वैभव के आधार पर बड़प्पन आँकने की प्रथा इस दुनिया में है जिसके पास जितनी सम्पन्नता, शिक्षा एवं चतुरता है, उसी अनुपात से उसके बड़प्पन का मूल्य आंका जाता है। बलिष्ठता और प्रतिभा भी इसी वर्ग में आती है, जो दूसरों पर अपनी छाप छोड़ती हैं तथा धाक जमाती हैं। लोग उग्रता, आतंकवाद, दुष्टता और हानि पहुँचाने की शक्ति को देखते हुए भी डरते, मान देते हैं।
बड़प्पन के मूल्याँकन की यह सभी कसौटियाँ ओछी तथा खोटी हैं। इनके सहारे हम किसी व्यक्ति का सही मूल्याँकन नहीं कर सकते। कसौटी ही खोटी हो तो सोने और पीतल का अन्तर कैसे जाना जाय?
व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई उसकी सुसंस्कारिता के आधार पर आँकी जानी चाहिए। देखा जाना चाहिए कि किसने अपने आप में गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में कितनी उत्कृष्टता अपनाई है और निजी चरित्र तथा दूसरों के साथ सद्व्यवहार में किस सीमा तक अपनी विशिष्टता अपनाई है।
जो अपने को जितना संयत, सज्जन और अनुशासित बना सका, वह उतना ही महान है। धर्म चिन्हों या प्रचलनों से कोई धर्मात्मा नहीं बनता। जिसने आदर्शों के प्रति अपनी निष्ठा जिस सीमा तक परिपक्व की है, वस्तुतः उसी का बड़प्पन सफल और सराहनीय है।
गीता की गणना यों हिन्दू धर्म के धर्मशास्त्रों में होती है, पर वस्तुतः वह विश्व धर्म, मानव धर्म, सार्वभौम धर्म का सबसे छोटा एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें तत्वज्ञान, आचारशास्त्र, नीति, औचित्य, विवेक जैसे सभी महत्वपूर्ण विषयों का समावेश हो जाता है।
इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि धर्मग्रन्थों को मात्र पूजापाठ की वस्तु मान लिया गया है। उनके उल्लेखों का वाचन या श्रवण ही पुण्यफल दाता मान कर सन्तोष कर लिया जाता है। यह आरम्भिक जानकारी या विषय वस्तु समझने के लिए किसी ग्रन्थ का पढ़ना, समझना तो आवश्यक है, पर इतने भर से ही यह नहीं मान लेना चाहिए कि अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो गई। यदि ऐसा ही होता तो महत्वपूर्ण ग्रन्थों के मुद्रक, प्रकाशक, विक्रेता उन विषयों के अनुभवी पारंगत भी हो जाते और उनका वही लाभ उठाते जो उन प्रसंगों को जीवन में उतारने वाले उठाते हैं।
विश्व के देशों के मानचित्र एवं भूगोल बाजार में बिकते हैं। उन्हें पढ़ने-देखने से एक अनुभव तो होता है, पर वह लाभ नहीं मिलता जो उन क्षेत्रों का परिभ्रमण करने अथवा सम्पर्क साधने से मिलता है।
हिंदू धर्म में गीता, रामायण, भागवत आदि के कथा-प्रसंग कहने-सुनने के आयोजन आये दिन होते रहते हैं, पर उनके पीछे प्राय: मान्यता यही रहती है कि इस वाचन, कथन, पठन, श्रवण भर से वह पुण्य मिल जाय जो इनकी बताई हुई रीति-नीति जीवन में उतारने पर मिल सकना सम्भव है।
गीता के प्रतिपादन वस्तुतः ऐसे हैं, जिससे उसे सार्वभौम तत्वज्ञान का, विश्व धर्म का श्रेय मिला है।
लोकमान्य तिलक, गांधी जी, सातवलेकर, गीतानन्द, चिन्मयानन्द, शंकर, रामानुज, विनोबा, ज्ञानेश्वर तथा अनेक संस्कृत आचार्यों ने गीता के अर्थ तथा विवेचन अपनी-अपनी दृष्टि से किये हैं, और भी अनेक विश्व विद्वानों ने इस पर लेखनी उठाई है और जो जितना गहरा उतरा है उसे उतना ही प्रकाश हाथ लगा है।
सर एडविन आर्नाल्ड ने गीता का अंग्रेजी में पद्यानुवाद किया था। उन्होंने अनेकों पाश्चात्य विद्वानों का ध्यान इस दार्शनिक सम्पदा की ओर खींचा। ईस्ट इंडिया कम्पनी के वरिष्ठ अधिकारी चार्ल्स विलकिन्स इस ग्रन्थ पर मुग्ध थे। भारत के गवर्नर जनरल वारेन हैस्टिंग्स ने भी बड़ी बारीकी से इसे समझने का प्रयत्न किया और कम्पनी के आर्थिक अनुदान से इसका प्रकाशन इंग्लैंड में सन् 1784 में कराया।
इसके अतिरिक्त प्रो. मैक्समूलर पालड्रसन, हक्सले, क्रामस्टोफर, ईशरवुड आदि ने भी इसकी सुविस्तृत विवेचनाएं की और कहा कि गीता में वह सब कुछ है जो विभिन्न धर्मों के विश्व के अतिरिक्त जनों ने समय-समय पर किसी भी रूप में कहा है।
राजगोपालाचार्य और सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने पूर्वार्त्त और पाश्चात्य नीति दर्शन का इसे संगम समन्वय कहा है। स्वामी चिन्मयानन्द ने भी इस ग्रन्थ के कई सामान्य समझे जाने वाले प्रसंगों पर तीखा प्रकाश डाला है।
गीता यों महाभारत के 18 अध्यायों का पृथक से छपा एक संकलन मात्र है, पर उसमें जीवन दर्शन से सम्बन्धित इतने अधिक विषयों का क्रमबद्ध रूप से गुन्थन किया गया है कि चिन्तन का कोई महत्वपूर्ण विषय उसमें छूटने नहीं पाया है।
गीता माहात्म्य में उसे सभी उपनिषदों का सार कहा गया है जिसे कृष्ण ने दुहा और अर्जुन रूपी बछड़े ने पिया है, पर वस्तुतः यह न कोई इतिहास है और न किसी सामयिक समस्या का समाधान जैसा कि उसके प्रथम अध्याय की भूमिका को पढ़ने समझने से प्रतीत होता है। यदि ऐसा होता तो उसमें औपनिषद तत्वज्ञान का इतना गहरा समावेश करने की आवश्यकता न होती।
गीता हर बुद्धिवादी के लिए पढ़ने योग्य है। उसके सहारे किसी अनसुलझी समस्याओं का समाधान मिलता है जिनके सम्बन्ध में विद्वजन असमंजस में ही बने और विवाद करते रहे हैं।
प्रसन्नता और आनन्द में मौलिक अन्तर है। प्रसन्नता इच्छित भौतिक वस्तुओं की उपलब्धि पर होती है। पर वह देर तक टिकती नहीं। क्योंकि उससे भी बड़ी उपलब्धि की उत्कण्ठा तत्काल आ दबोचती है। सौ रुपये का लाभ हुआ। क्षण भर प्रसन्नता हुई। दूसरे ही क्षण, हजार की लालसा जग पड़ी और वे सौ रुपये अपर्याप्त लगने लगे। असन्तोष उत्पन्न करने लगे। साथ ही उन सौ रुपयों की रखवाली का नया ताना-बाना बुनना पड़ा। इतना ही नहीं जब उनके खर्च का हाथ बढ़ता है तो मुफ्त का या अनीति उपार्जित धन मात्र कुमार्ग में जाने के लिए रास्ता बनाता है। नशा, जुआ, शृंगार, व्यभिचार, ठाट-बाट बनाने जैसी बातें सूझती हैं। क्षण भर की प्रसन्नता कुछ ही क्षणों में नई चिन्ताओं और हैरानियों का बोझ लाद देती है। तब लगता है कि रोज कुंआ खोदने रोज पानी पीने की परिस्थिति औचित्य की दृष्टि से कहीं अच्छी थी। जब औसत भारतीय स्तर का जीवन जीते तब अधिक उपयुक्त मनःस्थिति में थे। दौलत की अभिवृद्धि ने ठाट-बाट बढ़ाया, ललक जगाई पर साथ ही आत्म-सन्तोष का अपहरण कर लिया।
भौतिक उपलब्धियां बादलों की बिजली की तरह चमकती और कुछ ही समय में विलीन हो जाती है। वैभववानों की सुविधाएं अवश्य अधिक रहती हैं। पर ईर्ष्या, द्वेष, असंतोष, अपहरण आदि की आशंकाओं से चित्त में अशान्ति की मात्रा अनायास ही बढ़ती जाती है। वासना, तृष्णा की आग ऐसी है जो ईंधन पाकर तृप्त नहीं होती वरन् और भी अनेक गुनी होकर भड़कती है।
फिर स्थिर और वास्तविक आनन्द क्या है? इसकी विवेचना करते हुए शास्त्रकारों ने- तत्त्वदर्शियों ने वास्तविक आत्मिक सुखों को तीन प्रकार का बताया है। इनमें स्वर्ग, मुक्ति और समाधि का उल्लेख होता है। कहा गया है कि यह परिस्थितियां जिन्हें भी हस्तगत होती हैं, वे अक्षय सुख की अनुभूति करते हैं, फिर उनके हाथ से आनंद कभी जाता ही नहीं। यह चाव लगने पर फिर उसे छोड़ने का मन भी नहीं करता।
वर्तमान मान्यता के अनुसार यह तीनों ही कठिन दीखते और असम्भव लगते हैं। समझा जाता है कि स्वर्ग और मुक्ति मरने के बाद मिलते हैं। स्वर्ग के लिए देवलोक जाना होता है और मुक्ति ब्रह्मलोक में पहुंचने पर मिलती है। समाधि के बारे में भी ऐसी ही मान्यता है कि अपने को संज्ञा शून्य बनाने की स्थिति बड़ी कठिन योग साधनाओं के सहारे कालान्तर में मिलती है। उन्हें प्राप्त करने की कठिनाइयों की बात सोचने पर मनुष्य निराश हो जाता है। निराशा की स्थिति में मनुष्य वह भी नहीं कर पाता जो कर सकता है। जिन्हें अत्यधिक कठिन, असम्भव स्तर का मान लिया जाय उनके लिए निराश मनःस्थिति के कारण जो प्रयास हो सकते थे, वे भी नहीं बन पड़ते।
वस्तुतः स्वर्ग, मुक्ति और समाधि सम्बन्धी सभी मान्यताएं भ्रमपूर्ण हैं। स्वर्गलोक, देवलोक, ब्रह्मलोक, सम्बन्धी मान्यताओं के सम्बन्ध में जो विवेचन किया गया है वह अलंकारिक है। ग्रह नक्षत्रों के सम्बन्ध में विज्ञान ने अब तक बहुत खोज-बीन कर ली है। ब्रह्माण्ड का स्वरूप और ढांचा अब बुद्धि क्षेत्र के लिए अगम्य नहीं रहा। पर उसकी पकड़ में स्वर्ग लोक या ब्रह्म लोक जैसे किसी स्थान का कहीं पता नहीं चला है। फिर समीपतम तारक भी इतनी दूर हैं कि बिना द्रुतगामी वाहनों के उन तक पहुंचने की आशा नहीं की जा सकती। मरणोत्तर स्थिति में भी प्राण कहीं अन्यत्र जा सकेगा, ऐसी सम्भावना कम ही है।
फिर स्वर्ग आदि लोक क्या हैं? इन्हें चेतना की परतें ही कह सकते हैं। यह मनुष्य के उत्कृष्ट व्यक्तित्व, स्तर एवं दृष्टिकोण पर ही निर्भर है कि मनुष्य जिस भी मनःस्थिति में रहे, उसे उसी लोक का वासी कहा जाय।
सन्तोषी, प्रसन्नचित्त, कर्तव्यपरायण, सज्जन, समझदार, ईमानदार, जिम्मेदार और बहादुर मनुष्य जिसके प्रौढ़ और परिपक्व मन:स्थिति में रहते हैं उसे स्वर्ग कहते हैं। कठिनाइयां उनके सामने भी आती रहती हैं, पर वे उन्हें अपनी परीक्षा मानते हैं कि समाधान खोजने या सहने का पराक्रम या साहस उदय हुआ या नहीं। ऐसी आत्माएं स्वर्गलोक में काम करती हैं। उनकी प्रसन्नता, प्रफुल्लता को कोई छीन नहीं सकता है।
मुक्ति भव-बन्धनों से छुटकारे को कहते हैं। भव-बन्धनों में हथकड़ी, बेड़ी और गले की तौक की तुलना दी गई है। पर इन्हें क्रूर, दुर्धर्ष अपराधियों को बन्दीगृहों में ही पहनाया जाता है। सामान्य लोग तो खुले हुए भी फिरते हैं। इस बन्धन अलंकार का तात्पर्य लोभ, मोह और अहंकार से है। उन्हें मनुष्य स्वयं ही अपने ऊपर लादता और मकड़ी के जाले की तरह उनमें स्वयं ही फंसता है। वह चाहे तो उस जाल-जंजाल को विवेक दृष्टि अपनाकर आसानी से समेट भी सकता है।
मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएं बहुत ही सीमित हैं। इतना अद्भुत शरीर और इतना बुद्धि कौशल उनकी पूर्ति कुछ ही घंटों के परिश्रम में पूरा कर सकता है। विपुल सम्पदा का लालच तो उसके संग्रह या अपव्यय के लिए ही होता रहता है। यदि उस ललक को छोड़ा जा सके तो समझना चाहिए कि लोभ का अस्तित्व समाप्त हुआ।
परिवार के प्रति कर्तव्य का निर्वाह एक बात है और मोहग्रस्त होकर उनके लिए ही जीवन निछावर कर देना सर्वथा दूसरी। बच्चों को बढ़ाते जाना, उन्हें सुविधाओं से लादते जाना, इसी मोह को बेड़ी कहते हैं। परिवार को छोटा रखना, नये सदस्य बनाना बढ़ाना, जो है उन्हें ईश्वर का उद्यान समझकर माली की तरह साज सम्भाल करते रहना समुन्नत बनाना किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए। घर के सदस्यों को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाने भर की आकांशा हो तो उसकी पूर्ति सहज ही संभव है। परिवार का उद्यान अपने आप में सुधारने आदर्श प्रस्तुत करने की पाठशाला है, जिसमें पढ़ाने और पढ़ने के दोनों ही सुयोग साथ-साथ मिलते हैं। मोह ग्रस्त लोग ही कुटुम्बियों को कुटेवों में अभ्यस्त कराते हैं और उन्हें दुःख देने और स्वयं सुख पाने का कुचक्र रचते हैं। इस मोह पाश से कोई भी दूरदर्शी तत्वदर्शी सहज ही छूट सकता है और उसी परिकर को अपने आनन्द का उद्गम बना सकता है।
भौतिक समाधि में एकाग्रता का- योगनिद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शरीर जड़ है उसे प्रसुप्ति जैसी अभ्यस्त स्थिति में पहुंच जाने का अभ्यास भी भौतिक चेष्टा या सफलता ही कहा जा सकता है। जड़ समाधि के अभ्यासी उस तन्द्रा से उठने पर फिर प्रपंचों के कुचक्र बुनते देखे गये हैं। इस अद्भुत कौतुक में वे लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यश और धन बटोरते हैं। इन दोनों की असाधारण मात्रा किसी भी व्यक्ति को अधोगामी बना सकती है। समाधि का तमाशा दिखाने वाले यदि इसी प्रकार के माया जाल रचें तो आश्चर्य भी क्या है? जिन्हें वास्तविक समाधि लगानी आती है वे उसे आत्म-कल्याण के लिए प्रयुक्त करते हैं, न कि विज्ञापन के लिए। जिनमें वास्तविकता है, वे अपने अभ्यास को गोपनीय ही रखते हैं।
समाधि वस्तुतः सन्तुलित बुद्धि का नाम है। इसे गीता में स्थितप्रज्ञ के नाम से सम्बोधित किया गया है। अपने आप पर यथार्थवादी दृष्टि रखना- अन्तर्मुखी रहना और सांसारिक कर्तव्यों को शरीर धारण करने का किराया या ईश्वरेच्छा इच्छा का अनुशासन मानकर करते रहना वास्तविक समाधि है। यही अनासक्त कर्मयोग है। इसे अपनाये बिना तो शरीर के कलपुर्जों को जंग खा जाती है और उसकी निरोगता छिन जाती है साथ ही प्रगति, प्रसन्नता भी।
कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए निरहंकार और निर्लिप्त रहना व्यावहारिक जीवन का समाधियोग है। इसे कबीर ने ‘सहज समाधि’ कहा है। सुव्यवस्थित, सन्तुलित और शालीनतायुक्त मन:स्थिति का निर्माण कर लेना समाधि योग का ही प्रत्यक्ष स्वरूप है।
इस प्रकार स्वर्ग सुख देव-मानवों के साथ रिश्ता जोड़ने से- मुक्ति, लोभ, मोह और अहंकार के प्रपंच से बच निकलने को समझा जाता है। समाधि अर्थात् सम्यक् बुद्धि। यह सुसंतुलित उच्चस्तरीय चिन्तन का नाम है। यह तीनों ही उपलब्धियां सरल हैं और विवेकपूर्ण जीवन नीति अपनाने वाले हर किसी को अक्षय आनन्द प्रदान करती रह सकती हैं।
ऋषि ने पुकारा है - “तमसो मा सदगमय”। हे प्रभु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। असत् से सत की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर। देखना है कि यह अमृत कहाँ है? सत् कहाँ है? और ज्योति कहाँ है? उन तक कैसे पहुँचा जा सकता है। इन तीनों देव विभूतियों को पाकर किस प्रकार कृत-कृत्य हुआ जा सकता है।
यह तीनों हृदय गुफा में अवस्थित हैं और अंतर्मुखी होकर इस रत्न राशि को कोई भी विवेकशील व्यक्ति सरलता पूर्वक बटोर सकता है।
गुफा निवास एक बात है और गुफा की उपलब्धि दूसरी। भौतिक क्षेत्र की गुफाएँ पर्वतीय प्रदेशों में जगह-जगह पाई जाती हैं। वे प्रकृति की संरचनाएं हैं। उनमें वन्य पशु अपने आश्रय बनाते हैं और अपना विश्राम काल उन्हीं में बिताते हैं। प्राचीन काल में आत्म चिन्तन, अन्तःक्षेत्र के अनुसन्धान के लिए ऐसा वातावरण अधिक उपयोगी माना जाता था। तब उसमें स्थान-स्थान पर अनेक योगी-यती रहते थे। उनका आत्म-बल ऐसा होता था कि शरीर निर्वाह के साधन भी अनायास ही मिल जाते थे और सुरक्षा संकट उत्पन्न नहीं होता था।
अब वैसी स्थिति नहीं रही। तो भी लोग नकल बनाने में ही अपनी महत्ता समझते हैं। असली राजा या ऋषि बनना यदि सम्भव न हो तो लोग रंग मंचों पर उन्हीं वेषों का वस्त्र विन्यास के आधार पर मुखौटे लगाकर वैसा ही प्रदर्शन करते हैं। इमारतों की तरह तहखाने की डिजाइन भी बना लेते हैं और उसी को गुफा कहते हैं। उसमें बैठे-बैठे समय गँवाते हुए सोचते हैं कि वे भी पुरातन काल के ऋषियों जैसी सिद्धियाँ प्राप्त कर रहे हैं। वे भूल जाते हैं कि चिन्तन और लक्ष्य में जमीन आसमान जितना अन्तर रहते हुए भी असली और नकली की एक जैसी स्थिति कैसे हो सकती है? यदि गुफा में रहने से ही सिद्धियाँ मिली होतीं तो सभी चूहे सिद्ध पुरुष हो गये होते। शीत आतप का जहाँ अधिक दबाव होता है, या दृष्टि से बचने की आवश्यकता होती है, वहाँ वन्य पशु प्रायः गुफाओं में रहते हैं या उसे अपने पंजों से खोदकर बना लेते हैं। नेवला, गोह, साँप आदि का अधिकांश जीवन गुफाओं में ही समय काटते हुए बीतता है।
अध्यात्म क्षेत्र में वातावरण की महत्ता तो है ही पर उस दिशा में प्रगति करने के लिए इतने भर से काम नहीं चल जाता। इससे अधिक भी कुछ करना होता है। अन्यथा वातावरण का लाभ शारीरिक स्वस्थता तक ही सीमित होकर रह जाता है।
तत्त्वदर्शियों ने हृदय क्षेत्र में गुफा कहा है। यहाँ हृदय के भौतिक और आत्मिक पक्ष के अन्तर को समझना होगा। भौतिक हृदय सीने में बाँई ओर नाशपाती जैसे आकार की एक छोटी सी माँसल संरचना है, जो अपने रचना प्रयोजन के अनुसार को धमनियों, और छोटी नलिकाओं द्वारा निरन्तर रक्त फेंकती और खींचती रहती है। इसकी धड़कन उस स्थान पर हाथ रखकर आसानी से पहचानी जा सकती है। इसी पर रक्तचाप की न्यूनाधिकता का प्रभाव पड़ता है और क्रिया-कलाप थोड़ी देर के लिए रुकते ही प्राणान्त हो जाता है।
अध्यात्म क्षेत्र की हृदय गुफा इससे भिन्न है। वह मेरुदण्ड में अनाहतचक्र के समीप है। पंचकोश गणना में यही विज्ञानमय कोश है। इसे भौतिक हृदय की सीध में तनिक पीछे हटकर अपनी स्वतन्त्र सत्ता बनाये रहने वाला माना गया है। संक्षेप में यही अन्तराल या अन्तःकरण है- भाव सम्वेदनाओं का केंद्र। कविता में किसी को दिल दे बैठना उस पर निछावर होने को कहते हैं। उर्दू का एक शेर है- “दिल के आइने में हैं तसवीरें यार, जब जरा गरदन झुकाई देखली।” यह आइने जैसा दिल रक्त संचार ग्रन्थि से सर्वथा भिन्न है। हिम्मत, साहस, बहादुरी आदि के संदर्भ में भी उसी आत्मिक हृदय का उल्लेख किया जाता है।
भावनाओं का तो केंद्र ही यह है। यहाँ भावनाओं से तात्पर्य आदर्शवादी, पुण्य परोपकार में मिश्रित भाव सम्वेदनाओं से है। यह कार्य बुद्धि नहीं कर सकती। बुद्धि का आधार प्रत्यक्ष लाभ हानि है। घाटा पड़ने पर उसे झटका लगता है और लाभ होने पर गर्व का उभार आता है। किसी वृद्धजन के मर जाने पर खुशी मनायी जाती है उसकी अर्थी को सजाया जाता है। मृत्युभोज में पैसा खर्चा जाता है। मानो कोई आकस्मिक लाभ हुआ हो। बुद्धि का यह निर्णय ठीक ही है कि एक बेकार आदमी घर घेरे हुये था, पैसा खर्च कराता था और आये दिन सेवा सहायता की माँग करता था। ऐसे झंझट से पीछा छूटा तो अच्छा ही हुआ। उस घटना पर खुशी होनी ही चाहिए। किन्तु उसकी धर्मपत्नी को विछोहजन्य जो दुःख होता है उसे वही जानती है। छोटे बच्चों भी बुद्धि की दृष्टि में व्यर्थ ही होते हैं। माता को सदा हैरान ही करते रहते हैं। खर्च भी कराते ही हैं पर उनकी मृत्यु पर माता को कितना कष्ट होता है, यह भावना है। किन्तु विडम्बना यह है कि लड़की के मर जाने पर बाप मन ही मन प्रसन्न होता है कि एक बड़े ऋण भार से छुटकारा मिला। यही है तार्किक बुद्धि लाभ देखने वाली बुद्धि और भावना का अन्तर, उस भावना का जो अन्तःकरण कहलाती और हृदय गुफा में रहती है।
बुद्धि को तक के आधार पर प्रभावित किया जा सकता है और प्रलोभन या दबाव से उसकी दिशा बदली जा सकती है किन्तु वह लुढ़केगी सदा स्वार्थ साधन की दिशा में ही। उसे मोड़ना इसी पक्ष में सम्भव है। घाटे का सौदा वह नहीं करना चाहती। इसलिए ऐसे उच्च आदर्शों के परिपालन में उसे कटिबद्ध नहीं किया जा सकता जिसमें प्रत्यक्षतः घाटा पड़ता हो। यही कारण है कि बुद्धिवादी धर्मोपदेशक आदर्शों की बड़ी-बड़ी बातें तो कहते हैं। उनके भाषण बड़े लच्छेदार होते हैं, पर जब उस कथन को निजी जीवन में कार्यान्वित करने के अवसर आते हैं तो पीछे हट जाते हैं। इसका कारण एक ही है कि उनने धर्मचर्चा को बुद्धि क्षेत्र में तो अपनाया है पर अन्तःकरण में भावना क्षेत्र में स्थान नहीं दिया।
संसार में अनेकों व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो आदर्शों को प्रमुखता देते हैं। उनकी भावनाएं उस रंग में रंग जाती हैं और उस उत्कृष्टता को अपनाने में बड़े से बड़ा जोखिम उठाते हैं। शारीरिक कष्ट, पैसे की हानि, विरोधियों द्वारा त्रास उपहास आदि की घटनाएँ उनके सामने आती हैं। यहाँ तक कि अपने पिछले कुसंस्कारों को उलट-पुलट करते देखा गया है। किसी के तनिक से बहकने पर बहक जाते हैं। स्वार्थ त्यागने परमार्थ अपनाने का श्रेय तो लेना चाहिए, पर उसके लिए जो त्याग बलिदान करना पड़ता है, उसके लिए कदम बढ़ाने का साहस नहीं करते। करते हैं तो कुछ ही दिनों में क्षणिक उत्साह का बबूला फूटते ही पीछे लौट जाते हैं। इस लौटने में अपनी कमजोरी स्वीकार न करके किसी न किसी अन्य पर दोषारोपण करते हैं। परिस्थितियों की मजबूरी बताते हैं। यह भावनाओं का अधूरापन ही है।
भाव संवेदना का क्षेत्र यदि समुन्नत सुसंस्कृत हो तो उसमें सच्ची सहानुभूति उपजती है। दूसरों के कष्ट बँटा लेने और अपनी सुविधाओं को बाँट देने के लिए मन करता है, मन ही नहीं करता साहस भी उभरता और वे तथाकथित मित्र स्वजनों को असहमत होते हुए भी वैसा आदर्शवादी साहस कर गुजरते हैं।
जापानियों को रूस की लड़ाई में एक नदी आड़े आई। पुल बनाना कठिन था। इस नदी को पार करने के लिए एक हजार नागरिकों की लाशों का पुल बनना था जिस पर होकर सैनिक पार जा सकें। इसके लिए नागरिकों की भर्ती की गई। एक हजार की जगह चार हजार नाम आ गये। इन नामों में एक लड़का भी था जो भर्ती होने के लिए अति उत्सुक था पर उसकी मां बीमार थी। अकेला था। इसलिए उसे मंजूरी न मिली। मां ने अपने को आड़े आया देखकर विष पी लिया और लड़के को भेजते हुए कहा- “शरीर की, मां की अपेक्षा राष्ट्र माता की सेवा अधिक आवश्यक है तुम प्रसन्नता पूर्वक जाओ।”
मन को जो प्रिय लगता है, उसी के सम्बन्ध में उसकी विचारणा चल पड़ती है। जिस प्रकार पैसा मिलने पर किसी को भी वेश्या अपना प्रेम प्रदर्शित करने लगती है। उसी प्रकार मन की पूरी मशीन उसी स्तर की कल्पनाएँ करने, सम्भावनाएँ खोजने और प्राप्ति के साधन तलाशने में लग जाती है। आकांक्षाओं को उसी प्रकार मन्त्र तन्त्र का संचालक माना गया है जैसे कि शरीर से काम कराने में मन की प्रेरणा काम करती है।
जीवन का स्वरूप क्या हो? भविष्य में किस दिशा में बढ़ा जाय? इसका निर्धारण करने के लिए जिस अन्तराल से संदेश मिलते हैं, उस पर आकांक्षाओं की प्रधानता रहती है। इच्छाओं को अनुचित ठहराने ओर सही राह पर लाने में बुद्धि का उतना योगदान नहीं होता जितना भावनाओं का। बुद्धि तो राज दरबारियों की तरह शासक की हाँ में हाँ मिलाने लगती है। उसी का समर्थन करती है। वही उपाय बताती है जैसी कि मालिक की मर्जी होती है।
चेतना क्षेत्र की अधिष्ठात्री बुद्धि को माना जाता है। यह मान्यता लोकाचार से सम्बन्धित दैनिक क्रिया-कलापों पर ही ठीक तरह लागू होती है। पर जहाँ तक जीवन प्रवाह को मोड़ने का सम्बन्ध है, वहाँ आकांक्षाओं की ही प्रमुखता है। यह आकांक्षाएं निकृष्ट कोटि की भी हो सकती हैं। उनकी प्रतिशोध, वासना, लालसा की भी भरमार हो सकती है और उस उद्विग्नता में मनुष्य कुकर्म करने की योजना भी बना सकता है और तत्परता भी दिखा सकता है। किन्तु उन्हें उच्चस्तरीय बनाना हो तो अपनी प्रियता के साथ जोड़ना हो तो उसके लिए उसी स्तर का ताना-बाना बुनना पड़ता है। लौकिक आकांक्षाओं के स्थान पर आदर्शवादी आध्यात्मिक अभिलाषाओं को ही अपनाना पड़ता है। उसी अधिग्रहण को भक्ति भावना कहते हैं।
‘भक्ति’ साधारणतया भगवान से प्रेम करने को कहते हैं। पर वह व्यावहारिक नहीं, कल्पना में, तो किसी स्वल्प लोक की स्वर्ण परी को भी प्रिय पात्र बनाया जा सकता है। पर जहाँ तक ईश्वरीय सत्ता का सम्बन्ध है उसका अनुशासन पाला जा सकता है। वैसा प्रेम नहीं हो सकता जैसा कि दो मित्रों या सम्बन्धियों के बीच होता है।
तत्वज्ञानियों का कथन है कि ईश्वर एक नियम, अनुशासन और व्यवस्था है, जिसका किसी से रोग द्वेष नहीं हो सकता। उससे किसी पक्षपात की भी आशा नहीं की जा सकती। निष्पक्ष न्यायाधीश को मनुहार उपहार से फुसलाया नहीं जा सकता है। उसके सामने यथार्थता को सिद्ध करने वाले प्रमाण ही सब कुछ होते हैं। ईश्वर की अनुकूलता, अनुकम्पा किसी भावुकता भरी उछल-कद से नहीं खरीदी जा सकती। उस प्रयोजन के लिए अपनी पात्रता और प्रामाणिकता सिद्ध करनी होती है। इस ढाँचे में ढलने के लिए ऐसी प्रबल अभिलाषा उत्पन्न करनी होती है जो उत्कृष्टता की पक्षधर हो। भक्ति का यही तात्पर्य है और यही स्वरूप।
प्रश्न यह था कि आकांक्षा को कहाँ नियोजित किया जाय? इसका आध्यात्मिक उत्तर एक ही हो सकता है- उत्कृष्टता के साथ। उत्कृष्टता का तात्पर्य आदर्शवादिता, उदारता, दूरदर्शिता, सज्जनता को ही माना जा सकता है। यही तो वे सत्प्रवृत्तियां हैं जो मनुष्य के अन्तराल एवं व्यक्तित्व को महान बनाती है। उसे ऐसे मार्ग पर चलाती हैं जिसमें आत्म परिष्कार और पुण्य परमार्थ का समुचित समन्वय हो।
व्यवहार बुद्धि साँसारिक स्वार्थों का समर्थन करती है। बहुमत अपनाये गये क्रिया-कलापों से प्रभावित होती और उसी का अनुकरण करते हुए उसी राह पर चलती है। ऐसी दशा में व्यावहारिक विचारणा से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह उस पक्ष का समर्थन करेगी जो ओछे, बचकाने, अदूरदर्शी जन साधारण में प्रचलित नहीं है। बहुमत में स्वार्थी समुदाय है। आदर्शों की बात सोचने वालों को दर्शन तो जहाँ-तहाँ ही हो सकता है। उन्हें तो इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठों पर ही खोजा जा सकता है। जिनको महामानवों की गाथाएं, उच्चस्तरीय विचारणा की, महा प्रज्ञा की- झाँकी मिल सके और जिन्हें वह अनुकरणीय अभिनन्दनीय लग सके, उनसे ही दूसरों से सत्परामर्श मिलने की आशा की जा सकती है। अन्यथा आत्मा और परमात्मा को छोड़कर प्रायः सभी ऐसे हैं जो येन-कन प्रकारेण स्वार्थ सिद्धि का ही परामर्श देते हैं। यहाँ तक कि तथाकथित सन्त महन्त भी स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि का वह मार्ग अपनाने की ही सलाह देते हैं जो प्रकारांतर से स्वार्थ सिद्धि के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
जीवन किस प्रकार व्यतीत किया जाय? इस बहुमूल्य सम्पदा को किस प्रयोजन में लगाया जाय? इसका सही परामर्श दो ही दे सकते हैं। एक आत्मा, दूसरा परमात्मा। इन दोनों के समन्वय से जो विचार बुद्धि प्रकाशित होती है उसे ‘महाप्रज्ञा’ कहते हैं। इस समुच्चय का एक ही परामर्श हो सकता है कि आदर्शों के लिए जिया जाय। उत्कृष्टता को अपनाया जाय। महामानवों के पद चिन्हों पर चला जाय। शारीरिक सुविधाओं को नहीं, आन्तरिक महानता को वरण किया जाय।
