नींव मजबूत बनाओ

भवन जितना ऊंचा बनाना होता हैं नींव उतनी ही गहरी खोदनी पड़ती है। नींव की गहराई पर ही भवन की ऊंचाई निर्भर है। ध्येय ऊंचा हो और उसे पाना भी हो तो अपना व्यक्तित्व उतना ही गम्भीर और मजबूत बनाना होता है। ऐसे मकानों पर आँधी तूफान और भूकम्प का असर नहीं पड़ता। नींव गहरी होने के कारण वे डगमगाते नहीं।

नींव का कार्य पूरा हो जाने के बाद भवन निर्माण की दिशा और स्वरूप बनता है। इसी प्रकार ज्ञान, चरित्र और व्यक्तित्व बन जाने के बाद ध्येय पूरा करने की यात्रा आरम्भ होती है। इस प्रकार बने हुए भवन पर छोटी-बड़ी चोटें पड़ती रहती हैं और बड़े झकझोरे आते रहते हैं पर कुछ बिगाड़ नहीं पाते। जबकि कमजोर नींव वाले एक ही अन्धड़ से उखड़ कर दूसरे कोने पर जा गिरते हैं। जीवन को जितना महान बनाना है उतने ही मजबूत मनोबल वाली नींव बननी चाहिए।


उपासना में आत्मशोधन की अनिवार्यता

उपासना का अर्थ है- पास बैठना। भगवान को अपने पास बिठाना या स्वयं भगवान के पास बैठना। दोनों ही स्थितियों में इसकी पात्रता आवश्यक है। राजा को अपने घर बुलाकर उसे देर तक पास बिठाये रहना या स्वयं राज महल में जाकर उनके समीप रहना एवं देर तक वार्तालाप करना, यह हर किसी के लिए सम्भव नहीं। इसके लिए पात्रता चाहिए। दीन-हीन, मलीन या रोग ग्रसित व्यक्तियों को यह सुविधा नहीं मिल सकती। उसके लिए पूर्व तैयारी करनी पड़ती है। श्रीमद् भागवत् में भगवान की समीपता प्राप्त करने के लिए चार तैयारियाँ करने की बात लिखी हैं।

(1) सात्विक सीमित आहार। जिससे पेट तनकर भारा रखने के कारण आलस्य प्रमाद न सताये। दूसरे अन्न के अनुरूप मन बने और भगवान में रुचिपूर्वक लग सके। अभक्ष्य, अनीति उपार्जित धान्य खाने से मन उद्विग्न एवं चंचल बनता है और भगवत् प्रसंग से हटकर बार बार दूर भागता है।

(2) वाक् संयम। कटु वचन, मिथ्या भाषण, असत्य मखौल जैसे भ्रष्ट वचन न बोलकर वाणी को इस योग्य बना लेना जिससे किया हुआ नाम स्मरण सार्थक हो सके।

(3) इन्द्रिय निग्रह- चटोरापन, कामुकता, मनोरंजक दृश्य देखने की चंचलता, संगीत आदि आकर्षणों की ओर दौड़ पड़ना जैसे चित्त को चंचल बनाने वाले उपक्रमों से दूर रहना। उन आकर्षणों के लिए उमंगें उठती हों तो उन्हें रोकना।

(4) स्वाध्याय और सत्संग का सुयोग बनाते रहना जिससे भगवद् भक्ति में श्रद्धा विश्वास बढ़े। जमे हुए संचित कुसंस्कारों के उन्मूलन का क्रम चलता रहे। उनके आधार पर ही लोभ मोह का दुष्परिणाम विदित होते हैं। उच्चस्तरीय चिन्तन मनन से ही मन की भ्रष्टता का निराकरण होता है।

माता पिता के निकट जाना या उनकी गोदी में बैठना किसी बच्चे के लिए कठिन नहीं होना चाहिए। यह सरल है और स्वाभाविक भी। भगवान के साथ मनुष्य का घनिष्टतम सम्बन्ध है। आत्मा परमात्मा से ही उत्पन्न हुई है। उसके साथ सम्बन्ध बनाये रहने से कोई मनुहार करने या अनुदान देने की आवश्यकता नहीं है। अनुनय विनय तो परायों से करनी पड़ती है। भेंट पूजा तो उनकी जेब में डालनी पड़ती है जिनसे कोई अनुचित प्रयोजन सिद्ध करना है। बालक की जितनी उत्कण्ठा अभिभावकों की गोदी में चढ़ने की होती है उसकी तुलना में माता-पिता भी कम उत्सुक आतुर नहीं होते। पर इस प्रयोजन की पूर्ति में एक ही व्यवधान अड़ जाता है- बालक का शरीर गन्दगी से सना होना। मल मूत्र से बच्चे ने अपना शरीर गन्दा कर लिया हो और गोदी में चढ़ने का आग्रह कर रहा हो तो माता मन को कठोर करके उसे रोकती है, पहले स्नान कराती, पोछती और सुखाती है। उसके उपरान्त ही छाती से लगाकर दुलार करती और दूध पिलाती है। उसे अपना शरीर गन्दा और दुर्गन्धित होने का भय जो रहता है। विलम्ब का व्यवधान उसी कारण अड़ता है। यह विलम्ब बच्चे के हित में भी है और माता के हित में भी।

भगवद् भक्त कहलाने के लिए साधक को इस योग्य बनाना पड़ता है जिससे पास बिठाने वाले की भी निन्दा न हो। जिन अधम और अनाचारियों को भगवत् अनुग्रह प्राप्त हुआ है उन सभी को अपने दुर्गुणों का परिशोधन करना पड़ता है। इसके बिना अब तक किसी को भी उपासना का आनन्द नहीं मिला। परिशोधन भक्त की अनिवार्य कसौटी है। उसका श्रेय चाहे भक्त स्वयं ले ले या भगवान को दे दे। पर है इस प्रक्रिया की हर हालत में अनिवार्यता। मनुष्य एक ओर तो अनाचाररत रहे और दूसरी और उथले कर्मकाण्डों के बल पर ईश्वरीय अनुकम्पा का आनन्द लेना चाहे तो उसे अब तक की परम्परा और शास्त्र मर्यादा के सर्वथा प्रतिकूल ही समझना चाहिए। श्रीमद् भागवत् में इसी तथ्य को उपासना प्रेमियों के सम्मुख उद्घाटित किया है।


निराकार और साकार का स्पष्टीकरण

निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त नियामक सत्ता का कोई एक आकार नहीं बन सकता। जो एक स्थानीय होगा वह सर्वव्यापक नहीं बन सकता। एक स्थान पर तो उस पर ब्रह्म सत्ता का एक अंश या एक घटक ही किसी कलेवर में सीमाबद्ध देखा जा सकता है। व्यापक अग्नि तत्व समेट कर एक स्थान में केन्द्रित नहीं किया जा सकता। मोमबत्ती में जलता हुआ उसका एक अंश ही देखा जा सकता है। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी या पदार्थ में भगवान की अंश रूप में झाँकी की जा सकती है। पर उसे पूर्ण ब्रह्म या परब्रह्म नहीं कह सकते हैं। मिट्टी के ढेले को चन्दन, पुष्प, कलावा आदि से सुसज्जित करके उसे पूजा प्रकरण में गणेश बनाया जाता है। भक्त का श्रद्धा संवर्धन का कार्य इतने से भी सध जाता है। पर कोई यह दावा नहीं कर सकता कि ब्रह्माण्ड व्यापी गणेश तत्व सिमट कर उसके जल कलश में केन्द्रित हो गया है। इस प्रकार समझने को तो किसी भी प्राणी या पदार्थ को भगवान का अंश प्रतीक मान सकते हैं। पर यह मान्यता भर की बात है। तत्त्वतः वह व्यापक सत्ता अपने व्यापक रूप में ही समग्र रहेगी।

भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन करने का आग्रह अर्जुन को ही रहा था। वह इसके लिए हठ कर रहा था। कृष्ण उसे बार-बार समझा रहे थे कि चर्म चक्षुओं से आज तक भगवान को न किसी ने देखा है न कोई देख सकेगा। आग्रह हो तो ज्ञान चक्षु भाव चक्षु- इसके लिये खोलने पड़ेंगे। कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान चक्षु प्रदान करते हुए अपना विराट् रूप दिखाया और कहा देख, यह विश्व ब्रह्माण्ड ही मेरा रूप है। अर्जुन ने वैसी ही भावना की और अपना समाधान कर लिया। यशोदा भी ऐसे ही प्रत्यक्ष दर्शन चाहती थीं उन्हें भी विराट् रूप दिखाकर सन्तोष कराया गया। राम के समय भी कौशल्या और काकभुसुण्डि इसी प्रकार विराट् विश्व की भाव कल्पना से अपना समाधान कर सके।

पूजा प्रयोजन के लिए काष्ठ, मृतिका, पीतल, कांस्य आदि धातुओं की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। दिवाली के अवसर पर गणेश, लक्ष्मी प्रायः मिट्टी के बने ही पूजे जाते हैं। बंगाल में नवरात्रि के समय दुर्गा की और महाराष्ट्र में गणेश पूजा के अवसर पर गणेश जी की भव्य मूर्तियाँ बनती हैं वे मिट्टी, लुगदी, जूट, बांस आदि को मिलाकर बनाई जाती हैं। पूजा के उपरान्त किसी जलाशय में विसर्जन कर देते हैं। इसे प्रतीक पूजा कहते हैं। मन्दिरों में पत्थर या धातु की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और भक्त जन उसी बैसाखी के सहारे अपनी भाव यात्रा का अभ्यास जारी रखते हैं। छोटे बच्चों को जब तक चलना नहीं आता तब तक तीन पहियों की गाड़ी हाथ में थमाकर चलने का अभ्यास कराते हैं। स्कूल में भर्ती होने वाले बालकों को क-कबूतर, ख-खरगोश, ग-गाय, घ-घड़ी की छवियां दिखाकर स्मरण और उच्चारण का अभ्यास कराते हैं। किन्नर गार्डन के लकड़ी के टुकड़े भी इस प्रयोजन में सहायता करते हैं। प्रतीक पूजा का विज्ञान इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। इतने पर भी बच्चे जानते हैं कि तीन पहिये की गाड़ी पैर नहीं हो सकती, कबूतर, खरगोश, गाय, घड़ी देखते रहने से शिक्षा का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। किन्नर गार्डन के लकड़ी के टुकड़े जेबों में भरे फिरने भर से कोई विद्वान नहीं बन सका है। यह सब आरम्भिक आश्रय मात्र हैं। देव पूजा में प्रतिमाऐं, उस तत्व का स्मरण भर दिलाती हैं और बिखरे हुए ध्यान को एकाग्र करने के काम आती हैं।

सजीव सत्ताओं के बीच घनिष्टता उत्पन्न करने का काम प्रेम करता है। वह अन्तःकरणों को परस्पर जोड़ने का गोंद है। इसीलिए प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। भक्त और भगवान के बीच घनिष्ठता स्थापित करने के लिए प्रेम भावना प्रदीप्त करनी होती है। मनुष्यों के बीच भी यही अवलम्बन काम देता है। इससे पराये अपने बन जाते हैं। इसके अभाव में अपने भी परायों की अपेक्षा अधिक दूर लगते हैं। पति-पत्नी, विवाह से पूर्व अपरिचित होते और दूर रहते हैं पर जब उनके भीतर आत्मीयता उगती और प्रेम भावना उफनती है तो एक दूसरे के लिए प्राण प्रिय हो जाते हैं। दो शरीर एक आत्मा जैसी अनुभूति होती है। बच्चे, कुटुम्बी, मित्र, पड़ौसी इसी आधार पर आत्मीयता के बन्धनों में बंधे होते हैं और अपने ही शरीर के अंग अवयवों जैसे लगते हैं। जड़ पदार्थों को परस्पर जोड़ने के लिए ठोकने, सरेस चिपकाने, सिलाई या बैल्डिंग करने जैसे उपाय काम में लाये जाते हैं। आत्माओं को एकीभूत बनाने के लिए प्रेम ही एक मात्र उपाय है।

आत्मा को परमात्मा के निकटतम लाने ले जाने के लिए उच्चस्तरीय प्रेम का अभ्यास करना पड़ता है। उच्चस्तरीय का तात्पर्य है- उत्कृष्ट, आदर्श, निस्वार्थ, पुनीत। बाजारू प्यार तो रण्डी भडुओं के बीच भी होता है। ठग अपनी शिकार को मीठी बातें करके फंसाते हैं। चाटुकारों का धन्धा ही यह है। चमचागिरी से जिसे चुना जाता है उसके प्रति असमय सद्भावना का लवादा ओढ़ना पड़ता है। यह बाजारू बातें हुईं जिसमें झूठ-मूठ का प्रेम दिखाया जाता है। किन्तु सच्चे आत्मीयजनों के लिए प्यार की परिपूर्ण वास्तविकता रहती है। आत्मा और परमात्मा के बीच घनिष्ठ आत्मीयता उत्पन्न करने के लिए उच्चस्तरीय प्रेम का आश्रय लेना पड़ता है।

प्रेम की प्रकृति ऐसी है जो दृश्यमानों के साथ ही निभती है। अदृश्य के प्रति नहीं। वायु, ऊष्मा, ऊर्जा, प्रकाश, शब्द आदि शक्तियाँ निराकार हैं। उनका उपयोग ही साधनों से हो सकता है पर इनसे प्रेम नहीं हो सकता। प्रेमी का शरीर धारी होना आवश्यक है। वस्तुएं भी तभी प्यारी लगती हैं जब उनका कोई आकार हो। साकार उपासना में इष्टदेव की प्रतिमा इसी प्रयोजन के लिए कल्पित करनी पड़ती है और उस कल्पना में घनिष्ठता का पुट लगाना पड़ता है।

आत्मिक प्रगति के तीन आधार हैं (1) ज्ञान (2) कर्म और (3) भक्ति। ज्ञान के लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन और मनन से काम लेना पड़ता है। कर्म के लिए उद्देश्यपूर्ण प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। भक्ति के लिए कोई उच्चस्तरीय आधार भगवान का गढ़ना पड़ता है। यों प्यार तो स्त्री बच्चों से भी होता है पर उसके पीछे स्वार्थ और आदान-प्रदान के तत्व काम करते हैं। इस अभ्यास को आगे बढ़ाने के लिए आदर्श के समुच्चय इष्टदेव की प्रतिमा गढ़ते हैं और एकान्त एकाग्रता के समय अंतर्मुखी होकर उसके साथ अपने को घुला देने की भावना करते हैं। हिन्दू समाज में, राम, कृष्ण, शिव, सूर्य, हनुमान, दुर्गा, सरस्वती, गायत्री आदि की छवि इतनी अच्छी तरह अन्तःक्षेत्र में उभारते हैं जिसमें वह काल्पनिक न होकर वास्तविक प्रतीत होने लगे। अन्य धर्मावलम्बी अपने-अपने मजहब में ईश्वर की जो छवियाँ प्रचलित हैं उन्हें काम में ले सकते हैं। ईसाई धर्मानुयायी ईसा, मरियम की, मुसलमान पैगम्बर, अल्लाह की, बौद्ध बुद्ध की छवियों को इष्टदेव मानते हैं और उनकी छवि को इतनी अधिक आत्मीयता से निहारते हैं मानो वे काल्पनिक न होकर वास्तविक ही हों। इसी कारण विभिन्न धर्मावलम्बियों के बीच इस प्रसंग को लेकर कोई विग्रह नहीं होता क्योंकि वे वास्तविकता को जानते हैं कि इष्टदेव अपनी ही भावभूमि में अपने ही द्वारा गढ़े गये हैं।

प्रेम की एक प्रकृति और है कि वह घनिष्ठ बनाने के लिए पूर्वाभ्यासों का सहारा लेता है और कोई रिश्तेदारी जमाता है। प्रियजनों में, माता, पिता, सहायक, स्वामी, सखा, पति प्रमुख हैं। भगवान को अपने से ऊंचे स्तर का रखना है इसलिए पत्नी पुत्र या नौकर के रूप में वह प्यार निम्न स्तरीय हो जाता है। इष्टदेव की छवि के साथ उपरोक्त उच्च सम्बन्धियों में से एक मानकर अपने आत्मीय अनन्यता बढ़ानी पड़ती है। इसमें भावोद्रेक होने लगते हैं। विश्वास बंधता है श्रद्धा तत्व को अपने भीतर अधिकाधिक मात्रा में बढ़ाने का अवसर मिलता है।

प्रतिमा पूजन का मूल उद्देश्य श्रद्धा संवर्धन का आधार निश्चित करना है। आत्मिक सफलताओं में श्रद्धा सबसे बड़ा तत्व है। मीरा के गिरधर गोपाल, बोडाना के रनछोड़जी, रामकृष्ण परमहंस की काली, एकलव्य के द्रोणाचार्य श्रद्धा के कारण ही अपनी चमत्कारी शक्ति का परिचय दे सके थे। साकार उपासना की विशेषतया इसी निमित्त आवश्यकता पड़ती है। जो आस्तिक नास्तिक, साकारवादी निराकारवादी, सभी क्षेत्रों में ऐसे श्रद्धा संवर्धक आधारों का आश्रय लिया जाता है। मुसलमान संगे असवद के प्रति असीम श्रद्धा रखते हैं। राष्ट्रीय क्षेत्रों में झण्डे का श्रद्धापूर्ण सम्मान किया जाता है। कलश स्थापन, दीपक प्रज्ज्वलन आदि के पीछे यही भाव है। तत्त्वतः भगवान को सर्वव्यापी निराकार मानने वालों को भी श्रद्धा संवर्धन के लिए-भक्ति भावना विकसित करने के लिए प्रतीक पूजा का आश्रय लेना पड़ता है। क्रमिक साधना का यह एक सुनिश्चित अंग है।

विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों एवं परंपराओं में अनेकानेक प्रतिमाओं को मान्यता मिलती चली आई है। इनमें से जिनके साथ पूर्व घनिष्ठता चल रही हो उसे चलते रखा जाता है। गायत्री उपासना में साकार उपासना वाले हंसारूढ़ देवमाता को प्रतीक बनाते हैं और निराकारवादी प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य-सविता का ध्यान करते हैं। ध्यान या पूजन के साथ घनिष्ठ आत्मीयता की भावना करना आवश्यक है।

श्रद्धा के संयोग से ही प्रतिमा में शक्तिदायिनी क्षमता उत्पन्न न हो तो फिर काम नहीं चलेगा। मुसलमानी काल में सोमनाथ, विश्वनाथ, कृष्ण जन्मभूमि, राम जन्मभूमि आदि की प्रतिमाओं को यह कहकर खण्डित किया गया कि इनमें निजी शक्ति होगी तो तोड़ने में अनिष्ट करेंगी पर वैसा कुछ नहीं हुआ। स्पष्ट है कि स्थापित प्रतीक अपने आप में शक्ति पुँज नहीं होते श्रद्धा का आरोपण ही भक्त के अन्तराल को हुलसित करता है।

इष्टदेव को सद्भावनाओं, सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों का केन्द्र माना जाय। पवित्रता और प्रखरता का भांडागार। उसके साथ प्रेम सम्बन्ध स्थापित करते हुए एक ही भाव रखा जाय समर्पण। द्वैत की समाप्ति और अद्वैत का आरम्भ जिस प्रकार आग में ईंधन पड़ने से तद्रूप हो जाता है समझा जाना चाहिए कि आत्मा सत्ता परमात्मा की विभूतियों के साथ एकीभूत हो रही है। नाला नदी में मिलकर नदी बनता है। बेल पेड़ से लिपटकर उतनी ही ऊंची उठ जाती है। पोली बांसुरी वादक की फूँक से स्वर निकालती है। पत्नी अपना अस्तित्व पति के व्यक्तित्व में घुला देती है, अनुभव करना चाहिए अपनी सत्ता इष्टदेव के साथ एकीकार हो रही है और परमात्मा की पवित्रता, प्रखरता अपनी अन्तरात्मा के कण-कण में ओत-प्रोत हुई जा रही है।

इस अभ्यास में बढ़ी हुई भक्ति भावना को अधिक व्यावहारिक बनाने का एक ही व्यावहारिक स्वरूप है कि इस विश्व उद्यान को अधिक सुखी, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने के लिए अपनी समस्त क्षमताओं का उत्सर्ग कर दिया जाय। व्यायामशाला में अर्जित की गई बलिष्ठता का दंगल में अथवा दूसरे सत्प्रयोजनों में खर्च किया जाता है। निश्चय होना चाहिए कि भक्ति भावना का इष्टदेव के साथ एकात्म भाव स्थापित करने के उपरान्त जो अभिवर्धन न किया गया है उसे प्राणिमात्र की सेवा साधना में-जनमानस के परिष्कार में-सत्प्रवृत्ति संवर्धन में किया जायेगा। ऐसा न होगा कि पूजा के समय भाव तरंगें उठाकर उसी मनोविनोद को जहाँ का तहाँ समाप्त कर दिया जाय। भगवत् भक्ति की सार्थकता उसके इस विराट् विश्व को अधिकाधिक हरा-भरा फला-फूला बनाने में है।

स्मरण रहे इस भक्ति भावना की परिपुष्टि के लिए इष्टदेव के साथ एकात्म होने में याचना जैसा कुछ नहीं है। प्रेम में दिया ही दिया जाता है उसमें लेने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है।

भगवान के दर्शन को लेकर अति भ्रम पैदा करना व्यर्थ है। वह तो भक्त की अपनी निज की भावना है जो घनिष्ठ होने पर दिवा स्वप्न की तरह दृष्टिगोचर होती है। भगवान की मूर्ति रही भी होती तो वह केवल एक होती। हर सम्प्रदाय वालों के लिए अलग-अलग प्रकार के रूप वे कैसे बनाते और दर्शन देने के लिए अपना लोक अथवा काम छोड़कर कैसे भागे आते। इसलिए प्रतीकों से ही काम चलाना चाहिए प्रत्यक्ष दर्शन का आग्रह किसी को भी नहीं करना चाहिए।


सृष्टा का उत्तराधिकारी महान बनकर रहे

मानवी विकास का वास्तविक स्वरूप निर्धारित करना हो तो यह मानकर नहीं चला जा सकता कि मनुष्य शरीर पाने तक ही उसकी अन्तिम परिधि है। उसे विकासोन्मुख होने के लिए शरीरगत जीवनयापन को भी सब कुछ न मानकर अपनी सत्ता उस चेतना के साथ जोड़नी पड़ेगी जो इस ब्रह्माण्ड पर अनुशासन करती और अन्तराल को सुविकसित स्वच्छ बना लेने वालों पर अपनी उच्चस्तरीय अनुकम्पा बरसाती है। साथ ही मनुष्य को इस प्रकार का चिन्तन अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित करती है कि उसके अन्तराल में अति महत्वपूर्ण क्षमताओं का भी भण्डार भरा बड़ा है जिसे थोड़ा विकसित कर लेने पर वह काया की दृष्टि से यथावत् रहते हुए भी व्यक्तित्व कि दृष्टि से यथावत् रहते हुए भी व्यक्तित्व की दृष्टि से महानतम बन सकता है।

इस अध्यात्म विकास के तत्वज्ञान के अनुरूप चेतना को विकसित परिष्कृत, समर्थ, विलक्षण बनाने का द्वार मनुष्य शरीर मिलने के उपरान्त खुलता है। इससे पूर्व तो वह मात्र जीवधारी ही बनकर रहता है। साथ ही प्रकृति का अनुशासन मानने के लिए बाधित रहता है। दो प्रकृति पर अनुशासन करने, उसे अपने अनुकूल बनाने की विद्या का ज्ञान तक नहीं होता। प्रकृति पर परमात्मा का स्वामित्व है। दूसरा हस्तान्तरण उसके युवराज मनुष्य को उसकी परिपक्वता विकसित होते ही उपलब्ध होने लगता है। यह दूसरी बात है कि वह उस अनुदान का कितनी बुद्धिमत्ता के साथ किन प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त करता है।

विकास की मानवी परत में उभरते ही उसे आत्मबोध की एक नई उपलब्धि हस्तगत होती है वह अनुभव करता है कि काय कलेवर उसका समग्र स्वरूप नहीं वरन् एक वाहन उपकरण आच्छादन मात्र है। उसके भीतर रहने वाली चेतना ही मनुष्य को ऊँचा उठाती नीचे गिराती है। मनः स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदाता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। वह प्रकृति की कठपुतली मात्र नहीं है। अन्य प्राणियों की तरह मात्र निर्वाह ही उसकी एकमात्र आवश्यकता नहीं है। वरन् व्यक्तित्व का स्तर उठाकर जीवन सज्जा को-अनेकों उपलब्धियों विभूतियों से अलंकृत करना भी एक विशिष्ट उद्देश्य है। जब तक यह विचारणा नहीं उठती तब तक वस्तुतः मनुष्य नर पशु ही रहता है और इन्द्रिय लिप्साओं तथा मानसिक तृष्णाओं तक ही उसकी गतिविधियाँ सीमित रहती हैं, न वह जीवन का महत्व समझ पाता है और न उसे चेतना की पृथकता-विशिष्टता सम्बन्धी कुछ ज्ञान होता है।

विकास की दृष्टि से पेड़ की ऊंचाई एक सीमा तक बढ़ती जाती है। वह सीमा पूरी होने पर उसका फैलाव एवं मोटाई की अभिवृद्धि होती है तथा फूल फल लदने लगते हैं। योनियों की दृष्टि से हाथी, सिंह, ह्वेल आदि का विस्तार तथा प्रभाव बढ़ा चढ़ा है, पर शरीर संरचना और मानसिक स्तर की दृष्टि से मनुष्य ही मूर्धन्य है। इसीलिए उसे सृष्टि शिरोमणि कहा जाता है। प्राणि जगत पर उसका अधिकार है। इतना ही नहीं प्रकृति के अनेकानेक रहस्यों की परतें उसने उधाड़ी हैं और एक सीमा तक उस पर आधिपत्य भी प्राप्त किया है। सुख साधन उसके पास असीम मात्रा में हैं। अस्त्र-शस्त्रों सहित रण कौशल में उसकी प्रवीणता है। समाज गठन और शासन तन्त्र का निर्माण उसी का अनुपम कौशल है। पदार्थ विज्ञान में उसने असाधारण उन्नति की है। यह सब बातें इस बात का प्रमाण हैं कि प्राणि जगत में उसकी प्रमुखता असंदिग्ध है।

पेड़ की ऊंचाई पूरी हो जाने पर उसकी प्रगति फल-फूलों की दिशा पकड़ती हैं। यह बात मनुष्य के सम्बन्ध में भी है उसका विकास मानसिक और आत्मिक दो दिशाओं में प्रस्फुटित होता है और इन क्षेत्रों की बढ़ी-चढ़ी सफलताओं में अपनी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति करता है।

विकास अविरल गति से चलता है इससे मानवी संदर्भ में भौतिक उन्नति एवं आध्यात्मिक प्रगति के नाम से जाना जाता है। यही उत्कर्ष की दो दिशाएं हैं। सम्पदाओं से सुसम्पन्न व्यक्ति को अति मानव कहा गया है और आत्मिक उत्कृष्टता को अति मानस।

भौतिक प्रगति में शरीर बल, बुद्धि बल, साधनबल, संगठन बल, अधिकार, कला कौशल आदि की गणना होती है। ऐसे लोग श्रीमन्त, सामन्त, शासक, विद्वान आदि नामों से जाने जाते हैं। उनकी महत्वाकाँक्षा इस दिशा में बढ़ती है कि अधिकाधिक वैभव, क्षेत्र एवं जन समुदाय पर उनका अधिपत्य हो और अधिकाधिक लोग उनका लोहा मानें, सम्मान प्रदान करें। ऐसे लोग सामान्य क्षेत्र में भी बहुत होते हैं और उन्हें वरिष्ठ कहते हैं। जब वे आर्थिक या शासकीय क्षेत्र में समर्थ होते हैं तो उनकी महत्वाकाँक्षा और भी अधिक तीव्र हो जाती है। इतिहास ऐसे लोगों के प्रमाण उदाहरणों से भरा पड़ा है। हिरण्याक्ष, वृत्रासुर, रावण आदि की चर्चा इसी वर्ग में होती है। पिछले दो महायुद्ध जर्मनी के शासकों की महत्वाकाँक्षाओं के कारण ही लड़े गये और उनमें मरने वालों तथा तबाह होने वालों की संख्या करोड़ों तक पहुँची। हिटलर, मुसोलिनी ऐसे ही महत्वाकाँक्षी थे। आज भी रूस और अमेरिका पर परस्पर ऐसी ही तैयारियों में संलग्न होने का दोषारोपण करते हैं। दार्शनिक नीत्से के शब्दों में यह वर्ग विश्व विजय का स्वप्न देखता है उसकी पूर्ति के लिए असंख्यों के विनाश में नहीं चूकता। लोग इन्हीं का लोहा मानते हैं और आतंक से भयभीत होकर अथवा चापलूसी में शेर के द्वारा किये शिकार में श्रृंगाल को भी कुछ झूठन मिल जाने का ताना बाना बुनते हैं। इस वर्ग को तथा उनके समर्थकों को अतिमानव शब्द से सम्बोधित किया जा सकता है जो महामानव शब्द से सर्वथा प्रतिकूल शब्द है।

आन्तरिक विकास की आध्यात्म उत्कर्ष की दूसरी दिशा धारा है। उसे योगी अरविन्द के शब्दों में अति मानस कहा जा सकता है। इसका सर्वसुलभ उपाय है- सज्जनता। जिसे उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और उदार व्यवहार का समन्वय कह सकते हैं। यह सहजीवन का महा मानव स्तर है। इसे जो अपनाते हैं वे क्षुद्र प्रयोजनों में निरत नहीं रहते। पेट और प्रजनन का कार्य भी वे निपटाते तो रहते हैं, पर ऐसा नहीं होता कि उन्हीं में अपना सीमा बन्धन बाँध लें। वे लोक-कल्याण एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन के सामयिक क्रिया-कलापों को अपने जीवन क्रम में अविच्छिन्न रूप से सम्मिलित करते हैं। इसके लिए निजी आवश्यकताओं में कटौती करनी पड़ती है तो उसे भी करते हैं, और कार्य भार तथा विरोधियों का दबाव बढ़ने से जो कठिनाई उठानी पड़ती है उन्हें भी सहन करते हैं। उन्हें सन्त, सुधार, शहीद के नाम से इतिहासकार स्मरण करते हैं। महापुरुषों, महामानव या युग पुरुष के नाम से ऐसे ही लोगों को श्रेय सम्मान दिया जाता है और उनकी उत्कृष्टता से प्रभावित होकर अगणित व्यक्ति उनका अभिनन्दन अनुकरण करते हैं।

इससे भी सूक्ष्म क्षेत्र में उतरने वाले व्यक्ति अपने अन्तराल को अधिकाधिक परिशोधन और परिष्कार करते हैं। कषाय कल्मषों को सतर्कतापूर्वक बुहारते हैं और क्रिया क्षेत्र में ही नहीं अन्तराल में उठते रहने वाले उतार-चढ़ावों को भी सन्तुलित करते हैं। उनके भीतर पवित्रता और बाहर प्रखरता का समावेश रहता है। ऐसे लोग तप का आश्रय लेकर अपनी प्रसुप्तियों को जगाते और प्रखरताओं को तेजस्वी करते हैं। योग के सहारे आत्मा और परमात्मा के बीच समन्वय का आदान-प्रदान का पथ प्रशस्त करते हैं। जिनकी तपश्चर्या और योग साधना बलवती होती है उन्हें ऋषि, देवता, अवतार आदि नामों से पुकारते हैं। वे लोक कल्याण के लिए स्वाध्याय सामग्री विनिर्मित करते हैं और सामयिक समस्याओं के समाधान के सत्संग का ऐसा भाण्डागार विनिर्मित करते हैं जिसमें से अमृत जल भर कर विज्ञजन लोकमानस को परिष्कृत करने में जुट पड़ते हैं। इस आधार पर वे स्वयं दौड़ धूप करने की अपेक्षा दिशा निर्धारण एवं योजना निर्माण की दृष्टि से लोक सेवा की तुलना में कहीं अधिक काम कर गुजरते हैं।

हर कोई नहीं जानता, पर सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि प्रयत्न प्रयासों के महत्व की उपेक्षा न करते हुए सूक्ष्म वातावरण में लोक मानस को किसी भी दिशा में तूफान की तरह उड़ा ले जाने की विशेष सामर्थ्य होती है। सूक्ष्म वातावरण यदि भावनात्मक प्रदूषणों से, दुष्प्रवृत्तियों से भर रहा हो तो उसका प्रभाव समूचे संसार या समुदाय पर पड़ता है। उसमें विकृतियाँ भरती चली जांय तो छूत की बीमारियों की तरह अगणित लोग उससे प्रभावित होते हैं और अच्छी राह छोड़कर कुमार्ग पर घिसटते जाते हैं। इसके विपरीत यदि सूक्ष्म वातावरण को तेजस्वी ऋषि कल्प व्यक्तियों द्वारा भर दिया जाय तो चन्दन के पेड़ की तरह उसका प्रभाव न केवल समीपवर्ती झाड़-झंखाड़ों को सुगन्धित बना देता हैं वरन् दूर-दूर के वातावरण में मनोरम सुगन्ध की मनोरमा सद्भावना भर देता है।

ऋषि कल्प व्यक्ति अदृश्य वातावरण पर प्रभाव छोड़ते हैं और अपने तेजस्वी व्यक्तित्व द्वारा समय के अनुपयुक्त प्रवाह को उलट कर सीधा करते हैं। इतने पर भी उनकी कार्यपद्धति हर किसी के समझने की नहीं होती। वे अपनी अतीन्द्रिय क्षमताएं उभारते हैं और उनके सहारे अनेक असमर्थों को सामर्थ्यवान बनाकर ऐसे लक्ष्यों की पूर्ति करते हैं जिसे ईश्वर की चमत्कारी अनुकम्पा ही कहा जा सके। आत्मबल में अलंकारिक रूप से हजार हाथियों का बल बताया गया है।

यों लोक सेवी महामानव यदि अपना व्यक्तित्व निखार कर सामयिक आवश्यकताओं को पूरी करने में सफल होते हैं। अतिमानस का पहला या दूसरा चरण जो भी अपनाया जा सके अपने और समस्त समाज के विश्व ब्रह्माण्ड के उत्कर्ष में सहायक ही होते हैं।

सांसारिक दृष्टि से चर्म चक्षुओं से अतिमानवों का ही अधिक महत्व माना और उल्लेख होता है, पर सच्चाई यह है अतिमानस विनिर्मित करने की दिशाधारा ऐसी है जिसमें अपना ही नहीं विश्व मानव का ही वास्तविक हित साधन होता है।


हजरत निजामुद्दीन (kahani)

दिल्ली में एक संत थे- हजरत निजामुद्दीन। उनके यहाँ ईश्वर की वन्दना वाला संगीत चलता ही रहता था।उन दिनों दिल्ली के राजा थे- गयासुद्दीन तुगलक। उनने संत को गाना बजाना बन्द करने का हुक्म भेजा। उनने फरमान मानने से इनकार कर दिया।तुगलक ने सीधा दण्ड तो न दिया पर उन्हें हैरान करने की ठानी।निजामुद्दीन एक बावड़ी बनवा रहे थे। उसमें लगे मजूरों को उनने किले में काम करने के लिए बुला लिया। ताकि काम रुक जाय।मजूर दिन में किले का काम करते और रात को चुपके से बावड़ी बनाने आ जाते।रात को दिये की जरूरत पड़ती। तेल के ढेरों दिये जलते और बावड़ी बनती।तुगलक ने हुक्म दिया- हजरत के हाथों कोई तेल न बेचे।हजरत ने पानी भर कर दिये जलाना शुरू कर दिया और बावड़ी बनती रही।इस चमत्कार से तुगलक का शिर नीचा हो गया बावड़ी पूरी होने तक पानी के चिराग जलते ही रहे।तब से उस बावड़ी का दरगाह का नाम चिराग निजामुद्दीन पड़ गया।


परमात्म सत्ता के विराट् रूप का दर्शन

परमात्मा का दर्शन एक प्रिय और आकर्षक विषय है। लोगों की मान्यता है- इस दर्शन भर से ईश्वर को इतना अनुग्रहीत किया जा सकता है कि उससे जो कुछ भी उचित अनुचित माँगा जाय वह निश्चित रूप से मिल जाय।

इस सम्बन्ध में संव्याप्त भ्रम धारणा इतनी बड़ी और गहरी है कि उसके निरस्त करने के कुछ समय वर्ग सकता है। किन्तु यह निश्चित है कि भ्रम का अपना कोई अस्तित्व नहीं और वह वास्तविकता का प्रकाश प्रकट होते ही क्षण भर में तिरोहित हो जाता है।

ईश्वर का मनुष्य आकृति में या किसी देवता के रूप में प्रकट होना, दर्शन देना, यह विशुद्ध रूप से अपनी कल्पना अथवा मान्यता का खेल है। सर्वव्यापी कोई भी वस्तु या शक्ति निराकार ही हो सकती है और जो निराकार है उसके प्रत्यक्ष दर्शन कैसे हों?

