देव लोक में अवस्थित उस कल्पवृक्ष की मान्यता सही नहीं है जिसके नीचे बैठकर मनुष्य अपनी आवश्यकता पूर्ण करता है। यदि कल्पना सही हो भी तो तुम किस प्रकार स्वर्ग पहुँच सकोगे और कैसे उसके सान्निध्य में बैठकर अभीष्ट लाभ उठा सकोगे?
एक दूसरा वास्तविक कल्पवृक्ष है जो तुम्हारे समीप भी है और मान्यताओं के अनुरूप भी। अच्छा हो उसी के समीप जाओ और निश्चित रूप से अपना मनोरथ पूरा करो।
वह भूलोक का कल्पवृक्ष तुम्हारा व्यक्तित्व है। धूलि धूसरित होने के कारण ही वह ठीक से परिलक्षित नहीं होता। उस पर जमी मैल की परत बुहारो और देखो कि वह कितना सुन्दर और कितना उदार है।
व्यक्तित्व पर चढ़ी दुर्गुणों की मलीनता ही उसे निरर्थक स्तर पर बनाये रहती है और किसी काम नहीं आती। यहाँ तक कि उसका भारवहन भी कठिन पड़ता है।
परिष्कृत व्यक्तित्व जिसमें मानवी गरिमा के उपयुक्त गुण कर्म स्वभाव का बाहुल्य हो। सन्मार्ग पर चलने वालों के लिए घर में पधारे देवता के समान है। उसकी सज्जा और अर्चना करके तुम उस स्थिति में पहुंच सकोगे जो प्रगति और शान्ति के दोनों ही वरदान बिना माँगे प्रदान करती हैं।
बड़ी योजनाएँ बनाने और बड़े काम करने से पूर्व यह देखा जाना चाहिए कि उसके लिए उपयुक्त साधन जुटाये जा सकेंगे या नहीं और वे उपयुक्त रीति से संग्रह हो सकेंगे या नहीं?
बात केवल साधनों की ही नहीं दूरदर्शिता, अनुभव और प्रवीणता की भी है। उसके अभाव में ईमानदार व्यक्ति भी अनजाने में ऐसे काम कर बैठते हैं जिनमें पीछे पछताना पड़े। फिर बड़े कामों के साथ बड़ी ईमानदारी बौर बड़ी जिम्मेदारी का अनुभव करने वाले साथी सहकारी भी चाहिए। अन्यथा हाथी की अम्बारी गधे की पीठ पर लाद देने में हाथी जैसी शोभायात्रा तो नहीं निकलेगी, उलटे गधे की पीठ टूटेगी और मालिक को उस थोड़ी आजीविका से भी हाथ धोना पड़ेगा, जो बेचारा गधा अपनी सामर्थ्य भर धीरे−धीरे उपार्जित करता रहता था। यदि बड़े कामों को, बड़ी योजनाओं को चला सकने की परिस्थिति न हो तो यही अच्छा है कि कार्य छोटे रूप में किया जाय और दायित्वों का विकेन्द्रीकरण किया जाय।
यहाँ भी बात वही आती है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसके पाये मजबूत होने चाहिए। मजबूत नींव पर ही भव्य भवन खड़े किये जाते हैं। उथली नींव पर जल्दी और किफायत की बात सोचते हुए यदि दुर्बल चरित्र और व्यक्तित्व के लोगों को निर्माण का काम सौंपा जाएगा तो वे अपने तात्कालिक लाभ और आलस्य की बुरी आदतों को ही आगे रखेंगे और इतनी हानि करेंगे जितनी कि बड़ा काम हाथ में न लिये जाने पर हो सकती है।
महत्व साधनों का माना जाता है। साधनों को एकत्रित करना बुद्धिमत्ता समझी जाती है और समझा जाता है कि इनका उपयोग जहाँ भी किया जाएगा वहीं प्रगति के दृश्य उपस्थित होंगे। पर यह मान्यता तथ्यों और उदाहरणों की कसौटी पर खरी उतरती है।
समझने के लिए मोटा सिद्धान्त यह है कि बिचौलिये कमीशन खाते हैं इसलिए उपभोक्ता की वस्तुएँ महंगी पड़ती हैं। वे मिलावट भी करते हैं। इसलिए उन्हें हटा दिया जाय और सरकारी क्षेत्रों में वे सब काम कराये जाँय ताकि लाभांश सरकार को अर्थात् जनता को मिले। अफसरों को भरपूर वेतन और महंगाई भत्ता मिलता है। बुढ़ापे के लिये पेन्शन, ग्रेच्युटी, फण्ड आदि भी। इसलिये उन्हें आर्थिक तंगी की आशंका से बेईमानी न करनी पड़ेगी। सिद्धान्ततः यह प्रतिपादन सर्वथा सही है। पर व्यवहार में कुछ और ही देखा जाता है। जितने व्यवसाय सरकारी नियन्त्रण में चल रहे हैं उनमें से अधिकाँश घाटा देते देखे जाते हैं। बाजार की तुलना में घटिया भी बैठते हैं और महंगे भी पड़ते हैं। इसका कारण समझने के लिए हमें तनिक गहराई में उतरना पड़ेगा और देखना पड़ेगा कि दायित्व सौंपने से पहले व्यक्तियों को कामों में प्रवीण पारंगत बनाया गया है या नहीं। उनकी ईमानदारी को असंदिग्ध बनाया गया है या नहीं। उनकी प्रतिभा का समुचित विकास हो सका है या नहीं? यही वह मूल केन्द्र है जिसमें दुर्बलता रहने के कारण शानदार योजनाएँ भी कागजी घोड़े बनकर रह जाती हैं। असफल होतीं, घाटा देतीं और शिकायतें उत्पन्न करती हैं। वस्तुतः यह दोष योजनाओं का नहीं साधनों की कमी का नहीं वरन् उस उपेक्षा का है जिसके कारण कार्यकर्त्ताओं को सुयोग्य और ईमानदार बनाने की ओर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना कि दिया जाना चाहिए। भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों पर यह बात समान रूप से लागू होती है। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड मुझे लग रहा है कि यहां पर पेज छूट रखा है या पेज छूट रखें हैं। मेरे पास orignal नहीं है और पी डी एफ में भी ऐसा लग रहा है कि पेज गायब हैं। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड सिखाए गए हैं। मूल तो दर्शन है, शेष क्रियायोग तो सामान्य-सा खेल है।
नीति शास्त्र का सर्वप्रथम नियम यह है कि अपने पड़ौसी को अपनी की तरह प्यार करें। प्यार क्यों करें? इसका उत्तर वेदान्त में मिलेगा नीति शास्त्र में नहीं। वेदान्त का ‘तत्वमसि’ “पड़ौसी को इसलिए नहीं चाहेगा कि वह हमारी भलाई करेगा किन्तु तत्वमसि तो “स्प्रिचुअल वननेस”− ‘‘एक परमपिता के सन्तान” होने की बात सिखाता है। यही नीति शास्त्र का मूलभूत सिद्धान्त है “आध्यात्मिक एकता”। इस दृष्टि से किसी व्यक्ति को दुःख पहुँचाने का कोई कार्य हम नहीं करेंगे। इतना ही नहीं किसी अन्य को नुकसान पहुँचाकर अपना लाभ नहीं उठायेंगे। वेदान्त का सत्य निरूपण विभिन्न मत−मतान्तरों के बीच ही नहीं अपितु वास्तविक धर्म तथा वास्तविक विज्ञान के बीच उस समस्वरता का संस्थापन करता है जो आज की अतीव आवश्यकता है। मैक्समूलर ने कहा था “सभी तत्वज्ञान की विचारधाराओं में वेदान्त सर्वोत्तम है क्योंकि वह हर प्रकार के तत्वज्ञानों और सभी धर्मों का समन्वय करता है।”
सनातन धर्म के अनुसार परम शक्ति एक ही हो सकती है, चाहे आप किसी सम्प्रदाय के क्यों न हों। यह दिव्य शक्ति न केवल मनुष्यों को ही जीवन प्रदान करती है अपितु पशु तथा वनस्पति सृष्टि एवं जड़ सृष्टि को भी जीवन प्रदान करती है क्योंकि जड़ में भी मालीक्यूलर ऐक्टिविटी जैसे कि इलेक्ट्रान आयन, स्टेम्स या मालीक्युल की चित्र−विचित्र संरचना−हलचल हरदम होती रहती है। इसे आप चाहे लाइफ कोर्स या प्राण नाम दें, सारी सृष्टि वेदान्त के अनुसार प्राण तत्व से भरी हुई है।
वेदान्त कहता है कि वास्तव में मानवता ही ईश्वरत्व है। यदि आप अपने भाई या पड़ौसी से दुर्व्यवहार करते हैं, तो उसके मानी होते हैं कि आपका यह दुष्कृत्य भगवान के साथ हो रहा है।
प्रो. मैक्समुलर के अनुसार वेदान्त “सब तत्वज्ञानों की विचारधाराओं का सार है जो विश्व के सभी धर्मों का समन्वय करता है क्योंकि योरोप के विभिन्न मूर्धन्य तत्वज्ञानी जैसे प्लूटो, शोपेनहावर, हेगल, काष्ट, ह्यूम इत्यादि सभी ने उच्चतम सत्य के बारे में जो कुछ बताया है, उसको आप वेदान्त में पायेंगे। वैदिक धर्म पालन करने वाला एक सच्चा ईसाई, सच्चा मुसलमान, सच्चा बौद्ध या सच्चा हिन्दू है क्योंकि वह परम सत्ता की उपासना करता है और प्राणि मात्र में परमात्मा का दर्शन करता है, इसलिए विश्व के सभी पैगम्बरों और सन्तों का वह सम्मान करता है और पूज्य भाव दर्शाता है।”
जीवन के उद्देश्यों को समझने का प्रयत्न कीजिए और किसी भी भांति उस लक्ष्य, इष्ट से इसकी उपासना कीजिए। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब हम कोई बुरा काम करते हैं जिससे किसी को दुख होता है, हम अशांत हो उठते हैं क्योंकि हमारी आत्मा हमें कोसती है। इसी प्रकार जब हम सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं, किसी की भलाई करते हैं तो मन प्रसन्न शांत रहता है, उसी समय हम देवत्व का अनुभव करते हैं क्योंकि अशांत मन में शैतान रहा करता है। वेदांत के अनुसार इसी धरती पर स्वर्ग नर्क दोनों हैं। वेदांत की आधारशिला कर्म सिद्धांत है। कर्मयोग का जितना सुंदर विवेचन वेदांत में है, वह कहीं और देखने को नहीं मिलता।
जो मुस्करा न सका, उसे जीना नहीं आया।
डा. माम उस पुरुषार्थी का नाम है जिसने अपने बलबूते लेखक बनने का प्रयत्न किया और उसमें पूरी तरह सफल भी हुआ। उनकी एक पुस्तक की ही अब तक 15 करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनकी लगभग 50 पुस्तकों से कितनी आय हुई। यह सारा पैसा उन्होंने अपने उत्तराधिकारियों के लिए न छोड़कर निर्धन लेखकों को सहायतार्थ एक फण्ड बनाने हेतु दान कर दिया। चूँकि वे स्वयं उन परिस्थितियों से गुजरे थे अतः वे उन कठिनाइयों को भली−भाँति समझते थे जो उनके आड़े आईं। समाज में रहते हुए यदि मात्र परिवार तक न सीमित रहकर हर व्यक्ति अन्यों के लिए ऐसा ही उदार बन जाए तो अभाव कहीं न दिखाई पड़े।
भगवान् का प्रेम जीवन के सत्य को देखता है। भगवान का प्रेम मनुष्य के शिव को देखता है। भगवान का प्रेम आपके जीवन के सौंदर्य को देखता है। आप परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं अतः उनके हो जाने में उनके गुणों का उभार आपके जीवन में होना स्वाभाविक है। गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, ताप्ती, नर्मदा, गोदावरी आदि नदियाँ तब तक स्थल खण्ड में इधर−उधर विचरण करती रहती हैं जब तक उन्हें नदियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जाता। उनकी शक्ति और सामर्थ्य की तब तक उतनी ही होती है किन्तु जब वे सब मिलकर एक स्थान में केन्द्रीभूत हो जाती हैं तो उनका अस्तित्व समुद्र जितना विशाल, रत्नाकर जैसा सम्पन्न, सिन्धु-सा अनन्त बन जाता है। अपने आपको परमात्मा में समर्पित कर देने पर मनुष्य का जीवन भी वैसा ही अनन्त−विशाल, सत्य, शिव एवं सुन्दर हो जाता है। उन्हें पाकर मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है।
ईसा, मंसूर, शंकराचार्य, रामकृष्ण, दयानन्द तथा अरविन्द आदि अनेकों ईश्वर परायण देवदूत हैं। ईश्वर की कृपा के फलस्वरूप उन्होंने सामान्य व्यक्तियों से उच्चतर सिद्धियाँ प्राप्त कीं। यह ईश्वर उपासना का अर्थ एकाँगी लाभ उठाना रहा होता तो इन महापुरुषों ने भी या तो किसी एक स्थान में बैठकर समाधि से ली होती या भौतिक सुखों के लिये बड़े से बड़े साधन एकत्र कर शेष जीवन सुखोपभोग में बिताते। पर उनमें से किसी ने भी ऐसा नहीं किया। उन्होंने अन्त में मानव मात्र की ही उपासना की। सिद्धि से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लौटकर वे फिर समाज में आये और प्राणियों की सेवा को अपनी उपासना का आधार बनाया।
“परमात्मा केवल एकान्तवासी को मिलते हैं और अध्यात्म का अर्थ घरबार छोड़कर योगी हो जाना है” यदि ऐसा अर्थ लगाया जाय तो फिर हमारे ऋषियों की सारी व्यवस्था एवं भारतीय दर्शन की सारी मान्यता ही गलत हो जायेगी। जप, ध्यान या साधना की एक निश्चित सीमा होती है उसके बाद की साधना समाज और विश्व के हित साधन तथा लोक मंगल में जुटने की होती है। ऋषियों ने गृहस्थ में रहकर साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिए अन्त तक लगे रहे।
यह समष्टि से प्रेम का ही प्रभाव है जो पाषाण को भी भगवान् बना देता है। मूर्ति क्या है? पाषाण की एक प्रतिमा मात्र। उसमें अपनी व्यक्तिगत विशेषता कुछ नहीं होती। किन्तु यही साधारण प्रस्तर प्रतिमा तब परमात्मा के रूप में बदल जाती है और वैसा ही प्रभाव सम्पादन करने लगती है, जब भक्तों की प्रेम भावना उसमें समाहित हो जाती है। भक्त का प्रेम पाते ही पाषाण खण्ड अपनी शोभा, आकर्षण, तेज और प्रभाव में सजीव हो उठता है। प्रतिमा पूजन का तत्व−ज्ञान यही है कि परम ब्रह्म, परमात्मा, सामान्य जनों के लिये अज्ञेय और असाध्य होता है। उससे प्रेम किया जा सकता है, उसकी भक्ति भी की जा सकती है, किन्तु यह भावना मानसिक अस्थैर्य के कारण निराधार रह जाती है।
मनुष्य की भावना एक आधार चाहती है, एक ऐसा अवलम्ब चाहती है, जिसका सहारा लेकर वह ठहर सके और अपनी वाँछित दिशा में विकसित भी हो सकते हैं। मानव की भक्ति भावना को आधार देने के लिये ही मूर्ति पूजा का आविष्कार किया गया है। युग−युग से परमात्मा का प्रतीक के रूप में मूर्ति पूजन होता जा रहा है और लोग उस माध्यम से आनन्द और सद्गति पाते चले जाते हैं। इस प्रयोग में एक महान् आध्यात्मिक तथ्य वर्तमान है। वह यह कि जिस किसी में, अपनी भावना का आरोपण कर प्रेम किया जायेगा, वह वस्तु चाहे जड़ हो या चेतन, सजीव हो अथवा निर्जीव व्यक्ति की भावना के अनुसार ही फलीभूत होने लगती है।
मूर्ति पत्थर अथवा धातु की बनी एक निर्जीव प्रतिमा होती है। किन्तु भक्त से परमात्मा की भावना पाकर वह उसके लिए भगवान् ही बन जाती और तद्नुसार ही फल देने लगती है। तथापि मूर्ति में यह विशेषता आती तब ही है, जब भावना के साथ अखण्ड आस्था और अगाध श्रद्धा का भी समावेश हो।
अध्यात्म का मूल मन्त्र प्रेम ही बताया गया है। भक्ति साधना से मुक्ति का मिलना निश्चित है। जिस भक्त को परमात्मा से सच्चा प्यार होता है, वह भक्त भी परमात्मा को प्यारा होता है। उपनिषद् का यह वाक्य ‘रसो वै सः’ इसी एक बात की पुष्टि करता है−परमात्मा प्रेम रूप है, इसका स्पष्ट तात्पर्य यही है कि जिसने प्रेम की सिद्धि कर ली है, उसने मानो परमात्मा की प्राप्ति कर ली है अथवा जहाँ प्रेमपूर्ण परिस्थितियाँ होंगी वहाँ परमात्मा का बास माना जायेगा। परमात्मा की प्राप्ति ही आनन्द का हेतु होता है।
आनन्द प्राप्ति का एक सरल और सुन्दर-सा उपाय यही है कि हम ईश्वर के प्रति जिस त्याग को करना चाहते हैं, उसकी जो सेवा करना चाहते हैं, उसका लाभ उसके अंश संसार के अन्य जीवों को पहुंचायें। संसार के सारे जीवों में परमात्मा का निवास है। उनको दी हुई हर सेवा उस एक ईश्वर को ही प्राप्त होती है। प्राणियों की सेवा ईश्वर की ही सेवा है। और उनके लिए किया हुआ हर त्याग उसके प्रति ही किया गया माना जायेगा।
जिस प्रकार कुएँ में मुंह डालकर आवाज करने से उसी प्रकार की आवाज कुएँ से निकलकर कानों में गूँजने लगती है, उसी प्रकार साधक के हृदय का प्रेम परमात्मा अथवा उसके व्यक्त रूप प्राणियों को प्राप्त होकर पुनः प्रेमी के पास ही वापस आकर उसे आत्म−विभोर कर देता है। इसका यह आशय नहीं कि परमात्मा अथवा प्राणी उसके प्रेम को स्वीकार नहीं करते और वह वैसे है वापस कर दिया जाता है। बल्कि इसका आशय यह है कि जब साधक परमात्मा अथवा प्राणियों को प्रेम करता है तो उनकी ओर से भी प्रेम पाता है। परमात्मा से कुछ पाना हो तो भक्त को देना ही पड़ता है।
अनेक बार लोग देश, राष्ट्र अथवा समाज के प्रति बड़ा प्रेम अनुभव करते हैं। उनका यह प्रेम बात−बात में प्रकट होता है। परमात्मा के प्रति भक्ति−भाव में आँखें भर−भर लाते हैं। कीर्तन, भजन अथवा जाप करते समय धाराओं में रो पड़ते हैं। उनकी यह दशा देखकर कहा जा सकता है कि उन्हें समाज अथवा परमात्मा से प्रेम है। किन्तु वे ही लोग अवसर आने पर उसके लिए थोड़ा−सा भी त्याग करने के लिए तैयार नहीं होते। ऐसे प्रेमी अथवा भक्त जन प्रेम से नहीं भावातिरेक से परिचालित होते हैं। सच्चे प्रेम का प्रमाण है−त्याग। जो अपने प्रिय के लिए सब कुछ सुखपूर्वक त्याग करता है और जो उस त्याग के बदले में रत्ती भर भी कोई वस्तु नहीं चाहता, वहीं सच्चा प्रेमी है, भक्त है।
नालन्दा विश्वविद्यालय में देश−देशान्तरों से विद्यार्थी पढ़ने आते थे। उन दिनों चीन का एक विद्यार्थी भी था। ह्वेनसाँग कई वर्ष पढ़ने के बाद बहुत-सा बौद्ध साहित्य लेकर अपने देश वापस लौट रहा था। नदी पार कराने के लिए विद्यालय के कुछ छात्र भी साथ में गये।
नाव भारी हो गयी थी। लगने लगा कि वह डूबेगी। मल्लाह ने कहा यह साहित्य वाला बोझ नदी में डाल दो तो ही नाव पार लगेगी अन्यथा डूबेगी।
ह्वेनसाँग इतने परिश्रम से उपलब्ध हुये साहित्य को छोड़ना नहीं चाहता था। इस असमंजस को दूर करने के लिए विश्वविद्यालय का एक छात्र नदी में कूद पड़ा। उसका त्याग देखकर सभी दंग रह गये।
साधना वस्तुतः किसी देवी देवता या भगवान की मनुहार उपहार में बदले फुसलाकर मनमर्जी की चीजें पकड़ लेने की जादूगरी नहीं है। अधिकाँश लोग इसी विभ्रम में जहाँ तक भटकते और चित्र विचित्र पूजा पत्री के विधान करते हों तो भी हमें भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं। हमें शास्त्रकारों, आप्तजनों और अनुभवी पथ प्रदर्शकों का सार संक्षेप इसी रूप में अपनाना चाहिए कि साधना का पूरा नाम है जीवन साधना। जो इसके बहिरंग और अन्तरंग पक्षों को परिष्कृत कर लेते हैं, वे ही इस असली साधना के बदले यथार्थवादी सिद्धि प्राप्त करते हैं।
सर्वव्यापी भगवान् एक नियम अनुशासन ही हो सकते हैं। सारी सृष्टि इसी व्यवस्था क्रम में बँधकर अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। जो भी व्यतिक्रम करता है टूटकर चूर−चूर हो जाता है। सृष्टा के सम्बन्ध में हम इतनी मान्यता अटूट रखें और उनका अनुशासन समझें और अपनायें तो समझना चाहिए कि भक्ति भावना की उच्चस्तरीय भूमिका निभ गई।
अब उनके अनुग्रह और वरदानों की बात आती है। यह परमात्मा का नहीं आत्मा का विषय है। हम जितना ही अपने को विकसित परिष्कृत कर लेते हैं उसी अनुपात से सिद्धियों, विभूतियों, सफलताओं और महानताओं को अपनी ओर खींच बुलाते हैं। यह विभाग परमात्मा ने हर आत्मा के जिम्मे छोड़ा है और कहा है वह अपनी इच्छानुसार ऊँचा उठे या नीचा गिरे। परमात्मा किसी को कुछ करने के लिए बाधित नहीं करता। उसका तो व्यवस्थाक्रम ही इस प्रकार चल रहा है कि कोल्हू में ऊपर से तिल या बिनौली जो डाली जाय इसी का उसी गन्ध और स्वाद वाला तेल नीचे निकल पड़ेगा। इस प्रसंग में चापलूसी में फुसलाने और भेंट पूजा में बरगलाने की चतुरता रत्ती भर भी काम नहीं आती। आखिर भगवान मनुष्य जैसा लालची और खुशामदी तो है नहीं। पात्रता के अनुरूप उपलब्धियाँ पाने की ही उसकी सृष्टि में अविच्छिन्न व्यवस्था है।
जीवन के अन्तरंग पक्ष को भी बहिरंग पक्ष की तरह हमें स्वयं ही सँभालना पड़ेगा। इस क्षेत्र का प्रथम चरण यह है कि हम अन्तर्मुखी होना सीखें। अपने भीतर घुसे और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाकर अपनी त्रुटियों और विशेषताओं को खोजें। त्रुटियों को झटके में या धीरे−धीरे हटाना अपने साहस पर निर्भर है पर वे हटानी अवश्य पड़ेंगी। यही बात विशेषताओं के सम्बन्ध में है वे जितनी कुछ भी हैं उनमें खाद पानी देने और बढ़ाने की चेष्टा दृढ़तापूर्वक करनी चाहिए।
यह कार्य चिन्तन और मनन से सम्पन्न होता है। अन्तरंग की योजनाएँ इसी आधार पर बनती हैं। आमतौर से लोग दूसरों की बुराई देखते हैं और अपने सम्बन्ध में बेखबर रहते या पक्षपात बरतते हैं। अन्तर्मुखी होकर ही यह सुधार परिष्कार, निर्माण या विकास का कार्य किया जा सकता है। इसलिए दिनचर्या में इसके लिए कोई समय और स्थान निश्चित निर्धारित करना चाहिए। समय ऐसा जिसमें एकान्त मिले, स्थान ऐसा जहाँ कोलाहल होने से ध्यान न बटे। ऐसी स्थिति में सुस्थिर बैठकर अपने अन्तरंग की गुफा में प्राण चेतना को घुस जाने और ध्यानपूर्वक भले बुरे का पर्यवेक्षण करना चाहिए।
असंयम ही हमार सबसे बड़ा शत्रु है। उसके चार भाग हैं। इन्द्रिय असंयम। ध्यान असंयम। समय असंयम और विचार असंयम। अपनी दिनचर्या तथा आदतों पर पैनी दृष्टि डालकर यह देखना चाहिए कि इन चार महाशत्रुओं में से किसी ने अपने स्वभाव में घुसकर अधिकार तो नहीं कर लिया। जहाँ जो गड़बड़ी दिख पड़े उसे हटाने और अधिकाधिक संयमी बनने का प्रयत्न करना चाहिए। सही नीर क्षीर विवेक है यही राजहंस परमहंसों की सराहनीय सत्प्रवृत्ति। यह अभ्यास हर दिन किया जाय। शरीर, वस्त्र, मकान की तरह अपने अन्तराल में इन कूड़े-करकटों का कोई ढेर जमा न होने देना चाहिए। जो कुसंस्कार जम गये हों उन्हें पूरी तत्परता के साथ झाड़-बुहार कर फेंकना चाहिए। यही है अन्तराल की स्वच्छता जिसमें भगवान को बुलाया या बिठाया जा सकता है।
एक बड़ा गुड़−गोबर यह हो गया है कि हमने आत्मा को शरीर में घुला दिया है। शरीर अलग से सोचने और आत्मा अलग से विचारने की चीज है। इसके बिना हम अपने हित और स्वार्थ को भी नहीं समझ पाते। घोड़े पर सोने का साज सजाने और सवार का फटे चिथड़े पहने फिरने जैसा उपहासास्पद है ठीक हमारी रीति−नीति वैसी ही होती है। शरीरगत वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए हम दिन रात खपते हैं यहाँ तक कि अनीति पर भी उतर आते हैं और परिणामतः असह्य दुःखों को सहते हैं।
आत्मा एक कोने में सिसकती रहती है। उसकी भूख जिस आत्मशोधन और पुण्य परमार्थ से हो सकती है उसे जुटाने के लिए न मन होता है और न अवकाश निकलता है। शरीर मजा उड़ाता है और पाप का गट्ठर सिर पर लादकर आत्मा को जाना पड़ता है।
इस अन्तर को अधिकाधिक स्पष्ट करना आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण चरण है। हम जीवन और मृत्यु को साथ−साथ मिलाकर जिएँ। ऐसी पूर्व तैयारी संजोयें जिसमें मरण के समय व्यामोह में और मरने के उपरान्त दुर्गति में न रहना पड़े।
अन्तरंग योग का तीसरा चरण है− समस्वरता। अपनी मनःस्थिति को अविचल बनाये रहना। साँसारिक परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित न होना। जीवन क्रम के साथ अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ जुड़ी रहती हैं। परिस्थितियों पर किसी का काबू नहीं। लहरों की तरह इस सरोवर में लहरें रहती हैं। रात दिन की तरह परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। इनसे हर्ष शोक की अतिशय अनुभूति से अपने आपको बचाये रखा जाय। एक का मरण दूसरे स्थान का जीवन है। एक को हानि होती है तो दूसरा लाभ उठाता है। इस उतार चढ़ावे से बचा नहीं जा सकता पर अपनी मनःस्थिति को ऐसे ढाँचे में ढाला जा सकता है कि भावनाओं को अत्यधिक प्रभावित होने से रोका जा सके। अति हर्ष न अति विषाद। यही उपयुक्त है। गीताकार ने इसे स्थिति प्रज्ञा या योगी की स्थिति कहा है। उद्वेगों से अपने को बचाये रहने वाला शारीरिक और मानसिक रोगों से बचता है। निराशा नीरसता उसे नहीं सताती। वह अपने को दीन असहाय अनुभव नहीं करता और अपनी प्रसन्नता को अक्षुण्ण बनाये रहता है। यह बड़ी बात है। महत्वपूर्ण भी। ऐसा ही स्थिर मन उच्चस्तरीय भूमिका अपनाने और ऊर्ध्वगमन कर सकने में समर्थ होता है। आत्म साक्षात्कार के लिए ईश्वर दर्शन के लिए उपयुक्त पृष्ठभूमि है।
अन्तरंग योग का चौथा है अपने संकीर्ण सीमा बन्धनों की विशालता में विकसित करना। संसार को भगवान के विराट् रूप में देखना। अपनत्व को थोड़े व्यक्तियों थोड़े साधनों तक सीमित न रखकर असीम में सुविकसित कर देना। जो जितने थोड़े दायरे में है। अपने ‘स्व’ को बाँधे हुए है वह उतना ही दयनीय है। कूप मण्डूक को छोटे से जलाशय में ही सीमित रहना पड़ता है। गूलर के भुनगे बहुत छोटी स्थिति में अपनी जिन्दगी गुजारते हैं। नाली के कीड़ों को सड़ी कीचड़ में ही गुजारा करना पड़ता है। यही स्थिति उन लोगों की है जो लोभ और मोह के छोटे दायरे में मरते खपते रहते हैं। जिन्हें अपने ही मतलब से मतलब जो न पड़ौसियों की दशा पर दृष्टि डालते हैं और न जिन्हें देश, धर्म, समाज संस्कृति से सरोकार। प्रशंसा के लिए दान का विज्ञापन कर सकते हैं। यों धूर्तों द्वारा मूर्खों द्वारा जेब काटने के जीते जागते उदाहरण बनते हैं। अपनी गतिविधियाँ ऐसे कार्यों तक सीमित रखते हैं जिनसे भले ही प्राणियों का सुख सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में भले ही राई रत्ती योगदान मिलता है पर उन्हें तीसमारखाँ बनने का अवसर अवश्य मिले। ऐसे ही लोग हैं जिन्होंने बेतुके मन्दिरों, किलों, स्मारकों में विपुल सम्पदा तो लगाई, पर आत्मिक प्रगति के लिए विचारशील उदारता से वस्तुतः वंचित ही बने रहे।
कायिक और मानसिक, बहिरंग और अन्तरंग के अतिरिक्त योग त्रिवेणी की तीसरी धारा है− क्रिया योग। इसमें शरीर और मन के अतिरिक्त ऐसा भी कुछ करना पड़ता है जो रहस्यमयी अतिरिक्त शक्तियों को प्रसुप्त से जागृति की स्थिति में ला सके। अतीन्द्रिय क्षमताओं को सशक्त एवं सक्रिय कर सके। इसी को क्रियायोग कहते हैं। इसके भी चार चरण हैं− अर्चना, जप, ध्यान और प्राणायाम।
अर्चना प्रतीक की स्थापना और उपचार पदार्थों से उसका पूजन वंदन है। प्रतीक रूप में इष्ट की कोई प्रतिमा बनानी पड़ती है। मुसलमान काबा में रखें ‘संगे असवद’ का बोसा लेते हैं। विभिन्न देशों के अपने−अपने झण्डे होते हैं और उन्हें देशभक्ति की भावना से फहराया और नमन किया जाता है। लेनिनग्राड में लेनिन के मृत शरीर को प्रतिष्ठापित किया गया है और विश्व भर के कम्युनिस्ट उसकी झाँकी करने पहुँचते हैं। यह उनकी मनःस्थिति है जिनका ईश्वर से कोई सीधा वास्ता नहीं। प्रतीक पूजा में एकलव्य के मृतिका विनिर्मित द्रोणाचार्य और मीरा के पाषाण रूप गिरधर गोपाल की चर्चा होती है। जिन्हें श्रद्धा का दृश्यमान केन्द्र के रूप में गढ़ा गया था और उनके सहारे भावनाओं के उभार में समुचित सहयोग लिया गया था।
सामान्यजनों को भी कोई न कोई यज्ञ प्रतीक बनाना होता है। निराकारवादी भी प्रकाश ज्योति−किसी ग्रन्थ या शरीरधारी गुरु को माध्यम बनाते हैं और उसके सम्मुख नमन−वंदन ही नहीं, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से अर्चन करते हैं। स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने का यह सरल मार्ग है। उनके लिए भी यह उपयुक्त है जो इंद्रिय प्रधान है जितना तत्वज्ञान की भूमिका का अभी उत्थान नहीं हुआ है। यह साकार पूजा है। मन्दिरों की संरचना और मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा इसी बहुसंख्यक बाल वर्ग के निमित्त हुई है। तत्वज्ञानी होने पर भी इसे अपनाये रहना आवश्यक है। क्योंकि उनके अनुकरण से अन्य अनेकों को भी उपासना का अवसर मिलता है और इससे श्रद्धा ने सही मान्यता का भाव तो जगता ही है। परिवार में छोटे−बड़े वर्ग के विभिन्न लोग रहने से−उन्हें इस प्रतिमा पूजा के माध्यम से नमन वन्दन का अवसर मिलता है जो प्रकारान्तर से किसी न किसी रूप में आस्तिक भावनाओं के पोषण में सहायक ही होता है।
