उन्नति नहीं, प्रगति अभीष्ट

उन्नति कर सकना कठिन नहीं है। नवजात शिशु बढ़कर छह फुट की ऊँचाई तक जा पहुँचता है। बरगद का नन्हा सा पौधा विकसित होकर बहुत बड़ी जमीन पर अधिकार कर लेता है। निर्दयी व्याघ्र वनराज कहलाते हैं। चींटियों के बिलों में सेरों अनाज जमा पाया जाता है। पहलवान और सरकस के खिलाड़ी ऐसे कृत्य करते हैं, जिन्हें देखकर चकित रह जाना पड़े। जेबकट भी अपनी जिन्दगी में लाखों के वारे-न्यारे करते हैं। चतुर व्यवसायी कोठियाँ खड़ी करते और मोटरों पर सफर करते हैं। लक्षाधीशों और अमीर सामन्तों की इस दुनिया में कमी कहाँ है?

उन्नति करने वालों की सूची बड़ी है। प्रतिस्पर्धा इसके लिए उत्तेजित करती है चतुरता आकाश के तारे तोड़कर साधन सम्पदा जमाकर लेती है। प्रतिभा और शिक्षा भी अभ्यास की वस्तु है। परिश्रमी और लगनशील उसे सहज ही अर्जित कर लेते हैं। दुनिया बड़ी तेजी से उन्नति की दिशा में बढ़ रही है। विज्ञान, बुद्धिवाद और अर्थशास्त्र सभी इस दिशा में सहायक हैं।

प्रगति शब्द का उपयोग आन्तरिक विभूतियों के सम्बन्ध में किया जाना चाहिए। अपने संबंध में संयम बरतने पर बचत का उपयोग सदुद्देश्यों के लिए उदारतापूर्वक किये जाने पर प्रगति बन पड़ती है। प्रगतिशील व्यक्ति में से ही देवता प्रकट होते हैं और प्रगतिशील समाज, समुदाय स्वर्गीय वातावरण का रसास्वादन करता है। मनुष्यता का दायित्व और लक्ष्य यही है भी।


योग साधना की तीन धाराएँ

योगविज्ञान को त्रिवेणी संगम की तरह तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। हमारे कायिक आवरण भी तीन हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इन तीनों की स्वच्छता और प्रगति के लिए तीन स्तर के उपाय-उपचारों को प्रचलन है।

स्थूल शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है। बीमार व्यक्ति तो अपने तथा दूसरों के लिये भारभूत ही होता है। उससे न भौतिक प्रगति सधती है, न आत्मिक। इसीलिए योगी को सर्वप्रथम शरीर से संबंधित क्रियायोग को अपनाना पड़ता है। इसके दो प्रमुख आधार हैं। एक आहार, दूसरा व्यायाम। साधना हेतु आहार की सात्विकता आवश्यक है। उसका स्तर और अनुपात भी ऐसा रहना चाहिए जिससे आलस्य या अपच का प्रकोप न होने पाए। इसके अतिरिक्त इसी क्षेत्र में व्यायाम का महत्व माना गया है। आसनों का अभ्यास इसी निमित्त किया जाता है। बन्ध-मुद्राओं के अभ्यास भी इस प्रयोजन में मदद करते हैं। संचित मलों के निष्कासन के लिए हठयोग के अंतर्गत इसी निमित्त नेति, धौति, वस्ति, कपाल, भाति इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। यह क्रिया प्रधान होने से क्रियायोग के नाम से जानी जाती है। इसी निमित्त कई बार चान्द्रायण व्रत, दूध-तक्र कल्प आदि किए जाते हैं।

योग का दूसरा चरण है- मनोनिग्रह। इसे सूक्ष्म शरीर की साधना कहा गया है। मन की कुकल्पनाएँ और इच्छाएँ इसके अंतर्गत नियन्त्रित की जाती हैं। एकाग्रता की साधना अपने विभिन्न रूपों में इसी निमित्त करते हैं। ध्यान के अनेकानेक प्रयोग प्रचलन इसी निमित्त हैं।

मन की चंचलता का निरोध इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम इन चार अनुशासनों से बंधा हुआ है। निरंकुश स्वेच्छाचारी मन न नीति, मर्यादा का अंकुश मानता है और न सही मार्ग पर चलने के लिये सहमत होता है। उसे सरकस के रिंगमास्टर की तरह हंटर के बल पर अनुशासन मानने के लिये बाधित किया जाता है। यही मनोनिग्रह है। एक काम से छुड़ाने का एक ही उपाय है- वह यह कि दूसरी आदत छुड़ाने के लिये नई कार्य पद्धति में उसे जुटा दिया जाय। जप या ध्यान का युग्म मनोनियंत्रित करके उसे लक्ष्य बिन्दु पर केन्द्रित होना सिखाता है।

कारण शरीर की साधना में अन्तःकरण का उदात्तीकरण करना पड़ता है। आस्थाएँ, भावनाएँ, आकाँक्षाएँ विचारणाएँ आदर्शों के अनुरूप ढालनी पड़ती हैं। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कार इस मार्ग में पग-पग पर बाधा पहुँचाते हैं इसलिए उनकी ओर से विमुख होने की बैरागी प्रवृत्ति अपनानी होती है और आदर्शों के समुच्चय भगवान के साथ आन्तरिक भक्ति भावना जोड़नी पड़ती है। यही योग है। इसी को अद्वैत एवं समर्पण की स्थिति कहते हैं। जिस प्रकार आग में ईंधन डाल देने पर वह सामान्यता खोकर असामान्य बन जाता है, उसी प्रकार ‘प्रेम’ रूपी भगवान में अपने आपको होम देने पर मनुष्य का जीवनक्रम विश्व प्रेम से ओत-प्रोत हो जाता है। आत्मीयता की परिधि सीमित न रहकर असीम हो जाती है। जिससे भी प्रेम किया जाता है, उसकी प्रसन्नता के लिए सेवा सहायता करने की उत्कंठा होती है। विराट् विश्व को ईश्वरमय मानते हुए लोक मंगल के कार्यों में निरत होना पड़ता है। भगवान की विश्व-वाटिका को सींचना, उसे हरी-भरी सुरम्य-सुविकसित बनाना वास्तविक ईश्वर प्रेम है। यह कल्पना लोक की उड़ाने उड़ने से नहीं, जनकल्याण की सेवा-साधना का व्रत लेने से संभव होती है। योग की यही तीन धाराएँ हैं, जिनका साधक को समुचित समन्वय करते हुए ही आगे बढ़ना होता है।


Quotation

ईश्वर और कुबेर में से दोनों की भक्ति एक साथ नहीं चल सकती। जो अच्छा लगे, उनमें से एक को चुन लें।


परमात्मा की प्रतीक प्रतिनिधि– आत्मसत्ता

जीवात्मा परमात्मा की अंशधर सत्ता है तथा मानवी काया ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट संरचना एवं इस निखिल ब्रह्मांड का एक छोटा रूप है। इस काया को सर्वव्यापी प्रकृति की अनुकृति कहा गया है। ईश्वर का व्यष्टि रूप- लघु जगत- माइक्रोकाज्म मनुष्य है जिसके अंतर्गत विराट् का वैभव बीज रूप में प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है। प्राचीनकाल के दार्शनिकों, अध्यात्मवादी ऋषि-मनीषियों ने मनुष्य के स्वरूप का विशद् रूप से अध्ययन किया और विवेचन प्रस्तुत किया है। उन्होंने मानव की विशिष्टताओं, श्रेष्ठताओं एवं गुणों को प्रतिष्ठित करने के साथ ही यह भी खोजने का प्रयत्न किया है कि पिण्ड का ब्रह्मांड से, मनुष्य का सृष्टि से, लघु जगत्- माइक्रोकाज्म का विराट् विश्व-माइक्रोकाज्म से किस प्रकार का रहस्यपूर्ण एवं गूढ सम्बन्ध है।

ईश्वर की व्याख्या करते हुए सुप्रसिद्ध दार्शनिक ज्योतिर्विद् राबर्ट जोलर ने अरबी ज्योतिष तत्व के प्राचीनतम ग्रंथ ‘द अरेबिक पार्ट्स’ की व्याख्या में कहा है कि सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्मांड का- समष्टि जीवन का मूलभूत आधार तत्व प्रथम अनादि चेतन सत्ता “मोनेड”- परमात्मा है। दिक् काल से परे इस सत्य को सब कालों में दार्शनिकों, अध्यात्मवादियों, रहस्यवादियों और संतों ने माना है एवं इसे विभिन्न नामों से सम्बोधित किया है। दार्शनिक प्लेटो ने इसे स्वयंभू- “क्रिएचर इटसेल्फ” एवं राबर्ट फ्लड ने “फर्स्ट फार्म” कहा है। जर्मनी प्रख्यात अध्यात्म वेत्ता जेकब बोहम ने इसे ‘फ्लेगरेट’ के नाम से जाना है, जिसका अर्थ होता है- प्रकाश विस्फोट। उनके मतानुसार मोनेड अर्थात् ईश्वर स्वयं अपनी आहुति देकर इस सृष्टि की रचना करता है।

कुछ दार्शनिकों ने मोनेड का स्पलेन्डर, प्रोटियस एवं फेन्स के नाम से जाना है, तो बहुतों ने इसे ‘गॉड’ कहा है। गुरुग्रन्थ साहब में उसे ‘चाँदना’ कहा गया है। अन्यों ने इसकी संगति सूर्य से बिठाई है। बाइबिल में परमेश्वर को ‘ज्योति’ कहा गया है। हजरत मूसा को कोहिनूर पर ‘जलवा’ रूप में वह दिखाई दिया था। उपनिषद् में उसे ‘परम ज्योति’ कहा गया है। अध्यात्म शास्त्र में इसी को ‘दिव्यआलोक’ कहा गया है। ‘डिवाइन लाइट’ नाम इसी को दिया गया है। ‘अरेबिक पार्ट्स’ में उसे ही प्रथम मूल तत्व कहा गया है जिसमें सम्पूर्ण जीव जगत की विराट् सत्ता समाविष्ट है। यह प्रथम मूलतत्व ही व्यष्टि और समष्टि में, जीव और जगत में उनके मूलाधार रूप में समाया हुआ है। उस एक तत्व से ही जीवन की सभी घटनाएँ एवं अनुभूतियाँ, प्राकृत के समस्त रूप एवं जातियाँ तथा विश्व के सभी दृश्य प्रपंच उद्भूत होते हैं। उसी के अटल दिव्य विधान के अनुसार ही सबका प्रकटीकरण होता है। यही चेतन शक्ति दृश्य-अदृश्य जगत् एवं उसके विविध पदार्थों को अपनी मूल एकता में सबको एक साथ माला के मनकों की भाँति बाँधे हुए है।

श्रीमद्भगवद्गीता में इस मोनेड को सर्वोच्च अविनाशी आत्मा कहा गया है। इसका प्रकृति स्वरूप आध्यात्मिक दिव्य चेतना है, जो कि समस्त सृजनात्मक शक्तियों का सृष्टा, सृष्टि का आदि, मध्य और अन्त एवं सूर्य तथा चन्द्रमा में ऊष्मा स्वरूप है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं व्यष्टित्व आदि इसकी श्रेष्ठ प्रकृति, उच्चस्तरीय अभिव्यक्ति आत्मसत्ता-प्राणशक्ति है जो समस्त संसार में प्राण का संचार करती है।

गीताकार ने कहा है कि “जिस प्रकार सूर्य सम्पूर्ण पृथ्वी को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार इस जगत् का स्वामी ईश्वर समस्त विश्व ब्रह्मांड को प्रकाशित करता है।” मोनेड-ईश्वर अपने स्वरूप में एक अखण्ड, अद्वैत, पूर्ण शाँत निराकार एवं निर्गुण सत्ता है। एक से अनेक होने- अनेक रूपों में स्वयं को प्रकट करने के लिए वह संकल्प करता है, ताकि वह अपने अनन्त गुणों एवं स्वरूपों की अभिव्यक्ति कर सके। अपने अव्यक्त स्वरूप को प्रकट करने के लिए उसने स्वयं को तीन सत्ताओं में व्यक्त किया- (1) स्वयं वह-मूल सत्ता-मोनेड (2) विराट् विश्व-ब्रह्मांडीय सत्ता-समष्टि सत्ता एवं (3) लघु जगत् सत्ता-व्यष्टि सत्ता-मानवी सत्ता

ये तीनों सत्ताएँ एक ही मूल स्रोत से प्रकट होकर दृश्य रूप में भिन्न-भिन्न तीन सत्ताएँ दिखते हुए भी अनिवार्य रूप से मूलतः एक-अखण्ड-अद्वितीय हैं। व्यष्टि मनुष्य एवं समष्टि ब्राह्मी चेतना दोनों समान रूप से एक ही कार्य विधि एवं नियम द्वारा संचालित हैं। सभी संतों ने अपनी रचनाओं में हरमेटिक मैक्सिम सिद्धान्त की पुष्टि की है कि- “वह जो ऊपर है, नीचे की तरह ही है और जो नीचे है वह ऊपर की तरह ही है।” अर्थात् जो नियम, विधि-विधान, सृष्टि-विश्व-ब्रह्मांड में लागू हैं, वही नियम पिण्ड, लघु घटक मनुष्य में भी लागू हैं। मनुष्य एवं सृष्टि के समस्त क्रियाकलाप समान नियमों से बँधे हुए हैं।

आत्म सत्ता की महत्ता को सभी अध्यात्मविदों ने एक स्वर से स्वीकार है और परिष्कृत आत्मा को परमात्मा के समतुल्य माना है। कुरान में उल्लेख आता है कि “मनुष्य धरती पर अल्लाह का प्रतिनिधि है (कुरान-सूरा 2 एवं 35/35-)

“अल्लाह ने मानव को सर्वश्रेष्ठ आकार प्रदान किया है।” (कुरान-सूरा 15/4, 64/3, 40/16-)

बाइबिल में इस बात का अनेक स्थलों पर उल्लेख मिलता है कि “विराट् ब्रह्म का सारा रहस्य मानव में निहित है, क्योंकि नर ही नारायण के अति निकट है। सृष्टि में वही परमात्मा का साकार रूप है। मनुष्य ही ईश्वर का जीवन्त मन्दिर है। (बाइबिल - जेनेसिस 1/2, 6/27, 5/1, 9/6)

ईसा ने मनुष्य की सेवा को ईश्वर की पूजा के समकक्ष माना था।

“अल्लाह ने मानव को सर्वश्रेष्ठ आकार प्रदान किया है।” कुरान-सूरा 95/4, 64/3, 40/96

पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रख्यात लैटिन दार्शनिक हेनरी कार्नेलियस एग्रीपा ने अपनी कृति ‘डि ऑकल्टा फिलॉसॉफिया’ में लिखा है कि मनुष्य की आत्मा एक अलौकिक दिव्य प्रकाश है। इसमें व्यष्टि और समष्टि दोनों समाये हुए हैं। आत्मा वास्तविक रूप में अविकारी, आत्म निर्भर, सर्वज्ञ एवं सभी शरीरों और भौतिक पदार्थों से परे है। वह भौतिक तत्व से उत्पन्न नहीं हुई है। वस्तुतः आत्मा एक दिव्य मूल तत्व है एवं उसकी उत्पत्ति दिव्य स्रोतों से हुई है।

ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के अनुसार “मनुष्य की आत्मा ईश्वर से सीधे प्रकट होकर उपयुक्त स्थूल शरीर से जुड़ जाती है। वास्तविक रूप में जीवात्मा का धरती पर जब सर्वप्रथम अवतरण होता है तो वह दिव्य सूक्ष्म शरीर, वायवीय शरीर रूप में अवतरित होकर स्थूल देह में प्रवेश करती है। इस वायवीय सूक्ष्म शरीर को आत्मा का पारलौकिक वाहन (वेहीकल) कहा जाता है। ईश्वर, जो चराचर जगत का केन्द्र है, उसी के आदेश से जीवात्मा मनुष्य के हृदय में प्रविष्ट होती है। इस तरह अविनाशी आत्मा पारलौकिक वाहन के माध्यम से स्थूल एवं नाशवान शरीर के भीतर बन्द कर दी जाती है। जब शरीर तथा उसके विभिन्न अंग अवयव बीमारी अथवा अन्य दोषों के कारण क्षीण काय जर्जर हो जाते हैं, प्राण शक्ति कमजोर पड़ जाती है, ऊष्मा मंद होती चली जाती है, तब उस स्थिति में जीवात्मा शरीर को छोड़ देती है और शरीर मृत हो जाता है जीवात्मा सूक्ष्म शरीर के माध्यम से ईश्वर के सामने जाती है। गार्जियन जेनी और डेमन्स भी उसके पीछे-पीछे जाते हैं और उस जीवात्मा के अच्छे-बुरे कर्मों की रिपोर्ट जीवन का लेखा-जोखा ईश्वर के सामने प्रस्तुत करते हैं। जिसके आधार पर ईश्वर अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को स्वर्ग सुख प्रदान करता और बुरे कर्म करने वाले को नरक में भेजता व दंड देता है।” प्लेटो का यह प्रतिपादन भारतीय दर्शन का चित्रगुप्त व यमराज वाली मान्यता से मिलता जुलता है।

दार्शनिकों का मत है कि गुण, कर्म स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश होने तथा सत्कर्म करने पर ही अशुभ कर्मों का विनाश होता है और भावी जीवन उज्ज्वल एवं सुखमय बनता है। भगवान महावीर उत्तराध्ययन सूत्र (3/7) में कहते हैं- “अशुभ कर्मों के नाश होने पर ही आत्मा शुद्ध, निर्मल और पवित्र बनती है। जीवात्मा तब जाकर मनुष्य योनि प्राप्त करती है।”

सोलहवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध दार्शनिक संत गियारडेनो ब्रुनो की मान्यता है कि मनुष्य के अन्दर कोई ऐसा दक्ष रचनात्मक तत्व है, जिसके द्वारा उसके चारों ओर एक विलक्षण शरीर की संरचना संपन्न होती है। यह कोई बाहरी नहीं वरन् अन्तःशक्ति है जो भीतर से गढ़ती, उन्हें सुरक्षित रखती और परस्पर विरोधी तत्वों को एकता एवं सामंजस्य के सूत्र में बाँधकर एक साथ रखने की क्षमता रखती है। यह मूलतत्व ही सही अर्थों में मनुष्य है। यही मूलतत्व विशिष्ट दैव तत्व देव शक्ति है, प्रेरक आत्मा है, चैतन्य शक्ति है जो शरीर को चलाती है, उसका संचालन करती है।

इजिप्ट के मूर्धन्य दार्शनिक, हरमेस ट्रिस्मेजिस्टस को वहाँ के निवासी उन्हें अपने ईश्वर ‘थोथ’ के समतुल्य मानते हैं। हरमेस ने मनुष्य को ईश्वर का एक दिव्य चमत्कार माना है। उनके अनुसार मनुष्य के समान गौरवशाली, मर्यादित एवं श्रद्धास्पद कोई भी प्राणी इस धरती पर नहीं है। ईश्वर ने ही मानवी काया में प्रवेश किया है। ईश्वर का प्रतिनिधि होने से वह स्वयं में समस्त ईश्वरीय गुणों से अभिपूरित है। मानवी सत्ता ईश्वरीय नियमों से बँधी हुई है। यही कारण है कि मनुष्य की आँखें निम्नगामिता को छोड़कर सदैव श्रेष्ठता की ओर- परमपिता परमेश्वर की ओर ऊपर उठी रहती है। मनुष्य ही है जो सबको प्यार बाँटता और बदले में स्नेह सहयोग पाता है। उसका आविर्भाव, अर्जित सम्पदा एवं प्रतिभा सबके कल्याण के लिए- “सर्वभूत हिते रतः” है।

प्रख्यात ग्रीक दार्शनिक पिको डेला मिरानडोला के अनुसार ईश्वर ने मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों के स्वभाव को अपने नियमों द्वारा सीमित एवं नियंत्रित कर दिया है और मनुष्य को विचार करने तथा कर्म करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र रखा है। वह इच्छानुसार सोच सकता है अपना निर्माण कर सकता है और अपने को गढ़ सकता है। वह चाहे तो कर्मों के माध्यम से निम्न योनियों में जन्मता और भ्रमण करता रह सकता है एवं चाहे तो दिव्य योनियों में जन्म ले सकता है, बन्धन मुक्त हो सकता है और नर से नारायण बन सकता है। अपने विकास अथवा पतन के लिए मनुष्य स्वयमेव जिम्मेदार है क्योंकि वरण की स्वतंत्रता उसे मिली है।

देवी भागवत् में कहा गया है-

स्वकर्मणा सर्वसिद्धिं अमरत्वं लभेद् ध्रुवम्

सुरत्वं च मनुष्यत्वं च राजेन्द्रत्वं लभेन्नरः।

कर्मणा इन्द्रो भवेज्जीवो ब्रहमपुत्रः स्वकर्मणा,

कर्मणा च शिवत्वं च गणेशत्वं, तथैव च॥

अर्थात्- “मनुष्य अपने कर्मों और प्रयासों के आधार पर ईश्वर, मनुष्य, इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश आदि जो चाहे बन सकता है।” कायसत्ता वस्तुतः परमात्म सत्ता का एक लघु संस्करण है। उसके महत्व को समझा जाना एवं उसका सदुपयोग श्रेष्ठ कार्यों के निमित्त किया जाना चाहिए।


चैतन्य महाप्रभु (kahani)

महाप्रभु चैतन्य जगन्नाथ पुरी क्षेत्र में प्रचार यात्रा पर निकले थे। मण्डली में कई विद्वान भी थे। वट-वृक्ष के नीचे एक किसान को तन्मयता पूर्ण गीता पाठ करते देखा। उसकी आँखों में भावना के आँसू टपक रहे थे, और तन्मयता देखते ही बनती थी। मण्डली रुक गई, पाठ सुनने लगी। उच्चारण अशुद्ध था। अल्पशिक्षित होने के कारण वह न संस्कृत पाठ से ही अवगत था, न श्लोकों का अर्थ ही उसे विदित था।

विद्वानों ने उसे टोका और अशुद्ध बोलने से रोका तो भी वह रुका नहीं, पढ़ता ही रहा। बोला- मेरे लिए इतना ही बहुत है कि भगवान जो कह रहे हैं उसे मेरी आत्मा अमृत की तरह पी रही है।

महाप्रभु ने विद्वानों से कहा इस अशिक्षित की भावना को नमन है। यही है वह तत्व जिसके सहारे भक्ति ओर भक्त की सार्थकता है।


समत्व कितना सम्भव कितना असम्भव

गीताकार ने समत्व को योग कहा है। यह समत्व क्या है? मोटे अर्थों में समानता के बरताव को साम्य कह सकते हैं। साम्यवादी अर्थ व्यवस्था का यही आधार है। तब क्या योगी को साम्यवादी रीति-नीति अपनाने से लक्ष्य की पूर्ति में सफलता मिल जायेगी?

व्यवहार में समत्व का पूर्णतया परिपालन असम्भव है। हाथ की पाँच उंगलियां एक सी नहीं होतीं। घर में बड़ों छोटों के प्रति व्यवहार, शिष्टाचार में अन्तर बरता जाता है। बुद्धिमत्ता की कद्र होती है और मूर्खता दुत्कारी जाती है। समाजसेवी लोकहितैषी जनसम्मान और जनसहयोग अर्जित करते हैं और प्रशंसा प्रतिष्ठा पाते हैं। इसके विपरीत उजड्ड, अनाचारी, आतंकवादी समाज दण्ड, राजदण्ड और आत्मदण्ड भुगतते हैं। उनके साथ सम्बन्ध बनाने से भी सभी डरते हैं। भय यही लगा रहता है कि कहीं यह कालनेमि की तरह मित्रता का आडम्बर ओढ़कर शत्रुता जैसी घात न चला दे। जहाँ भय और आशंका है, वहाँ मित्रता कैसे बने? सहयोग कैसे सधे? सम्मान देने के लिए मन किस प्रकार उत्साह प्रकट करे?

जानवर सभी एक से होते हैं, पर उनमें से गाय को पालते हैं। भेड़िये से डरते हैं। सुअर को दुत्कारते हैं। यह अन्तर स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। उन्मादी से सतर्कता बरतनी पड़ती है। वह न जाने कब क्या कर बैठे? उसे ऐसे स्थान पर नहीं बिठाया जाता, जहाँ समझदारी और जिम्मेदारी निबाहने की आवश्यकता समझी जाती है। पूजा की थाली और कचरे की टोकरी साथ-साथ नहीं रखी जा सकती। यह सब देखते हुए विदित होता है कि समता सापेक्ष है। उसे पत्थर की लकीर नहीं माना जा सकता और हर कहीं एक ही आधार नहीं अपनाया जा सकता। सभी भेड़ें एक लाठी से नहीं हाँकी जा सकतीं। सभी धान बाईस पसेरी नहीं बिक सकते। उनके स्तर और गुण-दोष को निरखा-परखा जाता है और तब यह निर्णय किया जाता है कि किसके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाय? देवता और दैत्य के बीच समता कैसी? उजाले और अंधेरे का अन्तर तो रहेगा ही। परिस्थितियों को देखकर ही व्यवहार करने के लिए हाथ बढ़ाना पड़ता है। हीरा और काँच एक भाव नहीं बिक सकते। रोगी और निरोगी एक बिस्तर पर नहीं सुलाये जा सकते। अन्तर रहना आवश्यक है। ऐसी दशा में वह सिद्धान्त कटता है जिसमें “समता” पर जोर दिया जाता है एवं उसे नीति और धर्म के समकक्ष बताया गया है।


Quotation

सामर्थ्य के हाथी पर जब विवेक का अंकुश नहीं रहता तो वह रौंदने और कुचलने को ही जुट पड़ता है।

वस्तुतः समता का तात्पर्य मानसिक सन्तुलन से है। समयानुरूप परिस्थितियाँ अनुकूल भी होतीं और प्रतिकूल भी होती हैं। इन भिन्नताओं के बीच अपना सन्तुलन बनाये रखा जाय। सुख दुःख के आवेगों को इतना न बढ़ने दिया जाय कि वे हड़बड़ी पैदा कर दें और यह विचार करना कठिन हो जाय कि अनुकूलता का लाभ किस प्रकार उठाया जाय और प्रतिकूलता से निपटा किस प्रकार जाय? आवेशग्रस्त व्यक्ति एक प्रकार से अर्ध विक्षिप्त की स्थिति में पहुँच जाता है। अधीर स्थिति में वह न करने योग्य भी कर बैठता है और कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं।

लाभ में प्रसन्नता और हानि में खिन्नता स्वाभाविक है। इसे रोका नहीं जा सकता, पर इतना तो हो सकता है कि इन स्थितियों में मानसिक सन्तुलन बिगाड़ने की अति तक न जाया जाय। विवेकवान इसीलिए ऐसे अवसरों पर अपना विवेक कायम रखते हैं ताकि आगे क्या कदम उठाया जाना है, इसका सही निर्णय कर सकें।


आत्मज्ञानं परं ज्ञानम्

जानकारियाँ जितनी अधिक हों, उतनी ही उत्तम हैं। ज्ञान को मस्तिष्क का रत्न भण्डार कह सकते हैं। जो जितना अधिक विज्ञ है, वह अपनी सूझ-बूझ को इतनी विकसित कर लेता है कि अपनी ही नहीं, दूसरों की समस्याओं का भी समाधान कर सके। स्वयं ही ऊँचा न उठे वरन् दूसरों को भी ऊँचा उठा सके, आगे बढ़ा सके। अन्यान्य सम्पदाएँ तो आती-जाती रहती हैं, पर ज्ञान का वैभव भण्डार ऐसा है जिसे काम में लाते रहने पर भी वह निरन्तर बढ़ता ही रहता है, घटता नहीं।

इसीलिए स्वाध्यायशील होना एक बड़ा सद्गुण बताया गया है। सिसरो ने कहा है- “प्रकृति की अपेक्षा स्वाध्याय से अधिक मनुष्य श्रेष्ठ बने हैं।” जबकि शेली का कहना है कि “जितनी ही हम अध्ययन करते हैं, उतना ही हमको अपने अज्ञान का आभास होता जाता है।” इसी कारण श्रुति में कहा गया है- “स्वाध्यायान्नाप्रमदः” अर्थात् स्वाध्याय के क्षेत्र में मनुष्य को प्रमाद नहीं करना चाहिए। वस्तुतः प्रगतिशील विचार धारा-प्रेरणा एवं तत्परता उत्पन्न करने के लिए सत्साहित्य नितान्त आवश्यक है। सत्संग से भी यही प्रयोजन आँशिक रूप से पूरा होता है।

इन दो के अतिरिक्त दो उपाय-उपचार ज्ञान वृद्धि के और भी हैं। इनमें से एक है चिन्तन, दूसरा मनन। अपनी समस्याओं का कारण एवं निदान तलाश करने पर अपने आप भी मिल सकता है। सत्य तो यह है कि अपनी समस्याओं के संबंध में दूसरा कोई इतनी अच्छी तरह जान नहीं सकता जितना कि हम स्वयं जानते हैं। पर पक्षपात, पूर्वाग्रह की एक परत मन-मस्तिष्क पर ऐसी जमी होती है जो अपने को सदा निर्दोष बताती रहती है। जो विग्रह या संकट हैं, उनके दोष दूसरों पर मढ़ती रहती है। दूसरों को सुधारना, बदलना अपने हाथ में नहीं है। जब अपना मन ही कहना नहीं मानता तो दूसरों को उस प्रकार के परिवर्तन हेतु सहमत कैसे किया जा सकता है? जब दूसरों की विवशता और परिस्थितियाँ हम नहीं समझ पाते तो उनके साथ न्याय भी कैसे कर सकेंगे? आमतौर से होता यही है कि हम अपनी कठिनाई, अड़चनों का कारण स्वयं ही होते हैं। यह तथ्य समझ में नहीं आता। जब किसी तथ्य की जड़ तक नहीं पहुँचा गया तो उसका निश्चित एवं सही समाधान भी कैसे निकले?

ज्ञान के क्षेत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है- आत्म ज्ञान, क्योंकि अपना आपा ही सदा अपने साथ रहता है। उसी की निकृष्टता-उत्कृष्टता के आधार पर हमारा पतन और अभ्युदय होता है। अपनी दुर्बलताएँ और त्रुटियाँ दूसरों के ऊपर आरोपित होती हैं। रंगीन चश्मा पहन लेने से सारी वस्तुएँ रंगीन दिखाई पड़ती हैं। इसी प्रकार अपना अनगढ़ पर दूसरों पर तरह-तरह के दोषारोपण करता है। यों इस संसार में भले-बुरे सभी प्रकार के लोग हैं। दुष्ट और भ्रष्टों की भी कमी नहीं, पर उनसे निपटना सन्तुलन बनाये रहकर जितनी अच्छी तरह हो सकता है, उतना विग्रह और आक्रमण-प्रत्याक्रमण के आधार पर नहीं। दुरात्मा भी प्रायः उन्हीं पर हाथ छोड़ते हैं, जिन्हें अपने शिकंजे में कस लेने में सरलता देखते हैं। जब उन्हें प्रतीत होता है कि मक्खियों के छत्ते में हाथ डालने पर हाथों हाथ परिणाम भुगतना पड़ेगा तो वे भी मौन साध लेते हैं। इसलिए अपनी समर्थता बनाये रहना भी दुष्ट दुरात्माओं का आक्रमण रोकने या उससे निपटने का सही तरीका है।


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“कोई चमत्कार दिखाइये तो जानूँ कि संसार में सचमुच आत्मा और परमात्मा नाम की कोई वस्तु है।” एक सज्जन ने महर्षि रमण से प्रश्न किया। महर्षि शाँत हो गये और गम्भीर विचार की मुद्रा में बोले- तात! अनन्त काल से सूरज आ जा रहा है, मर मरकर जी रहा है, तारागण चमक रहे हैं इस विराट् से बड़ा और चमत्कार क्या हो सकता है। जिज्ञासु की शंका का समाधान हो गया, उन्होंने अनुभव किया जीवन का प्रादुर्भाव ही ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है।

सबसे बड़ी कमजोरी अपने में यह पाई जाती है कि हम आत्मावलोकन नहीं कर पाते। अपने को हर स्थिति में निर्दोष मानते हैं और दूसरों की कमियों को बढ़ा चढ़ा कर देखते हैं। किन्तु इतने पर भी यह संभव नहीं कि दूसरों को अपनी इच्छानुसार बदल या ढाल सकें।

सड़क में गड्ढे हों तो शॉक एब्जार्बर्स एवं कमानी वाली गाड़ी उस पर चलने पर झटके नहीं अनुभव होने देती। पैरों में जूते हों तो कंटीले, पथरीले पथ पर भी आसानी से चला जा सकता है। संसार का प्रवाह-प्रचलन बदलना कठिन है पर हम अपनी रीति-नीति और आदतें तो आसानी से बदल सकते हैं। इससे पूर्व आवश्यकता इस बात की है कि आत्म समीक्षा की बुद्धि विकसित हो। हम अपने गुण, कर्म और स्वभाव का पर्यवेक्षण करें एवं जो अनुपयुक्त है, उसे सुधारें। जिन सद्गुणों की कमी हो, उन्हें बढ़ायें। आत्मसमीक्षा का सबसे सही तरीका यही है कि अपनी दुष्प्रवृत्तियों को खोज-खोज कर बुहारते चलें एवं सज्जनता में जितनी कमी है, उसे पूरी करते चलें। आलस्य और प्रमाद से बचना, अपने को नियमित, संयमित एवं मृदुल बनाना, ऐसा उपचार है, जिसे अपनाकर अपने को सही अर्थों में प्रगतिशील और समुन्नत बनाया जा सकता है।

आत्मबोध की एक ऊँची कक्षा भी है, जिसमें अपने को ईश्वर का युवराज मानते हुए उसके विश्व उद्यान को सींचने-समुन्नत करने में दायित्व रहने का दायित्व कंधों पर आता है। अपनी अपूर्णताओं को दूर करने के लिए सेवा धर्म अपनाना पड़ता है। सभी आध्यात्मिक कृत्यों में कुछ न कुछ कर्मकाण्ड जुड़ा रहता है। आत्मशोधन और लोकमंगल यह दो कार्य ऐसे हैं जिन्हें सरलतम, श्रेष्ठतम साधन-विधान समझा जा सकता है। जप-ध्यान से, पूजा-अर्चा से तो मात्र आत्मशुद्धि का प्रयोजन ही आँशिक रूप से सधता है, किन्तु परमार्थ पारायणता का- सेवा साधना का- उपचार ऐसा है जिसके सहारे व्यक्ति अनायास ही सद्गुणी और परमार्थी बनता जाता है। यह आत्मिक प्रगति की ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें आत्मशोधन के अतिरिक्त लोक कल्याण भी जुड़ा हुआ है और अपना ही नहीं, सभी का भला होता है।

आत्म ज्ञान की उच्च भूमिका में अपने को ईश्वर का अंश मानने का निर्देशन है। ईश्वर सत्प्रवृत्तियों का, श्रेष्ठता का समुच्चय है। अंशी और अंशधर में समानता होनी चाहिए। आग के साथ सट जाने वाला ईंधन अग्निवत् ज्वलन्त हो जाता है। अपने को ईश्वर मानने की कल्पना करते रहने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। बात तब बनती है, जब मान्यता को व्यवहार में उतारा जाय। जो अपने को ईश्वर का अंश या ज्येष्ठ पुत्र मानेगा, वह उसे कल्पना की उड़ान तक सीमित न रखकर उसे कार्यान्वित भी करेगा। इस कर्तृत्व में दो बातों का समावेश होता है। एक यह कि अपने कायकलेवर व मस्तिष्क को देवालय के रूप में विनिर्मित किया जाय, जिसमें चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता के रूप में प्रतिष्ठित देखी जा सके और व्यक्तित्व में देवोपम सत्प्रवृत्तियों का समावेश हो।


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भगवान महावीर उधर से गुजर रहे थे। रास्ते में मिले एक ग्रामीण ने उनके चरणों में गिरकर प्रणाम किया। उत्तर में अर्हन्त ने भी उसके चरणों पर मस्तक टेका। ग्रामीण सकपकाया। बोला- “आप तपस्या के भण्डार हैं उस विभूति को मैंने नमन किया। पर मैं तो कुछ भी नहीं हूँ मेरा नमन किस लिए।” अर्हन्त ने कहा- “तेरे भीतर जो परम पवित्र आत्मा है मैं उसी को देखता हूँ और नमता हूँ। मेरे तप से तुम्हारा सत्य बड़ा है।”

आत्मसत्ता की जानकारी उपलब्ध होना ज्ञान गरिमा का सर्वोच्च स्तर है। भौतिक पदार्थों, इतिहासों, भूखण्डों, शिल्पों, दर्शनों की जानकारियाँ भी समय-समय पर काम आती रहती हैं। उनके सहारे कुशलता बढ़ती है और उपार्जन तथा सम्मान की संभावना बढ़ती है। किन्तु स्मरण रखा जाय कि इन सबमें बड़प्पन आत्म ज्ञान का ही है। आत्म ज्ञान उथला है या गहरा, इसका परिचय हम किसी के भी व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व का मूल्याँकन करते हुए ही कर सकते हैं।


स्वर्ग नरक इसी धरती पर विद्यमान

लोक-लोकान्तरों के अद्यावधि किये गये सर्वेक्षण से पता चलता है कि समस्त ब्रह्मांड में पृथ्वी अपने ढंग की अनोखी है। इसके निवासी प्राणियों की सभ्यता-संरचना अन्य लोकों के संभावित प्राणियों की तुलना में कही अधिक श्रेष्ठ हैं। अन्य ग्रह नक्षत्रों की परिस्थितियों को देखते हुए वहाँ प्राणियों के होने की बात समझ में तो आती है, पर उनमें इतनी सुन्दरता, सुविधा और परिस्थितियों के अनुकूलन की सूझ-बूझ नहीं हो सकती। क्योंकि ताप, प्रकाश और ध्वनि का ऐसा सुयोग किसी लोक में कदाचित ही बन सके जैसा कि इस धरातल पर है। पृथ्वी का धरातल ठण्डा होकर जल से भर गया था और पवन चलने लगी थी, तब उन प्रारंभिक दिनों में यहाँ पर उत्पन्न हुए जीवधारियों की स्थिति भी विलक्षण थी। पानी में अमीबी स्तर के- शैवाल वर्ग के प्राणी वनस्पति उत्पन्न हुए, जबकि थल पर कछुए और सूकरों के दर्शन होते थे। पानी में मछलियाँ उपज पड़ी थीं। यह स्थिति तत्कालीन वातावरण के कारण बहुत दिनों तक बनी रही। इसके पीछे वाले युग में महागज, महासरी सृप जैसे प्राणियों ने जन्म लिया। अवतारों की शृंखला में भी मत्स्यावतार-कूर्मावतार, वाराहावतार, नृसिंहावतार, ह्यग्रीव अवतार आदि की स्थिति का वर्णन विकासकाल के इसी क्रम का परिचय देता है।

