वैभव की कमी नहीं, पर आवश्यकता जितना ही समेटें

पक्षियों को देखिए! पशुओं को देखिए! वे प्रातः से लेकर सांयकाल तक उतनी खुराक बीनते चलते हैं जितनी वे पचा सकते हैं। पृथ्वी पर बिखरे चारे दाने की कमी नहीं। सवेरे से शाम तक घाटा नहीं पड़ता। पर लेते उतना हैं जितना मुंह मांगता और पेट संभालता है। यही प्रसन्न रहने की नीति है।

जब उन्हें स्नान का मन होता है, तब इच्छित समय तक स्नान करते हैं। उतना ही बड़ा घोंसला बनाते हैं जिसमें उनका शरीर समा सके। कोई इतना बड़ा नहीं बनाता। जिसमें समूचे समुदाय को बिठाया सुलाया जाय।

पेड़ पर देखिए! हर पक्षी ने अपना छोटा घोंसला बनाया हुआ है। जानवर अपने रहने लायक छाया का प्रबंध करते हैं। वे जानते हैं कि सृष्टा के साम्राज्य में किसी बात की कमी नहीं। जब जिसकी जितनी जरूरत है आसानी से मिल जाता है। फिर संग्रह की अनावश्यक जिम्मेदारी किस लिए उठाई जाय। आपस में लड़ने का झंझट क्यों मोल लिया जाय। हम इतना ही लें, जितनी तात्कालिक आवश्यकता है।

ऐसा करने से हम सुख शांतिपूर्वक रहेंगे भी और उन्हें भी रहने देंगे जो उसके हकदार हैं।


मौन साधना की महिमा

प्रकृति में सदैव मौन का साम्राज्य रहता है। पुष्प वाटिका से हमें कोई पुकारता नहीं, पर हम अनायास ही उस ओर खिंचते चले जाते हैं। बड़े से बड़े वृक्षों से लदे सघन वन भी मौन रहकर ही अपनी सुषमा से सारी वसुधा को सुशोभित करते हैं। धरती अपनी धुरी पर शान्त चित्त बैठी सबका भार सम्भाले हुए है। पहाड़ों की ध्वनि किसी ने सुनी नहीं, पर उन्हें अपनी महानता का परिचय देने के लिए उद्घोष नहीं करना पड़ा। पानी जहाँ गहरा होता है, वहाँ अविचल शान्ति संव्याप्त होती है।

मौन की क्षमता वस्तुतः असीम है। महर्षि रमण के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे मूक भाषण देते थे। आश्रम पर आदमी तो क्या पशु पक्षी भी आकर सदा उनके चारों ओर मंडराते रहते थे। हिरन और शेर एक साथ उनके सत्संग का लाभ लेकर चुपचाप चले जाते। यह मौन साधना की चरम परिणति है। एकाकी, मौन बने रहकर बड़ी से बड़ी सृजनात्मक कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया जा सकता है तथा अपार आनन्द की अनुभूति की जा सकती है। वाणी में तेज एवं ओज, शान्ति बनाये रखने पर ही आता है और यह सम्भव है मात्र मौन साधना से। संचित कमाई को अच्छे प्रयोजन में कभी-कभी खर्च करने पर काम तो सफल होता ही है आत्मिक शान्ति भी प्राप्त होती है। ठीक वैसे ही मौन रहकर वाणी को नियन्त्रित किया जा सकता है। विद्वानों ने शान्ति को ‘जीवन का हीरा’ जिसे कभी नष्ट नहीं होने देना चाहिए तथा वाणी से अभिव्यक्त एक-एक शब्द को मोती की संज्ञा दी है। हमें उसी रूप में इसे खर्च करना चाहिए। वाणी मौन के अभ्यास से ही प्रखर होती तथा प्रभावोत्पादक बनती है।

साधना काल में मौन का विशेष महत्व बताया गया है। मौन रहकर ही आत्मोन्मुख होकर आत्मदर्शन-ईश्वर दर्शन सम्भव है। श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न करने के लिए मौन रहकर शक्ति अर्जित करना परम आवश्यक है। व्यर्थ की बकवाद बहस से अपनी शक्ति नष्ट करने की अपेक्षा उसे संचित कर विशेष प्रयोजन सिद्ध किये जा सकते हैं।

व्यावहारिक जीवन में भी मौन विशेष महत्वपूर्ण है। जीवन मार्ग में आयी बाधाओं को मौन रहकर ही चिन्तन कर टालना सम्भव हो पाता है। ‘‘सौ वक्ताओं को एक चुप हराने’’ वाली बात बिल्कुल सही है। व्यर्थ की बकवाद में अपनी ही शक्ति नष्ट होती है, यह स्पष्ट जानना चाहिए।

योगी राज भर्तृहरि ने मौन को ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों का आभूषण बताया है। कबीर कहते हैं-

वाद विवादे विषघना, बोले बहुत उपाध। मौन गहे सबकी सहै, सुमिरै नाम अगाध।

एमर्सन कहते थे- ‘‘आओ! हम मौन रहने का प्रयास करें ताकि फरिश्तों की कानाफूसी सुन सकें।’’

आध्यात्मिक साधनाओं में मौन का अपना विशेष महत्व है क्योंकि उसके सहारे अंतर्मुखी बनने का अवसर मिलता है। निरर्थक चर्चा में जो शक्ति का अपव्यय होता है उससे बचने की स्थिति सहज ही बन जाती है।

पर साथ ही यह और भी समझा जाना चाहिए कि मौन के समय विचारों की साँसारिक प्रयोजनों में भगदड़ रुकनी चाहिए अन्यथा वह विडंबना मात्र बन कर रह जायगी। यों चिन्तन का सर्वथा अभाव होना तो सहज नहीं। पर मौन काल में इतना तो सरलतापूर्वक हो सकता है कि इस अवधि में आत्म चिन्तन ही मुख्य विषय रखा जाय। आत्मा और शरीर की भिन्नता अनुभव करने के साथ यह भी सोचना चाहिए कि मानवी शक्तियों का भण्डार अन्तःक्षेत्र में ही विद्यमान है, उसे उपलब्ध करने के लिए आत्म परिष्कार की कार्यविधि निर्धारित करने में चिन्तन को नियोजित किया जा सके तो निश्चय ही मौन साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त होता है।

यहाँ इतना और भी ध्यान में रखना चाहिए कि मौन को आरम्भ में थोड़े समय से शुरू किया जाना और फिर कुछ-कुछ विराम देते रह कर उसे आगे बढ़ाया जाय एकाएक लम्बा मौन साधने से पीछे उसका निर्वाह कठिन हो जाता है।


तर्क पर भावना का अंकुश अनिवार्य

छोटा बच्चा जब चलना सीखता है तब उसके लिए तीन पहिये के उस ढकोसले की आवश्यकता पड़ती है और तब उसे ‘गाड़ी’ शब्द से भी सम्बोधन करते हैं। पर बड़े होने पर, उसे गाड़ी मानना कठिन है, क्योंकि तब परिभाषा बदल गई होती है और गाड़ी का अर्थ उस वाहन से लिया जाता है जो अपने ढाँचे में सवारियों को बिठाकर उसे सही दिशा में आराम के साथ ले जा सके, मनुष्य को उसे खींचने का कष्ट न सहना पड़े।

तर्क बुद्धि बच्चों की तिपहिया गाड़ी की तरह है जो तथ्यों का पता लगाने में सहायक होते हैं। जब तक बच्चा दौड़ने योग्य न हो जाय तभी तक उसकी उपयोगिता रहती है। किन्तु उस पर निर्भर रहकर सत्य तक पहुँच सकना अत्यन्त कठिन है।

तर्क की शक्ति संसार के बुरे से बुरे काम को अच्छा सिद्ध करने में ऐड़ी से चोटी तक का पसीना लगा सकती है और अपनी जादूगरी इस प्रकार दिखा सकती है जिससे सामान्य बुद्धि वयस्क बालक उसका लोहा मानने लगे और वैसा ही अनुभव करने लगे जैसे कि तार्किक ने बाजीगर की सफाई की तरह कुछ के स्थान पर कुछ दिखा दिया हो।

कोई उच्चस्तरीय सिद्धान्त ऐसा नहीं है जिसे झुठलाने के लिए अपने तर्क और अनेक उदाहरण प्रस्तुत न किये जा सकें। संसार में इतने मत, वाद, सम्प्रदाय इसी कारण उगे और प्रतियोगिता में अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे रहे हैं। पर यह कहना कठिन है कि उस घुड़-दौड़ में दर्शकों का क्या हित साधन हुआ? कई बार उस प्रतिस्पर्धा में कइयों को घातक चोट भी लगती देखी गई है।

तर्क बुद्धि की उपयोगिता और आवश्यकता समझते हुए भी उसे खिलाड़ियों की गेंद कहा जा सकता है जो कभी इस मैदान में चली जाती है कभी उसमें। ठोकर मारकर उसे समर्थ खिलाड़ी बहुत दूर तक फेंक सकता है और बहुत ऊँची उछाल सकता है।

तर्क बुद्धि अपने पक्ष के सबूत ढूंढ़ने और प्रस्तुत करने में भी चतुर वकीलों की तरह अपनी कलाबाजी दिखाती है। झूठे को सच्चा और सच्चे को झूठा सिद्ध करने में पक्ष विपक्ष के वकील कैसी कुशलता दिखाते और कैसे सबूत जुटाते हैं कि चकित रह जाना पड़ता है। वे कानूनों में दिये हुए शब्दों को भी इस प्रकार खींच-तान करते हैं ताकि उनका वह मुवक्किल जीते जिसने भरपूर फीस देकर कुतर्क बुद्धि को अपना पक्ष समर्थन देने के लिए खरीदा है।

तर्क सुन्दर, सुडौल और आकर्षक लगते हुए भी उस नर्तकी की भाँति है जो किसी भी भरी जेब वाले की गोदी में बैठ सकती है और प्रेमालाप से मुग्ध कर सकती है। ऐसे तर्क के सहारे साँसारिक प्रयोजनों में कदाचित कुछ काम भी चले। पर आदर्शों के समर्थन में उनकी सहायता नहीं के बराबर ही मिलती है। यदि ऐसा न होता तो सभी बुद्धिवादी उच्चस्तरीय आध्यात्मिक जीवन जी रहे होते।

मानवी गरिमा के क्षेत्र में केवल भावनाएँ ही काम देती हैं। बुद्धि मस्तिष्क की उपज है और भावना अन्तराल की अनुभूति जिसे आत्म-प्रेरणा अथवा दैवी संदेश कहते हैं।

आदर्शवादिता और व्यवहार कुशलता में प्रत्यक्ष ही भारी अन्तर है। आदर्शों के पक्ष में तर्क बुद्धि नगण्य ही सहयोग देती है। उसे प्रत्यक्ष लाभ की कसौटी पर अनुपयुक्त सिद्ध करती है। देश भक्ति, समाज सेवा, चरित्र गठन, सादगी, संयम, त्याग, परमार्थ, दया, सेवा आदि की उपयोगिता तर्क बुद्धि से सिद्ध नहीं होती। इनमें तात्कालिक घाटा पड़ने की बात भली प्रकार कही जा सकती है। यदि उपरोक्त आदर्शों को अपनाना और उनका पक्ष समर्थन कराना हो ता दूरदर्शी विवेकशीलता की आवश्यकता पड़ेगी और महामानवों के उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर जहाँ-तहां ही अंकित पाये जा सकते हैं।

मनुष्य प्रत्यक्षवादी है। छोटे बालकों की तरह उसे तात्कालिक लाभ से रुचि होती है। भावी परिणाम सोचकर कदम उठाने की क्षमता तो अनुभवी प्रौढ़ावस्था में विकसित होती है। अपराधी प्रवृत्ति के लोग मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बाल बुद्धि वालों में ही गिने जा सकते हैं। वे तात्कालिक लाभ के लिए नशेबाजों और अन्य दुर्व्यसनियों की तरह भविष्य को अन्धकार पूर्ण बना लेते हैं।

तर्क अर्थात् प्रत्यक्ष लाभ का समर्थन। यदि इस मानसिक कौशल को अवसर मिले तो वह उन कुकर्मों का ही समर्थन करेगा जिनसे अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए असंख्य निर्दोषों का हनन या शोषण किया जाता है। संसार के आततायियों में से अधिकाँश को प्रत्यक्षवाद की दृष्टि में चतुर ही कहा जा सकता है। जेलों में लम्बी अवधि की सजा पाने वालों और मृत्युदण्ड सहने वालों में अधिकतर इतने चतुर व्यक्ति ही होते हैं जिनके कौशल पर दांतों तले उँगली दबाई जा सके। राजनैतिक प्रतिशोध में बन्दी बने लोगों को छोड़कर अपराधों में सजा पाने वाले प्रायः ऐसे ही चतुर तर्क वादी होते हैं। जो न जाने कितनों का घात कर चुके होते हैं।

तर्क बुद्धि एक प्रकार की सम्पदा है। उसके बदले बाजार में जाकर हम भला-बुरा कुछ भी खरीद सकते हैं। किन्तु भावनाओं के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती। वे माता की तरह अपने आँचल में बैठने वाले शिशुओं का मात्र कल्याण ही सोच सकती हैं। उन्हें वही परामर्श दे सकती हैं जिन्हें अपनाने पर सुखी और समुन्नत कहा जा सके।

हाथी तभी तक उपयोगी है जब तक कि उसकी गरदन पर महावत बैठा और अंकुश का प्रयोग करता है। यदि यह नियन्त्रण हट जाय तो वह मनचाहे मार्ग पर चलकर मनमाने कृत्य करेगा और सुविधा बढ़ाने के स्थान पर बर्बादी के भयंकर सरंजाम रचेगा। इसलिए जिनके पास विलक्षण बुद्धि है, उन्हें विशेष रूप से आदर्शों का अनुबन्ध पालन करने के लिए कहा जाता है। अन्यथा वह अपना ही नहीं प्रभावित होने वाले असंख्य व्यक्तियों का विनाश कर सकती है।

प्रेत पिशाचों में एक बहुत ही डरावनी किस्म है- “ब्रह्म राक्षस”। अपनी बिरादरी वालों में वे सबसे अधिक विनाशकारी माने जाते हैं। आवश्यक नहीं कि मरने के पश्चात ही इस योनि में जाना पड़े। असंख्य व्यक्ति जीवित होते हुए भी इसी स्तर के ताने-बाने बुनते हैं जो बाहर से अच्छे-भले दिखते हुए भी अपनी पृष्ठभूमि में छल, दम्भ, पाखण्ड, शोषण, उत्पीड़न के अनेकानेक जाल बिछाये हुए हैं। मछुआरों की कमी नहीं, चिड़ी मार भी बहुत हैं, शिकारियों और कसाइयों को अपने समुदाय को बड़प्पन की डींग हाँकने का अवसर मिलता है। बाजीगर भी दर्शकों को मूर्ख बनाकर अपनी चतुरता पर गर्व करते हैं। इसी प्रकार तर्क बुद्धि का-उच्च शिक्षा एवं कुशलता का उपयोग आदर्शों के विपरीत प्रयोग करने वाले ही होते हैं। पुराने जमाने में उन्हें ‘ब्रह्म राक्षस’ कहा जाता था पर अब कोई ऐसा नाम ढूंढ़ना पड़ेगा जिससे उनकी तर्क बुद्धि और सम्पदा को समयोचित सम्मान दिया जा सके। कारण कि इसी समुदाय का आज बाहुल्य सर्वत्र बढ़ता दिखता है।


आस्ट्रेलिया के हार्वर नगर में (kahani)

आस्ट्रेलिया के हार्वर नगर में बहुत जोर की आग लगी। जेल का फाटक भी जल गया कैदी निकलकर आग बुझाने में लग गये। आग बुझ जाने पर सभी कैदी अपनी कोठरियों में वापस आ गये। गिने तो सब मौजूद थे।

अफसर ने पूछा- ‘‘आप लोग इस अवसर का लाभ उठाकर भाग भी सकते थे।” कैदियों ने कहा- ‘‘हम अपनी सरकार और कानून के प्रति वफादार हैं ऐसा काम नहीं कर सकते जिससे न्याय व्यवस्था बिगड़े।”

अफसर ने प्रसन्न होकर उन सभी कैदियों को छोड़ दिया।


“भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ”

श्रद्धा मनुष्य जीवन के उन आधार-भूत सिद्धान्तों में से एक है जिससे वह पूर्ण विकास की ओर गमन करता है। श्रद्धा न हो तो मनुष्य साँसारिक सफलतायें प्राप्त करके भी आत्मिक सुख प्राप्त न कर सकेगा क्योंकि जिन गुणों से आध्यात्मिक सुख मिलता है उनकी पृष्ठभूमि श्रद्धा पर ही निर्भर है।

इसलिए मानसकार ने बताया है- ‘‘भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ। याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥” (बालकाण्ड 2)

अर्थात्- शंकर विश्वास है तो भवानी श्रद्धा। दोनों की उपासना से ही सिद्धि या अंतःकरण में स्थित परमात्म देव के दर्शन सम्भव होते हैं।

शिवत्व अर्थात् जीवन के बुरे तत्वों का संहार-ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख कारण है किन्तु शिव अकेला अपूर्ण है उसे उमा भी चाहिए। उमा अर्थात् गुणों का अभिवर्द्धन। शिव का अर्थ है असुरता का संहार और भवानी का अर्थ है भावनाओं का परिष्कार। शिव के रूप में विश्वास दृढ़ होता है, कठिन होता है पर भवानी के रूप में श्रद्धा सरल और सुखदायक होती है। अतः विश्वास जगाना हो तो श्रद्धा की शरण लेनी चाहिए। श्रद्धा साधना को सरल बना देती है, सुख रूप कर देती है।

श्रद्धा का समावेश मनुष्य के पारलौकिक जीवन को भी आनन्दमय बनाता है। मनुष्य मृत्यु से दुःखी इसलिए रहता है कि वह जानता है उस ओर अकेला जाना पड़ेगा। भय की, भूल की, अज्ञान की जड़ अकेलापन है। उससे सभी को दुःख मिलता है पर हृदय की श्रद्धा जीवित रहे तो अकेलापन भी नहीं अखरता। श्रद्धा स्वयं अन्तःकरण में आनन्द का उद्रेक करती है तो ऐसा आभास होता है कि हमारी प्रिय वस्तु हमारे बहुत समीप, अपनी कल्पना में ही ओत-प्रोत है। अपना अन्तर्देवता श्रद्धा के वश में है, वह आपकी इच्छाओं की पूर्ति अन्तःकरण में ही किया करता है। उससे मनुष्य को असीम तृप्ति मिलती है।

निर्जन का निवासी श्रद्धा भावना के द्वारा अनन्त से प्यार करता है, उसे जगाता है, चूमता है और उसके साथ घुल-घुल कर बातें करता है। अनन्त भी उसके सम्पूर्ण अपराध क्षमा कर अपनी गोदी में समेट लेता है। यह सुख श्रद्धा का सुख है यह सुख भावनाओं के परिष्कार का सुख है, इस सुख से आत्मज्ञान का सुख फलित होता है।

समाज में रहकर भोग की सारी परिस्थितियाँ मौजूद हों तो भी लोगों का सन्तुष्ट रह पाना सन्दिग्ध है। सुख किसी पदार्थ ने नहीं है वह तो आत्मा की किसी वस्तु में आरोपित कर देने का भाव मात्र है। मन में श्रद्धा हो तो हर उदासीन वस्तु भी अपने प्रेम का आनन्द का पात्र बन सकती है। दूर गये परिजनों के चित्र देखकर सुख अनुभव करते हैं, भगवान की मूर्ति का स्तवन कर पुलकित होते हैं इसमें अपनी श्रद्धा ही आधार है। श्रद्धा से पाषाण भी भगवान बन जाता है।

एक मनुष्य अपने घर से बहुत दूर देवी के दर्शन को गया। बहुत दिनों से दर्शनों की अभिलाषा थी। मन्दिर के द्वार पर पहुँचा तो प्रवासी का हृदय भर आया। साष्टाँग प्रणाम किया उसने और फूल-पत्र जो कुछ लाया था अर्पित कर दिये मूर्ति के सामने। मूर्ति को इस पर अभिमान हो गया। बोली मैं कितनी ऐश्वर्यवान हूं जो लोग दूर-दूर से आते और मुझे शीश झुकाते हैं।

आकाश यह सब देख रहा था। उसने कहा देवी! तुम्हारा वैभव धन्य है किन्तु इतना और जान लो कि मनुष्य पूजने नहीं आया। इनकी तो आदत है कि दूर जाकर ये अपनी श्रद्धा को पूजते हैं। इनकी श्रद्धा के कारण ही तू देवी है अन्यथा तेरा कलेवर तो पत्थर से बनी प्रतिमा मात्र है।

सचमुच श्रद्धा न होती तो मनुष्य, बड़ा शून्य, शुष्क, नीरस और उदास होता। तब उसकी स्वार्थ वृत्तियों पर कौन अंकुश लगाता, उसकी संकीर्णता को कौन रोकता। कामान्ध हो गया होता मनुष्य यदि वह भावनाशील न रहा होता। निचेष्ट हो जाता मानव, यदि उसके हृदय में श्रद्धा न होती। परमात्मा तो दूर वह अपने कुटुंबियों से, माता-पिता, बालकों से, भाइयों से, पत्नी आदि किसी से भी सहृदयता का व्यवहार न करता। श्रद्धा है इसलिए मनुष्य जीवित है, समाज जीवित है, परमात्मा जीवित है। वह लुप्त हो जाय तो क्या व्यक्ति और क्या समाज, मनुष्य सबको दबोच कर खा गया होता। पर बेचारा श्रद्धा का दास है उसी के सहारे जीवन की कठिनाइयों को झेलता रहता है। खुद भूखा, नंगा रहकर औरों का पालन करता है। कष्ट आप झेलता है, कमाता खुद है बाँट देता है सब को। समाज के प्रति उत्सर्ग की भावना न रही होती तो मनुष्य जीवन में आनन्द भी क्या शेष बचता? श्रद्धा है जो मनुष्य को बलिदान करना सिखाती है।

श्रद्धा का अर्थ है- आत्म-विश्वास। इस विश्वास के सहारे मनुष्य अभाव में, तंगी में, निर्धनता में कष्ट में, एकान्त में भी घबराता नहीं। जीवन के अन्धकार में श्रद्धा प्रकाश बनकर मार्गदर्शन करती है और मनुष्य को उस शाश्वत लक्ष्य से विलग नहीं होने देती। आत्मदेव के प्रति, ईश्वर के प्रति, जीवन लक्ष्य के प्रति हृदय में कितनी प्रबल जिज्ञासा है, जीवन की इस विशालता को जानना हो तो मनुष्य के अन्तःकरण की श्रद्धा को नापिये। यह वह दैवी मार्गदर्शन है जिसे प्राप्त कर साँसारिक बाधाओं का विरोध कर लेना सहज हो जाता है।

प्राचीन काल के गुरु, आचार्य धर्म तत्त्ववेत्ता सब शिष्य की श्रद्धा की गहराई की परख कर लेने के उपरान्त उन्हें ब्रह्म विधा का अधिकारी घोषित करते थे। जब तक शिष्य की श्रद्धा का आकार न समझ लिया जाता था तब तक उन पर गोपनीय साधनाओं और सिद्धान्तों को प्रकट न किया जाता था। श्रद्धावान् विद्यार्थी ही ज्ञान का, आत्म-दर्शन का महान लाभ प्राप्त करते थे।

ऐसे असंख्य वर्णन शास्त्रों में धर्म पुराणों में मिलते हैं। शिष्य सत्यकाम जाबालि, आरुणी, उपमन्यु, नचिकेता आदि ने अपनी उत्कट श्रद्धा के द्वारा अपने गुरुओं को द्रवीभूत किया और अल्प आयु में ही वह ज्ञान अर्जित कर सके जो कठिन साधनों से भी सम्भव न था। भक्त ध्रुव की अचल श्रद्धा के परिणाम स्वरूप देवर्षि को पृथ्वी पर आना पड़ा और कुमार का मार्ग-दर्शन करना पड़ा। अपनी उत्कृष्ट श्रद्धा से उसने परमात्मा को जीत लिया। ध्रुव ने नहीं उसकी श्रद्धा ने उसे पाँच वर्ष की आयु में ही पूर्णता की स्थिति को पहुँचा दिया।

अपनी श्रद्धा के कारण ही राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ के विशेष कृपा पात्र बने थे। गुरु ने उन्हें एक ही कार्य सौंपा था कि वे उनकी गायें चराया करें। ऐश्वर्य और भोगों में पले हुये दिलीप और उनकी धर्म-पत्नी के लिये गौओं के पीछे जंगल-जंगल घूमना कम कठिन बात न थी। धूप उन्हें देखने को न मिली थी, काँटों से खेलना वे न जानते थे, बिना पदत्राण भला वे ऊँची-नीची विजन श्रृंखलाओं में कैसे घूम पाते? हिंसक पशुओं का सामना करना तो क्या महारानी उन्हें देख भी न सकती थीं किन्तु राज दम्पत्ति की श्रद्धा ने उनमें वह शक्ति भर दी कि दिलीप वन-वन घूमें, गायें चराईं शेरों से लड़े और शूलों से जूझे। गुरु शिष्य की श्रद्धा के समक्ष परास्त हो गये और उन्हें राजा का अभीष्ट पूरा करना ही पड़ा।

यह श्रद्धा ईश्वर प्राप्ति या पूर्णता के लिये ही आवश्यक नहीं वरन् वह अपने लोगों पर आत्म-भाव, धर्म और संस्कृति के प्रति प्रेम, राष्ट्र और जाति के प्रति कर्तव्यनिष्ठा का भी पाठ सिखाती है। मनुष्य जिस सामूहिकता में बंधा हुआ है उसका जीवन और प्राण भी श्रद्धा ही है।

श्रद्धा मनुष्य के सर्वतोन्मुखी विकास का आधार है अतः मनुष्य जीवन में श्रद्धा उद्देश्य बनकर रहनी चाहिये। श्रद्धा ही मनुष्य जीवन का आदर्श होना चाहिये। श्रद्धा का अर्थ है आत्मविश्वास और आत्म विश्वास का अर्थ है ईश्वर विश्वास। श्रद्धा आस्तिकता की धुरी है।


Quotation

सुनो अनेकों की। पर अपनाओ उन्हीं की, जो न्यायोचित दिखे। लोगों का अविवेकी बकवाद तुम्हें भ्रान्त धारणाओं में न उलझा दे। इसलिए हर कथन की उपयोगिता का विवेक बुद्धि से परीक्षण करो।


मनस्विता के विकास की आवश्यकता

मनुष्य को प्राणि वर्ग में श्रेष्ठ और सर्वोत्तम इसलिए नहीं माना गया है कि वह अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान और साधन सम्पन्न है। यह विशेषता तो अन्य प्राणियों को भी उनकी संरचना एवं आवश्यकता के अनुरूप मिली हुई है।

मनुष्य इसलिए श्रेष्ठ है कि वह प्रकृति से लड़ सकता है। उसे बदल और इच्छानुरूप गढ़ सकता है। प्रकृति के अन्तराल में घूमकर उसके रहस्यों का पता लगा सकता है और उन्हें अपने अनुरूप बना सकता है।

यह चर्चा मात्र पदार्थ जगत के संदर्भ में ही नहीं हो रही है वरन् उस प्रकृति के सम्बन्ध में भी हो रही है जो उसकी सीमा में ओत-प्रोत है। सीमा का तात्पर्य है शरीर मन, सघन और सम्बद्ध समुदाय। यह किस रूप में उसे मिले यह भौतिक प्रकृति का खेल है अधिक से अधिक यह कह सकते हैं कि यह सब उनकी परिस्थितियों अथवा भाग्य रेखाओं के अनुरूप है। इतना सब होते हुए भी मनुष्य उन्मुक्त है। विशिष्ट एवं मौलिक है। वह उस सबको जो हस्तगत है बहुत कुछ बदल सकता है। बहुत कुछ ही नहीं, आमूल-चूल भी।

सीमाएं उसे बाँधती नहीं। वह अपने कौशल के बल पर सीमाओं को तोड़ एवं मरोड़ सकता है। प्रकृति ने उसे प्राणि समुदाय से मिलती-जुलती प्रकृति एवं संरचना प्रदान की है। अन्य प्राणी इस बन्धन से अवरुद्ध हैं। वह न अपनी प्रकृति को तोड़ या छोड़ सकते हैं वरन् सिर झुकाकर अनुशासन मानते हैं और जिस भी स्थिति में नियति ने उसे रहने के लिए बाधित किया है, उसी में रहकर जिन्दगी के दिन पूरे करते हैं। किन्तु मनुष्य है जो अपनी आन्तरिक प्रकृति को पाशविक स्तर की न रहने देकर बहुत ऊँचा उठा सकता है। महामानव एवं ऋषि कल्प बना सकता है। साथ ही यह भी हो सकता है कि अपने को इतना गिरा ले कि उसकी तुलना में हिंस्र पशु भी पीछे रह जाते हैं। वह छल-छद्म के सहारे अनेकानेक जीवितों के शरीर में उनका रक्त इस प्रकार चूस सकता है कि उन्हें पता भी न चले-बुरा भी न लगे और हाय कहने के लिये मुँह भी न खुले। नर पशु तो वह प्रकृतितः है पर यदि वह चाहे तो नर पिशाच भी बन सकता है।

यह हुआ चेतनात्मक प्रकृति की तोड़-मरोड़। शरीर के सम्बन्ध में भी यही बात है। वह क्षय के रोगी से उछलकर चन्दगीराम पहलवान बन सकता है। जुकाम से सदा ग्रस्त रहने वाले से विश्व विख्यात सेण्डो बन सकता है। वह संकल्प शक्ति के बल पर माँस पेशियों को लोहे जैसी बना सकता है। साँस रोक सकता है और हृदय की धड़कन पर नियन्त्रण करके समाधिस्थ हो सकता है। मुख सज्जा जितनी समस्त श्रृंगारों से मिलकर हो सकती है, उससे असंख्य गुनी अधिक सुन्दरता वह मुसकान, मस्ती और खिलखिलाहट के आधार पर अर्जित कर सकता है।

साथ ही यह भी हो सकता है कि संरचना आकर्षक होते हुए भी प्रकृति के अनुरूप उसे कुरूप, कर्कश और घिनौनी बना ले। यह भी हो सकता है कि उसे आलस, प्रमाद, असंयम के आधार पर रोगों का घोंसला बना दे और रोते कराहते असमय में ही मौत के मुँह में घुस पड़े।

परिवार यों संयुक्त समझा जाता है और उसका वातावरण बनाना संयुक्त उत्तरदायित्व माना जाता है। पर साथ ही इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जो उनमें से प्रतिभावान होता है वह समूचे परिवार पर न केवल अंकुश रखता है वरन् उसकी प्रवृत्तियों को जिस दिशा में चाहे हाँक सकता है। रावण ने अकेले में ही समूची लंका के निवासियों को दैत्य बना लिया था। गुरुकुलों के वातावरण में नर-रत्न ढलते रहे हैं। भागीरथ ने तो अपने दिवंगत परिवार तक का उद्धार कर दिया था। यह प्रकृति के ऊपर विजय प्राप्त करना है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को आकृति में जिस प्रकार अन्तर होता है वैसे ही प्रकृति भी वंशानुक्रम, पालन-पोषण, प्रशिक्षित आदि के आधार पर भिन्नता युक्त होती है। किन्तु प्रकृति जयी मनुष्य है जो अपने चाक पर कुम्हार की तरह इच्छित बर्तन विनिर्मित करता चला जाता है।

वातावरण बनने बिगड़ने में अनेक परिस्थितियां कारण होती हैं। समाज एक प्रकार का अजायब घर है, जिसमें अनेकों आकृति-प्रकृति के प्राणी अपनी-अपनी बोली बोलते और हरकतें करते रहते हैं। पर उन सबसे तालमेल बिठाकर अनुरूप नीति भेद अपनाते हुए सरकस के रिंगमास्टर की तरह काम लेता है। जो स्वभावतः अनगढ़ हैं उन्हें भी गला-पिघलाकर अपने ढाँचे में ढाल लेता है। एक अच्छा आदमी सैकड़ों बुरों पर जेलर की तरह शासन करता है। साथ ही इसमें भी अत्युक्ति नहीं कि एक ही दुर्व्यसनी अपने दुर्गुणों की श्रृंखला उतनी तेजी से बिगाड़ता है कि अच्छे-खासे समुदाय को विग्रहों का अखाड़ा बना देता है। अपने बिगड़े व्यवहार में अनेकों को बागी विद्रोही बना देता है। साथ ही यह भी सच है कि जिस प्रकार युधिष्ठिर ने एक दिन के लिए जाकर नरक को स्वर्ग में बदल दिया था उसी प्रकार कोई भी सच्चरित्र मनुष्य समूचे परिवार को, समाज को पहले की अपेक्षा एक ऐसे बदले हुए ढाँचे में ढाल सकता है कि देखने वाले आश्चर्यचकित होकर रह जाँय।

संसार के इतिहास पर दृष्टिपात करने से महान परिवर्तनों के पीछे मुट्ठी भर लोगों की प्रतिभा, योजना एवं पराक्रम परायणता काम करती दिखती है। उनने अपने प्रभाव से अनेकों का सहयोग आकर्षित किया और साहसपूर्वक आगे-आगे चलते हुए वह कर गुजरे जिससे इतिहास की दिशाधारा ही बदल गई।

यह सफलताएँ किस प्रकार उपलब्ध हुईं? समझा जाता है कि प्रचार माध्यम बड़े सशक्त होते हैं और तर्कों के द्वारा अनेकों में हेर-फेर लाया जा सकता है पर बदले हुए जमाने में अभिनेताओं की तरह नेता, प्रचारक, तार्किक और लेखकों की भी बाढ़ आने लगी है। इसे भी एक व्यवसाय माना और उसका कौशल सीखने का अभ्यास किया जाता है। इस बाढ़ के बावजूद वातावरण बदलने का-प्रवाह को उलटने का कोई लक्षण दिख नहीं पड़ता क्योंकि इसके लिए जिन प्रतिभाओं की आवश्यकता है उनके विनिर्मित करने के कोई प्रयास नहीं चल रहे हैं। कलाकार रंग-मंच सजा सकते हैं। लोगों को हँसा या रुला सकते हैं पर यह नहीं कर सकते कि दर्शक समुदाय घर लौटने पर भी उनके संकेतों पर चलने का साहस दिखा सकें।

सादगी और ईमानदारी, अच्छी बात है पर उसके साथ प्रखरता, प्रतिभा, तेजस्विता का भी समावेश होना चाहिए। ताकि वे अपने पराक्रमी व्यक्तित्व के सहारे अपने को संघर्षशील और गढ़ने ढालने की क्षमता रखते हों। इसका अभ्यास निज के अन्तरंग और बहिरंग को सुयोग्य बनाने के आधार पर किया जाना चाहिए। इसके लिए उस बहुमुखी विकास की आवश्यकता है। जिसे गीताकार ने “योगा को कर्म कौशल” रूप में बताया है। इसमें चिन्तन और चरित्र की पवित्रता एक आवश्यक शर्त है पर इसके लिए मनोबल, साहस, पराक्रम की भी कमी नहीं रहनी चाहिए। यह आत्म-विश्वास और आत्म-गौरव का प्रसंग है। जिसकी अभिवृद्धि के लिए चरित्र निष्ठा के अतिरिक्त स्वतन्त्र प्रयोग होना चाहिए।

हम हारे नहीं। अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करें। कठिन परिस्थितियों से जूझने में खिलाड़ियों जैसा रस लें तो मनुष्य में उस प्रतिभा का उदय हो सकता है जो व्यक्ति एवं समाज की वरिष्ठता विकसित करने के लिए नितान्त आवश्यक है।


Quotation

शास्त्र पत्थर की लकीर नहीं है। और न श्रेष्ठ पुरुषों के वचन आत्यंतिक सत्य पर आधारित हैं। ऐसा होता तो उनके बीच विरोध क्यों पाय जाते? तुम सच्चाई को ढूँढो और वह जहाँ भी मिले, वहाँ से चुन लो।


‘कर्मफल और उसके परित्याग” सिद्धाँत की अपूर्णता

तत्व दर्शन के कुछ सिद्धान्तों की अनुपयुक्त व्याख्या करके उसे इस स्थिति में पहुँचा दिया गया है कि लोग उन्हें प्रगति के मार्ग में बाधक मानने लगे हैं और उन्हें तर्क विहीन तक कहने लगते हैं।

“इच्छाओं का परित्याग” एक ऐसा ही प्रसंग है जिस पर तत्व दर्शन में बहुत जोर दिया गया है और कामनाओं को छोड़ देने में मानसिक शान्ति या मोक्ष मिलने जैसे लाभों का दिग्दर्शन कराया गया है।

इस कथन का वह अर्थ नहीं है जो शब्द गठन के अनुरूप मोटी बुद्धि से लगाया जाता है। कामना त्याग का अर्थ यहाँ केवल इतना है कि भौतिक महत्वाकाँक्षाओं को लिप्सा तृष्णाओं को इतना न बढ़ने दिया जाय कि वे आकाश पाताल चूमने लगें और परिस्थितियों तथा योग्यता के साथ तालमेल न बिठाने दें। ऐसे व्यक्ति दिवा स्वप्नों को पूरा करने में जब असफल रहते हैं तो अत्यधिक निराश हो जाते हैं और अपना मनोबल एवं प्रयास ही गँवा बैठते हैं। अथवा अपराधी दुष्प्रवृत्तियों पर उतर आते हैं। अपने में से एक को अत्यधिक वैभववान् बनते देख कर लोग उनके पुरुषार्थ की सराहना करने के स्थान पर ईर्ष्या करने लगते हैं। इसके अतिरिक्त भी बढ़ी-चढ़ी सम्पन्नता से सामान्य जनों को विषमता की अनुभूति होती है और वे पुरुषार्थ की नकल न कर सकने पर वैभव प्रदर्शन का पाखण्ड रचते हैं और इसके लिए अनीति उपार्जन पर उतारू हो जाते हैं अथवा आँख में खटकने वाले को ही नीचे गिराने का प्रयत्न करते हैं। महत्वाकाँक्षी व्यक्ति निजी स्वार्थ साधना में इतना निमग्न हो जाता है कि उसे परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना तो दूर उस सम्बन्ध में सोचते तक नहीं बन पड़ता। इस प्रकार के संग्रहित वैभव का स्वयं तो उपभोग कर नहीं सकते। उसका लाभ उत्तराधिकारी उठाते हैं और मुफ्त में मिले बिना परिश्रम से कमाये धन को आँख मूँदकर खर्च करते हैं। फलतः बदले में उनके गले दुष्प्रवृत्तियाँ बंधती हैं और व्यक्तित्व का विकास रुकता है।

ऐसी-ऐसी अनेकों हेय परिणतियों का ध्यान रहते हुए महत्वाकांक्षाओं के परित्याग की बात कही गई है। पर उस कथन के साथ दो बातें जोड़ देने की भूल बन पड़ी है। एक तो यह कहना चाहिए या कि भौतिक कामनाओं को घटाया जाय और उस बचत को परमार्थ प्रयोजनों में उससे भी अधिक तत्परता के साथ नियोजित किया जाय। पूरी बात इतना स्पष्टीकरण करने के उपरान्त ही बन पड़ती है। अन्यथा कामना त्याग का अर्थ निष्क्रियता, नीरसता, अकर्मण्यता, उदासीनता जैसा ही कुछ बन पड़ता है। लोग उच्चस्तरीय आकाँक्षाओं को भी त्याग मान बैठते हैं और मानसिक अपंगता की स्थिति में लेजाकर पटक देते हैं।