इसके अतिरिक्त दूसरा चरण है−ध्यान। ध्यान अन्तरंग में कोई प्रतिमा स्थापित करके उसके साथ घनिष्ठता−तन्मयता स्थापित करने को कहते हैं। साकारवादी किसी प्रतिमा, देवालय, नदी, सरोवर, बर्तन, दीपक, सूर्य आदि का जो रुचिकर लगता हो उसका ध्यान कर सकते हैं। इसमें आँखें बन्द रखनी पड़ती हैं और कमर सीधी। सुखासन या कमलासन पर स्थित। हाथ गोदी में। यह ध्यान मुद्रा है। इसे अपनाते हुए इष्टदेव का ध्यान किया जाता है और उसके साथ तद्रूप होने की भावना परिपक्व की जाती है। दीप पतंग की तरह। यह द्वैत को मिलाकर अद्वैत स्थिति में पहुंचने की साधना है−समर्पण की।
गायत्री के साकार उपासकों को कहा जाता है कि वे छोटे बालक की तरह माता के अंचल तले बैठे और स्तनपान जैसा आनन्द लें। निराकारवादियों को कहा जाता है कि वे प्रातःकाल के उदीयमान सूर्य, सविता का ध्यान करें और इस अनुभूति को परिपक्व होने दें कि उनके बलवत् नग्न शरीर पर सविता की किरणें आच्छादित एवं प्रविष्ट होती चली जाती हैं। स्थूल शरीर में बल, सूक्ष्म शरीर में ज्ञान और कारण शरीर में दिव्य भाव के रूप में अपनी जड़ें गहरी जमाती चली जाती हैं। इस प्रकार की कल्पना ही नहीं साथ ही भावना भी करनी चाहिए। कल्पना में किसी दृश्य का आभास भर दिव्य चक्षुओं से होता है, किन्तु भावना में उस प्रकार की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है। अपने आप को विश्वास ही नहीं अनुभव भी वैसा होता है। यह अनुभव जितना−जितना सघन होता जाता है उसी अनुपात से वह चेतना का अंग बताया जाता है और अनुभव होता है कि वस्तुतः वैसा होने लगा। आदित्य की ऊष्मा और आभा अपने व्यक्तित्व को तपाने लगी और अपनी स्थिति एक सीमित सूर्य जैसी हो गई। अन्य सम्प्रदायों में अन्य प्रकार के ध्यान भी बताये गये हैं। पर उन सब का आधारभूत सिद्धान्त वही है जो ऊपर बताया गया है।
जप क्रियायोग का तीसरा चरण है जो ध्यान के साथ ही चलता है। ध्यान और जप को विलग कर दिया जाय तो शरीर और मन में से एक का काम मिलेगा और दूसरा छुट्टल रहने अनगढ़ क्रिया करने लगेगा। मात्र ध्यान हो तो शरीर को जहाँ−तहाँ खुजाने या कुछ हरकत करने की इच्छा होगी। यदि एकाकी जप हो तो मन छुट्टल रहेगा और वह आकाश−पाताल की कल्पनाएँ करने की घुड़दौड़ लगाने लगेगा अस्तु दोनों का समन्वय ही अभीष्ट है।
जप में गायत्री या अन्य मन्त्र का बार−बार रटन करने से उसकी स्थिति जिह्वा तक सीमित न रहकर अचेतन मन में उतर जाती है और उस मन्त्र के अर्थ एवं भाव के अनुरूप अपनी चेतना ढलने लगती है।
क्रियायोग का चौथा चरण है−प्राणायाम। प्राण को प्राण विद्युत कहा गया है वह चेतन भी है और सर्वव्यापी भी। प्राणायाम विधि से न केवल समुचित मात्रा में साँस भीतर पहुँचती है और फेफड़ों को परिपक्व करती है, वरन् उसका मूल तत्व है कि साधक के संकल्प से विश्वव्यापी महाप्राण की एक बड़ी मात्रा खींची जाती है और वह शरीर के कण−कण में समाविष्ट होती है।
भौतिक विद्युत का आवेश जहाँ भी समाविष्ट होता है वहाँ हलचल हरकत प्रारम्भ हो जाती है। प्राण विद्युत से झटका मारने और अनिष्ट करने जैसा कोई जोखिम नहीं है, पर वह संकल्पपूर्वक खींचे जाने और भीतरी अंग प्रत्यंगों द्वारा अवशोषित किये जाने पर वह एक उत्साह भरा उभार प्रकट करती है। अंगों की निर्बलता निष्क्रियता दूर होती है और नई चेतना का संचार नये सिरे से होता है। यह बैटरी चार्ज करने के समान है। शक्ति समाप्त होने पर बैटरी एक प्रकार से समाप्त हो जाती है और नाम मात्र का प्रभाव परिचय देती है, पर जब उसे चार्जर के साथ जोड़कर नये सिरे से शक्ति सम्पन्न कर दिया जाता है तो वह नई के समान कार्य करने लगती है। प्राणायाम थकान मिटाने का अनोखा तरीका है उससे न केवल शरीर के अवयव सक्षम होते हैं वरन् यह भी होता है कि मनःक्षेत्र में प्रतिभा, प्रज्ञा और मेधा का उदय हो और उस क्षेत्र की प्रसुप्त शक्तियाँ जागृत होकर सिद्ध पुरुषों जैसी अतीन्द्रिय क्षमताओं का चमत्कारी परिचय दें।
प्राण का निरोध दीर्घ जीवन का अमोघ उपाय है। प्राण धीमा पड़ने पर दुर्बलता आ घेरती है और उसके निकल जाने पर सत्य निश्चित है। किन्तु यदि प्राण निरोध विज्ञान का अभ्यास किया जा सके तो मरण को चिरकाल तक आगे धकेला जा सकता है। प्राणायाम की गति तीव्र कर देने से शरीर में ऊर्जा की मात्रा बढ़ जाती है और उसके सहारे शीत ऋतु में भी कम वस्त्रों में अथवा बिना वस्त्रों के भी रहा जा सकता है।
प्राणायाम की उच्चस्तरीय विधि है− सोहम् साधना। इसमें नादयोग का भी समावेश हो जाता है साँस खींचते समय सो और निकालते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है। इसका श्रवण कर्णेंद्रिय की सूक्ष्म तन्मात्रा के सहारे ही होता है। इस शब्द विन्यास में जब मन लगने लगता है तो न केवल मन की एकाग्रता प्रगाढ़ होती है वरन् आत्मा और परमात्मा के मिलन की सरस अनुभूति भी होने लगती है। ‘सोहम्’ साधना को ‘हंसयोग’ भी कहा गया है। चौबीस अवतारों में एक हंशावतार भी है। पक्षियों में सबसे पवित्र और उत्कृष्ट हंस माना जाता है। हंसयोग की साधना में सोहम् प्राणायाम से जीवात्मा में वे सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं जो हंस में पाई जाती हैं। नीर, क्षीर विवेक के कारण−सरोवर में से मुक्ता ढूँढ़ निकालने के कारण हंस की प्रशंसा है। ऐसी ही विभूतियों को उपलब्ध करने में सोहम् साधना की प्राणायाम भी मदद करता है।
उच्च शिक्षा, चतुरता या शरीर सौष्ठव भर से कोई व्यक्ति न तो आत्म सन्तोष पा सकता है और न लोक सम्मान। इन सबसे महत्वपूर्ण है परिष्कृत व्यक्तित्व। प्रतिभाशाली और उन्नतिशील बनने का अवसर इसी आधार पर मिलता है।
समग्र व्यक्तित्व के विकास को विज्ञान की भाषा में “बौड़ी इमेज” कहा जाता है। जिनने इस दिशा में अपने को विकसित कर लिया उनने दूसरों को प्रभावित करने की विशिष्टता को उपलब्ध कर लिया। ऐसे ही व्यक्ति प्रामाणिक और क्रिया कुशल माने जाते हैं। उनकी माँग सर्वत्र रहती है। वे न तो हीन समझे जाते हैं और न अपने कामों में असफल रहते हैं। “बौड़ी इमेज” से तात्पर्य− सौंदर्य, सज्जा या चतुरता से नहीं वरन् व्यक्तित्व की उस विशिष्टता से है जिसके आधार पर किसी की वरिष्ठता एवं विशिष्टता को स्वीकार किया जाता है। यह किसी के विश्वस्त, प्रामाणिक एवं क्रिया कुशल होने की स्थिति है। जिसके पास यह संचय है, समझना चाहिए उसके पास बहुत कुछ है। जो इस क्षेत्र में पिछड़ गया समझना चाहिए कि उसे तिरस्कार का भाजन बनना पड़ेगा।
यह विशिष्टता, सज्जनता, विनम्रता एवं आत्म−संयम के आधार पर विकसित होती है। ऐसे व्यक्ति उन दुर्गुणों से बचे रहते हैं जिनके कारण क्रिया−कुशल एवं स्वस्थ सौंदर्यवान होते हुए भी मनुष्य ऐसे कुकृत्य करने लगता है जिसे चरित्रहीनता एवं अप्रामाणिक की संज्ञा दी जा सके। कितने ही चतुर व्यक्ति अपने को हेय स्थिति में फँसा लेते हैं।
ऐसे व्यक्ति शारीरिक ही नहीं मानसिक एवं चारित्रिक रोगों से ग्रसित पाये जाते हैं। जिनने अपने व्यक्तित्व की साधना नहीं की आदर्श एवं संयम को महत्व नहीं दिया वे कुकर्मों से धन या दर्प का लाभ भले ही उठालें, अन्य क्षेत्रों में उन्हें घाटा त्रास एवं तिरस्कार ही सहना पड़ता है।
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि के आधार पर अपने शरीर के बारे में एक निश्चित धारणा या कल्पना होती है। मानव शरीर के सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन करने वाले समाज विज्ञानियों तथा मनोवैज्ञानिकों ने प्रत्येक व्यक्ति की अपने स्वयं के बारे में बनी इस निश्चित धारणा या प्रतिबिम्ब को− ‘बौडी इमेज’ या ‘बौडी कान्सेप्ट’, ‘बौडी स्कीम’ जैसे नाम दिए हैं। ‘बौडी इमेज’ न केवल व्यक्ति की अपनी पूर्णतया जागृत अवस्था में अपने बारे में बनी धारणा है बल्कि अचेतन या अर्धचेतन अवस्था में भी व्यक्ति का अपने स्वयं के बारे में दृष्टिकोण उसकी अनुभूतियाँ, अनुभव तथा उसके मनोकल्पनाएँ आदि भी इसमें सम्मिलित हैं। व्यक्ति की स्वयं के प्रति बनी इन धारणाओं अनुभवों का स्पष्ट अथवा साँकेतिक दर्शन इस आधार पर किया जा सकता है कि वह अपने प्रत्येक कार्य व्यवहार की व्यवस्था व समायोजन कैसे करता है? क्योंकि व्यक्ति के प्रत्येक क्रिया−कलाप, हाव−भाव, कार्य व्यवहार में व्यक्ति स्वयं की ‘बौडी इमेज’ का बहुत गहरा प्रभाव होता है।
आप किसी वर्ग के रोगी नर−नारियों को इकट्ठा कीजिए जिन लोगों ने औसत जीवन जिया है। उनके रोग सम्बन्धी जीवन का अध्ययन करें। बहुतों को विभिन्न रोगों के दौरान गुजरना पड़ा है। इस प्रकार की बीमारियाँ प्रायः उन दिनों उन्हें हुई हैं जब उन्हें विभिन्न चढ़ाव−उतार वाले मनःस्थितियों में गुजरना पड़ा तभी पेचिश, अल्सर, हाई ब्लडप्रेशर और हार्ट अटैक के दौरे पड़े होंगे। अनुसन्धान में पाया गया है कि लगभग सभी बीमारियां जब मानसिक दबाव की अधिकता पड़ती है तभी उग्रतम होती जाती हैं। ‘साइकोलॉजी टू डे’ पत्रिका में (सितम्बर 1984) डॉ. स्टाव हैनरी का कहना है कि हजार पीछे 75 प्रतिशत से अधिक रोगी उक्त कथन की सत्यता प्रतिपादित करते हैं। कुछ लोगों को अन्यों की अपेक्षा मानसिक तनाव आदि अत्यधिक उग्र होते जाते हैं।
हमारे शरीर की विभिन्न क्रियायें जैसे गुर्दे का रक्त में से अशुद्धि को छान लेना, आँतों का पोषक आहार का सोखना आदि अनेकानेक अजूबी क्रियाएँ, मस्तिष्क एवं स्नायु तन्त्र और पिट्यूटरी जैसी हारमोन ग्रन्थियों के उचित स्वरूप में क्रियाशील होने पर निर्भर है। अपराधी प्रवृत्ति इन सभी गतिविधियों को अस्त−व्यस्त कर देती है।
अनैतिक गतिविधियाँ अपनाते समय अथवा उसके पश्चात उनका मुँह सूखने लगता है जो इस बात का प्रतीक है कि पाचन क्रिया सम्पूर्णता बन्द कर दी गई है। शक्ति परिवर्तित तथा प्रगति के कारण सांसें तीव्र हो जाती हैं, छलांगें तेज होती जाती हैं। साथ ही रक्त में इन्डोराफिन जैसी नशीली स्राव का मिश्रण हो जाता है जिससे कोई भी चोट मोच आने पर शरीर को भास नहीं होता। साथ ही साथ ए. सी. टी. एच. (एड्रीनी कार्टिको, ट्राफिक हारमोन) का स्राव मस्तिष्क से होने लगता है जिससे स्मरण शक्ति तेज हो जाती है और मस्तिष्क की बुद्धि कुशाग्र हो उठती है।
केन्या में मसाई मार गेम रिजर्व अभयारण्य में रहने वाले 60 से अधिक बबून बन्दरों में स्ट्रेप्स रिस्पान्स के बारे में कई प्रयोग किये गए हैं। इन बबूनों की शरीर संरचना मनुष्यों से कई प्रकार मिलती−जुलती है। इन वानरों की यह विशेषता होती है कि नायक और नायक के कुछ सहचर विशिष्ट विशेषाधिकार जताते हैं जैसे उत्तम आहार ग्रहण करने में, सुरक्षित स्थान पर कब्जा करने में तथा बंदरियों से सेवा लेने में, जूँ निकलवाने में इत्यादि। यह सब विशिष्टता उन्हें प्रतिभा सज्जनता के आधार पर मिली होती है।
सुप्रसिद्ध दार्शनिक इमरसन ने कहा है− ‘‘उद्वेग एवं भय को मन में अंकुरित ही न होने दो।” उन्होंने यह भी बताया है कि यदि मानवी मस्तिष्क में से उद्वेग एवं भय को निकाल दिया जाय तो उसकी पूरी क्षमता का सदुपयोग किया जा सकता है।
तनाव से मुक्ति पाने के लिए जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए। यदि वस्तुस्थिति का सही ढंग से विश्लेषण कर लिया जाय तो भय से सुगमतापूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है।
कल्पनाओं के उत्पादन का एक मात्र केन्द्र मानवी मस्तिष्क को ही समझा जाता है। कुकल्पनायें भी यहीं विकसित होतीं और अपना कुप्रभाव छोड़ती हैं। व्यक्ति इनके उत्पादन को पूरी तरह रोक सकता है।
संसार में भय का अस्तित्व तो है पर इसे जीवन क्रम में अपनाना कोई जरूरी नहीं है। व्यक्ति को इन कुकल्पनाओं को मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए। पूर्णतः भौतिकवादी विचारधारा के लोगों को भी इस तथ्य से भली−भाँति परिचित होना होगा कि फिटैस्ट व्यक्ति (प्रवीणतम) भी भयमुक्त होकर अपने जीवन संघर्ष में सफल रहा।
जब व्यक्ति अपनी पूरी साहसिकता का परिचय देने लगे तो शेर जैसे नर भक्षी से भी भयभीत नहीं होता। मामूली-सी कायरता आ जाने पर चूहे जैसे नगण्य प्राणी से भी डरने लगता है। उदाहरण के लिए चिड़ियों को देख सकते है। डरपोक चिड़िया किसान द्वारा बनाये गये कृत्रिम पुतले (बिजूका) से डरकर भाग जाती हैं जबकि साहसी अपना पेट भरकर ही हटती हैं।
अनीतियुक्त आचरण में यह विशेषता है कि उच्छृंखलताजन्य दर्प प्रकट करते हुए भी उसके अन्तराल में असमंजस बना रहता है और वह समस्त व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। शरीर में रोग, मन में खेद दोनों मिलकर व्यक्ति ऐसा बन जाता है जिससे किसी भी विषय में सही निर्णय करते नहीं बन पड़ता। अभ्यस्त चरित्र हीनता दिन−दिन बढ़ती जाती है और फिर वह व्यक्ति सभ्य समाज में अपना स्थान बनाने तथा प्रगतिशील कदम उठाने की स्थिति में नहीं रहता।
जब तक धन, धातु और कागज के रूप में है तब तक वह कूड़े करकट के अतिरिक्त कुछ नहीं। पर जब वह योजनाओं और भावनाओं के साथ जुड़ता है, तब वह शक्ति बनता है।
मनुष्य का शरीर छोटा होता है। मन छोटा नहीं होना चाहिए। भगवान वामन बारह अंगुल के थे और अष्टावक्र ऋषि आठ जगह से मुड़े होने के कारण ऊँचाई में भी बहुत छोटे थे, पर उनने अपनी प्रतिभा से संसार को चकित कर दिया।
कांगो क्षेत्र के निवासी आमतौर से बौने प्रायः चार फुट के होते हैं। पर इतने शरीर से भी वे अपने देश का सभी कारोबार संभाल लेते हैं।
ग्रन्थियों और हारमोनों में गड़बड़ी पड़ जाने के कारण कई बच्चे बौने रह जाते हैं, पर इससे उनकी मानसिक स्थिति पर बहुत प्रभाव नहीं पड़ता। वे चतुरता में बड़ों के समान ही होते हैं और अपने कद की तुलना में अधिक पुरुषार्थ करके दिखाते हैं।
संसार में बौनों का इतिहास भी मनोरंजक और आश्चर्यजनक है उनमें से कितनों को ही असाधारण श्रेय मिला है।
ब्रिज पोर्ट में सन् 1838 में जन्मा टाम थम्ब संसार का सबसे छोटा और प्रख्यात बौना था। उनका वजन 24 कि. ग्रा. और कद 3 फुट से कुछ कम था। वह बड़ा हंसोड़ और चतुर था। एक म्यूजियम के मालिक बार्नम की सहायता से उसने विश्व भर में 24 हजार मील की यात्रा की। इस अजूबे को देखने आने वाले लोग उसे कुछ न कुछ पैसा देते थे उसने अपने ही जितने कद की एक अध्यापिका लैविनिया से विवाह किया। उसके विवाह में 2000 अमेरिका के संभ्रान्त व्यक्ति शामिल हुए।
रोम के सम्राट डोमेटिसियन को अपने दरबार में बौने रखने का बहुत शौक था। 2 फुट से कम के बौनों की उनने एक बड़ी सेना बनाई थी।
रूस के सम्राट जार पीटर को भी बौने पालने का ऐसा ही शौक था, उनने अपनी एक बौनी नौकरानी का विवाह उसी की लम्बाई के एक बौने से किया था, जिसमें 72 बौने बराती आये थे।
इंग्लैंड का जेफरी हडसन जासूसी के लिए नियुक्त किया गया था। वह 14 वर्ष की आयु में मात्र 22 इंच का था। उन्हीं दिनों एक दूसरा बौना गित्सव 3 फुट 10 इंच का था। बहुत प्रख्यात हुआ।
फ्राँस का एक नन्हा जासूस रिश बौर्ज बादशाह के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण जासूसी करता था। वह क्रान्तिकारियों की गतिविधियों की सारी गुप्त सूचनाएँ एक महिला की गोद में छोटे बच्चे की तरह छिपकर पहुँचाता था।
मैक्सिको की एक लड़की लूतिया जाकेत सन् 1854 में जन्मी उसका कद 20 इंच और वजन 3 कि. ग्रा. था। जर्मनी की एक यहूदी लड़की लियाग्राफ मात्र 21 इंच की थी। रूस के जार पीटर ने बौने के लिए एक छोटा नगर ही बसाया था। सन् 1939 में न्यूयार्क नगर में बौनों का एक विश्व खेल हुआ था। मिकू बौने का कद 18 इंच और वजन 14 ग्राम था।
इन बौनों को आश्चर्य से अवश्य देखा जाता है पर उनने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें बुद्धिहीन या आदर्शहीन कहा जा सके। इसके विपरीत कितने ही ऐसे आदमी हुए हैं जिनके पास प्रचुर साधन थे, पर उन्हें बड़प्पन की शेखी लूटने के लिए निरर्थक कामों में लगाते रहे। बुद्धिमान सोचते हैं कि यदि उन साधनों का सदुपयोग हुआ होता तो कितना अच्छा रहता।
मिश्र शासन का खजांची ऊँट पर सवार होकर मक्का गया। रास्ते में ऊँट के पैर जहाँ−जहाँ पड़े वहाँ वह एक−एक गिन्नी रखवाता गया। इस प्रकार उसने 20 लाख डालकर मूल्य का सोना बखेरा। वह जिसके भी हाथ लगा वह उठा ले गया। ऐसे मन्द बुद्धि सनकी दुनिया में अनेकों हुए हैं।
ल्हासा तिब्बत के पोटीला महल में 13 वें दलाईलामा की कब्र है। जो 70 फुट ऊँची है और सोने से ढकी हुई है। इसमें उसकी इच्छानुसार एक टन सोना लगा हुआ है। जो 10 लाख डालकर मूल्य का है।
सबसे भारी घण्टा जार कोलोकोल द्वारा सन् 1775 में ढाला गया घंटा है जिसका वजन 196 टन तथा व्यास 6 मीटर तथा ऊँचाई 16 फुट 3 इंच है। इसके बाद मांडले वर्मा का मिगुन नामी घण्टा है जो 61 टन भारी और 16 फुट ऊँचा है।
जब पिरामिड बनाने का शौक मिश्र के समीपवर्ती शासकों को चर्राया तो छोटे−मोटे संभ्रांत भी पीछे न रहे। पश्चिमी अफ्रीका के एक माओ शासक मुहम्मद अश्किया ने भी अपने जीवन काल में एक भौंड़ा पिरामिड बनवाया। यों उसमें ढेरों त्रुटियाँ थीं फिर भी वह उस निर्माण की प्रशंसा करते−करते न अघाता था।
गीजा पिरामिड (मिश्र) 451 फुट ऊँचा एवं इसका क्षेत्रफल 13 एकड़ है। 4 हजार मजदूर 30 वर्ष तक इसमें काम करते रहे। अनेकों व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हुई, उन्हें भी इसी की नींव में दफना दिया गया।
रोम के बादशाह ओरेलियनिम के दरबार में एक ऐसा पेटू था जो देखते−देखते दस व्यक्तियों का भोजन चटकर जाता था।
दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन नगर में एक मलायन लकड़हारा ऐसा था जो 16 मनुष्यों का भोजन अकेला ही शर्त बदलकर खा जाता था। साधारण खुराक तो उसकी कम ही थी।
बड़प्पन की अभिलाषा स्वाभाविक एवं उचित है। पर उसका औचित्य तभी है जब वह दूसरों के सामने ऊँची आदर्शवादिता का परिचय दे, अन्यथा पहाड़ की ऊँची चोटियों पर चढ़ने की तरह अपना पैसा और श्रम समय गँवाने से क्या लाभ? निरुद्देश्य के कामों में संलग्न होकर कई व्यक्ति अपना बड़प्पन सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। चापलूसों द्वारा तात्कालिक बड़ाई के अतिरिक्त उन्हें कोई ऐसा लाभ नहीं मिलता जिसके लिए इतिहासकार उनका स्वर्णाक्षरों में उल्लेख कर सकें।
इस सस्ते बड़प्पन की तुलना में मनुष्यों, प्राणियों या निर्जीव समझे जाने वाले संस्थानों की अधिक महत्ता है जो अपनी उपयोगिता सिद्ध करते हैं अथवा दूसरों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
बेसेन डीन आस्ट्रेलिया का दि चर्च आफ क्राइस्ट 1 दिन में 120 स्वयंसेवकों द्वारा खड़ा किया गया था और दूसरे दिन उसमें धर्मोत्सव सम्पन्न हुआ। यह घटना 4 जनवरी 1913 की है।
प्राचीन यूनान की एक खण्डहर पड़ी पूजा वेदी का इस देश के निवासियों ने उस खण्डहर को उन्हीं पुराने पत्थरों से नये सिरे से निर्माण किया अन्तर केवल इतना किया गया कि कुछ सीढ़ियाँ कम रखीं गई और कुछ ऊँचाई भर कम रखी गई। इस कारण उसमें नया पत्थर नहीं लगाना पड़ा पुराने से ही काम चल गया।
सपने में देखे भवन की आकृति को यथावत् बना देने का निश्चय फ्राँस के एक देहाती किसान की लगन यथावत् बनी रही। उसने अपने सारे साधन झोंककर 27 वर्ष में वह भवन तैयार किया।
आवश्यकता पड़ती है तो मनुष्य को बड़प्पन का पाठ पशु भी पढ़ा देते हैं। न्यू फाउण्डलैण्ड के समुद्र तट पर एक छोटा जहाज पानी में डूबा। उसके सभी सवारों को एक कुत्ते ने मुँह में रस्सी दबाकर दूसरा सिरा पकड़ने वाले सभी नाविकों और कर्मचारियों को किनारे से लगा दिया।
द्वितीय महायुद्ध को अनैतिक बताने के अपराध में एरी (इंग्लैंड) का एक व्यक्ति था गिल्वर्ट लेन। उसे 31 मास नजरबंदी और 183 दिन जेल में काटने पड़े। स्वयं कष्ट सहकर भी अपने उचित विचारों की अभिव्यक्ति में जो सुदृढ़ रहे उन्हें भी बड़प्पन की आंखों से ही देखा जायेगा। बड़प्पन की कोई सुनिश्चित कसौटी नहीं बनाई जा सकती, नहीं किसी फितुरी काम से अपना नाम उस श्रृंखला में जोड़ा जा सकता है।
मनुष्य जीवन देकर ईश्वर ने अपना चरित्र अनुग्रह कर दिया अब तुम्हारी बारी है कि उसकी दुनिया में शान्ति के बीज बोओ और उस पर बदले में अनुग्रह करो।
बाहर के बहुत से पदार्थों और प्राणियों से हमारी जान पहचान है। साथ ही यह भी विदित है कि कौन अपना कौन पराया है अपनों को कितना प्यार किया जाना चाहिए और उन्हें कितना लाभ दिया जाना चाहिए। परायों के प्रति सीमित सद्व्यवहार ही पर्याप्त माना जाता है। इसी नीति को बरतते हुए जिन्दगी व्यतीत हो जाती है।
किन्तु यह नीति अपने आपे के प्रति एक प्रकार से विस्तृत ही कर दी जाती है। यहाँ तक कि जब आत्म चिन्तन का समय आता है तब यह भी भुला दिया जाता है कि अपना पराया कौन है। उनकी सही पहचान भी नहीं रहती और व्यवहार करते समय ठीक उलटा बरताव किया जाता है।
मनुष्य आत्मा है। उसका आच्छादन अथवा वाहन शरीर है। कपड़ा पुराना हो जाता है फट जाता है तब उसका मोह त्यागकर नया बदल लेते है। वाहन भी जब जराजीर्ण−काम करने में असमर्थ हो जाते हैं तो उनकी छुट्टी कर दी जाती है। कपड़ों और सवारियों की उतनी देखभाल और साज−सम्भाल की जाती है जितने के वे अधिकारी हैं। शरीर के प्रति हमारा रवैया यही होना चाहिए। उन्हें स्वच्छ और स्वस्थ बनाये रहने के लिए कर्त्तव्य पालन भर किया जाना चाहिए।
‘स्व’ आत्मा है। वही सगा और सनातन है। शरीर न रहने पर भी वह बना रहता है। सन्मार्ग पर चलने का श्रेय उसी को मिलता है और कुमार्ग पर चलने की भर्त्सना भी उसी की होती है। होनी भी उसी की चाहिए शस्त्र का गलत उपयोग करने का दण्ड उसे चलाने वाले को मिलता है। उस उपकरण को नहीं।
वाहन को चलाने में सावधानी न बरती जाय उसे छुट्टल छोड़ दिया जाय तो दुर्घटना होकर रहेगी। बिना लगाम का घोड़ा कहीं भी जा सकता है और किसी भी राह पर चल सकता है। बिना ब्रेक और हैण्डल की गाड़ी किसी भी खाई खड्ड में गिर सकती है और अपनी तथा बैठे हुए लोगों की दुर्गति बना सकती है। इन्द्रियों की लिप्साओं मन की तृष्णाओं की पूर्ति में बिना उचित अनुचित का विचार किये, कुछ भी चाहने, माँगने और करने दिया जाय तो वे अपनी खाज खुजाने की चेष्टा करेंगी। मन को ममता और आत्मा की पूर्ति चाहिए और इन्द्रियों को विलास की आकाँक्षा रहती है। यदि विवेक का अंकुश न रहे तो वे अतिवाद पर उतारू हो सकती हैं और नीति मर्यादा तथा औचित्य का बेतरह उल्लंघन कर सकती हैं। इस अति में शरीर को भी ऐश−शौक का−भर्त्सना और प्रताड़ना का भागी बनना पड़ता है। आत्मा का तो अहित होता ही है।
मनुष्य जन्म बड़े पुण्य का प्रतिफल है। वह इसलिए मिला है कि उसका सदुपयोग करके आत्मा के कल्याण का प्रयत्न किया जाय। आदर्शों का पालन, और लोक मंगल का सेवा साधन करने में ही उसका हित है। इन प्रयासों से शरीर को भी स्वस्थ और प्रसन्न रहने का अवसर मिलता है। किन्तु यदि यह भुला दिया जाय कि आत्मा का अपना भी कोई स्वरूप, स्वार्थ एवं उद्देश्य तो भी अपना आपा मात्र शरीर रह जाता है। जब आत्मा को भुला दिया गया तो शरीर के हित साधन का ध्यान भी कहाँ रहेगा। तब इन्द्रियों की लिप्सा पूरी करने में अतिवाद की सीमा तक जा पहुँचने की उच्छृंखलता अपनाई जायगी और वासना पूर्ति के लिए आत्मा की ही नहीं शरीर की भी दुर्गति बनाई जायेगी।
मन भी एक इन्द्रिय है उसकी विकृति अहंकार बनकर फूटती है। संग्रह और प्रदर्शन में रस लेती है। फलतः वह नीति और मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए अपराध में संलग्न होने तक पर उतारू हो जाती है। भले ही उस अहंकार की पूर्ति के लिए दूसरों का उत्पीड़न ही क्यों न करना पड़े। अनावश्यक साज−सज्जा में उपहासास्पद ही क्यों न बनना पड़े।
जीवन की वास्तविक आवश्यकताएँ थोड़ी ही हैं। उन्हें नित्य के सामान्य श्रम से पूरा किया जा सकता है किन्तु तृष्णा का कोई अन्त नहीं वह सुख साधनों को इतनी अधिक मात्रा में संग्रह करना चाहती है मानो लाख−करोड़ वर्ष जीना हो और उसके लिए असीम मात्रा में एक दिन ही संग्रह करके रख लेने का निश्चय किया गया हो। बात इतने तक भी सीमित नहीं रहती कुटुम्बियों के लिए भी इतनी सम्पदा संग्रह करने का मन होता कि उन्हें स्वयं श्रम न करना पड़े और उत्तराधिकार के रूप में मिली हुई समृद्धि के बलबूते ही शौक−मौज करते रहें। यह सब बाहरी परिकर परिवार है जिसके लिए हम मरते खपते रहते हैं और अपने आपे तक को भूल जाते हैं।
आत्मा शब्द तो कई बार मुख से निकलता और कान से सुनाई पड़ता रहता है। पर व्यवहारतः यह नहीं समझ पाते कि शरीर से पृथक कोई चेतन सत्ता भी अपने भीतर विद्यमान है जो शरीर के न रहने के उपरान्त भी बनी रहती है। उसकी श्रेय साधना ही अपना वास्तविक हित साधन है।
शरीर का उपयोग ऐसे प्रयोजनों के लिए किया जाना चाहिए जिनसे आत्मा का वास्तविक हित साधन होता हो। यह बन पड़ने की सम्भावना तभी बन पड़ती है जब दोनों की पृथकता व्यवहारतः समझें और दोनों का हित साधन जिसमें सम्भव है उस क्रिया−कलाप को अपनाने के लिए सचेष्ट रहें। अहित किसी का भी न होने दें।
संयम दोनों का हित साधना करता है। इन्द्रिय संयम से स्वास्थ्य और सन्तुलन बना रहता है। मानसिक संयम से उद्धत आकाँक्षाओं पर अंकुश लगता है फलतः शान्ति और सन्तोष दोनों ही बने रहते हैं। इस नीति को अपनाने से शरीर का ही नहीं आत्मा का भी हित साधन होता है। उसे आन्तरिक प्रफुल्लता रहती है और वह उद्देश्य सधता है जिसके लिए बहुमूल्य मानव शरीर धारण करने का सुयोग मिला है।
आत्मा को स्वर्गीय प्रफुल्लता पाने और भव बन्धनों से मुक्त होने के लिए ही यह जन्म मिला है। असंयम और उद्धत आचरण करने पर दोनों का ही अहित होता है जब कि उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र का आश्रय लेने पर आत्मा को परमात्मा का दिया हुआ उपहार हर दृष्टि से सार्थक होता है। क्षणिक रसास्वादन के लिए भविष्य को हर दृष्टि से अन्धकारमय बना लेने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।
मिस्र के सन्त घुननून एक बार नदी किनारे शौच से निवृत्त होने गये। उन्हें छत्त पर खड़ी एक राजकुमारी देख रही थी। सन्त ने भी उन्हें देख लिया और नमाज से निवृत्त होकर उस युवती के महल के नीचे जा पहुँचे और पूछा− ‘‘क्या मुझसे कुछ पूछना है?”
