जीवात्मा की तुलना विकास एवं पतन के सन्दर्भ में बीज से की जा सकती है। बीज की तीन ही गतियाँ होती हैं। पहली तो यह कि वह गलना सीखे और विकसित हो पौधे के रूप में स्वयं को परिणति कर विधाता की “एकोऽहं बहुस्यामि” घोषणा के अनुरूप अनेकों बीजों को जन्म दे। दूसरी गति यह कि वह पिसकर आटा बन जाये। आहार रूप में जीवधारियों के काम आये और अन्त में विष्ठा में परिणति होकर उपेक्षित हो खाद बन जाय। तीसरी गति यह कि वह भीरु, संकीर्ण बन सतत् अपने को बचाने की बात सोचता रहे और अन्त में सड़न-सीलन द्वारा नष्ट हो जाये।
मनुष्य की भी इसी प्रकार तीन गतियाँ हैं। गलकर परमार्थ प्रयोजनों में संलग्न हो अनेकों के काम आए। स्वयं यशस्वी जीवन जिए एवं अन्यों को ऊँचा उठाए। दूसरी गति है अपने शरीर एवं परिवार की परिधि में आबद्ध हो पेट-प्रजनन तक की समस्याओं की पूर्ति में ही उलझा रहे। पशु स्तर की जिन्दगी बिताए और घिनौनी स्थिति को प्राप्त हो। तीसरी गति है- संकीर्णता एवं स्वार्थपरता। जिससे न तो स्वार्थ ही सधता है न परमार्थ। अति कृपण स्वार्थ बुद्धि वाले ऐसे व्यक्ति अन्ततः सबसे हीन योनि को प्राप्त होते हैं।
मानव जीवन की सार्थकता, उपलब्ध क्षमताओं की तारीफ तभी है जब वह प्रथम गति का वरण कर देव मानव बनने का प्रयास करे। गलकर पुष्पित, पल्लवित हो अनेकों को सन्मार्ग गामी बनाए। रास्ते तीनों ही खुले हैं। जो जिसे चाहे, अपनाकर अपनी गति को प्राप्त कर सकता है। नित्य दैनन्दिन व्यवहार में यही तो हम देखते भी हैं।
डाक विभाग की ओर से थैले समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण अगस्त माह की पत्रिका के लिए पाठकों को काफी प्रतीक्षा करनी पड़ी, इसका हमें खेद है। काफी प्रयासों के बाद 19 अगस्त तक पत्रिकाएँ डिस्पैच की जा सकीं। ट्रेन में बैगों की लोडिंग आदि की समस्या भी बनी रहने के कारण प्रायः देरी हो जाती है। अखण्ड-ज्योति पत्रिका पाठकों का बौद्धिक आहार है। विलम्ब होने से व्यथा होना स्वाभाविक है। हमारे प्रयास तो यही रहते हैं कि पत्रिका परिजनों को समय पर मिलती रहे।
व्यवस्थापक
अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
एक राजा था। उसने राज्य के ज्ञानियों की परीक्षा करने के लिए एक विचित्र उपाय अपनाया। एक बकरा पाला। घोषणा की कि जो इसका पेट भर देगा उसे हजार स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार मिलेगा। बकरे को कोई भी सवेरे से शाम तक अपने साथ ले जा सकता है और पेट भर सकता है। शाम को यह राजा ही जाँचेगा कि पेट भरा कि नहीं।
घोषणा सुनकर बहुतों का उत्साह उभरा। काम जरा सा और सरल भी। इनाम इतना बड़ा। अनेकों लालायित हुए और उसे कर दिखाने का आवेदन लेकर राज दरबार में आये।
राजा ने सभी के नाम नोट कर लिए और बारी-बारी एक-एक बकरा सभी को मिलने का वायदा करते हुए, निश्चित दिन बता दिया।
अब सिलसिला शुरू हुआ। जिसकी पारी थी वह ले जाता और साधारण सी घास न खिलाकर- गेहूँ, चने आदि के पौधे खिलाता पूरी छूट देता और बढ़िया से बढ़िया हरियाली सामने रखता। शाम को इस आशा से दरबार पहुँचता कि उसे इनाम जरूर मिलेगा। पर परीक्षा के समय सभी को निरुत्तर होना पड़ता। राजा द्वारा जब घास सामने रखी जाती तो बकरा आदत के अनुसार उसे खाने लगता। फलतः उसका भूखा होना सिद्ध हो जाता।
रोज की इस घिस-घिस का रहस्य एक विचारशील ने समझा और नया उपाय सोच लिया। वह बकरे को खेत में ले गया और घास खाने के लिए जैसे ही उसने मुँह खोला वैसे ही एक छड़ी उसके मुँह पर जड़ दी। सारे दिन यही चलता रहा। बकरे को कुछ भी खाने का अवसर न मिला। वरन् वह खाने का प्रयत्न करते ही मार पड़ने के डर से इतना भयभीत हो गया कि चराने वाले के हाथ में छड़ी देखकर मुँह खोलना तो दूर उलटा मुँह फेर लेता और उसकी ओर पीठ कर लेता।
नई परिस्थिति में बकरे ने नई आदत अपना ली। तो वह व्यक्ति भूखे बकरे को लेकर राजदरबार में पहुँचा। रोज वाली परीक्षा की गई। बकरे के सामने घास थी। पर सामने ही चराने वाला छड़ी लेकर खड़ा रहा। भयभीत बकरे ने घास खाना तो दूर उलटे उस ओर से मुँह फेर लिया और पीठ कर ली।
दर्शकों ने तालियाँ बजाईं और चराने वाला विजयी घोषित हुआ और उसे सहस्र स्वर्ण मुद्राओं का इनाम मिल गया।
प्रसंग समाप्त हो जाने पर सभी विज्ञजन बुलाये गये। राजगुरु ने उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा अपना मन बकरा है। उसे भोग विलास की हरी घास खाने की रुचि है। इतने पर भी उसका पेट भरता नहीं, चाहे कितना ही कुछ क्यों न मिले। जैसे ही नई वस्तु सामने आती है वह आदत के अनुसार अपनी अतृप्त ललक का परिचय देता है और पेट भरा होने पर भी नये को खाने के लिए मचल पड़ता है। उसे तृप्त नहीं किया जा सकता भले ही कितना ही चारा क्यों न डाला जाता रहे।
उपाय एक ही है- रोकथाम करने का और छड़ी जमाने का। छड़ी जमाना अर्थात् अनुपयुक्त के दुष्परिणामों का बोध करना। यह अपने अनुभव से भी सीखा जा सकता है और दूसरों की दुर्गति का परिचय कराने पर भी। मन को मारना हो तो उसे संयमी बनाने और सही रास्ते पर चलने के लिए बाधित करने का उपयुक्त उपाय है। सरकस के जानवर वे रिंग मास्टर के हन्टर के इशारे पर करतब दिखाना सीखते हैं। मन को भी कड़े अंकुश, अनुशासन और प्रतिरोध से ही काबू में लाया जाता है।
सर्वेश्वर की उस सत्ता को प्रेम का- श्रद्धा का पर्याय माना गया है। शास्त्रकार ने कहा है- “रसों वैसः”। यह रस क्या है? वस्तुतः यह रस उस अनुभूति का नाम है जिसके आस्वादन मात्र से आत्मा को परम सत्ता से मिलन संयोग जैसी असीम तृप्ति होती है। यह रस प्रेम रस ही तो है। ईश्वर का साक्षात्कार जब भी होता है, अन्तःकरण से शाश्वत प्रेम के निर्झर के फूट पड़ने के रूप में ही होता है। यह अगोचर सत्ता रस से भरपूर है, जहाँ आदर्शवादी उमंगों का समुच्चय विद्यमान है, घट-घटवासी वह सर्वव्यापी सत्ता अपना अस्तित्व भाव-सम्वेदना, करुणा, परमार्थ के रूप में सतत् प्रकट करती रहती है। भक्त को क्या चाहिए? अपने अन्दर उस स्तर की श्रद्धा- भावनाओं की उत्कृष्टता ही तो वह गुण है जिसे विकसित कर भगवत् सत्ता का प्यार मिलता है। यही उसकी प्यास है, जो तृप्त अन्तःकरण को शान्त कर उसे श्रेष्ठता के पथ पर चलने को प्रेरित करती है।
भगवत् सत्ता से प्रेम किसी भौतिक आदान-प्रदान पर नहीं, आध्यात्मिक लेन-देन पर निर्भर है। भक्त को कुछ त्यागना पड़ता है और भगवान को अनुदान पाने वाले की गरिमा को ध्यान में रखना होता है। इस स्थिति में दोनों परस्पर पूरक बन जाते हैं । यह घनिष्ठता ही प्यार कहलाती है जो आदर्शों के परिपालन हेतु भक्त को पर्याप्त आत्मबल देती, उत्कृष्टता उभारती और सन्मार्ग पर चलने हेतु सहयोग देती है। इस प्रेम में पाने की नहीं, सतत् उत्सर्ग करने की- देते रहने की आतुरता बनी रहती है।
ईश्वर-भक्त का परस्पर सम्बन्ध भावनात्मक आदान-प्रदान का है। यह परम सत्ता श्रद्धा-प्रगाढ़ निष्ठा- दृढ विश्वास का समुच्चय है। जहाँ भी ये तत्व इकट्ठे होंगे, वहीं दैवी चमत्कार उत्पन्न होगा। एकलव्य का मृतिका का गुरु और रामकृष्ण का काली इन्हीं तत्वों के अभिवर्द्धन से अनुप्राणित हुए व सामर्थ्यवान बने थे। मीरा का गिरिधर गोपाल इन्हीं का घनीभूत मूर्त रूप था। वस्तुतः भाव-श्रद्धा का सम्मिलित रूप ही भक्ति है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं। श्रद्धा रहित भक्ति तो ढोल के समान पोल व आडम्बर मात्र है। ऐसी पंगु भक्ति में कोई सामर्थ्य नहीं होती। इसे सामर्थ्यवान बनाने के लिए श्रद्धा एवं अगाध निष्ठा का समन्वय अपरिहार्य है।
निश्छल हृदय से की गई प्रार्थना, भक्ति का ही एक रूप है, किन्तु दोनों में सूक्ष्म अन्तर है। प्रार्थना वेदनापरक होती है, जबकि भक्ति मस्तीपरक। दोनों प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से ईश्वर-साक्षात्कार के ही मार्ग हैं, पर उनके स्वरूप में थोड़ी भिन्नता है। लक्ष्य दोनों का एक ही है। भक्त अपनी गहन भक्ति के द्वारा भगवान से तादात्म्य जोड़ता है, वह ईश-चिन्तन में इतना मस्त हो जाता है कि उसे परिस्थिति, काल एवं स्वयं की भी सुधि नहीं रहती, दोनों के बीच की भित्ति टूट जाती है और भक्त-भगवान एक हो जाते हैं। चेतना रहते हुए भी वह बाह्य चेतना से विलग हो अपने इष्ट में पूर्णतः लीन हो जाता है। तब सर्वत्र उसे अपना अधिष्ठाता ही नजर आता है, समस्त जड़-चेतन उसी के प्रसार-विस्तार रूप में दिखाई पड़ते हैं। अपने-पराये की परिधि समाप्त हो जाती है। ‘स्व’ का सीमा बन्धन टूटना ही भक्ति का चरमोत्कर्ष है। भक्त-भगवान का मिलन-संयोग इसी स्थिति में होता है।
प्रार्थना में आत्मा की कसक होती है। घोर निराशा, असफलता, दरिद्रता अथवा दारुण दुःख में जब प्रार्थी की पुकार अन्तःकरण से प्रस्फुटित होती है, तो वह विधाता के पास पहुँचे बिना नहीं रहती। इस कातर-पुकार से भगवान या तो स्वयं प्रार्थी की सहायता के लिए दौड़े चले आते हैं अथवा किसी अन्य माध्यम से उसे समाधान प्रदान करते हैं, उसकी रक्षा करते एवं सहयोग देते हैं।
सम्पर्क-सूत्र इसी स्तर का होने से अभ्यर्थी की आवाज भगवान तक पहुँच पाती है, और भगवान की ओर से तभी उसका उत्तर भी प्राप्त होता है, अन्यथा उथले मन से लोभ-लिप्सा युक्त याचना तो अनसुनी ही रहती है। चूँकि विधि-विधान सम्बन्धी यह सत्ता भली-भाँति जानती है कि याचक फरेबी है और अन्यान्य मनुष्यों की तरह विधाता को भी भ्रमित करना चाहता है। सस्ती प्रार्थना के बदले अपने आपको न बदलने वाले बहूमूल्य उपहार के आकांक्षी आत्म-प्रवंचना में पड़े रहते समय गँवाते देखे जाते हैं। विधाता का यह शाश्वत नियम है कि वे ऐसे पाखण्डियों का साथ नहीं देते। उन्हें तो निश्छल और पवित्र मन वालों से प्रेम है, जो आडम्बरहीन हैं, उन्हें ही उनका अनुग्रह प्राप्त होता है।
अस्तु सच्चे मन से की गई प्रार्थना निरर्थक नहीं जाती, उसका कोई-न-कोई जवाब अवश्य मिलता है। एकबार रामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने उनसे पूछा कि क्या हर प्रार्थना सार्थक होती है? उनने उत्तर दिया “अन्तःकरण से की गई सच्ची पुकार भगवान तक अवश्य पहुँचती है, वह बेकार नहीं जाती, भक्त को उसका उत्तर भी प्राप्त होता है।
शिष्य का शंका समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने आगे कहा- “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, अर्थात् ब्रह्म अनन्त अपरिमित है। वह समस्त जड़-चेतन में उसी प्रकार रमा हुआ है, जैसे इस संसार में वायु के अणु। निराकार जल में जैसे साकार बर्फ जम जाती है, उसी प्रकार प्रार्थना रूपी शीतलता से उस अगोचर ईश्वर-सत्ता का साक्षात्कार किया जा सकता है। वह सत्ता सर्वज्ञ है, सर्व-शक्तिमान है। हम उसके आगे अबोध बालक से हैं। हमें सदा उसका नाम स्मरण करते रहना चाहिए, अपने अन्तर्मन में उसे सदा बिठाये रखना चाहिये।”
प्रार्थना की शक्ति के चमत्कारी परिणामों को भले ही विज्ञान सम्मत न माना जाय, इन्हें प्रमाण रूप में नित्य घटते देखा जा सकता है। आये दिन ऐसे अनेकों प्रसंग प्रकाश में आते व परमसत्ता की इस अलौकिकता का परिचय देते रहते हैं।
जापान में जोसुवा कस्बे में एक किशोरी सपरिवार रहती थी। नाम था येन। उसके पास किसी देवी की एक छोटी प्रतिमा थी। वह ऐसी सुघड़ थी, मानों साक्षात् देवी ही विराजमान हो। येन उससे बहुत प्यार करती थी। उसे सदा अपने कमरे में पलंग के सिरहाने एक छोटी मेज पर रखती थी और रात में सोते वक्त बहुत देर तक उससे बातें करती रहती, जैसे मूर्ति सचमुच उसकी बातें सुन रही हो। प्रतिदिन का यही उसका क्रम था।
दुर्दैव से एक बार वह बीमार पड़ी। आरम्भ में बीमारी को सामान्य समझकर घरवालों ने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया और स्वतः ठीक हो जाने की उम्मीद से छोड़ दिया, किन्तु मर्ज बढ़ता ही गया। घर वालो को चिन्ता हुई, तो उसे योग्य डॉक्टरों से दिखाया गया, मगर बीमारी उन्हें भी समझ नहीं आयी। येन बिल्कुल कंकालवत् बन गई। अब वह अपने कमरे में पलंग पर लेटी-लेटी देवी की प्रतिमा के सामने रोती रहती और उससे मूक प्रार्थना करती रहती। निरन्तर वह दिन-दिन शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होती जा रही थी। एक सप्ताह तक सब कुछ सामान्य क्रम में चलता रहा। एक सप्ताह बाद एक दिन अचानक मूर्ति की आँखों से आँसू झलकते दिखाई पड़े। आश्चर्य की बात कि जब से प्रतिमा ने रोना प्रारम्भ किया, येन उत्तरोत्तर ठीक होने लगी। देवी की प्रतिमा चौबीसों घण्टे रोती रहती, जिससे उसके नीचे बिछा कपड़ा पूरी तरह भीग जाता।
यह घटना बिजली की तरह चारों ओर फैली। बड़े-बड़े डॉक्टर व वैज्ञानिक भी उस दृश्य को देखने के लिए वहा उपस्थित हुए। उन्होंने आँसू का रासायनिक विश्लेषण किया। मानवी आँसू के ही सारे घटक उस जल में भी पाये गए। जब तक येन पूर्णतः ठीक नहीं हो गई, मूर्ति रोती रही। जिस दिन वह पूर्ण स्वस्थ हुई, प्रतिमा ने भी उस दिन से रोना बन्द कर दिया। इस घटना से जनसाधारण को प्रार्थना की शक्ति-सामर्थ्य पर विश्वास दिलाया, अनेकों में ईश्वर-निष्ठा विकसित की।
ऐसी ही एक घटना एक अमरीकी साहित्यकार के साथ घटी। अपटान सिनक्लेयर अपने जमाने के जाने-माने साहित्यकार थे। अमरीका में इनकी खूब ख्याति थी। विचारों से ये धार्मिक और ईमानदार प्रकृति के थे। भगवान में इनकी गहरी आस्था थी और प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-प्रार्थना किया करते।
उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है- “ प्रार्थना करते-करते मैं भाव-विभोर हो जाया करता था। इस स्थिति में मेरे अन्तरंग से बार-बार एक आवाज उभरती ‘ सिन! तुम अपनी आस्था और निष्ठा को बनाये रखना। मैं देखता हूँ, कि तुम्हारी पत्नी कुछ संशयवादी है, किन्तु तुम अपने विश्वास को घटने मत देना। यदि तुम्हारी आस्था डगमगायी, तो फिर हमसे नहीं मिल पाओगे। सिनक्लेयर का कहना है कि यद्यपि यह वाणी स्थूल रूप में नहीं होती थी, फिर भी मुझे उसके एक-एक शब्द स्फुट सुनाई पड़ते।”
इसी पुस्तक में एक अन्य सन्दर्भ के साथ उन्होंने लिखा है कि एकबार उनकी पत्नी गम्भीर रूप से बीमार पड़ी। उनका निवास एक ऐसे गाँव में था, जहाँ से शहर काफी दूर पड़ता था। पत्नी को तत्काल शहर के किसी अस्पताल में दाखिल कराने के लिए कोई परिवहन-सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी और न गाँव में कोई डॉक्टर-हकीम ही था। सबसे बड़ी परेशानी तो यह थी कि मर्ज रात में यकायक उत्पन्न हुआ और देखते-देखते गम्भीर बन गया। दूसरी बात, उन्हें इस नये मकान में आये अभी दो ही सप्ताह हुए थे। अन्तः आसपास के लोगों से भी पूरा परिचय नहीं हो पाया था। इस स्थिति में बीमारी की बात किससे कहें? सोच-विचार कर देखा, उपाय अब एक ही शेष था- ईश्वर। वे ही अब इस कठिन परिस्थिति में एकमात्र सहारा रहे गये हैं- वह विचार कर उनने प्रार्थना शुरू कर दिया।
वे स्वयं एक कमरे में थे और बगल वाले कमरे में उनकी पत्नी मरणासन्न अवस्था में पड़ी थी। रात भर वह बैठे ईसा की मूर्ति के सामने प्रार्थना करते रहे। सवेरा होने तक वे अभ्यर्थना करते रहे। यहाँ तक कि सूर्योदय हो गया, धूप चढ़ने लगी, तब भी वह बैठे ही रहे। अन्ततः पत्नी की पगध्वनि से सिनक्लेयर की तन्द्रा टूटी। पत्नी ने देखा, उनकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह रही थी। पत्नी को स्वस्थ देख आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता में उसने पूछा- “नैन्सी, जो कुछ में देख रहा हूँ, क्या वह सच है? क्या सचमुच तुम ठीक हो गई हो? नैन्सी ने हामी भरी और रात घटी एक विलक्षण घटना का उल्लेख किया। उसने बताया- ‘प्रार्थना में आपके बैठने के करीब दो घण्टे बाद मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे कोई दिव्य प्रकाश मेरे अन्दर प्रवेश कर गया हो। इसी के बाद से मेरी तकलीफें धीरे-धीरे घटने लगीं। एक घण्टे बाद मेरे स्वास्थ्य में काफी सुधार हुआ, किन्तु इसी बीच नींद आ गई। अभी-अभी जब नींद खुली, तो मुझे आपके प्रार्थना में बैठने की याद आयी और आपको देखने के लिए यहाँ चली आयी।
अपनी भारत भ्रमण यात्रा के दौरान पाल ब्रण्टन एक बार बनारस पहुँचे। वहाँ उनकी एक प्रसिद्ध ज्योतिषी सुधी बाबू से भेंट हुई। बातचीत से ज्ञात हुआ कि सुधी बाबू अब अपने परिवार में अकेले हैं और यहीं अपने मकान में रहते हैं। ब्रण्टन महोदय ने जब उनकी ज्योतिष सिद्धि के बारे में पूछा, तो उनने कहना आरम्भ किया- “बचपन में मैं बहुत मन्द बुद्धि का था। कुछ भी पढ़ता तुरन्त भूल जाता । परीक्षाओं में असफल रहता। इससे माँ-बाप बराबर झिड़की दिया करते। कुछ समय तक तो मैं इसे सहता रहा, पर जब दिन-प्रतिदिन यही क्रम बन गया, तो मैं परेशान हो उठा और इसके लिए भगवान से मौन प्रार्थना करने लगा। अभ्यर्थना से मेरा हृदय कभी-कभी बुरी तरह टूट जाता। लेकिन अन्दर से सदैव यही स्फुरणा मिलती रही कि “प्रार्थना निरन्तर करते रहना। कभी मुझे भूलना नहीं”। इस अन्तर्ध्वनि से मेरा हृदय इतना भावुक हो उठता, कि प्रायः मैं रो पड़ता। लम्बे समय तक मेरा यह क्रम चलता रहा। अचानक एक दिन मुझे एक स्वप्न दिखाई पड़ा। सपने में एक दिव्य-पुरुष मुझसे कह रहे थे- ‘तुम ज्योतिष का अध्ययन शुरू करो, सफलता मिलेगी।’ तभी से मैंने अपना सारा ध्यान ज्योतिष पर केन्द्रित कर दिया। ज्योतिष शास्त्र की दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन और संग्रह आरम्भ किया। उसी प्रार्थना का परिणाम है कि आज मेरा भवन ज्योतिष शास्त्र की एक अनुपम लाइब्रेरी के रूप में परिणित हो गया है, ज्योतिष विद्या की अनेकों अच्छी व दुर्लभ पांडुलिपि के रूप में मुझे यह ज्ञान सम्पदा मिली है।” सुधी बाबू ज्योतिष में इतने निष्णान्त थे कि मात्र सामान्य अंक गणना द्वारा हर व्यक्ति का जीवन-वृतान्त बता देते थे।
गाँधीजी प्रार्थना को आत्मा का आहार मानते थे। उनके अनुसार यह अध्यात्म का पहला कदम है। इसमें खरा उतरने के बाद ही व्यक्ति आगे के सोपानों का श्रेयाधिकारी बन सकता और सफलता पा सकता है। उनका कहना था, अध्यात्म की शुरुआत आत्म-परमात्मा तत्वों के अस्तित्व स्वीकारोक्ति से ही होती है। इसके बाद ही इसकी गहराई में प्रवेश का सुयोग बनता है। अपने अन्दर इन तत्वों को परिपुष्ट और सुविकसित बनाने के लिए वे प्रार्थना-उपासना-सेवा को ही प्रमुख मानते थे और आत्मा को इन्हीं उपचारों से पोषण प्राप्त होने की बात कहते थे।
हालीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता पीटर सेलर्स के जीवन में भी एक अद्भुत घटना घटी थी। आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व की बात है। वे अपने दो इंजिन वाले विमान द्वारा बरमूडा त्रिकोण पार करने का प्रयास कर रहे थे। अमेरिका के पूर्वी तट की ओर स्थित इस रहस्यमय त्रिभुज के बारे में पहले कई रहस्यमय घटनाक्रम प्रकाश में आ चुके थे। फिर भी खतरों से खेलने वाले ऑकल्ट के प्रेमी इस व्यक्ति ने अपनी उड़ान जारी रखी। उन्हें पता था कि उड़न तश्तरी से लेकर वायुयान गायब होने जैसे कई प्रसंग इससे जुड़े हैं। इन प्रसंगों पर सोचते सोचते वे लगभग इस त्रिभुज को पार कर ही चुके थे कि उन्हें लगा, वायुयान उनके नियन्त्रण के बाहर जा रहा है। वह बड़ी तेजी से नीचे गिरने लगा जबकि एल्टीट्यूड मीटर सही रीडिंग दे रहा था। उनका कहना है उन्हीं क्षणों में उन्हें अपनी भारत यात्रा के दौरान एक हिन्द योगी द्वारा सिखाये गये गायत्री मन्त्र का स्मरण हो आया। आसन्न मृत्यु संकट से ध्यान हटाकर वे पूरी श्रद्धा व निष्ठा के साथ इस मन्त्र का सतत् जप करने लगे। जप के समय आँखें बन्द थीं प्रार्थना चल रही थी लेकिन इन्द्रियाँ विमान के नियन्त्रण में संलग्न थीं। जब कुछ क्षणों बाद उनकी आँखें खुली तो उन्होंने देखा कि खतरा टल चुका है, वे जीवित हैं और उनका विमान उस त्रिभुज को पार कर बरमूड़ा द्वीप पर आ चुका है। इस अनुभूति को उन्होंने अमेरिका के मुख्य पत्रों में प्रकाशित करवाया व लिखा कि “इस मन्त्र के जप में ईश-प्रार्थना में अद्भुत शक्ति-सामर्थ्य है। मैंने तो इसकी अनुभूति मात्र की है। वैज्ञानिक यदि जप प्रक्रिया व प्रार्थना शक्ति के परिणामों पर अनुसन्धान कर सकें तो यह सबसे बड़ा शोध कार्य होगा।”
सुप्रसिद्ध लेखक एरिकवॉन डैनिकन ने अपनी पुस्तक “मिरेकल्स ऑफ गॉड्स” में अनेकों ऐसे चमत्कारों का वर्णन किया है जो प्रार्थना की प्रतिक्रिया स्वरूप अभी भी घटते देखे जा सकते हैं। इनमें से एक फ्रांस के “लॉर्डिस” स्थान से सम्बन्धित घटना यहाँ उल्लेखनीय है। इसे न केवल ईसाई वरन् सभी धर्म समुदाय एक तीर्थ मानते हैं। दुनिया के कोने-कोने से लाखों की संख्या में जन समुदाय प्रतिवर्ष यहाँ एकत्र होता देखा जा सकता है। इस स्थान पर एक कन्या बर्नेडेट ने 28 वीं शताब्दी में प्रार्थना द्वारा ईसा से साक्षात्कार किया था।
वस्तुतः सभी धर्म मतावलम्बियों ने प्रार्थना शक्ति को ईश्वरीय सत्ता से साक्षात्कार का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना है। भगवान की आकृति कुछ भी हो, श्रद्धा-भक्ति से की गई प्रार्थना के द्वारा उसके साथ निश्चित ही तादात्म्य बिठाया जा सकता है। आत्मिक प्रगति का लक्ष्य इन दोनों के समन्वय से ही पूरा होता है। भक्तियोग की साधना तत्काल प्रतिफल देने वाली है, लेकिन इसका क्रम ज्ञानयोग, कर्मयोग की सिद्धि के बाद ही आता है। श्रद्धा को श्रेष्ठता से प्यार माना गया है एवं भक्ति को उदार आत्मीयता एवं सेवा सज्जनता। पात्रता प्राप्ति के बाद की गयी निश्छल प्रार्थना निश्चित ही अपने सुपरिणाम दिखाती है साधक को धन्य बना देती है।
कवि के उद्गार हैं कि किसी सज्जन पुरुष द्वारा सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती- “केषां न स्यादभिमतफला प्रार्थना ह्युत्तमेषु।” प्रार्थना आत्मा का आहार है। भक्त को भगवान से जोड़ने वाला धागा है। आसन्न विपत्तियों और प्रत्यक्ष दृश्यमान प्रतिकूलताओं से जूझने हेतु आत्मबल सम्पन्न साधक के लिए प्रार्थना ही एकमात्र अवलम्बन है।
चिन्तन से चरित्र और चरित्र से व्यवहार बनता है। व्यवहार ही कर्म है। कर्म से परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। पदार्थों का संचय और अनेकों का सहयोग सत्कर्मों के आधार पर ही सम्भव होता है। सत्कर्म और कुछ नहीं सद्विचारों के ही प्रतिफल हैं। प्रगति के सुविस्तृत वृक्ष का उद्भव जिस बीज के अंकुरित होने के कारण होता है उसे उपयुक्त दिशा में बहने वाला विचार प्रवाह कह सकते हैं।
विचारों की दो दिशा धाराएँ हैं एक विधेयात्मक दूसरी निषेधात्मक। इंजन आगे भी चलता है और पीछे भी। कृत्यों में सत्कर्म भी सम्मिलित है और दुष्कर्म भी। ज्वार-भाटे की तरह उत्थान और पतन की भी द्विधा इस संसार में गतिशील है। पुण्य और पाप का स्वर्ग नरक इन्हीं के आधार पर विनिर्मित होता है। विचारों को सही दिशा दे सकना ही परम पुरुषार्थ माना गया है।
अपने आपको दीन, दुःखी, दरिद्र, दुर्भाग्यग्रस्त मानते रहने का जी हो तो इसका बहुत ही सरल तरीका यह है कि अपने से अधिक सुखी समुन्नत लोगों के साथ तुलना करने लगिये। स्थिति पिछड़ी हुई दिखाई पड़ती रहेगी। इसके विपरीत यदि वर्तमान स्थिति में ही सुखी सम्पन्न, सौभाग्यवान मानने का मन हो तो वैसी मान्यता बन जाने में भी कोई देर न लगेगी। अपने से दुःखी दरिद्रों के साथ तुलना कीजिए। तुरन्त प्रतीत होगा कि हम लाखों करोड़ों से कहीं अधिक अच्छी स्थिति में हैं। कुबेर भी अपने को दरिद्र कह सकते हैं क्योंकि उनसे अच्छी स्थिति लक्ष्मी के पति लक्ष्मी नारायण तो होंगे ही। इसी प्रकार ऋषि कल्प लोगों को अपने कमण्डल जैसे उपकरणों में भी कुछ अनावश्यक और किसी को दे डालने योग्य प्रतीत हो सकता है। यह सब विचारों का चमत्कार है। वे जैसे भी होंगे वैसी ही अनुभूति होगी और मान्यता बनेगी। वस्तुतः मनःस्थिति ही परिस्थिति का बोध कराती है।
भविष्य के सम्बन्ध में अन्धकार और संकट में भरी-पूरी सम्भावनाएँ मजे में गढ़ी जा सकती हैं। कल्पना पर कोई रोक-टोक नहीं। उन्हें जैसा भी चाहें गढ़ा जा सकता है। इसके समर्थन में तर्क, तथ्य, कारण और उदाहरण भी ढूँढ़े जा सकते हैं। फुन्सी बढ़कर कैन्सर बन जाने के- जुकाम बिगड़कर तपेदिक होने के ऐसे अनेकों उदाहरण मिल सकते हैं जिनमें लोगों के प्राण चले गये। कोई चाहे तो फुन्सी उठते या जुकाम होते ही उसके बढ़कर भयंकर होने और मरण होने की बात मन में बिठाई जा सकती है। मान्यता की पुष्टि के लिए उस प्रकार की घटनाओं का स्मरण करते रहा जा सकता है। इसके विपरीत यदि आशावादी विचार पद्धति हो तो उन उदाहरणों की भी कमी नहीं जिनमें असाध्य समझे गये रोगी भी अच्छे हुए और बाद में लम्बी अवधि तक जिये हैं। दोनों में से किस स्तर की कल्पना की जाये और भविष्य को अन्धकारमय या उज्ज्वल अनुभव किया जाय, यह पूर्णतया अपनी मर्जी की बात है। बातें दोनों ही सही और दोनों ही गलत हैं। यथार्थता यह है कि भविष्य का किसी को बोध नहीं। बात कोई निश्चित नहीं। भवतव्यता को भगवान को पता हो सकता है। मनुष्य उससे पूर्व ही- अघटित घटनाओं की कल्पना के सहारे किसी भी स्तर की गढ़ सकता है और समय आने से पूर्व भी उद्विग्न या प्रसन्न रह सकता है। दोनों में से किसे चुना जाये यह अपनी मर्जी की बात है।
जिस स्तर के विचार मस्तिष्क में घूमते रहते हैं वैसी ही अभिरुचि एवं आकाँक्षा ढलने लगती है। धीरे-धीरे वैसा ही स्वभाव बन जाता है। क्रिया पद्धति भी वैसी ही ढलने लगती है। साथी सहयोगी भी उसी स्तर के जुटने लगते हैं फलतः समूचा वातावरण ही उस स्तर का बन जाता है जैसों का मनःक्षेत्र में चिन्तन प्रवाह बहाया गया। अभिरुचि में सृजनात्मक शक्ति है वह अपने अनुरूप सरंजाम जुटाने में बहुत हद तक सफल होती रहती है। चोर जुआरी अपने जैसों की चाण्डाल चौकड़ी जुटा लेते हैं। वे उन्हें ढूँढ़ लेते हैं या उस प्रकृति वाले खोजते-खोजते पास आ पहुँचते हैं। सन्त सज्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनकी देव मण्डली में बनती और घनिष्ठता बढ़ती रहती है। विभिन्न स्तर के समुदाय, क्लब, संगठन इसी आधार पर खड़े होते हैं। उसके लिए कोई बहुत बड़ा प्रयत्न नहीं करना पड़ता। प्रकृति एक जैसों को एक जगह इकट्ठा कर देती है। पशु पक्षियों तक में ऐसा होता है तो मनुष्यों में ऐसा क्यों न होगा। स्वर्ग और नरक में अनुरूप और अनुकूल प्रकृति के लोग उपयुक्त परिस्थितियों में जा पहुँचते हैं। सृष्टि व्यवस्था इस प्रयोजन में सहज सहायता करती रहती है।
एक ही परिस्थिति में एक ही जगह जन्मे दो व्यक्तियों के दिशा धाराओं में क्रिया और सफलताओं में आश्चर्यजनक जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया गया है। इसका कारण और कुछ नहीं उनकी विचार भिन्नता भर है। परिस्थितियाँ मनुष्य को कुछ बनाती है यह आंशिक सत्य है। केवल दुर्बल मनोभूमि के लोगों पर ही यह उक्ति लागू होती है। हवा के साथ तिनके और पत्ते उड़ते रहते हैं। यह जितना सही है, उससे ज्यादा सही है लोग झाड़ियाँ काटकर राह बनाते और दुर्गम पर्वतों पर जा चढ़ते हैं। मनोबल का चुम्बकत्व ऐसा प्रचण्ड है कि अपने अनुरूप साधन एवं सहयोग अर्जित कर सके। मनस्वी लोग अनुकूल वातावरण बनाते या फिर खोजते-खोजते यहाँ तक जा पहुँचते हैं।
प्रगतिशील महामानवों की जीवनचर्या का तात्विक विश्लेषण करने पर यह तथ्य सभी पर समान रूप से लागू होता है कि दिशाधारा का निर्माण सृजनात्मक विचार पद्धति ने किया। वे उन पर दृढ रहे। प्रतिकूलताओं में भी मान्यताओं के दीपक जलते रहे। निर्धारित लक्ष्य की ओर नियमित रूप से बढ़ते रहे। मार्ग में अड़चने आईं, निरुत्साहित करने वालों की कमी नहीं रही, फिर भी वे विचलित नहीं हुए। कदम तो कभी धीरे कभी तेज उठे पर वे रुके नहीं। संकल्प बल साथ देता रहा। फलतः वे वहा पहुँचे जहाँ उन्हें समुचित श्रेय तथा सम्मान मिल सका। ठीक यही बात उन पर भी लागू हुई है, जो हेय चिन्तन के कुचक्र में फँसे रहे, कुसंग में निरत रहे, दुर्व्यसनों के अभ्यस्त बने और क्रमशः अनुपयुक्त मार्ग पर एक के बाद दूसरा कदम उठाते चले गये। परिणति अत्यन्त दुःखदायी हई। पतन और पराभव के गर्त में गिरे और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़े करते चले गये। मोटे रूप में इन दोनों के मध्यवर्ती अन्तर घटनाक्रमों परिस्थितियों और सहयोगियों के साथ भी जुड़ता है किन्तु वास्तविकता यही थी कि मनःस्थिति ने परिस्थितियाँ गढ़ीं और उत्थान पतन के सरंजाम जुटा दिये। जिन्हें वातावरण घसीटता रहता है वे एक सीमा तक ही आगे-पीछे हट या बढ़ पाते हैं। असाधारण स्तर की भली या बुरी प्रगति में मनुष्य की विचारधारा ही प्रमुख भूमिका निभाती है।
आमतौर से साधनों को महत्व दिया जाता है और परिस्थितियों को उत्थान-पतन का निमित्त कारण माना जाता है। पर वस्तुतः वैसा है नहीं। यदि ऐसा ही होता तो हेय परिस्थितियों में जन्मे लोग सदा वैसे ही बने रहते। जो सम्पन्न परिस्थितियों में जन्मे वे सुविधाओं के आधार पर कहीं से कहीं जा पहुँचते। पर ऐसा होता नहीं। मनःस्थिति ही दिशा विशेष में जीवन क्रम को धकेलती है और फिर दौड़ती रेल के पीछे उड़ते पत्तों की तरह साधन और सहयोग भी अनायास ही खिंचते जुटते चले जाते हैं। मनुष्य मनोबल का धनी है। इसी के सहारे वह अपनी दुनिया वैसी बना लेता है जैसा कि उसने चाहा है। अपने को ढालने और धकेलने की क्षमता हर किसी में विद्यमान है। उसका उपयोग निषेधात्मक और विधेयात्मक विचारों के रूप में पतन या उत्थान के निमित्त किया जाता रहता है। सफलताएँ इसी आधार पर मिलती हैं।