इच्छा शक्ति की महत्ता का वर्णन करते-करते मनोविज्ञान थकता नहीं है। वह कहता है कि बिखरी शक्तियों का केन्द्रीकरण करने और प्रतिभा को विकसित करना ही सफलता का मूल मन्त्र है। सफलताएँ उसी आधार पर मिलती हैं। उदासीन मन वाला व्यक्ति तो ज्यों-त्यों करके अपने दिन ही गुजार सकता है कोई बड़ा काम कर सकने की पृष्ठभूमि तक नहीं बन पाती। ऐसी दशा में तत्वज्ञान द्वारा प्रतिपादित अनासक्ति का तात्पर्य यदि शब्दार्थ मात्र तक समझ बैठा जाय तो वह उपदेश जीवन की गतिशीलता अवरुद्ध कर देने वाला अभिशाप बनकर ही रह जाता है।

इसी कथन का एक पक्ष यह भी है कि फलासक्ति छोड़कर निष्काम कर्म करना चाहिए इसकी विद्वजन कैसी ही मनोरम व्याख्या क्यों न करें, पर वह व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। कोई भी समझदार व्यक्ति किसी काम में हाथ तब डालता है जब उसके आकर्षक प्रतिफल की सम्भावना का अनेकानेक तर्कों, तथ्यों, प्रमाणों, उदाहरणों के कहारे परिणाम के सम्बन्ध में किसी सुनिश्चित प्रतिफल की बात पर विश्वास कर लेता है। इसके बिना कोई अपनी पूँजी, श्रम शक्ति और प्रतिष्ठा को दाँव पर नहीं लगा सकता। यह सामान्य व्यावहारिकता है। इसका परित्याग करना किसी परमहंस के लिए ही सम्भव हो सकता है। अथवा उस श्रमिक के लिए सम्भव है जिसका वेतन पाने के अतिरिक्त नफा-नुकसान से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस स्थिति वाले भी यह परख लेते हैं कि वेतन उपयुक्त है या नहीं। वह यथा समय वसूल होता रहेगा। साथ ही यह भी विचारा जाता है कि कोई जोखिम भरा काम तो नहीं करना पड़ेगा जिसमें लेने के देने पड़ें। परिणाम सोचे बिना कोई भी व्यक्ति किसी काम में हाथ नहीं डालता। इस सर्वमान्य और सही प्रचलन को झुठलाने में विद्या व्यसनी लोग कुछ भी कहते रहें पर उनकी मधुर वार्तालाप सुनकर भी कोई श्रवण कर्ता ऐसा नहीं हो सकता जा उस कथन को अपने जीवन क्रम में सम्मिलित कर सके। बात जब गले उतरने वाली ही नहीं है तो उसे सच्चे मन से अपनाना किसके लिए किस प्रकार सम्भव हो सकता है।

योगी जन भी ऋद्धि-सिद्धि, स्वर्ग-मुक्ति, ईश्वर सान्निध्य, जन्म-मरण से छुटकारा, मन प्रतिष्ठा जैसी अनेक मनोकामनाओं से प्रभावित होकर ही वैराग्य, तप, योग आदि की दिशा में कदम उठाते हैं। सामान्य जनों में किसान, व्यवसायी, कर्मचारी यहाँ तक कि चोर-उचक्के तक पहले लाभ उठाने वाले पक्ष को देखते हैं। भले ही उनके बाद कुछ भी क्यों न परिणाम हाथ न लगे।

‘कर्मफल का त्याग’ का शब्दार्थ और उसकी मोटी व्याख्या दोनों ही ऐसी है जिन्हें असंगत और अव्यावहारिक कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है।

इस कथन का और भी अधिक स्पष्टीकरण आवश्यक है। कहा यह जाना चाहिए कि उद्देश्य और प्रतिफल के सम्बन्ध में विचारपूर्वक धारणा बनाने और कार्यारंभ करने के साथ-साथ मनुष्य को प्रतिफल के सम्बन्ध में इतना निश्चिन्त नहीं होना चाहिए कि जो चाहा गया है वह यथावत उपलब्ध होकर ही रहेगा, क्योंकि मनुष्य का एकाकी पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं है। परिस्थितियों की भी उसमें भारी भूमिका रहती है। वे प्रतिकूल चल पड़े तो सोची हुई योजना उलटी भी हो सकती है। किसान खेती करता है पर यह भी हो सकता है कि वर्षा का अभाव, बाढ़, टिड्डी, पाला, फसल के रोग, चोरी आदि किसी प्रतिकूलता से पाला पड़े और परिश्रम निष्फल चला जाय। इसी प्रकार व्यवसाय में मन्दी, प्रतिस्पर्धा, ग्राहकों की कमी, चोरी आदि के कारण उलटा घाटा भुगतना पड़े। ऐसी दशा में एकाँगी चिन्तन करने वाले अपना मानसिक सन्तुलन गँवा बैठते हैं और भविष्य के लिए निराश हो बैठते हैं। ऐसी स्थिति में होना यह चाहिए कि बुरी से बुरी परिस्थिति आ धमकने पर भी उसका सामना करने के लिए तैयार रहा जाय।

इस तैयारी में वाहन प्रयास उतने कारगर सिद्ध नहीं होते जितनी कि मानसिक पूर्व तैयारी। ऐसी दशा में किसी आकस्मिक झटके की आशंका नहीं रहती। सतर्कता में भी कमी नहीं पड़ती। हानि की जो सम्भावना है उनके सम्बन्ध में समुचित सावधानी बरती जाती है। अन्यथा सफलता या असफलता का एकाँगी चिन्तन करने वाले अथवा उदासीन रहने वाले को अपनी ही बौद्धिक भ्रम ग्रस्तता के कारण ऐसी जोखिम उठानी पड़ सकती है जिसमें कि वह हर्ष-विषाद की दोनों ही परिस्थितियों में अपना सन्तुलन गँवा बैठे और भविष्य में कुछ करने का साहस ही न करे।

“कर्मफल का त्याग” इसी तत्व दर्शन का समग्र रूप है। जो उससे प्रभावित हों, वे उसका तात्विक अभिप्राय भी समझकर चलें, तभी वह दार्शनिक प्रतिपादन वैसा उपयोगी सिद्ध हो सकेगा, जैसा कि उसके माहात्म्य में बताया जाता है।


जार्ज बर्नार्डशा (kahani)

एक साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशा से मिलने गये। बातों-बातों में अपने देश के पूर्वजों का बढ़-चढ़कर बखान करने लगे।

वर्णन लम्बा होते देखकर शा ने कहा- ‘पूर्वजों के पुराने बखान पर चल पड़ने पर तो आपको आदिम काल के बन्दर पूर्वजों तक पहुँचना पड़ेगा। इसलिए अच्छा यही है, हम अपनी और आज की बात करें।


आत्मबोध का प्रथम सोपान “सोहम्” साधना

मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और वातावरण में इतना अधिक रम जाता है कि उसे अपने पराये का कुछ बोध नहीं रहता। छोटा बालक जहाँ भी आकर्षण देखता है वहीं का हो रहता है यहाँ तक कि अपने माता-पिता तक की याद नहीं करता और खेल-खिलौनों में ही पूरी तरह तन्मय हो जाता है। बड़ी आयु के लोग भी प्रायः यही गलती करते रहते हैं। अपने आपे के स्वरूप को समझने की भूल करते रहते हैं और शरीर आवरण उसकी साज-सज्जा, व्यवसाय तथा स्वजन सम्बन्धियों में इतने अधिक तल्लीन हो जाते हैं कि वे ही सर्वस्व प्रतीत होने लगते हैं फलतः जो कुछ भी सोचना करना होता है, वह इस आवरण क्षेत्र से ही सम्बन्धित रहता है। बहुमूल्य जीवन सम्पदा इसी खेल-खिलवाड़ में खप जाती है।

होना यह चाहिए कि अपने उस वास्तविक स्वरूप को समझने, उसकी अनुभूति करने की चेष्टा की जाती है जो शरीर आवरण के भीतर प्राण तत्व के रूप में गतिशील रहता है। उनके निकल जाते ही यह सुन्दर शरीर देखते-देखते कुरूप, मलीन और अस्पर्श्य हो जाता है। सम्बन्धियों को उसे जल्दी ठिकाने लगाने के लिए दौड़−धूप करनी पड़ती है। विलम्ब किया जाय तो वह स्वयमेव सड़ने लगता है। अपने भीतर से कृमि उत्पन्न कर लेता है जो उसे खाकर समाप्त कर दें। अथवा गिद्ध, चील, श्रृंगाल, कूकर गंध पाते ही उसका अस्तित्व मिटा देने के लिए आतुरता पूर्वक दौड़ पड़ते हैं।

इस आवरण के भीतर विद्यमान आत्मा ही मनुष्य का वास्तविक रूप है। हित साधन की दृष्टि से उसी को प्रमुखता दी जानी चाहिए। जीवन लक्ष्य की पूर्ति इसी आधार पर बन पड़ती है। काया तो एक छाया की तरह है। इसे तो इन्द्रिय लिप्साओं और मानसिक तृष्णाओं की पूर्ति का ही जुनून सवार रहता है। आमतौर से यह तथ्य विस्मृत ही हो जाता है कि अपना वास्तविक हित किसमें है? यों इस संदर्भ में धर्म शास्त्रों और आप्त वचनों में सर्वाधिक जोर इसी एक बात पर दिया जाता रहता है कि “अपने को जानो”। “मैं कौन हूँ यह समझो।”

धर्मोपदेशकों की तरह अध्यात्म क्षेत्र में रुचि रखने वाले भी मोटेतौर से यह जानते रहते हैं कि वे “आत्मा” हैं। पर इस मोटी जानकारी से कुछ काम नहीं चलता यह तोता रटन सर्वथा अपर्याप्त है। इसकी गहन अनुभूति होनी चाहिए और इस मान्यता को परिपक्व होना चाहिए कि शरीर और आत्मा सर्वथा भिन्न है। दोनों के बीच सवार-सवारी जैसा, मिस्त्री उपकरण जैसा सम्बन्ध है। दोनों के स्वार्थ भी पृथक्-पृथक हैं। शरीर स्वार्थ का समर्थक है। उसे विलास, वैभव और सम्मान चाहिए। पर आत्मा के ऊपर इन तीनों सम्पदाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन्हें तो शरीर ही भोगता है। और आश्चर्य यह भी है कि उसकी तृप्ति भी क्षणिक होती है। विलास वैभव हस्तगत हुआ नहीं कि उसके प्रति उत्साह समाप्त हुआ नहीं। फिर नई वस्तु की नये स्वाद की तलाश आरम्भ हो जाती है इसी प्रकार अतृप्त अशांत स्थिति में ही सर्व समर्थ समझे जाने वाले लोगों का जीवन काल भी व्यतीत हो जाता है।

वह मिल ही नहीं पाता, जिसके लिए मानव जीवन के रूप में भगवान की यह सर्वश्रेष्ठ कलाकृति हस्तगत हुई थी। आत्म-कल्याण के प्रयत्न या तो हो ही नहीं पाते या बहुत ही उथले स्तर के होते हैं। कुछ शब्दों की पुनरावृत्ति करते रहने या पूजा-पत्री का बाल क्रीड़ा जैसी उठक-पटक कर लेने पर से चिन्ह पूजा भले ही निभ जाती हो। पर वह आत्मबोध नहीं हो पाता जो शरीर आत्मा की पृथकता अनुभव करने पर होता है। यह स्पष्ट हो जाता है कि सारा चिन्तन और क्रिया-कलाप शरीर सुख के लिए ही नियोजित न रहे उसमें आत्म-कल्याण के लिए भी समुचित स्थान रहे। ऐसी उमंगें उठने लगें तो समझना चाहिए कि ‘आत्मबोध’ हुआ और आत्म-कल्याण का द्वार खुला। जब तक कानों से सुनने, जीभ से कहने और हाथों से वस्तुओं की उलट-पुलट को ही अध्यात्म साधना समझा और उतने भर से ही सन्तोष किया जाता हो, तब तक यही समझना चाहिए कि अभी मन बाल-क्रीड़ाओं में रम भर रहा है।

आत्मा और शरीर के स्वार्थ पृथक-पृथक हैं। आत्मा के स्वार्थ को परमार्थ कहते हैं। इसे करने के लिए शरीरगत लिप्साओं को मर्यादा में रखना पड़ता है ताकि उसके निर्वाह के लिए वस्तुतः जो नितान्त आवश्यक है, उतना ही उपलब्ध कराया जाय। वितृष्णाओं से बचा जाय। इतना बन पड़ने के उपरान्त ही यह बन पड़ता है कि आत्मा की पृथकता और महत्ता अनुभव की जाय और उसके उत्कर्ष के लिए ऐसा कुछ किया जाय जो परमार्थ प्रयोजनों की पूर्ति के लिए उत्साह उमगता है। यही सघन अनुभूति आत्म-कल्याण के लिए जो आवश्यक और महत्वपूर्ण है उसे करने के लिए दबाव भरी अन्तःप्रेरणा उभारती है।

इन्हीं तत्वों को ध्यान में रखते हुए “आत्म-बोध” को आत्मिक प्रगति का प्रथम सोपान कहा गया है। इसके निमित्त प्रत्यक्ष क्रिया-कृत्यों में ‘सोहम्’ साधना को उच्चस्तरीय महत्व दिया गया है। इसके अतिरिक्त भी अन्य साधनाएँ चलती रहें पर प्रमुखता इसी आत्म बोध की साधना को दी जानी चाहिए।

साँस खींचते समय “सो” की, रोकते समय “अ” की और निकालते समय “हम्” की सूक्ष्म ध्वनि को सुनने का प्रयास करना ही सोऽहम् साधना है। इसे किसी भी स्थिति में-किसी भी समय किया जा सकता है। जब भी अवकाश हो, जितना भी हो, उतनी ही देर उस अभ्यास क्रम को चलाया जा सकता है। यों शुद्ध शरीर, शान्त मन और एकान्त स्थान और कोलाहल रहित वातावरण में कोई भी साधना करने पर उसका प्रतिफल अधिक श्रेयस्कर होता है, अधिक सफल रहता है।

साँस निरन्तर चलती रहती है। उसमें वायु के साथ-साथ प्राण तत्व का आवागमन भी चलता रहता है “सोहम्” ध्वनि इस प्राण तत्व के वायु के साथ घर्षण होने के साथ उत्पन्न होती है। इसलिए इस साधना में शरीर और आत्मा दोनों की सत्ता अनुभव करते हुए उनके स्तर के अनुरूप महत्व देने, तद्नुसार जीवनक्रम का निर्धारण करने वाला विवेक जागृत होता है।

“सोऽहम्” साधना जितनी सरल है, बन्धन रहित है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी है। “सोऽहम्” का अर्थ है- ‘‘मैं वह हूं” “ॐ” अर्थात् ‘आत्मा’। ‘वह’ अर्थात् परमात्मा। यह आत्मा और परमात्मा का समन्वय है। शरीर और प्राण का भी। द्विधा का बोध होने पर आपकी हैसियत के अनुरूप प्रमुखता देने और आवश्यकता के अनुरूप साधन जुटाने का सन्तुलन बिठाने के लिए योजनाबद्ध कार्य पद्धति अपनाना आवश्यक हो जाता है। यह स्थिति अन्तःक्षेत्र में विनिर्मित हो रही हो तो समझना चाहिए कि, साधना मात्र कर्मकाण्ड नहीं रही वरन् उसका प्रभाव अन्तराल की गहराई तक पहुँचने और ज्योतिर्मय होने लगा।

इस स्थिति में आत्म-कल्याण के उभयपक्षीय कार्यक्रम अपनाने पड़ते हैं। शरीर कल्याण के लिए संयम और पुरुषार्थ। आत्म-कल्याण के लिए अपनी सीमा को संकीर्ण परिधि से आगे बढ़ाकर विश्वव्यापी बनाना और सृष्टि को अधिक सुन्दर समुन्नत बनाने के प्रयास में जुट जाना। इन्हीं प्रयासों के चल पड़ने पर जाना जा सकता है “सोऽहम्” साधना परिपक्व और फलवती हो चली।


हजरत उमर से मिलने उनके घर आया (kahani)

एक बार एक आदमी हजरत उमर से मिलने उनके घर आया। उसने सना कि उमर की पत्नी काफी बड़बड़ा रही है, पर हजरत उमर कुछ भी जबाब न देकर मौन हैं। उस आदमी ने पूछा, ‘वह इतने बोली जा रही है और आप हैं कि बिलकुल चुप्पी साधे हुए हैं।

हजरत उमर गम्भीरता से बोले, “भाई वह मेरे गन्दे कपड़े धोती है, खाना पकाती है, मेरी सेवा करती है और सबसे बढ़कर वह मुझे पाप से बचाती है, तो क्या अब उसका इतना भी हक नहीं कि कुछ बोले?”


योग साधना का मजाक न बने!

मनुष्य शरीर और चेतना का सम्मिश्रण है। दोनों की सत्ता और महत्ता पृथक-पृथक हैं। यों दोनों मिलजुलकर ही जीवन की गाड़ी दो पहियों की तरह चलाते हैं। फिर भी उनकी संरचना और क्रिया-पद्धति में अन्तर है। शरीर पंचतत्वों के सम्मिश्रण से बना है। उसकी पाँच कर्मेंद्रियां और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मन मस्तिष्क, यह क्रिया पक्ष हैं। काय सत्ता जो उसके संचालन के निमित्त मशीन का काम करती है, वह धड़ एवं सिर के आवरण में छिपी है। धड़ में फुफ्फुस, हृदय, आमाशय, आँत, वृक्क, प्लीहा आदि अवयव हैं और खोपड़ी के भीतर मस्तिष्क ये प्रधान हैं।

यह सभी अवयव अपने-अपने काम करते रहते हैं और पालन-पोषण एवं सफाई का तन्त्र किसी प्रकार चलता रहता है। शरीर की संचालिका शक्ति को ‘प्राण’ कहते हैं। यह वह सचेतन विद्युत शक्ति है, जो नाड़ी तन्तुओं के माध्यम से समस्त शरीर में फैली हुई है। इसका प्रमुख केन्द्र मस्तिष्क का मध्य भाग माना जाता है, जिसे ब्रह्मरंध्र या सहस्रार कहते हैं। चेतना और शरीर का जब तक सम्बन्ध रहता है तब तक जीवन है और जब दोनों का वियोग हो जाता है, तो मृत्यु हो जाती है। यही है, संक्षेप में शरीर और प्राण चेतना का अति संक्षिप्त परिचय।

सुखी और बलिष्ठ जीवन के लिए शरीर को स्वस्थ रखा जाना चाहिए। इसके लिए आहार-विहार के नियमों का पालन किया जाना चाहिए। शारीरिक अवयवों में से किन्हीं को अतिरिक्त रूप से बलिष्ठ बनाना हो, तो उसके लिए विशेष व्यायाम करने पड़ते हैं। भारतीय विधि से उन्हें सम्पन्न करने की प्रक्रिया शारीरिक योग कहलाती है इसमें आहार की सात्विकता और ब्रह्मचर्य की संयमशीलता प्रथम है ही, इसके उपरान्त अंग विशेष के व्यायामों के लिए आसन-फेफड़ों की मजबूती और अधिक ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए प्राणायाम के अभ्यास करने पड़ते हैं। तीसरा उपचार ध्यान का है। इसके अंतर्गत मन की एकाग्रता और स्वसंकेत- ‘‘ऑटो सजेशन”-का प्रयोजन पूरा करना पड़ता है। आशा की जाती है कि इतना करते रहने वाला शारीरिक योगाभ्यासी दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु से बचा रहेगा उसे बलिष्ठ रहने का अवसर मिलेगा।

किन्तु इन्हीं क्रिया-प्रतिक्रियाओं को “योग” मान बैठना भूल होगी। यह शरीर पक्षीय “योग” है। जब कि ऋषियों की योग-परिभाषा में आत्मा और परमात्मा के मिलन को ‘योग’ कहते हैं। इस ब्रह्मांड में सचेतन शक्ति काम करती है। उससे प्रकृति के समस्त क्रिया-कलाप सुसंचालित ढंग से चलते हैं उस शक्ति को ‘परमेश्वर’ कहते हैं। इस परब्रह्म शक्ति का एक पक्ष वह भी है जो सचेतन आत्माओं के साथ संबद्ध है। इसे ‘परब्रह्म’ या ‘परमात्मा’ कहते हैं। इस निखिल ब्रह्मांड में परमात्म सत्ता प्रचुर परिमाण में भरी पड़ी है। कोई व्यक्ति यदि चाहे तो अंतरंग के सचेतन योग द्वारा अपनी आत्मा में परमात्म तत्व का अधिकाधिक भाग आकर्षित कर सकता है, साधारण प्राणवान से महाप्राण बन सकता है। अध्यात्म योग का यही स्वरूप है।

अध्यात्म योग के तीन भाग हैं-

(1) समग्र संयम- जिसे ‘तप’ कहा जाता है। तप के चार भाग हैं- (अ) इन्द्रिय संयम (ब) अर्थ संयम (स) समय संयम (द) विचार संयम। हमारी शक्तियाँ बेतरतीब उछल-कूद में अस्त-व्यस्त होती रहती हैं। इन चारों संयमों द्वारा उन्हें मात्र निर्धारित प्रयोजन में ही लगने की शिक्षा दी जाती है। (2) योग साधन की दूसरी धारा है- ध्यान। यों मन किसी-न-किसी शुभ-अशुभ प्रसंग का ध्यान करता ही रहता है, पर उसे आत्मसत्ता के विवेचन पर एकाग्र करने को ‘ध्यान’ कहते हैं। (3) तीसरा पक्ष है उत्कृष्टता के साथ तन्मयता, जिसे “भक्तियोग” भी कहते हैं। ऊँची स्थिति में यही समाधि बन जाती है। यह प्राण चेतना को अधिकाधिक समर्थ बनाने की कार्य पद्धति है।

जिस प्रकार शारीरिक योग से कोई व्यक्ति पहलवान, योद्धा, कलाकार, नट आदि बन सकता है, उसी प्रकार की आध्यात्मिक सिद्धियाँ भी हैं, जिन्हें श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा, प्रतिभा आदि कहते हैं। इसका समग्र स्वरूप ‘ब्रह्मतेजस्’ या ‘आत्मबल’ कहलाता है। इस क्षेत्र में विकसित हुए प्राण में अतीन्द्रिय क्षमताऐं जग पड़ती हैं। दूर श्रवण, विचार संचालन, प्राण प्रहार, प्रत्यावर्तन, भविष्य कथन आदि अतीन्द्रिय क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियाँ ऐसी हैं, जिन्हें दूसरे लोग देखकर आश्चर्यचकित हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त उच्चस्तरीय सिद्धियाँ भी हैं, जो स्वयं अनुभव की जाती हैं, पर दूसरों को उनकी प्रतीति नगण्य ही हो पाती है।

वरदान देने, शाप देने, अपनी क्षमताएं दूसरे में हस्तान्तरण करने, पिता और देवता स्तर की आत्माओं से संपर्क, वातावरण का परिशोधन एवं परिष्कार आदि-आदि, यह सब परमात्म सत्ता के साथ घनिष्टता के चिन्ह हैं। इस स्थिति में ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की-विश्व बन्धुत्व की भावनायें विकसित होती हैं और स्वार्थ परमार्थ स्तर तक अपना फैलाव कर लेता है। यह जानकारियाँ तो सभी को होती हैं, पर अनुभूतियाँ किसी-किसी को। जिसे अनुभूति होने लगे, उसे ‘तत्त्वज्ञानी’ कहते हैं। तत्त्वज्ञानी को अपनी अन्तरात्मा में विराजमान परमात्मा के सतत् दर्शन होते हैं। इसी को ‘ईश्वर-दर्शन’ कहते हैं। इस स्थिति तक पहुँचते-पहुँचते सम्पदा की लिप्सा, संचय की तृष्णा और बड़प्पन के प्रदर्शन की अहंता के त्रिविध बंधन टूट जाते हैं और मनुष्य “जीवन मुक्त” बन जाता है। यह मुक्ति जीवित स्थिति में भी हो सकती है। मरण की इसमें कोई शर्त नहीं। इस स्तर पर पहुँचने वाली आत्मायें नर पशु, नर पिशाच के नारकीय दलदल को पार कर लेती हैं और महामानव, ऋषि, देवात्मा स्तरों तक जा पहुँचती हैं। इन्हीं को अध्यात्म भाषा में ‘लोक’ कहा गया है। यहाँ लोक का तात्पर्य स्तर है, किसी ग्रह-नक्षत्र आदि में जा पहुँचना नहीं। इस स्तर के व्यक्तित्वों को प्रकृति के अदृश्य अंतराल की झाँकी होती है। वे भूत के घटनाक्रम, वर्तमान के प्रयास और भविष्य की संभावनाओं का स्वरूप जान सकते हैं। अपनी प्राण चेतना की टक्कर मार कर उन्हें उलट-पलट भी सकते हैं। ऐसी आत्मा को कर्मफल में बाधित होकर, जन्म-मरण के चक्र में घूमना, उनके लिए बाधित नहीं होना पड़ता। रिजर्व सेना की तरह परमात्म क्षेत्र में वे सुरक्षित प्रतिभाओं की तरह निवास करते हैं। जब भी सृष्टि संतुलन में जहाँ कहीं उनकी आवश्यकता होती है तब उन्हें सन्त, सुधारक, शहीद या अवतारी के रूप में भेज दिया जाता है, ताकि वे लोक मानस में असाधारण उत्तेजना पैदा कर सकें। सृष्टा स्वयं निराकार होने के कारण ऐसी ही दिव्य आत्माओं के अन्तराल में अपना विशिष्ट प्रकाश देकर कोई महत्वपूर्ण कार्य करा लेते हैं।

जिन्हें योग की ऋषि प्रणीत परिभाषा समझनी और अपनानी हो, उन्हें अपने पुरुषार्थ से अपने अन्तराल में अवस्थित दैवी संरचना और शक्ति भंडारों का पर्यवेक्षण एवं उत्कर्ष-जागरण करना होता है, पंचकोशों का अनावरण, षट्चक्रों का बेधन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार उद्घाटन, त्रिविध ग्रन्थि भेदन आदि क्रियायें करनी पड़ती हैं। राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग यह चार अभ्यास हैं और ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग-ये तीन जीवन यापन के क्रियाकलाप। इनमें से कौन, किसे, किस क्रम में करे इसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक का अवलम्बन अपनाना पड़ता है। अखाड़े में उस्ताद शागिर्द का, पर्यवेक्षण और दिशा निर्धारण क्रम चलता है। ठीक इसी तरह साधक की स्थिति का गंभीरतापूर्वक पर्यवेक्षण करने के उपरान्त यह निश्चय करना होता है कि किस साधक के लिए, किस स्थिति में, किस प्रयोजन के लिए, क्या साधना विधान अपनाना आवश्यक होगा?

यह अध्यात्म योग साधना का प्रकरण हुआ। शारीरिक योगाभ्यास के बालबोध-आरम्भिक अभ्यास पर पहले ही कुछ प्रकाश डाला जा चुका है। वे शरीर से होने वाले व्यायामों की तरह हैं और उनका लाभ भी उतना ही सीमित है। जीवनचर्या और मनोभूमि को कसने की भी उनमें उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती। स्कूली बच्चों की तरह उनकी पढ़ाई कोई भी कर सकता है। वे कसरतें सर्व सुलभ हैं।

इन दिनों शरीरगत कुछ हलकी-फुलकी कसरतों को ‘योग’ का नाम दिया गया है। हिन्दी के योग शब्द को अंग्रेजी में “योगा” कहा जाता है। पाश्चात्य देशों के निवासी इस “योगा” को कोई जादू-चमत्कार समझते हैं और उसे सस्ते मूल्य पर खरीदना चाहते हैं। न संयम बरतना पड़े, न कष्ट कठिनाई भरी साधनाओं का झंझट उठाना पड़े और आशा के अनुरूप फल भी मिले। ताड़ने वाले इस बाल-बुद्धि को समझ लेते हैं और उसी के अनुरूप एक सुगम-सा पाठ्यक्रम बना देते हैं। उनमें ‘आसन’ और ‘मेडीटेशन’ यही दो मुख्य हैं। आसन हल्के-फुल्के अंग संचालन जैसे एवं मेडीटेशन आंखें बन्द करके कोई कल्पना करते रहना। इससे भी आगे कदम बढ़ाना हुआ तो लम्बी सांसें खींचने का प्राणायाम और जोड़ लिया गया। आजकल भारत के चतुर सन्त वेश धारियों ने इसी प्रकार का योग यूरोप, अमेरिका के देशों में चलाया है। भारत में भी जहाँ-तहाँ उसी की नकल हो रही है। यह मनोरंजन का अच्छा रास्ता है। विशेषतया उसका नाम बड़ा और स्वरूप छोटा है। कोई भी अपने बेटे का नाम राजा रख सकता है, पर जो विशेषता और विभूतियाँ राजा के पास होनी चाहिए वे उसके पास न हों तो यह एक मजाक ही बनकर रहेगा। ‘योगी’ किसी समय बहुत ऊँची स्थिति तक पहुंचते हुए सिद्ध पुरुष होते थे। आज छोटी कक्षाओं के बच्चे भी कुछ कसरतें सीख कर अपने को योगी कहते हैं। इससे वे बच्चे तो योगी नहीं होते, ‘योग’ शब्द को ही बचकाना कहलाने का अवसर मिलता है। ऐसी दशा में योग विज्ञान के साधकों का भी मन छोटा होता है कि उन्हें इतनी तितिक्षा करने पर भी बाल बिरादरी में सम्मिलित होने से क्या लाभ? ‘योगी’ एक श्रेय सूचक शब्द है, उसकी परिधि बाल विनोद, क्रीड़ा कौतुक तक सीमित कर दी जाय तो इससे अपनी संस्कृति की मान्यताओं को आघात ही लगेगा।

यदि तथाकथित योगियों का विचार उसे बहुसंख्यक लोगों तक पहुँचाने का हो तो शुरुआत आसन और ध्यान की बी.ए.,एम.ए. जैसी कक्षाओं से न करके यम-नियम की आरंभिक श्रेणी से करनी चाहिए। राजयोग के यह प्रारम्भिक चरण हैं। यम-नियम अर्थात् शारीरिक-मानसिक सदाचार। यह सिद्धान्त परक भी है। इस आधार पर देश में नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का वातावरण तैयार किया जा सकता है। व्यायामों में श्रमदान को लिया जाय और उसे सामूहिक रूप से प्रयत्न करके स्वच्छता तक आगे बढ़ाया जाय, जलाशयों को सुधारा जाय और घरेलू शाक वाटिका से लेकर वृक्षारोपण जैसे कार्यों में सामूहिक श्रमदान को व्यायाम के रूप में प्रचलित किया जाय। स्काउटिंग स्तर की परेडें और खेलकूदों को भी प्रश्रय दिया जा सकता है। यह सभी कार्य ऐसे हैं, जिनमें शारीरिक व्यायाम आसनों की तुलना में कम नहीं, अधिक अच्छी तरह किया जा सकता है। देहाती खेलकूद अब समाप्त जैसे हो गये हैं, उनका पुनरुद्धार फिर से किया जा सकता है। आसनों की दिशा यदि इस ओर मोड़ी जा सके तो बताये जाने वाले लाभों की तुलना में अभ्यासी ही नहीं, सारा समाज भी लाभ उठा सकता है।

‘मेडीटेशन’ का अर्थ यदि ध्यान की एकाग्रता ही है, तो उसके लिए इच्छाशक्ति भी साथ में बढ़ाने के लिए “स्वसंकेत”- ऑटोसजेशन क्या बुरा है? ध्यान में देवताओं और उनके वाहनों के चित्रों को माध्यम बनाने की तुलना में संसार के महामानवों, ऋषियों, उद्धारकों की जीवन गाथाओं में सन्निहित रहस्यों को खोज निकालने का काम सौंपा जा सकता है। प्रवास यात्राओं में भी वहाँ की पुरातन और अर्वाचीन परिस्थिति की तुलना करना तथा भावी प्रगति की योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए प्रश्नोत्तर करने और उनमें अधिक गहराई का परिचय देने वालों को पुरस्कृत करना प्रत्यक्षतः अधिक लाभदायक है।

यदि एक बिन्दु पर ध्यान करना आवश्यक हो तो आँखें बन्द करके उदीयमान सूर्य का ध्यान और उसकी किरणों का रोम-रोम में प्रवेश करके बल, ज्ञान और भावनाओं की अभिवृद्धि का ध्यान करना हर किसी के लिए उपयोगी हो सकता है। संगीत शिक्षा में एकाग्रता तथा भाव-संवेदनाओं को उभारने का गुण है। उसकी शिक्षा भी एकाग्रता के लिए बुरी नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि योग को व्यायाम और एकाग्रता की शिक्षा के लिए ही प्रयोग करना है, तो उसके साथ अन्य सामयिक आवश्यकताओं को भी क्यों न सम्मिलित कर लिया जाय। निशानेबाजी अपने आप में एक एकाग्रता की कला है और स्कूलों में दी जाने वाली सैनिक ड्रिल में वे सभी गुण समाविष्ट हैं, जो व्यायाम की आवश्यकता पूरी करने के साथ-साथ अनुशासन भी सिखाते हैं और साहस, उत्साह भी बढ़ाते हैं। यह आन्दोलन तथा कथित “योगा” से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। योग के ऊपर यह लाँछन लगते रहते हैं, कि उसमें स्वार्थपरक सीमित दृष्टिकोण रहता है। यह बात ऊँची श्रेणी के योग के संबंध में तो नहीं कहीं जा सकती, पर मात्र अंग संचालन सिखाने की अपेक्षा तो यह कहीं अच्छा है, कि ऐसे शारीरिक, मानसिक व्यायामों को लोकप्रिय बनाया जाय, जो नागरिक कर्तव्य एवं समाज निष्ठा की सत्प्रवृत्तियों को भी अग्रगामी बनाते हों एवं अध्यात्म की गूढ़ साधना के प्रति दिमाग भी साफ करें।

ध्यान और योगाभ्यास, यों दोनों ही ऊँचे दर्जे की आत्मशोधन तथा आत्म परिष्कार की प्रक्रिया हैं। उन्हें अपनाने पर आत्मा को परमात्मा स्तर का क्षुद्र से महान बनने का अवसर मिलता है। पर यदि उसके साथ जुड़े हुए अन्य कर्त्तव्यों का निर्वाह कठिन पड़े और उसे स्कूलों में ही चलाना हो, तो इन व्यायामों को ‘योग’ न कहा जाय, साथ ही उनके साथ ऐसी चारित्रिक नियम निष्ठा तथा कार्य पद्धति, जोड़ी जाय, जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए ही लाभदायक सिद्ध हो सके। इसी में योग की और उसे अपनाने वालों की सार्थकता है।


Quotation

प्रचलनों को महत्व मत दो। बहुसंख्यक वे हैं जिनमें विचारने की क्षमता नहीं और जो परिपाटी का आश्रय लेने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं सकते।

** ** ** **


Quotation

पुरखों की कब्र मत कुरेदो। मोती पाने के लिए समुद्र में नई डुबकी लगाओ।

वृद्ध जटायु रावण को परास्त करने में समर्थ न था, तो भी उसने अनीति होते देख कर चुप बैठना उचित न समझा। भिड़ गया। इसमें उसे प्राण त्यागने पड़े पर हारने पर भी विजयी से भी अधिक श्रेयाधिकारी बन गया।


धन्वन्तरि के विद्यालय (kahani)

धन्वन्तरि के विद्यालय में वागभट्ट आयुर्वेद पढ़ रहे थे। उनकी पीठ में एक भयंकर फोड़ा हो गया। उपचार के लिए एक जड़ी की आवश्यकता पड़ी। गुरुदेव ने उसका नाम बताया, आकृति समझाई और वन प्रदेश में उसे खोजने के लिए भेजा।

वागभट्ट तीन महीने तक ध्यानपूर्वक जड़ी-बूटियाँ खोजते रहे। अनेकों प्रकार की देखी समझी तो पर अभीष्ट औषधि मिली नहीं। वे वापस लौट आये।

धन्वन्तरि ने विवरण सुना तो ज्ञानवृद्धि और नई खोजों पर प्रसन्नता व्यक्त की।

दूसरे दिन छात्र को लेकर वे पड़ौस के खेत में गये और अभीष्ट औषधि उखाड़ लाये। सेवन कराई तो छात्र कुछ ही दिन में अच्छा हो गया।

अवसर पाकर वागभट्ट ने गुरुदेव से पूछा- भगवन्! औषधि तो पास में ही खड़ी थी, फिर मुझे इतने कष्ट साध्य प्रयास के लिए क्यों भेजा?

धन्वन्तरि ने कहा- वत्स, प्रयोजन लाभ की तुलना में ज्ञान और अनुभव का सम्पादन अधिक महत्वपूर्ण है। तुम इस कारण इतना पुरुषार्थ कर सके वह लाभ अनायास की उपलब्धि से कहाँ मिल पाता।


क्या हम बन्दर की औलाद हैं?