राजकुमारी ने कहा− ‘‘अब कुछ नहीं पूछना। जो पूछना था उस सबका जवाब मिल गया। नदी तट पर शौच करते देखकर समझा कि यह कोई पागल है। पर जब पानी लिया तो जाना कि इसमें अक्ल है। पागल नहीं। नमाज पढ़ी और सही उच्चारण किया तो समझा कि यह कोई शास्त्रज्ञ है। मेरी ओर देखा तो समझा कि कोई धर्मोपदेशक हैं जो मुझे राह बताना चाहते हैं। पर जब तुम मुझे निहार रहे हो तो प्रतीत होता है कि तुम इनमें से कुछ नहीं संसारी प्रवृत्तियों से घिरे हुए और सन्त का वेष धारण किये साधारण मनुष्य हो और मनुष्य की दृष्टि में तो हर नारी अबला है−भोग करने योग्य गुड़िया भर है। सन्त का अहंकार जल गया।
आर्थिक आदान-प्रदान− शरीरगत सेवा सहयोग के सहारे परस्पर एक दूसरे की सहायता करने, मैत्री विकसित करने एवं सद्भावना उपलब्ध करने के अनेकानेक प्रमाण सामान्य जीवन में आये दिन मिलते रहते हैं। छोटे और बड़ों में, मित्र-मित्र में, कई कारणों से, कई प्रकार के आदान-प्रदानों का सिलसिला चलता रहता है।
ऊँचे स्तर पर मनुष्य की एक विशेष क्षमता है− प्राण। यह एक प्रकार की जीवंत विद्युत है। जीवन एवं व्यक्तित्व इसी की न्यूनाधिकता में गिरता उठता रहता है। प्राण की सीमित मात्रा सभी प्राणधारियों को समान रूप से उपलब्ध है। वे शरीर यात्रा के आवश्यक साधन इसी से सहारे जुटाते हैं और यथोचित पुरुषार्थ एवं कौशल विकसित करने में सफल रहते हैं। प्राण ऐसा तत्व है जो हवा की तरह भीतर भी भरा है और समस्त ब्रह्मांड में भी संव्याप्त है। उसकी अतिरिक्त मात्रा प्राणायाम प्राणाकर्षण विधान जैसे उपायों के सहारे अर्जित भी की जा सकती है।
प्राण अपनी सर्वतोमुखी समर्थता के लिए तो आवश्यक है। उसका प्रयोग उपचार दूसरों के हित अनहित के लिए भी किया जा सकता है। योग माध्यम से प्राणोचार का प्रयोग प्रायः सदुद्देश्यों के लिए ही होता है। किन्तु ताँत्रिक अभिचार से इसे दूसरों को परास्त करने के लिए प्रहार रूप में भी किया जाता है। शक्ति−शक्ति ही रहेगी। उसका उपयोग किसने किस प्रकार किया यह दूसरी बात है। प्राण मानवी सत्ता की सबसे बड़ी शक्ति है। उसका उपयोग पग−पग पर होता है। जीवन मरण के लिए−समर्थता दुर्बलता के लिए−कायरता साहसिकता के लिए−अवसाद और पराक्रम के लिए प्राणशक्ति की न्यूनाधिकता एवं उत्कृष्टता निकृष्टता ही आधारभूत कारण होता है। बाहरी उपचारों से तो तनिक-सा ही सुधार परिवर्तन सम्भव होता है।
विचार दूर−दूर तक जा सकते हैं। उन्हें पत्रों, लेखों तथा टैप टेलीफोन आदि के माध्यम से अन्यत्र भी भेजा जा सकता है। किन्तु प्राण में यह कमी है कि वह एक सीमित क्षेत्र में ही रहता है। उसका कहने लायक प्रयोग समीपवर्ती परिधि में ही हो सकता है। जैसे−जैसे दूरी बढ़ती जाती है वैसे ही प्राण प्रभाव का क्षेत्र झीना होता जाता है। किन्हीं महाप्राणों की बात दूसरी है जो अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र को−उसमें रहने वाले समुदाय को अनुप्राणित करें। किन्तु सामान्यतया यह सचेतन ऊर्जा जलती आग की तरह निकटवर्ती को ही अधिक प्रभावित करती है। आग से दूर हटते जाने पर उसकी रोशनी भले ही दिखे पर गर्मी में तो निश्चित रूप से कमी ही होती जायेगी। प्राण की प्रकृति भी यही है।
ऋषि आश्रयों में गाय और सिंह निर्भय होकर एक घाट पानी पीते थे। किन्तु उस प्रभाव परिधि से बाहर निकल जाने पर फिर वे ‘आक्रामक आक्रान्त’ की रीति−नीति अपनाने लगते हैं। उसे प्राण शक्ति का सम्मोहन ही कहना चाहिए।
सान्निध्य का प्रभाव क्या पड़ता है इसका सामान्य परिणाम सत्संग और कुसंग के भले−बुरे रूप में देखा जाता है। समर्थों की निकटता असमर्थों को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। चोर, जुआरी, लम्पट, मद्य−व्यसनी, दुर्गुणी संपर्क में आने वालों को अपना छूत लगा देते हैं। यह कुसंग हुआ। सज्जनों की− प्राणवान महामानवों की निकटता भर से सहचरों से उन गुणों का एक महत्वपूर्ण अंश अनायास ही हस्तांतरित होता है। इसलिए अधिक समय के लिए सम्भव न होने पर भी लोग महामानवों के निकट तक पहुँचाने का किसी न किसी बहाने कुछ न कुछ प्रयत्न करते रहते हैं।
दर्शन, प्रणाम, चरण स्पर्श, पैर दबाना आदि से महाप्राणों को भले ही कोई लाभ न मिले पर दुर्बल प्राण उस तनिक से सुयोग तक का लाभ उठा लेते हैं। अधिक घनिष्ठता की तो बात ही क्या? जो पक्ष प्रबल होगा वह दूसरों को अपनी भली−बुरी विशेषताओं से प्रभावित करेगा।
दाम्पत्य जीवन में यह चमत्कार विशेष रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। महात्मा गाँधी का इसी स्तर का अनुदान उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा को मिला था। रामकृष्ण परमहंस की पत्नी माता शारदामणि जो निजी स्तर पर उतनी ऊँची नहीं थीं पर उन्हें अपने पति का न केवल यश, श्रेय वरन् प्राण भी समुचित मात्रा में उपलब्ध हुआ था। ऋषियों की तरह ऋषिकाएँ भी प्रायः उसी स्तर की प्रखरता अपने में धारण किये होती थीं, भले ही उनके विद्या, तपश्चर्या या प्रतिभा निजी रूप से उतनी बढ़ी−चढ़ी न रही हो। सप्त ऋषि मण्डली में वशिष्ठ के समान ही अरुंधती को भी समतुल्य पद मिला था। नारी और नर के मध्य विद्युत संचार की एक प्रकृति प्रदत्त विशेष आकर्षण शक्ति काम करती है। आवश्यक नहीं कि पति−पत्नी के रूप में ही हस्तांतरित हो, वह अन्य रिश्तों से सरलता पूर्वक अग्रगामी होती है। योगी अरविन्द और प्रातः स्मरणीय माताजी की घनिष्ठता लौकिक नहीं अध्यात्म स्तर की ही थी। विवेकानन्द और निवेदिता के रिश्ते भी ऐसे ही थे। मनु की पुत्री इला उन दिनों अपने पिता के दाहिने हाथ का काम करती थी। इनके मध्य भी नेहरू और इन्द्रा जैसी निकटवर्ती आत्मीयता थी। इन उदाहरण में सरदार पटेल और उनकी पुत्री मणिवेन का नाम भी गिनाया जा सकता है। गाँधीजी के आश्रम में उनकी साज सम्भाल करने वाली महिलाएँ अपेक्षाकृत अधिक नफे में रही थीं।
नर और नारी की प्रकृति संरचना की ही ऊपर की पंक्तियों में उल्लेख हुआ तो इसका अर्थ यह नहीं कि नर और नर के−नारी और नारी के बीच−वैध प्रत्यावर्तन हो नहीं सकता या उसमें कुछ विशेष अड़चन पड़ती है। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द, विरजा और दयानन्द, कृष्ण और अर्जुन जैसों की निकटवर्ती घनिष्ठता अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी सिद्ध हुई थी। इस विचार प्रभाव को भी अधिक प्राण प्रत्यावर्तन कहना चाहिए।
इस प्राण प्रवाह को ही कुण्डलिनी के नाम से जाना जाता है। उसे प्रचण्ड बनाने का विशेष उपक्रम एवं विधान है। शक्तिपात द्वारा बड़े रूप में और चिकित्सा उपचार की तरह छोटे रूप में इस क्षमता का लाभ एक के द्वारा दूसरे को दिये जाने का प्रावधान है।
स्थूल शरीर से परे मनुष्य के सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व अब विज्ञान द्वारा भी प्रामाणित होने लगा है। सन् 1963 से अब तक रूस के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में कई सफल प्रयोग किये हैं। वहाँ के एक इलेक्ट्रान विशेषज्ञ सेमयोन किर्लियान ने अपनी वैज्ञानिक पत्नी वैलिण्टाना के सहयोग से फोटोग्राफी की एक विशिष्ट प्रविधि का आविष्कार किया। इस विधि द्वारा सजीव प्राणियों के आस−पास होने वाले सूक्ष्म कम्पनों और देह−ऊर्जा के क्रिया−कलापों का छायाँकन किया जा सकता है।
इन छाया चित्रों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रत्येक प्राणी के दो शरीर होते हैं। पहला प्राकृतिक अथवा भौतिक जो आँखों से दिखाई देता है और दूसरा सूक्ष्म शरीर जिसकी सब विशेषताएँ प्राकृतिक शरीर जैसी होती हैं, पर जो दिखाई नहीं देता। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह सूक्ष्म शरीर ऐसे सूक्ष्म पदार्थों का बना होता है जिनके इलेक्ट्रान ठोस शरीर के इलेक्ट्रानों की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से चलायमान होते हैं। उनके अनुसार सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर से अलग होकर कहीं भी विचरण कर सकता है।
‘द बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी’ का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों ने उसके तत्वों का भी विश्लेषण किया है। बायोप्लाज्मा की संरचना और कार्य विधि का अध्ययन करने के लिए सोवियत वैज्ञानिकों ने कई प्रयोग किए और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बायोप्लाज्मा का मूल स्थान मस्तिष्क है और यह तत्व मस्तिष्क में ही सर्वाधिक सघन अवस्था में पाया जाता है तथा सुषुम्ना नाड़ी और स्नायविक कोशिकाओं में सर्वाधिक सक्रिय रहता है।
शास्त्रकार ने इस शरीर की तुलना एक ऐसे वृक्ष से की है जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे की ओर हैं। जिस प्राण ऊर्जा के अस्तित्व को वैज्ञानिकों ने अनुभव किया वह आत्मचेतना नहीं है बल्कि सूक्ष्म शरीर के स्तर की ही शक्ति है जिसे मनुष्य शरीर की विद्युतीय ऊर्जा भी कहा जाता है। यह ऊर्जा प्रत्येक जीवधारी के शरीर में विद्यमान रहती है।
मनुष्य शरीर पदार्थ का समुच्चय है उसका मूल स्वरूप ऊर्जामय है। शरीर के इर्द−गिर्द फैला रहने वाला तेजोवलय तथा विचार तरंगों के रूप में आकाश को आच्छादित किये रहने वाला चेतन प्रवाह अपने−अपने स्तर की ऊर्जा का परिचय देते हैं। चूँकि पदार्थ कभी मरता नहीं इसलिए यह मनुष्य की आत्मा न सही, शरीर या पदार्थ भर माना जाय तो भी यह कहा जा सकता है कि मृत्यु के उपरान्त भी ऊर्जा बनी रहती है जिसे अध्यात्म की भाषा में प्राण कहा जाता है।
विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी डा. पेनफील्ड ने मस्तिष्क के अग्रभाग में लगभग ढाई वर्ग इंच लम्बे और 1/10 इंच मोटे एक ऐसे क्षेत्र का पता आज से वर्षों पूर्व लगाया था जहाँ दो काली पट्टियाँ हैं जिन्हें टेम्पोरल कारटेक्स कहा जाता है। ये कनपटी के नीचे मस्तिष्क को चारों और छल्लानुमा घेरे हुए हैं। यही वे पट्टियाँ हैं जहाँ मानसिक विद्युत का प्रवेश होते ही अच्छी−बुरी स्मृतियाँ उभरती हैं। इसी में स्मृतियों के भण्डार भरे पड़े हैं, यदि इनमें विद्युत आवेश प्रवाहित किया जाये तो इतनी सी पट्टी ही उस व्यक्ति के ज्ञात−अज्ञात सारे रहस्यों को उगल सकती है। जिसे भयवश, लोक लज्जा अथवा संकोच वश मनुष्य व्यक्त नहीं कर पाता, जो जन्म−जन्मान्तरों से संस्कार रूप में मनुष्य के साथ संचित बने रहते हैं।
यह पट्टियाँ किसी केन्द्रक तत्व (न्यूकिलक एलीमेंट) से बनी होती हैं। जब इनमें लहरे उठती हैं तो इनसे प्रभावित नलिका विहीन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से एक प्रकार के हारमोन्स निकलते हैं। जो क्रोध, घृणा, कामवासना, भय, ईर्ष्या, द्वेष, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, सहिष्णुता आदि भावों के जनक कहे जाते हैं। हारमोन्स के कारण ही मनुष्य स्वस्थ या रोगी बनता है। यदि अच्छे गुण होते हैं तो अच्छे हारमोन्स और बुरे गुण बुरे हारमोन्स का द्योतक है। अच्छे हारमोन्स का निश्त्रवण स्निग्धता, हल्कापन, प्रसन्नता, प्रफुल्लता अच्छे विचार उत्पन्न करता है। बुरे हारमोन्स ठीक इसके विपरीत प्रभाव दिखाते हैं।
उदाहरण के लिए डा. पेनफील्ड ने एक व्यक्ति की इस काली पट्टी में विद्युत प्रवाहित की तो वह एक गीत गुनगुनाने लगा जो न तो अमेरिकन था न जर्मनी, उपस्थित कोई भी व्यक्ति उसे समझ न सका। उस गीत को टैप कर लिया गया और भाषा शास्त्रियों की मदद ली गई तो पता चला कि वह भाषा किसी आदिवासी क्षेत्र की थी और वह गाना सचमुच ही उस क्षेत्र के लोग गाया करते हैं।
इस प्राण ऊर्जा को सम्वर्धन किया जाय, उसे खिलवाड़ में न बखेरा जाय अभी उससे कोई महत्वपूर्ण काम लिया जाय इसी में बुद्धिमत्ता है।
एक व्यापारी ने जल्दबाजी से अपना सारा धन बेटों को बाँट दिया और स्वयं उनके आश्रित हो गया। देखा कि अब इसके पास कुछ नहीं है तो पुत्र वधुयें तिरस्कार करने लगीं। बारी−बारी वह चारों के यहाँ रहा तो भी हर जगह उसे उपेक्षा ही मिली।
दुःखी होकर वह एक मित्र के यहाँ पहुँचा। उसने अपनी नीति बताई। चारपाई के चारों पायों के नीचे, थोड़ा−थोड़ा पैसा जमीन में गाढ़ रखा था। कहता था जो बहू अधिक सेवा करेगी उसी को यह धन देकर जाऊँगा।
सभी बहुयें एक दूसरी की प्रतिद्वन्द्वता करतीं और सेवा में आगे निकलने की कोशिश करतीं ताकि सम्पत्ति उन्हीं को मिले। धन थोड़ा-सा ही था। पर उसे अधिक समझकर उनकी सेवा अधिक होती थी।
भूल करने वाले मित्र को भी उनने अपने घर रख लिया और बताया सब कुछ देकर स्वयं खाली हो जाना बुढ़ापे के लिए संकट मोल लेना है।
‘इन्ट्रोडक्शन टू साइन्स’ पुस्तक में विद्वान टी. ए. थाक्सन लिखते हैं कि विज्ञान का लक्ष्य अवैयक्तिक तथ्यों का प्रामाणिक रूप से सत्य की भाषा में सरलता से प्रस्तुतीकरण करना है। एक वैज्ञानिक घटनाओं और दृश्यों का सूक्ष्म निरीक्षण करता तथा उनमें नियमानुकूलता का पता लगाकर जो निष्कर्ष निकालता है, वही परीक्षण की कसौटी पर खरा उतरने पर एक निश्चित सिद्धान्त अथवा विधि−विधान के रूप में परिणत हो जाता है। इस प्रकार विज्ञान तर्क पूर्ण निष्कर्षों तथा आनुभविक सूक्ष्म परीक्षणों द्वारा सत्य के निकट पहुँचता है। पर उस निष्कर्ष तथा आविष्कृत सत्य को कभी भी अन्तिम नहीं मानता। प्रयोग में पुनरावृत्ति विज्ञान का आवश्यक अंग है। प्रयोगों की कसौटी पर कसे बिना कोई भी तथ्य स्वीकार्य नहीं होता। किसी ग्रन्थ अथवा व्यक्ति का कथन इसलिए प्रामाणिक नहीं माना जाता है कि वे पुरातन हैं वरन् सत्यता के आधार पर वे प्रामाणिक घोषित किये जाते हैं। सत्यानुसन्धान की प्रवृत्ति के कारण विज्ञान ने प्रतिष्ठा प्राप्त की है।
आदिम अवस्था में मानव की बुद्धि इतनी विकसित नहीं हुयी थी। प्रकृति की घटनाओं को वह समझ नहीं पाता था। प्राकृतिक प्रकोपों को वह किसी अविज्ञात शक्ति का−देवी-देवता का कोप मानता था। सूर्य ग्रहण चन्द्र ग्रहण का लगना, भूकम्प का आना ज्वालामुखी का फटना, तूफान का आना जैसी घटनाओं के प्रति उसकी मान्यता थी कि वे किसी दैवी शक्ति से अभिप्रेरित होती हैं, पर बुद्धि के विकास से प्रकृति के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा बढ़ी। फलतः वे रहस्य अनावृत होते चले गये तथा पुरानी मान्यताएँ भी बदलती गयीं। उन्हें अब प्रकृति की असामान्य घटना भर समझा जाता है।
जिज्ञासा की भावना तथा तर्क की प्रवृत्ति वैज्ञानिक मनोवृत्ति की प्राथमिक शर्त है। किसी वस्तु, घटना अथवा रहस्य को देखकर सहसा ही ‘क्या’, क्यों और कैसे का प्रश्न, उठे, यही वैज्ञानिक मानसिकता है। सत्य एवं तथ्य की खोज में इसी से प्रेरणा मिलती है। प्रचलित सिद्धान्तों, मान्यताओं तथा परिकल्पनाओं में औचित्य का अंश कितना है, इसका निर्धारण इस खोज की मनोवृत्ति से ही हो पाता है। पूर्व मान्यताओं एवं स्वयं के पूर्वाग्रहों का उसमें स्थान नहीं होता। रहस्यों को जानने के लिए उठायी गयी शंकाएँ वितण्डावादी तर्क से अभिप्रेरित नहीं होती वरन् जिज्ञासा से प्रेरित होती हैं। जिज्ञासा से प्रेरित वैज्ञानिक खोज ही महत्वपूर्ण उपलब्धियों का आधार बनता है। विज्ञान कभी भी सिद्धान्तों की सर्वज्ञता को स्वीकार नहीं करता। उसके लिए कोई तथ्य अथवा घटना प्रश्न से परे नहीं होते। क्रिया और प्रतिक्रिया के नियम को मात्र वह शाश्वत मानकर चलता है तथा उनका स्वरूप जानने का प्रयत्न करता है। वैज्ञानिक मनोवृत्ति सृष्टि के रहस्यों को जानने के लिए मनुष्य को सतत् उत्प्रेरित करती है। अपनी सामर्थ्य एवं उपलब्धियों को कभी भी विज्ञान पूर्ण नहीं मानता। न्यूटन जैसे विज्ञानी तो यहाँ तक कहते हैं कि “ज्ञान के अथाह सागर से कुछ सीपी और घोंघे ही अभी एकत्रित किये जा चुके हैं। गहराई में डुबकी लगाने पर नीलम, मूँगे, मोती और पन्ने मिलने की भी सम्भावना है।”
ज्ञान को पूर्ण नहीं सतत् विकासशील मानना विज्ञान का नियम है। किसी भी नयी सम्भावना से वह इन्कार नहीं करता। आशावादी भविष्य पर उसका दृढ़ विश्वास होता है। प्रकृति के जिन रहस्यों अथवा घटनाओं को अभी समझा नहीं जा सका है, विज्ञान यह मानकर चलता है कि कल नहीं तो परसों उनके ऊपर के परदे अवश्य उठेंगे तथा यथार्थता सामने आयेगी। आविष्कृत सार्वभौम सिद्धान्तों एवं तथ्यों को जो सर्वमान्य हैं, उन्हें ही विज्ञान प्रामाणिक मानता तथा स्वीकृति देता है। सन्देह पूर्ण आविष्कार मान्यता प्राप्त नहीं कर पाते। भेद खड़ी करने वाली दीवारों को पार करके वह सिद्धान्तों की एकरूपता में विश्वास करता, उन्हें ही मान्यता देता है।
मनुष्य की कायिक संरचना ऐसी है जिसके अनुसार यदि अवयवों की जान−बूझकर तोड़−फोड़ न की जाय तो अपनी पूर्णायुष्य सौ वर्ष तक बिना किसी कठिनाई के जीवित रह सकता है। उसकी मानसिक संरचना अन्य सभी प्राणियों की तुलना में अधिक विचित्र विलक्षण है। उसमें ऐसी विद्युत शक्ति, प्राण शक्ति एवं संकल्प शक्ति के भाण्डागार हैं जिनके सहारे दुर्बलता को हटाया, रुग्णता को भगाया और मनचाही दीर्घायुष्य का उपयोग किया जा सकता है। टूटे और थके जीव कोशों को फिर से नवीनीकरण की काया-कल्प क्षमता इस सृष्टि के समस्त प्राणियों में मात्र मनुष्य को ही प्राप्त है। समाधि जैसे उपचारों के सहारे वह लम्बा विश्राम लेकर मरण और पुनर्जीवन के बीच थकाव मिटाने वाली सुविधा स्वयं अर्जित कर सकता है। इस प्रकार उसे एक ही शरीर को स्थिर रखते हुए कई−कई बार जन्म लेने की स्थिति का लाभ लेते रहने का अवसर मिलता रह सकता है। दीर्घायुष्य अन्य प्राणियों के लिए आश्चर्यजनक हो सकती है वे कदाचित ही अपनी निर्धारित अवधि का व्यतिरेक करके अधिक समय अपना कलेवर स्थिर रख पाते हों पर मनुष्य के लिए शतायु का व्यतिक्रम करके सैकड़ों हजारों वर्ष भी जीवित रहना सम्भव है।
प्राचीन काल में सैकड़ों वर्ष जीने वालों की बड़ी संख्या थी। वे प्रायः अध्यात्म क्षेत्र के प्रयोक्ता थे। दो सौ वर्ष के लगभग तक जा पहुँचने वाले और डेढ़ सौ वर्ष तक अक्षम यौवन का आनन्द लेने वाले तो इन दिनों भी जहाँ तहाँ सामान्य लोगों के बीच ही मिल जाते हैं। योगियों के समुदाय में अन्वेषण करने पर सैकड़ों वर्ष तक जीवित रहने वालों को भी खोजा जा सकता है। उत्तर प्रदेश देवरिया क्षेत्र का उदाहरण बाबा के सम्बन्ध में अभी भी बहुतों के मुँह सुना जाता है कि वे दो सौ की आयु पार कर चुके। इसी प्रकार गंगोत्री निवासी स्वामी कृष्णाश्रम तो अवधूत की आयु दो सौ वर्ष से अधिक आँकी जाती थी। वे हिन्दू विश्वविद्यालय की शिला रखने गये थे। तीन वर्ष पूर्व ही उनका देहावसान हुआ है। सर्वसाधारण की पहुँच से बाहर के सिद्ध पुरुषों में कितने ही अभी भी ऐसे हो सकते हैं जिनने शरीर की आवश्यकतानुसार आश्चर्यजनक अवधि तक मरण से बचाये रखा हो।
पुराणों में ऐसे पाँच चिरंजीवियों का उल्लेख है जो मृत्यु की पकड़ से आगे चले गये हैं और जो सर्वसाधारण के संपर्क में न आने पर भी अभी भी जीवित रह रहे हैं। ऐसे दिव्य मानवों में मारकण्डेय, हनुमान, परशुराम, विभीषण और अश्वत्थामा की गणना होती है।
जामवन्त के सम्बन्ध में ऐसे कथानक हैं कि वे वामन अवतार के समय उपस्थिति थे और कृष्णावतार तक बने रहे। लंकाकाण्ड में उनके द्वारा हनुमान को प्रोत्साहन करने वाली भूमिका प्रख्यात है। गुरु वशिष्ठ के सम्बन्ध में भी ऐसे ही उल्लेख मिलते हैं। वे राम से पहले की सात पीढ़ियों के भी गुरु रहे और उनका यथावत् मार्ग दर्शन करते रहे। व्यास को भी अठारह पुराण लिखने में लम्बा समय लगा। मत्स्य गंधा के गर्भ से उत्पन्न होने से लेकर पाण्डु, धृतराष्ट्र, विदुर के जन्मदाता बनने तक की अवधि की काल गणना की जाय तो वह हजारों सैकड़ों वर्षों की बैठती है। दुर्वासा का यों शाप देते रहने का ही कीर्तिमान है, पर जिन−जिन को उनने शाप दिये उनका समय सतयुग से लेकर द्वापर तक का रहा है। इस अवधि को भी अप्रत्याशित रूप से लम्बी माना जाएगा। यह बात विश्वमित्र के साथ जुड़े हुए कथानकों के सम्बन्ध में भी है। न केवल विश्वमित्र वरन् सप्त ऋषियों में भी सभी ऐसे रहे हैं जिनका अस्तित्व युग−युगान्तरों तक स्थिर बना रहा। जटायु के बड़े भाई सम्पाति ने डडडड अपने संस्करण सुनाते हुए जो घटनाएँ सुनाई हैं इससे डडडड यह मानना पड़ता है कि उनने हजारों वर्ष की आयु पाई होगी।
दीर्घायुष्य के दो माप दण्ड हैं−एक अवधि परक, दूसरा क्षमता परक। कौन कब जन्मा, और कब मरा। इस काल गणना के अनुसार ही आमतौर से किसी के जीवन काल की गणना होती है। किन्तु एक दूसरा माप−दण्ड भी है कि किस में कितनी कार्य क्षमता, स्फूर्ति, जीवनी शक्ति एवं योजनाबद्ध कार्य पद्धति अपनाकर कोई कितने महत्व का कितना काम कर सका? यह पर्यवेक्षण के कम महत्व का नहीं है। एक डेरी में बीस दुबली गायें, तीस बीघे जमीन कर तीस किलों दूध दें। इसकी तुलना में तीन मजबूत गायें पाँच बीघे जमीन घेरे और पैंतीस किलो दूध दें तो बुद्धिमत्ता की कसौटी पर तीन गाय वाली डेरी के संचालक नफे में रहते दिखेंगे। इसी प्रकार कोई घुट−घुट कर आलसी−प्रमादी की तरह चींटी की चाल चले और कार्य परिणाम की दृष्टि से उपहासास्पद और स्तर की दृष्टि से गया−गुजरा काम कर सके तो अस्सी वर्ष जीकर भी उसने कुछ नहीं पाया, कुछ नहीं दिया और कुछ नहीं किया। जबकि चालीस वर्ष तक जीने वाले किसी पुरुषार्थी ने गजब का काम कर दिखाया। दोनों की तुलना में चालीस वर्ष वाले को दीर्घजीवी और अस्सी वर्ष वाले को अल्प जीवी भी ठहराया जा सकता है। यह माप दण्ड भी अपने स्थान पर सही है। यदि इस आधार पर मूल्याँकन किया जाय तो असंख्यों ऐसे लोग भी शतायु, सहस्रायु कहाये जा सकेंगे। जो अवधि की दृष्टि से पचास−चालीस जितनी तुच्छ अवधि तक ही जीवित रहे।
आद्य शंकराचार्य मात्र बत्तीस वर्ष जिये और विवेकानन्द ने छत्तीस वर्ष जितना अल्पायु जीवन पाया। इतने पर भी इन महा योगियों ने थोड़े−थोड़े ही समय में जो कर दिखाया, उसकी सराहना युग−युगान्तरों तक होती रहेगी। चार धामों की स्थापना, उच्चस्तरीय साहित्य सृजन, शास्त्र दिग्विजय जैसे अविस्मरणीय कार्यों को देखते हुए शंकर की अल्पायु पर हजारों नर पामरों की लम्बी−लम्बी जिन्दगियाँ निछावर की जा सकती हैं लम्बी अवधि जीने की सार्थकता तब है जब उसमें महत्वपूर्ण और उच्चस्तरीय क्रिया−कलापों की श्रृंखला भी जुड़ी हुई हो। वेद वेत्ता सातवलंकर, महर्षि महामना मालवीय, गान्धी जी, बिनोवा, नेहरू, प्रायः अस्सी पार गये हैं। सातवलंकर और कर्वे तो सौ का अंक छूने लगे थे। उनकी सराहना लम्बी आयु पाने की दृष्टि से उतनी नहीं होती, जितनी कि उनका महान कार्यों का मूल्याँकन करने पर होती है। इतनी हो या इनसे भी अधिक कुछ लुञ्ज−पुञ्ज कुछ कड़कदार बनकर दिन गुजारते रहे हैं, पर मात्र इतने भर से इनका कोई मान गौरव नहीं बढ़ता। कुछ को तो ऐसा सुयोग अनायास ही मिल जाता है, किन्तु उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्होंने कुछ समय नियम निभाये और दीर्घ जीवी बने। कौतूहल बस उनसे लोग ऐसे ही प्रसंगों पर चर्चा करते रहते हैं और ललचाते रहते हैं। कोई सस्ते नुस्खा पूछकर वे भी अधिक दिन जीने की तिकड़म भिड़ाते हैं। अधिक दिन जीना कईबार तो अपने लिए तथा घर वालों के लिए भारभूत भी हो जाता है।
डा. केनिव रासले की पर्यवेक्षण रिपोर्ट के अनुसार मनुष्य के गुर्दे 200 वर्ष तक, हृदय 300 वर्ष तक, चमड़ी 1000 वर्ष तक, फेफड़े 1500 वर्ष तक और हड्डियाँ 4000 वर्ष तक जीवित रह सकने योग्य मसाले से बनी है। यदि उन्हें सम्भाल कर रखा जाय तो वे इतने समय तक अपना अस्तित्व भली प्रकार बनाये रह सकती हैं। इनके जल्दी खराब होने का कारण यह ही है−उनसे लगातार काम किया जाना और बीच−बीच में मरम्मत का अवसर न मिलना। यदि इसी व्यवस्था बन पड़े तो निश्चित रूप से मनुष्य की वर्तमान जीवन अवधि में कई गुनी वृद्धि हो सकती है।
प्रकृति के हर कण में न केवल हलचल वरन् ऊर्जा का विपुल भण्डार भी भरा पड़ा है। चेतना की हर इकाई इससे भी अधिक समर्थ है। भाव सम्वेदनाओं, विचार तरंगों, संकल्प निश्चयों की भूमिका ही मानवी प्रगति का क्रम इतना आगे तक घसीट लाने में समर्थ हुई है। जीव कोश लगते भर नगण्य से हैं पर हैं वे भी विधाता के प्रतिनिधि। उनकी परतें उघाड़ कर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि वे अपने आप में पूर्ण एक छोटा ब्रह्माण्ड अंचल में समेटकर बैठे हैं। शक्ति की दृष्टि से उनमें से प्रत्येक नव सृष्टि की संरचना में कटिबद्ध होने वाले विश्वामित्र के समतुल्य हैं। इन्द्रियों की सामान्य गतिविधियाँ, जीवन निर्वाह में काम चलाऊ योगदान करते रहना भर प्रतीत होती हैं, किन्तु यदि तात्विक दृष्टि से देखा और पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि उनके अन्तराल में भी इतनी जादुई क्षमता भरी पड़ी है जिनका एक नगण्य-सा भाग ही निर्वाह क्रम में प्रयुक्त होता है। शेष तो सुरक्षित भाण्डागार की तरह जमा रहता है। उसमें ऐ ढेरों भाग अनावश्यक अपव्यय एवं हानिकारक दुरुपयोग में नष्ट होता रहता है। यदि इस अदूरदर्शी क्षरण को रोका जा सके तो उस बचत से भी इतना बड़ा भण्डार जमा हो ससता है जिसके बलबूते विपुल विभूतियों का अधिपति−ऋद्धि-सिद्धियों का अधिष्ठाता−देवमानव बन सकना सम्भव हो सके। संयम को ही तप कहते हैं। तप की शक्ति सर्वविदित है। तपाये जाने पर लोहा, सोना आदि धातुएँ परिशोधित होती और बहुमूल्य बनती हैं।
टूटे बर्तन में दूध दुहने पर, दुधारू गाय का खरीदना और पालना भी निरर्थक चला जाता है। दुहने वाले का श्रम निरर्थक नहीं जाता, छेदों में से टपके हुए दूध से उसके कपड़े भी खराब होते हैं और जिस जमीन पर वह फैलता है वहाँ मक्खियाँ भिनकने वाली गन्दगी भी पैदा होती है। असंयम के सम्बन्ध में भी यही बात है। इन्द्रिय असंयम के फलस्वरूप मनुष्य अपनी पूर्व संचित तथा अब की उपार्जित क्षमताओं को गवाँ ही नहीं बैठता, उसे दुरुपयोग का दुष्परिणाम भी भोगना है। जिह्वा इन्द्रिय को चटोरी बनाकर अनावश्यक मात्रा में अभक्ष्य−भक्षण करते रहने वाले अपना पाचन तन्त्र बिगाड़ लेते और रोगों से आक्रान्त होते देखे गये हैं। जननेन्द्रिय मार्ग से बहुमूल्य जीवन रस नालियों में बहाते रहने वाले किस प्रकार अपनी जीवन शक्ति और बौद्धिक क्षमता गवाँ बैठते हैं यह किसी से छिपा नहीं। अन्यान्य इन्द्रियों के दुरुपयोग के सम्बन्ध में भी यही बात है। इन्द्रिय संयमी किस प्रकार दीर्घायुषी होते और बलिष्ठता का आनन्द लेते हैं यह किसी से छिपा नहीं। मनोनिग्रह के आधार पर एकाग्रता, तन्मयता उपलब्ध कर लेने वाले योग सिद्धियों के अधिष्ठाता बनते हैं। योग का केन्द्र बिन्दु ही मनोनिग्रह है। पातञ्जलि ने ‘‘योगाश्चित्र वृत्ति निरोध” सूत्र में इस रहस्य का सार्वजनिक उद्घाटन किया है कि यदि मन को पतनोन्मुख प्रवाह में बहते रहने से रोका और उच्चस्तरीय रचनात्मक प्रयोजनों में लगाया जा सके तो उसके परिणाम आश्चर्यचकित कर देने वाले अत्यन्त चमत्कारी होंगे।
भौतिक जीवन को शानदार सुव्यवस्थित बनाने में क्षमताओं के संयम को ही दूरदर्शिता पूर्ण माना गया है। अपव्यय में कटौती करने से जो बचत होती है उतने भर से कोई विपुल वर्चस्व का धनी हो सकता हैं। “सादा जीवन उच्च विचार” सूत्र में आत्मिक प्रगति का सार संक्षेप सन्निहित है। अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम की तप साधना जिसने कर ली, समझना चाहिए उसने अभाव, दारिद्रय और पिछड़ेपन से आत्यंतिक छुटकारा प्राप्त कर लिया। असंयमी कितना ही पूर्व संचित संप्रदायों का धनी हो, उसका वर्तमान उपार्जन कितना ही बढ़ा−चढ़ा क्यों न हो क्रमशः खोखला ही बनता चला जायेगा। अनाज को घुन और कपड़ों को दीमक जैसे छोटे कीड़े निगल जाते हैं। अदृश्य विषाणु शरीर में घुस पड़ते हैं तो अच्छी खासी काया को जर्जर बनाते और प्राण हरण का कारण बनते हैं। असंयम की गणना उस आग, तेजाब से की गई है जो जहाँ भी ठहरेंगे उसे जलाने−गलाने के उपरान्त ही चैन लेंगे। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को संयमी बनना पड़ता है। तपश्चर्या वस्तुतः संयम साधना का ही दूसरा नाम है।
वृक्ष धूप, शीत सहते रहते हैं, पर दूसरों को छाया, लकड़ी और फल−फूल बिना किसी प्रतिफल की आशा के मनुष्यों से लेकर पशु−पक्षियों तक को बाँटते रहते हैं। क्या तुम इतना ही नहीं कर सकते?
