदद कर पाते होंगे। वे ऐसे उच्चस्तरीय कार्य करने में समर्थ नहीं रहे होंगे जैसे कि ऋषि-मुनि करते थे या करना चाहते थे। क्योंकि मूल अलाउद्दीन ने जिस ढांचे में अपना व्यक्तित्व ढाला था। उसकी अनुकृतियाँ उनसे भिन्न प्रकार का स्तर अपनाने में समर्थ नहीं हो सकती थीं। ताँत्रिक साधना करने वालों को श्मशान सेवन, अघोरी आचरण का बहुत पहले ही अभ्यास करना होता है। जब उस कापालिक स्तर की प्रक्रिया उनकी नस-नस में भर जाती है तभी वे भूत, प्रेत, चुड़ैल, डाकिन, जिन्न, मसान स्तर के भयावह कृत्य कर सकने में समर्थ होते हैं। यही बात देवोपम कृत्यों के बारे में है। योगीजन अपने व्यक्तित्व को उपवास, ब्रह्मचर्य धारणा, ध्यान, पुण्य, परमार्थ के कृत्यों में लगाये रहते हैं। इन कार्यों में उनकी गति जितनी गहरी होती है उसी अनुपात से उनकी अनुकृतियाँ, छाया शक्तियाँ विशिष्ट कार्य करने में समर्थ होती हैं।
सिद्ध पुरुषों की ऋद्धि-सिद्धियाँ वस्तुतः उनके मूल व्यक्तित्व के अनुरूप ही होती हैं। कितने ही सिद्ध पुरुष बाजीगर जैसे कौतुक भरे दृश्य दिखा सकते हैं पर उनके अतिरिक्त कोई प्रत्यक्ष लाभ बड़ी मात्रा में किसी को नहीं दे सकते। हवा में हाथ मारकर लौंग इलायची मँगाकर किन्हीं को उसके दस-पाँच नग ही वे दे सकते हैं। एक बोरी लौंग एक बोरी इलायची मँगाकर किसी को वे हजारों रुपये का लाभ तत्काल करा सकें ऐसा नहीं हो सकता। कई आकृतियाँ दिखा सकना, गाय बैल के झुण्ड सामने दीखने लगना, यह हो सकता है, पर वे बैल हल खींचने लगे और गायें दूध देने लगें यह नहीं हो सकता। क्योंकि उस सिद्ध पुरुष के मूल शरीर में बैलों की तरह हल जोतने की सामर्थ्य नहीं होती। यदि उनमें उतनी क्षमता रही होती तो वे जादुई बैल हल जोतने- गाड़ी खींचने का लाभ दे सकने में भी अवश्य ही समर्थ रहे होते। जिन्हें मात्र कौतूहल उत्पन्न करना है, सस्ती वाहवाही लूटनी है। पर जिन्हें अपने प्रत्यक्ष व्यक्तित्व के समतुल्य अदृश्य साथी उत्पन्न करने हैं। वे सर्वप्रथम अपनी मूल सत्ता को तद्नुरूप बनाते हैं। इसी सफलता के ऊपर यह निर्भर है कि वे कितने साथी उत्पन्न कर सकते हैं। विक्रमादित्य पाँच वीर ही उत्पन्न कर सके यही उनकी चरम सीमा थी। यदि वे दस उत्पन्न करते तो उनमें नाम मात्र की शक्ति होती। संख्या की दृष्टि से दस होने पर भी वे पाँच के बराबर भी काम नहीं कर पाते। साथ ही यह बात भी थी कि विक्रमादित्य से योद्धा के, शासक के गुण थे वे वीर भी इन्हीं कामों को कर सकते थे। किसी ऋषि की भूमिका निभा सकना उनके बस की बात न थी।
गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण प्रयोग के पीछे भी यही तथ्य काम करता है। उनने 75 वर्षों में एक विशेष क्षमता सम्पन्न व्यक्तित्व विनिर्मित किया है। प्रत्यक्ष शरीर से उनने 10 ऋषियों की भूमिका निभाई है। व्यास की लेखनी, पतंजलि का योगाभ्यास, चरक का वनौषधि विज्ञान एवं याज्ञवल्क्य का यज्ञ विज्ञान, नारद का प्रचार तन्त्र उनने अपनाया है। विश्वामित्र की तरह वे गायत्री के दृष्टा बने हैं। पर इन सब वीरों में उनकी अर्जित शक्ति का एक-एक अंश ही आ सका है। एक ही समग्र शक्ति में से यह विभाजन हुए है। यदि एक काम में पूरी शक्ति लगी होती तो उसके परिणाम भी आश्चर्यजनक होते। अब पाँच गुने व्यक्तित्व की सम्भावना सामने है। पाँच कोशों को समूचा व्यक्तित्व समझा जा सकता है। गायत्री की पंचमुखी साधना में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश यदि ठीक तरह विकसित किए जा सकें तो पाँच स्वतन्त्र व्यक्तित्व विकसित होते हैं और वे अदृश्य स्तर के रहने के कारण दृश्यमान पाँच शरीरों की अपेक्षा पांच गुना अधिक कार्य कर सकते हैं। सूक्ष्मीकरण प्रयास का तात्पर्य यही है। अब तक वे जो काम करते रहे हैं, उनमें अनेक गुनी क्षमताओं का समावेश होने से सफलता भी अनेकों गुनी होगी। इसके अतिरिक्त उन्होंने नये कार्य हाथ में लिए हैं। गगनचुम्बी युद्धोन्माद को ठण्डा करता है। विघटन में लगी हुई शक्तियों को रचनात्मक प्रयोजनों में लगाना है। युग सृजन की प्रक्रिया को सम्पन्न करना दो-पाँच आदमियों का काम नहीं है। इसके लिए प्रतिभाओं की चेतना का दिशा परिवर्तन करना है। जो विनाश और पतन की बात सोचते हैं और इसी प्रयास में अपनी शक्ति नियोजित किए हुए हैं, उनका चिन्तन और प्रयास बदलना है। उलटे को उलटकर सीधा करना है। गुरुदेव यह सब करते तो अब तक भी रहे हैं पर अब जबकि उनकी सामर्थ्य पाँच गुनी अधिक हो जायेगी तो वे कार्य जो धीमी गति से चलते रहे हैं पाँच गुनी अधिक शक्ति से नियोजित करेंगे और उसका परिणाम भी पाँच गुना नहीं पचास गुना अधिक होगा। दृश्य से अदृश्य की क्षमता अनेक गुनी अधिक जो होती है।
कुपात्र को नहीं दूँगा, ऐसा मत कहो। तुम्हारे उद्यान के फूल ऐसा भेदभाव नहीं करते और न चारागाह ही गायों पर ऐसा प्रतिबन्ध लगाते हैं। हवा और सूरज तुम्हें अपने अनुदान देते समय क्या परख करते हैं। फिर तुम्हीं इतनी गहरी छानबीन और जाँच-पड़ताल किसलिए करने लगे?
पतन को उत्थान में, विनाश को विकास में बदलने का नाम ही युग परिवर्तन है। यह लड़ाई पाँच मोर्चों पर लड़ी जानी है। महाभारत पाँच पाण्डवों द्वारा लड़ा गया था। लंका दमन हनुमान, अंगद, नल, नील, जामवन्त नाम के पाँच सेनापतियों द्वारा लड़ा गया है। जीवन रथ को खींचकर किनारे पर लगाने अथवा उसे गहरे गर्त में डूबो देने के लिए पाँच ज्ञानेन्द्रियों को ही उत्तरदायी बताया जाता है। वे सन्मार्ग पर चलें तो मनुष्य ऋषि और देवता बन सकता है। कुमार्ग अपनाये तो पशु-पिशाच बनते देर नहीं लगती। आध्यात्म का युद्ध पाँच मोर्चों पर लड़ा जाता है। इनमें विजय प्राप्त करने वाले अपने भीतर प्रसुप्त स्थिति में पड़े हुए पाँच देवताओं को जागृत कर लेते हैं। पांच रत्न, पंचामृत के नाम से जिन दैवी शक्तियों का स्मरण किया जाता है, पंचोपचार के विधि-विधान में जिन्हें जगाया जाता है, वे ही परम कल्याण कारक- परमानन्द दायक हैं। देवता यों तो तेतीस कोटि या तेतीस भी है, पर उनमें प्रमुख पाँच ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश और भवानी। इनका अनुग्रह प्राप्त कर लेने के बाद और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। इन पाँचों के प्रतीक सूक्ष्म शरीर में सन्निहित पाँच कोश हैं। कोश अर्थात् भण्डार। भण्डार किसके? ऋद्धि-सिद्धियों के। यह जिनके पास है समझना चाहिए कि विश्व वैभव उसके करतलगत है।
पाँच वैभवों की गणना इस प्रकार होती है (1) धन (2) बल (3) ज्ञान (4) कौशल (5) विज्ञान। यह जिनके हाथ में है समझना चाहिए कि वही सामर्थ्यवान् है। सामर्थ्यों का उपयोग जिस भी प्रयोजन के लिए होता है उसी में सफलता मिलती चली जाती है। आज जो कुछ भी सामने है। वह इन्हीं पाँचों की परिणति है। जिनके पास यह है- वे ही दुनिया को भली या बुरी बनाने के लिए जिम्मेदार हैं। यदि परिस्थितियाँ बुरी हैं तो दोष इन पाँचों को ही दिया जाना चाहिए। यदि सुधार परिवर्तन न होना है तो इन पाँचों का आश्रय लिए बिना और कोई चारा नहीं है।
मनुष्य गया गुजरा है तो उन्हीं के अभाव से और यदि वह समर्थ है तो उन्हीं को उपलब्धि एवं मात्रा को उसका श्रेय दिया जायेगा। जो जितना ज्ञानवान है, बलवान है, प्रतिभावान है- वह उतना ही सामर्थ्यवान है। इन सामर्थ्यों के सहारे मनुष्य बड़े-बड़े काम कर सकता है। वे काम अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी। अच्छे काम अपना और दूसरों का हित साधन कर सकते हैं। बुरे काम अपना और दूसरों का अहित कर सकते हैं। दोनों ही स्थितियों में जहाँ सामर्थ्यों की आवश्यकता है वहाँ उनके सदुपयोग का विवेक भी अभीष्ट है। यह विवेक न होने पर अथवा उसका प्रवाह कुमार्गगामी होने पर जो जितना समर्थ है वह उतने ही अधिक दुराचरण कर सकेगा और उतना ही अधिक विनाशकारी विघातक सिद्ध होगा।
आज अधिकाँश व्यक्ति असमर्थ हैं। वे पेट-प्रजनन के कोल्हू में पिलते रहते हैं। कई बार तो वे दूसरों पर आश्रित रहते हैं। थोड़े से व्यक्ति प्रतिभाशाली सामर्थ्यवान हैं। उनमें से जिनके पास प्रतिभा है, वे उसका उपयोग बुरे कामों में करते हैं। फलस्वरूप सामर्थ्य विनाश हेतु प्रयुक्त होती है। इसका प्रतिफल अपने और दूसरों के अहित में ही होता है। आज यही हो भी रहा है। जो भी क्षमता सम्पन्न हैं, वे अपनी सम्पदाओं का इस प्रकार प्रयोग करते दृष्टिगोचर होते हैं जिनसे सर्वसाधारण को नीचे गिराने वाली, पतन के गर्त में धकेलने वाले परिणाम प्रस्तुत हों। सामर्थ्यवानों की स्वभावतया अधिक जिम्मेदारी है। उन्हें भगवान ने जो अतिरिक्त साधन दिए हैं वे इसलिए दिए हैं कि सर्वसाधारण को ऊँचा उठाने वाले आयोजन करें। स्वयं भी श्रेय प्राप्त करें और दूसरों को भी श्रेय पथ पर अग्रसर करें। लेकिन देखा ठीक उलटा जाता है। दुर्बलों के लिए तो अपनी गाड़ी खींचना ही कठिन है। दूसरों की वे क्या सहायता कर सकते हैं। वे दुर्भाग्यवश ऐसे कामों में हाथ डालते हैं, जिनसे विग्रह उत्पन्न हों और पतन की- विनाश की परिस्थितियाँ उत्पन्न हों। इनमें बुद्धि न हो ऐसी बात नहीं पर वह उलटे मार्ग पर चल पड़े तो कोई क्या करें? चाकू का उपयोग कलम बनाने, कागज काटने, फल काटने आदि में होता है पर कोई दुर्बुद्धिवश किसी में उसे भोंक दे और प्राण हरण कर ले, यह भी तो हो सकता है। यही बात प्रत्येक सामर्थ्य के सम्बन्ध में है।
किसी के पास धन हो और उसे दुर्व्यसनों में खर्च करने लगे अथवा ऐसे व्यापार करें जिससे लोकहित की हानि हो तो यह सहज सम्भव है। कितने ही धनवान व्यक्ति नशे का व्यवसाय करते हैं। पशु वध में अपनी पूँजी लगाते हैं। दुर्व्यसनों को भड़काने वाली दुष्प्रवृत्तियों में अपना पैसा लगाकर अपना अधिक लाभ सरलतापूर्वक कमाने के लिए कितने ही अनुपयुक्त कार्य करते हैं। अश्लील साहित्य, गन्दे चित्र, पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाली फिल्में बनाने में कितने ही धनवानों ने अपनी प्रचुर पूँजी लगाई हुई है। ऐसा वे गरीबी या किसी मजबूरी के कारण नहीं करते। वरन् लोभ-लिप्सा वश लाख को करोड़ बनाने की ललक में ऐसे कामों में हाथ डालते हैं। मजूरों या खरीददारों का गला काटते हैं। वे चाहते तो उचित मजूरी देकर, उचित मुनाफा लेकर सर्वसाधारण का हित करने वाली वस्तुओं का उत्पादन कर सकते थे। इसमें उस पूँजी का भी सदुपयोग होता और जिस चक्र में पैसा घूम रहा है, उससे जनसाधारण की आवश्यकता भी पूरी होती। किन्तु दुर्बुद्धि को क्या कहा जाय, जो कुमार्ग अपनाती और अहित ही अहित करती है।
यही बात अन्य क्षमताओं के सम्बन्ध में भी है। साहित्य को ही लें। चरित्र निर्माण का समाज कल्याण के साहित्य का एक प्रकार से आज अभाव ही है। प्रेरणाप्रद चित्रों की अत्यधिक आवश्यकता है। ऐसी फिल्में बननी चाहिए जो सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दे सकें। इन कार्यों में हाथ डालने पर इतना ही जोखिम है कि थोड़ा अधिक परिश्रम करना पड़ेगा और सीमित लाभ मिलेगा। जिनके पास पर्याप्त पूँजी है, उनके लिए इसमें क्या कठिनाई हो सकती है। लाख के करोड़ न होंगे तो दस लाख सही। मुनाफा तो हर हालत में है ही। थोड़ा कम मिला तो उनका क्या काम हर्ज हो रहा है। पूँजी तो बढ़ ही रही है। उतने पर भी संतोष किया जा सकता है। लोकहित सधता है। जन मंगल का प्रयत्न करने का यश मिलता है। यह क्या बुरा है? किन्तु दुर्बुद्धि को क्या कहा जाय, जो पतन की दिशा में ही चलती है बहुत जल्दी अत्यधिक लाभ कमाने से कम में चैन ही नहीं लेती।
शासन भी एक बड़ी शक्ति है। उसमें सुधार की अत्यधिक गुंजाइश है। जो पैसा टैक्स के रूप में मिलता है उसे अपनी पार्टी को मजबूत बनाने के स्थान पर, नौकरशाही का पोषण करने के स्थान पर शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, समाज कल्याण जैसे कार्यों में लगाया जा सकता है। युद्ध की तैयारियाँ सरकारें ही करती हैं। जितना धन समाज कल्याण के कार्यों में लगता है उससे अधिक युद्ध की तैयारी में लगता है। इसके स्थान पर पंचायत द्वारा झगड़े सुलझाने की नीति अपनाई जाये और उस पर सच्चे मन से अमल किया जाय तो युद्धोन्माद का जो वातावरण उत्पन्न किया जा रहा है, उस पर जो प्रचुर धन व्यय किया जा रहा है, उसकी आवश्यकता ही न पड़े।
विज्ञान क्षेत्र में लगे बहुमूल्य मस्तिष्क यदि अणु-आयुध जैसे भयंकर अस्त्र बनाने के स्थान पर जन-कल्याण के उत्पादनों में लगें तो परिस्थितियाँ बदलकर कहीं से कहीं पहुँच सकती हैं। जमीन के नीचे पानी की प्रचण्ड धाराएं बहती हैं। उन्हें ऊपर लाया जा सके तो सारे रेगिस्तान हरे-भरे हो सकते हैं और खाद्य समस्या का चुटकी बजाते हल निकल सकता है। विशालकाय उद्योगों की मशीनें बनाने के स्थान पर जापान की तरह कुटीर उद्योगों की छोटी-छोटी मशीनें बनाई जायें तो छोटे गाँव कस्बों में बदल सकते हैं और बेकारी की समस्या देखते-देखते हल हो सकती है। वैज्ञानिक आविष्कारों की शोध में लगे लाखों बहुमूल्य दिमाग यदि उस गौरख धन्धे से हटकर मनुष्य की भूख और बेकारी दूर करने में लग सकें तो चमत्कारी परिणाम हो सकते हैं।” युद्ध प्रयोजन में लगी हुई प्रतिभाएँ यदि अध्यापक और माली का काम सम्भालें तो संसार में फैला हुआ पिछड़ापन देखते-देखते समाप्त हो सकता है।
जिन्हें भगवान ने इतनी बुद्धि दी है, इतने साधन दिये हैं वे एक से एक श्रेष्ठ कारगर योजनाएं बना सकते हैं। जिनके पास प्रचुर पूँजी और विशाल साधन हैं वे यदि अपनी सामर्थ्य को संव्याप्त पिछड़ेपन को दूर करने के लिए नियोजित भर कर सकें तो सब ओर परिवर्तन ही परिवर्तन दिखाई पड़े।
क्या कारण है कि वे ऐसा कर नहीं पा रहे हैं या कर नहीं रहे हों, इसका उत्तर एक ही हो सकता है- सद्भावना का अभाव। जिनके पास सद्भावना रही है उनसे स्वल्प साधनों में भी ऐसे लोकोपयोगी कार्य कर दिखाये हैं कि दुनिया दाँतों तले उंगली दबाये रह गई। भामाशाह की कुल पूँजी 30 लाख के लगभग थी। उसे देकर उनने इतिहास बदल दिया। आज इतना आये दिन सट्टे में कमाने गँवाने वालों की कमी नहीं, पर उन्हें कोई ऐसी योजना नहीं सूझती कि सद्भावना सम्पन्न कोई रचनात्मक काम सम्पन्न हो सके। स्वामी श्रद्धानन्द ने घर का मकान पाँच हजार में बेचकर उससे गुरुकुल काँगड़ी की स्थापना की और उस संस्था ने सैकड़ों देश भक्त निकाले। आज भी अपने काम का ढिंढोरा पिटवाने के लिए सैंकड़ों व्यक्ति, मंदिर, सदावर्त आदि में खर्च करते हैं, पर ऐसी सूझ नहीं सूझती कि नाम का ढोल पिटवाने के स्थान पर कोई ऐसे रचनात्मक उदाहरण खड़े करें जो नया वातावरण बनाने वाले उपयोगी काम कर सकें।
वैभव की कहीं कमी नहीं है। बुद्धिमानों की श्रेणी में एक से एक बढ़कर मौजूद हैं। पर सद्भावना के अभाव में उस वृद्धि और सम्पदा का कोई ऐसा नियोजन नहीं हो पाता जो समय की उलटी बहती हुई धारा को मोड़ सके। कभी ऐसे व्यक्ति उत्पन्न हुए हैं, तो उनने चमत्कार करके दिखाये हैं। गाँधी अकेले ही खड़े हुए थे। उनने आजादी की लहर चलाई और उसमें लाखों व्यक्ति अपना तन, मन, धन झोंकने के लिए तैयार हो गये।
जो कुछ ऊपर की पंक्तियों में लिखा जा रहा है उसे समझने, सोचने, जानने, मानने की बुद्धि किसी में न हो, ऐसी बात नहीं है। इस संदर्भ में लेख कोई न लिखता हो, प्रवचन कोई न करता हो, किसी ने यह प्रसंग सुना समझा न हो सो बात भी नहीं हैं, पर सद्भावनाओं को अन्तःकरणों की गहराई तक उतार सके और उसे अपनाने के लिए विवश कर सके, ऐसा सुयोग बन नहीं पा रहा है।
गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया की पाँच धाराएं इसी निमित्त उद्भूत होने जा रही हैं ताकि सामर्थ्यवानों, बुद्धिमानों को समय की पुकार सुनने-समझने के लिए बाधित कर सकें। जो सद्भावनाओं का स्रोत है, उसे झकझोर कर प्रज्ञावानों को इसके लिए विवश कर सकें कि बहते हुए प्रवाह के साथ ही न बहते रहें वरन् नदी की धारा को चीरकर उल्टी बह सकने वाली मछली का उदाहरण प्रस्तुत करें।
बुद्धिमान, धनवान सत्तावान, स्तर की कितनी ही प्रतिभाएँ अपने समय में विद्यमान हैं, पर उन सबका वही हाल हो रहा है जो कभी अर्जुन का था और कहता था “कार्पण्य दोषों पहतस्वभाव” कृपणता द्वारा स्वभाव को अपहृत कर लिया गया है। और सम्मूढ़ चेता स्थिति उन सबके ऊपर बुरी तरह हावी हो रही है।
गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया में पाँच देव शक्तियों को नये सिरे से जागृत किया जा रहा है और सामर्थ्यवानों के गहन अन्तराल तक उनका उद्बोधन पहुँचाने का उपक्रम चल रहा है। मनीषा- सम्पदा- शासनसत्ता, प्रतिभा- विज्ञान गरिमा के पाँचों क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें बुद्धिमता की कमी नहीं है। वे दूसरों को बहुत कुछ सिखा सकते हैं और उन्हें कौन सिखाये? कौन समझाये? आवश्यकता मात्र एक बात की है कि सद्भावना का नश्तर अन्तराल की गहराई तक चुभोया जा सके और ऐसा परिवर्तन प्रस्तुत किया जा सके जिससे अस्थायी प्लास्टिक सर्जरी नहीं अपितु काया कल्प स्तर की परिणति सम्भव की जा सके। आज की स्थिति में यह असम्भव इसलिए दीख पड़ता है कि बुद्धि से बुद्धि को समझाने का प्रयत्न किया जाता रहा है। इसके लिए दबाव डालने वाले औजार अधिक कारगर स्तर के होने चाहिए।
काँच सीधी लकीर में कटता नहीं, टूट जाता है। उसे काटने के लिए हीरे की नोंक वाली कलम की जरूरत पड़ती है। पत्थर की कड़ी चट्टान में छेद करने के लिए भी यही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। बारूद के कारतूस चट्टान को टुकड़े-टुकड़े करके उड़ा तो देते हैं पर पानी निकालने के लिए गोल छेद का बोरिंग करने के लिए भी हीरे की नोंक वाला बरमा चाहिए। जो वस्तुएँ अति कठोर होती हैं, जो टूट जाती हैं, पर बदलती नहीं ऐसी वस्तुओं के लिए उन्हीं के अनुरूप साधनों की आवश्यकता पड़ती है।
वाल्मीकि को किसी ने बदलने के लिए उपदेश न दिये हों सो बात नहीं पर देवर्षि नारद के उपदेश ही कारगर साबित सिद्ध हो गये। पार्वती को समझाने वाला परिवार एक ओर और नारद का दस अक्षरों का उपदेश एक ओर रहा। पार्वती ने नारद जी का उपदेश माना, सारे घर की शिक्षा उनने अस्वीकृत कर दी प्रहलाद के बारे में भी यही बात है। एक ओर प्रताड़नाओं की चरम सीमा और एक ओर नारद का उपदेश। नारद का कथन ही हृदयंगम हुआ। ऐसे उपदेश वाणी से नहीं दिये जाते वरन् उनके लिए शब्द शक्ति की ऐसी प्रचण्ड धारा चाहिए जो मनुष्य की बुद्धि तक ही नहीं, वरन् अन्तःकरण तक प्रवेश कर सके और दिये हुए उपदेश को गहराई तक हृदयंगम करा सके।
सूक्ष्मीकरण में गुरुदेव अपने को पाँच हिस्सों में विभक्त कर रहे हैं। उसी प्रकार जिस तरह कि हाथ की उँगलियाँ पाँच होती हैं। कई बार तो पाँचों का सम्मिलित प्रयोग घूँसे या चांटे के रूप में होता है। कई बार उनका अलग-अलग प्रयोग भी होता है। लिखने में अँगूठा और तर्जनी काम में लायी जाती है। संकेतों में एक, दो, तीन, चार का भी प्रयोग होता है। उनने अपना एक सूक्ष्म शरीर गायत्री परिवार के परिजनों के व्यक्तिगत मार्गदर्शन एवं सहयोग के लिए सुरक्षित रखा है। एक पिछड़े वर्ग को उठाने के लिए है। एक से वे बुद्धिजीवियों को, एक से व्यवसायी वर्ग को और एक से विभिन्न देशों की राजसत्ताओं शासकों को प्रभावित करने के काम में लगाते रहेंगे। इस सब का सम्मिलित परिणाम यह होना चाहिए कि परमाणु युद्ध जैसी विनाशकारी विभीषिकाओं को टाला जा सकेगा। सर्वत्र जो छोटे-बड़े विग्रह चल रहे हैं, वे देर-सवेर में शान्त हो जाएंगे। रचनात्मक प्रयास इन दिनों नहीं के बराबर चल रहे हैं, इन सभी में तेजी आयेगी। पांचों शरीर उनके इर्द-गिर्द नहीं वरन् समस्त संसार में अपना व्यापक प्रभाव छोड़ेंगे। नव निर्माण का वातावरण बनेगा और विनाश को विभीषिकाएं शिथिल और शान्त होती जाएँगी।
अकेला एक व्यक्ति सीमित कार्य कर सकता है, पर व्यक्ति के पाँच सूक्ष्म शरीर मिलजुल कर योजनाबद्ध रूप से कार्य करें तो उसका प्रभाव दूसरा ही होगा। एक उंगली से किसी को धमका दिया जाय तो उसका प्रभाव थोड़ा सा होगा। किन्तु पाँचों उंगलियों की सम्मिलित चोट पकड़ के रूप में लगेगी तो उसका प्रभाव दूसरा ही होगा। गुरुदेव का सूक्ष्मीकरण उनकी शक्ति को पाँच गुनी बढ़ाने जा रहा है। निःसंदेह उसका प्रभाव सब प्रकार से श्रेयस्कर ही होगा।
युग विभीषिकाएं मानव की ओर से आमन्त्रित परिस्थितियाँ हैं। प्राप्त सामर्थ्य एवं उपार्जित वैभव का नियोजन जिस दिशा में हुआ है, परिस्थितियाँ वैसी ही बनती चली गयी हैं। कला, साहित्य, शासन, विज्ञान आदि क्षेत्रों में प्रतिभा एवं सम्पदा का अभाव नहीं किन्तु दिशा न मिलने के कारण वे आज उल्टी दिशा में चल रहे हैं। सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया द्वारा गुरुदेव अपनी पाँच देव शक्तियां-पंचकोशों को सक्रिय कर इन सामर्थ्यों के सुनियोजन का पुरुषार्थ सम्पन्न करेंगे।
जीवन जीना सब कलाओं से ऊपर है। जो उसे सुन्दरतापूर्वक जी सका वह सच्चा कलाकार है।
समूचे संसार को कष्ट दिए बिना एक व्यक्ति को कष्ट नहीं दिया जा सकता। आत्मा का हित साधन किए बिना दूसरों का हित साधन नहीं होता।
कुन्ती ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया था और वे पाँच प्रमुख देवताओं की शक्तियों को आकर्षित करके जन्मे थे। यह प्रक्रिया साधारण स्त्रियों की तरह पूरी नहीं हो गई थी। इसके लिए कुन्ती को विशेष तप अनुष्ठान करने पड़े थे। यह महत्वपूर्ण प्रजनन सामान्य कामों के लिए नहीं, अत्यन्त महत्वपूर्ण कामों के लिए किया गया था। साधारण स्तर के व्यक्ति उसे पूरा नहीं कर सकते थे। महाभारत की कठिन योजना इन्हीं पाँच पांडवों ने पूरी की थी। सामान्य स्तर के होने पर यदि वे सौ कौरवों की तरह होते तो भी हार जाते।
मनुष्य तो एक साथ एक ही बच्चा जनते हैं। पर पशु-पक्षियों में कितने ही ऐसे होते हैं जो एक साथ कई जनते हैं उन्हें प्रजनन काल में विशेष सतर्कता रखनी पड़ती है जब तक वे समर्थ नहीं हो जाते तब तक उन्हें उनकी माताएँ उनके पालन-पोषण की सुरक्षा भी विशेष रूप से बरतती हैं। यदि न बरतें तो वे समर्थ होने से पूर्व ही दम तोड़ दें। जननी की कितनी जिम्मेदारी होती है, यह वही जानती है। प्रजनन मात्र से प्रसव कृत्य पूरा नहीं हो जाता। असमर्थों को समर्थ बनाने के मध्यान्तर में माता को क्या-क्या सोचना और क्या-क्या करना पड़ता है यह बहुसंख्यक प्रसव करने वाली किसी भी मादा के निकट रहकर उसकी विशेष गतिविधियों को देखकर जाना जा सकता है।
गुरुदेव इस एक वर्ष में पाँच अदृश्य शक्तियों को जन्म दे रहे हैं। उनके लिए उन्हें कुन्ती जैसी भूमिका निभानी पड़ रही है। इस कृत्य पर वे अपना ध्यान पूरी तरह एकाग्र किए हुए हैं। अन्य सामान्य कार्यों से उनने अपना चित्र पूरी तरह समेट लिया है। यहाँ तक कि एक-दो व्यक्तियों को छोड़कर अन्यायों से मिलना-जुलना, वार्तालाप करना तक बिलकुल बन्द कर दिया है। जो अतिमहत्वपूर्ण कार्य उनके हाथ में है, वह ऐसा है कि समग्र एकाग्रता चाहता है। ध्यान को कई अन्य कार्यों में बिखेरने पर वह कार्य उतनी ही अच्छी तरह नहीं हो सकता जैसा कि होना चाहिए था।
सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत गुरुदेव अपने आपको पाँच भागों में विभक्त एवं विकसित कर रहे हैं। सच तो यह है कि वर्तमान शरीर की तुलना में नवनिर्मित पाँच शरीर कहीं अधिक समर्थ होंगे। सन् 2000 से अभी 16 वर्ष बाकी हैं। पाँचों शरीरों को इस पूरे समय में जमकर दिन-रात मशक्कत करनी है। इतने समय तक उनकी वर्तमान काया जीवित रहे और अत्यन्त बलिष्ठों जैसी भूमिका निभा सके ऐसी आशा नहीं की जा सकती। फिर वह जीवित रहकर भी एकांगी रहेगी। चर्म कलेवर एक सीमा में ही कार्य करने के लिए बाधित होता है। उसके अनेक सीमा बन्धन हैं। इनके रहते वे कार्य सध नहीं सकते जो उनके कन्धों पर आये हैं। कुन्ती स्वयं महाभारत लड़ नहीं सकती थी। इसके लिए उसे नवीन सृष्टि करनी पड़ी। अंजनी पुत्र हनुमान ने जो उत्तरदायित्व निभाये, वे उनकी माता अंजनी निभा नहीं सकती थी। स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी ने तप करके भगवान को जन्म दिया था। वे दोनों स्वयं ही अवतार रूप धारण करना चाहते तो कर नहीं सकते थे। बीज कितना ही सामर्थ्यवान क्यों न हो अपने उसी रूप में वृक्ष नहीं बन सकता। उसे गलना होता है और अनेक शाखा पल्लवों वाले वृक्ष के रूप में विकसित होना होता है। छाया, पल्लव, फूल, फलों से लदने के रूप में बीज अपने मूल रूप में विकसित नहीं हो सकता। बीज की कितनी ही महिमा क्यों न हो वह अपने मूल रूप से वृक्ष नहीं बन सकता और वृक्ष की जो उपलब्धियाँ हैं, वह बीज के कलेवर में रहते हुए पूरी नहीं कर सकता।
गुरुदेव का वर्तमान शरीर सीमित परिधि में ही मनुष्यों से संपर्क साधता रहा है। आगे भी उसकी यही परिधि रहेगी। जबकि असंख्य लोगों के साथ न केवल संपर्क साधने की वरन् अनुदान बाँटने की भी आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए उनका विकास सूक्ष्म शरीरों के रूप में होना नियति की विधि व्यवस्थानुसार आवश्यक है।
अस्पतालों में आक्सीजन गैस के सिलेण्डर रहते हैं। उससे एक समय में एक या दो रोगी की आवश्यकता ही पूरी हो पाती है। लाखों मनुष्यों को प्राणदान देना हो तो सूक्ष्म अदृश्य वायु का प्रवाह ही उस कार्य को कर सकता है। अँगीठी सीमित गर्मी दे सकती है। लैम्प का प्रकाश भी सीमित क्षेत्र में ही अपना प्रभाव दिखाता है। किन्तु सूर्य की किरणें आधी पृथ्वी को गरम और प्रकाशवान बनाती है। उससे करोड़ों मनुष्य और प्राणी लाभ उठाते हैं। इस लाभ की आशा अँगीठियों और लैम्पों से नहीं की जा सकती। एक काया में अवरुद्ध होने के कारण गुरुदेव की वर्तमान सामर्थ्य सीमित है। यों इस सीमा में सीमित रहते हुए भी उन्होंने अनेक ऋषियों की विविध प्रकार की गतिविधियों को संचालित किया है। अब तक की आवश्यकता सीमित थी। इसलिए उतने से भी काम किसी प्रकार चलता रहा है। पर आवश्यकता हजारों लाखों गुनी बढ़ गई है। युग परिवर्तन के अनेकों पक्ष हैं और हर पक्ष की ढेरों ऐसी आवश्यकताएँ हैं। इसीलिए अनिवार्य हो गया है कि उनका सूक्ष्मीकरण हो। एक स्थान की पूर्ति के लिए उस स्थान को ग्रहण करने के लिए पाँच सूक्ष्म शक्तियाँ स्थानापन्न हों। अभी पाँच कलेवरों में से वे इसी दृष्टि से अपने को विकसित विकेन्द्रित कर रहे हैं।
अब तक के जीवन में गुरुदेव ने प्रायः 24 लाख व्यक्तियों को अपने से सम्बद्ध किया है। इनकी ढेरों आवश्यकताओं की पूर्ति अभी भी बाकी है। अभी ऐसी स्थिति नहीं आई है कि इन्हें मार्गदर्शन या सहयोग की आवश्यकता न रही हो। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उनने अपना नव विकसित शरीर सुरक्षित रखा है। पाठकों- प्रज्ञा परिवार के परिजनों में से एक को भी यह न कहना पड़ेगा कि वयस्क होने से पहले ही हमारी उंगली छोड़ दी गई। हमारी नाव मझधार में ही रह गई।
मनुष्यों की संख्या 500 करोड़ के लगभग पहुँचने जा रही है। इनके साथ गुरुदेव का सीधा संपर्क नहीं बन सका है। देश की सीमा बन्धन और साथ ही भाषा सम्बन्धी कठिनाई अब तक सीमित व्यक्तियों से ही प्रत्यक्ष संपर्क साध सकी है। जब कि आवश्यकता इससे हजार गुने अधिक लोगों के साथ संपर्क साधने और प्राण भरने की है। नेतृत्व कर सकने वाले थोड़े ही होते हैं। उन्हीं पर सारा बोझ नहीं लादा जा सकता। जन साधारण को अपने पैरों पर भी खड़ा होना होगा। इसके उपरान्त ही नेतृत्व का सहयोग कुछ काम दे सकता है। पाँच सूक्ष्मीकृत शरीर में से एक प्रज्ञा परिजनों के लिए और दूसरा सर्वसाधारणों के लिए सुरक्षित है। इतनी व्यवस्था जुटाये बिना अब तक के संपर्क सूत्र में बँधे हुए लोग गड़बड़ा जायेंगे और नये लोगों में प्राण फूँकने का काम समाप्त हो जायेगा। युग परिवर्तन की बहुमुखी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अब तक संपर्क सूत्र में बँधे हुए लोग तो यथावत् यथा स्थान रहने ही चाहिए। यह संख्या बल और भी बढ़ना चाहिए। फसल लगातार बोई और काटी जाती रहनी चाहिए। तभी खेत हरे-भरे रहेंगे।
मूर्धन्य लोग तीन स्तर के हैं। मनीषी- संपत्तिवान- क्रिया कुशल, प्रतिभावान। इन तीनों वर्गों के ऊपर जनसाधारण के नेतृत्व का भार है। तीनों ही अपनी विभूतियों द्वारा ऐसे कार्य करते हैं जिनका प्रभाव जनसाधारण पर पड़ता है। इनके द्वारा संचालित प्रवृत्तियां सर्वसाधारण को प्रभावित करती हैं। बड़ों का अनुकरण छोटे करते हैं। प्रतिभावान अपने क्रिया-कृत्यों द्वारा अन्यों को अनुकरण की प्रेरणा देते हैं। तीन सूक्ष्मीकृत शरीर इन तीन मूर्धन्यों को सही मार्ग पर चलने- सत्प्रवृत्तियां उभारने के लिए हैं। संसार में सदा यही होता आया है। मूर्धन्य लोगों ने सर्वसाधारण को अपने पीछे चलाया। उन्हें सुधारा, सम्भाला, बदला और सत्प्रवृत्तियों के नियोजन में लगाया जा सके तो एक हवा चलती है। वातावरण बनता है और वह बन पड़ता है जिस पर नव निर्माण की आधारशिला निर्भर है।
मेघ गर्जन को सभी देखते और गड़गड़ाहट को सभी सुनते हैं। पर यह विरले ही जानते हैं कि इन दोनों के पीछे बिजली की तड़पन काम करती है। दृश्यमान कृत्यों के पीछे अदृश्य उमंग की भूमिका रहती है।