इस परिधि में अपनी अभिरुचि को केंद्रित और प्रगाढ़ किया जा सका तो समझना चाहिए कि भक्ति भावना का अन्तराल में प्रवेश हुआ और वह वर्ग मिला जिस पर चलते हुए हर कदम आनन्द एवं उल्लास की अनुभूति प्रदान कर सकता है। भक्ति का रसास्वादन ऐसे ही कर्मयोगी कर सकते हैं। जिन्हें उथली भावुकता उछाल कर प्रेम मग्न होने का नाटक करना है वे अभिनय के रूप में रोने, गाने, उछलने, मटकने जैसा कुछ भी नाटक कर सकते हैं, उनके लिए क्षण में रोना और क्षण में हँसना भी सम्भव हो सकता है न आता हो तो किसी अभिनय मण्डली में सम्मिलित रहकर उस कला में प्रवीण बना जा सकता है, पर इस विडंबना से हाथ क्या लगना है? आत्मा की गहराई में उतरने और परमात्मा की ऊँचाई नापने के लिए- महाप्रज्ञा का- दूरदर्शी विवेकशीलता का ही आश्रय लेना पड़ता है और वह साहस जुटाना पड़ता है जिसमें आत्मावलम्बन अपनाया जा सके, अन्य सभी का साथ छोड़ बैठने पर भी एकाकी लक्ष्य तक पहुँचकर रहने का व्रत निबाहा जा सके।
अन्तर्द्वन्द्व का महाभारत हर घड़ी धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मनःसंस्थान में छिड़ा रहता है। भौतिक आकर्षण अपनी ओर खींचते हैं। उनकी पकड़ इतनी मजबूत होती है कि पूर्व संचित कुसंस्कार, सामयिक लिप्सा लालसाएं प्रलोभनों की ओर ही घसीटती हैं। आदर्शों की पक्षधर दिव्य ज्योति तो अन्तःकरण के किसी कोने में जलती और अंधकार में न भटकने का धीमा परामर्श देती रहती है। इस दिव्य-ज्योति को प्रज्वलित किया जा सके तो वह सूझ-बूझ भरी दूरदर्शिता उभर सकती है, जिसमें आत्मकल्याण को प्रमुख और शरीर को दूसरे नम्बर पर रखा जा सके।
शरीर लिप्सा को प्रिय पात्र बनाने पर हम भोगों को भी चैन से भोग नहीं पाते और आत्मा को पतन के नारकीय गर्त में धकेलते हैं। किन्तु यदि आत्म सत्ता- परमात्म अनुशासन को स्वीकार करें तो शरीर यात्रा भी किसी घाटे में नहीं रहती। इसी राह को अपनाने वाले स्वार्थ और परमार्थ की सिद्धि का उभयपक्षीय लाभ उठाते हैं।
स्वामी विवेकानंद जी बनारस की एक सँकरी गली से जा रहे थे। रास्ता घेरे बन्दरों का झुण्ड बैठा था। स्वामीजी डरे और भाग कर लौटने लगे। बन्दरों ने पीछा किया, कपड़े फाड़ दिये और कई जगह काट खाया। चीख-पुकार सुनकर गली का एक गृहस्थ बाहर निकला। उसने कहा, “भागो मत, सामना करो। कुछ नहीं तो घूँसा तानकर इनकी ओर बढ़ो।”
स्वामी जी ने वैसा ही किया। बन्दर ठिठके और धीरे-धीरे इधर-उधर खिसक गये। विवेकानंद ने समझा कठिनाइयों से डरना व्यर्थ है। उससे जूझने के लिए हिम्मत के सहारे आगे बढ़ना चाहिए।
आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रगति पथ पर पहला चरण बढ़ाने वाले को अपने आहार को सुधारने और उसकी मात्रा में कटौती करनी चाहिए। किसके लिए आहार की कितनी मात्रा पर्याप्त है? इसका निर्णय उसी को स्वयं करना होगा। क्योंकि हर व्यक्ति की स्थिति भिन्न होती है। उसके पाचन तन्त्र की क्षमता कितनी है? इसकी जानकारी जितनी अच्छी तरह अपने आप को होती है, उतनी दूसरे को नहीं। इसलिए निर्धारण भी स्वयं ही किया जाना चाहिए।
इसकी दो कसौटियाँ हैं। एक यह कि भोजन का भार इतना न बढ़े कि आलस्य आने लगे। लेटने सोने को जी करे। काम करने की इच्छा न रहे। यह बातें बताती हैं कि भोजन अनावश्यक मात्रा में किया गया। दूसरा यह कि पेट आधा ही आहार से भरे। आधा, पानी के लिए और साँस के आवागमन के लिए खाली छोड़ा जाना चाहिए। ठूँस-ठूँसकर इतना न खाया जाना चाहिए कि आग्रह करने पर थोड़ा और खा लेने की गुंजाइश न रहे। तीसरी परख यह है कि दूसरी बार भोजन करने से पूर्व पिछला खाया हुआ भली प्रकार पच गया हो और नया आहार ग्रहण करने की लालसा बलवती हो चले। पेट खाली प्रतीत हो। ऐसी स्थिति न बन पड़े तो समझना चाहिए कि पहले खाया हुआ अभी पचा नहीं है। अपच की स्थिति में आदत से विवश होने पर खाने की आदत भड़कते ही थाली परोसवा लेना गलती की बात है।
पेट की सामर्थ्य से अधिक खाते रहने, बार-बार जल्दी-जल्दी कुछ न कुछ मुँह में ठूँसते रहने की आदत से स्वभाव बिगड़ जाता है और वैसा ही मतत् करने की उत्कण्ठा उभरती है। यह आदत एक प्रकार से स्वभाव को ही बिगाड़ देती है और पता नहीं चल पाता कि भूख लगी भी है या नहीं? ऐसी दशा में एक दो दिन का उपवास केवल जल पर रखने और पेट की सफाई के लिए ऐनीमा आदि लेते रहने से कब्ज से छुटकारा मिल जाता है। उतरी हुई गाड़ी फिर से पटरी पर आ जाती है।
आमतौर से देखा गया है कि लोग प्रायः आवश्यकता से दूना भोजन करते हैं। ऐसी दशा में मनुष्य रोटी नहीं खाता वरन् रोटी मनुष्य को खाने लगती है। एक साधारण अनुमान यह है कि अभ्यस्त मात्रा से यदि आधी मात्रा घटा दी जाय तो काम मजे में चलता रह सकता है। पेट को जो अनावश्यक भार ढोने में अपनी सामर्थ्य समाप्त करनी पड़ती है, उस अनाचार से छुटकारा मिल सकता है।
जल्दी-जल्दी में उल्टे सीधे ग्रास निगलने नहीं चाहिए, वरन् ग्रास को इतना चबाया जाना चाहिए कि वह गले से नीचे सहज ही उतर जाय, उसमें मुँह के स्रावों का समुचित समावेश हो जाय।
भोजन में स्वाद के नाम पर मसाले, मिठाई, चिकनाई, मिर्च, खटाई, इतनी नहीं डालनी चाहिए जिससे स्वाद के चटोरपन में आहार की ज्यादा मात्रा पेट में चली जाय। भोजन का अपना निजी रुचिकर स्वाद है। ग्रास को अच्छी तरह चबा लेने पर उस स्वाद की अनुभूति स्वयं होने लगती है। जितना नमक, शकर आदि चाहिए उतना खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक मिला रहता है। इसलिए बाहर से जायके के लिए कुछ भी मिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
गान्धीजी ने सप्त महाव्रतों में “अस्वाद” को प्रथम व्रत बताया है। अस्वाद का तात्पर्य है जायके के लिए आहार में ऊपर से कुछ भी न मिलना। ऐसा करने से पेट में उतनी ही मात्रा उतर पाती है, जितनी कि वस्तुतः आवश्यक है। नमक, मसाले और मिठाई ही वह रिश्वत है जिसे जीभ को देकर उससे पेट पर अत्याचार करने के लिए फुसलाया जाता है। अस्वाद आहार पेट में उतनी ही मात्रा में प्रवेश कर पाता है जितनी कि वस्तुतः आवश्यकता है।
मनुष्य वानर बिरादरी का प्राणी है। उसके स्वाभाविक आहार फल और शाक है। ऊँचे दर्जे के फल ही महंगे होते हैं। ऋतु फल प्रायः अनाज के भाव ही पड़ जाते हैं। आम, अमरूद, खरबूजा, तरबूज, बेर, जामुन आदि फल अपने समय पर सस्ते ही बिकते हैं। टमाटर, ककड़ी, भिण्डी, गाजर, मूली आदि शाक कच्चे ही खाये जा सकते हैं। कुछ हरे शाक ऐसे हैं, जिन्हें उबाल लेने से काम चल जाता है।
इनसे काम न चलता दीखे तो अन्न को उबालकर खाया जाना चाहिए। उन्हें बारीक न पीसा जाय तो ही अच्छा है। दालें साबुत ही पकानी चाहिए। चावल तो साबुत पकता ही है। गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि का दलिया बनाया जा सकता है। उबले अन्न को अमृताशन कहते हैं। वह सुपाच्य भी होता है और सात्विक भी। आधी मात्रा फल शाक की और आधी अमृताशन की ली जा सके तो पर्याप्त है।
पानी भी आहार है। उसे गहरे कुओं से लिया जाय। कृमि कीटकों का सन्देह हो तो उबाल लिया जाय। छानकर तो हर हालत में पीना चाहिए। भोजन के समय तो कम पानी लिया जाय, पर बाद में एक-एक ग्लास पानी लेते रहने का सिलसिला जारी रखना चाहिए और दिन भर में 15-20 ग्लास पानी पी लिया जाय। इससे पेट की सफाई में मदद मिलती है।
आहार को भगवान का प्रसाद या औषधि की भावना से लिया जाना चाहिए। स्वाद के अभाव में नाक भौं सिकोड़ने की आदत न डाली जाय। जो चीज अपने अनुकूल न पड़ती हो, उसे पहले ही हटा देना चाहिए। ताकि जूठन छोड़ने का अवसर न आये। साधारणतया दोपहर और शाम को दो ही बार भोजन करना चाहिए। प्रातःकाल दूध, छाछ, नींबू, शहद जैसी हल्की वस्तुएँ हल्का पेय लिया जा सकता है। बीच-बीच में कुछ खाते रहने की आदत तो डालनी ही नहीं चाहिए।
शास्त्रकारों ने हर साधक को- आरोग्याकांक्षी, संयमी, विचारशील को आहार के सम्बन्ध में कुछ विशेष ध्यान देने योग्य परामर्श दिये हैं। छांदोग्य उपनिषद् का कथन है- “जो खाया जाता है उसके तीन भाग बनते हैं- निरर्थक अंश का मल, सार्थक भाग का रक्त-माँस और उसके सूक्ष्म भाग से मन बनता है। यह मन अन्नमय है।”
देवी भागवत का कथन है- “आहार शुद्ध होने पर चित्त निर्मल होता है और निर्मल चित्त से ही धर्मधारणा बन पड़ती है।
तैत्तिरीय का कथन है- “अन्न ही सर्वश्रेष्ठ औषधि है। इसे बुद्धिमान विचारपूर्वक खाते हैं। अविचारी असंयमी इस अन्न द्वारा ही खा लिये जाते हैं।”
वाल्मीकि रामायण का कथन है- “जैसा जिसका आहार होता है, वैसे ही उसके देवता होते हैं।”
गायत्री उपनिषद् में कहा गया है- “यज्ञ वेदों पर निर्भर है। वेद वाक् पर। वाक् मन पर। मन प्राण पर और प्राण अन्न पर निर्भर है। इसलिए सत्व भोजी ही याज्ञिक हो सकता है।
तैत्तिरीय का एक और कथन है- “आश्चर्य है कि मैं इतना भी नहीं समझा पाया कि व्यक्तित्व आहार पर ही निर्भर है।”
घेरंड संहिता की उक्ति है- “अन्न को अमृतमय बनाकर खाने वाले सिद्ध पुरुष हो जाते हैं। छान्दोग्य का कथन है- “यह अन्न ही ब्रह्म है, यही मन है, यही तप है।” मनु कहते हैं- “आलस्य और अन्नदोष से लोग बेमौत मरते हैं।
पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् में कहा गया है- “अभक्ष्य आहार त्याग देने से अन्तःकरण पवित्र होता है। ज्ञान का उदय होता है और बन्धन टूट जाते हैं। ब्रह्म पुराण में लिखा है- “दलिया, खिचड़ी और सात्विक पदार्थों का सेवन उपवास माना गया है। उनसे आत्म शुद्धि होती है और आत्मतेज प्राप्त होता है। कर्म पुराण में लिखा है- “जो पर उपार्जित अन्न खाता है। वह उसके पाप ही खाता है। ऋग्वेद का वचन है कि अन्न का एक अंश परमार्थ के निकालकर तब बचे हुए को ही खाना चाहिए।
ऐसे अगणित शास्त्र वचन हैं, जिनमें न्यायोपार्जित सात्विक आहार पर निर्भर रहकर ही योग साधना करने का निर्देशन है।
लम्बी अवधि तक अपना अस्तित्व बनाये रहने वाले सिद्ध पुरुष सूक्ष्म शरीर धारी होते हैं। स्थूल शरीर की एक सीमा मर्यादा है। भारत की जलवायु में सौ वर्ष की आयु को पूर्ण माना गया है। “जीवेम शरदः शतम्” आदि वेद मन्त्रों में इसी तथ्य का रहस्योद्घाटन किया गया है। आशीर्वादों में सौ वर्ष तक जीवित रहने की कामना की जाती है। कभी-कभी कहीं-कहीं कुछ लोग अधिक समय भी जीवित रहते देखे गये हैं। पर वे अपवाद हैं। अपवाद तो किसी भी क्षेत्र में दृष्टिगोचर हो सकते हैं।
सिद्ध पुरुष बहुधा हिमालय क्षेत्र में निवास करते हैं। जहाँ शीत की प्रधानता होती है। उस क्षेत्र का अधिकांश भाग बर्फ से ढका रहता है। जो हिमि प्रदेश के जीव-जन्तु हैं, वो तो गुफाओं में जाकर गहरी निद्रा में सो जाते हैं और जब बसन्त आता है और आहार तथा जल की व्यवस्था हो जाती है तो नींद खुलती है और बाहर निकलते हैं। यह हिमानी प्राणियों के लिए प्रकृति की विशेष व्यवस्था है। मनुष्य शरीर की संरचना ऐसी नहीं है। उसे अन्न जल ही नहीं आग जलाने के लिए ईंधन की भी व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके अतिरिक्त मल-मूत्र त्यागने एवं आच्छादन की भी। वह सामान्यतया बन नहीं पाता। इसलिए बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, जमुनोत्री आदि के देवालयों की प्रतिमाएं भी अन्यत्र ले जायी जाती हैं। उतने समय के लिए कपाट बन्द रहते हैं। ऊँचे क्षेत्रों के निवासी भी अपने पशुओं को लेकर नीचे मैदानी क्षेत्रों में आ जाते हैं। और वह समय सुविधा के स्थानों में ही व्यतीत करते हैं।
हिमालय पर जो लोग साधना के लिए जाते हैं, वे भी शीतकाल में वह स्थान छोड़कर नीचे चले आते है। स्थूल शरीर धारी यह गतिविधि अपनाते हैं। क्योंकि उसे जीवित रखने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है, वे सहज उपलब्ध नहीं होते। यदि कोई हठ-पूर्वक वहाँ रहना ही चाहे तो उसे ढेरों सामग्री एकत्रित करनी पड़ेगी जैसी कि पर्वतारोहियों को कुलियों का काफिला समान ढोने के लिए साथ लेकर चलना पड़ता है। जो इस प्रकार की व्यवस्था करेगा, उसके लिए शरीर धारण किये रहना ही एक समस्या हो जायेगी। इसलिए हिमालय यात्रा एवं उधर टिकने के लिए मई से सितम्बर तक के ही प्रायः छह महीने वहाँ रहकर अपना स्थान छोड़ देना पड़ता है। ऐसी उलट-पुलट में गहन स्तर की साधनाएं नहीं हो सकतीं। यह एक साधारण बात है। सामान्य जन स्वास्थ्य लाभ या साधना आदि प्रयोजनों के लिए उपरोक्त व्यवस्थाएं बनाते और सुविधा के स्थान बदलते रहते हैं।
प्रश्न सिद्ध पुरुषों का है। वे सूक्ष्म शरीरधारी ही होते हैं। स्थूल शरीर का समापन कर चुके होते हैं। सूक्ष्म शरीर धारी सत्ताएँ स्थूल शरीर से नेत्र आदि इन्द्रियों से नहीं देखे जा सकते। यदि दीखने लगें तो मनोकामनाओं वाले लोग उन्हें कहीं से भी ढूँढ़ निकालें और हजार प्रकार के प्रपंच रचकर अपनी हठ पूरी करके टलें। ऐसी विपत्ति में यदि वे फँसते फिरें तो वे प्रयोजन पूरे किस प्रकार कर सकेंगे, जिसके लिये ऐसी कष्ट साध्य परिस्थितियों में रहने और भीड़ से बचने का उनने निश्चय किया होता है। यदि प्रपंच में फँसने और लोगों से घिरे रहने का ही मन होता तो फिर उनके लिए शहर कस्बों में डेरा डालना क्या बुरा था? साधन भी जुटते रहते। लोगों की भीड़ भी जमी रहती और प्रचार विज्ञापन भी होता रहता, जैसा कि आजकल के महन्त मठाधीशों के साथ होता देखा जाता है।
यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि जीवन निर्वाह के दुर्लभ साधनों का छः महीने चल सकने वाला जखीरा जमा करने के उपरान्त ही कोई हिमाच्छादित प्रदेशों में रहने का साहस कर सकता है। ध्रुव प्रदेशों की यात्रा करने यों अनेकानेक खोजी दल गये हैं, उन्हें कितना साधन साथ लेकर चलना पड़ा है, इस विवरण के रुचि रखने वाले लोग पत्रों तथा पुस्तकों में पढ़ते रहते हैं, फिर सामान्य शरीर लेकर सामान्य व्यक्ति वहाँ किस तरह रह सकेगा? यह समझ में आने योग्य बात नहीं है।
ऐसी अनगढ़ किम्वदंतियां अकसर सुनने को मिलती रहती हैं, जिनमें किन्हीं कौतूहल प्रियों को अपनी विशेषता का ढिंढोरा पीटने वालों द्वारा यह कहते हुए सुना गया है कि हम हिमालय गये। हमसे किसी सिद्ध पुरुष ने भेंट की कठिनाईयाँ पूछीं। गुफा में ले गये। अमुक भोजन कराये और मनमाँगे आशीर्वाद दिये। इन कथा गाथाओं के पीछे तनिक भी सच्चाई नहीं होती। क्योंकि साधारण चर्म-चक्षुओं से किसी सिद्ध पुरुष के सूक्ष्म शरीर को नहीं देखा जा सकता। न कानों से उनकी बात सुनी जा सकती है, न जीभ से कुछ कहा जा सकता है। एक सूक्ष्म शरीर दूसरा स्थूल शरीर इनकी परस्पर संगति बैठती ही नहीं।
फिर अदृश्य रहने के लिए जब उन्होंने सूक्ष्म शरीर अपनाया है तो वे सभी को देख सकते हैं। उन्हें कोई सामान्य व्यक्ति नहीं देख सकता। विशेषतया वे व्यक्ति जो अपनी लौकिक कामनाएं पूरी करने के फेर में हैं। उनमें इतनी विशेषता होती है कि किसी भी मन की बात जान सकें और यदि वह व्यक्तिगत लाभ से नहीं, विश्वकल्याण की किसी महती आवश्यकता के निमित्त समर्पित है तो उनके भीतरी अन्तराल में ही आवश्यक जानकारी एवं क्षमता प्रदान कर दें। लौकिक और पारलौकिक स्वार्थ साधना के फेर में जो लोग हैं, उन्हें वे अपना सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर में परिणत करके पिछलग्गू बनाएँ, इसके पीछे न कोई तर्क है, न तथ्य।
सिद्ध पुरुषों का भी अपना स्वरूप, प्रयोजन एवं स्तर है। वे किसी को अपनी सहायता प्रदान करते हैं। अपने तप का कोई भाग काट कर प्रदान करते हैं, तो उसका कारण कोई अत्यन्त उच्चस्तरीय प्रयोजन होना चाहिए। यह दर्शन परामर्श अनुदान चमत्कार दिखाने, अहंकार बढ़ाने एवं स्वार्थ साधने के निमित्त नहीं हो सकता।
सामान्य जीवन व्यतीत करने वाले, साधारण प्रपंचों में फँसे रहने वाले व्यक्ति उन्हें देख पायें या संपर्क साध पायें, जब काट लायें यह सम्भव नहीं। वे इतना विवेक सँजोये होते हैं कि इधर-उधर फिरने वाले प्रपंचियों की वास्तविकता पहचान सकें और अपने को उनके चंगुल से बचाने के लिए अदृश्य स्थिति में ही बने रहें। यही कारण है कि चेला मूँड़ने वालों से वे किसी भी प्रकार सम्बन्ध स्थापित नहीं करते। वे अपनी कल्पना के आधार पर जो कुछ गढ़ते रहें, कहते रहें, यह उनकी इच्छा।
सिद्ध पुरुष अपनी व्यक्तिगत अपूर्णताएं, सूक्ष्म शरीर धारण करने से पहले ही पूर्ण कर चुक होते हैं, उन्हें स्वर्ण मुक्ति, सिद्धि प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनका उस स्थिति में रहने का एक ही प्रयोजन होता है। ईश्वर के पार्षद के रूप में उनकी सृष्टि के असन्तुलनों को सन्तुलनों में बदलने के लिए अदृश्य वातावरण को प्रभावित करना। यह कार्य उन्हें ईश्वर ही सौंपता है। अपनी निजी इच्छाएँ, तो वे बहुत पहले ही समाप्त कर चुक होते हैं, उनकी कोई निजी योजना भी नहीं होती। जो बताया जाता है, मात्र उसे ही उतना ही करते रहते हैं।
सिद्ध पुरुषों को भी कभी-कभी शरीर धारियों के साथ संपर्क बनाने की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि वे स्वयं तो शरीर धारी होते नहीं। पर कुछ काम ऐसे कराये जाने की जरूरत पड़ती है, जिसके लिए क्या एवं साधनों की आवश्यकता होती है। इसके लिए उन्हें ऐसे सत्पात्र ढूंढ़ने पड़ते हैं जो प्रामाणिकता और उत्कृष्टता की कसौटी पर पहले से ही अपने को खरा सिद्ध कर चुक हों। अप्रामाणिक और अनगढ़ व्यक्ति तो सिद्धि अनुदानों को पाकर बौखला जाते हैं और ऐसा कुछ कर बैठते हैं, जिसे अनर्थ ही कहा जा सके। इस कारण किसी को सिद्ध पुरुषों की तलाश में नहीं जाना पड़ता, वे स्वयं ही उन्हें आवश्यकता अनुभव करा देते हैं और सौंपे गये कार्य के लिए जितनी दिव्य क्षमता की आवश्यकता पड़ती है, उसे हस्तान्तरित कर देते हैं।
शिवाजी, चन्द्रगुप्त, विवेकानंद आदि को गुरुओं ने ही तलाश किया था। वे उन्हें ढूंढ़ने तलाशने के लिए कहीं मारे-मारे नहीं फिरे थे। विश्वामित्र स्वयं ही दशरथ पुत्रों को माँगने उनके घर गये थे। सिद्ध पुरुषों को मात्र अपना हाथ बँटाने के लिए किसी शरीर धारी की काया तलाश करनी पड़ती है। जब वे परख लेते हैं कि यहाँ कामनाओं की कीचड़ नहीं, समर्पण की दिव्य भावना का अस्तित्व मौजूद है, तो वे स्वयं ही उनके सिर पर छा जाते हैं। उसकी समूची सत्ता को अपने में धुला लेते हैं, पर इससे पूर्व वे हजार बार परखते हैं कि कोई अपनी निज की लौकिक या पारलौकिक स्वार्थ सिद्धि के लिए उन्हें फँसाने और अनुचित लाभ न उठाने लगे। जो हर कसौटी पर खरे सिद्ध होने की स्थिति में पहुँच चुके होते हैं, मात्र उन्हीं पर हाथ डालते हैं, उन्हीं से कुछ आशा करते हैं और जो देनी हो, उन्हीं को देते हैं।
साथ ही यह चौकसी भी रखते हैं कि मनुष्य में आमतौर से पाई जाने वाली वासना, तृष्णा और अहन्ता की पूर्ति के लिए उनके दिये अनुदानों का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है। यदि ऐसा दीखता है तो अपने अनुदान वापस भी ले लेते हैं। ऐसी दशा में वह देव दीक्षित नहीं रहता, वरन् जादूगरों की तरह माया जाल रचता रहा है। ऊँचा चढ़कर गिरने वाले को चोट भी अधिक लगती है। जबकि जमीन पर खड़ा हुआ व्यक्ति फिसल पड़ने पर यत्किंचित् चोट खाकर ही खड़ा हो जाता है।
सिद्ध पुरुषों की तलाश में न हम हिमालय जाएं और न कहीं अन्यत्र। अपनी पात्रता बढ़ायें। कमल पुष्प वत अपने को खिलाने का प्रयत्न करें, ताकि मधु-मक्खी भौंरे, तितली उस पर स्वयं मंडराने लगें। चिड़ीमारों और मछुआरों की विधा अपना कर कोई सिद्ध पुरुषों को नहीं फँसा सकता। उनकी मनुहार भी नहीं करती पड़ती और न भटकने तलाशने की आवश्यकता पड़ती है। अपनी पात्रता का विकास ही वह उपाय उपचार है जिसके सहारे सिद्ध पुरुषों को सत्पात्रों की तलाश करनी पड़ती है। स्मरण रखने योग्य तथ्य एक ही है कि दैवी विभूतियाँ मात्र दैवी प्रयोजनों के लिए ही हस्तगत होती हैं। उनसे प्रत्यक्ष सा परोक्ष स्वार्थ नहीं साधा जा सकता। ईश्वर की विश्व वाटिका को सींचने, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने के निमित्त ही किसी को दिव्य-सिद्धियाँ मिली हैं और भविष्य में मिलती रहेंगी।
कटक में सुभाष चन्द्र बोस के पिता वकील थे। उन्होंने अपने बेटे को बड़ा आदमी बनाने के लिये उच्च शिक्षा दिलाने की पूरी व्यवस्था की। सुभाष हिंदुस्तान से एम.ए. करके इंग्लैंड में आई.सी.एस. करने गये और ससम्मान उत्तीर्ण होकर आये। पिता उन्हें किसी ऊँची सरकरी नौकरी में लगाना चाहते थे, पर उनकी नस-नस में आध्यात्मिकता और देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी। उनने नौकरी करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया और विवाह भी नहीं किया। देश को स्वतन्त्र कराने के आन्दोलन में काम करने लगे। स्वामी विवेकानंद से वे संन्यास की दीक्षा लेना चाहते थे, पर उनने आदेश दिया कि देश का काम करना संन्यास से किसी भी प्रकार से कम नहीं।
एक बार प्लेग फैला हजारों हर दिन मरने लगे। उसमें सुभाष ने रोगियों की सेवा तथा मुर्दों की अन्त्येष्टि करने में दिन-रात एक कर दिया।
वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। पर उसमें उनका मन न लगा उनने क्रांतिकारी योजना बनाई। द्वितीय विश्व युद्ध के दिन थे। छिप कर विदेश चले गये और प्रवासी भारतीयों को संगठित करके आजाद हिन्द फौज बनाई, जिसमें अपनी सामर्थ्य भर काम किया। सुभाष की चरित्र निष्ठा, आध्यात्मिकता और देश भक्ति उच्चस्तर की थी।
मनीषी कहते हैं कि ईश्वर को अपने से जितना दूर समझोगे वह उतनी ही दूर रहेगा। ब्रह्मलोक, गौलोक, शून्यलोक आदि में रहने और अवसर मिलने पर किसी की याद कर लेने का स्वभाव भी उसका माना जा सकता है। पर अच्छा यही है कि उसे अपने निकटतम समझा जाय। अन्तःकरण में अवस्थित उस परम सत्ता के आगे भिखारी की तरह कुछ माँगते रहने के लिए पहुँचेंगे तो वह गुब्बारा, चाकलेट, झुनझुना जैसा कुछ देकर बहला देगा। पर यदि उसके राजकुमार और सेनापति बनकर रहेंगे तो उस पद के अनुरूप अनुदान-आदर भी पायेंगे और वेतन भी। वार्ता करने में उसके साथ रस आना चाहिए, वैसा जैसा बालक को अपने अभिभावक के साथ आता है।
ईश्वर को जो देना था, दे चुका। मनुष्य जन्म से बढ़कर और कोई कलाकृति उसके पास है नहीं। इतना देने के बाद वह तुमसे अनुदान का प्रतिदान चाहता है। वृक्ष जमीन के माध्यम से जीवन रस प्राप्त करते हैं पर उसे स्वयं पचा नहीं जाते। विकसित पल्लवित होते और फूलते फलते हैं। पर उस सम्पदा को वे ईश्वर के निमित्त, उसे प्राणि पुत्रों के निमित्त उन्हें जो मिला है उस सब कुछ को वापस लौटाते रहते हैं।
कोयल आम का रसपान करती है, पर बदले में उसे सुरीली कूक सुवासित पुलकित कर देती है। भौंरा पुष्प का पराग पाता है पर अपने गुँजन से उसके समूचे परिकर को गुँजित कर देता है। हमें भी कुछ ऐसा ही करना चाहिए।
ईश्वर की उपासना, कर्मकांडों से नहीं, भावनाओं से की जाती है। उसे केवल भक्त की भावनाओं का स्वाद सुहाता है। ईश्वर के प्रति भक्ति-भाव रखने का तात्पर्य है उसके इस विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य- अधिक सुविकसित बनाना। मात्र भावुकता प्रकट करने की प्रवंचना उसे लुभाने फुसलाने में समर्थ नहीं होती।
जो ईश्वर से चाहते हो, उसके लिए प्रयत्न पुरुषार्थ करो। वह तुम्हारी सहायता करेगा। अकर्मण्यों को भिक्षा भी नहीं मिलती। मिलती भी है तो इतनी तुच्छ और क्षुद्र जिससे ग्रहीता और दानी दोनों का मान घटे। अपनी पात्रता विकसित करो ताकि अधिकर पूर्वक माँगने और उदारतापूर्वक पाने का सुयोग उपलब्ध कर सको।
ईश्वर आपके घर आँगन में आने और निवास करने के लिए आतुर है। आप उसमें भरी सड़न और गन्दगी को बुहार डालें ताकि उसे बहुत देर अपने बैठने लायक जगह तलाश करने का इन्तजार न करना पड़े।
अपने हृदय को करुणा से, हाथों को उदारता से, वचनों को मधुरता से और मन को प्रफुल्लता से स्वच्छ कर डालें, इतनी भर स्वच्छता उससे गले मिलने के लिए पर्याप्त है।
दोषों से छुटकारा पाना भक्ति को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है। न ईर्ष्यालु बनो, न स्वार्थी, न अशांत रहो, न असन्तुष्ट। पापों का प्रायश्चित करो और उस वातावरण से, संपर्क से दूर रहो जो तुम्हें गिराता और लुभाता है। न किसी ठगो, न अपने को ठगाओ। न अनीति बरतो और न अनीति के सामने सिर झुकाओ। दूसरों के साथ ऐसी भलाई बरतो जो ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है।
ईश्वर न किसी को भटकाता है और न मिलने के लिए आतुर को तरसाता है। आप ही हैं, जो उसे द्वार बन्द करके प्रवेश होने से रोकते हैं। आप ही हैं जो कुपात्रता का प्रदर्शन करक उसे चोट पहुँचाते और वापस लौटाते हैं।
दूसरों की कठिनाइयों के प्रति अपने हृदय में करुणा उमगाओ, फिर जो कुछ भी तुमसे बन पड़ेगा वह धर्म होगा।
ज्ञान का मोटा अर्थ है “जानकारी”। काम चलाऊ जानकारी प्रायः सभी को होती है। निपट अनाड़ी मन्दमति, बुद्धिहीन स्तर के अर्थ विक्षिप्तों को ही अज्ञानी कहते हैं। ऐसे लोग अपवाद स्वरूप विरले ही पाये जाते हैं। सामान्यतया अधिकांश ऐसे ही होते हैं जिन्हें जानकार कहा जा सके।
अध्यात्म तत्वज्ञान में ‘ज्ञान’ शब्द को विशेष अर्थ में लिया गया है और उसकी महिमा भी बहुत बताई गई है। कहा गया है कि “ज्ञान से बढ़कर पवित्र और कुछ नहीं है।” (न हि ज्ञानेन सद्दश पवित्रमिह विद्यते)। यदि सामान्य ज्ञान से इसका तात्पर्य रहा होता तो स्कूली शिक्षा प्राप्त प्रत्येक साक्षर को ज्ञानवान कहा जाता और यह समझा जाता कि उससे श्रेष्ठ सम्पदा और किसी के पास नहीं है। किन्तु बात ऐसी है नहीं। तत्वज्ञानी ज्ञान की उपमा सूर्य से देते हैं। सूर्य के उदय होने पर अंधकार का नाश हो जाता है। यहाँ अंधकार का तात्पर्य भी अज्ञान से लिया गया है। तात्पर्य समझने का प्रयत्न किया जाय तो यह संगति उस भ्रम के साथ बैठती है जिसे भ्रान्ति या माया कहा गया है। भ्रान्ति क्या है? सामान्य व्यक्ति भी बाजार से वही खरीदता है जो खरीदना है। वस्तुओं के नाम भी वही बताता है जो उसका है। फिर भ्रम किस बात का?
