आत्म विजेता ही विश्व विजेता

साधना का तात्पर्य है- आत्मानुशासन। अपने ऊपर विजय प्राप्त करने वाले को सबसे बढ़कर योद्धा माना गया है। दूसरों पर आक्रमण करना सरल है। बेखबर लोगों पर हमला करना तो और भी सरल है। इसलिये आक्रमणकारियों को योद्धा कहने का औचित्य कम ही है।

असली शत्रु हमारे कुसंस्कार हैं- जो पशु प्रवृत्तियों के रूप में अन्तरंग ही उत्कृष्टता को दबाये बैठे रहते हैं और उत्कृष्टता की दिशा में एक कदम बढ़ाने की तैयारी करते ही भारी अड़चन बनकर द्वार रोकते हैं। इनसे निपटना कम बहादुरी का काम नहीं है।

घुन लकड़ी को और विषाणु स्वास्थ्य को चौपट करते हैं। व्यसन और दुर्गुण ही मनुष्य को नीचे गिराते हैं और उसके अभ्युदय का कोई प्रयास सफल नहीं होने देते।

यदि हम अपने असली शत्रुओं को समझ पायें और उनकी जड़ों को उखाड़ पायें तो समझना चाहिए कि परम पुरुषार्थ कर गुजरने में सफलता पाई। आत्म विजेता को ही विश्व विजेता कहा है।


स्वर्ग क्या? मुक्ति कैसे?

व्यक्तिगत स्वर्ग और मुक्ति की बात सोचना अब हमें छोड़ देना चाहिए और समझना चाहिए कि इन्हें विखण्डित नहीं किया जा सकता। इनकी उपलब्धि कितनी ही मन्द गति से क्यों न हो- मिलेगी एक साथ ही। स्वर्ग मिलने की सम्भावना तभी है, जब जिस समाज में अपना रहना है, वह समुन्नत हो। निकृष्ट व्यक्तियों के साथ निकृष्ट वातावरण में रहते हुए हम अपना चरित्र एवं मानसिक सन्तुलन बनाये नहीं रह सकते। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों की प्रतिक्रिया सज्जनों पर भी होती है। फलस्वरूप वे अपनी उत्कृष्टता बनाये नहीं रह सकते। ऐसी दशा में कोई व्यक्ति सन्त या सज्जन ही क्यों न हो- स्वर्ग की प्राप्ति न कर सकेगा। डाकुओं के बीच धनी का निर्वाह नहीं हो सकता, उसे कभी भी कोई दबोच लेगा। उत्कृष्टता यों उत्पन्न तो हरेक में हो सकती है, पर उसका पोषण और अभिवर्धन परिस्थितियों के खाद पानी से ही होगा। अकेले सुधरने से ही काम नहीं चलेगा, दूसरों को सुधारते हुए अपना सुधार सम्भव है। दूसरों को तारने का उपक्रम करते हुए हम भी तर सकते हैं।

कोई देश पराधीन हो तो उसका एक भी नागरिक स्वाधीन नहीं हो सकता, स्वतन्त्रता पूरे देश को मिलेगी तभी उसका आम नागरिक भी स्वतन्त्र कहला सकेगा। दोष-दुर्गुणों से– कषाय-कल्मषों से, स्वार्थ और संकीर्णता से छुटकारा पाना ही मुक्ति है। लोभ और मोह को ही भवबन्धन कहा गया है। केवल ईश्वर से डरें और कर्त्तव्य पालन पर अडिग रहें तो फिर हमें किसी से भी डरने की आवश्यकता न पड़ेगी। जिसने कायरता को जीत लिया उसे समर्थ, स्वतन्त्र और निर्भय कहा जा सकता है। प्रलोभनों के आगे न झुकें, अनीति के आगे अधिक आपत्ति आने के डर से घुटने न टेकें- अनौचित्य को अस्वीकृत कर केवल विवेक संगत और न्याय समर्थित को ही अंगीकार करें तो समझना चाहिए, कि आत्मिक प्रगति को अवरुद्ध करने वाले असुरों पर विजय प्राप्त कर ली। आध्यात्मिक भाषा में मुक्ति का यही अर्थ है। जहाँ भगवान और भक्त दो ही रह जाएं- व्यक्ति और आदर्श दो का ही अस्तित्व हो- अवाँछनीय प्रवृत्तियों के घुस पड़ने की जहाँ सम्भावना न हो- ऐसी मनःस्थिति को ही जीवन मुक्ति कहते हैं। यही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।

किन्तु यह मुक्ति भी एकाकी नहीं हो सकती, जिस प्रकार सारे देश को विदेशी गुलामी से मुक्त कराया जाता है, उसी प्रकार समस्त मानव समाज को निकृष्ट-चिन्तन व अवाँछनीय कर्तृत्व से विरत करना होगा। अन्यथा एक के कषाय-कल्मष दूसरे पर आच्छादित हुए बिना न रहेंगे। सूखी लकड़ी के साथ-साथ गीली लकड़ी भी जल जाती है। छूत की महामारी शुद्ध रक्त वालों को भी चपेट में ले लेती है तात्पर्य यह है कि कुछ ही मनुष्य सन्त बनकर मुक्ति के अधिकारी बन जाएं- यह नहीं हो सकेगा।

एलविक्य विश्व का सबसे ठिगना आदमी है। सिकन्दरिया में रहने वाले इस व्यक्ति की लम्बाई मात्र 16 इंच है। जब इसे सैर करने की इच्छा होती है, तो छोटे से पिंजड़े में डाल कर ले जाया जाता है।

भगवान बुद्ध ने इस तथ्य को समझा था, वे कहते थे- “संसार के समस्त प्राणियों के मुक्त हो जाने के उपरान्त ही मुझे मुक्ति मिलेगी। तब तक मैं बार-बार जन्म लेता और मरता रहूँगा। मुक्ति के लिये प्रयत्नशील तो रहूँगा, पर वह सर्वजनीन होगी, मेरे अकेले के लिए नहीं।”

ऋषि ने ठीक ही कहा है मुझे राज्य, सुख, स्वर्ग और मुक्ति आदि की कामना नहीं, दुख-तप्त प्राणियों के कष्ट निवारण की ही कामना है।”

स्वर्ग उत्कृष्ट चिन्तन का नाम है और मुक्ति आन्तरिक दुर्बलताओं से छूटना। यह विभूतियाँ समस्त मानव-समाज को उपलब्ध हो सकें, तभी व्यक्ति विशेष का कल्याण होगा।


बहिरंग और अन्तरंग की विसंगति

विकास के बहिरंग क्रिया-कलापों से बहुत लोग परिचित हैं पर भूलते प्रायः उसी पक्ष को रहते हैं जिसे आत्म विकास कहते हैं। व्यक्ति मोटे तौर से बहिर्मुखी है। ज्ञान उसे इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है। इन्द्रियों में एकपक्षीय शक्ति है। वह उसी को देख सकती है, जो बाहर है। उसी का रसास्वादन कर सकने की भी क्षमता है। इस आधार पर हमें जो ज्ञान प्राप्त है वह एकाँगी एवं अधूरा है।

दूरबीन आँखों पर लगा कर दूर तक के दृश्य देख सकते हैं पर उस आँख को नहीं देख सकते जो दृष्टा है।

नेत्र गोलक में कहाँ क्या खराबी है या उसकी सुन्दरता में क्या न्यूनाधिकता है इस बता सकना दूरबीन के बलबूते की बात नहीं है। कान बाहर के शब्दों को सुनते हैं। ध्वनियों को पहचानते और उनके मध्यवर्ती अन्तर की विवेचना करते हैं पर यह नहीं समझ पाते कि उनकी आन्तरिक संरचना कैसी है? नाक सूँघ कर सुगंध और दुर्गन्ध का अन्तर करती है पर यह नहीं जानती कि उसकी भीतरी परतों में उभर रहे जुकाम का क्या स्वरूप और कारण है?

स्कूल में हमें बहिरंग ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बताया जाता है। पेड़ पौधों के उत्पत्ति, ऋतु परिवर्तन, प्राणियों की आकृति प्रकृति, धरती की भौगोलिक स्थिति, पदार्थ का मूल स्वरूप और उसका परिवर्तन किस प्रकार होता है इसकी जानकारी को एक के बाद दूसरी कक्षा में पढ़ाया जाता है। इन विषयों में अधिक जानकारी को विद्वान कहते हैं। वे इतिहास भी पढ़ा सकते हैं और यह बता सकते हैं कि किन प्रदेशों के लोगों की परिस्थितियाँ और मान्यताएँ क्या हैं? इतनी अधिक जानकारियों का संग्रह रखने पर भी वे यह नहीं जानते कि मनुष्य की व्यक्तिगत सत्ता क्या है? और वह किस प्रकार विकसित एवं अधःपतित होती है? एक व्यक्ति जिन परिस्थितियों में दुखी, चिन्तित और हैरान रहता है उन्हीं में दूसरा क्यों मस्ती में दिन गुजारता है और अपने सौभाग्य को सराहता है? इस अन्तराल की भिन्नता और उसकी आन्तरिक मनःस्थिति में विसंगति बने रहने का कारण क्या है? वह यह नहीं जानता। बाहर की बातों में प्रवीणता और दृष्टा के स्वरूप के बारे में अनजान रहने वाली इस स्थिति को भौतिक जानकारी कहा जाता है। आमतौर से लोग इसी के बारे में जानकार होते हैं और इसी संदर्भ को विद्यालयों में पढ़ते हैं।

जानकारी जितनी अधिक हो उसे मस्तिष्कीय विकास कहा जा सकता है। मन-मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने का काम पुस्तकें करती हैं। अध्यापक कराते हैं। इसके अतिरिक्त जो कुछ अन्य सूत्रों से जानकारियाँ प्राप्त करते हैं वही हमारी ज्ञान सम्पदा है। जो जितना बहुज्ञ है, वह उतना ही बड़ा जानकार या विद्वान माना जाता है।

इतने पर भी उसकी यह समस्त मिली-जुली जानकारी अपूर्ण है क्योंकि वस्तुओं का स्वरूप जान लेने पर भी वे हमारे ऊपर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ क्यों छोड़ती हैं, इस सम्बन्ध में हम नहीं के बराबर जानते हैं। एक वृक्ष को चित्रकार उसकी शोभा सुषमा वाले पक्ष से देखता है। बटोही उसकी नीचे कैसी और कब तक छाया मिल सकती है इस आधार पर एवं लकड़हारा उसकी लकड़ी के बाजारू मूल्य का अनुमान लगाता है। बात तीनों की ही सही है पर उन मूल्याँकनों के बीच इतना अन्तर क्यों है? इस दृष्टिकोण की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो आधारभूत कारण हैं उनसे वह प्रायः अनभिज्ञ ही रहता है।

एक भवन को पुरातत्त्ववेत्ता, इतिहासज्ञ, शिल्पी, सैलानी अलग-अलग दृष्टि से सोचते और उसके सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के अनुमान लगाते हैं। विक्रेता और खरीददार तक एक ही वस्तु की व्याख्या अपने स्वार्थ को प्रधानता देते हुए करते हैं। आँखों से दृश्य प्रायः एक ही जैसे लगते हैं पर उनकी व्याख्या विवेचना करने का समय आने पर कथनोपकथन में इतना अन्तर क्यों पड़ जाता है? इसे समझ पाना तो दूर उसे समझने की आवश्यकता तक नहीं समझी जाती।

इसका कारण है हमारी परं के प्रति अभिरुचि जो उनसे मिल सकने वाले लाभों की कल्पना पर निर्भर रहती है। इस कल्पना में लाभ ही नहीं हानि के आधार भी जुड़े रहते हैं। हिरन को उछलते, खरगोश को फुदकते और मोर को नाचते समय जो प्रसन्नता होती है, वह बाघ की दहाड़ सुनकर या दूर से ही उसकी शक्ल देखकर सर्वथा विपरीत हो जाती है। प्रिय जन्तुओं को अधिक निकट से और अधिक देर तक अवलोकन करने की इच्छा होती है पर बाघ, भेड़िये के निकट होने का परिचय मिलते ही होश उड़ जाते हैं और आत्मरक्षा के प्रयत्न करने की बात सोचते हैं। पशुओं की अंग रचना में सामान्य भेद होता है। देखने मात्र से वे हमारा कुछ बनाते बिगाड़ते भी नहीं किन्तु उनकी उपस्थिति से जो प्रतिक्रिया होती है उसके बीच भारी अन्तर रहता है। इस अन्तर करने वाले का निज का स्वरूप एवं गठन क्या है उसके बारे में उस भिन्नता का कारण नहीं जानते। जिसने सिंह की आकृति और प्रकृति के सम्बन्ध में पहले कुछ जाना सुना नहीं है उसे सम्भवतः डर भी न लगे और आत्मरक्षा का उपाय भी न सोचना पड़े।

इन उदाहरणों से हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि वस्तु का स्वरूप ही सब कुछ नहीं है। उसके सम्बन्ध में अधिक जानकारी का उपयोगिता अनुपयोगिता का परिचय होना भी आवश्यक है। आँखें न हों तो दृश्य कैसे दिखें? कान बहरे हों तो परामर्श या निन्दा स्तुति का बोध कैसे हो? जिव्हा सत्ता शून्य हो तो स्वादों का रसास्वादन कैसे बन पड़े? यही है हमारी जानकारी की अपूर्णता जो बाहर की जानकारी देती है, पर अपने चिन्तन तन्त्र के परोक्ष होने के कारण उसका आधारभूत कारण समझाने से वंचित ही रखती है।

शरीर को हम देख सकते हैं। उसे छूकर बनावट से भी अवगत हो सकते हैं। किन्तु जब किन्हीं अवयवों के भीतर दर्द होने लगता है तो यह नहीं समझ पाते कि कहाँ क्या गड़बड़ी हुई है? इसके लिए डाक्टर के पास जाना और परामर्श करना पड़ता है। अपने मित्र सम्बन्धियों से परिचित होते हुए भी यह नहीं समझ पाते कि इनके प्रति किन दायित्वों और वर्जनाओं का पालन करना चाहिए। लोकाचार वश प्रचलन की जानकारी भी हो तो भी यह आस्था नहीं उभरती कि जो करना चाहिए वही सोचते या करते हैं या नहीं। कई बार कथनी और करनी के बीच आकाश, पाताल जैसा अन्तर होता है। ठग और अनाचारी अपना बाहरी परिचय जैसा देते हैं, वैसा व्यवहार नहीं करते। जो योजना होती है, उसे प्रकट नहीं करते हैं और मित्रता की बात कहते हुए भी शत्रुता जैसा आचरण करते हैं।

यह विसंगतियाँ क्यों होती हैं? इसका कारण एक ही है कि हम दुनिया का स्वरूप भर देख और समझ पाते हैं पर मूल्याँकन करने का जो सही तन्त्र है उसकी भिन्नता एवं रीति-नीति का विश्लेषण विवेचन नहीं जानते। हम दृश्य को देखते हैं और अपनी जानकारी के आधार पर उसकी प्रतिक्रिया का अनुमान लगाते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि दृष्टा का दृश्य के बीच अन्तर करने वाली और अनुभूतियों की भिन्नता का अनुभव कराने वाली प्रणाली में क्या अन्तर है? यहाँ कारण यह है कि दृश्यों को देखकर जो प्रतिक्रियाएँ होती हैं वह अपनी निज की नहीं कही-सुनी और समझी होती हैं। उनकी वास्तविकता के बीच भारी अन्तर होता है। यह कारण है कि दुहरे व्यक्तित्व के कारण अक्सर हम भटकते और वह निर्णय करते हैं जो नहीं करने चाहिए।


Quotation

फूल बैठा, सिर धुन रहा था। फल पाने की मेरी कामना न जाने कब पूर्ण होगी। न जाने कामना पूर्ति का वरदान कब उतरेगा?

चाँदनी हँस पड़ी। उसने कहा- देखते नहीं! फल का अस्तित्व तुम्हारे भीतर ही पल रहा है। तनिक प्रौढ़ तो बनो। तुम स्वयं फल में परिणत होगे।


इस सृष्टि का कोई सृजेता है अवश्य!

यह एक विचारणीय प्रश्न है कि इस गतिशील विश्व ब्रह्मांड के लिए जो कार्यकारणता, परस्पर सम्बद्धता, सन्तुलन, संकोचन, संरक्षण, प्रसारण, घात-प्रतिघात और क्रिया-प्रतिक्रिया अपेक्षित है और जो युग-युगान्तरों से चलती आ रही है, वह बिना बुद्धि के कैसे सम्भव है? यदि कोई बुद्धिमान सृष्टा नहीं है, जो अपनी सृष्टि के माध्यम से और उसके अन्दर कार्य करे तो ये सब क्रियाएँ समस्त प्रकृति के अन्दर कैसे जारी रह सकती हैं?

थामस डेविड पार्क्स नामक एक गवेषणा रसायनविद् ने विश्व की इसी सूत्रबद्धता के बारे में यह कहा है कि “मेरे चारों ओर जितना भी यह अजैव या इनौर्गेनिक संसार है, मैं उसमें नियम और प्रयोजन देखता हूँ। मैं विश्वास नहीं करता कि वे सब पदार्थ वहाँ अकस्मात हैं या परमाणुओं के आकस्मिक संघात से बने हैं। मेरे लिए तो उस नियम का अर्थ है बुद्धि और इस बुद्धि को मैं परमात्मा कहता हूँ। पार्क्स आगे और कहता है कि शायद किसी रसायनविद् के लिए तत्वों की नियतकालिक व्यवस्था सबसे अधिक आकर्षक विषय हो। रसायनशास्त्र का नया अध्येता सबसे पहले जिस चीज को सीखता है वह है तत्वों में कालक्रम या नियमबद्धता। इस क्रम का अनेक तरह से वर्णन और वर्गीकरण किया गया है किन्तु सामान्यतया इस शताब्दी के रूसी रसायनविद् मेडेलीव को अपनी कालक्रमिक तालिका का श्रेय देते हैं। इस व्यवस्था से न केवल ज्ञात तत्वों और समासों (कम्पाउण्डों) का पता लगता है, किन्तु जिन तत्वों की अभी तक खोज नहीं हुई उनकी गवेषणाओं के लिए भी प्रेरणा मिलती है। तालिका की जो क्रमबद्ध व्यवस्था है उसमें खाली स्थानों को देखकर उन तत्वों की कल्पना पहले से ही कर ली गई है। अज्ञात और नए समासों के गुणों का पूर्वकथन करने में तथा उनकी प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करने में सहायता के लिए रसायनविद् आज भी उस कालक्रम तालिका का प्रयोग करते हैं। वे रसायनविद् सफल हुए हैं, यही इस तथ्य की सबल साक्षी है कि अजैव या इनौर्गेनिक संसार में सुन्दर क्रम विद्यमान है। अपने चारों ओर हमें जो क्रमबद्धता दृष्टिगोचर होती है वह अन्धाधुन्ध और विवेकहीन ढंग से सर्वव्यापक नहीं है। उसमें कल्याण और हित की भावना भी समाविष्ट है- जो इस तथ्य की साक्षी है कि उस दिव्य बुद्धिमान सत्ता को भलाई और सुख की भी उतनी ही चिन्ता है जितनी प्रकृति के अचल नियमों की। यदि आपको अपने चारों ओर इस बात के कहीं अपवाद नजर आते हैं तो वे आपकी बुद्धिमत्ता के नियमों को ही चुनौती दे सकते हैं।

उदाहरण के लिए पानी को ही ले लीजिए। फार्मूला के अनुसार उसका जो भार है- 18। इससे हरेक यह कहेगा कि इसे सामान्य तापमान और दबाव में गैस होना चाहिए। अमोनिया का फार्मूला के अनुसार भार है 17 और वह -33 सेन्टीग्रेड जितने कम तापमान पर भी वायुमण्डल के वर्तमान दबाव में गैस ही है-कालक्रम तालिका में स्थिति के हिसाब से हाइड्रोजन सल्फाइड का पानी से घनिष्ठ संबंध है और उसका फार्मूला भार है- 34 और वह - 59 सेन्टीग्रेड तापमान पर भी गैस ही है किन्तु सामान्य तापमान पर भी पानी सर्वथा द्रव ही रहता है। यह ऐसी बात है जिस पर किसी को भी रुककर सोचने को बाधित होना पड़ेगा। विश्व-प्रसिद्ध जीव भौतिकीविद् फ्रैंक ऐलन ने इसी “पानी के बारे में कहा कि “पानी के चार विशिष्ट गुण हैं। कम तापमान पर भी आक्सीजन की भारी मात्रा जज्ब करने की पानी में ताकत है। जमने से पहले पानी का अधिकतम घनत्व 4 सेन्टीग्रेड पर होता है जिसके कारण झीलें और नदियाँ तरल बनी रहती हैं और पानी की अपेक्षा कम घनता वाला होने के कारण बर्फ पानी की ही सतह पर तैरती रहती है और जब पानी जमने लगता है तब ताप की भारी मात्रा छोड़ता है जिसके कारण भी भरी सर्दियों में समुद्रों, झीलों और नदियों में जीवधारियों का जीवन सुरक्षित रहता है।” इस तथ्य से सुस्पष्ट है कि परमात्मा ने समस्त विश्व की रचना के पीछे अपना भद्र और शिवतर स्वरूप प्रकट किया है।

फ्रैंक ऐलन ने संसार का उद्भव अकस्मात् हुआ अथवा सप्रयोजन, इस तथ्य पर बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण विचार प्रकट किया है। वे कहते हैं कि, “कभी-कभी यह ख्याल प्रकट किया जाता है कि इस भौतिक विश्व के किसी सिरजनहार की जरूरत नहीं है। किन्तु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विश्व की सत्ता है। इसके उद्भव के लिए चार हल प्रस्तुत किये जा सकते हैं। प्रथम, यह कि यह निरा भ्रम है- जो अभी कही गई बात के विपरीत है, द्वितीय, यह कि यह असत् से स्वयं उत्पन्न हो गया, तृतीय, यह कि इसकी उत्पत्ति हुई ही नहीं, यह सदा से विद्यमान है, और चतुर्थ, यह कि यह उत्पन्न किया गया है। जो पहला हल पेश किया गया है यदि उसे माना जाए तो उसका अभिप्राय यह होगा कि मानवीय चेतनता की तत्व मीमांसीय समस्या के अलावा हमारे लिए और कोई समस्या नहीं रहेगा जिसे हल करना हो, और वह चेतनता भी एक भ्रम मात्र ही होगी। दूसरा यह विचार भी कि पदार्थ और ऊर्जा के मेल से बना यह संसार अभाव में से पैदा हो गया इतना वाहियात है कि वह विचार करने योग्य ही नहीं है। तीसरा जो यह विचार है कि संसार सदा से है, इसकी भी एक बात सृष्टि की सकर्तृकता के सिद्धान्त से मिलती है या जो शक्तिगर्भित जड़ पदार्थ सदा से है, या कोई बनाने वाला सृष्टि का कर्ता सदा से है। जितनी बड़ी बौद्धिक कठिनाई एक विचार में है, उससे कम दूसरे विचार में नहीं है। किन्तु उष्मा गतिकीय (थर्मोडायनेमिक्स) के नियमों से पता लगता है कि, संसार ऐसी अवस्था को प्राप्त होता जा रहा है जबकि सभी पिण्डों का एक जैसा अत्यन्त कम तापमान रह जाएगा और उनमें शक्ति भी शेष नहीं रहेगी। तब प्राणियों का जीवन धारण करना असम्भव हो जाएगा। अनन्त काल में शक्ति समाप्ति की यह अवस्था कभी न कभी तो आएगी ही यह इतनी गर्मी देने वाला सूरज और तारे, असंख्य जीवधारियों को अपनी गोद में लपेटे यह पृथ्वी, इस बात के पक्के सबूत हैं कि सृष्टि का उद्भव किसी न किसी काल में, काल भी एक निश्चित अवधि में घटित हुआ है, और इसलिए इस विश्व का कोई न कोई रचयिता होना चाहिए। एक महान प्रथम कारण, एक शाश्वत, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान सृष्टा अवश्य होना चाहिए और यह सारा विश्व उसी की कारीगरी है।”

फ्रैंक ऐलन के मतानुसार “जीवन धारण करने योग्य बनने के लिए पृथ्वी ने जितने रूप बदले हैं वे इतने अधिक हैं कि उन्हें आकस्मिक नहीं माना जा सकता।” पृथ्वी का आकार आदि का नपा-तुला होना भी एक आश्चर्य का कारण है। वे कहते हैं कि, “कभी-कभी आकाश की विशालता की तुलना में पृथ्वी के छोटे आकार की चर्चा करके असमानता का उल्लेख किया जाता है किन्तु यदि पृथ्वी का आकार भी उतना ही छोटा होता, जितना चन्द्रमा का है, अर्थात् वर्तमान व्यास से उसका व्यास केवल 1/4, होता तो गुरुत्वाकर्षण की शक्ति (पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति छह गुना कम है) वायुमण्डल को सम्भाल सकती, न पानी को और तापमान भी इतना सीमातीत होता कि जीवन धारण करना कठिन हो जाता। यदि पृथ्वी का व्यास वर्तमान व्यास से दुगना कर दिया जाता तो बढ़ी हुई पृथ्वी की धरातल वर्तमान धरातल से चौगुना होता और गुरुत्वाकर्षण शक्ति दुगनी हो जाती। जिसका परिणाम यह होगा कि वायुमण्डल की ऊँचाई खतरनाक रूप से घट जाती और उसका दबाव भी 15 से 30 पौण्ड प्रति वर्ग इंच बढ़ जाता जिसका जीवन भर गम्भीर घातक असर पड़ सकता था। सर्दी वाले क्षेत्र खूब बढ़ जाते और प्राणियों के बसने योग्य क्षेत्र में भारी कमी हो जाती।

यदि और भी कल्पना करें कि पृथ्वी का आकार सूरज जितना बड़ा हो जाए, किन्तु उसकी सघनता ज्यों की त्यों कायम रहे, तो उसकी गुरुता 150 गुनी बढ़ जाएगी, वायुमण्डल की ऊँचाई घटकर केवल चार मील रह जाएगी, पानी का भाप बनकर उड़ना असम्भव हो जाएगा और वायु का दबाव प्रति इंच 1 टन से अधिक बढ़ जाएगा। 1 पौण्ड के प्राणी का वजन तब होगा 150 पौण्ड, और मानवों का आकार घटकर इतना छोटा हो जाएगा जैसे गिलहरी, इस प्रकार के प्राणियों में किसी भी प्रकार के बौद्धिक जीवन की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। सूर्य से पृथ्वी की अब जितनी दूरी है यदि उस दूरी को दुगुना कर दिया जाए तो जितनी गर्मी अब मिलती है वह घटकर चौथाई रह जाएगी, अयन में घूमने का उसका वेग केवल आधा रह जाएगा, सर्दियों में उसका मौसम लम्बाई में दुगुना हो जाएगा और सब प्राणी ठण्ड के मारे जम जायेंगे। यदि सूर्य से पृथ्वी की वर्तमान दूरी आधी कर दी जाए तो सूर्य से मिलने वाली गर्मी चौगुनी हो जाएगी, अयन में घूमने का वेग दुगना हो जाएगा, ऋतुओं की लम्बाई आधी रह जाएगी और पृथ्वी इतनी तप्त हो जायगी कि सब प्राणी जल-भुन जायेंगे। इस समय पृथ्वी का जितना आकार है और सूर्य से जितनी दूरी है, तथा अयन में घूमने का उसका जो वर्तमान वेग है, उसी के कारण पृथ्वी पर जीवधारियों का रहना सम्भव है और तभी मानव-जाति शारीरिक, बौद्धिक और आत्मिक जीवन के वर्तमान आनन्दों का उपभोग कर सकती है। इस तरह यदि ब्रह्माण्ड के एक अत्यन्त लघुतम घटक पृथ्वी को ही देखने पर मानवीय बुद्धि चकरा जाती है तो पूरी सृष्टि में मौजूद क्रमबद्धता एवं नियमों को देखकर क्षुद्र मानवीय बुद्धि का उस ईश्वर के लिए “नेति-नेति” का सम्बोधन करना आश्चर्यजनक नहीं है।

संसार के महानतम वैज्ञानिकों में से एक लॉर्ड कैल्विन ने यह महत्वपूर्ण बात कही है- “यदि तुम काफी गम्भीरता से विचार करो, तो विज्ञान तुम्हें ईश्वर में विश्वास करने को बाध्य कर देगा।” जान क्लीव लैण्ड कॉथरान नामक एक गणितज्ञ और रसायन शास्त्री का यह कथन शानदार है, जिसमें उसने कहा है कि, “इस समय संसार के बारे में जो भी कुछ बुद्धिग्राह्य और जानकारी पूर्ण ढंग से ज्ञात है वह कुल मिलाकर यह प्रकट करता है कि वास्तविकता के कम से कम तीन साम्राज्य हैं। इनमें से एक है भौतिक (पदार्थगत) दूसरा है बौद्धिक (मानसिक) और तीसरा है रूहानी (आत्मिक)” कॉथरान ने परमाणु जगत की जानकारी जिस ढंग से दी है उसे समझकर कोई “तार्किक और नास्तिक” भी ईश्वर के अकाट्य नियमों को मानने के लिए बाध्य हो जाएगा। क्योंकि बिना कारण के कोई भी कार्य नहीं हो सकता। इसीलिए भारतीय नीतिज्ञों ने उस परमकारण, परमतत्व ईश्वर को सार्वभौमिक, सार्वकालिक नियम कहा है। प्रकारान्तर से ईश्वर को इन्हीं गुणों का समुच्चय भी कहा जाता है। वे कहते हैं कि “परमाणु की बनावट के ढाँचे की खोज से अब यह बात प्रकट हो गई है कि रासायनिक व्यवहार के इन सब उदाहरणों में निश्चित नियम काम करते हैं न कि अस्तव्यस्तता, नियमशून्यता या आकस्मिकता।

वस्तुतः आस्तिकता बुद्धिसंगत, तर्कसम्मत एवं प्रमाणों से प्रतिपाद्य है। जो भी सही अर्थों में वैज्ञानिक है, वह ईश्वरीय सत्ता को नकार नहीं सकता। विज्ञान-सद्ज्ञान व्यक्ति को नास्तिक नहीं, सही मायने में आस्तिक बनाता व यह सोचने हेतु मजबूर करता है कि इस सृष्टि का कोई न कोई कर्ता-धर्ता है अवश्य। वह व्यक्ति नहीं है, परब्रह्म है। सर्वव्यापी विधि-व्यवस्था है, नियामक तन्त्र है। काण्ट ने कहा है कि उसे अपनी सत्ता दिखाने के लिए किसी चमत्कार के प्रदर्शन को आवश्यकता नहीं क्योंकि उसकी सामान्य गतिविधियाँ ही यह प्रतिपादन कर सकने में समर्थ हैं।


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विज्ञान बनाम तत्वज्ञान (kahani)

विज्ञान बनाम तत्वज्ञान

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ब्रिटिश भौतिकी विशेषज्ञ एडमन्ड ह्विटैकर ने लिखा है कि “यह कहना गलत है कि प्रकाश और शक्ति के अचानक संयोग से ही ब्रह्माण्ड की रचना हुई है। वास्तविक बात यह है कि परब्रह्म शून्य से इस ब्रह्माण्ड की रचना करता है दूसरे विशेषज्ञ एडवर्ड मिल्ने का भी कथन है कि ईश्वर के, किसी सृजेता के बिना ब्रह्माण्ड की कल्पना हो ही नहीं सकती।

अधिकाँश भौतिकी विशेषज्ञों और खगोलज्ञों का अनुमान है कि सृष्टि के प्रारम्भ में कोई महान शक्ति अवश्य थी जिसने इस ब्रह्माण्ड की रचना की। अपने आप यह ब्रह्माण्ड कदापि नहीं बन सकता। सिर्फ प्रकाश और शक्ति के संयोग के बिना सिरजनहार का यह सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड अरबों वर्षों तक कैसे कायम रहेगा? सन्त आगस्तिन, आइन्स्टीन, वाल्टर नर्सट्, फिलिप्स मॉरसन और एलन सैन्डोज आदि विशेषज्ञ इन्हीं बातों को स्वीकारते हैं। एलन सैन्डोज ने ब्रह्माण्ड का जन्म दस अरब वर्ष पूर्व होने की सम्भावना व्यक्त की है।

आइन्स्टीन का कथन है कि विज्ञान का एक धर्म है। वह निश्चित नियमों पर चलता है। सृष्टि की रचना अपने आप हुई- यह कहना विज्ञान के विपरीत है। यह सारा सुव्यवस्थित विश्व कैसे अपने आप बन सकता है। अतः हमें मानना ही पड़ेगा कि विश्व का निर्माता एवं संचालक कोई सुपर पावर अवश्य है।

भूगोलज्ञों के अनुसार प्रारम्भ में सृष्टि के पूर्व ब्रह्माण्ड में तीव्र दबाव पड़ा और अग्नि गोलों की उत्पत्ति हुई। कालान्तर में ये ही गोले ग्रह, नक्षत्र सूर्य, तार आदि बने। इस अग्निकाण्ड से विश्व के (पूर्व के) प्रमाण सब नष्ट हो गए। सम्भव है कि उस समय एक सभ्य और बुद्धिमान दुनिया रही हो जो कि इस विस्फोट से नष्ट हो गई। इसके बाद ही हमारे विश्व की रचना हुई हो। किन्तु दुर्भाग्यवश विज्ञान इन सबका प्रमाण नहीं दे सकता।

सभी खगोलज्ञों में प्रायः यह सहमति है कि ब्रह्मांड का विस्तार प्रारम्भ में कैसे हुआ। पहले यह पाया गया कि विश्व ब्रह्मांड हमेशा निरन्तर फैलता ही रहेगा। मंदाकिनियाँ निरन्तर एक दूसरे से दूर हटती रहती हैं और उनके बीच अन्तर बढ़ता ही जाता है। अतः अन्तरिक्ष सूना पड़ता जा रहा है। प्रत्यक्षतः प्रत्येक मन्दाकिनी अकेली है, उसका कोई पड़ौसी नहीं है।

इन दूरवर्ती मंदाकिनियों में पुराने तारे एक-एक करके जलते रहते हैं और नए-नए तारे इनके बदले उत्पन्न होते हैं। इन मंदाकिनियों में विशाल शक्ति होती है जिससे सभी जीव जीते हैं। समाप्त होते हुए अन्तिम तारे का प्रकाश बन्द होने पर ब्रह्मांड में अन्धेरा छा जाएगा और सब प्राणी मर जाएँगे।

ब्रह्म विज्ञानियों (तत्वज्ञानियों) का कहना है कि आर्ष ग्रन्थों में दिये गये उद्धरण सत्य हैं। प्रारम्भ में ईश्वर ने पृथ्वी व जीवधारियों की रचना की। सन्त आगस्तिन कहते हैं कि इस बात को कोई सिद्ध नहीं कर सकता कि पृथ्वी पर ही जीवन जैसी परिस्थितियां क्यों विनिर्मित की गयीं और ग्रहों पर क्यों नहीं। विज्ञान ने इतना ही प्रामाणित किया है कि ब्रह्मांड में गैस पिण्ड बना, उसमें विस्फोट से अग्नि पिण्ड बना जो बाद में तारे का रूप लेता है। पृथ्वी, सूर्य और समस्त ग्रह-तारों की रचना इसी तरह होती है।

वस्तुतः विज्ञान विश्वास पर नहीं चलता वरन् वह प्रमाणों पर चलता है। यह वास्तव में प्रामाणित नहीं हो सकता कि ब्रह्मांड की रचना प्रारम्भ में कैसे हुई? यह कोरी कल्पना जल्पना का विषय है। विज्ञान तो सिर्फ इतना बता सकता है कि वर्तमान में सृष्टि क्रम क्या है? वह कैसे हुआ? भविष्य में क्या होगा? इस सबका पीछे नियामक शक्ति कौन सी है? इस प्रश्न का उत्तर ईश्वर की सत्ता को केन्द्र बिन्दु मानने वाले तत्वज्ञानी ही दे सकते हैं।


योगी अरविन्द का अतिमानस और धरती पर स्वर्ग

श्री अरविन्द के दर्शन की विशिष्टता यह है कि वे किसी अतिवादी मार्ग पर चलकर लक्ष्य तक पहुँचने को गलत मानते हैं और बुद्ध दर्शन पर ही विश्वास करते हैं, जिन्होंने हर क्षेत्र में मध्यम मार्ग को ही औचित्य पूर्ण बताया है, जैसा कि उनके दर्शन से स्पष्ट होता है। महर्षि अरविन्द योग एवं भोग दोनों की समन्वयात्मक मध्य स्थिति को ही सही मानते व अपनाने पर जोर देते हैं। इसी में पूर्वार्त्त और पाश्चात्य दोनों जगत का हित साधन है। उनके विचार में योग के लिए घर-संसार छोड़ना जरूरी नहीं है। वे दैनन्दिन कर्म को ही योग मानते हैं और गीता के “योग कर्मसु कौशलम्” सूत्र का समर्थन करते हैं। उसका मानना है कि योग साधना जिस तन्मयता से मन्दिर-मस्जिद-गिरजाघरों में भिन्न रूपों में चलती है, उसी तत्परता व लगन से वह ऑफिस-कारखानों में, दैनिक दिनचर्या के साथ भी चलती रह सकती है। आवश्यकता है सिर्फ इसमें रस लेने की, अभिरुचि अन्तः से पैदा करने की।

अरविंद-दर्शन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उन्होंने अपनी कल्पना में आध्यात्मिक जीवन को पूरी मनुष्य जाति के लिए संभव बताया है और कहा है कि यह शक्ति हर व्यक्ति के अन्दर विद्यमान है और प्रयत्नपूर्वक उसे प्रकट किया जा सकता है। उनने अपने दर्शन में न सिर्फ इसी संभावना को अभिव्यक्त किया है, वरन् इससे भी आगे की बात कही है कि सम्पूर्ण पृथ्वी को अतिमानवी अतिमानस से अभिपूरित किया जा सकता है, सम्पूर्ण मानव जाति को अध्यात्मजीवी जाति के रूप में परिणत कर देव-स्तर तक पहुँचाया जा सकता है। फिर वह इसी मानव शरीर में, इसी लोक में उन समस्त सुखों व आनन्द को भोग सकेगा, जिसे अभी धरती पर अलभ्य स्वर्ग में उपलभ्य माना जाता है। इस तथ्य का उद्घाटन उन्होंने अपने महाकाव्य “सावित्री” में किया है। उसमें उनने दावा किया है कि यह रूपांतरण आयेगा और अवश्य आयेगा परन्तु यह कोई दैवी चमत्कार के रूप में घटित नहीं होगा। न ही आकस्मिक रूप में आयेगा वरन् इसकी प्रगति धीमे-धीमे होगी। वे कहते हैं कि “मनुष्य का रूपांतरण अवश्यंभावी है। वह होकर रहेगा और मनुष्य अध्यात्मजीवी अवश्य बनेगा। परम चेतना के भीतर जो अद्भुत शक्तियाँ छिपी हैं, उसका प्रकटीकरण मानव में होकर रहेगा।” महर्षि अरविंद ने इसी जीवन को दिव्य जीवन की संज्ञा दी है।