जिन फलों के भीतर अधिक कोमल और महत्वपूर्ण फल मज्जा, गूदा होता है, उनके ऊपर छिलका अधिक कड़ा होता है। अनार, कटहल, नारियल कुछ इसी प्रकार के फल हैं। इनके छिलके ही अन्दर के रसीले भाग की रक्षा करते हैं। जिनके छिलके पतले-कमजोर होते हैं, उन्हें पक्षियों से बचाना कठिन हो जाता है। अमरूद, पपीता, आम ऐसे फल हैं जिनके ऊपर पतला छिलका होने से उनकी रखवाली करनी पड़ती है। पेट में पलने वाले जानवर एक मजबूत झिल्ली के भीतर पलते हैं ताकि पेट की हलचलें उन्हें नुकसान न पहुँचा पाएँ। जिन पक्षियों के पेट में सुरक्षा का प्रबन्ध नहीं होता वे अण्डे देते हैं। अण्डे का छिलका बच्चे की वृद्धि और सुरक्षा के हिसाब से मजबूत होता है। यही प्रजनन प्रक्रिया की व्यवस्था सूक्ष्मीकरण पर लागू होती है। एक से पाँच बनने का प्रयोग ऐसा है, जिसके लिए बाहर से नुकसान न पहुँचा सकने वाली सुरक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध अनिवार्य हो जाता है।
एकाकी निवास का प्रबन्ध इसलिए करना पड़ रहा है कि भीतर का सुरक्षा कवच मजबूत रहे एवं बाह्य तत्व किसी प्रकार की क्षति न पहुँचाने पायें। बहुत आवागमन मिलने-जुलने के क्रम से उस व्यवस्था को क्षति पहुँचती है जो चारों ओर से घेरा चाहती है। जहाँ स्वाभाविक घेरा नहीं होता, वहाँ कृत्रिम प्रबन्ध करना पड़ता है। चिड़िया अंडे को समुचित गर्मी पहुँचाने के लिए छाती के नीचे दबाकर सेती रहती है। इस प्रक्रिया को नर और मादा दोनों ही बारी-बारी बैठकर पूरा करते हैं। यदि कोई आदमी अण्डों को छू ले और उसके हाथों की गन्ध अण्डे को स्पर्श मात्र कर ले तो मादा उन्हें फिर नहीं सेती। अण्डा सड़ जाता है। सूक्ष्मीकरण में एक को पाँच बनना है। यह पाँच अण्डे एक साथ सेने के बराबर है। इसके लिए न केवल मजबूत घेरे की आवश्यकता है। वरन् सेकने के अनुपात की गर्मी भी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब बाहर के आवागमन पर प्रतिबन्ध रहे। जब तक अण्डे पक नहीं जाते तब तक प्रतिबन्ध रहेगा ही। अंडे में से बच्चे निकलने के बाद वे बिना पंखों के चूजे होते हैं। इनकी सुरक्षा घोंसले की परिधि में होती है। इसमें प्रवेश निषिद्ध होता है। चिड़िया के गन्ध के हिसाब से अपने पराये का अन्तर जानती है। यदि कोई ऐसी उलट-पुलट करे व किसी चिड़िया के अण्डे-चूजे उठाकर किसी के घोंसले में रख दे तो चिड़िया को घोंसले तक में उसका पता चल जाता है एवं साज सम्भाल में अंतर आ जाता है।
सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया में गुरुदेव को अन्दर अपना घोंसला बना कर रहना पड़ रहा है। रहने का स्थान न केवल सीमित रखना पड़ रहा है, वरन् वह सुरक्षित भी रखना पड़ रहा है। इसमें प्रवेश हेतु संबंध सूत्र हैं। उनके साथ साझेदारी मुद्दतों से निभती रही है। वे उनकी पिछली साधनाओं में भी साझीदार रही है। इसमें भी हैं। एकदम बाहरी वातावरण से सम्बन्ध काट लेने के कारण मिशन की गतिविधियों की जानकारी देने और आवश्यक निर्देशन- परामर्श प्राप्त करने हेतु वे मध्यस्थ का काम करती रही हैं। शरीर के लिए भोजन, वस्त्र का निर्देशन तो गुरुदेव का ही रहता है, पर उस सामग्री को जुटाने में भागीदार अपनी उनकी रही है। यह प्रबन्ध आरम्भ से ही रहा है। अण्डे को नर-मादा बारी-बारी से सेते हैं। इन दोनों में अब कौन नर है- कौन मादा, यह भेदभाव मिट चुका। जो स्थिति है, साझेदारी की कही जा सकती है। इसके उपरान्त यह घेरा इतना कड़ा और मजबूत है कि इससे प्रवेश निषेध की आवश्यकता पूरी हो जाती है।
प्रत्येक बच्चे को कुन्ती की तरह अलग-अलग शक्तियों से सम्बन्धित रखा जा रहा है ताकि वे अपने-अपने प्रयोजन को यथासमय परिपक्व होकर पूरा कर सके। इसमें कमी रह जाने पर अभिमन्यु का सा कच्चापन रह सकता है। चक्रव्यूह के जो सात घेरे बने हुए हैं उनमें एक के बेधन का रहस्य मालूम न होने पर प्रशिक्षण अधूरा होने पर लक्ष्य अधूरा रह जाने का- अभिमन्यु के प्राण गँवाने जैसा संकट सामने आ सकता है।
जो तथ्य, लक्ष्य और रहस्य को नहीं जानते, वे प्रायः आग्रह करते रहते हैं कि उन पर यह प्रतिबन्ध लागू न किया जाय क्योंकि वे पुराने हैं, अधिक घनिष्ठ-आत्मीय हैं, मिशन के अधिक शुभेच्छु रहे हैं। यह सारी बात सही होते हुए भी वे यह भूल जाते हैं कि कितने बहुमूल्य अण्डे बच्चे इन दिनों पाले जा रहे हैं। घुसपैठ का सिलसिला चला देने पर उद्देश्य का गुड़-गोबर हो जाएगा। एक को मिलने की छूट देने के बाद फिर कोई तर्क या ऐसा न रहेगा जिसके कारण अन्यान्यों को रोका जा सके। रोकथाम न रहने पर घोंसले का वातावरण ही बदल जाएगा और जिस परिश्रम से, जिस आशा से इस बार पिछली सभी साधनाओं से भिन्न प्रकार की उच्चस्तरीय साधना की जा रही है, उसका प्रयोजन ही अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
जिस आवास स्थली में- कोठरी में रहा जा रहा है, जहाँ तक एक-दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है, उसे अभिमन्त्रित-कीलित किया गया है। इसमें जो प्रयोग चल रहे हैं वे अद्भुत हैं। कुछ ऐसे हैं, जो रात्रि को करने पड़ते हैं तब दिन में सोकर काम चलाया जाता है। कुछ दिन में करने के हैं। कुछ मन्त्र ऐसे हैं जिनमें तनिक भी एक शब्द की भी भूल हो जाने पर उच्चारण तन्त्र ही उलट-पुलट सकता है। इसलिए प्रयोग चलाते समय क्षण-क्षण में यह देखभाल करनी पड़ती है कि शरीर और मस्तिष्क का सन्तुलन ठीक रह रहा है, या नहीं। बिगड़ता है तो उसे हाथों हाथ सुधारना पड़ता है।
सभी जानते हैं कि मानव माता एक बच्चा जनती है। कदाचित दो जनने पड़ें तो आपरेशन की- सीजेरियन सेक्शन की आवश्यकता पड़ जाए। अधिक बच्चे पेट में हों तो वे सभी अविकसित कम भार के होते हैं। बच्चे तो मरते ही हैं, जननी के भी प्राण संकट में रहते हैं। सभी सही रूप में जन्में, दुबले कमजोर न भी हों, माता के लिए भी प्राण संकट न खड़ा हो तो उसे सम्पन्न करने के लिए कितनी कुशलता की जरूरत पड़ेगी, इसे भुक्तभोगी एवं विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं। सूक्ष्मीकरण की विधा जितनी महत्वपूर्ण है, उसी के अनुरूप उसके लिए प्रतिबन्ध भी लगाने पड़ रहे हैं। सुरक्षा प्रबन्ध भी उसी स्तर के करने पड़ रहे हैं। यह एक वैज्ञानिक प्रयोग है जो ऋषि परम्परा का एक अंग है। साधारण ज्ञान परक साधनाओं में ज्ञान, कर्म और भक्ति के सनातन प्रयोग काम दे जाते हैं। उसमें सामान्य उपासनाऐं बिना जोखिम की होती हैं। किन्तु विज्ञान के प्रयोगों में प्रयोक्ता के लिए भी जान जोखिम बन जाती है। अणु संयन्त्र बनाने- बिगाड़ने में तनिक भी अस्त-व्यस्तता बन पड़े तो उसमें अपने लिए तथा दूसरों के लिए खतरा ही खतरा है।
खतरे की बात भुलाई नहीं जा सकती। कृष्ण जब छोटे थे तब भी पूतना, कालिया नाग, तृणावर्त जैसे कितने ही संकट आ खड़े हुए थे। रामचन्द्रजी को भी बचपन में कितनी ही विपत्तियों का सामना करना पड़ा था। ऋषियों के बड़े और महत्वपूर्ण कार्यों प्रयोगों में कितने ही संकट आए। विश्वामित्र के छोटे से यज्ञ में ताड़का, सुबाहु, मारिचि जैसे तीन-तीन असुर एक साथ आक्रमण करने आ पहुंचे। गुरुदेव पर जनवरी वाले आक्रमण को अभी भूलने के दिन नहीं आये हैं। फिर आगे भी निश्चिन्त हो सकें ऐसा समय नहीं आया है। जिन शक्तियों से जूझना है वे छोटी नहीं हैं। जो वजन हटाना है, वह हल्का नहीं है। ऐसी दशा में जो कार्य हाथ में लिया गया है, उसमें पूरी तरह सतर्कता का उपयोग करना पड़ रहा है। इसमें प्रथम एवं महत्वपूर्ण एकान्त साधना है। इसमें विक्षेप उत्पन्न करने का प्रयास किसी भी प्रियजन या शुभ चिन्तक को कभी नहीं करना चाहिए।
आइन्स्टीन के सूत्रों का विषद विवेचन करने वाले बायोफिजीसिस्टों का मत है कि जो हमें दिखाई नहीं पड़ता, वह परोक्ष जगत कितना विराट है उसकी कल्पना उस आयाम में पहुँचकर, दिग्काल के परे जाकर बोध होने पर ही की जा सकती है। सारा जगत कम्पन तरंगों का समुच्चय है एवं विचार तरंगें उन्हीं का अंग है। उनकी गति प्रकाश की गति से भी कहीं अधिक तीव्र है, इसी कारण मानवी कल्पना शक्ति अद्भुत एवं अगणनीय है।
बाल पहेलियों और कबीर की उलट बांसियों की तरह गीता में एक रहस्यों भरा श्लोक है, जिसमें कहा गया है-
या निशा सर्वभूतानां तस्या यां जागर्ति संयमी। यस्यां जागर्ति भूतानां सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
अर्थात्- जब सब प्राणियों की रात होती है तब संयमी जागा करते हैं। जब सब प्राणी जागा करते हैं, तब मुनि सोया करते हैं।
शब्दार्थ को देखते हुए यह आश्चर्यजनक और असम्भव प्रतीत होता है। जब सब लोग जगा करें तब मनीषी गण सोया करें तो यह बात बड़े अचंभे की होगी। संयमी लोग जब रात्रि को जगेंगे तो उन्हें किसी से वार्तालाप व्यवहार करने का अवसर न मिलेगा। मुनि लोग जब जगेंगे तब सारी दुनिया सोई हुई होगी। ऐसी दशा में वे सदा एकाकी रहेंगे। अथवा यों कहें कि सर्वसाधारण के विपरीत उनका आचरण होगा। ऐसी दशा में उन्हें किसी से सामान्य व्यवहार करते न बन पड़ेगा। जब लोगों के व्यवहार का समय होगा तो वे सो जाया करेंगे। ऐसी दशा में वे सदा दुनिया के लिए सोए हुए होंगे। यह विचित्र बात सामान्य समझ से परे लगती है। ऐसे तो दुनिया का लाभ उस व्यक्ति को न मिल सकेगा और उससे दुनिया का कोई व्यक्ति न संपर्क साध सकेगा, न लाभ उठा सकेगा। ऐसी स्थिति में रहकर संयमी या मुनि एक प्रकार से मूर्च्छित या मृतक कहलाएंगे।
इस पहेली का तात्पर्य यह है कि आध्यात्मवादी और भौतिकवादी के चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में ठीक उल्टी स्थिति होती है। संसारी लोग जो सोचते या करते हैं, मुनि का चिन्तन ठीक उससे उल्टा होता है। व्यवहार में भी ठीक ऐसी ही प्रतिकूलताएँ होती है। स्वयं कबीर के शब्दों में “कहत कबीर यहुँ अकथ कथा है कहता कही न जाई।” विधि की व्यवस्था पर उनका यह संकेत मात्र है।
सांसारिक मनुष्य मात्र शरीर को ही सब कुछ मानते हैं और उसी के लिए मरते-खपते हैं। शरीर सुख-सज्जा ही उनके लिये सब कुछ होती है। इसके लिये वे आत्मा को बड़ी से बड़ी क्षति पहुँचाते रहते हैं। इसके विपरीत जो आत्म पारायण व्यक्ति हैं, वे शरीर की सुख-सुविधाओं की उपेक्षा करते रहते हैं। मात्र निर्वाह ही उनके लिए पर्याप्त होता है। वे जानते हैं कि सीमित सात्विक जीवनचर्या ही निरोग बनाये रहती है और दीर्घ जीवन प्रदान करती है। सात्विक रहन-सहन सस्ता होता है। आज धन और इन्द्रिय पारायण चर्या अपनाने के लिए महँगे साधन इकट्ठे करने पड़ते हैं, जिसके लिए अनीति उपार्जन के बिना काम नहीं चलता। ऐसे साधन एकत्रित करने पर साज-सज्जा तो अवश्य बढ़ जाती है पर उसके लिए बेईमानी- अनीति अपनाये बिना काम नहीं चलता। इसके लिए आत्मा धिक्कारती रहती है। सादगी का रहन-सहन अपनाने पर ठाठ-बाट तो नहीं उनता, तरह-तरह के स्वादों के विलासों की व्यवस्था तो नहीं बनती पर आत्मा सदा संतुष्ट- प्रमुदित बनी रहती है। सादगी अपनाने पर उच्च विचार धारण किये रहने का सुयोग बना रहता है। विवेकवानों के लिए यह स्थिति हर दृष्टि से शान्तिदायक और संतोषजनक होती है।
उपरोक्त दोनों ही परिस्थितियाँ परस्पर सर्वथा प्रतिकूल हैं। दोनों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए गीताकार ने सोने और जागने की उपमा दी है। सोने का अर्थ है विरति, उपेक्षा और अवहेलना। जागने का तात्पर्य है उत्साह, आतुरता, लालच आकाँक्षा। यह दोनों ही बातें एक दूसरे से विपरीत ही तो होती हैं।
जीवन के अनेकानेक पक्ष हैं। आहार, विहार, उपार्जन, उपभोग, संग्रह इन सबकी अपनी-अपनी अभिरुचियाँ हैं, अपने-अपने स्वाद हैं। इन्हें उपार्जित करने सम्बन्धी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हैं और उपभोग सम्बन्धी अलग-अलग मान्यताएँ हैं। आहार को ही लें। किसी को स्वाद रहित, सात्विक आहार रुचिकर लगता है तो किसी को मिष्ठान्न, पकवान, षट्रस व्यंजन, सो भी इतनी मात्रा में कि पेट फूलने-फटने लगे। किसी को आधा पेट आहार से भरना है, चौथाई पानी के लिए और चौथाई हवा के लिए छोड़ना है। दोनों में कितना अधिक अंतर हुआ। इन्द्रिय भोगने के लिए किसी को मर्यादाओं का ध्यान रखना होता है। यह गाँठ बाँधनी पड़ती है कि इन जंगली घोड़ों को मनमानी छूट दी गयी तो जीवनी शक्ति को खोखली करके छोड़ेंगे, इसलिए इन्हें अंकुश वाले हाथी की तरह- लगाम वाले घोड़े की तरह- नकेल वाले ऊँट की तरह काबू में ही नहीं रखना है वरन् लक्ष्य तक पहुँचाने की सही राह पर भी चलाना है। विशेषतया कामुकता का चिन्तन और व्यवहार ऐसा रखना है कि वर्जनाओं की तोड़-फोड़ न होने पाए। माता, बहिन, बेटी, पुत्री की मान्यताओं पर किंचित व्यतिरेक न होने पाए।
पशु-पक्षी तक मर्यादाएँ पालते हैं। मादा के आह्वान पर ही प्रजनन हेतु काम सेवन करते हैं। फिर मनुष्य तो अधिक विचारशील है। उसे तो जीवन शक्ति के बचाव का, नीति और मर्यादा का और भी अधिक पालन करना है। जो इस सन्मार्ग पर जागरूक है, उसे समझना चाहिए कि मुनि की तरह, योगी की तरह उस समय भी जागता है जबकि पशु-प्रवृत्ति के लोग निद्राग्रस्तों की तरह नीति और मर्यादा के सम्बन्ध में उनींदे बने रहते हैं। सोते हुए व्यक्ति को न कपड़े सम्भालने का होशो-हवास रहता है और न मुंह खोलने, बन्द करने का। विवेकवान- अविवेकी को ही यहाँ जागृत और निद्रित की संज्ञा दी गयी है।
वस्त्र विन्यास की विहार पद्धति में एक प्रकार के लोगों को “सादा जीवन उच्च विचार” के अनुरूप सादगी और सज्जनता का ध्यान रहता है। दूसरे ऐसे सजे फिरते हैं जैसे रंग-बिरंगे गुड्डे गुड़िया। दोनों में से पहले को मानवी गरिमा को, अन्तः की उत्कृष्टता को बनाये रखने का सदा ध्यान रहता है तो दूसरे को बहिर्मुखी जीवन ही रुचिकर लगता है। इसी के बलबूते वह अन्यों पर अपनी छाप पड़ने की भ्रान्तिपूर्ण अनुभूति करता रहता है।
एक पक्ष को ईमानदारी की- न्यायोपार्जित कमाई का ध्यान रहता है और न्यूनतम में निर्वाह करके जो बचता है, उसे पुण्य-परमार्थ में, सत्प्रयोजन में- लोक मंगल में लगाने का सदैव ध्यान बना रहता है। दूसरा पक्ष न्याय-अन्याय का कुछ भी ध्यान न रखकर जैसे भी बने वैसे कमाने और आवश्यक अनावश्यक संग्रह करने की ललक में मग्न रहता है। बेहिसाब खर्च करता और तंगी भुगतते हुए ऋणी बना रहता है। किसी को देना तो दूर, जैसे भी बन पड़े, हड़पने में वह भय लज्जा का विचार नहीं करता।
आध्यात्मिक जीवन जागृत जीवन है और मर्यादा रहित भौतिक जीवन सोता हुआ। दोनों का मध्यवर्ती अन्तर स्पष्ट है। दोनों के बीच चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में जमीं-आसमां जैसा अंतर होता है। एक को सज्जनता के अतिरिक्त दूसरा कुछ किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं। दूसरा उद्दण्ड असुरों की तरह किसी बात का विचार किए बिना लूटते-खसोटते खाते और बिगाड़ते हैं।
वेदान्त मानवी व्यक्तित्व की मर्यादा बताता हुआ कहता है त्वचा, शरीर, सम्प्रदाय, मत, धर्म और राष्ट्रीयता कभी मनुष्य की सीमा नहीं हो सकते। जैसे-जैसे मनुष्य अपने अज्ञान पर विजय पाता है, वैसे-वैसे इन सीमाओं को भी पार कर लेता है। कहा भी है-
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसांम्। उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
अर्थात्- यह मेरा देशवासी है, यह परदेशी है- ऐसी दृष्टि केवल ओछे मन वालों की है। एक उदार मन के लिए तो सारा संसार कुटुम्ब है।” गीताकार ने सम्भवतः इसी तथ्य को दृष्टिगत रख मुनि और संयमी को जागृत कहा है और उद्दंडों- संकीर्णों को प्रसुप्त। दोनों अपने अन्तर के अनुरूप प्रतिफल भी प्राप्त करते हैं।
न काष्ठ में देवता है, न पत्थर में, न ही मिट्टी में। देवता तो भावना में निवास करते हैं। इसलिए भावना की ही प्रधानता है।
“संसार दुःखमय है। काया अपवित्र है। यहाँ सब कुछ माया और भ्रम है। कोई किसी का नहीं। सब मतलब के साथी हैं। अस्तु सब कुछ त्याग कर बैरागी होना चाहिए।” यह मध्यकालीन अन्धकार युग की मान्यताएँ हैं। इन्हें कितने ही भारतीय दार्शनिकों ने प्रश्रय दिया। फलतः लम्बे समय तक त्याग के नाम पर गृहत्याग- कर्तव्य त्याग यहाँ तक कि अनशन आदि से शरीर त्याग की विधा बहुतों ने अपनायी। अध्यात्म संवाद सुनने वालों में से अनेकों ने ऐसी ही मान्यता बनाई और वे अनासक्त, निस्पृह, स्थितप्रज्ञ आदि शब्दों का तात्विक अर्थ न समझ कर जड़ भरत जैसे अन्यमनस्क जीवन जीने लगे। उदासीनता एक सम्प्रदाय विशेष बन गई। उसे अपनाने वालों ने श्रम और दायित्व का परित्याग करने पर भी श्रेय सम्मान अर्जित किया। ऐसा था, वह दिग्-भ्रान्ति का युग, उसे दार्शनिक अवसाद की बेला कहा जा सकता है।
‘सर्व क्षणिकं, सर्व दुःख’
यह सब कुछ क्षणिक नश्वर है और दुःखमय है।
निर्वाह साधनों के उपार्जन और उपयोग को भी हेय ठहराया गया। कहा गया-
आये दुःखं, व्यये दुःखं, धिगर्थान् कष्टकारणम्।
कमाने में दुःख, खर्चने में दुःख, जिससे दुःख ही दुःख मिलता है उस धन को धिक्कार।
आश्चर्य यह है कि जिनने इन उक्तियों का प्रतिपादन किया वे इसी संसार में निवास निर्वाह करते रहे। इतना ही नहीं धन साहस साधनों के सहारे सुखपूर्वक जीवनचर्या चलाते रहे। न उनने संसार छोड़ा, न देह और न निर्वाह साधनों का परित्याग ही कर सके। जो प्रतिपादनकर्त्ताओं तक के लिए साध्य नहीं, उसे व्यावहारिक कैसे कहा जाय? फिर भी उसे कहा जाता रहा। परिणाम एक ही हुआ। उदासीनता का ऐसा वातावरण जिसमें पुरुषार्थ की उपेक्षा होने लगी। साथ ही कर्त्तव्य पालन के लिए जिस तत्परता की आवश्यकता थी। अनौचित्य से जूझने के लिए जो पराक्रम अभीष्ट था, उसकी उपेक्षा चल पड़ी। संक्षेप में यह मध्यकालीन दार्शनिक अवसाद ही हमारे पतन पराभव का कारण बना।
देखना यह है कि वस्तुतः भारतीय दर्शन पलायनवादी है। उसमें स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, जैसी व्यक्तिगत स्वार्थपरता को ही सब कुछ माना गया है। जीवन को महान बनाने तथा लोक मंगल के लिए पराक्रम करने जैसी साहसिकताओं के लिए उसमें कोई स्थान नहीं है।
शरीर को तीर्थ, देवालय, ऋषि आश्रम की संज्ञा दी गई है और उसकी पवित्रता प्रखरता अक्षुण्ण रखने तथा बढ़ाते चलने का निर्देश दिया गया है। यजुर्वेद की ऋचा है-
सप्त ऋषायः प्रति हिताः शरीरे। सप्त रासन्ति सदम प्रमादम् ॥
अर्थात्- यह शरीर सप्त ऋषियों का पवित्र आश्रम है ये सातों सतर्कतापूर्वक इसका संरक्षण करते रहते हैं।
यह सप्त ऋषि रक्त माँस आदि सप्त धातुएं हैं। षट्चक्र और सातवाँ ब्रह्मरन्ध्र यह सात लोक हैं। सात प्रमुख धमनियों को सप्त सरिता कहा गया है। दोनों नेत्रों की सूर्य चन्द्र से तुलना की गई है। पाँच प्राण से बनी चेतना को भूलोक की उपमा दी गई है।
यही बात इस विश्व ब्रह्मांड के सम्बन्ध में भी है। गीता में भगवान ने अर्जुन को अपने विराट् रूप का दर्शन कराया। यह दिव्य चक्षुओं से होने वाला दिव्य दर्शन और कुछ नहीं इस विश्व ब्रह्मांड को ईश्वर का स्वरूप मानने और उसके प्रति सेवा साधना का श्रद्धाँजलि अर्पित करने का भाव रखने का ही प्रतिपादन है।
भारतीय संस्कृति पलायनवादी नहीं वरन् इसमें सौ वर्ष तक प्रबल पुरुषार्थ करते हुए जीवित रहने और प्रगति पथ पर चलते हुए पूर्णता तक पहुँचने का निर्देशन है।
सौंदर्य मनुष्य का प्रिय विषय है। वह न केवल सुन्दर वस्तुओं को देखना चाहता है, वरन् सौंदर्य को अधिकाधिक परिमाण में देखना चाहता है। कुरूपता से अप्रसन्नता एवं खीज होती है उसे हटाने के लिए जो सम्भव है सो करता भी है। इस मनोवृत्ति ने मनुष्य को सुसज्जित बनने या रहने की प्रेरणा दी है। इस प्रयास का जहाँ तक वस्त्राभूषणों से सम्बन्ध है वहाँ तक उसे फैशन कहते हैं।
फैशन शब्द अच्छे अर्थ में भी आता है और बुरे में भी। अपनी आर्थिक स्थिति से बाहर खर्च करके बनाई हुई सज्जा बुरे अर्थ में आती है। जिसमें अत्यधिक सज्जा की गई हो वह उपहासास्पद मानी जाती है। पर जिसमें मर्यादा के अन्दर सुन्दर बनने की ललक झलकती हो वह उपयुक्त है। सौंदर्य कला है। कलाकार की प्रशंसा होती है। जिसने अपना संसार सत्य, शिव के साथ-साथ सुन्दर भी बनाया है उस विश्वम्भर की छवि कला में देखी जा सकती है। कला का दर्शन ईश्वर के दर्शन जैसा है। कला और सौंदर्य एक जैसे हैं। उसके दर्शन की लालसा का औचित्य है।
मनुष्य ईश्वर ने तो यथासम्भव सुन्दर बनाया ही है, अब मनुष्य की बारी है कि वह उस छवि को अपनी रुचि के अनुसार और अधिक निखारे। उसमें जो सज्जा का योगदान कर सके, करे। इसी को वेश विन्यास कहते हैं। बाजारू बोलचाल में इसे फैशन भी कहते हैं। शरीर को वस्त्रों आभूषणों से सजाया जाता है। शृंगार प्रसाधनों से नाक, कान, बाल आदि को अधिक सुन्दर सुव्यवस्थित बनाने का प्रयत्न किया जाता है। पुष्प सज्जा का अनेक प्रसंगों में उल्लेख आता है। जहाँ तक औचित्य की सीमा के अंतर्गत यह सब है वहाँ तक तो सराहनीय है। उपहास तब होता है जब उसमें भोंड़पन का- फूहड़पन का- मर्यादा से आगे का समावेश होता है। फैशन शब्द ऐसी ही स्थिति में प्रयोग होता है।
अंग अवयव जैसे भगवान ने बनाये हैं उन्हें स्वच्छ रखकर सुन्दर बनाया जा सकता है। कपड़े साफ सुथरे शरीर के आकार में फिट बैठने वाले, मन्द रंगों वाले ही शोभा बढ़ाते हैं पर यदि उन्हीं को भड़कीले रंगों वाले और विचित्र सिलाई के बना दिया जाय। नाक कान में अधिक लटकने वाले आभूषण लटकाये जायें तो उसे फैशन कहा जायेगा। भगवान ने त्वचा का रंग काला बनाया है तो उसे सफेद बनाने के लिए सफेद या लाल रंग से पोता जाय तो भी वह स्थिति फैशन कही जायेगी और उसकी संज्ञा बचकानेपन में जुड़ेगी। स्वाभाविकता को अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर बनाने के प्रयास को कला कहते हैं। कला सराहनीय है। उसमें कलाकारिता का परिचय मिलता है।
जैन पुराणों में तपस्वी बाहुबलि के चरित्र का वर्णन है। उनने कठोर तपस्याएँ की थी, पर अहन्ता नहीं टूटी तो इस साधना से भी उन्हें शांति न मिली। महत्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था।
उदास बाहुबलि को उसकी बहन ने देखा तो असफलता का कारण ताड़ लिया। उसने आते ही कहा- “हाथी की पालकी से नीचे उतरो और समझदारों की तरह जमीन पर चलो।”
कथन का मर्म बहिन ने समझाया कि अहन्ता को छोड़ो, आकाँक्षाओं से छुटकारा पाओ, इसके बिना साधना की सफलता मिल नहीं सकती।
बाहुबलि ने ऐसा ही किया और वे देखते-देखते सिद्ध पुरुष हो गए।
पत्थर का कोयला एक विशेष स्तर पर पहुँचकर हीरा बन जाता है। यों अनगढ़ प्रयोग करने वाले उसकी अँगीठी जलाकर भी कमरे में रख लेते हैं और भोर होने से पहले ही उस विषैली गैस से मर चुके होते हैं। जबकि हीरा उपलब्ध करने वाले सुसम्पन्न भाग्यवान बनते हैं। लोहा, राँगा, सीसा अमुक जैसे सामान्य खनिजों का बाजारू मूल्य तुच्छ होता है पर उन्हें जब भस्म रसायन बना लिया जाता है तो संजीवनी बूटी का काम करते और महंगे मूल्य पर बिकते हैं। पीने का पानी भाप बनाकर जब ‘डिस्टिल्ड वाटर’ बना लिया जाता है तब उसकी गणना औषधियों में होती है। आदमी भी यों गली-कूचों में भीड़ लगाते और गन्दगी फैलाते रहते हैं पर जब उन्हें सुसंस्कारिता की साधना द्वारा महान बना लिया जाता है तो फिर ऋषि देवता कहाते- अपनी नाव पर चढ़ा कर असंख्यों को पार करते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है।
यहाँ चर्चा स्वार्थ के सम्बन्ध में की जा रही है। यह शब्द या प्रयोग इसलिए बदनाम हुआ है कि इसे लोग घटिया प्रयोजनों के लिए- घटिया ढंग से नियोजित करने लगे। अन्यथा अपनी भलाई करने के सिद्धाँत या प्रयास में कोई ऐसी बुराई नहीं है, जिसे अपनाना अनुचित कहा जाय। शरीर को ही सब कुछ मान बैठने- उसकी उच्छृंखल लिप्साओं को पूरा करने के लिए अनैतिक उपार्जन और अवाँछनीय उपयोग करने तक जब बात बढ़ जाती है तभी उस मर्यादा उल्लंघन को हेय कहा और दोष दिया जाता है। स्वार्थ के साथ घटिया दृष्टिकोण जुड़ जाने और उसके साथ अनाचार चल पड़ने से ही तहलका मचता और स्वार्थ बदनाम होता है। आक्रामक अनीति ही पाप कहलाती हो, सो बात नहीं। नैतिक कर्त्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों की अवहेलना भी निन्दनीय और दण्डनीय मानी गई है। स्वार्थान्ध व्यक्ति सदा आक्रामक ही हो और निरन्तर अपराध ही करता रहे ऐसा भी नहीं, फिर भी इस मनोरोग से पीड़ित वह व्यक्ति इतना कृपण और अनुदार हो जाता है कि उपार्जन को बन्दरिया की तरह मरे बच्चे को भी छाती से चिपकाये फिरता है। इतना नहीं सूझता कि औसत नागरिकों की तरह सादगी का निर्वाह करके कुछ बचाया जाय और उसे उन लोगों के लिए लगाया जाये जो ऐसी सहायता की कुछ बूंद पाने के लिए भी तरसते रहते और न मिलने पर पीड़ा एवं पतन का अभाव एवं पिछड़ेपन का त्रास सहते रहते हैं।
मनुष्य की अपनी गरिमा और विशेषता है। इसके साथ ही उसके ऊपर वैयक्तिक चरित्र निष्ठा और समाज गत उदार सहकारिता के उत्तरदायित्व भी जुड़े हैं। उनकी उपेक्षा अवहेलना करने पर सुसम्पन्न और समर्थ व्यक्ति भी अनाचरण के कुमार्ग पर चल पड़ता है। उद्धत अपव्यय के साथ दुर्व्यसन जुड़ जाते हैं। फिर समर्थों से सत्प्रयोजनों की जो आशा की जाती है उसकी भी उपेक्षा होती है। ऐसी अनगढ़ मनःस्थिति से घिरे हुए व्यक्ति को यदि स्वार्थान्ध कहा जाता है और उस पर सर्वजनीन तिरस्कार बरसता है तो वह ठीक ही है। स्वार्थी अपने वैभव पर इतरा तो सकते हैं, उसके सहारे गुलछर्रे तो उड़ा सकते- किसी को सता या बहका भी सकते हैं। इतने पर भी अपनी या दूसरों की दृष्टि में अपनी गरिमा सिद्ध नहीं कर सकते। अनुदारताजन्य आम-प्रताड़ना और लोक भर्त्सना की दुहरी मार उन्हें निरन्तर सहनी पड़ती है। ऐसे व्यक्ति ठिठोली तो कर सकते हैं पर आत्म संतोष की साँस लेने, अन्तरंग की प्रफुल्लता अनुभव करने का कभी अवसर ही नहीं मिलता। अपराधियों की तरह उनकी आंखें नीची ही रहती हैं। यों मूंछें मरोड़ते तो दुष्ट दुरात्मा भी देखे जाते हैं, पर शान के साथ सिर उठाकर चलना और असंख्यों का श्रद्धा भाजन बनना मात्र सज्जनों के लिए सुरक्षित है। यहाँ एक बात और नोट करने की है कि सज्जनता, शिष्टाचार बरतने या मधुर बोलने तक ही सीमित नहीं है उसके साथ चारित्रिक पवित्रता और सेवा साधना स्तर की उदारता का भी समावेश रखना आवश्यक होता है। ऐसी वास्तविक सज्जनता ही आत्म-संतोष देने और जन-साधारण से स्नेह सहयोग खींच लेने में समर्थ होती है। संकीर्ण स्वार्थपरता में यही सबसे बड़ा दोष है कि अपने साथ उच्चस्तरीय सज्जनता के पैर ही नहीं टिकने देती। जिस पर सवार होती है उसकी नकेल पकड़कर भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण की कंटीली राह पर ही चलने के लिए विवश करती है। इस विवशता के रहते कोई न ऊँचा उठ सकता है और न आगे बढ़ सकता है। टोकरी में बन्द पड़े टमाटर की तरह स्वयं भी तेजी से गलता है और जिन्हें छूता है उन्हें भी अपने साथ-साथ ही गलाता चलता है। इस प्रकार स्वार्थ साधन प्रत्यक्षतः लाभदायक दीखते हुए परोक्षतः हानि ही हानि करता चला जाता है।
मानवी प्रगति एकाकी प्रयत्नों से नहीं बन पड़ती। प्रगति तो दूर निर्वाह तक का हित साधन नहीं जुटता। कौन है जो जीवन की सभी आवश्यकताएँ स्वयं पूरी करले, अभीष्ट वस्तुएँ स्वयं ही उपार्जित करले। अन्न, वस्त्र, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, वाहन जैसी दैनिक आवश्यकताएँ भी अन्य लोगों के श्रम सहयोग से ही उपलब्ध कर सकना सम्भव होता है। गृहस्थी जमाने के लिए पत्नी की आवश्यकता होती है। वह भी किसी उदारमना ने कन्यादान करके दी होती है। आजीविका उपार्जन का तारतम्य तय बैठता है जब श्रमिकों का- ग्राहकों को सहयोग मिले। कोई पूँजी या नौकरी प्रदान करे। यह सब साधन कोई जन्म से साथ लेकर नहीं आता। समाज से ही उपलब्ध करता है। अभिभावक स्वतंत्र सज्जन उन्हें उदारतापूर्वक देते हैं और बाजार में उन्हें आदान-प्रदान के आधार पर उपलब्ध किया जाता है। जब सामान्य जीवन तक बिना जन सहयोग के नहीं चलता तो उच्चस्तरीय अभ्युदय के लिए तो उसके बिना काम नहीं चलता। महामानवों में से हर किसी को इसी राह पर चलना पड़ा है कि चरित्र निष्ठा और सेवा साधना के आधार पर अपनी गरिमा सिद्ध करें और बदले में जन सहयोग के सहारे ऊँचे उठें। सच्चा और सार्थक जन समर्थन ही महामानवों के उच्च पद पर प्रतिष्ठित कराता रहा है। तलवार के बल पर तो मात्र दैत्य ही आतंक जमाते और लूट-खसोट करते देखे गये हैं। इतने पर भी वे सद्गुणों के अभाव में न तो सुरक्षित रख पाते हैं और न उपयुक्त उपयोग कर सकने के कारण उसके सहारे कुछ सुख-चैन ही पाते हैं। इस समूची वस्तुस्थिति का पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष तक पहुँचना पड़ता है कि चिरस्थायी, महत्वपूर्ण और वजनदार प्रगति के लिए जन सम्मान और सहयोग अर्जित किया जाय। इस कमाई का एक ही सुनिश्चित उपचार है। अपनी प्रमाणिकता का परिचय देना। इसकी तीन कसौटियाँ हैं। एक चिन्तन की उत्कृष्टता, दूसरी चरित्रगत- आदर्शवादिता, तीसरी- व्यवहार में उदार आत्मीयता। इन प्रश्न-पत्रों को हल किए बिना किसी को भी इतना प्रामाणिक नहीं माना जा सकता कि जन समुदाय उसके सम्मुख श्रद्धा से मस्तक झुकाये, भावभरी श्रद्धांजलि चढ़ाये और कन्धों पर बिठाकर ऊँचा उठाये।