जीवों का विकास क्रम क्रमशः अधिक सुविधा सम्पादन की खोज करने वाली इच्छा शक्ति को देखते हुए एक सीमा तक यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जीवन ने लघुता से विभुता की दिशा में पदार्पण किया है। पर यह सिद्धान्त अमीबा जैसे लघुकाय जीवों तक ही लागू होता है। आगे तनिक भी उनकी संगति नहीं बैठती। मछली आरम्भ से ही मछली है और कछुआ आरम्भ से ही कछुआ। मछली के कछुआ होने और कछुए के शूकर बनने की कल्पना यदि यही रही होती तो उन परिवर्तनों का मध्यवर्ती उदाहरण भी देखने को मिलता। कहीं कोई प्रमाण ऐसा पाया जरूर जाता जो मछली का विकसित और कछुए का अविकसित शरीर परस्पर एक होते हुए दृष्टिगोचर होते। घोड़े का विकसित रूप महाअश्व के रूप में दिखाई पड़ता और आदिम मनुष्य बढ़ते-बढ़ते महादैत्य की परिधि तक जा पहुँचा होता।

सृष्टि के आरम्भिक काल में महा सरीसृप, महा गज, महा गरुड़ आदि का इतने समर्थ होने के उपरान्त लुप्त होने का कोई कारण नहीं था। परन्तु विकासवाद के सिद्धान्तानुसार पूर्वकाल की तुलना में अब तक बढ़ते-बढ़ते इन्हें और भी अधिक बड़ा हो जाना चाहिए था।

विकासवाद की खोज प्रायः स्वरूप विकसित जल जीवों पर हुई है। उस क्षेत्र में भी सामान्य सा ही परिवर्तन होता है। वे परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालते या वातावरण से प्रभावित होते देखे गये हैं। ऐसा तो मनुष्यों में भी होता रहता है शीत प्रधान देशों के मनुष्य गोरे और ऊष्ण कटिबन्धों के समीपवर्ती काली चमड़ी के होते हैं पर इससे उनकी शारीरिक या मानसिक संरचना में कोई अन्तर नहीं आता। काले हविश लोग पीढ़ियों पूर्व अमेरिका में बसे थे। वंशानुक्रम के थोड़े से शरीर चिन्हों को छोड़कर वे क्रमशः उसी सभ्यता और मनःस्थिति में ढले हैं जिसमें कि मूल अमेरिका वासी रहते हैं। उत्तर ध्रुव के निवासी एस्किमो बड़ी संख्या में कनाडा के इर्द-गिर्द बस गये हैं। उनका स्वभाव और बौद्धिक विकास वातावरण के अनुरूप ही बन गया है। वंशानुक्रम का प्रभाव अधिक से अधिक इतना ही रह सकता है जैसा कि मंगोल वर्ग के लोगों की आँखें कम चौड़ी और नाक सिकुड़ी हुई होती है। इसके विपरीत अफ्रीकी नस्ल वालों के हाथ और नथुने चौड़े होते हैं। यह क्षेत्रीय विशेषतायें भी वातावरण बदलने पर क्रमशः अपने में परिवर्तन लाती रहती हैं। किन्तु इसका चेतना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। दयालु, निष्ठुर, सज्जन-दुर्जन प्रत्येक समुदाय में पाये जाते हैं।

जल जीवों में मछलियाँ आदि में अपनी-अपनी पैतृक विशेषता तो रहती है। पर एक वर्ग दूसरे में नहीं बदलता। ह्वेल-शार्क आदि की अपनी-अपनी जातियाँ और वंश परम्पराएँ हैं वे आरम्भ से वैसी ही बनी हुई हैं। झींगा मछलियाँ कभी विकसित होते ही ह्वेल बन जायेगी और ह्वेल का आकार जलयानों जैसा हो जायेगा, ऐसी आशा करना व्यर्थ है। पालतू मुर्गे को शुतुरमुर्ग बनाया जा सकता है या हिरन घोड़े हो सकते हैं, यह अटकल लगाना व्यर्थ है।

विकासवाद का एक पक्ष यह है कि जड़ ही चेतन बन जाता है। परमाणु ही जीवाणु का रूप धारण कर लेते हैं। यदि यह बात ही रही होती तो युवाओं के स्वस्थ शरीरों को मरण के उपरान्त सहज ही जीवित किया जा सकता। शरीर तो यथावत् है। किसी भयंकर रोग या दुर्घटना को छोड़कर यदि साधारण स्थिति में किसी की मृत्यु हुई है तो थोड़ी उलट-पुलट करके उसे जीवित करने में क्यों कठिनाई होती। कारण कि शरीर तो भीतर बाहर से ज्यों का त्यों बना हुआ है ऐसी दशा में उसे पुनर्जीवित करने का उपचार बहुत कठिन नहीं होना चाहिए।

प्रागैतिहासिक काल के पाषाणीकृत अस्थि पंजरों (फॉसिल्स) के आधार पर खड़ा किया विकासवाद का काल्पनिक ढाँचा इसलिए नहीं माना जा सकता कि विज्ञान काल में ऐसे कोई महान परिवर्तन नहीं हुए। जिन्हें देखकर उन कल्पनाओं की पुष्टि की जा सके। बन्दर जाति में से कोई भी अब तक विकसित होकर मनुष्य नहीं बना। इसी प्रकार पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों की प्रजातियाँ यथावत बनी हुई हैं। क्षेत्रीय वातावरण के आधार पर परिपक्व हुई प्रकृति ही वंश परम्परा के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इसके अतिरिक्त उनका मूल स्वभावः यथावत् ही बना रहता है। शाकाहारी और माँसाहारी प्राणी सुविधा के रहते अपनी प्रकृति नहीं बदलते। मनुष्य के पालतू होने पर ही वे अपनी प्रकृति में यत्किंचित् परिवर्तन कर लेते हैं, जैसे बंदर का सिगरेट पीना। पर वह आदत भी उनके वंशजों में नहीं चलती। गाय, बैल हिरन आदि को माँसाहारी बनाया जा सकता है इसमें सन्देह है। वंशानुक्रम की सीमा भी इसी सीमा को कठिनाई से छू पाती है। अन्यथा वह यथावत ही बनी रहती है। इस क्षेत्र में भी विकासवाद के प्रतिपादित सिद्धांतों के बारे में समझा जा सकता है। सृष्टि की विचित्रता को देखते हुए कहीं कोई अपवाद दिख पड़े तो उतने भर से किसी सिद्धान्त की पुष्टि नहीं होती।

जड़ से चेतन का बनना भी इसी प्रकार का कौतूहल है। पत्थर को भले ही पीस कर रेत बना लिया जाय पर उससे कोई समग्र प्राणी नहीं बन सकता। काई जैसा कोई रासायनिक परिवर्तन भले ही हो चले। यह सिद्धान्त बहुत थोड़े स्तर के सड़न से उत्पन्न होने वाले कृमि-कीटकों के सम्बन्ध में भले ही एक सीमा तक लागू हों, विकसित प्राणियों में, पशु-पक्षियों तक में ऐसा कुछ देखा नहीं जा सकता है। ऐसे कहने वालों को यह प्रश्न असमंजस में डाल देता है कि भविष्य में मनुष्य का विकसित रूप क्या होगा? क्या वह सर्प की तरह बिना हाथ पैरों के दौड़ सकेगा?

विकासवाद की कल्पना के विरुद्ध इसलिए विचार करना पड़ता है कि उससे हमारा स्थायित्व चला जाता है। आत्मिक चेतना समाप्त हो जाती है और वंशानुक्रम का जीवाणुवाद ही शेष रह जाता है। इसके उपरान्त मनुष्य के लिए निर्धारित नीति मर्यादा के सारे नियम छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। मनुष्य यदि हँसने वाला पशु और चलने वाला पौधा है तो उसे आवश्यकतानुसार कुछ भी करने की छूट मिल जाती है। फिर कर्त्तव्य अकर्तव्य का कोई विवेचन शेष नहीं रहता। पशु प्रवृत्तियों में से अधिकांश ऐसी हैं जो मानवी सभ्यता में तनिक भी तालमेल नहीं खाती। पशु अपना पेट कहीं भी दिखने वाली हरियाली को देखकर भरने चल पड़ता है। उसे यह ज्ञान नहीं कि यह खेत किसी ऐसी विधवा का है जिसके छोटे बच्चे इसी फसल से पलेंगे। फिर वह दूरदर्शिता और उपयोगी दूरदर्शिता को भी छोड़ बैठेगा और भावनात्मक भी न रहेगा। अन्य प्राणियों में किसी भी नर-मादा के साथ यौन संपर्क साधने की छूट है। यदि मनुष्य भी एक पशु है तो उसे भाई-बहिन, माता पुत्र जैसे पवित्र रिश्तों की क्या आवश्यकता रह जायगी। फिर वह भी क्यों अन्य प्राणियों की तरह स्वच्छन्द यौनाचार बरत कर परिवार संस्था को समाप्त क्यों न कर लेगा?

कर्मफल का सिद्धान्त केवल मनुष्य पर ही लागू होता है। अस्तु वह तात्कालिक लाभ के लिए ललचाते समय भावी परिणामों की बात भी सोचता है। स्वर्ग नरक भी उसकी दृष्टि में रहता है और सामाजिक यश अपयश भी प्रभावित करता है। ऐसी ही अनेक विशेषताएँ मनुष्य की हैं। आस्तिक भी वही होता है और ज्ञान, कर्म-भक्ति को विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए संयम अनुशासन के अनेकानेक वचन अनुशासन अपने ऊपर स्वेच्छापूर्वक लगाता है। यदि तथाकथित विकासवाद के सिद्धान्त को मान्यता दी जाय तो फिर इस संसार में “जिसकी लाठी-उसकी भैंस” का सिद्धांत ही सर्वत्र अपनाया जाने लगेगा और बड़ी मछली छोटी को खाने लगेगी।

ऐसी दशा में मानवी स्नेह सहयोग का आधार क्या रह जायेगा? उचित अनुचित का विश्लेषण कैसे हो सकेगा। ऐसी दशा में वन-मानुषों की बिरादरी में ही सारा मनुष्य समुदाय सम्मिलित हो जायेगा। तब न्याय, प्रेम, सहयोग, देश भक्ति, परमार्थ, आत्म-संयम जैसे सिद्धान्तों का भी सहज परित्याग चल पड़ेगा।

विकासवाद में पुरातत्व की प्राणि विकास की खोज ही सीमित नहीं है पर उसकी प्रतिक्रिया अत्यधिक भयंकर है। वह मनुष्य की संचित सभ्यता को पूरी तरह छीन सकती है फलतः प्रगति का द्वार भी रोक सकती है। भ्रष्टाचार और अनाचार की तो पूरी छूट मिलेगी ही।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए काल्पनिक विकास वाद को किसी की अभिभूत और अप्रामाणिक कल्पना का घुड़-दौड़ मात्र ही समझा जाना चाहिए।

आत्म गौरव, आत्म-सम्मान, इतिहास, सभ्यता, संस्कृति की दुहाई देने वाले, अपने को सृष्टि का मुकुटमणि और सृष्टा का ज्येष्ठ पुत्र मानने वाले मनुष्य के लिए यह बड़ी लज्जा की बात होगी कि डार्विन के मतानुसार वह अपने महान पूर्वजों को बन्दर कहे। यदि इस मान्यता ने जोर पकड़ा तो हमें निर्वस्त्र होकर रहने में भी क्या लज्जा लगेगी और शिक्षा, दर्शन आदि की क्या उपयोगिता शेष रहेगी।


Quotation

पिछले जन्मों में न जाने कितने परिजनों को अपना कहता रहा है और भविष्य में न जाने कितनों को कहेगा। अनावश्यक मोह और दबाव में मत बँधो। केवल कर्त्तव्य पालन पर ही सन्तोष करो।

** ** ** **


Quotation

यह मत देखो किसको प्रिय लगा किसको अप्रिय। कौन सी हानि हुई किसको लाभ पहुँचा। मात्र आदर्श को अपनाओ। वे ही अपना पराया वास्तविक हित साधन करते हैं।


चेहरे से उल्लास टपकता (kahani)

एक सन्त थे। सदा प्रसन्न रहते। चेहरे से उल्लास टपकता रहता।

चोरों ने समझा उनके पास कोई बड़ी दौलत है। अन्यथा हर घड़ी इतने प्रसन्न रहने का और क्या कारण हो सकता है।

अवसर पाकर चोरों ने उनका अपहरण कर लिया। जंगल में ले गये और बोले- हमने सुना है, आपके पास सुखदा मणि है। इसी से इतने प्रसन्न रहते हैं। उसे हमारे हवाले करो अन्यथा जान की खैर नहीं।

सन्त ने एक-एक करके हर चोर को अलग-अलग बुलाया और कहा- चोरों के डर से मैंने उसे जमीन में गाड़ दिया है। यहाँ से कुछ ही दूर पर वह स्थान है। अपनी खोपड़ी के नीचे चन्द्रमा की छाया में खोदना मिल जायेगी।

सन्त पेड़ के नीचे सो गये। चोर अलग अलग दिशा में चले और जहाँ-तहाँ खोदते फिरे। जरा-सा उठते चलते तो छाया भी हिल जाती और उन्हें जहाँ-तहाँ खुदाई करनी पड़ती। रात भर में सैकड़ों छोटे-बड़े गड्ढे बन गये पर कहीं मणि का पता न लगा।

चोर हताश होकर लौट आये और सन्त पर गलत बात कहने का आरोप लगाकर झगड़ने लगे।

सन्त हँसे, बोले- मूर्खों मेरे कथन का अर्थ समझो। खोपड़ी तले सुखद मणि छिपी है। अर्थात् उसमें श्रेष्ठ विचारों के कारण मनुष्य प्रसन्न रह सकता है। तुम भी अपना दृष्टिकोण बदलो और प्रसन्न रहना सीखो।

चोरों को यथार्थता का बोध हुआ तो वे भी अपनी आदतें सुधार कर प्रसन्न रहने की कला सीख गये। यही थी सुखद मणि।


समग्र अध्यात्म के त्रिविधि आधार

अध्यात्म की त्रिवेणी तीन धाराओं में प्रवाहित होती है (1) प्रेम (2) ज्ञान (3) बल। इन तीनों का सन्तुलित अभिवर्धन करने से ही कोई समग्र अध्यात्मवादी हो सकता है।

प्रेम हमारे अंतःकरण का अमृत है। जिस प्रकार हम अपने स्वार्थ, सुख, यश, वैभव और उत्सर्ग को चाहते हैं उसी प्रकार दूसरों के लिए भी चाहना उठने लगे तो उसे प्रेम का प्रकाश कहना चाहिए। अपनापन ही सबसे अधिक प्रिय है। अपने शरीर मन, यश, सुख की चाहना रहती है। यह अपना आपा जितना विस्तृत होता चलेगा वह उतना ही प्रिय लगेगा और उसे सुखी समुन्नत बनाने की उतनी ही तीव्र उत्कंठा उठेगी। अपना परिवार जिस तरह प्यारा लगता है उसी तरह यह आत्मीयता की परिधि विस्तृत होती जाती है और अपना ‘प्रिय’ क्षेत्र बढ़ता चला जाता है। उसके लिये सेवा सहायता करने की इच्छा होती है और सत्कर्म ही बनते हैं। अपनों के साथ दुष्टता कौन करता है। प्रेम भावना की वृद्धि मन में से सभी दुष्प्रवृत्तियों को हटा देती है और मनुष्य सज्जन और सच्चरित्र एवं सहृदय बनता चला जाता है। प्रेम असंख्य सद्गुणों का श्रोत है इसलिये उसे अध्यात्म का प्रथमचरण माना गया है।

दूसरा घटक है- ज्ञान। यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं। जीवन के लक्ष्य को हम भूल जाते हैं। आत्म कल्याण की बात विस्मृत हो जाती है और कर्त्तव्य धर्म का पालन करने की गरिमा समझ में नहीं आती। इन्द्रियों की वासना और मन की तृष्णा पूरी करने के लिए-अहंकार की पूर्ति के लिये निरर्थक कार्य करते हुए जीवन बीत जाता है और पाप की गठरी सिर पर लद जाती है। यह सब अज्ञान का फल है। अपने को शरीर नहीं आत्मा मानकर चलें। आत्म-कल्याण की दृष्टि से जीवन क्रम निर्धारित करें और वासना तृष्णा को अनियन्त्रित न होने दें। अहंकार के स्थान पर आत्मबल बढ़ाने में लगें तो समझना चाहिए ज्ञान की उपलब्धि हो गई। स्कूली शिक्षा या धर्म पुस्तकें पढ़ लेने का नाम ज्ञान नहीं है। यह तो एक आस्था है जो अन्त करण में प्रकाशवान होकर हमें सही और गलत का विवेक कराता है। यह ज्ञान जो जितना प्राप्त कर लेता है वह उतना ही सफल आत्मवादी कहा जाता है।

तीसरा चरण है- बल। निर्बल को न साँसारिक सुख मिलता है न आत्मिक। हमें बलवान बनना चाहिए। मनोबल के आधार पर ही आपत्तियों से निपटना, प्रगति के पथ पर बढ़ चलना सम्भव होता है। लोभ, मोह जैसे शत्रुओं को परास्त करते हुए प्रलोभनों से बचते हुए आदर्श वादिता के मार्ग पर अपनी प्रवृत्तियों को मोड़ सकना साहसी और पराक्रमी व्यक्ति के लिए ही सम्भव है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सामर्थ्यवान और सशक्त बनाना पड़ता है। आत्मिक, मानसिक, शारीरिक सभी दुर्बलताएँ दूर करनी पड़ती हैं और आर्थिक क्षेत्र में इतना स्वावलम्बी रहना पड़ता है कि किसी के आगे हाथ न पसारना पड़े।

मनुष्य की सत्ता तीन भागों में विभक्त है (1) अन्तःकरण (2) मस्तिष्क (3) शरीर। इसी विभाजन को अध्यात्म की भाषा में कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर कहते हैं। अन्तःकरण का वैभव है-प्रेम। मस्तिष्क का धन है-ज्ञान। शरीर का वर्चस्व है-बल। चूँकि शरीर से ही आर्थिक पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्ध है इस लिए धन, व्यवहार, कौशल और संगठन को भी इसी क्षेत्र में गिना जाता है।

इन तीनों के समन्वय से ही समग्र अध्यात्म बनता है। एकांगी से काम नहीं चलता। अन्न, जल और वायु के त्रिविध आहार पर जीवन निर्भर है। आध्यात्मिक जीवन की यह तीनों प्रवृत्तियाँ समान रूप से आवश्यक हैं। इनका समन्वय ही त्रिवेणी का संगम है। उस तीर्थराज प्रयाग में स्नान करके ही हम जीवन लक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।


अन्तः का परिमार्जन-परिष्कार

अन्धकार का निराकरण अथवा प्रकाश का प्रज्वलन दोनों एक ही बात हैं। कहने का ढंग भर अलग है। अस्वस्थता का निवारण अथवा आरोग्य का संवर्धन यह कहने की शैली भिन्नता भर है। दरिद्रता का समापन एवं सम्पन्नता का आगमन यह देखने सुनने में ही दो बातें प्रतीत होती हैं पर वस्तुतः हैं एक ही।

आत्मा स्वयं पवित्र है। ईश्वर का अविनाशी अंश होने के कारण उनमें तत्त्वतः अपवित्रता जैसी कोई वस्तु है नहीं। इस संसार के वातावरण में आच्छादित अवांछनीयता ही जब उसके ऊपर आवरण डाल लेती है तभी उसमें कुरूपता दृष्टिगोचर होने लगती है। सूर्य चन्द्र के ऊपर ग्रहण लगने या बदली कुहरा छा जाले से उनकी छवि धूमिल हो जाती है। पर मूलतः सूर्य चन्द्र वैसे हैं नहीं आवरण हटते ही वे अपने मूल रूप में प्रकाशवान दिखने लगते हैं।

मनुष्य में अनेकों अभाव एवं विकार दिखते हैं। यह उसके ऊपर किसी ने थोपे नहीं हैं। यह अनाचरण एवं भटकाव की प्रतिक्रिया मात्र है। यदि इस संकट एवं झंझट से उबरा जा सके तो उस आनन्द की प्राप्ति के लिए कुछ अलग से अतिरिक्त प्रयास करना नहीं पड़ता।

असंयम न बरता जाय तो दुर्बलता, रुग्णता के कुचक्र में फँसने जैसी कोई बात है नहीं। सृष्टि के समस्त प्राणी जन्मते मरते तो हैं पर बीच में रुग्णता के जाल में नहीं फँसते। यदि रोग स्वाभाविक रहे होते तो समुद्र के जल चर-वन्य पशु एवं घोंसलों में रहने वाले पक्षियों को आधि-व्याधियों से घिरा देखा जाता और उन सबके लिए डाक्टरों की, अस्पतालों की भी सृष्टा को व्यवस्था करनी पड़ती। मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी को अस्वस्थता घेरती नहीं। वह उन्हें असंयम की कुकर्म पत्री भेजकर आग्रह पूर्वक न्यौत बुलाता है। यदि बिगाड़ को सुधार लिया जाय तो मनुष्य पूर्णायुष्य प्राप्त करे और रुग्णता से कराहते दुर्दिनों में समय न गुजारे।

हँसने की कला केवल मनुष्य के हिस्से में आई है। सौंदर्य बोध केवल उसी को हो सकता है। सहकारिता का कौशल हर किसी को आता है। मनःक्षेत्र का सन्तुलन बनाये रखकर वह हर परिस्थिति के साथ तालमेल बिठा सकता है और हर घड़ी हँसती-हँसाती जिन्दगी जी सकता है। यह सारे उपहार उसे जन्मजात रूप में मिले हैं। इतने पर भी यदि किसी को कुढ़ता-कुढ़ाता, रोता-रुलाता, डरता-डराता देखा जाय तो समझना चाहिए कि अत्यन्त मूल्यवान मानस तन्त्र प्राप्त करने का सुयोग होते हुए भी, उसे उसका प्रयोग करना नहीं आया। अनाड़ी ड्राइवर कीमती मोटर को भी किसी पेड़ से टकराते और खड्ड में धकेलने की दुर्घटना करते देखे गये हैं। इन वाहनों की बनावट को दोष देना व्यर्थ है। सड़क को कोसने से भी लाभ नहीं। गलती ड्राइवर की ही दुर्घटनाओं में होती है।

परिवार हर मनुष्य को मिला हुआ एक छोटे नन्दन वन जैसा सुरम्य उद्यान है। उसके बीच रहकर आनन्दित, उल्लसित, गदगद और प्रगतिशील परिस्थितियों में रहा जाता है। इस स्थिति में व्यवधान क्या पड़ता है- बचपन की सौम्य सात्विकता और भोलेपन का प्रकृति प्रदत्त सुषमा गँवा देने से। चिड़ियां अपने अण्डे बच्चों वाले घोंसले में कलोल करती है तो हम परिवार की मधुरता, मृदुलता क्यों गँवा देते हैं? माता वात्सल्य, पत्नी का समर्पण, भाई-बहिनों का साहचर्य, बच्चों की खिलौनों जैसी शोभा यदि हमें उल्लसित नहीं कर पाती, तो समझना चाहिए कि अपने अन्तराल के स्नेह स्रोत सूख गये।

मनुष्य दरिद्र क्यों होता है? हाथी और गैंडे जैसे बहुत खाने वालो के लिए भरपेट भोजन सदा उपलब्ध होता रहता है फिर दो मुट्ठी अनाज खाने वाले और दस गज कपड़ा लपेटने वाले के दस अंगुलियां वाले दो अतिरिक्त हाथ क्यों उसका पेट नहीं भर पाते? क्यों वह अभाव ग्रस्त, दरिद्र रहता है? इसमें आवश्यकता से असंख्य गुनी चाहना पीठ पर लादे फिरना ही एकमात्र कारण है। तृष्णा एक आग है जो निरन्तर ईंधन डालते रहने पर भी बुझती नहीं, वरन अधिकाधिक प्रदीप्त होती जाती है। ऐसे ही निरर्थक जाल जंजाल है, जिन में मनुष्य निरन्तर मकड़ी के जाले की तरह स्वयं ही बुनता और स्वयं ही फँसता रहता है। रेशम के कीड़े को कोटों में कौन बन्द करता है? मेंढक को कुएं में कौन पकड़कर लाता और धकेलता है। मनुष्य अभागा स्वयं ही अपनी हथकड़ी बेड़ी कसता और बन्दी गृह में ताला डालकर चाबी जेब में डाले फिरता है। कहता है कोई इसमें से छुड़ाये तो बड़ा अनुग्रह हो।

कमरा रोज झाड़ना पड़ता है। पहनने वाले कपड़े रोज धोने पड़ते हैं। दाँत माँजने की नित्य आवश्यकता पड़ती है। स्नान भी दैनिक कृत्य है। इस वातावरण में गन्दगी चारों ओर उड़ती रहती है। वह बिना प्रयत्न के ही सर्वत्र जमती रहती है। यदि इसे नित्य न धोया बुहारा जाय तो कुछ ही समय में गन्दगी के ढेर लग जायेंगे। यह सफाई ही साधना है। वातावरण में सत् कम है और असत् बहुत। अर्थ कम है अनर्थ बहुत। इसलिए यह सतर्कता बरतनी पड़ती है कि अशुभ का अनावश्यक आच्छादन अपने शुभ को आच्छादित न करले। इस सतर्कता का नाम ही साधना है।

ईश्वर को किसी की प्रशंसा, स्तुति, मनुहार नहीं चाहिए। उसकी समग्र प्रशंसा कोई कर भी नहीं सकता। समुद्र में एक चुल्लू डाल देने से उसकी क्या तो अभिवृद्धि होगी और क्या प्रसन्नता। इसी प्रकार भेंट उपकार का कोई कुछ अनुदान प्रस्तुत करे। पंचोपचार, षोडशोपचार के अनुरूप धूप, दीप, पुष्प, चन्दन, अक्षत आदि समर्पित करें तो उसे पाकर भगवान कैसे समझें कि यह बड़ी अनुकम्पा कर रहा है और भक्ति-भाव का परिचय दे रहा है। प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि को मानसिक व्यायाम कहा जा सकता है। उसके सहारे मन की एकाग्रता एवं इच्छा शक्ति की अभिवृद्धि हो सकती है। इसलिए इन्हें भी दण्ड-बैठक, कुश्ती, कबड्डी जैसे शारीरिक व्यायाम समतुल्य माना जा सकता है। इन्हें कैसे माना जाय कि आत्मबल बढ़ाने में वे सहायक हो सकते हैं और पवित्रता एवं प्रखरता बढ़ा सकते हैं।

स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन, कथा-कीर्तन आदि के सहारे जीवनचर्या में सतोगुण बढ़ाने का मार्ग-दर्शन मिलता है। पर उसका कहना सुनना ही पर्याप्त नहीं। उस राह पर चलना भी तो चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हमारे चिन्तन और चरित्र का प्रवाह निरन्तर उत्कृष्टता के मार्ग पर चले। आचरण में अधिकाधिक आदर्शवादिता और पुण्य परमार्थ की गतिविधियों का समावेश बढ़े। यह दिन भर में घंटे आध घंटे की चिन्ह पूजा नहीं है। उस मार्ग पर निरन्तर चला जाना चाहिए। भूल न होने पाये- कुसंस्कारों का आक्रमण चढ़ न दौड़े, इसका निरीक्षण परीक्षण हर घड़ी चलना चाहिए। साधना इसी का नाम है। इसमें अपने आपको साधा जाता है। ईश्वर को लुभाने या उसके सम्मुख चित्र-विचित्र क्रिया कृत्य करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। परब्रह्म इस निखिल ब्रह्मांड के सुचारु रूप से संचालन में निमग्न है। उसे किसी भक्त पर पुष्प वर्षा करने- दौलत के थैले भेजने या वरदान अनुदान देने की न तो आवश्यकता अनुभव होती है और न ही इच्छा उठती है। वह स्वयं जिस प्रकार नियमबद्ध होकर कार्यरत रहता है उसी प्रकार अपने अनुयायियों से भी आशा करता है कि वे निर्धारित अनुशासन का पालन करेंगे।

उच्च पद की उपलब्धि के लिए आवश्यक योग्यता अर्जित करने और परीक्षा प्रतियोगिता में खरा सिद्ध होने की आवश्यकता पड़ती है। इससे कम में काम चलने वाला नहीं है। परीक्षक अथवा नियुक्ति कर्ता की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पूजा-अर्चा करने से योग्यता सिद्ध करने की अनिवार्यता से बचा नहीं जा सकता। ईश्वर का कई बार नाम लेने भर से किसी की भी भक्ति प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती। ईश्वर के दरबार में चापलूसी या भेंट पूजा की मनुहार करने मात्र से अपना उल्लू सिद्ध कर लेने में आज तक किसी को भी सफलता नहीं मिली है। फिर सस्ता रास्ता ढूंढ़ निकालने की प्रवंचना में हमीं क्या अपना समय बर्बाद करें।

मल-मूत्र में सना हुआ बच्चा माता की गोद में चढ़ने, दूध पीने के लिए चाहे कितना ही क्यों न मचल रहा हो पर वह असीम प्यार करने पर भी तब तक उसे दूर ही रखती है जब तक धो पोंछकर उसे भली प्रकार साफ सुथरा नहीं कर लेती। भगवान की भी रीति-नीति यही है। उनके भक्त को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र का परिचय देना चाहिए। इसमें अनाचार से हाथ खींचना पड़ता है। लोगों को यह कठिन प्रतीत होता है। सरल यह लगता है कि अनाचार से मिलने वाले लाभों को दोनों हाथों से समेटते रहें और पूजा-पाठ की चित्र−विचित्र चिन्ह पूजा करके भगवान को भी बहकाते फुसलाते रहें। दोनों हाथ लड्डू भरे रहने की यह विडम्बना मात्र मन को बहकाने भर के काम आती है। ईश्वर भक्तों को वाल्मीकि, विल्व मंगल, अंगुलिमाल, अम्बपाली की तरह अपनी जीवनधारा बदलनी पड़ती है। भागीरथ, हरिश्चन्द्र और दधीचि की तरह सत्प्रयोजनों के लिए बढ़-चढ़कर त्याग बलिदान की आवश्यकता अनुभव करने पड़ती है। सो भी ऐसा त्याग बलिदान नहीं, जिसकी परिधि का कष्ट और कर्मकाण्डों की सीमा तक अवरुद्ध होकर रह गयी हो।

वासना, तृष्णा और अहंता से हमारे तीनों शरीर मलीन होते हैं। वासना स्थूल शरीर को, तृष्णा सूक्ष्म शरीर को और अहंता कारण शरीर को हेय बनाती है। इन मलीनताओं का परिशोध करना ही साधना का उद्देश्य है। जो इस सही मार्ग पर चलते हैं वे अध्यात्म साधना के अनुरूप ऋद्धि-सिद्धियों से भरा-पूरा सत्परिणाम भी प्राप्त करते हैं।


Quotation

जो रोटी की चिन्ता करता है नास्तिक। वाणी और बुद्धि न रहने पर भी पशु-पक्षी पेट भरते हैं तो समझदार और परिश्रमी मनुष्य क्यों भूखा मरे।


एक सुन्दर मकान बनाया (kahani)

किसी धर्मात्मा ने जंगल में एक सुन्दर मकान बनाया और उद्यान लगाया, ताकि उधर आने वाले उसमें ठहरें और विश्राम करें।

समय-समय पर अनेक लोग आते और ठहरते रहे। दरबान पूछता रहा- बताइए, मालिक ने इसे किन लोगों के लिए बनाया?

आने वाले अपनी-अपनी दृष्टि से उसका उद्देश्य बताते रहे।

चोरों ने कहा- ‘‘एकान्त में सुस्ताने हथियार जमा रखने और माल का बँटवारा करने के लिए।”

व्यभिचारियों ने कहा- ‘‘बिना किसी खटके और रोक-टोक के स्वेच्छाचारिता बरतने के लिए।”

जुआरियों ने कहा- “जुआ खेलने और लोगों की आँखों से बचे रहने के लिए।”

कलाकारों ने कहा- ‘‘एकान्त का लाभ लेकर एकाग्रतापूर्वक कला अभ्यास करने के लिए।”

सन्तों ने कहा- ‘‘शान्त वातावरण में भजन करने और ब्रह्मलीन होने के लिए।”

“मनुष्य जन्म भी महल और उद्यान कि तरह सुन्दर है। लोग इसका उद्देश्य और उपयोग मनमर्जी के अनुकूल समझते करते हैं।”


कामुकता प्रधानतया मानसिक है।

मनुष्य एक सामान्य शरीर है। उसमें लिंग परिवर्तन कुछ रसायनों की न्यूनाधिकता से होता है। जन्मजात रूप से जननेन्द्रियों की बनावट में अन्तर भर होता है, किन्तु कामुकता का उभार तथा प्रजनन पूर्णतया उन विशिष्ट रसायनों के आधार पर होते है, जिन्हें हारमोन कहते हैं।

हारमोनों में कितने ही स्तर के हैं और वे शारीरिक मानसिक विकास में काम आते हैं। उनकी न्यूनाधिकता से मनुष्य का गठन सामान्य न रहकर असामान्य हो जाता है। कभी-कभी लम्बाई छः-सात फुट को भी पार कर जाती है और कभी-कभी उनमें अवरोध उत्पन्न होने पर वह तीन फुट जितना बौना भी रह जाता है। अशक्तता एवं सशक्तता भी बहुत कुछ इन्हीं पर अवलम्बित रहती है।

यौन प्रयोजनों में इनका बड़ा हाथ है। स्वाभाविक विकास न होने पर मनुष्य देखने में स्वस्थ प्रतीत होते हुए भी नपुंसक स्तर का रह जाता है। यह व्यथा पुरुषों की भांति स्त्रियों में भी पाई जाती है।

एन्ड्रोजन्स हारमोन की बहुलता से पुरुषोचित कामुकता विकसित होती है और कभी-कभी वह मर्यादाओं का अतिक्रमण भी करती देखी गई है। स्त्री प्रवृत्ति को उभारने में प्रोजेस्ट्रान हारमोन्स का हाथ है। वह अधिक हो तो कामुक चंचलता और अतृप्ति बनी रहती है। कम होने पर लज्जा, भय, उपेक्षा और खेद की प्रवृत्ति पाई जाती है।

इन दिनों इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है। पुरुष स्त्रियों का कामुक चिन्तन अधिक करते हैं और स्त्रियाँ पुरुषों सम्बन्धी चिन्तन में अधिक रुचि लेती हैं। इसका परिणाम सामान्यतः यह होता है कि स्वाभाविक प्रवृत्ति में अन्तर पड़ना आरम्भ हो जाता है। कड़ी मेहनत वाले खेलों में अधिक तत्परता दिखाने वाली युवतियों के चेहरे पर बाल उगने लगते हैं और आवाज पुरुषों जैसी भारी हो जाती है। अन्य महिला अवयवों में भी इस आधार पर अस्वाभाविकता आ जाती है। पुरुषों के चिन्तन पर यदि नारी अवयवों का आकर्षण छाया रहे तो वे भी विपरीत स्तर की प्रवृत्ति अपनाने लगते हैं।

लिंग परिवर्तन की घटनाएँ पूर्व काल में होती थीं या नहीं। इसका कोई निश्चित इतिहास नहीं है। मात्र इतनी ही जानकारी है कि पुरुषों में एक वर्ग “हिजड़ा” स्तर का होता है और वह नर या नारी में से किसी की भी भूमिका नहीं निभा सकता। पर अब जबकि चिकित्सा विज्ञान का अधिक विकास हुआ है और शल्य चिकित्सा अपने चमत्कार दिखाने लगी है तो पुरुष वर्ग में से बहुतों में स्त्री जननेन्द्रिय उभरने की सम्भावना क्रमशः तेजी से बढ़ रही है जबकि स्त्रियों के पुरुष बनने के अवसर कम मिलते हैं। उसमें शल्य क्रिया एक बार में ही पूरी नहीं हो जाती। वरन थोड़ा-थोड़ा करके उस प्रकरण को कई बार में निपटाना पड़ता है।

इस संदर्भ में व केवल प्रजनन संस्थान में पाये जाने वाले अवयवों को ही सारा श्रेय जाता है वरन् मस्तिष्क में विद्यमान पिटुटरी और पीनियल ग्रन्थियों की भी अपनी विशेष भूमिका है। वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षण उत्पन्न करती हैं। जिसमें पसीने की गंध साँस आदि में रहने वाले तत्वों का भी आकर्षण सम्मिलित है। इच्छित रंग रूप का भी। यदि यह मानसिक ग्रन्थियाँ पारस्परिक आकर्षण उत्पन्न न करें और अभीष्ट चुम्बकत्व उत्पन्न न करें तो यौनाचार भी शिथिल पड़ जाता है और सन्तानोत्पादन की सम्भावना भी घट जाती है।

दाम्पत्य जीवन की सफलता बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए घनिष्ठता उत्पन्न करें। इस प्रयास में प्रकृतिगत न्यूनाधिकता की पूर्ति भी सहज ही होने लगती है। ब्रह्मचर्य पालन में अकेली अन्य मनस्कता भी काम दे जाती है, उससे हारमोनों में उभार सहज ही शिथिल होने लगते हैं।


संगीत सृष्टि का भाव भरा उल्लास

संगीत में ध्वनि तरंगों के कितने ही मोड़-तोड़ और घुमाव ऐसे होते हैं जो उन्हें एक विशेष प्रकार के प्रवाह में निस्सृत करती हैं। ताल वाद्यों का भी क्रम साथ-साथ चलने पर अपने तरह के ‘‘रिद्म’’ बनते हैं। न केवल तरंग प्रवाह वरन् ‘‘रिद्म’’ क्रम का समावेश होने से ध्वनि तरंगों का एक ऐसा विशिष्ट उपक्रम बन पड़ता है जो न केवल चेतन वरन् जड़ को भी प्रभावित करता है।

लोहे के पुलों पर सैनिकों को कदम मिलाकर चलने की मनाही होती है। कारण कि उस संयुक्त ताल बद्धता में पुल के टूट गिरने का खतरा रहता है। इतना ही नहीं एक विशिष्ट प्रकार के रिद्मों में मकानों की छतों में लगे हुए लोहे के गर्डर टूट गिर सकते हैं। इसी प्रकार ताल या सप्त सुरों के अनुरूप उत्पन्न हुआ स्वर प्रवाह ही धातुओं, इमारतों तक को प्रवाहित करता है। इन उपक्रमों से जलाशय तक प्रभावित हो सकते हैं।

सचेतनों पर तो संगीत का जो प्रभाव पड़ता है उसका तो कहना ही क्या? वनस्पतियों पर उसका बहुत अच्छा प्रभाव पाया गया है। पौधे अधिक तेजी से बढ़ते हैं, और फसल का उत्पादन भी अधिक होता है। संगीत के रिकार्ड बजाकर कृषि और बागवानी दोनों पर ही उस प्रभाव का लाभ उठाया जा रहा है।

जल-जन्तुओं को स्तब्ध एवं आकर्षित करने की संगीत की क्षमता भी वैज्ञानिक कसौटियों पर कसी और खरी पाई गई है। मछलियाँ मोहित होकर भाग-दौड़ बन्द कर देती हैं और मछुओं के जाल में आसानी से फँस जाती हैं। मछलियों की प्रजनन शक्ति भी अधिक बढ़ जाती है। वे उन अण्डों में बर्बाद कम होती हैं और पकती अधिक हैं।

पक्षियों में यह प्रभाव मुर्गियों और कबूतरों पर जाँचा गया है। संगीत के शौकीन पक्षी उत्तेजित होते हैं। उनकी अभिवृद्धि और कुशलता में बढ़ोत्तरी होती है। वे अण्डे संख्या में और भार में अधिक होते हैं इसलिए उस वातावरण में पलने वाले पक्षी जहाँ जल्दी प्रौढ़ होते हैं वहाँ उनकी प्रजनन शक्ति भी बढ़ती है। बतखों पर भी यह प्रयोग सफल हुआ। उन्हें भी इस प्रभाव से प्रभावित होने का अवसर मिलता है।

पाश्चात्य देशों में गायों को दुहते समय उन्हें संगीत के रिकार्ड सुनाकर तन्मय किया जाता है। फलतः अधिक दूध मिलता है। भेड़ बकरियों के सम्बन्ध में भी यह बात है। मात्र भैंस ही ऐसा कम बुद्धि वाला जानवर है जिस पर संगीत का कम प्रभाव पड़ता है। विदेशों के चिड़ियाघरों में यह प्रयोग बहुत सफल रहा है कि उदास रहने वाले जानवरों को प्रसन्न रखने के लिए उन्हें समय-समय पर संगीत रिकार्ड सुनाये जाते रहें। हाथी, घोड़े जैसे बुद्धिमान समझे जाने वाले प्राणी इसमें बहुत रस लेते और खुश रहते हैं।

सपेरे बीन के आधार पर ही उनका तमाशा दिखाते हैं और इस आधार पर उन्हें बिलों से बाहर निकालकर पकड़ भी लेते हैं। हिरनों को वेणुवादन की कला से मुग्ध करके उन्हें पकड़ने की कला बहेलिये लोग जानते थे और जाल बिछाकर पकड़ने के आदी थे। जो इस कला को जानते थे वे इसी उपाय को अपनाने में सरलता अनुभव करते थे।

कहा तो यहाँ तक जाता है कि बुझे हुए दीपकों को जलाने में दीपक राग और बादलों को बरसाने में मेघ मल्हार बहुत हद तक सफल होता था। आज की परिस्थितियों में यह कहाँ तक सफल होगा, कहा नहीं जा सकता।

संगीत की उपयोगिता इसी हद तक सीमित नहीं है कि वह मनुष्यों के मनोरंजन के साथ-साथ भावना तरंगित करने का आनंदन भी देता है। वरन् इसमें भी है कि उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन पर रोग निवारण पर, अच्छा असर पड़ता है और उसे एक विशेष चिकित्सा पद्धति के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। उससे दुर्बलता सुधारने में और रोग कीटाणुओं को नष्ट करने में सहायता मिलती है। संगीत एक बलवर्धक टॉनिक भी है।