यह अध्यात्म क्षेत्र की विडंबना है। हम अपने आत्म स्वरूप को भूल जाते हैं और शरीर को अपने में- अपने को शरीर में ओत-प्रोत देखते हैं। जब कि वस्तुतः दोनों सर्वथा भिन्न हैं। शरीर को एक वाहन, उपकरण, औजार समझना चाहिए और उसके द्वारा जीवन के मूलभूत उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो काम लिया जाना चाहिए सो लेना चाहिए। इस भ्रान्ति में नहीं पड़ना चाहिए कि हम शरीर मात्र हैं। उसी की वासना, तृष्णा, अहन्ता हमारे लिए इष्ट अभीष्ट है। इसलिए अपना समग्र समय, श्रम और मनोयोग उन्हीं के लिए लगा देना चाहिए। अपना समग्र स्वरूप, आनन्द, वैभव शरीरगत महत्वाकांक्षाओं को ही मान बैठना चाहिए।
अध्यात्म के नाम पर चाहे कहा सुना कुछ भी जाता है। पर व्यक्ति की मान्यता इस संदर्भ में इतनी परिपक्व है कि शरीर सुख के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। आत्मा की पृथकता- कहते सुनते तो रहते हैं, पर वैसा कभी अनुभव नहीं करते। यदि करते होते तो आत्मा का स्वरूप, उद्देश्य, उपयोग भी समझते और अपनी कार्य पद्धति का तद्नुरूप निर्माण निर्धारण करते। तब ध्यान में आता कि यह सुर दुर्लभ अवसर इसलिए मिला है कि उसका सही सदुपयोग करके अपने यथार्थ ज्ञान का परिचय हो और उस प्रयास के बदले जो कुछ उपलब्ध हो सकता है उसे प्राप्त करके धन्य बनें।
आत्मा को शरीर इसलिए दिया गया है कि वह उससे आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का पुण्य परमार्थ साधकर कृत-कृत्य बनें। अपनी इस सूझ-बूझ के उपहार में महामानव ऋषि, मनीषी और देवात्मा स्तर की उत्कृष्ट पदवी प्राप्त करते हुए कृतकृत्य बनें। इस तथ्य को हृदयंगम कर लेने और आचरण में उतारने की युक्ति को ज्ञान कहा गया है। आत्म विस्मृति की भ्रान्ति अपना लेने का नाम ही अज्ञान, अंधकार, भ्रान्ति एवं माया है।
तथ्य को अलंकारिक रूप में समझाने के लिए ज्ञान की उपमा सूर्य से दी गई है। जब तक सूर्य उदय नहीं होता तब तक प्राणी अज्ञान रूपी अंधकार में भटकता रहता है, झाड़ी को भूत समझता है। रस्सी को साँप समझता है और सही पगडण्डी को छोड़कर झाड़-झंखाड़ भरी उलझन में जा फँसता है। लिप्सा-लालसा के व्यामोह में वह सोचता है जो नहीं सोचना चाहिए। वह करता है, जो नहीं करना चाहिए। इसी भ्रान्ति दुर्गति को माया के भ्रम जंजाल में भटकना कहा जाता है।
सूर्य निकल आने पर स्थिति सही रूप से दीख पड़ती है। शरीर को उपकरण और आत्मा को आधिपति समझने की सूझ-बूझ उग आती है। फलतः मनुष्य सही मार्ग अपनाता लक्ष्य तक पहुँचाता, श्रेयस्कर परिणाम प्राप्त करता है। ऐसी व्यवस्था जुटा देने के कार्य सूर्य को ज्ञान के- ज्ञान को सूर्य के समतुल्य माना गया है।
इस अलंकारिक उपमा का उल्लेख शास्त्रकारों ने स्थान-स्थान पर किया है।
वेद ने ब्रह्म अर्थात् परमात्मा के श्रुतिलभ्य ज्ञान को सूर्य के सदृश ज्योति रूप में चित्रित किया है-
‘ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिः।’ (यजुर्वेद 23/48)
अर्थात्- मैत्रायण्युपनिषद् ने भी “जो ब्रह्म है, वह ज्ञानमय ज्योति ही है और जो ज्योति है, वही सर्वोद्भासक आदित्य है। मंत्रदृष्टा ऋषि ने अज्ञान घन का भेदन करके, उसके पार चमकने वाले उन आदित्यवर्ण परमात्मा का दर्शन कर लिया है, अतः उनका कथन है कि मैं उस तत्व को समझ गया हूँ उसको जानने की तीव्रतम जिज्ञासा ही मृत्युरूप इस आवरण धन माला का भेदन कर सकती है, इसके लिए कोई दूसरा मार्ग नहीं है-
“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्ण” तमसः परस्तात्। तमेव विदित्याsतिमृत्युमेति नान्यः पन्या विद्यतेsयमाय। (यजुर्वेद 32।28)
आश्चर्य इस बात है कि जानकारी रहते हुए भी अनजानों जैसी रीति-नीति क्यों अपनाई जाती है? धर्मोंपदेशक और तत्त्ववेत्ता भी माया के व्यामोह में अज्ञानी भ्रमग्रस्तों जैसा आचरण क्यों करते हैं? इसके उत्तर में कहा गया है कि बहुधा मस्तिष्क में बुद्धि होते हुए भी वह दुर्बुद्धि स्तर पर उतर आती है और यथार्थता के विपरीत आचरण करती है। सूर्य के प्रभाव से ही समुद्र में से बादल उठते हैं और वे बादल ही सूर्य के प्रकाश को ढ़ककर अंधकार जैसी स्थिति उत्पन्न कर देते हैं।
शास्त्रकार ने आगे कहा है-
‘एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यथादित्यो दृष्यते।’ (कौशीतकि ब्राह्मण 12)
अर्थात्- “यह ब्रह्म ही दीपित हो रहा है जो आदित्य दिखाई पड़ता है।”
सूर्य ऊर्जा और आभा का प्रतीक है। उसमें रोशनी भी है और गर्मी भी। सद्ज्ञान को सूर्य की उपमा देने की ठीक स्थिति तब बनती है, जब विवेकवान में न केवल आत्मबोध का उदय हो वरन् ऐसी प्रखरता- ऊर्जा भी उत्पन्न हो जिसके सहारे अपने को भटकाव के दलदल में से निकाल कर सही मार्ग अपना सके और गर्त में गिरने की अपने उबरने की स्थिति अपना सकें।
ज्ञानवान होने के दो लक्षण बताये गये हैं एक आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना और दूसरे “विश्व बन्धुत्व” की अनुभूति। अपने को सबमें और सबको अपने में देखने का व्यावहारिक स्वरूप यही बनता है कि हँसते-हँसाते जिऐं और मिल बाँटकर खायें। जो अपने सुखों को दूसरों के निमित्त बाँट सकता है और दूसरों के दुःखों में हिस्सा बँटा सकता है तो समझना चाहिए कि दूसरी सद्बुद्धि का आविर्भाव हुआ और ज्ञान ने कार्य में- मान्यता ने प्रयास में परिवर्तित होने का साहस भरा कदम उठाया।
सद्ज्ञान इसी का नाम है जो जीवन का प्रकाश है। सही मार्ग अपनाने की प्रेरणाएँ प्रदान करें और साथ ही इतना शौर्य, साहस, विवेक और पराक्रम भी प्रदान करे जो पथ भ्रष्ट, आलसी, प्रमादी, उन्मादी और अर्धविक्षिप्त लोगों द्वारा अपनाई गई रीति-नीति से अलग हटकर अपने निमित्त अपना निर्धारण स्वयं कर सके। अन्धानुकरण का परावलम्बन छोड़ें उस ऊर्जा से उनके मानस को छुटकारा मिल सके और अकेला चल पड़ने का साहस उमंगे। समझना चाहिए कि उसी के अंतराल में विवेक रूपी सूर्य का उदय हुआ और उसी के श्रेय सौभाग्य का उदय हुआ।
क्षमताओं को अपव्यय से रोककर यदि उन्हें महान प्रयोजनों के लिए नियोजित किया जा सके तो कोई भी व्यक्ति साधारण से असाधारण बन सकता है।
सोये हुए साँप को जगा देना सरल है। एक कंकड़ फेंक देने भर से वह फुसकार मारता हुआ फन फैलाकर पीछे दौड़ सकता है। दबी हुई चिंगारी को प्रचण्ड कर देना सरल है। एक गठरी फूँस डाल देने पर या एक बोतल किरासिन तेल उड़ेल देने भर से यह कार्य हो सकता है। बाघ की माँद पर जाकर ढोल बजा देना आसान है, पर जब वह दहाड़ता हुआ हमला करता है तब उससे बचाव करना कठिन है। आग जब प्रचण्ड होकर पूरे गाँव को जला देने के लिए उबल पड़े तक उसका बुझाना और जिनका नुकसान हुआ है उनका हर्जाना चुकाना कठिन है।
कुंडलिनी जागरण के लिए जिन पूर्व साधनों की आवश्यकता है। उनके जुटाने में ही अधिकांश समय लगता है, अन्यथा क्रिया मात्र का सम्बन्ध रहा होता तो उसे बालू का महल बनाने की तरह कोई बालक भी कर गुजरता और सारे साथियों को बुलाकर अपनी कारीगरी का ढिंढोरा पीटता फिरता। बिजली का बटन दबा देना सरल है, पर करेंट के चल पड़ने पर फिर उसकी चपेट में जो-जो आते हैं उन्हें समेटना कठिन है। यह ठीक है कि सरकस में शेरों को रस्से पर चलाने की क्रिया मनुष्य ही कराते हैं। पर उन मनुष्यों को अपने जैसा साधारण नहीं माना जा सकता। कोई अनाड़ी उसी करतब को दिखाने के लिए मचल पड़े तो समझना चाहिए कि इसका बुरा दिन आ गया।
कुंडलिनी जागरण, क्रिया की दृष्टि से अति सरल है। उसमें मूलाधार, मेरुदण्ड और सहस्रार के साथ थोड़ी छेड़खानी करनी पड़ती है। यदि वह बहुत हलकी या उथली हुई तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उसे तनिक सशक्तता पूर्वक प्रयोग में लाया गया तो उसकी हलचल देखते ही बनती है। साँप की फुँसकार, हाथी की चिंघाड़ शेर की दहाड़ और आकाशीय बिजली की तड़कन से उसकी तुलना करनी पड़ती है। यों उनसे लाभ भी उठाया जा सकता है पर पासा पलट गया तो लेने के देने पड़ने में भी सन्देह नहीं।
सपेरे साँप को नचा कर ही अपना गुजारा करते हैं। रीछ वाले अपनी गृहस्थी का उसी के बलबूते निर्वाह करते हैं। हाथी पर सवारी, राजा सामंत करते हैं। शेर खरीदना और सिखाना लाखों रुपया खर्च करने वाले सरकस मालिकों का काम है। इन कर्मों में सफलता प्राप्त करने वालों की प्रशंसा की जाती है। पर यदि चौकड़ी चूक गये तो जान गँवा बैठने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। इसलिए डरा तो नहीं जाना चाहिए पर प्रयोग की प्रवीणता और बचाव के साधनों की सुविधा समय रहते एकांत में कर लेने में ही समझदारी है। कुंडलिनी साधना के लिए कदम बढ़ाने वालों को अपनी क्रिया तलवार की धार पर चलने से कम समर्थ किन्तु जोखिम भरी नहीं समझनी चाहिए।
इस प्रयोग में जिन उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। उनकी गणना पहले कराई जा चुकी है। (1) संकल्प (2) साहस (3) प्राण (4) संयम (5) धैर्य (6) तत्परता (7) तन्मयता इन सातों का संकलन कर लेना एक प्रकार से आत्म विजय करना है। जिसने अपने को जीत लिया उसके लिए अन्य किसी को भी जीत लेना सरल है।
श्रद्धा और विश्वास भरे निश्चय निर्धारण, कार्यान्वयन को संकल्प कहते हैं। जिसने किसी विषय की जिज्ञासा उभार कर पक्ष और विपक्ष का संदर्भ मन्थन नहीं कर लिया है, उसके लिए संकल्प कर सकना और निभा सकना कठिन है। बाल कल्पनाएं और कौतुक कौतूहल देखने भर की ललक आम लोगों में होती है। उनके मनोरथ पानी के बबूले की तरह उठते फूटते रहते हैं। गरम दूध उफन कर बर्तन से ऊपर निकलता है। एक चम्मच पानी डालते ही वह पेंदे में भी बैठ जाता हे। ऐसी मनःस्थिति वाले कोई बड़ा काम नहीं कर सकते। वे आज आरम्भ करते और कल छोड़ बैठते हैं। साधन पथ के पथिकों को धैर्यवान होना चाहिए और विलम्ब लगने पर इतना ही सोचना चाहिए कि हथेली पर सरसों जमाना बाजीगर का काम है। हजार वर्ष जीवित रहने वाले वृक्ष उगने और प्रौढ़ होने में समय ले जाते हैं। उनकी सिंचाई और देखभाल देर तक करनी होती है।
सहस में आत्मबल, आत्मविश्वास और पराक्रम का सम्पुट रहता है। कठिनाइयों के बिना सामना किये किसी बड़े काम में तत्काल सफलता नहीं मिलती। बालक जन्म लेने से पूर्व स्वयं काफी हैरान हो लेता है और माता को परेशान कर लेता है। सरल काम तो इस संसार में एक ही है मजाक और मनोरथ। बड़े पुल और बाँध बनाने, बड़े कारखाने खड़े करने में कितने साधन सरंजाम जुटाने और कितने जोखिम उठाने पड़ते हैं इसका विवरण ऐसे कामों का दायित्व उठाने वाले भुक्तभोगियों से ही पूछा जा सकता है।
प्राण एक शक्ति है जिसे सजीव विद्युत कहा जाता है। इसका अभ्यास करने के लिए प्राणाकर्षण प्राणायाम करते रहना है। इसका विधान सीधा सा है कि निखिल ब्रह्माण्ड में चेतना का भण्डार भरा पड़ा है और हम उस समुद्र में मछली की तरह जी रहे हैं। वह हमारे भीतर ओत-प्रोत है और हर श्वास के साथ हम उसे अधिकाधिक मात्रा में भर रहे हैं। शक्ति पुंज, चेतना भाण्डागार जैसी हमारी स्थिति बन रही है। इसे कल्पना के रूप में नहीं वास्तविकता के रूप में मान्यता देनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि हमारे कण-कण में रोम-रोम में सृष्टा का वरिष्ठ तेजस्- ब्रह्म वर्चस्- संव्याप्त हो रहा है। इस क्रिया में प्राणायाम अभ्यास से बहुत सहायता मिलती है।
संयम उस तत्व का नाम है जो उत्तेजना भी, आवेशों आवेगों, प्रलोभनों, दबावों को अस्वीकार करता है और बहकाने वाले फुसलाने वाले हर अनौचित्य को स्वीकारने से दो टूक इनकार करता है।
आये दिन भीतर और बाहर से अवाँछनीयताओं के उफान आते रहते हैं। कई बार तो वे अन्धड़ की तरह प्रचण्ड होते हैं। कामुकता और जीभ का चटोरापन तो अपने स्वभाव के अंग बने बैठे होते हैं। लोभ और मोह की- संग्रह और प्रदर्शन की लालसा इतनी तीव्र होती है, जो कुकर्म और अपराध अपनाने तक के लिए उत्तेजना प्रदान करती है। मित्र, सहयोगी, पड़ौसी और सम्बन्धी भी यह करते हैं और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में वैसा ही अनुगमन करने का परामर्श देते हैं। एक ओर भीतरी और बाहरी दबावों का आकर्षण, दूसरी ओर सादगी, सज्जनता अपनाने पर उपहास और विरोध का तंगी और हैरानी का धैर्य तोड़ने वाला कुचक्र चलना। जो इस परिस्थिति से आये दिन जूझता रहता है, जूझने में प्रसन्नता अनुभव करता है उसे संयमी कहते हैं। उसे अपनी-अपनी निज की शक्ति- दुष्प्रवृत्तियों से जूझने में व्यय करनी पड़ती है। ‘ना’ कहना सीखना पड़ता है और किसी के भला या बुरा मानने का विचार करना पड़ता है। यह अभ्यास परिपक्व होते-होते उस संयम के रूप में बदलता है जो मनुष्य को सोने जैसा खरा और चट्टान जैसा मजबूत बना देता है।
तत्परता का अर्थ है- लगन- लगन, स्फूर्ति और श्रम शीलता का समन्वय। जिस काम में हाथ डाला जाय उसे पूरा करना अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाय। आलस्य प्रमाद को पास न फटकने दिया जाय। श्रम की कठोरता में अपना गौरव अनुभव किया जाय।
तन्मयता का अर्थ है- एकाग्रता। दत्त-चित्त होना। मन को भटकने न देना। जो सोचना या करना है उसी के सम्बन्ध में इतनी गहराई तक उतरा जाय कि अन्य कोई विचार सामने आने ही न पाये। मस्तिष्क में टिक ही न सके। अर्जुन का मत्स्य वेध, पृथ्वीराज का शब्द वेध इसका अच्छा उदाहरण है। कीट भृंग का संदर्भ भी इस सम्बन्ध में दिया जाता है। यह एकाग्रता भौतिक और आत्मिक सफलताओं के लिए समान रूप से आवश्यक है।
इस सप्त सम्पदाओं को अन्तराल में धारण करने पर कोई व्यक्ति सच्चा साधक बन सकता है। सातों ऋषि उसके भीतर निवास करते हैं और न उसकी साधना खण्डित होने देते हैं और न उपलब्धियों का दुरुपयोग करने पर उलटा परिणाम हस्तगत होने की विपरीत स्थिति बनने देते हैं। जिनने इस दिशा में उपेक्षा बरती अपने को पवित्र और प्रखर नहीं बनाया वे मात्र क्रिया-कृत्यों में उलझे रहते हैं और जादूगरी का अनुकरण करते हुए ऐसी आशा लगाये रहते हैं कि करामातें हस्तगत करके लोगों को मूर्ख बनाने, उनसे यश और धन प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करेंगे। ऐसे लोगों को अपयश और अनिष्ट ही हाथ लगता है। नैतिक पतन के गर्त में गिरने से उनका अन्तरात्मा भी दुर्बल होता है और वस्तु-स्थिति विदित होने पर प्रशंसक भी निन्दक, विरोधी बन जाते हैं।
कुंडलिनी जागरण महत्वपूर्ण तो है, पर उसमें बारूद के खिलौनों से खेलने जैसा जोखिम भी है। दिवाली के दिनों में फुलझड़ी जलाने और पटाखे छुड़ाने में मजा तो बहुत आता है, पर कितनों की ही आँखें फूटती और उँगलियाँ उड़ती भी देखी गई हैं। भूत-प्रेत सिद्धि से लेकर कुंडलिनी जागरण तक की सिद्धियाँ ऐसी हैं जिसमें शरीरगत संस्थानों की ही उठक-पटक करनी पड़ती है। इन सबको करने से पूर्व अपने साधनों को सही बना लेना और सुरक्षा कवच से सुसज्जित हो जाना है। टूटी तलवार और फटी ढाल लेकर लड़ाई के मैदान में उतर पड़ना, ऐसी जल्दबाजी है जिसका दुष्परिणाम पागल हो जाने जैसी विपत्तियों के रूप में सहन करना पड़ सकता है।
तीर कमान सही हो तो निशाना चिड़िया से लेकर शेर तक पर साधा जा सकता है, अभ्यस्त शिकारी कटार के सहारे सिंह, व्याघ्रों तक को परास्त करते देखे गये हैं पूर्ण अभ्यास एवं अनुभव की भूमिका ऐसे अवसरों पर ही परखी जाती है। जो आतुरता में दूसरों की नकल करने में जुट पड़ते हैं, उनकी उतावली उन्हीं के लिए खतरनाक सिद्ध होती है।
इसकी तुलना में दूसरी साधनाएँ भी हैं जो अपूर्ण रहने पर भी किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाती। अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि लाभ सीमित मात्रा में मिले- समय कुछ अधिक लगे। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार के ऐसे जोखिम की आशा नहीं हैं जिसके लिए चुनाव की गलती पर पश्चाताप करना पड़े।
ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग की साधनाऐं भी ऐसी हैं जिनके सहारे अध्यात्मवादी उपलब्धियों का समुचित लाभ मिल सकता है। हठयोग की सभी क्रियाऐं ऐसी हैं जिसमें साधक की मनोभूमि और मार्गदर्शक की अपरिपक्वता बनी रहने पर उस प्रकार के प्रयोगों में कोई नई व्यवधान उठ खड़े होने की सम्भावना रहती है।
कुंडलिनी प्रयोग हठयोग के अंतर्गत आता है। उसके लिए मात्र मनोभूमिका परिशोधन ही नहीं, नाड़ी शोधन के लिए नेति, धौति, वस्ती, कमाल भाति, वज्रोली आदि की भी तैयारी करनी पड़ती है। उनमें अशुद्धता भरी रहने पर अवरुद्ध नली वाली बन्दूक के न चल सकने की तरह असफलता का एक नया कारण बनता है। (क्रमशः)
माता अंजनी और पिता पवन ने अपनी प्रतिभा के अनुरूप पुत्र को जन्म दिया, उसका शरीर इतना सुडौल था कि पत्थर पर गिरने से पत्थर टूट गया पर उनका कुछ न बिगड़ा। इस घटना की स्मृति में उनका नाम बजरंगी भी रखा गया। एक नाम हनुमान भी था।
राम के न्याय पक्ष को सहायता देने के लिए उनने प्राण-पण से प्रयत्न किया। सुरसा की माया से निपटना, लंका को जलाना, समुद्र पार करना, सुषेन वैद्य की बताई दुर्लभ संजीवनी बूटी लाना जैसे अनेकों साहस भरे काम उनने किये। “राम काज कीन्हे बिना, मोहि कहाँ विश्राम” उनका प्रण था। असुर विनाश की तरह उन्होंने अपने सहचरों समेत रामराज्य की स्थापना में भी योगदान दिया। अधर्म के विनाश और धर्म के संस्थापन में निरन्तर लगे रहने के कारण वे भगवान के सच्चे भक्त कहलाये। राम पंचायतन में ही उन्हें भी एक स्थान मिला। राम लक्ष्मण ने उनके कंधे पर बैठकर उनका गौरव बढ़ाया।
ध्यान का तात्पर्य है बिखरे हुए विचारों को एक केंद्र पर केंद्रीभूत करना। यह एकाग्रता का अभ्यास, चिन्तन को नुकीला बनाता है। मोटे तार से कपड़ों को नहीं सिया जा सकता। पर जब इसकी पैनी नोंक निकाल दी जाती है तो कपड़े की सिलाई का प्रयोजन भली-भाँति पूरा हो सकता है। बिखराव में शक्तियों की अस्त व्यस्तता रहती है। पर जब उन्हें बटोरकर एक केंद्र के साथ बाँध दिया जाता है तो अच्छी बुहारने वाली झाडू बन जाती है। धागों को इकट्ठा करके कपड़ा बुना जाता है और तिनके रस्सी बन जाते हैं। मेले ठेलों की बिखरी भीड़ गन्दगी फैलाती और समस्या बनती है पर जब उन्हीं मनुष्यों को सैनिक अनुशासन में बाँध दिया जाता है तब ये ही देश की सुरक्षा संभालते हैं, शत्रुओं के दाँत खट्टे करते हैं और बेतुकी भीड़ को नियम मर्यादाओं में रखने का काम करते हैं। बिखरे घास-पात को समेटकर चिड़ियाँ मजबूत घोंसले बना लेती हैं और उनमें बच्चों समेत निवास करती हैं।
बिखरी धूप मात्र गर्मी रोशनी पैदा करती है पर जब उसे आतिशी शीशे द्वारा छोटे केंद्र पर केंद्रित किया जाता है तो आग जलने लगती है। गर्मी आते ही तालाबों का पानी तेजी से भाप बनकर आसमान में उड़ जाता है। पर व्यवस्थित और केंद्रित की हुई भाप रेलगाड़ी जैसे वाहनों को घसीट ले जाती है। यह केंद्रीकरण के चमत्कार हैं। विचार शक्ति के सम्बन्ध में भी यही बात है। वह निरर्थक कल्पनाओं में उलझी रहती है और शेख-चिल्ली जैसे अनगढ़ ताने-बाने बुनती रहती है। बन्दर इस डाली पर से उस डाली पर अकारण उचकते मचकते रहते हैं। पर क्रमबद्ध काम करने वाली मधु-मक्खियां अपने छत्ते में ढेरों शहद जमा कर लेती हैं। मकड़ी अच्छा-खासा घर बना लेती है। क्रमबद्धता इसी को कहते हैं।
विचारों को दिशाबद्ध रखने वाले विद्वान, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, शिल्पी, विशेषज्ञ, दार्शनिक बन जाते हैं। पर जिनका मन उखड़ा-उखड़ा रहता है वे समस्त सुविधा साधन होते हुए भी आवारागर्दी में जीवन बिता देते हैं। अर्जुन के द्रौपदी स्वयंवर जीतने की कथा प्रसिद्ध है। उसकी समूची एकाग्रता मछली की आँख पर जमाई थी और लक्ष्य वेध लिया था। जब कि दूसरे राजकुमार चित्त के चंचल रहने पर वैसे ही धनुष-बाण रहने पर असफल होकर रह गये थे। निशाने वही ठिकाने पर बैठते हैं जो लक्ष्य के साथ अपनी दृष्टि एकाग्र कर लेते हैं।
कल्पनाओं की शक्ति असाधारण है। बरसात के दिनों में टिड्डे हरे रंग के रहते हैं और गर्मी में घास सूख जाने पर वे पीले हो जाते हैं। कारण एक ही है कि वर्षा में उन्हें अपने चारों ओर हरियाली दीखती है और गर्मी की सूखी घास, सूखी जमीन पड़ जाती है। उसे देखते-देखते टिड्डा भी पीला पड़ जाता है। कीट भृंग का उदाहरण प्रसिद्ध है। भृंग का गुँजन सुनते और स्वरूप देखते-देखते झींगुर भी तद्रूप हो जाता है।
कल्पनाओं की एकाग्रता में असाधारण शक्ति है। झाड़ी में से भूत निकल पड़ता है और जान लेकर हटता है। कुछ मित्रों ने शर्त बदी कि जो कोई मरघट में रात को मुर्दे के कफ़न में कील गाड़ आवे उसे वह अपनी भैंस उपहार में दे देगा। जो तैयार हो गया वह चला तो गया पर मन में डरता रहा। रात के अन्धेरे में उसने मुर्दे के कफ़न में कील गाड़ने की अपेक्षा अपनी धोती में कील गाड़ ली। जब उठा तो कील ने उलझा लिया। उसने समझा भूत ने पकड़ लिया। जोर से चीखा और उसी समय उसका हार्ट फेल हो गया। भावी आशंकाओं की कल्पना करके कितने ही लोग इतने भयभीत रहते हैं की नींद उड़ जाती है और जीना हराम हो जाता है।
यह कल्पना का निषेधात्मक स्वरूप है। उसके विधेयात्मक स्वरूप भी है कि शुभ और उच्च कल्पनाओं, मान्यताओं के आधार पर मनुष्य का मस्तिष्क ही नहीं जीवन क्रम भी उसी ढाँचे में ढलने लगता है और वह अन्ततः वैसा ही बन जाता है।
अध्यात्म प्रयोजन में कल्पना और भावना का एकीकरण करते हुए किसी उच्च केंद्र पर केंद्रीभूत करने का अभ्यास कराया जाता है इसे ध्यान कहते हैं। ध्यान की क्षमता सर्वविदित है। कामुक चिन्तन में डूबे रहने वालों को स्वप्नदोष होने लगते हैं। टहलने के साथ स्वास्थ्य सुधार की भावना करने वाले तगड़े होते जाते हैं पर दिन भर घूमने वाले पोस्ट मैन या उसी कार्य को भारभूत मानने वाले उस अवसर का कोई लाभ नहीं उठ पाते। पहलवान की भुजायें मजबूत हो जाती हैं किन्तु दिन भर लोहा पीटने वाले लुहार को कोई लाभ नहीं होता। इस अन्तर का एक ही कारण है भावनाओं का सम्मिश्रण होना और दूसरे का वैसा न कर पाना।
योगाभ्यास की ध्यान धारणा में अनेकों प्रयोग हैं। देववादी बहुधा अपने-अपने मान्य देवता का ध्यान करते हैं। जप के साथ ध्यान का जुड़ा रहना उपयुक्त भी है। इसमें मुख से नामोच्चार का अवसर मिलता है पर मस्तिष्क खाली रहता है। वह अनगढ़ कल्पनाओं में इधर-उधर भागता रहता है। जप के साथ मनोयोग भी जुड़ना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब मस्तिष्क को ध्यान जैसी प्रक्रिया में नियोजित कर दिया जाय। देवताओं की गणना नहीं, जिसे जो सुहाता है वह उसे इष्ट मान लेता है और साधना काल में उसका ध्यान करने का प्रयत्न करता है पर वह भी निभता नहीं। क्योंकि मात्र छवि पर देर तक चित्त को एकाग्र नहीं रखा जा सकता। उसके साथ आत्मीयता भरी भावनाऐं भी जुड़नी चाहिए। उन्हें अपना कोई घनिष्ठ स्वजन सम्बन्धी माना जाना चाहिए। इसीलिए “पितु, मातु, सहायक, स्वामी, सखा” जैसी भावनाओं का आरोपण इष्ट छवि में आरोपित किया जाता है और उसके साथ घनिष्ठतम आत्मीयता एकता जोड़नी पड़ती है। इस भाव चेतना का समावेश होने पर ही देवी देवताओं की, छवि की भाव कल्पना करने पर उनके साथ मन एकाग्र होता है अन्यथा भटकता ही रहता है। इस प्रयोग में इष्टदेव के सम्बन्ध में समझी गई भली बुरी विशेषताऐं भी अपने में अवतरित होने लगती हैं। कामुक देवता की काम वासना, क्रोधी एवं युद्ध परायण देवी का आक्रोश भी भक्त के स्वभाव में सम्मिलित होने लगता है।
इसलिए चरित्र गाथा वाले देवताओं की अपेक्षा बिना चरित्र का इष्ट अधिक निर्दोष है उस पर चाहे जैसी ऊँची से ऊँची भावनाऐं आरोपित की जा सकती हैं। उसमें उनके चरित्र दोष बाधक नहीं होते।
निराकार साधना में सविता देवता का ध्यान सर्वोत्तम माना गया है। सविता अर्थात् प्रातःकाल का उदीयमान स्वर्णिम सूर्य। यही गायत्री शक्ति का देवता भी है। छंद विनियोग में गायत्री का देवता ‘सविता’ कहा गया है। सविता की शक्ति सावित्री भी गायत्री ही है।
सविता ध्यान का विधान यह है कि अपने को निर्वस्त्र निश्छल बालक जैसा माना जाय। पूर्व दिशा में प्रातःकाल के उदीयमान सूर्य को अपना इष्ट माना जाय। और ध्यान किया जाय कि उसकी धीमी किरणें अपने सम्पूर्ण शरीर पर बिखर रही हैं। मात्र बिखरती ही नहीं शरीर के ऊपरी बाहरी क्षेत्र अवयवों में प्रवेश भी करती हैं।
स्थूल शरीर में उन किरणों का प्रवेश बलवर्धन करता है। सूक्ष्म शरीर मस्तिष्क प्रदेश में उनका प्रवेश बुद्धि, वैभव और प्रज्ञा अनुदान की वर्षा करता है। कारण शरीर- हृदय देश भावना क्षेत्र को श्रद्धा, सहृदयता और सद्भावना से सराबोर करता है। इसी प्रकार काया के भीतर वाले सभी छोटे बड़े अंग-प्रत्यंग सविता की किरण प्रवेश द्वारा लाभान्वित होते हैं। सभी को उनकी आवश्यकता के अनुरूप बल मिलता है। सभी परिपुष्ट और क्रियाशील बनते हैं। उनके भीतर जो अंधकार रूपी विकार थे वे प्रकाश के प्रवेश से तिरोहित होते हैं। अपना व्यक्तित्व निखरता है और स्थूल शरीर को ओजस्, सूक्ष्म शरीर को तेजस् और कारण शरीर को वर्चस् उपलब्ध होता है। जैसे सूर्योदय होते ही कमल पुष्प खिलने लगते हैं वैसे ही अपनी समग्र सत्ता इस सविता साधना से साधना से विकसित उल्लसित, प्रफुल्लित एवं तरंगित होती है।
यह ध्यान नेत्र बन्द करके कहीं भी किया जा सकता है। यदि इसे प्रत्यक्ष करना हो तो जहाँ प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य सर्वप्रथम दिखाई पड़ता हो वहाँ ऊँचे स्थान पर बैठना चाहिए। लज्जा-वस्त्र लंगोट भर पहिन कर समस्त शरीर खुला रखना चाहिए। सूर्य की ओर मुख रखना चाहिए। पर उसे लगातार देखना नहीं चाहिए। क्षणभर के लिए उसकी झाँकी इस प्रकार करनी चाहिए कि उस क्षणिक दर्शन का अभ्यास देर तक बना रहे। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि दर्शन के योग्य प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य ही होता है जब उसमें तेजी सफेदी आने लगे तो फिर उसका खुली आँख से देखना हानिकारक होता है। नेत्रों की ज्योति क्षीण करता है।
यहाँ सविता को निर्जीव अग्निपिण्ड मात्र नहीं मानना चाहिए जैसा कि भौतिक विज्ञान की दृष्टि से माना जाता है। आध्यात्मिक भाव मान्यताओं के अनुरूप वह परब्रह्म का तेजस्वी प्रतीक है- प्राण शक्ति को सृजेता। प्राणियों का प्राण और पदार्थों का गति धर्म। भौतिक विज्ञानी मानते हैं कि पृथ्वी पर जो जीवन है वह सब सूर्य का ही अनुदान है। इसी प्रकार पदार्थों में जो विशेषताएं पाई जाती हैं वे सूर्य किरणों में से अविभूत होती हैं। यदि सुर्य बुझ जाय तो पृथ्वी का अस्तित्व भी न रहेगा। वह अन्धेरी हिमाच्छादित तो हो ही जायेगी, साथ ही किसी अन्य ग्रह की आकर्षण शक्ति से खिंचकर कहीं अन्यत्र चली जायेगी तब उसका स्वरूप भी नहीं रहेगा। यह वैज्ञानिक मान्यता हुई।
अध्यात्म मान्यताओं के अनुसार सूर्य परब्रह्म की प्रत्यक्ष प्रतीक प्रतिमा है। वह मात्र भौतिक पदार्थों का ही उपहार नहीं देता अपितु चेतना को जीवन्त बनाये रखने वाले पाँच प्राण भी उसी में आते हैं। उसकी आराधना से हम अपने आन्तरिक चुम्बकत्व संकल्प शक्ति से अभीष्ट मात्रा में अभीष्ट स्तर के प्राण आकर्षित और धारण कर सकते हैं। सूर्य में असीम ऊर्जा है। उस ऊर्जा का चेतना पक्ष जितना अभीष्ट हो, जितना धारण करने की क्षमता हो उतना प्राप्त कर सकते हैं।
सविता का ध्यान सर्वोत्तम है। वह प्रत्यक्ष देव है। उसकी ध्यान धारणा से हम प्रत्यक्ष लाभ भी प्राप्त करते हैं। भौतिक सिद्धियाँ भी और आत्मिक ऋद्धियाँ भी।
श्री विश्वेश्वरैया दक्षिण भारत में कोलार जिले में जन्मे। पिताजी तीर्थयात्रा में ही र्स्वगवासी हो गये। 15 वर्ष की आयु के इस बालक की पढ़ाई माता तथा मामा की सहायता में चली। कुछ ट्यूशन पढ़ाकर भी कमा लेते था। इंजीनियरिंग पास कर लेने पर भी उन्हें सहायक इंजीनियर की पोस्ट मिली।
उनने भारी सूझ-बूझ का परिचय दिया। निजी समस्याओं में उलझे न रहकर उनने देश निर्माण के बड़े काम हाथ में लिये। बैंगलूर, पूना, मैसूर, बड़ौदा, हैदराबाद, ग्वालियर, इन्दौर, कोल्हापुर, सूरत, नासिक, नागपुर, धारवाड़, बीजापुर आदि अनेक शहरों की पेयजल व्यवस्था उनने सम्भाली। मैसूर विश्वविद्यालय भी उन्हीं के प्रयत्न से बना। कितने बाँध उनकी देख-रेख में बने। उनकी सचाई, लगन और श्रमशीलता देखते ही बनती थी। वे 101 वर्ष जिये उन्हें भारतरत्न की उपाधि मिली और डाकघर ने उनके नाम पर टिकट चलाये।
व्यक्तिगत गुणों की दृष्टि से उनके इतने अधिक संस्मरण हैं कि उन्हें सच्चे अर्थों में महामानव ही कहा जा सकता है।
नादयोग को शब्द ब्रह्म की साधना कहा गया है। जीवन की ज्ञान चेतना शब्द, रस, रूप, गन्ध, स्पर्श की पाँच तन्मात्राओं पर आधारित हैं। इन्हीं से पाँच ज्ञानेंद्रियां बनी हैं। शब्द की इनमें प्रमुखता है। बच्चा जब जन्म लेता है तो अन्य इन्द्रियाँ तो काम नहीं करती। दिखाई भी नहीं देती। पर संसार में आते ही सर्वप्रथम उसकी रोने की वाणी ही सुनाई पड़ती है। शब्द ज्ञान होने पर अन्धे भी अपना काम चला लेते हैं, पर कानों के अभाव में तो उसे गूँगा भी रहना पड़ता है और बहरा भी। जीवन विकास में जिस प्रकार शब्द का प्रारम्भ है उसी प्रकार ब्रह्म के प्रकटीकरण में भी शब्द का सर्वोपरि स्थान है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उसके किसी नाम का अवलम्बन अपनाना पड़ता है। सृष्टि का आरम्भ भी शब्द तत्व से हुआ। विज्ञान के अनुसार इस संसार में तीन शक्तियाँ ही प्रमुख हैं। शब्द, ताप, और प्रकाश। इन्हीं की तरंगें समस्त सूक्ष्म प्रकृति में संव्याप्त हैं और इन्हीं के मिलने-बिछुड़ने से अनेकानेक वस्तुएँ बनती और अनेकानेक घटनाएँ घटित होती हैं।
प्रकृति के अन्तराल में अगणित ध्वनियों का प्रवाह बहता है। प्रत्येक घटना सर्वप्रथम शब्द रूप से ही प्रकट होती और प्रकाश में आती है। जो कुछ विश्व ब्रह्माण्ड में हो रहा है या होने जा रहा है उसका अदृश्य रूप सर्वप्रथम शब्द के रूप में ही विनिर्मित होता है। रूप का निर्धारण तो उसके उपरान्त होता है। भूतकाल की घटनाएँ दृश्य रूप में तो मिट जाती हैं पर उनका स्वरूप शब्द रूप में चिरकाल तक बना रहता है।
