सुनिश्चित वरदायी−आत्मदेव

परोक्ष देवता अगणित हैं और उनकी साधना उपासना के माहात्म्य तथा विधान भी बहुतेरे। किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही। इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को आघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।

इस बुद्धिवादी युग में देव मान्यता के सम्बन्ध में सन्देह भी प्रकट किया जाता है। यहाँ तक की अविश्वास एवं उपहास भरी चर्चाएं भी होती हैं। ऐसी दशा में हमें सर्वजनीन ऐसे देवता का आश्रय लेना चाहिए जो साम्प्रदायिक अन्धविश्वासों से ऊपर उठा एवं सर्वमान्य हो। साथ ही जिसके अनुग्रह और वरदान के सम्बन्ध में भी उँगली न उठे।

ऐसा देवता एक है और वह है− आत्मदेव। अपना सुसंस्कृत आपा एवं परिष्कृत व्यक्तित्व। इसका आश्रय रहने पर कोई न अभावग्रस्त रह सकता है और न निराश−तिरष्कृत।

अन्य सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कष्ट साध्य साधनाएँ करनी पड़ती हैं। आत्मदेव की सत्ता सबके भीतर समान रूप से विद्यमान रहते हुए भी उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए भी निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्मसुधार और आत्मविकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।


शाश्वत आनन्द का अनुसंधान

आनन्द को पाना चाहते हो तो उसकी और कदम बढ़ाओ−लम्बी मंजिल पर एक−एक डग भरते चलने से ही उसकी समीपता का लक्ष्य पूरा हो सकेगा।

इसके लिए किसी सघन कुञ्ज में एकान्त साधना की आवश्यकता न पड़ेगी। कर्म को त्याग कर कल्पना लोक में विचरने से कुछ काम न चलेगा। सत्कर्मों में निरत रहकर श्वेत बिंदुओं के साथ−साथ आनन्द के मणि−मुक्तकों का संचय किया जा सकेगा। प्रभु को भेंट करने योग्य यही सर्वोत्तम हार−उपहार है जो सत्प्रयासों में बहने वाले श्वेत सीकरों से गूँथा गया है।

आनन्द की खोज बालकों के भविष्य चिन्तन जैसी काल्पनिकता के आधार पर नहीं हो सकती और न बूढ़ों की तरह उसे अतीत की स्मृतियों की चर्चा करते रहकर पाया जा सकता है। उसके लिए कर्मनिष्ठ तरुणों की तरह वर्तमान से जूझना पड़ेगा। आनन्द गहरे कुएँ का जल है, जिसे ऊपर लाने के लिए देर तक प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। मोती लाने वाले गहराई में उतरते और जोखिम उठाते हैं। आनन्द पाने के लिए गोताखोरों जैसा साहस और कुआँ खोदने वालों जैसा संकल्प होना चाहिए।

यदि सचमुच ही आनन्दित रहने की इच्छा हो तो फूलों से कुछ सीखो। वे स्वयं खिलते हैं और जो उधर से निकलता है, उसके होठों को खिलाते हैं। अपना सौरभ उदारतापूर्वक वायुमण्डल में बखेरते हैं। यह नीति अपनाकर कोई भी भीतरी आत्म-सन्तोष और बाहरी सम्मान का भाजन बन सकता है। मधु मक्षिकाएँ अनवरत श्रम करती हैं। वे उसका लाभ नहीं उठातीं। उपभोग तो दूसरे ही करते हैं, पर इस श्रम में संलग्न उनकी कर्मनिष्ठा सहज ही आनन्द का उपहार देती रहती है। यदि ऐसा न होता तो दूसरों द्वारा मधु निचोड़ लिये जाने के उपरान्त वे दूसरे दिन फिर क्यों उसी प्रयास में संलग्न होतीं। उद्देश्यपूर्ण सत्कर्मों की प्रतिक्रिया ही आनन्द के रूप में अनुभव की जाती है। जिन्हें सरसता की खोज है, उन्हें इसी राह पर चलना पड़ेगा।

आनन्द का चिन्तन बुरा नहीं, पर उसे बीज की तरह गलना और उगना चाहिए अन्यथा नयनाभिराम वट वृक्ष की छाया में बैठकर सरसता का आस्वादन संभव न हो सकेगा। ध्यान और योग की अपनी उपयोगिता है, पर उतने भर से सच्चिदानन्द का सान्निध्य सम्भव नहीं। भगवान का कोई स्थिर रूप नहीं, वे सक्रियता के रूप में गतिशील हो रहे हैं। इस विश्व की शोभा, स्वच्छता जिस दिव्य गतिशीलता पर निर्भर है। हम उसका अनुसरण करके ही प्रभु प्राप्ति के राजमार्ग पर चल सकते हैं। चिन्तन इसके लिए प्रेरणा देता है, लक्ष्य तक पहुँचने के लिए चलना तो पैरों को ही पड़ेगा। भावनाओं में प्राणों की प्रतिष्ठापना कर्मनिष्ठा ही काम करती है। सत्कर्मों में निरत हुए बिना आनन्द की अनुभूति आज तक किसी को भी नहीं हो सकी है।

नीरसता क्या है? निष्क्रियता, उद्विग्नता क्या है? अनर्थ में अभिरुचि। हमारे जन्मजात आनन्द अधिकार को इन दो ने ही छीना है। जीवन नीरस लगता है क्योंकि सत्प्रयोजन की दिशा में हम निष्क्रिय बने रहते हैं। हम उद्विग्न रहते हैं क्योंकि अकर्म और कुकर्म करके आत्मा को चिढ़ाते और बदले में चपत खाते हैं। यदि आनन्द अभीष्ट हो− तो निरानन्द की दिशा में चल रही अपनी दिग्भ्रांत यात्रा का क्रम बदलना पड़ेगा। एक क्षण के लिए रुकें और देखें कि जो चाहते हैं उसे पाने की दिशा और चेष्टा सही भी है कि नहीं। चिन्तन के फलस्वरूप आनन्द की प्राप्ति का जो माहात्म्य बताया गया है उसका आधार यही है कि वस्तु स्थिति को नये सिरे से समझें और जीवन−नीति का नये सिरे से निर्धारण करें।


सृष्टा की अगम्य संरचना

शरीर के अन्तराल में जीवनकोश, तन्त्रिकाएँ, ऊतक, द्रव रसायन, रक्त कण, हारमोन्स, जीन्स प्रभृति आँख से न दिख पड़ने वाले असंख्य पदार्थों से यह शरीर बना है। इतने पतले मोतियों से यह माला गुंथी है कि देखकर आश्चर्य होता है कि बनाने वाले औजार और हाथ कितने नन्हें होंगे। चावल के दाने पर गायत्री मन्त्र लिख देने वाले कई कारीगरी अपनी कृतियों को जिसे भेंट करते हैं उससे अच्छा पुरस्कार पाते हैं। पर चावल की तरह निर्जीव नहीं, अरबों−खरबों घटकों को निरन्तर क्रमबद्ध गतिशीलता बनाये रखने वाले जिन जीव कणों की रचना हुई है उसे देखते हुए लगता है कि इनका सृजेता कोई बहुत ही लघु आकार का होगा।

पशु पक्षियों और चलते−फिरते गतिशील प्राणियों की बात छोड़िये मिट्टी पानी में मिले हुए सूक्ष्म जीवी, बैक्टीरिया और वायरस जैसे अदृश्य किन्तु शरीर में उथल−पुथल मचा देने वाले दैत्य जैसी सामर्थ्यों से भरे−पूरे अदृश्य जीव कणों की संरचना और कार्य पद्धति पर जब नजर डाली जाती है तो लगता है सृजेता भी प्रायः इतना ही छोटा होगा। परमाणुओं के भीतर एक समूचा सौर मण्डल नियोजित करके उसे भी नियमित गति से चलने वाला−और विस्फोट के समय प्रलय खड़ी कर देने वाला तत्व कितना छोटा है कि उसका परिचय अनुमान के आधार पर ही हस्तगत हो सका है। इसीलिए उसे नियन्ता की “अणोरणीयान्” अणुओं का भी अणु, छोटे से भी छोटा कहा गया है।

किन्तु जब दूसरी ओर नजर पसार कर देखते हैं तो ब्रह्माण्ड की विशालता देखते हुए लगता है कि इतने बड़े−बड़े घटक जिस कुम्हार ने अपने चाक को घुमाते हुए बनाये होंगे उसका कारखाना और आवा कितना बड़ा होगा। जिसमें सृजन ही नहीं होता वरन् उनमें से किसी को भी चैन से न बैठने देने वाली−निरन्तर द्रुतगति से दौड़ने वाले पिण्डों में असीम सामर्थ्य भर दी है वह स्वयं आकार में कितना बड़ा होगा। उसकी कारीगरी एवं कुशलता देखते हुए सहज विश्वास होता है कि उसे ‘महतो महीयान्’ की उपमा दिया जाना सर्वथा सार्थक है।

ब्रह्माण्ड की विशालता की कल्पना करने मात्र से बुद्धि थकित और चकित रह जाती है और सोचना पड़ता है कि इतने विशाल घटकों की संरचना और उनकी बिना परस्पर टकराये निरन्तर गतिशील घुड़दौड़ की व्यवस्था बनाने में कितनी कारीगरी और दूरदर्शिता का समावेश हुआ है। उसे जाँचना, समझना तो दूर कल्पना मात्र कर सकने में मानवी बुद्धि अपने को असमर्थ पाती है। जिधर भी आँख उठाकर देखते हैं भीतर और बाहर आश्चर्य ही आश्चर्य दृष्टिगोचर होता है। गीताकार ठीक ही कहता था ‘आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेन’।

यह देखना और कहना तथ्य को देखते हुए इतना स्वल्प है कि उसे समग्रता की तुलना में राई−रत्ती का भी लाख करोड़वाँ भाग कह सकते हैं।

पदार्थ विज्ञान की वर्णमाला पढ़ने वाले जब ब्रह्माण्ड की गुरुता और पिण्ड की लघुता को देखते हैं तो अपनी तोतली वाणी में छोटे बच्चों की तरह कुछ ऐसा बोलते हैं जो स्वयं उनकी समझ में नहीं आता। फिर दूसरों को वे किस प्रकार समझा सकेंगे।

हर कोई जानता है कि प्राणी में जीवन सत्ता काम करती है। उसका अन्त होते ही मृत्यु घोषित कर दी जाती है पर यह जीवन आखिर है क्या? इसका जान सकना अभी तक उनके लिए सम्भव न हो सका। यह कह देना सरल है कि मनुष्य एक चलता−फिरता पेड़−पौधा है। शरीर के अंत के साथ ही उसका अन्त हो जाता है। पर यह बात भी गले नहीं उतरती क्योंकि मरने के बाद यदि शरीर को किसी उपयुक्त विधि से समाप्त न किया जाय तो उसके भीतर से ही असंख्य छोटे−बड़े कृमि उत्पन्न हो जाते हैं और काया के सरंजाम को स्वयं ही खा−पीकर वह बराबर कर देते हैं। जब मृत शरीर में अनेक प्राणियों का जन्म हो सकता है तो उसे जड़ पदार्थ कैसे कहा जाय? और यदि शरीर के रासायनिक पदार्थों को जीवन स्रोत कहा जाय तो मृत शरीर फिर पूर्ववत् काम करने योग्य क्यों नहीं रहता? जीवन की पहली चेतना की विलक्षणता की अभी तक कोई व्याख्या नहीं की जा सकी तो उसकी सत्ता का स्रोत और भविष्य का विवेचन कर सकना तो और भी कठिन है। यन्त्र उपकरणों, आविष्कारों के जो छोटे−मोटे खिलौने बन पड़े हैं उन पर विज्ञान जगत को अहंकार करना ऐसा ही है जैसा गीली बालू का महल बनाने वाले का अपने को बहुज्ञ इंजीनियर मानना।

प्रकृति जड़ है और यह सारा उसी ने अनायास ही बनाकर खड़ा कर दिया है। यदि ऐसा है तो उसके भीतर परस्पर पूरक और सहयोग सन्तुलन बनाये रहने वाली क्षमता किस प्रकार उत्पन्न हो गई। अनगढ़ और निर्जीव वस्तुएँ घर में भी आये दिन जरा से आघात से टूटती−फूटती रहती हैं। फिर इतने छोटे और इतने बड़े घटकों में निरन्तर टकराव होना चाहिए था व क्यों नहीं होता? शरीर के जीवकोश और ब्रह्माण्ड के ग्रह नक्षत्र आपस में टकराते क्यों नहीं? अपनी−अपनी निर्धारित कक्षा पर नियत चाल से क्यों कर चलते रहते हैं। यदि प्रकृति निर्जीव है तो उसकी कृतियां भी ‘घुणाक्षर न्यान’ के अनुसार जैसी−तैसी बनानी चाहिए और उनके बीच कोई पारस्परिक तालमेल नहीं होना चाहिए जबकि ‘इकालॉजी’ के सिद्धान्त को सर्वत्र लागू हुआ देखते हैं। ऐसी दशा में यह कहना कि सृष्टि क्रम प्रकृति द्वारा स्वयमेव संचालित हो रहा है, इसमें किसी चेत सत्ता का दखल होने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह कथन सर्वथा उपहासास्पद ही कहा जा सकता है।

शरीर के जीवकोश जल्दी−जल्दी मरते और नई वंश वृद्धि करते हुए रिक्तता की पूर्ति करते रहते हैं। एक का दूसरे घटक के साथ दूरदर्शिता पूर्ण सहयोग है तभी जीवन क्रम चल पाता है।

ब्रह्माण्ड की गतिविधियों पर तनिक-सी दृष्टि डालने पर प्रतीत होता है कि यह सब कितना जटिल और कितना अद्भुत है। अपने सौर मण्डल को ही लें। उसके ग्रह और उपग्रह कितनी चमत्कारी छटा दिखाते हैं कि उसकी विलक्षणता किसी जादूगर के तमाशे जैसी हैरत में डालने वाली प्रतीत होती है।

सूर्य पृथ्वी से कितनी दूर है पर उसकी किरणें ही यहाँ आकर जीवन और हरितमा की परिस्थितियाँ प्राप्त करती हैं। ब्रह्माण्डीय किरणों की बौछार से पृथ्वी अपना सन्तुलन न गँवा बैठे इसके लिए उसके ऊपर एक से एक अद्भुत कवच चढ़े हुए हैं। उत्तर ध्रुव अंतर्ग्रही अनुदानों में से जितने उपयोगी हैं उतने अपने पेट में ले जाता है और उपयोग करने के बाद जो कचरा बचता है उसे दक्षिण ध्रुव के द्वारा निखिल अन्तरिक्ष में धकेल देता है। यदि यह व्यवस्था न होती तो पृथ्वी भी अन्य निर्जीव पिण्डों की तरह ही एक होती और यहाँ जो अनुपम सौंदर्य एवं वैभव बिखरा पड़ा है उसका कहीं अता−पता भी न होता।

सूर्य अपने साथ नौ ग्रह और 43 चन्द्रमाओं का परिवार साथ लेकर एक महासूर्य की परिक्रमा के लिए निकला है। यह यात्रा लाखों वर्षों में पूरी होगी। इस बीच कोई बाल−बच्चा बिछुड़ न जाय इसलिए उन सबको अपने साथ एक चुम्बकीय रस्सी से बाँध रखा है। इतना ही नहीं उनमें क्रियाशीलता बनाये रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा भी भेजता रहता है।

पृथ्वी से सूर्य 109 गुना हैं। दोनों के बीच की दूरी 93000000 मील है। सूर्य की परिक्रमा वह एक वर्ष में पूरी करती है। उसमें उसकी गति प्रति घण्टा 100191 मील होती है। समूचे सौर मण्डल का व्यास 1 शंख 18 अरब किलोमीटर है। इतने क्षेत्र की साज सम्भाल रखे रहने की जिम्मेदारी अपने सूर्य की है। सौर परिवार न केवल सूर्य से बंधा है वरन् उनके सम्बन्ध परस्पर भी इतने घनिष्ठ हैं कि बिना किसी टकराव के वे परस्पर एक दूसरे की अनेकों प्रकार से सहायता करते रहते हैं।

समूचा ब्रह्माण्ड कितना बड़ा है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आसमान में जो तारे दिख पड़ते हैं वे हम से लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं। प्रकाश वर्ष एक पैमाना है जिसे प्रकाश की चाल एक सेकेंड में एक लाख छियासी हजार मील के हिसाब से माना जाता है। इस हिसाब से एक दिन, एक महीना या एक वर्ष कितनी दूरी का बोध है। इसका हिसाब लगाने में ढेरों कागज खप जायेगा। फिर इतने प्रकाश वर्षों का तो कहना ही क्या जितनी कि दूरी उन सबके बीच में है।

ब्रह्माण्ड तेजी से फूल और फैल रहा है। उसके मध्यवर्ती करोड़ों निहारिकाएं और उन निहारिकाओं में करोड़ों सौर मण्डलों का होना। इतने पर भी उन सबका एक दूसरे से दूर हठते आगे बढ़ते जाना यह असमंजस उत्पन्न करता है कि यह फुलाव और फैलाव आखिर कितना आगे तक बढ़ेगा और उसके लिए अन्तरिक्ष की विशालता कितनी होनी चाहिए। सन्तोष उसी सिद्धान्त से होता है कि ब्रह्माण्ड की बनावट गोलाई की है इसलिए फैलते चलते हुए निहारिका मण्डल और सौर मण्डल भी परिभ्रमण की गति अपना लेंगे और एक सीमित अन्तरिक्ष में ही चक्कर काटते रहेंगे।

ब्रह्माण्ड में निहारिकाओं में अभी अनगढ़ मसाला भरा पड़ा है। उनमें विस्फोट हो सकता है और नये सौर मण्डलों की सृष्टि हो सकती है वर्तमान ग्रह-नक्षत्रों में से कितनों की ही स्थिति पृथ्वी जैसी भी हो सकती है और उन में साधारण जीवधारियों से लेकर−मनुष्य से भी अधिक ज्ञान विज्ञान के धनी हो सकते हैं। यह प्रश्न भी विचाराधीन है कि ब्रह्माण्ड भर के बुद्धिमान मनुष्यों में परस्पर तालमेल बैठने से वर्तमान सृष्टि में से सजीव और निर्जीव पिण्डों की गतिविधियों में असाधारण परिवर्तन हो सकता है। स्थिति को देखते हुए उस पुरातन मान्यता को भी बल मिलता है जिसके अनुसार कि लोक-लोकान्तरों में अन्य सशक्त देवताओं की उपस्थिति अन्य लोकों में मानी गई है और उनकी सहायता मनुष्यों को मिलते रहने की बात कही गई है। ग्रहों की निहारिकाओं की उथल−पुथल से पृथ्वी वालों को क्या लाभ मिलता है और किन संकटों की आशंका रहती है। इस संदर्भ में ब्लैक होल, धूमकेतु आदि एक से एक बढ़कर आश्चर्यजनक रहस्य भौतिक विज्ञानियों की पकड़ में आते जा रहे हैं। और भविष्य में अन्तरिक्ष की अधिक शोध बन पड़ने पर मनुष्य की ससीमता असीम हो जायगी।

यहाँ तो हम सबको इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि लघुतम पिण्ड घटकों और विशालतम ब्रह्माण्ड सदस्यों की संरचना करने वाली उसे सृष्टा को मान्यता मिलनी चाहिए जो मनुष्य को मर्यादाओं में रखना चाहता है और कर्मों का प्रतिफल देने में किसी प्रकार का पक्षपात किसी के साथ नहीं करता।


रोटी का इन्तजाम (kahani)

प्रख्यात विभूति हातिम परदेश जाने लगे तो अपनी पत्नी से पूछ बैठे− ‘‘तुम्हारे लिए खाने−पीन का कितना सामान रख जाऊँ?”

“जितनी मेरी आयु हो”−कहकर स्त्री हँस पड़ी।

“तुम्हारी आयु जानना मेरे बूते की बात नहीं।”

“तब तो मेरी रोटी का इन्तजाम भी आपके बूते से बाहर है। यह काम जिसका है उसी को करने दीजिये।” पत्नी की आस्था पर मुग्ध होकर हातिम परदेश चले गये। तब एक पड़ौसन ने पूछा− तो उसे भी हातिम की पत्नी ने जवाब दिया− ‘‘बहिन हम सद्गृहस्थ हैं। इसमें रहते हुए साधना का लाभ लेना है तो हर समय उच्च आदर्शों को ध्यान में रखकर जीवन चलाना होता है। मेरे पतिदेव ईश्वर आस्था और पुरुषार्थ के बल पर अनजान स्थानों पर लोकहित के लिए चले जाते हैं और सफल होते हैं। हम अपनी ईश्वर निष्ठा और पुरुषार्थ की परीक्षा और पुष्टि का प्रयास ऐसे ही अवसरों पर तो कर सकती हैं।’’


मानवी तेजोवलय

मोटे तौर पर चेहरे को देखकर कितने ही व्यक्ति बहुत कुछ जानने और समझने में सफल हो जाते हैं। आकृति देखकर प्रकृति का अनुमान लगाने वाले सूक्ष्मदर्शी नाक, कान, आँख, मुँह आदि की बनावट को नहीं वरन् चेहरे के चारों ओर उमड़ते−घुमड़ते तेजोवलय को ही परखते हैं और उसी के आधार पर व्यक्ति के आन्तरिक व्यक्तित्व का प्रभाव एवं परिचय प्राप्त करते हैं।

तेजोवलय का एक केंद्र चेहरे की ही तरह जननेन्द्रिय क्षेत्र में छाया रहता है, इस क्षेत्र में प्रजनन सम्बन्धी केन्द्र होने से लय का प्रभाव यौन आकर्षण उत्पन्न करने वाला होता है। किशोर वय के भिन्न लिंगों के बीच यह वलय ही अधिक उभार उत्पन्न करता है। समलिंगों की समीपता में वह तेजस् उत्तेजित नहीं होता। कटि प्रदेश को सदा ढके रहने के पीछे यही आधार होता है कि समलिंगों को तेजोवलय भिन्न लिंगों के बीच अनावश्यक उभार न पैदा करे।

सामान्यतया रंग रूप का आकर्षण हर किसी को मुग्ध करता है, पर यह तेजोवलय तद्नुरूप न हुआ तो कुछ ही समय में वह मूल्याँकन बदल जाता है। रूपवान काया में भी विषधर सर्प जैसी विद्रूपता प्रकट हो सकती है एवं कुरूप व्यक्ति अष्टावक्र, सुकरात, गाँधी की तरह सिर आँखों पर बिठाया जाने लगता है। साज−सज्जा द्वारा तो शरीर की कुरूपता एक सीमा तक छिपाई भी जा सकती है, पर तेजोवलय के सूक्ष्म शरीर पर किसी भी प्रकार पर्दा नहीं डाला जा सकता है। सुविकसित अन्तःकरण सम्पन्न व्यक्तियों को किसी की भीतरी स्थिति को पहचानने में देरी नहीं लगती है। यही कारण है कि महामानव किसी की बाह्य सुन्दरता अथवा कुरूपता को अधिक महत्व नहीं देते हैं। वे रंग रूप की अपेक्षा तेजोवलय में संव्याप्त सुन्दरता एवं कुरूपता को वास्तविक व्यक्तित्व मानते हैं। भले−बुरे व्यक्तित्वों के प्रति जनसामान्य की श्रद्धा एवं अश्रद्धा भी इसी अन्तःऊर्जा के आधार पर बनती है।

शरीर को खुला-नग्न छोड़ देने पर शरीर विद्युत की मात्रा स्फुल्लिंगों के रूप में उड़ने लगती है। वस्त्र पहनने का कारण शरीर को सर्दी से बचाना या शोभा बढ़ाना भी हो सकता है, पर मूल कारण तेजोवलय पर आवरण आच्छादित किये रहना ही है। भीतर की ऊर्जा बाहर न निकलने पाये इसीलिए वस्त्रों का आवरण ढका जाता है। आध्यात्मिक साधनाओं में निरत रहने वाले कठोर तप-तितिक्षा के अभ्यासी साधु संन्यासी तथा योगी भी नग्न शरीर में भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाये रहते हैं। पूर्ण नग्न शरीर रखना असभ्य आचरण माना जाता है। इस मान्यता के पीछे प्रमुख कारण सामाजिक मर्यादाएँ हैं, पर आत्मिक कारण यह है कि शरीर को नग्न रखने वाला अपनी, शक्ति तरंगें बड़ी मात्रा में बाहर बिखेरता रहेगा, साथ ही दूसरों के भले−बुरे प्रबल भावों से अपने को बचा भी न सकेगा। धूप का तीव्र प्रभाव नग्न शरीर पड़ता है। इसी प्रकार दूसरों का चुम्बकत्व भी निर्वस्त्र लोगों को अधिक प्रभावित कर सकता है।

साधु, सन्तों, महापुरुषों की माला, जनेऊ, खड़ाऊँ, वस्त्र अथवा अन्य वस्तुएँ उपहार आशीर्वाद स्वरूप पाकर लोग कृतार्थ हो जाते और उनके प्रभाव से देर तक लाभान्वित होते रहते हैं। दीर्घकाल तक उनमें वह दिव्य प्रभाव बना रहता है। भगवान बुद्ध का एक दाँत लंका में आज भी सुरक्षित रखा है। मुहम्मद साहब का एक शिर का बाल काश्मीर की एक मस्जिद में रखा हुआ है। इंग्लैंड के एक गिरजाघर में ईसामसीह का रखा कफ़न कितने ही श्रद्धालुओं की प्रेरणा का केन्द्र बना हुआ है।

तेजोवलय मात्र प्रकाश ही नहीं उसमें चुम्बकत्व भी मिश्रित है। जो दुर्बलों को प्रभावित करता और सशक्तों से प्रभावित होता है। इसे अध्यात्म साधना के विभिन्न स्वरूपों को अपना कर निश्चित ही बढ़ाया जा सकता है। सुपात्र योगी यही कर अपनी सामर्थ्य बढ़ाते हैं।


साधना बनाम मनोकामना

साधना का उद्देश्य किसी के सामने गिड़गिड़ाना, झोली पसारना या नाक रगड़ना नहीं है। दीनता न आत्मा को शोभनीय है न परमात्मा को प्रिय। परमात्मा न खुशामद का भूखा है और न है उसे प्रशंसा की आवश्यकता। उसकी महानता अपने आप में अपनी प्रशंसा है। मनुष्यों की वाणी न उसमें कुछ वृद्धि कर सकती है और न कमी। अपने ही बालक के मुख से प्रशंसा कराना किसी मनुष्य को भी अच्छा नहीं लगता फिर परमात्मा जैसे महान के लिए तो उसमें क्या आकर्षण हो सकता है। प्रशंसा करके किसी से कुछ प्राप्त करने का प्रयत्न ओछे दर्जे का कृत्य माना जाता है। उस चंगुल में ओछे लोग ही फँसते हैं और उसे करने के लिए ओछापन ही तैयार होता है। खुशामद व चापलूसी का गोरख−धन्धा उन्हें पसन्द आता है, जो वस्तुतः प्रशंसा के पात्र नहीं। वे अपने चापलूसों के मुँह से अपनी बड़ाई सुनकर खुशी मना लेते हैं। असली न मिलने पर उस आवश्यकता को नकलियों से पूरा कर लेते हैं। भक्त और भगवान के बीच यदि यही खुशामद चापलूसी का धन्धा चले तो फिर समझना चाहिए दोनों की गरिमा गिर गई।

माँगना बुरा व्यवसाय है। चोरी से भी बुरा। चोर दुस्साहस करता है और खतरा मोल लेता है तब कहीं कुछ पाता है। पर भिखारी उतना भी तो नहीं करता। वह बिना कुछ किये ही पाना चाहता है। कर्म विज्ञान को एक प्रकार से वह झुठलाना ही चाहता है। संसार के स्वाभिमानी अपंग और असमर्थ भी स्वाभिमानी होते हैं। कोढ़ी और अन्धे भी कुछ कर लेते हैं। समाज उन्हें कर्तृत्व के साधन तो देता है, पर मुफ्त में बिठा कर नहीं खिलाता। इसमें देने वाले की उदारता भले ही हो पर लेने वाले को ऋण के भार से दबना पड़ता है और दीन बनकर स्वयं स्वाभिमान का हनन करना पड़ता है। यह हानि उस लाभ से बुरी है जो किसी दान से कुछ प्राप्त करके उपलब्ध किया जाता है।

उपासना से पाप नष्ट होने का वास्तविक अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति जीवन साधना के प्रथम चरण का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं, दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझेगा और उनमें सतर्कतापूर्वक वितरण हो जायेगा, पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश, पर उल्टा अर्थ कर दिया गया पाप कर्मों के प्रतिफल का नाश। कदाचित ऐसी उलटवांसी सही होती तो फिर इस संसार में पाप को ही पुण्य और कर्त्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हजार तरकीबें हैं। उन्हें अपना कर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वंद्व निश्चिन्त रह सकते हैं। दैव दण्ड ही एक मात्र बन्धन था सो इन धर्म ध्वजियों ने उड़ा दिया। अब असुरता को स्वच्छंद रूप से फलने−फूलने और फैलाने का पूरा−पूरा अवसर मिल गया। पाप कर्मों के दण्ड से मुक्ति दिलाने का आश्वासन पूजा−पाठ की कीमत पर जिनने भी दिया है उनने मानवीय आदर्शों और अध्यात्म के मूलभूत आधारों के साथ व्यभिचार किया है।

लघुता को विशालता में−तुच्छता को महानता में समर्पित कर देने की उत्कण्ठा का नाम प्रार्थना है। नर को नारायण−पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने का संकल्प प्रार्थना कहलाता है। आत्मा को आबद्ध करने वाली संकीर्णता जब विशाल व्यापक बनकर परमात्मा के रूप में प्रकट होती है तब समझना चाहिए प्रार्थना का प्रभाव दिख पड़ा, नर−पशु के स्तर से ऊँचा उठकर जब मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होने लगे तो उसे प्रार्थना की गहराई का प्रतीक और चमत्कार माना जा सकता है। आत्म-समर्पण को प्रार्थना का आवश्यक अंग माना गया है।

एक शराबी ने नशे में धुत्त होकर किसी के हाथों अपना मकान सस्ते दाम में बेच डाला होश आया तो अदालत में अर्जी दी कि नशे में होश हवाश ठीक न होने के कारण वह बिक्री की थी। अब होश में आने पर उस इकरार नामे से इनकार करता हूँ। पूजा, प्रार्थना के समय लोग न जाने क्या− क्या स्तुति, प्रार्थना करते हैं। ‘‘मैं तेरी शरण में आया हूँ, तेरा ही हूँ, तेरे चरणों में पड़ा हुआ हूँ, मेरा तो तू ही है। तेरे सिवा मेरा कौन है।” आदि आदि। वे इन शब्दों का अर्थ भी नहीं समझते और न फलितार्थ। जो शब्द कहे जा रहे हैं यदि वे समझ−बूझकर होश−हवाश में कहे गये होते तो जरूर उस स्थिति के अनुरूप जीवन क्रम ढालने और विचारों तथा कार्यों में उनका समावेश करने का प्रयत्न किया गया होता। पूजा स्थल से निकलते ही−जब जब प्रार्थना कथन को कार्यान्वित होने की आवश्यकता अनुभव होती है तब सब कुछ बहुत कठिन प्रतीत होता है। होश में आये हुये शराबी की तरह तब उस कथनी को करनी में परिणति कर सकने की हिम्मत न होने से यही कहना पड़ता है उस इकरार नामे से इनकार करता हूँ जो पूजा के समय सब कुछ भगवान को समर्पण करने वाली शब्दावली के साथ कहा गया था।

प्रार्थना में यही कामना जुड़ी रहनी चाहिए कि परमात्मा हमें इस लायक बनाये कि उसके सच्चे भक्त अनुयायी एवं पुत्र कहला सकने का गौरव प्राप्त करें। परमेश्वर हमें यह शक्ति प्रदान करे जिसके आधार पर भय और प्रलोभन से मुक्त होकर−विवेकसम्मत कर्त्तव्य पथ पर साहसपूर्वक चल सकें और इस मार्ग में जो भी अवरोध आवें उनकी उपेक्षा करने में अटल रह सकें। कर्मों के फल अनिवार्य हैं। अपने प्रारब्ध भोग जब उपस्थित हों तो उन्हें धैर्य पूर्वक सह सकने और प्रगति के लिये परम पुरुषार्थ करते हुए कभी निराश न होने वाली मनःस्थिति बनाये रह सकें। भगवान हमारे मन को ऐसा निर्मल बना दें कि कुकर्म की ओर प्रवृत्ति की उत्पन्न न हो और हो भी तो उसे चरितार्थ होने का अवसर न मिल पाये। मनुष्य जीवन की सफलता के लिये गतिशील रहने की पैरों में शक्ति बनी रहे ऐसी उच्चस्तरीय प्रार्थना को ही सच्ची प्रार्थना के रूप में पुकारा जा सकता है, जिसमें धन, सन्तान, स्वास्थ्य, सफलता आदि की याचना की गई हो और जिसमें अपने पुरुषार्थ कर्त्तव्य के अभिवर्धन का स्मरण न हो ऐसी प्रार्थना को याचना मात्र कहा जायेगा। ऐसी याचनाओं का सफल होना प्रायः संदिग्ध ही रहता है।

भगवान से माँगने योग्य वस्तुयें श्रद्धा, हिम्मत, श्रमनिष्ठा, सच्चरित्रता, करुणा, ममता, पवित्रता और विवेकशीलता जैसी वे सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियाँ हैं जो विपन्नता को सम्पन्नता में बदल देती हैं और अभाव रहते हुए जिनके कारण विपुल सम्पन्नता का सुख अनुभव होता रहता है। प्रगति और सफलता का सारा आधार सद्गुणों पर अवलंबित है। उनके बिना अकस्मात किसी प्रकार कोई लाभ मिल भी जाय तो उसे सम्भालना और स्थिर रखना सम्भव न होगा। सदुपयोग केवल उस वस्तु का किया जा सकता है जो उचित मूल्य देकर उपार्जित की गई है। अनायास बिना परिश्रम के मिली हुई सम्पत्ति का अपव्यय ही होता है और उससे अनेक व्यसन और उद्वेग पैदा होते हैं जिनके कारण वह उपलब्धि सुखदायक न होकर अनेक विपत्तियाँ और विकृतियां उत्पन्न करने का कारण बन जाती हैं। भगवान जिस पर प्रसन्न होते हैं उसे सद्गुणों का उपहार देते हैं क्योंकि वे अपनों आप में इतने महान हैं कि यह साधन सम्पन्नता न भी हो तो भी केवल उन सद्गुणों की सम्पदा के आधार पर मनुष्य सुखी समुन्नत और सम्मानित जीवन जी सकता है। यही दिव्य संपदायें भगवान से मांगनी चाहिए। यही हैं वे विभूतियाँ जिन्हें वे अपने भक्तों को दया करते हैं।

भौतिक सफलतायें हमें अपनी भुजाओं और कलाइयों से माँगनी चाहिए। अपनी अकल को तेज करना चाहिए और सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए। अवरोध उत्पन्न करने वाली त्रुटियों को सुधारना चाहिए। सफलता का द्वारा खुल जायेगा।

भगवान स्वयं अपनी विधि-व्यवस्था में बँधे हुए हैं। उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने आपके साथ तक कोई रियायत नहीं की, अपने सगे सम्बन्धियों तक को छूट नहीं दी। कर्मफल की व्यवस्था को ही सर्वत्र प्रधान रखा। ऐसा न होता तो कोई पुरुषार्थ करने के लिए तैयार ही क्यों होता और कुकर्मों से बचने के लिए किसी को आवश्यकता ही क्या पड़ती? प्रार्थना मात्र से सारी सुविधायें मिल जाती तो फिर कठोर, कर्मठता के लिए कटिबद्ध होने की इच्छा ही क्यों होती?