वस्तुतः यह कोरी कल्पना नहीं, अपितु एक ऐसा सर्वांगपूर्ण जीवन दर्शन है जो आत्मिकी के मूलभूत सूत्रों से जनसाधारण को परिचित कराता है। यह दर्शन यह सिखाता है कि अध्यात्म कायरों का नहीं, हिम्मत वालों, जीवट वालों के लिये है। अध्यात्म का अवलम्बन किसी को पराश्रित, निठल्ला नहीं बनाता बल्कि उसे नर मानव से देव मानव बनाता, ऊँचे सोपानों पर चढ़ाता है।

योगीराज अरविन्द का “अतिमानस” वस्तुतः भगवद् चेतना का ही पर्याय है जो कि कालक्रम में निकट भविष्य में प्रकट होने वाला है। यह विकास की अन्तिम स्थिति होगी। चरम विकास का अन्तिम सोपान। इससे पूर्व मन के चार निम्न सोपानों का योगीराज ने उल्लेख किया है- उच्चतर मन, प्रकाशित मन, संबुद्ध मन तथा ओवर माइण्ड। अतिमानस इन सभी से ऊपर की व अन्तिम स्थिति है।

अरविन्द कहते हैं कि आज जो गहन अन्धकार मानवी बुद्धि के सामने अज्ञान वंश छाया हुआ है उसे दूर कर पाना मानव के वश की बात नहीं। जब कभी यह धुँधलका छंटेगा तो वहाँ कोई चिन्तक अथवा विचारक नहीं होगा, होगा सिर्फ एक दुष्टा मानव-आत्म दृष्टा। फिर उसके लिए कुछ भी जानना समझना असंभव न होगा। योगीराज के अनुसार जान का अरुणोदय बुद्धि के अवसानान के बाद ही होता है। अगली दिनों यही क्रम चलेगा और इससे अति मानव की उत्पत्ति होगी।

बुद्धि के धरातल से ऊपर उठने के बाद मनुष्य में तीन प्रकार के रूपांतरण का उल्लेख श्री अरविन्द ने अपने दर्शन में किया है- चैत्तिक, आध्यात्मिक और अतिमानसिक। अहं के विसर्जन को उनने चैत्तिक अथवा “साइकिक” रूपांतरण कहा है। ज्ञान के अवतरण को आध्यात्मिक परिवर्तन के अंतर्गत रखा, जबकि आरोह-अवरोह के अवलम्बन द्वारा अन्तिम लक्ष्य की प्राप्ति, को उनने अतिमानसिक उत्थान बताया है। संभवतः यही धरातल तैतिरीयोपनिषद् का विज्ञानमय कोश है।

यद्यपि श्री अरविन्द ने इस रूपांतरण-प्रक्रिया की पूर्णता की कोई निश्चित अवधि नहीं बतायी है, किन्तु यह उनने स्पष्ट रूप से कहा है कि आरंभ में यह रूपांतरण स्वल्प लोगों को प्राप्त होगा। बाद में यही लोग समाज की धुरी साबित होंगे, जिसके गिर्द सारा समाज, सारा विश्व परिभ्रमण करेगा और अन्ततः उसका भी रूपांतरण हो जायेगा।

यह तो उनने भविष्य-दर्शन के आधार पर कहा है; पर वस्तुतः श्री अरविन्द के योग का मूल उद्देश्य क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने एक बार कहा था- “पूर्ण योग उस शक्ति को, उस प्रकाश को, उस चेतना को, उस वास्तविकता को पृथ्वी पर अवतरित करता है, जो पार्थिव चेतना को ऊपर उठा सके, उसे सामान्य से असामान्य बना सके और जो कुछ भी इस धरित्री पर है, उसे पूर्ण रूप से परिवर्तित कर सके। एक ऐसा देवोपम वातावरण बनाने में समर्थ हो, जो धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूति करा सके।”

वे कहते हैं कि “किसी अन्य लोक की झलकी प्राप्त करना, ज्योति दर्शन होना, कोई आध्यात्मिक अनुभूति होना, ‘स्व’ की स्थिति से ऊपर उठ जाना, सार्वभौम आत्मा का अनुभव होना, यह तो हमारी आत्मिक प्रगति के आरंभिक सोपान भर है। प्राचीन योगी इसी को इति श्री मानकर स्वर्ग-मुक्ति की कल्पना करते थे, यही उनका परम लक्ष्य होता था”।

“पर हमारा उद्देश्य तो इससे बहुत ऊँचा है। हम चाहते हैं कि महत् चेतना, ब्राह्मी चेतना को उतार कर शरीर स्तर तक लाया जाय, जिससे हममें सार्वभौमिकता पूर्ण रूप से संव्याप्त हो सके। यदि यह प्रथम शर्त ही पूरी न हो सकी, तो रूपांतरण का पहला ही अनुबन्ध अधूरा रह जायेगा।”

रूपांतरण की इस प्रक्रिया में प्रकृति मानव से महामानव, नर से नारायण क्षुद्र से महान बनाने के लिए अपने ताने-बाने बुनने लगी है, मगर श्री अरविन्द का विचार है कि चूँकि मनुष्य इस सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ प्राणी है, उसमें सोचने-समझने की क्षमता है, अस्तु अगले विकास-क्रम में उसे प्रकृति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना पड़ेगा तभी ऐसा संभव हो सकेगा। उनका कहना है कि अब तक की विकास-प्रक्रिया में पदार्थ से जीवन एवं जीवन से मन प्रादुर्भूत ही चुके हैं। अब अतिमन की बारी है, जो मन के भीतर अन्तर्निहित है। विकास के अगले क्रम में मनुष्य को इसी सोपान पर पहुँचना है।

वे आगे कहते हैं कि बुद्धि की क्रिया-प्रतिक्रिया मनुष्य बहुत देख चुका। अब उसे ऊँचा उठाने में बुद्धि असमर्थ है; किन्तु फिर भी यदि मनुष्य उसी पर निर्भर रहा, तो फिर संभव है कि आगे उसका अस्तित्व ही न बच पाये। उनका विश्वास है कि प्रकृति की आरे से बुद्धि मानव को सहायक के रूप में प्रदान की गयी थी, परन्तु यह उसका दुर्भाग्य ही है कि वह बुद्धि को ही अपना सर्वस्व मान बैठा और आज वही बुद्धि उसे पतन-पराभव के गर्त में धकेल रही है। वे कहते हैं कि यदि मनुष्य को अपना अस्तित्व बचाना है तो उसे अतिमन, अतिमानस को अपने अन्तःकरण में उतारना ही पड़ेगा। यही उसका दैवी अनुग्रह का अगला पड़ाव है और संकेत भी। बुद्धि का आश्रय छोड़कर प्रज्ञा में प्रवेश करना ही अब मनुष्य के लिये अभीष्ट है एवं यह उसे करना ही पड़ेगा।

इस संदर्भ में अरविन्द-दर्शन की सबसे अधिक समानता पियरे टेलहार्ड द चार्डिन के चिन्तन के रूप में देखी जाती है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दि फिनोमिना ऑफ मेन” में अनेक संभाव्यताओं के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानवी विकास की अगली पद-यात्रा चेतना की ओर होगी और समाज अध्यात्मजीवी बनेगा। जिसमें न तो पारस्परिक विद्वेष होगा, न आपसी वैमनस्य। वह अपनी समस्त विपत्तियों, समस्त समस्याओं-संघर्षों से मुक्त होकर रहेगा। किन्तु टेलहार्ड का विश्वास है कि यह सब कुछ विज्ञान ही सम्पन्न करेगा, जबकि श्री अरविन्द इसका प्रतिवाद करते हैं। उनके विचार में विज्ञान में वह सामर्थ्य नहीं कि वह समाज को बदल सके। रूपांतरण अध्यात्म ही कर सकने में समर्थ है, ऐसा वे मानते हैं।

“मैन दि अननोन” एवं “रिफ्लेक्शन्स ऑन लाइफ” के बहुचर्चित लेखक अलेक्सिस कैरेल की मूर्धन्य वैज्ञानिकों में गणना है। अनेकानेक तथ्यों-आँकड़ों के आधार पर वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि मानवी सभ्यता बड़ी तेजी से विनाश की ओर अग्रसर हो रही है और यह सर्वनाश अब सिर्फ बुद्धि पर निर्भर रहकर नहीं टाला जा सकता। यहाँ पर वे भी योगी अरविन्द के स्वर-में-स्वर मिलाकर बोलते हैं कि यदि आगे विनाश को रोकना है, तो मनुष्य को बुद्धि से आगे का विकास करना पड़ेगा, उसे आत्मा और चेतना की ओर लौटना पड़ेगा और उन देवोपम गुणों को फिर से अपने अन्दर प्रतिष्ठापित करना होगा, जो कभी धर्म और अध्यात्म के साथ पुष्पित पल्लवित हुए थे।

कुछ बिन्दुओं पर नीत्से की भी श्री अरविन्द के साथ समानता देखी जा सकती है। कहा जाता है कि महर्षि से पूर्व सुपर मैन की कल्पना नीत्से ने ही की थी। किन्तु दोनों की इस संबंध में अवधारण में जमीन-आसमान का अन्तर है। किन्तु एक अन्य स्थान पर दोनों का मतैक्य स्पष्ट झलकता है। योगिराज ने अब तक की विकास-यात्रा को अतिमानस के अवतरण की तैयारी मात्र कहा है; जबकि नीत्से का कथन भी इसी से मिलता-जुलता है। उसने स्वीकारा है कि अब तक का सम्पूर्ण मानवी इतिहास सुपरमैन के पदार्पण की पूर्व तैयारी भर है। नीत्से ने इस बात को बार-बार दोहराया है कि मनुष्य का विकास अधूरा है और उसका अतिक्रमण होना ही है।

हेनरी बर्सों और मार्टिन हेडेगर की तरह प्रसिद्ध उर्दू शायर मुहम्मद इकबाल ने भी मानवी बुद्धि को विकास का रोड़ा कहा है और सम्पूर्ण मनुष्य जाति को उससे आगे बढ़ने का संदेश दिया है। उनकी निम्न पंक्तियों से स्पष्ट है- “गुजर जा अक्ल से आगे कि यह चिरागे-राह है, मंजिल नहीं है।” और कहना न होगा कि अरविन्द के भी लगभग यही शब्द हैं।

एक पूर्ण मनुष्य की कल्पना करते हुए कबीर कहते थे- “पाछे पाछे हरि फिरै कहत कबीर कबीर”। यह उक्ति पूर्णतः परिपूर्ण रूप से विकसित मानव पर चरितार्थ होती है। इकबाल ने अध्यात्मवादी विकास की परिकल्पना कर मुहम्मद साहब के “तखल्लकुबी अखलाक अल्लाह” अर्थात् “देवत्व को धारण करो” का पुरजोर समर्थन किया है। स्वयं वे कहते हैं- “खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तदबीर के पहले खुदा बन्दे से खुद पूछे, बता! तेरी रजा क्या है।” यही वह पूर्ण मनुष्य है जिसे अरविन्द ने अध्यात्म जीवी महामानव कहा है और मार्टिन हेडेगर ने “आथेंटिक बिइंग” इकबाल ने इसी को “नायबे इलाही” की संज्ञा दी है।

वस्तुतः आने वाला समय मनुष्य के चरम विकास, परिस्थितियों के आमूलचूल परिवर्तन का युग है। दार्शनिक, दूरदृष्टा मनीषी यह कहते ही आ रहे हैं, हमें अपनी भूमिका पहचाननी व निभानी भर है।


ब्राह्मण की परिभाषा (kahani)

भगवान बुद्ध अनाथ पिण्डक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य, अनाथ पिण्डक भी समीप ही बैठा, धर्मचर्चा का लाभ ले रहा था। तभी सामने से महाकाश्यप, मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुन्द और देवदत्त आदि आते हुए दिखाई दिये। उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा- वत्स! उठो! यह ब्राह्मण मण्डली आ रही है, उसके लिए योग्य आसन का प्रबन्ध करे।

अनाथ पिण्डक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा- भगवन्! आप सम्भवतः इन्हें जानते नहीं। ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य भी है।

गौतम बुद्ध अनाथ पिण्डक के वचन सुनकर हँसे और बोले- “तात! जति जन्म से नहीं गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ, रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवा भावी होने के कारण ही इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान– जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते हैं।”


विचार-शक्ति एक प्रचण्ड ऊर्जा

शरीर में विद्यमान अरबों जीव कोशों के मध्य मस्तिष्क एक चमत्कारी क्षेत्र है। मस्तिष्क के सभी घटक असाधारण क्षमता सम्पन्न हैं। अन्य कोश तो शरीरचर्या का जीवनचर्या से सम्बन्धित क्रियाकलाप भर पूरा करने में लगे रहते हैं पर मस्तिष्कीय कोश विचार प्रक्रिया सम्पन्न करने के अतिरिक्त निखिल ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ भी अपना संबन्ध जोड़ते हैं।

शरीरों के साथ-साथ रहने पर उनके बीच मैत्री उत्पन्न हो जाती है, पारस्परिक आदान-प्रदान भी चल पड़ते हैं। प्रतिभा वालों की गतिविधियों का अनुकरण, अनुसरण सामान्य स्तर के लोग करते देखे जाते हैं। प्रचलन प्रवाह इसी आधार पर बन पड़ते हैं। प्रथाएँ इसी प्रकार चलती हैं। मित्रता और सहकारिता के पीछे भी यही तत्व काम करते हैं कि किन के बीच कितनी घनिष्ठता बनी।

शरीरगत विशेषताओं की तुलना में मनोगत वर्चस्व अधिक प्रभावशाली है। सामान्य रूप से भी वह अपना प्रयोजन पूरा करता है पर यदि उपायों से मनोबल बढ़ाया जाय और किन्हीं के साथ स्नेह पूर्वक जोड़ा जाय तो उसका विशेष प्रभाव देखने में आता है। अभिभावकों की भाषा बच्चे शीघ्र ही ग्रहण कर लेते हैं। अध्यापक मनोयोगपूर्वक पढ़ाते हैं तो वह दिया हुआ ज्ञान छात्रों के गले शीघ्र उतर जाता है। समवय बालक आपस में अधिक उल्लासपूर्वक हँसते खेलते हैं। समान प्रकृति के मनुष्य आपस में न केवल घनिष्ठतापूर्वक मिलते हैं, वरन् एक दूसरे के गुण दोष भी सहज अपनाते देखे गये हैं। यह मानसिक तारतम्य है जो सहज स्वाभाविक है। लोक व्यवहार में यह सर्वत्र देखने को मिलता है।

किन्तु विशेष प्रयत्नपूर्वक इस प्रक्रिया को बढ़ाया भी जा सकती है। वरिष्ठ विचार कनिष्ठों पर हावी होते हैं और उन्हें अपने साथ या पीछे चलने के लिए बाधित करते हैं। पालतू हाथी जंगली हाथियों को रस्से में पकड़ लाते हैं। पालतू कबूतर भी दूसरे झुण्ड के कबूतरों को अपने समूह में घसीट लाते हैं। इसी प्रकार प्रबल विचार सामान्य विचार वालों को अपने समान बना लेने में प्रायः सफल होते हैं।

बुरे विचारों की पतनोन्मुख क्षमता सर्वविदित है। दुष्प्रवृत्तियों से भरे हुए व्यक्ति जहाँ रहते और संपर्क साधते हैं वहाँ अपना प्रभाव ही नहीं छोड़ते, उन्हें सहमत भी करते हैं। शुद्ध विचारों की सामर्थ्य भी कम नहीं। यदि कोई मनस्वी और दृढ़ चरित्र व्यक्ति अपने विचारों में आस्था और दृढ़ता उत्पन्न कर ले तो उसका प्रभाव भी अन्यान्यों पर पड़े बिना नहीं रहता। समीपवर्ती क्षेत्र में तो विचार अपना काम करते ही हैं। ऐसा भी होता है कि विचारों की परिपक्वता दूरवर्ती क्षेत्र को प्रभावित करे और जिन लोगों के साथ सीधा सम्बन्ध नहीं है उनके साथ भी संबन्ध स्थापित करें और ढांचे में ढालें।

विचारों के इस महाभारत में हर किसी को शारीरिक बलिष्ठता की तरह मानसिक बलिष्ठता भी सम्पादित करनी चाहिए। यह सोचना ठीक नहीं कि बुरे लोग अधिक हैं सो उनकी मिली जुली शक्ति ही अधिक काम करेगी। यह मान्यता तभी सही मानी जा सकती है जब रोकथाम करने वाली उत्कृष्टता का अपना कोई प्रभाव या स्थान न हो। यदि संकल्पवान व्यक्ति अपने विचारों में- आदर्शवादिता और दृढ़ता भर सके तो संख्या में स्वल्प होते हुए भी वे अपने प्रभाव की गरिमा सिद्ध कर सकेंगे। जिस प्रकार यह संभव है कि बुरे लोग दूसरों को बुराई के कीचड़ में लपेट लेते हैं, उसी प्रकार यह भी संभव है कि श्रेष्ठता घटाटोप बरसने लगे तो शीतलता और हरीतिमा का वातावरण विनिर्मित कर दे। विचारों की शक्ति विशिष्ट है। उसमें भी उत्कृष्ट चिन्तन और चरित्र असाधारण प्रभाव छोड़ते हैं।


गीता का मनोवैज्ञानिक विवेचन

विश्व के सभी महान धर्मग्रन्थ देश काल की सीमा से परे हैं। वे शाश्वत और सार्वभौमिक हैं। भगवद् गीता इसी श्रेणी के धर्मग्रन्थों में आती है और इस प्रकार यह मात्र हिन्दुओं के लिए ही नहीं है। इसका सन्देश एक सार्वजनीन उपयोगिता की जानकारी कराता है। यह आज भी उसी प्रकार नवीन है जिस प्रकार कई शताब्दियों पूर्व गीताकार द्वारा अर्जुन को दिया गया था। वस्तुतः आधुनिक मानव को गीता के सन्देश की आवश्यकता है। यदि वह वैज्ञानिक और तकनीकी जन्य तनावों एवं दुश्चिन्ताओं से मुक्ति पाना चाहता है, तो उसे गीता से प्रेरणा पानी चाहिए।

देखें! आधुनिक मानव की मूल समस्याएं क्या हैं? साइंस और टेक्नोलॉजी की नई तरक्की से आज की संस्कृति में रह रहे नर-नारियों के जीवन में, उनके नैतिक मूल्यों में, काफी सीमा तक ह्रास हुआ है। मात्रात्मक मूल्यों का अपेक्षाकृत महत्व अधिक माना जाने लगा है। गुणात्मक उपयोगिता की उपेक्षा हो रही है। उसका आन्तरिक जीवन दरिद्र है, और वह इस गरीबी की दासता से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसके लिए वह साइंस और टेक्नोलॉजी द्वारा उपलब्ध भौतिक पदार्थों को बटोरने में लगा है। मनुष्य इस समस्या का जो कि मूलतः मनोवैज्ञानिक है, भौतिक हल ढूंढ़ रहा है। वह सोचता है कि विज्ञान जो कि शक्तिशाली हो रहा है, सभी समस्याओं को सुलझा सकता है। किन्तु वह भूल जाता है कि, विज्ञान गति की समस्या को सुलझा सकता है, वह दिशा का पथ-प्रदर्शन नहीं कर सकता कि किस दिशा में चलना चाहिये। वह इस वास्तविकता के दृष्टिकोण को भूल गया है कि विज्ञान सुविधा प्रदान कर सकता है, किन्तु सुख-शान्ति नहीं। सुख शान्ति पदार्थों के आधिपत्य से नहीं मिलती बल्कि मन को उसकी सभी अन्तर्बाधाओं से मुक्त करने से ही मिलती है। इसलिए इसे पवित्र और निष्पाप कहा गया है। आधुनिक युग पदार्थों के ऊपर मानवीय ज्ञान के विजय का युग है, फिर भी मन को जीतने का रहस्य सीखना है। बिना मन को जीतने का रहस्य जाने पदार्थों पर विजय प्राप्ति की होड़ व्यर्थ ही नहीं बल्कि निरपेक्ष रूप से खतरनाक भी है। मनुष्य ने ज्ञान की प्राप्ति तो की है, किन्तु उसमें विवेक की कमी है। जब तक वह ज्ञान को प्रज्ञा में परिवर्तित करने में असमर्थ है, तब तक उसका एवं सम्पूर्ण मानव-प्रजाति का भविष्य मनहूस एवं अन्धकारमय है। दूसरे शब्दों में, मानव आज सभी वस्तुओं के ऊपर “जीवन के यथार्थ-दर्शन” की खोज में है, जो मात्र हिंदू दर्शन में, पूर्वार्त्त अध्यात्म में उपलब्ध है।

भगवद्गीता, जीवन के यथार्थ दर्शन का अकूत मूल्यों का संदेश है। गीता जीवन के मार्ग का मर्म बताती है ताकि आधुनिक मानव की प्रस्तुत चिर नवीन समस्याओं का निदान ढूंढ़ निकालने में सहायता मिले। भगवद्गीता न केवल यथार्थ-कर्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन करती है, बल्कि वह बिना भूल के यह मर्म बतलाती है कि यथार्थ कर्म, यथार्थ-बोध होने पर ही संभव है। गीता के अनुसार यथार्थ बोध मानवीय मन की एक ऐसी स्थिति है, जिसमें वह समग्र और निर्विकार-ध्यान के योग्य होता है। यह अवस्था विचारणा की भ्रान्ति से मुक्त अवस्था है एवं प्रतिकूलताओं से दूर है। गीता की शिक्षा अर्जुन को सीढ़ी दर सीढ़ी उद्विग्नता से प्रकाश की ओर ले जाती है। मन जो कि इच्छा वासना के आकर्षण से पकड़ लिया गया है, वही बुद्धि के प्रकाश से ज्योतिर्मान होता है। दूसरे शब्दों में, वह मानस से अतिमानस की ओर ले जाती है।

प्रश्न उठता है कि क्या गीता मनुष्य को आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दुनियादारी छोड़ने के लिए कहती है? क्या यह सुझाव देती है कि मनुष्य को कर्म का परित्याग कर देना चाहिये? भगवद्गीता की शिक्षा का अनोखापन इस तथ्य में सन्निहित है जिसमें वह यह कहती है कि आध्यात्मिक लक्ष्य की खोज जीवन के प्रतिदिन के दैनन्दिन क्रिया व्यापार में करना चाहिए। गीता यह कहती है कि मानव सर्वोच्च प्रबोध को, सभी कर्मों को उचित ढंग से करते हुए न कि कर्म से दूर भागते हुए प्राप्त कर सकता है। अब प्रश्न यह कि मनुष्य किस तरह यथार्थ-कर्म को जान सकता है? गीता यह कहती है कि जैसे ही मानव अपने को प्रतिक्रिया से मुक्त करता है, वह गहन गूढ़ निष्क्रियता (अकर्म) की अनुभूति करता है। निष्क्रियता या अकर्म ही निश्चय ही कर्म या क्रिया के सम्पादन के लिए यथार्थ पृष्ठभूमि है। कर्म जो यथार्थ हो, क्रिया जो स्वयं के विचार से मुक्त हो।

गीता के तीन प्रमुख योग की परिभाषाओं में से हमें उस मार्ग को समझना चाहिये जिसे भगवान श्री कृष्ण ने यथार्थ बोध को प्राप्त करने के लिए निर्देशित किया है, जहां से अकेले उचित कर्म का आविर्भाव होता है। योग के बारे में गीता कहती है कि यह एक वियोजन है, जिससे दुख का संयोजन होता है, वह क्या है जो कि मानव को दुख से संसर्ग कराता है। निश्चय ही वह मन है। इसकी सामर्थ्य तुलना एवं विषमता के द्वारा जानी जा सकती है। मानव के दुख की समस्या मूलतः मन की समस्या है जो कि तुलना एवं विषमता की प्रक्रिया को ग्रहण करने से पैदा हुई है। इस प्रक्रिया से ही उसकी सभी प्रतिक्रियाएं प्रादुर्भूत होती हैं।

आधुनिक मानव निश्चय ही आन्तरिक द्वन्द्वों से उद्विग्न एवं अशान्त है तथा यह अन्तर्द्वन्द्व ही उसके समग्र मनोवैज्ञानिक जीवन की अपूर्णता का कारण है। यह वियोजन की समस्त दुखों का कारण है। वास्तव में वह अन्तः के सुनियोजन की खोज में है तथा संभवतः इसके लिए, उच्चतर मार्गदर्शन गीता की उपेक्षा कोई नहीं हो सकता। समग्र व्यक्तित्व के निर्माण के लिए कर्म की सक्रियता एवं सुनियोजन गीता का एक शाश्वत संदेश है। जहां मन की प्रतिकूलता की स्थिति ज्ञानातीत है, अकर्म का संतुलन मनोवैज्ञानिक समग्रता की स्थिति है। गीता इस समस्या से संबन्ध, व्यापक दृष्टि से रखती है। व्याख्यान के बाद व्याख्यान, अन्ततः अंतिम प्रवचन में अर्जुन महत चेतना की इच्छ तथा अपनी वैयक्तिक महत्वाकांक्षा में परस्पर संबद्ध देखता है, एवं प्रत्यक्ष बोध द्वारा मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की समाप्ति की स्थिति तक पहुंच जाता है। इस तरह वह पूर्ण समग्रता को प्राप्त करता है।

गीता का उद्बोधन आधुनिक युग की समस्याओं के लिए त्वरित एवं प्रयोगात्मक मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है। वह मन की जटिलताओं को बाहर निकालने की राह दिखाती है तथा अति मानस की पूर्णता और मुक्तावस्था का दिग्दर्शन करती है। गीता कहती है कि यह रास्ता कुछ थोड़े लोगों के लिए ही नहीं है। इस रास्ते पर वे सब चल सकते हैं जिन्होंने जीवन की उलझनों से मुक्ति का मार्ग खोजा है। एक उम्र में जहां व्यक्ति अधिक से अधिक राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक शक्तियों के प्रभाव के कारण स्वयं को बौना, नगण्य देखता है, वहां पर गीता आशा और खुशहाली का सन्देश प्रदान करती है। इसके लिए वह उसे जीवन के मार्ग का दिग्दर्शन कराती है, जो समाप्त हुए महत्व को उसे पुनः दिलाने की ओर ले जाती है। गीता व्यक्ति को सक्रिय जीवन का रास्ता चुनने का मार्गदर्शन करती है।

व्यक्ति का आध्यात्मिक पुनरुत्थान निश्चय ही सुखी समाज की संरचना का मार्ग है। वस्तुतः यह मानव में प्राण फूंकने वाला एवं शक्ति प्रदान करने वाला एक ऐसा शाश्वत संदेश है जो युगों-युगों तक चिरनवीन बना रहेगा।


भगवान बुद्ध (kahani)

भगवान बुद्ध कौशांबी पहुंचे। वहां के धूर्तजनों ने मिलकर एक मंडली बनाई और तथागत का तिरस्कार करने की ठानी। उन्हें बहुत अपशब्द कहे। मारने तक पर उतारू हो गये।

आनन्द ने कहा- अन्यत्र चलना चाहिए। यहां के लोग बड़े अभद्र हैं।

तथागत ने पूछा यदि वहां भी ऐसा ही दुर्व्यवहार हुआ तो? आनन्द बोले तब अन्यत्र चलेंगे। प्रश्नोत्तर की यह शृंखला बहुत देर चलती रही और आनंद अन्यत्र, अन्यत्र की रट लगाये रहे।

तथागत ने कहा- यह उचित नहीं। वस्तुस्थिति विदित होने की परिस्थिति आने तक हमें यहीं ठहरना चाहिए। चल पड़ने पर लोग इन्हीं का कथन ठीक मानेंगे और हमारा साहस टूटेगा।

नियत कार्यक्रम के अनुसार पड़ाव वहीं डाला गया। और आक्षेप कर्ताओं की हिम्मत टूट गई।


चतुर्थ आयाम और सिद्धावस्था

चित्र आमतौर से द्विआयामीय होते हैं। उनमें लम्बाई चौड़ाई ही दृष्टिगोचर होती है। आगे पीछे के, ऊँचे नीचे के वस्तु संकेतों को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि यह कितनी गहरी या ऊँची होनी चाहिए।

गत दो दशकों में त्रिआयामीय चित्र बनाने का सिलसिला चल तो पड़ा है पर सर्व साधारण के लिए अभी पूरी तरह सुलभ नहीं हुआ।

अभी उनका मोटा तरीका इतना ही है कि दो आँखों पर दो चित्र एक जैसे ही लगाये जाते हैं। एक फोकस बिन्दु पर जब दोनों की छवियाँ एकत्रित हो जाती हैं, तब उनकी गहराई-ऊँचाई भी अनुभव में आने लगती है। बच्चों के टेलिस्कोप और दो बिन्दीदार चित्रों को आपस में सटाकर भी यह कौतूहल बच्चों के लिए सुलभ हो गया है कि वे त्रिआयामीय चित्र देखें। सिनेमा ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया और कुछ थ्री.डी. फिल्में भी पिछले दिनों बनाई हैं। यह फिल्में होलोग्राफी के सिद्धान्त के आधार पर बनाई गई थीं। इसमें मात्र गहराई, ऊँचाई, निचाई ही नहीं दीखती थी पर साथ ही इतना और भी देख पड़ता था कि सामने का पर्दा कोई खुला मैदान है और उसमें से निकल कर शेर घोड़े वगैरह इस तरह दौड़ते आ रहे हैं मानो वे दर्शकों पर सवार ही होने वाले हैं। प्रारंभ में इन्हें देखकर अनेक सिनेमा दर्शक भयभीत हो गये और चीखते हुए हाल से भागे। कइयों को वह कौतूहलवर्धक दृश्य इतने आश्चर्यजनक लगे कि उनने उन्हें कई-कई बार देखा। पर अब यह प्रयोग नवीन नहीं रहा। “थ्री डी” कामिक्स काफी लोकप्रिय हो गये हैं।

इस थ्री डायमेन्शनल तकनीक को विज्ञानी यूक्लिड ने आविष्कृत किया था और इसका नाम स्टीरियोस्कोपी दिया था। इस आधार पर प्रथम फिल्म “बवाना डेविल” बनी थी, जो बहुत ही सफल रही। बीच में तकनीकी कठिनाइयों के कारण वह बहुत विस्तार न पा सकी, पर बाद में नये सिरे से ऐसी शृंखला को कार्यान्वित करने की हालीवुड ने एक समग्र योजना बनायी एवं वे इसमें सफल रहे।

अलबर्ट आइंस्टीन ने इस विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अनेक आयामों की संभावना व्यक्त की थी। इसमें से वे उपलब्ध जानकारियों व उनकी परिणतियों पर प्रामाणिक प्रकाश डालते थे और कहते थे कि जब मनुष्य चतुर्थ आयाम के तथ्यों को कार्य रूप में परिणति करने लगेगा तब उसके ज्ञान में अबकी तुलना में अनेक गुनी वृद्धि होगी। साथ ही ऐसी शक्ति भी हस्तगत होगी जिसे जादुई कहा जा सके। वस्तुतः चतुर्थ आयाम को जादू लोक की समता दी जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

जर्मनी के प्रो. जौलनर ने वर्षों अथक परिश्रम करके चतुर्थ आयाम डडडडडडडड के बारे में अनेक महत्वपूर्ण खोजें की। अनुसंधान के दौरान उनने पाया कि अगणित ऐसे कार्य, जो त्रिआयामीय स्पेस में संभव नहीं, उन्हें चतुर्थ-आयामीय स्पेस में सुगमतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। यथा धातु की बनी गेंद को दस्ताने की तरह उल्टा जा सकता है। इसी प्रकार दोनों किनारों से बँधे धागे में आसानी से गाँठ लगायी जा सकती है एवं दो पृथक डिब्बों में बन्द छल्लों की, डिब्बों को खोले बिना आपस में फँसाया जा सकता है। उनका कहना है कि इसी प्रकार के अनेकानेक अजीबोगरीब करतब दिखाये जा सकते हैं।

यही नहीं, इस आयाम की विश्वसनीयता को प्रामाणित करने के लिए उनने परोक्ष जगत से भी संपर्क किया और अनेक माध्यमों का सहयोग लेकर कई प्रकार के प्रयोग किये। कहा जाता है कि इसमें इन्हें अद्भुत सफलता मिली। एक प्रयोग के मध्य देखा गया कि वे जिस कुर्सी पर बैठे थे, उसकी भुजा से उनकी बाँह अपने आप बँध गई, यद्यपि उनका दूसरा हाथ टेबुल पर था, जिसे प्रयोग के दौरान उनने संचालित किया ही नहीं। एक अन्य प्रदर्शन में टेबुल के दोनों सिरों से बँधी डोरी में स्वतः गांठें बँध गई। तात्पर्य यह कि परोक्ष जगत के माध्यम से चौथे आयाम के चमत्कारों को आसानी से देखा जा सकता है। प्रेतात्माएँ भी चौथे आयाम की पुष्टि करती हैं और चतुर्थ आयाम प्रेत योनि के अस्तित्व को असंदिग्ध रूप से प्रमाणित करता है।

प्रो. क्रुक्स ने तो यहाँ तक कहा है कि चौथे आयाम में पहुँच जाने के बाद वस्तुओं का वजन अप्रत्याशित रूप से घट जाता है तथा एडगर वैलेस के अनुसार इस आयाम में शरीर अग्निरोधी बन जाता है, उसे आग से किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुँचती।

वैज्ञानिकों द्वारा यह अनुमान लगाया गया है कि जब मनुष्य फोर्थ डायमेन्शन क्षेत्र में प्रवेश करेगा तो उसकी यही आँखें टेलिस्कोप और स्टीरियो माइक्रोस्कोप का काम करने लगेंगी। वह पीने के पानी में चलते फिरते कीड़े देख सकेगा और जिस प्रकार राडार दूर-दूर तक की आकाश में उड़ती वस्तुओं को अपने पर्दे पर दिखा देता था, उसी प्रकार मनुष्य की गरुड़ दृष्टि भी अन्तरिक्ष और इतनी दूर तक इतनी स्पष्टता के साथ देख सकेगी जैसे कि अपनी आँखों से एक सीमित मोटाई और दूरी देखी जाती है। इस प्रकार मनुष्य की दृष्टि में विशिष्टता भरी जाने का स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि उसका ज्ञान कहीं अधिक बढ़ जाय और उस आधार पर अपनी सुरक्षा और प्रगति संबन्धी कई समस्याओं का समाधान संभव हो सके। जितना वह अब जानता है उसकी तुलना में अधिक जानकार बन सके।

चतुर्थ आयाम में प्रवेश कर सकने वाला प्राणी एक प्रकार से सिद्ध पुरुष होगा। वह पीछे मुड़ कर बीती हुई घटनाओं को भी देख सकेगा और सिर उठाकर यह भी अनुमान लगा सकेगा कि भवितव्यता क्या है? निकट भविष्य में क्या होने जा रहा है? कारण की घटनाओं का तारतम्य उनके प्रत्यक्षतः सामने आने से पूर्व ही चल पड़ता है और उसका आभास मिलना संवेदनशील इन्द्रियों के लिए सरल होता है। अनेक जीव-जंतु भूकम्प, वर्षा आदि की घटनाओं के घटित होने के पूर्व ही अनुमान लगा लेते हैं और समय से पूर्व ही अपने बचाव का उपाय कर लेते हैं। इसे चतुर्थ आयाम का सीमित आभास कह सकते हैं। इस आधार पर अपना दूसरों का भूतकाल और भविष्यत् बहुत अंशों में जाना जा सकता है।

इतना ही नहीं, इसके साथ एक नई शक्ति का भी प्रादुर्भाव हो सकता है। चौथे आयाम में प्रविष्ट व्यक्तियों के सूक्ष्म नेत्रों में ऐसी शक्ति हो सकती है जिसके सहारे वे अदृश्य लोक में भ्रमण करने वाले जीवात्माओं की सत्ता का परिचय प्राप्त कर सकें। उन्हें विदित होने लगे कि किस स्तर की मृतात्मा कितनी दूरी पर किस स्थिति में रह रही है। उसके साथ संबन्ध मिलाना और आदान-प्रदान का सिलसिला चला भी कुछ कठिन न रहेगा।

अभी हम द्विआयामीय या त्रिआयामीय दुनिया में रह रहे हैं। त्रिआयामीय तक का भी थोड़ा बहुत उपयोग ही हाथ लगा है। पर जब चौथे आयाम में प्रवेश करना बन पड़ेगा तो बुद्धि एवं शक्ति का इतना विस्तार होगा जिसे “सिद्धावस्था” कहा जा सकेगा।


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Quotation

कहते हैं कि कलिंग देश का राजा मधुपर्क खा रहा था। उसके प्याले में से असावधानी से थोड़ा सा शहद टपक कर जमीन पर गिर पड़ा। उस शहद को चाटने मक्खियाँ आ गयीं। मक्खियों को इकट्ठी देख छिपकली ललचायी और उन्हें खाने के लिए आ पहुँची। छिपकली को मारने बिल्ली पहुँची। बिल्ली पर दो-तीन कुत्ते टूटे। बिल्ली भाग गई और कुत्ते आपस में लड़कर घायल हो गये।

कुत्तों के मालिक अपने-अपने कुत्तों के पक्ष का समर्थन करने लगे और एक दूसरे का दोष बताने लगे। उस पर लड़ाई ठन गयी। लड़ाई में दोनों ओर की भीड़ बढ़ी और आखिर सारे शहर में बलवा हो गया। दंगाइयों को मौका मिला तो सरकारी खजाना लूटा और राजमहल में आग लगा दी।

राजा ने इतने बड़े उपद्रव का कारण पूछा तो मन्त्री ने जाँचकर बताया कि भगवन् आपके द्वारा असावधानी से गिराया हुआ थोड़ा सा शहद ही इतने बड़े दंगे का कारण बन गया है।

