ईसा कहते थे- “तुम मुझे प्रभु कहते हो, गुरु कहते हो, उत्तम कहते हो, मेरी सेवा करना चाहते हो और मेरे लिये सब कुछ बलिदान कर देने को तैयार रहते हो। किन्तु मैं तुमसे फिर कहता हूँ, तुम मेरे लिये न कुछ करते हो और न करना चाहते हो।”
“तुम जो कुछ करना चाहते हो, मेरे लिए करना चाहते हो जबकि मैं चाहता हूँ तुम औरों के लिए ही सब कुछ करो। औरों के लिए कुछ न करने पर तुम मेरे लिए भी कुछ न कर सकोगे। मैं तुमसे सच कहता हूँ कि यदि तुमने इन छोटों के लिए कुछ न किया तो मेरे लिए भी कुछ न किया।”
“मैं फिर कहता हूँ कि मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न मत करो, मेरी प्रसन्नता तो इन छोटे और गरीब आदमियों की प्रसन्नता है। मुझे प्रसन्न करने के स्थान पर इनको प्रसन्न करो, मेरी सेवा की जगह इनकी सेवा और सहायता करो। यदि तुम सच्चे मन से प्रभु की प्रार्थना नहीं करते, तो तुम्हारा प्रार्थना में खड़ा होना ठीक वैसा ही है, जैसे ग्वाले के डण्डे से घेरी हुई भेड़ें बाड़े में खड़ी हो जाती हैं।’’
अर्जुन ने उर्वशी के काम प्रस्ताव को अमान्य किया उसे मातृ भाव से देखा। आहत कामिनी उर्वशी ने शाप दिया ‘‘तुम्हें एक वर्ष पुरुषत्वहीन वृहन्नला बनकर रहना होगा। अर्जुन ने यह शाप भी उसी सहज भाव से स्वीकार करके उर्वशी को नमन किया।
कौरवों से हुई शर्त के अनुसार बारह वर्ष वनवास के बाद एक वर्ष अज्ञातवास के समय अर्जुन उसी वृहन्नला स्थिति में राजा विराट् के यहाँ रहे। परन्तु उसी बीच उन्हें अकेले ही कर्ण, द्रोण, भीम सहित कौरव सेना से युद्ध करना पड़ा। राजा विराट् का साला और सेनापति कीचक द्रौपदी पर कुदृष्टि डालने के कारण भीम के हाथों मारा गया। कौरव कीचक से डरते थे। उसके मरने की सूचना पाकर उन्होंने विराट पर चढ़ाई कर दी। ऐसी विषम स्थिति में वृहन्नला अर्जुन विराट की ओर से लड़े। पुरुषत्वहीनता के शाप के बीच भी उन्होंने ऐसा पुरुषार्थ दिखाया कि कौरव तो परास्त हुए ही, स्वयं उन्हें भी आश्चर्य हुआ।
बाद में भगवान कृष्ण से उस संदर्भ में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा- ‘पुरुषत्वहीनता के शाप के बीच ऐसा प्रचण्ड पुरुषार्थ आपके ही आशीर्वाद से बन पड़ा।’
अर्जुन का यह कथन सुनकर कृष्ण थोड़े गम्भीर हुये; बोले- ‘‘पार्थ! यह ठीक है कि मैं तुम्हारे हित के लिए प्रयत्नशील रहता हूँ। परन्तु इस प्रसंग में तो तुम देवी उर्वशी के आशीर्वाद से ही विजयी हुए थे।’’
अर्जुन चौंके बोले- “प्रभु परिहास कर रहे हैं। उर्वशी ने तो मुझे पुरुषत्वहीन होने का शाप दिया था; उनके आशीर्वाद का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
भगवान थोड़ा मुस्कराये बोले- “धनंजय! ऐसा कहकर तुम अपनी ही मान्यता के साथ अन्याय कर रहे हो। क्या तुम सोचते हो कि जिस उर्वशी के प्रणय को तुमने अस्वीकार कर दिया था, वही सब कुछ थी? जिस उर्वशी के प्रति तुमने निष्ठा दिखाई, मातृ भाव से देखा ही नहीं, उसका शाप भी स्वीकार किया, वह मातृरूपा उर्वशी क्या कुछ भी नहीं थी। यदि मातृरूपा उर्वशी कुछ नहीं थी तो तुमने उसके लिए कामिनी उर्वशी की उपेक्षा क्यों की?
अर्जुन असमंजस की स्थिति में प्रभु का मुख देखते रह गये। श्री कृष्ण ने अपने कथन को स्पष्ट करते हुए कहा- “अर्जुन! तुमने कामिनी उर्वशी की उपेक्षा की थी, उसने क्रोधित होकर तुम्हें काम शक्तिहीन होने का शाप दे दिया परन्तु तुमने जिस मातृ शक्ति का सम्मान किया जिसके प्रति आस्था अडिग रखते हुए तुमने शाप भी शिरोधार्य किया उसने तुम्हें हृदय से आशीर्वाद दिया था ‘‘मेरा यह अजेय पुत्र जो वासना के सामने अजेय रहा, हे प्रभु, उसे कभी पुरुषार्थ क्षेत्र में पराजित न होना पड़े।’’
‘‘हे वीर! शाप या आशीर्वाद के लिए वाणी का प्रयोग किया जाय न किया जाय, जब तक वह अन्तःकरण की गहराई से निकलता है फलित होता है। शाप देने वाली उर्वशी से आशीर्वाद देने वाली उर्वशी अधिक सक्षम थी। उसका आशीर्वाद कैसे खाली जा सकता था।’’
अर्जुन हर्षित हुए बोले- ‘‘आज आपने मेरा एक भारी भ्रम दूर कर दिया। मुझे देवी उर्वशी के प्रति किंचित् मात्र भी रोष नहीं था, और न अपने किए पर कोई पश्चाताप ही। परन्तु मातृ भाव का स्नेह प्रसाद मिलने का रहस्य समझ में नहीं आ रहा था।”
भगवान बोले ‘‘हे पार्थ! नारी का एक पक्ष कामिनी पक्ष है उस पर ‘काम’ का प्रभाव होता है। दूसरा लक्ष्मी पक्ष मातृ पक्ष है, उसमें परमात्म शक्ति का प्रत्यक्ष निवास होता है। तुम जैसे श्रेष्ठ नर नारी की उस दुर्धर्ष मातृ चेतना को भी अपने पुरुषार्थ से पा लेते हैं। तुमने वही किया है।’’
अपने आपकी समीक्षा करना, व्यक्ति के वर्तमान स्वरूप को समझना आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन और न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है। इस आत्म निरीक्षण का एक और भी पहलू है कि जो विशिष्टताएँ-आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं, उनका यदि विकास नहीं हुआ है तो उसकी आवश्यकता अनुभव करते हुए आत्मोत्कर्ष का प्रयास सम्भव हो सकेगा।
वस्तुतः मनुष्य के पास ऐसा बहुत कुछ है जो सदा अप्रकट और अविकसित ही बना रहता है। मस्तिष्कीय क्षेत्र की अतीन्द्रिय क्षमताएं और अन्तःकरण की ऋद्धि सिद्धियां ऐसी हैं जो हर किसी के पास न्यूनाधिकता में पाई जाती हैं। यदि आत्म-निरीक्षण की कला हस्तगत हो सके तो मनुष्य इन दिव्य केन्द्रों का स्थान एवं स्वरूप समझ सकता है और उन्हें विकसित करने के लिए वह सब कर सकता है जो सुदृढ़ संकल्प शक्ति के सहारे निश्चित रूप से हो सकता है। योग और तप इसी प्रयोजन के लिए किया जाता है।
यदि लक्ष्य ईश्वर प्राप्त भर हो तो भी वह कार्य अमुक कर्मकाण्डों के बलबूते नहीं हो सकता। उसके लिए भी आन्तरिक परिष्कार और उपयुक्त चिन्तन चरित्र अपनाने की आवश्यकता है। तद्विषयक जो परिवर्तन या विकास करना है उसका स्वरूप सामने आने की बात तभी बनती है जब आत्म-निरीक्षण का सिलसिला परिपूर्ण उत्साह के साथ चलाया जाय।
यह भ्रम जितनी जल्दी दूर हो सके उतना ही अच्छा है कि ईश्वर प्राप्ति या देवाराधन के लिए अमुक कर्मकाण्ड ही सब कुछ हैं। लोग इसी भ्रम में ग्रसित रहकर अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप पूजा विधानों में संलग्न रहते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर के भी मनुष्य की भाँति चर्म चक्षु ही हैं वह मात्र क्रिया-कृत्यों को ही देख पाता है किसी का अन्तरंग देखने या परखने की उसमें क्षमता नहीं है। या है तो इसे महत्व नहीं देता और हेय व्यक्तित्वों को भी उनकी क्रियाओं से प्रभावित होकर छाती से लगा लेता है।
पापों के क्षमा होने या उनके नाम प्रताप में नष्ट हो जाने की बात सही नहीं है। तीर्थाटन आदि कृत्यों में भी यदि कोई चाहे तो दिशा निर्देशन प्राप्त कर सकता है। पर पापों के नष्ट हो जाने या कर्मफल के उलट जाने की बात सोचना प्रकारान्तर से ईश्वर की बड़ी व्यवस्था उलट जाने की दुराशा रखना है। प्रभु के दरबार में पुजारियों के साथ पक्षपात होने और बिना पुजारियों के दूध में से मक्खी को निकाल फेंकने की उपेक्षा का कोई विधान नहीं है। इस तथ्य को समझते ही तुरन्त यह समस्या आगे आती है कि हमें अंतर्मुखी होने का अभ्यास करना चाहिए ताकि आत्म-निरीक्षण के साथ-साथ आत्म-सुधार का प्रयास भी चल पड़े। इसकी अनिवार्य आवश्यकता है। इस क्षेत्र में कोई सस्ते उपचार- आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त और किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते।
आत्म निरीक्षण में सर्वप्रथम शरीर और आत्मा की मित्रता अनुभव करने का प्रसंग आता है। इसके बिना वह भ्रान्ति बनी ही रहती है जिसे अध्यात्म की भाषा में “माया’’ कहा जाता है। माया का सार संक्षेप इतना ही है कि चेतना अपने आपको मात्र शरीर मानती रहती है और उसके निर्वाह तक सीमित न रहकर उसे सजाने, समृद्ध बनाने, दर्प दिखाने में लगी रहती है। वासना, तृष्णा और अहन्ता की पूर्ति की ही सफलता एवं प्रसन्नता का केन्द्र बिंदु मान लिया जाता है। इतना ही नहीं शरीर के साथ संपर्क साधने वाले कुटुम्बी, सम्बन्धी, मित्र परिचित ही इस शरीराभ्यास के क्षेत्र में घुस पड़ते हैं। इन्हीं सबको वैभववान् बनाने के लिए इच्छाओं और चेष्टाओं का केन्द्रीकरण हो जाता है। जीवन की अवधि और शारीरिक मानसिक शक्ति का आना इसी क्षेत्र में होता रहता है। कूप मण्डूक जैसी-गूलर के भीतर रहने वाले भुनगों की तरह मनुष्य की स्थिति हो जाती है और वह आत्मा परमात्मा के सम्बन्ध में- आत्मोत्कर्ष एवं ईश्वर प्राप्ति के सम्बन्ध में कुछ गम्भीर विचार तक नहीं कर पाता। फिर सुधार विकास का उपक्रम तो चले ही कैसे?
आत्म-निरीक्षण का प्रथम चरण- आत्म-निरीक्षण जितना गम्भीर और प्रखर होता है। उसी अनुपात से शरीर और आत्मा की भिन्नता का वास्तविक बोध होता है। अन्यथा तोता रटन्त की तरह आत्मा परमात्मा चर्चा का बाल-विनोद चलता रहता है।
माया के बन्धन शिथिल होने या कटने का एकमात्र उपाय है कि अपनी सत्ता की द्विधा स्थिति को समझा जाय। यह अनुभूति विकसित हो सके तो ही आत्मा का महत्व एवं हित सूझ पड़ता है और शरीर के पक्ष में झुकी हुई सारी प्रवृत्ति को सन्तुलित करने का मन होता है। शरीर संसार में अनुरक्त करता है और आत्मा की प्रायः सर्वथा उपेक्षा करता है। यह सोच तक नहीं पाता कि हमारे भीतर आत्मा नाम की कोई वस्तु भी है और उसकी भी कुछ माँग, पुकार, सुख एवं आवश्यकताएं भी हैं। इस प्रकार की अनुभूति तभी होती है जब शरीर पर अपना सर्वस्व निछावर किये रहने के ढर्रे में हेर-फेर किया जाता है। आत्मा को परमात्मा का सन्देश सुनने और आह्वान को अंगीकार करने की बात अन्तरंग की गहराई तक प्रवेश कर जाती है, तभी यह सूझ पड़ता है कि शरीर की तरह आत्मा के निमित्त भी कुछ किया जाना चाहिए?
क्या किया जाना चाहिए? इसके उत्तर में दो तथ्य उभर कर सामने आते हैं। एक यह कि आत्म-गौरव के अनुरूप, व्यक्तित्व के ढलने में जो त्रुटियाँ चल रही हैं इसे कठोरतापूर्वक नियमन किया जाय, इसी को तप कहते हैं। इस संदर्भ में कठोरता बरतनी होती है अन्यथा अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियाँ सहज पीछा नहीं छोड़ती। तपश्चर्या में शरीर को अकारण काय कष्ट देना व्यर्थ है। इससे तो स्वास्थ्य गड़बड़ाता है। होना यह चाहिए कि ऐसा मनोबल विकसित किया जाय जो दुष्प्रवृत्तियों से मल्लयुद्ध करके उन्हें परास्त कर सके। यह संशोधन पक्ष हुआ।
इसके अतिरिक्त दूसरा पक्ष श्रेष्ठता के अभिवर्धन का है। यह आत्म विश्वास और आत्म-बल के आधार पर उपयुक्त कार्यक्रम बना लेने से भी सम्भव हो सकता है। पर इसके लिए सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय ईश्वर की उपासना करने से भी सहायता मिल सकती है। इसे योग कहते हैं। योग का तात्पर्य है- जुड़ना। किसके साथ जुड़ना? विराट ब्रह्म, समग्र समाज के साथ अपने को जोड़ना और क्षुद्र स्वार्थपरता के-सीमा बन्धन शिथिल करने का अभ्यास करना। योगी का दृष्टिकोण समता और क्रिया-कल्याण सर्वजनीन हित साधन का होता है। इसके लिए अभ्यास स्वरूप राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग में से किसी का या सभी के समन्वय का अभ्यास आरम्भ किया जा सकता है। यही है यथार्थवादी आत्मिक प्रगति का राजमार्ग।
मध्य रात्रि में गहरी नींद सोते हुए नेपोलियन को सेनापति ने जगाया और दक्षिण मोर्चे पर शत्रु के अचानक आक्रमण का विवरण सुनाते हुए, क्या उपाय अपनाया जाय, इसका निर्देश पूछा। नेपोलियन आँख मलते हुए उठे और दीवार पर टँगे 34 नम्बर नक्शे को उतारते हुए कहा- ‘इसमें बताये हुए तरीके का अवलम्बन करो।’
सेनापति चकित था, कि जिसका उसे अनुमान तक न था, उस संभावना को नेपोलियन ने समय से पूर्व ही कैसे सोच लिया और कैसे उसका प्रतिकार खोज लिया।
असमंजस तोड़ते हुए नेपोलियन ने कहा- ‘विचारशील अच्छी से अच्छी आशा करते हैं, किन्तु बुरी से बुरी परिस्थितियों के लिये तैयार रहते हैं। मेरी मनःस्थिति सदा से ऐसी ही रही है। इसलिये विपत्ति टूटने से पहले भी उसका अनुमान लगाने और उपाय सोचने में मुझे संकोच नहीं होता।
हवा एक संसार व्यापी तत्व है। पर वह कहाँ कितनी है, इसका नाप करने के लिए उस क्षेत्र पर दृष्टि डालनी पड़ेगी जिसमें वह वायु भरी है। इसी प्रकार जलाशयों में-समुद्र सरिताओं में असीम जल भरा पड़ा है, पर किसी व्यक्ति के अधिकार में कितना जल है इसका अनुमान उसके बर्तन या क्षेत्र को देखकर लगाना पड़ेगा। अग्नि का तेजस् सर्वत्र विद्यमान है पर उसकी प्रचण्डता का अनुमान इस बात पर निर्भर है कि उसे कितनी मात्रा में किस स्तर का ईंधन मिला।
परमात्मा चेतन सत्ता का एक ब्रह्मांड व्यापी विस्तार है, पर वह आत्माओं में उतना ही अवतरित होता है जितनी कि उसकी क्षमता है। किसी के पास वह बहुत स्वल्प होता है किसी के पास अति प्रचुर। इसका कारण उसकी धारण क्षमता पर निर्भर है। जिस कोठे में ठसा-ठस काठ-कबाड़ भरा हुआ है। उसमें किसी भले मानुष को ठहराने की व्यवस्था नहीं की जा सकती है। कीचड़ भरी नाली में स्वच्छ जल का प्रवाह किस प्रकार बहाया जायेगा। परमात्मा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसका किसी से राग द्वेष नहीं, न उसे किसी की मनुहार की जरूरत है और न भेंट उपहार की आवश्यकता। उसे केवल एक बात देखनी होती है कि धारण करने की किसमें कितनी क्षमता है। हाथी जितना वजन लादकर चल सकता है उतना गधा नहीं। दुर्व्यसनी भिखारी को उपेक्षापूर्वक कुछ देकर भगा दिया जाता है किन्तु संबंधियों में जमाता अथवा लोक सेवी प्रामाणिक व्यक्तियों को सामर्थ्य भरा अधिकाधिक देने का प्रयत्न सम्मान पूर्वक किया जाता है।
भगवान भी इन्हीं नीति नियमों का पालन करते हैं और अपनी अनन्त सामर्थ्य में से अपनी सन्तानों में से प्रत्येक को उतना ही हस्तान्तरित करता है जितनी कि उसकी योग्यता है। छोटे-बच्चे को चाकलेट खरीदने के लिए दस पैसे भर मिलते हैं, पर वही जब बड़ा हो जाता है तो उसकी योग्यता और व्यवसाय की उपयुक्तता देख कर कोई बड़ी योजना कार्यान्वित करने के लिए संचित पूँजी का बड़े से बड़ा अंश पिता उस युवक को हस्तान्तरित कर देता है। छोटा बच्चा एक रुपया माँगता है तो उसके सदुपयोग पर अविश्वास करते हुए अभिभावक स्पष्ट इनकार कर देते हैं। किन्तु बड़े होने पर उसे इंजीनियरिंग कालेज की पढ़ाई पर पाँच सो रुपया मासिक भी प्रसन्नतापूर्वक देते हैं। भगवान भी यही करते हैं।
परमात्मा की सामर्थ्य का इतना विस्तार है कि उसकी एक-एक कलाकृति देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है बीज में से पेड़ खड़ा कर देना एक आश्चर्य है। आसमान में चाँद सितारे जिस पर अधर में लटक रहे हैं। सूरज जिस प्रकार असीम ऊर्जा वितरित करता है। जलाशयों के प्राणी किस प्रकार उस कैद खाने में प्रसन्न रहते और कल्लोल करते हैं वह देखते ही बनता है। आकाश में उड़ता पक्षी और बिना इन्द्रियों वाले केंचुए किस प्रकार अपनी निर्वाह सुविधाएँ उपलब्ध कर लेते हैं यह कुछ कम आश्चर्य की बात नहीं है। आसमान से बरसने वाला मूसलाधार पानी किसी विचारशील को प्रपंचों में डाल देने और सर्व सत्ता मान की गरिमा का अनुमान लगाने में कुछ कठिनाई नहीं होती।
मनुष्य को अन्य प्राणियों की तरह पेट की भूख और जननेन्द्रिय की खुजली मिटाने भर के लिए सामान्य बुद्धि और शरीर संरचना प्रदान की है। यह बच्चों को झुनझुने या पतंग, गुब्बारे बाँटने की तरह है। यह प्राणि की न्यूनतम और अनिवार्य आवश्यकता है। इन कारणों में उसे शरीरगत तृप्ति जुटाने का अवसर मिलता है और वह अपने शरीर तथा मन को काम-धन्धे में जुटाये रहता है। यदि भूख और कामेच्छा न होती तो प्राणी ऐसे ही निठल्ले पड़े रहते और उनकी सक्रियता एवं बुद्धिमत्ता तक जीवित न रह सकती। जीवधारी को हलचल भरा जीवनयापन करने के लिए यह दो तकाजे, गले से इस प्रकार बाँध दिये जाते हैं जिससे वह निठल्ला होकर अपनी सत्ता को पिछड़ेपन के गर्त में न धकेल दे।
किन्तु ऐसा नहीं समझना चाहिए कि भगवान के भण्डार में या उसके भाग्य में इतना ही सीमित है। जो मिला है उससे असंख्य गुना पाने की इसमें अभी और भी गुंजाइश है। पाने वाला चाहता भी है और देने वाला भी कंजूस नहीं है। इतने पर भी देखा जाता है कि चाहने वाले को मन-मसोस कर रहना पड़ता है और देने वाला भी अपने दुर्भाग्य को कोसता है कि वह ऐसे सत्पात्र नहीं पा सका, जिसे अपनी विभूतियाँ अधिकाधिक मात्रा में देकर अपने मन का भारीपन दूर करता और पाने वाला भी निहाल होकर रहता।
आत्मा परमात्मा का सजातीय और वंशज है। उसे बहुत कुछ प्राप्त करने का हक है। किन्तु देखा जाता है कि लोग क्षुद्र स्तर का-नर पशुओं जैसा ही जीवन व्यतीत करते हैं। न उन्हें स्वयं सन्तोष गर्व गौरव प्राप्त करने का अवसर मिलता और न दूसरों के लिए ही कोई प्रेरणाप्रद मार्ग छोड़कर जाते हैं।
घर में मकड़ी, छिपकली, मक्खी, मच्छर जैसे प्राणी भी रहते हैं। जिन्दगी भी काट लेते हैं, पर उनकी ओर कोई दृष्टि उठाकर भी नहीं देखता और न उनकी उपस्थिति से कोई लाभ या यश देखता है। परिवार के बीच रहकर कितने ही मनुष्य इसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। जो महत्वाकाँक्षाएँ आत्मा को श्रेय, संतोष और यश गौरव चाहती हैं, वे एक प्रकार से अर्ध मृत, अर्ध मूर्च्छित स्थिति में ही पड़ी रहती हैं। उन्हें जगाने की भीतर से उमंग उठे तो योग्यताएँ भी उभरे। परिस्थितियाँ भी बनें। साधन भी जुटें और ऐसा अवसर मिले कि मनुष्य अपनी और दूसरों की दृष्टि में महत्वपूर्ण गिना जा सके।
इस दिशा में यदि किसी का मन चले तो समझना चाहिए कि उसकी मानवी गरिमा भ्रूण की स्थिति में न रहकर नवजात शिशु की तरह स्वयं नवजीवन पाने और सम्बन्धियों को नये उत्तरदायित्व संभालने में सफल रही। प्रगति मार्ग की ओर यात्रा चल पड़ी। इसके लिए प्रथम लक्ष्य यही हो सकता है कि अपने व्यक्तित्व को मानवी गरिमा के ढाँचे में ढाला जाय। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अपने को परिष्कृत जनों की पंक्ति में बैठ सकने योग्य बनाया जाय। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा बनाया जाय कि जो संपर्क में आये प्रभावित हुए बिना न रहे और अपनी तुलना में अधिक विकसित सद्गुणी अनुभव करते हुए सम्मान ही नहीं सहयोग भी प्रदान करे।
दूसरा चरण प्रगति के लक्ष्य पर चलने का यह है कि अपना व्यवसाय, कार्यक्रम, इस प्रकार का बनाया जाय जिससे अपने निर्वाह और लोकमंगल की सन्तुलित व्यवस्था बनी रहे। तृष्णाएँ बहुधा ऐसा वैभव माँगती हैं जिसके ओछे लोगों पर उसके दुस्साहस की छाप पड़ सके। ईमानदार और उदार आदमी का सम्पन्न बन सकता। असंभव है। लोगों पर अपनी आदर्शवादिता का स्थायी प्रभाव छोड़ने की अपेक्षा यह सरल पड़ेगा कि अपराधियों जैसा षडयंत्र बनाकर लोगों ठगा या आतंकित किया जाय। आमतौर से महत्वाकाँक्षी लोग यही करते और अपने को अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान और सफल अनुभव करते हैं। पर जिन्हें उच्चस्तरीय प्रगति की आकाँक्षा है, उन्हें संसार के परमार्थ परायण लोगों की जीवन गाथाएँ पढ़नी चाहिए और देखना चाहिए कि भीतर उपजी महानता उन्हें किस प्रकार ऊंचा उठा सकी। कहाँ से कितने साधन जुटा सकी। कितनों का भावभरा शानदार सहयोग उपलब्ध करा सकी।
आज का वातावरण क्षुद्र लोगों और क्षुद्र गतिविधियों से भरा हुआ है। उदाहरण समझने और अनुकरण कर बैठने की क्षुद्रता से हमें अपने को बचाना चाहिए और वर्तमान काल के तथा भूतकाल के महामानवों की विचारणा और लोकहित के लिए अपनाये गये क्रिया-कलापों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। आदर्शों पर, आदर्शवादियों पर अपनी श्रद्धा केन्द्रीभूत करना, उनके पद चिन्हों पर सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनी कार्य शैली निर्धारित करना। उस निर्धारण पर सुदृढ़ रहना, ऐसा बड़ा काम है जो किसी के भी जीवन को धन्य बना सकता है। भले ही वह थोड़े ही अवधि के लिए जिया गया हो। शंकराचार्य, विवेकानन्द, रामतीर्थ आदि भरी जवानी में ही उठ गये थे, पर वे ऐसा शानदार जीवन जिए जिस पर हजारों शतायुष्यों को निछावर किया जा सकता है।
बाल-बुद्धि की एक और माँग है कि वे अपने में कोई ऐसी विलक्षणता प्रकट कर सकें जिसे सिद्धियाँ चमत्कार कहा जाता है। यह प्रलोभन भूतकाल में भी था और अब भी पाया जाता है। योगी, तपस्वी, सिद्ध पुरुष अपनी विलक्षणताओं को दिखाकर सर्वसाधारण को प्रभावित करते थे। यहाँ तक कि वाम मार्ग- तन्त्र मार्ग की अवांछनीय प्रक्रिया का अवलम्बन करके हेय जीवन जीते और स्वार्थी लोगों की उचित अनुचित सहायता करते थे। जो इन प्रयोजनों के लिए कष्ट साध्य साधनाएँ नहीं कर सकते थे उनने इस प्रयोजन को जादूगरी या इन्द्रजाल से लोगों को हिप्नोटिज्म स्तर के प्रयोगों द्वारा अपने की विलक्षणता सिद्ध करने का प्रयास किया। अब भी वह शैली फल-फूल रही है और भोले भावुकों को भूत-प्रेत देवी-देवताओं के नाम पर भ्रम-जंजाल में फंसाया और उनके समय तथा धन को बर्बाद कराया जा रहा है।
यह बाल-बुद्धि किसी भी शालीनता समर्थक विज्ञजन को शोभा नहीं देती। सामान्य लोगों के बीच-सामान्य लोगों की तरह जीवनयापन करते हुए ऐसी छाप छोड़ना बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसमें उच्चस्तरीय यथार्थता हो और किसी छल-कपट का रहस्यवाद का आश्रय न लेना पड़ा।
चर्चा यदि सिद्धियों की ही चल पड़ी और व्यक्ति को अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं के प्रश्न पर विचार करना पड़े तो भी हमें यही मानकर चलना होगा कि वे विभूतियाँ श्रेष्ठ विभूतियाँ, श्रेष्ठ सज्जनों में-ऋषि मुनियों में अनायास ही उत्पन्न हो जाती हैं। संसार में कहाँ क्या हो रहा है? कब क्या होने जा रहा है? यह जानने के लिए किसी अतिरिक्त कला-कौशल को अपनाने की आवश्यकता नहीं है। यह कार्य स्वच्छ दर्पण पर प्रतिबिंब सही रूप में दिखने की तरह है। बढ़िया कैमरे में वस्तु स्थिति का चित्र खींचने की तरह टेलिस्कोप से दूर-दूर तक का देखने की तरह माइसकोप से अदृश्य कीटाणुओं को देख सकने की तरह-श्रेष्ठ जीवन में ऐसी विशेषताएँ स्वयमेव उत्पन्न हो जाती हैं।
इन दिनों परामनोविज्ञानी इस प्रकार की विलक्षणताओं को-अतीन्द्रिय क्षमता कह रहे हैं। दूर-दर्शन, दूर-श्रवण भविष्य कथन, विचार संचालन आदि को मानसिक क्षेत्र की सिद्धियाँ मान रहे हैं और उसके लिए क्या करना चाहिए। क्या किया गया था, इसका पता लगाना चाहते हैं किन्तु समझा जाना चाहिए कि जिन लोगों में अनायास ही ऐसी विशिष्टताएँ प्रकट होती हैं, उनमें पूर्वजन्मों की मानसिक स्वच्छता काम कर रही होती है। इस समय भी ऐसे अभ्यास किये जा सकते हैं जिनके द्वारा ऐसी विलक्षणताएं प्रकट की जा सकें। पर देखा जाता है कि जो अपने में ऐसी विशेषताएं प्रदर्शित करते हैं वे लोगों को अचम्भे में डालने और अपनी विलक्षणता सिद्ध करने तक ही सीमित रहते हैं। उन उपलब्धियों का उपयोग किसी ऐसे महान प्रयोजन के लिए नहीं होता जिससे व्यक्तित्वों को समुन्नत और विपन्नताओं का अनुकूलन किया जा सके। ऐसी दशा में वे अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी चर्चा का विषय बनकर रह जाती हैं। अधिक से अधिक यह साबित कर सकती हैं कि मानवी सत्ता में कितने अनोखे रहस्य छिपे पड़े हैं। उनको हस्तगत करे अबकी अपेक्षा कितनी सुविधाएँ प्राप्त की जा सकती है।
यहाँ यह समझा जाना ही चाहिए कि ख्याति के लिए स्वार्थ साधन के लिए-अन्यों को नीचा दिखाने के लिए यदि इन शक्तियों का उपयोग किया जाय तो वे अधिक दिन तक ठहरती भी नहीं और उस जादूगर के लिए अन्ततः पश्चाताप ही छोड़ जीत हैं।
इन सिद्धियों को देखकर इतना समझना ही पर्याप्त होगा कि मनुष्य उतना ही सीमित नहीं है जितना कि दृष्टिगोचर होता है। उसमें ईश्वर का अंश होने के नाते लगभग उतनी ही क्षमताएँ एवं विलक्षणताएँ भरी पड़ी हैं, जितना कि आत्मा के उद्गम केन्द्र परमात्मा में है। वे इतनी अधिक है कि विज्ञात ऋद्धि-सिद्धियां तो सहज ही उससे मिलने के कारण हस्तगत हो ही जाती हैं वरन् ऐसी विभूतियाँ भी हस्तगत हो जाती हैं जो अभी चर्चा का विषय नहीं बन पाई हैं।
सिद्धियों में उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और परमार्थ परायण व्यवहार की तीन विभूतियाँ सर्वोपरि हैं। इनको प्राप्य करने के लिए निरन्तर जीवन को अभ्यस्त करना अपने आप में एक सर्वसुलभ ओर अत्यन्त उच्चतर का योगाभ्यास है। इसे कर गुजरने वाले अपने समीपवर्ती वातावरण को स्वर्ग जैसा सुखद पाते हैं। अनाचार की पशु प्रवृत्तियाँ छूटते ही वे भव-बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। वे सिद्धियाँ जिन्हें विलक्षणताएँ कहते हैं, वे पवित्र आत्माओं के इर्द-गिर्द अनायास ही घूमती और उपेक्षित होती रहती हैं।
मैं धुंधले तौर पर यह अनुभव करता हूँ कि जब मेरे चारों ओर सब कुछ बदल रहा है, मर रहा है, तब भी इन सब परिवर्तनों के नीचे एक जीवित शक्ति है जो कभी नहीं बदलती, जो सबको एक में ग्रथित करके रखती है, उसका संहार करती है और फिर नये सिरे से पैदा करती है, यही शक्ति ईश्वर है, परमात्मा है। मैं मानता हूँ कि ईश्वर जीवन है, सत्य है, प्रकाश है, प्रेम है, वह परम मंगल है।
-महात्मा गाँधी
एक अनपढ़ व्यक्ति दार्शनिक अरस्तु के पास पहुँचा और ब्रह्मज्ञान की दीक्षा माँगने लगा।
सिर से पैर तक दृष्टि डालने के बाद उन्होंने सिखावन दी। नित्य कपड़े धोना और बाल संवारना आरम्भ करो। गलतियाँ सुधारते चलने का सिलसिला ही साधना कहलाता है और परमात्मा तक पहुँचाता है।
मेज पर सजे गुलदस्तों में से एक तो लगे थे असली गुलाब, और दूसरे में थे नकली कागज के फूल। असली फलों ने आते ही दुःख प्रकट किया, तो नकली फूलों ने पूछा- भाई तुम इतने सुन्दर भवन में आ गये हो फिर भी इतने दुःखी हो इसका क्या कारण है।
असली गुलाब ने कहा मैं इसलिये दुःखी हूँ कि मुझे इस सुन्दर भवन में थोड़े ही दिन रहने का सौभाग्य मिला है। कल नहीं तो परसों मुझे यहाँ से कचरा समझकर हटा दिया जायेगा। प्रसन्न होने का अधिकार तो आपको है। क्योंकि आपको शायद ही यहाँ से हटना पड़े।
नहीं भाई नहीं-कागज के फूल ने कहा- ‘‘मेरा सारा जीवन तो कृत्रिमता को खपाने में लगा है। धन्य हैं आप जो दो घण्टे में इतना दे जाते हैं जितना हम पूरे जीवन में नहीं देते।”
असली फूल का चेहरा खिल उठा। उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ कि मैं जिसे सुखी समझ रहा था। उसका स्वयं का अन्तःकरण इतना विदग्ध है। निश्चय ही सत्य है कि सुख दुःख का कारण दृष्टिकोण है, बाह्य परिस्थितियाँ नहीं।
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‘फूल से पत्थर ने कहा- ‘‘जानता नहीं मेरी शक्ति। एक ही आघात में तेरा कचूमर निकाल दूँगा।”
मुस्कराते फूल ने कहा- ‘‘तब तो आप मेरा उपकार ही करेंगे मित्र, मेरी सुगन्ध दूर-दूर तक फैला देने का अहसान ही तो करेंगे मेरे ऊपर।”
नीति शास्त्रियों के अनुसार व्यक्तित्व के निर्माण में मनोनुकूलता (एप्टीट्यूड) का भी योगदान होता है। व्यक्तित्व के विकास एवं निर्धारण में सन्तुष्ट मन की असाधारण भूमिका होती है। सर्वविदित है कि श्रेष्ठ कलाकार, संगीतकार, साहित्यकार, वैज्ञानिक अपनी साधना में इतनी तत्परता व मनोयोग से निरत रहते हैं कि उन्हें बाह्य दुनिया की उतनी परख नहीं रहती जितनी कि अपनी आन्तरिक आकाँक्षा को पूर्ण करने की। तन्मय बने रहने से बाह्य व्यवधानों एवं आकर्षणों का प्रभाव भी उतना नहीं पड़ता। एक निश्चित दिशा में अपने चिन्तन एवं क्रिया-कलाप को लगाये रखने पर भटकाव की भी गुँजाइश नहीं रहती। मनोनुकूलता श्रेष्ठ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक सिद्ध होती है।
किसी कार्य विशेष में शीघ्रातिशीघ्र दक्ष हो जाना इस बात का परिचायक है कि उस विषय में उस व्यक्ति की मनोनुकूलता है। मनोनुकूलता और जन्मजात क्षमता में अन्तर है। तीव्र बुद्धि और मनोनुकूलता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह आवश्यक नहीं कि जिस व्यक्ति की बुद्धि तीव्र अधिक है वह कार्य में निपुणता एवं सफलता प्राप्त कर ही ले।
मनोनुकूलता और रुचि में भी अन्तर होता है। सम्भव है कोई व्यक्ति संगीत में रुचि रखता हो पर उसमें मनोनुकूलता न हो। वस्तुतः यह एक मानसिक प्रवृत्ति है जो किसी काम विशेष में व्यक्ति को पूरी तरह तत्पर रहने के लिए प्रेरित करती है और सफलता लक्ष्य तक पहुँचाकर रहती है।
जेम्स मैकेन्जी कहते हैं- ‘‘प्रगति के लिए जहाँ जानकारी, परिस्थिति, प्रतिभा, सुविधा आदि की आवश्यकता है, वहाँ मनोनुकूलता की और भी अधिक है। इच्छा करते रहने या मान्यता बना लेने मात्र से काम नहीं चलता वरन् मन को अभीष्ट लक्ष्य में समुचित रस लेने लगने के लिए भी प्रशिक्षित अभ्यस्त किया जाना चाहिए। यही है वह मनोनुकूलता जो समग्र तत्परता के साथ अभीष्ट प्रयोजन में जुटाने और सफल बनाने में प्रमुख भूमिका निभाती है।’’
जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं शिक्षाविद् हरबार्ट महोदय ने चारित्रिक विकास के लिए ‘श्रेष्ठ नैतिक विचारों’ को बहुत महत्वपूर्ण बताया है वे सद्विचारों के निरन्तर संपर्क में रहने और स्वाध्याय के साधन जुटाने पर बल देते हुए कहते हैं कि ‘‘जब सद्विचारों के फलस्वरूप उनमें रस आने लगता है जो आचरण में आने पर चरित्र का निर्माण करते हैं। उनका कहना है कि मनुष्य के आचरण और चरित्र के विकास के लिए उसका उत्कृष्ट एवं भले विचारों के संपर्क में रहना आवश्यक है। व्यक्ति के भले बुरे कार्यों का हेतु उसके श्रेष्ठ-निकृष्ट विचार ही होते हैं। सद्विचारों से व्यक्ति की पाशविक वासनाएँ विवेकपूर्ण भावनाओं इच्छाओं में बदलती चली जाती हैं और व्यक्ति देवोपम बन जाता है।”
“मानवी मस्तिष्क कोरे कागज के समान है, उस पर कुछ भी लिखा जा सकता है। भीतर से तो प्रेरणाएँ भर उठती हैं। उन्हें दिशा देने तथा व्यवहार में उतारने का ताना-बाना विचार तन्त्र द्वारा ही बुना जाता है। इसकी व्यवस्था न की जाय तो व्यक्ति भटकता ही रहेगा और यह न समझ सकेगा कि आज की परिस्थितियों में सत्प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने के लिए उसे क्या और कैसे करना चाहिए।”
विचार विस्तार इन दिनों एक कंटकाकीर्ण जंगल की तरह उग पड़ा है। अनैतिक और अवाँछनीय विचारों की बाढ़ तूफानी गति से आई है। साहित्य, चित्रकला के क्षेत्र में तो हानिकारक उत्पादन हुआ ही है। प्रचलन में भी ऐसे ही विचार व्यवहृत होते देखे जाते हैं जिन्हें अनैतिकता कुरुचि का सड़ी-गली संरचना कहा जा सके। समय का प्रवाह नीति-निष्ठा के पक्ष में नहीं है। जो हवाएं बह रही हैं, वे नमी को सुखाने वाली और छत-छप्परों को उड़ा ले जाने वाली ही सिद्ध हो रही हैं। ऐसे समय में मानवी गरिमा को बना सकने में एक ही उपाय कारगर हो सकता है कि आदर्शवादिता के पक्षधर विचारों का न केवल उत्पादन किया जाय वरन् उन्हें जन-जन के मन-मन तक पहुँचाने का व्यापक एवं समर्थ प्रयास क्रम भी अपनाया जाय।
जीवन तो भगवान का दिया हुआ है पर उसे दिशा देने और किसी परिणाम पर पहुँचने की पूरी-पूरी जिम्मेदारी चिन्तन चेतना की है। उसी के अनुरूप व्यक्ति बनते, बढ़ते और बदलते हैं। पेट की भूख बुझाने में जो स्थान आहार का है वही मानसिक एवं भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति में विचार संपदा का। अभक्ष्य खाने पर रुग्णता एवं अकाल मृत्यु का संकट सामने आ खड़ा होता है। अचिन्त्य चिन्तन को उत्साहित करने वाले कुविचार भी प्रायः ऐसा ही संकट उत्पन्न करते और पतन पराभव के गर्त्त में धकेलते देखे जाते हैं।
कलिजुंग ने उच्च लक्ष्य की ओर चलने वालों को अपना गन्तव्य सुनिश्चित कर लेने पर बहुत जोर दिया है। उनका कथन है-
“अधिकाँश व्यक्तियों का कोई लक्ष्य नहीं होता। वे हवा के रुख में उड़ने वाले तिनके पत्तों की तरह कभी इधर कभी उधर भटकते देखे जाते हैं। अनेकानेक आकर्षण-अनेकानेक परामर्श-सामने आते रहते हैं इनमें से किन्हें अपनाया जाय? किन्हें छोड़ा जाय इसका निर्भीक निर्धारण न होने से कभी एक ओर बढ़ना कभी मुड़ना, उलटकर चलने लगने जैसी विक्षिप्त विचित्रता कार्यान्वित होती रहती है। ऐसे लोग बढ़ तो किसी भी दिशा में नहीं पाते। भटकावजन्य थकान और खाली हाथ रहने की निराशा मन को खिन्न उद्विग्न किये रहती है।”
“विडम्बना के कुचक्र में उलझे रहने की अपेक्षा यह उत्तम है कि जीवन का लक्ष्य निश्चित किया जाय और फिर उसकी पूर्ति के लिए अपनी योग्यता के अनुरूप छोटे शुभारम्भ से प्रयास आरम्भ कर दिया जाय।’’
“एक रास्ते पर चलने वाले ही व्यवहार क्षेत्र की प्रगति में सफलता पाते हैं। विद्वान, पहलवान, कलाकार स्तर की कहने योग्य सफलतायें उन्हीं को मिली है जिनने एक लक्ष्य स्थिर किया और बिना मन डुलाये निर्धारित मार्ग पर चलता रहा उसे हर काम में अभीष्ट सफलता मिली है। छोटे आकार वाली चींटी भी लक्ष्य के प्रति उत्साह और प्रयास में मनोयोग संजोये रहने पर ऊंचे पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है।”
“लक्ष्य के अनुरूप चिन्तन, चिन्तन के अनुरूप पुरुषार्थ, पुरुषार्थ के अनुरूप सहयोग एवं साधनों का एकत्रीकरण-तदुपरान्त सफलता का श्रेय। इसी प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए सामान्य स्तर के लोग, आश्चर्यजनक सफलतायें प्राप्त करते रहे हैं।”
“व्यक्तित्व की श्रेष्ठता परक प्रगति को महत्व देने वाले आधी अधूरी कल्पना नहीं करते रहते वरन् लक्ष्य तक पहुँचने का संकल्प करते हैं और उस पर व्रतशील होकर जुट जाते हैं। जिनने अपने में इतनी साहसिकता जगा ली उनकी सफलता की आधी मंजिल पूरी हो गई। अवरोधों और अभावों से जूझना, परिश्रम और मनोयोग को अधिकाधिक प्रखर करना यों प्रत्यक्षतः सफलता के निमित्त कारण समझे जाते हैं किन्तु इससे भी बड़ी बात है कि लक्ष्य निर्धारण। आदर्शवादी प्रगति के लिये तो इस प्रकार की व्रतशीलता नितान्त आवश्यक है। इस प्रकार का निश्चय यदि जीवन के आरम्भिक दिनों में किया जा सके तो प्रगति के लिये पर्याप्त अवसर मिल जाता है। वैसे इस प्रकार के निर्धारण जब भी किये जा सकें तभी सराहनीय श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न करने आरम्भ कर देंगे।”
लार्क एल हाल ने अपने ग्रन्थ ‘प्रिंसिपल्स ऑफ विहेवियर’ में नीति निष्ठा की गरिमा बताते हुए लिखा है- ‘‘आचरण की सर्वोत्तम अवस्था वह मानी गई जिसमें मनुष्य विवेकपूर्ण कार्यों को ही करता है। विवेक उसका मार्गदर्शक होता है। नैतिक दृष्टि से विकसित आचरण वाला व्यक्ति औचित्य, अनौचित्य का निर्णय अपने स्वतन्त्र विचार से करता है। उसको समाज के अनेक विरोधी रीति-रिवाजों और नियमों में से सर्वोत्तम का तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार चुनाव करना होता है। उच्चस्तर का आचरण उन्हीं का माना जाता है जिनमें स्वतंत्र विचार करने की क्षमता एवं तद्नुरूप कार्य करने की योग्यता होती है। नैतिक सिद्धान्तों के अनुसार आचरण करना सर्वश्रेष्ठ साहस माना गया है। संसार के महामानव अपने स्वतन्त्र चिन्तन, नीति निर्णय एवं आदर्शवादी कार्य पद्धति के बल पर ही आगे बढ़े हैं।
“सदाचार समर्थक विचारों को पढ़ना उस प्रकार के उपदेशों को रुचिपूर्वक सुनना एक सराहनीय अभिरुचि है। पर इतने भर के काम कुछ नहीं बनता। आदर्शों को अपनाने, उन्हें व्यवहार में उतारने के लिए एक विशेष प्रकार के साहस की आवश्यकता पड़ती है जो भौतिक क्षेत्र के साहसियों से भिन्न प्रकार का होता है। कठिन कामों में धैर्य, साहस, उत्साह, दिखाने वाले और अवरोधों की चिन्ता किये बिना हाथ में लिये काम को पूरा करने में निरत व्यक्ति साहसी कहलाते हैं। यह लौकिक प्रयोजनों को पूरा करने वाली शूरवीर स्तर की साहसिक हुई। अपनी त्रुटियों को समझना-समझने के उपरान्त उनसे लड़ पड़ना-संपर्क क्षेत्र में छाये हुए अनुपयुक्त वातावरण के दबाव को अस्वीकार करना-साथ ही जो आदर्श युक्त हैं उसे अपनाते समय सामने आने वाली आन्तरिक आनाकानी और स्वभाव अभ्यास की मनमानी को उलटकर रख देना-ऐसा साहस है जिसकी परिणति महामानवों को उपलब्ध होने वाली गरिमा सफलता बनकर सामने आती है।’’
सी. स्पीयर मैन की ‘इन डिवीजुअल विहेवियर’ के एक अध्याय का सार संक्षेप इस प्रकार है-
“असावधानी बाहर से छोटी सी भूल भर मानी जाती है पर वस्तुतः उसके द्वारा उत्पन्न हुई हानियाँ किसी बाहरी आक्रमण से कम नहीं होती। अन्तर इतना ही है कि कुल्हाड़ी से लकड़ी को तत्काल काट दिया जाता है और वह कृत्य प्रत्यक्ष दिखता है। इसके विपरीत घुन इसी कार्य को गुपचुप करता और अपेक्षाकृत देरी लगा लेता है। असावधानी के कारण होने वाली हानियों का लेखा-जोखा तैयार किया जायेगा कि घाटा देने वाली समस्त मदें उतने संकट उत्पन्न नहीं करतीं जितनी अकेली असावधानी करती रहती है। अच्छे खासे लाभदायक धन्धे करने वालों में से कितने ही लोग इसी एक बुद्धि के कारण दिवालिये बनते देखे गये हैं।”
‘‘असावधानी जीवन के हर क्षेत्र में अप्रत्याशित संकट उत्पन्न करती और अपने यजमान को पग-पग पर नीचा दिखाती, धूलि चटाती रहती है। जीवन विकास के क्षेत्र में इसका प्रभाव और भी अधिक होता है। अपने दोष दुर्गुणों के प्रति उनके कारण होने वाले हानियों के प्रति उपेक्षा बरतने वाले लोग अन्ततः ऐसे संकट में जा फँसते हैं जिससे निकलने की न सूरत बचती है और न हिम्मत रहती है। नशेबाजी की तरह ही असावधानी भी एक प्रकार की धीमी आत्म-हत्या है जिससे विनाश क्रम रहता तो धीमा है पर होता है निश्चित रूप से।’’
“प्रगति के लिए किन सद्गुणों को अपनाना आवश्यक है? अवगति से निकलने के लिए किन दुर्गुणों को हटाना अनिवार्य है? इसे न देखा सोचा जाय। जैसा कुछ भी ढर्रा चल रहा है वैसा ही चलने दिया जाय तो प्रगति की आशा रखना तो दूर- वर्तमान दुर्गति से उबरना भी सम्भव न हो सकेगा।”
“जागरूकता उस सत्प्रवृत्ति का नाम है जो प्रगतिशीलों से प्रेरणा लेकर-विकास पथ पर चलने की उमंग उत्पन्न करती है। उसके लिए आत्म विश्वास-साहस और पुरुषार्थ जगाती है। इतना ही नहीं उत्कर्ष पथ पर चलने में स्वभावतः आते रहने वाले अवरोधों से जूझने का शूरवीरों जैसे अविचल धैर्य और संतुलन भी प्रदान करती है। जागरूक भूत से सीखते हैं-भविष्य की सोचते हैं और तद्नुरूप जो आवश्यक है उसे करने के लिए न केवल दूरगामी निर्धारण करते हैं वरन् बिना समय गँवाये उन निर्धारणों को क्रियान्वित करने में जुट भी पड़ते हैं।’’
नैतिक विकास हेतु जागरूकता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यह जागरूकता इस स्तर की होनी चाहिए जिसे न तो अवाँछनीयता सहन हो और न सुधार के लिए पराक्रम बरतने में विलंब करने वाली आना-कानी।
जो कूड़े को खाद बना सके, उसे सच्चा कलाकार समझो।
चेतना तीन गतियों में गतिशील रहती है। प्रथम ऊर्ध्वगमन प्रगतिशील- उत्कर्ष। दूसरी जड़ता-यथा स्थिति। तीसरी- अधोगामी, पतित। इन्हीं स्थितियों को स्वर्गलोक-मृत्यु लोक और नरक लोक कहते हैं। जिनके मन में कोई महत्वाकाँक्षा नहीं उठती। खाने सोने की पशु प्रवृत्ति अपनाये रहते हैं। ज्यों-त्यों करके जिन्दगी पूरी करते रहते हैं। वे पशुवत् जीते हैं। उन्हें नर पशु भी कह सकते हैं। परिस्थितियों के झकोरे उन्हें टूटे पत्तों की तरह जहाँ-तहाँ उड़ाते रहते हैं।
जिन्हें प्रगतिशीलता की महत्वाकांक्षा है वे ऊपर उठते और आगे बढ़ते हैं। जड़ता की स्थिति में न उन्हें चैन मिलता है न सन्तोष। मनुष्य से ऊँची स्थिति महामानव की है। ऋषि, देवात्मा, सिद्ध पुरुष, जीवन मुक्ति इसी प्रगतिशीलता के स्तर हैं। यह श्रेय किसी को अनायास ही नहीं मिलता। इसके लिए उच्चस्तरीय पुरुषार्थ करना पड़ता है। आत्म-शोधन और आत्म-विकास के लिए इन्हीं दो प्रयासों को अपनाना और लक्ष्य पूर्ति तक निरन्तर जारी रखना पड़ता है। तीसरी गति अधःपतन की है। प्रयास तो इसमें भी करना पड़ता है पर वह प्रवाह में बहने जैसा नितान्त सरल होता है। समाज में चारों ओर पतनोन्मुखी प्रवृत्तियाँ संव्याप्त हैं। लोग स्वभाव में दुष्प्रवृत्तियां भरते और बढ़ाते रहते हैं। क्रियाएँ ऐसी होती हैं जिनमें वासना, तृष्णा और अहन्ता की पूर्ति के लिए छूट रहे। कर्तव्य और औचित्य का विचार न करना पड़े। अनीति अपनाने वाले और अपराधी आचरण करने वाले अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में कम समय में लाभ अर्जित कर लेते हैं पीछे क्या परिणाम भुगतना पड़ेगा यह देखने समझने की विवेक बुद्धि नहीं के बराबर होती है। यों ज्ञान चर्चा में कर्मफल की बात उनने पढ़ी-सुनी ही नहीं अनेक बार कही भी होती है। किन्तु उस पर विश्वास नहीं के बराबर होता है। कारण कि सत्कर्मों का-आदर्शवादी गति विधियों का-प्रचलन न होने से अनुकरण प्रिय प्रवृत्ति उसे एकाकी अपनाने में झिझकती है। फिर ऐसे उदाहरण भी सामने कम ही होते हैं जिनमें सन्मार्ग पर चलने वालों ने हाथों हाथ वैसी सफलता पाई हो जैसा कि दुष्ट दुराचारी छल प्रपंच की अपराधी दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाकर हाथों हाथ अर्जित कर लेते हैं। यों उनके दुष्परिणाम भी होते तो निश्चित रूप से हैं पर सभी भले-बुरे कर्मों का प्रतिफल समयसाध्य होता है। इतनी देर में हुई परिणति की प्रतीक्षा कौन करे? स्मरण कौन रखे?
लोक प्रचलन अनीति की दिशा में है। वह पतन के गर्त्त में जा गिरते हैं। बर्फ पिघलने पर हिमालय का स्वच्छ जल नदी के प्रवाह में गिरकर अधोगामी बनता है और अन्त में नीचे गिरते-गिरते समुद्र के खारी जल वाले खड्ड में जा गिरता है अधः पतन का यही क्रम है। धार्मिक भाषा में इसी को नरक कहते हैं।
पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति सहज ही हर वस्तु को ऊपर से नीचे खींचती है। पानी ढलान की ओर बहता है और क्रमशः नीचे की ओर गिरता जाता है। यह सरल है। इस सरल मार्ग को अपनाकर अनेकानेक प्राणी पतन के गर्त में गिरते हैं। उनकी देखा-देखी मनुष्यों की अनुकरण प्रिय प्रवृत्ति अन्धी भेड़ों की तरह एक के पीछे एक चलती और गर्त में गिरती जाती हैं। प्रचलन बड़ा प्रभावी होता है। वह परम्परागत उचित और सौभाग्य प्रतीत होता है। भले ही वह कितना ही कष्ट कर या असुविधाजनक क्यों न हो? नर पशुओं द्वारा अपनाई गई जीवनचर्या का यही स्वरूप है। उसका अनुगमन करने में कष्ट और झंझट भी सुहाते और अपनाने योग्य प्रतीत होते हैं।
नर-नारी बिना सन्तानोत्पादन किये एक दूसरे के लिए असंख्य गुने उपयोगी हो सकते हैं और समाज के लिए अति महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं। प्रसव की मरण तुल्य व्यथा और सर्वथा अपरिचित प्राणी को घर बुलाकर उसके लिए सामर्थ्य से अधिक श्रम और धन लगाते हैं। विवेक की कसौटी पर बिना प्रचलन का विवाह एक प्रकार के सुख सौभाग्य जैसा है किन्तु लोगों की उलट बुद्धि को देखा जाय कि सन्तान न होने पर दुख मनाते हैं और उस हर दृष्टि के कष्ट कारक उपलब्धि के प्राप्त होने पर फूले नहीं समाते हैं। इसी को कहते हैं लोक प्रचलन। सामाजिक कुरीतियाँ, अवाँछनीय मान्यताएँ, दुष्प्रवृत्तियाँ इस प्रकार चलती हैं। लोग नशा पीते और अपना शरीर, धन, सम्मान, कौशल एवं परिवार अस्त व्यस्त करते हैं। दुष्प्रवृत्तियों की छूत ऐसी ही है वह एक से दूसरे को लगती हैं और पतन पराभव का वातावरण बनाती रहती हैं। नरक इसी अधोगमन को कहते हैं।
धार्मिक भाषा में अलंकारिक रूप से स्वर्ग लोक को ऊपर बताया गया है। मर्त्य लोक वही है जिसमें हम सब बिना उठे गिरे पशुवत् पेट प्रचलन के कुचक्र में दिन गुजारते रहें। यह यथास्थिति ही मर्त्य लोक है। नरक लोक नीचे है। अर्थात् अधोगामी निकृष्टता अपनाने पर निर्भर है। वस्तुतः किसी ग्रह नक्षत्र पर यह लोक नहीं है। उनकी दूरी नहीं नापी जा सकती। यह जीवन की रीति-नीति और दिशा धाराएँ हैं। जिन्हें मनुष्य अपनाता तो स्वेच्छापूर्वक है पर कृत्यों का परिणाम भुगतने के लिए सृष्टि व्यवस्था के अंतर्गत बाधित रहता है।
ऊर्ध्व लोक से तात्पर्य यहाँ उत्कृष्टता से है। इसके हृदयंगम भाव सम्वेदना को-सहृदयता को अपनाना स्वभाव में उतारना और आचरण में समाविष्ट करना पड़ता है। हृदय में भगवान विराजते हैं। इसका तात्पर्य करुणा, उदारता, सद्भावना, शालीनता को कार्यान्वित करना है। इससे भी एकदम ऊर्ध्वलोक की दिशा में मस्तिष्क के अन्तराल में काम करने वाली प्रकाश ज्योति है। दूसरे शब्दों में इस दूरदर्शी विवेकशीलता-दिव्य दृष्टि कहते हैं। मस्तिष्क के मध्य भाग में ब्रह्म रन्ध्र को शेषशायी विष्णु का और कैलाशवासी शिव का अदृश्य स्थान माना गया है। विवेक को तृतीय नेत्र कहा गया है। इसी क्षेत्र में अतीन्द्रिय क्षमताओं का भण्डार भरा पड़ा है। आज्ञा चक्र को मस्तिष्क भांडागार की चाबी कहा गया है। इस महाकोष में से अभी मनुष्य को सात प्रतिशत का ही अनुभव अभ्यास है। यदि आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा इस क्षेत्र का जागरण, उन्नयन सम्भव हो सके तो सामान्य व्यक्ति का देव पुरुष होना सम्भव है।
दीपक जब ठीक तरह जलता है तब उसकी प्रकाश ज्योति ऊर्ध्वगामी होती और अपने प्रभाव क्षेत्र को ज्योतिर्मय बनाये रखती है। किंतु जब दीपक के पेंदे में छेद हो जाता है तो जिस स्थान पर वह रखा था उसे गन्दला कर देता है। कोई छुए तो उस चिकनाई को हाथ या कपड़े से छुड़ाना कठिन पड़ता है। इतना ही नहीं दीपक के जल सकने की क्षमता आधी चौथाई रह जाती है। जो बत्ती देर तक काम दे सकती है थी पर तेल नीचे रिस जाने पर एक बारंगी जल जाती है और उसकी लपट से पास रखी हुई वस्तुओं में अग्निकाण्ड का खतरा उत्पन्न हो जाता है। देखते-देखते प्रकाश क्षेत्र अन्धकार में डूब जाता है। यह दीपक के पेंदे में छेद हो जाने की दुष्परिणितियाँ हैं। हमारे मस्तिष्क में से प्रज्ञा का तिरोभाव हो जाने से दूरगामी विवेकशीलता घट जाने से ऐसी ही खेदजनक सम्भावनाएँ सामने आती हैं।
चेतना का ऊर्ध्वगमन शरीर के ऊर्ध्वलोक ऊर्ध्व भाग से सम्बन्धित है। इसके तीन कक्ष है। हृदय की सहृदयता, मस्तिष्क की विवेकशीलता यह दो आधार हुए तीसरा है- रसना। जिव्हा पर अंकुश रख रखकर स्वाद जनी जाता है। व्रत उपवास की साधना द्वारा मनोबल बढ़ाया जाता है और शरीरगत जीवनी शरीर शक्ति को आरोग्य एवं दीर्घ जीवन प्रदान करने वाली रखा जाता है। मनोनिग्रह की आधी साधना स्वाद जन से हो जाती है और मनोबल अभिवर्धन की आधी यात्रा पूरी हो जाती है। संकल्प और साहस के अभिवर्धन में उपरोक्त तीनों ही क्षेत्र में मिल-जुलकर काम करते हैं। यह ऊर्ध्व लोक की यात्रा है। इसे चेतना का ऊर्ध्वगमन कह सकते हैं।
अधोलोक- नरक यों व्यक्तित्व के साथ जुड़े हुए गुण, कर्म, स्वभाव से सम्बन्धित है। पर यदि काय विभाजन के अनुरूप वर्गीकरण किया जाय ता नाभि क्षेत्र को मर्त्य लोक कहा जायेगा। पेट और प्रजनन तक सीमाबद्ध रहना और पशु प्रवृत्ति का परिचायक है। जिनका कोई आदर्श उद्देश्य या लक्ष्य नहीं है। उन्हें प्रकृति प्रेरणा से दो कार्यों में निरत रहना पड़ता है। जन्म के साथ ही क्षुधा की प्रेरणा साथ आती है और जिस-जिस प्रकार पेट भरना पड़ता है। इसके उपरान्त किशोरावस्था आते-आते यौवन की सीढ़ी तक पहुँचते-पहुँचते यौनाचार की उमंगें उठती हैं और जोड़ी ढूंढ़ने तथा गर्भाधान का ताना-बाना बुनने की प्रक्रिया चल पड़ती है। समस्त प्राणियों को शरीरगत श्रम के लिए भूख का और दिमाग में मधुर कल्पनाओं का सरंजाम जुटाने के लिए काम-क्रीड़ा के लिए दिमाग पर जोर देना पड़ता है। समस्त जीवधारी विभिन्न प्रकार की गतिविधियां इन्हीं दो प्रयोजनों के निमित्त करते देखे जाते हैं। यह प्रकृति प्रेरणा है जो समस्त जीवित प्राणियों में पाई जाती है। इसी में नर पशु की जिन्दगी भी कट जाती है। इसलिए इसे प्राणि लोक या मनुष्य लोक कहा गया है।
अधो लोक में मल मूत्र के छिद्र आते हैं। अधिक खाने और मद्य माँस वाले इन दोनों को भी रुग्ण कर लेते हैं। पेचिश, अपच जैसे रोग घेर लेने पर मल त्याग की स्वाभाविक क्रिया में बाधा पड़ती है। बहुमूत्र, मधुमेह, सुजाक, पथरी जैसे मूत्र रोग भी एक प्रकार से अधोलोक हैं। इनके वेग न रुकने पर वस्त्र बिस्तर खराब होने और दुर्गन्ध से कुरुचि उत्पन्न का घिनौनापन देखा जाता है। यौनाचार भी इसी क्षेत्र की क्रिया है। उसका प्रभाव मस्तिष्क तक धावा बोलता है तो अगम्यागमन, व्यभिचार, बहुमैथुन, कामुक चिन्तन आदि के उद्देश्य सिर पर सवार रहते हैं और उसे मानसिक कामाचार के फलस्वरूप मनुष्य खोखला होता जाता है। मानसिक विशेषताएँ- विभूतियाँ एक-एक करके विदा होने लगती हैं और उच्च स्तरीय चिन्तन के अभाव में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षट् रिपु श्रृंखलाबद्ध अथवा व्यतिरेक क्रम से मनुष्य पर आरूढ़ होने लगते हैं। उनके आवेश उद्विग्नता की आग में जलाते रहे हैं और परिणाम चित्र-विचित्र स्तर की नारकीय यातनाएँ प्रस्तुत करते रहते हैं। अपने शरीर में भी तीनों लोक हैं। उसमें से क्या चयन करना है यह मनुष्य की अपनी इच्छा के ऊपर निर्भर है।
भगवान महावीर आत्म संयम की साधना में उन दिनों लीन थे। उन्हें उद्विग्न करने के लिए संगम नामक एक दुष्ट पीछे पड़ा हुआ था। आये दिन वह उन्हें क्षुब्ध करने के लिए कुछ न कुछ कुचक्र रचता रहता।
एक दिन उसने खौलता दूध उनके ऊपर उलट दिया। जो भी वे अविचल भाव से अपनी साधना में निरत रहे।
संगम पिघला। वह अपने कुकृत्यों पर आंसू बहाता क्षमा माँगता विदा होने लगा।
भगवान की आँखें भी नम हो गई। वे बोले- तात् इन कुकृत्यों का दुष्परिणाम तुम्हें कितना कष्टकारक होगा, यही सोचकर मुझे व्यथा हो रही है। दूध से जलने पर उठे हुए फफोले देखकर नहीं।
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बंगाल के न्यायाधीश नीलम वंद्योपाध्याय ने एक बीमा एजेण्ट के फुसलाने पर पाँच हजार का बीमा करा लिया। मधुमेह के बीमार होते हुये भी स्वास्थ्य विवरण में उस बात को छिपा दिया गया।
लम्बी बीमारी के बाद जब वंद्योपाध्याय महोदय का अन्तकाल निकट आया, तो उनने बीमा एजेण्ट को बुलाकर उसे बेईमानी का इकरार नामा लिखा और बीमे को रद्द करा दिया। बोले- ‘‘जीवन भर बुराइयों से बचता रहा, तो मरते समय यह पाप सिर पर लादकर क्यों मरूं।’’
पूर्व जन्मों के प्रारब्धवश इस जीवन में जो काम, संयोग और परिस्थितियाँ मनुष्य को उपलब्ध हों, उनमें सन्तोष रखते हुये आगे की उन्नति के लिये उद्योग करना धर्म है। शरीर जिस साधना में तत्पर हो उसी को पूरा करना मनुष्य का कर्तव्य है। अपनी परिस्थितियों से बहुत अधिक की कामना करना ही मनुष्य की दुःखद स्थिति का कारण है। अनियन्त्रित मनोरथ का त्याग करना ही अपने पूर्व-प्रारब्ध के लिए सन्तोष करने का अच्छा उपाय है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि आगे के लिए अधिक सुन्दर परिस्थितियाँ प्राप्त करने की चेष्टा न करें। श्रेय की इच्छा करने वाले मनुष्य को न तो निष्क्रिय रहना चाहिए और न ही विविध कामनायें करनी चाहिए।
सेना में सिपाही की योग्यता के अनुसार कमाण्डर उसे कोई एक काम सौंप देता है। योग्यता बढ़ा लेने पर कमाण्डर क्रमशः उसे उच्च पद देता चला जाता है किन्तु सिपाही की स्थिति में रहते हुये सेनानायक के पद की आकाँक्षा करने से न तो वह सिपाही के कर्तव्यों का भली-भाँति पालन कर सकेगा और न ही सेनानायक का पद ही मिल सकेगा। इससे दुःख तो मिलेगा ही दुष्परिणाम भी उपस्थित हो सकते हैं।
एक ही परिस्थिति में यदि दत्तचित्त से लगे रहें तो उसमें भी आशाजनक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। कभी इधर, कभी उधर की दौड़ भाग करना मनुष्य की अस्थिरता का चिन्ह है। जो तरह-तरह की कामनायें मन में करते रहते हैं उन्हें ही यह परेशानी भुगतनी पड़ती है। अधिक से अधिक धन, अधिक सुख-सुविधाओं की लिप्सा ही मनुष्य को कमजोर और दुखी बनाती है क्योंकि यदि उन्नति की उचित योग्यता, शक्ति और परिस्थितियाँ न हुई तो आकाँक्षाओं की कभी पूर्ति नहीं हो सकेगी। और उससे दुःखी, अधीर,चिन्तित और निराश ही बने रहेंगे।
दूसरों को अधिक सुखी और सम्पन्न देखकर ईर्ष्या करना और परमात्मा को दोषी ठहराना मनुष्य की बहुत बड़ी भूल है। ऐसा वह इसलिए करता है कि उसे केवल अपने अधिकार प्रिय हैं। पूर्व जीवन में उसने क्या किया है इसकी भी तो कुछ संगत होनी चाहिए। किसी को कम किसी को अधिक देने का अन्याय भला परमात्मा क्यों करेगा? मनुष्य अपने ही कर्मों का लाभ या घाटा उठाता है। एक रुपया देकर किसी को भला पाँच रुपये की कीमत की भी कोई वस्तु मिली है? योग्यता से अधिक दे देने की भूल भला परमात्मा क्यों करेगा? ऐसा यदि हो तो उसे लोग अन्यायी ही तो कहेंगे। यही क्या कुछ कम उपकार है जो उसने आपको मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर प्रदान किया है। आप चाहें तो अपने जीवन का मूल्य बढ़ा सकते हैं और कर्तव्य पालन तथा अन्य सद्गुणों द्वारा आगे के लिए शुभ परिस्थितियाँ, अच्छे परिणाम और मंगल संयोग प्राप्त कर सकते हैं।
काम बदलने की चिन्ता आप मत कीजिए। यह एक प्रकार की ‘कर्ण हिंसा’ है। इसी में पुरुषार्थ करते रहिये। भली परिस्थितियों के संयोग ईश्वरीय प्रेरणा से स्वतः प्राप्त हो जाते हैं उसके लिए कोई जोड़-तोड़ नहीं करनी पड़ती। आप क्रियाशील रहिये, उद्योग करते जाइये, उन्नति के अवसर आपके जीवन में जरूर आयेंगे। पर कदाचित आपके प्रारब्ध कुछ इस तरह के नहीं हैं कि आप अधिक उन्नति कर सकें तो खीझ और उत्तेजना से प्राप्त परिस्थिति का सन्तोष भी आपको नहीं मिल सकेगा। इसीलिए फल प्राप्ति की कामना को गीताकार ने दोष बताया है और मनुष्य को निरन्तर कर्म करने की प्रेरणा दी है।
जागृत मनुष्य कभी क्रियाहीन नहीं रहेगा। प्राप्त परिस्थितियों में जो लोग प्रसन्नतापूर्वक लगे रहते हैं जीवन का सुख उन्हीं को मिलता है। सुख किसी वस्तु या परिस्थिति विशेष में नहीं है। वह एक मानसिक भाव है जो प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न रहने से मिल जाता है। छोटी-छोटी बातों में दुखी रहने का तात्पर्य यह है कि आप परमात्मा के विधान की अवहेलना करना चाहते हैं। यों न सोचिये वरन् अपने से दयनीय स्थिति के व्यक्तियों से अपनी तुलना कीजिए और पूर्ण प्रसन्न रहने का प्रयत्न कीजिए। पुरुषार्थ करने की आप में शक्ति होगी तो अच्छे परिणाम भी मिल जायेंगे पर परिणाम की ओर अपना ध्यान बनाये रखकर प्राप्त आनन्द को क्यों छोड़ते हैं? जागृत पुरुष इसीलिए प्रत्येक परिस्थिति में सुख का अनुभव करते हैं और तप, त्याग, परोपकार द्वारा अपनी भावनाओं को उत्कृष्ट बनाकर आगे के लिए शुभ फल संचय कर लेते हैं। इसी जीवन की बढ़ी हुई योग्यता ही तो अन्य जन्मों के संस्कार रूप में दिखाई देती है।
दूसरी अवस्था में मनुष्य की कर्म भावना का विश्लेषण आता है। पुरुषार्थ अपनी शारीरिक या पारिवारिक आवश्यकतायें पूर्ण कर लेने को ही नहीं कहते। मनुष्य इस संसार में रहकर यहाँ के हवा, पानी, धरती, प्रकाश आदि का स्वच्छंद उपभोग करता है, इस तरह वह धरती माता का भी ऋणी है। जो उपकार प्रकृति और परमात्मा ने उस पर किये हैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सही तरीका यह है कि मनुष्य भी प्राणिमात्र की सेवा ओर उपकार भावना से काम करे। स्वार्थों तक ही सीमित रहने से पशु और मनुष्य में भेद भी कुछ नहीं रह जाता। परमात्मा का श्रेष्ठ पुत्र कहलाने का सौभाग्य तो तब मिलता है जब निष्काम भावना से सृष्टि के अन्य प्राणियों के साथ समता, न्याय और कर्तव्य पालन की उदारता बनी रहे।
बच्चों का पालन-पोषण, व्यापार, देश-रक्षा, मेहनत, मजदूरी, ज्ञान-सम्पादन और जन-मार्गदर्शन, इन कर्मों में से ऊँच-नीच, छोटे-बड़े कम महत्वपूर्ण या अधिक महत्वपूर्ण होने की एक ही कसौटी है और वह है मनुष्य की भावना। स्वार्थ सम्मुख रखकर परोपकार दिखाई देने वाले कर्म भी फलदायक नहीं होते। निष्काम भाव से की हुई बच्चों की सेवा और प्राणिमात्र के हित के लिये किया गया उपदेश दोनों का ही फल समान है क्योंकि उनकी भावना एक ही है। कर्म की विविधता में उसका मूल्य भावना स्तर पर आँका जाता है। किसी व्यक्ति की आप चोरों से रक्षा करें और बदले में आधा धन माँगने लगे तो आपकी यह सेवा प्रभावशाली न रहेगी। कर्म का महत्व फल त्याग से है। सच्चा सुख, सन्तोष तो तब मिलता है जब मनुष्य अपने आप को परमात्मा का एक उपकरण मानकर विशुद्ध त्याग भावना से परोपकार करता है। जीवन मुक्त का लक्षण फल-प्राप्ति की कामना का परित्याग ही बताया जाता है।
प्रकृति हमें नित्य, निरन्तर निष्काम कर्म करने की शिक्षा देती रहती है। सूर्य, चन्द्रमा, प्रकाश देते हैं। बदले में कुछ प्राप्त करने की उनकी कोई भावना नहीं होती। वृक्ष अपने फलों का उपभोग अपने लिये नहीं करते। पहाड़ लोगों को असीम खनिज देते हैं, नदियाँ शीतल जल से लोगों को तृप्त करती रहती हैं। इन्हें कभी किसी तरह की कोई भी कामना नहीं होती। लोक-कल्याण के लिये निरन्तर एक सी स्थिति में चलते रहना ही उनका धर्म है। मनुष्य की दशा भी इसी तरह की होनी चाहिए। सुख कर्म में है फल तो उसके विनाश का प्रारम्भ मात्र है।
मुक्ति एक लक्ष्य है जो निरन्तर चलते रहने से प्राप्त होता है। उच्च स्थिति प्राप्त करने के लिये मनुष्य छलाँग से काम नहीं ले सकता। बीच की साधनावस्था से होकर आगे बढ़ना ही स्वाभाविक नियम है। अकुलाहट, तीव्रता या चित्त में विकार आना मनोरथ पूरा न होने का लक्षण है।
आत्म-कल्याण के विविध साधनों में प्रत्येक स्थिति में हर मनुष्य के लिए सरल और सुलभ साधना-निष्काम कर्म ही भावना ही है। कठोर साधनों की अपेक्षा यह मार्ग अधिक सरल है जिसे गीता में “निष्काम कर्म योग” के नाम से प्रतिपादित किया गया है। कर्तव्य भावना का ज्ञान और मनोरथ के परित्याग से परमात्मा की स्थिति का बोध हो जाता है और मनुष्य जन्म मरण के भव बन्धन से मुक्ति पा लेता है। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसके लिए निष्काम-कर्म से बढ़कर और कोई दूसरा उपाय श्रेष्ठ नहीं है।