बहिरंग योग की सरल साधनाएँ

साधना का प्रथम चरण है शरीर का संशोधन। इसमें आहार और विहार में पिछले अभ्यासों को छोड़कर नवीन अवधारणाएँ कार्यान्वित करनी होती हैं। आहार के सम्बन्ध में हमारे अभ्यास स्वाद प्रधान होते हैं और ठूँस−ठूंसकर खाने को भी। यह दोनों ही व्यवहार आहार को तामसिक बना देते हैं। स्वाद वही उपयुक्त है जो पदार्थ में प्रकृति समाविष्ट होते हैं। फलों के अपने−अपने शाक हैं। कच्चे खाये जा सकने योग्य शाकों के भी अपने। उन्हीं की भिन्नता में रस लेना चाहिए और प्रसन्न रहना चाहिए। अन्नों को−शाकों को उबाल लेने पर उनकी कठोरता या अस्वादिष्टता मिट जाती है। उबले शाक प्रायः एक जैसे स्वाद के होते हैं। उबले अन्नों में दाल, चावल, दलिया, खिचड़ी आदि का अपना स्वाद होता है। यह सभी सुपाच्य भी होते हैं। कठिनाई उत्पन्न होती है तलने भुनने में−चिकनाई का समावेश करने से यह शकर एवं नमक मसालों की ऊपर से भरमार करने से। यह तामसिक स्वाद एक प्रकार से नशेबाजी की तरह आदत के अंग बन जाते हैं। इस लोलुपता में आहार की उचित मात्रा का ध्यान नहीं रहता और पेट की पाचन क्षमता से कहीं अधिक खा लिया जाता है। यह व्यतिक्रम आलस्य और प्रमाद पैदा करते हैं। मन में उत्तेजना और चंचलता भी। रोगों की जड़ यहीं से जमती है। यदि आधे पेट खाने−आधे में हवा पानी के लिए गुंजाइश छोड़ने का नियम अपनाया जा सके तो समझना चाहिए कि सामान्य स्वास्थ्य में अभिवृद्धि होगी और रोगी शरीर में सुधार का सिलसिला तत्काल करना पड़ेगा। स्वल्पाहारी योगी होते हैं। इसके लिए सर्वप्रथम अस्वाद व्रत पालन करना पड़ता है। संयमों में सर्वप्रथम स्वाद जप है। इतना तात्पर्य है प्राकृतिक रूप में पदार्थों का जो स्वरूप है उसी में सन्तुष्ट रहना। ऊपर से चिकनाई या मसालों का समावेश नहीं होने देना। जो अन्न या आलू जैसे कठोर प्रकृति के हैं उन्हें उबाल लेना। स्वाद की उपेक्षा करते ही आहार की अनावश्यक मात्रा घट जाती है और उतना ही उदरस्थ करने का अभ्यास बन पड़ता है जो पाचन की मर्यादा के अंतर्गत है।

विहार में शयन−जागरण एवं विश्राम के घण्टों का निर्धारण है। आत्मानुशासन का यह दूसरा चरण है। समय का एक क्षण भी व्यर्थ न गँवाया जाय। श्रम, विश्राम, टहलने, स्वाध्याय, सत्संग जैसे अनावश्यक कार्यों में अपने समय को इस प्रकार बाँध लेना चाहिए कि उसमें आलस्य प्रमाद के प्रवेश की कहीं कोई गुंजाइश न रह पाये। मनमर्जी की दिनचर्या चलने देने में प्रकारान्तर से आवारागर्दी अपनाना है। ऐसी उच्छृंखलता लगती तो अच्छी है पर समय सम्पदा का ऐसा अनावश्यक अतिक्रमण होता है जिसमें कोई महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेकर पूरा करने की बात बन ही नहीं पड़ती। भौतिक या आत्मिक स्तर के जो भी कार्य किये जाते हैं सभी आधे−अधूरे, लँगड़े−काने−कुबड़े रह जाते हैं। उनके कारण असन्तोष उपजता है, अपयश मिलता है और कौशल का स्तर गिरता चला जाता है।

विहार में स्वच्छता और सादगी का भी समावेश है। वस्त्र, उपकरण जिन्हें भी काम में लाया जाय वे भड़कीले, महंगे, न हों। हर वस्तु को स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखा जाय। सादगी सज्जनता और सादगी की साक्षी देती है। स्वच्छ, स्वच्छता, सुरुचि, सुसंस्कारिता और व्यवस्थित बुद्धि की यह मानसिक जागरूकता का चिन्ह है कि वस्तुओं को साफ सुथरी रखा जाय और उन्हें सम्भाल सुधार कर इस प्रकार रखा जाय कि वे सुन्दर प्रतीत हों। व्यवस्था पूर्वक कूड़ा भी कूड़ेदान में ढक कर रखा जाय तो कुरूप नहीं लगता है और बहुमूल्य पात्रों, उपकरणों, वस्त्रों, पुस्तकों को भी बेतरतीब बखेर दिया जाय तो वे कूड़ा प्रतीत होती हैं। हर आँगन, दीवार, फर्नीचर यदि सम्भाला जाता रहे तो वह सब भी सुन्दर चेहरे की तरह आकर्षक लगते हैं। साधना का यह तीसरा प्रसंग है जिसमें मनोयोग का भी समावेश है। यों इसकी गणना विहार में भी हो सकती है।

सुव्यवस्था समय सम्पदा का सुनियोजन करने के साथ मितव्ययिता पर भी आधारित है। हम उतना खर्च करें जितना जीवन धारण करने के लिए नितान्त आवश्यक है। कोई व्यक्ति अधिक कमाता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसे अनावश्यक खर्च करने की छूट मिल गई। समूचा मानव समुदाय एक परिवार है। इसमें समर्थ और असमर्थ सभी मिल−जुलकर रहते हैं। कमाने वाले ही सब कुछ खर्च नहीं कर डालते, वरन् मिल-जुलकर खाते और एक जैसी सुविधा का लाभ उठाते हैं। कमाऊ अधिक खरचे और जो असमर्थ हैं वे मुँह जोहें, तरसें तो यह अनीति किसी सहृदय के लिए अपनाने योग्य नहीं है। हमें औसत भारतीय स्तर का गुजारा करना चाहिए जो अदक्षता अथवा परिस्थिति के कारण गई−गुजरी स्थिति में दिन गुजारते हैं। यदि उन्हें सहारा मिल सके तो निश्चय ही ऊँचे उठने और आगे बढ़ने की स्थिति अपनाने के लिए गतिशील हो सकते हैं। नैतिक जीवन−आध्यात्मिक जीवन की यह भी एक अनिवार्य शर्त है। शान-शौकत में अनावश्यक अपव्यय करने पर हम अध्यात्मवादी जीवन नहीं जी सकते। इस अनाचार से प्रत्यक्ष ही अहंकार बढ़ता है और अनेकों का ईर्ष्या भाजन बनना पड़ता है। वैभव एवं प्रदर्शन की दृष्टि से नहीं हम मात्र सज्जनता और सदाशयता को अपनाये रहकर ही श्रद्धा एवं प्रशंसा के पात्र बन सकते हैं।

व्यावहारिक जीवन में अध्यात्मवादी बनने की बौद्धिक प्रक्रिया यह है कि हम दूरदर्शी विवेकशील बनें। अपने चारों ओर भले−बुरे का मिश्रित पुद्गल भरा पड़ा है। इसमें से कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे यथावत् अपनाया जा सके। यहाँ कीचड़ में कमल खिलते हैं और सुरम्य पौधे पर विष वृक्ष फलते हैं। सुन्दरता के पीछे कुरूपता झाँकती हैं और कुरूपता के अन्तराल में सुन्दरता भरी होती है। अनाज को छाँटा फटका, छाना न जाय तो साथ में मिले हुए कंकड़ दाँत तोड़ेंगे और पेट में पहुँचकर शूल उत्पन्न करेंगे। न सब पुरातन ही अच्छा या बुरा है और न नवीन है। पुराने खण्डहरों और कपड़ों को छोड़ना पड़ता है। पुराना घी बदबू देने लगता है। इसी प्रकार नये प्रचलनों में फैशन परस्ती, नशेबाजी, उच्छृंखलता जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ प्रगतिशीलता कहलाने लगी हैं। अच्छे से अच्छे और बुरे से बुरे काम करने वाले अपनी ही इर्द-गिर्द बड़ी संख्या में विद्यमान रहते हैं फिर इनमें से किनका अन्धानुकरण किया जाय। सम्प्रदायों और धर्मोपदेशकों के कथन में इतना मतभेद होता है कि इनमें से किसी एक को पूर्ण सही ठहराया जाना कठिन है। ऐसी दशा में एक ही मार्ग सुरक्षित रहता है कि सोना खरीदते समय उसे कसौटी पर कसा और आग में तपाया जाय। इसके उपरान्त ही जो खरा हो उसे अपनाया और जो खोटा है उसे त्याग दिया जाय। विवेक की कसौटी पर कसने के उपरान्त किसी कथन या प्रचलन को अपनाया जाय तो यह सत्य के निकट पहुँचने की सरलतम और प्रामाणिक रीति होगी।

बहुत कार्य ऐसे होते हैं जो तत्काल लाभदायक प्रतीत होते हैं और अन्ततः दुःखदायी परिणाम उत्पन्न होते हैं। सस्ते अपराधों की तरह। बहुत से कार्य ऐसे होते हैं जो कष्ट पूर्वक हस्तगत होते हैं पर पीछे चिरकाल तक सुख देते हैं तप साधन और गोताखोर के मोती चयन की तरह। इनमें से किसे अपनाया जाय इसका सही निर्णय वह कर सकता है जिसे दूरगामी परिणाम का अनुमान लगा सकने की क्षमता है। अन्यथा कुछ के बदले ऐसा कुछ हाथ लगता है जिससे चिरकाल तक पश्चाताप करना पड़े।

अनगढ़ मन और सुसंस्कृत विवेक में सदा महाभारत मचा रहता है। लोभ मोह और अहंकार के दैत्य पालन अपनी ओर घसीटते हैं और मानवोचित्त गौरव गरिमा का आग्रह संयम अपनाने और शालीनता की राह पर चलने का होता है। यह अंतर्द्वंद्व छोटे बड़े रूप में सभी के भीतर चलता है। कुसंस्कारी मन और अनगढ़ परिवार धर्म की मूर्खता और अधर्म की बुद्धिमत्ता बताता है। तथाकथित स्वजन सम्बन्धी भी बहुमत और प्रचलन की दुहाई देकर कौरव सेना में भर्ती होने के लिए कहते हैं इस गीतोक्त महाभारत में अर्जुन की तरह गाण्डीव उठाना और भगवान के हाथों रथ की बागडोर सौंप देना विजय−श्री वरण करने का उपयुक्त मार्ग है।


पूर्वाग्रहों से उबरिये

सीमाबद्ध रहने पर मनुष्य की स्थिति कुँए के उस मेढ़क की तरह हो जाती है जो समस्त संसार को उस परिधि में सिमटा देखता है। विस्तार, गहराई एवं जल सम्पदा की दृष्टि से दूसरा कोई क्षेत्र बड़ा भी हो सकता है, इसकी वह कल्पना भी नहीं कर पाता। जो सामने है मात्र वह ही सत्य है, यथार्थ है और सब कुछ है, इस मान्यता के पूर्वाग्रह से वह इस कदर जकड़ा रहता है कि विराट् समुद्र एवं उसकी अथाह जलराशि की जब कभी भी उसके सामने चर्चा होती है तो उसे वह मिथ्या समझता तथा अपनी जानकारी एवं अनुभव को सर्वोपरि मानता है। ज्ञान के उस सीमित दायरे से निकल न पाने तथा पूर्वाग्रह के जाल में बुरी तरह जकड़े रहने की विडम्बना से उबरने का अवसर जीवन पर्यन्त नहीं मिल पाता। कुँए में पैदा होता, बढ़ता और अन्ततः वह मेंढक उसी में मरता है। इसके विपरीत नदियों के प्रवाह के साथ बहने वाली, तालाबों, नालों से निकलकर नदी के मार्ग से समुद्र की अथाह जलराशि में जा पहुँचने वाली मछलियाँ वास्तविकता से परिचित होती हैं उन्हें कुँए, तालाबों का सीमा बन्धन का ज्ञान होता है और समुद्र की विशालता का भी।

सीमा बन्धन से निकलकर विराट् की ओर छलाँग लगा सके तो मनुष्य को भी ज्ञात होगा कि संसार एवं सृष्टि के विषय में बनायी गयी उसकी मान्यताएँ कितनी एकाँगी कितनी अपूर्ण तथा कितनी भ्रामक हैं। सम्भव है जिस क्षेत्र में मनुष्य रहता है, उस सीमित क्षेत्र के लिए वे उपयोगी हों पर आवश्यक नहीं कि बनाये गये पैमाने सर्वत्र ही प्रामाणिक सही और खरे उतरें। उदाहरणार्थ पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सापेक्ष वस्तुओं के द्रव्यमान, लम्बाई चौड़ाई अथवा ऊँचाई मापे जाते हैं पर ये माप स्थिर नहीं हैं, गुरुत्वाकर्षण शक्ति के परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं।

आइन्स्टीन के अनुसार अपने द्रव्यमान के अनुपात में प्रत्येक वस्तु किसी दूसरे वस्तु को अपनी ओर आकर्षित करती है। पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति अधिक होने का कारण है, उसका बड़ा क्षेत्र फल और भारी द्रव्यमान, इस सिद्धान्त के आधार पर वैज्ञानिक न्यूटन द्वारा आविष्कृत गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त में परिवर्तन आया। वस्तुओं के पारस्परिक आकर्षण शक्ति पर प्रकाश डालते हुए रूस के प्रख्यात अन्तरिक्ष विज्ञानी कान्स्टेन्टीन एड्यूवर्डेविचत्सियोल कोवोस्की ने 23 जुलाई 1934 को रूपी पत्र प्रावदा में लिख कि “मैं किसी विषय पर इतना तल्लीन नहीं होता जितना कि पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर विजय प्राप्त कर अन्तरिक्ष यात्रा की समस्या को सम्भव बना देने में आत्म−विभोर हो जाता हूँ।”

इस प्रकार विभिन्न ग्रहों, तारों तथा नक्षत्रों पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति उनके द्रव्यमान और घनत्व के अनुसार भिन्न−भिन्न होती है। इस आधार पर किसी भी वस्तु का द्रव्यमान एक निश्चित स्थान पर स्थायी तो हो सकता है पर दूसरे ग्रह पर उसका भार उतना नहीं होगा। किसी वस्तु का भार कितना होगा यह उस बात पर निर्भर करता है कि जिस धरातल पर वह है, उसका द्रव्यमान और घनत्व कितना है। अस्तु किसी भी वस्तु पर भार स्थिर नहीं माना जा सकता। गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के केन्द्र में शून्य होती है। यदि किसी प्रकार वहाँ पहुँचना सम्भव हो तथा वहाँ भार लिया जा सके तो हर वस्तु का भार शून्य होगा। ऊँचाई की ओर बढ़ने पर भी भार में कमी आती है। समुद्र तक के निकट किसी भी चीज का भार सर्वाधिक होगा क्योंकि वहाँ गुरुत्वाकर्षण शक्ति अधिक है जबकि पर्वतों पर अपेक्षाकृत कम होगा। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति को पार कर जाने पर भारहीनता की समस्या आती है। अन्तरिक्ष यात्रियों को इसीलिए उस तरह के वातावरण में रहने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अन्यथा अनभ्यस्त होने पर कितने ही प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

गुरुत्वाकर्षण शक्ति के साथ जुड़े रोचक तथ्यों में से एक यह भी है कि जो वस्तु धरती पर अत्यन्त भारी लगती है तथा उसे उठाना सम्भव नहीं हो पाता, उसे कोई भी व्यक्ति दूसरे ग्रह पर जहाँ कि आकर्षण न्यून है, आसानी से उठा सकता है। उदाहरणार्थ एक पहलवान यदि 80 कि. ग्रा. वजनी किसी वस्तु को लेकर पृथ्वी पर दौड़ सकता है तो वही चन्द्रमा पर गाय को उठाकर ऊँची चारदीवारी के पार छलाँग लगा सकता है। पर सूर्य पर तो किसी के लिए खड़ा होना भी सम्भव नहीं है क्योंकि वहाँ पृथ्वी से साढ़े सत्ताईस गुनी अधिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। मंगल और बुध ग्रहों पर भी गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम है। उन पर 250 किलोग्राम तक की वजनी वस्तुओं को आसानी से उठाकर छलाँग लगाया जा सकता है। पर बृहस्पति की गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी अधिक है। अधिक खिंचाव होने के कारण वहाँ चलने में भी कठिनाई हो सकती है। मंगल और बृहस्पति के बीच अनेकों छोटे−छोटे क्षुद्र ग्रह हैं जिनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति अत्यन्त कम है, वहाँ भारी भरकम छोटे−मोटे मकानों को भी उठाकर आसानी से चहल कदमी की जा सकती है।

वैज्ञानिक त्सियोलवोस्की के अनुसार विभिन्न ग्रहों पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति की भिन्नता जीवों, वनस्पतियों, पहाड़ों आदि की ऊँचाई पर भी प्रभाव डालती है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी का 1।6 भाग है, अतएव वहाँ पहाड़ों की तुलनात्मक ऊँचाई छः गुना अधिक होगी तथा भार में भी अन्तर आयेगा। जो वस्तु पृथ्वी पर 12 कि. ग्रा. है, वह चन्द्रमा पर 2 कि. ग्रा. के लगभग होगी। पृथ्वी पर 40 फीट किसी कल्पित मनुष्य को चलने में भारी कठिनाई अधिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण हो सकती है पर चन्द्रमा पर उसे किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी।

गुरुत्वाकर्षण का पृथ्वी की परिस्थितियों तथा जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। पृथ्वी पर यदि गुरुत्वाकर्षण न हो तो वायुमंडल भी तत्काल समाप्त हो जायेगा। नदियां, समुद्र स्थिर होकर या तो जम जायेंगे अथवा गैस के रूप में बदल जायेंगे। जीव जन्तुओं एवं वनस्पतियों का विनाश हो जायेगा। गुरुत्वाकर्षण के अभाव में मनुष्य को उसी प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा जिस प्रकार कि अन्तरिक्ष यात्रियों को करना पड़ता है। गुरुत्वाकर्षण रहित वातावरण में कोई वस्तु तब तक गतिशील नहीं हो सकती है जब तक कि किसी वाह्य शक्ति का दबाव न पड़े। जबकि किसी वस्तु के गतिशील हो जाने पर उसे रोकना कठिन होगा। गुरुत्वाकर्षण के न रहने पर मनुष्य को ऐसा प्रतीत होगा कि जैसे हृदय की गति मन्द होती जा रही हैं तथा स्पन्दन क्षीण होता जा रहा हो। ऐसा आभास होगा जैसे बहुत ऊँचाई से गिर रहा हो। वह अधिक समय अपनी शारीरिक हलचल बनाये नहीं रख सकता।

चन्द्रमा से अन्यान्य ग्रहों का रूप भी सर्वथा भिन्न दिखायी देता है। वहाँ से सूर्य अत्यन्त चमकीला तथा रंग में गहरा नीला दृष्टिगोचर होगा। आकाश तारकोल की तरह काला दिखायी देता है तथा पृथ्वी झिलमिलाती नजर आती है जबकि तारे आकाश में मोती जैसे हलचल रहित चमकते प्रतीत होते हैं। चन्द्रमा पर सूर्योदय तथा सूर्यास्त पृथ्वी की तरह क्रमिक तथा लालिमायुक्त नहीं दिखायी देगा बल्कि उदय और अस्त अकस्मात होता दिखायी पड़ता है। वायुमण्डल के अभाव में वहाँ तेज आवाज भी सुनायी नहीं देती। यदि चन्द्रमा पर फुटबाल को जोर से मारा जाय तो वह एक मील ऊपर तक उछल सकती है। अरबी घोड़ा हवा से बातें करेगा। भारी से भारी वस्तुएँ भी हल्की−फुल्की गेंद जैसी वजन की मालूम होंगी। अस्तु भार की मान्यता गुरुत्वाकर्षण के सापेक्ष सतत् बदलती रहती हैं। इस तरह के अगणित अन्यान्य तथ्यों से जो अपरिचित हैं तथा अपनी मान्यता के प्रति अडिग हैं उन्हें पूर्वाग्रही ही कहा जायेगा।

संसार विषयक मान्यताओं के संदर्भ में ही नहीं सत्य के अन्यान्य पक्षों के बारे में भी जो एकाँगी सोचते तथा उसे ही परिपूर्ण मानते रहते हैं, उनकी स्थिति किसी पूर्वाग्रही से कम नहीं है। अधिक अच्छा हो, अपने ज्ञान की क्षुद्रता को नम्रतापूर्वक स्वीकार किया जाय तथा नयी जानकारियों की उपलब्धि के लिए अपनी अन्वेषक विवेक दृष्टि सदा खुली रखी जाय।


उपासना का उद्देश्य समझें

यह समझना भूल है कि पूजा करना ईश्वर पर ऐसा अहसान करना है जिसके बदले में उसे हमारी उचित अनुचित मनोकामनायें पूरी करनी ही चाहिए। ओछे स्तर के लोग ऐसा ही सोचते हैं और इसी प्रलोभन से पूजा−पत्री का औंधा−सीधा ठाठा रोपते हैं। आधार ही गलत हो तो बात कैसे बने−पार कैसे पड़े? पूजा करने वालों से दोस्ती और न करने वालों से ‘कुट्टी’। यदि ऐसी रीति−नीति अपनाने लगे तो फिर ईश्वर को समदर्शी कैसे कहा जा सकेगा? फिर संसार में कर्त्तव्य और पुरुषार्थ की आवश्यकता क्या रहेगी? यदि पूजा द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करके मनोकामनायें पूर्ण की जा सकती हैं तो फिर इतने सस्ते और सरल मार्ग को छोड़कर क्यों कोई कष्ट साध्य गतिविधियाँ अपनाने को तैयार होगा? यदि यह तथ्य सही होता तो मन्दिरों के पुजारी सर्व मनोरथ सम्पन्न हो गये होते और साधु पंडित जो ईश्वर का ही झण्डा उठाये फिरते हैं सर्व कामना सम्पन्न रहे होते। फिर उन्हें अभाव असन्तोष क्यों सताता? प्रत्यक्ष है कि यह वर्ग और भी दयनीय स्थिति में है। कारण कि उपासना को कामना पूर्ति का माध्यम समझा गया और आवश्यक कर्म निष्ठा से मुँह मोड़ लिया गया। इस गलत आधार को मान्यता मिल जाने से आस्तिकता का उपकार नहीं हुआ वरन् उसे असत्य और संदिग्ध मानने की अनास्था ही बढ़ी।

उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित करने की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि आन्तरिक स्वच्छता का क्रम बिना व्यवधान के निर्बाध गति से चलता रहे। नित्य का अभ्यास ही किसी महत्वपूर्ण विषय में स्थिरता और प्रखरता बनाये रह सकता है। यदि पहलवान लोग नित्य का व्यायाम छोड़ दें, फौजी सैनिक परेड की उपेक्षा कर दें तो फिर उनकी प्रवीणता कुछ ही दिन में अस्त−व्यस्त हो जायेगी। स्कूली पढ़ाई छोड़ने के बाद जिन्हें फिर कभी पुस्तकें उलटने का अवसर नहीं मिलता वे उस समय के सारे प्रशिक्षण भूल जाते हैं। याद केवल उतना ही अंश रहता है जितना काम में आता रहता है। मन की भी यही स्थिति है, वह पशु प्रवृत्तियों के निम्नगामी प्रवाह में तो अनायास ही बहता रहता है, पर यदि उसे उच्च स्तर पर बनाये चढ़ाये रहना हो तो पतंग उड़ाने वालों की तरह बहुत कुछ पुरुषार्थ करना होता है। पानी को कुएँ से निकालने टंकी तक पहुँचाने में नित्य ही प्रयत्न करना पड़ता है पर नालियाँ अपने आप चलती रहती हैं। गिरा हुआ पानी अपने आप नीचे ढुलकता जाता है और उसके बिना किसी यन्त्र मशीन या प्रयास के नालियाँ बहती रहती हैं। निकृष्ट बनाना हो तो संचित पशु प्रवृत्ति को स्वच्छन्द छोड़ देना पर्याप्त है वे जीवन वृक्ष पर अमर बेल की तरह छा जायेंगी पर यदि उत्कृष्टता का उद्यान लगाना हो तो उसके लिये चतुर माली जैसा कला कौशल एवं मनोयोग नियोजित करना पड़ेगा। उपासना मनःक्षेत्र को सुरभित उद्यान की तरह फल फूलों से लदा हुआ बनाने के कुशल पुरुषार्थ की तरह ही समझी जानी चाहिए। वस्तुतः मनोकामनायें पूर्ण करने का यह विवेक संगत एवं यथार्थ मार्ग है। मन देवताओं का भी देवता है। यदि उसे साध सँभाल लिया जाय तो वह कल्पवृक्ष से कम नहीं अधिक ही उपयोगी एवं वरदानी सिद्ध होता है। उपासना इस मन कल्पवृक्ष को सुविकसित बनाने की वैज्ञानिक विधि−व्यवस्था का ही नाम है।

आत्मोत्कर्ष में अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को, उपासना को अपने नित्य क्रम में सम्मिलित करना ही चाहिये। यह नहीं सोचना चाहिये कि हम ईश्वरीय आदेशों का पालन करते हैं फिर उपासना की क्या जरूरत। लुहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि शिल्पी अपने श्रम और प्रयोजन में लगे रहते हुए भी यह आवश्यक समझते हैं कि उनके औजारों पर जल्दी−जल्दी धार धरी जाती रहे। नाई अपने काम में ठीक तरह लगा रहता है पर उस्तरा तो उसे बार−बार तेज करना पड़ता है। मन ही वह औजार है जिससे क्रिया-कलापों को ठीक तरह करते रह सकना सम्भव होता है। यदि भौंथरा होने लगे तो फिर कर्तृत्व का स्तर भी गिरने लगेगा। इसलिये जहाँ अन्य अनेक कार्यों में समय लगाया जाता है वहाँ मन की मलीनता को स्वच्छ करने और उसे प्रखर बनाने के प्रयास को भी नित्य का एक आवश्यक कर्त्तव्य माना जाना चाहिए। पेट की भूख बुझाने के लिए बार−बार भोजन करना पड़ता है। आत्मा की भूख बुझाने के लिए भी उसे उपासना का आहार बार−बार नित्य ही दिया जाना आवश्यक है।

पुरुषार्थ की प्रखरता में उपासना अत्यधिक सहायक होती है, उसे समय नष्ट करने वाली बाधा नहीं माना जाना चाहिए। पारलौकिक पुरुषार्थों में अधिक उत्कृष्टता लाने के लिये अपने समय का एक अंश उपासना में नियत रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिमोपाल लगा देने से−लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उज्ज्वल जीवन क्रम रहते हुये भी यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायेगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्मकाण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।

स्वांति के जल से मोती वाली सीपें ही लाभान्वित होती हैं। अमृत उसी को जीवन दे सकता है जिसका मुँह खुला हुआ है। प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते हैं। इन पात्रताओं के अभाव में स्वांति का जल, अमृत अथवा प्रकाश कितना ही अधिक क्यों न हो उससे लाभ नहीं उठाया जा सकता। ठीक यही बात देव उपासना के सम्बन्ध में लागू होती है। घृत सेवन का लाभ वही उठा सकता है जिसकी पाचन क्रिया ठीक हो। देवता और मन्त्रों का लाभ वे ही उठा पाते हैं जिन्होंने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से−विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है जो बताये हुए अनुपान और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते। फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरन्तर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुये पात्रों में उतना ही चल रह पाता है। जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता। देवता और मन्त्रों से लाभ उठाने के लिये पात्रता नितान्त आवश्यक है।

साधना ही अपनी महिमा और महत्ता है। उसे गंगा जल से कम नहीं अधिक ही महत्व दिया जा सकता है पर साथ ही साथ यह भी समझ लेना चाहिए कि वह सर्व समर्थ नहीं है। गंगा जल से बनी हुई मदिरा अथवा गंगा जल में पकाया हुआ माँस सर्व समर्थ नहीं गिने जायेंगे। शौचालय में प्रयुक्त होने के उपरान्त का गंगाजल भरा पात्र देव प्रतिमा पर चढ़ाने योग्य न रहेगा। गंगाजल की शास्त्र प्रतिपादित महत्ता यथावत् बनी रहे इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उसके संग्रह उपकरण एवं स्थान ही पवित्रता भी अक्षुण्ण बनी रहे।

रंगरेज कपड़ा रंगने की प्रक्रिया उसकी धुलाई से आरम्भ करता है। यदि मैला कपड़ा रंगने के लिए दिया जाय तो पहले उसे धोवेगा। धुले हुए कपड़े पर ही रंग चढ़ता या चढ़ाया जाना सम्भव होता है। उपासना को रंगाई कह सकते हैं और साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है, पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ−बूझ भी भौंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया श्रम भी सार्थक न रहेगा।


प्रतिपादन और उसका प्रभाव

तत्वज्ञान को पढ़ने समझने वाले लोग भी उन मार्ग पर प्रायः स्वयं नहीं चल पाते। दूसरों को उपदेश करने वाले और अध्यात्म युक्त धर्म मार्ग पर चलने की आये दिन चर्चा करने वाले लोग भी जब स्वयं उस मार्ग पर चलते नहीं, तो कथनी और करनी का अन्तर दूसरों में क्या उत्साह भर सकता है और किस प्रकार उन्हें उस कथन पर विश्वास करने के लिए उद्यत कर सकता है?

करनी और कथनी का अन्तर छिपाये नहीं छिपता। वह हवा के साथ उड़कर असंख्यों के मस्तिष्क से जा टकराता है। और अनुमान आशंका से आगे बढ़कर वह चर्चा का विषय बन जाता है, काना−फूसी का रूप धारण करता है और सन्देह बढ़ते−बढ़ते सर्वजनीन चर्चा का विषय बन जाता है। और यदि वैसा अन्तर न हो तो अनेक प्रतिभावानों द्वारा लगाये गये लाँछन भी हवा में उड़ जाते हैं और उनका कोई गम्भीर प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तविकता असंख्य विरोधों को चीरती हुई विज्ञजनों के अन्तराल में श्रद्धा बनकर जा बैठती है। इसीलिए नीतिकारों से निन्दा प्रशंसा की चिन्ता न करके वस्तुस्थिति को प्रामाणित बनाने का परामर्श दिया है।

कथनी और करनी का अन्तर यों अखरता तो हर क्षेत्र में है। पर धर्म और अध्यात्म क्षेत्र में यह अन्तर लोगों को प्रतिपादित दर्शन के प्रति ही अनास्था उत्पन्न करता है। सुनने वाले सोचते हैं कि यह मार्ग इतना सही और व्यावहारिक रहा होता तो प्रवक्ता स्वयं ही उसे क्यों न अपनाता और उन बातों से स्वयं क्यों वंचित रहता जिन्हें प्राप्त करने के लिए दूसरों से कहा जा रहा है।

विचारणीय है आदर्शों का प्रतिपादन करने वाले स्वयं उनसे क्यों पीछे हटते हैं। इसका मुख्य कारण उनकी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाएँ होती हैं जिन्हें कामनाएँ पूरी होती हैं। भावना के आगमन में यह कामनाएँ दबी ही नहीं रहती। अपेक्षित साधन या अवसर मिल जाने पर भी वे आग में ईंधन डालने की तरह बढ़ती ही जाती है। उनकी पूर्ति के निमित्त उठती हुई उत्कण्ठा इतनी व्याकुलता उत्पन्न करती है कि मनुष्य अपने द्वारा किये गये प्रतिपादनों को भुलाकर संकीर्ण स्वार्थपरता की दलदल में गहरा ही धँसता जाता है और कुकृत्य तक करने लगता है। अभ्यास हो जाने पर पीछे वह आत्म-ग्लानि भी नहीं होती जो विवेकवानों के मन में उठनी चाहिए यह महत्वाकाँक्षाओं का समूह ही ‘काम’ कहा गया है और इसे पतन के गर्त्त में धकेलने वाला शत्रु कहा गया है। गीताकार के शब्दों में यह ‘काम’ ही ऐसा उद्वेग है जो मनुष्य को अपनी और दूसरों की आँखों में गिरा देता है।

इस विडम्बना से कैसे पीछा छूटे? इस प्रश्न का भक्तिमार्गी उत्तर देते हैं कि ईश्वर की शरण में जाना और ज्ञानमार्गी कहते हैं अपने को सीमित संकीर्णता से उबारकर सबको अपने और अपने को सब में देखना। ऐसी मनःस्थिति में परमार्थ ही स्वर्ग बन जाता है और दूसरों को सुखी बनाने वाले कार्य अपनी निजी सफलता से बढ़कर आनन्ददायक प्रतीत होने लगते हैं।

ईश्वर की शरीर में जाने की बात भी ऐसी ही है। अदूरदर्शी परमात्मा को कोई व्यक्ति विशेष मानते हैं। और उसे भी उन्हीं दुर्बलताओं से ग्रसित मानते हैं जिनसे कि मनुष्य घिरे रहते हैं। पूजा उपचार के निमित्त प्रयुक्त किये जाने वाले काल्पनिक ईश्वर और सर्वव्यापी निराकार परब्रह्म में भी ऐसा ही, जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है।

इस संदर्भ में शास्त्र कहता है कि−

सर्वभूतस्य मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ईक्षते योग मुक्तात्मा सर्वत्र सम दर्शनः। −गीता

अर्थात्− सम्पूर्ण प्राणियों में अपने को और अपने को सब प्राणियों में योगीजन देखते हैं। जिन्हें सर्वत्र एक ही तत्व दिखता है वे मुक्तात्मा हैं। वही योगी हैं।

अयमांसर्वभूतेषु भूतात्मानां कृतालयम्। अर्हयेदान मानाभ्यां मैत्राभिन्नेनं चक्षुषा। मनसैतानि भूतानि प्रणमेद बहुमान यत्। ईश्वरो जीव कलया प्रविष्टो भगवानिति॥ −गीता

अर्थात्− सब प्राणियों को मेरी ही आत्मा समझकर उन्हें भिन्न−अभिन्न भाव से देखना, उनकी सेवा सहायता करना, मान देना, इन प्रयोजनों में संलग्न जीव भगवान को प्राप्त करता है।

यच्चक्षुषा न पश्यति, येन चक्षुंषि पश्यन्ति तदेव ब्रह्मत्वविद्धिनेदं यदिदं उपासते। −उपनिषद्

अर्थात्− जो आँखों से नहीं देखा जा सकता। जिसके कारण नेत्र देखते हैं। उसी परब्रह्म को जानना चाहिए। जिसकी पूजा उपासना की जाती है वह ब्रह्म नहीं है।

परमेश्वर की शरण में जाना हो तो इस तरह जाना चाहिए कि उत्कृष्टताओं के समुच्चय परमेश्वर को अपने अन्तरंग और बहिरंग जीवन में ओत−प्रोत कर लें। यदि साकार ब्रह्म से सम्बन्ध जोड़ने की इच्छा हो तो यह विराट् विश्व ही उसकी प्रतिमा है। उसकी पूजा−अर्चा के निमित्त संसार में सदाशयता और सज्जनता की सुसंस्कारिता का अभिवर्धन अपनी समूची सामर्थ्य के अनुरूप करना चाहिए।

प्राणों को अपने में और अपने को प्राणियों में समाया हुआ देखने का अर्थ यह है कि दूसरों के दुःख बँटाने और अपने सुख बाँट देने में अपना सन्तोष और आनन्द निरन्तर चढ़ता चले। जो बरताव दूसरों द्वारा अपने लिए किये जाने की अपेक्षा करते हैं वही हम स्वयं भी दूसरों के लिए करते हैं। साथ ही एक बात का और भी ध्यान रखें कि औसत नागरिक जैसा जीवन क्रम अपनाये। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का यथार्थवादी तत्वज्ञान इस आधार पर नियत है और अपनी बचत के समय श्रम और साधनों को उनके लिए लगा सकना सम्भव होता है जिन्हें कि ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की मान्यता के अनुरूप शरीर और परिवार की तरह अपना माना जाना चाहिए।

दृष्टिकोण में इतनी उदात्त आत्म-भावना या ब्रह्म परायणता का समावेश हो जाने पर ही अन्तःकरण उस ढाँचे में ढलता है जिसके आधार पर कि उच्चस्तरीय तत्वज्ञान को प्रतिपादन तक सीमित न रखकर अपने चरित्र व्यवहार का भी अविच्छिन्न अंग बनाया जा सके।

ऐसे एकात्म भाव के ढाँचे में अपने को ढाल लेने वाले दूसरों को जो परामर्श देते हैं वह सुनने वालों के कानों तक सीमित नहीं रहता और मस्तिष्क को झकझोरता हुआ अन्तराल तक उतर जाता है। इतना ही नहीं, ऐसा भी होता है कि उनका व्यक्तित्व वातावरण में उच्चस्तरीय ऊर्जा बखेरे और उससे परिचित अपरिचित अनेकों अनायास ही सत्प्रेरणाऐं ग्रहण करते और प्रभावित होते चले जायें। ऐसा जीवन ही धन्य है जो स्वयं तरे और अन्य असंख्यों को तारे।

इस स्तर का जीवन कितने दिन जिया गया इस पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है। वे अल्पायु होने पर भी वयोवृद्धों से बढ़कर है और जिनने भारभूत जीवन जिया वे दीर्घायु होते हुए भी बालकों से भी गये बीते अबोध हैं। कहा गया है कि−

तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते।

अर्थात्− तेजस्वियों की आयु कितनी हो गई। इसकी समीक्षा नहीं करनी चाहिए वे तो अजर−अमर होते हैं।


अजनबी अंग्रेज (kahani)

एक अजनबी अंग्रेज अस्पताल में अपने मित्र से मिलने जा रहे थे। टैक्सी वाले अजनबीपन का लाभ उठाकर मनमाने दाम माँग रहे थे। एक जापानी सज्जन अपनी कार लेकर उधर से निकल रहे थे। उनने इशारा करके अंग्रेज को अपनी कार में बिठा लिया। अस्पताल का रास्ता मुश्किल से पाँच मिनट का था। उसके दरवाजे पर उनने छोड़ दिया। किराये की बात पूछी तो उनने कहा− ‘‘यह भाईचारे का तकाजा था, यों ही वसूल हो गया। अब लेना-देना कुछ नहीं है।


थियोसोफी का तत्व दर्शन

रूस में जन्मी एक बालिका जन्म से ही अपने साथ अद्भुत संस्कार लेकर आई थी। आध्यात्म साधनों में घंटों एक निष्ठ भाव से निमग्न रहती। जब वह पाँच वर्ष की थी तभी वह तत्वज्ञान सम्बन्धी प्रश्नों के ऐसे उत्तर देती मानो वह ब्रह्म विद्या के गूढ़ रहस्यों का गहरा अध्ययन भी, अभ्यास और अनुभव भी कर चुकी हो। नाम था उसका ‘ब्लावस्की’ आयु के साथ शिक्षा भी बढ़ती रही और साधना अनुभूति तथा निष्ठा भी।

चवालीस वर्ष की आयु में वे अमेरिका गई। सैर सपाटे या कला−कौशल सीखने के लिए नहीं, वरन् उस जिज्ञासा का समाधान करने जो वहाँ के ‘फार्म हाउस’ के बारे में उनने सुन रखी थी। अमेरिका के उस केन्द्र में दिव्यात्माओं के दर्शन कराये और सन्देश सुनाये जाते थे। उनकी सत्ता को प्रामाणित करने वाले घटनाक्रम भी उस संस्थान में होते रहते थे। ‘ब्लावस्की’ अपनी मान्यताओं को दूसरे लोगों द्वारा प्रत्यक्ष की दिखने से उन्हें हर्ष भी था और गर्व भी। वे वह सब आँखों से देखना चाहती थीं। इसलिए लम्बी यात्रा का कष्ट उठाते हुए वे वहाँ पहुँचीं।

उन्होंने बारीकी से देखा कि इसमें कहीं जादूगरों द्वारा किये जाने वाले छल छद्म जैसा तो कुछ नहीं है। पर अनेक परीक्षाओं के उपरान्त यथार्थता यथार्थता ही रही। वे उस संदर्भ में अधिक जानने के लिए वहीं रुक गईं। इसी बीच अपनी ही जैसी लगन वाले एक और जिज्ञासु साधक से उनकी भेंट हुई। नाम था− आलकाट। दोनों का परिचय हुआ। विचार विनियम होता रहा और वे लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ब्रह्म विद्या का प्रकाश वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर संसार भर में फैलाया और जन−साधारण को उपलब्ध कराया जाय। इसी निर्णय को क्रियात्मक रूप देने के लिए न्यूयार्क में थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना हुई। यह सन् 1875 की बात है।

इसके उपरान्त ‘ब्लावस्की’ हिन्दुस्तान चली आईं। उनकी मान्यता थी कि आडम्बरों के बढ़ जाने पर भी भारत में अध्यात्म का तत्वज्ञान और साधना विधान विद्यमान है। ऐसे प्रयासों के लिए वही उर्वर भूमि रही है। अस्तु भारत भ्रमण के उपरान्त उनने यहीं बस जाने का निर्णय किया। मद्रास के समीप अडवार नामक स्थान में सोसाइटी का प्रधान कार्यालय बना और वाराणसी में उसकी भारतीय शाखा का मुख्यालय। यों संस्था का विस्तार संसार के 60 देशों में है और उनके अनेक नगरों में उनकी शाखा प्रशाखाएँ हैं।

इंग्लैण्ड के प्रो. लेडवीटर तो संस्था के सिद्धान्तों से इतने प्रभावित हुए कि इन्होंने अपना जीवन ही इस निमित्त अर्पित कर दिया। जब वे इंग्लैण्ड से भारत आ रहे थे तब रास्ते में यह सन्देह भी मन में उठ रहा था कि उनका निर्णय सही एवं उपयोगी भी है या नहीं। इसके उत्तर में अचानक ही एक कागज उनके हाथ में आ गया, जिसमें उठाये गये कदम को सही बताया गया था। लेडवीटर का विश्वास और भी अधिक परिपक्व हो गया और वे सच्चे मन से इस निमित्त समर्पित हो गये। भारत में एन्टीवीसेन्ट का सहयोग उन्हें मिला और संस्था की गतिशीलता देखते−देखते द्रुतगति से बढ़ने लगी।

थियोसोफी ने अध्यात्म तत्वज्ञान के अन्यान्य पक्षों पर प्रकाश डालते हुए यह प्रतिपादन विशेष रूप से किया है कि उच्च भावना सम्पन्न मनुष्यों का उद्देश्य दिव्य शक्तियाँ तलाशती रहती हैं और जो उनकी कसौटी पर खरे उतरते हैं उनको आगे बढ़ने की प्रेरणा और समय-समय पर समुचित सहायता प्रदान करती रहती हैं। देवत्व का संरक्षण और अभिवर्धन उनका प्रधान कार्य है। इस समुदाय को थियोसोफी ने “मास्टर्स” कहा है। उनका तात्पर्य देवात्माओं में से जो सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं, अन्तरिक्ष में विचरण करते हैं, भावनाशील चरित्रवानों की तलाश करते हैं और उन्हें श्रेष्ठता की दिशा में बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं। ऐसी आत्माओं का निवास बहुधा हिमालय के उस क्षेत्र में रहता है जो तिब्बत के समीप पड़ता है। यह अध्यात्म का ध्रुव केन्द्र है। ईश्वरीय इच्छा को जानकर देवात्मा ‘मास्टर्स’ इसी क्षेत्र में संसार भर की देखभाल करते हैं ओर धर्मतत्त्व का−सद्भाव का अभिवर्धन करने के लिए देवदूतों जैसी मध्यवर्ती भूमिका सम्पन्न करते हैं। स्थूल शरीर न होने से वे प्रत्यक्ष क्रियाएँ तो नहीं कर पाते पर अपने दिव्य शरीर से पवित्र आत्माओं के माध्यम से वैसा कराते रहते हैं जो सामयिक लोक कल्याण के लिए आवश्यक है।