मात्र इतना हो सकता है कि अपनी भावनाएं यदि प्रगाढ़ हों तो वे कल्पित स्वरूप के अनुरूप दिवा स्वप्न की तरह दर्शन देने लगे। भगवान भावना स्तर पर मनुष्य के साथ संपर्क साधते हैं। इसलिए उनकी अनुभूति अन्तःकरण में दिव्य विचारों के रूप में हो सकती है। वह भी यदि वास्तविक होगी तो उस अनुभूति को व्यावहारिक जीवन में उतारे बिना रहने नहीं दे सकती।

यदि जीवन क्रम पुराने ढर्रे का गये बीते लोगों के स्तर का बना रहे। चिन्तन में पवित्रता और प्रखरता का काया कल्प स्तर का परिवर्तन न हुआ हो तो समझना चाहिए कि वह दिव्य दर्शन भी दिवा स्वप्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। ऐसा तो हिप्नोटिज्म के आधार पर किसी को भी ईश्वर, देवता या और कुछ दिखाया जा सकता है।

वहाँ ईश्वर को साकार मानने के उपरान्त ही चर्म चक्षुओं से उसके देखे जाने की आशा की जा सकती है। पर क्या ईश्वर जन्म लेते और मरते हैं? निश्चय ही नहीं। इस मान्यता की अपेक्षा तो विराट् ब्रह्म-विशाल विश्व के रूप में ईश्वर का भाव क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना श्रेष्ठ है। तुलसीदास जी ने “सियाराम मय सब जग जानी” के रूप में ही उनका दर्शन और अभिवन्दन किया था।

विष्णु सहस्र नाम में पहले ‘विश्व’ का नाम आता हैं। पर्वत, नदी, वन आदि समस्त विश्व परमात्मा का ही स्वरूप है। प्रकृति के उन्मुक्त वातावरण में भी ऋषियों ने परमात्मा के दर्शन किये। इसी परमात्मा बोध के कारण हिमालय, गंगा, आदि पवित्र समझे जाने लगे। यह अज्ञानवश प्रकृति में ईश्वरत्व का आरोप नहीं है।

श्रुति का कथन है कि एक ही ब्रह्म का विद्वानों द्वारा बहुत नाम रूपों में वर्णन किया गया है। पृथक-पृथक सम्प्रदायों में उनके विभिन्न नाम रूप हैं। पर इससे ईश्वरों का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता।

परमात्मा कर्त्तव्य निष्ठ है। उससे उत्पन्न देव गण सदा क्रियाशील और अनुशासित रहकर कार्य करते हैं उन्हें भय है कि यदि अकर्मण्यता और प्रमाद बरता गया तो प्रकोप का भाजन बनना पड़ेगा। अतः नियत समय पर कर्तव्यरत रहते और कार्य अंजाम के प्रति सजग रहते हैं। इन्द्र, अग्नि तथा मृत्यु भी इसीलिए आज्ञानुवर्ती होकर कार्य करते हैं।

भीषास्माद वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादिन्द्रश्चाग्निश्च। मृत्यु-र्धाबति पंचम।

यह ईश्वर नियम रूप है। यदि हम ईश्वरीय नियमों का प्रति पालन करते हैं तो समझना चाहिए कि हमारी आस्तिकता सच्ची है।

अनेक देवताओं की मान्यता से एकेश्वरवाद के सिद्धान्त में कोई अन्तर नहीं आता। नदी या तालाब में लहरें उठती रहती हैं। उनके स्वरूप अलग-अलग दृष्टिगोचर होते हैं। इतने पर भी वे वस्तुतः जलाशय के अविच्छिन्न अंग ही हैं। इसी प्रकार अगणित देवताओं सम्बन्धी मान्यताओं के पीछे भी एक ही परम तत्व को समाहित समझा जाना चाहिए।

पुरुष सूक्त के अनुसार देवताओं की उत्पत्ति ईश्वर के अंगों से बताई गई है। पुरुष की संज्ञा परमात्मा को दी गई है। पुरुष का स्वरूप शब्दातीत है। उसके हाथ पैर सिर आदि अनन्त हैं। उसकी शक्ति अनन्त, अपरिमित है। इसी कारण उन्हें “सहस्र शीर्षा पुरुषः। सहस्राक्षः सहस्र पात्।” कहकर विराट् रूप में सम्बोधित किया जाता है।

ईश्वर के मुंह से अग्नि और इन्द्र की उत्पत्ति बताई जाती है। मन से चन्द्रमा और प्राण से वायु की उत्पत्ति बताई जाती है। नाभि से अन्तरिक्ष की उत्पत्ति हुई है। “चन्द्रमा मनसो जातः।” चक्षो सूर्यो अजायत। मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च। प्राणव्दायुर जायत। नाभ्य आसीन्दन्तरिक्षम्। पद्म्याँ भूमि र्दिशः श्रोत्रात।”

अच्छा हो हम ईश्वर या देवताओं की व्यक्ति विशेष के स्तर की मान्यता न बनाये। उसे एक व्यापक सत्ता के रूप में हृदयंगम करें। विभिन्न देवी-देवताओं या अवतारों की प्रतिमा बनाने और पूजने में हर्ज नहीं किन्तु उसकी निराकारिता, सर्वव्यापकता और न्यायशीलता में सन्देह करके वैसा कुछ नहीं सोचा जाना चाहिए जैसा कि भक्त जन दर्शन करने के फेर में इसलिए रहते हैं कि उनकी इच्छित मनोकामनाएं इतने भर से पूर्ण हो जायगी।

वस्तुतः ईश्वर की अनुकम्पा या साँसारिक सफलता पाने के लिए हमें अपनी पात्रता का विकास करना चाहिए। उपलब्धियाँ उसी आधार पर हस्तगत होती हैं। पूजा उपासना का तात्पर्य भी पात्रता विकसित करना भर है। न कि ईश्वर को फुसलाना।


ऋषि अंगिरा (kahani)

ऋषि अंगिरा के शिष्य उदयन बड़े प्रतिभाशाली थे, पर अपनी प्रतिभा के स्वतन्त्र प्रदर्शन की उमंग उनमें रहती थी। साथी सहयोगियों से अलग-अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास यदा-कदा किया करते थे। ऋषि ने सोचा यह वृत्ति इसे ले डूबेगी...... समय रहते समझना होगा।

सर्दी का दिन था बीच में अंगीठी में कोयले दहक रहे थे, सत्संग चल रहा था। ऋषि बोले कैसी सुन्दर अंगीठी दहक रही है। इसका श्रेय इसमें दहक रहे कोयलों को है न? सभी ने स्वीकार किया।

ऋषि पुनः बोल- देखो, अमुक कोयला सबसे बड़ा-सबसे तेजस्वी है। इसे निकालकर मेरे पास रख दो। ऐसे तेजस्वी का लाभ अधिक निकट से लूँगा।

चिमटे से पकड़कर वह बड़ा तेजस्वी अंगार ऋषि के समीप रख दिया गया।

चर्चा चल पड़ी। -पर यह क्या? अंगार मुर्झा सा गया। उस पर राख की पर्त आ गयी और वह तेजस्वी अंगार काला कोयला भर रह गया।

ऋषि बोले- बच्चों देखा, तुम चाहे जितने तेजस्वी हो, पर इस कोयले जैसी भूल मत कर बैठना। अंगीठी में यह अन्त तक तेजस्वी रहता और सबसे बाद तक गर्मी देता। पर अब न इसका श्रेय रहा- न इसकी प्रतिभा का लाभ हम उठा सके।

शिष्य समझ गये- ऋषि परम्परा वह अंगीठी है जिसमें प्रतिभाऐं संयुक्त रूप से सार्थक होती हैं। व्यक्तिगत प्रतिभा का अहंकार न टिकता है न फलित होता है।


“योगा” और “मेडीटेशन” का कौतुक

योग का वास्तविक अर्थ और स्वरूप है आत्मा और परमात्मा का एकीकरण। इससे आत्मा की ही अपनी क्षमता, पवित्रता और पात्रता बढ़ानी पड़ती है ताकि वह परमात्मा में घुल सकने योग्य बन सके।

योग अर्थात् मिलन। मिलन में सहधर्मी होना आवश्यक है। अन्यथा स्तर में असाधारण अन्तर रहने पर यह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। पानी में नमक, चीनी, दूध जैसे पदार्थ ही घुल सकते हैं क्योंकि उनके परमाणुओं का भार जल के अणुओं जितना ही होता है। लोहे का, पत्थर का चूरा यदि पानी में मिलाया जाय तो वह तलहटी में बैठ जायेगा और कभी भी आत्मसात न होगा। योग में परमात्मा से मिलने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए जीव को ही अपना स्तर ईश्वर के समतुल्य विकसित करना होता है। ईश्वर को जीव की मनमर्जी पर चलने के लिए प्रयत्न करना उपहासास्पद है। इस अवैज्ञानिक विद्या से कभी किसी को सफलता नहीं मिली और न मिल सकती है।

गिड़गिड़ाने, नाक रगड़ने, प्रशंसा भरी मनुहार करने, भेंट पूजा का लालच दिखाने, कर्मकाण्डों में रिझाने या किसी स्थान विशेष पर विराजमान समझकर उसके दर्शन करने के लिए तीर्थयात्रा पर निकल पड़ने जैसे क्रिया-कृत्य उसे लुभाने, फुसलाने और वरगलाने में सफल नहीं हो सकते। इतनी चालाकी को सामान्य बुद्धि वाले भी समझ लेते हैं कि अनधिकारी रहते हुए भी बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त करने की आशाऐं लगाये बैठे रहने की बात सर्वथा सिद्धांत हीन और बेतुकी है।

इसमें भक्त या साधक को अपना समूचा व्यक्तित्व विकसित और परिष्कृत करना होता है। शरीर मन और अन्तःकरण को तद्नुरूप ढाँचे में ढालना पड़ता है। इसी निमित्त विभिन्न कर्मकाण्डों की-योग साधनाओं की संरचना हुई है। क्रिया के सहारे व्यक्तित्व को समुन्नत करने की पद्धति ही दिव्य मिलन का-योग का प्रयोजन पूरा करती है।

योग के कितने ही मार्ग हैं। साधन विधान अनेकानेक हैं। यह भिन्न निर्धारण व्यक्ति की सामयिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए करने होते हैं। उनमें अन्तर हो सकता है। यह रुचि और परम्परा का विषय है। किन्तु इस तथ्य में कभी कहीं अन्तर नहीं आ सकता कि योग मार्ग पर चलने वाले को अपने समग्र व्यक्तित्व को ऊंचा उठाना पड़ता है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उन आदर्शों का समावेश करना होता है जो मानवी गरिमा के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। तथ्य एक ही है। उसके निमित्त अपनाये गये उपचारों में प्रकृति भिन्नता के कारण अन्तर हो सकता है। पर जिसमें क्रिया काण्ड ही सब कुछ समझा गया हो और व्यक्तित्व को सामान्य जनों की अपेक्षा अधिकाधिक उत्कृष्ट बनाने की उपेक्षा की जा रही हो, समझना चाहिए कि बाल कौतूहल जैसी विडम्बना मात्र है। भले ही उसका नाम साधना रख लिया जाय। इन कौतूहलों में नवधा भक्ति के नाम पर प्रतिमा पूजन भी हो सकता है और कथा कीर्तन भी।

कर्मकाण्डों से कुछ आशा तभी रखी जा सकती है जब वह मानवी चरित्र की ऊंचाई की ओर उछालने का प्रयोजन पूरा कर सकें। हेय जीवन जीते हुए नाम जाप, देव दर्शन, जलाशयों का स्नान मात्र मार्गदर्शन में सहायक हो सकता है लक्ष्य पूर्ति में सहायता नहीं कर सकता।

योग एक चेतना परक विज्ञान है। उसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को जागृत, सशक्त और प्रखर बनाने के लिए उसी प्रकार सोपान निर्धारित हैं जैसे छत्त पर चढ़ने के लिए जीने की सीढ़ियों में सन्निहित होता है।

राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राण योग, कुण्डलिनी योग, चक्रवेधन, ज्ञान योग, भक्तियोग, कर्मयोग, ध्यानयोग आदि अनेकानेक राजमार्ग निर्धारित हैं। उनमें से प्रत्येक में आरम्भ से चलकर अन्त तक क्रमबद्ध रूप में निर्धारण अपनाने पड़ते हैं यथा राजयोग में, यम, नियम, आसन प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण ध्यान, समाधि की एक क्रमबद्ध योजना है। हठयोग में नाड़ी शोधन, नेति, धोति, वस्ति, वज्राली, कपाल आदि का प्रयोग होता है। यही बात अन्यान्य योगों के सम्बन्ध में भी है। उस समूचे विज्ञान को स्कूली कक्षाओं की तरह एक के बाद एक को अपनाया जाना चाहिए। कृषि कर्म जुताई, बुवाई, खाद, पानी, रखवाली आदि की एक क्रमबद्ध प्रक्रिया पर आधारित है।

मेले में जिसे जो अच्छा लगे वह उसे खरीद सकता है। किन्तु स्कूल में वर्णमाला, गणित आदि की उपेक्षा करके सीधे एम. ए. में दाखिला लेने का मनोरथ पूरा नहीं हो सकता। विद्यार्थी को एक एक कक्षा उत्तीर्ण करती होती है। स्कूल और मेले में यही अन्तर है। योग में स्कूली विधान लागू होने की बात हृदयंगम करनी होती है। इस क्षेत्र में मेले की तरह चाहे जहाँ से आरम्भ करने और चाहे जो खरीदने की सुविधा नहीं है। कोई साधक समाधि या ईश्वर दर्शन का प्रथम चरण मान बैठे तो यह उसकी ऐसी भूल है जिसमें निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है।

इन दिनों आसन व्यायामों को ही ‘योग’ कहा जाने लगा है। शरीर शुद्धि के लिए वे भी एक अंग हो सकते हैं। पर उन्हें योग शब्द से सम्बोधित नहीं किया जा सकता। अधिक से अधिक उन्हें ‘योगासन’ कह सकते हैं। व्यायाम का अंग संचालन का प्रयोजन दूसरे तरीकों से भी हो सकता है। उसके लिए निर्धारित आसनों के लिए हठ करना व्यर्थ है। हो सकता है कि कभी आसन पद्धति को ही सर्वोत्तम व्यायाम पद्धति माना गया हो पर अब तो हम उससे भी सरल तथा लाभप्रद दूसरे प्रकार के व्यायाम भी अपना सकते हैं।

रुपये का एक अंश पैसा भी है। सौ पैसे मिलकर एक रुपया बनता है। यह सब ठीक है। पर यह भी गलत नहीं कि पैसे का नाम रुपया नहीं दिया जाना चाहिए। इसमें अकारण भ्रम पैदा होता है। विदेशों में प्रचलित “योगा” मात्र आसन व्यायामों तक सीमित होता दिखता है।

यही बात ‘मेडीटेशन’ के सम्बन्ध में भी है। ध्यान की अनेक विधियाँ प्रचलित हैं उनसे एकाग्रता सधती है। जो हर काम में सफलता की बात जोड़ती है। बन्दूक का सही निशाना साधने वाले शिकारियों की सफलता का श्रेय उनकी एकाग्रता है। सरकस में दिखाये जाने वाले अधिकांश खेल ‘एकाग्रता’ के आधार पर ही चमत्कार दिखाते हैं। बही खाते का सही हिसाब रखने वाले एवं परीक्षा में अच्छे नम्बरों से पास होने वाले छात्रों की सफलता भी उनकी मानसिक बुद्धि पर निर्भर करती है। पर इन सबको योगी तो नहीं कह सकते। एकाग्रता एक सामान्य कौशल है जो मनुष्य को इच्छित दिशा में सफलता प्रदान करने में अच्छी भूमिका निभाता है। मस्तिष्क से काम लेने वाले हर व्यक्ति को ध्यान पूर्वक काम करना चाहिए। और उस विशिष्टता का सम्पादन करने के लिए किसी न किसी मानसिक व्यायाम का अवलम्बन करना चाहिए। इन सभी माध्यमों को ध्यान या ‘मेडीटेशन’ कहा जा सकता है। इन्हें करने वालों को उसकी उतनी ही प्रतिक्रिया का अनुमान लगाना चाहिए जितनी कि वह है। उसे योग सिद्धि की आशा से नहीं करना चाहिए।

योग की ध्यान धारणा में अन्तर्मुखी होकर अनेकानेक रहस्यमय केन्द्रों पर चित्त एकाग्र करना होता है। चित्त अर्थात् अचेतन मन। यौगिक ध्यान को विचार नियन्त्रण तक सीमित रहकर अचेतन मन की क्रिया प्रक्रिया पर अधिकार प्राप्त करना होता है। निष्ठा, प्रज्ञा और श्रद्धा को प्रदीप्त करना। यह उस ‘मेडीटेशन’ से बहुत आगे का चरण है जिसे कौतुकी लोग ध्यान शिक्षा के माध्यम से कराते हैं। किन्तु आत्मा और परमात्मा के मिलन में इस क्षमता का प्रयोग किये जाने की ओर संकेत भी नहीं करते और इसके लिए चरित्र निर्माण तथा भावनात्मक परिष्कार की आवश्यकता नहीं समझते।

प्रचलित ‘योगा’ और मेडीटेशन योग विज्ञान का एक कौतूहल परक पक्ष है। वैसा ही जैसा कि सिद्ध पुरुषों की नकल पर मदारी लोग अनोखे करतब दिखाते हुए बच्चों का मन बहलाते रहते हैं।


अहन्ता के नागपाश से जीवन मुक्ति

आत्मा की आकांक्षाओं, मान्यताओं और भावनाओं को क्रियान्वित करने का भार मन को वहन करना पड़ता है। वह कार्यान्वयन की योजना बनाकर शरीर को देता है। ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के सहारे वह उन्हें चरितार्थ करता रहता है। यही है जीवनचर्या का सामान्य क्रिया-कलाप और विधि-विधान। प्रत्यक्ष कृत्य शरीर करता है इसलिए दोष अथवा श्रेय उसी को मिलता है पर यह भुला दिया जाता है कि शरीर जड़ पंच तत्वों का बना हुआ है। उसमें न सोचने की क्षमता है करने की। रेल, मोटर, साइकिल आदि यन्त्र वाहन अपनी मर्जी से भला बुरा कुछ भी करने में असमर्थ रहते हैं। ड्राइवर ही उन्हें जहाँ-तहाँ घसीटे फिरते हैं। यही विद्या जीवन क्रम में चरितार्थ होती है।

आत्मा का परिधान अन्तःकरण है। उससे चेतना प्रभावित है। समर्थ एवं परिष्कृत आत्माएं साधना द्वारा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाल लेती है फलतः व्यक्तित्व परिष्कृत स्तर का बनता है और मनुष्य कलेवर में देवत्व की आभा झलकती है। इसके विपरीत यदि तमोगुणी असुरता अन्तराल की गहराई तक चली जाय तो प्रवृत्ति एवं आकाँक्षा अनुपयुक्त कामों में रस लेती है और फिर तद्नुकूल प्रवृत्तियों का प्रवाह बहने लगता है।

आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों में वासना, तृष्णा और अहन्ता का असामान्य, उद्धत हो उठता, अनेकानेक दोष-दुर्गुणों का सृजन करता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्सर यह छः षड् रिपु माने गये हैं। यही प्रमुख मनोविकार हैं। क्रियाओं में वही उभरते दिखते हैं, किन्तु वस्तुतः उनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है उपरोक्त तीन दुष्प्रवृत्तियों का फलितार्थ ही उन्हें समझा जाना चाहिए।

वासना और तृष्णाजन्य विकृतियों का विवरण पिछले अंकों में प्रस्तुत किया जा चुका है। अब अहन्ता पर विचार किया जाना चाहिए। यह अहंकार का दूसरा नाम है। व्यक्ति अपने आप को दूसरों की आँखों में वरिष्ठ प्रदर्शित करना चाहता है और उसके लिए अनेक तरह के सरंजाम जुटाता है। यों इसका सीधा सरल और सौम्य मार्ग है कि साधारण लोग गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से हेय जीवन जीते हैं। षड् रिपुओं के चंगुल में बुरी तरह फंसे होते हैं। फलतः चिंतन और चरित्र की दृष्टि से उनकी स्थिति नर पशु, नर पामर या नर पिशाच जैसी होती है। इन दुष्प्रवृत्तियों के क्षेत्र में कौन अग्रणी रहा इसी की प्रतिस्पर्धा उनमें चलती रहती है। इसी हेय स्तर की सफलताओं को अपनी चतुरता, कुशलता एवं सफलता के नाम से दिखाते बखानते रहते हैं। औसत आदमी की अहन्ता इसी रूप में प्रकट होती है। दुष्ट दुराचारी अपने अनीति कृत्यों को गौरव गरिमा में सम्मिलित करते हैं और छल प्रपंच की अनीति और आक्रमण की घटनाओं को अपनी विशिष्टता के रूप में देखते और दिखाते हैं।

यदि इस कुपन्थ को उलटकर सज्जनोचित शालीनता अपनाई जा सके तो वास्तविक प्रशंसा और प्रतिष्ठा का आधार बन जाती है। उतने भर से आत्म प्रतिष्ठा, आत्म गौरव एवं आत्मोत्कर्ष की स्थिति बन जाती है। लोगों का यह मिथ्या भ्रम है कि ओछे हथकंडे अपनाकर येन-केन प्रकारेण अपनी महिमा का विज्ञापन किया जा सकता है और उससे लोगों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करके अपने को वरिष्ठ सिद्ध किया जाता है। इस आधार पर प्रशंसा करने वाले दूसरे ही क्षण मुँह फेरते ही निन्दा करने में भी नहीं चूकते। सामने की चापलूसी और परदा हटते ही यथार्थता बखनाने लगती है।

फैशन सजधज, अमीरों जैसे ठाठ-बाट किसी दुर्बल पर आक्रमण किसी सज्जन को ठगना, घर में विपुल सम्पदा जमा करना, चाटुकारों का मुंह मीठा करके अपनी प्रशंसा सुनना आदि करतूतें उद्धत अहन्ता वाले लोग करते रहते हैं और उसी में अपना ढेरों, समय, श्रम, धन तथा चिन्तन गंवाते रहते हैं। इस आधार पर जो प्रदर्शनात्मक प्रपंच खड़ा किया गया था। वह क्षणिक और अवास्तविक विडम्बना खड़ा करने के अतिरिक्त और किसी काम नहीं आता।

शृंगारिक वेश विन्यास बनाने वाले, कीमती वस्त्र आभूषणों से लदने और तेल-फुलेल से महकने वाले लड़की लड़के सोचते हैं कि वह जिस राह भी निकलेंगे उधर ही दर्शक उनकी कलाकारिता, सुन्दरता एवं सम्पन्नता को सराहेंगे। पर होता उससे ठीक उलटा है। उनके चरित्र पर उंगली उठती है। दुराचार का आमन्त्रण देते फिरने वाला माना जाता है। शृंगारिकता हर किसी पर वही छाप छोड़ती है भले ही किसी अनुचित लाभ के लिए कोई मुँह सामने कुछ प्रशंसा के शब्द भले ही कह दे।

सादगी का सघन सम्बन्ध उच्च विचारों से है। गांधी, ईसा, बुद्ध जैसों के परिधान सस्ते और स्वल्प थे। ऋषि और महापुरुष भी अपनी सज्जा औसत देश वासियों से अधिक महंगी नहीं होने देते थे। यह शालीनता के परिधान हैं। इस प्रकार के आच्छादन से किसी की प्रतिष्ठा घटती नहीं वरन बढ़ती है। महंगे वस्त्र और महंगे आभूषण धारण किये फिरने वालों को स्वाँग नाटकों के प्रदर्शनकारी माना जाता है। अथवा यह कहा जाता है कि पैसे को उपयुक्त कार्य में लगाकर सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगाने की अपेक्षा मूर्खता द्वारा अपव्यय का कैसा कौतुक कौतूहल किया जा रहा है। अहन्ता का सबसे घटिया प्रदर्शन साज-सज्जा की शृंगारिकता के रूप में ही होता देखा जाता है।

समाज में फैली हुई बुराइयों में अपनी बुराई को बढ़-चढ़कर सिद्ध करने पर उस स्तर के लोग प्रशंसा करेंगे ही जेल में बन्द अपराधियों में से जो अपनी करतूतों का अधिक दिलचस्प या भयानक विवरण सुनाते हैं उनकी बात सुनकर दूसरे लोग अवाक् तो रह जाते हैं, पर कभी अवसर पड़ने पर उनका साथ देने के लिए भूलकर भी तैयार नहीं होते। सोचते हैं ऐसे लोग किसी की भी हजामत बना सकते हैं। इनका कोई सगा सम्बन्धी नहीं होता। वो जिसके साथ मित्रता जोड़ते हैं पहले उसी को हलाल करते हैं।

दुष्कर्मों में दिखाई गई धूर्तता या निष्ठुरता किसी के लिए गौरव या प्रतिष्ठा की बात नहीं हो सकती। ऐसे लोगों पर दसों दिशाओं से घृणा और भर्त्सना बरसती है। रंडी भंडुए आपस में मीठी बातें करते हैं और आदान प्रदान भी किन्तु दोनों में से कोई किसी का मित्र नहीं होता। मौका पड़ने पर उन्हें मुँह मोड़ने में ही नहीं, घात मारने में भी देर नहीं लगती है। दुर्जनों का संसार भर में न कोई प्रशंसक होता है और न सहयोगी। सज्जनता अपनाने वालों की मुंह आगे प्रशंसा भले ही न हो, भीतर से हर व्यक्ति उनके लिए श्रद्धा रखता है और साथ ही सहयोग की भावना भी। यह किसी प्रकार कम महत्व की उपलब्धियाँ नहीं हैं। महापुरुष सामान्य स्थिति से ऊंचा उठकर महान पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं इसमें सज्जनता के आधार पर उपलब्ध हुआ सम्मान और सहयोग ही प्रधान कारण होता है।

अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने, शेखी बघारने को आत्मश्लाघा ग्रस्त मनोरोगी माना जाता है। सज्जनों का सुनिश्चित गुण है नम्रता और विनयशीलता। उनकी सादगी देखते ही बनती है। महामना मालवीय जी को भारत सरकार ने “सर” की उपाधि दे रखी थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद ‘डाक्टरेट’ स्वीकार करने के लिए आमन्त्रित किया। पण्डित महासभा ने उन्हें पण्डित शिरोमणि की उपाधि दी थी। इन तीनों पदवियों को उनने अस्वीकृत कर दिया और कहा मेरे पिताजी ‘पण्डित’ की परंपरागत उपाधि दे गये है उसका निर्वाह ही मुझे अत्यधिक भारी प्रतीत होता है फिर और उपाधियों से लद कर उन्हें वहन कर सकना मेरे लिए कैसे सम्भव होगा। यह नम्रता का एक उदाहरण है। इस कारण मालवीय जी की गरिमा घटी नहीं, बढ़ी ही। सूर, तुलसी,मीरा कबीर जैसे सन्त अपना परिचय सामान्य लोगों की पंक्ति में ही खड़ा होकर देते रहे हैं। यदि उनने बड़प्पन की प्रशंसात्मक डींगें हाँकी होती तो निश्चित रूप से वे विज्ञजनों की दृष्टि में गये गुजरे समझे गये होते।

मनुष्य के लिए यह क्या कम गौरव की बात है कि वह परमेश्वर का युवराज है। इस पदवी को सार्थक बनाने के लिए उसे अपना व्यक्तित्व और कर्तृत्व ऐसा बनाना चाहिए जो उस गरिमा के अनुरूप हो। इसके लिए उसे अपनी निजी पवित्रता और प्रखरता उच्च स्तर की विनिर्मित करनी चाहिए। निजी अभिलाषाओं को इतना कम करना चाहिए कि उसे अपरिग्रही ब्राह्मण कहा जा सके। ब्राह्मण को भगवान भी अपेक्षाकृत अधिक प्यार करते हैं और चारों वर्णों में उसकी श्रेष्ठता मानी गई है। इसका एक ही कारण है कि उसका निजी निर्वाह अति सामान्य होता है और अभिमान इतना गलित होता है कि भिक्षा माँगने में भी अवमानना अनुभव न करे यह नम्रता की चरम सीमा है। फलों से लदे हुए वृक्ष की हर डाली नीचे झुक जाती है।

आत्म गौरव की अनुभूति और लोक प्रतिष्ठा की प्राप्ति का एक ही मार्ग है- पुण्य परोपकार में रसानुभूति और लोक सेवा में निरन्तर प्रवृत्ति। जो इस मार्ग को अपनाते हैं वे हर घड़ी अपनी और दूसरों की दृष्टि में गौरव गरिमा से भरे-पूरे माने जाते हैं। इसके बिना अन्य पगडण्डियाँ ढूंढ़ने वाले काँटों में उलझते और भटकाव में फंसते हैं।

सूरज, चन्द्रमा निस्वार्थ भाव से प्रकाश वितरण के लिए निरन्तर भ्रमण करते हैं। बादलों के लिए एक ही काम है समुद्र से पानी लाना और सूखे भूखण्डों में शीतलता एवं हरीतिमा उगाना। वृक्ष दूसरों के लिए फलते हैं। पवन दूसरों के लिए चलता और अग्नि दूसरों के लिए जलता है। यह श्रेष्ठतम युक्त कर्तृत्व ही उन्हें भरपूर सम्मान प्रदान करता है। इससे बढ़कर अहन्ता की पूर्ति और क्या हो सकती है। मनुष्य को भगवान के विश्व उद्यान का माली बनाकर भेजा गया है और दायित्व सौंपा गया है कि वह सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में तन्मयता और तत्परता के साथ लगा रहे। यह लगन जिनकी जितनी बढ़ी-चढ़ी होगी उसकी अहन्ता उतनी ही विगलित होती जायगी। इस आधार पर भार मुक्त हुई आत्मा इसी शरीर के रहते जीवन मुक्त का आनन्द उपलब्ध करेगी।


तीन पहाड़ (kahani)

तीन पहाड़ थे। तीनों में बहुत दूरी न थी। देवताओं का आगमन उधर हुआ। उनकी स्थिति और इच्छा पूछी और सहायता करने का आश्वासन दिया।

सबसे ऊंचे पहाड़ ने कहा- ‘‘उसे और ऊंचा उठा दिया जाय ताकि वह दूर दूर से लोगों को दिखने लगे।”

दूसरे ने कहा- ‘‘उसे हरा भरा बना दिया जाय ताकि साधकों को आश्रय और लाभ मिले।”

तीसरे ने कहा- ‘‘उसकी निरर्थक ऊंचाई समाप्त करके समतल खेत बना दिया जाय।”

देवताओं ने तीनों की इच्छा पूरी कर दी। उन वरदानों से किसे क्या लाभ मिला, इसकी खोज खबर लेने वालों ने बताया कि अधिक ऊंचा उठ जाने के उपरान्त बड़े पहाड़ को अधिक सर्दी-गर्मी सहनी पड़ती है। हवाएं टकराती हैं और कड़कती बिजली के आघात उसी को सहने पड़ते थे। मध्यवर्ती पहाड़ की शोभा तो बढ़ी पर ऊंचाई अधिक रहने के कारण लोग वहाँ तक पहुँच न सके और बढ़े हुए वन्य पशुओं के उपद्रवों से आये दिन अनुपयुक्त दृश्य दिखने लगे।सबसे नफे में वह रहा जिसने ऊंचाई का झंझट छोड़कर स्वयं को समतल बना लिया था। लहलहाती फसलों और फल-फूलों से लदी उस घाटी के सहारे अनेकों की अन्नपूर्णा चल रही हैं। खेत का महत्व, गौरव और मूल्य पहाड़ों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया था।


कबीर दास जी का रहस्यवाद

सन्त कबीर अपनी उलटवांसियों में साधारण सी किन्तु अलंकारिक भाषा के माध्यम से ऐसा तत्व दर्शन प्रस्तुत कर गए हैं जो जीवन के विभिन्न पक्षों को छूता एवं मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है। यह शैली अध्यात्म क्षेत्र में और कहीं देखने में नहीं आती। कुछ की झलक यहाँ है।

एक अचम्भा देखा रे भाई, ठाड़ा सिंह चरावै गाई। पहले पूत पीछे भई माई, चेला के गुरु लगै पाई॥

जल की मछली तरूवर व्याई, पकड़ि बिलाई मुर्गा खाई॥ बैलहि डारि गूति घर लाई, कुत्ता कूलै गई विलाई॥

शब्दार्थ- कबीरदास कहते हैं- मैंने एक अचम्भा देखा। सिंह खड़ा-खड़ा गाय चरा था। पहले पुत्र जन्मा, बाद में माता ने जन्म लिया। गुरु चेला के पैर लग रहा था। जल में रहने वाली मछली ने पेड़ पर प्रसव किया। मुर्गा ने बिल्ली को पकड़कर खा लिया। बैल को पटककर मुनि घर लाया। कुत्ते के साथ बिल्ली प्रणय कर रही थी। माँस फैला हुआ था और उसकी रखवाली चील कर रही थी।

तात्पर्य- स्वभाव संस्कार एक प्रकार का सिंह है। बुरी आदतों का अभ्यस्त हो जाने पर सब कुछ चीर-फाड़ कर रख देता है, पर यदि उसे साध लिया जाय तो गाय चरा लेने जैसा भोलापन भी प्रदर्शित करता है। फिर हानि के स्थान पर लाभ ही लाभ करता है।

आत्मा माता है और मन पुत्र। पर आत्मबोध मन को सुसंस्कृत बनाने के बाद होता है। इस प्रकार पुत्र पहले जन्मा और माता पीछे। आत्म ज्ञान गुरु है और संसार ज्ञान चेला। संसार ज्ञान के उपरान्त आत्म ज्ञान होता है। इस प्रकार चेला का पैर गुरु नमन करता है। बुद्धि मछली है। यह जब ब्रह्मलोक में प्रवेश करती है तो उपयोगी अण्डे देती है। मुर्गा वैराग्य है और बिलाई माया। इस प्रकार मुर्गा बिलाई को खा जाता है। बैल आलसी मन है, इसे साधक कन्धे पर डालकर ले जाता है संस्कार कुत्ता है और तप तितीक्षा बिल्ली। साधना का प्रताप देखिये, दोनों शत्रुता छोड़कर मित्रता साधते हैं।

धरति उलटि आकासहि जाई। चिउटी के मुख हस्ति समाई॥

बिन पौने जहं परबत उड़ै। जीव जन्तु सब बिरछा बुड़ै॥

सुखे सरवर उठै हिलोर। बिन जल चकबा करै किलोल॥ -कबीरदास

शब्दार्थ- धरती उलटकर आकाश को चली, चींटी के मुँह में हाथी समा गया, हवा के बिना ही पर्वत उड़ने लगा, जीव जन्तु सब वृक्ष में बूड़ने लगे। सूखे सरोवर में हिलोरें उठने लगीं, चकवा बिना पानी के ही कलोल करने लगा।

तात्पर्य- माया मोह ग्रसित जीवन में जो कर्म व्यवहार होते हैं वे साधनारत जीवन में एकदम उलट जाते हैं। दृश्य जगत अदृश्य जगत में समा जाता है। यह संसार हाथी है, आत्मा जब जागृत होती है तो उसमें सारा संसार विलीन हो जाता है। पर्वत जैसा दिखने वाला माया मोह बिना प्रयास के ही, बिना हवा के ही गायब हो जाता है।

जमीन में छेद करके अधोगति को जाने वाले गुण कर्म स्वभाव आत्मा के आनन्द रूपी वृक्ष में डूबने लगते हैं। यह भौतिक जीवन मायाग्रस्त, नीरस और दुःख दरिद्र से भरा है तो उसी सूखे सरोवर में अन्तःकरण आनन्द की हिलोरें लेने लगता है। चित्त रूपी चकवा को जब आत्मज्ञान का अमृत मिल जाता है तो वह कलोल करने लगता है।


काश हम दिशा बदल सकें

क्या मनुष्य ने नीचता और नृशंसता ही सीखी है। क्या उसका पराक्रम स्वार्थपरता और विनाश विग्रह के लिए ही है? यह बातें तभी सच मालूम पड़ती है जब भूतकाल में हुए इस प्रकार के उदाहरणों की खोज करते हैं। खोजने में क्या नहीं मिल जाता? यहाँ जमीन में साँप, बिच्छू, काँतर और कानखजूरे ही भरे पड़े हैं? इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक ही नहीं नकारात्मक भी मिलता है यदि ऐसे ही घिनौने जन्तुओं से धरती भरी पड़ी होती तो यहाँ कृषि उद्यान किस प्रकार उगा पाते? और बहुमूल्य खनिजों की सम्पदा कहाँ से उपलब्ध होती? यदि दुष्ट दुराचारी ही इस संसार में भरे होते तो ऋषि तपस्वियों और वीर बलिदानियों की कथा गाथाऐं हमें सुनने को कहाँ से मिलतीं। यह सही है कि कभी कंस, रावण, जरासंध जैसे भी यहाँ उत्पन्न हुए और अनाचारों की भरमार करते रहे हैं। पर जनक, हरिश्चन्द्र, अश्वपति, भागीरथ जैसे राजवंशी भी इसी वसुधा को गौरवान्वित करते रहे हैं।

भविष्य को अन्धकारमय देखने के लिए विज्ञान के सिर पर अनेक दोष मढ़े जा सकते हैं पर शल्य चिकित्सा जैसे अनुसन्धानों में मृत प्राणों को जीवन भी उसी आधार पर मिला है। संचार और परिवहन के- सिंचाई और मुद्रण की अनेक उपयोगी धाराएं भी उसी के माध्यम से हस्तगत हुई हैं। भविष्य को अन्धकारमय देखने के लिए अनेकों कारण और प्रमाण दृष्टिगोचर होते हैं किन्तु सृजन और सहयोग के सभी आधार नष्ट हो गये हों सो बात भी नहीं है।

मनुष्य जाति ज्वार भाटों की अभ्यस्त है। उसे ढेरों समय अन्धकार में गंवाना पड़ता है, पर सदा रात्रि ही नहीं होती। सूरज, चन्द्रमा का प्रकाश हमारी कार्य पद्धति को समुन्नत बनाने के लिए कारगर भी होता है। इतिहास में विनाश के दुर्दिनों की ही भरमार नहीं दिखती, वरन् ऐसा भी होता रहा है कि उपयोगी कठिन कार्य भी मनुष्य ने ही कर दिखाये हैं। स्वयं से धरती पर गंगा उतरने, समुद्र छलाँगने, गोवर्धन उठाने जैसे मिशन दूसरी घटनाओं के रूप में इस प्रकार भी प्रस्तुत हुए हैं कि मनुष्य की अपार सामर्थ्य और सूझ-बूझ का परिचय भी प्राप्त किया जा सकता है।

स्वेज और पनामा की नहरें मनुष्य की अनोखी पुरुषार्थ परायणता है। थल में जल भर देने के प्रयासों में कितनी जन शक्ति, कितनी धन शक्ति एवं कितनी कार्य कुशलता का नियोजन हुआ है और उनके कारण संसार को कितनी सुविधाओं का लाभ मिला है, इसे हम सहज ही देख सकते हैं। चीन की दीवार और मिश्र के पिरामिड, मनुष्य की बुद्धिमता और असाधारण सूझ-बूझ को कार्यान्वित कर दिखाने के प्रमाण हैं। मनुष्य जब सृजन की दिशा में सोचता है तो उसे इतना अद्भुत सोचने और विकट पराक्रम प्रदर्शित करते हुए देखा जाता है जिसके कारण कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़े। जलचरों की तरह समुद्र में किलोल करने और पक्षियों की तरह आकाश में स्वच्छन्द विचरते मनुष्य को देखते हैं तो यह विश्वास करते नहीं बनता कि उसे मात्र विनाश ही विनाश आता है वह इस धरित्री को नरक बनाने के लिए ही उत्पन्न हुआ है उसने हत्या की कला में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए युद्ध कौशल भर सीखा है। वह अनादि काल से सृजन भी सोचता रहा है और विश्वास करना चाहिए कि उसकी इस सृजन क्षमता का सर्वथा समापन ही नहीं होने जा रहा। उसने श्रम और सहयोग की विशिष्टता को सर्वथा भुला दिया है।

बहुत लम्बा समय नहीं हुआ। नीदरलैण्ड ने समुद्र को पीछे धकेलते-धकेलते उससे 2,05,000 हैक्टर जमीन हथिया ली और अपने देश का क्षेत्रफल 8 प्रतिशत बढ़ा लिया। इस भूमि पर प्रायः ढाई लाख लोग न केवल रहते वरन् खेती-बाड़ी, व्यवसाय, उद्यान, निवास आदि के साधन खड़े कर लिये हैं।