विचार मंथन से विवेक मिलता है और सत्कर्मों से आत्मबल बढ़ता है भगवान उन पर प्रसन्न होते हैं जो उसकी सृष्टि को सुंदर बनाने में निरत रहते हैं।
शक्ति के भाण्डागार मनुष्य के काय संचालन में बहुत-सी शक्ति खर्च होती है। एक अच्छे-खासे कारखाने में छोटे-बड़े जितने कल पुर्जे होते हैं उसकी तुलना में शरीरगत घटकों की संख्या कम नहीं ज्यादा ही है। यह सभी परस्पर संबद्ध हैं। घड़ी के पुर्जों की तरह इनमें से कुछ खराब स्थिति में होते हुए भी घिसट रहे हों तो स्वभावतः उसके खिंचाव में कहीं अधिक शक्ति व्यय होती है। एक वरिष्ठ पहलवान बनने में जितनी शक्ति लगती है उससे कहीं अधिक एक फटे-टूटे सड़े-गले शरीर से काम निकालने में अधिक क्षमता का अपव्यय होता है। इस बर्बादी को रोका जा सके और इस प्रकार जो सामर्थ्य बचती है उसे उपयोगी कार्यों में लगाया जा सके तो साधारण स्थिति का मनुष्य भी इतनी क्षमता बचा सकता है जिसका सदुपयोग बन पड़ने पर आश्चर्यजनक सफलताएँ उपलब्ध होंगी।
इसके बाद मनुष्य का मस्तिष्क आता है। सारा विद्युत प्रवाह यहीं से उत्पन्न होता है। हृदय के माध्यम से होने वाला रक्त संचार प्रायः माँस पेशियों की स्थिरता एवं उनकी समर्थता में ही व्यय हो जाता है। इसमें कहीं ऊँची मस्तिष्कीय क्षमता है। उसके सचेतन भाग से हमारे विचार व्यवहार चलते हैं और अचेतन पक्ष शरीरगत अनेकानेक रहस्यमय सूत्र संचालकों की बागडोर सम्भालता है। बौद्धिक प्रतिभा का केन्द्र बिन्दु यही है। स्फूर्ति का आवेग भी यहीं उत्पन्न होता है। मनुष्य की मानसिक क्षमता का प्रायः 7 प्रतिशत अंश ही व्यवहार में आता शेष 93 प्रतिशत ऐसा ही जो प्रसुप्त या उपेक्षित स्थिति में ही पड़ा रहता है। उसे जगाने पर मनुष्य मानसिक क्षमताओं के क्षेत्र में एक भानमती का पिटारा खोल सकता है और सामान्य लोगों की तुलना में दिव्य पुरुष या महामानव हो सकता है।
शरीरगत स्वाभाविक क्षमता का अधिकाँश भाग आलस्य के गर्त में गिरकर सड़-गल जाता है। बौद्धिक क्षमताओं का आधा अधूरा अन्यमनस्क भाव से किया हुआ उपयोग प्रवाह कहलाता है। प्रमादी मनुष्य बौद्धिक क्षेत्र में पिछड़ा ही बना रहता है और भूल पर भूल करता रहता है।
शारीरिक क्षमताओं का बहुत कुछ दुरुपयोग असंयम से होता है। काम करने वाले अवयवों की सामर्थ्य निचुड़ कर वास्तविक उत्तेजनाओं में खर्च हो जाती है। सामर्थ्यों का भण्डार चुकते जाने पर मनुष्य खोखला होता जाता है। उसका आँख, कान, जिव्हा, जननेन्द्रिय तत्वानिस्वत्व हो जाती है और माँसपेशियाँ शिथिल, त्वचा निस्तेज होती जाती है। जवानी में बुढ़ापा आ धमकता है। झुर्रियाँ पड़ने की आयु आने से बहुत पूर्व ही त्वचा झूलने लगती है और युवावस्था की तेजस्विता सुन्दरता अनायास ही लटक पड़ती है।
जिह्वा का असंयम पाचन तन्त्र को लड़खड़ा देता है और जननेन्द्रिय का असंयम हृदय और मस्तिष्क दोनों को ही शिथिल करता है। यौन उत्तेजना मन्द पड़ जाती है। नपुँसकता आ घेरती है और व्यक्ति शौर्य पराक्रम से हीन होता चला जाता है। असंयम अपने हाथों अपनी जड़ें काटता है। शक्तियों का यह अपव्यय ऐसा है जो उठती उम्र नये रक्त में तो प्रतीत नहीं होता पर जैसे ही उठाव शिथिल पड़ता है वैसे ही अनुभव होता है कि सामर्थ्य के भण्डार में से कितना अधिक अपव्यय हो चुका और शरीर को किस कदर अशक्तता का अभिशाप सहना पड़ा।
मानसिक शक्ति भण्डार के अपव्यय में चिन्तन की दो विकृतियाँ हैं एक को आवेश दूसरे को अवसाद कहते हैं। चिंता, क्रोध, आवेग, ईर्ष्या, प्रतिशोध आदि से उत्तेजित व्यक्ति की स्थिति ज्वर ग्रस्त जैसी हो जाती है।
भय, आशंका, निराशा जैसी कुकल्पनाओं से संत्रस्त व्यक्ति ढेरों शक्ति गँवा बैठता है और उसे लगता है कि आसमान फटा या जमीन धँसी। डरपोक के मन पर इतनी आशंकाएँ छाई रहती हैं कि सब ओर से अनर्थ ही आक्रमण करता दृष्टिगोचर होता है। कारण कोई प्रत्यक्ष नहीं दिखता, तो ग्रह नक्षत्र, भाग्य, भूत-प्रेत, देवी-देवता उलटे पड़ते और किसी के द्वारा जादू टोना करने संकट खड़े किये जाने का त्रास इतनी बड़ी मात्रा में दृष्टिगोचर होता है जितना कि बहादुरों को नास्तिक संकट से जूझते हुए भी भयाक्रान्त नहीं करता।
यह मानसिक शक्तियों का अपव्यय आसानी से समाप्त हो सकता है यदि मनुष्य आत्महीनता की ग्रन्थि से ग्रसित न हो और आवश्यक पौरुष बनाये रखे। हिम्मत से काम ले और जब जो कठिनाई सामने आयेगी उससे निपट लिया जायेगा ऐसी हिम्मत रखे। हिम्मत टूटते ही मनोबल ही नहीं शरीर बल भी पलायन कर जाता है और हाथ के नीचे का साधारण-सा काम भी पर्वत जितना भारी और उफनते नाले जैसा दुस्तर प्रतीत होता है।
आत्म-बल कहीं आसमान से नहीं टूटता और न कोई देवी-देवता उसे उपहार में देते हैं वह आत्म-विश्वास का प्रतिफल है। यदि हम अपने को ईश्वर की सर्वोत्तम कलाकृति समझें और शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का भाण्डागार जन्मजात रूप से लेकर जन्मे अनुभव करें तो शंका-कुशंकाओं का कागज से बने रावण की तरह खोखला सिद्ध होता है। असली भूत संसार में जितने हैं उनकी तुलना में अन्धेरी झाड़ियाँ और श्मशान के पीपल पर रहने वाले काल्पनिक भूतों की संख्या कहीं अधिक है। इन सब को कोई तो चुटकी बजाते उड़नछू कर सकता है।
अभी कितना चलना है, यह सोचने पर मंजिल बहुत लम्बी मालूम होती है और लक्ष्य तक पहुँचने में अनेक अड़चनों का भय प्रतीत होता है। किन्तु यदि अपने मजबूत पैरों तले की सड़क को देखा जाय तो प्रतीत होगा कि जो पैर जिस सड़क को इतनी दूर पार कर चुके वे शेष मंजिल को क्यों पार न कर सकेंगे।
भाग्य ने हमें इस स्थिति में पटका यह कहने की अपेक्षा यह कथन सारगर्भित है कि भाग्य को निष्क्रिय रहने या विपन्न बनाने की जिम्मेदारी अपनी रही है और यदि पिछले अपव्ययों की रोकथाम करने उपलब्ध शक्तियों का नये सिरे से सदुपयोग करें तो भाग्य के निर्माता बनने में कोई सन्देह नहीं है। प्रगतिशीलता के दो उपाय हैं कि जिन-जिन छिद्रों में होकर शक्तियों का भण्डार बूँद-बूँद होकर रिसता है और भरे घड़े को खाली कर देता है उन सभी छिद्रों को बन्द कर दिया जाय। इससे अपव्यय रुकेगा। संयम थमेगा। अब एक ही बात करने योग्य शेष रह जाती है कि शक्ति को निरंतर कार्यरत बनाये रहने की योजना बनायें और उन्हें क्रियान्वित करने में जुट पड़ें।
चाकू पर धार धरने से उसकी कार्य क्षमता और चमक दोनों ही बढ़ती हैं। इसी प्रकार आत्मविश्वास, साहस, पुरुषार्थ के सहारे अपनी इन्हीं शक्तियों को अनेक गुना बढ़ाया जा सकता है जो हमें इस मानव जीवन के साथ परमात्मा द्वारा आरम्भ में ही प्रदान की गई है। बीज को खाद पानी मिलने पर वह बढ़कर वृक्ष बन जाता है अपनी वर्तमान क्षमताओं को ही यदि बर्बादी से बचायें और उत्कर्ष की दिशा में लगायें तो अशक्ति को समर्थता में सहज ही बदला जा सकता है।
श्रेष्ठि बंधारक ने तथागत से पूछा- आपकी मण्डली के सभी सदस्यों की कठिन और कष्टसाध्य जीवनचर्या है। कभी भोजन मिलता है, कभी नहीं। पैदल लम्बी यात्रा करते हैं, जमीन पर सोते हैं। फिर भी क्या कारण है कि हमारा श्रेष्ठ समुदाय दुर्बल और उदास रहता है और आपके परिव्राजक कमल के फूल जैसे खिले और प्रसन्न दिखाई पड़ते हैं।
तथागत ने एक ही कारण बताया- साधु जन न केवल ब्रह्मचर्य से रहते हैं, अपितु वे आज के गुजारे पर सन्तुष्ट रहते हैं, उन्हें कल की चिन्ता नहीं रहती। जो भी इस तरह रहेगा, प्रसन्नतापूर्वक जियेगा।
कई व्यक्ति कई प्रकार के निश्चय भावावेश में कर बैठते हैं और उनकी जोर-शोर के साथ घोषणा भी करते हैं। इतना ही नहीं उनको पूरा करने के लिए दुराग्रह भी अपनाते और हठवादिता का परिचय भी देते हैं। ऐसे निश्चय या उद्घोष जिनमें दूरदर्शिता और परिणाम की सम्भावना का समावेश न हो प्रायः अनुचित ही होते हैं और प्रतिज्ञा के स्थान पर उन्हें हेय हठवादिता ही कहा जाता है। संकल्प अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी। प्रतिशोध एवं दर्प के आवेश में प्रायः लोग ऐसी प्रतिभाएँ करते देखे गये हैं जिनमें दूसरों को तो अनर्थ सहना ही पड़े और फलस्वरूप अपने को कम दुष्परिणाम न भुगतना पड़े।
अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि आज सूर्यास्त होने तक जयद्रथ का वध करूंगा। यह बात बनी नहीं। परिस्थितियाँ दूसरे ढर्रे पर चल पड़ी ऐसी दशा में अर्जुन को असफल रहने पर आत्म-हत्या कर लेनी चाहिए थी। पर कृष्ण ने उसमें दुहरी हानि देखी और छद्मपूर्वक नकली सूर्य चमका कर जयद्रथ वध का कुचक्र रचना पड़ा। यहाँ प्रतिज्ञा रही भी और नहीं भी रही। कृष्ण ने प्रतिज्ञा निबाहने की अपेक्षा उसे टूट जाना हित कर समझा। क्योंकि वह आवेश में की गई थी ओर सम्भावनाओं का गंभीरतापूर्वक अनुमान नहीं लगाया गया था।
ऐसे आवेश प्रायः हत्याएँ कराने, आत्म हत्या के लिए उभारने-या उचित कार्यों को छोड़ बैठने के लिए उकसाते हैं और संकल्प न रह कर संकट बन जाते हैं।
व्रतशीलता का उपयुक्त माध्यम एक ही है आत्म-शोधन और औचित्य की मर्यादा में प्रगति पथ पर अग्रसर होते रहने का निश्चय। ऐसी प्रतिज्ञाओं में कालावधि की सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। क्योंकि मनुष्य के हाथ में इच्छित अनुकूलताएँ एव परिस्थितियाँ नहीं हैं। ऐसी दशा में काल सीमा निर्धारित करना भी व्यर्थ है। व्रतशील को अपने निश्चय पर दृढ़ तो रहना चाहिए। किन्तु अपवादों के लिए गुंजाइश भी रखनी चाहिए। गाँधी जी मंगलवार को मौन व्रत रखते थे, पर वह इसके लिए हठवादी नहीं थे। कई बार उन्हें वह व्रत आगे-पीछे भी करना पड़ा। वाह्य कृत्यों में अपवादों के लिए इतनी गुंजाइश भी छोड़नी पड़ती है।
वस्तुतः व्रत शब्द से तात्पर्य आत्म-शोधन के निमित्त किये गये शुद्धि संगत उपायों को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहना है। इसमें उपवास, ब्रह्मचर्य जैसे उच्चस्तरीय नियमों का प्रतिज्ञापूर्वक परिपालन आता है। दयानन्द, शंकराचार्य आदि ब्रह्मचर्य का और कणाद, पिप्पलाद आदि आहार सम्बन्धी सीमा बन्धन का सरलतापूर्वक निर्वाह कर सके। श्रम सम्बन्धी सीमा बन्धन का नियम भी निभ सकते हैं। इतना अध्ययन, भजन, व्यायाम आदि करना हो। ऐसी प्रतिज्ञाएँ उपयुक्त भी हैं और निभती भी हैं।
यही बात सत्य के सम्बन्ध में भी है। सैन्य विभाग के रहस्यों का प्रकट करना वाचक सत्य हो सकता है पर उद्देश्य पूर्ण सत्य नहीं। चोरों और ठगों को अपनी वास्तविक स्थिति बता देना प्रकारान्तर से अनीति का ही परिपोषण है।
व्रतशील हम बनें। प्रतिज्ञाएँ भी लें, पर वे सभी विवेकपूर्ण और दूरदर्शिता युक्त होनी चाहिए। आवेश में की हुई हठवादिता को जितना जल्दी उलटा जा सके उतना ही अच्छा है।
सन्त ज्ञानेश्वर के पिताजी ने गृहस्थ के उत्तरदायित्व को अधूरा छोड़कर संन्यास ले लिया था। उनके गुरुदेव स्वामी रामानंद को जब वस्तुस्थिति विदित हुई तो उनने उन्हें पुनः गृहस्थ धर्म में प्रवेश करने का आदेश दिया और संन्यास छुड़ा दिया। इसमें वचन भंग का दोष तो आता है, पर उससे बड़ा व्रत निभता है- भूल सुधार का।
प्रख्यात है कि अंगुलिमाल डाकू नित्य प्रति 108 उंगलियाँ काटकर उनकी माला देवी पर चढ़ाया करता था। इसी आधार पर उसने अपना नाम ‘अंगुलिमाल’ रखा हुआ था। भगवान बुद्ध के संपर्क में आने पर उसने उस प्रतिज्ञा से मुख मोड़ लिया और अहिंसा का प्रचारक बन गया।
कई हठवादी एक बार मुख से निकले शब्दों को पूरा करने में ही संकल्प की पूर्ति समझते हैं और अपने दर्प को पूरा हुआ समझते हैं। द्रोणाचार्य द्रुपद के दरबार में कुछ याचना करने गये और गुरुकुल में साथ पढ़ने की मित्रता का स्मरण दिलाया। इस पर द्रुपद ने उनका उपहास उड़ाया। द्रुपद से उस अपमान का बदला लेने के लिए अपने शिष्य पाण्डवों से उन्हें परास्त करने और मुश्कें बाँधकर सामने प्रस्तुत करने का आदेश दिया। वही हुआ। इसके बाद प्रतिशोध की क्रिया प्रतिक्रिया चल पड़ी और उसका अन्त महाभारत के सर्वनाशी रूप में सामने आया। चम्बल के डाकुओं की खदान उमड़ पड़ने का कारण भी प्रतिशोध की परम्परा चल पड़ना ही निमित्त कारण है। इसीलिए कहा गया है कि किसी आवेश में की हुई प्रतिज्ञा का पूर्ण करना आवश्यक नहीं। मन बदलने पर परिस्थितियों में अन्तर आ जाने पर बात को बदल देने में समझदारी ही मानी जाती है।
सम्राट अशोक ने जीवन के अन्त काल में बुद्ध संघ को सहस्र स्वर्ण मुद्राएँ देने का संकल्प लिया, पर राज्य उनके उत्तराधिकारी के हाथ चले जाने पर दैनिक उपयोग की वस्तुएं दी और अन्त में एक सूखा आँवला जो उनके पास शेष रहा था वह उनके संघ को देकर अपने संकल्प की पूर्णाहुति मान ली।
अम्बपाली को नगर वधू रहने की शपथ दिलाई गई थी, पर उनने बुद्ध की शरण में आते ही उस अनीति बन्धन को टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया और सती साध्वी की तरह धर्म प्रचार में संन्यासिनी बनकर जुट गईं।
वचन के एक बार मुँह से निकल जाने पर वैसा ही करके रहना प्रतिज्ञा पूर्ति मानी जाती है, पर उसका मूल्य तभी है जब अपनी सामर्थ्य को तोलते हुए-परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, उच्च उद्देश्य के निमित्त की जाय। इस कसौटी पर आत्म-शोधन के लिए किये गये व्रत, उपवास, संयम निर्वाह आदि के संकल्प ही उस मर्यादा के अंतर्गत आते हैं जिन्हें कष्ट सहते हुए भी निबाहना चाहिए।
कई व्यक्ति एक पैर पर खड़े रहने, एक हाथ ऊँचा रखने आदि की प्रतिज्ञाएँ ले लेते हैं और उन्हें बहुमूल्य शक्तियों का समापन करते हुए निबाहते हैं। कुछ लोग कष्ट मौन धारण करते हैं और जब काम नहीं चलता तो स्लेट पेन्सिल पर अपनी इच्छाएँ व्यक्त करते रहते हैं। ऐसे व्रत धारण को अनावश्यक ही नहीं आहत कर परम्परा उत्पन्न करने वाला और दूसरों के सम्मुख अपना बड़प्पन सिद्ध करके यश लूटने का षड्यन्त्र भी माना जा सकता है। सादगी अपने आप में एक व्रत है। जिसके साथ उच्च विचारों का अविच्छिन्न सम्बन्ध जुड़ा हुआ है।
भगवान बुद्ध आरम्भ में अत्यन्त कठोर तप करने लगे थे और अस्थि पिंजर मात्र रह गये थे। तब उन्हें उस हठ को छोड़ने और मध्यम मार्ग अपनाने की प्रेरणा मिली। उनने अपनी भूल समझी और अविलम्ब सुधार ली।
व्रतशीलता और प्रतिज्ञापालन अच्छी बात है उससे मनोबल बढ़ता है, पर साथ ही यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि किसी के बहकावे से कोई कुकृत्य कर बैठने की प्रतिज्ञा तो नहीं कर ली गई है। यदि ऐसा हो तो उसे तत्काल सुधारा जाना चाहिए। आत्म सुधार में हठवादिता का परित्याग भी आता है जो अपने आप में एक श्रेष्ठ व्रत है।
कष्ट भाग्य के धकेले नहीं आते। उन्हें अपनी अनुपयुक्त गतिविधियों द्वारा हम स्वयं न्योंत बुलाते हैं। ईश्वर तो उन्हें चिन्तन सुधारने और प्रतिभा निखारने के लिए भेजते हैं।
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तर्क की सार्थकता तब बढ़ती है जब उसमें श्रद्धा का समन्वय हो।
बाजीगर कभी-कभी ऐसे अनोखे खेल दिखाते हैं कि बच्चे तो क्या, बड़े-बड़े भी चकित रह जाते हैं और उन रहस्यों एवं करामातों के सम्बन्ध में हतप्रभ होकर रह जाते हैं? कि यह सब किस आधार पर, क्यों कर प्रदर्शित किया गया।
भगवान की कलाकृतियाँ सदा आँखों से आगे गुजरती रहती हैं इसलिए वे एक प्रकार से अभ्यास में सम्मिलित हो जाती हैं और साधारण एवं स्वाभाविक लगती हैं। पर गंभीरतापूर्वक उन्हें देखा जाय तो प्रतीत होगा कि यहां सब कुछ आश्चर्य ही आश्चर्य है। आसमान, सूरज, चांद, सितारे, बादलों के घटाटोप, उनका बरसना और कड़कड़ाना लगता है कि यह किसी बड़े शक्तिशाली एवं असाधारण बुद्धि वाले का कौशल है। धरती पर ऊँचे पर्वत और नीचे समुद्र अपनी अनोखी छटा दिखाते हैं। बीच-बीच में जलाशय, घने जंगल, लम्बे रेगिस्तान और नदियों का प्रवाह देखकर चकित रह जाना पड़ता है कि आखिर यह सब कैसे सम्भव हो सका इस भिन्नता भरी संरचना का निर्माण किन हाथों से किन उपकरणों के सहारे बना पड़ा।
प्राणियों की आकृति और प्रकृति और भी हैरत भरी है। मिट्टी में रहकर वनस्पति उत्पादन में सहायता करने वाले अदृश्य सूक्ष्म जीवी, पानी में रहने वाले अदृश्य कीटाणु, झींगुर, टिड्डी से लेकर गरुड़ जैसे पक्षी और हाथी, ह्वेल जैसे प्राणियों का चित्र विचित्र निर्माण ही नहीं उनके आहार-विहार के साधन भी इस प्रकार बनाये गये हैं कि वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और कठिनाइयों का निराकरण आसनी से कर सकें।
इसके उपरान्त आता है सर्वोच्च श्रेणी का प्राणी मनुष्य उसकी शारीरिक संरचना इतनी सूक्ष्म, इतनी विचित्र और इतनी अद्भुत है कि देखकर दंग रह जाना पड़ता है कि समझ में नहीं आता कि सागर को गागर में किस तरह भरा गया। ब्रह्माण्ड के सुविस्तृत घटकों की इस छोटी-सी काया में किस प्रकार समाविष्ट किया गया। किस प्रकार विशाल ब्रह्मांड की छोटी किन्तु समग्र इकाई के रूप में इस काय-कलेवर के कण-कण में अनोखापन भरा गया यह देखते ही बनता है।
इतना ही नहीं कि सृष्टा ने अपनी निज की सत्ता और विलक्षणता भी मनुष्य को उत्तराधिकारी युवराज के रूप में प्रदान की है। परन्तु इतनी सतर्कता भी रखी है कि कहीं इसका अत्यधिक दुरुपयोग न होने लगे। इसलिए विभूतियों को इतनी कुशलता के साथ छिपाया है कि साधारणों को उनका आभास तक न मिले किन्तु अन्तर्मुखी हो गई। पनडुब्बों की तरह गहरे उतर सकें तो बहुमूल्य मणि मुक्तक टोकरे भर-भरकर समेट सकें।
मनुष्य प्रत्यक्षतः गया-गुजरा प्राणी है। वह न जल में डूबा रह सकता है, न आसमान में पक्षियों की तरह उड़ सकता है। बन्दर की तरह वह पेड़ पर भी नहीं चढ़ सकता है। प्रतिद्वन्द्विता में छोटे से रोग कीटाणु-वायरस-ही उसका कचूमर निकाल सकते हैं। हिरन की तरह, छलाँग मारना और घोड़े की तरह दौड़ना तो उसके बस की बात है ही नहीं। टक्कर में असंख्य जीव जन्तु ऐसे हैं जो उसे देखते-देखते धराशायी कर सकते हैं। इतने पर भी वह सृष्टि का मुकुट मणि है। अपने पराक्रम के बलबूते नहीं, मिले हुए दिव्य अनुदानों के आधार पर। शरीर की संरचना ही देखिए। हाथों का इतनी जगह से इस प्रकार मुड़ना और इतनी उँगलियों का होना ऐसी विलक्षणता है जैसी अन्य किसी प्राणी में नहीं मिल सकती। शरीर को सीधा होकर चलने में मेरुदंड की, आर्चेज ऑफ फुट की जो समर्थता है उसकी तुलना में कोई प्राणी नहीं ठहरता। सामान्य संरचना की तुलना में कितने ऊँचे स्तर के कौशल वह दिखा सकता है इसका प्रत्यक्ष दर्शन ओलम्पिक खेलों और सधे हुए सरकस खिलाड़ियों के करतब देखकर जाना जा सकता है कि इस काया को कितना साधा और कितना समुन्नत बनाया जा सकता है।
एक कदम और आगे बढ़े तो उसका कौशल वैज्ञानिकों के प्रकृति के गहरे परतों में खोलकर एक से एक बढ़कर आविष्कार करने की कृतियों में देखा जा सकता है। सृष्टि के अन्य प्राणि जहाँ जलती आग को देखकर मुसीबत मानते हैं और देखते ही भाग खड़े होते हैं वहाँ मनुष्य है जो मृत्यु की सहेली बिजली की घरेलू सेविका की तरह काम करते रहने और दिन रात में कभी छुट्टी न माँगने के लिए विवश करता है। देश-देशान्तरों के मध्यवर्ती दूरी को समाप्त करके रख देने वाले टेलीफोन, टेलेक्स, रेडियो, टेलीविजन, प्रक्षेपास्त्र, वायुयान आदि साधनों के माध्यम से मीलों की लम्बाई वाली दूरी का कोई अस्तित्व नहीं रहा। वर्षों में हो सकने वाला कार्य मिनटों और सेकेंडों में पूरा किया जा सकता है।
शल्य क्रिया ने यह सम्भव कर दिया है कि गोलियों से बिधे हुये व्यक्ति भी बचाये जा सकते हैं। अंगों का प्रत्यारोपण हो सकता है। अपंगों को कार्य कर सकते योग्य बनाने के लिए अनेकों उपकरण बन चुके हैं। यह चिकित्सा क्षेत्र की करामात है। महादैत्यों और विश्वकर्माओं को चुनौती देने वाले विशालकाय कल-कारखाने मनुष्य की प्रतिभा से ही खड़े किये गये हैं। पूर्वकाल में देवलोक में इन्द्र के पास एक वज्र था। अब अणु बमों और हाइड्रोजन बमों के रूप में ऐसे हजारों वज्र बनाकर अपनी तिजोरियों में बन्द कर रखें हैं। कभी तान्त्रिक सम्मोहक स्त्री का प्रयोग करके जीवितों को मृतकवत बना देते थे आज उस कार्य को क्लोरो फार्म, पैथीडीन आदि अनेकों रसायन बाजार में उपलब्ध हैं। सोमरस पीकर कभी देवता अलौकिक अनुभूतियों का रसास्वादन करते थे। अब हीरोइन हशीश, चरस की इतनी किस्में चल पड़ी हैं जो सेवन कर्ता को किसी विचित्र लोक में पहुँचा देती हैं।
लेखन और भाषण उसकी विलक्षण उपलब्धि है। तत्वज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करके उससे धर्म, अध्यात्म, मनोविज्ञान ही नहीं गढ़ा है वरन् ईश्वर को भी अपनी मनमानी आकृति एवं प्रकृति का गढ़ा है। यह ठीक है कि ईश्वर ने मनुष्य को बनाया है पर उससे भी अधिक सत्य है कि ईश्वर को मनुष्य ने ही गढ़ा है। सृष्टि के असंख्य प्राणियों को उसकी सत्ता के संबंध में ज्ञान तक नहीं है।
अन्तरिक्ष को उसने धरती के समान अपना कार्यक्षेत्र बना लिया है। देवता समझे जाने वाले चन्द्रमा का कोना-कोना छान डालने वाले और उसे सिर्फ एक घूमता हुआ मृतिका पिण्ड सिद्ध करने वाला मनुष्य ही है। सौर मण्डल की जामा तलाशी उसने ले ली है और इसके आगे ब्रह्मांड की टोह लेने का उसका हौसला देखने ही योग्य है। प्रकृति के बहुत कम रहस्य उसकी जानकारी से बाहर रह पाये हैं। लैसर किरणों जैसी शक्तियाँ उसने हस्तगत कर ली हैं। और वह दिन दूर नहीं जब वह प्राणियों का मुकुट मणि ही नहीं प्रकृति का अधिष्ठाता भी बन सकेगा।
कभी दैत्य, देवताओं और अवतारों को दिव्य सत्ताओं द्वारा शक्तियाँ हस्तगत करनी पड़ती हैं और इसके लिए प्रचण्ड तप का आश्रय लेना पड़ता था। आज अस्त्रों और कुटिलताओं, उद्दण्डताओं के सहारे मनुष्य ने भूतकालीन दैत्यों की तुलना में अपने को वरिष्ठ ही सिद्ध करके दिखा दिया है। इतिहास के विगत दिनों में ही ऐसे दैत्य उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने अपनी सनकें पूरी करने के लिए लाखों करोड़ों को अपने दाँतों से पीस डाला उनके आतंक और कृत्यों को देखकर रावण कुम्भकरण जैसे भी पराभूत होकर एक कोने में बैठ सकते हैं।
प्रश्न देवताओं और अवतारों का है। लगता है मनुष्य को वह भूमिका निभाने में देर लगेगी किन्तु बुद्धों, गांधियों की परम्परा निकट भविष्य में कार्यान्वित होने जा रही है तब मनुष्य ही दृश्यमान देवताओं की तरह सर्व साधारण के परिचय क्षेत्र में होगा। उन्हीं में से कुछ विश्व को कायाकल्प कर सकने में समर्थ अवतार भी हो सकते हैं।
आदिमकाल के अनगढ़ और आज के सुविकसित मनुष्य में जमीन आसमान जितना अंतर है। कभी देवता चूहे और हंस की सवारी करते थे अब मोटर और वायुयान अपेक्षाकृत अधिक सशक्त वाहन हैं। सरस्वती ने आदमी की आधीनता स्वीकार कर ली है। प्रेस और प्रकाशन होते ही ज्ञान की देवी सरस्वती को पेन्शन देकर मनुष्य ने उस पद को अपने आधिपत्य में ले लिया है। विचारों के विस्तार के स्वामी गणेश अब घुड़-दौड़ में रेडियो टेलीविजन में पीछे रह गये हैं।
यह सब क्या है? यह मनुष्य के रहस्यमय मस्तिष्क के प्रायः सोलहवें भाग की करामात है। परामनोविज्ञान ने पता लगाया है कि अतीन्द्रिय क्षमताओं के भण्डारों में खोपड़ी में कैद लिवलिवा पदार्थ भरा पड़ा है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ मात्र ऋषियों को ही उपलब्ध हों ऐसी बात नहीं। अनेकों उस सम्पदा को लेकर जन्म के आरम्भ से ही आते हैं और भविष्य कथन से लेकर अदृश्य दर्शन के ऐसे विवरण बताते हैं जिन्हें देखते हुए वह अविश्वास उठ गया जो मनुष्य की सीमित शक्ति से प्रतिबद्ध मानता था।
यह प्रतिपादन ऋषियों और शास्त्रकारों का ही नहीं कि मनुष्य की काया एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला है। उस अभिमत से भौतिक विज्ञानी और तत्वज्ञानी भी सहमत हो गये हैं। संसार में अनेकों प्रयोगशालाएँ हैं जो आविष्कारों और चमत्कारों का सृजन करती हैं। पर उन सबका एक स्थान पर समन्वय कहीं देखता हो तो उसे मानवी कार्य की अदृश्य परतों को उखाड़ कर देखा जा सकता है कि मनुष्य कितना समुन्नत है। तत्वज्ञान के क्षेत्र में वह उतना ही सुसंस्कृत भी है जितनी कि ऋषियों और देवताओं के सम्बन्ध में मान्यता है। सामर्थ्यों की कमी नहीं पर भूल एक ही होती चली आ रही है कि हृदय को विशाल एवं उदार न बनाया जा सका। उपलब्धियों की संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए प्रयुक्त किया गया और यह भुला दिया कि क्रिया की प्रतिक्रिया भी होती है और दुष्कृत्यों का दुष्परिणाम भी होता है। कदाचित् आस्तिकता का प्रकाश उसे उपलब्ध हो सका होता तो इतना सामर्थ्यवान होने पर उपलब्ध क्षमताओं का सदुपयोग कर सकने पर स्वयं धन्य बनता और इस धरातल के वातावरण को स्वर्गोपम बना देता।
एक समय ऐसा भी रहा है कि कुछ अधिनायकों और आतंकवादियों को छोड़कर साधारण मनुष्य यह सोचता रहा है कि तुच्छ, नगण्य एवं भाग्य श्रृंखला में बँधा हुआ है। पर अब विज्ञान ने उन मान्यताओं को बदल दिया और महर्षि व्यास के युधिष्ठिर के कान में कहे हुए इस वाक्य की कि ‘‘मैं एक रहस्य बताता हूँ मनुष्य से श्रेष्ठ और कहीं कुछ नहीं है।’’ इन्हीं शब्दों को अब विज्ञान ने ढिंढोरा पीटते हुए सर्वसाधारण के सामने तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सिद्ध कर दिया है। मनुष्य की अद्यावधि प्रगति आश्चर्यजनक हुई है किन्तु उसकी संरचना को देखते हुए सम्भावनाएँ अत्यधिक ही नहीं असीम भी हैं।
आकाश में जब तब बिजली कौंध जाने से यह अनुमान लगता है कि अनन्त आकाश में असीम विद्युत भण्डार भरा पड़ा है। इसी प्रकार मनुष्यों में से कितने ही जब अपने कला-कौशल और प्रभावी व्यक्तित्व का परिचय देते हैं तो पता चलता है कि जो भूतकाल में हो सका वह भविष्य में भी हो सकता है। जो एक कर सका उसे दूसरा भी कर सकता है। कारण स्पष्ट है कि जिस प्रकार प्रकृति की परत खुलने पर उसके अन्तराल में असीम शक्ति का भण्डार भरा दिखता है उसी प्रकार मनुष्य की शारीरिक और मानसिक संरचना को देखते हुए यह सहज विश्व है कि जो प्रसुप्त है उसे जगाया जा सके तो हर मनुष्य महामानव बन सकता है और दैत्य या देव में से किसी की भी भूमिका निभा सकता है। वह सीमित दिखते हुए भी असंख्यों सम्भावनाओं और क्षमताओं से भूरा पूरा है।
आत्मिकी के प्रतिपादन आरंभ से ही यह रहे हैं। समस्त दैवी शक्तियों और भौतिक संपदाएं मनुष्य के अंतराल में विद्यमान हैं। पर उनका प्रत्यक्षीकरण या उपयोग करने के लिए आत्म परिष्कार का प्रयत्न करने आवश्यकता है। योग और तप द्वारा, आत्मशोधन द्वारा इसी की पूर्ति ऋषि युग में होती रही है और वे अपने को ऋद्धि सिद्धियों का भंडार सिद्ध करते रहे हैं। देवताओं की भूमिका स्वयं निभा सकने के प्रमाण प्रस्तुत करते रहे हैं। अब विज्ञान ने भी उसी स्वर से स्वर मिलाया है और व्यक्ति के शारीरिक सूक्ष्म संरचना और मस्तिष्क की विलक्षणता को देखते हुए यह कहा है कि वह अद्भुत है, अनुपम है, आश्चर्य है। कदाचित् हम अपनी इस वस्तुस्थिति को पहचानें और सक्षम बनने में समर्थ हो सकें तो उतना आगे बढ़ा जा सकता है जिसकी कि आज की परिस्थितियों में तो कल्पना कर सकना भी कठिन है।
सम्मान सबका करो, किन्तु विश्वास केवल उनका जो प्रामाणिकता की कसौटी पर अनेकों बार परखे जा चुके हैं।
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अन्धा मनुष्य सर्प की आशंका से गले में डाली गयी पुष्प माला को भी उतार फेंकता है। अविवेकी लोग सत्परामर्श को भी घाटा पहुँचने की आशंका से उपेक्षापूर्वक अनसुनी कर देते हैं।
स्वेच्छा पूर्वक अपनाई गई दरिद्रता मनुष्य को महामानव बनाती है, किन्तु आलसी के ऊपर लदी हुई दरिद्रता उसकी अकर्मण्यता का स्वाभाविक दुष्परिणाम है।
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दरिद्र वह है जिसकी तृष्णा विशाल है। जो स्वल्प में सन्तोष कर सकता है वही सम्पन्न है और वही प्रगतिशील।
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मूर्ख एक ओर देखता है, बुद्धिमान सब ओर। आंखें सबके माथे में जड़ी होती हैं, पर विवेक दृष्टि सौभाग्यवानों को ही मिलती है।
पण्डित जी नाव में बैठकर नदी पर कर रहे थे। रास्ते में मांझी के साथ वार्तालाप चल पड़ा।
पण्डित ने पूछा- भाई तुम गणित पढ़े हो? उसने ‘ना’ कह दिया। फिर वे भाषा, व्याकरण, भूगोल, इतिहास आदि के सम्बन्ध आदि के सम्बन्ध में पूछने लगे। हर बार उसने ‘ना’ का सिर हिला दिया। वह कुछ भी पढ़ा-लिखा नहीं था।
तो तुम्हारी जिन्दगी व्यर्थ चली गई। बिना पढ़े तो पशु होते हैं। माँझी चुप हो गया।
थोड़ी देर में हवा चली गई। भयानक आँधी आई और नाव डगमगाने लगी। डूबने का खतरा देखकर, माँझी ने पण्डित से पूछा- आपको तैरना आता है क्या?
