संगीत मल्ल विद्या, चिकित्सा आदि अनेकों विषय ऐसे हैं जिनके सिद्धान्त रट लेने भर से काम नहीं चलता उसका प्रयोग और अभ्यास भी करना पड़ता है। पानी में घुसे बिना तैरने में कौन निष्णात् बन सकता है?
अध्यात्म सिद्धान्तों को पढ़ना-सुनना, समझना अच्छी बात है। उससे दिशाबोध होता है, पर मंजिल तो चलने से ही पार होती है।
अध्यात्म का अर्थ है- अन्तर्मुखी होना। अपने भीतर भरी हुई देव विभूतियों को जागृत और जीवन्त करना। देवता की उपासना साधक को देवता बना सके, उन जैसी विशेषताएं उत्पन्न कर सके, तभी उस प्रयास की सार्थकता है।
परमार्थ परक पुण्य प्रयोजन पूरा करने में संलग्न होना वह उपाय उपचार है, जिससे अध्यात्म तत्वज्ञान को कार्य रूप में परिणित करने का अवसर मिलता है और उसी अभ्यास के बलबूते तत्वज्ञान को कर्म में विकसित होने का अवसर मिलता है। यही सार्थक अध्यात्म है।
आग का प्रज्वलित रहना ईंधन की व्यवस्था पर निर्भर है। तत्वज्ञान का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उसे सेवा साधना द्वारा कार्य रूप में परिणत होने दिया जाये। अध्यात्मवादी और सेवाभावी होना एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं।
महाप्रभु ईसा अपने शिष्यों से कहते थे- “तुम मुझे प्रभु कहते हो- मुझे प्यार करते हो, मुझे श्रेष्ठ मानते हो और मेरे लिए सब कुछ समर्पण करना चाहते हो। सो ठीक है। परमार्थ बुद्धि से जो कुछ भी किया जाता है, जिस किसी के लिए भी किया जाता है वह लौटकर उस करने वाले के पास ही पहुँचता है। तुम्हारी यह आकाँक्षा वस्तुतः अपने आपको प्यार करने, श्रेष्ठ मानने और आत्मा के सामने आत्म समर्पण करने के रूप में ही विकसित होगी। दर्पण में सुन्दर छवि देखने की प्रसन्नता- वस्तुतः अपनी ही सुसज्जा की अभिव्यक्ति है। दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रकट करना उसी के लिए सम्भव है जो भीतर से श्रेष्ठ है। प्रभु की राह पर बढ़ाया गया हर कदम अपनी आत्मिक प्रगति के लिए किया गया प्रयास ही है। जो कुछ औरों के लिए किया जाता है वस्तुतः वह अपने लिए किया हुआ कर्म ही है। दूसरों के साथ अन्याय करना अपने साथ ही अन्याय करना है। हम अपने अतिरिक्त और कोई को नहीं ठग सकते। दूसरों के प्रति असज्जनता बरतकर अपने आपके साथ ही दुष्ट दुर्व्यवहार किया जाता है।”
“दूसरों को प्रसन्न करना अपने आपको प्रसन्न करने का ही क्रिया-कलाप है। गेंद को उछालना अपनी माँस-पेशियों को बलिष्ठ बनाने के अतिरिक्त और क्या है? गेंद को उछालकर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते। इसके बिना उसका कुछ हर्ज नहीं होगा। यदि खेलना बन्द कर दिया जाये तो उन क्रीड़ा उपकरणों की क्या क्षति हो सकती है? अपने को ही बलिष्ठता के आनन्द से वंचित रहना पड़ेगा।”
“ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए। अपने आपसे ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।”
“गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है, उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना। यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुःख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हैं और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए- उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं। दूसरों की सेवा सहायता अपनी ही सेवा सहायता है।”
“प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो अपने को परमात्मा जैसा महान बनाने के लिए तड़पता है- जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है। जो उसी का होकर जीना चाहता है उसी को भक्त कहना चाहिए। दूसरे तो विदूषक हैं। लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभु प्रेम का निर्मम उपहास है। भक्ति में तो आत्म समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है लेने की इच्छा ही कहाँ रहती है?”
“ईश्वर का विश्वास, सत्कर्मों की कसौटी पर ही परखा जा सकता है। जो भगवान पर भरोसा करेगा वह उसके विधान और निर्देश को भी अंगीकार करेगा भक्ति और अवज्ञा का ताल-मेल बैठता कहाँ है?”
“हम अपने आपको प्यार करें ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अन्तःकरण को प्यार से ओत-प्रोत कर लिया, जिसके चिन्तन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ा है ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा, जो दीपक की तरह जलकर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।”
बादलों का पानी जमीन पर गिरता है। जमीन से ढलान पर बहने वाली नदियों में जाता है और नदियाँ समुद्र के गहरे गर्त में जा गिरती हैं। पतन का यही स्वाभाविक क्रम है। मन को यदि रोका न जाये तो वह भी इसी दिशा में स्वभावतः चल पड़ेगा। इसलिए वर्षा के पानी को समुद्र के गर्त में से बचाकर किसी उपयोगी कार्य में लगाना या दिशा विशेष में बहाना हो तो उस पर भी रोकथाम लगानी होगी। पशुओं को खूँटे से बाँध कर ही निर्धारित कामों में लगाया जा सकता है अन्यथा वे छुट्टल छोड़ देने पर जिस-तिस का खेत उजाड़ेंगे। निरर्थक घूमेंगे और आपस में लड़ेंगे। इसलिए उन्हें अनुशासन में रखने के लिए मर्यादाओं का घेरा डालना और बंधन बाँधना पड़ेगा। मजबूत और ऊँचा बाँध बनाकर ही नदियों से सिंचाई के काम की नहरें निकाली जाती हैं।
मन को चिन्तन पक्ष में प्रशिक्षित करने के लिए उसे संयम के अनुबन्ध अपनाने के लिए प्रशिक्षित करना पड़ेगा। इन अनुबंधों को संयम कहते हैं। संयम के चारों पक्षों को गत अंक में अवगत कराया जा चुका है। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम सीख लें तो समझना चाहिए कि अबोध मन वयस्क हो गया और उसने नहाने, कपड़ा धोने, दाँत माँजने, बिस्तर उठाने, बुहारी लगाने जैसे उपक्रम अपनाकर साफ-सुथरा रहना सीख लिया। उन्हें न अपनाने पर कल्पनाएँ और इच्छाएँ ऐसा नटखटपन करती रहेंगी जैसा अबोध बालक करते हैं। वे चन्दा मामा से लेकर तारा गणों की गेंदें बनाने के लिए मचल सकते हैं। इन अभिलाषाओं को- माँगों को- कोई पूरा नहीं कर सकता। तृष्णा की खाई इतनी गहरी है कि उसके लिए अनेकों जन्मों का परिश्रम खपाया जाये तो भी उसको पाटा नहीं जा सकता। अन्ततः अब या फिर कभी उन विडम्बनाओं में से कल्पनाओं को उबारना पड़ेगा तो उसके लिए चिन्तन पर अंकुश लगाने, इच्छाओं पर अंकुश लगाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग मिलेगा नहीं।
चिन्तन के उपरान्त मनुष्य की बड़ी शक्ति है- प्रयास श्रम एवं समय का सुनियोजन। जीवन का तात्पर्य वर्षों की लम्बाई नहीं, वरन् यह है कि उसके समय घटकों का किस प्रकार, किस निमित्त उपयोग किया गया। अनेकों थोड़े दिन जीते हैं, किन्तु अभिमन्यु और भगतसिंह की तरह, विवेकानन्द और रामतीर्थ की तरह अल्प आयु में ही अपने को, अपने समाज को कृत्य-कृत्य कर जाते हैं। कितने ही ऐसे होते हैं जो परम अवधि सौ वर्ष तक जी लेते हैं, पर रहते दूसरों पर भार बनकर ही हैं। ऐसे दीर्घ जीवन से क्या अपना और क्या दूसरों का लाभ?