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बुद्धिमानी की निशानी उपलब्ध साधन और समय का श्रेष्ठतम उपयोग करना हैं।
आवश्यकताओं और इच्छाओं का अन्तर समझा जाना चाहिए। आवश्यकताएं वे हैं जो हमारे जीवन रथ को चलाने में अनिवार्यतः काम में आती हैं, और उन्हें जुटाये बिना जीवित रह सकना सम्भव नहीं होता।
इच्छाएँ वे हैं, जिनके बिना कोई काम रुकता नहीं, पर बड़प्पन जताने और अहंकार बढ़ाने के लिए अकारण ही उन्हें संग्रह किया जाता है। यह संग्रह अस्वाभाविक होने के कारण कष्टसाध्य भी होता है और परिणति में दुःखदायी भी। इनके कुचक्र में फँसकर उन बहुमूल्य सत्कर्मों को कर सकना सम्भव नहीं रहता जो आत्मा को प्रगतिशील और जीवन को महान बनाते हैं। व्यस्तता के रहते वे बच कैसे पड़े? अनावश्यक सम्पदाओं के संग्रह में अनेक तरह के अनाचार अपनाने पड़ते हैं फलतः कुकर्मी जीवन आत्म−प्रताड़ना और लोक भर्त्सना का कारण बनता है।
आवश्यकताएँ वे हैं जो औसत भारतीय स्तर की अन्न, वस्त्र, निवास, शिक्षा, चिकित्सा आदि को जुटाने के लिए अभीष्ट हैं। उनके लिए हर समर्थ आदमी को श्रम करना चाहिए। छोटे बालकों, अपंगों अथवा जराजीर्णों के अतिरिक्त हर किसी के लिए आवश्यक है कि अपने निर्वाह के निमित्त एक तरह न सही दूसरी तरह से श्रम करे। काम चोर, हरामखोर होकर न जियें। परावलम्बी होकर गुजारा तो विवशता की स्थिति में ही करना चाहिए। और वह सोचते रहना चाहिए कि कब उस लज्जाजनक स्थिति से उबरने का अवसर मिले।
इच्छाएँ एक दुर्व्यसन है−नशेबाजी जैसा। जिन वस्तुओं की सामान्य दैनिक जीवन में आवश्यकता नहीं है। उन्हें क्यों तो संग्रह किया जाय? और क्या उनका अपव्यय करके कुप्रचलन का−दुर्व्यसनों का भागीदार बना जाय। अमीरी, ठाट−बाट, शृंगारिकता, विलासिता के साधनों का जमा करते जाना कभी सौभाग्य और बड़प्पन का चिन्ह रहा होगा पर जब बढ़ती हुई विचारशीलता ने उस मान्यता को निरस्त कर दिया है। अब इस वर्ग की गणना हेयजनों में होती है।
मनुष्य को समय, कौशल एवं अवसर मिला है वह इसलिये है कि अपनी वरिष्ठता तथा दूसरों की सुख−शान्ति बढ़ाने में उपयोग करे। इसलिए नहीं कि दौलत जमा करके ईर्ष्या भड़काये और विग्रह खड़े करे। दीवार खड़ी करने के लिए किसी दूसरी जगह से मिट्टी उठानी पड़ती है और वहाँ गड्ढा बनता है। संसार में भगवान ने इतनी ही सामग्री बनाई है कि सब लोग मिल बाँटकर खा सकें और हँसते−हँसते जी सकें। जो दूसरों की तुलना में अधिक सम्पत्तिवान विलासी बनना चाहते हैं वह अपनी, ईश्वर की और समाज की निगाह में नीचे गिरें।
जीवन सीमित है। मनुष्य की कार्य क्षमता भी मर्यादित है। इस अवसर को किस प्रकार खर्च किया जाय, यह विचारणीय है। कोई चाहे तो गुजारे जितना कुछ ही घंटे के श्रम में ईमानदारी के साथ कमा सकता है और बची हुई सामर्थ्य को ईश्वर के उस उद्यान को सींचने में विश्व वसुधा को समुन्नत करने में लगा सकता है।
पिछला कदम उठाकर ही अगला कदम बढ़ाया जा सकता है। तुच्छ के छोड़ने पर ही गौरव पाया जा सकता है।
इच्छाओं को पतन की सीढ़ी बताया गया है और विचारशीलों को उनका परित्याग करने के लिए धर्म−शास्त्रों में अनेक ढंग से कहा गया है। आत्मिक उन्नति का इसे प्रथम चरण बताया गया है। उस महान कथन का तात्पर्य उन इच्छाओं के परित्याग से है जो वासना, तृष्णा और अहंकार की अभिवृद्धि के असीम साधन जुटाने के लिये हर समय प्रेम पिशाच की तरह सिर पर चढ़ी रहती हैं। हम आवश्यकताओं, इच्छाओं का अन्तर समझें और उचित निर्वाह के जितना आवश्यक है उसका न्यायोपार्जन करने के उपरान्त ऐसी इच्छाएँ करें जो देश, धर्म, समाज की संस्कृति को समुन्नत बनाने का पथ प्रशस्त करे।
न्यूरोलॉजी के अनुसार मस्तिष्क के बाहरी धूसर पदार्थ−ग्रे मैटर में तन्त्रिका कोशिकाओं न्यूरान्स की संख्या करीब 10 अरब है। अनुमास्तिष्क−सेरिबेलस में लगभग 120 करोड़ और मेरुदण्ड में 1 करोड़ 35 लाख तन्त्रिकाएँ इसके अतिरिक्त हैं। इनके साथ−साथ ग्लाया स्तर की करीब एक खरब लघु कोशिकाएँ इन न्यूरान्स की सहेली बन कर रहती हैं। इनके मिलन स्थल को तन्त्रिका−बंध−न्यूरोग्लाया−कहते हैं। इन सबका सम्मिश्रित प्रयास ही मस्तिष्कीय चेतना है।
वैज्ञानिक पद्धति से मस्तिष्क के अधिक से अधिक 17 प्रतिशत भाग को जाना जा सका है, जबकि अत्यन्त कौतूहल वर्धक रहस्य शेष 83 प्रतिशत में छिपे हैं। सुपीरियर एण्ड इन्फीरियर सेरिव्रल पेडेन्कल्स के बीच अवस्थित मस्तिष्क में ही सम्पूर्ण दृश्य केन्द्र (सेन्सरी एरिया) बने हैं। मस्तिष्क से निकलने वाली सभी नसों के नाभिक (न्यूक्लियाई) यहीं पर हैं। यहाँ एक अद्भुत संसार छिपा है पर उसे यन्त्रों से नहीं, भावनाओं से, ध्यान से ही देखा जा सकता है।
इस अनोखे उपकरण मस्तिष्क में ऐसी क्षमताएँ छिपी पड़ी हैं जिनके क्रिया रूप को देखकर आँखें फटी रह जाती हैं। असम्भव से असम्भव भी मनुष्य कर गुजरने की क्षमता रखता है। इसके अनेकों उदाहरण इतिहास में दैनन्दिन जीवन में देखे जा सकते हैं। आयु का मस्तिष्कीय कार्य क्षमता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो इस पर निर्भर है कि किसने कितना अपनी क्षमताओं को निखारा, तराशा।
जार्ज बर्नाडशा 93 वर्ष की आयु तक इतना अधिक लिखते थे कि वे स्वयं 40 वर्ष की आयु में भी इतना नहीं लिख पाते। गोस्वामी तुलसीदास ने 50 वर्ष की आयु के बाद रामचरित मानस लिखना आरम्भ किया था और दो वर्ष की अवधि में उसे समाप्त कर विश्व साहित्य की महत्वपूर्ण देन देकर विश्व को उपकृत किया। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 90 वर्ष की आयु में अपना एक उपन्यास पूरा किया था।
यूनानी नाटककार सोफोप्लीन ने 90 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक “आर्डीपस” लिखा था। यद्यपि उन्होंने इसके पहले भी कई रचनाएँ लिखी थीं, पर जिन रचनाओं ने उन्हें साहित्यिक जगत में प्रतिष्ठित किया वे सभी 80 वर्ष की आयु के बाद लिखी गईं थीं। अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि मिल्टन 44 वर्ष की आयु में अंधे हो गये थे। अन्धे होने के बाद उन्होंने सारा ध्यान साहित्य रचना पर केन्द्रित किया और 50 वर्ष की आयु में अपनी प्रसिद्ध कृति “पैराडाइजलास्ट” लिखी। 62 वर्ष की आयु में उनकी एक और प्रसिद्ध कृति “पैराडाइज रीगेण्ड” प्रकाशित हुई। जर्मन कवि गेटे ने अपनी प्रसिद्ध कृति “फास्ट” 80 वर्ष की आयु में लिखी थी। 92 वर्ष का अमेरिकी दार्शनिक जॉनडेवी अपने क्षेत्र में अन्य सभी विद्वानों से अग्रणी था उन्होंने दर्शन के क्षेत्र में 60 वर्ष की अवस्था में ही प्रवेश किया था।
बैंगलौर की एक भारतीय महिला शकुन्तला ने संसार में कठिन गणित के उत्तर तत्काल देने से कभी असाधारण ख्याति पाई थी। सिडनी (आस्ट्रेलिया) में उनने एक करोड़ों की लागत वाले कंप्यूटर से बाजी बदकर गणित के उत्तर दिये और आगे रहने में सफलता पाई। कंप्यूटर जितनी देर में उत्तर बताता था शकुन्तला उससे पहले ही प्रस्तुत कर देती थी। उन्हें ‘गणित की जादूगरनी’ कहा जा रहा हैं।
उपन्यास लेखन के क्षेत्र में वैरोनेस डी. मेयर का अपने स्तर और कीर्तिमान है। वह पूरे 30 वर्ष तक उपन्यास लेखन कार्य में ही दत्त−चित्त से जुटे रहे। इस अवधि में उन्होंने 320 उपन्यास लिखे। सभी मूर्धन्य प्रकाशकों ने प्रकाशित किए। करोड़ों की संख्या में उपन्यास उनके जीवन काल में ही बिक गये।
सीडर रैपिड्स आइडोवा अमेरिका का एक प्रतिभावान व्यक्ति एक साथ कई उत्तरदायित्व संभालता था। उत्तरदायित्व को इस प्रकार पूर्ण करता मानो उसने इसी में विशिष्टता प्राप्त की हो। वह एक साथ वकील, वैज्ञानिक, अध्यापक, विधायक, सम्पादक, न्यायाधीश, मेयर, नर्सरी−संचालक, होटल मालिक और स्टीम वोट निर्माता है। हर काम में उन्होंने चोटी की सफलता और ख्याति पाई। इसके अतिरिक्त वह 6 बैंकों, 17 कम्पनियों, 10 रेल लाइनों, तथा 3 कालेज का अध्यक्ष भी था। इनमें से किसी ने भी उनकी उपेक्षा, व्यस्तता या अयोग्यता की शिकायत नहीं की।
न केवल नाटक लिखने में वरन् उन्हें प्रदर्शित करने की व्यवस्था बनाने में भी पेरिस का मेरीडीन लम्बर्ट थ्यूलान प्रख्यात था। उसने एक वर्ष में 50 तीन−तीन खण्डों वाले नाटक लिखे। जिस दिन ये लिखकर पूर्ण किये गये उसी दिन उन्हें प्रदर्शन के लिए भी व्यवस्था बनानी पड़ी। जनता का अत्यधिक आग्रह देखकर उसे कई नाटकों में स्वयं भी अभिनय करना पड़ा। अपने विषय में पूरा रस लेने और गहराई तक उतरने की विशिष्टता के कारण ही उसने ऐसी सफलता और प्रतिष्ठा अर्जित की।
अपने विषयों में पारंगत होने के कारण पाल ए. चैडबोर्न को अमेरिका के तीन महाविद्यालयों में तीन पृथक−पृथक विषय पढ़ाने पड़ते थे। प्राध्यापकों की कमी नहीं थी पर उसके ज्ञान की प्रगाढ़ता और पढ़ाने की शैली को देखते हुए हर विश्वविद्यालय अपने यहाँ काम करने के लिए आग्रह करता था। अन्ततः उसने तीन कालेजों को सन्तुष्ट करने का कार्यक्रम बनाया। तीनों में वह एक दूसरे से भिन्न विषय पढ़ाता था। विलियम्स कालेज, वाडोइन कालेज, मादने मेडीकल कालेज में उसने क्रमशः वनस्पति विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा की सर्वोच्च कक्षाएँ पढ़ाते रहने की जिम्मेदारी भली प्रकार निभाई।
प्रतिभा, जिम्मेदारी और ईमानदारी व्यक्ति की त्रिविधि आवश्यकता पूर्ण करने वाले व्यक्तियों में अमेरिकी काँग्रेस के सदस्यों में श्वीलर काल फैक्स का नाम सुविख्यात है। इन दिनों महत्वपूर्ण पदों में से एक व्यक्ति एक ही पद सम्भाल सकता था। पर सदस्यों ने सर्व सम्मति से दो सर्वोच्च पदों पर बने रहने के लिये न केवल आग्रह किया वरन् इसके लिए विशेष नियम प्रस्ताव भी पारित किये। काल फैक्स यूनाइटेड स्टेट्स के सन् 1865 में उपराष्ट्रपति भी थे और उन्हीं दिनों उन्हें हाउस आफ रिप्रजेन्टेटिव में स्पीकर का पद भी सम्भालना पड़ता था।
ज्ञान पिपासा के धनी मोल्शियोर सेविस, चिकित्सा शास्त्र में मूर्धन्य बनना चाहते थे। उनने चिकित्सा कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व यह आवश्यक समझा कि अपने विषय में निष्णात बनने के उपरान्त किसी के चिकित्सा करने का उत्तरदायित्व सम्भाले। इसके लिए उन्होंने प्रायः समूचा जीवन विद्यार्थी की तरह खपा डाला। वे एक, एक करके फ्राँस के 26 विश्वविद्यालयों में भर्ती हुए और वहाँ उन्होंने उस विषय में विशिष्टता प्राप्त की जिनकी कमी अनुभव होती थी। अन्त तक अपनी परिपक्वता में कभी ही अनुभव करते रहे। फलतः उन्होंने आजीविका के लिए फ्रांस के स्ट्राम्स वर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का काम अपना लिया पर रोगियों की चिकित्सा में अपने ज्ञान की कमी बताते हुए उनमें हाथ ही नहीं डाला।
आगस्टीन थिएरी नामक फ्रांसीसी वरिष्ठ इतिहासकार को दैवी प्रकोप का शिकार होना पड़ा। उसकी भरी जवानी में आँखें चली गईं। इतना ही नहीं पक्षाघात के कारण वह एक प्रकार से अपंग भी हो गया। फिर भी उसने अपने प्रिय विषय को जारी रखा। इसने इतिहास के 20 अत्यन्त सम्मान प्राप्त ग्रन्थ लिखे। स्वयं लिखने में असमर्थ हो जाने पर वह बिस्तर पर पड़े−पेड़ ही बोलकर दूसरों से लिखने की सहायता लेता रहा। शरीर की अशक्तता में भी इसका काम रुका नहीं।
उपरोक्त उदाहरण व अन्यान्य विलक्षण प्रतिभाओं के वर्णनों से मानवी सत्ता की विलक्षण निधि मस्तिष्क की क्षमता की असीम सम्भावनाओं की एक झलक मिलती है।
यह प्रतिभा हर किसी में विद्यमान है। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें किसी प्रकार जागृत किया जा सके। कभी−कभी वे पूर्व संचित संस्कारों से अनायास भी जागृत पाई जाती हैं।
वेदकाल के ऋषियों से लेकर अद्यावधि भक्तजनों ने अपनी अनुभूतियाँ प्रायः छन्द बद्ध रूप में ही विनिर्मित की हैं। भक्ति काल के प्रायः सभी साधनारत महामानव या तो कविताएँ रचते रहे हैं, या फिर छन्द−स्वरों में भगवान के गुणानुवाद गाते रहे हैं। महर्षि नारद से लेकर सूर, तुलसी, मीरा, कबीर तक की वही परम्परा क्रमबद्ध श्रृंखला के रूप में चली आई है।
सामूहिक संगीत के महत्व पर डाक्टरों का मत है कि जब कई व्यक्ति एक साथ गाते हैं तो सब लोगों का स्वर प्रवाह एवं आन्तरिक उल्लास मिलकर एक ऐसी तरंग श्रृंखला उत्पन्न करता है, जो वातावरण में मिलकर सबको उल्लसित कर देती है। यही उल्लास अन्तः की सूक्ष्म ग्रन्थियों को उत्तेजित कर रस प्रवाहित होने में सहायक भूमिका निभाता है। रसों वैसः की अनुभूति इसी कारण संकीर्तन, दिव्य संगीत में होती पायी जाती है।
गायन में स्तुति, मंगलाचरण, भगवान का ध्यान, माता का ध्यान, छोटे बच्चों को पास बैठाकर गाना, सजावट और सौंदर्य पूर्ण स्थान जैसे देव मन्दिर, तीर्थ अथवा जलाशयों के किनारे सामूहिक रूप से गाने का प्रयोग और भी प्रभावोत्पादक होता है। प्राचीनकाल में ऐसे अवसरों पर्व−त्यौहार पूजन, तीर्थयात्रा, मन्दिरों आदि में संगीत अभ्यास और गायन की व्यवस्था इसलिये की जाती थी कि उन पर्वों और स्थानों के सूक्ष्म प्रभावों को तरंगित कर उसका भी लाभ उठाया जा सके।
यह समझा जाना चाहिए कि संगीत, मात्र मनोरंजन नहीं है यदि उसे भावनाओं और प्रेरणाओं से सुसज्जित रखा जा सके तो इसका परिणाम न केवल गाने सुनने वालों के लिए वरन् सुविस्तृत वातावरण को श्रेयस्कर परिस्थितियों से भरा−पूरा बनाने में सहायक हो सकता है।
मनुष्य की कोमल भावनाओं को झंकृत, तरंगित करने पर उसमें देवत्व का उदय होता है। इस प्रयोजन की पूर्ति में नादयोग द्वारा शब्दब्रह्म की साधना करना एक उत्कृष्ट योगाभ्यास है। दीपक-राग, मेघ-राग जैसे स्वर ब्रह्म के नगण्य से स्थूल प्रकृति से सम्बन्धित चमत्कार है। सूक्ष्म प्रकृति को तरंगित ओर उत्तेजित करने में उसकी धाराएँ बदलने में भी संगीत का प्रभाव स्वल्प दृष्टिगोचर नहीं होगा। अन्य योगों की साधना का अवलम्बन लेकर जिस प्रकार उच्चकोटि की सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं, उसी प्रकार स्वर−योग की साधना से भी उच्च अध्यात्म की भूमिका में प्रवेश करके दिव्य विभूतियों को करतलगत किया जा सकता है, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के अन्तराल में नाद−ब्रह्म का गुञ्जन संव्याप्त, उसकी प्रतिध्वनि से पिण्ड की अन्तःस्थिति भी गूँजती रहती है। संगीत की स्वर−साधना इस अव्यक्त गुञ्जन को व्यक्त बनाती है मुखर करती है। गान यदि उच्चस्तर का हो तो अन्तरात्मा की भाव सत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानन्द की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।
संगीत के अदृश्य प्रभाव को खोजते हुए भारतीय योगियों को वह सिद्धियाँ और अध्यात्म का विशाल क्षेत्र उपलब्ध हुआ, जिसे वर्णन करने के लिये एक पृथक वेद की ही रचना करनी पड़ी। सामवेद में भगवान की संगीत शक्ति के ऐसे रहस्य प्रतिपादित और पिरोये हुए हैं, जिनका अवगाहन कर मनुष्य अपनी आत्मिक शक्तियों को कितनी ही तुच्छ हों−भगवान् से मिला सकता है। अब इस सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों की मान्यतायें भी भारतीय दर्शन की पुष्टि करने लगी हैं।
योग शास्त्रों में संगीत की बड़ी चर्चा है। तत्त्ववेत्ताओं का कथन है कि अदृश्य जगत् की सूक्ष्म कार्य प्रणाली पर जिधर भी दृष्टि डालते हैं, उधर ही यह प्रतीत होता है कि एक दिव्य संगीत से सभी दिशायें और विश्व भवन झंकृत हो रहा है। यह स्वर लहरियाँ वीणा, भ्रमर, झरना, नागरी भेरी, वंशी आदि की तरह सुनाई देती हैं। जिस तरह सर्प नाद को सुनकर मस्त हो जाता है, उसी तरह चित्त उन स्वर लहरियों में आसक्त होकर सभी प्रकार की चपलतायें भूल जाता है। नाद से संलग्न होने पर मन ज्योतिर्मय हो जाता है और जो स्थिति कठिन साधनाओं से भी कठिनाई से मिलती है, वह स्वर योग के साधक को अनायास ही मिल जाती है।
अक्षर परब्रह्म परमात्मा की अनुभूति के लिये वस्तुतः संगीत साधना से बढ़कर अन्य कोई अच्छा माध्यम नहीं, यही कारण रहा है कि देव संस्कृति की उपासना पद्धतियों से लेकर कर्मकाण्ड तक में सर्वत्र “स्वर” संयोजन अनिवार्य रहा है। मन्त्र भी वस्तुतः छन्द ही हैं। वेदों की प्रत्येक ऋचा का कोई ऋषि, कोई देवता तो होता ही है उसका कोई न कोई छन्द जैसे युष्टटुप, अनुष्टुप, गायत्री आदि भी होते हैं। इसका अर्थ ही होता है कि उस मन्त्र के उच्चारण की ताल, लय और गतियाँ भी निर्धारित हैं। अमुक फ्रीकोंसी पर बजाने से ही अमुक स्टेशन बोलेगा उसी तरह अमुक गति, लय और ताल के उच्चारण से ही मन्त्र सिद्धि होगी−यह उसका विज्ञान है।
नादयोग के साधक सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों के माध्यम से घण्टा नाद, शंख नाद, वेणु नाद, मेघनाद, निर्झर प्रवाह आदि के रूप सुनने का प्रयत्न करते हैं और उस आधार पर सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में चल रही अगणित गति-विधियों के ज्ञाता बनते हैं। इन स्वर निनादों के साथ जी अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है वह प्रकृति पर आधिपत्य स्थापित करने और उसे अपनी अनुयायी−संकेत गामिनी बनाने में सफलता प्राप्त करता है। योगविद्या का अपना स्थान है। स्वरशास्त्र स्वरयोग का साधन विज्ञान में महत्वपूर्ण स्थान है। नासिका द्वारा चलने वाले सूर्य चन्द्र स्वरों को माध्यम बनाकर कितने ही साधक प्रकृति के अंतराल में प्रवेश करते हैं और वहाँ से अभीष्ट मणि मुक्तक उपलब्ध करते हैं।
विश्व के यशस्वी गायक एनरिकी कारूसो लिखते हैं−जब कभी संगीत की स्वर लहरियाँ मेरे कानों में गूँजती, मुझे ऐसा लगता मेरी आत्म−चेतना किसी असह्य जीवनदायिनी सत्ता से सम्बद्ध हो गई है। शरीर की पीड़ा भूल जाता हूँ भूख−प्यास और निद्रा टूट जाती है, मन को विश्राम और शरीर को हल्कापन मिलता है। मैं तभी से सोचा करता था कि सृष्टि में संगीत से बढ़कर मानव−जाति के लिये और कोई दूसरा वरदान नहीं है।
कारूसो ने जीवन भर संगीत की साधना की। जबकि एक बार एक शिक्षक ने यहाँ तक कह दिया कि तुम्हारा स्वर संगीत के योग्य है ही नहीं। तुम्हारा स्वर लड़खड़ाता है पर निरन्तर अभ्यास और साधना से कारूसो ने संगीत−साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाईं और यह प्रामाणिक कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।
संगीत से मनुष्य का आध्यात्मिक विकास होता है और वह सूक्ष्म सत्ता के भाव−संस्पर्श और अनुभूति की स्थिति पाता है, यह परिणाम अंतर्जगत से सम्बन्ध रखते हैं, इसलिये उस सम्बन्ध में विस्तृत अन्वेषण का क्षेत्र पाश्चात्य जगत के लिये अभी नितान्त खाली है, मस्तिष्क शरीर और वन्य वनस्पतियों तक में संगीत के जीवनदायी प्रभाव को पाश्चात्य विद्वान और वैज्ञानिक भी अब मानने लगे हैं। वस्तुतः संगीत का मनुष्य जीवन को सरस बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। यदि संगीत का अस्तित्व मिट जाय तो दुनियाँ बड़ी ही नीरस, रूखी और कर्कश प्रतीत होने लगेगी। साधारण पशु की अपेक्षा मनुष्य को आनन्दमयी स्थितियाँ प्राप्त हैं उनमें संगीत साहित्य और कला का बहुत बड़ा भाग है।
इसके अतिरिक्त युवकों के चरित्र निर्माण में संगीत को एक अत्यन्त प्रभावशाली साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। अरस्तू कहा करते थे− ‘‘स्वर और लय के योग से कैसी भी भावनायें उत्पन्न की जा सकती हैं।” महाराष्ट्र राज्य के भूतपूर्व राज्यपाल श्री प्रकाश जी ने एक बार कहा− ‘‘संगीत की शिक्षा स्कूलों में अनिवार्य कर देनी चाहिये। इससे युवक विद्यार्थी में मानसिक एकाग्रता और जागरूकता का विकास स्वभावतः होगा। यह दो गुण स्वयं उसके व्यक्तित्व में अन्य गुणों की वृद्धि करने में सहायक बन सकते हैं।
हमारे प्रत्येक देवता के साथ संगीत का अविच्छिन्न सम्बन्ध होना यह बताता है कि विश्व की सृजन प्रक्रिया में संगीत का चमत्कारिक प्रभाव है। हृषीकेश का पाञ्चजन्य, शंकर का डमरू, भगवान कृष्ण की मुरली, भगवती वीणा−पाणि सरस्वती की वीणा का रहस्य एक दृष्टि से यह भी है कि सृष्टि का प्रत्येक अणु संगीत शक्ति से गतिशील हो सकता है।
देखा जाय तो शास्त्रीय संगीत की रचना एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित है कि उसका लाभ मिले बिना रहता नहीं। इसी कारण संगीत को पिछले युग में धार्मिक और सार्वजनिक समारोहों का अविच्छिन्न अंग माना जाता था। आज भी विवाह शादियों और मंगल पर्वों पर उसकी व्यवस्था करते और उसके लाभ प्राप्त करते हैं। हम देखते नहीं पर अदृश्य रूप में ऐसे अवसरों पर प्रस्फुटित स्वर संगीत से लोगों को, आल्हाद, शान्ति और प्रसन्नता मिलती है, लोग अनुशासन में बने रहते हैं।
मिलिटरी की कुछ विशेष परेडों में भी वाद्य यन्त्र प्रयुक्त होते हैं। उससे नौजवानों को कदम तोलने और मिलाकर चलने में बड़ी सहायता मिलती है। कारण उस समय सबके अंतर्जगत् एक−सी विचार तरंगों से आविर्भूत हो उठते हैं।
लेकिन स्मरण रहे संगीत की उपयोगिता तभी है जब उसे उच्च उद्देश्य के लिए प्रयुक्त किया जाय। कलाएं दुधारी तलवारें हैं यदि उन्हें पशु प्रवृत्तियां भड़काने के लिए काम में लाया जाय तो वे घातक भी कम सिद्ध नहीं होतीं। इसलिये यह कहा जाता रहा है कि संगीत का उपयोग मात्र आत्मोत्कर्ष के निमित्त किया जाना चाहिए। संगीत से ही इस सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। संगीत हमारे जीवन का सार है, एक अभिन्न अंग है। इसके सुनियोजन द्वारा आत्मिक प्रगति सुनिश्चित है, इसमें कोई संदेह नहीं।
ईश्वर कैसा है और कहां है इस झंझट में भले ही न पड़ो, पर यह तो देखो कि तुम्हें किस लिए बनाया और किस तरह जीने के लिए कहा।
परमेश्वर तुम्हारा रूप धारणा करने को इस शर्त पर तैयार है कि तुम उसका रूप धारण करो।
एक लकड़हारा जंगल से लकड़ियाँ काटता और बेचता था। इस बार उसे मार्ग में एक मन्दिर पर चलने वाले सत्संग में बैठने का चस्का लगा।
उस दिन थक भी गया था, सो लकड़ियों का गट्ठा बाहर रखकर सत्संग सुनने लगा। उस समारोह में विचारशील लोग सम्मिलित होते थे। लकड़ियों से चन्दन की सुगन्धि आती देखकर वे सत्संग समाप्त होने पर बाहर निकले और एक−एक−रुपया देकर एक−एक लकड़ी खरीदने लगे। सो वह गट्ठा देखते−देखते सौ रुपये का बिक गया। अब उसने जाना कि मैं जो लकड़ी काटता था व किस पेड़ की है। मैं जानता ही न था। और न वे खरीददार जानते थे क्योंकि चन्दन के बारे में उनने सुना भी न था।
लकड़हारा अब जलावन के लिए नहीं, सुगन्धित चन्दन के रूप में लकड़ी काटता और साहूकार समुदाय में बेचता। थोड़े ही दिनों में निर्धन से धनी हो गया। सत्संग का विचारशीलों के संपर्क का जो लाभ होता है वह मनुष्य को निहाल कर देता है।
जो चला गया वह वापस नहीं लौट सकता। उसके लिए शोक करना व्यर्थ है। न मुर्दे पुनर्जीवित होते हैं और न गये क्षण वापस लौटते हैं। जो सम्भव नहीं, उसके लिए क्यों शिर धुना जाय, इसमें दुहरी हानि है। जो गया उसकी हानि हो चुकी। उसकी क्षति पूर्ति नहीं हो सकती पर इतना तो हो ही सकता है कि उसे विगत के लिए स्मरण करने से मन को रोका जाय। इससे समय तो नष्ट होता है साथ ही शोक की व्यथा भी कम कष्टकारक नहीं होती। उससे मन का विक्षोभ बढ़ता है। अनिद्रा जैसे रोग आ धमकते हैं। रोने से आंखें खराब होती हैं। सबसे बड़ी विपत्ति है शोकातुर का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाना। यह अर्धविक्षिप्त जैसी स्थिति में जा पहुँचता है और परिवर्तित परिस्थिति में क्या सोचा और क्या किया जाना चाहिए इसका निर्णय करने में असमर्थ हो जाता है। विगत के स्मरण से उत्पन्न होने वाली व्यथा का त्रास इतना समय ले जाता है कि उसे बचा लिये जाने पर कुछ काम बनता। यह स्व उपार्जित दूसरी क्षति है जिससे समझदारी अपनाने पर सहज ही बचा जा सकता है।
मृतकों को भूत कहते हैं। भूत डरावने होते हैं। भूतकाल के सम्बन्ध में भी यही बात है। जो बीत गया उसकी स्मृति कई बार व्यथित करती है। जो अच्छा था उसे लौटने की आकाँक्षा उठती है। जो बुरा था उसके प्रति आक्रोश विक्षोभ उभरता है। दोनों ही दृष्टि से विगत का अनावश्यक स्मरण हानिकारक है। उस चिन्तन में जो समय नष्ट होता है और विक्षोभ उभरता है उसे बचा लेना ही बुद्धिमानी है। चिन्तन को उस केन्द्र से हटाकर जो सम्भव है उसे करने में क्यों नियोजित न किया जाय?
यही बात भविष्य कल्पनाओं के सम्बन्ध में भी है। जैसा हम सोचते या चाहते हैं वैसा बन ही पड़ेगा इसका कोई निश्चय नहीं। जो कुछ घटित होने वाला है वह अपने इच्छित ही हो इसकी कोई गारन्टी नहीं। आकाँक्षाओं के फलित होते रहने का ही यहाँ क्रम नहीं चलता। परिस्थितियाँ उनमें से कितनों को ही विफल बनाकर रख देती हैं। पुरुषार्थ भी सदा सफल नहीं होता। यहाँ अप्रत्याशित भी बहुत कुछ होता है।
अच्छे भविष्य की आशा करनी चाहिए किन्तु बुरे के लिए भी तैयार रहना चाहिए। मनुष्य के हाथ में केवल वर्तमान ही है उस पर सारा ध्यान केन्द्रित किया जाय। समय, श्रम और मनोयोग उसी पर नियोजित किया जाय। इसी में औचित्य है भूत की वापसी सम्भव नहीं। उन घटनाक्रमों से जो सीखा जा सकता हो सीखना चाहिए। अनुभव अर्जित करने और भविष्य के लिए शिक्षा लेने भर के लिए विगत का स्मरण करना चाहिए। उसे स्मरण करके विक्षोभ उभारा जाय उसकी अपेक्षा तो यह अच्छा है कि जो बीत गया उस पर रेत डाला जाय।
भविष्य के लिये योजना बनाने में योग्यता, परिस्थिति, साधन सामग्री, मेहनत, हिम्मत आदि अनेकों के सम्मिलन से भविष्य बनता है। इतने पर भी अनेक बार ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियाँ आ धमकती हैं जिनके कारण सुयोगों को भी अयोग्यों की तरह असफल रहना पड़े।
सामने वर्तमान है। वही अपने हाथ में भी है। अच्छा हो हम अपना समूचा ध्यान उसी के श्रेष्ठतम सदुपयोग पर नियोजित करें। बूढ़े भूतकाल का बखान करते और विगत की स्मृति और चर्चा से व्यथित होते रहते हैं। बच्चे भविष्य की बिना पर के रंगीनी उड़ाने उड़ते रहे हैं। परी लोक की कल्पनाएँ और भविष्य की सुखद सम्भावना बाल−बुद्धि को ही शोभा देती हैं। जो प्रौढ़ हैं वे वर्तमान की वास्तविकता समझते हैं और उसे सार्थक बनाने के लिए पराक्रमपूर्वक जुटते हैं।
साहस और सूझ−बूझ के सहारे साधारण स्थिति में मनुष्य भी कई बार ऐसे महत्वपूर्ण कार्य कर दिखाते हैं जो उतावले और डरपोक प्रकृति के समर्थ एवं साधन सम्पन्न होने पर भी नहीं कर पाते।
सैन मैरिना के एक किसान का हल जोतने वाला खच्चर एक जंगली भालू ने मार दिया था। किसान ने उस रीछ को पकड़ लिया और खच्चर का काम करने के लिए उसे बाधित कर लिया था। उस बूढ़े साहसी किसान के साहस को देखने दूर−दूर के लोग आते थे।
जर्मनी के पहलवान मैक ससिस के शरीर का वजन 140 पौण्ड था पर उसने अपने शरीर से 40 पौण्ड अधिक भारी व्यक्ति को एक हाथ से 16 बार सिर तक की ऊँचाई तक उठाकर दिखाया।
आर्कोट के नवाब अनवरुद्दीन 1749 में 107 वर्ष के थे। तब भी वे अम्बौर की लड़ाई में हाथी पर चढ़कर लड़ने गये। लड़ाई में उनने जौहर तो बहुत दिखाये पर शत्रु की गोलियों के शिकार होकर मोर्चे पर ही ढेर हो गये।
अटलाँटिक सागर ह्वेल मछलियों के शिकारियों के लिए प्रसिद्ध है। उनके शिकार के लिए शिकारी जहाज अक्सर उधर जाते रहते हैं। ‘स्टार आव दि ईस्ट’ नाम एक जहाज शिकारियों के दस्ते के साथ उधर पहुँचा। एक बड़ी ह्वेल के साथ उनका मुकाबला हुआ। भाले फेंके गये। जो ह्वेल को लगे वह क्रुद्ध होकर जहाज पर टूट पड़ी और एक नाविक को उसने देखते देखते निगल लिया। नाविक तीस घण्टे उसके पेट में रहा किसी प्रकार उसने अपना चाकू कमर से निकाला और ह्वेल का पेट चीरकर बाहर निकला। अपने ढंग की यह अनोखी घटना थी।
रोम के एक शासक मैक्सी नियेनस ने एक दरबारी को मौत की सजा दी। और यह फैसला उसी पर छोड़ दिया कि मृत्यु दण्ड को किस तरह कार्यान्वित किया जाय। दरबारी कास्टेन्टाइन सम्राट का दामाद था। उसने भरे दरबार में सजा की स्वीकारोक्ति की व स्वेच्छा से प्राणघात की याचना की। उसने दोनों हाथों से गला घोटकर प्राण त्याग दिये।
न्यूजीलैण्ड के 85 वर्षीय एल्फ्रेड रीड ने एक 170 मील लम्बी यात्रा 10 वर्ष में अकेली पूरी की, उसमें उसे ऊँची पहाड़ियों को चढ़कर और नदियों को तैरकर पार करना पड़ा। खाने सोने का प्रबन्ध उसे परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं ही करना पड़ता था।
माटामार−न्यूजीलैण्ड का 122 वर्षीय आदिवासी अपने कबीले की प्रथा के अनुसार सुनसान टापू में छोड़ दिया गया। 9 वर्ष तक वह वहाँ के पक्षी मारकर खाता रहा और अन्त में निढाल होकर मर गया।
आस्ट्रेलियाई एक सेना का जनरल एन्टल स्टारे 47 वर्ष तक सेना में रहा उसने 89 लड़ाइयाँ लड़ीं, 84 बार गम्भीर रूप से घायल हुआ। शानदार मौत उसने लड़ाई में ही पायी।
लान्स, फ्रान्स एक होटल में मेज पर चढ़कर आपस में लड़ रहे थे कि प्रबन्धक गरदेव रिहार्ड ने मेज समेत उन दोनों को उठा लिया और 20 फूट ले जाकर जमीन पर पटक दिया। इतना मजबूत, तगड़ा था यह प्रबन्धक।
मिस्र का सुलतान वैवार्स अपना पराक्रम शत्रुओं और निजी सैनिकों के सामने प्रकट करने के लिए 38 पौण्ड भारी लोहे का कवच पहनकर नील नदी तैर कर तार करता और वापस आता। यह क्रम उसने 17 वर्ष तक निरन्तर चलाया।
फैल्डर्स का काउण्ट वाडोइन का एक तगड़े भालू से वन बिहार के समय मुकाबला हो गया। काउंट ने हिम्मत नहीं हारी और भालू का गला घोट दिया।
फारसी दार्शनिक अब्दुल कासिम ने अपने जीवन में 30 बार मक्का यात्रा पैदल चलकर की। इसमें उसे 82000 मील पैदल चलना पड़ा। पहली यात्रा तो उसने घुटनों के बल चलकर पूरी की थी।
केनिया नेशनल पार्क का रेंजर एक दिन घोड़े पर सवार होकर अपने कार्य क्षेत्र को देखने जा रहा था कि एक बबर शेर ने उस पर आक्रमण करके नीचे पटक लिया। मौत सामने थी। रेंजर ने अपने छोटे चाकू से नीचे पड़े−पड़े ही शेर का पेट फाड़ डाला और अपनी जान बचाई।
काहिड काउन्टी के मोड़ सविन्शन का मुकाबला एक जंगली रीछ से अफ्रीका की धनी झाड़ियों के बीच हो गया। निहत्थे होने पर भी उनने हिम्मत नहीं हारी और कुश्ती लड़ते रहे। कई घाव सहने के उपरान्त भी उनने रीछ को गला घोंटकर मार डाला।
कभी−कभी सूझ−सूझ के सहारे ऐसे काम हो जाते हैं कि दंग यह जाना पड़ता है। न्यू गायना में एक बड़ा दलदल हवाई पट्टी के पास था। उससे जहाजों को खतरा रहता। इस कठिनाई को दूर करने के लिए वहां के आदिवासियों का एक उत्सव कराया गया। 24 घंटे नाच चला। इतने से ही वह भूमि इतनी कड़ी हो गयी मानी रोलर से दबाकर सही की गई हो।
बाइनजेटाइन के सम्राट कास्टेस्टाइन ने बलगेरि डडडड पर 80 हजार सैनिकों से हमला बोला। हमला इतना आकस्मिक हुआ कि बलगेरिया के सैनिक शस्त्र तक न सम्भाल सके और भाग खड़े हुए। जीत अनोखी डडडड उसमें आक्रामक सेना का एक भी सैनिक न मरा न घायल हुआ।
ऐसी घटनाओं में बलिष्ठता और साधन जितना काम देते हैं उसकी तुलना में साहस और सूझ−बूझ का महत्व अधिक सिद्ध होता है।
ईश्वर भक्ति और नानक देव की बढ़ती लगन को देखकर उनके पिता चिन्तित रहने लगे। उन्होंने सोचा यदि यही स्थिति रही तो यह कभी भी परिवार छोड़कर अन्यत्र जा सकते हैं, इसलिए किसी रोजगार में लगाना उचित है।
दूसरे दिन उन्होंने अपने पुत्र नानक को बुलाकर कहा− ‘‘इधर−उधर भटकने से काम न चलेगा। खाने को तो दोनों समय भोजन चाहिए ही। अब तुम बराबर के हो गये हो अतः दुकान की ओर ध्यान देना चाहिए। तुम आज बाहर चले जाओ। वहाँ से दुकान के लिए सामान ले आओ। हाँ, इतना ध्यान रखना कि सामान अच्छी किस्म का हो और किसी के बहकावे में आकर गाँठ का पैसा भी मत गँवा आना।’’
नानक ने रुपये लेकर कहा− ‘‘पिताजी! आप चिन्ता न करें। मैं सच्चा और खरा सौदा करके ही लौटूँगा।’’ पुत्र का आश्वासन पाकर पिता निश्चिन्त हो गये। उन्हें मार्ग में भगवान का गुणानुवाद गाते हुए कुछ साधु मिले जो कई दिन से भूखे थे। जब नानक को पता चला तो उन्होंने अपनी गाँठ के सारे रुपयों से साधुओं के भोजन की व्यवस्था की। उन्हें भरपेट खाना खिलाया और रात भर उनके साथ रहकर सत्संग किया। दूसरे दिन खाली हाथ घर लौट आये।
जब पिता ने दुकान के माल के सम्बन्ध में पूछताछ की तो उन्होंने सारी घटना का विवरण समझाते हुए कहा− ‘‘धर्म की कमाई सर्वश्रेष्ठ कमाई है। इसका सुफल इस लोक में ही नहीं वरन् परलोक में भी मिलता है। मैं आपसे कहकर गया था कि सच्चा और खरा सौदा करके ही लौटूँगा। अब आप ही बताइए कि भूखे ईश्वर भक्तों को भोजन कराने से भी बढ़कर कौन−सा सच्चा सौदा हो सकता है?’
चेकोस्लोवाकिया की एक नदी के समीप कुछ लोग पर्यटन कर रहे थे, तभी सामने से कुछ मधुर संगीत सुनाई देते लगा। लोगों ने छान मारा पर पता न चला कि कौन और कहाँ से गा रहा है। जबकि आवाज उनके पास ही हो रही थी। उस स्थान पर कुछ समय पूर्व कुछ सिपाही मारे गये थे, इसलिए यह मानकर उस बात को टाल दिया गया कि उन सिपाहियों की मृतात्मायें गा रही होंगी।
एक बार कैलीफोर्निया की एक स्त्री भोजन पकाने जा रही थी, अभी वह उसकी तैयारी कर रही थी, चूल्हे से विचित्र प्रकार के गाने की ध्वनि निकलने लगी। गाना पूरा हो गया उसके साथ ही ध्वनि आनी भी बन्द हो गयी। न्यूयार्क में एकबार बहुत से लोग रेडियो प्रोग्राम सुन रहे थे, एकाएक संगीत ध्वनि तो बन्द हो गयी और दो महिलाओं की ऊँची−ऊँची आवाजों में बातें आने लगीं। रेडियो स्टेशन से पूछा गया तो पता चला कि वहाँ से केवल नियमबद्ध संगीत ही प्रसारित हुआ है। बीच की आवाज कहाँ से आई यह किसी को पता नहीं।
सेण्ट लुईस में एक बार रात्रि−भोज का आयोजन किया गया। जैसे ही संगीतकारों ने वाद्य−यन्त्र उठाये कि उनसे ताजा खबरें प्रसारित होने लगीं। इससे आयोजन के सारे कार्यक्रम ही फेल हो गये। नाहरियाल की एक स्त्री ने बताया कि उसके स्नान करने के टब से गाने की ध्वनियाँ आती हैं। एलवर्टा के एक किसान का कहना है कि जब वह अपने कुएँ के ऊपर पड़ी हुई लोहे की चादर को हटाता है, तो कुएँ के तल से संगीत सुनाई देने लगता है। पुलिस को सन्देह हुआ कि किसान ने कहीं रेडियो छुपाया होगा। इसलिए इंच−इंच जमीन की जाँच कर ली। पड़ोसियों के रेडियो भी बरामद कर लिए पर जैसे ही उस लोहे की चादर को हटाया गया, आवाज बार−बार सुनाई दी और अन्ततः उस समस्या का कोई हल निकाला नहीं जा सका।
‘वण्डर बुक ऑफ दी स्ट्रेंज फैक्टर्स’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक ने नील नदी के किनारे स्थित कारनक के खण्डहरों में दो घूरती हुयी प्रतिमाओं का उल्लेख किया है। ये दोनों प्रतिमायें डेढ़ कि. मी. के फासले पर जमी हुई हैं तथा उनके पास जाने पर ऐसा लगता है जैसे कोई विशालकाय दैत्य घूर रहा हो। इनमें एक प्रतिमा पत्थर की सामान्य मूर्तियों की तरह चुप खड़ी रहती है, पर दूसरी से अक्सर कुछ बोलने की आवाज आती रहती है। पत्थर की मूर्ति क्यों और कैसे बोलती है इसका पता लगाने की हर सम्भव कोशिश की गयी, किन्तु अभी तक कुछ कारण खोजा नहीं जा सका। मूर्ति में कोई रेडियो भी नहीं है जिससे यह अन्दाज लगाया जा सके कि वह अदृश्य शब्द प्रवाहों को पकड़कर ध्वनि में रूपांतरित कर देते हैं।
ब्रिटेन के नार्थ वेल्स प्रदेश के तट पर चलने से उसमें रेतीय सुमधुर संगीत ध्वनि सुनाई पड़ती है। जिससे वह लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनता चला गया। लन्दन विश्व विद्यालय के सुप्रसिद्ध रसायन शास्त्री डा. केनेथ रिजवे तथ्य की पुष्टि के लिए इस संगीतमय रेत को बोरियों में भरवाकर अपनी प्रयोगशाला में ले गये। प्रयोगों के उपरान्त उन्होंने बताया कि पैर के दबाव के कारण बालू के कण आगे−पीछे सरकते हैं ये कण अधिकाँशतः समान आकर के होते हैं इसलिए उनमें से संगीतमय ध्वनि निकलती है। लेकिन हुआ यह कि रेत ने प्रयोगशाला में संगीत नहीं गाया।
मध्य एशिया के आठ लाख कि. मी. क्षेत्र में फैले हुए गोबी मरुस्थल के तकलामारान अंचल के पश्चिमी छोर पर स्थित अन्दास पारसा नामक स्थान में करुण संगीत सुनाई देता है। यह संगीत कभी−कभी ही सुनाई देता है और अधिक से अधिक पन्द्रह मिनट तक चलता है। अमेरिका की एक रेडियो कम्पनी ने इस करुण संगीत को टैपकर सुनाया तो कुछ ही दिनों में आकाश वाणी केन्द्र को हजारों श्रोताओं ने पत्र लिखे और बताया कि इस संगीत को सुनकर उनका हृदय व्यथा वेदना से भर आया। एक टी.वी. कम्पनी ने इस स्थान की एक टी. वी. फिल्म भी उतारी और अपने दर्शकों को बिना किसी कमैन्ट्री के सुनाई तो दर्शक रोने भी लगे।
अफगानिस्तान में काबुल के पास एक रेतीले मैदान में घोड़ों के दौड़ने और नगाड़ा के पीटने की आवाज आती है जैसे कहीं से घुड़सवार अपने घोड़े दौड़ाते हुये एक नगाड़े को पीटते आ रहे हों।
इसराइल के सिनाई अंचल की तलहटी में स्थित एक पर्वत से घण्टियाँ बजने की आवाज आती है। इसी कारण वह ‘वेल माउण्टेन’ कहकर भी पुकारा जाने लगा है। ईरान के मरुस्थल में कई स्थानों से ऐसा स्पष्ट संगीत सुनाई देता है जैसे वहाँ कोई बीन बजा रहा हो।
कवाई टापू पश्चिमी आइलैंड के हवाइयाँ ग्रुप में आता है। होनोलूलू से करीब 12 कि. मी. दूर के इस टापू पर स्थित एक 20 मीटर ऊँची पहाड़ी तरह−तरह की आवाज करती है। इस पहाड़ी के पत्थर कोटल, शेल्स तथा लावा के कणों से निर्मित पाये गये हैं, जो स्वयं अपने आप में आश्चर्य हैं। उससे भी बड़ा आश्चर्य यह कि पहाड़ी से प्रायः कुत्तों के भौंकने की ध्वनि आती है। रात के अन्धकार और आँधी वर्षा के समय यह ध्वनि बहुधा होती है। बच्चों के लिए यह क्षेत्र निषिद्ध घोषित है क्योंकि बच्चे इस आवाज को सुनने पर भयभीत हो जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि पास के किसी गाँव में कुत्ते ही भौंकते हों और उनकी प्रति ध्वनि आती हो। इस पहाड़ी के आसपास मीलों दूर तक कोई गाँव नहीं है आज तक कोई भी वैज्ञानिक उस कारण की खोज नहीं कर पाया कि इस टीले से भौंकने की आवाज क्यों आती है। सदियों से यह रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है तथा अपने विश्लेषण की लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहा है। ‘वण्डर बुक ऑफ दि स्ट्रैन्ज फैक्टर्स’ नामक पुस्तक में इन भौंकने वाले टीलों का सविस्तार विवरण दिया गया है।
कोई यह अभी तक नहीं बता सका कि ये आवाज कैसे पैदा हुईं, विज्ञान के पास ऐसी विचित्र घटनाओं का कोई जवाब नहीं। क्या इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर रहे वैज्ञानिकों के समुदाय में से कोई एक भी इस अविज्ञात को तथ्यों, प्रमाणों के आधार पर सिद्ध करने के तैयार है? यह चुनौती सभी के लिये है।
आत्मवत् सर्व भूतेषुः का सन्देश देने वाले स्वामी रामतीर्थ अमेरिका पहुँचे। जहाज सान फ्रांसिस्को बन्दरगाह पर रुका। जहाज खड़ा होते ही सभी यात्री जल्दी−जल्दी अपना सामान सँभालने लगे। सबमें उतरने की जल्दी और उत्सुकता दिखाई देने लगी। जहाज में एक तरफ एक व्यक्ति शान्त भाव से डैक पर खड़ा था, उसके चेहरे पर कोई घबराहट दिखाई दे रही थी और न ही उतरने की उतावली उसे कुछ देर तक एक अमेरिकन व्यक्ति देखता रहा और अन्त में बोला− ‘‘क्यों महाशय, आपको यहाँ नहीं उतरना है क्या? अपना सामान क्यों नहीं सँभालते?’’