यह कार्य अनायास ही नहीं हो गया। उसके लिए उन्हें उस समुद्र से लड़ना पड़ा। जिसने 1916 में प्रलयंकर बाढ़ बनकर एमस्टरडम का सारा उत्तरी इलाका उदरस्थ कर लिया था और खारा पानी भरकर उस भूमि को बेकार बना दिया था। इस प्रकार मात खाते रहने की अपेक्षा उस देश के निवासियों ने निश्चय किया कि समुद्र को मजा चखना चाहिए। तब कोई अगस्त मुनि तीन चुल्लू में सागर सोखने नहीं आये और न किसी लक्ष्मण ने धनुष बाण उठाकर उसे क्षमा माँगने के लिए बाधित किया। वरन् मनुष्य का कौशल ही आगे आया जिसका कर्तृत्व देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। जूडर की खाड़ी में 15 से 50 किलोमीटर की चौड़ाई में प्रायः 130 किलोमीटर धंस कर असाधारण बाँध बांधा गया। यह समुद्र तल से 6 मीटर ऊंचा है। इसकी नींव 180 मीटर चौड़ी है। बांध बनाते समय सन् 1916 से 1920 तक समुद्र के साथ आँख मिचौनी खेलनी पड़ी जैसे ही भाटा पीछे हटता बजरी, सीमेन्ट आदि का इतनी मुस्तैदी से वजन डाला जाता कि जब तक ज्वार वापस लौटे तब तक डाला हुआ मसाला पत्थर जैसी मजबूती पकड़ ले। मिलिक, इंजीनियर, नाविक एक मुस्तैद सेना की तरह छापा मारते और समुद्री उछालों की कमर तोड़ देते। यह प्रयास बिना नागा पूरे 4 वर्ष तक चला और वह प्रयोजन सिद्ध हो गया जिसकी योजना बनाने वालों को स्वप्नदर्शी कहा जाता था। इस टकराव में प्रायः आधा श्रम आधा मसाला समुद्र ने बर्बाद कर दिया तो भी अन्ततः उसे हार ही माननी पड़ी। सन् 1920 में बांध बनकर तैयार हो गया। उसका सिरा इतना चौड़ा और इतना मजबूत है कि उस पर ट्रकों, बसों, और कारों की निरन्तर धमा-चौकड़ी मची रहती है।

इस निर्माण कार्य में जो साधन, उपकरण एवं धन जन का भारी प्रबन्ध करना पड़ा उसे उस छोटे से देश के निवासियों ने किस प्रकार जुटाया होगा और बीच-बीच में आने वाली निराशाजनक कठिनाइयों का किस प्रकार सामना किया होगा। इसका सुविस्तृत विवरण पढ़ने पर पता चलता है कि मनुष्य की सृजनात्मक भक्ति भी कितनी प्रचण्ड है आवश्यकता उसे नियोजित करने भर की है।

संसार में अभावों की शिकायत बहुत की जाती है। जनसंख्या की तुलना में जमीन कम पड़ने की बात भी कही जाती है। पर कभी सृजन के क्षेत्रों पर दृष्टि नहीं जाती। अफ्रीका का इतना बड़ा क्षेत्र वीरान पड़ा है जिसे सहयोगपूर्वक समुन्नत किया जाय तो न केवल उस देश के निवासियों को भारत जैसे एक समूचे देश का उसमें अभिनव निर्वाह हो सकता है। ब्रह्मपुत्र के प्रभाव से बने हुए दलदलों को यदि पर्वतीय चूरे से पाटा जा सके तो एक नया वर्मा बस सकने जितनी भूमि हस्तगत हो सकती है।

पारस्परिक भय और अविश्वास यदि बड़े देश अपने मन से निकाल सकें और मिल-जुलकर प्रस्तुत शक्तियों को विकास कार्यों में लगा सकें तो पिछड़ी हुई और दरिद्र दुर्बल दुनियाँ उतनी ही समृद्ध दृष्टिगोचर हो सकती है जैसी कि आज जापान जर्मनी आदि दृष्टिगोचर होते हैं।

अन्तरिक्षीय कार्यक्रम का उद्देश्य अगले दिनों आकाश को कुरुक्षेत्र बनाना और प्रतिद्वन्द्वियों को भूनकर खाक बना देना है। यदि यह इरादे बदले जा सकें और युद्ध आयुधों में लगने वाली राशि एवं कुशलता को जन साधारण की कठिनाइयों से उबारने में लगाया जा सके तो एक पंच वर्षीय हो जाने में न केवल आर्थिक समस्याओं का समाधान हो सकता है वरन् प्रगति के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है उन्हें जुटा सकना नितान्त सरल हो सकता है।

बात दिशा बदलने भर की है विश्व विजय की महत्वाकाँक्षाओं को विश्व निर्माण के लिए नियोजित किया जा सके तो सर्वत्र उतनी खुशहाली उत्पन्न हो सकती है जिसके आधार पर सभी बिना किसी टकराव के जीवनोपयोगी समस्त साधन प्राप्त कर सकें और उन्हें मिल बाँटकर खाते हुए हंसती-हंसाती जिन्दगी जी सकें। इस दिशा परिवर्तन में उतना जोखिम नहीं है जितना कि विनाश पर उतारू मनःस्थिति में अपनी प्रतिपक्षी में तथा अगणित निर्दोषों की न पूरी हो सकने वाली क्षति की सम्भावना है।

आज सबसे बड़ी आवश्यकता मानवी चिन्तन की दिशा बदलने की है। विद्वता, बुद्धिमत्ता की कहीं कमी नहीं। सफलता के एक से एक बड़े कीर्तिमान प्रस्तुत करने वालों की सामर्थ्य और प्रतिभा की कम नहीं आँकी जा सकती। वैभव भी कम नहीं। जितना धन सरकारों के सम्पन्नों के पास है वह इसके लिए पर्याप्त है कि संसार के दो तिहाई वनमानुषों और पिछड़ों को उनकी स्थिति से उबार कर देवोपम न बन पड़े तो भी बुद्धिमान मनुष्यों की तरह सुविधा सम्पन्न जीवन तो जी ही सकते हैं।

जिस परिवर्तन को लाने की आज महती आवश्यकता अनुभव की जा रही है उसे उपलब्ध करने का राजमार्ग एक ही है कि मनुष्य आपा-धापी और छीन-झपट का विचार छोड़कर मिल-जुलकर रहने और सहयोगपूर्वक आगे बढ़ने का मन बनाये और उसी के लिए योजनाबद्ध कदम उठाये।

मनुष्य के पास न साधनों की कमी है न सूझ-बूझ की। उसका सहयोगपूर्ण पराक्रम यदि सृजन की दिशा में नियोजित हो सके तो कोई कारण नहीं कि सर्वत्र संव्याप्त चिन्ता, आशंका, उद्विग्नता, से छुटकारा न मिल सके। स्नेह सहयोग की प्रवृत्ति अपनाई जा सके और जो अभाव इन दिनों खलते हैं उन्हें पूरा करने के लिए नीदरलैण्ड निवासियों जैसा संकल्प किया जा सके तो हर क्षेत्र में हर स्तर की चमत्कारी प्रगति का आश्चर्य देखा जा सकता है।


अभिमान के नशे में चूर (kahani)

सिकन्दर जिस देश पर आक्रमण करने की तैयारी में था, उसी देश का राजा जब अपने सामने उपस्थित देखा तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसने सोचा कि यह हमारे सैन्यबल से भयभीत हो आत्म समर्पण हेतु आया है। अतः वह गर्व से फूल उठा। पर बातों ही बातों में उसने सिकन्दर से कहा- ‘‘कृपया यह तो बताइये कि हमने आपका कोई अपकार तो किया नहीं, फिर हमारे राज्य पर आक्रमण की तैयारी कैसे कर दी?”

अभिमान के नशे में चूर सिकन्दर बोला- ‘‘तुम तो कायरों की तरह बातें करते हो, जाओ अब तुम्हारे राज्य पर आक्रमण नहीं करेंगे पर कम से कम सात वर्ष तक तुम्हें कर देना होगा।”

“आप जैसे ऐश्वर्यशाली राजा के लिए थोड़े से कर की शर्त शोभा नहीं देती। फिर इतनी कम धनराशि से आपका क्या बनता बिगड़ता है? क्या ही अच्छा हो कि हम दोनों मित्रता कर लें और अपनी प्रजा को सुख-शान्तिमय जीवन व्यतीत करने दें।” राजा ने सिकन्दर को समझाते हुए कहा।

सिकन्दर, राजा की बात मान गया। अन्त में राजा ने सिकन्दर को अपनी सम्पूर्ण सेना सहित राज्य में प्रीति-भोज हेतु आमन्त्रित किया। निश्चित समय सिकन्दर सारी सेना सहित पहुँच गया। स्वागत के लिए वहाँ राजा, मंत्रीगण और समस्त सशस्त्र सैनिक उपस्थित थे। सिकन्दर ने अपनी सेना को चारों ओर से घिरा देखा तो काँप उठा। उसे मित्रता के बीच विश्वासघात की गन्ध आने लगी।

राजा ने बड़े प्रेम से अतिथियों को स्वागत करते हुए कहा- ‘‘सिकन्दर! मैं सेना की छोटी-सी टुकड़ी को लेकर आप सबका स्वागत करने आया था। वैभवशाली सम्राट का स्वागत भी तो उसी स्तर का होना चाहिए था। शायद आपको यह शंका है कि मैंने सैन्य दुर्बलता के कारण आपसे मैत्री की, पर इस विचार को आप भूल जाइये। मुझे व्यर्थ में ही लोगों का खून बहाना पसन्द नहीं है और न अब ही मैं युद्ध की इच्छा से यहाँ उपस्थित हुआ हूं। हम सब आपकी अगवानी करने आये हैं। हमारा विश्वास शान्ति और प्रेम में है, घृणा और युद्ध में नहीं।” इतना सुनकर सिकन्दर का सिर लज्जा से झुक गया।


आत्मदेव परामर्श नहीं मानता

भागवत् माहात्म्य में एक कथा है, आत्मदेव नामक ब्राह्मण की। कथा लौकिक और आध्यात्मिक दोनों अर्थों में प्रेरक है।

ब्राह्मण ‘आत्मदेव’ तुँगभद्रा नदी के किनारे रहता था। साथ रहती थी पत्नी नाम था ‘धुँधली’। आत्मदेव निर्मल स्वभाव के थे, घर में खाने-पीने की ठीक व्यवस्था थी। परन्तु पत्नी क्रूर झगड़ालू स्वभाव की थी। उनकी सन्तान भी नहीं थी। इसलिए दुःखी रहते थे।

एक बार जंगल में नदी के किनारे एक सन्त मिले। आत्मदेव ने अपना दुःख प्रकट किया। कहा पुत्र हीन, कर्कश पत्नी, इन कारणों से दुःखी आत्महत्या करने का मन होता है। आप कृपा करें तो ही जीवन में रस आ सकता है।

सन्त ने कहा- अनेक सत्पुरुषों की पत्नियाँ कर्कश हुईं हैं। उससे उन्होंने घर से मोहमुक्ति पायी और ईश कार्य में लगे। तुम भी ऐसा ही करो। पुत्र न होता तो ईश कार्य करने वाले के लिए वरदान होता है। पुत्र तो दुःख रूप भी सिद्ध होते हैं, ईश कार्य तो सदैव कल्याणकारी है। तुम उसी ओर ध्यान लगाओ।

आत्मदेव की समझ में बात नहीं आयी। वह अपने पक्ष में तर्क देते हुए बोले “अपुत्रस्य गतिर्नास्ति” अपुत्री की सद्गति नहीं होती। मुझे सद्गति के लिए पुत्र चाहिए।

सन्त ने समझाया भागवत् शास्त्र में यह भी लिखा हैं कि पुत्र से सद्गति नहीं मिलती। पुत्र तो लगभग सभी के होते हैं। पुत्र से सद्गति मिलती होती तो सभी को सद्गति मिल जाती। परन्तु ऐसा होता नहीं है। पुत्र द्वारा श्राद्ध पिण्डदान से सद्गति की कामना करने वाला पिता हीन माना गया है। सद्गति तो केवल सत्कर्मों से मिलती है। असली श्राद्ध श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म है। पिण्ड शरीर को कहा गया है। अपना शरीर ईश्वरार्पण कर देना, उसी के काम में पूरी तरह लगा देना वास्तविक पिण्डदान है। इसलिए तुम सद्गति के लिए पुत्र की कामना छोड़कर सत्कर्मों की कामना करो।

परन्तु ब्राह्मण आत्मदेव नहीं माना, किसी भी तरह पुत्र पाने के लिए अड़ गया। सन्त ने उसे एक फल दिया कहा अपनी पत्नी को यह श्रद्धापूर्वक सेवन करा देना। उसके समय पर सन्तान उत्पन्न होगी। ब्राह्मण फल लेकर घर गया, पत्नी को दिया। दुष्टा पत्नी श्रद्धा के स्थान पर कुतर्क गढ़ने लगी। गर्भधारण के कष्ट से भयभीत होने लगी। उसकी छोटी बहिन गर्भवती थी। उसने सुझाया “दीदी तुम गर्भधारण का नाटक करो, मेरा बच्चा अपना बच्चा बतलाकर छुट्टी पा लेना।”

धुँधली को यह सलाह जंच गयी। फल गऊ को खिला दिया। बहन के घर प्रसव के लिए गयी। उसका बच्चा अपना बच्चा कहकर लौट आयी। आत्मदेव प्रसन्न हुआ। धुँधली ने अपने पुत्र का नाम रखा धुँधकारी। बालक पहले तो प्यारा लगा पर ज्यों-ज्यों बढ़ा उसके कुसंस्कारों से सब तंग होने लगे। वह मनमानी करने लगा रोकने पर माता को पीटने लगा। अब आत्मदेव को लगा कि इससे तो निपुत्री ही भले थे।

उधर सन्त के फल के प्रभाव से गऊ के गर्भ से गौकर्ण हुए। वे विद्वान सुसंस्कारी निकले। उन्होंने पिता आत्मदेव को घर का मोह छोड़कर तपस्वी जीवन जीने की सलाह दी। उससे उन्हें शान्ति मिली। धुँधकारी अपने कुकृत्यों से जल्दी मरा और प्रेत योनि में जा पड़ा। गौ कर्ण ने उसे भगवत् चरित्र सुनाकर उसके कुसंस्कार छुड़ाये तब वह मुक्त हुआ।

यह लौकिक अर्थ हुआ। आध्यात्मिक अर्थ हर व्यक्ति पर लागू होता है। आत्मदेव मनुष्य के अन्दर आत्म चेतना जीव है। उसकी पत्नी है धुँधली, अर्थात् अविकसित बुद्धि जिसे धुँधला दिखता है। वह लौकिक कामना करता है, सन्त का परामर्श नहीं मानता। इसलिए दुःख को न्योता देता है। धुँधली बुद्धि सन्त का सत्परामर्श कैसे स्वीकार करती। उसे तो छोटी बहन ‘स्वार्थ बुद्धि’ का प्रस्ताव अच्छा लगा। तप से बचो, पर पुत्र का लाभ लो।

कुसंस्कारी पुत्र धुंधकारी ‘स्वार्थ बुद्धि द्वारा पैदा स्वार्थी स्वभाव है। अहंकार उसका मुख्य गुण है। वह मनमानी करता है, बुद्धि और जीव को भी सताता और पीटता है। सब नर्क का कष्ट पाते हैं। पर सन्त के प्रसाद के प्रभाव से गो ‘इन्द्रियों के सुसंस्कार जो सत्कर्मरत हैं वे सहायता करते हैं। आत्मदेव को वैराग्य और धुंधकारी को निरहंकारिता सरलता का संस्कार देकर उन्हें कष्ट से छुड़ाता है।

आत्मदेव स्वयं निर्मल हैं, पर सन्त का परामर्श नहीं मानता। धुँधली को अपने प्रभाव से निर्मल नहीं बनाता स्वयं उसके चक्कर में फंस जाता है। जो अन्त में दुःख से त्रस्त होकर किया, वह पहले सन्त के सद्-परामर्श से करता व धुँधली को सुसंस्कार दे पाता तो दुःख के चक्र में लम्बे समय तक क्यों पिसता?


संकल्प बल और स्वस्थता

सभी रोग भावना से सम्बन्धित नहीं होते। कुछ ऐसे शारीरिक कष्ट होते हैं जिन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से दूर किये बिना भी उनसे उत्पन्न तकलीफों से छुटकारा पाया जा सकता है।

एक फ्राँसीसी प्रौढ़ जो कि काफी हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ था, चालीस की अवस्था में ‘आक्राइटीस’ रोग से आक्रान्त हो गया। कुछ दिनों तक इसके ग्रस्त रहने के उपरान्त असीम पीड़ा शुरू हुई, लेकिन कुछ ही दिनों में वह दौर समाप्त हो गया और वह विक्रेता के रूप में यात्रा पर निकल पड़ा।

अन्तः में उसे घड़ी का सहारा लेना पड़ा। पैर और उंगलियों के जोड़ो में भयंकर गाँठें पड़ गईं। एक यात्रा में उसकी पत्नी भी उसके साथ थी। उसकी हालत बहुत ही दयनीय थी। आज वह गलियों में लड़खड़ाता हुआ चल रहा था तथा चलने में अपनी असमर्थता जाहिर का रहा था।

तभी अचानक एक नवयुवक उनके सामने से गुजरा। वह काफी प्रसन्न था तथा सीटी बजाते हुए जा रहा था। उसके हाथ नहीं थे। उनकी जगह उन्होंने हुक लगा रखा था। महिला ने अपने पति का उस ओर ध्यान आकर्षित किया। उसे देखकर उनके दिमाग में एक ऐसे युवक का चित्र उभरा जिसके समक्ष अपना सारा का सारा जीवन अभी भी पड़ा हुआ हो, जिनके हाथों को काट दिया गया हो और उनकी जगह हुक लगे हों। फिर भी वह खुश हो।

युवक को अति प्रसन्न देखकर उस व्यक्ति ने भी दृढ़ संकल्प लिया कि मैं भी अब किसी से कोई शिकायत नहीं करूंगा। इसके बाद उसे अनेक प्रकार की बीमारियाँ हुईं। उसका यकृत बढ़ गया। उसने अपनी नेत्र ज्योति खो डाली, उंगलियां इतनी मुड़ गईं कि बटन लगाना भी दूभर हो गया। फिर भी उसके मुँह से आह तक नहीं निकली।

अब वह काफी खुश था मनोबल उसका दृढ़ था। हालाँकि उसकी शारीरिक समस्याओं का निदान नहीं हो पाया था। उसकी मुड़ी उंगलियाँ पूर्ववत् थीं। यकृत अभी भी बढ़ा हुआ था, लेकिन उसने उन सभी समस्याओं का हल ढूंढ़ निकाला था।

जिन्हें ईश्वर पर विश्वास होता है वे समस्याओं के रहते हुए भी उनकी तकलीफों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं।

इस रोगी ने ऋणात्मक विचारणाओं को अपने से बिल्कुल निकाल दिया। अतः आक्राइटीस रोग यद्यपि रहा अवश्य पर उसके लिए वैसा कष्ट साध्य नहीं रहा।

दृढ़-संकल्प और विधेयात्मक कथन भी स्वास्थ्य पर चमत्कारिक असर डालते हैं। यदि प्रतिदिन स्वास्थ्य के प्रति दृढ़तापूर्वक विधेयात्मक कथन यथा- ‘‘मैं निरोग हूँ, स्वस्थ हूँ। कभी भी रोगी नहीं बनूँगा।” आदि आदि कहा जाय तो बहिरंगों एवं अन्तरंगों पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है और सचमुच व्यक्ति आजीवन स्वस्थ बना रहता है। इसके विपरीत यदि निषेधात्मक कथन कहा जाय तो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ग्रन्थियाँ एवं अन्य अंतरंग स्वाभाविक रूप से अपना काम नहीं कर पाते। फलतः शारीरिक विकार उत्पन्न होने लगता है।

“सायकोसोमैटिक मेडिसिन अकादमी” के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं फिजीसियन, अल्फ्रेड जे. केन्टर ने यहाँ तक सचेत किया है कि हमें स्वास्थ्य के प्रति अर्ध-धनात्मक कथन भी नहीं कहना चाहिए। यथा- ‘‘मैं आज बीमार नहीं पड़ूंगा।” इसके बदले हमें पूर्ण धनात्मक कथन का प्रयोग करना चाहिए, जैसे मैं आज अच्छा हो जाऊंगा।”

डा. केन्टर का कहना है कि ये सभी वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं। यदि ऐसे दृढ़-संकल्प को अपनाकर अपने दैनिक जीवन में उसे व्यवहार में लाया जाय तो सेहत अच्छी हो जायेगी। जीवन-अवधि बढ़ जायेगी, स्फूर्ति और ताजगी का आभास होगा, खुशहाली बढ़ जायेगी एवं मानव जीवन का सबसे बड़ा उपहार- ‘शान्ति’ मिलेगी।

एक व्यक्ति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। जब उसका शव परीक्षण किया गया तो उसमें बहुत तरह की शिकायतें पायी गईं। उसके दिल और वृक्क खराब थे। टी. बी. और अल्सर से भी वह ग्रस्त था। इतना सब होने के बावजूद भी वह 84 वर्ष की आयु में पहुँच चुका था। उसके बारे में डाक्टरों का कहना था कि इसे 30 वर्ष पहले मर जाना चाहिए था। उसकी उत्तरजीविता के राज के बारे में जब उसकी पत्नी से पूछताछ की गई तो उसने बताया कि वे हमेशा इस बात पर दृढ़ रहते थे कि “हमारा आने वाला कल बहुत अच्छा होगा।”

इस प्रकार संकल्प-शक्ति के द्वारा रोगों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है एवं दीर्घायु बना जा सकता है। अच्छी भावना, संकल्प, एवं व्यवहार को अपने दैनिक-जीवन में अपना कर कोई भी आजीवन स्वस्थ रह सकता है।

आशावादी चिन्तन के निम्न सिद्धान्तों को जो कि तथ्य परक है, अपना कर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है-

1- दृढ़तापूर्वक यह स्वीकारना चाहिए कि मैं स्वस्थ हूँ।

2- अपने मन-मस्तिष्क में अपना चित्र एक अच्छे व्यक्ति के रूप में बनाये रखना चाहिए।

3- अद्भुत जीवनी शक्ति प्रदान करने के कारण भगवान का प्रतिदिन बार-बार धन्यवाद करना चाहिए।

4- मन को बेकार की चिन्ताओं एवं परेशानियों से मुक्त रखने का हर सम्भव प्रयत्न करना चाहिए। बैर-भाव, शत्रुता, पश्चाताप, हीनता, नैराश्य आदि को मन से निकाल कर उनकी जगह अच्छे स्वास्थ्यकर विचार लाना चाहिए।

5- वैसी कोई भी चीज हमें अपने अन्दर नहीं लानी चाहिए जो शरीर के विभिन्न तन्त्रों को कमजोर कर दे।

6- अपना शारीरिक वजन उतना ही रखना चाहिए जितना डाक्टर के अनुसार होना चाहिए।

7- नियमित व्यायाम अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इसके चयन में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कौन-सा व्यायाम हमारे लिए रुचिकर है। किसी ऐसे व्यायाम का चयन नहीं करना चाहिए जो अपने लिए उबाऊ हो जिससे हम उसमें अनियमित बन जायें।

8- अपनी शारीरिक जाँच नियमित रूप से करवाते रहना चाहिए।

9- ‘‘आत्मा अथवा मन को आरोग्य किये बिना शरीर को आरोग्य करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।” यह प्लेटो का प्रसिद्ध कथन है। सचमुच, मन को अस्वास्थ्यकर विचारों से मुक्त कर ही हम अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त कर सकते हैं।

स्वास्थ्य का ठीक रहना नित्य के जीवन व्यापार के लिये अनिवार्य है। स्वस्थ शरीर ही सही चिन्तन कर पाता है एवं सही चिन्तन ही स्वल्प काया के लिये उत्तरदायी है। यह एक प्रतिष्ठित प्रामाणित तथ्य है। बहिरंग उपचार पर तो अधिकाँश पद्धतियाँ, मन एवं विशेषज्ञ जोर देते चले आये हैं। पर अन्तरंग जिसे स्थूल का पोषण करने वाला मूल केन्द्र कहा जा सकता है, पर कारगर होने वाली पद्धति के लिये समुचित प्रयास चिकित्सा जगत में नहीं किये गये।

अन्तरंग के दो पक्ष हैं। एक मन अर्थात् संकल्प शक्ति तथा दूसरा अन्तःकरण, आस्थाओं का मूल उद्गम केन्द्र। मन की इन्द्रियपरक (ग्यारहवीं इन्द्रिय) एवं अतीन्द्रिय सामर्थ्य का अब वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं। परन्तु इसका सूक्ष्म पक्ष और भी बलवान एवं सामर्थ्यों से भरपूर है। यह जीवनी शक्ति का मानसिक पक्ष है जिसके बल पर प्रतिकूलताओं में भी शरीर न केवल जीवित बना रहता है वरन् स्वास्थ्य को कदापि प्रभावित नहीं होने देता। जीवनेच्छा, जिजीविषा के नाम से जानी जाने वाली यह शक्ति प्रत्येक के भीतर विद्यमान है। जो इसे पहचानकर इसका उपयोग कर लेता है वह ऐसे असम्भव काम कर बैठता है जिन्हें नादान लोग चमत्कार कह बैठते हैं। वस्तुतः है वह मन शक्ति का ही एक स्वरूप।

प्रसिद्ध विचारक नारमन वींसेन्ट पील कहते हैं, स्वस्थ रहने के लिये यह जरूरी है कि व्यक्ति अपनी जीवनी-शक्ति की असीम सामर्थ्य को दृढ़ता से स्वीकार करे। इसे जीवन की रचनात्मक शक्ति भी कहा जा सकता है। विचारों की विधेयात्मक सामर्थ्य का उपयोग कर कई असाध्य रोगी मृत्यु के मुख से निकालते देखे गये हैं। विडम्बना यह है कि अधिकाधिक व्यक्ति ठीक इसके विपरीत, निषेधात्मक चिन्तन में निरत दिखाई देते हैं। उनका एक ही रोना रहता है कि वे मजबूत हैं, अक्षम हैं, परिस्थितियों के कारण कार्य कर पाने में असमर्थ हैं एवं ये परिस्थितियाँ ही उनकी समस्त विपत्तियों का, यहाँ तक कि कुस्वास्थ्य का भी प्रधान कारण हैं। पश्चिम में भौतिक सुख सुविधाओं के बावजूद सर्जनात्मकता का अभाव कुस्वास्थ्य का कारण बनता चला जा रहा है। सर पील के अनुसार “जो कुछ भी मनुष्य कहता है, वह उसके विचारों में होता है, वह निश्चय ही जीवन में क्रियान्वित होता है। जो व्यक्ति वय की दृष्टि से वृद्ध होते हुये भी यह कहता है कि अभी तो मैं स्वस्थ हूँ, युवा हूँ, निश्चित मानिये, उसे ‘जरा’ स्पर्श भी नहीं कर सकती।” पर उल्टा ही है। तीस वर्ष पार करते करते ही आज का नवयुवक दैनिक जीवन के तनावों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ मान ‘‘प्रिमेच्योर एजींग” बुढ़ापे से ग्रस्त होता चला जाता है। यही कारण है कि प्राचीनकाल में वृद्धावस्था में पाये जाने वाले सारे रोग अब 30-35 वर्ष के आसपास ही दृष्टिगोचर होने लगे हैं।

ईसाई धर्म गुरुओं का कहना है कि भगवान ने स्वयं मनुष्य के जीवन में श्वास फूँकी है। हमारा यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि हम अपने प्रत्येक दिन का शुभारम्भ इस घोषणा से करें कि “मैं ईश्वर का ही एक अंश हूँ। जब ईश्वर प्रदत्त जीवन मेरे अन्दर स्पन्दित हो रहा है, मैं ईश्वर के गुणों से अभिपूरित हूँ तो फिर निराशाग्रस्त होकर उसकी अवमानना क्यों करूं? जब तक उस आनन्द प्रदायक सृष्टा की इच्छा होगी, मेरा आयुष्य काल चलता रहेगा। क्यों न मैं इस अवधि को पूरी क्षमता से जीकर पूरा करूं।


अपने समय का अद्वितीय विद्वान (kahani)

अब से कोई दो हजार वर्ष पूर्व सिसली में जन्मा आर्किमिडीज अपने समय का अद्वितीय विद्वान और वैज्ञानिक था। उसके प्रतिपादनों और आविष्कारों से उस समय का विज्ञ समुदाय चमत्कृत था। एक दिन सिसली के सेनापति को उससे मिलने की इच्छा हुई सो एक सिपाही भेज कर बुलाया। उस समय आर्किमिडीज रेखागणित का कोई हल निकालने में व्यस्त थे। सो चलने में आनाकानी करने लगे। उस पर सन्देश वाहक सिपाही आग बबूला हो गया और तलवार निकालकर उसका सिर काट दिया। फलतः एक ऐसी ज्योति बुझ गई जैसी कि कभी-कभी ही संसार में उदय होती और चमकाती है।


इनका कारण ढूँढ़ना अभी शेष है।

लन्दन के वीरबेक कालेज में भौतिकी के प्राध्यापक जान हस्टेड ने इस प्रसंग में भी रुचि लेनी आरंभ की कि क्या मानवी चेतना में कुछ ऐसी विलक्षणताएं भी हैं जिन्हें प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सके। इस संदर्भ में उनने तथाकथित कितने ही गूढ़ विद्या विशारदों से संपर्क स्थापित किया कि वे अपने सम्बन्ध में तथाकथित किंवदंतियों के सम्बन्ध में निराकरण करें और जन साधारण को यथार्थता से अवगत करने के सम्बन्ध में अवसर प्रदान करें।

इस चुनौती को अधिकाँश ख्यातिनामाओं ने टाल दिया। कइयों ने अपनी तलाशी देने और जिन उपकरणों का वे प्रयोग करते हैं उनकी पूर्व परीक्षा करने के अवसर दें इस बात को भी उनने अस्वीकार कर दिया। इससे हस्टेक को निराशा हुई उनने समझा जादूगरी के हथकण्डों को सिद्धि कहा और विश्वासी भावुकों की श्रद्धा का दोहन किया जा रहा है।

किन्तु एक सज्जन ने अपने को उनकी शर्त के अनुरूप अपनी परीक्षा करने और जो वे अद्भुत दिखा सकते थे उसके लिए तैयार हुए उनका नाम था- यूरी गेलर। इस इसरायली युवक ने अपनी को कैंब्रिज युनिवर्सिटी को प्रस्तुत किया और विभिन्न विचारों के तथा विभिन्न योग्यताओं के निरीक्षकों की एक मण्डली बुलाये जाने का अनुरोध किया। इनमें हस्टेड प्रमुख थे।

यूरी गेलर ने आत्मिकी क्षेत्र का भौतिक पदार्थों पर प्रभाव सिद्ध करने के लिए कुछ वस्तुएं प्रस्तुत कीं।

(1) उनने एक अति कठोर काँच का गोला कपड़ों में लपेटकर बक्से में बन्द कराया। स्वयं उससे एक फुट दूर रहे। सिर्फ उसे घूरते भर रहे। थोड़ी देर में बक्से में छेद कर उसी गोले में से छोटी-छोटी गोलियाँ निकलीं। जिन्हें बीन लिया गया। अब गोला खोला गया। वह अपने पूर्व रूप में ही था। पर वजन घट गया था। बाहर उछली हुई गोलियों को गोले के साथ रखा गया तो उसका पूर्व वजन पूरा हो गया। उपस्थित निरीक्षकों को इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि इस प्रयोग में कोई चालाकी नहीं हुई है।

(2) दूसरा प्रयोग उनने एक हाथी दांत की माला आकाश से टपकने का वायदा किया। अपने हाथ पीछे की तरफ बंधवा लिए और लैबोरेटरी की पूरी तरह सफाई करा ली कि कहीं उस तरह की माला छिपी हुई तो नहीं है। उनके कपड़े भी बदल दिये गये। इस पर उनके कथनानुसार मेज पर तीन फुट ऊपर से माला गिरी। उसे भी परीक्षण के लिए इसलिए भेजा गया कि कहीं हिप्नोटिज्म के आधार पर मति भ्रम तो उत्पन्न नहीं किया गया है। माला असली पाई गई।

(3) एक क्लॉक घड़ी कमरे में टाँगी गई उसमें चाबी नहीं। जिस फिनर के दबाव से घड़ी चलती है उसे भी हटा दिया गया। पर नियत समय पर घण्टे बजते रहे। जबकि टाइम बताने वाली सुई स्थिर ही बनी रही।

(4) चौथा प्रयोग उनने लन्दन से शिकागो की लैबोरेटरी में भेजा। वहाँ भी निरीक्षकों की एक मण्डली बैठी थी। हवा में तैरता हुआ एक पार्सल वहाँ पहुँचा। इस पार्सल को लन्दन के निरीक्षकों ने स्वयं ही अपने हाथ से बन्द किया था। उसमें एक गुलदस्ता, एक टमाटर और एक छोटा टेलीविजन सैट था। वह सभी वस्तुयें आधे घण्टे के भीतर उड़कर पहुंच गईं। जबकि इतनी तेजी से उड़कर और किसी साधन से उसे नहीं पहुँचाया जा सकता था।

इसके अतिरिक्त इसी जाँच पड़ताल में कुछ स्वतन्त्र घटनाएं और भी जुड़ गईं। पश्चिम जर्मनी के अन्वेषक प्रो. हेन्स वेण्डर ने बताया कि एक बार उनके कमरे में जमीन से छत्त तक गरम पत्थर उछलने गिरने का सिलसिला चला। उन्होंने किसी की दुष्टता हो तो उसे पकड़ने के लिए कई गार्ड नियुक्त किये। पर उनके होते हुए भी जब घटना न रुकी तो उन्हें वह मकान बदलना पड़ा। उनका कहना था कि इन घटनाओं को भूतों का उपद्रव समझने के अतिरिक्त और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके।

इसी प्रकार उनने यह भी बताया कि उनकी ताला बन्द अलमारी में रखी हुई वस्तुएं अलमारी बन्द रहते हुए भी उड़ीं, एक-एक करके सारे मकान में बिखर गईं।

यह दो घटनाएं यद्यपि पूरी गेलर से सम्बन्धित नहीं पर वे इतना तो बताती ही हैं कि भौतिकी के नियमानुसार सारा जगत चलता हो ऐसी बात नहीं है। उसमें ऐसी विलक्षणताएं भी मौजूद हैं जिनका कारण ढूँढ़ निकालना अभी विज्ञान के लिए शेष है।


प्रतिभावान क्या सचमुच पागल होते हैं?