कौशल और वैभव का चमत्कार दिखाकर चकाचौंध भर उत्पन्न किया जा सकता है। उस कौतुक कौतूहल पर लोग तालियाँ भी बजा सकते हैं। अचम्भा देखने के लिए जमघट भी लगा सकते हैं पर जब प्रश्न श्रद्धा और सहयोग का आता है तो उठकर चले जाते हैं। नाटक अभिनय और सरकस के कारीगर कलाकार अपने नट विद्या के कारण आकर्षण के केन्द्र तो बनते हैं पर उनमें से किसी को भी उच्च पदासीन नहीं किया जाता। लाल बहादुर शास्त्री जैसे प्रामाणिक व्यक्तित्व ही लोक श्रद्धा अर्जित करते और बिना धन लुटाये, षड़यंत्र बनाये उच्चतम पद प्राप्त करते हैं। गान्धी, बुद्ध, लिंकन जैसों की व्यक्तिगत विशिष्टता ही उन्हें मूर्धन्य बनाती रही है। यह विशिष्टता और कुछ नहीं चरित्र और व्यवहार ने आदर्शों का सघन समावेश रहना भर है। महान व्यक्तित्व में सत्प्रवृत्तियां अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती हैं। दूरदर्शी सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए जो स्वार्थ सिद्धि की जो रूपरेखा बनाई जाती है उसी को परमार्थ कहते हैं।
बीज गलकर घाटे में रहा या नफे में। इसका उत्तर तात्कालिक और दूरगामी परिणामों की कसौटी पर कस कर ही दिया जा सकता है। बीज अच्छा-खासा, गोल-मटोल, चमकदार, वजनदार था। बोये जाने पर वह सड़ गल गया इसमें प्रत्यक्षतः हानि ही दृष्टिगोचर होती है। किन्तु जब इस पूँजी नियोजन के दूरगामी परिणामों पर विचार किया जाता है तो दूसरे ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। बीज राई भर आकार का था। एक सप्ताह से भी कम समय में वह कई गुने आकार वाला अंकुर बन गया। महीना पूरा भी न होने पाया था कि पत्र पल्लवों से लदा पौधा बन गया। समय बीतते देर न लगी कि उसने आश्चर्यजनक ऊँचाई तक प्रगति कर ली और फल फूलों से लद गया। एक ही फसल में सैकड़ों हजारों फल लगे और उनमें से प्रत्येक में कई-कई बीज थे। एक बीज ने गलकर यदि एक ही फसल में अपने सदृश हजारों बीज कमा लिए और हर फसल में उतनी ही उपलब्धि हस्तगत होते रहने का सिलसिला जमा लिया तो उस दूरदर्शी परिणति को देखकर यही कहा जायेगा कि बीज ने गलने की हिम्मत जुटाकर बुद्धिमता ही दिखाई। वह घाटे में नहीं रहा जैसा कि बोये जाते समय प्रतीत होता था। स्वार्थ और परमार्थ की बुराई अच्छाई इसी आधार पर परखी जानी चाहिए। एक है जो तत्काल लाभ तो देता है, पर बदले में भविष्य को अन्धकारमय बना देता है, दूसरा है जो आरम्भ में संयम बरतने और उदार बनने की कसौटी प्रस्तुत करता है, किन्तु साथ ही सही सिद्ध होने पर खरे सोने की तरह उचित मूल्य तथा सम्मान मिलता है। कसौटी से बचने पर तो खरे-खोटे दोनों का गुड़-गोबर हो जाता है। काँच और हीरा एक जैसा दीखता है।
मैत्री, श्रद्धा, प्रशंसा, आत्मीयता, सद्भावना, सहायता जैसी विभूतियों को भी यदि उपलब्धि माना जा सके। और उनके बदले अनेक कष्टों से बचने और अनेक अभ्युदयों का सुयोग बनने की बात यदि समझ में आ सके तो फिर उन्हें लूटने की नहीं खरीदने की ही बात सोचनी चाहिए। लूटने के लिए प्रपंच भी रचे जा सकते हैं। इस धूर्तता के जमाने में ऐसा ही होता भी रहता है। धर्मात्मा, सदाचारी, योगी, तपस्वी, पराक्रमी, देशभक्त, सिद्ध पुरुष के रूप में दृष्टिगोचर होने के लिए लोग कई प्रकार के प्रदर्शन, पाखण्ड रचते रहते हैं। सभा सम्मेलनों में मंच पर बैठने वाला झटकने और प्रशंसा कराने और अपने को तीस मारखां होने की डींग हाँकने की विडम्बना अब आम फहम बात हो गई है। उस फिराव में कितने ही लोग रहते हैं और इस आडम्बर को खड़ा करने में कुछ तो जेब से भी खर्च करते हैं। किन्तु देखा जाता है कि इससे कुछ नहीं बनता नहीं। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी में इतनी गिरह की अवल होती है कि वे छद्म को ताड़ सके और विडम्बना को पर्दा उठाकर देख सकें। कइयों का बहरूपियापन अनजान लोगों के बीच कुछ समय काम भी दे जाता है किन्तु मुखौटा तो मुखौटा ठहरा। पीतल के बर्तन पर चढ़ी हुई चाँदी की कलई कुछ दिन ठहरती है और असलियत प्रकट होने पर बहुत दे नहीं लगती। घटिया को बढ़िया बताने वाले कभी-कभी तो किसी-किसी पर हाथ साफ भी कर लेते हैं किन्तु भेद खुलते ही ऐसी धुनाई होती है कि सिर पर पैर रखकर भागना पड़ता है और किसी नई जगह जाल बिछाना पड़ता है। चिड़ीमार धन्धे की तरह लोक श्रद्धा बटोरने के लिए विशिष्टता की छद्म प्रवंचना इस स्तर का लाभ नहीं दे सकता, जिसके सहारे कि कोई प्रगाढ़ विश्वास प्राप्त कर सके। चिरस्थायी एवं गहरा जन सम्मान और सहयोग अर्जित करने के लिए सच्चे अर्थों में सज्जनता अपनानी पड़ती है। इसका उपाय मात्र एक ही है- अपने सम्बन्ध में कड़ाई बरतना और दूसरों के साथ उदारता का परिचय देना।
जिस चौराहे पर मनुष्य खड़ा है, उसकी सड़क दो दिशाओं में जाती है। एक शरीरगत तात्कालिक लाभों के आकर्षणों से सजी हुई जिसमें विलासिता, तृष्णा और अहन्ता की गठरी सिर पर लादकर चलना पड़ता है। अनुदार, निष्ठुरता, अपनानी और ‘मतलब से मतलब’ रखने की नीति अपनानी पड़ती है। उसका आरम्भ आकर्षक और अन्त भयावह है। चौराहे से दूसरी सड़क चलती है- आरम्भ में अपने को कसने के उपरान्त दूरगामी सत्परिणामों के लक्ष्य तक पहुँचाने वाली। इन्हीं में से एक को स्वार्थ या नरक कहते हैं और दूसरी को परमार्थ या स्वर्ग कहा जाता है। बात जादू के खेल जैसी है, जिसमें भ्रमवश कुछ का कुछ दीखता है। उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए जब लोहा भट्टी में प्रवेश कर सकता है, जननी को प्रसव पीड़ा सहने और छाती का दूध निचोड़ने में आपत्ति नहीं होती तो जिन्हें समझदारों जैसी सूझ-बूझ उपलब्ध है, वे भी बचत करने, बैंक में डालने और हर पाँच वर्ष में पूँजी दूनी करते-करते बीस-तीस वर्षं में हजार को लाख बना लेने वाली नीति अपनाते हैं। परमार्थ में थोड़ा-सा लगाकर स्वार्थ सिद्धि का ऐसा लाभ दिलाते हैं जिस पर गर्व किया जा सके।
बाजार में कोई भी वस्तु मुफ्त नहीं मिलती। सभी को कीमत चुकानी पड़ती है, यदि प्रगाढ़ मित्रता और सघन सहकारिता अर्जित करने में किसी को कमाई एवं भलाई दीखती हो तो उसे लूटने, झपटने की चतुरता बरतने से काम न चलेगा। वरन् सही मूल्य पर सही वस्तु खरीदने की नीति अपनानी पड़ेगी। यह कार्य परमार्थ की पूँजी लगाकर ही सम्भव हो सकता है। स्वार्थी के पास कितनी ही सुविधाएँ क्यों न हों उससे कभी भी किसी को सघन आत्मीयता का रसास्वादन करने जैसा सुयोग मिलता नहीं। निष्ठुरता और उद्दण्डता अपनाकर जिनके लिए कमाई की गई थी वे कुटुम्बी तक उनके प्रति आन्तरिक सद्भावना नहीं रखते। मतलब सिद्ध होने में कमी पड़ने पर आंखें बदलने लगते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि स्वार्थ परायण वस्तुतः किसी का सगा नहीं होगा। तथाकथित अपनों का भी नहीं- मित्र, कुटुम्बियों का भी नहीं। इस निकृष्टता से अवगत रहने के कारण ऐसे लोगों को अपनों द्वारा भी बारम्बार ठगा, दबाया और सताया जाता है। उन्हें हमेशा हरेक से यही शिकायत रहती है कि दुनिया स्वार्थियों से भरी है और जेब काटने फिरती है।
वस्तुतः ऐसा होता नहीं। यह दुनिया का एक बड़ा दर्पण है जिसमें हम अपना ही स्वरूप देखते हैं। यह संसार एक पोला गुम्बज है जिसमें अपनी ही आवाज प्रतिध्वनि बनकर गूँजती रहती है। हम यदि स्वार्थी हैं तो उसी प्रकृति के लोगों से घिरे रहेंगे और उनसे जिस प्रकार के व्यवहार की सम्भावना रहती है वैसा ही कुछ भुगतते रहेंगे। परमार्थ का चुम्बकत्व सज्जनता को खींच डालता है वह अपने लिए एक ऐसे संसार, समुदाय एवं वातावरण की रचना करता है जिसके सहारे सुख-शान्ति और प्रगति प्रसन्नता का अनुभव हर घड़ी होता रहे।
दूरदर्शी सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए स्वार्थ सिद्धि की जो रूपरेखा बनाई जाती है, उसी को परमार्थ कहते हैं। स्वार्थ शब्द घटिया नहीं है, उसका प्रयोग घटिया ढंग से होने के कारण यह बदनाम हुआ है। अपनी भलाई जब अवाँछनीय उपार्जन और उपयोग तक बढ़ जाती है तब हेय एवं अनैतिक कहलाती है। वस्तुतः परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ है।
जो इसे समझता है, वह जीवन की रीति-नीति कुछ इस प्रकार बनाता है कि स्वयं का हित साधन करते हुए भी समाज सेवा का प्रयोजन पूरा होता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। श्वेतकेतु ब्रह्म विद्या जानने के लिए बहुत दिन से गुरु गृह में निवास कर रहे थे। पर अभीष्ट अनुदान उन्हें नहीं मिला।
गुरु की निष्ठुरता से खिन्न होकर एक दिन आश्रम की यज्ञाग्नि ने कहा- तुम पर दया आती है। गुरु का पल्ला छोड़ो वे जब तक लौटकर आवें तब तक मैं ही तुम्हें ब्रह्म विद्या बताऊँगी। श्वेतकेतु ने अग्निदेव के अनुग्रह का बड़ा उपकार माना। साथ ही अत्यन्त विनम्रतापूर्वक बोले। सेवा किये बिना आपसे जो अनुदान मिलेगा, वह बिना मूल्य मिलने के कारण फलेगा कहाँ?
पात्रता विकसित किए बिना तो उपहार हाथ लगेगा वह टिकेगा कहाँ? अग्निदेव लज्जित होकर अन्तर्ध्यान हो गये। अपनी श्वेतकेतु ने गुरु सेवा करके अपनी पात्रता परिपक्व की और नियत समय पर अभीष्ट अनुदान लेकर वापस लौटे।
भावना और क्रिया में से व्यक्ति या कृत्य की कैसे परख की जाय? यह विचारशीलों के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न है। जिनकी बाहर की आँखें खुली हैं भीतर की बन्द हैं। वे मात्र क्रिया के अनुरूप कार्य और व्यक्ति का मूल्याँकन करते हैं, पर जो गहराई तक प्रवेश कर सकते हैं जिनके ज्ञान चक्षु खुले हैं वे भावनाओं के स्तर को परखते हैं और इसी आधार पर श्रेष्ठ निकृष्ट की परख करते हैं।
होना यह चाहिए कि भीतर और बाहर का स्तर एक हो। जो बाहर से पुण्यशील है सत्कर्म परायण है उसे उसी प्रकार का भावनाशील भी होना चाहिए। जो दुष्कर्म करता है उसकी भावना भी वैसी ही होनी चाहिए ताकि व्यक्ति और कार्य की यथार्थता परखने में किसी को कठिनाई न पड़े।
किन्तु समय विचित्र है इसमें भीतर और बाहर के स्तर में भारी अन्तर दिखाई पड़ता है। अस्तु साधारण समझ के लिए बड़ा कठिन पड़ता है कि किसे पुण्यात्मा माने किसे दुरात्मा। विशेषतया कठिनाई तब और भी अधिक बढ़ती है जब भीतर के दुरात्मा बाहर से पुण्यात्मा का कलेवर धारण करते हैं।
अनाथालय, गौशाला, विधवा आश्रम आदि पुण्य कर्मों का वो सकून बोर्ड लगाकर जब उनकी आड़ में धन का अपहरण और दुराचार करते हैं तब अजनबी व्यक्ति के लिए वास्तविकता का पता लगाना कठिन पड़ता है। जब भेद खुलता है तब बड़ा दुःख होता है। देश भक्ति के नारे लगाने वाले जब अपने असली रूप में प्रकट होते हैं तो भले लोगों पर भी विश्वास करना कठिन हो जाता है। विशेषतया सार्वजनिक जीवन में लोक सेवा का आवरण पहनने वाले जब कपट मुनि के रूप में छद्म ओढ़े दीखते हैं तब आश्चर्य होता है। धर्मोपदेशक, साधु का आवरण पहने हुए लोग उलटा व्यवहार करते दीखते हैं। तो क्रिया और भावना का अन्तर जाँचना आवश्यक हो जाता है। असमंजस होता है कि किस पर विश्वास किया जाये, किस पर नहीं।
ऐसे छद्म प्रसंगों में तो भावना की जाँच पड़ताल नितान्त आवश्यक हो जाती है। कई व्यक्ति भोलेपन में क्रिया को ही सब कुछ मान बैठते हैं और भावना का महत्व समझने की आवश्यकता नहीं समझते। विशेषतया यह भूल हार्दिक कर्मकाण्डों के सम्बन्ध में होती है। लोग पूजा पाठ के लोकाचार मात्र से यह समझ बैठते हैं कि भगत भक्ति का प्रयोजन पूरा हो गया। जप, पाठ, कीर्तन भर के बाह्य कृत्यों से यह सन्तोष कर लेते हैं कि देवता की प्रसन्नता अर्जित कर ली। मन्दिरों में देव दर्शन, नदी सरोवरों में स्नान, ब्रह्मभोज आदि के क्रिया-कृत्यों से अपनी धर्म श्रद्धा पूर्ण कर लेते हैं। यह परख नहीं करते कि हमारी भावनाएँ कितनी गहरी या उथली हैं।
वेदान्त इस दिशा में सही दिशा देते हुए हर साधक को उपयुक्त अनुशासन के अधीन अपने को रखने का अनुरोध करता है। कठोपनिषद् का निर्देश है- “दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्म दर्शिभिः”- अर्थात् “जो सूक्ष्म सत्य देख सकते हैं, उनके एकाग्र मन अवश्य आत्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं, ऐसे मन जिन्हें सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधा गया है।” लेकिन होता यह है कि ऐसे सूक्ष्मदर्शी एकाग्र मन वाले अनुशासित व्यक्ति सामान्य जन समुदाय में मिलते नहीं। हमारा परिकर धर्म भीरु, भावुक किन्तु विवेकहीन व्यक्तियों का एक समुदाय है, जो कर्मकाण्ड को ही सब कुछ मानते व उसमें अनाप-शनाप खर्च करते हैं। वे धर्म-अध्यात्म के इस तत्वदर्शन को नहीं समझ नहीं पाते कि वास्तविकता है क्या? उन्हें धर्म के ठेकेदार महन्त-कथा वाचक गण जो उपदेश देते हैं, उसमें भी क्रिया-कृत्यों की प्रधानता होती है। वे मुक्ति से लेकर स्वर्ग प्राप्ति, पितरों को दान से लेकर पर्व-त्यौहारों के माहात्म्य के लिए भी तरह-तरह के विधि विधान बताते हुए अपना उल्लू तो सीधा करते देखे जाते हैं। किन्तु धर्म के नाम पर शोषण करते हुए, उन्हें यह नहीं समझ में आता कि उनका यह कृत्य कितना घातक है।
जन साधारण तो तत्वदर्शन समझता नहीं, कर्मकाण्ड करके यही मानकर चलता है कि उसे जो आश्वासन दिया जा रहा है, पूरा हुआ। स्वर्ग के टिकट के नाम पर दिग्भ्रान्त एवं गरीब जनता को भावनाओं से खेलना आसान है, इसे धर्माचार्य भली-भाँति जानते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा ही मूढ़ तब का धनिक समुदाय में भी मिलता है। ऐसे लोग जिनके पास पैसा है वे कोई भी खर्चीला धर्मकृत्य कर सकते हैं और सर्वसाधारण की तथा अपनी निज की आँखों में अपनी गणना पुण्यात्माओं में कर लेते हैं। भले ही वह पैसा अनीतिपूर्वक ही क्यों न कमाया हो। वह प्रदर्शन लोगों की दृष्टि में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाकर उसका लाभ प्रकारान्तर से अन्य प्रकार उठाते हैं। इस प्रकार धर्म कृत्य भी एक प्रकार से व्यवसाय बन जाते हैं। जो लगाया है उसे ब्याज समेत कमा लेते हैं।
कई व्यक्ति सार्वजनिक संस्थाओं धार्मिक संस्थानों के सदस्य या पदाधिकारी इसलिए बनते हैं कि लोगों में अपनी प्रतिष्ठा लोक सेवियों की तरह होने लगे। इस ख्याति को वे अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए प्रयुक्त करते हैं। संस्थाओं में जितना समय लगाया था उसकी तुलना में प्रकट या परोक्ष रूप से- उचित या अनुचित रूप से अधिक लाभ उठा लेते हैं।
भेद खुलने से पूर्व तक सामान्य लोग भी भ्रम में रहते हैं। विचित्र बात यह है कि ऐसे धर्म कलेवर वाले स्वयं को भी भ्रम में रखे रहते हैं। विशेषतया धार्मिक कर्मकांडों के कर्त्ता यह समझते रहते हैं कि जनता के सामने तो भेद खुल सकता है, पर देवता इतने अनजान हैं कि उन्हें भावना में कोई सम्बन्ध नहीं। कर्मकाण्ड ही उनके लिए सब कुछ है।
इस असमंजस का स्पष्टीकरण गीताकार ने किया है- “देवान् भावता नेक” देवता अर्थात् पुण्य कर्म भावनाओं पर निर्भर हैं। कर्त्ता की भावनाओं का जैसा स्तर होगा उसी हिसाब से उसके पुण्य कर्म का फल होगा। यदि भावना रहित क्रिया होगी तो उसे प्रदर्शन मात्र कहा जायेगा और वह प्रदर्शन भी बहुत समय तक अपनी यथार्थता को छिपाये न रहेगा। वास्तविकता देर-सबेर में प्रकट होती है। तब वह पुण्य कर्म न करने से भी महंगी पड़ती है। छद्म का आवरण खुलने पर उसका उपहास और तिरस्कार होता है।
गीताकार ने इसीलिए भावना की महत्ता को स्पष्ट किया है। जिनके पास धन नहीं है वे कोई बड़ा आडम्बर नहीं कर सकते तो भी उनकी भावना उच्चस्तरीय रहने पर किया गया यह स्वल्प कृत्य भी विशाल आयोजनों से बढ़कर होता है। देशभक्ति के बड़े नारे लगाने और बड़े नेता बनने की अपेक्षा छोटे स्वयं सेवक के रूप में बिना ख्याति का श्रमदान करते रहने पर सम्मान भी प्रदान करता है और श्रेय भी।
भावना उच्चस्तरीय हो पुण्य कृत्य बनेंगे ही। यह हो सकता है कि धन पास में न होने से कोई बड़ा स्वरूप खड़ा न हो। नेता बनने का अवसर न मिले। धर्मकृत्य का कोई प्रदर्शन न बन पड़े, पर इससे क्या अपनी आत्मा सत्यता और भावनाशीलता के आधार पर प्रसन्न तथा बलिष्ठ रहेगी। यश न मिले तो श्रेय अवश्य मिलेगा। भावना प्राण है और क्रिया कलेवर। मात्र कलेवर हो और प्राण न हो तो उसका कोई महत्व नहीं रह जाता, यह सुनिश्चित समझा जाना चाहिए।
भलाई करने की गरिमा तभी बनती है जब उसके साथ प्रतिफल का पुरस्कार पाने या प्रशंसा सुनने की दुर्बलता छिपी न हो। इन्हें चाहने पर भलाई का पुण्य भी चला जाता है और दूरगामी प्रतिफल उत्पन्न करने वाला लाभ भी हाथ नहीं आता। न चाहने वालों को इनसे वंचित नहीं रहना पड़ता वरन् धकेलने पर भी पीछे दौड़ते हैं।
शरीर क्या है? इसकी कितनी ही व्याख्याएँ हो सकती हैं। प्रत्यक्षतः यह मल-मूत्र की गठरी है। श्वास स्वेद आदि के द्वारा हर घड़ी दुर्गन्ध बाहर निकलती रहती है। इसे हर घड़ी स्वच्छ न रखा जाये तो थोड़े समय में ही इस गन्दगी के अम्बार लग जाते हैं। बीमार पड़ने की नौबत आ जाती है। दूसरों को समीप बिठाने या बैठने में घृणा लगने लगती है।
दूसरे अर्थों में इसे देखा जाय तो वह भगवान का सर्वोपरि उपहार है। इससे बहुमूल्य वस्तु जीवधारी को देने के लिए उनके पास और कोई है ही नहीं। यह स्वर्ग नसैनी है और वैतरणी की मझधार में डुबोने वाली नाव भी। सदुपयोग करने पर मनुष्य महामानव, देवता या ऋषि बन सकता है। दुरुपयोग करने पर प्रेत, पिशाच, दैत्य, दानव बन सकता है। नासमझों के लिए यह इतना भारी शकट है जिसे घसीटना दुष्कर पड़ता है। सुयोग्यों के लिए यह पुष्पक विमान है जिस पर बैठकर लोक-लोकान्तरों की सैर करते हुए ब्रह्मलोक तक जाया जा सकता है।
मनुष्य शरीर की प्रशंसा में कहा जाय तो बहुत कुछ कहा जा सकता है। इसका दृश्य कलेवर उन पाँच तत्वों से मिल कर बना है जिन्हें पाँच देवता कहते हैं। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी तथा आकाश। इन देवताओं की देवपूजन के पुण्य प्रयोजन में सर्वप्रथम पूजा होती है। इन्हीं से सारा संसार बना है। इन्हीं से प्राणियों, वनस्पतियों और पदार्थों की संरचना हुई है। इसी से इन्हें सृष्टि का कर्त्ता कहा गया है। यह पांचों मानव शरीर में प्रत्यक्ष उपस्थित हैं। इसलिए इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है।
मानवी चेतना की संरचना पाँच प्राणों से हुई है। इन्हें तत्व देवताओं में उच्च श्रेणी का कहा गया है। इन देवताओं के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं।
सदा भवानी दाहिनी, सम्मुख रहे गणेश। पाँच देव रक्षा करें, ब्रह्मा, विष्णु, महेश ॥
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भवानी और गणेश यह पाँच प्राण हैं। जीव चेतना का निर्माण संचालन इन्हीं के द्वारा होता है। पाँच तत्व और पाँच प्राण मिलकर दस देवता हुए। इन सभी को मिलाकर दश दिग्पाल भी कहा जाता है। यह मानव काया की श्रेष्ठता हुई। सूक्ष्म शरीर में कुण्डलिनी, सहस्रार, ब्रह्मरन्ध्र, षट्चक्र, ज्ञानेन्द्रियाँ, उपत्यिकाएँ बताई गई हैं। यह शक्तियों की, सम्पदाओं विभूतियों की भाण्डागार हैं। जब तक यह प्रसुप्त स्थिति में है तब मृतक मूर्च्छित मानी गई हैं। किन्तु जब यह जागृत हो जाती हैं तब इनके चमत्कार वरदान देखते ही बनते हैं। इनमें से जो जिन्हें सिद्ध कर लेता है वह उतना ही बड़ा सिद्ध पुरुष बन जाता है। साथ ही यह भी कि जो दुर्व्यवहार द्वारा जिसे जितना क्रुद्ध कर देता है उसके देवता भी उतने ही अधिक क्रुद्ध हो जाते हैं और इस क्रोध के कारण मनुष्य स्वयं दुःख पाता है, बदनाम होता है तथा दूसरों को दुःख देने, गिराने की दृष्टि से पशु पिशाच एवं दैत्य दानवों की गणना में गिना जाता है। हर हालत में मानवी सत्ता असाधारण है यह मनुष्य के अपने हाथ की बात है कि इन्हें जिस भी प्रयोजन में चाहें व्यवहार करे। उत्थान या पतन में से जो जिसे भी चुनना चाहे, चुन सकता है। इस रूप में भगवान का वरदान इतना बड़ा मिला है कि अपने सौभाग्य और भगवान के अनुग्रह को जितना भी सराहा जाय उतना ही कम है।
काय कलेवर में सन्निहित देवताओं में से इन पंक्तियों में एक की चर्चा विशेष रूप से की जा रही है। इसका नाम है ‘वाक्’ देवता। बोलचाल की भाषा में इसे जिव्हा कहते हैं। ज्ञानेन्द्रियों की गणना करते समय इसे रसना और वाणी दो की संख्या में गिना जाता है। यह इसका दुहरा उपभोग है जबकि अन्य इन्द्रियों का एक-एक प्रयोजन ही गिना जाता है। जिव्हा अर्थात् भोजन का प्रयोजन पूरा करने वाले- स्वादेन्द्रिय- रसना। दूसरा बोलचाल में काम आने वाली वाक्- वाणी।
अध्यात्म शास्त्रों में जिव्हा को सरस्वती कहा गया है। विशुद्ध होने पर जब यह बोलती है तो अपने लिए वशीकरण मन्त्र का काम देती है। जो भी इसके परिष्कृत वचन सुनता है- वशीभूत हो जाता है। इसके स्वर सरस्वती की वीणा के समान हैं, जो अपने को भी और दूसरों को भी मन्त्र मुग्ध कर देते हैं। साथ ही ज्ञान की वर्षा भी करते हैं। सरस्वती ज्ञान के वरदान देती है। यह परिष्कृत जिव्हा का काम है कि जो भी संपर्क में आवे। जो भी अमृत वचनों को सुनें वह श्रेय पथ पर चले, उत्कर्ष की प्रेरणा प्राप्त करे।
धन्वन्तरि का अमृत कलश जिव्हा में सन्निहित है। यह सौम्य, सात्विक, सीमित आहार करती है तो स्वास्थ्य के सुरक्षित रखने का उत्तरदायित्व निभाती है। जिसकी जिव्हा वश में है, उसका स्वास्थ्य बिगड़ने जैसा कोई भय नहीं है। प्रत्येक प्राणी अपना आहार ताजे हरे रूप में उदरस्थ करता है। पकाने की पाक विधा विषवत् मानकर उससे दूर रहता है। ऐसा तो कोई भी जीवधारी इस पृथ्वी पर नहीं जो अपने आहार में मिर्च, मसाले, खटाई, मिठाई चीजें बाहर से मिलाता हो। तलता, पकाता, भूनता हो। जिव्हा को चटोरी बना देने पर ही वह नशेबाजों की तरह अभक्ष्य माँगने लगती है। उसकी टेव न बिगाड़ी जाय तो फल, शाक या अंकुरित धान्य उसके लिए समुचित पुष्टाई प्रदान करते हैं। न पेट को खराब होने देते हैं और न अपच के कारण सड़न उत्पन्न होने- पाचन तन्त्र खराब होने और बीमारियों का सिलसिला चल पड़ने जैसा अनर्थ नियोजित करते हैं।
यदि पाश्चात्य विकासवाद को ही सही मान लिया जाय तो मनुष्य बन्दर की जाति का है। बन्दर न कभी मसालों की माँग करता है और न तलने भूनने का अनर्थ करता है। फलस्वरूप जो भी रूखा सूखा प्राकृतिक आहार मिल जाता है, उसी के बलबूते कुदकता-फुदकता फिरता है। मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु पाक विधा है। यदि वह उसे भुला दे तो स्वास्थ्य की दृष्टि से नव जीवन प्राप्त करे। जिस प्रकार नशेबाज की आदत बिगाड़ देने, तरह-तरह के स्वाद माँगने का चटोरापन अपनाने के कारण ही मनुष्य दुर्बलता, बीमारी तथा अकाल मृत्यु का ग्रास बनता है। जिव्हा की आदत-बिगाड़ देना उसके साथ अत्याचार करना है।
इसी प्रकार वाणी की बात है। उससे नम्रता, विनय शीलता, सज्जनता और मिठास भरे वचन बोले जाय तो कलह का प्रश्न ही न उठे। आये दिन के झगड़े झंझट खड़े न हों। लड़ाई-झगड़े के पीछे वास्तविक कारण तो बहुत कम होते हैं। जो होते हैं, वे समझदारी भरे विचार विनिमय से आसानी से सुलझाए जा सकते हैं। कलह का प्रधान कारण कटु भाषण ही है। अपना अहंकार जताना और दूसरे का सम्मान गिराना, यही वह कारण है जिसके कारण मनुष्य दूसरों की दृष्टि में गिरता है और कोप का भाजन बनता है।
कटु वचन विष वृक्ष की तरह है जिस पर बिच्छू के डंक जैसे काँटे लगते हैं। छाया में बैठने से खुजली मचती है और फल-फूल प्राण घातक ही होते हैं। निर्दोष होते हुए भी कटुवचन बोलने वाले को ही सब लोग दोषी ठहराते हैं। उसके साथ कोई सहानुभूति नहीं बरतता।
वाणी का गुण एकमात्र मिठास ही नहीं यह भी है कि जो कहा जाय सच्चाई और भलाई से जुड़ा हो। झूठे, छलयुक्त, दूसरों को गलत सलाह देने वाले और पतन के मार्ग पर धकेलने वाले वचन मीठे होते हुए भी त्याज्य हैं। वाणी को सरस्वती कहा गया है। उसकी झंकार सितार जैसी, कला मोर जैसी होनी चाहिए। साथ ही जो कहा जाय सार्थक, ऊँचा उठाने वाला और यथार्थता युक्त होना चाहिए। गपबाजी, दिल्लगीबाजी, मखौल जैसे दुर्गुण वाणी में नहीं मिलने चाहिए।
जिस प्रकार अन्य देवताओं की साधना करके उनसे वरदान प्राप्त किए जाते हैं उसी प्रकार सरस्वती की प्रतिनिधि जिव्हा से भी सात्विक अस्वाद भोजन की और मधुर हितकारी वचन बोलने की साधना करनी चाहिए। जो ऐसी साधना कर लेते हैं वे उसका प्रत्यक्ष वरदान प्राप्त कर लेते हैं। यही बात शरीर में अवस्थित अन्य देवताओं की साधना के सम्बन्ध में भी है।
काया को बलिष्ठ बनाने हेतु जिस प्रकार सन्तुलित पोषण की आवश्यकता पड़ती है, ठीक उसी प्रकार मानवी अन्तःकरण को प्रखर परिष्कृत करने के लिए, नित्य आत्मिक पोषण देते रहने के लिए उपासना अनिवार्य है। बिना श्रद्धा-विश्वास के उपासना का आधार नहीं बन पाता। श्रद्धा अर्थात् सिद्धान्त निष्ठा- श्रेष्ठता से असीम एकात्मता। इस मूल आधार को लेकर की जाने वाली उपासना फलवती होती है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र की क्यों न हो? भौतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त व्यक्तियों से पूछा जाए तो उसके मूल में उनके कुछ गिने-चुने आदर्शवादी सिद्धान्तों से लगाव को ही धुरी के रूप में देखा जा सकता है। आत्मिक जगत तो और भी अनूठा परब्रह्म की परोक्ष सत्ता का एक अभिव्यक्त रूप है। मनुष्य को जब कार्य-कलेवर का चोला ओढ़कर जन्मना पड़ा तो उसे दैवी चेतना से तादात्म्य स्थापित करने के लिए कोई न कोई माध्यम तो बनाना ही होगा।
उपासना विज्ञान में जीव-ब्रह्म के मिलन में सहायक “बफर” की भूमिका निभाने के रूप में प्रतीकों की चर्चा की जाती है। साकारोपासना को महत्व देने वाले अपनी श्रद्धा को दृढ़ आधार देने के लिए किसी न किसी प्रतीक को, चित्र अथवा मूर्ति को एक अनिवार्य माध्यम मानते हैं। जबकि एक दूसरा वर्ग ऐसा है जो स्वयं को किसी सीमा से, प्रतीक की परिधि से आबद्ध नहीं रखना चाहता। वह बिना किसी माध्यम के व्यष्टि एवं समष्टि चेतना का एकीकरण चाहता है। इन्हें निकारोपासना का समर्थक कहा जाता है।
धर्म-दर्शन के क्षेत्र में बहुधा ऐसी भ्रान्तियाँ बहुसंख्य व्यक्तियों द्वारा समय-समय पर फैल भी जाती रही हैं जिनसे उपासना का स्वरूप क्या हो, उस निराकार ब्रह्म से संपर्क स्थापित करने का माध्यम क्या बने, यह स्पष्ट नहीं हो पाता। हिन्दू धर्म में अनेकानेक मत प्रचलित हैं। कोई देवी की शक्ति के रूप में, देवता की चित्र अथवा मूर्ति के रूप में, परब्रह्म को वेदान्त के निर्धारणानुसार सोऽहम् के रूप में, कोई सविता के तेज के रूप में, अग्नि आदि देवता उनके प्रतीकों के रूप में देखता व अपने भाव चित्र तद्नुसार बनाता है। अन्यान्य धर्मावलम्बी भी किसी न किसी अवलम्बन का आश्रय लेते देखे जाते हैं। वस्तुतः ये सभी जो निराकार की उपासना का समर्थन करते हैं, उन्हें भी साकार माध्यमों को किसी न किसी रूप में अपनाना पड़ता है। हमारे अपने ही आर्य समाजी बन्धु स्वर्णिम सविता को, वेद भगवान को मानते हैं, जो प्रकारान्तर से एक माध्यम प्रतीक ही तो हैं। ईसाई क्रूस का, मुसलमान काबा का, एवं पारसी बन्धु अग्नि का ध्यान करते देखे जाते हैं। यह भी वस्तुतः साकार ध्यान का ही प्रतीक है। नास्तिक समझे जाने वाले, धर्म को अफीम की गोली कहने वाले साम्यवादी भी मार्क्स, लेनिन की कब्रों पर पुष्प चढ़ाते एवं अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति करते हैं। अपने से बड़ों का अभिवादन, महापुरुषों के चित्रों- सद्ग्रन्थों के प्रति श्रद्धा का होना भी एक प्रकार की उपासना है।
इस सम्बन्ध में जो बुत परस्ती, मूर्ति पूजा इत्यादि के वितण्डावादी तर्क खड़े करते हैं उन्हें जानना होगा कि परब्रह्म तो कण-कण में संव्याप्त है। उस सत्ता से संपर्क बनाने हेतु माध्यम कुछ भी बना लिया जाए, लक्ष्य तो एक ही है। किसी स्थान विशेष के लिए रवाना होने से पूर्व यदि वाहन मार्ग दिशा का निर्धारण न करें तो दिग्भ्रान्त होना स्वाभाविक है। पहले ही कुतर्कों के जाल में उलझ गए तो एक कदम बढ़ना भी कठिन है। मनोवैज्ञानिकों का यह कथन है कि मानव मस्तिष्क की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह दृश्य अवलम्बनों के बिना कुछ भी मौलिक परिकल्पना नहीं कर सकता। बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए बच्चों के प्रारम्भिक शिक्षण में चित्र की भाषा का प्रयोग अनिवार्य बताया है। दिए जा रहे शिक्षण का चित्रों से सीधा सम्बन्ध न होते हुए भी अभीष्ट प्रयोजन में यह प्रक्रिया विशेष रूप से सहायक सिद्ध होती है। अक्षर ज्ञान कराने में सुगमता होती है। आगे चलकर उच्च कक्षाओं में उस प्रतीक अवलम्बन की आवश्यकता नहीं रह जाती।
उपासना क्षेत्र में प्रतीक आधारों का लगभग यही मनोविज्ञान है। ईश्वरीय सत्ता निराकार है पर हर साकार घटक में वह समायी हुई है। जीवात्मा की अभिव्यक्ति शरीर से होती है। परमात्मा की जड़ चेतन घटकों से युक्त इस विशाल ब्रह्मांड के रूप में सतत् अभिव्यक्ति होती रहती है। उसकी अनुभूति के लिए साकार घटकों से जुड़ना तथा अपना भाव परक सम्बन्ध स्थापित कर उसे सशक्त बनाना आवश्यक है।