देखना यह है कि जीवन सम्पदा को किस निमित्त लगाया जाये? इसके लिए प्रचलन देखने की आवश्यकता है। मछलियों में बड़ी छोटी को निगल जाती है और उस बड़ी को मछुए के जाल में अपना प्राण गँवाना पड़ता है। प्रचलन ऐसा ही है। बहुमत ऐसे ही निरर्थक काम करता रहता है। समस्त पृथ्वी पर जितने मनुष्य रहते हैं, उतने दृश्य और अदृश्य कृमि कीटक एक मील की परिधि में रहा करते हैं। पर उनकी उपयोगिता क्या? पेट प्रजनन के कुचक्र में इधर से उधर भटकते रहते हैं। इसी स्तर का जीवन अधिकाँश मनुष्य जीते हैं। उनकी नकल क्या करनी? वनमानुषों, नर पशुओं का अनुकरण भी कोई करने लायक बात है।
बहुसंख्यक लोगों का क्रिया-कलाप ही प्रचलन कहाता है। बहुसंख्यक तो अपनी आत्मा सत्ता के अस्तित्व तक को भुला बैठे हैं। उन्हें अपना आपा काया मात्र के रूप में परिलक्षित होता है। अपनापन उन्हें शरीर तक सीमित प्रतीत होता है इसलिए उसी की सुख-सुविधा साधने में जीवन को रुचिपूर्वक खपाते रहते हैं। पेट की भूख, जननेन्द्रिय की तरंग, धन की ललक, बड़प्पन की बड़ाई की सनक। बस इसी सीमा में उनके क्रिया-कलाप बनते हैं। बच्चे जनने और उन्हें पालने में तो चुहिया भी प्रवीण होती है। वह तीन सप्ताह में प्रौढ़ हो जाती है और एक बार में आठ दस बच्चे जनती है। यह प्रजनन वर्ष में प्रायः चार बार होता है। इस प्रकार तीस-चालीस बच्चों की जननी वह एक वर्ष में ही बन जाती है। हर बार पति बदलने पड़ते हैं इस प्रकार ढेरों की वह पर्यंक शाथिनी बन लेती है। इसमें कौन-सा व कैसा बड़प्पन? क्या गौरव, क्या महत्व? मनुष्य भी किशोरावस्था में ही प्रजनन कर्म में लगता है और बच्चे पैदा करने के अतिरिक्त उन्हें पालता भी है। यही जाल-जंजाल इतना बड़ा है जिसका कि ताना-बाना बुनते बुढ़ापा आ धमकता है और मौत अपने थैले में चना चबैना की तरह समेट ले जाती है।
किसी विचारवान की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार जिया जाना कृमि-कीटकों से, पशु-पक्षियों से ऊँचे स्तर का तनिक भी नहीं है। सभी जीवधारी ऐसा ही करते एवं इसी मार्ग पर चलते रहते हैं। भवन बनाने में दीमक, और दाने जमा करने में, श्रम करने में चींटी की मेहनत को सराहा ही जा सकता है। जमाखोरी के लिए खटने वालों में मधुमक्खी का जीवन इसी गोरख-धन्धे में बीतता है। दिन भर वह श्रम करती है और उस संचय का लाभ कोई दूसरे उठाते हैं। मनुष्य भी अपनी क्षमताओं का उपयोग इन्हीं प्रयोजनों के लिए करते रहते हैं। सब ओर जो होता दिखता है उसी की नकल वे स्वयं भी करने लगते हैं। मस्तिष्क में समझ तो बहुत होती है। शिक्षा और चतुरता तो बहुत अर्जित कर ली जाती है। पर उनका उपयोग भी इन्हीं तुच्छ प्रयोजनों के लिए होता रहता है। इसी कोल्हू में चलते पिलते वह दिन आ खड़ा होता है जिसके उपरान्त और कुछ करने को शेष नहीं रह जाता।
मन को समझाया जाना चाहिए कि जिस प्रकार एकाकी स्वार्थ चिन्तन में अपनी बुद्धि लगाई जाती है, उसी प्रकार यह भी देखा जाना चाहिए कि जीवन सम्पदा का उपयोग मानवोचित रीति से हुआ या नहीं? मनुष्य को अतिरिक्त बुद्धिमत्ता, अतिरिक्त क्षमता और प्रतिभाओं से भरा-पूरा जीवन दिया गया है। वह शरीर यात्रा भर के लिए खर्च नहीं हो जाना चाहिए जिस प्रकार कीड़े-मकोड़ों का होता है। अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मोर नाचता है, जुगनूँ चमकता है, भौंरा गूँजता है, पर इस विडंबना से क्या तो उन्हें मिलता है और क्या कोई और कुछ पता या सीखता है। वैभव बढ़ाकर ठाठ-बाट रोपने में हमें भी मिथ्या अभिमान के अतिरिक्त और क्या मिल पाता है। उपभोग की एक सीमा है। उसके बाद जो बचता है, उसे दूसरे मुफ्तखोर ही हड़प जाते और हराम की कमाई को फुलझड़ी की तरह जलाते हैं। हो सकता है यह मुफ्तखोर तथाकथित कुटुम्बी सम्बन्धी ही क्यों न हों?
वासनाओं की पूर्ति क्षण भर के लिए होती है दूसरे की क्षण दूने वेग से फिर उभर आती है। उसकी पूर्ति में प्रसन्नता अनुभव करना ऐसा ही है जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबाते हुए अपना ही जबड़ा घायल कर लेता है और उससे टपकने वाले खून को सूखी हड्डी का रस मानता है। चटोरपन और कामुकता की ललक को पूरी करने का प्रयत्न ठीक इस मूर्ख कुत्ते के समान है जो अपना ही जबड़ा घायल करता जाता है और लाभ कमाने की बात सोचता है। दाद खुजाकर अपने को लहू-लुहान कर लेने की तरह ही विषयासक्ति है। उससे मनुष्य अपनी ही जीवनी शक्ति को निचोड़ता और खोखला होकर बेमौत मरता है।
लोभ, मोह और अहंकार, वासना, तृष्णा और बड़प्पन यही विडम्बनाएँ आदि से अन्त तक मनुष्य के सिर पर भूत-पलीत की तरह चढ़ी रहती हैं और गहरे नशे की तरह विचारशीलता को कुँठित किये रहती हैं।
मन को समझाया जाना चाहिए कि जीवन सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है वह अमानत के रूप में किसी महान प्रयोजन के लिए मिला है। इसे इस उपहासास्पद ढंग से न गँवाया जाये, जिससे समय निकल जाने पर पश्चात्ताप ही शेष रहे। शरीर की वास्तविक आवश्यकताएँ थोड़े से श्रम व समय में पूरी की जा सकती है फिर उन्हीं को बढ़ाते रहने और न पूरी हो सकने वाली विडंबनाएं रचने से क्या लाभ?
आम आदमी इतना ही जानता है कि शरीर के भीतर कोई आत्मा है जो मरने पर इसमें से निकलकर कहीं स्वर्ग-नरक में चली जाती है या भूत-प्रेत बन जाती है।
यह मान्यता उसी प्रकार गलत है जैसा कि शरीर को अपना स्वरूप या शरीर मानना या ईश्वर को कोई ऐसा व्यक्ति विशेष मानना जिसे कोई भी प्रशंसा करके, नाम लेकर या भेंट पूजा देकर अपनी मनोकामना पूरी कराने के लिए तैयार कर सकता है।
भ्रान्तियों से ऊपर उठकर वस्तुस्थिति को समझा जाये तो आत्मा अजर-अमर है। शरीर रूपी चोले उसे नये-नये बदलने पड़ते हैं। जराजीर्ण होने पर, असंयम बरतने पर या दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर शरीर बदलना ही पड़ता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति नंग धड़ंग फिरने में संकोच करता है, उसी प्रकार आत्मा को भी शरीर धारण करते रहना पड़ता है। जन्मते या मरते समय कुछ कष्ट उसी प्रकार हो सकता है जैसे कि कसा कपड़ा पहनने या उतारने में थोड़ी खींच-तान करनी पड़ती है। ऐसी कठिनाइयाँ तो रोग होने, चोट लगने, फोड़ा-फुन्सी उठने के समय भी होती रहती है। महिलाओं के प्रसव समय में भी ऐसा ही कष्ट होता है।
स्वर्ग नरक जीव को मनुष्य के शरीर में भी मिल सकता है। जो सन्तुष्ट हैं, प्रसन्न हैं, भविष्य के प्रति आशान्वित हैं, साथियों से तालमेल बिठा लेते हैं, वह स्वर्ग में हैं। जो शरीर से रोगी, मन से उद्विग्न, समाज से तिरस्कृत, पैसे से अभावग्रस्त, पारिवारिक विग्रह से विपन्न है, उसे नरकगामी कहा जा सकता है।
हर दो जन्मों के बीच में कुछ अवकाश मिलता है जिसमें आत्मा निरन्तर कार्य करने की थकान को मिटा सके। इस बीच किसी-किसी को अपनी मानसिक उद्विग्नता के कारण प्रेत-पितर जैसी योनियों में रहना पड़ता है। यह जन्म-मरण का चक्र चलता ही रहता है। भगवान तक को बार-बार अवतार लेने और शरीर धरने पर जन्म-मरण के फेरे लगाने पड़ते हैं।