वचनों का बवण्डर भले ही समुद्र जितना विस्तृत क्यों न हो, उससे आत्मा की प्यास नहीं बुझती। इसके लिए कर्म के चुल्लू का प्रयोग करना पड़ेगा, भले ही वह आकार में छोटा हो।
यदि परब्रह्म की परिभाषा व्याख्या करनी हो तो सृष्टि के कण-कण में संव्याप्त नियम चेतना, अनुशासन व्यवस्था को देखना होगा। सूक्ष्म दृष्टि से देखने वाले पार्टीकल फिजिक्स के ज्ञाता कहते हैं कि पदार्थ के न दीख पड़ने वाले छोटे कणों से लेकर जीवाणु-विषाणु तक एवं तारा मण्डलों के समूहों में गतिमान फोटॉन-लक्सान कणों तक के बीच एक अत्यन्त सजग अनुशासित विधि-व्यवस्था कार्यरत दिखाई पड़ती है। इकॉलाजी के इसी पक्ष को नियामक सत्ता को विज्ञान की दृष्टि में ईश्वर कह सकते हैं। आस्तिकता का यही एक प्रमाण ऐसा है जिसे पूर्णतः विज्ञान सम्मत कहा जा सकता है।
नास्कितावादी दर्शन के प्रणेता- नीत्से ने आज से कोई सौ वर्ष पूर्व घोषणा की कि “ईश्वर अब अन्तिम रूप से मर गया है। उसका प्रादुर्भाव अब अतिमानवों की पीढ़ी के रूप में होगा।” उसने कहा था कि तलाशने का कितना भी प्रयास किया जाये, ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं दिखता। इस घोषणा ने एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में तहलका तो मचा दिया पर वैज्ञानिकों को ईश्वर परब्रह्म की सही व्याख्या हेतु अनुसन्धान हेतु भी प्रेरित किया। पदार्थ विज्ञान के ज्ञाता जब “यूनिफिकेशन ऑफ फोर्सेज” की चर्चा करते हैं तो ऊर्जा के रूप में पदार्थ में छिपी चेतना के स्वरूप की एक झाँकी देख पाते हैं एवं जितना इस रहस्य को खोजने का प्रयास करते हैं उतना ही गहरा इसे पाते हैं।
गत सौ वर्षों की वैज्ञानिक प्रगति का इतिहास पदार्थ भौतिकी के उद्भव विकास का नहीं, कण-कण में संव्याप्त चेतन सत्ता की प्रगति का इतिहास कहा जा सकता है। पदार्थ दिखाई पड़ता है, लेकिन उसमें छिपी ऊर्जा दृश्यमान नहीं है। शरीर दृष्टिगोचर होता है लेकिन आत्मा नहीं। कारण यह है कि पदार्थ व शरीर स्थूल है, अतः वह स्थूल नेत्र से दृष्टिगोचर हो जाता है तथा सहज ही उस पर विश्वास हो जाता है। इसके आगे सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत मन आता है, जिसकी क्रिया से तो हम सब परिचित होते हैं, परन्तु उसे प्रत्यक्ष देखना सम्भव नहीं। इसी तरह अति सूक्ष्म आत्मा को देखना तो और भी दुष्कर है।
कोई चीज दीखती नहीं इससे उसके अस्तित्व को झुठलाया नहीं जा सकता। मनुष्य की तो देखने व सुनने की भी सीमा है। एक खास वेवलेन्थ पर ही हम देख अथवा सुन सकते हैं। इससे कम अथवा अधिक वेवलेन्थ की ध्वनि अथवा दृश्य हमारे किसी काम के नहीं। प्राप्त जानकारी के अनुसार मनुष्य के कान केवल उतने ही ध्वनि कम्पन पकड़ सुन सकते हैं, जिनकी गति 33 प्रति सेकेण्ड से लेकर 40 प्रति सेकेण्ड के बीच होती है। जबकि ब्रह्माण्ड में इससे अधिक गति के ध्वनि कम्पन, जो शरीर को नुकसान पहुँचा सकते हैं, सदा गुँजित होते रहते हैं। 75 डेसीबल की ध्वनि मनुष्य के लिए असह्य हो जाती है। आमतौर से आपसी बातचीत का क्रम 10-20 डेसीबल पर चलता है। 150 डेसीबल पर शरीर में भारी विक्षोभ उत्पन्न होता है। एक तारे के टूटने मात्र से भयंकर गर्जना होती है, जो हमें बहरा बना दे सकती है, परन्तु वह हमें सुनाई ही नहीं देती।
पानी में विद्यमान अगणित जीव-जन्तु, आसमान में छाए असंख्य तारे इन आँखों की पकड़ में नहीं आते। सूर्योदय सूर्यास्त के समय आसमान में छाया रंग-बिरंगा वातावरण दृष्टि भ्रम ही होता है। वस्तुतः वहाँ कोई रंग का अस्तित्व ही नहीं होता। सिनेमा के पर्दे पर सिलसिले वार चलने वाला दृश्य मात्र तीव्र गतिशीलता का खेल है। उसकी तीव्र गति के कारण हम दो चित्रों के बीच के अन्तर को समझ नहीं पाते। रेगिस्तान में मृग मरीचिका का उदाहरण सर्वविदित है, जहाँ दृष्टि भ्रम के कारण सरोवर के अस्तित्व का बोध हो जाता है। चन्द्रमा से देखने पर पृथ्वी आसमान में स्थित दिखती है। रंग की पहचान दृष्टि भी, हर व्यक्ति में अलग-अलग होती है। सूर्य का रंग वास्तव में श्वेत होता है, परन्तु वायुमंडल के धूलि कण के कारण वह लाल-सा प्रतीत होता है। अनन्त आकाश से विद्युत चुम्बकीय किरणें सतत् पृथ्वी पर बरसती रहती हैं। इन्हें विज्ञान की भाषा में ‘कॉस्मिक रेज’ कहते हैं। मनुष्य को इसका कभी भान नहीं हो पाता।
विज्ञान ने अब यह स्वीकार किया है कि यह जगत वास्तव में तरंगों का समुच्चय है। एक शब्द में यहाँ जो कुछ भी है सब तरंगमय है। जो भी दीखता अथवा जिसकी अनुभूति होती है, वह सब क्वाण्टा यानि तरंगों के समन्वित रूप के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। भौतिक विज्ञान की एक शाखा पार्टिकल फिजिक्स के अनुसार प्रत्येक पदार्थ की संरचना इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान जैसे सूक्ष्म विद्युत कणों के आधार पर हुई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जगत की हरेक वस्तु एक दूसरे से सम्बन्धित ही नहीं वरन् एक ही है। जड़ चेतन सभी में एक ही सत्ता विद्यमान है तथा सबका उद्गम केन्द्र भी वही है। दूसरी तरफ शक्ति के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों का जीवन काल एक सेकेण्ड का दस करोड़वाँ हिस्सा तथा गति 1 लाख 86 हजार मील प्रति सेकेण्ड (प्रकाश की गति) बताई गई है। अतः इनके मापन अथवा वर्गीकरण में वैज्ञानिक असमर्थता व्यक्त करते हैं। फिर भी इस ओर और भी अधिक शोध प्रयास करने की आवश्यकता को अनुभव किया गया है। क्वाण्टम थ्योरी विशेष रूप से इस विषय से सम्बन्धित अध्ययन में ही संलग्न है। यह थ्योरी शक्ति के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों का अध्ययन विश्लेषण करती है। डॉ. यूनीन पी. विग्नर ने चेतना की जानकारी प्राप्त करने हेतु इसे एक महत्वपूर्ण माध्यम बतलाया है।
शोध निष्कर्ष के रूप में सर ए. एस. एडिंगृन का कथन है कि ‘भौतिक पदार्थों के अन्तराल में एक चेतन शक्ति क्रियाशील है, जिसे उसका प्राण-जीवन का आधार माना जा सकता है। अब तक हम इसके स्वरूप एवं क्रिया-कलाप से अवगत नहीं हो सके हैं, पर उसके अस्तित्व को झुठलाया नहीं जा सकता। वैज्ञानिक मैकब्राइट ने भी अपना अध्ययन निष्कर्ष इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि परोक्ष जगत् में एक ज्ञानयुक्त एवं इच्छायूक्त सत्ता के होने की पूरी सम्भावना है। विश्व की समस्त गतिविधियाँ उसी से संचालित हैं। डॉ. मोर्डेल ने भी कहा है कि ‘अणु और पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों का व्यवहार से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि परोक्ष जगत में कोई चेतन शक्ति अवश्य क्रियाशील है।
प्रख्यात वैज्ञानिक इंगोल्ड ने भी कहा है- ‘सृष्टि से क्रियाशील चेतन शक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझने में अभी हम असमर्थ हैं।’
भारतीय तत्त्वदर्शियों ने इस विषय में महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं। उनने चेतना के व्यापक स्वरूप के विषय में यह दर्शन प्रतिपादित किया था-
एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूता धिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च। -श्वेता श्वेतरः 6।11
अर्थात्- वही एक देव सभी प्राणियों में अन्तरात्मा रूप में व्याप्त तथा समस्त कर्मों का नियामक संचालक है। निर्गुण होते हुए भी चेतना शक्तियुक्त है। समस्त क्रिया-कलापों का साक्षी है।
ईशोवस्योपनिषद् में भी इसी प्रकार का उल्लेख मिलता है कि “वह गतिमान है, स्थिर भी है। दूर है और निकट भी है। वह हरेक के अन्दर और बाहर भी स्थित है।” स्पष्ट है कि ऐसा सर्वव्यापक स्वरूप चेतन शक्ति- विद्युतीय ऊर्जा का ही हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने मात्र इतना ही कहा है कि उनके वर्तमान साधनों से ईश्वर के अस्तित्व का परिचय नहीं मिलता। यह कभी नहीं कहा कि यह उनका अन्तिम निष्कर्ष है, ज्ञान की चरम सीमा है, जो जान लिया गया वही अन्तिम है। विनम्र शब्दों में कहा जाये तो यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि विज्ञान दुराग्रही नहीं है। भविष्य में सम्भावित नयी खोजों के लिये उसका द्वार हमेशा से खुला रहा है। बचपन का विज्ञान किशोरावस्था से गुजर कर अब जैसे-जैसे प्रौढ़-परिपक्व हो रहा है, जानकारियाँ अधिक सम्भावनाओं से भरी, संशोधित एवं नितनूतन उपलब्ध होती जा रही हैं। हर नवीन शोध पिछली को नकारती ही नहीं, नये प्रतिपादन प्रस्तुत कर प्रगति क्रम को और आगे बढ़ा देती है। ऐसी व्यवस्था न होती तो विज्ञान कैसे प्रगति कर पाता? उसकी शोध अनुसंधान के अनेकानेक विषयों में एक खोज ईश्वर की, विधि-व्यवस्था का संचालन करने वाले नियन्ता की भी है। यह सोचना अकारण नहीं है वह दिन दूर नहीं जब साधनों से तो नहीं, अपने तर्क- प्रतिपादन- तथ्यों के सहारे दर्शन की बैसाखी पर चलकर पंगु विज्ञान अपनी इस मंजिल को अवश्य पूरी करेगी।
दर्शन शास्त्र के अनुसार ईश्वर का “एकोऽहम् बहुस्यामि” का उद्घोष इस बात का प्रमाण है कि ब्राह्मी चेतना एक ही है। उसी का विस्तार इस जगत रूपी माया के स्वरूप में प्रकट हुआ है। बिजली की धारा से जिस तरह अनेकानेक कार्य किये जा सकते हैं, उसी तरह ब्राह्मी चेतना का उपयोग अनेकों रूपों में प्रकट होता है। विद्युत सूक्ष्म है परन्तु उसकी क्रियाशीलता स्थूल में अनुभव की जा सकती है। स्थूल का अस्तित्व भी विद्युत के आधार पर ही टिका रहता है। ठीक इसी प्रकार निराकार ब्रह्म शक्ति को प्रत्यक्ष जगत की क्रियाशीलता में अनुभव किया जा सकता है तथा प्रत्यक्ष जगत का प्राणाधार भी वही होता है।
ऋषियों ने इस जगत के गूढ़ रहस्यों का अध्ययन, यन्त्रों के आधार पर नहीं, अन्तर्दृष्टि- आत्मज्ञान के आधार पर किया था। उनने प्रमाणित कर दिखाया था कि जो मनुष्य के भीतर है वही बाहर भी है तथा जो बाहर है वही भीतर भी है। उनने मानव मात्र के अन्तराल की खोज को समस्त ब्रह्माण्ड की खोज बतलाई थी। एक शब्द में उनने इस विषय को ‘आत्मिकी’ के नाम से पुकारा था। जिसका भावार्थ है अपने आप को- अपने अन्तरंग में छिपे गूढ़ रहस्यों को जानने की साधना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ध्यान-साधना का रास्ता सुझाया गया था।
जल की सतह पर यदि हलचल मची हो तो उसकी परत को देखना सम्भव नहीं। ठीक उसी प्रकार मन में ज्वार-भाटे उठते रहें तो उसके अन्तराल में सन्निहित दिव्य चेतना का अनुभव अत्यन्त मुश्किल है। इसके लिए तो संयमित व एकाग्र मन की आवश्यकता है जो ध्यान-साधना से सम्भव है। वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे अपनी मनःशक्ति को माया रूपिणी प्रकृति को समझने में समय नष्ट न करके दिव्यात्मा के अनुभवों की खोज में प्रयुक्त करें, जिससे परम सत्य की जानकारी तथा मानव जीवन के परम उद्देश्य का उद्घाटन हो सके।
ईश्वर क्या है, कहाँ है? युगों-युगों से मनीषी यह जिज्ञासा उठाते व समाधान खोजते रहें हैं। ऋग्वेद का ऋषि कहता है- “एको विश्वस्य भवनस्य राजा”- वह सब लोकों का एकमात्र स्वामी है तथा “तस्मिन ह तस्थुर्भ वनानि विश्वा”- उस परमात्मा में ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं। उपनिषदकार कहते हैं- “ईश्वर को आँखों से कोई नहीं देख सकता, किन्तु हममें से पवित्र मन वाला हर कोई अपनी विमल बुद्धि से ईश्वर को देख सकता है।” वैज्ञानिकों ने भी सृष्टि के सृजेता ज्येष्ठ माने जाने वाले परब्रह्म को भी अपनी अन्वेषक दृष्टि से देखा व अपना अभिमत व्यक्त किया है।
एक सनकी था। उसे अपनी परछाई से भूत का आभास होता और पैरों की चाप सुनकर डरने लगता था। सोचता कोई उसका पीछा करता है।
आशंका बढ़ती तो वह तेज कदम उठाता, ताकि पीछा करने वालों से बच सके। बहुत समय तक यही क्रम चलता रहा। इतने पर भी डर घटा नहीं। तेजी से चलने पर विपत्ति भी पीछे दौड़ती प्रतीत होती।
अन्त में वह थक कर बैठ गया। बैठते ही छाया रुक गई और पदचाप की आवाज ने डराना बन्द कर दिया।
सनक दूर होते ही, डर दूर हुआ। आशंका मिटी और समाधान हो गया। देर से सही पर अन्त में यह समझ लिया गया कि डर अपनी ही छाया और पदचाप उत्पन्न करती थी।
जे. कृष्णमूर्ति कभी भगवान थे, पर अब इंसान हो गये। यह एक अचम्भे की बात है। इंसानों में से अपने को भगवान घोषित करते अनेकों देखे और सुने गये हैं, पर ऐसा कदाचित् ही कहीं हुआ हो कि भगवान ने अपना ईश्वरीय चोला उतार फेंका हो और मात्र इंसान रह गये हों।
यह कथा जे. कृष्णमूर्ति की है। इन्हें थियोसोफिकल सोसायटी ने नया मसीहा घोषित किया था। बाइबिल के एक प्रसंग में ईसा मसीह का दुबारा प्रकट होने का जिक्र है। समय का वर्णन भी ऐसा ही है, जिसकी संगति इस शताब्दी से खाती है। उसमें जो चिह्न होने चाहिए, उसका तुक भी थियोसोफिकल सोसायटी की कर्त्ता-धर्त्ता श्रीमती एनीबेसेन्ट एवं श्री लेडबीटर ने कृष्णमूर्ति के साथ मिला दिया था।
एक अवकाश प्राप्त ब्राह्मण अफसर के घर कृष्णमूर्ति का जन्म हुआ। योरोप में ख्याति प्राप्त अध्यात्म नेता लेडवीटर ने अपने दिव्यज्ञान के सहारे घोषणा की कि इस बालक में ईसा मसीह की दिव्य आत्मा है। इस घोषणा पर विश्वास किया गया और बालक को अधिक योग्य बनाने के लिए उसकी शिक्षा-दीक्षा की गई, उन्हें इंग्लैण्ड ले जाया गया, उन्हें कुलीनों के लिए विनिर्मित विद्यालयों में पढ़ाया गया। वयस्क होने पर उन्हें फ्रांस की सोरबीन यूनिवर्सिटी में पढ़ने भेजा गया। चुपके-चुपके उनकी ख्याति फैलायी गयी, फलतः उनके भक्तों की कोई कमी न रही।
सन 1929 में कैम्ब्रिज नगर के एर्डे किले के मैदान में एक सम्पन्न भक्त ने अपनी पाँच हजार एकड़ भूमि इस नये मसीहा को भेंट की, ताकि भक्तजनों के लिए एक साधक सम्पन्न नगर उस पर बसाया जा सके।
पर यह सिलसिला बहुत दिन न चल सका। कृष्णमूर्ति के कितने ही स्वागत समारोह हो चुके थे, उनमें वे नपी-तुली बातें कहते थे और बताये हुए तौर-तरीके से बैठते थे, पर हेम्पशायर के वुक्स वुड पार्क में एक नया धमाका हुआ। उस समारोह में उनने अपनी पोल स्वयं खोल दी और कहा कि “न तो मैं मसीहा हूँ, न कोई विचित्र व्यक्ति। दूसरों की तरह मैं साधारण आदमी हूँ। मुझसे किसी चमत्कार की आशाएँ कोई न करे। आप लोग अपने ही जैसा एक सामान्य व्यक्ति मुझे समझें। जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, अन्य व्यक्ति भी मेरे ही जैसे हैं। मसीहा या उद्धारकर्ता अपने सिवाय अपने लिए और कोई नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति ऊँचा उठा, तो वह अपने प्रयास-पुरुषार्थ से स्वयं ही ऊँचा उठा है। आप में से जो ऊँचे उठना चाहते हों या उद्धार के इच्छुक हों अपने ही प्रयास-पुरुषार्थ की ओर देखें, अन्य किसी की आशा न करें। मेरे सम्बन्ध में अब तक की मान्यताओं को बदल दें, किसी भ्रम में न रहें। मैं भगवान नहीं, मात्र इंसान हूँ।”
इनका यह भाषण धमाके जैसा था। जो उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाए बैठे थे, उन पर एक प्रकार से तुषारापात हो गया। भगवान के, ईसा नये अवतार के सम्बन्ध में जिनने बड़े-बड़े सपने देखे थे, उनकी आँखें खुल गईं।
साथ ही सत्य के अन्वेषकों को एक बड़ा सहारा मिला। जो उठा है अपने ही कर्मों या पुरुषार्थ से उठा है। जो गिरा है, उसे उसके अपने कर्मों ने ही गिराया है। दूसरे किसी को सलाह भर दे सकते हैं, पर ऐसा नहीं हो सकता कि अपने बलबूते किसी का उद्धार करें।
जे. कृष्णमूर्ति के इस भाषण से धर्मक्षेत्र में व्यापक हलचल मच गई। अवतार की आशा पर बहुत कुछ पाने की जो आशा लगाये बैठे, उनके सपनों का बालू का महल ढह गया। जिनने उन्हें भगवान बनाया था और उनके सहारे बहुत खेल खड़ा करने की आशा कर रहे थे, उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। इसके बाद जे. कृष्णमूर्ति ने साधक वेष-भूषा में सत्य का उद्घाटन करते हुए अपना प्रचार प्रारम्भ किया कि हर मनुष्य आत्मनिर्भर है, अपने विचारों और कार्यों से ही वह उठ या गिर सकता है। अभी भी वे यही कर रहे हैं।
भगवान बुद्ध से उनके शिष्यों ने निर्वाणावस्था में हुई उपलब्धियों के बारे में प्रश्न पूछे- तो उनने कोई उत्तर न दिया, मौन हो गये। इस पर शिष्यों ने अपने-अपने ढंग से अनुमान लगाये। बुद्ध ने सोचा कि वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं और वे अनिश्चय की स्थिति में रह रहे हैं। व्याख्याकारों ने बाद में उनके इस मौन को शून्यवाद ठहराया और आत्मा-परमात्मा तथा संसार के सम्बन्ध में उनकी मान्यता अनिश्चित ठहराई। अस्तु बुद्धवाद को प्रच्छन्न नास्तिकवाद तक कहा जाने लगा।
गहराई में उतरकर देखने वालो ने बुद्ध मान्यता को भाव दर्शन में निरूपित किया है। वे इस संसार को तथा जीवन ब्रह्म को व्यक्ति विशेष की निर्धारित मान्यताओं के अनुरूप बताते थे और जीवन तथा संसार को भाव लोक कहते थे। अनुभूतियाँ भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न प्रकार की इसी आधार पर होती हैं।
एक व्यक्ति अपने को चोर मानता है। वह उसी स्तर के साथी सहयोगी तलाश कर लेता है। उन्हें ही बुद्धिमान मानता है। जो वस्तुएँ जहाँ रखी हैं वे वहाँ से किस प्रकार चोरी करके हटाई जा सकती हैं। इसका ताना-बाना बुनता है। घर आकर पत्नी को सावधान करता है कि सर्वत्र चोरों की भरमार है। ऐसा न हो कि सामग्री कोई चुरा ले जाय। जो चुराकर लाया गया है, उसे ऐसे छिपाकर रखता है कि किसी पर भेद न खुले।
ऐसे व्यक्ति के लिए संसार एक अच्छा-खासा चोर लोक है। वह अपने असली स्वरूप को लोगों की आँखों से छिपाता रहता है। इसके लिए ऐसा कृत्य करता और वचन बोलता है जिससे उसे चुराने और छिपाने में प्रवीण समझा जा सके। कल्पनाएँ वह इसी स्तर की करता और योजनाएँ इसी सन्दर्भ की बनाता है। वह उसका स्वनिर्मित लोक है जिसमें जिन्दगी भर निर्वाह करते रहने की पूरी गुंजाइश है।
एक व्यक्ति विलासी है। उसकी दृष्टि उपभोग सामग्री पर ही लगी रहती है। सुविधा और सुन्दरता की ललक लगी रहती है। वह ऐसे ही वातावरण के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। ऐसों से ही घनिष्ठता साधने के लिए प्रयत्नशील रहता है। कामुक साहित्य पढ़ने, वैसी ही फिल्में देखने और उन्हीं प्रसंगों की चर्चा कहने सुनने में उसे रस आता है। किस इन्द्रिय के द्वारा, किस प्रकार, क्या रसास्वादन किया जा सकता है, इसी की कल्पनाएँ उठती रहती हैं। चिन्तन और समय इन्हीं बातों का ताना-बुना बुनने में बीतता है। सम्पदा का बड़ा भाग इसी में खर्च हो जाता है। विलासी लोगों की जीवनचर्या कहाँ किस प्रकार बीतती है। वे किस प्रकार क्या साधन जुटाते हैं, इसी की खोज-खबर में आँख-कान लगे रहते हैं। इस संदर्भ का संचित ज्ञान, अनुभव, इतना इकट्ठा हो जाता है कि उन्हें विलास का विश्व कोश कहा जा सके। ऐसे लोगों का संसार ‘विलास संसार’ है।
कुचक्रियों की एक अलग ही दुनिया है उन्हें छल प्रपंच के बिना चैन नहीं। किसी मजबूरी से विवश होकर वे दुरभिसंधियाँ गढ़ते हों ऐसी कोई बात नहीं होती। न वे भूखे होते हैं- न दरिद्र, न जरूरतमंद न संकटग्रस्त। तो भी उनका चिन्तन ऐसे सरंजाम जुटाने में ही लगा रहता है इसमें आदि से अन्त तक चकमेबाजी और तिकड़म भिड़ाने का जाल बुना गया हो।
योग्यता की दृष्टि से वे गये-गुजरे नहीं होते। उपलब्ध बुद्धिमता को यदि वे किसी उपयुक्त कार्य में लगाना चाहें तो उससे कहीं अधिक सफलता प्राप्त कर सकते, जितनी की छल-बल से प्राप्त करते हैं। पर किया क्या जाय? उनकी विवशता है। मान्यताओं, अनुभवों और आदतों के सहारे उनने छललोक गढ़ लिया है उससे उनके उतार-चढ़ाव और मोड़-तोड़ भर हैं। अस्तु जीवन प्रवाह ही उस स्तर का बन गया है। वे अपने विनिर्मित छद्मलोक में ही प्रसन्न भी रहते हैं और कई बार अपनी चतुरता का गर्व भरा बखान भी करते हैं।
सन्त, सज्जन, लोक सेवी, परमार्थ परायण, महामानवों की दुनिया अन्यान्यों से सर्वथा भिन्न है। उन्हें न लोभ सताता है न मोह। न वासना का नशा चढ़ा होता है न तृष्णा की आग में झुलसते हैं। सीधा, सौम्य, सादगी का जीवन जीते हैं और उच्च विचारों में रमण करते हैं। उनके मित्र सहयोगी उसी स्तर के होते हैं। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से उनका परिकर देवोपम बना रहता है। उत्कृष्ट सोचते और आदर्श को कार्यान्वित करते हैं। असहयोगी, विरोधी, हंस उड़ाने और मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं रहती। तो भी वे किसी के परामर्श सहयोग की परवाह न करते हुए एकाकी अपने मार्ग पर चलते हैं। दूसरे लोग जहाँ धन, वैभव अर्जित करने में जिन्दगी गुजार देते हैं वहाँ उनको इस कोल्हू में पिलने की इच्छा तक नहीं होती। भव बन्धनों से बचते-बचाते अपनी नाव को खेकर ले जाते हैं साथ ही उस पर बिठाकर अनेकों को उस पार पहुँचाते हैं। इस समुदाय की दुनिया भी अनोखी है जिसकी सामान्य जनों के साथ संगति नहीं बैठती। सन्तोष और आनन्द उन्हें भी इसमें किसी से कम नहीं मिलता।
एक घर में रहने वाले सदस्यों का खान-पान रहन-सहन तो एक जैसा होता है पर संसार सबका अलग-अलग। छोटे बच्चे खेल खिलौने में रमते हैं। उनकी कल्पनाएँ, मान्यताएँ, भावनाएँ इच्छाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें बड़ों से सर्वथा भिन्न कहा जा सके। किशोरों की मस्ती का क्या कहना? पग-पग पर रोकना पड़ता है अन्यथा आसमान में उड़ने और हवा में तैरने लगें। जरा जीर्ण वयोवृद्धों का मन कहा अटका रहता है वे क्या चाहते हैं, उसका भाव चित्र तैयार किया जा सके तो प्रतीत होगा उनकी दुनिया कितनी नीरस और कष्टसाध्य है। मौत के दिन भयभीत रहकर भी गिनते रहते हैं। युवकों की रंगरेलियों उमंगों और महत्वाकाँक्षा योजनाओं का संसार ही अलग है। वे न जाने क्या-क्या करना और क्या-क्या बनना चाहते हैं। अहंता नस-नस से टपकती है। दिन भर सजते और दर्पण देखते हैं।
सयानी लड़की किसी घर की रानी होने का सपना देखती है और लड़का स्वर्ग पर उतरकर किसी परी के आँगन में नाचने के साज संजोता है। नारी तो जिस तेजी से अपने केचुल बदलती है उसे देखकर आश्चर्य होता है। अभी-अभी प्रतियोगिताएँ जीतने वाली छात्रा- कुछ ही महीने बाद घूँघट लगाये वधू- साल छह महीने के भीतर जननी, बाद में गृह स्वामिनी और दिन बीतने नहीं पाते कि सास बनकर स्वामित्व वधू के हवाले करती है। इन विभेदों के बीच असाधारण अन्तर होता है।
मृतकों का मरणोत्तर जीवन और भी विचित्र होता है। गर्भ में निवास करने वाले भ्रूण की परिस्थितियाँ और भी विलक्षण होती है। रोगी कितना कमजोर और असहाय होता है। दरिद्र पर क्या बीतती है। अपराधी क्या सोचता है। शासक का गर्व किस भाषा में बोलता है। यह देखने और इन सबकी मित्रताएँ आँकने पर प्रतीत होता है कि पंच तत्वों से बनी और धरती आकाश के बीच बसी एक ही प्रत्यक्ष दुनिया में कितने अधिक अन्दर विद्यमान है और कितने लोग इसके नीचे कितनी प्रकार की मान्यताएँ संजोये बैठे हैं। यह एक अच्छा-खासा अजायब घर है। पागल खाने की संज्ञा देना तो ठीक न होगा।
इस दुनिया में मात्र मनुष्य ही नहीं रहते। पशु-पक्षी, सरीसृप, कीट-पतंग और सूक्ष्म जीवी समुदाय के प्राणियों की भी अनेकानेक जातियाँ उपजातियाँ हैं। इनके शरीर और मन अपने ढंग के बने हैं। इनकी इच्छाएँ, आवश्यकताएँ, रुचियाँ, सम्वेदनाएँ, समस्याएँ, सुविधाएँ और क्षमताएँ ऐसी हैं जिनके भाव चित्र तैयार किये जा सके तो इन सबके बीच उतना ही अन्तर है जितना कि लोक-लोकान्तरों के मध्य पाई जाने वाली भिन्नताओं के बीच पाया जाता है । स्वर्ग और नरक की कोई तुलना नहीं। ग्रह-उपग्रहों में से प्रत्येक का वातावरण एक दूसरे से भिन्न है। सौर मण्डल में बुध आग जैसा गरम और प्लेटो शून्य तापमान से भी अधिक ठण्डा। प्राणियों के मध्य भी ऐसी ही अगणित प्रकार की दुनिया बनी और बसी हुई है। उनमें समता कम और भिन्नता अत्यधिक है।
वैज्ञानिक और दार्शनिकों का अनुसन्धान निर्धारण और भी अधिक विचित्र है। वैज्ञानिक यहाँ अणु-परमाणुओं की आंधियां भर चलते देखते हैं। ताप, प्रकाश और शब्द की उद्देश्य तरंगें इस जगत में हलचलों की जन्मदात्री है। वे न कभी चैन से बैठती है और न बैठने देती है। जड़-जीवाणु और चेतना जीवाणुओं में उनके अनुसार कोई मौलिक अन्तर नहीं। पदार्थ ही स्थिति विशेष में जीवन बन जाता है। जब तक जीवन तब तक आत्मा। यह सब कुछ स्वयंभू और सनातन है। प्रकृतिगत अनुशासन ही सृजन अभिवर्धन और परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश वही हो सकता है। यही है वैज्ञानिक का पदार्थ परिकर और आत्म-वैभव। उनका संसार विस्तृत है पर साथ ही आधारभूत कारण की दृष्टि से इतना ही सीमित है।
दार्शनिक को कण-कण में चेतना दीखती है। इन सबमें ब्रह्म ही ओत-प्रोत है। चेतना अदृश्य और जड़ उसका दृश्य स्वरूप है। जड़ को चेतना जैसी हलचलें करने और गुण धर्म के क्षेत्र में सुस्थिर करने का कारण परब्रह्म का अनुशासन निर्देशन ही निमित्त कारण है। जड़ को वह कभी दृश्य तो कभी अदृश्य रूप में परिणति कराता रहता है। जो निर्जीव समझा जाता है उसमें भी जीवन विद्यमान है।
कुछ बातों से असहमत होते हुए भी दोनों कुछ स्थानों पर सहमत है। यह जो कुछ दिखता है लगता है वह वस्तुतः वैसा कुछ है नहीं। यह पदार्थ और प्राणी के बीच होने वाले आदान-प्रदान की अवास्तविक अनुभूति है। गन्ना रसायन विशेष से बना है जिह्वा के रसों का समन्वय होने के उपरान्त उसकी जानकारी मस्तिष्क के मिठास के रूप में लगती भर है। नीम हमें कड़वा लगता है पर ऊँट उसे बड़े चाव पूर्वक खाता है। नीम का वास्तविक स्वाद कैसा है यह कुछ भी कहा नहीं जा सकता। विभिन्न प्राणी अपनी स्थिति के अनुरूप उसका स्वाद बताते हैं। यही बात स्वरूप के सम्बन्ध में भी है। हाथी को मनुष्य अपने से कई गुना बड़ा दीखता है तो आश्चर्य नहीं। इन्द्र धनुष जैसा कि हम देखते हैं वैसा किसी भी स्थान पर होता नहीं। मात्र पानी की बूंदों पर सूर्य किरणों की प्रतिक्रिया भर वैसा बोध कराती है।
संसार कैसा है? उसका रस, रूप और गुण बताना कठिन है। यह हर किसी की अपनी-अपनी अनुभूति का विषय है। इसमें इसकी इंद्रियों, मस्तिष्कीय संरचना, मान्यता, परिस्थितियां आदि निमित्त कारण होते हैं। अतएव कहा जा सकता है कि यह संसार भाव लोक है। हर प्राणी की अपनी मान्यता और भावना है। समझने का अपना तन्त्र और अपना रुझान। इसलिए हर किसी को वह अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग प्रकार का दृष्टिगोचर होता है। वह वस्तुतः कैसा हो इसका किसी को अता-पता नहीं।
हर व्यक्ति अपनी दुनिया अपनी मनःस्थिति एवं परिस्थिति के समन्वय से गढ़ता है। उसे जब चाहता है तब बदल भी लेता है। सुख में दुःख और दुःख में सुख भासने लगता है। विषयों की प्रतिक्रिया दुःखदायी प्रतीत होती है और तपश्चर्या की परिणति की कल्पना करके व्यक्ति दुःख उठाते हुए भी प्रसन्नता व्यक्त करता है।
यह संसार भाव लोक है। हर किसी का पृथक-पृथक भी। साथ ही यह छूट एवं सुविधा भी है कि वह उसका स्वरूप एवं स्तर जब चाहे तब बदल ले। इसलिए कहा गया है कि मनुष्य अपने भाग्य एवं संसार का निर्माता आप है। ब्रह्म ने यह ब्रह्मांड और उसका विधान अनुशासन बनाया यह ठीक है। प्रकृति का सूत्र संचालन भी इसका कारण हो सकता है। इतने पर भी यह तथ्य जहाँ का तहाँ है कि हर किसी की अपनी दुनिया निराली है वह निजी की भावनाओं के अनुरूप ही सुन्दर और कुरूप बनता है। भगवान बुद्ध ने उसकी व्याख्या विवेचना में मौन रहकर ठीक ही किया था।
अपनी-अपनी विचारणा और भावना के अनुरूप हर व्यक्ति स्वयं अपने भाव-लोक का सृजन करता है। बाह्य परिस्थितियां कुछ भी हों, जैसी तरंगें अपने चहुँ ओर आन्दोलित होती रहेंगी, वैसी ही अनुभूतियां होंगी, मनःस्थिति की प्रतिक्रिया बाहर परिलक्षित होगी। परोक्ष जगत की यह एक अद्भुत संरचना है जिसे स्थूल आंखें देख तो नहीं सकतीं, उनकी अनुभूति अवश्य कर सकती हैं। इसे बदलना, अनुकूल बना लेना हर मनुष्य के लिए अपने पुरुषार्थ के बलबूते सम्भव है।
मन को एकाग्र करने से बिखरी हुई शक्ति का एकीकरण होता है। बिखराव से क्षमता अस्त-व्यस्त होती है, पर उसे एकाग्र करने से क्षमता का केन्द्रीकरण होता है। केन्द्रित होने से शक्ति का उद्भव होता है। सूर्य किरणें बिखरी हुई हों तो उनसे सामान्य ताप की अनुभूति होगी किन्तु यदि काँच पर थोड़े से क्षेत्र की भी किरणें इकट्ठी कर ली जायें तो आग जलने लगेगी। बारूद को बिखरी हुई स्थिति में जलाया जाये तो एक चमक भर उठेगी, किन्तु बारूद को बन्दूक की नली में केन्द्रित करके जलाने से गोली का निशाना लगता है।
ध्यान आँख बन्द करके बैठने भर का नाम नहीं। आँख तो बन्द करनी पड़ती है ताकि बहिर्मुखी मन अन्तर्मुखी हो सके। किन्तु मात्र इतना ही ध्यान के लिए पर्याप्त नहीं है। आंखें बन्द करने के उपरान्त भी कल्पनाओं की दौड़ जारी रखी जा सकती है? ऐसी दशा में ध्यान कहाँ हुआ। आंखें बन्द, कल्पना लोक रचा और उसमें भ्रमण किया जा सकता है। ध्यान का उद्देश्य समेटना और समेटे हुए को केन्द्रीभूत करना है। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि ध्यान की दिशा में कदम बढ़े।