प्राचीनकाल के मनीषीगण मानव मनोविज्ञान से भली-भाँति परिचित थे। वे यह भी जानते थे कि मनुष्य के मन की रचना बड़ी बेढब है। दृश्य आधारों के बिना उसकी एकाग्रता बन नहीं सकती। मात्र शुष्क तत्वदर्शन के आधार पर वह विराट् सत्ता को न तो समझ ही सकता, न ही संपर्क स्थापित कर सकता है। ये ही अवरोध प्रतीक उपासना, साकार उपासना के आविष्कारक बने। शक्तियों के प्रतीक विभिन्न देवी-देवताओं का आविर्भाव इसी कारण हुआ। साकार माध्यमों की उपयोगिता इसलिए भी है कि चंचल मन न तो निराकार ब्रह्म की कल्पना कर सकता है, न ही एकाग्र चित्त ही हो सकता है। उसे दृश्य अवलम्बन देना आवश्यक है। साकार प्रतिमा में इष्ट की छवि देखने तथा उसमें अपनी श्रद्धा को सतत् आरोपित करते रहने पर वह और भी परिपुष्ट होती है। भावनाओं के आरोपण से वह साकार प्रतिमा भी जीवन्त हो उठती तथा रामकृष्ण परमहंस की काली, मीरा के शालीग्राम की तरह अपने अनुदानों की वर्षा करने लगती है। प्रतीक किसको चुना गया? साकार उपासना के लिए किसे आधार बनाया गया? ये प्रश्न उतने महत्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि किस स्तर की श्रद्धा भावना का अभिसिंचन किया गया।
एक ही प्रतिमा साधना क्षेत्र में किसी के लिए चमत्कारी सिद्ध हो जाती है और किसी के लिए मात्र पाषाण की आकृति भर लगती है, इसका कारण क्या है? अन्तर श्रद्धा भावना के स्तर में सहज ही खोजा जा सकता है। एकलव्य मिट्टी की मूर्ति को गुरु के रूप में प्रतिष्ठापना करके वह अनुदान प्राप्त करने में सफल हो गया जो शरीर धारी गुरु द्रोणाचार्य के अत्यन्त निकट रहकर भी पाण्डव बन्धु नहीं प्राप्त कर सके थे। यह प्रतिमा में आरोपित सघन श्रद्धा का ही चमत्कार था। जिस राम की उपासना से तुलसीदास महान बने, जिस कृष्ण की आराधना से सूर ने अपने जीवन को सफल बनाया, उन राम और कृष्ण की मूर्तियाँ- चित्र आज भी विद्यमान हैं पर तथाकथित उपासकों, भक्तों के लिए वे कुछ विशेष करामाती नहीं सिद्ध हो पाती। इस विरोधाभास से उन्हें असमंजस हो सकता है जो स्थूल तक ही सीमित रहते हैं। तत्वदर्शी यह जानते हैं कि एक ही तरह की उपासना के प्रतिफलों में अन्तःश्रद्धा का होना न होना ही महत्वपूर्ण है। अपनी निष्काम सघन श्रद्धा के अनुरूप ही साकार उपासना के परिणाम प्रकट होते हैं।
साधना में प्रगति के लिए किसी देवी अथवा देवता को इष्ट बनाया जाय, यह प्रश्न अधिकाँश नये साधक करते हैं। अपनी अभिरुचि एवं प्रकृति के अनुरूप कोई भी माध्यम चुना जा सकता है। पर यह पक्ष उतना महत्वपूर्ण नहीं है। प्रश्न यह उठना चाहिए कि किस स्तर की श्रद्धा का आरोपण आत्मिक प्रगति में सहायक होगा? इसके उत्तर में जो जितनी गहराई तक प्रवेश करेगा उसे उसी अनुपात में आगे बढ़ने के लिए जीवन्त एवं सशक्त आधार मिलेंगे।
साकार अवलम्बन इसलिए भी आवश्यक है कि उनके बिना विश्वात्मा की सजीव अनुभूति सम्भव नहीं है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का मन्त्र रटते रहना आसान है पर अन्तःकरण में उसकी अनुभूति तभी सम्भव है जब मनुष्य मात्र से, प्राणी मात्र से स्नेह सद्भाव का सघन सम्बन्ध हो। आत्मीयता सिद्धान्तों तक सीमित न रहकर सरस सम्वेदना बनकर अन्तःकरण से फूट पड़े। सबके कल्याण की भावना जग पड़े। इसके लिए नश्वर को ही मध्यस्थ बनाना पड़ता है।
प्रेम का- करुणा का- वात्सल्य का- आरोपण किस प्रकार हो? निश्चित ही शरीर माध्यम के रूप में आ खड़ा होता है। प्रेम एवं आत्मीयता व्यावहारिक धरातल पर सेवा, त्याग, बलिदान आदि के रूप में प्रकट होते हैं, जिसकी प्रेरणा साकार प्रतिमा के माध्यम से ही मिलती है। अथर्ववेद में ऋषि प्रार्थना करता है-
उदनो दिव्यस्य नो धातकी शानः विढयाः दृतिम्॥
अर्थात्- अहोरात्र के धाता हमारे ईश्वर! तुम इस मूर्ति को अपना शरीर कल्पित करो अर्थात् अपनी प्रतिष्ठापना इस मूर्ति में करो।”
अथर्ववेद में आगे कहा गया है-
“एहि अश्मान याविष्ट आश्या भवतु ते तनुः। कृष्णान्तु विश्वे देवा आयुष्टे शरदः शतम् ॥”
अर्थात्- हे ईश्वर! यहाँ इस पाषाण प्रतिमा में विराजिये, यह पाषाण प्रतिमा आपका शरीर हो। समस्त देवगण इस शरीर को शतायु बनाएँ।
“न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये। देवो हि विद्यते भावे तस्माद् भावो हि कारणम्॥ ( चाणक्य नीति 7।12 )
अर्थात्- देवता लकड़ी में नहीं हैं और न पाषाण अथवा मिट्टी में ही हैं, वह तो उसके अंतर्गत रहस्यमय भाव में हैं, इसलिए यह रहस्यमय भाव ही मूर्ति पूजा का कारण है।
आचार्य शंकर कहते हैं-
मुक्ता अपि लीलया विग्रहादिंक कृत्वा भजन्ते॥
अर्थात्- “जीवन मुक्त पुरुष भी क्रीड़ा रूप में प्रतीकोपासना करते हैं।”
“लार्जर कैटेकिज्म” पुस्तक में सुधारवादी ईसाई सन्त मार्टिन लूथर लिखते हैं कि- “एकमात्र हृदय को आस्था और विश्वास ही प्रतिमा को ईश्वर बना देते हैं या उसे पाषाण टुकड़ा भर रहने देते हैं। यदि तुम्हारी आस्था अविचल तथा विश्वास निष्कपट है तो तुम निश्चित ही प्रतिमा के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने में सफल हो जाओगे। इसके विपरीत यदि तुम्हारी आस्था तथा विश्वास की जड़ें कच्ची हैं तो सच्चे ईश्वर को कभी भी नहीं पा सकोगे, क्योंकि ईश्वर और विश्वास- ये दोनों साथ-साथ चलते हैं।
आक्षेप लगाने वाले कुछ तथाकथित विद्वानों का कहना है कि- “साकार उपासना में मन कभी भी स्थिर नहीं हो सकता, क्योंकि मन प्रतीक के अंग अवयवों में घूमता रहता है।” पर यह आक्षेप विवेकपूर्ण नहीं है। एक सीमित परिधि में घूमने से एकाग्रता समाप्त नहीं हो जाती। एकाग्रता का अर्थ स्थिरता नहीं है। निश्चित दायरे में मन का घूमते रहना उसी में तल्लीन होना भी एकाग्रता है। कवि, साहित्यकार, वैज्ञानिक, मनीषी जैसी प्रतिभाओं की एकाग्रता इसी बात से आँकी जाती है कि अपने-अपने विषयों में वे किस सीमा तक तल्लीन हैं। साधना क्षेत्र में भी इस स्तर की एकाग्रता का बनना अभीष्ट माना जाता है। निर्विचार, निर्विकल्प समाधि की स्थिति इससे ऊँची, काफी आगे की बात है। वह भी इसी मार्ग पर चलते रहने से ही उपलब्ध होती है। अनायास सम्भव नहीं हैं।
साधना क्षेत्र की सारी उपलब्धियाँ इस तथ्य पर निर्भर है कि मन को भटकने से रोककर उद्देश्यपूर्ण उत्कृष्ट चिन्तन में नियोजित कर दिया जाय। यह मनन प्रक्रिया जितनी सघन होगी- भाव श्रद्धा से अभिपूरित होगी, सफलता उसी क्रम से हस्तगत होती चली जायेगी। इसके लिए प्रतिमा को ही अवलम्बन बनाया जाय, अनिवार्य नहीं। सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय भी एक प्रकार से श्रेष्ठ विचारों का सामीप्य पाना- महामानवों के चिन्तन से तादात्म्य स्थापित करना है। मार्ग कोई भी अपनाया जाए, माध्यम कुछ तो बनाना ही पड़ेगा ही- इसे समझना उतना ही अनिवार्य है जितना कि किसी भाषा को समझने के लिए उसकी लिपि एवं बोल-चाल के स्वरूप को सीखना- हृदयंगम करना। श्रेष्ठ चिन्तन यदि किसी भी प्रतीक को माध्यम बनाकर लक्ष्य के प्रति नियोजित कर दिया जाए तो उसकी उपलब्धियाँ निश्चित ही महत्वपूर्ण फलदायी होंगी। यही उपासना का तत्वदर्शन है जिसे अपनाकर साधना क्षेत्र के राज मार्ग पर बढ़ पाना अधिक सरल हो जाता है।
हिन्दू पौराणिक गाथाओं में ऋषि वाल्मीकि का नाम आता है। जो आरम्भिक जीवन में दस्यु कृत्य करते थे, पर पीछे नारद जी के शिक्षा सान्निध्य से उन्होंने दूषित कर्म छोड़ दिये और सच्चे अर्थों में ऋषि बन गये।
मुस्लिम समाज में ऐसा ही एक नाम फजील बिन अयाज का आता है। वे रोजा नमाज में कमी नहीं करते थे। साथियों को भी वैसी ही शिक्षा देते थे, किन्तु पेशा डाका डालने का करते थे। इतने पर भी देख लेते थे कि उस व्यक्ति के पास पैसा खर्च से ज्यादा है या नहीं जिस पर कम होता उसे छोड़ देते माल बटवारे में कभी उन्होंने साथियों के साथ बेईमानी या झगड़ा नहीं किया।
एक दिन एक सरदार अपने काफिले समेत जा रहा था। डाकुओं का अंदेशा देखकर उसने भक्त जैसा लिबास पहने हुए फजील को विश्वास योग्य समझा और अपनी रकम उनके हाथों सौंप दी। कहा- आप रखवाली करके मेरे पैसा बचा देंगे। फजील ने उसका पैसा जमीन में गाड़ दिया। जब खतरा दूर हो गया तो सरदार पहुँचा और अपना पैसा माँगा। फजील ने कहा- जा, जहाँ गाड़ा था वहीं से उखाड़ ले। साथियों ने इस पर आनाकानी की तो उनने कहा- इसने मेरे ऊपर भरोसा किया है। विश्वासघात कैसे करूं।’
एक दिन कुरान की एक आयत फजील ने ध्यानपूर्वक पढ़ी जिसका अर्थ होता था- “क्या ईमान वालों के लिए ऐसा वक्त नहीं आया कि उनका दिल अल्लाह से हटे।”
उस आयत को उनने बार-बार पढ़ा और उस दिन से सच्चे अर्थों में सन्त बन गये। डाका डालना बन्द कर दिया। इसके बाद वे मक्का चले गये और एक सच्चे फकीर की तरह रहने लगे।
एक दिन खलीफा हारूं-अल-रशीद उनसे मिलने आये और प्रार्थना करने लगे “कुछ नसीहत दीजिए।” फजील ने कुछ महत्व की बातें उनसे कहीं। “एक दिन अल्लाह से मैंने प्रार्थना की कि मुझे सरदार बना दें। उसने मुझे इन्द्रियों का सरदार बना दिया।” हारूं रशीद ने कहा कुछ और फरमाइये। फजील ने कहा- “एक दिन मैंने अल्लाह से कहा- मुझे नजात (मुक्ति) चाहिए। अल्लाह ने सीधा रास्ता बता दिया।”
फजील ने कहा- अल्लाह ने कहा- बूढ़ों के साथ मेहरबानी और जवानों तथा बच्चों के साथ नेकी कर। मैंने वही किया और नजात पा गया।
हारून के आगे पूछने पर फजील ने कहा- “अल्लाह ने कहा- खुदा से डर और उसके दरबार में जवाब देने के लिए तैयार रहा मैंने उस दिन से वही रास्ता अपनाया।”
फजील ने कहा- “अल्लाह ने कहा, तेरी जानकारी में कोई गरीब बुढ़िया भूखी सो गयी तो खुदा के दरबार में इंसाफ माँगेगी। उस दिन से मैंने ऐसे गरीबों की तलाश करना शुरू कर दिया और खुद खाना तब खाया जब उसे खिला लिया।”
इसके बाद खलीफा इन सूफी फकीर को कुछ धन देने उठे। फजील ने कहा- मुझे दोजख (नरक ) में डालने का इरादा करता है क्या? इसके बाद खलीफा उठकर चल दिये। चलते वक्त उनने फिर खलीफा से कहा- “जो खुदा से डरता है उसकी जुबान गूंगी रहती है। वह बेकार बातें नहीं कहता और दुनिया वालों से बेकार मुहब्बत नहीं बढ़ाता।”
फजील की दो लड़कियाँ थीं। वे विवाह के योग्य हो गयीं। वे विवाह कर न सके। मरते वक्त उनने कहा- इन लड़कियों को पहाड़ की चोटी पर ले जाना और अल्लाह से कहना- जब तक जिन्दा थे, आपने फजील की रखवाली की अब इन लड़कियों की भी आप ही रखवाली करें। कहते हैं कि एक बादशाह उधर से निकला। उसने फजील की दोनों लड़कियों की शादी अपने शहजादों से कर दी। फजील ने जिस प्रकार अपने जीवन को बदला उसकी मुस्लिम हदीसो में बड़ा विशद विवेचना की गयी है। सच्चे अर्थों में वे मुस्लिम समुदाय के वाल्मीकि थे।
वेदों में मन्त्रों की 20 हजार ऋचाएँ हैं। इन सभी को विभिन्न छन्दों में विभक्त किया गया है। छंद अर्थात् गीत गायन। इन सभी गीतों की सीमा मर्यादा है। कौन किस प्रकार गाया जायेगा, इसका ऋषिगणों द्वारा उसी समय निर्धारण हो गया है, जब इनका सृजन हुआ है। इन्हें लयबद्ध गाया जाना चाहिए। मोटा विभाजन तो उदात्त, अनुदात्त स्वरित के क्रम में हुआ है। मन्त्रों के नीचे, ऊपर आड़ी टेड़ी लकीरें जो लगाई जाती हैं, उनमें उच्चारण के संकेत हैं। लेकिन जब इन्हें स्वर समेत गाना हो तो उनके सरगम, सामवेद में दिए गये हैं। वहाँ अंकों के चिन्ह हैं। वैदिक सरगम का संकेत 1, 2, 3, 4 आदि अंकों में अक्षरों के ऊपर दिया जाता है। यह ध्वनियाँ हैं, जिन पर हिन्दी गीतों को कई-कई तरह से गाया जाता है। इन गाने के ढंगों को सरगम की भिन्नता के हिसाब में अंकित किया जाता है। आगे वाले इन आड़ी-टेड़ी लकीरों के हिसाब से अनुमान लगा लेते हैं और छन्दों की उसी क्रम से गाने लगते हैं। एक छन्द को अनेक ध्वनियों में गाया जा सकता है। इन ध्वनि भिन्नताओं में सरगम के अतिरिक्त आड़ी-टेड़ी लकीरों में संकेत ध्वनि बना देते हैं। इस प्रकार वेद मन्त्रों में जो ऋचा सामगान के रूप में गायी जाती है, तब उनके ऊपर अंक संकेत लगा देते हैं। सामगान की यही परम्परा है। कुछ दिन पूर्ण सामगान की अनेकों शाखाएँ थी, पर अब वे लुप्त हो गई। जो बची हैं मात्र वे ही उपलब्ध हैं।
इसके अतिरिक्त जटा-पाठ, घनपाठ का भी तरीका है। इनमें से कुछ मिलते हैं, कुछ लुप्त हैं। जो मिलते हैं, उनमें से अधिकाँश की श्रुति सम्पदा है। कहना और सुनना अथवा कण्ठस्थ करना वेदों का क्रम था। पर अब इतना परिश्रम लोग करते नहीं। जो लिखित हैं उसी के सहारे गाड़ी चलती है, आगे भी चलती रहेगी।
शुद्ध उच्चारण के लिए कंठस्थ होना विश्वस्त एवं प्रामाणिक है। गायन की दृष्टि से ही यह लयबद्धता नियोजित नहीं की गई, पर उनके अर्थ और प्रतिफल भी भिन्न हो जाते हैं। किस प्रयोजन के लिए किस मन्त्र को किस लय ध्वनि में गाया जाय, इसका अपना अलग शास्त्र है। मन्त्रों के विभिन्न प्रयोजन हैं। मात्र शब्दार्थ तो मोटी बात है। उसे तो निरुक्त, व्याकरण, शब्द कोष के सहारे सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। छन्दों के साथ ऋषि, देवता आदि का भी उल्लेख किया जाता है। इन संकेतों के हिसाब से यह अनुमान लगाया जाता है कि अर्थ किस प्रयोजन के निमित्त किया जायेगा। शब्दार्थों की दृष्टि से एक ही मन्त्र के कई अर्थ भी हो सकते हैं। पर ऋषि को किस प्रसंग का अर्थ अभीष्ट है यह जानने के लिए छन्द ऋषि, देवता का, जो हर मन्त्र के साथ उल्लेख है उसका अवलोकन कर तद्नुसार निर्धारण करना होता है।
मन्त्रों का शब्दार्थ ही सब कुछ नहीं है। यह भी दृष्टव्य है कि ध्वनि प्रवाह के आधार पर इसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? प्रतिफल क्या उत्पन्न होगा?
शब्द का प्रतिफल वार्तालाप में भी भला-बुरा होता है। मीठे और कड़वे वचन अपने-अपने भले-बुरे परिणाम उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार उच्चारण की प्रतिक्रियाएँ शारीरिक, मानसिक, नैतिक, बौद्धिक क्षेत्रों में अपने-अपने ढंग की अलग-अलग होती हैं। इन्हीं को मन्त्र की परिणति कहते हैं। अमुक विधि में अमुक मन्त्र का प्रयोग करने से अमुक रोग का निवारण- अमुक मनोविकारों का शमन होता है। अमुक प्रकार के विचार उठते और अमुक प्रकार की भावनाएँ जन्म लेती हैं। मनुष्य की कई प्रकार की प्रवृत्तियां हैं। जो उसे उत्साहित, निरुत्साहित, आनन्दित, उदासीन बनाती हैं। उन मनोवृत्तियों का प्रभाव जीवन के अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रकार का होता है यही मन्त्र की परिणति है। मन्त्र बल से धन का पिटारा तो किसी को नहीं मिलता पर ऐसी प्रवृत्तियां अवश्य उठती हैं जिनके कारण मनुष्य लाभान्वित होता या घाटा उठाता है।
अदृश्य जगत के अदृश्य प्राणी परोक्ष रूप में कई बार अमुक व्यक्ति से सम्बन्ध बनाकर अच्छी या बुरी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं। इसमें कुछ अनिष्ट कर हो तो उसका शमन- समाधान मन्त्र बल से हो सकता है। ग्रह-नक्षत्रों का अमुक समय में अमुक व्यक्ति पर श्रेष्ठ या निकृष्ट प्रभाव पड़ना बताया जाता है। इसी को दुर्भाग्य या सौभाग्य कहते हैं। इन परिस्थितियों को मंत्र बल से अनुकूल किया जा सकना एवं प्रतिकूलताओं का निवारण भली-भाँति सम्भव है।
मनुष्यों की भाँति यह प्रभाव पशुओं पर भी पड़ता है। कई बार मनुष्यों की तरह पशुओं पर भी परिस्थितियों के अनुकूल-प्रतिकूल प्रभाव होते देखे जाते हैं। वे बीमार हो जाते हैं। सामर्थ्य गँवा बैठते हैं। बीमारी- महामारी के शिकार होते हैं। ऐसे अनिष्टों को मन्त्र बल से निवृत्त करना सम्भव है, ऐसा यांत्रिकों का मत है।
संगीत का प्रभाव वैज्ञानिक अनुसन्धानों से मनुष्यों, पशुओं पर ही नहीं वृक्ष-वनस्पतियों पर भी पड़ते देखा गया है। फसल को अधिक उपजाऊ बनाने, फल-फूल अधिक आने का प्रभाव कितने ही परीक्षणों से देखा गया है। संगीत के ही प्रभाव से गाय अधिक दूध देती देखी गयी है। मुर्गियों अधिक संख्या में और बड़े आकार के अपेक्षाकृत जल्दी अण्डे देती हैं। मछलियों को टेप रिकार्डर पर संगीत सुनाये गये तो उनने अधिक अण्डे बच्चे दिए। मानसिक रोगियों को संगीत सुनाया गया तो वे व्यथा से मुक्त हो गये। बुद्धि वर्धक प्रयोगों के संगीत का उपचार सही सफल सिद्ध हुआ है। जो कार्य साधारण संगीत के फलस्वरूप हो सकता है वह मन्त्र प्रयोगों के विशेष संगीत से और भी अच्छी तरह से हो सकता है। जो लाभ पशुओं, पक्षियों एवं वनस्पतियों को मिल सकता है, वह मनुष्यों को न मिले, ऐसी कोई बात नहीं है।
संगीत का ही एक उत्कृष्ट स्वरूप मन्त्र है। वैज्ञानिक खोजों ने सामान्य संगीत की कितनी ही उपलब्धियाँ हस्तगत की हैं और उसे अनेक क्षेत्रों में प्रभावशाली पाया है। संगीत मात्र मनोरंजन ही नहीं है, वरन् उसमें प्रभावोत्पादक शक्ति भी है।
प्रसिद्ध संगीतकारों में कितने ऐसे हुए हैं, जिनके गायन वादन से बुझे हुए दीपक जल जाते थे। मेघ मल्हार के गायन से बादल बरसने लगते थे। साँप का विष उतारने में भूतोन्माद आदि ठीक करने में विशेष प्रकार के संगीत का तुरन्त विशेष फल तो आज भी देखा जा सकता है। फिर मन्त्रों की शक्ति तो और भी विशेष होनी चाहिए। उसमें तो और भी उच्चस्तरीय संगीत का समावेश है। ऐसी दशा में उसका तो और भी विशेष प्रतिफल होना चाहिए।
मन्त्र शक्ति-शब्द शक्ति का संगीत शक्ति का विकसित रूप है। संगीत की ध्वनि सुनकर मृग मोहित हो जाते हैं। सपेरे साँपों को वशीभूत कर लेते हैं। मन्त्र शक्ति के अनेकानेक चमत्कारी प्रतिफलों के सम्बन्ध में किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
किसी सराय में एक व्यक्ति रात्रि विश्राम के लिए रुका। रात्रि को भोजन करके सो गया। प्रातः अपने गन्तव्य को चल दिया। एक वर्ष बाद वह पुनः सराय मालिक से मिला। मालिक ने आश्चर्य के साथ पूछा- “आप जीवित कैसे?” यात्री ने पूछा- “क्यों क्या बात है?”
सराय मालिक ने कहा- “एक वर्ष पूर्व आप रात्रि को हमारे यहाँ ठहरे थे। उस रात भोजन में एक जहरीला साँप गिर गया था। विषाक्त भोजन करने वाले अन्य पाँच व्यक्ति दूसरे दिन मर गये। पर आज आपको जीवित देखकर मुझे भारी अचरज हुआ। मैं तो आपको मृतक ही मान रहा था।”
वह व्यक्ति यह घटना सुनकर इतना अधिक भयभीत हुआ कि तुरन्त बेहोश होकर जमीन पर गिरा और थोड़ी ही देर बाद हृदय की धड़कन बन्द होने से उसकी मृत्यु हो गयी।
इस दुनिया में न तो कोई पहली बार आया है और न ही उसका अस्तित्व इस बार अन्तिम है। प्रत्येक मनुष्य पिछले कई जन्मों में इसी संसार की यात्रा कर चुका है और उन्हीं गोरख धन्धों में उलझाकर जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त अपना सारा समय व्यतीत कर चुका है, जिनमें कि वह इस समय उलझा हुआ है। इस दृष्टि से संसार के अनुभव न किसी के लिए नए हैं और न ही अपरिचित प्रमाण हैं- पुनर्जन्म के वह वृत्तांत, जिनमें विभिन्न धर्म सम्प्रदायों के व्यक्तियों ने अपने पिछले जन्मों के विवरण बताये जो अक्षरशः सत्य निकले।
भारतीय दर्शन ने पुनर्जन्म को सृष्टि विधान का एक स्वाभाविक क्रम माना है। अन्य धर्म सम्प्रदायों ने भी प्रकारान्तर से मनुष्य के मरणोत्तर अस्तित्व को स्वीकारा है तथा संसार के बुद्धिजीवियों और विचारशील व्यक्ति भी अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि तृष्णा वासना के मोह बन्धन रहते हुए मनुष्य को लौट-लौटकर इसी संसार चक्र में आना पड़ता है। जुलाई 1959 में जबलपुर की एक नौ वर्षीय बालिका का उदाहरण अपने समय में काफी चर्चित रहा है। बोलना, समझना और अपने आप को व्यक्त करने की क्षमता का विकास होते ही यह बालिका अपने पिछले जन्म का विवरण बताने लगी थी। उसका कहना था कि वह पहले (पिछले जन्म में) सिलहट में रही है और उसने बी.ए. तक शिक्षा भी प्राप्त की है। 21 वर्ष की आयु में उसका विवाह भी हो गया था और विवाह के तुरन्त बाद ही एक मोटर दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गयी थी। सिलहट जाकर जब उस बालिका के बताये विवरणों की सच्चाई को जाँचा परखा गया तो एक-एक बात सच निकली।
मृदुला दो वर्ष की थी तभी एक दिन घर में एक मेहमान द्वारा लायी गयी कुछ लीचियाँ देखकर उसे पूर्व जन्म की याद आ गई। उसने अपने माता-पिता को बताया कि वह देहरादून की रहने वाली है। अपने पिछले जन्म के सम्बन्ध में उसने और भी बातें बताईं। पहले तो माता-पिता उसकी बातों को हँसी में टालने लगे, पीछे जब वह बहुत परेशान करने लगी तो वे मृदुला को साथ लेकर देहरादून गये। मृदुला ने ही उन्हें घर तक पहुँचने का मार्ग इशारों से बताया। पिछले जन्म के घर पर पहुँच कर मृदुला एक वृद्ध महिला की गोद में बैठ गई और बोली तुम मेरी छोटी बहन हो।
आश्चर्य व्यक्त करते हुए महिला ने पूछा, ‘यह कैसे हो सकता है?’
मृदुला ने कहा- ‘मैं तुम्हारी बड़ी बहन मुन्नू हूँ। मुन्नू मृदुला के पिछले जन्म का ही नाम था। उसके माता-पिता ने बच्ची के बारे में, जो कुछ वह कहती थी वह सब बताया। सुनकर उस परिवार के लोग हैरान रह गए क्योंकि जो कुछ भी उन लोगों ने बताया वह यथातथ्य सत्य था।
मुन्नू के घर आर्यसमाज के प्रसिद्ध संन्यासी आनन्द स्वामी भी उस समय आया करता थे। मुन्नू का जब देहान्त हुआ तब उन्होंने संन्यास नहीं लिया था। मृदुला को जब बिना कुछ बताए आनन्द स्वामी से मिलाया गया तो उन्हें पहचान कर वह बोली, “अरे! खुशाल चन्द जी! आप तो पहले भी देहरादून आते थे, लेकिन इस वेश भूषा में नहीं। आपको स्वामीजी के रूप में मैं 25-26 वर्ष बाद देख रही हूँ। आप कब से संन्यासी हो गये हैं? उल्लेखनीय है- आनन्द स्वामी का गृहस्थ नाम खुशालचन्द ही था। सब आश्चर्यचकित रह गए। उस घर में एक बूढ़े व्यक्ति ने मुन्नू से दुलार करते हुए पूछा, ‘बिटिया तुमने अपने नौकर को नहीं पहचाना वह वृद्ध व्यक्ति अपनी ओर संकेत कर रहा था। मृदुला उस व्यक्ति के गले में बांहें डालकर झूल गई और बोली “आप क्यों मुझे शर्मिन्दा करने वाला मजाक करते हैं? आप तो मेरे पिता हैं।”
पुनर्जन्म के इस मामले का अध्ययन वर्जीनिया विश्वविद्यालय में परामनोविज्ञान के प्रोफेसर डा. स्टीवेन्सन ने भी किया और उन्होंने इस केस के सम्बन्ध में कहा, यह निश्चित रूप से पुनर्जन्म का मामला है। ऐसे और भी कई देशों से ढेरों मामले मेरे सामने आए हैं। उनका अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि पुनर्जन्म कोरी कल्पना नहीं वरन् एक ध्रुव सत्य है।
मृदुला ने न केवल अपने पूर्व जन्म का बल्कि उसके पहले वाले जन्म का हाल बता कर सबको दंग कर दिया। देहरादून के एक वैश्य परिवार में जन्मी मुन्नू का देहान्त सन् 1945 में हो गया था। तब उसकी आयु 24 वर्ष थी और इसके बाद वह 1949 में नासिक के ब्राह्मण कुल में जन्मी थी। देहरादून में उसका जन्म तीसरा पूर्व जन्म था। उस जन्म में मृदुला ने हिन्दी में एम.ए. किया था और नासिका में जन्म लेने के बाद जबलपुर से राजनीति शास्त्र से एम.ए. किया था।
इस्लाम धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता को स्थान नहीं है। परन्तु ऐसे मामले सर्वप्रथम वहीं प्रकाश में आये थे, जिनसे ज्ञात होता है कि पुनर्जन्म धर्म और सम्प्रदाय की मान्यताओं से अनावद्ध है। तुर्की की एक घटना का उल्लेख करना इस संदर्भ में अप्रासंगिक न होगा। इस घटना की जाँच करते हुए इस्तम्बूल की परामनोविज्ञान तथा वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद् के अध्यक्ष ने कहा था, स्पष्ट ही यह जीवात्मा के देहान्तरण का मामला है, एक शरीर में दो जीवात्माओं की उपस्थिति का नहीं। सन् 1964 के आसपास इस घटना को लेकर तुर्की में व्यापक चर्चा फैली थी। घटना का नायक एक चार साल का बालक था, जिसका नाम था इस्माइल अतलिंकलिक। एक दिन इस्माइल अपने पिता अहमद की गोदी में बैठा खेल रहा था। तभी उधर से एक फेरी वाला निकला इस्माइल ने फेरी वाले को देखते ही आवाज दी। पिता ने समझा कि उसका बेटा शायद कुछ खरीदना चाहता है। लेकिन फेरी वाले को उसके पिता को यह देखकर हैरानी हुई, जब इस्माइल ने महमूद उसका नाम लेकर कहा, अरे महमूद! तुमने अपना धन्धा कब से बदल दिया? तुम तो पहले साग-सब्जी बेचा करते थे न।’
इस फेरी वाले का नाम था महमूद। एक चार साल के बच्चे के मुंह से अपना नाम सुनकर वह दंग रह गया और इस्माइल का मुँह ताकने लगा। उस समय तो उसकी हैरानी का और भी कोई ठिकाना नहीं रहा, जब उसने कहा, ‘मुझे भूल गए महमूद मियाँ? याद करो मैं आबिद हूँ, आबिद! जिससे तुम सब्जी खरीदा करते थे। कुछ याद आया!’
अपने बेटे के मुँह से यह बातें सुनकर पिता को भी कुछ कम आश्चर्य नहीं हुआ, फेरी वाले ने तभी अपने आपको सम्हाल कर कहा, ‘यह क्या कह रहे हैं आप? आबिद का कत्ल हुए तो छह साल बीतने को आए।’ यह सुनकर इस्माइल ने कहा, तो क्या हुआ? मैं आबिद नहीं हो सकता? मैंने फिर जन्म ले लिया है।” इसके बाद इस्माइल ने अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत बताना शुरू किया तो अड़ोस-पड़ोस के लोगों तक ही नहीं धीरे-धीरे बात पूरे शहर में फैल गई। आबिद तुर्की के ही अदना शहर का रहने वाला था और छह वर्ष पूर्व उसकी हत्या कर दी गयी थी।
पिछले जन्म का वृत्तांत बताने की बात जैसे ही पत्र प्रतिनिधियों तक पहुँची वे महमूद के घर आए और वे इस्माइल को उसके पिता के साथ लेकर अदनानगर पहुँचे। इस्माइल ने ही उन्हें आबिद के घर का पता बताया। घर पहुँचते ही वह जोर से चिल्लाने लगा। आबिद की बेटी गुलशरा ने दरवाजा खोला तो इस्माइल ने उसे देखते ही कहा, ‘‘मेरी बेटी गुलशरा। कैसी हो?’’ फिर वह रसोई की ओर बढ़ गया। वहाँ एक वृद्ध स्त्री खाना पका रही थी। उसकी ओर संकेत करते हुए इस्माइल ने कहा, ‘यह है मेरी पहली बीवी हातिस।’ उसने यह भी बताया कि हातिस के कोई बच्चा न होने पर उसने शाहिरा से शादी कर ली थी जिससे उसके तीन बच्चे हुए थे।
अपनी हत्या के सम्बन्ध में इस्माइल ने जो विवरण दिया, वह आश्चर्यजनक रूप से सच था। वह पत्र प्रतिनिधियों को साथ लेकर अस्तबल में ले गया तथा वहाँ पहुँचकर उसने बताया कि यहीं 31 जनवरी 58 को उसकी हत्या कर दी गई। उसने बताया, हमारा परिवार बड़ा सुखी था। हम लोग हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते थे। एक दिन रमजान और मुस्तफा मेरे पास बिलाल नाम के आदमी को लेकर आये और काम माँगने लगे। मैं साग सब्जियाँ उगाया करता था। मैंने उन लोगों को काम पर रख लिया। क्योंकि मुझे भी आदमियों की जरूरत थी। 31 जनवरी की सुबह को रमजान ने मुझे अस्तबल में बुलाया और कहा कि मेरा घोड़ा कुछ लँगड़ा रहा है। मैं झुककर घोड़े का पैर देखने लगा तभी सिर पर जोर से प्रहार हुआ और उन लोगों ने मुझे मार डाला। यह सारा वाकया मेरी छोटी बीवी शाहिरा तथा जिली और इस्मत (आबिद के बच्चे ) देख रहे थे। कोई चश्मदीद गवाह न छूट जाए, इसलिए उन लोगों ने मेरी बीवी और बच्चों का भी कत्ल कर दिया। किन्तु हत्यारे बच न सके। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और प्राण दण्ड की सजा दी।
पत्र प्रतिनिधियों ने अदना के पुलिस थाने में छह वर्ष पुराने रिकार्ड देखे, उसमें हत्या का ठीक वैसे ही विवरण मिला जैसा इस्माइल ने बताया था।
बदायूँ (उ.प्र.) में कुछ वर्ष पूर्व पुनर्जन्म की एक ऐसी ही विचित्र घटना प्रकाश में आई। वहाँ के एक वैश्य परिवार में जन्मे चार वर्षीय अनिल ने एक दिन अपनी माँ को अचानक भाभी कहकर पुकारा तो माँ ने कहा, भाभी क्यों कहता है रे? मैं तो तुम्हारी माँ हूँ न। अनिल ने कहा, ‘तुम मेरी माँ बाद में हो भाभी पहले। भूल गई मैं तुम्हें लिवाने के लिए सहसवान जा रहा था और तुम मुझे लालाजी कहा करती थीं।’
इसके बाद अनिल ने पूर्व जन्म की घटनाओं पर इस प्रकार प्रकाश डाला जैसे वे घटनाएँ उसी के साथ घटी हो। इस जन्म का अनिल, पिछले जन्म में अपनी माँ का ही देवर था। उसकी आयु 16 वर्ष थी और वह अपने भाई के साथ दुकान पर बैठा करता था। एक दिन उसके बड़े भाई ने कहा कि सहसवान जाकर अपनी भाभी को लिवा ले आए। वह रिक्शे पर बैठकर बस स्टैंड जाने के लिए रवाना हुआ। रिक्शा कुछ दूर ही गया होगा कि एक कार उससे टकरा गई और रिक्शा चूर-चूर हो गया। रिक्शा चालक तथा सवार दोनों की ही इस दुर्घटना में मृत्यु हो गई। इसकी पुष्टि सभी ने की।
पिछले जन्म की घटनाएँ बताने वाले ऐसे सैकड़ों प्रसंग हैं। काश, यह समझा जा सके कि जन्म के रूप में यही एक अवसर अपने पास नहीं मिला है बल्कि पहले भी कई बार हम इस दुनिया में आ चुके हैं तो यह तथ्य आसानी से हृदयंगम किया जा सकता है कि जिन बातों के लिए लोभ, लालच, मोह ममता और तृष्णा वासना के वशीभूत होकर हम मरते खपते रहते हैं, उनके लिए पहले भी मर-खप चुके हैं। तभी कुछ हाथ नहीं लगा तो अब क्या लग सकता है? इस चिन्तन को अपनाया जा सके तो वर्तमान जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में अग्रसर होने की महत्वपूर्ण प्रेरणा तथा उमंग अपने भीतर जगाई जा सकती है।
विजयी सिकन्दर की सेनाएँ एक जंगल के रास्ते से वापस लौट रही थीं। रास्ते में एक पेड़ के नीचे झोपड़ी बनाकर रहने वाले एक अलमस्त फकीर को देखा, जो मस्ती में ढपली बजाने और गीत गाने में निमग्न था। ऐसी अभावग्रस्त परिस्थितियों में इतनी मस्ती देखकर सिकन्दर रुका और उस अलमस्त का परिचय पूछा। उसने कहा- “मैं बादशाह हूँ।” चकित होकर सिकन्दर ने पूछा- भला किस राज्य के बादशाह हो? आपका माल खजाना कहाँ है?