अनिद्रा दूर करने में संगीत उपचार बहुत कारगर सिद्ध हुआ है। बच्चों को सुलाने के लिए पुरातन काल की माताएँ लोरियाँ गाया करती थीं। अब उस झंझट से बचने के लिए हलके संगीत रिकार्ड लगा दिए जाते हैं। इतना ही नहीं, जिन वयस्कों को भी देर में नींद आती है उनके लिए बिना गीत का संगीत जिसमें ध्वनि तरंगें ही काम करती हों, एक उपयोगी सिद्ध हो रहा है। शिकागो के डाक्टर मैकमूलर ने तो मानसिक रोगों की चिकित्सा प्रक्रिया में संगीत का ही एक माध्यम बनाया और अच्छी ख्याति प्राप्त की है। डाक्टर ऐटकिसन का वह तरीका इस उपचार के सामने फीका पड़ गया है। जिसमें वे अनिद्रा के रोगियों को एक से दस तक गिनती-गिनने की पुनरावृत्ति करते हुए ऐसे रोगियों का उपचार किया करते थे। आध्यात्मिक चिकित्सा में राम या ॐ जैसा मानसिक जप करने पर भी जल्दी नींद आने की बात कही है। कुछ लोग पुस्तकें पढ़ते ही नींद आ धमकने की बात कहते हैं।

सर्दी या गर्मी का ऋतु प्रभाव बढ़ने पर कई प्रकार के रोग खड़े होते हैं। जाड़े के दिनों में खाँसी, जुकाम, दर्द, निमोनिया आदि की शिकायतें खड़ी होती हैं। गर्मी में लू मारना, भूख न लगना, शिर दर्द, अनिद्रा, जलन आदि की व्यथाएँ खड़ी होती हैं इनके लिए उन रोगों के अनुरूप ध्वनि तरंगों का प्रयोग वैज्ञानिकों ने किया है और उनका सत्परिणाम सामान्य दवा-दारु की अपेक्षा कम नहीं, अधिक प्रभावोत्पादक ही पाया है।

चित्त की एकाग्रता के लिए, भाव समाधि के लिए नाद ब्रह्म का उपाय सरलतम और नवीनतम उपचार है। प्राचीन काल के योगी जन अन्तरिक्षीय दिव्य ध्वनियों का सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय को जागृत करके सुना करते थे। अब वह कार्य स्थूल ध्वनि प्रवाहों में भी सम्भव हो गया है। इस प्रकार ध्यान धारणा के निमित्त अब कई विशिष्ट प्रकार के ध्वनि प्रवाहों का सफल प्रयोग किया जा सकता है। इसमें अपेक्षाकृत सरलता भी रहती है। यह नादब्रह्म की साधना है।

हर्षोल्लास के वातावरण को कई गुना बढ़ा देने की क्षमता संगीत में है। यही कारण है कि त्यौहारों, संस्कारों, पर्वों पर विशेष रूप से गीत वाद्यों का आयोजन किया जाता है। विवाह शादियों में महिलाएँ इसी प्रयोजन में विशेष रूप से दत्त-चित्त रहती हैं और अपनों तथा उपस्थित जनों का मन प्रफुल्लित करती हैं। पुरुष गायक भी अपने अनुभवों के आधार पर इस विद्या का अपने ढंग से उपयोग करते हैं और उल्लास की अभिवृद्धि में सहायक होते हैं।

कुछ पक्षी अपनी कर्णप्रिय मधुरता के लिए प्रख्यात हैं। कोयल की कूक, मोर का उद्घोष, भ्रमरों का गुँजन-सभी प्रसिद्ध हैं। झींगुर की झंकार ही नहीं, मेंढकों की टर्र-टर्र भी प्रकृति के अन्तराल को उत्तेजित करती है और श्रवण कर्ताओं का मन मोहती है। इस प्रकार के और भी अनेक पक्षी हैं, जिनके कलरव से सृष्टि के आनन्ददायक तत्वों का अभिवर्धन होता है। उससे सभी जड़ चेतन प्रभावित होते हैं।

वैज्ञानिकों के मतानुसार मानवी संरचना के निकटवर्ती प्राणियों में बन्दर, खरगोश प्रमुख हैं। चूहों की संरचना में ही मनुष्य संरचना से बहुत कुछ समानता मिलती है। इस आधार पर संगीत के प्रभाव को जाँचने के लिए उपरोक्त जंतुओं पर विशेष रूप से परीक्षण किये गये हैं। इन परीक्षण कर्ताओं में डा. जार्ज फैर विल्सन अग्रणी रहे हैं। उनके प्रकृति भेद से पृथक-पृथक संकेतों का प्रभाव जाँचा और कहा है कि यदि सही चुनाव बन पड़े तो यह प्राणी विभिन्न स्तर के लाभ संगीत द्वारा उठा सकते हैं। उनकी अभिवृद्धि और प्रसन्नता में निश्चित रूप से उत्साहवर्धक प्रभाव पड़ता है।

कई प्राणियों को कई संगीतों के प्रति 34 दिन के अभ्यास से इस प्रकार प्रशिक्षित किया जा सकता है कि उनकी प्रिय ध्वनि तरंगें निस्सृत हो जान पर वह भोजन की तलाश की बात को भी छोड़कर उस मधुर स्वर को सुनने के लिए अत्यन्त आतुर होते हैं। ध्वनि बन्द हो जाने पर अप्रसन्नता और खीज प्रकट करते हैं। देखा गया है कि प्राणी प्रायः उस स्वर को अधिक पसन्द करते हैं जो उनके अपने स्वर से मिलता-जुलता हो।

वनमानुष, चिंपेंजी, गोरिल्ला जाति के बन्दर मनुष्य जैसे स्वभावों के अभ्यस्त होते हैं। उन्हें प्रिय संगीत सुनाकर उत्साहित किया जा सकता है। उस वर्ण के प्राणियों को वंशी और वायलिन का स्वर अन्य वाद्य यन्त्रों की तुलना में अधिक पसन्द आता है।

दरियाई घोड़ा और गेंडा अपनी गहरी नींद के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हें बेचैन करने वाली भूख ही नींद से उठा सकती है। उनके जगाने में संगीत का बहुत अच्छा प्रभाव होता देखा गया है। वे सुनते ही चौकन्ने हो जाते हैं और इधर-उधर भागने की अपेक्षा अपने स्थान पर बैठे-बैठे तब तक संगीत सुनते रहते हैं जब तक कि वह बन्द नहीं हो जाता। सरोद वादन पर तो उन्हें मुँह बांये झूमता हुआ देखा गया है। हाथी घोड़ों को वाद्य यन्त्रों की ध्वनि पर नाचता देखा गया है। रीछ बन्दर भी इसी का अनुसरण करते हैं। वन बिलावों को पाइप बैण्ड अन्य वादनों की अपेक्षा अधिक उत्साह प्रदान करते देखा गया है। मगर घड़ियालों को भी संगीत सुनने का डडडड चस्का पड़ जाता है, तब वे भी लहराने लगते हैं और अपनी अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। इसी प्रकार कुत्तों और लोमड़ियों को भी प्रभावित होते देखा गया है।

विचारणीय है कि जब सामान्य पशु-पक्षी, साँप, बिच्छू तक संगीत से प्रभावित होते हैं तो उसका प्रभाव मनुष्य जैसे भावनाशील प्राणी पर क्यों न पड़ेगा। यह प्रभाव प्रायः उपयोगी ही सिद्ध होता है।

संगीत उच्चकोटि की कला है। उसमें उत्साह और उल्लास बढ़ाने वाले तत्व बड़ी मात्रा में हैं। संगीत बदनाम तो इसलिए हुआ है कि उसके साथ अश्लीलता जुड़ती चली गई और वह बुराई बढ़ते-बढ़ते इस हद तक पहुँची कि कामुकता और संगीत कला एक दूसरे के साथ बुरी तरह गुंथ गई। दूध में मक्खी पड़ जाने पर वह पूरा लोटा भर दुग्ध खराब हो जाता है। संगीत की भी इन दिनों ऐसी ही दुर्गति हुई है और उसे मनचलों का व्यसन माना जाने लगा है।


असाधारण सुन्दर (kahani)

एक गरीब घर की लड़की थी, असाधारण सुन्दर। उस देश का राजकुमार उस पर मोहित हो गया। प्रणय निवेदन करने लगा। लड़की सहमत न थी।

जब लड़की के पिता पर बहुत दबाव पड़ने लगा और न मानने पर संकट दिखने लगा तो लड़की ने स्वयं ही राजकुमार के विचार बदल देने का जिम्मा लिया।

उस बार राजकुमार आया तो उसने एक सप्ताह बाद आने का निमन्त्रण दिया।

इस बार उसने दस्तों की दवा लेनी आरम्भ कर दी। मल को एक घड़े में भरती चली गई। एक सप्ताह में हड्डियों का ढाँचा भर रह गई।

राजकुमार आया। देखा तो लड़की अस्थि पंजर मात्र थी। सारा रूप यौवन हवा में उड़ गया था। आश्चर्य से उसने पूछा- यह क्या हुआ?

लड़की ने उंगली का इशारा करके घड़ा बताया और कहा- रूप यौवन उसमें कैद है। चारपाई पर मेरा असली रूप पड़ा है।

राजकुमार ने घड़े को उघाड़ कर देखा उसमें एक सप्ताह से जमा किया हुआ मल-मूत्र भरा था।

राजकुमार को समझने में देर न लगी कि जो चमकता था, वह यही घिनौना जंजाल था। कुरूप अस्थि पिंजर चारपाई पर पड़ा है। उसने रूपासक्ति छोड़ दी और लड़की को गुरु मान कर नमन करता हुआ वापस चला गया।


आइन्स्टीन जा समय से पहले ही चले गये

विज्ञान की कोई महत्वपूर्ण शाखा ऐसी नहीं थी जिसे अलबर्ट आइन्स्टीन ने प्रभावित न किया हो और उसमें ऐसे परिशिष्ट न जोड़े हों जिनके कारण पूर्व मान्यताओं की अपूर्णता दूर हो सके।

सापेक्षवाद उनकी विशेष देन है। अणु विज्ञान को अणु आयुध बनाने तक की स्थिति तक पहुँचाने का श्रेय उन्हीं को है। उसी जानकारी के आधार पर अमेरिका वह अणुबम बना सका जो जापान के नागाशाकी और हिरोशिमा नगरों पर गिराये गये और भारी पर संहार का कारण बने।

आइन्स्टीन नहीं चाहते थे कि विज्ञान को रचनात्मक कार्यों से हटाकर ऐसे विनाशकारी कामों में प्रयोग हो। प्रेसीडेन्ट रूजवेल्ट के इस आश्वासन पर ही अमेरिका की अणु प्रयोगशाला आइन्स्टीन के तत्वावधान में बन सकी।

जब जापान पर अप्रत्याशित रूप से अणु बम गिराये गये तो समाचार पाते ही वे दिन भर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोते रहे और हत्याकाण्ड का अपराधी अपने को कहते रहे। विज्ञान के आविष्कार करने वालों का उसके प्रयोग में कोई हस्तक्षेप न हो यह बात उन्हें बहुत ही बुरी लगी। राष्ट्र नेताओं के इस कृत्य के लिए जापान के मूर्धन्य विज्ञानी हिदेकी यूकावा से उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों और रूंधे गले से क्षमा माँगी।

इसके बाद उनका रुख ही बदल गया। वे इस प्रकार के आक्रमणों का आजीवन विरोध करते रहे। मैकार्थीवाद की उनने कटु आलोचना की। दार्शनिक और विज्ञान क्षेत्र के मूर्धन्य वर्ट्रेण्डरसेल के स्वर में स्वर मिलाकर उनके ऐसे हथियारों पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने के लिए आवाज ऊँची की।

इसके बाद आइन्स्टीन का वैज्ञानिक इस प्रकार मर गया जैसे जापान वाले बम उन्हीं पर गिरे हों। जीवन के अन्तिम दिनों में वे छोटे बच्चों के गणित का हल सरल करते में अपनी बुद्धि का उपयोग करने लगे थे। अपने ढीले ढाले कपड़े पहन कर समय काटने के लिए नौका विहार पर निकल जाते थे। कभी-कभी वायलिन पर मौजार्ट की ध्वनि बजाकर अपने भारी मन को हलका कर लिया करते थे।

आइन्स्टीन जिन दिनों परमाणु शक्ति के अन्वेषण में व्यस्त थे। उन दिनों कई मित्र अपना परिचय नोट कराने के लिए आग्रह किया करते थे।

इस पर एक दिन उनने चुटकी लेते हुए कहा- ‘‘यदि मेरे प्रतिपादन और अन्वेषण सही सिद्ध हुआ तो जर्मनी मुझे महान जर्मनवासी कहकर अभिनन्दन करेगा और फ्राँस वाले मुझे महान फ्राँसीसी कहेंगे। लेकिन यदि मेरी खोज गलत निकली तो मुझे दोनों में से एक भी अपना न कहकर एक पागल यहूदी ठहरायेंगे।”

सन् 1952 में इसराइल के अध्यक्ष वेजमेन की मृत्यु पर इसराइल सरकार उन्हें अध्यक्ष बनाना चाहती थी। इस पर अस्वीकृति का उत्तर लिखते हुए आइन्स्टीन ने कहा-जन सेवा एवं राजनीति के क्षेत्र में मैं सर्वथा अनुभवहीन हूँ। अतएव इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने में मैं अपने को सर्वथा अयोग्य मानता हूँ।

उनके सम्बन्ध में संसार के मूर्धन्य व्यक्तियों ने असाधारण अभिमत व्यक्त किये हैं। एडिंगटन यही कहते रहे-उनकी शानी का दूसरा व्यक्ति मैं नहीं जानता। रिचर्ड कामन्श ने कहा- ‘मैं समझा नहीं पाया कि ऐसी अद्भुत और इतनी सही कल्पनाएँ उनके मस्तिष्क में कैसे उठती रहीं।’ आस्तिक विज्ञानियों ने भी उनके विचारों से अपनी मान्यताओं को बहुत कुछ सुधारा और बढ़ाया।

मौत उनकी समय से पूर्व आ गई। शरीर और मन की स्थिति ऐसी नहीं थी जिसमें वे जीने से और विज्ञान की अधिक सेवा करने से इन्कार कर रहे हों। पर परिस्थितियों ने उन्हें भीतर से तोड़कर रख दिया था। अन्तिम दिनों में बच्चों की तरह किसी प्रकार मन बहलाने में दिन बिताने लगे थे।


कामक्षरण को रोकें उसे सही दिशा दें।

पृथ्वी के दो ध्रुव हैं- एक उत्तरी, दूसरा दक्षिणी। शरीर के भी दो महान शक्ति केन्द्र हैं। एक मस्तिष्क में अवस्थित सहस्रार चक्र-ब्रह्मरंध्र, जिसमें मन-बुद्धि-चित्त सुबोध का अन्तःकरण चतुष्टय निवास करता है। दक्षिणी ध्रुव जिसे मूलाधार चक्र कहते हैं, जननेन्द्रिय मूल में है। इन दिनों की समर्थताओं के बलबूते ही मनुष्य समुन्नत स्तर का बनता है। ब्रह्मरंध्र में बुद्धिमत्ता से लेकर ब्रह्मचेतना भरी पड़ी है। इसी को कैलाश, मानसरोवर कहते हैं। यही क्षीरसागर में शेषशायी विष्णु का निवास है। जननेन्द्रिय मूल के गह्वर में महाकाली कुण्डलिनी शक्ति का निवास है। इसे साहस का केन्द्र कहते हैं और वंशवृद्धि के तत्व भी इसी क्षेत्र में सन्निहित हैं। मस्तिष्कीय प्रसन्नता का अपना आनन्द है और काम चेतना का अपना उत्साह।

इन दोनों शक्ति भण्डारों को भगवान ने इसलिए प्रदान किया है कि उनके माध्यम से जीवन का सफल बनाने वाले एक-से-एक बढ़े-चढ़े कार्य सम्पन्न किये जा सकें। मस्तिष्कीय ब्रह्मरंध्र मनुष्य को विद्वान, बुद्धिमान, प्रज्ञावान, दूरदर्शी, दिव्यदर्शी आदि बनाता है। परमात्मा से साक्षात्कार करने से लेकर स्वर्ग-मुक्ति, ऋद्धि-सिद्धि आदि का यह उद्गम केन्द्र है। साँसारिक सूझ-बूझ एवं योजनायें भी इसी केन्द्र में उद्भूत होती हैं। मूलाधार चक्र में उत्साह और साहस के भण्डार भरे पड़े हैं। उनके सहारे कठिन दिखने वाले पराक्रम और पुरुषार्थ उपलब्ध होते हैं और साधारण दिखने वाला व्यक्ति भी असाधारण सफलता उपलब्ध करता है। इन्हें सुरक्षित रखा जाय, इस दृष्टि से भगवान ने इन्हें गोपनीय तिजोरियों में बन्द करके रखा है। मस्तिष्क खोपड़ी के सुदृढ़ कवच के भीतर अवस्थित है। जननेन्द्रिय क्षेत्र भी बालों से, वस्त्रों से इस प्रकार ढका रहता है कि साधारणतया किसी की दृष्टि उस पर न पड़े। यह सुरक्षा प्रबन्ध इसलिए है कि किसी प्रकार इन अनावश्यक क्षति न पहुँचे।

किन्तु मनुष्य की बुद्धिमत्ता को परखने की दृष्टि से सृष्टा ने इन दोनों केन्द्रों में ऐसी कुलबुलाहट उत्पन्न की है कि वे वयस्क होते ही उत्तेजित हो उठते हैं और उस दिव्य सामर्थ्य का अपव्यय काम-क्रीड़ा में करने लगते हैं। इसका परिणाम व्यक्तित्व को प्रतिभावान बनाने वाली प्राण चेतना के अनावश्यक क्षरण रूप में ही दृष्टिगोचर होता है और जो विवेकपूर्वक इन्द्रियनिग्रह का संयम बरतने नहीं पाते, वे थोड़े ही दिनों में खोखले हो जाते हैं। ऐसी दशा में ज्यों-त्यों जीवन की गाड़ी खींचते रहते हैं। कोई महत्वपूर्ण सफलता हस्तगत नहीं कर पाते। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही शास्त्रकारों ने ब्रह्मचर्य को सिद्धि दाता तप कहा है और यथासम्भव काम-क्रीड़ा से बचने का परामर्श दिया है।

विवाह का तात्पर्य दाम्पत्य जीवन की सार्वजनिक घोषणा और एक-दूसरे के चरित्र की रक्षा-विशेषताओं का मिलजुलकर रचनात्मक दिशा में सदुपयोग करना है। जो लोग इस प्रकार का जीवन बिता पाते हैं, वे परस्पर एक-दूसरे का हृदय जीतते, गहरा स्नेह-सद्भाव अर्जित करते हैं। काम वासना की पूर्ति भी दाम्पत्य जीवन में होती रहती है, पर उसमें दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने की महती आवश्यकता रहती है। इस संदर्भ में हम दूसरे प्राणियों को मिलने वाले प्रकृति प्रेरणा से बहुत कुछ शिक्षण ग्रहण कर सकते हैं। मादा जब गर्भ धारण की स्थिति में होती है, वैसी आवश्यकता अनुभव करती है तो नर को उत्तेजना प्रदान करती है। गर्भधारण होते ही दोनों पक्ष उस ओर से अपना मन सिकोड़ लेते हैं। पक्षी आमतौर से जोड़ा बनाकर रहते हैं, पर उनमें से कोई भी कुसमय की छेड़छाड़ नहीं करता। गाय, भैंस, भेड़, बकरी झुण्ड में चरती हैं। उनमें सभी मादाएँ नहीं होती कुछ नर भी होते हैं, पर गर्भधारण की प्राकृतिक उत्तेजना के बिना कोई किसी को हैरान नहीं करते। इसी में मर्यादा पालन भी है और शारीरिक मानसिक सुरक्षा भी।

आज के प्रचलनों में यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि नारी को वयस्क होते ही, उसे नर द्वारा कुदृष्टि से देखने का सिलसिला चल पड़ता है और उसकी परिणति बहुत बार काम सेवन के रूप में भी होती है। जहाँ तक कि उस प्रसंग में सभी नीति-नियमों का उल्लंघन अतिक्रमण आरम्भ हो जाता है। फलतः कुछ ही दिनों में दोनों पक्षों की जननेंद्रियां रोगग्रस्त हो जाती हैं। पुरुषों को प्रमेह, स्वप्नदोष, शीघ्र पतन, नपुँसकता आदि रोग घेर लेते हैं और स्त्रियों को प्रदर, रक्त प्रदर, जलन, खुजली, फुन्सी जैसे रोग घेरने लगते हैं, बहुमूत्र की व्यथा लग जाती है। ऐसे-ऐसे अनेकों रोग अमर्यादित मैथुन का दुष्परिणाम है।

प्रकृति ने नर नारी दोनों की विशेषतया नारी की जननेंद्रिय को इस प्रकार सृजा है कि जब प्रजनन की उत्कृष्ट अभिलाषा हो तभी उस अवयव पर दबाव पड़े, अन्यथा अनावश्यक घर्षण और क्षरण शरीर की बहुमूल्य धातुओं की बर्बादी आरम्भ कर देता है।

कुण्डलिनी गह्वर-जननेन्द्रिय मूल में समाहित शक्ति भण्डार को ऊर्ध्वरेता होना चाहिए, ताकि उस स्नेह के पोषण से बुद्धिमत्ता का दीपक प्रदीप्त रह सके। जो इस तथ्य की उपेक्षा करते व काम-सेवन में अतिवाद बरतते हैं, वे अपनी मेधा, समर्थता और स्वास्थ्य सन्तुलन को बेहिसाब गँवाते हैं। यह सौदा बहुत महंगा पड़ता है। कहते हैं कि कुत्ता सूखी हड्डी चबाने लगता है, तो उसके जबड़े छिल जाते हैं और खून निकलने लगता है। उसका स्वाद उसे ऐसा प्रतीत होता है, मानो यह रक्त सूखी हुई हड्डी का स्वयं हो। वस्तुतः होता यह है कि काम सेवन में अपनी समर्थता को बारूद की तरह जलाया जाता है और उस फुलझड़ी से छूटती चिनगारियों को देखकर मोद मनाया जाता है।

काम सेवन की तरह काम चिन्तन भी कम भयानक नहीं है। मस्तिष्क में जिस स्तर के विचार आते हैं उसी स्तर की क्रिया के निमित्त मन मचलने लगता है और इस आतुरता की पूर्ति के लिए सही गलत अनेक उपाय सूझते हैं। कई बार तो उसके लिए कोई न कोई तरकीब भी ढूंढ़ निकाली जाती है। इसीलिए भारतीय मनोविज्ञान वेत्ताओं ने परामर्श दिया है कि काम चिन्तन पर नियन्त्रण किया जा सके, तो काम सेवन की प्रक्रिया फिर कुछ भी कठिन न रह जायेगी।

यह स्मरण रखने योग्य है कि दाम्पत्य जीवन का उद्देश्य घर परिवार की व्यवस्था बनाने से लेकर परस्पर एक-दूसरे की प्रगति में सहायता करना है। जिसकी योग्यता बढ़ी-चढ़ी है, वही अपने साथी की सहायता भी अधिक कर सकता है। फिर मित्रता के साथ यह परम पवित्र कर्त्तव्य भी जुड़ा हुआ है कि एक-दूसरे की सुविधाओं की देखभाल ही न करें, वरन् योग्यता भी बढ़ायें। इसके लिए स्वयं भी प्रयत्न परामर्श करना पड़ता है। एकान्त का बचा हुआ समय समुन्नत जीवन की रूपरेखा बनाने की अपेक्षा यदि काम-कौतुक में ही वह संयम खर्च करते रहा जाय, तो दो कार्य एक साथ कैसे बन पड़ेंगे?

सृष्टि के सभी प्राणी नया गर्भ धारण तब करते हैं, जब पिछला बच्चा बहुत हद तक स्वावलम्बी हो जाय। मनुष्य ही है जो इस मर्यादा का अतिक्रमण करता है और पिछला बच्चा समर्थ होने से पूर्व ही नयी जिम्मेदारी उठाने के लिए आतुर होने लगता है। बहुप्रजनन ही दृष्टि से अनर्थकारी है। इससे जननी का स्वास्थ्य बर्बाद होता है। पिता पर आर्थिक भार पढ़ता है। बच्चों का लालन-पालन सही रीति से नहीं हो पाता और समाज की प्रगति योजनाओं का सर्वनाश होता है। इतना उत्पादन नहीं बढ़ रहा है जितनी तेजी से बच्चे पैदा हो रहे हैं काम सेवन में मर्यादा न रखने के फलस्वरूप अधिक बच्चे पैदा होते हैं और उन सभी को न माता-पिता का उचित स्नेह संरक्षण मिल पाता है और न उनकी प्रगति के लिए आवश्यक साधन जुटाना बन पड़ता है।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चतुर्वर्ग में जहाँ ‘काम’ शब्द का उपयोग हुआ है, वहाँ उसका अर्थ हास-परिहास, क्रीड़ा-विनोद मात्र है। यौनाचार की खुली छूट नहीं। इस संदर्भ में जितना संयम बरता जा सके, उतना ही उत्तम है। इसमें अपना ही नहीं साथी का भी शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य सही रहता है। जो इसका ध्यान रखते हैं, उन्हें सच्चा मित्र भी कह सकते हैं और साथ ही हित चिन्तक भी।

नारी को कामिनी, रमणी, वेश्या के रूप में चित्रित करने में ओछे साहित्यकारों, कवियों, गायकों, चित्रकारों की पूरी भूमिका रहती है। रीतिकाल के कवियों ने नारी के कामोत्तेजक पक्ष को ही उभारा है। नृत्य, अभिनय आदि भी इसी कुत्सा तक केन्द्रित हो गये हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि भावनात्मक शालीनता हम बुरी तरह गंवा बैठे और मानवी उत्कृष्टता को परित्याग कर उन पशुओं की बिरादरी में सम्मिलित हो गये, जिनमें काम सेवन के लिए बहिन, पुत्री, माँ आदि के लिए भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। जिस उच्छृंखलता के साथ यह दुष्प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि हम शील का परित्याग करके नरपशु बनते जा रहे हैं।

नीति और औचित्य का भावना स्तर यह बताता है कि नर-नारी के बीच भाई-भाई जैसा, बहिन-बहिन जैसा व्यवहार होना चाहिए। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की माँग है कि अश्लीलता को उत्तेजित करना एक दण्डनीय अपराध माना जाय। अश्लीलता का दृष्टिकोण समाज क्षेत्र में प्रगति का सबसे बड़ा व्यवधान है, क्योंकि वह नारी की योग्यता एवं क्षमता को प्रतिबन्धित रखता है। नर और नारी सर्वथा अलग रहें, तो फिर बात वहाँ से शुरू करनी चाहिए कि लड़के माता का दूध न पियें। बहिन भाई एक घर में न रहें। इतने पतित समाज में पूरी अराजकता फैलेगी और सर्वनाश होगा। यह उसी की शुरुआत है कि नारी कि दृष्टि से नर को और नर की दृष्टि से नारी को सर्वथा पृथक रखने और मिल-जुलकर काम करने को अविश्वास की दृष्टि से देखा जाय। ऐसी व्यवस्था बनाने में तो हजार प्रकार की हानियाँ हैं। उचित इतना ही है कि दृष्टिकोण में परिवर्तन किया जाय। नारी को माता का, बहिन का, पुत्री का सम्मान दिया जाय और पत्नी को भी धर्मपत्नी, गृहलक्ष्मी दृष्टि से देखते हुए समान सम्मान, समान सहयोग एवं समान अधिकार देने का मानवोचित्त दृष्टिकोण अपनाया जाय। स्मरण रहे, वर्तमान प्रचलन जिसमें नारी मात्र के प्रति अश्लील कामुकता की दृष्टि से देखा जाता है, अत्यन्त हेय है। भगवान शंकर ने ऐसे ही उद्दण्ड कामदेव का नाश तीसरा नेत्र खोलकर किया था। हमें शिव-पार्वती, विष्णु-लक्ष्मी, राम-सीता के उच्च आदर्शों को समझने और अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। इसी में कल्याण है।

शास्त्रकार का यह कथन शत-प्रतिशत सही है कि “मरणं बिंदु पातेन जीवनं बिन्दु धारणात्” मर्यादा भंग के कारण बढ़ते हुए व्यभिचार ने ऐसे अनेकों रोगों को इन्हीं दिनों जन्म दिया है, जिनके कारण मनुष्य को आज नारकीय सड़न में सड़ते हुए मरना पड़ रहा है। अच्छा हो मनुष्य काम सेवन की मर्यादा समझे एवं ऊर्ध्व रेता बनकर अपनी शक्ति उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लगाये।


अण्डे बहा ले गया (kahani)

समुद्र टिटहरी के अण्डे बहा ले गया। अनुरोध करने पर भी वापस करने को तैयार न हुआ। टिटहरी चोंच में बालू भर-भर कर समुद्र में डालने लगी। अगस्त ऋषि यह दृश्य देख रहे थे। कारण पूछने पर उसने ऋषि को सारी बात बता दी। और कहा अण्डा मिलने या जीवन जाने तक मेरा प्रयास चलता रहेगा।

ऐसे संकल्पवान की सहायता करने का अगस्त का मन हुआ। उनने तीन चुल्लू में समुद्र पी लिया। घबराकर उसने अण्डे वापस कर दिये। तब उसे त्राण मिला। संकल्पवान, साहसी और कर्मठ आदर्शवादियों को सहयोगियों की कमी नहीं रहती।


जैसा अन्न जल खाइये, तैसा ही मन होय

लोग जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं, यह एक तथ्य है। जिनके मन में बुरे विचार घूमते रहते हैं वे देर-सबेर में छोटे या बड़े दुष्कर्म कर ही बैठते हैं। कर्म का पहला रूप विचार ही है। कौन क्या करने जा रहा है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि कौन क्या सोचता है। उसके मस्तिष्क में कैसे विचार घूम रहे हैं।

कोई काम अनायास नहीं होता बहुत पहले से उसकी भूमिका पक जाती है तो चूजे की तरह विचार के अण्डे में से फूट पड़ती है।

इन दिनों कोई क्या सोचता रहता है इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले दिनों क्या करके रहेगा, क्या करने जा रहा है।

विचारों का खुराक से सीधा सम्बन्ध है। जो तामसिक भोजन करता है उसकी विचार श्रृंखला भी वैसी ही बन जायेगी। सात्विक आहार सात्विक विचार करने की पृष्ठ भूमि बनाता है। मद्य माँस खाने पीने वाले धीरे-धीरे निष्ठुरता के विचार अपनाने लगते हैं। नशा पीने वाले विवेक खो बैठते हैं, दूरदर्शिता उनके हाथ से चली जाती है। इसके विपरीत जो सात्विक आहार करते हैं उनके शरीर पर निरोगता दृष्टिगोचर होती रहेगी साथ ही उत्तम विचारों की भी छत्र छाया बनी रही है, रहेगी।

अपना भावी जीवन किसी को कैसा बनाना है इसके उसे उसी स्तर का साहित्य पढ़ना चाहिए और वैसी ही मंडली में बैठना चाहिए जो उसी तरह की चर्चा किया करती हो। साहित्य मात्र समय काटने के लिए मनोरंजन के लिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए वरन् यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि विचार धारा की डोलची में पढ़े हुए साहित्य का निश्चित रूप में असर पड़ेगा। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक विचार को दूसरे विचार से काटने के लिए प्रतिपक्षी विचार बढ़ाते रहा जाय, पर स्मरण रहे कुविचारों की शक्ति आफत लाती है। गिरावट की ओर व्यक्ति जल्दी गिरता है और तेजी से भी। इसलिए अच्छे और बुरे विचार साथ-साथ पढ़ते रहा जाय तो बुरे विचार अपना असर जल्दी डालेंगे और ज्यादा भी। अच्छे विचार धीमे और देर में अपना असर डालते हैं। यही बात संगति के संबंध में भी है। बुरे और अच्छे दोनों तरह के लोगों के साथ मिलना बैठना जारी रखा जाय तो असर बुरों का जल्दी और ज्यादा पड़ेगा।

इसी सिलसिले में आहार को भी एक महत्वपूर्ण इकाई मानना चाहिए। मिर्च मसालों से भरे हुए चिकनाई, तेल, घी में भुने हुए पकवान खाने की आदत मनुष्य का चित्त चंचल बनाती है। स्वभाव में, विचारों पर भोजन अपना असर डालता है। स्वाध्याय और सत्संग से भी बढ़कर भोजन का नम्बर है। अभक्ष्य खाने के उपरान्त पेट और मस्तिष्क के रोगों पर उसकी प्रतिक्रिया होती है। उदाहरणार्थ- नशा पीकर देखा जाय। पेट की स्थिति असामान्य हो जायेगी। कम खाने को जी करेगा या ज्यादा खाने को। स्वाभाविक भूख में व्यतिरेक उत्पन्न हो जायेगा। इसी प्रकार विचार पद्धति भी विकृत हो जायेगी। क्रोध उबलेगा, काम वासना के लिए असाधारण रूप से जी मचलेगा। अपने पन के बारे में असाधारण दबंग होने का भाव होगा या फिर ऐसा लगेगा कि अपंगा दीनहीन जैसी स्थिति हो गई। सब कुछ छिन गया या बहुत कुछ अपने पल्ले आ गया। यह नशे की बात हुई। अन्य आहार भी अपना-अपना असर दिखाते हैं। फल, शाक जैसे आहार सात्विक विचार लाते हैं।

दलिया, खिचड़ी, दही जैसे सतोगुणी पदार्थ सीमित मात्रा में खाने के उपरान्त सदाचार, परोपकार, संतुलित जीवनचर्या अपनाने की इच्छा उठती है। पकवान मिष्ठान खाने के उपरान्त स्वार्थ भावना तीव्र होती है और बड़े आदमी बनने की उमंगें उठती हैं। आहार का विचारों के साथ एक सुनिश्चित संबंध जुड़ा हुआ है।


ज्योतिर्विद्या की समुचित जानकारी जन जन तक पहुंचे

ज्योतिष का अर्थ है- अन्तरिक्षीय बोधगम्य प्रकाश। यह वेदज्ञान के छः अंगों में से एक महत्वपूर्ण अंग है। सौर मण्डल के नवग्रहों और ब्रह्मांडव्यापी सत्ताईस नक्षत्रों का अपनी इस पृथ्वी पर असाधारण प्रभाव पड़ता है, अन्यथा यह लाभ न मिलने पर उसकी स्थिति भी सौर मण्डल के अन्य ग्रहों, उपग्रहों की तरह निर्जीव पिण्ड जैसी रही होती।

पृथ्वी पर कब किस ग्रह नक्षत्र का कितना प्रभाव एवं दबाव पड़ेगा? कब कौन ग्रह नक्षत्र, कितनी दूरी पर किस स्थिति में रह रहा होगा और उसका प्रभाव अन्न, जल, वायु, वनस्पति, प्राणि जगत पर क्या पड़ रहा होगा, इस विज्ञान की जानकारी हम ज्योतिष शास्त्र के आधार पर ही जान सकते हैं। ऋतु परिवर्तन, वर्षा, दुर्भिक्ष, भूकम्प, तूफान, महामारी जैसे मनुष्य जाति पर पड़ने वाले अतिशय महत्वपूर्ण प्रभावों की जानकारी हम इस आधार पर पा सकते हैं और प्रतिकूलताओं से बचने तथा अनुकूलताओं से लाभ उठाने की स्थिति में हो सकते हैं।

जन्मकाल में बालक अत्यन्त कोमल स्थिति में होता है। उस पर सौरमंडलीय परिस्थितियों का संग्राहक प्रभाव पड़ता है। उस आधार पर व्यक्ति की अभिरुचि, प्रतिभा, व्यक्तित्व सम्भावना आदि का बहुत कुछ पता चलता है और भी ऐसी रहस्यमयी बातें है, जिनका मनुष्य जीवन के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसी विद्या की सही जानकारी होने पर व्यक्ति अपने क्रिया-कलापों का अदृश्य अंतरिक्ष के साथ तालमेल बिठा सकता है। इसीलिए इस विज्ञान को वेदांग के छः विभागों में से एक माना गया है।

किन्तु कठिनाई यह है कि ग्रहों का सूक्ष्म गणित करने में समयानुसार जो अन्तर पड़ता रहता है उसको समय-समय पर सही करते रहने की व्यवस्था इन दिनों नहीं रही। पृथ्वी पूरे चौबीस घण्टे में अपनी धुरी पर नहीं घूमती, उसमें कुछ सेकेंडों का अन्तर रहता है। इस प्रकार वह 365 दिन में नहीं 366.20 में अपना वर्ष चक्र पूरा करती है। पृथ्वी की एक और विशेषता है कि वह अपनी सीधी चाल नहीं दौड़ती, वरन् कुदकती-फुदकती, लहराती हुई, थरथराती, नाचती कूदती हुई परिक्रमा पथ पर चलती है। इसलिए उसकी कक्षा में भी अन्तर पड़ जाता है। सूर्य और चन्द्रमा की गति के बारे में भी यही बात है। सूर्य क्रमशः ठण्डा पड़ता जाता है। बीच-बीच में भयंकर सौर ज्वालायें उठती रहती हैं। चन्द्रमा पृथ्वी से दूर हटता रहता है। इसलिए न केवल उसका आकार घटता रहता है। वरन् उसके प्रभाव से समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटे भी हल्के पड़ते जाते हैं। सौर मण्डल के अन्य ग्रहों की चाल और कक्षा का जो हिसाब लगाया गया है वह पूर्ण शुद्ध नहीं है। उसमें पंचाँग निर्माण की विधि के अनुसार सब कुछ पूर्णतया सही नहीं बैठता। कुछ समय उपरांत उसमें अन्तर पड़ता जाता है जिसे दृश्य गणित के आधार पर आंखों या उपकरणों की सहायता से सही करते रहने की आवश्यकता पड़ती है। इस विधि को दृश्य गणित कहते हैं।

भारतीय ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर जो वेधशालायें अति पुरातन काल में बनी थीं, वह कालचक्र में अन्तर आने पर नये सिरे से विनिर्मित करनी पड़ीं। जयपुर के महाराज ने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा, वाराणसी में पाँच वेधशालायें बनवाई थीं। देश में अनेकों सूर्य मन्दिर थे, उनके निर्माण में भी वेधशालाओं की विशेषता थी। कोणार्क का सूर्य मन्दिर इसी प्रयोजन के लिए काम आता था। शाम्बपुरी एवं उदयगिरि की वेधशालायें भी प्रसिद्ध थीं। कुतुब मीनार का दिल्ली में निर्माण विशुद्ध वेधशाला के रूप में हुआ था। उसकी सात मंजिल सात ग्रहों का और 27 खिड़कियां 27 नक्षत्रों का वेध देखने के लिए हैं। पृथ्वी कुछ झुकी हुई है, इसी हिसाब से कुतुब मीनार का ऊपरी भाग भी 5 अंश झुका हुआ बताया गया है। निर्माण की गलती समझकर अँग्रेजों ने ऊपर का भाग तुड़वा दिया और अब अधूरी मीनार ही अवशेष रूप में है। 21 जून की मध्याह्न में उसकी छाया जमीन पर नहीं पड़ती।

मिश्र के पिरामिडों की संरचना भी इसी निमित्त हुई है। उनकी लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई इस क्रम से रखी गई है कि पृथ्वी और सूर्य की दूरी नापी जा सके। पृथ्वी का केन्द्र जहाँ पड़ता है, उस स्थान पर उनकी रचना हुई है। स्काटलैण्ड से वारमूडा क्षेत्र तक विशालकाय पत्थरों की संरचना भी ऐसी है, जो सूर्य और पृथ्वी के बीच पड़ने वाले अन्तर का बोध कराती है। मैक्सिको में, चीन तथा अरब देखो में भी ऐसे अवशेष पाये गये हैं जो विश्वभर में ज्योतिष का ज्ञान होने तथा सामयिक अन्तरों की जाँच-पड़ताल आवश्यक समझकर समय-समय पर वहाँ बनाये गये हैं। इसके माध्यम से दृश्य गणित के आधार पर पृथ्वी और ग्रहों के बीच पड़ते रहने वाले अन्तरों को जाना जाता था और पिछले निर्धारणों को शुद्ध किया जाता था।