थियोसोफी क मूर्धन्य संचालकों द्वारा कतिपय बड़े और प्रामाणिक ग्रन्थ लिखे गये हैं जिनमें “टाक्स ऑन दि पाथ ऑफ आकल्टिज्म” “एट दि फीट ऑफ दि मास्टर्स” और “दि लाइट ऑन दि पाथ” अधिक प्रख्यात हैं।

इन पुस्तकों का प्रधान प्रतिपादन यह है कि यदि मनुष्य अपने आपको पवित्र प्रखर एवं सत्पात्र बना ले और आत्मोत्कर्ष तथा लोक मंगल के प्रति अभिरुचि का अभिवर्धन करे तो उसे देवात्माओं का अदृश्य अनुदान एवं वरदान हस्तगत होता रहता है।

इन मान्यताओं की पुष्टि में सोसाइटी द्वारा प्रकाशित उन अनेक घटनाओं तथा व्यक्तियों के उद्धरण हैं जिनमें धर्म प्रेमियों ने सत्प्रयोजन के लिए कदम बढ़ाते हुए किस प्रकार और कितनी अदृश्य सहायताएँ उपलब्ध कीं। यह हो सकता है कि इन सहायकों के प्रत्यक्ष दर्शन न हों या विशेष परिस्थितियों में हो भी जांय, किन्तु वे भीतर ही भीतर यह अनुभव अवश्य करते हैं। सत्प्रयोजनों में इतनी प्रगति मात्र उनके निजी पुरुषार्थ से ही नहीं हो रही है वरन् उसके सफलता के पीछे कोई अदृश्य किन्तु अति समर्थ हाथ भी काम कर रहे हैं।

मरणोत्तर जीवन के बारे में थियोसोफी की मान्यता है कि आत्मा मरती नहीं। न किसी स्थान विशेष पर कैद रहती है। वरन् इसी अपने अन्तरिक्ष में परिभ्रमण करती रहती है। पुराने घर और सम्बन्धियों को पहचानती है। उनसे सहानुभूति भी रखती है, पर यह मानकर दुःखी नहीं होती कि शरीर छोड़ना पड़ा और किन्हीं घनिष्ठों से बिछुड़ना पड़ा।

मृतात्माएँ थकान मिटाने के लिए विश्राम भी करती हैं, पर पीछे सक्रिय हो जाती हैं और अपने पिछले अनुभवों के आधार पर वे नये क्रिया कलाप में सन्निद्ध होती हैं। दुष्टात्मा भूत-प्रेत की योनि में जाते तो हैं, पर वे डराने धमकाने के अतिरिक्त किसी का कोई बड़ा अनिष्ट नहीं कर सकते और न महत्वपूर्ण सहायता कर सकने की उनमें क्षमता होती है। उनके साथ सम्बन्ध सधने से मनुष्य को घाटा ही पड़ता है। इसलिए उस मिशन के प्रतिपादनों में भूत विद्या की जहाँ भर्त्सना की गई है वहीं ‘मास्टर्स’ −देवात्माओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने का लाभ बताते हुए उस प्रक्रिया का विधान भी बताया गया है।

‘ब्लावस्की’ जीवन के अन्तिम दिनों में अपना महान ग्रन्थ ‘सीक्रेट ऑफ डाक्ट्रिन’ लिख रही थीं। वह सात बड़े खण्डों में प्रकाशित हुआ है। लेखन कार्य कीं अधूरी स्थिति में ही उनका अन्त समय आ पहुँचा। वे गहरी बीमारी में फँस गई। पर उनके ‘मास्टर’ ने प्रकट होकर आश्वासन दिया कि उनकी मृत्यु को तब तक रोक रखा जायेगा जब तक वे हाथ में लिये कार्य को पूरा नहीं कर लेतीं। ऐसी ही हुआ भी।

थियोसोफी की पूजा पद्धति में सभी प्रमुख धर्मों के मंत्र लिये गये हैं और सर्व धर्म समभाव का उनमें से उपयुक्त प्रतिपादनों के चयन को प्रोत्साहन दिया गया है। इसके संस्थापक ईसाई धर्मावलम्बी थे फिर भी हिंदू धर्म की मान्यताओं को ही इस मिशन में प्रधानता दी गई है। हिंदू विश्वविद्यालय का प्रारंभ सर्व प्रथम हिंदू विश्वविद्यालय का प्रारंभ सर्व प्रथम हिंदू नेशनल कालेज के रूप में थियोसोफी वालों ने ही किया था।


Quotation

राजहंस दूध पीते हैं जल छोड़ देते हैं। मोती चुगते हैं काड़े नहीं खाते। ऐसी व्रतशीलता निभाकर कोई भी श्रेष्ठ बन सकता है।


प्रकृति के रहस्य अपने अन्तराल में खोजें

हम प्रकृति के असीम समुद्र में एक छोटी मछली की तरह रह रहे हैं। हम उसके मध्यान्तर में रहने वाले प्राणी हैं और वह वायुमण्डल की तरह हमारे चारों ओर घिरी है। इतना होते हुए भी हम उसके रहस्यों को अत्यन्त स्वल्प मात्रा में ही जान पाये हैं। मछली जन्म से लेकर मरण पर्यन्त जिस जलाशय में रहती है उसके सम्बन्ध में वह नगण्य जानकारी से अवगत होती है। उस जल का निर्माण किन गैसों से हुआ है? उसमें क्या रासायनिक पदार्थ घुले हैं, बेचारी को इतनी तक जानकारी नहीं होती।

प्रकृति के अनेकों रहस्य हमने जान लिये हैं और उस आधार पर कितने ही वैज्ञानिकों ने आविष्कार करके अपने को सुविज्ञ कहलाने संसार के सुविधा साधन बढ़ाने एवं दर्शकों को चमत्कृत करने में सफलता पाई है। इतने पर भी जो जानना शेष है वह असीम है। उसे समझ पाने में सीमाबद्ध मानव इंद्रिय शक्ति एवं बुद्धि की दौड़−धूप की मर्यादा में रहकर ही जो जान सकता था जान पाया है, या जान सकेगा। इसके अतिरिक्त भी जो असीम जानने योग्य बचा रहेगा उन्हें पूरी तरह समझ पाना कभी सम्भव हो सकेगा इसकी आशा नहीं के बराबर है।

हम धरातल के बारे में बहुत कुछ जानते हैं क्योंकि उसी पर रहते हैं और वायुयानों से उसकी स्थिति को हस्तामलकवत देख पाते हैं किन्तु इस पर भी उस पर निर्वाह करने वाले अगणित कृमि कीटक जैसे प्राणियों की अतीन्द्रिय क्षमता के सम्बन्ध में बहुत ही कम जान सके हैं। जीवन के संचालन में सहायक बैक्टीरिया और मरण के अग्रदूत वायरसों की विचित्रता और बहुलता के सम्बन्ध में अत्यल्प जान पाते हैं।

दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करने का आदिम काल से अभ्यास है प्रजनन के संदर्भ में भी बहुत कुछ जाना जा सका है किन्तु यह सफलता अभी भी हस्तगत नहीं हुई है कि पुत्र या पुत्री में से जिसे चाहे उसे जन्म दे सकें।

ऊपर आसमान में दृष्टि उठाकर देखने से बादलों के उठाव तो दिखते हैं पर यह नहीं कहा जा सकता कि वे कब, किस स्थान पर कितनी मात्रा में जल वर्षायेंगे। आँधी−तूफान कब आ धमके, और कितनी उखाड़−पछाड़ करने के बाद कहाँ जाकर बुलबुले की तरह समाप्त हो जाय इसे कौन जानता है? किस क्षेत्र में किस महामारी का कितना प्रकोप होगा और वह चिकित्सा प्रयोजन को झुठलाकर कितनों को काल का ग्रास बना लेगा इस तक की तो समग्र जानकारी मिल नहीं पाई है। निश्चित और सफल चिकित्सा की बात तो और भी आगे की है।

समुद्र की गहराइयों में कहाँ, क्या भरा है। इसके सम्बन्ध में जो ज्ञान उपलब्ध हो सका है वह नगण्य है। अन्तरिक्षों की शून्यता में क्या पदार्थ, कितनी मात्रा में कहाँ भरा रहता है इसकी जानकारी कुछेक मील तक ही निहित हो सकी है। अनन्त आकाश में बिखरे हुए ग्रह तारकों और निहारिकाओं की वास्तविक स्थिति क्या है? इस सम्बन्ध में जो कुछ कहा जाता है वह सब अनुमान के आधार पर है। कौन जाने उन कल्पनाओं में कितनी सचाई है।

अपने ब्रह्माण्ड के ठीक पीछे उतना ही सशक्त और समग्र एक प्रति विश्व चलता है। एण्टी यूनिवर्स एंटौ मैटर−एन्टी एटम आदि की अस्तित्व मान्यता प्राप्त कर सकता है। किन्तु काया के साथ लगी रहने वाली इस छाया के सम्बन्ध में हम कितना कम जानते हैं। यदि उसे जान सके तो इन लोक-लोकान्तरों में, वहाँ के वातावरण में आमूल-चूल स्तर का परिवर्तन हो सकता है।

इससे भी अधिक स्पष्ट अंतर्जगत है। जिसमें मृतात्माएँ निवास करतीं और मनुष्य के साथ भले−बुरे व्यवहार करती रहती हैं। उनके क्रिया-कलापों के परिचय हमें एक निश्चित वास्तविकता की तरह मिलते रहते हैं। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे किस स्थिति में कहाँ रहते और किस प्रकार निर्वाह करते हैं? विभिन्न धर्म सम्प्रदायों में यहाँ तक कि परामनोविज्ञानियों ने भी उनकी सत्ता के प्रमाण परिचय उपलब्ध कर लेने पर भी उनके निर्वाह एवं कार्यक्षेत्र के बारे में कोई निश्चित बात नहीं कही है। मरणोत्तर जीवन अभी भी उतना ही रहस्यमय बना हुआ है जितना कि पहले कभी था। बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद ने यों उन मान्यताओं की बहुत कुछ सीमाबद्ध कर दिया है फिर भी अभी तक ऐसे प्रमाण मिलते रहते हैं जो सर ओलियर लाज जैसे विज्ञानियों को अध्यात्मवादी बना देते हैं।

वर्षा में यों पानी ही बरसता है। पर घटनाएँ साक्षी हैं कि उनमें कई बार शकर घुली हुई पाई गई है और ऐसी लालिमा वर्षी है जो कपड़ों और जमीन को रँग दे। आसमान से जीवित मछलियों मेंढकों जैसे जीवित जन्तुओं का बरसना तो और भी अधिक आश्चर्यजनक है।

कई रेगिस्तानों में अभी भी संगीत सुनाते रेत के कण पाये जाते हैं। खारे समुद्रों में मीठे पानी के फव्वारे उछलते पाये गये हैं। रबड़ की तरह मोड़े मरोड़े जाने वाले और पानी पर तैरने वाले पत्थर यह बताते हैं कि प्रकृति के विभिन्न पक्षों के संदर्भ में जो निष्कर्ष निकाले गये हैं वे आँशिक रूप से ही सही हैं।

ब्रह्माण्ड में अनेक ब्लैक होलों के अस्तित्व विद्यमान हैं जिनके बारे में किन्हीं साधनों से निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है पर वे अन्तरिक्ष में अवस्थित इतने भयंकर भँवर हैं जो अपनी चपेट में आने वाले धरती आकाश के अनेक भारी भरकम घटकों को उदरस्थ कर जाते हैं और यह पता नहीं चलता कि उनका हड़पा हुआ पदार्थ किस लोक को चला गया। कहा इतना भर जाता है कि मरे हुए तारों के प्रेत पिशाच हैं।

मनुष्य यों एक सीधा सादा-सा प्राणी है पर उसका मस्तिष्कीय रहस्यवाद कभी-कभी इतना विलक्षण जाता है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। मोटे ग्रन्थों को स्मृति पटल पर सुस्थिर कर लेना। छोटी आयु में ही संगीत आदि की विलक्षण प्रतिभाओं का परिचय देना चकित कर देता है कि बिना किसी क्रमबद्ध प्रशिक्षण के यह विभूतियाँ किस प्रकार जाग पड़ीं।

अतीन्द्रिय क्षमताओं के क्षेत्र में कई मनुष्य ऐसे पाये गये हैं कि जो दूर दर्शन, दूर श्रवण, भविष्य कथन, विचार सम्प्रेषण आदि विशेषताओं से सम्पन्न होते हैं और अविज्ञात बातों को बिना किन्हीं सहायता के इस प्रकार बताते हैं मानो उनने वह सब प्रत्यक्ष देखा हो। उड़न तश्तरियाँ अभी भी रहस्य बनी हुई हैं। उन्हें बुद्धि भ्रम और प्रकृति घटकों की विलक्षणता कहकर समाधान किया गया है फिर भी अनेक द्वारा छोड़े अवशेषों या साथ ले जाये गये पदार्थों की यथार्थता का पता लगाने पर इन समाधान कर्ताओं को स्वयं असमंजस होता है कि लोकान्तरों से आवागमन का यह कोई माध्यम ही तो नहीं है।

रेगिस्तानों में जहाँ पानी का कोई आधार नहीं उगने वाले ‘करटैक्ट’ पौधों को हरे−भरे देखकर यह आश्चर्य होता है कि इन परिस्थितियों में वे जीवन जल किस प्रकार और कहाँ से प्राप्त करते हैं।

अपनी धरती तोप के गोले से भी अधिक तेजी से सूर्य की परिक्रमा करती है, अपनी धुरी पर घूमती है, लहराती है। इतने पर भी उस पर रहने वाले हम मनुष्यों को इससे तनिक भी प्रभावित नहीं होना पड़ता यह कैसे आश्चर्य की बात है। सभी ग्रह अधर में लटके हुए हैं और द्रुतगति से दौड़ते हैं फिर भी नीचे नहीं टपक पड़ते। यह कैसी मजबूत पारस्परिक आकर्षण की मजबूत रस्सियाँ उन्हें आपस में बाँधे हुए हैं यह कैसे आश्चर्य की बात है।

कई बार कई मनुष्यों के शरीर से झटका देने वाली बिजली या अग्निकाण्ड खड़ा कर देने वाली ज्वाला फूट पड़ती देखी गई है। 90 प्रतिशत पानी वाले इस शरीर का ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ना कितना अचरज भरा है।

मनुष्य ने अनेकों कल−कारखाने, पुल, बाँध आदि बनाये हैं पर वह अपने जाति वालों को एक धर्म, एक संस्कृति, एक कानून और एक देश बनाकर रहने के लिए सहमत न कर सका। उसके बुद्धि वैभव को इतना भी न कर पाने पर किस आधार पर सराहा जाय। अपराधी आतंकवादियों को काबू में रखना और युद्धों की अपेक्षा पंच फैसले से जो समस्याओं का हल न निकाल सकी। सर्वमान्य समता का सिद्धान्त मात्र पुस्तकीय प्रतिपादन बनकर रह रहा है यह कैसी विडम्बना है। करोड़ों को गरीबी, बीमारी, अशिक्षा और पिछड़ेपन की चक्की में पिसते रहने पर भी सभ्यता विकास के दावे कितने थोथे हैं, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता में कोई सन्देह न होते हुए भी उसके हाथ नगण्य जितना ही लगा है।

न्यूटन के आविष्कारों की जिस मण्डली में भूरि−भूरि प्रशंसा हो रही थी। उनमें वक्ताओं की सदाशयता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए भी उसने सच्च मन से इस वास्तविकता को स्वीकारा था कि वह एक छोटे बच्चे की तरह समुद्र के किनारे चक्कर लगाकर तुच्छ तुल्य के सीप घोंघे ही ढूँढ़ पाया है। जो जानना बाकी है वह इतना असीम है कि उसके ढाँचे की कल्पना तक नहीं की जा सकती।

सही बात भी यही है। हमारी सत्ता कितनी विलक्षण क्यों न हो पर वह शरीर में आबद्ध और मानसिक दृष्टि से प्रतिबन्धित है। हम अपने मस्तिष्क का सात प्रतिशत भाग काम में ला पाते हैं और 93 प्रतिशत ऐसे ही प्रसुप्त एवं अविज्ञात स्थिति में पड़ा रहता है। शरीर संरचना और उसके अनुरूप तालमेल बिठाते हुए जीवनचर्या बनाने तक में हम समर्थ नहीं हो सके अन्यथा उसे सौ वर्ष ही नहीं सैकड़ों वर्षों तक तपस्वियों की तरह जिया जा सकता था।

विज्ञान के भौतिक पक्ष पर ही यत्किंचित् अन्वेषण करने और थोड़े से चमत्कार प्रस्तुत करने में ही हमने सफलता पाई है। सो भी आधी−अधूरी। क्योंकि ब्रह्म और प्रकृति के सभी कार्य सुव्यवस्थित और सुनियोजित रीति से चल रहे हैं। जब हम इसमें देखते हैं तो उस अचंभे को अपने ज्ञान की अपूर्णता न कहकर प्रकृति के अपवाद कहकर अपने को समग्र सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं।

भौतिक बुद्धि और भौतिक उपकरणों की सहायता से किये गये अन्वेषण और निकाले गये सिद्धान्त सदा अपूर्ण और विवादास्पद ही बने रहेंगे। यथार्थता तक पहुँचाने के लिए हमें अपनी ब्राह्मी चेतना जगानी होगी और सृष्टा के साथ योग द्वारा एकात्मता स्थापित करने के आधार पर यह जानना होगा कि प्रकृति के रहस्यों में से जो अभी अविज्ञात बने हुए हैं उनका तात्विक कारण क्या है?

जो खिलौने हाथ लग गये हैं उनसे मन बहलाने या किसी दूसरे के शिर में दे मारते हुए उसे लहू-लुहान कर देने की विद्या सरल है। समुद्र की ऊपरी सतह पर तो नाव में बैठकर या हवा भरी रबड़ की कुप्पी पेट में बाँध−कर भी तैरा जा सकता है। पर लम्बी साँस ले सकने की क्षमता अर्जित करके पनडुब्बियों की तरह समुद्र की तली में मोती ढूँढ़ निकालना कितना कठिन है। उसे उस प्रकरण में पुरुषार्थ करने के अभ्यस्त लोग ही जान सकते हैं।

यदि हमारी अभिरुचि अविज्ञात को विज्ञात बना सकने की बुद्धिमत्ता अपनाने में हो तो उसका सही तरीका एक ही है कि अपने को अंतर्मुखी बनाने का अभ्यास डालें कि अपने भीतर कितना तिलस्म भरा हुआ है। योगी तपस्वी इन्हीं अनुभूतियों को अर्जित करने और रहस्यमय अदृश्य क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयत्न करते हैं। चक्रों, कोशों, ग्रन्थियों, उपत्यिकाओं में समाहित रहस्य ऐसे हैं जिनकी क्षमता और स्थिति समझ लेने पर मनुष्य बाह्य जगत में प्रकृति के रहस्यों को जानने में समर्थ हो सकता है।

चेतना का केन्द्र मस्तिष्क और सम्वेदना का स्रोत हृदय है। यदि इन दोनों चेतना केन्द्र के साथ अपनी अनुभूतियों का तादात्म्य किया जा सकता है तो ब्राह्मी चेतना के साथ भी अपना सम्बन्ध जुड़ सकता है। सच्चे सम्बन्धी परस्पर अपने रहस्यों को भी साक्षी पर प्रकट कर देते हैं। प्रकृति की अधिष्ठात्री मातृ शक्ति और चेतना के निकटवर्ती केन्द्र परब्रह्म के साथ सम्बन्ध जोड़ा जा सके तो समझना चाहिए कि सभी रहस्यों के उद्घाटन की चाबी हस्तगत हो गई।

मनुष्य की अपनी आवश्यकता, मर्यादा और क्रिया-शीलता की परिधि सीमित है। उतने भर से ही कार्यरत रहा जाय तो उतना समग्र रूप से उपलब्ध हो सकता है जो सरल जीवन को सुखपूर्वक जीने के लिए आवश्यक है इतना हस्तगत हो सके तो मनुष्य हँसती−हँसाती, उठती−उठाती जिन्दगी जी सकता है।

कदाचित किसी को रहस्योद्घाटन में ही रुचि हो और प्रकृति के अविज्ञात आधारों को समझने की उत्कण्ठा हो तो उसके लिए आवश्यक है कि आत्म−संरचना और उससे सम्बन्धित रहस्यों को जानने का प्रयत्न करें। जैसा कि हमारे पूर्ववर्ती ऋषि तपस्वी करते रहे हैं। इस आधार पर विज्ञान के वे रहस्य भी हस्तगत हो सकते हैं जो भौतिक उपकरणों से−बौद्धिक उछलकूद से एक सीमा तक भी सम्भव है। रहस्यों की चाबी तो उस प्रकृति पुरुष के हाथ में है जिसके साथ सम्बन्ध जोड़ने में हम प्रायः कतराते ही रहते हैं।


Quotation

ईश्वर को प्रसन्नता करने के लिए तीन काम पर्याप्त हैं− नदी जैसी उदारता, सूरज जैसी गतिशीलता और पृथ्वी जैसी सहनशीलता।


अपना घर (kahani)

महाराष्ट्र के मान्य साहित्यकार आचार्य प्रहलाद केशव अत्रे के पास संचित सम्पदा उन दिनों पचास लाख निश्चित की गयी थी।

मरते समय उसकी वसीयत सारे राष्ट्र के नाम करके ट्रस्ट बना दिया। बच्चे तो शिक्षा प्राप्त करके अपने पैरों पर खड़े होने योग्य पहले से ही हो गये थे। उन्हें उनने उत्तराधिकार में कुछ भी नहीं दिया। वसीयत में लिखा− सारा देश ही मेरा परिवार है, थोड़े से वंशजों के साथ बँधा हुआ नहीं।

परिवार से बढ़कर तपोवन कोई है नहीं। कहीं अन्यत्र भटकने की अपेक्षा अपना लक्ष्य यहीं खोजना चाहिए।

एक कलाकार संसार की सबसे सुन्दर वस्तु का श्रेष्ठतम चित्र बनाना चाहता था। पर यह समझ नहीं पा रहा था कि वह वस्तु क्या है? सो पूछने के लिए निकल पड़ा।

सन्त से पूछा तो उनने कहा− ‘श्रद्धा’, क्योंकि उससे भगवान तक मिल सकता है।

एक नव वधू से पूछा− तो बोली “प्रेम” इससे दो आत्माएँ एक होती हैं।

आगे चलकर वहीं प्रश्न एक सैनिक से पूछा−उसने कहा− ‘‘शान्ति” क्योंकि इससे असंख्यों की जानें बचती हैं।

तीनों की ही बातें ठीक थीं। पर तीनों का सम्मिश्रण कैसे हो? इसका समाधान खोजते घर लौट आया।

घर में प्रवेश करते ही बच्चा लिपट गया उसकी आँखों में असीम श्रद्धा थी और पत्नी ने आरती उतारी उसकी भावनाओं में प्रेम छलक रहा था और सारे घर में सुख−शान्ति का वातावरण बन गया। तीनों का समन्वय हो गया।

कलाकार का समाधान हो गया। उसने एक अति सुन्दर चित्र बनाया जिसके ऊपर लिखा था− ‘‘अपना घर।”


जीवन जीने की कुशलता

प्रत्यक्षतः साधनों का महत्व ही माना जाता है। क्योंकि दिखाई भी आँखों से वही पड़ता है। उन्हीं के आधार पर किसी की क्षमता, योग्यता, सफलता का अनुमान लगाया जाता है, पर यह स्थूल दृष्टि है। स्थूल ही नहीं अवास्तविक भी। क्योंकि साधन कितने ही विपुल क्यों न हों अन्ततः वे होते पदार्थ ही हैं। पदार्थों को कोई भी व्यक्ति खरीद और सजा सकता है। भले ही उस विषय में वह प्रवीण पारंगत न हो।

बाजार में बहुमूल्य वस्तुओं की दुकानें होती हैं। उन्हें यथास्थान रखने से लेकर बेचने तक का काम मुनीम गुमाश्ते करते हैं। वे वस्तु की विशेषता बताने से लेकर ग्राहक को लुभाने, खरीदने के लिए आतुर करने तक का काम करते हैं। उन्हीं की कुशलता से दुकान चलती है। मालिक भरपूर लाभ भी उठाता है, पर इनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो उन पदार्थों के सम्बन्ध में गहरी प्रवीणता रखता हो जो इन्हें चलाकर, बनाकर दिखा सके। स्पष्ट है उनके साधन जुटाने और उन्हें सजाने की योग्यता भर पाई है। बैंक से रुपया कर्ज लेने− मौके की दुकान उपलब्ध करने−मुनीम गुमाश्ते फुर्तीले नियुक्त करने, वस्तु का विज्ञापन करने जैसे कलाएँ जानी हैं। उन मशीनों को अच्छी तरह चलाना, जहाँ खराबी आने लगी है, उसे दुरुस्त कर देना उनका काम नहीं है जो मालिक बने हुए हैं और इज्जत तथा पैसा कमाते हैं। बहुमूल्य मशीनों की सजी−धजी लाखों की पूँजी वाली मशीनों तथा दुकानों की वास्तविक स्थिति यही होती है। देखने वाले भले ही मालिक को सारा श्रेय देते रहें।

हलवाई की छोटी−सी दुकान का उदाहरण लीजिए। उसमें मिठाइयाँ बनाने वाले कारीगर अलग होते हैं। वे चुपचाप अपने कौने में बैठे मिठाइयाँ बनाने में लगे रहते हैं। किसी मिठाई में कुछ खराबी आ जाय तो उसे नया उपाय अपनाकर सुधारना भी वे ही जानते हैं। उनके कला−कौशल से ही दुकान प्रख्यात होती है। ग्राहक उसी के कारण टूटते हैं और मालिक इसी आधार पर मालदार बनते हैं। किन्तु दुकान पर काम करते हुए दूसरे ही दस आदमी दिख पड़ते हैं। सजाकर रखने वाले, तोलने वाले, हिसाब रखने वाले, आवश्यक वस्तुएँ बाजार से लाने वाले, सफाई तथा स्टोर वाले, यही सब दुकान पर काम करते हुए दिखाई पड़ते हैं। ग्राहक उन्हीं को पहचानते हैं। दुकान उन्हीं के बलबूते चलती दिखाई पड़ती है। मालिकी का परिचय बड़े वाले बोर्ड से मिलता है। किन्तु यह रहस्य बिरलों को ही मालूम है कि उस दुकान की चसकदार मिठाइयों की ख्याति किसकी विशेषता पर निर्भर है। वह तो अपना कौशल बढ़ाता और चुपचाप बैठा अपना काम करता रहता है। यहीं बात मशीनों की, दर्जी की या दूसरी तरह की दुकानों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। उनका प्रत्यक्ष, प्रदर्शनात्मक, साधन परक स्वरूप बनाकर खड़ाकर देना एक बात है और विशिष्टताओं के आधार पर ख्याति और प्रामाणिकता एकत्रित करना दूसरी। सफलताओं का श्रेय किसे मिले। इसकी साधारण दृष्टि दूसरी होती है और विशेष, बारीक, गहरी दृष्टि दूसरी।

जीवन बहुमूल्य फर्म है। इसमें भी प्रत्यक्ष साधनों का ही महत्व दिखता है। मोटी परख उतना ही पकड़ पाती है। भगवान का दिया हुआ सौंदर्य, पूर्वजों का छोड़ा हुआ धन−बैंक का सहयोग−उपयुक्त स्थान पर दुकान कुशल कर्मचारी आदि का श्रेय संयोगों को ही दिया जा सकता है। व्यक्तित्व को श्रेय तब मिलता है जब अनायास उपलब्ध हुए साधन हाथ में न होते और अपनी ही सूझ-बूझ अथवा दौड़-धूप से सारा सरंजाम जुटाया गया होता। महामानवों के छोटे काम भी उनके यश को अजर-अमर बना देते हैं। जबकि धन कुबेरों का आकाश पाताल जितना खर्च किया हुआ लगाया गया धन, लोगों की आँखों तले नहीं आता। क्योंकि मानवी विवेक बुद्धि यह पहचानती है कि साधनों का बाहुल्य और व्यक्तित्व का स्तर इन दोनों के बीच क्या अन्तर होता है और दोनों में से किसे कितनी श्रद्धा सराहना मिलनी चाहिए।

प्रसंग मानव जीवन के गौरव का है। जिसके पास अधिक साधन, सरंजाम, पद, सम्मान प्राप्त हैं−वह चमड़े की आँखों को ही चकाचौंध में डाल सकता है। उसे उसका सौभाग्य भी कह सकता है। पर जिनके पास सूक्ष्म बुद्धि है−विवेक दृष्टि है−वह मात्र एक ही बात देखता है कि कर्ता के निजी व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का उसमें कितना समावेश हुआ है।

साधन जड़ है और कौशल चेतना। साधन जमा कर लेना और उनसे बनी गाड़ी को पटरी पर लुढ़का देना किसी के लिए भी सरल है। किन्तु अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता की छाप किसी पर छोड़ना सर्वथा दूसरी। व्यक्तित्व के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में जितनी उत्कृष्टता और प्रामाणिकता होती है, उसी अनुपात से अन्यान्यों की अन्तरात्मा तक गहरी छाप पड़ती है। इसी आधार पर प्राप्त की हुई सफलता अभिनन्दनीय और अनुकरणीय बनती है।

हर काम में आकर्षण और दबाव आते हैं। इनसे विचलित न होना और उत्कृष्टता का हर कीमत पर बनाये रहना, सामान्य काम नहीं है। असफलताएँ, विपरीत परिस्थितियां और आक्रामक प्रतिकूलताएं विशेषतया आदर्शवादी जीवनचर्या के साथ छेड़खानी करती रहती हैं। कभी−कभी तो वे इतनी भारी और विकट होती हैं कि आदमी को हताश उद्विग्न कर देती हैं। कभी ऐसी होती हैं कि दूसरे दुनियादारों की तरह ओछे हथकंडों पर उतर कर किसी तरह काम चलाना पड़ता है। ऐसे ही अवसर परीक्षा की घड़ी होते हैं। यह आग में खेलना है। इस भट्टी में से खरा सोना ही पास होता है।

आदर्शवादी जीवन को विशेषतया ऐसी प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ता है। उनसे पार होना सिद्धांतवादी हिम्मत और दृढ़ता का काम है। वह न हो तो घाटा सहकर− मुसीबत में पैर जमाये रहना हर किसी का काम नहीं है। यह मात्र चरित्रवानों के लिए ही सम्भव है। चरित्र का अर्थ है−महान मानवीय उत्तरदायित्वों की गरिमा को समझना और उसका हर कीमत पर निर्वाह करना।

इस आकाश में जमीन से बहुत ऊँचाई पर ग्रह, तारक टँगे हुए और चमकते हुए दिखाई पड़ते हैं। यह उनका विस्तार और प्रकाश ही है, जो चिर अतीत से लेकर अद्यावधि यथावत् यथास्थान चमकता दिखाई पड़ता है। आकाश में उड़ने वाले झंझावात उनकी स्थिरता और गरिमा को कोई आघात नहीं पहुँचा पाते। मनुष्य की गरिमा भी ऐसी ही है जो यदि आदर्शवादी कौशल के अनुरूप गढ़ी और ढली हो तो उसके पतन पराभव का कोई कारण नहीं बनता यों जब तब तो छोटी बदली भी सूर्य चन्द्र के प्रकाश को धूमिल करती देखी गई है।

जीवन मनुष्य के हाथों में सौंपा गया सबसे शानदार और महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। जिससे उसे सँभाले रहना और शानदार बनाये रहना सीख समझ लेना चाहिए कि उसी की कुशलता और विभूति सत्ता सराहनीय है। जिनके पास ऐसी कीर्ति सम्पदा है वे साधनों के अभाव में भी ऊँचे उठते और सफल होते हैं। अनेकों को प्रकाश देना और पार करना ऐसे ही प्रतिभावानों का काम है।


कमाया तो जेब काटकर (kahani)

कमाया तो जेब काटकर भी जा सकता है और, अनैतिक तरीके अपनाकर भी, किन्तु अनीति का उपार्जन, भले ही श्रम से ही क्यों न किया गया हो, कभी भी स्वीकारा नहीं जा सकता।

एक लड़का अपने पिता की आज्ञा पर चलता था। उसे सिखाया गया था कि परिश्रम की कमाई खानी चाहिए। लड़का एक दिन चोरों के गिरोह के साथ हो लिया और किसी के घर में सेंध लगाकर अपने हिस्से के 100 रुपये घर ले आया। बाप ने एक दिन में इतने रुपये कमाने की बात आश्चर्य से पूछी−लड़के ने कहा− यह परिश्रम की कमाई है और सारा विवरण बता दिया।

बाप ने कहा− ध्यान रखो कमाई मात्र परिश्रम की ही नहीं ईमानदारी की भी होनी चाहिए।


मनोबल का अभिवर्धन और सदुपयोग

मनुष्य की काया मजबूती की दृष्टि से बड़े प्राणियों की तुलना में दुर्बल भी कही जा सकती है। पर उसका मनोबल ऐसा विलक्षण है कि यदि प्रयत्नपूर्वक शरीर को सुदृढ़ बनाने में लग जाय तो उससे कुछ से कुछ बन सकता है। जिनने विभिन्न प्रकार की बलिष्ठताओं सम्बन्धी कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उनमें से अधिकाँश ऐसे थे जिन्हें आरम्भिक दिनों में गया−गुजरा ही माना जाता था पर अपने मनोबल का उपयोग करके आश्चर्यजनक प्रगति कर सकने में समर्थ हुए।

हरियाणा के चन्दगीराम आरम्भिक दिनों में क्षय से बुरी तरह ग्रसित थे। योरोप के सैण्डो जुकाम से बुरी तरह पीड़ित रहते थे और शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र था पर जब उन्होंने अपने शरीर को सम्भालने का निश्चय किया और सुधार के नियमों को दृढ़तापूर्वक कार्यान्वित करने लगे तो संसार के माने हुए पहलवानों में उनकी गणना होने लगी और स्थिति में काया−कल्प जैसा परिवर्तन हो गया।

कालिदास और वरदराज युवावस्था तक मूढ़मति समझे जाते थे विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन तक की बुद्धि आरम्भिक दिनों में बहुत मोटी थी किन्तु इन लोगों ने जब अपने बुद्धि पक्ष में तीक्ष्णता लाने का निश्चय किया तो उनकी विद्वता प्रथम श्रेणी के मनीषियों में गिनी जाने लगी। ओलंपिक खेलों और सरकसों में अद्भुत काम करने वाले−कीर्तिमान स्थापित करने वाले आरम्भ से ही वैसी स्थिति में नहीं थे। उनने अपने को किसी विशेष ढाँचे में ढालने का सच्चे मन से प्रयत्न किया और उस स्थिति तक जा पहुँचे जिसे देखकर साथियों को उनकी प्रगति के पीछे कोई जादू चमत्कार दिखने लगा।

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, दयनीय दरिद्रता वाले परिवार में उत्पन्न हुए। उपयुक्त वातावरण और साधन न होते हुए भी ऊँचे दर्जे के वकील बने राजनीति में प्रवेश किया तो चुनावों में 13 बार हारे। इतने पर भी उनने अपना मन छोटा न होने दिया। मनोबल स्थिर रखा और प्रयत्नों में ढील नहीं की। अन्ततः अमेरिका के अद्वितीय प्रतिभावान राष्ट्रपति बन सके। इन अमेरिकी राष्ट्रपतियों में जार्ज वाशिंगटन और गिरफींटा जैसों को पैतृक सुविधा साधन नहीं मिले। वरन् अभावों और प्रतिकूलताओं से जूझते हुए− अपना रास्ता आप बनाते हुए आगे बढ़ सके।

इतिहास के पृष्ठ पलटे जाँय तो सुविधा साधनों के आधार पर व्यक्तित्व का विकास करने वाले लोग बहुत ही कम मिलेंगे। वे सुविधाओं की बहुलता का विलासी उपयोग करने में ही व्यक्तित्व की दृष्टि से हेय और हीन बनते गये हैं। प्रगतिशीलों की जीवन गाथा बताती है कि मनोबल और साहस ही छोटी परिस्थिति वालों को प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचाने में समर्थ हुए हैं। जिनने अपने ऊपर नियमित व्यवस्था दृढ़ता और साहसिकता का पल्ला पकड़ा उनके प्रगति पथ को कोई भी अवरुद्ध न कर सका।

दृष्टि पसार कर देखा जाय तो गये गुजरे स्तर का जीवनयापन करने वालों में से अधिकाँश ऐसे रहे हैं जिनने अपने व्यक्तित्व को उठाने वाले गुण कर्म, स्वभाव को प्रगतिशील बनाने में ध्यान नहीं दिया। अपने को हीन मानते रहे और साहस भरे नये कदम उठाने से कतराते रहे। दूसरों का मुँह ताकते रहे और यह आशा लगाये बैठे रहे कि अन्य लोग कृपा कर उनकी सहायता करेंगे और अपने कंधे पर रखकर ऊँचा उठावेंगे। अन्ततः उनकी यह आशा निराशा में ही परिणत होती रही।

कितने ही व्यक्ति देवताओं की मनुहार करके अपने ऊपर सुयोग बरसाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। अवगति का दोष ग्रह नक्षत्रों या भाग्य को देते रहते हैं। पर इससे बनता क्या है। मात्र आत्म-प्रवंचना करके किसी प्रकार उठती उमंगों का समाधान कर चुप बैठते और दिन काटते हुए जिन्दगी बिता देते हैं।

आत्म−हीनता मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। उसके रहते भविष्य अन्धकारमय ही दिखता रहता है और आशा का प्रकाश किसी कोने से उठता नहीं दिखता। ऐसे लोग या तो दीन हीन, शोषित प्रताड़ित परिस्थितियों के साथ समझौता करके मौत के दिन पूरे करते हैं या विवशता में कोई चारा न देखकर पलायनवादियों की तरह मोर्चा छोड़कर भाग खड़े होते हैं और साधु बाबा जैसा कोई विचित्र वेश बनाते हैं अथवा आत्म-हत्या कर बैठने जैसे कोई अविवेक पूर्ण कदम उठाते हैं।

धन को बड़ी वस्तु माना जाता है। कई शरीर सौष्ठव और शिक्षा के प्रमाण पत्रों को महत्व देते हैं। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि मनोबल के अभाव में अन्य सभी उपलब्धियां धूल के बराबर हैं। उनके सहारे मनुष्य बहुत थोड़ी सुविधाएँ अर्जित कर सकता है। किन्तु मनोबल के प्रखर होने पर उसका हर कदम प्रगति की दिशा में उठता है।

यह मनोबल किसी के द्वारा अनुदान में नहीं मिलता। अपनी व्यक्तिगत सूझ−बूझ के सहारे ही उसे बढ़ाया जाता है। मनोबल का प्रथम प्रयोग और अभ्यास अपने दुर्गुणों से जूझने और सद्गुणों को बढ़ाने के माध्यम से किया जाता है। लोग यह भूल जाते हैं कि छोटी−छोटी दुर्बलताएँ मनुष्य को उसी प्रकार छूँछ बना देती हैं जैसी कि फूटे घड़े में बूँद−बूँद रिसते रहने पर उसे खाली कर देता है और इसके विपरीत बड़ा कण जमा करने में मन भर का बड़ा पात्र भर जाता है।