अलमस्त ने कहा- मन को जीतकर बना हुआ बादशाह। इस सारी दुनिया में मेरे बाप परम पिता की ही तो दौलत भरी पड़ी है फिर मैं अलग से छोटा खजाना कहाँ बनाता फिरूं। सिकन्दर को मस्ती का कारण विदित हुआ और उसे सच्ची बादशाहत का उस दिन पहली बार आभास मिला।
असम प्रान्त की एक देहाती बैंक का कर्मचारी था- रामसिंह। भोर की बेला में खेत से घर की ओर आ रहा था कि रास्ते में साँप का एक जोड़ा लिपटा हुआ दीखा। रामसिंह रुककर उनका खेल देखने लगा। सर्पयुग्म को यह सहन न हुआ उसने उचटकर रामसिंह का पैर काट खाया। घर पहुँचते-पहुँचते वह बेहोश हो गया। बेहोश होने से पहले साँप के काटे की घटना उसने घर वालों को बता दी थी।
ऐसी घटनाओं के मामले में सपेरे ही इलाजी समझे जाते हैं। इर्द-गिर्द जो सपेरे थे, उन्हें बुलाया गया। उनमें जो अधिक वयोवृद्ध और अनुभवी थे, उनने इलाज का जिम्मा अपने हाथ में लिया। रामसिंह पूरी तरह बेहोश हो चुका था। हल्की सी साँस और धीमी-सी नब्ज़ चल रही थी। सपेरे का इलाज भी विचित्र था। उसके सिर के सारे बाल मुंड़वाये गये। सिर पर गीली मिट्टी की मोटी परत लगा दी गई। पास की नदी में उसे सीने तक गहरे पानी में खड़ा किया गया। अपने आप वह खड़ा नहीं हो सकता था सो चारों ओर घड़ों को पानी से भरकर उन्हें एक के ऊपर एक रखा गया और ऐसा जुगाड़ बना दिया गया कि वह खड़ा रहे, गिरने न पाए।
चार दिन तक वह खड़ा रहा सिर की मिट्टी सूखने न पाये। इसलिए उसे बार-बार बदला जाता रहा। पांचवें दिन उसने आंखें खोली जम्हाई ली। आशा बँधी कि रामसिंह बच गया। वह बच तो गया पर स्थिति ऐसी थी जैसी गहरे नशे में हो। क्रमशः कुछ खाने पीने लगा। कुछ कहता सुनता भी था। पर स्वस्थ मनुष्य जैसी स्थिति न थी। सपेरे अपना चमत्कार दिखाकर चले गये। अब डाक्टरों की बारी आई। उनने जाँच पड़ताल की और कहा शरीर में अभी भी जहर है। जो उपाय वे कर सकते थे सो किया पर उससे भी नाम मात्र का लाभ हुआ। उन दिनों बंगाल के प्रसिद्ध काँग्रेसी नेता उस क्षेत्र के मशहूर डाक्टर भी थे। उन्हें भी रोगी दिखाया गया। डाक्टर राय ने एक विचित्र बात कही- “इसके शरीर में सर्प की गन्ध है। उसके कारण और भी बहुत से साँप इसके समीप आ सकते हैं। आसपास वालों को नुकसान पहुँचा सकते हैं इसलिए इर्द-गिर्द वालों को सावधान रखा जाये इसे कोई नुकसान न होगा।” मामूली इलाज के अतिरिक्त उनने भी कोई खास बात नहीं कही।
आये दिन साँप आते और रोगी से लिपटते। इसके बाद बिना कुछ अन्य हरकत किये चले जाते। एक दिन बहुत बड़ा अजगर आ गया जो रोगी के वजन से दुगुना भारी था। वह लिपटा भर रहा पर बिना कुछ हानि पहुँचाए वह भी वापस चला गया। डाक्टरों ने एक चेतावनी दी कि यह रोगी किसी को काट न खाये। अन्यथा उसकी मौत भी साँप के काटे के समान हो जायेगी।
रामसिंह धीरे-धीरे अच्छा होने लगा। होशो-हवास की बातें करने लगा। साँपों का आना-जाना कम हो गया पर यह जानने के लिए कि वह सचमुच साँप तो नहीं हो गया है। उसने घर की पालतू बकरी के बच्चे को दाँत से काट भर लिया। देखते-देखते वह जहर से ग्रसित होकर जमीन पर लुढ़क गया और मर गया। अब सब जगह अफवाह फैल गई कि आदमी की शक्ल में रामसिंह साँप हो गया है।
उसके लिए अलग झोपड़ी बना दी गई। भोजन वहीं पहुँचा दिया जाता। साँप उसके पास आते जाते, लिपटे रहते और छोड़कर बिना कुछ हानि पहुंचाये वापस चले जाते। रामसिंह न उनसे डरता न ही लड़ता-झगड़ता। रोटी समय पर मिल जाती। इस प्रकार उसने शेष जिन्दगी के चार वर्ष गुजारे और एक दिन अपनी मौत मर गया। इस इलाके में रामसिंह को साँप का भूत कहा जाता था। सृष्टि के इस विचित्र विधि-विधान का उत्तर किसी के पास नहीं था।
परिस्थितियाँ किसी को मजबूत या कमजोर नहीं बनाती। वरन् वे तो सिर्फ यह सिद्ध करती हैं कि वस्तुतः वह था क्या?
विद्वान, लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक, व्यवसायी, उद्योगपति, राजनेता आदि के रूप में मनुष्य का बाह्य स्वरूप उसके चेतन मस्तिष्क की चमत्कृति भर है। भौतिक जगत में इन विभूतियों की सामर्थ्य से हर कोई परिचित है। परन्तु इससे परे अचेतन मस्तिष्क का भी अस्तित्व है, जिसे रहस्यों का पिटारा कहा जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों ने भी इस बात को स्वीकारा है कि अचेतन मस्तिष्क चेतन मस्तिष्क से कहीं अधिक रहस्यपूर्ण और विलक्षण क्षमताओं से सम्पन्न है। इन्हें अभी जाना नहीं जा सका, न इनके कारणों का विश्लेषण सम्भव हो पाया है।
जैसा कि सुविदित है, अचेतन मस्तिष्क की सामर्थ्यों का मात्र सात प्रतिशत ही अब तक मनोवैज्ञानिकों को ज्ञात है। उनके अनुसार यह कहा जाता है कि अभिरुचि, प्रकृति, सीखा हुआ स्वभाव और चिरसंचित आदतों की मूलभूमि अचेतन मस्तिष्क ही है। पर मनोवैज्ञानिकों ने इसे संसार का सर्वाधिक रहस्यमय, अद्भुत तथा शक्तिशाली यन्त्र बताया है तथा यह कहा है कि यदि इसके गूढ़तम अविज्ञात रहस्यों को प्रकट किया जा सका तो उस मनःशक्ति के सहारे संसार की आज की तुलना में हजार गुनी अधिक प्रगति सम्भव हो सकेगी। व्यक्ति की मनःशक्ति के सहारे ही वह कार्य सम्भव हो सकेगा जो आज याँत्रिकी के द्वारा किया जाता है। इसे वैज्ञानिक साइकोसाइबर्नेटिक्स विधा नाम देते हैं।
अतींद्रिय विद्या के ज्ञाताओं ने अपने अनुभवों के आधार पर बताया है कि प्रायः चेतन मस्तिष्क में उथल-पुथल मची रहने के कारण हमें अचेतन मस्तिष्क की सामर्थ्यों का बोध भी नहीं हो पाता है। समुद्र में ऊपर तो तरंगें नजर आती हैं लेकिन उनके विकराल रूप से न घबराकर गहराई में डुबकी लगाकर जाने वाले गोताखोर बहुमूल्य रत्नराशि खोज निकालते हैं जो जानकारी के अभाव में समुद्र तल में पड़ी रहती है। लगभग यही स्थिति मस्तिष्क की है। उसका उपयोग तो हम कर भी नहीं पाते। परन्तु चेतन मस्तिष्क को शाँत व नियन्त्रित किया जा सके तो अचेतन मस्तिष्क की जागृति हो सकती है तथा उसकी विलक्षण विभूतियों से लाभान्वित होने का अवसर हमें मिल सकता है। अभी जो कुछ भी ई.ई.जी. द्वारा ज्ञात किया जा सका है, वह चेतन मस्तिष्क का विद्युत तरंग प्रवाह मात्र है। इसे मस्तिष्कीय विद्युत का 13 प्रतिशत भाग माना जाता है।
आमतौर से दैनिक जीवन में शब्द, ध्वनि और दृश्य का बोध हमारा चेतन मस्तिष्क ही करता है। परन्तु कभी ऐसा भी अवसर आता है जब चेतन मस्तिष्क को इसका बोध नहीं हो पाता है। ऐसी स्थिति चेतन मस्तिष्क की सामर्थ्य से परे की ध्वनि या दृश्य प्रकट होने अथवा उसके सुषुप्तावस्था में होने पर उत्पन्न होती है। इस अवस्था में अचेतन मस्तिष्क जागृत रहता है। उसे ही शब्द, ध्वनि अथवा दृश्य का गहरा बोध होता है। तथा उसका प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। साथ ही इस माध्यम से मानसोपचार भी सम्भव हो सकता है।
प्रयोगकर्ताओं के एक दल द्वारा 1977 के ग्रीष्म काल में फोर्टली- न्यूजर्सी के ग्राहकों को एक प्रोजेक्टर के माध्यम से ‘लावा खाओ और कोका-कोला पीओ’ का सन्देश प्रत्येक पाँच सेकेंड पर पूरे फिल्म के दौरान प्रेषित किया गया। चेतन मस्तिष्क के लिए यह सन्देश उतना महत्वपूर्ण नहीं था परन्तु अचेतन मस्तिष्क में यह अत्यन्त विस्मयकारी परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हुआ। शीघ्र ही बाजार में लावा की बिक्री में 5.75 प्रतिशत तथा कोका कोला में 38 प्रतिशत की वृद्धि आँकी गई।
लुइसियॉना विश्व विद्यालय के मेडिकल इलेक्ट्रानिक्स के वैज्ञानिक डा. हॉल ब्रेंकर ने अपने इस तरह के प्रयोग के लिए “टैकिस्टोस्कोपीक प्रोजेक्शन” नामक उपकरण का विकास किया है। उनने अपने रोगियों के ऊपर “आई एम ऑनेस्ट, आइ विल नॉट स्टील। इट इज रांग टू स्टील। इफ आइ स्टील आइ विल गैट कॉट।” ( मैं ईमानदार हूँ, मैं चोरी नहीं करूंगा। चोरी करना पाप है। यदि मैंने चोरी की, तो पकड़ा जाऊँगा।” ) का सन्देश सम्प्रेषित करवाया। परिणाम स्वरूप रोगियों के व्यवहार में अभूतपूर्व अनुभव किये गये। इसे स्वसम्मोहन प्रक्रिया कही जाय अथवा अचेतन का प्रशिक्षण, वस्तुतः यह आध्यात्म प्रयोगों की क्रिया पद्धति की ही एक अनुकृति है।
मिशिगन विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक हॉवर्ड शेवरीन ने अचेतन रूप में प्राप्त विभिन्न सन्देशों का मस्तिष्कीय तरंगों के ऊपर प्रभाव का अध्ययन एक संवेदनशील ई.ई.जी. मशीन से किया। ब्रूकलीन कॉलेज के मनोवैज्ञानिक मैथ्यू इरडेली ने भी ऐसे सन्देशों के पुनः आवर्तन का प्रयोग अनेक रोगियों के ऊपर सम्भाषण तथा दिवा स्वप्न के दौरान किया है। उक्त दोनों ही प्रयोगों से अचेतन मस्तिष्क की क्षमताओं की यथार्थता प्रामाणित की जा सकी है। ई.ई.जी. उपकरण से डी.सी. पोटेन्सियल ज्ञात कर बायोफीड बैक द्वारा विधेयात्मक परामर्श बार-बार विद्युत तरंगों के रूप में देने का प्रयास अब किया जा रहा है, जिसकी सफलता बताती है कि योग साधनाओं में अचेतन मस्तिष्क का नियन्त्रण सुनियोजन कितना तर्क सम्मत व वैज्ञानिक है।
न्यूयार्क विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक लॉयड सिल्वरमैन ने “मम्मी एण्ड आइ आर वन” (माँ और मैं एक हैं) का सन्देश कई रोगियों को नित्य पाँच मिनट सम्प्रेषित किया। स्क्रीन के ऊपर यह सन्देश इतनी तीव्रता से दिखाया जा रहा था कि चेतन मस्तिष्क के ऊपर उसका कोई प्रभाव नहीं होता परन्तु ऐसे दस वर्ष के प्रयोग का प्रतिफल शरीर का वजन कम करके मनोविकारों से मुक्ति दिलाने, मद्य-धूम्रपान की आदत छुड़ाने तथा पढ़ाई में अच्छी प्रगति करने के रूप में दृष्टिगोचर हुआ है। 1975 में किए गये एक प्रयोग में 30 महिलाओं का मोटापा घट गया एवं वे तनावमुक्त भी हुईं। 1979 में मोन्टाना विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों ने सिल्वरमैन प्रणाली अपनाकर कितनों को इसी प्रकार का सन्देश दे-देकर सिगरेट पीना छुड़वाया।
अपने प्रयोग-प्रतिफलों को देखकर सिल्वरमैन ने उन लोगों को चुनौती दी है, जिनने फ्रायड के अचेतन मस्तिष्क की प्रभाव क्षमता से सम्बन्धित सिद्धान्त को एक कल्पना बताया है, कोई आविष्कार या प्राप्ति नहीं। दूसरी तरफ वेसिलयन विश्वविद्यालय के डा. नाथन ब्रोडी ने अपनी ‘एनुअल रिव्यु ऑफ साइकोलॉजी 1980’ नामक पुस्तिका में तो अचेतन मस्तिष्क को मनोविश्लेषण प्रक्रिया में अत्यन्त सहायक बताया। उनका कथन है कि “फ्रायड के मनोविज्ञान के एकाँगी पक्ष यौन प्रवृत्ति को ही उभारा गया जबकि अचेतन सम्बन्धी उनका मत अपने विधेयात्मक रूप में काफी हद तक सही भी ठहराया जा सकता है। उभारा उसे जाना चाहिए था जिससे व्यक्तित्व का विकास होता है न कि उसे जिससे कुण्ठाएँ पनपती हों।”
प्राचीन काल से ही संगीत का उपयोग भी मनःचिकित्सा के लिए इसी रूप में किया जाता रहा है। वैदिक काल में सामवेद की रचना संगीत के मन पर विलक्षण प्रभाव को देखकर ही की कई थी। ऋषियों ने संगीत का प्रयोग अपने ही मन को नियंत्रित करने से लेकर अन्तराल में छिपी ऋद्धि-सिद्धियों के जागरण हेतु किया था तथा महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की थी। ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व ज्यामिती के विद्वान पाइथागोरस ने मनःचिकित्सा में संगीत की उपयोगिता प्रामाणित की थी। सीरिया के एक प्रवक्ता लैम्बलीकस ने कहा था कि मानसिक तनाव तथा आतुरता के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई व्याधियों के उपचार में संगीत की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कैम्पवेल ने अपने प्रयोगों के आधार पर बताया है कि विभिन्न दृश्यों का भी मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उनने कहा कि दृश्यों के आधार पर अवचेतन मस्तिष्क एक विशेष प्रकार की विद्युतीय रसायन प्रक्रिया सम्पन्न करता है, जिससे समस्त शरीर प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
कैम्पवेल ने प्रज्ज्वलित दीपक के समक्ष किसी व्यक्ति को बिठाकर यह प्रामाणित किया कि गहन आनन्द की आवृत्तियां उतने समय में बनती हैं एवं मनुष्य परम शान्ति का अनुभव करता है। त्राटक प्रयोग में वस्तुतः बिन्दु साधना द्वारा यही किया जाता है। एकाग्रता तल्लीनता सम्पादन के साथ-साथ उच्छृंखल विचारों पर नियन्त्रण एक बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अमेरिका के लेसली एम. लीक्रान ने भी प्रयोगोपरान्त प्रज्वलित दीप शिखा का रोगोपचार तथा मनःचिकित्सा में महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध किया है, चर्चों में मोमबत्ती जलाकर उपासना करने एवं पारसियों द्वारा अग्नि पूजा के पीछे यही मनोवैज्ञानिक महत्व है।
भारतीय योग विद्या के आचार्यों ने प्राचीन काल में ही प्रत्याहार, ध्यान-धारणा जैसी प्रक्रियाओं को अपनाकर अचेतन मस्तिष्क को जागृत करने में सफलता अर्जित की थी। इससे उनने दूर-दर्शन, दूर श्रवण, विचार सम्प्रेषण, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्षीकरण आदि कितनी ही अद्भुत क्षमताएँ हस्तगत की थीं। बाह्य तथा अंतर्जगत दोनों ही क्षेत्रों में वे समर्थ एवं सिद्ध साबित होते थे। पुनः उन्हीं प्रक्रियाओं का अवलंबन लेकर आज भी इसकी पुनरावृत्ति सम्भव है। तभी आज का, मन की दृष्टि से दीन-हीन व्यक्ति, अपने अन्तरंग में सन्निहित शक्ति के विशाल भण्डार से परिचित हो सकता है तथा उसका उपयोग करके देवोपम जीवन जी सकता है।
चार स्नातक अपने विषयों में निष्णात होकर साथ-साथ घर वापस लौट रहे थे। चारों को अपनी विद्या पर बहुत गर्व था।
रास्ते में पड़ाव डाला और भोजन बनाने का प्रबन्ध किया, तर्क शास्त्री आटा लेने बाजार गया। लौटा तो सोचने लगा कि पात्र वरिष्ठ है या आटा। तथ्य जानने के लिए उसने बर्तन को उल्टा तो आटा रेत में बिखर गया। कला शास्त्री लकड़ी काटने गया। सुन्दर हरे-भरे वृक्ष पर मुग्ध होकर उसने गीली टहनी को काट लिया।
गीली लकड़ी से जैसे-तैसे चूल्हा जला, थोड़ा चावल जो पास में था उसी को बटलोई में किसी प्रकार पकाया जाने लगा। भात पका तो उसमें से खुद-बुद की आवाज होने लगी। तीसरा पाक शास्त्री उसी का ताना-बाना बुन रहा था।
चौथे ने उबलने पर उठने वाले ‘खुद-बुद’ शब्दों को ध्यानपूर्वक सुना और व्याकरण के हिसाब से इस उच्चारण को गलत बताकर एक डण्डा ही जड़ दिया। भात चूल्हें में फैल गया।
चारों विद्वान भूखे सोने लगे तो पास में पड़े एक ग्रामीण ने अपनी पोटली में नमक सत्तू, निकालकर खिलाया और कहा- पुस्तकीय ज्ञान की तुलना में व्यावहारिक अनुभव का मूल्य अधिक है। मानवी मस्तिष्क में लगभग 10 खरब स्नायु कोष होते हैं। यदि प्रत्येक कोष को गिनने में एक सेकेंड लगे तो भी इन्हें पूर्णरूपेण गिनने में 300 सदी लग सकती हैं।
जैसे-जैसे हम सचमुच ज्ञानवान होते जाते हैं, वैसे-वैसे उदारता बढ़ती जाती है।
वह क्षण निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण रहा होगा, जब मनुष्य ने अपने आपको सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार पाल लिया। क्योंकि इस स्थिति में मनुष्य ने विश्व वसुधा के सृष्टि परिवार के अन्याय प्राणियों को हीन और हेय मान लिया। सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझने की अहंमन्यता मनुष्य में किसी भी कारण से विकसित हुई हो लेकिन यह सत्य है कि उसने अपने इस पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर निरीह प्राणियों का शोषण और मनचाहा उत्पीड़न किया। अपनी अहंमन्यता को उसने संसार के दूसरे प्राणियों पर जिस ढंग से थोपा उसकी प्रतिक्रिया परिणति या कहना चाहिए उसका विकास स्वयं उसके लिए ही उलटा दाँव सिद्ध हुआ है। जो दाँव उसने मनुष्येत्तर प्राणियों पर चलाया था। वह धीरे-धीरे उसके स्वभाव का अंग बन गया और अब वह यही प्रयोग अपनी जाति पर भी अपनाने लगा है। परिणाम यह हो रहा है कि मानवीय सम्वेदना धीरे-धीरे घट रही है तथा वैयक्तिक सुख स्वार्थ के लिए शोषण और अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। इस स्थिति को व्यक्ति-व्यक्ति के बीच, परिवार-परिवार के बीच, जातियों, समुदायों और विभिन्न राष्ट्रों के बीच खींच-तान के रूप में स्पष्ट देखा जा सकता है।
होना यह चाहिए था कि मनुष्य अपनी सर्वश्रेष्ठता की अहंमन्यता नहीं पालता और सभी प्राणियों को जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखता। उनकी अनन्त क्षमताओं से कुछ सीखने का प्रयत्न करता। कदाचित् ऐसा हुआ होता तो स्थिति कुछ और ही होती। वह अपने सहचर पशु-पक्षियों को देखता, यह जानता कि प्रकृति ने उन्हें भी कितने लाड़-दुलार से सजाया सँवारा है तो उसका हृदय और विशाल बनता तथा चेतना का स्तर और ऊँचा उठता।
इस स्थिति में प्रतीत होता कि अभागे कहे जाने वाले इन जीवों को भी प्रकृति से कम नहीं, मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक उपहार ही मिले हैं और वह कई क्षेत्रों में अन्य प्राणियों से पीछे है। उदाहरण के लिए मनुष्य पक्षियों को पक्षियों की तरह अकेले किसी एक ही दिशा में बहुत ऊँचाई तक उड़ने की सामर्थ्य प्राप्त करने में अभी समय लगेगा। वह भी किन्हीं यन्त्रों की मदद से। स्वयं के बलबूते पर तो उसके लिए जमीन से 2-3 फुट ऊपर ऊँचाई पर चलना भी असम्भव है। मनुष्य को गर्व हो सकता है कि वह गगनचुम्बी इमारतें और बड़े-बड़े पुल बाँधने में समर्थ है। किन्तु मधुमक्खियों और चींटियों की कलाकारिता देखी जाए तो उनकी कुशलता के सामने मनुष्य की सारी कलाकारिता धरी रह जायेगी। बीवर जैसा चतुर और कुशल इंजीनियर तो बिना प्रशिक्षण प्राप्त किए अपनी क्षमता का जिस तरह प्रदर्शन करता है, वह मनुष्य के लिए कहाँ सम्भव है?
चींटी अपने भार से सत्तर गुना अधिक भार सहज ही ढो सकती है। इसकी तुलना में मनुष्य का जितना वजन है, उस हिसाब से उसे कम से कम 35 क्विंटल वजन अपने सर या पीठ पर ढो लेना चाहिए पर मनुष्य में उतनी क्षमता कहाँ है? पिस्सू और मेंढक अपनी ऊँचाई से 250 गुना अधिक ऊँचाई तक उछल सकते हैं। मनुष्य में वैसी क्षमता तभी मानी जाएगी जब वह 1375 फीट आसानी से उछल जाए। किन्तु वह तो दस फीट ऊँची दीवार भी नहीं फाँद सकता। मधु-मक्खी छत्ता बनाती है तो जिस डाल पर ऊपर की ओर 20 मधुमक्खियाँ होती हैं उनके नीचे 10000 मक्खियों का सात किलो वजन लटकता रहता है। इस हिसाब से एक मनुष्य की टाँगें पकड़कर 2000 व्यक्तियों को लटक जाना चाहिए। दुनिया का कोई बड़ा से बड़ा पहलवान या जिमनेस्ट भी ऐसा नहीं कर पाने में कहाँ समर्थ होता है?
चील की आंखें जितनी तेज होती हैं, उसी अनुपात में यदि मनुष्य की दृष्टि तीक्ष्ण रही होती तो वह प्लूटो ग्रह पर चल रही गतिविधियों को अपने घर के आँगन में बैठा-बैठा देख सकता था। चमगादड़ जैसे श्रवण शक्ति यदि इंसान को मिल सकी होती तो वह अपनी कोठरी के अन्दर बैठा-बैठा ही धरती के किसी भी हिस्से में बैठे दो व्यक्तियों के बीच चल रही काना-फूसी सुन सकता था। कुत्ते जैसी घ्राण शक्ति यदि मनुष्य को मिल जाती तो वह चाहने पर मंगल ग्रह पर उठ रही अमोनिया गैस को घर में बैठे-बैठे ही सूँघ सकता था। एक तितली दिन भर में जितना उड़ती है उसे लम्बाई में नापा जाए तो वह दस मील दूर तक उड़ लेती है। मनुष्य का भार उसकी तुलना में कई हजार गुना है। तितली के हिसाब से यदि वह उड़े तो उसे एक दिन में अधिक नहीं तो कम से कम पृथ्वी की एक बार तो परिक्रमा कर ही लेना चाहिए। परन्तु ऐसा क्या सम्भव हो पाता है? नहीं न। फिर किस आधार पर मनुष्य यह कह सकता है कि वह सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक विभूतिवान प्राणी है?