अपनी पृथ्वी का व्यास 13 हजार किलोमीटर है। उसका 71 प्रतिशत भाग समुद्र में डूबा हुआ है और 29 प्रतिशत भूमि है। समुद्र की गहराई भी आश्चर्यजनक है। उसमें प्रशांत महासागर 14050 फुट गहरा है। सबसे उथला आर्कटिक सागर है, जिसकी गहराई 4200 फुट है समुद्रों में बड़े-बड़े पर्वत भी हैं।

अपनी पृथ्वी का वजन 66,00,000,000,000 खरब टन है। वह 30 किलोमीटर प्रति सेकेंड की उड़ान भरती हुई 3650,20 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा करती है। पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव 14 हजार फुट गहरा और दक्षिणी ध्रुव 19 हजार फुट ऊँचा है। उत्तरी ध्रुव पर पौधों, मनुष्य तथा पशुओं का अस्तित्व है, दक्षिणी ध्रुव पर मात्र पेन्गुइन पक्षी तथा एक प्रकार का मच्छर पाया जाता है। दोनों उड़ नहीं सकते।

अंतर्ग्रही तरंगें पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर आती है। जो उनमें से उपयोगी होती हैं, उन्हें पृथ्वी रोक लेती है और जो बेकार होती हैं उन्हें दक्षिणी ध्रुव के रास्ते निकाल बाहर करती हैं। पृथ्वी की ठण्डी परत प्रायः 15 मील है, इसके बाद गरम द्रव भरा पड़ा है। इस गर्मी तक कभी समुद्री पानी रिस कर चला जाता है, तो भाप बनती है और ज्वालामुखी फूटते तथा भूकम्प आते हैं, जिनके कारण धरती निवासियों को भयंकर क्षति एवं अस्त-व्यस्तता का सामना करना पड़ता है।

पृथ्वी पर जो सूर्य किरणें छनकर आती हैं उसी के आधार पर यहाँ न केवल गर्मी रोशनी का अस्तित्व रहता है, वरन् प्राणियों की उत्पत्ति भी होती है। पृथ्वी के ऊपर वायुमण्डल का एक जीवनप्रद घेरा है। जिसमें साँस लेते हैं- उसकी ऊँचाई 100 मील से अधिक नहीं है। इसके उपरान्त पृथ्वी के ऊपर मोटी परतें चढ़ी हैं, जिनसे छनकर ग्रहों का प्रभाव उपयोगी मात्रा में पृथ्वी पर आता है। पहली परत को आयनोस्फियर, दूसरी को ट्रोमोस्फीयर, तीसरी को स्ट्रेटोस्फीयर, चौथी को ओजोनोस्फियर, पांचवीं को एवजोस्फीयर कहते हैं। यह परतें 65 हजार फुट तक ऊँची गई हैं।

ध्रुवों की स्थिति बड़ी विचित्र होती है। वहाँ प्रायः छः महीने का दिन और छः महीने को रात होती है। दृश्यों के बीच आँख मिचौनी चलती रहती है। जमीन पर चलते हुए आदमी अधर में लटके दिखते हैं और आवाजों का गूँजना, तरह-तरह की सीटियों का बजना यह बताता है कि ध्रुवों की स्थिति में अनेक असामान्यतायें होने के कारण ग्रह क्षेत्र, शक्तियों के पृथ्वी पर आवागमन का विशेष क्षेत्र है। इनकी समुचित जानकारी प्राप्त करके हम उस अदृश्य को जान सकते हैं, उसके ऊपर हमारा वर्तमान और भविष्य बहुत कुछ अवलम्बित है।

सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी पर जिस अनुपात में आती है। वह इतनी अधिक है कि उसका यदि सही उपयोग सम्भव हो सके तो मनुष्य की आवश्यकता के लिए अभीप्सित गर्मी उसी से मिल सकती है। इतना ही नहीं, समुद्र के खारे पानी को भाप बनाकर मीठे जल की समस्या भी हल हो सकती है।

भूकम्पों, ज्वालामुखियों, हिमयुग और समुद्री बाढ़ आदि का सम्बन्ध जिन तथ्यों के साथ जुड़ा हुआ है वे ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी से ही हस्तगत हो सकते हैं। उल्कापात और धूमकेतुओं का आवागमन भी कम संकट नहीं है। उपयुक्त समय पर उनके आगमन और दिशा प्रवाह की सही गणना हो सके तो उन विपत्तियों को आधुनिक अणु आयुध प्रहार से दूर भी धकेला जा सकता है।

मुद्दतों तक सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण देवताओं पर विपत्ति आने या कुपित होने का कारण माने जाते रहे हैं। पर अब वह भय वैज्ञानिक जानकारी ने दूर कर दिया है कि यह सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी की छाया का खेल है। आकाश के तारे टूटने को किसी देवपुरुष की मृत्यु आदि माना जाता था। अब समझा जाता है कि मंगल और बृहस्पति के बीच से किसी टूटे ग्रह का जो मलबा उल्काओं के रूप में घूमता रहता है, उसमें से कुछ टुकड़े उछलकर वातावरण में आ जाते हैं और जलकर राख हो जाते हैं, इसी का प्रकाश उल्कापात के रूप में दिखता है। भूकम्प, ज्वालामुखी आदि के सम्बन्ध में जो डरावने अन्ध-विश्वास फैले थे, वे ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी से सहज ही दूर हो गये।

उपयुक्त जानकारियों के आधार पर आकाश में परिभ्रमण और यानों को ऊपर भेजकर सृष्टि के रहस्यों का पता लगाना सरल हो गया है। काम करने और लाभ उठाने के लिए आकाश एक नया क्षेत्र मिला है। मनुष्यों पर ग्रहों के पड़ने वाले प्रभाव की जानकारी प्राप्त होने से पूर्व सतर्कता सम्भव हो गई है। मानसून, तूफान आदि की पूर्व सूचना मिल जाने से बचाव के कितने ही उपाय सोचे जाने लगे हैं।

समझा जाता था कि नक्षत्र आकाश में झाड़-फानूसों की तरह टँगे हैं, पर अब पता चला है, कि वे भी एक प्रकार के सूर्य हैं और एक-दूसरे से लाखों हजारों प्रकाश मील दूर हैं। प्रकाश गणितों में प्रकाश की एक लाख छियासी हजार वर्ष प्रति सेकेंड की चाल मानी जाती है। इस आधार पर प्रकाश वर्ष बनते हैं। इतनी दूर होने के कारण नक्षत्र पृथ्वी वासियों पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं छोड़ सकते। यह भी एक अन्ध-विश्वास विज्ञान ने हमारा दूर किया है।

ज्योतिष का क्षेत्र बहुत बड़ा है। उससे जहाँ पृथ्वी का धरातल और अन्तरिक्ष में घटित होने वाले घटनाक्रमों का पता चलता है, वहाँ मनुष्यों के व्यक्तिगत प्रकृति के गुण दोषों सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त उसके उत्कर्ष का पथ-प्रशस्त किया जा सकता है और अनर्थ की दुःखद सम्भावनाओं को टाला जा सकता है। किन्तु यह सब सम्भव तभी है, जब ज्योतिष का ज्ञान-विज्ञान समग्र रूप से जाना, सीखा और सिखाया जा सके। कठिनाई एक ही है कि स्वल्प श्रम में काम चलाने वाले और बाजारू पंचाँगों के सहारे ग्रह दोष की आशंका बताकर भोले लोगों की जेब काटने का व्यवसाय अनेक लोगों ने अपना रखा है। जब बाजारू पंचांग खरीदने भर से ज्योतिषी बना जा सकता है, तो कोई ग्रह गणित की कष्ट साध्य परिपाटी जानने का प्रयत्न क्यों करे?

जिस प्रकार पृथ्वी के विभिन्न भागों का दिन-रात, प्रभात, मध्याह्न, सन्ध्या काल, अलग-अलग समय पर होता है, उसी प्रकार स्थान विशेष पर ग्रह नक्षत्रों की पड़ने वाली प्रभाव क्षमता भी भिन्न-भिन्न होती है। इसलिए सही गणित के लिए आवश्यक यह है कि स्थानीय पलभा के अनुरूप पंचांग बने और सब लोग अपने स्थानीय पंचाँगों से काम लें। बम्बई के गणित से बने हुए पंचाँग से दिल्ली की स्थिति का सदा पता लगाना सम्भव नहीं। अपने या समीपवर्ती क्षेत्र के पंचांगों के सहारे ही यह प्रयोजन सही-रीति से सिद्ध हो सकता है।

ज्योतिर्विज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त विशाल है। हमारी उपलब्ध जानकारी को ज्योतिभौतिकी के क्षेत्र में हुई शोध ने और भी बड़ा आकार दिया है। फलित ज्योतिष के अन्ध-विश्वास से उभर कर ग्रह-नक्षत्रों एवं हमारे चारों ओर फैले वातावरण के जीवधारियों पर प्रभाव को अब हम खुलकर कह सकने की स्थिति में हैं। एस्टॉलाजी एवं एस्ट्रानामी में अभी जो विग्रह संव्याप्त दृष्टिगोचर होता है, उसे मिटाया जा सकता है, यदि इसी वैज्ञानिक दृष्टि से प्राप्त शोध निष्कर्षों को जन-जन तक सुगम भाषा में पहुँचाया जा सके। इससे अनावश्यक भय तो मिटेगा ही, उस पुरातन ज्योतिर्विद्या की लंगड़ी बैसाखी को भी सहारा मिलेगा, जिसकी मान्यताएँ आज भी गणितीय आधार पर सही है।


प्रसन्नता आज के कामों के साथ जोड़ दें

डेल कारनेगी कहते थे कि भूतकाल पर विचार मत करो क्योंकि अब वह फिर कभी लौटकर आने वाला नहीं है। इसी प्रकार भविष्य के बारे में साधारण अनुमान लगाने के अतिरिक्त बहुत चिन्तित एवं आवेशग्रस्त होना व्यर्थ है। क्योंकि कोई नहीं जानता कि परिस्थितियों के कारण वह न जाने किस ओर करवट ले। हमें सिर्फ वर्तमान के बारे में सोचना चाहिए और वही करना चाहिए जो आज की परिस्थितियों में सर्वोत्तम ढंग से किया जा सकता है। हमारी आशा कुछ भी, क्यों न हो प्रसन्नता के केन्द्र वर्तमान के प्रति जागरूकता बरतना और सर्वोत्तम ढंग से निर्वाह करना ही होना चाहिए।

रोलेण्ड विलियम्स बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी जिम्मेदारियाँ और गतिविधियाँ भी सुविस्तृत थीं। पर वे अपनी मेज पर उन्हीं फाइलों को आने देते थे जिन्हें आज ही निपटाया जा सकता है। इसी सिद्धान्त को अपना कर वे अत्यन्त सफल व्यवस्थापक बन सके।

प्रकृति परिवर्तनशील है उसकी दौड़ इतनी तेज है कि उसकी चाल नाप सकना सम्भव नहीं। नदी में पैर डालकर थोड़ी देर में उन्हें ऊपर उठाया जाय तो मात्र इतने क्षणों से असंख्यों टन पानी आगे बढ़ गया होगा। और पीछे से आने वाले ने उसकी जगह ले ली होगी। इस चाल के साथ किसी का दौड़ सकना सम्भव नहीं। इसी प्रकार भूतकाल की घटनाओं का आकलन करते हुए आज का निर्माण व्यर्थ है। इसी प्रकार भविष्य की उन कल्पनाओं में उड़ते रहने से कोई लाभ नहीं जो कभी-कभी आशा के विपरीत अनोखे ढंग से बदल जाती हैं।

भूत के घटनाक्रमों का सही निष्कर्ष इतना ही है कि हम उन परिवर्तनों से कुछ सीखें और उस नसीहत को ध्यान में रखते हुए आज का कार्यक्रम बनायें। इसी प्रकार भविष्य को यदि सचमुच उत्तम बनाना है तो उसका भी एक ही तरीका है कि वर्तमान का श्रेष्ठतम उपयोग कर गुजरें और उन बोये हुए मीठे फलों का अवसर आने पर चखें। काम कम और चिन्ता अधिक यह बर्बादी का बहुत बुरा तरीका है।

जार्ज बर्नाडशा कहते थे कि हर समय व्यस्त रहो। इससे तुम्हारी वे शक्तियां बच जायेंगी जो सपनों और कल्पनाओं की चक्की में पिसती हैं और शरीर और मन को बुरी तरह निचोड़ देते हैं।

मनुष्य के पसीने में सम्पदाएँ भरी हुई हैं और पसीने की बूंदों के साथ सम्पदाएँ टपकती हैं। रुचि पूर्वक आज के कामों में संलग्न होने से बढ़कर तत्काल आनन्द प्राप्त करने का और कोई तरीका नहीं है।

जिन्हें जीवन से सचमुच प्यार है और वे उस उपलब्धि का बढ़ा चढ़ा रसास्वादन करना चाहते हैं उनके लिए जीवन विज्ञानियों का एक ही परामर्श है कि अपनी मस्ती किसी भी कीमत पर न बेची जाय अपनी स्वतन्त्रता में विवेक के अतिरिक्त और किसी को भी हस्तक्षेप न करने दिया जाय।

अनुकूल परिस्थितियाँ, लोगों की अनुकम्पाएँ, समृद्धि की सम्भावनाओं की आशा रखने में कोई हर्ज नहीं। पर हिम्मत एकाकी चल पड़ने की होनी चाहिए। हमारा संतोष और आनन्द इस बात पर केन्द्रित रहना चाहिए कि हमने भले काम किये, दायित्व निभाये और जो किया उसमें पूरा श्रम और मनोयोग लगाया। इस आधार पर हम हर घड़ी प्रमुदित रह सकते हैं भले ही परिणाम इच्छा के अनुरूप हों या प्रतिकूल।


Quotation

आनन्द और सम्मान के पीछे मनुष्य का विवेकयुक्त परमार्थ छिपा रहता है। भले ही वह आँखों से दिख पड़े या नहीं भी।


स्वास्थ्य सुधार के लिए रंगों की उपयोगिता

मनुष्य के शरीर और मन पर रंगों का सुनिश्चित प्रभाव पड़ता है। रंगे कपड़े, पुते मकान में जो रंग मिला होता है, वे अपना प्रभाव छोड़ते हैं। काँच के माध्यम से सूर्य किरणों को शरीर पर लिया जाय या रंगीन काँच की बोतल को धूप में छः घंटे रखकर उस पानी को दो-दो घंटे बाद पिया जाय तो उसका प्रभाव भी रंग के अनुसार आरोग्य प्रदान करने में काम आता है।

लाल रंग गर्मी उत्तेजना उत्साह का प्रतीक है। उसे ठण्डक, उदासीनता मन्दगति के निवारण में प्रयोग करना चाहिए।

नीला रंग शीतल है। शान्तिदायक है। निद्रा लाता है। बेचैनी दूर करता है।

पीला रंग पाचक है। मल विसर्जन में, पसीना लाने में, मानसिक उद्विग्नता में काम आता है। नेत्रों की ज्योति बढ़ाता है।

अन्य रंग इन तीन के सम्मिश्रण से बनते हैं। इसलिए उनके गुण भी उसी अनुपात में परिवर्तित होते रहते हैं। जैसे नीला और पीला मिलने से हरा बनता है। पीला और लाल मिलने से नारंगी होता है। इनमें न्यूनाधिकता भी होती है। जो रंग ज्यादा होगा उसका प्रभाव अधिक पड़ेगा और जो मात्रा में कम होगा उसका असर कम रहेगा। किस काम में प्रयोग करना है, इसी आधार पर रंगों को यथावत भी लिया जा सकता है और उनका न्यूनाधिक मात्रा में मिश्रण भी किया जा सकता है।

“इंटर नेशनल जर्नल आफ वायोसोशल रिसर्च” में प्रकाशित एक लेख में ऐसे अनेकों प्रयोगों का वर्णन है जिनमें विद्यालय एवं दफ्तरों की दीवारों में रंगों की पुताई में प्रयोग करके अभीष्ट लाभ प्राप्त किया गया और जो कठिनाई रहती थी उसे दूर किया गया।

अमेरिका के इन्स्टीट्यूट फार वायो स्पेशल रिसर्च के डायरेक्टर एलेगजेन्डर चास ने भी रंगों के आधार पर मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति में हेर-फेर होने की बात स्वीकार की है और इसके अनेकों उदाहरण प्रस्तुत किये हैं।

सोवियत संघ में कोयला खदानों में काम करने वाले श्रमिकों की वर्दियां गहरे नीले रंग की बनवायी गई हैं और देखा गया है कि कोयले की धूल का जो दुष्प्रभाव पड़ना चाहिए वह इस परिवर्तन से कम हो गया। इसी प्रकार वहाँ अधिक गर्मी वाले कारखानों में हरे रंग का जहाँ जितना सम्भव है वहाँ उतना प्रयोग किया गया।

होटलों में जहाँ अधिक मात्रा में खाने पर लाभ समझा जाता है वहाँ नारंगी रंग के मेजपोश बिछाये जाते हैं और जहाँ कम खाने से लाभ है वहाँ आसमानी या सिलेटी कपड़े बिछाये जाते हैं।

शोधकर्ताओं का कथन है कि रंगों का प्रभाव मस्तिष्क के महत्वपूर्ण भागों पर विशेष रूप से पड़ता है और वहाँ से फिर उसी प्रकार की प्रेरणा सारे शरीर के लिए चल पड़ती हैं।

अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से स्रावित होने वाले हारमोन इन रंगों के प्रभाव से अपनी क्षमता में रगों की चुम्बकीय शक्ति से न्यूनाधिक होते और अपने प्रभाव में परिवर्तन करते हैं। मस्तिष्क की पिट्यूटरी और पीनियल ग्रन्थियों पर रंगों का प्रभाव प्रत्यक्ष देखा गया है। हाइपोथैलमस क्षेत्र को इसी आधार पर उत्तेजित और शान्त होते देखा गया है। यही कारण है जो दुर्बलता और रुग्णता का निवारण करने में सहायक होते हैं।

छोटे बच्चों के लिए यह प्रयोग प्रक्रिया विशेष रूप से उपयोगी है। क्योंकि उनकी प्रकृति अधिक कोमल होती है उस पर तीखी औषधियों की ऐसी प्रतिक्रिया होती है जो लाभ के स्थान पर हानि भी कर सकती है। यही बात गर्भिणी स्त्रियों के सम्बन्ध में भी है। उन दिनों उनकी प्रकृति विशेष रूप से नाजुक रहती है वे तीखी औषधियों का प्रभाव सहन नहीं कर पाती। उदरस्थ बच्चे के ऊपर माता के खान-पान तक का-मानसिक उद्विग्नता तक का प्रभाव पड़ता है तो तीखी औषधियाँ क्यों प्रभाव न डालेंगी। इसलिए जहाँ सौम्य चिकित्सा की आवश्यकता है वहाँ रंगों का प्रयोग करना चाहिए।

जर्मन एकेडेमी ऑफ कलर साइन्स के निर्देशक हेरोल्ड बोल फर्थ ने प्रयोगों के सम्बन्ध में अपना अभिमत निश्चित कर लेने के उपरान्त इन प्रयोगों की विशेषतया बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर ही किया। उनका कथन है कि कोमल एवं संवेदनशील प्रकृति वालों के लिए रंगों के माध्यम से उनका उपचार करना अधिक उपयुक्त एवं सुरक्षित है।

मौसमी फूल हर मौसम में हर रंग के खिलते हैं। इनमें से जो रंग अपने लिए उपयुक्त हो उसे अपने आँगन में या गमलों में बोना खिलाना चाहिए। इन्हें रोगी के समीप रखने से उनका प्रभाव पड़ता है।

शाक भाजी और फल भी विभिन्न रंगों के मिलते हैं। उनमें भी रंग के अनुरूप प्रभाव पाये जाते हैं। इसलिए इनके चुनाव में भी सेवन कर्ता की प्रकृति तथा आवश्यकता का ध्यान रखना चाहिए।

स्विट्जरलैंड में रंग चिकित्सा का प्रचलन सबसे अधिक है। वहाँ पहाड़ी क्षेत्रों में क्रोमोपैथी के कितने ही चिकित्सालय बने हुए हैं जिनमें फ्रेम लगी एक व्यक्ति के बैठने या लेटने योग्य कोठरियाँ बनी हुई हैं। जिनमें गहरे या हलके रंग के काँच अदल-बदल कर लगाये जा सकते हैं। उनमें रोगी एकाकी नंगे बदन बैठते हैं और रंग में छनकर आया हुआ सूर्य प्रकाश शरीर पर लेते रहते हैं। विशेषतया उस अवयव पर जो रुग्ण है। जो अंग प्रकाश से बचाना हो उस पर कपड़ा तानकर छाया कर दी जाती है। तेज धूप में गहरे रंग के और हल्की धूप में हलके रंग के काँच लगाये जाते हैं ताकि प्रकाश और गर्मी का सन्तुलन सही बना रहे। ऐसे केबिन कहीं भी बनाये जा सकते हैं और रुग्ण अवयवों पर पन्द्रह मिनट से लेकर आधे घंटे तक सूर्य किरणों का प्रकाश पहुँचाया जा सकता है।

हलके कपड़े रंग कर पहनाना और सूर्य की खुली धूप में टहलना भी इस चिकित्सा पद्धति का अंग है। इसके लिए प्रातःकाल का समय ही उपयुक्त है। धूप तेज होने लगे तो सिर को तौलिये से ढक लेना चाहिए।

रत्न धारण करने की परिपाटी इसी चिकित्सा का अंग है। यों ग्रह शान्ति के हिसाब से ज्योतिषी लोग नवग्रहों के आधार पर नौ रंगों में से किसी को धारण करने की सलाह देते हैं पर जहाँ तक चिकित्सा का सम्बन्ध है और सामान्य आर्थिक स्तर की बात है वहाँ साफ-सुथरे पारदर्शी रंगीन कांचों का धारण करना भी लाभदायक होता है। इन्हें इस प्रकार पहनना चाहिए कि उन्हें स्पर्श करती हुई सूर्य किरणें शरीर का स्पर्श कर सकें। सोने में या किसी धातु में जड़ कर उन्हें पहनने का इस दृष्टि से कोई तुक नहीं है।

खिड़कियों के दरवाजे ऐसे लगाये जाँय जिनमें सफेद या रंगीन काँच इच्छानुसार अदल-बदल कर लगाये जा सके। दरवाजों पर लटकाये जाने वाले पर्दों के सम्बन्ध में यही बात है उनके रंगों का चुनाव करते समय अपनी आवश्यकता को विशेष रूप से ध्यान में रखना चाहिए।

मानसिक शान्ति के लिए आमतौर से नीले या हरे रंग का प्रयोग किया जा सकता है। रात्रि को सोते समय हल्की रोशनी के बल्ब लगाकर कमरे में जलते रहने दिये जाँय तो उनका प्रभाव पड़ता है। पढ़ना लिखना हो तब तो सफेद बल्ब ही काम देते हैं अन्यथा ऐसे ही केवल प्रकाश की जरूरत हो तो रंगीन बल्ब अच्छे लगते हैं। उनसे आँखों पर तेज चमक भी नहीं पड़ती और कीड़े मच्छर भी कम आते हैं स्वस्थ स्थिति में सफेद कपड़े पहनाना ही ठीक है अन्यथा उद्देश्य विशेष के लिए महिलाओं एवं बच्चों को रंगीन किन्तु हलके कपड़े पहनाने चाहिए ताकि हवा और धूप को शरीर तक पहुंचने में अड़चन न पड़े। गर्भिणी स्त्रियों को पीला रंग अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। यह समस्त उपक्रम पूर्णतः विज्ञान सम्मत हैं इसे चिकित्सक गण भी स्वीकार कने लगे हैं।


आत्मीयता के आधार पर पनपती घनिष्ठता

घनिष्ठता अपने आप में एक शक्ति है। उसके कारण निकटवर्ती लोगों में तो विचारों का, सम्वेदनाओं का आदान-प्रदान चलता ही रहता है पर वह इससे भी आगे एक कदम बढ़कर अन्य जीवधारियों के बीच भी एक सुनिश्चित तथ्य की तरह काम करता है। पशु-पक्षी, कीट पतंगे अपने वर्ग वालों तक अपनी इच्छाओं और जानकारियों से अवगत कराते रहते हैं। यदि ऐसा न हो तो उनकी जीवनचर्या ही न जान सकें।

चींटी, दीमक, मधु-मक्खी, तितली, जुगनूँ और अपने वर्ग वालों को अपनी जानकारियों को साथियों तक पहुँचाकर उनका सहयोग करते रहते हैं। प्रजनन क्रिया के लिए दूसरे पक्ष को आमन्त्रण देने के लिए उनके पास एक ही साधन है विचार सम्प्रेषण। इसका एक कारण गन्ध को बताया जाता है। पर यह मोटा अनुमान मात्र है। गन्ध में इतने स्तर, वर्ग और उतार-चढ़ाव नहीं होते जिसके आधार पर जीव जगत की सहकारिता का आधार मजबूत बना रहे।

इसी प्रकार सुपरनेचर पुस्तक के लेखक लॉयेल वेस्टन ने “माइन्ड ओवर मैटर” के अंतर्गत लिखा है कि चींटी समुदाय में भी विचार-सम्प्रेषण की, टेलीपैथी की विलक्षण क्षमता आत्मीयता पर ही आधारित है। जब तक चींटी समुदाय की रानी चींटी स्वस्थ रहती है, सभी चींटियां समुदाय में या समुदाय से अलग होकर एकाकी सहज स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं। रानी चींटी की भूमिका अभिभावक के रूप में मानी जा सकती है।

‘टेलीपैथी’ विषय पर गहन शोध करने वाले अमेरिकन जॉन गैदर प्रैट ने अपने प्रसिद्ध शोध-ग्रन्थ “पैरासाइकोलॉजी” में मनुष्यों के दैनिक जीवन के अनेकानेक पालतू पशुओं का भी जिक्र किया है जिनमें टेलीपैथी की विशेष क्षमता पाई जाती है। इस संदर्भ में उन्होंने एक डुलेन परिवार का दिया है।

कितने ही पशु-पक्षियों को अपने पालने वाले प्रेमियों के साथ इतनी घनिष्ठता होती है कि वे अपनी भाव सम्वेदनाओं से आकुल होकर उस प्रियजन को कितनी ही कठिनाई सहकर भी ढूँढ़ निकालते हैं और उस तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं।

एक व्यक्ति आने निवास स्थान आरोरा, इलीनॉयस को छोड़कर 200 कि.मी. दूर मिशीगन जिले के लॉनसिंग शहर में रहने के लिए चला गया, किन्तु अपने पालतू वफादार कुत्ते ‘टॉनी’ को अपने पुराने घर पर ही छोड़ना पड़ा। डुलेन परिवारी-हरिजन उस समय- अत्यधिक आश्चर्यचकित हुए जब उन्होंने अपने उसी पालतू कुत्ते टॉनी को 6 सप्ताह बाद लॉनसिंग की गलियों में साथ घूमते देखा।

प्रैट महोदय ने इसी प्रकार के अन्य दो महत्वपूर्ण उदाहरण देते हुए लिखा है कि पश्चिमी वर्जीनिया के एक 12 वर्षीय लड़के ने एक कबूतर को पालतू बना लिया। कुछ समय पश्चात किसी रोग विशेष के कारण उस लड़के को उपचार के लिए आने शहर से 70 मील दूर एक अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। एक रात को उस लड़के ने सींखचे से बाहर यकायक किसी पक्षी के फड़फड़ाने और चोंच से तार की जाली को नोंचते हुए देखा, वह पक्षी उस कमरे में प्रवेश पाने के लिए अत्यधिक व्यग्र हो अपनी चोंच लहू-लुहान किये जा रहा था। लड़के का कौतूहल बढ़ा और विस्तर छोड़कर, ज्यों ही सींखचे पर गया, तो उस पक्षी को पहचानकर उसकी आँखें भीग गईं। यह पक्षी और कोई नहीं उसका अपना वही कबूतर था जिसे उसने बहुत छुटपन से ही पाला-पोसा था।

ठीक इसी प्रकार की घटना एक स्वीडन परिवार की भी है। इस परिवार ने वन्य पक्षी नीलकण्ठ को अत्यधिक स्नेह पूर्वक पोषित परिवर्धित किया। जब ग्रीष्म कालीन लम्बे अवकाश को बिताने के लिए यह परिवार अपने निवास स्थान से सैकड़ों मील दूर एक प्राकृतिक सुरम्य स्थल को चला गया, पक्षी को अन्य परिवारी लोगों की देखरेख में छोड़ दिया गया। किन्तु इस पक्षी ने भी टेलीपैथी के माध्यम से उसी दिशा में उड़ान भरी और यात्रा के दूसरे दिन बाद वह परिवारी सदस्यों के भ्रमण के दौरान उन्हीं में मिल गया। वह जाकर अपने मुख्य स्वामी के कन्धे पर बैठ गया। यह सब देखकर परिवार के सभी व्यक्ति अत्यधिक आश्चर्य में पड़ गए।

“टेलीपैथी” विषय की गहन गवेषणाओं से वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि यद्यपि पशुओं में टेलीपैथी ग्रहण करने की क्षमता होती तो है, किन्तु कुत्ते में आत्मीयता के आधार पर यह क्षमता सबसे अधिक पनपी पायी जाती है। वे हमेशा आने वाली विपत्ति से गृह मालिकों को आगाह करते रहते हैं। रात्रिकालीन समय में आने वाली विपत्ति का उन्हें पूर्ण आगाह हो जाता है इसलिए परिवार वालों को समय रहते सावधान हो जाने के लिए अनेकानेक प्रकार के शारीरिक हाव-भाव से चेष्टायें करते हैं। इतने पर भी गृह मालिक नहीं समझ पाता है, तो वे भौंकने लगते हैं। इस प्रकार की घटनाएँ रिकार्ड की गई हैं जब कुत्ते का अकारण भौंकना समझकर नजर अन्दाज कर दिया गया, फलतः प्रातः उस परिवार में किसी की हत्या कर दिये जाने, लूट-पाट हो जाने अथवा किसी की मृत्यु हो जाने के तथ्य प्रकाश में आए हैं, कभी-कभी तो कुत्ते अपने मालिकों की दफनाई गई कब्रों को खोज निकालते हैं और उसके पास से हटना नहीं चाहते। ऐसे घटनाक्रम भी देखे जा रहे हैं जिसमें पुनः कब्र खोदने पर ये व्यक्ति जीवित पाये गये। अन्दर की गर्मी ने प्राण संचार आरम्भ कर दिया। चिकित्सक धोखा खा गए किन्तु कुत्ते ने धोखा नहीं खाया।

अपनत्व यदि सच्चा और गहरा हो तो घनिष्ठ जनों के मध्य समीपता एवं सहायता की सहज आतुरता उत्पन्न करता है। मैत्री इसी आधार पर पनपती है। इस आधार पर दूरस्थ व्यक्ति भी निकटवर्ती की तरह प्राण प्रिय लगते रहते हैं। यहाँ तक कि देवता एवं भगवान भी इस बन्धन को तुड़ाने का प्रयत्न नहीं करते।


हवाना होकीची नामक एक बालक (kahani)

मुशाकी (जापान) में अब से ढाई सौ वर्ष पूर्व हवाना होकीची नामक एक बालक गरीब परिवार में जन्मा। उसे सात वर्ष की आयु में चेचक निकली और उसी में दोनों आँखों से अन्धा हो गया। अब उसके लिए कुछ भी देख सकना सम्भव न था। इस दुर्भाग्य भरे जीवन में अब अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ रह नहीं गया था। ऐसी स्थिति में लोग पराश्रित होकर जीते हैं। दूसरों की सहायता पर उनकी जीवन यात्रा चलती है।

पर होकीची हिम्मत नहीं हारा। एक-एक इंच की दो आँखें ही तो गई थीं। इतने बड़े शरीर के अन्य कलपुर्जे तो ज्यों के त्यों थे, फिर वह क्यों यह माने कि उसका सब कुछ चला गया। 63 इंच लम्बे शरीर में से दो इंच घट जाने पर भी 61 इंच की काया तो यथावत् थी ही।

होकीची 101 वर्ष जिया। 7 वर्ष बचपन छोड़कर शेष 94 वर्ष अनवरत रूप से ज्ञान की साधना की। किशोर अवस्था तक वह केवल पढ़ता रहा इसके बाद उसने पढ़ाने का धन्धा अपना लिया। वह छात्रों को पढ़ाता और बदले में उनसे अपने काम की पुस्तकें पढ़वा कर अपने ज्ञान की वृद्धि करता। यह पढ़ने और पढ़ाने का क्रम उसने आजीवन जारी रखा ओर जापान ही नहीं समस्त संसार के अद्भुत स्मरण शक्ति सम्पन्न विद्वानों की अग्रिम पंक्ति में अपना नाम लिखाया। वह एक बार जो सुन लेता उसे कभी भूलता न था।

उसके मस्तिष्क में संग्रहित अति उपयोगी ज्ञान की एक राष्ट्रीय शिक्षा संस्था ने नोट कराया और उसके आधार पर (एक विश्व ज्ञान कोष) प्रकाशित किया गया, जो 2820 खण्डों में प्रकाशित हुआ है। संसार के इतिहास में इससे बड़ी और इससे अधिक तथ्यपूर्ण पुस्तक अभी तक कोई भी नहीं छपी।


मरने के उपरान्त भी प्राणसत्ता का अस्तित्व

मनुष्य रक्त मांस का बना भौतिक शरीर मात्र ही नहीं, उसका एक अन्य शरीर भी है। मरणोपरान्त वह उसी शरीर में निवास करता है। यद्यपि यह शरीर सूक्ष्म और अदृश्य है किन्तु उसकी सत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता। आये दिन इस प्रकार की अनेकानेक घटनाएँ घटती रहती हैं, जो सूक्ष्म शरीर के अस्तित्व की साक्षियाँ देती हैं।

कुछ दिनों पूर्व इसी प्रकार की घटना हरदोई जिले के पनहइया गाँव में घटित हुई। सखाबक्श सिंह गाँव के मुखिया थे। उनका ट्रक ड्राइवर एक दोपहर घर के आँगन में विश्राम कर रहा था कि इतने में उसकी आँखें लग गईं। थोड़ी देर बाद वह कराहते हुए उठ बैठा और अपने सीने पर हाथ फेरने लगा। उसकी छाती में जले का निशान उभर आया था। सम्बन्धियों के पूछने पर उसने बताया- ‘‘जब मैं सो रहा था, तो एक यमदूत आया और मेरे प्रतिरोध के बावजूद मुझे उठा ले गया। जहाँ वह मुझे ले गया, वहाँ का वातावरण अद्भुत था, चारों ओर नीले रंग का एक दिव्य प्रकाश फैला हुआ था, बड़े-बड़े गगन-चुम्बी महल थे, सफेद दाढ़ियों वाला एक बाबा बैठा था। उसके समस्त शरीर से अलौकिक तेज निकल रहा था। मुझे देखते ही उसने उस सिपाहीनुमा दूत से कहा- ‘‘इतनी जल्दी इसे क्यों ले आये? वापस ले जाओ।” तत्पश्चात् दूत ने मुझे लौट चलने को कहा, किन्तु तब तक मैं वहाँ इतना रम चुका था, कि लौटने से इन्कार कर दिया। इस पर एक तप्त सलाख से उसने मुझे दागा और जमीन पर पटक दिया। इतने में मेरी नींद खुल गई।” आज भी उसके सीने पर वह निशान बना हुआ है।

एक ऐसी ही घटना न्यूयार्क, अमेरिका की है। नेल्सन नामक एक बाईस वर्षीय युवक कार में एक मित्र के साथ घूमने जा रहा था। पास ही सड़क पर एक भयंकर मोड़ था। कार तेज गति से जा रही थी। मोड़ में वह गाड़ी को सम्भाल न सका और सामने से आती एक बस से कार जा टकराई। एक तीव्र चीत्कार के साथ नेल्सन बेहोश हो गया। उसके मित्र को कोई विशेष चोट नहीं आयी। वह तुरन्त नेल्सन को पास के अस्पताल में ले गया। डॉक्टरों ने अथक प्रयास के बाद ही वह खतरे से बाहर हो सका। कुछ दिन पश्चात् जब नेल्सन स्वस्थ हुआ, तो बेहोशी के बाद का सारा वृतान्त हूबहू दुहराकर लोगों को सकते में डाल दिया। उसने जो कुछ सुनाया वह इस प्रकार है- ‘‘बस से जब कार टकराई, तो मेरे सिर पर तीव्र आघात हुआ। एक असह्य पीड़ा से मैं छटपटा उठा। फिर मुझे ऐसा आभास हुआ मानों मैं तृणवत् हल्का हो गया हूँ और ऊपर उठ रहा हूँ । मुझे मेरा शरीर गाड़ी के अन्दर क्षत-विक्षत दिखाई पड़ा। मित्र एक ओर पड़ा था। देखते-देखते वहाँ काफी भीड़ इकट्ठी हो गई। मेरे दोस्त ने दो अन्य व्यक्तियों की सहायता से मेरे घायल शरीर को कार से बाहर निकाला और एक अन्य कार से हॉस्पीटल ले आया। यहाँ कुछ समय बाद मैं पुनः अपने शरीर में प्रविष्ट कर गया।” इसी बीच उपस्थित लोगों के मध्य जो भी वार्ता हुई थी, उसने शब्दशः उसे सुना डाला।

बोस्टन में इसी प्रकार की एक घटना तब घटित हुई जब 32 वर्षीय मॉम लाउरा स्पिटलर आने हृदय रोग के इलाज के लिए वहां के एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती हुईं। आरंभिक परीक्षण के बाद डॉक्टरों ने हृदय का ऑपरेशन करने का निश्चय किया। ऑपरेशन प्रारम्भ हुआ, किन्तु बीच में ही किसी कारणवश उसकी हृदय गति रुक गई। डॉक्टरों के लाख प्रयत्न के बावजूद भी धड़कन चालू न हो सकी। ऑपरेशन पूरा हो चुका था डॉक्टर इस कारण और भी परेशान थे, क्योंकि महिला गर्भवती थी। हृदय गति बन्द होने से गर्भस्थ शिशु को भी खतरा हो सकता था। इस सम्बन्ध में अभी वे बच्चे को ऑपरेशन द्वारा बाहर निकालने पर विचार कर ही रहे थे, कि अचानक धड़कन फिर आरम्भ हो गई। धीरे-धीरे स्पिटलर होश में आयीं आर इस बीच के सारे अनुभव को कह सुनाया- ‘‘एकाएक मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैं अपने शरीर से बाहर निकल आयी हूं। डॉक्टरों से घिरे बिस्तर पर मुझे अपना शरीर स्पष्ट दिख रहा था और मैं यह भी देख रही थी, कि डॉक्टर मेरे मामले से परेशान हैं। उनके बीच जो कुछ बात-चीत हो रही थी, सब मुझे स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था। इस वक्त स्वयं को मैं बिल्कुल भारहीन महसूस कर रही थी तथा हवा में इधर-उधर तैर सकती थी।” इस प्रकार के घटनाक्रम ओ.बी.ई. (आउट ऑफ बाड़ी एक्सपीरियन्स) नाम से जाने जाते हैं। ऐसे अनेकों अनुभवों का संकलन परामनोवैज्ञानिकों ने किया है।