तब राजा ने समझा कि छोटी-सी असावधानी भी मनुष्य के लिए कितना बड़ा संकट उत्पन्न कर सकती है।


सन् 2000 की विभीषिका

नास्ट्रॉडामस अपने समय के असाधारण भविष्यवक्ता थे। यों उन्होंने इन विशेषताओं को प्राप्त करने के लिए कोई साधना नहीं की थी, पर यह अनुदान उन्हें दैवी अनुग्रह की तरह जन्मजात रूप में ही मिला। वे किसी के पूछने पर कभी-कभी ही उत्तर देते थे। पर जब अपनी मौज मर्जी छूटती तो कथन के प्रवाह को रोकते न थे और इस प्रकार कहते चले जाते थे कि तात्पर्य समझने पर उनके मित्र ही उन्हें “बावला” कहने लगते थे।

वे एक साधारण यहूदी परिवार में जन्में पर पीछे उन्हें शासन के दबाव से विवश होकर ईसाई धर्म स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने अध्ययन में लम्बा समय लगाया। यायावरों की तरह दूर देशों में घूमे और अपना अनुभव बढ़ाया। उन्होंने चिकित्सक की पदवी हासिल करली थी और उसी पेशे को निर्वाह का साधन बनाया। भविष्यवाणी तो शौक मौज में करते थे। वह उनका व्यवसाय न था।

कभी-कभी उनकी बातें इतनी सटीक बैठती थीं कि लोग चकित रह जाते थे। उनके एक मित्र ने दो सूअर के बच्चे पाल रखे थे। मजाक में उनके मित्र ने पूछा इन बच्चों का भविष्य बताओ। नास्ट्रॉडामस ने कहा काले बच्चे को कल हम लोग खाएँगे और सफेद किसी भेड़िये के पेट में चला जायगा। उनके इस कथन को गलत सिद्ध करने के लिए पहले सफेद बच्चा काटा गया। रसोइये ने उसे पका कर रख दिया। इतने में मालिक का पालतू भेड़िया आया और पतीली को पूरी तरह साफ कर गया। अब मालिक की नाराजी का ध्यान आया तो उसने काला वाला काट लिया और उसे पकाकर दोनों मित्रों को परोसा। मित्र ने हँसते हुए कहा- “तुम्हारा भविष्य कथन गलत हो गया न!” इस पर उत्तर मिला- “यह काले सूअर का माँस है। सफेद तो कभी का भेड़िये के पेट में चला गया।” वस्तुस्थिति का पता लगाया गया तो रसोइये ने सारी घटना कह दी। कथन वही सत्य सिद्ध हुआ जो पहले कहा गया था। घटना तो छोटी सी है पर बताती है कि उनमें आगत को जान लेने की क्षमता प्रारम्भ से ही थी।

1 जुलाई 1556 को उनका एक शिष्य शेविप्नी मिलने आया। वार्तालाप के बाद दूसरे दिन फिर मिलने की आज्ञा माँगी। इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि “कल सवेरा होते-होते तो मैं इस दुनिया से चला ही जाऊँगा।” कथन नितान्त आश्चर्यजनक लगता था क्योंकि उस समय उनका स्वास्थ्य बिलकुल ठीक था। इतनी जल्दी मरने जैसी कोई बात नहीं मालूम पड़ती थी। भवितव्यता होकर रही। वे सूर्योदय से पहले ही दूसरे दिन मर गये।

नास्ट्रॉडामस अपने समय में कोई बहुत प्रख्यात न थे पर उनकी भविष्यवाणियाँ जब अक्षरशः सही उतरने लगीं, तब उनकी ओर लोगों का ध्यान गया। भूत और वर्तमान के संबन्ध में जो उनने लिखा था वह जनश्रुति के आधार पर कहा गया समझ लिया गया, पर जो भविष्य के संबन्ध में कहा गया था उस पर पीछे वालों ने बहुत ध्यान दिया और पाया कि उनने जो कहा था, वह समय आने पर सही होकर रहा।

उनने अपनी पुस्तक काव्य रूप में चौपदी की तरह लिखी है। उस हस्त लिखित पुस्तक को अठारह वर्षीय ऑक्सफोर्ड विश्व विद्यालय का छात्रा एरिका ने पुराने पुस्तकालय में से ढूँढ़ निकाला। ध्यानपूर्वक पढ़ा और पाया कि उसमें भावी घटनाओं के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा है।

लेखक के मरने के उपरान्त जो भविष्यवाणियाँ सही उतरीं उनमें से कुछ इस प्रकार थीं।

- सन् 1954 में इंग्लैंड के सटन पार्क में मेंढक बरसे।

- हिटलर का उल्लेख उनके भविष्य कथन में किया गया था, जो चार सौ वर्ष बाद बताये हुए समय पर ही जन्मा और जिसने जर्मनी का द्वितीय युद्ध छेड़ा एवं सारी दुनिया का इतिहास बदल डाला।

- उसने अनेक वर्षों की फसलों की मौसम परिवर्तन की परिणति लिखी जो आने वाले वर्षों में खरी उतरी।

- उसने अगले चार सौ वर्षों में होने वाले आविष्कारों, औद्योगिक क्रान्ति का वर्णन किया। उन दिनों वैसा बन पड़ने की किसी को आशा न थी पर समयानुसार सभी परिवर्तन होते चले गये।

- प्रक्षेपणास्त्रों, उपग्रहों और पनडुब्बियों का उसने हाल लिखा है, जिनकी उन दिनों कोई कल्पना तक न करता था।

- जापान पर अणुबम गिराये जाने की विभीषिका की संभावना का भी उसने उल्लेख किया है।

- ईरान पर खुमैनी शासन, मुल्लावाद तथा आतंक का भी उसने जिक्र किया है।

- ईसा का परिवर्धित स्वरूप एशिया से पैदा होगा और जन-मानस को प्रभावित करेगा। यह व्यक्ति या विचार बुद्ध के कार्यों को आगे बढ़ाएगा।

तीसरे महायुद्ध का भी इस पुस्तक में संकेत है। ईसवी सन 1995 से लेकर 1999 तक विश्व में भयानक आतंक छाया रहेगा। बीसवीं सदी का अंत उसने अग्नि युग के रूप में कहा है जिसमें सर्वत्र अग्निकाण्ड के ही दृश्य दिखेंगे। सन् 2000 से पहले तक की वार्ताएं कहकर नास्ट्रॉडामस की लेखनी मौन हो गई है।

लगभग ऐसा ही संकेत अमृतसर से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व एक सूफी संत द्वारा प्रकाशित पुस्तक “आणे वाले समय दा हाल” में भी मिलता है।

इन्हीं कथनों से मिलता जुलता कथन एक पोलिश सन्त का भी है। उनकी एक पुस्तक जर्मन भाषा में “पैटर्न ऑफ प्रोफेसी” नाम से छपी है। उसमें सन् 1986 के आस-पास अस्थायी विश्व शान्ति का वर्णन है साथ ही यह भी कहा गया है कि एक भयंकर भूकम्प से योरोप का एक बड़ा भाग सन् 1996 में नष्ट होगा। सन् 2000 में महाविनाश का इस पुस्तक में संकेत है। यह नकारने का कोई कारण नहीं कि उपरोक्त कथन आने वाले समय में सत्य न निकलें।


वैयाकरणी कैयट (kahani)

वैयाकरणी कैयट का स्वास्थ्य दिन-दिन खराब होता जा रहा था। उसका कारण था, दिन को तो वह आजीविका के लिए परिश्रम किया करते थे और रात में जाग-जाग कर महाभाष्य पर टीका लिखा करते थे। उनकी पत्नी उनके स्वास्थ्य के विषय में बहुत चिन्तित रहा करती थी। वे जब-तब पति से इतना परिश्रम न करने की प्रार्थना किया करती थीं। एक बार पत्नी ने जब बहुत कहा तो उन्होंने जवाब दिया- ‘देवि! इतना परिश्रम मेरे लिए अनिवार्य है, इसके बिना मेरा जीवन शून्य हो जायेगा। तुम्हारे पोषण के लिए पति होने के नाते मुझे धनोपार्जन के लिए परिश्रम करना ही है और ब्राह्मण होने के नाते समाज के लिए ज्ञान का दान करना ही है। मैं अपन इन दोनों अनिवार्य कर्तव्यों में से किसी से- एक से भी विरत नहीं हो सकता।’ पत्नी ने उत्तर दिया- “स्वामी समाज का महत्व मुझ से अधिक है और उसके लिए ज्ञान वृद्धि का जो महान कार्य आप कर रहे हैं उससे मुक्त हो जाइये।”

कैयट पत्नी की बात सुनकर बोले- “तो फिर यह घर किस प्रकार चलेगा?” “यह उत्तरदायित्व आप मुझ पर छोड़ दीजिये” पत्नी ने कहा। “इसके लिए मेरे पास एक योजना है।”

पत्नी ने बतलाया कि आज से मैं अपने कुटीर के चारों ओर उगी हुई कुशा की रस्सियां बनाकर बेचा करूंगी और आप सर्वथा निश्चिन्त होकर सम्पूर्ण एकाग्रता से ज्ञान साधना में लग जाइये।

कैयट की आंखों में हर्षपूर्ण कृतज्ञता के आंसू आ गये और वे बोले जिसकी जीवन संगिनी ज्ञान का महत्व समझकर इतना सहयोग करने को तत्पर हो उसकी साधना भला क्यों न पूरी होगी?


इक्कीसवीं सदी की भवितव्यताएँ – नवयुग की वेला निकट आ पहुँची

इन दिनों तृतीय महायुद्ध का आतंक सर्वत्र सर्वत्र छाया हुआ है। इस वज्रपात की सम्भावना से समूची मानव जाति की नींद हराम है। कभी-कभी लगता है कि प्रलय की घड़ी और सामूहिक मरण का दिन निकट आ गया। अणु आयुधों के उपरान्त विष बरसाने वाले रासायनिक अस्त्र और लेसर जैसी मृत्यु किरणें धीमे-धीमे प्रकाश में आ रही हैं और प्रतीत होता है कि प्राण वायु बरसाने वाले बादलों से सुशोभित आकाश मरघट बनकर जलेगा। सूर्य चन्द्र और सागर तक को मनुष्य की उद्वतता निगल बैठे तो आश्चर्य नहीं? कल्पना तो यह भी की जाती है कि यहाँ खंडहरों और नीरवता के अतिरिक्त और कुछ ऐसा न बचेगा जिसे मृत्यु के ताण्डव नृत्य से भिन्न देखा जाय।

किन्तु आस्थावानों को विश्वास रखना चाहिए कि उस सर्वनाश के चरितार्थ होने में लाखों करोड़ों वर्षों की देर है। आत्म विज्ञान की शक्तियाँ भौतिक विज्ञान द्वारा रचे हुए इस अनर्थ को समय रहते रोक सकेंगी। नागासाकी और हिरोशिमा की पुनरावृत्ति अन्यत्र कहीं भी नहीं दीख पड़ेगी। वृत्रासुर किसी समय ऐसा ही विनाश रच रहा था कि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र ने उसकी कमर तोड़ दी और उसके मनसूबे औंधे मुँह गिरकर धूलि चाटने लगे। अभी जो बादल बेतरह गरज रहे हैं वे तीव्रगामी तूफान के साथ उड़ जायेंगे। वे न हिमयुग में बदलेंगे, समुद्र में उफान लाकर धरातल को उदरस्थ ही कर सकेंगे। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, यह न्यूटन का नियम है। भौतिकी का दर्प दलन करने के लिए वह उद्भव हो रहा है जिसमें महाकाल की अप्रत्याशित भूमिका सम्पन्न होती देखी जा सके।

वैज्ञानिक, राजनेता, भविष्यवक्ता, अन्वेषक अपने-अपने तर्क और तथ्य आगे रखकर यह प्रमाणित करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि महाविनाश में अब उँगलियों पर गिनने जितने समय को देर है किसी सीमा तक उठे हुए कदम अब वापस नहीं लौटेंगे। इन प्रवक्ताओं के कथन अनुमान, विश्लेषण पर कोई आक्षेप न करते हुए हमें यह पूरी हिम्मत के साथ कहने ही छूट मिली है कि आतंक के समय रहते शान्त होने की भविष्यवाणी करें और जन साधारण से कहें कि विकसित होने की अपेक्षा सृजन की बात सोचें। दुनिया यह नहीं रहेगी जो आज है। उसकी मान्यताएं, भावनाएं, विचारणाएं। आकांक्षाएं ही नहीं, गतिविधियाँ भी इस तरह बदलेंगी कि सब कुछ नया-नया प्रतीत होने लगे।

आज से पाँच सौ वर्ष पुराना कोई मनुष्य कहीं जीवित हो और आकर अबकी भौतिक प्रगति के दृश्य देखे तो उसे आश्चर्यचकित होकर रह जाना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि यह उसके जानने वाली दुनिया नहीं रही। यह तो भूतो की बस्ती जैसी बन गई है। सचमुच पिछले दिनों बुद्धिवाद और भौतिकवाद की सम्मिलित संरचना हुई भी ऐसी ही है जिसे असाधारण अद्भुत, अनुपम और आश्चर्यजनक परिवर्तन कहा जा सके।

ठीक इसी के समतुल्य दूसरा परिवर्तन होने जा रहा है। उसके लिए पाँच सौ वर्ष प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इस नये परिवर्तन के लिए एक शताब्दी पर्याप्त है। आज की चकाचौंध जैसी परिस्थितियाँ और आसुरी मायाचार जैसी समस्याएँ अब इन दिनों भयावह लगती है और उनके चलते प्रवाह को देखकर लगता है कि सूर्य अस्त हो चला और निविड़ निशा से भरा अंधकार अति समीप आ पहुँचा पर ऐसा होगा नहीं। यह ग्रहण की युति है। बदली की छाया है, जिसे हटा देने वाले प्रचंड आधार विद्यमान भी हैं और गतिशील भी। लंका काण्ड की नृशंसता के उपरान्त रामराज्य का सतयुग वापस आया था। वैसी ही पुनरावृत्ति की हम अपेक्षा कर सकते हैं।

विनाश की सोचते और चेष्टा करते हुए मनुष्य का बुद्धि संसार थक जायेगा और वैभव के साधन स्रोत सूख जायेंगे। उन्हें नये सिरे से नई बातें सोचनी पड़ेगी कि प्रवाह की इस दिशा को उलट दिया जाय और उपलब्ध साधनों को सृजन के लिए लगाया जाय। ऊपर से पड़ने वाले दबाव ऐसी ही उलट फेर संभव करेंगे। उनने उलटे को उलट कर सीधा करने का निश्चय कर लिया है।

आयुध बनाने वाले कारखाने के मजदूरों और इंजीनियरों को सृजन के साधन विनिर्मित करने का नया काम मिलेगा। आयुधों से लोगों का अब पेट भर गया है मजूरों को उधार या मुक्त बाँटकर अपने कारखानों की बेरोजगारी उन्हें बरबस रोकने पड़ रही है।

अगले दिनों भूखी, प्यासी, अशिक्षित, बीमार, पिछड़ी दुनिया की आवश्यकता इतनी अधिक दृष्टिगोचर होगी कि उनकी पूर्ति के लिए युद्ध साधनों और निर्माताओं की समूची पूँजी खप जायेगी। माँग भी इतनी होगी कि सीमित मुनाफा लेकर उत्पादक को जलते तवे पर पानी की बूँदों की तरह खपाया जा सके। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि विनाश के लिए एक छुरी या दियासलाई पर्याप्त है। पर विकास के लिए तो अनेकानेक साधन बड़ी मात्रा में जुटाने पड़ते हैं। अगले दिनों सृजनात्मक उत्पादन की हजार गुनी माँग होगी और कहीं से भी बेकारी बेरोजगारी की पूँजी जमा होने की शिकायत सुनने को न मिलेगी।

संसार भर में प्रायः दस करोड़ सैनिक और अर्ध सैनिक हैं वे युद्ध की पढ़ाई पढ़ते, परीक्षा देते और प्रतीक्षा करते रहते हैं। उन्हें इस बाल कक्षा से आगे बढ़कर उस कालेज में भर्ती होना चाहिए जिसमें वे गरीबी, अशिक्षा और बीमारी के विरुद्ध मोर्चा लगा सकें और ढहा देने वाली तोपें चला सकें। दस करोड़ अध्यापक, बागवान, चिकित्सकों को आज की दुनिया के लिए स्वर्गलोक से अवतरित होने वाले देवता समझा जाय। उन्हें मृत्यु दूत की पदवी से विरत होना पड़ेगा।

युद्धों से समस्या घटती नहीं बढ़ती ही है। घटाने और मिटाने का एक ही तरीका है। विचार विनिमय, पंच फैसला, संधि या विश्वास। यह तत्व उभरने ही वाले हैं। अण्डे में हैं तो क्या, कल वे चूजे बनेंगे, परसों मुर्गे और कुछ ही समय बीतेगा कि ब्रह्म मुहूर्त होने की बाँग लगाने लगेंगे। सोतों को जगाने की उनकी पुकार अनसुनी न की जायेगी।

विष उगलने वाले, कुँभकरण जैसी साँस लेने वाले विशालकाय कल कारखाने बन्द हो जाएंगे। वायु प्रदूषण बढ़ेगा और जल प्रदूषण का कुहराम मचेगा। एक एक, दो दो हार्स पावर की मोटरें गृह उद्योगों के माध्यम से उन वस्तुओं का उत्पादन करने लगेंगी जिनकी विलास के लिए नहीं निर्वाह के लिए आवश्यकता है। न शिक्षितों की बेरोजगारी रहेगी न अशिक्षितों की। सभी को काम मिल जायगा और भूख ही नहीं मिटेगी, वरन् उस शैतानी पर भी अंकुश लगेगा, जो खाली दिमाग होने के कारण शैतानी बनकर छाई रहती है।

शहर बिखरेंगे और गाँव सिकुड़ेंगे। बीच की स्थिति कस्बों की होगी। चारों ओर खेतों और बागों के फार्म होंगे। सिंचाई और बुवाई का ऐसा योजनाबद्ध ताना बाना बनेगा जो न केवल हरित क्रान्ति की आवश्यकता पूरी कर सकेगा वरन् पाताल गंगाओं से खींचकर रेगिस्तानों को भी इंदिरा नहर की तरह उर्वर भूमि में परिणत कर सकेगा।

आज तो उत्पादन जितना ही श्रम विक्रय में लगता है। पीछे हर कस्बे में मुहल्ले-मुहल्ले में ऐसे सुपर बाजार होंगे जहाँ एक ही जगह विक्रेताओं और खरीददारों की कुछ ही समय में अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने का सुयोग मिल सके।

गाँवों की बसावट आज जैसी भौंड़ी न होगी वरन् वे “लार्जर फैमिली” के रूप में खेती करने वाले ऐसे परिवारों के रूप में बसे होंगे जो अपने आप में स्वावलम्बी भी होंगे और सुरुचि पूर्ण भी, सुसंस्कृत एवं सुनियोजित भी। बड़े शहरों की बड़ी गंदगी को तब जलाशयों में बहाकर पेयजल को दूषित न करना पड़ेगा वरन् कचरे को खाद में बदल लेने की पद्धति कार्यान्वित होने लगेगी। खेत उर्वर बनेंगे और गंदगी का कहीं दर्शन भी न हो सकेगा।

आज धर्मजीवी अगणित हैं। 65 लाख संत बाबा, 1 लाख प्रशिक्षित पादरी, तथा 1 लाख अन्यान्य धर्मों के पुरोहित। कुछ साधक, कुछ योगी। यह एक करोड़ का समुदाय असली धर्म की सेवा करेगा। व्यक्तित्व की प्रखरता और समाज के सुगठन के लिए जिस स्तर के लोक शिक्षण की आवश्यकता है वह नीति निष्ठा और समाज सेवा की दो गंगा-यमुना धाराओं में भली प्रकार समा जाता है। कर्मकाण्ड और जप तप व्यक्तिगत रुचि एवं आवश्यकता का विषय है। उसे ऐच्छिक छोड़ दिया जाय पर धर्म का वह पक्ष जो जनता से अपना निर्वाह भर पाता है, मात्र इसी काम में निरत रहे कि व्यक्ति का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार शालीनता युक्त बनाये। समाज में ऐसे प्रचलन चलाने के लिए जन संपर्क साधे, जिससे सुधरे समाज की झाँकी विनिर्मित हो सके। ऐसी झाँकी जिसे धरती पर स्वर्ग का अवतरण कहा जा सके। यह संत वर्ग स्कूली शिक्षा के स्थान पर सामाजिक शिक्षा का नैतिक शिक्षा का वातावरण बनाये। परिव्राजकों की तरह बादल बन कर उन पिछड़े क्षेत्रों में पहुँचे जहाँ नव सृजन की चेतना जगाने की आवश्यकता है।

अन्यान्य गिरजाघरों-मस्जिदों, देश के अगणित देवालयों की इतनी भूमि और इतनी सम्पदा विद्यमान है जिससे कितने ही नवजीवन जगाने वाले विश्व विद्यालय चलाये जा सके।

यह एक करोड़ की धर्म सेना विश्व राष्ट्र की सम्पदा रहे और वहीं से उसे वहाँ समय समय पर, सत्याग्रह करने के लिए भेजी जाय जहाँ कहीं भी अनीति बरती जा रही है। जब विश्व राष्ट्र का समस्त संसार का शासन होगा और भौगोलिक दृष्टि से देशों का छोटे प्रान्तों की तरह पुनर्गठन होगा तो स्थानीय समस्याओं को सुलझाने के लिए मनीषियों का मंत्रिमंडल काम करेगा। इनका वालिग वोट से चयन न होगा वरन् लोक सेवी प्रतिभाओं में से उन्हें नियुक्त कर लिया जाया करेगा। अनगढ़ भीड़ द्वारा एक वालिग एक वोट के आधार पर ऐसे सूत्र संचालक नहीं चुने जा सकते जो अपने पराये का पक्षपात करने की अपेक्षा लोकहित और आदर्शों का परिवर्तन ही अपना कर्तव्य समझें।

अब बिखरे हुए, अपने क्षेत्रीय स्वार्थों की दुहाई देने वाले देशों का जमाना चला गया। अब संसार भर का एक ही विश्वराष्ट्र रहेगा। उसमें न्याय और विवेक चलेगा। न आर्थिक विषमता रहेगी न ही जातीय। हर किसी को शान्ति से रहने और रहने देने का अधिकार मिलेगा। उस वर्ग का उन्मूलन किया जायगा जो अपने परिकर और वर्ग को अनुचित लाभ दिलाने की दुहाई देकर लोगों को भड़काते और चलते हुए कार्य में बाधा डालते हैं।

कम आवश्यकताएं कम समय में पूरी हो जाने के उपरान्त सर्व साधारण को इतना समय मिल सकेगा कि वह अपना, शारीरिक मानसिक विकास करने के लिए समुचित अवसर प्राप्त कर सके, अपने संपर्क क्षेत्र में प्रगतिशीलता उत्पन्न करने वाले क्रिया कलापों में भी योग दान दे सकें।

परस्पर मिल जुलकर उपयोगी काम करने से सहज मनोरंजन हो जाता है। संगीत, साहित्य कला को प्रज्ञा और श्रद्धा को उभारने में प्रयुक्त किया जा सके तो उसमें इतने उच्च कोटि के मनोरंजन की व्यवस्था हो सकती है जिस पर आँखें व मन-मस्तिष्क खराब करने वाले सिनेमाओं को निछावर किया जा सके। प्रकृति अपने आप में इतनी अधिक सुन्दर और सुखद है कि उसकी गोदी में खेलने का आनंद उस अनुभूति की पूर्ति कर सकता है जिसके लिए कि आज हर किसी को बड़ी प्यास है। वैचारिक प्रदूषण की मुक्ति की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

मनुष्य में देवत्व उदय करने वाला और धरती का स्वर्ग जैसा वातावरण बनाने वाला समय अब निकट है। अन्धकार सिमट कर पलायन कर रहा है। ऊषा काल का अरुणोदय उल्लास का संदेश लेकर आया है। हर हृदय सरोवर में अब शतदल कमल खिलने ही वाले हैं।

( क्रमशः )


लकड़हारे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते (kahani)

पेड़ काटने की योजना बनाते हुए लकड़हारे उस जंगल में घूम रहे थे। हाथ में लोहे की कुल्हाड़ी भर थी।

साथियों को चिन्तित देखकर वट वृक्ष ने कहा- “लकड़हारे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। कुल्हाड़ी की कोई विसात नहीं। हम लोग चिन्तित क्यों हों?”

“चिन्तित उस दिन होना पड़ेगा जिस दिन हममें से ही कोई फूटकर दुश्मन का साथ देगा और कुल्हाड़ी का बेंट बनेगा।”

बात सच निकली। जंगल कटना तब आरंभ हुआ जब लोहे की कुल्हाड़ी को लकड़ी का बेंट हाथ लग गया।


संकीर्ण स्वार्थपरता नितान्त घातक

स्वार्थ सबको प्रिय लगता है। हर किसी की स्वाभाविक मनोवृत्ति स्वार्थ साधन की होती है। उसमें कुछ बुरा भी नहीं है। जो आत्म हित कर सकता है वही दूसरों को सुखी समुन्नत बनाने में भी सहायक हो सकता है। जो स्वयं ही ठूँठ है वह दूसरे किसी की क्या सहायता करेगा?

निन्दा स्वार्थ की नहीं संकीर्ण स्वार्थ की की गई है। संकीर्ण स्वार्थ वह है जिसमें तात्कालिक लाभ तो दिखता है पर उसके फलस्वरूप आने वाली विपत्ति की ओर से आँखें बन्द ही बनी रहती हैं।

दूरगामी स्वार्थ साधन के लिए मनुष्य को अपना, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार सुधारते हुए व्यक्तित्व को खरे सोने जैसा बनाना पड़ता है, जिसका मूल्याँकन कहीं भी हो सके। अपनी गरिमा को गिरा कर जो स्वार्थ साधा गया है यह तो वस्तुतः अनर्थ है। अनर्थ को स्वार्थ समझने की भूल अदूरदर्शी ही करते हैं।

उच्चस्तरीय स्वार्थ को ही परमार्थ कहते हैं। परमार्थ का अर्थ लुटा देना नहीं, बीज बोना है, जो अनेक गुना होकर उगे। भावुकता में विवेक खो बैठने वाले और झूठी वाह-वाही में फूल जाने वाले लोग बहुधा परमार्थ के नाम पर भी ऐसे काम करते हैं जिससे प्रदर्शन तो होता है, पर किसी प्रकार का हित साधन नहीं।

दूसरों को घाटा देकर साधा हुआ स्वार्थ प्रकारान्तर से अपना ही अहित करता है। वस्तुस्थिति प्रकट होने पर जिसे स्वार्थ की लपेट में लिया गया है वही नहीं, वरन् उस प्रसंग से अवगत सभी लोग सावधान हो जाते हैं और उसकी उचित बातों पर भी विश्वास नहीं करते।

परमार्थ में दूसरों को स्वार्थ प्रधान समझा जाता है और अपने लाभ को गौण माना जाता है। लोकसेवी, परोपकारी, सन्तजन और महापुरुष अपने जीवन की यही नीति बनाते हैं। फलतः वे लोगों की श्रद्धा, विश्वास, स्नेह, सम्मान और सहयोग इतनी अधिक मात्रा में अर्जित कर लेते हैं जितना बहुत पूँजी खर्च करके भी हस्तगत नहीं किया जाता। महामानवों को लोकसेवा के बल पर ही सौभाग्य भरे अवसर मिलते हैं। लोक विश्वास जो जितनी मात्रा में उपलब्ध कर सका, वह उतना ही ऊँचा उठा और आगे बढ़ा है। यह परमार्थ का ही प्रतिफल है। बीज गलकर विशाल वृक्ष के रूप में इसी आधार पर विकसित होता है।

ओछे स्वार्थ साधने में मनुष्य यह भूल जाता है कि अपने लाभ के लिए दूसरों को कितनी हानि पहुँचाई जाती है। इस प्रकार कमाया हुआ तात्कालिक लाभ मनुष्य का सामाजिक सम्मान गिराता है और अन्तरात्मा को इतना कलुषित कर देता है कि वह दुष्प्रवृत्ति परायों को ही नहीं अपनों को भी चपेट में ले लेती है। अपनों के साथ किया गया दुर्व्यवहार तत्काल न सही कालान्तर में प्रबल प्रतिरोध के रूप में प्रकट होता है। भले ही उसका कारण और स्वरूप कुछ भी क्यों न हो। स्वार्थी के प्रति सभी की दृष्टि आशंका भरी रहती है और यही संदेह बना रहता है कि अपने मतलब के लिए हमें गर्त में न गिरा दे। जिनको इस स्वार्थ से लाभ मिलता है वे साझीदार भी चौकन्ने रहते हैं। उसको नहीं मानते। वरन् समझते हैं कि यह सब अपनी आदतों के वशीभूत होकर कर रहे हैं। ऐसे व्यक्ति से तथाकथित मित्र संबंधी भी चौकन्ने रहते हैं और उससे अनुचित लाभ उठाने में भी नहीं हिचकते। अतः स्वार्थ वही उचित है जिसमें परमार्थ जुड़ा हो।


Quotation

अपनी दशा से लोगों को आतंकित करने वाला ग्रह शनि वास्तव में इतना हलका फुलका है कि यदि उसे किसी विशाल महासागर में छोड़ दिया जाय तो वह अपने भार से डूबने की जगह रबर की गेंद की तरह तैरने लगेगा।


कहीं हम आत्मघात तो नहीं करने जा रहे?

नव ग्रहों में पिछले दशकों में प्लूटो, नेपच्यून, यूरेनस नामक तीन ग्रहों को और सम्मिलित कर लिया गया है। 55 वर्ष पूर्व वे अविज्ञात थे। बढ़िया दूरबीनों से वे छोटे-छोटे गोलों की तरह दीखते हैं पर उनका इतिहास सौरमंडल संरचना के बाद का है। इन तीनों की रचना बाद में हुई जबकि सूर्य ने अपने ग्रह उपग्रहों को सुव्यवस्थित कर लिया था।

सौरमण्डल की पूर्व संरचना में एक सुविकसित ग्रह था- “फैथॉन”। उसकी सभ्यता अन्य सभी साथियों की तुलना में कहीं अधिक विकसित थी। उस पर आज के बुद्धिमान और विद्वान धरती निवासियों के स्तर के प्राणी रहते थे। उनने विज्ञान में विशेष रूप से प्रगति की थी। उसका मूल स्थान बृहस्पति और मंगल के बीच में था। आकार विस्तार भी कम न था। सूर्य के अनुदान उसे पृथ्वी जितने ही मिलते थे इसलिए न तो जल की कमी थी, न वायु की, न खाद्य पदार्थों की।

उस ग्रह के निवासी पृथ्वी निवासियों से किसी प्रकार पिछड़े हुए न थे। किन्तु आपाधापी, स्वार्थपरता, आक्रमण की ललक उन्हें भी कम नहीं सताती थी। बढ़े हुए यह दुर्गुण ही उनके विनाश का निमित्त कारण बने।

कहा जाता है कि उनने अणु आयुध विकसित कर लिये थे। पहले तो प्रतिपक्षियों को डराने धमकाने के लिए उस भण्डार का उपयोग करते रहे, पर एक दिन किसी उन्मादी ने उस उन्माद को कार्यान्वित करके दिखा दिया, अणु बम चलने लगे। विनाश दोनों पक्षों का ही नहीं हुआ, चेरनोबिल जैसे किसी बारूद के भण्डार में आग लग जाने से उस समूचे ग्रह की धज्जियाँ उड़ गईं। वह फिर छितरा गया। टुकड़े धज्जी-धज्जी हो गये।

विस्फोट का वेग बहुत भयंकर था। वह इतना शक्तिशाली द्रुतगामी था कि उसकी टकराहट ही नहीं, छोड़ी हुई विकिरण व्यवस्था से सौर मण्डल में भारी उत्पाद मचा और असाधारण अन्तर हुआ। पृथ्वी पर आदिम काल के जीवित विशाल काय जीव जन्तु फैले हुए विकिरण की लपेट में आ गये और महागज, महासरी सृप महागरुड़ जैसे प्राणियों की सुविस्तृत संख्या समूची धरती पर से देखते-देखते समाप्त हो गई। उनके कंकाल मात्र जहां-तहां उस विष वेल की साक्षी देने के लिए शेष रह गये हैं। इन कंकालों में विकिरण पाया गया है। इसलिये अनुमान लगाया जाता है कि वे अपनी मौत नहीं मरे। परिस्थितियों ने उनके प्राण हरण किये। उन दिनों छोटे मझोले प्राणी और भी रहे होंगे, पर बात पुरानी हो जाने से उनके अवशेष अभी तक खोजे नहीं जा चुके हैं।

कहा जाता है कि विस्फोट हर दिशा में छोड़ा गया और उसने शनि ग्रह के इर्द-गिर्द भ्रमण करने वाले उपग्रहों का चूरा कर दिया। यह चूरा ही शनि के इर्द-गिर्द इन दिनों धूलि कणों से बने छल्ले के रूप में परिभ्रमण कर रहा है। मंगल ग्रह पर पानी था और उसकी भूमि पर पृथ्वी से मिलते जुलते प्राणी रहते थे। पर फैथॉन से प्रचंड ऊर्जा जब उधर से निकली तो मंगल की सारी जल सम्पदा भाप बनकर उड़ गई। मौसम का तापमान अतिशय बढ़ गया। इसका परिणाम यह हुआ कि यह ग्रह भी प्राणी रहित वीरान सुनसान मरघट जैसा हो गया। उस पर पुरानी सभ्यता के भग्नावशेष पाषाणकृत स्थिति में अभी भी पाये जाने की संभावना है। फोटो तो उनका अस्तित्व बताते हैं पर असली जानकारी तब मिलेगी जब चंद्रमा की तरह मंगल पर भी मनुष्य उतरेगा।

भौतिकविदों का मत है कि फैथॉन में इतनी गति और प्रचंडता थी कि वह सहज रुका नहीं। उसने अपनी चुम्बक शक्ति से अन्यान्य ग्रहों की सामान्य स्थिति में असाधारण परिवर्तन किया। पृथ्वी के मौसम, वर्षा और दिनमान पर असाधारण प्रभाव पड़ा और उसकी गतिशीलता में कमी आई। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों का जन्म उसी माहौल में हुआ।

फैथॉन को लम्बी यात्रा करनी पड़ी और जब वह थक कर निढाल हो गया तो तीन टुकड़ों में बनकर शून्य के बहुत दूरवर्ती क्षेत्र में अपने लिए स्थान बना सकने में समर्थ हुआ। अब वे पिण्ड जैसी स्थिति में हैं, उन्हें सूर्य की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का अन्तिम छोर ही कहा जा सकता है।

यूरेनस की आकृति विचित्र है। उस पर एक मीनार जैसी सीधी खड़ी हुई है। यह कोई एंटीना, प्रसारण यंत्र अथवा सूचना ग्राहक केन्द्र हो सकता है। पर वह वस्तुतः है क्या, इसका सही पता अभी तक नहीं लगाया जा सका है क्योंकि उसकी दूरी इतनी अधिक है कि दृश्यों के दीखते हुए भी उनके संबंध में सही अनुमान लगाया जा सकना संभव नहीं।

नेपच्यून के बारे में कहा जाता है कि उसकी शीतलता शून्य से 300 डिग्री कम है फलतः वहाँ जो भी पदार्थ हैं वह अत्यधिक ठोस और कठोर स्थिति में हैं। हो सकता है कि वह समूचा ग्रह हीरे जैसे किसी पदार्थ का पर्वत बन गया हो।

अन्तिम भाग जो स्थिर हो सका, वह प्लूटो है। वह सूर्य और पृथ्वी के अन्तर की अपेक्षा 40 गुनी अधिक दूरी पर है। वहाँ तक सूर्य का प्रकाश पृथ्वी की तुलना में 1600 गुना कम है।

प्लूटो का एक वर्ष हमारी पृथ्वी के 220 वर्षों में होता है, उसका दिन रात भी पृथ्वी की अपेक्षा छह गुना दूर होता है। वहाँ से देखने पर सूरज एक जलती मोमबत्ती जैसा प्रतीत होगा। पृथ्वी, मंगल जैसे ग्रह जुगनूँ जैसे चमकते उड़ते दिखाई देते होंगे। प्लूटो का तापमान शून्य से 300 डिग्री कम है। उस पर कोई जीवित प्राणी अपना निर्वाह नहीं कर सकता। ऐसी है उसकी दयनीय स्थिति।

यह कुछ मोटे तथ्य हैं जो यह बताते हैं कि शृंखला की एक इकाई मार्ग भ्रष्ट हो जाने पर कितने विग्रह खड़े कर सकती है। फैथॉन के विग्रहों के बारे में शोध जारी है। उसके मूल स्थान मंगल और बृहस्पति के बीच में उल्काओं की एक माला अभी भी परिभ्रमण कर रही है, उसी से उछल कर कभी-कभी कोई खण्ड पृथ्वी से आ टकराता है जो साइबेरिया की दुर्घटना का स्मरण दिला जाता है और बता जाता है कि फैथॉन का कचरा भी इतना भयानक है कि उसका एक अंश भी पृथ्वी की वर्तमान छवि और स्थिति को बिगाड़ सकता है।

सबसे बड़ी बात समझने योग्य यह है कि शक्ति को उपलब्ध या एकत्रित कर लेना एक बात है और उसे संभाल कर रखना, मात्र उच्च प्रयोजनों के लिए ही प्रयुक्त करना दूसरी। यदि शक्ति और मूर्खता दोनों ही एक साथ मिल जाते हैं तो वे अपने लिए ही नहीं अन्यान्यों के लिए भी संकट उत्पन्न करती हैं। इन दिनों अणु बमों का, रिएक्टरों का उन्माद छोटे बड़े अनेक देशों पर चढ़ रहा है। यह निर्माण की अवधि है, जब उसके प्रयोग का समय आये तो उसकी भयंकरता की कल्पना करते ही दिल दहलता है। लगता है कि लाखों वर्ष पूर्व फैथॉन के शक्तिमानों ने जिस मूर्खता को अपनाया था, उसकी पुनरावृत्ति करने ही तो हम नहीं जा रहे हैं?