ज्ञान और बोध की दृष्टि से भी कई प्राणी मनुष्य की तुलना में बहुत आगे हैं। दीमकों के झुण्ड वर्षा ऋतु आने से पहले एकाएक न जाने कहाँ विलुप्त हो जाते हैं? मकड़ियाँ वर्षा नहीं होती, एवं शुरू होने ही वाली होती है कि अपने जाले समेटने लगती हैं, चींटियां अपनी खाद्यान्न व्यवस्था सुरक्षित करने लगती हैं। असामयिक वृष्टि की सूचना गौरैया मिट्टी में लोट कर, मिट्टी स्नान द्वारा पहले से ही देने लगती है। इस अनुपात से मनुष्य को जैसी सूक्ष्म बुद्धि प्राप्त है, उसके अनुसार तो उसे त्रिकालदर्शी होना चाहिए था पर कितने लोग त्रिकालदर्शी हो पाते हैं? कारण स्पष्ट है कि वह अपनी इन क्षमताओं के विकास की बात तो दूर उन्हें पहचानने और अनुभव करने तक का प्रयास ही नहीं करता, प्रयास भी दूर की बात रही, वह इसकी आवश्यकता ही नहीं समझता।
माननीय काया विलक्षण अद्भुत रसायनों का भण्डार है। हारमोन्स के रूप में अब जिन स्रावों का ज्ञान वैज्ञानिकों और शास्त्रियों को हुआ है, उससे तो पुराण युग की कल्पनाएँ भी साकार सत्य होने जा रही हैं। आकार वृद्धि या संकुचन की दृष्टि से योग शास्त्रों में वर्णित अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ अब कोई असम्भव बात नहीं रही। हारमोन्स के अध्ययन ने इन सम्भावनाओं पर अपनी स्पष्ट मुहर लगा दी है। मनुष्य शरीर परमात्मा का दिया हुआ एक सर्वांगपूर्ण यन्त्र है। किन्तु उसका मनुष्य कितना सदुपयोग कर पाता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। शरीर को मनचाही स्थिति में बदलकर यौगिक क्रियाएँ करने और अपनी शारीरिक क्षमताओं से विशेष लाभ अर्जित करने की सफलता योगीजन ही प्राप्त कर सके हैं, किन्तु प्रकृति के पुत्रों ने मनुष्य को इस क्षेत्र में पीछे छोड़ दिया है और वे योगियों से भी आगे बढ़ गये हैं। अमेरिका के जन्तु शास्त्रियों ने यह पता लगाया है कि कुछ पक्षियों में इस प्रकार की विशेष क्षमता होती है, जिसके द्वारा वे एक क्षण में ही अपनी आँख के लैन्स को दूरदर्शी (टेलिस्कोप) से सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) में बदल लेते हैं। दूर की वस्तु ताड़ने या समीप की छोटी वस्तु को बड़े आकार में करके पहचानने के लिए अपनी इस क्षमता का उपयोग करते हैं।
ईल मछली तो किन्हीं तांत्रिकों या काला जादू जानने वालों की तरह मारण मन्त्र का प्रयोग करती है। वह अपने शिकार को देखकर दूर से ही अपने शरीर को ऐसा तिगनी का नाच नचाती है जैसे डायनेमो चल पड़ा हो और सचमुच इस क्रिया से वह डायनेमो की तरह विद्युत शक्ति उत्पन्न करती है, जिसके प्रभाव से शिकार तत्क्षण मर जाता है और तब वह उसका भक्षण कर लेती है।
कबूतर 55 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से उड़ सकता है पर वह सामान्यतः 40 मील प्रति घण्टे की गति से ही उड़ता है। कई देशों में कबूतर उड़ाने की प्रतियोगिताएँ होती हैं। इसके लिए कबूतरों को और तेज गति से उड़ाने का अभ्यास कराया जाता है। स्पेन में हुई एक प्रतियोगिता में 919 मील की उड़ान एक कबूतर ने कुल तीन घण्टे में पूरी कर ली थी। इसी प्रकार से एक अन्य प्रतियोगिता में एक कबूतर ने 4 घण्टे में ही रोम से डर्बी तक करीब 1000 मील की दूरी तय कर ली थी। अमेरिका के एक कबूतर ने 35 घण्टे में 10010 मील की दूरी तय कर रिकार्ड कायम किया। वहीं के एक अन्य कबूतर ने 43 घण्टे लगातार मैनिटोपा (कनाडा) से अमेरिका के दक्षिणी छोर टैक्सास तक की 2040 मील की दूरी तक बिना रुके आने-जाने का रिकार्ड स्थापित किया। दक्षिण पश्चिम अफ्रीका के ईयाकद्वीप से उड़ाया गया लन्दन के एक कबूतर ने 5500 मील की अनवरत यात्रा 15 घण्टे में पूरी कर सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये। कदाचित् इस तरह की क्षमता मनुष्य को मिल सकी होता तो उसने अंतर्ग्रहीय दूरियों को ताक पर रख दिया होता। तब तो वह धरती पर अपना घर बनाता, चन्द्रमा पर खेती करता और सैर करने के लिए मंगल तथा शुक्र ग्रहों पर उद्यान लगाता। पर हाय रे मनुष्य का भाग्य। वह तो दिन भर में अधिक से अधिक 30 मील ही पैदल चल पाता है। इससे अधिक चलने या दूर की यात्रा तय करने के लिए उसे यन्त्रों का ही सहारा लेना पड़ता है।
उड़ने या तेज गति से यात्रा करने में कबूतर के अलावा भी दूसरे कई पक्षी हैं जो उससे अधिक तीव्र गति से भी उड़ सकते हैं परन्तु कबूतर में विलक्षण परीक्षण बुद्धि और स्मरण शक्ति भी पाई जाती है, जो अन्य प्राणियों में दुर्लभ है। मास्को के एक इंजीनियरिंग कारखाने के कुछ विशेषज्ञों ने उनकी इस अद्भुत क्षमता का उपयोग करने का निश्चय किया। बाल-बियरिंग बनाने वाले उस कारखाने में कुछ खरोंच लगे व चोट खाये बियरिंगों को अलग करने की समस्या थी। कुशल से कुशल कारीगर भी उन्हें छांटने में चूक जाते थे। किन्तु कुछ कबूतरों को कुल तीन दिन की ट्रेनिंग देकर इस काम में लगाया गया तो उन्होंने कुशल कारीगरों को भी मात कर दिया। अब इनमें से प्रत्येक कबूतर एक घण्टे में 3500 बाल-बियरिंग की जाँच कर लेता था। आश्चर्य की बात तो यह है कि उनने जरा भी चूक नहीं की। मनुष्य के मस्तिष्क में न्यूरोन्स कणों की संख्या अरबों-खरबों होती है, जिनमें स्मृति के बीज होते हैं। कबूतरों की तुलना में इस मस्तिष्क का यदि पूर्ण विकास किया जा सके तो संसार में जितने पुस्तकालय हैं, उन सबकी पुस्तकों को एक ही मनुष्य कण्ठस्थ कर सकता है।
मधुमक्खियाँ, बर्रे तथा चींटियां भी स्मरण शक्ति की दृष्टि से अद्वितीय सामर्थ्यवान जीव हैं। इन पर कई प्रयोग करके यह देखा गया है कि उन्हें चाहे जितना भटका दिया जाये, घर पहुँचने में उन्हें जरा भी दिक्कत नहीं होगी। ध्वनि और गन्ध को पहचानने की क्षमता तो इनमें अद्भुत ही कही जा सकती है। जर्मनी में एक विचित्र प्रयोग द्वारा इस तथ्य को प्रमाणित किया गया। इस प्रयोग में टेलीफोन के एक रिसीवर से एक फीट दूर एक मादा झींगुर और एक मादा टिड्डे को रखा गया। वहाँ से बहुत दूर पहले एक नर झींगुर को ट्राँसमीटर के पास रखा गया। जैसे ही उसने ट्रांसमीटर के पास ध्वनि की और वह ध्वनि रिसीवर तक पहुँची, मादा झींगुर अपने स्थान से भागकर रिसीवर में जा घुसी, यद्यपि रिसीवर में उसे अपना प्रेमी नहीं मिला, तो भी उसने अपने प्रेमी की आवाज को पहचानने में भूल नहीं की थी। इस सारे उपक्रम में मादा टिड्डा अपने स्थान पर जमा हुआ था। दुबारा ट्रांसमीटर के पास टिड्डे की ध्वनि कराई गई तो इस बार मादा टिड्डा भागकर आई और उसने यह सिद्ध कर दिया कि वह भी अपने वंश को पहचानने की सूक्ष्म बुद्धि से पूरी तरह ओत-प्रोत है।
जीव-जन्तुओं के इस तरह सुव्यवस्थित, विवेकपूर्ण और सुविकसित जीवन क्रम का लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद सुप्रसिद्ध जीवशास्त्री हेनरी बेस्टन ने बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण समीक्षा करते हुए लिखा है कि प्रकृति से परे कृत्रिम जीवन जीने वाला मनुष्य इन छोटे-छोटे प्रकृति पुत्रों का ज्ञान के चश्मे से देखता, उनकी अपूर्णता पर दया दिखाता और उनकी विवशता पर तरस खाता है, किन्तु यह उनकी छोटी नहीं, जबर्दस्त भूल है। मनुष्य को अपने सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार त्याग देना चाहिए और मनुष्येत्तर प्राणियों के विकसित संसार से कुछ शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
अपने कदम प्रकाश की ओर उठें तो छाया पीछे-पीछे चलेगी। किन्तु यदि छाया को पकड़ने की कोशिश की गई तो वह हाथ आना तो दूर, तेजी से और दूर भागती जाएगी।
प्रख्यात शारीरिक मानसिक रोगों के अतिरिक्त एक विचित्र रोग है ‘वहम’। ऐसे वहमी आदमियों को अंग्रेजी में न्यूरोटिक कहते हैं।
इस सनक के रोगियों को न कोई शारीरिक रोग होता है न मानसिक। शरीर और मस्तिष्क की जाँच पड़ताल करके चिकित्सक हाथ हिलाते हुए इतना ही कहते हैं आपके किसी अंग में कोई रोग नहीं है। किसी बीमारी के लक्षण आप में दिखाई नहीं पड़ते। फिर भी रोगी यही कहता जाता है कि मैं भारी कष्ट से पीड़ित हूँ। डाक्टर की बात पर उसे तनिक भी विश्वास नहीं होता उसे कोई रोग नहीं है।
कभी ज्वर, कभी शिर दर्द, कभी दिल की धड़कन, कभी दम फूलना, कभी घुटन का उन्हें अनुभव होता है। एक से दूसरे डाक्टर पर दौड़ता है। हर जगह एक ही उत्तर मिलता है कि आपके शरीर या मस्तिष्क में कोई विकार मालूम नहीं पड़ता, महज वहम आपको परेशान कर रहा है। दवा के नाम पर वे कहते हैं “वहम की दवा तो लुकमान के पास भी नहीं है आप अपने मन को समझा लें तो ही यह शिकायत दूर हो सकती है।” पर मन तो मन जो ठहरा वह मानता किसकी है। मन को मनाने वाला तो कोई सिद्ध योगी ही हो सकता है।
वहम किसी घटना के साथ जुड़ा होता है। श्मशान या कब्रिस्तान के समीप से निकलते हुए भूत की सम्भावना नजर आती है और लगता है कि वे लोग यहाँ मौजूद हैं और अब तब डराने या हमला करने ही वाले हैं। मन मजबूत हो तो ऐसा कुछ वहाँ नहीं दीखता। किसानों के खेत श्मशान या मरघट के आस-पास होते हैं। रात को हल जोतते रहते हैं। अकेले होते हैं। रात के अन्धेरे में उल्लू बोलते और सियार दौड़ते रहते हैं पर भूत का भय कभी पास भी नहीं फटकता।
अक्सर न्यूरोटिक व्यक्ति किसी घटना के साथ किसी मुसीबत की संगति जोड़ लेना है। धूल भरी आँधी चलने पर उसे लगता है कि आँधी के रेत में दम घुट जायेगा। बादल उमड़ने और गरजने की घटना को देख कर भय लगता है कि बादल ऊपर गिरे और उसके नीचे दबकर मरे। ऐसी घबराहट का एक ही इलाज है कि बन्द कमरे में बैठा जाये और आँधी या बादल को देखना बन्द कर लिया जाय। आँखें बन्द कर लेने पर भी कुछ राहत मिलती है।
एयर कण्डीशन्ड गाड़ी के डिब्बे में बैठने से लगता है कि हवा बन्द हो गई और दम घुटने लगा। ऐसे व्यक्ति हवाई जहाज का सफर नहीं कर सकते। खिड़कियाँ बन्द देखकर लगता है कि साँस लेने का रास्ता बन्द हुआ। ऐसे व्यक्ति रेलगाड़ी में बैठने पर बाहर नजर दौड़ाते ही पेड़, खेत दौड़ते देखते हैं। साथ ही लगता है कि सर घूमने लगा और उल्टी होने वाली है। कभी-कभी तो उलटी हो भी जाती है। पिपरमिंट की गोलियाँ भी काम नहीं देती। इलाज एक ही है कि आंखें बन्द कर ली जायं और पेड़ों के दौड़ने का दृश्य अनदेखा कर दिया जाये।
किन्हीं-किन्हीं को दिल का दौरा पड़ने या पेट का दर्द उठने जैसे तेज अनुभव होते हैं। डाक्टर की जाँच पड़ताल या दवा-दारू कुछ काम नहीं आती, हाँ, जादूगरों की भभूत कभी-कभी वहम की चिकित्सा का काम दे जाती है। बीमारी भूत के दौरे के कारण आरम्भ हुई थी और जादू मन्त्र चला देने से वह दूर हो गई।
अपने देश के पिछड़े इलाकों में अन्धविश्वास बहुत है। साथ ही वहम की बीमारी भी बहुतों में पायी जाती है पाई जाती है। यह छूत के रोग की तरह एक से दूसरे को लगती है। जिस प्रकार आँख दुखती देखकर दूसरे देखने वाले की भी आँख दुखने लगती हैं। एक को उल्टी करते देखकर दूसरे को भी उल्टी आने लगती है। उसी प्रकार वहम की बीमारी भी एक से दूसरे को लगती है और भूत प्रेत के रूप में कइयों की जान का बवाल बन जाती है।
इसका इलाज एक ही है कि वहमग्रस्त व्यक्ति को वहम की व्यथा का वास्तविक स्वरूप समझाया जाय और उसे छोड़ने के लिए समझा-बुझाकर सहमत किया जाय।
अश्लीलता को अनैतिक माना गया है। शरीर के वे अंग जो कामाचार से सम्बन्धित हैं उन्हें निर्वस्त्र न रखने की मर्यादा है। उन पर दृष्टिपात करने से कामुकता भड़कती और उन मर्यादाओं को तोड़ने के लिए मन चलता है जो नर और नारी के बीच शील मर्यादाओं का पुल बाँधें हुए है।
मनुष्यता के साथ कितने ही ऐसे शील जुड़े हुए हैं जो पशु-पक्षियों में कीट पतंगों में नहीं है। उनमें अस्तेय नहीं है। किस वस्तु पर किसका अधिकार है यह ज्ञान उन्हें नहीं होता इसलिए खानपान की वस्तुएँ जिसे जहाँ मिलती है वह वहाँ से हथियाने लगता है। दया, क्षमा, उदारता, कृतज्ञता जैसे गुण भी उनमें नहीं होते। स्वार्थ को तनिक सा आघात लगते ही वे क्रुद्ध होते और लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। इसी प्रकार यौनाचार के सम्बन्ध में कोई मर्यादा उनमें नहीं है। भिन्न लिंग के साथ यौनाचार करने में उन्हें कोई लज्जा, भय, संकोच नहीं होता। किन्तु मनुष्य को वैसी छूट नहीं है। मनुष्य वस्त्र पहनते हैं। विशेषकर कामुकता से संबंधित अवयवों को ढ़ककर रहते हैं। यह मानवोचितशील है। इसकी मर्यादाओं का उल्लंघन करना अश्लीलता कहलाती है, जो हेय मानी गई है।
जननेन्द्रिय, जंघाए, वक्ष, कमर जैसे अवयव देखने से कामोत्तेजना उभरती है और यौनाचार के लिए मन चलता है। इसलिए स्त्रियाँ भी और पुरुष भी इन अंगों को ढक कर रखते हैं। इनके नग्न प्रदर्शन से मनोविकार भड़कते हैं, जो यौनाचार शील पर आघात पहुँचाते हैं।
मानवीय शील के अंतर्गत अपनी वैध धर्मपत्नी या धर्म पति के साथ ही यौनाचार की छूट है। अन्यों के साथ विभिन्न सम्बन्धों की विधा है। स्त्रियाँ अन्य पुरुषों के साथ पिता, भाई या पुत्र के सम्बन्ध रखें इसी प्रकार पुरुषों को नारियों के प्रति माता, बहिन या पुत्री के भाव रखने चाहिए। कामुकता की दृष्टि इन मर्यादाओं को तोड़ती और मानवशील को आघात पहुँचाती है। इसीलिए चोरी जैसे अपराधों में उसे गिना गया है।
यौनाचार की पृष्ठभूमि उन अंगों के नग्न प्रदर्शन से बनती है। जिन्हें देखने या छूने का अधिकार परस्पर पति-पत्नि को ही है। छूने के साथ ही देखने की भी गणना होती है। यह आधार चित्रों तक चला गया है। निर्वस्त्र चित्र, जिनमें कामुकता भड़काने वाले अवयव दिखते हैं अश्लीलता की परिधि में आते हैं और उनका देखना, दिखाना, बेचना, खरीदना दण्डनीय अपराध माना जाता है। यह इसलिए कि इससे ऐसी कामुकता भड़कती है जो नर-नारी के पवित्र एवं वैध सम्बन्धों का उल्लंघन करने के लिए उत्तेजित करती है। यह उत्तेजन दृश्य साधनों से भी हो सकता है एवं श्रव्य साधनों से भी। इन दिनों दोनों ही समाज में खूब प्रचलित हैं। इनका खुला विरोध तो बहुत कम देखा जाता है, किन्तु मौन रूप में उन्हें सुनते-देखते अपनी कामुकता की वृत्ति को पोषण देते अनेकों देखे जा सकते हैं। पतनोन्मुख प्रवाह स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बढ़ता है और इस झोंके में बहुसंख्य व्यक्ति आ जाते हैं। सच्चे साहसी वे होते हैं जो इनसे अप्रभावित हो इनका खुला विरोध करते हैं। औरों को भी आदर्शों के प्रति सहमत करते व स्वयं आगे बढ़ते देखे जाते हैं।
सामान्यतया फिल्मी गीतों, शादी-ब्याह में गाये जाने वाले गानों, लोक गीतों में प्रयुक्त शब्दों की अनदेखी कर दी जाती है। इसी प्रकार कैलेंडरों में देवी-देवताओं के चित्रों में भाव-भंगिमाओं, वस्त्र परिधान आदि भी उत्तेजक बनाये जाते हैं। यह भी अनुचित है। यही कारण है कि अश्लीलता की व्यापक परिभाषा में उत्तेजना प्रदान करने वाले दृश्य एवं श्रव्य उपकरणों की भी गणना होती है।
इस संदर्भ में कई कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसी साज सज्जा अथवा आकृति मुद्रा को क्या कहा जाय जो कामुकता की दृष्टि उत्पन्न करती है। इसका निरूपण करना हो तो किसी ऐसी सज्जा या मुद्रा में करनी चाहिए जो हमारी बहिन या पुत्री की हो। स्वभावतः हम चाहते हैं कि वे सौम्य हों। उनके वस्त्र अथवा अंगशील मर्यादा का पालन करते हों। उन पर अश्लीलता की उँगली न उठती हो। इस मर्यादा के टूटने पर हमारी आँखें नीची हो जाती हैं। जिसने वह चित्र मुद्रा अथवा सज्जा बनाई हो, उस पर क्रोध आता है। ऐसे निर्माण में यदि अपनी बहिन या पुत्री ने सहयोग दिया हो, उत्साह दिखाया हो, आग्रह किया हो तो उस पर भी क्रोध आता है। निकटवर्ती सगे सम्बन्ध होते हुए भी इसे चरित्रहीन कहने की मान्यता पनपती है और इच्छा होती है कि वह दृश्य जल्दी ही आँखों के सामने से हटा दिया जाये।
प्रसंग यहाँ नारी मात्र की सुरुचिपूर्ण सज्जा का है। कुछ समय से प्रचलन ऐसा चला है जिसमें हम अपने घरों की नारियों को ऐसे वस्त्रों से सजाते हैं जो आम पहनावे में नहीं आते। जो स्वाभाविक नहीं हैं। जो अपनी विचित्रता के कारण दर्शकों की आंखें अपनी ओर खींचती हैं। नवयौवन की आयु में तो ऐसी वेष-भूषा विशेष रूप से आँखें अपनी ओर खींचती हैं और वह खिंचाव उत्तेजक होता है। इस आकर्षण को मात्र उनके पति ही देखें ऐसा अनुबन्ध नहीं है। रास्ता चलते लोग भी देखते हैं और उस प्रदर्शन में कामुक-ललचायेपन का आकर्षण भी होता है। यह विशुद्धतः अश्लीलता हुई। नग्न अथवा अर्द्धनग्न चित्रों को इसलिए अश्लील कहा गया है कि इससे कामुकता की दृष्टि उत्पन्न होती है। इस कसौटी पर ऐसे वस्त्र, शृंगार, उपकरण भी आते हैं जिससे किसी नारी के सम्बन्ध में कुत्सित कल्पना उठती हो।
इन दिनों फैशन के नाम पर ऐसे वस्त्र, उपकरण एवं शृंगार साधनों का प्रचलन चल पड़ा है जो हमारे घरों की बहू-बेटियों का ऐसा स्वरूप सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत करता है जिसे अर्ध अश्लील कहा जा सके। इससे घटिया दृष्टिकोण वाले पुरुषों की कामुक दृष्टि उभरती है और वे कभी-कभी उस उत्तेजना में ऐसे प्रदर्शन या व्यवहार करने लगते हैं जिन्हें अवाँछनीय कहा जाय। इसमें पूरा दोष लफंगे पुरुषों का नहीं उन महिलाओं का या उनके घर वालों का भी है जो अपने घरों की बहू-बेटियों को गुड़िया की तरह सजाकर निकालते हैं। उत्तेजक वेश-भूषा पहनाने में अपना बड़प्पन मानते हैं।
इन दिनों प्रगतिशीलता का समय बताया जाता है। नर और नारी की समानता का नारा लगाया जाता है। यदि यह सही है तो महिलाओं को वैसे ही सादे वस्त्र पहनने और उपकरण सजाने चाहिए जैसे कि पुरुष पहनते हैं। लफंगों या छिछोरों की बदमाशी का विरोध करने के लिए अन्यान्य उपायों में एक यह भी अपनाया जाना चाहिए कि सयानी बहू-बेटियों के वस्त्र सादगी वाले हों। नर और नारी की समानता का नारा यदि सच्चे मन से लगाया गया है तो पुरुषों के नाक, कान छेदकर उनमें आभूषण पहनाये जायें। अथवा नारियों को भी उनसे मुक्त किया जाए।
यदि सचमुच ही विचारशीलता का युग आ रहा है तो नर और नारी दोनों को ही सीधे सादे सौम्य और लगभग एक जैसे कपड़े पहनने चाहिए। इससे दोनों ही वर्गों में समानता का भाव पैदा होगा। नारी सजधज कर जब गुड़िया बनकर निकलती है, अपनी शील अंगों को रंगों से, आकर्षक वस्त्रों तथा उपकरणों से सजाकर निकलती है तो इसका अर्थ यह होता है कि उसने अपने को रमणी-कामिनी के रूप में प्रस्तुत किया। यह नारी का हेय एवं लगभग अश्लील स्वरूप है। प्रगतिशीलता के इस युग में नारी को लगभग नर जैसी सज्जा पर सन्तोष करना होगा। अश्लीलता के विरुद्ध आवाज बुलन्द करते हुए हमें आकर्षक एवं कामुकता भड़काने वाले वस्त्र शृंगार का समापन ही करना चाहिए ताकि नारी के प्रति सहज श्रद्धाभाव बढ़े।
रेशम नाइलोन की ऐसी साड़ियां या वस्त्र जिनमें नग्नता ढकने के लिए नीचे दुहरा वस्त्र पहनना पड़े, शालीनता के विपरीत है। वर्षा होने लगे और कपड़े भीग जायें अथवा नदी तालाब आदि में खुला स्नान करना पड़े तो ऐसे वस्त्र लज्जा जनक स्थिति पैदा कर देते हैं, सारा शरीर नंगा दिखने लगता है। कई बार तो वर्षा न होने पर भी महीन वस्त्र पहनने वाले की बेइज्जती करते हैं। वक्षस्थल और कमर भी ऐसे स्थान हैं जिन्हें शील परम्परा के अनुसार ढका रहना चाहिए। जिन वस्त्रों के पहनते ही कटि प्रदेश खुला दीखे उन्हें अश्लीलता की श्रेणी में गिना जा सकता है। वक्षस्थल और उभार ढके रहने के लिए चुनरी ओढ़ने का रिवाज रहा है अब उसके स्थान पर कृत्रिम उभार प्रदर्शित करने वाले झीनी चुनरी पहनना ऐसा है जिन पर दर्शकों की अनायास दृष्टि जाती है और उन अंगों को गोपनीय रखने की परम्परा का उल्लंघन होता है।
आभूषणों में सभी ऐसे हैं जिन्हें नारी को गुड़िया बनाने की लज्जित स्थिति में ले जाने वाला कहा जा सकता है। विशेषतया नाक कान के बड़े आकार के आभूषण चेहरे को घूर-घूर कर देखने का निमंत्रण देते हैं। होठों का रंगना भी ऐसा ही निमंत्रण है जो मनचले दर्शकों को कामुक दृष्टि से देखने का निमंत्रण देते हैं।
सादगी सबसे बड़ी शोभा है। विशेषतया जबकि कामुकता की धूम है, लोगों की कुदृष्टि बढ़ रही है। ऐसी सज्जा वाली महिलाओं के सम्बन्ध में अनुपयुक्त मान्यता बनाई जाती है और छेड़खानी की जाती है। शालीनता की माँग यही है कि सादे वस्त्र पहने जाएँ। इसके पहनने वाले का पैसा बचता है। आदर्शवादी पहनाव को देखकर यह अनुमान लगता है कि यहाँ ऐसा मानस तथा निर्धारण है जिसे सौम्य कहा जाय। नर और नारी एक समान का सिद्धान्त जब भी जहाँ भी प्रकट करना होगा तो सजावट वाले कपड़ों और आभूषणों का मोह छोड़ना ही होगा। सौम्य शालीनता एवं आदर्शवादिता के विस्तार के अतिरिक्त यौन संपर्क सम्बन्धी भ्रान्ति निवारण हेतु भी यह अनिवार्य है कि परिधान-मुद्रादि की पवित्रता पर अधिक ध्यान दिया जाए। यह प्रयोजन अनावश्यक प्रतिबन्धों से सम्भव नहीं। इसके लिए तो नर एवं नारी दोनों को स्वेच्छा से सद्भाव की महत्ता समझनी होगी, ताकि वे सौजन्य से साथ रह जीवन शकट चलाते रह सकें एवं प्रगति की दिशा में एक दूसरे के पूरक बन सकें।
विश्व विख्यात कथाकार तुर्गनेब की एक बहुत छोटी किन्तु दिलचस्प कहानी है-
एक मूर्ख अपने को बहुत बुद्धिमान मानता था। जहाँ जाता बात करता वहाँ से उपहास अपमान लेकर वापस लौटता।” दुखी होकर वह एक विद्वान के पास पहुँचा। “बोला- ऐसा मन्त्र सिद्ध करा दीजिए कि मेरी ख्याति बुद्धिमान के रूप में फैल जाए।”
“विद्वान को मखौल सूझा। पास बुलाकर कान में एक मन्त्र कहा और उसे अपनाये रहने पर अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होने का विश्वास दिलाया। वस्तुतः हुआ भी वैसा ही वज्र मूर्ख कुछ ही दिनों में विद्वान गिना जाने लगा और उसकी चर्चा हर किसी की जीभ पर थी।
“बताया गया मन्त्र इतना ही था कि दूसरे जो भी कहें उसका खण्डन करते हुए ठीक उलटी बात इतनी जोर देकर कही जाये कि लोग कथन में कुछ दमखम समझने लगें।” इस मन्त्र को अपनाकर कोई भी मूर्ख- मूर्ख समुदाय में विद्वान की तरह प्रख्यात हो सकता है।”
आज समाज में ऐसे विद्वानों की क्या कोई कमी है?
बुराई इस दुनिया में बहुत है, पर इतनी नहीं जिसे अच्छाई से अधिक कहा जा सके। अँधेरा कितना ही सघन या व्यापक क्यों न हो वह उतना नहीं हो सकता, जो प्रकाश से भारी पड़े और बाजी मारने की हिम्मत करे। संसार में दृष्ट दुराचारियों की भरमार है। इतने पर भी वह समुदाय इतना बड़ा या सामर्थ्यशाली नहीं है, जो सज्जनों की तुलना में किसी भी दृष्टि से बढ़-चढ़ कर माना जा सके।
दुष्टता में अहित करने की शक्ति है। इसलिए उससे सतर्क रहने, बचने, विरोध करने और आवश्यकतानुसार लड़ पड़ने की आवश्यकता पड़ती है। इतने पर भी यह नहीं हो सकता कि हम अपना अधिकाँश समय इसी जंजाल की उधेड़ बुन में लगाये रहें। बुराइयाँ और बुरों की करतूत ही यदि ध्यान में रहे और उनसे बचने लड़ने भर को प्रमुखता दी जाने लगे तो समझना चाहिए कि श्रेष्ठता के साथ संपर्क बनाने, उसे अर्जित करने और लाभ उठाने का अवसर ही हाथ से चला गया।
गन्दगी बुहारने का नित्य कर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। उसकी उपेक्षा करने पर बीमारियाँ फैल सकती हैं। इतने पर भी उस कार्य को आजीविका उपार्जन एवं व्यवस्था से बढ़कर नहीं माना जा सकता। यदि उस ओर से मन हटे तो प्रगति का सारा ढाँचा ही लड़खड़ाने लगेगा।
समय का सही उपयोग है सज्जनों के साथ संपर्क सहयोग और सज्जनता की गरिमा का जीवनचर्या में सघन समावेश। सृजन और सम्वर्धन की दिशा में किया गया प्रबल पुरुषार्थ ही व्यक्ति की क्षमताओं, वरिष्ठताओं एवं विभूतियों का अभिवर्धन करता है। इसी के सहारे किसी का आगे बढ़ना और ऊँचा उठना सम्भव हो पाता है।
अधिक महत्वपूर्ण और अधिक ध्यान देने योग्य बात यह है कि मनुष्य अपनी क्षमताओं की वृद्धि करे। उपार्जन में संलग्न रहे और ऐसे काम करे जो अपने लिए तथा दूसरों के लिए सत्परिणाम उत्पन्न करें। यह सब कुछ अनायास ही नहीं हो जाता। इसके लिए योजनाबद्ध प्रयास करने पड़ते हैं। साधन जुटाने और अवरोध निरस्त करने पड़ते हैं। सहयोगियों को ढूंढ़ना और सत्परामर्श दे सकने योग्यों का अनुग्रह अर्जित करना पड़ता है। इस संदर्भ में सबसे बड़ी आवश्यकता अपनी पात्रता बढ़ाने की है।
साधनों को जुटाना, अवरोधों को हटाना, सहयोग अर्जित करना, निजी व्यक्तित्व को सुधारना यह चारों ही काम ऐसे हैं जिनके लिए समग्र मनोयोग लगाने की आवश्यकता पड़ती है। यह सब कुछ चुटकी बजाते नहीं हो जाता, किसी वरदान या चमत्कार की इस हेतु आशा नहीं की जा सकती। यह सब कुछ अपने ही प्रयत्न पुरुषार्थ पर निर्भर है।
देखने-सुनने में सरल लगता है कि अपने को समझाने सुधारने में क्या देर लगेगी यह तो सहज ही हो जाने वाला काम है, पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। अपने को सुधारना इतना कठिन है कि उसे संसार सुधारने के समतुल्य कठिन एवं महत्वपूर्ण माना गया है। यह मनोयोग की एकात्मता पर निर्भर है। इसी प्रकार बहिरंग क्षेत्र में अनुकूलताएँ और सुविधा बढ़ाने वाली रीति, नीति अपनाना, दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाये बिना अन्य किसी भी तरह बन नहीं पड़ता। इसके लिए एकाग्र चिन्तन और जुझारू मनोबल की जरूरत पड़ती है। उपेक्षा बरतने वाले अपरिचितों तक से संपर्क साधकर उन्हें मैत्री की जंजीरों में जकड़ना पड़ता है। प्रगति के आवश्यक साधन सड़क पर पड़े नहीं मिल जाते उनके लिए अवसर ढूंढ़ने, अधिक श्रम करने और उपलब्धियों को अपव्यय से बचाकर अभीष्ट के लिए नियोजित करना पड़ता है। यह चक्रव्यूह बेधने और किला जीतने की तरह शानदार सफलता है, जिसे शानदार लोग ही हस्तगत कर पाते हैं।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने यह स्वीकार कर लिया है कि पदार्थ परक सभी शक्तियाँ अथवा मूल प्रेरक बल एवं ब्रह्मांड में प्रभावी चेतन क्रियाएँ एक ही केन्द्र से उत्पादित व नियंत्रित होती हैं। यह ऋषियों की उस मान्यता से मेल खाता है जिसमें समस्त ब्रह्मांड में क्रियाशील एक ही शक्ति स्रोत के विषय में उद्घाटन करते हुए कहा गया है- “एकं सद्विप्रा बहुधा वदान्ति”- ऋग्वेद (1।264।46) अर्थात्- वह परम सत्ता एक ही है किन्तु विज्ञजन उसी ब्राह्मी सत्ता को अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि नामों से पुकारते हैं।
पुनः कठोपनिषद् (1।2।20) का ऋषि कहता है-
अणोरणियान महतो महियान। आप्मस्य जन्तोह निहितो गोहयम्॥
अर्थात्- छोटे से बड़े आकार के सभी पदार्थ एक शक्ति से सम्बन्धित तथा नियन्त्रित होते हैं।
इन आप्त वचनों से स्पष्ट होता है कि आधुनिक विज्ञान द्वारा ज्ञात किया गया- ब्रह्मांडीय एकत्व का समस्त बलों के एकीकरण का सिद्धान्त ऋषियों को बहुत पूर्व ही मालूम हो चुका था। उसी आधार पर उनने ज्योतिर्विज्ञान का स्वरूप विकसित किया था तथा उसके माध्यम से पदार्थों व शक्तियों के बीच पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन करने में सफलता प्राप्त की थी। साथ ही उनने ब्रह्मांडीय सूक्ष्म रहस्यों को भी उद्घाटित किया था, जिसे ज्योतिर्विज्ञान विद्या में निहित कर दिया गया।
वस्तुतः पदार्थ विज्ञान की समस्त विधाओं का आधार स्तम्भ ज्योतिर्विज्ञान ही है। न्यूटन, गैलीलियो, कोपरनिकस व अन्यान्य श्रेष्ठ वैज्ञानिकों ने अपने कार्य इसी क्षेत्र से आरम्भ कर इसी तथ्य की पुष्टि की है तथा इसे आधुनिक विज्ञान का जन्मदाता बतलाया है। मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जाऊँगा? संसार की उत्पत्ति कैसे हुई तथा इसका भविष्य क्या है? इस जगत का विस्तार कितना हुआ है? जगत के समस्त घटकों के बीच पारस्परिक संबंध कैसा है तथा उसका क्या परिणाम होता है? आदि ऐसे जटिलतम वैज्ञानिक प्रश्न हैं, जो ज्योतिर्विज्ञान के माध्यम से ही हल हो सके हैं। उसी को आधार मानकर आज के वैज्ञानिक ब्रह्मांड भौतिकी पर अनुसन्धान रत हैं।
आर्ष वांग्मय में ज्योतिर्विज्ञान को ज्योतिर्विज्ञान को ज्योतिष नाम से महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ज्योतिष का शाब्दिक अर्थ शक्ति अथवा नक्षत्रों का ज्ञान होता है। अतः यह वह विज्ञान है जो ब्रह्मांडीय शक्ति तरंगों एवं नक्षत्रों की गतिविधियों का अध्ययन करता है। स्पष्ट शब्दों में इसे शक्ति के विभिन्न घटकों की पारस्परिक क्रिया का विज्ञान कह सकते हैं। अर्थात् पंचतत्वों एवं शरीर के विभिन्न अवयवों अथवा शक्ति-बलों के बीच पारस्परिक क्रिया के परिणामों का अध्ययन ही ज्योतिर्विज्ञान है। इसका सम्बन्ध मूलतः सूर्य तथा सौर मण्डल के अन्यान्य ग्रहों एवं पृथ्वी तथा उसके निवासियों के बीच पारस्परिक क्रियाओं से है। इस परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्धों के आधार पर ही ज्योतिर्विज्ञान की समग्र पृष्ठभूमि बनती है।
सृष्टि के आरम्भ से ही ज्योतिर्विज्ञान का स्वरूप आर्ष साहित्य में प्रकट हुआ पाया जाता है। ऐसा उल्लेख शास्त्रों में मिलता है कि ऋषि गर्ग ने इस ज्योतिर्विज्ञान को विश्व सृजेता ब्रह्मा जी से सीधे प्राप्त किया था। तदुपरान्त उनने उस विद्या को अन्यान्य ऋषियों तक पहुँचाया था। मनु, कपिल, भृगु, सहदेव, अस्ति, बाराहमिहिर, वशिष्ठ, भास्कराचार्य, आर्य भट्ट आदि ज्योर्तिविद्या के प्रकाण्ड विद्वान माने जाते थे। इन्होंने सामान्य उपकरणों के माध्यम से अदृश्य जगत का अनुसंधान कर अनेकों ऐसे निष्कर्ष निकाले जिन्हें आज भी सत्यापित होते देखा जा सकता है।
सृष्टि की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाने के लिए ऋषियों ने “अपरा और परा” विद्या की नींव डाली थी। सृष्टि के भौतिक स्वरूप का अध्ययन अपरा विद्या के माध्यम से किया जाता था। परन्तु ऋषियों ने परा की तुलना में अपरा विद्या को छोटे स्तर का माना था। क्योंकि इससे जगत के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाता। जगत का वास्तविक स्वरूप सूक्ष्म में अन्तर्निहित है, जिसका ज्ञान परा विद्या के माध्यम से हो सकता है। परा विद्या को ऋषियों ने “अतीन्द्रिय”- “सूक्ष्म योग शक्ति ग्राह्य” बताया था। योगीजन इसी का आश्रय लेकर परोक्ष की शोध करते थे। प्रकारान्तर से जो परा विद्या में निष्णाँत थ, तपः पूत योगी थे, वे ही ज्योतिर्विज्ञान के अनुसंधान में सक्षम होते थे।
वेदों का सम्बन्ध परा विद्या से ही है और ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा गया है। इस प्रकार ज्योतिष को भी परा विद्या के माध्यम से ही समझा जा सकता है। अर्थात् ज्योतिर्विज्ञान का स्पष्टीकरण स्थूल दृष्टि से कदापि नहीं, प्रत्युत अतींद्रिय सूक्ष्म योग शक्ति से ही सम्भव है। साथ ही यह भी स्मरणीय है कि चूँकि परा विद्या एक उच्चस्तरीय गणित है, अतः ज्योतिष भी उच्चस्तरीय गणित ही है। भारतीय ज्योतिर्विद् भास्कराचार्य ने तभी तो अपने प्रसिद्ध ग्रन्थों लीलावती एवं बीजगणित में आधुनिक गणित के प्रारम्भिक सूत्रों की की स्थापना की है। यथा- “योगे रवं क्षेप समम्, रव गुणः रवम्।” अर्थात्- किसी अंक में शून्य जोड़ने अथवा घटाने से उस अंक में कोई अंतर नहीं आता, किन्तु किसी अंक को शून्य से गुणा करने पर गुणनफल शून्य हो जाता है।
उक्त पुस्तक में ग्रह नक्षत्रों की पृथ्वी से दूरी, उनकी गति तथा उस गति से पृथ्वी पर पड़ने वाले सम्भावित प्रभावों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण सूत्रों का भी वर्णन है।
ऋषि परम्परा के जीवन्त होने के कारण ही ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से भारत कभी विश्व का शिरोमणि था। उसने अपने सिद्धान्तों व अनुभवों से समस्त विश्व को आलोकित कर रखा था। भारतीय ज्योतिष विद्या को विश्व भर में मान्यता प्राप्त थी। आर्य संस्कृति का प्रसार विस्तार करने वाले परिव्राजक ऋषिगणों ने इसे वसुधा के कोने-कोने तक पहुँचा दिया था।