सौर-मण्डल के ग्रह-उपग्रहों को पहले से ही जाना जा चुका है। अब अन्तरिक्ष की पहुँच के भीतर वाले अन्य सभी ग्रह पिण्डों की स्थिति जानी जा रही है। पर अपनी पृथ्वी जैसी सुविधाजनक परिस्थिति और उतनी ही सुनियोजित आकृति-प्रकृति के बुद्धिमान प्राणियों का पता नहीं चला। कभी यह माना जाता था कि धरती ब्रह्मांड की केन्द्र है। पर अब सृष्टि की विराटता की जानकारी होने पर भी इतना तो माना ही जाने लगा है कि यह धरित्री सृष्टा की कलाकृति है। उसे बड़े मनोयोगपूर्वक बनाया गया है,किसी सौंदर्य दृष्टि वाले कलाकार द्वारा। बाह्य प्रतिकूलताओं से बचाने के लिये आयनोस्फियर के 1600 किलोमीटर चौड़ी परत के स्तर के एक से बढ़कर एक कवच पहनाए गये हैं। ब्रह्मांडीय किरणें अति घातक मानी जाती हैं। उनसे बचाव यह रक्षा कवच ही करते हैं। यही नहीं वे उन क्षुद्र ग्रहों- उल्कापिंडों। (एस्टेरॉइड्स) के प्रहार से भी धरती को बचाते हैं जो दो करोड़ प्रति मिनट की संख्या में सतत् अन्तरिक्ष में बरसते रहते हैं। ग्रहों का चूरा-मलबा भटकता-भटकता पिण्ड नक्षत्रों से जा टकराता है। इन टकराहटों के कारण ही हमारा चन्द्रमा खाई खड्डों से भरा कुरूप बन गया है। अन्य ग्रह भी इसी प्रकार क्षत-विक्षित होते रहे हैं, किन्तु पृथ्वी ही है जो कवचों की आड़ में अपनी रक्षा कर लेती है। अन्य, जल और वायु का ऐसा सुन्दर सन्तुलन यहाँ है, जिसका प्रभाव उसे सदा प्रगतिशील एवं फला-फुला बनाये रखता है।

आकाशीय उल्काएँ- ग्रह पिण्ड कभी-कभी रक्षा कवच बेध कर धरातल तक चली आती हैं। किन्तु इनसे कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रहार से आबादी वाला क्षेत्र प्रभावित हुआ हो। अधजली उल्काएं पृथ्वी पर गिरती तो रहती हैं, पर आश्चर्य इस बात का है कि वे प्रायः समुद्रों अथवा पहाड़ों पर ही गिरती हैं। प्राणियों को किसी प्रकार की असाधारण क्षति पहुँचाने वाला उपद्रव नहीं करती। वस्तुतः मानवी प्रकृति के संसाधनों में इतने प्रकार के आधार विद्यमान हैं, जिनके कारण मनुष्य को इतना अधिक साधन सम्पन्न बनाने का अवसर मिला है कि उसने अपने को विश्व का मुकुटमणि और प्रकृति का अधिपति तक कहना शुरू कर दिया है।

मानवी आचार संहिता भी क्रमशः ऐसी बनती चली गई है जो मनुष्य को मर्यादाओं के अनुशासन में जकड़े रहती है। यदि ऐसा न होता तो सर्वत्र अराजकता फैल जाती और जंगल का कानून काम करता। दर्शन शास्त्र की, धर्म और आध्यात्म की ऐसी संरचना हुई है जिसके कारण व्यक्ति आदिम काल की तुलना में बहुत अधिक सभ्य एवं संस्कृत बन चुका है। यों अन्ध विश्वासों ने आस्थाओं के क्षेत्र में हानि भी कम नहीं पहुँचाई है।

जो वस्तु उपलब्ध नहीं होती अथवा प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देती, उसके अस्तित्व की कल्पना प्रायः लोग अन्यत्र किया करते हैं। ऊर्ध्वलोक की, स्वर्गलोक की मान्यता प्रायः इसी आधार पर बनी है। स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, शिवलोक आदि के रूप में ऐसी बढ़ी-चढ़ी सुखद-आनन्द भरी परिस्थितियाँ कल्पित की जाती हैं। इन्हें उपलब्ध करने के लिए अनेक देवाराधन, दान पुण्य एवं धर्मानुष्ठान किये जाते हैं। किन्तु यथार्थता समझ में आ जाने पर स्पष्ट हो जाता है कि यह स्वर्गानुभूति प्राप्त करने के लिए किसी अन्य लोक की यात्रा नहीं करनी पड़ती। वह अपने इसी लोक में, हर किसी के लिए हर कही उपस्थित है। यही कारण है कि इसे सुर दुर्लभ कहा जाता है। देवता इस लोक का आनन्द लूटने के लिए स्वर्ग से उतरकर प्रायः धरती पर आते हैं। ऐसी मान्यता है कि वे यहाँ आकर मानवी काया धारण करते हैं। भगवान को भी अवतार लेने हेतु धरती पर ही दौड़कर आना पड़ता है। अब तक पृथ्वी पर 24 अवतार होने का वर्णन मिलता है। अन्य धर्म की मान्यताओं को साथ लेकर चला जाय तो उनकी संख्या और भी अधिक हो जाती है। भगवान का भूलोक से असाधारण लगाव है। यहाँ की बिगड़ी परिस्थितियों को सुधारने के लिए स्वयं दौड़े आते हैं, जबकि अन्य लोकों में शीत-ताप सह्य बना देने तक उनका ध्यान नहीं गया या अवसर नहीं मिला।

स्वर्ग किसी स्थान विशेष का नाम नहीं है। परिमार्जित संतुलित एवं आदर्शवादी दृष्टिकोण ही स्वर्ग है। इसे अपना लेने पर किसी भी परिस्थिति में सुखी रहा जा सकता है, हँसते-हँसाते जिया जाता है। भीतर से उमगने वाला स्नेह-सौजन्य का निर्झर दूर-दूर तक के क्षेत्रों को हुलसाता और पुलकित करता है। गुण, कर्म स्वभाव की- चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की श्रेष्ठता अपने आप में इतनी महत्वपूर्ण है कि हर स्थिति में हर्षोल्लास की बहुलता खींचकर निकट ले आती है। इस प्रकार स्वर्ग जाना नहीं पड़ता, उसे अपने आकर्षक व्यक्तित्व की चुम्बकीय शक्ति से घसीट बुलाया जाता है। भगवान की तरह, देवताओं की भाँति स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक आदि भी मनुष्य के निकट तक रहने के लिए लालायित रहते हैं। अपने व्यक्तित्व का सिग्नल देकर उन्हें अपना सहचर-अनुचर बनाया जा सकता है। योगीराज अरविन्द ने सुपरचेतन के अवतरण के माध्यम से इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है।


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दो भूल जाने योग्य है। एक वह नेकी है जो अपने द्वारा किसी के साथ बन पड़ी और दूसरे वह बदी जो दूसरे ने अपने साथ की। दो याद रखने योग्य हैं एक- कर्तव्य। दूसरा- मरण।

नरक-पाताल भी अन्यत्र नहीं हैं और न वे किसी दूसरे के बनाए हुए हैं, न किसी के आधिपत्य में। वे भी अपनी ही दुर्बुद्धि, दुष्प्रवृत्ति और नीचता से सम्बन्धित हैं। जिस प्रकार तेज धूप में बैठने से शरीर गरम हो जाता है, ठीक उसी प्रकार उग्र, ओछे और स्वार्थी स्वभाव के कारण जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, उसी को अधोगामी पाताल या शोक संताप से भरा नरक कह सकते हैं।

भगवान ने हमें इस अलौकिक सुविधा सम्पन्न पृथ्वी पर सुरदुर्लभ मनुष्य शरीर देकर भेजा है। अब हमारा दायित्व है कि उसे श्रेष्ठ एवं समुन्नत बनाकर धरती पर स्वर्ग उतार कर दिखायें।


शिव का तत्वज्ञान

शिव भारतीय धर्म के प्रमुख देवता हैं। ब्रह्मा और विष्णु के त्रिवर्ग में उनकी गणना होती है। पूजा उपासना में शिव और उनकी शक्ति की ही प्रमुखता है। उन्हें सरलता की मूर्ति माना जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नाम से उनके विशालकाय तीर्थ स्वरूप देवालय भी हैं। साथ ही यह भी होता है कि खेत की मेंड़ पर किसी वृक्ष की छाया में छोटी चबूतरी बनाकर गोल पत्थर की उनकी प्रतिमा बना ली जाय। पूजा के लिए एक लोटा जल चढ़ा देना पर्याप्त है। सम्भव हो तो बेल पत्र भी चढ़ाये जा सकते हैं। फूलों की अपेक्षा वे नहीं करते। न धूप-दीप, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प, जैसे उपचार अलंकारों के प्रति उनका आकर्षण है।

क्या शिव कहीं हैं? हैं तो उनकी क्रिया पद्धति क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर बाल-विनोद की तरह नहीं दिया जाना चाहिए। उनका वर्चस्व साधारण मनुष्यों जैसा नहीं है कि उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी अनिवार्य साधन सामग्री जुटानी पड़े। वे सर्वव्यापी और निराकार हैं। सूक्ष्म तत्वों को शरीर धारण नहीं करना पड़ता। सूक्ष्म अपने आप में एक आकार है। इतना विस्तृत और व्यापक, जिसमें यह अपना विश्व और ब्रह्मांड सभी आसानी से समा सकें।

इस सृष्टि के प्राणी और सभी पदार्थ तीन स्थितियों में होकर गुजरते हैं- एक उत्पादन, दूसरा अभिवर्धन और तीसरा परिवर्तन है। सृष्टि की उत्पादक प्रक्रिया को ब्रह्मा, अभिवर्धन को विष्णु और परिवर्तन को शिव कहते हैं। मरण के साथ जन्म का यहाँ अनवरत क्रम है। बीच गलता है तो नया पौधा पैदा होता है। गोबर सड़ता है तो उसका खाद पौधों की बढ़ोतरी में असाधारण रूप से सहायक होता है। पुराना कपड़ा छोटा पड़ने या फटने पर उसे गलाया और कागज बनाया जाता है। नये वस्त्र की तत्काल व्यवस्था होती है। इसी उपक्रम को शिव कहा जा सकता है। वह शरीरगत अगणित जीव कोशाओं के मरते जन्मते रहने से भी देखा जाता है और सृष्टि के जरा-जीर्ण होने पर महाप्रलय के रूप में भी। स्थिरता तो जड़ता है। शिव को निष्क्रियता नहीं सुहाती। गतिशीलता ही उन्हें अभीष्ट है। गति के साथ परिवर्तन अनिवार्य है। शिव तत्व को सृष्टि की अनवरत परिवर्तन प्रक्रिया में झाँकते देखा जा सकता है। भारतीय तत्वज्ञान के अध्यवसायी कलाकार और कल्पना भाव संवेदना के धनी भी रहे हैं। उन्होंने प्रवृत्तियों को मानुषी काया का स्वरूप दिया है, विद्या को सरस्वती, सम्पदा को लक्ष्मी एवं पराक्रम को दुर्गा का रूप दिया है। इसी प्रकार अनेकानेक तत्व और तथ्य देवी देवताओं के नाम से किन्हीं काय कलेवरों में प्रतिष्ठित किये गये हैं। तत्व ज्ञानियों के अनुसार देवता एक से बहुत बने हैं। समुद्र का जल एक होते हुए भी उसकी लहरें ऊँची-नीची भी दीखती हैं और विभिन्न आकार प्रकार की भी। परब्रह्म एक है तो भी उसके अंग अवयवों की तरह देव वर्ग की मान्यता आवश्यक जान पड़ी। इसी अलंकारिक संरचना में शिव को भी मूर्धन्य स्थान मिला।

वे प्रकृति क्रम के साथ गुँथकर पतझड़ के पीले पत्तों को गिराते और बसन्त के पल्लव और फूल खिलाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें श्मशान वासी कहा जाता है। मरण भयावह नहीं है और न उसमें अशुचिता है। गंदगी तो सड़न से फैलती है। काया की विधिवत् अन्त्येष्टि कर दी गई तो सड़न का प्रश्न ही नहीं रहा। हर व्यक्ति को मरण के रूप में शिव सत्ता का ज्ञान बना रहे, इसलिए उनने अपना डेरा श्मशान में डाला है। वहीं बिखरी भस्म को शरीर पर मल लेते हैं। ताकि ऋतु प्रभावों का असर न पड़े। मृत्यु को जो भी जीवन के साथ गुँथा हुआ देखता है उस पर न आक्रोश के आतप का आक्रमण होता है और न भीरुता के शीत का। वह निर्विकल्प निर्भय बना रहता है। वे बाघ का चर्म धारण करते हैं। जीवन में ऐसे ही साहस और पौरुष की आवश्यकता है। जिसमें बाघ जैसे अनर्थों और अनिष्टों की चमड़ी उधेड़ी जा सके और उसे कमर में कसकर बाँधा जा सके। शिव जब उल्लास विभोर होते हैं तो मुण्डों की माला गले में धारण करते हैं। यह जीवन की अन्तिम परिणति और सौगात है- जिसे राजा व रंक समानता से छोड़ते हैं। न प्रबुद्ध ऊँचा रहता है और न अनगढ़ नीचा। सभी एक सूत्र में पिरो दिये जाते हैं। यही समत्व योग है, विषमता यहाँ नहीं फटकती।

शिव को नीलकण्ठ भी कहते हैं। कथा है- कि समुद्र मंथन में जब सर्वप्रथम अहंता की वारुणी और दर्प का विष निकला तो उसे शिव ने उस हलाहल को अपने गले में धारण कर लिया। न उगला, न पिया। उगलते तो वातावरण में विषाक्तता फैलती, पीने पर पेट में कोलाहल मचता। मध्यवर्ती नीति यही अपनाई गई। शिक्षा यह है कि विषाक्तता को न तो आत्मसात करें, न ही विक्षोभ उत्पन्न कर उसे उगलें। उसे कण्ठ तक ही प्रतिबन्धित रखें।

शिव का वाहन वृषभ है जो शक्ति का पुंज भी है, सौम्य-सात्विक भी। ऐसी ही आत्माएं शिव तत्व से लदी रहती और नन्दी जैसा श्रेय पाती हैं। शिव का परिवार भूत पलीत जैसे अनगढ़ों का परिवार है। पिछड़ों, अपंगों, विक्षिप्तों को हमेशा साथ लेकर चलने से ही सेवा सहयोग का प्रयोजन बनता है।

शिवजी का मस्तक ऐसी विभूतियों से सुसज्जित है जिन्हें हर दृष्टि से उत्कृष्ट एवं आदर्श कहा जा सकता है। मस्तक पर चन्दन स्तर की नहीं, चन्द्रमा जैसी संतुलन शीलता धारण की हुई है। सिर से गंगा की जलधारा बहने से आशय ज्ञान गंगा से है। मस्तिष्क के अन्तराल में मात्र “ग्रेमैटर” न भरा रहे, ज्ञान विज्ञान का भण्डार भी भरा रहना चाहिए ताकि अपनी समस्याओं का समाधान हो एवं दूसरों को भी उलझन से उबारें। वातावरण को सुख शान्ति मय कर दें।

शिव के तीन नेत्र हैं। तीसरा नेत्र ज्ञान चक्षु है, दूरदर्शी विवेकशीलता का प्रतीक जिसकी पलकें उघरते ही काम देव जलकर भस्म हो गया। सद्भाव के भागीरथ के साथ ही यह तृतीय नेत्र का दुर्वासा भी विद्यमान है और अपना ऋषित्व स्थिर रखते हुए भी दुष्टता को उन्मुक्त नहीं विचरने देता, मदमर्दन करके ही रहता है।

तीन भव बन्धन माने जाते हैं- लोभ, मोह, अहंता। इन तीनों को ही नष्ट करने वाले ऐसे एक अस्त्र की त्रिपुरारि शिव को आवश्यकता है, जो हर क्षेत्र में औचित्य की स्थापना कर सके। यह शस्त्र त्रिशूल रूप में धारण किया गया- ज्ञान, कर्म और भक्ति की पैनी धाराओं का है।

शिव डमरू बजाते और मौज आने पर नृत्य भी करते हैं। यह प्रलयंकर की मस्ती का प्रतीक है। व्यक्ति उदास निराश और खिन्न विपन्न बैठकर अपनी उपलब्ध शक्तियों को न खोए, पुलकित प्रफुल्लित जीवन जिए। शिव यही करते हैं, इसी नीति को अपनाते हैं। सर्पों को वे गले लगाते हैं ताकि वे काटना छोड़ें, अपनी सुन्दर चमक-दमक से जन-जन का मन मोहें।

ऐसी ही अनेक सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय है- शिव। उनकी इन विशेषताओं को हम समझें भी और अपनायें भी।


राजसूय यज्ञ (Kahani)

राजसूय यज्ञ हुआ। सभी प्रमुख व्यक्तियों को काम बाँट दिए गए। कृष्ण को अधिक सम्मानित समझकर कोई काम नहीं दिया गया।

कृष्ण को खाली समय गंवाना बुरा लगा और खोज कर अपने लिए एक महत्वपूर्ण काम निकाल लिया। अतिथियों के पैर धोना और जूठी पत्तलें उठाना।


दिव्य ज्योति दर्शन की ध्यान धारणा

गायत्री माता को “सूर्य मण्डल मध्यस्था” सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान कहा गया है। इस महामन्त्र के विनियोग में गायत्री छंद- विश्वामित्र ऋषि एवं सविता देवता का उल्लेख है। प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य को सविता कहा गया है। वस्तुतः यह ज्ञान स्वरूप परमात्मा का नाम है। अग्नि पिण्ड सूर्य तो उसकी स्थूल प्रतिमा भर है। ईश्वर की स्वयंभू प्रतिमा सूर्य को कहा गया है। ॐ उसका स्वोच्चारित नाम है।

सूर्य को प्रकाश और तेज का प्रतीक माना गया है। चेतना क्षेत्र में इस ज्ञान को प्रकाश कहा गया है। लेटेन्ट लाइट, डिवाइन लाइट, ब्रह्मज्योति आदि शब्दों में मानवी सत्ता में दैवी अवतरण के प्रकाश के उदय की संज्ञा दी गई है। सूर्य का ध्यान करते समय साधक की भावना रहती है कि सविता देव से निस्सृत दिव्य किरणें मेरे कायकलेवर में प्रवेश करती हैं। फलस्वरूप स्थूल शरीर में बल, सूक्ष्म शरीर में ज्ञान और कारण शरीर में श्रद्धा का संचार करती हैं। तीनों शरीर इन अनुदानों सहित अवतरित होने वाले प्रकाश से परिपूर्ण होते चले जाते हैं। यह संकल्प जितना गहरा होता है, उसी अनुपात से चेतना में उपरोक्त विविध विशेषताएं विभूतियाँ उभरती चली जाती हैं। इस प्रकार यह ध्यान आत्म-सत्ता के बहिरंग एवं अन्तरंग पक्ष को विकसित करने में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है।

प्रकाश ध्यान का आरम्भ सूर्य को पूर्व दिशा में उदय होते हुए परिकल्पित करने की भावना से होता है। उसकी किरणें अपने काय-कलेवर में प्रवेश करती हैं और तीनों शरीरों को असाधारण रूप से सशक्त बनाती हैं। स्थूल शरीर को अग्निपुंज, अग्निपिण्ड-सूक्ष्म शरीर को प्रकाशमय, ज्योतिर्मय, कारण शरीर को दीप्तिमय, कान्तिमय, आभामय बनाती हैं। समूची जीवन सत्ता ज्योतिर्मय हो उठती है। इस स्थिति में स्थूल शरीर को ओजस्, सूक्ष्म को तेजस् और कारण शरीर को वर्चस् के अनुदान उपलब्ध होते हैं। इस ध्यान धारणा का चमत्कारी प्रतिफल साधक को शीघ्र ही दृष्टिगोचर होने लगता है। स्थूल शरीर में उत्साह एवं स्फूर्ति, सूक्ष्म शरीर में संतुलन एवं विवेक, कारण शरीर में श्रद्धा एवं भक्ति का दिव्य संचार इस प्रकाश ध्यान के सहारे उठता, उभरता दीखता है। मोटी दृष्टि से यह लाभ सामान्य प्रतीत हो सकते हैं। किन्तु जब इस अन्तःविकास की प्रतिक्रिया सामने प्रस्तुत होगी तो प्रतीत होगा कि यह सामान्य साधना कितना असामान्य प्रभाव परिणाम उपलब्ध कराती है।

सूर्य के प्रकाश ध्यान का प्रथम चरण बाहर के सूर्य की दिव्य किरणों का प्रवेश आत्मसत्ता में कराने का है। दूसरा चरण अन्तः सूर्य की मान्यता परिपुष्ट करके उसका प्रकाश बाह्य जगत में फैलाने का है। इस अपने अनुदान विश्व मानव के लिए प्रेरित करने की प्रक्रिया कह सकते हैं। प्रथम चरण को संग्रह और दूसरे को विसर्जन कह सकते हैं। द्वितीय चरण की अंतःक्षेत्र में सूर्योदय होने की मान्यता है। स्थूल शरीर का मध्य केन्द्र- नाभिचक्र, सूक्ष्म शरीर का आभाचक्र और कारण शरीर का हृदयचक्र है। इनमें से किस साधक को किस केन्द्र पर ब्रह्म चेतना के प्रतीक सविता देव के उदय की भावना करनी चाहिए। इसका निर्धारण अपनी व्यक्तिगत स्थिति का सूक्ष्म पर्यवेक्षण करते हुए करना होता है।

अन्तः सूर्य की धारणा परिपक्व होने पर उसका प्रकाश निकटवर्ती क्षेत्र को प्रकाशित करता ही है, साथ ही उसका प्रभाव बाह्य जगत में भी फैलता है, इससे वातावरण में किन्हीं सामयिक सत्प्रेरणाओं को सुविस्तृत किया जा सकता है। मनुष्य के किसी वर्ग विशेष को उपयोगी प्रेरणाओं से प्रभावित किया जा सकता है। किसी व्यक्ति विशेष के अभावों की पूर्ति भी इस आधार पर की जा सकती है। मनुष्येत्तर प्राणियों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसी प्रकार वनस्पति जगत-पदार्थ सम्पदा की स्थिति में सुधार करने के लिए भी अन्तः सूर्य की क्षमता का परिपोषण होना सम्भव है। यह कितना प्रभाव उत्पन्न कर सकेगा, यह इस पर निर्भर है कि साधक का संयम बल, मनोबल और श्रद्धाबल किस स्तर का है। यह समर्थता साधना की प्रखरता और व्यक्तित्व की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती है।

ध्यानयोग में ज्योति दर्शन की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करते हुए शास्त्रकार कहते हैं:-

नत्तेजो दृश्यते येन क्षणमात्रं निराकुलम्।

सर्वपाप विनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्॥

-शिव संहिता

भावार्थ:- आत्मा का यह परमतेज जो पुरुष चिर स्थित होकर क्षण मात्र भी देखता है वह सब पाप से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है।

ज्योतिः पश्यति योगीन्द्रः शुद्धं शुद्धा चलोपमम्। तत्राभ्यास बलेनैव स्वयं तद्रक्षको भवेत्॥

-शिव संहिता

ज्योति का ध्यान करने वाले साधक की ज्योति जब अचल हो जाती है तब वह साधना ही अपने बल से साधक की रक्षा करती है।

ध्यानयोग में ज्योति दर्शन के भेद उपभेद समझाते हुए शास्त्रकार कहते हैं:-

स्थूलं ज्योतिस्तथासूक्ष्मं ध्यानस्यत्रिविधं बिंदु।

स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजो मयं तथा।

सूक्ष्म बिन्दुमयं ब्रह्म कुंडलनी पर देवता॥

-घेरण्ड संहिता 6/1

ध्यान तीन प्रकार का होता है- स्थूलध्यान, ज्योतिर्ध्यान एवं सूक्ष्मध्यान जिसमें मूर्ति, इष्ट देवता अथवा गुरु का चिन्तन हो उसे स्थूल और जिसमें तेजोमय ब्रह्म या शक्ति की भावना हो उसे ज्योतिर्ध्यान कहते हैं। जिस ध्यान के द्वारा बिन्दुमय ब्रह्म कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान हो उसे सूक्ष्म ध्यान कहते हैं।

गायत्री महाशक्ति की आरम्भिक साधना में माता के रूप में साकार उपासना की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु उच्चस्तरीय साधना के लिए प्रकाश ध्यान को ही अपनाना पड़ता है। गायत्री की उच्चभूमिका सवितामय बन जाती है। गायत्री का प्राण प्रकाश पुंज सविता देवता ही है, अस्तु समुन्नत भूमिका के साधक प्रकाश के ध्यान का ही अवलम्बन करते हैं। विभिन्न प्रसंगों में श्रुति यही कहती आयी है। ताण्ड्योपनिषद (10/5/3) कहता है- “तेजसा वे गायत्री एवं ज्योतिर्वे गायत्री छन्दसाम्” (13/7/2) यजुर्वेद कहता है- “सविता वे प्रसकानामीशे अर्थात् सबको उत्पन्न करने वाला परमेश्वर सविता है।” छांदोग्योपनिषद् में ऋषि कहते हैं-

य एष आदित्ये पुरुषोदृश्यते सोहमस्मि स एवाहम स्मीति॥

अर्थात् “आदित्य-मण्डल में जो पुरुष देखा जाता है वह मैं हूं। उसे अपना ही स्वरूप समझना चाहिए” शास्त्रकार आगे कहते हैं-

आदित्य मण्डल ध्याये त्परमात्मा नमव्ययम् शौनक स्मृति।

आदित्य मण्डल में अव्यय परमात्मा का ध्यान करना चाहिए।

सविता सूर्व भूतानां सर्वभावांश्च सूयते।

सर्वनात्प्रेरणाच्चैव सविता तेन चोच्यते॥

अर्थात्- “समस्त सत्वों, सभी प्राणियों और समस्त भावनाओं को प्रेरणा देने के कारण ही उसे सविता कहते हैं”।

यो देवः सवितास्माकंधियो धर्मादि कर्मणि।

प्रेरयेत्तस्य तर्द्गस्तद्वरेण्यमुपस्यहे॥

अर्थात्- जो सविता देवता हमें धर्म एवं कर्तव्य की प्रेरणा करता है। उसके वरेण्य भर्ग की हम उपासना करें।

प्रत्यक्ष अग्नि सूर्य भी प्राण-चेतना का प्रतीक है। अस्तु उसका संपर्क सान्निध्य भी साधक में प्राण संचार करता है। यह प्राण प्रतिभा भी आत्मिक प्रगति के लिए कम महत्वपूर्ण नहीं है। प्राणाग्नि उपलब्ध करने के लिए भी सूर्योपासना की उपयोगिता है। इस तथ्य का प्रतिपादन इस प्रकार शास्त्रों में उपलब्ध होता है।

प्राणः प्रजानामुदयत्मेष सूर्यः

-प्रश्नोपनिषद्

प्रजा के लिए प्राण बनकर सूर्य उदय होता है।

समृता को परब्रह्म का प्रतीक माना गया है। शत पथ ब्राह्मण को श्रुति है-

आदित्ये ब्रह्म इति आर्दशः

आदित्य ब्रह्म ही है। वह परंपरागत तथ्य है।

सूर्य को आत्मा और परमात्मा का सम्मिश्रण भी कहा गया है-

यो असौ आदित्य पुरुषः सो असौ अहम्।

-यजु

जो इस सूर्य मण्डल में जो पुरुष है वह मेरी ही आत्मा है।

इसी कारण ऋग्वेद में ध्यान के लिए प्रातःकाल के उदीयमान सूर्य को सर्वोत्तम माध्यम माना गया है। “अथ आदित्य उदयन प्राची दिशां सर्वान् प्राणान् रश्मिसु सन्निधते” मन्त्र में प्रातःकाल के उदीयमान सूर्य की किरणों को प्राण वर्षा करने वाली कहा गया है। आत्मसत्ता में प्राण तत्व का आकर्षण अभिवर्धन करने के लिए इस ध्यान प्रक्रिया का विशेष महत्व है।

उपासना में मध्यकालीन प्रौढ़ सूर्य को नहीं प्रभात कालीन स्वर्णिम सूर्य को ही उपयुक्त माना गया है। भावना संज्ञा उसी की है। ध्यान में स्वर्ण कान्ति वाले नवोदित सविता का ध्यान करने का ही निर्देश है। इसकी फलश्रुतिओं का साधक को शीघ्र ही अनुभव होने लगता है।

प्रकाश ज्योति की साधना करने वाले साधक को कई प्रकार की कई आकृतियों की कई रंगों की ज्योतियों के दर्शन होते हैं। यह भ्रान्तियाँ नहीं हैं वरन् सूक्ष्म लोक की विशेष धाराएँ हैं। जिस प्रकार नादयोग में कई प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं और उन सब के पीछे कुछ दिव्य संकेत संदेश होते हैं। इसी प्रकार बिन्दुयोग साधना के अंतर्गत किये जाने वाली सविता देव की प्रकाश ज्योति की ध्यान धारणा में भी कई रंगों के प्रकाशों का दर्शन होना भी दिव्य अनुभूतियों की श्रेणी में ही गिना जायगा।

ध्यानयोग के लिए आश्रय किसी भी प्रतीक के अथवा परमात्मा के दिव्य विराट् रूप के चिन्तन रूप में लिया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन गुणों का ध्यान किया जा रहा है वे साधक को कितना अनुप्राणित कर पाए, उसके जीवन में किस सीमा तक उतरे। ध्यान से सिद्धि बाद की बात है, पहले सविता के ध्यान द्वारा प्राण शक्ति के अपने अन्दर होने की धारणा की जाय वही उत्तम है।


द्रौपदी के स्वयंवर (Kahani)

द्रौपदी के स्वयंवर का समय था। राजकुमार बड़ी संख्या में आ गये। समय कम था। जयमाला बाणबेध की प्रवीणता की शर्त पर ही डाली जानी थी। सो प्राथमिक परीक्षा की व्यवस्था की गई। जो उसमें उत्तीर्ण हो, वही असली मत्स्य बेध की प्रतियोगिता में सम्मिलित होगा। द्रोणाचार्य को प्रथम परीक्षक नियुक्त किया गया।

प्रतियोगी राजकुमार बारी-बारी से आते गये। एक नकली मछली निशाने की जगह रखी गई। परीक्षार्थी जब निशाना साधने के लिए उद्यत होते तब उनसे प्रश्न पूछा जाता- “तुम्हें मछली के कौन-कौन से अवयव दिखते है?”

उत्तर में जो अनेक अवयव दिखने की बात कहते उन्हें अनुत्तीर्ण ठहरा दिया जाता। एक अर्जुन ही ऐसा निकला, जिसने कहा- “देव मुझे मछली की आँख के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखता।” इस उत्तर से द्रोणाचार्य संतुष्ट हुए। उसे अन्तिम प्रतियोगिता में भेजा गया जहाँ उसने निशाना बेधा और स्वयंवर जीतकर द्रौपदी को वरण किया।

समग्र एकाग्रता से ही सफलता की सुनिश्चितता होती है/


सन्तों के वरदान और अनुदान

किसी के पास अपनी उपार्जित सम्पत्ति हो, वह इच्छानुसार चाहे जिसे दे सकता है, चाहे जिस काम में खर्च कर सकता है। उस वैभव को अपनी सुख-सुविधा में लगावे या किसी और को हस्तांतरित कर दे, यह उसकी अपनी मन-मर्जी की बात है। यह क्रम आदिकाल से चलता रहा है और अनन्तकाल तक चलता रहेगा।

लोग अपनी कमाई को पूरी तरह अपने लिए खर्च नहीं करते, वरन् स्त्री-बच्चों की सुख-सुविधा में खर्चते रहते हैं और मरने के उपरान्त उसे उन्हीं के लिए छोड़ जाते हैं।

आध्यात्मिक उपार्जन भी धन कमाने की तरह है। उसे इतनी मात्रा में भी कमाया जा सकता है कि उससे आत्म कल्याण जैसे प्रयोजन पूरे हो सकें और बचत को किसी अन्य उपयोगी काम के लिए किसी प्रामाणिक व्यक्ति को हस्ताँतरित किया जा सके। ऐसे क्रिया-कलापों को शक्तिपात या वरदान कहते हैं।

रामकृष्ण परमहंस के पास आध्यात्मिक सम्पदा प्रचुर मात्रा में थी। वे उसका उपयोग भारतीय संस्कृति के प्रसार-विस्तार में लगाना चाहते थे; पर स्वयं इस स्थिति में नहीं थे कि विश्व भ्रमण कर सकें। नई पीढ़ी के बुद्धिजीवियों को अपनी क्षमता के आधार पर प्रभावित कर सकें, इसके लिए उन्हें किसी सहायक की आवश्यकता थी। विवेकानन्द उन्हें मिल गये। ठोंक-बजाकर परख लिया कि आदमी प्रामाणिक भी है और सुयोग्य भी। उनने निश्चय किया कि इस युवक के लिए चिर साध्य साधना में लग कर अपनी कमाई के बलबूते वह प्रयोजन पूरा कर सकना कठिन पड़ेगा। इसमें लम्बा समय चला जायेगा और जो काम तत्काल किये जाने योग्य हैं, उनमें विलम्ब हो जायेगा। सरल उपाय यही था कि वे अपनी आध्यात्मिक सम्पदा हस्तान्तरित कर दें। परमहंस जब शरीर छोड़ने लगे तो पास ही बैठे विवेकानन्द के शरीर पर अपना पैर रखा उनके शरीर में बिजली कौंध गयी। चकित होकर उनने गुरु की ओर देखा। उत्तर मिला- “जो कुछ पास में था, सो सब दे दिया। अब इसे अभीष्ट प्रयोजनों में लगाना। मैं इस शरीर से जा रहा हूँ सो इस काया को ठिकाने लगा देना।” विवेकानन्द ने वही किया। अमानत को उन्हीं के काम में लगाया। अपनी निज की किसी महत्वाकांक्षा के लिए उसमें से रत्ती भर भी खर्च नहीं किया। वे जब विदेशों में प्रचार के लिए गये तो उन्हें हर घड़ी यही अनुभव होता रहा कि कोई दिव्य शक्ति उनकी वाणी और मस्तिष्क पर छाई हुई बोल रही है। अस्त-व्यस्त होती हुई संस्कृति में प्राण लौट आये। शक्तिपात सार्थक हो गया।

समर्थगुरु रामदास को देश की पराधीनता पर बड़ा क्षोभ था। चारों ओर जो अत्याचार हो रहे थे, वे उनसे सहन न होते थे। किन्तु अपना स्वरूप और उद्देश्य छोड़ना भी उनसे नहीं बन पड़ता था। अपना कार्य उन्हें किसी अन्य के माध्यम से कराने की सूझी। पर इसके लिए पात्रता आवश्यक थी। कुपात्र के हाथ में शक्ति जाने में तो सर्प को दूध पिलाने और अनर्थ ही हस्तगत होता है। उनकी निगाह शिवाजी पर गई; पर बिना जाने अपना उपार्जन ऐसे ही किसको दे दिया जाय? सिंहनी का दूध लाने और मुस्लिम तरुणी को माँ कहकर लौटा देने के उपरान्त उन्हें पात्रता पर विश्वास हो गया। उन्होंने शिवाजी को शक्ति दी। भवानी तलवार भी। सामान्य मराठा बालक को उन्होंने छत्रपति बना दिया और स्वतंत्रता संग्राम का शुभारम्भ चल पड़ा।

भारत पर मध्य एशिया के शक-हूण बार-बार हमला करते और लूट-पाट करके चले जाते थे। इस स्थिति से चाणक्य को बहुत क्षोभ था। उनने आक्रमणकारियों से निपटने और सीमित भारत को विशाल भारत बनाने के लिए एक दासी की कोख से पैदा हुये चन्द्रगुप्त को चुना। वे स्वयं तो नालंदा विश्वविद्यालय की व्यवस्था में संलग्न थे। चन्द्रगुप्त को सफलताएँ मिलती चली गयीं और वे भारत का, सुदूर क्षेत्रों तक विस्तार करने में समर्थ हुये। आक्रमणकारियों की तो उनने कमर ही तोड़ दी।

गान्धी जी सर्वोदय का काम करना चाहते थे। पर राजनीति उन्हें छोड़ नहीं रही थी। उनने विनोबा को चुना और वे देश में रचनात्मक कार्यों को अग्रगामी बनाने में सफल हुये।

यह वे घटनायें हैं, जिनमें उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तपस्वियों ने अपना तप सत्पात्रों को हस्ताँतरित किया है। स्वामी दयानन्द की सफलताओं का परोक्ष श्रेय उनके गुरु स्वामी विरजानंद को जाता है।

यह एक तथ्य है कि उच्च उद्देश्यों के लिए तपस्वियों की एवं देवताओं की कृपा उपलब्ध होती है। गाँधी का व्यक्तित्व दैवी अनुकम्पा से चमका था। महामना मालवीय हिन्दू विश्वविद्यालय की, श्रद्धानंद गुरुकुल कांगड़ी की, हीरालाल शास्त्री वनस्थली बालिका विद्यालय की स्थापना जैसे महान कार्य अपने व्यक्तित्व के बलबूते नहीं, वरन् दैवी अनुकूलता के सहारे ही कर सके। सुग्रीव, विभीषण, नरसी मेहता, सुदामा आदि को उच्चस्थिति प्राप्त कराने में भगवान ही सहायक रहे। भागीरथ द्वारा गंगावतरण की प्रक्रिया में शिवजी का कम योगदान नहीं रहा। शिव से ही परशुराम ने वह कुल्हाड़ा प्राप्त किया था, जिसके द्वारा उन अकेले ने ही अगणित अनीति करने वाले सत्ताधीशों के सिर काट दिये। हनुमान सुग्रीव की चाकरी करते समय नगण्य थे; पर जब वे राम काज के लिए तत्पर हुए तो जामवन्त ने अपना विपुल पराक्रम उनके सुपुर्द कर दिया बुद्ध ने कुमारजीव को वह सामर्थ्य प्रदान की थी जिसके बलबूते वे चीन तथा उसके समीपवर्ती देशों में बौद्ध धर्म व्यापक बनाने में सफल हुये।

उदारमना तपस्वी अनेक बार दीन-दुखियों की भी सहायता करते रहते हैं और व्यक्तिगत सहायता करके ऊँचा उठाने में भी प्रसन्नता अनुभव करते हैं। गुजरात के बापा जलाराम का अन्न क्षेत्र सर्व साधारण के लिए खुला रहा और अब तक खुला हुआ है। यह कार्य व्यक्तिगत पुरुषार्थ के आधार पर संभव नहीं होते। श्रेय प्रदान करने के लिए दैवी अनुग्रह ही पृष्ठभूमि में काम करता है।