रसायन शास्त्रियों का मत (kahani)

रसायन शास्त्रियों का मत है कि हमारे शरीर में आमतौर से इतनी चिकनाई है कि उससे नहाने के साबुन की साधारण टिकियों जैसी 7 टिकियाँ बन सकती हैं। हमारे शरीर में लोहे की इतनी मात्रा रहती है कि उससे एक छोटी मोटी कील बन सकती है। चीनी की मात्रा से चाय के 1-2 प्याले भर सकते हैं। चूने से हाथ-दो-हाथ जगह को पोता जा सकता है। फास्फोरस से कम से कम 40 माचिसों के लिए मसाला बनाया जा सकता है। मैग्नेशियम से मैगनेशिया की काफी बड़ी मात्रा बन सकती है। हमारे शरीर में इतना पोटैशियम है कि उसमें गन्धक की एक चुटकी मिला देने से एक छोटी तोप दागी जा सकती है।

इन सारे रासायनिक पदार्थों का मूल्य अधिक से अधिक 10-12 रुपया हो सकता है। क्या इतने तुच्छ मूल्य के शरीर को ही जीवन समर्पित कर देने में कोई समझदारी है?


व्यक्तित्व मात्र वंश-परम्परा से नहीं बनता

शरीर के बाहरी अवयव तो जाने पहचाने हैं। पर उनके भीतर छोटे-छोटे अरबों जीव कोशों की शृंखला विद्यमान है। ये सभी अपने-अपने निर्धारित कार्यों में लगे रहते हैं। सतत् मरते और जन्मते रहते हैं। इन कोशाओं के भीतर भी एक विशाल भण्डार विद्यमान है, जिनमें अनेक रसायनों के अतिरिक्त अति सूक्ष्म इकाइयाँ हैं ‘जीन्स’। इनके भीतर गुण सूत्रों के ऐसे घटक रहते हैं जो प्रजनन प्रक्रिया में काम आते हैं। नर-नारी दोनों में ही यह घटक रहते हैं। नारी डिम्ब और नर शुक्र के अन्तःकलेवर में इन्हीं की प्रधानता रहती है। निषेचन के समय दोनों पक्ष के गुण सूत्र आपस में गुँथ जाते हैं और एक नई सृष्टि का आरंभ करते हैं। भ्रूण की स्थापना इसी आधार पर होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार शिशुओं का जन्म और उनकी विशेषता इन्हीं छोटे-छोटे इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखे जाने वाले घटकों की विकसित प्रक्रिया पर निर्भर है।

इस प्राथमिक जानकारी का प्राप्त होना बाल बोध की तरह आवश्यक है पर आनुवाँशिकी का उतना महत्व नहीं है, जितना कि दिया जाता है। उनका प्रभाव आरंभिक भूमिका निर्वाह के काम तो आता है, पर शिशु में वही सब गुण धर्म हों, यह आवश्यक नहीं। माता और पिता के स्वास्थ्य और मन की थोड़ी छाप शिशु में भी पाई जाती है किन्तु यह सोचना गलत है कि नवजात बालक का समूचा व्यक्तित्व, इन डिम्ब और शुक्र कीटकों की ही समन्वित अनुकृति है।

बच्चे के साथ पूर्व जन्मों के संचित संस्कार भी रहते हैं। जिन लोगों के बीच में उसे जीवनयापन करना पड़ता है, उनके वातावरण की छाप भी उस पर रहती है। शिक्षा अपना प्रभाव छोड़ती है। इसके अतिरिक्त प्राणी का निज का रुझान, चिन्तन, दृष्टिकोण भी अपनी प्रतिक्रिया - सम्मिलित करता है। भौतिक क्षेत्र की इतनी विशेषताएँ मिलकर तब वह रसायन विनिर्मित होता है, जिससे व्यक्तित्व की समग्र रूप रेखा गढ़ी जाती है।

आनुवाँशिकी विज्ञान के मूर्धन्य “जीन्स” की संरचना पर इसलिए बहुत ध्यान दे रहे हैं कि उनकी भीतरी हलचलों और विधि व्यवस्थाओं की समुचित जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त इच्छित स्तर के बच्चे जन्माये और श्रेष्ठ कोटि के मनुष्य बनाये जा सकें। इस प्रयोजन के लिए वे प्रौढ़ परिपक्व नर-नारियों को ही प्रजनन क्षेत्र में प्रवेश करने की छूट देते हैं और कहते हैं कि जिन युग्मों में अभीष्ट परिपक्वता न हो, उन्हें गर्भ धारण करने कराने का दायित्व वहन नहीं करना चाहिए। साधारण मनोविनोद ही दाम्पत्य जीवन का आनन्द है। यह मान्यता रखते हुए मैत्री भर निबाहनी चाहिए। मानवी समाज संरचना के अंग बनने वाले ऐसे नागरिक उत्पन्न नहीं करना चाहिए जो अपने लिए तथा अन्यान्यों के लिए संकट उत्पन्न करें।

किन्तु यह प्रतिपादन भी अधूरा, एकाँगी, ही है, नर-नारी के स्थूल घटक ही पूरी तरह शिशु के शरीर एवं स्वभाव का निर्माण नहीं करते। यदि ऐसा होता तो सुयोग्य संतानों का कार्य मात्र कुछ बलिष्ठ स्त्री पुरुषों के लिए रह जाता। समग्रता के लिए बलिष्ठता के साथ-साथ बुद्धि वैभव भी होना चाहिए। उनके गुण, कर्म स्वभाव भी उच्चस्तरीय होने चाहिए। जबकि ऐसा कभी सुनिश्चित नहीं होता। शरीर के रसायन काय कलेवर पर ही अपनी छाप छोड़ सकते हैं किन्तु उन गुणों को उत्तराधिकार में प्रदान नहीं कर सकते, जिनका उन्हें स्वयं अभ्यास नहीं। इस आधार पर तो यह मान्यता बनती है कि अशिक्षित जोड़े से उत्पन्न उनकी सन्तानें मूर्ख स्तर की बनी रहेंगी। न उनमें विद्या के प्रति रुचि होगी और न उनका मस्तिष्क बुद्धि की प्रखरता, शान दिखा सकने के योग्य बन सकेगा। इस प्रतिपादन के समर्थन में असंख्यों उदाहरण मौजूद हैं, जिनमें अभिभावकों की तुलना में संतान में भिन्न प्रकार के गुण पाये गये। आवश्यक नहीं कि संगीतकार का बेटा संगीतकार ही हो। साहित्यकार का बेटा साहित्यकार ही हो। इसके अतिरिक्त सामान्य परिवारों में विशिष्ट योग्यताओं वाले वरिष्ठ व्यक्तियों को उत्पन्न ही कैसे किया जाय?, इसे प्रतिपादन के विपरीत अनेकानेक प्रमाण और उदाहरण विपुल संख्या में देखने को मिलते हैं।

अतएव नर-नारी की शारीरिक बलिष्ठता, सुन्दरता को महत्व देते हुए भी उनके समूचे व्यक्तित्व के परिष्कृत होने की आशा और संभावना इतने छोटे आधार में सीमित नहीं की जा सकती। यदि ऐसा कुछ है भी तो उसे उतने समय तक के लिये ही सीमित समझा जा सकता है, जब तक कि बालक पूर्णतया अभिभावकों पर ही निर्भर रहता है और उन्हीं द्वारा प्रदत्त मार्ग-दर्शन का अनुसरण करता है। पर यह स्थिति देर तक नहीं रहती। किशोर को जब स्कूल जाने में समाज संपर्क बनाने का अवसर मिलता है तो देखने सुनने को ऐसा बहुत कुछ मिलता है जो ज्ञान अनुभव अभिभावकों के पास नहीं था। ऐसी दशा में समाज सम्पर्क की प्रभाव क्षमता ही किशोरावस्था में अपनी विशेषताओं का अनुभव कराने लगती है। ऐसी स्थिति में आनुवाँशिकी को उतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, जितना कि इन दिनों दिया जा रहा है।

मनुष्य न तो पशु है और न पेड़, जिसके बीजों की जाँच पड़ताल करके अच्छी नस्ल पैदा की जाय। कलमें पेड़ों में लगाई जा सकती हैं। ग्राफ्टिंग के प्रयोगों से नई-नई किस्म के खूबसूरत पौधे बनाने में मदद मिली है। क्रास ब्रीडिंग के प्रयोगों से पशु वर्ग पर भी अपवाद जितना ही प्रतिफल मिल सका है। गधे और घोड़ी के संयोग से खच्चर तो उत्पन्न हुए पर वे सभी रहे नपुँसक ही। उनमें अपना वंश चलाने की क्षमता नहीं पायी गयी। शरीरगत जीन शृंखला के आधार पर ही हम नई पीढ़ी का सृजन स्वरूप निर्धारित करेंगे तो वह मनोरथ पूरा न हो सकेगा जो मनुष्य की मौलिक विशिष्टताओं में सामान्य प्रयासों से कोई बड़ा प्रयोजन-परिवर्तन पूरा कर सके।

समर्थ भारी पीढ़ियों के निर्माण में अध्यात्म उपचारों का आश्रय लेना होगा और उस क्षेत्र में उच्चस्तरीय भाव चिन्तन का समावेश करना होगा। आदर्शों और सिद्धान्तों को यदि चेतना की गहरी परतों तक प्रविष्ट कराया जा सके तो उस भावनात्मक विशेषता का समावेश उनमें करके नई पीढ़ियों में अभीष्ट विशिष्टताएं पैदा की जा सकती हैं। प्राचीन काल के गुरुकुलों में महामानवों की ढलाई होती थी। वहाँ मात्र शिक्षा का ही प्रबन्ध न था वरन् उनके रहन-सहन, चिन्तन और संवेदना को ऐसे तत्वज्ञान में ढाला जाता था जिससे बालक वंशपरंपरा में चले आ रहे कुसंस्कारों का परिमार्जन कर सकें और गुरु-परम्परा की विशेषताओं को आत्मसात कर सकें। इस संदर्भ में अभिभावकों का उत्कृष्ट चिन्तन और उदाहरण जैसा आदर्श चरित्र भी एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।


अचूक नुस्खा (kahani)

वर्नार्डशा के एक डॉक्टर मित्र थे। वे अक्सर बीमार रहते थे। शा न कहलवा भेजा कभी आप फुरसत में हों तो मेरा मुआइना कर जायें।

डॉक्टर तुरन्त दौड़े आये। पर सीढ़ियों पर चढ़ते-चढ़ते हाँफ गये। शा ने उन्हें आराम-कुर्सी दी और एक गिलास पानी पिलाया। कहा- देखा आपने मैं उम्र में आपसे कितना बड़ा हूँ और इन्हीं सीढ़ियों पर दिन में तीन बार चढ़ता उतरता हूँ। कभी हाँफता नहीं आप कहें तो वह नुस्खा आपको भी बता दूँ।

डॉक्टर ने कहा- “कृपा पूर्वक बता दीजिए। मुझे जहाँ भी जाना होता है वहाँ इस शिकायत का सामना करना पड़ता है।”

शा ने कहा- “अपनी खुराक में एक तिहाई कटौती कर दें।”

साथ ही कहा नुस्खा बताने की फीस पाँच शिलिंग दीजिए। डॉक्टर ने हँसते हुए पाँच शिलिंग उन्हें दे दिये।

शा अपने बीमार मित्रों को अक्सर इसी बहाने बुलाया करते थे और नीरोग रहने का यह अचूक नुस्खा बता कर पाँच शिलिंग वसूल किया करते थे।


श्रेष्ठ सम्पदा का उच्चस्तरीय उपयोग

खोपड़ी की पेटी में विचार गूलर के फल की तरह जन्मते या मर जाते हैं, अथवा वे मानसरोवर में हंसों की तरह मोती बीनते और संसार की शोभा बढ़ाने के लिए उड़ने फिरने लगते हैं, इन दोनों बातों में दूसरी बात ही सही है। विचार मस्तिष्क की उत्पत्ति भले ही हों, पर वे उस अण्डे में सदा कैद नहीं रहते। पकने पर पक्षी बनते और उन्मुक्त आकाश की सैर करते हैं।

विचारों में समस्याओं के समाधान की योग्यता ही नहीं संचरण की क्षमता भी है। उनके साथ विद्युत क्षमता जुड़ी होती है जो रेडियो तरंगों की तरह भ्रमण करती है। विचारणीय यह है कि चिन्तन की परिधि तक ही उन्हें सीमित न रहने देकर संचार सम्प्रेषण प्रयोजन में भी उन्हें काम ला सकते हैं या नहीं? मस्तिष्क हमारा टेलीफोन है उसका निचला हिस्सा वाणी के रूप में बोलता है और कान सुनने का। ये ग्रहण करके मस्तिष्क तक विचारों को पहुँचाने का काम करते हैं। इस सर्वविदित प्रक्रिया के अतिरिक्त ऐसा भी होता है कि विचार स्वयं एक शक्ति के रूप में अभीष्ट स्थान तक पहुँचें और वाणी की तरह निर्धारित केन्द्र तक अपना कथन पहुँचायें। पहुँचाये ही नहीं, ग्रहण भी करें। रेडियो यंत्र से विचार तंत्र की तुलना की जा सकती है। यह हो सकता है कि बिना किसी माध्यम के विचारों को किसी या किन्हीं व्यक्तियों तक पहुँचायें अथवा अनेकों को अवगत कराने के लिए अनन्त आकाश में बिखेर दें। विश्व चिन्तन के बहते प्रवाह को हम अपने सशक्त विचारों से सुधार या परिवर्तन का सन्देश दें।

“साइकिक डिस्कवरी बिहाइण्ड द आयरन करटेन” की सम्पादकगण शीला ओस्ट्रेण्डर एवं लिन श्रोडर ने अपनी पुस्तक में ऐसे प्रमाणों के उदाहरण दिये हैं जिसमें सुदूरवर्ती जीवधारी के लौह आवरण में आबद्ध होने पर भी विचारों का आदान-प्रदान संभव हुआ। यहाँ लौह आवरण से तात्पर्य सोवियत रूस (यू.एस.एस. आर.) से है जहाँ प्रत्यक्ष रूप से ऐसे प्रयोगों पर प्रतिबन्ध है पर अब वहीं से परामनोविज्ञान की पुष्टि के ढेरों प्रमाण सामने आ रहे हैं।

लैनिनग्राड परामनोविज्ञान प्रयोगशाला के अध्यक्ष डॉ. वासिलएव ने विचारों के प्रेषण और ग्रहण के ऐसे प्रमाणों का एकीकरण किया है जो अनुमानित नहीं थे। अजीबोगरीब थे पर वे सभी कसौटी पर खरे उतरे।

सोवियत विज्ञानी कार्ल निकोलायेव ने मास्को से साइबेरिया के मध्य विचारों का आदान प्रदान बिना किसी माध्यम के सही तरह स्थापित कर दिखाया। उनका कहना था कि ऐसे प्रयोगों के लिए प्रेषक और ग्राहक मस्तिष्कों को पूर्व प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

यह और भी सरल है कि निकटवर्ती व्यक्ति के विचार, भाव, उद्देश्य और आचरण को पढ़ लिया जाय। दुराव करने वाले व्यक्ति इस प्रकार के प्रयोक्ताओं से अपने असली रूप को छिपा नहीं सकते। इस प्रयोग में वाशिंगटन विश्व विद्यालय एवं स्टेनफोर्ड रिसर्च सेण्टर की प्रयोगशालाओं ने उत्साह वर्धक सफलता पाई है।

“रिलीजन एण्ड साइंस इन लाइफ” पुस्तक के लेखक मैक डोगल का कहना है कि निकट भविष्य में विचार व्यक्तिगत सम्पदा की तरह सीमाबद्ध न रखे जा सकेंगे, वरन् उस पर विज्ञान द्वारा सशक्त धाराओं की छाप छोड़ी जा सकेगी। लोगों को मद्यपों की तरह युद्धोन्माद अपनाने अथवा शान्ति से रहने के लिए बाधित किया जा सकेगा।

“द अननोन” पुस्तक में विद्वान लेखक डॉ. फैमोरियन लिखते हैं कि विचार कल्पना की तरह नहीं है वरन् उनमें ऐसी क्षमता भी है कि वे दूसरों की मनःस्थिति और परिस्थितियों पर प्रहार कर सकें। शत्रु को मित्र और मित्र को शत्रु बना सकें। यह विचार बन्धनों और परिस्थितियों को तोड़कर विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच सकते हैं। “मेण्टल रेडियो” पुस्तक की भूमिका में प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने उसी तथ्य का प्रतिपादन किया है।

फ्राँसीसी मानस शास्त्री रेनेवार कोलियर का कथन है कि विचारों का आदान-प्रदान ही नहीं, भावनाओं का संवेग भी पढ़ा और समझा जा सकता है। प्रयत्न करने पर मनुष्य का चिन्तन उसी प्रकार नंगा करके देखा जा सकता है जैसे कि कपड़ा उतार देने पर शरीर को।

वरसा (पोलैण्ड) की “इंटरनेशनल फिजीकल काँग्रेस” में ऐसे कई शोध पत्र पढ़े गये जिनमें सिद्ध किया गया कि विचारों को आमंत्रित और प्रेषित करना उसी प्रकार संभव है, जैसा कि धन का आदान-प्रदान।

ब्रिटेन की “साइको-फिजीकल सोसाइटी” के शोध अधिकारी एरिक एसीमोव, एवं पोलैण्ड के स्टीफन ओसोविक का मिला जुला प्रतिपादन है कि शरीर की स्वस्थता और रुग्णता बहुत करके मनुष्य के विचारों पर निर्भर है। अस्त व्यस्त और निषेधात्मक चिन्तन करने वाला व्यक्ति आहार-विहार सही रखने पर भी बीमारियों में फँसता चला जाता है। कनाडा के सर्जन डॉ. नॉरमन हॉपकिन्स ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों को व्यक्त करते हुए कहा है कि औषधियों की अपेक्षा उत्साहवर्धक आशा जनक विचार देकर रोगी को अपेक्षाकृत जल्दी अच्छा किया जा सकता है।

विचार स्वच्छन्द प्रतीत होते हैं पर वे अपने द्वारा ही नहीं किसी के द्वारा भी प्रतिबन्धित किये जा सकते हैं और मनुष्य का चिन्तन एक दिशा से दूसरी दिशा में घुमाया जा सकता है।

अब तक संसार में बड़ी शक्तियाँ- धन, शस्त्र, विज्ञान को माना जाता रहा है और विचारों को व्यक्ति विशेष के काम आने वाली सामान्य चेतनात्मक क्षमता माना जाता रहा है। पर मनोविज्ञान के अभिनव निष्कर्षों ने यह प्रतिपादन किया है कि इन सबके ऊपर विचार शक्ति है। उसका स्वरूप एवं उपयोग अभी तक सही रूप में जाना नहीं गया। जितना भण्डार इसका मनुष्य के पास है, उसका अधिक से अधिक सात प्रतिशत उपयोग निर्वाह की समस्याओं को सुलझाने के लिए किया जा रहा है। ज्ञान और विज्ञान क्षेत्र में विचारों की जितनी महत्ता है उसे न तो समझा गया और न काम में लाया गया। अभी 93 प्रतिशत भाग अविज्ञात के गर्भ में है। अगले दिनों नये सिरे से इस सम्पदा की गवेषणा होने जा रही है ताकि व्यक्ति अधिक सशक्त और प्रबुद्ध बन सकें। विचारों का जीवन के हर पक्ष में जब उच्चस्तरीय उपयोग होगा तो निश्चित है कि उत्थान और समाधान के दानों ही पक्ष संतुलित होंगे। उन सभी समस्याओं का समाधान संभव होगा जो व्यक्ति और समाज को बुरी तरह हैरान किये हुए हैं।


मौत का ख्याल (kahani)

एक पेड़ पर दो बाज प्रेम-पूर्वक रहते थे। दोनों शिकार की तलाश में निकलते और जो भी पकड़कर लाते उसे शाम को मिल बाँटकर खाते। बहुत दिन से उनका यही क्रम चल रहा था।

एक दिन दोनों शिकार पकड़कर लौटे तो एक की चोंच में चूहा था और दूसरे की में साँप। शिकार दोनों ही तब तक जीवित थे। पेड़ पर बैठकर बाजों ने जब उनकी पकड़ ढीली की साँप ने चूहे को देखा और चूहे ने साँप को।

साँप चूहे का स्वादिष्ट भोजन पाने के लिए जीभ लपलपाने लगा और चूहा साँप के प्रयत्नों को देखकर अपने पकड़ने वाले बाज के डैनों में छिपने का उपक्रम करने लगा।

उस दृश्य को देखकर एक बाज गम्भीर हो गया और विचार मग्न दीखने लगा। दूसरे ने उससे पूछा- “दोस्त, दार्शनिकों की तरह किस चिन्तन मनन में डूब गये?”

पहले बाज ने अपने पकड़े हुए साँप की ओर संकेत करते हुए कहा देखते नहीं यह कैसा मूर्ख प्राणी है। जीभ की लिप्सा के आगे इसे मौत भी एक प्रकार से विस्मरण हो रही है।

दूसरे बाज ने अपने चूहे की आलोचना करते हुए कहा- और इस नासमझ को भी देखो भय इसे प्रत्यक्ष मौत से भी डरावना लगता है।

पेड़ के नीचे एक मुसाफिर सुस्ता रहा था। उसने दोनों की बात सुनी और एक लम्बी साँस छोड़ते हुए बोला- हम मानव प्राणी भी साँप और चूहे की तरह स्वाद और भय को बड़ा समझते हैं, मौत तो हमें भी विस्मरण रहती है।


स्वप्नों के पीछे छिपे सूक्ष्मदर्शी संकेत

आमतौर से थका हुआ मस्तिष्क निद्रा के समय अवकाश पाकर छोटे बच्चों की तरह खेल खिलवाड़ करने लग जाता है। उस समय जो कुछ दीखता है वह निरर्थक सा लगता है। उसके बीच कुछ तारतम्य भी नहीं होता। बच्चे दिन भर खेलते कूदते हैं। यह सब मन मौजी होता है पर कोई बाल मनोविज्ञानी उनके पीछे प्रवृत्तियों की करतूतें भी आँक सकता है। कौन किस तरह के खेल खेल रहा है, इसकी संगति बिठाने से पता चलता है कि किन प्रवृत्तियों के उपादान किस स्तर के खेल खेलने की पृष्ठभूमि बना रहे हैं। सपनों के संबंध में भी यही बात है। आमतौर से वे बेतुके और तारतम्य विहीन लगते हैं पर कोई भी स्वप्न विशेषज्ञ अध्ययन द्वारा यह जान सकते हैं कि उनके पीछे क्या मानस काम कर रहा है?

सपने बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी को आते हैं। जो कहते हैं हमें नहीं आते वे प्रायः उन्हें स्मरण नहीं रख पाते, या फिर इतने महत्वहीन होते हैं कि स्मृति पटल पर कोई छाप नहीं छोड़ पाते। जिन्हें सचमुच ही सपने न आते हों, उन्हें असाधारण स्तर का मानना चाहिए, क्योंकि वह निद्रा योगी स्तर की होती है।

सामान्य सपनों में शरीर व्यथाओं का संकेत भर होता है। किस अवयव में क्या रोग प्रवेश कर चुका है या क्या प्रवेश करने वाला है, इसका बहुत कुछ संकेत सामान्य स्वप्नों में भी मिल जाता है। अचेतन मन की उच्च भूमिका में एक चिकित्सक भी रहता है जो स्वप्नों के माध्यम से चिकित्सा या परिचर्या भी बताता रहता है। इस साँकेतिक भाषा को समझना थोड़ा कठिन अवश्य है पर सूक्ष्मदर्शी उतने भर से अनुमान लगा सकते हैं। बहुत छोटे बच्चे जब रोते हैं तब कुशल अभिभावक उसका कारण, अर्थ और उपचार भली भाँति समझ लेते हैं।

मनुष्य की कितनी ही मानसिक व्यथाएँ ऐसी होती हैं जो अपनी अतृप्ति का इजहार स्वप्नों द्वारा करती रहती हैं। उन्हें तृप्त न भी किया जा सका तो भी सपना देखने भर से मन बहल जाता है और बोझ हल्का हो जाता है। समीपवर्ती वातावरण भी स्वप्नों के लिए उत्तरदायी है। शोर हो रहा हो, मच्छर काट रहे हों, गंध आ रही हो तो उनका तीखापन भी कठिनाई को प्रकारांतर ने व्यक्त करने वाला होता है। मल मूत्र त्याग की इच्छा हो या नींद में उठते न बन पड़ रहा हो तो भी इस स्तर के सपने आते हैं।

कुछ सपने आध्यात्मिक होते हैं उनमें पूर्वाभास रहते हैं। भविष्यवाणियाँ प्रकट होती हैं, संभावनाऐं छिपी रहती हैं। बिलकुल निकट भविष्य में कोई अनहोनी घटना घटित होकर चुकी हो, या घटित होने वाली हो उसका आभास जिन स्वप्नों में आता है उन्हें आध्यात्मिक स्वप्न कहते हैं। उन्हें देखने के बाद या अधूरा रहते आँख खुल जाती है। चित्त परेशान होता है। छाती धड़कने लगती है। स्थिति सामान्य न रहकर असामान्य हो जाती है। दुबारा सोने का प्रयत्न करने पर भी नींद नहीं आती और जो देखा है उसका प्रभाव मन पर से उतरता नहीं।

कई बार कोई स्वजन संबंधी मर चुके हों या मरने वाले हों तो उनकी आत्मा भी पूर्वाभास देने जा पहुँचती है। उसके पीछे कोई दुर्घटना हो तो उसका अनुमान भी लगता है।

कई बार दिवास्वप्न भी ऐसे अवसरों पर आते हैं। नींद नहीं होती। जाग्रत अवस्था होती है पर कुछ अप्रासंगिक आभास मन में उठता है। ऐसे स्वप्नों में कई बार भविष्य वाणियाँ होती हैं। आवश्यक नहीं कि सर्वथा ऐसा होकर ही रहे। उनमें कई बार मन का वहम भी होता है और पीछे कल्पना मात्र निकलती है पर कई बार उनमें संभावना का भी गहरा पुट रहता है।

प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत आस्ट्रिया के राजकुमार आर्कड्यूक फैंकिस फर्डीनेन्ड की हत्या किये जाने के साथ ही हुई। आर्कड्यूक के भूतपूर्व शिक्षक विशेष जोसेफ लेनी ने एक भयानक स्वप्न में देखा कि यूगोस्लाविया के सारजेवे नामक स्थान पर 28 जून 1914 को सवा तीन बजे सुबह एक भारी भीड़ के मध्य आर्कड्यूक फर्नीनेन्ड की हत्या कर दी गई है।

नींद भंग होते ही जोसेफ लेनी की नजर घड़ी पर गई उस समय 3.15 बजे थे और जून की 14 तारीख थी। इस दुःस्वप्न को जोसेफ ने अपनी माँ और उपस्थित अतिथियों को सुनाया। कुछ क्षणों बाद ही एक टेलीग्राम प्राप्त हुआ जिसमें उसी समय आर्कड्यूक के मारे जाने की सूचना थी।

‘दी न्यूयार्क टाइम्स’ ने 16 अप्रैल 1912 के अंक में ‘टाइटैनिक’ नामक विशाल जलपोत के हिमशैल से टकराकर डूब जाने का एक दुःखद समाचार प्रकाशित किया था। 66,000 टन वजनी 882.5 फीट लम्बे जलयान में 2207 व्यक्ति बीस लाइफ बोटों के साथ यात्रा कर रहे थे। अटलाँटिक महासागर में 23 नॉट की रफ्तार से जा रहा टाइटैनिक एक आइसवर्ग से टकरा कर डूब गया। इस दुर्घटना में 1250 व्यक्ति डूब मरे और 886 यात्रियों को बचा लिया गया।

सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मार्गन राबर्टसन ने 14 वर्ष पूर्व ही अपने उपन्यास “टाइटन की बरबादी अथवा अनुपयोगिता” (द रेक आफ दी टाइटन, ऑर फ्यूटिलिटी) में पूर्व कथन के रूप में वर्णन किया था। टाइटैनिक के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उपन्यास में वर्णित आँकड़ों से जलयान की लम्बाई, वजन, डूबने का कारण, स्थान, समय तिथि, उसकी नॉटिकल स्पीड, पैसेंजरों की संख्या आदि का मिलान करने पर पाया गया कि दोनों में बहुत कुछ साम्य था।

स्वेडिश सोसायटी फार साइकिकल रिसर्च की संस्थापिका श्रीमती इवा हेलस्ट्राम ने सन् 1954 में एक स्वप्न में देखा कि वे अपने पति के साथ स्टाकहोम की सड़कों पर उड़ रही हैं। नीचे सड़क पर एक ही हरी ट्रेन सामने से आकर एक ट्राली से टकरा जाती है जिससे अनेकों व्यक्ति घायल हो जाते हैं। स्टाकहोम में उस समय भूरे रंग की रेलगाड़ियों का प्रचलन था परन्तु एक महीने बाद ही सभी गाड़ियों का रंग बदलकर हरे रंग से पेन्ट करा दिया गया। इवा हेलस्ट्राम को अब निश्चय हो गया कि उसका सपना अवश्य दृश्य में परिणत होकर रहेगा। इस घटना को उसने डायरी के पन्नों पर अंकित भी कर लिया। दो वर्ष बाद 4 मार्च 1956 को 4 नम्बर की एक नीली ट्राली हरे रंग की जेरुशलम ट्रेन से वल्हाला वेगन नामक स्थान पर दुर्घटनाग्रस्त हो गई। यह दुर्घटना ठीक उसी स्थान पर हुई थी जिस स्थान को श्रीमती इवा ने अपनी डायरी में नोट कर रखा था।

विश्व में मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखने वाले धर्म संस्थापकों के जीवन में स्वप्नों का विशेष महत्व रहा है। बुद्ध, ईसा, हजरत मोहम्मद से सम्बन्धित स्वप्न ऐसे थे जिन्होंने इतिहास को बदल दिया। इन महामानवों के जन्म से पूर्व ही इनके माता-पिता तथा कई अन्य अनुयाइयों को धर्म की रक्षा करने वाले देवदूतों की जानकारी स्वप्न में मिल गई थी। सीजर, हेन्नीबल, डेस्कार्टस, नेपोलियन और हिटलर के स्वप्न भी इस बात के प्रमाण हैं जिससे प्रेरित प्रभावित होकर इन दुस्साहसियों ने संसार को नये रूप में ढालने का प्रयत्न किया।

रोम पर चढ़ाई करने से पूर्व सीजर अपने सिपाहियों के साथ रूबीकान के पास पड़ाव डाले पड़ा था। रात्रि स्वप्न में सीजर ने देखा कि वह अपनी माता के साथ सो रहा है। स्वप्नदर्शियों द्वारा बताया गया कि इसका अर्थ है कि सीजर को साहसपूर्वक मातृ शहर रोम पर आक्रमण कर देना चाहिए। सीजर ने रोम पर चढ़ाई कर दी और बिना किसी अवरोध और रक्तपात के रोम पर अधिकार कर लिया।

बाद में रोम के दूसरे विजेता कार्थेजिनियन जनरल हेन्नीबल ने एक महत्वपूर्ण सपना देखा। जिसका वर्णन करते हुए रोम के प्रख्यात इतिहासकार बालेरियस मैक्सिमस ने लिखा है कि - “हेन्निबल ने स्वप्न देखा कि देवदूत जैसा सुन्दर नवयुवक उसके सामने प्रकट होकर कह रहा है कि उसे स्वर्ग से इसलिए भेजा गया है कि वह हेन्नीबल को इटली पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करे। हेन्नीबल ने देखा कि एक विशालकाय सर्प उसके रास्ते में विजय में आड़े आने वाली प्रत्येक वस्तु को जबरदस्ती प्रचण्ड वेग से हटाता और नष्ट करता जा रहा है। सर्प के ऊपर आकाश में फैले अंधेरे धुँधले बादलों को चीरते फाड़ते हुए प्रकाश चारों तरफ फैल गया है।” इस स्वप्न के आधार पर हेन्नीबल ने इटली पर आक्रमण करके उसे तबाह कर दिया और विजयी रहा।

ग्रीक इतिहासवेत्ता हेरोडोटस ने अपनी पुस्तक में ग्रीस विजेता पर्शियन नवयुवक जेरक्सेस के स्वप्नों का वर्णन किया है। स्वप्न के आधार पर जेरक्सेस ने ग्रीस पर धावा बोल दिया और भयंकर रक्तपात किया था। एक दूसरे स्वप्न के आधार पर उसका शासनकाल अल्पकालीन ही रहा। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनमें पैगम्बरी स्वप्नों से प्रेरित होकर महापुरुषों और दुस्साहसियों ने अपने अपने भविष्य गढ़े हैं।

ओलिवर क्रोम्बेल को स्वप्न में एक दैत्याकार महिला का दर्शन हुआ जिसने बताया कि ओलिवर इंग्लैण्ड का एक महान पुरुष बनेगा। स्वप्न में देखे दृश्य के अनुसार ही ओलिवर ने इंग्लैण्ड में अपने प्रतिद्वंद्वी को हराकर एक दिन महानता अर्जित की। सन् 1485 में बोसवर्थ फील्ड के निर्णायक युद्ध में जाने से पूर्व राजा रिचर्ड तृतीय ने स्वप्न में एक दुष्टात्मा को देखा जिसने बार-बार रिचर्ड की आँखों के सामने नृत्य करते हुए उसकी नींद हराम कर दी। यह स्वप्न राजा की पराजय का पूर्वाभास था। लड़ाई में रिचर्ड मारे गये थे।

10 वर्ष की आयु में अलेक्जेन्डर महान ने एक स्वप्न में देखा था कि एक परदार साँप-ड्रैगन उसे एक सफेद अंडा खाने के लिए दे रहा है। यह सपना भविष्य में उसकी महानता और सफलताओं का द्योतक माना गया था।

वाटरलू की लड़ाई से पूर्व नेपोलियन ने अपनी जय और पराजय के सपने देखे थे। स्वप्न में देखी गई एक काली बिल्ली जो दोनों सेनाओं के मध्य बेतहाशा दौड़ लगाती है और नेपोलियन के सैनिकों को टुकड़े-टुकड़े कर डालती है, नेपोलियन की पराजय का संकेत था। राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को अपनी हत्या किये जाने का पूर्वाभास स्वप्न में ही हो गया था। मेरी एन्टोइनेटी ने सपने में एक कालम पर उगते लाल सूरज को देखा जो शीघ्र ही समाप्त हो गया। यह दृश्य मेरी के पतन और उसके प्राण दण्ड का पर्याय बना। चांसलर आटोवान विस्मार्क ने बादशाह विलियम प्रथम को एक स्वप्न का हवाला देते हुए बताया था कि आस्ट्रिया के चंगुल से उसने कैसे मुक्ति पाई। उपरोक्त स्वप्नों के उदाहरण ऐसे हैं जिनसे विश्व इतिहास प्रभावित हुआ है।

सन् 1917 में प्रथम विश्व युद्ध के समय बैवेरियन इन्फैन्ट्री के कार्पेरिल एंडाल्फ हिटलर युद्ध मैदान में अपने बैरक में सैनिकों के साथ पड़ा एक भयानक स्वप्न देख रहा था। स्वप्न में वह भूस्खलन से और पिघले हुए लौह से मिट्टी के नीचे धँसा जा रहा है और उसके सीने से रक्त रिस रहा है। नींद खुलते ही हिटलर हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ और साथियों पर नजर दौड़ाई तो सभी सही सलामत थे। सामने दूरस्थ फ्रेंच टुकड़ी का जमघट दिखाई दे रहा था। स्वप्न के दृश्यों से भयभीत हिटलर आश्रय स्थान को छोड़कर अकेले ही दूर खाई के ऊपरी हिस्से पर जाकर खड़ा हो गया। वहाँ भी वह नहीं ठहर सका और अपनी इच्छा शक्ति के विरुद्ध अन्तः प्रेरणा के आधार पर आगे बढ़ गया। कुछ क्षणों पश्चात बरक में भयंकर विस्फोट हुआ और उसके सभी सिपाही मलबे में जिन्दा दफन हो गए। अकेला हिटलर ही बचा रहा। इस घटना ने हिटलर की महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाया। उसे विश्वास हो गया कि विश्व में कुछ महान कार्य करने के लिए भाग्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा है और ईश्वर उसे सहायता प्रदान कर रहा है।

इसी प्रकार फ्राँसीसी क्रान्ति नेता जीन पीशान ने बचपन में एक स्वप्न देखा कि भूखे भेड़िये उसे खाये जा रहे हैं। सपना सच हुआ उसकी मृत्यु भेड़ियों द्वारा चबा लिये जाने से ही हुई।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी भविष्यवक्ता लॉरॉन ने भविष्यवाणी की थी कि उसकी मृत्यु ग्लेशियर में दबने से होगी। लेकिन लाश ठीक दो वर्ष बाद फिर वहीं से मिल जायगी। ठीक ऐसा ही हुआ।

रिवाद (जॉर्डन) के भविष्यवक्ता अब्दुल रजाक ने एक बार स्वप्नदर्शी भविष्यवाणी की कि बादशाह अब्दुल्ला का कत्ल होगा। भविष्यवाणी सच निकली। इसके बाद उसने 13 वर्ष तक मौन रहने की प्रतिज्ञा की ताकि ऐसी ही अशुभ भविष्यवाणी और किसी के संबंध में वह न कर बैठे।

वस्तुतः अचेतन मस्तिष्क का अविज्ञात वाला भाग बड़ा ही अद्भुत विस्मयकारी है। सपने हमें एक झाँकी दिखाते हैं, उस परोक्ष जगत की, जिसका कि आभास मन को अचेतन अवस्था में सतत् होता रहता है। यदि इन सूक्ष्मदर्शी संकेतों से औरों की तरह कुछ सबक लेकर साधना पराक्रम द्वारा प्रसुप्त को जगाने का प्रयास किया जाय तो इतना कुछ हस्तगत हो सकता है जिसकी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती।

प्रकृति के विलक्षण अंकन

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रेगिस्तानों में जब तेज हवा चलती है, तब वह टीलों को एक जगह से दूसरी जगह उड़ा ले जाती है। समतल को ऊबड़ खाबड़ और ऊबड़ खाबड़ को समतल कर देती है। पर यह उथल पुथल होते बेसिलसिले ही हैं। उसे प्रकृति का साधारण खेल भी माना जाता है और दूसरी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता।

पर आश्चर्य तब होता है जब हवाएं किसी विशेष क्रम से चलती हैं और बालू पर अपने विशेष प्रकार के निशान बनाती चली जाती हैं। नात्का, पेरू आदि के रेगिस्तानों में यह कौतूहल विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता है। उन क्षेत्रों में जब तेज हवाएं चलती हैं तब वे चित्र विचित्र ढंग से अपनी गति बदलती हैं। कभी सीधी चलती हैं। कभी टेड़ी तिरछी कभी लहराती हुई। बालू के कण उनसे प्रभावित होते हैं। फलतः मीलों लम्बे घेरे में भूमि पर ऐसी रेखाएं बन जाती हैं मानो किसी गणितज्ञ ने रुचिपूर्वक नाप तौलकर ज्यामिती के आधार पर उन्हें बनाया हो और इस समूचे क्षेत्र को रहस्यमय कलाकारिता की पृष्ठभूमि में सजाया गया हो। आकृतियाँ इतनी अजीबोगरीब इतनी आकर्षक होती हैं कि दर्शक का मन मोह लेती हैं और प्रकृति की इस कलाकारिता को वह स्तब्ध होकर देखता रह जाता है। इस क्षेत्र में कितने ही दर्शक दूर देशों से इसी निमित्त आते हैं कि प्रकृति विनिर्मित इस कलात्मक संरचना को देखें और दृश्यों की विभिन्नता का आनन्द लूटें।

विगत आधी शताब्दी से इन कृतियों के रहस्य खोजे जा रहे हैं और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयत्न किया जा रहा है पर अभी तक कुछ तुक बैठा नहीं है। रहस्य तब और भी गहरा हो जाता है जब बालू और कंकड़ों से मिलकर बंदर, रीछ, बैल, भेड़ जैसे छोटे और गुलाई लिए हुए जानवरों की अनुकृतियाँ बनकर खड़ी हो जाती हैं। दूर से फोटो लेने पर वे जीव जन्तु ही प्रतीत होते हैं। पर भेद तब खुलता है जब उन्हें निकट जाकर देखा जाता है।

इस अजूबे के शोधकर्ता जर्मन वैज्ञानिक मारिया रीच ने इसी प्रयोजन की तह तक पहुँचने के लिए उनमें अपना डेरा डाला है और यह जानने का प्रयत्न किया है कि आखिर होता ऐसा क्यों है।

इन विचित्र रेखाओं का एक विशेष नामकरण किया गया है “नाज्का” इनके साथ कौतूहल ही नहीं वरन् ज्योतिष विज्ञान की भी कितनी ही तुकों का समावेश होता है। एक क्षेत्र में किसी विशेष मास में निश्चित तारीख को नियत रेखाएँ बनती हैं। जिन्हें उन दिनों के कार्यक्रम तथा भविष्य की जन्म कुण्डली कहा जा सकता है। इस आधार पर यह सोचा गया है कि यह अंकन विश्व के विभिन्न समूह क्षेत्र से संबन्धित भूतकालीन एवं भावी घटनाक्रमों को अंकन करते हैं जिसका रहस्य पढ़ लिये जाने पर यह जाना जा सकेगा कि प्रकृति अपने ढंग से अपनी भाषा में अपनी कलम से कुछ विचित्र लेखन करती है। पढ़े लिखों की तरह मनुष्यों से कहती है कि “क्या तुम इस अविज्ञात का अर्थ बता सकने जितना पढ़ लिख गये हो?”