अब की बार उनका सिल, हिला तो माँझी ने कहा- आपकी जिन्दगी पूरी तरह चली गई। मेरी नाव तो मात्र व्यर्थ हो गई थी।
मस्तिष्कीय ज्ञान से व्यावहारिक ज्ञान की महिमा कम नहीं है।
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एक छोटी नदी थी। पार जाने के लिए एक लम्बा लट्ठा उसके आर-पार रखा था। उस पर एक के निकलने जितनी ही जगह थी।
एक दिन दो बकरे दो ओर से एक ही समय चले पड़े और बीच में आकर अड़ गये। न किसे ने पहले सोचा और न परिस्थिति की विषमता देखकर पीछे हटने का विवेक अपनाया।
अड़े सो अड़े। हेटी कोन कराये? घमण्ड कौन छोड़े? पीछे हटने और जान बचाने की बात, सोचने की बात, कौन सोचे? लड़ने मरने और दूसरे को नीचा दिखाने के उन्माद में परस्पर टकराने लगे। छोटे बकरे के बाद बड़ा गिरा और दोनों ही नदी के प्रवाह में पड़कर मौत के मुँह में चले गये। अहंकार का उन्माद, जो न कर गुजरे, सो कम ही है।
पाश्चात्य जगत में धार्मिक मान्यताओं एवं तर्क में परस्पर टकराव देखा जाता है लेकिन भारतीय दृष्टिकोण इस सम्बन्ध में भिन्न है। अंग्रेजी में जिसे ‘फेथ’ (Faith) कहकर पुकारा जाता है, हिन्दी में उसे श्रद्धा कहते हैं। अंग्रेजी शब्द ‘रीजन’ (Reason) सामान्य भाषा में बुद्धि कहलाता है। पाश्चात्य संस्कृति में फेथ और रीजन में कई सदियों से संघर्ष चला आ रहा है। आर्ष मान्यताएँ शाश्वत हैं। वे बताती हैं कि श्रद्धा एवं बुद्धि के समन्वय में ही मानवता का कल्याण है। जब यह सम्बन्ध स्पष्ट होने लगता है तो व्यक्ति को दोनों की अभिन्नता, एक दूसरे के बिना अपूर्णता का आभास होता है।
धर्म श्रद्धा पर आधारित है और विज्ञान बुद्धि पर। यह पाश्चात्य दृष्टिकोण है। वहाँ ईसाई धर्म और वैज्ञानिकों में गत चार-पाँच सदियों से पारस्परिक द्वेष एवं टकराव की स्थिति देखी जा सकती है। वैज्ञानिक धर्म को चमत्कार और अन्ध श्रद्धा मानते आये हैं और धार्मिक कहे जाने वाले लोग वैज्ञानिकों को नास्तिक कहते आये हैं। यही नहीं धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों में भी जैसे- कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट आदि में भिन्न-भिन्न मान्यतायें होने के कारण संघर्ष होता आया है। मध्यकालीन युग में ईसाई तथा गैर ईसाइयों के बीच ही नहीं कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच भी एक दूसरों को सफाया कर देने वाले कट्टरवादी धर्म युद्ध हुए हैं।
धर्म के बारे में वैज्ञानिकों का ख्याल है कि धर्म पुस्तकों में जो लिखा है उसे ही सत्य मानना, उसके बारे में कोई प्रश्न नहीं कर सकना, यह बात विज्ञान के मूल-भूत सिद्धान्तों के विरुद्ध है। पाश्चात्य देशों में आरम्भ में धर्म सत्ता का ही बोलबाला था और वैज्ञानिकों के सत्यान्वेषण करने के लिए समर्पित हो जाने के लिए अटूट श्रद्धा को तोड़ने के लिए प्रयत्न किया गया। फलस्वरूप 19 वीं शताब्दी के अन्त में पाश्चात्य विज्ञान का नाम बुद्धिवादी हुआ और धर्म का नाम अंध श्रद्धालु, संकीर्ण एवं असहिष्णु हुआ। जिसका प्रभाव यह हुआ कि उसका दुष्परिणाम हम लोग भी भुगत रहे हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के सत्प्रयत्नों ने पश्चिम की धार्मिक मान्यताओं एवं भारतीय वैदिक आध्यात्मिक विचारधाराओं के बीच के अन्तर को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया।
भारत में विज्ञान का विकास करना ही होगा, बुद्धि को तीक्ष्ण करना ही होगा लेकिन भारत में विज्ञान और बुद्धि को आध्यात्मिक सिद्धान्तों से संघर्ष करने की कोई आवश्यकता नहीं है। शिक्षित वर्ग में आज यह आम मान्यता भरी हुई है कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करेंगे लेकिन धार्मिक मान्यताओं को दूर करेंगे। सौभाग्यवश पाश्चात्य सुप्रसिद्ध, वैज्ञानिकों का झुकाव भारतीय अध्यात्म की ओर हुआ है तथा वे अध्यात्म और विज्ञान के संघर्ष से प्रसन्न नहीं हैं। साथ ही वे इसके समाधान के लिए प्रयत्नशील हैं। पाश्चात्य में भी धर्म के उच्च नेतागण भी अपनी धार्मिक मान्यताओं के बारे में बुद्धिगम्य और वैज्ञानिक आधार पर जोर दे रहे हैं। इसी तरह इन वैज्ञानिकों की संख्या भी बढ़ रही है जिनका मत है कि मनुष्य को धर्म और श्रद्धा की आवश्यकता है। लेकिन पाश्चात्य जगत में ऐसा बुद्धिगम्य और विज्ञान पर आधारित अध्यात्म न पाने से पश्चिम के कई मान्य धार्मिक और वैज्ञानिक लोग भी भारतीय तत्वज्ञान की ओर आकृष्ट हुए हैं।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आर्थर एडिंगटन के कथनानुसार इस वैज्ञानिक युग में भी फेथ (श्रद्धा) का स्थान सर्वोच्च है क्योंकि बुद्धि श्रद्धा का एक छोटा अंग है।
अल्वर्ट आइन्स्टीन के अनुसार भी धर्म और विज्ञान के क्षेत्र में अलग-अलग होने पर भी इन दानों के बीच परस्पर आदान-प्रदान करने की बड़ी क्षमता है। धर्म ने विज्ञान से बहुत कुछ पाया है, लेकिन धर्म ने मानवीय जीवन का जो लक्ष्य दिया है उसकी ओर बढ़ना विज्ञान के लिये बाकी है। विज्ञान को सत्य एवं विवेक का अन्वेषण करना होगा। भावनाओं का श्रोत धर्म है। आइन्स्टाइन के मतानुसार मौलिक वैज्ञानिक वही है जिसको पूर्ण श्रद्धा है। धर्म के सिवा विज्ञान पंगु है और विज्ञान के सिवा धर्म अन्धा है।
आज के युग में आम आदमी मनहूस मनोवृत्ति वाला हो गया है जिसकी स्थिति यह है कि वह हर वस्तु की बाजारू कीमत तो जानता है, परन्तु किसी को उपयुक्त नहीं समझता। वैज्ञानिक मनहूस तो नहीं है लेकिन उनमें श्रद्धा भी कम हुआ करती है। उनको अपने कार्य से ही मतलब रहता है अन्य क्षेत्रों के प्रति प्रायः वह उदासीन जैसा रहता है।
वर्कले विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध भौतिकविद् प्रोफेसर फ्रिटजाफ काप्रा के कथनानुसार-वैज्ञानिक अनुसंधान में बौद्धिक तीक्ष्णता एवं बौद्धिक प्रक्रियायें ही मुख्य हुआ करती हैं लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। अगर बुद्धि के साथ अन्तःप्रेरणा का संयोग नहीं हो सके तो अनुसंधान प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। ये अन्तःप्रेरणाएं प्रयोगशाला के टेबल पर नहीं आती हैं, वे आती हैं प्रायः नैसर्गिक वातावरण में। जबकि वैज्ञानिक घने जंगलों में घूम रहा हो या समुद्र के ज्वार-भाटों को मन्त्र मुग्ध की भाँति देख रहा हो, ‘या’ शान्त चित्त होता है। इसी के सहारे मन में अपने कार्य क्षेत्र की विभिन्न परिकल्पनायें उठती रहती हैं तथा वह किसी अगम्य सत्ता से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। वैज्ञानिक कहता है कि इतना मैं जानता हूँ पर इसके आगे क्या है? मैं नहीं जानता लेकिन आगे कुछ अवश्य है, जिसे अनुभव करता है। यहीं से श्रद्धा शुरू होती है। अध्यात्म विज्ञान में श्रद्धा उसी का कहते हैं जिसमें अनजान तथ्य के प्रति सम्मानित मनःस्थिति होती है। जो इन्द्रियातीत है, वही श्रद्धा है। सामान्य ख्याल है कि शून्य आकाश खाली है लेकिन विज्ञान के आधुनिक आविष्कार दर्शाते हैं कि शून्य आकाश में अगणित कण विद्यमान हैं जिनकी उत्पत्ति और लय निरन्तर हुआ करती है। आधुनिक भौतिक विज्ञान तथा भारतीय तत्त्वदर्शन यहाँ अति सान्निध्यता प्रकट करते हैं।
छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार ये समस्त दुनिया बहुत ही सूक्ष्म कणों की बनी हुई है, यही सत्य है। यही बात अन्यान्य उपनिषद् संदर्भों में भी प्रकट हुई है।
श्री रामकृष्ण परमहंस के कथनानुसार चेतना के दिव्य महासागर जिसको “ज्योतिसार ज्योति” अथवा सच्चिदानन्द नाम से पुकार गया है, का रसास्वादन करने के लिए दो मार्ग हैं। प्रथम है सगुण उपासना तथा निर्गुण उपासना। श्रद्धावान साधक अपने मनोरंजन में आरोपित भावनाओं से जिस तत्व की अनुभूति करता है उसी तत्व के विभिन्न स्वरूप की अनुभूति बुद्धि से भी हो सकती है। ‘एकम् सत्य विप्रा बहुधावदरन्ति’ सत्य एक ही है, विद्वतजन् उसका विभिन्न स्वरूपों में दर्शन करते हैं। इसी दर्शन के कारण भारत में चार्वाक जैसे ईश्वर को इंकार करने वाले सांख्य, जैन, बौद्ध आदि अर्ध ईश्वरवादी एवं अनेक देववाद को मानने वाले, विभिन्न विचार धाराओं वाले व्यक्तियों के बीच भी अन्योन्याश्रित प्रेम और आदर पाया जाता है। ठीक इसी तरह विज्ञान की चरम सीमा तक पहुँचने वाले मनीषी भी भारतीय तत्व ज्ञान में अपने ही मत का समर्थन अपने ही तौर तरीके से दर्शन कर सकते हैं।
अणुविद् वैज्ञानिक एर्विन स्त्रण्डिगर अपनी पुस्तक “जीवन क्या है?” में लिखते हैं कि चेतन तत्व की अनुभूति विभिन्न देश काल में भिन्न-भिन्न लोगों ने एक ही स्वरूप में की है। कहीं-कहीं इनमें भिन्नता भी पायी जाती है तो इसका एक ही कारण है कि तथ्य एक होने पर उसकी सजावट के साधन भिन्न हो सकते हैं।
आधुनिक भौतिकविद् दुनिया को बुद्धि युक्त मन से देखता है जबकि रहस्यवादी आध्यात्मिक सन्त अपने अन्तर्मन से देखता है। दोनों का गन्तव्य स्थान एक ही होने पर भी ऐसा लगता है दृश्य भिन्न-भिन्न हैं। अगर दोनों अपने लक्ष्य के अन्त तक पहुँच जांय तो एक ही दृश्य नजर आयेगा।
प्यार की सम्वेदना ईश्वर की प्रत्यक्ष सहानुभूति एवं अभिव्यक्ति है। हलचल तो जड़ पदार्थों में भी होती है, परमाणु, जीवाणु और विषाणु भी चले फिरते, जीते ओर हलचलें करते हैं पर उन्हें आत्मा के चेतनायुक्त नहीं गिना जाता, कारण कि चल बल के रहते हुए भी उनमें भावना का समावेश नहीं होता। भावनाओं से सम्पन्न चेतना का ही दूसरा नाम आत्मा है। आत्मा की परमात्मा के रूप में परिणति तब होती है जब उसमें प्यार का अमृत भर निर्झर लहराने लगता है। प्रेमी प्रकृति को ईश्वर की प्रतिध्वनि प्रतिच्छाया कहा जाय तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
नीरस, रूखे, निष्ठुर, शून्य और शुष्क प्रकृति के मनुष्य जीवित तो कहे जा सकते हैं पर उनमें उस सद्भावना युक्त सरसता का अभाव रहता है जिसे सहृदयता कहते हैं। सहृदयता का ही दूसरा नाम प्रेम प्रकृति है। यह जिस भी अन्तःकरण में उगेगी वहाँ चन्दन जैसी शीतल सुगन्ध उमगती रहेगी। ऐसे व्यक्ति इस धरती के वरदान हैं स्थिर शान्ति और प्रगति उन्हीं के अस्तित्व से जुड़ी रहती है।
अपनी आत्मा की परिधि जो जितनी विस्तृत कर सकता है वह उतना ही प्रेम व्यवहार की व्यापकता का परिचय दे सकता है। दूसरों में अपनी आत्मा का-अपने में दूसरों का अस्तित्व समाया हुआ अनुभव करना ही वह उद्गम है जहाँ प्रेम भावनाओं का आविर्भाव होता है। परायापन जहाँ होगा वहाँ उपेक्षा बरती जायगी और उदासीनता रहेगी। पर जहाँ अपनापन जोड़ लिया गया हो वहाँ गहरी दिलचस्पी पैदा होगी। अपने आपे को सुखी समुन्नत बनाने का प्रयास हर कोई सहज स्वभाव से करता है। आत्मीयता की बूंदें जितने क्षेत्र में बरसेंगी उसमें उल्लास की हरियाली निश्चित रूप से उगेगी।
अधिकार में आई हुई वस्तुओं को अपना माना जाता है। जिनसे कुछ प्राप्त होने की आशा है अथवा जिनके साथ कारण वश मोह बन्धन बंध गये हैं वे सभी प्रिय लगते हैं। प्रिय पदार्थों और प्रियजनों का सान्निध्य भी प्रिय लगता है। उनके सुख सन्तोष में भी अपने को वैसी ही प्रसन्नतादायक अनुभूति होती है। आनन्द का समस्त परिवार प्रेम के केन्द्र बिंदु से ही विनिर्मित और विकसित होता है। रुग्ण और अभावग्रस्त दुःखी मनुष्य भी प्रिय पात्रों को देखकर खिल उठते हैं यह सदा देखा जाता है। वैभव के विस्तार एवं निकटवर्ती परिजनों में जितनी ममता होती है उतना ही उनका सान्निध्य प्रिय लगता है। यदि हम इस आत्मीयता की परिधि को अधिक व्यापक और विस्तृत बना सकें तो अपनी सारी दुनिया हर्षोल्लास से भर सकती है।
समस्त सद्गुणों का मूल प्रेम है। जो अपने से प्रेम करेगा उसे व्यक्तित्व के सद्गुणों से- सत्प्रवृत्तियों से- सुसज्जित करना ही होगा। सद्ज्ञान का आहार आत्मा को देना ही पड़ेगा। जो अपने से प्यार करेगा, जिसे अपने उज्ज्वल भविष्य की आशा है उसके लिए एक मार्ग राजमार्ग यही प्रतीत होगा कि संयम और सदाचार से शरीर को और परिष्कृत विवेक दृष्टि से अपने मनःक्षेत्र को परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाने में संलग्न हो।
आत्मा का प्रकाश जितने क्षेत्र में विस्तृत होगा उतने में अपना आपा बिखरा दिखाई देगा। उसे स्वच्छ सुरक्षित और समुन्नत बनाने के लिए अन्तःकरण में अदम्य स्फुरता उठेगी। सेवा धर्म उसका सहज स्वभाव बन जायेगा। जब अपने समान ही दूसरों को भी सुखी सम्पन्न बनाने की आत्म-भावना विस्तृत हो उठेगी तो अपनी ही भाँति उन्हें भी सुखी समुन्नत बनाने के लिए ऐसी उत्कंठा जगेगी जिसे रोकना या दबाना सम्भव ही न हो सके।
प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। यदि वह स्वार्थपरता और संकीर्णता से सना नहीं है, पवित्र और प्रखर है तो उसे पाकर मनुष्य महान से महानतम होता चला जायेगा और अपने में नर में नारायण की झाँकी करेगा।
गधे के पेट से गधा पैदा होता है और बन्दर के पेट से बन्दर। गेहूं बोया जायेगा तो गेहूं उगेगा और चना बोयें तो चने की फसल सामने आयेगी। आम की गुठली आम का ही पौधा पैदा करती है और बबूल का बीज काँटे वाला बबूल। हम जो बोते हैं वही काटते हैं।
कर्म बीज है और सुख-दुख उसके फल। बुरे कर्म दुख और दुष्परिणाम उत्पन्न करते हैं और सत्कर्मों के प्रतिफल सुख एवं अन्य सत्परिणामों के रूप में सामने आते हैं। समय में अन्तर हो सकता है पर परिणाम अन्यथा होने की कोई गुंजाइश नहीं है। सरसों का बीज दो दिन में अंकुरित होता है और ताड़ वृक्ष के बीज का अंकुर एक वर्ष में फूटता है। किस कर्म का फल मिलने में कितना समय लगेगा, यह निश्चित नहीं- पर इसे सन्देह रहित ही मानना चाहिए कि कर्मों का फल मिलकर रहता है।
कल का दूध आज का दही है। कल यह पतला और मीठा था, आज उसका स्वरूप गाढ़ा और खट्टा है। नाम भी बदल गया। कल उसे दूध के नाम से पुकारा जाता था, आज उसका परिवर्तित नाम दही है। कल के कर्म आज सुख या दुख के रूप में प्रस्तुत हैं। अथवा अगले दिन वे फलित होकर उपस्थित होंगे।
यह विश्व व्यवस्था कर्म और उसके फल के परस्पर अन्योन्याश्रित होने के कारण ही टिकी हुई है। यदि ऐसा न होता तो कोई दुष्कर्मों के तात्कालिक लाभ को छोड़ता नहीं और न सत्कर्मों में जो उचित लाभ मिलता है उतने से कोई सन्तुष्ट होता। दूरगामी परिणामों की सुनिश्चितता ही वह आधार है जिसने मनुष्य को मर्यादा में रहने और कर्तव्य को अपनाये रहने के लिए सहमत किया है।
यह हो सकता है कि कभी सत्कर्मों के परिणाम देर से मिलें और यह भी सम्भव है कि कुकर्मी सफलताएँ एवं समृद्धियाँ प्राप्त करते चले जायें। ऐसे प्रसंगों में कालचक्र का हेर फेर ही समझा जा सकता है। नशा पीते ही तुरन्त खुमारी नहीं आती। थोड़ी देर लगती है। पिया हुआ नशा अपना असर दिमाग तक पहुँचाये तब तक यही प्रतीत हुआ, नशे का कोई असर नहीं हुआ। पर जानकार जानते हैं कि थोड़ा समय लग जाने के कारण यह नहीं कहा जाता कि नशे का असर होता ही नहीं।
कर्मफल तुरन्त न मिलकर थोड़ी देर से मिलने की व्यवस्था इसलिए कि मनुष्य के निजी विवेक और चरित्र की परीक्षा हो सके और आत्म-संयम तथा दूरदर्शिता की कसौटी पर उसे परखा जा सके। स्वतन्त्र कर्तृत्व की सुविधा देकर भगवान ने मनुष्य को अपने उत्थान और पतन की छूट दी है। यह मनुष्य को गौरव दिया गया है, उत्तरदायित्व सौंपा गया है, और प्रामाणिक समझा गया है कि वह इस स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न करेगा। अन्यथा कर्मफल की तुरन्त व्यवस्था होती तो मनुष्य यन्त्रवत् रह जाता। उसकी स्वतन्त्र चेतना को न सम्मान मिलता न उत्कृष्टता सिद्ध करने का अवसर। उस यान्त्रिक व्यवस्था में श्रेष्ठता और निकृष्टता की परख और प्रतिस्पर्धा ही न रहती।
कर्मफलों से छूटने के लिए मनौती मनाना या पूजा पत्री के कर्मकांडों का सहारा लेना निरर्थक है। ऐसी सस्ती व्यवस्था यहाँ यदि होती तो लोग दोनों हाथों से पाप कमाते और चट-पट उसे माफ कराने की टण्ट-घण्ट करके निपट जाते। तब इस संसार में न न्याय रहता न व्यवस्था, हर कोई पाप तो करता पर उसके फल से बच निकलने की सस्ती तरकीबें अपना लेता।
हमें दुष्कर्मों से बचना चाहिए। सत्कर्मों में प्रवृत्त रहना चाहिए। जो कर चुके हैं उसे साहस और धैर्यपूर्वक स्वीकारना चाहिए। सम्भव हो तो स्वेच्छापूर्वक आत्म दण्ड भुगतने को उद्यत रहे- प्रायश्चित क्रम अपना कर अपने प्रखर आत्म-बल का परिचय देना चाहिए। परमात्म सत्ता का व्यवस्था तन्त्र यही अपेक्षा मनुष्य से रखता भी है।
मानसिक एकाग्रता के सुनियोजित अभ्यास से रह व्यक्ति अपने अन्दर छिपी उन विभूतियों को जगा सकता है, जिन्हें अतीन्द्रिय कहा जाता है। लोग जिन्हें चमत्कार समझते हैं, वे वस्तुतः शारीरिक योगाभ्यास की अनेकों परिणतियों का एक छोटा-सा भाग भर है। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो असम्भव माना जा सके।
मैरीक्रैगकिमब्रो अमेरिका की एक जानी पहचानी अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न महिला रही हैं। उनके पति अपट्रान सिनक्लेयर भी इस विषय पर एक जाने-माने लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। दोनों पति-पत्नी ने मिलकर दूरानुभूति (टेलीपैथी) सम्बन्धी अनेकों प्रयोग परीक्षण कर उन्हें सही पाया है। अपने लम्बे अनुभव के उपरान्त उन्होंने पाया है कि मन की क्षमता अपार है। यदि थोड़ा भी इसे साध लिया जाय तो इससे अनेकों करतब दिखाए जा सकते हैं जो सामान्य व्यक्तियों की दृष्टि में चमत्कार होते हैं। वस्तुतः ऐसी बात है ही नहीं। ये मानसिक चेतना की परिधि में आने वाली क्षमताओं का विस्तार भर है।
एक प्रयोग में मेरीक्रैग को एक बन्द लिफाफा दिया गया और उसके अन्दर बन्द तस्वीर के बारे में पूछा गया। क्रैग ने थोड़ी देर तक उसे अपने शरीर से चिपकाये रखा, ध्यानावस्था में चली गयी। 15 मिनट पश्चात् उसने कागज पर घोंसले की एक तस्वीर बनायी। इसके बाद लिफाफा खोला गया। उसके अन्दर भी पक्षी के घोंसले का चित्र बना हुआ था।
दक्षिणी कैलीफोर्निया में एक अन्य विदेशी युवक ‘जान’ रहता था, जो घूम-घूमकर ऐसे ही विलक्षण मानसिक करतब दिखाता था। जब वह गहरे ध्यान की स्थिति में जाता, तो उसका संपूर्ण शरीर कठोर व ठंडा हो जाता था ऐसी स्थिति में उसके सिर को एक कुर्सी पर तथा टाँग के अन्तिम सिरे को दूसरी कुर्सी में रखकर कोई उसके ऊपर खड़ा हो जाय, तो भी उसे कुछ पता नहीं चलता था। अनेक अवसरों पर समाधि की स्थिति में जान के पेट पर भारी-भरकम चट्टान रखकर वजनी हथौड़े के प्रहार से तोड़ा जाता पर इसका भी उसकी समाधि पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं देखा गया, न ही उसे कोई तकलीफ अनुभव होती। इतना ही नहीं इस स्थिति में वह वायुरुद्ध ताबूत में बन्द होकर अनेक घण्टों तक जमीन के अन्दर पड़ा रह सकता था।
‘जान’ के इन प्रदर्शनों में किसी प्रकार की धोखाधड़ी अथवा छल-कपट की कोई गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि सारी नुमाइशें योग्य वैज्ञानिक व मूर्धन्य शरीर शास्त्रियों के तत्वावधान में सम्पन्न होती, प्रदर्शन किसी कमरे में न होकर इसके लिए किसी पार्क अथवा खुले मैदान का चयन किया जाता, ताकि प्रदर्शक के लिए हाथ की सफाई का कोई अवसर ही न रह जाय।
इसी प्रकार का एक कौशल जॉन ने अपट्रान सिनक्लेयर के घर पर अनेक वैज्ञानिकों एवं डाक्टरों की उपस्थिति में दिखाया था। वह एक बेंच पर लेट गया। कोई हाथ की सफाई प्रस्तुत न करे, इसलिए जॉन के हाथ-पैरों को सिनक्लेयर के कुछ मित्र दृढ़ता से पकड़े हुये थे। उसने आँखें बन्द की और थोड़ी देर पश्चात् सामने पड़ी 34 पौण्ड वजनी मेज हवा में धीरे-धीर ऊपर उठने लगी। शनैः शनैः कर वह चार फुट ऊपर उठकर अधर में लटक गयी, फिर मन्थर गति से हवा में वह तैरने लगी ओर दर्शकों के सिर के ऊपर करीब आठ फुट की दूरी तय की।
इसके अतिरिक्त जॉन में टेलीपैथी और फेस रीडिंग की अद्भुत क्षमता विद्यमान थी। इस प्रदर्शन के दौरान वह कमरे से बाहर आ जाता और उपस्थित लोगों में से किसी एक से कमरे की कोई वस्तु मानसिक रूप से चुन लेने व उसे स्वयं तक सीमित एवं अप्रकट रखने को कहता। इसके बाद वह कमरे में प्रवेश कर उक्त व्यक्ति को अपने पीछे खड़ा होने तथा उस वस्तु पर विचार करते हुये पीछे खड़ा होने तथा उस वस्तु पर विचार करते हुये पीछे-पीछे आने का निर्देश देता। कुछ देर तक वह कमरे का चक्कर लगाता रहता, फिर कमरे से उस वस्तु को उठाकर दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत कर देता, जिसका उस व्यक्ति ने मानसिक रूप से चयन किया था।
जॉन जब अपट्रान के घर से चला गया, तो क्रैग एक दिन ध्यान करने को बैठी। उसने अपने अवचेतन मन से कहा, कि इस वक्त जॉन कहाँ है और क्या कर रहा है? इसकी सूचना उसे दे। थोड़ी देर पश्चात ध्यान में क्रैग को जॉन सड़क पर गुलदस्ता लेते हुये कहीं जाता दिखाई पड़ा। बाद में जॉन को टेलीफोन कर क्रैग ने तथ्य का पता लगाया। उसने बताया कि सचमुच उस समय वह लाँस एन्जिल्स की सड़कों पर गुलदस्ता लिए अपने एक मित्र को भेंट करने जा रहा था। इसके बाद क्रैग ने जॉन पर इस प्रकार के ढेर सारे प्रयोग किये।
एक ऐसे ही प्रदर्शन में कुछ लोगों ने सेकेंड की जानकारी रखने के लिए स्टॉप वॉच रख रखी थी। जितने समय में जानने समाधि से उठ बैठने का वचन दे रखा था, बिल्कुल उतने ही समय में उसने समाधि तोड़ी, एक सेकेंड का भी आगे पीछे नहीं हुआ।
मनोनिग्रह के दो रूप हैं। एक उथला-जिसमें मन की अनावश्यक दौड़-धूप की उच्छृंखलता को रोककर निर्धारित उपयोगी क्रिया-कलाप में केन्द्रित किया जाता है। यह विशुद्ध भौतिक है। हाथ पैर आँख कान को प्रयोजन विशेष में लगाये रहने के समान।
इससे भी कई उपयोगी कार्य सम्पन्न होते हैं। गणितज्ञों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, मदारियों, बाजीगरों, बन्दूक का निशाना लगाने वालों में इस विशेषता के कारण ही प्रवीणता पाई जाती है। सृजन प्रयोजनों में अध्ययन में यह एकाग्रता आवश्यक होती है और पहलवान, सरकस के नट नायक प्रायः इसी कला में अभ्यस्त होते हैं। रस्सी पर चलना, खेल दिखाना इसी प्रवीणता का प्रतिफल है।
व्यवहारिक मन की ही तरह अचेतन तन भी मस्तिष्क के ही एक के एक स्तर विशेष हैं। उसका नियमन अभ्यास करने से वे क्षमताएँ जागृत होती हैं जिन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ कहते हैं। इसके द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्य भी मन में सन्निहित सूक्ष्म इन्द्रिय शक्ति से ही सम्पन्न होते हैं। आँखों से एक सीमित दूरी तक ही देखा जा सकता है। कानों में अमुक स्तर की आवाजें सुनी जा सकती हैं पर उनके साथ यदि निग्रह मन का संयोग बन पड़े तो दूर के दृश्यों को देख सकना और दूरवर्ती वार्तालाप को सुन सकना सम्भव हो सकता है। इसी प्रकार से एक इन्द्रिय का काम दूसरी इन्द्री से भी लिया जा सकता है। आँखों का काम नाक, कान या अंगुलियों से भी लिया जा सकता है। एक इन्द्रिय के न होने पर उस कार्य को अचेतन मस्तिष्क शरीर में किसी भी संवेदनशील अंग से पूरा करा सकता है। इस अभ्यास से प्राण शक्ति जासूसी कुत्तों जैसी भी हो सकती है। इसके सहारे किसी खोये या अविज्ञात व्यक्ति को ढूंढ़ा या पकड़ बुलाया जा सकता है। अन्य जीव जन्तुओं में कई प्रकार की विलक्षणताएं देखी जाती हैं। मकड़ी, बिल्ली आदि में मौसम ढलने या किसी दुर्घटना के घटित होने की पूर्वाभास क्षमता पाई जाती है। इस स्तर की विशेषताओं के लिए भौतिक मन का केन्द्रीकरण एक ज्ञानविधि का अभ्यास ही पर्याप्त है। मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म जैसे खेल सामान्य स्तर के लोग भी विकसित कर लेते हैं। कइयों में ये बिना किसी अभ्यास के जन्मजात रूप से पाई जाती है। पैरासाइकोलॉजी परामनोविज्ञान के आधार पर ऐसी ही क्षमता सम्पन्न मनुष्यों की खोज बीन की जा रही है। जिससे जाना जा सके कि किसमें अनायास ही यह विभूतियाँ प्रकट हुईं और किनने इसके लिए कुछ साधन या अभ्यास किया। इस संदर्भ में मस्तिष्क को और भी तीव्रगामी परिवर्तित स्थिति का बनाने के लिए कतिपय विश्व विद्यालयों द्वारा शोध प्रयास चल रहे हैं। इनमें सफलता भी मिल रही है। पर यह समझा जाना चाहिए कि यह समस्त घटना क्रम में विलक्षणताएँ भरी पड़ी हैं। एक शुक्राणु अपने जैसा एक नया मनुष्य गढ़ सकता है। इसे क्षमता के अंतर्गत ही समझा जाना चाहिए। मस्तिष्क शरीर का ही एक अंग है।
कितने ही व्यक्ति कई प्रकार के आश्चर्यजनक शारीरिक पराक्रम दिखाते हैं। खेल प्रतियोगिताओं में ऐसा बहुत कुछ देखने को मिलता है। कई व्यक्ति अनोखेपन के कई कीर्तिमान स्थापित करते हैं। यह शारीरिक पुष्टाई का प्रमाण है। इसी प्रकार मन भी शरीर का ही एक अंग अवयव है। यह भी ग्यारहवीं इन्द्रिय है। उसके चमत्कारों को भी भौतिक विशेषताओं की परिधि में लाना पड़ेगा। बहुत से छोटी आयु के बच्चे संगीत बजाते और प्रवचन रट लेते हैं। यह उनकी बौद्धिक प्रवीणता है। इन्हें आश्चर्यजनक मानते हुए भी शारीरिक या मानसिकता का नैतिक दासता ही कहा जायेगा।
आध्यात्मिक उत्कर्ष इससे आगे का चरण है। उसमें चित्त का नहीं, चित्त वृत्तियों का निरोध करना पड़ता है। चित्त वृत्तियाँ अर्थात् दुष्प्रवृत्तियां। संयम से लेकर योगाभ्यास तक यही विषय प्रधानता पाता रहा है। इस स्थिति से उबरने पर ही मनचाही आध्यात्मिक साधना बन पड़ती है, जिसमें वासना के लिए ही नहीं, तृष्णा के लिए भी कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। फिर अहन्ता की, वाहवाही लूटने की, दूसरों पर छाप छोड़ने, किसी को नीचा दिखाने की गुँजाइश कैसे हो सकती है। माँसाहार, मद्यपान जैसे आत्मा पर कलुष कषाय चढ़ायें वाले व्यवहारों की भी गुँजाइश नहीं है। ऐसे लोगों को आध्यात्मिक वातावरण में रहना पड़ता है। उन्हें मदारी, नट, बाजीगर एवं अविश्वासी तार्किकों के बीच में निर्वाह कर सकना कठिन होता है।
जादूगरी प्रत्यक्षतया हाथ की सफाई या छल है। भले जादूगर इस बात को प्रकट भी कर देते हैं कि यदि उनके पास सिद्धियाँ रही होती तो तमाशा दिखाने का व्यवसाय क्यों अपनाते। अध्यात्म वेत्ता छल क्यों करेगा? और किसलिए आत्म-प्रवंचना अपनाकर धूर्तों की बिरादरी में सम्मिलित होगा?
आध्यात्मिक सिद्धियाँ वे है जिनमें वे उच्चस्तरीय व्यक्ति किसी को अपना संचित विभूतियों का एक अंश देकर उसे अपनी बिरादरी में घसीट ले जाता है। ऊँचा उठाता और आगे बढ़ाता है। दोष-दुर्गुणों से छुड़ाता और कन्धे पर बिठाकर गहरी नदी में तैरते हुए अपने प्रियजनों को पार लगाता है।
वर्षा ऋतु निकट थी। पानी बरसने पर आश्रम में ईंधन की कमी न पड़े, इस दृष्टि से मातंग ऋषि ने गुरुकुल के छात्रों की पढ़ाई बन्द कर दी और जंगल से लकड़ी काटने और संचय करने में लगा दिया।
छात्र अभ्यस्त तो न थे पर गुरु आदेश का पालन करते हुए उत्साहपूर्वक उस कार्य में लग गये। अधिक श्रम करते और अधिक कुशलता का परिचय देने की मानों उनमें होड़ ही लग गई हो।
कई दिन के श्रम में अभीष्ट मात्रा में ईंधन एकत्रित हो गया। आश्रम की समीपवर्ती सभी झाड़ियाँ समाप्त हो गईं, दूर-दूर तक न कोई फूल था न पत्ता। फिर भी सुगन्ध ऐसी महक रही थी मानो आश्रम पुष्पोद्यान के बीच खड़ा हो।
छात्रों ने पूछा- देव, इतनी तीखी सुगन्ध कहाँ से आ रही है। मातंग ने छात्रों से कहा- यह गन्ध भूमि से उठ रही है। जाकर देखो किस स्थान से यह महक आती है।
छात्र भूमि सूँघते फिरे। जहाँ-जहाँ से वह उठ रही थी, उन सभी स्थानों पर उनने चिन्ह लगा दिये। बढ़ी हुई जिज्ञासा ने पूछा, पुष्पों से गन्ध उठते तो हमने देखी है पर भूमि से गन्ध उभरने का क्या कारण है?
मातंग ऋषि ने कहा- वत्स, तुम्हारे श्रम सीकर जहाँ गिरे हैं वही भूमि महकने लगी। मनोयोगपूर्वक किये गये श्रम का यह चमत्कार तुम कभी भी कहीं भी देख सकते हो।
शरीर यों सभी के देखने में एक जैसे प्रतीत होते हैं, पर उनमें ऐसी विलक्षण विशेषता देखी जाती है कि आश्चर्यचकित रह जाता है। हिमालय की गुफाओं में ऐसा सन्त पाये गये हैं जिन्हें उस क्षेत्र में खाने योग्य कोई वस्तु भी नहीं मिलती थी और वे अपना नियत स्थान छोड़कर कहीं जाते भी नहीं थे। वायु में रहने वाले पोषक तत्वों से ही वे अपने लिए काम चलाऊ आहार उपलब्ध कर लेते हैं।
आहार की तरह ही नींद का स्थान भी है। सोये बिना न तो थकान दूर होती है और न मस्तिष्क को विश्राम मिलता है। बहुत दिन जागते रहने पर मनुष्य पागल हो जाता है। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि पागल होने से पूर्व नींद आना बन्द हो जाती है।
किन्तु कभी-कभी इसके भी अपवाद पाये जाते हैं। जकार्ता से उत्तर पूर्व में एक द्वीप है- बाली। उसके अलासंकार कस्बे में एक व्यक्ति है ‘केतूल’ वह पिछले 40 साल से क्षण भर के लिए भी नहीं सोया।
द्वितीय महायुद्ध के समय उसने अपनी आँखों ऐसे दृश्य देखे थे जिनसे उसका कलेजा काँप गया। तब वह छोटा बालक ही था। उस घटना का उसके मन पर ऐसा घातक प्रभाव पड़ा कि उसे नींद आना बिलकुल बन्द हो गई। कुछ दिन तो उसे थकान रही किन्तु पीछे शरीर और मस्तिष्क ने अपने को ऐसे ढाँचे में ढाल लिया कि नींद की आवश्यकता शरीर दूसरी किसी विशेष प्रणाली से पूरी करने लगा। जकार्ता पोस्ट नामक पत्र के अनुसार दूर-दूर के मनःशास्त्री इस रहस्य को खोजने के लिए वहाँ पहुँचे हैं, पर अभी तक उस रहस्य का उद्घाटन नहीं हो सका है।
हारमोनों की न्यूनाधिकता में तनिक-सा अन्तर आ जाने से मनुष्य बहुत भी लम्बा हो सकता है और बहुत ठिगना भी रह सकता है।
चीन में एक व्यक्ति सुनीगंज की लम्बाई 7 फुट 9।। इंच थी। बाजार में इतना बड़ा ताबूत न मिला तो उसके पैर सिकोड़ कर सन्दूक में रखना और दफनाना पड़ा।
इसी प्रकार स्काटलैण्ड में एक बौना आदमी मात्र ढाई फुट का था। वह बौद्धिक दृष्टि से बौना नहीं था। समझदारी की बातें कहता और समझदारों जैसे काम करता था वह 30 वर्ष जीवित रहा।
ईराक के एक नागरिक सलमाआवोदीन ने आठ साल में अपने रक्त की 435 वीं बोतल दान देकर रक्त दान का नया विश्व रिकार्ड कायम किया है। उसका स्वास्थ्य इन वर्षों में यथावत् बना हुआ है उसको कोई क्षति नहीं पहुंची है।
अभ्यास करने से मनुष्य अपनी कार्य क्षमता असाधारण रूप से बढ़ा सकता है। अपंगों के इतिहास में ऐसे अनेकों हुए हैं जिनने दोनों हाथ चले जाने पर पैर नेत्र और मुँह की सहायता से उच्च शिक्षा प्राप्त की और चित्रकला तथा टाइप राइटिंग जैसे कार्यों में सामान्य लोगों की तरह काम कर सके।
योगाभ्यास के आधार पर कई व्यक्ति अपने हृदय की धड़कन और श्वास-प्रश्वास क्रिया बन्द करके समाधिस्थ हो जाते हैं। देखने में वे मृतक जैसी स्थिति में होते हैं, पर इच्छित समय पर समाधि में लगकर फिर अपने अवयवों को जीवित मनुष्यों की तरह सक्रिय बना लेते हैं।
अतीन्द्रिय क्षमताओं के ज्ञान में जैसे-जैसे अभिवृद्धि होती जाती है। उसी आधार पर ऐसे प्रमाण मिल रहे हैं कि एक ही शरीर में दो या इससे भी अधिक व्यक्तित्व निवास कर सकते हैं। कभी-कभी एक जीवित और दूसरा मृतात्मा होता है। कभी-कभी छाया पुरुष जैसे दो व्यक्तित्व एक ही शरीर में निवास करते पाये गये हैं। उससे भी अधिक आत्माओं के एक ही शरीर में रहने की कुछ घटनाएँ देखी गई हैं।
“मिस्टीरिअल यूनीवर्स” ग्रन्थ के रचयिता सरजेम्स जीन्स ने लिखा है- विज्ञान जगत अब पदार्थ सत्ता नियंत्रण करने वाली चेतन सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा है और यह खोजने में लगा है कि हर पदार्थ को गुण धर्म की रीति-नीति से नियन्त्रित रखने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है? पदार्थ को स्वसंचालित, अचेतन, सत्ता समझने की प्रचलित मान्यता अब इतनी अपूर्ण है कि उस आधार पर प्राणियों की चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन सत्ता को समझने का प्रयास गम्भीरतापूर्वक कर रहे हैं।
फिजिओलॉजीकल साइकोलॉजी के लेखक श्री मेक डूगन ने लिखा है- मस्तिष्कीय संरचना को कितनी ही बारीकी से देखा समझा जाय यह उत्तर नहीं मिलता कि पाशविक स्तर से ऊँचे उठकर मानव प्राणी अपने में उच्चस्तरीय ज्ञान-विज्ञान की धारायें कैसे बहाता रहता है और भावनापूर्ण सम्वेदनाओं से कैसे ओत-प्रोत रहता है? भाव सम्वेदनाओं की गरिमा समझते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य के भीतर कोई अमूर्तिक सत्ता भी विद्यमान है जिसे आत्मा अथवा भाव चेतना जैसा कोई नाम दिया जा सकता है।
अणु विज्ञान के आचार्य अलबर्ट आइन्स्टीन ने परमाणु प्रक्रिया का विशद् विवेचन करने के उपरान्त अपने निष्कर्ष को घोषित करते हुए कहा है- मुझे विश्वास हो गया है कि जड़ प्रकृति के भीतर एक ज्ञानवान चेतना भी काम कर रही है।
सर ए. एस. एडिंग्टन का कथन है- भौतिक पदार्थों के भीतर एक चेतन शक्ति काम कर रही है जिसे अणु प्रक्रिया का प्राण कहा जा सकता है। हम उसका सही स्वरूप और क्रिया-कलाप अभी नहीं जानते पर यह अनुभव करते हैं कि संसार में जो कुछ हो रहा है वह अनायास, आकस्मिक या अविचारपूर्ण नहीं है।
पी. गेईउर्स अपने ग्रन्थ ‘इवोल्यूशन’ में अपने निष्कर्ष व्यक्त करते हुए कहते हैं- सृष्टि का आरंभ जड़ परमाणुओं से हुआ और ज्ञान पीछे उपजा यह मान्यता सही नहीं है। लगता है सृष्टि से भी पूर्व कोई चेतना मौजूद थी और उसी ने क्रमबद्ध एवं सोद्देश्य रीति-नीति के साथ इस विश्व ब्रह्मांड का सृजन किया।
‘इन्ट्रोडेक्शन टू साइन्स’ पुस्तक में विज्ञान जे. ए. थामसन ने कहा है- विश्व में जीवन कब और कैसे उत्पन्न हुआ उसका विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं है।
ख्याति प्राप्त विज्ञान वेत्ता टेण्डल ने अपने ग्रन्थ ‘‘फ्रेगमन्ट्स आफ साइन्स” में स्वीकार किया है- हाइड्रोजन, आक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस प्रभृति तत्वों के ज्ञान शून्य परमाणुओं से मस्तिष्क की संरचना हुई है।
जे. वी. एस हेल्टेन का कथन है पदार्थ या शक्ति ही इस संसार का समग्र स्वरूप नहीं है। हम दिन-दिन इसी निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि एक समष्टिगत मनःतत्व समस्त विश्व पर नियन्त्रण स्थापित किये हुए है।
आर्थर एच. क्रांपटन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि संसार के पदार्थों को जलते हुए ईंधन जैसा समझा जा सकता है। जड़ चेतन की ज्वलन्त गतिविधियाँ ऐसे अग्नि तत्व के साथ सम्बद्ध हैं जिसे व्यापक चेतना या आत्मा आदि किसी नाम से संबोधित किया जा सकता है।
हर्वट स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक ‘फर्स्ट प्रिन्सीपल’ में कहा- एक ऐसे विश्वव्यापी चेतन तत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता जो साधारणतया सभी प्राणियों में विशेषतया मानव प्राणियों में जीवन की एक सुरम्य प्रक्रिया का निर्धारण करती है। प्राचीन काल के धर्माचार्य या दार्शनिक जिस प्रकार उसका विवेचन करते रहे हैं भले ही वह संदिग्ध हो, भले ही उसका सही स्वरूप अभी समझा न जा सका हो, पर उसका अस्तित्व असंदिग्ध रूप से है और वह ऐसा है जिसका गम्भीर अन्वेषण रूप से है और वह ऐसा है जिसका गम्भीर अन्वेषण होना चाहिए।
डा. गार्ल कहते हैं- संसार का मुख्य तत्व पदार्थ नहीं वरन् वह चेतन सत्ता है जो समझती, अनुभव करती, सोचती, याद रखती और प्रेम करती है। मृत्यु के उपरान्त जीवन की पुनरावृत्ति का सनातन क्रम उसी के द्वारा गतिशील रहता चला आ रहा है।
संसार के प्रमुख विज्ञान वेत्ताओं के सम्मिलित निष्कर्ष व्यक्त करने वाले ग्रन्थ “दी ग्रेट डिजाइन” में प्रतिपादन किया गया है कि यह संसार निर्जीव यन्त्र नहीं है। यह सब अनायास अकस्मात ही नहीं बन गया है। चेतन और अचेतन हर पदार्थ में एक ज्ञान शक्ति काम कर रही है। उसका नाम भले ही कुछ भी दिया जाय।
‘‘साइन्स एण्ड सोल’’ के लेखक आर. डबलिन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि प्राणि जगत के अस्तित्व को जड़ परमाणुओं की हलचल मात्र-मान बैठने से काम नहीं चलेगा। भावना, विचारणा, कल्पना और सम्वेदना जैसी तरंगें उत्पन्न करने वाली ज्ञान सत्ता को यदि अस्वीकार किया जाय तो जीवधारियों की सत्ता की सही व्याख्या ही नहीं हो सकती।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक आलिवरलाज कहते थे- ‘‘मुझे विश्वास है अब वह समय निकट आ गया है जबकि विज्ञान को नये क्षेत्र में प्रवेश करना होगा। विज्ञान अब भौतिक जगत तक ही सीमित नहीं रहेगा। चेतन जगत भी अब वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।’’
इंग्लैंड की रॉयल सोसायटी के सेक्रेटरी सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘सर जेम्स जीन्स’ ने लिखा है- ‘‘पहले यह मान्यता थी कि जड़ जगत की चेतना ही उत्पत्ति का आधार है। भौतिक तत्वों के समन्वय से ही मन की उत्पत्ति होती है। लेकिन यह यथार्थवादी मान्यता अब बदल गई है। अब यह माना जाने लगा है कि चेतन सत्ता ही जड़ पदार्थों की उत्पत्ति करती है। इस जड़ जगत के पीछे एक विराट चेतना काम कर रही है।’’
सर जेम्स जीन्स ने “दि न्यू बैकग्राउण्ड ऑफ साइन्स” नामक पुस्तक में यह उल्लेख किया है “उन्नीसवीं सदी में विज्ञान का मूल विषय भौतिक जगत था लेकिन अब प्रतीत हो रहा है कि विज्ञान जड़ पदार्थों से अधिकाधिक दूर होती जा रहा है।”
‘दि मिस्टीरियस यूनिवर्स” में उन्होंने लिखा है- वैज्ञानिक विषय के संदर्भ में हमने जो पूर्व मान्यता बना ली है अब उसकी पुनः परीक्षण की आवश्यकता है। जड़ जगत को जो प्रधानता दे बैठे थे- अब प्रतीत हो रहा है कि वह गौण है। जड़ जगत के पीछे एक नियामक सत्ता काम कर रही है।
प्रो. ए.एस. एडिंगटन ने कहा है- ‘‘अब विज्ञान इस निर्णय पर पहुँचा है कि समस्त सृष्टि को एक अज्ञात शक्ति गतिमान कर रही है।’’
अब विज्ञान का जड़ पदार्थों से लगाव समाप्त हो गया। चेतना, मन, आत्मा का अस्तित्व माना जाने लगा है। चेतन सत्ता ही जड़ जगत की उत्पत्ति का मूल कारण है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक हर्बर्ट स्पेन्सर ने कहा- ‘‘जिस शक्ति को मैं बुद्धि की पहुंच से परे मानता हूँ वह धर्म का खण्डन नहीं करती अपितु उसे और अधिक बल पहुँचाती है।’’
प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलफ्रेड रसल वैलेस ने अपनी पुस्तक ‘‘सोशल इनवाइरनमेण्ट एण्ड माँरल प्रोग्रेस’’ में स्पष्ट लिखा है- “मुझे विश्वास है कि चेतना ही जड़ पदार्थों को गति प्रदान करती है।’’
सन् 1934 में “दि ग्रेट डिजाइन” नामक पुस्तक में चौदह वैज्ञानिकों ने अपना मत इस प्रकार प्रकट किया- ‘‘यह संसार चेतना रहित कोई मशीन नहीं है। इसका निर्माण अकस्मात ऐसे ही नहीं हो गया। ब्रह्मांड के सभी क्रिया-कलापों को एक चेतन शक्ति नियन्त्रित कर रही है चाहे हम उसे कुछ भी नाम दे दें।”
अलबर्ट आइन्स्टीन ने कहा है- ‘‘मैं ईश्वर को मानता हूँ। इस अविज्ञात सृष्टि के अद्भुत रहस्यों में वह ईश्वरीय शक्ति ही परिलक्षित होती है। अब विज्ञान भी इस बात का समर्थन कर रहा है कि सम्पूर्ण सृष्टि का नियमन एक अदृश्य चेतन सत्ता कर रही है।’’
जे. बी. एस. हैलडेन ने लिखा है- ‘‘अविज्ञात सृष्टि के कुछ ही रहस्यों को हम जान पाये हैं। सृष्टि को हम एक निर्जीव मशीन मात्र समझ रहे थे। यह हमारी भूल थी। वास्तव में यह सृष्टि चेतन शक्ति से सम्बद्ध है। जड़ पदार्थों का संचालन यह चेतन शक्ति ही कर रही है।
आर्थर एस. एडिंगटन ने लिखा है- ‘‘ईश्वर का अस्तित्व नहीं है यह मान्यता टूट चुकी है। चूँकि धर्म आत्म और परमात्म शक्ति से जुड़ा हुआ है। अतः धर्म का खण्डन नहीं किया जा सकता।’’
आर्थर एच. क्राम्प्टन ने कहा है- ‘‘हमारे चिंतन मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है। वरन् इससे भी अलग एक शक्ति है जो विचारणाओं को प्रेरित करती है। उस चेतन शक्ति की सम्पूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पायी है यह लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व बना रहता है।
उस ईश्वर को पूजो जिसे तुम जेब में रख सको या जिसकी जेब में तुम रह सको। उसे तलाशते मत फिरो जो सातवें आसमान पर रहता है और एक ही भाषा की वर्णमाला पढ़ा है।
सन्त दादू में ब्रह्मज्ञानी और श्रमजीवी का समन्वय था। ऋषि परम्परा को उनने इसी रूप में समझा और अपनाया था। उपासना और सत्संग प्रवचन के उपरान्त वे अपना बचा हुआ समय लोकोपयोगी कार्यों में लगाते थे?