राजा दिलीप को कोई संतान नहीं होता थी। वे गुरु वशिष्ठ के आश्रम में कुछ समय तपस्यारत रहे और वहाँ से पुत्र प्राप्ति का वरदान लेकर वापस लौटे। कुन्ती की मनोकामना देवताओं ने पूर्ण की थी। च्यवन अपने जर्जर शरीर का कायाकल्प करने में अदृश्य शक्ति की कृपा से ही समर्थ हुये थे। कर्ण को कवच-कुण्डल और अर्जुन को गाण्डीव देवताओं से ही प्राप्त हुआ। यह व्यक्तिगत सहायता थी। इसके पीछे ऐसी शर्त नहीं थी, कि इन अनुदानों का उपयोग परमार्थ के लिए ही करना पड़ेगा। टिटहरी समुद्र से अण्डे वापस लेने के लिए चोंच में भर-भर कर बालू डाल रही थी। उसके सत्साहस से प्रभावित अगस्त्य मुनि ने समुद्र सोख कर उस पक्षी के अण्डे वापस दिलाये थे। यह सर्वथा व्यक्तिगत अनुदान थे। प्याऊ, अस्पताल, अन्न क्षेत्र आदि जाकर कोई खाली हाथ नहीं लौटता।

रोते को हँसता देखकर प्रसन्न होने के लिए भी कितने ही उदारमना दानवीरों की तरह अपनी अध्यात्म सम्पदा खर्चते रहते हैं। बच्चे गुब्बारा खिलौना पाकर उछलते-कूदते हैं। पैर में चोट लगने पर मरहम पट्टी कर देने, भूखे को रोटी खिला देने और प्यासे को पानी पिला देने पर जो खुशी उन्हें होती है, उसे देख कर सेवा करने वाले को भी कम प्रसन्नता नहीं होती। संतजन ऐसी बिना बदले की आशा के भी बहुधा सेवा-सहायता किया करते हैं। सूर्य-चन्द्रमा का प्रकाश हर घर तक पहुँचा है। पवन सभी को प्राण बाँटता है। धरती सभी का बोझ सहती है। बादल सर्वत्र बरसते हैं; वे यह नहीं देखते कि यह भले का खेत है या बुरे का। रोतों को हँसा देने में आत्मवादियों को कम प्रसन्नता नहीं होती।

बहुमूल्य सिद्धियाँ अपनी सुयोग्य बेटियों की तरह होती हैं, जिन्हें बड़े लाड़-चाव से, धन खर्च करके बढ़ाया और पढ़ाया जाता है; उन्हें किसी के हाथ सौंपते समय पिता को यह सोचना पड़ता है कि यह किसी कुपात्र के घर न चली जायं। उसे जान बूझकर कोई पिता कुपात्र के याचना करने पर भी देने को तैयार नहीं होता; किन्तु साधारण कठिनाइयों में सेवा-सहायता करना तो मानवी धर्म है। दयालुता को छोड़ते भी नहीं बनता। घर पर आये भिक्षुक को कोई खाली हाथ नहीं जाने देता। पानी घर में होते हुये भी प्यासे को दुत्कार देने से सज्जनता चली जाती है। जब वृक्ष अपनी छाया में हर किसी को बैठने देते हैं और अपनी टहनियों के बीच पक्षियों को प्रसन्नतापूर्वक घोंसला बनाने देते हैं, तो फिर मनुष्य ही ऐसा क्यों कर बने कि जिनकी कष्ट कठिनाइयाँ अपनी सामर्थ्य के भीतर हैं, उन्हें निराश लौटने दें। अतिथि-सत्कार का कर्तव्य पालन सन्तजन भी करते हैं और कठिनाइयों से उबारने के लिए स्वयं पानी में कूद कर डूबतों को बचा लेते हैं यह रीति-नीति तपस्वियों को भी सुहाती है। पर वे औचित्य की सीमा को सदा ध्यान में रखते हैं। ऐसा नहीं होने देते कि उनके किसी अनुदान का दुरुपयोग हो। किसी की बन्दूक उधार माँगकर कोई शिकार खेलता फिरे, तो ऐसी सहायता भी अनुपयुक्त ठहराई जायेगी। नशा पीने के लिए सहायता करते रहना दान नहीं, वरन् दूसरे का भविष्य बिगाड़ना है। दिये हुए का उपयोग किसने किस प्रयोजन के लिए किया, यह तो विचार करने और ध्यान रखने योग्य ही है।

ऋषि का यह कथन उचित ही है कि “मैं राज्य नहीं चाहता न सुख, न स्वर्ग न मुक्ति। दूसरों के दुःख दूर करने भर की मेरी कामना है।” मरते समय भगवान बुद्ध ने कहा था कि जब तक एक भी प्राणी बंधन में बँधा है, तब तक उसे मुक्त करने के लिए मैं बार-बार जन्म लेता रहूँगा। ऐसी उदारता अध्यात्म चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है और हमेशा रहेगी।


जिन्दगी का कारवाँ (Kahani)

एक बार अरब लोगों का एक काफिला रेगिस्तान से होकर गुजर रहा था। दिन में आग बरसती तो वे सुस्ताते और रात को थोड़ी ठंडक होने पर चल पड़ते।

एक रात वे देवताओं के इलाके से होकर गुजर रहे थे। सुनसान अंधेरी रात में देवताओं की गरजन भरी आवाज सुनाई पड़ी। वे डरे , बहुत पर देवताओं की बात सुनने और आए हुए आदेशों को पालने में ही खैर मनाने लगे।

पहली आवाज आई- ‘रुको’ वे सब रुक गए। दूसरी आवाज थी- ‘मुझे’ वे झुक गए। तीसरा आदेश मिला- ‘जमीन पर बिखरे कंकड़ बीनो और जेबें भरकर चल पड़ो।’ उनने वैसा ही किया। अन्तिम निर्देश था- ‘सवेरा होने तक कहीं ठहरना मत। बस जब सूरज निकलेगा। तो तुम सुखी भी बहुत होगे पर दुःख भी कम न होगा।’

कारवाँ के राहगीर डर के मारे काँप रहे थे। देवताओं के आदेश मानने के अतिरिक्त और कोई चारा न था। किसी प्रकार रात पूरी की।

सवेरा होते ही देखा तो, उनकी जेबों में कीमती हीरे, मोती भरे थे। सो वे सचमुच बहुत सुखी हुए। पर जब यह ख्याल आया कि वस्तुस्थिति का उस समय पता क्यों न लगा- इस बात पर दुख भी कम नहीं हुआ। उस क्षेत्र में हीरे की खान थी। यह पता चलता तो ऊंटों का असबाब उढ़ेल कर वे हीरों से बोरे भर सकते थे।

जिन्दगी का कारवाँ देवताओं के इलाके से गुजरता है पर हम स्तब्ध, भयभीत कुछ सुखी और बहुत दुःखी होकर मंजिल पार करते हैं।


श्रद्धा और अन्ध श्रद्धा

श्रद्धा के साथ सद्भावना और विश्वास का समावेश होता है। विश्वास के लिए तो व्यक्तिगत मान्यता ही पर्याप्त है। ठग, विश्वासघाती कोई ऐसा प्रपंच रचते हैं जिससे भोले-भावुक व्यक्ति जाल में फँस जाते हैं और अपना सब कुछ गँवा बैठते हैं। पीछे भूल पर पछताते हैं। अच्छे लोग भी कभी-कभी विश्वासीजनों का शोषण करते देखे गए हैं।

श्रद्धा वस्तुतः किन्हीं आदर्शों पर अवलम्बित होनी चाहिए। कर्तव्य पालन, सच्चाई, ईमानदारी, जिम्मेदारी, नीतिमत्ता, सेवा-भावना, न्यायनिष्ठा के प्रति गहरी श्रद्धा होना उचित है। आत्म गरिमा और समाजगत हित-साधना में सदाचरण, सज्जनता, उदारता जैसे सद्गुण आते हैं। इनके प्रति अटूट श्रद्धा होने के पीछे आदर्श भी है, न्यायनिष्ठा भी एवं प्रामाणिकता भी। इन सद्गुणों को अपनाने से अपनी गरिमा निखरती है और दूसरों की भलाई होती है। संयम-अनुशासन भी इसी प्रकार पालने योग्य है। अपने आपको उच्छृंखल न बनने दें। इतना विलास और वैभव उपलब्ध न करें जो अन्यान्य मध्यवर्ती लोगों को प्राप्त नहीं है। अतिशय सम्पदा-अपव्यय, पाखण्ड, प्रदर्शन, जैसे दुर्गुण सिखाती है। यदि कोई औसत नागरिक स्तर के निर्वाह से अधिक कमाता है तो औचित्य इसी में है कि उस बुद्धि-वैभव, बल-पराक्रम को दुर्बलों को उठाने, उठतों को बढ़ाने और असमर्थों की सेवा-सहायता में लगायें। सत्प्रवृत्ति संवर्धन की विधि-व्यवस्था में खर्च करें। मर्यादाओं का पालन करें और वर्जनाओं का व्यतिरेक न होने दें। श्रद्धा का क्षेत्र यही है।

बहुधा लोग अपने देवता, सम्प्रदाय या गुरु आदि पर इतनी अधिक श्रद्धा आरोपित करते हैं कि उनके अतिरिक्त अन्य सभी प्रतिपादन झूठे या गर्हित प्रतीत होने लगते हैं। अपनी मान्यता के समर्थक शास्त्र सही लगते हैं और अन्य सभी को झूठा ठहराया जाता है। यह श्रद्धा का अतिरेक है, जिसके अपनी मान्यता-परिधि को छोड़कर और सब कुछ मिथ्या ही नहीं, घृणित भी प्रतीत होने लगता है। इसे अन्ध श्रद्धा कह सकते हैं। यह न सत्य की परिपोषक है, न उचित और न मानवी सौमनस्य के अनुकूल। इसमें दुराग्रह सन्निहित है।

दूसरे धर्मगुरु भी तपस्वी-सदाचारी हो सकते हैं। दूसरे सम्प्रदायों में भी अच्छी बात हो सकती है। दूसरे मंत्र या देवता भी श्रद्धानुरूप फल प्रदान कर सकते हैं। दूसरे शास्त्रों में भी नीति, न्याय और सदाचरण का समर्थन है; ऐसी दशा में उन्हें सर्वथा अमान्य कैसे ठहराया जा सकता है? हेय या तिरस्कृत कैसे किया जा सकता है?

इस संसार की सभी वस्तुएँ अपूर्ण हैं। उनमें कहीं न कहीं न्यूनता रहती है। पूर्ण तो एक परमात्मा है। पूर्ण सत्य तक अभी पहुँचा नहीं जा सका। इस तक पहुँचने के लिए बहुमुखी प्रयत्न चल रहे हैं और आशा की जा रही है कि देर-सबेर में उसका बड़ा अंश प्राप्त कर लिया जाएगा। संभवतः परब्रह्म और परमसत्य को मानवी बुद्धि की अल्पता समग्र रूप से समझ सकने में भी सफल न हो सके।

ऐसी दशा में अपनी ही मान्यताओं को पूर्ण मान बैठना और अन्य सभी को झूठा कहना दुराग्रह है। किसी की भी लिखी या कही बात को ईश्वरीय वाणी या पत्थर की लकीर मानना अनुचित है। जब मनुष्य अपूर्ण है तो उसकी कृतियाँ भी अपूर्ण हो सकती हैं। यह संभव है कि किसी धर्मगुरु की अन्तरात्मा ने अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुरूप कोई बात ईमानदारी से समझी और सच्चाई के साथ कही हो। पर यह नहीं कहा जा सकता कि संसार भर में प्रचलित अन्यान्य मान्यताओं में सभी गलत हैं और उनके प्रतिपादकों ने जो कुछ लिखा या कहा हो, वह मूर्खता या दुर्भावना से भरा हो। सत्य की ठेकेदारी हम अकेले ही लेते हैं तो उस महान तत्वज्ञान को अपनी छोटी अंजुलि में कैद करने का दुस्साहस करते हैं।

हमें सम्प्रदाय और संस्कृति के संबंध में विशेष रूप से मानवी विवेक को मान्यता देनी होगी। मानवी सदाचरण और विवेक एक हो सकता है। उसका मिल बैठ कर संशोधन, पुनर्नवीनीकरण भी किया जा सकता है। मंथन से नवनीत भी निकल सकता है। “जो सत्य है सो हमारा” यह कहना ठीक है। पर यह गलत है कि “हमारे द्वारा जो समझा व कहा जा रहा है, वही सत्य है।” गैलीलियो, न्यूटन, आइंस्टीन, हाइज़ेनबर्ग तक की तत्कालीन मान्यताएं जो कभी सत्य मानी जाती थीं, समय के प्रवाह व विज्ञान के विकास के साथ बदल गयीं।

वस्तुतः ईश्वर असीम है और मनुष्य ससीम। अपनी ससीमता के शिकंजे में असीम को जकड़ने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। ईश्वर एक है, कई नहीं। यदि उसे कुछ कहना होता तो सभी के लिये एक बात कहता। अनेक सम्प्रदायों के क्षेत्र में वह अनेक तरह की बातें कहे, अलग-अलग तरह के नियम बनाए, वह कैसे हो सकता है? जब सभी धर्म अपने मत को ईश्वर की वाणी कहते हैं, तो यह विचारणीय है कि उनके बीच अन्तर क्यों है? जब सभी शास्त्रकार और आप्तजन मान्य हैं, तो उनके प्रतिपादनों में अन्तर क्यों होना चाहिए? यहाँ निष्पक्ष विवेक को आधार मानकर चलते हैं तो यही मानना पड़ता है कि विभेदों की मत-मतान्तरों की दीवारें मनुष्यों की अपनी-अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के आधार पर सामयिक या क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान के लिए व्यक्त की गई हैं। उनमें से किसी पर भी उँगली उठाए बिना, किसी पर सन्देह या अविश्वास व्यक्त किये बिना यह हो सकता है कि आज की परिस्थिति के अनुरूप जितना औचित्य दृष्टिगोचर हो, उतना वहाँ से चुन लिया जाय और सभी शास्त्रों, आप्तवचनों का इसलिए सम्मान किया जाय कि अपने समय में उनकी भी उपयोगिता रही है। जिन गुरुजनों ने जो कहा है, वह सच्चाई-ईमानदारी से कहा है पर समय को क्या कहा जाय, जिसने परिस्थितियाँ भी बदली हैं और कसौटियाँ भी। ऐसी दशा में मान्यताओं और प्रतिपादनों के बीच अन्तर दीख पड़ना भी स्वाभाविक है। इसे हमें समझना और सहन करना चाहिए। जिस प्रकार वस्त्रों की डिजाइन की भिन्नता के कारण कोई किसी से लड़ता-झगड़ता नहीं, उसी प्रकार धर्म दर्शन के संबंध में भी इसी प्रकार की इतनी ही छूट होनी चाहिए कि जो जिसे रुचे, उसे वह अपनाये, पर दूसरों पर आक्षेप न करे। उन्हें निन्दनीय या नास्तिक या धर्मद्रोही आदि न ठहराये।

अपने प्रिय सम्प्रदाय, प्रतिपादनों, गुरु आदि के प्रति श्रद्धा रखना और उनका प्रतिपालन करना अपनी जगह उचित है। पर अनौचित्य तब आरम्भ होता है, जब हम अपनी मान्यता दूसरों पर थोपने का आग्रह करते हैं, इसके लिए उन्हें बाधित करते, सताते या फुसलाते हैं। मानवी मौलिक अधिकारों में विचारों की स्वतंत्रता की छूट है। प्रतिबंध वहाँ से आरम्भ होते हैं, जब वे नीति विरुद्ध होकर अपराधों की श्रेणी में जा पहुँचते हैं। उसके लिए राजदण्ड या समाजदण्ड ही पर्याप्त है। इसी के साथ आत्म प्रताड़ना भी सहनी पड़ती है, किन्तु किसी धर्म सम्प्रदाय के विषय में ऐसी बात नहीं है। वे सर्वग्राही, सर्वसम्मत एवं सार्वभौम नहीं है। हमारी ही तरह दूसरों को भी अपने दर्शन और प्रचलन को तब तक मानते रहने की छूट होनी चाहिए, जब तक वह दूसरों पर आक्षेप या आक्रमण न करे।


Quotation

जो प्रामाणिक हैं उन्हीं का विश्वास करो। जो अनेक कसौटियों पर खरे उतरें मात्र उन्हीं से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाओ। हर अवसर का मूल्याँकन करो और उसके सदुपयोग की बात सोचो। प्रगति के यही तीन तरीके है।

पिछले दिनों धर्म के नाम पर अधिकाँश सम्प्रदायों में रक्तपात हुए हैं। रिलीजियस फेनेटिसीज्म् का एक ताजा उदाहरण ईरान की ताजी स्थिति के रूप में देखा जा सकता है। इस कठमुल्लावाद से हिन्दू धर्म भी अछूता नहीं है। इतिहास साक्षी है कि धर्मोन्मादियों ने दूसरे मतावलम्बियों को दुष्ट या भ्रष्ट मानकर उन पर आक्रमण किया और अपने दुराग्रह की बलिवेदी पर असंख्यों का प्राण हरण किया।

अब हमें न्याय का अवलंबन लेना चाहिए। श्रद्धा को दुराग्रह की सीमा तक नहीं पहुँचने देना चाहिए। हम श्रद्धा का आश्रय लें, पर अंधश्रद्धा के गुलाम न बनें।


आध्यात्मिक साम्यवाद का दिशाधारा

ऋषि प्रणीत ग्रन्थों में न सिर्फ ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न धाराओं का समावेश मिलता है, वरन् उदात्त जीवन और आध्यात्मिक दृष्टिकोण के उच्च मानवी मूल्यों का निर्धारण भी वे करते हैं। इनमें एक ऐसे सार्वकालिक-सार्वदेशिक शाश्वत सत्य का प्रतिपादन मिलता है, जो सदा से मनुष्य का मार्गदर्शन करता आया है, किन्तु जब से हमने उस ओर उपेक्षापूर्ण दृष्टि अपनायी है, एक ऐसे युग का सूत्रपात हुआ है जिसमें मानवी आदर्श और नैतिक मूल्यों का सर्वथा अभाव ही दीखता है एवं उसकी जगह सर्वत्र अनैतिकता व छल-प्रपंच का ही बोलबाला है। यदि इस महामारी का कोई उपयुक्त उपचार नहीं हुआ, तो समस्त मानव जाति ही इसकी चपेट में आ सकती है, और युग-युगों से संजोयी अपनी सभ्यता-संस्कृति को खोकर विस्मृति के गहरे विवर में विलीन हो जायेगी।

ऐसी दशा में आशा की किरण हमें ऋषियों के कर्तव्य और व्यक्तित्व से मिलती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे आर्ष ग्रन्थ हैं, अस्तु फिर से हमें उस आप्त वचनों का स्मरण करना पड़ेगा, जो क्षुद्र स्वार्थपरता से ऊपर उठ कर धर्म-धारणा के अवधारण की प्रेरणा ही नहीं देते, अपितु विशाल दृष्टिकोण के अवलम्बन का पक्ष भी प्रस्तुत करते हैं।

श्रुति कहती है- “ध्रुवां भूमिं पृथ्वीं धर्मणा धृतामृ” अर्थात्, यह ध्रुव भूमि, यह पृथ्वी धर्म द्वारा धारण की गई है। यह सही भी है। जब तक धर्माचरण का अनुसरण यहाँ होता रहा, यह पृथ्वी प्रत्यक्ष स्वर्ग की उपस्थिति का एहसास कराती रही, किन्तु इससे विमुख होकर मनुष्यों ने न सिर्फ स्वयं को असुर तुल्य बना लिया, वरन् पृथ्वी पर भी भार बन बैठे। यह भार धर्म द्वारा ही कम हो सकता है। धर्म का अवलम्बन मनुष्य को श्रेष्ठ ही नहीं बनाता, अपितु वह सुख भी प्रदान करता है, जो आज सर्वत्र अनुपलभ्य है। इसी को अपनाये जाने की प्रेरणा देते हुए शास्त्रकार कहते हैं- “सृगां ऋतस्य पन्थाः” अर्थात् धर्म का मार्ग धारण योग्य है, यह सुखमय है, किन्तु यह स्थिति बोध कैसे हो? यह सुख कैसे मिले? इसका भी वेद में समाधान है। ऋषि कहते हैं- “समानो मंत्र समिति समानो समानं मनः सहचितमेषाम् समानो व आकूतिः समाना हृदयानिवः समानमस्तु वो मनोयधावः सुसहासति”, अर्थात् हम सब की मंत्रणा में, समितियों में, विचारों में समानता हो, दुर्भावना और वैषम्य न रहे, अभिप्रायों में, हृदयों व मनों में समता-एकता का भाव हो। स्पष्ट है, मनुष्य में जब ये भाव जगेंगे, तो उसका देवत्व उसकी क्षुद्रता को उखाड़ फेंकेगा, तभी उसे सच्चे सुख-शान्ति की प्राप्ति हो सकेगी।

लोक कल्याण की इस नैतिक वांछनीयता के साथ ही ऋषियों ने शोषण-वृत्ति और मत्स्य न्याय जैसे अवाँछनीय तत्वों की कटु आलोचना की है। जरूरतमंदों की अन्न-धन से सहायता नहीं करना, इसे अनैतिक माना गया है और इससे बचने की सलाह दी गई है। स्व-उपार्जित धन का सामान्य-निर्वाह स्तर तक उपभोग तो उचित बताया गया है, पर इससे आगे व्यय करने को सामाजिक अन्याय कहा गया है- “नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाधो भवति केवलांदी”

आगे श्रुति कहती है- “शतहस्तं समाहरं सहस्रहस्तं संकिर” अर्थात् सैंकड़ों हाथों में इकट्ठा करो और सहस्रों हाथों से बाँट दो।

ऋषि आत्म कल्याण के लिए प्रार्थना करता है- “यद भद्रं तन्न आसुव”, अर्थात्, जो भद्र है, कल्याण है, उसे हमें प्राप्त करायें, किन्तु वह मात्र आत्मकल्याण की ही बात नहीं सोचता, विश्वकल्याण के भी भाव उसमें उमंगते हैं, इसलिए वह कहता है-

“संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्व सं जानाना उपासते॥”

जिस प्रकार सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आदि देव अविरोध भाव से प्रेमपूर्वक अपना-अपना कार्य सम्पन्न करते हैं, वैसे ही हे मानवों! तुम भी समष्टि भाव से प्रेम-सौहार्दपूर्वक साथ-साथ कार्य सम्पादित करो।

ऋषि आगे कहते हैं- मात्र साथ-साथ कार्य करना ही पर्याप्त नहीं है अपने परिवार के सदस्य की भाँति अन्यों की सुरक्षा-सहायता का भी ध्यान रखो- “पुमानं पुमांसं परिपातु विश्वतः।” आगे तो यह आदर्श चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है। आप्त वचन है- ‘निर्वैरिः सर्वभूतेषु” और “न पाये प्रति पापः स्यात्साधुरेव सदा भवेत्।”

वर्तमान युग के मूर्धन्य विचारक और विद्वान नीतिवेत्ता भी इस युग विपन्नता को दूर करने के लिए उन्हीं मानवी आदर्शों की आवश्यकता पर जोर देते हैं, जिसका प्रतिपादन आर्ष साहित्य में मिलता है। इस क्षेत्र में इस युग के महान अर्थशास्त्री और मानवतावादी कार्लमार्क्स का नाम अग्रगण्य है, जिसने साम्यवादी समाज की विचारधारा की नींव रखी।

मार्क्स ने अपने मानववादी दर्शन में जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति एवं व्यक्ति के यथार्थवादी जीवन को ही अपना आदर्श माना है। वे अपने दर्शन में व्यक्ति को प्रमुखता नहीं देते और समाजगत दृष्टि को सामूहिक जीवन को ध्यान में रखते हुए विचार करते हैं। अस्तु, उनका समाज व्यक्तिवादी समाज न होकर साम्यवादी समाज है, जिसमें किसी व्यक्ति को महत्व न देकर पूरे समाज को महत्व दिया जाता है और “वन फॉर ऑल एण्ड ऑल फॉर वन” के सिद्धान्त पर कार्य करता है।

इस प्रकार मार्क्सवादी समाज में व्यक्ति के बीच सिर्फ आर्थिक-वित्तीय समानता ही नहीं पायी जाती, वरन् भावनात्मक एकता का अद्भुत सामंजस्य भी देखा जा सकता है। पारस्परिक सहयोग-सहकार और प्रेम-सौहार्द इस समाज की पहली विशेषता है, किन्तु इतने में ही मार्क्स व्यक्तित्व की पूर्णता का इतिश्री नहीं मान लेते। वे शारीरिक-मानसिक क्षमताओं के समन्वय में ही इसकी पूर्णता देखते हैं।

मार्क्स वर्तमान समाज से संतुष्ट नहीं हैं। वह इसे अमानवीय समाज की संज्ञा देते हैं और एक ऐसे जनतंत्र के बारे में विचार करते हैं, जो “एक वर्ग-एक राज्य” का पक्षधर हो। उनका पूर्ण विश्वास है कि आज का मानववाद एक दिन विकास के पूर्ण उत्कर्ष पर पहुँचेगा और मनुष्य अपनी खोयी गरिमा को प्राप्त कर पुनः देवोपम बनेगा।

मार्क्स ही नहीं, अन्य अनेक विद्वानों, विचारकों और मनीषियों ने भी इस बात को स्वीकारा है कि हमारे नैतिक मूल्यों में इस हद तक गिरावट आ चुकी है कि अब यदि आगे भी यह पतन जारी रहा, तो हमें दैत्य के धरातल पर पहुँचा देगा। अस्तु सब ने एक स्वर से इस बात की आवश्यकता समझी है कि वर्तमान त्रास से बचने के लिए अब हमें धर्म और अध्यात्म की शरण में जाना होगा। यह एकमात्र विकल्प है, जो हमें महाविनाश की सर्वग्राही स्थिति से बचाकर देवत्व के सर्वोत्कृष्ट स्तर तक पहुँचा सकता है। इसी में हमारा कल्याण है और मानव जीवन की सार्थकता थी।

टी. एस. इलियट ने अपनी प्रसिद्ध रचना “मानववाद पर पुनर्विचार” में देवत्वहीन मानववाद की कल्पना को अस्वीकार कर दिया है। वे धर्म को मानववाद की बैसाखी मानते हैं और एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं स्वीकारते। “ईस्ट एण्ड वेस्ट रिलीजन” नामक अपनी पुस्तक में डॉ. राधाकृष्णन ने धर्म के आधार पर अभिनव मानववाद की कल्पना की है और कहा है कि “मनुष्य के भौतिक और आध्यात्मिक कल्याण का सबसे श्रेष्ठ आधार धर्म है।” मूर्धन्य कैथोलिक मानववादी आकमारितां का कथन है कि सामाजिक विषमता को मिटा कर समता और एकता का भाव जगा सकना अध्यात्म द्वारा ही संभव हो सकता है। वे आज की विपन्न नैतिकता से उबरने का मार्ग बताते हुए लिखते हैं- इस पतनोन्मुख स्थिति से अब हमें धर्म-दर्शन ही त्राण कर विकास की स्थिति तक पहुँचा सकता है।

इन सबका विवेचन कर निष्कर्ष निकालते हुए प्रसिद्ध दार्शनिक बर्गसाँ ने कहा है कि शाँति आज मनुष्य के लिये मृगतृष्णा बनी हुई है। शाँति के सारे भौतिकवादी प्रयास अधूरे हैं। उसे बाह्योपचारों, सुविधा-साधनों द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। काण्ट और शापेन हॉवेर ने योगीराज अरविंद के ही कथन को कुछ और शब्दों में निरूपित करते हुए अन्तराल में उन उच्चस्तरीय मानवी मूल्यों की प्रतिष्ठापना की चर्चा की है, जो मानव-जीवन के बीच सेतु का काम कर सके, उनमें प्रेम-सौहार्द पनपायें और आज के शुष्क जीवन में रसात्मकता और रागात्मकता भर सकें। यही आध्यात्मिक साम्यवाद होगा।


कलमी आदमी नहीं बन सकते!

मूर्धन्य वैज्ञानिकों में एक विशेष महत्वाकांक्षा इन दिनों इस दिशा में जगी है कि प्राणियों का रूपांतरण करके उन्हें अधिक उपयोगी बनायें। इस दिशा में वे एक प्राणी की कोशिकाएँ दूसरे शरीर में प्रविष्ट कराते और यह देखते हैं कि संकरत्व का कैसा प्रतिफल होता है। इस दिशा में उनने वनस्पति वर्ग पर अधिक सफलता पाई। वस्तुतः प्रयास वैज्ञानिक मेण्डल द्वारा सर्वप्रथम वनस्पति जगत में ही किये गए एवं एक पौधे में दूसरे की कलम लगाकर क्रास ब्रीडिंग कर तीसरी किस्म का बनाने में उन्हें सफलता मिली।

शाक भाजियों, फूलों और फलदार वृक्षों पर यह प्रयोग बहुत सफल हुए हैं। यहाँ तक कि एक ही पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के फलों की कलमें सफलतापूर्वक लगा ली गयीं। वनस्पतिजन्य धान्यों की भी कई किस्में उत्पन्न की गई हैं। ये संकर प्रजातियाँ कहलाती हैं। इनके बीज भी बोये जाते हैं वे छोटी (ड्वार्फ) या बड़ी पौद भी लगाई जाती है।

चूंकि वनस्पतियों को भी उथले प्राणी वर्ग में ही गिना जाता है, अतः यह दुस्साहस किया गया कि सचेतन मन एवं बुद्धि वाले प्राणियों पर भी वह प्रयोग करके देखा जाये। इन प्रयासों में उतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि उन्हें वनस्पतियों में मिली थी। प्राणियों में ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं, साथ ही अपनी पृथक जाति एवं रुचि भी। इनका संकरस्य अधिक सफल नहीं हो सका। विजातीय रज एवं वीर्य परस्पर सम्मिश्रित नहीं हो सकते। जर्सी गायें तो उन्हीं गायों के परिवर्धित संस्करण हैं। अपवाद एक ही सामने आया है। गधे और घोड़ी के सम्मिश्रण से खच्चर उत्पन्न हुआ। किन्तु खच्चरों के युग्म न बन सके। वे नपुंसक ही रहे। इसके विपरीत गधी के गर्भाशय में घोड़े का वीर्य भी फलित न हुआ। कुछ समय पूर्व चीन में एक मादा चिंपैंजी का गर्भाधान पुरुष के शुक्राणु से कराया गया था। उद्देश्य एक ही था- ऐसी प्रजाति उत्पन्न हो जिसमें शक्ति-पौरुष चिम्पैंजी का हो किन्तु बुद्धि मनुष्य की। ऐसे प्रयोग असफल ही रहे हैं। वस्तुतः सभी प्राणि गंध प्रधान होते हैं। यौनाचार क्रिया में उन्हें सजातीय ही स्वीकार होते हैं। उत्तेजना होने पर भी एक वर्ग दूसरे वर्ग के प्राणी के साथ कामाचार हेतु उद्यत नहीं होते। कारण कि एक की उत्तेजना दूसरे पक्ष को प्रभावित नहीं करती।

फिर भी बायो इंजीनियरिंग के इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अभी हारे नहीं हैं। वे सोचते हैं कि आज नहीं तो कल वनस्पति स्तर के प्रयोग पशुओं में भी सफल होंगे। मुर्गे की कई प्रजातियाँ उत्पन्न की गयी हैं। इसी प्रकार क्षेत्र विशेष के सजातीय पशुओं का भी संकरत्व बन पड़ा है और उनके दुधारुपन श्रमशीलता एवं माँसलता में भी वृद्धि हुई है। इस हेरा-फेरी में भी मौलिक वर्ग वही रहा है। उस लक्ष्मण रेखा से हटकर कलम लगाने का प्रयोग एक प्रकार से कौतूहल बनकर ही रह गया है।

महत्व की बात मनुष्य से संबंधित है। प्रश्न रह-रह कर यही सामने आता है कि क्या मनुष्य में किसी अन्य प्राणी की या किसी अन्य प्राणी में मनुष्य की कलम लगाई जा सकेगी? शरीर संरचना की दृष्टि से बन्दर और मनुष्य आपस में मिलते जुलते हैं। चिंपैंजी, बनमानुष एवं गोरिल्ला भी बन्दर वर्ग के हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है। इनका मनुष्य के साथ प्रत्यावर्तन तो दूर, इन वानरों की भी मिश्रित प्रजातियाँ पैदा न की जा सकीं। कुत्ते और भेड़िये के सम्मिश्रण से बने वंशजों पर भी यही बात लागू होती है।

मनुष्यों में जलवायु के भेद से गोरी, काली, पीली जैसी कई नस्लें पाई जाती हैं। हड्डी की बनावट व शक्ल के हिसाब से भी कोई काकेशियन है, कोई मंगोलॉइड। पर वे मूलतः हैं सभी मनुष्य ही। इसलिए उनका संकरत्व चल जाता है। एग्लोइंडियन सरीखी जातियाँ माता-पिता के गुणों सम्मिश्रण लेकर भिन्नता लिए हुए विकास करने लगी हैं। नर व नारी में से जिसकी प्रौढ़ता परिपक्वता अधिक होती है, संतानों में उनकी विशेषता का अंश भी अधिक पाया जाता है। पर यह अन्तर आकृति में अधिक, प्रकृति में कम होता है। प्रकृति वातावरण या समाज के अनुरूप बनी है। यह प्रयास निराशाजनक ही रहा कि जाति गत संकरत्व से उनके गुणों में नवीनता उत्पन्न करके ऐसी पीढ़ी को जन्म दिया जाय जो उपयोगिता की दृष्टि से माता-पिता की तुलना में अधिक वरिष्ठ हो। कई बार तो उल्टा भी हुआ। संकरत्व से पैदा जाति पूर्वजों से भी घटिया निकली है।

प्रयोक्ताओं की चिन्ता यह है कि वर्तमान पीढ़ियों की तुलना में अगली पीढ़ियां अधिक समर्थ-बलशाली बनें। वे प्रतिभाशाली हों व सुन्दर भी। इसके लिए कभी माता को प्रमुख उत्पादक इकाई मानकर चलते हैं, तो कभी पिता के पौरुष को। इसी प्रयास में वे ऐसे जोड़ों के संयोग को महत्व देते हैं, जिनमें दोनों पक्ष विशेषताओं से भरे हों। पर बहुत खोजने पर भी मुट्ठी भर जोड़े ही ऐसे मिल सकते हैं। फिर उनका स्वास्थ्य भी समिति उत्पादन की क्षमता वाला होता है। उतने भर से विश्वभर के लिए व्यापक परिमाण में अभीष्ट स्तर के व्यक्ति नहीं पैदा हो सकते, न ही इस बात की कोई गारण्टी दी जा सकती है कि आगामी पीढ़ियां वातावरण से अप्रभावित रहकर अपनी श्रेष्ठता बनाये रखेंगी।

इस संदर्भ में अधिक माथा पच्ची करने से पूर्व वनस्पतियों और प्राणियों की मौलिक संरचना पर ध्यान देना चाहिए। वनस्पतियाँ शरीर मात्र हैं। उनमें यौनाचार नहीं है। बीज या गाँठ से वे अपना वंश चलाती व बढ़ाती रहती हैं। किन्तु प्राणियों में चेतना की अतिरिक्त मात्रा है, साथ ही कामुकता की संवेदना का एक विशेष स्तर भी। यह भी नर-मादा के उत्पादन उभार से संबंधित है। यह स्थिति संतुलित न हो तो मनुष्य या अन्य प्राणी नपुंसक कहलाएँगे। वृद्धावस्था में हारमोन्स के स्तर में परिवर्तन से उफान ठण्डा हो जाता है और संतानोत्पादन की क्षमता होते हुए भी वैसा बन नहीं पड़ता। वनस्पतियों के बारे में यह बात नहीं। गर्मी की सूखी घास वर्षा आते ही फिर हरियाने लगती है, जबकि प्राणी एक बार नष्ट होने पर दुबारा नहीं जीवित होते।


Quotation

उतावली न करो। प्रकृति के सब काम एक निश्चित गति से चलते हैं।

मानवी विशेषता मात्र शरीरगत नहीं है। अधिक से अधिक काया सुन्दर, सुगठित या बलिष्ठ हो सकती है। पर इसका बुद्धिमत्ता, प्रतिभा या कौशल से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। गांधी, विनोबा, राधाकृष्णन या अष्टाचक्र जैसे कायिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्ति भी उच्चस्तरीय हो सकते हैं, जब कि रावण, कुंभकरण जैसे अदूरदर्शियों की भी कभी नहीं होती।

मनुष्य आहार-विहार के संयम से स्वस्थ, दीर्घजीवी हो सकता है। पर इतने भर से काम कहाँ चलता है? महापुरुष, अतिमानव, ऋषि बनने के लिए दूरदर्शिता से भी अधिक शालीनता की आवश्यकता होती है। यह मात्र नर-नारी के कायिक संयोग भर से नहीं होता वरन् उसके लिए पीढ़ियों की परम्परा, पारिवारिक वातावरण चाहिए एवं ऐसे जोड़े जिनमें परस्पर प्रभाव ग्रहण करने की क्षमता हो, तभी वह सम्मिश्रण व्यक्तित्व का गठन करता है। वैसा माहौल बना करके ही व्यक्ति को चिन्तनशील, मनीषी, चरित्रवान एवं व्यवहारकुशल बनाया जा सकता है। इसलिए मनुष्य को वनस्पति व जीव-जंतुओं से भिन्न मानकर उसके निषेचन पर उतना ध्यान नहीं देना चाहिए जितना कि शालीनता के पक्षधर वातावरण पर।


सुरदुर्लभ मनुष्य जन्म की सार्थकता

मनुष्य जन्म को सुर दुर्लभ माना गया है। स्वर्ग में एकरसता है जिसके कारण कोई भी ऊब सकता है। देवता भी। दावतों में षटरस व्यंजन परोसे जाते हैं। गुलदस्ते में विभिन्न रंग के फूल जोड़े जाते हैं। आभूषणों में, वस्त्रों में विभिन्नता और विचित्रता के कारण ही उनका सौंदर्य निखरता है। मनुष्य जन्म में अनेक प्रकार की परिस्थिति का सामना करने में चातुर्य दिखाने तथा चित्र-विचित्र परिस्थितियों में निपटने का अवसर मिलता है।

इस विविधता और बहुलता के कारण मनुष्य जीवन को अधिक सरस और विविध मिश्रित होने के कारण सुखद माना गया है।

मनुष्य स्वर्ग जाने की इच्छा करता है। यह दूर के ढोल सुहावने वाली उक्ति है। जिस प्रकार एक जगह रहते-रहते ऊब आती है, एक जैसा भोजन करते-करते ऊब जाता है और नवीनता ढूंढ़ने को मन करता है। पर्यटन व्यवसाय इसी आधार पर चल रहा है। मनुष्य जिस प्रकार स्वर्ग लोक के तथाकथित आनन्दों का लाभ लेने के लिए लालायित रहता है, उसी प्रकार देवता भी अपनी एकरसता मिटाने के लिए मनुष्य लोक में जन्म लेने के लिए लालायित रहते बताये जाते हैं। देव पूजन में जितनी भी प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित होती हैं वे सभी मनुष्याकृति होती हैं। इससे विदित होता है कि मनुष्यता के साथ देवत्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है। इतना ही नहीं अपनी बहुलता और विविधता के कारण वह अधिक आकर्षक एवं अधिक श्रेष्ठ भी है।