यह सृष्टि तीन पदार्थों की बनी है- ताप, ध्वनि और प्रकाश। इन्हीं की तरंगें निकलती, बिछुड़ती और नाना प्रकार के पदार्थों की रचना करती हैं। ध्यान में इन तीनों को पकड़ना और एक स्थान पर केन्द्रित करना होता है। तीनों का सम्मिश्रण ॐ में होता है। उसकी ध्वनि स्वरूप है ॐ अथवा ओऽम् दोनों में से कोई भी ध्वनि ध्यान के लिए चुनी जाती है। अब मात्र ओंकार के अक्षरों को ही पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए वरन् उसे सूर्य के मध्य में अवस्थिति गोलाकार ध्यान करना चाहिए। यह प्रकाश मात्र गोल न हो वरन् उसमें प्रचण्ड गर्मी का समावेश होना चाहिए। ऐसी और लक्षण वाली ध्वनि जिसके चारों ओर गोलाकार गर्म प्रकाश भी हो, ध्यान के लिए उपयुक्त है। उसमें प्रकृति के मूल तीन तथ्यों का समावेश हो जाता है। प्रकृति के इन त्रिविध झलकों को आंखें बन्द करके सब ओर से मन एकाग्र करके ध्यान करना चाहिए।
इन तीनों माध्यमों का अर्थ प्रयोजन भी ध्यान रहे। अज्ञान को अंधकार की उपमा दी गई है। प्रकाश स्वरूप ओंकार मन के अंधकार को हटाता है। अनेक प्रकार की भ्रांतियां मन में छाई रहती है। प्रकाश उन सबका निराकरण करता है। ओंकार में नाम और रूप दोनों हैं। इष्टदेव का जप स्मरण करने के लिए कोई न कोई इष्टदेव नियत करना पड़ता है। इसके लिए ओंकार की शब्द ध्वनि और आकृति काम दे जाती है। ओंकार सार्वभौम है। उसे सभी धर्मों और संप्रदायों में समान मान्यता दी गई है। अब तीसरी विशेषता ओंकार की ताप है। ताप अर्थात् ऊर्जा। ऊर्जावान को मनस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी कहते हैं। ओंकार जप ध्वनि के साथ उसकी ऊर्जा आभा और आकृति का ध्यान करने से उन तीनों विशेषताओं का समावेश होता है जो ओंकार में सन्निहित हैं। यों ओंकार एक अक्षर है, पर व्याकरण शास्त्र के हिसाब से वह तीन भी हो जाता है अ उ म् । तीनों के सम्मिश्रण से ॐ बना है। जप ध्यान के लिए एक भर पर्याप्त है। ताप, शब्द और आभा यही इन अक्षरों के अर्थ हैं। ध्यान करते समय भी इन तीनों तथ्यों का समावेश होना चाहिए। तब यह पूर्ण हो जाता है। इसमें ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों का समावेश हो जाता है। इसी त्रिक से संसार बना है। मन यदि कहीं भागे तो उन तीनों में से किसी की परिधि में कहीं गया माना जाये और उसे परब्रह्म की एकता की परिधि माना जाये। आंखें बन्द करने का तात्पर्य है अन्तर्मुखी होना। अन्तर्मुखी होने के उपरान्त ध्वनि ताप और आभा युक्त ओंकार पर अपने ध्यान एकत्रित किया जाये। ध्यान योग की यह सर्वोत्तम साधना है।
हम न तो पीठ देख सकते हैं और न बुराई। इसलिए यह कार्य दूसरों द्वारा किया गया है तो उसे वस्तुस्थिति समझने का लाभ उठायें।
चेतन प्रकृति एवं मनुष्य सहित अन्य जीवधारियों के बीच सृष्टि ने एक ऐसी विधि-व्यवस्था विनिर्मित की है, जिसे परस्पर अन्योन्याश्रित अनुशासन नाम दिया जा सकता है। सारा जीव जगत न केवल अपने दैनन्दिन क्रिया-कलापों अपितु विकास हेतु उस प्राण सम्पदा से जुड़ा हुआ है जो समष्टि रूप में उसके चारों ओर विद्यमान है। मानव, पादप-वृक्ष-वनस्पति, जीव-जन्तु सभी इस चक्र में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह पर्यावरण चक्र ही जीव-जगत की सुनियोजित कार्यपद्धति के लिये उत्तरदायी माना जाता है।
इस व्यवस्था में कहीं भी तनिक व्यतिरेक आने पर मानव द्वारा उसमें छेड़छाड़ किये जाने पर परिणतियाँ विषम होती हैं। मनुष्य को आधि-व्याधियों से जूझना पड़ता है। पर्यावरण संतुलन अस्त-व्यस्त हो जाता है। अन्ततः आकाश के पोले ईथर भाण्डागार में भरी ये प्राण सम्पदा है क्या? एवं किस प्रकार जीवधारियों को प्रभावित करती है, इस पर वैज्ञानिकों ने भी गहराई से अनुसंधान किया है एवं अपना अभिमत व्यक्त किया है।
जीवधारी जिस वातावरण में रहते हैं, वह कितनी विपुल ऊर्जा सम्पदा अपने अंतराल में छिपाये हुए है, इसकी सहज ही कल्पना नहीं होती। हम निरन्तर बाह्य वातावरण से श्वास खींचते व छोड़ते रहते हैं। प्राणवायु रूपी आक्सीजन यदि थोड़ी देर न मिले तो जीना दूभर हो जाय। सारे शरीर की गंदगी अन्यान्य मार्गों के अतिरिक्त कार्बनडाइ आक्साइड के रूप में प्रश्वास द्वारा एक व्यक्ति के द्वारा हर मिनट 15 से 20 बार छोड़ी जाती है। मोटे रूप में यही व्यक्ति का पर्यावरण से आदान-प्रदान क्रम माना जाता है। तनिक गहराई से देखें तो पाते हैं कि हर जीवधारी एक समर्थ एवं सशक्त विद्युत मण्डल से घिरा हुआ है। आयनोस्फियर की सबसे निचली परत पृथ्वी से साठ किलोमीटर दूरी पर है। दोनों के मध्य स्थित इस आयन मण्डल में लगभग 5 वोल्ट प्रति मीटर के औसत से विद्युत का दबाव बना हुआ है। हर व्यक्ति को घेरे एक सूक्ष्म विद्युत रूपी कवच प्राण ऊर्जा का समुच्चय है एवं यही शरीरगत गतिविधियों एवं मस्तिष्कीय क्रिया-कलापों पर अपना सर्वाधिक प्रभाव डालता है।
विद्युत आवेश धन व ऋण दो में बँटा होता है। मनुष्य के लिए ऋण विद्युतधारी आयन्स की मात्रा का अधिक-कम होना ही बहुत बड़े परिवर्तन का कारण बन जाता है। ये ऋण आयन्स श्वास से भी अंदर जाते हैं एवं त्वचा से भी। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार प्रकाश की गति के समकक्ष चलने वाले फोटान्स के समरूप न्यूट्रोनो कण- माइण्डान्स भी सूक्ष्म रूप से बिना किसी प्रतिरोध के शरीर एवं मस्तिष्क के विद्युत मण्डल से आदान-प्रदान करते रहते हैं।
सबसे पहले बर्कले विश्वविद्यालय (कैलीफोर्निया) के अलवर्ट पाल क्रूगर ने आज से कुछ वर्ष पूर्व यह प्रतिपादित किया था कि शरीर व मस्तिष्क में सूक्ष्म रक्त स्रावों की वृद्धि तथा स्फूर्ति एवं सक्रियता के लिये ऋण आयनों का वायुमंडल में होना अत्यधिक आवश्यक है। यह प्रभाव पूरी तरह इन आवेशित कणों की मात्रा पर निर्भर है। धन आवेशित कणों का जब बाहुल्य होता है, व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है, चिड़चिड़ापन, थकान एवं एकाग्रता में कमी नजर आती है। जैसे ही वातावरण में ऋण कण बढ़ा दिये जाते हैं, तनाव क्रमशः कम होने लगता है एवं व्यक्ति की चैतन्यता स्फूर्ति में वृद्धि आ जाती है।
मनुष्य के चारों ओर जन्म के बाद गर्भावस्था से बाहर आते ही ऋण आयन का घेरा बन जाता है एवं अन्त तक यही उसे प्राण का शक्ति पुँज बनाते हुए जीवन शक्ति उसमें फूँकता रहता है। जैसा कि सभी जानते हैं कि गर्भ में स्थित भ्रूण के लिये विधाता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है ताकि वह रज्जु से जुड़कर माँ से पोषण पाने के अतिरिक्त “एम्नियाटिक द्रव्य रूपी” अपने कवच से भी रासायनिक आदान-प्रदान करता रहे। यह थैली न केवल ‘शॉक एक्जार्बर’ की भूमिका निभाती है, वरन् इसमें विद्यमान विद्युत कण, एंजाइम्स आदि का भ्रूण से आदान-प्रदान क्रम बराबर चलता रहता है। गर्भकाल के समापन के तुरन्त बाद अत्यधिक प्रतिकूलताओं से भरे, विद्युतविभवयुक्त वातावरण में उसका आगमन होता है यहाँ उसे ऋण आयन का यह गोला सुरक्षा प्रदान करता है। प्रकारांतर से इस विद्युत पुंज को थियॉसाफी के मत से वायटल बॉडी कह सकते हैं। भारतीय अध्यात्म मतानुसार इसे प्राणमय कोश का बहिरंग में अभिव्यक्त होने वाला रूप माना जा सकता है।
वैज्ञानिक मतानुसार स्वच्छ वायु में प्रति घन सेण्टीमीटर 1500 से 4000 आयन्स होते हैं। चूंकि पृथ्वी का आवेश ऋण प्रधान है, इस वायु कवच में भी ऋण-धन का अनुपात 90 : 10 का होता है। प्रदूषण रहित नैसर्गिक वायुमण्डल, हरीतिमा- स्वच्छ झरनों से युक्त स्थानों पर ऋण आयन्स अधिक होते हैं। ऐसे वातावरण में रहने वाले व्यक्तियों की जीवनी शक्ति, मनोबल अधिक होने से रोग-शोक इन्हें नहीं सताते एवं ये सदैव स्वास्थ्य लाभ कर विधेयात्मक चिन्तन में लीन होते देखे जाते हैं। औद्योगीकरण, जनसंख्या का बाहुल्य, निर्वानीकरण एवं प्रदूषण से ऋण आयन्स घटते चले जाते हैं। धन आयनों की मात्रा अधिक होने से श्वास से ली जाने वाली वायु भी विकारयुक्त होती है। ऐसे स्थानों पर मनोविकारों, असाध्य रोगों का बाहुल्य होता देखा जाता है। आत्म-हत्या, आक्रामक वृत्ति एवं अपराधों को जन्म देने में ऋण आयनों की कमी प्रधान हो सकती है। चूंकि ये सीधे मानवी काया एवं मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाहों पर प्रभाव डालते हैं, मनुष्य के दैनन्दिन क्रिया-कलाप इनकी कमी व धन आयनों की बढ़ोत्तरी से निरन्तर प्रभावित होते हैं।
वैज्ञानिकों ने शिथिलता, बेचैनी तनाव आदि मिटाने के लिये उपरोक्त सिद्धान्त के आधार पर “ऋण आयन जेनरेटर” बनाए हैं, जो निरन्तर वायु को शुद्ध कर मनुष्य के आसपास ऋण आवेश का कवच विनिर्मित करते रहते हैं। ये जनरेटर चालू होते ही 3500 ऋण एवं 100 घन आयन्स प्रति घन सेंटीमीटर पैदा करते हैं एवं बंद होने पर लगभग 5-6 घण्टे तक 550 ऋण व 500 धन आयन्स का अनुपात आसपास के वातावरण में बनाये रखते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से जब अध्ययन किया गया कि नैसर्गिक वातावरण की तुलना में विनिर्मित कणों में स्वास्थ्यवर्धक- प्रफुल्लता बढ़ाने वाले गुण नहीं थे। एयर कंडीशनर का प्रयोग भी जहां-जहां होता देखा गया वहां इन आयन्स की मात्रा शून्य के बराबर पायी गयी। यही कारण है कि अब वैज्ञानिक भी सेनीटोरियम, बड़े-बड़े निर्णय लेने वाले अधिकारियों के कार्यालयों आदि के आसपास कृत्रिम झरने, फव्वारे आदि लगाकर, हरीतिमा को स्थान देते हैं।
मात्र परिस्थितियाँ ही मानव के आयन मण्डल का निर्धारण नहीं करती। यह भी पाया गया है कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में मन के बेचैन, अस्त-व्यस्त, तनावग्रस्त होने पर उनके आसपास का विद्युत मण्डल ही बदल गया। ऋण आयनों का स्थान धन आयनों ने ले लिया। इसके लिए उन्हें एक इलेक्ट्रान भर से मुक्ति पानी होती है। रोगग्रस्त व्यक्तियों एवं प्रारम्भिक लक्षणों का विश्लेषण करने वाले चिकित्सकों का कहना है कि मन की विचार तरंगों के अनुरूप ही बाहर का आयन मण्डल और शुद्ध भाषा में कहे तो आभा मण्डल बदलता रहता है। न्यूयार्क विश्वविद्यालय के डा. फ्रैंक हॉकिन्शायर एवं राकफेलर विश्वविद्यालय के डॉ. जोनाथन चैरी ने विश्लेषण कर पाया है कि तनाव, थकान, एकाग्रता में कमी, असमय चिड़चिड़ापन जैसी मनःस्थिति जैसे-जैसे रोगी के अंदर विकसित होने लगती हैं, उसका आयन मण्डल अपना आवेश खोकर धनात्मक होने लगता है। कई रोगियों में तो इस विश्लेषण के आधार पर ही इन मनोविकारों की जिनके सम्बन्ध में रोगी बहुधा मौन देखे जाते हैं तथा भावी प्रतिक्रियाओं की पहले से भविष्यवाणी की जा सकती है।
वैज्ञानिकों का कथन है कि केन्द्रीय स्नायु संस्थान की क्रिया प्रणाली बड़ी वैचित्र्य पूर्ण है। पुरुषों से स्वचालित संस्थान (ए. एन. एस.) में ऋण आयनों को धन में बदलने के अवसर अधिक पाए जाते हैं, इसी कारण वे रोगी भी जल्दी होते हैं। इसमें परिस्थितियों का क्रम, मन-मस्तिष्क की बनावट का अधिक हाथ होता है। इनकी तुलना में स्त्रियां भावुक होते हुए भी दृढ़ स्वचालित संस्थान होने के नाते कम रोगी होती देखी जाती हैं। उनका विद्युत कवच भी पुरुषों की तुलना में ऋण आवेशों से अधिक भरा होता है। भावनात्मक उद्वेगजन्य शारीरिक रोग, इसी कारण उन्होंने स्त्रियों में कम पाये।
मनःस्थितिजन्य आयन्स के प्रभाव एवं पर्यावरण से उत्पन्न होने वाले रोग कारक आयन्स की प्रतिक्रियाओं को जानने के बाद एक विलक्षण प्रसंग की चर्चा भी यहाँ अभीष्ट हो जाती है, जिसकी आज पश्चिम में बड़ी चर्चा है। ‘इलविण्ड्स’ (बुरी हवाओं का बहना) के रूप में मौसम में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन इन दिनों समाचारों की सुर्खी में है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कथन है कि नमी से भरी तेज पूरबी हवाएँ कभी-कभी वातावरण में अनायास ही धनात्मक आयन्स का अनुपात बढ़ा देती है। ‘वेदरिंग’ नामक पुस्तक में स्टीफन रोजेन लिखते हैं कि जब ये हवाएं संव्याप्त प्रदूषण एवं पर्यावरण असंतुलन के कारण बहती हैं तो क्षय रोगियों में प्रसुप्त रोग के उभर आने, मिर्गी का दौरा आने के अवसर बढ़ जाते हैं। वातावरण के प्रभाव के कारण तनाव एवं चिड़चिड़ापन व्यक्तियों में बढ़ते देखा जाता है जिससे आत्महत्या, आक्रामक वृत्ति, दमा, हार्ट अटैक, स्ट्रोक जैसे घटनाक्रम घटने का अनुपात उन क्षेत्रों में बढ़ जाता है। दक्षिणी हवाएँ रक्त का थक्का जमने का समय कम कर देती हैं जिससे शरीर में कही भी अनायास रक्त स्राव एवं लकवे का प्रकोप हो सकता है। ऐसा उनके साथ घटते अधिक देखा जाता है जिनके आसपास ऋण आवेश की मात्रा पूर्व से ही क्रम हो। स्विट्जरलैंड, बवेरिया जैसे आल्पस पर्वत की तलहटी में बसे क्षेत्रों में इस हवा को “फोहेन” नाम दिया गया है। वहाँ जब ये हवा बहती है सड़क पर दुर्घटनाएँ अनायास ही बढ़ जाती हैं। लोग घरों में रहना पसंद करने लगते हैं जब तक कि हवा का प्रभाव समाप्त न हो जाय।
अब सभी इस अभिमत को मानने लगे हैं कि रोगों का कारण जानने के लिये विस्तृत सूक्ष्म पर्यवेक्षण अनिवार्य है। इससे भावी घातक व्याधियों से बचना भी संभव है एवं वाँछित आयन मण्डल विकसित कर नैसर्गिक जीवन क्रम अपनाकर जीवनीशक्ति का बढ़ाया जाना भी शक्य है। व्यवहार विज्ञानी एवं प्रख्यात स्नायु विशेषज्ञ इस सम्बन्ध में पूर्वार्त्त दर्शन में वर्णित साधना उपक्रमों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि इनके माध्यम से अपने बहिरंग वातावरण को ऋण आवेशयुक्त बनाना संभव है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि योगसाधना के द्वारा प्राण ऊर्जा का सम्वर्धन भली प्रकार सम्भव है। इसके लिये उचित वातावरण मिल सके तो ठीक, नहीं तो आत्मशोधन एवं साधना प्रक्रिया द्वारा भी मनःस्थिति द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित की जा सकती हैं। विज्ञान का यह स्थूल पक्ष तो इस दिशा में संकेत भर देता है। इससे आगे की- शरीर की ‘सटलर’ जानकारी एवं उसे उपकरण मानकर विद्यमान ऊर्जा सम्पादन का सदुपयोग- सुनियोजन योग शास्त्रों में वर्णित है। इस ज्ञान का लाभ उठाया जा सके तो वह सब कुछ अर्जित कर सकना संभव है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में वर्णित किया जाता है।
वैज्ञानिकों का मत है कि मानवी काया व मस्तिष्क जिन सूक्ष्म रस-स्रावों से प्रभावित होती है, वे मनुष्य के आसपास के वातावरण में स्थित ऋण आयनों की मात्रा के अनुपात पर निर्भर करती हैं। जब भी धन आवेश इस आभा मण्डल में बढ़ता है, तामसी प्रवृत्तियां उभरने लगती हैं। तनाव जन्म लेता है व कई साइकोसोमेटिक बीमारियां जन्मती हैं। ऋण आयन प्रकृति के साहचर्य में रहने वालों के आभामण्डल में अधिक होते हैं। वे ही व्यक्ति की स्फूर्ति, चेतनशक्ति एवं सक्रियता बढ़ाते हैं।
औरंगजेब जब मरने लगा तो उसने कई मुल्लाओं को बुलाया कि मुझे अपने तीन पाप बहुत भारी मालूम पड़ते हैं, आप लोग किसी तरह उन्हें खुदा से माफ करा दें। तीन पाप थे (1) पिता को जेल में बन्द करा देना (2) दारा वगैरह भाइयों का कत्ल करा देना तथा (3) सूफी फकीर सरमद का सिर उतरवा लेना। गुनाह माफ हुये या नहीं यह तो ईश्वर ही जाने पर यह स्पष्ट है कि मरते समय उसे इन पापों का रंज अवश्य था।
सरमद सूफी सन्त थे। वे मध्य एशिया से भारत व्यापार के लिए आये थे। पहले वे सिन्ध में तिजारत करते रहे, साथ ही सूफी पन्त का प्रचार भी। जन्मतः वह यहूदी थे। बाद में मुसलमान हुए और अन्त में वेदान्त धर्म के अनुयायी हो गये। दारा उनकी भक्ति और विद्वता से बहुत प्रभावित थे। औरंगजेब ने जब दारा का कत्ल करा दिया तो उसे यह भय बराबर बना रहा कि दारा के मित्र और जनता में अत्यन्त लोकप्रिय सरमद कहीं उसके लिए कोई संकट खड़ा न करे। वे उसकी आंखों में काँटे की तरह खटकने लगे।
एक दिन औरंगजेब सरमद के पास से गूजरे। देखा कि वे नंग-धड़ंग पड़े हैं। कम्बल दूर पड़ा है। औरंगजेब ने कड़ककर कहा- नंगा क्यों पड़ा है, पास में पड़े कम्बल से बदन क्यों नहीं ढक लेता, सरमद ने कहा- इतनी कृपा आप ही कर दें। मुझे तो बन नहीं पड़ता। औरंगजेब ने कम्बल उठाया तो उसके नीचे उन सबके सिर थे जिन्हें उसने कत्ल कराया। औरंगजेब के बूते कम्बल न उठा। तो सरमद ने कहा- तू ही बता- तेरे पापों को ढकना ज्यादा जरूरी है या अपने बदन को ढकना।
सरमद का दिल्ली की जनता पर असाधारण प्रभाव औरंगजेब से देखा न गया। उसके इशारे पर मुल्लाओं ने इल्जाम लगाया कि वह अधूरा कलमा पढ़ता है। अदालत में पेश किया गया तो वहाँ भी उसने वह अधूरा ही सुनाया ‘ला इला इललिलाह’ जिसका अर्थ होता है। सभी दोषी हैं। शेष अंश जो शेष रह गया था। वह था। मुहम्मद ‘ रसूलिल्लाह’। सरमद का कहना था कि मैंने अभी उस देवदूत का दर्शन नहीं किया। जिन्हें देखता हूँ, दोषी पाता हूँ। इस कथन पर मुल्लाओं की अदालत में सरमद को दोषी पाया गया और उसका सिर उतार लेने का हुक्म हुआ। सरमद का सिर काट लिया गया। जब सिर कटा तो उसमें से तीन बार आवाज निकली- ‘ला इलाह इल्लिलाह’। सरमद सच्चे विश्वास की इस गवाही को देख कर सभी दंग रह गये।
जिस दिन सरमद का सिर कटा उस दिन पूरी दिल्ली में रंज मनाया गया। न किसी के घर में चिराग जला न चूल्हा। बादशाह के सामने कोई कुछ कर ही नहीं सकता था, पर इतना सभी ने अनुभव किया कि एक बेगुनाह सच्चे फकीर का कत्ल हुआ।
औरंगजेब के मन पर उस अन्याय का बोझ जिन्दगी भर लदा रहा और जब वह मरा तब भी उसे वह गुनाह बेतरह अखरता रहा।
सूफी सन्त अपनी भक्ति भावना के लिए भारत भर में लोकप्रिय रहे। अजमेर के ख्वाजा भी सूफी थे। जिनकी दरगाह पूजने हिंदू, मुसलमान सभी जाते हैं। सूफी धर्म के सिद्धान्त, हिंदुओं के वेदान्त दर्शन से पूरी तरह तालमेल खाते हैं। सरमद की कब्र दिल्ली में है जिन्हें उनका इतिहास स्मरण है उन सब के सिर उस स्थान के समीप जाकर झुक जाते हैं।
सर्वे हि यत्र नेतारः सर्व पण्डित मानिनः। सर्वे महत्व मिच्छन्ति स वृन्द अवसी दति। -महाभारत
जहाँ सब लोग नेता बनने के इच्छुक हैं, जहाँ सब सम्मान चाहते हैं और पण्डित बनते हों, जहाँ सभी महत्वाकाँक्षी हों वह समुदाय पतित और नष्ट हुये बिना नहीं रहेगा।
वैभव को आम आदमी शक्ति और सौभाग्य का चिह्न मानता है किन्तु वस्तुस्थिति का विवेचन करने पर प्रतीत होता है कि शरीरगत बलिष्ठता का महत्व वैभव की तुलना में की अधिक है। सम्पदा के बल पर प्रतिभा नहीं खरीदी जा सकती, किन्तु प्रतिभावान पराक्रम और साहस के बल पर अनुपयुक्त परिस्थितियों में भी सुविधा साधन उपार्जित करते और संपत्तिवान बनते देखे गये हैं।
शरीर सौष्ठव से भी बढ़कर बुद्धिमता को समझा जाना चाहिए। कुरूप और अपंग स्तर के अष्टावक्र, सूरदास स्तर के व्यक्ति भी वरिष्ठों में गिने गये इसके विपरीत सुन्दर और बलिष्ठ दिखने वाले अनाचारी अपराधी भी घृणा और भर्त्सना के भाजन बनते हैं। बुद्धिमानों में से कितने ही ऐसे हुए हैं जो देखने में दुर्बल या कुरूप लगते थे फिर भी उनके सम्मान में कोई कमी नहीं हुई। चाणक्य और सुकरात की शरीर संरचना कुरूपों जैसी ही तो थी।
बुद्धिमता का एक पक्ष चातुर्य है। व्यवहार कुशल, मिलनसार और वस्तुस्थिति को ताड़ लेने वाले सामान्य जनों की तुलना में, नफे में रहते हैं। किन्तु देखना यह है कि ‘व्यक्तित्व’ को मानव जीवन जीवन की सर्वोपरि विशेषता है क्या वह भी मात्र मस्तिष्कीय कुशाग्रता के सहारे उपलब्ध हो सकता है? यहाँ उत्तर ‘ना’ में देना होगा और कहना पड़ेगा कि मानवी महानता व्यक्ति की भाव सम्वेदना, आदर्शवादिता एवं संयमशीलता पर निर्भर है। यही है वे अवलम्बन जो सामान्य योग्यता और परिस्थिति वालों को भी महानता के उच्च पद तक पहुँचाने में समर्थ होते हैं।
आवश्यक नहीं कि शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ और विशाल स्तर के प्राणी बुद्धिमान भी हों। इसी प्रकार यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर बुद्धिमान भावनाशील संकल्पवान भी होगा। इतने पर भी प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाली और स्तर ऊँचा उठाने के लिए संकल्प एवं उमंग को ही वरिष्ठता दी जाती है। उसकी ऊर्जा एवं प्रेरणा से प्राणी प्रतिकूलताओं के बीच रहते हुए भी अनुकूलता उत्पन्न करने में सफल होते हैं। इसके विपरीत आलसी प्रमादी प्रकृति के बलिष्ठता एवं सुविधा की दृष्टि से सुसम्पन्न होते हुए भी परिस्थितियों से लोहा लेने में परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढालने में प्रयत्नरत न होने के कारण अपनी सत्ता तक गँवा बैठते हैं।
डायनोसौर अपने समय के धरती पर पाये जाने वाले प्राणियों में सर्वाधिक संख्या में, शरीर की दृष्टि से दैत्याकार, स्वभाव से क्रूर, विकसित एवं बुद्धिमान प्राणी माने जाते थे। एक अरब 40 करोड़ वर्ष पूर्व पाया जाने वाले ब्रैकियोन्सौरस की ऊँचाई पाँच मंजिली इमारत के बराबर थी। व्हेल से कई गुना भारी छोटे मस्तिष्क वाला यह भीमकाय प्राणी स्वतन्त्र विचरण करता था। डायनोसौर्स में सबसे अधिक शक्तिशाली टाइरैनोसौरस थे। इनकी ऊँचाई दो मंजिल भवन के बराबर थी। दाँतेदार जबड़ों वाला, मशीनों जैसा शक्तिशाली विध्वंसक विशालकाय सिर के होते हुए भी इनका मस्तिष्क बहुत छोटा था। सात करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी का वातावरण बदल गया और डायनोसौर इस परिवर्तित वातावरण में अपने को अधिक समय तक जीवित नहीं रख सके और क्रमशः प्रकृति की गोद में विलुप्त हो गये।
जिन छोटे-छोटे स्तनधारी जीवों को डायनोसौर निगल जाते थे, दुश्मनों का आतंक समाप्त होते ही परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालने में समर्थ हो गये। इनकी मस्तिष्कीय क्षमता डायनोसौर्स की बुद्धिमता से 20 गुनी अधिक थी फिर भी परिस्थितियों के चंगुल से फंसकर असहाय बने विनष्ट होते रहे। इनमें से अधिकांश प्राणी दैत्यों के शिकार बनकर अपनी जाति वंश तक को समाप्त कर बैठे। दानवाकार डायनोसौर्स के अचानक विलुप्त होने पर वे स्तनधारी विभिन्न रूपों में विकास की ओर अग्रसर होने लगे। मैदानी भागों को छोड़कर जंगल की ओर आकर्षित होने लगे। इनमें से कुछ हवा में उड़ने लगे और चमगादड़ बन गये। कुछ ने समुद्र को चुना तथा व्हेल तथा डालफिन्स बन गये। अधिकाँश प्राणियों ने अपने निवास के लिये पृथ्वी के धरातल को पसंद किया और जंगली जीवन व्यतीत करने लगे। इनमें से कुछ प्राणियों ने पेड़ पर चढ़ना सीखा उसी पर रहने लगे जिनसे बाद में बन्दरों, लंगूरों का विकास हुआ। रहन-सहन-खानपान, स्थान एवं परिस्थिति के अनुरूप आवश्यक अंगों का विकास इन प्राणियों में प्रकृति प्रेरणा से स्वयमेव होता गया। शारीरिक और मस्तिष्कीय क्षमता का विकास क्रमशः पीढ़ी दर पीढ़ी होता गया। लंगूर से बन्दर, गोरिल्ला, चिरपैन्जी और इसी क्रम से कालान्तर में मनुष्य का विकास हुआ।
बुद्धिमता की अभिवृद्धि के लिए यह आवश्यक नहीं कि मस्तिष्क के आकार का उसमें भरे पदार्थों का भी विस्तार हो। भार एवं विस्तार एक बात है और तीक्ष्णता सूक्ष्मता दूसरी। यह मानना ठीक नहीं कि आकार में बड़ा होने पर भी कोई मस्तिष्क अधिक बुद्धिमता का परिचय दे सकता है। मनुष्य का सिर आरंभ से ही प्रायः उतना ही लम्बा-चौड़ा और भारी रहा है जैसा कि आदि काल में था। ......... अभिवृद्धि एवं उत्कृष्टता की जांच पड़ताल खोपड़ी की नाप तौल से नहीं, वरन् इस बात से की जानी चाहिए कि उसमें संकल्प शक्ति, श्रद्धा, सम्वेदना एवं आशा की कितनी मात्रा है। मानवी प्रगति का उद्गम स्रोत इसी भावना सम्वेदना को समझा जा सकता है। इस मर्म केन्द्र का विस्तार होने पर अगले दिनों मनुष्य सच्चे अर्थों में बनेगा। सच्ची बुद्धिमत्ता, वस्तुतः सुसंस्कारिता का ही दूसरा नाम है। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में मानवी विकास की दिशाधारा इसी ओर गतिशील होगी।
बौद्धिक क्षमता में मनुष्य अब चरम सीमा पर पहुँच गया हो, ऐसी बात नहीं है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि ‘मनुष्य’ शब्द ही विकास की अन्तिम शब्दावली नहीं है वरन् विकास का वह मूल स्रोत है जिससे नये और उच्चतर जीवन का प्राकट्य-प्रादुर्भाव होना सुनिश्चित है। मनुष्य अपने पूर्वजों से कुछ न कुछ हमेशा ग्रहण करता आया है और भविष्य के लिए अधिकाधिक विचार संचयन, उद्यमशीलता, बुद्धिमता अपनाने का प्रयत्न करता रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार भविष्य में मनुष्य का जो बौद्धिक उत्तराधिकारी आने वाला है वह ‘बायोलॉजिकल’ न होकर ‘कल्चरल’ होगा। धरती पर आने वाला यह बौद्धिक जीवन ‘एगहेड’ होगा जो आकृति में मनुष्य जैसा होगा। इसका क्रेनियम अपेक्षाकृत बड़ा और मसल घूर्नियर होगा और इसके रहन-सहन जीवनयापन की शैली मोहक और शानदार होगी।
जीवन के स्वरूप और उसकी प्रकृति को समझने तद्नुसार समग्र व्याख्या कर सकने में विज्ञान असफल रहा है। आधुनिक जैविकी, जीवन की मात्र कुछ हलचलों, भौतिक रासायनिक प्रक्रियाओं के आधार पर उसकी व्याख्या करती है। जीवन के मूलभूत गुणों- पोषण, पाचन, चयापचय, श्वसन, उत्सर्जन, प्रजनन और गति से जीवित अजीवित- जड़, चेतन का विभेद किया जाता है। अमीबा जैसे एक कोशीय प्राणी से लेकर मनुष्य तक की जैविक प्रक्रियाओं में ‘गति’ को प्रमुख माना गया है। चलते रहना ही प्राणियों का स्वभाव है। उसके प्रत्येक अंग-अवयव, कोशिका-ऊतकों में निरन्तर कुछ न कुछ हलचल एवं प्रक्रियाएँ अवश्य होती रहती हैं। स्थिरता आते ही नियति चक्र जीवन के समापन का उद्घोष कर देती है।
विकास की दृष्टि से मनुष्य को सभी प्राणियों से सर्वाधिक बुद्धिमान, कार्य कुशल, एवं सक्षम माना गया है। जैविक प्रक्रियाओं के समान होते हुए भी मनुष्य को समस्त जीवधारियों में शिरोमणि और अग्रदूत इस आधार पर माना गया है कि उसकी बुद्धिमता, बोलने, सोचने और उसे क्रिया रूप में परिणति करने की क्षमता अन्य प्राणियों से असंख्य गुना बड़ी है। फिर भी निम्न श्रेणी के जंतुओं की बुद्धिमत्ता को भी उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता। उदाहरण के लिए जाल बुनने वाली मकड़ी की कलाकारिता, दीमक की कारीगरी, पक्षियों की कलाबाजी देखते ही बनती है।
वर्तमान मनुष्य की गतिविधियों क्रिया-कलापों को देखकर उसकी बुद्धिमता पर सन्देह होने लगा है। सहयोग सहकार के राजमार्ग से भटककर संघर्षात्मक विध्वंसात्मक रवैया- तौर-तरीके अपनाते हुए हर बुद्धिमान को देखा जाता है। बुद्धिमान होने की न्यायसंगत पहचान है- परस्पर स्नेह-सहयोग की भावनात्मक एकता को बढ़ावा देना- प्रोत्साहित करना। कनाडा के सुप्रसिद्ध एन्थ्रापोलाजिस्ट आर. वी. ली के अनुसार बुद्धिमान होने का अर्थ है- पारस्परिक आदान-प्रदान, सहयोग-सद्भाव जिसके आधार पर मानव सभ्यता की आधारशिला टिकी हुई है।
वैभव, शरीर, मस्तिष्क, ज्ञान, कौशल आदि को देखकर किसी को भी प्रगतिशील, समर्थ एवं बलिष्ठ नहीं माना जाना चाहिए। न किसी की साज-सज्जा देखकर उसके सौभाग्य को सराहा जाना चाहिए। वरन् ध्यान इसी तथ्य पर केन्द्रित करना चाहिए कि सच्ची प्रगति आन्तरिक वरिष्ठता के साथ जुड़ी हुई है। यह बढ़ेगी तो मनुष्य हर क्षेत्र में बढ़ेगा किन्तु अन्तरंग की दुर्बलता बनी रही या बढ़ती रही तो फिर दुर्गति ही निश्चित है। प्राणी समुदाय के उत्कर्ष एवं अपकर्ष के इतिहास पर एक दृष्टि दौड़ाकर इस तथ्य को और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है।
शारीरिक बलिष्ठता ही कुछ नहीं है। विकासवाद की जीवधारियों सम्बन्धी मान्यता को ही लिया जाये तो कथन और भी सत्य प्रतीत होता है। वास्तविक मानवी प्रगति भाव सम्वेदना के प्रगति क्रम पर निर्भर है। भावी प्रगति का केन्द्र बिन्दु भी यहीं रहने वाला है। बुद्धिमता की कसौटी कितनी सही है, यह भी विवादास्पद ही है। यदि इसी पर विकास को समझना हो तो बुद्धिमत्ता की परिभाषा ही बदलनी होगी।
एक जिज्ञासु कबीर के पास पहुँचा, बोला- ‘दो बातें सामने हैं- संन्यासी बनूँ या गृहस्थ।’
कबीर ने कहा- ‘जो भी बनो आदर्श बनो।’
उदाहरण समझाने के लिए उन्होंने दो घटनाएँ प्रस्तुत कीं।
अपनी पत्नी को बुलाया। दोपहर को प्रकाश तो था, पर उन्होंने दीपक जला लाने के लिए कहा ताकि वे कपड़ा अच्छी तरह बुन सकें। पत्नी दीपक जला लायी और बिना कुछ बहस किये रखकर चली गई।
कबीर ने कहा- ‘गृहस्थ बनना हो तो परस्पर ऐसे विश्वासी बनना, कि दूसरे की इच्छा ही अपनी इच्छा बने।
दूसरा उदाहरण सन्त का देना था। वे जिज्ञासु को लेकर एक टीले पर गये, जहाँ वयोवृद्ध महात्मा रहते थे। वे कबीर को जानते न थे। नमाज के उपरान्त उनसे पूछा- ‘आपकी आयु कितनी है?’ बोले- ‘अस्सी बरस।’
इधर-उधर की बातों के बाद कबीर ने कहा- ‘बाबाजी, आयु क्यों नहीं बताते?’ सन्त के कहा था- ‘बेटे, अभी तो बताया था, अस्सी बरस! तुम भूल गये हो। टीले से आधी चढ़ाई उतर लेने के बाद कबीर ने सन्त को जोर से पुकारा और नीचे आने के लिए कहा। वे हाँफते-हाँफते चले आये। कारण पूछा, तो फिर प्रश्न किया- ‘आपकी आयु कितनी है?’ सन्त को तनिक भी क्रोध नहीं आया। वे उसे पूछने वाले की विस्मृति मात्र समझे और कहा- ‘अस्सी बरस है।’ हँसते हुए वापस लौट गये।
कबीर ने कहा- ‘सन्त बनना हो तो ऐसा बनना, जिसे क्रोध ही न आये।’
अब तक ज्योतिषी, सामुद्रिक शास्त्री ही हस्तरेखा देखकर यह बताया करते थे कि भाग्य या भविष्य क्या है। जन्म कुण्डली की तरह हस्तरेखा देखकर भी भूत भविष्य की सम्भावना का कथन किया जाता था। अब शरीर विज्ञानी इस आधार पर स्वास्थ्य की स्थिति और स्वभाव की स्थिति का निष्कर्ष निकालने लगे हैं। रोग परीक्षा के लिए वैद्य नाड़ी देखते रहे और नाखूनों की सफेदी देख रक्ताल्पता का निष्कर्ष निकाला जाता था। सरकारी दस्तावेजों में हाथ के अँगूठे के छाप लेकर व्यक्ति की सही पहचान की जाती है। दो व्यक्तियों के अंगूठे एक जैसे नहीं मिलते। इसलिए हस्ताक्षरों के जाली होने की सम्भावना तो रहती है, पर अंगूठा छाप में यह संदेह नहीं रहता कि वह व्यक्ति कोई दूसरा तो नहीं है।