इन मोटी जानकारियों के अतिरिक्त विशेष ध्यान देने और गम्भीरता पूर्वक समझने की बात यह है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। यह मान्यता एक सीमा तक ही सही है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास है उसे परिस्थितियों से विवश होकर दिन गुजारने पड़ते हैं। वातावरण के दबाव या प्रभाव से यह बनता या ढलता है। यह बात दुर्बल मनःस्थिति वालों के लिए ही आँशिक रूप में सही कही जा सकती है। वास्तविकता यह है कि मनुष्य मनोबल का धनी है। उसकी इच्छा शक्ति या संकल्प शक्ति बड़ी प्रचण्ड है। उसका सही उपयोग करने के लिए वह अनुकूलता उत्पन्न कर सकता है। प्रतिकूलताओं से लड़-झगड़ कर वह उन्हें अपने अनुकूल बना सकता है।
आत्म विश्वास न हो तो व्यक्ति को पराधीनता की ही बात सूझती है। वह दूसरों के ही शिकंजे में कसा रहता है। कठपुतली की तरह जिस-तिस के इशारे पर नाचता रह सकता है। किन्तु जिन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान है, अपने ऊपर भरोसा है, उन्हें दूसरों की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। वे सहयोग दें या असहयोग करें, साथियों के साथ वह बंधा रहकर या तो उनको अनुकूल बना लेता है या अपने लिए दूसरा रास्ता बना लेता है।
आकाँक्षा उत्कट हो तो व्यक्ति उस क्षेत्र के लोगों से संपर्क साधता है। रास्ता पूछता है। अपने चिन्तन और चरित्र को अभीष्ट ढाँचे में ढालता है। इसके उपरान्त उसी स्तर के लोगों के साथ परिचय, संपर्क एवं घनिष्ठ भाव बढ़ाता जाता है। तद्नुरूप एक समुदाय बन जाता है और विचार विनिमय, खोज-बीन, समर्थन-सहयोग से वे साधन भी जुटने लगते हैं जो निर्धारित प्रयोजन के लिए अभीष्ट एवं आवश्यक हैं। पहले धीमे कदम उठते हैं पीछे अनुभव, अभ्यास एवं संपर्क से उन कदमों में तेजी आने लगती है और प्रगति की प्रक्रिया तेजी पकड़ लेती है।
इससे पूर्व आवश्यक यह है कि व्यक्ति नेक और सही हो। झूठे, बेईमान, लवार, दुर्गुणी, व्यसनी लोग अपनी साख गँवा बैठते हैं। फिर उनका न कोई प्रशंसक रहता है, न सहयोगी। मतलब की दोस्ती बनती बिगड़ती रही है। रेत की दीवार की तरह उनका मित्र मण्डल बिखर जाता है और एक दूसरे को उल्लू बनाने के दाँव-पेच चलने लगते हैं। ऐसी दशा में व्यक्ति अकेला ही रह जाता है। अविश्वस्त, अप्रामाणिक और चरित्रहीन का कहीं कोई भरोसा नहीं करता। मतलब निकलते ही पर्दा बदलते और रंग पलटते देर नहीं लगती। ऐसे व्यक्ति चतुरता और धूर्तता के बल पर कुछ कमा लें यह बात दूसरी है। पर वे कोई ऐसा काम नहीं कर सकते जिनके लिए उनके प्रति कहीं सच्ची श्रद्धा उगे और सहयोगी स्तर की चिरस्थायी मैत्री पले।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति को तत्वज्ञान के दूसरे चरण में प्रवेश करते हुए कुछ सूत्रों को हृदयंगम करना चाहिए।
-मैं स्वभावतः अपने सृजेता की तरह पवित्र और सशक्त हूँ।
-मैं अपने भाग्य का निर्माता आप हूँ। अपनी परिस्थितियों को प्रयत्नपूर्वक बदल सकता हूँ।
-जैसी अपनी मनःस्थिति होगी, वैसी परिस्थितियाँ बनेंगी, वैसे ही साथी मिलेंगे और स्तर के अनुरूप साधन जुटेंगे।
-दुर्गुण शरीर पर चिपकी हुई गन्दगी की तरह है। उन्हें रगड़कर धोया और साफ किया जा सकता है।
-चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की आदर्शवादिता और व्यवहार की शालीनता अपनाकर मनुष्य ऊँचा उठ सकता है, आगे बढ़ सकता है।
इन सूत्रों को बार-बार दुहराया जाये। इन मान्यताओं को गहराई तक अन्तराल में जमाया जाये। इन्हें शाश्वत सत्य माना जाये। साथ ही महा-मानवों की जीवनचर्या पर दृष्टिपात करके इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाये कि इन्हीं तथ्यों के सहारे गई-गुजरी, परिस्थितियों के बीच जन्मे और पले हुए व्यक्ति भी प्रगति के उच्च स्तर तक पहुँचे हैं। कठिनाइयों ने जूझते हुए अपना रास्ता आप बनाते रहे हैं।
इस सृष्टि का कुछ ऐसा विचित्र नियम है कि उठते हुए का अनेकों समर्थन करते हैं और गिरते को सहारा देने की उपेक्षा और गिराने में अपनी बहादुरी समझते हैं। सहयोग सबको देना चाहिए और देखना चाहिए कि अपनी सहायता सत्प्रवृत्तियों के समर्थन में, संवर्धन में जा रही है या नहीं। यदि उलटा हो रहा है, अपने सहयोग का लाभ उठाकर कोई दुर्जन अधिक दुष्टता पर उतारू होते दीख पड़े तो समर्थन से हाथ खींच लेना ही उचित है। मनुष्य जीवन का एक क्रम है कि सहयोग के सहारे ही लोग समर्थ और प्रगतिशील बनते हैं पर इसमें भी एक बात विचारणीय है कि सज्जनों को सहयोग दिया जाये और उन्हीं से सहयोग लिया जाये।
अपना उद्देश्य ऊँचा रखा जाये। अपनी सामर्थ्य और हिम्मत पर भरोसा किया जाये। जो काम हाथ में लिया जाये उसमें समूची तत्परता और तन्मयता दाँव पर लगा दी जाये। काम इस प्रकार किया जाये, मानों उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया हो। किसी की इज्जत उसके ठाठ-बाट या कौशल के आधार पर नहीं, इस आधार पर होती है कि उसने किस प्रकार के काम कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से पूरे किये। ( क्रमशः )
स्वर्ग के देवता धरती पर आये। उनकी कल्पना थी कि मनुष्य गिड़गिड़ायेंगे और अभावों की कहानी कहकर वरदान की याचना करेंगे। पर मनुष्यों में से किसी ने उनकी ओर नजर भी न उठाई। खेतों में लहलहाती फसल देखकर वे फूले न समा रहे थे।
देवता वापस लौटने लगे तो धरती ने उन्हें बुलाकर कहा- मेरे पुत्रों ने श्रम के देवता की आराधना सीख ली है, उन्हें किसी बात का अभाव नहीं रहता।
गीताकार का सार संक्षेप “अनासक्ति योग” के रूप में किया जाता है। आसक्ति छोड़कर कर्म करना- फल की आशा को त्यागकर कर्म करना- यह प्रतिदिन देखने सुनने में तो अच्छा लगता है पर जीवन की संरचना और व्यवहार की वस्तुस्थिति को देखते हुए जब गम्भीरता पूर्वक उपरोक्त कथन पर विचार किया जाता है तो प्रतीत होता है कि उपरोक्त प्रतिपादन को कार्यान्वित कर सकना किस प्रकार सम्भव हो सकता है?
भगवान ने मनुष्य को बुद्धि दी है और उस बुद्धि का यही उपयोग है कि उचित अनुचित का विचार करे लाभ-हानि सोचे और इसके उपरान्त किसी निर्णय पर पहुंचे। कोई कदम उठाने से पहले हजार बार विचार कर लिया जाये कि इस प्रयास का क्या परिणाम हो सकता है? यदि श्रेयस्कर लगे तो ही किसी कार्य को हाथ में लिया जाये और जब लिया जाये तो उसमें पूरा मन, समय, श्रम, एकाग्रतापूर्वक इस तरह किया जाये कि उत्कृष्ट स्तर का बन पड़े। कार्य की श्रेष्ठता और समग्रता ही किसी की प्रतिष्ठा का करण बनती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए विज्ञजन “कर्म ही ईश्वर पूजा है” की बात कहते हैं।
इस तथ्य के साथ अनासक्ति कर्मयोग की संगति नहीं बैठती। फल की इच्छा छोड़कर कर्म करना चाहिए। इन शब्दों का गठन तो सुन्दर और प्रतिपादन भी सरस हो सकता है किन्तु जब उस कथन को व्यावहारिकता की कसौटी पर कसा जाये तो अनेकों प्रश्न सामने आ खड़े होते हैं। फल की आशा या इच्छा छोड़ दी जाए तो यह कैसे प्रतीत हुआ कि जो किया जा रहा है वह उचित है या अनुचित? लाभकारी सिद्ध होगा या हानिकारक?