सुर दुर्लभ होने के अतिरिक्त मनुष्य जन्म सृष्टा का श्रेष्ठतम उपहार भी है। इस निर्माण में परमात्मा ने अपना सारा कला-कौशल संजो दिया है। प्राणियों में इसकी तुलना का और कोई नहीं है। शरीर बल की दृष्टि से हाथी, सिंह आदि बलिष्ठ भी हो सकते हैं, पर ऐसा सौंदर्य ऐसा कला कौशल, बुद्धि वैभव और किसी को भी उपलब्ध नहीं है। इतनी जगह में इतनी प्रकार मुड़ तुड़ सकने वाला और अतिशय विचित्र कामों को कर दिखाने वाला शरीर और किसी प्राणी के पास नहीं है। यह विशिष्टता खेल प्रतियोगिताओं में सरकसों में भली भाँति देखी जा सकती है। शिल्प और कला-कौशल में उसकी चतुरता बाजीगरी जैसी प्रतीत होती है। अवसर और साधनों के अभाव में भी वह कितनी सफलताएँ प्राप्त कर लेता है, उन्हें जादुई ही कहा जा सकता है।

मनुष्य भौतिक एवं बहिरंग दृष्टि से सफल कहा जा सकता है। उसकी अन्तरंग जगत की जिन विभूतियों सिद्धियों का परिचय मिलता जाता है उससे यह सिद्ध होता है कि अणिमा, लघिमा, महिमा आदि जो देवोपम विलक्षणताएँ योगियों में पूर्व काल में देखी जाती थीं, उन्हें अब भी प्रकट एवं कार्यान्वित किया जा सकता है। सिद्ध पुरुषों की विभूतियाँ कपोल कल्पनाएँ नहीं वरन् ऐसी वास्तविकता थी जिन्हें इन दिनों भी प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। इसके उद्गम उन अतीन्द्रिय क्षमताओं में विद्यमान हैं जो इसी मानवी मस्तिष्क की विभिन्न गुहाओं में छिपी पड़ी हैं। मनुष्य के अन्तराल की विशिष्टताओं को ही अलंकारिक रूप से बाह्य देवता कल्पित किया गया है। इस मान्यता के अनुरूप तो स्वर्ग के देवता अंश रूप से इसी मानवी काया में विद्यमान माने जा सकते हैं। बाजार में बिकने वाले चित्रों में एक ऐसा भी बिकता है जिसमें गौ के शरीर में विभिन्न स्थानों पर देवताओं की स्थापना दिखाई गई है। गाय के सम्बन्ध यह प्रतिपादन अविश्वस्त भी हो सकता है किन्तु मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमताओं द्वारा हो सकने वाले चमत्कारों को देखते हुए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि देवगण अंश रूप में मानवी काया में भी रहते हैं। भले ही उनका समग्र अस्तित्व किसी लोक विशेष में स्वर्ग लोक में रहता हो। अतींद्रिय क्षमता केन्द्रों के माध्यम से सम्बन्ध सूत्र तो पहले से ही जुड़ा हुआ है। उसे भीतर से उभार कर बाहरी देवताओं को आमंत्रित-अवतरित किया जा सकता है। इस प्रकार मनुष्य और देव एक बन सकते हैं।

मनुष्य जीवन अनुपम एवं अद्भुत है। कहा जाता है कि चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करने के उपरान्त यह अवसर मिलता है। इसका सदुपयोग करने पर निजी अपूर्णताओं को पूर्ण किया जा सकता है और विश्व उद्यान को समुन्नत बनाकर अपना कर्तव्यपालन एवं ईश्वरीय अनुग्रह का सम्पादन किया जा सकता है। महामानव, सिद्ध पुरुष, देवात्मा अवतार आदि ऐसी ही उच्चस्तरीय पदवियाँ हैं जिन्हें दायित्वों को समझने और निबाहने वाले आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

84 लाख वर्ष के भ्रमण की अवधि इतनी बड़ी है कि इतने में प्रायः एक लाख मनुष्य जन्म बीत सकते हैं। इतनी अवधि तक दण्ड भुगतने, प्रतीक्षा करने पर फिर कहीं नये मनुष्य जन्म की बारी आती है। तब फिर वही भूल दुहराई जाने लगती है वासना, तृष्णा और अहंता का त्रिदोष जैसा सन्निपात ज्वर चढ़ बैठता है। उस नशे की खुमारी में उसी की पुनरावृत्ति की जाने लगती है जो पेट प्रजनन को लक्ष्य मानकर क्षुद्र योनियों में क्रियान्वित होती रहती है। इस संदर्भ में सभी प्राणी प्रवीण हैं। सभी पेट भरते हैं। सभी गर्भाधान का रस लेते हैं। सभी अपना बड़प्पन सिद्ध करने के लिए एक दूसरे पर गुर्राते और हमला बोलते हैं। यदि इसी की पुनरावृत्ति मनुष्य जन्म जैसे सुयोग के मिलने पर भी होती रही तो समझना चाहिए कि हीरे को कांच समझा गया और उसे कौड़ी मोल बेच दिया गया।

चन्दन के उद्यान को किसी अनजान लकड़हारे ने कोयला बनाकर बेच दिया था। मनुष्य भी यदि यही भूल करता है तो उसका दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति में यदि यह जीवन खप जाय और जिस सृष्टा ने बड़ी आशाओं के साथ यह धरोहर प्रदान की थी, उसके दरबार में खाली हाथ जाना पड़े तो उसे एक प्रकार की दुर्घटना ही कहना चाहिए।

मनुष्य में महत्वाकांक्षाएं उभरती रहती हैं, पर वे बहिर्मुखी होती हैं। उनमें लोकेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेषणा का बाहुल्य होता है। यह सभी बहिर्जगत से सम्बन्धित होती हैं। साधन व परिणाम भी बहिर्जगत से संबंधित हैं। पदार्थ द्रुतगति से चलता है। उसमें स्थिरता तनिक भी नहीं, क्षण भर के लिए भी नहीं। ऐसी दशा में विविध कामनाओं की पूर्ति के संदर्भ में भी यही क्रम चलता है। पानी में बुलबुले उठते और फूटते रहते हैं। यह अवरुद्ध हवा का व्यापक हवा से मिलने की व्याकुलता का खेल है। इसी खिलवाड़ में मनुष्य की जिन्दगी बीत जाती है और जब प्रतीत होता है कि सिंहासन पाने जैसा अवसर बालू की भीत बनाने की खिलवाड़ में बीत गया, तो पश्चाताप का ठिकाना नहीं रहता। यह अन्तः वेदना ही मृत्यु के समय भयंकर त्रास बनकर सामने आती है। जो समय महत्व प्राप्त करने का था, वह यदि विडम्बनाओं में ही बीत जाय तो उसकी क्षतिपूर्ति कैसे हो सकती है?

मनुष्य जीवन सुर दुर्लभ है। इसकी एक-एक घड़ी हीरे-मोतियों जैसी बनने योग्य है। इतनी बड़ी सम्पदा का उपयोग किस प्रकार किया जाय, यह जान लेना और कर गुजरता ही सुयोग की सार्थकता है।


Quotation

आदमी जब अपने को ही सब कुछ समझता है अपने लिए ही सोचता और करता है। तब वह कुकर्मरत होता है और संकटों की कटीली बाड़ में कैद होता है।


आत्मसत्ता की तथ्य सम्मत प्रामाणिकता

शारीरिक बनावट की दृष्टि से सभी मनुष्य प्रायः एक जैसे होते हैं, किन्तु अंतस् के स्तर में भारी अन्तर पाया जाता है। आन्ध्र हैदराबाद का एक बारह वर्षीय बालक ऐसी प्रांजल संस्कृत धारा प्रवाह से बोलता था, मानो वह उसे मातृभाषा के रूप में जन्मजात मिली है। इसी प्रकार कितने ही बालक बिना कारीगर शिक्षा पाये ऐसे कला कौशल का, बुद्धि चातुर्य का परिचय देते पाये गये हैं, जिससे प्रतीत होता है कि इन विभूतियों का अनुदान इन्हें किसी पिछले जन्म की कमाई से मिला है।

अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त करना तो योगाभ्यास का विषय है पर कितनों में ही अनायास रूप से ऐसी विशेषताएँ देखी जाती हैं, जिन्हें अद्भुत, अनुपम एवं आश्चर्यजनक कहा जा सके।

इन दिनों वैज्ञानिक क्षेत्र में मानवी अतीन्द्रिय क्षमताओं का प्रसंग चर्चा का विषय बना हुआ है। दूर संचार, दूरदर्शन, पूर्वाभास, स्वप्न संकेत अदृश्य सहायक मानवीय विद्युत विचार संचार, स्वसम्मोहन, शरीर विद्युत, हिप्नोटिज्म, प्रेत हलचल, पुनर्जन्म जैसे विषयों पर भारी खोज बीन जारी है। ढूंढ़े गये प्रमाणों से इन सभी प्रसंगों पर अनेकानेक ऐसे घटनाक्रम मिलते चले जाते हैं, जिन्हें गम्भीर परीक्षण के उपरान्त यथार्थता के रूप में समझा भी गया है। उन्हें उपहास में उड़ा देने की अन्ध-विश्वास बताने की या झुठलाने की हिम्मत बड़े-बड़े तार्किकों एवं अनास्था वादियों की भी नहीं पड़ रही है। शरीर में भिन्न चेतना की शाश्वत सत्ता के क्रिया कलापों को देखते हुए उन्हें मान्य शोध विषयों में सम्मिलित किया गया है।

मनुष्य शरीर का अस्तित्व जलने के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। उसका अस्तित्व किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं बना अवश्य रहता है। इस सम्बन्ध में धार्मिक मान्यताएँ तो न्यूनाधिक मात्रा में मिलती जुलती ही रही हैं। पर अब विज्ञान ने भी इस संदर्भ में अपनी हठधर्मिता छोड़ दी है कि शरीर मात्र चलता फिरता पेड़ पौधा ही है जो दिल की धड़कन बन्द होते ही अपनी सत्ता की इति श्री कर बैठता है। उपलब्ध प्रमाणों में दिवंगत आत्मा प्रेत-पितर के रूप में नित नये घटनाक्रम सामने आते रहे हैं। जिन्हें अन्धविश्वास या मन गढ़न्त भर नहीं कहा जा सकता।

बाइबिल में ईसा के बारे में लिखा है कि वे पूर्व जन्म में एलीसियस थे। इसके बाद वे ईसा के रूप में जन्मे। यह भी कहा जाता है कि वे फिर जन्म लेंगे और संसार का नये सिरे से कल्याण करेंगे।

थियोसोफिकल सोसाइटी का जन्म ही इस आधार पर हुआ कि उसमें शामिल वैज्ञानिकों का प्लेन्चेट द्वारा मृतात्मा से सम्बन्ध हुआ और उसके माध्यम से ऐसी सूचनाएं प्राप्त हुईं जिनकी प्रामाणिकता में कोई सन्देह न था। शोध के उपरान्त अनेक वैज्ञानिक तथ्यों ने मृतात्माओं के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिखाया और उस संदर्भ में आगे गहरी खोजें करते रहकर उस मान्यता को प्रामाणिकता का जामा पहनाया।

परामनोविज्ञान के घटना प्रसंगों के अंतर्गत कई ऐसे प्रामाणिक प्रसंग ऐसे व्यक्तियों से संदर्भित मिलते हैं जिन्हें देख पढ़कर उनकी विश्वसनीयता पर कोई संदेह नहीं रहता। कुछ स्वप्नों में मिली प्रेरणा से संबंधित होते हैं तो कुछ अनायास मिली अदृश्य प्रेरणा के रूप में। कुछ पुनर्जन्म संबंधी होते हैं तो कुछ पूर्वानुभूति के रूप में। अनेक व्यक्तियों को आने वाले घटना क्रम, विभीषिका, दुर्योग या समष्टिगत विपत्ति का आभास ऐसे होने लगता है, मानो उनकी आंखों के सामने फिल्म चल रही हो। उस समय तो सब कुछ रहस्यमय आश्चर्यजनक लगता है, पर जब यह सत्य सिद्ध होता है तो फिर अविज्ञात के संबंध में कोई दुविधा मन में रह नहीं जाती।

जॉनेथन सैमुअल ने अपनी एक काल्पनिक विज्ञान कथा में सौर मण्डल की स्थिति पर भी प्रकाश डाला है। एक जगह उसने लिखा है कि मंगल ग्रह के दो चन्द्रमा हैं जिनमें एक से दूसरे की चाल दूनी है।

उस समय उस कथन को कपोल कल्पना ही कहा गया पर उसके 154 वर्ष बाद वाशिंगटन की नवेलि आब्जर्वेटरी ने दूरबीनों की सहायता से ठीक वैसा ही पाया। मंगल ग्रह पर दो चन्द्रमा देखे गये। उनमें एक की अपेक्षा दूसरा दूने वेग से दौड़ता है। एच.जी. वेल्स की काल्पनिक कथाएँ भी बाद में कई अंशों तक सही पाई गई हैं।

आक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज में वहाँ के विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने मिलर परामनोविज्ञान सम्बन्धी शोधों के लिए एक सोसाइटी बनाई है, जिसका उद्देश्य है, अविज्ञात रहस्यों का मानवी अवचेतन के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध होने न होने की घटनाओं की जाँच पड़ताल करके निष्कर्ष निकालना। उसने इस प्रसंग में उपस्थित किये गये प्रयासों को झुठलाया नहीं है। साथ ही यह भी स्वीकार किया है कि इस संदर्भ में धैर्यपूर्वक लम्बे परीक्षण की आवश्यकता है।

भारत में बनारस नगर में “इंडियन सोसाइटी फॉर साइकिक एन्ड यौगिक रिसर्च” है। इसके अन्वेषकों ने भी यह माना है कि उपलब्ध प्रमाण ऐसे नहीं हैं जिन्हें उपहास में उड़ाया जा सके। उनकी गम्भीरता अधिक अन्वेषण की माँग करती है।

रूस में उत्रेखत्वस्की यूनीवर्सिटी ने परामनोविज्ञान के रहस्यवादी पक्ष को मान्यता दी है। उसने इस विषय पर 14 देशों की एक अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी भी बुलाई थी। नेल्या मिखाइलोवा नामक रहस्यवादी परामनोवैज्ञानिक इसी राष्ट्र की हैं व कई वैज्ञानिक इसका परीक्षण भी कर चुके हैं।

ब्रिटेन के सर ई.ए. वेलिंग्टन पुरातन भाषाओं और लिपियों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उनने अपने इस क्षेत्र में प्रवेश करने और सफलता प्राप्त करने के सम्बन्ध में एक स्वप्न संस्मरण लिखा है।

एक रात वे सोये हुए थे कि उन्होंने सपना देखा कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पुरातन विद्या का एक शोध विशेषज्ञ नियुक्त किया जाना है। उस प्रतियोगिता में उसे सम्मिलित हो जाना चाहिए। कोई शक्ति सफलता दिलाने में उसकी सहायता करेगी।

प्रतियोगिता वस्तुतः अगले दिन होने ही वाली थी। वेलिंग्टन को उसमें स्थान पाने की उत्कण्ठा भी बहुत थी। सपने के आश्वासन में उनका उत्साह बढ़ा। नियत तिथि आई तो उनने फिर एक सपना देखा जिसमें एक वयोवृद्ध उनके हाथ में परीक्षा के प्रश्न पत्र थमा रहा है। साथ ही एक पुस्तिका में उनके उत्तर भी लिखे थे। सोते-सोते ही उनने उन कागजों को कई बार पढ़ा और ऐसी मनःस्थिति बना ली, मानो उन्हें वह सब कुछ भली-भाँति याद हो गया है।

दूसरे दिन परीक्षा हुई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब ठीक वही प्रश्न पत्र सामने आये जो उन्होंने सपने में देखे थे। आश्चर्य यह है कि उत्तर उन्हें याद थे, सो लिखने में तनिक भी कठिनाई नहीं हुई।

पर्चे जाँचे गये। वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए और विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त हुए। उनने अत्यन्त दुरूह समझी जाने वाली प्राचीन लिपियों का सफल अन्वेषण किया। उनके प्रतिपादन को प्रामाणिक माना गया और कितने ही अविज्ञात रहस्यों का उद्घाटन हुआ।

इन सफलताओं के सम्बन्ध में उन्होंने बताया कि उन्हें लिपियों के रहस्य जानने में इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ी जितनी कि समझी जाती है। उन्हें किसी अदृश्य सहायक ने जो उन विधाओं का पारंगत था, सहायता की और प्रतिपादन इतनी जल्दी सम्पन्न हो गये जिसकी कोई आशा न करता था। जीवन भर वे पुरातत्व विधा पर ही अन्वेषण करते रहे व अपनी उपलब्धियों का श्रेय परोक्ष जगत में बैठी दैवी सत्ता को देते रहे।

प्रख्यात फिल्म कलाकार रोमान रोवारी उस दिन एक छोटे होटल में ठहरे हुए थे। होटल के मालिक की मृत्यु के उपरान्त उसके लड़कों के बीच सम्पत्ति के बटवारे का झगड़ा चल रहा था। पिता इस सम्बन्ध में मरने से पूर्व कोई वसीयत कर गये हैं क्या? इसका उन लड़कों को पता न था। झगड़ा रोवारो के सामने भी एक प्रतिष्ठित अतिथि के नाते आया। उसमें कहा गया कि कोई उपाय हो तो झगड़ा सुलझाएँ।

रोवारो इसी समस्या को अपने मस्तिष्क में लिए हुए सो गया। रात को उसे सपना आया कि वह वसीयत होने की आशा से होटल के तहखाने में लगी लोहे की अलमारी को खोल कर उसकी कुरेद-बीन कर रहा है इतने में रद्दी कागजों के ढेर के बीच उसे वसीयत मिल गई। खुशी का ठिकाना न रहा कि वह झगड़े को सुलझाने में कामयाब हुआ। इतने में उसकी नींद खुल गई। सवेरा होने में देर न थी। उठकर वह नित्य कर्म से निपटा और लड़कों को बुलाया। सपने की बात कही। किसी को विश्वास तो न हुआ फिर भी देखा तो तहखाने में सचमुच एक लोहे की अलमारी पायी गई। उसे ढूंढ़ने गया तो अन्य कागजों के बीच फँसी हुई वह वसीयत मिल गई।

उस आधार पर बटवारा हो गया और उस सपने ने एक बड़ी समस्या सुलझा दी।

पुलित्जर पुरस्कार विजेता अमेरिका निवासी मैकिनेल केन्टर ने अपनी पुस्तक में उस घटना का सुविस्तृत विवरण लिखा है जिसमें वाशिंगटन के एक छोटे होटल में किसी प्रेतात्मा के साथ उन्हें झगड़ना पड़ा था। लेखक के कथनानुसार कम्बल ओढ़ कर सोया ही था कि पैताने की ओर से कोई उसका कम्बल खींचने लगा। उसने आवाज दी पर कोई बोला नहीं। सोचा चूहा आदि कोई खटपट कर रहा होगा। उसने कम्बल कस कर पकड़ लिया तो भी वह खिंचता चला गया। आधा शरीर नंगा हो गया। इस पर वह उठ बैठा और चारों ओर कारण तलाश करने लगा। उसे दीवार से सटा हुआ एक व्यक्ति दिखाई दिया। साथ ही कमरे में अविज्ञात रोशनी एवं एक विचित्र गंध फैलाने लगी। भूत हँसा और फिर लड़ने, धमकाने की मुद्रा में सामने आ गया। अन्ततः मैकिनेल डरकर बाहर आ गया और दरवाजे से बाहर बैठकर रात गुजारी। फिर भी उसे कमरे में मनुष्यों की बात चीत सुनाई और हलचल दिखाई देती रही।

फ्रेडरिक मायर्स ने मनुष्य की रहस्यमय चेतना के सम्बन्ध में बहुत खोजा और बहुत लिखा है। वे उस सत्ता को “सबलिमिनल सेल्फ” कहते थे।

मायर्स ने संसार के विभिन्न क्षेत्रों में दौरे किये और दुर्घटनाओं को खोजा जो मनुष्य की सामान्य बुद्धि एवं क्षमता से परे थीं। बारह वर्षों के प्रयत्न से उसने प्रायः 400 ऐसी घटनाएँ खोजीं जिनका उत्तर सामान्य बुद्धि से नहीं दिया जा सकता और न कोई तार्किक उनकी यथार्थता पर सहज विश्वास कर सकता है, पर वे सभी सत्य थीं। प्रमाणों पर आधारित थीं।

मायर्स ने अपनी खोजों को वैज्ञानिकों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए परीक्षा की कसौटी पर कसा जाना पसंद किया। इस उद्देश्य के लिए उसने “साइकिक रिसर्च सोसाइटी” का गठन किया। उसमें तार्किक और वैज्ञानिक प्रत्यक्षवादी सम्मिलित किये। इस जाँच पड़ताल द्वारा यह पाया गया व प्रमाणित किया गया कि पूर्वाभास और दूरदर्शन के कितने ही अनुभव सही भी होते देखे गये हैं। उनने प्रेतात्माओं की हलचल को भी प्रामाणिक सिद्ध किया। विवाद रहते हुए भी उनके प्रतिपादनों में से अधिकाँश ऐसे थे जिनका खण्डन किसी भी आधार पर नहीं किया जा सकता था।

दार्शनिक सुकरात अपने समय के प्रख्यात मनीषियों में से एक थे। उनने स्वयं तो अपनी जीवनी नहीं लिखी, पर विद्वान प्लेटो, जेनोफेन प्लुटार्क आदि के ग्रन्थों से सुकरात की जीवन गाथा के साथ जुड़े हुए कितने ही प्रामाणिक संस्मरण मिलते हैं।

उन उल्लेखों के आधार पर माना जाता है कि सुकरात के साथ एक दिव्य आत्मा रहती थी जिसे वे “डेमन” कहते थे। वह उन्हें हर महत्वपूर्ण विषय पर परामर्श दिया करती थी, जिन्हें वे अक्षरशः स्वीकारते थे।

इस संदर्भ में कितने ही ऐसे घटनाक्रमों का उल्लेख है जो पूर्वाभास के रूप में उन्हें बताये गये। उन्होंने उन्हें मित्र मण्डली में प्रकट भी कर दिया। समय आने पर वे सभी पूर्व सूचनाएँ सही साबित हुईं।

विद्रोह फैलाने के अपराध में अदालत से सुकरात को मृत्यु दण्ड मिला। अपील में उनके छूट जाने के लिए पर्याप्त सामग्री एकत्र कर ली गई थी। पर “डेमन” ने कहा “यह मृत्यु तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है। इससे इन्कार मत करो।” सुकरात ने अपील नहीं करने दी और वे विष का प्याला पीकर खुशी-खुशी मृत्यु की गोद में चले गये। कोई-कोई डेमन को उनका छाया पुरुष मानते थे, कोई अदृश्य आत्मा मानते थे।

इंग्लैण्ड के प्रख्यात लेखक लार्ड मिण्ट ने अपनी पुस्तक “दि थर्ड किलर” में अपने भारतीय मित्र सरदार के. एस. पणिक्कर के सम्बन्ध में लिखा है कि उनका विश्वास था कि भारत में सन् 2000 के बाद कम्युनिज्म आ जाएगा। उसका नेतृत्व करने के लिए मुझे उस समय परिपक्व युग चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक है कि मुझे इन्हीं दिनों मर जाना चाहिए ताकि नये जन्म में उस नेतृत्व को सम्भालने योग्य बन सकूँ “उनकी इच्छा पूरी हुई और वे अपने इच्छित समय पर साधारण मौत मर भी गये। सन् 2000 आने वाला है। वह युग वैसा होगा या नहीं एवं उनका पुनर्जन्म होगा या नहीं, यह एक प्रश्न चिन्ह है।

आत्मा की अमरता का सिद्धान्त यदि सही सिद्ध होता है और उसके पुनर्जन्म होने से लेकर पूर्व कृत कर्मों या अभ्यासों का सिलसिला क्रमबद्ध बैठता है तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। भविष्य को उज्ज्वल बनाने की चिन्ता एवं इच्छा हर विचारशील में पाई जाती है। पर यह निश्चित नहीं हो पाता कि भले बुरे कर्मों के प्रतिफल यदि अभी नहीं मिलते हैं तो भविष्य में कभी मिल सकते हैं क्या?

शरीर मरण के बाद आत्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाने की बात नास्तिक स्तर के प्रत्यक्षवादियों द्वारा कही जाती है, पर उसका प्रमाण उत्तर उनसे नहीं बन पाता जो आत्मा को अमर मानकर उसके साथ कृत्यों तथा आदतों की शृंखला साथ जाने की बात से अन्यायों को भी सहमत करना चाहते हैं। प्रत्यक्ष वाद ही प्रत्यक्षवाद का जवाब है। अब परिस्थितियाँ ऐसी बनती जा रही हैं। मुनियों ने आत्मा के चिरस्थायी अस्तित्व के सिद्ध करके अगले जन्मों में क्रियाकलापों की परिणत सिद्ध की जा सके।

यह सिद्ध होना मनुष्य के दृष्टि कोण को व्यापक रूप से निरत रहने से भविष्य में सत्परिणाम मिलने का विश्वास सुदृढ़ एवं सुस्थिर हो सकेगा।


संकल्प-शक्ति के द्वारा (Kahani)

एक बार भगवान बुद्ध से उनके प्रिय शिष्य ने पूछा- ‘प्रभो! क्या संसार में ऐसी भी कोई वस्तु है, जो चट्टानों से भी अधिक कठोर हो? बुद्ध ने कहा- ‘हाँ’, लोहा है जो चट्टानों से भी कठोर है।’ शिष्य ने फिर पूछा- ‘क्या ऐसी भी कोई वस्तु है, जो लोहे से भी कठोर और मजबूत हो।’ बुद्ध ने कहा- ‘हाँ, अग्नि है। यह लोहे को भी पिघला देती है।’ शिष्य ने फिर पूछा- ‘अग्नि से भी बढ़कर कौन सी वस्तु है?’ बुद्ध ने उत्तर दिया- ‘पानी, जो अग्नि को भी बुझाने की सामर्थ्य रखता है।’

शिष्य की जिज्ञासा अब भी शान्त नहीं हुई। उसने पुनः प्रश्न किया- ‘पानी से भी श्रेष्ठ कोई वस्तु हो सकती है?’

बुद्ध ने कहा- ‘हाँ, वायु। वह जल के प्रवाह को बदल देती है। पानी बरसाने वाले मेघों को भी तितर-बितर कर देती है।’

‘शिष्य ने अन्त में पूछा- ‘प्रभो! क्या विश्व में ऐसी भी वस्तु है, जो वायु से भी बलवान् है, श्रेष्ठ है?’

बुद्ध ने उत्तर दिया- ‘हाँ, वह है मनुष्य की संकल्प-शक्ति। संकल्प-शक्ति के द्वारा मनुष्य वायु को भी अपने वश में कर सकता है। संकल्प-शक्ति के बल पर मनुष्य अनेक ऐसे महान् कार्यों को सम्पन्न कर लेता है, जो सामान्य लोगों के लिये आजीवन असम्भव जान पड़ते हैं।’


काया में समाया- ऊर्जा का जखीरा

मानवी चेतना के विकास में विद्युत चुम्बकीय शक्ति- प्राण ऊर्जा की जीवन भूमिका होती है। इसमें घट-बढ़ होने पर शारीरिक और मानसिक सन्तुलन गड़बड़ा जाता है और व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। परामनोविज्ञानियों के अनुसार विश्व ब्रह्मांड के निर्माण में भाग लेने वाले तत्वों के सूक्ष्म एवं दिव्य परमाणुओं से मनुष्य का शरीर विनिर्मित होती है। सृष्टि का हर कण विद्युत आवेशित अणु-परमाणुओं से बना होता है जिनमें सतत् प्रकंपन होता रहता है। परमशून्य तापमान से ऊपर की अवस्था में एक प्रकार की विद्युत चुम्बकीय तरंगें निकलती रहती हैं जिसे रेडिएण्ट-एनर्जी कहते हैं। इस ऊर्जा की तरंग लम्बाई 0.0001 से लेकर 3×10¹⁴ एंग्स्टार्म और इनकी आवृत्तियाँ 1×10¹¹ से लेकर अनन्त तक होती हैं। मनुष्य का शरीर भी इन आवेशित तरंगों को छोड़ता और ग्रहण करता रहता है।

“इलेक्ट्रोमैग्नेटिक थ्योरी आफ लाइफ” के पुरोगामी मूर्धन्य शरीर शास्त्री एवं वैज्ञानिक प्रो. एस. बर्र एवं मनः चिकित्साशास्त्री लियोनार्ड जे. राविज के अनुसार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड मनुष्य के विकास की गति को तेज करती है और जीवित प्रोटोप्लाज्म के टूट-फूट की मरम्मत का दिशा-निर्देशन करती है। वैज्ञानिक द्वय ने इस प्राण विद्युत को ‘लाइफ-फील्ड’ नाम से सम्बोधित किया है। इनका कहना है कि यही वह तत्व है जिसका अपने में अधिकाधिक विकास करके विश्व समाज की दिशाधारा को श्रेष्ठता की ओर मोड़ देने वाले महामानवों ने अपने जीवनकाल में प्रत्यक्ष चमत्कार कर दिखाया। हिटलर, नैपोलियन एवं सिकन्दर जैसे व्यक्तियों ने प्राण ऊर्जा का दुरुपयोग अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में किया और विनष्ट हुए।

मूर्धन्य वैज्ञानिकों ग्लिफोरो सी. फर्नास ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “नेक्स्ट हण्ड्रेड ईयर्स” में लिखा है कि मनुष्य शरीर का निर्माण जटिल प्रोटीन अणुओं से बने एक निषेचित अंडे से आरम्भ होता है, जिसके विभाजन और विकास से विभिन्न ऊतकों का निर्माण होता है। ऊतकों से अंग अवयवों एवं शारीरिक ढाँचे का निर्माण होता है। प्रत्येक कोशिका की संरचना में कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, सल्फर जैसे अनेकों तत्व भाग लेते हैं। प्रत्येक कोशिका की उत्पत्ति विद्युत इकाई- वेव पॉकेट के रूप में होती है। एक स्वस्थ युवा मनुष्य का शरीर 10 शंख कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। इस प्रकार हर व्यक्ति का शरीर 10×10²⁸ वेव पैकेट्स विद्युत ऊर्जा का समूह होता है। शरीर के समस्त अंग अवयवों एवं क्रिया-कलापों का संचालन तथा नियंत्रण तंत्रिका तंत्र के केन्द्र संस्थान मस्तिष्क द्वारा होता है जिसके निर्माण में लगभग 10 अरब न्यूरॉन्स भाग लेते हैं। प्रत्येक न्यूरान का अपना विद्युत आवेश होता है और प्रत्येक कोशिका अपने आप में पूर्णतया चार्ज की हुई एक छोटी विद्युत बैटरी होती है। तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञ डॉ. एस. क्लोज के अनुसार केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र की तुलना डायनेमो से की जा सकती है जिससे विद्युत का उत्पादन होता है।

न्यूयार्क सिटी के बेल टेलीफोन लैबोरेटरी में अनुसंधानरत वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि मनुष्य के शरीर के निर्माण में भाग लेने वाले घटक सतत् प्रकंपित होते रहते हैं और उनसे 80 अरब साइकल्स प्रति सेकेंड की दर से प्राण विद्युत- विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण होता रहता है।

सुविख्यात चिकित्सक डॉ. मार्टन हवाइटले ने अपनी पुस्तक “थ्योरी आफ लाइफ, डिजीज एण्ड हेल्थ” में कहा है कि मनुष्य का जीवन तभी तक दिखाई देता और क्रियाशील रहता है जब तक शरीर के समस्त ऊतकों की समष्टिगत ऊर्जा वैद्युतीय ऊर्जा के रूप में विद्यमान रहती है। यही ऊर्जा विद्युत तरंगों के रूप में शरीर के नस-नस में दौड़ती है जिसे वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से मापा जा सकता है।

ग्लासगो के प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी डॉ. विलियम ई. ब्यायड ने मानव मस्तिष्क और शरीर के अंतः संबंधों पर कई वर्षों तक गहन अनुसंधान किया और पाया कि प्रत्येक व्यक्ति का शरीर एक प्रकार की इलेक्ट्रिकल फील्ड द्वारा घिरा रहता है। त्वचा में अन्तर्निहित विद्युतीय ऊर्जा को मापा जा सकता है। मस्तिष्क की कार्यक्षमता विद्युतीय शक्ति पर निर्भर करती है। इसमें कमी आने पर मनुष्य अनेक बीमारियों से घिर जाता है। मस्तिष्कीय विद्युत ऊर्जा को इनसे फैलोग्राफी (ईईजी) के माध्यम से जाना और मापा जाता है। शरीर से निसृत होने वाली वैद्युतीय तरंगों के मापन के लिए ब्यायड ने ‘इमैनोमीटर’ नामक एक विशेष उपकरण का आविष्कार किया और उसके माध्यम से शरीर में रोगों की उपस्थिति से निकलने वाले विकिरणों और दवाइयों के प्रयोग के बाद के विकिरणों का अध्ययन किया। विभिन्न रोगियों के मस्तिष्क और शरीर के मध्य चलने वाले परिसंवादों का अध्ययन भी उन्होंने कैथोड रे ओसिलोग्राफ उपकरण के माध्यम से किया और पाया कि मनुष्य का शरीर उसकी इच्छाओं, भावनाओं और विचारणाओं द्वारा संचालित है। इनकी ऊर्ध्वगामिता होने पर मस्तिष्कीय एवं शारीरिक विद्युत ऊर्जा के भण्डार में अभिवृद्धि होती है। इच्छा विचारणा और भावना की निम्नगामिता पर प्राण ऊर्जा की संचित पूँजी भी समाप्त हो जाती है और मनुष्य दीन-हीन दयनीय एवं रुग्णावस्था में जा पहुँचता है।

चिकित्सा विज्ञानियों ने अपना ध्यान अब मनुष्य शरीर से विसर्जित होने वाली विद्युत ऊर्जा की ओर केन्द्रित किया है और इसका उपयोग रोग निवारण में करने लगे हैं। सुविख्यात वैज्ञानिक श्री एल. ई. ईमान ने अनेक रोगियों को इस विधि से रोगमुक्त कराया है। अपनी पुस्तक “कोआपरेटिव हीलिंग- द क्यूरेटिव प्रापर्टीज ऑफ ह्यूमन रेडिएशन” में श्री ईमान ने बताया है कि प्रत्येक व्यक्ति का सिर तथा दाँया हाथ और दाँया पैर वाला शरीर का आधा भाग विद्युत चुम्बकीय धनात्मक होता है। तथा मेरुदण्ड एवं बाँये हाथ और पैर की ओर से ऋणात्मक आवेश युक्त होता है। विशेष प्रकार के ताम्र तार और कापर गॉज से शरीर के विपरीत ध्रुवों को जोड़ देने से एक पूर्ण विद्युत सर्किट बन जाता है। एक व्यक्ति के शरीर पर अथवा सामूहिक रूप से कई व्यक्तियों के शरीरों के मध्य विद्युत सर्किट कायम करके एक दूसरे को लाभ पहुँचाया जा सकता है। काया के विपरीत ध्रुवों को विद्युत सुचालक तारों से किसी भी सर्किट में जोड़ने पर लाभकारी परिणाम न केवल स्वास्थ्य संवर्धन के रूप में अपितु बायोफीड बैक द्वारा प्रसुप्त के जागरण के रूप में मिल सकते हैं।

काया की विद्युतीय क्षमता का विश्लेषण और विवेचन तभी सार्थक है, जब उस ऊर्जा का सदुपयोग सुनियोजन किया जाय। अपार संपदा में से थोड़ा-सा भाग काम में आता है तो विलक्षण मेधा, वैज्ञानिक गवेषणात्मक बुद्धि एवं असीम जिजीविषा के रूप में दिखाई देता है। यदि शेष बची संपदा, जो हिमखण्ड की तरह जल के नीचे छिपी पड़ी है, को योग साधनाओं अध्यात्म उपचारों द्वारा प्रभावित किया जा सके तो मानव उन अगणित विभूतियों से संपन्न हो सकता है, जिन्हें हम सिद्धियों के रूप में जानते हैं।


Quotation

संसार विचार भिन्नता से भरा पड़ा है, उनमें से मात्र उन्हें ही स्वीकार करो जो विवेक की कसौटी पर खरे उतरें।


अलौकिक शक्तियों का उद्गम- अन्तराल में

मनुष्य देखने में एक साधारण प्राणी प्रतीत होता है। उसका काय-कलेवर बन्दर से मिलता जुलता है। बोलने, सोचने और खोजने की विशेषताओं ने ही उसे प्रगति के उस स्तर तक पहुँचाया है, जिस पर कि आज वह है।

देखने में इन साधारण विशेषताओं से युक्त असंख्य मानव-प्राणी पाये जाते हैं। वे अपनी विकसित शरीर संरचना और मानसिक विकास की असीम संभावनाओं के कारण अपनी विभिन्न विलक्षणताओं के प्रमाण प्रस्तुत करते रहते हैं।

किन्तु गहराई से खोजा जाय तो प्रतीत होता है कि उनकी विदित क्षमताओं की तुलना में अविज्ञात सामर्थ्यों का भंडार और भी बड़ा है। सूक्ष्म शरीर की अलौकिकता को प्रत्यक्ष न होने के कारण झुठलाया भी जा सकता है। पर प्रत्यक्ष शरीर का विश्लेषण तो ऐसा है जिसे देखते हुए उसकी रहस्यमय संरचना से इनकार नहीं किया जा सकता।

अरबों, खरबों की संख्या में ज्ञानतन्तु शरीर के प्रत्येक क्षेत्र में, विशेषतया मस्तिष्क में भरे पड़े हैं। इनमें जो विद्युत प्रवाह बहता है, उसकी प्रत्यक्ष प्रतीति इसलिए नहीं हो पाती कि वह विकेन्द्रित रहता है। यदि उसे समेटकर एक केन्द्र पर केंद्रीभूत किया जा सके तो उससे इतनी बिजली बन सकती है जिससे एक बड़ा मिल चलाया जा सके। मस्तिष्कीय चिन्तन के आधार पर अनेक योजनायें बनतीं और कार्यान्वित होती हैं, तो भी प्रबुद्धों में पाई जाने वाली शक्ति समस्त क्षमता का एक बहुत छोटा अंश होती है। यदि उस सब को एकत्रित किया जा सके तो उससे कोई व्यक्ति देव दानव स्तर का बन सकता है। अपने शरीर की अपने संसार की और समस्त ब्रह्मांड की स्थिति के सम्बन्ध में ऐसी जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है जिन्हें अलौकिक एवं अद्भुत कहा जा सके। ऋद्धि-सिद्धियों का वर्णन कपोल कल्पना नहीं है। उन्हें किसी अन्य का दिया हुआ अनुदान-वरदान भी नहीं कहा जा सकता। वे भीतर से ही उगती और प्रस्फुटित होती हैं। इसके लिए मूलभूत सामग्री उसे जन्मजात रूप में उपलब्ध है। प्रश्न केवल उन्हें जागृत करने भर का है। यह जागरण साधनाओं द्वारा संभव हो सकता है।