उन दिनों बचे समय में वे पगडंडी के किनारे की झाड़ियाँ काट रहे थे।
सन्त दादू से भेंट करने के लिए उस दिन शहर कोतवाल घोड़े पर चढ़कर आये। रास्ते में झाड़ी काटता एक अर्ध नग्न श्रमिक दिखा। पूछा- ‘‘बताओ सन्त दादू का आश्रम कहाँ है? उनसे भेंट कब होती है।’’
दुविधा में पड़े सन्त अचकचा रहे थे कि क्या उत्तर दें? कुछ बोल नहीं पा रहे थे। इस गुमसुम स्थिति से खीजकर कोतवाल ने एक हन्टर जमा ही दिया। बोले- “गूँगा-बहरा है क्या, जो बात का जवाब तक नहीं देता।’’
घोड़ा बढ़ाकर आगे पहुँचे, तो एक किसान मिला। उससे भी कोतवाल ने दादू का पता पूछा। उसने कहा- ‘‘पीछे लौट जाइए। उधर झाड़ियाँ काटते मैंने उन्हें देखा है। शायद वहीं होंगे। किसान ने जैसी आकृति बतायी, वह तो उसी व्यक्ति जैसी थी, जिसमें कि हंटर जमाकर वे आये थे।
लौट कर देखा तो दादू पीठ सहला रहे थे। हंटर जोर का पड़ा था। चमड़ी उखड़ आयी थी। कोतवाल ने उन्हें पहचाना, तो क्षमा माँगने लगा।
दादू ने कहा- ‘‘अज्ञान ही विपत्तियों का कारण है। आपने मुझे नहीं पहचाना और मैनें भी आपको जानने का प्रयत्न नहीं नहीं किया है। जानने वाले दुर्घटना करने और सहने से बच जाते हैं।’’
इस संक्षिप्त से सन्त समागम में सीखा और सिखाया गया है- ज्ञान ही सुख का कारण है। ज्ञान में सर्वोपरि महत्व का आत्मज्ञान है, जिसके सहारे बन्धन कटते और सिद्धि के द्वार खुलते हैं।
मनुष्य का हृदय धड़कता है और उस आधार पर समस्त शरीर में रक्त संचार एवं गतिशीलता का माहौल बनता है। धड़कन बन्द हो जाने पर शरीर की मृत्यु सुनिश्चित है।
ब्रह्मांड को भी ईश्वर का विराट रूप माना गया है। उसका भी कोई हृदय हो चाहिए। यह धड़कन वैज्ञानिकों ने सुनी है और उसे किसी तारे से आने क कल्पना छोड़कर यह स्वीकार किया है कि यह ब्रह्मांड की हृदय धड़कन है।
पृथ्वी पर अन्तरिक्ष से कुछ क्रमबद्ध रेडियो संकेत आते रहते हैं। उनके सम्बन्ध में कोई अनुमान लगाये जाते हैं जिनमें से एक यह भी है कि किसी विकसित सभ्यता वाले लोकवासी पृथ्वी के साथ सम्बन्ध सूत्र जोड़ने के लिये यह आदान-प्रदान संकेत भेजते हैं।
अब उनके सम्बन्ध में अधिक जानकारी मिली है और प्रतीत हुआ कि पलसार्स तारों से एक विशेष प्रकार के शक्तिशाली रेडियो बौछार होती है। वही इन वीप-वीप संकेतों के रूप में धरती तक आते-आते बदल जाती है। इतनी सशक्त रेडियो बौछार का समीपवर्ती क्षेत्र में और कोई उद्गम स्त्रोत है नहीं।
यह पलसार्स तारे क्या हैं? इनका विवेचन करते हुए अन्तरिक्ष विशेषज्ञों ने इनकी संरचना अद्भुत बताई है। वे कहते हैं जब कोई तारा जीर्ण होकर मरणासन्न होता है तब उसका विस्तार सकुड़ते-सकुड़ते अत्यन्त सघन हो जाता है। विशाल विस्तार थोड़े से में सिमट जाता है। सूर्य अपनी पृथ्वी से 330,000 गुना भारी है। यदि इसकी ऊर्जा समाप्त हो जाय तो वह पिचककर मात्र दस किलोमीटर व्यास का गोला बन जायेगा। इतने पर भी उसका भार उतना ही बना रहेगा जितना अब है। सभी मरणासन्न तारों की यही स्थिति होती है।
इस सिकुड़न में जहाँ विस्तार कम होता है वहाँ उनकी रेडियो धर्मिता असंख्य गुनी बढ़ जाती है और वह समूचे ब्रह्मांड में फैलने लगती है। दूरी के हिसाब से जो ग्रह जितने समीप होते हैं वे उस विकिरण से उतने ही अधिक प्रभावित होते हैं। दूरी बढ़ते जाने पर प्रभाव घटते जाना स्वाभाविक है।
रुक-रुक कर विकिरण धरती पर आने से लगता है ब्रह्मांड का दिल धड़कता है। मनुष्य का हृदय जिस तरह धक-धक करता रहता है उसी प्रकार क्रमबद्ध रूप से इन संकेतों पर ध्यान केन्द्रित करने पर लगता है कि ब्रह्मांड शरीर का कोई हृदय केन्द्र है और वहाँ यह धड़कन जैसी हलचल होती है। इस मान्यता की संगति इसलिए और भी अधिक अच्छी तरह बैठ जाती है कि प्रकृतिगत हलचलों के पीछे भी किसी पेण्डुलम गति को काम करते समझा जाता है। घड़ी हलचल पेण्डुलम क्रम पर आधारित है। हृदय की धड़कन को भी पेण्डुलम व्यवस्था माना जाता है। ब्रह्मांड का क्रम भी इसी आधार पर चल रहा हो तो क्या आश्चर्य?
इस पलसार्स समूह में एक विलक्षण है इसका नाम 153 रखा गया है। यह अपने स्थान पर अवस्थित है। अन्य साथियों की तरह अपनी धुरी पर घूमता नहीं। और बौछार का सतत् क्रम चलाता है। जब कि अन्य धुरी पर घूमने के कारण जब ध्रुव केन्द्र सामने होने पर ही पृथ्वी की ओर बौछार पहुँचा पाते हैं। इस समुदाय का एक ही स्थिर क्यों हैं इसके बारे में कहा जाता है कि यह पिछले ब्रह्मांड का बचा-खुचा अवशेष है जो किसी प्रकार किसी कोने में महाप्रलय और महासृजन की चपेट में आने से बच गया है।
जिसकी प्रेरणा परिष्कृत अन्तःकरण में उठती है वह पूरी होकर रहती है।
प्रकृति के अगणित रहस्यों में से मनुष्य के हाथ अभी थोड़े से ही लग पाये हैं। यहाँ तक कि जिस सूर्य ऊर्जा के मध्य हम जीवन यापन करते हैं, उसका भी समुचित मात्रा में उपयोग सीख नहीं पाये हैं। अन्यथा ईंधन और ऊर्जा का जो संकट सामने खड़ा है उसका अब से बहुत पहले ही समाधान हो गया होता।
भूत और भविष्य की घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शन करना यों आज सर्वसाधारण के लिए सम्भव नहीं। कोई योगी सिद्ध पुरुष ही उस संदर्भ में कुछ बता सकते हैं। नर का यदि सुदूर नक्षत्रों तक पहुंच सकना किसी प्रकार सम्भव हो सके तो वहाँ से वे सारे दृश्य प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं जिन्हें हम आज चिर अतीत कहते हैं।
1971 में रूस और अमेरिका ने मिलकर एक संस्था का गठन किया, जिसे ‘‘सोवियत अमेरिकन कांग्रेस आन एण्स्ट्रा टेकिस्टेरियस लाइफ’’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यह संस्था अमेरिका के ‘ब्यूराकन’ प्रदेश में गठित हुई है।
इस संस्था ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि आकाश गंगा में ही पृथ्वी जैसी विकसित सभ्यता 1 लाख आकाशीय पिंडों में होने की सम्भावना है। इस सम्भावना की बात तय होने पर वैज्ञानिकों में यह जानकारी प्राप्त करने की उत्सुकता हुई कि वहाँ के लोग कैसे रहते होंगे आदि। आकाशीय पिण्डों की अति दूरी को ध्यान में रखते हुए संचार माध्यम केवल “रेडियो सिगनल” ही हो सकते हैं। ऐसा निश्चय होने के उपरान्त खगोल विद्या-विदों एवं अन्य वैज्ञानिकों ने सेटी (एस. ई. टी. ई.) -सर्च फार एक्स्ट्रा टेरिस्टेरियल इन्टेलीजेन्स) नामक संस्था गठित की। कई वर्षों से आकाश में ‘रेडियो सिगनल’ भेजे जा रहे हैं और प्रत्येक आकाशीय पिण्ड की रेडियो एक्टीविटी मालूम करके उनका नक्शा बनाया जा रहा है। इस कार्य की जटिलता के बारे में सेटी के पायोनियर (अग्रगामी) डॉ. फ्रैन्क डो. ड्रेक कहते हैं- ‘यह कार्य उस सुई को ढूँढ़ने के समान है जो विशाल घास के ढेर में खो गई है।’
प्रसिद्ध डच भूगर्भ शास्त्री प्रो. सोल्को डब्लू. ट्राम्प ने ‘साइकिल फिजिक्स’ पुस्तक में विभिन्न प्रयोग परीक्षण करके यह लिखा है कि पृथ्वी अगणित विशेषताओं और धाराओं से भरे-पूरे चुम्बकत्व से भरी-पूरी है। वैज्ञानिक उपलब्धियों में प्रकारान्तर से इसी क्षमता के स्रोतों को खोजा और प्रयोग में लाया गया है। इसका समर्थन (फ्रेन्च एटॉमिक एनर्जी कमीशन’ के सदस्य ‘इकोले नारमल और अमेरिका के सुरक्षा-विभाग एवं अर्कन्सास विश्व विद्यालय के डा. जाबोज हारबलिक ने भी किया है। डा. जाबोज ‘अमेरिकन सोसायटी आफ डाइसर्स’ के प्रमुख हैं।
अन्य ग्रहों तारकों तक पहुँचने के लिए अभी तक न कोई वाहन ढूंढ़ा जा सका है और न किसी सुलभ मार्ग की जानकारी मिली है। किन्तु यदि पृथ्वी के निकटवर्ती किसी ब्लैक होल में प्रवेश किया जा सके और गन्तव्य लक्ष तथा उस विवर का अन्त जाना जा सके तो बिना किसी परिश्रम के एक से दूसरे ब्लैक होल के रास्ते उन सुदूर निहारिकाओं में पहुँचा जा सकता है। जिनकी कि अभी तो पूरी कल्पना भी नहीं हो पाई है।
अभी वारमूडा त्रिकोड के एक छोटे से ब्लैक होल का पता चल पाया है जो वायुयानों और जलयानों को अपने उदर में ग्रास की तरह घसीट ले जाता है पर पृथ्वी भर में यह एक ही हो ऐसी बात नहीं है। ध्रुव प्रदेश और समुद्रों के सुविस्तृत क्षेत्र में और भी कितने ही ऐसी ब्लैक होल हो सकते हैं जिनका आदि अन्त जाना जा सके तो ब्रह्मांड यात्रा अति सरल हो सकती है।
खगोल शास्त्रियों का कहना है कि यदि ब्लैक होल के शक्ति भण्डार का उपयोग किया जा सके तो ऊर्जा के लिए मुंहताज न होना पड़े। ब्लैक होल का शक्ति भण्डार अनन्त काल चलने वाला होता है, ऐसी मान्यता है।
कोई एक विशालकाय तारा जब मृत्यु के सन्निकट पहुँचता है तब उस दृश्य का अवलोकन करते हुए खगोल शास्त्रियों ने बताया कि उस अवधि में तारे का प्रकाश करोड़ों गुना बढ़ जाता है। यह इतना अधिक बढ़ता है कि सम्पूर्ण तारा समूह का प्रकाश एक ओर, इस मृतप्राय तारे का प्रकाश और विकिरण एक ओर। कई अरब वर्षों में एक तारे से जो प्रकाश शक्ति निःसृत होती है, मृत्यु के कुछ घण्टे पूर्व उतनी ही मात्रा में शक्ति व प्रकाश प्रवाहित हो जाता है। यदि अति विशालकाय तारे की मृत्यु का गहराई से अध्ययन किया जाय तो उसकी मृत्यु के साथ कभी-कभी एक ब्लैक होल का जन्म होता है। खगोल शास्त्रियों ने मृतप्राय तारे की तुलना करते हुए बताया है कि जिस पर ज्वलनशील पदार्थ या लकड़ी से निर्मित 40-50 मंजिल का मकान जलते-जलते ही टूटकर गिरने लगता है और अन्त में बहुत छोटे रूप में शेष रह जाता है उसी प्रकार तारा भी जलते-जलते अपने करोड़ों गुने छोटे रूप में संकुचित हो जाता है।
यदि कोई विराट् तारा जो सूर्य से 10 गुना बड़ा हो, उसकी मृत्यु हो तो वह ब्लैक होल में परिवर्तित होता है। उस स्थिति में वह कितना संकुचित होता है इसे इस प्रकार समझा जा सकता है- गुरू पृथ्वी से 13 सौ गुना बड़ा है और सूर्य गुरू से 1 हजार गुना बड़ा है तो 10 सूर्य जितने आकार का तारा पृथ्वी से 130 लाख गुना बड़ा होगा। ब्लैक होल बनने के बाद यह विराट् तारा पृथ्वी पर स्थित किसी ‘हवाई टापू’ जितना रह जाता है। अपने स्वरूप से कितने अरबों गुना गुना छोटा हो जाता है।
ब्लैक होल दो प्रकार के होते हैं (1) भंवरदार और (2) बिना भँवर वाले। जैसे नदियों में कई स्थानों पर गहरे पानी में भँवर होती है ठीक उसी प्रकार ब्लैक होल भी अपने पास जाने वाली किसी भी वस्तु को अपनी ओर खींच लेता है। इसी एक लक्षण द्वारा ब्लैक होल का अनुमान लगाया जा सकता है। क्योंकि यह प्रकाश भी सोख लेता है।
हमारे ‘मन्दाकिनी’ तारा विश्व में ही 50 लाख से अधिक ब्लैक होल होने की सम्भावना है। एक बड़ा ब्लैक होल कन्या राशि में पाया गया है जिसका एम 85 नाम है। एवं पृथ्वी से 6 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है।
प्रसिद्ध भौतिकविद् ‘जान ए विलर’ की मान्यता है कि एक ब्रह्मांड से दूसरे ब्रह्मांड में जाने के लिए गुप्त सुरंग मार्ग ब्लैक होल हो सकते हैं।
कैम्ब्रीज युनिवर्सिटी के अनुसन्धान कर्ता स्टीफन होडिंग के अनुसार ब्लैक होल में स्थल और समय का कोई बन्धन नहीं होता। ब्लैक होल के माध्यम से मनुष्य वर्तमान से कई लाखों वर्ष पूर्व और लाखों वर्ष आगे भी पहुँच सकता है।
स्टीफन ने कहा है कि ब्लैक होल में कण और प्रति कण एक दूसरे को नष्ट करते रहते हैं।
जिस प्रकार ब्लैक होल प्रत्येक प्रकार के पदार्थ एवं प्रकाश किरण सोख लेता है और कहीं कुछ दिखाई नहीं देता है। इसी ब्रह्मांड में खगोलविदों ने ऐसे स्थान पाये हैं। जहाँ पहले कुछ नहीं था, वहाँ तीव्र गति से प्रकाश एवं अनेकों प्रकार के आयोनाइज कण पाये गये। ऐसे स्थानों को ‘‘व्हाइट होल’’ नाम से जाना जाता है। खगोल शास्त्रियों की कल्पना है कि ‘ब्लैक होल’ और ‘व्हाइट होल’ के बीच आपसी सम्बन्ध हैं। दोनों के माध्यम को ‘वर्म होल’ कहते हैं।
व्हाइट होल की खोज के बाद वैज्ञानिक अनुमान लगा रहे हैं कि संलग्न व्हाइट होल और ब्लैक होल के माध्यम से किसी अन्य ब्रह्मांड में भी पहुँचा जा सकता है क्या? इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि इन संलग्न ब्लैक और व्हाइट होल के माध्यम से किसी अन्य ब्रह्मांड में कुछ समय में पहुंच सकते हैं जबकि यदि सीधे मार्ग से चला जाय तो कई अरब वर्ष लग जायेंगे।
महाभारत काल में भगीरथ के पूर्वज सगर राजा ने अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञ का घोड़ा घूमते-घूमते किसी ऐसे अज्ञात स्थान में पहुँच गया जिसका पता नहीं लगा। उसे ढूंढ़ने में 60 हजार का जन समुदाय भी गायब हो गया। किंवदंती है कि वे सब पाताल पहुँच गये और भगीरथ ने तप द्वारा गंगा अवतरण कर उनका उद्धार किया। सम्भवतः ऐसी ही कुछ गति इन तारकों की भी होती होगी।
खोज के ऐसे-ऐसे अनेक क्षेत्र विज्ञान के सामने पड़े हैं पर उसे नक्षत्र युद्ध और परमाणु बम बनाने की वितृष्णा में चैन पड़े तब तो उन दिशाओं में कुछ सोच सकना संभव हो।
दार्शनिक कानफ्युनियस जब मरने लगे तो शिष्यों को अपना मुंह फाड़कर दिखाया कि ‘‘जीभ पहले जन्मी पर अभी तक जिन्दा है। दाँत बाद में जन्मे पर पहले उखड़ गये। कठोर पहले हारता है और कोमल बहुत दिन सफल रहते हैं। मेरी इस शिक्षा को सदा याद रखना’’ इतना उपदेश देकर उनने अपनी आंखें बन्द कर ली।
एक बार की बात है- देवताओं और असुरों में घमासान युद्ध छिड़ा। दोनों पक्षों ने अपनी समूची शक्ति दाँव पर लगा दी। आरम्भ के दिनों में देवताओं का पक्ष लड़खड़ाया। सेनापति बदलने की आवश्यकता अनुभव हुईं। निर्णय प्रजापति को करना था।
ब्रह्माजी कारण जानने और उपाय खोजने के लिए समाधिस्थ हो गये। उनने देखा देवता विलासी और प्रमादी हो गये हैं। सो अन्य गुणों का बाहुल्य होते हुए भी इन दो कमियों के कारण वे जीत न सकेंगे। संयमी और पराक्रमी सेनापति की नियुक्ति होनी चाहिए।
उन दिनों भूलोक में राजा मुचुकुन्द की समता संयम और पराक्रम में मुकाबला कर सकने वाला और कोई नहीं था। सो उन्हें ही प्रजापति के आदेश से देव वाहिनी का सेनापति बना दिया गया। उनने आते ही माहौल बदल दिया। हारते हुए देवता जीतने लगे।
युद्ध लम्बा खिंच गया। साथ ही पाशा भी पलटने लगा। असुर फिर तगड़े-पड़ते गये और देवता जीती बाजी हारने लगे। चिन्ताजनक स्थिति से प्रजापति को अवगत कराया गया। उनने देखा कि विजय मिलते देख कर मुचुकुन्द अहंकारी होने लगा है। विजय के लिए अपेक्षित गुणों में संयम और पराक्रम की ही तरह निरहंकारिता भी एक महत्वपूर्ण आधार है। वह घटने लगे या हो नहीं तो समझना चाहिए पराभव के दुर्दिन आ गये। मुचुकुन्द को भूल सुधार साधना करने को कहा गया। नम्रता का अभ्यास करने में देर लगते देखकर नये सेनापति की नियुक्ति आवश्यक हो गई।
इसके लिए कार्तिकेय उपयुक्त पाए गये। उनमें तीनों विशेषताएँ थीं। अतएव नये सेनाध्यक्ष वे ही बने और नई रणनीति अपनाकर दैत्य समुदाय पर विजय प्राप्त करने में सफल हुए।
मानवीय गरिमा को भी सदा यही गुण प्रभावित करते हैं। यह परम्परा इस देश में सदैव चलती रही है।
यौन परिवर्तन का प्रथम आपरेशन जनवरी 1955 में अमेरिका में हुआ था। इसके उपरान्त वह सिलसिला तेजी से चला। जिन्हें यौन विकृतियाँ थी, वे आज लज्जा वश अपनी बात किसी के सम्मुख प्रकट नहीं कर पाते थे। पर इस सफलता से अनेकों की हिम्मत बढ़ी और अनुमानतः संसार भर में अब तक 70 हजार लोगों ने अपने आपरेशन कराकर लिंग परिवर्तन किया है। इनमें से 20 हजार अकेले अमेरिका में ही हुए हैं। डा. आर. विनियर ने इस सम्बन्ध में बहुत ख्याति प्राप्त की है।
ऐसे आपरेशन मात्र उन्हीं के होते हैं जिनमें पहले से ही उभय पक्षीय चिन्हों का प्रकट अस्तित्व है। आवश्यक नहीं कि यह स्थिति जन्मजात ही हो। मनोभूमि बदलने अथवा शारीरिक ज्वार-भाटों में किसी विशेष प्रकार का उफान आने से प्रजनन अंग भी नई दिशा में विकसित होने लगते हैं। यह ढलान इन दिनों नारीत्व की ओर अधिक है। इसलिए परिवर्तन भी उसी दिशा में अधिक हुए हैं और आपरेशन के उपरान्त मात्र जननेंद्रियों के परिवर्तन नहीं हुए वरन संतानोत्पादन के तद्नुरूप उपक्रम भी चल पड़े हैं।
शुक्राणुओं का डिम्बाणुओं में बदल जाना सरल है जबकि नये शुक्राणुओं का उत्पादन कठिन। जनखों में से अधिकाँश में स्त्री प्रधान प्रवृत्तियाँ अधिक पाई जाती हैं जबकि उनमें पुरुषत्व प्रधान कम ही होते हैं।
यहाँ एक विशेष रूप से आश्चर्यजनक बात यह है कि खिलाड़ी महिलाओं ने पुरुष बनने के प्रयास विशेष रूप से किये क्योंकि उनमें पौरुष की प्रवृत्ति पहले से ही अधिक परिपक्व हो चुकी थी और वे अपने को पुरुष वर्ग के अधिक निकट पाती थीं। चैकोस्लोविया की धावक टेन्डा काडव कोवा-उत्तरी कोरिया की दौड़ चैंपियन सिनाडेन डिन-ने इस संबन्ध में प्रयास किये और वे सफल रहीं। सन् 1974 में भारत की हॉकी प्रतियोगिता में मूर्धन्य महिला बलजीत कौर को भी ऐसी ही सफलता मिली।
विज्ञान इस संबन्ध में अधिक गंभीरता से शोधरत है कि क्या नारी के पुरुष वर्ग में परिवर्तित करने में अधिक सफलता पाई जा सकती है। क्योंकि शारीरिक श्रम की दृष्टि से वे ही अधिक समर्थ और निडर पाये गये हैं। स्त्री दिशा में परिवर्तन होने के उपरान्त उनकी कार्य क्षमता में किसी सीमा तक घटोत्तरी ही होती है।
इसी प्रकार अन्य कितनी ही प्रजातियाँ ऐसी हैं जो आवश्यकतानुसार लिंग परिवर्तन करती रहती हैं।
इसका एक कारण माँस भक्षण के समय नर के हारमोन नारी शरीर में और मादा पशु के हारमोन नर शरीर में जा पहुँचना भी है। इस कारण ही असमय में ही वे उभार उठने लगते हैं जो परिपक्व आयु में उठने चाहिए किन्तु समय से बहुत पहले ही परिवर्तन के चिन्ह प्रकट करने लगे।
हारमोनों में स्त्री-पुरुष को और पुरुष हारमोन स्त्री को इन्जेक्ट करके उनकी प्रवृत्तियाँ एक सीमा तक परिवर्तन हो सकती हैं। विशेषतया मूँछ के बालों की घट-बढ़ और स्तनों का उभार अधिक सरलता से हो सकता है। जननेन्द्रिय में परिवर्तन उसी दशा में संभव है जब दोनों प्रकार के चिन्ह पहले से ही मौजूद हों। अब ये परिवर्तन उतने विचित्र नहीं माने जाते जितने कि तीन दशक पूर्व माने जाते थे।
काँटों के साथ जिन्दगी काटना तुम्हें असह्य तो नहीं होता? चाँदनी ने गुलाब के फूल से पूछा।
फूल बोला भिन्न प्रकृति वालों के बीच अपने ढंग से काँटे भी तो रहते हैं। फिर सहिष्णुता की नीति अपनाने में मुझे ही क्यों कठिनाई पड़ेगी।
प्रतिभा पराक्रम, मनोयोग और साहस के सम्मिश्रण से बनती है। वह कितने ही सांसारिक क्रिया कुशल पुरुषार्थ परायण, पूर्तिवान और महत्वाकाँक्षी लोगों में भी पाई जाती है। उसे व्यक्तित्व का मूल्य महत्व समझने वाले अपनी आदतों को तद्नुरूप ढालकर स्वयं भी विकसित कर लेते हैं। कुछ में वह जन्मजात भी होती है जिसका कारण पूर्व संचित संस्कारों के सम्पदा को ही माना जा सकता है। राजनीति, साहित्य, कला, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में कितने ही प्रतिभाशाली लोग आये दिन दृष्टि-गोचर होते रहते हैं।
प्रखरता इससे आगे की बात है। उसमें अध्यात्म स्तर का पुरुषार्थ अनुदान जुड़ा होता है। वह आदर्शवादी भी होते है और उत्कृष्टता समर्थक उच्चस्तरीय भी। प्रखरता और प्रतिभा का अन्तर स्पष्ट है। प्रतिभा का झुकाव वैभव अर्जित करने के लिए ललकता रहता है और वह आमतौर से भौतिक सफलता सुविधा के लिए ही प्रयुक्त होती रहती है। प्रखरता का रुझान आदर्शों की ओर होता है वह सम्पदा नहीं महानता अर्जित करती है। उसका उपयोग व्यक्तिगत सुविधा सम्पादन में तो नगण्य ही होता है किन्तु अधिकाँश क्षमता सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में लगी रहती है। प्रायः लोक मंगल के परमार्थ प्रयोजन में उसे नियोजित रहते देखा गया है।
अध्यात्म क्षेत्र से सम्बन्धित लोगों में प्रतिभा नगण्य और प्रखरता की मात्रा बढ़ी-चढ़ी होती है। ऐसे कम ही लोग हुए हैं जिनमें दोनों का समन्वय समान स्तर का रहा है। यह आवश्यक नहीं कि जिसमें प्रखरता हो उसमें प्रतिभा का नाम भी न हो। वह होता तो है पर उसका अनुपात अपेक्षाकृत कम ही रहता है। जिस पलड़े पर वजन पड़ेगा उसी को नीचा झुका हुआ पाया जायेगा। दोनों में से जो जिसे अभीष्ट होता है वह उसे उपार्जित कर लेता है।
आद्य शंकराचार्य प्रखरता के धनी थे। सोलह वर्ष की आयु से ही वे महामानवी जैसे उच्चस्तरीय दृष्टि अपनाकर उसकी पूर्ति में जुट गये और उस तादात्म्य ने उन्हें ऐतिहासिक सफलताएँ प्राप्त करने का अवसर दिया। कुमारिल यह भी अपने समय के असाधारण व्यक्तित्व संपन्न थे पर उनने अपनी विशिष्टता को सामयिक विकृतियों और भ्रान्तियों से जूझने में लगाया। वे चाहते तो उस विशिष्टता के बदले प्रचुर परिणाम में धन, यश, पद आदि भी उपलब्ध कर सकते थे।
योगी अरविन्द योग्यता की दृष्टि से उच्च पदासीन रह सकते थे। बहुत समय तक रहे भी। बड़ौदा स्टेट के दीवान, नेशनल कालेज के संस्थापक और प्रतिभा सम्पन्न बुद्धि जीवी के रूप में उन दिनों उनकी ख्याति थी। देश भक्ति के क्षेत्र में भी अग्रणी थे, क्रान्तिकारी भी रहे। किन्तु अन्ततः उनकी प्रतिभा प्रखरता में बदली। साधना परायण हुए और योगीराज बने, महर्षि कहलाये। अपने तपोबल से उन्होंने सूक्ष्म वातावरण गरम किया और एक से एक बढ़ी-चढ़ी देश भक्त प्रतिभाओं के अम्बार लगा दिये। इन दिनों जितने महामानव एक साथ एक से एक ऊँचे स्तर के उभरे वैसा इतिहास के अन्य सोपानों में नहीं देखा गया। अरुणाचलम् के महर्षि रमण की तपश्चर्या का समूचे लोक मानस पर क्या प्रभाव पड़ा होगा। इसका अनुमान उनके समीपवर्ती क्षेत्र की प्रतिक्रियाओं को देखकर लगाया जा सकता है। उनके मौन सत्संग में मोर, सर्प, गिलहरी, बन्दर, कबूतर आदि नियमित रूप से आते थे और अपने नियत स्थानों पर बैठकर उस प्रवाह का आनन्द लेते थे। कई बार तो उन्हें बन्दरों के झुण्डों में चल रहे द्वंद्वों से निपटने बाहर आना पड़ता था। उन्हीं की भाषा में बोलकर वे फैसला करते थे, जिसे मानकर वे भावी रीति-नीति अपनाया करते।
चाणक्य की प्रखरता उन्हें प्रधानमन्त्री और विश्वविद्यालय के उच्चपद पर आसीन होने के बाद भी अपरिग्रही ब्राह्मण बनाये रही। उनका कौशल अद्भुत था, पर निजी प्रयोजनों में उसका एक कण भी प्रयुक्त नहीं हुआ। विदेशी आक्रमणों को निरस्त करने और देश को सुविस्तृत संगठित एवं समुन्नत बनाने में उनके निर्धारणों ने चमत्कारी भूमिका निबाही। उनके संपर्क प्रभाव से प्रदत्त एक सामान्य बालक चन्द्रगुप्त महान कहलाया। भगवान बुद्ध को अवतार माना जाता है। यह पद उन्हें अकस्मात नहीं मिला। उत्तराधिकारियों को मिलने वाले सिंहासन या वैभव की तरह उन्हें कुछ ही हस्तगत नहीं हुआ। यात्रा आरम्भ करने से लेकर लक्ष्य तक पहुँचने की लम्बी मंजिल से कष्ट साध्य सफलताएँ उत्पन्न करने का श्रेय उनकी प्रखरता को ही है। यह एक ऐसी सशक्त आकर्षण शक्ति है जिसके कारण न सहयोगी कम पड़ते हैं न साधन। बुद्ध एक मध्यवर्ती स्तर के युवक से बढ़ते-बढ़ते अवतार पद तक पहुँचे। वे अकेले ही गगनचुम्बी नहीं बने। अपने साथ आनन्द, राहुल कुमार जीव, हर्ष वर्धन, अशोक, संघ मित्रा, अश्वपति आदि अनेकों हलके-फुलकों को भी आकाश तक उड़ सकने का श्रेय सौभाग्य प्रदान कर सके।
आयुर्विज्ञान क्षेत्र में चरक, सुश्रुत, वागभट्ट आदि ने जिस-जिस स्तर के प्रयोग अनुसंधान किये, उसके लिए समूची मानवता चिरकाल तक कृतज्ञ रहेगी। रसायन शास्त्र के माध्यम से महत्वहीन पदार्थों को मणि-मुक्तकों से बढ़कर- अमृतोपम स्तर का बना देने में उनका कितना बड़ा योगदान रहा, इसका मूल्याँकन यह अनुमान लगाने पर हो सकता है कि उन प्रयासों के अभाव में विज्ञान जगत को चिरकाल तक कितनी पिछड़ी स्थिति में पड़ा रहना पड़ता। अन्तरिक्ष विज्ञान के रहस्योद्घाटन करने में भाष्कराचार्य आर्यभट्ट आदि की प्रखरता ने जो प्रस्तुतीकरण किया उससे मनुष्य ने वह सब जाना जिसके अभाव में उस क्षेत्र की उपलब्धियों से हम सब चिरकाल तक वंचित ही बने रहते और न पूरी हो सकने वाली क्षति उठाते। भाषा के क्षेत्र में पाणिनि, साधना में पातंजली, कथा साहित्य में व्यास, दर्शन में कपिल कणाद का जो योगदान रहा उसकी तुलना सूर्य-चन्द्र के अनुदानों से की जाती रहती है।
मध्यकाल के सरस्वती साधकों में, कालिदास, वोपदेव वरदराज, कैमट आदि की भावभरी चर्चा होती रहती है। यह उपार्जन उनका स्कूली नहीं था। वरन अध्यात्म क्षेत्र के प्रयोग प्रयत्नों के माध्यम से वे सामान्य होते हुए भी विलक्षण मेधा का परिचय दे सकने में समर्थ हुए। अपनी विद्या का उन्होंने बाजारू उपयोग नहीं किया। जो सृजा जो किया उसके पीछे भाव सम्वेदना एवं ज्ञान गरिमा को अधिकाधिक विस्तृत करने वाली उत्कंठा से ही अनुप्राणित रहा। उपरोक्त नामावली इन लोगों की है जो जन्मजात रूप से मन्द बुद्धि स्तर के थे और साथियों की उपेक्षा अवमानना सहते थे। इसी श्रृंखला में एक आधुनिक नाम महात्मा आनन्द स्वामी का भी जुड़ता है। वे बाईस वर्ष की आयु तक मूढ़मति समझे जाते रहे किन्तु गायत्री उपासन की चमत्कारी परिणति ने उनका भाग्य ही बदल दिया। अति पूर्वकाल में ऋषि तैत्तरेय ने किसी की उच्द्रिष्ट ज्ञान सम्पदा को ऐसे ही तीतर बनकर निगल लिया था और इतने भर वे देखते-देखते ब्रह्म विद्या के अधिष्ठाता बन गये थे।
अपने समय के प्रखरता संपन्नों में ऐसे कितने ही नाम सम्मिलित होते हैं जिनकी जन्मजात स्थिति, आर्थिक शैक्षणिक, शारीरिक एवं पारिवारिक दृष्टि से सामान्य स्तर की ही थी, पर वे प्रखरता अपनाकर महानता की दिशा में तेजी से बढ़े और वहाँ पहुँचे जहाँ से वे अनन्त काल तक असंख्यों की प्रगति पथ पर बढ़ चलने का मार्ग दर्शन करते रहेंगे। ऐसे महामानवों में राणाप्रताप, छत्रपति शिवाजी, युग पुरुष गान्धी, महामना मालवीय, लोकमान्य तिलक, पंजाब केशरी लाजपत राय, नेताजी सुभाषचंद्र, चन्द्रशेखर आजाद जैसे राजनैतिक क्षेत्र के महामानवों की गणना की जा सकती है। सामाजिक क्षेत्र में विवेकानन्द, दयानन्द, रामतीर्थ, गुरु गोविन्द सिंह, समर्थ रामदास, कबीर, रैदास आदि की सराहना मुक्त कण्ठ से की जा सकती है। सुसम्पन्नों में राजा कर्ण, भामाशाह, जुगलकिशोर बिड़ला, जैसों का नाम श्रद्धावंत होकर लिया जाता रहेगा। यह इसलिए नहीं वे सर्वोपरि धनाध्यक्ष थे वरन् इसलिए उनकी प्रखरता अपने वैभव को उच्चस्तरीय प्रयोजन में लगा सकने की पृष्ठभूमि बना सकी। आमतौर से लोग वैभव का उपयोग विलास, संचय एवं कुपात्रों पर अनावश्यक भार बखेरने की तरह ही करते रहते हैं। महर्षि कर्बे जैसी सूझ-बूझ कितनों की होती है कि वे थोड़ी-सी राशि से सन्तान को सुशिक्षित, स्वावलम्बी बनाने के अतिरिक्त अपने अनुदान को लोक हित में लगाने के लिए ब्याज समेत वसूल भी कर लें। इस समुदाय में अहिल्याबाई जैसी महिलाओं का भी उदार स्मरण किया जा सकता है। यों उस पिसनहारी का भी समूची मानवता अभिनन्दन करती रहेगी जिसने पिसाई करके निर्वाह करने की स्थिति रहने पर भी जो बच सका पूरी ईमानदारी से बचाया और लोक-मंगल के लिए उदारता पूर्वक अपने हाथों ही विसर्जित कर दिया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर जो कमाते थे उसमें से एक चौथाई से परिवार पोषण करने के उपरान्त तीन चौथाई अभावग्रस्त छात्रों के निमित्त खर्च कर देते थे। यह सम्पन्नता की चर्चा नहीं वरन् उस प्रखरता का अभिनन्दन है जिसने खर्च का सही मार्ग सुझाया और थोड़े को भी बीज की तरह बो देने का साहस प्रदान करके बहुमूल्य फसल काटने का सौभाग्य दिलाया। राजा जनक, दानवीर कर्ण, जैसे उदारमना भी इसी अपरिग्रही ब्राह्मण परिवार में गिने जाते हैं। हरिश्चन्द्र की साहसिक उदारता का स्मरण अनन्त काल तक किया जाता रहेगा।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का पालन-पोषण उनकी सौतेली माँ ने किया था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच दिन काटने वाली इस महिला ने इस बालक को ऐसी प्रेरणाएँ और नसीहतें दीं जिनसे बच्चे की समझ और शिक्षा ही नहीं, आत्मा भी ऊँची उठती चली गई और वह क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते हुए अमेरिका का राष्ट्रपति ही नहीं विश्व के महामानवों में से एक बना। एक बार अब्राहमलिंकन से उनकी उन्नति का कारण और शिक्षा का आधार पूछा तो उसने एक शब्द में उतना ही कहा- जन्म दात्री न होते हुए भी जिसने मेरी निर्मात्री को पूरा किया उसी अपनी माँ का बनाया हुआ मैं एक खिलौना भर हूँ।