अब हाथ की बनावट के सम्बन्ध में सोचा जाता है कि वह शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का विवरण भी प्रस्तुत करती है, इसलिए हाथ की रेखाएँ और उसकी कोमलता कठोरता देखकर डॉक्टरों ने किसी व्यक्ति को क्या रोग है और उसकी मानसिक स्थिति क्या है इसकी परीक्षा करना भी आरम्भ कर दिया है। कई शरीर शास्त्रियों का मन्तव्य है कि हाथ देखकर किसी का व्यक्तित्व भली प्रकार समझा जा सकता है और तद्नुरूप उसकी चिकित्सा का निर्धारण हो सकता है।
शरीर की अंग रचना में हाथ सबसे अधिक संवेदनशील है। उसके विभिन्न क्षेत्रों की रेखाएँ नीची-ऊंची होती रहती हैं। मोटे तौर पर रेखाओं की बनावट प्रायः समान बनी रहती है, पर बारीकी से देखा जाये तो प्रतीत होगा कि उनमें काफी हेर-फेर होता रहता है। न केवल हथेली की रेखाएँ वरन् अंगुलियों के पोरबे, नाखून, हथेली का पीछे वाले बाल कई तरह से सिकुड़ता-फैलता और ऊँचा-नीचा, उभार गहरा होता रहता है। जिन्हें इसका अनुभव है उन्हें विभिन्न रोगियों की स्वास्थ्य सम्बन्धी भूत, वर्तमान और भविष्य का पर्यवेक्षण करने में कोई कठिनाई नहीं होती।
योरोप और अमेरिका म अब हस्त विज्ञान के सम्बन्ध में कितने ही चिकित्सा विशेषज्ञों की खोजें चल रही हैं। वे ज्योतिषियों, समुद्र शास्त्रियों की तरह मात्र रेखाएँ नहीं देखते वरन् हाथ के हर भाग में होते रहने वाले उतार-चढ़ाव का निरीक्षण करते रहते हैं। उनका कथन है कि पैथालॉजी की दृष्टि से हाथ अकेला ही वह विवेचन प्रस्तुत करता है जितना कि रक्त, मूत्र, मल, थूक, एक्सरे आदि की परीक्षा की जानकारी से प्राप्त होती है। इस आधार पर की गई चिकित्सा अपेक्षाकृत अधिक लाभकारी सिद्ध हुई है। इस विज्ञान में डॉ. गार्डन, ई. हेल, डॉ. हर्डेयन, डॉ. स्मिथ, डॉ. ईवान, डॉ. हिरनेक आदि ने विशेष ख्याति प्राप्त की है। उनको पर्यवेक्षण एवं उपचार अधिक प्रामाणित पाये गये हैं।
न्यूयार्क स्थित स्टेटन हाईलैण्ड अस्पताल कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के पामिस्ट्री शोध विभाग ने कीरो की पामिस्ट्री में एक नयी शृंखला जोड़ी है। कीरो ने हस्त रेखाओं द्वारा ग्रहगणित का ऊहापोह किया था और बताया था कि हाथ की रेखाएँ तथा विशेष स्थानों के उठाव देखकर रेखाओं की लम्बाई तथा सीधापन तिरछापन जानकर किसी का भविष्य जाना जा सकता है कि उसका भूतकाल कैसा रहा है और भविष्य कैसा होने जा रहा है।
उस शोध में एक नयी शृंखला अब यह जुड़ी है कि मनुष्य किसी रोग से पीछा छुड़ा चुका है और किस नये रोग की सम्भावना में प्रवेश कर रहा है। यह जानकारी शारीरिक ही नहीं मानसिक क्षेत्र की भी हो सकती है कि मनः क्षेत्र में कौन व्यक्ति श्रेष्ठता या निकृष्टता की ओर कदम बढ़ा रहा है। यह एक बड़ी बात और बड़ी सम्भावना है जिसकी गहरी खोज होनी चाहिए।
अपने ऊपर विश्वास करो ताकि दूसरे तुम्हें विश्वास योग्य समझें और विश्वास योग्यों का दिया जाना वाला सहयोग सम्मान प्रदान करें।
दृश्यमान स्थूल आयामों के अतिरिक्त दिग्-काल के बोध रूप में एक अतिरिक्त अविज्ञात आयाम भी होता है। इनकी जानकारी जब वैज्ञानिकों को इस सदी के प्रारम्भिक दशकों में हुई तो उससे न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मन सम्बन्धी भी अनेकों रहस्यमय जानकारियाँ उभर कर सामने आईं। प्रारम्भ में छाया वैज्ञानिक चिन्तन को घेरा हुआ कुहासा, ज्यों ही क्रमशः मिटता चला जा रहा है, विचारणात्व बोध को मानवी स्वास्थ्य से जोड़ पाने में क्रमशः वैज्ञानिकों को सफलता हस्तगत होती जा रही है।
जैसे हम देश काल, कण-प्रतिकणों के विराट् साम्राज्य को साकार रूप नहीं दे सकते मात्र कल्पना ही कर पाते हैं, ठीक उसी प्रकार मानवी मस्तिष्क के मनस् रूपी अदृश्य आयाम की, विचारों के स्वरूप की मात्र कल्पना भर ही कर पाते हैं। पिछले दिनों “मनुष्य दीर्घायुष्य कैसे बने”, इस मुद्दे पर जब स्वास्थ्य विज्ञानियों ने अनुसंधान क्रम आरम्भ किया तो उन्हें भौतिकी के सापेक्षवाद सिद्धान्त को मानवी काया एवं चिन्तन पर आरोपित कर, इस माध्यम से विचारों के बोध जगत का मनुष्य के जीवकोशों एवं चिन्तन प्रवाह पर प्रभाव जानने की आवश्यकता जान पड़ी। इन चिकित्सा विज्ञानियों का मत था कि बहुसंख्य तथाकथित शारीरिक रोगों की उत्पत्ति, जिनमें कैन्सर, हृदयाघात एवं उच्च रक्तचाप जैसी घातक व्याधियों का बाहुल्य है, चौथे आयाम विचार जगत में सर्वाधिक होती देखी जाती है। चाहे इनके कारणों हेतु आधुनिक विज्ञान जगत की उपलब्धियों, आहार-विहार का व्यक्तिक्रम, परावलम्बी जीवन क्रम, एवं प्रदूषण कारक तत्वों का वातावरण में बाहुल्य जैसों का नाम ले लिया जाये लेकिन ये सब मूलतः हर मनुष्य के चारों ओर छाये विचार मण्डल, जिसे डॉ. अर्नेस्ट बर्जर ने “आयडियोस्फियर” नाम “बायो” एवं “आयनोस्फियर” की तरह दिया है, में होने वाले असंतुलन की ही प्रतिक्रिया है। इसे समझाने के लिये वे कहते हैं कि अच्छा होगा कि इस चिकित्सीय चतुर्थ आयाम की परिकल्पना को आइन्स्टीन के भौतिकी के बलों के एकीकरण व सापेक्षिकता सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय।
दिक्, काल सम्बन्धी सापेक्षवाद की मनीषी आइन्स्टीन की वर्षों पुरानी मान्यता पर आज के वैज्ञानिक जितनी गहराई से चिन्तन करते हैं, उन्हें अनेकानेक नई अनुभूतियाँ होती, नये चिन्तन के आयाम खुलते चले जाते हैं। आइन्स्टीन की जन्म सदी पर पिछले दिनों प्रकाशित विद्वान लेखक नोजेल काल्डर की पुस्तक “आइन्सटीन्स यूनीवर्स” में कई ऐसे अविज्ञात तथ्यों का उद्घाटन किया गया है जो अभी तक सूत्र रूप में होने के कारण वैज्ञानिक समझ पाने में असफल रहे हैं। “वायोलेन्ट यूनीवर्स”, “वेदर मशीन”, “स्पेसशीप ऑफ माइण्ड”, “द माइण्ड ऑफ मैन”, एवं “की टू यूनीवर्स” जैसी बेस्ट सेलर पराभौतिकी पर लिखी गयी पुस्तकों के लेखक डॉ. नीजेल काल्डर ने आइन्स्टीन को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न दैवी पुरुष माना है, जिन्होंने परोक्ष जगत की परिकल्पना करने तथा अदृश्य जगत के अनुसंधान हेतु मानवता को मार्ग सुझाया। न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मनस् के अविज्ञात आयामों को भी उन्होंने दृश्यमान रूप दिया, जिसे समझने का कार्य अब पैंसठ वर्ष बाद सम्पन्न हो रहा है।
सापेक्षवाद की परिकल्पना के विषय में लिखते हुए काल्डर लिखते हैं कि इसे ‘सापेक्षता’ के स्थान पर इसके विपरीत “इनवेरिएन्स थ्योरी” (स्थिरता या अपरिवर्तनीयता) नाम देना अलबर्ट आइन्स्टीन ने सर्वाधिक उपयुक्त समझा था। उन्होंने “रिलेटीविटी” की नहीं अपितु “एब्सॉल्यूट” की खोज की थी, एवं इस पर वे बराबर जोर देते रहे। वैज्ञानिक उस परम (एब्सॉल्यूट) सत्य की शोध करने वालों की बृहद् शृंखला की एक कड़ी भर है, इसका बोध कराने के लिए उन्होंने रिलेटिविटी (सापेक्षिकता) नाम का प्रयोग भर किया था। उनका कथन था कि पदार्थ तो “जमी हुई ऊर्जा” (फ्राजन एनर्जी) भर है। ऐसे में दृश्यमान मस्तिष्कीय द्रव्य पदार्थ को ही सब कुछ नहीं मान लेना चाहिए। इस जमी ऊर्जा का रूपांतरण चतुर्थ आयाम में जब विचार तरंगों के रूप में होता है तो वे अति शक्तिशाली ऊर्जा प्रवाह में बदल जाती व आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है। आइन्स्टीन पर शोध करने वाले पिछले दशक के वैज्ञानिकों यथा डॉ. सिडनी ड्रेल, रॉजर पेनरोज एवं इर्विन शैपिरो का मत है कि क्वाण्टा-बेव-पार्टीकल के समुच्चय उस आयनोस्फियर की तरह की आइन्स्टीन मनःक्षेत्र की इस जमी ऊर्जा को विचार प्रवाह के प्रभा-मण्डल आयडियोस्फियर के रूप में हर व्यक्ति पर छाया हुआ मानते थे। इसका नेगेटिव व पॉजिटिव होना ही व्यक्ति के स्वयं के चिन्तन, स्वास्थ्य एवं प्रभावोत्पादकता पर तथा आसपास के वातावरण पर तद्नुरूप प्रभाव डालता है, ऐसा उनका मत था।
महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन के अनुसार विचार तरंगों के कम्पन इतने तीव्र होते हैं कि उन्हें मापा नहीं जा सकता, मात्र उस तीव्रता एवं उसके सापेक्ष नहीं परम होने का बोध भर किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार आइन्स्टीन का विश्वास था कि मानवी विचार तरंगों के परिप्रेक्ष्य में उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को देखा जाना चाहिए, न कि जीवाणु-विषाणु-प्रदूषण जैसे बाह्य कारकोंजन्य प्रभाव को। उनका मत था कि स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी घटनाएँ अनुभव-बोध रूपी विचार लोक में घटती है। इसमें व्यतिरेक जब भी होता है, जीवनी शक्ति लड़खड़ाती है एवं रोग मनुष्य को आ घेरते हैं- कोशिकाएँ जल्दी बुढ़ाने लगती हैं, मनुष्य स्वतः प्राकृतिक रूप में अथवा रोगों का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त होता है।
यह विचारणीय तथ्य है कि अलबर्ट आइन्स्टीन एक भौतिकविद् थे न कि चिकित्सा शास्त्री। लेकिन स्पेस टाइम की उनकी परिकल्पना, अनुभव-बोध एवं विचार मण्डल (आयडियोस्फियर) की संरचना के माध्यम से उन्होंने रोगों के कारणों के सिद्धान्त एवं दीर्घायुष्य होने के स्वरूप को सूत्र रूप से 1913-14 में ही लिखकर रख दिया था।
आज हम पाते हैं कि वस्तुतः हमारे दैनन्दिन जीवन की घटनाओं के मूल में तेजी से दौड़ लगाने वाले विचार मण्डल के गति प्रवाह की कितनी महती भूमिका है। रूसी चिकित्साशास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक डॉ. पावलोव ने चूहे से लेकर मनुष्यों तक के ऊपर किए गए परीक्षणों के आधार पर यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला था कि हर व्यक्ति के अन्दर किसी कार्य को शीघ्रता से करने- न करने, आवश्यकता की महत्ता समझने न समझने का बोध कराने वाली एक घड़ी होती है जो समय-समय पर उसके द्वारा विनिर्मित विचार मंडल के अनुरूप उसे चेतावनी देने का कार्य करती है। अवचेतन में यह सतत् क्रियाशील रहती व मनुष्य को निर्णय लेने हेतु विवश करती रहती है। पावलोव का मत है कि हमारी इस आन्तरिक घड़ी को जब शीघ्रता से किसी कार्य को करने का बोध होता है तो वह एक निश्चित गतिलय पर काम करने वाली आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास आदि प्रक्रियाओं की कम्पन गति तीव्र कर देती है। संतुलित मनःस्थिति वाले मन से संचालित शरीर की सभी क्रियाओं का संचालन करता है।
वैज्ञानिकों का मत है कि समय की गतिशीलता का बोध विचारों पर प्रभाव डालकर रोगों के होने-न-होने के रूप में अपनी अभिव्यक्ति करता है। जिन व्यक्तियों पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता एवं यह तनाव को जन्म देता है उन्हें टाइप ‘ए’ इनडिविजुअल कहा गया है। ऐसे व्यक्ति मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में बहुत महत्वाकाँक्षी होते हैं एवं स्वयं को उच्च लक्ष्यों हेतु समर्पित कर सर्वोच्च सफलता हस्तगत करने की पात्रता रखते हैं। लेकिन इनमें जो स्वयं को संतुलित नहीं रख पाते, वे तनाव का सामना करने में अक्षम बने रहते हैं एवं बहुधा हृदय रोगों के शिकार होते हैं। अन्तर्मुखी प्रवृत्ति वाले ये व्यक्ति सर्वदा अपने बोध-अनुभूति के आयाम में कुछ कर गुजरने की, लक्ष्य पूर्ति की कामनाओं से घिरे रहकर बेचैनी एवं व्यथा युक्त जीवन जीते हैं। यहाँ तक विश्राम की अवस्था में भी इनकी हृदय की गति व रक्त चाप अधिक होता है। एड्रीनेलिन, नारएड्रीनेलीन, सिरोटोनिन, इन्सुलिन जैसे हारमोन्स सर्वदा उत्तेजना बनी रहने के कारण हरी सिकनेस से ग्रस्त इन व्यक्तियों के रक्त में सतत् स्रवित होते रहते हैं। इन टाइप ‘ए’ व्यक्तियों में आमाशय में अम्लाधिक्य, श्वास गति की वृद्धि, रक्त के वसा घटकों में वृद्धि, सारी माँस-पेशियों में तनाव, स्वेद ग्रंथियों से पसीने का सतत् बहना जैसे लक्षण अधिक पाये जाते हैं। इन लक्षणों को जो सारे कायतंत्र को प्रभावित करते हैं- “टाइप सिन्ड्रोम” नाम दिया गया है।
वैज्ञानिक द्वय कैनेथ ब्रेचर एवं डेनिस शियामा ने अपने शोध निष्कर्षों में लिखा है कि टाइप ‘ए’ व्यक्तियों को अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह समय की द्रुतगामी चाल के प्रति चिन्तित न रहकर मध्यवर्ती समय बोध का जब अभ्यास कराया गया हो तो उनके रस द्रव्यों के स्रावों की गति में 25 ये 40 प्रतिशत कमी होती देखी गयी। बायोफीडबैक द्वारा भी निर्देशन प्रक्रिया से तनाव की प्रक्रिया में उन्हें मदद मिली। विशेष रूप से हृदय रोग से ग्रस्त व्यक्ति समय आयाम के प्रति अधिक संवेदनशील पाए गए हैं। अब चिकित्सक औषधि उपचार के स्थान पर “समय कम नहीं है”, “जीवन में जीने हेतु पर्याप्त समय”, “जल्दबाजी की कोई आवश्यकता नहीं” , जैसे सम्मोहन परक निर्देश देकर उन्हें ऐसी अनुभूति कराते हैं कि वे वस्तुतः वर्तमान में जी रहे हैं, किसी से पिछड़ नहीं रहे। औषधि उपचार की तुलना में यह उपचार अधिक कारगर पाया गया है।
वास्तविकता यही है कि हममें से बहुसंख्य व्यक्ति जाने अनजाने इस “टाइप सिन्ड्रोम” के शिकार हो जाते हैं। कारण केवल यही है कि हम वर्तमान में जीना नहीं जानते, आगत को सामने देखते हुए तुरन्त उसे पाने की चेष्टा करते हैं। जो कुछ दृश्यमान है, उससे परे बोध अनुभूति का जो आयाम विचार मण्डल के रूप में हमारे चारों ओर छाया रहता है, उसे हम वाँछित दिशा में मनोबल के सहारे बनाते रह सकते व तद्नुसार जीवन जी दीर्घायुष्य प्राप्त कर सकते हैं। यह जीवन बहुत लम्बा है, उसमें कई दिन हैं, उसमें भी कई घण्टे, मिनट, व सेकेंड हैं। यदि इनका भली−भांति सुनियोजन कर चिन्तन प्रवाह को सही दिशा दी जा सके तो अकारण रोगग्रस्त न रह कर समस्वरता से भरी हँसी-खुशी की उपलब्धियों से भरी पूरी जिन्दगी जीने में समर्थ हो सकते हैं।
कल्पना लोक में विचरण करने वाले- दिवास्वप्न देखने वाले तो स्वयं वैज्ञानिक मनीषी आइन्स्टीन के अनुसार इस त्रिआयामीय जगत को विकृत रूप में देखते हुए स्वयं पर आरोपित कर फलितार्थ भोगते हैं। आधुनिकता के इस युग में “एंजीग वार्धक्य” को टालकर दीर्घायुष्य प्राप्त करने की सही तकनीक मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्तॉव के अनुसार समय बोध के आयाम में सही चिन्तन करने की ही है। इस तथ्य को हृदयंगम करने वाले ऋषि-मुनि गण सदैव इस सूक्ष्म आयाम में ही जीवन जीते व अपने जीवन की सीमित अवधि को असीम बना लेते थे। उसी उपक्रम का आश्रय लेकर आज भी आयुष्य को बढ़ा पाना एवं रोगों को टाल पाना संभव है, इसमें किंचित मात्र भी सन्देह नहीं होना चाहिए।
चिकित्सा विज्ञानियों में आदिकाल से आयुष्य बढ़ाने हेतु नवीन खोजें करने की प्रतिस्पर्धा रही है। नवीनतम प्रतिपादन पिछले दिनों कुछ वैज्ञानिकों ने साईंस डाइजेस्ट पत्रिका में प्रकाशित किया। उनका मत है कि “आयडियोस्फियर” नाम से एक चतुर्थ आयाम हर व्यक्ति के चहुँ ओर संव्याप्त होता है। यह आयडियोस्फियर, बायोस्फियर की ही अनुकृति है। परोक्ष जगत का द्वार खोलने वाला यह चौथा आयाम ऐसा है जिसके प्रवाहों को अनुकूल बनाकर व्याधियों से बचना एवं दीर्घायुष्य को प्राप्त करना सम्भव है। सम्भव है अगले दिनों योग साधना से इस आयाम में पहुँचने की होड़ मचने लगे एवं “एजींग” (वार्धक्य) पर नियंत्रण में वैज्ञानिक-अध्यात्मवादी सफल हो जायँ।
प्रार्थना प्रातः की कुँजी और संध्या की चटखनी है।
-मैथ्यू हैनरी
इस सृष्टि में सब कुछ नियमित और अनुशासित ढंग से चल रहा है। स्वच्छन्दता और उच्छृंखलता यदा-कदा दीखती तो है पर थोड़ी गहराई में उतरते ही उसके पीछे भी कोई न कोई अनुबन्ध काम करता दिखाई देता है। साइबेरिया के पक्षी वहाँ मौसम अनुकूल न रहने पर हजारों मील की यात्रा करके भारत आ जाते हैं और परिस्थिति बदलते ही वे उसी क्रम से वापस लौट जाते हैं। कुछ जाति की मछलियाँ प्रजनन की उमंग आते ही हजारों मील की लम्बी यात्रा पर निकल पड़ती हैं और जहाँ उनके लिए अनुकूलता है वहाँ पहुँच कर अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति करती हैं। यह सब इस प्रकार होता है कि मानो उसके लिए किसी ने पहले से ही प्रशिक्षित किया हो अथवा समय पर किसी सशक्त ने हण्टर लेकर वह कष्टसाध्य काम उनसे कराया हो।
सूर्य चन्द्र ग्रह नक्षत्र अपनी गतिविधियों में समय चक्र का बिना रंच मात्र व्यवधान किये पालन करते हैं। इतना ही नहीं वे अपने परिभ्रमण मार्ग पर चलते रहने में भी राई रत्ती चूक नहीं करते हैं। ऋतुएं अपने समय पर आती हैं और अवधि पूरी होते ही चली जाती हैं। सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन का क्रम ऐसा है, मानो नियति ने इस सुनिश्चित व्यवस्था को बहुत समझ-बूझकर बनाया हो। अणु परमाणुओं के गर्भ कलेवर में जो क्रम चलता है उसमें सौर मण्डल का नियम अनुशासन और विधि-विधान भली प्रकार लागू होता है।
मनुष्य को बाह्य जीवन में इच्छानुसार काम करने की एक सीमा तक छूट मिली हुई है। उसमें व्यतिरेक बरतने पर राजदण्ड, समाज दण्ड, प्रकृति दण्ड के हण्टर बरसने लगते हैं। फिर आन्तरिक क्रिया-कलापों में तो कहीं कोई अव्यवस्था है ही नहीं। रक्त प्रवाह, धड़कन, पाचन, शयन, जागरण, ग्रहण, विसर्जन की प्रक्रिया सुनियोजित रीति से चलती रहने तक ही जीवन स्थिर रहता है।
गर्भावस्था में स्त्रियो की हृदय की धड़कन होती तो न्यूनाधिक है पर भ्रूण की चेतना उसे प्रति मिनट 72 के हिसाब से सुनती है। उस अवधि में बच्चे को उन्हें सुनने का इतना अधिक अभ्यास हो जाता है कि उसके बिना चैन न पड़े। जन्मने के बाद भी उसे ऐसे अवसरों की तलाश रहती है जिनमें प्रति मिनट 72 धड़कनें लयबद्ध रूप से सुनने का अवसर मिले। जब भी ऐसा अवसर आता है उसे असाधारण प्रसन्नता होती है।
समय के अनुशासन में मनुष्य का भीतरी ढांचा मजबूती के साथ कसा हुआ है। मांसपेशियों का आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास, निमेष-उन्मेष आदि में यदि तालबद्धता रहती है तो मनुष्य प्रसन्न भी रहता है और निरोगी भी। पर जब भी अस्त-व्यस्तता चढ़ती और मनुष्य स्वच्छन्दता बरतकर निर्धारित क्रम बिगाड़ता है तो क्रमबद्धता लड़खड़ाने के कारण उसे अनेकानेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। प्रकृति के अन्य जीव-जन्तु प्रकृति प्रेरणा के सहारे उस समय सारिणी का बहुत कुछ परिपालन करते हैं। एक मनुष्य ही हे जो दिनचर्या में अनियमितता बरतता है और अनेकों परोक्ष कठिनाईयां बटोर लेता है।
प्राणायाम प्रक्रिया में इसी तालबद्धता से संबंधित समय सारिणी का अभ्यास किया जाता है। उस सन्दर्भ में जितनी प्रवीणता प्राप्त होती जाती है उतनी ही कायिक स्थिरता, सुदृढ़ता और दक्षता बढ़ती देखी जाती है।
सृष्टि क्रम नियमबद्ध अनुशासन का परिपालन करते हुए चल रहा है। मनुष्य के लिए भी मर्यादा पालन और नियम निर्धारण आवश्यक है। स्वच्छन्दता का उदत्त उपयोग करने वाले अहंकारी देर तक मनमर्जी नहीं चला सकते और उन्हें अंकुश अनुशासन के परिपालन में बाधित होना ही पड़ता है। अच्छा हो, वस्तुस्थिति को समझें और अनुशासित नियमित जीवन जीने की आदत डालें।
जीवन को शक्तिशाली बनाने के तीन सूत्र हैं- आत्म-ज्ञान, आत्म-संयम और आत्म-सम्मान।
मनुष्य के लिए ठीक तरह सोचना और करना तभी तक सम्भव होता है जब तक उसकी बुद्धि सावधान होती है। बुद्धि भ्रष्ट होते ही सारा चिन्तन लड़खड़ा जाता है। उलटा सोचता है और उलटे ही काम करता है। फलतः परिणाम भी उलटे होते हैं। सारे प्रयास सत्परिणाम उत्पन्न करने के स्थान पर उलटी विपत्ति खड़ी करते हैं। अस्तु मनुष्य का सर्वप्रथम प्रयास यह होना चाहिए कि बुद्धि को भ्रष्टता की दलदल में न फंसने दें।
इस सम्बन्ध में गीता की उक्ति है-
यदा ते मोह कलिलं बुद्धिर्व्धतरिष्यति। तदा गन्तेसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य श्र॥
अर्थात्- भगवान अर्जुन से कहते हैं जब तेरी बुद्धि मोह रूपी दल-दल से निकल आवेगी। तब उस रास्ते पर चलेगा जो करने वालों और सुनने वालों सभी के लिये श्रेयस्कर है।
बुद्धि भ्रष्ट कैसी होती है? वह किस दल-दल में फंस जाती है। इसका कारण और निवारण इस श्लोक में बताया गया है। मोह रूपी दलदल ही ऐसा है जिसमें बुद्धि फंस जाती है और प्रयत्न करने पर भी निकल नहीं पाती।
धन का लालच लोभ कहलाता है और व्यक्तियों के प्रति असाधारण लगाव मोह। यह मोह ही बुद्धि को मगर की तरह निगल जाता है । मनुष्य की अपनी आवश्यकताएँ तो बड़ी सीमित हैं। उनकी सूची बनाई जाय, और उतने साधन जुटाये जायें तो यह सब सरलतापूर्वक जुट जाता है। सात्विक आवश्यक और उपयोगी का ध्यान रखा जाये तो वे इतनी सरल होती हैं कि अपने निजी परिश्रम से उतना सब दो चार घण्टे में ही उपार्जित हो सकता है। वासना की लिप्सा अपनाने पर शरीर की आवश्यकताएँ भी बढ़ जाती हैं। वे महंगी पड़ती हैं। बहुत ही विलासी साधन सामग्री की आवश्यकता पड़ती है। ठाठ-बाट, शृंगार, चटोरेपन, कामुकता आदि का क्षेत्र बड़ा है इसके लिए बहुत साधन चाहिए। बहुत परिश्रम भी अभीष्ट है। तो भी आदमी जितना कमा सकता है उसे देखते हुए शरीर की शोभा सज्जा की एक सीमा है और वह इतनी अधिक नहीं है कि उसके लिए पूरा जीवन ही निछावर करना पड़े।
न पार हो सकने वाला दलदल तो मोह का है। मोह को ममता भी कहते हैं। मेरे पन का विस्तार इतना बड़ा हो सकता है कि उसकी पूर्ति हो सकना कठिन है। कुटुंबियों, मित्रों, संबंधियों की परिधि तो और भी बड़ी है। अपनी संपत्ति, जायदाद, वाहन, नौकर आदि का विस्तार कितना भी किया जा सकता है। यह मोह है। जिन्हें मेरा कह सकें उनकी सूची बनाई जाये तो वह इतनी बड़ी हो सकती है कि बुद्धि की मर्यादा छोटी पड़ जाय। बुद्धि अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुरूप ही उपार्जन का ताना-बुना बुन सकती है। परिश्रम के सहारे तो वह थोड़ा सा ही हो सकता है। चोरी, बेईमानी के आधार पर कमाने की भी हर व्यक्ति की सीमा होती है। उपार्जन के उपरान्त उसके संरक्षण का प्रश्न आता है। वस्तुएं तो अपने पास बहुत हो जायं पर उनका संरक्षण न हो सके ता फिर चार, डाकू, भिक्षुक, ईर्ष्यालु, ठग उसे किसी न किसी बहाने अपहरण कर ले जाते हैं। सत्प्रयोजन में तो साधनों का कितना ही व्यय किया जा सकता है। पुण्य परमार्थ की कोई सीमा नहीं। किन्तु मात्र संग्रह या उपभोग करना हो तो बहुत बड़ा झंझट है। उपभोग की औचित्य की सीमा से बाहर किया जाय तो वह दुर्व्यसन ही हो सकते हैं। ऐसा संग्रह अहंकार ता बढ़ाता है, पर उसके साथ में इतने झंझट हैं कि यह मोह ममता बहुत भारी पड़ती है और सुख देने की अपेक्षा चिन्ता और दुर्गुण बढ़ाते हुए विनाश का कारण बनती है।
मोह ममता निजी प्रयोजनों से आगे बढ़कर जब कुटुंबियों, संबंधियों तक में फैलती है तो उसकी सीमा और भी बढ़ जाती है। फालतू कमाने वाले या संग्रह करने वाले के कुटुंबियों की सीमा नहीं रहती। सगे तो स्त्री पुत्र आदि थोड़े ही होते हैं। बिना सगे भी सगे बन बैठते हैं और अपने को सम्बन्धी सिद्ध करते हुए फालतू सम्पदा पर अपना अधिकार जताते हैं। हिस्सेदारी की माँग करते हैं। जब अनावश्यक धन संग्रह है ही तो उसे चाटुकारों में वितरण करके उनसे प्रशंसा सुनने, आत्मीयता की दुहाई कान में पड़ने का लोभ भी संवरण नहीं होता। अपनी ही तरह इन कुटुम्बियों, संबंधियों के लिए भी धन-दौलत जमा करने और बांटने का मन होता है। इसके लिए जितने भी साधन एकत्रित किये जायें उतने ही कम हैं।
बुद्धि के उपयोग करने के लिए यह मोहजन्य ताना-बाना इतना सुविस्तृत होता है कि इतनों के लिए सोचने और करने के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। क्या करना? इसका पूर्ण रूप है- क्या सोचना। सोचना भी एक प्रकार का कर्म है। बीज का विकसित रूप पौधा है। चिन्तन का विकसित रूप कर्म है। कर्म से साधन एकत्रित होते हैं। जो एकत्रित है उसी को तो वितरण किया जायेगा। इन सारी भूमिकाओं को बुद्धि ही सम्पन्न करती है। वह कितनी ही तीव्र और सक्षम क्यों न हो पर जब मोह जाल में फंस जाती है, तो मकड़ी के जाले की तरह अपने आप को उसी में फंसा लेती है। न उसमें से निकलने का अवसर मिलता है न इच्छा ही होती है। सामान्य मनुष्य बुद्धि को इसी मोह जाल में फंसाये रहता है। पूरा जीवन इसी में खप जाता है। सारी योजनाएँ इसी की बनती हैं। अवांछनीय उपार्जन जितना पेचीदा है उससे अधिक उसका उपभोग और वितरण है। इन दोनों कामों में आदि से अन्त तक अनौचित्य भरा रहता है। अतएव उनकी गुत्थियों को सुलझाना लोभ की पूर्ति में भी कठिन पड़ता है। मोह को लोभ का बड़ा भाई बताया गया है । जिन्हें अपना मानकर धन दिया जाता है उनके सम्बन्ध में यह इच्छा भी होती है कि यह हमारा कहना माने। लेने को तो हर कोई तैयार है पर मानने को कदाचित ही कोई तैयार होता है।
आत्म-कल्याण के लिए, पुण्य परमार्थ के लिए- जीवन को सार्थक बनाने के लिए- मानव परायणता के लिए भी बुद्धि और कर्म की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य इतने सरल नहीं है कि तनिक से पूजा-पाठ को चिन्ह पूजा भर से सम्भव हो सके। इसके लिए जीवन को एक विशेष ढाँचे में ढालना होता है। उच्चस्तरीय कर्म व्यवस्था अपनानी पड़ती है। इस निमित्त बुद्धि का नियोजन उससे भी अधिक चाहिए जितना कि लोभ और मोह के निमित्त लगाना होता है। यह लगे कैसे? बुद्धि या कर्म का- समय या श्रम का वह भाग आये कहां से? जो कुछ है वह तो सारा मोह रूपी दलदल में फँसा रह जाता है।
आत्म कल्याण के लिए साधारण बुद्धि से भी काम नहीं चलता। इसके लिए प्रज्ञा, मेधा चाहिए। विवेकवान दूरदर्शिता अभीष्ट होती है। इस स्तर की बुद्धि उपजे कैसे? उसका एक ही उपाय है कि उसे मोह रूपी दलदल में से किसी प्रकार बाहर निकाला जाय। यह दलदल ही समस्त मेधा को उदरस्थ कर जाता है। इसलिए परमार्थिक जीवन के लिए प्रथम आवश्यकता इस बात की है कि चिन्तन को मोह-जाल में से निकाला जाय। सौम्य, सात्विक, सरल, निर्लोभ, निर्मोह जीवन का लक्ष्य बनाया जाय। गीता की यही उक्ति ऐसी है जिसे अपनाये बिना और कोई गति नहीं।
स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका की एक सड़क से गुजर रहे थे तो उनकी विचित्र वेशभूषा को देखकर लोग उन्हें मूर्ख समझने और मजाक बनाने लगे। अपने पीछे आती हुई भीड़ के सम्मुख स्वामीजी रुके और उनने पीछे मुड़कर कहा- सज्जनों! मेरी वेशभूषा को देखकर आश्चर्य मत करो। आपके देश में सभ्यता की कसौटी पोशाक है। पर मैं जिस देश से आया हूँ वहाँ कपड़ों से नहीं मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती है।
आनन्द की तलाश में लोग जहाँ-तहाँ मारे फिरते और तितली की तरह एक फूल से दूसरे फूल पर बैठते हैं। असंतुष्ट रहने पर अन्यत्र उड़ते और वहाँ से भी दूर के ढोल सुहावने होने का आक्षेप लगाते हुए किसी अन्य स्थान के लिए चल पड़ते हैं। असफलता वहाँ भी छाया की तरह साथ चलती है। जिस स्थान, व्यक्ति या परिस्थिति को कभी बहुत ही आकर्षक माना गया था, वह सम्पर्क सधने के उपरान्त वैसा निकलता नहीं जैसा कि मिलन से पूर्व सोचा गया था। यह अतृप्ति जन्म अशान्ति ही मनुष्य के पीछे प्रेत, पिशाच की तरह फिरती रहती है। आनन्द की खोज में व्याकुल और उसकी उपलब्धि के लिए आतुर मनुष्य बहुत कुछ करने पर भी उसे प्राप्त न कर सके तो उसे विडम्बना ही कहा जायेगा।
क्या इस संसार में आनन्द है ही नहीं और उसकी कल्पना भर करके लोग हैरान फिरते रहते हैं? या फिर उसके स्थान, केन्द्र की जानकारी न होने- प्राप्त करने के उपाय से अपरिचित होने के कारण यह असफलता हाथ लगती है? इन प्रश्नों पर विचार आवश्यक है।
निराशावादी दार्शनिकों ने इस जन्म-मरण की रोग-शोक की वितृष्णाओं से भरा-पूरा भी बताया है। यहाँ सर्वत्र दुःख ही दुःख होता है। कइयों का पाप और पतन भर की झाँकी मिली है और स्वर्ग जैसे किसी दूर स्थान में जाकर संतापों से त्राण पाने की बात कही है। कइयों को यहाँ सब कुछ भ्रम मात्र दृष्टिगोचर हुआ है जो घटित हो रहा है, जो सामने है उसे माया कहा है। माया से छूटने के लिए वह वे आत्म केन्द्रित या ब्रह्म विलीन होने की बात सोचते हैं। यह पलायन भर है। निराशा और निरानन्द की मनःस्थिति में प्रायः ऐसे ही तर्क सूझते हैं और ऐसे उपाय गढ़ने पड़ते हैं। निराशा के विक्षोभ में लोग आत्महत्या कर लेते हैं। जीवन और संसार को शोक संताप का जाल-जंजाल मानकर उससे भागने की बात सोचना प्रकारान्तर से दार्शनिक आत्म हत्या ही है।
तथ्यों पर गंभीरता से विचार करने पर वस्तुस्थिति वैसी प्रतीत नहीं होती जैसी कि निराशावादी मनःस्थिति में सूझ पड़ती है। सृष्टा ने इस संसार को असाधारण परिश्रम और मनोयोग के साथ सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में गढ़ा है। यहाँ सर्वत्र आनन्द ही आनन्द भरा पड़ा है। सत् चित् आनन्द स्वरूप ने सत् तो अपने तक सुरक्षित रखा है किन्तु चित- चेतना को- आनन्द की उपलब्धि के लिए साधनों की कमी नहीं रहने दी है। प्रस्तुत हलचलों के पीछे कहीं भी आनन्द को झाँकते देखा जा सकता है। शर्त एक ही है कि तत्व और तथ्य को देख समझ पाने की दृष्टि का उन्मीलन बन पड़ा हो। आंखों में पट्टी बाँध लेने पर तो दिन में भी अंधेरा दिखता है। नीरसता और निराशा की दृष्टि लेकर तो आनन्द की अनुभूति का सुयोग मिल ही कैसे सकेगा?