स्थूल शरीर की क्षमतायें प्रत्यक्ष हैं। उन्हें खेल प्रतियोगिताओं में, सर्कस में बढ़े-चढ़े रूप में देखा जा सकता है। पर सूक्ष्म शरीर की सामर्थ्य के बारे में उतनी सघन घटनायें प्रत्यक्ष देखने में नहीं आतीं। वे चिरस्थायी नहीं होतीं जिससे उनके अस्तित्व एवं प्रभाव का पर्यवेक्षण गंभीरतापूर्वक किया जा सके।

तिब्बत में सूक्ष्म शरीर को मानव जीवन में महत्वपूर्ण भूमिकायें निभा सकने सम्बन्धी काफी प्रयत्न हुए हैं। इनका वर्णन ‘टिबेटन बुक ऑफ दी डेड’ एवं ‘सीक्रेट योग ऑफ टिबेट’ पुस्तक में विस्तारपूर्वक दिया गया है। एवं रूसी ग्रन्थ “हार्ट ऑफ एशिया” में तिब्बत तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में विद्यमान सूक्ष्म शरीरधारी शक्तियों के क्रिया-कलापों का महत्वपूर्ण विवरण है।

दृश्यमान स्थूल शरीर के आगे की सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की शक्तियों एवं विभूतियों का वर्णन “दी प्रोजेक्शन आफ दी ऐस्ट्रल बाडी” में इस प्रकार किया गया है कि वैज्ञानिक एवं प्रत्यक्षवादी लोग भी इनके सम्बन्ध में सारगर्भित जानकारी प्राप्त कर सकें। इस संदर्भ में विधिवत् शोध कार्य फलोरिडा की “वर्ल्ड पैरासाइकालिजिकल रिसर्च फाउंडेशन” कर रही है।

प्रथम विश्वयुद्ध की एक घटना है कि एक समुद्री जहाज का बेड़ा जर्मनी पर हमला करने के लिए समुद्र के किसी अज्ञात क्षेत्र में जमा हो रहा था। जासूसों ने यह सूचना तो सेनापति तक पहुँचा दी पर वे यह न बता सके कि बेड़ा किस स्थान पर है।

इस हेतु अध्यात्मवेत्ता ‘डिवाइनर’ की सहायता ली गई। उसने समुद्र का पूरा नक्शा मँगाया। कुछ देर ध्यान करके उसने उस स्थान पर चिन्ह लगाया जहाँ बेड़े के होने की संभावना थी। उस क्षेत्र के लिए तुरन्त मुहिम भेजी गई।

सर विलियम बैरेट ने अपनी पुस्तक “दी डिवाइनिंग राड” में ऐसी घटनाओं का संग्रह करने के अतिरिक्त यह बताया है कि ऐसा क्यों कर होता है। वे कहते हैं कि प्रत्येक पदार्थ एवं प्राणी के परिकर से अपने-अपने ढंग की विद्युत चुम्बकीय तरंगें निकलती हैं। वे उड़कर आकाश में फैलती और मानवी चुम्बक के साथ टकराती हैं। संवेदनशील व्यक्ति उन्हें पकड़ और समझ लेते हैं कि यह संकेत कहाँ से आ रहा है और कहाँ कैसी स्थिति है।

इसी आधार पर भूगर्भ से कितनी ही धातु खदानें खोजी गई हैं और जल स्रोतों का पता लगाया गया है। यह शक्ति तत्वतः हर व्यक्ति में होती है, पर उसे विश्वासपूर्वक कार्यान्वित कर सकने की क्षमता विकसित कर सकना किसी-किसी से ही बन पड़ता है। किन्हीं में यह क्षमता जन्मजात रूप से अनायास ही प्रकट होती देखी गई है।

मार्टिन इंगले ने अपनी खोज-पूर्ण पुस्तक “दी एक्सपीरियन्स इन प्रोफेसी” में छानबीन करने के उपरान्त ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया है जिनसे पता चलता है कि मनुष्य शरीर में कितनी अद्भुत दिव्य क्षमतायें विद्यमान रहती हैं। पर उन्हें विकसित और कार्यान्वित करने का अवसर किसी-किसी को ही मिलता है।

संकलित घटनाओं में कैलीफोर्निया के एक दंपत्ति द्वारा किसी हत्या का पूर्वाभास मिलने और उसकी सूचना पुलिस में नोट कराये जाने का उल्लेख है। वाल्टर नामक एक लेखक की पत्नी मैसी चाय बना रही थी। उसने भरे प्याले में एक फिल्म जैसा दृश्य देखा। एक हत्यारा दो व्यक्तियों की हत्या करके डाका मार ले गया। पुलिस ने मोटर साइकिल पर उसका पीछा किया। डाकू एक अधबनी झोपड़ी में घुस गया, जहाँ उसे धर दबोचा गया। यह अनुभूति पुलिस में दर्ज कराई गई तब उसे भ्रान्ति बताकर मजाक में उड़ा दिया गया। किन्तु पन्द्रह दिन भी बीतने न पाये थे कि घटना ठीक उसी प्रकार घटित हुई और पुलिस ने डाकू को लूटी गई सम्पत्ति के साथ धर दबोचा।

उपरोक्त पुस्तक एवं डॉ. थेल्मा मॉस की “द प्रोबेबिलीटी ऑफ इम्पासीबिल” पुस्तक में ऐसी चार सौ से भी अधिक घटनाओं का वर्णन है, जो अद्भुत हैं और जिन्हें जाँच पड़ताल के उपरान्त वैज्ञानिक मान्यता मिली है।

एक घटना सन् 1913 की है। तब वाइसराय ने अपना शासन तो दिल्ली में जमा लिया था पर वहाँ की गर्मी अँग्रेज मण्डली को रास नहीं आ रही थी। वे किसी ठंडी जगह को समीपवर्ती क्षेत्र में ही तलाश रहे थे। इस दृष्टि से उन्हें शिमला-कालका वाला क्षेत्र अनुकूल और निरापद लगा। वहाँ बसने के लिए रेल का रास्ता जरूरी था। अध पक्की सड़कों पर बसें तो चलने लगी थीं पर ऊँचे पहाड़ी मार्ग पर रेल निकालना टेढ़ी खीर थी। फिर भी निश्चय किया गया और काम चल पड़ा।

कुछ दिनों ही काम चला पर सही पैमायश न बन पड़ने के कारण आगे की ऊँचाई आड़े आ गई। लगने लगा कि रेल के छोटे इंजन इतनी ऊँचाई तक चल न सकेंगे। काम छोड़े बैठने में भी हेठी होती थी और उपाय भी कोई सूझ नहीं रहा था।

इस असमंजस से एक उसी काम में लगे हुए मजूर ने उबारा। वह पढ़ा लिखा तो न था पर तंत्र मंत्र में गति रखता था। उसने अपनी अन्तःप्रेरणा के आधार पर कहा- “आगे की छह मील जमीन पर सुरंग बना दी जाय तो समस्या हल हो जाएगी। इतनी लम्बी सुरंग बन पड़ेगी, इसका उस काम पर लगे हुए इंजीनियरों को भरोसा न हो रहा था। फिर भी उस मजूर मलखू के बहुत जोर देने पर काम चालू किया गया। आगे की कठिनाइयों में भी वह मार्ग-दर्शन करता रहा। साथ ही इस निमित्त पूजा पाठ के अनेक विधि विधान भी करता रहा। उसे साधारण कुली से पदोन्नत करके जमादार बना दिया गया। हर छोटी बड़ी कठिनाई का हल उससे पूछा जाता। मानो वह कोई बड़ा इंजीनियर हो। उसके दबाव देने पर सफलता हाथ लगती देख उस योजना में लगे हुए अंग्रेज भी उसके पूजा पाठ में सम्मिलित होते। निदान लम्बी अवधि में वह रेलमार्ग बन कर तैयार हुआ। उन दिनों उस सफलता का श्रेय मलखू को ही दिया जाता रहा। उसकी मंत्र विद्या किसी प्रवीण इंजीनियर की योग्यता से कम महत्व की सिद्ध न हुई।

अमेरिका के दक्षिण पश्चिम में फोनिक्स से कुछ किलोमीटर दूर स्थित माइकेलटाउन का वायुसेना का एक हवाई अड्डा जब बन्द किया गया तो उस देश में इन अफवाहों को और भी अधिक बल मिला कि वहाँ चित्र-विचित्र भुतही घटनाओं का अड्डा है। वहाँ चिनाटी पहाड़ियों की ढलानों पर संध्या समय रंग बिरंगी रोशनियाँ जलती बुझती दिखाई देती थीं। मैक्सिको से लगे टेक्सास राज्य में कितनी ही जगह इन जलती बुझती रोशनियों ने आतंक पैदा कर दिया। यह रोशनियाँ कई बार जीप गाड़ियों और यात्रियों का पीछा करती देखी गईं। एक बार तो उनने कई जीपों को इस प्रकार जला दिया मानों वे तेज आग की भट्ठी में पिघला दी गई हों। इन रोशनियों की खोज में निकला एक वैज्ञानिक दल ही विलुप्त हो गया। इस हेतु बनाया गया एक शोध संस्थान ही जल कर खाक हो गया। ऐसे घटना प्रसंगों का कोई विज्ञान सम्मत समाधान नहीं मिलता। पर उससे परोक्ष जगत के रहस्यमय एवं अति शक्तिशाली क्रियाकलापों की झलक मिलती है। सूक्ष्म शरीरधारी आत्माएं संभवतः “आदमी” नामक इस असभ्य जीव को वहाँ बसने नहीं देना चाहती थीं।

सोवियत रूस के क्रीव प्रान्त के चेरनोबिल संयंत्र में अचानक आग, अणु आयुधों से भरी रूसी पनडुब्बी का डूबना एवं चंद्रमा पर पहुँच जाने वाले अमेरिकी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा अन्तरिक्ष में उपग्रह छोड़ने की लगातार चार असफलताओं से भी यह लगता है कि कोई परोक्ष सत्ता इन विनाशकारी कृत्यों को रोक रही है।

ब्रह्मांड जड़ पदार्थों से ही भरा हुआ नहीं है। उसमें सचेतन का भी बहुत बड़ा भाग है। यह सचेतन मनुष्य की ओर आकृष्ट होता है या उसे अपनी ओर आकर्षित करता है। दोनों पक्षों में आदान-प्रदान की भी आकाँक्षा रहती है। इसलिए मिलन की आतुरता सिद्ध करने वाली कितनी ही घटनाएँ भी घटित होती रहती हैं। यदि इन उभय-पक्षीय प्रयत्नों को निष्फल न जाने दिया जाय तो ब्रह्मांडीय चेतना के अनुदानों से मनुष्य अपने आप को देवोपम सामर्थ्यों से भरा पूरा बना सकता है।


एकाग्रता के चमत्कारी सत्परिणाम (Kahani)

बारूद को ढेर कर उसमें आग लगा दी जाय तो भक् से जल कर समाप्त हो जाय, पर यदि उसे बंदूक या तोप में भरकर एक दिशा विशिष्ट में गोली समेत धकेला जाय तो निशाने को तहस-नहस कर देगी।

सूर्य किरणें ऐसे ही बिखरी रहती हैं। पर यदि उन्हें आतिशी शीशे के द्वारा एकत्रित किया जाय तो थोड़े से दायरे का एकीकरण देखते-देखते आग जलने लगेगा।

ढेरों भाप ऐसे ही उड़ती रहती है। पर यदि उसे रोक कर एक नली विशेष से निर्धारित प्रयोजन के लिए नियोजित किया जाय तो रेलगाड़ी के इंजन दौड़ने लगते हैं।

नदियों में पानी निरर्थक बहता रहता है पर यदि बाँध बनाकर किसी नहर द्वारा बहाया जाय तो लम्बे क्षेत्र की सिंचाई होने और प्रचुर अन्न उपजने की संभावना बनती है। यह सब बिखराव को रोकने, एक दिशा नियोजन में प्रयुक्त करने की एकाग्रता के चमत्कारी सत्परिणाम हैं।


विश्वास और चिकित्सा

आपाधापी से भरे इस युग में निदान एवं चिकित्सा के आधुनिकतम साधन होने के बावजूद रोगों में कहीं कमी नजर आती दिखती नहीं। अधिक और अधिक पाने की होड़, वैभव-सुख साधनों की लालसा इतनी तीव्र है कि व्याधिग्रस्त काया, संक्षोभ-विक्षोभग्रस्त मस्तिष्क एवं अशांति-उद्विग्नता की कीमत पर भी वह यह दौड़ छोड़ना नहीं चाहता। आध्यात्मिक चिकित्सा के प्रतिपादनकर्त्ताओं ने एक महत्वपूर्ण तथ्य यह निकाला है कि प्रज्ञापराध ही सभी रोगों को जन्म देता है। चिन्तन एवं आस्था की विकृतियों से जन्मे रोग बाह्योपचार से ठीक नहीं हो सकते।

“अन्डरस्टेण्डिंग ह्यूमन बिहेवियर” नामक विश्वकोश में रोगों के कारण व उपचार पर एक शोध अध्ययन प्रस्तुत किया गया है कि कई रोगियों पर प्रयोगों के उपरान्त पाया गया है कि उन्हें दवाओं की नहीं उनकी राम कहानी सुने जाने की आवश्यकता होती है। चिकित्सक जब रोगी का विश्वास हासिल कर लेता है तो वह जो भी देगा, चाहे वह रंग-बिरंगा साधारण जल हो अथवा विटामिन बी काम्पलेक्स की या खड़िया मिट्टी की गोलियाँ, रोग मिट जाता है। वस्तुतः रोगी की सुनने के लिए आज किसी के पास समय नहीं है। निदान हेतु मूत्र, रक्त परीक्षण से लेकर, एक्सरे, ई.सी.जी. इत्यादि अनेक जाँचे अनावश्यक रूप से नित्य लाखों व्यक्तियों की की जाती है। एक बड़ा पुलिन्दा रोगी के पास इकट्ठा होता जाता है व उसे सहज ही रोग की गंभीरता का सम्मोहन देता रहता है। जितनी ज्यादा जाँच जिस किसी भी रोगी की हुई हो, वह उतना ही गंभीर, असाध्य एवं जाँच करवाने वाला चिकित्सक सबसे बड़ा विशेषज्ञ माना जाता है।

इस प्रकार के उच्चतम डिग्रीधारी चिकित्सकों को नीम हकीम कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। “स्वीट नथिंग्स” शीर्षक से डॉ. ए. जे. क्रोनिन ने अपने अनुभवों के आधार पर एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें उन्होंने लिखा है कि “मैं मूर्धन्य चिकित्सक इसलिए माना जाता था कि मैंने जनमानस का अध्ययन काफी गहराई से कर समय की मांग एवं रोगी की मनोवृत्ति के अनुरूप औषधियाँ दीं। ये औषधियाँ खड़िया मिट्टी की रंग बिरंगी गोलियाँ मात्र थीं। किन्तु इन्हें देते समय रोगी को कई प्रकार के परामर्श एवं उसके दुःख में सहभागी बनकर जो विश्वास मुझे उनका अर्जित होता था, वह राम बाण का काम करता था।”

वर्तमान चिकित्सा पद्धति, चिकित्सकों की कार्यप्रणाली एवं रोगियों की मानसिकता पर व्यापक सर्वेक्षण करने के उपरान्त हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर हेनरी के. बीचर ने लिखा है कि किसी भी रोग की निदान के बाद चिकित्सा के पूर्व यदि रोगी की मनःस्थिति की पढ़कर “प्लेसिबो” औषधियां दी जायँ तो काफी सीमा तक उस औषधि प्रदूषण से बचा जा सकता है जो शरीर संस्थान में इन घातक ड्रग्स के कारण पैदा होता है। आज व्याधियों में आएट्रोजेनिक रोगों का बाहुल्य है। ये वे रोग हैं जो चिकित्सक महोदय द्वारा रोगी पर प्रयोग हेतु दी गई विभिन्न औषधियों के शरीर रूपी समर क्षेत्र में हुए युद्ध के फलस्वरूप जन्म लेते हैं। जुकाम, दमा, पेप्टिक, अल्सर, सिर दर्द, मानसिक तनाव, अनिद्रा,उच्च रक्तचाप, अपच, इरीटेबल बॉवेल इत्यादि अनेक रोग ऐसे हैं, जिन्हें मात्र “प्लेसिबो” चिकित्सा से ठीक किया जा सकता है। प्लेसिबो वे औषधियां हैं जो शरीर पर कोई घातक प्रभाव नहीं डालतीं व गुर्दे-मल मार्ग द्वारा बाहर निकाल दी जाती हैं। इनका रंग-बिरंगा होना व चिकित्सक द्वारा इनका महात्म्य बताकर दिया जाना ही रोग को मुक्त करने में सहायक सिद्ध होता है। चुम्बक चिकित्सा, जड़ी बूटी उपचार, क्रोमोपैथी एवं यहाँ तक कि होम्योपैथी भी एक प्रकार से “फेथ हिलींग” ही हैं।

वस्तुतः रोग, चिन्तन की अस्त-व्यस्तता के परिणाम स्वरूप जन्मते हैं। यदि आत्म निरीक्षण की आटोसजेशन पद्धति अपनायी जाय तो न केवल रोग से मुक्ति मिल सकती है अपितु विद्यमान क्षमताओं का परिपूर्ण सदुपयोग भी हो सकता है।


विज्ञात सम्पदा खोजी और खोदी निकाली जाय

पृथ्वी का धरातल जितना है उतना ही रहेगा। उसे तान कर बढ़ाया नहीं जा सकता, पर उसके ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जिनसे संपर्क नहीं साधा गया और दोहन नहीं किया गया। यदि इस सारी सम्पदा को अधिकार क्षेत्र में लिया जा सके और उसका सदुपयोग किया जा सके तो सुनिश्चित है कि इन दिनों वस्तुओं का जो अभाव दीख पड़ता है वह भविष्य में न रहेगा और पीढ़ियों तक उसके सहारे सुखपूर्वक जिया जा सके। अभी तो सिर्फ एक मीटर गहरी धरती की उर्वरा तक जो कुछ उगाया जा सकता है उसी से काम चलाना पड़ता है। उतने भर को ही हम उपलब्धियों की चरम सीमा मानते हैं।

धरती की गहराई में प्रवेश करने का सिलसिला जब से चला है, तब से खनिज सम्पदा के भण्डार हस्तगत होते चले गये हैं। किसी जमाने में गोबर और पेड़ों को ही जला कर ऊर्जा उत्पन्न की जाती थी, पर अब पत्थर का कोयला, गैस और तेल के भण्डार भूतल से कुरेद कर उस आवश्यकता की बहुत कुछ पूर्ति की जा रही है। यह सम्पदा थी तो अनादि काल से, पर मनुष्य ने उसे उपलब्ध करने तथा प्रयोग में लाने की विधि नहीं सीखी थी। अब भौतिक जगत को अधिक तत्परतापूर्वक खोजा जाना आरम्भ हुआ है तो सम्पदाएँ भी प्रचुर परिमाण में हाथ लगी हैं। लोहा, सोना, चाँदी, ताँबा, शीशा जैसी अनेक धातुएं एवं पेट्रोलियम आदि भी धरातल की गहरी परतें खोदने पर ही हाथ लगे हैं।

समुद्र में मोटेतौर पर खारा और भारी पानी भरा दीखता है। उसकी खतरनाक स्थिति को समझते हुए कभी समुद्र पार करने का निषेध रहा है। कारण कि अन्य क्षेत्रों में एक तो भाषा सम्बन्धी कठिनाइयाँ थीं, दूसरी समुद्र के तूफान, ज्वार-भाटों के कारण भी नौकायन को खतरे से भरा हुआ देखा जाता था। कितनी ही किंवदंतियां भी डराती थीं। पर वह समय चला गया। अब बढ़े हुए ज्ञान के आधार पर समुद्र की गोद में मनुष्य जाति खेलती है। पानी की सतह का सड़क जैसा उपयोग करने वाले छोटे-बड़े अनेकों द्रुतगामी जलयानों का आविष्कार हो चुका है। हजारों यान उस क्षेत्र में दौड़ते हैं और कइयों टन माल इधर से उधर ढोते हैं। ऐसे यानों की योजना विचाराधीन है जिसके अनुसार समुद्र में तैरते हुए नगर बनाये जा सकेंगे और भूमि पर आबादी के रहने के लिए जो कमी पड़ती जा रही है उसकी पूर्ति हो सकेगी। समुद्र में बहुमूल्य धातुओं के भण्डार भी हैं। कहा जाता है कि भूगर्भ से मनुष्य ने जितना अधिक पाया है उतना ही वैभव उसे अगले दिनों समुद्र से मिलने जा रहा है। थल एक तिहाई है और जल दो तिहाई। समुद्र के सुविस्तृत क्षेत्र से ही बादल उठते और थल को सींचते हैं। पानी से वनस्पति उगती और मनुष्य के जीवन का आधार बनती है। अन्न, जल ही नहीं, हवा भी समुद्र के थपेड़ों की चोट सहकर ही गतिशील रहती है। इस प्रकार धरती पर रहने वाले मनुष्य सहित सभी प्राणियों का परोक्ष आधार समुद्र को माना जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। अगले दिनों उसके भीतर पाई जाने वाली शैवाल जैसी वनस्पतियों का भी अन्न जैसा उपयोग होने लगेगा। समुद्र तल से तेल और गैस मिलने की पूरी संभावना है। पनडुब्बियों और युद्ध पोतों ने समुद्र क्षेत्र को भी कुरुक्षेत्र की भूमिका निभाने योग्य बना दिया है। समुद्र भी पृथ्वी के साथ ही जुड़ा हुआ है पर उसका दृश्य भर देखा जाता है। उपयोगिता नहीं खोजी गई थी और न कुछ पा सकने का सुयोग बना। अब गंभीर ज्ञान के सहारे प्रकृति के रहस्यों को खोजने का ही परिणाम है कि हम पूर्वजों की तुलना में अधिक बड़े क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करते हैं और कहीं अधिक वैभव के अधिकारी हैं।

प्रकृति कंगाल नहीं है उसके पास इतना कुछ है जिसे देखकर आश्चर्यचकित रहा जा सकता है आवश्यकता अब रहस्यमय परतों तक पहुँच सकने वाली और कुरेदने की लगन दिखा सकने वाली प्रतिभा की है। वह प्रसुप्त स्थिति में मनुष्य के पास प्रचुर परिमाण में विद्यमान है आवश्यकता उसे जागृत करने भर की है। अनजान बने रहने वाले अनगढ़ जन तो अच्छी खरी परिस्थितियों में भी अभाव का रोना रोते रहते हैं।

अभी-अभी दक्षिणी ध्रुव का विशाल क्षेत्र खोज निकाला गया है। कुछ दशाब्दियों तक इसकी स्थिति का सामान्य ज्ञान भी लोगों को न था। उत्तरी ध्रुव अपेक्षाकृत छोटा, कम ठंडा और मनुष्य की पहुँच के अंतर्गत है। उसमें आने जाने और प्रकृति की- वातावरण की- अंतर्ग्रही परिस्थितियों की उस संपर्क से महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती रही हैं। वहाँ के तटीय क्षेत्र में बसने वाले एस्किमो कबीले भी उस क्षेत्र की खोज में सहायक सिद्ध होते रहे हैं। किन्तु दक्षिणी ध्रुव के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उसका आकार सुविस्तृत है। धरती के महाद्वीपों में से उसे भी पांचवां महाद्वीप माना जा सकता है। इतने बड़े क्षेत्र का ओर-छोर ढूंढ़ निकालना पिछले दिनों संभव न था। वैसे साधन भी नहीं थे। पूरे द्वीप पर एक भी मनुष्य नहीं बसता, कारण कि ठंड इतनी अधिक पड़ती है कि तथाकथित गर्मी के मौसम में भी हड्डियों तड़का देने वाली ठंड पड़ती है। फिर बर्फ की इतनी मोटी चादर जमी है जिसे मीलों की ऊँचाई में नापा जा सकता है।

किन्तु आज का तरुण समझा जाने वाला मनुष्य पूर्वजों को बालकों जैसी स्थिति का समझता, मानता है। प्रगति ने उसे तरुणाई प्रदान की है और साथ ही ऐसी बौद्धिक चेतना, साधन, सुविधा भी दी है, जिसके सहारे वह प्रकृति के अनुद्घाटित रहस्यों को समझने और उनसे लाभ उठाने का सफल प्रयास कर सके। भौतिक क्षेत्र में की गयी इस मानवी प्रगति को जितना सराहा जा सके उतना ही कम है।

विशालकाय- किसी भी महाद्वीप की तुलना में अग्रणी बैठने वाला दक्षिणी ध्रुव इतना अद्भुत और सुसम्पन्न है कि उसके वैभव को ललचाई दृष्टि से देखा जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

दक्षिणी ध्रुव प्रदेश के विशाल परिकर में बर्फ की ऊपरी परत को छेदकर इतनी अधिक खनिज सम्पदा उपलब्ध की जा सकती है जितनी कि पिछले दो सौ वर्षों में खुले क्षेत्र से निकाली गयी है। इस प्रकार पता चलता है कि दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में आड़े वक्त के लिए प्रकृति ने जो सम्पदा छिपा कर रखी थी, उसे प्राप्त करके मनुष्य अगली शताब्दियों के लिये निश्चिन्त हो सकेगा।

हमारा विदित तथा विज्ञात काय-कलेवर तथा परिचय क्षेत्र सीमित है। वह हमें अपर्याप्त मालूम पड़ता है और अभावों की बात सोचकर हम असंतुष्ट बने रहते हैं। किन्तु यदि अपने रहस्यमय क्षेत्र को अंतर्जगत में ढूंढ़े तथा बाह्य जगत के उन दैवी क्षेत्रों में प्रवेश करें जिनसे कि अभी तक हम अपरिचित ही बने रहे हैं, तो वैभव और संतोष का नया द्वार खुल सकता है। जरूरत आन्तरिक रहस्यों को उद्घाटित करने और बाह्य जगत में आदर्शवादिता के दैवी क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए आवश्यक साहस जुटाने भर की है।


उछालक का पुत्र (Kahani)

उछालक का पुत्र श्वेतकेतु जब गुरुकुल से विद्या पढ़कर वापस लौटा तो पिता ने पुत्र से  पूछा- क्या तुमने वह जान लिया जिसे जानने के उपरान्त सब कुछ जान लिया जाता है? श्वेतकेतु ने कहा- मेरे गुरु जो जानते थे वह उन्होंने बिना छिपाए बता दिया। पर उसमें वैसी जानकारी नहीं मिली जैसी कि आप पूछते हैं।

उछालक ने एक बीज दिखाते हुए पुत्र से पूछा- वृक्ष और पत्ता इसमें समाहित हैं, पर क्या तुम्हें वह दिखाई पड़ता है? श्वेतकेतु ने सिर हिलाते हुए इन्कार कर दिया।

पिता ने पुत्र को समझाया। दृश्य के मूल में अदृश्य की सत्ता काम करती है, वह अदृश्य आंखों से नहीं सूक्ष्मदर्शी विवेक से देखा जाता है। तुम ज्ञान चक्षुओं का उपयोग करो। अदृश्य को समझो और देखो। उसे जान लेने पर ही तुम उस ब्रह्म को पा सकोगे, जिसे देखने पर इस संसार का वास्तविक स्वरूप दिख पड़ता है।


ज्योतिर्विज्ञान और वेधशालाएँ

आकाश में अवस्थित ग्रह नक्षत्रों का भला बुरा प्रभाव धरती के वातावरण, प्राणियों, वनस्पतियों तथा ऋतु परिवर्तनों पर पड़ता देखा गया तो प्राचीन काल के मनीषियों ने इस संबंध में अधिक खोज करने का निश्चय किया। इसके लिए सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक समझा गया कि आकाश में घूमते ग्रहों की स्थिति को समझा जाय कि वह कब कहाँ किस स्थिति में होती है? यह कार्य आरम्भिक दिनों में लम्बी नलिकाओं के सहारे होता था। जो निष्कर्ष निकलते थे, उसके आधार पर ग्रह गणित की विधाएँ विनिर्मित की गईं। लम्बे समय तक इस गणितीय आधार पर ही ज्योतिष की गाड़ी को चलाया जाता रहा।

इतने पर भी स्थिति निश्चित न हुई। गणित का निष्कर्ष सही नहीं बैठता था। ग्रहों के उदय-अस्त में घंटों का नहीं दिनों का अंतर पड़ने लगा तब गणित के नये-नये फार्मूले खोजे और अपनाये जाने लगे। इस पर भी अनिश्चितता किसी न किसी रूप में बनी ही रही। कारण यह था कि पृथ्वी की तरह सौर मण्डल के अन्यान्य ग्रहों की चाल की नापतौल पृथ्वी की घड़ियों से सही नहीं हो पा रही थी। दोनों के बीच अंतर बना ही रहता था और वह घटता बढ़ता भी रहता था। एक दो वर्षों में ही यह आवश्यक पड़ जाती थी कि ग्रह नक्षत्रों की स्थिति को आंखों से देखते रहा जाय और उसके आधार पर समय-समय पर किये गये गणितों की प्रक्रिया में आवश्यक हेर-फेर किया जाता रहे। इस प्रयोजन के लिए वेधशालाओं के निर्माण का सिलसिला शुरू हुआ। तब भारत की दूरवर्ती विशालता थी। यहाँ के विद्वान समूची धरती को अपना ही घर तथा कार्य क्षेत्र मानते थे। इसलिए वे मात्र भारत में ही बैठे रहने की अपेक्षा जहाँ आवश्यकता अनुभव करते थे वहाँ बस जाते थे। ज्योतिष के लिए उपयुक्त भौगोलिक स्थिति यूनान की समझी गई और वेधशालाओं का अभिनव सिलसिला उसी भूमि से चला। यद्यपि उस विधा की जन्मदात्री भारतभूमि ही बनी रही। यूनान को वह ज्ञान निर्यात होता रहा। मध्य एशिया में औरंगजेब के प्रपौत्र उलूखवेग ने खगोलवेत्ताओं की सहायता से एक वेधशाला बनाई जिसमें लकड़ी से बने यंत्र लगाये थे वाराहमिहिर की “पंच सिद्धान्तिका” में इन वेधशालाओं को बनाने के सूत्र संकेत हैं। उन्हीं के आधार पर निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।

भारत में यह स्थापनाएँ इसके उपरान्त हुई। दिल्ली की कुतुबमीनार इसी आधार पर बनी। उसमें ग्रहों तथा राशियों का मापन प्रबंध है। समीप ही 27 नक्षत्रों की स्थिति जानने के लिए सत्ताईस ऐसे यंत्र बने हैं जिनकी सहायता से नक्षत्रों स्थिति भी आँकी जा सकती थी।

इस विषय में जयपुर के तत्कालीन शासक जयसिंह ने विशेष रुचि ली। उन्होंने इस विधा के ग्रन्थ देश-देशान्तरों से मंगाये और उनके अनुवाद कराये। उन्होंने यह आवश्यक समझा कि यदि ज्योतिष शास्त्र को सही स्थिति में रखा जाना है तो इसके लिए मात्र गणित की पुरानी विधियाँ ही पर्याप्त न होंगी, वरन् इसके लिए सुनियोजित वेधशालाएँ स्थान-स्थान पर बनानी पड़ेंगी, जिससे ग्रह चाल और पृथ्वी की सीध से संबंधित प्रकाश का तारतम्य सही रीति से संभव हो सके। इसी प्रकार उन दिनों प्रचलित नवजात शिशु की जन्मकुण्डली बनाने के लिए भी आवश्यक यह समझा गया कि समीपवर्ती वेधशाला द्वारा प्रमाणित जन्माक्षरों को ही सही माना जाय। यह सभी कारण ऐसे थे जो खगोलवेत्ताओं को इस बात के लिए बाधित करते थे कि यदि इस शास्त्र की प्रामाणिकता स्थिर रखनी हो तो इसके लिए स्थान-स्थान पर वेधशालाएँ बनाई जायँ।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए महाराजा जयसिंह ने अपने संग्रहित ज्ञान तथा निजी सूझ-बूझ के आधार पर कई वेधशालाएँ एक के बाद एक खड़ी कीं। दिल्ली के तत्कालीन शासक मुहम्मदशाह से आज्ञा पत्र प्राप्त करके प्रथम वेधशाला दिल्ली में बनाई गई जिसके उपरान्त उज्जैन में वेधशाला बनी। कर्क रेखा उज्जैन से होकर ही गुजरती है। महाकाल की गणना का भी उससे संबंध है। इसके पश्चात मान मंदिर में वाराणसी की छोटी वेधशाला बनी उसमें मात्र 6 प्रधान यंत्र बनाये गये।

जयपुर की वेधशाला बनाने का कार्य सन् 1718 से लेकर 1738 तक सम्पन्न हुआ। उसे देश की सबसे बड़ी वेधशाला कहा जा सकता है। इसमें यंत्र अपेक्षाकृत अधिक लगे हैं और गणकों की सुविधा के लिए कुछ बड़े आकार के भी बनाये गये हैं।

मथुरा की वेधशाला छोटी थी। मद्रास की वेधशाला तत्कालीन गवर्नर आकले ने सन् 1792 में बनायी। इसमें नवीनतम जानकारियों का भी समावेश किया गया। देव प्रयाग में भी ऐसी ही एक यंत्र की वेधशाला है। पुरातन इतिहास को खोजने पर नवीं शताब्दी में राजा रतिवर्मा ने महोदय पुरा (दक्षिण भारत) में एक वेधशाला बनाई थी। रामायण काल में महर्षि अत्रि की तूर्य वेधशाला प्रसिद्ध थी। इन वेधशालाओं के माध्यम से आकाशीय पिण्डों के उन्नतांश, दिशांश, अक्षांश आदि की गणना होती थी। कई जगह मजबूत मिट्टी और चुना पत्थर की सहायता से ज्योतिष संस्थान बने थे। उनका नाम जहाँ कहीं ‘ग्रह मंत्रालय’ भी दिया गया था।

भास्कराचार्य ने अपने ‘सिद्धान्त’ शिरोमणि और ‘करण कौतूहल’ ग्रन्थों में खगोल वेध के निमित्त अनेक विधान रखे हैं। पर उनमें से छोटे बड़े यंत्र बनाने का विधान रखा है। पर उनमें से इन दिनों विनिर्मित वेध-शालाएँ वक्रयंत्र, चापयंत्र, तर्घयंत्र, मौलयंत्र, नाड़ीयंत्र, वलययंत्र, पट्टिकाययंत्र, शंकु यंत्र, दिगंशयंत्र, पलभायंत्र, वृत्तयंत्र, भित्तियंत्र, कपालयंत्र आदि ही मिलते हैं। निर्माणकर्ताओं ने अपने नाम को प्रख्यात करने के लिए सम्राटयंत्र, राययंत्र, जय प्रकाशयंत्र आदि नाम भी रख लिये। इनका पुराना वास्तविक नाम क्या था यह जाना नहीं जा सका। पीछे ऐसी भी प्रयत्न किये गये कि कुछ यंत्र ऐसे भी बनाये जायं जिनमें कई यंत्रों का समावेश हो और उनके सहारे कई प्रकार के गणित एक साथ किये जा सकें। इस प्रयोजन के लिए मिश्रित यंत्र बना। नियति यंत्र में एक साथ दिनमान, क्रान्तिवृत आदि की जाँच पड़ताल की जा सकती है।

कोणार्क (उड़ीसा) का सूर्य मंदिर वस्तुतः एक सूर्य वेधशाला है। सूर्य को खुली आँखों से देखना कठिन है। इसलिए इसकी अंशगणना अति कठिन समझी जाती है। इसको हल करने के लिए खगोलवेत्ताओं की एक मंडली ने राज-सहयोग से कोणार्क का सूर्य मंदिर बनाया और उसमें सूर्य का वेध संधान किया।

इन दिनों ज्योतिष की मूल दिशा मरोड़कर उसे पूजा भाष्य, भविष्य कथन, मुहूर्त शोधन, ग्रहशान्ति आदि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ग्रह गणित की वस्तु स्थिति की ओर किसी का ध्यान नहीं है। यही कारण है कि छह शास्त्रों में प्रमुख गिना जाने वाला ज्योतिष शास्त्र अपनी मौलिक विशेषता और गरिमा से विलग होता चला जा रहा है।

इस क्षेत्र में आशा की एक किरण के रूप में शांतिकुंज की नवनिर्मित वेधशाला को देखा जा सकता है, जिसमें प्राचीन सिद्धान्तों और अर्वाचीन अनुभवों का समावेश करते हुए एक छोटा किन्तु सर्वांगपूर्ण ग्रह मंत्रालय विनिर्मित किया गया है और नेपच्यून, यूरेनस, प्लेटो नाम तीन नवीन ग्रहों का अभिनव गणित भी सम्मिलित करते हुए दृश्य गणित पंचांग भी गत तीन वर्षों से प्रकाशित किया जाने लगा है। इस प्रसंग में अभी अधिक शोध प्रयत्नों की आवश्यकता है।


अंतरिक्षीय रहस्यों का एक नया दौर

अपनी इस विशाल धरती पर कई स्थान ऐसे हैं जो उनसे जुड़े रहस्यमय घटनाक्रमों के कारण सुर्खियों के विषय बनते रहे हैं। इन घटनाओं के पीछे वैज्ञानिकों ने अटकलबाजियाँ लगाकर विद्युत चुम्बकीय अथवा क्वान्टम भौतिकी, गुरुत्वबल कारण बताकर छुट्टी पाली है, पर सच पूछा जाय तो ये सभी रहस्य अभी भी “अविज्ञात” नामक फाइल में बन्द हैं। ये सभी यह सोचने पर विवश करते हैं कि मानवी बुद्धि अभी विकास की चरम अवस्था तक नहीं पहुँच पाई है। बहुत कुछ जानना समझना अभी शेष है।

भारत में आसाम प्रान्त के जटिंगा घाटी स्थान पर हर वर्ष एक विशेष मौसम में रात की बत्तियाँ जलते ही पक्षियों का उड़-उड़ कर आकर आत्म हत्या कर लेना साथ ही अन्य छोटे कीट-जीव जंतुओं की सामूहिक आत्म हत्या अभी भी एक अचम्भा बनी हुई है। अभी तक साइबेरिया के तुंगुस्का प्रान्त में एवं अमेरिका के एरीजोना में उल्कापात के प्रमाण रूप में दो विशाल गड्ढे पाए गए थे। अब महाराष्ट्र के चन्द्रपुर के समीप एक अत्यन्त विशाल गर्त्त मिला है जो बताता है कि एक बहुत बड़ी उल्का यहाँ कभी गिरी होगी। इसका आकार पहले पाए गए दोनों गढ्ढों से दुगुना बड़ा है एवं भूगर्भ विशेषज्ञों के अनुसार उल्का गिरने की अवधि भी हजारों वर्षों में गिनी जा सकती है। हो सकता है कि ऐसे और भी कोई चिन्ह हों जो बताते हों कि अन्तरिक्षीय रहस्यों के उद्घाटन का दौर अभी चल ही रहा है।

अमेरिका के दक्षिण पूर्व तट पर उत्तर में बरमूडा द्वीप, दक्षिण में फलोरिडा तथा पूर्व में बहामा द्वीप के बीच का लगभग 40 अक्षांश पश्चिमी देशान्तर तक फैला इलाका, जो बरमूडा त्रिकोण कहलाता है, अपनी रहस्यमयी घटनाओं की शृंखला के कारण काफी समय से शोध का केन्द्र बना हुआ है। इस क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले वायुयान तथा जलयानों के अदृश्य होने का सिलसिला चलाता ही रहा है किन्तु न तो जहाजों के अवशेष ही मिल पाए हैं, न ही वायुयानों का मलबा। सारे आधुनिक यंत्रों को शोध प्रक्रिया में झोंक देने पर भी यह ज्ञात न हो सका कि वे सभी कहाँ, किस लोक में विलुप्त हो गए?