संसार में अन्यत्र भी ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें धरती की पट्टी पर बहुत कुछ रहस्यमय लिखा है। मिस्री रेगिस्तान में कई जगह हंसने रोने या गाने जैसी आवाजें बालू में से निकलती हैं। पर उनकी गतिविधियाँ तीव्र होना वायुवेग के ऊपर निर्भर रहता है।

नाज्का रेखाएँ 4 से 18 इंच तक ऊँची उठी हुई देखी गई हैं और उनसे बने हुए खिलौनों की ऊँचाई 90 फुट से लेकर 400 फुट तक ऊँची देखी गई है।

वाशिंगटन विश्व विद्यालय एवं ब्रिटेन के खगोल शास्त्रियों ने उस क्षेत्र में पाई जाने वाली चट्टानों पर देखे गये अंकनों में पृथ्वी का आदिम काल से अद्यावधि घटित हुए घटनाक्रम का विवरण तैयार करने का प्रयत्न आरम्भ किया है।

कैसी विचित्र है प्रकृति की रहस्यमयी भाषा और लेखनी! कौन समझ पायेगा उसके पग-पग पर बिखरे चित्र विचित्र रहस्यों को।


जीवन और मृत्यु से जुड़े कुछ प्रश्न

मनुष्य को मृत्यु का भय असाधारण रूप से सताता है। अपने किसी प्रियजन का विछोह होने पर छाती फटने लगती है और प्रतीत होता है कि वज्रपात जैसा कुछ हुआ। यह विछोह कैसे सहन हो सकेगा? किन्तु मनुष्य की मस्तिष्कीय संरचना ऐसी है जिसमें हर्ष शोक की हिलोरें सदा एक रस नहीं रहतीं। वे ज्वार भाटे की तरह आती तो हैं पर समयानुसार उनका समापन भी हो जाता है। जिन प्रियजनों की मृत्यु हो गई उनके बिना भी काम चलने लगता है।

दूसरों से भी अधिक बड़ा भय अपनी मौत का है। यों यह आशा भी बनी रहती है कि अपना मरण क्यों होगा? हमें तो अनन्त काल तक वैभव भोगना है। विलास ही में डूबे रहना है और कामनाओं की पूर्ति का सरंजाम सदा जुटाते और भोगते रहना है। किन्तु दूसरी ओर यह कल्पना भी विचलित करती रहती है कि एक दिन हमें भी मरना पड़ेगा। मरण के साथ ही अपने पराये हो जाते हैं। उनके साथ जुड़ा हुआ रिश्ता भी समाप्त हो जाता है। जिस सम्पदा को कितने परिश्रम और अनर्थ करते हुए कमाया था, उस पर से भी अधिकार उठ जायेगा। उसे दूसरे हथिया लेंगे और मनचाहा उपयोग करेंगे। न अपना परिवार रहेगा और न धन वैभव।

यहाँ तक कि जिस शरीर की चिन्ता, सज्जा, सुविधा, के लिए निरन्तर प्रयत्न किये गये; उसकी सम्पन्नता, सुन्दरता, बलिष्ठता पर इतना अभियान रहा, वह भी साथ छोड़ देगा। चिता में जलकर राख हो जायेगा और उसकी राख तक को किसी जलाशय में बहा दिया जायेगा ताकि नामो निशान कहीं कोई बाकी न रहे। क्या इसी दुर्गति के लिए शरीर को दुलराने के लिए अमूल्य जीवन काल बिताया गया था?

परिवार से संबंध टूटने, मित्र मण्डली के लिए अपरिचित हो जाने, धन वैभव छिन जाने, शरीर न रहने पर फिर अन्ततः हमें कहाँ रहना पड़ेगा। जिस भवन में जिस पलंग और बिस्तर पर नींद बिताई जाती थी, मरने के बाद उसके दर्शन तक न हो सकेंगे। उनके स्पर्श करने तक का अधिकार न रहेगा? जिन बेटे पोतों पर इतनी ममता थी कि उन्हें साथ लिये फिरने के बिना, खिलाने और हँसाने के बिना चैन न पड़ता था; अब उन्हें देख पाने, संपर्क साधने तक की गुंजाइश न रहेगी। प्राणवल्लभा पत्नी, जिसके लिए दो शरीर एक प्राण की मान्यता संजोये रखी गई, क्या वह मृत्यु के उपरान्त इतनी अपरिचित हो जायेगी कि उसके संबंध सपनों में भी न बुलाये जा सकें?

मृत्यु सचमुच बड़ी भयंकर है। इतनी भयंकर कि उसके उपरान्त कहाँ रहना, कहाँ बसना? कहाँ समय गुजारना इसका कुछ भी ठिकाना न हो। अन्धकार का भय सभी को लगता है। मरने के बाद सभी को जो कष्ट सहना पड़ता है, उससे भी अधिक व्यथा इस बात की होती है कि मरने के बाद क्या होगा? किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा? वहाँ कौन अपना होगा? किससे किसी सहायता की अपेक्षा की जा सकेगी?

जीवन भर के क्रिया-कलापों पर जब दृष्टि डाली जाती है, तब उसमें ऐसा कुछ दीख नहीं पड़ता जिसके आधार पर सद्गति की कोई व्यवस्था बनती हो? पेट और प्रजनन का ताना बाना बुनने में ही सारी आयुष्य चुक गई। फिर कुछ पुरुषार्थ किये भी तो वे मात्र अहंकार की पूर्ति के लिए। उनमें आतंक जमाने, छाप छोड़ने की ही लालसा सर्वोपरि रही। उसी के लिए चित्र-विचित्र विडंबनाएं और प्रवंचनाएं खड़ी की जाती रहीं, ऐसी दशा में मरणोत्तर, जीवन से सद्गति की आशा तो की ही कैसे जाय? यदि नरक के कोल्हू में पिसना पड़ा तो अकल्पनीय दुर्गति होगी जो कभी सोचा तक नहीं उससे पाला पड़ा तो वे व्यथा वेदनाएँ कैसे भुगती जा सकेंगी? यही है वह चिन्तन जो विचारशील मनुष्य को डराता और असमंजस में डालता है।

मूढ़मति अपेक्षाकृत नफे में रहते हैं, क्योंकि उनकी विचार शक्ति वर्तमान की ही परिधि में घूमती रहती है। ऐसे लोगों को न भूत पर पश्चाताप करने की आवश्यकता पड़ती है और न भविष्य के लिए कोई तैयारी करने की। ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि “सबते भले विमूढ़ जिन्हिं न व्यापै जगद्गती।” मूढ़मति लोग आगा पीछा नहीं सोचते। उन्हें जन्म की उपयोगिता और मरण की विभीषिका से भी कुछ वास्ता नहीं रहता। उद्भिज वर्षा के साथ जन्मते और शीत की लहर आते ही इंठकर ढेर हो जाते हैं। उनके लिए न जीवन, जीना है और न मरण मरना। इनकी परमहंसो या विचार शून्यों जैसी मनःस्थिति होती है।

मृत्यू एक समस्या है ऐसी समस्या, जिसका अन्त जिसका समाधान मरण ही है। वह एक-एक कदम अपनी ओर बढ़ती चली आती है और उसकी नियति यही है कि जिस पर हाथ डालती है, उसे उठा कर ही ले जाती है। उससे बचने या छिपने की भी तो कोई युक्ति नहीं है।

मरण का जितना चिन्तन अन्तिम दिनों किया जाता है उतना ही यदि समय रहते किया जा सके तो कितना अच्छा हो। यदि समय रहते चेता जा सके तो उसके लिए कुछ किया भी जा सकता है। मृत्यु को सुखद भी बनाया जा सकता है। उसकी शर्त यही है कि जीवनचर्या को ऐसे ढांचे में ढाला जाये जिसमें आत्मसन्तोष बना रहे। पवित्रता की जीवनचर्या साथ रहे। मनुष्य को उन्नत बनाने के लिए ऐसे सत्कर्म बनते रहें जिनकी परिणति सुखद भी हो और मंगलमय भी। मंगलमय इन अर्थों में जिनके पद चिन्हों पर चल कर लोग अपना भला कर सकें और वातावरण को वसन्त जैसा बना सकें। जिसके प्रवाह चलते सर्वत्र कोपलें उगने, फूल खिलने और कोयल कूकने का दृश्य दीख पड़े।

मृत्यु को भूल जाना अपने भविष्य को ही भूल जाना है। कल की चिन्ता सभी को करनी पड़ती है। किसान से लेकर व्यवसायी तक जब भविष्य निर्माण में ही लगे रहते हैं तो विचारशीलों के लिए भी यही उचित है कि वे जीवन के आरम्भ और अन्त के संबंध में सोचें।

मनुष्य जीवन का आरम्भ ईश्वर की उस अनुकम्पा के साथ होता है, जिसमें पूर्णता प्राप्त करने और लोक कल्याण में निरत रहकर पुण्य परमार्थ कमाने की निर्धारणा है। मृत्यु वह परीक्षा की बेला है जिसमें यह देखा जाता है कि उस उद्देश्य की पूर्ति किस प्रकार हुई, जिसके लिए यह बहुमूल्य धरोहर सौंपी गई थी।

मृत्यू को सुखद और मंगलमय बनाना और जीवन को सुनियोजित ढंग से जीना एक ही बात है।


मरकर भी जीवित बने रहने की विद्या(kahani)

मात्र कुढ़ते रहने से, चिन्ता की चादर ओढ़कर निष्क्रिय हो जाने से और मन ही मन कुड़ बुड़ाते रहने से किसी को रत्ती भर लाभ न तो कभी हुआ है न कभी आगे होने वाला है।

इसलिए ऐ परमेश्वर के प्यारे पुत्रों! जिन्दा ही मर जाने की बजाय तुम मरकर भी जीवित बने रहने की विद्या का अभ्यास करो। निष्क्रियता की घुटन का घेरा तोड़कर उत्फुल्ल क्रियाशीलता की खुली हवा में साँस लेना सीखो।

रेशम का कीड़ा अपना कोया खुद बुनता है और फिर उसी में घुटकर मर जाता है। घुटन की छटपटाहट से उबरने के लिए वह भी शायद हमारी ही तरह कभी विधाता, कभी व्यवस्था और कभी पड़ौसी को कोसता होगा। हमारे मन रूपी कीड़े को भी अपने ही बनाये कोयों की कैद में बंधना-घुटन पड़ता है।

‘कोयाबन्दी’ की निष्क्रियता के अँधेरे बंद तहखानों से निकलकर ऊपर आओ, ‘मानसिक कालकोठरी’ के वातायनों को सूर्य की ऊष्मा और स्वच्छ सुरभित पवन का स्वागत करने दो। तुम्हारे कुस्वास्थ्य का यही एक मात्र निदान है।

जाओ और यही संदेश अपने संपर्क में आने वाले जन-जन तक पहुंचाओ ताकि जहाँ-जहाँ भी किसी प्रकार की बुराई हो उसे दूर करने में अपनी-अपनी सीमा और शक्ति भर वे सक्रिय सहयोग दे सकें। उनकी समस्त सामर्थ्य केवल हवा के साथ लड़ने में ही व्यर्थ न चली जाये। —सेन्ट पाल

योग विद्या बनाम बाजीगरी

अब की भाँति पुरातन काल में भी बाजीगरों, जादूगरों की एक बिरादरी थी, जो लोगों को भ्रम में डालकर जहाँ उनकी विलक्षणता का भान कराती थी, वहाँ यह भी करती थी कि अपने सिद्ध पुरुष, ताँत्रिक योगी प्रसिद्ध करें भावुकजनों की श्रद्धा का दोहन करें और उन्हें अपनी जादू की क्षमता से भयभीत करके आतंकित भी करें। यह आकर्षण और आतंक उनके लिए गहरी कमाई का आधार बनता था। इतना ही नहीं इस प्रपंच को देखकर लोग उनसे कुछ पाने के लोभ से, सताये जाने के भय से चापलूसी भी करते थे। उनके साथ उलझने में डरते थे और कुछ ले देकर अपने संबंध बिगड़ने देने जैसी स्थिति नहीं आने देते थे।

ख्याति इन जादूगरों की ही सच्चे योगियों की तुलना में कहीं अधिक होती है। खाँचा तब और भी अधिक फिट बैठ जाता था जब वे अपने को योगी ताँत्रिक बताकर देवताओं और दैत्यों का प्रतिनिधि घोषित बताकर करते थे। अपनी कठिनाइयों के समाधान में उनके द्वारा समाधान किये जाने की आशा से भी लोग उनके पास पहुँचते थे और गृह शान्ति, पिशाच, निवृत्ति के लिए किये जाने वाले क्रिया कृत्यों से भारी रकमें ऐंठते थे।

अध्यात्म वेत्ताओं, तत्वज्ञानियों तथा योगी तपस्वियों की इस देश में कमी नहीं रही। उनने उसे एक आदर्श के लिए अपनाया। सद्ज्ञान वृद्धि के लिए प्रयुक्त किया और संसार में नीतिमत्ता आदर्शवादिता विकसित करने के लिए अपनी शक्ति लगाई। स्वयं अनुकरणीय मार्ग अपनाया और सन्मार्ग पर चलने की सर्व साधारण को प्रेरणा दी।

आत्म विधा में प्रपंच प्रदर्शन का निषेध है, क्योंकि उसका मूल आधार छल और भ्रम होता है। प्रकृति के हर कार्य अपने नियत नियमों के अनुसार चलते हैं। उनमें व्यतिरेक उत्पन्न हो जाये तो सर्वत्र अन्धेरगर्दी का ही साम्राज्य फैले और विश्वव्यापी सुव्यवस्था की शृंखला टूट-फूट कर बिखर जाय। कौतूहलों का प्रदर्शन अकारण नहीं होता। उसके प्रदर्शनकर्त्ता लोभ, लालच, अहमन्यता से लोगों को किसी प्रकार चंगुल में फँसाने की फिकर में रहते हैं। अपना व्यक्तिगत लाभ साधने के लिए संपर्क में आने वालों पर भी यही प्रभाव छोड़ते हैं कि वे दैवी शक्तियों के ऐजेन्ट होने के नाते दूसरों को लाभ पहुँचा सकते हैं या हानि करते हैं। भय और प्रलोभन ही उनके द्वारा अस्त्र रूप में प्रयोग किये जाते हैं, जिसके जाल जंजाल में फँसे हुए कितने ही अविचारी उनके पीछे सस्ते लाभ के निमित्त लग लेते हैं और अन्त में प्रवंचना, विडम्बना, निराशा एवं पश्चाताप का असमंजस सहते हुए सिर धुनकर अपने घर बैठते हैं, क्योंकि जो आशा दिलाई गई थी, जो कौतुक लीला दिखाई गई थी, वह समयानुसार मिथ्या सिद्ध होती है। तब दो ही रास्ते शेष रह जाते हैं कि ढोल की पोल को निकालें अथवा वैसी ही धूर्त्तता अपनाकर दूसरों का शोषण करें।

मध्यकाल में वाममार्ग का अत्यधिक प्रचलन रहा है योगियों का स्थान ताँत्रिकों ने ले लिया था। दैत्यों और दानवों के मायाचार पूर्व काल में भी प्रसिद्ध थे। वे देवताओं से इन प्रपंची कुचक्रों के आधार पर ही भारी पड़ते और जीतते थे। इससे घटिया वह प्रक्रिया है जिसके बलबूते सामान्य मानव स्तर की प्रतिभा रहते हुए छल कपट के आधार पर दृष्टि बंध जैसे उपचार किये और चमत्कार दिखाये जाते थे। इसके लिए न योग स्तर की दैवी साधना करनी पड़ती थी और न दैत्य दानवों वाली कठोर अघोरी तंत्र साधना। इसका ढाँचा प्रपंचों, अफवाहों किम्वदंतियों तथा षडयंत्र के रूप में बनाकर अघटित को घटित दिखाने का उपक्रम किया जाता था। कोई विशेष अनुभूति न होने पर भी किसी को षडयंत्र में सम्मिलित करके उसके मुख से अद्भुत घटित होने का बयान करवाना, अन्यों का उस पर विश्वास होना यह अपने ढंग का प्रपंच है।

आधुनिक मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म प्रणाली को दृष्टिबंध भी कहते हैं। उनमें प्रयोक्ता की प्रबल इच्छा शक्ति किसी अधिकृत व्यक्ति पर आच्छादित हो जाती है और फिर वह अपने मनोबल को दूसरे के मनोबल में इस प्रकार ठूँस देता है कि वह प्रयोक्ता के इशारे पर ही नाचता है। वह जैसा रहता है वैसा ही सोचता, करता, देखता या अनुभव करता है। इन दिनों इस उपचार का रहस्य पुस्तकों में आने लगा है और बताया जाने लगा है कि यह योगाभ्यास नहीं है वरन् मनोबल के आधार पर उत्पन्न किया गया चित्त विभ्रम है। इस स्थिति में फँसा हुआ व्यक्ति दिवास्वप्न देखता है और जिसका अस्तित्व नहीं है उसका भी अनुभव करता है।

इस स्तर के प्रयोक्ता मध्यकाल में यज्ञ (मख) करवाते थे। वे योगियों की तरह सम्मानित नहीं होते थे और न दैत्यों जैसा उनका आतंक होता था। फिर भी किन्हीं उपकरणों रसायनों के आधार पर वे ऐसे कृत्य करते थे जिन्हें देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह जाते थे और हतप्रभ होकर उन्हें सिद्ध पुरुष मानने लगते थे। इससे भी छोटी एक और श्रेणी थी जिसे विद्याधर कहते हैं। बाजीगर, जादूगर, कीमियागर उसी से मिलता जुलता शब्द है। आज के बाजीगर तो अपनी-अपनी कला प्रदर्शन के साथ-साथ इस तथ्य को प्रकट भी कर देते हैं कि उनका करतब हाथ की सफाई चालाकी मात्र है। इसमें योग सिद्धि जैसी कोई बात नहीं है। पर मध्यकाल में इस हथफेरी के अभ्यासी अपने को विद्याधर घोषित करने लगे थे और गाँव गोठ के ओझा सयाने दिवाने स्तर के भूत, जिन्न, डाकिनी, शाकिनी आदि सिद्ध होने का दावा करते थे। इस छद्म के सहारे उन्हें अपनी अलौकिकता सिद्ध करने का अवसर मिलता था। योगी तपस्वियों की श्रेणी में तो वे सम्मिलित नहीं हो पाते थे पर जन साधारण को मूर्ख बनाने और लूटने में उन्हें बढ़ चढ़कर सफलता मिल जाती थी।

हिंदू इतिहास पुराणों में तो दानवी मायाचार का ही वर्णन है। पर जैन बौद्ध कथानकों में विद्याधरों के कुकृत्यों का मनोरंजक वर्णन है। इस वर्ग के लिए अपने कुचक्रों का प्रत्यजन्य सिद्ध करने के लिए और उन्हें अपनी इच्छित मनौती पूर्ण कराने के लिए सहमत करने हेतु पशु बलि या न बलि देने का भी आडम्बर खड़ा करते थे। वे स्वयं ऐसा अनाचार करते या लोलुपों को सब्जबाग दिखाकर उनसे कुकृत्य कराते थे।

अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा ऐसे कौतूहल प्रदर्शन की निन्दा की गई है और उस अनाचार में संलग्न लोगों को अपने समुदाय में सम्मिलित न करने का प्रतिबन्ध रखा है। बुद्ध काल में एक नट साधु वेष बनाकर किसी राजा द्वारा ऊपर लटकाया हुआ स्वर्ण कमंडलु उतार लाया था। राजा प्रजा सभी को सभी को अपना शिष्य बना आया था। जब यह कमंडलु वाला प्रसंग बुद्ध तक पहुँचा तो उन्होंने उस पात्र को चूर्ण विचूर्ण बनाकर नदी में प्रवाहित करा दिया और इन प्रपंचों से सभी को सावधान कर दिया।

जैन साहित्य में इन उपचारों को कुहेट्ट विज्जा नाम से जादूगरी वर्ग में रखा है। कहीं-कहीं उसका नाम तालोह घटिनी विज्जा भी कहा गया। इनका स्वरूप है लोगों में कौतुक प्रदर्शन करना। साधारण जनों को आश्चर्यचकित कर देना। कैक्रिय विज्जा, जंद्याचरण विज्जा, नाम से भी इन मलिन विद्याओं के स्वरूपों का तिरस्कार पूर्ण वर्णन किया गया है।

जैन गाथाओं में अंजनचोर और रोहिणक तस्कर की शताधिक गाथाएँ पाई जाती हैं जिसमें वे दिन दहाड़े लोगों को भ्रम में डालते, श्रद्धा संजोते और उनके धन का अपहरण कर लेते थे। अनेकों को ठगने के बाद वे साधु वेशधारी राज पुरुषों द्वारा पकड़े गये और पकड़कर बंदी गृह में प्रताड़ित किए गये। जैन साहित्य में कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न को एक विद्याधर द्वारा फुसला कर अपहरण कर लिये जाने का प्रसंग है। आकाश में हाथ मारकर खाद्य वस्तुएँ उत्पन्न करना और इन्हें इच्छुकों को खिला देना हिप्नोटिज्म स्तर का प्रयोग है। कलाबाजी के सहारे या हाथ की सफाई से बालों में से रंगीन धूलि निकाली जा सकती है या किसी वस्तु में चतुरता पूर्वक इत्र लगाकर उसे सुगंधित होने का भ्रम कराया जा सकता है।

गाँव गोठ में फिरने वाले बाजीगर भी बालकों या बालबुद्धि वालों को भली प्रकार मंत्रमुग्ध कर लेते हैं। वे डिब्बे में आकाश से छीन-छीन कर रुपये या सिगरेटों का ढेर लगा देते हैं। हथेली पर सरसों जमा देते हैं। बड़े श्रेणी के जादूगर अधर में लटकते किसी का अंग भंग करके उसे जोड़ देने जैसे काम करते हैं। काँच ब्लेड या जहरीले साँप निगल जाते हैं। कई साँप पेट में उतार कर फिर उन्हें बाहर निकाल लेते हैं। उन बड़े तमाशों में भी वास्तविकता नहीं होती, मात्र ऐसा प्रपंच रचा जाता है जिसे सामान्य बुद्धि सहज विश्वास के कारण उसे घटित मान ले और जो चालाकी की गई है उसे पकड़ पहचान न सके।

इस प्रकार के करतबों को ऋद्धि सिद्धियाँ मानना भूल है। सिद्धियाँ प्रदर्शन के लिए नहीं होतीं। उनका विज्ञापन नहीं किया जाता। समाधि लगानी हो तो मोक्ष प्राप्ति के लिए उसे किसी एकान्त गुफा में लगाना चाहिये। चौराहे पर गड्ढा खोदकर उसमें काम चलाऊ साँस का प्रबन्ध रखना। पीछे उसके खुलने पर जय जयकार कराना भेंट पूजा में ढेरों रुपया एकत्रित कर लेना, नई जगह जाकर वही नया तमाशा फिर दुहराना, यह सब एक प्रकार का व्यवसाय है। इसमें योग की चरम स्थिति समाधि का उपहास होता है। समाधिस्थ व्यक्ति जीवन मुक्त स्तर के होते हैं। उन्हें प्रदर्शन करने, वाह-वाही लूटने, और पुजापा बटोरकर घर भरने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

सन्त पुरुषों और बाजीगरों का अन्तर स्पष्ट है। सन्त व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने के लिए कषाय कल्मषों का हनन करने वाली आत्मशोधन साधना करते हैं। जीवन को सरलतम, अपरिग्रही, तपस्वी स्तर का बनाते हैं। वे लोकेषणा को आत्म मार्ग का सबसे बड़ा व्यवधान मानकर ऐसे प्रपंच नहीं रचते जिसमें उनकी जय-जयकार बुले। यह सब तो सेवा मार्ग पर चलने वाले परमार्थ परायण महा पुरुषों के जन मंगल वाले कृत्य सामने आने पर अनायास ही होता रहता है। मजमा लगाने या विज्ञापन बाजी करने की आवश्यकता तो उन्हें पड़ती है जिनके पास उत्कृष्टता तो है नहीं, मात्र पोले ढोल को बजाते और नगाड़े जैसी धूम मचाते हैं। अन्त में भर्त्सना और प्रताड़ना ही उनके हाथ लगती है। इन प्रपंचियों के कुचक्र में फँसकर भोले भावुकों को अपनी श्रद्धा का व्यतिरेक न करना पड़े, श्रद्धा का दोहन न होने पाये, इसलिए उन्हें समय रहते अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा योग का तत्वज्ञान समझाया जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि यह आत्मशोधन की उच्चस्तरीय विधा है। जिसे यह सुयोग हस्तगत होता है वह उसका उपयोग जन मानस के परिष्कार, समाज के सुगठन एवं परमार्थ प्रयोजनों के अतिरिक्त और किसी काम में नहीं करता। प्रदर्शन करने पर तो आदिकाल से ही नियन्ता का प्रतिबंध लगा हुआ है।


सच्ची शांति (kahani)

राजा अश्वघोष वैराग्य लेकर ईश्वर दर्शन की लालसा से देश देशान्तरों में भ्रमण करते रहे। न तीर्थ यात्रा से शान्ति मिली, न देव दर्शन से। कथा प्रवचन सुनते रहे उससे भी कोई बात बनी नहीं। साधना में मन ही नहीं लगा।

इस प्रयास परिभ्रमण में वे एक किसान के खलिहान में जा पहुँचे, वह बहुत प्रसन्न और सन्तुष्ट दीख रहा था। उसे तृप्ति और शान्ति का रसास्वादन करते हुए पाया, मस्ती के गीत गा रहा था और हल चला रहा था।

अश्वघोष वहीं बैठ गये। और किसान से वैसी ही तृप्ति उन्हें की प्रदान करने की याचना करने लगे।

किसान ने सभी बात जानी और कठिनाई समझी। वैरागी को पेड़ तले बैठा लिया। जो चावल पास में थे वह परोसे और आधा-आधा बाँट-कर खाया। पेट भर गया तो दोनों को गहरी नींद आ गई और उसी छाँव में देर तक सोते रहे।

दोनों साथ-साथ जागे। किसान ने कहा परिश्रम पूर्वक कमाया और मिल बाँट कर खाया जाय तो वैसी शान्ति मिल सकती है जैसी कि ज्ञानी वैरागी चाहते हैं।

राजा की आँख खुल गई और उनने अपनी रीति-नीति अपनाई जैसी कि किसान ने प्रत्यक्ष कर दिखाई थी।


ईसा का गिरि प्रवचन

अपने प्रथम बारह शिष्यों को ईसा एक दिन पर्वत पर ले गये। वहाँ उन्होंने उन्हें जो उपदेश दिये, उनमें अपने ज्ञान और अनुभव का सारा सार निचोड़ दिया है। उतना भर यदि किसी की मान्यता में प्रवेश पा सके, तो समझना चाहिए कि धर्म और अध्यात्म का सार तत्व उसके हाथ लग गया।

ईसा ने कहा- “इस संसार में जो विनम्र, जिज्ञासु, दयालु, अपरिग्रही, पवित्र मन, शान्त, सन्तुलित और एकता बढ़ाने वाले हैं वे ही धन्य हैं। वे ही मोक्ष के अधिकारी हैं। वे ही प्रभु के पुत्र कहलाने लायक हैं। जिन्हें आदर्श पालन करते हुए कष्ट सहने पड़े उनका जीवन धन्य है, क्योंकि धर्मराज्य में प्रवेश उन्हीं को मिलेगा।

लोग जब तुम्हारी निन्दा करें, सच्चाई पर दृढ़ रहने के कारण झूठे अभियोग लगायें, तो तुम अपने को सौभाग्यशाली समझना। भूतकाल में जो सन्त हुए हैं, उन्होंने तिरस्कार और कष्ट सह कर ही साधुता प्राप्त की है।

तुम धन और यश के पीछे न भागना। उन्हें अपना बल न समझना, वे कुहासे की तरह हैं, जो सघन दीखता भर है पर उसमें तथ्य कुछ नहीं होता। उन्हें पाकर न तुम संतुष्ट रह सकोगे और न चैन से बैठ सकोगे। जीवन निर्वाह के लिए दरिद्रों की सेवा-सहायता करो और अपना पुरुषार्थ ईश्वर के कामों में लगाओ।

पवित्रता और सेवा यह दो कार्य ही ऐसे हैं, जिन्हें मजबूती से पकड़े रहने पर तुम महान बनोगे और धन्य कहलाओगे। तुम ऊँची पहाड़ी पर बसे नगर की तरह सब की आँखों में आगे रहो। छिपाने योग्य कुछ भी ऐसा न हो जो किसी कोने पर कालिख लगा सके।

पुरातन कथनों को पत्थर की लकीर जैसा न मानो, उनमें सत्य के साथ असत्य भी घुल मिल गया है। इसे छानो, फटको और विवेकपूर्वक देखो की अपनाने योग्य कितना है। जो उचित है उसी को अंगीकार करो। अन्धों की तरह किसी के पीछे न चलो, शास्त्रियों के पीछे भी नहीं।

क्रोध न करो। न ईर्ष्या न छल। दूसरे मूर्खता करते हैं तो तुम्हें उनका अनुकरण करने की क्या आवश्यकता? अपना मुँह उजला और हाथ स्वच्छ रखो। दूसरे किस तरह रहते हैं और क्या करते हैं, यह ढूंढ़ने के लिए दुर्जनों के समुदाय में मत जाओ।

लोग मित्र से प्रेम करते हैं और शत्रु से द्वेष। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि वैर रखने और शत्रुता बरतने वाले के साथ भी तुम सज्जनता बरतना। अन्यायी अपनी मौत मरेगा पर सज्जनता सदा जीवित रहेगी। कृतघ्नो के प्रति भी करुणा बरतो क्योंकि ईश्वर भी वैसा ही करता है।

लोग व्यभिचार को बुरा कहते हैं। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि न कुदृष्टि से देखना और न पाप का चिन्तन करना संयम ही तुम्हारा साथी और हितैषी है।

अपने को अधिक अच्छा बना लो ताकि सामान्यजनों पर छाप छोड़ सको। ऐसे वचन बोलो जो सब को शान्ति दें और ऊँचा उठायें। तुम्हारी वाणी ही है जो हृदय के स्तर का परिचय कराती और सज्जनता का प्रमाण देती है।

बढ़-बढ़ कर बातें मत करो। शेखी न बघारो। भीतर और बाहर से एक रहो। नम्रता और शिष्टता का समुचित निर्वाह करो। उस राह पर न चलो जिस पर उद्दंड चलते हैं। कपट का तानाबाना न बुनो। अपने को उसी रूप में प्रकट होने दो जैसे कि वस्तुतः तुम हो।

ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह तुम्हें आज की रोटी आज दे। पूरा परिश्रम करो और जमाखोरी की ओर मन न ललचाने दो। सम्पदा वे नहीं जमा कर सके, जिनके हृदय में करुणा है। तुम न धनी बनो, न धनियों को देखकर ललचाओ।

जो श्रद्धा का महत्व नहीं जानता वही वैभव की चिन्ता करता है। पुरुषार्थ पर विश्वास करो और ईश्वर पर श्रद्धा रखो। श्रद्धा ही मनुष्य को सींचती और आगे बढ़ाती है।


विभिन्न रंगों की प्रकृति और प्रवृत्ति

सूर्य किरणों ने सात रंगों का सम्मिश्रण है। जो पदार्थ उनमें से जिस रंग का अवशोषण कर लेता है वह उसी रंग का हो जाता है। पदार्थों में रंग शोषण की क्षमता पृथक-पृथक है। इसी के आधार पर वे विभिन्न रंगों के दिखाई पड़ते हैं। प्रमुख रंगों की संख्या तो सात ही हैं पर उनके सम्मिश्रणों से उनकी संख्या कई हजार हो जाती है न्यूनाधिकता के कारण- मिश्रणों के कारण यह वर्ण परिवर्तन होते रहते हैं।

रंगों का साधारण उपयोग दृश्य विचित्रता के आधार पर सौंदर्य बोध करता है। हर रंग की अपनी-अपनी शोभा और सुन्दरता है। लोग अपनी पसंदगी के अनुरूप कपड़े रंगवाते, मकान पुतवाते, आभूषण पहनते और प्रिय पदार्थों की कलात्मक रंगाई पुताई करते हैं।

यह प्रिय परिचय का आभास हुआ। रंगों की अपनी-अपनी उपयोगिता भी है और गुणवत्ता भी। कड़ी चमकदार तेज धूप में यदि हरे नीले कांच के चश्मे पहन लिये जायं तो लगता है मानो धूप हलकी हो गई हो। पेड़ पौधों की घास पात की हरीतिमा सहज ही आँखों को प्रिय लगती है और शीतलता प्रदान करती है। नदी और झरने का, समुद्र का पानी नीला या हरा होता है। यह आभास मात्र है। वस्तुतः पानी बिना रंग का होता है पर प्रकाश की किरणें उस पर उसी रूप में परिलक्षित होती हैं जो मनुष्य को शक्ति और शीतलता प्रदान करे। ऐसे रंग हरे और नीले ही हैं आसमान में मात्र पोल भरी है। जहां तहां सितारे लटकते हैं। पर यह पोल भी नीलिमा बनकर प्रतिभासित होती है और मस्तिष्क को सान्त्वना प्रदान करती है।

सूर्य किरण चिकित्सा में रंगीन काँच के माध्यम से विभिन्न पदार्थों को अभीष्ट रंग के साथ सुनियोजित किया जाता है। इस विशेषता के आधार पर पानी, चीनी या दूसरा कोई पदार्थ रंग के अनुसार गुण दिखाता और रोग भगाता है। रंग चिकित्सा में लाल, नीला और पीला तीन रंग प्रधान माने गये हैं। लाल गरम, नीला ठंडा और पीला पाचक हैं। इन्हीं रंगों के सम्मिश्रण को रोग विशेष के लिए उपचार रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

रंगों का मनोवैज्ञानिक प्रयोग भी है। लाल रंग उत्तेजना, नीला शान्ति और पीला संतुलन बनाता है। नीले का स्थानापन्न हरा, लाल का नारंगी और पीले का बसन्ती या भगवा काम चला देता है। शुद्ध रंगों का मिलना कठिन है। उनमें प्रायः अन्यों का सम्मिश्रण रहता है। इसी आधार पर उनका प्रभाव भी बदलता रहता है।

लोक प्रचलन में रंगों के संबंध में अनेक प्रकार की मान्यताएँ भी हैं। पर उनका कोई तथ्य पूर्ण वैज्ञानिक कारण नहीं है। जादू टोने में काला कपड़ा और मरण के लिए लाल कपड़ा विग्रह खून खराबा उत्पन्न करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

ईसा से 1500 वर्ष पूर्व लिखे हुए “इवर्स पेपीरस” नामक ग्रन्थ में लाल रंग को युद्ध का, विद्रोह का, दुर्घटना का प्रतीक माना गया है। ज्वर से लड़ने के लिए चिकित्सक तथा परिचारक लाल रंग का कपड़ा पहनकर जाते थे और सोचते थे कि इससे ज्वर का भूत डरकर भाग जायेगा।

रूस ने क्रान्ति को लाल रंग दिया है और अपना झण्डा उसी रंग का बनाया है। उसे खतरे का निशान भी माना जाता है। निर्माणों और वाहनों में जहाँ रोकथाम की जरूरत होती है वहाँ लाल कपड़ा लटका देते हैं। गार्ड लाल झण्डी दिखाकर गाड़ी रोकते हैं। सधवाएँ अपने विवाहिता होने का चिन्ह माथे पर लाल सिंदूर लगाकर प्रकट करती हैं।