विद्वान ऑफिसर होम्स का पाला अनेक प्रतिभाशालियों से पड़ा था। उनसे उनका परिचय भी था। इतना ही नहीं उनके गुण दोषों को देखते हुए निष्कर्ष स्पष्ट था कि- ‘प्रतिभावान्’ एक सीमा तक पागल होते हैं। वे अपनी सनक को इस कदर सही मानते हैं कि उन्हें यथार्थता के रूप में अनुभव करने लगते हैं। उनकी यह धारणा अकारण नहीं थी। इसके पक्ष में उनने अनेक प्रमाण और उदाहरण भी एकत्रित किये थे।

होम्स का कथन है कि प्रतिभावानों को किसी एक सनक की पूर्ति में अपनी समग्र मानसिक चेतना झोंकनी पड़ती है। इसका परिणाम यह होता है कि विभिन्न प्रयोजनों में काम करने वाली मानसिक क्षमताएं जब एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत होती हैं, तो वे उस प्रयोजन में तो असाधारण रूप से सफल होते हैं किन्तु मस्तिष्कीय क्षमता के अन्य क्षेत्र में अविकसित रह जाते हैं। फलतः उनके दैनिक जीवन की सामान्य प्रवृत्तियाँ सीमित एवं अस्त-व्यस्त रह जाती हैं। कोई सर्वांगीण प्रतिभावान नहीं होता वरन् किसी दिशा विशेष में ही उनका चिन्तन तल्लीन रहने से उसी सीमा तक सीमित रह जाता है। फलतः उनके दैनिक जीवन की गतिविधियों को देखकर लोग जहाँ सनकी मानने लगते हैं। वहाँ उनकी कार्य विशेष में अद्भुतता की छाप भी मानते हैं।

शेक्यपीयर ने भी इस मान्यता की पुष्टि की है और कहा है कि प्रतिभावान सचमुच पागल नहीं होते। वे निर्धारित कार्यों को लगन पूर्वक करते हैं। पर इस अत्युत्साह में वे उन तथ्यों की उपेक्षा करने लगते हैं जो दूसरों की दृष्टि से किसी सुयोग्य व्यक्ति में अनिवार्य रूप से होने चाहिए।

वालट स्काट यूरोप के एक अच्छे कवि हो गये हैं। वे बहुधा स्वरचित कविताओं को महाकवि ‘वायरिन’ की मान बैठते थे और बहुत ही भावना पूर्वक उन्हें सुनाते थे। उन्हें अपनी भूल का पता तब चलता जब प्रकाशित पुस्तक में वह उन्हीं द्वारा विनिर्मित दिखाई जाती थी।

दार्शनिक स्विष्ट किन्हीं विचारों में इतना तन्मय हो जाते थे कि उन्हें सामने बैठे मित्रों तक में उनका नाम और परिचय पूछना पड़ता था। विचारों की मस्ती से जब उनकी व्यावहारिकता नीचे उतरती तब वे अपनी भूल पर पश्चाताप करते और आगन्तुक मित्र से क्षमा माँगते।

आइन्स्टीन एक मित्र के यहाँ रात्रि भोज पर गये। उन्हें जल्दी ही वापस लौटना था। पर वे यह समझ बैठे कि यह घर मेरा है और मित्र दावत पर आये हैं। वे बार-बार घड़ी देखते पर मित्र के न जाने पर उनसे शिष्टाचार वश कुछ वार्ता करने लगते। इस प्रसंग में जब बहुत देर हो गई तो उनने अपने मित्र को पधारने तथा इतना समय देने के लिए धन्यवाद दिया और उन्हें फिर कभी पधारने की बात कहकर विदाई शिष्टाचार निभाया। जब मित्र हंस पड़े तो उन्हें पता चला कि यह उस मित्र का घर है और यहाँ में ही निमन्त्रित के रूप में आया था। कई घण्टे का समय इसी भ्रम में नष्ट हुआ।

फ्राँस के साहित्यकार एलनेजेक्टर डयूमा ने बहुत लिखा है पर उनकी एक सनक थी कि वे उपन्यास नीले कागज पर कविताएं पीले कागज पर और नाटक लाल पर लिखते थे। उन्हें नीली स्याही से चिढ़ थी। जब भी लिखते किसी दूसरे रंग की स्याही का प्रयोग करते।

मोपासाँ अपने कमरे के दाँये कोने में लिखने के आदी थे पर उन्हें अक्सर दिशा भ्रम होता था और बाँये कोने में बैठकर लिखता रहता। काम समाप्त करने के बाद ही उन्हें अस्त-व्यस्तता का पता चलता।

कार्लाइल ने प्रसिद्ध साहित्यकार चार्ल्स लेम्ब की कृतियों तथा दैनिक जीवन की अस्त-व्यस्तताओं की समीक्षा करते हुए लिखा है कि वह साहित्यकारिता की दृष्टि से सर्वथा माननीय थे। पर अपने निजी तथा पारिवारिक जीवन में वे जिस तरह समय गुजारते थे उसे देखते हुए उन्हें एक विचित्र प्रकार का पागल ही कहा जा सकता था।

संसार प्रसिद्ध कलाकार वायरिन को रात्रि के समय भयंकर सपने आते थे। कई बार वे उस उनींदी अवस्था में बुरी तरह चिल्लाने लगते थे और हवा में पिस्तौल के फायर करने लगते थे। पीछे परिवार वालों ने किसी दुर्घटना की आशंका से उनकी पिस्तौल ही छीन ली थी।

अंग्रेज कवि शैली को विश्वयुद्ध की योजनाएं बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने वालों से बड़ी चिढ़ थी। वे उन्हें समझाने बुझाने के लिए लम्बे पत्र लिखते पर उन्हें डाक में नहीं डालते थे। वे उन्हें बोतलों में बन्द करके टैम्स नदी में बहा दिया करते थे और सोचते रहते थे कि वे उन व्यक्तियों तक जल माध्यम से सहज ही पहुँच जायेंगे। ऐसे पत्र उनने सैकड़ों की संख्या में लिखे थे।

जर्मन कवि पैरों तले बर्फ की सिल्ली रखकर और ठण्ड के दिनों में भी कमरे की सभी खिड़कियाँ खोलकर बैठता था। तभी वह अच्छी कविताएं लिख पाता था।

पोलैण्ड के पियानो वादक नाटकों में बड़े सम्मान के साथ बुलाये जाते और पारिश्रमिक के अच्छे पैसे वसूल करते थे। पर उन्हें एक सनक थी कि जहाँ पियानो रखा जाता था। वहाँ न बैठकर अपना स्टूल जहाँ-तहाँ जमाते फिरते जब उनके मन की जगह मिल जाती तब वे भारी पियानो को उठवाकर वहाँ ले जाते जहाँ उनसे स्टूल जमाया था।

समरमेट अपनी मेज पर रखे कागजों पर एक कुटिल आंख का चित्र बनाया करते थे। इन चित्रों के सम्बन्ध में पूछा जाता तो वे उसका कुछ उत्तर न दे पाते और किसी अज्ञात शक्ति की प्रेरणा बताया करते थे।

फ्रांसीसी लेखक ऐमिले कभी-कभी गली से गुजरता तो उसमें लगे बिजली के खम्भों को गिनता जाता। भूल जाता तो लौटकर गली के कोने से उन्हें दुबारा गिनना शुरू करता। ऐसा करने में उसका क्या अभिप्राय हैं इसका उत्तर देते उसे कभी न बन पड़ा। मात्र उसे आदत बताता था।

बेकन वर्षा के दिनों में खुली घोड़ा गाड़ी में बैठकर बहुत देर तक घूमता रहता। उसका विश्वास था कि जिस प्रकार वर्षा के पानी में खेती को- पौधों को लाभ होता है वैसा ही उसे भी मिलेगा।

ऐसे उदाहरण एक नहीं अनेकों हैं चंगेज खाँ, सिकन्दर, तुगलक, नादिरशाह, औरंगजेब आदि की नये इलाके जीतने और नये आक्रमण करने की धुन रहती थी। वे यह नहीं देख पाते थे कि पिछले दिनों जो इलाके जीते गये थे उनकी सही व्यवस्था बनी या नहीं। अथवा जितना जीता गया है वह हजम हो सकता है या नहीं। हिटलर का मानसिक विश्लेषण करने वालों का कहना है कि वह दुस्साहसी भर था। उसे परिणामों की सही अनुमान लगाने की क्षमता नहीं के बराबर थी।

अधिक पढ़ने लिखने वालों को भी कभी-कभी सनकी पाया गया है। बाइबिल में एक स्थान पर उल्लेख हैं कि- ज्यादा पढ़ने ने तुझे पागल बना दिया है।


सनकियों की कमी नहीं

मनुष्य जितना बुद्धिमान विचारशील है उतना ही मूर्ख और सनकी भी है। कहावत है कि दुनिया में अकल का परिणाम डेढ़ हैं। इसमें से एक अपने पास होना समझा जाता है और आधी सारी दुनिया के हिस्से में आई हैं।

कुछ आदमी बुद्धि पर जोर देते और उचित अनुचित का विचार करते हैं। पर कुछ ऐसे हैं जिनकी खोपड़ी में जो सनक उठती है उसी को करते रहते हैं। किसी से सलाह लेने की भी उन्हें आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

जूनागढ़ के नवाब महावत खाँ कुत्ते पालने के शौकीन थे। उन्होंने लगभग ढाई हजार कुत्ते पाल रखे थे। प्रत्येक कुत्ते के लिये नल, बिजली, पंखे से युक्त विशेष कमरे निर्मित किये गये थे। कई नौकर केवल इसी काम के लिए नियुक्त थे। उन्होंने अपनी एक कुतिया का विवाह रचाया जिसमें ढाई लाख मेहमान पधारे थे और करीब सात लाख रुपये खर्च हुए थे।

एंतारियो के एक पुलिस कर्मी जान पावर्स तितली पालने के शौकीन थे। उसने छह हजार से अधिक तितलियाँ पाली थीं। ये तितलियाँ जाली में बन्द रहने की अपेक्षा जान पावर्स के शरीर पर बैठना अधिक पसन्द करती थीं।

कुआलालम्पूर के निवासी ‘पिपमास’ सून मधु मक्खियाँ पालने के शौकीन थे। उसकी मधुमक्खियों ने उसके बाँये हाथ पर छत्ता रख लिया था।

भोजन के शौकीन पटियाला के राजा भोपेन्द्र सिंह के रसोईघर में 142 रसोइये थे। उनमें से 16 केवल ‘एग-करी’ बनाया करते थे।

रोमन सम्राट ‘मैक्सी मख’ शराब पीने और माँस खाने के शौकीन थे। वे प्रतिदिन लगभग 18 किलो माँस और 20 गैलन शराब पीते थे।

सेवाइल के शासन ‘अवादेल मोता दिल’ खोपड़ियों के गुलदस्ते बनाकर उनमें आकर्षक फूल लगवाया करता था। इसके लिये वह अपने शत्रुओं को मारता था उनकी खोपड़ियाँ साफ कराकर उनका उपयोग करता था।

इंग्लैण्ड के प्रख्यात कवि वायरन को खोपड़ियों के पात्रों में मदिरा पीने पिलाने का शौक था।

मुगल बादशाह को “कल्ला मीनार” बनवाने का शौक था। मुगलों की ओर से बैरम खाँ ने जब सिकन्दर शाह की सेनाओं को परास्त किया तो उसके सम्मान में बादशाह ने दस हजार दुश्मनों की खोपड़ियों की कल्लामीनार बनवाई थी।

चीन के नानकिंग नामक स्थान में निवास करने वाली ‘ताई लो’ नामक एक लड़की को खोपड़ियाँ एकत्र करने का इतना शौक था कि उसके पिता की मृत्यु पर उसकी खोपड़ी भी सुरक्षित रख ली थी।

जार्जडन नामक एक व्यक्ति को भयानक चेहरों, खालों व चित्रों को एकत्रित कर अपने कमरे सजाने का शौक था और अपने दरवाजे पर बैठकर जोर-जोर से शोर मचाता था। वह रेडियो बहुत जोर से बजाता था।

‘गार्ड स्टोन’ नामक एक लार्ड अपनी वेशभूषा बड़ी विचित्र बनाये रखता था और अपने सोने के कमरे में भयानक व टूटी-फूटी वस्तुएं भरे रहता था। उसके कमरे में मृत देहें और भयानक चित्र फैले पड़े रहते थे।

जोजर नामक एक पादरी हर दूसरे तीसरे दिन हैट खरीदता और उन्हें कब्रिस्तान में रख आया करता था ताकि मृतकों की प्रेतात्माएं उन्हें पहिनें।

पश्चिम जर्मनी का एक रिक्शा चालक ‘जान म्यूटर’ प्रतिदिन पाँच घण्टे नहाता था।

रोम के बादशाह नीरा की महारानी पपिया गधी के दूध से स्नान किया करती थी। विश्व सुन्दरी ‘क्लियोपेट्रा’ पी गधी के दूध में नहाने की शौकीन थी।

नेपोलियन की पत्नी जोसेफाइन स्ट्राबेरी के फूलों के रस से नहाने की शौकीन थी।

स्पेन की सुन्दरी ‘मेरिया द पाडिल्ल’ शराब से भरे हम्मामों में नहाने की शौकीन थी।

फ्राँस की अद्वितीय सुंदरी ‘मादाम द मैसेनान’ प्रतिदिन दो बार सुगन्धित इत्रों से स्नान किया करती थी।

फिलिपसासूनं लन्दन का एक बैंक कर्मचारी था। यात्रा के लिए एक दिन वह रेलवे स्टेशन पहुँचा, किन्तु दुर्भाग्यवश ट्रेन छुट चुकी थी और वह यात्रा नहीं कर सका। वह तुरन्त स्टेशन मास्टर के पास पहुँचा और अपने लिए स्पेशल ट्रेन की व्यवस्था करने का आग्रह किया। वहाँ कोई दूसरी ट्रेन उस रोज उपलब्ध नहीं थी, अतः उसके लिए किसी स्पेशल ट्रेन की व्यवस्था नहीं हो पायी। स्टेशन मास्टर ने उसे किसी दूसरी ट्रेन से यात्रा करने की सलाह दी, पर स्पेशल ट्रेन से यात्रा करने की उस पर तो धुन सवार हो गयी थी। किसी अन्य गाड़ी से सफर करने के लिए वह राजी नहीं हुआ। अन्ततः तीसरे दिन स्पेशल ट्रेन का आदेश हुआ, जिसमें बैठकर उसने अकेले यात्रा की। इस सनक में उसकी सारी सम्पदा लग गई साथ ही बैंक से भी बड़ी धनराशि कर्ज लेनी पड़ी, जिसे वह जीवन भर नहीं चुका सका। अन्ततः बैंक का उसके मकान व जमीन नीलाम कराना पड़ा तथा उसे नौकरी से भी निकाल दिया गया।

कनाडा का एक व्यापारी जो अपने जीवन में एक फिल्म अभिनेता तो नहीं बन सका किन्तु उसने अपनी वसीयत में लिखा था कि मेरी मृत्यु के पश्चात् मेरी सारी सम्पत्ति किसी ऐसे नाटक कार को दी जाय जो प्रति वर्ष शेक्सपीयर का नाटक हेलमेट का प्रदर्शन करे और इस प्रदर्शन में कब्रिस्तान का दृश्य दर्शाने के लिए उसकी निजी खोपड़ी का ही उपयोग किया करे।

एक अमेरिकी जो अपने जीवन में सम्मानित न हो सका अपनी मृत्यु के पूर्व उसने अपनी सम्पत्ति की वसीयत में लिखा कि ‘उसकी मृत्यु के बाद उसकी चमड़ी से ढोल बनाया जाय और जब भी स्वतन्त्रता दिवस आए वाशिंगटन में झंडोत्वोलन के समय उसे बजाया जाय। जो भी व्यक्ति यह कार्य कर सके सरकार उसी को मेरी सारी सम्पत्ति सौंप दे।”

जैरेमी बैंथन नामक व्यक्ति जो अपने जीवन में किसी भी मेडिकल कालेज का सदस्य भी नहीं बन पाया अपनी वसीयत में लिखा था कि- “मेरी मृत्यु के बाद मेरी सारी सम्पत्ति ऐसे मेडिकल कालेज को दे दी जाय जो प्रबन्धक समिति की बैठक में उसकी खोपड़ी को एक ऊंचे आसन पर रख सके।”

समेइल ब्राँट नामक अंग्रेज ने अपनी पत्नी से परेशान होकर अपनी वसीयत में लिखा कि उसकी सारी सम्पत्ति को तभी उसकी पत्नी को दी जाय जब वह प्रतिदिन 5 सिगरेट पिया करे अन्यथा सरकारी खजाने में जमा करा दिया जाय।”

काउण्ट लियो जो एक प्रसिद्ध उपन्यासकार था अपनी वसीयत में लिखा था कि मृत्यु के बाद उसके शव के पास उसकी पत्नी को न आने दिया जाय। यह मानने पर ही उसकी सम्पत्ति उसे सौंपी जाय।

स्वेम नामक एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी से परेशान होकर अपनी वसीयत में मात्र 6 पैसे अपनी पत्नी को इसलिए दिया था कि इससे अपने लिए फाँसी की रस्सी खरीद ले।”

न्यूयार्क के एक व्यक्ति ने अपनी वसीयत में लिखा था कि “वह अपनी दुश्चरित्र पत्नी को उसका प्रेमी तथा चोर नौकर को फटे पैन्ट तथा लापरवाह को टूटी कारें छोड़ रहा है तथा सम्पूर्ण धन अपने पुत्र के लिए छोड़कर जा रहा है।”

बेल्जियम के एक व्यक्ति ने अपने परिवार वालों से परेशान होकर अपनी सारी सम्पत्ति अपने प्रिय कुत्ते के नाम ही कर दी क्योंकि संसार में उसने ही उसे सबसे ज्यादा प्यार किया था।

मेक्सिको के एक किसान डब्ल्यू डेपरेन ने अपनी सारी सम्पत्ति अपने खच्चर के नाम कर दिया जिसने उसके 20 एकड़ खेत को उर्वरा बनाने में पूरा सहयोग किया था।

अमेरिका के एक व्यक्ति ने अपनी सारी सम्पत्ति अपने तोते के नाम करके मरा।

अमेरिका की श्रीमती मैक हेनरी ने अपनी सारी सम्पत्ति बिल्ली के ही नाम कर दिया था।

एक महिला ने अपनी सारी सम्पत्ति अपनी पाँच बिल्लियों के नाम बराबर-बराबर बाँट देने की वसीयत लिखी थी।

इटली की एक महिला ने अपनी 2300 पौण्ड की सम्पत्ति अपने कुत्ते के नाम कर दिया था।

लन्दन के फाँकिंस नामक पियक्कड़ ने अपनी वसीयत में लिखा था कि “उसकी सम्पत्ति का एक भाग प्रति वर्ष उसकी जयन्ती पर शराबियों को शराब पिलाने में खर्च किया जाय।”

यूगोस्लाविया के एक शराबी ने अपनी वसीयत में लिखा था कि प्रतिवर्ष वर्षी के समय उसकी कब्र को शराब से धोया जाय और शहर के सभी शराबियों को कब्र में बैठाकर खूब शराब पिलायी जाय।

बर्मा के एक शराबी ने अपनी मृत्यु के पूर्व वसीयत लिखी जिसमें से 1000 पौण्ड प्रति वर्ष उसकी वर्षी के समय शराब में व्यय करने को कहा था।

स्काटलैण्ड के एक व्यापारी ने अपनी दो पुत्रियों के लिए लिखी वसीयत में लिखा था कि उसकी सम्पत्ति का बंटवारा उनकी पुत्रियों में उनके वजन के अनुपात में किया जाय।

एक अमेरिकी धनी ने अपने जीवन में 71 पायजामे बनवाये। मृत्यु के पूर्व उसने अपनी वसीयत में लिखा कि उसके सभी पायजामे एक-एक करके नीलाम कर दिये जांय। नीलाम लेने वालों के आश्चर्य का तब ठिकाना न रहा जब उन सभी पायजामों में एक-एक हजार का बेनामी चैक सिला पाया।

फ्राँस के एक धनी ने अपनी वसीयत में लिखा कि उसकी सम्पत्ति के ब्याज को सालाना ऐसे व्यक्तियों को पुरस्कार देने में व्यय किया जाय जिनकी आंखें, नाक, बाल तथा कलाई अति सुंदर हो।

दार्शनिक क्रेट्स ने अपनी वसीयत में अपनी सारी सम्पत्ति अपने मित्र को सौंपकर यह सुझाव दिया कि उसके लड़के यदि मूर्ख सिद्ध हों तो यह धनराशि उन्हें दे दें अन्यथा गरीबों की भलाई में लगा दें।

प्राचीन कलात्मक वस्तुओं का संग्रहालय तो सभी ने देखा सुना होगा किन्तु पश्चिम जर्मनी में कुछ अजीबो-गरीब संग्रहालय बनाए गए हैं। उदाहरणार्थ-

खटमल-मक्खी ऐसे घृणित जीव जिनका नाम लेना भी घृणास्पद लगता है। पश्चिम जर्मनी के अस्चेफन वर्ग में 1000 किस्म की प्रजाति के खटमल मक्खी एकत्र कर रखे हैं उनके बढ़ने एवं रहन-सहन की भी ठीक व्यवस्था की गई है।

जर्मनी के मुएन्दे नगर में धूम्रपान के सभी साधन संग्रहित किए गये हैं। एडवर्ड सप्तम के समय की सिगरेट से लेकर आज तक के सिगार व बीड़ी आदि विश्व के समस्त धूम्रपान के साधन एकत्रित हैं। यहाँ पर एक 6 फीट लम्बी सिगार भी है जिसे एक आदमी 1 माह तक पी सकता है।

प. जर्मनी के हेम्वर्ग नगर में आदिकाल से आज तक के सभी मिट्टी, पत्थर, लकड़ी, काँच, प्लास्टिक आदि के बोतल व पात्र संग्रहित हैं। प्राचीन काल में समुद्री जलयानों को सन्देश भेजने वाला बोतल भी है।

जर्मनी के एक स्थान पर प्राचीन काल से आज तक ही रोटियों के नमूनों का संग्रहालय है उसी प्रकार का संग्रहालय काहिरा में भी है जहाँ पर ई. पूर्व से 5000 वर्ष पूर्व की गेहूँ की रोटी सुरक्षित हैं।

प. जर्मनी के आघन बैंक में प्राचीन काल से अब तक के जूतों चप्पलों के नमूनों का भण्डार किया गया है।

प. जर्मनी के फ्रेन्टेन्स्टाड में प्राचीन काल से आज तक के टैक्स प्रपत्र संग्रहित हैं सबसे पुराना टैक्स फार्म 3000 ई. पूर्व का है।

प. जर्मनी की स्टटगर्ट नगर में छातों और टोपियों पगड़ियों के विश्व भर के हजारों नमूने प्राचीन काल से अब तक के संग्रहित हैं। इनमें भारी से भारी व जेब में रखकर चलने वाले छाते तक शामिल हैं।

सम्पन्न और सुशिक्षित बुद्धिमान विचारशील होते हैं यह मानने में कोई तुक नहीं। उनमें भी ढेरों ऐसे होते हैं जो ऊंट-पटांग सोचते और जो मनमर्जी आये सो करते रहते हैं।


पृथ्वी पर होते रहे परिवर्तन

पृथ्वी की स्थिति में समय-समय पर भयानक परिवर्तन होते रहते हैं। इन्हें महाप्रलय या खण्ड प्रलय कहा जाय तो भी आश्चर्य नहीं। यह परिवर्तन भूत काल में भी हुए हैं और भविष्य में भी उनके होने की सम्भावना है।

इन परिवर्तनों के उपरान्त प्राणी स्वल्प काल में ही विकसित कैसे हो गये यह आश्चर्य की बात है। इसका एक और समाधान निकला है कि पाषाणों के मध्य प्राणी चिरकाल तक जीवित रह सकते हैं। इसी प्रकार यह भी सम्भव है कि मनुष्य भी कहीं सुरक्षित स्थानों पर अपना अस्तित्व बनाये रहे हों।

कहा जाता है कि आदिम काल का मनुष्य अनगढ़ गुफाओं में रहता था, पर अब पर्वतीय प्रदेशों में ऐसे भव्य भवन ढूँढ़ निकाले गये हैं जो प्राकृतिक अनगढ़ नहीं हैं वरन् मनुष्यों द्वारा उच्चस्तरीय कला-कौशल के साथ बनाये गये हैं।

पृथ्वी की, समुद्री द्वीपों की खोज के श्रेय अमुक मनुष्यों को दिये जाते हैं पर प्रश्न यह उठता है कि उनने इतनी जल्दी इतनी सरलतापूर्वक वे स्थान कैसे ढूँढ़ निकाले। इसका समाधान उन मानचित्रों से मिला है जो अतीव पुरातन हैं और पृथ्वी एवं समुद्र की सही स्थिति के विवरण बताने की स्थिति में उपलब्ध हुए हैं। नवीन शोध कर्ताओं ने सम्भवतः इन्हीं मानचित्रों से सहायता ली है और खोज का काम शीघ्रतापूर्वक समग्र रूप से सम्पन्न किया है।

सभ्यताओं का इतिहास इतना नवीन नहीं है जितना कि पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जाता है। वरन् वास्तविकता यह है कि अनुमानित काल की अपेक्षा कहीं पहले ऐसी सभ्यताओं का विकास विद्यमान था, आज की वैज्ञानिक प्रगति से किसी भी प्रकार कम महत्व की नहीं माना जा सकता।

चेचेन-इंगुशेती पहाड़ियों में पुरावेत्ताओं की एक खोज ने मनुष्य के गुफा निवास की ‘असभ्यता’ के बारे में पुरानी भ्रान्त धारणाओं को भंग कर दिया है। यहाँ बड़ी ऊंचाइयों पर चट्टानों को तराशकर बनाये दो तले-तीन तले आवास मिले हैं, जिन्हें बहुकक्षी गुफाओं की संज्ञा दी जा सकती है। इस गुफा नगरी में लोगों के रहने के अतिरिक्त घरेलू कामकाज और पशुओं के लिए भी जगहें बनी हैं।

सन् 1900 में काईथेरा टापू के पास समुद्र में जब गोताखोरों ने स्पांज ढूंढ़ने के लिए डुबकी लगायी, तो उन्हें एक ध्वस्त जहाज का मलवा मिला। 180 फुट नीचे समुद्र तल पर इस मलबे में जब खोजबीन की तो विभिन्न प्रकार की धात्विक मूर्तियों और बरतनों के अतिरिक्त उन्हें किसी यन्त्र का एक भाग भी मिला। यह यन्त्र का गियर वाला भाग था, जिसमें प्रयुक्त तकनीक अत्यन्त जटिल थी। सूक्ष्म निरीक्षण से यह किसी अत्यन्त परिष्कृत यन्त्र का कोई हिस्सा मालूम पड़ा। सम्भवतः यह किसी खगोलीय कलैंडर का भाग हो, क्योंकि इसमें चन्द्रमा और ग्रह-मण्डलों की स्थितियाँ दिखायी गई हैं।

शोधकर्ताओं ने इस यन्त्र को 100 ई. पू. के हेलेनिस्टिक युग का बताया, किन्तु उनका कहना है कि इस युग में टेक्नलॉजी का अभाव था। जब उस गियर तन्त्र की शुद्धता की परीक्षा की गई, तो इस कसौटी में भी वह खरा उतरा। उसमें त्रुटि एक मिली मीटर के 10 वें भाग से अधिक न थी। यह त्रुटि कोई बहुत अधिक नहीं मानी जा सकती। जब उस काल के लोग टेक्नलॉजी से बिल्कुल ही अनभिज्ञ थे, तो इतना परिष्कृत यन्त्र उन्हें कहाँ से प्राप्त हुआ? वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों का कहना है कि यह यन्त्र सम्भव है उन्हें किसी अन्तरिक्षीय अतिविकसित सभ्यता से प्राप्त हुआ हो।

सन् 1929 में टर्किश नेशनल म्यूजियम के डायरेक्टर बी. हैलिल एडेम को एक क्षति प्राचीन नक्शे के कुछ टुकड़े प्राप्त हुए। नक्शा रैडसी एवं परसियन गल्फ के क्लीट एडमीरल पीरीरेस द्वारा विनिर्मित है। उक्त एडमीरल ने नक्शे का सन् 1513 में बनाया। म्यूजियम से प्राप्त टुकड़े उसके विश्व नक्शे के ही भाग हैं। सन् 1940 में इसकी अनेक प्रतियाँ तैयार करवायी गईं। सन् 1954 में यह नक्शा विख्यात अमरीकी मानचित्रकार अरलिंग्टन एच. मैलरी के हाथ लगा। मैलरी प्राचीन नक्शे के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने बताया कि पीरी रेस के नक्शे में महाद्वीपों एवं दक्षिणी ध्रुव को स्पष्ट दिखाया गया है। उनके अनुसार सन् 1513 तक दक्षिणी ध्रुव की खोज नहीं हो पायी थी। उसके मानचित्र में अमरीका का भी उल्लेख है, जिसके बारे में तत्कालीन लोगों को कोई जानकारी नहीं थी। जब दो स्थानों के बीच की दूरी जानने के लिए आधुनिक मानचित्र एवं पीरी रेस के नक्शे का तुलनात्मक अध्ययन किया गया, तो यह जानकर अचम्भा हुआ कि पुराने नक्शे में भी विभिन्न स्थानों के बीच की दूरियों को बिल्कुल सही-सही आँका गया है। इसके अतिरिक्त मानचित्र में विभिन्न स्थानों का सही-सही निरूपण भी नक्शे की विलक्षणता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतना सही मानचित्र किसी अतिविकसित टेक्नलॉजी के बिना सम्भव नहीं। आधुनिक युग में ऐसे मानचित्र बनाने के लिए वायुयानों एवं जलयानों के माध्यम से इन्फ्रारेड फोटोग्राफी एवं प्रतिध्वनि का सहारा लिया जाता है। दक्षिणी ध्रुव के बारे में तो सन् 1949 तक विज्ञानियों को सही जानकारी नहीं थी। फिर इतना सही मानचित्र 15 वीं सदी में कैसे बना लिया गया, जबकि नक्शे में उल्लिखित अधिकाँश स्थानों के बारे में तत्कालीन लोगों की कोई जानकारी नहीं थी।

डेनिकेन का कहना है- नक्शा देवमानवों द्वारा कक्षा में घूमते स्पेश-स्टेशन से बनाया गया और इसे पृथ्वी वासियों को भेंट स्वरूप प्रदान किया।

सन् 1898 में सक्कारा के निकट एक कब्र में वायुयान का एक मॉडल प्राप्त हुआ। वायुयान का नम्बर 6347 उसमें स्पष्ट अंकित है यह माडेल लकड़ी का बना है वजन 3972 ग्राम पाया गया। दोनों डैनों का फैलाव 18 से.मी. हैं, नाक 3.2 से.मी. और इसकी सम्पूर्ण लम्बाई 14 से.मी.। मॉडल का आकार-प्रकार हवाई उड़ान के अनुकूल है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके डैने, पूंछ एवं शरीर की लम्बाई का अनुपात एक आदर्श वायुयान का है। इस पर मिश्री भाषा में “पा-डायमेन” अंकित है जिसका अर्थ है “अमन का उपहार”। यह ‘अमन’ कौन हो सकता हैं? डेनिकेन के अनुसार अमन और कोई नहीं अन्तरिक्षवासी देवमानव ही हैं। विभिन्न स्थानों में इस प्रकार के अनेक वायुयान मॉडल पाये गये हैं। ये सभी ‘हाल आफ इजिप्टियन म्यूजियम फार एन्टिक्वीटिज’ में सुरक्षित हैं। वर्तमान समय में यहाँ इस प्रकार के 14 मॉडल उपलब्ध हैं।

कार्सन सिटि, नेवादा के सन्निकट प्रान्तीय जेल के आहाते में उत्खनन के समय सन् 1882 में सैण्ड स्टोन की एक परत में जूते पहने हुए मनुष्य के पद चिन्ह प्राप्त हुए थे। जिनकी लम्बाई 18-20 इंच और चौड़ाई 8 इंच थी। इसके पास ही उस ट्रैक में अनेकों अन्य पशुओं जैसे- हाथी, घोड़े, हिरण, भेड़ियों के पद चिन्ह मिले थे। इन पद चिन्हों तथा शैलाभों की उम्र 2000000 से 3000000 वर्ष आँकी गई थी।

नेवादा के पशिंग काउन्टी स्थित फिशर कैनन क्षेत्र में सन् 1927 में अल्फ्रेड ई. नैप को ट्राइऐसिक लाइमस्टोन में धंसे चमड़े के जूतों के चिन्ह अंकित मिले। प्रिन्टों के फोटोमाइकोग्राफ लेने पर ज्ञात हुआ कि जूतों के चमड़े पतले धागों से हाथों द्वारा टाँके गये थे। इस विधि को 1927 में जूते बनाने वाले अपना रहे थे। ट्राइऐसिक लाइम स्टोन की उम्र 180000000 से 225000000 वर्ष तक आँकी गई।

ओहियो के कोसोक्टन नामक स्थान के समीप उत्खनन करते समय सन् 1837 में बौनों का एक कब्रिस्तान मिला। नर कंकालों की लम्बाई 3 से साढ़े चार फुट लम्बी थी और सभी अलग-अलग लकड़ी के ताबूतों में बन्द करके दफनाये गये थे। बौनी सभ्यता से सम्बन्धित कोई शिल्प तथ्य उपलब्ध न होने के कारण उनकी अवधि निश्चित नहीं हो सकी, लेकिन कब्रों की संख्या देखते हुए इस सभ्यता के कार्य काल और सम्भावित शहर की सम्भावना सुनिश्चित है।

इसी तरह 1891 में ओहियो के एक बहुत बड़े कब्रिस्तानी टीले की खुदाई करने पर एक पुरुष का स्थूल काय भारी भरकम शरीर ताँबे की चद्दर में लिपटा हुआ पाया गया। सिर पर ताँबे की टोपी, हाथ-पैर और पेट-पीठ सभी ताँबे से ढके हुए थे। मुँह के अन्दर मोतियाँ ठुसी हुई थीं और गले में मोतियों तथा भालू के दाँतों से बना हार पहनाया गया था। इस कब्र के समीप ही एक महिला का अस्थि पंजर दफनाया हुआ मिला।

ये सभी कंकाल 500 फीट लम्बे, 200 फीट चौड़े और 28 फीट ऊंचे टीले की 14 फीट गहराई में दफन किए हुए मिले थे।

सन् 1853 में अमेरिका के एक खान उत्खनन में शिलाखण्ड में चारों तरफ से बन्द एक हार्नी लिजार्ड छिपकली निकली। पूर्ण विवरण ज्ञात करने के लिए न्यू मेक्सिको के न्यायाधीश हाटन ने इस छिपकली को वाशिंगटन स्थित स्मिथसोनिएन संस्थान को भेज दिया। पत्थर को तोड़कर बाहर निकाले जाने के बाद यह छिपकली दो दिन बाद मर गई।

1865 में इंग्लैण्ड के दुरहम प्रान्त के हार्टलेपूल वाटरवर्क्स की खुदाई का कार्य प्रगति पर था। 25 फीट की गहराई पर मैग्नीसिया लाइम स्टोन के भारी भरकम पत्थर हटाये जा रहे थे। पत्थर के एक टुकड़े के टूटने पर उस पत्थर के एक छोटे सी गुफा में बन्द एक जीवित टोड टर्र-टर्र करता हुआ बाहर निकला जिसकी आंखें चमक रही थीं और मुँह बन्द था। आवाज नासाछिद्रों द्वारा निकल रही थी। सुप्रसिद्ध भू-विज्ञानी राबर्ट टेलर ने बताया कि टोड की उम्र 6000 (छः हजार) वर्ष की थी।

सन् 1852 में इंग्लैंड के डर्बी प्रान्त में पासविक स्थित खान की खुदाई करते समय मजदूरों को 12 फीट की गहराई में पत्थरों को तोड़ते समय एक बड़े शैल खण्ड के मध्य एक छोटी-सी गुफा में 6 इंच व्यास वाला मेंढक बैठा हुआ मिला। मेंढक की बाह्य त्वचा कैल्शियम कार्बोनिक के क्रिस्टलों से ढकी हुई थी। जैसे ही मेंढक का संपर्क बाह्य वातावरण से हुआ वह मर गया।

इसी तरह 1835 में लन्दन में रेलवे लाइन बिछाते समय मजदूरों ने पत्थर के एक खण्ड को तोड़कर एक जीवित मेंढक निकाला था। प्रारम्भ में मेंढक का रंग चमकीला भूरा था, परन्तु 10 मिनट बाद बाह्य वातावरण के संपर्क में आते ही उसका रंग बदल कर काला हो गया। यह मेंढक चार दिन तक जीवित रहा।

सन् 1786-88 के मध्य फ्राँस के ऐक्सिन प्राविन्स में शहर के समीप बृहत् उत्खनन कार्य जोर-शोर से चल रहा था। खान से पत्थर निकाल कर जस्टिम पैलेस का पुनर्निर्माण कराना था। पत्थरों की चट्टानें बालू और मिट्टी की तहों से अलग-अलग परतों में जमीं थी जिन्हें एक के बाद दूसरी परत की खुदाई करके निकाला जा रहा था। 40 फीट की गहराई में से पत्थरों की 11 वीं परत निकाली जा चुकी थी। बालू हटाकर पत्थरों को तोड़ा गया। उसके नीचे पृथ्वी के गर्भ में समाई हुई 300000000 वर्ष पुरानी मानवी सभ्यता के दर्शन हुए। पत्थरों के खम्भे, अर्धनिर्मित पत्थर, सिक्के, लकड़ी से बने हथौड़े की मुठिया, आठ फीट लम्बा और एक इंच मोटा लकड़ी का सुन्दर बोर्ड तथा कई अन्य प्रकार के बुडेन टूल्स को देखकर सभी हतप्रभ हो गये। उनमें से अधिकाँश चीजें एवं डिजाइनें फ्राँस में 18 वीं सदी में, प्रचलित थीं।

तथ्यों को देखते हुए हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि मानव सभ्यता अति पुरातन है और वह जीवाणु से नहीं ब्रह्माण्ड के अन्याय लोकों में निवास करने वाले देव-मानवों से अनुदान में मिली है।


रसायन शास्त्री वैज्ञानिक लेबोशिये (kahani)

फ्राँस के महान रसायन शास्त्री वैज्ञानिक लेबोशिये ही थे। उन्होंने आक्सीजन को ज्वलनशीलता और दो गैसों के मिलने से पानी बनने जैसे आविष्कार कर दिखाये थे। साथ ही वे ऐसे अर्थ शास्त्री भी थे। जिनके प्रतिपादनों ने उस देश की अर्थ व्यवस्था सुधारने में भारी योगदान दिये। राज्य क्रान्ति की उथल पुथल वाले दिनों किसी ने झूठी चुगली करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया। मरने के बाद फ्राँस की विद्वत सभा ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- वह सिर जो एक क्षण में ही काट दिया गया वह फिर से इस देश को नसीब हो, इसकी हजारों वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।


पुरातन चिकित्सा पद्धतियों को नये सिरे से खोजा जाय

“सोशल साइकिट्री आफ लीमा, पेरु” संस्था के डायरेक्टर डा. सी. ए. सीगुयेन ने एक “इन्टर नेशनल कांग्रेस आफ साइकिट्रिस्ट्स” के एक सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि “वास्तविक मानवीय गौरव-गरिमा मानवीय जाति की प्राचीन परम्पराओं में ही निहित है, अतः उसी के पुनर्जागरण और पुनरुत्थान के लिए आज इस बात की आवश्यकता है कि नये सिरे से उसी की खोज की जानी चाहिए।

पैराग्वे में ट्यूपम्वेय नाम के एक विश्व ख्याति के नीम हकीम हैं। इन्होंने अपनी घ्राण-इन्द्रिय को अपने संकल्प बल से इतना अधिक विकसित कर लिया है कि वे अपने गंभीर से गम्भीरतम रोगियों का रोग निदान मात्र उनके पहनने के वस्त्रों को सूंघकर ही करते हैं वस्त्रों को सूंघकर ही रोग का पता लगाते हैं और पुनः उस बीमारी के निदान स्वरूप औषधियाँ निर्धारित करते हैं और परहेज कराते हैं आधुनिक शरीर शास्त्री उनकी इस विलक्षण क्षमता का लोहा मानने लगे हैं। भौतिक विज्ञान जहाँ असफल होता है वहाँ वे मात्र वस्त्रों की गन्ध विशेष को सूंघकर रोग लक्षण ज्ञात कर लेते हैं। अब तक उनके पास जो भी रोगी पहुँचे हैं शत-प्रतिशत रोग मुफ्त हुए हैं।

पुरातन काल के चिकित्सक जड़ी-बूटियों के सूक्ष्म गुणों से अवगत रहते थे। साथ ही रोगी के पथ्य से असाधारण परिवर्तन न करते थे। अपनी बढ़ी हुई संकल्प-शक्ति से रोगी को निश्चित रूप से निरोग होने का आश्वासन दिलाते हैं। यह उपचार पद्धति आधुनिक रोग कीटाणुओं को मारने के प्रयास में स्वस्थ कीटाणुओं को नाश करने की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और हानि रहित थी।

इसी में एक उपचार श्रद्धा प्रयोजन का भी जुड़ता था। दैवी अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के कर्म-काण्ड कराये जाते थे। इनका भी रोगी के मनःक्षेत्र पर तथा पारिवारिक वातावरण पर प्रभाव पड़ता है।

संगीत उपचार इन्हीं अचूक प्रयोगों में ही एक है। संकीर्तन तथा दूसरे प्रकार के गायन वादन रोगी पर अपने अतिरिक्त प्रभाव छोड़ते थे और उसे जल्दी अच्छा करने में सहायक सिद्ध होते थे।

तीसरी प्रकार की एक विचित्र चिकित्सा प्रणाली भी प्रचलित है जिसे एनीमा मैगनेटिज्म (प्राणी की विद्युत) कहते हैं यह शक्ति मनुष्य में जितनी अधिक मात्रा में होती है उतना ही वह प्रभावशाली, तेजस्वी, उत्साही, आत्म-विश्वासी, आशावादी और कार्य कुशल होता है। उसका ओजस्, तेजस्, (aura) उसके चेहरे, आँख, मुँह, नाक और मस्तिष्क द्वारा निकलता रहता है।

चेहरे के अतिरिक्त हाथों और उंगलियों से भी इसकी किरणें निकलती रहती हैं। इस प्रकार का व्यक्ति अपने किसी भी रोगी को स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर सकता है। महापुरुष जीसस जिनके नाम पर आज संसार फूल चढ़ाता है और जिन्हें अत्यन्त आदर से भगवान का अवतार मानकर स्मरण करता है, मात्र अपने हाथ के स्पर्श से किसी भी व्यक्ति के गम्भीर से गम्भीरतम रोग को दूर कर देते थे। महापुरुष जीसस ने रोग मुक्ति के लिए प्रायश्चित विधान भी निश्चित किया था।

इन औपचारिक प्रणालियों के अतिरिक्त एक चिकित्सा प्रणाली मैस्मरेजम पर आधारित है। यूरोप में सबसे प्रथम आस्ट्रिया के वियाना नगर के मैस्मर नामक व्यक्ति ने सन् 1770 में यह सिद्धान्त ढूँढ़ निकाला था। उसी मैस्मर के नाम पर इस विद्या का नाम मैस्मरेजम और इसके प्रयोगकर्ता का नाम मैस्मेराजर प्रचलित हुआ। इस पद्धति के द्वारा रोगोपचार करने की प्रक्रिया का अध्ययन करने के लिए “फ्रैंच एकेडेमी आफ साइन्सेस” ने एक “इन्डवायरी कमेटी” का गठन किया। अध्ययन के दौरान रोगियों के उपचार करने में मैस्मर की प्रणाली पूर्ण रूपेण सफल होती पाई गयी। मैस्मर की प्रणाली पूर्ण रूपेण सफल होती पाई गयी। मैस्मर ने कमेटी के एक साक्षात्कार में बताया कि वह ईथर की शक्ति जो आकाश में विद्यमान है, जिस पर संकल्प की तरंगें भरी पड़ी हैं अतः आकर्षण शक्ति से उस संकल्प शक्ति, चुम्बकत्व शक्ति को आकर्षित करता है। जिससे अपने रोगियों का उपचार करता है।