महान वैज्ञानिक टामस अथवा एडीसन बचपन में अत्यन्त मन्द बुद्धि थे। पढ़ने में उनकी अक्ल चलती ही न थी। सो अध्यापक ने बच्चों के हाथों अभिभावकों को पत्र भेजा। इसे स्कूल से उठा लें। मन्द बुद्धि होने के कारण वह पढ़ न सकेगा। बच्चे की माँ ने भरी आँखों और भारी मन से पत्र पढ़ा। बच्चे को दुलारा और छाती से चिपका कर कहा- ‘मेरे बच्चे, तुम मन्द बुद्धि नहीं हो सकते। मैं स्वयं ही तुम्हें पढ़ाऊँगी, बच्चे को स्कूल से उठा लिया गया और उसकी माँ ने पढ़ाना प्रारम्भ किया। परिणाम सभी के सामने है। बच्चा विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से एक बना।
प्रश्न न यों उच्चस्तरीय योग्यता का है और न विपुल सम्पन्नता का। वह तो दस्यु तस्करी से भी आती रहती है। कुचक्री, प्रपंची, ठग, शोषण, अपराधी प्रवृत्ति के लोग अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान होते हैं। उनमें से अधिकाँश की शिक्षा भी बढ़ी-चढ़ी होती है। इतने पर भी उन उपलब्धियों का उपयोग उच्च प्रयोजनों के लिए न बन पड़ने के कारण अन्यान्यों के साथ-साथ उनका अपना भी अहित ही होता है। साधन स्वल्प हों, योग्यता थोड़ी हो तो भी प्रखरता के सहारे उसे महान प्रयोजनों में लगाकर अनुकरणीय आदर्श पीछे वालों के लिए छोड़ा जा सकता है। ऐसा प्रकाश, उत्साह और साहस जिस अन्तःप्रेरणा आधार पर बन पड़ता है उसे प्रखरता कहते हैं। ऐसे लोगों में राजस्थान बालिका विद्यालय के संस्थापक हीरालाल शास्त्री, संगरिया विधा पीठ के जन्मदाता स्वामी केशवानन्द, अपंगों के आश्रयदाता बाबासाहब आमटे आदि से लगनशील सेवा साधकों को काल गति भी विस्मरण के गर्त में न गिरने देगी।
भगवान की तरह ऋषि भी युग की आवश्यकता के अनुरूप अवतार लेते हैं। नई समस्याओं का समाधान नये रूप से ही होता है। पुराने समाधान नये व्यवधानों से नहीं निपट पाते।
मस्तिष्क का कार्य मात्र इन्द्रियों पर अनुशासन बनाये रखना नहीं है। मस्तिष्कीय सामर्थ्य की जब भी परामनोविज्ञान क्षेत्र में चर्चा होती है, तब जीव-ब्रह्म संपर्क सूत्रों की विवेचना इसी में विद्यमान घटकों के माध्यम से की जाती है। सहस्रार ही शरीर क्षेत्र में अवस्थित ईश्वरीय सत्ता का निवास स्थान है जिसे मस्तिष्क में मध्य भाग में ब्रह्मरंध्र के समीपस्थ माना जा सकता है।
जिस प्रकार अणु-परमाणु से भरी पदार्थ सत्ता का उद्गम केन्द्र है- इलेक्ट्रान एवं उसके भी सूक्ष्म कण प्रति कण। उसी प्रकार शरीर संसार की समस्त गतिविधियों का मूल स्त्रोत- शक्ति केन्द्र है- सहस्रार। ब्रह्म सत्ता का अवतरण इसी स्थान पर होता है। इस शक्ति स्त्रोत को जिसके माध्यम से व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना से मिलती है, कहीं ढूँढ़ना है तो उसकी झलक स्थूल रूप में मस्तिष्क मध्य में विद्यमान विद्युत्स्फुल्लिंग के फव्वारे “रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम” के रूप में देखी जा सकती है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मस्तिष्क के मध्य भाग से सहस्रों विद्युत स्पन्दन सतत् प्रस्फुटित होते दिखाई देते हैं। सुषुम्ना तथा मस्तिष्क के सन्धि स्थल से कुछ ऊपर मस्तिष्क मध्य (मिड ब्रेन) नामक स्थान से विद्युत उन्मेषों को घनीभूत होते तथा ऊपर की ओर उठकर सहस्रों स्नायु केन्द्रों तथा अरबों स्नायु कोशों को उत्तेजित प्रभावित करते देखा गया है। इन्हें ‘एसेन्डिंग रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम’, ‘स्पेसिफिक’ एवं ‘डीफ्यूज’ ‘थेलेमिक प्रोजेक्शन’ नाम दिया गया है। ये सारे शरीर को चेतन बनाये रखने तथा निद्रा-जागृति के विभिन्न चक्रों के लिये उत्तरदायी माने जाते हैं। इन स्पन्दनों को यदि इच्छानुकूल नियन्त्रित किया जा सके तो उनके प्रभाव से समग्र मस्तिष्क के किसी भी स्नायु केन्द्र को इच्छानुसार सक्रिय तथा शिथिल बनाये जा सकने जैसी असंभव उपलब्धियों को सम्भव कर दिखाया जा सकता है।
योग एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। इसमें शक्ति केन्द्र जागरण का अर्थ केवल केन्द्रों की तीक्ष्णता तथा सक्रियता को बढ़ा देना ही नहीं, उन्हें सुव्यवस्थित, सुनियोजित करना भी है। विद्युत्धाराओं के स्पन्दन विभिन्न विकृत स्थानों को उत्तेजित कर मिर्गी, हाथ-पैरों की असामान्य हलचलों को जिस प्रकार जन्म देते हैं व उसकी आँशिक विद्युत कंपन प्रक्रिया को जिस प्रकार “इलैक्ट्रो एनसेफेलोग्राफी” यन्त्र द्वारा पकड़ा जा सका है उससे स्पष्ट होता है कि ये विद्युत स्पंदन सामान्य अवस्था में अति तीव्र एवं गतिमान होते हैं। इनसे भले ही निषेधात्मक पक्ष सिद्ध होता है, यह तो प्रमाणित हो ही जाता है कि इन विधुत्धाराओं को सुनियोजित कर सहस्रार जागरण की- न्यूटन क्रिस्टल रूपी केन्द्रों को जगाकर उनसे समष्टि चेतना से संपर्क की क्रिया-प्रतिक्रिया उत्पन्न करना सम्भव है। इसके लिए बाह्य इलेक्ट्रोडों की आवश्यकता नहीं। अन्दर का विद्युत्संस्थान ही इतना समर्थ सक्षम है कि उसको सुव्यवस्थित कर किसी भी प्रसुप्त केन्द्र को जगाया जा सकना पूर्ण रूपेण सम्भव है।
यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि पृथ्वी पर विराजमान जीवधारी मनुष्य एक विलक्षण विद्युत्दबाव से प्रतिक्षण प्रभावित होता रहता है। पृथ्वी की सतह और वायु मण्डल के आयनोस्फियर्स के मध्य लगभग तीन लाख बोल्ट की शक्ति का धन विद्युत विभव होता है। मानवी काया एक अच्छी विद्युत्चालक है। यह काया जिस विशाल विद्युत संधारक के मध्य बैठी है उसे वैज्ञानिक ‘ग्लोबल केपेसिटट’ कहते हैं। यह किसी भी स्थिति में हलचल रहित नहीं है। इसमें सतत् विद्युत स्खलन होता रहता है। ‘शूमैन रेजोनेन्स’ के नाम से 7 से 8 तरंगें प्रति सेकेंड की आवृत्ति में विद्यमान यह विद्युत प्रवाह जिस प्रकार मानवी काया को उत्तेजित प्रभावित करता रहता है उसका मूल कारण यह है कि इन तरंगों का गुण हमारे मस्तिष्क की विद्युत तरंगों से अत्यधिक साम्य रखता है। केवल 20 बाट विद्युत शक्ति से संचालित-अरबों सक्रिय न्यूरान्स व उन्हें जोड़ने वाले तन्तु संस्थान के ढांचे से बना यह मस्तिष्क ब्रह्मांडीय विद्युत की आवृत्ति पर ही चलता है। यही प्रमुख कारण है कि मनुष्य के दैनन्दिन क्रियाकलाप विद्युतीय क्षेत्रों-विद्युत चुंबकीय तरंगों तथा रेडिएशन की लहरों से सत्त प्रभावित होते रहते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन-निष्कर्ष इस कथन की पुष्टि करते हैं कि मानवी सामर्थ्य असीम है। केंद्रिय जगत का एक प्राणी-मानव अपनी उपलब्ध शक्ति सामर्थ्यों का सीमित उपयोग ही कर पाता है। यदि किसी प्रकार अपने संस्थान को जगाया-उत्तेजित किया जा सके तो उस महत् चेतना संस्थान शक्ति भण्डार से संपर्क स्थापित कर सकना भी सम्भव है। ईथर के ब्रह्मांडव्यापी महासागर में दृश्य एवं अदृश्य-पदार्थ परक तथा चेतना प्रधान शक्ति छिपी पड़ी है। यह महाप्राण का महासागर है। इस सागर की ही लघु संरचना मानवी काया है, ब्रह्मरंध्र एवं सहस्रार एवं जिसके संपर्क माध्यम हैं। हर जीवधारी अपनी-अपनी पात्रता के अनुसार इस भण्डार से वैभव अनुदान प्राप्त करता है। साधना उपचार-ध्यान धारणा आदि के विभिन्न प्रयोगों द्वारा इस सामर्थ्य को बढ़ या-विकसित किया जा सकता है।
एरियल या एन्टीना ट्रान्समीटर द्वारा भेजी शब्द किरणों को पकड़ते हैं। उनको इतना शक्तिशाली बनाया जाता है कि सुदूर क्षेत्रों से आने वाली तरंगों को पकड़कर भी उन्हें ध्वनि में परिवर्तित किया जा सके। ठीक इसी प्रकार मस्तिष्क के न्यूरान्स एक प्रकार के रेडियो क्रिस्टल, एंटीना या एरियल हैं। वे ब्रह्मांड में संव्याप्त तरंगों को पकड़ते हैं तथा वाँछित प्रवाह को, व्यक्ति को सामर्थ्यशाली बनाने वाली ऊर्जा में बदल देते हैं।
सहस्रार की जैव संरचना को रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम के रूप में देखते हुए उसकी एक भव्य राडार या एण्टीना के रूप में कल्पना की जा सकती है जो तरंगों को पकड़कर अरबों स्नायु कोशों तक भेजता है, उनमें विद्युत सक्रियता बढ़ाता है। अलंकारिक रूप में सहस्रार की सहस्र दल कमल-सहस्र फन सर्प के रूप में कल्पना की गयी है। ब्रह्मलोक की व्याख्या में बृहत् क्षीर सागर-सहस्र फन वाले शेषनाग की शैया एवं पर विष्णु भगवान के शयन का वर्णन है। वस्तुतः क्षीर सागर मस्तिष्क में विद्यमान ग्रेमैटर है। सहस्रार कमल ही रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम है जो सारे ग्रेमैटर में मध्य मस्तिष्क से ऊपर तक फैला हुआ है। इस संस्थान में अवस्थित चेतना ही ब्रह्म सत्ता के प्रतीक-भगवान विष्णु हैं। साधारण स्थिति में यह क्षेत्र प्रसुप्त-निष्क्रिय ही पड़ा रहता है इसी कारण इसमें भगवान सोते हुए दिखाए जाते हैं। यही शिवलोक है जहाँ मानसरोवर व कैलाश है। इन अलंकारिक विवरणों के पीछे एक ही उद्देश्य है-समष्टि चेतना को अपने अन्दर अवस्थित देखना-उसकी गरिमा को पहचानना तथा उससे अनुदान प्राप्त करना। आत्मा-परमात्मा के मिलन-अद्वैत की स्थिति की अनुभूति यहीं की जाती है। योगी इसी केन्द्र में प्राण को विकेन्द्रित कर ब्रह्मांड का विचरण और नियन्त्रण जैसी सफलता प्राप्त करते हैं।
सहस्रार को महत् चेतना का द्वार माना गया है। मूलाधार में प्रसुप्त पड़ी सर्पिणी कुण्डलिनी यहीं पर मुखबंध कली के खिलने के रूप में विकसित होती है तथा शतदल कमल के सहस्रार के रूप में उसका विकास होता है। सहस्रार को स्वर्गलोक का कल्पवृक्ष कहा गया है। प्रलयकाल में भी शेष रहने वाला अक्षय वट, गीता का ऊर्ध्वमूल-अश्वस्थ-बोधि वृक्ष आदि उपमाएं इस ब्रह्म बीज को इसी कारण दी गयी है कि अपनी जागृत स्थिति में यह साधक को दिव्य सत्ता संपन्न बनाता है- पिंड में संव्याप्त चेतन सत्ता के तारों को समष्टि सत्ता के चेतना पुँज से जोड़ता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं धन्य बनता है व अपने संपर्क क्षेत्र के अनेकानेक व्यक्तियों को दिव्य आलोक से भरा-पूरा बनाता है।
सहस्रार की आध्यात्मिक संरचना को दृष्टिगत रख शरीर में उसके स्थूल प्रतिनिधि की कल्पना की जाय तो सहस्त्राधिक स्फुल्लिंगों में विभाजित मध्य मस्तिष्क से प्रवाहित ‘रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम’ से उसकी संगति ठीक-ठीक बैठ जाती है। मस्तिष्क के एक-एक केन्द्रक-नाभिक, ग्रेमैटर के गुच्छों के रूप में बिखरे पड़े न्यूरॉनल सेण्टर्स को ये प्रवाह उत्तेजित करते हैं तथा उन्हें प्रसुप्त से जागृति की स्थिति में लाते हैं। इस स्थान से न केवल काया की अचेतन गतिविधियों का नियमन ‘इच्छानुसार ‘मानिटरिंग’ भी। जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह जो इस स्थान पर केन्द्रीभूत होता है, समग्र काया के स्नायु तन्तुओं का सम्मिश्रित स्वरूप है। इस स्थान पर विद्युत की सघनता सारी काया में सर्वाधिक पायी गयी है। यहाँ से जो प्रवाह चलते हैं वे रेटिकुलर (जालीनुमा) प्रोजेक्शन के माध्यम से एक-एक स्नायु कोष को प्रभावित करते हैं- उनकी आवृत्ति को ब्रह्मांडीय तरंगों की आवृत्ति से जोड़ देते हैं। आदान-प्रदान की क्षमता-वाँछित को ग्रहण करने की सामर्थ्य इसी संस्थान के माध्यम से अर्जित हो पाती है।
इस आदान-प्रदान का, समष्टि चेतना से संपर्क का सबसे महत्वपूर्ण एवं सशक्त पक्ष यह है कि भावना सम्बन्धी मस्तिष्कीय स्नायु रस स्रावों का नियन्त्रण भी इसी स्थान से होता है। भावनाओं का रसायन शास्त्र भी अपने आप में विचित्र है। आज का वैज्ञानिक अब उन रहस्यों को जान सकने में समर्थ हो गया है जिन्हें अपनी शैशवावस्था में अविज्ञात कहकर छोड़ दिया जाता था। भाव-सम्वेदनाओं जैसी विशिष्टताओं का सम्बन्ध अब न्यूरोकेमीकल ट्रांसमीटर्स से जोड़ा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि अब स्वेच्छा से अति भावुकता पर नियन्त्रण व सामान्य स्थिति में पायी जाने वाली भावपरक मान्यताओं का नियमन-विस्तरण सम्भव है। मस्तिष्क के मध्य भाग से ऊपर दोनों हेमीस्फीयर्स के बीच एक संस्थान पाया जाता है- ‘लिम्बिक सिस्टम’ इसी में आनन्द, दुःख, भाव-सम्वेदना, यौन भावना सम्बन्धी महत्वपूर्ण केन्द्र है। हारमोन ग्रन्थियों के माध्यम से क्रियाशील यह संस्थान पूरी तरह से अपने स्नायु उत्तेजन हेतु ‘रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम’ के द्वारा भेजे गये सन्देशों पर निर्भर है। ‘ऐनकेफेलीन’ नामक रस स्रावों स्नायु सन्धि स्थलों से प्रवाहित कर ये आनन्द की अनुभूति कराते हैं, भावनाओं को उत्कृष्ट बनाते हैं तथा उनके सुनियोजन के लिये चिन्तन प्रदान करते हैं। कैलीफोर्निया युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक द्वय जॉन ह्यूजेज एवं श्री लीक्स तथा जॉन हापकिन्स मेडीकल स्कूल के ‘सोलोमन स्नीडर’ द्वारा आविष्कृत इन हारमोन्स से चिकित्सकों को तो मनोरोगों एवं भावनात्मक विक्षोभों का समाधान करने में सहायता मिली है परन्तु अध्यात्म विधा के अध्येता इस अमृत कलश के सदुपयोग का, सहस्रार के जागरण से भाव योग, श्रद्धा-समर्पण से अद्वैत की स्थिति की प्राप्ति का प्रतिपादन करते हैं। यही वस्तुतः सहस्रार का शाश्वत स्वरूप भी है।
दक्षिणी धरातल समुद्र तल से 19000 फुट उभरा हुआ है। इसे विश्व शरीर की जननेन्द्रिय का उभार कह सकते हैं। पुराणों में इसे शिवलिंग कहा गया है। नारी की जननेन्द्रिय में भी यह उभार छोटा रूप में भी पाया जाता है।
मस्तिष्क ब्रह्मरंध्र एक गड्ढा है। आँख, कान, नाक, मुख आदि भी इसी क्षेत्र के गड्ढे हैं। इन्हें उत्तर ध्रुव कह सकते हैं। उन्हीं क्षेत्रों से विविध प्रकार की प्रेरणाएँ उत्पन्न होती हैं। इन उत्कट आकाँक्षाओं को ज्ञान या काम भी कह सकते हैं। यही कुण्डलिनी भी है।
जैन पुराणों में तपस्वी बाहुबलि के चरित्र का वर्णन है। उनने कठोर तपस्या की थी पर अहन्ता नहीं छूटी तो साधना से भी उन्हें शान्ति न मिली। महत्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था।
उदास बाहुबलि को उनकी बहन ने देखा तो असफलता का कारण ताड़ लिया। उसने आते ही “हाथी की पालकी से नीचे उतरो और समझदारों की तरह जमीन पर चलो।
कथन का मर्म बहिन ने समझाया कि ‘‘अहन्ता को छोड़ो आकाँक्षाओं से छुटकारा पाओ इसके बिना सफलता मिल नहीं सकेगी।”
बाहुबलि ने वैसा ही किया और देखते ही देखते सिद्ध पुरुष हो गये।
‘दि रूट्स आफ कोइन्सीडैन्स’ में कोस्लर ने स्पष्ट लिखा है- ‘‘हम निःसन्देह ऐसे चमत्कारों से घिरे हैं जिनके अस्तित्व की अब हम उपेक्षा करते रहे। फलतः इसे अन्धविश्वास से अधिक कुछ माना नहीं गया, इसलिए मनुष्य ने सदियों तक यह नहीं समझा कि वह सूक्ष्म शक्तियों से घिरा है।” आगे उन्होंने कहा कि- ‘‘यह निश्चित है कि हम एक ऐसे मानसिक चुम्बकीय क्षेत्र में वास करते हैं, जो संयोग जैसी घटनाओं को प्रेरित करता है।”
न्यूजीलैण्ड के कुक जलडमरु मध्य में दो महिला नाविकों की जान एक मृत ह्वेल मछली ने बचाई। नाव समुद्री चक्रवात में फंसकर डूब गयी। नाविक महिलायें थीं। वे कुछ दूर तक तैरीं उसी बीच उन्हें एक ह्वेल मछली की लाश पानी में तैरती हुई मिल गई। वे उस पर चढ़ गयीं। और नाव की तरह उसी को खेती हुई, किनारे पर आ लगीं।
फैलमाउथ (मेन) से प्राप्त समाचार के अनुसार 62 वर्षीय एडविन रोविन्सन के नेत्रों की ज्योति 9 वर्ष पूर्व तक सड़क दुर्घटना में विदा हो गयी थी। उनके डाक्टर विलियम टेलर ने जाँच पड़ताल के बाद बताया कि पिछले सप्ताह में रोविन्सन तड़क-दमक वाली वर्षा तूफान में फंस गये थे। एक पेड़ के नीचे शरण पाने के लिए उन्होंने अपनी एल्युमीनियम की छड़ी का प्रयोग किया। आकाशीय विद्युत की गर्जन से धक्का खाकर रोविन्सन जमीन पर गिरे- खरोचें आईं- किन्तु जब वे उठे तो पाया कि वे बिन किसी यन्त्र की सहायता से सुन सकते हैं और वे पुनः अपनी आँखों से पूर्ववत् देखने लगे।
मेरी गैलेन्ट प्रान्त के फ्राँसीसी गवर्नर की तीन वर्षीय पुत्री एक समुद्री यात्रा पर गयी। रास्ते में बीमार पड़ी और मर गयी। उसकी लाश बोरों में जल संस्कार के लिए सीं ली गयी। कुछ समय उपरान्त देखा गया कि जहाज की पालतू बिल्ली लाश के पास चक्कर काटती है। आमतौर से बिल्लियां लाश से दूर रहती हैं। सन्देह हुआ कि बच्ची जीवित तो नहीं है। बोरा खोला गया तो लड़की में हल्की-सी साँस चलती मिली। उसका उपचार चला और ठीक हो गयी। बड़ी होने पर उसका विवाह फ्राँस के राजा लुई चौदहवें के साथ हुआ और वह 84 वर्ष की आयु तक जीवित रहीं।
सन् 1825 में पश्चिम जर्मनी के समुद्र तट पर पालने में बैठे हुए दो बच्चे पाये गये। भयानक समुद्री बाढ़ आई थी। असंख्यों घर परिवार उसमें डूब गये। किसी माता ने इन बच्चों को तैरने की सुविधा सोचकर पालने से बाँध दिया होगा। वे डूबे नहीं किनारे पर आ लगे। उन्हें एक समुद्री जहाज के मालिक ने उठाया और पाल लिया। बड़े होकर वे पालने वाले के उत्तराधिकारी बने और जहाजों के मालिक कहलाये। जिन्दगी उनने समुद्र में ही बिताई अन्ततः किसी समुद्री तूफान में फँस कर जहाज समेत समुद्र के गर्भ में ही समा गये।
न्यूयार्क की एक वयोवृद्ध महिला कैथोलिन मैक्सोइन का उदाहरण ऐसा है जिसके जीवन में आकस्मिक विपत्तियों और अप्रत्याशित सुरक्षा संयोगों का ऐसा विचित्र ताना-बाना है कि आश्चर्य से चकित रह जाना पड़ता है।
कैथोलिन सात वर्ष की थी तब सह स्कूल के बच्चों के साथ स्टीमर के द्वारा हडसन नदी में सैर करने गयी थी। स्टीमर में आग लग जाने से सभी बच्चे जल गये। जब कि कैथोलिन एक लकड़ी के तख्ते को सीने में लगाकर नदी में कूद पड़ी। लहरों में काफी देर तक झूला झूलते रहने के बाद किसी दूसरी नाव ने देखा तो बचा लिया।
1954 में हवाई जहाज से यात्रा से यात्रा कर रही थी कि उसमें आग लग जाने से पायलट के बहुत प्रयास के बाद भी सभी यात्री जल गये। केवल कैथोलिन झुलसी हुई जीवित बची जो कुछ दिन बाद ठीक हो गई।
सन् 1956 में वह बस से यात्रा कर रही थी। बस का टायर फटा वह लुढ़की और खड्ड में जा गिरी। आग लग जाने से बस के सभी यात्री जलकर खाक हो गये। केवल कैथोलिन वहाँ भी शीशा तोड़कर बाहर निकल सकी।
सन् 1961 में वह इंजन से सटे हुए डिब्बे में बैठी यात्रा कर रही थी। सामने से आती दूसरी रेल से टक्कर हो जाने के कारण इस रेल का इंजन चकनाचूर हो गया। कैथोलिन के डिब्बे में इस बार भी केवल वही बची शेष सब मृत्यु के ग्रास बन गये।
1962 में वह छुट्टी बिताने की दृष्टि से जोरजिया गयी वहाँ जिस कमरे में वह रहती थी उस पर एक दिन पहाड़ की चट्टान ऊपर से गिरी तो उसमें ठहरे तीन अन्य यात्री मर गये। संयोग कि कैथोलिन उसी समय कमरे से बाहर चली गई थी।
यही नहीं टैक्सी से यात्रा करते समय एक अन्य मोटर से टक्कर हो जाने के कारण टैक्सी का ड्राइवर मर गया अन्य सभी यात्री घायल हो गये। परन्तु कैथोलिन इस बार भी पूर्ण सुरक्षित थी।
सन् 1967 में एक दावत में मछलियाँ परोसी गईं, जिसमें कैथोलिन भी निमंत्रित थी। जहरीली मछलियाँ खाने के कारण अस्पताल में सभी की मृत्यु हो गई भरपेट खाने के बाद भी कैथोलिन पर विष का कोई प्रभाव न था।
‘इनकेडिबल कोइन्सीडेंस’ में ऐलनवान ने एक घटना का उल्लेख किया है। प्रिंस एडवर्ड द्वीप के निवासी कोगलान की टैक्साज स्थित गालवैस्टन नामक स्थान पर 1899 में एक यात्रा के दौरान मृत्यु हुयी। उसे वहाँ के मकबरे में शीशे की परतों से मढ़े ताबूत में दफना दिया गया। एक वर्ष भी नहीं हुआ था कि सितम्बर 1900 में गालवैस्टन द्वीप में भीषण तूफान आया। तूफान के कारण कोगलान का ताबूत मकबरे से निकलकर बहता-बहता मैक्सिको की खाड़ी में जा पहुँचा। वहाँ से वह ताबूत फ्लोरिडा का चक्कर काटकर अटलाँटिक महासागर में आ गया। फिर पानी का प्रवाह ताबूत को उत्तर की दिशा में ले गया। आठ वर्ष बाद अक्टूबर 1908 में प्रिंस एडवर्ड द्वीप के मछुओं ने तूफानी लहरों के बीच बड़े डिब्बे को तैरते देखा। उत्सुकता वश जब वे उसे किनारे लाये तब कोगलान का नाम अंकित देख तुरन्त पहचान गये। यह समुद्री किनारा कोगलान के गाँव से कुछ ही दूर पड़ता था। कोगलान के शव को उचित सम्मान के साथ उस गिरजे के कब्र स्थान में पुनः दफना दिया गया।
माँ हमेशा अपने बच्चों को स्वावलंबन की शिक्षा देती, उन्हें सुसंस्कारी बनाती है।
एक बार लक्ष्मी जी स्वर्ग से धरती पर आईं और लोगों को इकट्ठा करके कहा- ‘मनचाहा धन माँग लो।’ माँगने वालो की भीड़ जमा होने लगी।
धरती ने देवी के रूप में प्रकट होकर कहा- ‘‘बच्चों! मुफ्त का धन न लो। उससे तुम बेमौत मरोगे।’’ पर किसी ने उनकी सुनी नहीं। वरदान माँगते और कोठे भरते गये। देने के उपरान्त लक्ष्मी जी लौट गईं।
जिन्हें धन मिला था। उन्होंने काम धन्धा बन्द कर दिया। गुलछर्रे उड़ाने लगे। कई वर्ष प्रकार बीत गये। कोई खेत, कारखाने न गया। फलतः आवश्यक वस्तुएँ समाप्त होती गईं। दुर्भिक्ष खड़ा हो गया और लोग भूखों मरने लगे। यद्यपि सोना चाँदी सभी के कोठों में भरा पड़ा था।
धरती ने लम्बी साँस भरते हुए कहा- ‘‘मुफ्त के धन में अनेकों दुर्गुण जड़े रहते हैं। परिश्रम की कमाई पर सन्तोष करते, तो मेरे बच्चों की आज ऐसी दुर्गति क्यों होती।’’
डार्विन के विकासवाद में पृथ्वी का जन्म तथा उस पर छोटे जीवाणुओं के उपरान्त बड़े जीवधारियों की उत्पत्ति का वर्णन है। प्रायः इसी को सही माना जाता और उसी अनुमान को स्कूली पुस्तकों में प्रामाणिक बताया जाता है।
किन्तु नवीनतम खोजों से जो अकाट्य प्रमाण सामने आये हैं वे उन मान्यताओं को पूरी तरह उलट देते हैं। उनसे पता चलता है कि पृथ्वी अनुमान के विपरीत कहीं अधिक पुरानी है और जीवन की शुरुआत छोटे जीवाणुओं से नहीं वरन् सभ्य मानवों से होती है। उनके न केवल शरीर असाधारण रूप से बड़े-छोटे थे वरन् उन्हें विज्ञान की भी उच्चस्तरीय जानकारी थी। इसके ऐसे प्रमाण चिन्ह मिले हैं जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता।
इन्हीं शोध कथनों में भूतकालीन खण्ड प्रलयों और भावी अनिष्ट सम्भावनाओं का भी उल्लेख है।
मिस्र की नील घाटी की सभ्यता को 10 हजार वर्ष ई. पूर्व पुराना बताया जाता है वहाँ के सबसे पहले सम्राट ‘मीन्स ने अपने दक्षिणी मिस्र के राज्य में उत्तरी भाग को भी मिलाकर राज्य चलाया था। उसके काल की भोजपत्र पर अंकित नील-नदी की स्तुति आज भी लन्दन के अजायब घर में सुरक्षित है। चौबीस अक्षरों की वर्ण माला का आविष्कार वहाँ पहले-पहल हुआ था साथ ही लेखन सामग्री का उपयोग भी होने लगा था। मिस्र के पिरामिड जो आज भी रहस्य बने हुए हैं उसी काल के निर्मित बताये जाते हैं। इन पिरामिडों में गिजे का पिरामिड 230 मीटर की भुजा के वर्गाकार आधार पर विनिर्मित है, जिसकी ऊँचाई 147 मीटर है। कहा जाता है कि इस पिरामिड को 1 लाख कारीगरों ने 20 वर्षों में बनाया था। इस पिरामिड में नरसिंह (सिर तथा धड़) की मूर्ति पत्थर से बनी लगभग 49 मीटर लम्बी और 21 मीटर ऊँची है।
कोणार्क का विशाल मन्दिर 400 मीटर लम्बा था। उसके मुख्य कक्ष की लम्बाई 52 मीटर और चौड़ाई 103 मीटर थी। यह कक्ष 136 खम्भों पर पाटा गया था। इसके 12 बीच के खम्भे तो 24-24 मीटर ऊँचे थे जिनमें से प्रत्येक पर 100 व्यक्ति एक साथ खड़े हो सकते थे।
पश्चिम एशिया में दजला-फरात नदियों के किनारे के निप्पुर, बाबुल और उरनगर ई. पू. 5000 के आसपास बसाये गये थे। इनमें बाबुल का टावर विश्व विख्यात है।
वस्तुतः इन विलक्षण पिरामिडों की संरचना भारतीय कलाकारों ने ही की थी। जिसे कभी-कभी पिरामिड बैल्ट के नाम से भी पुकारा जाता रहा है। यह बैल्ट मिश्र से मेसोपोटेमिया से लेकर यूरोप तक तथा अमेरिका से पूर्व (भारत) तक फैली हुई है। सुमेरिया (मिश्र) में बनी इस प्रकार की विलक्षण इमारतों में सूर्य पूजा का क्रम आज भी चलता है। लोगों में धार्मिक चेतना की जागृति को इसे केन्द्र कहा जा सकता है।
पश्चिम जर्मनी के एक भूगर्भ शास्त्री का कहना है कि पृथ्वी के बनने से पहले भी ब्राह्मण में प्राणियों का अस्तित्व था। पृथ्वी को बने 380 करोड़ से 460 करोड़ वर्ष हो गये हैं।
जर्मन शोध सेवा के अनुसार जीवेन विश्वविद्यालय के भूगर्भ शास्त्री प्रो हाँस डीटकफलग का कहना है कि उन्हें ऐसे अवयवों के अवशेष मिले हैं जो मूलतः टूटे हुये तारों के खनिज ढाँचे में बन्द थे। इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से देखने पर ये अवशेष वर्तमान जीवित अवयवों के समान ही पाये गये। हालाँकि इनका आकार वर्तमान अवयवों का दसवाँ हिस्सा है।
प्रो. फलग का कहना है कि हालाँकि ये सक्षम अवयव केवल एक कोशिका से बने हैं और उनमें कोई हड्डी नहीं है लेकिन ये चट्टानों में अरबों वर्ष तक जीवित रह सकते हैं। पश्चिम ग्रीनलैण्ड की इसुआ चट्टान में पाये गये सूक्ष्म अवशेषों से यह बात सिद्ध हुई है। यह चट्टान विश्व की सबसे पुरानी चट्टान मानी जाती है। प्रो. फलक का मत है कि उल्काओं का निर्माण भी उसी समय हुआ था तब सौरमण्डल का निर्माण शुरू हुआ था। लगभग सौ वर्ष पहले स्वीडन के नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक स्वांटे अरहेनियस ने एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। जिसका प्रो. फलग भी समर्थन करते हैं। इस सौ वर्ष पुराने सिद्धान्त के अनुसार जीवन सबसे पहले बाहर अन्तरिक्ष में शुरू हुआ। शक्तिशाली जीवाणु अन्तरिक्ष से पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों पर गये जहाँ उनके लिये जीवित रहने की परिस्थितियाँ थीं। इस सिद्धान्त का अभी तक पूरी तरह से खण्डन नहीं हुआ है और न ही यह पूरी तरह से सिद्ध हुआ है।