यह मानव स्वभाव के विपरित भी है। मनुष्य पहले सोचता है? बाद में करता है। सोचने की प्रक्रिया यह है कि जिसमें लाभ समझा जाये उसे किया जाये? जिसमें श्रम व्यर्थ जाता हो या हानि की आशंका हो तो उसमें हाथ न डाला जाये। मन लगाकर काम करने की स्थिति तभी बनती है जब उसके उत्साहवर्धक परिणाम होने की अपेक्षा हो। अन्यथा निष्प्रयोजन कोई क्यों श्रम करेगा? क्यों समय लगावेगा और किस निमित्त साधनों को उस हेतु संचित नियोजित करेगा।
प्रयोजन भले ही अशुद्ध मूर्खतापूर्ण हो, पर वह होना तो चाहिए ही। बिना उद्देश्य की क्रिया तो कोई विक्षिप्त मनुष्य ही कर सकता है। ऐसी दशा में अनासक्ति का तुक कैसे बैठा? किन्तु गीताकार के द्वारा दिये गये उस शब्द की व्याख्या और परम्परा कुछ विचित्र रूप में चल पड़ी। परमहंस अवधूत इसी प्रकार के रहन-सहन अपनाने लगे। अन्यमनस्क योग का एक अलग ही स्वरूप चल पड़ा। उसे गुरु गोरखनाथ से जोड़ा गया। उदासीन सम्प्रदाय तो प्रख्यात है ही।
उदासीनता का अर्थ निरपेक्ष या निष्पक्ष कहा जाता है। पर यह कहने में ही सरल है, व्यवहार में इसे कोई ब्रह्मज्ञानी ही ला सकता है साधारण जन नहीं। पाप और पुण्य के- उचित और अनुचित के बीच कोई ऐसी स्थिति नहीं पैदा की जा सकती, जिससे दोनों से अलग रहा जा सके। सुख-दुख- लाभ-हानि- मानापमान रहित स्थिति वाले व्यक्तित्व को “स्थित प्रज्ञ” बताया गया है। पर क्या ऐसी स्थिति व्यवहार में बन पड़ेगी या नहीं, यह विचारणीय है। दिन और रात के बीच का एक सन्ध्याकाल होता तो है पर उसे मिश्रण कहा जा सकता है अलग नहीं। स्त्री और पुरुष के दो विभागों में सृष्टि बँटी हुई है। नपुँसक होते तो हैं पर वे अपवाद हैं।
मनोविज्ञान की दृष्टि से उदासीनता निष्क्रियता के लगभग समीप जा पहुंचती है। जो उदासीन होगा, वह एक प्रकार से अनिर्णीत मनःस्थिति का होगा। उदास नीरस लोग ही ऐसे हो सकते हैं। उन्हें निष्पक्ष भी नहीं कह सकते। न्यायाधीशों को निष्पक्ष कहा जाता है। पर वे भी न्याय के पक्षपाती होते हैं। यदि वे यह कहने लगें कि हमें न्याय अन्याय से क्या लेना देना, तो फिर किसी को दण्ड देते हुए भी- दोषी ठहराते हुए भी उनसे न बन पड़ेगा। ऐसा तो ईश्वर भी नहीं है। वह भी पापियों को नरक का दंड और पुण्यात्माओं को स्वर्ग का उपहार देता रहता है। जो अध्यापक बच्चे के फेल होने की चिन्ता और पास होने की उत्कण्ठा न रखे वह पढ़ने में वैसी रुचि न ले सकेगा जैसी कि उसे लेनी चाहिए। ऐसी दशा में उस पर अकर्मण्य या अनाड़ी होने का दोष लगेगा।
फल प्राप्ति की इच्छा से ही मनुष्य में उत्साह बढ़ता है और वह पूरा पराक्रम करता है। यदि कुछ पल्ले पड़ने वाला न हो तो मनुष्य बेगार भुगतने या लकीर पीटने की तरह कुछ भला बुरा करता तो रह सकता है पर उस कर्तृत्व की कुछ विशिष्टता होगी भी या नहीं? यह विचारणीय है।
यह दर्शन का भ्रम पक्ष है। इससे प्रतीत होता है कि या तो कहने वाले ने यह विचार नहीं किया कि इस प्रतिपादन से भ्रम तो उत्पन्न नहीं होगा? या फिर समझने वाले से यह चूक हुई है कि कहने वाला यदि विचारशील है तो उलझाने वाली बातें क्यों कहेगा? ऐसी दशा में दोनों ही पक्षों को भ्रम निवारण करने और किसी उपयुक्त निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयत्न करना चाहिए अथवा फिर ऐसा होना चाहिए कि कोई निष्पक्ष वर्ग अपनी विवेक बुद्धि से दोनों ही पक्षों की कठिनाई समझे और जहाँ कुछ भ्रान्ति हो उसका निराकरण करे।
अनासक्ति के बारे में इतना ही कहा जा सकता है। सामान्य सम्भावना के विपरित कभी अच्छे काम का अच्छा और बुरे काम का बुरा परिणाम यथा समय न मिलता हो। उसमें डडडडडडड बिम्ब होता या विपरित फल उत्पन्न होता भी हो तो भी अधीर नहीं होना चाहिए। उसे अपवाद या दुर्विपाक समझकर उपेक्षा में नहीं डालना चाहिए। और इतने पर भी सन्मार्ग से विचलित न होना चाहिए। खिलाड़ियों जैसी मनःस्थिति रखनी चाहिए कि हार-जीत होते रहने पर भी वे अपने अभ्यास को नहीं छोड़ते। किन्तु इसका यह अर्थ तो नहीं होता कि हार-जीत से ऊपर उठकर रहा जाये? ऐसे खिलाड़ी का तो उत्साह ही मारा जायेगा।
ऐसी ही भ्रांति “अहिंसा” के संबंध में भी है। वह अव्यावहारिक है। जीवित रहने वाले के शरीर में पुराने जीवकोश मरते व नए पैदा होते रहते हैं। पानी को छान लेने पर भी, हवा को नाक पर पट्टी बाँध लेने पर भी शरीर में प्रवेश करने से रोका नहीं जा सकता। अब तो वनस्पतियों में भी जीवन सिद्ध हो गया है और उन्हें भावनाशील भी माना जाने लगा है। ऐसी दशा में अहिंसा का अतिवादी अर्थ करने वालों को वनस्पतियों का सेवन भी छोड़ना होगा। लकड़ियों को जलाना और जमीन पर चलना भी हिंसा हो सकती है। झाड़ू से जमीन झाड़ते चलने पर भी सूक्ष्म जीवियों की हिंसा होती है। धूप में कपड़ा सुखाना और बीमार होने पर दवा लेना भी हिंसा में गिना जा सकता है। ऐसी दशा में जीवित रहने वाले को सही अर्थों में अहिंसक नहीं कहा जा सकता।
अहिंसा की व्याख्या करते समय यही कहना चाहिए कि अनावश्यक रूप से प्राणियों को कष्ट न दिया जाये। दुर्व्यवहार से किसी का दिल न दुखाया जाये। यह औचित्य की सीमा है। जेल और फाँसी को भी इस आधार पर हेय ठहराया गया तो फिर समाज में व्यवस्था का चल सकना की कठिन हो जायेगा। तब आक्रमणकारियों, अपराधियों को भी रोका न जा सकेगा। और देश की सीमाओं की रक्षा भी न हो सकेगी।
अतिवादी प्रतिपादनों से यथा सम्भव बचना ही चाहिए। भगवान बुद्ध के कथनानुसार हम मध्यम मार्ग अपनायें। अतिवादी न बनें। अनीति करें नहीं, पर साथ ही सहें भी नहीं, इसी प्रकार का हमारा सुलझा हुआ दृष्टिकोण होना चाहिए।
मृत्यु की निकटता से चिन्तित न होओ। वह पुराना कपड़ा बदलकर नया पहनने जैसी उत्साहवर्धक स्थिति है। तुम्हारी सत्ता तो अमर है।
मन कल्पना तो कितनी ही कर सकता है। इच्छाओं की परिधि भी असीम रहती है। पर अभिरुचि या प्रीति एक सीमित केन्द्र पर ही रहती है उसे बिखेरा नहीं जा सकता। बहुमुखी भी नहीं किया जा सकता।
पत्नी का समर्पण पति के निमित्त होता है। वह उसके प्रति वफादारी का पूरा निर्वाह करती है। यों उसे शिष्टाचार और अनुशासन वश सान जिठानी आदि को भी मानना पड़ता है। इसी प्रकार पति समर्पित अपनी पत्नी के लिए ही रहता है। अन्याय रिश्ते अन्याय महिलाओं के साथ भी निभाता है। चकोर की चन्द्रमा के प्रति, चकवा की मेघ माला के प्रति अनन्य प्रीति होती है। शरीर निर्वाह के लिए वे घोंसला बनाने, दाना चुगने आदि का काम भी करते हैं।