नादयोग का अभ्यास शब्द तत्व सम्बन्धी अतीन्द्रिय क्षमताओं को जागृत करने के निमित्त ही किया जाता है। सामान्य शरीर में तो समीपवर्ती और स्पष्ट शब्द सुनने की ही क्षमता है। वे न तो बहुत दूर की आवाज को सुन सकते हैं और न घुस-पुस जैसी अस्पष्ट धीमी आवाज को समीप ही होते रहने पर ही समझ पाते हैं। कानों को जितनी सामान्य शक्ति मिली है वह मात्र मनुष्य की सामान्य दैनिक निर्वाह में काम आ सकने जितनी ही है। उनके माध्यम से श्रवण भी सीमित जानकारियां ही देता है। पढ़कर अन्यत्र के समाचार भर जाने जा सकते हैं पर प्रत्यक्ष की तुलना में जो असंख्य गुना अप्रत्यक्ष है उसकी जानकारी प्राप्त होने का मनुष्य को कोई आधार नहीं मिला है। रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन जैसे उपकरण भी मनुष्य के मुख से निकली हुई वाणी के साथ जुड़ी हुई जानकारी ही दे सकते हैं। किन्तु ऐसी सांकेतिक भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते कि विभिन्न क्षेत्रों में जो घटित होने वाला है उसकी जानकारी मिल सके और यह पता चल सके कि कहाँ क्या हो चुका, कहाँ क्या हो रहा है या क्या होने जा रहा है? इस भवितव्यता की जानकारी अनन्त अन्तरिक्ष में विचरती रहती है। हाँडी कच्ची है या पक गई इसकी जानकारी उसके भीतर चल रही हलचलों के अनुरूप निकलते रहने वाले शब्दों के आधार पर जानी जा सकती है। इसके लिए ढक्कन खोलने और उसका निरीक्षण-परीक्षण करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
ऐसा ही ज्ञान नादयोग के अभ्यासी को हो सकता है। इसके लिए कानों को रुई से, शीशी की कार्क से, या मोम पर चढ़ी हुई कपड़े की पोटली से कानों के छेद इस प्रकार बन्द करने पड़ते हैं कि बाहर की आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। ऐसा एकांत स्थान भी ढूँढ़ा जा सकता है जहाँ बाहरी शब्द सुनाई न पड़ते हों। संगीत को टेप करने के लिए ‘साउण्ड प्रूफ’ कमरे भी बनाये जाते हैं जिसमें होकर भीतर की आवाज बाहर या बाहर की भीतर न पहुँच सके। शारीरिक स्थिति शान्त और चित्त एकाग्र रखने की तो हर साधना में आवश्यकता पड़ती है। उत्तेजित शरीर और अशांत चित्त से तो कोई भी आध्यात्मिक साधना नहीं हो सकती।
इसके उपरान्त ध्यान को सूक्ष्म कर्मेंद्रिय के साथ जोड़ना पड़ता है और गहराई में उतरकर यह देखना पड़ता है कि कोई अनाहत शब्द भीतर से उभर रहा है क्या? आरम्भिक दिनों में कोई विशेष ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती। ऐसी दशा में निराश होने की आवश्यकता नहीं है। लगातार अभ्यास करने से कुछ बहुत ही हलकी-धीमी सूक्ष्म ध्वनियां सुनाई पड़ने लगती हैं और आसपास के वातावरण को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि वह किसी समीपवर्ती घटनाक्रम से सम्बन्धित आवाज ही है।
नादयोग में सुनाई पड़ने वाली आवाजों में झींगुर बोलने, चिड़िया चहचहाने, बादल गरजने, झरना झरने के कलख नदी जैसी बाँसुरी या डमरू या सितार बजने जैसी, शंख ध्वनि जैसी, भौंरा गूंजने जैसी आवाजें होती हैं। इससे मिलती-जुलती कोई और भी आवाज हो सकती है। एक ही आवाज लगातार सुनाई देती रह सकती है, और उनमें हेर-फेर भी होता रह सकता है।
आरम्भ क्रम चलाकर इन्हें स्पष्ट होने देना चाहिए। जब आवाजें स्पष्ट हो चलें तब ध्यान को और भी अधिक गहराई में ले जाना चाहिए इनका सूक्ष्म जगत की किसी घटना से सम्बन्ध तो नहीं है। यदि ऐसा कुछ होता है तो उसके दृश्य मानस क्षेत्र में कल्पना पटल पर उतरने लगते हैं और प्रतीत होता है कि यह अपने संपर्क क्षेत्र में घटित होने वाली किसी घटना या किसी मित्र सम्बन्धी की भवितव्यता सम्बन्ध संकेत तो नहीं है। आभास को किसी से कहना नहीं चाहिए वरन् स्वतः ही यह परीक्षण करना चाहिए कि अनुमानित संकेत सही उतरा या नहीं।
कभी-कभी अपने शरीरगत अवयवों की हलचलों से सम्बन्धित यह शब्द होते हैं। आमाशय, आँतें, यकृत, हृदय, फुफ्फुस, गुर्दे आदि की असाधारण हलचलें भी अपने आप इस आधार पर अपना परिचय देती हैं। शरीर का तापमान घटना बढ़ना भी इस ध्वनि प्रवाह के साथ बढ़ी-घटी रोशनी के रूप में या शान्ति उत्तेजना के रूप में अनुभव होती है। इस प्रकार अपने शरीर और मन का निरीक्षण भी नादयोग के आधार पर हो जाता है। मन में उठने वाले उत्तेजना, क्रोध, आवेश, ईर्ष्या, प्रतिशोध, कामुकता जैसे विचारों से उत्तेजना रहती है और भय, सन्देह, निराशा, उदासी आदि का संकेत मन्द, अस्फुट, कानाफूसी जैसी स्थिति से लगने लगता है।
आरम्भ में नादयोग में अपनी निजी कल्पना और प्रकृति प्रवाह का सम्मिश्रित परिचय हो सकता है। पर जैसे-जैसे अन्तःकरण की शान्ति एवं समस्वरता बढ़ती जाती है। सूक्ष्म जगत का परिचय मिलने लगता है। यहाँ तक कि ईश्वर की इच्छा गतिविधियों में सुधार परिवर्तन के निमित्त आदेश रूप में संकेत मिलने लगते हैं। कुछ दिन के अभ्यास से यह स्पष्ट हो जाता है कि नादयोग द्वार जिन ध्वनियों का जैसा तात्पर्य समझा गया था वैसा हुआ या नहीं। तांत्रिकों में इसे कर्ण पिशाचिनी सिद्धि कहते हैं। जो संसार भर की पूछी बिना पूँछी बातों को चुपचाप कान में कहती रहती हैं।
आवश्यक नहीं कि मनुष्य साधन सम्पन्न परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर ही प्रगति कर सके। अमेरिका का जार्ज ईस्ट मैन कम पढ़ा होने से चपरासी की नौकरी करने के लिए बाधित हुए। दिन भर दफ्तर के काम में जुटा रहता और रात को कई-कई घन्टे जगकर फोटोग्राफी का सिद्धान्त समझने और उसके प्रयोग करने में लगा रहता। जो इस विषय में उसका मार्गदर्शन कर सकते थे उन्हें ढूँढ़ने और उलझनों के हल पूछने में प्रयत्नशील रहता, संपर्क बनाता रहता।
उसकी लगन और मेहनत उसे सफलता की दिशा में अग्रसर कराती ले गई। उसने इस दिशा में प्रवीणता प्राप्त की और विश्व विख्यात ‘कोडक’ कम्पनी का संस्थापक बना। उस कार्य में अकेला होने के कारण लाभ भी अच्छा कमा सका।
उसने अपनी जीवन भर की कमाई दो करोड़ डालर एक इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना में दान कर दी और उसी गरीबी को साथ लेकर विदा हुआ जिसे लेकर वह जन्मा था।
व्यक्तित्ववान से तात्पर्य रंग रूप की सुन्दरता, कपड़ों की सज-धज, घुंघराले केश या साज-सज्जा के सामान से नहीं लगाया जाना चाहिए। यह विशेषताएं तो रंगमंच के नट नटियों में भी हो सकती हैं। पर इसके कारण उन्हें आकर्षक मात्र समझा जा सकता है। उन्हें व्यक्तित्ववान नहीं कहा जा सकता। ऐसे लोगों के प्रति किसी को श्रद्धा होती है न सम्मान। उन्हें कोई उत्तरदायित्वपूर्ण काम भी नहीं सौंपे जा सकते और न उनसे आशा की जा सकती है कि वे जीवन में कोई महत्वपूर्ण काम कर सकेंगे।
व्यक्तित्व से तात्पर्य शालीनता से है। जो सद्गुणों के उत्तम स्वभाव से सज्जनता से और मानवी गरिमा के अनुरूप अपनी वाणी, शैली, दिशाधारा एवं विधि-व्यवस्था अपनाने में है। यह सद्गुण स्वभाव के अंग होने चाहिए और चरित्र तथा व्यवहार में उनका समावेश गहराई तक होना चाहिए। अन्यथा दूसरों को फँसाने वाले ठग भी कुछ समय के लिए अपने को विनीत एवं सभ्य प्रदर्शित करते हैं। कोई जब उनके जाल में फँस जाता है तो अपने असली रूप में प्रकट होते हैं। धोखे में डालकर बुरी तरह ठग लेते हैं। विश्वासघात करके उसकी बुरी तरह जेब काटते हैं। कोई आदमी वस्तुतः कैसा है इसे थोड़ी देर में नहीं समझा जा सकता। उसकी पिछली जीवनचर्या देखकर वर्तमान संगति एवं मित्र मण्डली पर दृष्टिपात करके समझा जा सकता है कि उसका चरित्र कैसा है। यह चरित्र ही व्यक्तित्व की परख का प्रधान अंग है।
इसके अतिरिक्त, शिक्षा एवं विचार पद्धति भी देखने योग्य है। कुछ समय के वार्त्तालाप में मनुष्य की शिक्षा एवं आस्था का पता चल जाता है। चिन्तन वाणी में प्रकट होता है। ठग आदर्शवादी वार्त्तालाप कर सकने में देर तक सफल नहीं हो सकते। वे किसी को जाल में फँसाने के लिए ऐसी बातें करते हैं मानों उसके हितैषी हों और उसे अनायास ही कृपा पूर्वक कोई बड़ा लाभ कराना चाहते हैं। नीतिवान ऐसी बातें नहीं करते वे अनायास ही उदारता नहीं दिखाते और न अनुकम्पा करते हैं। न ऐसा रास्ता बताते हैं जिसमें नीति गँवाकर कमाई करने का दाँव बताया जा रहा है। व्यक्तित्ववान स्वयं नीति की रक्षा करते हैं भले ही इसमें उन्हें घाटा उठाना पड़ता हो। यही नीति उनकी दूसरों के सम्बन्ध में होती है। जब भी, जिसे भी वे परामर्श देंगे वह ऐसा होगा जिसमें चरित्र पर आँच न आती हो, भले ही सामान्य स्तर का बना रहना पड़े।
शालीनता उपार्जित करने के लिए शिक्षा की भी जरूरत पड़ती है। अशिक्षित आमतौर से गँवार या मूर्ख होते हैं। उनके व्यवहार में दूसरों को हानि पहुँचा कर अपना लाभ कमा लेने की नीति का समावेश होता है। ऐसा ही वे स्वयं करते हैं और ऐसा ही कर गुजरने के लिए वे दूसरों को परामर्श देते हैं। कारण कि उनका ज्ञान समीप वर्ती, साधारण लोगों तक ही सीमित होता है और औसत आदमी सफल बनने के लिए ऐसे ही तरीके अपनाता है। उनमें से अपवाद रूप में ही भलमन साहत पाई जाती है। जिस पर इस समुदाय का प्रभाव है वे यही समझते हैं कि दुनिया का रीति-रिवाज यही है और इसी रीति-नीति को अपनाने में कोई हर्ज नहीं है। सुशिक्षित-स्वाध्यायशील व्यक्तियों के सामने ही आदर्श वादियों की कार्य पद्धति होती है। इतिहास में ही ऐसे श्रेष्ठ पुरुष खोजे जा सकते हैं। वे कभी-कभी और कहीं-कहीं ही होते हैं। उन्हें आदर पूर्वक पढ़ने, सुनने और समझने में ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि कितने ही लोगों ने प्रत्यक्ष घाटा उठाते हुए भी आदर्शों का परिपालन किया है और सर्व साधारण के सामने अनुकरणीय पथ प्रदर्शन प्रस्तुत किया है। ऐसे लोग यदि भावनाशील हुए और आदर्शों को अपनाने से किस प्रकार महान बना जा सकता है यह समझ सके तो फिर अपने को ढाँचे में ढालता है और समय-समय पर दूसरों को भी वैसी ही सलाह देते हैं। इसी परख पर यह जाना जा सकता है कि यह व्यक्तित्ववान है या नहीं। उसकी शालीनता परिपक्व स्तर की है या नहीं।
व्यक्तित्ववान दूसरों का विश्वास अर्जित करते हैं, साथ ही सम्मान एवं सहयोग भी। ऐसे लोगों को बड़े उत्तरदायित्व सौंपे जाते हैं और वे उन्हें उठाने में प्रसन्न भी होते हैं। क्योंकि महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने में अनेक लोगों का विश्वास और सहयोग अर्जित करने में ऐसे ही लोग सफल होते हैं। निश्चित है कि महत्वपूर्ण कामों को पूरा करने में सद्गुणी साथी अनिवार्य रूप से आवश्यक होते हैं और वे हर किसी का साथ नहीं देते। कारण कि उन्हें यह देखना पड़ता है कि कहीं ओछे लोगों की मंडली में शामिल होकर हमें भी बदनामी न ओढ़नी पड़े।
व्यक्तित्ववानों की परख का एक और भी तरीका है कि उनने अपने सगे सम्बन्धियों के साथ न्यायोचित व्यवहार का निर्वाह किया या नहीं। जिनके साथ निरन्तर रहना पड़ता है उन्हीं के साथ आदमी की असलियत खुलती है। बाहर के लोगों के साथ तो बनावटी सज्जनता भी दिखाई जा सकती है, पर मुखौटा पहनकर दिनचर्या का निर्वाह नहीं हो सकता। चकमे में डालने की कला कभी-कभी ही काम देती है और वह प्रायः अजनबी लोगों पर ही सफल होती है। जिनसे लगातार वास्ता पड़ता है उनसे किसी के स्वभाव या चरित्र की वस्तुस्थिति छिपी नहीं रहती।
व्यक्तित्ववानों को सदा अपनी गरिमा का ध्यान रहता है। स्वाभिमान गँवाने वाले कामों में वे हाथ नहीं डालते। ऐसी दशा में चतुर लोग उनसे उदास रहते हैं और घनिष्ठता स्थापित नहीं करते। किसकी घनिष्ठता किन से है, यह देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि इस व्यक्ति का स्तर क्या होना चाहिए? इसी प्रकार यदि पिछले दिनों के कार्यों पर दृष्टि डाली जाय और यह देखा जाय कि वे किस स्तर के थे तो भी समझा जा सकता है कि इसका व्यक्तित्व क्या है। इस स्तर की प्रतिभा अर्जित करने के लिए उच्चस्तरीय स्वाध्याय सत्संग आवश्यक है। जिसे बाहरी स्थिति ऐसी मिलेगी वही चिन्तन और मनन भी ऊंचे स्तर का कर सकेगा। उसके द्वारा अन्यान्यों को भी ऊंचे स्तर का परामर्श एवं सहयोग मिलेगा। इन्हीं कसौटियों पर कसकर यह देखा जा सकता है कि किसका व्यक्तित्व किस स्तर का है।
व्यक्तित्व सच्चे अर्थों में मनुष्य की महती और चिरस्थायी सम्पदा है। इसी के सहारे वह अपना और दूसरों का भला कर सकता है। किन्हीं पर उपयोगी प्रभाव डालने में भी ऐसे ही लोग सफल होते हैं। अन्यथा जिनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। वे सर्वत्र सन्देह की दृष्टि से देखे जाते हैं और पोल खुलने पर उपहासास्पद बनते हैं।
ऊंचे उठने, सफल बनने एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए जिस सौभाग्य को सराहा जाता है वह वस्तुतः खरा व्यक्तित्व ही है। सोने की जब कसौटी और अँगीठी पर परख हो जाती है तो उसकी उपयुक्त कीमत मिलती है। यही बात व्यक्तित्व के सम्बन्ध में भी वह जब खरा होने की स्थिति तक पहुँच जाता है तो मनुष्य को ऐसा सौभाग्यशाली बनाता है। जिसकी चिरकाल तक सराहना होती रहे।
महान कहानी लेखक ईसप छोटे बच्चों के साथ खेल रहे थे और उन्हीं की तरह हँसने-चिल्लाने और कुछ बनाने बिगाड़ने में व्यक्त थे। नगर के कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों ने ईसप की इन बालक्रीड़ाओं को देखा और उनकी महानता का स्मरण दिलाते हुए अपना समय नष्ट करने का कारण पूछा।
ईसप ने उत्तर में खूँटी पर से खुली प्रत्यंचा का धनुष उठाकर दिखाया और कहा यदि इसकी डोरी सदा खिंची रखी जायेगी तो यह समय पर काम देने योग्य न रहेगा। इसी प्रकार यदि मनुष्य सदा गम्भीर और तनावग्रस्त रहे तो वह अपनी विशिष्टताएं जल्दी ही गँवा बैठेगा। मनुष्य के लिए हँसना-हँसाना भी आवश्यक है।
बहुत दिनों से यह सिद्धान्त विज्ञान क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करता रहा है कि प्रकाश की गति एक सेकेंड में 186000 मील है। इससे तीव्र और कोई गति नहीं। यदि ब्रह्माण्ड की यात्रा पर निकला जाय तो कहाँ कितने समय में पहुँचा जा सकेगा, इसका अनुमान इस आधार पर लगाया जाना चाहिए कि इस गति से चलने वाला कोई वाहन मिल जायगा। किन्तु मनुष्य का चिन्तन और कर्तृत्व अभी इतना विकसित नहीं हुआ कि प्रकाश की गति से अधिक चलने वाले किसी वाहन के निर्माण की कल्पना की जा सके।
दूसरा तथ्य इस संदर्भ में विचारणीय है कि ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उसे अपने दायरे से कितना किस प्रकार आगे बढ़ने देगी। गुरुत्वाकर्षण ग्रह के भार और विस्तार से सम्बन्धित है। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति एक सेकेंड में 1102 किलोमीटर से है। इससे अधिक तेज चाल में फेंकी जाने वाली वस्तु ही पृथ्वी की पकड़ के दायरे का उल्लंघन कर सकती है।
अन्तरिक्ष में गतिशील ग्रह गोलकों की स्थिति गुरुत्वाकर्षण के सम्बन्ध में समानता नहीं है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण प्रति सेकेंड 317 है। कारण कि पृथ्वी का व्यास मात्र 12700 किलोमीटर है। जब कि सूर्य का व्यास 14 लाख किलोमीटर। कितने ही ग्रह इतने भारी और विस्तृत हैं कि उनकी गुरुत्वाकर्षण सीमा लाँघने के लिए प्रकाश गति की तुलना में कहीं अधिक द्रुतगामी होना चाहिए।
ऐसे ग्रहों का अस्तित्व इस ब्रह्माण्ड में है जिनका गुरुत्वाकर्षण प्रकाश गति से अधिक है। ऐसी दशा में उनकी रोशनी उसे ग्रह की पकड़ में आ सकती है और उसे परिधि से बाहर कहीं भी दीख न पड़ेगी। चमकदार होते हुए भी वह पिण्ड अंधकारमय दृष्टिगोचर होगा। फिर भी उसकी शक्ति और सत्ता तो बनी ही रहेगी।
एक और सिद्धान्त ‘ग्रैविटेशन रिएक्शन’ का है। इस परिधि में आने वाला पिण्ड सिगनल एक्स बन जाता है। यही बहु चर्चित ‘ब्लैक होल’ है। इसका आकर्षण और विस्तार इतना अधिक होता है कि उसकी पकड़ में आ जाने पर पृथ्वी जैसे विशाल पिण्ड भी खिंचते चले जा सकते हैं और इतनी तेजी से इतनी दूर पहुँच सकते कि उसका कुछ अता-पता ही न लगे।
नवीन शोधों के अनुसार ग्रह वृद्धता को प्राप्त होने पर अपने अंग-प्रत्यंग सिकोड़ना शुरू करते हैं। सिकुड़न बढ़ने किन्तु भार कम न होने की स्थिति में एक और विचित्रता उत्पन्न हो जाती है जिससे वह जीवित होते हुए भी मृतक की श्रेणी में पहुँच जाता है। ऐसी दशा में भी ऊर्जा उसके पास बनी रहती है। वह इतनी अधिक होती है कि संसार भर की समस्त मोटर गाड़ियाँ 100 मील प्रति घण्टे की चाल से 100 अरब वर्षों तक दौड़ती रहें।
सभी ऊर्जा शक्ति की प्रतीक तो होती हैं, पर यह आवश्यक नहीं कि वह संपर्क में आने वाली वस्तु को जला ही दे। वह खींचते रहने के काम भी आ सकती है।
ब्रह्माण्ड का किसी को दौरा करना हो तो उसे प्रकाश से अधिक गति वाले वाहन बनाकर हजारों वर्ष में दूरवर्ती ग्रह गोलकों की यात्रा करने की आवश्यकता नहीं। वह इन ब्लैक होलों की आकर्षक शक्ति का सहारा लेकर थोड़े ही समय में अभीष्ट स्थान तक पहुँच सकता है।
ब्लैक होल इस अनत आकाश में अनेकों हैं। वे सीधी लाइन की तरह या खड़े डण्डे की तरह नहीं है। वरन् एक ऐसी सड़क की तरह है, जिसमें स्थान-स्थान पर चौराहे फटते हैं। उनमें मुड़कर सीधे जाने की अपेक्षा तिरछा या दायाँ-बायाँ भी जाया जा सकता है।
ब्लैक होलों में छोटी बड़ी पगडंडियां भी हैं। वे राजमार्ग की तरह साथ सीधी तो नहीं हैं, पर उनका सहारा पकड़ कर यात्री अपनी दिशा बदल सकता है और चाल में धीमापन या तीव्रता जा सकता है।
इस प्रकार लोक-लोकांतरों की यात्रा सम्भव हो सकती है। ब्लैक होने पर सवार होकर ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण का बन्धन भी बाधक नहीं बनता और गति सम्बन्धी किसी व्यवधान के आड़े आने का भी झंझट नहीं रहता।
प्राचीन काल में अन्य लोकों के निवासी पृथ्वी पर आते रहे हैं और पृथ्वी निवासियों को अंतर्ग्रही ही नहीं अन्तर निहारिकीय यात्रा की भी सुविधा मिली है। मार्ग की दूरी, उसे पूरी करने में लगने वाली लम्बी अवधि के कारण जीवन का अधिकांश भाग यात्रा में ही व्यतीत हो जाने का खतरा भी नहीं रहता। अपना अभीष्ट काम पूरा करने में जितना समय लगाने की आवश्यकता है उसे लगाकर उतनी ही तेजी से वापस भी लौटा जा सकता है जितनी तेजी से कि पहुँचा गया था।
इस प्रकार की यात्रा में आवश्यक साधन सामग्री साथ ले जाने या वहाँ की कोई वस्तु साथ लाने में भी कठिनाई नहीं पड़ती। मात्र उसे किसी मामूली धागे से शरीर के साथ बाँधे रहना पड़ता है ताकि वह साथ चलती रहे और विलग न होने पावे।
विज्ञान ने अभी पदार्थ की शक्ति का ही पता लगाया है। उसने सम्मिश्रण विकर्षण की जो प्रतिक्रिया होती है उसे भी एक सीमा तक समझ लिया गया है। ग्रह-उपग्रह भी जो भेजे गये हैं वे सौर मण्डल के ग्रहों और चन्द्रमाओं के इर्द-गिर्द तक ही पहुँच पाये हैं। इस परिधि का उल्लंघन करने के उपरान्त वे पृथ्वी के साथ किसी सम्बन्ध सूत्र से बंधे रहते और यह आशा नहीं की जा सकती कि वे फिर वापस लौट सकेंगे।
“ब्लैक होल” अभी तो एक भय का कारण बने हुए हैं। बरमूड़ा त्रिकोण के पास उसकी एक पतली सी नोंक आती है उसकी पकड़ में जो जलयान वायुयान आ जाते हैं वे ऊपर उठते और अदृश्य हो जाते हैं। इसके बाद उनका कुछ अता-पता नहीं लगता कि वे किस दिशा में किस कारण कहाँ चले गये। उनके वापस लौटने की भी प्रतीक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि विश्व ब्रह्माण्ड में फैले हुए ब्लैक होलों के जाल और उनसे सम्बन्धित मार्गों और पगडण्डियों का कुछ पता प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इतना जान लेने के उपरान्त भी ज्ञातव्य लोक के बारे में यह समझना बाकी रह जाता है कि मनुष्य के जीवनयापन सम्बन्धी सुविधा वहाँ है या नहीं? विचारों का आदान-प्रदान हो सकता है या नहीं। इसके साथ ही उस संपर्क का परिणाम भी समझना है कि इतनी जोखिम उठाकर आने या जाने वाले प्राणी एक दूसरे का कुछ हित साधन कर सकते हैं या नहीं।
अन्तरिक्ष विज्ञान और उसके द्रुतगामी वाहनों के सम्बन्ध हमारा भौतिक विज्ञान या अध्यात्म विज्ञान पता लग सकेगा, उस दिन उसे विश्व ब्रह्माण्ड की अनन्त विभूतियों के साथ जुड़ने का अवसर भी मिलेगा।
जयपुर के अग्रवाल महाविद्यालय भवन में अ.भा. आयुर्वेद सम्मेलन हो रहा था। महामना मालवीय जी को अध्यक्षता करनी थी। उन दिनों देशी रजवाड़े किसी राष्ट्रीय विचार वाले को अपने क्षेत्र में प्रवेश न करने देते थे। अस्तु मालवीयजी के जुलूस एवं भाषण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
मालवीय जी ने पैंतरा बदला उनने भागवत कथा कहना आरम्भ कर दिया जो पूरे दो घण्टे चली। जनता मन्त्र मुग्ध रह गई।
समाचार राजमहल पहुँचा तो राजा ने मालवीय जी की कथा सुनने उन्हें राजमहल में आमन्त्रित किया। बड़े ध्यान से उन्होंने कथा सुनी। इसके उपरान्त हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए राज्य कोष से लाखों रुपये की सहायता भी दी गई।
योग साधनाओं के माध्यम से अध्यात्म जीवन की उच्च कक्षाओं में पहुँचे योगी महापुरुष अनेक अलौकिक शक्तियाँ क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं। परन्तु प्रकृति ने कई जीव जन्तुओं को भी ऐसी अलौकिक शक्तियाँ दी हैं- जिनके बिना उनका काम ही नहीं चल सकता था। उन शक्तियों और क्षमताओं के सम्बन्ध में जानकर तो आश्चर्य ही होता है और परमात्मा की अनन्त अनुकम्पा के सम्मुख नतमस्तक हो जाना पड़ता है।
शीत प्रधान देशों में जहाँ बर्फीले तूफान आते हैं और सामान्य मौसम में भी जहाँ कोई मनुष्य मुश्किल से रह पाता है, वहाँ कई जातियों के पक्षी रहते हैं। बर्फीले तूफान वर्ष में किन दिनों आते हैं, यह कोई निश्चित नहीं है और उनमें जीवन के अस्तित्व की सम्भावना बिल्कुल ही नहीं है। फिर भी कुछ जाति के पक्षी वहाँ रहते हैं और बर्फ गिरने के एक माह पूर्व ही वहाँ से उड़ जाते हैं। कोई दस दिन पहले भी उड़ता है और कोई दो माह पूर्व भी, परन्तु प्रतिवर्ष वे अपने स्वाभाविक नियत अवधि में ही उड़ जाते हैं। बर्फ कब गिरेगी- प्रायः यह अनिश्चित ही रहता है फिर भी उनके उड़ने के समय में कोई भूल नहीं होती।
इसी प्रकार शीत प्रधान देशों में जब बर्फ गिरने लगती है तो रीछ कई दिनों पहले गुफा में चले जाते हैं और अपना आवश्यक आहार इकट्ठा कर लेते हैं। इसी प्रकार एक जापानी चिड़िया है, वह भूकम्प आने के चौबीस घण्टे पहले उस क्षेत्र को छोड़ देती है। हमारे देश में साधारण चिड़िया की भाँति यह जापान में सर्वत्र पायी जाती है, गाँवों में भी। गाँव के लोग उसे उड़ते और गाँव छोड़कर जाते देख समझ जाते हैं कि भूकम्प आने वाला है और वे भी गाँव छोड़ जाते हैं। आश्चर्य है कि अब तक विकसित वैज्ञानिक संयन्त्र भी कुछ घन्टे पूर्व ही भूकम्प की भविष्य वाणियाँ करते हैं फिर इस चिड़िया को चौबीस घण्टा पहले ही कैसे पता चल जाता है।
उत्तरी कनाडा में शीत ऋतु के समय झीलों पर बर्फ की मोटी सतह जम जाती है। लेकिन वहाँ की झीलों में रहने वाली मछलियाँ इससे पूर्व ही गर्म जगह की ओर चली जाती हैं जहाँ बर्फ नहीं जमती। अब उन्हें कैसे पता चलता होगा कि यहाँ बर्फ जम जायेगी और अमुक स्थान पर नहीं जमेगी। टिटहरी- एक भारतीय पक्षी है जो कभी वृक्षों पर अण्डे नहीं देता वह अकसर नदी, तालाबों के किनारे पर ही अण्डे देता है वह समय भी प्रायः वर्षा ऋतु के आस-पास होता है, परन्तु नदी तालाब के तट पर भी वह पानी से इतनी दूर और इतना ऊँचे अण्डे देता है कि बाढ़ आ जाने पर भी जल वहाँ तक पहुँचता नहीं। ग्रामीण क्षेत्रों में इसीलिए यह मान्यता है कि जिस वर्ष टिटहरी के अण्डे पानी में बह जायें वह वर्ष अति विनाशकारी होता है।
जलचर प्राणी पृथ्वी या आकाश में मर जाते हैं और नभचर अथवा थलचर पानी में नहीं बचते परन्तु एक पक्षी है आरिब्डक। जो आकाश में भी उड़ता है और पानी में भी महीनों तैरता रह सकता है।
जीव विज्ञान के आचार्य विलियम जे. लॉग ने वर्षों तक प्राणियों की अतीन्द्रिय शक्तियों के सम्बन्ध में खोज की और उन निष्कर्षों को पढ़कर यह आसानी से अनुभव किया जा सकता है कि मनुष्य बुद्धि कौशल में भले ही पशुओं से काफी आगे निकल गया हो परन्तु अतीन्द्रिय शक्तियों के क्षेत्र में पशु-पक्षी ही उससे बढ़े-चढ़े हैं।
कुत्तों और भेड़ियों की घ्राण शक्ति इतनी तीव्र होती है कि वे मीलों दूर की गन्ध ले लेते हैं। गन्ध के आधार पर तो मनुष्य दो फुट दूर खड़े इनसान को नहीं पहचान सकता लेकिन कुत्ता गन्ध के मामले में इतना होशियार है कि पहने हुए कपड़ों को यहाँ तक कि पद चिन्हों के आधार पर भी वह उस व्यक्ति को कहीं भी पहचानने में सफल हो जाता है। संगीन मामलों में अपराधियों की खोज के लिए कुत्तों का सहारा इसी प्रकार लिया जाता है- पाठक इससे तो भली-भाँति परिचित हैं।
इसी प्रकार उल्लू, चील ओर गिद्ध की दृश्य शक्ति अपने ढंग की अनूठी ही होती है। उल्लू के नेत्रों में प्रचण्ड रोशनी भरी पड़ी है कि वह केवल रात में ही देख पाता है। किसी वस्तु का न दिखाई देना अंधकार के कारण ही नहीं होता वरन् तीव्र प्रकाश हो तो भी आँखें देखने में असमर्थ होती हैं। जो प्रकाश हमारी आँखों के लिए सामान्य है और उसमें हम आसानी से देख सकते हैं वही प्रकाश उल्लू की आँखों के लिए चौंधिया देने वाला बन जाता है और उल्लू इसी कारण दिन में देख नहीं पाता।
चील और गिद्ध मीलों ऊपर उड़ते हुए भी नीचे पड़े माँस के टुकड़े को देख लेते हैं। बाज हजारों फीट ऊपर उड़ते हुए भी घास या झाड़ियों में छुपे मेंढक, चूहे और साँप को आसानी से देख लेता है। हमारे लिए तो पाँच फीट ऊपर से भी घास के नीचे छुपे मेंढक चूहों को देख पाना असम्भव है। खरगोश और मछलियाँ भी बिना सिर हिलाये चारों तरफ देख लेते हैं। श्रोत्रेन्द्रिय की दृष्टि से हरिण सबमें अद्वितीय है। वह मीलों दूर की आहट सुन लेता है। न सुनायी पड़ने वाली शेर की दहाड़ वह तुरन्त सुन लेता है और उसके कान खड़े हो जाते हैं।
कई प्राणियों में इस प्रकार की शक्तियाँ और क्षमतायें विकसित हैं जिनकी तुलना में मनुष्य बौना सिद्ध होता है। इस दृष्टि से मनुष्य को प्रकृति का सबसे बड़ा पुत्र और सर्वोपरि अनुदानों से युक्त कहा जाना अनुपयुक्त लग सकता है परन्तु वस्तुतः ऐसा है नहीं। वस्तुतः ये शक्तियाँ मनुष्य को जन्म-जात मिली हैं। मनुष्य की संरचना का आध्यात्मिक अध्ययन सिद्ध करता है कि सूक्ष्म शरीर में विद्यमान षट्चक्रों में वे सभी सम्भावनाऐं और शक्तियाँ अन्तर्हित हैं जो पिछले किन्हीं जन्मों से विकसित हो चुकी थीं। यह तो एक तथ्य है ही कि सभी जीव योनियों में भ्रमण कर चुकने के बाद यह मनुष्य को मिली है।
मानवी कलेवर के सूक्ष्म शरीर में विद्यमान षट्चक्रों में जीवात्मा की यात्रा के समस्त अनुभव और उपलब्धियां किसी टेप रिकार्डर में रिकार्ड की गई आवाज की तरह टेप है आवश्यक है तो उन्हें जागृत भर करना। वे सुप्त इसलिए हैं कि मनुष्य की लम्बी यात्रा के कारण वे पीछे छूट गयी हैं और अप्राकृतिक रहन-सहन तथा विकृत जीवन विकृत मनोभूमि के कारण उनकी अनुभूति भी निष्पद पड़ चुकी है।
कहा जा सकता है कि प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ अनुदानों का अधिकारों मनुष्य है तो उसे वे इस जीवन में भी प्रदत्त की जा सकती थीं। लेकिन प्रकृति का यह नियम है कि जिन परिस्थितियों में जिस वस्तु या शक्ति की आवश्यकता हो वह उपलब्ध करा दी जाय। अनावश्यक और अनपेक्षित शक्तियों के दुरुपयोग की ही सम्भावना अधिक रहती है। इसलिए जब तक कोई अपनी पात्रता सिद्ध नहीं कर देता वे मिल नहीं सकतीं। यह सृष्टा का एक अनिवार्य शाश्वत सिद्धान्त है।
अरुणाचलम् के महर्षि रमण ने भी अरविन्द जैसी रीति-नीति अपनाई। वे तनिक समर्थ होते ही आत्मबल का सम्पादन करने और उससे देश के वातावरण में पुरुषार्थ परक ऊर्जा भरने का निश्चय किया। उनने दैनिक जीवन में वे गतिविधियाँ अपनाईं, जिनके सहारे कषाय-कल्मषों का निराकरण कर सकें। इस आधार पर उनका व्यक्तित्व इतना प्रखर हो गया कि जो भी उनके सान्निध्य में आता और अपने में भारी परिवर्तन हुआ अनुभव करता। वे मौन रहते थे तथा उनकी मध्यमा, परा, पश्यन्ति वाणियाँ समूचे वातावरण में गूँजती। पशु-पक्षी तक उनके मौन सत्संग में सम्मिलित होते।
महर्षि अपने संपर्क क्षेत्र में दीन दुःखियों की सेवा करते रहते और दरिद्र नारायण को भगवान मानते। एक दिन किसी ने उनसे भगवान के दर्शन की बात कही तो वहाँ ले गये जहाँ झोंपड़ी में एक बीमार पड़ा था। वे दुःखियारों में भगवान का दर्शन करते तथा औरों को कराते थे। उनकी मूक साधना ने सहस्रों प्रचारकों से अधिक काम किया।
मोटी लकड़ी को जमीन में गाढ़ना कठिन है। उसके लिए जमीन में गड्ढा बनाना पड़ता है या लकड़ी की नोक पतली करनी पड़ती। बार-बार हर आवश्यकता के लिए अलग-अलग गड्ढे खोदने की अपेक्षा यह अच्छा है कि कोई नोकदार उपकरण बनाकर छेद करते रहा जाय। सुई से नहीं प्रयोजन पूरा होता है। बरमा भी यही काम करते हैं। इन्जेक्शन की सुइयाँ भी पतली रखी जाती है।
मन की बनावट ऐसी है कि उसे आगत परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपने स्तर की कल्पनाऐं करनी पड़ती हैं। प्रस्तुत या सम्भावित विपन्नताओं का निराकरण करना एक बात है और उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मार्ग खोजना भी ऐसा है जिसके लिए मन की गति तीव्र होनी चाहिए। कल्पनाएँ करने तथा काट-छाँट करने के लिए भी कम परिश्रम नहीं करना पड़ता। इन सब प्रयोजनों के लिए तीव्रता एवं तीक्ष्णता आवश्यक भी है। यदि ऐसी संरचना न होती तो मनुष्य मन्द बुद्धि या दीर्घसूत्री बनकर रह जाता। वह आज्ञा पालन भर कर पाता। पशुओं से अधिक उसकी प्रतिभा विकसित न होती।
आमतौर से मन की दौड़ या पहुँच उन्हीं प्रयोजनों तक जुड़ी रहती है जो उसे रोज करने पड़ते हैं। हर मनुष्य का एक निर्धारित जीवन ढर्रा होता है। निर्वाह एवं व्यवसाय के लिए एक सीमित क्षेत्र होता है। उसी में मन की उधेड़-बुन करते रहना पड़ता है। ताँगे का घोड़ा अभ्यस्त सड़क पर ही दौड़ते रहने का आदी होता है। कोल्हू के बैल को भी एक नियत दायरे में घूमते रहना पड़ता है। अभ्यास या स्वभाव इसी आधार पर बनता है। इसके लिए कुछ विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता। सामान्य क्रिया-कलाप ही सभी आवश्यक बातें सिखा लेता है और अल्पबुद्धि व्यक्ति अपने निर्धारित काम पूरे कर लेता है। नौकर मालिक की इच्छा आवश्यकता को भली प्रकार समझते हैं और अपने जिम्मे के काम नियत क्रम से पूरा कर देते हैं। भले ही वे मन्दबुद्धि ही क्यों न हों।
किसी अनभ्यस्त विलक्षण कार्य के लिए विशेष ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है। मनुष्य ही नहीं मन भी इसी प्रकार सधाया जाता है। आत्म-निरीक्षण, आत्मसुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के चार चरणों में हमारा अन्तरंग जीवन बँटा हुआ है। इनकी विधिव्यवस्था जाने बिना मनुष्य अपने अंतर्जीवन में प्रवेश नहीं कर सकता। इस प्रवेश से ही कुसंस्कारों का परिशोधन और सुसंस्कारों का अभिवर्धन बन पड़ता है। यही है व्यक्तित्व के निखार और आत्म-सुधार की प्रक्रिया। जिसके आधार पर समुन्नत अथवा प्रगतिशील बन सकना सम्भव होता है।