दुर्गुणों में चोरी बेईमानी जैसे दोषों की प्रमुखतया निन्दा की जाती है। किन्तु सच पूछा जाय तो आलस्य और प्रमाद सबसे बड़े दुर्गुण हैं। अस्त−व्यस्तता और अव्यवस्था के रहते व्यक्ति न तो प्रतिभावान बन सकता है और न अन्यान्यों पर अपनी छाप छोड़ सकता है। भले ही वह कितना ही योग्य क्यों न हो। वह जिस काम में भी हाथ डालेगा उसमें खामियाँ ही खामियाँ भरी दृष्टिगोचर होंगी। ऐसे लोगों को कोई दायित्वपूर्ण काम सौंपने में भी लोग कतराते हैं। और बेईमान न होने पर भी अव्यवस्था के कारण उसे गये−गुजरा मानते हैं। ऐसे लोग एक प्रकार से अपनी प्रतिष्ठा ही गँवा बैठते हैं। उन्नति के अवसर प्राप्त करना तो दूर की बात रही। जो अपनी खामियों पर तीखी दृष्टि नहीं रखता और उन्हें सुधारने का प्रयास नहीं करता समझना चाहिए कि उसका विधाता सदा बायाँ प्रतिकूल ही रहेगा।

मनोबल की अभिवृद्धि का महत्व यदि समझ लिया गया तो समझना चाहिए कि आत्म−सन्तोष और लोकसम्मान का सुनिश्चित मार्ग मिल गया। मनोबल बढ़ाने के लिए सर्वप्रथम इसी अखाड़े में उतरना पड़ता है जिसमें निजी व्यक्तित्व को निखारना प्रमुख है।

विज्ञजनों का यह कथन शत−प्रतिशत सही है कि ईश्वर केवल उनकी सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं। जो अपने प्रति उपेक्षा बरतते हैं और हीन भावनाओं से ग्रसित रहते हैं, उनका साथ तो भाग्य भी छोड़ देता है। परखने वालों को दोष देना व्यर्थ है। यदि अपना दाम खोटा होगा तो उसे हर जगह तिरष्कृत होना पड़ेगा। कोई मूर्ख या ब्रह्मज्ञानी ही उन्हें अपना सकता है।

बाहरी प्रतिकूलताओं पर विजय प्राप्त करना कठिन नहीं है। उनकी उपेक्षा की जा सकती है। असहयोग का रुख अपनाया जा सकता है। विरोध सफल होता न दिखे तो अपने को उस माहौल से हटाकर दूसरा स्वतन्त्र रास्ता अपनाया जा सकता है। आवश्यक नहीं कि जिन व्यक्तियों या परिस्थितियों के साथ तालमेल नहीं बैठता, उनके साथ बँधा ही रहा जाय। जो ढर्रा अनुकूल नहीं पड़ता उससे बदलने में आवश्यक संकोच बरतने के लिए अपने को बाधित माना जाय। यदि अपनी ओर से किन्हीं दुर्गुणों के कारण विसंगति नहीं बैठ रही है तो आत्म समीक्षा के उपरान्त उन परिस्थितियों से अपने को अलग कर लेना चाहिए जो अपने को रास नहीं आती।

अपनी प्रतिभा, सूझ−बूझ और तत्परता ऐसी होनी चाहिए जो सम्बन्धित व्यक्तियों को नरम करने और मोड़ने में सफल हो सके। पर यदि प्रयासों का उपयुक्त परिणाम नहीं निकलता और निरन्तर कुढ़ते या असन्तुष्ट रहने की अपेक्षा यही अच्छा है कि उस घेरे से अपने को बाहर कर लिया जाय और ऐसा रास्ता अपनाया जाय जो बार−बार न भी बदलना पड़े। हर परिवर्तन से पूर्व उसके पक्ष विपक्ष में चिन्ता, अधिक से अधिक गहरा चिन्तन हो सकता हो उसे कर लेने के उपरान्त ही नया कदम उठाना चाहिए और उस नये प्रयोग में इतनी सूझ−बूझ और प्रामाणिकता का परिचय देना चाहिए कि बदलने के कारण जो चर्चा का माहौल बना है उस कालिख पर सफेदी पुत सके।

स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ बनती हैं। परिस्थितियों की प्रतीक्षा में बैठे रहने की अपेक्षा यह कहीं सरल और कहीं सफल होता है कि अपने को अधिकाधिक सद्गुणी बनाया जाय। व्यक्तित्व को उस स्तर तक पहुँचाया जाय जिस तक पहुँचने पर किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने की सम्भावना सुनिश्चित होती है।

व्यक्तित्व का परिष्कार−भाग्योदय का सबसे सही तरीका है। जो प्रामाणिक है, वे न तो दुत्कारे जाते हैं। न असफल रहते और न उपेक्षा के भाजन बनते हैं। हीरा अन्ततः उनके हाथों ही जा पहुँचता है जो उसका मूल्य समझते और उपयोग जानते हैं। यदि अपना मनोबल आत्म−निरीक्षण, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास पर केन्द्रित किया जा सके तो प्रतीत होगा कि आन्तरिक काया−कल्प हो गया। दुष्प्रवृत्तियों का परित्याग करते−करते उस स्थान में खालीपन नहीं रहता वहाँ सत्प्रवृत्तियाँ अपने पैर जमाती हैं और अपने को प्रामाणिक एवं जिम्मेदार घोषित करती हैं। ऐसे व्यक्तियों की हर जगह माँग है। उन्हें कोई छोड़ना नहीं चाहता वरन् प्यासे की तरह अपनी सहायता के लिए ढूँढ़ता रहता है।

जो सतर्कता, सूक्ष्म बुद्धि सूझ−बूझ अपने को परिष्कृत करने में लगाई गई है, उसी का प्रयोग जब बाहरी कामों में होता है तो वे इतने सुन्दर बन पड़ते हैं कि कर्ता की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगा दें। ऐसे लोगों का ईर्ष्यालु भी कुछ बिगाड़ नहीं सकते। कारण कि वे प्रतिद्वन्द्विता में ठहरते नहीं। थोथे गाल बजाते हैं। उनकी निन्दा तथा अड़ंगेबाजी कसौटी पर खोटी सिद्ध होने के कारण उतना अहित नहीं कर सकती−वैसा वातावरण नहीं बना सकती जो अपनी गरिमा को चोट पहुँचा सके।

हर क्षेत्र के प्रगतिशीलों की जीवन गाथाएँ पढ़ने पर प्रतीत होता है कि उनने अपने क्रिया−कृत्य के साथ समग्र तत्परता और तन्मयता बरती है। उद्देश्य ऊँचे रखे हैं और अपनी गतिविधियों को आदर्शों में च्युत नहीं होने दिया। ओछे मनुष्य धूर्तता अपनाकर जो तात्कालिक सफलता प्राप्त कर लेते हैं वह उनकी गरिमा को गिराती जन सहयोग से वंचित करती और भविष्य को अन्धकार मय बनाती है। ऐसे अनीतिपूर्ण लाभ, वस्तुस्थिति को प्रकट किये बिना नहीं रहते और अन्ततः घाटे में ही रहते हैं।

प्रगति की अभिलाषा उचित है। हर कोई अपनी लौकिक एवं पारलौकिक सुख−शान्ति चाहता है और उत्कर्ष की महत्वाकाँक्षाएँ सँजोये रहता है। यह न तो अनुचित है, न कठिन। मनुष्य अपने आपको सज्जन, सुव्यवस्थित और प्रामाणिक बना ले तो समझना चाहिए कि उसने आगे बढ़ने का सही रास्ता पा लिया और यदि उसने अपनी गतिविधियों को शालीनता और सूझ−बूझ से भरी−पूरी रखा तो अपने प्रयास ही उसे उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचा देंगे। ऐसे लोगों को सुयोग्य जनों का भावभरा सहयोग भी मिलता है कि स्थिति ऐसी हस्तगत होती है जिसे सराहनीय ही नहीं अनुकरणीय भी कहा जा सके।

साहस दिखाने और श्रम की विवशता हर स्तर के व्यक्ति के सामने रहती है। पराक्रम किये बिना किसी का गुजारा नहीं। समझ से काम लिये बिना तो पशु पक्षियों का भी काम नहीं चलता, फिर मनुष्य जीवन में इनकी अनिवार्यता तो माननी ही पड़ेगी।

बात इतनी भर है कि अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का दूरदर्शी सूझ−बूझ का समुचित मात्रा में समावेश किये रखा जाय। अपने साथ कड़ाई करने और दूसरों के साथ नरमी बरतने की नीति अपनाई जाय। महापुरुष की जीवन गाथाओं से उनके कर्तृत्व और व्यक्तित्व के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई महानता को गम्भीरता पूर्वक समझने का प्रयत्न किया जाय। जो व्यक्तित्व की दृष्टि से खरा है वह बहुमूल्य सोने या हीरे की तरह है। उसकी गरिमा और कीर्ति अक्षुण्ण है। इतनी अक्षुण्ण कि मरने के उपरान्त भी अपनी गाथा से अनेकों का उपयोगी मार्गदर्शन करती रहती है।


धौम्य ऋषि (kahani)

धौम्य ऋषि अपनी शिष्य मण्डली समेत कुरुक्षेत्र मार्ग से गुजर रहे थे तो रास्ते में गज घंट के नीचे अण्डे से निकला हुआ बच्चा दिख पड़ा। सभी भगवान की लीला को सराहने लगे।

धौम्य ने कहा− भगवान का काम पूरा हो चुका। अब मनुष्य का काम शुरू होता है। इस बच्चे को उठाओ और ऐसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाओ जहाँ वह आहार पा सके और अपने बलबूते उड़ने में समर्थ हो सके|बूँदें समुद्र में गिरीं और अपनी सत्ता लुप्त होते देखकर खेद मनाने लगीं। समुद्र बोला− महानता के प्रति समर्पण करके कोई घाटे में नहीं रहा|

समुद्र का पानी उड़कर बादल बन गया। स्वाति नक्षत्र में बरसा तो बूँद सीपी में पड़कर मोती बन गई।

बूँद को पुरानी खिन्नता और समुद्र की सान्त्वना स्मरण आई। उसने अनुभव किया कि महानता के प्रति समर्पण करना घाटे का सौदा नहीं है।


Quotation

दिव्य चेतना के प्रवाह से जन चेतना में अनोखे उभार आते हैं। ऐसे प्रयोग सदैव होते रहे हैं।

रामावतार के चेतना प्रवाह से अनपेक्षित उभार आये। अपराधी प्रवृत्ति के भील आदि परम सज्जन बनकर सहयोग करने लगे। चंचल अप्रामाणिक वानर परम धैर्य तथा निष्ठा के धनी बन गये।

कृष्ण के प्रभाव से भी ऐसा ही हुआ। कंस का भय छोड़कर मथुरावासी गोपों का साथ देने लगे। सामान्य ग्वालों में कंस जैसे आतंकवादी का प्रतिरोध करने की हिम्मत आ गयी। कौरवों के अधिकार और प्रलोभन के बावजूद पाण्डवों को कुचक्र से बचाने वाले उनका साथ देने वाले साहसी बराबर मिलते रहे।

महर्षि रमण- योगी अरविंद जैसों के प्रयोग से राष्ट्रीय चेतना की अनोखी लहर उठी। गांधी जी को सत्याग्रही, सुभाष को आजाद हिंद फौज के सैनिक मिलते चले गये। जिनके राज्य में सूरज नहीं डूबता था उनके आतंक और प्रलोभन सब बेकार सिद्ध हुए। क्रांतिकारी लोकसेवी हर क्षेत्र में पनपते रहे।


मनुष्य की विलक्षण अतीन्द्रिय क्षमताएँ

मनुष्यों में अतीन्द्रिय क्षमताओं का होना पौराणिक कथाओं में भी प्रकट है। मध्य काल में उनके ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं और आज भी वे विशेषताएँ कितनों में देखी जाती हैं। कभी इन बातों को कपोल कल्पना कहा जाता था, पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। अगणित प्रत्यक्ष प्रमाणों की जाँच पड़ताल करने के उपरान्त प्रत्यक्षवादी जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं−उसके अनुसार मनुष्य में ऐसी सामर्थ्यों का होना शक्य माना गया है जो इन्द्रिय शक्ति से परे की हैं।

ऐसी सामर्थ्यों में दूर दर्शन, दूर श्रवण, भविष्य कथन, विचार सम्प्रेषण, शाप, वरदान, स्वप्न संकेत प्राण प्रत्यावर्तन, दिव्यलोक के साथ आदान−प्रदान जैसी कितनी ही अब तक प्रमाणित हो चुकी हैं और कितनी ही ऐसी हैं जो कल्पना या जादूगरी की अवमानना चिरकाल तक सहन करने के उपरान्त अब यथार्थता की तरह प्रामाणिकता और प्रतिष्ठा के क्षेत्र में प्रवेश करने जा रही हैं।

इन क्षमताओं के संदर्भ में अनेकानेक पुरातन प्रमाण उपलब्ध हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उन दिनों में मात्र इन्द्रिय शक्ति ही सब कुछ नहीं थी, वरन् इन्द्रियातीत क्षमताएँ महत्वपूर्ण अवसरों पर प्रयुक्त होते रहने का प्रचलन था उनके सहारे मनुष्य अब से कहीं अधिक सशक्त था और अधिक सुविधाएँ सम्पादित करता था।

संजय की दूर−दर्शन और दूर श्रवण की क्षमता का उल्लेख मिलता था। वे महाभारत मोर्चे पर चल रहे दृश्यों और संभावनाओं का यथावत् विवरण जन्मान्ध धृतराष्ट्र को घर बैठे सुनाते रहते थे। लोक−लोकान्तरों में परिभ्रमण करते रहने की शक्ति देवर्षि नारद में थी उनका विष्णु लोक के साथ आवागमन और आदान−प्रदान सदा बना रहता था। उन्हें पूर्वाभास भी होता था और जानकारियां सम्बन्धित व्यक्तियों तक सहज सेवा सहायता के भाव से पहुँचाते रहते थे। पार्वती को शिव विवाह की सम्भावना, सावित्री को एक वर्ष बाद पति वियोग, जैसी पूर्व सूचनाएँ उनके द्वारा सम्बन्धित व्यक्तियों तक पहुँचाये जाने के अनेकानेक वर्णनों का विभिन्न पुराणों में उल्लेख है।

गान्धारी की आँखों में दिव्य तेज था। वे आमतौर से पट्टी बाँध कर रहती थीं। आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने एक बार पट्टी खोलकर दुर्योधन को देखा और उसका शरीर लोह जैसा सुदृढ़ बना दिया। वनवास में अकेली पाकर एक व्याध ने दमयन्ती पर कुदृष्टि डाली। दमयन्ती ने अग्नि दृष्टि से उसे देखा फलतः वह व्याध वहीं जलकर भस्म हो गया। दुर्वासा के शापों से अंबरीष जैसे कितनों को ही अपार कष्ट सहना पड़ा। श्रृंगी ऋषि के शाप से परीक्षित की सर्प दंश से मृत्यु हुई थी। उन्हीं के वरदान मंत्रोच्चारणों से सम्पन्न हुए यज्ञ द्वारा दशरथ को चार अवतारी पुत्रों का प्राप्त होना सर्वविदित है। कपिल मुनि के शाप से राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का भस्म होना प्रख्यात है। कालिदास के मेघदूत का नायक यक्ष शाप पीड़ित होकर ही अपनी प्रेयसी से दूर पड़ा था और मेघों को सन्देश वाहन बनाकर अपनी व्यथा प्रेयसी तक पहुँचाने का उपक्रम कर रहा था। ऋषि से व्यंग उपहास करने वाले यादवों का पूरा समुदाय शाप का भाजन बना और परस्पर लड़-भिड़कर समाप्त हो गया। परशुराम से छल पूर्वक बाण विद्या सीखने वाले कर्ण गुरु शाप से उस विद्या का प्रयोग कर सकने की क्षमता गवां बैठा और मात्र सारथी रहकर निर्वाह करता रहा। देवयानी का विवाह प्रस्ताव स्वीकार न करने पर कच को भी सीखी हुई संजीवनी विद्या से हाथ धोना पड़ा।

स्वामी विवेकानन्द ने अपने संस्मरणों में एक ऐसे महात्मा का वर्णन किया है जो बिना अन्न जल ग्रहण किये मात्र वायु भक्षण करके लम्बे समय तक जिये। वे पोहारी बाबा के नाम से प्रख्यात थे। इसकी यथार्थता जाँचने के लिए विदेशों से भी पर्यवेक्षकों के कई जत्थे आये और वे सभी सन्तुष्ट होकर लौटे। पंजाब के राजा रणजीत सिंह ने अंग्रेज गवर्नर को हरिदास नामक साधु के छः महीने लम्बी भूमिगत समाधि का प्रमाण परिचय दिया था। वे साधु पूरे छः महीने गड्ढे में बन्द रहे। गड्ढे को बन्द करके ऊपर से फसल बो दी गई थी ताकि उसमें किसी चालाकी हेरा-फेरी की गुंजाइश न रहे। छः महीने बाद समाधि खोदी गई तो वे साधु जीवित निकले और कुछ ही समय में पूर्ववत् सामान्य हो गये।

इस सम्बन्ध में- ‘‘हिस्ट्री ऑफ दि सिख्स” नामक पुस्तक में (लेखक डॉ. मैकग्रेगर) महाराजा रणजीत सिंह के गुरु स्वामी हरिदास द्वारा सन् 1837-38 में किए गये भूमिगत समाधि के प्रदर्शन का विस्तृत विवरण मिलता है। इसका निरीक्षण पंजाब में नियुक्त ब्रिटिश राज्य के तत्कालीन अन्य उच्चाधिकारियों ने भी किया था। स्वामी हरिदास को एक मजबूत सन्दूक में सीलबन्द करके जमीन में खोदे गये गहरे गड्ढे में उतार दिया गया फिर ऊपर से मिट्टी डालकर प्लास्टर से बन्द कर दिया गया। 40 दिन पश्चात् गड्ढा खोदकर सन्दूक बाहर निकालने पर स्वामीजी का समूचा शरीर निश्चेष्ट पाया। हृदय और नाड़ी में भी स्पन्दन नहीं था। लेकिन सिर में शिखा वाला स्थान इतना तप्त था कि छूते ही हाथ जल जाता था। कान−नाक से मोम निकाल कर पूर्व निर्दिष्ट विधि के अनुसार शरीर पर शीतल जल का छिड़काव करते ही उनका शरीर चैतन्य हो उठा तथा सभी उपस्थित लोगों व विशिष्ट अतिथियों से उसी तरह बातचीत करने लगे जैसे समाधि में जाने से पूर्व कर रहे थे।

सन्त हरिदास की दूसरी समाधि की अवधि दस महीने थी। यह प्रदर्शन उन्होंने अदीना नगर में किया था। उस प्रसंग का संस्मरण कैप्टेन ओसबर्न ने अपनी पुस्तक ‘रणजीत सिंह’ में दिया है। इस बार सुरक्षा, निगरानी और पहरेदारी सम्बन्धी काफी एहतियात बरते गये। जिस जमीन के भीतर स्वामीजी समाधिस्थ थे उस भूमि पर जौ की फसल बो दी गई ताकि भीतर से निकल भागने की धोखाधड़ी पकड़ी जा सके। लेकिन पूरी सतर्कता और कड़ाई के बावजूद ऐसी कोई घटना घटी नहीं।

अतीन्द्रिय क्षमताओं के अंतर्गत ही पुराणों में ऐसी अनेकानेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जिसमें शाप के फलीभूत होने और उससे अप्रत्याशित कष्ट−कठिनाइयों के उत्पन्न होने का उल्लेख है−कपिल मुनि के शाप से सगर पुत्रों का भस्मीभूत होना, श्रृंगी ऋषि के शाप से राजा परीक्षित को साँप द्वारा काटा जाना, गान्धारी के शाप से छप्पन कोटि यदुवंशियों का लड़ मरना, नहुष का सर्प बनना, दमयन्ती के शाप से व्याध का विनष्ट होना आदि कुछेक उदाहरण हैं।

गुरु गोरखनाथ से एक कापालिक बहुत चिढ़ा हुआ था। एक दिन आमना-सामना हो गया। कापालिक के हाथ में कुल्हाड़ी थी, उसे ही लेकर वह तेजी से गोरखनाथ को मारने दौड़ा। पर अभी कुल दस कदम ही चला था कि वह जैसे−का−तैसा खड़ा रह गया। कुल्हाड़ी वाला हाथ ऊपर और दूसरा हाथ पेट में लगाकर हाय−हाय चिल्लाने लगा। वह इस स्थिति में भी नहीं था कि इधर−उधर हिल-डुल भी सके।

केप कालावी के गवर्नर पीटर जिज्वर्ट नार्टन की मृत्यु भी एक सैनिक के शाप के परिणाम स्वरूप हुई मानी जाती है। कहा जाता है कि एक बार जिज्वर्ट नार्टन ने नौ निर्दोष सैनिकों को फाँसी की सजा भागने के अभियोग में दी थी, जिसके फलस्वरूप आठ तो बिना कुछ बोले फाँसी पर झूल गये किन्तु अन्तिम व्यक्ति ने बड़े रोष के साथ यह कहते हुए कि “नार्टन तुझे कुछ ही समय में ईश्वर के पास जवाब देने के लिए घसीट कर ले चलूँगा।” फाँसी पर झूल गया। देखा गया कि कुछ ही क्षणों के उपरान्त वह गवर्नर दफ्तर में कुर्सी पर बैठे−बैठे मर गया।

वस्तुतः मनुष्य जितना विलक्षण है, क्षमता सम्पन्न है, उतना उसे अपने आपके विषय में आभास नहीं है। यदि इस सामर्थ्य को उभारा जा सके तो हर व्यक्ति अपनी अद्भुत अतीन्द्रिय सामर्थ्य का प्रयोग सत्प्रयोजनों के निमित्त कर सकता है। विडम्बना तो यही है कि बहुसंख्य व्यक्ति अपनी इस अविज्ञात विभूति से अनजान बने रह जीवन व्यर्थ गवाँ देते हैं।


जीवन सम्पदा की फुलझड़ी न जलायें

मानवी जीव कोशों की सुदृढ़ता को परखते हुए कोलम्बिया विश्वविद्यालय के डा. एच. एस. सिक्सन ने एक बार कहा कि यदि स्नायु उत्तेजना और रासायनिक विकृतियों से शरीर की रक्षा की जा सके तो मनुष्य की संरचना उसे 800 वर्ष तक जीवित रहने का अवसर दे सकती है।

कार्नेट विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग ने अपने परीक्षणों से यह निष्कर्ष निकाला है कि शारीरिक श्रम की तुलना में नीरस मानसिक श्रम से कहीं अधिक थकाना आती है।

खाद्य−पदार्थों में पाई जाने वाली ऊष्मा जिसे ‘कैलोरी’ कहते हैं यदि कम मात्रा में मिले तो थकान आवेगी। यह मान्यता भी अभी पूर्णतया निरस्त नहीं हुई है। पिछली शताब्दी के यह निष्कर्ष अभी भी दुहराये जाते हैं कि भोजन में ऊष्मा की मात्रा समुचित हो तो थकान से बचा जा सकता है और बुढ़ापा वस्तुतः थकान ही है।

यह माना जाता है कि 150 पौण्ड वजन का कोई व्यक्ति सोते समय 65 कैलोरी प्रति घंटा खर्च करता है। लेटे रहने में 77, पढ़ने में 100, टाइप करने जैसे कामों में 145, चलने−फिरने में 200 और कड़ा परिश्रम करने में 300 कैलोरी प्रति घण्टा के हिसाब से खर्च होती है।

डा. वाल्डविन के अनुसार मनुष्य शरीर का तापमान तो 98.6 डिग्री रहता है, पर उसे अनुकूल 98 डिग्री तापमान का वातावरण ही पड़ता है। इससे अधिक ठण्डक या गर्मी होने पर उसकी कैलोरी शक्ति अधिक मात्रा में खर्च होने लगती है और थकान जल्दी चढ़ती है। डा. डोनाल्ड ए. लेयर्ड के अनुसार कोलाहल भरे वातावरण में रहने वाले मनुष्य को 20 प्रतिशत थकान का शोरगुल के कारण ही चढ़ती रहती है। यही जल्दी बुढ़ापा लाती है।

मेयोक्लीनिक के डा. केन्ड्रिल ने कहा हैं “चिड़चिड़ापन मनुष्य की थकान का सर्वविदित चिन्ह है।” लेही क्लीनिक के डा. एलेक का मत भी यही है− वे कहते हैं चिड़चिड़ा मनुष्य दया का पात्र है क्योंकि वस्तुतः वह गहरी थकान का मरीज होता है। उस पर क्रोध करने या बदला लेने से तो इस मरीज का और भी अहित होगा। थकान बढ़ेगी और बुढ़ापे की रफ्तार तेज होगी। इसे रोकने व आयुष्य को बढ़ाने के लिए व्यक्ति को तनाव रहित बनना होगा।

केवल दीर्घ जीवन ही सम्भव नहीं वरन् यह भी सम्भव है कि ढलती आयु में भी सशक्त यौवन को स्थिर रखा जा सके। शरीर में आयु की वृद्धि के साथ कुछ तो परिवर्तन होते हैं पर यह मानवी प्रयत्नों पर निर्भर है कि वह शिथिलता से अपने को बचाये रहें और वृद्ध होते हुए भी अशक्त न बनें।

वारजन विवारेस नियासी पियर डिफोरबेल 129 वर्ष का होकर सन् 1809 तक जीवित रहा। मरते समय उसका स्वास्थ्य ठीक था और उसकी सभी इन्द्रियाँ अपना काम ठीक तरह करती थीं। उसने तीन विवाह किये और कितने ही बच्चे पैदा हुए उनमें से तीन बच्चे ऐसे भी थे जिन्हें तीन पृथक शताब्दियों में पैदा हुआ कहा जाता है। एक बच्चा 1699 में दूसरा 1738 में तीसरा 1801 में जन्मा। यों यह अन्तर लगभग सौ वर्ष ही होता है, पर शताब्दियों के हिसाब से इसे तीन शताब्दियों में भी गिना जा सकता है। और साहित्यिक शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि उसका एक बच्चा 16 वीं शताब्दी में, दूसरा 17 वीं में और तीसरा 18 वीं में जन्मा। उसकी तीसरी पत्नी 19 वर्ष की थी जबकि डिफोरबेल 120 वर्ष का। यह तीसरा दाम्पत्य जीवन भी उसने प्रसन्नता पूर्वक बिताया। पत्नी को इसमें कोई कमी दिखाई न दी। यह विवाह नौ वर्ष तक सुख पूर्वक चला और उसमें कई बच्चे हुए।

उपरोक्त तीन शताब्दियों में जन्मे तीन बच्चों की जन्म तिथियाँ उनके प्रमाण पत्रों समेत सन् 1877 के ‘मेगासिन पिटारेस्क’ में छपी हैं। जो घटनाक्रम की यथार्थता प्रकट करते हुए यह भी सिद्ध करती हैं कि दीर्घ जीवन ही नहीं यौवन को भी अक्षुण्ण बनाये रहना सम्भव है−असम्भव नहीं।

जोरा आगा नामक टर्की के एक दीर्घजीवी वृद्ध पुरुष की आयु 1927 में 153 वर्ष की थी। उस समय उसने अपना ग्यारहवाँ विवाह किया था। उससे पूर्व 10 स्त्रियों और 27 बच्चों को वह अपने हाथों कब्र में सुला चुका था। उसके जीवित बच्चे 70 से ऊपर थे।

बीमारियों से मनुष्य का घिरा रहना भी उसका प्रकृति को चुनौती देने का ही दण्ड दुष्परिणाम है। उपभोग की मर्यादाओं का उल्लंघन शरीर संरचना के अनुरूप आचार संहिता न अपनाने से स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है और उसकी दुःखद प्रतिक्रिया आये दिन बीमार रहने के रूप में भुगतनी पड़ती है। जितना सरल, सौम्य, हलका और आवेश उत्तेजनाओं से रहित जीवन जिया जायेगा उतना ही मृत्यु का भय और कष्ट हलका होता जायेगा।

हमारे शरीर में प्रतिदिन अगणित कोशिकायें जन्मती और मरती हैं। किन्तु मस्तिष्क की तान्त्रिक कोशिकाओं के बारे में यह बात नहीं है। उनका पुनर्निर्माण नहीं होता। मस्तिष्क में कोशिकायें प्रति घन सेंटीमीटर एक करोड़ के अनुपात में पाई जाती हैं। वे प्रति घण्टे एक हजार की औसत से मरती रहती हैं। इस प्रकार यह पूँजी क्रमशः घटती रहती है। बहुधा जीवन काल में ही 10 प्रतिशत मस्तिष्क घट जाता है। यह पूँजी समाप्त होते चलने से शरीर पर मनःचेतना का नियन्त्रण घटता चलता है और वह भी बुढ़ापे का निमित्त बन जाती है।

दीर्घ जीवन के दो प्रमुख आधार यह माने जाते हैं कि श्वास धीमे लिये जाँय तथा शीत वातावरण में रहा जाय। योगी लोगों की प्राणायाम क्रिया तथा हिमकन्दराओं में निवास को प्रमुखता देने का एक कारण यह भी है कि वे शरीर को अमर या दीर्घजीवी बनाकर अपना और पराया अधिक श्रेय साधन कर सकें।

रीछ, सर्प, कछुए, मेंढक शीत ऋतु आने पर अपने को सिकोड़ कर बैठ जाते हैं। ताप की तीव्रता से जो शक्ति का क्षरण होता है वह उन दिनों न होने से वे जीव निराहार पड़े रहते हैं। गति शरीर संचालन भर के लिये आवश्यक है। यदि उसे अव्यवस्थित ढंग से खर्च किया जाय तो साँसें तेज चलने लगेंगी और उससे दीर्घ जीवन में कमी आ जायगी।

सृष्टि विज्ञान पर दृष्टिपात करने से विदित होता है कि जिन जीवों का श्वास संचालन मन्द गति से होता है वे अधिक दिनों जीवित रहते हैं, इसके विपरीत जिनकी साँसें तेजी से चलती हैं वे कम समय जी पाते हैं। इस सम्बन्ध में प्रति मिनट साँस लेने और आयुष्य प्राप्त करने सम्बन्धी अनुमानित विवरण पर प्रकार है− कछुआ साँस 5 प्रति मिनट आयु 150 वर्ष। सर्प साँस 8 आयु 120 वर्ष। हाथी साँस 2 आयु 100 वर्ष। मनुष्य साँस 12 आयु 100 वर्ष। घोड़ा साँस 18 आयु 50 वर्ष। बिल्ली साँस 25 आयु 12 वर्ष। बकरी साँस 25 आयु 12 वर्ष। कबूतर साँस 36 आयु 8 वर्ष। खरगोश साँस 40 आयु 7 वर्ष।

नृतत्व विज्ञान वेत्ता बताते हैं कि प्राचीनकाल में मनुष्यों की श्वास−प्रश्वास संख्या 11-12 थी। पर जब मानसिक उत्तेजन एवं शारीरिक उष्णता में−आहार−विहार अव्यवस्था एवं बौद्धिक उद्वेगों से परिस्थिति बदल गई और आदमी अधिक गरम रहने लगा है। गर्मागर्मी से भरे हुए लोग जल्दी उफनते और जल्दी चलते हैं। उनका आयुष्य कम हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?

स्वास्थ्य सुरक्षा की सर्वाधिक दूरदर्शी नीति यही है कि प्रकृति के अनुरूप अपना आहार−विहार, रहन−सहन बनाये रखा जाय जैसा कि सृष्टि के सभी प्राणी बनाये रखते और चैन से जीते हैं। इन्द्रियों का संयम बरता जाय, दिनचर्या ठीक रखी जाय, श्रम और आराम का सन्तुलन रहे, मस्तिष्क को उत्तेजनाओं से बचाये रखा जाय, स्वच्छता का ध्यान बना रहे तो इन मोटे नियमों का पालन भर करने से बहुत हद तक छुटकारा मिल सकता है। स्व उपार्जित बीमारियों का ही बाहुल्य रहता है−बाहर से तो बहुत कम आती हैं। मौसम का प्रभाव, वंशगत विकार, छूत, दुर्घटना आदि कारणों से भी अप्रत्याशित रोग हो सकते हैं, पर उनका अनुपात बहुत स्वल्प रहता है। दीर्घ आयु, रोग रहित जीवन जीना हो तो हमें जीवन सम्पदा की फुलझड़ी जलाने का तमाशा समय रहते बन्द कर देना चाहिए।


दृश्य के साथ जुड़ा हुआ अदृश्य

प्रकाश विज्ञानी अर्नेस्टले और उनके सहयोगी शिष्य डा. गैवर ने होलोग्राफ के एक नये सिद्धान्त का आविष्कार किया, जिसके आधार पर त्रिआयामित्र (थ्री−डी) स्तर का छाया चित्रण आँखों से देखा जा सकना और भूतकालीन दृश्यों को इन्हीं आँखों से इस प्रकार देखा जा सकना, सम्भव हो सका मानो वह घटनाक्रम अभी−अभी ही बिल्कुल सामने घटित हो रहा हो।

इसी प्रकार तीन दशक पूर्व रूस के इलेक्ट्रानिक विज्ञानवेत्ता ऐमयोन किर्लियान ने एक ऐसी फोटोग्राफी का आविष्कार किया था जो मनुष्य के इर्द−गिर्द होने वाली विद्युतीय हलचलों का भी छायाँकन करती है। इससे प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर के साथ−साथ सूक्ष्म शरीर की भी सत्ता विद्यमान है और वह ऐसे पदार्थों से बनी है जो इलेक्ट्रानों से बने ठोस पदार्थ की अपेक्षा भिन्न स्तर की हैं और अधिक गतिशील भी।

पिछले दिनों हुई शोधों से न्यूयार्क विश्वविद्यालय के डा. राबर्ट वेकर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ब्रह्माण्ड व्यापी विद्युत चुम्बकीय शक्ति विश्व के प्रत्येक पदार्थ को जड़ चेतन को अपने साथ जकड़े हुए है। विश्व की प्रत्येक इकाई उसी समष्टि की एक घटक है। अस्तु पृथकता के बीच भी सघन एकता विद्यमान है और उस एकता के कारण ही पदार्थों और प्राणियों में दृश्य−अदृश्य आदान−प्रदान होता है। जो क्रम आये दिन अनुभव में आता रहता है वह सामान्य और जो यदा−कदा दिख पड़ता है वह असामान्य चमत्कार कहा जाता है। जबकि वह ऐसा है नहीं।

विज्ञानी ट्रेवर जेम्स का कहना है− ‘‘हमारी आंखें वर्णक्रम की अल्प मात्रा भर देख पाने में ही समर्थ हैं। वे वर्णक्रम के सिर्फ सात रंगों को ही पकड़ पाती हैं, किन्तु इसमें लाल से लेकर बैंगनी तक केवल सात ही रंग नहीं होते, वरन् ऐसे दस अरब रंग होते हैं, जो आँखों को दिखाई नहीं पड़ते। इनकी ‘तरंग लम्बाई’ हमारी आँखों की पकड़ से बाहर होती है।”

“सूक्ष्म जीवाणु एवं विषाणु हम नंगी आँखों से नहीं देख सकते, किन्तु सामान्य एवं इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप के सहारे उन्हें देखा जा सकता है। उसी प्रकार इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट फोटोग्राफी की सहायता से एक ऐसे अदृश्य चेतनात्मक जगत में पहुँचा जा सकता है जो देश काल की सीमा से परे है।”

सुप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक एच. जी. वेल्स ने अपनी पुस्तक ‘दि इन विजिबल मैन’ में उन सम्भावनाओं पर प्रकाश डाला है, जिसके आधार पर कोई दृश्य पदार्थ या प्राणी अदृश्य हो सकता है और अदृश्य वस्तुएँ दृष्टि−गोचर होने लगती हैं। इस विज्ञान को उन्होंने ‘अपवर्तनांक रिफ्लेक्टिव इन्डिसेंस’ नाम देकर उसके स्वरूप एवं क्षेत्र का विस्तृत वर्णन किया है। निश्चित ही एक ऐसे सूक्ष्म जगत का अस्तित्व भी है जो अपने इस ज्ञात जगती की तुलना में न केवल अधिक विस्तृत वरन् अधिक शक्तिशाली भी है। उनकी यह कल्पना उन पौराणिक प्रसंगों को दृष्टि में रखते हुए सही भी लगती है। जिनमें ऋषि गणों, देवताओं के अन्तर्ध्यान होने व प्रकट होने के विवरण मिलते हैं।

एक घटना पेरिस की एक प्राचीन प्रतिमा की है। मूर्धन्य फ्राँसीसी वैज्ञानिक सेलारिया सहित अन्य वैज्ञानिकों का एक दल जब इस प्रतिमा का निरीक्षण कर रहा था, तब देखते ही−देखते प्रतिमा अचानक गायब हो गई और उसके स्थान पर एक−दूसरी विशालकाय मूर्ति आ विराजी जो अत्यन्त डरावनी थी।

सन् 1920 में लन्दन के युवा साँसद पिक्टर ग्रेसर एक दुकान से बाहर निकलते ही सहसा विलुप्त हो गये। इसी प्रकार पोलैण्ड निवासी पादरी वोनेस्की 13 जुलाई 1950 को एक मित्र के पास जाने के लिए अपने घर से निकले। लगभग 80 मीटर दूर जाकर वे भी हवा में विलीन हो गये। ढूँढ़−खोज के बहुतेरे प्रयास किये गये, किन्तु सब निष्फल रहे।

एक सुप्रसिद्ध घटना अमेरिका की है− जिसमें 23 सितम्बर 1908 को टेनेसी, अमरीका निवासी एक किसान डेविड लॉग अपने दो मित्रों के साथ शाम को हवाखोरी करने निकला और मित्रों के देखते−ही−देखते हवा में गायब हो गया। मित्रों ने उस स्थान की काफी छानबीन की, परन्तु कोई ऐसा सूत्र हाथ नहीं लगा जिससे उसके अचानक गायब होने के कारण मालूम हो सके। मित्रों में एक न्यायाधीश भी थे। उनने लॉग को खोजने के लिए भरपूर सरकारी प्रयास किए, किन्तु सफलता नहीं मिली। आखिरकार हार कर उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा− ‘‘यह एक अविश्वसनीय सत्य है जिसका समाधान खोजने पर भी नहीं मिलता।”

श्री एलन और श्रीमती क्रिस्टीन 1975 की गर्मियों में छुट्टियां मनाने उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर निकले। लैपलैण्ड के एक गिरजाघर के पास से गुजरते हुए श्रीमती क्रिस्टीन श्री एलन से कुछ आगे बढ़ गईं। कुछ दूर आगे बढ़ कर उनने पीछे मुड़कर देखा तो उनके पति लापता थे। बहुत खोजबीन की गई, किन्तु उनका कोई सुराग न मिला। स्थानीय लोगों ने भी इस काम में उनका सहायता की पर सब बेकार। यहाँ तक कि जासूसी कुत्तों का भी प्रयोग किया गया, पर कुत्ते उस स्थान पर पहुँच कर रुक जाते और भौंकने लगते। पास ही सेना का कैम्प था। उन लोगों ने भी श्रीमती क्रिस्टीन के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए उनके पति की खोज में विशेषज्ञों की मदद ली, पर सारे प्रयास विफल रहे।

वस्तुतः अदृश्य जगत अपने इसी दृश्य जगत से जुड़ा हुआ है। मृत्यु के उपरान्त अथवा किसी अदृश्य प्रक्रिया द्वारा भी मनुष्य इसी स्थिति में पहुँच जाता है जो दूसरों को न दिखे। असन्तुष्ट स्थिति में मरने वाले लोग तो आमतौर से प्रेतों के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय देते रहते हैं।