ईसा से 200 वर्ष पूर्व वैज्ञानिक स्तर के प्रयास आरम्भिक स्तर पर ही चल रहे थे। तब मशीनों आदि का तो सर्वथा अभाव ही था। उस स्थिति में भी यूनान के भूगोलज्ञ क्लाडियस टालमेयस ने ब्रह्मांडीय संरचना सम्बन्धी दर्शन को प्रतिपादित करने के लिए ख्याति प्राप्त की थी उसने अपने शोध प्रयासों के लिए भारतीय गणित और तर्कशास्त्र का ही अवलम्बन लिया एवं अपने ग्रन्थों में बड़े सम्मानपूर्वक इन सूत्रों को उद्धृत भी किया। उसी आधार पर उसने पृथ्वी की कक्षा तथा अन्यान्य ग्रहों के परिभ्रमण चक्र का मानचित्र बनाया था, जिससे ग्रह नक्षत्रों की स्थिति जानने में काफी सफलता मिली, जो उन दिनों की वैज्ञानिक प्रगति को दृष्टिगत रख एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
टालमेयस ने स्वप्रतिपादित दर्शन तथा गणितीय गणनाओं को अपने ‘ज्योतिष महानिबन्ध’ (अलमागेस्ट) नामक ग्रन्थ में प्रकाशित करवाया। अपनी गणितीय गणना के आधार पर उसने 1028 नक्षत्रों की भी जानकारी दी। आधुनिक यन्त्रीकृत वैज्ञानिक खोजों के समक्ष टालमेयस का सिद्धान्त तो अब बौना प्रतीत होता है, फिर भी उस प्रतिभाशाली व्यक्ति का प्रयास सराहनीय है, जिसने यन्त्राभाव में भी उन दिनों इतने महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त की।
छठी शताब्दी में पुनः भारत के आचार्य ब्रह्मगुप्त ने ज्योतिर्विज्ञान पर महत्वपूर्ण काम किया। उनने ‘ ब्रह्म स्फुट सिद्धाँत’ तथा ‘खण्ड खाड्यक’ नामक दो महान ग्रन्थों की रचना की। इन ग्रंथों में सौर मण्डल के ग्रह नक्षत्रों की स्थिति, गति एवं गणना सम्बन्धी सूत्र दिए गए हैं। सातवीं और आठवीं शताब्दी में इनका अनुवाद अरबी भाषा में भी हुआ। वहीं से वह मध्य एशिया के ग्रीस आदि देशों में पहुँचा।
11 वीं सदी में भारत की यात्रा करने वाले महान अरबी विद्वान अलबरूनी बाराहमिहिर द्वारा प्रतिपादित ग्रन्थों से बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने उनके अनेकों ग्रन्थों का अनुवाद अरबी भाषा में करवाया। अरब देशों में ज्योतिर्विद्या का प्रसार इसी प्रकार सम्भव हुआ। पिरामिडों की रचना में ज्यामिती का प्रयोग यह बताता है कि उन दिनों उत्तर अफ्रीका मध्य एशिया एवं विद्या के क्षेत्र में अग्रणी भारत में पारस्परिक सघन सम्बन्ध थे। खगोल गणित पर आधारित ये अद्भुत संरचनाएं किसी भारतीय तत्वदर्शी की देख-रेख में बनवाई गई हैं, ऐसा विद्वानों का मत है। खोजियों का कहना है कि दिल्ली की कुतुबमीनार भी वस्तुतः एक वेधशाला थी जो नक्षत्रज्ञ बराहमिहिर द्वारा स्थापित की गई थी। इसका प्राचीन नाम मेरु स्तम्भ था। आक्रमणकारियों ने उसका स्वरूप बदलकर कुतुबमीनार नाम दे दिया, जो मेरु स्तम्भ का ही मुगलों द्वारा किया गया अरबी अनुवाद है। इसके माध्यम से नक्षत्रों की जानकारी प्राप्त कर प्रतिकूलताओं से बचने व अनुकूलताओं से लाभ उठाने की व्यवस्था की जाती थी।
वर्तमान में भौतिक विज्ञानियों ने भी ज्योतिष के क्षेत्र में छुई-मुई प्रयास आरम्भ किया है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक द्वय ड्यूूवी एवं एडिंग्टन ने प्राणियों के ऊपर अन्तर्ग्रहीय प्रभावों का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रत्येक ग्रह नक्षत्रों का अपना एक वायुमण्डल है और उसका अपना एक इलेक्ट्रानिक नाद भी होता है। यह नाद ही प्राणियों के ऊपर प्रभाव छोड़ता है। गर्भान्तुक शिशु के भविष्य का निर्धारण ये ब्रह्मांड व्यापी तरंगें ही करती हैं।
लुइस डे ब्रोगली के अनुसार प्रत्येक पदार्थ में कणिकाएं तथा स्पन्दी तरंगें प्राकृतिक रूप से होती हैं। उनने इसे पदार्थ तरंग बताया। उनके अनुसार ग्रह नक्षत्रों की भी तरंगें होती हैं जो मनुष्य के ऊपर सतत् प्रभाव छोड़ती रहती हैं। पृथ्वी की तरंगों का कान्तिमान 3.6 गुना 10 पर घात 31 सेण्टीमीटर होता है। परन्तु इसका अनुभव नहीं होता। पृथ्वी के कम्पन का कान्तिमान 8.25 गुना 10 पर घात 66 नम्बर प्रति सेकेंड होता है, फिर भी उसका ज्ञान स्थूल दृष्टि से सम्भव नहीं।
ब्रह्मांड व्यापी इस प्रभावशाली नाद अथवा तरंगों के समुच्चय को समझने हेतु वैज्ञानिकों ने अनेकों दूरदर्शी यन्त्र एवं सैटेलाइट्स आकाश में छोड़ रखे हैं। कैम्ब्रिज मैसा चुसेट्स से सम्बन्धित ‘ज्योतिष विज्ञान शोध गृह’ के संचालक डा. ब्रेन मार्सडेन के अनुसार पूरे विश्व में 300 दूरबीनें- वेधशालाओं में लगी हैं। परन्तु यह अपरा विद्या का अंग है जिससे ब्रह्मांड सम्बन्धी समग्र ज्ञान सम्भव नहीं। तरंगों की लम्बाई, कम्पन गति को ज्ञात कर मात्र स्थूल आयामों तक पहुँचा जा सकता है। पर विद्या पर आधारित आत्मिकी की ज्योतिर्विज्ञान शाखा इसके विपरीत नाद-ब्रह्म, शब्द की शक्ति को विज्ञान सम्मत विधि से बेध करने की क्षमता रखती है। कब किन कम्पनों का- कणों की बौछार व अंतर्ग्रही प्रभावों को कैसे जीव जगत- वनस्पति समुदाय एवं वातावरण समुच्चय पर प्रभाव पड़ेगा, इसके लिए खगोल गणित के सूत्रों को ऋषियों ने आज से काफी पूर्व ही जान लिया था। इसी आधार पर दृश्य गणित पंचांग बनाया जाता था।
नाद से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है, यह अध्यात्म विज्ञान की मान्यता है। जिस बिग बैंग से सृष्टि के जन्म होने की चर्चा एस्ट्रो फिजीसिस्ट करते हैं, वह ओंकार अथवा नाद का ही एक रूप है। आज शक्ति की शब्द ब्रह्म परक उस शक्ति सामर्थ्य का उद्घाटन बड़े विशद रूप में आर्ष ग्रन्थों में किया गया है। आज विज्ञान की उपलब्धियों के संदर्भ में, आधुनिक उपकरणों को पुरातन वेधशाला से समन्वित कर फिर उसी ज्योतिर्विज्ञान का पुनर्जीवन सम्भव है जो ब्रह्माण्डीय जगत की प्रतिकूलताओं से जीव जगत को बचाता था। यह जानकारी प्राप्त कर मानवता को लाभान्वित किया जा सकता है एवं आडम्बर पाखण्ड के चंगुल में फँसे ज्योतिष शास्त्र को पुनः विज्ञान सम्मत बनाया जा सकना सम्भव है। युग सन्धि के परिप्रेक्ष्य में यह अब और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
जब तक अपने को उठाने और सुधारने को तुम स्वयं तैयार नहीं होते तब तक कोई दूसरा तुम्हें उठा या सुधार नहीं सकता।
क्रोधान्ध एक प्रकार का पागल है। वह न कहने योग्य वचन बोलता है और न करने योग्य काम करता है। बदला लेने के आवेश में वह दूसरों का जितना अहित करता है, उससे अधिक गुना अपना कर लेता है।
घटना 13 अक्टूबर 1917 की है। पुर्तगाल के कोबिडा इरिया नामक स्थान में तीन बच्चों ने पेड़ पर लटकते एक प्रकाश को देखा। प्रकाश के बीच में एक चन्द्र वदनी देवी मुस्करा रही थी। लड़के डरने लगे तो उस देवी ने कहा- “डरो मत! मैं स्वर्ग से आई हूँ। तुम लोग इसी समय आया करो तो प्रकाश समेत मेरे दर्शन करते रह सकोगे।”
लड़कों ने बात सब जगह फैला दी दूसरे दिन उस गाँव के आसपास के लोग सत्तर हजार की संख्या में उस स्वर्ग की देवी के दर्शन करने एकत्रित हुए। युवती के दर्शन तो न हुए पर लोगों ने बादलों के बीच चाँदी जैसा चमकता हुआ एक दिव्य प्रकाश का गोला देखा। दर्शकों में पढ़े-बिना-पढ़े आस्तिक-नास्तिक, मूढ़-तार्किक विद्वान सभी किस्म के लोग थे। सभी ने उस समय वह प्रकाश पुँज देखा और आश्चर्यचकित रह गये कि आखिर यह है क्या? गोला स्थिर न रहा उसने कई घेरे बनाकर कला बाजियाँ खानी शुरू कर दी। गोला तश्तरी जैसा हो गया। इसके कई प्रकार की आकृतियाँ बनने लगीं। बहुत समय तक उसमें इन्द्र-धनुष उभरा रहा। इन्द्र-धनुष बहुत लम्बा था। अन्तरिक्ष के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक उसकी लम्बाई थी। इस समय हल्की वर्षा हो रही थी। दर्शकों के कपड़े उसमें भीग रहे थे। इतने में प्रकाश के गोले ने एक गरम लहर का चक्कर लगाया और देखते देखते सबके कपड़ों से भाप उठने लगी और वे सब ऐसे सूख गये मानो वर्षा से किसी के कपड़े भीगे ही न हों।
इस घटना की जानकारी मिलने पर सारे पुर्तगाल में तहलका मच गया। पुर्तगाल के सर्व प्रख्यात दैनिक पत्र मार्से क्यूलों के सम्पादक ने इस घटना का आँखों देखा विवरण छापा और उसे ‘सूर्य का नृत्य’ नाम दिया।
मनोवैज्ञानिकों में से कुछ ने तुक ठिठाई की कि सत्तर हजार व्यक्ति एक ही कल्पना से आबद्ध थे। फलतः उन्हें वैसा ही स्वरूप प्रतीत हुआ। जिनकी समक्ष में यह तुक नहीं आई, उनने सीधे-सीधे शब्दों में इसे दैवी चमत्कार कहते हुए, प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर शान्ति का बोधक इसे बताया।
भौतिकी के विज्ञान और मनोविज्ञानी ऐसी घटनाओं का अपने ढंग का अर्थ लगाते हैं। मनोविज्ञानी वी-जी-जुग ने अपनी पुस्तक ‘फ्लाइंग सासर’ पुस्तक में एक घटना का वर्णन लिखा है कि एक जगह चार व्यक्तियों को एक प्रकाश का गोला दीखा। पर मुझे नहीं दीखा। इसका कारण यह है कि वे चार व्यक्ति पहले से ही वैसी कल्पना किए बैठे थे। पर मेरी कल्पना वैसे न थी।’ फिर भी यह एक प्रश्न बना ही रहता है कि सत्ता हजार व्यक्तियों को एक ही तरह का दृश्य एक ही समय में कैसे दीखा? भौतिकी विज्ञानी इसे ब्रह्माण्डीय हलचल कह सकते हैं। फिर भी उसका कुछ कारण तो होना चाहिए।
सत्तर हजार लोगों ने एक ही समय में एक ही घटना देखी। सबके गीले कपड़े भाप बन कर उड़े और सूख गये। कैसे? इन प्रश्नों का उत्तर अभी भी देना बाकी है। मनोवैज्ञानिक जादूगरी “मास हिप्नोटिज्म” या ब्रह्मांड में हुई कोई घटना कहने से काम चलता नहीं। इसे एक दैवी चमत्कार मान लेने में भी कोई हर्ज नहीं है। दैवी चमत्कार भी इस विश्व व्यवस्था और प्रकृति घटना का ही एक अंग ही तो है।
प्राप्ति के आनन्द की तुलना में प्रयत्न का पुरुषार्थ कहीं अधिक आनन्ददायक है।
वैदिक काल के ज्योतिर्विदों तथा आधुनिक काल के खगोल भौतिकविदों ने एक तथ्य को ही प्रामाणित किया है कि समग्र प्राणी जगत के ऊपर वातावरण तथा अन्तरिक्षीय अंतर्ग्रही परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है। मनुष्य भी प्राणी समुदाय का एक अंग होने के नाते इससे मुक्त नहीं है। वस्तुतः यह समग्र ब्रह्मांडीय संरचना एक सूत्र में पिरोई हुई है। उनकी बाहरी भिन्नताएँ तो बस दृष्टि भ्रम मात्र है। अतः ब्रह्मांड के एक कण में भी यदि कोई हलचल अथवा परिवर्तन हो तो उससे समस्त ब्रह्मांड प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
मनुष्य का सबसे निकट का सम्बन्ध मौसम से है। वर्ष में अनेकों बार मौसम में परिवर्तन होता रहता है तथा तद्नुरूप मनुष्य का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। “कैनेडियन क्लाईमेट सेन्टर’ के एक हाल के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि जिस दिन हवा तेज हो, आर्द्रता बढ़ रही हो, वायु दाब घट रहा हो और तापमान में तेजी से उतार-चढ़ाव आ रहा हो, उस दिन तनावजन्य माइग्रेन रोग होने की बहुत अधिक सम्भावना रहती है। ऐसे व्यक्ति ऐसे मौसम में आत्मघात अधिक करते देखे जाते हैं, चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है एवं पारस्परिक कलह, झगड़ों के अवसर बढ़ जाते हैं।
कोलम्बिया यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की डा. इन्ज गोल्डस्टीन ने अपने अध्ययन निष्कर्ष में बताया है कि उच्च वायु दाब से मौसम ठण्डा रहता है तथा उस दौरान वर्षा नहीं होती। इससे दमे के मरीजों को कुछ राहत मिलती है। जैसे ही आर्द्रता बढ़ती व वातावरण उमस से भर जाता है, दमे का रोग उभर जाता है। इलिनॉयस मेडिकल सेन्टर विश्वविद्यालय की डा. अनिता बेकर- ब्लोकर ने बताया कि दिल का दौरा भी बहुधा मौसम परिवर्तन के परिणामस्वरूप ही उत्पन्न होता है। अध्ययन के दौरान उनने देखा कि दो दिन पूर्व हुई वर्षा के दौरान पुराने हृदयाघात (ओल्ड मायोकार्डियल इन फार्कशन) से मरने वालों की संख्या सामान्य की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक थी। वैसे भी हृदय रोग से मरने वालों की संख्या सर्वाधिक होती है।
‘जर्मन वेदर ब्यूरो’ द्वारा मौसम विज्ञान पर आधारित दैनिक स्वास्थ्य बुलेटिन भी जारी किया जाता है जो मौसम के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की ओर पूर्व इंगित करता है। नित्य बनते बिगड़ते उच्च और न्यून दाब केन्द्रों और गर्म ठण्डी हवा की चाल के आधार पर यह मौसम पूर्वानुमान तन्त्र मौसम को छः चरणों में विभाजित करता है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार प्रत्येक चरण स्वास्थ्य की भिन्न-भिन्न अव्यवस्थाओं- अपस्मार से लेकर पेट दर्द, के बारे में बताता है। आमतौर से उच्च वायु दाब जन सामान्य में स्वास्थ्य की अच्छी स्थिति की ओर संकेत करता है, जबकि न्यून दाब और गर्मी की स्थिति स्वास्थ्य में आने वाली खराबी की ओर इंगित करती है। कितने ही चिकित्सकों ने अब मौसम विज्ञान पर आधारित सेटेलाइट की गणना पर आधारित स्वास्थ्य बुलेटिनों का प्रयोग अपने मरीजों पर करना आरम्भ कर दिया है। समय से पूर्व ही डाक्टर स्वास्थ्य बुलेटिन के अनुरूप सारा सरंजाम जुटा लेते हैं ताकि यदि रोगियों को सचमुच ही वैसी स्थिति उत्पन्न हो जाय तो तुरन्त ही उन्हें उस स्थिति से मुक्त किया जा सके। कभी-कभी कुछ सावधानियाँ बताकर अथवा हल्की औषधियों, प्राणायाम आदि के प्रयोगों से भी रोग की स्थिति आने से बचा लिया जाता है।
पूर्णिमा के चाँद का भी मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे सम्बन्धित एक लोकोक्ति है, जिसमें पूर्णिमा के चाँद के प्रभाव से कुछ मनुष्यों को भेड़िया मानव बनते बताया जाता है, इससे भावार्थ यह है कि इसके दुष्प्रभावों से व्यक्ति में हिंसक वृत्तियां उभर आती हैं।
अब अनेक वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों से यह तथ्य प्रमाणित हो चुका है कि पूर्णिमा के चाँद का मनुष्य पर जैविक एवं भावनात्मक असर पड़ता है। देखा गया है कि पूर्णिमा काल में न्यूरो एन्जाइम्स अपनी क्रियाशीलता सारी काया में बड़ा देते हैं। रक्तचाप, हृदय धड़कन तथा चयापचय प्रक्रिया में भी इस समय तीव्रता अनुभव की गई है।
शिकागो के इलिन्वाइस यूनिवर्सिटी के फार्मकोलॉजी प्रभाग के प्रोफेसर डा. राल्फ डब्ल्यू मोरिस ने अध्ययनोपरान्त पाया कि रक्त स्राव अन्य अवसरों की तुलना में पूर्णिमा के ठीक पहले अधिक क्रियाशील हो जाता है। अपस्मार (मिर्गी) भी इन्हीं दिनों काफी बढ़ते देखे गए हैं। मधुमेह के रोगियों में भी इन्हीं दिनों रक्त शर्करा चरम स्थिति पर पहुँच जाती है।
मनःचिकित्सकों तथा पुलिस विभाग के अफसरों की मान्यता यह है कि पूर्णिमा का चाँद तनाव और चिन्ता को और भी बढ़ा देता है। मनःशास्त्रियों के अनुसार पूर्णिमा के दिन व्यक्ति की हठधर्मिता और आक्रामकता अन्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। इसके साथ ही अपराध दरों में आश्चर्यजनक वृद्धि इसी दौरान हुई पायी गई है। व्यक्तियों के व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन अनुभव किये गये हैं।
न्यूयार्क में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि इस पूर्णिमा काल में आगजनी की घटनाएँ अत्यधिक होती हैं। साथ ही देशव्यापी हत्याओं में 50 प्रतिशत वृद्धि होते देखी गयी है। डा. मोरिस ने अपने तथ्यों के समर्थन में एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि डेविड बरकोविज डाक तार विभाग का एक कर्मचारी था। उसने कुख्यात ‘सन ऑफ सैम’ हत्याकाण्ड आठ रातों में सम्पन्न किया। इन आठ रातों में से पाँच पूर्णिमा की रातें थीं।
डा. मोरिस के अनुसार मनुष्य के व्यवहार चिंतन में उन्माद लाने वाले इन चन्द्र प्रभावों की व्याख्या करना अत्यन्त जटिल है, क्योंकि पूर्णिमा काल में पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा तीनों एक ही सीधी रेखा में आ जाते हैं। अनुमानतः यह विद्युत चुम्बकीय एवं गुरुत्वाकर्षण सम्बन्ध के ही प्रमाण हैं जो काया के सूक्ष्म विद्युत प्रवाहों पर सीधा प्रभाव डालते हैं। उनमें परिवर्तन लाकर वे स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पृथ्वी को ऊर्जा की प्राप्ति सूर्य से ही होती है। परन्तु अब तो कुछेक वैज्ञानिकों ने यह भी कहना शुरू किया है कि पृथ्वी पर घटने वाली समस्त घटनाएँ सूर्य से प्रभावित होती हैं। कैलीफोर्निया के प्रसिद्ध जीवशास्त्री मारशा एडमस ने प्राकृतिक विपदाएँ, लूटपाट, आगजनी, विस्फोट, हत्याएँ आदि के लिए सौर परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया है। उनने शल्य क्रिया के दौरान हुए रक्तस्राव की मात्रा में सौर गतिविधियों में परिवर्तन के परिणाम स्वरूप कमी महसूस की। एक चिकित्सालय में रोगियों ने भूकम्प की घटना से पूर्व भावनात्मक स्थिरता दिखलाई। कितनों को उल्टी आयी। कितनों के ऊपर एनेस्थेसिया का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जबकि उन्हें औषधि उचित से अधिक परिणाम में दी गयी। एडमस ने पुनः बताया कि भूकम्प से पूर्व जानवरों के व्यवहार में परिवर्तन सौर गतिविधियों के कारण ही होता है।
एडमस ने इस बात का भी प्रमाण प्रस्तुत किया है कि सौर गतिविधियों में वृद्धि के एक सप्ताह के अन्दर फाकलैण्ड द्वीप में युद्ध की गतिविधियाँ आरम्भ हो गईं थीं। ज्ञातव्य है कि 2 वर्ष पूर्व हुए दक्षिणी महासागर के इस द्वीप को हथियाने हेतु महाशक्तियों में टकराव की नौबत आ गयी थी एवं विश्वयुद्ध की स्थिति बन गई थी।
पिछले दिनों पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय आन्ध्रप्रदेश में स्थित ‘इन्स्टीट्यूट ऑफ इन्वायरन्मेंटल स्टडीज’ द्वारा मनुष्य तथा प्राणियों पर सूर्य ग्रहण का क्या प्रभाव पड़ता है, इस विषय पर विशेष अध्ययन किया गया। यह अध्ययन रक्त वर्ग से सम्बन्धित था उसमें शारीरिक तापमान परिवर्तन, रक्तचाप, रुधिर शर्करा स्तर तथा नाड़ी दर पर विशेष ध्यान दिया गया था। मस्तिष्क शोध से ग्रसित बच्चों के आचरण-परिवर्तन पर भी अध्ययन किया गया। सूर्यग्रहण के परिणामस्वरूप रक्त वर्ग के एबी के अलावा अन्य किसी रुधिर वर्ग के व्यक्तियों के शारीरिक तापमान, नाड़ी दर तथा रक्त-चाप में कोई विशेष परिवर्तन देखने को न मिला। किन्तु ‘एबी’ वर्ग के व्यक्तियों के शारीरिक तापमान, नाड़ी दर तथा रक्तचाप में निश्चित रूप से गिरावट आ गई थी। साथ ही बी तथा एबी वर्ग के समुदाय में रुधिर शर्करा स्तर में परिवर्तन देखने को मिला जबकि अन्य वर्ग के लोगों में शर्करा स्तर वहीं बना रहा।
जान एण्टनी वेस्ट और जॉन गेरहार्ड टुण्डा नामक दो पत्रकारों ने अपनी पुस्तक ‘द केस फॉर एस्ट्रालॉजी’ में एक ही समय में जन्मे दो व्यक्तियों के ऊपर अंतर्ग्रहीय प्रभाव की साम्यता का उल्लेख किया है। उनने सैमुअल हेमिंग और जार्ज तृतीय नाम एक दिन ही जन्मे व्यक्तियों का उदाहरण दिया, जिन्हें एक ही दिन विरासत में राज मिला। दोनों देखने में लगभग एक से थे और स्वभाव में भी काफी समानता थी। दोनों का विवाह एक दिन हुआ एवं दोनों की सन्तानों की संख्या भी समान थी। दोनों की एक ही दिन मृत्यु भी हुई। उसे उन्होंने संयोग का अपवाद न मानकर प्रकृति की विचित्रता का परिचायक एक महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।
लेखक ने पुनः एक ही दिन, एक ही समय व स्थान पर जन्मे वैज्ञानिक आइन्सटाइन और लेखक जेम्स स्टीफेन्स व जेम्स जायस का उदाहरण दिया जिनकी जीवनचर्या में अद्भुत साम्यता था।
ऐसे अनेकों उदाहरण इस पुस्तक में विद्वान लेखकों ने दिये हैं जो अमुक ग्रह दशा में उत्पन्न व तद्जन्य प्रभावों में पले व्यक्तियों की आन्तरिक स्थिति एवं व्यवहार की एकरूपता पर प्रकाश डालते हैं। प्रकारान्तर से वे खगोल ज्योतिष के उस सिद्धान्त की पुष्टि ही करते हैं जो भास्कराचार्य, आर्यभट्ट आदि ने अपने ग्रन्थों में वर्णित किया है।
ग्रह नक्षत्रों का सभी प्राणियों के ऊपर निस्सन्देह प्रभाव पड़ता है। परन्तु मनुष्य इस ज्ञान से लाभ उठाकर अपनी विवेक बुद्धि के आधार पर उनके प्रभावों को निर्मूल तो नहीं, परन्तु उनसे अपने आपकी सुरक्षा कर सकता है। भारतीय ऋषियों ने इस विषय में कितने ही निर्देश प्रतिपादित किए हैं, जो मानव मात्र के लिए सुरक्षा कवच बन सकते हैं। सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय किसी प्रकार का आहार न लेना- पानी ग्रहण न करना- हो सके तो उस दिन उपवास का क्रम बनाना आदि उनमें से उल्लेखनीय मार्गदर्शन हैं। उनके द्वारा ग्रहणोपरान्त नदी स्नान का माहात्म्य भी बतलाया गया था, जिसका वैज्ञानिक कारण यह है कि ग्रहणकाल में शरीर पर घातक कॉस्मिक किरणों व विषाणुओं का आक्रमण होता है जिसे नदी के जल के स्नान द्वारा ही हटाया जा सकता है। जो प्राणशक्ति सम्पन्न होता है। स्पष्ट है कि प्रवाहित जल में प्राण ऊर्जा समाहित होती है जो घातक विषाणुओं को मारने में समर्थ होती है।
इनके अतिरिक्त ऋषियों ने अंतर्ग्रही प्रभावों से बचने हेतु सबसे महत्वपूर्ण रक्षा कार्य उपासना कृत्य के रूप में सुझाया था। इसके लिए प्राचीन काल में सामूहिक धर्मानुष्ठानों- उपासना क्रमों का प्रचलन था। संकट की अवधि में प्रायः ऐसा किया जाता था और सुरक्षा व्यवस्था बना ली जाती थी। इसका वैज्ञानिक रहस्य यह है कि व्यक्ति समष्टिगत मानसिक एकाग्रता, जो उपासना का प्रधान लक्ष्य है, के आधार पर ब्रह्मांडीय चेतना से सम्बन्ध बनाता है तथा अपने चिन्तन के अनुरूप उसे प्रभावित करता है।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने ग्रह-नक्षत्रों तथा मौसम के विषय में जानकारी लेने तथा उनके घातक प्रभावों को निर्मूल बनाने हेतु यन्त्रों का सहयोग लिया है। परन्तु शताब्दी का इतिहास बतलाता है कि दुष्प्रभावों की जानकारी लेने का उनका प्रयास तो ठीक है पर बचने के लिए आत्मिकी का अवलम्बन जरूरी है। कितनी ही बार देखा जाता है कि उन्हें पता भी नहीं चल पाता और हर वर्ष भूकम्प, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट अति-अनावृष्टि की चपेट में करोड़ों की जानें चली जाती हैं। यदि जानकारी हेतु नूतन एवं पुरातन प्रयासों का सामंजस्य बना लिया जाये एवं सुरक्षा हेतु अन्यान्य आधुनिक उपचारों के साथ जीवनी शक्तिवर्धक स्थूल एवं प्राणशक्ति वर्धक सूक्ष्म आध्यात्म उपचारों का आश्रय लेने का प्रयास किया जाय तो अधिक लाभ उठा सकना सम्भव है। योगविज्ञान आयुर्विज्ञान एवं ज्योतिर्विज्ञान तीनों का समुच्चय मानवी स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाने में काफी लाभकारी सिद्ध हो सकता है। इसके लिए भारतीय अध्यात्मविदों द्वारा प्रणीत विधा का मार्गदर्शन लिया जाना चाहिए ताकि प्रतिकूल से बचा व अनुकूल से लाभ उठाया जा सके।
सज्जनता की जितनी अधिक आवश्यकता समझी जाय उतनी ही कम है। उसकी प्रशंसा भी भरपूर की जानी चाहिए और मनुष्य की गौरव गरिमा इससे कम में न तो मिलती है, न सुरक्षित रहती है। आत्म-सन्तोष और लोक-सम्मान के लिए सज्जनता पहली शर्त है। इसे अर्जित किए बिना कोई व्यक्ति न तो महान बना है और न महत्वपूर्ण काम कर सकने में समर्थ हुआ है। उद्धत आचरण वाले क्षणिक आतंक भर उत्पन्न कर सकते हैं। छुरे की तरह डरावने लग सकते हैं पर उनके बलबूते कोई प्रगति पथ पर अग्रसर नहीं हो सका है। जिससे दूसरे राहत पायें और ऊँचे उठें ऐसे प्रशंसनीय सत्कर्म करने अनेकों के लिए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करने की क्षमता मात्र सज्जनता के सहारे ही हस्तगत होती है। दुर्जन तो फुलझड़ी की तरह जलकर चकाचौंध भले ही उत्पन्न कर लें पर उनकी उपयोगिता और महत्ता किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती।
यहाँ एक बात और भी समझ लेने योग्य है कि सज्जनता की सुरक्षा और अभिवृद्धि के लिए जिसकी अनिवार्य आवश्यकता है- उसका नाम ही- साहसिकता है। इसे साथ रखे बिना, सज्जनता जीवित न रह सकेगी। बोया हुआ बीज और खेत कितना ही सही समर्थ क्यों न हो उसे उगाने के लिए परिश्रम पुरुषार्थ भी आवश्यक है। किसान का पसीना न बहे, कौशल प्रयुक्त न हो तो फिर बीज की समर्थता परिलक्षित न हो सकेगी। खेत भी अपनी उर्वरता का प्रमाण परिचय न दे सकेगा। अच्छी फसल के लिए पुरुषार्थ भी उतना ही आवश्यक है जितना बढ़िया बीज और अच्छा खेत। सज्जनता को बीज कहा जा सकता है। वह एक उत्तम स्वभाव है। आदर्शवादी चरित्रवान व्यक्ति सज्जन होते हैं, किन्तु उनका पुरुषार्थ शिक्षित है। सज्जनता को कार्यान्वित न करें। न उठें न उठायें, न बढ़े न बढ़ायें तो उस अकर्मण्यता के रहते सज्जनता उपहासास्पद ही बनेगी।
साहसिकता का चिरस्थायी स्वरूप श्रमशीलता और तत्परता है। उसमें अस्त-व्यस्तता को निरस्त करना पड़ता है और आलस्य प्रमाद पर अंकुश लगाना होता है। यही है वह समन्वय जिसे खाद-पानी कहा जा सकता है उपलब्धियों की खेती करने वालों को अच्छी फसल प्राप्त करने का लाभ तभी मिलता है जब भी अकर्मण्यता से बचे और कर्मनिष्ठ पराक्रमियों की तरह विवेक बुद्धि द्वारा निर्धारित किये गये क्रिया-कलाप में परिपूर्ण रस लें और कटिबद्ध होकर जुट पड़ें।
इस संसार में हर कोई भला नहीं है। बुरों की भी यहाँ कमी नहीं। उनसे सतर्क रहने और निपटने के लिए न केवल जागरुकता की आवश्यकता है वरन् विरोध करने और जूझने की भी क्षमता चाहिए। इसके बिना आत्मरक्षा तक न बन पड़ेगी। भीरुता का नाम सज्जनता नहीं है। कायरों से उसका निर्वाह नहीं बन पड़ता। ऐसी दशा में दुष्ट दुराचारियों की बन पड़ती है। वे बिना झंझट वाले शिकार पर सर्वप्रथम आक्रमण करते हैं। सज्जनों को अक्सर यह शिकायत करते सुना गया है कि दुर्जन उन्हें बहुत सताते हैं। उसका कारण सज्जनता की गरिमा का दुर्बल होना नहीं वरन् यह है कि साहसिकता की महत्ता एवं अनिवार्यता नहीं समझी गई। प्रगति के लिए ही नहीं सुरक्षा के लिए साहसिकता की आवश्यकता है। अनाचार के सामने हथियार डाल देने वाले असज्जन ही कहे जायेंगे।
किसी का बुरा न करना और सबके प्रति शुभकामना रखना अच्छी बात है। पर अमृत का भी दुरुपयोग होने से वह विष का काम करता है। दुष्ट दुराचारियों के प्रति उदारता बरतने या उनके कुकृत्यों के प्रति आँखें बन्द किये रहने पर सज्जनता निभती नहीं। नीतिवान न्याय और औचित्य का समर्थन करते हैं। इस प्रयास में अनाचार से जूझना भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। नम्रता और उदारता ही नहीं शालीनता का एक पक्ष अनाचार के विरुद्ध तनकर खड़ा हो जाना भी है।
गायत्री महामन्त्र के विधि-विधान सहित जप की महत्ता शास्त्रकारों ने बड़े विस्तार से लिखी है। कोई भी ऐसा ग्रन्थ नहीं देखने में आता जिसमें इस मन्त्र के जप की व्यष्टिगत एवं समष्टिगत फलश्रुतियों का वर्णन न किया गया हो। यदि समुचित विधि से कर पाना सम्भव न भी हो तो भी इसके किसी भी अवस्था में जप व भावनात्मक ध्यान के सत्परिणाम होते बताये गये हैं। इसके पीछे इस मन्त्र में निहित प्रेरणाओं का महत्व तो है ही, छन्द शास्त्र की दृष्टि से शब्द गुच्छकों की महत्ता तो अपनी जगह है ही इसका मनोवैज्ञानिक आधार भी इतना सशक्त है कि यह एक पूर्णतः विज्ञान सम्मत प्रक्रिया प्रतीत होती है।
वस्तुतः मनुष्य शरीर एक ऐसी जटिल मशीन है जिसे समझने में सैकड़ों वैज्ञानिक लाखों जीव शास्त्री और करोड़ों चिकित्सा शास्त्री लगे हुए हैं किन्तु अब तक जितना जाना जा सका है वह नगण्य ही है।
योग साधनाओं के द्वारा इस शरीर के सम्बन्ध में जो कुछ जाना गया है, वह विज्ञान की अपेक्षा कई गुना अधिक महत्वपूर्ण है। इन साधनाओं के कठोर अभ्यास के द्वारा चेतना के गहन अन्तराल में प्रविष्ट हो तत्वदर्शी ऋषियों ने इस शरीर को ब्रह्मांड की प्रतिकृति के रूप में पाया। इसमें ऐसे-ऐसे चक्र, कोश, उपत्यिकाएँ नाड़ी गुच्छक और दिव्य क्षमता सम्पन्न केन्द्र विद्यमान हैं जिन्हें देखकर उन्हें “यत् ब्रह्माण्डे तत्पिण्डे” जो कुछ ब्रह्मांड में है वह सारा का सारा इस पिण्ड (देह) में विद्यमान है। 13 करोड़ प्रकाश वर्ष के विराट् क्षेत्र वाले इस ब्रह्मांड के मॉडल शरीर को वस्तुतः सृष्टि की सबसे विलक्षण मशीन कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जप विज्ञान एक ऐसी विद्या है जिसमें “शब्द” को बार-बार दुहरा कर बाँसुरी के छिद्रों में वायु फूँक कर उसमें से मधुर ध्वनि निकालने के समान इन शरीरस्थ शक्ति केन्द्रों में से वह क्षमताएँ अर्जित कर ली जाएं जो साधारण व्यक्तियों के लिए अद्भुत और चमत्कार जैसी लगें। इन शक्तियों को जागृत करने में जप साधना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके माध्यम से आत्म-चेतना का उच्चस्तरीय शिक्षण होता है इसी कारण प्रत्येक धर्म चाहे वह हिन्दू हो या सिख, ईसाई, बौद्ध, ताओ, इस्लाम या बहाई कोई भी हो अपनी उपासना पद्धति में जप को अनिवार्य रूप से जोड़ रखा है।
जप में गायत्री मन्त्र के जप को प्रधानता जो दी गयी है, इसका कारण यह है कि महाप्रज्ञा का उच्चस्तरीय तत्व दर्शन इसमें समाहित है। सद्बुद्धि की प्रेरणा से मानव मात्र का कल्याण सोचने वाले आर्षकालीन ऋषियों ने इसे अत्यधिक महत्व देते हुए वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता तक कहा है। न केवल हिन्दू धर्म में अपितु अन्यान्य मत सम्प्रदायों में भी इसे उचित स्थान प्राप्त है। गाँधीजी ने इसे भावी विश्व धर्म या संस्कृति का मूल आधार माना था व कहा था कि कभी विश्व-शान्ति आयी तो इसी मन्त्र की प्रेरणा से आ सकेगी।
गायत्री मन्त्र पूर्णतः विज्ञान सम्मत है एवं इसकी जप प्रक्रिया केवल मनोवैज्ञानिक क्रिया नहीं, अपितु लय-ताल पर आधारित शब्द-शक्ति की वैज्ञानिक विद्या है।
यहाँ विज्ञान की उस जटिलता में जाना अभीष्ट नहीं है। अपितु जप के माध्यम से आत्म चेतना का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण किस प्रकार होता है, उसकी जानकारी देना है। जप व्यक्ति को अपनी अंर्तचेतना की ओर अभिमुख करने और विराट् चेतना के साथ संगति सामंजस्य स्थापित करने की एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। गायत्री उपासना के प्रारम्भिक स्तर के साधक को मन्त्र जप का मनोवैज्ञानिक आधार समझ में आ जाये तो मन न लगने ध्यान उखड़-उखड़ जाने वाली कठिनाई आधा निराकरण तत्काल हो जाता है शेष मंजिल वह कुछ ही समय में पूर्ण कर सकता है।
मनोवैज्ञानिकों ने चेतना को प्रशिक्षित करने के लिए जो चार आधार बताए हैं वह चारों ही तथ्य “जप” में सन्निहित हैं। जप को इन्हीं चार धारणाओं का समुच्चय कह सकते हैं। यह आधार है (1) शिक्षण- बार बार दोहराना- रटना (2) जो जाग गया है या जिसे बार-बार दुहराया गया है, उसे स्व-स्वभाव का अंग बना लेना (3) टूटे सम्बन्धों को फिर कायम करना, बिखरे हुए स्नेह सम्बन्धों को फिर से स्थापित करना और (4) अपनी आस्था निष्ठा- और विश्वास को अनुभूति और सम्वेदना के स्तर तक प्रगाढ़ बना देना। दार्शनिक शैली में इन्हें ही (1) आत्म निरीक्षण (2)आत्म शोधन (3)आत्म निर्माण और (4) आत्म विकास कहते हैं। यह क्रमिक सोपान हैं। जप की चार सीढ़ियां हैं जिन पर चढ़ कर ही आत्मा परमात्मा तक पहुँचती है। इनमें योगाभ्यास जैसे क्रियाएँ दिखाई न देने पर भी इतनी सुदृढ़ता है कि मात्र इसी के आधार को अपनाकर व्यक्ति आत्म निरीक्षण से आत्मोत्कर्ष तक की उच्च स्थिति तक जा पहुँचता है।
जप की महत्ता अकारण रही होती तो गायत्री उपासकों से नियमित रूप से अधिक से अधिक जप की प्रेरणा देकर निरर्थक समय गँवाने के लिए नहीं कहा जाता, इसके पीछे मनोवैज्ञानिक के यही चार सशक्त सिद्धान्त कार्य करते हैं, यह साधक को दीन-हीन अवस्था से उठाकर महा समर्थ अवस्था तक पहुँचाने में पूर्ण सक्षम हैं। अज्ञान की राख से ढके आत्मा के श्रृंगार को चमकाने में यही चार आधार हैं। जप प्रक्रिया इन्हीं को पूरा करती है।
‘शिक्षण’ संस्कार की पहली भूमिका है। संसार में ऐसा कोई शिक्षित व्यक्ति नहीं जिसने इस भूमिका में प्रवेश किए बिना स्कूल की पढ़ाई पूरी की हो। प्रारम्भ में सभी को बार-बार दोहराने की क्रिया से करना पड़ता है। जप साधना में भी मन्त्र को बार-बार दोहराना पड़ता है। उसके बिना अभीष्ट संस्कार उत्पन्न नहीं होते।