नारंगी रंग मनीषा का चिन्ह है। साधु, सन्त, त्यागी, बैरागी, लोकसेवी इसे सम्मानपूर्वक धारण करते हैं। शिक्षा की देवी सरस्वती को पीत वर्ण से सज्जित करते हैं। खाद्य पदार्थों में आम, नीबू, पपीता जैसे पीले फलों में जीवन तत्व अधिक माने जाते हैं। पका केला भी इसी श्रेणी में आता है। रंगों की शोभा ही नहीं है उनके अपने-अपने गुण भी हैं।

पीला रंग उत्साहवर्धक भी है और कृमि नाशक भी। विवाह में हल्दी का उपयोग वर वधू विभिन्न प्रयोजनों में करते हैं। प्रातःकाल अरुणोदय का समय पूर्व दिशा में स्वर्ण-सा दीख पड़ता है। यह जागृति और कर्मठता का प्रतीक है। अग्नि भी पीत वर्णा होती है वह कच्चे को पकाती है कलह के घरों में यदि पीला रंग पोत दिया जाय तो आशा की जाती है कि उपद्रव या मनोमालिन्य शान्त हो जायेंगे।

हरा रंग यों उर्वता का चिन्ह है, पर उसे मुसलमान-धर्म में पवित्रता और अपने दीन का प्रतीक भी माना गया है। हज जाने वाले प्रायः हरे कपड़े पहनते हैं। आयरलैण्ड स्काटलैण्ड, ग्रीस आदि में भी इसे विशेष गौरव प्रदान किया गया है और मूर लोग इसे विजय का चिन्ह मानते हैं यातायात में हरा रंग गति का चिन्ह भर है। रास्ता साफ है बढ़ चलो। इतना संकेत हरा रंग दीखने से मिल जाता है।

नीला रंग ईसाई धर्म में स्वर्ग का सोपान है। मृतकों को नीले कपड़े पहनाये जाते हैं। नीला पौरुष का भी चिन्ह है मर्दाने कपड़े अधिकतर नीले रंग के और जनाने गुलाबी रंग के देखे जाते हैं। गुलाब में कोमलता, सुन्दरता, सुगन्ध और कला का सम्मिश्रण है। इसलिए स्वागत समारोहों में गुलाब पुष्पों को वरीयता दी जाती है। चेहरे को अधिक सुन्दर दिखाने के लिए लालिमा की झलक दिखाने वाले प्रसाधनों का उपयोग होता है।

बैगनी रंग लेखन कार्य में तो प्रयोग होता ही है, एकाग्रता की साधना में नीले प्रकाश का महत्व दिया गया है उन्हें प्रकाश के ऊपर नीला आवरण चढ़ाकर कृत्रिम रूप से पैदा किया जाता है। नेपोलियन अपनी पोशाक तथा अपने सैनिकों की वर्दी बैगनी रंग की बनवाता था। उसका विश्वास था कि दूसरों पर हावी होने की इस रंग में विशेषता है।

सफेद रंग सब रंगों का मिश्रण है तो भी वह शुद्धता, पवित्रता, प्रफुल्लता, उल्लास और स्वच्छता का रंग है। स्वर्ग से धरती पर आने वाले देवता एवं उनके सहयोगी देवदूत भी उसी रंग से अपने को आच्छादित करते हैं। स्वप्न में श्वेत वर्ण का दर्शन माँगलिक माना जाता है। श्वेत हाथी, श्वेत घोड़े, श्वेत कौए, श्वेत सिंह दर्शनीय शुभ माने जाते हैं श्वेत रंग मित्रता और संधि का परिचायक है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्र में श्वेत वस्त्रों का धारण स्वास्थ्यकर एवं उपयोगी माना जाता है। श्वेत रंग अलग से चमकता है इसलिए इस रंग से पुते वाहनों और पहने कपड़ों से दुर्घटनाओं की संभावना कम होती है।

काला रंग शोक का चिन्ह है। दुःख का प्रतीक है। उसके साथ शैतानी का तारतम्य बिठाया गया है। चित्रकार इसी रंग के आधार पर रेखाएं उभारते तथा अन्य रंगों की गहराई का बोध कराते हैं। काला रंग, काल का, महाकाल का प्रलय का भी प्रतीक है। फिर भी उसमें दृढ़ता का सामंजस्य है दैत्य परिवार इसी रंग से अपने को सुसज्जित करते थे।

विभिन्न रंगों की अपनी-अपनी प्रवृत्ति-प्रकृति है। उन्हें केवल नयनाभिरंजन ही न माना जाय वरन् यह भी समझा जाय कि प्रकृति ने अनेक रंगों का सृजन मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये किया है।


युग साहित्य प्रचार केन्द्र का पंजीयन (kahani)

युग साहित्य प्रचार केन्द्र का पंजीयन

मथुरा केन्द्रीय कार्यालय में 100 रुपये अमानत के रूप में जमा करके परिजन युग साहित्य प्रचार केन्द्र का पंजीयन करा सकते हैं। पू. गुरुदेव की लेखनी का प्रसाद जन-जन तक पहुँचे, इस उद्देश्य से न केवल संगठन स्तर पर, अपितु, वैयक्तिक स्तर पर ऐसे न्यूनतम 24000 केंद्रों की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। यह संख्या क्रमशः 24 लाख तक जा पहुँचे तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। साहित्य केन्द्र पंजीयन के बाद जब भी साहित्य मंगायें एडवान्स राशि व पुस्तकों की सूची भेज दें व वी.पी. या बैंक बिल्टी से साहित्य मँगा लें। कभी भी प्रचार केन्द्र बन्द करने की स्थिति आई तो अमानत राशि ज्यों की त्यों लौटा दी जायेगी। पत्र व्यवहार गायत्री तपोभूमि मथुरा से करें।


सौर मण्डल कितना विस्तृत कितना सम्पन्न

कोई जमाना था जब आकाश में एक ही चन्द्रमा चमकता था। समझा जाता था कि सौर मंडल के ग्रह सूर्य के बेटे हैं, और चन्द्रमा की गणना पोते के रूप में हो सकती है।

अब तक तीन बेटे बिछुड़े रहे। यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो के बारे में धरती वासियों को जो भी कुछ अता पता था वह यही कि उसके यह बिछुड़े भाई हैं, जो दूरी में रहने के कारण दीखते नहीं पर अब इन्हें देख और पहचान लिया गया है। साथ ही उनकी गतिविधियों और सम्पदाओं के सम्बन्ध में भी बहुत कुछ अता पता लगा लिया गया है।

अब प्रश्न पोतों का आता है अर्थात् चन्द्रमाओं का। अब तक एक को ही जाना गया, जबकि वे अब तक की जानकारी के अनुसार 60 हो चुके हैं। हो सकता है कि अगली नई जानकारियों में इनकी संख्या और भी बढ़ जाये।

ग्रह परिकर में बुध और शुक्र ये दो ही ऐसे हैं, जिनके कोई पोते नहीं हैं। वे बूढ़े भी हैं, और गरम मिज़ाज भी। इसलिए उन्हें अकेले-अकेले ही जिन्दगी काटनी पड़ रही है। शेष सभी के बच्चे हैं, पोते नाती यानी चन्द्रमा भी।

मंगल के दो चन्द्रमा हैं। इनमें से एक अपने ग्रह से मात्र 27 किलो मीटर और दूसरा 14 किलोमीटर है। अपने पिता की बहुत नजदीक से परिक्रमा करने में वे लगे रहते हैं।

मंगल और बृहस्पति के बीच में किसी ग्रह का चूरा घूमता है। इनमें से कुछ टुकड़े छोटे और कई तो कई-कई मील के हैं। अपने समय पर वे भी एक सीमा तक चमकते होंगे, तो उन्हें परपोते माना जा सकता है। इनकी जानने योग्य संख्या गिनी जाय तो लाखों में पहुँचेगी।

बृहस्पति के छोटे बड़े 12 चन्द्रमा हैं। इनमें से कई तो थोड़े फासले पर घूमते हैं और कई आगे पीछे भी निकल जाते हैं। एक साथ कितने ही चन्द्रमाओं का आकाश में चमकना बहुत सुन्दर लगता होगा। शनि के 19 चन्द्रमा हैं। इनमें से कई तो पृथ्वी के चन्द्रमा से भी बहुत बड़े हैं।

यूरेनस के 15 चन्द्रमा हैं। नेपच्यून के तीन और प्लूटो का एक चन्द्रमा ही दीख पड़ता है पर खोजी उपकरणों की स्थिति को देखते हुए उनके भी कुछ अधिक चन्द्रमा बढ़ सकते हैं।

शनि के इर्द-गिर्द एक समझी जाने वाली पट्टियां वस्तुतः तीन हैं। इनमें वाष्पीकृत पदार्थ कुहासे की तरह भरा हुआ है और ग्रह के साथ-साथ ही घूमता रहता है एस्ट्रोफिजीक्स की खोजों से पता चला है कि यूरेनस और नेपच्यून दोनों की स्थिति मिलती जुलती है। दोनों अमोनिया और मीथेन से घिरे हुए हैं। यह चमकदार बर्फ की तरह दृष्टिगोचर होते हैं। यदि उनकी चट्टानें काटी जायें तो उनकी कठोरता, चमक और पारदर्शक स्थिति ऐसी पायी जायेगी जिससे उस पदार्थ को हीरे के समतुल्य कहा जा सके।

इस क्षेत्र में पाये जाने वाले संभावित पदार्थ की गहरी जाँच इन्फ्रारेड फोटोग्राफी से विलियॅड हर्वर्ड ने की है और उस पदार्थ में पाये जाने वाले अणु दबाव को देखते हुए कहा है कि इसकी तुलना पृथ्वी पर पाये जाने वाले हीरे से भली प्रकार की जा सकती है।

पुरातन ज्ञान को ही पर्याप्त या सब कुछ मान बैठना अबुद्धिमत्ता पूर्ण है। प्रकृति के रहस्यों में से कभी हम बहुत थोड़ा ही जान पाये हैं। अभी इस शोध प्रसंग को चलते रहना चाहिए।


Quotation

जीवन का वास्तविक सुख उन्हीं विरले भाग्यवानों को प्राप्त होता है जो जीवन को एक समझौते के रूप में नहीं एक चुनौती के रूप में देखते हैं। चुनौती स्वीकारने का अर्थ है- बढ़िया तरीके से पूरी ईमानदारी के साथ काम करना।


अन्तरिक्ष के अविज्ञात जासूस

इन दिनों अद्भुत, अनुपम और असाधारण वस्तुओं के दृश्य अन्तरिक्ष में उड़ते हुए बहुलता के साथ दीख पड़ते हैं। इनके अस्तित्व को नकारा तो नहीं जा सकता, पर यह अनुमान अवश्य लगाया जा रहा है कि जो घटना-क्रम सहस्राब्दियों से दृष्टिगोचर नहीं हुए, वे अब इन दिनों क्यों बहुलता के साथ प्रकट हो रहे हैं?

आरम्भ में उन्हें उड़न तश्तरी (यू.एफ.ओ.) नाम दिया गया था। गोल चमकदार वस्तु के रूप में आकाश में से इन्हें मंडराते हुए देखकर किसी चक्र आकृति का बोध होता था। इसलिए उन दृश्य पदार्थों को वह नाम दिया जाता था। पर अब वैसी स्थिति नहीं रहीं उनकी अनेकानेक आकृतियाँ देखी गई हैं और पुराना क्रम भी उनका यही रहा कि प्रकट होना और लुप्त हो जाना। वे अब लुप्त नहीं होतीं और अपने लक्ष्य के अनुसार काम करती हैं।

धरती की स्थिति को जानने परखने के लिए उसके ठोस पदार्थों को ही प्रयोग प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करना पर्याप्त नहीं, वरन् अधिक गहरी छानबीन करने और पदार्थ को अन्यत्र किसी दूरवर्ती ग्रह उपग्रह में ले जाने की आवश्यकता पड़ती है। इन दिनों तूफानों का उभार है। एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका के भू भागों में इन दिनों ऐसे तूफानी चक्रवात प्रकट हो रहे हैं, जिनकी ऋतु को देखते हुए संभावना या आशंका सोचते नहीं बनती।

सहस्राब्दियों पूर्व महामारी, दुर्भिक्ष, अति वर्षा, टिड्डी एवं तूफान की लम्बी लहरें आती थीं। वे किसी बड़े क्षेत्र को प्रभावित करती थीं और दूरवर्ती लम्बाई पार करने के उपरान्त शान्त होती थीं। उनका प्रभाव भी देर तक रहता था। इससे प्रतीत होता था कि धरती की भीतरी या ऊपरी पात में कोई गड़बड़ी आई है और यह विग्रह खड़ा हुआ है। पर अब ऐसा नहीं होता। भयंकर तूफान कहीं भी आ जाते हैं और वे थोड़ी परिधि में अपना ताण्डव नृत्य दिखाकर समाप्त हो जाते हैं।

इस वर्ष बंगलादेश के तटीय क्षेत्र से लेकर केरल तक के समुद्र तट के किनारे-किनारे खण्ड तूफान आये हैं। वे लगातार नहीं चले और न उनकी अवधि लम्बे काल की रही। परन्तु तीव्रता इतनी देखी गई कि जिस क्षेत्र को भी उनकी चपेट में आना पड़ा, उसका कचूमर निकल गया। राजस्थान में भरतपुर, धौलपुर, जयपुर आदि में भी यह खण्ड विग्रह उतरे, वे आँख मिचौनी खेलते रहे। हिमालय क्षेत्र में इस बार इतनी बर्फ पड़ी और वर्षा हुई कि यातायात के मार्ग रुक गये और उन क्षेत्रों में बसने वालों के लिए निर्वाह साधन जुटाने कठिन पड़े।

कुछ वर्षों पूर्व दिल्ली नगर में असाधारण बवंडर (चक्रवात) आया था। वैसा उससे पूर्व एवं पश्चात् कभी नहीं देखा गया। इस बवंडर के मध्य में एक प्रकाश का गोला भी गुजरता उठता देखा गया था। ऐसी ही घटनाएँ संसार में अन्यत्र भी प्रकाश में आईं हैं।

उड़न तश्तरियाँ कोई प्रकृति में दृश्यमान गुत्थी या दृष्टिदोष है, अब ऐसा नहीं माना जाता। उनकी आकृति एवं चाल भी ऐसी उलटी सीधी देखी गई है, जिससे उनका पीछा किसी विशाल प्रक्षेपणास्त्र से भी नहीं किया जा सकता।

अब ये अनचीन्हीं वस्तुएं वैज्ञानिकों के लिए गुत्थी बन गई हैं। अन्तरिक्ष में छाया हुआ उपग्रहों का कबाड़ भी इस तरह बरस सकता है, यह बात भी समझी नहीं जा सकती। जिस बात पर मन जमता है, वह एक ही यह मान्य अनुमान है कि संभवतः अन्तर्ग्रही नियंत्रण कक्ष पृथ्वी के बिगड़ते हुए वातावरण और चिन्तन के विक्षिप्तों जैसे उन्माद को समूचे ब्रह्माण्ड के लिए संकट मानते हैं और बर्बादी से पूर्व स्थिति का जायजा लेकर उस पर नियंत्रण स्थापित करने का उपाय सोच खोज रहे हों।


सुयोग आकस्मिक है- सौभाग्य सद्भावजन्य

कई बार मनुष्य आकस्मिक सुयोगों का लाभ उठा लेता है। वह विपत्ति से बच निकलता है और अनिष्ट उसे मात्र छूकर निकल जाते हैं। ऐसे घटनाक्रमों को आश्चर्य माना जाता है और सौभाग्य भी।

रॉय सुलीवॉन अमरीका में विश्व का एकमात्र जीवित मनुष्य है जिसने आकाशीय विद्युत का 7 बार आघात सहन कर वरजिनिया के मानवीय विद्युत-संवाहक के नाम से ख्याति अर्जित की है। सुलीवॉन खुद को जानकारी नहीं हैं कि विद्युत क्यों उसके प्रति आकर्षित है। सन् 1942 में पहला वज्रपात उसके ऊपर हुआ। फलस्वरूप पैर के अंगूठे का नाखून जल गया। उसके बाद यह वज्रपात का सिलसिला 1969 से बराबर जारी रहा। जुलाई 1969 में भौहें जलीं। जुलाई 1970 में बाँया कंधा झुलस गया। 16 अप्रैल 1972 को बालों में आग लगी और 7 अगस्त 1973 में फिर से बालों में आग लगी। उस आघात के फलस्वरूप अपनी गाड़ी से 10 फीट दूर गिर पड़ा और माथा ठंडा करने के लिए पानी डालना पड़ा। उसके बाद 5 जून 1976 के छटे वज्राघात से टखने (Ankle) को चोट पहुंची और सातवें एवं अन्तिम बार के आघात से छाती के साथ आमाशय जल गया।

पर इससे यह नहीं कहा जा सकता कि तड़ित चालक बनकर उसे ईश्वर की अनुकम्पा मिली। यदि ऐसा हुआ होता तो उसने कुछ सोचा होता और बचे हुए जीवन को ऐसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाया होता जिसकी सर्वत्र सराहना होती। कितनों को ही प्रेरणा मिलती और कई जीवन की सार्थकता अनुभव करते हुए अनुकरणीय मार्ग पर चलते।

बेलजियम के ‘हरक्युलीस’ जान मेसीस ने 7 अप्रैल 1979 को अपने दाँतों से हैलिकाप्टर को ऊँचा उठाने से रोक लिया था। मनुष्य बनाम मशीन की इस रस्सा-कशी में हैलिकाप्टर का ऊर्ध्व दबाव 375 पौण्ड आँका गया था।

यह कार्य सर्व साधारण के लिए असंभव है। दाँत जबड़े हर किसी के इतने मजबूत कहाँ होते हैं?

जोहन हर्लींगर ने 1900 ईस्वी में वियेना से पेरिस 871 मील का रास्ता हाथों के बल चल कर तय किया। प्रतिदिन 10 घण्टे 1.58 मील की रफ्तार से यह यात्रा 55 दिन में पूरी की।

लम्बी यात्राएँ कई करते हैं। पर वे रुक-रुक कर होती हैं। चलने वाले पैरों के बल चलते हैं और बीच-बीच में सुस्ताते रहते हैं। अनवरत इतना श्रम कर पाना हर किसी के लिए कहाँ संभव है?

किन्तु यह सब किया गया शक्ति प्रदर्शन भर के लिए। औरों की तुलना में अपने को अधिक मनस्वी और सामर्थ्यवान सिद्ध करने के लिए। पर इतने भर से क्या बना? मनुष्य जैसे दुर्बल प्राणी से प्रतिस्पर्धा में आगे निकल जाना साधारण बात है। अभी शेर, चीते, हिरन, जिराफ, घोड़े जैसे कितने की प्राणी पड़े हैं जो मनुष्यों में से किसी भी धावक को, एथलीट को पीछे छोड़ने की क्षमता रखते हैं।

ओहियो निवासी डोन कुक ने लगभग 17500 इटली नस्ल वाली मधुमक्खी की दाढ़ी उगाई है। इस दाढ़ी की लम्बाई गलमुच्छा से कमर तक 17 इंच है। रानी मधुमक्खी को ठोड़ी से चिपकाये रखने के फलस्वरूप अन्य मधुमक्खियां रानी मधुमक्खी तक पहुँचने के प्रयास में एक दूसरे से चिपक कर इस अद्वितीय दाढ़ी का निर्माण करती हैं। इस व्यक्ति का जिक्र गिनीज बुक में विस्तार से हुआ है। यह अच्छा खासा कौतुक है। उस मनुष्य को सोते जागते हर समय ध्यान रखना होता होगा कि कहीं कोई मक्खी करवट बदलते, नहाते, कपड़ा बदलते कष्ट न पाये और उड़ न जाये। इस सतर्कता को सराहा जा सकता है किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि उसने अपने में मानवोचित सद्गुण बढ़ाये और किसी की कोल भावनाओं को आघात नहीं लगने दिया।

प्रदर्शन को लोग महत्व देते हैं। अपनी सतर्कता का प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं। पर ध्यान इस ओर नहीं देते कि व्यक्तित्व को जिन सत्प्रवृत्तियों के आधार पर महान बताया जा सकता है, उनका अभिवर्धन और पोषण करें।

मनुष्यों में से कई लम्बे भी होते हैं और भारी भी। उनकी अपने साथ तुलना करके कोई साधारण व्यक्ति हँसते मुस्कराते इतना भर कह सकता है कि वे स्वर्ग तक पहुँचने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं या पर्वत के छोटे भाई बनने का सुयोग प्राप्त कर रहे हैं। संसार में इस बढ़े हुए स्तर के कितने ही मनुष्य हैं।

22 फरवरी 1918 को इलीनोइस क्षेत्र के एलटोन में जन्मा रोबर्ट परसींग वेडलो विश्व का आज तक का सबसे लम्बा मनुष्य माना जाता है। 22.4 साल में उसने 8 फीट 11.1 इंच की लम्बाई प्राप्त कर ली थी।

इतनी लम्बाई हस्तगत करने के बारे में बताया जाता है कि 2 साल की उम्र में दूसरी बार के हर्निया की सर्जरी के बाद उसकी लम्बाई असाधारण रूप से बढ़ने लगी थी। संभवतः उसके पीटुचरी हारमोन्स में कहीं न्यूनाधिकता आ गई होगी। मात्र मर्द ही नहीं, महिलाओं ने भी इस क्षेत्र में प्रतिद्वन्द्विता की है।

18 जून 1955 को शिकागो में जन्मी और इन्डियाना के शेल्बोविले में स्थित सेण्डी एलन ने अपनी 22 वर्ष की उम्र में 7 फीट 71/4 इंच लम्बाई प्राप्त करके विश्व का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।

लम्बाई के बाद वजन का सुयोग आता है। कई व्यक्ति असाधारण रूप से भारी होते हैं और कई मनुष्यों के बराबर मांस का बोझ अपने ऊपर लादे फिरते हैं।

चिकित्सकों द्वारा तौल किया गया वजनी सम्राट का श्रेय सन् 1926 मोन्टीसेलो, मिस्सोरी में जन्मे रोबर्ट अर्ल ह्ययुजेस को मिला है। फरवरी 1958 में 1,069 पौण्ड के अपने वजन से उसने विश्व को चकाचौंध कर दिया था। इतना वजन लादकर भी वह वर्षों जिया। महज एक अजूबाभर बना रहा, वह किसी के काम क्या आता, उसे करवट दिलाने के लिए आठ व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती थी।

सर्वाधिक वजनदार जुड़वें बच्चों का श्रेय 7 दिसम्बर 1946 में जन्मे नोर्थ केरोलीना के हेण्डरसनविले में स्थित बिली और बेनी मेक्गुयीर को मिला है। नवम्बर 1978 में दोनों का वजन क्रमशः 743 पौण्ड और 723 पौण्ड के साथ कमर का घेरा 84 इंच था।

यह उपलब्धियाँ आश्चर्यजनक हो सकती हैं पर अभिनंदनीय नहीं। गौरवशाली भी नहीं।

कई व्यक्ति धनवान होते हैं। सामान्य लोगों की तुलना में उनका वैभव अनेक गुना अधिक होता है। पर इससे किसी की गरिमा कहाँ बढ़ती है? बहुत संग्रह होना या बलिष्ठता, लम्बाई, ऊंचाई की दृष्टि से बड़ा होना मनुष्य का गौरव नहीं है। विशिष्टता इसमें है कि जो कुछ भी न्यूनाधिक मात्रा में मिला है उसका श्रेष्ठतम उपयोग किया जाय। उसे पुण्य परमार्थ स्तर के ऐसे कामों में लगाया जाय, जिससे पिछड़े लोग सहारा प्राप्त कर सकें और उठते लोग अपने लिए प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें। बड़प्पन का वैभव नहीं, महानता का अवलम्बन ही ऐसा मार्ग है जिसके सहारे व्यक्ति ऊँचा, अग्रणी और महान कहला सकता है।


वातावरण की विशेषता (kahani)

आकाश से धरती पर प्रतिदिन प्रायः एक हजार बिजली गिरती है। एक विद्युत प्रहार में लगभग दस लाख वोल्ट जितनी क्षमता रहती है। वह सारा प्रहार एक बारगी एक क्षेत्र में हो तो उसके कारण तीन हजार वर्ग मील का एरिया पूरी तरह जलकर नष्ट हो सकता है। बिखराव ही है जो इस अनिष्ट से धरती की, धरती वालों की रक्षा करता है। फिर वातावरण में ऐसी विशेषता भी रहती है जिसके कारण अनिष्ट बहुत थोड़ी मात्रा में ही विपत्ति उत्पन्न कर पाता है।


पेड़ पौधों में भी मनुष्य स्तर की बिजली होती है।

मनुष्य शरीर का सूत्र संचालन विद्युत शक्ति से होता है। मस्तिष्क उस विद्युत का केन्द्र है और समस्त शरीर में बिखरे हुए ज्ञान तन्तु उसके संवाहक।

समझा जाता रहा है कि शरीर का केन्द्र हृदय है। उसकी रक्त संचार पद्धति ही जीवन को बनाये रहती है। पर यह आँशिक सत्य है। हृदय की धड़कन बिजली के झटकों से देर तक जारी रखी जा सकती है। हृदय को अलग निकाल कर उसे कृत्रिम साधनों से धड़कता हुआ रखा जा सकता है। किन्तु मस्तिष्कीय बिजली का प्रवाह उसे न मिले तो जीवन संभव नहीं। अकेला हृदय किसी को सजीव बनाये नहीं रह सकता है। भले ही उसमें रक्त की अभीष्ट मात्रा विद्यमान हो।

भूतकाल में नाड़ी चलना बन्द होने अर्थात् हृदय की धड़कन रुक जाने पर मनुष्य की मृत्यु घोषित की जाती थी पर अब ऐसा नहीं होता। मस्तिष्क का विद्युत प्रवाह बन्द होना आत्यन्तिक मृत्यु होना समझा जाने लगा है।

मानव शक्ति मात्र माँस पेशियों पर निर्भर नहीं है। जिन माँस पेशियों में जितने सशक्त ज्ञान तन्तु हैं, वे जितनी मात्रा में विद्युत उपलब्ध कराते हैं, मनुष्य में उतनी ही स्फूर्ति और सहन शक्ति रहती है। इसलिए प्राण विद्युत की अभीष्ट मात्रा का होना समर्थ जीवन के लिए आवश्यक समझा जाने लगा है।

मानवी विद्युत मशीनों में काम आने वाली बिजली से भिन्न है। यही कारण है कि उसकी उपस्थिति सामान्य रूप में अनुभव नहीं होती। सूक्ष्म अंकन करने वाले मीटर ही उसका पता लगा सकते हैं। किन्तु याँत्रिक पद्धति से ऐसा नहीं हो सकता कि उसे घटाने बढ़ाने का कोई कार्यक्रम बनाया या अपनाया जा सके।

पेड़ पौधे भी इस दृष्टि से मनुष्य की बिरादरी में ही आते हैं। उनमें पोषक रसायनों की भरमार तो है, जिसे वे उपयोगी मनोरंजन की तरह फूलों और खाद्य के रूप में फलों द्वारा देते रहते हैं। वायु शोधन उनका प्रमुख कार्य है। मनुष्य द्वारा छोड़ी कार्बनडाइ ऑक्साइड गैस वे स्वयं के काम लाते हैं और अपनी छोड़ी हुई आक्सीजन से मनुष्यों का पोषण करते हैं।

इस पुरातन धारणा के अतिरिक्त अब इस संदर्भ में एक नई मान्यता और जुड़ी है कि पेड़ों में बिजली भी होती है। उससे विद्युत घटक जैसा काम भी लिया जा सकता है और मनुष्य शरीर में इसकी जो कमी पड़ती है उसकी पूर्ति भी हो सकती है। यदि वृक्षों की छाया में घर झोपड़ा बनाकर रहा जाय तो वह मानवी विद्युत को बढ़ाने और स्फूर्ति समर्थता प्रदान करने में सहायता करता है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने यह तथ्य बहुत पहले सिद्ध कर दिया था कि पेड़ पौधों में जीवन होता है। वे सुख दुःख का अनुभव करते हैं। समीपवर्तियों से वार्तालाप करते हैं और एक दूसरे को यथा संभव सहायता भी पहुँचाते हैं।

अब आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसी शृंखला में एक और कड़ी जोड़ी है कि इस बिजली के माध्यम से वे छुटपुट कार्य भी हो सकते हैं जो बिजली या बैटरी की सहायता से किये जा सकते हैं।

आन्ध्र विश्वविद्यालय के एक शोधार्थी ने पपीते के तने से वह कार्य करके दिखाया है जो टी.वी. एंटीना द्वारा होता है। एंटीना अन्तरिक्ष में भ्रमण करती हुई शब्द तरंगों को पकड़ता है। उसे नीचे जुड़े हुए टेलीविजन यंत्र में भेजता है और दूर दर्शन का चित्र प्रदर्शन होने लगता है। बिना एंटीना के भी टी.वी चलाने का सहज तरीका यह है कि पतले तने वाले पेड़ों से वायुमंडल में से विद्युत तरंगें पकड़ने का काम लिया जाय। इस प्रकार वे विद्युत धारक और संचालक बन बैठते हैं।

वृक्षों की समीपता में रहने का लाभ वैसा ही है जैसा माता द्वारा अपने बच्चों को समीप रख कर दिया जाता है। छोटे बालक माता की गोदी में जितनी देर रहते हैं, उतनी देर उन्हें माता के शरीर से निकलने वाली बिजली प्राप्त होती रहती है। यह दुर्बल पक्ष के हित में है। पेड़ों विशेषतः कतिपय दिव्य वनस्पतियों की समीपता को शास्त्रों में अत्यधिक महत्व दिया गया है। उसे भी इसी प्रकार समझा जा सकता है। उससे शारीरिक और मानसिक कई प्रकार के लाभ हैं। अध्ययन के लिए पेड़ों के नीचे स्वच्छ वायु में बैठकर अपनी स्मरण शक्ति को अपेक्षाकृत अधिक तत्परतापूर्वक काम करती हुई देखा जा सकता है। बौद्धिक कार्य पेड़ों के नीचे बैठकर अधिक अच्छी तरह पूरे हो सकते हैं। पुरातन काल में ऋषि मनीषी आध्यात्मिक और भौतिक खोजें करते थे। उनके निर्वाह भव्य भवनों में नहीं वरन् सघन वृक्षावली के बीच ही होते थे। कवीन्द्र रवीन्द्र ने शाँति निकेतन की स्थापना इसी रूप में की थी। पुष्पोद्यान में टहलना मनुष्य को ताजगी प्रदान करता है। मात्र सुगंधि का, स्वच्छ वायु का ही लाभ नहीं मिलता वरन् उस क्षेत्र में लहलहाती प्राण स्तर की ऊर्जा से भी लाभान्वित होने का अवसर मिलता है।

इससे एक कदम और आगे बढ़कर कितने ही पौधों में भावनाएं भी पाई जाती हैं और वे मनुष्य के साथ प्रेम संबंध जोड़ते हुए प्रसन्नता अनुभव करते हैं। कितने ही पौधे अपने मालिकों और मालियों के दुःख सुख में भी साझी होते हैं। उनकी निकटता में अधिक प्रसन्न रहते और अधिक फलते फूलते हैं। उन की प्रसन्नता मनुष्य पर भी अपनी छाप छोड़ती है। पौधों को मनुष्य की और मनुष्यों को पौधों की भाव संवेदना उभारती है। इस सम्बन्ध में डॉ. बैक्सटर द्वारा किए गये प्रयोग महत्वपूर्ण हैं। कितने ही पेड़ पौधों की प्रकृति में सौम्य सात्विक भावनाओं का समावेश रहता है। वट, पीपल, आँवला, बेल, अशोक आदि को देवतुल्य माना गया है। इनकी समीपता में रहना, उन्हें अपने निवास क्षेत्र में लगाना आयुष्य वृद्धि की दृष्टि से आरोग्य सुदृढ़ रखने के उद्देश्य से प्रत्यक्ष लाभदायक है। उनसे निकलने वाली तरंगें मनुष्य को प्रकृति सान्निध्य का लाभ देती हैं और शारीरिक और मानसिक आधि−व्याधियों के निराकरण में उपयोगी सिद्ध होती हैं। दिन में पौधे शीतलता और रात में गर्मी देते हैं। तापमान की घट बढ़ से शरीर पर जो अनुपयुक्त प्रभाव पड़ता है उसे वृक्ष रोकते हैं। पेड़ पौधों का प्रेम और सान्निध्य एक प्रकार से प्रकृति के साथ घनिष्ठता बनाये रहना है। इससे हम उन्हीं की तरह सुविकसित होते और दूसरों की सहायता करने की प्रवृत्ति अपनाती हैं।


समय भी चक्र की तरह घूमता है (kahani)

समय भी चक्र की तरह घूमता है। दिन और रात्रि का होना, मौसम बदलना, यह सब समय के भ्रमण चक्र पर निर्भर हैं। सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण होने के कारण भी नहीं हैं।

पेड़ों में ग्यारह वर्ष का एक ऋतु चक्र आता है जिसके अनुसार उनके तने में एक परत जमती जाती है। रहस्य वादी ‘कीरो’ ने लिखा है कि प्रत्येक नये वर्ष में हर मनुष्य के जीवन में कोई असाधारण घटना घटित होती है।

इतिहास में 539 का अंक ऐसा है जो एक चक्र पूरा करता है। फ्राँस में सन्तलुई 1215 में जन्मे। वे अपने समय के असाधारण तत्वदर्शी थे उनके ठीक 539 वर्ष बाद फ्राँस में लुई सोलहवें का जन्म 1754 में हुआ।

सन्तलुई के 10 वर्ष बाद उसकी बहिन इलिजायेच जन्मी। सम्राट लुई की बहन का नाम भी यही था और वह भी दस वर्ष ही जन्मी थी। दोनों के पिताओं की मृत्यु उनके 12 वें वर्ष में हुई। दोनों का विवाह सत्रहवें वर्ष में हुआ था। सम्राट लुई का सन्तलुई को अवतार माना जाता था।

सन्तलुई ने 29 वें वर्ष में इंग्लैंड के बादशाह हेनरी तृतीय से संधि की। सम्राट लुई ने भी 29 वर्ष की आयु में इंग्लैंड के बादशाह जार्ज तृतीय से संधि की। 35 वर्ष की आयु में ही सन्तलुई और सम्राट लुई को बन्दी बनना पड़ा। दोनों ने 36 वर्ष की आयु में एक नई क्रान्ति का श्री गणेश किया। सन्त लुई की माँ का स्वर्गवास जिस सन में हुआ था उससे ठीक 539 वर्ष बाद सम्राट लुई की माँ मरी। इस प्रकार दोनों की जीवन घटनाओं में अनोखी समता है।


ध्वनियाँ हमें असाधारण रूप से प्रभावित करती हैं।

ध्वनि में स्वस्थ करने की शक्ति विद्यमान है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। वह चैतन्यता की अवस्थाओं को बदल सकती है। क्षति पहुँचाने, मन को मोड़ने, मनोभावों को उत्तेजित करने तथा मन को विह्वलता की पराकाष्ठा तक पहुँचा देने का कार्य ध्वनियाँ कर दिखाती हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ध्वनियों का प्रभाव बुरी तरह से कभी-कभी अहितकर रूप में भी दिखाई पड़ता है। जहाँ कहीं ध्वनि उच्च-स्तर की होती है, वहाँ उच्च-स्तर की मानसिक अस्वस्थतायें होती हैं। उच्च-शोर वाले उद्योग हृदय-रोग, सिरदर्द एवं श्वसन-शिकायतों के लिए उत्तरदायी माने गए हैं।

“मेसाचुसेट्स इन्स्टीट्यूट ऑफ-टेक्नोलॉजी” के डॉ. डेलहटीस के अनुसार तेज आवाज रक्त के कणों को कोएगुलेशन (सघनता) में वृद्धि करती है, जो बाद में धमनियों के कठोरीकरण एवं सकरे होने में सहायता दे सकती है। तीखी आवाज स्नायुविक विकारों में वृद्धि करती है। वायुयान, जेट और सुपर सोनिक की आवाजें खतरनाक स्तर की होती हैं। हीथ्रो एअरपोर्ट के समीप इस संबंध में अध्ययन किया गया। इस रिपोर्ट में यह प्रदर्शित किया गया है कि 31 प्रतिशत उच्चतर स्नायविक विकारग्रस्त लोग शोर वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं।

“यू. सी. एल. ए. स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड एप्लाइड साइंस” के एक वायु ध्वनिक अध्ययन में बताया गया कि लॉसएंजिल्स के 3 मील के विस्तृत लक्ष्य क्षेत्र के 80 हजार निवासियों में 29 प्रतिशत से अधिक मृत्यु दर थी। 40 प्रतिशत लोग उच्चतर विनाशक आघात से ग्रसित थे एवं 6 मील के घेरे में निवास करने वाले लोगों में अधिकाँश व्यक्ति यकृत की विकृति के शिकार बने। इस क्षेत्र में जन्म लेने वाले बच्चे जन्मजात शरीरगत असामान्यता लिए पैदा हुए। तरुण लोग जो बहुधा डिस्को तथा पॉप संगीत गोष्ठियों में जाते हैं, वे क्रमशः एवं उत्तरोत्तर अपनी श्रवण शक्ति को खोते जाते हैं। एक ध्वनि विज्ञानी डॉ. जॉन डायमण्ड तो कहते हैं कि “पॉप संगीत की एक विशिष्ट प्रतीकात्मक ताल डा, डा. डा दो तिहाई पेशियों की शक्ति को नष्ट करती है। यह “इलेक्ट्रानिक स्ट्रेन-गेज” के परीक्षण के बाद बताया गया।

ध्वनि प्रदूषण उस समय पर्यावरण, विशेषज्ञों के लिए चिन्ता का विषय है, जब यह रोग से संबंधित विपत्ति को फैलाती है। ताल और सुर की गति क्रमबद्ध हो तो अन्तरात्मा को स्वस्थ तथा बलवान् बनाती है, न होने पर तन्त्रिका तन्त्र को अपंग, शरीर को विकृत कर देती है। मानवीय मस्तिष्क और शरीर उत्तमता से समस्वरित हैं, और उन्हें सरलतापूर्वक तीव्र और कर्कश लय से अनुकूलता उत्पन्न कर बाहर किया जा सकता है।