व्यक्ति स्वाभाविक मुस्कराहट की मुद्रा में प्रत्युत्तर देते हुए बोला− ‘‘मेरे पास कोई सामान नहीं है।’’ तो पास में पैसे तो होंगे ही, जिससे खाने−पीने का काम चलता होगा। यह तुरन्त दूसरा प्रश्न हो उठा। ‘‘मैं अपने पास पैसे भी नहीं रखता।’’ तब तो यहाँ कोई आपका मित्र होगा, जिसके यहाँ ठहरना होगा। यह युवक का तीसरा प्रश्न था। स्वामी रामतीर्थ में प्रचण्ड आत्मविश्वास था और सबमें अपनी ही आत्मा देखने का आत्म−भाव भी। इसी आधार को लेकर तो वे इतनी लम्बी यात्रा आरम्भ कर रहे थे।
स्वामी जी युवक को प्रत्युत्तर देते हुए बोले− ‘‘हाँ, यहाँ हमारा एक मित्र है जिसके यहाँ हमें रुकना है और जो हमारी सब सहायता भी करेगा।’’ वह व्यक्ति कौन है? सच्चे वेदान्ती रामतीर्थ जी हँसे और उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए बोले− ‘‘आप ही मेरे मित्र हैं।’’
इंग्लैण्ड में जन्मे पाल ब्रिन्टन उन दिनों पत्रकारिता से सम्बन्धित कार्य करते थे पर उनका भारत के प्रति आकर्षण फिर भी कम नहीं हुआ। उन्होंने मनोविज्ञान और दर्शन शास्त्र पढ़ा ताकि अपनी अनवरत जिज्ञासा का वे आगे चलकर समाधान कर सकें। भारत की रहस्यमयी विभूतियों के सम्बन्ध में उनका आत्मविश्वास, अध्ययन और जानकार व्यक्तियों से परामर्श मिलकर ऐसी मनःस्थिति उत्पन्न कर सके जिसे रोके रहना देर तक सम्भव न हो सका और वे इंग्लैण्ड में बिखरे हुए कार्यक्रमों को समेटकर भारत की लम्बी यात्रा पर निकले−गुप्त भारत की खोज के लिए।
उनने दर्शनीय स्थानों, बड़े नगरों की ओर तनिक भी ध्यान न दिया वे परिचय संपर्क में आ सकने वाले योगियों का पता लगाते हुए सुदूर यात्राएँ करते रहे। उन्हें भेंट परामर्श करने और अनुकूलता की पृष्ठभूमि बनाने में काफी श्रम करना पड़ा। जिनके साथ उनकी भेंटें हुई उनमें से कितने ही जादूगर थे या तान्त्रिक। उनका जीवन ठाट−बाट का था। कुछ चमत्कारी प्रदर्शन करने की स्थिति में थे और इसके बदले वे कुछ राशि चाहते थे। उस विद्या का तत्व दर्शन, रहस्य या अभ्यास का विधान सिखाने के लिए तैयार न हुए। क्योंकि उनकी जड़ें खोखली थीं। वे केवल उथली हाथ की सफाई या मनोबल के प्रहार से छोटे−मोटे चमत्कार दिखाने की स्थिति में थे। पर वे चमत्कार ऐसे न थे जो कौतूहल उत्पन्न करने से आगे बढ़कर किसी व्यक्ति में परिवर्तन लाने या समाज की किसी समस्या का समाधान करने में समर्थ होते। जादू चमत्कारों से तो केवल बाल-बुद्धि लोगों को अचम्भे में डाला जा सकता है। प्रबुद्ध व्यक्ति तो केवल एक ही बात परखता है कि इन आत्मिक कहे जाने वाले प्रयोगों में व्यक्ति विशेष को अचम्भे में डालने के अतिरिक्त उसे ऊँचा या वरिष्ठ बनाने की क्षमता है या नहीं। उनकी रुचि लोक कल्याण में केन्द्रित हुई या नहीं और उसके निमित्त निजी प्रयत्नों से अथवा अपने भक्तजनों के सहयोग से कुछ किया या नहीं।
इस दृष्टि से उनकी यात्रा का पहला चरण उथला ही रहा। विभिन्न देशों से आने वाले जादूगर तो उनके देश में भी आते रहते थे और अपनी कला के सहारे आजीविका चलाते थे। उसी स्तर के कौतूहलों को देखने भारत नहीं आये थे जिनके बारे में उनने पहले ही बहुत कुछ देखा, सुना या पढ़ा था।
पाल ब्रिटन इसी स्तर के लोगों की प्रशंसा सुनाते भटकते रहे। कुछ ऐसे लोगों से भी मिलना हुआ जो दार्शनिक भूमिकाएँ विस्तारपूर्वक बता सकते थे पर उन्हें स्वयं कर दिखाने की स्थिति की स्थिति में न थे। बताया गया कि इसके लिए उन्हें हिमालय की खोज करनी पड़ेगी। व्यवहार जगत में तो योगी, तान्त्रिक और जादूगर ही अपनी प्रतिभा से भावुक जनों को प्रभावित कर सकते हैं। कठिनाई यह थी कि पाल ब्रिन्टन, दर्शन शास्त्र, मनः शास्त्र और चमत्कारवाद की पृष्ठभूमि से पहले ही अवगत होकर इस देश में आये थे ताकि यथार्थता के बदले भ्रम जंजाल बटोर कर न ले आयें। उनने तथाकथित चमत्कारी व्यक्तियों के प्रश्नों की झड़ी लगाकर वस्तुस्थिति समझने की कोशिश की और चमत्कार दिखाने से पूर्व अपनी तलाशी देने का अनुरोध किया तो वे अपने अपना अपमान मान बैठे। वस्तुस्थिति यही थी जिस भारत में बहु प्रचलित ‘‘चोर की दाढ़ी में तिनका’’ वाली उक्ति में व्यक्त किया गया है।
प्रसिद्ध पुरुषों में− पते ठिकाने वाले चमत्कारी लोगों से मिलकर उनने करामातें तो बहुत देखीं पर ऐसा कुछ न पाया जिससे आत्मवादियों में पाई जाने वाली व्यक्तित्व की महानता का भी परिचय उपलब्ध होता हो। ऐसों में उन्हें केवल एक ही व्यक्ति मिले। अरुणाचलम् के महर्षि रमण जो बालकों की तरह भोले और सज्जनों की तरह विनम्र थे। वे जो जानते थे उसे बताने में भी संकोच न करते थे। उनके साथ मनुष्यों से भी अधिक पशु−पक्षियों का भी परिवार रहता था जो नियम समय पर उनके दर्शन प्रवचन में बिना नागा उपस्थित होता और बिना लड़े−झगड़े अपने−अपने नियम स्थान पर बैठता था।
इन खोज−प्रयासों में उन्हें पैसा अधिक मात्रा में न मिला, जिसके लिए वे प्रसन्न होते और सन्तोष लेकर वापस लौटते।
इसके उपरान्त उनने जाना कि शरीर साधना करने वाले योगी ही जहाँ−तहाँ मिलेंगे। ऋषियों की तलाश करने के लिए उन्हें वहाँ जाना पड़ेगा जहाँ सर्वसाधारण की पहुँच नहीं होती। वे स्थान हिमालय की कन्दराएँ हैं। उपयुक्त वातावरण उन्हें उसी क्षेत्र में मिलता है। शीत की प्रधानता से उनकी लक्ष्य यात्रा सरल पड़ती है और कौतुक प्रिय लोगों के आवागमन में उनके कार्य में विक्षेप भी नहीं पड़ता। ऐसे एकान्तप्रिय व्यक्तित्व ऋषि कहलाते हैं। जब कि योगी अपने प्रदर्शन के लिए जन संकुल स्थानों में अपने अड्डे जमाते रहते हैं।
पाल ब्रिन्टन ने हिमालय क्षेत्र में प्रवेश किया और वहाँ की कन्दराओं में प्रवेश किया। इसमें व्यक्तिगत संपर्क ऐसा नहीं मिला जो उन्हें उपयुक्त स्थानों तक पहुँचा सके और उन ऋषि आत्माओं से मिला सके। यह कार्य उन्हें अपनी अन्तःचेतना को कम्पास मानकर उसकी संकेत सूचना के आधार पर दिशा निर्धारण करना पड़ा। कदाचित ही कभी कोई सहयात्री मिला। यह प्रथम अपरिचित प्रतीत होता था पर नियत स्थान तक पहुँचा देने की उनकी अनुकम्पा का देखते हुए प्रतीत हुआ कि वह अगाध उत्सुकता का समाधान करने में सहयोग देने की इच्छा से ही दूत भेजने का प्रयत्न योजनाबद्ध किया हुआ था।
पाल ब्रिन्टन की ऐसे कितने ही दिव्य पुरुषों से भेंट हुई पर आपका मौखिक रूप से कोई वार्तालाप न हो सका। इतने पर भी उन्हें अन्तःकरण में प्रेरणा प्रवाहों की अनुभूतियों का लाभ उठाते रहने के कारण यह अनुभव नहीं हुआ कि वे निस्तब्ध सुनसानों में बैठे हैं। क्षुधा निवारण के लिए उनका उपहार और रात्रि हो जाने पर रहने की सुविधा भी उन्हें उपलब्ध कराई जाती रही। इस यात्रा में उन्हें उस उत्कण्ठा का समाधान हो गया जिसके लिए वे इंग्लैण्ड छोड़कर कष्ट साध्य और खर्चीली यात्रा करने के लिए यहाँ आये थे।
पाल ब्रिन्टन की शोध सफल और सन्तोषजनक रही यों पूर्वार्ध में उन्हें विलक्षणता दिखाने वाले तथाकथित चमत्कारवादियों के फेर में पड़े रहकर यात्रा का प्रथम चरण अनावश्यक भ्रम जंजाल में भी बिताकर बर्बादी भी बहुत सहनी पड़ी।
पाल ब्रिन्टन अपनी यात्रा समाप्त करते समय अरुणाचलम् महर्षि रमण के आश्रम में अपना उत्साह बने रहने का आशीर्वाद माँगने फिर से गये और वह उन्हें मिल भी गया।
उनने इंग्लैण्ड लौटकर अपने अनुभवों का वर्णन विवेचन करने वाली कितनी ही शोधपूर्ण पुस्तकें लिखीं हैं। जिसके नाम हैं− (1) मैसेज फ्राम अरुणाचलम् (2) एहरमिट इन द हिमालयाज् (3) दि इनर रियलिटी (4) दि हिडेन टीचिंग वियाण्ड योग आदि प्रमुख हैं। इनका संसार की प्रमुख 12 भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है।
इन पुस्तकों की भूमिकाएँ ऐसे लोगों ने लिखी हैं जो अपनी प्रामाणिकता और अध्यात्म विषयों की जानकारी के सम्बन्ध में पहले से ही प्रख्यात रहे हैं।
पाल ब्रिन्टन का भारत यात्रा के उपरान्त उत्साह ठण्डा नहीं हुआ। वरन् वे संसार के ऋषियों की स्थिति और विश्व की शान्ति एवं प्रगति के प्रयासों में लगे रहे हैं, यों वर्णन उनने उनका भी किया है जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने और सस्ता सम्मान पाने के लिए कुछ अद्भुत प्रपंच रचते रहते हैं।
मानव हृदय से बढ़कर और कोई तीर्थ नहीं। भगवान इसी में बसते हैं और वहाँ तक जा पहुँचने वाले को दर्शन दिये बिना नहीं लौटने देते।
जापान में पुरातन काल में ‘शिन्टो’ धर्म का प्रचलन था। उसकी शिक्षायें तो यही थी जो अन्य धर्मों की हैं। धर्म सदाचार का ही समर्थन कर सकते हैं। भले ही कथा पुराणों में उनका छद्म रूप भी ऐसा जोड़ दिया हो जिनसे सामयिक आवश्यकता के अनुरूप उनमें छद्म मिला देने के अपवाद भी जुड़े हुए हैं। सभी धर्म ऐसा करते रहे हैं। चोर दरवाजे ऐसे भी रखे हैं जिनमें अपने विपरीत मतवालों से घृणा की जाय और बलपूर्वक उन्हें अपने धर्म में दीक्षित किया जाय। वस्तुतः विचार स्वातंत्र्य पनपने देने के लिये यह आवश्यक है कि मानवी ऐसे मौखिक अधिकारी को मान्यता दी जाय जो नीति सदाचार से टकराते न हों।
‘शिन्तो धर्म में कट्टरता नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध धर्म का जब उस क्षेत्र में प्रवेश हुआ तो बिना टकराये दोनों एक−दूसरे के साथ मिल गये। सामंजस्य ने दोनों की विशेषताएँ स्वीकार कर लीं। जापान के बौद्ध धर्म पर पुरातन शिन्तो मान्यताओं की गहरी छाप है। यदि यह प्रयोग अन्य धर्मों में ही हुआ होता तो धर्मों के कारण जो विलगाव उत्पन्न हुआ है और रक्तपात एवं छल छद्म अपनाये गये हैं उनकी कहीं कोई जरूरत न पड़ती।
शिन्तो धर्म की अतिरिक्त विशिष्टता यह है कि उसमें जापानियों को सूर्य पुत्र कहा है। उस क्षेत्र के निवासियों को अपने पूर्वज सूर्य के समान तेजस्वी और गतिशील होने की प्रेरणा दी है। यह मोटा सिद्धांत वहाँ के नागरिकों ने गहराई तक हृदयंगम किया है। इस आधार पर अपना स्वाभिमान ही नहीं चरित्र भी ऊँचा रखा है। व्यक्ति को अपने अस्तित्व के सम्बन्ध में ऊँची मान्यता रखने से उसकी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया क्या होती है, उसे जापान जाकर वहाँ के नागरिकों का भावनात्मक स्तर परखते हुए सहज ही किया जा सकता है।
अन्य धर्मों में आत्मा का उद्गम पतित क्षेत्र से माना गया है। हिन्दू धर्म में चौरासी लाख योनियों में घूमते हुए मनुष्य जन्म पाने पर फिर अपने पाप कर्मों का फल पाने के लिए उसी चौरासी के चक्र में चले जाने की मान्यता है। इसमें मनुष्य की चिरस्थायी सत्ता तो पशु की ही रही। मनुष्य जन्म तो ईश्वर का उपहार भर है। इसमें स्थायित्व नहीं है।
यह मान्यता विकासवादी डार्विन के उस मत से मिलती−जुलती है जिसमें क्षुद्र जल जीवों से धरती के प्राणियों में जीवन का विकास हुआ है और बन्दर से मनुष्य बना है। यदि हमारे पूर्वज बन्दर थे तो फिर उनकी वंश परम्परा अपने स्वभाव में सम्मिलित रहें तो क्या आश्चर्य। पुरातन निर्धारणों की सहज ही जनमानस में उनको मान्यता मिल जाती है और यदि वह गई गुजरी स्थिति है तो फिर पीढ़ियों में प्रखरता आने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।
भारतीय धर्म की वेदान्त मान्यता अपनाने योग्य है, जिसमें आत्मा को परमात्मा का अंश या प्रतीक प्रतिनिधि माना गया है और उसका परिष्कार करके पूर्णता की स्थिति तक पहुँचने के लिए निर्देशन किया गया है।
देवताओं को ऋषियों की सन्तान होने की बात हम अपने गोत्रों के आधार पर ही हृदयंगम कर सकते हैं। साथ ही पूर्वजों की गरिमा रक्षा के लिए अपने आपे को श्रेष्ठतम बनाने की बात भी सोच सकते हैं।
आँख मीच कर दूध पीने वाली बिल्ली समझती है कि घर का कोई व्यक्ति उसे देख नहीं रहा है। उसी प्रकार छिपकर पाप करने वाला सोचता है कि उसके कुकृत्यों पर सदा पर्दा ही पड़ा रहेगा। −महाभारत
अपने हठ के हठीले मत रहिए। बदलते हुए वक्त को देखिये और उसके साथ अपने को भी बदल डालिए। जाड़े के दिनों में पहने जाने वाले रुईदार कपड़े गर्मी के दिनों पहनने की कोशिश मत कीजिए। इससे बेकार वजन लदेगा और पसीने से तर−बतर होना पड़ेगा। इसी तरह जाड़े के दिनों में बर्फीली हवा की सनसनाहट की परवाह किये बिना मलमल का कुर्ता मत पहनिए, आपकी परेशानी बढ़ेगी और देखने वाले बेवकूफ कहकर फब्तियाँ कसेंगे।
बचपन में छोटे कपड़े पहने जाते थे। अगर वह जमाना चला गया, और आपके सन्दूक में वे कपड़े रखे हैं, तो उस लालच में मत पहनिए कि रिश्तेदारों ने इन्हें बड़ी मुहब्बत से सिलवाया था और उनके बनने में बहुत पैसा लगा था। बड़े जिस्म में छोटे साइज के कपड़ों की ठूँस−ठाँस करना बेकार है। इसी प्रकार बड़े भाई की पगड़ी सिर पर बाँधना बेकार है। बड़ा भाई आप से बीस वर्ष बड़ा है। अगर यही पगड़ी पहननी है, तो उसका वक्त आज नहीं है। बीस वर्ष इन्तजार करना पड़ेगा।
जब आप छोटे बच्चे थे, तब दादा की गोद में चढ़ने के लिए मचलना मुनासिब था, पर आज तो दादा बूढ़े हो चुके हैं और आप जवानी के दिनों में जा पहुँचे। इन दिनों तो बीमार दादा को आप गोद में उठायें, इसकी जरूरत पड़ सकती है।
वक्त सदा एक जैसा नहीं रहता। वह अपने ढंग से बिना किसी का इन्तजार किये बदलता रहता है। आपके लिए मुनासिब है कि इस बदलाव को समझें और उसी हिसाब से अपने तौर−तरीके बदल डालें।
रस्म−रिवाजें सदा एक जैसी नहीं रहती। बदलते वक्त के साथ वे भी बदलती रहती हैं। हठ मत कीजिए कि पुराने लोग जो तौर−तरीके काम में लाया करते थे, आप भी उन्हीं को अपनाये रहेंगे। गर्मी के दिनों में नदी सूख जाती है, तब आप नाव में चढ़ने की कोशिश क्यों करते हैं? जो काम बरसात में किये जाते हैं, वे गर्मी के दिनों करने की तैयारी करना क्या मुनासिब है?
समय को देखकर चलिए। समझदार लोग सदा ऐसा ही करते हैं? पुरानों की इज्जत करने का मतलब यह नहीं है कि वे जो कुछ भी करते रहे हैं, वही आपको भी करना चाहिए। छाता लगाने को कोई गैर जरूरी नहीं कहता, पर उसे अगर जाड़े के दिनों में लगाकर चलेंगे, तो तरीके को अपनाने की बात कहना बेकार है। वे छाता जरूर लगाते होंगे, पर उन ठण्ड के दिनों में नहीं जब न धूप थी, न बरसात। बुजुर्गों की तरह आप छाता लगाने का फैसला करें, तो यह जरूर देख लें, कि उन दिनों जैसा मौसम है या नहीं।
वक्त बदलते हैं, जो जरूरतें बदलती हैं। साथ ही तौर−तरीकों में हेर−फेर करने की जरूरत पड़ती है। आप इन बातों पर ख्याल न करेंगे और पुराने लोगों की दुहाई देकर बेवक्त की चला−ढाल अपनाये रहेंगे, तो ऐसे हठी होने में कोई समझदारी नहीं है। वे समझदार हैं जिन्होंने समय की चाल के साथ ताल-मिलाकर अपनी गति बढ़ायी ऐसे व्यक्ति, समुदाय या राष्ट्र कभी अभावग्रस्त नहीं होते। सफलता सदैव उनके कदम चूमती है। आप अपने अतीत को मत देखिए उसे सराहने में समय नष्ट न करिए। जो बीत गया सो बीत गया। उसकी चर्चा अब निरर्थक है। अब तो आपके सामने वर्तमान की वास्तविकता है। उससे निपटकर अपने भविष्य की रूपरेखा बनाइए। जल्दी कीजिए, कहीं ऐसा न हो कि आप सोचते ही रह जाएं व जमाना कहीं का कहीं जा पहुँचे।
जीवन के प्रकाशवान क्षण वे हैं जो सत्कर्मों में बीते और नेकी करते हुए बीते।
सेवा भी साधना है। उस माध्यम को अपनाकर अपना और दूसरों का कल्याण किया जा सकता है सेवा बिना उदारता और त्याग के बन नहीं पड़ती। इनका अभ्यास ही आत्मा को उच्च स्थिति तक पहुँचाता है। तालाब में घुसे बिना तैरना नहीं आता, परमार्थ−प्रयोजनों में संलग्न हुए बिना यह सम्भव नहीं कि जिन सत्प्रवृत्तियों का गुणानुवाद स्वाध्याय एवं सत्संग में पढ़ा गया है। उनको व्यवहार में भी उतारा जा सके। अध्यात्म सिद्धांतों का क्रियान्वयन लोक मंगल प्रयासों में संलग्न होने पर ही होता है। इसलिए साधु, ब्राह्मण सदा व्यक्ति और समाज के कल्याण में निरत रहने के कार्यक्रम बनाते और उनमें जीवन खपाते रहे हैं। सर्वसाधारण के लिए यही मध्यवर्ती मार्ग उपयोगी है।
योग क्षेत्र का एक विशेष वर्ग है। जिन्हें वैज्ञानिक स्तर का कह सकते हैं। उन्हें अंतर्मुखी होना पड़ता है साथ ही चिन्तन की दिशा विशेष में नियोजित रखने के लिए एकान्त की आवश्यकता होती है। भौतिक विज्ञानी भी अपने अन्वेषण, पर्यवेक्षणों में अपनी प्रयोगशाला ऐसे स्थान पर बनाते हैं जहाँ ध्यान बटाने वाला शोरगुल न हो। मन को अपने विशेष लक्ष्य में तादात्म्य होने की सुविधा रहे। गहन विषयों के आविष्कारक अपने लिए ऐसी ही परिस्थितियाँ तलाश करते रहते हैं।
आध्यात्मिक क्षेत्र का शोध पर्यवेक्षण कार्य भी ऐसा ही है जिसमें कोलाहल रहित वातावरण में एकान्त ढूंढ़ना पड़ता है। और लोगों की पूछताछ−वार्तालाप प्रसंग से बचने के लिए मौन भी रहना पड़ता है। इतना ही नहीं उन्हें शीत प्रधान वातावरण चाहिए। गरम प्रदेश में शरीर का बाह्य कलेवर भी उत्तेजित नहीं रहता वरन् अन्तःक्षेत्र भी अशान्त, उत्तेजित होने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में शोध, अन्वेषण, चित्त का एकाकीकरण ठीक तरह नहीं हो पाता। अनेक साथियों का सान्निध्य ऐसी स्थिति में विक्षेप ही उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में भौतिक विज्ञानी तथा आत्म विज्ञानी जिन्हें अपने निजी चिन्तन पर ही निर्भर रहना पड़ता है वे एकांत ही नहीं ढूंढ़ते वरन् एकाकी निवास का भी प्रबन्ध करते हैं। मौन भी धारण करते हैं। पर यह सदा के लिए नहीं हो सकता। कुछ सीमित काल के लिए ही होता है। क्योंकि अन्न, वस्त्र, आग जैसी दैनिक आवश्यकताएँ लम्बे समय के लिए संग्रह करके नहीं रखी जा सकतीं। और न कोई ऐसा क्षेत्र अब रहता है जहाँ भोज पत्र के वस्त्र और कन्द मूल, फल, बहुलता से मिलते हों। न कोई वन ही ऐसा है जहाँ सरीसृप एवं हिंस्र जीवों का अभाव हो। ऐसी दशा में सुरक्षा की भी एक समस्या सामने रहती है।
प्राचीन काल में अध्यात्म क्षेत्र के शोध विज्ञानी प्रायः ऐसी परिस्थितियाँ अपने महान कार्य के लिए ढूंढ़ते थे और हिमालय की कन्दराओं में रहकर अपने आत्मबल से जुड़ी हुई सिद्धियों के सहारे शरीर रक्षा का प्रबन्ध कर लेते थे। पर यह भूमिका अत्यंत उच्चस्तरीय है। सामान्य स्तर के साधक न तो ऐसी परिस्थितियाँ ढूंढ़ सकते हैं और न वहाँ भय और आशंका का परित्याग करके बिना साधनों के भी शरीर रक्षा का प्रबन्ध कर सकते हैं। इसलिए बदली परिस्थितियों में उन्हें भी मध्यवर्ती मार्ग तलाश करना पड़ता है और जीवनयापन की सुविधाएँ जुटाते हुए यदि किसी गम्भीर शोध में लगाना हो तो लगते हैं।
किन्तु यह समय ऐसा है नहीं। व्यापक परिस्थितियाँ आपत्ति काल जैसी हैं। आपत्ति काल में सामान्य निर्धारण छोड़कर आपत्ति धर्म का पालन करता है।
भगवान का भजन कहीं भी किसी भी परिस्थिति में हो सकता है। वह मनुहार या उपहार की अपेक्षा व्यक्ति का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार भी देखता नहीं परखता है। इसलिए इसकी कसौटी तो एक ही रहती है कि कौन उसकी इच्छाओं की पूर्ति और आज्ञाओं का पालन करने में किस सीमा तक लगा हुआ है। यह कार्य जन संपर्क में संलग्न रहने विशेषतया पिछड़ों को ऊँचा उठाने में ही सम्भव हो सकता है। इसी रीति−नीति को अपनाने पर ईश्वर की प्रसन्नता निर्भर है।
वैज्ञानिक शोध प्रक्रिया में प्रवेश करना ही हर किसी का काम नहीं है और न ऐसी जोखिम भरी जगह तलाश करने की आवश्यकता है जिसमें एकान्त की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए निर्वाह सामग्री का अभाव एवं अनेक प्रकार के भय विक्षोभों का सामना करना पड़े। यह शोध कार्य ऐसे वातावरण में भी हो सकता है। जहाँ सहज सुविधाएँ उपलब्ध हों और समान स्तर के दूसरे लोगों के साथ विचारों तथा साधनों का आदान−प्रदान करने की सुविधा हो।
वह समय दूसरा था जिसमें अपने अन्तराल में से ही अंतर्मुखी होकर हर स्तर के यन्त्र उपकरणों का उत्पादन करना पड़ता था। उन दिनों गहन एकान्त की आवश्यकता पड़ती थी और चित्त की अंतःचेतना की अत्यन्त गहराई में उतारना पड़ता था। आज विज्ञान की प्रगति ने ऐसे उपकरण उपलब्ध करा दिये हैं जो न केवल प्रकृति की−शरीर की शोध करने में सहायक हो सकते हैं वरन् मन और अन्तःकरण का पर्यवेक्षण करने में भी सहायक सिद्ध हो सकते हैं। उनकी उपस्थिति में भी अपने आपको उन यन्त्रों का स्थानापन्न बनाने के लिए क्यों प्रयत्न किया जाय।
ऐसे लोग देश में मुश्किल से दो पाँच ही हो सकते हैं। अरविन्द घोष, महर्षि रमण जैसे सूक्ष्मदर्शी पिछली शताब्दी में भी उँगलियों पर गिनने लायक ही हुए हैं। जिनकी आन्तरिक स्थिति वैसी है वे भूतकाल के सूक्ष्म शरीरधारी निष्णातों में अभी भी संपर्क बना सकते हैं और उनकी उपलब्धियों से अवगत हो सकते हैं। आवश्यक नहीं कि मध्यम श्रेणी के लोग भी हिमाचल में निवास करने के भावावेश में घर छोड़ें और अपनी चारित्रिक दुर्बलताओं के कारण ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करें जिसमें यह सारा परिवार ही बदनाम होता हो।
अभी योग में पारंगत होने और सिद्धि चमत्कार दिखाने की प्रवंचना में उन लोगों को नहीं फँसना चाहिए जिनने सच्चे अर्थों में अभी साधु ब्राह्मण की भूमिका भी सम्पन्न नहीं की है। ऐसे लोगों के अधूरे प्रयास और कुछ ही दिनों में निराश होकर पाखण्ड रचने के करतब लोगों में देखने में आते हैं तब उन लोगों का भी साहस टूटता है जो अध्यात्म विज्ञान की गहराई में उतरकर महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने की बात सचमुच ही सोचते हैं।
अधूरे योगी बनने और उपहासास्पद विडम्बनाएँ रचने की अपेक्षा अध्यात्म विज्ञान में वास्तविक रुचि रखने वालों के लिए निष्णातों का यही परामर्श उचित है कि वे युग धर्म के समझें। व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित असंख्य समस्याओं के समाधान में−आस्था संकट के निराकरण में अपना समय लगायें।
बड़ों का अनुकरण करने का कार्य रंग मंच के नटों के लिए छोड़ देना चाहिए। वे क्षण में योगी, क्षण में राजा, क्षण में विदूषक बन सकते हैं। वही कार्य यदि अध्यात्मवाद में रुचि रखने वाले भी करने लगे तो अपना और साथ ही इस समूचे क्षेत्र का गौरव गिरा देंगे।
यह समय हिमालय में जाकर योग साधना करने और किन्हीं सिद्ध पुरुषों को ढूँढ़ निकालने का नहीं है। उस स्तर का अपने को बनाये बिना किसी सच्चे सिद्ध पुरुष को ढूँढ़ पाना भी कठिन है। उनका अनुग्रह और सहयोग पाना तो बहुत आगे की बात है।
इन दिनों धर्म और अध्यात्म का सर्वसाधारण के योग्य रास्ता एक ही है कि वे ब्राह्मण, साधु और वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित करें और भारत की महान संस्कृति देव संस्कृति में नये सिरे से प्राण भरें।
आज का काम कल पर न टालो। वह कल निरन्तर आगे ही बढ़ता रहेगा और उस दिन को कभी आने ही न देगा जिसमें टाले हुए कामों का बोझ हलका किया जा सके।
हेलेन जैकब की गणना अमेरिका के मूर्धन्य साहित्यकारों में होती है। एक बार एक प्रवास के दौरान उन्हें चार महीने एक ऐसे मकान में गुजारने पड़े, जो भुतहा था। भूत के उपद्रवों और कारिस्तानियों का विस्तृत वर्णन इनने अपनी पुस्तक में किया है, यहाँ उसका सार संक्षेप प्रस्तुत है−
जिस मकान की चर्चा लेखक ने अपनी पुस्तक में की है वह नया−नया बनकर तैयार ही हुआ था। मध्यम आकार की वह एक दो मंजिली इमारत थी और पुराने मकानों से अलग कुछ दूरी पर बनी थी। लेखक को उस क्षेत्र में यही एकमात्र खाली मकान मिला, अस्तु पत्नी सहित उसी में ठहर गये। दिन में कोई असामान्य बात नहीं हुई। रात जैकब की पत्नी हेलेन ऊपरी तल के बैडरूम में लेटी हुई थीं। जैकब स्वयं अध्ययन कक्ष में लेखन कार्य में व्यस्त थे। गर्मी के दिन थे, अतः सारी खिड़की, दरवाजे खुले पड़े थे। तभी थोड़ी देर में बगल वाले कमरे से हेलेन की आवाज आयी। वह पूछ रही थी कि क्या यह थपकी की आवाज आपने की है? जैकब ने समझा कि शायद टेबल पर कलम से कोई ध्वनि उत्पन्न हुई हो, उसी के बारे में हेलेन पूछ नहीं हैं, अतः उसने पुनः उस प्रकार की ध्वनि उत्पन्न की, किन्तु हेलेन ने कहा कि उसने जो ध्वनि सुनी वह इससे भिन्न थी। वह ऐसी थी जैसी कोई सामने के ईंट बिछी रास्ते को किसी पतली छड़ी से ठोक रहा हो। जैकब ने इसे गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया और हेलेन का स्वप्न अथवा भ्रम समझकर टाल दिया। इसके बाद फिर कोई असामान्य नहीं घटा।
दूसरी रात लेखक और उसकी पत्नी निचले तल पर थीं। रात के करीब दस बजे फिर वही ईंट बिछे रास्ते पर छड़ी से ठोकने की ध्वनि उत्पन्न हुई। लेखक और उसकी पत्नी टार्च लेकर तुरन्त बाहर निकले, पर बाहर बिलकुल सुनसान था। देर तक खोजबीन के बावजूद भी किसी व्यक्ति अथवा पशु की उपस्थिति ज्ञात नहीं हो सकी। उस दिन के बाद से वह घटना बिल्कुल आम बात हो गई और सैकड़ों बार घटी होगी। हर बार रहस्य का पता लगाने की कोशिश की गई, पर हमेशा असफलता ही हाथ लगी।
इस घटना के अतिरिक्त बीच-बीच में अन्य घटनाएं भी घटती रहीं, यथा एक रात लेखक रोशनी बुझाकर बिस्तर पर लेटा ही था कि जमीन पर माचिस की तीलियाँ डिब्बे सहित गिरने की आवाज आयी। जैकब अविलम्ब उठे, रोशनी जलायी और कमरे को छान डाला, कहीं कोई तिनका भी फर्श पर नहीं दीखा।
एक अन्य रात समाचार पत्र के पन्नों के नीचे कमरे के फर्श पर फिसलने की ध्वनि सुनाई पड़ी। फिर उठकर जैकब ने कमरे की छान−बीन की, परन्तु कागज का एक टुकड़ा भी कमरे में नहीं दिखाई पड़ा।
इसी प्रकार एक रात एक व्यक्ति के चमड़े के जूते पहनकर निचले तल के कमरे में चलने की आवाज सुनायी पड़ी।
एक दिन हेलेन ऊपरी तक के चौके के काम में व्यस्त थीं, तभी नीचे से किसी की स्फुट आवाज आयी− ‘‘क्या ऊपर बहुत व्यस्त हैं।” आवाज उसकी एक पड़ौसन से मिलती जुलती थी। उसने तुरन्त छानबीन की। उक्त पड़ौसन के इस बारे में जानकारी चाही, तो उसने इस सबके बारे में अपनी अनभिज्ञता जाहिर की। अब तक जितनी भी घटनाएँ घटी थीं, वह सभी छोटे स्तर की सामान्य घटनाएँ थीं।
एक रात जैकब दम्पत्ति अपने अध्ययन कक्ष में पढ़ रहे थे कि बगल के गैरेज में किसी चीज के गिरने जैसी तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न हुई। ध्वनि इतनी तीव्र थी कि एक मील के दायरे तक में स्पष्ट सुनी जा सकती थी। आवाज किसी विशाल पियानो के जमीन पर गिरने और टकरा कर चूर−चूर होने जैसी थी। यद्यपि उस गैरेज का इस्तेमाल लेखक दम्पत्ति किताब−स्टोर के रूप में कर रहे थे, वहाँ पर टूटने लायक इस प्रकार की अन्य कोई चीज नहीं रखी थी, फिर भी मन को सान्त्वना देने के लिए जैकब ने टॉर्च उठायी और गैरेज पहुँचे। गैरेज का हर कोना छान मारा जमीन पर कुछ भी गिरा नजर नहीं आया। अन्ततः जैकब पिशाच की कार गुजारी समझ अपने कमरे में लौट आये। कर्ण कुहरों को विदीर्ण करने वाली यह गगनभेदी ध्वनि उस रात कुल मिलाकर तीन बार उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त तीन अन्य अवसरों पर इस घटना की पुनरावृत्ति हुई।