इसी प्रकार मन की तन्मयता एकनिष्ठ होती है। दूसरे केन्द्र के प्रति सामान्य कर्तव्य निर्वाह भर की बात पूरी करनी पड़ती है। आकर्षण के केन्द्र दो ही हैं। एक शरीर, दूसरा आत्मा। दोनों में एक को प्रथम, दूसरे को गौण मानकर चलना होता है। आमतौर से मनुष्य अपने को शरीर भर मानता है। इसलिए शरीर की जिनमें आसक्ति होती है वे सब भी प्रिय लगने लगते हैं। पेट की भूख सर्वप्रथम है। उसके लिए आजीविका उपार्जन की आवश्यकता पड़ती है। निर्वाह के प्रति जो व्यवसाय अपनाये जाते हैं। उनके प्रति दायित्व अनुभव किया जाना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त पालन की जिम्मेदारी का कुछ भाग अपने ऊपर होता है। यह सब कुछ आसानी से हो जाता है। न यह बोझिल है न कष्टकर।
दूसरा पक्ष आत्मा का है जो परमात्मा के प्रति जुड़ती है। सामान्य जीव जन्तुओं की तुलना में मनुष्य शरीर और मन का विशेष महत्ता है। अन्य किसी प्राणी को ऐसे अनुदान नहीं मिले। यह उद्देश्य विशेष के लिए दिये गये हैं। अनायास ही नहीं। अनायास ही अकारण ही ऐसा विशिष्ट जीवन मनुष्य को दिया गया होता तो उसे एक वर्ग के प्रति पक्षपात और अन्य सभी के प्रति अन्याय कहा जाता। समदर्शी को तो अपनी सभी संतानों के प्रति एक जैसी व्यवस्थाएँ करनी चाहिए। अपने वैभव का वितरण समान रूप से करना चाहिए। किन्तु मनुष्य जीवन अन्य सभी जीवधारियों की तुलना में विशिष्ट है। इसका कोई कारण- कोई उद्देश्य होना चाहिए। अन्यथा ईश्वर के न्यायकारी होने पर उँगली उठती है।
जिस प्रकार शरीर आत्मा के प्रति उत्तरदायी है। उनकी आवश्यकताओं इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन रात लगा रहता है। उसी प्रकार होना यह चाहिए कि आत्मा परमात्मा का जेष्ठ पुनः होने के कारण उसकी इच्छाओं को समझे, संकेतों का परिपालन करे, अनुशासन को निबाहे।
यह सब क्या है। इसे एक शब्द में लोक मंगल के लिए अटूट श्रम किया जाना कह सकते हैं। विश्व वाटिका भगवान की है। यह निर्माण उसी का है पर उसे सींचने सँजोने के लिए माली तो अलग से चाहिए। बाग का मालिक ही वह सब काम नहीं कर सकता। उसके सामने दूसरे बड़े काम होते हैं। इसलिए माली की नियुक्ति करके उसे खाद पानी सिंचाई आदि की सुविधा देकर यह जिम्मेदारी सौंप देता है कि उसे सुन्दर समुन्नत व फूला फला रखे। मनुष्य को माली की तरह लोक-मंगल का काम सौंपा गया है। इसे करते हुए वह निजी निर्वाह की- परिवार पालना की व्यवस्था भी अति सरलतापूर्वक जुटा सकता है। अद्भुत संरचना वाले शरीर को अपने प्रत्यक्ष दायित्वों को निभाना कुछ भी कठिन नहीं है। इसके अतिरिक्त भी वह उन कार्यों को करता रह सकता है जिसके लिए वह अनुपम अवसर उसे मिला है।
देखा गया है कि मनुष्य सारा जीवन शरीर निर्वाह के लिए नहीं इन्द्रिय लिप्सा, लाभ, लालसा एवं अहन्ता की पूर्ति हेतु ठाट-बाट बनाने में समाप्त कर देता है। मूल उद्देश्य का उसे ध्यान ही नहीं रहता। चिन्ह पूजा के लिए यत्किंचित् पूजा पाठ बन पड़ा तो कर देता है। वस्तुतः ईश्वर सर्व समर्थ है। उसे किसी की ओर से मनुहार तथा उपहार की न कोई इच्छा है न आवश्यकता। वह तो उस कार्य की पूर्ति देखना चाहता है जिसके लिए उसे संसार में भेजा गया है।
लोक मंगल के परमार्थ को अपनाने पर अपना स्वार्थ सहज ही सध जाता है। मनुष्य खाली पेट उठता भले ही हो पर सोता तब है, जब उसे भर लेता है। लोकहित के लिए उसके पास ढेरों समय श्रम और मनोयोग ही बच जाता है। इतना वह करता रहे तो सहज ही साथ में सद्भावना और उन सद्गुणों का विकास होता रहता है। जो स्वर्ग मुक्ति एवं आत्मकल्याण के लिए आवश्यक हैं। सेवा साधना के साथ सद्भावना और समयदान- अंशदान का परमार्थ तो सहज ही जुड़ जाता है। इसमें तीन गुना लाभ होता है। आत्म परिष्कार का संतोष-सेवा से कृतज्ञ हुए लोगों का भाव भरा सम्मान एवं ईश्वर के सौंपे दायित्व को पूरा करने से उपलब्ध होने वाला देवी अनुग्रह इस प्रकार लक्ष्य को प्रमुखता देने वाला लौकिक और पारलौकिक दोनों ही दृष्टि से नफे में रहता है।
इतना जानते हुए भी मनुष्य जीवन को अकारण क्यों बिताता है? अनर्थों का बोझ सिर पर क्यों लादता है? इसका एक ही कारण है- मन के रागों में आसक्ति। राग तीन ही हैं जिनका उल्लेख वासना, तृष्णा, अहन्ता के रूप में किया गया है। इन्हीं को लोभ मोह और दर्प भी कहते हैं। इनका आकर्षण जिनके ऊपर नशेबाजी के व्यसन जैसा चढ़ दौड़ता है उन्हें उस उन्माद में न आत्मा का ध्यान रहता है न परमात्मा का- न लक्ष्य का न कर्तव्य का।
इन रागों को ही भव-बन्धन कहा गया है। लोक प्रचलन का अनुगमन करने पर तो वे बड़े जटिल प्रतीत होते हैं, पर यदि सूक्ष्म दृष्टि और विवेक से काम लिया जाये तो सद्ज्ञान का सूर्य उदय होने पर यह कुहासा छंटने में देर नहीं लगती।
आत्मिक प्रगति के मार्ग में वैराग्य की चर्चा बहुत होती रहती है। विवेकहीन लोग उसका अर्थ शरीर निर्वाह और परिवार पालन के उत्तरदायित्वों का परित्याग करना मान बैठते हैं। भिक्षा पर निर्वाह करते हैं। आलस्य में समय गँवाते और आश्रितों के प्रति विश्वासघात करते हैं। इस स्थिति को वैराग्य जैसे सम्मानास्पद नाम से किस प्रकार सम्बोधित किया जाये? खाली समय और खाली दिमाग तो शैतान की दुकान होता है। उस स्थिति में मुफ्त का सामान और पैसा बटोरने की सूझ, सूझती है और ऐसे प्रपंच रचे जाने लगते हैं जिनमें लोगों के समय, धन और विवेक की बर्बादी होने लगे। वैराग्य तो लिप्साओं से होना चाहिए न कि कर्त्तव्य से? बैरागी को लोक सेवी होना चाहिए। न कि भारभूत जीवनचर्या अपनाकर प्रपंच गढ़ना और जनसाधारण को भ्रमित करना।
लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लोक सेवक मण्डल संस्था के संचालक का स्थान लालाजी के स्वर्गवास से खाली हो गया। इस स्थान पर निर्वाह मात्र का वेतन मिलता था।
कम पैसे पर योग्य आदमी कौन मिले। अड़चन के कारण मण्डल का काम रुक गया।
उन दिनों पुरुषोत्तम दास टण्डन पंजाब नेशनल बैंक के प्रांतीय मैनेजर थे। अच्छा वेतन मिलता था। उनने नौकरी छोड़ दी और मंडल के संचालन का काम संभाल लिया।
गाँधी जी ने इस त्याग से उत्पन्न आर्थिक कठिनाई के सम्बन्ध में पूछताछ की, तो उनने सीधा-सा उत्तर दिया- ‘जरूरत घटा लेने पर अर्थ सन्तुलन बिठा लेने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।”
ध्यान का मस्तिष्क के हेमीस्फेयरिक सिमेट्री पर क्या प्रभाव पड़ता है? इस पर अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक मार्कवेस्टकॉट ने निष्कर्ष निकाला है कि ध्यान का अभ्यास करने से मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्ध दाहिने और बाँये गोलार्द्ध अपनी उन्नत अवस्था में आ जाते हैं और दोनों के क्रिया-कलापों के मध्य अधिक सामंजस्य स्थापित हो जाता है। यह क्रियाशीलता ध्यान के बाद भी बनी रहती है। परिणाम स्वरूप विचारों में उत्कृष्टता का समावेश होना है और व्यक्ति रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्यों में रुचि लेने लगता है। यह सब रचनात्मक विचारों की ही परिणति होती है।
मनुष्य के मस्तिष्क से निकलने वाली वैद्युतीय तरंगें (जो 8 से 14 चक्र प्रति सेकेंड होती है) ध्यान करने से स्थिर होने लगती हैं। मस्तिष्कीय तरंगों की लय का स्थिर होना अभ्यास कर्त्ता के जीवन में जागरूकता आने सचेतन होने का परिचायक है और यही अभ्यास साधक को पूर्णता की ओर ले जाता है।