मरणोपरान्त जिंदा होने की एक अन्य घटना इंग्लैण्ड की है। वारविकशायर में विल्सन ट्रेपर नामक एक व्यापारी अपने परिवार सहित रहता था। एक बार वह गम्भीर रूप से बीमार पड़ा। स्थिति नाजुक देखकर उसे दूरवर्ती अस्पताल ले जाने की बजाय पड़ौस के डॉक्टर को उपचार के लिए बुलाना उत्तम समझा गया। डॉक्टर आया, किन्तु तब तक ट्रैपर शान्त हो चुका था। फिर भी परिवार वालों के सन्तोष के लिए उसने उसकी शारीरिक जाँच की और ट्रैपर को मृत घोषित कर दिया। सभी रोने-चीखने लगे पर आश्चर्य, आधे घंटे बाद ही पुनः उसके शरीर में हलचल दिखाई दी। डॉक्टर को फिर बुलाया गया। चेकअप के बाद उसे जीवित पाया और अविलम्ब अस्पताल ले जाने की सलाह दी। उपचार के बाद ट्रैपर स्वस्थ हो गया और अपना मरणोत्तर अनुभव सुनाते हुए कहता- मेरी मृत्यु पर सभी विलाप कर रहे थे। मैं उन्हें स्पष्ट देख-सुन रहा था। मगर मुझ पर किसी की दृष्टि पड़ती ही नहीं थी। चिल्ला-चिल्ला कर मैं कह रहा था कि मुझे कुछ नहीं हुआ है, मैं बिल्कुल ठीक हूँ, पर मेरी कोई सुनता ही नहीं था। कुछ समय पश्चात् यकायक यह अनुभूति समाप्त हो गयी, सारे दृश्य ओझल हो गये और मैं वापस अपने शरीर में आ गया।

अनेक बार ऐसा भी होता देखा गया है कि व्यक्ति मृत्यु-शैया पर पड़ा हो और मृत्यु से पूर्व सूक्ष्म लोक के उसे सारे दृश्य दिखाई पड़े हों। इसमें उस लोक का दिव्य वातावरण तथा वर्षों पूर्व मरे उसके सगे-सम्बन्धी भी सम्मिलित होते हैं। यदा-कदा दृश्य में ऐसे सम्बन्धी भी दिखाई पड़ जाते हैं, जिनकी मृत्यु की सूचना मरणासन्न व्यक्ति को होती ही नहीं।

ऐसी ही एक घटना का उल्लेख सर विलियम बैरेट ने अपनी पुस्तक “द बुक ऑफ लिविंग डेड” में किया है। बोन शहर में एक महिला की तबियत प्रसव उपरान्त अचानक खराब हो गई। तुरन्त महिला डॉक्टर को बुलाया गया। स्थिति में सुधार न होते देख डॉक्टर कुछ परेशान-सी दिखने लगी। इस पर महिला ने कहा- डॉक्टर, परेशान मत हो। मुझे उस संसार में चली जाने दो। कितना सुन्दर दृश्य है वहाँ, कितने अच्छे वहां के लोग हैं कितने दिव्य प्रकाश से वहाँ का वातावरण आलोकित हो रहा है, इतने में एक ओर इशारा करते हुए अपने मृत पिता से बात करने लगी, मानो सचमुच ही रक्तमाँस का उनका शरीर वहाँ उपस्थित हो। वह कहने लगी- ‘‘पिताजी, मैं जल्द ही आ रही हूँ। देखिये न ये मुझे आने ही नहीं देते।’’ इसी बीच वह एक ओर मुड़ी और विस्फारित नेत्रों से शून्य में कुछ घूरने लगी। तभी उसकी बूढ़ी माँ उस कमरे में पहुँची। उसने माँ की ओर देखते हुए आश्चर्य प्रकट किया- माँ! यह जेनी पिताजी के साथ कैसे है? वह तो हैमवर्ग में पढ़ रही है? जेनी उस महिला की छोटी बहन थी। एक सप्ताह पूर्व किसी दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई थी, जिसकी खबर जानबूझकर उससे छुपायी गई थी। दो दिन पश्चात् उस महिला की मृत्यु हो गई।

न्यू साउथ वेल्स की एक घटना है। डेविड और हैरी दो भाई थे। हैरी बड़ा था और न्यू साउथ वेल्स से 15 मील दूर एक अन्य शहर में नौकरी करता था। कमरे में आग लग जाने से उसका आकस्मिक निधन हो गया। इसकी सूचना डेविड को नहीं थी। वह बीमार था। बड़े भाई की मृत्यु के पाँच दिन बाद उसका भी देहान्त हो गया। निधन से एक घंटा पूर्व वह एक दम बिस्तर पर उठ बैठा और पैताने की ओर इंगित करते हुए बोला- पिताजी, वहाँ हैरी खड़ा मुझे बुला रहा है। उसकी वह बात कमरे में खड़ी उसकी माँ और नर्स ने भी स्पष्ट सुनी।

ये सभी घटनाएँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि मरने के बाद हमारा अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता, वरन् इस भौतिक संसार को त्याग हम सूक्ष्म लोक के वासी बन जाते हैं। जहां अपने सूक्ष्म शरीर में निवास करते हैं। यहाँ भी हम अपना भौतिक जगत वाला स्वरूप बनाये रहते हैं, हमारी रुचि प्रवृत्ति, इच्छा-आकाँक्षा बिल्कुल इहलोक जैसी ही बनी रहती है। क्षुद्रात्मा-दुरात्मा को यहाँ भी लोगों को सताने-उत्पीड़ित करने में ही मजा आता है, जबकि देवात्मा-धर्मात्मा परमार्थ-परायणता का अवलम्बन लेते और कल्याण की बात सोचते हैं, दूसरों की सेवा-सहायता ही अपना कर्त्तव्य मानते और इसी में आनन्द अनुभव करते हैं। ऐसे सूक्ष्म शरीर धारी प्रेत-पितर समय-समय पर अपना अस्तित्व प्रकट करते और अपनी सेवाओं से दूसरों को लाभान्वित बनाते देखे जाते हैं-

घटना ब्राइघम नामक इंग्लैंड के एक कस्बे की है। एक रात जॉनस्नो नामक बैंक कर्मचारी अपने कमरे में अकेले सो रहा था। बीबी-बच्चे किसी सम्बन्धी के यहां गये हुए थे। ठीक आधी रात को उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई जगा रहा हो। आंखें खोलीं, तो सामने सचमुच ही कोई खड़ा दिखाई पड़ा। बेड लाइट की रोशनी में उसने गौर से देखा, वहाँ उसका दिवंगत बाप खड़ा था, जिसकी मृत्यु के करीब दो वर्ष बीत चुके थे। मृत बाप को खड़ा देख, डर के मारे वह चीख पड़ा। भय से उसकी घिग्घी बँध गई, किन्तु इसी बीच आकृति जॉन के कुछ और करीब आ गयी तथा भय निवारण करते हुए कहा- जॉन! मेरे बेटे, डरो मत, मैं तुम्हारा पिता हूँ, कोई हानि पहुँचाने यहाँ नहीं आया, अपितु एक महत्वपूर्ण सन्देश देने आया हूँ। तुम जिस बस से कल यात्रा करने वाले हो, उसका एक्सिडेंट होने वाला है, उससे यात्रा मत करना।’ इतना कह आकृति अदृश्य हो गई। दूसरे दिन शाम को स्नो को पता चला, कि जिस बस से यात्रा नहीं करने की चेतावनी उसके मृत पिता ने रात को दी थी, वह सचमुच ही दुर्घटनाग्रस्त हो गई और उसके सभी सवार मारे गये।

गत वर्ष कोटा (राजस्थान) में इसी से मिलती-जुलती एक घटना घटी। रामलखन पिठौरा गाँव का एक समृद्ध किसान था। जून का महीना था। दिन में काफी तेज गर्मी पड़ती, जिसका असर रात को भी बना रहता। रात इतनी गर्म होती, कि कमरे में नींद नहीं आती। इसलिए रामलखन अपने पत्नी-बच्चों सहित घर की छत पर सोता। एक रात जब वह गहरी नींद में सो रहा था, तो पास ही किसी के कराहने की आवाज से उसकी नींद उचट गई। आँखें खुलीं, तो छत पर उससे कुछ ही दूर एक लहू-लुहान व्यक्ति खड़ा दिखाई पड़ा, उसका सिर फटा हुआ था और रक्त अविरल बह रहा था। जिससे उसके सारे कपड़े खून में सन गये थे। इस वीभत्स दृश्य को देख भय से वह चीख पड़ा । पास ही उसके पत्नी और बच्चे सो रहे थे। गुहार से सभी जग पड़े। पत्नी ने कारण पूछा, तो रामलखन ने सारा हाल कह सुनाया, परन्तु तब तक वह दृश्य गायब हो चुका था। पत्नी ने इसे उसका भ्रम समझा और सो जाने को कहा। उस रात फिर कुछ असामान्य नहीं घटा। दूसरे दिन आधी रात को फिर वही दृश्य दिखाई पड़ा। पत्नी ने मन का भ्रम कह पुनः उसे सुला दिया। तीसरी रात भी वही भय। इस प्रकार यह क्रम पाँच दिनों तक चलता रहा। छठवें दिन किसी कारणवश उसकी पत्नी अपने बच्चों समेत कमरे में ही सो गई। अकेला रामलखन ही छत पर सोया। मध्यरात्रि के करीब फिर वह आकृति प्रकट हुई। इस बार उसने रामलखन को नाम लेकर पुकारा। वह जगा, किन्तु लगातार छः दिनों से उसका साक्षात्कार होते-होते रामलखन का भय कुछ कम-सा हो गया था। साहस बटोरकर उसने उससे प्रश्न किया- ‘तुम कौन हो और क्या चाहते हो?’ आकृति ने जवाब दिया- मैं किशुन। कभी मेरा यहाँ मकान था। वर्षों पूर्व एक बरसात में मकान ढह गया और मैं उसी के नीचे दब गया। तभी से मुझे आपका इन्तजार था। मैंने ही यह जमीन खरीदने के लिए आपको प्रेरित किया। अब जब आपने इस जमीन को खरीदकर मकान बना लिया है, मैं आपके सामने उपस्थित हूं। मेरी मदद कीजिए। मुझे उस स्थान से बाहर निकालिए। बहुत पीड़ा हो रही है। इसके बदले में मैं आपको अपार सम्पदा दूँगा।’

आकृति की गिड़गिड़ाहट पर रामलखन को दया आ गई। उसने पूछा- ‘आखिर मुझे करना क्या होगा?’ किशुन नामधारी उस आकृति ने पुनः कहा- ‘सामने वाले कमरे के बाँये कोने में मैं दबा पड़ा हूं, वहाँ खोदकर मुझे मुक्त करो।’ आकृति के आदेशानुसार रामलखन तत्क्षण उठा तथा कमरे का कोना खोदना प्रारम्भ किया। करीब दो फुट खोदने पर उसे एक बाम्बी नजर आयी। बाम्बी के दिखते ही प्रेत के कथनानुसार उसने और खोदना बन्द कर दिया। दूसरे दिन अर्धरात्रि को किशुन फिर आया। उसने सहायता के लिए रामलखन को धन्यवाद ज्ञापन किया एवं एक स्थान का पता बताया। वहाँ खोदने पर रामलखन को ढेर सारे सोने-चाँदी के सिक्के मिले। बाद में उसने जब किशुन के बारे में लोगों से पूछताछ की, तो इसी नाम के एक व्यक्ति का पता चला जो वर्षों पूर्व उस मकान के गिरने से दबकर मर गया था।

जीवन शाश्वत है सनातन है। मरण धर्मा तो बस यह एक शरीर है। इस शरीर की कितनी चिन्ता मनुष्य को रहती है। इस क्षण भंगुर काया को तृष्णा, वासना के दलदल में न फंसने देकर मनुष्य अपनी आत्मिक प्रगति के प्रयास सतत् करता रहे, यही एक तत्त्वदर्शन भारतीय मनोविज्ञान एवं दर्शन का रहा है। इसका अवलम्बन लेकर उस अनन्त यात्रा को सही दिशा दी जा सकती है।


Quotation

भूत अब लौटने वाला नहीं । भविष्य का कोई निश्चय नहीं। सम्भालने और बनाने योग्य तो वर्तमान ही है।


जापान में बौद्ध धर्म के (kahani)

जापान में बौद्ध धर्म के सभी ग्रन्थों का अनुवाद एवं प्रकाशन होना था। लागत करीब तीन हजार आँकी गई। कार्य एक वृद्ध सन्त ने अपने जिम्मे लिया और जन-जन से याचना करके वह रकम पूरी कर ली।

जैसे ही अनुवाद प्रकाशन का कार्य हाथ में लिया गया, वैसे ही जापान में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। हजारों व्यक्ति भूखों मरने लगे। सन्त ने वह जमा राशि दुर्भिक्ष पीड़ितों के सहायता कार्य में लगा दी। ग्रन्थ का कार्य रोक दिया गया। अच्छा समय आया, तो धन एकत्र करने का कार्य दुबारा शुरू किया गया। धीरे-धीरे फिर तीन हजार इकट्ठे होने लगे।

इस बार भयंकर बाढ़ आ गयी। खेत खलिहान सभी बह गए। किसानों के झोंपड़े भी। सैकड़ों के मरने की खबर मिलने लगी। सन्त ने जमा राशि की बाढ़ पीड़ितों के लिए लगा दिया।

बाढ़ का आतंक चले जाने पर सन्त ने फिर चन्दा जमा करना शुरू किया। तीन बार राशि संग्रह करने में दस वर्ष लगे।

तीसरी बार के धन से ग्रन्थ प्रकाशन कार्य आरम्भ हुआ और वह यथा समय पूरा हो गया। पहली बार सन्त 60 वर्ष के थे, दूसरी बार 70 वर्ष के, और तीसरी बार 80 वर्ष के।

ग्रन्थ छपे तो उन पर तीसरी संस्करण छापा गया। दो पिछले संस्करण कहाँ गये। इसकी सफाई देते हुए भूमिका में लिखा गया वे दुर्भिक्ष पीड़ितों और बाढ़ पीड़ितों की सहायता के रूप में समझे जाने चाहिए।

ग्रन्थ प्रकाशन की तुलना में मनुष्य की जान बचाना दोनों बार अधिक आवश्यक और उत्तम समझा गया।

परमात्मा की प्रसन्नता का आधार यही परमार्थ परायणता है, दम्भ प्रदर्शन नहीं। उससे तो उल्टे उनको कष्ट ही होता है।


प्रेत ऐसे भी होते हैं।

इंग्लैण्ड का विण्डसोर महल प्रेतों का निवास गृह होने के रूप में प्रख्यात है। ऐलिजाबेथ प्रथम को पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था। उनका प्रेत अक्सर इस महल के पुस्तकालय में देखा जाता है। चार्ल्स प्रथम को तोपखाने से बहुत लगाव था उनकी आत्मा तोपखाने में दृष्टि-गोचर होती है। हेनरी अष्टम को गठिया की शिकायत थी। वे महल के आँगन पर लड़खड़ाते हुए घूमते हैं। तीसरे जार्ज को अन्धेरा पसन्द था। वे अब भी महल की जलती बत्तियाँ बुझा देते हैं। विण्डसोर के पार्क में शिकारी हर्ने अभी भी अपने शिकारी कुत्ते दौड़ता हुआ देखा जाता है।

आस्ट्रेलिया के सिडनी नगर में एक निःसन्तान मकान मालिक की किसी दुर्घटना में यकायक मृत्यु हो गई। उसकी एकमात्र सम्पदा सरकार की हो गई। सरकार ने उसे फ्रैंक नामक किरायेदार को फर्नीचर समेत उठा दिया। पर उसने आये दिन रात्रि के समय दैत्याकार प्रेत की घुस पैठ से दुःखी होकर खाली कर दिया। इसके बाद एक प्रोफेसर ने उसे लिया। वे प्रेतवाद को अन्धविश्वास भर मानते थे। पर उनने भी जगती आँखों से जो दृश्य देखे, उनका ब्यौरा जहाँ-तहाँ बताये बिना मकान खाली कर गये। इसके बाद उसे माइकेल ब्रुम ने लिया पर जब उनका सारा परिवार आतंकित हो उठा तो वे भी चले गये। इसके बाद जो नया किरायेदार आया उसने चौकीदारों और पुलिस मैनों की व्यवस्था की पर आँगन और बरामदे में पत्थर बरसने का पता न लगा सकने पर उनने भी हिम्मत खो दी और छोड़कर चले गये। एक महीने की उस उठक-पठक के बाद वह मकान अभी तक खाली पड़ा है।

बेथेसडा कम्युनिटी डेवलपमेंट के इनचार्ज प्रो. निक्सन अपने काम में बड़े मुस्तैद थे। दिन भर इनक्वारियाँ करते और रात को दफ्तर का काम निपटा तो उस समय वे अकेले होते। इस बेला में उनकी कुर्सियाँ हरकत करतीं एक जगह से दूसरी जगह खिसकती देखी गईं। और उन पर बैठने वाली शक्लें प्रकट एवं गायब होती देखी गईं। अगले दिनों उनने कुछ साथियों को काम करने के लिए रोक लिया। उनने भी यह विचित्र लीला देखी। एक दिन तो एक कुर्सी छत में जाकर चिपक गई।

पुलिस द्वारा जाँच पड़ताल कराई गई पर घटनाओं का कारण विदित न होने पर उनने भी रात का काम दफ्तर में करने की बजाय घर पर करना आरम्भ कर दिया।

इंग्लैंड की वर्तमान राजमाता बचपन में स्काटलैण्ड के ‘ग्लेसिल कैसल’ में पली थीं। उस किले में भूतों की घुस-पैठ थी। खासतौर से उनके ‘ब्लू रूम’ में। कर्मचारियों और दर्शकों ने उस क्षेत्र में भयभीत करने वाली घटनाएँ देखीं और उस क्षेत्र में जाने से कतराने लगे। राजमाता ने अपने अनुभव सुनाने की अपेक्षा मुस्करा भर देने से काम चलाया पर उन घटनाओं का खण्डन उनने भी नहीं किया। लार्ड स्टेक मेरु पर तो ऐसा भय सवार हुआ कि उनने वहाँ जन्म दिन मनाना ही बन्द कर दिया।

विलासपुर के रेलवे यार्ड के समीप अंग्रेजी शासन काल में दो यूरोपियन पति-पत्नि रहते थे। जोसेफ और मेरिया। उनकी उसी बंगले में मृत्यु हो गई। झूला झूलने का उन्हें बहुत शौक था। उनके न रहने के बाद भी झूला इस प्रकार हिलता था। मानो उस पर दो व्यक्ति बैठे झोंके ले रहे हैं। उस क्षेत्र के लोग भयभीत रहने लगे तो झूला उतार दिया गया।


प्रसन्नता साधनों पर नहीं, संकल्पों पर निर्भर

मनोकामनाएँ पूरी होने से प्रसन्नता होती है? या प्रसन्न रहने से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि वस्तुओं या साधनों की उपलब्धि पर मन की प्रसन्नता निर्भर नहीं है। बहुमूल्य वस्तुओं के विक्रेता या उत्पादक अपने गोदामों में कितना माल भरे रहते हैं। उन्हें हाथों से इधर-उधर उठाते धरते हैं। तो भी न सन्तोष होता है न उपलब्धि। इसके विपरीत जन-जातियों की महिलाएँ कौड़ियों, सीपों, घुंघचियों के जेवर बनाकर पहनती और प्रसन्न होती सौभाग्यवान् मानती हैं।

बैंक के खजांची के पास लाखों रुपयों के नोट होते हैं। जौहरी का नौकर जेवरों को झाड़ बुहार कर सुसज्जित रूप से रखता है। तो भी उनके मन पर उस सम्पदा की छाप नहीं होती। इसके विपरीत छोटे बच्चे गुब्बारे, सीटी, झुनझुने जैसी कम मूल्य की वस्तुओं का उपहार पाकर प्रसन्नता से फूले नहीं समाते और जिस-तिस को अपनी प्रसन्नता भरा सम्मान दिखाते फिरते हैं और फूले नहीं समाते।

मन जो चाहता है उसमें स्थिरता नहीं होती। लड़का मैट्रिक पास फस्ट डिवीजन होना चाहता था। सो हो गया। एक दिन खुशी भी छाई रही पर दूसरे दिन से चिन्ता आरम्भ हो गई कि कालेज की कक्षा में भी प्रथम श्रेणी आनी चाहिए। यह इच्छा उत्कण्ठा दिन-दिन तीव्र होती गई जैसे-जैसे परीक्षा निकट आने लगी वैसे-वैसे चिन्ता एवं उत्कण्ठा भी बढ़ती गई। सफलता में कोई सन्देह होने लगा तो मन का असमंजस और बढ़ता गया।

व्यापार में इच्छित लाभ हो गया। इसकी खुशी समाप्त नहीं हो पाई कि अब अगले कदम से लाभ की उत्कण्ठा भी बढ़ने लगी और उसका सरंजाम जुटाने की लगन लगी इस प्रकार जब तक कोई वस्तु उपलब्ध नहीं है तब तक उसकी उत्सुकता, उत्कण्ठा और लगन लगी रहती है। मिलने पर जो प्रसन्नता होती है वह क्षण भर रहती है और अगली उससे भी बड़ी सफलता पाने की योजना बनने लगती है।

कोई ऊँचा पर प्राप्त करने के लिए कब से, कितने प्रकार के प्रयत्न किये जा रहे थे। अब वह पद मिलते ही उसके साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियाँ पूरी होते रहने की फिकर दिन-रात बनी रहती है। ऐसा न हो कि उत्तरदायित्व ठीक तरह न निभा पाने पर उपहास प्रताड़ना मिले और अवनति का आदेश मिल जाय।

सन्तान नहीं हुई तब तक उत्कण्ठा। हो गई तो उसकी हारी-बीमारी, शिक्षा, सुसंस्कारिता आदि की चिन्ताएँ छाई रहने लगीं। ऐसी दशा में मनोकामना पूर्ति का सुख किसे मिलता है? मिलता है तो कितनी देर ठहरता है। फिर वह बच्चा बड़ा होने पर आज्ञाकारी दुर्गुणी निकले, तो निन्दा का पात्र बनना पड़ता है और हर घड़ी जी जलता रहता। किसी समय सन्तान होने की व्यथा अब इस रूप में बदल गई कि वह न होती। बिना सन्तान के रहते तो ही अच्छा होता। वस्तुओं के ऊपर टिकी हुई कामनाएँ आदि और अन्त में दुःखदायी परिणाम ही साथ लिये फिरती हैं। प्रसन्नता की एक झलक तो बीच में बिजली की तरह कौंधती है और क्षण भर में काले बादलों की घटा में तिरोहित हो जाती है।

स्थायी प्रसन्नता का एक ही मजबूत आधार है कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाया जाय। व्यक्तित्व को उत्कृष्टता में बदल लिया जाय। क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का समावेश रखा जाय। आत्म-गौरव को बढ़ाने वाली विधि-व्यवस्था को अपनाये रखा जाय। उस दिशा धारा को अपनाया जाय जिसमें अन्तरात्मा को सन्तोष बना रहे। ऐसी दिशाधारा अपनाना पूर्णतया अपने हाथ की बात है। यह निजी चिन्तन और चरित्र का प्रसंग है जिसे कोई भी ऊँचा रख सकता है और ऐसी प्रसन्नता में डुबा रहने का अवसर हाथ रहता है जो किसी के छीने से न छिन सके।


स्वप्न सर्वथा निरर्थक ही नहीं होते

घटना 31 अक्टूबर 1898 की है। इन्फील्ड, बेमोन्ट कस्बे की वर्था ह्मूज नामक लड़की घर से निकली और शाम होने पर भी घर वापस नहीं लौटी। चिन्तित माता पिता 150 लोगों के साथ वर्था को ढूंढ़ते हुए शेकर ब्रिज पर पहुँचे जहाँ उसे अन्तिम क्षणों में कुछ लोगों ने देखा था। गोताखोरों की मदद से मस्कोवा झील में तीन दिन तक लड़की को खोजा गया परन्तु सभी प्रयत्न असफल रहे।

चौथे दिन 4 मील दूर गाँव से चलकर श्रीमती टाइटस नामक एक महिला वर्था के घर पहुँची और दुबारा वर्था को झील में ढूंढ़ने के लिए उसके माता-पिता से अनुरोध किया। श्रीमती टाइटस ने बताया कि कल रात्रि स्वप्न में उसने उस स्थान को देखा है जहाँ वर्था डूबी हुई कीचड़ में फँसी पड़ी है। गोताखोर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते निराश हो चुके थे। दुबारा डुबकी लगाने से उन्होंने साफ इंकार कर दिया। श्रीमती टाइटस के आत्मविश्वास युक्त दबाव के आगे उन्हें एक बार फिर डुबकी लगाने को विवश होना पड़ा। इस बार टाइटस के निर्देशन में डुबकी लगाकर गोताखोर 18 मीटर गहरे पानी में एक मिनट तक डुबा रहा और जब बाहर आया तो उसके हाथ में वर्था का शव था। उसका शरीर श्रीमती टाइटस के कथानुसार ही कीचड़ में औंधे मुँह धँसा था। उस दृश्य को हजारों लोग झील के किनारे खड़े होकर देख रहे थे। इस बात पर सभी आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे कि चार मील की दूरी पैदल तय करके एक महिला ने स्वप्न में देखे गये दृश्य के आधार पर वर्था को खोजने में किस तरह से सहायता की। स्वप्न विशेषज्ञ एवं अनुसंधान कर्ता प्रख्यात मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने कहा था कि सुनिश्चित रूप में यह घटना सुपरनार्मल फैकल्टी आफ सीअरशिप की है। सीअरशिप को सामान्यतया परोक्ष दर्शन को अतीन्द्रिय दृष्टि कहते हैं जिसका सम्बन्ध अधिकतर स्वप्नों से होता है।

सन् 1827 में घटित रेड वार्थ हत्याकाण्ड का मामला स्वप्न दूरानुभूति के माध्यम से ही सुलझ सका था। घटना इंग्लैण्ड के साफोक गाँव की मारिया मार्टिन नामक एक लड़की की है जो विलियम कार्डर नाम के एक युवा किसान के साथ घर छोड़कर भाग गई थी। कुछ दिनों दोनों साथ रहे। कार्डर का सम्बन्ध एक अन्य महिला के साथ हो जाने के कारण उसने मारिया की हत्या करके उसे पशुशाला के आँगन में दफना दिया और मारिया के माता-पिता को सूचना भेज दिया कि हम दोनों प्रसन्न हैं और विवाह कर लिया है। एक वर्ष तक इस हत्याकाण्ड का सुराग किसी को नहीं मिला।

एक रात्रि में मारिया की माँ ने एक स्वप्न में देखा कि उसकी बेटी मारिया को कार्डर ने हत्या करके बार्नबखेर की फर्श के नीचे दफना दिया है। स्वप्न का दृश्य इतना सुस्पष्ट जीवन्त, अप्रत्याशित और भयप्रद था। जिसे देखकर मारिया के माता-पिता लड़की को खोजने कार्डर के घर जा पहुँचे। स्वप्न में देखे दृश्य के अनुसार फर्श तोड़ने पर मारिया का सड़ा गला शव निकला। कार्डर को हत्या के अपराध में मृत्यु दण्ड मिला।

‘डिवाइन कामेडी’ के रचयिता प्रख्यात महाकवि, दान्ते की मृत्यु हो गई थी। उनके महाकाव्य का “पैराडाइसो” नामक अन्तिम भाग अधूरा ही छूट गया था। दान्ते के मित्रों अनुयायियों और परिवार वालों ने पाण्डुलिपि ढूंढ़ने का बहुतेरा प्रयत्न किया परन्तु कुछ भी सूत्र हाथ नहीं लगा। अतः यह निश्चित कर लिया गया कि इस अध्याय को लिखने से पूर्व ही दान्ते चल बसे थे। दान्ते के दोनों पुत्र जैकेपो और पीरो आधुनिक शैली के कवि थे साथियों ने दोनों भाइयों की डिवाइन कामेडी के अन्तिम भाग को पूरा करने के लिए प्रेरित किया।

रात्रि के एक स्वप्न में जैकेपो ने देखा कि पिता द्वारा रचित डिवाइन कामेडी के अनुपलब्ध अन्तिम भाव के 13 सर्ग पितृगृह के एक आलमारी में बन्द हैं। स्वप्न भंग होते ही जैकेपो उठ खड़ा हुआ और अर्ध रात्रि को अपने पिता के एक पुराने मित्र पीर गिआर्डिनो के घर जा पहुँचा। स्वप्न का हवाला देते हुए जैकेपो ने बताया कि पिताजी ने स्वप्न में मेरा हाथ पकड़ कर उस मकान को तथा उस स्थान को दिखाया है जहाँ वे मृत्यु के पूर्व तक रहा करते थे और वहीं पर डिवाइन कामेडी को पूरा किया था। उन्होंने एक दीवाल को छूकर बताया कि जिस वस्तु को तुम तलाश रहे हो वह यहाँ छिपी है। गिआर्डिनो जैकेपो के साथ उषाकाल में ही उस मकान पर जा पहुँचे जहाँ दान्ते की मृत्यु हुई थी। मकान मालिक को जगाकर अन्दर प्रविष्ट हुए और स्वप्न निर्देशित स्थान पर पहुँचकर-दीवाल पर लगी चटाई को हटाया। उसके पीछे खिड़की पर आर्द्रता के कारण फफूंद लगे कुछ पेपर पड़े थे। उन्हें साफ किया गया तो वे डिवाइन कामेडी के अन्तिम 13 सर्ग निकले। लड़के का स्वप्न सच्चा निकला एवं दान्ते की रचना पूर्ण हो गयी।

प्रसिमा का राजनेता विस्मार्क तीन भयंकर युद्ध लड़ने के बाद जर्मनी के बिखरे प्रान्तों को एकत्रीकरण करने और उसका चांसलर बनने में सफल हुआ था। विजय श्री वरण करने का श्रेय एक स्वप्न में देखे गये दृश्य को देते हुए विस्मार्क ने अपनी पुस्तक “थाट्स एण्ड मेमोरीज” में पूरा वर्णन लिखा है।

विस्मार्क ने स्वप्न में देखा कि वह घोड़े पर बैठा आल्पस पहाड़ी के एक ऐसे संकरे रास्ते में फँस गया है जहाँ एक ओर खड़ी चट्टानें और दूसरी ओर चिकने शिला खण्ड हैं। इस परिस्थिति में घोड़े ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया है और वह न तो घोड़े पर से उतर सकता है और न ही घोड़ा मुड़ सकता है। विस्मार्क पर्वत की ओर चाबुक के सहारे खड़ा होकर ईश्वर से सहायता के लिए प्रार्थना करता है। तत्क्षण ही चाबुक इतना ऊँचा हो गया जिसके सहारे विस्मार्क को पहाड़ी के पार के रास्ते, दृश्य जंगल और बोहेमिया प्रान्त दिखाई देने लगा। उसने इसी रास्ते से जाकर बोहेमिया पर अधिकार कर लिया है और उनके सैनिक विजयोल्लास के हाथों में बैनर लिए दिखाई दे रहे हैं।

स्वप्न के तीन वर्ष बाद विस्मार्क का युद्ध आस्ट्रिया के विरुद्ध हुआ और उसके सैनिकों ने स्वप्न में निर्देशित रास्ते से बोहेमिया में प्रवेश किया और विजयी रहे।

सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एवं लेखक विलियम ओलिवर स्टीवेन्सन ने अपनी पुस्तक “द मिस्ट्री आफ ड्रीम्स” में स्वप्न दूरानुभूतियों का वर्णन किया है। एक स्वप्न में स्टीवेन्सन के लड़के ने देखा कि एक लम्बा गोरा व्यक्ति कार दुर्घटना में घायल हो गया है और साथ बैठी महिला को हल्की-सी चोट आई है। यह घटना सन् 1938 की है।

स्टीवेन्सन परिवार फ्लोरिडा से 1000 मील दूर नानटुकेट आइलैण्ड स्थित मकान में ठहरे हुए गर्मियों के दिन व्यतीत कर रहा था। फ्लोरिडा से उनका संपर्क टूट चुका था। समाचार पत्रों के माध्यम से थोड़ी बहुत जानकारी मिल जाती थी। एक दिन के समाचार पत्र के प्रमुख पृष्ठ पर स्पेन के राज्य सिंहासन का उत्तराधिकारी युवराज काउन्ट आफ कोवाडोंगा का फ्लोरिडा में एक कार दुर्घटना में मारे जाने का सचित्र विवरण छपा था। दुर्घटना के दृश्य, साथ में बैठी मियामी की एक महिला, युवराज के घायल होने, रक्त की कमी से मृत्यु हो जाने आदि सभी दृश्य स्वप्न में देखे दृश्यों के समान थे।

वस्तुतः निद्राकाल में अचेतन मस्तिष्क समष्टि में संव्याप्त अदृश्य विचार प्रवाह के अधिक समीप रहता है। स्वप्नावस्था में मस्तिष्क केन्यूरान्स अत्यन्त सक्रिय पाये गाये हैं, विशेष कर आर. ई. एम. निद्रा में दायें “पैराइटल कार्टेक्स” के। वैज्ञानिकों का मत है कि दूरानुभूति, पूर्वाभास ही नहीं अदृश्य से संपर्क का अविज्ञात केन्द्र इसी स्थान पर होना चाहिए। साधना द्वारा भी इस प्रस्तुत पड़े केन्द्र को जगाया एवं वे समस्त अनुभूतियां होती रह सहती हैं जो स्वप्नों के माध्यम से कुछ तो अनायास ही हो गयीं।


तन कर खड़े रहो जीत तुम्हारी है।

मनोवैज्ञानिक डा. नारमन विन्सेंट पीले के अनुसार मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास उसके चिन्तन और चरित्र पर निर्भर करता है। निषेधात्मक या विधेयात्मक चिन्तन मनुष्य को हेय नर-पशु अथवा उठा हुआ देव मानव बना देता है। विधेयात्मक चिन्तन एक प्रकार की विचार शैली है जिसमें व्यक्ति विषम या प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना मनोबल ऊँचा बनाये रखता है और अच्छे परिणामों की आशा रखता है। विपन्न परिस्थितियाँ, प्रतिकूलताएँ एक नया स्वर्णिम सुअवसर लेकर आती हैं जिनसे वह सबक सीखना और अपने व्यक्तित्व को निखारना, प्रखर बनाना अनिवार्य समझता है। विधेयात्मक पक्ष की ओर देखना, सोचना, संकल्पयुक्त विवेकशील मन की एक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के चयन पर निर्भर करती है।

अच्छाइयों में आस्था रखने वाले आत्मविश्वासी उत्साही व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में यह बात सदैव जीवन्त बनी रहती है कि ‘प्रगति एक दरवाजा रास्ता बन्द हो जाने पर सुनिश्चित रूप से दूसरे अनेक रास्ते खुलेंगे ही।’ विधेयात्मक दृष्टिकोण अपनाने वाले सदैव बुराइयों से अपना पीछा छुड़ाने और अच्छाइयों को अपनाने का प्रयत्न करते हैं। फलतः अच्छाइयाँ उनके जीवन और दृष्टिकोण का अंग बन जाती हैं। ऐसे व्यक्ति उज्ज्वल भविष्य की ओर देखते हैं और अन्धकारमय क्षणों, प्रतिकूल परिस्थितियों में अधिक प्रफुल्ल, उत्पादक और रचनात्मक दिशाधारा अपनाते हैं। यह मनोदशा ही उन्हें द्रुतगति से सफलता की ओर ले जाती है। उत्साही व्यक्ति ही विघ्न-बाधाओं से लोहा लेते और उन्हें निरस्त करते हुए प्रगति-पथ पर आगे बढ़ते हैं।

प्रख्यात विचारक एवं मनीषी विलियम जेम्स के अनुसार संसार में दो तरह के व्यक्ति पाये जाते हैं। पहले हैं- टफ माइण्डेड (सख्त स्वभाव वाले) तथा दूसरे हैं- टेण्डर माइण्डेड (नरम स्वभाव वाले संवेदनशील) व्यक्ति। नरम स्वभाव वाले व्यक्ति कठिनाइयों विघ्न-बाधाओं के उपस्थित हो जाने पर विचलित हो उठते हैं। आलोचना किये जाने पर तो उनका दिल ही बैठ जाता है। वे ऐसे व्यक्ति होते हैं जो रिरियाते चीखते-चिल्लाते भर हैं और कुछ न कर पाने के कारण असफलता ही उनके हाथ लगती है। सख्त मिजाज वालों की स्थिति इनसे भिन्न होती है। जीवन के हर क्षेत्र में वे सक्रिय और सफल होते देखे गये हैं। कैसी ही विषम कठिनाई या प्रतिकूलता क्यों न हो उससे वे हार नहीं मानते। प्रतिकूलता को ईश्वर का वरदान समझ कर नई सूझ-बूझ के साथ उसका सामना करते हैं। विश्व प्रख्यात लेखक स्काट निवासी थामस कार्लाइल में ऐसे ही व्यक्ति थे जिन्हें अपनी सारी जिन्दगी फाकामस्ती में काटनी पड़ी थी फिर अध्यवसाय के बलबूते वे सफलता की चरम सीमा तक पहुँचे थे। उनकी समाधि पर बने चबूतरे के एक ओर खुदी उनकी कुछ उनकी प्रेरक पंक्तियाँ आज भी स्काटवासियों के लिए ही नहीं वरन् समस्त विश्ववासियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी हुई हैं। प्रेरक पंक्तियों का निष्कर्ष है “न तो कभी निराश हो और न कभी हार मानो- उठो, खड़े हो जाओ और संघर्ष करो जब तक विजयी न हो जाओ। ईश्वर तुम्हारी सहायता करेगा।” कार्लाइल कहते हैं- ‘जीवन हममें से प्रत्येक से यही पूछता है कि क्या तुम बहादुर बनोगे? अथवा कायर बनना पसन्द करोगे? निश्चय ही हमें मजबूत, निर्भय और उत्साही बनना होगा। विधेयात्मक चिन्तन करने वाला व्यक्ति कायर नहीं हो सकता। वह स्वयं के जीवन में, मानवता और ईश्वर में विश्वास रखता है, अपनी योग्यता और क्षमता को पहचानता है। वह निर्भीक और अपराजेय होता है। जो कुछ सामने आता है उसी से अपने उपयोग की अच्छाइयाँ छाँट लेता है।

भली-बुरी परिस्थितियों का निर्माण करना, बहादुर या कायर बनना व्यक्ति के अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। विधेयात्मक पक्ष अपनाने पर कायर व्यक्ति भी धीरे-धीरे निडर और हिम्मत वाला बन जाता है उसकी सारी परिस्थितियाँ पलट जाती हैं। अपनी त्रुटियों को पहचानना, उन्हें सुधारना, किये पर पश्चाताप करना, दण्ड पाना और भविष्य में वैसा न होने देने को कृत-संकल्पित होना अनिवार्य है। मन में सद्विचारों, सत्कर्मों और दृढ़-संकल्पों की त्रिवेणी जहाँ सदैव हिलोरे मारती रहती है वहाँ प्रगति का रुका हुआ अवरुद्ध मार्ग अपने आप ढह जाता है। सद्विचारों में असीम शक्ति होती है। विचार गत्यात्मक, जीवन्त और रचनात्मक हों तो व्यक्ति परिस्थितियों को बदल सकता है, उन पर नियन्त्रण कर सकता है और अपना भविष्य सुखमय बना लेता है। लेकिन यदि विचार हेय स्तर के घृणा, बेईमानी और असफलता से भरे हुए हैं तो वे व्यक्ति तथा समाज के लिए विनाशकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।