काउण्ड इवान सेंटपीटर्स वर्ग में अपनी पत्नी अन्ना, दो बच्चों व बूढ़े नौकर के साथ रहकर वहाँ की जागीरदारी सम्भालता था। तब रूस में साम्यवादी क्रान्ति चल रही थी। इवान और अन्ना देखने में तो बड़े भोले−भाले लगते थे, पर थे बड़े क्रूर। उनने सैकड़ों व्यक्तियों को अपने क्रूर कृत्य का शिकार बनाया। जब करेलिया के लोगों ने उनके विरुद्ध आवाज उठानी शुरू की तब वह डर कर वहाँ से भाग गये और नेवा नदी के तटीय प्रदेश में एक परित्यक्त झोंपड़ी में शरण ली। रात हुई तो पति−पत्नी अपने बच्चों के साथ लेट गये। प्रकाश के लिए कन्दीलें जला लीं, किन्तु हवा के एक झोंके के साथ ही कंदीलें बुझ गई। दुबारा कंदीलें जलाई तो देखा कि लोमड़ियों का एक झुण्ड उन्हें घेरे खड़ा है। वे अत्यन्त भयभीत हो गये, पर तुरन्त ही लोमड़ियाँ न जाने कहाँ लुप्त हो गईं।

इवान का बूढ़ा नौकर भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था। जब वह लौटा तो अपने मालिक व मालकिन को झोंपड़ी में अचेत पड़ा देखा और पास ही खड़ी थी एक भयंकर काली साया। उसने गरज कर कहा− ‘‘मल्लाह! तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं, किन्तु तुम्हारे स्वामी अब बच नहीं सकते। उनने सैकड़ों निरपराधों की जानें ली हैं। उनके पाप का घड़ा अब भर चुका है।” इतना कह कर साया ओझल हो गई। बूढ़ा नौकर भारी अनिष्ट की आशंका से भयभीत हो उठा, किन्तु उसने अपना साहस नहीं खोया और अपने मालिक के होश में आने का इन्तजार करता रहा। इस बीच झोपड़ी में तरह−तरह के जीवों की आवाजें सुनाई पड़ती रहीं। रात के तीसरे पहर के करीब इवान और अन्ना की नींद झोंपड़ी की दीवार गिरने में खुल गई और उसी के साथ प्रकट हुआ खूँखार सील मछलियों का एक झुँड। मछलियों ने उन दोनों पर आक्रमण किया तो वे डर केर भागे नदी की ओर नदी के किनारे पहुँचकर उनने जल्दी−जल्दी तट पर बँधी नौकाएँ खोलीं और उन पर सवार हो नदी पार करने लगे। वे अभी बीच धार में थे कि अचानक न जाने कहाँ से लाल रंग की लोमड़ियाँ आकाश से प्रकट हुईं एवं अन्ना की ओर झपटीं। डर के मारे अन्न नदी में कूद पड़ी जहाँ सील मछलियों ने उसका काम तमाम कर दिया। अभी नाव कुछ ही आगे बढ़ी होगी कि इवान पर भी वैसा ही लोमड़ियों ने आक्रमण किया। इवान का भी वैसा ही अन्त हुआ जैसा अन्ना का। अलबत्ता बूढ़े मल्लाह और बच्चों का इन प्रेतात्माओं ने कुछ नहीं बिगाड़ा। बच्चों को मल्लाह ने ही पाल पोसकर बड़ा किया।

साउथ वेल्स में जेम्स फिशर नामक एक सम्पन्न किसान रहता था। उसके कोई सन्तान नहीं थी। अतः सम्पत्ति के उत्तराधिकारी के रूप में उसने अपने एक मित्र के बेटे जार्ज वारेल को चुना। वारेल उसकी सम्पत्ति जल्दी ही प्राप्त करना चाहता था। अतः एक दिन उसने किसान को खूब शराब मिलाकर उसकी हत्या कर डाली। हत्या इतनी सफाई से की गई थी कि उसका कोई सूत्र पुलिस के हाथ न लगा और न लाश का ही कुछ पता चला।

उक्त किसान का पड़ौसी जेम्स पार्ले एक दिन उसी के मकान के सामने से गुजर रहा था कि उसकी नजर अनायास उस किसान के मकान की ओर चली गई। उसने देखा कि पड़ौसी का भूत अपने मकान की ओर कुछ इशारा कर रहा है। इतना देखना था कि वह चिल्लाते हुए भागा। किन्तु यह आकृति उसे बार−बार दिखाई पड़ती रही और हर बार वह अपने एक कमरे की ओर इंगित करता। पार्ले ने सोचा, अवश्य ही उसकी मृत्यु का रहस्य उस कमरे से जुड़ा हुआ है, अतः उसने इसकी सूचना पुलिस को दी। बाद में जब उस कमरे का फर्श खोदा गया तो उक्त किसान की विकृत लाश मिली। यह ठीक वैसी ही थी जैसी आकृति पार्ले को दिखाई पड़ती थी। लाश के साथ ही अनेकों ऐसे सूत्र हाथ लगे जिसके आधार पर वारेल हत्यारा सिद्ध हुआ और उसे फाँसी की सजा सुनायी गई।

इसी प्रकार की एक घटना एडिनवरा की है। वहाँ के एक मुहल्ले में एक भुतहा मकान था। जो कोई भी उसमें ठहरता उसे एक महिला का प्रेत दिखाई पड़ता और वह डर कर भाग खड़ा होता।

एक बार डिक्सन नामक एक पुलिस इन्सपेक्टर इस मकान में आया। एक रात वे बिस्तर पर जा रही रहे थे कि ठण्डी हवा का एक झोंका आया, जिससे सारी खिड़कियाँ खुल गईं, उन्होंने उठकर पुनः खिड़कियाँ बन्द कीं और बिस्तर की ओर बढ़े, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो सामने एक खूबसूरत युवती खड़ी थी। डिक्सन कुछ बोल पाते उससे पहले युवती ने कहा− ‘‘क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ?” असमंजस की स्थिति में डिक्सन ने स्वीकृति दे दी। उसने आते ही कहना शुरू किया− ‘‘चूँकि आप पुलिस इन्सपेक्टर हैं अतः आपसे कुछ विनती करने आयी हूँ। मुझे विश्वास है कि मेरे आग्रह को आप ठुकरायेंगे नहीं।” इतना कह कर उसने अपनी कहानी आरम्भ की− ‘‘पन्द्रह वर्ष पहले मैं इसी बंगले में अपने बूढ़े बाप में साथ रहती थी। माँ बचपन में ही मर चुकी थी, अतः पिता ने पाल−पोसकर बड़ा किया। कुछ समय बाद पिता भी चल बसे अस्तु गुजारे के लिए मैंने इस बँगले को आप ही जैसे एक पुलिस अफसर को दे दिया। मैं भी इसी बँगले के एक कमरे में रहती थी। धीरे−धीरे हम दोनों के सम्बन्ध प्रगाढ़ हो गये और पति−पत्नी की तरह रहने लगे। वह अफसर शादी करने के लिए भी राजी हो गया। कुछ समय बाद जब मैं गर्भवती हुई और उससे शादी की बात कही तो उसने साफ इन्कार कर दिया तथा उल्टे मेरी हत्या कर चलता बना। इतना कह कर वह कुछ क्षण के लिए रुकी और फिर कहना शुरू किया− ‘‘आप उस अपराधी को गिरफ्तार कर सजा दिलवाइए, प्रमाण मैं उपलब्ध करा दूँगी। जब तक उसे दण्ड नहीं मिल जाता, मेरी आत्मा इसी प्रकार भटकती रहेगी।” यह कह कर जूरी का प्रेत लुप्त हो गया।

डिक्सन ने जब 15 वर्ष पूर्व की घटना की छानबीन शुरू की तो प्रमाण इस प्रकार एकत्रित होने लगे जैसे कोई प्रत्यक्षदर्शी व्यक्ति इसमें पुलिस की सहायता कर रहा हो। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर हत्यारे प्रेमी की तलाश की गई और उसे गिरफ्तार कर दण्ड दिया गया। बाद में जूरी की आत्मा ने डिक्सन को धन्यवाद दिया और ढेर सारे उपहार भी दिये।

ये सभी घटना प्रसंग मात्र अपवाद रूप में घटे संयोग नहीं कहे जा सकते। ये दो तथ्यों का रहस्योद्घाटन करते हैं। एक तो यह कि दृश्य के अतिरिक्त एक अदृश्य परोक्ष जगत का अस्तित्व है। दूसरा यह कि क्रिया की प्रतिक्रिया का शाश्वत सिद्धान्त जीवन क्रम में देखा जा सकता है।


आसुरी शक्तियों का कुप्रभाव

कोई व्यक्ति विश्वास करे अथवा नहीं। विलक्षण आसुरी शक्तियों के दुष्प्रभावों से बचा नहीं जा सकता। ब्राजील के नगर बेलम में 15 मार्च 1983 को इसी प्रसंग की एक घटना घटित हुयी। डौजैरिना मैरिया सैंतोस नामक 33 वर्षीय महिला ने दुर्भावना वश अपने पति, माता तथा दो बच्चों की हत्या कर दी।

सर्वप्रथम तो उसने एक लोहे की छड़ी से अपने सोते हुए पति की हत्या की तदुपरान्त 78 वर्षीय अपनी माँ को बड़ी नृशंसता से मार डाला और फिर अपने 2 वर्षीय बालक रुथ और सात महीने के डैनियल के गले को छुरा मारकर खत्म कर दिया। इसके उपरान्त सैंतोस ने अपने ऊपर अल्कोहल उड़ेलकर आत्म-हत्या की योजना बनायी ही थी कि पड़ौसियों ने उसकी जान बचा ली।

सैंतोस ने अपने कथन से स्पष्ट किया कि काफी दिनों से उसके ऊपर आसुरी शक्ति हावी होती चली आ रही थी। इसी का दुष्परिणाम यह निकला कि नित्य बाइबिल का पठन−पाठन करने वाली सैंतोस को अपनी सुसमाचार विभाग की सेवा से छुट्टी ही नहीं मिली। जेल में कड़ी सजा भी भुगतनी पड़ रही है।

अमेरिका के प्रसिद्ध नक्षत्र शास्त्री अलैक्जेण्डर वेयरिंग ने शिकागो में एक बिस्कुटी रंग की भव्य कोठी का निर्माण 1880 में कराया था। जिसका नाम ‘सिल्वर ओक’ रक्खा। बाद में वह अभिशप्त सिद्ध हुआ। उसमें एक एक करके बावन मौतें हुईं। अलैक्जेण्डर वेयरिंग स्वयं अपने घर में सात वर्ष बाद अक्टूबर 1887 में मृत पाया गया था। उपनगरीय बस्ती ‘अलवर्टो’ के नगर पालिका अध्यक्ष काल्विन सिंक्लेयर 192 सी एक चाँदनी रात को उस समय की गृह स्वामिनियों मिसेज एलिजावेथ और मिसेज जैकसन से मिलने गये थे परन्तु वे वहाँ से पागल होकर लौटे थे। ‘मैंने उसे देखा हैं’ बस यही असंबद्ध का प्रलाप वे करते थे। मिसेज एलिजावेथ और मिसेज जैकसन उसी रात को वहाँ मृत पाई गई थीं। सिंक्लेयर को पागलखाने भेजा गया।

जब सन् 1979 में उस बँगले के अन्तिम निवासी सूसन और एडवर्ड हुए तो एक रात को जो 13 दिसम्बर की एक मनहूस रात थी। एडवर्ड की लाश उसके उजाड़ और बेरौनक बगीचे में मिली थी जो क्षत−विक्षत थी और खून से नहाई हुई थी। ठीक इसके तीन दिन बाद 16 दिसम्बर 1979 को सूसन की भी मृत्यु ‘अलवर्टो’ के सिविल अस्पताल में हो गयी। आधी बेहोशी की दशा में अनर्गल सा प्रलाप करते हुए उसने जो बताया था, उसी के आधार पर लोगों ने उस घटना को जाना था। जून 1980 में शिकागो प्रशासन के एक निर्णय के अनुसार उस भव्य सुदृढ़ कहे जाने वाले बिस्कुटी रंग के बँगले को गिरवा दिया गया।

इस अभिशप्त बँगले ने एक सौ वर्ष की अपनी अवधि में 52 मानवों के जीवन से क्रूर हँसी हँसकर काल कवलित कर दिया। आज भी उस भूखण्ड से रुदन और अट्टहासों की ध्वनियाँ रात्रि में सुनी जाती हैं।

भारत पाक विभाजन के उपरान्त कराँची में अमेरिकी दूतावास के लिए जो भूमि चयन की गई, स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी कि यहाँ एक पीर की मजार है उन्हें छेड़ने के परिणाम अच्छे न होंगे। और वैसा हुआ भी।

नींव खोदने पर नर कंकाल और जहरीले साँप निकले। जैसे तैसे एक मंजिल पूरी हुई तो दूसरी की छत गिर गई और सैकड़ों मजदूर दब मरे।

उद्घाटन समारोह के दिन एक अजनबी वृद्ध क्रोध में इधर−उधर घूमते देखा गया टोकने पर उसने एक कर्मचारी के ऐसा घूँसा मारा कि कर्मचारी घंटों बेहोश रहा। घूँसा मारकर वृद्ध देखते−देखते अदृश्य हो गया। तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खाँ ने मौलवियों से पीर को शान्त कराने के कितने ही उपाय किये किन्तु सभी निष्फल रहे। फलतः आज भी दूतावास की इमारत भूतघर बनी खाली पड़ी है।


यह संसार सह अस्तित्व सिद्धान्त पर टिका है।

‘इकॉलाजी’ की मान्यता है कि सृष्टि सन्तुलन पर टिकी है। परावलम्बन (इन्टरडिपेन्डेन्स) मर्यादा निर्वाह (लिमिटेशन) और सम्मिश्रता (काम्प्लैक्सिटी) इन तीन आधारों पर प्रकृति व्यवस्था गतिशील है। “इलेक्ट्रिकल रिव्यू” नामक पत्रिका के एक अंक में चिकित्सा शोध समूह द्वारा दी गई इस खोज का विवरण प्रकाशित हुआ है कि मानव शरीर की विद्युत क्षमता का पर्यावरण के विद्युतीय दबाव से घनिष्ठ अन्तः सम्बन्ध है। हमारे अयन मण्डल में जब भी कोई गम्भीर उथल-पुथल होती है, उसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शरीर की सामान्य जैव−विद्युत चुम्बकीय शक्ति पर पड़ता है, उससे सामान्य क्रियाशीलता गड़बड़ा जाती है। उस उथल−पुथल को सन्तुलित करने के लिए शरीर में कई तरह की मानसिक व शारीरिक व्याधियाँ उठती दिखाई देती हैं, जिन्हें हम रोग व शोक की संज्ञा देते हैं। ऐसे ही कुछ प्रतिकूल अन्तर्ग्रही प्रभावों में ग्रहण, पुच्छल तारों आदि की गणना भी होती है। ग्रहण आदि का सर्वाधिक प्रभाव व इन हलचलों की पूर्वानुभूति जीवन जन्तुओं को पहले होती है। सूर्यग्रहण की जानकारी मनुष्य अपनी बुद्धि के बल पर वर्षों पूर्व भले जानने में समर्थ हो गया हो किन्तु उसके दुष्प्रभावों को समझने में अभी तक असमर्थ रहा है, जबकि जंगल के पशु−पक्षी सूर्य ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए उसके चौबीस घण्टे पूर्व से ही शोरगुल करना बन्द कर देते हैं। सबसे चंचल कहा जाने वाला बन्दर सूर्य ग्रहण के पूर्व ही खाना−पीना त्यागकर एकान्त प्रिय संन्यासी की भूमिका अदा करने लगता है।

जापान में पायी जाने वाली एक पक्षी जिसे चावी कहते हैं भूकम्प आने के चौबीस घण्टे पूर्व ही वह स्थान त्यागकर दूरस्थ उड़ जाती है। इसी प्रकार चीन में अनेकों भूकम्पों के पूर्व देखा गया कि वहाँ के पालतू गाय, बैल आदि अपनी−अपनी रस्सी तुड़ाकर घरों के बाहर हो जाते हैं। जबकि मानवीय बुद्धि भूकम्पीय झटकों को चौबीस घण्टे पूर्व भी जानने में असमर्थ है।

ऊँची पहाड़ियों पर बसने वाले पक्षियां बर्फ पड़ने के ठीक एक माह पूर्व पहाड़ियां त्याग कर सुरक्षित स्थानों में चली जाती हैं जबकि मनुष्य अभी तक शत−प्रतिशत रूप से बर्फ गिरने की भविष्यवाणी करने में असमर्थ रहा है। अनेकों प्रयोगों के बाद पाया गया कि आकस्मिक रूप से पड़ने वाली बर्फ के भी ठीक एक माह पूर्व पक्षियाँ स्थान खाली कर दूर−दराज देशों में चली जाती हैं।

तिब्बत और दार्जिलिंग में पायी जाने वाली पहाड़ी सारस वर्षा के 10-14 मिनट पूर्व ही पर्वतों की गुफाओं अथवा चट्टानों की आड़ में चली जाती हैं जिसे देखकर तिब्बती लोग अपना माल असबाव बाँधकर वर्षा से बचने का प्रबन्ध करने लगते हैं। कभी−कभी तो देखा गया कि आकाश में एक भी बादल नहीं हैं और पानी बरसने के कोई आसार न होते हुए भी जब यह पक्षी छिपने लगे तो उसके कुछ ही समय बाद बादल संघटित हुये और वर्षा होने लगती है।

जीव विज्ञानी मछलियों के इस भविष्य ज्ञान से हैरत में पड़ गये हैं कि मछलियाँ समुद्र तट पर ठीक तभी अण्डे देती हैं जब समुद्री लहरें उतर जाती हैं और दुबारा उठने की सम्भावना नहीं रहती। यदि मछलियों के इस भविष्य ज्ञान में एक मिनट का भी अन्तर पड़ जाय तो उनके सारे अण्डे गहरे समुद्र में जाकर नष्ट हो जाय। मछलियों के इस भविष्य ज्ञान सम्बन्धी शोध निष्कर्ष वैज्ञानिकों ने मछलियों को झील, तालाब और प्रयोगशालाओं में रखकर बनावटी प्रकाश, अन्धकार और बनावटी चन्द्रमा तक आकर्षण देकर प्राप्त किए। किन्तु इन प्रकृति प्रेमी मछलियों को रंचमात्र भी भ्रम में न डाला जा सका। इन सभी स्थानों पर रखी गयी मछलियों ने ठीक उसी समय अण्डे दिये जब सागर में रहने वाली मछलियों ने दिये अर्थात् लहरों के उतरते ही इन मछलियों ने अपने भविष्य ज्ञान के आधार पर उक्त क्रिया की। इनकी इस विधा की जानकारी में लाखों करोड़ों वर्षों से आज तक इंच मात्र का अन्तर नहीं आया अन्यथा इनका कभी का नाश हो गया होता।

विश्व की रचना निष्प्रयोजन नहीं, प्रयोजन युक्त है। इसका प्रमाण है जीव जगत के लिए पृथ्वी पर अनुकूल वातावरण का होना। न्यूयार्क विज्ञान अकादमी के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ. ए. क्रेसी मोरिसन का कहना है कि “गणित शास्त्र के नियमों से यह प्रमाणित होता है कि इस संसार का नक्शा किसी कुशल तथा बुद्धिमान इंजीनियर द्वारा खींचा गया हैं।” इस प्रतिपादन की पुष्टि हेतु उन्होंने गहन अध्ययन अन्वेषण किया है। उससे जो तथ्य सामने आये हैं उनका अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि हमारी पृथ्वी जो अपनी धुरी पर एक हजार मील प्रति घण्टे की रफ्तार से घूमती है, यदि उसकी गति सौ मील प्रति घण्टा हो जाय तो दिन और रात अब की तुलना में दस गुने लम्बे हो जायेंगे। दिन के समय सूर्य की गर्मी इतनी अधिक होगी कि पृथ्वी की समस्त वनस्पतियाँ जल जायेंगी। रात्रि को भयंकर ठण्ड पड़ेगी जिसके कारण अधिकाँश जीव मर जायेंगे।

चन्द्रमा की दूरी पृथ्वी से दो लाख बत्तीस हजार मील है। यदि उसकी दूरी मात्र 50 हजार मील होती तो सागरों में भयंकर ज्वार उठते। फलस्वरूप समस्त महाद्वीप जलमग्न हो जाते। सूर्य जीवन का स्रोत है। सूर्य से पृथ्वी की दूरी एवं प्राप्त होने वाला ताप का सामंजस्य जीवन के अनुकूल है। यदि सूर्य का ताप घटकर आधा अवशेष रह जाय तो पृथ्वी के सभी प्राणी जम जायेंगे। तापक्रम आधा और बढ़ जाय तो सब जल−भुनकर समाप्त हो जायेंगे। पृथ्वी 23 डिग्री के कोण पर झुकी है। इस कारण अनुकूल ऋतुएँ मिलती हैं। यह झुकाव न होता तो समुद्री भाप उत्तर से दक्षिण तक फैल जाती और सर्वत्र बर्फ के महाद्वीप बन जाते। वायु में आक्सीजन एवं कार्बन डाई आक्साइड गैस के सन्तुलन में सागरों की गहराई का हाथ है। यदि सागर अधिक गहरे होते तो इन गैसों के अभाव में वनस्पतियों का अस्तित्व नहीं बचता। अन्तरिक्ष वायु सुरक्षा कवच पतला अथवा हलका होता तो अगणित उल्काएँ नित्य ही जलती हुई पृथ्वी से टकराती और समस्त भू−सम्पदा को भस्मीभूत कर देतीं। हर दृष्टि से पृथ्वी पर अनुकूल, सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित वातावरण का होना इस बात का प्रमाण है कि कुशल हाथों से किसी समर्थ हाथों ने इस सृष्टि की रचना की है। संचालन एवं नियन्त्रण की बागडोर भी उसी के हाथों में है।

सोवियत रूप के वैज्ञानिक डॉ जी. ए. उशाकोव ने अपने ध्रुव शोध के विवरणों में एक और नया तथ्य प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं कि जीवन का आधार मानी जाने वाली आक्सीजन वायु पृथ्वी की उपज अथवा सम्पत्ति नहीं है। वह सूर्य से प्राण रूप में प्रवाहित होती हुई चली आती है और धरती के वातावरण में यहाँ की तात्विक प्रक्रिया के साथ सम्मिश्रित होकर प्रस्तुत ‘आक्सीजन’ बन जाती है। यदि सूर्य अपने उस प्राण−प्रवाह में कटौती कर दे अथवा पृथ्वी ही किसी कारण उसे ठीक तरह ग्रहण न कर सके तो आक्सीजन की न्यूनता के कारण धरती का जीवन संकट में पड़ जायेगा। पृथ्वी से 32 मील ऊँचाई पर इस प्राण का आक्सीजन रूप परिवर्तन आरम्भ होता है। यह आक्सीजन बादलों की तरह चाहे जहाँ नहीं बरसता रहता वरन् वह भी सीधा उत्तरी ध्रुव पर आता और फिर दक्षिणी ध्रुव के माध्यम से समस्त विश्व में वितरित होता हैं। ध्रुव प्रभा में रंग−बिरंगी झिलमिल का दिखना विद्युत मण्डल के साथ आक्सीजन की उपस्थिति का प्रमाण है।

कभी−कभी सूर्य मण्डल में विशेष उत्क्रान्ति उत्पन्न होने से उस प्रवाह की एक लहर पृथ्वी पर भी चली जाती है और ध्रुव प्रदेश में चुम्बकीय आँधी−तूफानों का सिलसिला चल पड़ता है। इनकी प्रतिक्रिया उसे ध्रुव क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रखती वरन् समस्त विश्व को प्रभावित करती है। कई बार यह चुम्बकीय तूफान बड़े उपयोगी और सुखद परिणाम उत्पन्न करते हैं और कई बार इनमें कुछ ऐसे तत्व घुले हुए चले आते हैं जिनका प्रभाव समस्त विश्व को कई प्रकार के संकटों में धकेल दे। एक बार सन् 1938 में एक चुम्बकीय तूफान ध्रुव प्रदेश पर आया था, उसकी भयानक चमक अफ्रीका तथा क्रीमिया तक देखी गई। उसका प्रभाव न केवल वस्तुओं पर पड़ा वरन् जीवधारी भी बुरी तरह प्रभावित हुए। ऐसी ही विद्युत आँधियों ने धरती पर ‘हिमयुग’ की परिस्थितियाँ उपस्थित कर दी हैं। मुद्दतों तक एक बड़े भू−भाग को बर्फ ने ढके रखा, समुद्र में बाढ़ आई और जमीन समुद्र में, समुद्र मरुस्थल में बदल गया। कहते हैं कहीं ऐसे ही वायु प्रलय, जल प्रलय, अग्नि प्रलय भी उपस्थित हो सकती हैं और यह चुम्बकीय आँधियाँ धरती के वर्तमान स्वरूप को कुछ से कुछ करके रख सकती हैं।

वस्तुतः यह संसार परस्पर विश्वास आत्मीयता और सहयोग के सिद्धान्त का पालन कर ही जीवित है। जब जीव, जन्तुओं को भी इन गुणों का अनुगमन करते पाया जाता है तो मनुष्य के आपसी बैर−भाव, वैमनस्य को देखकर शर्मिन्दा ही होना पड़ता है।

चीतल न केवल अपने सजातीय बन्धुओं से मित्रता करता है वरन् वह अन्य प्राणियों से भी दोस्ती कर लेता है। चीतल और बन्दर की दोस्ती लोक प्रसिद्ध है, जब बन्दर पेड़ पर चढ़कर फल तोड़ता और एक−एक करके अपने साथी चीतलों को खिलाता रहता है।

गिद्ध का अपने सजातियों के प्रति स्नेह देखते ही बनता है, जब वह किसी आहार को आपस में मिल बाँट कर खाता है।

शेरों में बड़ी प्रबल पारिवारिक भावना पाई जाती है। वह अपने शिशु को बड़े लाड़−प्यार से पालता−पोषता है। जब शिशु कभी उद्दण्डता का काम कर डालता है तो शेर उसे डांटता−फटकारता और आज्ञा का फिर भी उल्लंघन करने पर मार भी लगाता है।

जिराफ और जेबरे की मित्रता और साहचर्य, जीव जगत की एक अनोखी घटना है। जिराफ जेबरे को खाना खिलाता है और जेबरा न केवल संकट के समय अपने मित्र को उसकी पूर्व सूचना देता है, अपितु अपने प्राण देकर भी उसकी रक्षा करता है। पानी में तैरते हुए दरियाई घोड़े की पीठ पर बैठकर चिड़ियाएँ बड़े मजे से दोस्ती गाँठ लेती हैं। वह घोड़े की पीठ पर बैठकर न केवल जल विहार न आनन्द लेती हैं, वरन् वहाँ से भोजन प्राप्त कर पिकनिक भी मनाती हैं।

ऐसे अनेकों उदाहरण दैनन्दिन जीवन में देखे जा सकते हैं जो जीव जगत, मानव समुदाय एवं पर्यावरण के परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को, प्रकारान्तर से सृष्टा की व्यवस्था को ही प्रमाणित करते हैं। वस्तुतः यह सारी जगती सह अस्तित्व की एक सुनिश्चित विधि व्यवस्था पर टिकी हुई है। इस पर विश्वास रखने से आस्तिकता के तत्त्वदर्शन को पोषण मिलता है।


राजा धनंजय (kahani)

इन्द्रप्रस्थ में राजा धनंजय के घर में एक बार बोधिसत्व ने पुत्र रूप में जन्म लिया था। उसकी न्याय निष्ठा तथा दानशीलता की ख्याति समस्त जम्बू द्वीप में फैल गई। उन्हीं दिनों अनावृष्टि के कारण कलिंग देश में अकाल पड़ा।

कलिंग के राजा प्रजा के दुःख को देखकर दुःखी हुये। उन्होंने विज्ञजनों को बुलाकर दुर्भिक्ष निवारण का उपाय पूछा− उन्होंने कहा− प्राचीन समय में राजा अपना समस्त राज कोष दान कर देते थे। एक माह घास पर सोते थे। राजा ने ऐसा ही किया परन्तु वर्षा न हुई।

दूसरी सभा बुलाई गयी। ज्योतिषियों ने कहा− कुरु देश के राजा के पास अंजन वसभ नामक माँगलिक हाथी है उसके यहाँ आने पर वर्षा हो जायेगी। मंगल गज आ गया पर वर्षा इससे भी न हुई। तीसरी सभा बुलाई गयी उसमें बोधिसत्व ने बुझाया कि अधर्म बढ़ जाने से दुर्भिक्ष पड़ा। सभा को बात जँच गयी राजा ने इन्द्रप्रस्थ में 8 ब्राह्मण भेजकर धर्माचरण के नियम मँगवाए। धर्माचरण की मोटी मर्यादा तो स्वर्ण पटल पर लिखी थी। उनका मर्म रहस्य यह है− ‘कि हर व्यक्ति अपने आचरण की गहरी समीक्षा करे, सुधार के लिए सचेष्ट रहे। विनम्र बने, अपनी अपेक्षा दूसरों को श्रेष्ठ माने।’ जैसे ही धर्माचरण का पालन आरम्भ हुआ वैसे ही विपुल वर्षा होने लगी। दुर्भिक्ष का स्थान सुभिक्ष ने ले लिया।


क्या मनुष्य स्वभावतः आक्रामक है?

नृतत्व विज्ञानी डा. वाशवर्न मनुष्य की बौद्धिक क्षमता का इतिहास प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि “सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य का मस्तिष्क कई लाख वर्षों तक विकसित नहीं हुआ सात लाख साल पूर्व मनुष्य का मस्तिष्क पहले ही अपेक्षा दूना हो गया। चार लाख वर्ष पहले समूची स्थिति में अचानक परिवर्तन आया। मनुष्य का मस्तिष्क एक साथ कई आयामों में विकसित हुआ। किन्तु विकास की इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी त्रुटि यह रह गई की उसकी आक्रामक मनोवृत्ति में जरा भी परिवर्तन नहीं आया। पाषाण युग की सभ्यता एवं वर्तमान की मनोवृत्तियों में अब भी एक रूपता है। उनका कहना है कि आज आवश्यकता इसकी है कि मनुष्य बदले और उसे बदलना ही होगा अन्यथा मानव जाति का विनाश निश्चित है।”

उक्त विचार युनेस्को द्वारा आयोजित “पेरिस” की एक क्रान्फ्रेन्स में प्रस्तुत किया गया था विषय था अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार शान्ति की स्थापना की जाय? किस प्रकार मानवी मूल्यों की पुनर्स्थापना हो? इसमें 14 देशों के 18 मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने भाग लिया। विकासवाद का उपरोक्त सिद्धान्त सही न भी माना जाय तो भी मानवी स्वभाव को बदलने की आवश्यकता को तो समझना ही होगा।

दिवंगत प्रो. सोरोकोव ने अपनी पुस्तक “सोशल एण्ड कल्चरल डायनेमिक्स” में नौ सौ वर्षों में संसार के देशों ने जितने युद्ध किए हैं, उसके आधार पर विस्तृत तालिका बनायी है। इस तालिका के अनुसार बारहवीं सदी से बीसवीं तक रूस ने अपने समय का 42 प्रतिशत स्पेन ने 67 प्रति. पोलैंड ने 58 प्रति. ग्रीस ने 57 प्रति., इंग्लैंड ने 56 प्रति. फ्राँस ने 50 प्रति. हालैण्ड ने 44 प्रति. रोम ने 41 प्रति. आस्ट्रिया ने 40 प्रति. जर्मनी ने 28 प्रति. वर्ष युद्ध करते बिताया है। उक्त सम्मेलन में उपस्थित सभी मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि मनुष्य का मन परिवर्तनशील है, उसे बदला जाना सम्भव है।

आक्रामक, अति उत्साही व्यक्ति अपनी सामर्थ्य का अत्यधिक मूल्याँकन करने वाला होता है। इस आवेश में दूसरे को मच्छर की तरह मसल देने की अहमन्यता सवार रहती है। कभी−कभी बदला लेने की भावना प्रबल होती है। कभी मात्र नीचा दिखाने और स्वयं यशस्वी बनने तथा लाभान्वित होने की प्रवृत्ति का मन पर इतना अधिक दबाव बढ़ जाता है कि उसे आतंक प्रदर्शित करने के लिए कोई न कोई बहाना ढूँढ़ना पड़ता है। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि संसार में कोई न्याय व्यवस्था भी है जो आक्रामक को नीचा दिखाने के लिए स्वयं ही अदृश्य व्यवस्था बनाती रहती है। शान्ति प्रिय वाणी अपनी प्रकृति के अनुरूप बढ़ते भी रहते हैं और फलते−फूलते भी हैं और पारस्परिक सहयोग का लाभ उठाते रहते हैं। इसके विपरीत आक्रमणकारी आपस में ही ईर्ष्या द्वेष की आग में जलते रहते हैं और जब भी अवसर मिलता है, भेड़ियों की तरह एक−दूसरे की दबोचने का अवसर भी नहीं चूकते। सिंह व्याघ्रों की संख्या संसार में घटती ही जाती है। क्योंकि प्रकृति नहीं चाहती कि हानिकारक तत्व संसार में अधिक बढ़ें और अधिक समय तक जीवित रहें। आक्रामक अपराधियों को राजदण्ड, सामाजिक असहयोग एवं तिरस्कार भी निरन्तर सहन करना पड़ता है। यह उनकी जीवनी शक्ति को घटाने एवं परास्त करने में कम भूमिका नहीं निभाती। आत्म हनन का पश्चात्ताप भी उन्हें कम नहीं सहना पड़ता।

यों मनुष्य भूतकाल की विपन्न परिस्थितियों में आत्म रक्षा के नाम पर आक्रामकता अपनाता रहा है पर स्वभावतः अपनी शारीरिक एवं मानसिक संरचना के कारण वह आक्रामक है नहीं।


संतति की उत्कृष्टता के लिए- जन्मदाता उत्तरदायी

सुसंतति की उपयोगिता सभी समझते हैं, पर उसके लिए माता−पिता बनने वाले अपना स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न नहीं करते।

वैज्ञानिकों का इसके संदर्भ में ‘जीन्स’ को उत्तरदायी बताना तो ठीक है पर वे यह भूल जाते हैं कि इसका एक मात्र उपाय जन्मदाताओं का शारीरिक स्वास्थ्य सही होने से भी अधिक उनका मानसिक स्वास्थ्य सही होना अधिक आवश्यक है। क्योंकि सन्तति की उत्कृष्टता मात्र उसकी स्वास्थ्य−बलिष्ठता के आधार पर नहीं आँकी जा सकती। बौद्धिक और भावनात्मक स्तर गया−गुजरा होने पर कोई भी बलिष्ठ व्यक्ति दुष्ट, दुराचारी, विग्रही और उद्दण्ड ही हो सकता है। इसमें भी पिता की तुलना में माता को अधिक सुयोग्य और भावनाशील होना चाहिए।

यह स्पष्ट हो गया है कि अपने वातावरण तथा अपनी चेष्टाओं द्वारा व्यक्ति जिन स्वभाव−गुणों को अर्जित करता है, वे वंशानुक्रम से प्राप्त नहीं होते और न ही कोई व्यक्ति उन अर्जित विशेषताओं को वंशानुक्रम द्वारा अपने बच्चों को प्रदान कर सकता है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति ने अनेक भाषाएँ सीखी हैं, तो वह उस भाषा−ज्ञान को अपने बच्चों को वंशानुक्रम द्वारा नहीं दे सकता। बच्चों को भी भाषा−ज्ञान की प्रचलित विधियों को ही अपनाना होगा तथा मेहनत करनी पड़ेगी। वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट हो गया है कि वंशानुक्रम का निश्चित प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। आनुवांशिकी (जेनेटिक्स) का सारा ढाँचा ही इसी आधार पर खड़ा है। यह सही है कि कोई भी व्यक्ति जंगली बेर के बीज बोकर उनसे गुलाब के फूलों की आस नहीं कर सकता। गौरैया के अण्डों को सेकर उनमें से मोर के बच्चे कौन निकल सकता है? लेकिन जिन पौधों के बीज बोये जाते हैं, उनसे उन्हीं जैसे पौधे आखिर क्यों उगते हैं? चूहों से चूहा और बिल्ली से बिल्ली ही क्यों पैदा होती हैं? इसका उत्तर हैं, आनुवांशिकता अर्थात् नियमित वंश परम्परा, जिनके कारण ही ऐसा होता है। जो वस्तु जिस वंश की होगी, उसका बीज डाले जाने पर वैसा ही फल होगा। आनुवांशिकता में काम करने का ढंग भी शामिल है और चीजों का कद तथा रंग भी। उदाहरण के लिये वया पक्षी को बढ़िया लटकने वाला घोंसला बनाना किसी को सिखाना नहीं पड़ता है।

आनुवांशिकता अपने पूर्वजों से मिलने वाली विशेषताओं का ही दूसरा नाम है। वैज्ञानिक जानते हैं कि जीवों में जो विशेषतायें होती हैं, वे उन्हें अपने माता−पिता से अत्यन्त सूक्ष्म कणों के रूप में मिलती हैं। इन सूक्ष्म कणों को ‘जीन्स’ कहा जाता है। हमारा शरीर बहुत−सी कोशिकाओं से मिलकर बना है। ‘जीन’ कोशिका के क्रोमोसोम्स का ही एक भाग है। अगर किसी वट−वृक्ष की शाखा को कहीं उसके अनुकूल स्थान में लेकर जाकर बो दिया जाय तो वह भी मूल पेड़ की तरह ही फलने−फूलने लगेगी। उसकी कोशिकाओं के ‘जीन्स’ अपने पहले के पेड़ की ही भाँति होंगे। ठीक उसी तरह जिस तरह किसी स्पंज के टुकड़े में वैसे ही छिद्र होते हैं, जैसे उस स्पंज में थे जिसमें से कि टुकड़े को तोड़ा गया है।

यदि कोशिका को काटकर नाभिक से अलग कर दिया जाय तो कोशिका की मृत्यु हो जायेगी पर नाभिक में स्वतः निर्माण ही क्षमता होती है, हमारा आध्यात्मिक दर्शन यह कहता है कि उस नाभिक में इच्छा, आशा, संकल्प और वासना का अंश रहता है, उसी के अनुरूप वह दूसरा जन्म ग्रहण करता है। अभी पाश्चात्य विज्ञान इस संबंध में तो खोज नहीं कर पाया पर कोशिकाओं के नाभिक में पायी जाने वाली एक तरह की किरणों की जानकारी अवश्य मिली है, जो सम्भवतः एक जन्म के संचित संकल्पों को सन्तानोत्पत्ति के वंशानुक्रम विज्ञान द्वारा दूसरी पीढ़ी में ले जाने के लिये उत्तरदायी कहे जा सकते हैं। यह भी सूक्ष्मतर स्तर पर होने वाली प्रक्रिया है।

आहार क्रम को बदलकर भी कोशिकाओं को बदला जा सकता है। भले ही यह क्रम मन्दगामी हो पर यदि एक ही प्रकार के पदार्थ खाने में लिये जायें तो उसी प्रकार की कोशिकाओं को विकसित और सतेज कर दुर्बल एवं अधोगामी योनियों में पाई जाने वाली कोशिकाओं को हटाया और कम किया जा सकता है। इसका प्रभाव यह होता है कि मनुष्य में जो पाशविक वृत्तियाँ होती हैं, वह इन कोशिकाओं की मन्द, अशुद्ध और जटिल स्थिति के कारण होती हैं, उन्हें बदल कर, शुद्ध, सात्विक बनाया जा सकता है। अर्थात् जन्मदाता अपना व्यक्तित्व उच्चस्तरीय बनाये।

वैज्ञानिकों का ध्यान जीन्स की शल्य क्रिया करके उसमें समाये हुए अनुपयुक्त भाग को निकाल फेंकने की बात भर समझ में आई है। पर यह नहीं सोच पाये कि उस कमी की पूर्ति कैसे की जाय जो जन्मदाताओं में तत्वतः नहीं है। वे इसका समाधान कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से हल करना चाहते हैं पर वह भी नैतिक और पारिवारिक, सामाजिक परम्पराओं को देखते हुए व्यावहारिक नहीं दिखता। इसमें कानूनी बाधाएँ भी हैं कि इस प्रकार जन्मे बालक का पिता किसे कहा जाय। पुरुष प्रधान समाज में यह भी एक झंझट की बात है।