दार्शनिक लिंक ने अपनी पुस्तक ‘विश्व विवेचन’ में मनुष्य के चारों आरे बिखरी हुई हलचलों और परिस्थितियों की चर्चा बड़ी हृदयग्राही शैली में की है। वे कहते हैं- विषमान आनन्द को देख न पाना मनुष्य की अपनी समझने की भूल है। भाव सम्वेदनाओं की सौन्दर्य दृष्टि न होने से ही उस आनन्द से वंचित रहना पड़ता है। जो अपने इर्द-गिर्द ही वायु मण्डल की तरह सर्वत्र घिरा पड़ा है।
प्रभात काल में टहनियों पर चहकती और घास पर फुदकती चिड़ियों के कलरव सुनकर क्यों आनन्द की अनुभूति नहीं होनी चाहिए? उषा काल की लालिमा और बहती शीतल पवन को जो आनन्दी दृष्टि से देख सके उसके अन्तस् में क्यों उल्लास नहीं उठना चाहिए? आकाश कितना सुन्दर है। नीली चादर पर लटकते मणि मुक्तकों जैसे चाँद सितारे क्या रात्रि से किसी कलाकार की कलाकृति का परिचय नहीं देते? दिन में सूरज और रात्रि में चाँद से जो गरम और ठण्डी रोशनी बरसती है उसके साथ तादात्म्य मिला सकने वाले की क्या उल्लास भरी उमंगों का रसास्वादन नहीं होता। मखमली चादर की तरह धरातल पर बिछी हुई घास की समीपता से जिसके मन में पुलकन नहीं उठती, उसके भाग्य का ही दोष है कि इतना कुंठित दृष्टिकोण लेकर इस संसार में जन्मा और जिया।
शीतकाल में अंगीठी के आगे बैठकर तापना और गर्मी के दिनों में ठण्डे पानी से नहाना क्या कम सुखद है। रात्रि की माता की गोद में सुख पूर्वक विश्राम लेने- थकान मिटाने और नई स्फूर्ति पाने का हर दिन जो सुयोग मिलता है उसे कम महत्व का न माना जाय? दिन भर विनोद भरे कामों में जुटे रहना और समीपवर्ती क्षेत्र में चित्र-विचित्र हलचलें होते देखना किसी मनोरंजक मेले ठेले की बहार लूटने से क्या कुछ कम है? चलते-फिरते और बोलते-गाते खिलौनों की तरह जो प्राणि समुदाय अपने आस-पास मंडराता और आनन्द बिखेरता रहता है उसके पीछे झाँकने वाले उल्लास को देख सकने भर की कमी है। इसकी पूर्ति होते ही फिर कहीं कोई जगह ऐसी शेष नहीं रह जाती जहाँ आनन्द का अनुभव न हो सके।
मिठाई और मिर्च के अपने-अपने जायके हैं। रात और दिन का अपने-अपने ढंग का आनन्द है। ज्वारभाटों में से दोनों ही महत्व, उपयोग एवं सौन्दर्य है। यहाँ घटित अच्छा भी होता है और बुरा भी। जन्म और मरण, लाभ और हानि एक दूसरे के पूरक बनकर रहते हैं। नर और नारी की भिन्नता रहने से किसी का क्या बिगड़ता है। हो सकता है इनमें से एक किसी को प्रिय अप्रिय लगे पर इससे क्या परिवर्तन और संतुलन बिठाने वाली इस भिन्नता में आनन्द की कहीं किसी प्रकार कमी नहीं है।
हैरान अपना ही अनगढ़ दृष्टिकोण करता है। जो विद्यमान है उसमें से अशुभ ढूंढ़ने पर वह भी मिल सकता है। सृष्टि संरचना की विशेषता ही ऐसी है उसके किसी भी पक्ष को अपनी परख के अनुसार भला या बुरा समझा जा सकता है। मृत्यु एक के लिए सर्वनाशी प्रलय है तो दूसरे के लिए प्रभु मिलन का, नवीन जन्म धारण का शुभ सुयोग। कौन किन प्रसंग की क्या व्याख्या करे, यह अपने-अपने चिन्तन या स्वभाव पर निर्भर है।
कस्तूरी मृग के नाभि में सुगंध भरी होती है पर वह उसे अन्यत्र खोजता और मारा-मारा फिरता है। इसमें थकान, खीज और निराशा ही उसके हाथ लगती है। मृग तृष्णा वाला उदाहरण भी ऐसा ही है। चाँदनी रात में बिखरे बालू को जलाशय समझकर कुलाचें भरने वाले हिरन भी ऐसी ही खेदजनक स्थिति में समय गँवाते रहते हैं। हममें से भी आनन्द की खोज करने वालों में से अधिकाँश को ऐसी ही मनःस्थिति और परिस्थिति होती है।
यह संसार जड़ पदार्थों से बना है। वे मूलतः निर्जीव और निरानन्द है। आनन्द का आरोपण तो उन पर मानवी भाव संवेदना के आधार पर किया जाता है। यदि ऐसा न होता तो एक ही नारी को कामिनी और दूसरे को कल्याणी क्यों दीखती। एक धन के लिए कुकर्म करता और दूसरा उसे उदारता पूर्वक दान देता बखेरता क्यों दिखाई देता। एक विलास के लिए मरता है और दूसरा तपश्चर्या में आनन्द में सराबोर रहता है। यह और कुछ नहीं दृष्टिकोण का ही विभेद है।
नीरसता, अन्यमनस्कता, निराशा और कुछ नहीं मात्र मनुष्य को संकुचित और असंस्कृति दृष्टिकोण की ही परिणति है। जब तक उसमें सुधार परिवर्तन नहीं होगा तब तक आनन्द की अपेक्षा दिवा स्वप्न जैसी दुराशा ही बनी रहेगी।
आनन्द भीतर से उमंगता है वह भाव संवेदना और शालीनता की परिणति है। बाहर की वस्तुओं में उसे खोजने की अपेक्षा, अपनी दर्शन दृष्टि का परिमार्जन होना चाहिए। इतना बन पड़े तो नजर उठाते ही हर वस्तु, हर व्यक्ति और हर घटना में अपने-अपने ढंग का रसास्वादन होने लगेगा। हो सकता है कि कुछ घटनाएँ हमें सुधारने और झगड़ने के लिए उकसाये, कुछ सहनशीलता और दूरदर्शिता की परीक्षा करे और कुछ उल्लास भरी अनुभूतियों में परितृप्त करें। इतनी भिन्नता और विचित्रता के रहते हुए भी इस संसार में आनन्द की कमी कहीं दृष्टिगोचर नहीं होगी। अनुकूलता और प्रतिकूलता के भी तो अपने-अपने रस और अनुभव आस्वादन हैं।
पराक्रम :- शरीर का हर अवयव, कोश, ऊतक निरन्तर क्रियाशील है। रक्त परिभ्रमण, श्वास-प्रश्वास, मल विसर्जन आदि कार्य निरन्तर चलते रहते हैं। गति हर कार्य की अलग-अलग है, पर कोई क्रिया-कलाप कभी रुकता नहीं। आंतें, मस्तिष्क, गुर्दे आदि सतत् क्रियाशील हैं। वास्तविकता तो यह है कि गतिशीलता की कमी ही बुढ़ापा एवं गति रुक जाना मृत्यु है।
इसे अच्छी तरह जीव कोश के स्तर पर देखा जा सकता है। कोशों की बाहरी झिल्ली, सेलमेम्ब्रेन सतत् क्रियाशील है। यदि कुछ क्षणों के लिये यह झिल्ली कोश के भीतर से सोडियम को निकालना बन्द कर दे तो कुछ मिनटों में जीवकोश की मृत्यु हो जाती है। यही नहीं, कोश के अंदर विद्यमान साइटोप्लाज्म नामक जीवित पदार्थ सतत् चलता रहता है, एक ही स्थान पर नहीं बैठा रहता। हरेक जीवकोश में इस तरह द्रव्य में सतत् रासायनिक क्रियाएँ चलती रहती हैं।
रोग वैज्ञानिकों के अनुसार और कुछ नहीं, शरीर में चल रही अनेकों क्रियाओं में से एक या कुछ का रुक जाना शिथिल पड़ जाना ही है। जब भी ऐसा अंग विशेष में होता है तो वह विकार उसी अवयव में होता देखा जाता है। किन्तु शरीर का एक अंग होने के कारण वह शरीर पर प्रभाव डालता ही है। सारा शरीर विभिन्न लक्षणों के माध्यम से अपनी व्यथा प्रकट करता है। हृदय की माँस-पेशियों का जब कोरोनरी धमनियों से रक्त नहीं मिलता, थक्का रक्त-प्रवाह में बाधक बन जाता है तो हार्ट अटैक तुरन्त होता है। अपनी पुकार मांसपेशियां हृदय के दर्द के रूप में प्रकट करती हैं।
मनुष्य के लिए सतत् क्रियाशील बने रहना ही उसके अंग अवयवों के पराक्रम का प्रतीक है। यही अक्षुण्ण स्वास्थ्य की कुँजी है। यदि किसी कारण वश वह अधिक समय तक बिस्तर पर पड़ा रहे तो उसे अनेकों रोग आ घेरते हैं। सक्रिय, कर्मठ नजर आता मनुष्य देखते-देखते बूढ़ा हो जाता है। हड्डियों में कैल्शियम की मात्रा घट जाती है तथा वह घुल-घुलकर मूत्र मार्ग से निकल कर बाहर आने लगता है। कभी-कभी यही कैल्शियम जमकर पथरी रोग को जन्म देता है। निरन्तर लेटे रहने के कारण मूत्र संस्थान में संक्रमण की दर भी बढ़ जाती है, फेफड़ों में से वायु निष्कासन उचित ढंग से नहीं हो पाता तथा उनमें कभी-कभी पानी भर जाता है तथा त्वचा पर व्रण हो जाते हैं जिसे ‘बेडसोर’ कहते हैं।
हृदय की गति को पेसमेकर नामक एक विशेष ऊतकों का समुच्चय संचालित करता है। यदि यह काम करना बंद कर दे तो हृदय की धड़कन बंद होने- मृत्यु होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। कुछ मिनटों तक तो ‘कण्डक्शन टीश्यू’ अपनी भूमिका पेसमेकर रूप में निभाने का प्रयास करते हैं, पर मूल प्रेरणा स्रोत यदि निर्देश भेजना तत्काल आरम्भ न करे तो मृत्यु निश्चित है। हृदय का यह पराक्रम ही उसे जीवन भर चौबीसों घण्टे चलते रहने वाले पम्प की भूमिका निभाने में समर्थ बनाता है। ऐसे अनेकों उदाहरण शरीर तंत्र में देखे जा सकते हैं जो उनकी वैयक्तिक एवं सामूहिक क्रियाशीलता का परिचय देते हैं। इन्हीं के बलबूते वह स्फूर्ति व जीवनी शक्ति का अस्तित्व पराक्रम के रूप में सामने प्रत्यक्ष देखा जाता है।
प्रत्यावर्तन :- काय तन्त्र की इस कर्मशाला का हर कोश अवयव निरन्तर गतिशील ही नहीं रहता आदान-प्रदान के सतत् चक्र में घूमने की भूमिका भी बखूबी निभाता है। त्वचा के कोश निरन्तर झड़ते व नये आते रहते हैं। हर सत्ताईसवें दिन शरीर की समग्र त्वचा (सरफेस एरिया) 108 वर्ग मीटर है, की बाह्य सतह इपीडर्मीस के सभी कोश बदल जाते हैं। इनका स्थान नये सेल्स ले लेते हैं। शरीर में होने वाले हर सूक्ष्म परिवर्तन को त्वचा के जीवकोशों से जाना जा सकता है। रक्त के लाल कण एक नियत अवधि तक जीने के पश्चात् मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उसका स्थान नवीन रक्त कोशिकाएँ ले लेती हैं।
जल चक्र भी शरीर की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। अम्ल व क्षार के रक्त में अनुपात के अनुरूप रक्त आयतन बनाये रखने के लिये पानी ग्रहण करने व विसर्जन की प्रेरणाएँ उठती रहती हैं। सारी प्रक्रिया एक सूक्ष्म ‘हारमोन इलेक्ट्रो लाइट्स एन्जाइम तन्त्र’ द्वारा संचालित होती है जो निरन्तर गतिशील रह प्रश्वास, पसीने एवं मूत्र के माध्यम से इस चक्र को नियोजित करता है। यही तथ्य खनिज तन्त्र पर भी लागू होता है। नानप्रोटीन नाइट्रोजन, फास्फोरस, कैल्शियम, सल्फर, आयोडीन इत्यादि अनेकों प्रकार के तत्व शरीर एवं वातावरण के मध्य एक निश्चित गतिचक्र में घूमते हैं। अस्थियों में जमे कैल्शियम का समुच्चय तो नहीं, अठारह प्रतिशत भाग हर साल बदलकर नया हो जाता है। एक प्रकार से यह सारे कंकाल तन्त्र का नूतन काया कल्प है।
नित्य नूतनता तथा अपरिग्रह की भावना विधाता ने मानवी काया के साथ ऐसी संजो दी हैं, कि जीवन सहज ही सरस, गतिशील बना रहता है। प्राकृतिक जीवन जिया जा सके तो प्रफुल्लता बनी रहती है, काय तन्त्र अपनी प्रत्यावर्तन प्रक्रिया चालू रखता है एवं किसी वस्तु का न कहीं अभाव प्रतीत होता है, न कभी अनावश्यक जमाव ही हो पाता है। यह परिवर्तन चक्र इकॉलाजी के अनुशासन में बँधे सारे जीव जगत पादप समुदाय में पाने जाने वाले अनुशासन तन्त्र का ही अंग है। इसे रासायनिक आधार पर नहीं, विधि-व्यवस्था के एक समग्र सिस्टम के रूप में समझना होगा। पेड़-पौधे निरन्तर ट्रान्सपिरेशन प्रक्रिया द्वारा नीचे से जल खींचते व ऊपर वायुमण्डल में छोड़ देते हैं, नूतन पत्तियाँ हर वर्ष बदल कर अपना काया-कल्प करते रहते हैं। यह अद्भुत व्यवस्था प्रत्यावर्तन हेतु ही बनायी गयी है।
जीव-जन्तु भी हर वर्ष शीत ऋतु में शीत-निद्रा में चले जाते हैं। वे ऐसा शीत ऋतु से बचने के लिये नहीं करते। वैज्ञानिक श्री पेन्ग्रेले तथा श्री एडमण्डसन का कथन है कि शीत निद्रा में जाने वाले जानवर अपनी आन्तरिक घड़ी से चालित होते हैं, न कि बाह्य मौसम से। वह निर्देश देती है, तब शरीर हाइबरनेशन में चला जाता है। इस समाधि से उठने के बाद शरीर में नये जन्म के समान स्फूर्ति उभर आती है। सम्भवतः योगीजन इसी कारण हिम समाधि, कल्प साधना, एकान्त सेवन की प्रक्रिया सम्पन्न करते थे, ताकि वर्ष में एक बार प्रत्यावर्तन होता चले एवं आयुष्य बढ़ती रहे।
अनुशासन :- नियमित, अनुशासित बने रहना जीवन के लिये उतना ही जरूरी है जितना कि पारस्परिक सहकार, गतिशीलता एवं प्रत्यावर्तन। इस गुण को शरीर के अंग-अंग में क्रियाशील देखा जा सकता है।
यदि हृदय सतत् क्रियाशील रहे पर यह सक्रियता अनियमित हो, 70 से 80 बार प्रति मिनट धड़कन के रूप में न होकर एरिदमिक (लय-ताल रहित) हो तो हृदय की कार्य क्षमता में असामान्य कमी आ जाती है एवं वह सारे शरीर को प्रभावित करती है। हृदय रोगी न भी हो पर उसकी धड़कन अनियमित हो तो रोगी तुरन्त “कार्डिक फैल्योर” की स्थिति में चला जाता है। वाल्व संकरा हो तो काम चल भी जाता है लेकिन धड़कन अनियमित होने पर तुरन्त हृदयाघात- एट्रियल फिब्रिलेशन एवं मृत्यु की स्थिति आ पहुंचती है। अनुशासित विधि-व्यवस्था का यह क्रम श्वास संस्थान से लेकर मूत्र विसर्जन संस्थान तक सभी पर एक समान लागू होता है।
हर स्वर, ताल अथवा उच्चारित शब्दों की निर्माण प्रक्रिया में ऊपरी श्वास संस्थान के ‘वोकल कार्डस्’ ही नहीं अपितु जिव्हा, तालु, नासिका, होंठ आदि सभी अवयवों का एक नियमित क्रम से सिकुड़ना एवं फैलना उत्तरदायी होता है। इसी प्रकार विचारे गये शब्दों को लिपिबद्ध करने में हाथ की 15 से भी अधिक मांसपेशियां एक नियमित क्रम में आकुँचन-प्रकुँचन करती हैं। इस क्रम के गड़बड़ाने पर अक्षर लिख पाना संभव नहीं।
जीव कोश के स्तर पर तो यह नियमन-अनुशासन का क्रम और भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। हर जीव कोश में डी.एन.ए., आर.एन.ए. जैसे सूक्ष्म प्रोटीन घटक होते हैं। हर प्रोटीन में सैकड़ों अमीनो अम्ल एक नियमित क्रम से लगे होते हैं। ग्लूकोस के एक अणु में न्यूनतम बीस से भी अधिक इन्जाइमों को एक नियमित क्रमबद्ध सहयोग से तोड़ने पर ऊर्जा प्राप्त होती है जिसे कैलोरी कहा जाता है एवं सारा शरीर व्यापार चलता है।
ये तो मात्र कुछ उदाहरण हैं। शरीर में हो रही किसी भी क्रिया को नियमितता के किसी भी पहलू से देखा जाने पर वह खरा सिद्ध होता है। शरीर के सारे क्रिया-कलाप एक रिदमिक (लय-ताल युक्त) विधि-व्यवस्था से आबद्ध हैं। शरीर रोगी तब होता है जब इस अनुशासित व्यवस्था में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होता है।
एकात्मभाव :- का अर्थ है पारस्परिक भावनात्मक सद्भाव। शरीर के खरबों जीवकोश कार्य पद्धति तथा बनावट की दृष्टि से भिन्न-भिन्न प्रकार की जटिलताओं से भरे हैं। रेटिना (आँख का भीतरी पर्दा) एवं हड्डियों के कोशों, न्यूरान्स, रक्त के लाल कण, प्रोटीन निर्माता, इम्यून कोश तथा लीवर के कोशों की परस्पर तुलना की जाये तो उनके क्रिया-कलापों तथा आकृतियों में जमीन-आसमान जितना अन्तर मिलेगा। कहाँ रेटिना के सूक्ष्मतर कोश एवं कहाँ हड्डियों के बड़े कोश, कहाँ लाल रक्त कण जो मात्र 120 दिन जीते हैं व कहाँ मस्तिष्क के न्यूटान जो जन्मने के बाद ही मरते हैं। यह विविधता सारे शरीर में संव्याप्त पाई जाती है। इसके बावजूद ये सभी परस्पर मित्र भाव रखते हैं। शरीर को कोई चोट पहुँचने, ताप बढ़ाने, जीवाणु के आक्रमण की स्थिति में सभी मुकाबले हेतु समान रूप से तैयार रहते हैं। हृदय तीव्रगति से रक्त की पम्पिंग प्रारम्भ कर देता है। इम्यून संस्थान एण्टी बॉडिज बनाने लगता है। मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं। मस्तिष्क चेतना प्रखर हो जाती है एवं यकृत के कोश जल्दी-जल्दी मेटाबॉमिक क्रियाएं सम्पन्न करने लगते हैं। सहकारिता एवं पारिवारिकता की भावना की प्रत्यक्ष झाँकी शरीर में सहर्ष देखी जा सकती है।
हृदय मात्र अपनी ही चिन्ता नहीं करता, वह सारे शरीर के अंग अवयवों को आवश्यकता- परिस्थिति अनुसार रक्त पहुँचाने के लिए उत्तरदायी है। गुर्दा यदि शरीर में एक भी हो, दूसरा रोग विशेष के कारण काम न करे, या निकाल लिया जाये तो एक ही दो की भूमिका निभाने लगता है। शरीर के इस एकात्म भाव के आधार पर ही शरीर बाहरी घुसपैठियों से अपनी रक्षा कर पाता है, आवश्यकता आ पड़ने पर रसायन स्रावों से लेकर जीवकोशों, एण्टी बॉडिज सभी को जंग में खपा देता है।
शरीर को मात्र रासायनिक पदार्थों का समुच्चय मानने कहने वाले यह देखें कि काया के अन्तराल में चलती रहने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ किस प्रकार पदार्थ के सामान्य गुण धर्म के आधार पर सम्भव हो पाती हैं? पदार्थ अपनी नियत बाह्याकृति को धारण किये रह सकता है, साथ ही जो गतिशीलता उसे प्रकृति ने दी है, उसे पूरा भी करता रह सकता है, पर उसमें यह क्षमता नहीं है कि परिस्थितियों को देखते हुए अपनी रीति-नीति में परिवर्तन करता रह सके, न ही उसकी यह विशेषता है कि उच्चस्तरीय आदर्शों को अपने क्रिया-कलाप में सम्मिलित रख सके। पदार्थ का अतिरिक्त उपयोग हो पाना तभी सम्भव है, जब उसके मूल में कोई चेतनात्मक शक्ति या प्रेरणा काम कर रही हो। स्वचालित माने जाने वाले यन्त्र रोबोट आदि भी तभी अभीष्ट प्रयोजन पूरा करते हैं जब उसके पीछे कोई विचारशील व्यक्ति निर्देशन एवं सूत्र-संचालन कर रहा है।
जीवन के पीछे आत्मा की- परम सत्ता की शक्ति मानने के लिए अब उन व्यक्तियों को अपनी पूर्वाग्रह की मान्यता में परिवर्तन करना पड़ेगा जो प्रकृति को सर्वोपरि सत्ता और परमाणु को सर्व समर्थ घटक मानते रहे हैं, जिन्हें आत्मा या परमात्मा की क्षमता, उपयोगिता एवं आवश्यकता प्रतीत होती है।
ईशोपनिषद के आठवें मन्त्र में ऋषि कहते हैं-
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापबिद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् यदधाच्छोश्वतीभ्यः समाभ्यः॥
“ वह स्वंयभू (ईश्वर) सर्वत्र है, शुद्ध है, सूक्ष्म काया रहित, दोष रहित, मांसपेशियां रहित, पवित्र, पाप रहित, कवि-क्रान्ति दर्शी, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी है। उसने चिरन्तर प्रजापतियों को अपने-अपने काम सौंप दिए हैं।” वेदान्त की यही मान्यता जो आत्मा के पवित्र, शुद्ध एवं परमसत्ता के अविच्छिन्न अंश होने की घोषणा करती है, हर वैज्ञानिक के लिए एक प्रेरणा भरी चुनौती है।
विज्ञान प्रत्यक्षवाद की दुहाई देता है। उसे ऐसी प्रत्यक्षवादी चुनौतियाँ भी मिल सकती हैं जो पदार्थ की सर्व समर्थ स्वावलम्बी सत्ता के सम्बन्ध में अपनी मान्यता बदले और सोचे कि काया की सामान्य कार्य पद्धति के पीछे कितने रहस्य छिपे हुए हैं। ऐसे रहस्य जो शरीर को, उसके क्रिया-कलाप को मात्र भौतिक मानने से स्पष्ट करते हैं। यह शरीर परक क्रिया-कलाप अन्तः से उठने वाली स्फुरणा की ही अभिव्यक्ति हैं जो अनेकानेक रूपों में दिखाई पड़ती है। आत्म सत्ता और परमात्म सत्ता की एकात्मता एवं जटिल संरचना के इस सुसंचालन पर कबीर ने लिखा है-
जो चरिखा अरिजाय, बढैया ना भरै। मैं कातों सूत हजार, चरखुला जिन जरै॥
इस रहस्यवादी सन्त ने चरखे के क्रिया-कलापों में भी ईश्वरीय लीला संदोह की अनुभूति की और कहा है “यदि चरखा जल भी जाये तो उसका बनाने वाला बढ़ई नहीं मर सकता, पर यदि मेरा चरखा न जलेगा तो मैं उससे हजार सूत कातूँगा।
शरीर की सहकारिता, संघर्ष, सामंजस्य, पराक्रम, प्रत्यावर्तन, अनुशासन और एकात्मभाव नामों से वर्णित गुण परक वृत्तियां तथ्यों के साथ यही सिद्ध करती हैं कि शरीर के पीछे के रसायनों की ही हलचलें काम नहीं करती, उसका सूत्र-संचालन ऐसी अदृश्य शक्ति के माध्यम से होता है जो शरीर ही नहीं, इस समस्त विश्व वैभव का भावात्मक आधार पर सूत्र-संचालन करती है।
संग्रह का अन्त बिखराव है। अभ्युदय के अनन्तर अवसान आता है। संयोग की परिणति वियोग है। इस परिवर्तन चक्र पर घूमते हुए संसार में स्थिर तो एकमात्र “धर्म” ही है।
कार्य संचालन के मूल में क्रियाशील सात मुख्य प्रवृत्तियों में से सहकारिता, संघर्ष, सामंजस्य इन तीन पर पिछले अंक में प्रकाश डाला जा चुका है। शेष चार-पराक्रम, प्रत्यावर्तन, अनुशासन एवं एकात्मभाव पर इस अंक में चर्चा की जा रही है। इन प्रेरणाओं को समझ कर तथ्यों पर ध्यान देने वालों को यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि जीवन मात्र हलचलों का जमघट नहीं, आदर्शों का प्रयोग परीक्षण एवं निर्वाह बनकर रहता है।
परामनोविज्ञान संस्थान ने शिकागो के एक ड्राइवर सिरीयोस के कितने ही ऐसे आध्यात्मिक चमत्कारों को परीक्षा की कसौटी पर कस कर सही पाया है। जिसमें वह कल्पनाओं के फोटो खींचता था।
सन्देह यह किया गया कि वे कैमरे या उसके फिल्म में कोई चालाकी करता होगा। इस संदेह का निवारण करने के लिए शोध संस्थान ने उत्पादकों की सील लगे हुए कैमरे और फिल्म उसे दिये। उपस्थित व्यक्तियों में से किसी की कल्पना में क्या बात चल रही है उसके वह हूबहू फोटो खींच देता। यह प्रयोग उलट-पलटकर कई बार किया गया और यह सही पाया गया कि कल्पना के फोटो भी ठीक उसी तरह खींचे जा सकते हैं जैसे सामने खड़े किसी प्रत्यक्ष आदमी के।
लोंगफैलो कहते थे कि “बचपन और यौवन के आनन्द की तरह ही वृद्धावस्था भी आनन्द और उत्साह भरी है। आयुष्य के हर पहलू की अपनी-अपनी उपयोगिता है। बच्चे कुछ कमाई नहीं करते उनसे युवकों जैसे पुरुषार्थ भी नहीं बन पड़ते तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि बचपन निरर्थक या निरानन्द है। ठीक इसी प्रकार वृद्धावस्था भी दुःखदायी नहीं है और न ऐसी है जिसे निरर्थक कहा जा सके।”
वृद्धावस्था और थकान दो अलग-अलग चीज हैं। बुढ़ापा निरानन्द होता है, यह मानना गलत है। मन बूढ़ा होता है न जवान। वृद्धावस्था की अपनी उपयोगिता है। परिपक्व ज्ञान और अनुभव जिस स्थिति में मनुष्य के पास एकत्रित हो, उसके बारे में यह सोचा नहीं जाना चाहिए कि यह आयु बेकार है। मात्र दौड़ना ही जवानी नहीं है। जिन दिनों कोई व्यक्ति परिपक्व बुद्धि का होता है वह अवधि जवानी से किसी प्रकार कम मूल्यवान नहीं है।
सिर पर सफेद बाल और चेहरे पर झुर्रियों का होना किसी व्यक्ति का मूल्य घटाता नहीं वरन् बढ़ाता है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति के पास संकलित अनुभव अन्य अवस्था वालों की तुलना में सम्मान पाने के लिए बहुत कुछ है। वह अपने संकलित अनुभव के सहारे परामर्श दे सकता है जिसके लिए अन्य आयु वाले तरसते रहते हैं।
हँसने और हँसाने की कला याद हो तो वयोवृद्ध अन्य आयु वालों की तुलना में अधिक प्रसन्न दीख पड़ते हैं। मात्र जवानी की मजबूती और फुर्ती ही सब कुछ नहीं है। वृद्धावस्था की गम्भीरता का अपना महत्व है। परिश्रम करने पर ही वृद्धजन ऐसे परामर्श दे सकते हैं जिनके सहारे अधिक लाभान्वित होना बन पड़े। सौजन्य और शालीनता सीखने के लिए हर आयु के व्यक्ति को वृद्ध जनों के पास जाना पड़ता है।
जो थकान, निराशा और खीज अनुभव करता है वस्तुतः वह बूढ़ा है भले ही वह आयु की दृष्टि से जवान ही क्यों न हो। इसी प्रकार वह जवान है जिसमें आशा, उत्साह और हिम्मत मौजूद है भले ही उसके चेहरे का बुढ़ापा झलकता है। शरीर की स्थिति को नहीं, मन पर छाई हुई निराशा को दुःखदायी कहते हैं।
करने योग्य काम अलग-अलग हैं। बचपन और जवानी की मजबूती और फुर्ती अपने समय पर सराहने योग्य है। किन्तु बुढ़ापे की सुन्दरता किसी प्रकार कम नहीं आँकी जा सकती। शरीर थका हुआ हो किन्तु मन में उत्साह हो तो ऐसा व्यक्ति सुन्दर भी लगता है और हर किसी के लिए आनन्ददायक और उत्साहवर्धक।
कितने व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनने अभी-अभी जवानी में प्रवेश किया है। रूपवान और धनवान भी हैं किन्तु जिन पर निराशा छाई है। जिन्हें भविष्य अन्धकार भरा दिखता है। जिन्हें अपनों से और विरानों से शिकायत ही शिकायत है। ऐसे लोगों के चेहरे पर मुर्दनी छाई रहती है। उन्हें वृद्धों से भी गया-बीता समझा जायेगा।
सम्मान दूसरे नहीं देते मनुष्य अपनी इज्जत अपने आप करता है। जिसने अपने सद्गुणों से तौर तरीका ऐसा बना रखा है जिसकी इज्जत की जा सके तो समझना चाहिए कि उसकी उपयोगिता हर अवस्था में समझी जाएगी। बुढ़ापे के कारण कोई निरुपयोगी नहीं माना जाता। जिसने अपनी आदतें, इच्छाएं और गतिविधियां ऊँचे स्तर की रखी हैं, उन्हें कभी ऐसा बुढ़ापा नहीं देखना पड़ेगा जिसकी इज्जत में कमी पड़े।
विवेक पूर्वक सोचो, बोलो और करो। इतना बन पड़े तो समझो कि ईश्वर की प्रार्थना सही अर्थों में की जा रही है।
बाइबिल के ‘लूका’ अध्याय में ईसा और मरियम का संवाद आता है। ईसा कहीं गायब हो गये। इनके माता-पिता खोजते फिरे। बहुत दिन बाद मिले तो मरियम ने कहा- तुम्हें खोजने के लिए हमें कितना दुःख उठाना पड़ा। तुम कहाँ चले गये थे? ईसा ने उत्तर दिया- आप दुःखी न हों। मुझे तो अपने असली बाप के काम में ही लगे रहना है। इसके बाद ईसा कहीं चले गये और तीस वर्ष तक कुछ पता न लगा। बाइबिल में भी इन अज्ञातवास के तीस वर्षों की कोई चर्चा नहीं है।
आधुनिक खोज कर्ताओं ने उन तीस वर्षों का विवरण खोज निकाला है कि वे भारत में तीर्थयात्रा और धर्मशास्त्र का अध्ययन करते रहे। जो उन्होंने इस अवधि में सीखा उसी को उन्होंने अपने देश लौटकर धर्मोपदेश के रूप में कहना आरम्भ किया।
उन दिनों भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार था। बुद्ध काल को बीते मात्र 500 वर्ष ही तब तक हुए थे। रूसी विद्वान निकोलस नारोविच ने लगातार चालीस वर्ष खोज करके उन प्रमाणों को खोजा है जो ईसा के तीस वर्षों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। इस सामग्री को उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अननोन लाइफ ऑफ जीसस’ में प्रकाशित किया है। साक्षी के रूप में उन्होंने तिब्बत में एक बौद्ध विहार में ताड़ पत्रों पर लिखा हुआ ग्रन्थ प्रस्तुत किया है। जिसमें ईसा की भारत यात्रा में विभिन्न स्थानों के पर्यटन और अध्ययन का विवरण है। इसी विवरण में वह अंश भी सम्मिलित है जिसमें वे तिब्बत के उस बिहार में रहकर बौद्ध धर्म का अध्ययन करते रहे।
ईसा व्यापारियों के एक झुण्ड के साथ भारत आये। यहाँ उन्होंने वैष्णव, जैन और बौद्ध विद्यालयों में धर्मशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। कुछ दिन वे जगन्नाथ पुरी भी रहे। चूँकि वे शूद्रों से भी मेल-जोल रखते थे इसलिए पुरोहित लोग नाराज हुए। फलतः वे उस विद्यालय को छोड़कर अन्यत्र चले गये।
प्रसिद्ध इतिहासकार मिशचन्द्र दत्त ने अपनी पुस्तक “हिस्ट्री आफ सिविलाइजेशन इन एशियॉट इण्डिया” में विस्तार पूर्वक सिद्ध किया है कि “ईसाई धर्म बौद्ध धर्म की ही अनुकृति है” वापस लौटने पर ईसा एसोसियन धर्म में दीक्षित हो गये वह वैराग्य प्रधान था। इससे पूर्व यहूदी धर्म-कर्म प्रधान था। ईसा ने संन्यास लिया, इसी झंझट में ईसा को मृत्युदण्ड सहना पड़ा।
आर्थर लिलि ने अपनी पुस्तक ‘बुद्धिज्म इन क्रिस्टन डम’ में ईसा के जीवन की घटनाओं और सिद्धांतों का बुद्ध धर्म से तालमेल बिठाया है। इस पुस्तक में ‘धर्म पद’ और बाइबिल के बहुत से उद्धरणों का एक साथ तालमेल बिठाया है।
अजीज कुरैशी से अपनी पुस्तक “क्राइस्ट इन काशीर” में लिखा है कि उन दिनों ईसा ही नहीं यहूदियों का एक बड़ा समुदाय काशीर में बस गया था। जिनमें बहुत से लोग अभी भी गूज्जर जाति के रूप में बस रहे हैं।
एक रूसी विद्वान ‘रोरिक’ ने अपनी पुस्तक ‘हार्ट आव काशिया’ में लिखा है- ईसा के जीवन का एक बड़ा भाग भारत और तिब्बत में व्यतीत हुआ। डाक्टर स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक ‘मिस्टीकल लाइफ आफ जीसस’ और दुराई स्वामी आयंगर द्वारा लिखित ‘लोंग मिसिंग लिंक्स’ और मारवेल में ऐसे अनेकों प्रमाणों का संकलन है जिसमें ईसा का निवास एवं अध्ययन भारत के धर्मविद्यालयों में हुआ बताया गया है।
ईसा को मृत्यु दण्ड तो दिया गया पर न्यायाधीश पीलातुस ने उन्हें चतुरतापूर्वक बचा लिया और वे बाद में भी अपना काम करते रहे।
भविष्य पुराण प्रसंग 3 अध्याय 22 के श्लोक 22 से 26 तक ऐसा ही उल्लेख है जिसमें ईसा का भारत में लम्बे समय तक निवास और अध्ययन का वर्णन है।
सत्य बोलने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह याद नहीं करना पड़ता कि किससे, कब, क्या कहा था?....
यों तो मानव शरीर के हर अंग, अवयव का महत्व है। शरीर के विभिन्न क्रिया-कलापों में उनकी छोटी-बड़ी भूमिका है। पर उन सबमें मस्तिष्क का अपना अलग स्थान है। वह न केवल मूर्धा पर अवस्थित है वरन् मूर्धन्य गतिविधियों का संचालक भी है। आमतौर पर उससे सोचने- विचार करने, स्मृति रखने, निर्णय लेने जैसे काम लिये जाते हैं पर मस्तिष्क की सामर्थ्य उतने तक ही सीमित नहीं है। सूक्ष्म शक्तियों का वह ऐसा भाण्डागार है जिसका एक अत्यन्त छोटा भाग ही सामने आता तथा प्रयुक्त हो पाता है। अपने भीतर अद्भुत शक्तियों को दबाये एक ऐसे ही मानसिक केन्द्र की जानकारी वैज्ञानिकों को मिली है, जिसमें रहस्यमय शक्तियों के होने- उभरते रहने की संभावना व्यक्त करते हैं। जिसे योग विज्ञानी चिर पुरातन काल से आज्ञा चक्र- तृतीय नेत्र कहते रहे हैं तथा महान संभावनाओं से युक्त बताते रहे हैं, सम्भवतः वह केन्द्र यहीं कहीं स्थित हो।
दोनों भौहों के मध्य में स्थिति कोश-समूह को योग-विज्ञान में आज्ञाचक्र कहा गया है। यह दिव्य दृष्टि का एक महत्वपूर्ण संयंत्र है। यह रेडियो सेट के उस अति सूक्ष्म क्रिस्टल या चुम्बक-घटक से कहीं अधिक सूक्ष्म और समर्थ है, जो अदृश्य तथा अश्रव्य ध्वनि तरंगों को अपनी ओर खींचता है- उन्हें पकड़ता है और पुनः उन्हें दृश्य एवं श्रव्य कंपनों में परिवर्तित कर देता है। अदृश्य को देखने तथा अश्रव्य को सुनने की अद्भुत सामर्थ्य इस आज्ञा चक्र में है। संजय ने इसी के माध्यम से महाभारत के विविध दृश्य देखे थे तथा गीता के उद्बोधनों को सुना था। इसे ही शिवनेत्र कहा गया है जिससे भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था।
वेदों तथा उपनिषदों में आज्ञाचक्र को छठी इन्द्रिय अर्थात् अतीन्द्रिय क्षमताओं का समुच्चय कहा गया है। जागरण की स्थिति में इसके द्वारा दूरस्थ घटनाओं को देखा तथा सुना जा सकता है, मनोविज्ञान वेत्ता जिसे ई.एस.पी. नाम से पुकारते हैं।
मनः शास्त्रियों का मत है कि स्वप्नावस्था में सामान्यतया आंखें बंद रहती हैं। अन्य ज्ञानेंद्रियां भी विश्राम की स्थिति में होती हैं। कामेन्द्रियाँ भी शिथिल हो जाती हैं। उस स्थिति में दोनों भौहों के बीच ही आप्टिक चिआज्मा के आस-पास की कोशिकाएँ सक्रिय होतीं तथा विविध प्रकार के स्वप्नों की अनुभूति कराती हैं। स्वप्नों में मनुष्य का दांया मस्तिष्क सक्रिय होता है, वह विभिन्न प्रकार की बातें करता सुनता तथा अन्य तरह की चेष्टाएँ भी करता है। यह तथ्य इस पक्ष पर प्रकाश डालता है कि हर व्यक्ति बिना आँख कान के भी देखने-सुनने की दिव्य सामर्थ्य रखता है। स्वप्नों के पूर्वाभास के माध्यम से उस क्षमता का छोटा-सा परिचय भर मिलता है।
स्नायु वैज्ञानिकों ने अपने परिचय में पाया है कि आज्ञाचक्र का जहाँ केन्द्र है, वहा स्थित आप्टिक चिआज्मा के समीप की कोशिकाओं से निरन्तर इलैक्ट्रो मैग्नैटिक तरंगें निकलती रहती हैं। इसकी क्षमता सामर्थ्य एक्सरे लेजर किरणों से भी अधिक मानी जाती है। वे संकल्प से परिचालित तथा नियन्त्रित होती है। विविध स्थूल अवरोधों को पार करते हुए निर्दिष्ट स्थान पर जा पहुंचने की उनमें विलक्षण सामर्थ्य है। आज्ञाचक्र की सूक्ष्म विद्युत तरंगें ही परोक्ष जगत का दर्शन कराती हैं। इनकी सहायता से किसी भी व्यक्ति को मनःस्थिति- भावना, कल्पना, इच्छा, आकाँक्षा आदि के विषय में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अपनी ही नहीं दूसरों की अभिरुचि एवं प्रकृति को भी तृतीय नेत्र की सामर्थ्य के सहारे बदलना सम्भव है। अदृश्य सहायकों, भूत-प्रेत एवं पितरों से भी सम्पर्क साधना इस योगिक तृतीय नेत्र- आज्ञाचक्र के सहयोग से संभव है।
आज्ञाचक्र केंद्र की सूक्ष्मग्राही संवेदनशीलता तथा विलक्षणता को योगशास्त्र में तो प्रतिपादित किया ही गया है, अब तो अगणित मनोविज्ञान के प्रयोगों से यह प्रामाणित भी हो चुका है कि यह वह केन्द्र है जिसके द्वारा दिव्य दर्शन, दिव्य श्रवण, दूर दर्शन, भूत भविष्य का ज्ञान, पूर्वाभास, दूरानुभूति, विचार सम्प्रेषण जैसे कार्य सम्पन्न हो सकते हैं। उनका मत है कि इस केन्द्र से निकलने वाली सूक्ष्म किन्तु प्राणवान् भाव तरंगों के द्वारा सम्मोहन- मैस्मरेजम जैसे कार्यों को भी कर पाना संभव है।
ध्यान योगियों का अभिमत है कि आत्म-साक्षात्कार, ईश्वरानुभूति, दिव्य अनुदानों के आदान-प्रदान जैसे महान प्रयोजन तीसरे नेत्र के जागरण से ही सम्भव होते हैं। सामान्य-सा दीखने वाला व्यक्ति भी इस केन्द्र के जागरण से परम सत्ता से एकाकार होने का परम लक्ष्य सिद्ध कर सकता है। ध्यान योग के विविध प्रयोग इस केन्द्र के जागरण के लिए ही किये जाते हैं।
नूतन विकासवाद के प्रवक्ता कुछ वैज्ञानिकों का अभिमत है कि बहुत समय पूर्व मस्तिष्क के मध्य दोनों भौहों के बीच एक तीसरे नेत्र का अस्तित्व था, जो बाद में ग्रन्थि के रूप में बदल गया। पीनियल ग्रन्थि उस तीसरे नेत्र का ही बदला रूप है जो अपने भीतर अगणित रहस्यों को छिपाए हुए है। मनुष्य में इसका वजन मुश्किल से एक या दो मिलीग्राम होता है। पर इस छोटी-सी रचना का शरीर के विकास एवं उसकी हलचलों में भारी योगदान है। एकमात्र यही ऐसी ग्रन्थि है जिसमें तन्त्रिका कोशिकाएँ विधिवत् मस्तिष्कीय कोशों की तरह पायी जाती हैं। यदि इस ग्रन्थि का संतुलन गड़बड़ा जाये तो अनेकों प्रकार की शारीरिक-मानसिक समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। जागृत स्थिति में कुरेदने उभारने पर इससे अगणित उपलब्धियां भी हस्तगत होती हैं।
असन्तुलन की स्थिति में शारीरिक प्रौढ़ता शीघ्र आ धमकती है। जननाँग तेजी से बढ़ने लगते हैं। ग्रन्थि के हारमोन्स के असंतुलन से विकास अवरुद्ध हो जाता है। जीवन पर्यन्त बचपन का अभिशाप लद जाता है। शरीर एवं मस्तिष्क का विकास बंद हो सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि पीनियल ग्रंथि रक्त में शक्कर की मात्रा के माध्यम से “ग्रोथ” को संतुलित बनाये रखने में पिट्यूटरी ग्रंथि तथा पैन्क्रियाज की मदद करती है। इस ग्रंथि का नियंत्रण एड्रीनल तथा थायराइड ग्रंथियों पर भी रहता है।
वैज्ञानिकों ने अपनी खोजों में पाया है कि मनुष्येत्तर कितने ही जीव-जन्तु ऐसे हैं जिनमें तीसरे नेत्र का अस्तित्व स्थूल रूप में विद्यमान है। अपने दैनन्दिन कार्यों में वे उस नेत्र का उपयोग उसी प्रकार करते हैं जैसे कि सामान्य मनुष्य आंखों का करता है। न केवल देखने बल्कि समय, दिशा, मौसम, प्रकृति की घटनाओं का भी अनुमान वे अपने तृतीय नेत्र से लगा लेते हैं। यह मात्र उसका स्थूल स्वरूप है जिसका उपयोग जीव-जन्तु कर पाते हैं। मनुष्य के लिये तो अनेकों सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं।