वैज्ञानिक मार्कवेस्टकॉट ने अपने अनुसन्धान में पाया है कि ध्यान के समय मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों से ऊर्जा का उत्पादन लगभग बराबर मात्रा में होता है जो कि मस्तिष्क के सन्तुलन और समकालिकता का द्योतक है। सामान्य स्थितियों में या वार्त्तालाप के समय मस्तिष्क के दाँये-बाँये गोलार्द्ध में से एक भाग अधिक सक्रिय और प्रबल रहता है तथा दूसरे भाग पर अपना दबदबा बनाये रखता है। ध्यान के अभ्यास द्वारा इन दोनों गोलार्द्धों के क्रिया-कलापों में संतुलन और सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। क्योंकि उस समय मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ जाती है और उसका रेटिकुलर सिस्टम अच्छी तरह से कार्य करने लगता है। रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम (आर.ए.एस.) ध्यान की एकाग्रता में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ध्यान के समय मस्तिष्क के दाँये और बाँये- दोनों भागों के मस्तिष्कीय तरंगों की सक्रियता अत्यधिक बढ़ जाती है और ध्यान के बाद भी ये तरंगें कुछ समय तक अपनी उच्च स्थिति में होती हैं। जिससे दोनों गोलार्द्धों के मध्य सात्मीकरण अवस्था का पता चलता है। इस अवसर का लाभ साधक अपने मानसिक शक्ति के पूर्ण विकास में कर सकता है।
ध्यान पर वैज्ञानिक विवेचन और भी अनेकों विद्वानों ने प्रस्तुत किया है। एक और वैज्ञानिक डोनैल्ड ई. मिस्कीमैन के अनुसार ध्यान का अभ्यास करते रहने पर मनुष्य की बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होती है और विचार शैली भी उन्नत दिशा की ओर बढ़ती है। चेतन और अचेतन मन को सक्रिय बनाने एवं उसे विकसित करने का ध्यान एक महत्वपूर्ण उपाय है। स्मृति क्षमता की वृद्धि करने और उसे स्थायित्व प्रदान करने में ध्यान बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। शरीर की फिजियोलॉजी और मन की सामर्थ्य को बढ़ाने- उसे नई शक्ति प्रदान करने में भी ध्यान का अभ्यास बहुत उपयोगी होता है। उन्होंने साइकोमैट्री प्रयोगों द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है।
‘खिलाड़ियों पर ध्यान का प्रभाव’ नामक अपने अनुसन्धान में एम. केशव रेड्डी ने बताया है कि छह सप्ताह के ध्यान के अभ्यास से खिलाड़ियों की हृदय गति की दर में महत्वपूर्ण कमी आँकी गई। हार्ट रेट की यह कमी कार्डियोवेस्कुलर सक्रियता और उसकी क्षमता में वृद्धि का परिचायक है। इसी तरह खिलाड़ियों की वाइटल केपेसिटी जीवनी शक्ति में भी वृद्धि को आँका गया है। जितनी कम हृदय दर होगी, उतना ही अधिक रक्त विश्राम की बढ़ी अवधि (क्यू.टी.इन्टरबल) में हृदय को मिलेगा तथा वायटल केपीसीटी के बढ़ने से परफ्यूजन- वेण्टीलेशन अनुपात बढ़ने से स्फूर्ति सहज ही आएगी।
ध्यान के समय हृदय की धड़कनें और उसकी उत्सर्जन एवं उत्पादन प्रक्रिया में अन्तर आ जाता है। वैज्ञानिकों ने उत्सर्जन प्रक्रिया में औसत 25 प्रतिशत की कमी आँकी है। ग्रोलमैन के अनुसार निद्रावस्था में कार्डियक आउटपुट में 20 प्रतिशत की कमी आ जाती है और ध्यान के समय यह प्रतिशत और अधिक कम हो जाता है। डॉ. बुलार्ड का निष्कर्ष है कि ध्यानावस्था में आक्सीजन की खपत में कमी के कारण हृदय के क्रिया-कलाप प्रभावित होते हैं और उसके उत्पादन-उत्सर्जन प्रक्रिया में परिवर्तन आता है। अपव्यय रुकने पर ऑक्सीजन अन्य अनिवार्य कार्यों में लगती है।
ध्यान साधना का अभ्यास करने पर त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता भी असाधारण रूप से बढ़ती पाई गई है। राबर्टकीथ वैलेस ने अपने अनुसंधान में बताया है कि 10 मिनट की ध्यान साधना के साधकों की त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता में 500 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी मापी गयी। निमीलित अवस्था में साधक की त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि हो जाती है। आँखें बन्द करने पर साधना के अन्त में साधकों ने अपने को बहुत ही शान्ति की अवस्था में पाया। स्ट्रेस कम होना, तनाव घटना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
डॉ. बेन्सन के अनुसार ध्यान के नियमित अभ्यास से उच्च रक्तचाप के मरीजों में रक्तचाप सामान्य स्थिति में आता देखा गया है। परीक्षण के दौरान पाया गया कि यदि किसी ने ध्यान का नियमित अभ्यास बन्द कर दिया तो 4 सप्ताह के अन्दर-अन्दर मरीज का रक्तचाप फिर बढ़ी हुई आरम्भिक स्थिति में आ जाता है। उनका कहना है कि ध्यान के उपरान्त रक्तचाप में यह महत्वपूर्ण कमी सम्भवतः इण्टिग्रेटेड हाइपोथेलेमिक रिस्पान्स जिसे “रिलैक्सेशन रिस्पान्स” भी कहते हैं, की सक्रियता के कारण होता है।
उपरोक्त परीक्षण के आधार पर बेन्सन निम्न निष्कर्ष पर पहुँचे हैं-
“रिलैक्सेशन रिस्पान्स, सिम्पैथेटिक” तन्त्रिका तन्त्र की क्रियाशीलता में ह्रास से सम्बद्ध है और इसे “कैनन इमर्जेन्सी रिएक्शन” जो “फाइट और फ्लाइट रिस्पान्स” के नाम से प्रसिद्ध है, का दूसरा पक्ष कहा है।
इसके अतिरिक्त ध्यान का ई.ई.जी. द्वारा शरीर फिजियोलॉजी पर निम्न प्रभाव दृष्टिगोचर हुआ। 1. ई.ई.जी. द्वारा ध्यानयोगी में अल्फा तरंगों की बहुलता देखी गयी। बीटा-तरंगें यदा-कदा देखी गयीं। 2. ध्यान के उपरान्त दिल की धड़कन में प्रति मिनट 5 धड़कन की महत्वपूर्ण कमी दृष्टिगोचर हुई। 3. इसी प्रकार सभी ध्यान योगियों में ध्यान का आरम्भ के उपरान्त 5 मिनट के अन्दर ही शरीर के ऑक्सीजन उपभोग में 20 प्रतिशत की कमी देखी गयी। 4. ध्यान के आरम्भ होते ही व्यक्ति के गैल्वेनिक स्कीन रेसिस्टेन्स में महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी पायी गई, किन्तु बीच-बीच में इसमें कुछ कमी-वेशी भी होती रही। कुल मिलाकर सभी परिणाम तनाव शामक अधिक थे।
वस्तुतः अभी तक जितना प्रायोगिक कार्य अध्यात्म साधनाओं पर हुआ है वह उनकी सम्भावित परिणतियों को देखते हुए अत्यल्प है। मस्तिष्क एवं शरीर के अन्य संयंत्र अति विलक्षण हैं। मस्तिष्क के विद्युत फव्वारे के डी.सी. पोटेन्शियल नापने वाला कोई यन्त्र अभी तक कम्प्यूटर विज्ञान- साइबर्नेटिक्स में क्रान्ति करने वाला आधुनिक विज्ञान जगत नहीं बना पाया है। विधेयात्मक उच्चस्तरीय चिन्तन करते समय, तल्लीनता, एकाग्रता की स्थिति में, श्रद्धासिक्त भाव सम्वेदनाओं की चरमावस्था में मस्तिष्क की विद्युतीय स्थिति में क्या परिवर्तन होते हैं, चयापचय दर में क्या परिवर्तन होते हैं, स्नायु रसों का स्राव किस सीमा तक प्रभावित होता है, समग्र शरीर की वायोकेमीस्ट्री व बायोइलेक्ट्रीजीवी में क्या अन्तर आता है, यह जानने का प्रयास यदि किया जा सके तो ध्यान-योग सम्बन्धी अनेकानेक नये आयाम मनुष्य के हाथ लगेंगे। ध्यानयोग उच्चस्तरीय हो व अल्पावधि का ही हो तो वह हर प्रकार की सामर्थ्यवान तनाव शामक, मस्तिष्कीय सामर्थ्यों को बढ़ाने वाली औषधि का काम कर सकता है। आज के इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ रहे बल्कि तेजी से भाग रहे युग में ऐसी औषधि की आवश्यकता भी है। साथ ही उस अनुसन्धान की भी उपादेयता है जो उसे कसौटी पर खरा सिद्ध कर सके।