सुसन्तति प्राप्त करने का वही तरीका सर्वोत्तम है कि जनक जननी अपने उत्तरदायित्व को समझें और अपना व्यक्तिगत जीवन उस स्तर का बनायें जिनके द्वारा उत्पादित फसल उन्हीं के अनुरूप हो।

यह तभी सम्भव है जब गर्भाधान को काम−क्रीड़ा के कौतूहल से कहीं ऊँचा समझा जाय और उसके कारण समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान लगाया जाय।

कुसन्तति अपने लिए, परिवार के लिए, ही सिर−दर्द नहीं बनती वरन् अपने विकृत व्यक्तित्व एवं अवाँछनीय क्रिया−कृत्यों से समाज में अनेक विग्रह खड़े करती है। इस प्रकार का उत्पादन करने वाले भले ही शासकीय दण्ड व्यवस्था के अंतर्गत न आ पाते हों, पर उन्हें आत्मा और परमात्मा के सामने तो लज्जित होना ही होगा। जबकि सुसन्तति अपने सत्कर्मों से प्रशंसनीय वातावरण बनाती है।

सभी चाहते हैं कि उनके घर में सुसन्तति का प्रादुर्भाव हो, पर वे यह भूल जाते हैं कि खिलौना या पुर्जा बनाने से पूर्व उसका साँचा सही बनाना पड़ता है। अच्छा हो कि समाज के उत्थान और पतन की भावी योजना के लिए सुप्रजनन ही उचित माना जाय और उस अति जिम्मेदारी के काम में मात्र वे ही लोग हाथ डाले जिनने अपना−व्यक्तित्व इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त बना लिया हो।

यह ठीक है कि जैसा बीज होता है वैसा ही पौधा पैदा होता है। यह भी गलत नहीं है कि उर्वर भूमि में पौधे को तेजी से बढ़ने में सहायता मिलती है। पिता को बीज और माता को भूमि कहा गया है। यह पर्याप्त नहीं कि बीज सड़ा घुना न हो। अर्थात् पिता का व्यक्तित्व गुण, कर्म, स्वभाव एवं स्वास्थ्य गया−गुजरा न हो। इसी प्रकार यह भी उचित है कि माता को सुयोग्य, सुसंस्कारी एवं शिक्षा की दृष्टि से समुन्नत स्तर की होना चाहिए। इसके लिए स्त्री शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके बिना वह सद्गुणों का महत्व और उन्हें विकसित करने के उपायों से अनजान ही बनी रहेगी। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि लड़कों को नौकरी के निमित्त पढ़ाया जाता है और लड़की को पराये घर का कूड़ा समझकर हर बात में उसके प्रति उपेक्षा बरती जाती है सुसन्तति उत्पादन की दृष्टि से यह बहुत अनुचित है कि लड़कियों को सुयोग्य बनाने की दिशा में उपेक्षा बरती जाय।

बात इतने पर ही समाप्त नहीं हो जाती। पौधे को खाद−पानी और रखवाली भी चाहिए। बच्चों को घर का तथा स्कूलों का वातावरण ऐसा मिलना चाहिए जिसमें उन्हें सुसंस्कारिता उपलब्ध करने का अवसर मिले साथ ही शिक्षा भी ऐसी मिलनी चाहिये जो जीवन विकास के सर्वोपरि महत्व की आवश्यकता पूरी कर सके।


अजब तेरी कुदरत अजब तेरा खेल

रस्टीड−जर्मनी−के सेन्ट भूलारिच चर्च में एक ऊँची मीनार बनी है। इस पर एक 1599 और 1783 के बीच भयंकर आकाशी बिजली चार बार गिरी। वह चार बार धराशायी हुई और नये सिरे से बनाई गयी। चारों बार बिजली गिरने की तारीख 18 अप्रैल थी।

स्पेन के वार्सिलोना नगर में एक ‘सिएट सेंटिम्ब्रे’ नामक व्यक्ति हुआ है। जिसका अर्थ स्पेनी भाषा में होता है−सात सितम्बर। यह नाम उसे माता−पिता से नहीं मिला। लोगों के द्वारा थोपा गया। वह 7 सितम्बर को 1749 को पैदा हुआ और 7 सितम्बर 1801 को मर गया। उसके बेटे का भी यही नाम था। वह 7 सितम्बर 1774 को पैदा हुआ और 7 सितम्बर 1826 को मरा। इतना ही नहीं उसके पोते का भी यही नाम था और जन्म−मरण का दिन भी पूर्वजों की भाँति है। पोता 7 सितम्बर 1814 को पैदा हुआ और 7 सितम्बर 1868 को दिवंगत हुआ। तीन पीढ़ियों तक एक ही नाम और एक ही जन्म−मरण का दिन अभी तक उस देश में चर्चा का विषय है।

जापान पर भूकम्पों की विपत्तियाँ अनेक बार आई हैं पर छः भयानक संयोग ऐसे हैं जो एक ही तारीख को घटित हुये। और विनाश की दृष्टि से असाधारण रूप से भयानक माने गये।

(1) 1 सितम्बर 837 (2) 1 सितम्बर 859 (3) 1 सितम्बर 867 (4) 1 सितम्बर 1185 (5) 1 सितम्बर 1649 (6) 1 सितम्बर 1923। इनमें से छठे ने सबसे अधिक विनाश किया। उससे टोकियो और योकोहामा शहर बुरी तरह बर्बाद हुये और प्रायः 1 लाख 43 हजार व्यक्ति दबकर मर गये। घायलों की संख्या तो इससे भी कहीं अधिक थी।

विश्व−विख्यात चित्रकार आल्माटाडमा के जीवन में “17” की संख्या महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। यह बात वे स्वयं स्वीकार करते हुए कहा करते थे− ‘‘जब मैं 17 वर्ष का था तब 17 तारीख को अपनी प्रिय पत्नी से मिला। मेरे पहले मकान का नम्बर 17 था जब दूसरा मकान बनाया था वह भी 17 अगस्त से प्रारम्भ हुआ और उस नूतन ग्रह में मेरा प्रवेश भी 17 नवम्बर को ही हुआ। चित्रकारी के लिए सेन्ट जोन्स वुड ने जो कमरा लिया वह भी 17 नवम्बर का ही निकला।

एस. बी. फ्रेंच के जीवन की अधिकाँश घटनायें “7” की संख्या के साथ ही घटित हुईं। उनका जन्म 7वीं महीने की 7वीं तारीख को हुआ था। 7 वर्ष तक वे कभी बीमार नहीं हुये। 7वीं कक्षा तक वे कभी फेल नहीं हुये। उनका विवाह भी 7वीं लड़की के साथ हुआ और संयोग से उस लड़की के लिए भी फ्रेच 7वें ही लड़के थे।

ऐलन वान ने अपनी पुस्तक ‘इनक्रेडिबल कोइन्सीडेन्स’ में अंक संयोग पर आधारित घटना का भी उल्लेख किया है। आयरलैण्ड स्थित डबलिन के निवासी एन्टनी क्लैंसी के जीवन में ‘सात’ संख्या का विशेष महत्व रहा। उसके जीवन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर सात का संयोग अवश्य रहा। एन्टनी क्लैंसी के शब्दों में “सप्ताह के सातवें दिन, महीने की सातवीं तारीख को, वर्ष के सातवें दिन, इस सदी के सातवें वर्ष में मेरा जन्म हुआ था। मैं अपने माता−पिता का सातवाँ बेटा हूँ, यहाँ तक मेरे पिता भी अपने अभिभावक के सातवें पुत्र थे। अपनी सत्ताइसवीं वर्षगाँठ पर सातवीं घुड़−दौड़ में मैंने सात नम्बर का घोड़ा चुना और उसका नाम था−‘सातवाँ बहिश्त’। मैंने उस घोड़े पर सात शिलिंग लगाये। रेस में भी उसका सातवाँ नम्बर था।”

उत्तरी वर्टन यार्क्रस से डा. रुड के जीवन में 13 की संख्या दुर्भाग्य सूचक के रूप में रही। 13 वर्ष की अल्प आयु में वे बीमार पड़े। 13 दिन तक घोर कष्ट सहते हुये 13 तारीख को हृदय की बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गयी। उनके परिवार में 13 सदस्य थे। मृत्यु के समय कुछ 13 शिलिंग ही उनके फण्ड में बचे थे। अन्तिम संस्कार के समय भी 13 सदस्य ही उपस्थित हुये। रुड का नाम फूवाह था जो कि बाइबिल के 13 वें छन्द में आता है। उनकी मृत्यु के समय मात्र 13 तार ही शोक संवेदना के रूप में आये।

इसके विपरीत ‘डेनवरा कोलराडो’ के धनाढ्य उद्योगपति शेरमैन के लिए 13 की संख्या सौभाग्य सूचक थी। शेरमैन का जन्म 13 तारीख को हुआ। उनकी सगाई 13 तारीख को हुयी और विवाह भी 13 जून 1913 को हुआ। पत्नी का जन्म दिन भी 13 तारीख को ही था। उनके विवाहोत्सव में कुल 13 सदस्य ही उपस्थित थे। 13 की संख्या उनके जीवन में सदैव लाभदायक रही।

फ्राँस के सिंहासन के साथ 14 की संख्या का महत्व संख्याओं के साथ जुड़ी विचित्रताओं को प्रकट करती हैं। फ्राँस के प्रथम सम्राट हेनरी 14 मई 1029 को सिंहासन पर बैठे जबकि वहाँ के आखिरी सम्राट का नाम भी हेनरी था 14 मई 1610 को उनकी हत्या कर दी गयी थी। जिस तारीख को एक को सिंहासन मिला उसी को दूसरी 14 मई को मृत्यु का उपहार। वहाँ के अन्य सभी राजाओं के लिए 14 संख्या का महत्व सदैव बना रहा। हेनरी द्वितीय ने 14 मई को ही फ्राँस का राज्य विस्तार किया। हेनरी तृतीय को 14 मई के दिन युद्ध के मोर्चे पर जाना पड़ा। हेनरी चतुर्थ ने आपवरी का युद्ध 14 मार्च 1590 को जीता। 14 दिसम्बर 1599 को सवाय के ड्यूक ने अपने आपको हेनरी को आत्म−समर्पण किया। 14 तारीख को ही लार्ड डफिन ने लुई 13 वें के रूप में वैपतिस्मा ग्रहण किया। हेनरी चतुर्थ के पुत्र लुई 13 वें की मृत्यु 14 मई 1643 को हुई। 14 वें 1643 में (1+6+4+3=14) सिंहासन पर बैठे और 77 वर्ष (7+7=14) की आयु में उनकी मृत्यु हुई। लुई 14 वें ने कुल 14 वर्ष राज्य किया। इस प्रकार फ्राँस के सिंहासन पर 14 का महत्व सदैव बना रहा।

जर्मनी के शासक चार्ल्स चौथे ने अपने जीवन में चार की संख्या को अत्यधिक महत्व दिया। वह चार रंग की पोशाक को दिन में चार बार पहनते थे। चार प्रकार का भोजन, चार मेजों पर दिन में चार बार करते थे। चार प्रकार की शराब पीते थे, बग्घी में चार पहिए और चार ही घोड़े जुतते थे। उनके चार महल थे उनमें चार−चार ही दरवाजे और प्रत्येक महल में चार−चार कमरे, प्रत्येक में चार−चार ही खिड़कियाँ। मृत्यु के दिन उनके समीप चार ही डाक्टर उपस्थित थे। उन्होंने चार बार ‘गुडबाय’ कहा और ठीक चार बजकर 4 मिनट पर इस संसार से विदा हो गये।

संयोगवश संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास में 160 वर्षों से एक विचित्र परम्परा ही दिखाई पड़ती है। प्रति 20 वर्ष पर राष्ट्रपति की मृत्यु अपने ही कार्यकाल में हो जाया करती थी। 1840 में 68 वर्षीय विलियम हैरीसन राष्ट्रपति बने। मार्च 1841 में निमोनिया से मृत्यु हो गयी। 1860 में लिंकन राष्ट्रपति बने और इनकी हत्या 1865 में हो गयी। 1880 में प्रेसीडेन्ट गारफील्ड राष्ट्रपति बने और अगले वर्ष गोली लगने के कारण मर गये। 1920 में प्रेसीडेन्ट हार्डिंग ने कार्यभार सम्भाला। आप स्वाभाविक मृत्यु से 1923 में मर गये। 1940 में फ्रेंकलिन रुजवेल्ट राष्ट्रपति बने और 1945 आते−आते मर गये। 1960 में प्रेसीडेन्ट कैनेडी ने अपनी 1963 की मृत्यु के पूर्व तक राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। 1860, 1900, 1940 में चुने सभी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में मरे तो थे ही सब दूसरी बार राष्ट्रपति कार्यकाल में थे। अपवाद रूप में वर्तमान राष्ट्रपति रीगन ही हैं। अब तक इस श्रृंखला में वर्णित राष्ट्रपति में रीगन भी सबसे वयोवृद्ध हैं। वे 1984 में दूसरी बार के लिए पुनः चुने गए।

अमरीका के जिस विशप ने अपने तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध कर दिया है कि एफ. कैनेडी ही अब्राहम लिंकन थे। चालीस वर्ष की आयु में लिंकन को राष्ट्रपति बनने की इच्छा हुयी थी। कैनेडी को भी। दोनों विश्व शान्ति के प्रयासों में संलग्न रहे और नीग्रो स्वतन्त्रता को भी उन्होंने समान रूप से चाहा। लिंकन के चार बच्चे थे दो मर गये दो उनके साथ रहते थे। कैनेडी के भी चार पुत्र हुये दो मर गये दो जीवित रहे। लिंकन की पहली पत्नी फैशनेबुल थी, कविता व पेंटिंग में उसकी रुचि थी। ठीक इसी स्वभाव की पत्नी कैनेडी की थी। दोनों की आस्था धार्मिकता की ओर थी। भोजन में स्पार्शा दोनों को प्रिय था। लिंकन 1861 में राष्ट्रपति बने तो कैनेडी 1961 में। लिंकन के प्राइवेट सैक्रेटरी का नाम था कैनेडी और कैनेडी का लिंकन। दोनों की मृत्यु शुक्रवार के दिन हुई। दोनों ही गोली के शिकार हुये और जान्सन नामक उपराष्ट्रपतियों ने ही दोनों का पद सम्भाला।

किन्हीं व्यक्तियों के जीवन में कुछ अंकों का विशेष महत्व रहता है। प्रिंस विस्मार्क के जीवन में 3 का अंक कुछ विलक्षण संयोग लाता रहा। उनके तीन नाम थे− लाग्नवर्ग, शोपासेवी और विस्मार्क। उन्हें तीन उपाधियाँ मिलीं- प्रिंस, ड्यूक तथा काउण्ट। तीन कालेजों से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। तीन ही उनके पुत्र थे।

साइप्रस के शासनाध्यक्ष मकरिआस के जीवन में 13 का अंक कुछ ऐसे ही संयोग लाता रहा। 10 अगस्त 1913 को उनका जन्म हुआ। 13 वर्ष की आयु में चर्च में भर्ती हुये। 13 नवम्बर 1946 में उन्होंने प्रीस्ट दीक्षा ली। 13 जून 1948 में वे विशप बने तथा राजगद्दी पर बैठे। 13 मार्च 1951 में यूनान के राजा ने उनका अभिनन्दन किया। 13 दिसम्बर 1959 को वे राष्ट्रपति चुने गये।

भारत के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री के जीवन में मंगलवार का विशेष महत्व रहा। बचपन में एक बार वे गंगा में डूबते−डूबते बचे वह दिन भी मंगलवार था। यू. पी. पार्लियामेंटरी बोर्ड के मंत्री, 1947 में पुलिस एवं यातायात मन्त्री, 1951 में काँग्रेस के महासचिव, 1952 में रेलमन्त्री, 1957 में परिवहन मन्त्री आदि पद उन्होंने मंगलवार के दिन ही प्राप्त किये। यहाँ तक कि वे प्रधानमन्त्री भी मंगलवार को ही बने। मंगलवार को ही उन्हें स्व. राधाकृष्णन ने भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया। ताशकन्द वार्ता भी उन्होंने मंगलवार को प्रारम्भ की और अन्त में उन्होंने अपना पार्थिव शरीर भी मंगलवार के दिन छोड़ा।

आयरलैण्ड के क्रुक हैवेन शहर में एक ही मकान में रहने वाले दो दम्पत्तियों के एक ही दिन कुछ मिनटों के अन्तर से दो पुत्र पैदा हुए। नाम रखा गया−एलेनर गेडी तथा पैट्रिक। दोनों बच्चे अलग−अलग खेलते किन्तु एक दिन दोनों रोते−रोते घर पहुँचे तो उनके माता−पिता ने देखा कि दोनों के पैर में एक ही स्थान पर चोट लगी थी। दोनों बच्चे पढ़ रहे थे तब कई बार ऐसा हुआ कि दोनों को परीक्षा में समान अंक मिले। दोनों का विवाह एक साथ ही तय हुआ। शादी के बाद पहला बच्चा भी दोनों के एक ही दिन हुआ। पैट्रिक और ऐलेनर 96 वर्ष की आयु में एक ही दिन बीमार पड़े और साथ ही मृत्यु भी दोनों की एक ही समय में हुयी। इन घटनाओं से आयरलैण्ड के शिक्षित व्यक्ति भी बात को मानने लगे कि कोई एक सार्वभौमिक सत्ता व नियम सृष्टि में अवश्य काम कर रहा है।

भारत की भुवाल रियासत के उत्तराधिकारी के मुकदमे का फैसला संसार के इतिहास में अपने ढंग का अनोखा है। रियासत का राजा रमेन्द्र राय 1909 में मरा। उत्तराधिकारी स्थानापन्न हो गये। इसके 12 वर्ष बाद राजा प्रकट हुआ और उसने अदालत में अपनी सम्पत्ति वापस लेने का दावा किया उसका कहना था कि घर के लोग चिता में आग लगाकर घर चले गये और उसी समय वर्षा से आग बुझ गयी और वे मृतक से जीवित हो गये। स्मृति न रहने के कारण वे बारह वर्ष जहाँ तहाँ भटकते रहे और अब वे अपनी बंगला मातृभाषा तक भूल चुके हैं। इस दावे का उनके पूरे परिवार ने खण्डन किया। विधवा ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि यह कोई जाल−साज है उसका पति नहीं। इतने पर भी ब्रिटेन की प्रीवी कौंसिल ने सन् 1935 में राजा के पक्ष में फैसला दिया। राजा की भारी जायदाद थी उसमें तैंतीस लाख रुपया वार्षिक की आमदनी थी। यह सम्पत्ति फैसले के अनुसार उस मृतात्मा को मिल गयी जिसने अपने आपको सिद्ध करने और न्याय कर्ताओं को प्रभावित करने में विभिन्न सबूतों के आधार पर सफलता पाई। कुदरत का खेल विचित्र है इसकी पहेलियाँ वस्तुतः अबूझ हैं।


मरने के बाद भी आत्माएँ धरती वासियों से सम्बन्ध रखे रहती हैं।

वियेना के प्रख्यात चित्रकार जोसेफ आयनगार−के पीछे−पीछे मौत का साया फिरता था। जाने−अनजाने उसे कई बार मौत ने घेरा, पर उसका अदृश्य एवं अपरिचित सहायक उसे हर बार बचाता रहा। सन् 1880 में बुडापेस्ट में उसने फाँसी लगा कर आत्म हत्या की। बचाने के लिए वही अदृश्य सहायक पहुँचा और रस्से से नीचे उतार लिया। सन् 1848 में क्रान्तिकारी के रूप में शासन ने उसे मृत्यु दण्ड दिया। तब भी उस अपरिचित यूनियन भिक्षु ने राजा से मिलकर प्राणदण्ड रद्द कराया। अन्ततः उसने 68 वर्ष की आयु में अपने सीने में आप गोली मार कर आत्महत्या कर ली। अन्तिम संस्कार कराने के लिए भी वही भिक्षु उपस्थित रहा।

सन् 1563 की बात है। फ्राँसीसी ड्यूक डिगाइज की हत्या के अपराध में जानपाल ट्रीट नामक एक व्यक्ति को मृत्यु दण्ड दिया गया। मारने का तरीका यह निश्चित किया गया कि उसके दोनों हाथ दोनों पैर चार अलग−अलग मजबूत घोड़े से बाँध दिये जाँय। घोड़े एक साथ दौड़ाये जाँय ताकि अपराधी के चार टुकड़े हो जाँय। नियत व्यवस्था के अनुसार सेना के बलिष्ठ घोड़ों को घुड़सवारों द्वारा दौड़ाया गया पर आश्चर्य यह है कि घोड़े आगे बढ़ न सके। कैदी इतना मजबूत था कि उसका कोई अवयव न तो उखड़ता था न ढीला पड़ता था। घोड़े तीन बार बदले गये। बारहों घोड़े जब असफल रहे तो उसे रिहा कर दिया गया। उसका कहना था कि इस कार्य में उसके पूर्वजों ने अदृश्य रूप से सहयोग दिया।

मैसूर के राजा ने नई तोप के उद्घाटन के अवसर पर उस क्षेत्र के एक प्रख्यात साधु से आशीर्वाद माँगा। इनका किये जाने पर राजा बहुत क्रुद्ध हुआ और साधु को उसी तोप की नली से बाँधकर उड़ा देने का हुक्म दिया। वैसा ही किया भी गया। पर साधु मरा नहीं। पहली बार जब उसे बारूद भरी नली ने उड़ाया तो 800 फुट ऊँचाई पर उछल कर बहुत दूर खड़े हाथी की अम्बारी पर जा गिरा। पकड़कर लाया गया और दुबारा फिर उसे उसी प्रकार तोप से कसा और उड़ाया गया। इस बार वह एक दूरस्थ झोंपड़ी के छप्पर पर जा गिरा। और साफ बच गया। तीसरी बार उसे फिर नहीं बाँधा गया।

सन् 1919 में लिवरपूल में जेम्स नामक एक व्यक्ति के साथ जो बहुत पहले कभी फौज में रह चुका था एक घटना घटित हुई। लड़ाई के दौरान तोपों की भयंकर गर्जना के कारण उसके कान के पर्दे फट गये और वह बहरा हो गया था। पेंशन पर आ जाने के बाद एक रात उसने स्वप्न में देखा कि वह लिवरपुल के पवित्र सेंट विनिफ्रेड कुएँ के पास खड़ा होकर उसमें से जल निकाल कर स्नान कर रहा है जैसे ही पानी शरीर पर पड़ा कि शीत की−सी कंपकंपी लगी और इसी क्षण उसकी नींद टूट गई। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। पास में सो रहे उसके घर वालों ने पूछा−कौन! यह शब्द सुनते ही उसके जीवन में नया प्रकाश आ गया उसने आश्चर्यपूर्वक बताया− मैं हूँ जेम्स पर यह क्या हुआ, कैसे हुआ− जिस बहरेपन को डाक्टर नहीं ठीक कर पाये वह एक स्वप्न ने ठीक कर दिया।

काल के अनन्त प्रवाह में बह रही जीवन धारा का प्रेत योनि एक नया मोड़ मात्र है। हमारे सीमित बोध जगत के लिए भले ही वह जीवन धारा खो गई प्रतीत होती हो, पर वह सर्वदा अविच्छिन्न रहती है और हमार संस्कार क्षेत्र मरणोत्तर जीवन में भी सक्रिय रहता है, अन्तःकरण चतुष्टय मृत्यु के उपरान्त भी यथावत बना रहता है। अशान्त, विक्षुब्ध मनःस्थिति भी अपना स्वभाव उस रूप में ही बनाये रखती है। दुष्ट और दुरात्म जीवन क्रम की यह स्वाभाविक परिणति जीवात्मा को जिस अशांत दशा में रहने को बाध्य करती है उसका ही नाम प्रेत दशा है। अपनी दुर्दशा से सामान्यतः प्रेतों को दुःख ही होता है, पर अत्यन्त कलुषित अनाचारी व्यक्तियों की हिंस्र मनोवृत्तियाँ प्रेत जीवन पाकर भी अपनी क्रूर आकाँक्षाओं की पूर्ति करना चाहती हैं और लोगों को अनायास सताती रहती हैं पर अपना आतंक वे उन्हीं पर जमा पाती हैं, जिनका आत्मबल अविकसित हो। इसके विपरीत पितर शान्त सहयोग सतत देते रहते हैं।

डा. सी. डी. ब्रोड समेत अनेक वैज्ञानिक−मनोवैज्ञानिकों ने ‘मीडियम’ (प्रेत प्रभावित व्यक्ति) के बारे में एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि मस्तिष्क की संरचना जटिल है। वह शरीर के सम्मिलित संयोग का उत्पादन है, जिसमें एक अभौतिक तत्व भी सम्मिलित है, जिसे वे ‘साइकिक फैक्टर” कहते हैं। जब व्यक्ति मरता है, तो उसका शरीर रूपी यह संयोग बिखर कर नष्ट हो जाता है। इस प्रकार उस शरीर में अवस्थित मस्तिष्क का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है। किन्तु “साइकिक फैक्टर” कोई भौतिक द्रव्य (मैटर) नहीं है, अतः वह विनष्ट नहीं हो सकता। यह अवशिष्ट “साइकिक फैक्टर” इधर−उधर भ्रमण करता रहता है। फिर ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क को पाते ही वह प्रविष्ट हो जाता है जो इन परिव्राजक साइकिक फैक्टर्स के प्रति ग्रहणशील हो। ऐसे ही व्यक्ति “मीडियम” प्रेत वाहन बना करते हैं। “साइकिक फैक्टर” कोई व्यक्ति तो होते नहीं, वे पूरे मस्तिष्क के भी प्रतिनिधि नहीं होते। अपितु मस्तिष्क के पदार्थ से परे एक अंश विशेष होते हैं। अतः ‘साइकिक फैक्टर’ एक पूर्ण मस्तिष्क की तरह काम नहीं कर सकते।

इस संदर्भ में एक नया पक्ष और भी है। वह यह है कि जीव सत्ता अपनी संकल्प शक्ति का एक स्वतन्त्र घेरा बनाकर खड़ा कर देती है और जीवन को अन्य जन्म मिलने पर भी वह संकल्प सत्ता उसका कुछ प्राणांश लेकर अपनी एक स्वतन्त्र इकाई बना लेती है। और इस प्रकार बनी रहती है मानो कोई दीर्घजीवी प्रेत ही बनकर खड़ा हो गया हो। अति प्रचण्ड संकल्प वाली ऐसी कितनी ही आत्माओं का परिचय समय−समय पर मिलता रहता है। लोग इन्हें ‘पितर’ नाम से देवस्तर की संज्ञा देकर पूजते पाये जाते हैं।

पदार्थ का प्रेत ‘प्रति पदार्थ’ विश्व का प्रेत ‘प्रति विश्व’ छाया पुरुष की तरह साथ−साथ विद्यमान रहता है। उसकी चर्चा विज्ञान जगत में इन दिनों प्रमुख चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का प्रेत होता है, यह भी जाना और माना जाता रहा है। अब यह नया तथ्य सामने आया है कि महत्वपूर्ण घटनाओं के−महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प सत्ताओं के भी प्रेत हो सकते हैं। स्थूल के नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्म का अस्तित्व बना रहता है।

सर ओलीवर लाज ब्रिटेन के माने हुए वैज्ञानिक रहे थे, उन्हें कई विश्व विद्यालयों की मूर्धन्य डिग्रियाँ और स्वर्ण पदक प्राप्त थे। वे ब्रिटिश एसोसियेशन के प्रधान थे। उनका पुत्र रेमण्ड प्रथम विश्व युद्ध में मारा गया था। मृतात्मा के साथ संपर्क बनाने और उसके माध्यम से अनेकों ऐसी अविज्ञात जानकारियाँ प्राप्त करने में सफल हुए जो परखने पर पूर्णतया सत्य सिद्ध हुईं। उनके एक समकालीन वैज्ञानिक सर विलियम कुकस ने अपने प्रेतात्माओं सम्बन्धी निष्कर्षों का विवरण ‘रिसर्च इनन्टेफेनोमिनम आफ स्प्रिचुअलिज्म’ में प्रकाशित कराया है। उसमें सर ओलिवर लाज के शोध कार्यों का भी उल्लेख हुआ है।

महाकवि विलियम ब्लैक के बारे में कहा जाता है कि वे माइकेल एजिलो−मोजेज−क्लीओ पेट्रा की स्वर्गीय आत्माओं के साथ रात्रि के एकान्त में वार्तालाप करते थे। वे आत्माएँ आकर उनके साथ महत्वपूर्ण विषयों पर वार्त्तालाप करती थीं।

घटना 1956 की है, भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर सपरिवार जार्जिया के एक पुराने मकान में रहने लगे थे। वह मकान पुराने ढंग का था और चारों ओर लम्बे वृक्ष लगे हुए थे। कहा जाता है कि उस मकान का निर्माण सौ वर्ष पहले 1860 में हुआ था। जिमी कार्टर सन् 1956 से 1960 तक इस मकान में रहे। एक रात्रि उन्होंने मकान के एक कमरे में किसी की चीख सुनी। कौन चीखा था? यह जानने के लिए कार्टर और उनकी पत्नी ने घर का कोना−कोना छान मारा परन्तु कहीं कुछ नहीं मिला। कुछ दिनों बाद उस मकान में और भी किरायेदार आये। एक दिन एक किरायेदार के कमरे से मध्य रात्रि में उसका बिस्तर ही गायब हो गया। वह तो सोया का सोया ही रहा किन्तु उसके नीचे का बिस्तर इस तरह गायब हो गया जैसे उसने बिस्तर बिछाया ही न हो। यह देखकर सब आश्चर्य चकित रह गये। यदि कोई चोर आया भी था तो वह बिस्तर कैसे ले गया? और बिस्तर ही क्यों ले गया? जबकि अन्य कीमती सामान छुए तक नहीं गये थे। यह गुत्थी किसी तरह नहीं सुलझ सकी।

महाकवि विलियम ब्लैक के बारे में कहा जाता है कि वे माइकेल एंजिलो−मोजेल क्लीओ पेट्रा की स्वर्गीय आत्माओं के साथ रात्रि के एकान्त में वार्त्तालाप करते थे। वे आत्माएँ आकर उनके साथ महत्वपूर्ण विषयों पर वार्त्तालाप करती थीं।

कोई बीस वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड के पोर्टस् साउथ रोड इशर कस्बे के पास से जो भी मोटर गुजरती उसमें बन्दूक की गोली इस तरह लगती कि शीशे, छत या दरवाजे पर एक इंच का छिद्र साफ, गोल और व्यवस्थित होता मानो किसी मशीन से किया गया हो। ऐसी घटना लगातार होती रहीं। क्षेत्र में आतंक फैल गया।

पुलिस की छानबीन तथा स्काटलैण्ड यार्ड की वैज्ञानिक जाँच इस घटना का सुराग न लगी सकी। यहाँ तक कि नगरपालिका ने पुलिस के विरुद्ध पास किया कि पुलिस जाँच करने में असफल रही है। सुरक्षायें की गईं किन्तु वे बेकार रहीं। आवागमन ठप्प होने लगा।

इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी और दार्शनिक सी. ई. एम. जोड ने बी. बी. सी. पर एक संवाद में भाग लेते हुए कहा था− मैं भूतों पर विश्वास नहीं करता था, पर एक दिन जब मेरे ऊपर प्रयोगशाला में बैठे−बैठे चारों ओर से साबुन की टिकिया बरसनी आरम्भ हो गईं और खोज करने का उसका कोई आधार नहीं सूझ पड़ा तो मेरा विश्वास बदल गया और में अब भूतों के अस्तित्व को मानता हूँ।

कैंब्रिज विश्व विद्यालय में प्रेतात्माओं सम्बन्धी शोध कार्य करने के लिए एक विशेष विभाग ही खुला हुआ है। अमेरिका की “साइकिकल रिसर्च फाउंडेशन” द्वारा अनेक वैज्ञानिकों और बुद्धि जीवियों के सहयोग से सुनियोजित शोध कार्य चल रहा है। आशा है इसके परिणाम शीघ्र ही सामने आएँगे। अदृश्य जगत ऐसा विषय है जिसे स्थूल आयामों की परिधि में नहीं देखा जा सकता। उपकरण भी इसमें अधिक मदद नहीं कर सकते। दार्शनिक अनुसन्धान के इस क्षेत्र में किए जा रहे अमृत मंथन के परिणाम निश्चित ही शुभ होंगे।


जज रानाडे (kahani)

बम्बई हाईकोर्ट के जज रानाडे उन दिनों काँग्रेस के नेता थे। उन्हें बंगला सीखनी थी। कोई पढ़ाने वाला नहीं रहा था।

जो नाई उनकी हजामत बनाने आता था वह बँगला जानता था। रानाडे ने उसी से पढ़ना आरम्भ कर दिया।

इस पर उनकी पत्नी ने कहा− नाई से न पढ़ें। कोई सुनेगा तो आपके सम्मान को धक्का लगेगा।

रानाडे हँसते हुये बोले, दत्तात्रेय ने तो 24 गुरु बनाये थे। उनमें कीड़े−मकोड़े और पशु पक्षी तक थे। फिर हमें नाई को गुरु बनाने में क्यों आपत्ति होनी चाहिए। ज्ञान जहाँ से मिले ग्रहण किया जाना चाहिए।


स्वप्न बहुधा सार्थक भी होते हैं।

आदि कवि बाल्मीकि ने राम अवतार से पूर्व ही उस समूचे कथानक को आद्योपान्त लिखकर रख दिया था। भविष्य पुराण और कल्कि पुराण के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे घटनाक्रम से पूर्व ही लिखे गये। यह पूर्वाभास सिद्धि का उच्चस्तरीय स्वरूप है। इसमें घटनाएँ या सम्भावनाएँ प्रधान नहीं होती वरन किन्हीं तथ्यों का उच्च लोकों से मनुष्य पर अवतरण उतरता है। इस प्रयोजन में परिष्कृत ऋतम्भरा प्रज्ञा ही काम आती है। यह प्रयोजन दिव्यदर्शी ऋषियों की ऋतम्भरा प्रज्ञा ही सम्पन्न करती है।

कभी−कभी सामान्य के बीच असामान्य का दर्शन इसी प्रकार सम्भव होता है। पेड़ों में फल नित्य ही गिरते टपकते रहे हैं। इसे सभी लोग सहज स्वभाव से देखते रहते हैं पर न्यूटन की दिव्य दृष्टि ने उसे विशेष दृष्टि से देखा और पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति होने का रहस्य ढूँढ़ निकाला।

दिव्य दर्शन की दिवास्वप्न जैसे घटिया शब्द के साथ तो संगति नहीं बैठती, पर है वह भी एक ऐसी ही विशेष स्थिति जिसमें मनुष्य सामान्य बुद्धि से ऊपर उठकर ऋतम्भरा प्रज्ञा का सहारा लेता है। न केवल उच्चस्तरीय सोचता है, पर जैसे ही निष्कर्षों पर पहुँचता है, इतना ही नहीं उस स्थिति में वह अदृश्य लोकों से दिव्य आभास, सन्देश भी उपलब्ध करता है।

वेदों को अपौरुषेय कहा जाता है। उनका अवतरण परमात्मा के अभिवचनों की तरह ऋषियों की पवित्र आत्मा में हुआ था। इस प्रकार वे अपौरुषेय माने गये। कागज, स्याही, कलम, उपयोग से उन्हें लिपिबद्ध तो मनुष्यों ने ही किया होगा। कुरान के संबंध में भी ऐसी ही मान्यता है कि उसकी आयतें इलहाय−ईश्वरीय सन्देश की तरह हजरत पर उतरी थीं। अन्य धर्मों में उनके प्रमुख शास्त्रों के सम्बन्ध में इसी से मिलती−जुलती मान्यताएँ हैं।

अमेरिका का एक नागरिक एलन बेधन ने एक रात स्वप्न देखा कि तत्कालीन राष्ट्रपति राबर्ट कैनेडी एक भीड़ के साथ किसी पार्टी में जा रहे हैं। रास्ते में विरोधी दल का एक सदस्य उन्हें गोली मार देता है और राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाती है।

एलन ने अपना सपना “स्वप्न अनुसन्धान संस्था” के रजिस्टरों में नोट कर दिया और अनुरोध किया कि वे इस सपने की बात राष्ट्रपति तक पहुँचा दें इसके ठीक एक सप्ताह बाद सचमुच यह सपना सत्य हो गया और राष्ट्रपति गोली से मारे गये।

प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता लुई ऐगासिज ने अपनी जीवाश्म सम्बन्धी खोजों की सफलता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि मुझे स्वप्नों के इशारे से अपनी खोजे आगे बढ़ाने की अक्सर प्रेरणा मिलती रही है।

नोबेल पुरस्कार विजेता डा. पाडलिंग ने भी यह बताया था कि उन्हें अनेक नये वैज्ञानिक विचारों की प्रेरणा सपनों में ही मिली है।

महान गणितज्ञ रामानुजम् ने गणित के गूढ़ मसले सपनों में ही हल किये थे। इलाहाबाद पुल की ठीक−ठीक बनावट एक अंग्रेज इंजीनियर को सपने में ही दिखाई पड़ी थी।

पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) के प्राचार्य लेम्बटन एक वैज्ञानिक गुत्थी को सुलझाने में वर्षों से लगे थे। एक रात को उन्होंने स्वप्न देखा कि सामने की बड़ी दीवार पर उनके प्रश्न का उत्तर चमकदार अक्षरों में लिखा है। जागने पर उन्हें अत्यधिक आश्चर्य हुआ कि इतना सही उत्तर किस प्रकार उन्हें स्वप्न में प्राप्त हो गया।

डा. फ्रायड ने अपनी पुस्तक “इंटर प्रिटेशन आफ ड्रीम’’ में एक अनूठी घटना से सम्बन्धित स्वप्न के सम्बन्ध में लिखा कि- मेरे शहर में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के पुत्र का देहावसान हो गया। रात्रि में अंत्येष्टि सम्भव न होने से प्रातःकाल करने का निर्णय कर शव के चारों ओर मोमबत्ती जलाकर, एक पहरेदार छोड़कर मृतक का पिता अपने कमरे में जा सोया। नींद लगे थोड़ा ही समय हुआ होगा कि स्वप्न में उनका लड़का उनके सामने खड़ा हो कह रहा है कि क्या मेरी लाश यहीं जल जाने दोगे। यह स्वप्न देखते ही उसकी नींद टूटी और उसने झाँककर देखा तो लाश वाले कमरे में प्रकाश हो रहा था। वह पहुँचा तो देखा कि पहरेदार सो गया है और मोमबत्ती गिर जाने से कफ़न में आग लगने से लाश ही क्या यदि विलम्ब हो जाता तो मकान ही जल जाता।

इस स्वप्न से फ्रायड को यह स्वीकार करना पड़ कि स्वप्न जगत को दृश्य जगत एवं स्थूल वासनाजन्य कल्पनाओं तक सीमित करना भूल ही होगी। हाँ अक्षरशः सत्य निकलने वाले सपनों की तह तक हम अवश्य नहीं पहुँच पाते।