एक बार लेखक महोदय के एक मित्र पत्नी व बच्चे उनके यहाँ कुछ दिन के लिए आये। एक रात दोनों की पत्नियाँ व बच्चे थियेटर देखने चले गये। जैकब व उनके मित्र को किसी महत्वपूर्ण विषय पर मन्त्रणा करनी थी, अस्तु दोनों घर पर रुक गये। कुछ समय में दोनों वार्ता में व्यस्त हो गये, तभी ऊपरी मंजिल पर, किसी के कदमों की आहट आयी। जैकब इसे अनसुनी कर गया, किन्तु मित्र महोदय से न रहा गया, उसने पूछ ही डाला। जैकब से भूत के बारे में जानकर सहसा उसे विश्वास न हुआ। सिर के ऊपर ऊपरी मंजिल पर पदचाप लगातार आ रहे थे। टॉर्च लेकर दोनों दबे कदमों से उस कमरे में पहुँचे, मगर प्रेत पहले से ही सावधान था। दरवाजे तक उनके पहुँचते ही पग ध्वनित गायब हो गई। बिजली की रोशनी में कमरे का चप्पा−चप्पा ढूँढ़ा गया, कोई नहीं था। निराश होकर दोनों लौट आये। उस रात उनकी वार्ता और आगे नहीं चल पायी और महिलाओं के लौटते ही वे सोने की तैयारी में जुट पड़े।
कमरे छोटे होने के कारण अतिथि अर्थात् मित्र, उसकी पत्नी व लड़की तीनों ने एक ही कमरे में बिस्तर लगा लिये, हेलेन बगल वाले कमरे में लेखक के बिस्तर पर सो गई, जबकि स्वयं लेखक निचले तल में एक सोफा पर सो गये। अभी थोड़ी ही देर हुई होगी कि ऊपरी मंजिल पर अतिथि मित्रों की चहलकदमी और दबी आवाजें सुनायी पड़ने लगीं। कुछ देर के बाद उनकी आवाजें बन्द हो गयीं। सबेरा होते ही मित्र ने जैकब के कमरे में आकर रात की उस रहस्यमय आवाज के बारे में पूछा। लेखक चौंके और अपनी अनभिज्ञता दर्शायी। बाद में मेहमान ने जैकब को बताया कि रात उनके बिस्तर पर जाते ही गैरेज से इतनी तेज आवाज आयी मानो गैरेज की छत्त ढहकर ध्वस्त हो गई हो। हेलेन से जब इस बारे में पूछा गया, तो उसने भी अपनी अनभिज्ञता जाहिर की।
वस्तुतः यह वही ध्वनि थी, जिसे जैकब दम्पत्ति ने पहले तीन बार सुनी थी−विशाल पियानो का जमीन पर गिरकर चूर−चूर होना, पर आश्चर्य! कि इतनी तीव्र ध्वनि भी इस बार उन्हें सुनाई नहीं पड़ी।
इस घटना से उनके मित्र को भी भूतों के अस्तित्व पर विश्वास करना पड़ा, क्योंकि सबेरे मित्र के साथ लेखक ने अन्य अवसर की भाँति इस बार भी गैरेज की बारीकी से छान−बीन की, मगर परिणाम पहले जैसा ही था, कोई किताब भी गिरी नहीं दिखाई पड़ी वहाँ।
जैकब तर्क और तथ्य को मान्यता देने वाले मनीषियों में एक हैं। इन चार महीनों में घटित होने वाली घटनाओं के सम्बन्ध में वे कारण ढूँढ़ते रहे पर अन्त में इस मान्यता को स्वीकार ने के लिए विवश हुए कि प्रेत सत्ता कोई होती है और वह मनुष्यों के साथ छेड़खानी करना पसन्द करती है। जिस स्थान से उन्हें मोह होता है, वहाँ से सूक्ष्म रूप से बनी रहतीं व अपने अस्तित्व का परिचय देती हैं। अनेकों का किसी प्रकार का अहित नहीं करतीं पर कुछ विक्षुब्ध आत्माएँ रोगी बनाकर भगा बैठने तक ही उद्यम मचा देती हैं। मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व असंदिग्ध है, ऐसी घटनाएँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं।
मूर्ख और आलसी तो तारागणों की तरह जैसे के तैसे बने रहते हैं। सम्पत्ति और विपत्ति के लाभ और हानि के अवसर चन्द्रमा जैसे बड़ों पर आते हैं।
प्रस्तुत अन्तरिक्षीय खोज के कई कारण हो सकते हैं। अधिकाधिक जानने की इच्छा, अन्तरिक्ष का दोहन प्रतिकूलताओं के समाधान के खोज से लेकर भावी युद्ध के लिए रणक्षेत्र तैयार करना आदि। कारण कुछ भी हो आखिर इतनी महंगी योजनाओं का परिवहन करने में योजना निर्माताओं की दृष्टि किसी बड़ी बात पर होनी चाहिए।
इन सम्भावनाओं में एक कड़ी और भी जुड़ती है कि मनुष्य जिस उद्दण्डता पर उतारू है उसके फलस्वरूप इस धरती पर से जीवन की आवश्यक सामग्री ही समाप्त हो जाय और सर्वत्र विष ही विष भरा दिखे अथवा इस सुन्दर धरातल को हाइड्रोजन बमों और लैसर किरणों से नेस्त नावूद ही कर दिया जाय। तब मनुष्य को अपने अस्तित्व को किसी अन्य लोक में भेजना भी पड़ सकता है। सब लोग न सही कुछ लोग ही किसी उपयुक्त वातावरण वाले लोक में चले जायें तो आदम हब्वा की तरह अपनी वंश वृद्धि करते हुए अन्यत्र कहीं पृथ्वी जैसी परिस्थितियाँ बना सकते हैं। इसलिए कहाँ मानव जीवन की सम्भावना है इस निमित्त भी यह ढूँढ़−खोज चल रही हो सकती है।
जर्मन शोध संस्थान से सम्बन्धित जीर्वेन विश्व-विद्यालय के प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री प्रो. हांस डीटर फ्लग ने कुछ ऐसे अवयवों के अवशेष खोज निकालें हैं जो कभी तारों के टूटने से इस धरती पर आए।
प्रो. फ्लग ने पश्चिम ग्रीन लैण्ड की इसूजा चट्टान में पाए गये इस सूक्ष्म अवशेषों का इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से अध्ययन करने पर पाया कि इनमें प्राप्त अवशेष वर्तमान जीवित अवयवों का मात्र 1 प्रतिशत ही हैं फिर भी जीवन के समग्र लक्षण इन में किसी न किसी मात्रा में आज भी मौजूद हैं। यह चट्टान विश्व की सबसे प्राचीन चट्टान है।
अब से लगभग 100 वर्ष पूर्व स्वीडन के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्वांटे अरहेनियम ने उस समय एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया था, जिसमें उन्होंने लिया था “जीन्स” ने सर्वप्रथम बाह्य अन्तरिक्ष में जन्म लिया था। वहीं से शक्तिशाली जीवाणु अन्य ग्रहों में गए पृथ्वी भी उनमें से एक है और धीरे-धीरे जीव विकास क्रम में आज की स्थिति में विश्व पहुँचा।
प्रो. फ्लग इस सिद्धान्त की सत्यता सिद्ध करते हुए उल्काओं के जन्म को भी सौर मण्डल के निर्माण के साथ मानते हैं। इनका कहना है कि इसूजा चट्टान में पाए गये जीवांश अरबों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।
“इन्टेलीजेंट यूनीवर्स” के लेखक फ्रेड होयल ने अपनी पुस्तक में पृथ्वी के बाहर भी जीवन है इस बात को प्रामाणित करने के लिए विभिन्न कालों में तदाशय के वैज्ञानिक खोजों का ब्यौरा प्रस्तुत किया है।
लेखक के अनुसार पहली बार 1864 में, दक्षिणी, पश्चिमी फ्रांस में उल्कापात के अवयवों का सूक्ष्म वीक्षण यन्त्रों द्वारा परीक्षण करने पर इस बात की सम्भावना व्यक्त की जा सकी कि पृथ्वी के बाहर अन्य ग्रहों पर भी जीवन है।
1930 में परीक्षण में दौरान पाया गया कि पृथ्वी के बाहर से आने वाले उल्का शिला खण्डों के बीच कुछ ऐसे जीव हैं जिनकी बाहरी खाल होती हैं जिनमें ‘कारबन’ की परत सी चढ़ी रहती है।
पृथ्वी पर अन्तरिक्ष वासियों के आवागमन सम्बन्धी आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के अतिरिक्त संसार में पौराणिक भिथकों में भी इसका वर्णन मिलता है। प्रो. वाँन डेनीकेन ने उनका एक विवरण सम्पादित किया है। पुस्तक का नाम है− “इंजेकेले” उसमें काश्मीर में श्रीनगर शहर से 20 मील दूर बने पर्वतीय क्षेत्र में अवस्थित एक सूर्य मन्दिर का उल्लेख है जिसके भग्नावशेष अभी भी देखने को मिलते हैं।
राष्ट्रीय वैज्ञानिक और अन्तरिक्ष प्रशासन (नासा) जो अमेरिका में स्थित है ने आशा व्यक्त की है कि 2085 तक लोग चाँद और मंगल पर बस जायेंगे और वहीं से शनि, बृहस्पति, यूरेनस और नैप्च्यून के उपग्रहों की यात्रा शुरू कर देंगे।
डी. पी. ए. की हाल ही में एक बैठक के अनुसार कहा गया कि मंगल और चाँद पर बस्तियाँ बसाना सम्भव है और इस दिशा में प्रगति हो रही है।
प्रो. एल्वर्ट किंग (ह्यूस्टन विश्वविद्यालय) के अनुसार मंगल हमारे सौर मंडल का एक मात्र ग्रह है जहाँ पृथ्वी की तरह ही जीवन हो सकता है। इस सौर मण्डल में मंगल ग्रह पृथ्वी के निवासियों के लिए सबसे ज्यादा आकर्षक भी रहा है।
मंगल ग्रह की जाँच-पड़ताल के सिलसिले में भेजे गये वाइकिंग अन्तरिक्ष यान से जो चित्र भेजे हैं उसमें एक विशाल काय बन्दर की तथा पिरामिड जैसे किसी भव्य भवन की आकृति पाई गई है। इतना ही नहीं उसके ध्रुवों पर बर्फ भी देखी गई है। मंगल ग्रह पृथ्वी से बहुत कुछ मिलता−जुलता भी है। भारतीय खगोल विद्या में ही उसे पृथ्वी का पुत्र ही माना गया है। वैज्ञानिकों की आशा का केन्द्र अब चन्द्रमा से हटकर क्षुद्र ग्रहों तथा मंगल बनता जा रहा है। क्षुद्र ग्रहों की एक बड़ी श्रृंखला मंगल और बृहस्पति के मध्य भ्रमणरत रहती है। उनमें भी समुद्री टापुओं की तरह अन्तरिक्ष में जा बसने की बात सोची जा रही है।
जीवन के उत्पन्न होने तथा विकसित हो सकने की परिस्थितियाँ अन्य ग्रहों पर भी तलाशी जा रही हैं ताकि यदि पृथ्वी का वातावरण प्रकृति प्रकोप से या मानवी दुर्बुद्धि से रहने लायक न रहे तो कहीं अन्यत्र जा बसने और मनुष्य की अपनी विकसित सत्ता का अस्तित्व बनाये रहने की कहीं गुंजाइश मिल सके। पर सन्देह इस बात का भी है कि कहीं अन्यत्र बस जाने पर भी मनुष्य पृथ्वी की तरह चैन से रह सकेगा या नहीं, साथियों को चैन से रहने देगा या नहीं?
यदि उसने प्रदूषण बढ़ाने, संसाधन नष्ट करने, अधिकाधिक उपभोग एवं अनियन्त्रित प्रजनन जैसी गतिविधियाँ वहाँ भी चालू रखीं तो भगवान से यही प्रार्थना करना चाहिए कि या तो मानव को सद्बुद्धि दे या उसके ये प्रयास असफल सिद्ध हों। कम से कम मानव द्वारा उत्पन्न वैचारिक व अन्यान्य विकृतियाँ एक ही ग्रह तक सीमित रहें तो यह कौन−सा बुरा सौदा है।
काम की बातें इस दुनिया में थोड़ी हैं। उन्हें समझ और अपना सको तो व्यर्थ के उपदेश सुनाते रहने में समय न गँवाना पड़े।
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पिछड़ा और पिछला कदम उठाओ तब प्रगति के निमित्त अगला कदम उठेगा। इसी नीति को अपनाकर महानता के लक्ष्य तक पहुँच सकना बन पड़ेगा।
कथा वाचक गरीब ब्राह्मण पद्मनाभ कथायें बांच कर ही अपना निर्वाह करते थे। इस प्रकार जीविकोपार्जन के साथ−साथ सद्ज्ञान प्रचार का पुण्य प्रयोजन भी पूरा हो रहा था। धर्म ग्रन्थ का अध्ययन करते हुए उन्होंने एक स्थान पर पढ़ा। ज्ञानदान का प्रतिफल धन के रूप में ग्रहण नहीं करना चाहिए।
उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि अब तक वे इस नियम की अवहेलना ही करते रहे। धर्म प्रचार के लिए जब वे कथायें करते तो लोग जो दक्षिणा देते उसी से अपना गुजारा चलाते थे। अब तक जो भूल हो गयी सो हो गयी अब न होने दूँगा। इस संकल्प के साथ उन्होंने जंगल में लकड़ी काटकर अपना गुजारा चलाना आरम्भ कर दिया। दान दक्षिणा में लोग पैसा तो चढ़ाते ही थे, उस धन का उपयोग वे गुरुकुल तथा अन्य जनोपयोगी कार्यों में करते।
मनुष्य की जीवनी शक्ति का पारावार नहीं। यदि वह शारीरिक दृढ़ता बढ़ाने में ही अपने को लगा दे तो ऐसा दैत्य बन सकता है जिसे देखकर लोग आश्चर्य से चकित रह जाँय।
बंगाल प्रांत के व्यूर गाँव में जन्मी एक बालिका चार−पाँच आदमियों के बराबर भोजन करती थी। बड़ी होने पर शादी की गई तो ससुराल वालों ने बुरा−भला कहा जिससे खिन्न होकर उसने बिना कुछ खाये रहने का निश्चय किया। यह नियम 70 वर्ष जीवित रहने तक सध गया उसने 14 वर्ष की आयु से आहार त्याग दिया था यह उसकी संकल्प शक्ति की बदौलत ही सम्भव हो सका।
लैव लैण्ड के वैज्ञानिक जार्ज क्रायल ने इस सम्बन्ध में अपने एक शोध प्रबन्ध में सन् 1933 में कहा है कि यह आवश्यक नहीं कि आहार मात्र मुँह से ही ग्रहण किया और गले से उतार कर पाचन तन्त्र में ही पचाकर शरीर के विभिन्न अवयवों तक पहुँचाया जाय। वह साँस द्वारा आकाश में फैली हुई वायुभूत खाद्य सामग्री से भी उपलब्ध किया जा सकता है जीवन धारण हेतु प्रोटोज्म चाहिए वह किसी भी माध्यम से लिए जा सकते हैं।
दक्षिण अफ्रीका का पेराडम नगर में एक प्रीतिभोज की तैयारी की गई। आगन्तुकों को कौतुक सूझा तो प्रसिद्ध पेटू मेलायन लकड़हारे को आमन्त्रित कर लिया। यह तय किया गया कि पहले मेलायन को छककर भोजन कराया जाय शेष अतिथि बाद में बाँटकर खायेंगे। मेलायन को पूर्ण भरपेट खाने की छूट थी। उसने सोलह आदमियों के बराबर भोजन करके ही ऊपर दृष्टि उठाई। आगन्तुक कौतूहलवश देखते रहे बाद में रसोई घर में शेष चाय पीकर ही वापस गये।
वस्तुओं को तेजी से दूरी तक फेंकने वालों में मैक्लेन वर्ग जर्मनी का एडोल्फ प्रख्यात था। एक प्रदर्शन में उसने चाँदी के सिक्के बीस फीट दूर खड़े होकर बेतूल के पेड़ में खींचकर मारे। सिक्के इतनी गहराई तक जा घुसे उन्हें खोदकर निकालना पड़ा।
शून्य डिग्री से.ग्रे. तापमान पर कोई भी 10 मिनट से अधिक नहीं ठहर पाता। किन्तु मेजर डोन−मोल्ड एक घण्टे तक नंगे बदन बर्फ की शिला पर लेटे रहे और फिर सहज रूप से कपड़े पहनकर चलते बनें।
स्विट्जरलैंड और लोशेन स्टैज के मध्य 235 वर्ष तक सीमा विवाद चला और झंझट चलता रहा। अन्ततः एक बूढ़े सूझ−बूझ वाले लकड़हारे जोन कास्टवुड ने इस विवाद को सुलझाया। लकड़हारा बहुत बलिष्ठ व्यक्ति था उसने कहा कि 1040 पौण्ड भारी इस पत्थर को पीठ पर लादकर जहाँ तक वह चला जायेगा वहीं पर विभाजन रेखा मान ली जानी चाहिए दोनों पक्ष सहमत हो गये। भारी चट्टान को लादकर बूढ़ा 1 मील 4500 फीट दूरी तक गया और आगे भार न बहन करने से थककर चूर होकर गिर पड़ा जहाँ वह पत्थर गिरा उसी स्थान को विभाजन चिन्ह माना गया।
बर्फीली पहाड़ियों पर रहने वाले “लैप” जाति के लोग बर्फीली खाइयाँ पार करने के लिए छलाँग लगाने का अभ्यास करते हैं। उनमें युवा लोग 125 फीट तक की लम्बी छलाँग लगाते देखे गये हैं।
की वैस्ट “अफ्रीका” निवासी पीटर जेकाक्स के हाथ इतने मजबूत थे कि वह अपने हाथों की दोनों हथेलियों पर दो जवान आदमी बिठाकर सड़कों पर लिये−लिये फिरता था।
कोरिया का नाटे कद का ‘मांस’ नामक पहलवान मात्र 4 फीट 1 इंच का बौना था किन्तु सामर्थ्यों से भरा−पूरा। अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पहलवानों को चुटकी बजाते पछाड़ देता कठोर से कठोर ईंटों को हथेली में दबाकर चूर्ण बना डालता। पहलवान कुश्ती लड़ने से कतराने लगे। हारे हुए पहलवानों ने माँस को एक साँड से कुश्ती लड़ने की चुनौती दी। पहले तो माँस से इन्कार कर दिया। किन्तु बार−बार चिढ़ाये जाने पर वह तैयार हो गया। 13 मन का साँड दंगल में शराब पिलाकर उतारा गया। किन्तु आत्म−विश्वासी माँस ने पहली बार में ही जमकर ऐसा घूँसा मारा कि साँड चारों खाने चित्त आ गिरा और उठकर ऐसा भागा, यदि रोकथाम के लिए बाड़ न लगाई गई होती तो दर्शकों को ही कुचल देता।
अमेरिका के रिचर्ड ने अपनी काया की क्षमता को इतना विकसित कर लिया था कि बड़े से बड़े हथौड़े, भारी वजनी लकड़ी के लट्ठे, हाथी, तोप के गोले उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। सैनफ्रांसिस्को के 6 भारी भरकम पहलवान घूँसे मारते−मारते थक गये किन्तु रिचर्ड ऐसे बैठा रहा जैसे उसकी मालिश की जा रही है। 1964 में 100 पौण्ड वजन तक के गोले का अभ्यास था किन्तु 1966 में उसने एक प्रदर्शन में तोप के मुँहाने के सामने खड़े होकर 150 पौण्ड वजन का गोला दगवाया किन्तु टेबल−टेनिस की गेंद की तरह गोला छिटककर दूर जा गिरा और रिचर्ड अविचलित खड़ा रहा। इस घटना के बाद वो “इस्पात का आदमी” कहा जाने लगा। रिचर्ड को यह विद्या कहाँ से हाथ लगी इसके उत्तर में उसने बताया कि सन् 1924-25 में हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयाग, वाराणसी गया जहाँ भारतीय योगियों के संपर्क में आया उन्होंने जो योग साधनाएँ बताई यह उसका ही परिणाम था।
गुन्नार हैमण्डसन् आइसलैण्ड दीप समूह के क्षेत्र में समुद्री डाकुओं का सरदार था। लड़ते समय उन दिनों लोहे के रक्षा कवच पहनने का रिवाज था। वह भी उस भारी परिधान को समय−समय पर धारण करता। इस वजन से लदा होने पर भी वह खड़े आदमी को छलाँग लगाकर पार जा सकता था। इतना ही नहीं वह उल्टी छलाँग भी इतनी ही ऊँची पीठ की दिशा में भी लगा सकता था। पीठ पीछे खड़े हुए आदमी को भी उल्टी छलाँग लगाकर पार करने में उसे कोई कठिनाई नहीं होती थी।
बेल्जियम का राजा रोमैन्सन पंचम युद्ध के समय लोहे का कवच पहनता था जो प्रायः चालीस पौण्ड भारी था। वह कवच पहने जमीन से उछलकर ऊँचे कद के घोड़े पर सवार होता था। सहारा लेकर जीन पर वह कभी चढ़ा ही नहीं।
जर्मनी का भीमकाय मैक्ससिक वजन उठाने की कला में अपने समय का दैत्य माना जाता था। वह स्वयं तो 147 पौण्ड भारी था। पर 200 पौण्ड भारी वजन को आसानी से उठाकर दिखा देता था। एक प्रदर्शन में 200 पौण्ड भारी मनुष्य को अपने सिर से ऊँचा उठाकर दिखाया। यह प्रदर्शन एक बार नहीं पूरे सोलह बार उसने एक हाथ से किया। दूसरे हाथ में उसने पानी से लबालब भरा गिलास थामा और दिखाया कि एक हाथ से वजन उठाने में उसे कुछ भी असाधारण कठिनाई नहीं उठानी पड़ती है। यदि ऐसा होता तो दूसरे हाथ के लबालब भरे गिलास का कुछ बूँद पानी तो फैलता।
इंग्लैण्ड में भी एक ऐसी महिला जन्मी थी, जिसके शरीर पर ज्वलनशील पदार्थों का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता था। ‘नाइट्रिक एसिड’ को कुछ देर मुँह में रखकर जब उसने एक लोहे पर थूका तो उसमें लपटें निकलने लगीं। उबलते तेल का मुँह में रखे रहना, पिघले मोम को पानी की तरह मुँह में रखकर ऊपर से सील करवा देना, उबलते जस्ते को मुँह में डालकर उसे सिक्के के रूप में बदल देना, उसके लिए नितांत आसान था। उसके विविध ऐसे प्रदर्शनों से यह सिद्ध हो गया था कि उसका शरीर एकदम ज्वलनशील नहीं है, न ही ज्वलनशीलता का उस पर किंचित प्रभाव पड़ता है।
प्रस्तुत उदाहरण मनुष्य में प्रसुप्त दैत्योपम क्षमताओं की झांकी दिखाते हैं। अपनी कमजोरी पर निरंतर रोने कलपने वाले मनुष्य ये प्रेरणा देते हैं व प्रामाणित करते हैं कि अभ्यास से सामान्य-सी काया में अप्रतिम सामर्थ्य का जखीरा एकत्र किया जा सकता है।
दुनिया के साथ अपना ऐसे रिश्ता बनाओ जैसा उसका तुम्हारे साथ है।
रहस्यवाद के परे अनेक दुनियाँ हैं, जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते। सौंदर्यपरक, नीति परक, सत्ता व अमरता के बारे में हमारी जानकारी नगण्य है। पदार्थ दुनिया में ही कुछ शताब्दियों में बहुत उन्नति हुई है, जिनका हम अनुमान भी नहीं लगा पाते। संचार और आवागमन, अणु और परमाणु, रेडियो और टेलीविजन, आधुनिक उद्योग और कारखाने आदि क्षेत्रों में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। भविष्य में एक ऐसा अवसर होगा, जब पदार्थ जगत में और कोई उन्नति करने की गुञ्जाइश नहीं रहेगी। तब हम मन और अन्तर्शक्ति (इनर सेल्फ) के रहस्यों का पता लगाने में लग सकेंगे।
इससे जीवन के उद्देश्य एवं सफलताएँ, अमरता, अन्तःविकास आदि रहस्यवादी घटनाओं को मनुष्य ठीक से समझ सकेगा और विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान एवं सम्पूर्ण क्षमताओं का उपयोग अपने दैनिक क्रिया−कलापों में करेगा। तब विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान का उपयोग सम्पूर्ण मानव करेंगे। यह ऐसी आश्चर्यजनक उन्नति होगी, जिसकी आज का भौतिकवाद कल्पना भी नहीं कर सकता।
दार्शनिक स्टेसी के अनुसार अनेक लोगों ने इस तरह के आश्चर्यजनक अनुभव पाये हैं। इससे उस सर्वोच्च शक्ति से आने वाले समस्त विचारों, अच्छाइयों, नवीनताओं और सत्य से मनुष्य जाने−अनजाने परिचित होता है एवं उसका लाभ समस्त विश्व को वह देता है। रहस्यवाद का यह भी एक स्वरूप है, जो किसी के अभ्यास में अचानक आ जाता है और किसी को कठिन प्रयास करने पर यह क्षणिक बोध ही सारे कठिनाइयों का हल बतला देता है, जो मनुष्य को आजीवन प्रेरित करता है। निश्चय ही एक अनन्त महिमा और शक्ति का विश्व हमारे ज्ञान के परे है, जहाँ से वह समय पर हमें असीम ज्ञान, प्रकाश एवं शक्ति प्रदान करता है।
स्टेसी का कथन है कि इस ज्ञान से ही मानव जाति पूर्ण होगी और वास्तविक आनन्द प्राप्त करेगी, जो आज के पदार्थ जगत के सुखों से अनन्त गुना मूल्यवान व हितकर होगा। यह बौद्ध धर्म के निर्वाण (अमरता) के निकट का ज्ञान होगा, जो मन और आत्मा के परिष्कार से प्राप्त होता है। मनुष्य जब जीवन और जीवन देने वाले का महत्व समझ लेता है, तब वह अमरत्व को प्राप्त करता है। इस समय वह भौतिक नियमों से नहीं बँधा रहता और आत्मानुशासन के अनुसार चलता है। यही नया विश्व मनुष्य को खुशहाल रखेगा और मुक्ति दिलायेगा।
चेतना हमारे भौतिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती है, अतः हम उसे आज दैनन्दिन जीवन से अलग नहीं कर सकते। परन्तु एक समय आवेगा, जब वह सर्वोच्च शक्ति के सर्वोच्च रहस्यों को जान लेगा, तब यह चेतना बिलकुल बदली हुई होगी। तब उसे ईश्वर के सत्य शिव एवं सुन्दर स्वरूप का बोध होगा। यह ज्ञान असीम, अव्यक्त एवं पूर्णता आनन्ददायक है। इसमें ओजस्विता और आत्म समर्पण के भाव होते हैं। समय और दूरी से परे यह ज्ञान हमें इस नश्वर जगत की कठिनाइयों एवं संघर्षों से ऊपर उठाता है। यह अनुभव क्षणिक होता है और हमें आकर्षित करता है। इसे देर तक देखने की इच्छा होती है। ऐसी अनुभूतियाँ हमारे ऋषि गणों की हैं।
बड़े−बड़े रहस्यवादी ही इन अनुभवों को देर तक ग्रहण कर सकते हैं और ये सर्वोच्च आनन्ददायक एवं रहस्यवादी अनुभव ध्यानयोग के अभ्यास के कारण उनके वश में होते हैं। ब्रिटिश दर्शन शास्त्री सी. ई. एम. जोड़ के अनुसार ये आनन्ददायक अनुभूतियाँ परम सत्य (ईश्वर) को व्यक्त करती हैं। इसी से मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। यही है चेतना का वह रहस्यवाद जिसके लिए मनुष्य अनादि काल से भटक रहा है।
समृद्धि का एक पक्ष है धन, बल, यश, पद आदि बड़प्पन सूचक वैभव, जो परिस्थितिवश हस्तगत होते हैं। यह सभी ऐसे हैं जिनमें संयोग या सुयोग मुख्य है। यह किसे मिले किसे न मिले, इसका सुयोग पूर्णतया अपने हाथ नहीं है। ये हर प्रकार की सफलता, योग्यता, परिश्रम और चतुरता से सम्बन्धित है। किन्तु बहुत बार ऐसा भी होते देखा गया है कि गुणों के अभाव में भी वंश परम्परा के कारण लोग इन्हें हस्तगत कर लेते हैं। उत्तराधिकार में कइयों को बिना परिश्रम किये भी वैभव हस्तगत हो जाता है। लाटरी खुलने, दबा खजाना हाथ लगने, दहेज जैसे संयोगों से गरीबी−अमीरी में बदल जाती है। साथियों का श्रेय अपने पल्ले बँध जाता है।
किन्तु एक समृद्धि ऐसी है जो धनवान न होने पर भी अपने हाथ लग सकती है और इतनी कीमती होती है जिसे अमारी से किसी प्रकार कम नहीं आँका जा सकता। यह है गुण, कर्म, स्वभाव की स्व उपार्जित सम्पदा।
शिष्टाचार, मधुर व्यवहार, मीठी वाणी मनुष्य का स्व उपार्जित गुण है। इसके सहारे दूसरे अपने बन जाते हैं। कटुता के प्रसंग सामने होने पर भी नम्रता के सहारे जलती आग को ठण्डा किया जा सकता है। विरोधियों का काम नरम हो सकता है। विरोधी सहयोगी बन सकते हैं। यह विनयशीलता का दबाव ऐसा है जिसका प्रहार सहन करने में प्रतिपक्षी में भी ताकत नहीं होती। यह गुण दैवी गुण है। निजी सुसंस्कारिता के सहारे निरन्तर की साधना से ही अर्जित किया जा सकता है। सिद्धियों का यह एक बड़ा पक्ष है।
स्वभाव में सादगी एवं सज्जनता का समावेश ऐसी विशेषता है जिस एक पूँजी से राजा, सेठों से बढ़कर सम्मान मिल सकता है। गाँधी जी आधी धोती और आधा दुपट्टा पहनते थे पर उतने भर से जो बड़प्पन उन्हें मिलता था वह रेशमी मखमली पोशाक पहनने पर भी नहीं मिल सकता। बिछाने को चटाई, लिखने को सरकंडे की कलम आदि सस्ते और स्वल्प उपकरण जहाँ मितव्ययिता का लाभ देते थे वहाँ आन्तरिक बड़प्पन का भी प्रकटीकरण करते थे।
कर्मचारियों की कमी न होने पर भी आध्यात्मिक कर्मशील निजी कर्म को अपने हाथ से ही करते हैं। इससे समय अधिक खर्च होने या श्रेय लगने की हानि दिखाई पड़ती है वहाँ यह प्रतीत भी होता है कि व्यक्ति कितना नम्र और स्वावलम्बी है। ऐसी आदतें मनुष्य को जहाँ अनेकों बुराइयों से बचा लेती है वहाँ जन साधारण की दृष्टि में उच्चस्तरीय सम्मान भी प्रदान करती है। छोटे लोग अपना बड़प्पन दिखाने के लिए ठाठ−बाट बनाते हैं। इस पर भी अपने से अधिक ठाठ−बाट वाले के सामने अपनी हेटी अनुभव करते हैं। जबकि विनयशील व्यक्ति अनायास ही बड़प्पन अर्जित कर लेते हैं।
महामानवों द्वारा जो भी परिश्रम किया जाता है वह परमार्थ के लिए होता है। उस परमार्थ में कितनों का ही भला होता है और साथ ही एक परम्परा बनती है जिसे उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए अनेकों बार अनेकों के सामने प्रस्तुत किया जाता रहता है। उन उदाहरणों से भी कितनों को ही अपने लिए परमार्थ पथ पर चलने का मार्ग मिलता है।
साँसारिक सफलताएँ प्राप्त करने पर उनकी रखवाली का नया भार आता है जो बड़ा कष्टसाध्य होता है इसके अतिरिक्त अनेकों ईर्ष्यालु उत्पन्न हो जाते हैं और यश को अपयश में बदलने में कुछ उठा नहीं रखते। इसके विपरीत जिनके भीतर सज्जनता है उनके ईर्ष्यालु कोई होते नहीं। होते हैं तो भी प्रशंसक बन जाते हैं। आन्तरिक सिद्धियाँ कितनी बहुमूल्य हैं इसे अनुभव से ही जाना जा सकता है।
अपने ऊपर से विश्वास खो बैठने की मनःस्थिति को ‘आत्महीनता’ “इन्फीरियॉरिटी काँम्पलेक्स” कहते हैं। इसमें कोई मस्तिष्कीय विकृति नहीं होती। इसे कोई रोग भी नहीं कहा जा सकता। यह किसी कारण से आरम्भ होते-होते आत्म-विश्वास गँवा बैठने की आदत भर है।
इस आदत का प्रमुख लक्षण अपने आप को तुच्छ−हीन−असमर्थ−उपेक्षित−पराजित माना है। ऐसी दशा में व्यक्ति दूसरों से शर्माता है और उनसे पीछा छुड़ाने को मन होता है और कहीं ऐसी जगह छुपने का मन करता है जहाँ दूसरे लोग देखें नहीं। देखें तो वार्त्तालाप न करें। उसे एक प्रकार का डर-सा लगता है। यह डर किस बात का? कोई मारेगा या त्रास देगा ऐसा भय तो नहीं होता। पर इतना जरूर होता है कि अपने ऊपर से भरोसा उठ जाता है और लगता है कि दूसरों से संपर्क साधने पर या तो निन्दा होगी या कुछ ऐसा बन पड़ेगा जिसका अर्थ होता है पराजित या अपमानित होना।
वस्तुतः ऐसी कोई बात नहीं होती कि दूसरे लोग बुरा इरादा रखते हों। द्वेष मानते हों या गिराने डराने के लिए मिले हों पर दूसरों के साथ मिलने−जुलने आत्मीयता विकसित करने की सामर्थ्य भीतर से टूट जाती है तो मन की बात किसी के सामने प्रकट करने की हिम्मत नहीं रहती। हौसला पस्त हो जाता है और मिलने पर यही डर बना रहता है कि न जाने कोई क्या पूछ बैठ? उसका उत्तर अपने से बने या नहीं? कुछ उत्तर दिया जाय तो उपहास या विरोध तो न होने लगे?