“मैस्मरेज्म” चिकित्सा प्रणाली से ही आगे चलकर “हिप्नोटिज्म” चिकित्सा प्रणाली का विकास हुआ। मैनचेस्टर के एक डाक्टर ब्रेड न सन् 1841 में यह अनुभव किया कि कृत्रिम निद्रा को उत्पन्न करके रोगी के रोग की सूचना Suggestion (सुझाव) द्वारा निवृत्त किया जा सकता है। कृत्रिम निद्रा को हिप्नोसिस कहते हैं, इसलिए इसी के नाम के आधार पर इस चिकित्सा प्रणाली का नाम हिप्नोटिज्म पड़ा और इस विधा के प्रयोगकर्ता का नाम हिप्नोटिस्ट प्रचलित हुआ। इस चिकित्सा प्रणाली के आधार पर एक लड़की के रोग का निवारण सफलतापूर्वक हो जाने से अत्यधिक प्रभावित हुई। अतः उस मैरी बेकर एड्डी नामक लड़की ने एक नवीन चिकित्सा प्रणाली का प्रचलन किया जिसका नाम “क्रिश्चियन साइंस” रखा।

अतीन्द्रिय क्षमताओं का पाश्चात्य प्रयोग उत्साहवर्धक परिणाम उत्पन्न कर रहा है। यह शुभ लक्षण है और उस आवश्यकता का प्रतिपादन करता है कि हमें पुरातन चिकित्सा पद्धतियों की अन्यान्य पक्षों की गम्भीर शोध करके जनसाधारण की शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्त करने की उपयोगी पद्धतियाँ खोज निकालनी चाहिए।


दधीचि पुत्र पिप्पलाद (kahani)

दधीचि पुत्र पिप्पलाद ने जब माता से अपने पिता की देवताओं द्वारा अस्थियाँ माँगे जाने और उनके बने वज्र से अपने प्राण बचाने का विवरण सुना, तो उन्हें देवताओं के प्रति बड़ी घृणा उपजी। अपना स्वार्थ साधने के लिए दूसरों के प्राण हरण करने का छल करने वाले यह कितने नीच हैं। इनसे पिता को सताने का बदला लूँगा।

पिप्पलाद तप करने लगे। लम्बी अवधि तक कठोर तपश्चर्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और बोले- ‘वर माँग।’

पिप्पलाद ने नमन किया और बोले- ‘देव प्रसन्न है, तो अपना रुद्र रूप प्रकट कीजिए और इन देवताओं को जलाकर भस्म कर दीजिए।’

शिव स्तब्ध रह गये, पर वचन तो पूरा करना था। देवताओं को जलाने के लिए तीसरा नेत्र खोलने का उपक्रम करने लगे। इस आरम्भ की प्रथम परिणति यह हुई कि पिप्पलाद का रोम-रोम जलने लगा। वे चिल्लाये- ‘बोले भगवन्! यह क्या हो रहा है? ‘देवता नहीं, उल्टा मैं जल रहा हूँ।’

शिव ने कहा- ‘देवता तुम्हारी देह में ही समाये हुये हैं। अवयवों की शक्ति उन्हीं की सामर्थ्य है। देव जलें और तुम अछूते बच रहो यह नहीं हो सकेगा। कपड़ों में आग लगाने वाला स्वयं ही जल मरता है।

पिप्पलाद ने अपनी याचना लौटा ली। शिव ने कहा- ‘देवताओं ने त्याग का अवसर देकर तुम्हारे पिता को कृत-कृत और तुम्हें गौरवान्वित किया है। मरण तो होता ही, न तुम्हारे पिता बचते न काल के ग्रास से वृत्रासुर बचा रहता। यश गौरव प्राप्त करने का लाभ प्रदान करने के लिए देवताओं के प्रति कृतज्ञ होना ही उचित है।

पिप्पलाद का भ्रम दूर हो गया। उनकी तपस्या आत्म-कल्याण की दिशा में मुड़ गयी।


दैनिक जीवन में क्रियाशील “टैलीपैथी”

विचार सम्प्रेषण को यों अभ्यास द्वारा उच्च शक्ति सम्पन्न भी बनाया जाता है पर दैनिक जीवन में भी उसके प्रमाण कम नहीं मिलते। वे घनिष्ठ प्रियजनों के बीच आन्तरिक एकात्मा के आधार पर एक की बात दूसरे तक पहुँचाते रहते हैं। इसमें टेलीफोन, टेलीविजन जैसे उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती। आन्तरिक घनिष्ठता ही यह कार्य सहज सम्पन्न कर देती है।

उत्तरी इंग्लैण्ड के कॉनिस्टन वाटर शहर की घटना है। श्रीमती जॉन सेवर्न सन् 1880 की एक प्रातः अत्यधिक व्यग्र-व्यथित और उत्तेजित अवस्था में सोने से यकायक चौंक कर जाग पड़ीं। उन्हें ऐसा जान पड़ा कि मानो किसी ने मुख पर तीव्र घूँसा प्रहार किया है जिससे निचला ओठ पूरी तरह दाँतों तले कट चुका है। अतः बहते हुए खून को रोकने के लिए आँखें मलते हुए हड़-बड़ाहट रूमाल ढूंढ़ा और ज्यों ही ओठ के बहते रक्त को पोंछकर रूमाल को आँखों के सामने लायी, तो उसमें यत्किंचित् भी खून का निशान न पाकर वह और भी हक्की-बक्की रह गयी। इस अनिश्चय की स्थिति में ज्यों ही दर्पण में अपना मुँह देखा तो किसी भी प्रकार की चोट लगने एवं ओठ कटने जैसी बात नजर नहीं आई। इससे तो उनकी हैरानी और भी बढ़ गई। पति आर्थर के बिस्तर पर नजर डाली तो बिस्तर खाली पाया। घड़ी पर नजर डाली तो पाया कि प्रातः के 9 बज रहे हैं। अतः उसने समझा कि वह प्रातः नौका विहार के लिए चला गया है। वह बड़ी असमंजस और उधेड़ बुन की धुन में गृह कार्यों में लग गई।

आर्थर के लौटने पर नाश्ते के लिए मेज लगायी इसी बीच उसने पाया कि उसका पति उसके रूमाल को बार-बार अपने मुँह से लगा रहा है जिज्ञासा वश उसने पूछ ही लिया कि आज क्या मजाक सूझी है जो मेरे रूमाल का बार-बार चुम्बन ले रहे हो। इस पर चेहरे पर अत्यधिक विषाद लाते हुए कहा कि आज मुझे नया जीवन मिला है, नौका विहार करते समय यकायक समुद्री चक्रवातीय झंझावात में वह बुरी तरह से फंस गया। हवा के तीव्र वेग से उत्पन्न उत्ताल तरंगों के बीच अथाह जल-राशि में नौका अपने असन्तुलन को खोकर डगमगाने लगी। इस विपन्नावस्था में नाव में बैठे हुए-कृषक के ऊपर गिरा, वह भी जीवन-मौत की क्षणों से गुजर रहा था। अतः रोष में आकर उसने मेरे मुँह पर एक तीव्र प्रहार किया, जिससे निचला ओठ दाँतों तले आ जाने से रक्त-रंजित हो गया था। मैं तुम्हारी सहायता पाने के लिए छटपटाने लगा। इसी बीच धीरे-धीरे चक्रवात का प्रकोप शान्त हुआ, तब कहीं जाकर जान में जान आई और घर की राह ली।

इस प्रकार का आत्मिक चमत्कार विचार सम्प्रेषण की अनेकों घटनाओं का उल्लेख “कानिस्टन वाटर इपीसोड” नाम के शोध-निबन्ध में किया गया है, जिसमें हजारों ही घटनायें परीक्षा करने पर सत्य सिद्ध हुई हैं।

कुछ लोग इस प्रकार की घटनाओं को अतीन्द्रिय क्षमताओं के विकास की फलश्रुति मानते हैं, तो फ्राँस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक कैमायल-फ्लैमेरियन अपने प्रसिद्ध शोध ग्रन्थ “लिनकोनू” में टैलीपैथी नाम देते हैं। उन्होंने इस ग्रन्थ में उल्लेख किया है कि “टैलीपैथी” उस विधा का नाम है जिसके अंतर्गत किसी दूरस्थ व्यक्ति की भाव-सम्वेदनाओं वैचारिक निर्देशों से प्रभावित किया जा सके। इस तथ्य को उन्होंने एक घटना के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। एक बार गृह मालिक की अनुपस्थिति में एक गृहिणी ने अपनी मित्र-मण्डली को अपने घर पर सामूहिक प्रीति-भोज के लिए आमन्त्रित किया। संयोग वश उस दिन उसका पति शिकार के लिए जंगल में गया हुआ था। यद्यपि आज का दिन अत्यधिक शान्त स्वच्छ आकाश व सुहावना मौसम था। यकायक ‘डाइनिंग रूम’ की पहले से ही खुली खिड़की तीव्र आवाज के साथ बन्द हुई और पुनः तीव्र आवाज के साथ खुल गई।

गृहिणी के हृदय में अपूर्व स्पन्दन होने लगा, उसकी मनोदशा यकायक विलक्षण हो गई। उसने अपने मित्रों को विदा करते हुए कहा कि आज कुछ अनहोनी अप्रत्याशित दुःखद घटना घटित हुई है, इसको सुनने के लिए मुझे तैयार रहना है। मुश्किल से पौन घण्टा बीता ही था कि उसके पति का मृतक शरीर लाया गया जिसकी किसी व्यक्ति ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

इस प्रकार डा. फ्लैमेरियम का कहना है कि टैलीपैथिकी घटना वह होती है जिसमें किसी दूरस्थ स्थान से किसी भावी विपत्ति की सूचना दे दी जाती है। इस प्रकार की घटनाओं के हजारों उदाहरण पाए गए हैं, इनमें से अत्यधिक महत्वपूर्ण घटनाओं को- उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘लिनकोन्यू’ में रिकार्ड किया है।

इस प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘लिनकोन्यू’ में सर्वाधिक चर्चित एवं प्रामाणिक घटना फ्राँस की है। फ्राँस के थल सेना के कैप्टन सेनेगल सन् 1886 में एक रात्रि को 11.30 बजे पर अपने बिस्तर पर प्रगाढ़ निद्रा में सोए हुए थे इसका उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि तभी मैंने यकायक यह महसूस किया कि किसी ने मेरी छाती पर अत्यधिक दबाव डाला, जिससे तहस-नहस हो मैं अत्यधिक भयभीत हो गया। जब आँख मलते हुए कुहनी के बल बिस्तर से उठा और इधर-उधर निगाह डाली तो अपनी बूढ़ी दादी माँ यह कहते हुए दिखाई पड़ी “मेरे प्रिय मुन्ने, मैं तुझे अन्तिम अलविदा करने आई हूँ, अब तू मुझे फिर कभी नहीं देख सकेगा।” जैसे ही मैं उस छाया-प्रकाश की तरफ आगे बढ़ा, वैसे ही वह अदृश्य हो गया। मैं यह सभी देख सुन स्तम्भित सा रह गया। निश्चित रूप से यह स्वप्न नहीं था।” उन्होंने आगे अत्यधिक विस्मित होते हुए बताया कि मुझे आश्चर्य तो तब और अधिक बढ़ गया जब प्रातः टेलीग्राम से रात्रि के 11.30 बजे दादी माँ की मृत्यु यह कहते हुए हुई कि मृत्यु की गोद में जाने से पूर्व मैं अपने मुन्ने को अब कभी नहीं देख सकूँगी।” श्री फ्लैमेरियम ने इस प्रकार की घटनाओं का जहाँ उल्लेख किया है वहाँ ठोस प्रमाण और पुष्टियाँ भी दी हैं।

“बीयोन्ड टैलीपैथी” ग्रन्थ के प्रसिद्ध विद्वान लेखक एन्द्रिजा पुहेरिच ने बोस्टन शहर के एक बैल्डिंग करने वाले कर्मचारी जैक सुलेवन के जीवन की एक आश्चर्यजनक घटना का विवरण देते हुए लिखा है कि एक बार जब वह वाशिंगटन नगर की एक स्ट्रीट में कार्य कर रहा था जहाँ पर अन्य कोई सहायक उस समय उसके पास नहीं था, दुर्भाग्य से उसका पैर कीचड़ की नाली में फिसल गया। फिर क्या था शारीरिक यन्त्रणाओं में जिन्दगी मौत से जूझते हुए प्राण रक्षा के लिए छट-पटा रहा था उसे इस विपन्नावस्था में अपने मित्र भिट्टेकर की याद आ रही थी, जिसने हर संकट में विपत्ति मुसीबत में साथ दिया था, मृत्यु से पहले वह उससे मिलना चाहता था। भिट्टेकर के हृदय में यकायक स्फुरणा होने लगी, उसे एकदम अपने घनिष्ठ मित्र सुलेवन की याद आयी, उसे उस रोज पता नहीं था कि सुलेवन आज कहाँ कार्य कर रहा है। उसके मस्तिष्क में रह-रहकर ये विचार कौंध रहे थे कि वाशिंगटन स्ट्रीट में कोई अप्रत्याशित घटना घट रही है उसे ऐसा लग रहा था मानो कि उस दिशा में उसे कोई खींचे लिए जा रहा है। वह अपनी ड्यूटी के कार्य भार को ज्यों का त्यों छोड़कर आनन-फानन में वाशिंगटन स्ट्रीट में दाखिल हुआ, वहाँ उसने देखा कि बैल्डिंग करने वाली जनरेटर मशीन चल रही है, किन्तु चालक कर्मचारी कोई भी नजर नहीं आया। अत्यधिक घबराहट और हड़-बड़ की स्थिति में उसने उन सड़क का नक्शा तैयार किया। तभी उसे नाली के गन्दगी लगे ढेर में किसी के छटपटाने और तड़पने जैसा दिखाई दिया। कोई व्यक्ति हाथ को ऊपर किये सहायता के लिए संकेत कर रहा था। पास पहुँचकर अपने प्रिय मित्र सुलेवन को अर्ध मृतक और अचेतन अवस्था में उस कीचड़ से निकाला।”

ऐसे सहज स्वाभाविक प्रसंग घनिष्ठता के आधार पर अनायास ही घटित होते रहते हैं। अभ्यास के द्वारा इसे और भी अधिक विकसित किया जा सकता है।


उद्धत यौनाचार के भयावह दुष्परिणाम

विवाह के साथ ही नर-नारी के बीच यौन सम्बन्धों की छूट मिलती है और उनमें ही यह प्रतिबन्ध है कि वह पतिव्रत और पत्नीव्रत की मर्यादाओं के अनुरूप ही चलें। जब सन्तानोत्पादन की आवश्यकता दोनों पक्ष समान रूप से अनुभव करें तभी उस प्रसंग में हाथ डाला जाय अन्यथा हंसी विनोद हास परिहास जैसे क्रीड़ा कौतुकों से प्रेम प्रदर्शन का उद्देश्य पूरा कर लिया जाय। स्नेह और सहयोग दिनचर्या के प्रत्येक क्रिया-कलाप में समन्वित रखा जा सकता है और उतने भर से दाम्पत्य-जीवन में उल्लास एवं उत्साह बना रह सकता है।

सृष्टि के सभी जीव जन्तु इस मर्यादा का पालन करते हैं। उनमें से अधिकाँश वर्ष में एक बार ही प्रजनन प्रयोजन के लिए इस ओर कदम बढ़ाते हैं। बुद्धि हीन होते हुए भी वे प्रकृति अनुशासन का पालन करते हुए साथ-साथ रहते हुए इस मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते।

अकेला मनुष्य ही है। जो इस अनुबन्ध का उल्लंघन करता है और यौनाचार को मनोरंजन का विषय बनाता है। प्रजनन अंगों की संरचना ऐसी है जिनका यौनाचार के निर्मित न्यूनतम उपयोग ही किया जाना चाहिए। तो भी मात्र अपने जोड़ीदार के साथ। इसका उल्लंघन करने से स्वास्थ्य खोखला होता है। तेज और सौंदर्य घटता है, जीवनी शक्ति में कमी पड़ती है। फिर कहीं यदि इस संदर्भ से मर्यादाओं का उल्लंघन चल पड़े। नर नारी अनेकों को अपना साथी बनाने और उच्छृंखलता बरतने लगें तो यौन रोगों की उत्पत्ति होना स्वाभाविक है। पारस्परिक सद्भावना और विश्वास पात्रता घटती है। इतना ही नहीं अनाचार की ओर देखने-सुनने वालों का भी मन चलता है और वह श्रृंखला बढ़ते चलने पर पारिवारिक ही नहीं सामाजिक जीवन का भी ढाँचा बटोर देती है। सन्तान पर बुरा असर पड़ता है और आर्थिक अपव्यय का एक नया द्वार खुलता है। इस सबमें बड़ी बात है कि अनेकों के साथ दाम्पत्य संपर्क स्थापित करने का प्रतिफल भयंकर यौन रोगों के रूप में सामने आते हैं। जो जीवन भर कष्ट देते हैं। उनका स्थायी उपचार भी नहीं हो पाता। एक पक्ष इस प्रकार के रोगों से ग्रसित हो तो उसकी छूत दूसरे पक्ष को लगती है। सन्तानोत्पादन का क्रम चल पड़े तो नवजात शिशु भी उस वंश परम्परा को साथ लेकर आते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी वह अभिशाप त्रास देता रहता है। व्यभिचारी और व्यभिचारणियाँ प्रायः इस प्रकार के रोगों के शिकार पाये जाते हैं। वेश्याओं के यहाँ इस व्यथा का उत्पादन होता है और उसकी बेल इतनी लम्बी चलती है कि वह न जाने कितनों को अपनी चपेट में लेकर विनाशकारी दुष्परिणाम उत्पन्न करती है। जिन देशों या समाज में यौन स्वेच्छार पनपता है उसके पारिवारिक जीवन में आशंका अविश्वास और कलह के केंद्र रहते ही हैं साथ ही यह भयंकर रोग परम्परा इस तेजी से पनपती है कि दोषियों के साथ-साथ निर्दोष भी गेहूँ के साथ घुन की तरह पिसते हैं। पाश्चात्य देशों में यह व्यथा बेतरह बढ़ती जा रही है क्योंकि वहाँ दाम्पत्य मर्यादाओं का पालन अनिवार्य नहीं समझा जाता।

प्रथम विश्वयुद्ध के उपरान्त युवकों और प्रौढ़ों का बहुत बड़ी संख्या में संहार हुआ। फलतः आश्रितों की भावनात्मक और आर्थिक स्थिति को भारी आघात लगा। नारियों की तुलना में नर बहुत कम रह गये। अनाथ महिलाओं के सामने पारिवारिक निर्वाह की एक विकट समस्या के रूप में सामने आयी, फिर वे भावनात्मक सहयोग का अभाव भी अनुभव करने लगीं। इन दोनों कर्मियों की सहज पूर्ति यौन स्वेच्छाचार अपनाने से होती थी। इसलिए वह अधिक सस्ता और व्यापक होता चला गया। दाम्पत्य मर्यादाएं नहीं के बराबर रह गईं।

इस कुप्रचलन के जहाँ अन्यान्य दुष्परिणाम सामने आये वहाँ एक महान संकट यौन रोगों के रूप में सामने आया प्रदर, प्रमेह, स्वप्न दोष जैसे सामान्य रोगों से व्याधि उन महारोगों तक फैली जिन्हें सुजाक था ‘सिफलिस’ कहते हैं। छोटे रोगों को तो लोग गुपचुप भी सहन करते रहे, पर ‘सिफलिस’ वैसा रोग नहीं हैं जो छिपाये छिप सके। उसमें लगभग कोढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इतना ही नहीं उसमें ज्ञानेन्द्रियाँ सड़ने गलने लगती हैं और रक्त में उस रोग के विषाणुओं की अभिवृद्धि से सारे शरीर में व्रण विस्फोट होने लगते हैं। इससे भी बड़ी बात है कि वह छूत की बीमारियों में अग्रणी होने से एक से दूसरे को दौड़कर लगता है और निर्दोष भी असावधानी के कारण इस संक्रामक व्यथा के चंगुल में जकड़ जाते हैं और अपने संपर्क क्षेत्र इसी आग में झुलसते हैं।

सन् 1914 ये 1919 तक चले प्रथम विश्व महायुद्ध का दौर प्रायः यूरोप के देशों में रहा। विशेषतया जर्मनी के निकटवर्ती देशों में। इसलिए युद्ध के उपरान्त अन्य समस्याओं के अतिरिक्त व्यभिचार के और तज्जनित व्यभिचार की बाढ़ आई। लगे हाथों संक्रामक रोग ‘सिफलिस’ भी उबल पड़ा। जिनने उसका दुष्परिणाम देखा वे ऐसे रोगियों को साक्षात् यमदूत समझकर अपना प्राण बचाने के लिए घबराने और दूर रहने लगे।

जेल में एक पादरी की मृत्यु इसी रोग से हुई। एक से दूसरे में इसकी भयंकरता की जानकारी अफवाहों के साथ फैली, फलतः उस जेल के कैदी कहीं अन्यत्र तबादले के लिए आग्रह करने लगे। चूँकि चर्चा दूर-दूर तक फैल चुकी थी, इसलिए जहाँ भी उनके तबादले होते थे वहाँ के कैदियों ने उन्हें अपने यहाँ न आने देने का हठ ठान लिया। अन्त में उस सिर दर्द से कैदियों को मुक्त करके अधिकारियों ने किसी प्रकार अपना पीछा छुड़ाया।

बात कैदियों की नहीं गली-मुहल्लों की थी। एक ही छोटे कस्बे में करीब 2000 रोगी ऐसे पाये गये, जिनकी बीमारी प्रत्यक्ष दिखती थी। उन्हें कोई घर में रखने को तैयार न हो रहा था। अस्पतालों के डाक्टरों ने भी उनका इलाज करने से इनकार कर दिया। ऐसी दशा में उनके लिए किसी पुराने किले का खण्डहर निवास ग्रह बनाया गया। डाक्टर वहीं एक जगह खाने और लगाने की दवाएं रखवा देता था। शासन भी भोजन वस्त्र का ऐसा प्रबन्ध कर देता था कि एक स्टोर से वे लोग स्वयं ही अपने काम की चीजें निकाल लिया करें। जिन्हें प्रबन्धक नियुक्त किया गया था वे भी अपनी लम्बी छुट्टी लेकर चले गये या स्तीफे भेज दिये।

वैज्ञानिक शोधों ने इसे अच्छा करने की तो नहीं पर किसी सीमा तक दबाने की औषधियाँ निकालीं। प्रतिबन्धों के बीच पीड़ित भारी संख्या में मरे और इसके उपरान्त वर्षा थमने की तरह रोगों की भयंकरता घटी पर उसके जीवाणु एक-दूसरे को प्रभावित करते रहे।

इस संकट को युद्ध का अभिशाप माना गया। सैनिकों के गली मुहल्लों में प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध लगाये गये। बड़े जन संपर्क वाले कारखानों में इसकी डाक्टरी जाँच जल्दी-जल्दी होने लगी। महिलाओं के लिए अलग से अस्पताल बने। जन साधारण को इस भयंकरता से परिचित कराया गया तो एक शताब्दी में यह तूफान किसी प्रकार रुका और सामान्य स्थिति बनी।

इसके बाद दूसरा महायुद्ध आ धमका। उनने भी वही पुरानी परिस्थितियों को नया जीवन दिया। इस बीच एक और नया व्यसन पनपा ‘समलिंगी यौनाचार’ का। पुरुष पुरुषों से और स्त्रियाँ स्त्रियों से अपनी उच्छृंखल आदत का किसी प्रकार समाधान करने लगीं। सोचा क्या था कि कदाचित उससे वह पुरानी व्यथा न उभरेगी और व्यसन को भी तृप्ति मिलती रहेगी।

यह प्रयास और भी अधिक अप्राकृतिक होने के कारण नये रूप में उभरा इस नये रोग का नाम ‘एड्स’ (ए. आय. डी. एस.) अर्थात् एक्वायर्ड इम्यूनो डेफीशिएन्सी सिप्ड्रोम रखा गया। ऐन्टीवायटिक्सो के नये आविष्कारों ने सिर्फ इतनी ही मदद की कि पुराने लक्षणों को नया रूप दे दिया।

इस रोग का रोगी अपने स्नायु समूहों की क्षमता तथा ज्ञान तंतुओं की क्षमता खोता चला जाता है और कुछ ही सप्ताह में पक्षाघात पीड़ित की तरह अपंग हो जाता है। इसी स्थिति में उसकी मृत्यु हो जाती है। अच्छाई इतनी ही है कि रोगी को बहुत दिन पैर नहीं पटकने पड़ते। इलाज पर ज्यादा खर्च नहीं कराना पड़ता और जल्दी ही परलोक की टिकट कटा लेता है।

पिछली बार ‘सिफलिस’ का दौर यूरोप तक सीमित रहा और क्योंकि तब तक आवागमन के साधन सीमित थे और औद्योगीकरण, पर्यटन भी इतना नहीं बढ़ा था कि उस कारण ‘सिफलिस का क्षेत्र विस्तार हो सके। इसके लिए गोरों को ही चरित्र भ्रष्ट माना जाता था और युद्धोन्माद का दुहरा दण्ड भुगतते हुए देखा जाता था। पर अभी तीसरा युद्ध नहीं आया। जहाँ-तहाँ छुट-पुट लड़ाइयाँ ही चलीं किन्तु अन्य कारणों में आवागमन बढ़ गया। यह प्रायः सम्पन्न होते हैं और नई-नई जगहों में नये-नये प्रकार से व्यसन को भुनाना चाहते हैं। फलतः नया रोग ‘ए. आय. डी. एस.’ अब क्रमशः विश्वव्यापी होता चला जा रहा है। उसने अपनी लपेट में एशिया को भी ले लिया है। सिंगापुर, थाईलैण्ड एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र बनता जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय तस्करी का भी वह अड्डा बनता जाता है साथ ही व्यभिचार का केन्द्र भी। इसका प्रतिफल स्पष्ट है। उधर से इस रोग के बीज लेकर लोग अपने-अपने यहाँ वापस लौटते हैं और फिर अपने परिवार पड़ौस को इस उपहार का वितरण करते हैं।

प्लेग हैजा की तरह द्रुतगति से इसका विस्तार नहीं होता और न लक्षण ही इतने स्पष्ट प्रकट होते हैं। जानकारी तब मिलती है जब पानी सिर के ऊपर होकर उतर जाता है। पोशाकों का फैशन जैसे जल्दी-जल्दी बदलता रहता है और उसकी नकल यहाँ से वहाँ होती रहती है उसी प्रकार अब रोगों का प्रचलन भी चित्र विचित्र रूप में आता है। पूर्वकाल में यौन रोग नपुँसकता के तथा दुर्गन्धित स्रावों के रूप में उपजते थे। पीछे वे सुजाक आतशक के रूप में बदल गये। जब तक इनकी रोकथाम के कुछ उपाय खोजे गये तब तक नये रोग एड्स की भयंकरता सामने आ गई है। उसकी पहुँच संसार के कोने-कोने में पहुँचती जाती है, पर्यवेक्षण से पता चला है कि अब इस रोग के रोगी लाखों की परिधि पार करके करोड़ों में पहुँच चुके हैं और अभी कोई कारगर उपाय इसका नहीं खोजा जा सका। जब तक खोजा जायेगा तब तक प्रचलित उद्दण्डता के कारण उसका कोई और रूप सामने आ उपस्थित होगा।

कोलंबस अमेरिका की खोज में गया था। वहाँ रैड इंडियन महिलाओं से संपर्क साधा और लौटने पर इस प्रकार सड़ा कि जननेन्द्रिय से लेकर पेट तक बुरी तरह सड़ गया था।

अमेरिका की सभ्यता में रजनीश आश्रम में भी शिष्य और शिष्याएं बड़ी संख्या में रहते हैं। उनकी शिक्षा भी ‘संभोग में समाधि’ की है। ऐसी दशा में उन्हें भी अपने परिवार में यह शिक्षा बहुत जोर देकर देनी पड़ी है कि जोड़े बार-बार न बदले जांय।

अभिनव ‘एड्स’ रोग पर नियन्त्रण कब तक हो सकेगा। इसका उत्तर एक ही है कि यौन सदाचार को अनिवार्य मानने वाली पुरातन दम्पत्ति परम्परा को अपना कर परिवार को स्वर्ग बनाने से इनकार किया जाता रहा तब तक उस क्षेत्र को नरक की अनेकानेक व्यथाओं वेदनाओं से मुक्त नहीं रखा जा सकता। इन अभिशापों में ‘एड्स’ जैसे यौन रोगों की अभिवृद्धि तो निश्चित ही है। हम अपने दुष्कर्मों का प्रतिफल हाथों हाथ भुगतेंगे ही।


जलयान (kahani)

उन दिनों नौकानयन ही प्रचलित था। बड़े जलयान नहीं बने थे। उनकी कल्पना और योजना राबर्ट फुल्टन ने नैपोलियन के सामने रखी तो वह आग बबूला हो गया और एक शब्द कहकर प्रस्तोता को भगा दिया कि मेरे पास ऐसी बकवास सुनने के लिए समय नहीं है।

डबलिन की रॉयल सोसायटी के इंजीनियर लारेसकर इन दिनों जाने माने शिल्पी थे। जलयान के बारे में उनने भी यह मत व्यक्त किया कि इस आधार पर एक मनोरंजन का खिलौना भर बन सकता है। इसके द्वारा अटलाँटिक पार करने की बात सर्वथा बचकानी है।

सभी जानते हैं कि इस प्रकार के विरोध और उपहास के बावजूद जलयान बने और पूरी तरह सफल हुए।


नोस्ट्राड्रेमस की भविष्य वाणियाँ

फ्राँस में जन्मे महाप्राज्ञ नोस्ट्राड्रेमस का जन्म 1503 में और मरण 1555 में हुआ। वे डाक्टर आफ मेडीशन की उपाधि से अलंकृत थे। उनकी भविष्य वाणियाँ इतनी सही बैठती थीं कि तत्कालीन फ्राँस सम्राट चार्ल्स नवम उनके प्रति अत्यन्त श्रद्धावान रहे और अपने प्रमुख दरबारियों में उनकी नियुक्ति की।

नोस्ट्राड्रेमस ने अपने जीवन में एक पुस्तक लिखी ‘सेंचुरीज’ उसमें शताब्दियों के भावी घटनाक्रमों का वर्णन है। विगत 400 वर्षों में जो कुछ उनने लिखा है यह घटनाक्रम की दृष्टि से सही उतरता आया है। फलतः भविष्य में जो घटित होने वाला है उसके संबन्ध में भी उसके कथन को विश्व की अधिकाँश विज्ञजन विश्वास योग्य मानते हैं।

पुस्तक की मूल प्रति फ्राँस के राष्ट्रीय पुस्तकालय में सुरक्षित है। उसके कई भाषाओं में अनुवाद तथा प्रकाशन हुए हैं। उसे संसार की बहुचर्चित प्रतिष्ठा प्राप्त पुस्तक माना जाता है। हिटलर ने पुस्तक की लोकप्रियता देखते हुए कुछ अंश इस प्रकार छापे थे जिससे उसका पक्ष समर्थन होता था। पर वस्तुतः पुस्तक में उल्लेख का प्रतिकूल है। उसमें लिखा है कि “हिटलर और नाजी असंख्य यहूदियों की हत्या करने के बाद दुनिया से स्वयं भी समाप्त हो जायेंगे”

नोस्ट्राड्रेमस की फ्राँस से बाहर नहीं गये इसलिये कहीं की तात्कालिक परिस्थितियों के आधार पर भविष्य का अनुमान लगाना उनके लिये कठिन था। फिर भी उपरोक्त पुस्तक में उनने जो लिखा है वह आश्चर्य रीति से घटित होता चला गया है। फ्राँस के राष्ट्रपति मितराँ ने सन् 1983 में दी गई एक भेंट वार्ता में स्पष्ट रूप से कहा था कि वे “सेंचुरीज” पुस्तक के एक श्रद्धावान पाठक हैं।

जो घटनाऐं सही घटित हो चुकी हैं जो होने वाली हैं उसका विस्तृत विवरण जानने के लिये अंग्रेजी में प्रकाशित उनकी मूल पुस्तक को ही पढ़ना होगा। पर यहाँ ऐसा कुछ अति संक्षेप में लिखा जा रहा है जिसकी इन दिनों हम भारतीयों को दिलचस्पी हो सकती है।

उसके कुछ प्रसंग इस प्रकार है-

“विश्व में 20 वीं शताब्दी के उपरान्त उस देश का वर्चस्व होगा जिसकी सीमा पर तीन समुद्र मिलते हैं और जहाँ “गुरुवार को पवित्र दिन माना जाता है” (ऐसा देश हिन्दुस्तान ही हो सकता है। दक्षिण भारत में तीन समुद्रों की सीमाएं मिलती हैं और हिन्दुओं का पवित्र दिन गुरुवार है।)

“मुसलमान वर्ग ईसाइयों के शिकंजे में फंस जायेगा। और उसकी अपनी कोई स्वतंत्र भूमिका न रहेगी।

हिन्दुस्तान और यूरोप के संबंध घनिष्ठ हो जायेंगे। और बात यहाँ तक बढ़ेगी कि इस गुट में रूस भी सम्मिलित हो जायेगा।

-सन् 1999 में 7 वर्ष तक भारी उथल-पुथल के रहेंगे और संसार की परिस्थितियों में भारी हेर-फेर हो जायेगा।

-इसी अवधि में एक निर्णायक युद्ध होगा जिसमें 2 लाख 50 हजार हिन्दु मरेंगे पर अन्त में विजय उन्हीं की होगी।

-‘‘हिन्दू धर्म विश्व धर्म बनेगा और वेद मन्त्रों से ब्रह्माण्ड गूंजेगा। भारत विश्व का मार्गदर्शक बनेगा।”

इन भविष्य वाणियों के संबन्ध में आज तो अनुमान ही समाया जा सकता है। पर हैं वे सभी आश्चर्य जनक और अद्भुत।


Quotation

किसी मित्र के लिये स्वयं को मिटा देना इतनी कठिन बात नहीं है जितनी कि ऐसा मित्र पाना जिस पर अपने को निछावर किया जा सके।

-होम


छाया पुरुष- हमारा समर्थ सूक्ष्म शरीर

मरणोत्तर जीवन के उपरान्त कितनी ही आत्माऐं प्रेत या पितर के रूप में अपने, अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं। पर अन्वेषकों ने ऐसा भी पाया है कि जीवित व्यक्ति भी अपने “ईथरीक डबल” का परिचय प्राप्त करते हैं। इसे पुरातन ग्रन्थों में छाया पुरुष कहा गया है। दर्पण की सहायता से अपनी काया को एक अन्य काया के रूप में अनुभव करने से कुछ समय उपरान्त यह छाया पुरुष न केवल पृथक में दृष्टिगोचर होने लगता है, वरन् कई बार एक सहायक की तरह हाथ बटाने सहयोग देने में उसकी सत्ता काम करती हुई दिखाई पड़ती है।

यह छाया पुरुष अपना ही सूक्ष्म शरीर है जो जीवन काल में आमतौर से काया के साथ गुंथा रहता है और उसका परिचय यदा-कदा ही मिलता है। कई बार ऐसे स्वप्न आते हैं कि हम कहीं गये हैं या कोई हमारे पास आया है। उनमें जो वार्तालाप हुआ है यह सर्वथा सार्थक था। बताई या देखी हुई घटनाऐं सर्वथा सही निकलीं।

मृतात्माओं से संबन्ध बनाना, उनसे वार्तालाप करना या सहयोग लेना पूर्णतया अपने हाथ में नहीं होता। इसमें उन आत्माओं का सहयोग भी चाहिए। वे अन्यत्र जन्म ले चुकी हों या सहयोग न करना चाहें तो वे प्रयोग सफल नहीं होते। पर अपने ही छाया पुरुष को साधने का अभ्यास किया जाय तो उनकी सत्ता का परिचय तो मिलने ही लगता है। वह क्या सहयोग कर सकता है, यह इस बात पर निर्भर रहता है कि उसके पीछे आत्मबल का कितना अनुपात है।

ऐसी घटनाएं तो पूर्वकाल में भी घटित होती थीं पर उन्हें मति विभ्रम (इल्यूजन) या दिवा स्वप्न कह कर टाल दिया जाता था। पर जब चूँकि इस विषय पर व्यापक खोज-बीन होने लगी है और परा मनोविज्ञानियों ने ऐसे घटनाक्रमों का संकलन और पर्यवेक्षण करना आरम्भ किया है तो प्रतीत हुआ है कि यह भी अन्तराल की एक विशेष क्षमता है। कितने ही व्यक्ति अदृश्य दर्शन, भविष्य कथन आदि की क्षमताएं विशेष प्रयत्नपूर्वक अर्जित करते हैं पर कितनी ही ऐसे भी होते हैं जिनमें ऐसी अद्भुत क्षमताएं अनायास ही उभर आती हैं। भारतीय मान्यताओं के आधार पर यह किसी पुरातन अभ्यास का प्रतिफल होना चाहिए। जो पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं करते, वे भी मनुष्य को अति मानवी-अतीन्द्रिय क्षमताओं को अनेक प्रमाणों के आधार पर मान्यता देते हैं। उनका विचार है कि कुछेक व्यक्तियों में ऐसा उभार अनायास भी हो सकता है भले ही उसका कारण कुछ भी क्यों न हो?