ध्वनि कंपन है। तब संगीतज्ञ वाद्य-यंत्र को झंकृत करता है, तब हवा के चारों ओर यह झंकार सिकुड़कर फिर फैल जाती है। हमारा सम्पूर्ण शरीर ध्वनि की प्रतिक्रिया है। मनुष्य एक जैव-दोलक है। ठीक वैसे ही जैसे कि “एक रेडियो”। वैज्ञानिकों के जब हम सुरबद्ध स्थिति में होते हैं, तब आदर्श कार्य करते हैं। ध्वनि को मापने की इकाई को डेसीबल कहते हैं। 180 डेसीबल ध्वनि प्राणघातक होती है। 140 से 150 डेसीबल जेट-प्रस्थान के समय की ध्वनि शारीरिक और मानसिक क्षति पहुँचने में समर्थ है। 130 डेसीबल ध्वनि तन्त्रिकाओं के लिए कष्टदायक है। 110 से 120 डेसीबल की विस्तृत ध्वनि चरम स्थिति की है। इतनी ध्वनि नुकसान करने के लिए पर्याप्त है। इसके नीचे के स्तरों की ध्वनियाँ मध्यम किन्तु परेशान करने वाली मानी गई हैं। 10 डेसीबल की मन्द हल्की ध्वनि मानवी श्वासोच्छवास की तरह मन्द मानी गई है। नादयोग इसी श्रेणी में आता है।

ध्वनि और संगीत में व्यक्ति को स्वस्थ करने की क्षमता है। तनावों को शान्त करने, तन्त्रिकाओं को शिथिल करने और शरीर को निरापद एवं यथावत करने में ध्वनि और संगीत उपयोगी है। अधिकाँश शास्त्रीय संगीत और प्राकृतिक ध्वनियाँ शक्तिशाली और समर्थ बनाती हैं एवं लाभकारी होती हैं।

“डायरेक्टर ऑफ स्पैक्ट्रम रिसर्च इन्स्टीट्यूट कैलीफोर्निया” के मि. स्टेवेन हैपर्न के अनुसार हम सभी ध्वनि के महासागर के मध्य निवास करते हैं। कुछ निश्चित ध्वनियों के कंपन भी अत्यधिक लाभदायी हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में बल्गेरिया के डॉ. गार्गी खोजानोव ने पाया कि “जब विशेष ताल का उपयोग किया गया, तब सामान्य अवस्था गहरी शिथिलीकरण याने समाधि अवस्था जैसी स्थिति में बदल गई। “जुरिच के डॉ. हैन्स जैनी ने अपने ग्रंथ “सिमेटिक्स” में कहा है कि “तरंगें पदार्थों के निर्माण का कार्य तथा रूपांतरण भी करती हैं। उसने अपने एक प्रयोग में स्टील की चकतियों को द्रव पदार्थ में बिखेरा। प्लास्टिक, धातुओं के चूर्ण तथा पाउडर को भी उसी में मिला दिया। फिर उसने उस मिले हुए मिश्रण को एक नियंत्रित साधन से ध्वनि-कम्पन प्रदान किया। उसने देखा कि, लोहे के चकतियों के ऊपर के प्रतिरूप बदल जाते हैं। यह संवादी पैमाने के अनुसार होता है। उन्होंने एक “टेनोस्कोप” बनाया है। इस माइक्रोफोन में जब मुँह से ध्वनियाँ छोड़ी जाती हैं। वे ध्वनियाँ दृश्य प्रतीक के रूप में पर्दे पर निर्मित हो जाती हैं।

उन्होंने यह खोज की है कि ॐ एक मन्त्र है जो रेखा गणितीय रूप प्रस्तुत करता है। साधारणतया प्रतिदिन के बोल चाल के शब्द अव्यवस्थित होने के कारण कुछ भी प्रभाव नहीं डाल पाते। वे कहते हैं कि वह बहुत आश्चर्य चकित हुए कि “पूर्वार्त्त धर्मों के लोगों ने बहुत अधिक महत्वपूर्ण खोज संगीत के रूप में की है। अधिक महत्वपूर्ण मन्त्रों को अलाप सहित गाकर सुनाना अपने आप में एक चिकित्सा है।

अर्वाचीन पश्चिमी शरीर वैज्ञानिकों के कार्य यह विश्वास दिलाते हैं कि कम्पन एण्डोक्राइन, ग्लैण्ड पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। वियना के डॉ. लेसर लेसारियो के साऊण्ड थैरेपी के प्रयोग से उसके सेनीटोरियम के बहुत से रोगी अपने स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करके अपने घरों को लौट गये। यौगिक प्राणायाम में श्वासोच्छवास के समय ॐ का प्रयोग, निस्तब्धता और मन को शान्ति प्रदान करता है, यही मानकर उन्होंने ॐकार का जप कराया।

ध्वनि कंपनों से दीवारें तक टूट सकती हैं। बाइबिल बतलाती है कि जेरिको की तुरहियों की ध्वनि से एवं समूचा नगर नष्ट हो गया था। केरुसो लगातार स्वर प्रयोग करके शराब की बोतलें फोड़ा करता था। उसने अपने एवं स्वर-प्रयोग में कोलगन नामक एक बड़े चर्च के एक हिस्से को ढहा दिया था। ध्वनि अत्यधिक शक्तिशाली होती है। स्वस्थ बनाने या विनाश हेतु किसी भी रूप में इसका प्रयोग किया जा सकता है। रविशंकर के शास्त्रीय सितार वादन का लता गुल्मों पर प्रभाव ध्वनि की समर्थता व्यक्त करती है, जिसमें पौधे संगीत के प्रभाव से वाद्य-यन्त्र की ओर उन्मुख होते तथा पुष्पित होते देखे गये।

अधिकांश ध्वनियाँ हमारे नियन्त्रण के बाहर हैं। उस ध्वनियों पर नियंत्रण करने की आवश्यकता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए विपत्ति स्वरूप हैं। हमें लाभदायक ध्वनियों के बारे में भी ध्यान देना चाहिए जो मानव जीव को समृद्ध बनाती हैं। पूर्वार्त्त और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत तथा प्राकृतिक ध्वनि जैसे पक्षियों का गीत, समुद्री तरंगें, वायु तरंगें एवं पेड़ों की सरसराहट आदि की ध्वनियाँ लाभदायी हैं। प्राचीन काल के पूर्वज यह विश्वास करते थे कि “संगीत एक सेतु है, जिसका संबंध सभी वस्तुओं से है।” आज का विज्ञान भी अब यह कहता है कि “प्रत्येक वस्तु जो प्रकृति के अंतर्गत है वे सभी एक कम्पन में स्पन्दित होने वाली तरंगें हैं।”


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आश्विन नवरात्रि सत्र

प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी 9 दिवसीय आश्विन नवरात्रि सत्र 4 अक्टूबर शनिवार से आरंभ होकर 12 अक्टूबर रविवार विजयादशमी के दिन समाप्त होगा। यह विशुद्धतः अनुष्ठान सत्र है। अक्टूबर का एक माह का युगशिल्पी सत्र अलग से चलेगा। दोनों सत्रों के लिए इच्छुक परिजन अनुमति अभी से मँगा लें। अष्टमी तिथि क्षय होने पर भी पूर्णाहुति नवें दिन बारह तारीख को ही होगी।


अग्निहोत्र : एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया, अग्निहोत्र : कुछ जानने योग्य तथ्य

अग्निहोत्र न केवल भारतीय संस्कृति का मान्य धर्म कृत्य है, वरन् उसके पीछे अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का भी समावेश है। इस आधार पर वह जहाँ आत्मोत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करता है, वहाँ उसकी भौतिकी प्रतिक्रिया शारीरिक और मानसिक प्रयोजनों की भी पूर्ति करती है। खोया स्वास्थ्य वापस लौटता है। जीवनी शक्ति का चुकता भंडार फिर से भरता है। रोग, कीटाणुओं, विषाणुओं का आक्रमण घटता और निरस्त होता है।

अग्निहोत्र दिव्य औषधियों को वायुभूत बना देते की प्रक्रिया है। उसमें गुणकारक वनस्पतियों के अतिरिक्त समिधा रूप में प्रयुक्त सम्मिश्रण अपनी औषधीय विशेषता के कारण संयुक्त ऊर्जा पैदा करता है, जिसमें दोनों के पृथक-पृथक गुणों का समावेश तो होता ही है, साथ ही मिश्रण से उत्पन्न ऊर्जा और भी अधिक बलवती होती है। गंधक और पोटाश के अलग-अलग रहने पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं होती, किन्तु यदि उन दोनों को पीसकर संयुक्त किया जाय तो भड़कने वाली बारूद बन जाती है। गंधक और पारे को मिलाकर पीसने से कजली बन जाती है। ऐसा ही रासायनिक हेर-फेर समिधाओं और हवन के सम्मिश्रण से होता है। उसके गुण और प्रतिफल ऐसे सामने आते हैं जैसे न समिधाओं में थे और न शाकल्य में। पीला और नीला रंग मिला देने हरा रंग बन जाता है। यों हरे रंग का अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी है, पर नीले पीले का सामंजस्य उस तथ्य की पृथक से भी पूर्ति कर देता है।

यज्ञाग्नि प्रज्वलित करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि समिधायें सूखी प्रज्ज्वलनशील हों। कृमि-कीटकों का उसमें समावेश न हो। बहुत दिनों की रखी हुई पुरानी सामग्री या समिधायें सड़ने-घुनने लगती हैं, तब अग्नि प्रज्ज्वलन में उनका भी समावेश हो जाता है। ऐसी दशा में यज्ञ हिंसामय हो जाता है और उसके वास्तविक गुण चले जाते हैं।

यज्ञ के लिए औषधियों का चयन उनकी प्राणावस्था में किया जाना चाहिए। इसके लिए शास्त्रकारों ने उल्लेख किया है कि किस नक्षत्र में कौन औषधि परिपक्व स्थिति में रसवती होती है। उस अवधि से पूर्व या पश्चात् उसकी स्थिति ऐसी नहीं रहती कि यज्ञ में जो गुण बताये गए हैं, उन्हें सही रूप में प्रदर्शित कर सके। प्रौढ़ होने से पूर्व वनस्पतियों की संज्ञा अबोध अविकसित जैसी मानी गई है। उसमें वे गुण पकने नहीं पाते, जिनका कि लाभ मिलना चाहिए। यही बात उनकी जराजीर्ण स्थिति में भी होती है। जब बीज आ जाते हैं, तो वनस्पति का गुण बीजों में खिंच जाता है और डंठल निःसत्व हो जाते हैं। यह बात अन्न-फसल में भी है। जब उनकी बालें या भुट्टे कट जाते हैं, तो चारा सूख भी जाता है और गुण हीन भी हो जाता है। ठीक यही बात वनस्पतियों के सम्बंध में भी है। वे मध्यकाल में ही उपयुक्त रहती हैं। उनका यौवन काल ही ग्राह्य माना गया है। यज्ञ उसी के उपयोग से सार्थक होता है।

दूरदर्शी चिकित्सक अपने जड़ी-बूटी उद्यान स्वयं लगाते हैं, ताकि उचित समय पर उनका संग्रह किया जा सके। साथ ही यह भी पता चल सके कि एक के बदले दूसरी तो पल्ले नहीं बँध गई। कितनी ही औषधियाँ ऐसी होती हैं, जिनका बाह्य कलेवर आपस में मिलता-जुलता है। स्वाद और गंध में भी एकता होती है, पर रासायनिक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि उनके रासायनिक स्वरूप में भारी अन्तर है। एक में एक प्रकार का गुण है तो दूसरी में दूसरी का। यह अन्तर तभी समझा जा सकता है जब अपना निज का औषधि उद्यान हो। उसकी परखी हुई औषधियां ही लगाई जायें, नियत समय पर तोड़ी जायँ। इसके उपरान्त उसे शुद्ध जल से भली प्रकार धो लिया जाय। अन्यथा पत्तों पर जमते रहने वाले धूलिकण ऐसे हो सकते हैं, जो औषधि का गुणवत्ता में व्यतिरेक उत्पन्न करें और वह व्यतिरेक लाभ के स्थान पर हानि उत्पन्न करने लगे।

यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली औषधियों को छाया में रखा जाय। कड़ी धूप में सुखाने से उनका रस और तैलीय अंश भी वाष्प बनकर उड़ जाता है। इसलिए सतर्कता यह भी रखनी चाहिए कि औषधि हवा में सूखे, मध्याह्न तीव्र धूप से उसका पाला न पड़े। इसे इस प्रकार कूट लेना चाहिए, जिसे जौ कुट कहा जा सके। बिल्कुल मैदा जैसी पीस लेने पर फिर वह औषधि स्तर की बन जाती है। उसे सुरक्षित शीशियों में बन्द रखना पड़ता है, अन्यथा गंध बन कर भी उसका क्षमता हवा में उड़ सकती है और अपेक्षाकृत जल्दी गुणहीन हो सकती है।

शाकल्य में अन्नों का उपयोग करना उपयुक्त नहीं। नवान्न यज्ञ अलग होते हैं। नई फसल आने पर उसके अधपके बीज “होला” कहलाते हैं और उनका होली के अवसर पर होलिका यज्ञ के रूप में प्रयोग होता है। यह एक प्रकार से परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है, जिसके अनुग्रह से हमें यह जीवन सम्पदा प्राप्त हुई। ऐसा यज्ञ दिवाली पर भी हो सकता है। बरसाती-कार्तिकी फसल में भी कई प्रकार के अन्न पकते हैं। ज्वार, बाजरा, मक्का आदि उन्हीं दिनों उपजते हैं। इसलिए वे अपने उपयुक्त अवसर दिवाली पर काम आ सकते हैं।

यज्ञों के लिए आदर्श उपयुक्त समय अमावस्या पूर्णिमा बताया गया है। अमावस्या को “दर्श” कहते हैं, पूर्णिमा तो प्रख्यात है। यज्ञ यों कभी भी किया जा सकता है, पर अमावस्या, पूर्णिमा उसके विशेष प्रयोजनों में काम आते हैं।

अग्नि प्रज्ज्वलन में समिधाओं को इस प्रकार रखा जाना चाहिए कि वेदी या कुण्ड की परिधि में ही वह रहे। अधिक छोटी बड़ी न हो। उनको इस प्रकार चुना जाय कि बीच-बीच में जम जाने की गुंजाइश बनी रहे। यह झरोखेदार चुनाई होती है। इसमें समिधाएं एक दूसरे से अग्नि पकड़ती हैं और ऑक्सीजन सब ओर से मिलती रहने के कारण वे बुझने नहीं पातीं। लौ नीचे से भले ही चौड़ी हो, पर ऊपर जाकर उसकी स्थिति शंकु जैसी हो जानी चाहिए। समिधाएं गीली न हों। अनगढ़पन से चिनने पर तो ऐसा हो जाता है कि वे धुंआ देने लगती हैं। धुएँ में लकड़ी के गीलेपन की भाप और उसके अनुपयुक्त भाग का कार्बन होता है। यह यदि यज्ञ धूम्र में मिला जाय तो फिर अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। अनुपयुक्त तत्व मिल जाने से वह उपयोगी प्रक्रिया निरुपयोगी बन जाती है। इसलिए यज्ञ कार्य में एक कुशल व्यक्ति की जिम्मेदारी इसलिए रहती है कि कोयला बाहर न गिरने दें। लकड़ियों को छितराने न दें। धुएँ की स्थिति बनती हो तो पंखा झलकर उसे ठीक करें। हर हालत में धुंआ रोका जाना चाहिए। जब तक वह रुके न तब तक यजन कृत्य बंद रखना चाहिए। निर्धूम्र अग्नि में ही अग्नि होत्र करने का विधान है।

यज्ञ में यदि कई व्यक्ति सम्मिलित हैं तो उनके द्वारा कुण्ड या वेदी पर अग्नि में डाली हुई सामग्री इतनी होनी चाहिए, जिसे प्रज्वलित अग्नि साथ-ही-साथ आत्मसात करती चले। अधिक मात्रा में डाल देने पर वह इकट्ठी हो जाने पर पिण्ड जैसा बन जाती है और फिर प्रज्ज्वलन में कठिनाई उत्पन्न करती है।

सामान्य अग्निहोत्र सुगंधित गुणकारी वनौषधियों का ही होता है फसल पर नवान्न की आहुति देने के लिए ही विशेष होलिका यज्ञ होते हैं। उनके पीछे ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का और जन साधारण के प्रति मिलजुल कर बाँट कर खाने का संकल्प रहता है। इसलिए होली, दिवाली के यज्ञों को विशेष मान कर उनमें अन्न की आहुतियाँ दी जाती हैं, पर यह अन्न सभी यज्ञों के लिए उपयुक्त नहीं।

प्रचलन कुछ ऐसा चल पड़ा है कि शाकल्य में तिल, जौ, चावल मिलाये जाने लगे हैं। कई बार तो ऐसा होता है कि मात्र इन धान्यों से ही समूचा हवन कर लिया जाता है। इस प्रचलन के पीछे यज्ञ के साथ जुड़ी वैज्ञानिकता का समावेश नहीं है।

देवी-देवताओं की पूजा-अर्चा में पकवान, मिष्ठान आदि अर्पित करने की परम्परा है। कहीं-कहीं लड्डू, खीर आदि भी यजन किये जाते हैं, घी होमा जाता है और मेवा, फल आदि चढ़ाये जाते हैं। यह देव पूजन हुआ। हो सकता है कि किसी की समझ में यह आया हो कि देवताओं को चढ़ाया गया भोग उन तक नहीं पहुंचता। पुजारी लोग बीच में ही उस पर अपना कब्जा जमा लेते हैं। ऐसी दशा में यह अधिक बुद्धि संगत है कि उनका हवन करके देवताओं को सुगंध लाभ लेने दिया जाय और पुजारियों को कमीशन में हाथ साफ कर लेने से रोक दिया जाय।

जो हो, अग्निहोत्र की शास्त्रीय विधा में वनौषधियों का ही विधान है, उनके साथ शर्करा और घृत के समावेश की ही छूट है। शर्करा में सबसे सुलभ गुड़ है। उससे आगे फलों की शर्करा खजूर, छुहारा, दाख, किसमिस आदि के रूप में हो सकती है। तेल अंश की पूर्ति नारियल, बादाम, अख़रोट आदि से हो जाता है। सामग्री में उन्हें मिलाया जा सकता है या पूर्णाहुति के समय पर उन्हें अन्त में होमा जा सकता है, ताकि सामग्री का जो अंश कच्चा रह गया हो, तो उस चिकनाई के कारण भली प्रकार जल जाय।

केवल अन्नों का हवन निषिद्ध है। उनमें खाद्य तत्व भर होते हैं। वे रसायन नहीं, जिनके कारण शरीरगत आरोग्य और मनोगत संतुलन को अक्षुण्ण रखने में सहायता मिले। अभाव की स्थिति होने पर उसके दूसरे विकल्प हो सकते हैं। मात्र समिधा प्रज्वलित करके छोटी समिधाओं को शाकल्य की तरह होमा जा सकता है। चन्दन, चूरा, अगर तगर जैसे काष्ठ भी इस प्रयोजन में काम आ सकते हैं। समिधाओं में हर काष्ठ प्रयुक्त नहीं होता। वट, पीपल, पलास, आम, छोंकर आदि ही उस प्रयोजन में काम आते हैं। नीम, बबूल आदि को प्रयुक्त नहीं किया जाता। गुड़ और घी मिलाकर उसकी गोलियां भी यजन कृत्य में काम आ सकती हैं। यह सस्ते उपचार हैं डडडडडडड साधारण को अभाव या आर्थिक कठिनाई के कारण डडडडडड न रोकना पड़े।

दैनिक पंच महायज्ञों में रसोई में बने पहले ग्रासों को चूल्हे के समीप ही हवन कर देने का सुगम प्रचलन था। पिछले दिनों भी प्रचलन रहा है। संभव है उसी अन्न यजन को अन्यत्र भी काम लेने के उद्देश्य से अन्न का यज्ञ करने की बात सोची गई हो। जो हो, इन दिनों जबकि खाद्य पदार्थों की सर्वत्र कमी है, हमें उस प्रचलन पर नये सिरे से विचार करना चाहिए और किसी यज्ञ में अन्न न जलाकर वनस्पतियों से ही वह प्रयोजन पूरा करना चाहिए।

जापान के गांधी कागाव ने कालेज की पढ़ाई समाप्त होते ही दीन दुखियों की सेवा के लिए अपना जीवन लगाने का निश्चय किया। वे दरिद्रों और दुर्व्यसनियों के मुहल्ले में झोंपड़ी डाल कर रहने लगे। गुजारे के लिए नगर में जाकर कुछ घंटे काम कर लेते थे। शेष सारे दिन उन पिछड़े लोगों की सेवा साधना में लगे रहते। उनकी महानता की चर्चा धीरे-धीरे दूर-दूर तक फैलने लगी।

एक सम्पन्न परिवार की सुशिक्षित लड़की को विवाह करना था वह विलास में नहीं सेवा साधना में निरत रहना चाहती थी साथी ऐसा मिले तो मिल जुलकर दूना काम बन पड़े। इस विचार से उसने खोज जारी रखी। चर्चा सुनकर कागाव के पास पहुँची। उनकी भावना, चरित्र, निष्ठा एवं सेवा साधना देखकर मंत्र मुग्ध रह गयी। लड़की ने विवाह प्रस्ताव किया तो उत्तर मिला कि वे गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ कैसे निभा पायेंगे। इसके लिए सेवा कार्य में कटौती करने का उनका तनिक भी मन नहीं था।

युवती ने वचन दिया कि वह उन पर भार न बनेगी। उन्हीं की तरह वह भी अपने लिए कुछ उपार्जन कर लिया करेगी। प्रजनन से दूर रहेगी मातृ सेवा के आनन्द में सहभागी बनने के लिए वह विवाह कर रही है। सहमति हो गई और दोनों उसी टूटे झोंपड़े में रह कर साथ-साथ सेवा साधना में निरत रहने लगे।

कागावा दम्पत्ति ने न केवल एक मुहल्ले को सुधारा वरन् उस समूचे देश से पतन, पिछड़ेपन और दुख दैन्य को मिटाने में जुट गये। उनका कार्य क्षेत्र विस्तृत होता चला गया। अनेकानेक साथी मिले, सम्पन्न ने साधन दिये अन्त में सरकार ने भी उन्हें यह विभाग सुपुर्द कर दिया। सरकारी तंत्र की सहायता से सुधार कार्य में आश्चर्यजनक प्रगति मिली। कागावा दम्पत्ति अब संसार में नहीं हैं पर समूचे जापान में उन्हें भारत के गाँधी की तरह मान दिया जाता है। उनके चित्र घर-घर में टंगे अभी भी देखे जा सकते हैं।


पंचमुखी सावित्री और ज्वालमाल महाकाली

इस संसार में पदार्थ भरा पड़ा है और उसके भीतर शक्ति का भण्डार भी। यदि पदार्थ सर्वथा निर्जीव रहा होता तो पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति, उर्वरता कहाँ से आती? उसमें भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट कैसे होते?

आकाश, ग्रह-नक्षत्र अधर में टँगे हुए हैं, धुरी तथा कक्षा में नियत गति से घूमते भी हैं, आपस में टकराते भी नहीं। जन्म, अभिवर्धन और परिवर्तन का क्रम सभी चर-अचरों पर लागू होता है। यदि उनमें यह विशेषता न रही होती, शक्ति तत्व का अभाव रहता तो उनमें कई प्रकार की हलचलें न होतीं। चट्टानें और पर्वत भी गिरते-उठते रहते हैं। मौसम बदलते हैं और दिन-रात के अनवरत चक्र चलते हैं। इससे स्पष्ट है कि यह विश्व-ब्रह्माण्ड शक्ति से अभिपूरित है। यहाँ कुछ भी निःसत्व या निर्जीव नहीं है।

दृश्य-अदृश्य जीव-जन्तुओं को तो पहले से ही प्राणधारी वर्ग में माना गया है। मनुष्य इन सब का मुकुटमणि है। इसमें सामान्य प्राणियों की तुलना में अधिक क्षमता है। अन्य प्राणी तो उतनी ही सामर्थ्य के अधिकारी हैं, जिसके सहारे उनकी जीवन यात्रा चलती रहे, वंश-वृद्धि होती रहे। आक्रमण और आत्मरक्षा जैसे प्रयोजनों में ही उनकी सहज बुद्धि काम करती है।

यह प्रकृति की क्रियाशक्ति है। भौतिक विज्ञान के अन्वेषण-आविष्कार इसी क्षेत्र में होते रहते हैं। प्रकृति के अनेकों चमत्कार जो दीख पड़ते हैं, वे सभी प्रकृति की इस क्रियाशक्ति की देन हैं। यह मनुष्य में भी है और उसके कायिक क्रिया-कलाप को इस आधार पर चलाती रहती है।

ब्रह्माण्डव्यापी एक चेतना शक्ति भी है जिसे परब्रह्म कहते हैं। चिन्तन और निर्धारण उसी का है। वही योजनाएँ बनाता है और व्यवस्थाएँ करता है। मनुष्य का मानस उसी की छत्रछाया में विकसित होता है। लोकाचार क्षेत्र को मन की उथली परत संभालती है, किन्तु अन्तःकरण की- अन्तरात्मा की- सुपरचेतना की गहन परतें इस दिव्य ब्रह्मचेतना की परिधि में ही आती हैं और वहीं से उसका सूत्र-संचालन होता रहता है। मस्तिष्क के मध्य भाग में अवस्थित सहस्रार कमल-ब्रह्मरंध्र, इसी चेतना के मनुष्य में अवतरित होने का केन्द्र बिन्दु है। ब्रह्मा-विष्णु इसी अमृत कलश में विराजते हैं और उन देवताओं के दर्शन-संपर्क इसी क्षेत्र में होते हैं, जिनकी उपस्थिति स्वर्गलोक में या उससे भी ऊँचे ब्रह्म लोक आदि में मानी गई है। ब्राह्मीशक्ति चिनगारी के रूप में हमारे मस्तिष्क मध्य में विद्यमान है। वहीं सूक्ष्म और कारण शरीरों के दो पात्र प्रतिष्ठित हैं। ब्राह्मी कामधेनु दुहने वाले की इच्छानुसार इन पात्रों में से एक को या दोनों को भरती रहती है। उसी अनुग्रह से जीव उच्चस्तरीय सशक्त भूमिकाएँ निभा सकने में समर्थ होता है। ईश्वर और जीव की मध्यवर्ती एकता-घनिष्ठता इसी चेतना गहर में होती है। विश्व-ब्रह्माण्ड के लोक-लोकान्तरों तक अथवा अदृश्य देवशक्तियों के साथ संपर्क साधने, उन्हें अनुकूल बनाने में इसी क्षेत्र को विकसित, परिष्कृत एवं प्रशिक्षित करना पड़ता है। इस समूची विद्या को एक शब्द में ‘आत्मिकी” कह सकते हैं। देवताओं के क्रीडा-कल्लोल का यही क्षेत्र है। विष्णु उसी क्षीर सागर में शयन करते हैं। शिव की समाधि वाला कैलाश यही है। जीवात्मा का उत्थान-पतन इसी क्षेत्र में निर्धारित होता रहता है।

व्यक्ति सत्ता दो भागों में विभाजित है- स्थूल दूसरी सूक्ष्म। स्थूल दृश्यमान काया को कहते हैं और सूक्ष्म अदृश्य प्राण सम्पदा को। शरीर रसायनों का बना है। उसकी संरचना में विशुद्ध रूप से भौतिक घटकों का समावेश हुआ है। उसमें काम करने वाली क्रिया शक्ति को प्रकारान्तर से जैव ऊर्जा कहते हैं। उसे ओजस्-तेजस्-वर्चस् के रूप में आँका और नापा भी जा सकता है। शरीर के इर्द-गिर्द कुहरे जैसा छाया रहने वाला तेजोवलय इसी का प्रतिबिम्ब है।

जिस प्रकार ब्राह्मी चेतना, अमृत कुण्ड, ब्रह्मरंध्र मस्तिष्क मध्य में है, उसी प्रकार प्रकृतिगत क्रियाशक्ति प्राण ऊर्जा का भाण्डागार मूलाधार चक्र में है। मूलाधार चक्र जननेन्द्रिय मूल में कुछ ऊपर उठकर नाभिचक्र के पीछे भीतरी मध्य भाग में है, समझा जा सकता है कि मेरुदण्ड का अन्त जहाँ हुआ है, वह विचित्र गुच्छक मूलाधार चक्र है। शक्ति का निवास इसी उद्गम में है। वह समस्त शरीर में फैलती है, विभिन्न अवयवों का सूत्र संचालन करती है। मनःक्षेत्र में उल्लास और साहस उसी की देन है। इस प्रकार वह न्यूनाधिक मात्रा में छायी तो समस्त शरीर पर रहती है- और शरीर संबंधी विभिन्न क्रियाकलापों को भी संभालती है। उसका अति प्रत्यक्ष कार्य यौनाचार है। इसी क्षेत्र में कामोत्तेजना उत्पन्न होती है। मस्तिष्क उसकी तृप्ति के साधन ढूँढ़ता है। उपलब्ध न होने तक बेचैन रहता और स्खलन के उपरान्त कुछ काल के लिए शान्त हो जाता है; किन्तु बाद में फिर उत्तेजना उभर आती है और कामुक कल्पनाओं में भटकने लगती है। शाँति के लिए बार-बार पुनरावृत्ति करनी पड़ती है। वंश-वृद्धि इसी प्रकार होती है। नर-नारी प्रकृति के इसी प्रयोजन की पूर्ति में मरते-खपते रहते हैं। हँसने और रोने का जैसा मिश्रित संयोग इस प्रजनन कृत्य के साथ जुड़ा है। उसे देखते हुए विधाता की उलटबाँसी पर हँसे बिना नहीं रहा जाता।

प्रजनन प्रकरण को छोड़ कर इस प्राण ऊर्जा के उच्चस्तरीय प्रयोजनों की चर्चा यहाँ की जा रही है, यदि वह न्यून मात्रा में हो, तो मनुष्य डरपोक, आलसी, उदास और नपुँसक प्रकृति का होने लगता है युवावस्था में भी उसे आन्तरिक बुढ़ापा घेर लेता है, किन्तु यदि उसका अनुपात सामान्य हो, तो उसे एक समर्थ व्यक्ति की भूमिका निभाते हुए देखा जा सकता है।

मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा का मिलन-संपर्क मस्तिष्कीय ऊर्जा के साथ होता है। इसके आवागमन का मार्ग मेरुदण्ड है। मेरुदण्ड को मस्तिष्क का पुच्छ भाग ही कहना चाहिए। शरीर में फैले ज्ञानतंतु इसी के माध्यम से निस्सृत होते हैं। उन्हें संदेश और संकेत तो मनःक्षेत्र से मिलते हैं, किन्तु कार्य कर सकने की क्षमता कुण्डलिनी के विद्युत भंडार से उपलब्ध होती है। उसकी भूमिका जनरेटर या बैटरी स्टोर डायनेमो जैसी होती है। कभी-कभी वहाँ से चुम्बकीय क्रियाकलाप भी होते हैं। ए. सी. और डी. सी. करेंट की तरह खींचने और फेंकने की क्रियाएँ भी आवश्यकतानुसार उत्पन्न होती हैं। यह ज्वार-भाटे शरीर और मनःक्षेत्र में आगे बढ़ने और पीछे हटने के संकेत देते हैं। मैत्री और विग्रह-प्रेम और घृणा-सहयोग और आक्रमण इसी क्षेत्र के उतार-चढ़ावों के खेल हैं।

काय-कलेवर के इस लम्बे और भारी ढकोसले में संचालक सूत्र दो ही हैं। मस्तिष्क का अमृत कुण्ड जो भावना, कामना, आस्था, प्रज्ञा, श्रद्धा, निष्ठा आदि का उद्गम है। इस प्राण ऊर्जा का संवाहक कुण्डलिनी चक्र जो मूलाधार में अवस्थित रहकर मौलिक स्तर की ऊर्जा काया में तथा उसके संपर्क क्षेत्र में बखेरता रहता है।

आत्म विज्ञान में उपरोक्त दोनों ही विशिष्ट केन्द्रों के बारे में बहुत कुछ कहा और समझाया गया है; किन्तु पुरातन कथन शैली ऐसी है, जिसमें अलंकारिक कवित्व का अत्यधिक समावेश हुआ है। संभव है सोचने वालों ने सोचा हो कि आत्म विज्ञान के ज्ञाताओं को रहस्यवाद के आधार पर तथ्यों तक पहुँचने की मानसिक विशेषता भी होनी चाहिए। इसे कला-कौतूहल का सम्मिश्रण भी कह सकते हैं। जब शास्त्र और दर्शन जैसे विचार विज्ञान से संबंधित विषयों को छन्दबद्ध अलंकारिक रूप से लिखा गया है; तो आत्म विज्ञान को उस कला-सौंदर्य से वंचित क्यों रखा जाता। देव कुण्ड-अमृत सरोवर, मस्तिष्क और शक्ति कुण्ड - प्राणऊर्जा भण्डार कुण्डलिनी क्षेत्र की विवेचना में उसी क्रम का समावेश क्यों न किया जाता? किया भी गया है। हुआ भी है।

विज्ञान नर की अभिरुचि का विषय है और कला नारी का। चूँकि आत्म विज्ञानियों में से अधिकाँश नर रहे हैं। जिससे उनके लिए आप्त पुरुषों ने यही उचित समझा कि उस कथन को नारी अलंकार के साथ जोड़कर अधिक आकर्षक बनाया जाय। शक्ति शब्द ऐसे भी स्त्रीलिंग है। इसलिए उसकी विवेचना में अलंकार और लिंग नारी वर्ग के किये गये हैं, तो उसमें कुछ विसंगति नहीं समझी जानी चाहिए।

जहाँ नारी वर्ग की साधना का विषय है, वहाँ पुरुष वाचक प्रतिष्ठापना भी हुई है। पर उनका अनुपात अपेक्षाकृत कम ही है। नारियाँ अपने सामान्य जीवन क्रम में उस मार्ग पर अधिक दूर तक चल भी नहीं पातीं। गृह-व्यवस्था का संचालन ही उनके लिए एक पूरा तपोवन बन जाता है। फिर भी उनके लिए निषेध या प्रतिबंध नहीं है। अरुन्धती, अनुसुइया, सुकन्या, घोषा, अपाला, इला आदि की तरह उनके लिए भी ब्रह्मवादिनी स्तर का पुरुषार्थ करने की छूट है। मैडम क्यूरी की तरह नारी आत्म विज्ञान में भी अपने चरण बढ़ा सकती है।

प्रसंग यहाँ बहुलता वाले नरपक्ष का चल रहा है। उसके लिए उपरोक्त दोनों शक्तियों के साथ संबंध स्थापित करने के लिए शक्तियों के नारी रूपों की प्रतिष्ठापना की गई है।

मस्तिष्क क्षेत्र के देवता माने गये हैं- ब्रह्मा। ब्रह्मा की पौराणिक मतानुसार दो पत्नियाँ हैं। एक गायत्री, दूसरी सावित्री। गायत्री को ब्राह्मी, सरस्वती एवं प्रज्ञा भी कहते हैं। सात्विक प्रयोजनों के लिए आत्मोत्कर्ष, ऊर्ध्वगमन एवं मोक्ष, आत्म साक्षात्कार ब्रह्मनिर्वाण आदि के लिए गायत्री की उपासना की जाती है। सावित्री पाँच मुखी है। पाँच तत्व, पाँच प्राण का प्रतीक मानकर उसे सावित्री कहा गया है। वह पंचमुखी दशभुजी है। दशभुजी का अर्थ है दश इन्द्रियों की बलिष्ठता का केन्द्रीकरण। पाँच मुखों का तात्पर्य है- अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्द मय कोश। कोष कहते हैं खजाने को। बहुमूल्य मणिमुक्तकों का- ऋद्धि-सिद्धियों का खजाना। इनके सहारे शाप-वरदान देने की क्षमता प्राप्त होती है। यह दोनों ही भौतिक प्रयोजन हैं। इसलिए गायत्री को आत्मिकी और सावित्री को भौतिकी कहा गया है।

ऊर्जा पक्ष के अधिष्ठाता शिव माने गये हैं। उनका त्रिशूल ताप, शब्द और प्रकाश तरंगों के लहलहाते ऊर्जा भण्डार का प्रतीक है। शिव की दो पत्नियाँ हैं- एक पार्वती दूसरी महाकाली। महाकाली को दुर्गा, चण्डी, भवानी रौद्री आदि नामों से भी पुकारते हैं। यही कुण्डलिनी भी है।

पार्वती सौम्य हैं। उनके गणेश और कार्तिकेय दो पुत्र भी हैं। स्वयं कठोर तप करके उनने शिव को वरण किया था। किन्तु चण्डी ऐसे ही शिव के गले बँध गई। उसे प्रजा पति ने देवताओं की शक्ति एकत्रित करके सृजा था और दैत्यों का दलन संभव कराया था। इसके उपरान्त जब से अपनी दसों दिशाओं में ज्वाला बनकर विचरण करने लगी तो नियमन के लिए उन्हें शिव के गले बाँध दिया गया। वहाँ भी वे पार्वती की भाँति शिव के चरणों में नहीं गईं। नन्दी पर नहीं बैठीं। उनने अपना वाहन सिंह रखा और शिव को नीचे पटक कर उनकी छाती पर चढ़कर कल्लोल करने लगी हैं। यही है महाकाली-महाचण्डी कुण्डलिनी, जिसका कार्य दमन है। वाममार्ग में इसी का प्रयोग होता है।


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हमारी वसीयत और विरासत प्रकाशित

बहु प्रतीक्षित ग्रन्थ जो कि पूज्य गुरुदेव की लेखनी से आत्म कथा के रूप में सृजा गया है, प्रकाशित हो चुका है। प्रस्तुत पुस्तक में उनके असामान्य जीवन क्रम के उन प्रसंगों की चर्चा है जिनके कारण आज इतने वृहत प्रज्ञा परिवार के प्रमुख सिद्ध सन्त, एक मनीषी के रूप में वे प्रतिष्ठित हैं। उनकी सावित्री साधना एवं भावी जीवन जीवन क्रम संबंधी रहस्योद्घाटन भी प्रस्तुत आत्म कथा में है। अपने ढंग की अद्भुत इस पुस्तक में सभी पाठकों के लिए आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने योग्य समुचित मार्ग दर्शन है। पुस्तक गायत्री तपोभूमि मथुरा से उपलब्ध है। मूल्य है रु. 6.50 डाक खर्च अतिरिक्त।