यों अकारण कोई किसी से लड़ता नहीं, और न तिरस्कार की दृष्टि से मिलता-जुलता ही है। सभी को विचारों का आदान−प्रदान करने की−अपनी कहने दूसरे की सुनने की इच्छा होती है क्योंकि यह मनोरंजन का सुगम और इच्छा तरीका है। पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि सामने वाले भी मिलनसारी हों। डडडडड अकारण दोषी की तरह झेंपता झिझकता न हो। अन्यथा उपेक्षा दिखाने पर−दबे−दबे−धीमे−धीमे शब्दों में कुछ उत्तर देने में, अपनी ओर से कुछ वार्तालाप न करने से दूसरा आदमी भी खीजता नहीं तो कम से कम इतना तो करता ही है कि लोकाचार की सामान्य वार्ता करने के उपरान्त अपना मुख मोड़ ले और दूसरे किसी से बात करने लगे। यह स्वाभाविक भी है। पर वह झेंपू व्यक्ति इसे भी अपनी उपेक्षा या पराजय मानता है और मिलन पर कोई प्रसन्नता व्यक्त नहीं करता।
देहाती परम्परा के अनुसार नव वधुओं को कुछ दिन तक घूँघट निकाल कर चुपचाप किसी कोने में पीठ फेर कर बैठा रहना पड़ता है। कुछ कहना हो तो इतने धीमे शब्दों में अति संक्षेप में या इशारे से अपनी बात कहती हैं। पुरातन पंथी वृद्धाएँ इस संकोचशीलता को सराहती भी हैं और ऊँचे कुल खानदान की बात कर उसे सराहती भी है। कई पुरुष भी ऐसी ही मनःस्थिति के होते हैं संकोचशील या डरपोक। इससे सर्वत्र अजनबी वातावरण ही दिखाते और परिचित भी अपरिचित जैसे लगते हैं और खुलकर वार्त्तालाप करते हुए उन्हें संकोच सताता है। अपनी व्यथा एवं समस्या तक मुँह खोलकर कह नहीं पाते फिर दूसरों का परामर्श या समाधान प्राप्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
आमतौर से अशिक्षित महिलाओं में यह दोष उन क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है जहाँ घूँघट पर्दे का रिवाज अधिक होता है। वे घुटती रहती हैं पर अपनी कठिनाइयों को कह नहीं पातीं। लगाये गये दोषारोपणों को भी निर्दोष होते हुए सुनती रहती हैं। उत्पीड़न शोषण भी सहती हैं पर आँसू बहाने के और चुप रहने के अतिरिक्त और कुछ कह नहीं पाती। चुप रहना भी अर्ध स्वीकृति मानी जाती है जहाँ दोषारोपण पर सर्वथा चुप रहना−शालीनता का चिन्ह माना जाता है। वहाँ उससे यह भी प्रकट होता है कि आक्षेप सही है अन्यथा सफाई क्यों नहीं दी गई। ऐसी महिलाओं पर गुण्डे बदमाश भी घात लगाते और छेड़खानी करने में नहीं चूकते क्योंकि उन्हें यह भय नहीं रहना कि विरोध का सामना करना पड़ेगा। असहाय भेड़ बकरियों की तरह हर कोई उन्हें सताने को बैठा रहता है।
ठीक यही बात पुरुषों के सम्बन्ध में भी है। कोई चापलूस उन्हें आध्यात्मिक, दार्शनिक सज्जन, गंभीर आदि भी कह सकते हैं। पर असल में उन्हें मूर्ख, प्रतिभाहीन और अयोग्य ही समझा जाता है। निरर्थक वाचालता अपनाने वाले भी अपने मूल्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की आँखों में गिरा लेते हैं पर यह भी स्पष्ट है, डरपोक और अनावश्यक संकोचशील अपनी योग्यता में कमी होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं और जहाँ जाते हैं वहीं घाटा उठाते हैं। असामाजिक−गैर मिलनसार व्यक्तियों से कोई प्रसन्न नहीं रहता। उन पर दुराव का दोष लगाता है और चाहते हुए भी कुछ परामर्श या सहयोग दे सकने की स्थिति तक नहीं पहुँच पाता। इस प्रकार यह आदत मनुष्य को पग−पग पर नीचा दिखाने वाली ही सिद्ध होती है। ऐसे लोग जीवन में कभी महत्वपूर्ण सफलता अर्जित नहीं कर सकते। भले ही वे भाग्य को, समय को या सम्बन्धियों को इसके लिए दोषी ठहराते रहें। अस्तु जिन्हें भी इस व्यथा ने घेर लिया हो उन्हें इसके दुष्परिणाम समझने चाहिए और धीरे−धीरे मिलनसारी की−वार्त्तालाप की हँसने−हँसाने की आदत डालनी चाहिए। अपनी कहने और दूसरे की सुनने वाले सहज ही अपने मित्र बढ़ा लेते हैं और शत्रुता की लकीरों को धोकर सहज ही साफ कर देते हैं।
उससे अगला चरण है− भयाक्रान्त रहने का। इसकी मानसिक रोगों में भी गणना होती है और उपचार के लिए चिकित्सकों, मनोविज्ञानियों तथा भूत झाड़ने वाले ओझाओं का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। इस भयाक्रान्त मनःस्थिति को चिकित्सकों की भाषा में ‘फोबिया’ कहते हैं। सनक की तुलना अधिक कष्टप्रद मानते हैं। सनकी व्यक्ति कल्पना करता है और बिना प्रमाण की−खोजबीन की आवश्यकता समझे अशुभ मान्यताएँ गढ़ लेता है और उसी दुराग्रह के कारण अपना और दूसरों का अनर्थ करता है। उन पर किसी के समझाने का भी असर नहीं पड़ता। ऐसे लोगों की अर्ध विक्षिप्तों में गणना होती है। सनकी लोग उन्मादियों की तरह बिना आगा−पीछा सोचे कुछ भी भला−बुरा कर सकते हैं। वे किसी की बात पर ऐसा भरोसा भी कर सकते हैं जैसा कि अन्ध−विश्वासी करते हैं। आवेश उतरने पर उन्हें पछताते−शिर धुनते देखा गया है।
“फोबिया” भयाक्रान्त मनःस्थिति के रोगी हर समय डरते रहते हैं और कारण न होने पर भी कल्पना के सहारे गढ़, लेते हैं। ऐसे लोग वयस्क होते हुए भी अन्धेरे में उठकर पेशाब तक नहीं जा सकते। चूहों की खट−पट उन्हें चोरों की सेंध लगाने जैसी प्रतीत होती है। झुरमुट या पेड़ की हिलती हुई डालियाँ भूत चुड़ैलों जैसी लगती हैं। ऐसे लोग ज्योतिषियों के चंगुल में आसानी से फँस जाते हैं। डर का लाभ उठाकर ग्रह शान्ति करने वाले या भूत भगाने वाले उनकी उलटे उस्तरे से हजामत बनाते रहते हैं।
भयाक्रांत के मन में निरन्तर आक्रमण, प्रतिशोध और विश्वासघात छाया रहता है वे अकारण अपना जीवन भार बना लेते हैं और मित्रों पर भी शत्रुओं जैसे आरोप लगाते हैं। भविष्य उन्हें कठिनाइयों और विपत्तियों से भरा हुआ दिखता है।
इस मनःस्थिति को अपने भीतर विवेकशीलता, यथार्थवादिता, साहसिकता अपनाकर दूर किया जा सकता है। यह कार्य भले ही स्वयं का लिया जाय या किसी विचारशील का आश्वासन प्रोत्साहन उपलब्ध कर लिया जाय।
भीड़ के पीछे मत भागो। उनका साथ पकड़ो जो अपनी नाव में बिठाकर पार लगा सकते हैं। जिनने वर्चस्व पाया है, वे ही तुम्हें दिला सकते हैं।
शारीरिक रोगों के लक्षण प्रकट दिखते हैं और रोगी अपनी स्थिति का वर्णन स्वयं भी कर देता है तदनुसार चिकित्सकों के लिए उनका उपचार करना बहुत कठिन नहीं रहता।
कठिनाई उन मानसिक रोगों की है जो विशेषतया शिक्षित और सम्पन्न देशों में आँधी तूफान की तरह बढ़ रहे हैं। कठिनाई यह है कि व्यथा ग्रस्त अपने को रोगी नहीं मानता और जिस विपन्नता से घिरा होता है, उसका पता पारिवारिक तथा सम्बद्ध लोगों द्वारा बताये हुए लक्षणों में चलता है। जो लोग उन्मादी या विक्षिप्त होते हैं उनकी अस्त−व्यस्त हरकतें तो प्रकट होती हैं। उससे सम्बद्ध लोग परेशान रहते हैं और वह स्वयं दूसरों से नहीं अपने आप से भी परेशान रहता है। इस स्थिति में आवेश छाया रहता है और दोषारोपण से लेकर अपशब्द कहने, सन्देहग्रस्त एवं आशंकाओं से घिरा रहता है। वस्तुस्थिति की अपेक्षा ऐसी कल्पनाएँ गढ़ लेता है जो उसे इस प्रकार हैरान करती है मानो उसे सचमुच ही किसी शत्रु ने या विपत्ति ने घेर रखा हो। ऐसे व्यक्ति अपने सामान्य काम−काज ठीक तरह नहीं कर पाते फलतः आर्थिक कठिनाई भी घेर लेती है। साथी सहचर उसे विक्षिप्त समझकर आरम्भ में कुछ उपाय भी सोचते हैं पर पीछे कुछ परिणाम न निकलते देखकर उपेक्षा करने लगते हैं। ऐसी दशा में वह अपने को तिरस्कृत भी अनुभव करता है और दोष अपना न देखकर दूसरों के ही सिर मढ़ता है। इस स्थिति में विग्रह का एक नया सिलसिला चल पड़ता है।
जिनमें उन्माद के लक्षण प्रत्यक्ष दिख पड़ते हैं उन्हें मनोरोग चिकित्सालयों में या तो स्वयं जाना पड़ता है या उन्हें वहाँ अपनों द्वारा ही धकेला खदेड़ा जाता है। जो अपने को सर्वथा एकाकी अनुभव करते हैं और अपने तथा समाज के लिए अभिशाप बन जाते हैं उन्हें सरकारी नियन्त्रण में लेकर कोई दुर्घटना खड़ी न कर देने से रोका जाता है।
नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार संसार के समृद्ध देशों में पगलाने की यह व्यथा तेजी से बढ़ रही है। उदाहरण के लिए अमेरिका का एक पर्यवेक्षण सामने है। मनोरोग चिकित्सालयों के आधार पर उस देश के वयस्कों में 20 प्रतिशत व्यक्ति विभिन्न जाति के मनोरोगों से ग्रसित हैं। इनमें से 15 प्रकार के रोगों का बाहुल्य है। ऐसे रोगियों की संख्या वहाँ 4 करोड़ तक जा पहुँची है। इसके अतिरिक्त 1 करोड़ 31 लाख वे हैं जिन्हें विक्षिप्त तो नहीं कहा जा सकता पर सनकी अवश्य हैं। सनकी का तात्पर्य है जन−साधारण की रीति−नीति छोड़कर चिन्तन एवं स्वभाव व्यवहार की ऐसी लकीर पकड़ लेना जो अटपटी मालूम होती है और उनसे संपर्क रखने में कोई भी कतराने लगता है। वे कर्मचारी हैं तो बॉस और बॉस हैं तो कर्मचारी भीतर ही भीतर कुढ़ते रहते हैं और पारस्परिक व्यवहार में कई बार खीज प्रकट करने लगते हैं, अवज्ञा भी।
इससे भी आगे बढ़कर स्त्री−बच्चों के साथ भी पटरी न खाने की बात है। घर को छोड़कर कहीं जंगल में तो नहीं बस सकते पर जिनके साथ रहते उन्हें निरन्तर शिकायतें करते, उलाहना देते या चें−चें करते देखा जाता है। जहाँ प्रेम और सहयोग न हो, एक−दूसरे का सम्मान न करें−कृतज्ञता प्रकट न करें एवं उपयोगिता अनुभव न करें वहाँ साथ रहते हुए भी सराय, प्लेट फार्म या जेल जैसा वातावरण रहता है। ज्यों−त्यों करके मजबूरी में गाड़ी धकेली जाती रहती है। एक खण्डित व्यक्तित्व समूचे परिवार की ही नहीं, साथियों एवं पड़ौसियों की भी नाक में दम कर देता है। ऐसे सनकी समुदाय की गणना तो ठीक तरह नहीं हो सकी है, पर समझा जाता है कि वे अस्पतालों में भर्ती होने वालों की तुलना में कम नहीं अधिक ही होंगे।
इसके बाद नशेबाजों का नम्बर आता है। ऐसे नशेबाज जो खुमारी में ढेरों समय तथा पैसा बर्बाद करते हैं। हलके नशेबाज वे हैं जो बीयर सिगरेट जैसे बहुप्रचलित नशे के आदी हैं। पर जो होश−हवास खो बैठते हैं और खुमारी की स्थिति में कुछ भी करने लगते हैं असल में उन्हीं को आपे से बाहर नशेबाज कहा जाता है। उनकी सूझ−बूझ एवं क्रिया शक्ति कुँठित हो जाती है। खुमारी उतरने के बाद वे अपने को बेहद थके एवं निराश असहाय अनुभव करते हैं। तब उन्हें नया और बड़ा डोज लेने की आवश्यकता पड़ती है। इन सभी वर्ग के अस्त-व्यस्त लोगों की क्षमता एवं उपयोगिता बेतरह कम हो जाती है यों गुजारे भर की का चलाऊ स्थिति में तो वे किसी प्रकार बने रहते हैं। बड़ी बात यह है कि एक खण्डित व्यक्तित्व का मनुष्य अनेक अन्यों को भी अपनी चपेट में ले लेता है और भले चंगों को अपने से मिलता−जुलता बना लेता है। यह स्थिति अमेरिका की ही नहीं फ्राँस, ब्रिटेन, इटली आदि की भी है। एशिया और अफ्रीका के देशों में भी अनेक लोग ऐसे हैं, पर उन्हें गरीबी, बेकारी आदि प्रत्यक्ष कारणों का शिकार कहकर क्षम्य भी ठहरा सकते हैं।
बढ़ते हुए मस्तिष्कीय विकृतियों के सम्बन्ध में कामुकता और सामाजिक वर्जनाओं का व्यतिरेक प्रमुख कारण है। मनोरंजनों की अनेक धाराएँ सिमट कर कामुकता के इर्द−गिर्द एकत्रित होती जाती हैं। मर्यादाएँ तोड़ने वाला एक व्यक्ति अनेकों को अपनी छूत लगा देता है। चरित्रवान लोग अपने जैसे चरित्रवान कितने बना सकते हैं यह कहना कठिन है, पर यह निश्चय है कि उच्छृंखलता के आदी लोग वैसा ही चस्का अपने संपर्क में आने वाले अनेकों को लगा देते हैं।
पारस्परिक सद्भाव के स्थान पर छल कपट की परिपाटी जब अपनाई जाती है। तो दुहरे व्यक्तित्व का सृजन होता है। कहना कुछ करना कुछ जैसे स्वभाव वाले दूसरों के लिए जितने हानिकारक होते हैं उससे कहीं अधिक अपना नुकसान करते हैं। अन्तर्द्वन्द की स्थिति में मनुष्य सही सोचने और सही नतीजे पर पहुँचने की स्थिति में नहीं रहता।
अपराधी स्तर के कुकृत्य करने में कुछ समय पूर्व आत्मा−परमात्मा से डरते थे। अपयश एवं सामाजिक भर्त्सना का भय खाते और इस कारण जो तिरस्कार असहयोग उपलब्ध होता था उससे डरते थे। पर अब उच्छृंखलता साहसिकता का पर्यायवाचक बनती जा रही है। इस मार्ग पर चल पड़ने वाले आरम्भ में मानसिक स्वास्थ्य गँवाते हैं और फिर शारीरिक दुर्बलता रुग्णता के शिकार भी बनते जाते हैं। अपराधी एकाकी रह जाता है। उसका सच्चा मित्र सहयोगी कोई नहीं रहता। अवसर पड़ने पर तथा कथित अपनों का आँखें फेर लेना, अक्सर ऐसे ही लोगों के सामने आता रहता है। जिसका अपने ऊपर से विश्वास उठ जाता है उसे अपना कोई सगा नहीं दिखता। हर घड़ी धोखा होने की आशंका बनी रहती है। इन्हीं सब बातों को मिलकर वह स्थिति बनती है जिसे तनाव कहते हैं। यह ऐसा कुचक्र है जिसमें फँस जाने पर निकलना कठिन होता है। आन्तरिक दृष्टि से अशान्त व्यक्ति के व्यवहार में ऐसी अवाँछनीयताएँ घुस पड़ती हैं जिनके कारण निरन्तर खीज रहने लगती है और वह प्रकारांतर से विक्षिप्तता के रूप में प्रकट होती है।
इस स्थिति में मनोरोग चिकित्सक कोई कारगर सहायता नहीं कर सकते। कारण एक ही है मानवी मर्यादाओं का उल्लंघन। इसलिए उपचार भी एक ही हो सकता है सज्जनता, शिष्टता एवं आदर्शवादिता का समुचित मात्रा में अवलम्बन।
गान्धी जी की अतृप्त कामना−
“कभी कभी यह आता है कि सब छोड़−छाड़ कर एकदम एकान्त में जाकर अपना प्रयोग चलाकर देखूँ तो? अपनी शान्ति और कल्याण साधने के लिए नहीं, किन्तु आत्म निरीक्षण के लिए, आत्मा की आवाज को अधिक स्पष्टता से सुनने के लिए, जगत के ही कल्याण का प्रतिक्षण विचार हो, और इस विचार की सहज−सिद्धि प्राप्त हो सके। तभी मेरा अहिंसा का प्रयोग सफल होगा। पूर्ण अहिंसक मनुष्य गुफा में बैठा हुआ भी जगत् को हिला सकता है।
सावित्री साधना और पंचकोश [यह धारावाहिक लेखमाला गुरुदेव की 2 वर्ष की एकान्त साधना के सार संक्षेप के रूप में एक वर्ष तक लगातार जारी रहेगी]
आद्य शक्ति के दो पक्ष हैं। एक ज्ञान, दूसरा विज्ञान। ज्ञान में चेतना, विचारणा, भावना, मान्यता एवं आकाँक्षा सन्निहित है। इसका निवास मनुष्य के अन्तराल में है। विज्ञान प्रकृति सम्पदा के विस्तार और इसके इच्छानुसार कार्यान्वित करने की विद्या को कहते हैं। ज्ञान मनुष्य की अन्तः चेतना में समाहित है और विज्ञान इस क्रिया−कौशल के रूप में समझा जाता है जिससे पदार्थों को अपनी आवश्यकता के अनुरूप ढाला जा सके। यह समूचा विश्व ब्रह्माण्ड और शरीर पदार्थ है। इसको आवश्यकतानुरूप ढालने के कौशल का विकास विज्ञान के रूप में हुआ है। सृष्टा का ज्ञान और प्रकृति का वैभव दोनों मिल−जुलकर इस विश्व की व्यवस्था को बनाते और उसे गतिशील रखते हैं।
पौराणिक गाथा में यह प्रसंग इस प्रकार आता है कि सृष्टि सृजेता ब्रह्मा की दो पत्नियाँ थीं। एक गायत्री दूसरी सावित्री। गायत्री ज्ञान की देवी और सावित्री विज्ञान की अधिष्ठात्री। मनुष्य का काय कलेवर पदार्थ है इसलिए उसकी सत्ता को सावित्री के अंतर्गत लिया जाता है।
ज्ञान मार्ग पर बढ़ने से मनुष्य संयम और संवर्धन का मार्ग प्राप्त करता है। प्रसन्न रहने और प्रेरणा देने की राह प्राप्त करता है। आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार करता है। जीवन लक्ष्य की पूर्णता तक पहुँचता है। महामानव, ऋषि, देवात्मा, अवतार की श्रेणी में जा पहुँचता है। प्रत्यक्ष क्षेत्र में आगे बढ़ता है और परोक्ष में ऊँचा उठता है। ज्ञान की गायत्री की गरिमा ऐसी ही है।
विज्ञान द्वारा शारीरिक क्षमता का सही सदुपयोग किया जाता है। काय संरचना में छिपे रहस्यमय केन्द्रों को प्रसुप्त स्थिति से उबारकर जागृत स्थिति में लाकर उन्हें असाधारण रूप से सशक्त बनाया जाता है। लोग व्यवहार में काम आने वाले अनेक कौशलों में विज्ञान ही प्रवीण बनाता है। यही है सावित्री का स्वरूप डडडड कार्यान्वयन।
गायत्री साधना में आत्मशोधन प्रधान है। आत्म-सत्ता पर चढ़े जन्म−जन्मान्तरों के कुसंस्कारों का− जब संपर्क से मिलने वाले दोष दुर्गुणों का निराकरण किया जाता है। मानवी गरिमा के अनुरूप जिस समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी की आवश्यकता पड़ती है उन्हें अर्जित किया जाता है। बुद्धि में दूरदर्शी विवेकशीलता−महाप्रज्ञा का−समावेश होता है। डडडड सब विशेषताओं के कारण मनुष्य इसी जीवन में देवोपम स्थिति को प्राप्त करता है। अपनी रीति−नीति और दिशाधारा ऐसी बनती है जिसमें इसी जीवन में देवत्व जैसी गरिमा उपलब्ध हो सके, स्वयं तरे और दूसरों को अपने कन्धे पर बिठाकर पार करा सके।
सावित्री साधना से शरीरगत अलौकिक शक्तियों को प्रसुप्ति से ऊँचा उठाकर जागृति में लाया जाता है और यह जागरण इतना महत्वपूर्ण सिद्ध होता है कि उसके सहारे दृश्य जगत को अनुकूल बनाया जा सके। इन उपलब्धियों को सिद्धियाँ कहते हैं। सौर मण्डल की समस्त क्षमताएँ सूक्ष्म रूप से परमाणु में विद्यमान है। परमाणु की गतिविधियाँ और क्षमताएँ संक्षिप्त रूप में वही होती हैं जो परमाणु में पाई जाती हैं। ब्रह्माण्ड का समस्त समीकरण पिण्ड में विद्यमान है। किन्तु साधारणतया मनुष्य को इतनी ही स्वाभाविक क्षमता प्राप्त होती है कि अपनी जीवनचर्या की गाड़ी किसी प्रकार घसीट सके। इसके अतिरिक्त विश्व परिस्थितियों को मोड़ने मरोड़ने की आवश्यकता समझी जाती है तो उसे उस विज्ञान का आश्रय लेना पड़ता है, जिसे सावित्री कहते हैं।
विज्ञान के अनेक प्रयोजनों के लिए अनेकानेक यन्त्र उपकरण बनाये और आविष्कार किये हैं। उन सभी की मूल सत्ता काया में सन्निहित अनेकों सूक्ष्म केन्द्रों में समाहित होती है। वह चाहे तो प्रयत्नपूर्वक उन्हें सक्रिय सक्षम कर सकता है और काया को ऐसी प्रयोगशाला में परिणित कर सकता है और काया को ऐसी प्रयोगशाला में परिणित कर सकता है जिसमें वैज्ञानिकों द्वारा विनिर्मित सभी यन्त्र उपकरणों की सत्ता उभर सके और वे ही कार्य कर सके जो विज्ञान क्षेत्र के मूर्धन्य अपने शोध प्रयासों से सम्पन्न करते हैं।
आद्य शक्ति की दो प्रकार की प्रतिमाएँ पाई जाती हैं। इनमें एक मुख, दो भुजा, हाथ में कमण्डलु, माला, वाहन हंस−यह ब्राह्मी शक्ति है। इसे गायत्री कहते हैं। एक दूसरे प्रकार की छवि पंचमुखी प्रतिमा या चित्र रूप में मिलती है। इसे सावित्री कहते हैं।
गायत्री का वाहन हंस है। हंस अर्थात्− राज हंस, परमहंस, नीर−क्षीर विवेक कर सकने वाला, मोती चुगने, कीड़े आदि न खाने वाला व्रतशील। माला से उपासना और पुस्तक से स्वाध्याय का−सत्संग का−मनन चिन्तन का भाव है। मातृ शक्ति की यही प्रतिभा है। मानवी गरिमा की वह अधिष्ठात्री है, इसलिए उसकी एक दिशा धारा, एक प्रतिपादन के रूप में एक मुख है।
सावित्री का वाहन कमल है। कमल अर्थात् प्रसन्नता। सुख साधनों की बहुलता। उसके पाँच मुख हैं। शरीर पाँच तत्वों का बना है और उसका मानस चेतन पाँच प्राणों के समन्वय से बना है। सावित्री की दस भुजाएँ अर्थात् काया में सन्निहित दसों इन्द्रिय। इन्द्रिय शक्ति से ही काया अपने विभिन्न कार्य सम्पन्न करती है। आयुधों में भी ऐसे यन्त्र उपकरणों का चित्रण है जो लौकिक प्रगति एवं संघर्षशीलता के लिए काम आते हैं।
गायत्री प्रधान है क्योंकि सद्ज्ञान हस्तगत होने से मनुष्य ऐसा व्यक्तित्व उपलब्ध करता है जो यदि सम्पदा क्षेत्र की ओर ध्यान दे तो अपने या दूसरों के लिए विपुल वैभव उपलब्ध कर सकता है। किन्तु सावित्री का क्षेत्र विज्ञान की सीमा साँसारिक उपलब्धियों तक सीमित है। आवश्यक नहीं कि वैभव सम्पन्न व्यक्ति सद्ज्ञान का भी धनी हो। इसलिए उसे गौण माना गया है। व्यक्तित्व में आत्मा प्रमुख है और शरीर गौण। इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टिकोण से गायत्री को प्रमुख और सावित्री को गौण माना जाता रहा है। फिर भी उपास्य दोनों हैं। दोनों ही की अपने-अपने स्थान पर आवश्यकता रहती है। इसलिए समन्वयवादी साधक दोनों का ही प्रयोग करते और यथासमय उनकी क्षमताओं को कार्यान्वित करते हैं।
बाल्मीकि रामायण में प्रसंग आता है कि विश्वामित्र राम लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के बहाने अपने आश्रम में ले गये थे। वहाँ उन्हें बला और अतिबला विद्याएं सिखाई। यह दोनों सावित्री और गायत्री के ही दूसरे नाम हैं। एक के माध्यम से उन्होंने लंका में दुर्घर्ष असुरों को परास्त किया। दूसरी की शक्ति से उन्होंने सतयुग को त्रेता में वापस बुलाया। रामराज्य- धर्मराज्य की सतयुगी स्थापना की। इस प्रकार दोनों ही विद्याएं दो भिन्न प्रकार के प्रयोजनों में काम आईं और असाधारण प्रयोजनों की पूर्ति में सफल रहीं।
इन पंक्तियों में प्रधानतया सावित्री विज्ञान की चर्चा की जा रही है और बताया जा है कि उसके पाँच मुख शरीर रचना में− ब्रह्माण्ड के सृजन में प्रयुक्त हुए पाँच तत्व ये हैं−(1) पृथ्वी (2) जल (3) अग्नि (4) वायु (5) आकाश। इसी प्रकार मनःसंस्थान का सूत्र संचालन करने वाले पाँच प्राण हैं−(1) प्राण (2) अपान (3) ध्यान (4) उदान (5) समान। इन्हीं सबके समन्वय से मनुष्य जीवन की गाड़ी चलती है। इनमें सन्निहित रहस्यों को जाना और क्षमताओं को काम में लाया जा सके तो मनुष्य ऋद्धि−सिद्धियों का धनी हो सकता है।
पाँच की गणना में कई पक्ष आते हैं। पाँच देवता−(1) सूर्य (2) गणेश (3) ब्राह्मण (4) विष्णु (5) महेश। पंचरत्न प्रसिद्ध हैं। देवार्चन में पंचामृत का प्रयोग होता है। ज्योतिष का आधार पंचांग है। जड़ी−बूटियों में से अधिकांश के पाँचों अंग मूल, त्वक्, पत्र, पुष्प, फल ही काम में आते हैं। पाँच ज्ञानेंद्रियां, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विभूतियाँ, पाँच सम्पदाएँ प्रख्यात हैं। सावित्री साधना में पंचकोशों के अनावरण का विधान है। कुण्डलिनी जागरण में षट् चक्रों का वेधन करना होता है एवं कोश साधना में पाँच कोशों का। चक्रों और कोशों में राई रत्ती भर का अन्तर है। कुण्डलिनी जागरण, प्रचण्ड ज्वालमाल का प्रज्वलन है और पंचकोशी साधना में आवरणों को हटाते हुए शक्ति स्रोत तक पहुँचने का विधि−विधान। आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में छः और पाँच का मतभेद इसी प्रकरण से होता है। कुण्डलिनी का उद्भव मूलाधार से होता है। वह इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना मार्ग से होती हुई सहस्रार मस्तिष्क मध्य तक समाप्त हो जाती हैं। इस मेरुदण्ड मार्ग में पाँच चक्र ही पड़ते हैं। आज्ञाचक्र भ्रूमध्य भाग में है। वहाँ मेरुदण्ड का अधिकार क्षेत्र नहीं है। इस विवाद में ही षट्चक्र और पांच कोश की विसंगति हो गई है। दूसरे कुण्डलिनी हठयोग है, वह बिजली का खेल है। उसमें चूक पड़ने पर जोखिम उठानी पड़ सकती है। पर पंचकोश अनावरण सौम्य है। वह छिलके व कपड़े उतारने की तरह है। एक−एक करके कोट, जाकेट, कुत्ता स्वेटर, बनियान उतरते चले जाएँ तो इसमें समय भर लगेगा। किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका नहीं है। कुण्डलिनी आग, बारूद, बिजली, चुम्बक, रेडियम जैसे पदार्थों का कार्यान्वयन है। उसमें अधिक सतर्कता, तत्परता एवं अनुशासन की जरूरत है। जबकि केले के तने के परत उतरते जाने में, प्याज के छिलके हटाते जाने में किसी बड़ी प्रवीणता की आवश्यकता नहीं है।
आत्म−ज्योति के ऊपर पाँच आवरण दोष−दुर्गुणों के, कषाय कल्मषों के, कुसंस्कारों के चढ़े हुए हैं। उन्हें हटाते रहा जाय तो जो प्रकाश पहले धुँधला प्रतीत होता था, वही अब स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। यही आत्मदर्शन या ब्रह्म साक्षात्कार है। इस स्थिति तक पहुँचने के उपरान्त और कुछ करना शेष नहीं रह जाता।
पंचकोशों में (1) अन्नमय (2) प्राणमय (3) मनोमय (4) विज्ञानमय (5) आनन्दमय कोष की गणना होती है। इनके जागरण के लिए पाँच प्रकार की प्रत्यक्ष और परोक्ष साधनाएँ करनी पड़ती हैं।
अन्नमय कोश में आहार शुद्धि पर पूरा ध्यान दिया गया है ताकि उससे बनने वाला शरीर पवित्र और प्रखर बनता जाय। इसके लिए व्रत उपवासों का आश्रय लेना पड़ता है। सीमित और सात्विक आहार पर रहना पड़ता है। आसन−स्तर की व तीर्थयात्रा जैसी शरीर से सम्बन्धित साधना करनी पड़ती है। आसनों में इस प्रयोजन के लिए शवासन या शिथिलीकरण मुद्रा का अधिक महत्व है।
प्राणमय कोश में प्राणों का निग्रह नियन्त्रण मुख्य है। शारीरिक विद्युत को प्राण कहते हैं। इसके लिए संयम साधना करनी पड़ती है। इन्द्रिय निग्रह की कड़ाई करनी पड़ती है। शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य पालन करना पड़ता है। बहिर्मुखी प्रवृत्तियों को अन्तर्मुखी करना पड़ता है। प्राणायामों में से अपनी स्थिति के अनुरूप किसी प्राणायाम को चुनना होता है। इसके लिए प्राणाकर्षण प्राणायाम अधिक सरल और सुविधाजनक पड़ता है।
मनोमय कोश के अनावरण करने के लिए मन की एकाग्रता से सम्बन्धित साधनाओं की आवश्यकता पड़ती है। एकाग्रता साधन के लिए त्राटक साधना का विशेष महत्व है। उसमें मन की भाग-दौड़ को किसी एक केन्द्र पर केन्द्रित करना पड़ता है। चिन्तन की भगदड़ को पकड़कर एक खूँटे से बाँधना पड़ता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के अभ्यासों में भी मन रुकता है और एकाग्रता की स्थिति बढ़ती जाती है।
विज्ञानमय कोश के अंतर्गत विशेष ज्ञान, तत्व ज्ञान, आत्म-बोध की स्थिति अन्तःकरण में पैदा करनी पड़ती है। लोग अपने को शरीर मात्र समझते हैं और आजीवन उसी के लिए मरते खपते रहते हैं। इस दलदल में से निकलकर अपने शुद्ध स्वरूप का जीवन सम्पदा के स्वरूप एवं सदुपयोग पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। इसके लिए प्रातः उठते ही नया जीवन और सोते समय उसके अन्त का अभ्यास सर्वसुलभ है।
सोहम् साधना में आत्म-बोध का पुट है। नादयोग से ईश्वर का वाणी, पुकार, निर्देशन को सुनने का अवसर मिलता है। शरीर और आत्मा की विभिन्नता अनुभव करते हुए आत्मा के लिए क्या किया जाना चाहिए इस पर ध्यानस्थ होकर विचार करना होता है। तब संसार के पीछे दौड़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती। वरन् अपने को जागरूक प्रहरी मानकर दूसरों की सुरक्षा के लिए सतर्क करने वाला मार्गदर्शन करना पड़ता है।
आनन्दमय कोश में इस समस्त संसार को भगवान का विराट् स्वरूप मानते हुए उसे सुविकसित बनाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। परब्रह्म की सत्ता को अपने ब्रह्मरन्ध्र सहस्रार में प्रकाश ज्योति की तरह अनुभव करना पड़ता है। इस प्रयोजन के लिए खेचरी मुद्रा भी दिव्य रसास्वादन का अवसर प्रदान करती है। योग निद्रा अथवा समाधि अवस्था में भी अद्वैत भाव स्थापित करना पड़ता है। दिव्य चेतना के प्रति समर्पित होना पड़ता है। अपनी महत्वकाँक्षाओं को छोड़कर दिव्य चेतना के निर्देशन एवं अनुशासन का पालन करने के लिए तत्पर होना पड़ता है।
ये साधनाएँ यहाँ तो अपने सर्वसुलभ रूप में दी गयी हैं एवं सभी सुविधानुसार नियमित, समय निकालकर करनी होती हैं। फिर भी यह सन्देहास्पद रह जाता है कि कौन व्यक्ति किस स्तर की, कितनी देर किस क्रम से साधना करें। इससे ऊँचे स्तर की साधना के सोपान तो अत्यन्त रहस्यमय हैं। उनके लिए साधक की मनःस्थिति और परिस्थिति की जाँच पड़ताल करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य कोई अनुभवी एवं इस क्षेत्र का प्रवीण पारंगत व्यक्ति ही कर सकता है। इसलिए अन्य साधनाओं की भाँति पंचकोशी गायत्री साधना के लिए सावित्री विज्ञान का अध्यवसाय आरम्भ करने के लिए कुशल मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। रोगी की स्थिति देखकर जिस प्रकार चिकित्सक को उपचार का निर्धारण और परिवर्तन करना पड़ता है, उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र में परिशोधन और उत्कर्ष का प्रयोजन सिद्ध करने में उपयुक्त स्तर के मार्ग दर्शक की आवश्यकता पड़ती है। (क्रमशः)
तदित्य चोस्या सावित्री परमेषि प्रजापति सन्ध्ययोर्वेद विदुषी सप्त व्याहृति पूर्वकम्॥ −विष्णु स्मृति
अर्थात्− आदित्य की महाशक्ति सावित्री प्रजापति द्वारा उपासित है। उसे सन्ध्याकालों में सप्त व्याहृतियों समेत जपना चाहिए।
यम नचिकेता संवाद में प्राणाग्नि विद्या का निरूपण है। यम ने नचिकेता को अन्य कोई वरदान माँगने के लिए कहा। पर उसने इस रहस्य को जानकर ही अपना आग्रह पूरा किया। यह सावित्री और साधना से सम्बन्धित प्राण प्रकरण ही है। इसको पंचप्राण, सावित्री के पंचमुख कहते हैं। कुण्डलिनी जागरण रहस्य भी इसी प्राणाग्नि विद्या से संबंधित है।
एक मास के युग शिल्पी शिविर सम्बन्धी ज्ञातव्य
“प्रसन्नता की बात है कि परिजनों का उत्साह बना हुआ है एवं वे अधिक से अधिक संख्या में शान्ति−कुल के एक मास के सत्रों में प्रशिक्षण लेकर अपने−अपने क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक फैला रहे हैं। गत नवम्बर माह से एक और आकर्षण इसमें जोड़ दिया गया है। वह है फर्स्टएड एवं होम नर्सिंग का प्रशिक्षण। इसे निष्णात् चिकित्सकों द्वारा दिया जाएगा एवं एक माह में ही दोनों पाठ्यक्रम पूरे कर दिये जायेंगे। इंटरनेशनल रेडक्राँस एवं सेंटजॉन एम्बुलेन्स एसोसियेशन द्वारा मान्यता प्राप्त इस प्रशिक्षण का सभी को प्रमाण पत्र भी मिलेगा। जो लोग पहले आ चुके है पर इस विशेष शिक्षण से वंचित रहे हैं, वे पुनः इसके लिए आवेदन भेज सकते हैं।”
क्या एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभी को एक जैसी साधनाएँ बताई या कराई जा सकती हैं। इसका उत्तर ‘न’ में देना पड़ेगा। लम्बी तीर्थयात्रा में युवाओं के लिए लम्बी डगें भरते हुए जल्दी−जल्दी मार्ग तय कर सकना सरल है। पर यदि साथ में कोई बालक या वृद्ध हो तो उसकी क्षमता को देखते हुए सवारी का प्रबन्ध करना होगा अन्यथा एक जैसी गति अपनाने में बेचारे दुर्बलों का कचूमर निकल जाएगा।
एक मर्ज के सब मरीजों को एक जैसी दवा नहीं दी जा सकती। ज्वर आने पर दवा देते समय यह भी देखना होता है कि वह लू लगने से आया है अथवा ठण्ड लगने से निमोनिया जैसा है। बच्चों को, गर्भिणी को युवाओं को वृद्धों को उनकी क्षमता एवं स्थिति का ध्यान रखते हुए भिन्न औषधियों और भिन्न उपचारों का समावेश करता होता है। इसी सबके निरीक्षण परीक्षण के लिए चिकित्सक के परामर्श की आवश्यकता पड़ती है। यदि ऐसा न होता तो कोई भी मरीज किसी पुस्तक का पन्ना खोलकर ज्वर प्रकरण में से अपने लिए दवा चुन लिया करता।