वैज्ञानिकों की खोज से यह भी मालूम हुआ है कि ठण्डे खून वाले प्राणियों में इस क्षेत्र की कोशिकाएँ थर्मोस्टेट का काम करती हैं। उनके शरीर का तापक्रम एक-सा नहीं रहता, बदलता रहता है। गर्मी में गरम और ठण्ड में ठण्डा। तापक्रम नियन्त्रण के लिए वे गर्मी में ठंडे स्थानों पर रहते हैं तथा ठंड में गरम स्थानों पर। उनकी इस विलक्षणता के कारण उन्हें तापक्रम की पूरी खबर रहती है तथा समय-समय पर स्थान परिवर्तन के लिए निर्देश देती रहती है।
प. जर्मनी में हुई खोजों का निष्कर्ष है कि तीसरी आँख कुतुबनुमा का भी काम करती है। दूसरे पशु-पक्षी दिशा का अनुमान अपने इसी चुम्बक के आधार पर लगा लेते हैं। पृथ्वी चुम्बकत्व एवं जैव चुम्बकत्व दोनों की तरंग गति समान है, यह इससे सिद्ध होता है कि मनुष्यों में भी अपवाद रूप में किन्हीं-किन्हीं में यह कुतुबनुमा क्रियाशील बताया गया है। जिस प्रकार साइबेरिया से आने वाले आव्रजक पक्षी अपनी दिशा स्वयं ढूंढ़ते एवं आस्ट्रेलिया फिर वापस अपने निवास स्थान पर पहुँच जाते हैं, मनुष्यों में भी यही बोध विद्यमान होता है।
मानवी विलक्षणता के परिचायक किसी अंग का उपयोग न हो तो एनाटामी की दृष्टि से वेस्टीजियल ऑर्गन (निरर्थक अंग) ही कहा जाएगा। यही विडम्बना पीनियल- पीटुचरी एक्सिस एवं हाइपोथैलेमिक उत्तकों के साथ हुई है। सामान्य नजर आने वाले क्रिया-कलापों में असामान्य सामर्थ्य छुपी पड़ी है, किन्हीं-किन्हीं में यह फूट पड़ती है तो उन विभूतियों का परिचय मिलता है। वस्तुतः ये अपवाद नहीं है। ध्यान-धारणा द्वारा- योग अनुशासनों के माध्यम से इस केन्द्र को जगाकर असीम सामर्थ्यों को हस्तगतकर परोक्ष से सीधे सम्बन्ध जोड़ पाना संभव है।
मानवी संरचना के नर-नारी के दो भेद प्रत्यक्ष हैं। इतने पर भी यह विभाजन रेखा ऐसी नहीं है जिसे शाश्वत या सुस्थिर कहा जा सके। आत्मा जाति और लिंग रहित है। परिस्थितियों और संकल्पों के कारण ही वह अपना रूप गिरगिट की तरह बदलती रहती है। जो आज नर है, वह कभी नारी रहा हो इसमें आश्चर्य नहीं है। इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि जो आज नारी है भविष्य में नर को चोला पहन ले। नाटकों के पात्र आच्छादन परिधान बदलकर कभी नर तो कभी नारी बनते रहते हैं। जो कार्य सामयिक हो सकता है, उसका स्थायी रूप से बन पड़ना भी सम्भव है।
ऐसी कितनी ही पौराणिक गाथाएं हैं जिनमें एक ही व्यक्ति को नर और नारी की दोनों ही भूमिकाएं सम्पन्न करते हुए बताया गया है। एक ही शरीर में एक साथ दोनों प्रकार की आकृति होने की बात शिव के अर्द्धनारीश्वर में दृष्टिगोचर होती है। शिखण्डी आकृति से नर और प्रकृति से नारी था। अभी भी जनखे या हिजड़े इसी प्रकार के होते हैं। उनकी जननेन्द्रियां नपुंसकों या अविकसित मर्दों जैसी होती है पर उनका स्वभाव आचरण नारियों में इतना अधिक मिलता-जुलता है कि कई बार तो पहचानना तक कठिन हो जाता है। उसी प्रकार अनेकों ऐसी महिलाएँ देखी गयी हैं जो शरीर संरचना की दृष्टि से नारी होते हुए भी आचरण सारे मर्दों जैसे करती हैं। उन्हें न तो नारी जैसे वस्त्र अच्छे लगते हैं और न इस प्रकार का जीवन यापन करने में कोई उत्साह होता है।
इन उदाहरणों से प्रकट है कि नर और नारी का विभाजन जीवात्मा की अभिरुचि, आदत या परिस्थिति के अनुरूप होता है। वह चाहे तो उसे प्रयत्नपूर्वक बदल भी सकता है।
लिंग परिवर्तन की घटनाएँ तो पहले भी रहती थीं पर उन दिनों इसकी कोई खोज-बीन नहीं होती थी और लज्जा का प्रसंग होने के कारण वह गोपनीय भी रखी जाती थी। पर अब वैसी बात नहीं रही। लिंग परिवर्तन की घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं। वस्तु स्थिति का पर्यवेक्षण करने वाले इसमें कोई छल प्रयोजन भी नहीं देखते, विधाता की विविधता-विचित्रता ही देखते हैं। आये दिन होती रहने वाली ऐसी घटनाओं में से इन्हीं दिनों घटित हुई कुछ इस प्रकार हैं-
खड़गपुर बंगाल में एक उन्नीस वर्षीय विद्यार्थी आपरेशन द्वारा लड़की बनाया गया। उसके शरीर में दोनों ही जननेंद्रियां थीं, पर मूत्र त्याग वह ऐसे छिद्र से करता था जो लड़कियों में ही होती हैं। एक दिन उसका पेट फूला तो अस्पताल पहुँचाया गया। मालूम पड़ा कि मूत्राशय की नली पुरुष छिद्र से हटकर नारी अवयव के साथ जुड़ गई है। आपरेशन से उसे ठीक किया तो वह लड़की बन गया।
तेलवाड़ा के कैनाल अस्पताल में एक पच्चीस वर्षीय किसान युवक के पेट का आपरेशन किया गया। वह दर्द से चिल्लाता रहता था। आपरेशन करने पर प्रतीत हुआ कि उसके पेट में गर्भाशय था और मासिक धर्म का रक्त बाहर न निकल सकने के कारण दर्द होता था। आपरेशन करके रास्ता बना दिया गया तो वह ठीक हो गया। पुरुष जननेन्द्रिय नाम मात्र की थी सो उसे हटाया नहीं गया। अब वह लड़का- विधिवत लड़की घोषित कर दिया गया है। ऐसी एक नहीं, अनेकों घटनाएँ प्रकाश में आती हैं जो जनसामान्य को चौंकाती हैं। पर ऐसी कोई अद्भुत बात उसमें है नहीं।
बम्बई के प्लास्टिक सर्जन डा. मानेकशा के अस्पताल में दो युवक आपरेशन के उपरान्त युवती बने हैं। इनमें से एक मेहाम 23 वर्ष का और फैलिद 22 वर्ष का था। बहुत समय से वे दोनों अपने में नारी स्तर का परिवर्तन होने जैसी हलचलें अनुभव कर रहे थे फलतः अस्पताल में दाखिल हुए। उनकी मान्यता सही पाई गई। थोड़े अंग परिवर्तन के उपरान्त उनका लिंग बदल गया। एक का नाम मैरिन और दूसरे का फरह रखा गया जो उनके पुराने नामों से मिलते-जुलते हैं।
बनारस के सर सुन्दर लाल अस्पताल में एक नपुंसक स्तर के लड़के को कई छोटे आपरेशनों के उपरान्त युवती घोषित कर दिया गया है। लड़के की चाल-ढाल तो लड़कियों जैसी थी पर छोटा मूत्र मार्ग लड़की जैसा था। अस्पताल के सर्जन फणीन्द्र त्रिपाठी ने केस अपने हाथ में लिया और शल्य क्रिया द्वारा उसे पूर्ण नारी बना दिया गया।
आस्ट्रेलिया में ऐसी कितनी ही घटनाएँ प्रकाश में आई हैं और किए गए यौन आपरेशनों के उपरान्त वे परिवर्तित लिंग के अनुरूप जीवन क्रम बनाने तथा विवाह करने में सफल रहे हैं।
लंदन के पुलिस विभाग में नर के नारी बन जाने का नया घटनाक्रम सामने आया है। वजपार्ट नगर का एक पुलिस अधिकारी बीमारी की लम्बी छुट्टी लेकर अस्पताल में पड़ा रहा। उसे जननेंद्रियों में अवरोध और सूजन की शिकायत थी। निदान आपरेशन हुआ। उसमें नारी जननेन्द्रिय उभर कर प्रकट हो गईं। उसे नारी घोषित कर दिया गया और नाम मेरी दिया गया। पुलिस में उसकी नौकरी बनी रही पर ड्यूटी बाहर न जाकर दफ्तर में ही रहने की दी गई है।
समलिंगी विवाहों का प्रचलन अब बढ़ रहा है। ऐसे केसों से उनमें से एक का रुझान भिन्न लिंग जैसा पाया गया है। ऐसे लोग इस प्रकार के अनुबंध में संतोष भी अनुभव करते हैं। न्यूयार्क की एक घटना है। बच्चे को जन्म देकर एक व्यक्ति की पत्नी मर गयी। उस पुरुष की छाती से दूध आने लगा। बच्चे को वह पिलाने भी लगा। स्थिति और भी अधिक ठीक करने के लिए उसने डॉ. लियोवेलियन के अस्पताल में दाखिला लिया और दूध ग्रंथियों को अधिक जागृत करने का आपरेशन कराया। वह अब नारी की तरह बच्चे को दूध पिलाता है पहले की अपेक्षा दूध की मात्रा बढ़ गई है। इस व्यक्ति का लिंग परिवर्तन तो नहीं हुआ पर अपने बच्चों के लिए माता और पिता दोनों की आवश्यकता पूरी करता रहा।
इस प्रकार के घटनाक्रमों में नर का नारी बनने के प्रसंग अधिक देखने को मिलते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि नारियाँ नर बनती ही नहीं पर तुलनात्मक दृष्टि से नर के नारी बनने जैसे उदाहरण ही अधिक देखने में आते हैं।
मनोवैज्ञानिक इसका कारण यह बताते हैं कि नर के मन पर नारी का सौन्दर्य आकर्षण अधिक छाया रहता है। वह उसकी निकटता के लिए अधिक आतुर पाया जाता है जबकि नारी में नर के प्रति आकर्षण एक सीमा में ही एवं संयत होता है। गृहस्थ प्रवेश के उपरान्त वह नाम मात्र का रह जाता है। वह गृह लक्ष्मी या माता होने में गौरव अनुभव करती है और रमणी-कामिनी की भूमिका अन्यमनस्क भाव से ही निभाती है। कितनी ही विधवाएँ अपना वैधव्य बिना किसी दाग धब्बे के बिता लेती हैं। कितनी ही सधवाओं का दाम्पत्य जीवन उतना सरस संतोषजनक न होते हुए भी पतिव्रत धर्म भली प्रकार निभता रहता है। इससे प्रकट है कि नारी का नर के प्रति न तो उतना आकर्षण होता है और न सतत् चिन्तन। जबकि आम आदमी के सिर पर अवसर न मिलने पर भी कामुक कामनाओं का भूत चढ़ा रहता है। यह ललक ही अचेतन मन में पड़ी रहने पर उसे शिखण्डी स्तर की ओर धकेलते-धकेलते अन्ततः लिंग परिवर्तन जैसी स्थिति तक पहुंचा देती है। यह शरीर परिवर्तन भर है।
आत्मा का जाति-लिंग से ऊपर होने का तथ्य स्पष्ट है। चिन्तन और व्यवहार का अभ्यास ही उसे किसी वर्ग विशेष में रहने का आदी बनाता है। यदि संकल्प उलटे तो परिवर्तन तत्काल न सही देर-सवेरे में होने की संभावना रहेगी ही। इसी प्रकार लिंग विशेष के आधार पर किसी को वरिष्ठ-कनिष्ठ मानने की मान्यता भी भ्रामक है, यह स्पष्ट हो जाना चाहिए।
मित्रता करते तो कितने ही हैं पर उसे किससे करें और किस प्रकार निभाये, इसे बिरले ही जानते हैं। फलतः मित्रताएं टिकती नहीं। वे टूटती और वैमनस्य बढ़ाती रहती हैं।
ग्रह नक्षत्रों का परिवार भी मानवी परिवार की तरह नियति की एक विशिष्ट शृंखला में बंधा हुआ है। इन पिण्ड गोलकों में दृश्य और अदृश्य स्तर के पारस्परिक आदान-प्रदान क्रम अनेकानेक रूपों में चलते रहते हैं। अपना सौर-मण्डल भी एक सद्गृहस्थ की तरह मिल-जुलकर निर्वाह करता और मिल बाँट कर रखा है। विशाल ब्रह्मांड में विद्यमान अगणित सौर मण्डल अपने-अपने ध्रुव केंद्रों की प्रदक्षिणा करने के साथ-साथ किसी अविज्ञात किन्तु महान लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से बढ़ते चले जाते हैं।
अकल्पनीय दूरी पार करके धरती पर ग्रह-नक्षत्रों का आदान-प्रदान अदृश्य स्थिति में शक्य है। ऊर्जा किरणें ही प्रकाश की गति से भी तीव्र चाल से दौड़ लगाती हुई सीमित अवधि में धरती तक सतत् आती रहती हैं। यदि उनका आकार अन्तरिक्ष यानों जैसा ठोस दृश्यमान हो तो निश्चय ही लोक-लोकांतरों के बीच आदान-प्रदान अति कठिन ही बना रहेगा। यही कारण है कि प्रकृति सम्पदा का अंतर्ग्रही आदान-प्रदान तरंग स्तर का होने के कारण अदृश्य ही बना रहता है।
ब्रह्मांड में अधिकाँश ग्रह गोलक निर्जीव हैं। इतने पर भी इस विशाल परिकर में अगणित ऐसे भी लोक हैं जिनमें जीवन विद्यमान हैं, जिनमें धरती जैसी ही सजीवता विद्यमान हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी है जिनकी सभ्यता, सम्पदा एवं वैज्ञानिक विभूति मनुष्य लोक की तुलना में कही अधिक विकसित है। सजातियों के मध्य आकर्षण एवं सद्भाव होना स्वाभाविक है। विकसित सभ्यता वाले लोक-लोकांतरों के निवासी निश्चय ही इस भूलोक से परिचित हों और सम्पर्क, सद्भाव एवं आदान-प्रदान के लिए आतुर रहते हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
प्रमाण मिलते हैं कि अन्य लोकों के चैतन्य प्राणी जो संभवतः बुद्धि और विज्ञान के क्षेत्र में कुछ अधिक आगे बढ़े होंगे, भूलोक से सम्पर्क स्थापित करने के इच्छुक एवं प्रयत्नशील हैं। इस संदर्भ में अधिक प्रामाणिक साक्षी ऐसे अन्तरिक्ष यानों की हैं जो धरती तक आते एवं अपना अस्तित्व का प्रमाण-परिचय देते रहते हैं। संभवतः पिछली शताब्दियों में भी उनका आवागमन रहा हो और उपेक्षा के कारण उसे नोट न किया गया हो पर इस शताब्दी में उन्हें बड़ी संख्या में अधिक व्यापक क्षेत्र में देखा गया है। इन्हें ‘उड़न तश्तरी’ (यू.एफ.ओ.) के नाम से जाना जाता है। पर हैं वे दृश्यमान अन्तरिक्ष यान ही। किसी विकसित सभ्यता ने लम्बी यात्रा करने वाले- द्रुतगामी वाहनों का आविष्कार कर लिया प्रतीत होता है। उड़न तश्तरियों की सता को इसी रूप में मान्यता मिल रही है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जीवन विज्ञान के प्राध्यापक डा. जार्ज वाल्ड के अनुसार हमारी आकाश गंगा में ही एक अरब ग्रह हैं इससे परे एक अरब अन्य आकाश गंगायें हैं जिनमें से प्रत्येक में एक अरब ग्रह हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन सभी ग्रहों में एक से पाँच प्रतिशत तक ग्रहों में जीवन अवश्य विद्यमान है।
अमेरिका के मैरीलैंड विश्वविद्यालय के रासायनिक विकास संस्थान के निर्देशक डा. सिरिल पोन्नेमपेरूमा ने भारतीय विज्ञान काँग्रेस में बताया कि ब्रह्मांड से संदेश प्राप्त करने का प्रयास निरन्तर चल रहा है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि हमारे ही नभ मण्डल में दस लाख सभ्यताएँ अस्तित्व में हैं जिनका अध्ययन करने के लिए विशाल कंप्यूराइज्ड उपकरणों का प्रयोग वे कर रहे हैं।
सन 1947 में अमेरिका के पश्चिमी तट रार्कामा के निकट मोटर बोट में बैठे दो रक्षक एच.ए. डहल तथा फैड एल. क्रैसवेल समुद्र तट की निगरानी कर रहे थे। अचानक आकाश में दो हजार फुट की ऊँचाई पर गोल आकृति की प्रकाशमान छह मशीनें दिखाई दीं। पाँच मशीनें एक के चारों ओर घूम रही थीं। धीरे-धीरे नीचे उतरकर 500 फुट की ऊँचाई पर ही रुक गई। तभी डहल ने अपने कैमरे निकाल फोटो लेने के लिए कैमरे का स्विच दबाया ही था कि अचानक बीच वाली मशीन फट गई। दोनों अंगरक्षक तुरन्त छलाँग लगाकर पास की एक गुफा में घुस गए पर उनके साथ का कुत्ता वही मर गया। कुछ देर बाद बाहर निकलने पर देखा कि विस्फोट से फटे मशीन के टुकड़े तट पर बिखरे थे जो चमकीले एवं गरम थे। उनकी बोट में लगे ट्रान्समीटर भी जाम हो गए थे।
निरीक्षक दल ने वाशिंगटन के उक्त टापू पर फैले 20 टन धातु के टुकड़ों को एकत्र कर परीक्षण किया तो ज्ञात हुआ कि ये टुकड़े सोलह धातुओं के सम्मिश्रण से बने हैं जिन पर कैल्शियम की मोटी चादर चढ़ी है। वैज्ञानिक के लिए आश्चर्य यह रहा कि इन 16 धातुओं में से एक भी धातु पृथ्वी पर नहीं पाई जाती। वैज्ञानिक इनके नाम बता पाने में असमर्थ रहे एवं अभी तक उनका विश्लेषण संभव नहीं हो पाया है।
‘मेलबोर्न’ 24 अक्टूबर 78 को बीस वर्षीय युवा विमान चालक फ्रेडरिक वाके ने आस्ट्रेलिया एवं तस्मानियां के बीच चार्टर्ड उड़ान भरी। उसने अधिकारियों को बताया कि वह 137 मीटर की ऊँचाई पर किंग आईसलैण्ड के पास से उड़ रहा है और उसके विमान के ऊपर बहुत तेज गति से एक तश्तरी जैसी आकृति की लम्बी वस्तु उड़ रही है जिसके भीतर हरी रोशनी का प्रकाश आ रहा है। यान सहित लुप्त होने के पूर्व फ्रेडरिक के अन्तिम शब्द थे “मेरे विमान के इंजन में रुकावट आ रही है तथा वह विचित्र यान अब भी मेरे विमान के ऊपर छाया है।” इसके बाद रेडियो पर धातु के जोरों से टकराने का शोर सुनाई पड़ा तथा विमान का नियंत्रण कक्ष से सम्पर्क टूट गया। मेलबोर्न हवाई अड्डे से अनेक जहाजों ने खोज के लिए उड़ान भरी लेकिन दुर्घटना का कोई चिन्ह न मिला।
ऐसे अनेकों उदाहरण अमेरिका के अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा गठित यू.एफ.ओ. विभाग में संग्रहित देखे जा सकते हैं जिनमें यान चालकों, वायरलेस आपरेटरों के अन्तिम शब्द टेप रिकार्डेड हैं एवं जिनका कोई चिन्ह निश्चित स्थान पर न मिला, मात्र रेडियो धर्मिता से भरे वातावरण को छोड़कर। कई हैलिकाप्टर चालक सहित इस तलाश में गायब हो चुके हैं। वे कहाँ, किस लोक में गमन कर गए, कोई जानकारी वैज्ञानिकों के पास इस सम्बन्ध में नहीं है।
25 अगस्त 1976 की बात है। अमेरिका के नार्थ डकोटा प्रान्त में एक वायु सेना अधिकारी को रेडियो तरंगों द्वारा संदेश भेजने में अचानक बाधा का सामना करना पड़ा। खोजबीन करने पर पता चला कि इसी समय एक उड़न तश्तरी गहरे लाल रंग के प्रकाश बिखेरती ऊपर नीचे उड़ रही थी। इस समय रैडार ने भी दस हजार फीट की ऊँचाई पर उड़ती हुई एक गोल तश्तरी की सूचना दी। थोड़ी देर बाद यह उड़न तश्तरी दक्षिण की ओर मुड़ गई और यह अनुमान लगाया गया कि कोई 15 मील की दूरी पर वह पृथ्वी पर उतर गई है। उस स्थान पर वायु सेना की टुकड़ी पहुँची तो वह आठ मिनट पहले ही वहा से गायब हो चुकी थी। इस बीच दूसरी तश्तरी उत्तर की ओर दिखाई दी, उसे भी राडार ने देखा पर जब तक दस्ता उधर दौड़े वह भी गायब हो गई। इस आँख मिचौनी को राडार पर तो देखा जाता रहा, लेकिन इस सम्बन्ध में कोई सूत्र वैज्ञानिकों के हाथ नहीं लगा।
24 अक्टूबर 1977 की शाम को कनाडा के समुद्री तट पर शागहार्बर के सैकड़ों निवासियों ने आकाश में कोई चमकदार उड़ती हुई वस्तु देखी। देखते ही देखते वह समुद्र सतह पर जाकर विलीन हो गई। 20 मिनट के भीतर ही पुलिस कर्मचारी एक जहाज और आठ नावों सहित उस स्थान पर निरीक्षण करने पहुँच गए, जहाँ उड़न तश्तरी विलीन हुई थी। वहां ‘सर्चलाइट’ के तेज प्रकाश में वे केवल समुद्र के एक स्थान से पीला झाग निकलता देख सके। दो दिनों तक सैनिक गोताखोर उस स्थान पर गोता लगाते रहे पर वहाँ किसी वस्तु या उड़न तश्तरी का कोई प्रमाण नहीं मिला।
ये घटनाक्रम अभी ही नहीं, काफी पूर्व से घटते रहे हैं। 13 मई 1917 का दिन था। फातिमा नगर लिस्बन (पुर्तगाल) से कोई 62 मील दूर। “कारवां द इरिया” नामक झरने के समीप तीन बालक लूसिया, फैकिस्कोमार्तो और जेसिन्तोमार्तो अपने जानवर चरा रहे थे कि एक यान से अन्तरिक्ष यात्री उतरे और उन बच्चों से बातचीत की। बालक भाषा तो समझ न सके। यह घटना उन्होंने अपने अभिभावकों को सुनाई किन्तु इससे वे सहमत नहीं हुए। किन्तु ठीक एक माह बाद 13 जून को फिर एक अन्तरिक्ष यान आया उसमें से कुछ यात्री उतरे अबकी बार सम्मोहन किरणें जैसी फैंकी। बालकों से कुछ कहा। बालक समझे तो नहीं पर हाव-भाव से ऐसा लगा कि कह रहे हों कि “तुम बहुत अच्छे लगते हो। फिर 13 जुलाई को इस घटना की पुनरावृत्ति हुई।” अब यह बात सारा नगर जान चुका था। जो हजारों दर्शक उस स्थान पर जमा हो गये थे, उन्हें निराशा हाथ लगी। कुछ नहीं दिखाई दिया। अब अगली 13 तारीख के इंतजार में 70000 नगर निवासी नदी के किनारे जमा हो गये। थोड़ी ही देर में बादलों के बीच से कोई चौंधियाने वाली वस्तु आकाश से पृथ्वी की ओर आती दिखाई दी वह तेज घूमती तश्तरी नुमा कोई चाँदी जैसी धातु से निर्मित वस्तू थी। भीड़ के समक्ष उस दिन वह ठहरी नहीं। सूरज की तरफ जाकर लुप्त हो गई। देखने वालों का कहना था कि उसकी गति प्रकाश से भी अधिक थी। उन दिनों वैज्ञानिक प्रगति इतनी नहीं हुई थी अतः शोध की दिशा में कोई विशेष कदम नहीं उठे।
सन 1930 में प्लूटो ग्रह की खोज करने वाले अन्तरिक्ष विज्ञानी क्लाइड डब्लयू टाम्बा ने कहा था “मैंने व मेरी पत्नी ने उड़न-तश्तरियां आकाश में उड़ती देखी हैं। मैं उन पर, अंतर्ग्रही सभ्यता के अस्तित्व पर पूरा विश्वास रखता हूँ।” इंग्लैण्ड के अन्तरिक्ष विज्ञानी एच. पर्सी विल्किस ने भी 1935 में 500 फीट व्यास की उड़न तश्तरी देखने का विवरण ‘साईंस पत्रिका’ में दिया था।
अब वैज्ञानिकों के पास अन्तरिक्ष के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। अपने सौर-मण्डल में विद्यमान अनेकानेक ग्रहों पर वे जीवन की संभावनाएँ बताते हैं। यह अकारण नहीं हो सकता कि विकसित सभ्यता वाले अन्यान्य ग्रहवासी इस छोटे से ग्रह पृथ्वी के बारे में जानने को उत्सुक न हों। जब मनुष्य चन्द्रमा पर जा सकता है एवं चैलेन्जर, सोयुज-सैल्यूत यानों द्वारा अन्तरिक्ष में प्रयोगशाला खड़ी कर सकता है, अन्य ग्रहों के निवासी अपने यान यहाँ क्यों नहीं भेज सकते? अभी-अभी ‘नेचर’ एवं ‘साइंस’ पत्रिका में छपे प्रख्यात एस्ट्रोफिजीस्ट प्रो. कोनाल्ड ब्रेस के एक लेख के अनुसार “आने वाले रेडियो संदेशों से निश्चित ही पता लगता है कि दिक्-काल की परिधि से ऊपर विकसित सभ्यता वाले ग्रह पिण्ड हैं, जहाँ जीवन है। बरमूडा त्रिकोण जैसे स्थानों से संभवतः नमूने के रूप में पृथ्वी वासियों को- उनके यानों को परीक्षण के लिये वे ले जाते हैं।” कुछ भी हो, हमें अकेले के ही सौर मण्डल वासी होने का गर्व नहीं करना चाहिए अभी जानकारी नहीं मिली तो अर्थ तो निकलता नहीं कि ऐसी एक और पृथ्वी का या कई जीवनधारी ग्रहों का अस्तित्व ही नहीं है। ये घटनाएँ इसी की साक्षी हैं।
आधुनिक तकनीकी विकास से मनुष्य यदि यह समझे कि वह वैज्ञानिक प्रगति के शिखर पर जा पहुंचा तो यह उसका भ्रम है। उसकी इस मान्यता को झुठलाने एवं अधिक प्रगतिशील अंतर्ग्रही सभ्यताओं का प्रमाण देने हेतु समय-समय पर ऐसे घटनाक्रम घटित होते हैं जिनका प्रत्यक्षवादी कोई उत्तर नहीं दे पाते। परोक्ष में जो है जो जाना नहीं जा सका, उसका अस्तित्व भी हो सकता है। इस तथ्य को पूर्वाग्रहों को छोड़कर मानना ही श्रेयस्कर है। शोध प्रक्रिया चलती रहे किन्तु परोक्ष के रहस्यों को नकारा नहीं जाना चाहिए।
दूसरे मनुष्य की सम्मतियों का सम्मान कीजिए। कभी किसी से मत कहिए कि वह गलती पर है। दूसरों के विचारों का प्रत्यक्ष प्रतिवाद और अपने विचारों का सुनिश्चित समर्थन न करें।
आमतौर से अनुभव और अनुकरण के आधार पर लोग जीवन की गाड़ी अभ्यस्त लकीर पर चलाते हैं। दैनिक समस्याओं के समाधान भी इसी आधार पर होते हैं। बुद्धि का कोल्हू इसी जाने-माने ढर्रे पर चलता रहता है। अक्ल इसी सीमा में काम करती है।
किन्तु यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि बुद्धि की सीमा इतनी ही छोटी परिधि में काम कर सकती है। यदि उसे अवसर मिले तो ऐसी सूझ-बूझ का परिचय दे सकती है जिसे देखकर दांतों तले उँगली दबाना पड़े।
बुद्धि के भण्डार में से अनोखी एवं मौलिक सूझ-बूझ के मणि मुक्तक भी निकलते रहे हैं, निकल सकते हैं। पर उसकी शर्त एक ही है कि कुछ विशेष करने की व्याकुलता उसके सामने हो। कोई असाधारण कठिनाई सामने खड़ी हो, समस्या सुलझ न रही हो, अथवा इतनी तीव्र लगन हो जो किसी उपाय से लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आकुल हो। विशेष सूझ-बूझ का भण्डार ऐसी ही मनःस्थिति एवं परिस्थिति में खुलता है।
स्विट्जरलैंड के सुकारे क्षेत्र पर समीपवर्ती सामंतों ने हमला बोल दिया। उन दिनों मर्द किसी काम से बाहर गये हुए थे। महिलाएँ ही गाँव में रह रही थीं। आक्रमण से बचने के लिए उन्होंने विचित्र सूझ-बूझ का परिचय दिया।
अन्धेरा होते ही बकरियों के सींगों में उनने जलती मशालें बाँध दीं और उन्हें पहाड़ से नीचे की ओर खदेड दिया। दुश्मन के सैनिक नीचे से ऊपर चढ़ रहे थे तो उन्होंने मशालें लेकर आते हुए प्रेत देखे और भाग खड़े हुए। इस प्रकार महिलाओं की सामयिक सूझ-बूझ ने एक कठिन मोर्चा जीत लिया।
फारस के राजा ने पड़ोसी छोटे राज्य पर हमला किया। उस छोटे राज्य का राजा फरमैनिस संघर्ष करने की स्थिति में नहीं था। उसके पास सैनिक भी कम थे और अस्त्र-शस्त्र भी थोड़े। आत्म-रक्षा का कोई उपाय न देखकर उसने सूझ-बूझ से काम लिया। सभी सैनिकों और नागरिकों को रात्रि के अन्धेरे में सुरक्षा खाई खोदने में लगा दिया। रात भर फावड़े चलते रहे। दिन निकलने से पहले ही खाई को सूखे घास-पात से ढक दिया गया। सवेरा होते ही आक्रमणकारी विजय की सुनिश्चित सम्भावना देखकर तेजी और मस्ती के साथ दौड़े। फलतः वे धड़ाधड़ खाई में गिरते चले गये। खाई में गिरे और वापस लौटे सैनिकों का बहूमूल्य सामान जो सुरक्षा सैनिकों के हाथ लगा, वह दस करोड़ डालर का था।
फ्राँस के लैण्डेसीज नगर में सेना घिर गई थी। आक्रमणकारी सैनिकों के दल ने इस प्रकार घेराबंदी कर रखी थी कि भीतर रसद तक नहीं पहुंच सकी और घिरे हुए नागरिक तथा सैनिक भूखे मरने लगे।
बचाव का एक विचित्र उपाय जनरल डुवैले ने अपनाया। उसने घोड़ों की पीठ पर रेत के बोरे बाँधे और उसके नकली हाथ लगाकर भाले कस दिये। अन्धेरा होते ही घोड़ों के झुण्ड उन नकली सैनिकों को लेकर शत्रु की सेना में अन्धाधुन्ध घुस पड़े। रात्रि में असली नकली की पहचान नहीं हो सकी और उसे अप्रत्याशित घुड़-दौड़ से घबराकर आक्रमणकारी मोर्चा छोड़कर भाग खड़े हुए।
होलीलैण्ड में एक किला फतह नहीं हो रहा था। लगातार दो वर्ष तक आक्रमण चलता रहा पर प्रवेश का अवसर न मिला। इस पर सेनापति रिचार्ड ने एक नई सूझ-बूझ का परिचय दिया। किले की दीवारों में मधुमक्खियों के प्रायः एक सौ छत्ते लगे थे। उन सभी को उड़ा दिया गया। उड़ती मक्खियों ने किले के प्रहरियों पर हमला बोला तो जान बचाने के लिए इधर-उधर छिपने भागे। अवसर देखकर आक्रमणकारी सैनिक किले में घुस पड़े और किला फतह हो गया।
यदि अवरुद्ध मार्ग को खोलने के लिए विवेक बुद्धि जागृत हो और घबराहट का असंतुलन आड़े न आये तो ऐसी सूझ-बूझ हर किसी में उत्पन्न हो सकती है जो परम्परागत ढर्रे की अपेक्षा नया उपाय सोचे, नया मार्ग खोजे और सफलता प्राप्त करके रहे।
जिस भू-भाग पर हम रहते हैं उसका विस्तार लगभग सत्रह करोड़ वर्ग मील है एवं उसका तीन चौथाई हिस्सा पानी से ढका है। मात्र जल से भरा हुआ कुल क्षेत्र 13 करोड़ 16 लाख वर्ग मील पड़ता है। अन्तरिक्ष का विस्तार असीम है। जैसे-जैसे ऊपर की ओर बढ़ते हैं अन्तरिक्ष की परिधि उसी अनुपात में बढ़ती प्रतीत होती है। प्रकृति की सम्पदाएँ जितनी पृथ्वी के गर्भ और उससे जुड़े वातावरण में सिमटी है उसकी तुलना में अन्तरिक्ष में कही अधिक परिमाण में सन्निहित हैं। अस्तु विस्तार की दृष्टि से ही नहीं वरन् भौतिक सम्पदा की दृष्टि से भी अन्तरिक्ष पृथ्वी की अपेक्षा कहीं अधिक सम्पन्न है।
ऐसी स्थिति में अन्तरिक्ष विज्ञान का महत्व भू-विज्ञान की तुलना में कही अधिक बढ़ जाता है। जल और थल की तरह मनुष्य यदि चाहे तो अन्तरिक्षीय खोज में एक और कड़ी जोड़कर ग्रहों की गति और स्थिति से पृथ्वी के वातावरण तथा प्राणि जगत को जो किस प्रकार अनुकूलताएं और प्रतिकूलताएँ सहनी पड़ती हैं, इस जानकारी से लाभान्वित हो सकता है। प्राचीन काल में ज्योतिर्विज्ञान आज के भौतिक विज्ञान की भांति ही सुविकसित था। ग्रहों की गतिविधियाँ तथा उनकी सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं के बारे में जानकारी ऋषिगणों को भली प्रकार उपलब्ध रहती थी। फलतः वे अनुकूलताओं से लाभ उठाने तथा प्रतिकूलताओं से बचने का मार्ग निकाल लेते थे। मनुष्य जाति ने ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखा विकसित करके प्रगति पथ पर बढ़ चलने में अप्रतिम सफलता पाई है। अन्य विज्ञान की धाराएं सामयिक, सीमित और सम्बद्ध लोगों कसे प्रभावित करती हैं पर ग्रहों की सामर्थ्य अधिक प्रचंड और क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। ऐसी दशा में उनके साथ जुड़े हुए सम्बन्ध सूत्रों और आदान-प्रदान के सम्बन्ध में मनुष्य की जानकारी भी विशद होनी चाहिए।
भौतिक विज्ञान ने अन्तरिक्ष का महत्व समझा है। सर्वविदित है कि वायु एवं जल की अथाह सम्पदा आकाश के पोले ईथर में भरी हैं। विज्ञान के ज्ञाता इस तथ्य से परिचित हैं कि बिजली रेडियो, लैसर आदि की तरंगें आकाश में संव्याप्त होती हैं। ध्वनि, ताप, प्रकाश आदि की तरंगें आकाश में प्रवाहित होती हैं तथा अंतर्ग्रही अनुदान भी उसी क्षेत्र में मिलते हैं। अदृश्य जगत की सम्पदा सूक्ष्म अन्तरिक्ष में ही समाहित है। विचार तरंगें इसी परिसर में परिभ्रमण करती रहती हैं। ऐसे अनेकानेक आधार हैं जिनसे स्पष्ट है कि भूमण्डल की तुलना में अन्तरिक्ष में विद्यमान साधन सम्पदा का महत्व और स्तर असंख्य गुना अधिक है।
अध्यात्म वेत्ता अनादि काल से ही अपनी गतिविधियों को अन्तरिक्ष पर केन्द्रीभूत रखे रहे हैं। उनकी सामर्थ्यों का उत्पादन क्षेत्र अदृश्य जगत- सूक्ष्म जगत रहा है। ऋद्धि-सिद्धियाँ और आध्यात्मिक विभूतियाँ दिखाई तो प्रत्यक्ष रूप में पड़ती हैं, किन्तु इनका उपार्जन परोक्ष जगत से ही संभव हो पाता है। मानवी अन्तराल में तो उसकी बीज सत्ता भर विद्यमान है परन्तु वह सुविकसित होने और विभूतियों को करतलगत करने में अदृश्य सूक्ष्म जगत का ही अवलम्बन लेती है। साधना की तो जाती है अन्तराल में, पर उसका प्रतिफल दैवी शक्तियों का सहयोग लेने पर ही मिलता है।
वैज्ञानिकों को लेसर से लेकर मृत्यु किरणों तक एक से बढ़कर एक शक्तियाँ आज आकाश से ही उपलब्ध हो रही हैं, जो सृजन अथवा ध्वंस का- दोनों का ही उद्देश्य पूरी करती रह सकती हैं। इन्हें युद्ध आदि में प्रयुक्त कर अणु विस्फोट जैसी विभीषिका उत्पन्न की जा सकती है। सदुपयोग द्वारा सुविधा सम्वर्धन हेतु बहुमूल्य उपलब्धियां भी प्राप्त की जा सकती हैं। इन दिनों रेडियो, तार, टेलीफोन, टेलीविजन आदि संचार यंत्रों में छोटे-छोटे उपग्रहों से अनेक देशों में काम लिया जा रहा है जो पूर्णतया सफल रहा है। यह पद्धति सरल और सस्ती भी पड़ रही है। अब मौसम में इच्छानुकूल हेर-फेर की बात भी सोची जा रही है। ऋतुओं पर नियंत्रण कर गर्मी-सर्दी बढ़ा लेने, इच्छानुकूल क्षेत्र में वर्षा कराने के प्रयोग परीक्षण भी चल रहे हैं। यदि ये सफल रहे तो मानवी सुविधा सम्वर्धन में भारी प्रगति हो सकती है। इस विपुल ऊर्जा के सर्वसुलभ होने के साथ-साथ समुद्र की लहरों से सीधे बिजली बना लेने और उसके खारे जल को मीठा कर लेने में भी कोई विशेष कठिनाई नहीं होगी। इस स्वप्न को साकार करने में वैज्ञानिक प्रतिभाएँ जी-जान से लगी हुई हैं। उन्हें सफलता भी मिली है। लेकिन उज्ज्वल सपनों के साथ जुड़ा हुआ एक निराशाजनक पक्ष भी है। वह है- आविष्कारों एवं तकनीकी विकास से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण संकट का। इस दृष्टि से पिछली प्रगति अधिक महँगी पड़ी है।
विषाक्तता बढ़ने से आकाश में प्रदूषण इतना बढ़ गया है जिसके रहते मनुष्यों और प्राणियों को दुर्बलता और रुग्णता का अभिशाप सहते अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाने के अतिरिक्त कोई चारा न रहेगा। अंतर्ग्रही असंतुलनों में भी वृद्धि हुई है। प्रकृति प्रकोप इन्हीं दिनों अधिक परिमाण में दृष्टिगोचर हो रहे हैं। पृथ्वी अन्य ग्रहों के प्रभावों से निश्चित ही प्रभावित होती है। सौर मण्डल के चक्र में बँधी होने के कारण पृथ्वी का वातावरण भी अन्यान्य ग्रहों पर प्रभाव डालता है। अस्तु असंतुलनों और प्रकृति विपदाओं में मनुष्य द्वारा प्रदूषित पृथ्वी के वातावरण का भी सहयोग हो सकता है, ऐसा पर्यावरण विशेषज्ञ मानने लगे हैं।
विषाक्तता के परिशोधन का कोई कारगर उपाय नहीं सूझ रहा। “किंकर्तव्यविमूढ़” की भाँति वैज्ञानिक यह सोच रहे हैं कि संव्याप्त आणविक एवं अन्यान्य कचरे को अनन्त अन्तरिक्ष के किसी सूदूर कोने में फेंककर छुट्टी पा ली जाये। यह युक्ति मनुष्य के लिए कोई हानिकारक प्रभाव उत्पन्न नहीं करेगी, यह संदिग्ध है। अन्तरिक्षीय क्षेत्र में बढ़ते हुए तकनीकी कदमों के साथ बढ़ते उपग्रहों की संख्या भी भावी विभीषिकाओं का एक निराशाजनक पहलू प्रस्तुत करती है, जिसे नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता।
भौतिक विज्ञान तथा उसका तकनीकी ज्ञान प्राचीन काल में इतना सुविकसित न था। पर जिन उपलब्धियों के लिए अन्तरिक्ष विज्ञानी प्रयत्नशील हैं वे सारे प्रयोजन ज्योतिर्विज्ञान द्वारा गणना के माध्यम से पूरे कर लिए जाते थे। अन्तरिक्ष के अन्तराल में ग्रह, नक्षत्रों की स्थिति, अनुदान तथा उनके हानिकारक प्रभावों की जानकारी ज्योतिर्विज्ञान देता था। आत्म-विज्ञान उनसे लाभ उठाने- प्रतिकूलताओं से सुरक्षा उपचार की विधि व्यवस्था जुटाता था। अतीत की खोई हुई इस महान विधा ज्योतिर्विज्ञान की विलुप्त कड़ियों को ढूंढ़ने की पुनः आवश्यकता है। इस विज्ञान की पुनर्प्रतिष्ठा हो सके तो विज्ञान से कदम से कदम मिलाकर चलते हुए- बिना किसी क्षति के अन्तरिक्ष जगत से एक से बढ़कर एक भौतिक एवं अन्यान्य अनुदानों के रूप में लाभान्वित हो सकना संभव है।
चार साधकों ने एक सप्ताह तक मौन व्रत पालन की प्रतिज्ञा ली और किसी एकान्त आश्रम में साथ-साथ रहने लगे।
दूसरे दिन दीपक का तेल ख़त्म लगा तो एक ने नौकर से कहा- “तेल डाल दे।” दूसरे ने देखा तो व्रत तोड़ने की उलाहना देते हुए बोला- “प्रतिज्ञा के अनुसार तुम्हें बोलना नहीं चाहिए था।” तीसरे ने दोनों को डाँटा और कहा- “व्रत निभाते हो या चें-चें करते हो।”
इतना सुनने पर चौथे से भी रहा न गया और दर्प भरे शब्दों में बोल पड़ा- “अकेला मैं ही हूँ जो बोल नहीं रहा।”
यही है आज की स्थिति। लोग दूसरों के दोष बताते तो हैं, पर यह भूल जाते हैं कि स्वयं भी तो वही गलती नहीं कर रहे।
परिस्थितियाँ प्रगति का मार्ग खोलती हैं या मार्ग अवरुद्ध करती हैं यह आँशिक सत्य है। सर्वदा ऐसा ही होता हो सो बात नहीं है। कितनी ही बार ऐसा भी होता है कि जो कार्य बहुतों के लिये असंभव है वह कुछ के लिये सरल स्वाभाविक बन सके।
उत्तरी ध्रुव पर कड़ाके की ठंड पड़ती है और शून्य से नीचे वाले तापमान में कड़ी बर्फ जमी रहती है। छह महीने की लम्बी रात होती है। पेड़-पौधों का नाम नहीं। इमारतें बनाने व कृषि करने जैसे कोई साधन नहीं। फिर भी उस क्षेत्र में एस्किमो जनजाति हजारों लाखों वर्षों से वहाँ रहती चली आ रही है। मछलियों का आहार और कुत्तों का सहयोग इन्हें जीवन निर्वाह के आवश्यक साधन जुटाने के लिये पर्याप्त सिद्ध होता रहता है। अन्य लोग वहाँ रहें तो ठंड से हाथ पैरों की उंगलियां गलने लगे और जीवन संभव न हो पर अभ्यास से वे लोग वहाँ मजे में रहते हैं। प्रकृति ने परिस्थिति के साथ तालमेल बैठा लिया है।
अटलाँटिक समुद्र में कुछ ऐसे टापू खोजे गये हैं जिनमें न जाने कब से जनजीवन निवास और निर्वाह करता चला आ रहा है। न वहाँ सभ्यता पहुंची है न भाषा। रीति और नीति का कोई तर्कसंगत प्रचलन नहीं है। वनमानुषों जैसी उनकी जीवन पद्धति है और निर्वाह पद्धति। परस्पर मिल-जुल कर किस तरह रहा जा सकता है। आवश्यक साधनों को किस तरह उगाया और आड़े वक्त के लिए संजोकर रखा जा सकता है। इतना तौर-तरीका उनने अपनी सूझ-बूझ से सीख लिया है। प्रकृति और परिस्थिति का तालमेल ऐसा बैठ गया है कि बाहरी दुनिया में प्रचलित सभ्यता से सर्वथा अपरिचित होते हुए भी वे लोग बिना कोई कठिनाई अनुभव करते हुए लम्बे समय से दिन गुजारते आ रहे हैं। वे लोग वहां किस प्रकार पहुँचे यह अभी भी रहस्य का विषय बना हुआ है।
समुद्री अष्टभुज प्राणियों को अपनी भुजाओं से कसकर मार डालने के कारण बहुत ही भयंकर समझा जाता है। उससे समुद्र में उतरने वाले सभी को डर लगता है। पर भूमध्य सागर के किनारे बसने वाले यूनानी लोगों का सबसे प्रिय भोजन यह अष्टभुज है। वे उसे प्रयत्न पूर्वक पकड़ते और तरह-तरह के व्यंजन बनाते हैं।