विश्व−विख्यात संगीतकार मोजार्ट को एक ललित संगीत धुन एक बग्घी में झपकी लेते समय सूझी। वायलिन वादक तारातिनी को ‘द देविल्स सानेट’ नाम धुन डडडड की पूरी स्वप्न में सुनाई पड़ी। चौपीन भी अपने संगीत सृजन की प्रेरणा सपनों से पाते थे। नृत्य−पारंगता प्रसिद्ध महिला मेरी विगमैन ने “पास्तोरेल” नामक एक डडडड की कल्पना स्वप्न−दृश्य के आधार पर ही। हेनरी डडडड पाब्लो पिकासो, एण्ड्रयू वेथ, वान गाँग, साल्वाडोर डडडड आदि शीर्षस्थ चित्रकारों की सृजन चेतना में स्वप्नों डडडड बड़ा हाथ रहा है। साहित्यकारों का तो कहना ही क्या? पुश्किन, टालस्टाय, गेटे, शेक्सपीयर, बाण भट्ट, रवीन्द्रनाथ टैगोर, होमर, कालरिन, एडगर एलन पो, डडडड दान्ते, वैगनर, विलियम ब्लेक, विलियम बटलर, डडडड क्यूबिन आदि असंख्य साहित्यकारों को विभिन्न डडडड की प्रेरणाएं, संकेत सन्देश तथा परामर्श स्वप्नों के माध्यम से ही मिली थीं। हेनरी फार डेस कार्टिसडन पाइ डडडड यर जैसे गणितज्ञों का स्वप्नों से मार्ग निर्देशन पाने डडडड घटनायें सर्व विदित हैं।

भगवान महावीर के जन्म से पूर्व रानी तिशला ने 14 मार्मिक स्वप्न देखे थे। प्रथम में हाथी, द्वितीय में बैल, तृतीय में सिंह, चतुर्थ में लक्ष्मी, पंचम में सुवासित पुष्पों की माला, षष्ठम् में पूर्ण चन्द्र, सप्तम में सूर्य दर्शन, अष्टम में मंगल कलश, नवम् में नीले स्वच्छ जल वाला सरोवर, दशम लहलहाता सागर’ एकादश सिंहासन, द्वादश देव विमान, त्रयोदश रत्नराशि और चतुर्दश तेजस्वी अग्नि।

स्वप्न का फलितार्थ मर्मज्ञों ने इस प्रकार किया− हाथी सहायक साथी धैर्य−मर्यादा और बड़प्पन का प्रतीक है। उसके पेट में प्रविष्ट होने का तात्पर्य प्रलम्ब बाहु पुत्र जन्म का द्योतक है। वह महान धर्मात्मा, अनन्त शक्ति का स्वामी, मोक्ष प्राप्त करने वाला, यशस्वी, अनासक्त, ज्ञानी, सुख−शान्ति का उपदेश, महान गुणों वाला, शान्त और गम्भीर, त्रिकालज्ञ, देवात्मा और महान् होगा। भगवान महावीर का जीवन इस स्वप्न का पर्याय था। इसमें सन्देह नहीं। उपरोक्त सभी प्रतीकों का अर्थ मर्मज्ञों ने उन−उन वस्तुओं के गुण प्रभाव आदि की दृष्टि से निकाला जो उपयुक्त ही सिद्ध हुआ।

बाणभट्ट की प्रसिद्ध पुस्तक कादम्बरी की रूपरेखा उन्हें स्वप्न में ही मिली। रवीन्द्रनाथ टैगोर को अपनी गीताञ्जलि पुस्तक की कई कविताओं का आभास स्वप्न में मिला था। होमर, कालरिन, एडगर एलन पो आदि ने अर्ध चेतन स्थिति में− स्वप्न लोक में विचरण कर, उन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर अनेक रचनाओं का सृजन किया। नीत्से, दान्ते, वैगनर, विलियम ब्लेक, विलियम बटलर, कीट्स, क्यूविन आदि को विभिन्न कृतियों की प्रेरणाएं स्वप्नों से मिली थीं।

अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. आट्टो लोबी यह जानने का प्रयास कर रहे थे कि भ्रूणावस्था में शारीरिक तन्तुओं की क्रियाविधि कैसी होती है? उनकी धारणा थी कि यह उत्तेजना स्नायुओं में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों के कारण होती है। लेकिन इसकी परीक्षा कि प्रकार की जाय? इसी उधेड़ बुन में उनके सत्रह वर्ष गुजर गये है वे प्रयोग पर प्रयोग किये ही जा रहे थे। परन्तु यह धारणा प्रयोगों द्वारा प्रामाणित नहीं हो पा रही थी।

सन् 1920 की ईस्टर मई की पूर्व सन्ध्या को उन्होंने एक स्वप्न देखा जो विचित्र था और उनके ही प्रयोगों से सम्बन्धित था। नींद खुलने पर स्वप्न याद आया तो स्वप्न में देखे सभी तथ्यों को नोट कर लिया। गहराई से उन तथ्यों का विश्लेषण करने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि वे सभी बातें उनके ही प्रयोगों से सम्बन्धित हैं। परन्तु जल्दी−जल्दी में नोट करने पर बहुत से तथ्यों को नोट करना भूल गये थे। स्वप्न की बातों को सोचते−सोचते दोपहर का भोजन कर वे पुनः सो गये तो दुबारा वही स्वप्न देखा। अब की बार उन्हें वह सपना हूबहू याद रहा। जगने पर उसे अक्षरशः नोट कर लिया। प्रयोगशाला में जाकर स्वप्न के आधार पर प्रयोग करना आरम्भ किया। यह प्रयोग एक मेंढक पर किया गया और प्रथम प्रयास में ही उनकी धारणा सत्य सिद्ध हुई। फिर तो उन्होंने इस प्रयोग को कई बार दोहराया और हर बार उनकी धारणा पुष्ट होती चली गई। इस प्रयोग से चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसा नया अध्याय जुड़ा जिसने हृदय रोगियों उपचार की एक नयी दिशा ही खोल दी। इस खोज लिए उन्हें सन् 1936 में जीव विज्ञान का नोबुल पुरस्कार भी मिला।

पर जिन्हें एकाग्रता का अभ्यास है, जो मानसिक सन्तुलन ठीक बनाये रहे हैं उन शान्त चित्त व्यक्तियों और अविज्ञात चेतना द्वारा सार्थक स्वप्न भी प्रेरित किये जाते रहते हैं और वे उनके भविष्य निर्माण में बड़े सहायक भी होते हैं।

आवश्यक नहीं कि सब हर किसी को दिखने वाले अगणित स्वप्नों में से सभी को वे सार्थक रूप में ही दिखते हैं। अचेतन की कामनाएँ, भूतकाल की स्मृतियाँ, शरीरगत व्यथाएँ, उद्विग्नताएँ आकाँक्षाएँ आदि मनोवृत्ति मिलकर स्वप्नों की सम्भावना किया करती हैं और वे कौतुक कौतूहल मात्र होती हैं।

कुछ विचारकों ने अपने अनुभवों में लिखा है कि उनकी जागृत अवस्था में न सूझने वाले उदात्त तथा प्रगल्भ विचार स्वप्नावस्था में उनके मन को सूझ पड़े और उनको मालूम हुआ कि मानो उनके मन ने अति सुन्दर यथा योग्य भाषा में सब विचार उनके सम्मुख रख दिये हैं। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रकृति के अत्यन्त गहन रहस्य का पता उन्हें स्वप्नावस्था के मन के व्यापार से लगा। इनके मतों को झुठलाया नहीं जा सकता।


सर्पों से बचने के लिए नेवला पाला (kahani)

एक व्यक्ति ने घर की रक्षा और सर्पों से बचने के लिए नेवला पाला। नेवला बड़ा स्वामिभक्त स्वभाव का था। पति−पत्नी दोनों ही किसी काम से बाहर निकल जाते तो वह पूरी तरह घर की चौकीदारी करता।

एक दिन गृह स्वामिनी कुँए से जल भरने गयी। बच्चे को सोता छोड़ गयी। इतने में एक भयंकर काला नाग निकला, वह बच्चे को डसने ही वाला था, कि नेवले ने उसके टुकड़े−टुकड़े कर दिये। बच्चा यथावत जीवित बना रहा।

गृह स्वामिनी पानी लेकर लौटी, तो उसने घर के द्वार पर बैठे नेवले को देखा कि उसके मुँह से खून लिपटा हुआ है। बात की पूरी जाँच−पड़ताल किये बिना ही यह अनुमान लगा लिया कि इसने मेरे बच्चे को मार डाला। आवेश में उससे इतना भी न बन पड़ा कि वस्तुस्थिति को जाने और जाँचे। उसने जल से भरा घड़ा नेवले के ऊपर पटक दिया। वह तत्काल चूर−चूर हो गया।

घर में घुसकर देखा, बच्चा हंस−खेल रहा था। सर्प मरा पड़ा है। वस्तुस्थिति का अनुमान लगाया, तो उसने अपने आपको बहुत धिक्कारा और आवेश की आतुरता में होने वाले अनर्थ को समझा।

गृहस्थ जीवन में भी ऐसी कई अवसर आते हैं। उस सत्य मन को सन्तुलित बनाए रखना ही सच्ची साधना है।


भौतिक विज्ञान के अभिशाप और वरदान

विगत एक दो शताब्दियों में भौतिक विज्ञान की क्रमिक उन्नति हुई है। विशेषतया पिछले 50 वर्षों में प्रकृति के रहस्यों को खोज निकालने में आश्चर्यजनक सफलता हस्तगत हुई है। उस उत्साह में जो कदम वैज्ञानिकों, राजनेताओं और अर्थ शास्त्रियों के तालमेल से उठे हैं। उन्हें प्रारम्भिक दिनों में अत्यन्त उत्साहवर्धक माना गया था और समझा गया था कि इस आधार पर प्रगति के नये द्वार खुलने जा रहे हैं। किन्तु दूरदर्शी विवेकशीलता का समन्वय न होने से उस प्रगति की ऐसी खामियाँ सामने आ रही हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उपलब्धियों का प्रयोग करने की दिशा में कहीं कोई भारी चूक हो गई है, अन्यथा चन्द दिनों में ही इतने संकट क्यों आ खड़े होते जिनका समाधान समझ से बाहर होता चला जा रहा है।

विज्ञान का प्रथम चरण औद्योगीकरण की दिशा में उठा। कम लागत में, अधिक मात्रा में, अधिक साफ−सुथरी चीजें बनाते समय सोचा यह गया था कि सर्वसाधारण को सस्ते मोल में सुविधाएं उपलब्ध होंगी और निर्माताओं को अधिक लाभ कमाने का अवसर मिलेगा। इस मान्यता पर उन दिनों आम सहमति थी। उत्साह भी पूरा था। धन का विनियोग भी खुले हाथों हुआ। उत्पादन भी वैसा ही साफ सुधरा और सुन्दर सामने आया जैसा कि सोचा गया था। किन्तु उतावली में उठाये गये कदम नई समस्याएँ अविलम्ब उत्पन्न करने लगे। उलझनें ऐसी हैं जो सुलझने में नहीं आ रही और लगता है आरम्भ करते समय भविष्य में उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर समुचित विचार नहीं किया गया।

बड़ी मशीनों में थोड़े आदमी बहुत उत्पादन करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन उत्पादनों में बहु−संख्यक श्रमिकों की आवश्यकता होती थी, वह थोड़े ही लोगों द्वारा विनिर्मित होने लगा। फलतः बेकारी बेतहाशा बढ़ी और ठाली बैठे लोगों ने उचित अनुचित उपद्रव खड़े करने आरम्भ किये। आन्दोलनों ने−अपराधों ने गति पकड़ी और सार्वजनिक शान्ति में विक्षेप पड़ना आरम्भ हुआ।

बड़ी मशीनों ने अपने−अपने देश की खपत को ध्यान में न रखते हुए अत्यधिक माल बनाया। इसे खपाने के लिए मंडियों की आवश्यकता पड़ी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये नये किस्म का आर्थिक उपनिवेशवाद खड़ा हुआ राजनैतिक उपनिवेशवाद तो समर्थों की आपसी प्रतिद्वन्द्विता के कारण हलका पड़ा, पर उसके स्थान पर नया आर्थिक उपनिवेशवाद खड़ा हुआ। इसके लिए शीत युद्धों का आश्रय लिया गया और कृत्रिम अभाव का सृजन किया गया। फलतः देशों की स्वाभाविक सुख−शान्ति में भारी व्यवधान खड़ा हो गया।

बड़े कारखानों से उत्पन्न होने वाला कचरा एक समस्या बना। कुछ को नदियों में बहाया गया, कुछ हवा में उड़ा, कुछ ने जमीन घेरी। चूँकि यह कचरा विषैला होता है इसलिए उसमें जलाशयों की विषाक्तता बढ़ी। साँस लेने की हवा में जहर घुला और ईंधन के लिए, फर्नीचर के लिए पेड़ कटे ओर जलावन आवश्यकताओं के लिए सर्वप्रथम पेड़ों पर हाथ साफ हुआ। यह विषाक्तता कितनी अधिक हानि पहुँचा रही है इसका अनुमान बढ़ती हुई बीमारियों की व्यथा और उनके इलाज पर होने वाले बढ़ते खर्च से लगाया जा सकता है।

बड़ी मशीनों ने अधिक मात्रा में ईधन की माँग की। इसके लिए खनिज तेल और कोयले का सहारा लिया गया। यह भण्डार जमीन में एक सीमित मात्रा में ही हैं। गणितज्ञों ने बताया है कि जिस अनुपात में यह खर्च हो रहा है वही गति रही तो पचास वर्ष के भीतर तेल और कोयले का भण्डार चुक जायेगा। बिजली उत्पादन के लिए भी ईंधन चाहिए। उसके बिना बिजली थी न बन सकेगी। अणु भट्ठियों के सम्बन्ध में भी यही संकट है। यूरेनियम, प्लेटेनियम जैसे पदार्थ भी थोड़ी ही मात्रा में हैं। इसलिए अणु भट्टियाँ भी अधिक दिन काम न दे सकेंगी। इनसे निकलने वाला कचरा और भी भयावह है उसे कहाँ पटका जाय, यह प्रश्न अभी अनिर्णीत ही पड़ा है।

पिछले पचास वर्षों में दो विश्व युद्ध हो चुके। तीसरे के लिए मुहूर्त ही टल रहा है। युद्ध के कारणों में उत्पादनों को खपाने के लिए क्षेत्रों की आवश्यकता ही प्रमुख कारण है। जो देश युद्ध सामग्री बनाते हैं उनकी बिक्री तभी हो सकती है, जब युद्ध हो। अन्यथा वे कारखाने बन्द होंगे। पूँजी जाम होगी और बेकारी फैलेगी। इस लिए युद्ध भले ही अणु बमों से हो या रासायनिक आयुधों से समय की एक आवश्यकता बन गया है।

इतनी सारी समस्याओं का एकमात्र कारण विज्ञान का वह चरण है जिसने बड़ी मशीनें लगाने का निश्चय किया। यह साँप छछून्दर जैसी गति है जो न निगलते बनती है न उगलते।

विज्ञान ने राजनेताओं को भड़काया है कि वे थोड़ा सा प्रयास करके चक्रवर्ती बन सकते हैं। युद्ध की तैयारी में जनता को अधिकाधिक टैक्स देने पड़ रहे हैं फलतः महंगाई बढ़ रही है और मध्यवर्ती व्यक्ति का जीवन दुर्लभ हो रहा है। फिर हथियारों के जो पहाड़ बीसियों देशों में खड़े कर लिये हैं उनका क्या हो? वे खाने पहनने के काम तो आते नहीं, इस उत्पादन का उपयोग जन संहार में ही होता है और उसका कष्ट मरने वालों से भी अधिक उन्हें भुगतना है जो अनाथ अपंग बनकर किसी प्रकार जीवित बचे रहेंगे।

यदि विज्ञान ने सही कदम उठाया होता। बड़ी मशीनों का निर्माण न किया होता तो निश्चय ही उपरोक्त समस्याओं में से एक भी मुसीबत खड़ी न होती। नदियों में गिराया हुआ कचरा घुमा फिरा कर मनुष्य के ही पीने के काम आता है। जहरीली गैस जहां साँस द्वारा शरीर में जाती है वहाँ अब तेजाबी वर्षा का क्रम चल पड़ा है। उसके सहारे जो खाद्य उपजेगा वह भी जहरीला होगा। तीव्र विषों से कुछ ही समय में मृत्यु हो जाती है पर जहरीले अन्न जल में वायु के कारण बढ़ने वाली रुग्णता से मनुष्य को चित्र-विचित्र बीमारियों का शिकार बनना, तड़पते हुए अकाल मृत्यु मरना पड़ता है। बढ़ते हुए विज्ञान के चरण भले ही अमीरों की अमीरी बढ़ा सकें पर सर्वसाधारण का उससे सब प्रकार अहित ही होगा।

उदीयमान विज्ञान ने एक और बौद्धिक एवं भावनात्मक संकट खड़ा किया है। चेतना को जड़ की उत्पत्ति बताया है। फलतः नैतिक आचरणों का कोई मूल्य नहीं रह गया। नास्तिकता ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन करती है। उसने जहाँ माँसाहार का समर्थन किया है। वहाँ सामाजिक−नैतिक वर्जनाओं को व्यर्थ बताकर अपनी सुविधा को प्रधानता देने के लिए उकसाया है। इस दशा में त्याग, बलिदान, उदारता, पुण्य, परमार्थ का कोई महत्व नहीं रह जाता। जब मनुष्य चलता−फिरता पेड़ पौधा बताया गया तो एक दूसरे को लाभ या हानि पहुँचाने के लिए गणितीय सिद्धान्त ही काम करेंगे। जब बूढ़े बैल को न कमाने वाले बकरे को कसाई के यहाँ भेजा जा सकता है तो वृद्धों में बीमारों को अपंगों को भी मौत के घाट उतार देने में क्या झिझक होनी चाहिए? जब पशु पक्षियों में नर मादा भर का रिश्ता होता है। जब मनुष्य को जड़ पदार्थों की− पेड़ पौधों की, पशु पक्षियों की श्रेणी में गिन लिया गया तो फिर माँ, बहिन, बेटी आदि में पवित्र रिश्ते भी बेकार हो जाते हैं। इस ओर प्रवृत्तियां अब बढ़ ही गई हैं। घर, मुहल्ले, पड़ौस परिवार में ही व्यभिचार का प्रवाह बढ़ रहा है। विवाह व्यापार हो गया है। छोटे वर्गों में लड़की से पैसा वसूल किया जाता है और बड़े वर्गों में लड़के से दहेज वसूल किया जाता है। न देने या कम देने पर जला देने, निकाल देने आदि की घटनाएँ दिनों−दिन बढ़ती जाती हैं। यह परोक्ष रूप से भौतिकवादी चिन्तन का ही प्रति फल है। बच्चों का अपहरण और माँगी रकम न देने पर उनका कतल यह अब अनहोनी घटना नहीं रही। कुछ समय पूर्व चोर डाकू भी स्त्री−बच्चों पर हाथ नहीं उठाते थे पर अब स्वर्ग−नरक, पाप−पुण्य, लोक−परलोक, आत्मा−परमात्मा की मान्यताओं ने−भौतिकवादी दर्शन ने समाप्त कर दिया तो मनुष्य को और मछली को मारने खाने में अन्तर ही क्या रह गया। नागरिकता और समाज व्यवस्था के नाम पर मनुष्य की पशुता को दबाया नहीं जा सकता। उसके लिए दार्शनिक निष्ठा की आवश्यकता होती है। विज्ञान की बौद्धिक छलाँगों ने जब उसे समाप्त कर दिया जो मनुष्य को संयमी, सदाचारी बनाने का कोई ठोस आधार रह ही नहीं गया। आदर्शवाद की जब जड़ ही कट गई तो दिखावटी ढिंढोरा पीटने भर से बात कुछ बनती नहीं है।

आर्थिक क्षेत्र में बेकारी, बीमारी, गरीबी, विषाक्तता और अगले दिनों ईंधन की समाप्ति से तथाकथित प्रगति का बंठाधार, यह विज्ञान के वे अनुदान हैं जिन्हें सर्वसाधारण को उपहार में दिया है। महायुद्ध की विभीषिका का नंगी तलवार की तरह संसार की गरदन पर लटकाने का श्रेय भी उन ऐटमी हथियारों को है जिन्हें विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है। शहरों की अन्धाधुन्ध बढ़ोत्तरी और देहातों से भगदड़ का कारण भी इसी वैज्ञानिक प्रगति का है। इसी ने हजारों को लखपति करोड़पति बनाया है और लाखों करोड़ों को एक तरफ रूखा−सूखा खाने के लिए विवश किया है। डॉक्टर बढ़े हैं पर उनके अनुपात में मरीजों की अत्यधिक वृद्धि हुई है। लोग जिन्दा तो हैं पर मुर्दों से गई−गुजरी परिस्थितियों में।

नैतिकता के आधार पर जब तक धर्म और अध्यात्म रहे तब तक बाँध का पानी इस प्रकार नहीं टूटा था जिसमें खेत खलिहान सभी डूब जायें। बुद्धिमान नये युग का दर्शन है। दूसरे शब्दों में इसे विज्ञान का दर्शन कह सकते हैं। इसमें सुविधा संकलन करने के तर्कों की प्रमुखता है। फल यह हुआ है कि हम मछली निगलने वाले बगुले−अपने ही परिवार में कामोपयोग की छूट पाने वाले कुत्ते और अपनी बिरादरी को ही फाड़-चीर कर रख देने वाले भेड़िये की बिरादरी में सम्मिलित हो गये हैं। हम अर्थ प्रधान हैं, विलास और सुविधा के अतिरिक्त हमें और कुछ नहीं चाहिए। इन्हीं आकाँक्षाओं की जब जरूरत होती है समाज निष्ठा जैसी चादर उढ़ा देते हैं। विज्ञान ने जब मनुष्य को चलता−फिरता पौधा कहा है तो उसे क्यों न माना जाय। धर्म जब अफीम की गोली ईश्वर अन्ध−विश्वास उसी मंच से घोषणापूर्वक कहा गया है तो उस मान्यता से क्योंकर इनकार किया जाय?

इन अभिशापों से उद्विग्न मनुष्य मरना तो नहीं चाहता पर जीने की भी उसकी कोई इच्छा नहीं है। इसलिए नशेबाजी का आश्रय लिया गया है। बच्चे, बूढ़े नर नारी, ‘येन केन प्रकारेण’ उन्हीं का आश्रय ले रहे हैं। तमाखू चाय का फैशन पुराना हो गया अब मझोले लोग शराब और बड़े लोग हीरोइन का सेवन करते हैं। जितनी देर उनमें डूबे रहते हैं उतनी देर गम गलत कर लेते हैं अन्यथा विज्ञान का अभिशाप उन्हें दसों दिशाओं से नोंच−नोंचकर खाता हैं।


आदर्शों की कीमत (kahani)

मैत्री आदर्शों की कीमत पर निभाई नहीं जा सकती। यदि किसी ने कोई परोपकार किया है तो उसके बदले में अनीति पूर्वक कोई माँग आए तो, आदर्शनिष्ठ व्यक्ति उसे ठुकरा देते हैं। चाहे उन्हें कृतघ्न ही क्यों न कहना पड़े।

एक सज्जन त्रिवेणी नहा रहे थे। पैर फिसला और डूबने लगे। एक दूसरे शिक्षित व्यक्ति ने तैर कर निकाला। डूबने वाले ने अपना कलकत्ता का पता दिया। “कभी उधर आना हो तो कोई काम बतावें।” जिन्हें बचाया गया था, वे प्रसिद्ध बंगाली पत्र प्रवासी के सम्पादक थे। वे सज्जन थोड़े पढ़े लिखे थे, एक कविता बनाकर लाये। अपना डूबने निकालने वाला परिचय देते हुये कहा− यह कविता “प्रवासी” में छाप दें कविता छपने काबिल न थी सो उनने कहा यह छप न सकेगी, भले ही आपने जहाँ से निकाला था पुनः मुझे वहीं उठाकर पटक दें। लेकिन अपने उपहार के बदले में ऐसी अपेक्षा मुझसे न रखें जिससे मुझे अपनी आत्मा से समझौता करना पड़े।


बलि वैश्व हमारा दैनिक धर्म कर्त्तव्य

यज्ञ का अर्थ है− पुण्य, परमार्थ। उच्चकोटि का स्वार्थ ही परमार्थ है। उससे लोक कल्याण भी होता है और बदले में अपने को भी श्रेय सम्मान सहयोग आदि का लाभ होता है।

गीताकार ने जीवन में यज्ञीय तत्वज्ञान के समावेश करने का बहुत जोर दिया है और कहा है कि यज्ञ विधा की उपेक्षा करने का न लोक बनता है न पर लोक। जो यज्ञ से बचा हुआ खाते हैं। वे सब पापों से छूट जाते हैं और जो अपनी उपलब्धियों को अपने लिए ही खर्च कर लेते हैं वे पाप खाते हैं।

जिस प्रकार नित्य कर्मों में भोजन, शयन, स्नान, मल विसर्जन आदि को आवश्यक माना गया है। उसी प्रकार लोक मंगल के लिए श्रमदान, अंशदान की भी आवश्यकता है। इस संदर्भ में उपेक्षा बरती जाय तो समाज में दुष्प्रवृत्तियाँ बढ़ेंगी और उसका स्तर गिरेगा। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। जिस समाज में वह रहता है उसके प्रभाव से बच नहीं सकता। इसलिए आत्म−कल्याण का प्रयोजन पूरा करने के लिए भी अपनी जीवनचर्या में यज्ञ विद्या को सम्मिलित रखकर चलना चाहिए और उसे यदा−कदा नहीं नित्य नियमित रूप से करना चाहिए।

दैनिक बलिवैश्व प्रक्रिया के पाँच विभागों को पाँच ‘महायज्ञ’ कहा गया है। विशाल आकार−प्रकार से अग्निहोत्रों को जहाँ मात्र ‘यज्ञ’ नाम से पुकारा गया है वहाँ कुछ मिनटों में पूरी हो जाने वाली क्रिया को जरा-सी सामग्री लगने वाली क्रिया को महायज्ञ क्यों कहा गया? इसका सीधा−सा उत्तर है कि बलिवैश्व को मात्र कृत्य ही नहीं जीवन नीति का आवश्यक अंग माना गया है और उसे कभी भी न छोड़ने के लिए कहा गया है। जबकि विशाल यज्ञ जब कभी ही होते हैं और उनका प्रयोजन भी सामयिक समस्याओं एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होते हैं जब कि बलिवैश्व को आवश्यक कर्त्तव्यों की श्रेणी में गिना गया है और उन्हें कर लेने के उपरान्त तब भोजन ग्रहण करने का अनुशासन बनाया गया है। साथ ही उसकी परिणति का प्रतिफल भी बहुत आकर्षक बताया गया है।

यों बलिवैश्व का विधान कुछ बड़ा है और उसे पूरा करने के लिए संस्कृत भाषा के निर्धारित मन्त्रों को भी याद करना पड़ता है। पर उतना न बन पड़े तो उसे अति संक्षेप में रसोई पकाने वाली महिला भी बिना किसी कठिनाई के पूरा करती रह सकती है।

शांखायन, आश्वलायन, पराकर, गोभिल, खादिर आदि गुह्य सूत्रों में तथा शतपथ, गोपथ आदि ब्राह्मणों में बलिवैश्व की उपयोगिता एवं विधि−व्यवस्था का निर्देश किया गया है। शांखायन, गुह्य सूत्र के अध्याय (2.) काण्ड 17, सूत्र 4 में कहा गया है कि जो प्रायः सायं वैश्व देव यज्ञ करते हैं वे लक्ष्मी, दीर्घजीवन, यश तथा सुसन्तति प्राप्त करते हैं।

इस कल्प की उपेक्षा करने वालों की भर्त्सना करते हुए कहा गया है कि−

वैश्व देव विहीना ये आतिथ्येन बहिष्कृतया। सर्वे ते नरकं यान्ति काक योनि ब्रजन्ति च॥ −पाराशर स्मृति 1। 57

जो बलि वैश्व नहीं करते। अतिथि सत्कार से विमुख रहते हैं। वे नरक में पड़ते और कौए की योनि में जन्म लेते हैं।

बलि वैश्व में सम्मिलित पांच यज्ञ हैं। उनका परिचय इस प्रकार है।

ब्रह्म−यज्ञ का अथ है− ब्रह्मज्ञान आत्मज्ञान की प्रेरणा। ईश्वर और जीव के बीच चलने वाला पारस्परिक आदान−प्रदान।

देव यज्ञ का उद्देश्य है− पशु से मनुष्य तक पहुँचाने वाले प्रगति क्रम को आगे बढ़ाना। देवत्व के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव का विकास, विस्तार, पवित्रता और उदारता का अधिकाधिक संवर्धन।

ऋषि यज्ञ का तात्पर्य है− पिछड़ों को उठाने में संलग्न करुणार्द्र जीवन−नीत। सदाशयता के सम्वर्धन की तपश्चर्या।

नर यज्ञ की प्रेरणा है− मानवी गरिमा के अनुरूप वातावरण एवं समाज व्यवस्था का निर्माण। मानवी गरिमा का संरक्षण। नीति और व्यवस्था का परिपालन नर में नारायण का उत्पादन। विश्व मानव का श्रेय साधन।

भूत यज्ञ की भावना है− प्राणि मात्र तक आत्मीयता का विस्तार अन्यान्य जीवधारियों के प्रति सद्भावना पूर्ण व्यवहार। वृक्ष वनस्पतियों तक के विकास का प्रयास।

चूँकि बलिवैश्व को भोजन से पूर्ण करने का विधान है इसलिए वे इसे आसानी से कर सकती हैं। चूल्हे में से पहली बनी रोटी के एक−एक टुकड़े को घी और शकर में मिला कर गायत्री मन्त्र बोलते हुए पाँच आहुतियों के रूप में होम देने की क्रिया जहाँ तनिक−सा समय और तनिक−सा वातावरण धार्मिक बनने की दृष्टि से उसका महत्व असाधारण है।

बलिवैश्व में जिन पाँच आदर्शों का प्रतिपादन पाँच महायज्ञों के रूप में किया गया है उन्हें मानवी गरिमा को समुन्नत बनाने वाले ‘पञ्चशील’ कह सकते हैं बौद्ध धर्म में पंचशीलों का बहुत ही विस्तारपूर्वक वर्णन विवेचन किया गया है। उनका बहुत महत्व−माहात्म्य बताया गया है। इन पंचशीलों को जीवनचर्या एवं समाज व्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों से वर्गीकृत भी किया गया है। इस प्रकार पंचशीलों के वर्ग उपवर्ग प्रकारान्तर से व्यक्ति एवं विश्व समस्याओं को सुलझाने सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करते हैं।

पारिवारिक पंचशीलों में 1. श्रमशीलता 2. सुव्यवस्था 3. मितव्ययिता 4. शिष्टाचार और सहकारिता प्रधान हैं। जिन व्यक्तियों में यह गुण होंगे वे स्वयं सुखी रहेंगे और अपने संपर्क क्षेत्र को प्रसन्न तथा समुन्नत रखेंगे। जिन परिवारों में यह सत्प्रवृत्तियाँ व्यवहृत होती होंगी, उसके सदस्यों का समुन्नत सुसंस्कृत होना सुनिश्चित है।

इसलिए जब अवसर हो तब घर के लोगों को एकत्रित करके समझाते रहना चाहिए कि मनुष्य पेट भरने के लिए ही पैदा नहीं हुआ है। उसे दूसरों का भी ध्यान रखना चाहिए और पिछड़ापन दूर करने तथा सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने में योगदान देना आवश्यक कर्त्तव्य मानकर उनके लिए समय और साधन जुटाते ही रहने चाहिए।

साथ ही बलिवैश्व के पाँच महायज्ञों में जिन पंचशीलों की ओर संकेत हैं उन्हें अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में प्रमुख स्थान देना चाहिए। समग्र सुख शान्ति का यही मार्ग है।


कवीन्द्र रवीन्द्र (kahani)

कवीन्द्र रवीन्द्र ने एक बड़ा मार्मिक गीत रूपक लिखा है− मैं घर−घर भीख माँगने के लिए गाँवों में गया हुआ था। तभी तेरा स्वर्ण रथ मुझे दिखायी पड़ा और मुझे उम्मीद बँधी कि मेरे बुरे दिनों का अब अन्त होने वाला है। तेरा रथ पास आकर रुका और मैं बिना माँगे दान की प्रतीक्षा में तेरे सामने जाकर खड़ा हो गया। तेरी दृष्टि मुझ पर पड़ी और तू मुस्कराता हुआ रथ के उतार आया। मैंने समझा मेरा सौभाग्य मेरे पास आ गया, पर तूने ही मेरे सामने हाथ पसार दिया। कैसा परिहास किया तू ने भी- भिक्षुक से भिक्षा मांगी। मैं बड़ी उलक्षन में पड़ गया दबे मन से मैंने झोली ऐ एक अन्न का दाना निकाल कर तुझे दे दिया। वह दाना ले कर तू चला गया और मैं निराशा से भर उठा, पर सूर्यास्त के समय जब झोली खाली की, तो उसमें से सोने का एक दाना निकला। मैं जोर−जोर से रोने लगा− ‘‘काश, मैंने तुझे सर्वस्व अर्पित कर दिया होता।”


संगीत का प्राणियों और वनस्पतियों पर प्रभाव

संगीत के माध्यम से इलेक्ट्रो मैगनेटिक लहरें उत्पन्न होती हैं जो स्नायु प्रवाह पर वाँछित प्रभाव डालकर उनकी सक्रियता ही नहीं बढ़ातीं−विकृत चिन्तन को रोकती व मनोविकार मिटाती हैं।

स्वर शक्ति की सृजनात्मक सामर्थ्य पर अब वैज्ञानिक धीरे−धीरे ध्यान देने लगे हैं। जहाँ एक ओर शब्द शक्ति चालित बम एवं रॉबॉट तैयार हो रहे हैं, वहाँ प्रदूषण निवारण, मनोविकार शमन, शरीर रोग निवारण में तरंगों का प्रयोग हो रहा है। पशुओं की प्रजनन शक्ति बढ़ाने, पौधों के बढ़ने की गति तीव्र करने तथा अधिक फसल उगा सकने में भी वैज्ञानिकों को मदद मिली है।

पराध्वनि (अल्ट्रासोनिक) तरंगों के ऊपर वैज्ञानिकों द्वारा अब तेजी से प्रयोग किये जा रहे हैं। इसकी सामर्थ्य को उन्होंने लेसर किरणों से भी अधिक शक्तिशाली पाया है। कर्णातीत−श्रवणातीत−अनसुनी ध्वनियों की सामर्थ्य के परिमाण को अभी पूरी जाना भी नहीं जा सका है। “सुपर सोनिक रेडियो मीटर” बना सकने में वैज्ञानिक सफल अवश्य हो गए हैं जिसमें अन्तरिक्ष में संव्याप्त अगणित ध्वनि प्रवाहों को सुना−जाना जा सकता है। वैज्ञानिकों का ऐसा कथन है कि ध्वनि ऊर्जा की बहुमूल्य सम्पदा अन्तरिक्ष में बिखरी पड़ी है जिसका यदि सही उपयोग किया जा सके तो मनुष्य समुदाय की सारी आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं।

गायत्री महामन्त्र के समवेत स्वरित जप से उत्पन्न पराध्वनि में सारे वातावरण को कंपा देने की सामर्थ्य विद्यमान है, ऐसा विभिन्न स्वर वैज्ञानिकों का मत है।

मनुष्यों तक ही संगीत प्रभाव सीमित नहीं है वरन् उसे पशु पक्षी भी उसी चाव से पसन्द करते हैं और प्रभावित होते हैं। संगीत सुनकर प्रसन्नता व्यक्त करना और उसका आनन्द लेने के लिए ठहरे रहना यही सिद्ध करता है कि वह उन्हें रुचिकर एवं उपयोगी प्रतीत होता है। अन्य जीवों की जन्मजात प्रवृत्ति यही होती है कि उनकी स्वाभाविक पसन्दगी उनके लिये लाभदायक ही सिद्ध होती है। पशु पक्षियों पर संगीत का अच्छा प्रभाव देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि वह मनुष्यों की तरह अन्य जीवों के लिये भी न केवल प्रिय वरन् उपयोगी भी है।

पशु मनोविज्ञानी डा. जॉर्जकेर वित्स ने छोटे जीव जन्तुओं की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव का लम्बे समय तक अध्ययन किया है। घर में बजने वाले पियानो की आवाज सुनकर चूहों को अपने बिलों में शान्तिपूर्वक पड़े हुए उन्होंने कितनी ही बार देखा है। बेहिसाब उछल−कूद करने वाली चूहों की चाण्डाल चौकड़ी मधुर वाद्य यन्त्र सुनकर किस प्रकार मन्त्र−मुग्ध होकर चुप हो जाती हैं यह देखते ही बनता है।

फ्राँसीसी प्राणि शास्त्री वास्तोव आन्द्रे ने थलचरों, जलचरों और नभचरों पर विभिन्न ध्वनि प्रवाहों की, स्वर लहरियों की होने वाली प्रतिक्रियाओं का गहरा अन्वेषण किया है तद्नुसार वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि संगीत प्रायः प्रत्येक जीवधारी के मस्तिष्क एवं नाड़ी संस्थान पर आश्चर्यजनक प्रभाव डालता है। उनकी प्रकृति और मनः स्थिति के अनुरूप यदि संगीत बने तो उन्हें मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक उत्साह प्राप्त होता है। किन्तु उनकी कर्णेन्द्रिय को कर्कश लगने वाली अरुचिकर ध्वनियाँ बजाई जायें तो उससे उन्हें अप्रसन्नता होती है और स्वास्थ्य सन्तुलन भी बिगड़ता है। किस प्राणी की किस स्थिति में किस प्रकार का संगीत क्या प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, इसका अध्ययन करने वाले जर्मन प्राणि शास्त्री यह आशा करते हैं कि भविष्य में विभिन्न जीवधारियों की मनःस्थिति में आशाजनक परिवर्तन समय−समय पर किया जा सकेगा हिंस्र पशुओं को भी कुछ समय के लिये शान्त किया जा सकेगा और अवाँछनीय जीवों को उनके लिए अरुचिकर सिद्ध होने वाली ध्वनियाँ करके उन्हें दूर भगाया जा सकता है। इसी प्रकार उन्हें कई प्रवृत्तियों में संलग्न एवं उदासीन बनाने का कार्य भी संगीत के माध्यम से किया जा सकता है।

संगीत का प्रभाव पशु−पक्षियों पर गहरा पड़ता है। वेणु नाद सुनकर सर्प अपनी कुटिलता भूलकर लहराने लगता है। कई प्रान्तों में बहेलिये बीन बजाते हैं, उससे मुग्ध हुए हिरण, मृग निर्भय होकर पास चले आते हैं। हालैण्ड में गायें दुहते समय मधुर संगीत सुनाया जाता है। वहाँ की सरकार ने ऐसा प्रबन्ध किया है कि जब गायें दुहने का समय हो तब मधुर संगीत ब्राडकास्ट किया जाय, ग्वाले लोग रेडियो सैट दुहने के स्थानों पर रख देते हैं। संगीत को गायें बड़ी मुग्ध होकर सुनती हैं और उनके स्नायु संस्थान पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वे 15 से लेकर 20 प्रतिशत तक अधिक दूध दे देती हैं। ये प्रयोग भारत में भी किए गये हैं।

दुधारू पशुओं को दुहते समय यदि संगीत ध्वनि होती रहे तो वे अपेक्षाकृत अधिक दूध देते हैं। ऐसा देखा गया है।

सील मछली का संगीत प्रेम प्रसिद्ध है। कुछ समय पूर्व पुर्तगाल के मछुआरे अपनी नावों पर वायलिन बजाने की व्यवस्था बनाकर निकलते थे। समुद्र में दूर−दूर तक वह ध्वनि फैलती तो सील मछलियाँ सहज ही नाव के इर्द−गिर्द इकट्ठी हो जातीं और मछुआरे उन्हें जाल में पकड़ लेते।

घरेलू कुत्ते संगीत को ध्यानपूर्वक सुनते और प्रसन्नता व्यक्त करते पाये जाते हैं। वन विशेषज्ञ जार्ज ह्वस्हे ने अफ्रीका के कांगो देश में चिंपेंजी तथा गुरिल्ला वन मानुष को संगीत के प्रति सहज ही आकर्षित होने वाली प्रकृति का पाया है। उन्होंने इन वानरों से संपर्क बढ़ाने में मधुर ध्वनि वाले टैप रिकार्डरों का प्रयोग किया और उनमें से कितनों को ही पालतू जैसी स्थिति का अभ्यस्त बनाया। नार्वे के कीट विज्ञानी डा. हडसन शहद की मक्खियों को अधिक मात्रा में शहद उत्पन्न करने के लिए संगीत को अच्छा उपाय सिद्ध किया है। अन्य कीड़ों पर भी वाद्य यन्त्रों के भले−बुरे प्रभावों का उन्होंने विस्तृत अध्ययन किया है और बताया है कि कीड़े भी संगीत से बिना प्रभावित हुए नहीं रहते।

डा. सिंह ने दस वर्ष तक एक बाग का दो हिस्सों में परीक्षण किया। एक के पौधों को कु. स्टेला पुनैया वायलिन बजाकर गीत सुनाती दूसरे को खाद, पानी, धूप की सुविधाएं तो समान रूप से दी गई किन्तु उन्हें स्वर माधुर्य से वंचित रखकर दोनों का तुलनात्मक अध्ययन किया। जिस भाग को संगीत सुनने को मिला उनके फूल पौधे, सीधे, घने, अधिक फूल, फलदार सुन्दर हुए। उनके फूल अधिक दिन तक रहे और बीज निर्माण द्रुत गति से हुआ। डा. सिंह ने बताया कि वृक्षों में प्रोटोप्लाज्मा गड्ढे भरे द्रव की तरह उथल−पुथल की स्थिति में रहता है संगीत की लहरियाँ उसे उस तरह लहरा देती हैं, जिस तरह वेणुनाद सुनकर सर्प प्रसन्नता से झूमने और लहराने लगता है। मनुष्य शरीर में भी ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है। गन्ना, चावल, शकरकन्द जैसे मोटे अनाजों पर जब संगीत अपना चिरस्थायी प्रभाव छोड़ सकता है तो मनुष्य के मन पर उसके प्रभाव का तो कहना ही क्या?