डिजराइली कहा करते थे कि हमें अपने मस्तिष्क को महान विचारों से भर लेना चाहिए तभी हम महान कार्य सम्पादित कर सकते हैं। लोग क्षुद्र विचारों अपने बारे में, अपने बीवी बच्चों, परिवार, व्यापार आदि के सम्बन्ध में ही सदैव सोचते और मरते खपते रहते हैं। परिणामतः उसी स्तर के प्रतिफल भी उन्हें हाथ लगते हैं। यह एक तथ्य है कि जितना महान दृष्टिकोण और ऊँचे विचार होंगे उसी अनुपात में हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता जायेगा। मनोवैज्ञानिकों की अवधारणा है कि मनःमस्तिष्क या अन्तःकरण में उठने वाली वैचारिक तरंगें कल्पनाएं या भावनाएँ हमारे व्यक्तित्व को प्रकाशित करती हैं।

प्रख्यात मनःचिकित्सक मनोवैज्ञानिक एवं लेखक डा. नार्मन विन्सेंट पीले का कहना है कि जीवन के ही क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए ध्यान देने योग्य प्रमुख बात है- ध्येय उद्देश्य का सुनिश्चित होना। आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, भौतिक अथवा आध्यात्मिक उन्नति में से कुछ भी उद्देश्य हो सकता है। परन्तु मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति करना है। बाकी अन्य सुविधाएँ तो उसके इस उद्देश्य की प्रगति में मात्र सहायक भर हैं।

विलियम जेम्स की मान्यता है कि महान प्रयासों को प्रयोजनों को सफलतम बिन्दु तक पहुँचाने में प्रमुख बाधा ‘थकावट’ का आना, उमंगों का ठण्डा पड़ जाना है। यह एक प्रकार की ऊब या उचाट है जो थोड़े से असामान्य प्रयास करने पर उत्पन्न होती है। थोड़े प्रयत्न के बाद ही व्यक्ति थक जाता है और हाथ में लिए कार्य को बीच में ही छोड़ देता है। यद्यपि ईश्वर ने मनुष्य के अन्दर विपुल शक्ति का भाण्डागार छिपा रखा है जिसे थोड़ी-सी कोशिश करने पर जागृत किया जा सकता है।

मनःमस्तिष्क से निषेधात्मक चिन्तन को निकालने के लिए बोस्टन के प्रख्यात चिकित्सक डा. सारा जार्डन का सुझाया गया मार्ग सर्वमान्य है। डा. जार्डन का कहना है कि प्रत्येक दिन सुबह अपने मस्तिष्क को विचार से रिक्त कर उसे शैम्पू से धोइये। समस्त वैचारिक गन्दगी युक्त धूल-निषेधात्मक चिन्तन को बुहार बाहर करें और उस रिक्त स्थान की पूर्ति सद्विचारों को मन में धारण करें। दिन भर उन्हीं सद्विचारों से अपने को ओत-प्रोत रखें। प्रतिदिन नये विचारों को अपनाने और अपनाये हुए विचारों को स्मृति पटल पर दुहराते रहने से मनःसंस्थान इतना शक्तिशाली हो जाता है कि बुरे विचार पास तक नहीं आ पाते। प्रकारान्तर से यह आत्म शोधन का संकेत है। समाज में अगणित व्यक्तियों की तरह विचार और चरित्र भी भरे पड़े हैं। उनका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है पर हमें ग्रहण वही करना चाहिए जो हिम्मत बढ़ाते और भटकाव के क्षणों में मार्गदर्शन करते हैं।


Quotation

अच्छा सोचना और अच्छी योजना बनाना बुद्धिमानी है पर भाग्यवान वे हैं जो महान कार्य करने पर तुल जाते हैं और उन्हें पूरा करके छोड़ते हैं।

** ** ** **


Quotation

वे ही अजर-अमर हुए जिनने जीवन ठीक तरह से जाना।


अत्यधिक गम्भीर न रहें।

गम्भीर रहना वैसे सामान्यतया बुरा माना जाता है और समझा जाता है कि हँसना-हँसाना, हल्के-फुल्के रहना अच्छा होता है। इसमें कोई शक नहीं कि मनुष्य को प्रसन्न चित्त रहना चाहिए किन्तु, गम्भीर रहना भी एक कला है। यहाँ पर गम्भीरता से तात्पर्य जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने से है। प्राचीन काल से ही जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने की नीति प्रचलित थी इस चिन्तन को प्रकारान्तर से दूरदर्शिता पूर्ण कहा जा सकता है।

मनीषी, दार्शनिक तथा महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न लोग हमेशा जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर रहे हैं। वर्तमान युग में लोग चिन्तित रहते हैं गम्भीर नहीं। चिन्तित रहना एक बात है और गम्भीर रहना दूसरी।

जो चिन्तित रहते हैं, वे कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाते, केवल चिन्ता में घुलते रहते हैं। किन्तु जो गम्भीरतापूर्वक किसी एक विषय पर चिन्तन करते रहते हैं वे महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत कर अपना तथा समाज का भला करते हैं।

आधुनिक युग में लोग चिन्ता और तनाव से बचने के लिए हल्के-फुल्के मनोरंजन तथा नशा खोरी का सहारा लेते रहते हैं। ठाली बैठकर गपशप करना हल्के-फुल्के तथा गन्दे मजाक करना, ठिठोली करना और उसी में समय काट देना ही एक उनका उद्देश्य होता है। ऐसे लोग अन्दर से चिन्तित तथा तनावग्रस्त होते हैं और बाहर से सस्ते मनोरंजन का आधार लेकर प्रसन्न रहते हैं।

इसके विपरीत जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने वाले लोग यद्यपि सस्ते मनोरंजन से अपने मन बहलाव के बहाने नहीं खोजते प्रत्युत समस्याओं के महत्वपूर्ण हल निकालते और वास्तविक प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। मनोरंजन के पुराने साधन सिनेमा, सिगरेट, शराब और गन्दे नाच गाने अब बीते युग की बातें होती जा रही हैं। इन दृष्प्रवृत्तियों से जितनी जल्दी मुक्ति मिले अच्छा है। अब तो प्रबुद्ध वर्ग इलेक्ट्रानिक खोजों चाँद पर जाने या अन्तरिक्ष शोधों में व्यस्त रहना ही अपना मनोरंजन समझता है।

वस्तुतः गम्भीर दृष्टिकोण अपनाकर भी स्वस्थ मनोरंजन किया जा सकता है। कब गम्भीर रहना व कब हल्का रहना यह भी एक कला है। बच्चों का विकास करने के लिए हिल-मिलकर समय काटने में सबको बड़ा आनन्द आता है। और एक महत्वपूर्ण उद्देश्य की दायित्व की पूर्ति होती है। ऐसे कार्यों में मन लगाना जिससे स्वस्थ मनोरंजन भी हो और उस मनोरंजन से लाभ भी मिले, गम्भीर लोगों को प्रिय होता है। इसी में वे स्वयं को तनाव मुक्त कर लेते हैं।

उद्देश्यों आदर्शों के प्रति गम्भीर रहने में हर्ज नहीं इससे अपना चित्त एकाग्र रखने और हाथ में लिए काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने उसका महत्व विचारने का अवसर मिलता है किन्तु यह गम्भीरता ऐसी नहीं होनी चाहिए जो उदासी उपेक्षा जैसी प्रतीत हो और लगे कि मनुष्य किसी परेशानी में डूबा हुआ है। ऐसा होने पर लोग दूर रहने और बचने की कोशिश करते हैं। इस स्थिति में मनुष्य अपने को अकेला और जीवन को नीरस अनुभव करता है।

गम्भीरता के दबाव को हल्का करने के लिए हँसने-हँसाने की आदत डालनी चाहिए। पर वह होनी बाल सुलभ चाहिए उसमें व्यंग, उपहास, तिरस्कार जैसी भावनाएँ मिल जाने से वह हँसी भी विषाक्त हो जाती है। उसमें तो दूसरों को चोट पहुँचाने, किसी अनुपस्थित व्यक्ति की या अपनी अटपटी बातों की चर्चा करते हुए परिहास का अवसर ढूंढ़ा जाता है।

गाँधी जी हँस मुख थे। उनके सामने देश की अत्यन्त गम्भीर समस्यायें रहती थीं तो भी वह थोड़ी-थोड़ी देर में हँसते रहने के अवसर ढूंढ़ते रहते थे। कहते थे कि गम्भीरता को सुरक्षित रखने के लिए और अपने को बोझिल न होने देने के लिए हँसना भी एक मानसिक टॉनिक है।

परिहास प्राणियों के मध्य एकता, समता और समस्वरता लाता है। यदि ऐसा न होता तो विषमता की आग में चेतना की दुनिया कभी की जल-भुनकर नष्ट हो गई होती।

यह मान्यता सही नहीं है कि बुद्धिमत्ता यथार्थवादी और कठोर होती है इसलिए उसे भावुकता वश परिहास की आवश्यकता नहीं होती और न उसके लिए अवसर मिलता है। यदि ऐसा रहा होता तो बुद्धिमत्ता बड़ी कर्कश, कुरूप, बोझिल और संकट उत्पन्न करने वाली हो गई होती। मानवी परिहास की प्रवृत्ति संसार की सबसे बड़ी जीवन्त सुन्दरता है। यों प्रकृति की संरचना, ऋतुओं का परिवर्तन, चित्र-विचित्र वनस्पतियाँ और प्राणियों की विशेषताएँ स्वयमेव में ऐसी हैं कि मनुष्य उन्हें अपनी सौंदर्य दृष्टि से देखने पर मुग्ध होकर रह जाय।

यह कथन सही नहीं है कि उच्चस्तरीय व्यक्ति गम्भीर रहते हैं। इस गम्भीरता के पीछे भी उनके लक्ष्य विशेष का उत्साहवर्धक और आशाजनक सौंदर्य समाहित रहता है।


Quotation

जिस प्रकार सूखे बाँस आपस की रगड़ से ही जलकर भस्म हो जाते हैं। उसी प्रकार अहंकारी व्यक्ति आपस में टकराते और कलह की अग्नि में जल मरते हैं।


बैजामिन फ्रेंकलिन (kahani)

बैजामिन फ्रेंकलिन एक बार घाटे में आ गये और बीमार पड़े। घोर कठिनाई के दिनों उन्होंने एक मित्र से बीस गिन्नियाँ उधार माँगी, जो उन्हें मिल गई।

बुरा समय गुजर गया। फ्रेंकलिन प्रेस और पत्रकार का व्यवसाय करते हुए खुशहाल हो गये। मित्र का ऋण वापस करने वे पहुँचे और रुपया उनकी मेज पर रख दिया।

कर्ज दिये बहुत समय बीत गया था। वह घटना को भूल चुका था। स्मरण दिलाया तो उसने कहा था- यह पैसा मैंने आपको सहायता रूप में दिया था, लौटने की कोई आशा न रखी थी। इस पैसे को आप ही अपने पास रखें।

दोनों ओर से आना-कानी चलती रही। अन्त में फैसला यह हुआ कि, यह राशि अमानत के रूप में जमा रखी जाय और किसी जरूरत मन्द की आवश्यकता देखते हुए उसी प्रकार उधार इस शर्त पर दे दी जाय कि वह जब कभी लौटाने की स्थिति में होगा तो उसे किसी अन्य जरूरत मन्द को देने में हिचकेगा नहीं।

तब से अमेरिका में वह प्रचलन अभी तक जारी है। मुक्त में सहायता प्राप्त करके अपनी दीनता प्रदर्शित न करेगा वरन् किसी से लिये हुए को वापस करने की नीयत रखेगा। आवश्यक नहीं कि जिससे लिया गया है उसी को दिया जाय।

फ्रेंकलिन का यह धन अब अमेरिका के विभिन्न व्यक्तियों के पास बीस करोड़ डालर के रूप में घूम रहा है। लोग एक दूसरे से सहायता तो लेते हैं पर साथ ही ब्याज समेत अन्य जरूरत मन्द को देने की जिम्मेदारी का भी ध्यान रखते हैं।


देवात्मा हिमालय की खोज अभी बाकी है।

दिव्य-दर्शियों का मत है कि ब्राह्मी चेतना की सघन मात्रा का धरती पर विशिष्ट अवतरण देवात्मा हिमालय के हृदय केन्द्र से ही होता है। भौतिक दृष्टि से वैज्ञानिकों के लिए शक्ति के आवागमन केन्द्र उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव हो सकते हैं। किंतु अध्यात्म क्षेत्र का ध्रुव केन्द्र यही है। इस क्षेत्र में भ्रमण करते, निवास करते अथवा साधना तपश्चर्या करते हुए यह अनुभूति सहज ही की जा सकती है। जहाँ थियोसाफी मान्यतानुसार इसे योगियों की पार्लियामेण्ट कहा गया है। वहाँ श्रीमद् भागवत के बारहवें एवं दसवें स्कन्द में हिमालय में दिव्य पुरुषों के निवास होने की बात विशिष्ट माहात्म्य सहित लिखी है।

अभी भी इसके बारे में जन-सामान्य की जानकारी अत्यल्प है। मात्र पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों की प्रसिद्धि है और इनमें भी वे जो मोटर यात्रा द्वारा सीधी पहुँच में हैं। हिमालय की शोध में अभी बहुत कुछ ढूंढ़ा जाना बाकी है। तीर्थयात्री और स्थानीय निवासी भी वहीं तक पहुँच पाए हैं, जहाँ आवागमन सुगम है, पानी तथा खाद्य उपलब्ध करने के साधन हैं। वस्तुओं के आदान-प्रदान के लिए भी एक स्थान से दूसरे को जाना पड़ता है। मात्र प्रसिद्ध मठ-मन्दिर, जो धार्मिक आकर्षण के केन्द्र हैं, में पहुँचने पर आजीविका के कुछ स्त्रोत मिल पाते हैं।

आज से लगभग 1 सहस्र वर्ष पूर्व केवल 30 वर्ष की आयु में आद्य शंकराचार्य ने हिमालय यात्रा कर ज्योतिर्मठ की स्थापना की थी। समीपस्थ बद्रिकाश्रम एवं केदारनाथ के बीच का मार्ग अभी भी यात्रियों के लिए उसी प्रकार अनजाना एवं अगम्य है जैसा कि उस समय रहा होगा।

आज भी चारों धाम, पंचकेदार और पंचबद्री की समग्र उत्तराखण्ड यात्रा मोटर यातायात उपलब्ध होने पर भी एक माह में नहीं की जा सकती। क्योंकि ये स्थान ऊँचाई पर होने व कई स्थानों पर पैदल मार्ग होने के कारण समुचित समय माँगते हैं।

सर सिडनी बर्नार्ड पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बद्री केदार की गहन चोटियों में पहुँच की। उनका कहना है कि इतिहास के प्रारम्भ से ही शिवलिंग स्थित मानसरोवर एक पवित्र तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि ‘बद्रीनाथ शंकराचार्य के पूर्व भी वहाँ बौद्ध तीर्थ स्थल था। वहाँ बौद्धकालीन अवशेष पाए गए हैं।

पाण्डवों ने भी हिमालय आरोहण किया था। ब्राह्मण इतिहास हिमालय के इस क्षेत्र पर एक नया प्रकाश डालता है। इससे ज्ञात होता है कि यह समग्र क्षेत्र तब तान्त्रिक सिद्धियों के लिए प्रसिद्ध था। कुछ ऐसे प्रमाण हैं कि केदारनाथ, नाथ पंथी साधनाओं का भी पीठ रहा है। विशेषतः बगुला मुखी शक्ति साधना का। इसके साथ ही सौम्य आरण्यक साधनाएँ भी इस क्षेत्र में होती थीं।

“कनफटिया सम्प्रदाय” का यहाँ धार्मिक एवं राजनैतिक प्रभुत्व कभी था। अब तो मुश्किल से भी इस गुह्य साधना का ओर-छोर मिल पाता हो। पहाड़ की चोटियों पर बने मठ गुरु गोरखनाथ के पन्थ के हैं और देवियों के मठ कुछ विचित्रता लिए हुए हैं। लगता यह है कि प्रारम्भ में सात्विक साधना स्थली रहने के बाद वे मध्यकाल में वामाचारी तन्त्र साधना के विशेषज्ञों के हाथ आ गए। तान्त्रिक मत में तीर्थयात्रा साधना का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है इसी कारण इस क्षेत्र की तीर्थयात्रा का प्रचलन आदि काल से है।

केदारनाथ से भृगु श्रृंग का दर्शन होता है। यहीं से गंगा का उद्भव माना जाता है। गंगा की मूलधारा भागीरथी का ग्लेशियर (गंगोत्री ग्लेशियर), जो विश्व में सबसे बड़ा माना गया है, यहाँ से आरम्भ होकर उत्तर पश्चिम की ओर स्वर्ग रोहिणी चतुरंगी श्रृंखलाओं से होता हुआ शिवलिंग-सुमेरु के समीप गोमुख में प्रकट होता है। भागीरथी के अतिरिक्त अलकनन्दा व मन्दाकिनी का मूल स्त्रोत भी केदारनाथ के दाँये-बाँये हैं। इस तरह यह क्षेत्र पवित्र पुण्य तोया गंगा का आदि स्त्रोत है जहाँ कभी उसका अवतरण भागीरथी की साधना की परिणति रूप हुआ था। केदारनाथ से दिखाई देने वाले ऊँचे पर्वत श्रृंग को कैलाश नाम से सभी पहाड़ी लोग पुकारते हैं। उनका तात्पर्य यहाँ समग्र अगम्य दुर्गम हिमालय से होता है। आध्यात्मिक मान्यतानुसार शिवलिंग ही कैलाश व नन्दन वन के समीपस्थ झील ही मानसरोवर है। तिब्बत वाले कैलाश की संगति इतिहास व स्थलों से कुछ मिलती नहीं।

पशुपति और केदारनाथ दोनों ही स्थानों पर शिव-शक्ति का पूजन होता है। यहाँ ताँत्रिक विधि से शिवार्चन होता पाया जाता है। जागेश्वर, आदिबद्री, ऊखीमठ, मठमहेश्वर, तुँगनाथ, गोपेश्वर, त्रियुगी नारायण आदि स्थानों पर भी शैव मतानुसार उपासना की जाती है।

इसी के साथ-साथ यहाँ वैष्णव मत को भी भिन्न-भिन्न स्थानों पर देखा जा सकता है। यमुनोत्री से गंगोत्री एवं केदार से बद्री तक जो उपासना स्थलों की श्रृंखलाएं हैं, वे विविधता की परिचायक है। अपनी स्थिति, प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण तो वे देखने योग्य हैं ही, सिद्ध पीठ शक्ति स्थल होने के नाते भी वे जाने योग्य हैं। वहाँ समय निकालकर पैदल जाने एवं साधना करने का अपना अलग आनन्द है। फिर भी अभी इस क्षेत्र की जनसाधारण में चार धामों के अतिरिक्त जानकारी का अभाव ही है।

हिमालय के हृदय का बहुत-सा क्षेत्र अनजाना पड़ा है और वहीं दिव्य जड़ी-बूटियों का तथा सूक्ष्म शरीर में तपश्चर्या करने वालों दिव्यदर्शी साधकों का निवास है।

गंगोत्री से बद्रीनाथ सीधे पर्वत मार्ग से मात्र 40 मील है पर गम्य मार्ग पर चलने से 200 मील से अधिक की यात्रा करनी पड़ती है क्योंकि इस मध्य बहुत ऊँचे और दुर्गम पर्वत श्रृंग हैं। इसी प्रकार बद्रीनाथ और केदारनाथ का मध्यवर्ती क्षेत्र भी ऐसा है जिसे सच्चे अर्थों में फूलों की घाटी कहते हैं। अब हेम कुण्ड और तपोवन क्षेत्र मनुष्यों के आवागमन से भरने लगा है। इसलिए उनकी भव्यता तो बढ़ी है पर दिव्यता घटी है। साधक स्तर के व्यक्तियों के स्थान पर पिकनिक पर्यटन प्रधान रुचि वाले जमघट अधिक हैं।

कैलाश-मानसरोवर यात्रा का शास्त्रों में बहुत माहात्म्य वर्णन है। ऐतिहासिक तथा भौगोलिक दृष्टि से भी केदारनाथ के निकटवर्ती श्रृंग कैलाश कहे जाने के उपयुक्त माने जा सकते हैं और गान्धी सरोवर को मानसरोवर माना जा सकता है- जो मंदाकिनी के स्त्रोत के समीपस्थ है, शिवलिंग व इस पर्वत श्रृंग में से किसी को भी मान्यता दी जा सकती है। इस मान्यता को उभारना इसलिए भी आवश्यक हो गया कि पिछले दिनों जो कैलाश माना जाता रहा है वह चीन के चंगुल में चला गया और मार्ग में डाकुओं का खतरा पहले से भी अधिक बढ़ गया है। वह स्थान वस्तुतः वातावरण की दृष्टि से भी अब साधना स्थल नहीं रहा।

परिचित जड़ी-बूटियों को उस क्षेत्र के निवासी खोदकर बाजार में बेचते और गुजारा चलाते हैं। उनके उत्पादन की सुव्यवस्थित योजना न होने तथा काटने पर नियन्त्रण न रहने से वे अब दिनों-दिन घटती जाती है। भेड़-बकरी चराने वाले उस क्षेत्र में जा निकलते हैं तो घास और जड़ी-बूटियों सभी का सफाया कर देते हैं।

यदि ब्रह्म कमल जिसकी सुगन्ध से अनायास ही समाधि लग जाती है, संजीवनी जिसमें मृत को जीवित करने जैसा गुण है- जिसे हनुमान जी लक्ष्मण जी के लिए ले गये थे, ज्योति बूटी जो रात्रि में दीपक की तरह प्रकाशवान कही जा रही है, को पुनः खोजा जाए तो साधना एवं चिकित्सा दोनों ही क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत हो सकती हैं। हिमालय जितना विशाल है, उतना ही रहस्यमय भी है। अभी इसमें और गहरी पैठ लगाने की आवश्यकता है।


Quotation

आदर्शों से प्रेम करो ताकि वह सीमित न रहे और उसके प्रकाश में हर सज्जन प्रिय-पात्र बन जाय।


दैव सत्ताओं का धरा द्वार पर आगमन

सर्वांगपूर्ण मनुष्य जिस बीज से उत्पन्न हुआ है, उसके कोई लक्षण इस धरती की रासायनिक संरचना से दृष्टिगोचर नहीं होते। यहाँ सभी कुछ ऐसा अलौकिक है कि यदि उसे दैवी अनुदान कहा जाय तो कुछ ऐसा अलौकिक है कि यदि उसे दैवी अनुदान कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

पृथ्वी पर यदा-कदा ऐसे विलक्षण घटनाक्रम घटते रहते हैं, जो इस मान्यता की पुष्टि करते हैं। उड़न-तश्तरियों (यू. एफ. ओ.-अनआइडेन्टी फाइड फ्लाइंग आब्जेक्ट्स) का पृथ्वी के वायु मण्डल में प्रकट होकर फिर चले जाना ऐसी ही अबूझ पहेलियों में से है।

पश्चात् देशों में उड़नतश्तरियों को यू.एफ.ओ. के नाम से जाना जाता है। सन् 1969 में अमेरिका की हवाई सेना ने यू. एफ. ओ. अनुसंधान की 22वीं वर्षगाँठ को मनाया। इसकी रिपोर्ट का 8400 पृष्ठों में प्रकाशित किया गया। जिसमें 12864 मायावी दृश्यों का प्रदर्शन किया गया है।

अमेरिका के 54 प्रतिशत व्यक्ति उड़नतश्तरी को सत्य मानते हैं। 11 प्रतिशत का मत है कि इस प्रकार के दृश्य ब्रह्मांड की विलक्षणता के कारण हो सकते हैं। अमेरिका के प्रसिद्ध उड़नतश्तरी विशेषज्ञों (यूफोलौजिस्ट) जे. एलैन हाइनीक एवं जेम्स हार्डर को मान्यता दी जाती है। वे आजकल कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय में कार्यरत हैं। इन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान एवं अनुभवों से यू. एफ. ओ. के अस्तित्व को प्रमाणित किया है। समय-समय पर जिन अनेकों व्यक्तियों ने उड़न तश्तरियां देखीं उनके व्यक्तित्वों को भी इसने एकत्र किया है।

18 अक्टूबर 1973 को मैंसफील्ड के पास 750 मीटर की ऊँचाई पर एक अलौकिक दृश्य देखा गया। अमेरिकी सेना के कैप्टन लॉरेन्स कौहन ने उस चमकीले दृश्य को देखा तो उसने भयभीत होकर अपने हैलीकाप्टर को नीचे उतारा। उसके साथ चार व्यक्ति और भी थे। कैप्टन लॉरेंस ने बताया कि धातु निर्मित यह एक उड़नतश्तरी 150 मीटर की ऊँचाई पर उनके निकट स्थिर बनी रही। इसकी लम्बाई 15-18 मीटर तक थी। उसने बताया कि मुझे अचानक धक्का सा लगा। मेरा हैलीकाप्टर उस विचित्र तश्तरी की आकर्षण शक्ति से 1000 मीटर की ऊँचाई तक उठता चला गया।

2 नवम्बर 1971 को डैल्फोस के निवासी रोनाल्ड जौन्सन ने अचानक ही एक गड़गड़ाहट की ध्वनि सुनी। जमीन से 60 से.मी. की ऊँचाई पर उसने एक चमकीले दृश्य को देखा और वह उड़न तश्तरी सीधी ऊपर की ओर बढ़ती चली गयी। रोनाल्ड 10 मिनट तक बेहोश रहा। उसने 25 मीटर व्यास की उड़नतश्तरी को अपने माता-पिता को भी दिखाया। धीरे-धीरे यह चमक कम होती चली गयी।

5 नवम्बर 1975 को सात नवयुवक लकड़हारे अपने घर को लौट रहे थे। अचानक ही उन्हें परिभ्रमण करती हुई उड़न-तश्तरी दृष्टिगोचर हुई। 22 वर्षीय ट्रेविस्वाल्टन ट्रक से कूद कर इसकी ओर दौड़ा। उसके साथी तो भयभीत होकर लौट गये। लेकिन वह वहाँ से गायब हो गया। 6 दिन बाद उसने अपने साथी हैवर को टेलीफोन से सूचित किया कि “मुझे यू. एफ. ओ. में व्यक्ति ले गये थे, जिसकी लम्बाई 15 मीटर थी। उनकी विशाल भूरी आँखें थी और सिर पर बाल भी नहीं थे।’’ इन सभी व्यक्तियों के साक्षात्कार के लिए लाइडिटैक्टर का प्रयोग किया गया, जिसमें पाँच व्यक्तियों को प्रामाणित ठहराया गया।

श्रीमती जान्सन ने उड़न तश्तरियों के फोटो भी लिए हैं। क्योंकि उनके कृषि फार्म पर ये कई बार उतर चुकी हैं। इनमें भेड़िये जैसी आकृति की लड़की को उन्होंने अपने समीप आते हुये कई बार देखा है।

यू. एफ. ओ. की विलक्षणताओं का पता लगाने हेतु ‘एरियल फैनोमैना रिचर्स आर्गनाइजेशन’ की स्थापना हुई है। जिसमें विभिन्न प्रकार की घटनाओं को प्रामाणिकता की कसौटी पर कसा जाता है।

इतिहासकार एरिक व्होन दानिकेन के अनुसार विश्व के परिभ्रमण के समय उन्होंने ऐसे तथ्य एकत्र किये हैं जिनसे ज्ञात होता है कि बाह्य अन्तरिक्ष के जीवधारी पृथ्वी पर आये हैं।

अफ्रीका के दोयो जाति और दक्षिण अमेरिका के कयापो जाति का विश्वास है कि उनके त्यौहारों में उनके देवता अंतरिक्ष से आते हैं और त्यौहार के बाद चले जाते हैं। पेरू देश के लीमा शहर के पास मरुस्थल में दो यान उतरने का प्रमाण उन्होंने पाया है। अपने ग्रह के नहीं हैं। इनके लोक-लोकान्तरों से आने की बात ही सही मालूम पड़ती है।

सन् 1979 में ब्रेवेर्सवाइल, इन्डियाना में पत्थरों के कब्रिस्तानी टीले की खुदाई कराने पर 9 फीट आठ इंच लम्बा एक नर कंकाल निकला। कंकाल की गरदन के चारों तरफ माइका से बना हार लिपटा हुआ था और पैर के पास कच्ची मिट्टी से बनी मनुष्य की एक प्रतिमा खड़ी थी। 5 फीट ऊँचे और 71 फीट घेरे वाले इस टीले की खुदाई इन्डियाना के सुप्रसिद्ध पुरातत्वज्ञों, न्यूयार्क तथा ओहियो के मूर्धन्य वैज्ञानिकों और एक स्थानीय चिकित्सक डा. चार्ल्स ग्रीन के देखरेख में कराई गई थी। यह टीला मि. राबिन्सन के निजी स्वामित्व में था। अतः नर कंकाल राबिन्सन के पास ही सुरक्षित एक मिल में रखा गया था। बाद में यह एक भयंकर बाढ़ में बह गया। इस विलक्षण आकार-प्रकार के जीव की पृथ्वी वासी होने की मान्यता नहीं स्पष्ट होती। इस कंकाल की बनावट भी विचित्र थी तथा यह अधिक पुराना भी न होने से लगता है कि पिछले एक दो शतकों में कभी किसी उड़नतस्तरी के ध्वस्त होने पर यह यहीं रह गया।

सुप्रसिद्ध जीवाश्म विज्ञानी विलियम जे. मीस्टर को पुराने जीव जन्तुओं के फासिल्स एकत्र करने का बहुत शौक था। जून सन् 1968 में ट्राइलोवाइट नामक अकेशरुकीय जीव के जीवाश्म ढूंढ़ते हुए वे सपरिवार डेल्टा, यूटाह से 43 मील पश्चिम एन्टिलोप स्प्रिंग पहुँच गये। यह स्थान ट्राइलोवाइट से भरा पूरा माना जाता था। मीस्टर ने जैसे ही दो इंच मोटे पत्थर के पहिये पर हथौड़े से वार किया। वैसे ही शैल पट्ट दो भागों में पुस्तक की भांति खुल गया। शैल पट्ट पर सैण्डल पहने हुए मनुष्य के पद चिन्ह अंकित थे। सैण्डल पहने हुए व्यक्ति द्वारा पैरों तले अनेकों जीवित ट्राइलोवाइट कुचल दिये गये थे। सैण्डल सवा दस इंच लम्बी और साढ़े तीन इंच चौड़ी थी।

ट्राइलोवाइट, केंकड़े और झींगी समुदाय के सदस्य थे जो समुद्र में पाये जाते थे। 320000000 वर्ष तक फलते-फूलते रहने के बाद 280000000 वर्ष पूर्व ट्राइलोवाइट विलुप्त हो गये थे। मनुष्य के उद्भव विकास के सम्बन्ध में वैज्ञानिक मान्यताओं-धारणाओं के आधार पर मानव का इस धरती पर पर्दार्पण कोई 1000000 से 2000000 वर्ष से अधिक पुराना नहीं है और सभ्य बनने तथा जूते बनाने पहनने की कला तो उसने कुछ हजार वर्षों से ही सीखी है।

मीस्टर ने पद चिन्ह युक्त शैल खण्ड को यूटाह विश्व विद्यालय के धातु विज्ञानी प्राध्यापक मेल्विन कूक को दिखाया जिन्होंने इस दुर्लभ फुट प्रिंट को किसी भू-विज्ञानी विशेषज्ञ को दिखाने के लिए परामर्श दिया। मीस्टर ने “द डेजर्ट न्यूज” नामक पत्रिका में इस पद चिन्ह के बारे में पूर्ण विवरण प्रकाशित कराया। जिससे प्रभावित होकर यूहाट विश्वविद्यालय के म्यूजियम आफ अर्थ साइन्सेस के संग्रहाध्यक्ष जेम्स मेडसन ने पद चिन्हों का निरीक्षण विश्लेषण करने पर पाया कि ये पद चिन्ह 30 से 60 करोड़ वर्ष पुराने हैं। जेम्स ने बताया कि 600000000 वर्ष पूर्व इस धरती पर न तो मनुष्य थे और नहीं बन्दरों का उद्भव विकास हुआ था। यह पहेली बनी हुई है कि वह फॉसिल्स फिर किसका था?

ऐसे घटनाक्रम जिनका कोई तर्क सम्मत समाधान नहीं है एवं ऐसी विलक्षण खोजें जो अति मानवी मालूम पड़ती हैं, इस मान्यता की पुष्टि करती हैं कि मनुष्य यहाँ नहीं उपजा, कहीं और से सम्भवतः देवलोक से आया है। अभी जब तक इस सम्बन्ध में गुत्थियाँ नहीं सुलझ जातीं, इस अविज्ञात पर शोध जारी रहनी चाहिए।


प्राणाग्नि के जब-तब फूटने वाले शोले

घटना 2 जुलाई 1051 की है। अमेरिका के सेण्ट पीटर्स वर्ग (फ्लोरिडा) के एक मुहल्ले मेरी स्ट्रीट में रहने वाली श्रीमती मेरी हार्डी रोजर अपने मकान में विचित्र ढंग से जली हुई मरी पाई गई। 2 जुलाई की पूर्व सन्ध्या को हार्डी रोजर ने अपने मित्रों को एक पार्टी दी थी और उसका घर आधी रात तक चहल-पहल से भरा रहा था। मित्रों के ठहाके गूँज रहे थे। देर रात गए पार्टी समाप्त हुई और हार्डी रोजर अपने मित्रों को विदा कर हल्के चित्त से आकर अपने बिस्तर पर लेट गई। सुबह देर तक उसके मकान का दरवाजा बन्द रहा। मकान मालकिन पी. कार्पेण्टर ने सोचा कि रात में देर तक जागने के कारण रोजर अभी तक सो रही है। उसके काम पर जाने का समय हो गया है, इसलिए उसे जगा देना चाहिए।

यह सोचकर श्रीमती कार्पेन्टर ने रोजर के घर का दरवाजा खटखटाया किन्तु अन्दर से कोई उत्तर नहीं मिला। दो तीन बार दरवाजा खटखटाने के बाद जब कोई उत्तर नहीं मिला तो श्रीमती कार्पेन्टर ने सोचा कि रोजर को ज्यादा ही गहरी नींद आ गई होगी इसलिए स्वयं ही दरवाजा खोलकर उसे जगा देना चाहिए। यह सोचकर दरवाजा खोलने के लिए मकान मालकिन ने पीतल की बनी हुई कुण्डी पर जैसे ही हाथ रखा, उसके मुँह से चीख निकल गई। पीतल की कुण्डी इतनी गरम हो गई थी जैसे उसे घण्टों आग से तपाया गया हो। उसी से मिसेज कार्पेन्टर का हाथ जल गया था।

उसकी चीख सुनकर पास ही रहने वाले दोनों पड़ोसी निकल आए। मिसेज कार्पेन्टर ने उन्हें सारी बात बताई और कहा कि शायद फ्लैट में कोई दुर्घटना घट गई है। दुर्घटना की सम्भावना का अनुमान लगा कर दोनों पड़ोसियों ने दरवाजे को कन्धे से धक्का देना शुरू किया। दो चार धक्कों में ही कुण्डी निकलकर अलग हो गई और तीन व्यक्ति अन्दर प्रविष्ट हुए।

फ्लैट के भीतर कमरे की दोनों खिड़कियाँ खुली हुई थीं और कमरे की छत तथा दीवारें कालिख से इस तरह पुती हुई थी जैसे किसी ने वहाँ आग लगाई हो। कमरे का तापक्रम भी असाधारण रूप से गरम था और वहाँ रखा हुआ आदमकद शीशा इतनी अधिक आँच के कारण टूटकर पिघल गया था एवं बुरी तरह टुकड़े-टुकड़े हो गया था। किन्तु आश्चर्य की बात यह थी कि कमरे में धुँए या जलने की गन्ध का कहीं नामो-निशान तक नहीं था।

उन लोगों ने मेरी हार्डी को आवाज दी। पर कोई उत्तर नहीं मिला। मेरी हार्डी वहाँ हों तो उत्तर भी दें, उसके अवशेष तो राख की एक ढेरी के रूप में कमरे की ही एक खिड़की के पास पड़े थे। मिसेज कार्पेन्टर और दोनों पड़ोसियों ने उन अवशेषों को देखा तो दंग रह गए और तत्काल इस घटना की सूचना पुलिस को दी। पुलिस आई, उसने जाँच की परन्तु रहस्य सुलझने का कोई सूत्र हाथ में नहीं आ रहा था। पहले तो जाँच अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मामला असाधारण रूप से की गई आत्म-हत्या का है परन्तु शीघ्र ही उन्हें अपना विचार बदलना पड़ा क्योंकि आत्म-हत्या के लिए अपने शरीर को किसी भी प्रकार आग लगाई जाए किन्तु वह उस ढंग से राख में परिवर्तित नहीं हो सकता, जिस प्रकार मिसेज हार्डी का शरीर राख में परिणत हो गया था। आग लगने के बाद आखिर कोई भी व्यक्ति छटपटाता तो है ही और उस छटपटाहट के कारण मरणांतक स्थिति में पहुँचने तक भी आग निश्चित रूप से बुझ सकती है। फिर मानवी काया एवं उस पर भी अस्थियों की भस्मीभूत करने के लिए जितना ऊँचा भट्टी के स्तर का तापमान चाहिए, इतना तापमान आग के किसी प्रचण्ड भयंकर स्रोत से ही उत्पन्न हो सकता था। वहाँ पर कमरे की जो स्थिति थी और कमरे के सामान को क्षति पहुँची थी, उसके आधार पर किसी भी प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि कमरे में इतना उच्च तापमान पैदा हुआ हो।

जाँच अधिकारियों को जिस बात ने सबसे अधिक उलझन में डाला वह यह थी कि मेरी हार्डी की देह जिस स्थान पर राख हुई पड़ी थी, वहाँ फर्श पर बिछे कालीन पर आग लगने के बहुत ही सामान्य निशान थे। उसके पास ही रखी मेज पर पड़े हुए अखबार और कपड़ों को तो आग ने छुआ तक नहीं था। जाँच अधिकारी एडवर्ड डेविस इन विचित्र विरोधाभासों के कारण जब किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके तो उन्होंने प्रसिद्ध शरीर विज्ञानी डा. विंस्टन क्रागमैन की सहायता ली।

डा. विंस्टन क्रागमैन इस दुर्घटना के विभिन्न कारणों की सम्भावना पर विचार करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मिसेज हार्डी रोजर उस रहस्यमयी आग की शिकार हुई हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में “स्पांटेनियस ह्यूमन कम्बशन” (स्वतःदहन) कहते हैं। स्पांटेनियस ह्यूमन कम्बशन अथवा अनायास अपने आप जलने की यह प्रक्रिया ऐसी है जो पिछले दसियों वर्षों से वैज्ञानिकों को उलझन में डाले हुए है। इस रहस्यमयी आग के उत्पत्ति के कारणों को जानने के लिए विभिन्न प्रयोगों और अब तक इस तरह की घटी सैकड़ों घटनाओं में से करीब 100 घटनाओं का अध्ययन करने के बाद भी वैज्ञानिक यह पता नहीं लगा पाये हैं यह रहस्यमयी आग किस प्रकार और किन कारणों से उत्पन्न होती है? इसका स्त्रोत क्या है?