बहिरंग जीवन की परिस्थितियाँ समस्याओं और आवश्यकताओं के सम्बन्ध में हम बहुत कुछ जानते हैं क्योंकि दिनचर्या का सीधा सम्बन्ध इसी क्षेत्र में रहता है। बिगाड़ से बचाव और उत्कर्ष को अग्रगामी बनाने के लिए समूची कार्यविधि इसी में लगी रहती है। पर इससे भी महत्वपूर्ण क्षेत्र अन्तराल की संरचना जानने और आवश्यकता के अनुरूप उपक्रम अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु इस परिधि में प्रवेश करने का आमतौर से अवसर ही नहीं मिलता। इसलिए उस संदर्भ में अनाड़ीपन ही बना रहता है।
बहिरंग जीवन का अन्तरंग जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ बनती हैं। प्रतिभा भीतर से उभरती है। व्यक्तित्व भीतर से निखरता है। बाहर तो उसकी परिणति प्रतिक्रिया भर दृष्टिगोचर होती है। शरीर चर्या, अर्थ व्यवस्था, लोक व्यवहार आदि तो बहिरंग क्षेत्र से ही सम्बन्धित रहते हैं। उतने ही दायरे में काम करने का अभ्यास होता है। किन्तु महत्वपूर्ण प्रगति के लिए अन्तःक्षेत्र को समुन्नत, सुविकसित करना पड़ता है। इससे पूर्व वस्तुस्थिति को निरखना परखना पड़ता है। वही महत्वपूर्ण उलट-पुलट करने की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना कोई अध्यात्मवादी नहीं बन सकता और न आत्मोत्कर्ष का प्रयोजन करना पड़ता है।
इस प्रयोजन के लिए सर्वप्रथम अंतर्मुखी होना पड़ता है। जिस प्रकार शल्य चिकित्सा को भीतरी अंग अवयवों के स्वरूप और क्रिया-कलाप को समझने की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार अन्तःक्षेत्र को समझने और सुधारने के लिए अंतर्दृष्टि की आवश्यकता होती है।
यह सब जिस आधार पर किया जा सकता है कि उसे अंतर्मुखी प्रवृत्तियों का पर्यवेक्षण करने की कुशलता कहा जा सकता है। यह कुशलता एकाग्रता के सहारे सधती है। मन को बहिरंग क्षेत्र में काम करने पड़ते हैं इसलिए जैसी कुशलता उस क्षेत्र से काम करने की होती है। वैसी अन्तरंग क्षेत्र में प्रवेश करने, स्थिति समझने तथा परिवर्तन करने की नहीं होती। इस कमी की पूर्ति इसी प्रकार हो सकती है कि अभ्यस्त बहिरंग भाग-दौड़ से रोकथाम करके उसे अंतर्मुखी होने- भीतर की विकृतियों को टटोलने, निकलने, बढ़ाने, सुधारने, उभारने, जैसी अनेकों क्रिया-प्रक्रियाऐं करनी पड़ती हैं। इसके लिए मन को सर्वप्रथम एकाग्र करना पड़ता है। ताकि उसकी भाग-दौड़ में भीतरी नव-निर्माण में विक्षेप न पड़े।
एकाग्रता साधना को सिद्ध करना ही योग साधनाओं में से अधिकांश का मूल प्रयोजन है। इसके लिए तीन प्रयोग ही काम में लाये जाते रहे हैं और लाये जाते रहेंगे। (1) जप, (2) ध्यान, (3) प्राणायाम।
मनुष्य के तीन शरीर हैं। (1) स्थूल, (2) सूक्ष्म, (3) कारण। इन तीनों का परिमार्जन करने के लिए उपरोक्त तीन विधियाँ अपनाई जाती हैं स्थूल शरीर के लिए जप। सूक्ष्म शरीर के लिए ध्यान (3) कारण शरीर की लिए प्राणायाम। इन तीनों में से प्रत्येक की कई-कई विधियाँ हैं। उनमें से अपने मार्गदर्शक की छत्र छाया में किन्हीं का भी उपयोग किया जा सकता है।
भौतिक जगत की शक्तियाँ वे हैं जो प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होती हैं। आत्मिक शरीर की उपस्थिति तीन क्षेत्रों में हैं। (1) मस्तिष्क (2) हृदय (3) जननेन्द्रिय मूल (मूलाधार) इनमें अतीन्द्रिय क्षमताओं, सिद्धियों का निवास है। मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरन्ध्र में सहस्रार चक्र है। उसे उत्तरी ध्रुव चुम्बक की समता दी गई है। जिस प्रकार पृथ्वी उत्तरी ध्रुव के माध्यम में ब्रह्माण्डव्यापी अन्तर्ग्रही शक्तियों की खोलती और जो काम के योग्य है उन्हें पकड़ लेती है उसी प्रकार सहस्रार चक्र का आध्यात्मिक ध्रुव केंद्र परब्रह्म की दिव्य शक्तियों की देव विभूतियों को आकर्षित करती और अन्तःचेतना में धारण करती है। यही है वह शक्ति स्रोत जिसमें भी अपनी पात्रता के अनुरूप देवत्व धारण किया जा सकता है और महामानव, देवात्मा ऋषि एवं अवतार बना जा सकता है।
लन्दन के उत्तरी यार्क शायर के एक गाँव में जान सावर्स एक पव (सराय) चलाता था। उसी में मद्यपान की भी व्यवस्था थी।
जब मरा तब उसकी आयु 77 वर्ष की थी जब मरा तो अपनी इमारत की बरामदे में ही अपनी एक नकली कब्र बनवाई। उसकी एक गुफा में टेप रिकार्डर बजता रहता था। जो आगंतुकों से कहता दुनिया में शराब के मजे हैं। उसे जी भरकर पिया कीजिए ताकि लम्बी आयु का बोझा न ढोना पड़े।’ मेरे समीप आपको जल्दी पहुँचाने में यह शराब ही कारगर तरीका है।
आगन्तुक भी पीते तो थे, पर खतरे से डरते हुए रुक-रुक कर।
बर्तन में पानी भरा रहता है। वह स्थूल है। उसे नापा तोला जा सकता है और यह भी जाना जा सकता है कि उसने कितनी परिधि घेरी है तथा कितना प्रयोजन पूरा कर सकता है।
किन्तु जब वह आग पर चढ़ाकर भाप बना दिया जाय तो उसके आकार विस्तार विस्तृत हो जाता है और हवा के झोंके के साथ कहीं भी पहुँच सकता है, यद्यपि भाप की सघनता कम हो जाने पर वह दृष्टिगोचर भी नहीं होता। तो भी उनका अस्तित्व बना रहता है। यह सूक्ष्म स्वरूप है। रात्रि की ठण्डक में वह आकाश से नीचे उतर कर ओस बूँदों के रूप में पत्तों पर आ विराजता है। स्थूल की आकृति और सीमा बन जाती है न।
यही बात मानवी चेतना के सम्बन्ध में भी है। वह काया के पिंजड़े में कैद रहती है। सचेतन मस्तिष्क की अहन्ता उसे यही बोध होने देती है कि “मैं शरीर हूँ।” यही मेरा आकार, प्रकार- उद्देश्य एवं अस्तित्व है। यह मान्यता जितनी सघन होती जाती है उतना ही व्यक्ति संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों में बँधता जाता है। उसकी मान्यता, भावना, विचारणा, आकांक्षा एवं क्रिया इसी सीमा बन्धन में काम करती है। स्थूलता सीमित होती है, इसलिए इस स्तर का व्यक्ति उतना ही सशक्त होता है जितना कि उसका शरीर एवं शरीर परिकर के अधिकार में रहने वाले साधन। यह स्थिति मनुष्य की अल्पता की द्योतक है। वह अपना और दूसरों का हित अनहित इसी परिधि में कर पाता है।
सूक्ष्मता इससे ऊँची स्थिति है। चेतना शरीर में रहती तो है पर उस हल्की उथली बाड़ को लाँघकर बाहर भी जा सकती है। चिड़िया घोंसले में रहती तो है पर उससे बँधी नहीं रहती। लोमड़ी अपनी माँद में रहती है पर जब उपयुक्त अवसर होता है, तभी उसमें से बाहर जहाँ चाहती है, वहाँ आहार, जल, धूप आदि प्राप्त करने के लिए निकल जाती है। सूक्ष्म शरीर के सम्बन्ध में भी यही बात है। वह जब भी चाहता है, प्रयत्नपूर्वक बाहर निकल जाता है। यह स्थिति अनभ्यस्त, सर्वजनीन न होने के कारण इसका अभ्यास तो करना पड़ता है। पर असम्भव जैसा कुछ नहीं। सूक्ष्म शरीर आकाश की सुविस्तृत सीमा में भ्रमण कर सकता है और उसकी उन जानकारियों को एकत्रित कर सकता है जो स्थूल शरीर की ऊंची दीवार के कारण दृष्टिगोचर नहीं होती। स्थूल शरीर उतना ही जान समझ सकता है जितना कि उसका इन्द्रियजन्य मस्तिष्कीय अनुबंध समझने का अवसर देता है। किन्तु सूक्ष्म शरीर पर यह बन्धन नहीं है वह सूक्ष्म इन्द्रियों से सम्पन्न होता है। आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, स्थूल शरीर के साथ लिपटा होने पर भी सूक्ष्म शरीर, शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की तन्मात्राओं के सहारे अपनी दौड़ की परिधि में बहुत कुछ देख और समझ सकता है। अतीन्द्रिय क्षमता इसी को कहते हैं। दूर दर्शन, दूर श्रवण, विचार परिचय, संभाव्य भविष्य आदि के सम्बन्ध में बहुत कुछ अनुभव कर सकता है। ऐसा अनुभव जिसे मात्र स्थूल शरीर की सीमा तक सीमित चेतना के लिए असम्भव, अद्भुत माना जा सकता है।
सूक्ष्म शरीर अन्य शरीर धारियों के भीतर भी प्रवेश कर सकता है और वहाँ उलट-पुलट मचा सकता है। जब कि स्थूल शरीर- दूसरों के स्थूल शरीर को ही सुविधा-असुविधा पहुँचा सकता है। सूक्ष्मता की स्थिति में किसी के विचारों को पढ़ना- स्तर को समझना ही सम्भव नहीं होता। वरन् कर्तृत्व की सीमा इस परिधि तक बढ़ जाती है कि अन्तस् को कुछ नया बता या सिखा सके। पुरानी आदतों को बदल या सुधार कर उसके स्थान पर ऐसा कुछ स्थापित कर सके जिसे अपूर्व या अद्भुत कहा जा सके।
मरने के बाद भूत-प्रेत की योनि में गई हुई आत्माऐं कई बार किन्हीं सम्बन्धित व्यक्तियों के साथ राग-द्वेष चरितार्थ करने के लिए लिपट पड़ती हैं। उनके शरीर-मस्तिष्क पर वे अधिकार कर लेती हैं और उसका मनचाहा उपयोग करती हैं। शरीर की उठक-पटक, वाणी की बहक एवं मस्तिष्क की दिशाधारा में एक प्रकार का उन्माद छा जाता है और वशीभूत व्यक्ति के आचरण में देखते-देखते भारी परिवर्तन हो जाता है। शराब भी ऐसी ही उच्छृंखल मस्ती लगती है और खुमारी की स्थिति में स्वाभाविकता की अपेक्षा भारी अन्तर प्रस्तुत कर देती है। ऐसा ही उलट फेर सूक्ष्म शरीर जीवित स्थिति में भी कर सकता है। अपना मस्तिष्क दूसरों के मस्तिष्क में ठूंस सकता है और उसे वे विचार करने के लिए विवश कर सकता है जो प्रेरक हैं। इसी प्रकार शरीर में, स्वभाव में, गुण कर्म में भी अन्यान्यों को उलटकर नई दिशा में चलाया जा सकता है।
मनोविज्ञान के मूर्धन्य प्रयोक्ताओं ने ब्रेन वाशिंग की अनेकों विधियाँ आविष्कृत की हैं। वे शत्रु पक्ष के बन्दियों को इस प्रकार की विचारधारा देते हैं जिससे उनके पूर्व विचार सर्वथा बदल जायें। मित्र को शत्रु एवं शत्रु को मित्र समझने लगे। यह ब्रेन वाशिंग प्रयोग पशुओं पर भी प्रयुक्त किया गया है वे अपनी जन्मजात मूल प्रकृति को भूल जाते हैं और उस नई प्रवृत्ति को अपना लेते हैं, जो इलेक्ट्रोडों द्वारा उन्हें बदलने के लिए विवश किया जाता है। हिरन सिंह पर आक्रमण करता है और सिंह अपनी जान बचाने के लिए भागता फिरता है। चूहे बिल्लियों पर आक्रमण करके उन्हें भगा देते हैं और अपना स्वरूप विजेता जैसा प्रकट करते हैं। यह “ब्रेन वाशिंग” का चमत्कार है। पर वे अस्थायी हैं। उतनी ही देर वह विपन्नता काम करती है, जितनी देर कि उनके शरीरों, मस्तिष्कों पर प्रेरित विद्युतधारा का प्रभाव रहता है। ऐसा सामयिक परिवर्तन तो तब भी देखा जाता है जब तपोवनों के निकट जाकर वहाँ के प्राण प्रवाह से प्रभावित सिंह गाय एक घाट पानी पीने लगते हैं। पुराना शिकार- शिकारी का भाव भूल जाते हैं।
पौराणिक गाथाओं में वाल्मीकि, बिल्व मंगल, अजामिल, अंगुलिमाल, अम्बपाली आदि की जीवनक्रमों में असाधारण परिवर्तन हुआ। ध्रुव, प्रहलाद, पार्वती आदि ने वह नीति अपनाई, जो उनके जन्मजात वातावरण में सम्भव न थी। यह नारद जैसों का प्राण प्रहार ही था। जिसके कारण उन्हें अपनी पुरातन रीति-नीति बदलनी पड़ी। यह कोई जादू नहीं, वरन् सूक्ष्म शरीर की बलिष्ठता का प्रभाव था, जिसने दंगल जीतने जैसा पराक्रम दिखाया।
यह प्रभाव कई बार और भी ऊँचे दर्जे का होता है। आद्य शंकराचार्य की वह गाथा सर्व प्रसिद्ध है जिसमें उनने एक राजा के शरीर में प्रवेश करके काम शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था। अर्जुन का मन लड़ने का नहीं था किन्तु कृष्ण की सिखावन से उसे इस प्रकार युद्ध में प्रवृत्त होना पड़ा मानो वह स्वेच्छा से वैसा कर रहा है। यों पूर्व स्थिति में उसने ऐसे तर्क और तथ्य प्रकट किये थे, जो प्रकट करते थे कि वह युद्ध करने की मनःस्थिति में बिलकुल भी नहीं है पर उसे कुछ ही देर के विचार विनिमय में अपनी दिशा बदलकर बताई गई दिशा अपनानी पड़ी।
योग साधना में एक शक्तिपात प्रक्रिया का वर्णन है जिसके अनुसार एक समर्थ व्यक्ति अपने बल, पौरुष, तप आदि को दूसरे प्रियजन के लिए हस्तान्तरित कर सकता है। सुग्रीव अनेकों बार बालि से लड़ाई में हार चुक था पर जब राम द्वारा उसके गले में विजयमाला पहनाई तो उसकी स्थिति पहले की अपेक्षा सर्वथा बदल गई और उसने जाते ही विजयी की भूमिका सम्पन्न की। हनुमान से लेकर रीछ वानरों के समुदाय का राम के साथ पूर्व परिचय नहीं था और न लंका विजय में उनका कोई निजी स्वार्थ साधन। फिर भी वे मन्त्र मोहित की तरह उस अभिनव प्रयोजन में इस प्रकार जुटे मानो वह उनकी निजी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। यह आदर्श और पौरुष दूसरों का किया हुआ था। इस अनुदान को प्रक्रिया को शक्तिपात परिभाषा में सम्मिलित किया जा सकता है।
चन्द्रगुप्त, चाणक्य, शिवाजी, समर्थ, आदि के प्रसंग भी ऐसे ही हैं जिनमें इस तरह का कर्तृत्व प्रकट हुआ जैसा कि कर्ताओं का न पौरुष था, न मन और न अभ्यास। अनुदान भी कई बार निजी उपार्जन जैसा ही काम करते हैं। भामाशाह का दिया हुआ धन राणाप्रताप के डगमगाते हुए हौंसले बुलन्द करने में सहायक सिद्ध हुआ। अध्यात्म क्षेत्र में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनमें समर्थ गुरुओं ने अपने शिष्यों को कहीं से कहीं पहुँचा दिया।
अनगढ़ युवक नरेन्द्र को स्वामी विवेकानंद की वह भूमिका निभानी पड़ी, जिसके वे तो इच्छुक थे और न योग्य। किन्तु रामकृष्ण परमहंस का अनुग्रह उन्हें उस स्तर का बना सका, जिसके कारण उन्हें भारतीय संस्कृति का युगदूत कहा जाता है। उन्होंने लाखों करोड़ों के अंतरंग में अश्रद्धा के स्थान पर श्रद्धा का बीजारोपण कर दिया।
विवेकानंद ने अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “जब मैं बोलने खड़ा होता था तो आरम्भ में चिन्ता रहती थी कि क्या कुछ कह सकूंगा। जो ही बोलना आरम्भ करता तो प्रतीत होता कि मस्तिष्क पर किसी दिव्य लोक से ज्ञान वर्षण हो रहा है। जिह्वा जो बोलती थी, वह भी ऐसा होता था कि मानों जीभ किसी की है और वाणी किसी अन्य की।”
रामकृष्ण परमहंस के न रहने पर उनकी धर्मपत्नी शारदामणि की भी क्षमता और प्रकृति ऐसी हो गई थी, जिससे भक्तजनों को वह अनुपस्थिति अखरी नहीं।
परामनोविज्ञान के शोधकर्ताओं ने संसार में ऐसी अनेकों घटनाऐं ढूँढ़ निकाली हैं, जिनमें किसी अशिक्षित के मुँह से आवेश की स्थिति में अपरिचित भाषाओं में उच्चस्तरीय प्रवचन होते सुने गये।
कई वैज्ञानिकों, कलाकारों ने अपने अनुभव बताते हुए लिखा है कि उनका मार्गदर्शन और प्रशिक्षण किन्हीं अदृश्य दिव्य आत्माओं द्वारा हुआ। थियोसॉफी के जन्मदाताओं में से मेंडम ब्लैवेट्स्की और सर ओलिवर लॉज को भी ऐसे ही अदृश्य सहायकों की आश्चर्यजनक दिव्य सहायताऐं प्राप्त होती रही हैं।
यह सूक्ष्म शरीर की क्षमता का प्रभाव परिचय है। जिसे गहराई में उतारने वाले अभ्यासी भी उपलब्ध कर सकते हैं।
जो जान लिया वही सब कुछ है, ऐसा मूर्ख ही मानते हैं। बुद्धिमान अपना ज्ञान बढ़ाते रहते हैं। ताकि ढेर में से जो सारगर्भित है उसे चुन सकें।
यश अपयश मरण के उपरान्त भी सुगन्ध दुर्गन्ध की तरह चिरकाल तक बना रहता है। वस्तुतः यही मनुष्य का बहुमूल्य उपार्जन है।
बुद्ध एक बार एक सेठ के आग्रह पर उसके घर भिक्षाटन के लिए गए। सेठ ने मेवों की खीर बनाई थी।
बुद्ध ने गोबर भरा कमण्डल आगे बढ़ाते हुए उसमें डाल देने के लिए कहा।
कमण्डल में जगह न थी, सो पर उसमें डालने पर खीर खाने योग्य न रहती। इस असमंजस में सेठ ने कमण्डल माँग लिया उसे धोकर लाया। तब खीर भरी और हाथ में थमा दी।
बुद्ध दरवाजे तक तो गये पर फिर रुककर खड़े हो गये।
कहने लगे- हमारे आशीर्वाद और भगवान के वरदान को आप खीर जितना मूल्यवान भी मानते हों तो उसे रखने के लिए अपनी पात्रता बना लें। गोबर जैसी मलीनता भीतर भरे रहने पर वे अनुदान आपके काम न आ सकेंगे।
सेठ की आँखें खुल गईं उसमें आशीर्वाद याचना से पूर्व अपना पात्रता विकसित करने के लिए कषाय-कल्मषों के गोबर को बाहर निकाल फेंकने का निश्चय किया।
कोस्टारिका के पोआस ज्वालामुखी से लावा नहीं गर्म पानी निकलता है। यह 37 एकड़ में फैला हुआ है और 1000 फुट गहरा है। इससे जो फुहारा (गीजर) बनता है वह 350 फुट तक ऊँचा उठता है।
सबसे बड़ा हिमाच्छादित भूखण्ड ग्रीन लैण्ड है। इसका क्षेत्रफल 21,75,000 किलोमीटर है। वर्नकोट तट पर ज्वारों का उठान 48 फुट ऊँचाई तक जा पहुँचता है। चीन की नदी (हंगा चाँउ फे) में 25 फुट तक के ज्वार-भाटे उठते रहते हैं।
कनाडा के एक जंगल में भयंकर आग लगने से गंधक ऊपर पहुँचा और चन्द्रमा नीला हो गया। स्टाक होम में एक ज्वालामुखी फूटने पर चंद्रमा हरा दीखने लगा था। ऐसा 15 दिन तक चला।
कवीन का सिंग नाईंग चूर नामक एक ऐसा स्थान है, जहाँ प्रातःकाल हमेशा छाये रहने वाले घने कुहासे के कारण उगते हुए पाँच सूर्य दिखाई देते हैं।
उल्कापात की एक इतिहास प्रसिद्ध घटना है, 13 नवम्बर 1833 की। उस रात को उत्तरी अमेरिका के आसमान से लगभग 5 लाख जलती उल्काओं की वर्षा हुई। पर वे सभी जमीन में आने से पूर्व ही आयन मण्डल में जल गई थीं, इसलिए इस भयानक अग्नि वर्षा से किसी को कोई क्षति नहीं हुई। ज्ञातव्य है कि प्रति मिनट दो करोड़ उल्काएं पृथ्वी के कवच ओजोनोस्फियर पर गिरती रहती हैं, पर यह आच्छादन सुरक्षा प्रदान कर उन्हें बाहर धकेल देता है।
मनुष्य व अन्य जीवधारियों सम्बन्धी अचम्भे भी कम नहीं है। माइकल नामक एक आयरिश कुत्ते ने नाटकों में 1250 बार अभिनय किया और वह सारे संसार में प्रख्यात हुआ।
इसे लास ऐन्जिल्स के एक कसाई खाने में मरने से एक दिन पूर्व एक डालर में नाटक वालों ने खरीदा था।
नार्वे में जन्मा स्टेबेगर 146 जीवित रहा। रूस में 120 से लेकर 150 वर्ष तक जीने वालों की संख्या के 100 से अधिक व्यक्ति गिने गये हैं। विशेषकर कजाकिस्तान, ताशकंद इलाके में।
डेनमार्क में एक चितकबरे साँड़ के वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान द्वारा 1 लाख बच्चे उत्पन्न किये गये।
फ्राँसीसी लेखक विक्टर ह्यूगो ने अपना एक छोटी जाति का कुत्ता बैरोन अपने रूसी मित्र को उपहार में दे दिया। वह चला तो गया। पर नये स्थान से दूसरे ही दिन पुराने मालिक के पास चल पड़ा। उसने 3 महीने में 1500 मील की यात्रा की और फिर विक्टर ह्यूगो के पास आ गया।
सृष्टा की यह दुनिया अजीब है और अजीब ही इसके खेल हैं। ये प्रसंग ऐसे हैं जिनका कोई वैज्ञानिक समाधान किसी के पास नहीं है।
सारस्वत देश में कई वर्ष तक अकाल पड़ता रहा। प्रजाजन भूखों मरने लगे और देश छोड़ कर भागने लगे।
उन्हीं दिनों सप्त ऋषि उस क्षेत्र से होकर गुजरे। राजा ने सुना तो उनका आतिथ्य करने दौड़ा। साथ ही उन्हें स्वर्णदान भी देने लगा।
ऋषियों ने कहा तुम्हारे भण्डार में इतना धन है, पर यह आड़े वक्त में भी प्रजा के काम नहीं आ रहा, ऐसी निष्ठुर कृपणता को ग्रहण करके हम कैसे उसके भार को ओढ़ें।
स्थूल वस्तुओं के हस्ताँतरण में भले ही देर लगे परन्तु सूक्ष्म तत्वों के बारे में यह मान्यता अक्षरशः गलत बैठती है। उनका आदान-प्रदान सुगमतापूर्वक किया जा सकता है। हवा, गर्मी, प्रकाश और शब्द आदि को लम्बी दूरी तय करने में कोई विलम्ब नहीं लगता। ‘ऐस्ट्रल बॉडी’ के लेखक आर्थुर ई. पवैल ने सूक्ष्म शरीर की परमाणु संरचना के सम्बन्ध में बताया है कि इसके परमाणुओं की संख्या 495 अर्थात् 282475249 बबल्स होती है, जो मस्तिष्कीय परमाणु संख्या से कहीं अधिक होती है।
रामचरित मानस का एक प्रसंग है। लंका दहन के समय मरुत पुत्र हनुमान को उनचास प्रकार के पवनों का सहयोग मिला था। वस्तुतः इसे सूक्ष्म शरीर का विस्तार ही कहा जा सकता है।
भौतिक संरचना की दृष्टि से सूक्ष्म शरीर के अस्तित्व को सात श्रेणियों में विभक्त किया गया है। (1) सौलिड (2) लिक्विड (3) गैसियम (4) ईथरिक (5) सुपर ईथरिक (6) सब-एटमिक और (7) एटामिक। वैज्ञानिकों के कथानुसार स्थूल शरीर में भी 99 प्रतिशत परमाणु सूक्ष्म शरीर के ही क्रियाशील बने रहते हैं। सूक्ष्म परमाणुओं से बने शरीर को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। लेकिन इनकी संरचना परमाणु विज्ञान से कुछ भिन्न स्तर की होती है। इसके परमाणु सजीव एवं चेतन होते हैं। दूसरे शब्दों में इसे प्राण शरीर भी कह सकते हैं। वर्षा, शीत, उष्णता, सुख-दुख का अनुभव स्थूल की भाँति ही उसे होता है किन्तु सूक्ष्म शरीर के परिपोषण के लिए अन्न की आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल विचार और भावना ही इस प्रयोजन की पूर्ति करते हैं।
विचारों और भावनाओं का मूल केंद्र सूक्ष्म शरीर है। इनका प्रवाह यदि निषेधात्मक और ध्वंसात्मक है तो व्यक्ति पिशाच, असुर, राक्षस, शैतान बनेगा, विधेयात्मक स्थिति में महापुरुष, ऋषि, देवात्मा तथा महात्मा की श्रेणी में गिना जाने लगता है। इन्हीं के द्वारा मनुष्य सुखी, स्वस्थ, पराक्रमी तथा यशस्वी बनते हैं और यही प्रवृत्तियां उन्हें दुःख, रोगी, दीन, दाम और तुच्छ बनाकर छोड़ती हैं। मनुष्य-मनुष्य में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर नजर आता है वह इन्हीं की परिणति है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में सद्विचारों और सद्भावों के समुच्चय को ही 33 करोड़ देवताओं की संज्ञा दी गयी है।
अब प्रश्न उठता है क्या विचारों की अकूत सामर्थ्य को यन्त्र, उपकरणों के माध्यम से मापा जा सकता है? वैज्ञानिकों ने ‘हार्मोनोग्राफ’ यन्त्र का निर्माण करके एक अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया है। कलैडिनी साउन्ड फ्लेट यानी ‘ऐडोफोन’ की खोज भी इसी के सदृश्य है जिनमें विचारों की क्रियाशीलता को सुगमतापूर्वक देखा जा सकता है। सेना में संगीत के माध्यम से सैनिकों के सूक्ष्म शरीर अर्थात् विचार प्रवाह की शक्ति को विधेयात्मक मोड़ दिया जाता है जिससे उनमें साहस और देश भक्ति की भावनायें विकसित होने लगें। रुद्राक्ष, तुलसी, चन्दन आदि में पवित्र भाव विद्यमान होने के फलस्वरूप ही पूजा अर्चना में इनकी माला का इस्तेमाल किया जाता है।
लगभग चार हजार वर्ष पूर्व मिश्र के महान अध्यात्म वेत्ता स्क्राइन ऐनी ने बताया कि मृत्यु के बाद जीवन का अस्तित्व बना रहता है। परिपक्व मृत्यु होने के बाद चेतना कुछ समय के लिए विश्राम में चली जाती है। जीव की अवस्था के अनुरूप वह दो माह से दो वर्ष तक विश्राम ले लेने के पश्चात् नया जन्म धारण कर लेती है। ग्रीक लोग उसे ‘सबलूनर वर्ल्ड’ के नाम से पुकारते हैं। कहने का तात्पर्य है कि पृथ्वी में चन्द्रमा तक अर्थात् 2 लाख 40 हजार तक की दूरी में सूक्ष्म शरीर मरणोपरान्त भ्रमणशील बना रहता है। यहीं पर रैड इण्डियन का हंटिग ग्राउण्ड, नोर्समैन का बलहल्ला, मुसलमानों का हैरीफील्ड पैराडाइज, ईसाइयों का गोल्ड एण्ड ज्वैल्ड गेटेड न्यू जेरूसलम तथा भौतिक जगत के सुधारकों का लीसम-फिल्ड हैवन के होने का अनुमान लगाया जाता है।
विश्राम के बाद देवात्माएं, जिनके शरीरों का आणविक विकास प्रकाशपूर्ण हो गया होता है, दिव्य लोकों को चली जाती हैं और जब तक वहाँ रहने की इच्छा होती है तब तक रहती हैं। पीछे इच्छानुसार सुसंस्कारी परिवारों में जन्म लेकर लोक सेवा, पुण्य-परमार्थ और नेतृत्व उत्तरदायित्व सम्भालती हैं। सूक्ष्म शरीर को चौथा आयाम भी कहते हैं। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई जैसी विशेषताओं से इसकी संरचना मेल नहीं खाती।
सूक्ष्म शरीर में विचरण कर रही भूलोक की आत्माओं को मध्यकाल में नौम, वाटर, स्प्रिट अनडाइन, एअरस्प्रिट सेले भेंडर के नाम से भी पुकारा जाता रहा है। सामान्य भाषा में इन्हें परी, अप्सरा, ऐल्व, बेताल, पेरिश, डाइन्स, दैत्य, वन देवता, लम्पट, शैतान, पिशाच तथा देवात्माएं कह सकते हैं। मरण और पुनर्जन्म की अवधि में जीवात्मा को अशरीरी किन्तु अपना मानवी अस्तित्व बनाये रहना पड़ता है। जीवन मुक्त आत्माऐं वस्तुओं स्मृतियों घटनाओं और व्यक्तियों से प्रभावित नहीं होती और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के उपरान्त पुनः अपने लोक को वापिस लौट जाती हैं। किन्तु सामान्य स्तर की आत्मायें अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को पूरा करने का ताना-बाना बुनती रहती हैं। विछोह, राग-द्वेष की, प्रतिक्रियाओं से उद्विग्न रहित हैं। वस्तुतः ये अशरीरी आत्मायें सूक्ष्म शरीर के माध्यम से ही अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं।
देवात्माओं को ईश्वर का संदेशवाहक कहा जाता है। मनुष्य के बाद की श्रेणी देव योनि में ही पहुँचने की है। चौरासी लाख योनियाँ तो शरीरधारियों की हैं। वे स्थूल जगत में रहती हैं और आँखों से देखी जा सकती हैं। लेकिन दिव्य आत्माओं का शरीर दिव्य होने के कारण उन्हें चर्म-चक्षुओं से नहीं देखा जा सकता। देवताओं की तीन श्रेणियाँ गिनी गयी हैं। (1) कामदेव (2) रूप देव (3) अरूप देव। देवताओं के मार्गदर्शक एवं पृथ्वी तत्व पर नियन्त्रण रखने वाले चतुर राजाओं यानी देव राजसों का उल्लेख विश्व के विभिन्न धर्मग्रन्थों में प्रायः होता आया है। ब्लैवट्स्की की सुप्रसिद्ध एवं लोकप्रिय पुस्तक ‘सीक्रेट डौकट्राइन्स’ में इन देवराजसों की संख्या सात की अंकित की गयी है। हिन्दू धर्म में सप्त ऋषियों की भूमिका इसी प्रयोजन को पूरा करने की रही है।
मरणोपरान्त भी आत्मा का अस्तित्व यथावत बना रहता है। जीवित और मृत भेद मात्र स्थूल जगत तक ही सीमित रहता है। सूक्ष्म जगत में सभी जीवित हैं। इस प्रकार की मान्यतायें चिन्तन के कितने ही उत्कृष्ट आधार प्रदान करती है। आज हिन्दू, भारतीय एवं पुरुष हैं। कल के जन्म में ईसाई, योरोपीयन या स्त्री भी हो सकते हैं। आज का सत्ताधीश, कुलीन मनुष्य सोचता है कल प्रजाजन, अछूत एवं पशु बनना पड़ सकता है। मृत्यु की विभीषिका से बचने का यह सहज और सरल तरीका है।
कैलीफोर्निया के वैज्ञानिकों द्वारा किये गये पर्यवेक्षणों से पता चला है कि सूक्ष्म शरीर पर जलवायु का उतना ही प्रभाव पड़ता है जितना कि स्थूल पर। इसके विकास में शीत ऋतु को उनने अधिक उपयुक्त समझा है। इसलिए ऋषियों ने हिमालय क्षेत्र को साधना उपासना की दृष्टि अधिक उपयुक्त चुना है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं अध्यात्मवेत्ता लैडबीयर का कथन है कि आपत्तिकालीन स्थिति में उनकी सहायता 7000 मील दूर अदृश्य सहायकों ने ही की। इसका अनुमान सूक्ष्म शरीर की क्रियाशील विद्युत को देखकर लगाया जा सकता है। उसमें सूर्य तथा अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों से आने वाली ज्ञात और अविज्ञात किरणों का भरपूर समन्वय विद्यमान है।
स्थूल शरीर जड़-पदार्थों के बन्धनों से बँधा होने के कारण ससीम है, पर सूक्ष्म शरीर के बारे में यह मान्यता सही नहीं बैठती। उसकी सम्भावनायें अनन्त और असीम हैं। जिन तत्वों और इकाइयों से इसका निर्माण हुआ, वे समूचे ब्रह्माण्ड की गतिविधियों को प्रभावित करने की सामर्थ्य रखती हैं।
स्वप्नों के सम्बन्ध में कुछ की मान्यता है कि रात्रि को सोते समय सूक्ष्म शरीर बाहर निकल जाता है और संसार की घटनाओं को देखकर तथा परलोक के परिचितों से मिल-जुलकर लौटता है यह यात्रा सार्थक होती है और उसके साथ भवितव्यताओं के संकेत जुड़े होते हैं।
कई इन्हें पूर्व संचित स्मृतियों तथा इच्छा कामनाओं का खेल कहते हैं। कई अंतर्मन की बाल-क्रीडा, एवं शारीरिक मानसिक स्थिति के रहस्यों का एक अनगढ़ चिट्ठा उन्हें मानते हैं।
पर देखा गया है कि अनेक स्वप्न अपनी सांकेतिक भाषा में बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं। ऐसे कितने ही स्वप्न प्रकरण हैं जिन्हें यथार्थता एवं सम्भावना का बोधक माना जाता है। स्वप्न वासवदत्ता और स्वप्न चित्ररेखा का कथानक जिनने पढ़ा है वे यथार्थ से कम नहीं मानते। विक्रम बेताल के पच्चीस प्रसंग भी विक्रमादित्य ने अर्ध चेतन अवस्था में ही देखे थे।
जैन पुराणों में ऐसे सार्थक स्वप्नों की विशेष रूप से चर्चा है। गाथा है कि भगवान महावीर अपने साधना काल में कुछ समय सोये तो उन्हें दस सपने दिखाई दिये। उन्होंने, एक पिशाच को उनने पछाड़ा, सफेद कोकिल देखी, रंगीन पंखों का पक्षी देखा। रत्नों की माला देखी। गायों का झुण्ड देखा। कमल सरोवर देखा। अपने को समुद्र तैरकर पार करते देखा। सूर्य देखा। पर्वत पर मेघ माला छाई देखी, और दसवें स्वप्न में सुमेरु पर्वत की चोटी देखी।
इन स्वप्नों का संकेत और फलितार्थ समझने में देर न लगी। उन्होंने अपना जीवन क्रम ठीक उसी आधार पर बना लिया और वही व्यवस्था यथावत् चलती चली गई।
इसी प्रकार सम्राट, चंद्रगुप्त ने कुछ ही दिनों के बीच सोलह आश्चर्यजनक स्वप्न देखे। उनने उन्हें ज्यों का त्यों आचार्य भद्रबाहु को कह सुनाया। आचार्य ने उनको भावी जीवन बिताने की सारी विधि-व्यवस्था बता दी। चन्द्रगुप्त ने उसे पत्थर की लकीर माना और उसी के आधार पर कार्यक्रम बनाया। उसी आधार पर वे चलते रहे और इतने सफल हुए कि उनने उन्नति के शिखर पर पहुँचकर ही दम लिया।
जैन साहित्य में स्वप्न के फलितार्थ भी हैं। उनमें उन्होंने 62 प्रकार के स्वप्नों का वर्णन किया है और उनके गुण दोष बताये हैं।
हिन्दू ज्योतिष का ही मिला-जुला हस्तरेखा विज्ञान, स्वप्न विचार और विनिर्मित है। उनमें भी इस संदर्भ में बहुत कुछ लिखा गया है।
अरिहंत चक्रवर्ती की माता ने, तीस महास्वप्न देखे और उनके गूढ़ रहस्य समझते हुए अपने पुत्र को तद्नुरूप जीवन की रूपरेखा में प्रवृत्त किया।
आचार्य भिक्षु जब अपनी माता के गर्भ में थे तभी उनने स्वप्न देखा कि जन्मा हुआ पुत्र पृथ्वी का राजा होगा। बड़े होने पर जब वे संन्यास दीक्षा लेने लगे तो पुत्र ने माता को समझाया कि संन्यासी राजाओं का भी राजा होता है। राजा का अनुशासन एक क्षेत्र तक ही सीमित होता है। पर साधु तो देश-देशांतरों में सम्मान पाता है और मरने के बाद भी जीवित रहता है। वैसा ही हुआ।
मनोविज्ञानी फ्राइड ने जहाँ स्वप्नों को अचेतन मन के साथ जोड़ते हुए उनके कारण बताये हैं वहाँ उनमें शारीरिक और मानसिक स्थिति का विश्लेषण तथा भवितव्यताओं की पूर्व जानकारी देने वाला भी बताया है। उन्होंने रंगभेद के आधार पर भी स्वप्नों की विवेचना की है।
स्वप्न संकेतों के सम्बन्ध में व्यक्ति विशेष की स्थिति में भी उनकी संगति बिठाई जा सकती है। जो जिस परिस्थिति में रह रहा है उससे उसका सुधरने या बिगड़ने का भी फलितार्थ लगाया जा सकता है। अनेक व्यक्तियों की परिस्थितियाँ एक दूसरे से सर्वथा भिन्न होती हैं। उनमें क्या हेर-फेर होने जा रहा है इसका अनुमान स्वप्न संकेतों से मिलता है। संकेतों से दिशा भर मिलती है उसका स्पष्टीकरण अपनी व्यावहारिक बुद्धि से करना पड़ता है।
आधी निद्रा तो मनुष्य की शारीरिक थकान दूर करती है। पर प्रातःकाल का ब्राह्ममुहूर्त ऐसा होता है जो कई प्रकार के उद्बोधन देता है। आध्यात्मिक प्रेरणाऐं भी प्रायः उन्हें उसी समय मिलती हैं और दिव्य स्वप्न भी उसी समय आते हैं। कितने ही वैज्ञानिकों को उनकी अन्वेषण आविष्कार सम्बन्धी गुत्थियों को सुलझाने में स्वप्नों के सहारे एक प्रकार से ऐसा मार्गदर्शन मिला है जिससे वे न केवल गुत्थी सुलझा सके, वरन् अभीष्ट विधाओं में आशातीत सफलता भी प्राप्त कर सके।