पृथ्वी पर तथा उसके इर्द-गिर्द अनेकों सूक्ष्म गतिविधियाँ इस प्रकार चलती हैं कि उन्हीं के सहारे प्राणियों के शरीर वनस्पति, जल जगत, अन्तरिक्ष, खनिज, भूगर्भ आदि क्षेत्रों की गतिविधियों का सूत्र संचालन होता है। इनमें गुरुत्वाकर्षण सर्वविदित है, क्योंकि वह ऊपर से नीचे की ओर गिरने वाली वस्तुओं को देखकर ही बालकों तक को प्रतीत हो जाती है। फिर धरती का अधर में टँगा होना दूसरों के साथ स्वयं बँधा रहना तथा अपने साथ सौर मण्डल के अन्याय ग्रह उपग्रहों को बाँधे रहना और भी बड़े रूप में यह सिद्ध करता है कि पृथ्वी कोई बहुत बड़ा चुम्बक है। जिसकी पकड़ अपने कलेवर से बाहरी भाग को भी सन्तुलित रखती है और भीतरी क्षेत्र को भी इस प्रकार गतिशील बनाये रहती है कि जड़ चेतन स्तर के सभी पदार्थों का गति क्रम सुनियोजित ढंग से चलता रहे। पदार्थ में पाये जाने वाले परमाणु परिकर और जीवधारियों के शरीर में काम करने वाले जीवाणु तक परस्पर इसी चुम्बकत्व के सहारे अपने क्रिया-कलापों को चलाते हैं, जो पृथ्वी के चुम्बकत्व के असीम भण्डार में से उन्हें थोड़ी-थोड़ी मात्रा में उपलब्ध होता है। वनस्पतियों का बढ़ना, बादलों का उठना, गरजना, कड़कना समुद्र में ज्वार-भाटे आना आदि क्रियाओं का होना इसी चुम्बकत्व से सम्बन्धित है, जिसे भूमण्डल का प्राण भी कह सकते हैं। उसी महाशक्ति ने एक स्वनिर्मित कवच को राजछत्र की तरह अपने ऊपर धारण किया हुआ है, जिनसे अन्तरिक्षीय विकिरणों से रक्षा होती है और कोई उल्का उससे टकराये तो जल-बल कर खाक हो जाती है। इसे आयनोस्फियर कहा जाता है। जिसे पृथ्वी का प्राणमय कोश भी कह सकते हैं।
यह पृथ्वी का प्राण किस-किस क्षेत्र में किस प्रकार फैला हुआ है और उसका उपयोग कैसे हो सकता है, इसी जानकारी का यत्किंचित् पता लगाने में भौतिक विज्ञान सफल रहा है। जिसे वह प्रकृति पर विजय कहता है। यद्यपि जो जाना जा सका है, उससे असंख्य गुना जानने को शेष है। नित नये आविष्कारों का जो सिलसिला चल रहा है उसे इसी शक्ति भांडागार की कुरेद बीन कह सकते हैं।
यहाँ चर्चा मात्र शरीर पिण्ड के सम्बन्ध में करनी है। उसके जीवकोश, रसायन, हारमोन, जीन्स आदि की अपनी सुविस्तृत व्यवस्था है। यहाँ उसका उल्लेख सम्भव नहीं। चर्चा मात्र मेरुदण्ड की और उसके दोनों सिरों की (पोल्स) हो रही है। यह क्षेत्र समग्र काया की तुलना में बहुत छोटा होते हुए भी इतना महत्वपूर्ण है कि उसे योगाभ्यास की अति महत्वपूर्ण धारा कहा जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
मानवी काया यों है तो ब्रह्माण्ड की अनुकृति पर उसे छोटे रूप में समझाने के लिए एक भूमण्डल मान लेने में भी बहुत ही ज्ञातव्य बातें हस्तगत हो जायेंगी। पृथ्वी अपने उत्तरी ध्रुव से अन्तरिक्षीय भण्डार में से अपने काम की वस्तुएँ ग्रहण कर लेती है। यह उसका मुख है। मुख चाहे जो नहीं खाने लगता। जो उपयोगी होती है उन्हीं को स्वाद और स्वरूप के आधार पर पकड़ता और पेट में पहुँचाता है। उसी प्रकार अन्तरिक्ष में मंडराती रहने वाली असंख्य शक्तियों में से पृथ्वी उन्हीं को पकड़ती है और अपने लोक की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयुक्त करती है। प्रयुक्त करने के बाद जो कचरा बच जाता है उसे मलद्वार से- दक्षिण ध्रुव से निकाल बाहर करती है। पचे हुए उपयोगी अंश से ही उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। मानवी शरीर भी इसी क्रिया का अनुसरण करता है। उसका उत्तरी ध्रुव मस्तिष्क है और दक्षिणी ध्रुव वह जिसे मल मूत्र स्थानों का मध्य भाग मूलाधार चक्र कहते हैं। उत्तरी ध्रुव को सहस्रार चक्र कहते हैं। इन दोनों के मध्य एक प्रचण्ड शक्ति प्रवाह बहता रहता है जिसे कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं।
पृथ्वी द्वारा खींचा गया अन्तरिक्षीय प्रवाह भूमध्य रेखा के साथ-साथ चलता है। अंतर्ग्रही शक्तियों का पृथ्वी पर प्रवाह किस प्रकार बहता है और उसकी क्षमता अन्याय क्षेत्रों में किस प्रकार काम करती है? इसकी जाँच पड़ताल करने के लिए वैज्ञानिक इसी क्षेत्र में अपने विविध अन्वेषण करते रहते हैं। संसार की महत्वपूर्ण वेधशालाएँ इसी भूमध्य रेखा पर बनाई गई हैं। इसी क्षेत्र के लम्बे पर्यवेक्षण से अनेकानेक रहस्यों का उद्घाटन हो सका है।
शरीर की भूमध्य रेखा मेरुदंड है। वह स्वयं तो अध्यात्म प्रयोगों की दृष्टि से आश्चर्यजनक है ही, उसके दोनों सिरे भी असाधारण हैं जिन्हें जादुई ही कह सकते हैं। मेरुदण्ड के शक्ति प्रवाह में तीन धाराएँ बहती हैं, जिन्हें इडा- पिंगला- और सुषुम्ना कहा जाता है। बिजली की दो धाराएँ होती है। एक को निगेटिव- दूसरी को पॉजिटिव कहते हैं। इन दोनों का जहाँ मिलन होता है वहाँ तीसरा “करेन्ट” बहने लगता है। इडा, पिंगला का जहाँ मिलन होता है वहीं से तीसरी धारा सुषुम्ना का उद्भव होता है। इसी को शास्त्रकारों ने गंगा यमुना के मिलन की सरस्वती कहा है और उस संगम को त्रिवेणी नाम दिया है। सरस्वती प्रत्यक्ष नहीं है। वह मिलन संगम पर पाताल से आकर मिलती है। इसी बात को यों भी कहा जाता है कि जिस प्रकार पीला नीला रंग मिलाने से तीसरा अलग से हरा रंग बन जाता है, ठीक उसी प्रकार इस सुषुम्ना संगम को कहा जा सकता है। यह त्रिविधि संगम ऐसा है जिसे लक्ष्मी, काली और सरस्वती के संगम की उपमा दी जा सकती है।
जब हवा बहुत तेजी से बहती है तो ‘चक्रवात’ उत्पन्न होते हैं। नदी के तीव्र प्रवाह में भी “भंवर” पड़ते हैं। चक्रवातों और भँवरों में सामान्य प्रवाह की तुलना में सैकड़ों गुनी शक्ति अधिक होती है। उनकी चपेट में जो भी आ जाता है वह नाचने लगता है। वैज्ञानिक गण इन दिनों खोज में हैं कि चक्रवातों और भँवरों की असीम शक्ति को किसी प्रकार नियन्त्रित करके उपयोगी काम में लगाया जाये।
मेरुदण्ड के बीच बहने वाली गंगा यमुना इडा पिंगला में भी ऐसे ही चक्र बनते हैं, जिन्हें षट् चक्र कहा गया है। वस्तुतः वे सात हैं। मेरुदण्ड की सीमा में तो छह ही आते हैं। पर उनका ऊपरी सिरा सहस्रार भी उससे जुड़ा हुआ है। इसलिए मेरुदण्ड की सीमा से एक कदम और आगे बढ़ा जाये तो सहस्रार का कैलाश पर्वत आ जाता है जहाँ से गंगा और यमुना दोनों का मूलभूत उद्गम माना गया है।