योग साधना में अन्य देवी देवताओं या आत्माओं को सिद्ध करने की अपेक्षा अपने ही छाया पुरुष को सिद्ध कर लेना अधिक सरल है। भले ही उसकी सामर्थ्य प्रत्यक्ष शरीर के अनुरूप प्रकृति की सीमा में या स्वल्प ही क्यों न हो।

जर्मनी के महान विद्वान जॉन गेटे ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख किया है कि वह अपने मित्र फ्रेडरिक से मिलने गया। भावनापूर्ण विदाई के उपरान्त वह वापस लौटा तो उसे बगल में ही वैसे ही घोड़े पर सवार अपनी ही छाया चलती दिखी। उसकी पोशाक दूसरे प्रकार की थी। कुछ वर्ष बाद यह उस मित्र से फिर मिलने गया तो उसे ठीक वैसी ही पोशाक पहनने का अनायास सुयोग बन गया जैसे कि उसने पूर्व आगमन के समय अपने छाया पुरुष को पहने देखा था।

परा मनोविज्ञानियों ने और भी कितनी ही घटनाएं इस संदर्भ में नोट की हैं। इनमें एक प. जर्मनी की कुमारी फ्रेलिक की है जो अपने सूक्ष्म शरीर को आसमान में उड़ते देखती थी और कहाँ क्या हो रहा है यह देखती थी। साथ ही स्कूल शरीर को वे पीछे सड़क पर चलते हुए भी देखती थीं। उड़ते हुए उनने जहाँ जो किया था, पीछे पता लगाने पर वह दृश्य सही पाया गया।

ब्रिटेन की परामनोविज्ञान क्षेत्र की शोधकर्त्री श्रीमती रोजा ने इस विषय पर जो घटनायें घटित होते पाईं उनका वर्णन अपनी पुस्तक “ई. एस. पी., ए. पर्सनल मैनुएर” में विस्तार पूर्वक लिखा है। उनका कथन है कि इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सही एवं गलत कामों में से एक का चुनाव करते समय जो अंतर्द्वंद काम करता है उससे हमारे दो व्यक्तियों का परिचय मिलता है। इसी प्रकार सही सिद्ध होने वाले स्वप्नों में भी प्रायः अपने ही सूक्ष्म शरीर की क्षमता काम करती है।

इस प्रसंग की गवाहियों में श्रीमती हेवुड का सुविस्तृत वर्णन है जिससे उनका छाया पुरुष उनके देखते-देखते अनेक इच्छित काम कर दिया करता था।

इसी संदर्भ में एक पुस्तक लिखी है- एडमण्ड गर्नी ने जिसका नाम है “फेन्टाज्म ऑफ दि लिविंग” इनमें उनने ऐसे घटनाक्रमों का उल्लेख किया है कि एक ही व्यक्ति एक ही समय में दो जगह दो प्रकार के काम करता हुआ देखा गया।

नार्वे में ऐसी अनेक जन श्रुतियाँ प्रचलित हैं जिनमें छाया पुरुषों के कारण सम्पन्न हुए द्विधा क्रिया-कलापों का मनोरंजक वर्णन है। वहाँ इन्हें पूर्ण सत्य न सही अर्ध सत्य तो माना ही जाता है। इसी प्रकार योरोप के अनेक देशों में ऐसी गाथाओं की पुष्टि कई प्रामाणिक व्यक्ति भी करते देखे गये हैं जो मरणोत्तर काल में न सही जीवन काल में मनुष्य के दुहरे व्यक्तित्व की साक्षी देते हैं।

इंग्लैंड के पादरी चार्ल्स इवीडेल ने अपनी पुस्तक “मैन्स सर्वाइकल आफ्टर डेथ” में जहाँ मरणोत्तर जीवन के उपरान्त चेतना का अस्तित्व बना रहने संबन्धी प्रमाणों का उल्लेख किया है। वहाँ उनने स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर की विवेचना भी की है। वे कहते हैं जीवित रहते लोग अपने सूक्ष्म शरीर पर ध्यान नहीं देते अन्यथा उसे भी एक अभिन्न मित्र की तरह विकसित किया और काम में लाया जा सकता है। इस संदर्भ में उनने अपनी जानकारी की अनेकों घटनाओं का विवरण भी दिया है जिससे सिद्ध होता है कि जीवन काल में भी सूक्ष्म शरीर की सत्ता बराबर काम करती रहती है। यह मनुष्यों के प्रयत्नों पर निर्भर है कि उसे प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहने दे या प्रयत्नपूर्वक विकसित करके अपने लिए एक अतिरिक्त सहायक उत्पन्न करने का लाभ उठायें।

विश्व विख्यात लेखक मोपासा को तो जीवन के अन्तिम दिनों छाया पुरुष के साथ इतना अधिक तन्मय देखा गया कि वे स्थूल शरीर का मोह त्यागकर सूक्ष्म चेतना और सूक्ष्म जगत को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाने का निश्चय कर चुके थे और इसके उपरान्त वे कम दिन ही जीवित रहे।

भारतीय योग विद्या के अंतर्गत अनेक ऋद्धि-सिद्धियों का वर्णन आता है। उनमें से जो विशुद्ध भावात्मक हैं उन्हें छोड़कर जो अलौकिकताएं उपलब्ध होती हैं उनका निर्मित कारण सुविकसित सूक्ष्म शरीर ही है। उसी के माध्यम से अणिमा, लधिमा, महिमा, परकाया- प्रवेश, आदि की शक्तियों को प्राप्त कर सकना संभव होता है। जिन्हें अतीन्द्रिय क्षमता कहा जाता है और अचेतन मन की विशिष्टता बताया जाता है वह भी प्रकारान्तर से ऐसे सूक्ष्म शरीर के क्रिया-कलाप ही हैं, जो एक ही सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत दो व्यक्तित्व रह सकने की बात को प्रमाणित करते हैं। छाया पुरुष साधना इसी योग परिकर का एक छोटा प्रयोग है जिसे कोई चाहे तो सरलता पूर्वक विकसित कर सकता है और उसके सहज उपलब्ध सहयोग का लाभ उठा सकता है।


शकर के कारखाने में (kahani)

शकर के कारखाने में रहने वाली चींटी ने नमक की खदान वाली चींटी को अपने यहाँ आने की दावत दी और मिठास का आनन्द लेने के लिये कहा।

आतिथ्य प्राप्त करने के लिए वह मेहमान के यहाँ पहुँची पर उसे मिठास का आनन्द नहीं मिला। खालीपन ही पल्ले पड़ा।

निराश लौटती हुई सहेली को उसने कहा- बहन, मुँह में लगी हुई नमक की डली को छोड़ पाती तो तब कहीं मिठास का आनन्द मिलता।


यत्र तं बुद्धि संयोगं लभते पौर्वदेहिकम्”

मनुष्य शरीर जीवात्मा को वरदान स्वरूप प्राप्त होता है। उच्च-नीच कर्मों के आधार पर ही उसे विभिन्न योनियों में जाना पड़ता है और कर्मों के अनुरूप फल भी भुगतने पड़ते हैं। प्रकृति की नियामक सत्ता अदृश्य है। मनुष्य के भले-बुरे कर्मों पर वह सीधे अंकुश तो नहीं लगा पाती, पर कर्मफल की ऐसी व्यवस्था बनी हुई है, जिससे कोई बच नहीं सकता। अच्छे कर्म के फल भी उसे अच्छे मिलते हैं, जबकि पाप कर्म का प्रतिफल बुरा होता है। जब वह निकृष्ट कार्य पर उतारू होता है, तो उसे निम्न योनियों में भ्रमण करना पड़ता है। यहाँ तक कि कभी-कभी जड़ योनि भी प्राप्त होती है, किन्तु ऐसा तभी होता है, जब वह नियन्ता की निर्धारित मर्यादा को तोड़ता है।

छोटी-छोटी गलतियों के लिए जीवात्मा को इतनी बड़ी सजा नहीं मिलती, वरन् उसी योनि में रहकर तद्नुरूप कर्मफल भुगतने पड़ते हैं। इसके लिये सृष्टा ने पुनर्जन्म की व्यवस्था बनायी है। ताकि जीवात्मा को किये का उचित दण्ड अथवा पुरस्कार अगले जन्म में मिल सके। इसी श्रृंखला की कड़ी के रूप में हम किसी को लूला, लँगड़ा, अन्धा देखते हैं, तो किसी को पूर्णतः स्वस्थ। यत्र-तत्र अत्यल्प वय में विलक्षण प्रतिभाएं भी दिखाई पड़ती हैं, जिन्हें देखकर अचम्भा ही होता है। सामान्यतया इस छोटी वय में प्रतिभा उनमें इस ऊंचाई तक विकसित हो जाती है, जो सामान्य स्थिति में अत्यन्त कड़ी मेहनत करने पर प्रौढ़ावस्था तक में ही संभव हो पाती है।

प्रकारान्तर से ये घटनाएं पुनर्जन्म की ही परिपुष्टि करती हैं। पिछले जन्मों में किये गये प्रयास और परिश्रम ही अगले जन्म में प्रतिभा बन विकसित होते हैं। 16 वर्ष की आयु में शंकराचार्य का वेद वेदान्तों पर अधिकार प्राप्त करना, सातवलेकर का 7 वर्ष की आयु में ही फर्राटे से संस्कृत बोलना, मात्र 8 वर्ष की आयु में मोजार्ट का संगीत शास्त्र में महारत हासिल करना- ये सभी परोक्ष रूप से पुनर्जन्म के ही प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त आये दि यदा-कदा ऐसी अनेक घटनायें प्रकाश में आती ही रहती हैं, जो इसकी पुष्टि करती हैं।

ऐसी ही एक घटना हरदोई जिले के पंडरवा ग्राम में घटित हुई।

बद्री प्रसाद गुप्ता पंडरवा का अत्यन्त गरीब किसान था। पाँच सदस्यों की गाड़ी को बड़ी मुश्किल से खींच पाता था। परिवार व्यवस्था चलाने में खेती की सीमित आय जब अपर्याप्त साबित हुई, तो अपने निकटवर्ती गाँव के एक संपन्न सेठ अगले साल के यहाँ नौकरी कर ली। वह उसकी आटा चक्की चलाने लगा और अपने परिवार का किसी प्रकार भरण-पोषण करने लगा। सन् 1978 में सेठ की मृत्यु हो गई।

सेठ की मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् बद्री प्रसाद का एक लड़का हुआ। कमलेश जब 5 वर्ष का हुआ, तो उस ओर से पिहानी गाँव का जो कोई भी गुजरता, उसे वह पुकार कर प्रणाम करता और हालचाल पूछता। आरम्भ में परिवार वालों ने उसके इस व्यवहार पर विशेष ध्यान नहीं दिया। एक दिन बद्री प्रसाद ने किसी कारण वश कमलेश की पिटाई कर दी, तो गुस्से में आकर कमलेश ने कहा- ‘‘तुम तो हमारे ही नौकर हो और हमीं को पीट रहे हो। मैं पिहानी का सेठ अंगने लाल हूँ। उस दिन यदि आश्रय नहीं दिया होता, तो आज तुम कहीं और खाक छान रहे होते। उस एहसान को भूल गये और अब मुझी पर रोष दिखा रहे हो।’ लड़के की इन बातों को सुन बद्री प्रसाद चौंक गया। तथ्य के प्रति और दृढ होने के लिये उसने कमलेश से अनेक सवाल किये। सभी का उसने सही-सही जवाब दिया। इसके अतिरिक्त उसने अपने पिता के संबन्ध में कुछ ऐसी घटनायें भी सुनायी, जिसे सेठ अंगने लाल के सिवाय और कोई नहीं जानता था। इसके बाद सेठ के परिवार को बुलाया गया। उसने अपने पत्नी, बच्चे, पुत्र, पौत्र सभी को पहचान लिया। अनेक अन्य प्रश्न भी उससे किये गये, सभी का ठीक-ठाक उत्तर दिया। यहाँ तक कि जब उसे सेठ की तस्वीर दिखाई गई, तो तुरन्त उसने पहचान ली तथा कहा- ‘यही तो मेरा चित्र है।’ इस घटना की साक्षी आज भी उपरोक्त स्थान पर जाकर ली जा सकती है।

एक अन्य घटना प्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकेन्स की है। एक बार वे इटली भ्रमण को गये। रोम में एक होटल का कमरा किराये पर लिया और वहीं ठहर गये। आस-पास के दर्शनीय स्थानों को देखने के बाद वहाँ से 120 कि.मी. दूर रोम का प्रसिद्ध पार्क देखने की उन्हें इच्छा हुई। दूसरे ही दिन एक टैक्सी से गन्तव्य के लिये निकल पड़े। अभी 80 कि.मी. रास्ता ही तय हुआ होगा कि अंग्रेज उपन्यासकार को रोड के आस-पास के दृश्य कुछ परिचित से जान पड़े। वहाँ से ज्यों-ज्यों वे आगे बढ़े ऐसा प्रतीत हुआ मानो सारे के सारे दृश्य पूर्व परिचित हों। कार जब पार्क के गेट पर रुकी, तो वहाँ के आस-पड़ोस के मकान, बहुमंजिली इमारतें, वाटर-टायर सभी जाने पहचाने से लगे। पार्क में वे प्रविष्ट हुए। वहाँ भी वही सारे दृश्य। परिचित-सा तरण ताल, जाने पहचाने लम्बे-लम्बे यूक्लिप्टस के दरख्त, घास का लम्बा मैदान, जिसके बीचों बीच बड़ा-सा फव्वारा। सभी दृश्य उसके दिमाग में तेजी से घूम रहे थे। वह मैदान में वहीं बैठ गये और कुछ याद करने लगे। सहसा वे उठे तथा आस-पास के क्षेत्र का बिल्कुल हूबहू विवरण प्रस्तुत कर अपने मित्र को अचम्भे में डाल दिया। उनका मित्र उक्त क्षेत्र से पूर्ण भिज्ञ था। वह डिकेन्स के शत-प्रतिशत सही विवरण से सकते में आ गया। आश्चर्य की बात तो यह है कि चार्ल्स अपने जीवन में इटली पहली बार आये थे। इतनी सही-सही जानकारी कोई किसी अजनबी क्षेत्र का बिना किसी परिभ्रमण किये दे नहीं सकता। इस बारे में डिकेन्स से पूछने पर उनने बताया कि रोड के पार्श्व के दृश्य देखने के बाद इस क्षेत्र के सारे दृश्य स्वतः उनके स्मृति-पटल में फिल्म की भाँति उभरने लगे।

सन् 1960 में फिरोजपुर (पंजाब) के नूरपुर गाँव में पुनर्जन्म की एक ऐसी ही घटना घटी। फिरोजपुर से 10 मील दूर नूरपुर नामक गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में एक बालक पैदा हुआ। पिता सुन्दरलाल जी गाँव के शिव मन्दिर के पुजारी थे। बालक जब ढाई वर्ष का हुआ, तो पिता से स्कूल जाने के लिये जिद करने लगा। कौतूहल शान्त करने के लिये सुन्दरलाल ने उसकी भर्ती गाँव के स्कूल में करा दी। कुछ ही दिन में बालक रमेश ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय देना आरम्भ किया। जो सवाल अन्य साथी हल नहीं कर पाते, उसका जवाब वह तुरन्त दे देता। अपनी कक्षा में वह सदा प्रथम आता। 15 वर्ष का होते-होते उसने गीता, रामायण और महाभारत में अधिकार कर लिया तथा इन विषयों पर विद्वता पूर्ण प्रवचन देने लगा, जिसे सुन सब अचम्भा करते। रमेश जब तीन वर्ष का था, तभी से स्वयं को गुजरात के एक ब्राह्मण से संबद्ध बताता। कहता, ‘पूर्व जन्म में मैं उसी ब्राह्मण परिवार का एक सदस्य था और जगह-जगह भागवत कथा का आयोजन करता। एक दिन एक सड़क दुर्घटना में मेरी मृत्यु हो गई, उसके बाद मेरा यहाँ जन्म हुआ।’ रमेश द्वारा बताये पते पर जब खोजबीन की गयी, तो घटना बिल्कुल सत्य पायी गयी। उस गुजराती परिवार वालों ने इसे स्वीकारा कि कुछ वर्ष पूर्व परिवार के एक सदस्य की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हो गयी थी।

कभी-कभी निकृष्ट कर्मों के कारण मनुष्य को अण्डज अथवा पशु योनि भी प्राप्त होती है। यहाँ भी उसके सूक्ष्म संस्कार जीव का पीछा नहीं छोड़ते और पूर्व जन्म की उसकी प्रवृत्ति मनोवृत्ति इस योनि में भी स्पष्ट झलकती दिखाई पड़ती है। कैरेकस का तोता एवं जोहान्स वर्ग का एक बन्दर इसके स्पष्ट प्रमाण है जो अपनी अद्भुत गतिविधियों द्वारा लोगों को अचम्भित आकर्षित करते रहते हैं।

कैरेकस (क्यूबा) के इस तोते के बारे में कहा जाता है कि उसमें किसी कम्यूनिष्ट नेता के उग्रवादी गुण मौजूद हैं। क्यूबा के फिडल कास्ट्रो समर्थक साम्यवादी गुरिल्लों को यह तोता ‘हुर्रा’ कहकर उत्साहित करता है, एवं उनके तोड़-फोड़ के कार्यों में प्रोत्साहन व सहयोग देता देखा जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि तोता साम्यवादी गुरिल्लों को क्यूबाई भाषा में स्पष्ट निर्देश मार्गदर्शन भी देता है। तोते के उत्पात से तंग आकर वहाँ की सरकार ने कैरेकस से 278 मील दूर सान फ्रांसिस्को में इसे बन्दी बना लिया है। वहाँ अब उसके दुर्गुणों को निकालने एवं उसमें सद्गुणों के समावेश की कोशिश की जा रही है, किन्तु अब तक इस प्रयास में असफलता ही हाथ लगी है।

कुछ वर्ष पूर्व जोहान्सवर्ग, अफ्रीका के एक औद्योगिक फार्म के पास एक ऐसा ही करामाती बन्दर था। इसने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा से परिवार वालों का मन जीत लिया था। इस ऊंचाई तक उसमें प्रतिभा का विकास क्यों और कैसे हुआ? जीव विज्ञानियों के पास इसका कोई उत्तर नहीं है।

बन्दर को प्यार से लोग सैण्डो कहकर पुकारते थे। फार्म मालिक अल्बर्टो को पशुओं से बड़ा लगाव था। इसी कारण फार्म के अन्दर ही उसने एक छोटी पशुशाला खोल रखी थी, जिसमें भेड़, बकरियाँ और गायें रहती थीं। इन्हें चराने और इनकी देखभाल करने के लिए एक नौकर रखा गया था। यह बन्दर भी देख−रेख के लिए नौकर को ही सौंप दिया गया।

नौकर जब गाय चराने जाता तो प्रतिदिन बन्दर को भी अपने साथ ले जाता। धीरे-धीरे बन्दर को इसका अभ्यास हो गया। एक दिन किसी कारण वश नौकर अपने गांव चला गया। उस दिन बन्दर बिना किसी से कुछ कहे नियत समय पर भेड़ बकरियों को बाड़े से निकाल चराने ले गया और दिन भर चराता रहा। उसने न सिर्फ पशुओं को चराया, वरन् एक कुशल चरवाहे की भूमिका भी निभायी भटके हुए मेमनों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर इकट्ठा करता और एक स्थान की घास खत्म होने पर पशुओं को घेर कर हरी घास वाले मैदान की ओर ले जाता। ठीक समय पर हर रोज पशुओं को घर भी ले आता।

एक दिन घर पहुँचने पर बकरी का एक मेमना अपनी माँ का दूध पीने लगा तथा दूसरा अन्यत्र खेलता रहा। सेण्डो ने जब देखा कि सारा दूध एक ही बच्चा चट किये जा रहा है, तो उसने उसे पकड़ कर अलग किया और उसके दूसरे मेमने को भी ढूंढ़कर लाया। तब फिर दोनों का एक-एक थन से लगाकर दूध पिलाया।

इस घटना से अल्बर्टो बहुत प्रसन्न हुआ। उसने नौकर को दूसरे काम पर लगा दिया और चरवाहा का काम बन्दर को सौंप दिया। लगातार 14 वर्ष तक सैण्डो यह सेवा करता रहा।

सैण्डो के बारे में लोगों का विश्वास है कि वह पूर्व जन्म में कोई गड़रिया रहा होगा। उस जन्म में इसके बुरे कर्म के कारण जीवात्मा की अवगति हुई, फलतः दूसरे जन्म में इसे अन्दर का कलेवर प्राप्त हुआ।

पुनर्जन्म की मान्यता को समर्थन करते हुए गीताकार ने भी कहा है-

‘यत्र तं बुद्धि संयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।’

अर्थात्- “आत्मा पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि संयोग अर्थात् बुद्धियोग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाती है।’’

इस प्रकार उपरोक्त सभी एवं ऐसी अनेकों घटनाएं यही सिद्ध करती हैं कि जीवन अनन्त है, इसकी कोई परिसीमा नहीं। एक कलेवर की मृत्यु के बाद जीवात्मा दूसरा कलेवर ग्रहण करती है और अपने पूर्वजन्म के कर्म फल को भोगती है। कर्मफल के आधार पर ही उसके जन्म, जाति, आयु का निर्णय होता है। इस संदर्भ में पातंजलि का कथन ध्यातव्य है। योगदर्शन में वे कहते हैं-

क्लेशः मूलः कर्माशयो दृष्टादृष्ट जन्मवेदनीयः। सतिमूले तद्विपाको जात्यायुभोगाः॥

अर्थात्- सब प्रकार के क्लेशों के मूल में जीव द्वारा किये गये कर्म ही प्रधान है। उन्हीं के द्वारा उसकी जाति, आयु व सुख-दुःख भोग का निर्धारण होता है।

अस्तु, यदि हमें अपने अगले जन्म को सुधारना है, तो प्रयास इसी जीवन से आरम्भ हो जाना चाहिए और आचरण व व्यवहार, कर्तृत्व एवं व्यक्तित्व को उस स्तर का बनाया जाना चाहिए जिसके लिए ‘मनुष्य में देवत्व का उदय’ की बात कही गयी है और समस्त भूखण्ड पर 33 कोटि देवताओं के निवास की प्राचीन व अलंकारिक मान्यता रही है। इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता भी है।


संगीत का विज्ञान क्षेत्र में उपयोग

अगोचर, इन्द्रियातीत, परब्रह्म परमात्मा का जब सृष्टि के आदि काल में प्रकटीकरण हुआ तो वह शब्द ब्रह्म के रूप में अविज्ञात से विज्ञात हुआ।

भारतीय तत्व ज्ञान के अनुसार प्रकृति और पुरुष का जब समागम हुआ तो उससे एक ध्वनि उत्पन्न हुई। जिसे शब्द ब्रह्म कहा गया। शब्द ब्रह्म अर्थात् ओंकार, प्रणव, अनहत नाद।

घड़ियाल पर जब हथौड़ी की चोट लगती है और वह ‘टन्’ के उपरान्त बहुत देर तक थरथराहट के रूप में बनी रहती है। यही क्रम निरन्तर चलता रहता है और जिस प्रकार पेण्डुलम के हिलने से घड़ी के पुर्जे चलते रहते हैं। उसी प्रकार एक आघात पुरुष प्रकृति पुरुष के साथ अपनी प्रसन्नता भरी अभिव्यक्ति करती है। इसी चुम्बन आलिंगन की क्रमबद्धता के अनुरूप एक पेण्डुलम गति बन जाती है और उसके आधार पर सृष्टि क्रम के अनेकानेक कल पुर्जे चल पड़ते हैं। पंचतत्व, पंच प्राण आदि के माध्यम से जड़ चेतन जगत में असंख्यों हलचलें अनवरत गति से चलती रहती हैं उन्हें आधार पर गतिशील रहते माना गया है।

प्रकृति पुरुष के मिलन समागम की इस गति को ‘‘ॐ” कार की थरथराहट भरी ध्वनि के रूप में मानवी भाषा में अधिक समीपवर्ती पाया गया है। यों उस स्वर की सूक्ष्मता का यथावत् अनुकरण योगीजनों के लिए शब्द ब्रह्म की साधना करते हुए ही सम्भव है। फिर भी बाल-बोध की दृष्टि से उस मनुष्य द्वारा उच्चारित शब्दों में ‘ॐ’ कार ही कह सकते हैं। ‘ॐ’ कार का अधिक सरल उच्चारण ‘ऊ+उ+म्’ के संयोग से बनता है। पर यह पृथक कारण भी समग्र स्थिति का परिचय नहीं देता इसलिए उसे शब्द के साथ ही रूप में भी चित्रित किया गया है। यही है- ‘‘ॐ”। भाषा विकास के आरम्भिक दिनों में इस “ॐ” का स्वरूप (") जैसा था। पीछे इसमें और भी अधिक कलाकारिता का समावेश किया गया तो वह गणेश की गजानन प्रतिमा के रूप में विकसित हुआ। एक दन्त हाथी जैसी सूँड आदि की संगति इसी ‘ॐ’ कार या गणेश आकृति के साथ मिला दी गई।

अनादि ‘ॐ’ कार की थरथराहट के ऊंचे-नीचे आरोहन अवरोहों का ध्यान रखते हुए तत्वज्ञानियों ने उसे सप्त स्वरों में विभाजित किया। स, रे, ग, म, प, ध, नि, उसी ओंकार ध्वनि का वर्गीकरण है। इन्हीं स्वरों में समग्र स्वर शास्त्र का आविर्भाव हुआ और उसके उदाहरण प्रस्तुत करने के हेतु अनेकों राग रागनियों का प्रादुर्भाव हुआ। इन्हीं स्वरों की क्षेत्रीय ध्वनि प्रियता के आधार पर अनेकों वाद्य यन्त्रों का निर्माण हुआ। गले का क्रमबद्ध गुँजन-गायन और वाद्य यन्त्रों की सहमति को वादन कहा गया। गायन और वादन दोनों को मिलाकर समग्र संगीत बनता है पर यह अनिवार्य नहीं कि दोनों की संगति साथ-साथ ही होनी चाहिए। अकेला गायन भी हो सकता है और अकेला वादन भी। जहाँ जैसी सुविधा एवं आवश्यकता होती है वहाँ वैसा तालमेल बिठा लिया जाता है।

गायन के आधार पर मन्त्र विज्ञान विकसित हुआ है। उसमें शब्दों का ऐसा गुँथन ही प्रधान है, जिसकी बार बार पुनरावृत्ति करने जप करने पर एक विशिष्ट प्रकार के कंपन होते और साधन कर्ता को प्रभावित करें। इन मन्त्र तरंगों का किसी विशेष प्रयोजन के लिए भी। यह एक समूचा एवं सुविस्तृत विज्ञान है। इसे जानने के लिए मन्त्र महाविज्ञान और तन्त्र महाविज्ञान का साँगोपाँग अध्ययन आवश्यक है और उन मन्त्रों को सिद्ध करने के लिए जिन अनुष्ठानों की आवश्यकता पड़ती है उनका सही प्रकार अभ्यास कराने के लिए व्यवहार में अनुभवी और व्यक्तित्व में अतीव पवित्र परिष्कृत मार्ग-दर्शक की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे सिद्ध मन्त्र ही अपना चमत्कार दिखाते हैं अन्यथा पुस्तकों में से किसी मन्त्र शब्द गुंथन का ही अनपढ़ प्रयोग करने पर निराशा की हाथ लगती है।

यहाँ चर्चा गायन परक उच्चस्तरीय ‘मन्त्र विद्या’ की नहीं हो रही है। इन पंक्तियों का प्रयोजन उस संगीत की चर्चा से है जो वादन प्रधान है, जिसमें ध्वनि तरंगें उत्पन्न की जाती हैं और उन्हें विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। साधारणतया ‘संगीत’ शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में होता है। मन्त्र विज्ञान को “शब्द ब्रह्म” और स्वर लहरी एवं ताल वाद्यों के समुच्चय को ‘‘नाद ब्रह्म’’ कहते हैं। संगीत का सामान्य अभिप्राय इस वाद्य विद्या से ही समझा जाना चाहिए। उसमें गायन का समावेश आवश्यक नहीं। किन्तु यदि यह संयोग किसी प्रकार बैठ सके तो अच्छा ही है।

सामवेद में वेद मन्त्रों को संगीत प्रवाह के साथ जोड़ा जाता है। वेद तो वस्तुतः तीन ही हैं ऋग्, यजु, अथर्व। प्रायः इन्हीं में वर्णित मन्त्रों की अनेकानेक विधाओं के अनुरूप गाया जाता है तब उसे सामवेद कहते हैं। वह छंद विद्या अपने आप में अनोखी है। पर अब उस विद्या का प्रायः एक प्रकार से लोप ही हो गया है। कहते हैं कि कभी सामगान की सहस्र शाखाएं थीं। पर अब उनमें से थोड़ी ही उपलब्ध हैं-जटा पाठ, घन पाठ आदि उसी प्रकरण में प्रयुक्त होते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि उस लुप्त कड़ियों को नये सिरे से जोड़कर प्रस्तुत अस्त-व्यस्तता को साँगोपाँग किया जाय और उस आधार पर अगणित प्रकार के लाभ उठाने का सुयोग प्राप्त किया जाय।

विज्ञान का ऊहापोह इन दिनों पाश्चात्य मनीषियों द्वारा ही हो रहा है। उनने संगीत पर प्रयोग वादन तक ही हाथ में लिया है और उसी पर कतिपय प्रकार के प्रयोग किये हैं। पाश्चात्य भौतिकवादी दृष्टिकोण यह है कि उन्हीं कार्यों में उसी हद तक हाथ डाला जाय, जिस हद तक के मनुष्य के प्रत्यक्ष लाभ में सहायक होते हों। वहाँ संगीत विद्या का अतिरिक्त अन्वेषण भी इसी आधार पर हुआ है। जल-जन्तुओं में वे कृषि, शाक, फल की तरह ही खाद्य मानते हैं इसलिए मछलियों को सरलता पूर्वक पकड़ने और उनका प्रजनन बढ़ाने के लिए प्रयोग हुए हैं। मुर्गी, बत्तख आदि के अण्डे तथा माँस भी उनके लिए गाय के दूध की तरह ही आहार में सम्मिलित होते हैं इसलिए उनके लिए भी प्रयत्न हुए हैं। हिरन, खरगोश, बकरी, भेड़ आदि का भी इसी वर्ग में सम्मिलित करके उन्हें संगीत सुनाकर प्रभावित करने और उनसे स्वयं लाभान्वित होने की चेष्टा भी इसी आधार पर हुई है। उस प्रयत्न में उनने समुचित लाभ उठाया है।

मनोरंजन पक्ष में दूसरे लोग बहुत हैं जो गोष्ठियों में, उत्सवों में, नाटकों में, फिल्मों में बजने वाले तरह-तरह के गायनों और वादनों का उपयोग करते रहते हैं। इस विषय में विज्ञान ने इतना ही किया है कि इलेक्ट्रानिक मल्टीट्यून, हाई-फी-वाद्य यन्त्र बनाये हैं जो मनुष्य के अभ्यास श्रम को बचाते हैं और हारमोनियम की तरह उंगलियाँ बदलने भर से स्वासन यन्त्रों, तार यन्त्रों, ताल वाद्यों की बाल सुलभ सरलता से बढ़ा देते हैं। यह श्रम की बचत हुई। इसके अतिरिक्त संगीत का उपयोग वैज्ञानिकों ने इस निमित्त भी किया है कि उसके आधार पर शारीरिक और मानसिक रोगों का निदान भी किया जा सके एवं छुटकारा भी पाया जाय। उपरोक्त सभी प्रयोजनों की तुलना में यह अधिक महत्वपूर्ण प्रयोग है। अब संगीत उपचार भी एक चिकित्सा पद्धति बन गई है और उसका उपयोग सफलतापूर्वक सम्पन्न हो रहा है।

चिकित्सा की अनेकानेक पद्धतियाँ हैं और उनके अपने-अपने आधार हैं। आयुर्वेद शरीर में वात, पित्त, कफ का असन्तुलन मानता है। यूनानी में आवी, वादी, खादी प्रकृति की अस्त-व्यस्तता को रोगों का कारण मानता है। ऐलोपैथी में जीवाणु विषाणुओं के आक्रमण, जीवनी शक्ति के शिथिल होने तथा रासायनिक पदार्थों की न्यूनाधिकता को निमित्त कारण बताया गया है। होम्योपैथी में उत्पन्न हुए विषों को लक्षणों के आधार पर विष उपचार में मानने का विधान है। बायोकैमिक में बारह प्रमुख लवणों की घट-बढ़ को निमित्त माना गया है और उन्हें औषधि रूप में देकर क्षति पूर्ति करने की परम्परा है। क्रोमोपैथी में सूर्य किरणों के सात रंगों में से किसी रंग की कमीवेशी को रंगीन काँचों द्वारा उन किरणों का शरीर में प्रवेश कराकर पूरा कराया जाता है। यूनानी तिब्बी प्रायः आयुर्वेद की तरह जड़ी-बूटी खनिज, उद्भिज उपचार पर अवलम्बित हैं।

संगीत चिकित्सा से यह मानकर चला जाता है कि स्नायु संस्थान में विद्युत प्रवाह की न्यूनता या शिथिलता उत्पन्न होने से कतिपय शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। अस्तु नाड़ी संस्थान को तरंगित, उत्तेजित करना सम्भव हो तो शिथिलता जन्य विकृतियों से छुटकारा पाया जा सकता है और अस्त-व्यस्तताओं को दूर किया जा सकता है। नाड़ी संस्थान को उत्तेजित करने की क्षमता संगीत में है अतएव उसे मनीषी रोगों से छुटकारा पाने में लाभ उठाया जा सकता है। विशेषतया मानसिक रोगों में। क्योंकि संगीत का मनःसंस्थान को शिथिल कर लहराने में अधिक जल्दी एवं अधिक आसानी से प्रभाव पड़ता है।

अब अस्पतालों में चिकित्सा का एक माध्यम संगीत मान लिया गया है। अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, जापान, फ्राँस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली आदि देशों में अस्पतालों में एक विधा के अनुरूप संगीत के- विभिन्न स्तर के रिकार्ड बनाकर उपचार में सहायता ली जाती है। मानसिक अस्पतालों में तो इस प्रयोग को अब एक प्रकार से अनिवार्य ही माना जाने लगा है। सरकारी अस्पतालों के अतिरिक्त कितने ही चिकित्सकों ने अपनी उपचार पद्धति पूरी तरह संगीत चिकित्सा पर केन्द्रित की है। वे रोगियों को अमुक ध्वनि के संगीत, उतने समय सुनाये और उन ध्वनि तंरगों के शरीर में प्रवेश करके आवश्यक हरे-फेर करने का सिद्धान्त लैसर किरणों की प्रक्रिया के समतुल्य बताकर समझाते हैं। इसका प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही प्रकार का लाभ रोगी को मिलता है और वे इस सहज सुलभ सस्ती और मनोरंजन पद्धति के सहारे अपेक्षाकृत अधिक जल्दी अच्छे होते हैं। अतएव उसका लोकप्रिय होना स्वाभाविक है। वह लोकप्रिय ही नहीं उत्साहवर्धक गति से सफल भी हो रही है। (क्रमशः)


स्त्री का सोन्दर्य (kahani)

कौत्स उन दिनों महर्षि कण्व के आश्रम में तप कर रहे थे। एक दिन गुरु और शिष्य दोनों जंगल में देर तक काम करते रहे। सायंकाल महर्षि ने कौत्स को थोड़ा पहले आश्रम भेज दिया आप कुछ पीछे चले।

कौत्स आश्रम आ रहे थे, तब उन्होंने मार्ग में पड़ी एक सुन्दर स्त्री देखी। स्त्री को चोट लगी थी, वह पीड़ा से कराह रही थी। कौत्स एक क्षण रुके और फिर अपनी राह चलते बने। पीछे महर्षि कण्ठ भी उधर से आये और युवती को यों पड़ी कराहते देखा तो अपने शिष्य पर उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ। युवती को उठाकर वे आश्रम लाये और उसकी चिकित्सा की व्यवस्था कर दी।

कौत्स को बुलाकर उन्होंने पूछा- जब यह स्त्री मार्ग में तुम्हें कष्ट-पीड़ित अवस्था में मिली तब तुमने उसे उठाया क्यों नहीं, उसे आश्रम में लाकर सेवा का उचित प्रबन्ध क्यों नहीं किया। कौत्स ने सिर झुका कर कहा- भगवन्! मुझे सन्देह था कि मैं उस स्त्री के सौंदर्य से कहीं विचलित न हो जाऊं, इसीलिए चुपचाप चला आया।

महर्षि ने गम्भीर स्वर में कहा- वत्स! इससे क्या सौंदर्य से विरक्ति हो जायेगी। छिपा हुआ भाव तो कभी भी प्रकट हो सकता है, इसलिए वासनाओं के आकर्षण से बचने के लिए तो यह आवश्यक है कि वैसे वातावरण में रहकर ही आत्म-नियन्त्रण का अभ्यास किया जाये। क्या तैरना सूखे में सीखा जा सकता? उसी प्रकार आत्म-नियन्त्रण भी एकान्त में नहीं हो सकता।


विशिष्टताओं से सम्पन्न ये तुच्छ जीव जन्तु

उपेक्षित, असमर्थ एवं हेय समझे जाने वाले निम्न जीव-वस्तुओं की जीवनचर्या का गौर से समझें तो पता चलता है कि उनके अन्दर अनेकों ऐसी विशेषताएं हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। मनुष्य की विचारशीलता एवं अपनी सामर्थ्यों का घमण्ड टूट जाता है सर्वश्रेष्ठ होने का दावा यदि मनुष्य बुद्धिमता के आधार पर करता है तो उसका यह दम्भ मिथ्या सिद्ध होता है। अध्ययन करने पर वह ज्ञात होता है कि विचारशीलता के गुण नन्हें जीवों में भी विद्यमान हैं? भाषा द्वारा मनोभावों के आदान-प्रदान का क्रम मनुष्य तक ही सीमित नहीं है। वरन् अन्य जीव भी संकेतों द्वारा अपने भावों को व्यक्त करते हैं। कई बातों में तो ये मनुष्य से भी आगे हैं। इनमें अतीन्द्रिय क्षमताएं भी होती हैं जिससे प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों, घटनाओं की जानकारी बहुत समय पहले ही प्राप्त कर लेते हैं।

डा. फिशर एक कीट शास्त्री के रूप में प्रख्यात हैं। कीड़ों पर लम्बे अध्ययन एवं शोध कार्य के उपरान्त उन्होंने कहा कि चींटियों में सन्देश प्रसारित करने की एक विशेष प्रक्रिया है। उन्हें जब कहीं खाद्य पदार्थ की जानकारी मिलती है तो इसकी सूचना अन्यों को देने के लिए अपने पेट से एक विशिष्ट प्रकार का रासायनिक स्राव निकालती हैं। जिसकी गंध पाकर अन्य चींटियों को पता चल जाता है कि अमुक स्थान पर खाने योग्य पदार्थ है। वे कुछ ही क्षणों में ठीक उसी स्थान पर पहुँच जाती हैं जहाँ से उनको सूचना मिली थी। बिना किसी भेदभाव, झगड़े के उनका सहयोग चलता है। मिल-बांटकर खाने, संग्रह की संकीर्णता भरी प्रवृत्ति न अपनाने का इनका उदाहरण मानव जाति के लिए भी अनुकरणीय है।

गिलहरियों में संकेतों का आदान-प्रदान किस प्रकार होता है तथा उनके किस संकेत का क्या अर्थ होता है, इस पर ब्रिटेन के भूतपूर्व कृषि मंत्री जानटेलर ने बहुत दिनों तक अध्ययन किया? वे लिखते हैं कि एक समय दो नर गिलहरियों के बीच संकेतों के संचार में एक अपनी पूछ खड़ा करता है तो दूसरा इसके उत्तर में अपनी पूँछ नीची कर लेता है। यह इस बात का परिचायक है कि कहीं चलने की बात हो रही है जिसमें पहले के प्रस्ताव को दूसरे ने स्वीकार कर लिया? पहला नर गिलहरी अपनी पूँछ को घुमाता और आंखें तरेरता है तो दूसरा अपनी आंखें फैला देता है। एक अपने कान खड़े करता है तो दूसरा नीचे कर लेता है। इससे यह पता चलता है कि पहला नर दूसरे से शक्तिशाली है। उसके वर्चस्व को दूसरा भी स्वीकार करता है सभी गिलहरियों को अपनी शक्ति का बोध कराने के लिए एक गिलहरी को साथ लेकर शक्तिशाली नर तेजी से दौड़ता संपर्क साधता है। परिवार के मुखिया के समान वह अपने समूह के सभी गिलहरियों से साँकेतिक भाषा में उनके समाचार पूछता है।

डा. टेलर का कहना है कि विभिन्न ऋतुओं में वे ही संकेत भिन्न अर्थ प्रकट करते हैं। बसन्त में कान खड़े करना, पूँछ उठाने का अभिप्राय है कि उस गिलहरी को अधिक फल संग्रह करने का अधिकार है। वह अपनी पसन्द की मादा को सहयोगी के रूप में चुन सकता है। यह इस बात का प्रमाण है कि विचारशीलता का गुण इनमें भी पाया जाता है। सोचने की सीमा इनकी भले ही अपनी आवश्यकताओं के इर्द-गिर्द तक ही सीमित हो। किन्तु इस सीमित क्षेत्र में भी उनकी बुद्धिमता देखते बनती है। सीमित शक्ति, सीमित बुद्धि, सीमित साधनों में भी इनका जीवन हल्का फुल्का, उमंगों से भरा है। सामान्य जीव अभावों में भी इतना सुखी प्रसन्नता युक्त जीवन व्यतीत कर सकते हैं, तो फिर मनुष्य क्यों नहीं सुखी सन्तुष्ट रह सकता है? साधन, बुद्धि, सामर्थ्य हर दृष्टि से वह इन नन्हें जीवों से आगे है। इनसे भी मनुष्य प्रेरणा प्राप्त कर सकता है।