सन् 1745 के नवम्बर माह की घटना है। एक जलयान वायुसेना का नीचे चल रहा था और उसका सही मार्गदर्शन करने के लिए विमान ऊपर उड़ रहे थे कि अचानक अमेरिकी कन्ट्रोल टावर से उनका सम्बन्ध टूट गया। कप्तान की घबराई-सी आवाज जरूर सुनाई दी। इसके बाद संपर्क पूरी तरह समाप्त हो गया। वायुयान “मार्टिन मेसन्स” का कप्तान इतना ही बता सका कि “हमारे सभी यंत्र बेकाबू हैं और हम नहीं जानते कि अगले क्षणों में हमारा क्या होने जा रहा है।”

विभिन्न दिशाओं में इस सारे क्षेत्र को खोजने के लिए 218 नौकाएं भेजी गईं और 19 वायुयानों की एक टुकड़ी। खोजी विमानों में से एक का अन्तिम सन्देश था। हम अपने को असहाय अनुभव कर रहे हैं। कोई भी मशीन हमारा साथ नहीं दे रही है। लगता है हम किसी अज्ञात लोक की ओर उड़े जा रहे हैं। हमारे पीछे मत आओ खतरा है.......। फिर कोई संकेत न मिला। इसके बाद ऐसी ही दुर्घटनाओं का सिलसिला उस क्षेत्र में लगातार चल पड़ा।

सन् 1960 में चार वायुयान और 10 जलयान उसी क्षेत्र में गायब हुए। इनमें से एक के बारे में भी अनुमान तक नहीं लगाया जा सका कि आखिर इनका क्या हुआ? सन 1961 के अन्तिम माह में एक जलयान अमेरिका से इंग्लैण्ड के लिए रवाना हुआ इसमें 290 व्यक्ति सवार थे। मशीनों की भली प्रकार जाँच पड़ताल कर ली गई थी। फिर भी उस यान की भी दुर्गति हुई। वह रहस्य के गर्त में समा गया और सभी संभव खोजें कोई भी संकेत न दे सकीं।

उस क्षेत्र में थोड़ी दूर रहकर दुर्घटना का स्वरूप देखने वालों ने पाया है कि पहले उस क्षेत्र में कुहासा सा छाने लगता है। फिर ऐसा लगता है कि यान किसी चुम्बकीय तूफान में फँस गया और भँवर में फँसने जैसी स्थिति में चक्कर काटता हुआ वह गायब हो गया। अन्वेषकों में से कुछ ने उन यात्रियों को आकाश में पक्षी की तरह एक दिशा विशेष में उड़ते देखा। फिर वे दृष्टि से ओझल हो गए।

वस्तुतः बारमूडा त्रिकोण वैज्ञानिकों, रहस्यवादियों और अन्तरिक्षवेत्ताओं के लिए बहुत समय तक रहस्य का विषय बना रहा। सभी अपनी-अपनी समझ के अनुसार अनुमान लगाते रहे। इस संदर्भ में अनेक पत्र पत्रिकाओं में लेख छपे पर उनमें से किसी ने भी दावे के साथ अपने मत की पुष्टि न की। मात्र अनुमान ही लगाये जाते रहे। इनमें से सभी खोजियों का मत यही था कि यह रहस्य अभी भी ऐसा है जिसके सम्बन्ध में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

‘हेराल्ड कनाडा’ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख अधिक प्रामाणिक माना गया कि किसी अन्य लोक के बुद्धिमान प्राणी मनुष्य की संरचना और प्रगति के बारे में खोज बीन कर रहे हैं और वे अन्वेषण के लिए यहाँ से विभिन्न स्तर के यात्रा साधनों एवं बुद्धिमान मनुष्यों को अपने लोक में किसी विशेष आकर्षण शक्ति के सहारे घसीट ले जाते हैं। पृथ्वी पर अन्य लोकवासियों का अन्तरिक्ष से कुछ हजार वर्षों पूर्व से विशेष रूप से आवागमन रहा भी है।

बारमूडा त्रिकोण की घटनाओं के बारे में बहुत समय तक यह अनुमान लगाया जाता रहा है कि वहाँ कोई “ब्लैक होल” स्तर का अन्तरिक्षीय चुम्बकत्व होना चाहिए, पर आधुनिक अन्वेषणों के बाद वह मान्यता भी गलत ठहराई गई है, क्योंकि ब्लैक होल अत्यन्त शक्तिशाली और अधिक दायरे में फैले हुए होते हैं। वह इधर आ पहुँचे तो समूची पृथ्वी को उदरस्थ कर सकते हैं। तब यह पता भी न चलेगा कि पृथ्वी नाम का ग्रह इस क्षेत्र में कोई था भी या नहीं। इस कमी के कारण सौर-मण्डल के अन्य ग्रह भी डगमगाने लगेंगे और एक अन्तरिक्षीय विनाशी क्रान्ति का सामना करना पड़ेगा। “ब्लैक होल” इतने दुर्बल या छोटे नहीं हो सकते कि वे कुछ यानों को उदरस्थ करने के उपरान्त शान्त हो चलें।

प्रायः सौ वर्ष से उस क्षेत्र में यानों के गायब होने की घटनाएँ प्रकाश में आयी हैं। इन घटनाओं के बाद उस क्षेत्र में चुम्बकीय हलचलें की दृष्टिगोचर होती हैं। पिछले वर्षों से उधर से निकलने वाले जहाजों की मशीनें भी गड़बड़ाती हैं पर ऐसा कुछ नहीं होता कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए। अब थोड़ा अधिक घेरा बढ़ा कर ऐसा रास्ता निकाल लिया गया है, जिससे बिना जोखिम के यात्रा की जा सके।

ब्लैक होल के होने का अनुमान रद्द हो जाने के बाद यह सोचा जा रहा है कि किसी बुद्धिमान लोक के निवासी पृथ्वी के मनुष्यों और उनके साधनों में जो प्रगति हुई है, उसका पता लगाने आते हैं। यह मान्यता तो अनेक प्रमाणों से सिद्ध है कि हजारों वर्ष पूर्व अन्य लोकों के बुद्धिमानी निवासी इस पृथ्वी पर आते रहे हैं और यहाँ की प्रगति में अनेक प्रकार के विशेषता वैज्ञानिक स्तर के योगदान देते रहे हैं। एक हवाई अनुमान यह भी है कि अन्तर्ग्रही आत्माओं के द्वारा धरती पर उनकी संतानें भी उत्पन्न हुई हैं और वे अपेक्षा कृत अधिक बुद्धिमान एवं सामर्थ्यवान रही हैं। जापानी अभी भी अपने को सूर्य की संतान कहते हैं और अन्यत्र निवासियों की तुलना में अपने को हर दृष्टि से समर्थ एवं सक्षम मानते हैं। कुन्ती ने सभी बच्चे देवताओं का आह्वान करके उनके अनुग्रह से उत्पन्न किए थे। उन सभी का पराक्रम पृथ्वी निवासी अन्य लोकों की तुलना में बढ़ा-चढ़ा था। मिश्र पिरामिडों की समस्या अभी तक नहीं सुलझी है कि इतने भारी पत्थर इतनी ऊँचाई तक कैसे पहुँचाए जा सके, जब कि उस देश में कहीं भी वैसे पत्थरों की खदान नहीं है। ऐसी ‘क्रेन’ होने का भी प्रमाण नहीं मिलता। यही बात ईस्टर द्वीप की विशालकाय मूर्तियों पर भी लागू होती है। मनुष्य के बलबूते की बात वैसा निर्माण करने की अभी भी नहीं है। कुतुबमीनार की लाट जैसा बढ़िया लोहा अभी तक मनुष्य की सामर्थ्य के बाहर माना जाता है। इन कृतियों के पीछे अन्तरिक्षीय देवमानवों के प्रयासों को सोचा जाता है जो उन दिनों पृथ्वी के साथ घनिष्ठता बनाये हुए है।

एक लम्बी अवधि बीत जाने के उपरान्त विगत एक शताब्दी से उड़न तश्तरियों के आवागमन का पृथ्वी पर नया सिलसिला आरम्भ हुआ है। कुछ दिनों इन्हें अन्तरिक्षीय भ्रम-जंजाल माना गया था। पर उनके छोड़े अवशेष तथा यहाँ से उठाकर ले जाई गई वस्तुओं की बात प्रमाणित हुई है तो ऐसा सोचा जाता है कि वे अंतर्ग्रही देवमानव फिर से पृथ्वी के साथ आवागमन संपर्क जोड़ रहे हैं, ताकि यहाँ की वैज्ञानिक प्रगति का मानवी बुद्धिमता का वे पर्यवेक्षण कर सकें और इससे आगे का प्रसंग या तो मनुष्यों को सिखा सकें या उनसे सीख सकें। संभवतः इसी प्रसंग में उन्हें बारमूडा क्षेत्र आदान-प्रदान के लिए उपयुक्त जँचा हो।

उड़न तश्तरियों को बहुत समय तक दृष्टिदोष, विभ्रम मात्र माना जाता रहा और यह भी कहा जाता रहा कि वे अन्तरिक्ष में पहुँचने वाले चुम्बकीय भँवर जैसे कुछ हो सकते हैं। इन अटकलों के उपरान्त जब उनका पीछा करना शुरू किया गया तो ऐसी हरकतें सामने आईं जिनसे सिद्ध हुआ कि उनके साथ कोई बुद्धिमान प्राणी भी होना चाहिए और उनका पृथ्वी पर आना भटकाव नहीं सोद्देश्य होना चाहिए।

इस संदर्भ में कई खोज करने वालों को अदृश्य चेतावनियाँ मिलती रही हैं कि वे यह प्रयास बन्द करें अन्यथा जोखिम उठाएंगे। समझा गया कि यह किसी मनुष्य द्वारा की गई मखौल है। किन्तु खोज जारी रखने नया तथ्य सामने आया कि वे खोजी अदृश्य हो गए और किसी प्रकार यह पता न चल सका कि उनका कहाँ, कब कैसे अदृश्य हो जाना घटित हुआ।

जिनने उड़न तश्तरियों को बिना घबराए और गौर से देखा उनने बताया है कि जिस प्रकार पृथ्वी से चन्द्रमा जाने वाले अन्तरिक्षीय सूट पहनकर गये थे, प्रायः वैसी ही पोशाक वे यात्री भी पहने हुए थे। वे भूमि के समीप आये और यहाँ से कई धातु पात्र तथा जीवित प्राणी अपने यान में लेकर वापस लौट गए। संभवतः वे उन पर जैव प्रौद्योगिकी का कोई अनुसंधान करना चाहते हों।

इन अजूबों का वास्तविक कारण क्या है? यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। सम्पत्ति की हानि एवं जन हानि हो, ऐसा रास्ता भी मनुष्य ने निकाल लिया है। पर वे घटना क्रम भिन्न-भिन्न रूपों में भौतिकी के सारे सिद्धान्त काटते हुए घटित होते रहे हैं। फिर भी यह आशा की जाती है कि अन्ततः बारमूडा त्रिकोण जटिंगा घाटी, उड़नतश्तरियों जैसे अनेकानेक रहस्यों का जब भी उद्घाटन होगा, तो मनुष्य को ऐसी कई नयी जानकारियाँ मिलेंगी जो उसे अब तक उपलब्ध नहीं हुईं।


बिना किसी सोच-विचार के (Kahani)

पंचतत्वों बनी मण्डली, एक सुरम्य पर्वत पर पहुँची। चर्चा छिड़ी तो अपने-अपने बड़प्पन का प्रसंग उभर आया।

पृथ्वी बोली- सभी दुनिया का बोझ मैं उठाती हूँ। सबका पेट भी मैं ही भरती हूँ।

जल ने कहा- मेरे बिना जीवन ही नहीं। न वनस्पति न प्राणी। सब कुछ सूखने लगे और त्राहि-त्राहि मचे।

पवन बोला- दीखता नहीं हूँ तो क्या? मेरे बिना घुटन ही सबका गला घोंट देगी।

अग्नि ने कहा- गर्मी रोशनी के बिना इस लोक में शान्ति निस्तब्धता के अतिरिक्त और क्या बचेगा?

चारों का कथन पूरा हो गया फिर भी आकाश बोला नहीं। बार-बार पूछने पर उसने एक ही शब्द कहा- आप सब मेरे हैं और मेरी गोद में ही खेलते हैं। बड़प्पन का निर्णय बिना किसी सोच-विचार के हो गया।


मंगल ग्रह की दुर्दशा से हम सबक लें

सौर परिवार के ग्रहों और उपग्रहों में से केवल मंगल ही एक ऐसा है जिसकी परिस्थितियों की बहुत अंशों तक पृथ्वी से तुलना की जा सकती है। खोजी उपग्रहों ने जो सूचनायें एकत्रित की हैं, उनसे प्रतीत होता है कि चिर अतीत में वहाँ जलाशयों की भरमार थी। नदियाँ बहती थीं और झरने झरते थे। वहाँ ऐसी प्राण वायु भी थी, जिसके सहारे प्राणी उत्पन्न हो सकें और जी सकें।

इस प्रकार के प्रमाण वहाँ बड़ी संख्या में पाये गये हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि किसी जमाने में मंगल पर प्राणियों और वनस्पतियों की अच्छी खासी विद्यमानता थी। ग्रह सुहावना था। उसकी स्थिति भी वैसी ही थी, जैसी कि उस जमाने में पृथ्वी की रही होगी। सम्भवतः मनुष्य स्तर के बुद्धिमान प्राणी भी वहाँ रहे हों। वे खाद्य उत्पादन करते थे। वनस्पतियों का लाभ लेते थे और प्रकृति सम्पदा का उपयोग करते थे।

मंगल के ऊपर वैसा ही कवच आच्छादन भी था जैसा कि इन दिनों पृथ्वी के ऊपर है और ब्रह्मांडीय किरणों के घातक प्रभाव से उसे बचाता है। पृथ्वी की सतही हलचलें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उन्हें सुरक्षित रखने में यह कवच आवरण सहायता करते हैं। अन्यथा पृथ्वी अपनी विशेषतायें गँवा बैठे। अपने सीमित दायरे में वह गर्भवती के भ्रूण की तरह सुरक्षित है। आवरण, आच्छादन उसे सुविधा भरे वस्त्रों की तरह अपने अंचल में आश्रय दिए हुए हैं। गर्मी, वर्षा से जैसे मनुष्य को छुड़ाता बचाता है उसी प्रकार भूपिण्ड भी आकाश में घेरा डाले हुए आयनॉस्फियर के आच्छादनों के कारण ब्रह्मांडीय घातक किरणों से अपनी रक्षा कर पाता है। चमड़ी के थैले में जिस प्रकार भीतर अंग अवयव दबे ढके रहते हैं, उसी में भीतरी व्यवस्था सुरक्षित है। अन्यथा फटे थैले में से जिस प्रकार मूँगफली के दाने बिखर पड़ते हैं उसी प्रकार हमारे अंतरंग अवयवों को भी उलट-पुलट करने में देर न लगेगी।

पृथ्वी के कवच को इन दिनों बुरी तरह छेड़ा, झकझोरा जा रहा है। आणविक हलचलें ऊपर जाकर छाते में छेद कर सकती हैं। बढ़ता जा रहा तापमान भी उस झिल्ली को दुर्बल कर सकता है। ‘स्टार वार’ का जो घातक खेल खेला जा रहा है उसका प्रभाव धरातल पर ही नहीं बल्कि आच्छादन पर भी पड़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो अन्तरिक्षीय आदान-प्रदान में ऐसा व्यतिरेक उत्पन्न हो सकता है कि पृथ्वी पर भरा हुआ जल भाप बनकर ऊपर उड़ जाय और यहाँ वैसी ही स्थिति बन जाय जैसी कि वर्तमान मंगल ग्रह की है। पानी उड़ जाने पर न वनस्पतियाँ रहेंगी और न प्राणियों के लिए जीवित रह सकना संभव होगा।

मंगल का आवरण, आच्छादन किस कारण फटा यह तो अभी नहीं जाना जा सका, पर इतना निश्चित है कि उस सुरम्य ग्रह की दुर्दशा जीवधारियों द्वारा किए गए हस्तक्षेप से आवरण में टूट-फूट हो जाने के कारण ही हुई। वहाँ की जमीन के गर्भ में गहराई पर अभी भी बड़ी मात्रा में पानी का संग्रह है उसे ऊपरी परत ने किसी प्रकार बचा रखा है।

संभव है, मंगल को किसी अन्तरिक्षीय दुर्घटना का शिकार होना पड़ा हो, पर यहाँ तो शासक और वैज्ञानिक मिलकर शस्त्र सज्जा जुटाने में स्टार-वार के माध्यम से ऐसी भयावह खिलवाड़ करने में लगे हुए हैं, जिससे न केवल वे, वरन् अपने इस सुन्दर भूलोक को भी ले डूबेंगे। हमें आशा रखनी और विश्वास करना चाहिए कि मंगल ग्रह की दुर्दशा जैसी भूल पृथ्वी-वासी नहीं करेंगे। समय रहते सद्बुद्धि जागेगी एवं सृष्टि संतुलन करने वाली व्यवस्था से और छेड़खानी नहीं की जाएगी।


Quotation

कोई वह करता है जो उसे नहीं करना चाहिए तो निश्चय ही वह भोगेगा जो उसे नहीं भुगतना पड़ता।


इक्कीसवीं सदी की भवितव्यताएँ - 4 - नारी की प्रतिभा उभरेगी- क्षमता निखरेगी

नर और नारी का मध्यवर्ती अन्तर कृत्रिम है। दोनों ही मनुष्य वर्ग के अविच्छिन्न अंग हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक एवं सहयोगी हैं। दोनों की अपनी-अपनी विशिष्टता एवं उपयोगिता है। एक के बिना दूसरे का काम नहीं चल सकता। एकाकी रहने पर दोनों ही अपूर्णता एवं खीज-असंतुष्टि अनुभव करते हैं और नीरसता, निराशा के दो पाटों के बीच आकार अनाज में रहने वाले घुन की तरह पिस जाते हैं।

दोनों अपने आप में समर्थ एवं स्वावलम्बी हैं। एक दूसरे की सेवा-सहायता, श्रद्धा और सद्भावना के आधार पर करते हैं। किसी को किसी के हाथों अपना स्वाभिमान बेचने की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई किसी पर भौतिक क्षेत्र में आश्रित नहीं है, पर फिर भी पारस्परिक सद्भावना अर्जित करके अपनी श्रेष्ठता तथा प्रसन्नता को कई गुना बढ़ा लेते हैं। यह आदान-प्रदान विश्व-ब्रह्मांड की स्थिरता और गतिशीलता का आधार है। नर-नारी चेतना के पिण्ड और पुंज होने के कारण शोभा, सुन्दरता और उपयोगिता बढ़ा लेते हैं।

मानवी गरिमा की स्थिरता और अभिवृद्धि में नर-नारी का समान योगदान है। कोई किसी से न तो वरिष्ठ है, न कनिष्ठ। यह सदाशयता और सज्जनता ही है, जिसमें नम्रता और कृतज्ञता से प्रेरित होकर वे एक दूसरे से छोटे बनने का प्रयत्न करते हैं और समर्पित रहने में अनुभव करते हैं- संतोष, गर्व और उल्लास। इस पारस्परिक सद्भाव के उत्पादन से किसी के ऊपर किसी का दबाव नहीं है और न इसमें हीनता के लिए कहीं कोई गुंजाइश।

दोनों मिल जुलकर अपने-अपने हिस्से का काम करते हैं तो भिन्नता एकता में परिणत होती है। गाड़ी दो पहियों पर चलती है। ताली दो हाथ से बजती है। यात्रा के निमित्त दोनों पैर उठते हैं। दो आंखों को, दो कानों को, दो नथुनों को, दो फेफड़ों, गुर्दों को परस्पर पूरक ही कहा जा सकता है। इनमें से एक रहे दूसरा न हो तो कुरूपता तो बनेगी ही, दोनों का काम एक के करने पर शक्ति का क्षरण भी अनावश्यक रूप से होगा।

दोनों के काम अलग-अलग हैं। किन्तु यह कोई पत्थर की लकीर नहीं है। आवश्यकतानुसार कामों को अदल बदल भी सकते हैं। काम सो काम। न उसमें कोई ऊँचा है न नीचा। न किसी का किसी क्षेत्र में छोटापन है, न बड़प्पन। सुविधा के लिए काम का विभाजन, वर्गीकरण किया जाता है। चलने में बायाँ पैर आगे उठता है और खाने में दाहिने ही हाथ की पहल होती है। इसमें न किसी की इज्जत घटती है, न बढ़ती। जहाँ ऐसा भेदभाव पैदा हुआ, समझना चाहिए कि अनर्थ का बीजारोपण हो गया। इसका प्रतिफल बुरा ही होकर रहेगा।

जनसंख्या का आधा भाग नर है तो आधा भाग नारी। प्रगति और अवगति के लिए दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं। यदि किसी की योग्यता को प्रतिबंधित किया जाता है तो समझना चाहिए कि मानवी आचार संहिता का हनन हो रहा है। परस्पर प्रोत्साहन ही दिया जा सकता है। आगे बढ़ाने में सहयोग भी। यह कार्य प्रतिष्ठा एवं प्रशंसा का उपहार देकर ही कराये जा सकते हैं। दोनों एक दूसरे के लिए उदार और सच्चाई भरे मन से एक दूसरे के लिए यह अनुदान प्रस्तुत करें और व्यक्तित्व को बलिष्ठ समर्थ प्रखर बनाने में सहयोगी भी बनें। गलतियों को हँसी में उड़ाते रहने और सेवाओं को अविस्मरणीय रखने से ही घनिष्ठता बनती और कड़ी गाँठ की तरह बँधती है।

इन सिद्धान्तों की पिछले दिनों उपेक्षा होती रही है। नर को स्वामी और नारी को पालतू पशु का स्थान मिलता रहा है। सामाजिक न्याय की दृष्टि से भारी पक्षपात बरता जाता रहा है। नारी घूंघट निकाले, नर नहीं। नारी सती हो, नर नहीं। नारी को दहेज देना पड़े, नर को नहीं। नारी पिटे, नर नहीं। बिना संरक्षण के नारी घर से बाहर कदम न रख सके और नर स्वच्छंद विचरे। नर एक साथ कई विवाह कर ले पर नारी विधवा होने पर भी नहीं। यह ऐसे प्रतिबंध हैं, जिन्हें न्याय और औचित्य की किसी कसौटी पर खरा नहीं माना जा सकता। किन्तु फिर भी वे रहे हैं और आज भी पिछड़े क्षेत्रों में विशेष रूप से रह रहे हैं। इसका सीधा-सा परिणाम यह हुआ कि केवल पुरुष को ही पूरी गाड़ी धकेलनी पड़ी है। नारी को सहयोग कर सकने का अवसर ही नहीं मिला। फलतः उसकी प्रतिभा छीजती, घटती और गिरती गई। परिणाम समूचे समाज को सहना पड़ा। वह अर्ध विकसित बन कर रहा। अर्धांग पक्षाघात पीड़ित की तरह किसी प्रकार घिसटते हुए चला।

नारी को रमणी, कामिनी, भोग्या और काम कौतुक के लिए विनिर्मित समझा गया। रंग बिरंगे वस्त्र, आभूषण श्रृंगार प्रसाधन, इसलिए उस पर लादे गये ताकि वह अधिक आकर्षक, उत्तेजक प्रतीत हो। लाल सिंदूर लगाकर अपने को सधवा, किसी की सम्पत्ति होने की घोषणा करे। नख शिख की सुन्दरता और मांसलता के आधार पर उसका मूल्याँकन किया गया। रूपवती प्रिय लगी और सामान्य बनावट वाली तिरस्कृत होती रहीं। उनका अवमूल्यन और उपहास हुआ। इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि जो कामुकता भड़का सके, उस आदेश को अनिच्छा एवं अखरता रहने पर भी शिरोधार्य करती रहे, उसे ही पतिव्रता माना जाय।

इस संदर्भ में शिक्षित अशिक्षित, भारतीय योरोपीय सभी क्षेत्रों की नारियों की अपनी-अपनी कठिनाइयाँ हैं। किन्हीं को दबाव सहना पड़ता है तो किन्हीं को लुभावने आकर्षणों की सुनहरी जंजीर से बाँधा जाता है।

विचारणीय है कि क्या भविष्य में नारी को रबड़ की गुड़िया या कठपुतली की तरह ही जीवन-यापन करना पड़ेगा? क्या वह अपनी प्रतिभा का उपयोग, व्यक्तित्व को प्रखर और समाज को समुन्नत बनाने में कभी भी न कर सकेगी? यदि ऐसा हुआ तो समझना चाहिए कि संसार पर लदा हुआ पिछड़ापन आधी मात्रा में तो अनिवार्य रूप से बना ही रहेगा।

नारी की एक और बड़ी भूमिका है- प्रजनन। वह मात्र प्रसव ही नहीं करती वरन् भावी पीढ़ी का स्तर भी विनिर्मित करती है। वह सच्चे अर्थों में भविष्य की निर्मात्री है। क्योंकि बालक माता के संस्कार लेकर ही जन्मते हैं और शैशव की सारी अवधि उसी के संरक्षण में गुजारते हैं। तद्नुसार उनके गुण, कर्म, स्वभाव का ढाँचा अधिकतर इसी अवधि में ढल लेता है। बाद में तो उस पर खराद होती रहती है।

इस संदर्भ में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण वह मान्यता है जिसमें नारी का मूल्यांकन उसकी सुन्दरता-कामुकता के आधार पर किया जाता है। विवाह का अर्थ है- कामुकता की कानूनी छूट के रूप में नारी का प्रयुक्त होना। हेय मान्यता के कारण ही वह फुसलाई जाती है, बिकती है। व्यभिचार, बलात्कार की शिकार होती है, किसी विभाग में नौकर है तो अफसरों के इशारे पर चलने में ही खैर मनाती है। प्रतिरोध करने पर अभियोगों और लांछनों से लदती है। कालगर्ल्स बनने से लेकर कैबरेडान्सों तक में, वेश्याओं के कोठों में उसकी दयनीय दुर्दशा देखी जा सकती है। भूली भटकी जहाँ-तहाँ नारी निकेतनों में भर्ती होती हैं। तलाक और गर्भपात की विवशता उनके लिए कितनी कष्टकर और आघातपूर्ण होती है। उसे भुक्तभोगी स्थिति में ही जाना जा सकता है। बाल विवाहों से उनका शरीर किस प्रकार खोखला और रोगी हो जाता है, इसकी जानकारी सर्वेक्षणकर्ताओं ने अनेक अवसरों पर प्रकट की है।

नारी को इस स्थिति से उबारना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वर्तमान कुदृष्टि, कामुक चिन्तन की शिकार होने से उन्हें बचाया जाय। समानता का वास्तविक तात्पर्य यह है कि मान्यता और भावना की दृष्टि से नर नारी- भाई भाई की- बहिन बहिन की- या भाई बहिन की दृष्टि से पारस्परिक संबंधों को देखें। प्रेत पिशाच की तरह कामुकता को सिर पर न चढ़ी रहने दें। आंखों में शैतान की कुदृष्टि न घुसी रहे। भोग्या और उपभोक्ता का रिश्ता न रहे। कामुकता को न आवश्यक समझा जाय और न महत्व दिया जाय। पशुओं में प्रजनन अवधि आने पर नारी ही प्रथम प्रस्ताव करती है। नर बिना अनुरोध के साथ-साथ जीवन भर रहने पर भी अपनी ओर से छेड़ खानी का कभी कोई प्रसंग उपस्थित नहीं होने देता। यही प्रचलन मनुष्यों में भी रहे तो शरीरों का ऐसा सर्वनाश न हो, जैसा कि इन दिनों होता रहता है। उन मानसिक विकृतियों से छुटकारा मिले जो उत्कृष्ट चिन्तन के लिए गुंजाइश ही नहीं छोड़तीं। बलात्कार, व्यभिचार, अपहरण आदि की जो दुर्घटनाएं आये दिन होती रहती हैं उनकी कोई संभावना या गुंजाइश ही न रहे।

सौंदर्य देखने की- पुलकन की वस्तु है। उसे मरोड़ देने, गला घोट देने के लिए नहीं सृजा गया है। देवियों की प्रतिमाएँ सुन्दर भी होती हैं और सुसज्जित भी। उन्हें मंदिरों में प्रतिष्ठित देखा जा सकता है। दृष्टि सदा मातृ भाव से सनी पवित्रता से ही भरी रहती है। यही दृष्टि हाड़ माँस की नारी के लिए भी रखी जा सकती है। ऐसी स्थिति में सच्चे प्यार की भावनाएँ बनती हैं और गिराने की नहीं, अधिक विकसित करने की इच्छा होती है। इसी मनोभूमि में नर-नारी के बीच पारस्परिक स्नेह सौजन्य पनपता है और उनके सच्चे मन से मिलने पर ही एक और एक ग्यारह होने की उक्ति चरितार्थ होती है।

आज की विषम बेला में तो दाम्पत्य जीवन में और अधिक तप संयम बरतने की ही आवश्यकता है। हँसने मुस्कराने भर से काम क्रीड़ा की मानसिक पूर्ति हो जानी चाहिए। साथ-साथ रहने, काम करने, एक दूसरे को अधिक सुयोग्य बनाने, सम्मान देने, प्रशंसा करने में जो प्रसन्नता होती है उस पर घिनौनी कामुकता को निछावर किया जा सकता है।

अगले दिनों नारी को प्रतिबंधों, दबावों, तनावों, बंधनों से मुक्त करके सामान्य मनुष्य जीवनयापन करने की स्थिति में लाना होगा। उसे काम कौतुक से उबार कर व्यक्तित्व निखारने, प्रतिभा उभारने एवं योग्यता बढ़ाने के लिए समुद्यत करना होगा। यह समय की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे साहित्यकारों, चित्रकारों, विज्ञापन वालों, फिल्म व्यवसायियों के लिए मनोरंजन और कमाई का साधन नहीं बनने देना चाहिए। उसे इस रूप में सज्जित प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए जिससे वह विलास की पुतली दीख पड़े और इस कारण हर ओर से विपदाओं के बादल टूटें।

अगले दिनों नारी को हर क्षेत्र में नर की समता करनी होगी, सहायक की समर्थ भूमिका निभानी होगी। पर यह संभव तभी है जब उसे कामुकता की नारकीय अग्नि में जलने और जलाने से बचाया जाय। अगले दिनों नारी का देवी स्वरूप निखरना है, जिससे वह सर्वत्र सुख शाँति की स्वर्गीय वर्षा कर सके। अध्यात्म क्षेत्र की यह जिम्मेदारी है कि आने वाले वर्षों में नारी को जन नेतृत्व हेतु आगे बढ़ाएँ।


कंजूस सदा घाटे में रहते हैं। (Kahani)

एक महात्मा ने किसी भक्त की सेवा भावना से प्रसन्न होकर उसे सात दिन के लिए पारस-मणि दी और कहा- इसे छूने से लोहा सोना हो जाता है। जितने सोने की जरूरत हो बना लो। सात दिन बाद यह वापिस ले ली जायेगी।

भक्त बड़ा प्रसन्न हुआ कि अब मेरा सारा दरिद्र दूर हो जायेगा। पर वह था बड़ा कंजूस। सस्ता लोहा बड़ी तादाद में ढूंढ़ने लगा। जिस दुकान पर वह गया वहाँ उसकी समझ में लोहा थोड़ा था और महँगा भी था। बहुत सस्ता और बहुत बड़ा ढेर ढूंढ़ने के लालच में वह कई नगरों में गया पर उसे कहीं सन्तोष न हुआ।

इसी भाग-दौड़ में सात दिन पूरे हो गये। मणि वापिस ले ली गई और वह रत्ती भर भी सोना प्राप्त न कर सका।

अधिक सयाने बनने वाले और अधिक कंजूस सदा घाटे में रहते हैं।


एकता और समता का आदर्श

राष्ट्रीय एकता का वास्तविक तात्पर्य है- मानवी एकता। मनुष्य की एक जाति है। उसे किन्हीं कारणों से विखण्डित नहीं होना चाहिए। भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, जाति, लिंग, धन, शिक्षा, पद आदि के कारण किसी को विशिष्ट एवं किसी को निकृष्ट नहीं माना जाना चाहिए। सभी को समाज में उचित स्थान और सम्मान मिलना चाहिए। उपरोक्त कारणों में से किसी को भी यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि अपने को बड़प्पन के अहंकार से भरे और दूसरे को हेय समझे, उसका तिरस्कार करे।

इन दिनों कई प्रांतों में सम्प्रदाय विशेष के सदस्य होने के कारण अथवा पृथक भाषा भाषी होने के कारण अपने वर्ग-वर्ण को पृथक मानने और राष्ट्रीय धारा से कट कर अपनी विशेष भूमि, विशेष पहचान बनाने की प्रवृत्ति चल पड़ी है। इसे शान्त करने के लिए वैसे ही प्रयत्न किए जाने चाहिए, जैसे अग्निकाण्ड आरम्भ होने पर उसके फैलने से पूर्व ही किए जाते हैं। समता और एकता के उद्यान उजाड़ डालने की छूट किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए। द्वेष को प्रेम से जीता जाता है। विग्रह को तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत करते हुए विवेकपूर्वक शान्त किया जाता है। आक्रमण-प्रत्याक्रमण से तो विषमतायें बढ़ती ही जाती हैं और उस कुचक्र का कभी अन्त नहीं होता। इसलिए दुर्भाव और विग्रहों के पनपते ही उनके शमन समाधान का प्रयत्न करना चाहिए।

यह सामयिक उभार है जो देश का बुरा चाहने वालों की दुरभिसंधि के कारण उठ खड़े हुए हैं। यह विषवेलि पानी न मिलने पर समयानुसार सूख जायगी। पर कुछ व्याधियाँ ऐसी हैं जो चिरकाल से चली आने के कारण प्रथा परिपाटी बन गई हैं और उनके कारण देश की क्षमता तथा एकता दुर्बल होती चली आई है। समय आया है उन भूलों को अब समय रहते सुधार लिया जाय। अन्यथा यह सड़ते हुए फोड़े समूचे शरीर को विषैला कर सकते हैं।

जब सभी मनुष्यों की संरचना- रक्त माँस की बनावट एक जैसी है तो उनमें से किसे ऊँचा, किसे नीचा कहा जा सकता है। ऊँच-नीच तो सत्कर्म और कुकर्म के कारण बनते हैं। उसका जाति वंश से कोई संबंध नहीं। धर्म एक है। सम्प्रदायों का प्रचलन तो समय और क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुरूप हुआ है। उनमें से जो जिसे भावे, वह उसे अपनावे। खाने पहनने सम्बन्धी भिन्न रुचि को जब सहन किया जाता है, तो भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा, भिन्न परम्पराओं का अपनाया जाना किसी को क्यों बुरा लगना चाहिए। एक बगीचे में अनेक रंगों के फूल हो सकते हैं, तो एक देश में अनेक सम्प्रदायों के प्रचलन में ऐसी क्या बात है, जिसके कारण परस्पर विद्वेष किया जाय और एक दूसरे को नास्तिक या अधर्मी कहकर निन्दित बताया गया। सम्प्रदायों की एकता पर हम सब को पूरा जोर देना चाहिए। भाषाओं की भिन्नता पर लड़ने की आवश्यकता नहीं। अनेकता को हटाकर हमें भाषायी एकता अपनानी चाहिए ताकि समूचे देशवासी एक विचारों का आदान प्रदान सरलता के साथ कर सकें।

नर नारी के बीच बरता जाने वाला भेद भाव तो और भी निन्दनीय है। हम अपनी ही माताओं, पुत्रियों, बहनों, पत्नियों को हेय दृष्टि से देखें, यह कैसी अनीति है? इस भूल को अपनाये रहने पर आधा समाज पक्षाघात पीड़ित की तरह अपंग रह जाता है। परिवार वैसे नहीं बन पाते जैसे कि सुयोग्य गृहलक्ष्मी के नेतृत्व में वे बन सकते हैं।

भारतीय संस्कृति के दो प्रमुख आदर्श हैं। एक “वसुधैव कुटुम्बकम्” दूसरा “आत्मवत् सर्व भूतेषु”। इन दोनों को हृदयंगम करने पर एकता और समता को ही मान्यता देनी पड़ती है। इन आदर्शों को हमें किसी देश, क्षेत्र, सम्प्रदाय के सुधार तक ही सीमित न रखकर विश्वव्यापी बनाना चाहिए, ताकि समूची मनुष्य जाति सुख शांति से रह सके और सर्वतोमुखी प्रगति कर सके।


सतयुग लौटने वाला है।

भारत भूमि देवभूमि है। यहाँ की विभिन्न परिस्थितियों का रसास्वादन करने के लिए देवगण उसी प्रकार पृथ्वी पर जन्मने की आकाँक्षा करते हैं, जिस प्रकार कि हम सब स्वर्ग जाने और वहाँ के वैभव का लाभ लेने की सोचते हैं।

प्राचीन काल में इस स्वर्गादपि गरीयसी भारतभूमि पर देव-मानवों का ही बाहुल्य था। उनकी जीवनचर्या आदर्शों से ओत-प्रोत रहकर ही व्यतीत होती थी। चंदन वृक्ष की तरह वे समीपवर्तियों को अपने सदृश बनाते थे और समूचे वातावरण में ऐसी गंध बिखेरते थे, जिससे हर किसी का मन शान्ति सन्तुलन से भरा पूरा रहे।

संसार का हर पदार्थ गतिशील है। सौर मंडल के ग्रह उपग्रह तो अपनी धुरी तथा कक्षा में परिभ्रमण करते ही रहते हैं। पदार्थ की लघुतम इकाई के रूप में विद्यमान परमाणु तक को अपने साथ बाँधे रहते हैं। साथ ही उन्हें गतिशील भी बनाते हैं।

भारत भूमि पर अवतरित हुए देव-मानवों के लिए सर्वाधिक आनन्ददायक काम था प्रव्रज्या। प्रव्रज्या कहते हैं धर्म धारणा के विस्तार के लिए किया गया परिभ्रमण। एक स्थान पर स्थिर रहने की नीति वृक्षों या चट्टानों की है। वे जहाँ जन्मते हैं, वहाँ पर मरण की इति श्री भी करते हैं, किन्तु जिनमें जीवन है उन्हें गतिशीलता अपनानी पड़ती है। गति अर्थात् चलना। कहाँ चलना? किस कार्य के लिए चलना? इस प्रश्न का उत्तर महामानवों की ओर से सदा एक ही मिलता रहा है। प्रसुप्ति को जागृति में बदलना। अनगढ़ को सुगढ़ बनाना। निष्क्रियों में सक्रियता का प्राण फूँकना, अविनीत को प्रगति में बदलना। यही है वह प्रयोजन जिसके लिए देव-मानव अपने आपको सूर्य चन्द्र की तरह गतिशील बनाये रहते हैं एवं किसी स्थान विशेष से मोह नहीं जोड़ते।