मानव उत्पत्ति के बारे में विभिन्न प्रकार की लोक मान्यताएँ प्रचलित हैं। मानवी सभ्यता का विकास कब हुआ? इसके सम्बन्ध में भी विद्वानों के पृथक-पृथक अभिमत रहे हैं। कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी के उपकुलपति डा. जॉन लाइटफूट के अनुसार मानवी सभ्यता का विकास ईसा से 4004 वर्ष पूर्व 23 अक्टूबर के प्रातः से आरम्भ होता है। उन्होंने उत्पत्ति का मूल कारण त्रेयक परमेश्वर (ट्रिनिटी) को ही समझा है। डा. लाइटफूट का कहना है कि तथ्यान्वेषण का सर्वप्रथम अनुसंधान प्रयास फिलिप हैनरी गूज ने 1857 में किया। बाइबिल में वर्णित एडम और ईव की उत्पत्ति का भी यही समय है।
भारतीय धर्म ग्रंथों की मान्यताओं के अनुसार अब तक भगवान् विष्णु नौ बार सृष्टि का उद्धार कर चुके हैं अर्थात् महाप्रलय से मुक्ति दिलाई है। दसवीं बार महाप्रलय की प्रतीक्षा में वे इस समय बैठे हुए हैं। प्राचीन काल में मैक्सिको के एक महान मनीषी टौल्टेक, जिनके नाम से टौल्टेक कलैण्डर परम्परा चल पड़ी, ने अपनी गणनाओं के आधार पर बताया कि अब तक तीन बार इस पृथ्वी को महाप्रलयों का सामना करना पड़ा है। सर्वप्रथम घटित होने वाली को ‘वाटर सन’ यानी पृथ्वी बाढ़ों के प्रकोपों से घुल गयी। दूसरा युग ‘अर्थ सन’ का था। जिसमें सृष्टि के विनाश का मुख्य कारण भूकम्पों का रहा। तीसरी बार होने वाली महाप्रलय को ‘विंड सन’ के नाम से पुकारा जाने लगा। यह अन्तरिक्षीय वायु मण्डल में तीव्रता के कारण हुई। जिस युग में हम लोगे रह रहे हैं इसे ‘फाहर सन’ का चौथा युग कह सकते हैं। एटमिक (आणविक) जैसे युद्ध आयुधों की बढ़ती होड़ को देखकर यह अनुमान सहज की लगाया जा सकता है कि यह दुनिया शीघ्र ही जल भुनकर नष्ट हो जायगी। टौल्टेक ने इस महाप्रलय का मूल कारण सूर्य को ही माना है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अवलोकन किया जाय तो पता चलता है कि अपने इस युग का आरम्भ वर्ष 1453 अर्थात् कौनस्टैन्टीनोपल के पतन से होता है।
सुप्रसिद्ध पुरातत्वज्ञ, इतिहासकार एवं मानचित्रकार प्रो. चार्ल्स हैपगुड ने ‘‘मैप्स आफ दि ऐन्सीएन्ट सी किग्स’’ में अतीत के रहस्यमयी प्रमाणों को प्रस्तुत करते हुए बताया है कि कोलम्बस ने अपने पूर्वजों द्वारा बनाये गये मानचित्रों के आधार पर ही अनेकानेक अज्ञात स्थानों की खोज करने में सफलता पायी है।
अंटार्टिका महाद्वीप के बारे में भी यही बात कही जा सकती है। फ्राँस के एक शिक्षा शास्त्री फिलिप बुचे ने 1737 में अन्टार्टिका की स्थिति को अपने मानचित्र में भली-भाँति प्रदर्शित कर दिखाया। उन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुये वर्ष 1949 में स्वीडिश ब्रिटिश नार्वेजियन अभियान चल पड़ा और ठीक वैसी ही स्थिति वहाँ देखने को मिली।
अन्तर्राष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष 1958 बड़े धूमधाम के साथ मनाया और अंटार्टिका के बारे में बताया गया कि वहाँ पर बर्फ जैसी कोई चीज है नहीं। बुचे ने यही बात बहुत पहले प्रदर्शित कर रखी थी।
जर्मनी के इंजीनियर बिलहेम कौनिग ने वर्ष 1936 में बगदाद शहर के पुरातत्व संग्रहालय में रखे पाषाणों की जाँच पड़ताल करने के उपरान्त बताया कि आज से 1700 वर्ष सीवर प्रोजेक्स तथा इलैक्ट्रिक बैट्री का प्रयोग अवश्य रहा होगा। बैंजामिन फ्रैंकलिन ने इन्हीं प्रमाणों के आधार पर बिजली क प्रयोग की सार्थकता को सिद्ध कर दिखाया है।
भारतीय संस्कृति विश्वव्यापी है। ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध लेखक एवं अन्वेषक कर्नल फासेट के मतानुसार अमेजन नदी में एक रहस्यमयी इमारतों के अवशेषों को देखकर इसका अनुमान सुगमतापूर्वक लगाया जा सकता है। इस विशालकाय भवन के पत्थर रात्रि के समय में प्रकाश किरणों की भाँति चमकते हैं। कर्नल फासेट ने सन् 1920 में अपने शोध कार्यों से यह सिद्ध कर दिखाया है कि इन अलौकिक दृश्यों में भारतीय धर्म और संस्कृति की झलक-झाँकी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
डा. मैरिया रीके ने वर्ष 500 ए. डी. की ‘7 वर्डस लार्जेस्ट ऐस्ट्रानामी बुक’ का बड़ी गहनता के साथ अध्ययन किया और तथ्यों को प्रकट करते हुये बताया है कि ग्रह-नक्षत्रों का विज्ञान महाभारत काल में भी था। जिन्हें रथ और विमानों के नाम से संबोधित किया जाता रहा है।
ऐतिहासिक घटनाओं में मात्र 10 प्रतिशत से भी कम के प्रमाण अवशेषों के रूप में देखने को मिलते हैं। बेबीलॉन की पुस्तकों में ऐसे शिलालेखों का प्रदर्शन है जिन्हें देखकर कहा जा सकता है कि लोगों ने बिना किसी टैलिस्कोप की सहायता के शुक्र ग्रह की स्थिति का अनुमान लगाया। ‘हार्न ऑफ वीनस’ (शुक्र के सींग) का उल्लेख भी वहाँ के ग्रंथों में देखने को मिलता है। इसी तरह की मान्यतायें उनकी तारागणों के बारे में रही है वे उन्हें देवी-देवता, जानवर तथा वीर योद्धाओं की उपमा देते चले आये हैं। महान वैज्ञानिक, समुद्री यात्री एवं अन्वेषक सर वाल्टर रैले ने वानस के सम्बन्ध में जिन तथ्यों का उल्लेख ‘विश्व का इतिहास’ (1616) नामक पुस्तक में किया है उसी के आधार पर गैलीलियो जैसे विश्व विख्यात वैज्ञानिक अपने अनुसंधान कार्य में सफल हुए।
ईसा से 585 वर्ष पूर्व 25 मई को एक ग्रीक वैज्ञानिक एवं खगोलज्ञ थेल्स को स्टीम पावर की खोज का श्रेय दिया जाता है। सुप्रसिद्ध इतिहासकार हैरोडोटस के कथानुसार सूर्य और चन्द्र ग्रहणों की पूर्व घोषणा करने की क्षमता भी थेल्स में थी।
महाग्रन्थों के लेखक होमर और वर्जिल का कहना है कि मंगल ग्रह जब अपना स्वरूप लाल ग्रहण कर लेता है तो उसे युद्ध का देवता कहते हैं। यानी युद्धों के होने की संभावनायें अधिक बढ़ जाती हैं। यह ग्रह अपने दो विशेष दूत भेजता है- (1) फोबोस (2) डमोस। जिन्हें भय और दंगे उत्पन्न करने की पूरी छूट मिली होती है।
गिजाह के ग्रेट पिरामिडों का निर्माण लगभग आज से 5000 वर्ष पूर्व का है। जो मिस्र के 70 पिरामिडों में से सबसे बड़ा समझा जाता है। 45 मंजिल के इन पिरामिड में ढाई से बारह टन वजन के 25 लाख शिला खण्ड लगे हुए हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के शिला लेख देखने को मिले हैं जो हमारी संस्कृति की गरिमा को प्रदर्शित करते हैं।
पेरू में माकू पिक्कू नामक स्थान पर एक बिना छत का सूर्य मन्दिर है जो मौसम परिवर्तन के बारे में पूरी जानकारी प्रदान करता है। सूर्य किरणों की घट-बढ़ से यह सब कुछ ज्ञात होता है।
आर्कमिडीज तथा ग्रीक गणितज्ञों ने पाई की आधुनिक कीमत 3.1416 पिरामिडों पर अंकित शिला लेखों के आधार पर ही निकाली। कहने का तात्पर्य है कि मिश्र की गणितीय प्रणाली इतनी स्पष्ट थी जो आज के वैज्ञानिकों को बिना आश्चर्य में डाले नहीं रह सकती। एक वर्ष में 365.240 दिन होने की गणना पिरामिडों में अंकित है। इसे पिरामिडीकल इंच के नाम से भी जाना जाता है। पिरामिड की ऊँचाई का गुण यदि 1 करोड़ से कर दिया जाय तो सूर्य और पृथ्वी के मध्य की दूरी निकल आती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार पिरामिड का वजन 6 लाख टन है यदि इतनी संख्या का गुणा 1 अरब से कर दिया जाय तो लगभग पृथ्वी का निकल आता है।
गिजाह के पिरामिडों के स्तम्भ-चिन्हों को देखने से पता चलता है कि मिश्रवासी सूर्य की पूजा-उपासना में अत्याधिक रुचि लेते रहे होंगे। वहाँ के फारूह सम्राट को मरणोपरान्त ‘सन वोट’ में देवताओं द्वारा स्वर्ग में ले जाने के संकेत स्पष्ट परिलक्षित होते हैं।
पेरू अथवा बोल्बीया के मंदिरों, किलों तथा राज-भवनों में पाये गये इंका के ध्वंसावशेषों से विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं की उपासना का विधि-विधान देखने को मिलता है। भूकम्पों की पूर्व सूचना भी इनके संकेतों के आधार पर होती है।
बोलीबिया के टिआहूना के नामक स्थान पर सूर्य मन्दिर आज भी वैज्ञानिकों के लिए अनुसन्धान का विषय बना है। मन्दिर के दरवाजे पर मानवाकार की चौबीस प्रतिमायें प्रज्वलित मसाल लेकर खड़ी हैं। इनमें से कुछ प्रतिमायें मनुष्य जैसी आकृति तथा कुछ पक्षियों के सदृश दृष्टिगोचर होती हैं। ‘स्वर्ग से देवागमन’ की पौराणिक गाथाओं के अनुसार ये प्रतिमायें दैवीय संदेशों को मानवी चेतना तक पहुँचाने का कार्य सम्पन्न करती हैं।
पिरामिडों में स्टोनहैंज के निर्माण की विलक्षणता को देखते हुये कहा जा सकता है कि उत्कृष्ट श्रेणी के लोगों का अस्तित्व ईसा से 2000 वर्ष पूर्व भी रहा होगा। पृथ्वी और सूर्य की स्थिति में परिवर्तन का अनुमान ‘हील स्टोन’ पर फैली हुयी सूर्य किरणों से लगाया जा सकता है। ‘हील स्टोन’ पर सूर्य किरणें 21 जून को बिलकुल सीधी पड़ती हैं। ऋतु परिवर्तन इसी के आधार पर स्पष्ट देखा जा सकता है। ग्लासस्टोनबरी में जौडी एकल कलैण्डर एक विशालकाय पत्थर के ऊपर अंकित है। जिससे ग्रह-नक्षत्रों एवं राशिचक्रों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त होती है। ये सारी साक्षियाँ प्रामाणित करती हैं कि मानवी सत्ता सभ्यता का आदि स्त्रोत बहुत पुराना है। मानव श्रेष्ठ व सभ्य के रूप में ही धरती पर आया व विकसित हुआ है।
गणेश एवं कार्तिकेय जैसे अजेय देव पुरुषों, अवतार शक्तियों को जन्म देने वाली माँ पार्वती अपनी निष्ठा के बल पर, संकल्प शक्ति के कारण ही शिव को साथ पा सकी। भगवत् सत्ता के संपर्क सान्निध्य से जो संस्कार वे इन अवतार सत्ताओं को दे पाईं उसमें उनका पुरुषार्थ कम नहीं, अधिक ही था। यह नारी का ही धैर्य एवं तप, सहने की शक्ति है जो असम्भव को भी सम्भव कर सकती है।
वस्तुतः ईश्वर के प्रति दृढ़-निष्ठा, उसके अनुशासनों को मानते हुए जीवन में परिवर्तन लाना ही सच्ची आस्तिकता है।
जरथुश्त्र बादशाह गुश्तास्प के दरबार में पहुंचे। उन्हें ईश्वर निष्ठ जीवन जीने का सन्देश दिया। राजा ने कहा- ‘‘मैं तो सामान्य ज्ञान रखता हूं, यदि आप हमारे दरबार के विद्वानों का समाधान कर दें तो मैं आपके निर्देश पूरी तरह मानूँगा।’’
जरथुश्त्र ने विद्वानों के कठिन प्रश्नों के समाधान बड़े ढंग से तत्काल दिए। वे सभी अत्यन्त प्रभावित हुए। शहंशाह ने कहा- ‘‘आप धन्य हैं।’’ वस्तुतः ऐसे उत्तर परमात्म ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति ही दे सकता है।
बादशाह ने उन्हें सम्मानित किया और कहा- आप कोई चमत्कार दिखायें, हम सब आपके अनुयायी बनेंगे। जरथुश्त्र ने हाथ की पुस्तक दिखाते हुए कहा- यह अवस्था (ईश्वरीय ज्ञान) ही सबसे बड़ा चमत्कार है, जो लाखों को नयी दृष्टि देता है। इसके अलावा लोगों की आंखों में चकाचौंध पैदा करने वाले किसी चमत्कार के लिए ईश्वरीय धर्म में कोई स्थान नहीं है। बादशाह अपनी बाल-बुद्धि के लिए क्षमा माँगी और शिष्यत्व ग्रहण किया।
जापान में संगीत की शिक्षा को एक अनिवार्य विषय बनाया गया है। वहाँ प्राथमिक शाला से लेकर हाईस्कूल शिक्षा तक के सभी विद्यार्थियों को अन्यान्य विषयों के साथ संगीत भी अनिवार्य रूप में लेना पड़ता है। वहाँ के शिक्षार्थी भारत की तरह नौकरी पाने के लिये नहीं पढ़ते वरन् व्यक्तित्व और प्रतिभा के धनी होने की दृष्टी से पढ़ते हैं। इन दोनों कार्यों में संगीत भी अन्य विषयों से कम कारगर नहीं होता। उससे मनोबल बढ़ता है। कलाकारिता से अभ्यस्त होने का उत्साह बढ़ता है। सामाजिक बनने तथा दूसरे के सामने अपनी अभिव्यक्तियाँ प्रकट करने का अवसर मिलता है। ऐसे-ऐसे अनेक लाभों की दृष्टि रखकर संगीत को इस प्रकार की प्रमुखता दी गई है। वह पारिवारिक जीवन का सर्वसुलभ और मोद मंगल भरा मनोरंजन है। थकान और उदासी उससे सहज ही दूर होती है। यदा-कदा पारस्परिक मनोमालिन्य चल पड़े तो भी वह इन तरंगों में सहल ही उड़ जाता है। इस प्रकार वह वैयक्तिक और पारिवारिक दोनों ही जीवन प्रसंगों में अपनी उपयोगिता प्रामाणित करता है। व्यक्ति और परिवार से मिलकर ही समाज बनता है। संगीत व्यक्ति और परिवार को भी प्रभावित करे पर सामाजिक सत्प्रवृत्तियों की सहकारिता की- हँसी-खुशी की प्रवृत्ति को उभारने में योगदान न दे ऐसा हो ही नहीं सकता।
वह दिन दूर नहीं जब संगीत को शिक्षा क्षेत्रों में ऐच्छिक विषय न रहने देकर संसार भर में उसको अनिवार्य स्तर की मान्यता मिलेगी।
शिक्षा के उपरान्त चिकित्सा का विषय आता है। रोगी को कुछ क्षण मरहम पट्टी, सुई, सफाई भोजन आदि दैनिक कार्यों से कुछ ही घंटे में निपट लेने के उपरान्त प्रायः सारे दिन बेकार पलंग पर पड़ा रहना पड़ता है। घर कुटुम्ब के लोग कुशल क्षेम पूछने के लिए जब तब ही आ सकते हैं। उन्हें भी तो अपने आजीविका उपार्जन, व्यवस्था, आदि के काम करने पड़ते हैं। मनोरंजन करने के लिए समय काटने के लिए हर घड़ी वे भी पास बैठे नहीं रह सकते। ऐसी दशा में अकेला पड़ा हुआ रोगी, शारीरिक दृष्टि से भी रोगी रहता है और पड़ा-पड़ा ऐसी कल्पना करता रहता है जो उसे बीमारी की तरह ही कष्ट देती और दुःखी करती है। परिचर्या के लिए सही अस्पताल के कर्मचारी उपलब्ध हो सकते हैं। एक रोगी के लिए एक परिचारिका का का होना भी सुगम नहीं ऐसी दशा में सूनेपन की व्यथा से छुटकारा पाने के लिए सुगम सरल संगीत की अपनी उपयोगिता है। पर सूनेपन का अच्छा साथी बनकर इच्छित समय तक साथ रह सकता है। टैप रिकार्डर के माध्यम से अच्छे संगीत या उपयोगी परामर्श सुनते रहने के लिए यह व्यवस्था एक ऐसे मनोवैज्ञानिक डाक्टर का काम दे सकती है जो हर समय अपना काम छोड़कर हाजिर रह सकता है।
यों यह कार्य अच्छी पुस्तकों से भी हो सकता है। पर उतनी मात्रा में उपयोगी साहित्य भी कहाँ उपलब्ध होता है।
संगीत चिकित्सा अपने आप में एक श्रेष्ठ उपचार पद्धति है। सबसे बड़ी विषमता उसकी यह है कि अन्य किसी उपचार प्रक्रिया में वह बाधक नहीं होता। जबकि अन्य चिकित्सा विधियों में यह सुविधा नहीं है। होम्योपैथी चिकित्सा के साथ ऐलोपैथी नहीं चल सकती। एक दूसरे की दवाओं को काटती है और एक का भी समुचित लाभ नहीं मिलता। पर यह दोष संगीत चिकित्सा में नहीं है उसका निर्वाह किसी भी पद्धति के साथ भली प्रकार हो सकता है।
स्नायु समूह को- प्राण विद्युत को प्रोत्साहित करना उसका प्रधान कार्य है। इस विद्या में जितना सम्भव हो सकता होगा उतना लाभ ही होगा। उसमें ऐन्टी बायोटिक्स जैसा कोई मारक गुण नहीं है जो किसी भी रोगी को किसी भी दृष्टि से कुछ भी हानि पहुँचावे। रोगी के लिए चित्त को प्रसन्न रखने के साधन अपने आप में रोग निवारक विशेषताएँ हैं। रोते या उदास मचलते बच्चे को जिस प्रकार अच्छे खिलौने देकर मूड बदला जा सकता है उसी प्रकार संगीत भी सबके लिए विशेषतया रोगी के लिए अच्छा मनोरंजन है। उसकी शर्त एक ही है कि वह उद्देश्य के अनुरूप ऊँचे स्तर का होना चाहिए। यह गुण प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न करने पड़ते हैं वे बाजारू फिल्मी या दूसरे तरह के विछोह भर, शिकायत भरे, अश्लील संगीत में नहीं हो सकता। फिर बाजारू रिकार्ड गायन भरे होते हैं। जबकि चिकित्सा प्रयोजन के लिए स्नायु संस्थान में उपयोगी हलचलें उत्पन्न करने वाली ध्वनि तरंगों की ही आवश्यकता है। यह कार्य विशेषतया इसी प्रयोजन के लिए विचारपूर्ण विनिर्मित किये गये संगीत टैप ही सम्पन्न कर सकते हैं।
रोगों की भिन्नता के अनुरूप स्नायु संस्थान में यह गड़बड़ियाँ भी भिन्न प्रकार की होती हैं। इसलिए हर रोगी के लिए उसकी स्थिति के अनुरूप दवा का चयन करने की ही तरह उसकी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए- संगीत को प्रभाव को ध्यान में रखते हुए ऐसा चुनाव करना पड़ता है जो रोगी की स्थिति के अनुरूप हो। सबके लिए जिस प्रकार एक दवा देने से काम नहीं चलता उसी प्रकार प्रत्येक रोगी को-बिना उसकी विशिष्ट स्थिति एवं आवश्यकता को समझे किसी भी, संगीत को सुनने की छूट नहीं मिल सकती। ऐसी छूट मनोरंजन मात्र के लिए मिल सकती है चिकित्सा के लिए नहीं।
जिस प्रकार रसायन चिकित्सा के लिए रक्त, मूत्र आदि विभिन्न माध्यमों से रोगी की स्थिति का विश्लेषण के उपरांत औषधि का निर्णय करना पड़ता है उसी प्रकार स्नायविक एवं नाड़ी संस्थान की वर्तमान स्थिति जानने के लिए इस प्रयोजन के लिए आवश्यक उपकरणों द्वारा जाँच पड़ताल करनी पड़ती है। रोग का इतिहास एवं वर्तमान स्तर प्रश्नोत्तर प्रणाली से भी जाँचना पड़ता है। तभी यह स्पष्ट होता है कि शरीर के किस भेजे में कितनी निष्क्रियता छाई है और इसके लिए इतनी शक्ति का संगीत-कितनी देर-किस समय उपयोग में लाना ठीक पड़ेगा। निदान के बिना उपचार आरम्भ कर देना तो सब धान बाईस पसेरी के भाव बेचने की तरह है। उससे लाभ के साथ निराशा भी हाथ लग सकती है और हानि भी हो सकती है।
संगीत चिकित्सा का साँगोपाँग स्वरूप वर्णन करना और उसके भेद-उपभेदों का बताना इस छोटे लेख में सम्भव नहीं इसके लिए एक परीक्षित और अनुकूल पद्धति के समस्त भेद-उपभेदों का जानना-जनाना आवश्यक है। इसके लिए अगले दिनों ही एक उपयुक्त प्रक्रिया पाठकों के हाथ पहुँचेगी। यहाँ तो उसका संकेत भर जान लेना और पृष्ठभूमि समझ लेने से ही काम चल सकेंगे।
विदेशों में, विशेषकर अमेरिका में-इस प्रकार के संगीत अस्पतालों की स्थापना हुई है जो दूरस्थ रोगी की भी घर बैठे सेवा करते हैं। वे प्रश्नोत्तरों द्वारा रोगी की जाँच पड़ताल करते हैं और समाधान के हेतु अमुक संगीत श्रवण की सलाह देते हैं। वे टैप डाक में भेज दिये जाते हैं और उद्देश्य पूरा होने पर वापस मँगा लिये जाते हैं। ऐसे अस्पतालों की पृष्ठभूमि में ईसाई मिशनों का हाथ है जो अपनी लोकसेवा प्रवृत्ति, वैज्ञानिकता एवं ईसाई धर्म तत्वों की जन-जन के मन-मन में गहराई तक बिठाने के लिए प्रयत्नशील हैं। इसकी प्रगति समीक्षा पढ़ने से प्रतीत होता है कि वह योजना लोकप्रिय होने के साथ-साथ सफल भी सिद्ध हुई है। अन्य देशों में भी इस योजना का विस्तार हो रहा है और मानसिक रोगियों को विशेष रूप से लाभ हो रहा है। जो अस्पताल में दाखिल होने की स्थिति में नहीं पहुँचे हैं, मात्र सनकी और कुकल्पनाओं से ग्रस्त हैं वे परिवारी लोग अपने-अपने घरों पर इस योजना का विशेषतया लाभ उठा रहे हैं।
संगीत भारत का उत्पत्ति केन्द्र है। यहाँ के अधिकाँश देवी-देवता संगीत उपकरणों से सुसज्जित हैं। सामगान का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। विवाह जैसे उत्सव तो उस आयोजन के बिना सम्पन्न ही नहीं होते। लोक गीतों के रूप में हर सम्पन्न और पिछले क्षेत्र में अपने-अपने ढंग से उसका प्रचलन है। देवी-देवताओं की अभ्यर्थना में संगीत जैसे आयोजनों की व्यवस्था देश के कोन-कोने में होती है। भूत-प्रेत भगाने और साँप का विष उतारने में अपने-अपने ढंग के आयोजन सर्वत्र होते रहते हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि जन-मानस के विकास, लोक शिक्षण के अतिरिक्त इस प्रक्रिया का उपयोग शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य सम्वर्धन एवं रोग निवारण के निमित्त किया जाय। यह कार्य भारत की साँस्कृतिक परम्परा के अनुरूप भी है और व्यवहार में सरल भी। अथर्ववेद आयुर्विज्ञान का प्रधान ग्रन्थ है। उसकी समस्त संरचना छंद विद्या के अनुरूप हुई है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि उन मन्त्रों का अर्थ ही रोग निवारण शिक्षाओं से परिपूर्ण हो ऐसी बात नहीं है। रहस्य यह भी है कि उनका उच्चारण यदि सामवेदीय परम्परा के अनुरूप गायन क्रम से हो तो उसका असाधारण लाभ मिल सकता है। मंत्रों के पाठ, जप परंपरा ही नहीं है उनका विधिवत् गायन भी होगा और साथ में वादन का भी संयोग रहता है। यज्ञ कृत्यों में एक अधिकारी उद्गाता भी होता है जिसका उत्तरदायित्व वेद मन्त्रों की प्रक्रिया में गायन विद्या का उपयोग त्रुटिपूर्ण न रहने पाये।
इस सुविस्तृत विज्ञान में विलम्ब लगता दृष्टिगोचर हो तो एकाकी वेदमाता गायत्री का उपयोग समस्त शारीरिक मानसिक उपचारों के निमित्त हो सकता है। अन्तर इतना ही है कि उसके साथ उपयुक्त वादन विधियों का भी समावेश हो। उच्चारण मानसिक हो सकता है। रोगी को मन ही मन वेदमाता का ध्यान ओर मानसिक जप करने में किसी प्रकार के प्रतिबन्धों जैसी कोई बात नहीं है।
ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान हरिद्वार की यह शोध प्रक्रिया कई वर्षों से चल रही है कि किस शारीरिक और किस मानसिक रोग में गायत्री मन्त्र को किस राग रागिनी में ढाल जाय तो संगीतकारों के भी अनुकूल हो और साम विद्या के अनुरूप भी वह प्रयोग लम्बे समय से चलने के उपरान्त अब उस स्थिति में आ गया है कि उसे सार्वजनिक प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया जा सके।
शान्ति-कुंज में असाध्य कष्टसाध्य और छूत कि रोगियों के लिए तो व्यवस्था नहीं बन पाई है जिनके लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता पड़े या दूसरों को दूत लगने का भय हो तथा आश्रमवासियों को असुविधा हो पर जो सामान्य शारीरिक मानसिक कठिनाइयों से ग्रसित हों वे भारतीय स्तर की संगीत चिकित्सा का लाभ उठा सकते हैं। जिनके पास अपने टैप रिकार्डरों का प्रबन्ध है तो यहाँ से रोग विशेष के अनुरूप टैप मँगा सकते हैं।
आशा की जानी चाहिए कि भगवान शिव के डमरू, कृष्ण की वंशी, सरस्वती की वीणा और नारद के इकतारे में निस्सृत संगीत विद्या आज की स्थिति में भावनात्मक उत्कर्ष और शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के सम्वर्धन में महत्वपूर्ण योगदान वे सकने में समर्थ होगी।
उन दिनों अपहरण और बलात्कार का माहौल था। नारी का सम्मान उठाकर ताक पर रख दिया गया था। शासक वर्ग के लोग किसी की बहिन बेटी की बेइज्जत करते रहते थे। उसका रोष और प्रतिशोध भी हिन्दु समाज में छाया था।
उन दिनों किसी आतंकवादी शासक परिवार की एक सुन्दरी सैनिकों के हाथ पड़ गई। लाकर सम्राट शिवाजी के सम्मुख प्रस्तुत की गई कि उसे रनिवास मैं डाल लें।
शिवाजी ने उसे देखा और रूप की सराहना करते हुए कहा- ‘‘मेरी माता यदि इतनी ही सुन्दर होती तो मैं भी वैसा ही रहा होता।” युवती के कृतज्ञता व्यक्त करने पर शिवाजी ने कहा- ‘‘मैंने कुछ नहीं किया, पुरुषों की अनीति का प्रायश्चित करने का प्रयास मात्र किया है।” उस युवती को शिवाजी ने आदर पूर्वक उसके घर वापस पहुँचा देने की तत्काल व्यवस्था कर दी।
शिवाजी की चरित्र निष्ठा से प्रभावित दुर्गा ने उन्हें अमोघ तलवार ‘भवानी’ प्रदान की थी।
कहते हैं कि पहली बार और प्रथम सन्तान बड़ी प्रतिभाशाली और वीरता पूर्ण कार्य करने वाली होती है। इसके प्रतिपादनों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं और अनेकों उदाहरण हमारे समक्ष हैं।
मुहम्मद अली, संसार का सर्वश्रेष्ठ हैवीवेट और बाक्सिंग में चैम्पियन हुआ, क्योंकि वह अपने माता-पिता से प्रथम जन्म लेने वाला बालक था। नादिया कामन्सी नाम की महिला विश्व प्रसिद्ध हुई और अनुपम कला की प्राप्ति की। धन के क्षेत्र में एक ऐसा व्यक्ति जिसने स्वयं श्रम किया, अपनी सूझ-बूझ से करोड़पति बना। और बीसवीं शताब्दी का सबसे बड़ा विद्रोही पेन्टर जिसका नाम ‘पापलोपिकासो’ था उसने भी विश्व में ख्याति प्राप्त की तथा भारत की जानी पहचानी महिला जो राजनीति और शासन में विश्व के मूर्धन्यों में गिनी जाती है उनका नाम इन्दिरागाँधी है इन उदाहरणों के अन्तराल में केवल एक ही प्रामाणिकता मिलती है कि वे सभी अपने माँ-बाप की प्रथम सन्तानें थीं।
इस सम्बन्ध में कुछ वर्ष पूर्व श्री विलियम आल्थस ने बड़ा गहन अध्ययन किया, कि बच्चों के जन्म, उनका वातावरण और माता-पिता की अभिरुचियाँ कैसी रहीं और प्रथम बार जन्म लेने पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है।
उनका कहना है कि पैतृक गुण और संस्कारवान वातावरण इन पर बहुत प्रभाव डालता है। माता-पिता का जैसा भाव और जीवनचर्या होती है वह बालक में परिलक्षित होती है। जैसी इंदिरागांधी का जन्म एक बहुत सभ्य और बहुत अच्छे वातावरण में हुआ। उनके पिता विद्वान थे अतः इस सबका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा।
‘आलफ्रेड एडलर’ एक मनोवैज्ञानिक थे। 1964 में उन्होंने एक टैस्ट आई क्यू के आधार पर किया। यू.एस.ए. राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति की ओर से एक परीक्षा हुई जिसमें बहुत से लोग परीक्षा में बैठे पर 66% बालक उन परिवारों के थे जो अपने माता-पिता की पहली सन्तानें थीं। 52% और 59% प्रतिशत में वे परिवार वे सन्तानें आती हैं जिनके दो-दो और तीन-तीन बच्चे हुये। मनोवैज्ञानिक इसको इनेट इन्टैलीजैन्स जन्मजात प्रतिभा के नाम से पुकारते हैं। उनका कहना है कि इस परीक्षा में भी वे ही बालक आये जो अपनी माता-पिता से पहली सन्तान कहलाये।
रोबर्ट क्लाइव बड़ा प्रतिभाशाली व्यापारी था, यद्यपि वह अपने आप में इतना प्रसिद्ध नहीं था पर दूसरों को बड़ा बना देने की उसमें अद्वितीय प्रतिभा थी। इसके अतिरिक्त एक ऐसी प्रतिभाशाली महिला जिसके नीचे बहिनें थीं पर यह सबसे पहली लड़की होने के कारण बड़े अदम्य उत्साह और निर्भीकता की प्रतीक रही। इसने महिलाओं के अधिकारों के लिये एक संगठन बनाया। जिसका नाम सफराजेट्स था और यह महिला बहुत प्रसिद्धि हुई जिसको “इम्मेलाइन पक्खुरस्ट” कहते हैं।
इसके अतिरिक्त माओत्सेतुंग अपने परिवार में सबसे पहली सन्तान थे जो बहुत बड़े दार्शनिक, दूरदर्शी और अच्छे शासक सिद्ध हुये, तथा इसके अतिरिक्त सर फैड्रिक लाकर के निर्माण कर्ता और मालिक थे, केवल 10 वर्ष की उम्र में एक रेडियो का निर्माण किया और मात्र 12 वर्ष की उम्र में एक कार को बनाकर खड़ा कर दिया था। इस प्रकार बर्ट्रेड रसैल एक बहुत बड़े दार्शनिक, गणितज्ञ और प्रतिभाशाली पुरुष हुये। मनोविज्ञान के क्षेत्र में सिगमण्ड फ्रायड बीसवीं शताब्दी के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक हुये तथा माइकेल फाराडे बिजली का आविष्कारक था ये सभी प्रतिभाशाली पुरुष-प्रथम जन्म लेने वाले थे। इससे सिद्ध होता है कि माता-पिता की प्रथम सन्तान वातावरण और पैतृक गुणों के अनुसार श्रेष्ठ बनती है।
रेलवे आदि सरकारी महकमों के कर्मचारियों की अलग-अलग पोशाकें होती हैं। मिलिट्री बालों की ड्रेस अलग होती है। पोस्टमैन, सफाई, नर्सें आदि को अपनी-अपनी निर्धारित पोशाकें पहननी पड़ती हैं। धर्म सम्प्रदाय वाले भी ऐसे ही पहचान चिन्ह रखते हैं सिक्खों की पगड़ी और दाढ़ी उनकी अलग-अलग पहचान कराती है। अरबों और चीनियों की पोशाक में अन्तर होता है। स्कूलों के बच्चे तक अपनी-अपनी निर्धारित पोशाक पहनकर पढ़ने जाते हैं ताकि उनके स्कूल संबंधी जानकारी सहज ही उपलब्ध हो सके।
हिंदू धर्मानुयायियों की दो विशिष्ट पहचान हैं एक शिखा दूसरा सूत्र। सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत। पुलिस के सिपाहियों की पेटी और टोपी उनकी हैमिया प्रकट करती हैं उसी प्रकार शिखा, सूत्र, के दो प्रतीकों को देखकर पहचाना जा सकता है कि वे हिन्दू धर्मानुयायी हैं क्या?