मनोविज्ञानी फ्रायड का कथन है कि सचेतन मन की व्यवहार बुद्धि अचेतन मन की दिव्यता और विलक्षणता को दबाये रहती है। इसलिए शरीर का सूत्र संचालन करने वाला और मन को दिशा देने वाला अचेतन मन प्रायः उतना ही काम सम्भाल सकने की स्थिति में रहता है जिससे कायिक अंग संचालन की समस्याएँ सुलझती रहें और गतिविधियाँ चलती रहें पर यदि उसे इस कटघरे से बाहर निकलने का अवसर मिले, तो वह अदृश्य जगत की ऐसी जानकारियां प्राप्त कर सकता है जो साधारणतया हर किसी को उपलब्ध नहीं होती।
शरीर विज्ञानी हडसन का कथन है कि शरीर के पीड़ित या अवरुद्ध अवयव अपनी व्यथाओं और अड़चनों को स्वप्न में व्यक्त करते हैं। साथ ही यह उपाय उपचार भी बताते हैं कि किस प्रकार वे व्यथाओं से छूट सकते हैं। यदि कोई सुविज्ञ व्यक्ति स्वप्नों की सांकेतिक भाषा का रहस्य समझ सके और उनके दिये हुए दिशा निर्देशन पर ध्यान दे सके तो उसका प्रतिफल यह हो सकता है कि शारीरिक ही नहीं रोगों का निदान एवं उपचार ठीक तरह समझा जा सके और रुग्ण एवं परेशान व्यक्ति की कारगर सहायता की जा सके।
स्वप्न प्रत्यक्ष और परोक्ष का सम्मिश्रण है। उनमें हम अपनी निज की समस्याओं का हल ढूँढ़ सकते हैं। अतीन्द्रिय क्षमता विकसित होने पर हम दूर दर्शन दूर श्रवण, पुनर्जन्म आदि से जुड़ी हुई जानकारियां उपलब्ध कर सकते हैं तथा अदृश्य जगत के दिवंगत प्राणियों तथा देवात्माओं के साथ सम्बन्ध जोड़ सकते हैं।
साधारणतया स्वप्न रात्रि का भटकाव पर प्रतीत होते हैं। पर वस्तुतः वे वैसे होते नहीं। कभी-कभी इस खदान में उपयोगी मणि माणिक्य भी मिल सकते हैं। प्रयत्न की सफलता अभ्यास पर निर्भर है।
अब से 1800 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में एक महला-रोप्य नाम का एक राज्य था। राजा के तीनों राजकुमार बड़े उद्दण्ड थे। वे पढ़ने, लिखने और उपयोगी चर्चा सुनने को तैयार न होते थे। बड़े होने पर भी उनकी आवारागर्दी न घटी तो राजा बहुत दुःखी हुये। किसी अध्यापक को वे लड़के टिकने ही न देते थे।
राजा ने घोषणा की कि कोई अध्यापक मेरे लड़कों को पढ़ा सके तो उसे प्रचुर पुरस्कार मिलेगा। मात्र विष्णु शर्मा इसके लिये तैयार हुये। उनने कहानियाँ गढ़ीं और उन्हें सुनने के लिये राजकुमारों को तैयार कर लिया।
उन कथाओं का संग्रह पंच तन्त्र नामक ग्रन्थ में है। राजकुमार तो कथाओं के आकर्षण से समझदार हो ही गये और विष्णु शर्मा को प्रचुर पुरस्कार भी मिला। इसके अतिरिक्त वह ग्रन्थ साहित्य जगत में भी बहुत प्रख्यात हुआ। उसके संसार के सभी प्रधान भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
ब्रिटिश सोसाइटी फॉर साइकिक रिसर्च द्वारा योरोप भर के अस्पतालों में मरणासन्न रोगियों की अन्तिम मनोदशा का परिचय प्राप्त करने के लिए लम्बी अवधि तक खोजबीन की गयी है। उनमें से प्रायः आधे ऐसे थे, जिन्हें भय या पीड़ा ने आक्रान्त कर रखा था। दिल की धड़कन अनियमित चल रही थी और साँस लेने में कठिनाई अनुभव हो रही थी। उन्हें अपने पराये का कुछ होश न था। ऐसी मनोदशा में भी मानों गहरे पानी में डुबकी लगाई हुई हो, ऐसी स्थिति का अनुभव उन्हें हो रहा है, इसका अनुमान होठों की फड़कन, साँस लेते समय के नथुने एवं कभी-कभी हिलती-जुलती पलकों को देखकर लगाया जाता था। हाथ-पैरों की हलचल भी यह बताती थी कि इन्हें बेचैनी की स्थिति घेरे हुए है।
इतने पर भी लगभग आधे रोगी ऐसे थे जिन्हें मृत्यु की गोद में पहुँचते-पहुँचते एक दो दिन लग गए। उनकी जीवनी शक्ति भी क्षीण हो गई थी और काय संचालन के लिए जितनी सामर्थ्य चाहिए, उतनी जीव-कोशों में रह नहीं गई थी। दिल बैठता जा रहा था, कमजोरी का दौर बढ़ रहा था। किन्तु इतने पर भी मस्तिष्क साथ दे रहा था। वे कुछ अनुभव करते थे, ऐसा जिसे अवास्तविक और विलक्षण ही कहा जा सकता था।
ऐसे मरणासन्न रोगियों को प्रायः कुछ ही महीनों पूर्व मरे सम्बन्धियों या मित्रों की उपस्थिति समीप दीखती थी। साथ ही उनकी हलचल भी।
ऐसे अदृश्य दर्शन उन रोगियों को ही होते रहे जो मरणासन्न थे। उनसे जो कहा गया, वैसा अनुभव समीप उपस्थित लोगों में से किसी ने नहीं किया। इसलिए रोगियों के कथनों को ही सही मानना पड़ेगा।
जो दिवंगत आत्माऐं दीख पड़ीं उन सब पे परस्पर सहानुभूति का भाव था और वे सेवा भाव दिखा रही थीं। साथ ही यह भी कह रही थीं कि “हम तुम्हें साथ ले चलने के लिए आई हैं। हमें अकेलापन अच्छा नहीं लगता। तुम्हारे साथ रहने से बड़ा मजा आएगा।”
इस प्रकार की अनुभूतियाँ व्यक्त करने वालों में स्त्रियाँ अधिक थीं, पुरुष कम। बालकों में या बाल बुद्धि वालों में वे जीवित साथियों को ही देखने की इच्छा प्रकट करती पाई गईं।
जो ऐसे रोगी देर तक अस्पतालों में रह रहे थे, उन्हें उन नर्सों, डाक्टरों, कर्मचारियों की समीपता दीखती रही जो इसी बीच परलोक सिधार गए थे।
अनुसंधानकर्ताओं के निष्कर्ष अभिमत दोनों ही हैं। एक यह कि अचेतन मस्तिष्क की पूर्व स्मृतियाँ जागृत हुई हों। उनके मरण की बात भी ध्यान में हो। शरीर की आन्तरिक क्षीणता मृत्यु की सम्भावना का परिचय देती हों। उन सब बातों के सम्मिश्रण से एक ऐसा काल्पनिक खाका बन गया हो, जो उन्हें वास्तविकता जैसा प्रतीत होता रहता है।
दूसरी सम्भावना यह भी व्यक्त की गई है कि दिवंगत आत्माओं की अदृश्य लोक में उपस्थिति यह कराती है कि अमुक साथी मरने की स्थिति के निकट आ पहुँचा अतएव पूर्व सम्बन्धी से प्रेरित-आकर्षित होकर वे निकट चली आती हों और उनके दुःख में हिस्सा बँटाती हुईं, सहानुभूति प्रकट करती हों।
दार्शनिक प्रकृति के प्रौढ़ विचारधारा वालों ने अपने चारों ओर प्रकाश, सुगन्ध एवं हर्षोल्लास का अनुभव किया है और उस सुखद माहौल में जल्दी प्रवेश करने की उत्सुकता प्रकट की है जबकि भावुकता विहीन, रूखे स्वभाव के लोगों ने मरणकाल को एक अनिश्चितता की स्थिति में आंका है। इन सब बातों पर विचार करने से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य का संचित स्वभाव ही मरने के समय अनेक प्रकार के अनुभव कराता है।
यौवन यों उठती आयु को भी समझा जाता है। बीस वर्ष पर किशोरावस्था परिपक्व हो जाती है और यौवन आरम्भ हो जाता है। इस अवधि में चेहरे पर सुन्दरता और शरीर में कार्य क्षमता विकसित होती है। 30-35 वर्ष के उपरान्त आदमी प्रौढ़ स्थिर हो जाता है। बढ़ोत्तरी का उभार रुक जाता है पर मजबूती यथावत् बनी रहती है। यह शरीर का आयु सम्बन्धी विभाजन है। बढ़ती उम्र में उमँगों का उभार और उत्साह, साहस स्वयमेव होता है।
किन्तु एक दूसरा वर्गीकरण मन सम्बन्धी भी है। जब तक आशा, उमंग, उत्साह रहे, तब तक यही समझना चाहिए कि यौवन बना हुआ है। शरीर का उठाव और ढलान प्रकृति व्यवस्था पर निर्भर है। पचास से बुढ़ापा शुरू हो जाता है। और शरीर क्रमशः क्षीण होने लगता है। बाल पकने और दाँत हिलने लगते हैं। आँख, कान आदि की क्षमता दुर्बल होने लगती है। आलस्य बढ़ने लगता है, थकान जल्दी आती है।
किन्तु यह व्याख्या शरीर और आयुष्य से सम्बन्धित है। प्रकृति परक है। एक दूसरा पक्ष मानसिक है। मनुष्य यदि मानसिक दृष्टि से मजबूत है तो प्रकृति व्यवस्था में काफी हेर-फेर भी हो सकती है। मानसिक स्तर ऊँचा बनाये रखना बहुत कुछ अपने मन की बात है। मनोबल न गिरने दिया जाय तो यौवन बुढ़ापे में भी मरते समय तक भी बना रह सकता है।
भूत काल यदि शानदार रहा हो तो ही उन स्मृतियों को सँजोये रहा जाय, पर यदि परिस्थितियाँ प्रतिकूल रही हों तो उन्हें भुला दिया जाय और जिन सत्स्वभाव वाले लोगों का स्नेह, सद्भाव मिला हो, उसे ही स्मरण रखा जाय। परिस्थितियों की जटिलता और उनसे जूझने की साहसिकता का स्मरण भी मनोबल स्थिर रखने में सहायक होता है। आनन्द, उल्लास भरी सफलताऐं लिए हुए जो समय बीतता हो, उसकी स्मृति भी उत्साह बढ़ाती है। पराजय, असफलताओं और कटु-प्रसंगों को भूल ही जाना चाहिए।
वर्तमान को व्यस्त रखें और कर्तव्यों को इस प्रकार निबाहें, जैसे सैनिकों को अनुशासन निबाहना पड़ता है। चुस्ती और फुर्ती मानसिक स्थिति से सम्बन्धित है। उन्हें दुर्बल शरीर या भारी काया होते हुए भी बनाये रखा जा सकता है।
कार्य का प्रतिफल क्या मिला? यह सोचने की अपेक्षा अपने क्रिया-कलापों का मूल्याँकन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उसे कितनी समझदारी तथा जिम्मेदारी, ईमानदारी के साथ किया गया। इन विशेषताओं के जुटे रहने पर काम का प्रत्यक्ष परिणाम अधिक उत्साहवर्धक न हो तो भी मनोबल बना रहता है। मनोबल का नाम ही वास्तविक यौवन है, जिसे हर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति में बनाये रखा जा सकता है।
भविष्य को आशाओं के साथ जोड़कर रखना चाहिए सफलता पर विश्वास रखना चाहिए। भले ही उपयुक्त परिस्थितियाँ उपलब्ध होने में विलम्ब लगे, पर हारने-गिरने की बात कभी मन में जमने नहीं देनी चाहिए। शरीरगत क्षीणता का सामना करने का सहज उपाय यह है कि अधिक श्रम वाले कामों की अपेक्षा कम परिश्रम वाले कामों का चयन किया जाय। बीच-बीच में विश्राम लेते रहा जाय और सम्भव हो तो ऐसा किया जाय कि काम का स्वरूप और स्तर बदलते रहा जाय। एक की तरह का काम लम्बे समय तक करते रहने पर अपेक्षाकृत जल्दी थकान आती है। उनका क्रम, स्वरूप और स्तर बदलते रहा जाय तो व्यस्तता भी विनोद जैसी बन जाती है और अपने ऊपर बोझ लदा हुआ प्रतीत नहीं होता। शान्त मनःस्थिति वाले सदा जवान रहने जैसा अनुभव करते हैं।
क्या इस पृथ्वी पर ही बुद्धिमान प्राणी रहते हैं? क्या मानवी प्रगति इस विश्वब्रह्मांड में अनोखी और एकाकी है? इस प्रश्न का उत्तर अदूरदर्शिता और अहमन्यता के आधार पर ही “हाँ” में दिया जा सकता है। किन्तु यदि अन्वेषण बुद्धि का उपयोग किया जाय और प्रमाणों को टटोला जाय तो प्रतीत होगा कि प्रगति की प्रक्रिया अन्यत्र भी चल रही है, चलती रही है और इतनी आगे है कि मनुष्य को वहाँ तक पहुँचने में अभी काफी देर लगेगी।
ब्रह्माण्ड की समग्रता और उसमें प्राणियों का योगदान विषय पर जो अन्वेषण चल रहा है उससे ऐसे आधार उभरकर आते हैं जिनके सहारे यह स्वीकार किये बिना नहीं रहा जा सकता कि ईश्वर का कर्तृत्व इतना ही सीमित नहीं है, जितना कि हम देखते और समझते हैं। उसने एक से एक छोटे और एक से एक बड़े सृजन किए हैं। उसकी सृष्टि के घटक कितने अणु और विभु हैं। इसकी हम पूरी तरह कल्पना भी नहीं कर सकते।
शोधकर्ताओं का कथन है कि इस ब्रह्माण्ड में प्रायः दस हजार ग्रहों में विकसित स्तर का जीवन है, जिन्हें हम अपने शब्दों में देव या दैत्य भी कह सकते हैं। पृथ्वी वाले अन्य लोकों के प्राणवानों के साथ संपर्क नहीं साध सके हैं, वे इसलिए आरम्भिक चरण ही उठा रहे हैं और अन्तरिक्ष में भ्रमण कर सकने वाले साध नहीं जुटा रहे हैं। पर उनने सम्भवतः पृथ्वी के जन्मकाल से ही इसे अण्डे बच्चे की तरह पाला है और अपनी संचित पूँजी में से मूल्यवान अनुदान दिया है। अन्यथा यहाँ आदिम काल के अमीबा जैसे क्षुद्र और डायनोसौर जैसे वृहतकाय प्राणी ही रहते। पीढ़ियों के विकास में मूल सत्ता यथावत् ही रहती है। परिस्थितियों के अनुरूप उनमें यत्किंचित् परिवर्तन ही होता है। बन्दर से मनुष्य नहीं हो सकता। यदि हो सका होता तो मनुष्य की संरचना में भी अब तक भारी हेर-फेर हो गया होता या हो जाता। पर ऐसी कोई सम्भावना नहीं है। मनुष्य वर्तमान स्तर पर ही उत्पन्न हुआ है। आदिम काल में वह वनमानुष नहीं था वरन् वैसा था जैसा कि देवत्व सम्पन्नों को होना चाहिए। उन दिनों जबकि मानवी प्रतिभा को सुपुर्द किया जा रहा था, उच्च लोकवासियों ने उसे सुव्यवस्थित एवं सुयोग्य बनाने में भारी योगदान दिया।
यह सुनिश्चित है कि उच्च लोकों के निवासी पृथ्वी की खोज खबर लेने बीच-बीच में भी आते रहे हैं। किन्तु वैज्ञानिक विकास की कमी से एक स्थान की जानकारी सर्वत्र फैलने में सुविधा नहीं रही। किन्तु अब संचार साधनों की अभिवृद्धि से वह स्थिति आ गई है, जिसमें अद्भुत अनुभवों का विस्तार एक कोने से दूसरे कोने तक हो सके।
उड़न तश्तरियों के पृथ्वी के वातावरण में आते-जाते रहने के प्रमाण प्रायः एक शताब्दी से मिलते रहे हैं। दृष्टि भ्रम, प्रकृति की गुच्छक आदि रूपों में उन दृश्यों को झुठलाया भी जाता रहा है पर कुछ ऐसे अकाट्य प्रमाण भी हैं जो अपने अस्तित्व और कर्तृत्व को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।
पुरातत्व वेत्ताओं ने भी पृथ्वी पर ऐसे प्रमाण उपलब्ध किये हैं जो बिना असाधारण बुद्धिमता एवं साधन सामग्री के विनिर्मित नहीं हो सकते। ऐसे प्रमाणों की इतनी बड़ी शृंखला है कि उसे देखते हुए तथ्यों की पुष्टि दर पुष्टि होती चली जाती है। जैसा कि बच्चों को इतिहास की पुस्तकों में पढ़ाया जाता है, यदि वैसी ही स्थिति आदिम कालीन मनुष्य की पिछड़ी रही होती तो उनका कर्तृत्व ऐसा नहीं हो सकता था कि आधुनिकतम शिल्पियों को भी आश्चर्य से चकित कर दे।
पिछले दो दशकों में राकेट विमानों द्वारा मनुष्य सहित चन्द्रयात्रा हुई। अतिरिक्त अन्य प्रयोजनों के लिए कई ऐसी ही अन्तरिक्ष यात्राऐं सम्पन्न हुईं जिनमें मनुष्य गये थे। उनका अन्य लोक वासियों के साथ प्रत्यक्ष मिलन तो नहीं हुआ पर उनके द्वारा जो कहा सुना गया वह भी रिकार्ड किया गया। यह कोई भ्रम तो नहीं है? यान्त्रिक गड़बड़ी तो नहीं है? पृथ्वी की आवाजें ही तो यानों से टकराकर इस प्रकार की प्रतिक्रिया तो उत्पन्न नहीं कर रही हैं, इस प्रकार की आशंकाओं का अनेक प्रकार से निराकरण किया गया। टोह के लिए पृथ्वी पर अवस्थित कन्ट्रोल रूम से पूछताछ की गई किन्तु उससे ऐसा कुछ सिद्ध न हुआ कि पृथ्वी से उनका पीछा करने के लिए या वार्त्तालाप करने के लिए कोई उपकरण भेजा गया है।
अपोलो 12 चन्द्रमा की यात्रा पर गया था। उसमें तीन अन्तरिक्ष यात्री थे। उनने देखा कि यान के साथ ही समान दूरी एवं निश्चित कोण पर दो पदार्थ पीछा कर रहे थे। नासा के कन्ट्रोल रूम से पूछताछ की गई तो उनने बताया कि “पृथ्वी से ऐसी कोई वस्तु नहीं भेजी गयी है। यह आकाश की ही कोई वस्तु होनी चाहिए अथवा तुम लोगों का दृष्टि भ्रम है।
इसी प्रकार अन्तरिक्ष यान कमांड माड्यूल से पृथक होकर जब चन्द्रमा के तल की ओर बढ़ा तो ऐसी विचित्र ध्वनियाँ आरम्भ हो गईं, मानो कुछ लोग आपस में जोर-जोर से वार्तालाप कर रहे हैं। यह ध्वनियाँ यान के भीतर भी सुनी जाती रहीं और पृथ्वी के कण्ट्रोल रूम में भी। रिकार्ड उसका भी किया गया पर ऐसा कोई समाधान न निकला जिससे वस्तुस्थिति को जाना जा सके। यह क्रम 15 मिनट तक चलता रहा और बाद में अपने आप बन्द हो गया।
अपोलो 7 के यात्री अपने कमरे में एक विचित्र संगीत सुनते रहे। रात को दस बजे वे आवाजें किसी रेलगाड़ी की घड़घड़ाहट में बदल गई। कई संकेत बोधक सीटियाँ बजतीं और बदलती रहीं पर यह पता न चला कि यह सब कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है?
खगोल विज्ञानियों ने पिछले 50 वर्षों में ऐसी अनेकों गतिविधियों रेडियो दूरबीनों द्वारा देखी हैं, जिनसे प्रतीत होता है मानों किन्हीं समझदार प्राणियों द्वारा वहाँ कुछ उलट-पुलट की जा रही है। विज्ञानी जॉन नील का अनुमान था कि चन्द्रमा प्राणि रहित नहीं है। वहाँ से पृथ्वी के साथ जुड़ने वाला कोई अविज्ञात तारतम्य चल रहा है।
अपोलो 12 को धरती से उठे 90 मिनट ही हुए थे कि उस पर किसी तेज रोशनी ने कसकर एक लात जमाई और यान के भीतर का सारा सामान उलट-पुलट करके रख दिया।
जैमिनी यान के संचालक मेजर एडवर्ड ह्वाइड ने भी ऐसे ही अनुभव किये। उनके यान की बिजली बार-बार जलती और बुझती रही। साथ ही तीन अज्ञात गोले उस यान के इर्द-गिर्द मँडराते रहे, मानों किसी जासूसी के उद्देश्य से वे पीछे लगे हों। उन पदार्थों में से लम्बी-लम्बी बांहें बाहर आतीं, फैलती और सिकुड़ती रहीं। उन यात्रियों ने अपनी पुस्तक “वी सेवन” में ऐसे ही विचित्र अनुभवों का उल्लेख किया है जो उस यात्रा के बीच उन्हें होते रहे और हैरत में डालते रहे।
वैकानूर के ब्रह्माण्डीय अड्डे से दो यात्रियों समेत एक अन्तरिक्ष यान भेजा गया। वह कुछ ही दूर जा पाया था कि पीछे से कोई बला साथ लग गई। यात्री अड्डे को सूचनाऐं देते, पर उसकी सहायता सम्भव न हो सकी तो वह आकाश में ही अपना अस्तित्व खो बैठे।
यद्यपि इस प्रकार की घटनाऐं अभी गोपनीय रखी गई हैं, ताकि प्रतिपक्षियों के सम्बन्ध में अधिक जानकारी प्राप्त हो सके। तो भी यह किसी से छिपा नहीं है कि अन्तरिक्ष यान निर्विघ्न अपनी यात्राऐं पूरी नहीं करते। उनकी मुठभेड़ किन्हीं ऐसी शक्तियों के साथ होती रहती है जो मनुष्य से अधिक सामर्थ्यवान एवं प्रगतिशील है।
उद्वेग के दानव को पूजने वाले उसके लिए कलह, द्वेष, और उत्पीड़न के उपकरण जुटाते रहते हैं। तुम अपने देवता को स्नेह-सद्भाव के पुष्पों से सजाओ।
रेडियो तरंगों की तरह संगीत की भी शक्तिशाली तरंगें होती हैं। वे अपने प्रभाव क्षेत्र को प्रभावित करती हैं। उनसे वातावरण अनुप्राणित होता है। पदार्थों में हलचल मचती है और प्राणियों की मनोदशा पर उसका अनोखा प्रभाव पड़ता है। प्राणियों में मनुष्य की बौद्धिक एवं संवेदनात्मक क्षमता अन्य प्राणियों से विशिष्ट है। इसलिए संगीत का उस पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। यों भाव संवेदना प्राणि मात्र पर पड़ती है। वे अपने सामान्य क्रिया कलाप रोक कर वादन ध्वनि के साथ लहराने लगते हैं। उनमें शब्द ज्ञान तो होता नहीं इसलिए गायनों का अर्थ समझने में असमर्थ रहने पर भी वे गीतों के साथ जुड़े हुए भाव संचार को ग्रहण करते और उससे अनुप्राणित होते हैं।
कभी संगीत एक मनोरंजन था। इसी निमित्त उसका सरंजाम जुटाया जाता था। पर समय बदलने के साथ उसका महत्व समझा गया और विज्ञान की एक प्रभावशाली शाखा के रूप में उसे स्थान दिया जाने लगा। उसका प्रभाव भाव संचार में तो प्रत्यक्ष ही देखा जाता है, पर परोक्ष रूप से उसकी प्रतिक्रिया स्नायु समूह में हलचल उत्पन्न करने के रूप में भी देखी गई है। उसका प्रभाव मनुष्य पर क्या पड़ता है? इसका अन्वेषण करने पर पता चला है कि ज्ञान तन्तु, तथा नाड़ी संस्थान के सभी छोटे-बड़े घटक उनसे झंकृत होते हैं और शिथिलता को सक्रियता में परिणति करते हैं। इससे सर्वतोमुखी प्रतिभा जगती है। युद्ध सैनिकों से लेकर कामुकों तक उसकी उत्तेजना प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है।
यह प्रयोग मनुष्यों के शारीरिक और मानसिक रोग निवारण में अपना जादुई प्रभाव दिखाता दृष्टिगोचर हो रहा है। मनोविज्ञान शास्त्र और स्वर शास्त्र के विशेषज्ञों द्वारा यह निर्धारित किया जाता है कि किस रोग में किस संगीत प्रवाह से क्या प्रभाव किस प्रकार पड़ता है और उसका प्रयोग कब, किस निमित्त किस प्रकार करना चाहिए? अस्पतालों में पहले मात्र मानसिक रोगियों को ही संगीत टेप सुनाकर बिजली का झटका देने या नींद की गोलियाँ देने जैसे प्रयोग होते थे। उनसे मिलने वाले लाभों को देखते हुए शारीरिक रोगों के निमित्त भी कितने ही प्रकार के टेप बने और उन्हें सुनने पर रोगी इतने अधिक लाभान्वित होने लगे जितने दवादारू से भी नहीं होते थे।
अब संसार के महत्वपूर्ण विद्यालयों में यह प्रयोग चल रहे हैं कि संगीत को चिकित्सा विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग किस प्रकार बनाया जाय? वह दिन दूर नहीं, जिसमें संगीत को रोग निवारण के लिए ही नहीं वरन् स्वास्थ्य सम्वर्धन, बुद्धि विकास एवं प्रतिभा उभार के लिए भी प्रयुक्त किया जाने लगेगा। अब तक उसे खुशी के अवसरों पर प्रयुक्त किया जाता था। अब उसे शोक, क्रोध, चिन्ता, भय, आवेश आदि के समाधान के लिए भी प्रयुक्त किया जाने लगेगा। भाव-संवेदना और मस्तिष्कीय सन्तुलन के लिए संगीत उतना लाभ प्रस्तुत करने लगेगा जितना कि अन्य उपचार विधान अभी तक प्रस्तुत नहीं कर सके हैं।
पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओं पर भी यह प्रयोग आजमाया गया है और उसका समुचित प्रतिफल भी सामने आया है। वैज्ञानिकों ने चिड़ियाघरों में बन्द पक्षियों पर यह प्रयोग करने में सुविधा समझी। इसलिए उनके कटघरों से बाहर विविध प्रकार के संगीत टेप बजाये। देखा गया कि वे इसे सुनकर मन्त्र मुग्ध होते रहे। अपने-अपने सामान्य काम छोड़कर वे इकट्ठे हो गये। जहाँ से वह ध्वनि निस्सृत हो रही थी। पर जैसे ही वादन बन्द हुआ वैसे ही वह उदास हो गये और मुँह लटकाकर इस आशा में बैठे रहे कि कदाचित उसे सुनने का अवसर फिर मिले। बन्दर जैसे चंचल और उपद्रवी जीव आपस में चेंचें करना तक भूल कर उस अवसर पर भोले कबूतरों की तरह बैठे रहे। यह मन्द और मादक संगीत का प्रभाव था, पर जब उत्तेजक आक्रोश भरे और डरावने बाजे बजाये गये तो वे भी उत्तेजित हो उठते। चंचलता बढ़ी और आक्रोश में एक-दूसरे पर हमला करने लगे। कुछ ने दीवारों से टक्करें मारना और उपयोगी वस्तुओं को तोड़ना-फोड़ना शुरू कर दिया। किन्तु वादन बदल देने पर उन्हें शान्त होने में भी देर न लगी। बच्चे जो बहुत देर से इस प्रवाह से भर गये थे, थक कर अपने-अपने कटघरों में घुस गये और झपकियाँ लेने लगे।
चिली के चिड़ियाघरों में यह प्रयोग पक्षियों पर किया गया। सामान्य संगीत से तो वे भी उड़ना और चुगना छोड़कर उन पेड़ों पर बड़ी संख्या में आ जमे जहाँ लहराने वाला संगीत स्पष्ट सुनाई दे रहा था। उड़ाने, भगाने पर भी वे गये नहीं, एक डाली से दूसरी पर फुदकते भर रहे।
ऐसे विचित्र संगीत भी ढूँढ़ निकले गये हैं जो निराश निठाल, उदास एवं प्रतिभा रहित कर देते हैं। उन्हें सुनते रहने पर माँसाहारी हिंस्र जन्तुओं ने भूखे होने पर भी किसी पर आक्रमण का बड़ा साहस नहीं किया। आसपास के कीड़े-मकोड़े खाकर ही सन्तोष करते रहे। दुर्बल जीव-जन्तु स्थिरता ही नहीं अपना बैठे वरन् आँखों से आँसू भी बहाने लगे। शायद वे उनकी प्रसन्नता के सूचक थे।
संगीत का प्रयोग जलचरों पर भी वैसा ही प्रभावशाली सिद्ध हुआ है। आकर्षण संगीत टेप से मछलियाँ, कछुए, केकड़े तक उस क्षेत्र में दौड़ते चले आये और बिना किसी झिझक आशंका के वहाँ तक बढ़ते चले गये जहाँ से उसे संगीत की आवाज आरम्भ हो रही थी। इसके बाद दूसरा प्रयोग डरावने भयंकर स्वर बदल कर किया गया तो उस क्षेत्र में जो जीव-जन्तु थे, वे अपनी जान बचाकर दूर-दूर चले गये। मछली मारों ने उस प्रयोग का शिकार पकड़ने में लाभ उठाया।
पशु-पक्षियों की अपनी भाषा होती है। यद्यपि उनमें थोड़े-थोड़े ध्वनि शब्द ही होते हैं, पर उन्हीं के सहारे से आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। विभिन्न जीवों के उच्चारण विभिन्न प्रकार के हैं। इन संकेत स्वरों को टेप करके सुनाने पर उस वर्ग के प्राणी वैसी ही हरकतें करने लगे जैसे कि उनको संकेत उपलब्ध हुए। प्रणय निवेदन के स्वर सुनाकर उस वर्ग की नर-मादाओं को बड़ी संख्या में एकत्रित होते और सम्बन्ध बनाने के लिए आतुर होते देखा गया।
संगीत का पेड़-पौधों पर भी अच्छा प्रभाव देखा गया है। बर्लिन के एक उद्यान में दाहिने पक्ष में संगीत बजाये जाने का क्रम बना और उत्तरी पक्ष को नहीं छेड़ा गया। देखा गया कि संगीत वाली क्यारियों में फूल और फल अधिक उगे और उनकी बढ़ोत्तरी गति भी तेज हुई।
अब पशु पालक दूध दुहते समय ऐसे संगीत टेप बजाने लगे हैं, जिन्हें सुनकर उनका दूध अधिक मात्रा में स्रवित होने लगता है। किसान भी इस विधा को अपना कर रोगी कीटकों को मारने तथा अच्छी फसल उपजाने में सफल हो रहे हैं।
एक सधा हुआ ऊँट था। नक्कार खाने का कोई उत्सव होता तो उसकी पीठ पर नगाड़ा लाद कर चोबदार उसे बजाता हुआ चलता। ऊँट बहुत बूढ़ा हो गया। काम का न रहा तो उसे खुला छोड़ दिया गया। राजा का होने से कोई उसे मारता न था। ऊँट एक दिन बुढ़िया के सूखते हुए अनाज को खाने लगा। बुढ़िया ने सूप बजाकर भगाना चाहा। ऊँट ने कहा, “जनम भर नगाड़ों की आवाज सुनता रहा हूँ। तुम्हारे सूप से क्या डरने वाला हूँ।” बहुत सत्संगियों पर किसी की शिक्षा का असर नहीं पड़ता। आयु बीत जाने पर भी सारे जीवन भर के संस्कार छाये रहते हैं। उससे उबारने की सोचें तो जीवन को दिशा भी मिले।
रोगग्रस्त होना कष्टकर हानिप्रद तो है ही, उससे मनुष्य का मनोबल भी क्षीण होता है और चिन्तन की दिशाधारा डगमगाती है। उससे व्यक्तित्व का स्तर भी गिरता है। साथी सहयोगियों पर भार पड़ता है। जीवन में ऐसा रस नहीं रह जाता जो स्थिरता एवं प्रगति का पोषण करता रहे।
अस्तु रोग आने से पूर्व ही उसका उपचार करना चाहिए। यह उपचार आहार-बिहार की नियमितता के रूप में हो सकता है। यदि कुकृत्यों के दुष्परिणामों की बात ध्यान में बनी रहे तो वह कुयोग न आये जिसमें रुग्णता का सामना करना पड़े और संपर्क क्षेत्र का सारा वातावरण बिगाड़ना पड़े।
आहार के सम्बन्ध में हमें बराबर ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य शाकाहारी है। उसे स्वादों के कुचक्र में न पड़कर यह देखना चाहिए कि क्षणिक उत्तेजना के फेर में पड़ने की अपेक्षा दीर्घकालीन हित देखना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि असंयम अपना कर रोगों के फेर में पड़ना उचित है या अपने आपको समर्थ सुरक्षित रखते हुए भविष्य को स्थिर एवं सुखी समुन्नत बनाना ठीक है। यदि असंयम पर नियन्त्रण किया जा सके तो मनुष्य तीन चौथाई आधि-व्याधियों से बच सकता है। मात्र प्रकृति प्रकोप या दुर्घटनाएँ ही ऐसा कारण रह जाती हैं, जो दीर्घायुष्य के मार्ग में बाधक बनें।
सन्तुलित भोजन के फेर में अस्त-व्यस्त आहार क्रम बनाना अनुचित है। शाकाहारी प्राणी अपने शरीर के लिए आवश्यक तत्व वनस्पतियों से उपलब्ध कर लेते हैं। हाथी, गैंडा, बैल, हिरन आदि के शरीर में कोई ऐसी कमी नहीं पाई जाती, जिसके कारण उसे अन्यान्य प्रकार की वस्तुओं का साधन जुटाना पड़े। उन्हें जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता है, वे सभी उन्हें घास-पात से मिल जाती हैं। इनमें पौष्टिकता एवं क्षति पूर्ति की सभी आवश्यक क्षमताऐं मौजूद हैं।
रोग यदि उपस्थित हो तो चिकित्सक और रोगी दोनों का ही उत्तरदायित्व यह होता है कि उस भूल को सुधारें, जिसके कारण बीमारी के कुचक्र में फँसना पड़ा। इसके लिए यह आवश्यक है कि अपनी आहार-विहार समेत दिनचर्या को सही तरह से सुधार लिया जाय। उपवास से आमाशय को राहत मिलती है। आँतों में संचित मल के निष्कासन के लिए रेचक औषधियाँ लेने की अपेक्षा यह कहीं अधिक अच्छा है कि ऐनीमा लेकर आँतों को- विशेषतया बड़ी आँत को साफ कर लिया जाये। इतना भर कर लेने से संचित विकारों से बड़ी सीमा तक छुटकारा मिल जाता है।
उपचार के लिए वनौषधियों पर ही निर्भर होना चाहिए। ऋषियों ने इस संदर्भ में भारी खोज की है। उन्होंने जड़ी-बूटियों का न केवल रासायनिक विश्लेषण के आधार पर इस सिद्धान्त को आविष्कृत किया है कि किस रोग में क्या औषधि क्या काम करती है वरन् अपनी सूक्ष्म आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह देखा है कि अन्तरंग के मर्मस्थलों, जीव कोशाओं तथा जीव रसायनों पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है? चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट आदि का जीवन इसी विद्या को खोजने में लगा है। उनके जो निष्कर्ष पुरातन काल में थे, वे अभी भी यथार्थता यथावत् बनाये हुए हैं। उनमें कोई ऐसे तत्व नहीं हैं जो एक रोग को निवारण करने से ही इतने मारक तत्व भर दें कि पीछे उनसे निपटना ही एक समस्या बन जाय।
आयुर्वेद का मूलभूत आधार जड़ी-बूटियाँ हैं। उसमें खनिजों, रसों, भस्मों, विषों का सम्मिश्रण मध्य कालीन है। जब सामन्तों को अपनी अहन्ता का पोषण करने तथा चिरकाल तक भौतिक सुख उठाते रहने की ललक जगी। साथ ही विलासी जीवन क्रम को यथावत बनाये रहने की ललक रही तो उनकी इच्छा पूर्ति के लिए रसायनों की ओर चिकित्सकों का ध्यान मुड़ा। वे वाजीकरण प्रयोग हेतु उस प्रयास में लगे पर लाभ मात्र इतना ही हुआ कि तात्कालिक उत्तेजना उत्पन्न करके चमत्कार दिखाया जाने लगा। पर वह ऐसा था जो जीवनी शक्ति में उफान या उछाल ला दे और अनुभव करादे कि जादू जैसा प्रतिफल भी इससे हार सकता है। किन्तु जादू स्थिर कहाँ होता है। वह हथेली पर सरसों जमाने जैसी भ्रान्ति ही उत्पन्न करता है। स्थायित्व उसमें कहाँ होता है।
एलोपैथी का आधार भी वही है। स्थायित्व को भड़काना, उभरे लक्षणों को दबाना, संरक्षक तत्वों को कमजोर करना ताकि वे पीड़ा की अनुभूति न होने दें। यह सिद्धान्त चमत्कारी तो है पर है ऐसा जैसे थके घोड़े की असमर्थता का कारण और निवारण सोचने की अपेक्षा उसकी अन्धाधुन्ध पिटाई शुरू कर देना और जब वह उस असह्य आघात से तिलमिलाकर दौड़ने लगे तो अपने चाबुक की प्रशंसा के पुल बाँध देना।
वनौषधियों के सम्बन्ध में लोगों की उपेक्षा इसलिए पनपी है कि इन्जेक्शनों, कैपसूलों की तुलना में उसका उपयोग सीधा सादा-सा दीख पड़ता है। लागत भी अधिक नहीं लगती। समझा यह जाने लगा है कि जो वस्तु जितनी महंगी होगी, वह उतनी ही अच्छी होनी चाहिए।
चूँकि जड़ी-बूटियाँ सस्ती होती हैं, इसलिए समझा जाता है कि वे वैसी गुणकारी सिद्ध न हो सकेंगी। अश्रद्धा और उपेक्षा से देवता तक पत्थर बन जाते हैं जबकि श्रद्धा का पुट लगने से पत्थर भी देवता हो जाते हैं। हम अपने देश में उत्पन्न अमृतोपम वनस्पतियों की गरिमा समझी तो प्रतीत हुआ कि उनमें बूढ़े च्यवन को युवा बना देने और मूर्छित लक्ष्मण में पुनः चेतना लौटा लाने जैसी क्षमता अभी भी मौजूद है।
रोगी आतुर होता है। उसे यथाक्रम रोगों के निवारण का धैर्य नहीं होता। इसलिए वह वहाँ जाता है जहाँ चमत्कारी गुणों का बखान किया जाता है। पर इसमें आयुर्वेद चिकित्सकों की भूल भी कम नहीं है। वे शुद्ध और ताजी वनौषधियों का प्रबन्ध करने की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। पंसारियों के यहाँ रखी वर्षों पुरानी सड़ी-गली वस्तुऐं खरीद लाते हैं और यह भी नहीं देखते कि समय गुजर जाने के उपरान्त उसके गुण समाप्त तो नहीं हो गये। इसी प्रकार ऐसा तो नहीं हुआ कि समान आकृति वाली कोई दूसरी वस्तु दे दी गई हो। भूमि का प्रभाव भी उन पर रहता है। जिस भूमि में जो बूटी पूरे गुण लाती है वह परिपक्व होने पर समुचित लाभ देती है। उखाड़ने वाले उसे कच्ची भी उखाड़ लाते हैं। प्रयोग्य अंग का इस्तेमाल नहीं करते ऐसी दशा में भी उसमें समुचित प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता नहीं रहती। इसका समाधान चिकित्सकों को भी इस प्रकार करना चाहिए कि वे शान्ति-कुंज जैसे जड़ी-बूटी उद्यान अपने-अपने यहाँ खड़े करें और उनके गुणों में कोई अन्तर तो नहीं आया है यह रोगियों पर प्रयोग कर परखें।