न्यू गिनी की कुओर और पहाड़ियों पर भयंकर विषधर सर्प पाये जाते हैं। उनकी फुफकार भर से प्राणियों की मृत्यु हो जाती है पर उस क्षेत्र के आदिवासी इन्हीं को स्वादिष्ट भोजन मानते हैं। जब वे अधिक संख्या में हाथ लग जाते हैं तो पेड़ों से बाँधकर सुरक्षित खाद्य का भंडार बना लेते हैं।
कई बार माँ और बच्चे का मध्यवर्ती अन्तर औसत प्राणियों की तुलना में कहीं अधिक भी पाया जाता है। माया कंगारू की ऊँचाई 2 मीटर और वजन 100 किलोग्राम होता है पर जन्मते समय उसके बच्चे झींगुर जैसे इतने छोटे होते हैं कि एक चाय के चम्मच में तीन बैठ सके।
बड़ा कीर्तिमान काँटेदार सोई का है। मादा की लम्बाई 80 सेन्टीमीटर होती है पर जन्मते ही उसका बच्चा 80 से.मी. तक लम्बा होता है।
बच्चों की वृद्धि में ब्लू व्हेल की संतति सबसे बाजी मारती है। शिशु सवा तीन ग्राम प्रति घण्टे के हिसाब से बढ़ता है और एक दिन में माँ का तीस लीटर दूध पी जाता है। प्रकृति की यह विचित्रता बताती है कि परिस्थितियां ही प्रवृत्तियों का विकास करती हैं।
जीव चेतना विलक्षण है। वह बाधाओं के बीच अपना रास्ता बना लेना और वातावरण के अनुरूप ढलना जानती है। अवरोध अड़चन तो अवश्य उत्पन्न करते हैं पर सर्वथा रास्ता रोक देने में समर्थ नहीं हो पाते।
प्रगतिशीलों के लिए याद रखने लायक बात एक ही है- परिश्रम, परिश्रम और परिश्रम।
आहार और विहार के सम्मिश्रण से ऊर्जा उत्पन्न होती है। उसे कहीं न कहीं नियोजित करना पड़ता है। न करने पर व्याकुलता उत्पन्न होती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर ये छह द्वार ऐसे हैं जो मन पर आच्छादित होते हैं और शरीर द्वारा इन कृत्यों को किसी न किसी प्रकार पूरा करा लेते हैं। सामर्थ्यवान व्यक्ति यदि विचार ऊर्जा को किन्हीं उत्कृष्ट कार्यों पर व्यय न करें तो फिर उन्हें इन्हीं आकर्षक कामों में अपने शारीरिक क्रिया-कलापों को नियोजित करना होता है। कलुष-कषाय प्रत्येक सामर्थ्यवान के भीतर कुलबुलाते रहते हैं।
इनका निष्कासन किसी न किसी प्रकार किये बिना चैन नहीं पड़ता। निष्कासन किस प्रकार किया जाये इसके तीन उपाय हैं- भोग, प्रताड़ना और रेचन। स्वेच्छाचारी आधुनिक मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मनोविकारों को भोगने की पूरी छूट दी जाये। जो जिस प्रकार अपनी वासना तृप्त कर सके, करे। इसमें रोकथाम न लगाई जाये। रोकने से मानसिक ग्रंथियां बनती हैं, मनोविकार बढ़ते हैं। फलतः शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। उनके अनुसार निरोग होने के लिए कामुकता आदि विकारों को तृप्त करने का अवसर निकालना चाहिए।
इसके अतिरिक्त दूसरा उपाय है- प्रताड़ना। बुरे विचार सोचने या कुकर्म करने के लिये आतुर व्यक्ति को राजनैतिक या सामाजिक प्रताड़ना का प्रबन्ध किया जाये। उनके भय से व्यक्ति डरता है। प्रताड़ना की पीड़ा भी व्यथित करती है। बेइज्जती होने, इच्छित प्रयास में व्यवधान पड़ने से अक्ल ठिकाने आ जाती है और कुकर्म करने की इच्छा चली जाती है। वैसे विचार मन में से उतर जाते हैं। इतना ही नहीं, दूसरे लोग भी जो इस मार्ग पर चलना चाहते हैं, उस प्रताड़ना के दंड से भयभीत होकर वैसा विचार छोड़ देते हैं। पर कठिनाई एक ही है कि अदालत में अपराध सिद्ध हो अथवा समाज का संगठित प्रताप ऐसा हो जो कुकर्मी को उपयुक्त दण्ड दे सके। आमतौर से चतुर व्यक्ति इन दोनों ही तरीकों से अपने को बचा ले जाते हैं।
तीसरा उपाय है- रेचन। रेचन जुलाब को कहते हैं। दस्त होना अर्थात् विरेचन। मन में कुविचार चढ़ रहे हों तो स्वाध्याय या सत्संग से ऐसे विचार मन में लाए जायें जो कुविचारों की प्रतिक्रिया समझा सकें और मन को उन्हें त्यागने के लिए स्वेच्छापूर्वक सहमत कर सकें। अन्यान्यों द्वारा कुमार्ग पर चलने में जो हानियां उठाई गईं, उसकी घटना उदाहरण सामने प्रस्तुत करने पर विवेक पूर्वक भी मनुष्य अपना रास्ता बदल लेता है। जिन लोगों ने कुमार्ग के स्थान पर सन्मार्ग में शक्ति का नियोजन किया और प्रशंसा प्राप्त की, उन घटनाओं को समझने या समझाये जाने से भी मनुष्य विचार बदल देता है। इसी का नाम रेचन है।
कुमार्ग की तरफ सामान्य जनों की ऊर्जा अनायास ही उमड़ पड़ती है। पानी का स्वभाव नीचे की ओर बहना है। पर प्रयत्न करने पर ऊँचा भी उठाया जा सकता है और उपयोग में भी लिया जा सकता है। यह उपाय भी सम्भव है। शक्ति का जैसे ही भीतर से उभार हो, वैसे ही यह सोचना आरम्भ कर दिया जाये कि इसका श्रेष्ठ काम में नियोजन करके यशस्वी और मनस्वी लोगों की गणना में अपने को कैसे बिठाया जा सकता है। चिन्तन की दिशा यदि इस ओर मोड़ी जा सके तो कुकर्म करके जितना पुरुषार्थ प्रकट किया जा सकता है, उससे भी अधिक यश अच्छे कामों में अपनी आन्तरिक ऊर्जा को नियोजित करके लाभान्वित हुआ जा सकता है। अपने को लाभान्वित करने व सम्पर्क क्षेत्र में आने वालों को लाभ देने के लिए यही श्रेष्ठ तरीका है। पर तैयारी पहले से ही कर लेनी चाहिए। पराक्रम हेतु जब शरीर और मन में उमंग उठे तो तभी से यह सोचना होगा कि इस ईश्वरीय वरदान को सत्प्रयोजन में लगाने की योजना बनायी जाये।
मानवी काय संरचना में मोटे तौर पर हृदय और मस्तिष्क को बहूमूल्य माना जाता है। उन्हीं की मजबूती पर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की स्थिरता एवं प्रखरता आँकी जाती है। इतने पर भी एक और बड़ी वस्तु है, जिसे सर्वोपरि एक सर्वोत्तम कहा जा सके। वह है- बुद्धि। बुद्धि का तात्पर्य यह कल्पना शक्ति या शिक्षा सम्पदा से नहीं है। यह दोनों तो मस्तिष्कीय प्रशिक्षण से अवलम्बित हैं। कल्पनाओं की उत्तेजना देने वाला साहित्य एवं सम्पर्क कारगर हो सकता है। विद्यालयों की अध्यापकों की सहायता से शिक्षा का स्तर भी बढ़ाया जा सकता है। अनुभव अभ्यास से क्रिया कुशलता आती है। यह सभी उपलब्धियाँ ऐसी हैं जिन्हें सामान्य रीति से सामान्य साधनों से उपलब्ध किया जा सकता है। उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयास करने की उपयोगिता भी सर्व-साधारण को विदित है और चेष्टा भी चलती रहती है।
बुद्धिमता इससे ऊँची और आगे की वस्तु है। उसमें भावी परिणामों की ऐसी संगति बिठाई जाती है जो तथ्यों पर अवलम्बित हो। आमतौर से लोग किसी बात के पक्ष या विपक्ष में भावुक होते हैं, पूर्वाग्रह संजोये रहते हैं और जो प्रिय लगता है उसके पक्ष समर्थन में ही चिन्तन को जुटा देते हैं। यह भूल जाते हैं कि प्रस्तुत परिस्थितियों में यह संभव भी है या नहीं। यदि नहीं तो कोई मध्यवर्ती मार्ग निकल सकता है क्या? भावावेश में ऐसा प्रति पक्षी चिन्तन नहीं बन सकता। एक पहिये की गाड़ी एक पटरी पर दौड़ने की कोशिश करती है। अव्यावहारिक तरीका अपनाने के कारण इधर-उधर पड़ती है। सही निर्णय पर पहुंचने के लिए आवश्यक है कि पक्ष और विपक्ष की सभी संभावनाओं को सामने रखा जाये और दोनों के द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों तथा तथ्यों का गंभीरतापूर्वक पर्यवेक्षण किया जाये।
शेख चिल्ली की कथा बताती है कि वह सफलताओं का अत्युत्साह भरा ताना-बाना बुनता चला गया। समय और साधन का स्मरण ही नहीं रहा। फलतः तेल की मजूरी से मुर्गी खरीदना और उसके मुनाफे को बढ़ाते-बढ़ाते भरा-पूरा गृहस्थ बसा लेने में उसे आधा घण्टा भी नहीं लगा। यदि अतिवादी कल्पना उड़ान उड़ने के स्थान पर उसमें साधन जुटने और समय लगने की बात को ध्यान में रखते हुए निर्णय किया होता तो उसे बुद्धिमानी कहा जाता। तब उसके सिर का घड़ा भी न फूटता और भर्त्सना प्रताड़ना का भाजन भी नहीं बनना पड़ता। न्यूनाधिक मात्रा में आम लोग यही भूल करते हैं। जो सुहाता है, उसी की उपयुक्तता और संभावना सफलता को मान्यता दे बैठते हैं। फलतः उत्साह भरे कदम तत्काल उठा बैठते हैं। यथार्थता जब सामने आती है तब प्रतीत होता है कि साधन जुटाने, श्रम सहयोग का तारतम्य बिठाने और अड़चनों से निपटने जैसी महत्वपूर्ण बातें ध्यान में ही नहीं आई। फलतः बालू का महल तनिक-सा हवा का झोंका लगते ही ढह गया।
बुद्धिमता हानि और लाभ का- साधनों, परिस्थितियों और क्षमताओं का लेखा-जोखा लेती और व्यावहारिक कदम उठाती है। जबकि अत्युत्साही अपने प्रिय चिन्तन को ही सब कुछ मान बैठते हैं। ऐसे ही लोग चाटुकारों और ठगों के कुचक्र में फंसते हैं। जो कहा गया है उसी को सत्य मान बैठते हैं। परामर्श में लाभ ही लाभ देखते हैं। यह भूल जाते हैं कि कथन के पीछे कोई ऐसी दुरुभि सन्धियाँ हो सकती हैं जो पीछे सर्वनाश करके रख दें। गुण-दोष देखने की सूझ-बूझ का विकास न होने अथवा प्रयोग न बन पड़ने के कारण अक्सर लोग अनुपयुक्त कदम उठा बैठते हैं और पीछे जब हानिकारक प्रतिफल सामने आते हैं तब भूल के लिए पछताते अथवा अन्यान्यों को दोष देते हैं।
मूर्खता का एक और भी पक्ष है और वह भी आम-तौर से पर दृष्टि से ओझल रहता है। वह है- तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मान बैठना। ऐसा भी होता है कि जो कार्य तात्कालिक लाभदायक प्रतीत हो रहे हैं, वे आगे जाकर लाभ की तुलना में अनेक गुनी हानि उत्पन्न करें। यह भी हो सकता है कि जिसमें तत्काल घाटा दीखता है, वह आगे चलकर बहुत लाभदायक सिद्ध हो। इस संदर्भ में दूरदर्शिता अपनाये बिना और कोई ऐसा आधार नहीं जो सही निर्णय तक पहुँचा सकने में समर्थ हो सके। इस प्रसंग में हुई भूलें इतनी भयानक होती हैं कि जिन्हें रोटी के टुकड़े के लोभ में पिंजड़े में जा फंसने वाले और जान गँवाने वाले चूहे की उपमा दी जा सके। चासनी पर बेतरह टूटने वाली मक्खियाँ अपने पर और पंख फंसा लेती हैं और भर पेट मिठाई खाने के स्थान पर तड़प-तड़प कर मरती है। दाने के लाभ में चिड़ियों का, आटे की गोली के लिए मछलियों का जाल में फंसना भी इसी उतावली का कारण होता है।
अधिक मात्रा में अथवा अधिक मूल्य की वस्तुएँ उपलब्ध कर लेना एक बात है, पर उनका सदुपयोग कर सकना सर्वथा दूसरी। वस्तुएँ तभी तक सुखद होती हैं, जब वे नीतिपूर्वक उपलब्ध की गई हों और उनका उपयोग, उचित प्रयोजन के लिए उचित मात्रा में किया गया हो। व्यतिरेक करने पर तो पौष्टिक भोजन भी विषाक्त हो जाता है। सुपाच्य भोजन तभी पोषण करता है जब उसे पाचन की मर्यादा में खाया जाय, अन्यथा वह भी वमन, अतिसार, उदर शूल जैसे संकट खड़े करने लगता है। धन का अपव्यय दुर्गुणों और दुर्व्यसनों का अभ्यास करता है और ऐसी कठिनाईयाँ सहन करने को बाधित करता है जैसी कि दरिद्रों को भी नहीं सहनी पड़तीं। समझदारी इसमें है कि सही आहार, सही ढंग से प्राप्त किया जाये और उसके सेवन में संयम एवं विवेक बरता जाय। यही बात हर वस्तु के सम्बन्ध में लागू होती है।
लिप्सा अति उपभोग के लिए उत्तेजित करती है। उसे प्रभावित लोग इन्द्रिय असंयम बरतते हैं और उपभोग का क्षणिक ललक के लिए शारीरिक, मानसिक, स्वास्थ्य गँवाकर खोखले बन बैठते हैं। अतिशय उपभोग करने वाला असंयमी संभव है, आरंभ में अपने को भाग्यवान समझे और दूसरों के सामने इतरा कर चले। किन्तु कर्मफल की परिणति किसी को भी क्षमा नहीं करती। आंखें मूँदकर दौड़ने वाले ठोकर खाते और फिर कर दाँत तोड़ लेते हैं। बुद्धिमानी इसमें है कि परिणति को ध्यान में रखते हुए उस राह पर चला जाये जो मर्यादा पालन के लिए बाधित करने के कारण आरंभ में तो अनख जैसी लगती है पर पीछे चिरकाल तक सुखद परिणामों का आनन्द देती रहती है।
तृष्णा के आवेश में संचय की मात्रा का ध्यान नहीं रहता और वैभव बटोरने में औचित्य की मर्यादा गवा दी जाती है। झरने का जल तभी तक यशस्वी उपयोगी रहता है जब तक वह बहता रहता है। एक जगह टिकने की नीति अपनाते ही वह संचय समीपवर्ती क्षेत्र को पानी से डुबा देता है या फिर सतह ऊंची उठने के कारण प्रवाह का स्रोत ही रुक जाता है। धन के संबंध में भी यही बात है। उचित उपार्जन और हाथोंहाथ सदुपयोग बन पड़ने पर ही उसकी सार्थकता है। जहाँ अनावश्यक संचय होगा वहीं अगणित विकृतियां खड़ी करेगा और ईर्ष्या द्वेष भरे ऐसे विग्रह खड़े करेगा जिनसे प्राण संकट खड़ा हो चले। संग्रही घाटे में ही रहता है। उसे जिन उत्तराधिकारियों को हस्तान्तरित किया जाता है वे भी उसे पाकर सुखी नहीं रहते। मुफ्त का माल किसी को भी पचता नहीं है।
जीवन ईश्वर प्रदत्त बहुमूल्य सम्पदा है। इसे प्राप्त तो सभी करते हैं, पर उसका सदुपयोग नहीं जानते। फलतः दुर्बुद्धि के आधार पर बनाई गई जीवनचर्या पशु-पक्षियों के अविकसित जीवन में भी अधिक बोझिल और कष्टकारक होती है। जो इन उलझनों को सुलझा सके उसी को बुद्धिमान कहना चाहिए भले ही लोगों की दृष्टि में वह अनपढ़ या देखने में अनगढ़ ही क्यों न हो?
एक अनपढ़ व्यक्ति दार्शनिक अरस्तू के पास पहुँचा और ब्रह्मज्ञान की दीक्षा माँगने लगा।
सिर से पैर तक दृष्टि डालने के बाद उन्होंने सिखावन दी- ‘नित्य कपड़े धोना और बाल संभालना आरंभ कर दो। गलतियाँ सुधारते चलना ही साधना कहलाता और परमात्मा तक पहुँचाता है।’
शास्त्रों में प्राण को ईश्वर का स्वरूप माना गया है। शरीर में भी ईश्वर प्राण देवता के रूप में ही है। इसलिए हमें जानना चाहिए कि प्राण तत्व कोई साधारण वस्तु नहीं वरन् वह जिसकी महिमा महान से महानतम बताई गई है। उपनिषदकार का कथन है-
प्राणोवा ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। - छान्दोग्य
अर्थात्- प्राण ही बड़ा है। प्राण ही श्रेष्ठ है।
कतम एको देव इति। प्राण इति स ब्रह्म नद्रित्याचक्षते। -बृहदारण्यक
अर्थात्- वह एकदेव कौन सा है? वह प्राण है। ऐसा कौषितकी ऋषि से व्यक्त किया है।
‘प्राणों ब्रह्म’ इति स्माहपैदृश्य।
अर्थात्- पैज्य ऋषि ने कहा है कि प्राण ही ब्रह्मा है।
वेदों में प्राणतत्व की महिमा का गान करते हुए उसे विश्व की सर्वोपरि शक्ति माना है।
प्राणों विराट प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते। प्राणो ह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राण माहुः प्रजापतिम्॥ -अथर्व
अर्थात्- प्राण विराट है, सबका प्रेरक है। इसी से सब उसकी उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य, चन्द्र और प्रजापति है।
प्राणाय नमो यस्य सर्व मिदं वशे। यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठम्। -अथर्व
अर्थात्- जिसके अधीन यह सारा जगत है, उस प्राण को नमस्कार है। वही सबका स्वामी है, उसी में सारा जगत प्रतिष्ठित है।
ब्राह्मण ग्रंथों और आरण्यकों में भी प्राण की महत्ता का गान एक स्वर से किया गया है- उसे ही विश्व का आदि निर्माण, सबमें व्यापक और पोषक माना है। जो कुछ भी हलचल इस जगत में दृष्टिगोचर होती है उसका मूल हेतु प्राण ही है। देखिए :--
सोऽयमाकाशः प्राणेन वृहत्याविष्टव्धः तद्यथा यमाकाशः प्राणेन वृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतानि आपि पीलिकाभ्यः प्राणेन वृहत्या विष्टव्धानी त्येवं विद्यात्। -एतरेय 2।1।6
अर्थात्- प्राण ही इस विश्व को धारण करने वाला है। प्राण की शक्ति से ही यह ब्रह्मांड अपने स्थान पर टिका हुआ है। चींटी से लेकर हाथी तक सब प्राणी इस प्राण के ही आश्रित हैं। यदि प्राण न होता तो जो कुछ हम देखते हैं कुछ भी न दीखता।
प्राण एव प्रज्ञात्मा। इदं शरीरं परिगृह्यं उत्थापयति। यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः। -शाखायन आरण्यक 5।3
अर्थात्- इस समस्त संसार में तथा इस शरीर में जो कुछ प्रज्ञा है, वह प्राण ही है। जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।
शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि :--
प्राणेहि प्रजापतिः 4।5।5।13
प्राण उ वै प्रजापतिः 8।4।1।4
प्राणः प्रजापति 6।3।1।9
अर्थात्-प्राण ही प्रजापति परमेश्वर है।
सर्व ह्रीदं प्राणनावृतम्। -एतरेय
अर्थात्- यह सारा जगत प्राण से आदृत है।
प्रश्नोपनिषद में प्राणतत्व का अधिक विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है-
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नाद्धीर्य तपोमंत्राः कर्मलोकालोकेषु च नाम च। -प्रश्नोपनिषद् 6।4
अर्थात्- परमात्मा ने सबसे प्रथम प्राण की रचना की। इसके बाद श्रद्धा उत्पन्न की। तब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह पाँच तत्व बनाये। इसके उपरान्त क्रमशः मन, इन्द्रिय, समूह, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, और कर्मों का निर्माण हुआ। तदन्तर विभिन्न लोक बने।
अरा इव रथ नामौ प्राणे सर्व प्रतिष्ठम्। ऋचो यर्जूषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्मचं ॥6॥
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। हृदयं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतिष्ठिसि ॥7॥
देवानामसिवान्हितमः पितृणा प्रथमः स्वधा। ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वांगिरसामसि ॥8॥
इन्द्रस्तवं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परि रक्षिता। त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥9॥
यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः। आनन्द रूपस्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥10॥
व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः। वयमाद्यस्यदातारः पितात्वं मातरिश्वनः ॥11॥
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रेयाच चक्षुषि। या च मनसि सतता शिवां तां कुरुमोत्क्रमीः ॥12॥
प्राणस्येदं वशेसवं त्रिदेव यत्प्रतिष्ठतम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्य श्रीश्चप्रज्ञां च विधेहि न इति ॥13॥ -प्रश्नोपनिषद्-2
अर्थात्- रथ के पहिये की नाभि में जैसे अरे लगे रहते हैं उसी प्रकार चारों वेद, यज्ञ, ज्ञान, बल ये सब प्राण में लगे हैं। ॥6॥ हे प्राण आप ही प्रजापति हैं आप ही गर्भ में विचरते हैं। जन्म लेते हैं। प्राणी तुझमें मिल जाते हैं। तुम्हारे ही साथ स्थित रहते हैं ॥7॥ हे प्राण आप ही देवताओं को हवि पहुँचाने वाली अग्नि हैं। ऋषियों द्वारा अनुभूत सत्य आप ही हैं। ॥8॥ हे प्राण, आप ही सर्वशक्ति सम्पन्न इन्द्र हैं। आप ही प्रलय काल में रुद्र रूप होकर सबका संहार करते हैं। आप ही सबकी रक्षा करते हैं। वायु , अग्नि, चन्द्र, नक्षत्र, सूर्य आप ही हैं। ॥9॥ हे प्राण आप ही मेघ बनकर वर्षा करते हैं। उसी में प्राणियों का जीवन निर्वाह करने वाली अग्नि पैदा होती है। उसी से प्रजा प्रसन्न होती है। ॥10॥ हे प्राण आप ही संस्कार रहित शुद्ध, सबको पवित्र करने वाले, सर्वश्रेष्ठ ऋषि हैं। आप ही हमारे पिता हैं, आपसे ही हम पैदा हुए ॥11॥ हे प्राण आप ही वाणी, क्षोत्र, चक्षु, मन, अन्तःकरण आदि सबमें व्यक्त हैं। आप ही इन्हें कल्याणमय बनाइये ।हमें सावधान और शान्त रखिए। हमारे शरीर से बाहर न जाइए। ॥12॥ इस संसार में तथा स्वर्ग में जो कुछ है वह प्राण के ही अधीन है। जिस प्रकार माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है वैसे ही आप हमारी रक्षा कीजिए। हमें श्री, क्रान्ति, शक्ति और प्रज्ञा प्रदान कीजिए ॥13॥
प्राण शक्ति ने भाण्डागार वाले स्वरूप को जान लेने पर ऋषियों ने कहा है कि कुछ भी जानना शेष नहीं रहता है। भृगुतंत्र में कहा गया है-
उत्पत्ति मायाति स्थानं विभुत्वं चैव पंचधा। अध्यात्म चैब प्राणस्य विज्ञाया मृत्यश्नुते॥
अर्थात्- प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है? कहाँ से शरीर में आता है? कहाँ रहता है? किस प्रकार व्यापक होता है? उसका अध्यात्म क्या है? जो इन पाँच बातों को जान लेता है वह अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।
गुरु शिष्य कहीं जा रहे थे। रास्ते में प्रश्नोत्तर का क्रम भी चलता रहता।
शिष्य ने कहा- गुरुदेव! ज्ञान-विज्ञान में मन नहीं लगता। भजन भी बन नहीं पड़ता। कुछ उपाय करें।
गुरु ने दिव्य दृष्टि से वस्तुस्थिति समझी। शिष्य की पोटली में 100 रुपये थे। वह उनके सहारे कुछ करने की योजनाएँ बनाता रहता और सुनहरे सपने देखता रहता। कारण समझ में आ गया कि आसक्ति के रहते, विरक्ति के मार्ग पर चल सकना बन नहीं पड़ेगा।
अगले पड़ाव पर शिष्य शौच गया। पोटली वहीं रखी रखी गई। गुरु ने रुपयों की थैली निकाली और वही कुएँ में फेंक दी। धड़ाम की आवाज हुई। शिष्य भागा आया। पूछा क्या हुआ- किसकी आवाज हुई गुरुदेव! उत्तर मिला, लुभाने वाली, माया चली गयी। अब मन एकनिष्ठ होकर परमार्थ में लगेगा। दो घोड़ों की सवारी में असमंजस ही रहता है।
मुख से शब्द का उच्चारण न हो तो चेहरा कितना ही सुन्दर क्यों न हो, उसका कुछ महत्व नहीं रह जाता। गूँगा व्यक्ति संकेतों के बल पर कुछ काम चलाऊ इशारे भले ही करले मनोभावों का आदान-प्रदान करने में किसी प्रकार समर्थ नहीं हो सकता। वाणी भावनाओं का परिवहन करती है। दूसरा क्या कहता है इसे समझती है और स्वयं क्या कहना चाहते हैं इसका प्रकटीकरण करती है। सूरदास अन्धे थे तो भी वाणी की दृष्टि से मुखर होने के कारण सूर सागर लिख सके। नेत्रों की उपयोगिता अपने लिए जानकारियां एकत्रित कर देने के लिए है, पर वाणी का महत्व उससे अधिक है। उसके माध्यम से पढ़ा और पढ़ाया जा सकता है। स्वामी दयानन्द के गुरु विरजानन्द नेत्रहीन थे तो भी वे चारों वेदों के ज्ञाता और उद्भट विद्वान थे। मनुष्य की काया में पाँच ज्ञानेंद्रियां हैं। इन्हें पाँच देवता कहते हैं। इनमें वाणी प्रमुख है। उसे सरस्वती कहा जाता है। सब इन्द्रियाँ एक ओर, और वाणी एक तुला पर रखी जा सकती है।
यह सामान्य व्यवहार की बात हुई। अध्यात्म प्रयोजनों में भी वाणी की महिमा अगाध बताई गई है। सत्संग उसी के माध्यम से होता है। मंत्र धारण की माध्यम जिह्वा ही है। प्रत्यक्ष ब्रह्मा के दो स्वरूप हैं। एक शब्द ब्रह्म दूसरा नाद ब्रह्म। वार्तालाप में शब्द ब्रह्म का प्रयोग होता है। संगीत में- गीत वाद्य में नाद ब्रह्म का प्रयोग है। मंत्र शब्द ब्रह्म है। सत्संग शब्द ब्रह्म है। शिक्षा का समस्त प्रयोजन इसी माध्यम से होता है। योगाभ्यास ने नादयोग से परब्रह्म की परावाणी इसी माध्यम से सुनी जाती है। देवताओं की वाणी नाद माध्यम से ही प्रकट होती है। शिव का डमरू, कृष्ण की वंशी, नारद का तमूरा, चैतन्य की खरताल, मीरा के मजीरा, सरस्वती के सितार यह सभी दिव्य वाणी बोलते थे। कोकिल, भ्रमर आदि वाणी के माध्यम से ही प्रख्यात हुए हैं। जन-मानस को उद्वेलित करने में वाणी का ही प्रयोग होता है। इसे वशीकरण मंत्र कहा गया है। मीठे वचनों की तुलना वशीकरण मंत्र से की गई है। इसमें सहस्र तलवारें भी सन्निहित हैं। द्रौपदी के मुख से आठ अक्षर कडुए निकले थे कि उतने भर से महाभारत खड़ा हो गया और अक्षौहिणी सेना का सफाया हो गया।
सामान्य क्रिया-कलाप से लेकर आध्यात्मिक एवं उच्चस्तरीय प्रयोजनों में वाणी के माध्यम से व्यक्ति ज्ञानवान तो बनता ही है, शक्तिवान भी बनता है। वाणी में शक्ति की भी अवधारणा है। वचन देने और वचन निभाने में जीवन निछावर कर दिये जाते हैं। कन्यादान बागदान ही है। संकल्प करके राजा हरिश्चन्द्र ने अपना राज्य और स्त्री बच्चे दान कर दिये थे। “भुज उठाय प्रण कीन्ह।” राम ने असुर कुल का संहार करने में कितना बड़ा जोखिम उठाया, क्या नहीं किया। गुरु दीक्षा में गुरु अपनी शक्ति हस्तान्तरित करता है और गुरु दक्षिणा में शिष्य अपनी जीवन सम्पदा निछावर कर देता है। वाणी से विनोद, आक्रोश, स्नेह, समर्पण सब कुछ है। उतना करते ही मनुष्य की मूर्खता, विद्वता तत्काल प्रकट होती है। मित्रता और शत्रुता दोनों ही रंग बदलती हैं। जिह्वा से बढ़कर मनुष्य के पास दैवी वरदान और कुछ है ही नहीं। यह छिन गई हो तो समझना चाहिए कि जीवन का भयंकर अभिशाप है। गूँगा व्यक्ति न अपने मन की कह सकता है और न दूसरे की समझ सकता है। इस एक ही अभाव में सारे अभाव सन्निहित हैं। जिसे दिव्य वाणी मिली है उसे सब कुछ मिला है। इसलिए उसे मधुवती कहा गया है। जिह्वा को परिष्कृत करना सरस्वती की साधना कही जाती है।
शाप और वरदान इसी के द्वारा दिये जाते हैं। संयम में अस्वाद और मौन दो को उच्चस्तरीय साधना बताया है। आहार के संयम से आरोग्य, और दीर्घ जीवन दोनों मिलते हैं। मौन धारण का अभ्यास समस्त तपों में उच्चकोटि का है। एकाग्रता और एकात्मता दोनों की साधनाएँ मौन धारण से बनी हैं। जिसने जिह्वा की यह दोनों साधनाएं कर लीं समझना चाहिए कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया। जिसका इन्द्रिय संयम पर्ण हो गया वह सच्चे अर्थों में तपस्वी है। तपस्वी की वाणी अमोघ होती है। वह शब्द वेध- बोलता है। बैखरी वाणी रोकने पर मध्यमा परा और पश्यन्ती वाणियाँ भी वशवर्ती हो जाती हैं। उसमें मन्त्र सिद्ध होते हैं। उसके दिये हुये वरदान सफल होते हैं।
नाद ब्रह्म का सिद्ध पुरुष परमात्मा की वाणी सुनता है। दूर श्रवण और दूर विचार प्रेरणा नाद योग की सिद्धियाँ हैं। विचारों को पढ़ना इसी माध्यम से होता है। मंत्र में स्वर प्राण है। केवल अक्षर मंत्र नहीं है। सस्वर पाठ करने को ही मंत्र पाठ कहते हैं। सामगान को सिद्धियों का स्रोत कहा गया है। सामगान सहित गाये हुए मंत्र नाद ब्रह्म बनते हैं। मंत्र का जो फल एवं माहात्म्य बताया गया है वह सस्वर उच्चारण का है। स्वर विहीन मंत्र उच्चारण कर्ता के लिए घातक बताया गया है।
उद्गाता जिन मंत्रों का भजन एवं गायन करते हैं उनके फल यथावत् प्राप्त होते हैं। रोग निवारण, मानसिक संशोधन, वातावरण परिष्कार एवं अदृश्य जगत पर अधिकार यह प्रतिफल जिन मंत्रों के बताये गये हैं वे यजन और स्वर से संयुक्त होने पर ही होते हैं।
भगवान मनु ने कहा है- “महा यज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियर्त तनुः।” अर्थात्- यज्ञ और महायज्ञ का आश्रय लेने पर मनुष्य शरीर ब्राह्मण बनता है। इसके अभाव में याचक मात्र बनकर रह जाता है। अध्वर्यु वह है जिसने मंत्रों को सिद्ध किया है। सिद्ध मंत्र अनायास नहीं हो जाता उसे सस्वर प्रवीण पारंगत करना पड़ता है। सिद्ध पुरुषार्थ ग्रहण किया हुआ और उसके संरक्षण में अभ्यास किया हुआ फलित होता है। माली के संरक्षण में फूलने फलने वाले उद्यान की तरह मंत्र की सफलता भी सिद्ध पुरुष के संरक्षण में होती है।
मन्त्र का शुद्ध उच्चारण, तपश्चर्या पूर्वक संयम साधना, गुरु के संरक्षण, अटूट श्रद्धा यह सभी बातें जिस साधना में जुड़ जाती हैं। उसकी सफलता असंदिग्ध होती है जो ऐसे ही उलटे सीधे अक्षर दुहराते रहते हैं जिन्हें शास्त्र विधि का ज्ञान नहीं है, जो मर्यादा पालन नहीं करते, जो व्रत धारण नहीं करते उनके मन्त्र सफल नहीं होते।
मंत्र को शब्द वेध कहा गया है। जैसे शब्द वेध बाण निशाने पर लगाकर चलाने वाले के पास वापस लौट आता है उसी प्रकार सिद्ध किया हुआ मन्त्र लक्ष वेध करता है और फिर सशब्द स्थिति में प्रयुक्तों के शरीर में प्रवेश कर जाता है उसका भण्डार कभी खाली नहीं होगा।
पुस्तक में लिखे हुये शब्दों को याद कर लेना मंत्र नहीं है। उन्हें अक्षरों की पंक्ति कहना चाहिए। उसे याद कर लेना कविता याद कर लेने के समान है। ऐसे मंत्र का प्रयोग कौतूहल मनोरंजन के समान हैं। मंत्र को साधना और विचार और स्वर के साथ सिद्ध करना होता है। इसके लिए प्रवीण पारंगत का संरक्षण चाहिए। जो इन बातों की अपेक्षा करते हैं। स्वेच्छाचार बरतते उनके मंत्र हास्यास्पद बनकर रह जाते हैं। वैसा फल नहीं मिलता जैसा कि शास्त्रों में लिखा हुआ है। (क्रमशः)
जिन परिवर्तनों को हम आज संसार में देख रहे हैं वे अपने आदर्श और अभिप्राय में बौद्धिक, नैतिक और भौतिक है। आध्यात्मिक क्रान्ति अपने समय की प्रतीक्षा कर रही है और इसी बीच अपनी लहरे जहां-तहां उछाल रही है। जब तक यह नहीं आ जाती तब तक अन्य सबका मर्म भी समझ नहीं आ सकता, तब तक वर्तमान स्थिति की सभी व्याख्याएं तथा मनुष्य की भवितव्यता विषयक भविष्य वाणियाँ निरर्थक हैं, क्योंकि इस क्रान्ति की प्रकृति, शक्ति और क्रिया ही हमारी मानवता का आगामी युग चक्र निर्धारित करेगी।
-योगीराज अरविन्द
सूक्ष्म जगत की संरचना वैज्ञानिकों के लिये उतनी ही बड़ी चुनौती है जितनी कि मानवी काया के अविज्ञात रहस्यमय क्रिया-कलाप। प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक फ्रेड व्हाइल के अनुसार परमाणु जो पदार्थ की एक इकाई है, इतने सूक्ष्म होते हैं कि दस अरब परमाणुओं को यदि एक के ऊपर एक सीधी रेखा में खड़ा कर दिया जाये तब वे मनुष्य की ऊँचाई के बराबर होंगे। एक वयस्क मनुष्य में सात घात सत्ताईस शून्य जितने सूक्ष्मतम घटक परमाणु होते हैं एवं प्रत्येक के अन्दर एक नाभिक होती है जो परमाणु के अन्दर दस खरबवें भाग के बराबर स्थान घेरती है।
मानवी इन्द्रियाँ एक मर्यादा से मर्यादा से बंधी हुई हैं। वे निश्चित लंबाई व आवृत्ति की तरंगें देख या सुन पाती हैं। इससे सूक्ष्म स्थिति के लिये वैज्ञानिक सूक्ष्मदर्शी यंत्रों का सहारा लेते हैं। इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप जैसे यंत्रों के बावजूद अभी भी सूक्ष्मतम घटकों को देखा जा सकना सम्भव नहीं हुआ है। ये तथ्य बताते हैं कि सूक्ष्म जगत कितना विलक्षण, विराट एवं विचार जगत से परे है। योगी-ऋषि आत्मसत्ता का सूक्ष्मीकरण कर जीवनमुक्त स्थिति में ही इस परोक्ष सत्ता से- समष्टि चेतना से स्वयं को एकाकार कर लेते हैं एवं उन क्रिया-कलापों को देख पाने, उनमें भाग ले पाने में सक्षम हो पाते हैं जो भविष्य के गर्भ में विकास को पाने की स्थिति में होते हैं। इसी कारण उन्हें दृष्टा सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न महामानव कहा जाता है। ऐसी स्थिति में उनकी सत्ता बहुगुणित हो जाती है और अनेकानेक भूमिकाएँ एक ही समय में एक साथ निभा पाने में समर्थ हो पाती है।
सूक्ष्म की सामर्थ्य को चेतना के परिप्रेक्ष्य में समझने से पूर्व जड़ जगत में देखे तो विस्मित होकर रह जाना पड़ता है। रेत का छोटा-सा कण आंखों से देखने पर नगण्य मूल्य का होता है। लेकिन जब इसे अणु व परमाणु के रूप में विखंडित कर लिया जाता है तो तुच्छ से घटक में महान शक्ति छिपी पाते हैं। यह इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि परमाणु ऊर्जा के दोहन में मात्र उसका एक लाखवां भाग प्रयुक्त होता है। जो शक्ति निस्सृत होती है, वह असीम होती है। इस सन्दर्भ में यूरेनियम धातु का उदाहरण महत्वपूर्ण है। रेडियो किरणें छोड़ने वाली यह बहुमूल्य धातु शोधन उपचार के उपरान्त बहुत शक्तिशाली बन जाती है। इस धातु का एक घन फुट टुकड़ा भार में लगभग आधा टन होता है। जब इसके परमाणुओं पर न्यूट्रान कणों की बौछार की जाती है तो नाभिकीय विखण्डन प्रक्रिया से शक्तिशाली ध्वंस करने में समर्थ परमाणु बम तैयार होता है इस ऊर्जा का प्रयोग सारे भूमण्डल को नष्ट करने हेतु भी हो सकता है जबकि विधेयात्मक सुनियोजन कर इसकी एक पौण्ड मात्रा इतनी ऊर्जा पैदा कर सकती है जो 30 लाख पौण्ड कोयले को जलाने पर प्राप्त होती है।
मनुष्य की अन्तर्सत्ता की तुलना इस यूरेनियम धातु से की जा सकती है जिस पर ब्राह्मी सत्ता की किरणों की वर्षा होने पर वह सूक्ष्मीकृत- विखण्डित होती चली जाती है एवं विराट् शक्ति का पुँज बन जाती है। दृश्य मान पदार्थ व ऊर्जा का भेद मात्र अवस्था का ही भेद है। इन्द्रियातीत स्थिति में योग साधनाजन्य ऊर्जा दृश्यमान काया का ही परिवर्तित रूप है जो तेजस्, वर्चस् के रूप में बहुमूल्य निधि की भूमिका निभाती देखी जाति है। “अणोरणीयान महतो महीयान” का श्रुति वचन इसी तथ्य का साक्षी है कि लघुतम से घटक में महानतम संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं। इसीलिये श्रुति में ऋषि कह बैठते हैं-
“यो सावसौ पुरुषः “सोऽहमस्मि”
अर्थात्- “सूर्य में जो परम पुरुष है, वह मैं हूँ। सूर्य में अर्थात् ब्राह्मी चेतना के विराट् समुच्चय में जो आध्यात्मिक तत्व हैं, वही मुझ में भी हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से हम दोनों एक हैं, कही कोई भेद नहीं है।”
प्रसंग सूक्ष्मीकरण साधना का है। इस संदर्भ में मानवी काया का नहीं, चेतन सत्ता की गरिमा का महत्व है। जड़ पदार्थों पर लागू सूक्ष्मीकरण सिद्धान्त जब चेतना क्षेत्र में प्रयुक्त होता है तो उसकी चमत्कारी परिणतियाँ देखने में आती हैं। सुगठित अंग अथवा गौरवर्ण काया मनुष्य की महत्ता नहीं बढ़ाते, उसकी ज्ञान गरिमा एवं भाव संवेदना की प्रखरता ही उसे आत्मिक दृष्टि से ऊँचा उठाते हैं। ज्ञान को मस्तिष्क रूपी खरल में जितना घोटा जाता है, साधना, स्वाध्याय-सत्संग द्वारा जितना प्रखर बनाया जाता है, उतना ही वह सूक्ष्मतम बनते हुए मस्तिष्क कोष्ठों में सम्पादित होता जाता व मनुष्य को प्रज्ञावान बनाता है। यही ज्ञान की पूँजी जन्म-जन्मांतरों के लिये फिक्सड डिपॉजिट का काम करती है। आगामी जन्मों लोकोत्तर जीवन, वर्तमान जीवन में सूक्ष्म स्थिति में अनेकों महत्वपूर्ण कार्यों हेतु यही ज्ञान-निधि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अल्पायु में विशेष प्रतिभा (‘प्रोडिगी’) के जितने उदाहरण मिलते हैं, उनमें स्थूल मस्तिष्क की संरचना-विशिष्टता को नहीं, मन की सूक्ष्म परतों में निहित ज्ञान की पूर्व जन्मों में अर्जित सम्पदा को महत्ता दी जानी चाहिए। आइन्स्टीन, हाइजेन वर्ग, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सी. वी. रमन, जगदीश चन्द्र बसु प्रभृति प्रतिभाशाली व्यक्तित्व एक जन्म की अकेले को नहीं, जन्म-जन्मांतरों की ज्ञान साधना की उपज होते हैं। विधाता का नियम है कि वह पूर्वजन्मों की घटनाक्रमों की स्थूल मस्तिष्क को विस्मृति करा देता है। लेकिन अपवाद रूप में आग के शोलों के रूप में कुछ महापुरुषों में जब-जब मस्तिष्कीय भाण्डागार का अपवाद रूप में प्रस्फुटन होता है, वहाँ भौतिकविद् स्तम्भित होकर रह जाते हैं। वे स्थूल मस्तिष्क में उन विशेषताओं को ढूंढ़ते हैं जो वहाँ है ही नहीं, वे तो चेतना की गहन सूक्ष्म परतों में निहित होती हैं। जब खोजा ही गलत जाएगा, तो मिलेगा क्या? सूक्ष्म चेतना के इस स्वरूप पर अनुसंधान किए बिना मानवी विलक्षणताओं एवं सामर्थ्य के विस्तारों पर प्रकाश पड़ने वाला है नहीं?