गायत्री मन्त्र में परमात्मा से सद्बुद्धि प्रदान करने वाले जिस “धी” तत्व की माँग की गई है वह एक बार कह देने मात्र से संस्कार नहीं बन सकता। मनोभूमि उस ऊबड़-खाबड़ कठोर भूमि की तरह होती है जिसमें जुताई निराई गुड़ाई किये बिना बीज बोना उसे निरर्थक गँवा देने की तरह है साधना का बीज फले फूले इसके लिए “जप” द्वारा उसकी पर्याप्त जुताई आवश्यक होती है जप के द्वारा व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने का अभ्यास होता है जिससे वह अन्तरंग में छिपे कल्मष कषायों को पहचानता है उन्हें नष्ट करने, निकाल बाहर फेंकने की योजना बनाता है। भागवत् संस्कारों को गहराई तक जमाने के लिए इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। जप एक तरह की रगड़, मँजाई, खराद है जिससे मन और अन्तःकरण पर छाई हुई कलुष-कालिमा की धुलाई होती है। भीतर की अंतरात्मा की चमक उसी से प्रारम्भ होती है। इसीलिये प्रत्येक गायत्री उपासक को प्रतिदिन नियमित रूप से नियत स्थान में और सम्भव हो तो नियत संख्या में भी गायत्री मन्त्र जप का क्रम अपनाना चाहिए। कभी कम कभी अधिक से कहीं वर्षा कहीं सूखा, कहीं बीज कहीं ऊसर की सी उपहासास्पद स्थिति बनती है। यह अभ्यास का क्रम काफी समय तक चलता है तब कही सफलता का द्वारा खुलता है।
आत्म विकास की दूसरी सीढ़ी “जानकारी को स्वभाव का अंग बना लेना” अपने दोषों पर जैसे-जैसे दृष्टि साफ होती जाती है साधक उनके प्रति घृणा भी करने लगता है और उनका परित्याग भी करता है। अकेले आत्म निरीक्षण से सन्तोष कर लिया जाये तो इसे अधूरा जप माना जायेगा, स्वभाव में जो कमियाँ, कमजोरियाँ और दुराग्रह भरे पड़े हैं उनका निष्कासन जितनी तेजी से होगा इष्ट की समीपता की उतनी ही स्पष्ट अनुभूति होगी। इस अवस्था में आँख-मिचौनी और धूप-छाँव तो चलती है जन्म जन्मान्तरों के बुरे अभ्यास, तृष्णा वासना और अहंतायें बार-बार गड्ढे में गिराने का प्रयत्न करती हैं पर अब तक साधक जान लेता है कि वह शरीर नहीं आत्मा है वह जितना लौकिक है पारलौकिक उससे लाख गुना अधिक है सो रत्ती भर स्वार्थ के लिए करोड़ मन परमार्थ की उपेक्षा कोई बुद्धिमानी नहीं अतएव वह अध्यात्म में ही अपना कल्याण देखकर पूरे मन से पीछे लौटता, भूल के लिए प्रायश्चित करता उसे सुधारता और फिर कभी उसकी पुनरावृत्ति न होने देने का संकल्प लेता है।
मनुष्य का सूत्र संचालक कोई और है धागे टूट जाने पर जिस तरह कठपुतली के नाच में आनन्द नहीं जाता पिता से बिछुड़ कर जिस तरह पुत्र श्री हीन हो जाता है। विद्युत घर से कनेक्शन कट जाने से जिस तरह बल्ब प्रकाश हीन हो जाता है। उसी तरह परमात्मा से बिछुड़ने के कारण ही आत्मा की दुर्गति हुई है।
चेतना को प्रोन्नत करने के लिए मनोविज्ञान का तीसरा आधार भी जप से ही पूरा होता है। जप काल में चेतना आत्म केन्द्रित होकर ही अपने परमार्थिक स्वरूप को पहचानती है। जैसे-तैसे यह पहचान घनीभूत होती है साधक अपने अतीत की स्मृतियों को कुरेदता और भूतकाल की अपनी अवस्था को विचारता है स्वभावतः यह लगता है कि हम परमात्मा से बिछुड़ गये अन्त में यह बिछुड़न ही दुःख का मूल कारण है इसलिए वह बारम्बार अपने हितैषी को इस बात के लिए पुकारता है हे माँ! अब मुझे उस अन्ध कूप में गिरने नहीं देना। इस अवस्था में जब शरीर निर्मल हुआ, मन निर्मल हुआ तो स्वभावतः मन विधेयात्मक विचारणा से, आदर्श कर्तृत्व से भरा हुआ होगा।
चौथी स्थिति आध्यात्म निष्ठा की परिपक्व अवस्था है। जप के द्वारा भी साधक अपने प्रकाश स्वरूप की “सविता” के तेज से संगति बैठाता है जैसे-जैसे यह स्थिति प्रगाढ़ होती है वैसे-वैसे साधक अपने को सविता के तेज के रूप में “अयमात्मा ब्रह्म” “तत्वमसि” “सोहअस्मि” “शिवोऽहं” “चिदानदोऽहं” की अनुभूति करता है। इसे ही समाधि, तुरीयावस्था अथवा इष्ट सिद्धि कह सकते हैं। आत्म विकास के इस परिपाक तक पहुँचने के लिए इस तरह जप से ही कार्य चल जाता है अन्य कठिन योगाभ्यासों में पड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती इसीलिए जप को यज्ञ और विज्ञान की संज्ञा दी गई। जप पूर्णता तक पहुँचाने में अकेला ही समर्थ है।
मन्त्र में सन्निहित सामर्थ्य का उपयोग जप द्वारा कर के सृष्टि के ऐसे रहस्यों का उद्घाटन भी किया जा सकता है जो अभी वैज्ञानिक बुद्धि में तो नहीं समाते पर सामान्य कल्पनाओं से परे हो सकते हैं। यदि ऐसा रहा होता तो उच्च शिक्षित वैज्ञानिक वर्ग भी इस तरह की आध्यात्मिक अनुभूतियों से स्वतः ही ओत-प्रोत हो गया होता, जबकि देखा यह गया है उच्च शिक्षित, मनीषी और विचारक कहे जाने वाले लोग भी साँसारिक मायाजाल में फँसे रहते हैं जबकि कम शिक्षित पर भावनाशील गायत्री उपासकों में भी उच्च आत्मिक शक्ति प्रादुर्भूत होते देखी जा सकती है।
इसका कारण है कि मन्त्र की सफलता का मूल आधार “अक्षर विज्ञान”। मन्त्रों में निस्सन्देह अपार शक्ति निहित है कि मन्त्र गुच्छकों में निहित वैज्ञानिकता को हमें भूलना चाहिए। विज्ञान का अर्थ है सिद्धान्त का गणितीय होना। इसे निश्चित नियम बद्धता भी कह सकते हैं। इसमें साधक की आन्तरिक निर्मलता के साथ-साथ प्रतिदिन नियत समय जप करना भी आवश्यक है। नियत समय पर जप के साथ जप का समस्वर होना भी आवश्यक है। कभी जल्दी, कभी धीरे-धीरे, कभी आलस्य में, कभी सजग होकर किये गये अस्त-व्यस्त जप से परिणाम तो निकलेंगे पर अस्पष्ट और उलझे हुए होंगे। माला से जप का कारण यही है कि एक मन्त्र जप से प्रत्येक दूसरे मन्त्र जप में नियत अन्तर रहे। कम अधिक नहीं। सामान्यतः एक घण्टे में 10 या 11 माला का जप होता है अतएव नियम बद्धता को घड़ी के साथ भी साधा जा सकता है पर मन्त्र जप का परिपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन नियत समय नियत स्थान में नियमित रूप से जप करना आवश्यक होता है। परिस्थिति वश स्थान परिवर्तन करना पड़े तो भी जहाँ तक सम्भव हो समय की नियमितता का पालन तो करना ही चाहिए। उसके पीछे भी वैज्ञानिक सिद्धान्त है।
विधिपूर्वक जपे गये मन्त्र से उपासकों की अनुभूतियाँ उनका चिन्तन इतना विस्तृत होता है कि जिससे संसार की यथार्थता समझ में आ जाती है। भौतिक लाभ तो ऐसे हैं जैसे तीर्थयात्रा जाते समय मार्ग में पड़ने वाले किसी नगर से आवश्यक वस्तुयें भी खरीद ली जायें। मूल लाभ आत्मा की ईश्वरीय चेतना में परिणति ही है जिसे यह लाभ मिल जाता है, वह वस्तुतः जीवनमुक्त हो जाता है। उसका जीवन सचमुच धन्य हो जाता है। गायत्री मन्त्र की सफलता का यही मुख्य आधार है जिसे प्रयोग कर लाभान्वित होना हर व्यक्ति के लिए सम्भव है।
यह सोचना सही नहीं है कि जवानी में खुशी रहती है और बुढ़ापे में निराशा चढ़ी रहती है। दोनों का अपना अपना महत्व और रस है। उनमें थोड़ी भिन्नता तो है फिर भी गाड़ी के दो पहियों की तरह परस्पर जुड़ी हुई भी है। जवानी का उपार्जन बुढ़ापे को सुसम्पन्न बनाता है। और ढलती उम्र में उस सम्पदा के सदुपयोग का सही समय आता है जिसे जवानी में कमाया गया था। जवानी में पहाड़ पर चढ़ने जैसा जोश रहता है, पर बुढ़ापे पर उस शिखर पर पहुँचने के उपरान्त उन दूरवर्ती दृश्यों का सौंदर्य दीख पड़ता है जो चढ़ते समय दृष्टि में आया ही नहीं।
रात्रि महत्वपूर्ण या दिन, यह कहना कठिन है। यों दिन चमकता और श्रम करने का अवसर प्रदान करता है किन्तु यदि विश्राम वाली रात का अस्तित्व न रहे तो सभी थकान से जर्जर होकर मर मिटे। खाना लाभदायक है। पर उसे पचाने का समय और समर्थ तन्त्र भी तो चाहिए। बुढ़ापे में बढ़ी हुई बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और अनुभवशीलता इतनी गौरवमयी है कि शरीर पर थोड़ी थकान आने पर भी उसे जवानी में कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही उपयोगी माना जा सके।
उपार्जन और उपभोग के लिए जवानी का जोश आवश्यक होता है। ठण्डा पड़ने पर वे दोनों ही घट जाते हैं। इतने पर भी उनके स्थान पर जो दो नई चीजें उगती हैं। वे भी ऐसी नहीं है जिन्हें घटिया ठहराया जा सके। अनुभवों का संचय सही निर्णय तक पहुँचने में सहायता करता है। तब उचित और अनुचित की परख करने योग्य विवेक और सन्तुलन भी हस्तगत होता है। इनके अभाव में जवानी भूल पर भूल करती चली जाती है। जोश चढ़ती उम्र में रहता है। तो होश उसमें ढलान आने के बाद उत्पन्न होता है। दोनों का समन्वय एकीकरण तो कदाचित ही कहीं देखा जाता है। जीवन की सफलता में इन दोनों की ही आवश्यकता है।
शरीर की क्षमता ढलती उम्र में घटती है। इसलिए काम करना होता है। इसका लाभ यह है कि समय खाली बच जाता है और सोचने के साथ-साथ ऐसा कुछ करने का अवसर मिलता है जिसके लिए कठिन श्रम करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बौद्धिक कार्य ऐसे हैं जिन्हें करने के लिए कड़ी मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती। अनुभवहीनता के कारण युवावस्था पर अप्रामाणिकता की छाया रहती हैं। उस समय जो कहा जाता था उसे वजनदार होते हुए भी लड़कपन कहकर हँसी में उड़ाया जाता था पर बुढ़ापे के सम्बन्ध में यह बात नहीं है।
जवानी चले जाने पर उसके लिए पछताना ऐसा ही है जैसा कि जवानी आने पर चले गए बचपन के लिए रोना मचलना। जब विद्यार्थी अगली कक्षा में चढ़ने पर खुशी मनाता है और पिछली कक्षा छूट जाने का रंज नहीं करता तो वयोवृद्धों को भी क्यों इसका दुःख मनाना चाहिए कि जवानी चली गई। जो सामने है उसका महत्व समझना और सदुपयोग करना ही बुद्धिमानी है। बुढ़ापा उतना निरर्थक नहीं जिसके आगमन पर शोक मनाया जाये और सब कुछ छिन गया, ऐसा सोचा जाये।
बुढ़ापा तब भारी पड़ता है जब जवानी में उसके आगमन की पूर्व तैयारी नहीं की गई होती। अप्रत्याशित आधमकने वाले मेहमान से परेशानी हो सकती है, पर पूर्व सूचना मिलने पर प्रतीक्षा और तैयारी का अवसर देकर जो मेहमान आता है उससे प्रसन्नता ही होती है। बुढ़ापे को सम्मानित अभ्यागत माना जाय और उसके सत्कार का पूर्ण प्रबन्ध रखा जाय तो अनख लगने जैसे कोई बात होती नहीं।
जवानी की अनुभव हीनता में बरती गई हरकतों की उन दिनों दर-गुजर होती रहती है पर वयोवृद्धों को अपनी बढ़ी-चढ़ी हैसियत का ध्यान रखते हुए, गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता के उत्तरदायित्वों का अधिक मात्रा में निर्वाह करना पड़ता है। बुढ़ापे की गरिमा भी इसी में है। वह सुखद और सम्मानास्पद इसी आधार पर बनता है।
हिन्दू धर्म का पुरातन नाम वर्णाश्रम धर्म है। चार वर्ण और चार आश्रमों का क्रम जब तक अपने सही रूप में चलता रहा तब तक यह देश समाज निरन्तर उत्थान के मार्ग पर अग्रसर होता रहा। पर आज तो सब कुछ उल्टा ही दीख रहा है। फलतः हम संसार की जनसंख्या का पांचवां भाग होते हुए भी पिछड़े लोगों में गिने जाते हैं।
आश्रम धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की चार परम्परा आती हैं। पच्चीस वर्ष तक की आयु का ब्रह्मचर्य कहाँ पलता है? छोटी उम्र से ही निचुड़ना प्रारम्भ हो जाता है और बालक कच्ची उम्र में ही खोखले हो जाते हैं। गृहस्थ धर्म में उपार्जन की योग्यता बढ़ाकर परिवार का तथा समाज का आर्थिक पोषण सम्पन्न किया जाता था। आज अन्धाधुन्ध संतानोत्पत्ति और कुरीतियों दुर्व्यसनों में बढ़ते हुए खर्च के कारण लोग अनीति उपार्जन के लिए विवश होते हैं और ऋणी बनते हैं।
चारों आश्रमों में अति महत्वपूर्ण था वानप्रस्थ। ढलती आयु से पहले ही सन्तान की जिम्मेदारियों से निश्छल होकर लोग लोक मंगल के कामों में लगते थे। समाज को सुयोग्य लोक सेवा अवैतनिक रूप से मिलते थे। वे समूचे समाज को प्रगतिशील बनाने के कार्य में निरन्तर लगे रहते थे। फलतः देश-विदेश में ज्ञान, विज्ञान, नीति, धर्म सदाचार का वातावरण बनाते थे। यही कारण था कि यहाँ के तेतीस कोटि नागरिक तेतीस कोटि देवी देवताओं के नाम से प्रख्यात हुए और यह भारत भूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाई। संन्यासी शरीर से थक जाने पर परिभ्रमण तो नहीं करते थे, पर अपने उपयुक्त स्थानों पर निवास करते हुए विद्यालय, चिकित्सालय, धर्म शिक्षण मार्ग दर्शन कार्य करते थे। जिस समाज में ऐसी सुव्यवस्था हो उसका उन्नतिशील होना सुनिश्चित है। आज ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आश्रमों की ही दुर्गति नहीं हुई है। वानप्रस्थ का तो कहीं नाम निशान ही नहीं दीखता। भजन पूजा के बहाने 60 लाख भिक्षुक मात्र वेष के बहाने सन्त कहलाते हैं और समाज के लिए कोई उपयोगी कार्य न करके भारभूत जीवनयापन करते हैं। यह आश्रम धर्म की दुर्गति हुई।
अब वर्णधर्म की बात आरम्भ होती है। निरन्तर लोक सेवा में लगे हुए, अपरिग्रही, ब्रह्मपरायण विद्वान ब्राह्मण कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते। उद्दण्ड अनाचारियों से निपटने के लिए जान हथेली पर रखे फिरने वाले क्षत्रिय भी दृष्टिगोचर नहीं होते। उचित लाभाँश से अपना निर्वाह चलाने वाले समाज के अभावों को दूर करने वाले वैश्य भी कहाँ हैं? अधिक लाभ कमाने वाले, कर चुराने वाले और तमाखू जैसे हानिकारक पदार्थ उगाने बेचने वाले वैश्य ही आज तो सर्वत्र दिखाई पड़ते हैं। शूद्र अर्थात् श्रमिका जिस प्रकार श्रम कराने वाले श्रमिकों का शोषण करते हैं उसी प्रकार श्रमिक भी काम चोरों में किसी से पीछे नहीं रहते। उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि रखकर पूरा श्रम करने वाले- अधिकार की तरह कर्त्तव्य को भी प्रधानता देने वाले श्रमिक वर्ग को भी अब अभाव होता चला जाता है।
वर्ण धर्म जब तक ठीक प्रकार चल रहा था तब तक कार्य विभाजन रहने से हर वर्ग की उपयुक्त सन्तुलित संख्या बनी रहती थी। वंश परम्परा से उस शिक्षा में प्रवीणता आती जाती थी। न बेकारी की समस्या उत्पन्न होती थी। न किसी कार्य के लिए आवश्यकता से अधिक या कम लोगों की भरमार रहती थी। श्रम की दृष्टि से समाज में असन्तुलन उत्पन्न नहीं होने पाता था और न वंश परम्परा से उपलब्ध होने वाली प्रवीणता के अभाव में अकुशल लोगों की ही भरमार होती थी, पर आज तो वेष के आधार पर आश्रम और वंश के आधार पर वर्ण रह गया है। चारों वर्णों में वानप्रस्थ संन्यास को श्रेष्ठ माना गया है। उनके कर्त्तव्य उत्तरदायित्व लोगों ने भुला दिये हैं। मात्र लाल, पीले, कपड़े पहनने भर से उसकी लकीर पिट जाती है। इसी प्रकार वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ माना गया है किन्तु उसके साथ ही ज्ञान का संचय और वितरण, तपश्चर्या और अपरिग्रह की मर्यादा भी है। वह सब भुला दी गई है। मात्र वंश का अहंकार बच रहा है। कौन किस वंश में जन्मा इस आधार पर जाति-पाँति का प्रचलन शेष है। वर्ण और जाति अब समानार्थ बोधक रह गये हैं। वर्णों के साथ कर्त्तव्य जुड़े हुए हैं किन्तु जातियों के साथ ऐसा कुछ नहीं है। जो जिस वंश में जन्मा उसी हिसाब से उसकी जाति गिनी जानी लगी और जाति को ही वंश मान लिया गया। जबकि यह बातें सर्वथा भिन्न है। गीतकार ने इस सम्बन्ध में स्पष्ट किया है-
चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुण कर्म विभागशःतस्यकर्तारमपि यां विध्य कर्मारमव्ययम्।
भगवान कहते हैं चारों वर्णों की रचना मैंने गुण को विभाजन के अनुसार विनिर्मित की। यही मेरी कार्यपद्धति है। यहाँ गुण कर्म का विभाजन स्पष्ट किया है। यह कुल वंश का कोई उल्लेख नहीं है। कुल वंश की बात वहाँ तो एक सीमा तक भी लागू भी होती है जहाँ गुण कर्म की परम्परा का निर्वाह होता है। बढ़ई, लुहार, धोबी, अध्यापक, व्यवसायी आदि बचपन से ही अपने परिवार में चल रहे कार्यों को आरम्भ से ही देखते और सीखते रहने के कारण प्रवीण हो जाते हैं। इसमें गुण, कर्म प्रधान है। वंश के हिसाब से वह गणना नहीं हो सकती। किसी का पिता कलक्टर, डॉक्टर, इंजीनियर था किन्तु उसके बेटे बिना पढ़े मूर्ख हैं। उन्हें अपने पिता की पदवी धारण करने का अधिकार कैसे मिल सकता है। कलक्टर का लड़का चपरासी बन सका। तो वह अपने को कलक्टर की पदवी लगाने लगे तो यह बात उपहासास्पद होगी। स्तर बदल जाने के कारण उसे अपने को चपरासी ही कहना चाहिए, कलक्टर कोई वंश नहीं है। इसी प्रकार डॉक्टर इंजीनियर वंश नहीं हो सकता। उस कुल में जो भी जन्मे वह डॉक्टर इंजीनियर कहलाये यह कैसे हो सकता है। वर्ण को जाति कहना और जाति को वंश मानना सर्वथा गलत है। वंश स्थिर नहीं रह सकता उसके गुण, कर्म जैसे-जैसे बदलते जायेंगे वैसे-वैसे जाति भी बदलती जायेगी। वैसे सामान्यतः सभी मनुष्य जाति के हैं। घोड़ा, गधा, बैल आदि की तरह मनुष्य भी एक जाति के हैं। सबकी शरीर संरचना सबका रक्त माँस एक जैसा है। इस कारण वंश के हिसाब से उनकी बीच भिन्नता नहीं हो सकती।
इस सम्बन्ध में भी आज पूरा भ्रष्टाचार फैल रहा है। जातियों के भीतर उपजातियों का सिलसिला चल रहा है। फिर आपस में रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं। ब्राह्मणों के बीच बीसियों उपजातियाँ हैं और आश्चर्य इस बात का है कि वे आपस में रोटी बेटी तक का व्यवहार नहीं रखते। क्षत्रिय-क्षत्रिय के बीच, कायस्थ-कायस्थ के बीच उपजातियों में रोटी बेटी का व्यवहार नहीं। और तो और जिन्हें अछूत कहा जाता है वे भी आपस में वैसा ही विलगाव का बरताव करते हैं जैसा कि सवर्णों और अछूतों के बीच होता है। जाति-पाँति के इस भेदभाव ने सारे हिन्दू समाज को विश्रृंखलित करके रख दिया है। इसका परिणाम संगठन की दृष्टि से बहुत ही बुरा हुआ है। बाहर से हिन्दू कहलाते हुए भी जातियों और उपजातियों के विभाजन के कारण वर्गभेद इतना व्यापक और गहरा हो गया है कि उनके कारण दहेज जैसी अनेकों कुरीतियाँ उपज पड़ी हैं और बहुमत होते हुए भी वस्तुतः हम सब आत्म मत में विभाजित होते चले जा रहे हैं। इसका प्रभाव सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से बहुत ही हानिकारक और चिन्ताजनक पड़ रहा है।
यदि प्राचीन वर्णाश्रम धर्म अब नहीं रहा तो उसका गुण कर्म स्वभाव के आधार पर नया गठन हो सकता है। यदि वह भी सम्भव नहीं रहा तो मात्र हिन्दू या मनुष्य के रूप में अपना परिचय देना पर्याप्त मानना चाहिए।
सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्य प्राण्य दुर्लभम्। तथात्मानं समाधत्स्व भ्रश्यसे न पुनर्यथा॥
अपूर्ण पुण्यों से प्राप्त सुरदुर्लभ मानव शरीर स्वर्ग प्राप्ति का सोपान होता है। अतः इसे पाकर सदा शुभ कर्मों में ही लगाना चाहिए, ताकि मनुष्य पुनः इस शरीर से पतन, अवनति और भ्रष्टता की ओर उन्मुख न हो।
दार्शनिक अर्नाल्ड टॉयनबी ने लिखा है- “परमात्मा का नाम रटते रहना ही यदि आस्तिकता है तो मुझे ऐसे आस्तिक की अपेक्षा नास्तिक कहलाना अच्छा लगेगा। मैंने यह सोचा और जाना है कि अपने आपको सच्चे, ईमानदार के रूप में विकसित करना पूजा से अधिक श्रेयस्कर है।”
“मैं अपने पर आस्था रखता हूँ। और अपनी आत्मा पर अगाध श्रद्धा। क्योंकि वही मेरा भगवान है। मैं सोचता हूँ कि यदि अपने आप को भगवान बनाया जा सके तो फिर आस्तिकता का असली प्रयोजन पूरा हो जायेगा। पर यदि आस्तिकता की परिभाषा इतनी भर है कि व्यक्ति कितना ही निकृष्ट क्यों न बना रहे पर थोड़ी पूजा पाठ करके अपने को ईश्वर भक्त समझे तो मुझे ऐसी भक्ति से चिढ़ है और भक्त कहलाने में ऐतराज भी। ऐसी दशा में यदि कोई मुझे नास्तिक कहे तो इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं।”
“मैंने सचाई को नाम रटने से बेहतर समझा है और दुःखियारों की सेवा के समतुल्य। अपने को भला बनाना और गिरतों को उठाने में सहायता करना मैंने इबादत से कभी कम नहीं माना। जब भी चिन्तन और मनन का अवसर मिला है, तभी मैं यह सोचता रहा हूँ कि दूर रहने वाले भगवान को तलाश करने की अपेक्षा यह क्या बुरा है कि अपनी अन्तरात्मा को इतना अच्छा बनाया जाय कि वह ईश्वर के समतुल्य समझी जा सके। जिन्हें पूजा से प्रेम है, उनसे मैं इतना और कहता हूँ कि पूजा करने वाले को इस लायक बनाओ कि पुजारी कहलाने के हकदार बना सको।”
“मैं दुनिया में आस्तिकों की बढ़ोत्तरी देखना चाहता हूँ। पूजा का विस्तार सब जगह हो ऐसा मेरा मन है पर साथ ही यह भी सोचता हूँ कि किसी आस्तिक पर बेईमान होने का कलंक न लगे और पूजा करने वाले के सम्बन्ध में यह न कहा जाय कि अपने को बिना धोये, गन्दे गलीज मन से वह ईश्वर को बहका रहा है।
भजन करने के लिए सबसे अच्छी और एकान्त की जगह अपना अन्तःकरण है। अच्छा हो पहले हम उसे झाड़-बुहारकर इतना अच्छा बनायें कि इंसान के सारे गुण उसमें दीख पड़ें। प्रार्थना का मन्त्र मैं यह जपना चाहता हूँ कि “हे सज्जनता के पुँज! मुझे ऐसा भक्त बनाना जो सज्जन से कम न आँका जा सके। मुझे स्वर्ग जाना पड़े या नरक। पर वहाँ रखना जहाँ तू है। मैंने सुना है जिनके हृदय में करुणा बरसती है वहाँ तेरा निवास है। यदि ऐसा है तो मुझे दुःखियारों के गाँव में जगह देना भले ही लोग उसे नरक कहें। तू मुझे पसन्द करे या न करे पर मैं तुझे पसन्द करूं। पसन्दगी से पहले हमारे रिश्ते सचाई और ईमानदारी के हों। हममें से कोई किसी को ठगे नहीं और ऐसा कुछ न कहें, जिसकी हकदारी वाजिब नहीं है। आस्तिक भले होते हैं या नास्तिक, यह पहचान तू अपने पास रख। मुझे वह बना जिसके मन में इंसान के ताई दर्द हो और वह दर्द सेवा सहायता के लिए मजबूर कर दे।”
“भले कामों में समय लगे या पूजा प्रार्थना में, इसका चुनाव यदि मेरे ऊपर छोड़ा जा सके तो मेरी पसन्दगी नोट की जाय कि मुझे भला बनना और बनाना पसन्द है। हे परम पिता! तेरे रहने की जगह यदि सातवें आसमान पर हो तो मुझे एक ऐसी टूटी झोंपड़ी में रहने देना जहाँ दुखियारों का बसेरा हो।”
आस्तिक बनना मुझे पसन्द है। पर वह आस्तिकता ऐसी न हो जो घमण्डी और पाखण्डी बना दे और करुणा को छीनकर कुछ और हाथ में थमा दे।
जैसे जैसे हम सचमुच ज्ञानवान होते जाते हैं, वैसे-वैसे उदारता बढ़ती जाती है।
अखण्ड-ज्योति गत 47 वर्षों से प्राणवान परिजनों व प्रज्ञा मिशन के दैवी सूत्र-संचालन के मध्य एक कड़ी की भूमिका निभाती आई है। जब-जब भी किसी परिजन ने स्वयं को विभीषिकाओं की- प्रतिकूलताओं को तमिस्रा में घिरा पाया है, उसे समाधान परोक्ष रूप से पत्रिका के माध्यम से सतत् मिलता रहा है। स्थूल दृष्टि रखने वाले परिजन प्रत्यक्ष संपर्क को ही सब कुछ मान बैठते हैं। एक सीमा तक यह स्नेह बन्धन उचित भी है, फिर भी यह मान्यता कि बिना पूज्य गुरुदेव से मिले- अपनी समस्या कहे, इनका निवारण होने वाला नहीं है, काफी सीमा तक इन दिनों खण्डित होती गई है। इसे एक-एक वर्ष के तीन अज्ञातवास की अवधि में पूज्य गुरुदेव ने कर दिखाया है कि यदि वे परोक्ष के पर्दे पीछे चले जायें तो भी वह सारी विधि-व्यवस्था स्वतः गतिशील रहेगी, अनुदानों का क्रम चलता रहेगा, किसी परिजन को निराशा नहीं होगी।
विगत बसन्त पर्व से पूज्य गुरुदेव ने प्रत्यक्ष संपर्क बहुत सीमित कर दिया था, फिर रामनवमी के बाद तो वह मात्र 1-2 तक ही सीमित होकर रह गया। आश्रमवासियों, नित्य आने वाले सैकड़ों भावुक दर्शनार्थियों तथा पत्रों से व्यक्त होने वाली भावनाओं से उस व्यथा की अनुभूति हुई जो किसी को अपने संरक्षक पिता-मार्गदर्शक की अनुपस्थिति से हो सकती है, हो रही थी। किन्तु जैसे-जैसे उनकी सूक्ष्मीकरण साधना ने प्रचण्ड रूप लिया, सभी को स्वतः ऐसा लगने लगा कि गुरुदेव हमसे दूर नहीं गए, और पास आ गए हैं। इतने समीप कि हम उनकी अनुभूति चौबीस घण्टे करते रह सकते हैं।
योगीराज अरविन्द ने अपने प्रत्यक्ष मिलने जुलने का क्रम इसी कारण बन्द किया था कि मनोकामना पूर्ति एवं शंका समाधान वाले तथाकथित जिज्ञासुओं वे नष्ट होने वाला समय बचे एवं वे अपना बहुमूल्य समय विश्व विभीषिकाओं को निरस्त करने में लगा सकें। श्री माताजी वह भूमिका निभाती थीं जो श्री अरविन्द ने बहुत समय तक सम्पन्न की थी। उनके वर्ष में 2 बार दर्शन से ही जनसाधारण को संतोष हो जाता था। उन्हें लगता था कि ऋषि के दृष्टिपात मात्र ने उनकी समस्याएँ दूर कर दीं। दैनन्दिन जीवन की उलझनें निष्ठावान व्यक्तियों की स्वतः मिट जाती थीं। अरविन्द आश्रम पांडिचेरी में अभी जाने पर तो वह अनुभूति सम्भवतः न हो पर जब श्री माताजी सशरीर विद्यमान थीं, वहाँ जाने वालों को सतत् यह आभास होता था कि योगीराज उनके स्वयं के आसपास हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के संकट भरे बादलों से मानवता को त्राण दिलाने, अणुबम की विध्वंस लीला की चपेट में एक व्यापक समुदाय को आ सकने से बचाने तथा भारत को स्वतन्त्रता दिलाने में उनने जो भूमिका परोक्ष रूप से निभाई, उससे सभी भली-भाँति अवगत हैं। कैसे चमत्कारी ढंग से गाँधीजी का अहिंसा आन्दोलन सफलता की ओर बढ़ता चला गया, इसका इतिहास पढ़ने वाले महर्षि अरविन्द एवं रमण की मूक-एकाकी साधना को भुला नहीं सकते।
आज परिस्थितियाँ उससे भी विषम हैं। तृतीय विश्वयुद्ध की सम्भावनाएँ हर घड़ी सबको भयभीत व चौकन्ना बनाये हुए हैं। एक बम विस्फोट ने अपने विकराल रूप द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध का समापन कर दिया था। आज वैसे ही न्यूट्रान बम जो उस एक अकेले से भी अधिक शक्तिशाली हैं, सारे विश्व के पन्द्रह से भी अधिक राष्ट्रों के पास कुल 60 हजार की संख्या से भी अधिक हैं। यह पृथ्वी को दसों बार पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त हैं। यदि इनका उपयोग न भी हुआ तो इन्हें ‘डम्प’ करने पर जो रेडियो धर्मिता वातावरण में फैलेगी उसकी परिणति वैज्ञानिक निरन्तर गत 2-3 वर्षों से बताते आ रहे हैं। वह एक यूटोपिया नहीं है, वरन् हकीकत है, एक कड़वी सच्चाई है।
मानव-मानव के बीच विषमता की खाई बढ़ती चली जा रही है। विश्व शान्ति की बातें एक मंच से होती है तो साम्प्रदायिक विद्वेष, जातिगत- ऊँच-नीच परक मतभेद दूसरे मंच से स्वर उठाने लगता है। विश्व दो खेमों में बँट गया लगता है। एक पूँजीवादी विचारधारा का पक्षधर कहा जाने वाला समूह जिसमें वे सम्पन्न साम्यवादी राष्ट्र भी आ जाते हैं जिनकी कथनी व करनी अलग-अलग हैं। दूसरा समूह है- तथाकथित तृतीय विश्व का जिसमें विश्व के सारे गरीब राष्ट्र आ जाते हैं। यह अनुपात 20-80 का है एवं प्रथम समूह जिसे “नार्थ ब्लॉक या ग्रुप” भी कहा जाता, द्वारा “साउथ ग्रुप” का शोषण निरन्तर बढ़ता जा रहा है। जब तक इन दोनों समूहों में ऐक्य नहीं स्थापित होता, विश्व-शान्ति बहुत दूर की बात है- विश्व युद्ध का संकट मानवता पर छाया ही रहेगा।
सामाजिक स्तर पर भी अपराध, अनाचार बढ़ते चले जा रहे हैं। सब असंतोष के दावानल में जलते दिखाई देते हैं। नैतिक मूल्य न राजनीति में दिखाई देते हैं, न लोक व्यवहार में। ऐसे मार्गदर्शन तन्त्र कैसे, कहाँ से विनिर्मित हो? कहाँ से ऐसी व्यवस्था बने कि क्रमशः इन विपन्नताओं का घटाटोप मिटता चला जाये एवं नवयुग की स्वर्णिम बेला आती दृष्टिगोचर होने लगे। जैसा कि परिजन पढ़ चुके हैं, ऋषि परम्परा की ही एक कड़ी के रूप में गुरुदेव का स्वयं का तप पुरुषार्थ इस दिशा में नियोजित हो रहा है। जहाँ सार्वभौम समस्याएँ हों, वहाँ वैयक्तिक समस्याओं का कोई महत्व नहीं रह जाता। जहाँ सबका फैसला एक साथ इधर या उधर होगा, वहाँ अपने स्वार्थ की बात सोचना तो अदूरदर्शिता ही है। फिर भी इस अवधि में हर परिजन ने अनुभव किया है कि युग साधना के पुण्य प्रयोजन में सहभागी बनने पर वे घाटे में नहीं रहे। प्रत्यक्ष दर्शन या मार्ग दर्शन न मिलने पर भी परोक्ष रूप से उन्हें वे प्रेरणाएँ सतत् मिलती रहीं जिनने उनकी उलझनें स्वतः सुलझा दीं।
ऐसी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का क्रम जारी है जिनसे प्रतीत होता है कि सूक्ष्मीकरण साधना के परिणाम जन सामान्य को हाथों-हाथ मिलते जा रहे हैं। प्रज्ञा परिजनों का तो एक सीमित परिकर हैं। युग ऋषि के समक्ष सारा मानव समुदाय है। उनकी साधना का नियोजन ही उस पुण्य कार्य में हो रहा है जिससे समस्त मानव जाति को सही विचारने एवं सही काम करने की प्रेरणा मिले। जिसे भी अन्तर्चक्षु प्राप्त हैं, उसने यह अनुभव किया है कि समष्टिगत वातावरण क्रमशः बदला है। ऐसे में कोई नहीं चाहता कि यह साधना क्रम टूटे। गुरुदेव का संकल्प भी यही है कि वे सम्भवतः बसन्त पर्व पर एक वर्ष का साधना क्रम पूरा होने पर दर्शन तो देंगे पर प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का- बातचीत का क्रम माताजी तक ही सीमित रहेगा। पर्व विशेषों पर दर्शन क्रम तो चलेगा पर होगा वह योगीराज अरविन्द की तरह निमित्त मात्र का ही। इसी में प्रज्ञा परिवार का व समस्त मानव जाति का कल्याण है, ऐसा कभी सोचते व व्यक्त भी करते हैं।
शान्ति-कुँज पहुँचने वाले पत्रों से विदित होता है कि प्रत्यक्ष दर्शन का सुयोग न मिलने पर हर घनिष्ठ आत्मीय जन को अनुदान स्वतः मिलते चले गए हैं। आत्मिक एवं भौतिक क्षेत्र में जिसने जो चाहा, पात्रता के अनुरूप उसे मिलता चला गया। जो भी शान्ति-कुँज आया, वह इस व्यथा से मुक्त होकर गया कि उसे प्रत्यक्ष दर्शन न हो पाए हों, पर उसे वह सब कुछ मिल गया जो उसने चाहा था।
निष्ठा की परीक्षा की भी घड़ी है यह। जिनने गुरुदेव को एक शरीर मात्र माना, आदर्शवादिता का समुच्चय नहीं, उनकी बात अलग है पर जिनने भी युग पुरुष को सही मायने में समझा है, उनकी सैद्धान्तिक निष्ठा व्यवहार में उतरकर आयी है। क्षेत्रों में उनकी क्रियाशीलता बढ़ी है तो केन्द्र से बहुमुखी गतिविधियों का उत्तरदायित्व सम्भालने वाला तन्त्र एक टीम के रूप में सक्रिय हो गया है। ऋषि तन्त्र की यही एक गरिमापूर्ण विशेषता है कि परोक्ष सूत्र संचालन द्वारा वह सामान्यों से भी वे काम करा लेता है जो मोटी नजर से असम्भव नजर आते हैं। जिनका बड़ा कार्य क्षेत्र है, उतना ही जटिल उसका सुनियोजन भी है। लेकिन वह उसी तरह सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रियान्वित हो रहा है, जैसी कि गुरुदेव की अपेक्षा रही है।
पाठकों-परिजनों को सूक्ष्मीकरण साधना की महत्ता एवं फलश्रुतियों को समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई है, यह प्रसन्नता की बात है। जून, जुलाई, व अगस्त के अंकों ने सभी को वस्तुस्थिति से अवगत कराया व पुरुषार्थ में जुट पड़ने हेतु प्रेरित किया है। सूत्र संचालन तन्त्र को इस प्रतिक्रिया से यह आश्वासन मिला है कि इस युग साधना में तनिक भी गतिरोध न आएगा एवं उनकी स्वयं की निष्ठा दैनन्दिन और प्रखर होगी। -ब्रह्मवर्चस्
(डा. हरगोविन्द सिंह)
युग द्रष्टा ने तुम्हें पुकारा, पृथ्वी-पुत्रों आओ। तरुणाई बेकार न जाए, ऐसा पथ अपनाओ॥
हाड़-माँस के पिण्ड नहीं तुम, सविता की संतानो, चीरो अन्धकार की परतें, अपने को पहचानो,
जिस भविष्य के लिए धरा ने सही प्रसव की पीरें, तुम उसको साकार बनाओ, पीटो नहीं लकीरें,
परम्परा ही नहीं सभी कुछ, प्रबल विवेक जगाओ। तरुणाई बेकार न जाए, ऐसा पथ अपनाओ॥
उसी भूमि पर जन्मे हो तुम, गूँजी जहाँ ऋचाएँ, ऋषि दधीचि, शिवि, हरिश्चन्द्र की अजर-अमर गाथाएँ,
रही दिखाती कर्मभूमि का मार्ग जहाँ पर गीता, जहाँ अहिंसा के साधक ने हिंसा का गढ़ जीता,
जो अतीत की ज्योति प्रखर है, उसे अखण्ड जलाओ। तरुणाई बेकार न जाए, ऐसा पथ अपनाओ॥
अनाचार, अन्याय, कपट को बना सिद्धि की सीढ़ी, महामानवों की छवि धूमिल करती बौनी पीढ़ी,
देवासुर संग्राम छिड़ा है गली-गली, घर-घर में, निर्णय करो, किधर जाना है, ऐसे विषम प्रहर में,
गूँजे शंखनाद संस्कृति का, ऐसी ध्वजा उठाओ। तरुणाई बेकार न जाए, ऐसा पथ अपनाओ॥
कीट-पतंगे भी बुन लेते निज का ताना-बाना, जीव प्रबुद्ध वही है जिसने युग का स्वर पहचाना,
खड़ा सामने आज मसीहा स्वयं मशाल उठाए, धरती पर ऐसा शुभ अवसर जाने फिर कब आए,
बहती गंगा द्वार तुम्हारे, तन-मन विमल बनाओ। तरुणाई बेकार न जाए, ऐसा पथ अपनाओ॥
*समाप्त*