ऋषि ऋण - विद्याऋण भी चुकायें

भारतीय धर्म के अनुसार मनुष्य के कंधे पर तीन ऋण लदे होते हैं और उन्हें जीवन अवधि में ही चुकाने का प्रयत्न करना चाहिए। जीवन अवधि लम्बी भी हो सकती है और कम भी। बचपन में तो व्यक्ति की समझ और क्षमता अविकसित होती है इसलिए उन दिनों तो तत्व ज्ञान समझने और धर्म धारणा से संबंधित काम करने का अवसर नहीं होता, पर किशोरावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक की अवधि ऐसी होती है जिसमें जीवन चर्या से संबंधित अन्य कामों की तरह इन धर्म ऋणों को चुकाते रहने का हर कोई कुछ न कुछ न कुछ प्रयत्न करता रह सकता है।

पितृ ऋण, विद्या ऋण और देव ऋण यह तीन धार्मिक ऋण अनायास ही हर किसी मनुष्य शरीरधारी पर लदते हैं। जिस प्रकार किसी से पैसा उधार लेने पर उसे चुकाने की भी जिम्मेदारी होती है। वही इन तीन धर्म ऋणों के संबंध में भी है। पैसे का ऋण लेकर कोई उसे चुकाये नहीं। वापस करने से इनकार करे तो उसमें उसकी बदनामी होती है और बेईमानी गिनी जाती है। धर्म ऋणों के संबंध में परोक्ष होने के कारण उतना ध्यान नहीं दिया जाता पर कर्त्तव्य की माँग यही है कि संसार से विदा होने के पूर्व अपनी ऋण मुक्ति की जिम्मेदारी को पूरा कर लेना चाहिए। जब से मनुष्य होश संभालने और कुछ पुरुषार्थ करने की स्थिति में हो उसी समय से इस संबंध में विचार और प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए।

पितृ ऋण यह है कि माता पिता और परिजन जीवन रक्षा और विकास में कई प्रकार के योगदान देते हैं। उसका बदला उन्हें मिलना चाहिए। कृतघ्नता को सबसे बड़ा पाप माना गया है। जिनसे अपने को मनुष्य जन्म मिला और विकसित करने का अवसर मिला है उनके प्रति कृतज्ञता का भाव सदा रखना चाहिए।

बड़ों को नित्य अभिवादन, स्वर्गीयों को जल तर्पण तो बिना किसी अतिरिक्त भार को उठाये सहज ही हो सकते हैं। सूर्य की अर्घ्यदान या तुलसी के पौधे में जल डालना भी तर्पण का ही छोटा रूप है। इस अभिसिंचन की श्रद्धाँजलि से हमारा कृतज्ञता भावना जीवित रहती है।

तर्पण के साथ श्राद्ध का भी विधान है। श्रद्धा के अभिवर्धन का प्रतीक स्वरूप श्राद्ध कहलाता है। पूर्वजों के नाम पर वृक्षारोपण करने की विधा सरल भी है और उपयोगी भी। जिनके पास अपनी निजी जमीन न हो वे दूसरों की या सरकारी जमीन में उपयोगी वृक्ष लगाने तथा उन्हें पाल पोस कर बड़ा करने का दायित्व अपने कंधों पर ले सकता है। जलाशयों को गहरा और साफ रखना, कच्चे रास्तों का श्रमदान से सुधार भी श्राद्ध वर्ग के लोकोपयोगी कार्यों में सम्मिलित हो सकता है। इन दिनों प्रीतिभोजों, कर्मकाण्डी या निठल्लों को भोजन करा देने के रूप में चिन्ह पूजा होती है। उसके पीछे सार्थकता का कोई समावेश प्रतीत नहीं होता।

दूसरा ऋण गुरु ऋण है जिसे इन दिनों विद्या ऋण कहना उपयुक्त होगा, क्योंकि देश में 70 प्रतिशत अशिक्षित हैं। उनका विद्या तो दूर शिक्षा तक से संबंध नहीं बना ऐसी दशा में गुरु शब्द का उपयोग व्यर्थ है। जो शिक्षित नहीं हो सका, जिसकी विवेकशीलता नहीं जगी उसे तो बिना गुरु का निगुरु ही रहना चाहिए। फिर भी जो ज्ञान किन्हीं विज्ञजनों के कथन परामर्श से मिला है, उसे विद्या ऋण कहा जा सकता है।

इस ऋण को चुकाने के लिए शिक्षितों का तो यह अनिवार्य कर्त्तव्य बनता है कि निरक्षरों को साक्षर बनावें अथवा उन्हें जीवनोपयोगी सद्ज्ञान को सत्संग के रूप में सुनाते रहें। विद्या ऋण को स्वाध्याय के रूप में भी आँशिक रूप से चुकाया जा सकता है क्योंकि जिन मनीषियों ने युग धर्म का प्रतिपादन किया है उसे यदि स्वाध्याय नहीं किया जायगा तो उनका श्रम एक प्रकार से निरर्थक चला जायगा। विद्या ऋण से उऋण होने में स्वाध्याय सत्संग की दैनिक आवश्यकता है। श्रेष्ठ विचारों की श्रवण व्यवस्था कोई भी शिक्षित कर सकता है इसलिए सत्संग कार्य हर शिक्षित सत्परामर्श देने वाले अभिलेखों को सुनते रह कर सत्संगी कहला सकता है।

इन दिनों शिक्षा संवर्धन की महती आवश्यकता है। गरीबी, बीमारी, बेकारी पिछड़ापन आदि अनेकों विपन्नतायें मनुष्य को इसलिए त्रास देती रहती हैं कि वह उस मार्ग से परिचित नहीं है कि पिछड़ेपन से पीछा छुड़ाने के लिए क्या करना चाहिए। किनने कहाँ क्या किया और दुर्गति से पीछा छुड़ाकर कैसे प्रगतिशील बने हैं, यह प्रयोजन शिक्षा के बिना किसी प्रकार पूरा नहीं हो सकता। विद्यालय और पुस्तकालय दोनों मिलकर उस आवश्यकता की पूर्ति करते हैं जिसमें अक्षर ज्ञान ही नहीं विचारशील बुद्धिमान बनने की भी आवश्यकता पूरी करनी पड़ती है।

स्कूलों में 30 प्रतिशत छात्र पढ़ते हैं। 70 प्रतिशत प्रौढ़ों को अक्षर ज्ञान तक से परिचय नहीं है। वह स्थिति गरीबी से भी गई गुजरी है। इतने बड़े अभाव की पूर्ति की आशा मात्र सरकार से नहीं की जा सकती है। वह स्कूली बच्चों को उचित पढ़ाई पढ़ा ले तो भी ठीक है। अन्यथा प्रौढ़ निरक्षरों को वह पढ़ाने का प्रबंध कर सकेगी यह आशा नहीं की जा सकती। इस निमित्त प्रत्येक शिक्षित को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वह पाँच-पाँच निरक्षरों को साक्षर बनावेगा। जो साक्षर हैं उन्हें उस ज्ञान से परिचित करावेगा जो प्रगतिशील जीवन जीने के लिए आवश्यक है।

विद्यादान को सबसे बड़ा दान माना गया है क्योंकि उसके प्रतिफल रूप में अगले जन्म में निश्चित रूप से मनुष्य ही होना पड़ता है क्योंकि विद्या किसी और जन्म में नहीं मिल सकती। पुण्य पापों के फल तो अन्यान्यों में भी मिल सकते हैं पर विद्या का प्रतिफल प्राप्त करने के लिए तो मनुष्य बनना ही आवश्यक है। अन्य सम्पदाओं की तुलना भी विद्या धन के बराबर नहीं हो सकती।

इसलिए अपने देश की महती आवश्यकता को देखते हुए समय की माँग पूरी करने के लिए हर शिक्षित को चाहिए कि उन्हें पास पढ़ने वाले विद्यार्थियों को ही नहीं, जो शिक्षा का महत्व तक समझते नहीं उनके घरों पर जाकर भी पढ़ाने का प्रबन्ध करना चाहिए।

ढलती आयु में वानप्रस्थ ग्रहण करने की परम्परा है। वह पूरी तरह निभायें तो हर शिक्षित को आधी आयु बीत जाने के उपरान्त भोजन, भजन, स्नान की तरह ही विद्या दान का व्रत धारण करना चाहिए। पुरुषों को रात्रि का, महिलाओं को अपराह्न का और बच्चों को स्कूली समय से पहले या बाद का समय ऐसा बचता है जिसमें उन्हें घर बुलाकर या उनके घर जाकर पढ़ाया जा सकता है। इसे भी एक प्रकार का वानप्रस्थ धर्म का निर्वाह ही कहा जा सकता है।

अध्यापन एक श्रेष्ठ मनोरंजन भी है। इससे बढ़कर सम्मानास्पद कार्य दूसरा नहीं हो सकता। पढ़ने वाले ही नहीं उनके अभिभावक भी उपकार मानते हैं। अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने पर उन्हें पढ़ाने वाले सरकारी अध्यापकों को भी श्रेय मिलता है।


Quotation

नई वस्तु ही प्रिय लगती है। पुरानी के प्रति अरुचि होने लगती है। इसका सीधा अर्थ है कि आज की नई वस्तु भी कल पुरानी और अरुचिकर लगने लगेगी।

विद्यादान, अक्षरज्ञान के साथ ही समाप्त नहीं होता वरन् सच माना जाय तो उसके उपरान्त आरंभ होता है। व्यक्तित्व को, परिवार को, समाज को ऊँचा उठाने वाली जानकारियां न तो इन शिक्षितों को है और न अशिक्षितों को। दोनों ही वर्ग गई गुजरी जिन्दगी जीते हैं। गरीबी में भी अमीरी से अधिक सम्मान, संतोष और उत्साह भरने वाला ज्ञान वह है जो युग मनीषियों ने समय की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए उनके समाधान हेतु लिखा है। ऐसा साहित्य यों नहीं के बराबर है तो भी उसका सर्वथा अभाव नहीं है। उसका संग्रह करके प्रज्ञा पुस्तकालय चलाया जाना चाहिए और जिस प्रकार दुलार-पूर्वक, फुसलाकर साक्षरता संवर्धन के लिए अशिक्षितों के पढ़ने के लिए तैयार किया गया था, उसी प्रकार युग साहित्य पढ़ाने और वापस लेने का कार्य चल पुस्तकालयों द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए। निरक्षरों के लिए विद्यालय का और साक्षरों के लिए चल पुस्तकालय का प्रबंध करना चाहिए। दोनों का सम्मिश्रण ही शिक्षा और विद्या की आवश्यकता पूरी करता है। प्रत्येक उदार चेता को इस प्रकार विद्या ऋण चुकाना ही चाहिए।

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अपनों से अपनी बात

सतयुग की वापसी की दिशा में बढ़ते चरण

इस वर्ष का प्रज्ञा महा अभियान अपनी गति इस तेजी से पकड़ रहा है जिसे अनुपम एवं आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है। साधारणतया मनुष्य पेट प्रजनन की परिधि में ही अपनी समग्र क्षमता नियोजित किये रहता है। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति से बढ़कर और कुछ उसे दिखता ही नहीं। स्वार्थ पूर्ति में वह इतना निमग्न रहता है कि परमार्थ के लिए कुछ करना है, यह सोचना तक भारी पड़ता है। आम आदमी का विश्लेषण यही है। वह लोक परलोक की चर्चा में तो कौतूहल की तरह रस लेता है पर यह भूल ही जाता है कि जीवन के ये शाश्वत सत्य हैं। इन गुत्थियों को सुलझाए बिना व्यक्ति इतने प्रकार की उलझनों में उलझा रह जाता है कि पग-पग पर कसक सहनी पड़ती है। न आगे बढ़ते बन पड़ता है, न पीछे हटना।

इन विकट परिस्थितियों में इसे आश्चर्य ही कहना चाहिए कि नव-निर्माण के लिए सृजन शिल्पियों की आशातीत संख्या कार्य क्षेत्र में उतर रही है। जितनी आशा थी उससे कहीं अधिक पराक्रम दृष्टिगोचर हो रहा है।

इतिहास की घटनाओं में बुद्ध के भिक्षु, ईसा के पादरी, गान्धी के सत्याग्रही, राम के रीछ बानर, गोवर्धन उठाने वाले ग्वाल बालों की ऐसी संख्या हो गई थी जिसमें प्राणों को हथेली पर रखकर समय की समस्याओं को सुलझाने की चेष्टा की गयी थी। ऊपरी मन से नहीं, सच्चे मन से। इतने सच्चे मन से कि अपने को उन्होंने उद्देश्य के साथ तन्मय करके खपा ही दिया था।

मध्यकाल में सामूहिक स्तर पर विशाल कार्य तो परिस्थिति वश नहीं हो सके थे। पर सन्तों ने अपनी-अपनी छोटी बड़ी मंडलियाँ बनाकर देश के कोने-कोने में जन जागृति का शंख फूँका था और युग धर्म की माँग पूरी करने के लिए इतना प्रयत्न किया था कि कायरों में भी शूरता फूटने-फटने लगी थी। संतों की मंडलियाँ अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करती थीं और जितनी परिधि में प्राण फूँकने का संकल्प लिया था उसे पूरा करके दिखाती थीं। उस पुरातन काल के इतिहास को हम इन दिनों भी यथावत चरितार्थ होता देखते हैं तो प्रतीत होता है कि सत्प्रयोजनों का युग अपनी पुनरावृत्ति का नया उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।

औसत आदमी पशु होता है। उसे शरीर निर्वाह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। पराक्रम की बात सूझती भी है तो पैशाचिकता ध्यान में आती है। वह शोषण, आक्रमण, हत्या, अपराध स्तर के जघन्य कृत्यों में अपने बड़प्पन की, गर्व की पूर्ति करता है। अधिकाँश मनुष्य, जीवधारी, पशु और पिशाच स्तर का ही जीवन-यापन करते हैं। उनकी उद्दंडता की दूसरे दुर्बल मनोवृत्ति के लोग भी नकल करते हैं, पर ऐसे लोग यदा-कदा ही दृष्टिगोचर होते हैं, जो लक्ष्य के प्रति जागरुक रहते हैं और उसकी पूर्ति के लिए बढ़ चढ़कर त्याग बलिदान भी करते हैं। इन आदर्शवादियों को ही देव मानव कहते हैं। वे अपने पूर्व जन्मों की सुसंस्कारिता इतनी मात्रा में धारण किये रहते हैं कि समय की कठिनाइयाँ उन्हें विचलित नहीं कर पातीं, न दूसरों की देखा देखी ऐसा कुछ करते हैं जिससे मानवी गरिमा को सकुचाना- हेय बनना पड़े।

देखा गया है कि धरती पर नर पशु ही विचरते हैं और मरघटों में प्रेत पिशाच जलते-जलाते हैं। किन्तु मानवी काया में जिनने अन्तरात्मा भी उसी स्तर की जीवन्त जागृत रखी है, उनकी गणना उंगलियों पर करनी पड़ती है, पर उसे अपनी धरती का, अपने युग का आश्चर्य ही कहना चाहिए कि देव मानवों की असाधारण सृष्टि हुई है। उसे देवलोक का पृथ्वी वालों के लिए भेजा गया अनुपम वरदान-अनुदान ही कहना चाहिए। जो चिन्तन की दृष्टि से, उत्कृष्ट चरित्र की दृष्टि से, आदर्श और व्यवहार की दृष्टि से अनुकरणीय-अभिनन्दनीय कहे जा सकें, उन्हें महामानव ही कहा जा सकता है। जिस युग में देव मानवों का बाहुल्य होता है उसे सराहा जाता और सतयुग कहा जाता है। प्रज्ञा अभियान की बढ़ती, उफनती, उछलती गतिविधियों को देखकर यदि उसका मूल्याँकन सतयुग की वापसी के रूप में किया जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। हम प्रमाणों सहित इस तथ्य और सत्य का दर्शन इन्हीं आँखों से प्रत्यक्ष कर रहें हैं। इसे देव दर्शन या दिव्य दर्शन का सुयोग ही माना जा सकता है।

एक-एक लाख चरणों के पाँच संकल्प किये गये थे। सोचा गया था कि इस घोर स्वार्थपरता के युग में इतना भी बन पड़ेगा या नहीं। अब देखते हैं कि संभावित आशा से वे कहीं अधिक आगे बढ़ रही हैं और प्रार्थना के बदले में फूलों की मुट्ठियां ही नहीं, मणि-माणिकों की टोकरियाँ दिव्य लोक से बरस रहीं हैं। मनोरथ जो छोटा था वह मत्स्यावतार की तरह बढ़ता और सुविस्तृत होता चला जा रहा है। घटनाक्रम इसका साक्षी है कि कठिन दिखने वाला कार्य सरल हो सकता है? असंभव की परिणति संभव में कैसे हो रही है?

नालन्दा विश्व विद्यालय को खण्डहर बने शताब्दियाँ बीत गयीं। लोग उन खण्डहरों को देखने तो पहुँचते थे पर कोई यह आशा नहीं करता था कि इसका पुनर्जीवन भी संभव है। एक लाख छात्रों को जुटाना और शिक्षण का, निर्माण का, निर्वाह का त्रिविधि उपक्रम किसी एक तंत्र का बन सकेगा, इसकी कल्पना तक वर्तमान परिस्थितियों में नहीं की जा सकती थी। कालेजों, विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने वाले छात्रों को बोर्डिंग फीस, शिक्षण फीस आदि के नाम पर कितना देना पड़ता है इसे वे भुक्तभोगी जानते हैं, जिन्होंने एक दो छात्रों को उच्च शिक्षा दिलाकर अपना घर खाली कर लिया है। किन्तु इस असंभव को संभव हुआ ही समझा जाना चाहिए कि प्रज्ञा प्रशिक्षण की लहर तूफानी गति से बढ़ी। शांतिकुंज में जितना स्थान है वह तो ठसाठस भरा ही रहता है। इसके अतिरिक्त इन शिक्षार्थियों ने अपने-अपने यहाँ स्थानीय छोटे विद्यालय भी आरंभ कर दिये हैं। केन्द्र की और शाखाओं की सम्मिलित शिक्षण प्रक्रिया संख्या की दृष्टि से इतनी उत्साहवर्धक है जिसकी संकल्प करते समय आशा भी नहीं की गई थी। शिक्षार्थियों या छात्र युग शिल्पियों की संख्या इन दिनों एक हजार मासिक से कम नहीं, अधिक ही चल पड़ी है। आशा की गई है कि यह क्रम घटने वाला नहीं है, बढ़ता ही रहेगा।

एक लाख अग्रगामी युगशिल्पी कार्यक्षेत्र में उतरने की बात सोची गई थी। केन्द्र और शाखाओं की सम्मिलित संख्या उस लक्ष्य को पूरा करके रहेगी, यह निश्चित है। युग संधि के अभी 14 वर्ष शेष हैं। उतने दिन तक इसकी पूर्ति के लिए प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी। अवधि से पूर्व ही प्रगति के चरण कहीं अधिक आगे बढ़ चलेंगे।

संगठन का एक नया स्वरूप विनिर्मित हुआ है। एक मंडल के जिम्मे दस गाँव अथवा दस मुहल्ले सौंपे गये हैं। यह तीन मील के चतुर्दिक् घेरे में तो हो ही सकते हैं। कहीं-कहीं तीन मील से ज्यादा-कम भी यह क्षेत्र आबंटित हो सकते हैं। इस संदर्भ में नया नारा है- “दस गाँव का एक जिम्मेदार, दस विषयों का एक राजकुमार, दस कार्यक्रमों का एक सूत्रधार”। इसका तात्पर्य यह है कि दस-दस गाँव पीछे एक प्रशिक्षित व्यक्ति कायम हो। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ सके तो दसों गाँवों में एक-एक स्वतंत्र मंडल हो। फिर हर बड़े आयोजन में हर व्यापक विधि व्यवस्था में दसों गाँव में मिलजुल कर कार्य करें। वैसे प्रशिक्षित मंडली हर गाँव में रहे, जो अपने विविध कार्यक्रमों का संचालन भली प्रकार करती रहे। एक व्यक्ति से तात्पर्य यहाँ एक मंडल से है। एक गाँव के पीछे एक मंडल हो, यही तात्पर्य समझना चाहिए। मंडल को ही वैयक्तिक इकाई मानकर चला जायगा।

वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों की संख्या एक लाख मानी गई है। इन सबको अभिनव सूत्र संचालन की शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक-एक महीने के लिए शांतिकुंज अभिनव प्रज्ञा प्रशिक्षण में बुलाया गया है। इनकी परीक्षाएँ भी होंगी और उत्तीर्ण होने के प्रमाण-पत्र भी मिलेंगे। यहाँ से जाते ही उन्हें यह काम करना होगा कि अपने यहां के सहयोगियों को लेकर एक छोटा स्थानीय विद्यालय चलायें और यथा संभव वह सब कुछ पढ़ायें, जो उनमें एक महीने शान्तिकुँज रहकर सीखा है। पूरा समय लगाकर जो एक महीने में सीखा गया है वह कम समय नित्य लगाने पर संभवतः उसका जल्दी न सीखा जा सके। ऐसी दशा में स्थानीय विद्यालयों के लिए यह भी हो सकता है कि वे नित्य दो-दो, तीन-तीन घण्टे पढ़ें और पूरी पढ़ाई एक महीने के स्थान पर दो या तीन महीने में पूरी कर लें। परीक्षाएँ इनकी भी होंगी और स्थानीय विद्यालय में पढ़ने वालों को भी शान्तिकुँज से प्रमाण-पत्र भेजे जायेंगे।

इस क्रम में आशा की गई है कि वर्तमान वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र देश के एक-एक गाँव एक-एक नगले को अपना कार्यक्षेत्र बना लेंगे और नव निर्माण के लिए जो कार्यपद्धति विधि व्यवस्था निर्धारित की गई है, उसे पूरा करेंगे।

नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति की परिधि में शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, शैक्षणिक, धार्मिक, राजनैतिक तभी दिशा-धाराएँ आ जाती हैं। तात्पर्य यह है कि जन साधारण को जो सिखाया जाना चाहिए, स्वभाव में सम्मिलित किया जाना चाहिए, वह सभी कुछ इस प्रज्ञा प्रशिक्षण के अंतर्गत होगा, जिसे एक लाख अध्यापकों द्वारा हर गाँव, नगले, झोपड़ों तक पहुँचाया जाना है। यह विचार क्रान्ति अभियान है। इसमें लोक शिक्षण का कोई भी पक्ष अछूता नहीं छोड़ा गया है जो समग्र प्रगति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

कुछ कार्य ऐसे हैं, जिन्हें वरिष्ठ कनिष्ठ सभी स्तर के कार्यकर्ता अपने-अपने निवास स्थानों में रहते हुए करते रह सकते हैं। जैसे- 1. झोला पुस्तकालय 2. जन्म दिवसोत्सव 3. दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन 4. स्थानीय प्रज्ञा प्रशिक्षण विद्यालय का धीमी या तीव्र गति से संचालन। यह चारों कार्य अपने घरेलू काम काज करते हुए भी थोड़ा-थोड़ा समय निकालते हुए आसानी से किये जा सकते हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि कोई प्रतिभाशाली कार्यकर्ता उस क्षेत्र में हो, साथ ही मिशन से सम्बद्ध भी रहा हो तो उसे एक महीने के लिए प्रज्ञा प्रशिक्षण के लिए हरिद्वार भेजा जाय। स्मरण रहे जिनकी ट्रेनिंग एक महीने के लिए हरिद्वार हो जाती है, वे अष्ट धातु के बन कर लौटते हैं और अपने क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक की प्रगति ज्वाला जलाते हैं।

साइकिलों पर, समीपवर्ती क्षेत्रों की प्रचार यात्रा- अशोक वाटिकाओं की स्थापनाओं से लेकर घरेलू शाक वाटिका, मसाला-औषधि वाटिका तक का वृक्षारोपण यह कार्य ऐसे हैं, जिन्हें भी थोड़ा ध्यान देने से सहज ही किया जा सकता है। यह सब प्रवृत्तियाँ एक साथ चल पड़े तो समग्र परिवर्तन के लिए आवश्यक अन्य कार्य भी अनायास ही चल सकते हैं।

अपने देश में सामाजिक क्रान्ति की अत्यधिक आवश्यकता है। जाति पाँति के आधार पर, ऊँच-नीच, सम्प्रदायवाद, भाषावाद, खर्चीली शादियों, पर्दा प्रथा, भिक्षा व्यवसाय, बहु संतति, बाल-विवाह जैसे प्रचलनों के विरुद्ध तीव्रगति से आन्दोलन खड़ा किया जाना है। इसके लिए अनेकों कार्य ऐसे भी करने पड़ सकते हैं जिनमें बड़े स्तर पर आयोजन करने पड़ें और पैसे की जरूरत आ पड़े।

प्रज्ञा मिशन का आरंभ से ही यह नियम रहा है कि उसके मान्य सदस्य वे ही गिने जायेंगे जो नियमित रूप से समयदान और अंशदान देते हैं। चलती गाड़ी के इन्हें दो पहिए समझा जा सकता है, जिसके सहारे प्रगति रथ आगे बढ़ता है।

यह नितान्त आवश्यक है कि एक मण्डल के लोग अनिवार्य रूप से एक स्थान पर हर वर्ष मिल लिया करें। उसमें हरिद्वार की जीप टोली पहुँचा करेगी। इसमें पाँच गायक-वक्ता, लाउडस्पीकर, सुसज्जित यज्ञशाला, संगीत उपकरण, टेपरिकार्डर आदि सभी साधन रहते हैं ताकि आयोजन के लिए साधन सामग्री के निमित्त भागदौड़ न करनी पड़े। बिजली न होने की स्थित में साथ भेजी जा रही बैटरी यह प्रयोजन पूरा कर देती है। सभी मण्डलों में कुछ प्रचार उपकरण अनिवार्यतः होना चाहिए। ये हैं - 1. झोला पुस्तकालय के लिए साहित्य, 2. जन्मदिन मनाने के लिए सुसज्जित यज्ञशाला, 3. संगीत के वाद्य उपकरण, 4. स्लाइड प्रोजेक्टर, 5. टेप रिकार्डर-कम-एंप्लिफायर, 6. 12 वोल्ट की बैटरी एवं चार्जर। ये सभी साधन लगभग पाँच हजार रुपये में बन जाते हैं। इतनी सामग्री तो हर प्रज्ञा मण्डल को अनिवार्य रूप से जुटानी चाहिए। इस प्रयोजन हेतु पुरुषों द्वारा बीस पैसे रोज का ज्ञानघट और स्त्रियों द्वारा धर्मघट में एक मुट्ठी अनाज का अंशदान नियमित रूप से निकाला जाय और एकत्रित राशि का आय-व्यय सभी सदस्यों को हर महीने सुना दिया जाय।

समयदान निकलता रहा तो उपरोक्त सभी गतिविधियाँ निश्चित रूप से चलती रहेंगी। इसी प्रकार यदि अंशदान को न्यूनतम की सीमा तक अनुबन्धित न रखकर उदारतापूर्वक कुछ और बढ़ाया जाय तो उनके द्वारा जो काम बन पड़ेंगे, उन्हें इस स्तर का समझा जा सकता है मानो एक चलती-फिरती प्रज्ञापीठ का सार्थक संचालन हो रहा है।

जहाँ प्रज्ञा संस्थान बन चुके, वहाँ उपरोक्त कार्यों के लिए एक दो वैतनिक कार्यकर्ता रखकर इन गतिविधियों का उत्साह भरा सूत्र संचालन किया जा सकता है। जहाँ निजी इमारतें नहीं हैं वहाँ किसी का माँगा हुआ कमरा या पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार करके उसमें यह सभी प्रक्रियाएँ आसानी से चलाई जा सकती हैं। बालकों के लिए बालसंस्कारशालाएँ और महिलाओं के लिए परिवार निर्माण गोष्ठियों के अपने विशेष कार्यक्रम अलग से चल सकते हैं।

ये कार्यक्रम देखने में बहुत एवं बड़े मालूम पड़ते हैं पर जो लोग इन्हें करने के लिए जुट पड़ेंगे, उनके लिए ये नितान्त सरल है। मनुष्य जीवन का सारा समय रोजी-रोटी के लिए ही नहीं निकलना चाहिए, उसमें पुण्य परमार्थ के लिए - देशधर्म के लिए, आदर्शों एवं लोक सेवा के लिए भी कहीं कुछ जगह होनी चाहिए। प्रज्ञापरिजनों में से प्रत्येक से यह आशा की गयी है कि वे युगनेतृत्व की - समय परिवर्तन की इस बेला में महाकाल की चुनौती स्वीकार करेंगे। इस दिशा में जिनने भी कदम उठाए हैं वे गाँधी, बुद्ध, नेहरू, पटेल, बोस जैसे महामानव बन कर रहे हैं। संसार में अगणित व्यक्ति ऐसे हुए हैं जो पारिवारिक, आर्थिक एवं शिक्षा की दृष्टि से अति साधारण थे किन्तु उनने अपने को उदारमना, सेवाभावी बनाया और कहीं से कहीं जा पहुँचे। यदि वे लोभ-मोह के बंधनों में ही जकड़े रहते तो नरपशु से अधिक कुछ न बन पाते। मनुष्य वे हैं जो अपने जीवन की नाव स्वयं पार करें और साथ ही अन्य असंख्यों को पार लगायें। प्रज्ञा अभियान न ऐसा ही सुयोग प्रत्येक परिजनों को प्रदान किया है। इसे चूकना सामने आए सौभाग्य को ठुकराकर दूर फेंकने के समान है। यह समय वह है जिसमें हनुमान, अर्जुन की तरह कोई भी परिजन अपने को कृतकृत्य बन सकता है।

प्रसन्नता की बात है कि वरिष्ठ-कनिष्ठ सभी प्रज्ञापुत्र सामने प्रस्तुत युग चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं। उनका यह सत्साहस कभी उनके लिए अतीव श्रेयस्कर सिद्ध होगा, इस तथ्य पर निश्चित रूप से विश्वास किया जा सकता है।

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शक्ति का स्रोत संयम ही है (kahani)

महाभारत का अंतिम श्लोक पूर्ण हुआ। गणेश जी की अनवरत चलने वाली लेखनी को विश्राम मिला।

महर्षि व्यास जी ने हँसते हुये गणेश जी से पूछा- भगवन्! मैं इतने श्लोक बोलता रहा। अनेक प्रसंग तथा अनेक व्यवधान बीच में आये पर आप मौन ही रहे। इसका क्या रहस्य है।

गणेश जी हँस पड़े, उनने कहा- व्यास जी, जानते नहीं शक्ति का स्रोत संयम ही तो है। मैंने मौन रहकर ही तो इतना बड़ा महाभारत लिख सकने का कार्य किया है। मौन की महत्ता किससे छिपी है। वाणी का संयम सबसे बड़ा संयम माना जाता है जो मौन रहता है, कम बोलता है वही तो कुछ कर गुजरता है।

प्रसंग समाप्त होने ही वाला था कि अधूरी बात को पूरी करते हुये नन्दी ने कहा- सभी दीपों में तेल होता है किसी में कम किसी में ज्यादा। अक्षय तेल किसी में नहीं। प्राणियों में शक्ति तो रहती है पर वह विपुल नहीं, अक्षय नहीं। संयम द्वारा जो उसे नष्ट होने से बचा लेते हैं वे ही तो सिद्धि प्राप्त कर पाते हैं।

व्यास और गणेश दोनों ही इस तथ्य पर सहमत थे। महाभारत की रचना दोनों के सहयोग से इसी आधार पर हो सकी थी।


एक लाख दिग्गज इन्हीं दिनों मोर्चा सम्भालेंगे

सन् 2000 में विश्व की जनसंख्या 700 करोड़ तक हो सकती है। भारत की जनसंख्या अभी तो 75 करोड़ के लगभग है। पर यह अगले 14 वर्षों में एक सौ करोड़ तक हो सकती है। यह बढ़ी हुई जनसंख्या हवा के रुख के अनुरूप असह्य होगी। इसकी शिक्षा और रोटी का तो प्रबन्ध करना ही पड़ेगा। सबसे बड़ी बात है इनके व्यक्तित्वों को ढालना। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना। इसके बिना वे अपने नागरिक सामाजिक कर्तव्यों से अपरिचित ही बने रहेंगे और उस राह को प्राप्त न कर सकेंगे जिसमें प्रगतिशील प्रज्ञायुग में उन्हें पहुँचना है। पिछड़ा हुआ व्यक्ति हर दृष्टि से घाटे में रहता है।

चिन्ता अपनी पीढ़ी की भी कम नहीं है। वह भी समस्याओं, कठिनाइयों, विपत्तियों से घिरी है आज के समाधान आज चाहती है। वर्तमान पीढ़ी जब अपने तक को संभाल नहीं पा रही है तो नई पीढ़ी जो और भी अधिक विषमताओं, विभीषिकाओं से घिरी होगी उसे कैसे संभाल पायेगी?

नवयुग की तैयारी में सर्वतोमुखी नेतृत्व कर सकने वाली प्रतिभाओं को उठाना और समर्थ बनाना है। भारत की प्रस्तुत और भावी जनसंख्या को देखते हुए न्यूनतम एक हजार पीछे एक अग्रगामी मार्गदर्शक चाहिए। विश्व से पहले भारत का ही विचार करें तो भी एक करोड़ के लिए न्यूनतम एक लाख अग्रगामी प्रकाशवान प्रतिमाएँ चाहिए ऐसी प्रतिभाएँ जो अपनी नाव पर बिठाकर हजारों को पार लगा सकें। घर-घर अंधेरे में दीपावली जैसा प्रकाश भर सकें। घर-घर अंधेरे में दीपावली जैसा प्रकाश भर सकें।

इन दिनों एक ही क्षेत्र सुविकसित है राजनीति। इसके साथ उद्योग व्यवसाय या सुरक्षा को भी जोड़ सकते हैं। पर अगले दिनों तो स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवार, उपार्जन, संस्कृति, साहित्य कला जैसे अगणित विषयों में प्राण फूँकना और उन्हें युग की आवश्यकता पूरी कर सकने योग्य बनाना है इसके लिए राजनीति की तुलना में अत्यधिक बड़ा क्षेत्र खाली पड़ा है। उसकी पूर्ति उन्हें ही करनी होगी। जिन्हें आज तत्परतापूर्वक सर्वतोमुखी युग नेतृत्व कर सकने के समर्थ बनाया जा रहा है। वे न्यूनतम एक लाख तो तत्काल चाहिए। भविष्य में यह बिरादरी बढ़ती रहेगी सो अलग।

देखने, सुनने और कहने कल्पना करने में यह कार्य कठिन लगता है। पर यह प्रज्ञा मिशन के लिए नितान्त सम्भव है इसके दो कारण हैं। एक प्रत्यक्ष दूसरा परोक्ष प्रत्यक्ष यह कि प्रज्ञा पारायणों की संख्या 24 लाख है। इनमें पाँच लाख से अधिक तो प्रज्ञा पत्रिकाओं के ग्राहक और 20 लाख पाठक ही हैं। इनमें से एक लाख प्रतिभाओं को युग चुनौती स्वीकार करने का महाकाल निमंत्रण निश्चित रूप से स्वीकार हो सकता है। केवल अपना संगठन है जो इतनी बड़ी संख्या में युगशिल्पियों को ढालने में नालन्दा विश्व विद्यालय की पुनरावृत्ति कर सकता है। यह प्रशिक्षण शान्ति कुँज और उसकी शाखा प्रशाखाओं में चल रहा है।

इससे भी बड़ा कारण है कि मिशन की पीठ पर युगान्तरकारी दिव्य चेतना का हाथ होना? उसकी प्रत्यक्ष सहायता से मिशन हर वर्ष दस गुनी गति से आगे बढ़ता और विकसित होता रहा है। असम्भव जैसे कार्य उसी अदृश्य अनुदान के आधार पर संभव होते रहे हैं। अब उसकी गति और भी बढ़ेगी। समय मात्र 14 वर्ष का रहा है। इसमें दैवी अनुदान और अनुकूलन का तूफानी प्रवाह इस तेजी से बढ़ेगा कि जो आज कल्पनातीत प्रतीत होता है वह कल जादू चमत्कार की तरह प्रत्यक्ष होता दृष्टिगोचर होगा। एक लाख की अभीष्ट प्रतिभाएं भी अगले मोर्चे पर खड़ी दृष्टिगोचर होंगी।

अपने युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है युग नेतृत्व। इस भार को वहन करने वाले एक लाख दिग्गज इन दिनों बनाये जा रहे हैं। बनने के लिए वे स्वेच्छापूर्वक मचल भी रहे हैं।

कहना न होगा कि जो लाभ इन दिग्गजों द्वारा जन साधारण को मिलेगा उससे हजार लाख गुना आत्म संतोष जनसहयोग और ईश्वर अनुग्रह प्राप्त करके अपने आपको अजर, अमर, स्तर के श्रेयाधिकारी बना सकेंगे।


आयेगा अब नया उजाला

डा. हरगोविन्द सिंह


आयेगा अब नया उजाला (kavita)

चहक रहे धरती के पंछी, महक रहा आकाश है, आयेगा अब नया उजाला, यह हमको विश्वास है।

सिमट रहा अज्ञान अंधेरा, उखड़ गया असुरों का डेरा; जाग उठी कर्मठ तरुणाई, शक्ति नयी कण-कण ने पायी;

बीत गयी पतझड़ की रजनी, द्वार खड़ा मधुमास है। आयेगा अब नया उजाला, यह हमको विश्वास है।।

मन-मन्दिर को स्वच्छ बनाएं, सद्विचार के पुष्प सजाएं; प्रेम, एकता, भाईचारा, गूंज नवरचना का नारा;

जहां सुमति है, वहीं सुगति है, वहीं सिद्धि का वास है। आयेगा अब नया उजाला, यह हमको विश्वास है।।

युगद्रष्टा की निर्मल वाणी राह दिखाती ह कल्याणी, फैला युग-संगीत पवन में भरता भव्य भाव जन-जन में;

ललित कला के मंगल-घट में संस्कृति का उल्लास है। आयेगा अब नया उजाला, यह हमको विश्वास है।।

अब न यहां अन्याय टिकेगा, नहीं शील-ईमान बिकेगा; सदाचार का मान बढ़ेगा, विश्व प्रगति-सोपान चढ़ेगा;

जागृति का अभियान अनोखा बना रहा इतिहास है। आयेगा अब नया उजाला, यह हमको विश्वास है।।

*समाप्त*