अपने आप शरीर में आग उत्पन्न होना और उस आग में जलकर शरीर का भस्मीभूत हो जाना ऐसा विचित्र रहस्य है कि सामान्य अग्निकाण्डों से उसकी तुलना नहीं की जा सकती। क्योंकि जिस किसी के भी साथ इस प्रकार की घटना घटती है पहले तो उसे इसका कोई लक्षण ही पता नहीं चलता। अचानक हार्ट अटैक की तरह बिना किसी पूर्व सूचना के अग्नि स्फोट होता है जो व्यक्ति इस रहस्यमयी अग्नि का शिकार होता है उसे सम्भवतः इसकी कोई यन्त्रणा भी अनुभव नहीं होती।

उपरोक्त घटना के पहले और बाद में भी इस तरह के ढेरों अग्निकाण्ड हुए हैं इनमें 7 दिसम्बर 1956 को होनोलूलू द्वीप में ऐसा ही अग्नि काण्ड घटित हुआ। उस द्वीप की एक साधारण-सी बस्ती में रहने वाली पचहत्तर वर्षीय महिला यग सिककिम इस घटना की प्रत्यक्ष साक्षी रहीं। उस दिन दोपहर को वृद्धा किम किसी घरेलू काम में व्यस्त थी अचानक उसे किसी काम से अपनी पड़ोसिन वर्जीनिया कॉगेट की याद आई। किम दयालु, व्यवहार कुशल और पर दुःखकातर महिला थी। उसके स्वभाव से सभी खुश रहते थे और कॉगेट तो उसकी विशेष रूप से आभारी थी क्योंकि वक्त बेवक्त उसे किम से सहायता मिल जाया करती थी इसलिए वह किम के कई छोटे बड़े काम कर दिया करती थी।

किम को किसी काम के सिलसिले में कॉगेट की याद आई तो उसके घर पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने जो कुछ देखा उससे किम की भय के मारे चीख निकल गई। किम ने देखा कि कॉगेट का शरीर नीली लपटें छोड़ता हुआ जल रहा है। उसकी चीख सुनकर आस-पास रहने वाले लोग दौड़ आए। उन्होंने भी वह दृश्य देखा। वे कॉगेट को बचाने का कोई उपाय करने की बात सोच ही रहे थे कि देखते ही देखते उसका शरीर मुट्ठी भर राख में बदल गया। आश्चर्य की बात यह थी कि कॉगेट न तो अचेत हुई थीं और न ही चीखी-चिल्लाई ही थीं।

सैन फ्राँसिस्को के लागूना होम में भी 31 जनवरी 1959 को ऐसी ही घटना घटी जिसका प्रत्यक्षदर्शी वहाँ का एक चपरासी था। लागूना होम में बूढ़े व्यक्तियों की देखभाल की जाती थी। सरकार की ओर से चलाया जाने वाला वह एक ऐसा संस्थान है, जहाँ वृद्ध व्यक्ति ही रहते थे। उस घटना का प्रत्यक्षदर्शी चपरासी सिलेवेस्टर एलिस 31 जनवरी की शाम को चार बजे के लगभग जैक लार्वर को दूध का गिलास देने गया था, जो वृद्ध व्यक्तियों को होम की ओर से वितरित किया जाता था। जैक लार्वर ने दूध का गिलास ले लिया और पीने लगा। इसके बाद एलिस रसोई में चला आया।

कोई पन्द्रह मिनट के बाद एलिस लार्वर के कमरे में दूध का खाली गिलास वापस लेने के लिए पहुँचा जब वह लार्वर के कमरे में पहुँचा तो वहाँ उसने जो कुछ देखा वह बेहद भयावह दृश्य था। उसने देखा कि जैक लार्वर नीले रंग की लपटों में बुरी तरह जल रहा है। यह दृश्य देखकर उसने एक कम्बल लार्वर के शरीर पर लपेट देना चाहा परन्तु जैसे ही कमरे के कोने में रखा कम्बल लेकर उसके पास दौड़ता हुआ सा जाने लगा, पुलिस को कुछ फीट की दूरी पर आग की तेज असह्य आँच अनुभव हुई। उसे लगा कि वह भी उस आँच में झुलसने लगा है।

अपने को बचाते हुए एलिस ने कम्बल लार्वर पर फेंका और दौड़कर कमरे के बाहर आया तथा मदद के लिए चीखने पुकारने लगा। लोग मदद के लिए दौड़ आए। इसमें मुश्किल से पाँच सात मिनट लगे होंगे। सहायता के लिए आए संस्था के कर्मचारी तथा अन्य व्यक्ति लार्वर के कमरे में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि वहाँ राख का एक ढेर मात्र पड़ा है और कमरे के भी झुलसा देने वाली गर्मी व्याप रही है। आश्चर्य की बात तो यह थी कि एलिस ने जो कम्बल लार्वर के ऊपर फेंका था, उस पर कहीं-कहीं ही आग ने अपना प्रभाव दिखाया था। कमरे की सभी वस्तुएँ यथावत् सुरक्षित थीं। वहाँ न तो किसी प्रकार का धुँआ फैला हुआ था और न ही कोई चीज जलने की गन्ध आ रही थी।

इस घटना की रिपोर्ट पुलिस में की गई। जाँच अधिकारियों ने पहले तो उसे आत्म-हत्या का असाधारण प्रयास माना परन्तु इस विचार की कहीं से भी पुष्टि नहीं होती थी। कमरे में ऐसी कोई वस्तु नहीं पाई गई जो ज्वलनशील हो फिर यदि लार्वर ने आत्मदाह ही किया था तो उस आग से आस-पास की वस्तुएँ कैसे प्रभावित रह गई थीं? यहाँ तक कि उसके ऊपर जो कम्बल फेंका गया था, वही बिना जले कैसे बच गया था? अन्त में जाँच अधिकारियों को अपना निष्कर्ष बदलना पड़ा और इस केस को फाइल कर दिया गया।

इस तरह की जितनी भी घटनाएँ अब तक प्रकाश में आई हैं और जिनका विश्लेषण किया गया है उनमें यह तथ्य आश्चर्यजनक रूप से सामने आया है कि यह आग केवल शरीर को ही जलाती है। धातुओं पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता, अलबत्ता वह उन पर कुछ निशान जरूर छोड़ जाती है।

अध्यात्म विज्ञान में भौतिक अग्नियों की चर्चा आग, बिजली, आदि के अतिरिक्त शरीर में विद्यमान प्राणाग्नि का वर्णन किया गया है और उनमें से पाँच को प्रमुख और पाँच को गौण बताते हुए उनकी संख्या दस में गिनाई गई है। उन सबकी अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं यह जीवन्त स्तर की अग्नियाँ हैं जो ऊर्जा तो निस्सृत करती हैं किन्तु पदार्थ को कम और काया एवं मनःसंस्थान को अधिक प्रभावित करती हैं इसी के माध्यम से ताँत्रिक प्रयोगों से आग्नेयास्त्र जैसा काम लिया जाता है। उस माध्यम से अग्निकाण्ड कराने से लेकर मारण, मोहन, उच्चाटन, स्तम्भन, वशीकरण जैसा कई प्रकार का छोटा-बड़ा आक्रमण हो सकता है।

योग साधना से शरीर का माँस मज्जा वाला स्थूल भाग तो घट जाता है पर नये प्रकार की ऊर्जा का उत्पादन होता है, जिसे योगाग्नि कहते हैं। इसे शक्ति-पुँज कह सकते हैं। दधीचि की हड्डियों में यही विशेषता थी जिस के कारण उनके द्वारा बना वज्र, वृत्रासुर जैसे दुर्धर्ष दानव का हनन कर सकने में समर्थ हुआ।

मनुष्य शरीर को बिजली के अनेकों चमत्कार पारस्परिक सान्निध्य में होते देखे जाते हैं। बलिष्ठों का प्रभाव दुर्बलों पर पड़ता है। इस प्रभाव के पीछे यह प्राण विद्युत ही काम करती है। मनुष्यों में से हर एक को एक हार्स पावर की मोटर माना जाय तो योगाभ्यास द्वारा बढ़ाई गई प्राण विद्युत का शक्ति भंडार हजार हार्स पावर की मोटर जितना भी हो सकता है। इस आधार पर उनकी निजी समर्थता दूसरों को प्रभावित करने वाली विशिष्टता तथा वातावरण को बदल देने की क्षमता का अभिवर्धन होता है।

यह प्राणाग्नि या योगाग्नि का संक्षिप्त परिचय हुआ। इसी के माध्यम से दक्ष गृह में सती ने अपने शरीर से योगाग्नि प्रकट करके आत्मदाह किया था। योगीजनों में से मूर्धन्य व्यक्ति अपने शरीर त्यागते समय इसी योगाग्नि को उत्पन्न करके अपनी अन्त्येष्टि स्वयमेव कर लेते हैं। प्रयत्नपूर्वक इस जीवन्त ऊर्जा को बढ़ाने और उसे चमत्कारों में नहीं महान प्रयोजनों में खर्च करके अति महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। यह ऊर्जा कभी-कभी प्राकृतिक कारणों से अनायास भी उबल पड़ती है और ऐसे विलक्षण परिचय देती है जैसा कि उपरोक्त घटनाओं से विदित होता है।


गायत्री सर्वतोमुखी समर्थता की अधिष्ठात्री

इस विश्व में दो शक्तियाँ काम करती हैं- एक चेतन और दूसरी जड़। जड़ पदार्थ देखने में ही स्थिर प्रतीत होते हैं, पर उनमें भी अद्भुत क्रियाशीलता विद्यमान है। परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई है। वह चर्मचक्षुओं से स्थिर स्तब्ध दिखाई पड़ता है, पर जब सशक्त सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों से उनकी अन्तरंग स्थिति को देखा जाता है तो प्रतीत होता है कि परमाणु में कितनी प्रचण्ड शक्ति और द्रुतगामी हलचल भरी पड़ी है। अणु विश्लेषण, अणु विस्फोट के प्रयोगकर्ता जानते हैं कि पदार्थ का सबसे छोटा यह घटक भी अपने भीतर कितनी भयंकर क्षमता दबाये हुए है और वह क्षमता स्थिर न रह कर कितनी सक्रिय हलचलों में संलग्न है अणु भट्टियों से उत्पन्न ताप द्वारा जो विशालकाय विद्युत उत्पादन योजनाएँ चल रही हैं और अणु आयुधों द्वारा संसार भर का सर्वनाश करने की जो विभीषिका सामने खड़ी है, उसके मूल में परमाणु के अन्तराल में काम करने वाली प्रचण्ड सक्रियता ही मूल कारण है।

परमाणु की तरह दूसरा घटक है- जीवाणु। जीवाणु का शरीर कलेवर तो रासायनिक पदार्थों से ही बना होता है, पर उसकी अन्तःचेतना मौलिक है जो पदार्थ की शक्ति से उत्पन्न नहीं होती, पर अपने प्रभाव से कलेवर को तथा समीपवर्ती वातावरण को प्रभावित करती है। इसे चेतना कहते हैं। चेतना के दो गुण हैं, एक इच्छा एवं आस्था दूसरी विवेचना एवं विचारणा है। एक को अंतरात्मा दूसरी को मस्तिष्क कह सकते हैं। मस्तिष्क जो सोचता है उसके मूल में आकाँक्षा, आस्था, विवेचना एवं विचारधारा की सम्मिलित प्रेरणा ही काम करती है। इस जीव चेतना को परा प्रकृति कहते हैं।

परमाणु सृष्टि का सबसे छोटा घटक है, इसका संयुक्त रूप ब्रह्माणु या ब्रह्मांड है। व्यष्टि और समष्टि के नाम से भी इस लघुता और विशालता को जाना जाता है। जीवाणु की चेतना सत्ता आत्मा कहलाती है और उसकी समष्टि विश्वात्मा अथवा परमात्मा है। ब्रह्मांड में भरी क्रियाशीलता से परमाणु प्रभावित होता है। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि परमाणुओं की संयुक्त चेतना ब्रह्मांड-व्यापी हलचलों का निर्माण करती है। इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में इसी तथ्य को परमात्मा द्वारा आत्मा को अनुदान मिलना अथवा आत्माओं की संयुक्त चेतना के रूप में परमात्मा का विनिर्मित होना कुछ भी कहा जा सकता है।

परमाणु का गहनतम विश्लेषण करने पर जाना गया है कि वह मूलतः ऋण और धन विद्युत प्रवाहों में उतना ही समृद्ध सम्पन्न बनता जाता है। इस विश्व में बिखरी हुई शोभा सम्पन्नता को उसी महाशक्ति का इन्द्रियों से अनुभव किया जा सकने वाला स्वरूप कह सकते हैं। इसकी चर्चा इस प्रकार हुई है-

ईश्वरोऽहम् च सूत्रात्माविराडात्माऽहमस्मि च। ब्रह्माऽहम् विष्णु रुद्रौ च गौरी ब्राह्मी च वैष्णवी सूर्योऽहम् तारकाश्चाहं तारकेशस्तथाऽम्यहम्। यच्च किंचित्वचिद्वस्तु दृश्यते श्रू यतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्याहम् सर्वदा स्थिता॥

अपश्यस्ते महादेव्या विराड् रूपं परात्परम्। द्यौर्मस्तकं भवेद्यस्य चन्द्रसूर्यौ च चक्षुषी॥

दिशः श्रौत्रे वचो वेदाः प्राणोवायुः प्रकीर्तितः। विश्व हृदयमित्याहुः पृथ्वी जघन् स्मृतम्।

नभस्तल नाभिसरो ज्योतिश्चक्रमुरःस्थलम्। महर्लोकस्तु ग्रीवा स्याज्जनलोको मुख स्मृतम्।

तपोलोको रराटिस्तु सत्यलोकादधः स्थितः। इन्द्रादयो बाहवः स्युः शब्दः श्रोत्रं महेशितुः।

नासत्यदस्त्रौ नासे स्तो गन्धो घ्राणं स्मृतो बुधैः। मुखमग्नि समाख्यातो दिवारात्री च पक्ष्मणी।

एतादृशं महारूपं ददृशुः सुरपुंगवाः। ज्वालामालासहस्त्राढ्य लेहिना च जिह्वया।

सहस्त्रशीर्षनयनं सहस्त्रचरणं तथा। कोटि सूर्यप्रतीकाश विद्युत्कोटिसमप्रभम्। भयंकरं महाघोरं हृदक्ष्णोस्व्रासकारकम्। -देवी भागवत

मैं ही अणु, मैं ही विभु हूं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गौरी, ब्राह्मी, वैष्णवी मैं ही हूँ। सूर्य, चन्द्र, तारागण मैं ही हूँ। जो कुछ भी दिखाई पड़ता है या सुना जाता है जो कुछ भीतर बाहर है उस सब में मैं ही व्याप्त हूँ।

देवताओं ने उसका विराट् रूप देखा। उसका मस्तक- आकाश, सूर्य-चन्द्रमा- नेत्र, दिशायें कान, वेदवाणी, वायु- प्राण, विश्व- हृदय, पृथ्वी- जंघा, पाताल- नाभि, महःलोक- ग्रीवा, जनःलोक- मुख, सत्यलोक- अधः, तपोलोक- ललाट, इन्द्र- बाहु, शब्द- कान, अश्विनी कुमार- नासिका, गन्ध- नासिका, दिन-रात पलकें देखी।

देवताओं ने भगवती के ऐसे विराट् रूप के दर्शन किये। उसके शरीर में से असंख्य ज्वालाएँ निकल रही थीं। उसके हजारों सिर, हजारों नेत्र, हजारों चरण थे करोड़ों सूर्यों और बिजलियों जैसी दीप्ति निकल रही थी।

शक्तिवान के साथ शक्ति जुड़ी होती है। यह ब्रह्म शक्ति का समन्वय युग्म है। प्रत्येक शक्तिवान की सामर्थ्य को उसी संव्याप्त क्षमता का स्वरूप कहा जा सकता है। इसे पति-पत्नि के रूप में उदाहरणों सहित चित्रित किया गया है। समर्थों की सामर्थ्य के रूप में, विशिष्टों की विशेषता के रूप में इस महाशक्ति के दर्शन स्थान-स्थान पर किये जा सकते हैं। इसका अलंकारिक वर्णन देवी भागवत में इस प्रकार हुआ है।

संसार में जितने भी अभाव और कष्ट हैं, जितनी भी आधि-व्याधियाँ हैं उन सबको शक्ति की न्यूनता का प्रतिफल ही कहा जाना चाहिए। आत्मशक्ति के अभाव में सुख साधनों से वंचित रहना पड़ता, अस्तु शक्ति संयम के निरन्तर प्रयत्न करने चाहिए कि भौतिक समर्थता किस प्रकार प्राप्त होती है। इसे सब जानते हैं, पर आत्मिक तेजस्विता किस प्रकार पाई जा सकती है, इसका मार्ग अध्यात्म विज्ञान में बताया गया है। गायत्री साधना उसी के लिए की जाती है। शक्ति के अभाव में दुर्बलता ओर दुर्गति होने की चर्चा इस प्रकार आती है-

अनुमानमिदं राजन्कर्तव्य सर्वथा बुधैः। दृष्ट्वा रोग युतान्दीनाक्षन्क्षु धितान्निर्धनांछढान्।

जनानातीस्थक्षा मूर्खान्पीड़ितान्वैरिभि सदा। दासानाज्ञा करान्क्षु द्रनिह्वलानथ।

अतप्तन्भोजने भोगे सदार्तानजितेन्द्रियान्। तष्णाधिकानशक्तीश्च सदाधिपरिपीड़ितान्॥ -देवी भागवत

अर्थात्- हे राजन्! तुम कहीं पर लोगों को रोगी, दीन, दरिद्र, भूखे, प्यासे, शठ, आर्त, मूर्ख, पीड़ित, पराधीन, क्षुद्र, विकल, विह्वल, अतृप्त, असन्तुष्ट, इन्द्रियों के दस अशक्त और मनोविकारों से पीड़ित देखो तो समझना इन्होंने शक्ति का महत्व नहीं समझा और उसकी उपेक्षा अवहेलना की है।

गायत्री उपासना आत्मशक्ति अभिवर्धन का सरल किन्तु श्रेष्ठतम उपाय है। जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं वे समर्थ, सफल और सार्थक जीवन जीकर धन्य बनते हैं।


भगवान निराकार सर्वव्यापी (kahani)

भगवान निराकार सर्वव्यापी एवं जन्म-मरण से रहित है। विकृत परिस्थितियों को सन्तुलित करने के लिए उनकी प्रेरणा से तूफानी आन्दोलन उभरते रहते हैं। ये आन्दोलन ही अवतार कहलाते हैं। धर्मचक्र प्रवर्त्तन, महाभारत संयोजन, स्वतन्त्रता संग्राम की तरह प्रज्ञा अभियान भी एक ऐसा ही आन्दोलन है।

महामानव, सन्त सुधारक ओर शहीद का जीवन जीते हैं। वे अपने चरित्र और प्रयासों से असंख्यों को ऊँचा उठाते, आगे बढ़ाते हैं। उन्हें देवात्मा या ऋषि भी कहते हैं। ये ऋषि अवतार सत्ता के ही अंश होते हैं।


प्रज्ञा पुराण के चार खण्ड प्रकाशित

प्रज्ञा पुराण के प्रथम खण्ड को प्रकाशित हुए अभी पूरे पाँच वर्ष नहीं हुए कि उसके हिन्दी और गुजराती के सात संस्करण प्रकाशित हो गये। उसकी लोकप्रियता इसी से सिद्ध है कि सभी सम्प्रदायों व धर्मक्षेत्र के प्रवक्ताओं में से अधिकाँश ने इस पुराण में वर्णित कथाओं का अपने प्रवचनों में समावेश करना आरम्भ कर दिया है।

प्रज्ञोपनिषद के प्रथम खण्ड से गुँथी कथाओं में से बहुत कम ऐसी थीं कि जिनकी जानकारी पहले से ही उपलब्ध थी। उसका अधिकाँश भाग ऐसा है जिसे अविदित ही नहीं उद्देश्यपूर्ण एवं प्रेरणाप्रद कहा जा सकता है। इसलिए प्रवंचना को सुबोध और सरस बनाने के लिए इनका उपयोग करना हर वर्ग के लोगों को भाया और उनका भरपूर उपयोग किया। इन दृष्टान्तों का उपयोग जितना गायत्री परिवार में हुआ है उससे कहीं अधिक उन लोगों में हुआ है जो कि किसी भी धर्म सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखते हैं और धर्मोपदेशकों की भूमिका निभाते हैं।

अपनी प्रतिज्ञानुसार हम हर वर्ष प्रज्ञा पुराण का एक खण्ड लिखते और प्रकाशित करने के लिए बाधित थे। उसे कहां तक और कब तक निभाया जा सकेगा। कुछ कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि हमारे कार्यकाल पर आगे विराम लगने की सम्भावना है।

प्रज्ञापुराण का एक खण्ड प्रकाशित करने के उपरान्त अभी इतना ही बन पड़ा है कि नये तीन खंडों का और नया सृजन कर सकें। सो दैवी सत्ता के अनुग्रह से पूरा हो गया। अब द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ प्रज्ञापुराण के खण्ड एक साथ प्रकाशित किये जा रहे हैं। लिखे तो वे पिछले वर्षों में धीरे-धीरे जाते रहे हैं।

इन खण्डों में जो-जो कथाएँ हैं वे भी प्रथम खण्ड से कम रोचक सुबोध, सिद्धांत युक्त नहीं हैं। वे सभी ऐसी हैं जो आज की समस्याओं को पुरातन काल के समाधानों के साथ उपयुक्त तालमेल बिठाती हैं। विज्ञ पाठक सहज ही यह अनुमान लगा सकते हैं कि अठारहों पुराणों के पुरातन प्रयास में से सभी कथाओं का स्मरण रखना कठिन था। इसलिए उनका नये सिरे से अवगाहन करना पड़ा। इतना ही नहीं उसके लिए अन्य धर्मों की जितनी जानकारी मिल सकी उसमें से भी उपयोगी प्रसंग इसी प्रकार ढूँढ़े गये जिस प्रकार कि हिन्दू धर्म के विशाल कथा साहित्य को समुद्र मानकर उसमें से उपयोगी मणिमुक्तक निकाले गये। चयन करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि वे प्रतिगामिता का समर्थन न करें। प्रगतिशीलता का मार्गदर्शन करें। पुरातन कथानकों में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप ऐसा कथनोपकथन भी कम नहीं है जो आज की परिस्थितियों से तनिक भी तालमेल नहीं खाता। परिष्कृत बुद्धिवाद मान्यता प्राप्त, नीति शास्त्र के अनुरूप नहीं बैठता। उस सबको भी बटोर लिया जाता तो हर महीने एक पुराण बन सकता था, पर समय की स्थिति ओर आवश्यकता को देखते हुए, अनेक कसौटियों पर कसने के उपरान्त जो कथानक खरे बैठे हैं उनका ही इनमें संकलन किया गया है।

इस ग्रंथ की एक और विशेषता है कि श्लोकों में मात्र सिद्धान्तों का प्रतिपादन है और उनकी पुष्टि में कथानक जोड़े गये हैं। श्लोकों में कथानकों का वर्णन नहीं है। इस दृष्टि से यदि प्रस्तुत श्लोकों और उनके अर्थों को ही पढ़ा जाय तो वह युगगीता या प्रज्ञा उपनिषद् बन जाती है। आज की परिस्थितियों में शालीनता भरा जीवन जीने के लिए जिस उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं सज्जनोचित व्यवहार की आवश्यकता है उन्हीं को श्लोकों में समाविष्ट किया गया है। इस दृष्टि से उस भाग की प्रगतिशीलता का समर्थक एक शास्त्र सोचा जा सकता है। कथानकों में तो उन सिद्धान्तों का सरस समर्थन है ही।

प्रज्ञा परिवार की प्रमुख गतिविधि लोकमानस का परिष्कार है। इसी को विचार क्रान्ति भी कह सकते हैं। इसके अंतर्गत सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दोनों पक्ष आते हैं। इन दिशाधाराओं के लिए आवश्यक सामग्री युग शिल्पियों को मिल सके इस दृष्टि का यथासम्भव पूरा ध्यान रखा गया है।

प्रज्ञा परिवार में आये दिन प्रवचनों की आवश्यकता पड़ती है। बच्चों के, बड़ों के षोड्श संस्कार, पर्व समारोह, जन्मदिन, विवाह दिन, युग निर्माण सम्मेलन तथा अन्य शुभारंभों समारोहों के अवसर पर वक्तृता की क्षमता रखने वाले युग सृजेताओं को कुछ न कुछ बोलना ही पड़ता है। ऐसे प्रसंगों में उन प्रसंगों से तालमेल खाते हुए कथानक चुन लिये जांय और उनमें सामयिक स्थिति की टिप्पणी अपनी ओर से मिला दी जाय तो वे अनेकानेक आयोजनों में-येन नये व्याख्यान देते रह सकते हैं। उनकी संचित ज्ञान सम्पदा सीमित कहे जाने का कटु प्रसंग कभी नहीं आवेगा। ऐसे वक्ता सैकड़ों हजारों आयोजनों में प्रवचन करते रह कर भी अपनी नवीनता बनाये रह सकते हैं।

प्रज्ञा पुराण की प्रमुख आवश्यकता इसलिए भी समझी गई कि प्रज्ञा पीठों और प्रज्ञा संस्थानों में नियमित कथा कीर्तनों का क्रम चलता रहे। उनमें नवीनता बनी रहे। पुनरावृत्ति से उत्पन्न होने वाली ऊब न आने पाये।

कथा कीर्तन की परिपाटी न केवल प्रज्ञा संस्थानों में चलनी चाहिए वरन् प्रत्येक सद्गृहस्थ के यहाँ भी एक धार्मिक परिपाटी चलनी चाहिए कि सायंकाल घर का कोई शिक्षित सदस्य प्रज्ञा पुराण कथा कहा करे। उसमें बालकों को तो विशेष रस आता ही है बड़ों को भी कम प्रेरणा नहीं मिलती। वृद्धजनों को परलोक की तैयारी चलते देखकर इस प्रकार का कथा श्रवण एक प्रकार का धर्मकृत्य बन जाता है और वे उसमें पूरा रस लेते हैं।

स्वाध्याय शिक्षितों तक ही सीमित है। यदि उसका लाभ अशिक्षितों को भी देना हो तो उसका सत्संग रूप में परिणत करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। सत्संग के निमित्त व्यक्तिगत परामर्श देने की अपेक्षा यह कहीं अधिक उत्तम है कि प्राचीन कथा-पुराणों, इतिहासों के संदर्भ देकर उन विचारों की पुष्टि की जाय तो रूखे प्रतिपादनों द्वारा प्रस्तुत किये जाते हैं। दृष्टान्त उदाहरण अधिक प्रभावशाली होते हैं और स्मरण बहुत समय तक बने रहते हैं इसमें सन्देह नहीं।

प्रज्ञापुराण के अब तक चार खण्ड छप चुके अवसर मिल सका तो यह क्रम प्रवाह जीवन भर चलता रहे। अभी यह प्रधानतः हिन्दू धर्म से सम्बन्धित खण्ड है। आवश्यकता इस बात की भी है कि संसार में प्रचलित अन्यान्य धर्मों के अच्छे प्रसंगों को अधिक संख्या में प्रगतिशीलता एवं आदर्शवादिता के पक्ष में एकत्रित करना सम्भव हुआ तो अगले खण्डों में इस प्रकार के प्रसंग भी पाठकों को उपलब्ध होंगे जिनसे अन्याय धर्मों के मानने वाले भी अपनी परम्परा के अनुरूप इन्हीं प्रतिपादनों को सुनकर अधिक रस ले सकें और उसी लक्ष्य की ओर चलने की मनोभूमि बना सकें, जिस तक कि समूची मानव जीवन को अगले दिनों पहुँचना है।

प्रज्ञापुराण के द्वितीय खण्ड का मूल्य 22 रुपये, तृतीय का 20 रुपये तथा चतुर्थ का 18 रुपये है। जो पहले खरीद चुके हैं वे शेष को 60) भेजकर मँगा लें। प्रज्ञापुराण मँगाने के लिए ‘युग निर्माण योजना’ गायत्री तपोभूमि, मथुरा के पते पर आर्डर भेजना चाहिए। इस सम्बन्ध में विलम्ब न करें।


गुलाब के फूल (kahani)

गुलाब के फूल ऊपर की टहनी पर खिल रहे थे और सड़ा गोबर उसकी जड़ में सिर झुकाये पड़ा था।

गुलाब ने अपने सौभाग्य से सड़े गोबर के दुर्भाग्य की तुलना करते हुए गर्वोक्ति की और व्यंग की हँसी हस दी। माली उधर से निकला, तो उसने यह सब देखा। उससे चुप न रहा गया। गुलाब के कान से मुँह सटाकर बोला- ‘तुम्हें इस स्थिति में पहुँचाने में इन पिछड़े समझे जाने वाले कितनों का योगदान रहा है, तनिक इसे भी समझने का प्रयत्न करो।’


तीर्थ यात्रा पर निकलिये

भारतीय समाज में तीर्थयात्रा का माहात्म्य और पुण्य इतने विस्तारपूर्वक बताया गया है कि धर्मशास्त्रों का अधिकाँश भाग उसी से भरा पड़ा है। पुण्य अर्जन, पाप नाश, और मनोकामनाओं की पूर्ति, परलोक में सुख शान्ति यह प्रधान उपलब्धियाँ तीर्थयात्रा की बताई गई है।

पर साथ ही उसके साथ कुछ कर्तव्य, उत्तरदायित्व और विधान भी जुड़े हुए हैं। मात्र प्रतिमा दर्शन और जलाशय स्नान भर में इतने प्रयोजन पूर्ण नहीं हो सके। इन दिनों पर्यटकों की तीर्थों में काफी भीड़ रहने लगी है क्योंकि सैलानियों की सुविधा के- तथा पुरातन स्मारकों के दर्शन वहाँ जितनी मात्रा में हो जाते हैं उतने अन्यत्र मिलना कठिन है। जलाशयों का सान्निध्य और प्राकृतिक दृश्य भी अपेक्षाकृत वहाँ अधिक होते हैं। अन्य देशों में पर्यटन एक अच्छा-खासा मनोरंजन और उद्योग भी है। कश्मीर, श्रीनगर, गुलमर्ग आदि स्थान के लिए लोग विशुद्ध मनोरंजन की दृष्टि से ही जाते हैं पर सर्वसाधारण के लिए सस्तेपन के साथ पुण्यफल मिलने का प्रलोभन भी जुड़ा रहता है। महंगाई में किसान, कारीगर के पास पैसा भी बढ़ा है इसलिए उनकी सहज उमंग तीर्थयात्रा के लिए चल पड़ने की होती है। बसों और रेलगाड़ियों के डिब्बे भी तीर्थयात्रा की व्यवस्था बनाते हैं। उनमें लोगों को ठहरने सोने आदि की सुविधा भी रहती है। फलतः तीर्थयात्रा के लिए जाने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। इतने पर भी इस धर्म प्रयोजन के मूलभूत उद्देश्य को लोक एक प्रकार से भूलते ही जाते हैं।

प्राचीन काल में तीर्थ एक प्रकार से आरण्यक थे जिसमें गुरुकुल, वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था के साथ-साथ गृहस्थों को पवित्र वातावरण में रहने, साधना करने, सत्संग का लाभ उठाने एवं वहाँ के संचालकों से वर्तमान समस्याओं के समाधान और भविष्य को उज्ज्वल बनाने की योजना निश्चित करने की सुविधा मिलती थी। ऐसे आश्रमों में नदी, पर्वतों की प्राकृतिक दृश्यावली के साथ-साथ ऐतिहासिक किन्हीं प्रेरणाप्रद घटनाओं की स्मृतियाँ भी जुड़ी रहती थीं। तीर्थयात्रा पैदल करने का विधान है। वाहनों का उपयोग आवश्यक सामान लादने भर के लिए किया जा सकता है। आजकल जिस प्रकार लोग रेल मोटरों में दौड़ते हैं वैसा तीर्थ विधान शास्त्रों में कहीं नहीं है। वरन् ऐसी यात्राओं को निष्फल कहा और उनका उपहास उड़ाया गया है।

तीर्थयात्रा का एक रूप शिवरात्रि पर एवं सावन के महीने में काँवर कन्धे पर लादकर चलने वालों के रूप में उत्तर प्रदेश में देखा जाता है। गोवर्धन परिक्रमा, व्रज चौरासी कोश परिक्रमा, प्रयाग की पंचकोशी परिक्रमा, नर्मदा परिक्रमा आदि के रूप में अभी भी देखा जाता है। उसमें पैदल चलने का ही विधान अपनाना पड़ता है। विनोबा की भूदान यात्रा भी पदयात्रा के रूप में ही सम्पन्न हुई थी। गाँधी जी का स्वतन्त्रता संग्राम डांडी यात्रा के रूप में पैदल ही आरम्भ हुआ था।

पदयात्राओं के कितने ही भौतिक ओर कितने ही आध्यात्मिक लाभ हैं। भौतिक लाभ यह है कि पैदल चलने का नियम स्वास्थ्य सुधार का एक महत्वपूर्ण उपाय है। देश दर्शन करने, समाज की परिस्थितियाँ समझने और अनेकों के साथ परिचय बढ़ाने, संपर्क साधने का अवसर मिलता है। विद्यालयों में पढ़ने के समान ही लम्बी यात्राओं में निकलने पर अनेक प्रकृति के लोगों से सम्बन्ध के कारण व्यावहारिक अनुभव में कहीं अधिक वृद्धि होती है।

आध्यात्मिक लाभ यह है कि सुयोग्य विज्ञजनों नेतृत्व में जो जत्थे तीर्थयात्रा के लिए निकलते थे वे अपनी ज्ञान गरिमा और उत्कृष्ट भावना का लाभ लोगों तक घर बैठे पहुंचाते थे जो पेट प्रजनन तक ही सीमित रहते हैं और व्यवहार में आदर्शों को उतारने में कितना स्वार्थ एवं परमार्थ साधन है, इस तथ्य से अपरिचित हैं।

ऋषियों के गुरुकुल भी इसी प्रकार चलते-फिरते रहते और जगह-जगह डेरा डालकर उस क्षेत्र के वातावरण में धर्मधारणा की प्रतिस्थापना करते थे। एक स्थान पर जमे रहने की अपेक्षा उन्हें तीर्थयात्रा की असुविधा रहते हुए भी उसी प्रक्रिया को अपनाना पड़ता था। अभी भी अनेकानेक पुरातन ऋषियों में से कदाचित् ही किसी के निजी निवासी के ध्वंसावशेष मिलते हैं। क्योंकि उनकी कार्य प्रणाली ही चल प्रक्रिया पर अवलंबित थी। एक मार्ग में निर्धारित लक्ष्य पर पहुंचकर वे दूसरे मार्ग से लौटते थे और अपनी मंडली की ज्ञान संपदा में असाधारण बढ़ोत्तरी करते थे। इस पुण्य का फल निश्चय ही स्वर्ग मुक्ति जैसा होना चाहिए क्योंकि उसके साथ सद्व्यवहार ज्ञान संवर्धन की साधना जो जुड़ी रहती थी।

प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत उस पुरातन तीर्थ परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया गया है। 25 हजार मंडलियां जीप गाड़ियों से देश व्यापी सद्ज्ञान प्रसार के लिए भेजी जाती हैं। सूचनाओं के अनुसार इस निश्चित दिशाधारा की तीर्थयात्रा ने जन-मानस में दूरदर्शी विवेकशीलता की जड़ें गहरी जमाई हैं और नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्षेत्रों में सत्प्रवृत्तियों के जागरण का अलख जगाया है। इस प्रयास का परिणाम उत्साहवर्धक भी हुआ है और संतोषजनक भी।

केंद्र ने अपनी सूझ-बूझ और साधनों के अनुरूप लंबे डग उठाये हैं। अब प्रज्ञा परिजनों की बारी है कि वे तीर्थयात्रा के महान उद्देश्यों को पुनर्जीवित करने के लिए कुछ करें। इस दिशा में यह हो सकता है कि कम से कम दो और अधिक से अधिक पांच साइकिल सवारों की मंडलियां अपने यहां से चलें और एक मार्ग से हरिद्वार पहुंचें और दूसरे मार्ग से वापस लौटें। रास्ते में जहां ठहरना हों जहां भी लोगों से भेंट परामर्श का अवसर मिले वहां मिशन की विचार धारा से जन-जन को अवगत कराने का प्रयास करें। ढपली बजाना कुछ ही दिनों में अपने क्षेत्र के किसी वादक से सीखा जा सकता है और जहां भी ठहरना हो वहां दो व्यक्ति मिलकर मिशन के गीतों को थोड़ी-थोड़ी व्याख्या के साथ कहते रहकर एक उत्कृष्ट प्रचारक की भूमिका निभा सकते हैं। भले ही पूर्व तैयारी के अभाव में जनता की उपस्थिति थोड़ी ही क्यों न हो।

साइकिलें सबसे सस्ती और भार वहन तथा सवारी की कई आवश्यकताएं एक साथ पूरी कर सकती हैं। उन्हें रखने के लिए भी जरा-सी जगह चाहिए। मरम्मत भी बीच-बीच में अपने हाथों की जा सकती है। या हर जगह मिलने वाले मिस्त्रियों से कराई जा सकती है।

इस साइकिल पर गेरू और गोंद मिला कर ढक्कनदार डिब्बा लेकर चला जा सकता है और रास्ते में जो भी गांव कस्बे मिलें, उनकी दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखे जा सकते हैं। इसी संदर्भ में शांतिकुंज की ओर से एक अत्यंत सस्ता गायत्री चालीसा और मिशन का परिचय छापा गया है। इसकी कीमत लागत से कही कम है। इसे सस्ते में मिलने वाले उन लोगों को दिया जा सकता है जो उसका पाठ करने का वायदा करें। इस रास्ते हरिद्वार पहुंचना। चार दिन विश्राम तथा साधन सत्संग करने, तीर्थ दर्शन का पुण्य लेने का प्रयत्न किया जाय और बाद में दूसरे रास्ते इसी क्रिया पद्धति को क्रियान्वित करते हुए वापस लौट जाया जाय। यह प्रयास उन भावनाओं के अनुरूप है जिसे ध्यान में रखते हुए शास्त्रकारों ने तीर्थों का महात्म्य बताया और उसका पुण्यफल बताया था। नारे अधिक प्रकार के न लिखकर ‘‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा’’ और ‘‘एक बनेंगे, नेक बनेंगे’’ इन दो नारों से ही गांव-गांव की दीवारें रंग देने वाली तीर्थयात्रा की हम में से प्रत्येक को तैयारी करनी चाहिए।


नयी शक्ति दूँगा


नयी शक्ति दूँगा (kavita)

नये देश को मैं नयी शक्ति दूंगा।

जगा देश सारी मिटी कालिमा है। चतुर्दिक छिटकने लगी लालिमा है। निशानाथ सोये जगा अंशुमाली, मगर अर्चना की अभी रिक्त थाली। प्रगति पथ पर वेग से बढ़े चलें जो, करोड़ों पगों को नई शक्ति दूँगा।

नये देश को मैं नयी शक्ति दूँगा।

न होगा कभी दृष्टि से लक्ष्य ओझल, बनेगा हमारा हृदय-बल ही सम्बल। अतुल शक्ति अपने पगों में छिपी है, झुकेगा किसी दिन इन्हीं पर हिमाचल। धरा पर नया स्वर्ग बनकर रहेगा, मनुज को विवशता से मैं मुक्ति दूँगा।

नये देश को मैं नयी शक्ति दूँगा।

जवानी न रुकती कभी आँधियों से, जवानी सहमती न बरबादियों से। जवानी ने चाहा तो फिर करके छोड़ा, जवानी ने डरकर कभी मुँह न मोड़ा। कसम खाके उठी जवानी हमारी, मैं बलि की जवानों को आसक्ति दूँगा।

नये देश को मैं नयी शक्ति दूँगा।

अभी कल्पना हो सकी है न पूरी, अभी साधना रह गई है अधूरी। अभी तो खुला द्वार केवल प्रगति का, अभी लक्ष्य में शेष है और दूरी। बिना लक्ष्य की प्राप्ति के जो न लौटे, मैं ऐसी प्रखर शक्ति के व्यक्ति दूँगा।

नये देश को मैं नयी शक्ति दूँगा।

अज्ञात

*समाप्त*