भाव संवेदनाएँ आस्था केन्द्र के गहन अंतराल से उद्भुत होती हैं। वे चेतना के सबसे गहरे धरातल से उपजी होने के कारण विचारणा से सूक्ष्मतम होती हैं। इनकी संरचना के विषय में वैज्ञानिक अनभिज्ञ हैं। किन्तु भावनाओं की प्रतिक्रिया को शरीर के क्रिया-कलापों एवं बहिरंग में अनायास ही देखा जा सकता है। भावना के रसायन शास्त्र को प्रतीक रूप में कुछ अंतःस्रावी रसों, न्यूरो ह्यूमरल स्रावों के रूप में रक्त में, नर्व-सिनेप्सों में उभरा देखा जा सकता है। प्रसन्नता एवं दुःख के आंसुओं के स्वरूप को सीटी स्कैन, इकोएनसेफेलो ग्राफी, न्यूरोकेमीस्ट्री, न्यूरोहिस्टो पैथालॉजी से नहीं जाना जा सकता। यौन उन्माद कामोत्तेजना एवं नारी का माता के रूप में ममतामय रूप कहाँ व कैसे विभाजन रेखा पार करता है, इसे स्नायु रसायन शास्त्र नहीं समझा सकता। सूक्ष्म की महत्ता की यह झलक-झांकी भर है, जिसे अनुभूत भर किया जा सकता है पर चर्म-चक्षुओं से देखा नहीं जा सकता।
सूक्ष्मीकरण अध्यात्म विधा की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे ऋषि-मुनिगण समय-समय पर अपनाते रहे हैं। इसे अन्तर्मुखी साधना कहा जा सकता है जो युग समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में समष्टि चेतना को मथने के लिये सम्पादित की जाती है। यह साधना रई की भूमिका निभाती है जो महाकाल के इशारे पर युग ऋषियों द्वारा सम्पन्न की जाती है। प्रत्यक्ष में तो कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता लेकिन इससे परोक्ष वातावरण बनता है एवं परमाणु विखण्डन की पूर्व भूमिका बनती है। चेतना के समुद्र का यह मंथन नियन्ता की विधि-व्यवस्था का ही एक अंग है, जिसे सम्पन्न करने के लिये ऋषि आत्माएँ स्वयं आगे आती हैं।
आज की विषम परिस्थितियों में उस प्रचण्ड तप पुरुषार्थ की अप्रतिम भूमिका है। चारों ओर अनास्था के दावानल में जलती मानव जाति को त्राण दिलाने हेतु ऋषि परम्परा के नूतन संस्करण के रूप में युग ऋषि का जो साधना क्रम चल रहा है वह ऐसी ही प्रक्रिया का एक अंग है। इसमें सहभागी बनने हेतु जन्मी जागृतात्माएँ जो भूमिकाएँ निभाएंगी, वह समय के दृश्य पटल पर शीघ्र ही परिलक्षित होगा।
मनुष्य समाज में विविध प्रकार के मनुष्यों के बीच रहता है और पारस्परिक सम्पर्क से उसकी जीवन यात्रा सहज रूप में चलती रहती है। सान्निध्य सम्पर्क में कभी-कभी ऐसे व्यक्ति आ जाते हैं जिनके प्रति अत्यधिक आकर्षण की अनुभूति होती है। कभी-कभी कुछ व्यक्तियों के समीप आकर लगता है, इनसे जितना दूर रहा जा सके उतना ही हित साधन होगा। एक ही प्रजाति के, पर भिन्न रंग रूपों बनावट वाले व्यक्तियों के प्रति ये द्विधर्मी प्रतिक्रियाएँ क्यों होती हैं, इस सन्दर्भ में वैज्ञानिकों का कहना है कि पदार्थों की तरह चेतना का भी अपना प्रभाव क्षेत्र होता है। यह आभा मण्डल के रूप में सूक्ष्मीकृत कणों से विनिर्मित कवच की तरह काया के चारों ओर संव्याप्त रहता है। विचारणा एवं भावना के स्तर के अनुरूप इस आभा मण्डल में आकर्षण-विकर्षण के गुण धर्म आ जाते हैं। मनःस्थिति का- अन्तरंग का जो छाया चित्र मानवी काया के आस-पास बनता है, उसे सूक्ष्मदर्शी ब्रह्मवेत्ता समझ पाने में भली-भाँति सक्षम होते हैं।
अध्यात्मविदों का मत है कि चेतना का सूक्ष्मीकरण प्रत्यक्षतः यदि देखना हो तो उसे मानवी जैव चुम्बकत्व के कारण बनने वाले आभा मण्डल में देखा जा सकता है। जिस स्तर की जीव चेतना होगी, जितना ही उसमें श्रेष्ठता- उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं का समावेश होगा, उतना ही प्रकाशवान, विस्तृत किरण मण्डल, आरा या तेजोवलय के रूप में मनुष्य के चारों ओर संव्याप्त देखा जा सकेगा।
देवताओं के चित्रों के चारों ओर प्रकाश मण्डल चित्रित किया जाता है। विशेषतः चेहरे के आस-पास एक गोला प्रतीक रूप में बनाया जाता है जो बताता है कि देव-स्तर जो भी प्राप्त कर लेता है, इसका जैव-चुम्बकत्व उतना ही प्रबल-सघन होता है। ज्ञानेंद्रियों का जमघट तथा मस्तिष्क का विद्युत भण्डार एक ही जगह है इसीलिये प्रतीक रूप में चेहरे को ही तेजोवलय के प्रत्यक्षीकरण हेतु प्रधानता दी जाती रही है। जो बात देवताओं पर लागू होती है, वही मनुष्यों पर भी लागू होती है। जो नर पशु स्तर त्यागकर देव मानवों जैसे गुणों से अभिपूरित होता है, उसकी प्रभाव सामर्थ्य भी वैसी हो जाती है।
मानव का यह जैव चुम्बकत्व जो सूक्ष्म प्रकाश मण्डल के रूप में अवस्थित होता है, साधना क्षेत्र में तेजोवलय- ओजस के रूप में जाना जाता है। थियॉसाफी वाले इसे “ईथरीक डबल” कहते हैं एवं प्लाज्मा से विनिर्मित मानते हैं। शरीर की विद्युत सम्पदा यों तो पूरे शरीर से निस्सृत होती रहती है। परन्तु चेहरे, आंखों, उंगलियों एवं जननेंद्रियों के पास इसकी मात्रा सर्वाधिक होती है। मानव की सूक्ष्मीकृत ऊर्जा की तरह यह एक महत्वपूर्ण झाँकी है जिसके माध्यम से साधक की मनःस्थिति, रोगी होने की भावी संभावनाओं एवं भाव सम्वेदनाओं की गहराई को पढ़ा जा सकता है। समीपवर्ती वातावरण एवं साथी सहचर तेजोवलय के स्तर के अनुरूप ही प्रभावित होते देखे जाते हैं। कई बार यह वलय इतना प्रखर तेजस्वी होता है कि समीपवर्ती क्षेत्र को अपने प्रभाव से अनुप्राणित कर देता है। उस परिधि में प्रवेश करने वाले व्यक्ति भी उस प्रवाह में बहते हुए देखे जाते हैं। ऋषि-तपस्वियों के आश्रम में सिंह-गाय का एक साथ पानी पीने का सतयुगी उदाहरण इसी तथ्य की पुष्टि करता है।
विज्ञान क्षेत्र में पिछले दिनों ‘ह्यूमन आरा’ के मापन हेतु किर्लियन एवं शेर्लियन फोटोग्राफी के प्रयोगों के उपरान्त सूक्ष्म आभा मण्डल सम्बन्धी एक नयी विद्या विकसित हो गयी है जिसे ‘एरोबायोलॉजी’ नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार सामान्य अवस्था में मनुष्य के कन्धे से 6 फुट ऊपर तक चारों ओर घेरे एक अण्डाकार गोला होता है जिसे ‘प्लम’ कहते हैं। विशेष फिल्टर्स युक्त कैमरों के माध्यम से न इन आंखों से न देखे जा सकने वाले इस प्रकाश मण्डल का अंकन किया जा सकता है एवं इसका विश्लेषण कर यह जाना जा सकता है कि उस समय विशेष में व्यक्ति की मनःस्थिति कैसी है एवं भावनाओं का स्तर कैसा है? शरीर की ऊष्मा के इस विकिरण का मापन वैज्ञानिक तो रोग निदान, शल्य क्रिया में सफलता की सम्भावनाएँ, एवं मनोशारीरिक विश्लेषण हेतु करते हैं किन्तु अध्यात्म वेत्ता इसका विश्लेषण कर अन्तः की भाषा पढ़ लेते हैं एवं व्यक्ति के विधेयात्मक- निषेधात्मक प्रवाहों के अनुरूप परामर्श-साधना मार्गदर्शन दे पाने में भी समर्थ होते हैं।
एकोबायोलॉजी की इस विधा को सबसे पहले ब्रिटिश दार्शनिक डा. हैरोल्ड लेविस ने खोजा। एक एकोनॉटिक रिसर्च सेन्टर में हवाई जहाज के आर-पार बहने वाली हवा का शेर्लियन फोटोग्राफी के माध्यम से विश्लेषण चल रहा था। संयोग से वे भी वहीं उपस्थित थे। प्रदर्शन के दौरान एक कर्मचारी का हाथ कैमरे के सामने आने से फिल्म में हाथ की काली छाया के चारों ओर धुएँ के समान भूरे रंग के छल्ले दिखाई दिए। चूंकि इस फोटोग्राफी में उच्च वोल्टेज के ऊर्जा स्रोत का प्रयोग नहीं किया जाता अतः हानि की प्रत्यक्ष संभावना न देख उन्होंने चेहरे व शरीर को भी इस माध्यम से फोटोग्राफ किया। तभी से उनके शोध प्रयास इस दिशा में आगे बढ़ते चले गए एवं अंततः वे आभा मंडल का छायांकन कर उसका विश्लेषण करने में सफल हो गए।
वैसे आज से साठ वर्ष पूर्व एशिया के उतक मनोनिक एलेक्जेण्डर गुरविच ने यह मत व्यक्त किया था कि सभी जीवित कोशिकाएँ एक अदृश्य विकिरण ऊर्जा अपने चारों ओर छोड़ती है। इसे उन्होंने माइटोजेनिक रेडिएशन नाम दिया था। रूस में ही नोवोसी बर्स्क की साइबेरियन साइन्स सिटी के तीन वैज्ञानिकों ने 1968-69 में गुरविच के प्रयोगों को दुहराकर इस सिद्धान्त को पुनर्जीवित किया एवं कुछ तथ्य प्रतिपादित किए। ब्लायल काज्नाचेयेव, साइमन शूरीन एवं लुडमिला मिखाइलोवा नामक तीनों वैज्ञानिकों ने कहा कि हर जीवकोश विद्युत चुम्बकीय धाराओं के रूप में सिग्नल्स बाहर भेजने म समर्थ होता है जो अल्ट्रा वायलेट तरंग दैर्ध्य स्तर की होती हैं। कुछ वर्षों बाद मास्को यूनिवर्सिटी के बायोफिजिक्स विभाग के प्रमुख डा. बोरिस तार्सोव ने अपने प्रयोगों में पाया कि शरीर की चयापचयिक गतिविधियों के अतिरिक्त जैव रासायनिक परिवर्तनों को भी इस विधि से मापा जा सकता है।
जीवन के इलेक्ट्रो डायनेमिक सिद्धान्त के प्रवर्तक माने जाने वाले येल यूनिवर्सिटी के डा. हैराल्ड वर एवं लियोनार्ड रैबिट्ज से 1970 के दशक में एक महत्वपूर्ण खोज इस दिशा में की। उन्होंने शरीर के चारों ओर के विकिरण को एल. फील्ड (लाइफ फील्ड) नाम दिया और कहा कि यह न केवल अर्न्तस्थिति के मीटर के रूप में काम करती है अपितु जीवित प्रोटाप्लाजम की वृद्धि एवं रोगी कोशिकाओं की मरम्मत आदि में भी अपनी भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा है कि मनुष्य के चारों ओर की यह एल. फील्ड पृथ्वी के जैव चुम्बकत्व, ग्रह नक्षत्रों के आकर्षण-विकर्षण बल एवं सौर स्फोट गतिविधियों से भी प्रभावित होती है। मनोरोगियों में, अपराधी वृत्ति वालों में एवं श्रेष्ठ कार्य करने वाले सदा व्यस्त व्यक्तियों में यह एल. फील्ड भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। इसके माध्यम से व्यक्ति के अंतःक्षेत्र को बहिरंग जीवन में खोल कर देखा जा सकता है एवं वास्तविकता की जानकारी ली जा सकती है। इसके अलावा हाई वोल्टेज फोटोग्राफी का प्रयोग कर विकिरण का खतरा उठाते हुए प्रभा मण्डल का मापन संभव है। इसमें किर्लीयन फोटोग्राफी, इलेक्ट्रोग्राफी रेडिएशन फील्ड फोटोग्राफी आते हैं। इनके प्रवक्ताओं का मत है कि बीमारी होने से काफी पूर्व इस फोटोग्राफी द्वारा यह जाना जा सकता है कि इसकी संभावनाएँ कितनी प्रतिशत हैं। मद्धिम, धुँधले, प्रकाशवान ऑरा के मापन द्वारा उनका वर्गीकरण भी भली-भाँति सम्भव है। कौन निषेधात्मक प्रवृत्ति का है एवं नैराश्य का शिकार होकर आत्महन्ता स्थिति का रोगी बनेगा एवं कौन विधेयात्मक चिन्तन के सहारे अपनी जीवनी शक्ति का आश्रय लेते हुए मनोबल के सहारे अपनी नाव खे ले जायेगा, यह पूर्वानुमान भी ऑरा के इस विश्लेषण से संभव है।
वैज्ञानिकों द्वारा कायिक ऊर्जा- “आर्गेन एनर्जी” सम्बन्धी किया गया यह सारा शोध जंजाल एक बिन्दु विशेष पर तथ्यान्वेषियों को ले जाता है। वह यह कि हर व्यक्ति ऊर्जा का अक्षय भाण्डागार है। वह निरर्थक चिन्तन अथवा कामोपभोग में नष्ट होती रहती है। किन्तु जब इसका रूपांतरण किया जाता है तो कायिक आणविक संरचना विघटन के स्थान पर नियोजन में परिवर्तित हो व्यक्ति को ओजस्-वर्चस् सम्पन्न बना देती है। विद्युत शरीर सक्रिय हो जाता है एवं जैव चुम्बकत्व का विकिरण शरीर के चारों ओर प्रखर तेजयुक्त घेरा बनाकर एक आभा मण्डल बना देता है जिसकी चेतना जितनी सूक्ष्म होती है, वलयाकार में बना घेरा उतना ही प्रकाशवान होता है। अंतः का भाव मंडल ही आभा मंडल का निर्माण करता है। साधना पराक्रम द्वारा इस भाव मंडल को ही प्रखर शक्तिशाली बनाया जाता है। इस माध्यम से वे सभी मानवेत्तर पुरुषार्थ सम्पन्न किए जा सकते हैं जो सामान्य व्यक्ति के लिए असम्भव माने जाते हैं। जैन मत के प्रतिपादक तीर्थांकर महावीर ने इसी आधार पर लेक्ष्या के सिद्धान्त को जन्म दिया था जिसका पूरा ढाँचा ही पुद्गल (सूक्ष्माणु) प्राण ऊर्जा एवं भाव मण्डल पर आधारित है।
वैज्ञानिकों के प्रयास कायिक ऊर्जा के स्रोतों का पता लगाने एवं उसे मापने की दिशा में रुके नहीं हैं। नार्वे के डा. लेड रीच ने पहली बार अपने ‘आयन एकुमुलेटर’ यंत्र में मात्र दो-तीन छोटे उपकरण जुटाकर जब मानवी काया से विस्तृत पीले रंग की तेज रोशनी को पकड़ा, अंकित किया, तभी से उनके प्रयास इस दिशा में सतत् चल रहे हैं। रूस के युवा वैज्ञानिक विक्टर इन्युशिन ने इस “आर्गेन एनर्जी” को टोबी स्कोप यंत्र के द्वारा पहली बार मापा था एवं त्वचा प्रतिरोध तथा शेर्लियन फोटोग्राफी के माध्यम से बायोप्लाजमा के विकिरण को अंकित कर यह प्रतिपादित किया था कि जीवकोशों की विद्युत का समुच्चय ही बाहर प्रतिबिम्बित होता है। जापान के इन्स्टीट्यूट ऑफ रिलीजीयस फिलॉसफी एवं साइकोलॉजी के निदेशक डा. हिरोशी मोटीयामा ने एक्युपक्चर सिद्धांत पर ही ‘साय’ एवं ‘की’ एनर्जी का प्रतिपादन किया तथा एक विशेष यंत्र इलेक्ट्रोमीटर के माध्यम से उंगलियों के पोरों, चेहरों तथा होठों पर विशिष्ट विद्युतप्रवाह को मापा है। इसी की अल्पाधिक मात्रा के आधार पर वे ओजस् का शरीर में संचय एवं काया से उसका निस्सृत होना मानते हैं। उन्होंने पाया कि शरीर में विभिन्न मेरीडियन से प्रवाहित धारा प्रवाह भिन्न-भिन्न होता है। जब भी इसमें व्यतिरेक आता है, रुग्णता की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। वे कहते हैं कि बायोप्लाज्मा के रूप में आर्गेन एनर्जी ही प्रवाहित होती है एवं यही विशेष फोटोग्राफी द्वारा ‘ऑरा’ के रूप में तथा अन्य विशेष यन्त्रों से विद्युत उद्भव के रूप में मापी जाती है।
विद्युतप्रवाह के अतिरिक्त एरोबायोलॉजी में वैज्ञानिकों ने थर्मोविजन कैमरे के माध्यम से शरीर से निस्सृत ऊष्मा को भी मापा है एवं पाया है कि ताप ऊर्जा भी चमकदार रंग मिश्रित प्रवाह के रूप में काया के ऊर्ध्व केन्द्र मस्तिष्क से निस्सृत होती है। “मेडिकल फिजिक्स” पुस्तक में बायोफिजीसिस्ट डा. क्लार्क ने थर्मोग्राफी के माध्यम से ऊष्मा विकिरण को मापने का एक सफल प्रयास किया है। इस पद्धति के आधार पर शरीर में विद्यमान ऊर्जा, किसी प्रकार की न्यूनता एवं बायोफीडबैक द्वारा उसकी पूर्ति की व्यवस्था का एक समग्र तंत्र स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में बनाया गया है।
व्यवहार विज्ञान के विशारद ऊष्मा मापन एवं जैव चुम्बकत्व मापन का विश्लेषण कुछ अलग ढंग से करते हैं। वे कहते हैं कि जैसे लोहे का चुम्बक या विद्युत द्वारा उत्पन्न किया गया चुम्बकीय बल आकर्षण विकर्षण करता है वैसे ही ये आकर्षण-विकर्षण की प्रतिक्रियाएँ होती हों, ऐसी बात नहीं है। यह तो मात्र एकाँगी स्थूल पक्ष है जो भौतिकी का प्राथमिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी जानता है। उनके अनुसार मानवी तेजोवलय का विद्युत मण्डल अति सूक्ष्म स्तर का होता है एवं इसका प्रभाव क्षेत्र समीपस्थ एवं सम्बन्धित व्यक्तियों पर ही नहीं, एक व्यापक क्षेत्र पर पड़ता है। जितना भी कुछ मापा जा सका है वह तो उसकी एक झलक झांकी भर है। जो शेष है, वह असीम सामर्थ्य सम्पन्न है, प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है।
अध्यात्म वेत्ता इस मत से सम्मति व्यक्त करते हुए कहत हैं कि साधना की, सूक्ष्मीकरण की तप साधना की प्रतिक्रिया ओजस्, तेजस् वर्चस् की वृद्धि के रूप में होती है। ऐसे ऋषि कल्प महामानव गिने चुने होते हैं लेकिन उनके मौन होते हुए भी दृष्टिपात का, वाणी के द्वारा सत्परामर्श सत्संग का लाभ एक विशाल समुदाय को मिलता है। ओजस के क्षेत्र को रोकने के लिये वे तप-पुरुषार्थ हेतु एकाकी मौन साधना का अवलम्बन लेते हैं। जो भी इस सम्पर्क सान्निध्य की लपेट में आता है, उसे यह तेजोवलय बदलने- प्रभावित करने में सफल होता है। महामानवों के आश्रमों में, सिद्ध पीठों में जो प्रभाव सामर्थ्य रहती है, उसके मूल में यह प्रकाश पुंज- तेजोवलय ही काम करती है जो उनके वहां प्रत्यक्ष रूप में न रहने पर भी बनी रहती है। प्रत्यक्षतः आशीर्वचन-दर्शन, चरण-स्पर्श में छिपे सत्परिणामों के पीछे भी इस आभा मण्डल की ही भूमिका होती है। ऐसे तेजस् सम्पन्न व्यक्ति चिरायु होते हैं क्योंकि उनका छोड़ा हुआ प्रभाव चिरस्थायी होता है। विद्वत्जन कहते हैं- ‘तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते’ अर्थात्- “तेजस्वियों की आयु नहीं देखी जाती, वे अमर होते हैं।”
प्रसंग सूक्ष्मीकरण साधना के संदर्भ में यह चल रहा है कि युग समस्याओं के समाधान हेतु जिस तप-सामर्थ्य की आवश्यकता है, वह कैसे उपलब्ध हो? निरन्तर बढ़ते विग्रहों- पारस्परिक विलगाव- ईर्ष्या-द्वेष के दावानल से जूझती मानव-जाति को उबारने हेतु जिस स्तर का पुरुषार्थ अभीष्ट है, वह कैसे सम्पन्न हो? उत्तर एक ही है- बहिर्मुखी पक्ष को तिलांजलि देकर युग ऋषि द्वारा यह भूमिका निभाते हुए स्वयं को अन्तर्मुखी साधना में नियोजित किया जाना एवं सीमित समुदाय से ऊँचा उठ कर सारी वसुधा के हित साधन हेतु खपा देना। आज की परिस्थितियों में जो अनिवार्य था वही गुरुदेव ने किया है। उनकी एकाकी सूक्ष्मीकरण साधना का स्तर बहुत ऊँचा है। प्रत्यक्ष दर्शन न हो पाने का अभाव खलता तो है पर जो फलदायी परिणतियां उस तप साधना की होंगी, उसकी तुलना में वह तुच्छ है। आभा मण्डल के बहुलीकरण की समष्टि में संव्याप्त होने की यह युग साधना ऋषि तंत्र की विधि व्यवस्था का ही एक है। जो उनके जीवन क्रम से भली-भांति अवगत है, वे जानते हैं कि पूर्व में भी वे ऐसा एकाकी साधनाक्रम वे एक-एक वर्ष के लिये चार बार सम्पन्न कर चुके हैं। प्रस्तुत संकल्प बड़ी विकट घड़ियों में युग सन्धि की विषम बेला में लिया गया है। सभी परिजन इस युग साधना में सहभागी हैं। हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा। उनकी भविष्य वाणियाँ समय की कसौटी पर खरी उतरेंगी।
“जब मृत्यु निश्चित ही है, तब आप दिन-रात स्वाध्याय में सिर क्यों खपाते हैं?”
-एक व्यक्ति ने संत इमर्सन से प्रश्न किया।
-“इसलिए कि ज्ञान में घुल जाना ही अमरत्व है” इमर्सन ने संक्षिप्त उत्तर दिया और विचारों के सागर में लीन हो गए।
‘‘हमें देश तथा मानवता के लिए मन प्राण लगाकर अथक परिश्रम करना होगा। अभी तक यह आदर्श एक छोटा-सा बीज मात्र है, और जो जीवन इसे मूर्त रूप देता है वह स्वयं एक नन्हा-सा केन्द्र मात्र है, किन्तु हमारी ध्रुव आशा है कि बीज एक महान वृक्ष बनेगा और केन्द्र एक सदा विस्तृत होती हुई रचना का हृदय होगा। इस विसर्जित होते हुए जगत की अस्त-व्यस्तता में जन्म लेने के लिए नई मानवता संघर्ष कर रही है जो भावना हमें प्रेरणा दे रही है उसमें दृढ-विश्वास के साथ हम उस नई मानवता का, भावी भारत के ध्वज वाहकों का दर्शन करते हैं। यह विशद भारतीय अध्यात्म ही थके मांदे शरीर का जीर्ण देव संस्कृति का काया-कल्प करके उसे नया जीवन देगा। वह दिन जल्दी ही आएगा।
-“योगीराज अरविन्द”
प्रस्तुत समय की समस्याओं की तुलना समुद्र में बहते रहने वाले उस हिम खण्ड से की जा सकती है जिसका एक तिहाई से भी कम भाग ऊपर तैरता दिखाई देता है एवं शेष पानी में डूबा अदृश्य बना रहता है। जो नाविक इस तथ्य से अनभिज्ञ होते हैं, वे अनजाने विशाल समुद्र में अपने जहाजों को इनसे टकरा देते हैं एवं जीवन तथा सम्पदा खो बैठते हैं। आज जो दृश्यमान है, वही सब कुछ है, यह सोचने की आत्म-प्रवंचना हमें नहीं करना चाहिए। युद्धोन्माद , जघन्य स्तर के अपराध, पवित्र स्थलों का आश्रय लेकर धर्म के नाम पर हिंसा व अलगाववाद की दुहाई, सम्प्रदायवाद, जातीय आधार पर टिकी राजनीति के राज घरानों के जमाने के षडयंत्र एवं दुरभि सन्धियाँ बीसवीं सदी के इस सातवें-आठवें दशक की कुछ त्रासदी भरी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इन्हें देखते-देखते गत पच्चीस वर्षों में हम मोटी चमड़ी के हो गये हैं। अब हमें ये समस्याएं नजर नहीं आतीं, जीवन का अभिन्न अंग लगती हैं। लेकिन जो भुक्त भोगी हैं, वे बहुसंख्य हैं एवं वे समस्याओं का समाधान किसी भी स्थिति में चाहते कि विश्व-वसुधा की नैया युग विभीषिकाओं के इस आइसबर्ग से टकरा-टकरा कर चूर-चूर हो जाए। नियन्ता भी यह नहीं चाहता। चाहता होता तो सृष्टि रचता ही क्यों? उस परमसत्ता की एक ही इच्छा है कि मानवी पराक्रम- आत्मबल स्वयमेव उभर कर आए और इन विध्वंसक शक्तियों से मोर्चा ले। श्रुति का कथन सच है कि आत्मबल का पूरक परमात्म बल है। वह परमसत्ता तभी अपनी भूमिका निभाने आगे आती है जब मनुष्य अपने सारे प्रयास कर थक जाता है एवं रक्षा हेतु गुहार लगाता है।
जो समझदार हैं, वे समय की इस विषमता को भली-भाँति समझते हैं। वे जानते हैं कि बड़े राष्ट्रों द्वारा अस्त्र एकत्र कर लेने का अर्थ है- सामूहिक आत्मघात। बढ़ती जनसंख्या एवं संव्याप्त प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रदूषण की परिणति भी वे जानते- भली-भांति समझते हैं। वे इस तथ्य से भी अवगत हैं कि पूँजी के आधार पर विलासिता की पृष्ठभूमि पर एवं चिन्तन को विकृत कर देने वाले साधनों के बलबूते यह विश्व-तकनीकी दृष्टि से कितना भी बढ़ा-चढ़ा होने पर भी वस्तुतः विनाश को ही प्राप्त होगा। इस सम्बन्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय फ्राँस के आश्चर्यजनक पतन का प्रसंग उल्लेखनीय है। जर्मनी के खूंखार डिक्टेटर हिटलर ने जब नस्लवाद के नाम पर अपनी विनाश लीला का आरम्भ किया तब पोलैंड तो उसने पहले ही दाँव में धूर्तता से हथिया लिया। उसके समक्ष एक विस्तृत साम्राज्य फ्रांस का था जिसे हस्तगत करने पर विश्व विजय की सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाती। विदेशी आक्रामकों के बर्बर इरादों से अनभिज्ञ फ्रांसीसी सुरक्षा के स्थान पर विलासिता के मद में चूर बने हुए थे। हिटलर ने अपनी शक्ति, सैनिक बल, धन इस कार्य में अधिक नष्ट करना उचित न समझा। सुरा-सुन्दरी के नशे में डूबे फ्रांसीसियों ने मात्र चौबीस घण्टे में आत्म समर्पण कर दिया और हिटलर फ्रांस में अपना झण्डा फहरा कर नये मोर्चे की तैयारी करने लगा। तत्कालीन विचारकों ने चिन्तन करने पर पाया कि आत्मबल की दृष्टि से हीन, खोखले नागरिकों को जीता नहीं गया, उन्होंने स्वयं आत्म समर्पण कर दिया।
जिन्हें भगवान ने थोड़ी भी समझ दी है वे भली-भाँति जानते हैं कि आज सारे विश्व की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसी द्वितीय विश्व युद्ध के समय थी। राष्ट्रीयता, नैतिक अनुशासन मात्र किताबों में लिखने के लिये रह गया है। अश्लील साहित्य हमारे अपने ही देश में नहीं सारे विश्व में इतनी बड़ी मात्रा में छपता व नित्य पढ़ा जाता है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। नशीली दवाओं की खपत नित्य बढ़ती चली जा रही है। हशीश, कोकीन, चरस, गाँजा, हिरोइन जैसी घातक वस्तुओं की एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे देश में तस्करी का ऐसा जाल बिछा हुआ है जो तोड़े नहीं टूटता। फिल्मों ने ऐसे अवसर पर एक उत्प्रेरक (केटेलिस्ट) की भूमिका निभाने का दायित्व उठाया है। वे अपराधों, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता एवं आत्मघाती उन्मादी मनोवृत्ति को जन्म देने वाली प्रवृत्तियों को ही प्रश्रय देती नजर आती है।
समाचार पत्रों ने पत्र-पत्रिकाओं ने भी मानों नैतिक अनुशासन के पतन में भागीदार बनने का दायित्व अपने हाथों में ले लिया है। मात्र वे ही समाचार प्रकाश में आते हैं जिनसे अन्यों को, उन्हीं का अनुकरण करने की प्रेरणा मिले। राज्य प्रमुखों- राष्ट्राध्यक्षों- प्रशासनिक कर्मचारी वर्गों में ईमानदारी का अंश उतना ही है जितना कि पानी मिले दूध में घी का हो सकता है। ये एक ओर देश भक्ति की दुहाई देते हैं, दूसरी ओर क्षेत्रवाद जातिवाद का नारा लगाते हैं। आज एक दल में हैं तो कल अन्तरात्मा की पुकार पर दूसरे दल में पहुँच कर निष्ठावान होने की शपथ गीता पर हाथ रख कर लेते हैं। एक वर्ग उनका रह जाता है जिन्हें हम अर्थतन्त्र की बागडोर संभालने वाले पूँजीपति नाम दे सकते हैं। अपनी मनमर्जी से मिलावट, रिश्वतखोरी, का आश्रय लेकर चरित्रहीन व्यक्ति धन-कुबेर बन बैठे उन सभी को अंगूठा दिखाते नजर आते हैं जो दिन भर मेहनत कर आधा पेट भरने लायक रोटी भी नहीं कमा पाते।
लेकिन अब यह स्थिति अधिक दिन तक चलने वाली नहीं है। भले ही बहुसंख्यक व्यक्तियों की स्थिति उन बकरों की तरह हो, जिन्हें कसाई ग्रह ले जाने से पूर्व घास खिलायी जा रही हो व वे आगत के प्रति अनभिज्ञ हों, एक ऐसा वर्ग भी है जो भले-बुरे परिणामों को समझता व विश्व के नव निर्माण हेतु अपना पुरुषार्थ जुटाता है। भले ही इसमें उन्हें तात्कालिक हानि दिखाई पड़े वे विषम परिस्थितियों से जूझने हेतु विलम्ब न कर मोर्चा जुटाते एवं ऐसी रणनीति बनाते हैं जिससे अनीति अभाव एवं अज्ञान मिटे, सतयुगी प्रकाश धरती पर आए।
भारतभूमि सदा से युग परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आयी है। समय-समय पर पूर्वानुमानों एवं दिव्य दृष्टि के आधार पर अपना मत व्यक्त करने वाले देश-विदेश के मनीषियों ने कहा है कि जब-जब भी दैवी विपत्तियां बढ़ी हैं एवं मानव आसुरी आचरण में प्रवृत्त हुआ है, इस देवभूमि से उद्भूत दिव्यात्माओं ने ही युग परिवर्तन की महती भूमिका निभायी है। स्वतन्त्रता संग्राम में जितना श्रेय प्रत्यक्ष क्रियाशील क्रांतिकारियों एवं स्वाधीनता सैनिकों को दिया जाता है, उससे अधिक इन दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों ने उन सिद्ध महापुरुषों को दिया है जिन्होंने वातावरण बनाने हेतु तप-साधना की, परोक्ष में क्रियाशील रहे एवं युग परिवर्तन की प्रचंड आंधियां ला सकने में समर्थ हुए। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द से लेकर रामतीर्थ, योगीराज अरविन्द, महर्षि रमण आदि का नाम इसी सन्दर्भ में लिया जाता है। जिनका नाम इस सूची में नहीं है, वे सदा से उत्तराखण्ड की कंदराओं में तप साधना में निरत हैं एवं सारे लीला संदोह को देख रहे हैं जो प्रत्यक्ष में दृश्यमान है, परोक्ष में घटने वाला है।
परिवर्तन शब्द कहने-सुनने में सरल है, रुचिकर भी है तथा अभीष्ट भी। किन्तु विडम्बना एक ही है कि लगभग असंभव तो नहीं किन्तु कष्टसाध्य इस प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिये न तो साधन जुटाने से काम चल सकता है, न ही अनथक परिश्रम से कोई प्रयोजन सध सकता है। इस प्रयोजन की पूर्ति हेतु तो आदर्शवादी श्रद्धा का उथला नहीं गहरा स्तर चाहिए। यह जब तक न होगा सारे बाह्योपचार निरर्थक हैं। युग बदल सकने में समर्थ इस बहूमूल्य पूँजी का भाण्डागार मानवी व्यक्तित्व के गहन अन्तराल में छिपा पड़ा है जिसे कुरेदने, उभारकर प्रखर बनाने भर की आवश्यकता है। यही समस्त समस्याओं का समाधान है। यदि आस्थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन हो, उनका सुनियोजन हो गया तो मानना चाहिए कि श्रुति की मान्यतानुसार कलियुग चला गया एवं सतयुग का पदार्पण हो गया।
हम इसी आशावादी दृष्टिकोण के साथ उन चिरायु तपस्वी ऋषियों की युग साधना में सहभागी बने हैं कि नवयुग अवश्य आयेगा। वह श्रद्धायुग कहा जाएगा। आस्थाओं के स्तर के मीटर के आधार पर ही किसी की महानता-क्षुद्रता का मूल्यांकन किया जाएगा। महाप्रज्ञा का तत्वदर्शन जन-जन के मन-मन में प्रविष्ट होगा एवं विवेक का सारथी उन मूर्धन्यों की ज्ञानेन्द्रियों का संचालन करेगा जिनके हाथों में अर्थ, सुरक्षा, शासन एवं विचार तंत्र है। सूक्ष्मीकरण साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते हैं कि छोटे-छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभाएंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके। जो समर्थ होता है, वही पुरुषार्थ कर दिखाने का दावा कर सकता है। विचार-क्रान्ति शब्द तो अच्छा है किन्तु व्यवहार में इसे प्रयुक्त कर दिखाने के लिये एक समर्थ, दैवी तन्त्र का संरक्षण चाहिए। हमारा दावा है कि असंभव को संभव कर दिखाने का यह पुरुषार्थ आगामी पन्द्रह वर्षों में सम्पन्न होकर रहेगा। विवेक और श्रद्धा के जिस समन्वित ऋतम्भरा रूप का- आद्य शक्ति का अवलम्बन कर लिया है, उसमें लाखों-करोड़ों को अपना सहयोगी बनाया है। प्रत्यक्ष जितना किया जा सकता था, हो चुका। वह पृष्ठ भूमि तैयार हो चुकी जो नियन्ता को अभीष्ट थी। अब राष्ट्रीय नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर “ग्लोबल क्राइसिस” के निवारणार्थ परोक्ष भूमिका ही अभीष्ट थी। मौन-नितान्त एकाकी पुरुषार्थ क्या कुछ कर सकेगा, अन्तः में श्रद्धा का बीजारोपण कर कैसे वाँछित प्रयोजन कर सकेगा, इसे विश्व स्तर पर देखा जा सकना अगले दिनों सम्भव होगा।
इतिहास भी इस तथ्य का साक्षी है कि जब-जब भी बिगाड़ बेकाबू हुआ है, उसे नियंत्रित करने हेतु महाकाल रूपी महावतों की मार ही सफल हो पाई है। प्रकारान्तर से इसे भगवान के अवतार की संज्ञा भी दी जा सकती है। अदृश्य युग प्रवाह का विनिर्मित होना ही प्रज्ञावतरण है। समझ जब काम नहीं करती, तब अदृश्य जगत से- परोक्ष के व्यवस्था उपक्रम से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस धरती को महाविनाश के गर्त में जाने नहीं देगा। जिसकी इच्छा से इस सृष्टि का प्रारूप बना व मानव रूपी युवराज जन्मा, उसे जगती का वर्तमान चोला ही पसन्द है यह सोचना नासमझी है। नियन्ता ने सदैव संतुलन स्थापित करने हेतु दौड़ लगाने का अपना वचन निबाहा है।
इन दिनों भले ही प्रत्यक्ष में तमिस्रा का व्यापक साम्राज्य संव्याप्त नजर आता हो। वह दैवी सत्ता निराकार रूप में देखते-देखते एक छोटा-सा सूरज उगाकर सारी परिस्थितियाँ उलट सकती है। हरीतिमा रहित ठूंठों पर वासन्ती बहार ला देना उसके लिए बाँये हाथ का खेल है। इसके लिए ऋषि-महामानव सदा-सदा से ही अवतरित होते रहे हैं। वर्तमान क्रिया-कलापों में उस दैवी चेतना के सक्रिय क्रियान्वयन को ज्ञान-चक्षुओं द्वारा देखा जा सकता है। अन्यथा यह उमंग कैसे उठती, जिसने इस दैवी मिशन को कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया। जो इतना समझते हैं, वे इस आश्वासन को भी सुनिश्चित समझें कि समय बदलेगा, नासमझी का स्थान विवेकशीलता लेगी और समग्र सूत्र-संचालन सोये मूर्धन्यों के हाथों से निकलकर जागृतात्माओं के हाथों में आएगा। हमारी अन्तर्मुखी एकाकी साधना को उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
बाप बेटे चोरी को गये। बाप अभ्यस्त था और बेटा नौसिखिया। बेटे को कुएँ की मुँडेर पर खेत मालिक की खोज खबर रखे रहने की चौकीदारी के लिए बैठा दिया और स्वयं फसल काटने में लग गया। इससे पूर्व बेटे को बता दिया गया था कि मालिक आता दीखे तो इशारा कर देना ताकि हम लोग भाग चलें।
खेत कटने लगा। बाप काम में लग गया। लड़के ने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो खेत का मालिक तो नहीं दिखा पर संसार का मालिक सर्वत्र संव्याप्त नजर आया। सो वह चिल्लाया, पिताजी हमें तुरन्त भागना चाहिए। देखने वाले ने देख लिया।
दोनों बेतहाशा दौड़े। बहुत दूर जाने पर रुके तो बाप ने बेटे से पूछा, वह कौन था, कहाँ था जिसने हमें देखा। लड़के ने आसमान की ओर उंगली उठाकर उस सर्वव्यापी की ओर इशारा किया जो हर किसी को देखता है और करनी का फल दिये बिना मानता नहीं।
चोर की आंखें खुल गईं और उसने आगे से चोरी करना बंद कर दिया।
(मंगल विजय)
तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये। महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिए॥
‘मिलन’ विश्व की तरुणाई से, बूढ़े मन का कब होता है। महाप्राण के आलिंगन में, कब प्राणों का शव होता है॥
महाप्राण से महामिलन को, यौवन भरा उफान चाहिये। तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये॥
लेती आई मजा मिलन का, सदा-सदा से नयी जबानी। बूढ़े प्राण रहे बहलाते अपने को, सुन कथा, कहानी॥
अगर चाहिए मजा मिलन का, तो वैसा सामान चाहिये।। महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिये॥
जीवन जियें न निष्प्राणों-सा, जीवित रहते मृत न कहायें। प्राणवान जैसा जीकर हम, महा-मिलन का अमृत पायें।।
समरूप को समान स्तर का ही आदान-प्रदान चाहिये। महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिये।।
प्राणवान होने का परिचय दें हम मुस्कानें बिखरा कर। संघर्षों की भरी जवानी से अपना यौवन टकराकर॥
महाप्राण दें स्वयं निमन्त्रण, और अधिक क्या मान चाहिये। तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये।
महामिलन से मिली सुधा का, जन-मानस को पान करायें। जन-मानस के सुप्त प्राण को, शंखनाद कर चलो जगायें।
युग के प्राणों को लहराने, प्राण-सुधा का पान चाहिये। महाप्राण से महामिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिये॥
*समाप्त*