ऋषि अगस्त्य की पत्नी ने एक बार रत्न जटित आभूषण पहनने की इच्छा की और किसी शिष्य से माँग लाने के लिए उन्हें बाध्य किया। ऋषि किसी प्रकार जाने को तैयार तो हो गये पर एक शर्त रखी जिसके पास ईमानदारी की कमाई का धन होगा। उसी के आभूषण ग्रहण करूंगा। ऋषि के शिष्यों में कितने ही सुसम्पन्न थे। पहुँचे तो इच्छा पूर्ति के लिए वे सभी सहर्ष तैयार हुए। पर पूछने पर उन सभी का उपार्जन न नीतिपूर्ण था न उनका कमाया। अस्तु वे उन्हें लेने से इन्कार करते हुए आगे बढ़ते गए। अन्त में उनका एक ऐसा शिष्य मिला जो प्रतापी भी था और राजा भी। पर उसके कोष में कुछ भी शेष न था। जो मिलता उसे तत्काल लोक मंगल के कार्यों में खर्च कर देता। ऋषि को देने के लिये उसके पास आभूषण जैसी कोई वस्तु थी ही नहीं। विद्वान ऋषि खाली हाथ घर वापस लौटे और पत्नी को अनीति उपार्जित आभूषण पहनने के हठ को छोड़ने के लिए सहमत कर लिया।
दृश्यमान अग्नि का कितना महत्व है, हम सभी जानते हैं। चूल्हा जलने, मिट्ठी पकने, धातुऐं शोधने एवं ढालने जैसे अनेकों कार्य उसी के सहारे होते हैं। छोटी बड़ी मशीनों के पुर्जे ढालने के लिए अग्नि ऊर्जा ही काम आती है। यह मनुष्य द्वारा उत्पादित अग्नि की बात हुई। सौर ऊर्जा से वनस्पति उगती तथा पकती है। बादलों के बनने और बरसने का समूचा दायित्व सौर ऊर्जा ही वहन करती है। सीलन और सड़न से उबारना उसी का काम है।
इन प्रत्यक्ष अग्नियों के अतिरिक्त एक रासायनिक अग्नि भी है, जिससे वनस्पतियों में विभिन्न गुण और शरीरगत रसों की पाचन क्षमा का उत्पादन होता है। इसे शास्त्रों में वैश्वानर कहते हैं। शरीर में यह सन्तुलित मात्रा में रहती है। इसके घट या बढ़ जाने से मृत्यु निश्चित है। इसे जीवन भी कहते हैं और जीव ऊर्जा भी। शरीर में विभिन्न अनुपात के विभिन्न रसायनों की मात्रा भी विद्यमान है। उसे रासायनिक ऊर्जा कहते हैं, दूसरे शब्दों में उसे प्राण भी कहा गया है।
रासायनिक अग्नि प्रायः जीव सत्ता को ही प्रभावित करती है। इससे विभिन्न उपयोगों द्वारा रोगोपचार किया जाता है और बलवर्धन भी। आरोग्य शास्त्र उसी की देन है। प्रकृति प्रदत्त शरीर शुक्राणु से लेकर भ्रूण स्थिति तक गतिशील रहता है। प्रसव के उपरान्त ठोस, द्रव और वायुभूत खाद्य-पदार्थों द्वारा शरीर का अभिवर्धन होता है। नियत मात्रा में कमी आ जाने से कुपोषण स्तर की व्यथाऐं क्या को सताने लगती हैं।
इस सबका सार तत्व प्राण है। उसी के स्तर एवं अनुपात से मनुष्य में बलिष्ठता, सुन्दरता, जीवनी शक्ति, आदि का वर्चस्व बढ़ता है। इसी का एक पक्ष ओजस्, तेजस्, मनस् एवं वर्चस् कहलाता है। यह विश्वव्यापी दिव्य अग्नि है। वह पदार्थों को क्रियाशील रखती है और चेतना विभिन्न स्तर की भावनाओं कि उद्भव करती है। इन्हीं को प्रेरणा भी कहते हैं। अन्तरंग की प्रेरणाएं बहिरंग क्रिया-कलापों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं।
अग्नि, विद्युत, रसायन आदि के रूप में इस महातत्व का उपयोग करने का अवसर हमें अनायास ही प्राप्त भी होता रहता है और कौशलपूर्वक उसी को उपार्जित एवं धारण भी किया जाता है। मानस क्षेत्र में यही कल्पना, धारणा, आकांक्षा, प्रेरणा आदि के रूप में काम करती है। शरीर इसी का अनुशासन मानता है और निर्देशों का कार्यान्वयन करता है।
साँसारिक कामों में अग्नि की प्रत्यक्ष ऊर्जा आभा ही काम आती है जबकि अध्यात्म प्रयोजनों में उसके साथ जैव चेतना का भी समावेश करना पड़ता है। जो चेतना को प्रभावित करे उसे यज्ञाग्नि कहते हैं। इसमें प्राण ऊर्जा जोड़नी पड़ती है। इसके दो आधार हैं। एक मन्त्र के आधार पर उत्पन्न किया गया ध्वनि -प्रवाह। दूसरा यज्ञ संचालकों की शारीरिक एवं मानसिक साधनाक्रम पवित्रता। यज्ञ संचालकों में ब्रह्मा, अध्वर्यु, उद्गाता, होता आदि व्यवस्थापक होते हैं। होता यजमान रूप में इन्हीं में से एक है। इस समूचे समुदाय को ब्रह्मचर्य, उपवास, स्नान, शुद्ध वस्त्र धारण, जप-ध्यान आदि के द्वारा अपने आपको यज्ञाग्नि की समीपता का अधिकारी बनना पड़ता है। एक और पक्ष यह है कि अग्नि कहाँ से लाई गई। जिस प्रकार देव प्रयोजनों के लिए होता या पुरोहित को व्यक्तिशः पवित्र रहना पड़ता है, उसी प्रकार मन्त्रोच्चारण भी सही होना चाहिए। अन्यथा अशुद्ध उच्चारण से मन्त्र की वह शक्ति उभर नहीं पाती जो अभीष्ट प्रयोजनों के लिए आवश्यक है।
यज्ञाग्नि को तीन प्रयोजनों हेतु प्रयुक्त किया जाता है (1) शारीरिक रोग निवारण एवं समर्थता सम्वर्धन के लिए (2) मानसिक बुद्धिबल बढ़ाने तथा भावनाओं में उत्कृष्टता लाने के लिए (3) अदृश्य वातावरण एवं वायुमण्डल का संशोधन करने के लिए। इन तीन प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाली अग्नियों का प्रज्ज्वलन काष्ठ विशेष की समिधाओं से किया जाता है। इन तीन अग्नियों को क्रमशः अहिताग्नि, आव्हनीयाग्नि एवं दक्षिणाग्नि कहते हैं।
यज्ञाग्नि मौलिक उत्पादन की होनी चाहिए। उसमें अन्य व्यक्तियों या प्रयोजनों के संस्कार नहीं जुड़े होना चाहिए। अरणि मंथन का तरीका यह है कि पीपल के पके और सूखे काष्ठ में एक ओर गट्टा और दूसरे में शंकु निकलते हैं। दही मथने की तरह इसे दबाव देते हुए मथा जाता है। उस मंथन से चिनगारियाँ निकलती हैं। चिनगारियों को रुई में लेते हैं। वह जलने लगे तो कपूर के माध्यम से ज्वलनशील बनाकर उन्हें घी मिश्रित समिधाओं में फैला देते हैं। अग्नि जलने लगती है तो सर्वप्रथम उसमें सात आहुति घी की डालते हैं ताकि परिपूर्ण प्रज्ज्वलन में सुविधा हो। यज्ञ वेदी के चार कोनों पर चार जल पात्र रख देते हैं ताकि उत्पन्न होने वाली कार्बनडाइ आक्साइड का अंश उन जल पात्रों द्वारा सोख लिया जाय।
अग्नि प्रज्ज्वलन का अरणि मंथन वाला तरीका अब अभ्यास में न रहने और उपयुक्त काष्ठ का चयन न हो सकने पर अग्नि स्थापन के लिए चुम्बक लौह आदि का प्रयोग करना चाहिए। यह मैगनेट तरीका इन दिनों उपयुक्त है। माचिस में फास्फोरस जैसी अनुपयुक्त वस्तुओं का सम्मिश्रण रहता है। अग्नि प्रयोजनों में लगी हुई अग्नि काम में लाई जाय तो उसमें पूर्व संस्कार सम्मिलित हो जाते हैं। इन सब बातों का ध्यान रखते हुए यज्ञ प्रयोजनों के लिए पवित्र अग्नि ही काम में लानी चाहिए। आतिशी शीशे पर सूर्य किरणों को एकत्रित करने से भी वह मौलिक अग्नि उत्पन्न हो सकती है।
अग्निहोत्र अपने आप में एक विज्ञान है। उसमें रसायनों को वायुभूत बना देने के कारण व्यापकता बढ़ जाती है। ठोस पदार्थ, एल्केलाइड्स व टर्पीन्स इत्यादि जहाँ के तहाँ रहते हैं। द्रव रूप में वे अपने फैलाव के अनुसार काम करते हैं। किन्तु यदि जला कर वायुभूत बना दिया गया है तो उसके प्रभाव दूर-दूर तक पहुँचता है। अग्नि में लाल मिर्च, हींग आदि कोई भी तीक्ष्ण प्रकृति की वस्तु डाल दी जाय तो उसकी गन्ध जहाँ तक प्रभाव पहुँचाती है वहाँ तक बैठे हुए लोगों को छींकें या खाँसी आने लगती है। यज्ञाग्नि में ऐसी तीक्ष्ण वस्तुऐं तो नहीं होमी जाती, पर जिनकी भी आहुतियाँ दी जाती हैं, उन सबका व्यापक क्षेत्र में प्रभाव पड़ता है। इस दृष्टि से यह विधा शारीरिक और मानसिक रोग निराकरण के लिए उपयोगी है। यही वायु मण्डल में संव्याप्त विषाक्तता का भी निराकरण करती है। छोटा प्रयोग छोटे क्षेत्र में काम करता है और ढाल जैसा काम देता है। यह भौतिक क्षेत्र की उपलब्धि हुई। सूक्ष्म वातावरण में युद्धोन्माद जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ भर जाती हैं तो उनका परिशोधन भी यज्ञ के अध्यात्म पक्ष द्वारा ही हो सकता है। उसमें प्राण पर्जन्य की भी वर्षा होती है जिससे स्वस्थ वातावरण ही नहीं बने, आकाश से बरसने वाले बादलों में प्राण पर्जन्य का समुचित समावेश रहने से सर्वत्र पौष्टिकता की अभिवृद्धि हो। व्यक्तित्व को उभारने और प्रतिभा को निखारने के लिए भी अग्निहोत्र से असाधारण लाभ मिलता है।
आयुर्वेद शास्त्र में कितने ही रोगों में वनस्पतियों का धूम्र प्रयुक्त करने का विधान है। कारण यह है कि औषधि स्थूल और द्रव्य पदार्थों की अपेक्षा वायुभूत स्थिति में अधिक सूक्ष्म बन जाती है और मात्र नासिक, मुँह आदि खुले छिद्रों से ही नहीं, रोमकूपों द्वारा भी शरीर के अन्तराल में प्रवेश करती है और गहराई में घुसी हुई विकृतियों तक का निराकरण करती है। नासिक द्वारा खींची हुई वायु मस्तिष्क के उन क्षेत्रों तक भी जा पहुँचती है, जहाँ अन्य उपायों से उस संस्थान का स्पर्श नहीं किया जा सकता।
अग्नि होत्र के सम्बन्ध में वैज्ञानिक शोधों का सिलसिला अब विश्व भर में चल पड़ा है, क्योंकि वायुमण्डल के संशोधन और अवाँछनीय तत्वों के निराकरण में इसका असाधारण योगदान देखा गया है। गम्भीर पर्यवेक्षण से इसका और भी अधिक लाभ प्रस्तुत कर सकने वाला तरीका हाथ लग सकता है। अमेरिका स्थित अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी। बसन्त परांजपे द्वारा संचालित) में इस सम्बन्ध में गहरे अन्वेषण किए गए हैं और उसके परिणामों से विज्ञान क्षेत्र को अवगत किया है। कई वर्षों पहले भारतीय संस्कृति से प्रभावित एक ब्रिटिश डाक्टर टायलिट ने मुनक्का, किसमिस तथा खजूर जैसे मीठे फलों के धुएं का फेफड़े व हृदय सम्बन्धी रोगों के निवारण में सफलतापूर्वक प्रयोग किया था। इसी प्रकार प. जर्मनी के प्रो. रिलवर्ट, प्रो. जेफेलीन, कर्नलकिंग आदि ने भी अपनी व्यक्तिगत प्रयोगशाला एवं परीक्षण प्रक्रिया में अग्निहोत्र के लाभकारी प्रतिफलों को सत्यापित कर दिखाया है।
अमेरिका के मेरीलैण्ड बाल्टीमोर में पिछले काफी दिनों से यह प्रयोग चल रहा है। वर्जीनिया में एक अग्नि मन्दिर की ही स्थापना की गयी है, जिसमें विशेष स्तर की अग्नियों पर कुछ खाद्य-पदार्थ पकाये और रोगियों को खिलाये जाते हैं, जैसे कि भारतीय यज्ञ परम्परा में चरु को संस्कारित कर पकाया व खिलाया जाता है। इतना ही नहीं, यज्ञाग्नि की बची हुई भस्म का सभी औषधियों की तरह प्रयोग किया जाता है और अवशोषित जल का भी विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता है। इन प्रयोगों में न केवल अनेक औषधीय गुण वाली वनस्पतियाँ प्रयुक्त होती हैं वरन् अनेक स्तर की समिधाओं का भी एक दूसरे से भिन्न प्रकार का प्रतिफल पाया गया है।
यज्ञ कार्य में घृत के उपयोग का प्रावधान है, पर वह न मिले तो गौ दुग्ध भी काम में लाया जा सकता है। तेलों तथा हानिकारक रसायनों से बने घृत की शक्ल वाले वेजीटेबल घी के प्रयोग की अपेक्षा से तो यही अच्छा है कि शुद्ध गौ दुग्ध का प्रयोग कर लिया जाय। समिधाओं में अनेक प्रयोजनों के लिए विभिन्न काष्ठों के उपयोग का प्रावधान बताया गया है, पर यदि वैसा उपलब्ध न हो तो आम, पीपल, चन्दन देवदारु आदि के काष्ठ भी प्रयुक्त हो सकते हैं।
ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान हरिद्वार की अग्निहोत्र प्रयोगशाला अपने ढंग की अनोखी है। उसमें बहुमूल्य वैज्ञानिक यन्त्रों का ऐसा ही समग्र संकलन किया गया है। वनस्पति उद्यान भी अपना निज का उगाया गया है। इन प्रयोगों से जो प्रतिफल सामने आये हैं, वे आशाजनक उत्साहपूर्वक हैं। आगे भी इनसे महत्वपूर्ण परिणाम निकलने की आशा है।
इस दिशा में यदि समुचित प्रयोग शृंखला चलती रहे तो रचनात्मक की अनेक उपलब्धियों के सूत्र हाथ लग सकते हैं।
महात्मा गान्धी ने ईश्वर के विषय में लिखा है- “वह ऐसी रहस्यमय शक्ति है जो सर्वव्यापी है। उसे अनुभव करता हूँ, पर आँखों से नहीं देखता। यह कहना ठीक नहीं कि जो इन्द्रियों से नहीं दीखता उसका अस्तित्व नहीं।
हर विचारशील को अनुभव होता है कि सृष्टि व्यवस्था में कोई व्यवस्थित शासन चल रहा है। उसमें राई रत्ती अन्तर न पड़ने की बात मात्र संयोग कहकर हँसी में नहीं उड़ाई जा सकती।
जड़-पदार्थों में भी जीवन है। उसके अस्तित्व अपने अन्तःकरण में देखा जाता है जो सत्कर्म के लिए प्रोत्साहन देता और दुष्कर्म के लिए रोकथाम करता है।
संसार की हर चीज बदल रही है साथ ही नये रूप में विनिर्मित भी हो रही है। ऐसा व्यापक और व्यवस्थित क्रम बिना किसी नियमन के हो नहीं सकता।
जब अन्तःकरण की श्रद्धा उमड़ती है तब हम उसके अधिकाधिक निकट बढ़ते जाते हैं और उसके सौंदर्य तथा अनुग्रह सब ओर बिखरा देखते हैं। किन्तु जब अविश्वास से मानस विकृत होता है तो फिर अपनी आत्मा की तरह परमात्मा के अस्तित्व से भी इनकार करते हैं।
श्राद्ध पितरों के नाम पर किये जाते हैं और उनमें दान पुण्य किया जाता है। इस निमित्त उनके साथ तर्पण पिण्डदान आदि कर्मकांड भी जोड़ दिये गये हैं।
वर्ष में जिस तिथि में पितरों की मृत्यु हुई हो, उस दिन भी श्राद्ध किये जाते हैं और आश्विन कृष्ण पक्ष में भी। चूँकि उन दिनों कन्या का सूर्य होता है। इसलिए कन्यार्क का अपभ्रंश “कनागत” भी प्रचलित हो गया है।
पूर्वजों या गुरुजनों द्वारा किये गये उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना और उसकी वार्षिक ब्याज को चुकाना वार्षिक श्राद्ध है, चाहे वह मरण वाली तिथि को किया जाय या आश्विन पक्ष में।
उपकारी का प्रत्युपकार करना सामान्य मनुष्य धर्म है। धर्म कर्त्तव्यों के प्रति श्रद्धा बनाये रहना श्राद्ध है। अंत्येष्टि संस्कार के उपरान्त जो 13 दिन बाद श्राद्ध किया जाता है, उसमें स्वावलम्बी उत्तराधिकारी पूर्वजों की छोड़ी सम्पत्ति को उनकी धरोहर मानकर उनकी सद्गति के लिए ही परमार्थ प्रयोजनों में लगा देते हैं। मात्र असमर्थ आश्रित ही उसे निर्वाह में काम में लाते हैं।
दान का परिणाम लोक और परलोक दोनों में ही होता है। उससे यश और शान्ति दोनों ही मिलते हैं। सह वितरण क्रम अपनाने से समाज की सुव्यवस्था भी बनती है। पर वह दान सत्पात्रों को ही दिया जाना चाहिए और ऐसा होना चाहिए जिससे किसी की सुविधा सम्पन्नता भले ही न बढ़े, पर उनसे पिछड़ेपन से छुटकारा पाने और आगे बढ़ने ऊँचा उठने में सहारा मिले। यश के लिए किसी पर भी पैसा लुटा देना दान नहीं, एक प्रकार का अहंकारी अज्ञान है।
महाभारत की कथा है कि राजा कर्ण नित्य सवा मन सोने का दान किया करते थे। जब वे स्वर्गलोक गये तब उनके लिए निवास, वस्त्र, उपकरण, आहार आदि सब कुछ सोने से ही विनिर्मित मिला।
यह देखकर वे चकित भी हुए ओर दुःखी भी। केवल स्वर्ण साधनों से ही मेरा क्या काम चलेगा? देवदूतों ने कहा- जो आपने दिया है, वही तो आपको मिलेगा।
कर्ण को अपनी भूल प्रतीत हुई। उनने धरती पर एक महीने के लिए लौटने की इच्छा प्रकट की। धर्मराज ने वह अनुरोध स्वीकार कर लिया। वापस आते ही उन्होंने ज्ञानदान और अन्न दान के लिये अधिकारी पात्र तलाश किये और अपने कृत्य का सदुपयोग माना। अवधि पूरी करके वे फिर स्वर्ग गये तो जीवनोपयोगी सभी सामग्री उन्हें उपलब्ध हुई।
आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है- “श्रद्धा।” श्रद्धा में शक्ति भी है। वह पत्थर को देवता बना देती है और मनुष्य को नर नारायण स्तर तक उठा ले जाती है। किन्तु श्रद्धा मात्र चिन्तन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए। यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है। इन्हें चिन्तन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थ परक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है। उपकारी के प्रति कृतज्ञता का प्रत्युपकार का भाव रखना भावना क्षेत्र की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का प्राणवान चिन्ह है। इसके लिए धनदान आवश्यक नहीं, समय, धन, श्रम दान, भाव दान भी असमर्थता की स्थिति में इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए भारतीय धर्म परम्परा में श्राद्ध कर्म की महत्ता बताई गई है। सत्पात्र न मिलने या अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की स्थिति में इसे जलांजलि देकर तर्पण के रूप में भी सम्पन्न किया जा सकता है। यह सोचना उचित नहीं कि जो मर गए उन तक हमारी दी हुई वस्तु कैसे पहुँचेगी। पहुँचती तो केवल श्रद्धा है। उसे चरितार्थ करने के लिए किया गया दान तो सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में ही काम आता है।
शब्दार्थों की दृष्टि से गायत्री और सावित्री पर्यायवाचक माने जाते हैं पर जब साहित्यिक शब्दार्थ से आगे बढ़कर आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तो दोनों की प्रकृति में भिन्नता आ जाती है। गायत्री का तप करके ब्रह्माजी ने उच्चस्तरीय ज्ञान प्राप्त किया था। पर जब सृष्टि संरचना की आवश्यकता पड़ी तो पदार्थ सम्पदा सावित्री का आश्रय लेना पड़ा। वह सामग्री भी साधारण नहीं, असाधारण थी जिससे ब्रह्माण्ड का विस्तार और परमाणु का अन्तराल इतना सशक्त बन सका कि उसकी समग्र कल्पना कर सकना भी मानवी बुद्धि से बाहर की बात है।
गायत्री, सावित्री इन दो शब्दों का प्रयोग इस प्रकार मिले-जुले रूप में होता रहता है, जिससे वे दोनों एक ही प्रतीत होती हैं। पर वस्तुतः दोनों की बीच जो अन्तर है, उसे उस कथा के आधार पर समझा जा सकता है जिसमें ब्रह्मा जी की दो पत्नियाँ बताई गई हैं जिनमें से एक थी सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री गायत्री और दूसरी पदार्थ प्रकृति के अनुदानों से भरी-पूरी सावित्री। दोनों के सम्बन्ध बताते हुए शास्त्र कहता है-
सावित्री जप्यनिरतः स्वर्गमाप्नोति मानवः।
गायत्री जप्यनिरतो मोक्षोपायं च विन्दति॥
“सावित्री के जप करने वाले को स्वर्ग और गायत्री के जप करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।”
यों दोनों ही एक तथ्य के साथ जुड़ी हुई हैं। फिर भी उनके बीच द्विधा अवश्य है। गायत्री उपासना व्यक्तित्व को परिष्कृत करते हुए महानता की ओर अग्रसर करने के निमित्त की जाती है और सावित्री की साधना बल, पराक्रम वैभव प्राप्त करके सशक्त बनने के लिए। सावित्री को दूसरे शब्दों में जीवनी शक्ति कह सकते हैं। गायत्री को तो आत्म चेतना के परिष्कार और आत्मोत्कर्ष की दृष्टि से अनिवार्य माना ही गया है।
शास्त्रकार कहते है :-
ओंकारद् व्याहृतिर्भवति, व्याहृतितो गायत्री भवति, गायत्र्याः सावित्री भवति, सावित्र्याः सरस्वती भवति, सरस्वत्या वेदा भवन्ति, वेदेभ्यो लोकः।
ऊँकार से व्याहृतियाँ हुईं। व्याहृतियों से गायत्री। गायत्री से सावित्री, सावित्री से सरस्वती, सरस्वती से वेद और वेद से लोक उत्पन्न हुए।
उपरोक्त शास्त्र विवेचन में गायत्री और सावित्री के प्रत्यक्ष स्वरूप में क्या अन्तर है, यह स्पष्ट किया गया है। चौबीस अक्षरों के साथ तीन व्याहृतियाँ (भूर्भुवः) लगाने में वह गायत्री मन्त्र रहता है और उनके साथ सप्त महा व्याहृतियाँ लग जाने पर उसकी संज्ञा सावित्री हो जाती है। गायत्री से भागीरथ द्वारा गंगावतरण की तरह अन्तरात्मा में ब्राह्मी चेतना की ज्ञान गंगा का अवतरण होता है सावित्री द्वारा वह प्रयोजन पूरा होता है जो दधीचि ने अपनी अस्थियों का वज्र बनाकर देवताओं को संकट से उबारा था।
शक्ति का प्रतिनिधित्व करने के कारण उसके साथ अनेक प्रकार की अनेकों स्तर की शक्ति धाराओं का समावेश होता है। व्यक्तिगत जीवन में वही कुंडलिनी भी बन जाती है। अपनी या दूसरों की भौतिक परिस्थितियों में हेर-फेर करने की दृष्टि से ही सावित्री का आश्रय लिया जाता है।
जिस प्रकार गायत्री का युग्म यज्ञ है, उसी प्रकार सावित्री का देवता सविता है। सविता मोटे शब्दों में प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य को कहते हैं। पर अध्यात्म क्षेत्र में उसे ब्रह्मतेजस् के रूप में जाना जाता है। अग्नि पिण्ड सूर्य जड़ है। परन्तु सविता विश्वात्मा के रूप में चेतन तेजस्विता से भरा पूरा है। दूसरे शब्दों में उसी को व्यक्तिगत प्रयोजनों में प्राण और सार्वभौम क्षेत्र में महाप्राण कहते हैं। सावित्री का युग्म- शक्ति स्रोत सविता है। जिस प्रकार बिखरी हुई धूप को छोटे से आतिशी कांच द्वारा एकत्रित करके अग्नि प्रकट की जा सकती है, उसी प्रकार सावित्री का उपासक सविता का ब्रह्मतेजस् उपलब्ध करता है। ब्रह्मतेजस् का ही दूसरा नाम ब्रह्मवर्चस् है।
सूर्य अनन्त शक्तियों का स्रोत है। भौतिक विज्ञानी जानते हैं कि जीवों का विकास जल से नहीं, सूर्य ऊर्जा से ही सम्भव हुआ है। जल भी उसी के कारण बना। उसी से समुद्र बने। जलचर बने और विकासवादियों के अनुसार उन्हीं से प्राणी विकसित होते हुए मनुष्य स्तर तक आ पहुँचे। इसलिए वे भी अध्यात्मवादियों के स्वर में स्वर मिलाकर “सूर्य आत्मा जगत स्थुश्च” स्वीकार करते हैं।
सावित्री का अधिष्ठाता सूर्य है। यह सूर्य जो दिन में चमकता है, साधारण नहीं है। पृथ्वी को जीवन उसी से मिला है। सौर मण्डल के ग्रह उपग्रहों को गुरुत्वाकर्षण, चुंबकत्व, ताप, प्रकाश और ध्वनि की तरंगें उसी महा भण्डार से उपलब्ध होती हैं। साथ ही वह इन सब बाल-बच्चों को साथ लेकर महा सूर्य की परिक्रमा के लिए भी द्रुतगति से दौड़ रहा है। उसकी सामान्य गतिविधियों में तनिक भी असामान्यता आते ही पृथ्वी पर हाहाकार मच जाता है।
यह सूर्य की बात हुई। यह प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान है। इसकी एक अदृश्य आत्मा है, जिसे सविता कहते हैं। उस सविता को परब्रह्म कहा गया है और चेतन जगत पर अजस्र अनुदान बरसाने वाला भी। उस परम शक्तिमान की प्रार्थना करते हुए शास्त्र कहता है-
एष लोकनुलोकश्च सप्तदीपश्चसागरोः एष पाताल सप्तस्पो दैत्य दानव राक्षसाः। एष भूतात्मको देवः सूक्ष्मो व्यक्तः सनातनः ईश्वरः सर्वभूतानां परमेष्टि प्रजापतिः। - आदित्य हृदय
- समस्त लोक-लोकांतरों, सप्त द्वीपों, सप्त समुद्रों, सप्त पातालों, दैत्य दानव, राक्षसों आदि को आप सन्तुलित रखते हैं। प्राणियों की दृश्य और अदृश्य स्थिति आप में ही समाहित हैं। आप ही जीवधारियों के प्राण हैं। आप ही परमेष्टि प्रजापति हैं।
अन्य शास्त्रों में भी यह उल्लेख आता है-
प्राणो वै अर्क। - शतपथ 10।4।6।23
-“प्राण ही सूर्य है।”
सएष वैश्वानरो विश्व रूपः प्राणेकग्निरुदयते। - प्रश्नोपनिषद् 1।6
“सूर्य के उदय होने पर सारे विश्व में प्राणाग्नि का संचार होने लगता है।”
सहस्ररश्मि शतधा वर्तमानः। प्राणः प्रजानामुदंयत्येष सूर्यः॥
-प्राण ही सहस्र रश्मियों वाला, सैकड़ों प्रकार से वर्तमान प्रजा को उत्पन्न करने वाला सूर्य है।
भोsसो तपन्नुदेति ससर्वेषां भूतानाँ प्राणाना दायो देति। - श्रुति
- “इस सूर्य से ही सब प्राणियों को प्राण प्राप्त होता है।”
आदित्यों वै बाह्यप्राण उदयत्येषत्द्येनं चाक्षुषं प्राणामनुग्रह्णीते। -प्रश्नोपनिषद् 1।7
“ब्राह्म जगत् में यह प्राण आदित्य रूप होकर दसों दिशाओं में विद्यमान है।”
आग से लेकर बिजली तक, अणु शक्ति से लेकर लेसर किरणों तक का अपार शक्ति भण्डार पृथ्वी तक सूर्य के स्रोत से ही आता है। अब भी उसी के कारण अन्न, जल और वायु की जीवन सम्पदा उसी के द्वारा प्राप्त होती है और भविष्य में भी महती समस्याओं के समाधान के लिए उसी की ओर निहारा जा रहा है। पेय और सिंचाई के जल की दिन-दिन कमी पड़ती जाती है। इसके लिए सूर्य शक्ति का केंद्रीकरण कर समुद्र जल को भाप बनाने का एकमात्र विकल्प है। ऊर्जा के स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। भविष्य में यह आवश्यकता भी सूर्य का आश्रय लेने से ही हल होगी। अभी इस ओर ध्यान गया नहीं है कि यह दोनों अत्यन्त कठिन कार्य कैसे सिद्ध किये जा सकते हैं। पर वह दिन दूर नहीं जब सविता का अनुग्रह उपलब्ध कर लिया जायेगा। तब वे आधार भी हस्तगत हो जायेंगे जिनके कारण पृथ्वी निवासियों की जल तथा ऊर्जा की समस्याओं का समाधान हो सकेगा। रोग चिकित्सा में भी अगले दिनों सूर्य किरणों को ही महत्व मिलने वाला है।
आत्मिक चेतना और सविता चेतना का तारतम्य बनाने वाला आध्यात्मिक आधार सावित्री साधना है। सूर्य हमसे बहुत दूर है। लगभग दस करोड़ मील दूर। उसका प्रभाव पृथ्वी तक उसकी किरणों द्वारा ही आता है। माध्यम वे ही हैं। सूर्य की किरणों में सात रंग हैं। इन्हीं को पौराणिक भाषा में सूर्यरथ के सात घोड़े कहा गया है और उसी को तत्वज्ञानी सावित्री के साथ जुड़ी हुई सप्त व्याहृतियाँ (भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्) मानते हैं। संक्षेप में सावित्री साधना सूर्य साधना है। उसका माध्यम सावित्री मंत्र है। उसके माहात्म्य में शक्ति की प्रचण्ड धाराऐं उपलब्ध होने की बात कही गई है। भौतिक दृष्टि से सूर्य की शक्ति के 1/220 करोड़ वें भाग मात्र से जीव सत्ता का पोषण होने की बात कही जाती है।
गायत्री के चौबीस अक्षरों में भगवान से सद्बुद्धि की प्रेरणा का अनुरोध किया गया है, वह कम आवश्यक नहीं है। प्राथमिकता उसी की है। उसके बिना शक्ति का दुरुपयोग होने लगता है और विनाश का वातावरण बनता है। किन्तु सद्बुद्धि के रहते उस सामर्थ्य का सदुपयोग बन पड़ना ही निश्चित है।
व्यक्ति का आत्मज्ञानी होना पर्याप्त लगे तो सावित्री साधना की आवश्यकता नहीं है। पर जब मानवी पुरुषार्थ से काबू में न आने वाले संकट सामने हों, बड़े विनाश से टक्कर लेनी हो और सृजन के बड़े साधनों एवं अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता हो तो सावित्री की साधना अपनाना ही आत्म विज्ञान की दृष्टि से एकमात्र आधार है।
सप्त वचन भी इसकी साक्षी देते हैं-
सामर्थ्य प्राप्यचात्पुच्चैरन्यद भुवन सर्जन किंकि दयाद् सावित्री सम्यगेव मुपासिता।
अर्थात्- विश्वामित्र ने एक नई सृष्टि स्व जलने की सामर्थ्य सावित्री के अनुग्रह से ही प्राप्त की थी। इस संसार में और क्या-क्या ऐसा है जो सावित्री द्वारा उपलब्ध न हो सके।
इन दिनों संसार की स्थिति हर क्षेत्र में जितनी विषम है उतनी धरती के जन्मकाल से लेकर इतनी विषम कभी नहीं हुई। इसे व्यवस्थित बनाने के लिए शक्तिशाली उपकरण चाहिए। वही है सविता युक्त सावित्री जिसके तेजस् को यदि व्यवस्था के सन्तुलन में लगाया जा सके तो सर्वनाश का मुँह पीछे की ओर मोड़ने के लिए विवश किया जा सकता है। इस सम्भावना को चरितार्थ करने का ठीक यही समय है।
जैसा कि बताया जा चुका है, सावित्री उपासना पंचकोशों के जागरण विधान पर निर्भर है। इसका आरम्भिक परिचय हम पंचमुखी गायत्री के रूप में समय-समय पर देते रहे हैं। सर्वसाधारण से जितना बन पड़े, जितना बेजोखिम का हो, उस मर्यादा को ध्यान में रखते हुए ही यह विवरण छपा रहा है ताकि किसी अनजान द्वारा उत्साह में भरकर किसी परमाणु विस्फोट जैसे भयंकर कृत्य कर बैठने की आशंका न हो। अन्नमय कोश के लिए आहार-विहार की पवित्रता (2) प्राणमय कोश के लिए छोटे-छोटे व्रत लेकर साहसिकता बढ़ाने का प्रयास (3) मनोमय कोश के लिए एकाग्रता और सन्तुलन (4) विज्ञानमय कोश के लिए सहृदयता विवेकशीलता (5) आनन्दमय कोश के सर्वत्र बिखरे हुए सौंदर्य को दृष्टिगत रखते हुए प्रफुल्लित पुलकित रहने का सरल तत्वज्ञान और विधान बताया जाता रहा है और आगे भी बताया जाता रहेगा पर वह होगा उतना ही, जितना भार वहन करने वालों की क्षमता होगी। जिनका स्तर ऊँचा उठ सका है, उनके लिए मार्गदर्शक की कमी न अखरेगी। न हमें अखरी और न किसी सत्पात्र को अखरेगी।
सामान्य व्याख्या में सावित्री साधना को कुंडलिनी का उच्चस्तरीय जागरण भी कहते हैं। जननेन्द्रिय मूल में शक्ति का और मस्तिष्क के मध्य सहस्रार ब्रह्मरन्ध्र का निवास माना गया है। यों एक सीमा तक इन दोनों का मिलन, संयोग मेरुदण्ड मार्ग से चलता रहता है और उसी के आधार पर शरीर एवं मन की रहस्यमयी क्रियाऐं चलती रहती हैं। पर इसको यदि ऊँचे स्तर पर जागृत किया जा सके तो प्रसुप्त शक्ति भण्डार उभरने और ऐसे क्रिया-कलाप करने लगते हैं जिन्हें देवोपम या दैत्योपम कहा जा सके।
कुंडलिनी जागरण वस्तुतः एक प्रकार का समुद्र मन्थन है। समुद्र में नीचे कूर्म भगवान बैठे हैं। ऊपर मदराचल पर्वत रखा गया है। यह जननेन्द्रिय और उसके ऊपर मेरुदंड के बीच में सुषुम्ना चलती है जो इड़ा पिंगला से मिलकर बनी है। इसे शेषनाग की राई बनाये जाने के रूप में समझा जा सकता है। इस तत्वज्ञान के देव एवं साधनात्मक पराक्रम के दैत्य मिलकर मथते हैं जिससे समुद्र मंथन से निकले बहुमूल्य रत्नों की तरह अनेकों विभूतियाँ साधक को उपलब्ध होती हैं।
कुंडलिनी विवरण की एक उपमा और भी है। मस्तिष्क को उत्तर ध्रुव माना गया है और मूलाधार को दक्षिणी ध्रुव। पृथ्वी सूर्य की तथा अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों की दिव्य सम्पदा अन्तर्ग्रही शक्ति वर्षा के रूप में ग्रहण करती है। उसमें से उपयोगी अंश अपने लिए रखकर दक्षिण ध्रुव मूलाधार से होकर बाहर फेंक देती है। मनुष्य मस्तिष्क से ग्रहण करता है और जननेन्द्रिय से क्षरण कर देता है। जो बचत अंश हाथ में रह जाता है, उसी से साधक में ओजस्, तेजस, और मनस् दृष्टिगोचर होता है।
कुंडलिनी जागरण हठयोग की एक प्रक्रिया है जिसमें षटचक्रों का वेधन करना होता है। तब वह सर्प की तरह फुसकारती हुई अपनी क्षमता का परिचय देती है। शिव और पार्वती के गले में सर्प लिपटे होने की छवियाँ इसी कारण विनिर्मित होती हैं।
कुंडलिनी जागरण का प्रभाव भी व्यक्तिगत तेजस्विता के रूप में ही दृष्टिगोचर होता है क्योंकि वह जननेन्द्रिय मूल, मेरुदण्ड और ब्रह्म रन्ध्र के माध्यम से शरीर में ही उत्पन्न होती है और वहाँ तक प्रभाव दिखाती है, जहाँ तक कि शरीर संपर्क का कार्यक्षेत्र है।
सावित्री साधना और कुंडलिनी जागरण की थोड़ी-सी संगति तो बैठती है। उसमें षटचक्रों का वेधन करना पड़ता है। उसमें पंचकोशों का जागरण हाता है। यह सभी शक्ति भण्डार हैं, पर इनमें भरी हुई सम्पदा भिन्न-भिन्न प्रकार की है। जागृत कुंडलिनी उतने ही क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखाती है जितने में कि साधक का निकटवर्ती संपर्क क्षेत्र होता है किन्तु सावित्री विश्वव्यापी है। उसके प्रभाव से भूमण्डल का सम्पूर्ण क्षेत्र एवं प्राणि समुदाय का समूचा वर्ग प्रभावित हो उठता है। वह जन-जन के मन-मन में प्रेरित प्रेरणा की तरंगें उत्पन्न कर सकती है। वह अनर्थ सँजोने वाले को टक्कर मारकर नीचे गिरा सकता है और साथ ही दिशा भूले लोगों को सही रास्ते पर उसी प्रकार चला सकता है जिस प्रकार झुण्ड से बाहर जिधर-तिधर भागने वाली भेड़ों को ग्वाला डण्डा दिखाकर सीधे रास्ते पर ले आता है। आज की परिस्थितियों में असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए ऐसी ही समर्थता अवतरित करने की आवश्यकता है। सावित्री साधना में, सूर्य उपासना में, समय के अनुरूप तेजस् धरती पर खींच बुलाने के लिए यह प्रयत्न ऐसा ही है जैसे कि भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से जमीन पर खींच बुलाने के लिए बाधित किया था।
(क्रमशः)
रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदामणि जब अठारह वर्ष की हो गईं पिता के घर से पैदल चलकर पति के पास पहुँची।
परमहंस ने कहा- ‘देवि यदि पत्नी के रूप में तुम्हारा विलास पाने की अपेक्षा माता जैसा वात्सल्य पा सकूं? तो मैं कितना बड़भागी बनूँ?’