गन्ना, धान, शकरकन्द, नारियल आदि के पौधों और पेड़ों के विकास पर क्रमबद्ध संगीत का उत्साहवर्धक प्रभाव पड़ता है यह प्रयोग भारत के एक कृषि विज्ञानी संगीतकार डा. टी. एन. सिंह ने कुछ समय पूर्व किया था। कोयम्बटूर के सरकारी कृषि कालेज के अन्वेषण ने पौधों पर संगीत के अनुकूल प्रभाव की रिपोर्ट दी है।

कनाडा के किसान अपने खेतों के चारों ओर लाउडस्पीकर लगाकर रखते हैं, उनका सम्बन्ध रेडियो से जोड़ दिया जाता है और संगीत कार्य क्रम प्रसारण प्रारम्भ कर दिया जाता है। विस्कानिसन के संगीत शक्ति के व्यापक शोधकर्ता श्री आर्थरलाकर का कहना है कि संगीत से जिस तरह पौधों को रोगाणुओं से बचाया जा सकता है, उसी प्रकार मनुष्यों की रोग−निरोधक शक्ति का विकास भी किया जा सकता है।


कुण्डलिनी महाशक्ति एक परिचय

कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में जिस पंचाग्नि विद्या की चर्चा हुई है। उसे कुण्डलिनी शक्ति की पंच विधि विवेचना कहा जा सकता है। श्वेताश्वर उपनिषद् में उसे ‘योगाग्नि’ कहा गया है−

नतस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्नि मयं शरीरम्।

चैनिक योग प्रदीपिका में उसे ‘स्पिरिट फायर’ नाम दिया गया है। जानबुडरफ सरीखे तन्त्रान्वेषी उसे सर्पवत् बलयान्विता सपेंन्ट नाम देते रहे हैं।

ऋषि शिष्या मैडम ब्लैशेटस्की ने उसे विश्व−व्यापी विद्युत शक्ति−‘कास्मिकी इलैक्ट्रिसिटी’ नाम दिया है। वे उसकी विवेचना विश्व विद्युत के समतुल्य चेतनात्मक प्रचण्ड प्रवाह के रूप में करती थी। उन्होंने ‘वायस आफ दि साइलेन्स’ ग्रन्थ में अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया है− सर्पवत् या बलयान्विता गति अपनाने के कारण इस दिव्य शक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं। इस सामान्य गति को योग साधक अपने शरीर में चक्राकार बना लेता है इस अभ्यास से उसकी वैयक्तिक शक्ति बढ़ती है। कुण्डलिनी विद्युतीय अग्नियुक्त गुप्त शक्ति है यह वह प्राकृत शक्ति है जो सेन्द्विय निन्द्रय प्राणियों एवं पदार्थों के मूल में विद्यमान है।

ब्रह्माण्ड में दो प्रकार की शक्तियाँ काम करती हैं− एक लौकिक (सेकुलर) दूसरी आध्यात्मिक (स्प्रिचुअल) इन्हें फिजीकल और मैटाफिजीकल भी कहते हैं। लोग प्रत्यक्ष शक्तियों का प्रमाण प्रत्यक्ष उपकरणों से प्राप्त करते लेते हैं, अस्तु उन्हीं की सत्ता स्वीकार करते हैं।

शरीर विज्ञानियों ने उसे नाड़ी संस्थान से उद्भूत−नर्वस् फोर्स कहा है। डा. रेले ने अपने बहुचर्चित ग्रन्थ ‘मिस्ट्रीरियस कुण्डलिनी’ में उसकी वेगस गर्व’ के रूप में व्याख्या की है। माँस−पेशियों और नाड़ी संस्थान के संचालन में काम आने वाली सामर्थ्य को ही अध्यात्म प्रडडडड जनों में काम करने पर कुण्डलिनी संरक्षक बनने का प्रतिपादन करते हैं। उनके मतानुसार यह शक्ति डडडड नियन्त्रण में आ जाती है तो उसके सहारे शरीर की ऐच्छिक और अनैच्छिक गतिविधियों पर इच्छानुसार नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है। यह आत्म−नियंत्रण बहुत बड़ी बात है। इसे प्रकारान्तर से व्यक्तित्व डडडड अभीष्ट निर्माण की तदनुसार भाग्य निर्माण की डडडड कह सकते हैं। वे उसी रूप में कुण्डलिनी का गुण गान करते और उसकी उपयोगिता बताते हुए उसके जागरण का परामर्श देते हैं।

डाक्टर रेले की उपरोक्त पुस्तक ‘रहस्यमयी कुण्डलिनी’ की भूमिका तन्त्र मर्मज्ञ सर जानबुडरफ ने डडडड है। जिसमें उन्होंने रेले के इस अभिमत से असहमतता प्रकट की है कि वह शरीर संस्थान की विद्युतधारा डडडड है। उन्होंने लिखा है− ‘‘वह एक चेतन और महान सामर्थ्यवान शक्ति− ‘ग्रान्ड पोटेन्शियल’ है जिसकी तुलना अन्य किसी पदार्थ या प्रवाह से नहीं की जा सकती। डडडड राय में नाड़ी शक्ति कुण्डलिनी का एक स्थूल रूप ही वह मूलतः नाड़ी संस्थान या उसका उत्पादन नहीं वह न कोई भौतिक पदार्थ है और न मानसिक शक्ति। वह स्वयं ही इन दोनों प्रवाहों को उत्पन्न करती डडडड स्थिर सत्य (स्टेटिक−रियल) गतिशील सत्य (फैना डडडड रियल) एवं अवशेष शक्ति (रैजीहुअल पावर) के डडडड प्रवाह की तरह इस सृष्टि में काम करती डडडड व्यक्ति की चेतना में वह प्रसुप्त पड़ी रहती है। प्रयत्नपूर्वक जगाने वाला विशिष्ट सामर्थ्यवान् बन सकता है।”

विज्ञान की भाषा में कुण्डलिनी को जीवन की अथवा चुम्बकीय विद्युत कहते हैं। इसका केन्द्र मस्तिष्क माना गया है तो भी यह रहस्य अभी स्पष्ट नहीं हुआ कि मस्तिष्क को अपनी गतिविधियों के संचालन की क्षमता कहाँ से मिलती है। योगशास्त्र इसका उत्तर उस काम शक्ति की ओर संकेत करते हुए देता है और बताता है कि अव्यक्त मानवी सत्ता को व्यक्त होने का अवसर इसी केन्द्र से मिलता है। वही कामतन्त्र के विभिन्न क्रिया-कलापों के लिए आवश्यक प्रेरणा भी देती है। यही वह चुम्बकीय ‘क्रिस्टल’ है जो काया के ‘ट्रांजिस्टर’ को चलाने वाले आधार खड़े करता है।

कुण्डलिनी क्या है? इसके सम्बन्ध में शास्त्रों और तत्त्वदर्शियों ने अपने−अपने अनुभव के आधार पर कई अभिमत व्यक्त किये हैं। ज्ञानर्णव तन्त्र में कुण्डलिनी को विश्व जननी और सृष्टि संचालिनी शक्ति कहा गया है− ‘‘शक्तिः कुण्डलिनी विश्व जननी व्यापार वद्धोद्यता।” विश्व व्यापार एक घुमावदार उपक्रम के साथ चलता है। परमाणु से लेकर ग्रह−नक्षत्रों और आकाश गंगाओं तक की गति परिभ्रमण परक है। हमारे विचार और शब्द जिस स्थान से उद्भूत होते हैं−व्यापक परिभ्रमण करके वे अपने उद्गम केन्द्र पर ही लौट आते हैं। यही गतिचक्र भगवान के चार आयुधों में से एक है। महाकाल की परिवर्तन प्रक्रिया इसी को कहा जा सकता है। जीव को चक्रारूढ़ मृतिका पिण्ड की तरह यहीं घुमाती है और कुम्हार जैसे अपनी मिट्टी से तरह−तरह के पात्र उपकरण बनाता है, उसी प्रकार आत्मा की स्थिति को उठाने−गिराने की भूमिका भी वही निभाती है। कुण्डलिनी सृष्टि संदर्भ में समष्टि और जीव संदर्भ में−व्यष्टि शक्ति संचार करती है।

अध्यात्म ग्रन्थों में−विशेषतः उपनिषदों में कुण्डलिनी शक्ति की चर्चा हुई है। पर उतने को ही पूर्ण पक्ष नहीं मान लेना चाहिए। उतने से आगे एवं अधिक भी बहुत कुछ कहने, जानने और खोजने योग्य शेष रह जाता है। इन अपूर्ण घटकों को मिलाकर हमें वस्तुस्थिति समझने− अधिक जानने के लिए अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए।

कुण्डलिनी आत्म शक्ति की प्रकट और प्रखर स्फुरणा है। यह जीव की ईश्वर प्रदत्त मौलिक शक्ति है। प्रसुप्त स्थिति में वह अविज्ञात बनी और मृत तुल्य पड़ी रहती है। वैसी स्थिति में उससे कोई लाभ उठाना सम्भव नहीं हो पाता। यदि उसकी स्थिति को समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि अपने ही भीतर वह भण्डार भरा पड़ा है जिसकी तलाश में जहाँ−तहाँ भटकना पड़ता है। वह ब्राह्मी शक्ति अपने ही अन्तराल में छिपी पड़ी है, जिसे कामधेनु कहा गया है। आत्मसत्ता में सन्निहित इस महाशक्ति का परिचय कराते हुए साधना शास्त्रों ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि अपने ही भीतर विद्यमान इस महती क्षमता का ज्ञान प्राप्त किया जाय और उससे संपर्क साधने का प्रयत्न किया जाय। कुण्डलिनी परिचय के कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं−

मल−मूत्र छिद्रों के मध्य मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी का निवास माना गया है। उसे प्रचण्ड शक्ति स्वरूप समझा जाय। यह विद्युतीय प्रकृति की है। ध्यान से वह कौंधती बिजली के समान प्रकाशवान दृष्टिगोचर होती है। कुण्डलाकार है उसका स्वरूप प्रसुप्त सर्पिणी के समान है।

ज्ञान कर्म का समन्वय देवासुर सहयोग है। सुमेरु पर्वत यह तिकोना परमाणु है, जिसके कारण मूलाधार चक्र की रचना हो सकी। प्रसिद्ध है कि सुमेरु पर्वत पर देवता रहते हैं और स्वर्ण का बना है। निस्सन्देह इस त्रिकोण में इस से एक अद्भुत दिव्य शक्तियों और स्वर्ण सम्पदाओं का समावेश है। सुमेरु की रई, शेषनाग की रस्सी बनाकर समुद्र मथा गया। यह सर्प रज्जु−ब्रह्म नाड़ी के अंतर्गत इड़ा, पिंगला की विद्युत धाराओं से ओत−प्रोत है। शिव और विष्णु के प्रतीक ज्ञान और कर्म सुर और असुर जब समुद्र−मन्थन की−कुण्डलिनी जागरण की महासाधना में संलग्न हुए तो उसे सफल बनाने में प्रजापति ब्रह्मा ने कूर्म बनकर उसका बोझ अपने ऊपर उठा लिया। प्रयत्न असफल न हो जाय−सुमेरु नीचे न धँसक जाय−इस आशंका को निरस्त करने के लिए कूर्म भगवान् ने अवतार लिया और अपनी पीठ पर पर्वत जैसा भार उठा लिया। साधना पथ के पथिकों का उत्तरदायित्व भगवान् वहन करते हैं और सफलता का पथ पुरुषार्थ एवं निष्ठा के अनुरूप निरन्तर प्रशस्त होता चला जाता है। प्रथम चरण में ही चौदह रत्न नहीं निकल आये वरन् उसके लिए देर तक निष्ठापूर्वक मन्थन की प्रक्रिया जारी रखनी पड़ी। आध्यात्मिक साधनाओं में उतावली करने वाले अधीर व्यक्ति सफल नहीं होते, उसका लाभ तो धैर्यवान और श्रद्धा को मजबूती के साथ पकड़े रहकर विश्वासपूर्वक निर्दिष्ट मार्ग पर अवसर होते रहने वाले साधक नैष्ठिक साधक ही उठा पाते हैं।

कुण्डलिनी जागरण से इस प्रकार की अनेकों शक्तियों, सिद्धियों और क्षमताओं का जागरण होता है, यह सच है, क्योंकि इस साधना द्वारा साधक की अन्तर्निहित बीच रूप शक्ति जागृत होकर ऊर्ध्वगामी बनती है। यह साधनाएं आत्मसत्ता को परमात्म सत्ता से जोड़ने, उस स्तर पर पहुँचाने में समर्थ है। इनके लिए सामान्य साधना क्रम से ऊपर उठकर कुछ विशिष्ट साधना प्रक्रियायें अपनानी पड़ती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उनका अलग−अलग विधान है, इसलिए उनका सार्वजनिक प्रकाशन करना न आवश्यक हैं और न उचित।

कुण्डलिनी जागरण की साधना पद्धति का प्रयोजन अपने भीतर के देव अंशों को विकसित और परिपुष्ट बनाना है। कैलाश पर्वत पर सर्पों का यज्ञोपवीत धारण करके विराजमान शिव और क्षीर सागर में शेषनाग पर सोये हुए विष्णु का बीजांश हमारे मस्तिष्क मध्य केन्द्र−ब्रह्मरन्ध्र में यथावत् विद्यमान है। इस स्थान को ‘सहस्रार’ कहते हैं। महाकाली− अग्नि जिह्वा चामुण्डा का बीजांश जननेन्द्रिय गह्वर−‘मूलाधार’ −में विद्यमान है। इन दो शक्तियों के असम्बद्ध बने रहने पर केवल उनकी उपस्थिति का आभास मात्र ही होता है, पर जब उन दोनों का संगम समागम हो जाता है तो अजस्र शक्ति की एक ऐसी धारा प्रवाहित हो उठती है जिसे अनुपम या अद्भुत ही कहा जा सकता है।

मस्तिष्क के मध्य भाग में अवस्थित सहस्रार कमल में शेषशायी विष्णु भगवान अवस्थित हैं और अधःअवस्थित मूलाधार चक्र के अधिपति शिव हैं। शिव चरित्र में कामदेव द्वारा शिव को उद्दीप्त करने और उनके द्वारा तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को जला डालने वाली कथा प्रख्यात है। कुण्डलिनी जननेन्द्रिय केन्द्र के समीप होने से अपने निकटवर्ती क्षेत्र को प्रभावित करती है, तत्त्वदर्शी उस अपव्यय को ज्ञान नेत्र खोलकर नियन्त्रित कर लेते हैं। एक पौराणिक कथा इसी संदर्भ में यह भी है कि शिव के काम पीड़ित होने पर उनकी जननेन्द्रिय के 18 टुकड़े विष्णु ने कर डाले और वे जहाँ भी गिरे वहाँ ज्योतिर्लिंगों की स्थापना हुई। द्वादश ज्योतिर्लिंगों का उद्भव इसी प्रकार हुआ। वासना को ज्योति में बदला जा सकता है। इस कथानक का यही मर्म है।

शिवजी का प्रधान आभूषण सर्प है और उनके चित्रों में हर सर्प प्रायः 3॥ फेरे लगाकर लिपटा हुआ दिखाई पड़ता है। शिवलिंग की मूर्ति पूजा में नर−नारी की जननेन्द्रियों की ही स्थापना है। शिव मन्दिरों की प्रतिमा में नर−नारी की जननेन्द्रियों को सम्मिलित करके प्रतिष्ठापित किया जाता है और उस पर जल चढ़ाने की−शीतल करने, की प्रक्रिया जारी रहती है। अर्थात् इन अवयवों को यों अश्लील और गुह्य माना जाता है पर वे घृणित नहीं हैं। उनमें ऐश्वर्य के असाधारण रहस्य बीज विद्यमान हैं। प्रतीक रूप से सर्प जलहली और शिवलिंग की पाषाण प्रतिमा के बीच भी अवस्थित रहता है। इस स्थापना में इसी तथ्य का प्रतिपादन है कि कुण्डलिनी का अधिपति शिव प्रत्यक्ष एवं समर्थ परमेश्वर है। उनके निवास स्थान कैलाश पर्वत और मानसरोवर की तरह समझे जायें उन्हें नर−नारी की घृणित जननेन्द्रिय मात्र न मान लिया जाय। वरन् उनकी पवित्रता और महत्ता के प्रति अति उच्च भाव रखते हुए, सदुपयोग की आराधना में तत्पर रहा जाय। साहस और कलाकारिता के−पुरुषार्थ और लालित्य के−कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन् नर−नारी की जननेन्द्रियों के निकट मूलाधार चक्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय।

जर्मनी के मनःशास्त्री हेन्सावेन्डर ने अतीन्द्रिय क्षमता के अनेकों प्रमाण संग्रह करके यह सिद्ध किया है कि ‘‘मन की व्याख्या पदार्थ विज्ञान के प्रचलित सिद्धान्तों के सहारे नहीं हो सकती।” कुण्डलिनी विज्ञान इस सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत हो जाने वाली ऐसी विधा है जिसे मात्र अनुभूतियों से जाना जा सकता है।


अपनों से अपनी बात - “साधु ब्राह्मण परम्परा का पुनर्जीवन”

बाल्मीकि, अंगुलिमाल, विल्वमंगल जैसे पहले क्या थे और परिवर्तित स्थिति में क्या हो गये? इसका लेखा−जोखा लेने पर जादू चमत्कार जैसा सम्भव हुआ प्रतीत होता है। पूर्वार्ध में वे कितने हेय थे और उत्तरार्ध में वे कितनों को प्रकाश देने और ऊँचा उठाने में समर्थ हो गये थे, कौन नहीं जानता। ऐसे महान परिवर्तन प्रस्तुत करने वाला एक ही वर्ग है जिसे गृहस्थ होने की स्थिति में डडडड और प्रव्रज्या पर निकल पड़ने से साधु कहा जाता है। दोनों की प्रत्यक्ष स्थिति में राई−रत्ती जितना अन्तर डडडड है पर उनके लक्ष्य और उपवास में तनिक भी भिन्नता डडडड होती। इसीलिए विविध प्रसंगों में ‘साधु ब्रह्म’ शब्द डडडड कर बोला जाता है और दोनों वर्गों को एक मानते डडडड समान सम्मान दिया जाता है।

सामान्यतया मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह एक डडडड है और पशु वर्ग के अन्य प्राणियों की तरह डडडड का समय भी पेट भरने और प्रजनन का ताना−बाना बुनने में गुजर जाता है। पेट में भूख लगती है तो उसे डडडड तथा ढकने का प्रयास करना पड़ता है। मस्तिष्क डडडड जवानी का उन्माद चढ़ता है तो समय−समय पर मद डडडड होते रहने वाले हाथी की तरह वह जोड़ा ढूँढ़ता डडडड रति कर्म में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार परिवार डडडड है और उनके भरण−पोषण का भार सिर पर आता है, सामान्यता इतने में ही वह मनुष्य जन्म खप जाता है। डडडडबसे भगवान की सर्वोपरि कलाकृति एवं आत्मा को दी गई सबसे उच्चस्तर की धरोहर कहा गया है।

यह सामान्य क्रम हुआ। किसी प्रतिभावान से कुछ डडडड उन्माद उठ खड़े होते हैं और नशे में अर्ध विक्षिप्त डडडड के बेतुके क्रिया−कलाप करने के लिए बाधित करते हैं। यह नशे हैं लोभ, मोह और अहंकार। प्रत्यक्ष है कि कोई पेट भरने और तन ढकने से अधिक उपभोग नहीं कर सकता। जो उद्धत अपव्यय करता है वह अपने सौजन्य और भविष्य के साथ खिलवाड़ करता है। फिर लालची का अत्यधिक उपार्जन उसके साथ नहीं जाता जहाँ का तहाँ पड़ा रह जाता है और उसका उपयोग मुफ्तखोर करते हैं। भले ही उसका नाम कुटुम्बी सम्बन्धी ही क्यों न हों।

मोह में इसी प्रकार की भ्रान्ति है। हर जीवधारी अपना स्वतन्त्र अस्तित्व लेकर आता है और अपने ही कर्मफल से जिस−तिस के साथ जुड़ता और बिछुड़ता रहता है। सगा मानने पर भी कोई किसी का स्वामी नहीं हो सकता। ईमानदार माली की तरह यदि परिवार के उद्यान को सन्तुलित रीति से सोचने की सूझ जग पड़े तो मोह न उभरे और कर्त्तव्य ही स्मरण रहे। परिवार को विलासी और धन कुबेर बनाने की बात सोचना मूर्खता पूर्ण है। उस समुदाय के सदस्यों को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी भर बनाने की बात ध्यान में रहे तो अनावश्यक जंजाल में न उलझना पड़े और मनुष्य जीवन की सार्थकता के लिए कुछ बड़े कदम उठाना बन पड़े।

बड़प्पन की−अहंकार की सनक उन दोनों से अधिक उपहासास्पद है। ठाट−बाट, सज−धज, आडम्बर बनाने में चाहे जितना समय लगाया जाय, धन खर्चा जाय पर इससे किसी की श्रद्धा, सद्भावना और आत्मीयता हस्तगत नहीं कर सकता। चापलूसों द्वारा की जाने वाली वाहवाही से मन भरना हो तो सस्ता तरीका यह है कि अपने आप ही अपनी प्रशंसा के पुल बाँधकर टैप रिकार्डर पर अंकित कर लिया जाय और जितनी बार जितनी देर तक उन्हें सुनते रहा जाय। रूप यौवन पर इठलाने के लिए बड़ा-सा दर्पण दीवार पर टाँग लेना पर्याप्त है। उससे मन भर सकता है। दूसरों को अपने ही काम से फुरसत नहीं, अपनी ही समस्याओं से दिमाग खाली नहीं बचता फिर दूसरों पर ध्यान देने और उनका यश बखानने के लिये कोई क्यों दिलचस्पी ले।

संसार में प्रतिभाओं की कमी नहीं जो अपना और दूसरों का भला करते हुए सच्चे अर्थों में श्रेय पा सकती हैं। आत्म−सन्तोष, जन−सम्मान और दैवी अनुग्रह की त्रिविधि विभूतियों को विपुल मात्रा में उपलब्ध कर सकती हैं। यदि दृष्टिकोण सुधरे तो कोई क्यों पाप अनाचार करे। आज जो त्रास दूसरों को दिया जा रहा है वही कर्मफल की सुनिश्चित व्यवस्था के आधार पर अपने ऊपर कल नहीं तो परसों बिजली बनकर टूटेगा। यह बात ध्यान में रहे संसार में से अनीति अत्याचार की जड़ ही कट जाय। सभी सन्मार्ग पर चलें और सुखी रहें।

किन्तु प्रचलन इससे ठीक उलटा है। मनुष्य अपने को बुद्धिमान होने का दम भरता है पर बारीकी से पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि वह दृष्टिकोण में विकृतियां और विडम्बनाएँ भर लेने के कारण ऐसे कृत्य करता है जिसके बदले आत्म प्रताड़ना और विज्ञ समाज की भर्त्सना लदती रहे। इस दयनीय दुर्दशा से यदि मनुष्य को बचाया जा सके और उत्कृष्ट चिंतन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार का पाठ पढ़ाया−अभ्यास कराया जा सके तो समझना चाहिए कि ऐसा सौभाग्य उदय हुआ जैसा पारसमणि हस्तगत होने पर हो सका है।

यह काया−कल्प कौन करे? इतनी दक्षता किसमें है? इसके उत्तर में एक ही केन्द्र बिन्दु की ओर संकेत किया जा सकता है, वह है− साधु ब्राह्मण। साधु अर्थात् लोक सेवा में पूरा समय लगाने वाला। ब्राह्मण अर्थात् निर्वाह व्यवस्था जुटाते हुए लोक मानस के परिष्कार में यथासंभव अधिक से अधिक समय नियमित रूप से लगाना। मनुष्य जाति का उत्थान और पतन सुख और दुःख पूरी तरह इसी देव वर्ग पर अवलम्बित है।

प्राचीन भारत की महिमा गाते−गाते देशी और विदेशी इतिहासकार अघाते नहीं। विशाल भारत की तेतीस करोड़ जनसंख्या को उज्ज्वल चरित्र और भाव भरे सेवा साधन के कारण तेतीस कोटि देवता कहा जाता था। जिस भारत भूमि में यह देव मानव उभरते थे उसे ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ माना जाता था। जगद्गुरु और चक्रवर्ती का दायित्व इसी देश ने निभाया था। यहाँ न सम्पदा की कमी थी, न विद्या की, न गौरव गरिमा की।

उन दिनों यह सब कैसे बन पड़ा था, और आज वह स्थिति क्यों उलट गई तो एक शब्द में यही कहना पड़ेगा कि गढ़ने और ढालने वाले वर्ग का तिरोधान हो गया। ब्राह्मण वंश का समापन हो गया। जाति वंश के नाम पर ब्राह्मण की संख्या कम नहीं। वे गणना में अन्य जातियों की तुलना में अधिक भी हो सकते हैं। वंश की विडम्बना भी कम नहीं 60 लाख सन्त महन्तों का भार इस देश की जनता भावुकता वश वहन करती है। किन्तु इन कागज के हाथियों से क्या प्रयोजन सिद्ध हो, इनके द्वारा शानदार यात्रा का मोर्चे पर तहलका मचा देने का उद्देश्य किस प्रकार पूरा हो?

मिट्टी की गाय बछड़े समेत पचास पैसे की खरीदी जा सकती है और उसे नाम रूप की दृष्टि से समता भी मिल सकती है। पर इस खिलौने से पाँच किलो दूध नित्य कैसे उपलब्ध हो। इसका बछड़ा कुछ दिन बाद खेती के काम आने वाला बैल कैसे बने? यह खिलौने तो शोभा बढ़ाने या मन बहलाने भर के काम आ सकते हैं।

यह कार्य तो साधु ब्राह्मण ही कर सकते हैं कि अपने अथक प्रयास से ऊसर को उद्यान में बदल दें। नर पशु को देव मानव में बदल दें। उपदेशों का प्रभाव इसलिए नहीं पड़ता कि उनकी कथनी और करनी में अन्तर रहता है। जो दूसरों से कराना चाहते हैं वह स्वयं नहीं करते। साँचे में खोट हो तो उसमें ढली हुई वस्तुएँ साफ सुथरी कैसे बनें? उदाहरण सामने हैं। गान्धी, विनोबा, बुद्ध, विवेकानन्द को साथियों की भी कमी नहीं रही और न अनुयायियों की ही। खरे का अनुकरण करने वाले भी मिलते ही हैं। न मिलते होते तो पुरातन काल में भारत को विश्व का मुकुटमणि किनने बनाया था और आज भी प्रजा परिवार का एक सूत्र संचालक अपने साथ चौबीस लाख देव मानवों को किस प्रकार लिये−लिये फिरता है। इस प्रत्यक्ष प्रमाण को कोई भी छद्म छोड़कर यथार्थता का अवलंबन करते हुए अपने निज के प्रयोगों में इसी की पुनरावृत्ति होती हुई देख सकता है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल होता है इस तथ्य को पुरातन काल में भी खरा पाया जाता रहा है और हजार परीक्षाओं के बाद भी- आज भी, इसकी यथार्थता जांची जा सकती है।

यों युग शिल्पियों की- प्रज्ञा पुत्रों की संख्या एक लाख के लगभग है। पर उनमें एक ही कमी है- संकल्प में सुनिश्चितता का, दृढ़ता का, अनवरतता का अभाव। अभी उत्साह उभरा तो उछलकर आकाश चूमने लगे और दूसरे दिन ठण्डे हुए तो झाग की तरह बैठ गये। यह बचकानापन तो गुब्बारों और पतंगों में भी देखा जाता है ऊपर उड़ने की और गति पकड़ने की उनकी क्रिया तत्काल दिख पड़ती है पर हवा का रुख बदलते ही वे पूरब से उलटकर पश्चिम को चल पड़ते हैं। उड़ाने वाले का हाथ थकते ही पतंग जमीन पर आ गिरती है और गुब्बारा फुलाव को घटाते-घटाते कहीं खाई खंदक में जा गिरता है। इस अस्थिरता में लक्ष्यवेध नहीं हो सकता उसके लिए अर्जुन जैसी तन्मयता होनी चाहिए जो मछली की आंख भर ही देखे। इसके लिए एकलव्य जैसी निष्ठा चाहिए जो मिट्टी के पुतले को निष्णात अध्यापक बनाले।

कहां 24 लाख और एक लाख। कहां मात्र दस हजार। इस विसंगति के पीछे रहस्य एक ही है कि जरूरत हीरकों की पड़ गई है। कांच के नगीने से तो बिसातियों की दुकानें भरी रहती हैं और वे बीस-बीस पैसे के बिकते भी हैं। किंतु हीरे तो जौहरियों की तिजोरियों में ही मिल सकते हैं और उनके बड़ेपन की परख होते ही मूल्य भी हजारों रुपये जितना मिलने लगता है। दस हजार साथी ऐसे चाहिए जो व्रतशील हों। प्रतिज्ञा करें तो निबाहें। परिस्थितियों की आड़ में अपने मन की दुर्बलता को न छिपायें। समुद्र के मध्य खड़े हुए प्रकाश स्तंभ की तरह अकेले ही उधर से गुजरने वाले नाविकों का मार्ग-दर्शन करते रहें। न अकेलेपन की शिकायत करें न साथियों की तलाश। जिम्मेदारी अपनी अनवरतता की निभायें। जिस व्रत को धारण करें उसे हर स्थिति में अंत तक पालन ही करते रहें।

प्रसन्नता की बात है कि गुरुदेव की प्यास और तलाश आरण्यरोदन बनकर नहीं रह रहीं है। गत अंक में छपे अनुरोध का भावनाशील प्रज्ञा पुत्रों पर भारी प्रभाव पड़ा है और वह आकांक्षा अपीलें गले से उतरकर अंतराल की गहराई को मथ डालने में समर्थ हई हैं। विचारशीलों ने गंभीरता पूर्वक विचार किया है। निजी तृष्णा और युग देवता की याचना में से एक को चुनने की बेला में उनने स्वार्थ को ठुकराया और परमार्थ को वरण किया है।

इस एक महीने में परिजनों के जो भाव भरे पत्र आये हैं। उनसे प्रतीत होता है कि न केवल स्वेच्छा से व्रत ग्रहण किया है वरन् उनके अभिभावकों आश्रितों ने भी अनुमति देकर वैसा ही साहस दिखाया है जैसा विश्वामित्र की यज्ञ रक्षा के लिए राम लक्ष्मण के हाथ सौंपते हुए दशरथ ने दिखाया था। उर्मिला ने अपने पति और सुमित्रा ने अपने बेटे लक्ष्मण को बड़े भाई के साथ जाने के लिए प्रेरित किया था। लगता है वह परंपरा अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। दीपक कहीं-कहीं अधिक रात बीत जाने और आंधी चलने पर जहां-तहां टिमटिमा रहे हैं।

समर्पण पत्रों की विपुल संख्या और अभिव्यक्त दृढ़ता को देखते हुए प्रतीत होता है कि गुरुदेव की प्यास और तलाश अधूरी न रहेगी इतने विशालकाय उद्यान में से सीमित संख्या में खोजे गये सुरभित पुष्पों का चयन न तो असंभव होगा और न कठिन पड़ेगा। इच्छित संख्या सन् 86 में बसंत पर्व तक पूरी हो जायेगी ऐसा विश्वास है।


Quotation

ईश्वर निंदा प्रशंसा से परे है। न उसे किसी के स्तवन सुनने में रुचि है न उपहार पाने की जरूरत। वह सिर्फ यह देखता है कि भक्त ने अनुशासन पाला या आडंबरों के खेल खिलौनों से उसे फुसलाया।


गायत्री चालीसा पाठ अनुष्ठान

प्रातःकाल सूर्योदय के समय गायत्री मंत्र की एक माला वातावरण संशोधन का अनुष्ठान पहले से ही चल रहा है। इसकी पूर्ति ठीक प्रकार से हो रही है। कुछ छोड़ बैठते हैं तो कुछ नये आ जाते हैं। इस प्रकार प्रतिदिन 24 करोड़ जप करने का क्रम प्रज्ञा परिजनों द्वारा ठीक प्रकार चलाया जा रहा है। आशा की जानी चाहिए कि यह उपक्रम युग संधि के शेष 15 वर्षों में भी ठीक प्रकार चलता रहेगा। जिस संगठन के 24 लाख सदस्य हों और वे अपना न्यूनतम कर्तव्य निबाहें, उस निर्वाह का लेखा-जोखा ठीक तरह लिया जाता रहे, कमीवेशी को पूरा करते रहने का नियंत्रण रहे तो व्यक्ति के लिए छोटी किंतु समाज के लिए अतिशय उच्चस्तरीय प्रभाव उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया का सही रूप में चलते रहा कठिन क्यों होना चाहिए?

हीरक जयंती में उपरोक्त अनुष्ठान के समतुल्य ही एक दूसरा अनुष्ठान प्रारंभ किया जा रहा है वह है ‘गायत्री चालीसा पाठ’। इसमें समय का भी बंधन नहीं है। अनेेकों भावनाशील ऐसे हैं जो साधना तो करना चाहते हैं, पर प्रातःकाल सूर्योदय के समय का निर्वाह नहीं कर पाते। जिन लोगों की नौकरी रात में ड्यूटी देने की है, ऐसे लोगों की कमी नहीं। वे काम पर से लौटते ही सो जाते हैं और नींद पूरी करके देर में उठते हैं।

जिन घरों में देर में रोटी खाने देर तक रेडियो सुनने, टी.वी. देखने का प्रचलन है वे भी सवेरे देर तक सोते हैं। बच्चों को नींद देर तक आती है और जगाने पर कुड़कुड़ाते हुए जगते हैं। जगने पर नित्य कर्म की बात पहली है। पूजा-पाठ की दूसरी।

ऐसे लोगों के लिए गायत्री चालीसा पाठ का क्रम सर्व सुलभ समझते हुए किया गया है। गायत्री मंत्र का उच्चारण तो शुद्ध ही होना चाहिए। इसके लिए शिक्षित होना आवश्यक है। अपने देश में दो-तिहाई लोग बिना पढ़े हैं। वे गायत्री मंत्र का जप कैसे कर पायें ऐसे लोगों को भी इस महान उपासना में साथ लेकर चलने की बात सोची गई है। वह माध्यम है- गायत्री चालीसा का पाठ। इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है। यथासंभव जितनी शुद्धि रखी जा सके उतनी उत्तम है, पर उसके लिए कोई अनिवार्य प्रतिबंध नहीं है।

जो नितांत अशिक्षित हैं। उनके लिए यह तरीका उत्तम है कि एक शिक्षित व्यक्ति एक चौपाई पढ़े। दूसरे पास बैठे हुए बिना शिक्षित बालक, वृद्ध, महिलाएं उसे दुहरायें। इस प्रकार शिक्षितों के साथ अशिक्षितों की साधना भी चल पड़ती है। कुछ दिनों में तो वह बिना शिक्षितों के भी मौखिक रूप मे कंठस्थ हो जाता है।

यदि इसके साथ वाद्य यंत्रों का भी समावेश किया जा सके तो अच्छा खासा कीर्तन, भजन, संगीत हो जाता है और उससे सारे घर का वातावरण प्रतिध्वनित हो उठता है।

गायत्री चालीसा का महत्व इसलिए भी अधिक है कि उसके सहारे पाठ करने वाले को महात्म्य विदित होता है और श्रद्धा बढ़ती है। श्रद्धा ही साधना का प्राण है। जो कार्य जप से नहीं हो पाता वह माध्यम से पूरा हो जाता है।

गायत्री चालीसा छपाई कागज के हिसाब से एक रुपये की पांच पड़ती हैं। पर 24 लाख गायत्री चालीसा घर-घर पहुंचाने की दृष्टि से उन्हें एक रुपये में बीस प्रसाद रूप में केंद्र से दिया जा रहा है। जहां भी कोई सम्मेलन आयोजन हो वहां धार्मिक प्रवृत्ति वालों को इन्हें पांच-पांच पैसे से भी कम में बेचा जा सकता है। घाटा वितरण करने वाले उठायें। हीरक जयंती वर्ष से प्रतिदिन 24 लाख गायत्री चालीसा पाठ का नया प्रयोग आरंभ हो रहा है।


इतना प्यार बहाओ

(माया वर्मा)


इतना प्यार बहाओ (kahani)

इतना प्यार बहाओ जग में जैसे नवसूरज की लाली। उसमें जो डूबे वह समझे- आत्म-सुधा निधि मैंने पा ली॥

इतनी बांटो कोमलता, कि सभी उपवन में जाना भूलें। करुणामय उद्गार हमारे बढ़कर आसमान को छू लें॥

ईश्वर ने दी मानस बगिया, और मनुज है इसका माली॥

इतना बहे प्रकाश- किसी को ठोकर लगे न अपने आगे। इतनी हो तत्परता- दामिनी भी अपनी पुकार पर जागे॥

राहगीर पूछें- किसने यह लाल-मशाल जगत हित बाली॥

इतना हो सान्निध्य सुखद, अपनापन परिभाषा पा जाये। व्यथा किसी की सुनते-सुनते, अपना अंतरतम भर आये॥

संवेदन के पुष्प भार से झुक जाये इस उर की डाली॥

इतना हो विश्वास अडिग जैसे नभ, धरती और सितारे। आस्था की गहराई को लख सागर मरे शरम के मारे॥

हो न कहीं दीवार छद्म की, टूटे संदेहों की जाली॥

मिलें न यदि स्तांतिकण-गम नहीं- आंसू से ढालेंगे मोती। सूर्योदय तक कभी हमारी अंतर्ममता रहे न सोती॥

अपने घर आकर भी झोली किसी व्यथित की रहे न खाली॥

ऐसा जीवन जिएं सभी तो स्वर्ग उतर आये धरती पर। सही अर्थ में बने ‘मनुष्य’ -आज का भूला और भ्रमित नर॥

मानव में देवत्व और जीवन में आ जाये खुशहाली॥

*समाप्त*