धनी सब बनना चाहते हैं। लक्ष्य भले ही एक हो पर विभिन्न व्यक्तियों की योग्यता, परिस्थिति अनुभव एवं पूँजी का ध्यान रखते हुए ही बुद्धिमान यह परामर्श देते हैं कि किसे क्या व्यवसाय अपनाना चाहिए और उसका आरम्भ कहाँ से करके उसका विस्तार किन बातों का ध्यान रखते हुए करना चाहिए।
एक लाठी से जानवर तो हाँके जा सकते हैं। पर सब धान बाईस पसेरी के हिसाब से नहीं बिक सकते। कौन कितना पैसा लाया है और किसे किस स्तर के चावल चाहिए यह पूछताछ करने के हिसाब से तराजू पर बाट रखने और बोरियों के मुँह खोलने पड़ते हैं। बच्चों को खेलने के लिए हलके−फुलके खिलौने दिये जाते हैं ताकि वे उनकी भूल में कोई बड़ी जोखिम खड़ी न करें पर मजबूत पहलवानों के खेल के उपकरण भरी भरकम दिये जाते हैं ताकि उन्हें अपने पुरुषार्थ का काम सौंपा जा सके। घर के सभी सदस्यों को परिवार का अधिकार और कर्त्तव्य का निर्वाह आवश्यक बताया जाता है। पर काम सबको एक जैसे नहीं सौंपे जाते। उनके अनुभव और अभ्यास को ध्यान में रखते हुए इस सुपुर्दगी में अन्तर रखना पड़ता है।
ठीक यही बात साधना के सम्बन्ध में भी है। वह हर किसी के लिए एक जैसी नहीं हो सकती। जिसे आहार समय तक का अभ्यास नहीं, जो समय का अनुशासन का पाल नहीं सकता उसे सुलभ और हलकी−फुलकी साधना ही बताई जाती है। जिसमें लाभ भले ही अधिक न मिले पर हानि का खतरा तो नहीं। इसके विपरीत जिनने प्रारम्भिक साधना की कई कक्षाएँ उत्तीर्ण कर ली हैं उनके लिए अगले क्लास की बड़ी किताबें लानी पड़ती हैं। स्कूल भर की सभी कक्षाओं में छात्रों के स्तर का ध्यान न रखते हुए एक ही पुस्तक पढ़ाई जाने लगे तो इस व्यवस्था को−उपहासास्पद ही कहा जाएगा। अखाड़ों के उस्ताद अपने शागिर्दों को मौसम के अनुसार कसरतों में परिवर्तन करते रहते हैं। इस प्रकार के परिवर्तन या भेदभाव को अनुचित नहीं कहा जा सकता। साधक तो बालकों की तरह हठ करके एम. ए. की सुन्दर जिल्द वाली पुस्तक पढ़ने का भी आग्रह कर सकते हैं। पर उनका वह आग्रह जिस−जिस बहाने टालना ही पड़ता है। जो जितना वजन नहीं उठा सकता उसके ऊपर उतना कैसे लादा जाय। हाथी की अम्बारी गधे की पीठ पर लाद देना उसकी रीढ़ तोड़ देना है। इसी प्रकार हाथी के ऊपर गधे का पलान बाँधा जाय तो उसमें, हाथी, महावत और मालिक का उपहास ही उपहास है।
यह चर्चा यहाँ इसलिए की जा रही है कि देखा−देखी किसी की भी नकल के रूप में कुछ भी साधन अपनाने के लिए आग्रह नहीं करना चाहिए। अपनी दिशाधारा, मनःस्थिति का निरीक्षण परीक्षण किसी अनुभवी से कराने के उपरान्त ऐसा साधना पथ अपनाना चाहिए, जिस पर चलते हुए सुविधापूर्वक लक्ष तक पहुँचा जा सके।
अभी कुछ ही दिन की बात है बिजनौर नैनीताल सीमा पर बसे आसपुर गाँव का एक 22 वर्षीय युवक हंसराज, साधु महात्माओं की संगति में रहा करता था। उससे किसी योगी से प्राण ब्रह्माण्ड में चढ़ाने की क्रिया सीखी पर उतारने की बात भूल गया। फलतः उसकी मृत्यु हो गई। वह कह गया था कि घर वाले चिन्ता न करें मैं जल्दी ही जी पड़ूंगा। कई दिन लाश प्रतीक्षा में रखी रही पर जब शरीर सड़ने लगा तो उसकी अंत्येष्टि किया करनी पड़ी।
यह एक उदाहरण है। योगाभ्यास में मात्र लाभ ही लाभ नहीं है उसकी विलक्षण क्रियाओं में खतरे भी कम नहीं हैं। इसलिए खतरे वाले आपरेशन अस्पताल में भर्ती करने और उसकी शारीरिक स्थिति का कई प्रकार पर्यवेक्षण करने के उपरान्त ही शल्य चिकित्सा का प्रबन्ध किया जाता है। इसमें रोगी की इच्छा प्रमुख नहीं, चिकित्सा के निर्धारण की उपयोगिता है। उपासना में साधक की इच्छा, उत्सुकता, लालसा का उतना महत्व नहीं जितना अनुभवी मार्गदर्शक के निरीक्षण परीक्षण का।
इस क्षेत्र में भी पूरा अन्धेर चलता है। प्रवचन हजारों लाखों को एक जैसे दिये जाते हैं। यह मोटी जानकारी भर तक उपयोगी हो सकते हैं पर उपस्थित जन समुदाय में से किसे क्या करना चाहिए इसका निर्णय उसकी मनःस्थितियों एवं परिस्थितियों का अनुमान लगाते हुए पृथक−पृथक गोष्ठियों में मार्गदर्शन होना चाहिए। ऐसा करने पर ही उसका प्रतिफल सन्तोषजनक निकलता है। यही बात साधना के सम्बन्ध में भी है। उसे साधक की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। छोटे बच्चे जब बाजार जाते हैं तो हर चमकदार वस्तु को देखते ही पाने के लिए मचलते हैं। भले ही वह उनके काम की तनिक भी न हो। इसी प्रकार हो सकता है कि कोई मनचला साधक किसी भी देखे सुने कौतूहल के अनुरूप अपनी उत्सुकता बताने लगे और उसका तरीका सीखने के लिए मचलने लगे। ऐसी स्थिति में साधक के कथन पर ध्यान न देकर अनुभवी सिद्ध पुरुष को अपना दूरदर्शी परामर्श ही देना चाहिए। रोगी को वैद्य का बताया हुआ क्वाथ एवं पथ्य लेना पड़ता है। रोगी का आग्रह मिष्ठान्न पकवान्न खाने का हो और उसी अनुरूप चिकित्सक हाँ में हाँ मिलाने लगे तो समझना चाहिए कि अनर्थ ही होने जा रहा है।
पुरातन काल की परिपाटी यही थी पर अब न विज्ञ साधक रहे न अनुभवी मार्गदर्शक इसलिए सब घोड़े गधों को एक ही लाठी से हाँका जाता है। जितने भी संपर्क में आते हैं उन्हें एक ही रास्ता बताया जाता है। युवकों को संन्यास देने और वृद्धों को विवाह करने का परामर्श देने में कोई बुद्धिमानी नहीं। स्थिति को देखकर ही जीवन दर्शन और साधन उपक्रम में ही हेर−फेर होना चाहिए। जो इस तथ्य से अवगत हैं समझना चाहिए कि उन्हें अध्यात्म की पृष्ठभूमि का परिचय है।
शान्तिकुँज गायत्री तीर्थ हरिद्वार से आकर साधना करने वालों को इस निरीक्षण परीक्षण में होकर सर्वप्रथम गुजरना पड़ता है। उनकी शारीरिक स्थिति को बहुमूल्य यन्त्र उपकरणों में इस प्रकार जाँचा जा सकता है मानो उसे किसी भयंकर रोग से मुक्ति दिलाने का कार्य परिपूर्ण उत्तरदायित्व के साथ होने जा रहा है। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक पर्यवेक्षण के लिए इतने प्रकार के उपकरणों में उसकी आन्तरिक स्थिति जाँची जाती है मानो उसे पुरातन काल की ‘काया−कल्प’ जैसी स्थिति के लिए तैयार किया जा रहा है। इस प्रयोजन के लिए शरीर शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र के पोस्ट ग्रेजुएट बहुमूल्य ऐसे यन्त्र उपकरणों का प्रयोग यहाँ करते हैं जिनका आविष्कार अभी कुछ ही दिन पूर्व कंप्यूटर आदि के आने के बाद हुआ है।
साधक की इच्छा आवश्यक स्थिति को जानने का प्रयत्न किया जाता है पर यह आवश्यक नहीं कि साधक की इच्छा एवं आतुरता का ही सब कुछ मानकर तद्नुरूप मार्गदर्शन किया जाय। यही पुरातन काल के अध्यात्म मार्गदर्शकों की कार्य शैली थी और अगले समझदारी के युग में इसी का प्रयोग भी होगा।
सामूहिक समस्याओं के लिए जन सहयोग में सम्पन्न होने वाले यज्ञों की आवश्यकता एवं उपयोगिता तो असंदिग्ध है ही, इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत प्रयोजनों के लिए व्यक्तिगत यज्ञ सम्पन्न किये जाने के भी उदाहरण इतिहास, पुराणों में अनेकानेक मिलते हैं।
दशरथ को तीन विवाह कर लेने पर भी संतति प्राप्त नहीं हुई। उन्होंने श्रृंगी ऋषि की अध्यक्षता में पुत्रेष्टि यज्ञ कराया और एक से एक बढ़कर सुयोग्य चार सन्तानों का लाभ उठाया।
राजा द्रुपद की कन्या द्रौपदी का जन्म भी इसी प्रकार यज्ञ प्रसाद के रूप में हुआ था।
स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी ने भगवान को अपनी गोदी में खिलाने की कामना की। इसकी पूर्ति के लिए उन्होंने यज्ञ किया जिसका पौरोहित्य मनुपुत्री इला ने किया था।
सृष्टि निर्माण का कार्य ब्रह्माजी को सौंपा गया। इसके लिए क्षमता और सामग्री की आवश्यकता हुई। इसके लिए उन्होंने यज्ञ किया और गायत्री, सावित्री दो पत्नियों को साथ लिया। गायत्री के प्रताप से क्षमता और सावित्री के अनुग्रह से आवश्यक सामग्री उन्हें प्राप्त हुई।
च्यवन ऋषि की वृद्धावस्था और अन्धता का निवारण करने के लिए एक महायज्ञ हुआ था। उसका प्रसाद एक अवलेह के रूप में प्राप्त हुआ और वे फिर से नव जीवन प्राप्त करने में समर्थ हुए।
चरक संहिता में औषधि धूम्र से अनेक रोगों के उपचार का विवरण है। गायत्री तन्त्र के एक अध्याय में विभिन्न प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने के लिए विभिन्न औषधियों द्वारा यजन करने का उल्लेख है।
शिव पुत्र कार्तिकेय का पालन जिन छः कृतिकाओं से मिलकर किया था वे छः स्तर की यज्ञाग्नियाँ ही थीं। कार्तिकेय उन असुरों को पराजित करने में सफल हुए जिन्हें समस्त देवता मिलकर भी हरा न सके।
रावण को जब प्रतीत हुआ कि राम को परास्त करना सरल नहीं है तब उसने अन्तिम अस्त्र के रूप में एक तान्त्रिक मख कराना आरम्भ किया था। यदि वह सफल हो जाता तो राम उसे हरा न पाते। ऐसी दशा में हनुमान ने रीछ, वानरों की सेना लेकर उस मख का विध्वंस किया था।
जन्मेजय ने अपने पिता परीक्षित के तक्षक सर्प द्वारा काटे जाने पर एक सर्प यज्ञ किया था। मन्त्र बल से सर्प करीब खिंचकर आने और कुण्ड में गिरने लगे थे। तक्षक ने इंद्रासन के साथ लपेटा लगा लिया सिंहासन समेत इन्द्र भी जब अग्नि कुण्ड में गिरने के लिए खींचने लगे तब उन्होंने जन्मेजय को जाकर समझाया और उस आयोजन को जाकर बीच में ही समाप्त कराया। तक्षक तभी बच सका।
याज्ञवल्क्य ऋषि यज्ञ विद्या के निष्णात पारंगत थे, उनने इस विज्ञान की आजीवन शोध की और छिपे रहस्यों को खोज निकाला।
राजा दक्ष भी इस विज्ञान में प्रवीण थे। वे प्रकृति रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए एक महायज्ञ कर रहे थे। उसमें शिवजी को आमन्त्रित नहीं किया गया। इस पर उनकी पुत्री सती ने उस यज्ञ कुण्ड में ही अपने शरीर को समाप्त कर लिया था।
सौ यज्ञ पूरे कर लेने पर कोई भी कर्ता स्वर्ग सशरीर जा सकता है। नहुष इसी प्रकार पहुँचे थे। राजा बलि ने भी सौ यज्ञ किये थे। स्वर्ग पहुँचे तो उन्होंने उस उपहार के बदले यह चाहा कि भगवान मेरे दरवाजे भिक्षुक बन कर आयें। वरदान मिला और वामन भगवान बौने ब्राह्मण के रूप में उनके द्वारे थोड़ी-सी जमीन की याचना करने पहुँचे।
चक्रवर्ती भरत और राजा प्रभु के अश्वमेध यज्ञ इतिहास प्रसिद्ध हैं। वाजिश्रवा ने अपने सर्वमेध यज्ञ में अपने पुत्र नचिकेता तक को दान कर दिया था।
शुक्राचार्य असुरों के गुरु थे वे अपने यजमानों को शक्तिशाली सिद्धियाँ प्राप्त कराने के लिए अनेक तान्त्रिक यज्ञ कराया करते थे।
बालि को अजेयता यज्ञ के बल पर ही प्राप्त हुई थी। भगवान राम भी उसके सामने जाकर युद्ध जीत नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने ताड़ वृक्ष की ओट में छिपकर पीछे से बाण चलाया।
ऐसे−ऐसे अनेक प्रसंग अठारहों पुराणों में सहस्रों की संख्या में लिखे हुए हैं। इन सबका संकलन इन पंक्तियों में कर सकना कठिन है। पूरा अथर्ववेद इन्हीं प्रयोजनों के सूत्र संकेतों से भरा पड़ा है। आयुर्वेद उसी से निकला जिसमें शारीरिक, मानसिक और आत्मिक आधि−व्याधियों के निराकरण का विधि-विधान है। यजुर्वेद में कहा गया है कि देवताओं ने देवत्व यज्ञ का यजन करके ही प्राप्त किया।
यज्ञ ज्ञान का भण्डार है और विज्ञान का उद्गम। आत्मिक सूक्ष्म शक्तियाँ अतीन्द्रिय क्षमताओं को उसके आधार पर जगाया जा सकता है। व्यक्तित्व का परिष्कार और परिमार्जन उसके द्वारा सम्भव है। वह स्वर्ग और मुक्ति का द्वारा माना गया है।
चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं मन्त्र। वे शब्द रूपी प्रचण्ड शक्ति भी हैं। ताप का संयोग अग्नि के माध्यम से उसमें होता है। प्रकाश की उत्पत्ति प्रत्यक्ष ही है। भौतिक विज्ञान, ताप, शब्द और प्रकाश पर अवलम्बित है। जिन प्रयोजनों का प्राकृतिक शक्तियों के सहारे सम्पन्न किया जाना है वे सभी यज्ञीय अग्नि विद्या के सहारे हस्तगत हो सकती हैं। यज्ञ विज्ञान पर आमूल−चूल नवीनतम प्रतिपादन, अन्वेषण के परिणामों सहित आगामी बसन्त पर्व पर प्रकाशित होने वाले यज्ञ विज्ञान पर लिखे गए नये दो ग्रन्थों में पाठक पा सकते हैं।
राजा शतनीक बहुत दानी था। किन्तु वह प्रजा के कष्टों के निवारण की ओर समुचित ध्यान न देता था। उसके बाद उसका पुत्र सहस्रानीक राजा बना वह तत्त्ववेत्ता न्यायविद् एवं कर्त्तव्य निष्ठ था किन्तु ब्राह्मणों को दान बहुत कम देता था। एक बार ब्राह्मणों के प्रतिनिधि राजा सहस्रानीक के पास पहुँचे व उसके पिता की दान परम्परा का ध्यान दिलाते हुए उससे भी उसी परम्परा को आगे बढ़ाने का आग्रह किया। सहस्रानीक ने कहा- “यदि परलोक विद्याविद् कोई योगी वह बता सके कि दानशील मेरे पिता इन दिनों उस पुण्य के क्या सुफल पा रहे हैं, तो मैं आप लोगों को अवश्य दान दूँगा। मेरी बुद्धि के अनुसार तो मैं जो न्याय दान कर रहा हूँ वह राजोचित दान है। राजा की बात सुन ब्राह्मणों ने देखा कि ऐसे योगी से संपर्क किया जाय जो स्वर्गीय नरेश का अता−पता बता सके।
बहुत प्रयास के बाद एक आरण्यकवासी तपस्वी ऋषि इस हेतु सहमत हुए। दिव्य शक्ति से सूक्ष्म शरीर द्वारा उन्होंने लोकान्तर भ्रमण किया और वहाँ दिवंगत नरेश शतनीक की स्थिति जानी। नियत समय पर सभा में सबके समक्ष वह विवरण रखना तय हुआ था।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सभा जुटी। राजा, राज कर्मचारी, ब्राह्मण वर्ग एवं नागरिकगण विशाल संख्या में उपस्थित थे। दिव्यदर्शी योगी ने बताया “यद्यपि राजा शतनीक ने ब्राह्मणों के निर्देशानुसार 16 प्रकार के महान दान दिये थे, ब्राह्मणों को रत्न, वस्त्र दिया था। किंतु वे नरक त्रास भोग रहे हैं क्योंकि वह धन उन्होंने प्रज्ञा को उत्पीड़ित कर संचित किया था। राजा का प्रथम कर्त्तव्य प्रजा का योग्य परिपालन है। वैसा करते हुए ही सुयोग्य ब्राह्मणों का सच्चा सम्मान किया जा सकता है। धन बाँटना ब्राह्मणों का सच्चा सम्मान नहीं, राजा का यश लोभ था, लोकेषणा थी। दुःखी राजा ने बेटे को सन्देश भेजा है कि मेरी गलती न दुहराना और प्रजा के परिपालन के कर्त्तव्य की ओर प्रथमतः ध्यान देना।
नदियों के तेज बहाव को रोककर उससे नहरें निकाली जाती हैं। बिजली पैदा होती है और दूसरे कई प्रयोजन सिद्ध होते हैं। यदि बहाव को यथावत् बहने दिया जाय तो किनारों की मिट्टी कटेगी और गहराई नीची होती जाने से उस पानी का उपयोग ऊपर के क्षेत्र में न हो सकेगा। बहता पानी समुद्र के खारी जल में जा मिलेगा। पर्वती गहरी नदियों के तेज बहाव से उस क्षेत्र के तटवर्ती निवासियों को कोई लाभ नहीं मिलता वरन् बच्चे, चौपाये आदि के बह जाने का ही खतरा रहता है।
लोक मानस ऐसा ही प्रवाह है जिसमें रूढ़ियां, मूढ़ मान्यताएँ, संकीर्ण स्वार्थपरताओं की तीव्रता रहने से जन शक्ति और सम्पदा का अपव्यय एवं दुरुपयोग ही होता रहता है। जनसंख्या, शिक्षा, सम्पदा बलिष्ठता आदि की वृद्धि के साथ−साथ उनके उद्धत प्रयोग से दुष्परिणाम ही बनते हैं। अनर्थ ही खड़े होते हैं।
इस प्रवाह की रोकथाम करके बाँध की भूमिका निबाहने वाला एक ही वर्ग है। वह है ब्राह्मण। ब्राह्मण अपनी निजी सुख सुविधाओं का विसर्जन करके एक ही चिन्ता और क्रिया में निरत रहता है कि किस प्रकार कुप्रचलनों की रोकथाम हो, किस तरह उद्धत दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगे−और किस प्रकार सत्प्रवृत्ति के प्रचलन में सज्जनता की रीति−नीति में अभिवृद्धि हो−ब्राह्मण का यह एक ही लक्ष, उद्देश्य और धर्म कर्म है।
कभी इस देश में ब्राह्मण परम्परा जीवन्त थी। एक बहुत बड़ा वर्ग इसी निमित्त अपने को समर्पित किये रहता था। वह समाज की शालीनता को सुरक्षित रखने और उसे समुन्नत बनाने के लिए जो कुछ बन पड़ता था सो सब कुछ करता था। इसी उत्सर्ग का प्रतिफल था कि समूचा समाज उत्कृष्टता के शिखर बिन्दु तक पहुँचा रहता था और अनीति का−अनौचित्य का कहीं कोई चिन्ह तक परिलक्षित नहीं होता था।
आज ब्राह्मण परम्परा मिटती जा रही है। उसके दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं यही कारण है कि अवाँछनीयताएँ हर दिशा में सिर उठाती और अनर्थ सँजोती दिख पड़ती हैं। बाँध न बाँधें तो अधोगामी प्रवाह की रोकथाम कैसे हो। यदि रोक न लगे तो नहरें निकलने और बिजली घर बनने का सुयोग किस प्रकार सम्भव हो?
यहाँ ब्रह्म शब्द से तात्पर्य किसी जाति या वंश विशेष से नहीं जिस प्रकार बढ़ती जनसंख्या की धूम है। उसी प्रकार अन्य जातियों की तरह ब्राह्मण जाति भी बढ़ रही है। पर इससे क्या प्रयोजन सधा। यहाँ जाति−पाँति के जाल−जंजाल को देखते हुए यह आशा नहीं बँधती कि वे गुण कर्म स्वभाव से भी अपनी पैतृक परम्परा का दायित्व सम्भालेंगे। जो परिकर जिस विशेषता के लिए प्रसिद्ध है यदि वह उसे गँवा बैठे तो फिर ढाँचा ढकोसला ही शेष रह जाता है और उससे आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ हस्तगत नहीं होता।
ब्राह्मण को धरती का देवता माना गया है। उसे अभिवादन प्रणाम सम्मान का उच्चस्तरीय श्रेय दिया गया है। ब्रह्मभोज कराते हुए लोग पुण्य सम्पादन की कल्पना करते हैं। दान दक्षिणा देते समय ब्राह्मण को खोजा जाता है। ऐसा क्यों? जब सभी मनुष्य एक जैसे रक्त−माँस के एक−एक स्वभाव संरचना के हैं तो किसी वर्ग विशेष को श्रेष्ठता क्यों दी जाय? इस प्रश्न का सीध−सा उत्तर है कि उनके लक्ष्य, दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप को देखते हुए इस प्रकार की वरिष्ठता दी गई है न कि निजी वंश परिवार में जन्म लेने के कारण ऊँच−नीच का निर्धारण हुआ है।
ब्राह्मण का स्वरूप है लोक सेवा में विशेषतया लोकमानस को परिष्कृत बनाने की प्रक्रिया में निरत होने के कारण उसकी उपयोगिता एवं सेवा साधना के उपलक्ष्य में श्रेय देने की परम्परा चली है। इसके साथ ही यह आशा भी की गई है कि वे वही कार्य करेंगे जो उनके पूर्ववर्ती करते रहे हैं। कर्त्तव्य से इन्कार करने पर तो अधिकार भी छिन जाता है। स्वर्णकार को आभूषण बनाने की कला आनी चाहिए और उसकी दुकान में यही सब सरंजाम रहना चाहिए। पर ऐसा कुछ न हो स्वर्णकार हजामत बनाने का धन्धा करने लगे तो फिर वर्ग में उसकी गणना कैसे होगी और आवश्यकता पड़ने पर उसे उस कार्य के लिए कौन पुकारेगा कौन उसके घर जाएगा। व्यवसाय बदल लेने पर तो बिरादरी भी बदल जाती है। पूर्वज भले ही स्वर्णकार रहे हैं पर अब जिसकी हजामत बनाने की दुकान चलती है उसे ‘बारबर’−हज्जाम आदि विशेषणों के साथ ही पुकारा जाएगा।
पूर्वजों की विशेषता के आधार पर कोई अपने बड़प्पन का दावा नहीं कर सकता डॉक्टर, इंजीनियर आदि के लड़के बिना पढ़े हों या कुछ और धन्धा अपनायें तो अपने नाम के साथ पिता वाली पदवी जोड़ने का उन्हें कोई अधिकार नहीं रह जाता। कलाकार का बेटा यदि चपरासी है तो उसे कलाकार की कुर्सी पर जा बैठने का अधिकार किस प्रकार मिल सकेगा। आज के ब्राह्मण अपने वंश की गरिमा का श्रेय उठाना चाहते हैं तो उन्हें तद्नुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए तत्परता दिखानी होगी।
निस्वार्थ लोक सेवा से ही कोई परमार्थी बनता है। पर जिन्होंने मानवी सत्ता की प्राण सम्पदा−विचारणा को निकृष्टता के गर्त्त में न गिरने देने का−स्वच्छ निर्मल बनाये रहने का−ऊँचा उठाने और स्तर को श्रेष्ठतर बनाये रहने का जिम्मा अपने सिर पर लिया है। उसके निमित्त कष्ट सहा और त्याग किया है उसे सहज सम्मान मिलेगा। महानता उपार्जित करने में लोग तपस्वी जीवन जीते, आसमान जितना ऊँचा सोचते और बाजारू श्रमिकों की तुलना में कहीं अधिक श्रम करते हैं उनकी साधना कम से कम लोक श्रद्धा की अजस्र वर्षा तो करेगी ही।
कला कौशल सिखाने वाले तक को अपने विषय का प्रवीण पारंगत बनना पड़ता है। फिर कोई कारण नहीं कि लोग व्यवहार में शालीनता का समावेश करने वाले सर्वप्रथम अपने ही व्यवहार में उन विशिष्टताओं का समावेश किये बिना ही, दूसरों को मात्र प्रवचन देकर ही आदर्शवादिता की रीति−रीति अपनाने के लिए सहमत कर लें।
खिलौने, आभूषण, पुर्जे आदि ढालने के लिए सर्वप्रथम साँचे बनाने पड़ते हैं। जब वे ठीक तरह बन जाते हैं तो उनके साथ सटने वाली मुलायम वस्तुएँ भी ठीक आकार की बनती जाती है। गलाने और ढालने का यही तरीका सर्वथा अपनाया जाता है। अग्रगामियों के पीछे अनुगामी भी चल पड़ते हैं।
ब्राह्मणों को अग्रगामी होना पड़ता है और अनुकरणीय आदर्शों से भरा−पूरा भी। वक्ता ऊँची चोटी पर बैठता है। श्रवणकर्त्ताओं की पंक्ति नीचे रहती है। सामान्य जानकारी देने की बात है तो उस स्तर का लैक्चर कोई भी दे सकता है। किन्तु यदि जीवन को शालीनता के ढाँचे में ढालने तथा लोकहित के लिए कुछ त्याग बलिदान करने की बात हृदयंगम बनाने की अभीष्ट हो तो उसके लिए आवश्यक है कि स्वयं प्रतिपादन को निज के जीवन में चरितार्थ करके दिखाया जाय। संयम और लोक सेवा ही सत्प्रवृत्तियों में गिनी जाती है। धर्म मंच से इन्हीं का उपदेश दिया जाता है। ब्राह्मण जनता का स्तर ऊँचा बनाये रखने का उद्घोष करता है। ऐसी दशा में यह नितान्त आवश्यक है कि उन उत्कृष्टताओं को अपने निज के जीवन में इतनी गहराई तक संस्थापन किया जाय जिसे कड़ी कसौटी लगाने पर भी कोई खोटी सिद्ध न कर सके। ब्राह्मण को उपदेशक ही नहीं निजी जीवन की श्रेष्ठताओं से भरा-पूरा भी रहना चाहिए। (क्रमशः)
आज का दिन हमारा है, गुजरा हुआ कल मर गया और आने वाला कल अभी पैदा नहीं हुआ। जो काम कभी भी हो सकता है वह कभी नहीं हो सकता। जो काम अभी होगा वही होगा, जो शक्ति आज के काम को कल पर टालने में खर्च हो जाती है उसी शक्ति के द्वारा आज का काम आज ही किया जा सकता है।
हीरक जयन्ती का वर्ष आँधी तूफान की तरह आया और उसने एक−सिरे से दूसरे सिरे तक के पेड़−पौधों को झकझोर कर रख दिया। पत्ते और तिनके उड़कर आसमान छूने लगे। पैरों तले पड़ी रहने वाली धूल ने समूचा वातावरण आच्छन्न कर दिया। ऐसी हलचल गुरुदेव के जीवन में सम्भवतः सहस्र कुण्डी यज्ञ के दिनों ही आई थी। जब देश भर में हलचल मची थी और मणि−मुक्तकों की तरह ढूँढ़−ढूँढ़कर एक लाख विवेकशील धर्म प्रेमियों का संगठन बना था कि इस प्रतिगामी समझने वाले धर्म तन्त्र द्वारा युग परिवर्तन का प्रगतिशील वातावरण बना कर दिखाया जायेगा।
उस बात को 28 वर्ष बीत गये। इतनी अवधि में वह लगाया हुआ नन्दन वन गायत्री परिवार के रूप में परिपक्व परिपुष्ट हो गया और फूलने−फलने लगा। अब यह देखा जा रहा है कि उनका आच्छादन कितना सुविस्तृत हो गया और उस पर कितने बड़े कितने बहुत अमृत तुल्य फल लगने लगे।
इस उद्यान के 24 लाख सदस्य और एक लाख माली हैं। इस विस्तार ने देश−विदेश का अधिकाँश भाग घेर लिया है। उसकी मलयज गंध से जन−जन का मन प्रभावित होने लगा है। इसे कहते हैं बोये हुए खेत को लहलहाना और सफल के उत्पादन से घर के कोठे−कुठीले भर जाना।
वह अतीत की चर्चा हुई भविष्य की कल्पना और भी शानदार है। इतनी शानदार कि उसकी कल्पना भर से पुलकन और सिहरन उठती है। इसे कहते हैं सतयुग की वापसी। मूर्च्छना का नव चेतना में बदल जाना। च्यवन की वृद्धावस्था मरण की ओर चलने की अपेक्षा जवानी में लौट पड़ी थी। भारत की देव संस्कृति के साथ भी यही हुआ है। प्रतिगामिता उसे ग्रस ने जा रही है, पर गज को ग्राह के मुख से छुड़ाने वाले ने पाशा पलट दिया। द्रौपदी की लाज बच गई और उसका चीर अक्षय हो गया। यह है अपना भविष्य जिसे आज नहीं तो कल साकार होते हुए देखा जा सकेगा।
दृष्टिपात मध्यवर्ती वर्तमान पर करना है। इस मध्यावधि को वर्तमान की प्रभात बेला को हीरक जयन्ती नाम अनायास ही मिल गया है। आत्मा न कभी जन्मता है, न मरता है। शरीरों के अन्तराल में परिवर्तन का क्रम निरन्तर चलता रहता है। ऐसी दशा में किसकी आयु कितनी गिनी जाय, यह असमंजस की बात है। फिर भी लोकाचार के अनुसार उनके शरीर जन्म को 75 वर्ष होने को आये। परिजनों का उत्साह उमड़ पड़ा और इस वर्ष को हीरक जयन्ती नाम दे दिया गया।
इस वर्ष में क्या करना है? इसका निर्देशन गुरुदेव ने स्वयं ही दिया। वे मृतक भोज करने से स्थान पर वृक्षारोपण का परामर्श लाखों को दे चुके हैं, जिससे धन का अपव्यय न हो और कुछ ऐसी बात बने जो संसार की शोभा बढ़ाये, उन्होंने शादियों में दहेज का ही नहीं धूम−धाम का भी घोर विरोध किया है और अपने नेतृत्व में असंख्यों विवाह नितान्त सादगी युक्त कराये हैं। फिर वे अपनी हीरक जयन्ती पर धूमधाम मचाने, जुलूस निकालने प्रदर्शन खड़े करने जैसे बचकाने प्रयोजनों की अनुमति कैसे देते। यह वर्ष नितान्त सादगी के साथ मनाया जा रहा है। इतने पर भी इस अवसर पर रचनात्मक कार्यों पर डडडडऐसा लग रहा है जैसे पेज छूट रखा होडडडड में न्यूनतम एक वर्ष का समय चाहिए पर 1- डडडड 2- मजीरा 3- खड़ताल 4- चिमटा 5- तारवाद्य। पाँच को मिला देने से एक छोटा आरकेस्ट्रा बन डडडड है और इतने साजों के सहारे ही युग संगीत गाये जा सकते हैं। कथा के साथ कीर्तन किये जा सकते हैं इन डडडड बाजों का एक सेट प्रायः साठ रुपये की लागत में बन जाता है।
अपने यहाँ प्रवचन और संगीत विद्यालय चलाये डडडड। इनमें प्रकाशित प्रज्ञा पुराण के चारों खण्डों को डडडड दिया जाय और साथ ही उपरोक्त वाद्ययन्त्रों का डडडड शिक्षण चले। जिस स्तर का युग शिल्पी सत्र हरिद्वार में डडडड किया था उसी प्रकार का अपने यहाँ−अपने उत्साही कार्यकर्त्ताओं को एकत्रित करके चलाया जाय। इस प्रकार डडडड प्रचार मण्डली खड़ी करना उन सबका कर्तव्य है जो हरिद्वार युग शिल्पी शिक्षण प्राप्त करके लौटे हैं।
वायु मंडल और वातावरण की संशुद्धि के लिए युग परिवर्तन भूमिका के रूप में प्रज्ञा परिजनों द्वारा 240 करोड़ गायत्री जप का प्रयोग नियमित रूप से चल रहा है। इस वर्ष से उसमें वृद्धि की गई है। 24 करोड़ गायत्री चालीस पाठ का संकल्प इसी वर्ष से लिया गया हैं। जो युग संधि की अवधि सन् 2000 तक यथावत् डडडड। इन जापों से आयु, स्नान आदि का कोई डडडडड नहीं है। जब भी अवसर मिले तभी एक पाठ कर लिया जाय।
इस प्रयोजन के लिए विशेष रूप से गायत्री चालीसा छापे गये हैं और वे लागत से कहीं कम मूल्य में पाँच रुपये के सौ दिये जा रहे हैं। अपने संपर्क क्षेत्र में इन्हें इस शर्त पर वितरित किया जाय कि वे एक पाठ नित्य किया करेंगे।
अशिक्षित भी इस चालीसा पाठ योजना में इस प्रकार सम्मिलित हो सकते हैं कि पढ़े लोग एक बार कहें। बिना पढ़े उसे दूसरी बार दुहरायें। इस प्रकार शिक्षित अशिक्षित सभी इस योजना में सम्मिलित हो सकते हैं और न्यूनतम सौ पाठ कराने का जिम्मा हर प्रज्ञापुत्र ले सकता है। उनकी पूर्ति हो रही है या नहीं, इसका लेखा−जोखा भी रख सकता है। इस प्रकार प्रचार मण्डलियाँ तैयार करना और गायत्री चालीस पाठ का संकल्प पूरा कराना यह दो कार्य ऐसे हैं जो अभी−अभी इन्हीं दिनों आरम्भ किये गये हैं। इनकी पूर्ति के लिए किसी को भी कुछ उठा न रखना चाहिए। इस वर्ष एक हजार प्रचार मण्डलियाँ और 24 लाख पाठ प्रतिदिन का क्रम चलना ही चाहिए। यह झोला पुस्तकालय और जन्मदिन मनाने के आयोजनों से अतिरिक्त है। जन्मदिन मनाने की पाइप की नी फोल्डिंग यज्ञशालाएँ दो सौ के करीब में हरिद्वार से मिल सकती हैं। इन्हें अपने यहाँ भी बनाया जा सकता है। समीपवर्ती शाखाओं को सप्लाई करने के लिए वाद्ययंत्र, यज्ञशालाएँ एवं ज्ञानरथ कोई भी बना और बेच सकता है।
हीरक जयन्ती इन रचनात्मक कार्यों के साथ सम्पन्न होनी चाहिए। जो इन कार्यों को आगे बढ़ाने में योगदान दें, वे सभी हीरक जयन्ती के हीरक माने जायेंगे और उनके सत्प्रयत्न उनके लिए हर प्रकार श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न करें, ऐसी सर्व शक्तिमान माता से हम लोग प्रार्थना करेंगे।
एक कंजूस के पास बहुत धन था। उसने उसे जमीन में गाड़ रखा था। किसी प्रकार चोरों ने उसका पता लगा लिया और अवसर पाकर उसे खोद ले गये।
कंजूस ने यह देखा तो वह दहाड़ मारक रोने लगा। पड़ौसी भी कौतूहल वश इकट्ठे हो गये। कारण विदित होने पर छोटे लड़के ने कहा− ‘‘लालाजी, यह धन न आपके किसी काम आ रहा था और न किसी दूसरे के। निरर्थक पड़े रहने की अपेक्षा यदि वह चोर के काम आने लगा तो क्या हर्ज हुआ!” बच्चे की बात का हलका समर्थन खड़े हुए आम लोगों ने भी किया और एक बूढ़ा बोला− ‘‘धन तभी तक धन है जब वह किसी उद्योग उपयोग में लगा रहे अन्यथा उसमें और किसी कूड़े−करकट में क्या अन्तर?”
सृष्टि सृजन का, व्यक्ति सृजन का, तप ही है आधार। तप−बल द्वारा ही ब्रह्माजी, रचते हैं संसार॥1॥
मनु−सतरूपा, कश्यप−अदिति, इनका तप विख्यात। तप−बल से राम, कृष्ण के बने पिता अरु मात॥ तप से गौतम, महावीर का हो जाता निर्माण। भागीरथ के तप को मिलता गंगा को अनुदान॥ ध्रुव, प्रह्लाद, दधीचि सभी तो हैं तप के उपहार। सृष्टि सृजन का, व्यक्ति सृजन का तप ही है आधार॥2॥
तप कर ही माटी की ईंटें छू लेतीं आकाश। तप कर ही सोना पाता है जन−जन का विश्वास॥ पानी तप कर शक्ति सँजोता, चलते जिससे यंत्र। तप-बल के द्वारा संचालित बड़े−बड़े संयंत्र॥ तप से भस्म, रसायन बनकर करते हैं उपचार। सृष्टि सृजन का, व्यक्ति सृजन का तप ही है आधार॥3॥
तप से शमित हुआ करते हैं कल्मष और कषाय। पाप, पतन के परिशोधन का तप ही एक उपाय॥ विकृति, संस्कृति बन जाती है, जब तपता है व्यक्ति। नर से नारायण बनने की तप में ही है शक्ति। तप से सहज परिष्कृत होते हैं आचार−विचार। सृष्टि सृजन का, व्यक्ति−सृजन का तप ही है आधार॥4॥
अत्याचारों से, अनीति से तप करता संग्राम। तब रावण पर विजय पताका फहराते श्रीराम॥ क्रूर काल को महाकाल का तप कर देता ध्वस्त। तप के सन्मुख स्वयं दुष्टता हो जाती है नष्ट॥ सत् की अंतिम विजय हुई है और असत् की हार। सृष्टि−सृजन का, व्यक्ति सृजन का तप ही है आधार॥5॥
युग का विश्वामित्र तप रहा, इसीलिए अविराम। नये सृजन के सृजन−साधको! फिर कैसा विश्राम॥ त्याग और तप की भट्टी में करें व्यक्ति निर्माण। तप−बल से ही पतन पराभव से होगा उत्थान॥ तप से ही संभव देवों की संस्कृति का उद्धार। सृष्टि−सृजन का, व्यक्ति−सृजन का तप ही है आधार॥6॥
-मंगल विजय
*समाप्त*