विकसित भाषा प्रणाली ही मात्र विचारों मनोभावों को व्यक्त करने का माध्यम हो सकती है यह आवश्यक नहीं। मानवेत्तर जीव अपनी साँकेतिक भाषा अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं को भली-भाँति दूसरों तक पहुँचा देते हैं डा. सी. के. कार्पेन्टर पेन्सिलबानिया स्टेट विश्व विद्यालय के साइकोलोजिस्ट हैं। एन्थ्रोपोलाजी विभाग के अध्यक्ष भी हैं। बन्दरों के आदतों एवं संकेतों का इन्होंने अध्ययन किया। कुछ रोचक तथ्यों के उद्घाटन हुए। यदि कुछ बन्दर मिल-जुलकर वृक्ष की डाली को हिलाते हैं तो इसका अर्थ है कि वे अन्य बन्दरों को सूचित कर रहे हैं कि उस पेड़ पर उनका अधिकार है। दूसरे बन्दरों को उस पेड़ का फल एवं चारा खाने का कोई अधिकार नहीं है। उनके इस संकेत से दूसरा समूह चला जाता है।

कौन-सी वस्तु खाने योग्य है कौन सी नहीं, यह परख करने की क्षमता भी जीवों में पूर्णतया विकसित होती है। अपनी प्रकृति एवं आवश्यकता के अनुरूप वे उन्हीं खाद्य पदार्थों का चुनाव करते हैं जो उनके लिए उपयोगी एवं लाभप्रद होते हैं। ब्रिटेन के चिड़िया घर की अधिष्ठात्री हैं श्रीमती देवरा क्लेमान। वह प्राणिशास्त्र विशेषज्ञ भी हैं। इन्होंने कुत्तों की चौदह विभिन्न जातियों का अध्ययन किया उनका कहना है कि खाद्य अखाद्य की परख कुत्ते तुरन्त कर लेते हैं। वे वस्तुएं जो कुत्तों के समक्ष कभी नहीं आयी हैं। उनमें खाने योग्य और न खाने योग्य के निर्धारण की प्रक्रिया विशिष्ट है। ऐसे पदार्थों को कुत्तों के समक्ष रख देने पर वे सर्वप्रथम अपनी घ्राण शक्ति से सूँघते हैं। पुनः उन वस्तुओं पर पेशाब करके सूँघते हैं। तत्पश्चात चयन करते हैं कि वह वस्तु ग्रहण करने योग्य है अथवा नहीं। श्रीमती ‘क्लेमान’ ने अपने अध्ययन के द्वारा पाया कि कुत्ते इस चुनाव की प्रक्रिया में कभी भूल नहीं करते हैं।

शरीर के लिए किसी भी नई वस्तु के उपयोगी अथवा अनुपयोगी के निर्धारण में वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रयोग परीक्षण करने पड़ते हैं। तब कहीं जाकर वह निश्चित हो पाता है कि वह वस्तु कैसी है। जब कि कुत्ते इसका निर्णय तुरन्त कर लेते हैं। परमात्मा ने जीवों की इन्द्रियों को इतना समर्थ बनाया है जिससे वे बिना किसी बाह्य साधनों के अपने लिए उपयोगी का चुनाव कर सकते हैं। उनकी यह क्षमता देखकर विस्मित रह जाना पड़ता तथा श्रेष्ठता का दम्भ टूट जाता है।

अधिक संवेदनशील होने दूसरों के दुःख क्लेशों में हिस्सा बटाने के कारण ही मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ जीव घोषित किया गया है। अन्यथा शक्ति, के क्षेत्र में तो अन्य जीव मनुष्य से कहीं बहुत आगे हैं। संवेदनशीलता का गुण इनमें भी पाया जाता है। कभी-कभी तो ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं जिन्हें देखकर हृदय जीवों के प्रति श्रद्धा से भर उठता है तथा यह सोचना पड़ता है कि ये नन्हें जीव भी मनुष्य से कम नहीं हैं।

इस्लामाबाद (पाकिस्तान) के निकट की एक घटना है। एक ट्रक तीव्र गति से चला जा रहा था। सड़क पर एक कुतिया अपने नवजात शिशु को थन से लगाये दूध पिला रही थी। कुतिया ट्रक की चपेट में आकर तुरन्त मर गई। बच्चा असहाय माँ की लाश के निकट बैठा कातर दृष्टि से चारों ओर देख रहा था। सड़क के किनारे लगे पेड़ पर एक बन्दरिया बैठी थी। बच्चे की कातर दृष्टि से उसका ममत्व उमड़ पड़ा झट वृक्ष से उतरकर उसने पिल्ले को अपने सीने से लगा लिया। उसे दूध पिलाने लगी। कहते हैं कि वह दोनों कभी एक दूसरे को छोड़कर नहीं जाते। एक माँ के समान वह पिल्ले को दूध पिलाती, देख-भाल करती। कुछ समय, बाद पिल्ला मर गया। बन्दरिया को इतना अधिक सदमा पहुँचा कि उसने खाना, पीना तक छोड़ दिया। फलस्वरूप वह भी मर गई। अपने बच्चों तक ही आत्मीयता को सीमित रखने वाले मनुष्य के लिए यह घटना प्रेरणास्पद है। सामान्य जीव जिनकी सामर्थ्य अल्प है इतने संवेदनशील हो सकते हैं तो मनुष्य की सामर्थ्य, कई गुना अधिक है। उसकी सामर्थ्य का सदुपयोग एवं महत्ता तो आत्म विस्तार में ही निहित है।

इसी प्रकार की एक घटना का वर्णन दक्षिण अफ्रिका के वन में नियुक्त गेम वार्डन डेस्मोंड वाराडे करते हुए लिखते हैं कि मुझे शिकार करने में गहरी अभिरुचि थी। एक दिन ऐसी मार्मिक घटना घटी जिसने मेरे जीवन की दिशा-धारा ही बदल दी। झील के पास पानी पी रहे एक चीते को मैंने गोली मार दी। निकट जाकर देखा तो वह मादा थी। उसके थनों से दूध बह रहा था। मादा चीते को वहीं छोड़कर उसके बच्चों की खोज करने लगा। थोड़ी दूर पर झाड़ियों के झुरमुट में दो बच्चे खेल रहे थे। चीते के दोनों बच्चों को लेकर घर आया। मेरी कुतिया ने अभी कुछ दिनों पूर्व दो पिल्लों को जन्म दिया था। वह अपने बच्चों को दूध पिला रही थी चीते के दोनों बच्चे टकटकी लगाये पिल्लों को दूध पीते देख रहे थे। लगता था कि वे भी कुतिया से दूध की माँग कर रहे हों। कुतिया की दृष्टि इन पर पड़ी। एक अनहोनी घटना घटी। वह अपने बच्चों को छोड़कर चीते के बच्चों के पास दौड़ आयी। दोनों बच्चों को अपने थनों से लगा लिया। वे भी बिना किसी डर के दूध पीने लगे। कुछ दिनों तक वह चारों बच्चों को दूध पिलाती रही। सीमित दूध एवं दो अतिरिक्त का भार आ पड़ने के कारण वह कमजोर हो गई। यह देखकर मैंने अतिरिक्त दूध की व्यवस्था बनायी। कुतिया की इस संवेदनशीलता को देखकर हमने कभी भी जीवों को न मारने की शपथ ले ली।

बन्दर भी कितना संवेदनशील एवं सहयोगी हो सकता है इसका एक उदाहरण दुर्ग (म.प्र.) में पिछले दिनों देखने को मिला। पेड़ के नीचे एक राहगीर दिन में विश्राम कर रहा था। उसका बटुआ जिसमें दो हजार रुपये थे वहीं गिर पड़ा। उसके वहाँ से चले जाने पर वृक्ष पर बैठे बन्दर की दृष्टि बटुए पर पड़ी। वह व्यक्ति सारे दिन बटुए को ढूंढ़ता रहा। उसी रास्ते सायंकाल लौट रहा था। बन्दर बटुए को लिए उसका इन्तजार कर रहा था। जैसे ही वह यात्री लौटा बन्दर दौड़कर उसके पास जा पहुँचा। रुपयों से भरे बटुए को यात्री के समक्ष फेंककर वापस वृक्ष पर जा चढ़ा। अप्रत्याशित घटना से वह अवाक् रह गया। कृतज्ञता भरी दृष्टि से वह बन्दर का जाना देखता रहा।

मनुष्य समर्थ है विचारशील भी। किन्तु मात्र इस आधार पर वह अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकता बुद्धि तो जीवों में भी है। साँकेतिक भाषा प्रणाली जीवों के मनोभावों को व्यक्त एवं आवश्यकताओं की पूर्ति करने में पूर्णतया समर्थ है। सूझ-बूझ की दृष्टि से भी वे मनुष्य से आगे ही हैं। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि मात्र मनुष्य ही एक समझदार प्राणी है।


बड़े-बड़ों को नीचा दिखाया (प्रेरणा)

१.दुर्गुणों ने बड़े-बड़ों को नीचा दिखाया है। छोटा छेद भी बड़ी नाव को नदी में डुबा देने के लिए पर्याप्त होता है।

२.चन्द्रमा को गृहस्थ जीवन में कुछ कमी न थी, पर कामुकता के प्रवाह में अहिल्या का शील लूटने के लिए चले और सदा के लिए कलंकित हो गये।

३.नहुष ने मदोन्मत्त होकर ऋषियों को पालकी में जोता और जीवन भर की कमाई गवाँ बैठे।

४.बेन का मात्सर्य उन्हें ले डूबा। प्रजा को विवश करते थे कि वह उन्हें ईश्वर माने और वैसा ही सत्कार करे।

५.लोभी सहस्रबाहु न जमदग्नि का घर खखोर लिया तो अभीष्ट संपत्ति के स्वामी बनने की अपेक्षा परशुराम के कुल्हाड़े से अपनी भुजाएं कटा बैठे।

६.पुरोहित त्वष्टा से किसी बात पर तुनक का क्रोधांध होने वाले इंद्र को सुरपति के पद से च्युत होना पड़ा।

७.व्यामोह ग्रह त्रिशंकु के पराक्रम की सीमा न थी पर वे भ्रम-जंजाल में उलझ कर न धरती पर चैन से रह सके और न स्वर्ग ही पहुँच सके।

८.काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के पड़ोसियों में से एक भी बड़े से बड़े प्रतापियों की नीचा दिखा सकता है तो जिनने इन मनोविकारों में से कईयों को एक साथ अपना रखा है उनकी दुर्गति होने में तो संदेह ही क्यों रहेगा?


श्रेष्ठतम का वरण

मगध राज की कन्या सुहासिनी जब वयस्क हुई तो उसके लिए उपयुक्त की तलाश होने लगी। राज कन्या ने पिता से अनुरोध किया उसे मर्जी का पति चुनने दिया जाय। वह किसी सर्व तन्त्र स्वतन्त्र से विवाह करना चाहती है। पराधीन तो कष्ट ही कष्ट भोगते हैं। उनके साथ रहने में आनन्द कहाँ?

राजा ने इच्छित वर का चयन करने के लिए स्वयंवर की व्यवस्था कर दी। राजकुमार, व्यवसायी, विद्वान, कलाकार अलग-अलग कक्षों में ठहराये गये। सबको अपने-अपने समुदायों में बैठने की व्यवस्था की गई ताकि राजकुमारी जिस भी वर्ग को उपयुक्त समझे उसमें चयन कर लें।

सर्वप्रथम सुहासिनी राजकुमारों के समुदाय में गई। पूछा- आप लोगों का राज्याधिकार तो प्रजाजनों और सामन्तों सभा-सदों की इच्छा पर निर्भर रहेगा। यदि वे रुष्ट हो गये तो फिर शासक बनने की स्वतन्त्रता कैसे दिखा सकेंगे?

राजकुमारों से उत्तर न बन पड़े। पहली बार उनने अपनी पराधीनता अनुभव की ओर निराश लौट गये।

फिर वे विद्वानों के वर्ग में गई। उसने पूछा- गुण ग्राहकों के अभाव में आप अपनी विद्या का परिचय कैसे देंगे और उस विशिष्टता से किस प्रकार लाभान्वित होंगे?

उत्तर उनसे भी न बन पड़ा। विद्या की उपयोगिता गुण ग्राहकों पर निर्भर है इसलिए वे भी पराधीन ही सिद्ध हुए। कन्या ने इस वर्ग को विदा कर दिया।

सम्पन्न व्यवसायियों की बारी आई। पूछा- दुर्भिक्ष पड़ा तो? अराजकता फैली तो? उपलब्ध उत्पादन की खपत न हुई तो? व्यवसाय कैसे चलेगा।

व्यवसायियों ने अपनी पराधीनता स्वीकार की और वापस लौट गये।

कलाकारों के सामने भी विद्वानों जैसी कठिनाई थी। पारखी न हो तो उनकी कला को उन्मत्तों जैसा प्रलाप ही समझा जा सकता था। उनमें से कोई भी आत्म-निर्भर नहीं था। पराधीन को सुख कहाँ? जो सुखी नहीं उसके साथ बंधने से क्या लाभ? कन्या ने सभी अभ्यागतों को निराश कर दिया और साथ ही वह उपयुक्त वर न खोज पाने के कारण स्वयं भी निराश हो गई। खिन्न मन एकान्त सेवन करने लगी।

महामनीषी कौदन्य का उधर आगमन हुआ। मगध राज कन्या, समेत उनके दर्शन के लिए उपस्थिति हुए। साथ वर न मिलने का कारण और तज्जनित निराशा का भी परिचय कराया।

कौदन्य ने राजकुमार से पूछा- दूसरों के सहारे सुखी रहने की इच्छा करने वाली आप भी क्या पराधीन नहीं हुईं?

बात काँटे की थी। अपनी पराधीनता का प्रथम बार पता चला। अब आगे सोचा तो आत्मा पर काया और कामना का बंधन और भी अधिक सघन प्रतीत हुआ। सोचा- भव-बन्धनों से अपने को मुक्त करने की व्यवस्था करने के उपरान्त ही आनन्द उपलब्धि की बात सोचना चाहिए।

साथी खोजने का विचार उनने छोड़ दिया और भव-बन्धनों को काटने वाली तप साधना में निरत हो गईं। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के समन्वय परमार्थ को अपना जीवन सहचर बना लिया। विवाह की चर्चा सदा के लिए बन्द हो गई।


Quotation

आँख मीच कर दूध पीने वाली बिल्ली समझती है कि घर का कोई व्यक्ति उसे देख नहीं रहा है, उसी प्रकार छिपकर पाप करने वाला सोचता है कि उसके कुकृत्यों पर सदा पर्दा ही पड़ा रहेगा। -महाभारत


गायत्री मंत्र में हजार अणुबमों से अधिक शक्ति

कुछ समय पूर्व बम्बई के प्रख्यात साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ के सम्पादक संचालक श्री करेंजिया लन्दन गये थे। वहाँ रह रहे विश्व विख्यात विचारक कोयस्लर से भेंट की। इस भेंट में अन्य विषयों के अतिरिक्त परमाणु युद्ध की सम्भावना और उसकी विश्वव्यापी प्रतिक्रिया पर लम्बा वार्तालाप हुआ। इस संदर्भ में वे बहुत चिन्तित दिखाई पड़े। श्री करेंजिया ने पूछा- ‘‘यदि अणु आक्रमण हुआ तो हम अपनी रक्षा कैसे करेंगे?

इसके उत्तर में कोयस्तर ने कहा- ‘‘गायत्री मन्त्र में हजार परमाणु बमों से अधिक शक्ति है। यदि भारतवासी सामूहिक रूप से इस उपासना को आरम्भ कर दें तो उससे प्रकट होने वाली शक्ति आक्रमणकारियों के हौंसले पस्त कर सकती है।”

गायत्री मन्त्र के अर्थ स्वरूप और प्रभाव से अनेक लोग परिचित हैं पर उसकी भौतिक क्षेत्र में असाधारण रूप से कार्य कर सकने वाली क्षमता का अनुभव दूसरे लोगों ने नहीं किया जैसा कि उपरोक्त महान दार्शनिक ने।

साम्यवादी से अध्यात्मवादी के रूप में बदल जाने वाले इन महा विद्वान का परिचय पाठक जानना चाहेंगे। इसलिए उनके सम्बन्ध की कुछ संक्षिप्त जानकारियाँ नीचे की पंक्तियों में दी जा रही हैं।

आर्थर कोयस्लर वुडापेस्ट हंगरी में जन्मे। उनका परिवार सुसम्पन्न था, फिर भी रूसी हलचलों के उतार-चढ़ाव में उस परिवार को बुरे दिन भी देखने पड़े। कोयस्लर लम्बे समय तक साम्यवादी प्रचारक भी रहे और पत्रकार भी। उन दिनों साम्यवाद की सर्वोत्कृष्टता का जुनून उन पर सवार था और वे उसे जनता के उद्धार का एक मात्र उपाय मानते रहे।

कोयस्लर ने मात्र वाणी और लेखनी से ही प्रचार कार्य नहीं किया। वरन् समय आने पर उनने बन्दूक भी कन्धे पर उठाई और सेना में एक वरिष्ठ योद्धा की तरह काम करते रहे। वे जनरल फ्रेंको के विरुद्ध लड़े और पकड़े जाने पर जेल में बन्द भी रहे। वहाँ से किसी प्रकार भागे तो पेरिस में पकड़े गये। बाद में वे ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए और साम्यवाद के समर्थन में जो कुछ कर सकते करते रहे।

इस बीच उन्हें स्वतन्त्र चिन्तन का अकसर मिला और उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रचलित शासन प्रणालियों में से एक भी पूर्ण निर्दोष नहीं है। इन्हें मथ कर नवनीत निकाला जाना चाहिए और समाज व्यवस्था तथा शासन प्रणाली का अभिनव गठन इसी आधार पर किया जाना चाहिए। व्यक्ति के चिन्तन चरित्र और व्यवहार का स्वरूप भी नये ढाँचे में ढाला जाना चाहिए। वर्तमान मनुष्य की उपयुक्त जीवनचर्या अपनाने की मनःस्थिति में नहीं है। ऐसी दशा में व्यक्तियों के अनुरूप ही समाज एवं शासन का स्तर हो सकता है। इस चिन्तन ने उन्हें साम्यवादी परिधि में अवरुद्ध नहीं रहने दिया वरन् मानतावादी बन गये। उनने इंग्लैण्ड की नागरिकता ग्रहण कर ली। इसके उपरान्त वे क्रमशः अध्यात्मवाद की ओर अधिकाधिक झुकते चले गये।

अध्यात्मवाद का उद्गम उन्हें भारत लगा और वे एक बार लम्बी भारत यात्रा पर निकले। यहाँ उनका उद्देश्य किसी राजनैतिक पर्यवेक्षण का न था वरन् यह था कि गुप्त भारत की विशिष्टताओं को खोज निकाला जाय।

इस शोध प्रयास में अनेकों विशिष्ट व्यक्तित्वों से मिले। अनेकों पुरातन इतिहास का अवशेषों के आधार पर अध्ययन किया। हिमालय के रहस्यमय क्षेत्रों की यात्रा की और इस देश की पुरातन स्थिति और आधुनिक परिवर्तन का भी गम्भीर अध्ययन किया। यह यात्रा प्रयास उन्हें बहुत ही उपयोगी प्रतीत हुआ और उसका विवरण भी सार संक्षेप में प्रकाशित किया।

कोयस्लर के प्रकाशित ग्रन्थों में कितने ही बहुचर्चित और सारगर्भित हैं। उनमें से कुछ प्रमुख हैं- (1) दि योगी एण्ड कक्रिसार (2) इन साइड एण्ड आउट लुक (3) लाइफ आफ्टर डैथ (4) एक्ट आफ क्रियेशन (5) लोटस एण्ड दि रावो (6) एरायवल्स एण्ड डिपार्चस् (7) पोस्ट इन दि मशीन (8) गाड दैट फेल्ड (9) डार्कनेस एट नून (10) जेन्स ऐ समिंग अप (11) व्रिक्स टू वायवल आदि। इनमें से डार्कनेस एट नून’ का समस्त संसार में अत्यधिक प्रचार हुआ। इन पुस्तकों में उनने अपने दृष्टिकोण को निर्भीकता पूर्वक व्यक्त किया है और भारत की वर्तमान धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में चल रहे पाखण्ड की कटु भर्त्सना भी की है। कारण कि उनका मौलिक चिन्तन बहुत अंश तक साम्यवादी प्रभाव से ही किसी हद तक प्रभावित बना रहा और उनने श्रद्धा की तुलना में आलोचना को अधिक मान्यता दी। इस पर भी उनने वे भारतीय संस्कृति, दर्शन एवं अतीत के प्रति श्रद्धा व्यक्त की है और उसे मानव जाति के उत्कर्ष में उपयुक्त योगदान दे सकने योग्य कहा है।

मूर्धां ब्रह्मा शिखान्तो विष्णुर्ललाटं रुद्रश्चक्षुषी चन्द्रादित्यौ कर्णों शुक्रबृहस्पती नासापुटे अश्विनौ दन्तोष्ठावुभे सन्ध्ये मुखं मरुतः स्तनौ वस्वादियो हृदयं पर्जन्य उदरमाकाशो नाभिरग्निः कटिरिन्द्राग्नी जघनं प्राजापत्यमूरू कैलासमूलं जानुनी विश्वेदेवौ जंघे शिशिरः गुल्फानि पृथिवीवनिस्पत्यादीनि नखानि महती अस्थीनि नवग्रहा असृवके तुर्मांसमृतुसन्धयः कालद्वमास्फालनं संवत्सरोनिमेषोऽहोरात्रमिति वाग्देवीं गायत्रीं शरणमहं प्रपद्ये।

य इदं गायत्री रहस्यमधाते तेन ऋतसहस्त्रभिष्टं भवति। य इदं गायत्रीरहस्यधीते विसकृत पापं नाशयति। सर्वान् वेदानधीतो भवति। सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति।

-गायत्री रहस्योषनिषद्

गायत्री वाणी की अधिष्ठात्री देवी है। उसका सिर ब्रह्ममय, शिखान्त विष्णु, ललाट रुद्र, दोनों नेत्र- सूर्य, चन्द्र, कानों के दो छेद-शुक्राचार्य, बृहस्पति, नाक के दो छेद- दोनों अश्विनी कुमार, दाँत होठ- दोनों संध्याएं मुख- मरुत, स्तन- वसु, हृदय- मेघ, पेट- आकाश, नाभि- अग्नि, कटि- इन्द्र, जंघा- प्रजापति, उरु- कैलाश, घुटने- विश्वदेव, जंघा- शिशिर, गुल्फ- पृथ्वी, नख- महतत्व, अस्थि- नवग्रह, आंतें-केतु, माँस- ऋतु सन्धि, दोनों काल वर्ष निभेष- दिन-रात।

ऐसी विराट् ब्रह्म स्वरूपिणी महाशक्ति गायत्री की शरण में अपने को समर्पित करता हूँ।

इस गायत्री गुह्य रहस्य का जो अवगाहन करता है सो हजारों यज्ञ करने वाले की तरह श्रेयाधिकारी बनता है। उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। जिसने यह रहस्य जाना उसने मानो समस्त वेदों का अध्ययन कर लिया। सब तीर्थों में स्नान कर लिया।


वाशिंगटन पोस्ट (kahani)

वाशिंगटन पोस्ट की समाचार सम्पादिका कुमारी जेनेट कुक को उनकी कुशलता के लिए ‘पुलित्जर’ पारितोषिक प्रदान किया गया। उस देश में पत्रकारिता के लिए मिलने वाला यह सबसे बड़ा पारितोषिक समझा जाता है। जो प्राप्त करते हैं, उनकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लग जाते हैं।

इनाम की घोषणा वाले समारोह में ही कुमारी कुक ने उसे अस्वीकार कर दिया। साथ ही अपनी बहुत पैसे और प्रतिष्ठा वाली नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया। इस अवसर पर उनने इन सभी छद्मों को प्रकट कर दिया जिनके कारण उन्हें सफलता और प्रतिष्ठा मिली।

कुक के इस साहस पर सभी ने उनको “ईमानदार अन्तरात्मा के दुस्साहस” की संज्ञा दी और भूल सुधार के पश्चाताप को भूरि-भूरि सराहा। उनकी प्रतिष्ठा घटी नहीं वरन बढ़ी।


अणु विकिरण और यज्ञ विज्ञान

मैक्सिको की एक महिला कैमिस्ट द्वारा अपने पति की हत्या कर डालने का सफल प्रयास किया गया। वह अपने पति से इस कदर चिढ़ गई थी कि उससे तलाक लेकर ही पीछा नहीं छुड़ाना चाहती थी वरन् यह चाहती थी कि वह दुनिया में ही न रहे।

इसके लिए उसने एक खास तरकीब अपनाई। जब वह भोजन करता तब उसकी थाली के नीचे “यूरेनियम” की थोड़ी मात्रा बखेर देती। उसके विकिरण का प्रभाव थाली पार करता हुआ खाद्य पदार्थ तक पहुँचता रहा। पति पहले दुर्बल, पीछे बीमार पड़ा और नाड़ियों की ऐंठन अकड़न से मर गया। रोग न होने पर भी इस तरह की मृत्यु का भेद पोस्टमार्टम के बाद पाया गया। उसकी नसों में यूरेनियम का विकिरण पाया गया।

अणु आयुधों के निर्माण में यूरेनियम का उपयोग होता है। उसके माध्यम से जो भी वस्तुएं बनती हैं वे विकिरण फैलाती हैं। रोगियों को अस्पताल में रेडियो आइस्टोणों का प्रचलन हुआ है। उसका तत्काल तो कोई खास असर देखने में नहीं आता पर धीरे धीरे उसका प्रभाव शरीर में फैलता रहता है और ल्युकोमिया- रक्त कैन्सर जैसे रोग उत्पन्न करता है।

अणु आयुधों की दिनों-दिन कितने ही देश घुड़दौड़ जैसी बाजी लगाये हुए हैं। उनके सही बनने न बनने की जाँच विस्फोट परीक्षणों द्वारा होती है। जमीन के अन्दर, हवा में, समुद्र में, रेगिस्तान में कहीं भी उसका प्रयोग परीक्षण क्यों न किया जाय थोड़े समय तो उसका असर कुछ मील की परिधि में ही होती है किन्तु वह धीरे-धीरे, समूचे वातावरण में फैलता जाता है और उसका प्रभाव, वनस्पतियों, प्राणियों तथा मनुष्यों पर विषाक्तता जैसा होता है। बिजली उत्पन्न करने के लिए अणु भट्टियाँ बन रही है। उसकी राख को कहाँ डाला जाय यह एक प्रश्न है। उसे जहाँ फेंका जाय। विकिरण दूर-दूर तक फैलता है और उस क्षेत्र के निवासी प्राणियों पर उसका बुरा प्रभाव पड़ता है।

एक बार अमेरिका ने एटाल निर्जन द्वीप पर अणु परीक्षण किया था। देखा यह जाना था कि उसका प्रभाव कितनी दूर तक पड़ता है। विस्फोट के उपरान्त थोड़ी ही देर में वहाँ से 50 मील के अन्तर पर बसे हुए रोजलैण्ड द्वीप तक असर पहुँचा और वहाँ के निवासी तेजी से बीमार पड़ने लगे। पता चलते ही उन्हें जल्दी से हटाया गया। पर इतनी ही देर में वहाँ के ढेरों निवासी बीमार पड़े। कितने ही बीमार पड़े और कितने ही असाध्य रूप से बीमार हो गये और थोड़े समय में तड़प-तड़प कर मर गये।

यह एक घटना है। ऐसे-ऐसे अनेकों उदाहरण अनेक अणु आयुधों के निर्माण वाले देश कर चुके हैं, पर यह पता नहीं चलने दिया कि उसके कारण कितनी दूर के घेरे में उस विनाश लीला की चपेट में आये।

अणु विकिरण का असर धीरे-धीर होता है। वह पानी की लहरों की तरह चलती है और अपने प्रभाव से प्रभावित करती हुई संसार के समूचे क्षेत्र को देर सबेर में लपेट लेती है। अणु शक्ति का अस्त्रों के अतिरिक्त अन्य कितने ही कामों में प्रयोग हो रहा है और उनमें से अधिकाँश के द्वारा नाशकारी विकिरण फैल रहा है।

एक घटना इंग्लैण्ड की भी ऐसी ही प्रकाश में आई। विडर केल नामक स्थान में एक ‘रिएक्टर’ चल रहा था उसने कहीं से विकिरण लीक करना आरम्भ कर दिया। उसका असर बाजार में बिकने वाली खाद्य पदार्थों पर पड़ने लगा। बीमारियों का पता चलते ही ‘रिएक्टर’ तुरन्त बन्द करना पड़ा।

एक बार एक सुई की बराबर अणु विषाक्तता समुद्र में गिर पड़ी फलतः 24 घण्टे में 100 मील लम्बा और 15 मील चौड़ा समुद्र उससे प्रभावित हो चुका था।

अणु विकिरण वायुमण्डल में मिश्रित ‘ओजोन’ तत्व को जर्जर कर सकती है और सूर्य की किरणों को-पृथ्वी तक आने वाली छलनी को- अस्त-व्यस्त कर सकती है। फलतः बढ़े हुए तापमान से ध्रुवों की बर्फ पिघलने और समुद्रों में बाढ़ आने का खतरा हो सकता है।

वायुमण्डल में बिखरती रेडियो सक्रियता सैकड़ों वर्षों तक बनी रह सकती है और उसका पूरा प्रभाव मिटने में हजार वर्ष भी लग सकते हैं इस अवधि में उस प्रभाव से कितने बीमार पड़ेंगे। कितने अपंग होंगे और कितने बेमौत मरेंगे इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता।

सबसे बड़ा प्रश्न इस निर्माण में बचे हुए कचरे का है। अमेरिका की टेवेसी स्थित प्रख्यात ओकरिज नेशनल लैबोरेटरी में कचरे को जमीन में गाड़ने का निश्चय किया। एक सीमेंट कोठे में कचरा भरा और उसे 300 फीट गहरा गड्ढा खोदकर दफनाया। कुछ दिन तक इसे सफल प्रयोग माना जाता रहा। किन्तु पृथ्वी के भीतर की किसी भूकम्प जैसी हलचल से वह कमरा फट गया और विकिरण बाहर आकर वनस्पतियों, प्राणियों तथा मनुष्यों पर अपना घातक प्रभाव छोड़ने लगा। प्रयोग असफल माना गया।

अणु शक्ति से लाभ उठाने के लिए सभी आतुर हैं पर यह समझ में नहीं आ रहा है कि निर्माण काल के आरम्भ एवं अन्त में जो विकिरण फैलेगा उस अवशेष का क्या किया जा सकता है। उपास न निकला तो यह भस्मासुर महाविनाश रचकर रहेगा।

एक परीक्षण में इस विकिरण का कोमल शरीर बच्चों पर अधिक असर पाया गया। 24 बड़े देशों के पर्यवेक्षण में अफ्रीका में 44 बच्चों में से एक, आस्ट्रेलिया में से 53 में से एक। मिश्र में 86 में से एक, मलेशिया में 93 में से एक विकलांग पाया गया। सभी देशों का औसत फैलाने पर 116 में से एक बच्चा विकलाँग पाया गया। इसका कारण अणु विकिरण को माना गया। जहाँ विकिरण की भरमार है वहाँ यह विपत्ति भी अधिक है और जहाँ वायु अपेक्षाकृत शुद्ध है वहाँ दुष्प्रभाव भी कम हैं।

विकिरण की रोकथाम के सम्बन्ध में एक उपाय “यज्ञ” के प्रभाव को उपयोगी पाया जाता है। अणु विज्ञान नया नहीं है। भारत में महर्षि वैशेषिक ने अणु वाद की विस्तृत विवेचना की है। इससे प्रतीत होता है कि उन दिनों इस शक्ति का प्रयोग होता होगा और उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए यज्ञ प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया गया होगा।

चेचक के अन्वेषण कर्ता डा. डापकिन्स ने यज्ञ के धुएं को चेचक निवारण में बहुत उपयोगी पाया है। फ्राँस के वैज्ञानिक प्रो. विलवर्ट ने घी और शकर के धुँए को चेचक तपैदिक जैसी बीमारियों के विनाश में बहुत सहायक पाया है। डा. टायलिट ने किशमिश, घी, शकर के धुँए की टाइफ़ाइड में चमत्कारी लाभ दिखाता हुआ पाया है।

रूस में गाय के गोबर से लिपे मकानों पर विकिरण का कम प्रभाव पड़ते पाया गया है।

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान हरिद्वार ने अपने प्रयोग परीक्षण में विभिन्न रोगों के लिए विभिन्न प्रकार के यज्ञ धूम को बहुत सफल पाया है। कैलीफोर्निया की अग्निहोत्र युनिवर्सिटी बसंत (पराजपे-अक्कल कोट निवासी) की शोधों में भी यह पाया गया कि यज्ञ मनुष्य के शारीरिक और मानसिक रोगों में से कितनों में ही अपना आश्चर्यजनक प्रभाव दिखाता है। अणु विकिरण की भयंकरता को ध्यान में रखते हुए सुरक्षात्मक साधन की दृष्टि से यज्ञ विज्ञान को विकसित किया जाय तो यह अत्यंत सामयिक और अत्यंत महत्वपूर्ण काम होगा।


Quotation

लालची अपनी योग्यता और मेहनत से अधिक चाहता है। इसलिये उसे अनीति अपनानी और कंजूसी बरतनी होती है। यह दोनों ही आधार ऐसे हैं जो किसी को भी ले डूबते हैं। इसी कारण लालची कमाते कम और गंवाते अधिक हैं।

-सन्त तुकाराम


क्या पृथ्वी का नक्शा बदलने जा रहा है?