मध्यकाल में एक ऐसा अन्धकार युग भी आया था जिसमें सती प्रथा, बाल-विवाह आदि मजबूरियाँ पनपीं। उन्हीं दिनों जाति-पाति के आधार पर ऊँच-नीच की प्रथा पनपी और इसके लिए प्रतीकों के धारण पर प्रतिबन्ध लगा दिये गये। शूद्र वर्ण वाले जनेऊ न पहने ब्राह्मण ही पहने। अधिक से अधिक कोई क्षत्रिय वैश्य भी उसे मनमर्जी हो तो पहन लें। स्त्रियों पर भी शूद्रों की तरह यज्ञादि कार्यों में भाग न लेने गायत्री जप करने आदि का प्रतिबंध लग गया। स्त्रियों के चेहरे पर तो पर्दे का नकाब तक लगा दिया गया। देवताओं के आगे पशुबलि, बहु विवाह जैसी कुप्रथाएँ उसी काल के ध्वंसावशेष हैं जो कहीं-कहीं पिछड़े क्षेत्रों में अभी भी देखा जा सकता है। अच्छा ही हुआ कि प्रगतिशीलता और मानवी अधिकारों के उठते माहौल से अवाँछनीयताओं में से बहुतों को तोड़−मरोड़ कर फेंक दिया। अब दास दासी भी नहीं बिकते।
शिखा, सूत्र न केवल हिन्दू धर्म का प्रतीक चिन्ह है वरन् वह उद्देश्यों और आदर्शों का भी प्रतिनिधित्व करता है। हिन्दू मान्यता है कि जन्म से सभी पशु स्तर के होते हैं और उनमें भी स्वार्थ की, ईर्ष्या की, युद्ध की अनेकों पिछड़ी आदतें पाई जाती हैं। बड़े होने पर उन्हें मानवी सभ्यता से परिचित और अभ्यस्त कराया जाता है। नवजात शिशु नंग धड़ंग पैदा होता है पर वह स्थिति आगे नहीं रहने दी जाती। उसे कपड़ा पहनना सिखाया जाता है। सर्दी-गर्मी से बचने के लिए ही नहीं मानवी सभ्यता के प्रतीक रूप में भी। जो नहीं पहनते उन्हें आदिम कालीन या आदिवासी कहा जाता है। अफ्रीका में अभी भी बहुत से ऐसे इलाके हैं जहां नर ही नहीं नारियाँ भी किसी तरह की पोशाक नहीं पहनतीं।
शिखा और सूत्र को द्विजत्व अपनाने, मानवी सभ्यता को स्वीकार करने के रूप में धारण कराया जाता है। मुण्डन संस्कार सभी जातियों में प्रचलित है। इसे वस्तुतः शिखा की स्थापना का हर्षोत्सव कहा जाता है। यह मस्तिष्क के ऊपर शालीनता का ध्वज लहराने के समान है। राष्ट्रीय ध्वज, देश भक्ति का प्रतीक है। प्रायः सभी राजधानियों में उसके मुख्य भवन पर राष्ट्रीय झण्डा फहराता है। ठीक उसी प्रकार मस्तिष्क रूपी किले के ऊपर मानवी गरिमा को स्वीकारने और कार्यान्वित करने का उद्देश्य सदा ध्यान रखने के निमित्त शिक्षा सिखाने का नियम है। वैज्ञानिक दृष्टि से ब्रह्मरंध्र उच्च लोगों में सत्प्रवृत्तियों को आकर्षित करने और ग्रहण करने का ध्रुव केन्द्र माना गया है और कहा गया है कि शिर के बाल कटवाना, विशेषतया ब्रह्मरंध्र के ऊपर शिखा रूप आच्छादन बनाये रहना तो सद्बुद्धि सम्पादन के एक परोक्ष उपचार हैं। नारियाँ लम्बे बाल रखती हैं। पुरुष छोटे। पर ब्रह्मरंध्र की विशेषता को ध्यान में रखते हुए चोटी की तो अनिवार्यता समझी गई है।
मन्दिरों के शिखर पर ध्वजा फहराई जाती है। पर्वतों और टीलों के ऊपर देवियों के मन्दिर बनते हैं। मस्तिष्क रूपी शिखर देवालय पर शिखा को धर्म ध्वजा के रूप में फहराने का प्रचलन है।
देवालय आमतौर से छोटे-बड़े मन्दिरों के रूप में बनते हैं पर असमर्थ लोगों के लिए सस्ता तरीका यह निकाल दिया गया है कि एक छोटी चबूतरी बनाकर उस पर नदी का कोई गोल पत्थर जमा दिया जाता है। वह खुले में रहता है और एक लौटा जल चढ़ा देने भर से उसकी पूजा हो जाती है। शिर को एक चबूतरा और शिखा को देव प्रतिमा मानकर मस्तिष्क को एक देवालय माना गया है। ऐसा देवालय जिसमें कुविचारों के प्रवेश को निषिद्ध ठहराया जाय।
यज्ञोपवीत गायत्री मन्त्र का सूत्र सिद्धान्त है। यों देखने में वह एक धागा है पर उसके नौ धागे नौ सद्गुणों के प्रतीक हैं। इन गुणों को धारण किये रहने में ही मनुष्यता की गरिमा अक्षुण रखी जा सकती है। इस तथ्य का स्मरण दिलाने के लिए यज्ञोपवीत पहना जाता है।
सभी धर्म सम्प्रदायों का एक विशिष्ट मन्त्र होता है। हिन्दु धर्म के तत्वावधान एवं आदर्शों के प्रचलन का रहस्य गायत्री मन्त्र में समाहित है। उसे गुरु मन्त्र कहा जाता है। प्राचीन काल में पाठशाला प्रवेश करने वाले हर विद्यार्थी को अध्यापक लोग छात्रों को इसी मन्त्र की दीक्षा देते थे और समझाते थे कि अध्ययन के आधार पर जिस ज्ञान की उपलब्धि हो उसे उत्कृष्टता, आदर्शवादिता और लोकसेवा के त्रिविधि प्रयोजनों में लगाया जाना चाहिए। यही गायत्री मन्त्र के तीन चरणों की शिक्षा है। और यही यज्ञोपवीत की गायत्री के प्रतीक रूप में धारण करने का उद्देश्य। नौ धागे-नौ शब्द-तीन जीवन की दिशा धाराएँ उदात्त जीवन का अवलम्बन। इसी को तीन व्याहृतियाँ या जनेऊ की तीन गाँठें कहा जाता है। इसे उपनयन, यज्ञोपवीत ब्रह्म सूत्र आदि नामों से सम्मान पूर्वक पुकारा जाता है। यह सम्मान प्रकारान्तर में गायत्री मन्त्र का है।
उसे इस प्रकार पहना जाता है कि कन्धे पर, हृदय पर, कलेजे पर, पीठ पर, वह भली प्रकार लिपटा रहे। यही चार अवयव शरीर में सर्वोपरि महत्व के माने जाते हैं इसलिए इन सबको जनेऊ से कह दिया जाता है कि इन अवयवों में जो समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी की सत्प्रवृत्तियाँ हैं वे सभी विलग न होने पायें।
शास्त्रकारों ने इनका महत्व और रहस्य बताते हुए बहुत कुछ कहा है। इसमें से कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं-
यज्ञोपवीत में तीन तार हैं गायत्री में तीन चरण हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ प्रथम चरण, ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण और ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। तीनों का तात्पर्य है, इनमें क्या सन्देश निहित है, यह बात समझनी हो तो गायत्री के इन तीन चरणों को भली प्रकार जान लेना चाहिए।
ऋग्वेद में कहा गया है-
त्रिरस्यता परमा संति सत्या स्पार्हा, देवस्य जनिमान्यग्नेः। अनन्ते अन्तः परिवीत आगाच्छुरियः। शुक्तो अरयौरोरुचातः॥ (4।7।11)
इस उपवीत के तीनों सार महान हैं। उससे सत्य, तेजस्वी और पवित्र व्यवहार को ग्रहण करो। इसके मध्य में (ब्रह्मग्रंथि में) अनन्त परमात्मा की तेजस्विता शुचिता श्रेष्ठता सन्निहित है। यह यज्ञोपवीत धारण कर्ता को प्राप्त होती है।
देवतास्तत्र वक्ष्यामि आनुपूवण याः स्मृताः। ओंकारः प्रथमे तन्तौ द्वितीयेऽग्निस्तथैव च।
तृतीय नागादैवत्यं चतुर्थे सोमदेवता। पन्मे पितृदैवत्यं षष्ठे चैव प्रजापतिः।
सप्तमे मारुतश्चैव अष्टमे सूर्य एव च। सर्वे देवास्तु नवम इत्येतास्तन्तु देवता। -सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र (परिशिष्ट)
अर्थात्- यज्ञोपवीत के नौ सूत्रों में 9 देवता वास करते हैं (1) ओंकार- ब्रह्म (2) अग्नि- तेज (3) अनन्त- धैर्य (4) चन्द्र- शीतल-प्रकाश (5) पितृगण- स्नेह (6) प्रजापति- प्रजापालन (7) वायु- स्वच्छता (8) सूर्य-प्रताप (9) सब देवता- समदर्शन।
आँखों की दृश्य शक्ति पर कौन अविश्वास करेगा? और जो दिख पड़ता है उसे असत्य कैसे कहा जाय? किन्तु बात यह भी नहीं है कि जो आँखों से दिख पड़ता है सब कुछ उतने तक ही सीमित है। यदि ऐसा ही ही रहा होता तो माइक्रोस्कोप से दिख पड़ने वाले छोटे घटकों- और टैलिस्कोप से दृष्टिगोचर होने वाले दूरस्थ दृश्यों को मान्यता कैसे मिलती।
मनुष्य समझदार प्राणी है। वह वर्तमान के सभी कारणों के अनुरूप जो कुछ भी है उसी के आधार पर अनुमान लगाता है और भविष्य को तद्नुरूप घटित होने की आशा लगाता है। इस बौद्धिक परिपाटी को अनुपयुक्त भी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि संसार के प्रायः समस्त कार्य इसी आधार पर सम्पन्न होते हैं फिर भी एक तथ्य अपनी जगह पर बना ही रहता है कि कोई अदृश्य शक्ति अपनी मर्जी भी कम नहीं चलाती और मनुष्य के परिश्रम के निष्कर्ष में झुठलाने से भी रुकती नहीं। कई बार प्रवीण किसानों की फसल भी पाला, सूखा, टिड्डी आदि कारणों से चौपट होते देखी गई है और कई बार अन्धे के हाथ बटेर लगते भी। कइयों को उत्तराधिकार में अनायास ही प्रचुर सम्पदा हाथ लग जाती है और कई बिना परिश्रम किये लाटरी खुलने जैसे लाभ उठाते देखे गये हैं। यह अदृश्य के अनुदान हैं। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। यह भवितव्यता है, जिसे कई बार प्रत्यक्षवादी निष्कर्षों को उलट जाते भी देखा गया है। नावें डूब जाती हैं और आत्महत्या के लिए पानी में डूबने वाले भी किनारे पर जा लगते हैं और ईश्वर की इच्छा के अनुरूप दस आचरण के उपरान्त भी लम्बे समय तक जीते हैं। इन बुद्धि क्षेत्र को चुनौती देने वाली घटनाओं के अस्तित्व से सदा इनकार नहीं ही किया जा सकता।
इन पंक्तियों में आज की परिस्थितियों के संदर्भ में चर्चा की जा रही है और जो कार्य करने की संगति मिलाते हुए प्रतिफल प्रतीत होता है उसके सही गलत होने के सम्बन्ध में प्रकाश डाला जा रहा है। ऐसा प्रकाश जिसके पीछे महत्वपूर्ण अनुभूतियाँ काम करती हैं और जिन्हें किसी सशक्त संकेतों पर अवलम्बित कहा जा सकता है। इन पंक्तियों का लेखक जिन महत्वपूर्ण प्रकाश को प्रस्तुत कर रहा है उसे उसका व्यक्तिगत अनुमान आग्रह न माना जाय तो अधिक उपयुक्त है। यह प्रतिपादन ऐसा भी है जिस पर विश्वास करने वाला समय आने पर यह अनुभव न करेगा कि हमें व्यर्थ ही फुसलाया और डराया गया। हमें अदृश्य के साथ सम्बन्ध जोड़कर काम करते हुए प्रायः पूरा जीवन बीत गया। इतने समय में जो संकेत मिलते रहे हैं वे हमारे व्यक्तिगत जीवन में अक्षरशः सही घटते रहे हैं। दूसरों के या सार्वजनिक प्रसंगों के सम्बन्ध में भी सम्भावनाएँ विदित होती रही हैं पर उन्हें प्रकट करने पर प्रतिबन्ध रहने के कारण भविष्य कथन जैसा कभी कुछ किया नहीं गया। यह प्रथम अवसर है जिनका व्यक्ति विशेष से नहीं जनसाधारण से सीधा सम्बन्ध है। यह कथन स्वेच्छापूर्वक प्रकट करने का कोई मन भी नहीं था पर सार्वजनिक हित में इसे प्रकट करने के लिए उकसाये जाने पर ही ऐसा कुछ करने का साहस सँजोया गया है जिसका निकटवर्ती भवितव्यता और समूचे विश्व के लिए विचारणीय प्रसंग है।
यहाँ सर्वप्रथम राजनैतिक परिस्थितियों के सम्बन्ध में चर्चा की जा रही है। देशों के भीतर होती रहने वाली उथल-पुथल के सम्बन्ध में नहीं वरन् समूचे विश्व के समान रूप से प्रभावित करने वाली परिस्थितियों के सम्बन्ध में कुछ ऐसा कहा जा रहा है जिस पर मात्र विचार ही नहीं किया जाना चाहिए वरन् यह भी मानकर चलना चाहिए कि प्रस्तुत कथन सही निकला तो किसे अपना क्या कर्त्तव्य निर्धारित करना चाहिए।
इन दिनों राजनीति के प्रसंग में सबसे प्रमुख चर्चा तृतीय विश्व युद्ध की है। प्रमाणों से प्रत्यक्ष है उसमें तीर तलवारों का नहीं अणु आयुधों का- विषैली गैसों का और मारक किरणों का प्रयोग होगा। यदि ऐसा हुआ तो पक्ष और विपक्ष तो समान रूप से हारेंगे ही साथ ही यह पृथ्वी भी प्राणियों के जीवित रहने योग्य नहीं रहेगी। ऐसा सर्वनाश के उपरान्त किसका क्या प्रयोजन सिद्ध होगा। ऐसे कदम तो उन्मादी ही उठा सकते हैं। हमें सोचना होगा कि मनुष्य विज्ञान और कूटनीति में कितना ही आगे क्यों न बढ़ गया हो, ऐसे आत्मघाती कदम उठाने से पूर्व हजार बार सोचेगा और ऐसा न करेगा कि जिसमें विपक्ष के साथ-साथ अपना अस्तित्व भी सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जाय।
एक कूटनीतिक अनुमान यह है कि जापान की तरह अणु शक्ति का सीमित प्रहार करके विपक्ष को घुटने टेकने के लिए विवश किया जाय और अपनी वरिष्ठता की छाप छोड़ कर उससे मनमाना लाभ उठाया जाय? समझा जाना चाहिए कि जापान वाली घटना की अब पुनरावृत्ति हो सकना कठिन है। तब एक ही आक्रमणकारी शक्ति थी जो अस्त्र थे वे एक के ही हाथ में थे। अब वे इतने अधिक देशों के पास इतनी अधिक मात्रा में हैं कि सिलसिला आरम्भ होते ही उसकी श्रृंखला चल पड़ेगी और फिर मूँछ नीची करने की अपेक्षा मिट जाने या मिटा देने की अधीरता अहन्ता पूरे जोश-खरोश भरे प्रतिशोध के साथ चल पड़ेगी। अब सीमित युद्ध नाम की कोई सम्भावना नहीं रही। अब सर्वनाश या सहजीवन इन दो के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। अब आकाश-पाताल में यकायक झपट्टा मारने और शिकार को पंजों में दाबकर उड़ने की सम्भावना भी नहीं रही और न समुद्र के गर्भ में अग्नि बाण छोड़े जा सकते हैं। शस्त्र भण्डारों से भी बढ़कर अब गुप्तचरों के जाल बिछे हुए हैं। किसी योजना को आकस्मिक कार्यान्वित कर बैठने और सामने वाले को पता न चलने देने अथवा सभी गुप्त प्रकट प्रहार क्षेत्रों को काबू में कर लेने की बात भी नहीं बनने वाली।
आतंक का सबसे बड़ा कारण है भय और अविश्वास। सामने वाले कोक आक्रमणकारी मानकर अपनी सुरक्षा की दुहाई देते हुए अस्त्र भण्डार बढ़ाने और युद्ध के लिए उपयुक्त क्षेत्र ढूंढ़ने के कुचक्र में आज के राजनेता उलझकर रह गये हैं। किन्तु इस कल्पना में अत्युक्ति की भरमार है। हर कोई अपनी सुरक्षा चाहता है किन्तु आज की स्थिति में वह आशंकाओं का निवारण करने वाले उपाय अपनाकर ही कार्यान्वित किये जा सकते हैं। वास्तविकता यह है सामने वाले को डराने के लिए ही धमकी के रूप में यह आतंक गढ़ा जा रहा है। किसी के मन में भी मिटने या मिटाने का निश्चय नहीं है। यह तब होता जब स्वयं सुरक्षित रह सकने की कोई गुंजाइश रही होती। जो ऐसी कल्पना करता है वह वस्तुस्थिति से अपरिचित रह रहा है। यथार्थता यह है कि ऐसे वीभत्स रचने का कलंक कोई अपने सिर पर लेना नहीं चाहता। दूसरे की ओर से आक्रमण दिखाकर स्वयं चढ़ बैठने जैसा भी छद्म नहीं चल सकता है। ऐसी कल्पनाएँ सभी के मस्तिष्क में उठती और बबूले की तरह फूटती रहती हैं। कोई इस निश्चय पर नहीं पहुँच पाता कि ऐसी किसी दुर्नीति को अपनाकर विजय प्राप्त की जा सकी है।
सच्चाई यह है दोनों पक्ष ही डर रहे हैं और दोनों ही शान्ति चाहते हैं। इस वास्तविकता पर दैवी तत्वों की साक्षी स्वीकार की जा सकती है। हमारा पूरे साहस के साथ कथन है कि एक अधिक ईमानदार और साहसी पक्ष को अपनी ओर से एक पक्षीय पहल करनी चाहिए। दोनों की सहमति की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह तब तक सम्भव नहीं जब तक कि कोई एक बिना शर्त की पहल करने को तैयार न हो। ऐसा हो सका तो दूसरे पक्ष को झक मारकर झुकना पड़ेगा। विश्व शान्ति को अकारण नष्ट करने का साहस करेगा वह अपने मित्रों को भी शत्रु बना लेगा और छद्म के सहारे देर तक जीवित न रह सकेगा।
जापान पर एक पक्षीय अणु प्रहार होने का परिणाम यह हुआ कि संसार भर की सहानुभूति उस पीड़ित के साथ हो गई। न्याय बचाने के लिए उसे स्वतन्त्र भी करना पड़ा और ऐसा समझौता जो सस्ते में नहीं हो गया। जिस दिन आइन्स्टीन ने जापान पर अणु बम गिरने का समाचार सुना उसी दिन से वे अत्यन्त दुःखी और गम्भीर देखे गये। विज्ञान क्षेत्र को नमस्कार कर दिया। वायलिन बजाया और नाव में घूमकर दिल बहलाया करते थे। अधिक बीमार पड़ने पर डाक्टरों की एक छोटा आपरेशन करने की बात को भी अस्वीकार कर दिया और जल्दी शरीर छूटने की कामना की। मरते समय उनने कड़ी हिदायत दी कि उनका कोई स्मारक न बनाया जाय। यह प्रकारान्तर से विजेता पक्ष की हार है।
आगे भी लोकमत जीवित रहेगा। सृष्टा का लम्बा हाथ कार्यरत रहेगा। जो शान्ति के साथ-विश्व के मानव समुदाय के साथ खिलवाड़ करेगा। वह चैन से न बैठ सकेगा और न विजय के लाभ से लाभान्वित हो सकेगा। जीत उसकी होगी, सराहनीय भी वही होगा जो अपनी ओर से कदम बढ़ाकर-सुरक्षा की चिन्ता किये बिना इस विभीषिका को निरस्त करेगा और शान्ति का पक्षधर होने की बात कथनी से नहीं करनी में सिद्ध करेगा। जो भी बहादुर हो- जो भी विवेकशील हो उसे सामने वाले की प्रतीक्षा किये बिना एकाकी पहल का शुभारम्भ करना चाहिए। जो करेगा वह घाटे में न रहने पाये इसकी जिम्मेदारी महाकाल ने ली है।
मात्र राजनीतिज्ञ को ही नहीं इस निर्णय में उन्हें भी शामिल होना चाहिए जो युद्ध के उपकरण बनाते हैं और उसी व्यवसाय में धन कुबेर बनना चाहते हैं भले ही असंख्यों के प्राण जाँय और असंख्यों अनाथ बिलखें। यह व्यवसाय बड़ा घिनौना है और उससे भी बुरी बात यह है कि युद्ध का वातावरण बनाने के लिये आये दिन कहीं न कहीं कुछ न कुछ मार काट मचाते रहा जाय। ऐसी स्थिति में ही दोनों पक्ष हथियार खरीदते हैं और चन्द व्यापारी मौत का सौदागर बनकर धनी बनते हैं।
इस वर्ग को भी हमारा निवेदन है कि समय रहते अपनी गतिविधियाँ बदल दें। अपने साधनों को एक ओर से समेट कर दूसरे कार्यों में लगायें। सृजन के अनेकानेक काम बाकी पड़े हैं। गरीबी, बेकारी, बीमारी, अशिक्षा से निपटने के लिए उपयोगी व्यापार हजारों हो सकते हैं। पशुपालन, सिंचाई, सफाई, बिजली, गृह उद्योग जैसे अगणित छोटे-बड़े काम मौजूद हैं जिनमें वह पूँजी लगाई जा सकती है जो विनाश के साधन विनिर्मित करने में लगी हुई है। अभी तो यही समझा जाता है कि यह धन कुबेर ही राजनेताओं पर दबाव डालकर- जहाँ-तहाँ छोटी-बड़ी लड़ाइयाँ खड़ी कराने के निमित्त कारण हैं।
जो हो समझदारी हर किसी को अपनानी चाहिए। विशेषतया जिनका अनाचार समूची मानवता के प्रति अपराध करता है। ऐसे लोगों के लिए ही यह कहा गया है कि- ‘‘जो सताता है वह सताया जायेगा जो मिटाता है वह मिटाया जायेगा।’’
हमारी हार्दिक इच्छा यह है कि यह पंक्तियाँ उन शासनाध्यक्षों और उद्योगपतियों को पढ़ने को मिले, जो युद्ध के-विनाश के निमित्त अपने कौशल और साधन को नियोजित किये हुए हैं। काश, वे समय रहते इस सलाह को नहीं चेतावनी को ध्यान में रख सकें तो उनकी दिशाधारा बदलेगी। रीति-नीति में आमूल-चूल परिवर्तन होगा। वह परिवर्तन समूची मानव-जाति के भाग्य भविष्य का काया-कल्प कर सकने में समर्थ होगा। जिन्हें आज धरती पर रहने वाले शैतान समझा जाता है, उन्हें बदली हुई परिस्थितियों में भगवान कहा जायेगा।
एक मार्ग पर चलने वाला प्रवाह रोक कर यदि दूसरी दिशा में मुड़ेगा तो उसका परिणाम चमत्कारी होगा। करोड़ों को जिस चक्की में परोक्ष रूप से, पिस रहे हैं या पिसने जा रहे हैं उनके चेहरों की उद्विग्नता को यदि आशा, प्रगति और प्रसन्नता में बदला जा सके तो जिनके शिर पर आज विनाश के नियोजन का कलंक है उन्हें सृजन का श्रेय भी मिलेगा। क्योंकि शक्तियाँ स्थिर तो रहेंगी नहीं। समुद्र में डुबोई भी नहीं जा सकेंगी उन्हें विनाश से विरत किया जायेगा तो सृजन में निरत हुआ जायेगा। विज्ञान वैभव कौशल की क्षमताएँ यदि मानव जाति के अभिनव सृजन में- उत्कर्ष के उपयुक्त साधनों में नियोजित की जायेगी तो वातावरण कुछ से कुछ हो जायेगा। नरक को स्वर्ग बनाना इसी को कहते हैं।
कहना चाहिए तो शिष्टाचार वश कहा जा रहा है। वास्तविकता यह है कि यही करना होगा। इच्छा से भी और अनिच्छा से भी सृष्टा का व्यवस्थाक्रम और प्रकृति का सन्तुलन ऐसा है जिसमें समय-समय दुर्बुद्धिग्रस्त को सीधी राह पर खड़ा किया है। इस बार भी वे अपना काम करने और उलटों को उलटकर सीधा बनाने में लग पड़ी हैं। अच्छा हो प्रताड़ना ओर विवशता से बदलने की अपेक्षा दूरदर्शिता अपनाते हुए ही- सोचने का तरीका और काम करने का ढंग बदल लिया जाय।
ईश्वर एक है- कर्मफल। भले ही उसके नाम रूप अनेक हों। धर्म एक है- मानवी कर्त्तव्यों का निर्वाह। भले ही उसे किन्हीं शास्त्रों द्वारा समझा जाय।
सूचना
वर्ष 1983-87 ई. (संवत् 2043) का दृश्य गणित ब्रह्मवर्चस् पंचांग ब्रह्मवर्चस् शान्ति-कुँज हरिद्वार प्रकाशित हो चुका है। मूल्य तीन रुपये। शान्ति-कुँज हरिद्वार से इसे प्राप्त किया जा सकता है। जिन्हें मँगाना हो वे केन्द्र से पत्र व्यवहार कर लें।
अवन्तिका नगरी के समीप जंगल में कुछ ग्वाले पशु चराने जाया करते थे। उस क्षेत्र में एक ऊँचा टीला था। टीले पर जब कोई लड़का बैठ जाता तो बड़े विद्वानों जैसी बातें करता। नीचे उतरते ही उसकी स्थिति पूर्ववत् हो जाती। समझा गया कि टीले में कोई करामात है। सूचना राजा भोज के पास पहुँचाई गई। टीले को खोदने और उसके भीतर कोई विलक्षणता हो तो खोज निकालने की आज्ञा हुई।
टीला खोदा गया। उसके नीचे एक स्वर्ण सिंहासन निकला। उसके बत्तीस पाय थे, जो पुतली आकृति के बने हुए था। राजा भोज ने उसे अपने बैठने के लिए उपयुक्त समझा सो एक दिन इसके लिए निर्धारित हो गया।
राजा ने जैसे ही सिंहासन पर पैर रखा, पायों में लगी एक पुतली बोलने लगी अरे यह सिंहासन राजा विक्रम का है, वे बहुत गुणवान थे। उनके बत्तीस गुणों की प्रतिनिधि एक-एक पुतली है। यदि आप में वे गुण हों तो ही इस सिंहासन पर बैठना। भोज के पूछने पर एक पुतली ने एक गुण का संस्मरण सुनाया। राजा में वे गुण न थे इसलिये वे असमंजस में पड़े और मुहूर्त कल के लिये हटा दिया गया। दूसरे दिन दूसरी पुतली ने, तीसरे दिन तीसरी पुतली ने एक-एक गुण से सम्बन्धित संस्मरण सुनाये। इस प्रकार बत्तीस पुतलियों को अपने-अपने संस्मरण सुनाते हुए बत्तीस दिन बीत गये। राजा साहस पूर्वक यह न कह सके कि उनमें वे गुण हैं। अस्तु बत्तीसों पुतलियाँ मिल कर उस सिंहासन को आसमान में उड़ा ले गईं।
शासन में कितने सद्गुण होने चाहिये इस कथान्तर का यही अभिप्राय है। तभी उसकी प्रजा सुखी रह सकती है। यही बात सुव्यवस्थित परिवार के गृहपति पर लागू होती है।
गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण एकान्त साधना को प्रायः डेढ़ वर्ष हो चला। इस बीच उनकी ढलती आयु और प्रचण्ड तपश्चर्या को देखते हुए प्रत्यक्ष स्वास्थ्य बहुत अधिक नहीं लड़खड़ाया है। चेतना शरीर तो और भी अधिक बलिष्ठ समर्थ एवं तेजस्वी हो गया है। उनकी संरक्षक शक्ति का प्रताप देखते हुए हम सब को किसी चिन्ता की आवश्यकता नहीं। वे अनवरत क्रम से अपने मार्ग पर चल रहे हैं। निर्धारित लक्ष्य को पूरा करके रहेंगे, इतनी निश्चिन्तता हमें रहनी ही चाहिए।
श्रावणी पर्व पर उनने एक अँगड़ाई ली है। प्रज्ञामिशन की ओर ध्यान दिया है और भावनाशील परिजनों को भी उनने स्मरण किया है। सभी के कुशल समाचार पूछे और मनःस्थिति एवं परिस्थिति का लेखा-जोखा लिया है। साथ ही उनके उज्ज्वल भविष्य की संरचना का आश्वासन भी दिया है। इसके अतिरिक्त परिजनों के प्रति निजी अभिव्यक्ति का पौन घण्टे का वीडियो टैप भी कराया है। इसके उपरान्त वे अपनी प्रचण्ड साधना में फिर पहले की ही भाँति लग गये हैं। विश्व की विषम परिस्थिति का सन्तुलन बिठाने के लिए इससे कम ऊर्जा में काम चलने वाला भी नहीं है।
यह गुरुदेव की हीरक जयन्ती का वर्ष है। इसमें प्रायः छः महीने बीत चुके और लगभग इतने ही दिन शेष हैं। यह शानदार वर्ष सभी परिजनों के लिए हर दृष्टि से सौभाग्य सूचक और उत्साहवर्धक है। सभी के मन में इस अवसर पर कुछ करने की उमंग है। साधारणतया हर्षोत्सवों पर धूमधाम भरे सज्जा सम्मेलन और यज्ञादि कर्मकाण्ड होते रहते हैं। इस संदर्भ में गुरुदेव ने आरम्भ में ही अनिच्छा व्यक्त कर दी है और कहा कि इस महत्वपूर्ण बेला को इतने सस्ते में न निपटाया जाय। जिन्हें करना हो वे कुछ ऐसा ठोस काम करें जिसका प्रभाव जन-मानव के परिष्कृत करने के लक्ष्य की पूर्ति में महती भूमिका निभायें और उसका प्रत्यक्ष दर्शन प्रेरणाप्रद स्वरूप में चिरकाल तक होता रहे।
अधिक पूछने पर उनने कहा- हमारे जीवन के अनेकानेक कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण कार्य एक था- 24 प्रज्ञा पीठों का निर्माण। देवालयों की दृष्टि से वे भली प्रकार विनिर्मित हो गये। अनेकों का हमने स्वयं जाकर उद्घाटन भी किया। इमारतों की दृष्टि से मध्यवर्गी परिजनों का इतना साहस भी कम सराहनीय नहीं है।
जिस प्रयोजन के लिए आशाओं के साथ वह निर्माण हुआ, उसके पीछे एक दूरगामी चेतना उभारने वाला लक्ष्य भी था। आशा करली गई थी कि प्रत्येक प्रज्ञापीठ स्थानीय क्षेत्र में नव जीवन का संचार ही नहीं करेगा, वरन् समीपवर्ती गांवों को भी अपनी सेवा परिधि में लेकर एक मण्डल का केन्द्र बनायेगा। उनकी रचनात्मक प्रयत्नों से ट्यूबवैल जैसी हरितमा उगी दूर-दूर तक दिखाई देगी। वे विद्युत उत्पादक, जनरेटर बनकर अपने दायरे में आलोक वितरण करेंगे। प्राचीन काल में देव मन्दिर जनमानस में धर्मधारणा को गहराई तक प्रवेश कराते थे और लोकोपयोगी सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में वे प्राणपण से संलग्न रहते थे। उनके द्वारा उत्पन्न की गई लोक सेवकों की संगठना अनर्थ अनौचित्यों के पैर नहीं जमने देती थी। प्रज्ञापीठें ऐसी ही हलचलों की केन्द्र बनकर रहेंगी, ऐसी आशा अपेक्षा की गई थी।
पर लगता है वस्तुस्थिति को और भावी जिम्मेदारी को समझे बिना ही आतुरता में चन्दे के बल पर देवालय बन गये और कार्य समाप्त हुआ मान लिया गया। यही कारण है कि विनिर्मित प्रज्ञा पीठों में भाव भरा जीवन संचार नहीं हो रहा है। उत्पादित इन बालकों को पक्षाघात जैसा कुछ होता जा रहा है। वे चलते-फिरते हँसते-खेलते, बोलते-चलते नहीं दिखते परिस्थिति को देखते हुए गुरुदेव को व्यथा होती है और चोट लगती है। निर्जीवता के माहौल के बदले जाने और सजीवता उत्पन्न होने की आशा करते हैं।
हीरक जयन्ती वर्ष में समारोह के लिए गुरुदेव ने मना इसीलिए कर दिया है कि यदि प्रदर्शन और हुल्लड़ कोई ठोस काम होने की भूमिका नहीं बना सकते तो उनके निमित्त किया गया श्रम और खर्चा गया धन निरर्थक है।
इन निराशाजनक परिस्थितियों में भी एक आशा की नई किरण उनके मन में कौंध रही है। उसी का आभास उनने इस श्रावणी पर्व पर दिया है। वे चाहते हैं बन चुके प्रज्ञा पीठों को हिलाते-जुलाते रहा जाय ताकि उनकी मूर्च्छना हटे और प्राण चेतना के लक्षण प्रकटे।
साथ ही उनकी एक और इच्छा भी है कि 24 लाख के विशालकाय परिवार में से कम से कम दस हजार व्यक्ति ऐसे निकलें, जिन्हें ईंट चूने से नहीं हाड़मांस से बने, भावनाशील और क्रियाशील पीठ कहा जा सके जो सक्रिय भी हों और गतिशील भी।
गाँधी जी के सत्याग्रही, बुद्ध के परिव्राजक, विनोबा के सर्वोदयी, सुग्रीव के रीछ वानर और गोपाल के ग्वाल बाल कोई बहुत बड़ी प्रतिभा और परिस्थिति के नहीं थे, पर जब उन्होंने एक केन्द्र के तत्वावधान में रहकर परमार्थ प्रयोजन में अपने को समर्पित किया तो इन्हें इतना बड़ा श्रेय मिला जितना देवताओं को मिलता है।
प्रज्ञा परिवार के पंजीकृत सदस्य प्रायः 24 लाख हैं। इनमें से मात्र दस हजार निकल कर अगली पंक्ति में आयें जिन्हें सच्चे अर्थों में युग शिल्पी, प्रज्ञापुत्र एवं व्रतधारी कहा जा सके। उन्हें घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चले जाने के लिए नहीं कहा जा रहा है। बल्कि वह आह्वान किया जा रहा है कि न्यूनतम दो चार घण्टे का समय एवं बीस पैसे नित्य युगान्तरीय चेतना को गतिशील बनाने में संकल्पपूर्वक लगाते रहें। इतने में ही वे उस पंक्ति में गिने जा सकने योग्य बन जायेंगे जैसों की कि गुरुदेव ने इस बार अपेक्षा की है।
समय किसी के पास भी चौबीस घण्टे से कम नहीं। इसका सही विभाजन करके सही काम में लाते हुए सामान्य व्यक्ति महान कार्य कर गुजरते हैं जबकि व्यस्तता की गुहार लगाते हुए कितने ही अनगढ़ और आलसी अपना समय गँवाते हैं और उन समस्याओं को भी नहीं सुलझा पाते जिनकी आड़ में वे मानवी गरिमा को सार्थक करने वाले कार्यों से कतराते और आँख चुराते रहते हैं।
रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने वाले को भी आठ घंटा कमाने के लिए- सात घंटा सोने के लिए- पाँच घण्टा नित्य कर्म तथा अन्याय इधर-उधर के कामों के लिए छोड़ कर विशुद्ध रूप से चार घंटे बचते हैं। इसी में से संकल्पपूर्वक दो से लेकर चार घंटे तक युग धर्म के निर्वाह में लगाते रहा जाय तो स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही साथ-साथ सधते रह सकते हैं। जो इतना समयदान अनुदान प्रस्तुत कर सकें उन्हें जीवन्त प्रज्ञापीठ या वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र कहा जा सकेगा। ऐसे लोग मात्र अपने प्रयास से ही इतना काम कर गुजर सकते हैं जितने कि भव्य इमारतों वाली प्रज्ञा पीठों से की गई थी।
अर्थोपार्जन और परिवार निर्वाह के अतिरिक्त दो चार घंटे का समय भगवान के लिए, देश धर्म, समाज संस्कृति के लिए, गुरुदेव के लिए युग परिवर्तन के लिए लगाकर कोई व्यक्ति घाटे में नहीं रहेगा वरन् अपने त्याग की तुलना में अनेक गुना भण्डार भरेगा। इसके साथ ही अप्रैल अखण्ड-ज्योति अंक में छपे गुरुदेव के ‘बोया ’काटा लेख को कई बार पढ़कर सत्परिणाम के सम्बन्ध में सुनिश्चित विश्वास किया जा सकता है।
इन घंटों में क्या किया जाना चाहिए। यह अनेकों बार बताया जा चुका है। झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, कार्यकर्ताओं के जन्म दिन, दीवारों पर आदर्श वाक्य, मुहल्लों में स्लाइड प्रोजेक्ट प्रदर्शन, टैप रिकार्डर से गुरुदेव के नवीनतम प्रवचनों को सुनाया जाना, प्रज्ञा पुराण के चार खण्ड छप चुके हैं उनकी कथाएँ युग गीतों के टैप प्रातः काल सुनाने के लिए किसी ऊँचे स्थान पर लाउडस्पीकर फिट करना और टैप से युग कीर्तन बिस्तर पर पड़े हुओं को भी सुनाना, यह वे कार्यक्रम हैं, जिन्हें वर्णमाला अभ्यास के समतुल्य समझा जा सकता है। भारी भरकम, बोझिल और विशालकाय कार्य इतना कर चुकने के पश्चात् ही किसी को सौंपे जा सकते हैं। समर्थता की प्रारम्भिक सीढ़ी पार कर लेने पर ही विशालकाय क्रिया-कलापों का बोझ उठ सकता है।
उपरोक्त समूची योजना के लिए आवश्यक उपकरण खरीदने के लिए प्रायः पाँच हजार की राशि चाहिए। कुछ उपकरण पहले सके ही हों तो उतनी राशि से कम से भी काम चल सकता है। -झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, ज्ञानरथ, लाउडस्पीकर, स्लाइड प्रोजेक्ट, समग्र यज्ञशाला, वीडियो टैप सुगमसंगीत के वाद्ययन्त्र आदि ऐसी वस्तुएँ हैं जिनकी प्रचार कार्य में आये दिन आवश्यकता रहती है। वे न हों तो साधन हीन व्यक्ति का प्रचार कार्य आधा अधूरा बनकर रह जाता है।
इनके निमित्त राशि जुटाई ही जानी चाहिए। अपने पास से, मित्रों पर दबाव देकर, बर्तन बेचकर या कर्ज लेकर किसी न किसी प्रकार इतने साधनों की व्यवस्था करनी चाहिए और मन समझाने को सोचा जाना चाहिए कि कोई आकस्मिक आपत्ति आ गई थी और उसमें इतना पैसा लग गया। इन सभी के लिए मेण्टेनेन्स का खर्च बीस पैसा रोज के अंशदान की राशि से निकल सकता है। ईंट चूने की शक्ति पीठों में लाखों की राशि जुट जाय और हाड़मांस की बोलती चलती जीवन्त शक्ति पीठ के लिए आवश्यक उपकरणों के निमित्त उतनी छोटी राशि भी न जुट सके, ऐसा हो ही नहीं सकता।
स्थिर विनिर्मित प्रज्ञापीठों में निर्माण कर्ताओं ने स्वयं समय नहीं दिया। नौकरों से, बूढ़े बीमारों से, अनपढ़ अनगढ़ों से काम करवाया फलतः उसका कुछ निष्कर्ष न निकला। व्यक्ति की अपनी निज की प्रतिभा का अतिरिक्त मूल्य होता है। अनुपयुक्त व्यक्ति छोटे-मोटे काम भी नहीं कर पाता जबकि सुयोग्य व्यक्ति रास्ता चलते अनेकों काम बना कर रख देता है। अस्तु यह आवश्यक है कि नव सृजन का वातावरण बनाने के लिए कार्यक्रम चलाने के लिए वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयं आगे बढ़ें और देखें कि उन्हें कितने नये सहयोगी धड़ाधड़ मिलते चले जाते हैं और युग चेतना का प्रकाश उस समूचे क्षेत्र को किस प्रकार ज्योतिर्मय बनाता है।
प्रज्ञा परिवार के जो भी सदस्य इन पंक्तियों को पढ़ें, यह युग निमन्त्रण सीधा उन्हीं के नाम भेजा गया है। गुरुदेव की हीरक जयन्ती इन्हीं दिनों दस हजार प्रज्ञापुत्रों को जीवन्त प्रज्ञा संस्थान के रूप में खड़े होते देखना चाहती है। गुरुदेव दस हजार मनकों का हार अपने गले में पहनना चाहते हैं। अपना नाम अगली पंक्ति में लिखा कर औरों को भी परिजनो द्वारा अनुकरण की प्रेरणा दी जानी चाहिए।
आवश्यक ज्ञातव्य
जैसा कि पूर्व अंकों में सूचित किया गया था। प्रज्ञा पुराण के तीन और खण्ड ‘‘महामानव प्रकरण’’ ‘‘परिवार निर्माण प्रकरण’’ एवं ‘‘देव संस्कृति प्रकरण’’ पर प्रज्ञोपनिषद एवं कथाओं के अनूठे समन्वय के रूपों में गायत्री तपोभूमि मथुरा से प्रकाशित हो चुके हैं। लगभग 325 अखण्ड ज्योति पृष्ठो में प्रत्येक सजिल्द खण्ड में सामग्री आ पाई है। मूल्य प्रत्येक का 25) रक्खा गया है। इनका गुजराती अनुवाद भी शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है।
(लाखन सिंह भदौरिया)
तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता। युग द्रष्टा, युग स्रष्टा, प्रेरक जीवन-ज्योति-प्रदाता॥
पथ के गीध, शिला, शबरी को पावन प्यार लुटाते। चले जा रहे महाप्राण, करुणा की किरण उगाते॥ अंधकार में घिरे मनुज को ज्ञान मशाल थमाये। श्वास-श्वास को चले होमते, यज्ञ-ज्वाल धधकाये॥ सोई संसृति को जागृति का जीवन घूंट पिलाते। ध्यान-मग्न, एकाकी पथ पर आगे कदम बढ़ाते॥ अंध अनय के लिए मन्युवत् न्याय-नीति के त्राता। तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता॥
संस्कृति-सीता, शांति-सभीता को अब मुक्ति दिलाने। लिये अखण्ड-ज्योति-सा जीवन, युग का तिमिर मिटाने॥ चले जा रहे देव, लक्ष्य की सीमाओं से आगे। सोये नहीं एक पल को भी, नींद जीतकर जागे॥ चिंतन चरण वहां जा पहुंचे, जहां न कोई साथी। साथी बनी राह में छायी, केवल गहन निशा थी॥ धर्म-साधना अर्पित जीवन, साधक, सृजक विधाता। तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता॥
इसीलिए करुणार्द्र हृदय ने निशि को नहीं मिटाया। दो रातों के बीच संत ने दिन का दिया जलाया॥ विश्वामित्र, वशिष्ठ, व्यास की परंपरा का पानी। गंगा की अबाध धारा-सा बढ़ता रहे अमानी॥ उस सीमा तक लिये जा रहे तप की अमर कहानी। साथ न कोई जहां पहुंचकर आज करे अगवानी॥ चिंतन जाग रहा जन-जन में जीवन-ज्योति जगाता। तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता॥
आप्त पितर फूले न समाते, गर्वित माथ उठाये। आशीषों की वर्षा कर आनंद अश्रु भर लाये॥ पुलकित प्राण आर्ष संस्कृति के, मुक्त ऋचायें गायें। खड़ा हिमालय शीश उठाकर कीर्ति ध्वजा फहराये॥ भव्य भारती भरे भाव से पुलक-पुलक बलि जाये। तप की गाथा प्रलय काल तक स्वयं शारदा गाये॥ अमृत का पिघलाव प्राण से उमड़-घुमड़ उफनाता। तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता॥
*समाप्त*