बादल एक जगह नहीं टिके रहते। यों उनका जन्म स्थान समुद्र है, पर वे समुद्र के आश्रित बनकर उसी के इर्द-गिर्द मंडराते नहीं रहते, वरन् लम्बे प्रवास पर निकल जाते हैं, जहाँ पानी की आवश्यकता अनुभव करते हैं। बिना अपने पराये का भेद-भाव किए वे मूसलाधार बरस पड़ते हैं। अपने को गला देते हैं, पर यह गलना भी निरर्थक नहीं जाता। मिट्टी में जलधार के आत्मसात् होने पर जो हरीतिमा उगती है, उससे न केवल धरित्री की शोभा सुषमा बढ़ती है, वरन् उनके प्राणियों को जीवन धारण करने का अवसर भी मिलता है। ग्रीष्म से तपती जमीन शान्त होती है और कुम्हलाये हुए मुरझाये हुए पादपों को नवजीवन उपलब्ध होता है। बादल इसी में अपने को कृतकृत्य हुआ अनुभव करते हैं।

पवन अनिवार्य रूप से चलता रहता है। हर किसी को हिलाता और गोदी में लेकर झूला झुलाने जैसा मोद प्रदान करता है। इतना ही नहीं, वह इस प्राण तत्व को भी न केवल बाँटता है, वरन् फेफड़ों के भीतर पहुँचाता भी है, जिसके बिना किसी जीवधारी का जीवित रह सकना संभव नहीं।

नदी, निर्झर बहते हैं। उसके प्रयास से कितनों की प्यास बुझती है। खेत, उद्यान हरे भरे रहते और फल फूल से लदते हैं। नदियाँ समीपवर्ती क्षेत्रों से जल समेटती चलती हैं और सबको लेकर मार्ग में सिंचाई करती हुई समुद्र केन्द्र का भण्डार भरती हैं ताकि थलजीवों की तरह जलजीवों का भी पोषण होता रहे।

मनुष्यों और देवमानवों की रीति, नीति, विधि, दिशाधारा यही होती है। वे अपने निजी वैभव और यश की ओर ध्यान नहीं देते। औसत नागरिकों जैसा निर्वाह करने की व्यवस्था तो किसी प्रकार बन जाती है। प्रश्न है ऐसे काम करने का, जिनके साथ जीवन की सार्थकता जुड़ी हुई है। ऐसे काम एक स्थान पर बैठ कर तो कदाचित ही किसी सीमा में हो सकते हैं। जहाँ आवश्यकता है वहाँ दौड़कर स्वयं जाना पड़ता है। रेल, मोटरें स्वयं दौड़ती हैं और यात्रियों को अपने कंधे पर लादकर स्थान-स्थान पहुंचाती हैं। नावें भी यही करती हैं। स्वयं पानी में भीगी रहती हैं, पर बैठने वालों को भीगने से बचाकर पार उतारती हैं। उन्हें भी चलना दौड़कर पड़ता है, जबकि लाभ उठाने वाले उसकी पीठ पर जमे बैठे रहते हैं।

पानी का स्वभाव है कि जहाँ गड्ढा होता है वहाँ दौड़कर स्वयं जा पहुँचता है और तब तक भरता रहता है जब तक कि जल थल की सतह एक नहीं हो जाती। पिछड़े हुओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और उन्हें इतना सहयोग मिलना चाहिए कि वे समुचित स्तर तक ऊँचे उठ सकें। पिछड़ गये हों तो आगे बढ़ सकें। यह उनकी माँग पर नहीं, अपनी उदारता और आत्मीयता की प्रेरणा से किया जाना चाहिए।

माली स्वयं एक सीमा तक ही ऊँचा बढ़ता है, पर उसके लगाये पेड़ पर्याप्त ऊंचाई तक उठ जाते हैं। अनेक पक्षियों और कीट पतंगों का आश्रय बनते हैं तथा फल फूलों से छाया, ईंधन से अनेकों का हित-साधन करते हैं। इसका श्रेय माली को ही है कि उसने नन्हें बीज को शोभायमान समुन्नत वृक्ष बनाकर गौरवशाली बनने का श्रेय प्रदान किया। देवता भी यही करते हैं।

देवता उन्हें कहते हैं जो देते बहुत और लेते कम हैं। लेने के लिए मनुष्य की वास्तविक आवश्यकतायें ही कितनी हैं। पेट भरने को रोटी और तन ढकने को कपड़ा कुछ ही घंटों के परिश्रम से ही उपार्जित किया जा सकता है। कठिनाई तो तृष्णा की है। वही ऐसी खाई है जिसे कुबेर जितने खजाने से भी नहीं भरा जा सकता। अहंता का दर्प ऐसा है जिसके लिए इन्द्र जैसा वर्चस्व भी कम दिखाई पड़ता है। जो इन्हीं की पूर्ति में लगे रहते हैं उन्हें न समय मिलता है, न संतोष, न चैन। कोल्हू के बैल की तरह किसी के स्वार्थ साधन बनते हैं और बेगार भुगतते हुए दम तोड़ते हैं।

भारत सदा से देवभूमि रहा है। यहाँ से नर-रत्न उपजते और पुण्य परमार्थ के लिए अपना श्रम, समय, मनोयोग निछावर करते रहे हैं। साधु और ब्राह्मण के नाम से पहचाना और पूजा जाने वाला वर्ग शरीर संरचना की दृष्टि से तो अन्य मनुष्यों जैसा ही होता है, पर प्रवृत्ति में उत्कृष्ट आदर्शवादिता घुली रहती है। उन्हीं प्रेरणाओं से प्रेरित होकर वे अपनी रीति-नीति और गतिविधि का निर्धारण करते हैं। अपने लिए न्यूनतम लेते हैं और दूसरों के लिए अधिकतम देने के कारण ही पुरोहित वर्ग को भूसुर की- धरती के देवता कहलाने की प्रतिष्ठा मिली।


Quotation

यह परम्परा जब तक स्थिर रही तब तक इस देश को विश्व जन समुदाय ने जगद्गुरु का सम्मान दिया और चक्रवर्ती शासक के रूप में अपना भाग्य उन्हीं देवजनों के हाथ सौंपा। स्वर्ग सम्पदाएँ भी इन्हीं के हाथों अमानत रूप में जमा होती रहीं ताकि आवश्यकतानुसार उपयुक्त प्रयोजनों के लिए उसका प्रयोग होता रहे।

सतयुग की वापसी सन्निकट है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि सन्त परम्परा अपनाने के लिए विज्ञ समुदाय में उमंगों भरी लहरें उठ रही हैं और लोग स्वार्थ के बंधन तोड़कर परमार्थ की दिशा अपना रहे हैं। वे परिव्राजक बनने की विशालकाय योजना बना रहे हैं।

“विश्व चेतना अवतार ले चुकी है । नई पीढ़ी का सबसे बड़ा कर्त्तव्य यह है कि वह इस चेतना में आत्मा का प्रवेश कराये। हमें ऐसे आदर्शों एवं ऐसी संस्थाओं को अस्तित्व में लाना है जिनके भीतर से विश्वात्मा अपनी अभिव्यक्ति कर सके।” -सर राधाकृष्णन


शेखसादी के नीति वचन

“यह सही नहीं है कि प्रपंचों और विज्ञापनों के आधार पर किसी को सम्मान दिलाया या बदनाम किया जा सकता है। सत्य अपने आप में इतना समर्थ है कि अपनी स्थिति स्वयं स्पष्ट कर देता है। दिनमान उदय होने पर बदली छाने या कुहासा फैलने पर हल्का सा धुंधलापन आ सकता है, पर रात्रि हो जाने जैसा अंधकार किसी भी व्यवधान के कारण उत्पन्न नहीं हो सकता।”

“अपने आप को खरा रखो। अन्तर को टटोलो। देखो कि कहीं उसमें खोट तो छिपा हुआ नहीं है। चिनगारी छोटी होने पर भी अवसर पाकर प्रचंड ज्वालमाल बन सकती है। अपनी ही कमियाँ चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को गर्हित बनाती हैं। प्रकाश की ओर पीठ करके चलने वाला मात्र अपनी काली परछाई ही देखता है। आदर्शों से विमुख होकर कोई व्यक्ति न तो गरिमा अर्जित करता है और न ओछे उपायों से प्राप्त की गई ख्याति को बनाये रह सकता है। छद्म में देर तक पैर जमाये रहने की सामर्थ्य नहीं है।”

“नास्तिक से पाखंडी बुरा है। नास्तिक ईमानदार होता है। वह अपने विश्वासों को प्रकट करता है और बहुमत का विरोध सहने के लिए भी जोखिम भरा साहस करता है। किन्तु पाखंडी पहले आत्महनन करता है पीछे दूसरों की आँखों में धूलि झोंकता है। इस प्रकार पोल खुलने पर सामाजिक दंड मिलने के पूर्व ही वह उस भार से लद चुका होता है, जो कमर तोड़ती और गरदन मरोड़ती है।”

“छद्म एक प्रकार की जादूगरी है, जिससे बाल बुद्धि को भरमाया और नासमझी का कौतुक कौतूहल जैसा आडम्बर जता कर प्रभावित किया जा सकता है, पर वह स्थिति देर तक नहीं टिकती। बाजीगर के पास यदि वस्तुतः सिद्धियाँ रही होतीं तो यह तमाशा क्यों दिखाता, मजमा क्यों जुटाता, घर बैठे क्यों न पुजता।”

“देखभाल कर चलो और जाँच परख कर खरीदो। इस दुनिया में सब कुछ वैसा ही नहीं है जैसा कि बाहर से दिखता है। असल की नकल बनाने में लोग बहुत चतुर हैं। असली हीरे बड़े जौहरियों की दुकान पर ही मिलते हैं, पर नकली काँच के टुकड़े उनसे भी अधिक चमकते हैं और सन्दूक लेकर बैठने वाले बिसातियों की चादरों पर फैले पड़े रहते हैं। इस प्रचलन को रोका नहीं जा सकता। समझदारी इसी में है कि आँख खोल कर चला जाय और ठोकर खाने से बचा जाय।”

“न किसी पर विश्वास करो न अविश्वास। मनुष्य का स्वभाव परिवर्तनशील है। वह आज ऐसा है तो कल वैसा भी बन सकता है। परिवर्तनशीलता को ध्यान में रखो और हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहो। ऐसा न हो कि विश्वास में आकर विश्वासघात सहने के लिए बाधित हो जाओ। अच्छा यही है कि अति उत्साह से भरकर स्वयं को प्यार या द्वेष की सीमा में न रखा जाय, अपितु संतुलन बनाये रखा जाय। यही जीने की सच्ची रीति नीति है।”


Quotation

डेनमार्क के प्रख्यात मूर्तिकार थोवडिसन अपने समय के अद्वितीय कलाकार थे।

एकत्र मण्डली ने उनसे एक दिन पूछा- आपने किस गुरु से यह विद्या सीखी और किस विद्यालय में प्रवीणता प्राप्त की?

उत्तर देते हुए उनने कहा- आत्म समीक्षा ही ऐसा गुरु है और आत्म सुधार ही मेरा विद्यालय है। मैंने सदा अपनी कृतियों में त्रुटि खोजी और अधिक उपयुक्त बनाने के लिए जो समझ में आया उसे अविलंब अपनाया। इस अवलंबन को अपनाकर कोई भी सफलता के उच्च शिखर तक पहुँच सकता है।


सन्त इमर्सन के वैदिक विचार

अधिकाँश व्यक्ति संभवतः यह नहीं जानते कि प्रसिद्ध अमेरिकी अंतर्ज्ञान एवं प्राच्यविद्या विशारद राल्फवाडो इमर्सन पूर्वार्त्त दर्शन, वेद-उपनिषद् एवं गीता के प्रकाण्ड विद्वान थे। उनके लेखन में इन प्रतिपादनों की झलक मिलती है। उनका मत था कि आर्ष ग्रन्थों में विवेक एवं दर्शन का खजाना है।

वे सृष्टि की एक नियामक सत्ता को मानते थे, तथा उसे परब्रह्म- परमात्मा कहते थे। आत्मसत्ता पर विश्वास व्यक्त करने वाला उनका दर्शन ठीक वेदान्त पर आधारित था। इसे उन्होंने रिव्रस्तीय प्रतिपादनों के आधार पर बाइबिल के उदाहरणों से समझाने का प्रयास किया क्योंकि उनके पाठक मूलतः ईसाई ही थे। इमर्सन कहते थे कि ‘परमात्मा बिना सूचना दिए अथवा प्रकट हुए जीवात्मा की सतत् सहायता करता रहता है। दोनों के बीच कोई परदा या दीवार नहीं है जो इनके मिलन में बाधक बन सके।’ ईश्वर को उन्होंने अनादि, अनन्त माना एवं माया के दर्शन को ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या’ सिद्धान्त पर जन सामान्य को समझाया।

इमर्सन मानते थे कि जीवन, जवानी, बुढ़ापा, धन-वैभव, प्राणी सब में उस परमसत्ता का माया रूप संव्याप्त है। मानव जीवन को कमल पत्र पर पानी के एक बूँद की तरह विराजमान मानते हुए उन्होंने आद्य शंकराचार्य के प्रतिपादन की ही व्याख्या की। वे भाग्य के सिद्धान्त को मानते थे और पुरुषार्थवाद पर उन्होंने डटकर लिखा है। उनका मत था कि “हर प्राणी को अपने पूर्वजन्मों के कर्मों को भोगने के लिए बार-बार असंख्यों रूपों में जन्म लेना पड़ता है। जो जैसा करता है, वैसा पाता है। जो वैसा बोता है, वैसा काटता है।” ये मान्यताएँ कर्मफल के सिद्धान्त की पुष्टि करती एवं पुनर्जन्म का भी सत्यापन करती हैं।

इमर्सन अपने प्रतिपादनों में विभिन्न उदाहरणों से यह प्रतिपादित करते थे कि “कर्मफल वस्तुतः मनुष्य द्वारा समष्टि में समायी परमात्म सत्ता के साथ किए गए व्यवहार की ही प्रतिक्रिया है। कर्म और फल छाया की तरह मनुष्य के साथ लगे रहते हैं। मनुष्य अपने पापों को प्रार्थना व प्रायश्चित से समूल नष्ट तो नहीं कर सकता, हाँ प्रायश्चित के बाद उसका व्यवहार यदि मानवोचित है तो प्रतिफल उतना तीव्र नहीं होता, थोड़ा-सा कष्ट देकर निकल जाता है।” जितने भी प्रकार के मनोविकार एवं मनोशारीरिक रोग हैं, उन्हें वे कर्मों की प्रतिक्रिया ही मानते थे एवं तद्नुसार ही चिकित्सा किए जाने का निर्देश देते थे।

इमर्सन ने अपने ग्रन्थ “स्वेडनबर्ग” में माया, कर्मफल एवं पुनर्जन्म के सिद्धान्तों को हिन्दू दर्शन की पृष्ठभूमि पर समझाने का प्रयास किया है। वे लिखते है” कि जीवात्मा को हजारों बार जन्म लेना पड़ता है, जब तक कि वह अपने सभी दुष्कृतों से मुक्ति नहीं पा लेता। किन्हीं-किन्हीं को प्रयास करने पर अथवा अध्यात्म उपचारों द्वारा अथवा अनायास ही पूर्वजन्मों की स्मृति भी बनी रहती है, पर सृष्टा ने हर जन्म के बाद भूलने का ही सिद्धान्त बनाया है। पुनर्जन्म के प्रसंग मात्र पौराणिक निरर्थक नहीं, वरन् यथार्थ हैं।” रव्रीस्त भौतिकवादियों के खडण्नात्मक प्रतिपादनों को उन्होंने जगह-जगह काटा है।

अपने सभी ग्रन्थों में वे पाप और बुराई को अज्ञान का परिणाम बताते हुए लिखते हैं कि “ये भव बन्धन है जो मुक्ति के मार्ग में बाधक होते हैं। यदि परमात्मा का सच्चा प्यार चाहते हो तो उसे अच्छाइयों के समुच्चय, उत्कृष्टता की प्रतिमूर्ति के रूप में समझो एवं अपना व्यवहार वैसा बनाओ जैसा कि वह तुम से अपेक्षा रखता है। वैभव की प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ बुरा नहीं है, पर जब उसके लिए गलत तरीके अपनाए जाते हैं तो उस परमसत्ता का रोष विभिन्न प्रकार के दुर्व्यसनों, मानसिक संत्रास एवं विक्षोभों के रूप में प्रकट होता है।”

इन सभी प्रसंगों को पढ़ने पर लगता है कि विश्वमनीषा एक ही स्तर पर सोचती एवं अपनी अभिव्यक्ति करती है। इमर्सन ने प्रकारांतर से वैदिक वाणी को ही अपने शब्दों में प्रतिपादित किया है।


हजरत उमर– उनके जीवन के कुछ प्रसंग

इस्लाम धर्म को ऊँचा उठाने वाले कुछ गिने-चुने व्यक्तियों में हजरत उमर साहब का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है। उनके जीवन से संबंधित कुछ प्रसंग ऐसे हैं जो उस आदर्शवादिता का परिचय देते हैं जो सार्वभौम है, सभी धर्मों का मर्म है।

एक बार कूफे के गवर्नर ने अपने लिए एक बड़ा महल बनवाया और उसमें कीमती फाटक लगवाया। शान के लिए दरवाजे पर दरबान बिठाया। खबर हजरत उमर तक पहुँची और जाँच कराने पर सही भी निकली। उनने बड़े अफसर कूफे को भेजा और उन्होंने गवर्नर के फाटक तथा महल में आग लगवा दी। इस घटना से सारे राज्य के कर्मचारियों के कान खड़े हुए और उन्होंने आगे से सरकारी इमारतों को जनता के स्तर के अनुरूप ही बनवाया।

हजरत उमर ने अपने खानदान वालों के लिए यह रोक लगा रखी थी कि उन्हें किसी ऊँचे सरकारी पद पर अफसर न बनाया जाय। जिनने इस्लाम के लिए कुर्बानियाँ दी थीं और बड़े-बड़े कष्ट उठाये थे उन्हें भी पूर्वजों की ख्याति का कोई अनुचित लाभ न उठाने दिया।

एक बार युद्ध विजेताओं को एक-एक हजार दिरहम इनाम दिए गये। पर उनके पुत्र अब्दुल्लाह को उससे आधा ही पैसा मिला। उसने नाइंसाफ़ी की शिकायत की तो हजरत ने कहा- “तुम्हें मेरी आदर्शवादिता का भी हिस्सेदार होना चाहिए।” इसी प्रकार बेटे का काम अधिक भारी होते हुए भी उसकी अपेक्षाकृत कम वेतन पर नियुक्ति की गई। उनने अपने कबीले के लोगों से कह रखा था कि अपना आचरण दूसरों से ऊँचा रखें, अन्यथा उन्हें साधारण लोगों की तुलना में अधिक दण्ड दिया जायगा।

एक बार राज्य कोष में कस्तूरी जमा होने के लिए आई। तौलने के लिए उनकी पत्नी तराजू लेकर आगे आई। खलीफा ने उन्हें रोक दिया और कहा- “कस्तूरी की महक तुम्हारे हाथों और कपड़ों में लगेगी। ऐसी दशा में वह अतिरिक्त लाभ तुम्हें मात्र मेरी पत्नी होने के नाते क्यों उठाने दिया जाय?” उनके हाथ से तराजू छीनकर दूसरे कर्मचारी को दे दी गई।

हजरत उमर की पत्नी का रूस के सम्राट की पत्नी के साथ मेलजोल और पत्र व्यवहार था। एक बार पत्नी ने साम्राज्ञी को इत्र की शीशी उपहार में भेजी। बदले में साम्राज्ञी ने कुछ रत्न भेजे। खलीफा को पता चला तो उनने इत्र के पैसे पत्नी को देकर बाकी सारी रत्नराशि राज्यकोष में जमा करा दी।

एक बार हजरत उमर के लड़के अब्दुल्लाह ने एक ऊँट खरीदा। उसे सरकारी चरागाह में चरने के लिए छोड़ दिया गया। वह मोटा हो गया। हाट में बिकने बहुत से ऊँट पहुँचे। मोटा ऊँट किसका है? इसकी खलीफा ने जाँच कराई। मालूम पड़ने पर उसे बाजारू ऊंटों जितना ही पैसा दिया गया। जो बढ़ी हुई कीमत थी वह जब्त करके सरकारी चरागाह में चरने के कारण खजाने में जमा करा दी गई।

एक बार राज्य कोष की वार्षिक गिनती हुई। उसमें एक दीनार अधिक पायी गयी। कोषाध्यक्ष ने उसे हजरत के छोटे लड़के को दे दिया। मालूम होने पर उसे लौटा दिया गया और फिर से राज्य कोष में उसे शामिल किया गया। उनने कहा- “हमारे बच्चे प्रजा के धन को मुफ्त में लेने की आदत नहीं सीख सकते।”

ईराक के गवर्नर ने अपने क्षेत्र की आय केन्द्रीय सरकार को भेजी। उसमें कुछ जेवर भी थे। हजरत की भतीजी अस्मा ने उस ढेर में से एक छोटी अंगूठी अपने लिए लेनी चाही। हजरत ने उस माँग को अस्वीकार कर दिया। लड़की मन मार कर रह गई। “बिना हक की चीज कोई भी न ले, चाहे वह शासक का कितना ही निकटवर्ती क्यों न हो।” यह हजरत साहब का सिद्धान्त था।

उच्च पदाधिकारी ईराक के गवर्नर अशअरी ने एक कीमती चादर हजरत की पत्नी के लिए उपहार में भेजी, पर उसे स्वीकार नहीं करने दिया गया।

अजरबेजान की विजय पर टोकरे भर कर मिठाई विजेता अफसरों ने उनके लिए भेजी। एक टुकड़ा उठाते ही हजरत उमर को ध्यान आया कि यह सभी साथियों के लिए काफी नहीं हो सकती। अफसर ने कहा- “यह तो सिर्फ आपके लिए है।” इस पर खलीफा ने कहा- “मैं समुदाय का अमीन हूं। उसके हाथों पहुँचने वाली हर वस्तु अमानत है। अगर में उसमें से अपने लिए अलग से कुछ पाऊँ तो वह अमानत में खयानत ही कही जायेगी। बाद में समय आने पर खलीफा के वेतन से और मिठाई खरीद कर दोनों मिलाकर बाँट दी गईं।”

खरी आलोचना से न चूकने की हिदायत देते हुए उन्होंने साथियों से कहा कि “अगर मैं गिरकर टेढ़ा हो जाऊँ, तो तुम उठाने और सीधा करने का प्रयत्न करोगे या नहीं” लोगों ने हाँ कहा तो अपनी बात की पुष्टि मानते हुए उनने कहा- “मैं गलतियाँ करूँ, तो उन्हें बताने और रोकने का तुम्हें पूरा अधिकार है।”

अमीरुल मोमितीन का कुर्ता दूसरों से कहीं अधिक ढीला और लम्बा था। उन्हें टोकते हुए हजरत ने पूछा- “इतना अधिक कपड़ा आपने कहाँ से पाया? “हजरत के लड़के अब्दुल्लाह ने कहा, “यह कपड़ा चोरी का नहीं। मैंने छोटा कपड़ा सिलवाकर बाकी का कपड़ा इनके डीलडौल को देखते हुए दिया है।” बच्चे की आदर्शवादिता पिता के व्यवहार के अनुरूप ही थी।

हजरत कहीं से थके माँदे आ रहे थे। रास्ते में एक गुलाम गधे पर चढ़ा हुआ मिला। उसने प्रार्थना की कि आप सवारी पर चलें, मैं पैदल चलूँगा। हजरत ने इसे स्वीकार न किया। गुलाम का मन रखने के लिए थोड़ी दूर तक उसी के साथ पीठ के पिछली ओर बैठ गये, पर उसे उतरने नहीं दिया।

उन दिनों ऊंटों की खुजली के लिए उन्हें तेल मलने, दवा लगाने का काम गुलामों से कराया जाता था ताकि बदबू से जो परेशानी होती है वह उन्हीं को हो। पर हजरत यह कार्य स्वयं करते और कहते जब इन ऊंटों की सेवा हम लेते हैं तो उनकी हिफाजत भी हमीं को करनी चाहिए।

हजरत उमर प्रारम्भिक दिनों में मदाइन के गवर्नर थे। वे सरकारी कार्य करने के अतिरिक्त बचे हुए समय में खजूर की चटाइयाँ बुनते रहते। एक चटाई तीन दिरहम में बिकती तो एक दिरहम के खजूर के पत्ते खरीद लेते, एक दिरहम दान कर देते और बचे एक से अपना निर्वाह चलाते। राज्यकोष से निर्धारित वेतन उनने कभी स्वीकार ही नहीं किया।

हजरत साहब का विवाह हुआ तो ससुराल वालों ने स्वागत में दीवारों पर पर्दे टाँग रखे थे। उनने पहुँचते ही कहा- “अगर इन से दीवारें खराब नहीं हो गई हों तो कपड़े उतार दो और उनके लिए काम में लाओ जिन्हें तक ढंकने की जरूरत है।” तुरन्त वैसा ही किया भी गया।

एक दिन कुछ चारण बड़ाई के पुल बाँध रहे थे। हजरत ने कहा- “गंदे बूँद से पैदा हुए और खाक में मिलने वाले इंसान की प्रशंसा व्यर्थ है। उससे कुछ भलाई बन पड़ी हो तो उसी की चर्चा करो।”

वास्तव में हजरत उमर जैसे देवदूत, पैगम्बर ही इतिहास में स्वर्णाक्षरों में वर्णित किए जाने योग्य हैं। जिनका जीवन आदर्शों के प्रति समर्पित हो, उन्हीं के प्रति श्रद्धा पनपती एवं अनुकरण की उमंग उठती है।


ब्रह्मविद्या जानने के लिए गुरु गृह में निवास किये (Kahani)

श्वेतकेतु ब्रह्मविद्या जानने के लिए बहुत दिन से गुरु गृह में निवास कर रहे थे, पर अभीष्ट अनुदान उन्हें मिला नहीं।

गुरु की निष्ठुरता से खिन्न होकर एक दिन आश्रम की यज्ञाग्नि ने कहा- “तुम पर दया आती है। गुरु का पल्ला छोड़ो। वे जब तक लौटकर आवें तब तक मैं ही तुम्हें ब्रह्म विद्या बता दूँगी।”

श्वेतकेतु ने अग्निदेव के अनुग्रह का बड़ा उपकार माना। साथ ही अत्यन्त विनम्रता पूर्वक बोले- “सेवा किए बिना आप से जो अनुदान मिलेगा वह बिना मूल्य के कारण फलेगा कहाँ? पात्रता विकसित किए बिना जो उपहार मिलेगा वह टिकेगा कहाँ?”

अग्निदेव लज्जित होकर अंतर्ध्यान हो गए। श्वेतकेतु ने गुरु-सेवा करके अपनी पात्रता परिपक्व की और नियत समय पर अभीष्ट अनुदान लेकर वापस लौटे।


अंगकोरवाट जिसे अंधविश्वास व पलायन ले डूबा

वे फ्राँसीसी साम्राज्यवादियों के दिन थे। उनने अपनी सेना और सामर्थ्य भरपूर बढ़ाई। पूर्व के राष्ट्र उन्हें बेधने में सरल और प्रतिरोध रहित लगे, इसलिए अपना साम्राज्य उन्होंने उसी दिशा में बढ़ाया। वे अपने देश से लेकर इण्डोनेशिया द्वीप-समूह तक बढ़ते ही चले गये। इसमें उन्हें नाम मात्र की क्षति उठानी पड़ी। लूट में मिले माल से उनने न केवल आक्रमणों का खर्च निकाला, वरन् आक्रान्त देशों की सम्पन्नता और प्रकृति सम्पदा को बड़ी मात्रा में खीचते रहे। यह शोषण और आधिपत्य शताब्दियों तक चला।

इसी बीच प्रकृति सम्पदा का सर्वेक्षण करते हुए फ्राँसीसी सैनिक एक ऐसे घने जंगल में जा पहुँचे जिसमें देवताओं द्वारा बनाया गया एक नगर खोज निकाला। उसका विस्तार, शिल्प-सौंदर्य हर दृष्टि से भव्य था। पर उसे कंटीली झाड़ियों और जंगली पेड़ों ने अपने अधिकार में कर लिया था। सघनता इतनी थी कि पास-पड़ौस के देशवासियों तक को उसके सम्बन्ध में कोई जानकारी तक न थी।

फ्राँसीसियों ने सन 1860 में इसे खोजा और प्रकृति विज्ञानी हेनरी लेकाम्ते के तत्वावधान में साफ सुथरा बनाया। झाड़ियों को काटा, कचरे को हटाया और टूट-फूट को ठीक कराया। जब वह निखरा तो प्रतीत हुआ कि वह खण्डहर अर्ध जीवित स्थिति में मौजूद था। जितना टूटा फूटा था उससे अधिक वह प्रौढ़ स्थिति में इस प्रकार स्थिर था, मानों अभी हजारों वर्ष जीवित रहने के अरमान उसके मन में हैं। राजप्रसाद एवं दिवंगत शासकों के स्मारक तो भव्य थे ही। 10 लाख लोगों के अच्छी स्थिति में रह सकने योग्य अच्छे खासे मकान उस क्षेत्र में बने हुए थे। इर्द-गिर्द का इलाका खोजने पर पता चला कि वहाँ कभी मीठे पानी की नहरें बहती थीं। सिंचाई के अच्छे खासे साधन थे और वहाँ के किसान बढ़िया चावल की तीन-तीन फसलें साल भर में काटते थे। बड़े तालाबों में मछलियाँ पाली और पकड़ी जाती थीं। इस प्रकार उस क्षेत्र में खाद्य का अभाव न था। कारीगरों की भी कमी न थीं। उस प्रदेश में प्रायः सभी जगह बौद्ध संस्कृति छाई हुई थी। ऐसी बौद्ध संस्कृति जिस पर कि दैववाद और ब्राह्मणवाद की भी गहरी छाप थी।

इस प्रभु सत्ता सम्पन्न क्षेत्र के खण्डहरों की बनावट में वे सारे साधन थे जो किसी प्रभु सत्ता सम्पन्न राज्य में होने चाहिए। लगता है भवन निर्माण कला का उन दिनों तक अच्छा विकास हो चुका था। उस राज्य के शासकों ने दूर-दूर से कलाकार इस भव्य संरचना के लिए बुलाये होंगे अथवा अपने शिल्पियों को किन्हीं विकसित सभ्यता वाले देशों में भेजकर प्रशिक्षित कराया होगा। पत्थर, लकड़ी और ताँबे जैसी धातुओं पर अंकित वस्तु शिल्प ऐसा है, जिसे देखकर आश्चर्यचकित ही रह जाना पड़ता है।

जिनने भी इस पुरातन सभ्यता की नई खोज का पता पाया वे सभी उसे देखने दौड़ पड़े। पर आश्चर्य एक बात पर ही करते रहे कि इतना सुविधा सम्पन्न साम्राज्य आबादी से पूर्णतया खाली कैसे हो गया? आक्रमणकारियों की तोड़ फोड़ कत्ले-आम, लूट, महामारी जैसे कोई ऐसे चिन्ह भी नहीं पाये गये, जो आतंक बनकर आये हों और उस क्षेत्र के शासकों और जन साधारण को वह क्षेत्र खाली कर देने के लिए विवश किये हों।

पुरातत्त्ववेत्ताओं ने वहाँ उपलब्ध वस्तुओं के सहारे यह धारणा निश्चित की है कि वहाँ पुरातन काल में एक सुविकसित सभ्यता थी, जिसे “खमेर सभ्यता” कहा जाता था। उसके सदस्य मंगोलियन नस्ल के थे।

कहा जाता है कि यह हिन्द-चीन, इन्डोचाइना के नाम से जाना जाने वाला क्षेत्र भारतीय और चीनी नस्ल के सम्मिश्रण से बना था। भारत से कौडिन्य नामक प्रतापी धर्मोपदेशक वहाँ गये थे। उनने अपनी विद्वता सुन्दरता और कुशलता से वहाँ की रानी को मोह लिया और दोनों का विवाह हो गया। यह हिन्द और चीन का सम्मिश्रण हर क्षेत्र पर छा गया और समीपवर्ती छोटे बड़े देशों में भी वह लहर संव्याप्त हो गई। भारत और चीन के संगम का यह क्षेत्र साक्षी है। बर्मा से लेकर इन्डोनेशिया तक भारतीय सभ्यता की गहरी छाप पायी जाती है। आकृति और प्रकृति में भी चीनीपन भी विद्यमान है।

दक्षिण पूर्व एशिया पर खमेर जाति ने प्रायः 500 वर्ष की लम्बी अवधि तक अपना आधिपत्य जमाये रखा और प्रगतिशीलता के हर क्षेत्र में आशातीत पराक्रम कर दिखाया। खमेर लोग ही थे जिन्होंने उस समूचे क्षेत्र में नया उत्साह जगाया और समृद्धि का भण्डार भरा। उनकी राजधानी अथवा सूत्र संचालक सत्ता वही थी, जिसे “अंगकोरवाट” या “अंकोर” के नाम से जाना जाता है और जहाँ मूलनिवासियों में से एक भी दृष्टिगोचर नहीं होता। यह संसार का अनुपम ध्वंसावशेष है। इसमें देखने और जानने योग्य बहुत कुछ है। समयानुसार फ्रांसीसी अपने देश लोटने के लिए विवश हो गये, पर उन्होंने उस ध्वंसावशेष को जिस प्रकार खोजा और संजोया, उसका स्मरण सदा किया जाता रहेगा।

इस दर्शनीय स्थान की अब राष्ट्रसंघ के कला विभाग द्वारा देख-रेख होती है और पर्यटकों के लिए सप्ताह में दो दिन एक छोटे विमान की उड़ान होती है। सुरक्षा की दृष्टि से समीपवर्ती क्षेत्र में जन जातियों के कुछ लोगों को वहाँ बसा भी दिया गया है।

इसे देखने वाले हर व्यक्ति के मन में यह उत्कंठा बार-बार उठती है कि ऐसा भव्य क्षेत्र सर्वथा जन-शून्य कैसे हो गया? इतिहास की कड़ियाँ जोड़ने वालों ने उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कहा है कि अंगकोर का अन्तिम शासक यशोवर्मन विलासिता में डूबा तो प्रजा की देखभाल और सुविधाओं में कमी पड़ी। विद्रोह को दबाने के लिए उसने अपने आपको शिव का अवतार कहना शुरू किया और अपने एजेन्टों द्वारा जनता के मन में यह छाप गहराई तब बिठाई ताकि श्रद्धा के वशीभूत होकर कोई उसकी आलोचना न करे, उंगली न उठायें और जैसे भी रखा जा रहा है उसी प्रकार रहें।

जनता तो मान गई पर इस कमजोरी को भांप कर दूरवर्ती आक्रामक कबीले चढ़ दौड़ने के लिए आतुर हो उठे। उनके कई हमले हुए। जिनमें राजा हर बार हारा और प्रजा को बार-बार लुटना पड़ा।

इसी बीच जनता के मन में यह विचार फैलाया गया कि कोई शक्तिशाली दैत्य ऐसा प्रकटा है जिसके आगे शिव जी का भी कुछ वश नहीं चलता। राजा बचे-खूचे वैभव को लेकर किसी अविज्ञात सुरक्षित स्थान को चला गया। प्रजा अनाथ रह गई। उसका मनोबल टूट गया। पुनः संगठित होकर आक्रमणकारियों से जूझने और अपना अस्तित्व बचाने के स्थान पर हर नागरिक को यही सुझाया कि जो रास्ता उनके आराध्य ने अपनाया है वही उनके लिए भी श्रेयस्कर है। भगदड़ मची और जिसने जहाँ सोचा समझा वह वहाँ भाग गया। इस बिखराव में खमेर सभ्यता का भी अस्तित्व न रहा। वे भगोड़े जहाँ भी बसे वहाँ की प्रथा परम्परा में घुल गये।

इस प्रकार मनोबल का टूट जाना एवं अन्ध विश्वास का दलदल खमेर जाति को खा गया और सुविकसित अंगकोरवाट मात्र दर्शकों का कौतूहल-खण्डहर बनकर रह गया। यह खण्डहर साक्षात प्रमाण है कि अंधविश्वास किस तरह एक सुविकसित सभ्यता को नष्ट कर देता है।


Quotation

पतन के गर्त में गिर पड़ना, ढलान की ओर बहाव की तरह सरल है। उबरना और उठना कठिन है। इतना कठिन जो आत्म-विश्वास के बिना और किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता।


न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः

प्रकृति का नियम है कि जो पुरुषार्थी है, ईमान की कमाई पर जीना पसंद करते हैं, उन्हें हर तरह से सहयोग मिलता है। किन्तु इस वैचित्र्यपूर्ण संसार में लुटेरों, मुफ्त का माल बटोरने वालों की कमी नहीं है। गढ़े खजानों, डूबे जहाजों में छिपे स्वर्ण भण्डार इत्यादि की खोज आदिकाल से होती रही है। कई व्यक्ति अपनी पास की जमा पूँजी एवं जान तक गंवाते रहे हैं, फिर भी किसी ने सबक नहीं लिया। अभिशप्त सम्पदा को पाने के प्रयास लगभग असफल ही रहे हैं।

कोलम्बस “सोने की चिड़िया” भारत को खोजने निकला था पर पहुँच गया- बहामा, बारबेडोस एवं पोर्ट ऑफ स्पेन नाम वेस्ट इंडीज द्वीप समूह में। इतने ही क्षेत्र में चक्कर लगाकर स्पेन लौटकर उसने बताया कि वह प्रकृति एवं खनिज सम्पदा से भरपूर एक “नई दुनिया” का पता लगा कर आया है। यूरोप भर में चर्चा फैली और उस सम्पदा पर अधिकार जमाने हेतु कई देशों के गोरे चढ़ दौड़े और पश्चिम में जाने पर अमेरिका रूपी विशाल भूखण्ड का पता चला। उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका की खोज इन स्पेनी, ब्रिटिश पुर्तगाली लुटेरों के दुस्साहस भरे अभियान के कारण ही हो पाई। बाद में पता चला कि वह भूखण्ड मनुष्यों से खाली नहीं है। वहाँ के मूल निवासी रेड इण्डियन वहीं चिरकाल से मौजूद थे। “मय” एवं “इन्का” सभ्यता के अवशेष भी खोज निकाले गये।

भूमि के अनुपात से जनसंख्या कम होने के कारण उस स्थान को बीहड़ भले ही समझा गया हो, पर वस्तुतः वह वैसा था नहीं। वहाँ खनिज सम्पदा का बाहुल्य पाया गया। दक्षिण अफ्रीका से लेकर दक्षिण अमेरिका तक ऐसी पट्टी पाई गई जिसमें सोना ही सोना छिपा पड़ा था।