धरातल के स्वरूप में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे होते हैं जिनके लिये भूगर्भीय परिस्थितियों को उत्तरदायी ठहराया जा सके। यह क्रम तो चलता ही रहा है और चलता भी रहेगा। विचारणीय प्रश्न यह है कि अन्तरिक्षीय दबाव तथा मानवी उद्धत आचरण की इन परिस्थितियों के निर्माण में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

पृथ्वी को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला घटक सूर्य है। उसकी स्थिति में जब भी तनिक-सी उथल-पुथल होती है तो धरातल और समुद्र स्थल का सन्तुलन भी गड़बड़ा जाता है और नक्शा कुछ से कुछ बदल जाता है। इसी प्रकार मनुष्य जब भूगर्भ की सम्पदा का दोहन करने में अत्यधिक जल्दबाजी करता है तो भी स्थिति बेतरह बिगड़ जाती है।

इन दिनों तेल, कोयला और धातुओं के उत्खनन के लिए अत्यधिक आतुरता बढ़ती जा रही है। इस बढ़ती लिप्सा का कारण यह है कि कारखानों के लिए इनकी अत्यधिक आवश्यकता पड़ रही है। द्रुतगामी वाहन भी इन्हीं के आधार पर चलते हैं। रेल, मोटर, जलयान, वायुयान आदि के लिए ईंधन अपेक्षित होता है। विद्युत उत्पादन में भी प्रायः इन्हीं की आवश्यकता पड़ती है।

बढ़ी हुई जनसंख्या के लिए प्रयास यह किए जा रहे हैं कि भूतल से जितना अधिक पानी निचोड़ा जा सके, निचोड़ लिया जाय। इस सबका पृथ्वी का आन्तरिक स्थिति पर भी प्रभाव पड़ता है। भूगर्भ बड़ा सम्वेदनशील है। ठीक हृदय की तरह। जब शरीर पर चिन्ता, भाव सम्वेदना, आहार-व्यतिक्रम, बढ़ते कोलेस्टेरॉल, रक्तवाही नलिकाओं के मोटे होने से दबाव पड़ता है तो हृदय चीख उठता है व इसे एन्जाइना पेक्टोरिस या मायोकार्डियल इस्चीमिया कहते हैं। भूगर्भ भी जब दबाव सहन नहीं कर पाता तो ज्वालामुखी फूटने, भूकम्प आने से लेकर पर्यावरण और ऋतु परिवर्तन का ऐसा अवाँछनीय चक्र चल पड़ता है जो भूगर्भीय समस्वरता में असाधारण परिवर्तन उत्पन्न करता है और उसके कारण स्थिरता पर भारी दबाव पड़ता है। इस प्रकार के परिवर्तनों का मनुष्य जीवन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है, यह सहज ही समझा जा सकता है।

पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ईसा से 6000 वर्ष पुराने इतिहास में पृथ्वी पर हुई उलट-पुलट का विवरण ढूँढ़ निकाला है। ‘‘वर्ल्ड एथनालाजी फ्रॉम 6000 बी. सी.” पुस्तक में ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किए गये हैं जिनसे प्रतीत होता है कि नदियों के प्रवाह बदल गए। धरातल पर समुद्र घुस पड़े और समुद्रों की हलचलों ने कितने ही नये द्वीप विनिर्मित किए।

“साइण्टिफिक अमेरिकन” (अप्रैल 85) पत्रिका में वैज्ञानिक द्वय डा. ग्रेगरीविंक एवं जैसन भॉर्गन ने “द अर्थ्स हाँट स्पॉट्स “ शीर्षक से एक निबन्ध प्रस्तुत किया है जिसमें उन्होंने इस विषय का विस्तार से विवेचन किया है। वे कहते हैं कि भूगर्भ शास्त्री यह मानते हैं कि पृथ्वी की सतह स्थिर नहीं है। इसमें कुछ बड़े-बड़े टुकड़े (प्लेट्स) तैरते रहा करते हैं और कभी-कभी टकराते भी रहते हैं। विज्ञान की इस शाखा को “प्लेट टेक्टोनिक्स” नाम दिया गया है। इसके अनुसार पृथ्वी की 100 से 150 किलोमीटर मोटी ये प्लेटें होती हैं जिस पर भूखण्ड बने होते हैं किन्तु समुद्र के नीचे इस प्लेट की मोटाई 50 से 75 किलोमीटर पायी जाती है। इस प्लेट को भूविज्ञानी “लिथोस्फियर” कहते हैं। इस परत के नीचे 200 किलोमीटर मोटी दूसरी परत होती है जिसे “एस्थिनोस्फियर” कहा जाता है। आज भी भूभौतिकी विज्ञान का मूल विषय यह जानना है कि जो स्थिर है, उसके ऊपर “लिथोस्फियर” किस प्रकार रेंगता है, किस दिशा में सरकता है।

टोरोंटो विश्व विद्यालय के अध्यापक डा. ज.स्नो. विल्सन ने इस दिशा में विशेष अध्ययन हेतु हवाई द्वीप की यात्रा की। वहाँ के निवासियों के बीच प्रचलित दन्त कथाओं तथा भूभौतिकी सिद्धान्तों के बीच सम्बन्ध स्थापन का पहला प्रयास उन्हीं ने किया।

इस सम्बन्ध में हवाई द्वीप में एक दन्त कथा प्रचलित है। वहाँ के ज्वालामुखी की एक देवी ‘पीली’ है जिनकी एक आँख से आग निकला करती है। पहले उनका निवास हवाई द्वीप के पश्चिम में स्थित क्वाई द्वीप में था। किन्तु समुद्र के देवता ने इन्हें जब भगाया तो वे ओई द्वीप में आई व आकर वहाँ डेरा जमा लिया। वहाँ से भी भगाई जाने पर वे मावी द्वीप में रहीं और अब अन्ततः हवाई द्वीप में आकर बस गई हैं तथा किलाऊ नामक ज्वालामुखी के मुख से ज्वाला उगला करती हैं। यह सत्य है कि यह ज्वालामुखी भूगर्भीय प्लेटों की जरा-सी हलचल से फूट पड़ता है पर इसका इस किंवदंती से कितना सम्बन्ध है, कहा नहीं जा सकता। हाँ, समुद्र के ज्वार-भाटे, तूफान आदि आने के पूर्व संकेत लावा निकलने के पूर्व मिलने लगते हैं। श्री विल्सन इस कथा को भूगर्भ विधा के “प्लेट टेक्टोनिक साइकल” से जोड़ते हैं। भूगर्भ विद्या विशारदों ने पृथ्वी की धरातल तथा महासमुद्रों में पाई जाती ज्वालामुखी श्रृंखलाओं की गणना भी की है व उनका वर्गीकरण पाया है कि उनमें से कुछ नई हैं एवं कुछ अति प्राचीन। पुरानी और नई श्रृंखलाओं को जोड़ने से एक सम्पूर्ण कड़ी बनती है। इस दिशा को भूगर्भ शास्त्रियों ने लिथोस्फियर की भिन्न-भिन्न प्लेटों के रेंगने की दिशा मानी है।

हवाई द्वीप की उक्त कथा के अनुसार पश्चिम का ज्वालामुखी पूर्व की ओर खिसकता रहा। इस बात की पुष्टि भूगर्भ शास्त्रियों द्वारा बनाए गये रेखाचित्र भी करते हैं लेकिन इस बात का अध्ययन 200 वर्षों से हो रहा है कि किसी दिशा विशेष में प्लेट्स की सरकन क्यों होती है? उसका प्रेरक बल क्या है? आज से लगभग एक शतक पूर्व अमेरिकी भूगर्भ शास्त्री डाक्टर जेम्स ह्वाइट ने यह संशोधन प्रस्तुत किया था कि लिथोस्फियर के नीचे लावा की एक जेट धारा है जिसका प्रारम्भ हवाई द्वीप के पूर्व से होता है और पश्चिम में समापन।

अमेरिका का येलोस्टोन भी इसी प्रकार ऐसा नवीनतम स्थान है। इसका प्रारम्भ मध्य अमेरिका से होता है। खिसकने की गति क्रमशः पश्चिम से पूर्व की ओर देखी गयी है। इस प्रकार भू-पटल पर अन्य स्थानों पर भी हॉट-स्पॉट्स के स्थानान्तरण का चित्राँकन किया गया है। यह पाया गया है कि कालान्तर में पुराने स्पॉट्स घिसते जाते हैं और नवीन बनते जाते हैं। यह प्रक्रिया सारी पृथ्वी के भूगर्भ में घटती देखी जा सकती है।

उपरोक्त अन्वेषणों के आधार पर गम्भीर विचार करने वाले यह आशंका गलत व्यक्त नहीं करते कि अगले दिनों कोई ऐसी उथल-पुथल हो सकती है जो पृथ्वी के नक्शे में असाधारण परिवर्तन न करके रख दें। जिस तरह महाद्वीपों के खिसकने से भूतल की आज की स्थिति हुई एवं समुद्र ने एटलांटिस उप महाद्वीप का स्थान ले लिया, हो सकता है, अगले दिनों खिसकते जाने की प्रवृत्ति बढ़े एवं पृथ्वी वैसी न रहे जैसी कि आज दिखाई देती है।


राजा श्रोणिक (kahani)

राजा श्रोणिक सदा अशांत रहते थे। निद्रा की न्यूनता, चेहरे की उदास, अतृप्ति और आशंका उन्हें हर घड़ी हैरान किये रहती थी। कारण और समाधान पूछने वे भगवान बुद्ध के पास गये।

प्रवचन चल रहा था, सभी भिक्षु अति प्रसन्न मुद्रा में उसे श्रवण कर रहे थे। चेहरे पर तेजस्विता और आनन्द की पुलकन से सभी दिव्य लग रहे थे।

राजा की जिज्ञासा को समझते हुए तथागत ने उसी प्रवचन में यह तथ्य जोड़ दिया कि मनुष्य क्लान्त और उल्लसित क्यों रहता है। उनने कहा- तृष्णाएं ही मनुष्य को खाती हैं। उनसे बचा जा सके तो राजा रंक सभी समान रूप से सुखी रह सकते हैं।


महाविनाश रुक सकता है।

चन्द्र यात्राओं से पता चला है कि उसमें सीमित गुरुत्वाकर्षण तो है पर कोई सशक्त कवच आच्छादन नहीं है। इस अभाव ने उसे इस योग्य नहीं रहने दिया है कि वनस्पतियों या प्राणियों का उस पर निर्वाह होता रहे। सूर्य का प्रकाश पहुँचते ही वह अत्यधिक गरम हो जाता है। उसके हटते ही चरम सीमा की ठण्डक उत्पन्न हो जाती है आये दिन होने वाले उल्का पातों ने उसमें मीलों गहरे खाई खड्ड बना दिये हैं। यह सारी विभीषिकाएं वैसे आच्छादन के अभाव में ही वहाँ खड़ी हुई हैं, जैसा कि पृथ्वी की सुरक्षा के लिए तना हुआ है। यदि अन्य ग्रह उपग्रहों की भी यही स्थिति होगी तो वहाँ भी चन्द्रमा जैसा ही संकट खड़ा रहता होगा।

पृथ्वी के ऊपर चढ़े हुए एक के बाद दूसरे आच्छादन ऐसे हैं जिसने उसे आश्चर्यजनक सुविधा एवं परिस्थिति प्रदान की है। इसलिए बुद्धिमता इसी में है कि इन कवचों के साथ छेड़खानी न की जाय।

अन्तरिक्ष में जो प्रक्षेपणास्त्र भेजे जा रहे हैं वे भले ही आच्छादनों को पूरी तरह निरस्त न कर सकें पर उनमें छेद तो अवश्य ही कर सकते हैं। यह छेद छोटे से भी हों तो असाधारण संकट खड़ा कर सकते हैं। कभी उल्कापात होते हैं तो चना-मटर जैसे टुकड़े भी अजीब प्रकाश उत्पन्न करते हुए आकाश में दौड़ते चले जाते हैं। कुछ बड़े उल्कापात हों तो अनेकों अणु बम एक साथ फूटने जैसे विग्रह खड़े कर सकते हैं। इसी सदी में कुछ दर्शक पूर्व साइबेरिया में कुछ उल्कापात हुआ था। उसने संसार भर में तहलका मचा दिया। समुद्र में गिरने वाली उल्काएं समुद्री तूफान या पृथ्वी पर वात चक्रवात उत्पन्न करती है। उनकी शक्ति आश्चर्यजनक होती है।

इन दिनों विज्ञान की अभिरुचि अन्तरिक्ष की ओर मुड़ी है। उसने धरती और समुद्र पर आधिपत्य प्राप्त करने के उपरान्त अपना कार्यक्षेत्र अन्तरिक्ष बनाया है। न केवल खोजी उपग्रह भेजे जा रहे हैं वरन् भावी महायुद्ध के लिए कुरुक्षेत्र आकाश को ही बनाने की तैयारी की जा रही है। आकाश मार्ग से ऐसे प्रक्षेपणास्त्र दौड़ते रहे हैं जो कुछ ही क्षणों में धरती के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँच सकें और विघातक अस्त्र बरसाकर उस क्षेत्र को मटियामेट कर सकें। लेसर किरणों- मृत्यु किरणों का कार्यक्षेत्र भी आकाश ही है। अभी यह परीक्षण की बेला है। जो मारक अस्त्र बन पड़े हैं वे भी सीमित शक्ति के हैं। पर जब युद्ध अथवा खोज का कार्यक्षेत्र आकाश ही होता है तो यह असम्भव नहीं कि पृथ्वी की छतरी को पूरी तरह नष्ट करना सम्भव न हो तो भी उसमें दरार डाली जा सके, कोई खिड़की खोली या सेंध लगाई जा सके। ऐसा होने पर पृथ्वी की अत्यन्त बहुमूल्य सम्पदा गुरुत्वाकर्षण शक्ति एवं समुद्रीय जलराशि उस द्वार में होकर ऊपर उड़ सकती है अथवा ऐसी विपत्ति नीचे उतर सकती है जो पृथ्वी की विशिष्टता को नष्ट-भ्रष्ट करके उसे चन्द्रमा की तरह जीवधारियों के लिए रहने योग्य न रहने दे।

माना कि अन्तरिक्ष की छेड़खानी करके उसकी सामान्य प्राण वायु नष्ट करने से लेकर अनेक प्रकार की खिलवाड़ें सर्वसाधारण द्वारा नहीं की जा रही हैं। यह उद्दण्ड खेल तथाकथित विशिष्ट वैज्ञानिकों तथा राज-नेताओं द्वारा ही खेला जा रहा है पर विचारणीय यह है कि यह समूची पृथ्वी उन्हीं की संपदा तो नहीं है। जन-साधारण से भी उसका संबंध है। यह भूमण्डल किसी व्यक्ति विशेष अथवा समुदाय विशेष का बनाया हुआ नहीं है न ही यह किसी की बपौती है। फिर यदि बनाया हुआ भी हो तो उसे नष्ट करने की छूट नहीं है। आत्म-हत्या करना अपराध है। फिर समूचे घर या गांव में आग लगाकर उसमें रहने वालों को समाप्त कर देना तो और भी बड़ा अपराध है चाहे वह घर या गाँव उसी का अपना बनाया हुआ है। अन्तरिक्ष को विषाक्त करके उसकी प्राण वायु को विषैली कर देना अथवा पृथ्वी के आवरण कवच से खिलवाड़ करना किसी देश विशेष से शत्रुता निभाना नहीं है। वरन् समूची चर-अचर सृष्टि व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट कर देना है। उसे करने वाले जो भी हों। उस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा जो भी बनाते बढ़ाते हों उन्हें परमात्मा की इस सुन्दर कलाकृति का विनाश करने वाले अपराधी ही गिना जायेगा।

इस पृथ्वी पर जल, थल और वायु का एक सुन्दर समन्वय है। इस पर प्राणि मात्र का अधिकार है। इस सन्तुलन को स्थिर रखने में ही विश्व नागरिकता का निर्वाह है। यदि उसे नष्ट किया जाना है तो उत्पत्तियों और उन्मादियों को कुछ भी करते रहने की छूट नहीं दी जा सकती है। शेष लोग मूक दर्शक बनकर नहीं बैठे रह सकते। उनका अपरिहार्य कर्तव्य हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करें जिसमें किसी बड़े से बड़े को ही प्रकृति के साथ अनुपयुक्त छेड़छाड़ करने वाले अपने हाथ रोकने के लिए विवश होना पड़े।

इस सृष्टि संरचना के पीछे एक पूरक या प्रतिद्वंद्वी सन्तुलन काम कर रहा है इस तथ्य को सिद्धान्ततः बहुत पहले ही स्वीकार किया जा चुका है। अणु का प्रतिद्वंद्वी प्रति अणु-विश्व का प्रतिद्वंद्वी प्रति विश्व की सत्ता रहने से जो है वह सन्तुलित रीति से अपनी सत्ता एवं गतिविधि ठीक तरह बनाये हुए है। बैलेन्स बनाये रहने के लिए यह आवश्यक भी था अन्यथा एक ओर समूचा वजन बढ़ जाने से असन्तुलन जन्य संकट ही खड़ा होता।

जन्म के पीछे मृत्यु, सम्पदा के पीछे दरिद्रता, आक्रमण के पीछे प्रतिशोध काम करता है। अन्यथा एक ही दिशा में सफलता मिलते जाने पर जो स्थिति बनेगी उससे क्रम निर्वाह सम्भव न होगा। विश्व का प्रतिद्वंद्वी प्रति विश्व और अणु का विपक्षी प्रति अणु का अस्तित्व संरचना की स्थिरता एवं गतिशीलता का आधारभूत कारण है। पृथ्वी का वजन एक ओर अधिक दूसरी ओर कम हो तो उसकी धुरी न बनेगी और घूमने का प्रचलित क्रम अस्त व्यस्त हो जायेगा।

प्रति विश्व के सम्बन्ध में जो जानकारियाँ अब तक प्राप्त की जा सकी हैं, वे उसके अस्तित्व को तो सिद्ध करती हैं पर इस स्थिति में वह ज्ञान अभी नहीं पहुँच पाया है कि जो दृश्य है उसी की भाँति अदृश्य का भी प्रयोग उपयोग सम्भव हो सके। ब्रह्माण्डीय दैत्यों के बारे में भी यही बात है। इन्हें ‘‘ब्लैक होल” कहते हैं। इनके अस्तित्व का आकलन हो चुका है उनकी क्षमता एवं विस्तृति इतनी बड़ी है कि वे अपनी चपेट में आने वाले ग्रह नक्षत्र को भी देखते-देखते उदरस्थ कर सकते हैं और यह बता पाना सम्भव नहीं रहता कि जो निगल गया है वह उदर दरी के किस कोने में समा गया।

इसी “अद्भुत” की अनेकानेक सत्ताओं में- ‘‘ब्लैक होल” से मिलती-जुलती कुछ छोटी-छोटी इकाइयाँ भी हैं जिन्हें पूर्ण शून्य कहते हैं। वह स्थिति जहाँ भी होती है वहाँ की अमुक इकाइयों को काम करने से वंचित कर देती है। वे ठप्प हो जाती हैं। विस्तार के लिए पोल की आवश्यकता है। जहाँ ठोस हो वहाँ फटने फैलने एवं क्रियाशील रहने की गुंजाइश नहीं रहती।

तन्त्र प्रक्रिया के अंतर्गत मारण, मोहन, उच्चाटन वशीकरण की तरह एक स्थिति स्तम्भन भी है। स्तम्भन अर्थात् गतिहीनता जड़ता। चल बल प्रकृति प्रक्रिया है पर इसका विपरीत भाव यह भी है कि जीवन बना रहने पर भी उसका स्वरूप गतिहीन हो चले। पौराणिक गाथाओं में अहिल्या का शिला हो जाना प्रसिद्ध है। गौतम के शाप से ऐसा हुआ था। पर उसका निवारण भगवान राम के चरण स्पर्श से हो सका। यह एक उदाहरण है। जिसमें चल को अचल बना दिये जाने की प्रक्रिया है। पर्वतों की यही स्थिति होती है। उनके पाषाण परमाणु किसी गति विशेष में गतिशील रहते हैं। किन्तु वे सामान्यतया चट्टानों के रूप में स्थिर प्रतीत होते हैं। यों उस स्थिरता के अंतर्गत काम करने वाली गतिशीलता का आकलन किया जा सकता है। अमुक पर्वत अमुक क्षेत्र में इतना धंस रहा है, इतना उभर रहा है, इतना खिसक रहा है ऐसी अन्वेषण सूचनाएं प्रायः उपलब्ध होती रहती हैं। इन उदाहरणों से चल के साथ जुड़ने वाली अचल स्थिति को उदाहरण स्वरूप जाना जा सकता है। स्तम्भन यही है। यह कोई जादू नहीं वरन् प्रकृति की अनेकों चित्र-विचित्र गतिविधियों में से एक है। उत्तरी ध्रुव में छः महीने का दिन और छः महीने की रात होती है जबकि पृथ्वी का सामान्य भ्रमण प्रक्रिया के अनुसार वह प्रायः आधे-आधे समय की होनी चाहिए। किन्तु उत्तरी ध्रुव इसका अपवाद भी है। यदि तुलनात्मक दृष्टि से आश्चर्यवत् दिखता है किन्तु जिन्हें प्रकृति की बहुमुखी गतिविधियों का ज्ञान है। उनके लिए यह एक परिस्थिति विशेष पर आधारित हलचल मात्र है। स्तम्भन को ऐसे ही अनेक उदाहरणों के आधार पर समझा जा सकता है।

जिन्हें ‘प्रति विश्व’ की सम्भावनाओं का ज्ञान है उन्हें यह स्वीकार ने में कठिनाई नहीं होना चाहिए कि पूर्ण शून्य की स्थिति कहीं हो सकती है। कहीं पैदा की जा सकती है। ‘पूर्ण शून्य’ का एक अर्थ महाविनाश है। तब कोई जीवित नहीं बचेगा। शून्य के क्षेत्र में यह आवश्यक नहीं कि वहाँ की सभी वस्तुओं में स्थिरता या जड़ता उत्पन्न हो चले। यह हो सकता है कि अमुक प्रकार के अणु या पदार्थ ही उसके कारण स्थिर हों और अन्य वस्तुएं साधारण रीति से अपना काम करती रहें।

इन दिनों सर्वाधिक भयंकर अणु विस्फोट जन्य संकट इसी संदर्भ में पल सकता है। लेसर किरणों जैसी तंरगों को भी इस प्रकार दिग्भ्रान्त किया जा सकता है और वे अन्धे पक्षी की तरह बेतुकी उड़ानें भरती रह सकती हैं।

पुरातन अस्त्र अब इतने भयंकर नहीं रहे जिनसे बराबरी के आधार पर न लड़ा या निपटा जा सके। बारूद, डाइटनामाइट जैसी उपलब्धियाँ हाथ लगने पर पुराने युद्ध और महायुद्ध लड़े जाते रहे। सामयिक हार-जीत भी होती रही। अब यह अत्यधिक लालच का विषय नहीं रहा। जापान पर दो अणु अस्त्र गिराने और उसका परिणाम देखने के उपरान्त ही प्रमुख शक्तियों के मुँह में पानी भरा है और नये ढंग से सोचने का यह सिलसिला चला है कि विरोधी से निपटने के लिए इसी आधार को अपनाया जाय। अणु बम इसी आधार पर बनते चले गये हैं और प्रतिस्पर्धा ने बात को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है इसी प्रकार प्रक्षेपणास्त्रों की सफलता ने अन्तरिक्ष को कुरुक्षेत्र बनाने की बात सोची है। किन्तु यदि समझा या समझाया जा सकें कि अन्तरिक्षीय युद्ध को- अणु आयुधों को रोकने की कोई विधा हस्तगत हो गई है या हो सकती है तो युद्ध के लिए आतुर मस्तिष्कों को अपनी योजनाएं बदलनी पड़ सकती हैं और शान्ति में अपना लाभ देख सकते हैं। विचार यदि गहराई तक बैठ सके तो उनके अनुरूप गतिविधियाँ भी उलट सकती हैं इसमें सन्देह नहीं।

विश्वास किया जाना चाहिए कि विभीषिकाओं की काली घटाएं हटेंगी और प्रकाश की उदीयमान किरणों का अगले ही क्षणों दर्शन होगा।


विचित्र संयोग(kahani)

हेम्वर्ग (जर्मनी) के एक चौराहे पर दो कारों की टक्कर हो गई। चालक उतरे और आपस में लड़ पड़े। दोनों को चोट आई। पुलिस ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया और मुकदमा चला दिया। अस्पताल में उन्हें एक दूसरे का परिचय प्राप्त करने का अवसर मिला तो आश्चर्यजनक संयोग के लिए वे अवाक् रह गये।

ठीक दस साल पहले उसी चौराहे पर उन दोनों की मोटर साइकिलें टकराई थी। मारपीट हुई थी और पुलिस केस बना था।

इससे भी ठीक दस वर्ष पहले उनकी पैर साइकिलें भी इसी चौराहे पर टकराई थी और मार-पीट करके लहू-लुहान होकर घर लौटे थे।

इससे भी मजेदार बात यह है कि जब वे छोटे थे तब एक ही मोहल्ले में रहते थे। खेल के सिलसिले में दौड़ते हुए आमने सामने से आये तो आपस में टकरा गये। गुत्थम-गुत्था होने के बाद अपने घर लौटे।

हर दस साल बाद ठीक ही एक ही स्थान पर एक ही तारीख को एक जैसी टकराने वाली घटनाओं का होते रहना एक विचित्र संयोग ही कहा जायेगा ऐसे संयोगों के पीछे कोई नियति चक्र होता है। क्या यह विचारणीय है?


स्नेह दुलार सुधार का कारगर प्रदर्शन

मनुष्य से लेकर थोड़ी समझ वाले पशु-पक्षियों तक में प्रशंसा के प्रति अनुराग पाया जाता है। यह प्रेम भाव का सूचक है। प्रेम एक ऐसा चुम्बकत्व है जिसमें विकसित प्राणि वर्ग में से किसी को भी लुभाया और वशवर्ती बनाया जा सकता है।

स्वामी परमानन्द ने सिंह का एक छोटा बच्चा पाल लिया था, उन्होंने उसे शाकाहारी बना लिया था। बच्चा बड़ा होने पर भी उनके साथ चलता था। समीप ही सोता बैठता यहाँ तक कि उनने अपनी दिनचर्या का क्रम वैसा ही बना लिया था। एक बार वे पालतू सिंह समेत भारत के वायसराय से मिलने गये थे।

दक्षिण अफ्रीका की उस कुतिया की सर्वत्र चर्चा है जी अपने मालिक की भेड़ें चराकर अकेली ही ले आती है। गलती से कोई भटक जाय तो उसे ढूंढ़ कर लाती थी। चरवाहे के चले जाने पर उसने यह कार्य स्वयं सम्भाल लिया था और जब तक जीवित रही अपने कार्य का अंजाम ठीक तरह देती रही।

इसी प्रकार कई शौकीनों ने चिंपेंजी, गोरिल्ला, वनमानुष जाति के बच्चों को पालकर अनुशासन में रहना और शिष्टाचार निभाना सिखाया था। इस सिखाने के पीछे प्रेम प्रदर्शन और उसके प्रमाण में छोटे-मोटे उपहार देने गोदी में उठा लेने, पीछे थपथपा देने, सिर खुजला देने जैसे प्रमाण प्रस्तुत कर दिये करते थे।

अन्य छोटे-बड़े जीव जन्तुओं में प्रेम प्रदर्शन करने वाले के प्रति सद्भावना रखने और निकटता में प्रसन्नता अनुभव करने की विशेषता पाई जाती है।

पशु मनोविज्ञान की अच्छी जानकारी रखने वाले सरकसों के पशु प्रशिक्षक अनगढ़ जानवरों को ऐसे खेल दिखाने के लिए अभ्यस्त कर लेते है जैसे कर सकना मनुष्यों के लिए भी सम्भव नहीं होता। यह कार्य वे मुख्यतया प्रेम प्रदर्शन के माध्यम से ही कर पाते हैं। भूल करने पर इतना ही दण्ड काफी होता है कि उनके प्रति रुष्ट होने, उपेक्षा दिखाने जैसा अभिनय कर दिया जाय। इतने भर में वे अपनी गलती खोजने और सुधारने का प्रयत्न करने लगते हैं।

प्रेम पाकर प्रसन्न होने और प्रेमी के साथ घनिष्ठता स्थापित करने, उसके संकेतों पर चलने की विशेषता समझदार पशु-पक्षियों में पाई जाती है। वह प्रयत्न पूर्वक विकसित भी कि जाती है। जिन्हें ऐसा अवसर नहीं मिलता वे उस विशेषता को गवाँ भी बैठते हैं और अनगढ़ प्रकृति के ही दूसरों की भाँति बचे रहते हैं। छेड़ने, डराने से भी विद्रोह बनते एवं प्रतिशोध लेते भी देखे गये हैं।

यह स्वभाव मनुष्य में और भी अधिक विकसित स्तर पर होता है। उसे दुर्गुणी अवज्ञाकारी होने का प्रधान कारण एक ही है उनसे रुष्ट रहना, प्रताड़ना देना और समय कुसमय उनकी निन्दा करते रहना। सुधारने के यह तरीके आमतौर से नाकामयाब होते हैं। क्योंकि अविकसित व्यक्तित्व में प्रताड़ना को शत्रुता गिना जाता है। उनमें इतनी समझ नहीं होती कि नाराजी का मूल कारण सोच पायें और सुधारने की पद्धति को कार्यान्वित कर पायें।

बालकों के साथ बड़ों को विशेष रूप से यही व्यवहार करना चाहिए और उनके झलकने वाले दोष-दुर्गुणों का निराकरण इसी उपाय उपचार से करना चाहिए। बड़प्पन इसमें है कि छोटों से प्यार करे और उसका प्रदर्शन करने के लिए प्रशंसा परक शब्द बोला करे। इतना ही नहीं उनकी अच्छी क्रियाओं के लिए छोटे-मोटे उपहार भी दिया करें ताकि वे अपना सम्मान समझाते हुए गर्व-गौरव कर सकें। प्रेम व्यवहार के अभ्यस्त होने पर ही अपनी तनिक सी नाराजी चोट करती है और वे गलती समझने तथा सुधारने का प्रयत्न करते हैं।


अपनों से अपनी बात- हीरक जयंती इस प्रकार मने

सन् 85 को हीरक जयन्ती वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। प्रज्ञा मिशन का वर्ष बसन्त पर्व से आरम्भ होता है। उसी दिन पिछले की समाप्ति भी। इस बार जानकारी प्राप्त करते ही परिजनों में एक नई स्फुरणा कौंधी और उसके प्रकाश में उनने उस उत्सव वर्ष को बहुत ही शानदार ढंग से मनाया और उसकी तैयारी के लिये उमंग भरी हिम्मत जुटाई।

आमतौर से हर्षोत्सवों के अवसर पर धूमधाम का माहौल रहता है। त्यौहार, विवाह, शादी आदि के अवसर पर प्रदर्शन, प्रीतिभोज, गायन, वादन आदि का समारोह रहता है। संस्थाएं अपने वार्षिकोत्सव अधिवेशन मनाने में साज समूह एकत्रित करने, जुलूस निकालने, प्रवचन आयोजन, प्रदर्शनी आदि का ढाँचा खड़ा करते हैं और उसमें धन भी सामर्थ्य भर खर्च करते हैं। समारोह कितना बड़ा हुआ, इसकी स्थिति कैसी रही, जोश कैसा था, आदि बातों से ही उनकी सफलता का अनुमान लगाया जा सकता है।

इस दृष्टि से सन् 58 में गायत्री तपोभूमि में सम्पन्न हुआ सहस्र कुण्डीय गायत्री यज्ञ हर दृष्टि से शानदार समारोह रहा। उसे अद्भुत और अनुपम की संज्ञा मिली। अब दुबारा वैसा कुछ करने का न अपन मन था, न ऊपर का आदेश और व्यवस्था आयोजन। इस बार उसे व्यक्तिगत परिष्कार और लोक मंगल के लिये बढ़-चढ़कर प्रयास करने के रूप में मनाया गया। गाँधी जी ने एक बार “व्यक्तिगत सत्याग्रह” की योजना बनाई थी और कहा था सत्याग्रही काँग्रेस उद्देश्यों के अनुरूप अन्तरात्मा की पुकार पर योजना बनायें और राष्ट्र जागरण करते हुये जेल जांय। इस बार जेल जाने के काम को “व्यक्तित्व के परिष्कार के लिये कष्ट सहने’’ के रूप में कार्यान्वित कराया गया और राष्ट्र सेवियों को मिशन की प्रसार प्रक्रिया के लिए अधिक प्रयास करने के लिये कहा गया।

प्रज्ञा परिजनों का स्तर जन साधारण की दृष्टि से कहीं ऊंचा है। दूसरे लोग पेट-प्रजनन के अतिरिक्त जहाँ दूसरी बात सोचते ही नहीं वहाँ प्रज्ञा पुत्रों ने लोभ, मोह और अहंकार के त्रिविध भव-बंधन तोड़े नहीं तो ढीले अवश्य किये हैं। निजी आवश्यक कार्यों के साथ-साथ उन्होंने जन-जागृति के, युग परिवर्तन के कार्य को भी महत्व दिया है। यह साधारण बात नहीं, असाधारण बात है। अन्यान्य संस्था संगठनों की तुलना में प्रज्ञा परिवार का स्तर ऊंचा नहीं तो नीचा भी नहीं कहा जा सकता। इतने पर भी हमें शिकायत रही कि साधु, ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह करने वाले देव मानव स्तर के लोगों की संख्या विस्तार, आत्मबल, त्याग, बलिदान और पवित्रता, प्रखरता एक दृष्टि से उतनी ऊंची नहीं उठ पायी जितनी कि हम उनसे चाहते थे। जो युग परिवर्तन के हनुमान, अर्जुन जैसे अग्रदूत बनते, उनसे उतना पुरुषार्थ बन नहीं पड़ा।

इसी प्रकार यही कमी हमें खटकती रही कि जिस आन्दोलन के द्वारा 500 करोड़ मनुष्यों का भाग्य, भविष्य और स्वरूप ऊंचा उठाने के लिये प्रज्ञा आलोक का प्रकाश जितना व्यापक होना चाहिये था, उतना नहीं हो सका। मिशन की जानकारी भले ही करोड़ों को हो। पर उसके समर्थक सहयोगी 20 लाख से अधिक नहीं बढ़ पाये। यह संख्या जलते तवे पर पानी की कुछ बूंदें छिड़कने की तरह है। 500 करोड़ का 2500 वां भाग ही 20 लाख होता है। सभी परिजन यदि मिशन का सन्देश और अधिक जन-जन तक पहुँचाना चाहें तो वर्तमान प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को 25 हजार व्यक्तियों के साथ घनिष्ठ संपर्क साधना होगा। यह मुनादी पीटने की दृष्टि से तो शायद किसी कदर सफल भी हो जाय, पर जहाँ तक चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप से काया-कल्प जैसा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, वहाँ यह संख्या नगण्य न सही अपर्याप्त अवश्य है। हमारा मन था कि जीवन का अंतिम अध्याय पूरा करते-करते हम एक करोड़ हनुमान, अंगद न सही पर रीछ वानर तो मोर्चे पर खड़े कर सकेंगे पर वैसा बना नहीं। अन्य संगठनों की दृष्टि से तुलनात्मक रूप से 20 लाख समर्थक सदस्य होना बड़ी बात हो सकती है। पर काम जितना करने को पड़ा है और समय जितना विषम है, उसे देखते हुये साथियों की संख्या निश्चित रूप से अपर्याप्त है।

समय की विषमता दिन-दिन गम्भीर होती जाती है। सर्वनाश के बादल सभी दिशाओं से घुमड़ते आ रहे हैं। तूफानी विग्रहों की गणना नहीं। प्रदूषण, विकिरण जन संख्या उत्पादन जैसी समस्याएं सामने हैं। जन-जन के मन-मन में पाशविक और पैशाचिक प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। दुष्टों को आक्रमण करने का जितना दुस्साहस है उससे अनेक गुना छद्म श्वेत वस्त्रधारी और भले मानुष बनने वाले लोग करते हैं। प्रपंचों, संकीर्णताओं और अवाँछनीयताओं की दृष्टि से सभ्य दिखते हुये भी आदमी आदिम युग के जंगलियों जैसा असभ्य बनता जाता है। महायुद्ध की विभीषिका उन सबसे ऊपर है। किसी भी दिन बारूद के पहाड़ में कहीं से कोई चिनगारी उड़ कर पहुँच सकती है और उसका अन्त, इस सुन्दर धरती के रूप में परमात्मा की जो कलाकृति उभरी है। उस सृजन के देखते-देखते भस्मसात हो सकती है। अब की बार का युद्ध इस धरती को सम्भवतः प्राणियों के रहने योग्य भी न रहने दे।

इस विनाश बेला में सुरक्षा शक्ति की- शान्ति सेना की जितनी बड़ी संख्या चाहिये, उसका हौसला जितना बढ़ा-चढ़ा होना चाहिये। वह प्रयत्न करने पर भी बन नहीं पड़ा। एक अच्छा संगठन खड़ा करने भर से हमें किसी भी प्रकार का सन्तोष नहीं होता। जितना बड़ा संकट है, उसके अनुरूप ही अनर्थ को रोक सकने वाली चतुरंगिणी चाहिये। वह न बन पड़े तो छुटपुट प्रयत्नों का, निर्माणों का महत्व ही क्या रह जाता है।

हमारा मन था कि यदि हीरक जयन्ती मनाना है तो या तो प्रयत्न की असफलता पर धूल डालने और असफलता घोषित करने के रूप में मनाया जाय। या फिर ऐसा हो कि जो भी साथी सहयोगी हैं वे तूफान की तरह चल पड़ें, ज्वालामुखी की तरह उबल पड़ें और बह कर गुजरें जिसके लिये महाकाल ने जीवन्तों को पुकारा है। अन्यथा अपंगों, अनाथों की तरह जो लंगड़ा-लूला ढर्रा चल रहा है उसे किसी प्रकार घसीटते हुये आत्म प्रवंचना करते रहें।

हीरक जयन्ती वर्ष की बात जब सामने आई तो उसका स्वरूप उत्सव आयोजन पूर्वक मनाने से हमने स्पष्ट इन्कार कर दिया। सात प्रान्तों में सहस्र कुण्डीय यज्ञ और मथुरा का युग समारोह मनाने के उपरान्त यह आशा धूमिल हो गई है कि बड़े जन सम्मेलनों से कोई बड़ी बात हो सकती है। राजनैतिक संस्थाओं के एक से बढ़कर दूसरा समारोह हर वर्ष होता है। उनमें प्रत्येक में भारी दौड़-धूप और प्रचुर पूँजी खर्च होती है। किन्तु एक सप्ताह बीतने नहीं पाता कि उस आयोजन की प्रशंसा निन्दा तक समाप्त हो जाती है और लोग मेले ठेले के माहौल जैसा मनोरंजन करके उस बात को विस्मृति के गर्त में धकेल देते हैं। उसकी चर्चा तक समाप्त हो जाती है। इन्हीं तमाशों में से एक तमाशा हम और खड़ा करें। ऐसी इच्छा स्वप्न में भी नहीं है। पूरे बीस साल ऐसा ही माहौल बनाते रहे पर उसके फलस्वरूप जो मिला है उसे निरर्थक तो नहीं कह सकते पर असन्तोषजनक अवश्य है।

क्रान्तियों में आँधी जैसा वेग चाहिये। अक्सर उखाड़ फेंकने वाले आन्दोलनों को ही क्रान्ति कहा जाता है। पर जिसका लक्ष्य सृजन हो, उत्पादन हो, अभिवर्धन हो, काया-कल्प जैसा परिवर्तन हो वह देवत्व की पक्षधर क्रान्ति तो और भी कठिन होती है। एक मशाल लेकर समूचे गाँव को एक घंटे में जलाया जा सकता है, फिर उस गाँव में लगे क्षेत्र में सिंचाई का प्रबन्ध करके हरीतिमा की मखमली चादर बिछाना कितना श्रम साध्य और समय साध्य होता है, इसे सभी जानते हैं। अग्निकाण्ड के लिये एक पागल का उद्धत आचरण भी पर्याप्त है, पर लह-लहाती फसल उगाने या भव्य भवन बनाने के लिये तो कुशल कारीगरों की सुविकसित योग्यता और अगाध श्रम निष्ठा चाहिये।

प्रज्ञा परिवार सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों सैनिकों का स्तर ऊंचा चाहिये। ऐसा ऊंचा इतना अनुशासित कि उसके कर्तृत्व को देखकर अनेकों की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया- वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को सम्पन्न करने के लिये कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। इसी की “मल्लयुद्ध की विजय’’ शीर्षक से अप्रैल के अंक में चर्चा की है और कहा है कि जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिये। लोभ, मोह और अहंकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिये। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकेंगे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के सन्देश को और भी व्यापक बनाया जाय। इसके लिये जन-जन से संपर्क साधा जाय। घर-घर अलख जगाया जाय। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाय। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़े उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जांय। भले ही वे जन्म मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना पड़ता, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन सम्पन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिये जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके। जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिये इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊंचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिये। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसा चरित्र भी चाहिये और प्रयास भी।

हीरक जयन्ती वर्ष में क्या किया जाय? उस समारोह को कैसे मनाया जाय इसके संदर्भ में मई एवं जून के अंकों में हमारे संक्षिप्त अनुरोध मोटे अक्षरों में छापे जा चुके हैं पिछले माह के अंक में भी विस्तार से बताया जा चुका है। क्या किया जाय? इसका संकेत उनमें भी है और निरन्तर पूर्व के प्रज्ञा अभियान के मंच से अनेकों बार मौखिक और लिखित रूप से बताया जाता रहा है। उसे बार-बार कहने दुहराने की आवश्यकता नहीं है। उससे भी परिजन प्रायः अवगत भी हैं।

हीरक जयन्ती मनाने के लिये कुछ करने का जिनका सचमुच ही मन हो वे दो काम करें। वे दोनों ही उनके निजी रूप से करने के हैं। उनका प्रयोग अपने ऊपर करना है और अपने संपर्क क्षेत्र के ऊपर। वे दो हैं आत्म परिष्कार और जन-जागरण। इन दोनों कार्यों के लिए इन दिनों जितना उत्साह जिनने अधिक परिश्रम से किया होगा, उसे हम आंखें उठाकर टकटकी लगाये देखते रहेंगे वे थोड़ी और प्रतीक्षा करेंगे कि क्या वस्तुतः परिजनों में तत्परता उभरी?


VigyapanSuchana

आवश्यक सूचना

आश्विन नवरात्रि के नौ दिवसीय सत्र शान्तिकुँज में ता. 14 अक्टूबर से लेकर 22 अक्टूबर तक चलेंगे। दूसरा नवरात्रि का ही सत्र एक दिन के अन्तराल पर 24 अक्टूबर से चलेगा। यह तारीख 1 नवम्बर को समाप्त होगा। इनमें जो आना चाहे अभी से स्वीकृति प्राप्त कर लें। इन पन्द्रह दिनों में पाँच दिन वाले सत्र नहीं चलेंगे।


विजय-गीत


विजय-गीत (kavita)

तुम न घबराओ, न आंसू ही बहाओ अब, और कोई हो न हो पर मैं तुम्हारा हूं। मैं खुशी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा॥

मानता हूं, ठोकरें तुमने सदा खाईं, जिन्दगी के दांव में हारें सदा पाईं, बिजलियां दुख की, निराशा की, सदा टूटीं, मन गगन पर वेदना की बदलियां छाईं,

पोंछ दूंगा मैं तुम्हारे अश्रु गीतों से, तुम सरीखे बेसहारों का सहारा हूं। मैं तुम्हारे घाव धो मरहम लगाऊंगा। मैं विजय के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा॥

खा गई इंसानियत को भूख यह भूखी, स्नेह ममता को गई पी प्यास यह सूखी, जानवर भी पेट का साधन जुटाते हैं, ‘जिन्दगी का हक’ नहीं है रोटियां रूखी,

और कुछ मांगो, हंसी मांगो, खुशी मांगो, खो गये हो, दे रहा तुमको इशारा हूं। आज जीने की कला तुमको सिखाऊंगा। जिन्दगी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा ॥ -अज्ञात

*समाप्त*