पत्नी ने कहा- ‘देव! मैं आपके मार्ग में कंटक बनने नहीं आई। आपका अनुग्रह ही मुझे अभीष्ट है।’
दोनों ने मिलकर दाम्पत्ति जीवन को श्रद्धा और वात्सल्य से भर दिया।
लोगों में एक कमजोरी या महत्वाकांक्षा यह रहती है कि उन्हें जीवित रहते यश मिले और मरने के बाद भी किसी स्मारक के बहाने उनकी स्मृति बनाये रखें। शरीर से अमर होना तो सम्भव नहीं, पर यश शरीर से जीवित रहने की महत्वाकांक्षा भी कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं। क्योंकि इस बहाने मनुष्य को कुछ न कुछ ऐसे काम करने पड़ते हैं जिन्हें लोग उपयोगी समझें। जिनके बहाने उसे अन्य लोगों की तुलना में उसे श्रेष्ठ, धर्मात्मा आदि समझा जाने लगे।
जिन दिनों देश में विवेकशीलता थी, उन दिनों यश कामना को लोकोपयोगी कार्यों के निमित्त जगाया जाता था। अपने यश के लिए अथवा पूर्वजों का नाम प्रख्यात रखने के लिये लोग कुएं, तालाब, बाबड़ी बनाते थे। उन दिनों बाँध, नहर जैसे प्रचलन नहीं थे। पानी का मनुष्यों और पशु-पक्षियों के लिए अभाव रहता था। इस हेतु जलाशय बनाने की, पुण्यकर्मों की गणना उचित ही होती थी।
पेड़ लगाने या उद्यान लगाने का कार्य भी ऐसा था जिससे शुद्ध वायु, छाया, पक्षियों के लिए आश्रय, फल आदि के कितने ही लाभ दूसरों को मिलते थे। जिनके पास भूमि थोड़ी अधिक थी वे उसका एक भाग पेड़ लगाने के लिए निकालते थे और उस बहाने लकड़ी से लेकर अनेक प्रकार की सुविधाऐं सर्वसाधारण को मिलती थीं।
वृषभोत्सर्ग भी एक पुण्य कार्य था। बैल तो खेती के काम में लगे रहते थे, दुबले भी होते थे। इसलिए बैल को साँड़ के रूप में चिन्हित करके छोड़ दिया जाता था। वह उपयोगिता अभी भी अपने स्थान पर विद्यमान है। कृत्रिम गर्भाधान से मादा-पशुओं को हानि पहुँचती है और वंशज भी दुर्बल होते थे। प्राकृतिक क्रम सदा ही उपयोगी होता है। वृषमोत्सर्ग की स्थानापन्न प्रणाली दूसरी नहीं हो सकती।
उपरोक्त ऐसे काम थे जिनका लाभ प्रत्यक्ष दीख पड़ता था और उनके निर्माण में जो राशि लगती थी वह इतनी बड़ी नहीं होती थी कि एकाकी व्यक्ति अपने स्वजन परिजनों का श्रम संग्रहित करके उसे पूरा न कर सके। बिहार प्रान्त के एक मध्यवर्ती हजारी नामक किसान ने अपने क्षेत्र में आम्र उद्यान लगाने का व्रत लिया था और एक हजार आम्र उद्यान जनसाधारण को प्रोत्साहित करके खड़े कर दिये थे। कुंए, तालाब भी इसी प्रकार की श्रमदान से सहयोगपूर्वक बन जाते थे। उनमें कोई बहुत बड़ी पूँजी नहीं लगानी पड़ती थी। दुर्भिक्ष के दिनों में सम्पन्न लोग कष्ट पीड़ितों की सहायता के लिए ऐसे ही परमार्थ कामों के लिए अपना खजाना खाली कर देते थे। शासन का ध्यान तो सेना के उपयोग की सर्हद बनाने में रहता था, पर व्यापारी नगरों को जोड़ने में और साधु, सन्त तीर्थस्थान के मार्ग और निवास बनाने में अपनी भक्त मंडली का सहयोग लेते थे। दान में विवेक का समावेश रहता था कि कोई ऐसा काम बन पड़े जो लोकोपयोगी हो।
मध्यकाल के अंधकार युग में पुरातन प्राचीन काल ने करवट ली और मृतक के शव संस्कार का स्मरण दिलाने वाले मकबरे बनने लगे। छोटे श्मशानों में भी पत्थरों पर स्मृति की जाने लगी। यद्यपि ऐसे कार्यों से दर्शकों का ध्यान खिंचने, कौतूहल बनने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होता था।
एक और जमाना चल पड़ा। पितरों की सुविधा के लिए उनके बैठने की चबूतरी या मठिया बनाई जाने लगी। उनमें कोई उपयोगिता तो नहीं थी, पर अपनी मान्यता के अनुसार यह विचार कर लिया जाता था कि पूर्वज इस कृत्य से सुविधा अनुभव करेंगे और बदले में साँसारिक सुविधा सहायता प्रदान करेंगे।
यह मान्यता भूत-पलीतों से आगे बढ़कर उसी स्तर के देवी-देवताओं तक चली गई। पितर कहीं दूसरी जगह जन्म भी ले सकते हैं और सहायता भी सीमित ही कर सकते हैं, पर उनसे थोड़े ऊंचे दर्जे के देवी-देवता बहुत दिन तक बने रहते और अपने को तथा वंशजों को उस निर्माण के बदले कृतज्ञतापूर्वक सहायता कर सकते हैं। चूँकि हर आदमी कम खर्च में अधिक लाभ उठाना चाहता है इसलिए देवी-देवताओं की छोटी-छोटी मठिया बनाने की प्रथा चल पड़ी और एक की देखा-देखी दूसरे ने वही राह अपनाई।
विशाल देवालयों- धर्म संस्थानों और धर्मशालाओं का उद्देश्य इससे ऊँचा था। ऋषि युग में बौद्ध भिक्षुओं और जैन श्रवणों की तरह साधु सन्तों का प्रवास और धर्मधारणा के निमित्त सत्संगों एवं रचनात्मक कार्यों का प्रयास निरन्तर चलता था। वे भ्रमण करते थे तो स्थान की आवश्यकता पड़ती थी। धर्मशालाएं ऐसे ही सत्संग भवनों और सृजन कृत्यों के केंद्र रूप में बनती थी। देव प्रतिमा इसलिए मन्दिरों में स्थापित की जाती थी कि उनके भोग प्रसाद के नाम पर आगन्तुक अतिथियों की भोजन तथा निर्वाह व्यवस्था चलती रहे। सन्त गण अपने अपने सेवा क्षेत्र भी बाँट लेते थे और उस प्रवेश सज्जनता सेवा भावना बनाये रहने के लिए निरन्तर कार्यरत रहते थे। मिलन परामर्श के लिए- सामयिक आयोजनों के लिए वे धर्म स्थान काम देते रहते थे जिन्हें धर्म प्रयोजन के लिए- आस्तिकता, आध्यात्मिकता की फसल उगाने हेतु बनाया गया।
जब तक ऐसे निर्माण विवेकपूर्वक बनते रहे तब तक उनमें सत्प्रवृत्तियां चलने और चलाये जाने का दबाव डालने का क्रम बना रहा। वह बहुत ही उत्तम व्यवस्था थी। परिव्राजकों का अपना निर्वाह माँगने में समय खर्च नहीं करना पड़ता था वरन् एक ही स्थान पर अनेक लोक सेवियों को निर्वाह की आवश्यक सुविधाएं मिल जाती थीं। यह प्रयत्न व्यक्तिगत रूप से किये गये हों या सामूहिक रूप से, थे उपयोगी और लोकहित की भूमिका निभाने वाले।
विकृतियाँ इस क्षेत्र में भी घुस पड़ीं। धर्म सेवा के स्थान पर जिस देवता का मन्दिर बनाया है उसे अनुगृहीत करने और बदले में मनोकामनाएं पूरी करने की क्षुद्रता ने लोगों के मनों में स्थान बनाया। धर्मशालाएं फोकट की सरायें बन गईं जिसमें सैनानी, व्यवसायी और आवारा लोग अपना अड्डा जमाने लगे। धर्मशाला का अर्थ धर्म प्रयोजनों के निमित्त बना हुआ आश्रय स्तर का निवास होता है, पर किन्तु जब धर्म समागमों का विचार और क्रम समाप्त हो गया तो लोगों ने उन बेकार इमारतों को मुफ्त की सराय के रूप में प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। बनाने वालों ने अपना मन यह सोच कर बहला लिया कि मुफ्त सुविधा देने का अर्थ पुण्य होता है। भले ही उस सुविधा का लाभ पात्र, कुपात्र कोई भी क्यों न उठाये? यह तथ्य विस्मृत हो गया कि रिश्वत देने लेने की तरह कुपात्रों को दान देना भी हेय माना गया है। जो व्यवसायी, सैतानी या बराती गुलछर्रे उड़ाने आया है उससे तो होटलों जैसा किराया वसूल किया जाना चाहिए।
धर्म का सीधा-सा अर्थ है- लोक-मंगल, सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन जो भवन इस काम आये उसे धर्मशाला कहना चाहिए अथवा वह दीवारों पर विज्ञापन पेन्ट कराने की तरह लोकेषणा मात्र हुई। जो भवन यही प्रयोजन करते हों, उनसे लाभ उठाने वाले यदि उचित किराया दें तो यह हर दृष्टि से उचित ही होगा।
आस्ट्रेलिया का महा न्यायवाद अलफ्रंड डीकान लम्बी अवधि तक उस महत्वपूर्ण पद पर रहा। उसके प्रति राजा और प्रजा में असाधारण श्रद्धा थी। उसे तीन बार उस देश का प्रधान मन्त्री बनाया गया। इस आग्रह को उसने कर्तव्य समझ कर स्वीकार किया। तीन बार वह इस नियुक्ति को अस्वीकार भी कर चुक था। पर जब काम सिर पर आ ही गया तो उसे भी महा न्यायवादी स्तर पर ही सम्भालता रहा।
अपने कर्तव्य को निभाने से कभी पीछे नही हटना चाहिए|
साधना में विराम तथा भावी योजना का स्पष्टीकरण
बसन्त पूर्व के दिन अपना संदेश और कर्तृत्व का स्वरूप समझाने, भावी योजना बताने के लिए गुरुदेव ने अपनी साधना में एक छोटा विराम दिया। बसन्त पर्व पर कार्यकर्ता, जीवनदानी, प्रज्ञा पुत्र मिलकर प्रायः पाँच हजार का समुदाय एकत्रित हो गया था। सभी के मन में था कि प्रायः दो वर्ष से उनके दर्शन न हो सके, उनके वचन सुनने को नहीं मिले। उनकी आतुरता एवं गुरुदेव की आत्मीयता का सम्मिश्रित रूप ऐसा बना कि साधना क्रम यथावत् चलाते हुए दो घण्टे नित्य किन्हीं वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों से मिलने का आदेश मिल गया। अस्तु वे गायत्री नगर के प्रवचन मंच पर आये। उन्होंने अब तक की अपनी साधना की सफलता पर प्रकाश डाला। कहा- “वह जीवन के पिछले दिनों की गई साधना से भिन्न है। इसे तपश्चर्या एवं योग साधना का वह स्तर कहा जा सकता है जो सिद्ध पुरुषों ने की और जन साधारण को उसका असीम लाभ पहुँचाया।”
उनकी साधना का आधा भाग 24 लाख प्रज्ञा परिजनों की सेवा, सहायता, प्रगति एवं प्रेरणा के लिए सुरक्षित है। ताकि परिजनों के साथ एक प्रकार का सम्बन्ध विच्छेद जैसा रहने से किसी को यह अनुभव न हो कि हम असहाय हो गये, मार्गदर्शन का सिलसिला टूट गया। कठिनाइयों के समय सहारा देने वाली और अपनी नाव पर बिठाकर पार लगाने वाली शक्ति के सहयोग का सम्बल टूट गया। गायत्री परिवार का सृजन घनिष्ठ आत्मीयता और भाव भरे आदान प्रदान के आधार पर हुआ है। जो लोग इस छाया में एकत्रित हुए हैं, वे पहले जन्मों में भी साथ रहे थे और इस जन्म में भी साथ हैं। सम्भवतः उन्हें अगले दिनों भी साथ ही रहना पड़े। ऐसी दशा में आवश्यक है कि उन्हें उपयुक्त दिशा, प्रेरणा और सामर्थ्य प्रदान करने का वैसा ही सिलसिला चलता रहे जैसा कि अवसर पिछले दिनों मिलता रहा है। गुरुदेव ने कहा कि हमारी अब तक की तथा भावी साधना रूपी सम्पदा में इस समूचे परिकर का हक है और वह भविष्य में भी मिलता रहेगा।
वरिष्ठ परिजनों से मात्र आध्यात्मिक चर्चाओं के लिए ही यह मध्याह्न काल में मिलन-जुलने का अवसर दिया गया है किन्तु यह सदा नहीं चलता रहेगा।
लोगों ने देखा कि गुरुदेव का स्वास्थ्य बिलकुल अच्छा था। उसमें कहीं राई रत्ती भी अन्तर नहीं आया था। जो लोग यह कल्पना या आशंका करते थे कि उनका स्वास्थ्य एकाकी कठोर साधना या अन्य किसी कारण से बिगड़ गया है, उन सभी को गुरुदेव का चेहरा और शरीर देख, ओजस्वी वाणी सुन यह विश्वास हो गया कि वे चाहें तो सौ वर्ष जीवित रहने लायक उनका संयमी जीवन है। उनके मार्गदर्शक ने कोई विशेष मोर्चे पर भेजा या शरीर बदलने को कहा तो वह आदेश तो समर्पित और सच्चे शिष्य की तरह पूरा करेंगे ही, अन्यथा स्वास्थ्य के किसी कारण से उन्हें देह छोड़नी पड़े, ऐसी कोई और बात नहीं है। पिछले दो वर्षों में दो दाँत भर उनके और उखड़े हैं।
साधना उनकी आगे भी चलती रही है। अब तक के दो वर्षों में जो हस्तगत हुआ है, उसे अधिकाधिक मात्रा में नियोजित करना है। संसार की परिस्थितियाँ बिगड़ रही हैं। आस्था संकट की चपेट में आने से बिरले ही बचे हैं। लौकिक दृष्टि से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, विकिरण, प्रकृति प्रकोप, अदृश्य जगत का असन्तुलन, महायुद्ध की तैयारी, महामारी, बेरोजगारी, बढ़ती हुई अनीति और अपराधों की वृद्धि आदि ऐसे कारण हैं, जिनके चलते गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित सभी को हर घड़ी आशंकाओं तथा आतंक से ग्रसित रहना पड़ रहा है। बाढ़, सूखा, भूकम्प ज्वालामुखी आदि के उपद्रव आये दिन खड़े होते रहते हैं। इन सब विपत्तियों ने 500 करोड़ मनुष्यों का भाग्य एवं भविष्य अंधकारमय बना दिया है। जनसंख्या जिस हिसाब से बढ़ रही है, उस हिसाब से आवश्यक साधन नहीं बढ़ रहे हैं। फलस्वरूप दरिद्रता और महंगाई बराबर बढ़ती जा रही है। इन सबको मिलाकर खतरा इतना बढ़ गया है कि समूची पृथ्वी का विनाश तक हो सकता है।
इन परिस्थितियों से लोहा लेने और उन्हें परास्त करने के लिए अध्यात्म शक्ति ही काम देती है। वृत्रासुर के आतंक से छुटकारा पाने के लिए तपस्वी दधीचि की अस्थियों का वज्र बनाया गया था और उसके प्रहार से अनाचार को परस्त किया गया था। दधीचि ने अनौचित्य का ध्वंस किया था और भागीरथ द्वारा पृथ्वी पर लाई गई गंगा ने विविध प्रकार के सृजन कार्यों का दायित्व निभाया था। हमें इन दिनों अकेले ही ध्वंस से जूझने और सृजन को व्यापक समुन्नत बनाने की अध्यात्म भूमिका निभानी पड़ रही है, इसलिए हमारी विशिष्ट साधना चल रही है। इस कड़ी अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण होने की बेला में न हम विचलित हो रहे हैं और न किसी दूसरे को ही विचलित होना चाहिए। प्रहलाद और ध्रुव जिस कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हुए थे, उसमें हमें भी असफल होते नहीं देखा जाएगा।
साथ ही हम अपने निजी परिवार के अण्डे बच्चों का भी परिपोषण यथावत् करते रहेंगे। किसी को भी जुदाई की व्यथा सहन न करने देंगे। शरीर का बार-बार साक्षात्कार न होने या वार्त्तालाप का अवसर न मिलने से ही किसी को यह नहीं सोच लेना चाहिए कि सम्बन्ध सूत्र टूट गया। सच तो यह है कि वह और भी अधिक सघन हुआ है। उसमें और भी अधिक दृढ़ता आई है।
फिर भी किसी को सान्निध्य की, प्रत्यक्ष विचार विनिमय की आवश्यकता हो तो उसका तरीका यह है कि दस बार गहरे प्राणायाम करें। इसके उपरान्त दाहिना हाथ दस बार सिर पर फिरायें। इसमें अपने निजी विचार तिरोहित हो जायेंगे और हमारे विचार आपके मस्तिष्क में गूँजने लगेंगे। इस कार्य के लिए प्रातःकाल का समय ही सर्वोत्तम है। यह सबसे सस्ता वायरलैस है। इसका प्रयोग कोई भी कर सकता है। हमारे विचार ऊँचा उठाने वाले, सन्मार्ग दिखाने वाले ही हो सकते हैं। यदि कभी कुविचारों की प्रेरणा मिले तो समझना चाहिए कि बीच में ही कोई शैतानी करतूत आ धमकी। ऐसी दशा में अदृश्य विचार विनिमय को पर्याप्त न मानकर पत्र द्वारा शान्ति-कुंज से अपने प्रसंगों का समाधान कर लेना चाहिए।
इस वर्ष के लिए हमने जो कुछ कार्य अपने परिवार के लिए, परिजनों के लिये निश्चित किये हैं, वे बाल सुलभ हैं। नितान्त सरल हैं तो भी बहुत ही महत्व के हैं और उनसे हमारी निज की साधना में तथा उठाई हुई जिम्मेदारी को पूरा करने में असाधारण सहायता मिलेगी।
इस वर्ष के संकल्पों में प्रथम है एक लाख कुण्डों का यज्ञ। यह कहीं एक जगह या बड़े रूप में नहीं होगा। एक लाख वरिष्ठ परिजन अपने-अपने घरों पर अपना जन्मदिन मनायेंगे। एक-एक कुंड की वेदी, सुसज्जित यज्ञ मण्डप, कथा कीर्तन का प्रबन्ध सरलता से हो सकता है। यह परिवार निर्माण की प्रक्रिया है। इससे उस घर परिवार की सुरक्षा एवं प्रगति में सहायता मिलेगी। व्यक्तित्व का उभार या प्रतिभा का प्रसार होगा। प्रगति का द्वार खुलेगा।
इसके लिए स्थानीय शाखा संगठन को सारा सरंजाम सामूहिक रूप से लेना चाहिए ताकि हर जन्मदिन मनाने वाले को अनावश्यक दौड़-धूप न करनी पड़े।
जनक और याज्ञवल्क्य संवाद में आता है कि यदि यज्ञ को आवश्यक माना गया है तो उसके लिए खर्च की राशि और साधन कैसे जुटें? गरीब उसे कैसे कर सके? तो उसके उत्तर में याज्ञवल्क्य ने कहा मात्र समिधाओं का हवन करते हुए भी यज्ञ हो सकता है कि गुड़, घी और स्थानीय क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली सौम्य वनस्पतियों को मिलाकर हवन कर लिया जाय। आशा की जानी चाहिए कि इतनी गरीबी किसी के भी आगे न आएगी और वनस्पतियों की हवन सामग्री से ही प्रत्येक परिजन का जन्म दिवसोत्सव मनाया जा सकेगा।
इस वर्ष समर्थ शाखाओं की महीने में एक पाँच वेदी का हवन सामूहिक रूप से अवश्य करना चाहिए। उससे सारे गाँव की परिकर की सुरक्षा होगी।
स्मरण रहे कि एक कुंडी, पाँच कुंडी यज्ञ से बढ़कर बड़ा यज्ञ कहीं भी किसी को भी नहीं करना चाहिए। उसके विशेष कारण हैं। समय आने पर उसे भी प्रकट करेंगे। बड़े यज्ञों में- बहुत चन्दा इकट्ठा करने में चोरी चालाकी की पूरी-पूरी गुंजाइश रहती है। हम चाहते हैं कि सात लाख भारत के गाँवों में से प्रत्येक में यज्ञ हो, पर वे हों इस महान परम्परा को जीवन्त रखने एवं वातावरण में उपयुक्त प्रभाव उत्पन्न करने के लिए ही। उसका आकार इतना न बढ़ाया जाय कि उसमें शैतान की आँत घुस पड़े।
दूसरा संकल्प हमारा यह है कि एक लाख प्रज्ञा प्रचारक तैयार किये जायें जो देश और विश्व के कोने-कोने में युग चेतना का आलोक वितरण कर सकें। इसके लिए संगीत को माध्यम चुना गया है। वह शिक्षितों और अशिक्षितों को समान रूप से प्रभावित करता है। भावनाओं के मर्मस्थल तक जा पहुँचता है। संगीत के साथ भी प्रवचन के छोटे-छोटे टुकड़े जोड़े जा सकते हैं और उससे भजनोपदेशक की शैली निखर सकती है। मध्यकाल के प्रायः सभी सन्तों ने अपना प्रचार क्षेत्र प्रवचन संगीत, के माध्यम से ही व्यापक बनाया था। अपनी शैली भी भविष्य में यही होगी। गायकों को प्रथम और वक्ताओं को दूसरा स्थान दिया जायगा।
धर्म प्रचारक विद्यालय हर गाँव में चलना चाहिए। इनके जिम्मे स्थानीय कार्य होंगे और वे किस तरह पूरे किये जा सकेंगे, इस विधा को उन्हीं प्रज्ञा विद्यालयों में सिखाया जाएगा, जो हर गाँव में- 1 लाख गाँवों में इसी वर्ष खुलने चाहिए।
इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि हर गाँव में हर क्षेत्र से शान्ति-कुंज में एक महीना प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए एक प्रतिभाशाली व्यक्ति भेजा जाएगा। शान्ति-कुंज में ऐसी व्यवस्था की गई है कि एक महीने का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में कार्यकर्ता आ सकें और इस योग्य बनकर जा सकें कि अपने यहाँ और अपने समीपवर्ती क्षेत्र में प्रज्ञा प्रचारक विद्यालयों का संगठन, शिक्षण एवं सूत्र संचालन कर सकें।
यह नये ढंग की नई योजनाओं का प्रशिक्षण है। जो पिछले वर्षों में कभी युग शिल्पी सत्रों में आ चुक हैं, उन्हें भी सन् 89 के सत्रों में सम्मिलित होने की तैयारी करनी चाहिए। अपना पूर्व परिचय लिखकर ही समय से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करनी चाहिए। बिना स्वीकृति के प्रवेश न मिल सकेगा।
तीसरा संकल्प यह है कि इस वर्ष न्यूनतम 24 लाख पेड़ लगाये जाएं। यज्ञ की तरह वृक्ष भी वायु शोधन का कार्य करते हैं या उनकी बहुलता से जन साधारण पर मानसिक सत्प्रभाव पड़ता है। वर्षा आने से पूर्व ही इसकी तैयारी करके रखनी चाहिए।
मिशन का प्रभाव और प्रयास को बढ़ता देखकर जन श्रद्धा का शोषण करने के लिए कई आडम्बरी अपने-अपने अलग शितून खड़े कर रहे हैं। मिशन को छिन्न-भिन्न करके निजी महत्वकांक्षाओं को पूरी करने वाली आत्मघाती विडंबनाएं रच रहे हैं, दुष्प्रचार कर रहे हैं। इन पंक्तियों में तो उनसे सतर्क रहने भर का संकेत किया गया है। आवश्यकतानुसार अगले अंक में उनका भण्डा-फोड़ भी करेंगे जिससे रंगे सियारों की करतूतों से जन-साधारण को आवश्यक जानकारी प्राप्त हो सके। वे दिग्भ्रान्त होने से बच सकें।
यों पुराने मन्दिरों की जीर्णोद्धार और तीर्थयात्रा के युगधर्म के अनुरूप प्रचलन की योजना भी सामने है। पर अभी इतना ही पर्याप्त होगा कि उपरोक्त तीन कार्यों को हाथ में लिया जाय और उन्हें पूरा करके दिखाया जाय। प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक से यह अनुरोध, आग्रह, निर्देशन एवं मार्गदर्शन है।
एक मनुष्य सड़ता है तो समूचे वातावरण को दुर्गन्ध और कुरुचि से भर देता है।
(मंगल विजय)
चैन आता नहीं, प्यार बाँटे बिना, क्या करूं, प्यार की धार रुकती नहीं। कौन, कितना, अभी तक, इसे पी सके, यह पता तो नहीं, किन्तु चुकती नहीं॥ 1॥
स्नेह को स्रोत से, फूटते हर समय। छल छलाकर, छलक, छूटते हर समय। कोई लूटे, न लूटे कहो क्या करें, हम लुटाकर मजा लूटते हर समय॥
जीत ही जीत है बाँटने में सदा, एक क्षण, द्वारा पर, हार रुकती नहीं। चैन आता नहीं, प्यार बाँटे बिना, क्या करूं, प्यार की धार रुकती नहीं॥ 2॥
यह पता है कि प्यासे बहुत हैं अभी। प्यार के बिन उदासे बहुत हैं अभी। प्यार के नाम पर लूट ही लूट हैं, इस तरह के तमाशे बहुत हैं अभी।
वास्तव में जरूरत जहाँ प्यार की, प्यार की धार, उस द्वार, रुकती नहीं। चैन आता नहीं, प्यार बाँटे बिना, क्या करूं, प्यार की धार रुकती नहीं॥ 3 ॥
इसलिये प्यार की धार बहती सदा। हर समय धार, हर भार सहती सदा। वह उतर जाये, हर प्यास का कठ में, प्यार की धार की साध रहती सदा॥
देखकर हर तड़पती हुई प्यास को, प्राण से प्रीति-बौछार रुकती नहीं। चैन आता नहीं, प्यार बाँटे बिना, क्या करूं, प्यार की धार रुकती नहीं॥ 4 ॥
प्यार की धार तो खेलती प्राण पर। बूँद टिकती न पर, शुष्क पाषाण पर। प्यास की पीर से जो पिघलने लगे, क्यों नहीं, वह हृदय, आज इंसान पर॥
कोई उर्वर-धरा तो न प्यासी रहे, इसलिये यह द्रवित-धार रुकती नहीं। चैन आता नहीं, प्यार बाँटे बिना, क्या करूं, प्यार की धार रुकती नहीं॥ 5॥
*समाप्त*