दक्षिण अफ्रीका पर तो इंग्लैंड मूल के गोरे मजबूती से जम बैठे और उस पर उन्होंने अपने पंजे गहराई तक घुसा दिये, पर दक्षिण अमेरिका पर कई देशों के गोरे छुट-पुट जमीनों की घेराबंदी करके मात्र अपने छोटे-छोटे अधिकार क्षेत्र ही बना सके। साधनों के सीमित व घने जंगल होने के कारण वे उत्तरी अमेरिका जैसे सम्पन्न भी न हो सके।

वीरान स्थानों के संबंध में दन्तकथाएं और किंवदंतियां परीलोक की कहानियों की तरह तेजी से फैलती हैं और उन पर विश्वास भी कर लिया जाता है। अफवाह यह पनपा कि दक्षिण अमेरिका के जंगलों में शुद्ध सोना कंकड़ पत्थरों की तरह बिखरा पड़ा है। उसे समेटने का कोई साहस कर सके, तो देखते-देखते धन कुबेर हो सकता है।

जहाँ-तहाँ पाये गये स्वर्ण खण्ड और हीरे-पन्ने इस अफवाह को बल देने के लिए काफी थे कि उस भूमि की ऊपरी परतों पर ही अपार सम्पदा विद्यमान है। उसकी खुदाई की जाय तो सोने के पर्वत हाथ लग सकते हैं। इस कल्पना को मान्यता स्तर तक पहुँचाने वाले कुछ प्रमाण भी मिल गये।

एल्डोरेडो के बारे में बाद में बताया गया कि वह क्षेत्र या नाम सोने के राजा का है, जिसके अधिकांश उपकरण सोने के थे और वह अपार स्वर्ण सम्पदा का स्वामी था। उस क्षेत्र में एक सोने की नाव व राजा की प्रतिमा भी पाई गई। वह बताती थी कि सचमुच ही यह क्षेत्र कभी स्वर्ण सम्पदाओं का अधिपति रहा होगा। विश्वास यह बना कि मनुष्यों के न रहने पर भी उस धातु वैभव का अस्तित्व तो यहाँ बना ही रहना चाहिए।

स्वर्ण नौका का मिलना था कि न केवल उत्तरी-दक्षिणी अमेरिका में वरन् यूरोप के अन्यान्य देशों में भी यह कथा बिना पर लगाये उड़ गई। उससे खोजी दुस्साहसियों का जोश जगा और जो दक्षिण अमेरिका जैसे सुविधा रहित क्षेत्र में बसने की बात उपेक्षा में डाल चुके थे, उनने नये सिरे से अपना उत्साह उभारा और सोना बटोरने की अपनी-अपनी योजनाएं बनाने लगे।

सर्वप्रथम अमेरिका में पहले से बसे गोरों ने यह कार्य अपने हाथ में लिया। उन्होंने स्थानीय कुलियों और मार्गदर्शकों का महंगे मोल पर सहयोग प्राप्त कर सोने के बड़े-बड़े डले एवं पन्ने की किस्म के बहुमूल्य किस्म के पत्थर खोज निकाले। उपलब्धकर्ताओं ने प्राप्त सम्पदा का खूब प्रदर्शन किया। कल्पनाओं की उड़ान भरने वाले कुछ दुस्साहसियों ने योजना बनायी, कि स्थानीय आदिवासियों को मटियामेट कर वहाँ खोज-बीन की प्रक्रिया में सहयोग देने वाले व्यक्ति एवं साधन जुटाये जायें। मौका मिलने पर इन लालची व्यक्तियों की हत्या कर सारी सम्पदा कब्जे में कर ली जाये।

दक्षिण अमेरिका एवं मध्य अमेरिका से उपजा सोने की खोज का बुखार सारे यूरोप पर छा गया। खोजी दस्युओं की मण्डली बनने लगी। मार्ग व्यय एवं मशीनी साधनों के लिए कम्पनियाँ बनने लगीं। विभिन्न नागरिकता व वर्ग के लोक अपने-अपने लिए खोज का क्षेत्र निर्धारित करने लगे मतभेद व झंझट भी खड़े हुए पर वे जबर्दस्त की कमजोर पर जीत के आधार पर सुलझते भी रहे। खोजें इतनी अधिक हुईं कि उन सबकी गणना करना कठिन है। फिर भी कुछ बड़े दलों की सूचना तथा प्रतिक्रिया उपलब्ध है। “सीका” नामक झील के समीप सोने की नाव मिली थी। समझा गया कि उस झील में सोना होना चाहिए। ब्रिटेन तथा स्पेन वालों ने मिलकर इस क्षेत्र को गम्भीरतापूर्वक खोजा।

सोलहवीं सदी के आरम्भ से ही यह स्वर्ण की खोज का बुखार आरंभ हुआ और बीसवीं सदी के आरम्भ तक पूरे जोर-शोर से चलता रहा। आशा की केन्द्र बनी उस झील की तली में लाखों डालर कीमत की मशीनों द्वारा छेद किया गया और उसका पानी नीचे की दिशा में बहाया गया, पर पानी सिर्फ 15 फुट ही घट पाया। जो माल मिला वह इतना कम था कि उसे लागत की तुलना में सौवाँ भाग ही कहा जा सकता है। अन्यत्र भी छुट-पुट कुछ मिला, पर उतने भर से किसी भी मंडली का समाधान न हुआ। बड़े अभियानों को विशेष रूप से बड़े घाटे में रहना पड़ा।

कोलम्बिया के उत्तरी तट पर एक खोजी दल 900 व्यक्ति लेकर क्वेऐडो के नेतृत्व में अग्रसर हुआ। प्रकृति प्रकोप तथा रास्ते की कठिनाई के कारण लौटते समय मात्र 200 व्यक्ति शेष रहे और अन्य सब मर गये। घोड़ों और खच्चरों का काफिला भी ठिकाने लग गया, उसमें से भी इतने ही बचे जो मालिकों को लाद कर ठहराव केन्द्र तक बीमार हालत में वापस पहुँचा सके।

निराश लौटते हुए दलों ने जब नये जोशीले दलों को आते देखा तो उनकी आशा एक बार फिर जगी- सोचने लगे कि वह इनके साथी बन जायें। उनने अपना कमाया सोना उन्हें भेंट किया और अपनी खोज का अनुभव तथा निष्कर्ष भी बताया। साथ ही यह भी कहा कि उन्हें किस क्षेत्र में किन साधनों के साथ जाना चाहिए। सामग्री हेतु एक केन्द्र बना लेना चाहिए ताकि जरूरत के समय वहाँ से रसद-गोला-बारूद इत्यादि मंगाई जा सके। बात नपी तुली लगी सो उनने विश्वास कर लिया और सोचा कि इन थके अनुभवी लोगों को ही केन्द्र का रखवाला बना दिया जाय। निराश लोग तो यही चाहते थे। कुछ ही समय बाद उनने सामान को गायब कर दिया और जो कीमत हाथ लगी उससे अपने वतन लौट गये। इस प्रकार इन खोजियों को कई ओर से मार सहनी पड़ी। आदिवासियों की सिद्धहस्त तीरंदाज़ी सतत् उनके प्राण लेती रही। जंगलों में ठहरना और चलना शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत महंगा पड़ा। इसके अतिरिक्त निराश साथियों का लौटने के लिए आग्रह बढ़ता गया। सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस आशा से धन कुबेर बनने की योजना लेकर चले थे उसका एक अंश भी पूरा न हो सका। कई व्यक्ति जान गंवा बैठे। इतना जरूर हुआ कि वनखण्डों में पुरातन काल के बने मंदिर-महल खंडहर रूप में दृष्टिगोचर अवश्य हुए जिसके आधार पर पुरातत्व अन्वेषकों को विदित हुआ कि अमेरिका सभ्य समुन्नत रहा है, पर अब तो वहाँ लुटेरों की ही तूती बोलती है। सोने की खोज असफल हुई।

पराई भूमि पर किये गये अतिक्रमण कभी सफल हो सकते हैं क्या? इस आशा और सम्भावना पर स्वर्ण खोजियों की असफलता ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया है, वस्तुतः सम्पदा जब अपनी कमाई हुई न हो तो उसको हस्तगत करने के लिये किये गए प्रयास कभी सफल नहीं होते। सृष्टा का बनाया यह नियम कभी टूटता नहीं।


परोक्ष जगत का परिशोधन यज्ञों के माध्यम से

यज्ञ से अग्निहोत्र प्रक्रिया भिन्न है। अग्निहोत्र निर्धारित विधि व्यवस्था के अनुरूप कोई भी कर सकता है। शुद्ध शाकल्य, शुद्ध शरीर, शुद्ध वातावरण और शुद्ध विधि विधान का ध्यान रखकर उसे कोई भी गायत्री मंत्रों से आहुतियाँ देते हुए कर सकता है। उसका तात्कालिक प्रभाव भी इन्द्रियों या यंत्रों से देखा जा सकता है। समय स्वयं बताता है कि उसकी गुणवत्ता कितनी है।

अग्निहोत्र हेतु ऐसे विधान भी हैं कि निर्धन वर्ग के लोग अति सस्ते में इस प्रक्रिया की पूर्ति कर सकें। अन्य कोई वस्तु न हो तो समिधा वाले काष्ठों की ही छोटी-छोटी तीली बना कर उन्हें शाकल्य मान कर हवन किया जा सकता है। हवन सामग्री की अपेक्षा गुड़ और घी के सम्मिश्रण से बनी हुई गोलियाँ भी इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त की जा सकती हैं। उनमें चंदन चूरा डाल कर और भी सुगंधित एवं सुव्यवस्थित बनाया जा सकता है ताकि वे आपस में चिपकें नहीं, अपना अस्तित्व अलग से बनाये रह सकें। शर्करा और घृत का अग्निहोत्र में विशेष महत्व है, पर इन्हें शुद्ध स्थिति में ही लेना चाहिए। चीनी की अपेक्षा गुड़ उन रसायनों से रहित होता है जो मिलों में उसे सफेद करने के लिए मिलाये जाते हैं। गौ घृत मिलना अब सरल नहीं रहा है। मिलावट की सब ओर भरमार है। इसलिए गाय का थोड़ा सा शुद्ध दूध लेकर उसका एकाध तोला मक्खन निकाला जा सकता है। उसे गुड में मिलाकर ऐसी सामग्री बन सकती है। जो सर्व सुलभ हो और उसके लिए बहुत पैसा भी खर्च न करना पड़े। वनस्पतियों की बनी शुद्ध सामग्री मिल सके तो और भी अच्छा। गौ घृत अधिक मात्रा में मिल सके तो उसे सौभाग्य ही समझना चाहिए।

यज्ञ शब्द वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ उसके साथ वेद मंत्रों का शुद्ध समावेश हो। इसके लिए पहले से ही शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करके प्रवीणता प्राप्त करनी पड़ती है। किसी पारंगत वक्ता के स्वर में स्वर मिलाकर भी इस प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।

यज्ञ में मंत्रों के शुद्ध उच्चारण का महत्व है पर जिनके द्वारा उनका उच्चारण किया जा रहा है, उनका व्यक्तित्व और चिन्तन-चरित्र भी उच्चस्तरीय होना चाहिए। उनका आहार-विहार ऐसा होना चाहिए जिसे ऋषि कल्प कहा जा सके। अभक्ष्य खाने वाले, मादक द्रव्य पीने वाले, लम्पट व्यसनी प्रकृति के व्यक्ति वेद मंत्रों के उच्चारण में प्राण नहीं भर सकते। इन दिनों ऐसे ब्रह्म परायण मनःस्थिति और परिस्थिति को अपनाने वाले मिलते नहीं। सभी पर असंयम सवार रहता है। यही कारण है कि ऋषि की तरह शाप वरदान दे सकने वाले ब्रह्मवेत्ता कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते। फलतः उनकी वाणी का कोई प्रभाव भी नहीं होता।

यज्ञ व्यक्तिगत भी हो सकता है और सामूहिक भी। व्यक्तिगत यज्ञों में पति-पत्नी सम्मिलित होते हैं। घृत के लिए गाय पालते हैं। घर में देवालय स्तर की यज्ञशाला बनाकर रखते हैं जिसमें हर मौसम में बिना किसी कठिनाई के यज्ञ किया जाता रहे। यह दीर्घकालीन होता है, नियमित भी रहता है। ब्रह्मतेज की वृद्धि के लिए गायत्री मंत्र से न्यूनतम 24 आहुतियाँ नित्य देने का विधान है। इससे अधिक बन पड़े तो और भी उत्तम। अधिक का अधिक फल होता ही है। यह दैनिक जप का दशाँश नहीं हो तो न्यूनतम शताँश तो होना ही चाहिए। यदि अनुष्ठान के साथ व्रत पूर्वक जप चल रहा है तो ऐसा भी हो सकता है कि उसकी पूर्णाहुति का यज्ञ नित्य न बन पड़ने पर पूर्णाहुति के समय एक दिन ही सम्पन्न कर लिया जाय। उसमें अन्य कुटुम्बी भी सम्मिलित किये जा सकते हैं। अन्यथा नित्य यज्ञ का उद्देश्य आत्म शक्ति का अभिवर्धन ही होता है। ब्रह्मतेज उपलब्ध करने के लिए उसे किया जाता है। ब्राह्मण के छह कर्मों में यज्ञ स्वयं करना और दूसरों को करने की प्रेरणा देना यह दोनों ही पक्ष सम्मिलित हैं।

यज्ञ सामूहिक भी होते हैं पर उनका उद्देश्य वायुमंडल शोधन जैसा भौतिकता भर तक सीमित नहीं रहता। यह प्रयोजन तो सामान्य है। बड़ी बात है- वायु मंडल का साधन। वायु मंडल और वातावरण के अन्तर को अधिक अच्छी तरह समझा जाना चाहिए। वायु प्रदूषण का निराकरण और प्राण तत्व का अभिवर्धन अग्निहोत्र प्रक्रिया में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व का परिष्कार ओजस्, तेजस् और वर्चस का निखार आदि उच्चस्तरीय हैं, इसलिए इनके साथ अनेक अनुबंध भी जुड़े हुए हैं। अधिक सतर्कता और सात्विकता का समावेश करना होता है। यज्ञ कराने वाले ब्रह्मा, आचार्य, अध्वर्यु, उद्गाता चारों को यज्ञ काल से कहीं पूर्व से ही आहार शुद्धि, ब्रह्मचर्य साधना नित्यकर्मों की कठोरता का प्रतिपालन नियमपूर्वक करना होता है। आहुति देने वाले होता- यजमान भी यज्ञ के दिनों में व्रत धारण करते ही हैं, परिपूर्ण संयम भी बरतते हैं। यज्ञ के दिनों में स्वेच्छाचार बरतने की तनिक भी गुंजाइश नहीं रहती। व्रतशील रहे बिना यज्ञ कृत्य फलप्रद नहीं होता। उसका उद्देश्य आत्मिक क्षेत्र की प्रगति है। इसके संयमशीलता, तपश्चर्या जितने अधिक ऊँचे स्तर की हो सके, उतना ही उत्तम है। यज्ञ में मंत्रों के शुद्ध उच्चारण का भी विशेष महत्व है। यह उच्चारण विधिवत सीखा हुआ तथा परीक्षा में खरा उतरा होना चाहिए।

सामूहिक यज्ञो में दो प्रकार प्रधान होते हैं- एक राजसूय- दूसरे बाजपेय। राजनीतिज्ञों- शासकों-दलों द्वारा राजनैतिक प्रयोजनों के लिए बड़े आयोजन सम्पन्न बनाये किये जाते हैं, उन्हें राजसूय यज्ञ कहते हैं। लंका विजय और कंस जरासंध वध के उपरान्त तत्कालीन मूर्धन्य राजनेताओं को आमंत्रित किया गया था और आहुतियों के अतिरिक्त भावी राजनीतिक विधि व्यवस्थाओं का भी निर्धारण किया गया था। इस प्रकार इन यज्ञों के रूप में समय समय पर क्षेत्रीय-प्रान्तीय आयोजन भी होते रहते थे, उसमें विचार मंथन होता था और मूर्धन्यों की सलाह से एक निर्णय पर पहुँचा जाता था ताकि शासन सत्ता में स्वेच्छाचारिता का समावेश न होने पाये।

बाजपेय यज्ञ धर्म पुरोहितों द्वारा आयोजित किये जाते थे उनमें विद्वानों, मनीषियों, विचारकों, धर्माचार्यों को आमंत्रित किया जाता था। इनमें तत्कालीन वैयक्तिक एवं सामाजिक समस्याओं के कारण समझते हुए इसके वातावरण का योजनाबद्ध हल निकाला जाता था। ऐसे आयोजन किन्हीं तीर्थों में किन्हीं नियत तिथियों पर तीर्थ स्थानों में निर्धारित रहते थे। सत्प्रवृत्तियों में निरत साधु ब्राह्मण उनमें बिना किसी के निमंत्रण की प्रतीक्षा किये स्वयमेव जा पहुँचते थे। परस्पर भेंटे भी हो जाती थी। क्षेत्रीय समस्याओं, परिस्थितियों की जानकारी मिलती थी और स्थानीय तथा सर्वजनीन समाधानों का सिलसिला चलता था। कुंभ पर्व ढाई-ढाई वर्ष बाद देश के प्रमुख स्थानों पर होते थे। आज तो उनमें साज-सज्जा, स्नान, पूजन, भोजन भण्डारा आदि की विडम्बना ही शेष रह गई है, पर पुरातन काल में ऐसा नहीं होता था। तब लोग समय की समस्याओं और आवश्यकताओं पर विचार करते थे। अपने प्रयासों को उसी दिशा में मोड़ते थे। सुधार के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करके रहते थे। प्रव्रज्या में निरत बिखरे हुए साधुजनों का एकत्रीकरण, विचार-विनिमय और निर्धारण का यह सुनिश्चित अवसर था। देश के अन्य क्षेत्रों में, तीर्थों में भी ऐसे ही समारोह एकता सम्मेलन होते रहते थे।

विश्व का विचारपरक वातावरण जब तक उच्चस्तरीय रहता है तब तक सतयुगी परिस्थितियाँ बनी रहती हैं, पर जब उनमें दुर्बुद्धिजन्य दुर्गुणों का प्रभाव बढ़ने लगता है, तो उसकी प्रतिक्रिया सर्व साधारण में उद्दंडता, आवेश, अनाचार भरती है। उनकी परिणति शोक संताप के रूप में सामने आती है। थोड़ी प्रतिभाएं अनेकों को अपने साथ घसीट ले जाती हैं और शीतयुद्ध, गृहयुद्ध, अपराधों का घटाटोप जैसे परिणाम बन कर सामने आती हैं। यह वातावरण का प्रदूषण है, जिसे वायुमंडलीय प्रदूषण से भी अधिक भयंकर माना जाता है। वायुमंडल की विषाक्तता रोग फैलाती और दुर्भिक्ष लाती है, किन्तु वातावरण में दुष्टता और भ्रष्टता के तत्व भर जाने से प्रकृति कुपित होकर ऐसे कहर बरसाती है, जिसे मनुष्यकृत ‘कत्लेआम’ से भी अधिक भयंकर समझा जा सकता है।

इन दिनों परिस्थितियाँ ऐसी ही हैं। उन्हें विकृत मनःस्थिति की देन माना जा सकता है। सभी जानते हैं कि इन दिनों कुमार्गगामिता अपनी चरम सीमा पर चल रही है। बढ़ती हुई जनसंख्या तथा उभरती दुष्प्रवृत्ति का विस्फोट इस प्रकार हो रहा है कि वह कभी भी नक्षत्र युद्ध या असाध्य महामारियों के रूप में फूट सकती है। विज्ञान और बुद्धिवाद का दुरुपयोग ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर सकता है, जिसमें मानवी सत्ता और सभ्यता का अंत होने जैसी स्थिति आ पहुँचे।

ऐसे भयंकर समय में भौतिक उपाय उपचार तो शासकों एवं धनाध्यक्षों द्वारा अपने-अपने ढंग से चल ही रहे हैं। अध्यात्म क्षेत्र के मनस्वियों को इन दिनों दिव्य प्रतिकारों का आश्रय लेना चाहिए और व्यक्ति तथा समाज को नरक जैसे दल-दल में फंस जाने से पूर्व ही उबारना चाहिए। इसके लिए सर्वसुलभ उपचार यज्ञ प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने के स्तर पर प्रयास करना चाहिए। इस आधार पर ही वातावरण का परिशोधन संभव हो सकता है। तपस्वियों के द्वारा किये गये ऐसे आयोजन अन्तरिक्ष में ऐसी उथल-पुथल कर सकते हों और विकास के नये आयाम आरम्भ हो सकें।

पदार्थ यजन के साथ-साथ मंत्रोच्चार की स्वर विद्या, प्रयोक्ताओं की प्रखर पवित्रता का सम्मिश्रण होने से ही यज्ञीय विद्या उस स्थिति तक पहुँचती है, जिसमें प्रस्तुत आशंकाओं, आतंकों और अपराधों से लोहा ले सकना, उनके दावानल को बुझा सकना संभव हो सके। यज्ञ मात्र प्रतिकार ही नहीं है। उसके साथ परिष्कार भी जुड़ा हुआ है। अदृश्य का दृश्य जगत पर प्रभाव पड़ता है। अध्यात्म अदृश्य की विकृति से निपटने और उसमें सुखद संभावनाएं भर सकने में समर्थ है। अध्यात्म का अभिवर्धन एवं अभिसरण योग और तप द्वारा हो सकता है, पर उसका प्रत्यक्ष रूप यज्ञ प्रक्रिया के रूप में कार्यान्वित होता है। ऐसी प्रक्रिया जिसमें स्वर विज्ञान पदार्थ विद्या और उच्च स्तरीय व्यक्तित्वों का शास्त्रीय विधि से समावेश हो।


महात्माओं की संगति का चस्का (Kahani)

कर्नाटक के बीजापुर क्षेत्र में जन्में विश्वेश्वर जी को सन्त महात्माओं की संगति का चस्का लगा। उनके संपर्क से वे ईश्वर दर्शन, देवताओं का वशीकरण, मंत्र सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण, चमत्कार प्रदर्शन जैसे आकर्षक दिवास्वप्नों में उलझ गये। इस प्रयोजन के लिए अनेक गुरुओं की बताई हुई अनेक साधनाएं भी कीं, पर उनने कुछ ही समय में यह अनुभव कर लिया कि इस जाल जंजाल में कुछ सार नहीं। भ्रान्तियों के भटकाव और व्यवसाइयों के आडम्बर भर पर यह सारा खेल खड़ा है। उनने गहन चिन्तन, मनन और आप्त जनों के परामर्श से यह निष्कर्ष निकाला, कि जीवनचर्या में आदर्शों का समावेश और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की सेवा साधना ही सच्चे आध्यात्म का प्रयोजन पूरा करती है। वे सीमित उपासना का क्रम बनाकर शेष समय लोक साधना में लगाने लगे।

सन्त विश्वेश्वर गृहस्थ थे। सादे कपड़े पहनते थे। स्थानीय जागीरदार की शासन व्यवस्था में भी योगदान करते थे। इतने पर भी उनका लक्ष्य और कार्यक्रम साधु पुरुषों जैसा ही रहा। लोगों ने उन्हें स्वेच्छा से सन्त कहा और माना।

सन्त विश्वेश्वर जी ने व्यावहारिक अध्यात्म का मार्ग अपनाया और अपने प्रबल प्रयत्न से उसी में हजारों को लगाया।

उस क्षेत्र में प्रचलित ऊँच-नीच, छुआछूत और स्त्री को हीन समझे जाने की मूढ परम्परा को मिटाने का व्रत लिया। कीर्तन अयोजकों की पद्धति अपनाई। उसमें स्त्री और छुद्र भी समान रूप से भाग लेते थे। फलतः पुरातन पंथियों के विरोध का सामना करना पड़ा। इस झंझट में उन्हें बार-बार अपमान और कष्ट सहने पड़े, पर वे मार्ग से तनिक भी विचलित नहीं हुए।

उन्होंने उस सारे क्षेत्र में घूमकर कीर्तन आयोजनों के महत्व में पशुबलि, मृतक भोज, भिक्षा व्यवसाय, जादू टोना जैसी अनेक कुरीतियों, प्रचलनों को हटाने में आशातीत सफलता प्राप्त की। वे अपने समय के माने हुए समाज सुधारक सन्त थे।


सत्साहस की सामर्थ्य

शरीर बल, शस्त्र बल, धन बल, विद्या बल आदि की तरह मनोबल भी एक शक्ति है- सामान्य नहीं असामान्य। वह सत्साहस के रूप में उभरती है और साधन एवं सहयोग के अभाव में भी बहुत कुछ कर गुजरती है।

अनीति की दिशा अपना लेने पर साहस को दुस्साहस कहते हैं। दस्युओं, तस्करों, आतंकवादियों का भी मनोबल सामान्य लोगों की तुलना में अधिक उभरा हुआ होता है। वे जोखिम उठाकर भी नृशंस कृत्य कर गुजरते हैं। इतने पर भी उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारती रहती है। समाज में भर्त्सना होती है और राजदण्ड मिलता है। ऐसे प्रयासों के साथ जुड़े हुए मनोबल को क्रूरता, दुष्टता आदि नामों से पुकारा जाता है। इससे लोग भयभीत-आतंकित तो होते हैं, पर उनका कोई सम्मान समर्थन नहीं करता। लोभ या दबाव से जो उनका साथ देने लगते हैं। वे भी पकड़ ढीली होने पर बिदक कर अलग खड़े हो जाते हैं। यहाँ तक कि बन पड़े तो संचित घृणा को प्रतिशोध के रूप में प्रकट करके रहते हैं।

सत्साहस वह है जिसके साथ आदर्श जुड़े होते हैं। कितने ही पुण्यात्मा उच्च सिद्धान्तों के लिए प्रसन्नतापूर्वक त्याग-बलिदान करते हैं। यदि उनका आत्मबल बढ़ा हुआ न होता तो प्रतिपक्षियों का आक्रमण और स्वजन-सम्बन्धियों का झंझट से दूर रहने का सिखावन उनका मार्ग रोक लेता, पर जिन्हें मानवी गौरव गरिमा के प्रति आस्था है उन्हें किसी का भी भय नहीं लगता। न वे डरते हैं और न रुकते हैं।

भारत बंटवारे के दिनों नोवाखाली बंगाल में भारी रक्तपात हो रहा था। एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय का रक्त-पिपासु बन रहा था। इस पागलपन को रोकने के लिए गाँधी जी ने उस क्षेत्र में स्वयं जाना उचित समझा। वे चल पड़े। प्रश्न सुरक्षा का था। हत्यारे गाँधी जी की भी जान ले सकते थे। इसलिए उनके साथी शुभचिन्तकों ने सोचा कि सुरक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध रखा जाय। उन्हें अकेले न जाने दिया जाय। साथ में अन्य लोग भी चलें ताकि जिन पर पागलपन सवार है वे गाँधी जी पर हाथ न डालें।

प्रसंग गाँधी जी ने सुना तो वे इस पर सहमत न हुए। सभी साथियों को लौटा दिया और वे अकेले ही चल पड़े। उनने कहा- “सचाई और भलमनसाहत की संयुक्त शक्ति इतनी बड़ी है कि अकेला सत्याग्रही भी बड़े से बड़े खतरे के बीच जा सकता है। उसे किसी से भी डरने की जरूरत नहीं। मौत से भी नहीं।” गाँधी जी उस रक्त रंजित क्षेत्र में देर तक अकेले ही रहे और आवेशग्रस्तों का उन्माद उतारते रहे। पीड़ितों को सान्त्वना और हिम्मत देकर उनके घावों पर मरहम लगाते रहे। अनीति अधिक समय तक नहीं ठहर सकती। वह रुकनी तो थी, रुक भी गई। गाँधी जी निर्भयतापूर्वक बिना किसी प्रकार का आक्रोश व्यक्त किये अपना काम सफलता पूर्वक करते रहे।

आदर्शों के लिए गहरी निष्ठा रखने वाले व्यक्ति अपने कर्तव्य से इसलिए नहीं रुकते, कि उनके मार्ग में खतरा है? खतरे को कमजोर और कायर नहीं उठा सकते, वे घाटा भी नहीं उठा सकते, किन्तु जिन्हें कर्तव्य का बोध है, वे समय पर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में चूकते नहीं। मनोबल का सत्साहस उनका समर्थ साथी होता है।


Quotation

एक राज्य में रिवाज था कि जिसे राजगद्दी पर बिठाया जाता उसे दस साल बाद एक ऐसे निर्जन टापू में छोड़ दिया जाता जहाँ अन्न-जल का कोई प्रबन्ध न था। भूखा प्यासा मरना पड़ता।

बहुत राजा इसी प्रकार मरे। पर एक बुद्धिमान ने सिंहासन पर बैठते ही उस टापू को बसाना शुरू कर दिया। कुँआ, तालाब, वृक्ष, महल, उद्योग, जनसंख्या आदि सभी की व्यवस्था कर ली। दस साल बाद वहाँ पहुँचा तो राजा से भी अच्छी स्थिति में रहा। यह लोक और परलोक का प्रसंग है।


अपनों से अपनी बात

वातावरण के संशोधन-उपचार की पुण्य-प्रक्रिया

महत्वपूर्ण पूर्णताओं के उपलक्ष में यज्ञ करने की पुण्य परम्परा अनादि काल से चली आई है। हमारे जीवन के साथ जुड़े हुए यों अनेकानेक कार्य ऐसे है, जिन्हें अनुपम, अद्भुत और आश्चर्यजनक कहा जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। 76 वर्षों में हमने यह प्रमाणित कर दिखाया है कि अध्यात्म कपोल कल्पना नहीं है। वह चेतना पक्ष का विशुद्ध विज्ञान है। भौतिक विज्ञान की तरह प्रत्यक्ष और प्रामाणित। उसके प्रतिफल उसी स्तर के हैं, जिन्हें स्वर्ग-मुक्ति ऋद्धि-सिद्ध नाम से जाना पहचाना जाता है। अनेक व्यक्ति कई साधनाएँ करने पर भी खाली हाथ रहते हैं पर हमने जो बोया, उसे सौ गुना बढ़ाकर काटा है। इसमें अध्यात्म की विधि व्यवस्था को सही रूप से अपनाने-भर की कमी रह जाती है। लोग पूजा पाठ का क्रिया-कृत्या तो कर लेते हैं, पर जीवन शोधन की अनिवार्य आवश्यकता की ओर ध्यान नहीं देते। यही वह भूल है जिसके कारण आत्मविज्ञान के सुनहरे प्रतिफलों से उन्हें वंचित रहना पड़ता है। हमारा जीवन एक अनुभव भरी नोट बुक के रूप में प्रस्तुत हुआ है, जिसे कोई भी दर्पण की तरह देख सकता है और यदि उस मार्ग पर चलना है तो पथ प्रदर्शिका के रूप में इस छोटी जीवनी का अनुसरण कर सकता है। हमारी उपासना, साधना और आराधना त्रिवेणी की तरह अवगुँठित हुई है और जीवन, तीर्थराज संगम की तरह बना है। प्रस्तुत वर्ष संसार में फैले भ्रमों का निवारण कर सकने योग्य प्रमाण साक्षी बन कर खरे सोने की तरह प्रस्तुत हुआ है इसकी हीरक जयन्ती परिजनों ने मनाई है तो उसे प्रस्तुत जीवनशैली के प्रति आस्था का प्रकटीकरण ही कहा जा सकता है। जीवन के 75 वें वर्ष में मनाई जाने वाली हीरक जयन्ती का द्विवर्षीय कार्यक्रम था। इसलिए इस वर्ष उसका समापन किया जा रहा है तो इसमें कुछ हर्ज भी नहीं है।

अखण्ड-ज्योति पत्रिका ही हमारा वह उपकरण है, जिसके माध्यम से 24 लाख प्रज्ञा परिजनों का एक सुगठित संगठन खड़ा किया जा सका और उसे आत्म-निर्माण, विश्व-कल्याण में लगाया जा सका। कोटि-कोटि शिक्षितों ने इसे पढ़ा और उससे अधिक अल्पशिक्षितों ने पढ़ा। इससे उस उद्देश्य की पूर्ति हुई, जिसे कभी सन्तजन घर-घर अलख जगा कर पूरा किया करते थे। गाँव-गाँव, घर-घर, नगर-नगर दिव्य चेतना का प्रकाश पहुँचाने में निरत रहते थे। अखण्ड-ज्योति के पिछले जीवन के 50 वर्ष इसी प्रयोजन में संलग्न रहे हैं। इसकी स्वर्ण-जयन्ती यदि उसके पाठक मनाते हैं तो इसमें भी उनकी श्रद्धासिक्त सद्भावनाओं की ही अभिव्यक्ति है। मंजिल का एक बड़ा चरण पूरा कर लेने पर यदि उसके पाठक हर्षोल्लास मनाते हुए स्वर्ण जयन्ती का आयोजन करते हैं तो इसमें कुछ अनुचित जैसा नहीं है।

इसी वर्ष पूरे होने वाले कार्यों में एक है तीन वर्ष से चली आ रही सूक्ष्मीकरण साधना का समापन। यह सावित्री साधना का एक प्रयोग था। उसे देश की देवात्मा कुण्डलिनी का जागरण कह सकते हैं। यह किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए की गई साधना नहीं थी। विश्व-कल्याण एवं भारत का अभ्युदय इसका लक्ष्य था। इसे प्रचण्ड कुण्डलिनी जागरण स्तर पर करना पड़ा और भागीरथ, दधीचि जैसे कठोर अनुबन्धों का पालन करना पड़ा। तीन वर्ष सुरक्षित रूप से व्यतीत हो गये। यह आश्चर्य है, अन्यथा विश्वामित्र के त्रेता वाले यज्ञ की तरह उसमें विध्वंस व्यवधान के भी प्रयत्न होते और कई सुबाहु, मारीचि, ताड़का जैसे असुर तत्व अपने-अपने ढंग से छद्म आक्रमण करते। किया भी गया, हुआ भी। पर महाशक्ति ने ढाल बनकर उस कुचक्र को निरस्त कर दिया। बड़े कार्यों में बड़े जोखिम रहते भी हैं। वे आते रहे और टलते रहे। यह प्रयोग भी सफल हुआ। उसका प्रयोजन था कि अनेक दिशाओं से विश्वमानवता पर गहराते हुए संकटों का निराकरण हो। उनमें से कितने ही संकट टल गए हैं। कई टल रहे हैं और कई टलने वाले हैं। अपने समय का सबसे बड़ा संकट था “विश्वयुद्ध”। उसकी जड़ें काटी जा रही हैं। अणुयुद्ध का अतिवादी पक्ष था- स्टारवार “नक्षत्रयुद्ध”। लगता था यह कहर बरसा तो एक पक्ष संसार भर की सम्पदा अपने पैरों तले दबा लेगा। पर आज की परिस्थितियां बता रही हैं कि यह प्रयोग सफल नहीं हो सकेगा। चार बार “चैलेन्जर”- यान सहित अंतरिक्षीय उपग्रह अमेरिका द्वारा छोड़े गए। एक कक्षा में पहुंचने से पूर्व ही सात यात्रियों सहित जलकर राख हो गए। शेष औंधे मुंह धरती पर आ गिरे। अब “नक्षत्रयुद्ध” योजना के अमेरिकी अध्यक्ष वैज्ञानिक पीटर हीगल स्टीन ने अपना इस्तीफा दे दिया है और सरकार से सहयोग न करने का निश्चय किया है। साथ ही इसी विभाग के 100 केन्द्रों में काम करने वाले प्रायः सात हजार “स्टारवार” वैज्ञानिकों ने भी इस प्रयास में काम करने से इन्कार कर दिया। रूस व अमेरिका के मध्य रेक्जेविक (आइसलैण्ड) में हुई शिखरवार्ता के रीगन के अड़ियल रुख के कारण असफल हो जाने से भी जनआक्रोश उभरा है। रूस ने नरम रुख व स्थिति को देखते हुए स्पष्ट कहा जा सकता है कि विश्वयुद्ध का खतरा अब टल गया। इसके अतिरिक्त नजर आने वाली देश-विदेश की छुटपुट समस्याएं भी हमारा विश्वास है कि निकट भविष्य में ही सुलझ जाएंगी। शान्ति का वातावरण बनेगा और प्रगति चरण परिपुष्ट होगा। इस संभावना में विश्व देवात्मा की कुंडलिनी जागरण को भी उचित श्रेय दिया जा सकता है।

उपरोक्त तीनों ही कार्यों का समापन ऐसे विशाल यज्ञ के रूप में होने जा रहा है जो उन तीन महान कार्यों के अनुरूप हैं जो इन्हीं दिनों सम्पन्न होकर चले हैं। हमारे प्रत्यक्ष जीवन का पुरुषार्थ पक्ष पूरा होकर उसका वह पक्ष आरंभ होता है, जिसे अति सूक्ष्म कहा जा सके। “अखण्ड ज्योति” के लिये हमने भावी 14 वर्षों के लिये काफी कुछ लिखकर रख दिया है अथवा ऐसी व्यवस्था बनादी है कि हमारा चिन्तन निरन्तर जनमानस को झकझोरता रहे, चाहे लेखनी किन्हीं भी हाथों में हो। पाठकों को सामयिक मार्ग दर्शन भी समय-समय पर हमारी अनुपस्थिति में मिलता रहेगा। अब साधना क्षेत्र का वह पक्ष आरंभ होता है जिसे युग के अनुरूप एक उपलब्धि माना जा सके और असंख्यों अध्यात्मवादी उच्चस्तरीय लाभ उठा सकें।

अब तक सम्पन्न हुए कार्यों के समापन को एक मध्यान्तर माना जा सकता है। इसके लिए एक वर्ष की अवधि रखी गयी है, जिसमें एक सहस्र शतकुण्डी गायत्री महायज्ञ सम्पन्न होंगे। इनमें एक लाख कुण्डों में यज्ञाग्नि प्रज्वलित होगी। परिजनों के उत्साह को देखते हुए इसे भी बढ़ाना पड़ रहा है। अब 24 कुण्डों के चौबीससौ छोटे यज्ञ भी होंगे। इन सबमें खाद्यान्न नहीं, जड़ी बूटियों का ही प्रयोग होगा। आदिवासी क्षेत्रों में जो यज्ञ होंगे, उनके लिए शान्तिकुंज से हवन सामग्री भी बिना मूल्य दी जाएगी। आयोजनकर्ताओं को यज्ञ साधन जुटाने में परिश्रम व धन व्यय न करना पड़े, इसके लिए एक ट्रक में स्टेज, यज्ञशाला, प्रवचन-पण्डाल, चित्र प्रदर्शनी, यज्ञ-उपकरण, वक्ता, गायक, लाउडस्पीकर आदि सभी आवश्यक वस्तुएं भेजे जाने की व्यवस्था बनाई गई है। इस खर्चीली व्यवस्था को जुटाने के लिए शांति-कुंज ने अपने साधनों की सर्वमेध जैसी मनःस्थिति बनाली है।

गायत्री यज्ञों का अपना महत्व है। गायत्री-श्रद्धा, सद्भावना, संवेदना, विवेकशीलता की अधिष्ठात्री है। आज इन्हीं तत्वों का लोकमानस में अभाव पड़ डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडडडडडडडड ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। ।।।।।।।। यहां पेज छूटा हुआ है ।।।।।।।।। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

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