मेरुदण्ड संरचना का कार्य विश्लेषण करने पर उनमें उस प्रकार की रक्त वाहिनियाँ भी पाई जाती हैं और शक्ति धाराएँ भी। वैज्ञानिक इडा प्रक्रिया को- “सिम्पैथेटिक सिस्टम” और पिंगला को “पैरासिम्पैथेटिक सिस्टम” कहते हैं। इन दोनों का उद्गम जिस कैलाश से है उसे मस्तिष्क मध्य में अवस्थित “हाईपोथेलेमस” कहते हैं। इसी के दो सिरे ‘पीनियल’ और ‘पिट्यूटरी’ मस्तिष्क में ही अवस्थित रहते हैं। इन दोनों को मिलाने वाली शृंखला ही हाइपोथेलेमस है। इसे सहस्रार चक्र कहा गया है। ब्रह्मरन्ध्र भी इसी के साथ जुड़ा हुआ है, जिसकी संगति “कॉपर्स कैलोजम” के समीप से बैठती है। चक्र वेधन, सहस्रार उन्नयन एवं मूलाधार का शक्ति उद्घाटन यह तीनों ही कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया को पूर्ण कर लेने के लिए आवश्यक हैं।
कहा जा चुका है कि मूलाधार मलमूत्र छिद्रों के मध्य है। इस स्थान की शल्य क्रिया करने पर जो नाड़ी गुच्छक पाया गया है उसे ‘सेक्रलप्लेक्सस’ कहते हैं। इससे स्नायु प्रवाह माध्यम से प्रायः कामोत्तेजना उभरती रहती है और सन्तानोत्पादन के लिए शुक्राणु, डिम्बाणु प्रजनन अंगों में बनते रहते हैं। यहीं से दाढ़ी, मूँछ, पौरुष, साहस, श्रम योग्य कठोरता उभारने वाले हारमोन उत्पन्न होते हैं। योगाभ्यास में इसे अग्निकुण्ड, कुण्डलिनी निवास आदि का नाम दिया गया है।
मस्तिष्क मध्य में निवास करने वाले केन्द्र में अप्रत्यक्ष रूप से काम करने वाले विद्युत उत्पादन केन्द्र को सहस्रार के अतिरिक्त “रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम” भी कहते हैं। इसे अति संवेदनशील विद्युत मापक यन्त्रों की सहायता से ही मापा जा सकता है। यहाँ क्षण-क्षण में विद्युत स्फुल्लिंग उभरते रहते हैं। इसे असली हृदय कहा जा सकता है। छाती में धड़कने वाला हृदय रक्त को फेंकने वाली धड़कन जारी रखता है। मस्तिष्क के माध्यम से उछलती रहने वाली रहस्यमयी क्षमता को असली हृदय भी कह सकते हैं। सहस्रार चक्र का इससे सीधा सम्बन्ध है। उसे ब्रह्मरन्ध्र का उद्गम भी कह सकते हैं। इन स्फुल्लिंगों को ही शतदल कमल कहा गया है और शतमुख वाला महा सर्प जिस पर क्षीर सागर में विष्णु भगवान शयन करते हैं।
मूलाधार और सहस्रार को मिलाने वाला छोटे-छोटे घटकों से मिलकर बना मेरुदण्ड है। इसी को बोल-चाल की भाषा में रीढ़ कहते हैं। स्पाइनल कार्ड इसके अन्दर होता है। इसी के मध्य व दोनों और वे तीनों नाड़ियाँ-शक्ति धाराएँ बहती हैं, जिनका उल्लेख ऊपर इड़ा पिंगला के रूप में किया गया है। इन्हीं दोनों की मध्यवर्ती सुषुम्ना है। मेरुदण्ड मार्ग को ‘इक्वेटोरियल लाइन’ विषुवत् रेखा कहते हैं। किन्तु इसका मध्यवर्ती प्रवाह “सेन्ट्रल केनाल” (स्पाइनल कार्ड का केन्द्रीय भाग) के नाम से जाना जाता है। यही सब मिलकर वैसी स्थिति बनती है जैसी कि पृथ्वी पर भूमध्य रेखा की है। ऐसे तो समस्त शरीर ही शक्तिपुँज है किन्तु योग साधना से सम्बन्धित प्रचण्ड शक्ति का केन्द्र उसी भाग को समझा जाना चाहिए जो मूलाधार से लेकर सहस्रार तक मेरुदण्ड माध्यम से शक्ति पुँज बनकर अवस्थित है।
कुण्डलिनी जागरण एक क्रिया नहीं है वह विभिन्न पक्षों, अवयवों में बँटी हुई है और उसके प्रत्येक अवयव को इस प्रकार झकझोरना पड़ता है जिससे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति होती हो। मूलाधार, सहस्रार, इडा, पिंगला, सुषुम्ना यह पाँच घटक मोटे अंग अवयवों के रूप में गिने जा सकते हैं। अब इनके अन्तराल में सन्निहित शक्तियों का विवरण चलता है। मेरुदण्ड मार्ग में छह चक्र हैं। इन्हें छह स्तर की विद्युत शक्तियाँ कह सकते हैं। इनमें से जो अपने लिए विशेष उपयुक्त है उसी पर प्रयत्न केन्द्रित करने पड़ते हैं। छहों चक्रों को जगाने का तात्पर्य तो ऐसा है जैसा किसी विशाल कारखाने के अनेकानेक कल पुर्जों की समग्र जानकारी प्राप्त करना। यह व्यर्थ है। उनमें से जिनके साथ अपना सीधा संपर्क हो, उतने की ही जानकारी प्राप्त कर लेने में एक मध्यवर्ती साधक का काम चल सकता है। यही बात मूलाधार के अनेक पक्षों में से जो अपने लिए अभीष्ट है उसी अंग पर हाथ डाला जाये। यह सिद्धान्त सहस्रार की हजार या सौ धाराओं में से अपने उपयोगी पक्ष को चुनने के सम्बन्ध में है।
हजरत उमर का एक बड़ा स्वागत समारोह होने जा रहा था। दूसरे कई लोग भी उनके साथ थे। रात भर चलना था। समारोह का दिन अगले सवेरे था।
तब पाया गया कि एक आदमी आगे चलने वाले ऊँट की नकेल पकड़कर चले और दूसरे लोग ऊँटों की पीठ पर बैठकर झपकी लेते चलें। नकेल कौन पकड़े, इसकी पारी तय कर दी गई। काफिला रात भर चलता रहा। पौ फटी और भोर हुआ तो मालूम हुआ कि वह बस्ती आ गई, जिसमें स्वागत समारोह होना तय था।
पारी के हिसाब से हजरत उमर आगे वाले ऊँट की नकेल पकड़कर चल रहे थे। पीछे वाले चिल्लाये- “चलना बन्द किया जाये, ताकि हम लोग जमीन पर उतर सकें।”
आगे के ऊँट की नकेल पकड़कर चलने वाले हजरत उमर ने कहा- “हर आदमी अपनी जगह पर बैठा रहे और अपना काम करे। स्वागत के लिए यह जरूरी नहीं है कि नकेल पकड़कर चलने वाले की अवज्ञा की जाये और जो पीठ पर बैठे हैं, उन्हें उतरने के लिए मजबूर किया जाये।” ऐसे ही सत्कर्म, श्रेष्ठ चिन्तन महामानवों को विश्ववंद्य स्तुत्य बनाते हैं। उनके प्रसंग पढ़कर जन साधारण को भी वैसा ही बनने, अहंकार मुक्त होने की प्रेरणा मिलती है।
महान चित्रकार आगस्टी केन्वायर जितने अधिक वृद्ध होते गये उतना ही उनका कला-प्रेम पढ़ता गया। युवावस्था में वे एक अच्छे चित्रकार थे। उनकी रोजी-रोटी उसी से चलती थी, पर दुर्भाग्य से यह न देखा गया। उनके हाथ-पैरों में गठिया की शिकायत आरम्भ हुई और इतनी बढ़ी कि पैरों ने दो कदम चलने से भी इन्कार कर दिया। पहियेदार कुर्सी के सहारे ही वे घर के एक कोने से दूसरे कोने तक खाने, सोने जैसी दैनिक आवश्यकताएँ पूरी करने जा सकते थे। हाथों का यह हाल हो गया कि ब्रुश पकड़ना उँगलियों के लिए कठिन हो गया। तब वे उँगलियों के साथ रस्सी से ब्रुश बाँध लेते और चित्रकारी में तन्मय रहते।
यों दर्द उन्हें चौबीस घण्टे बना रहता था। कई बार तो वह इतना बढ़ जाता कि पहियेदार कुर्सी से उतरने और चढ़ने का अवसर आने पर उन्हें कराहना पड़ता। ब्रुश को रंग की प्लेट तक ले जाने, डुबाने और उठाने में कई बार उंगलियों में बेतरह कसक होती और वे उसे जहाँ की तहाँ रखने के लिए मजबूर हो जाते। थोड़ा चैन मिलने पर ही हाथ उठता, पर चित्रकला की उनकी तन्मयता में इससे भी कुछ अन्तर न आया।
अपंग कलासाधक की लगन और कला देखने के लिये दूर-दूर से नौसिखिये चित्रकार उनके पास आया करते थे और उस संदर्भ में गूढ़ प्रश्न पूछते थे। एक प्रश्न यह तो होता ही था, सत्तर वर्ष से अधिक आयु हो जाने के कारण जरा-जीर्णता और रुग्णता के रहते हुए भी वे किस प्रकार अपने प्रयास में इतने दत्त चित्त रह पाते हैं? उत्तर में वे नये कलाकारों को अपनी मनःस्थिति का सार बताते हुए यही कहते- ‘यदि कोई कलाकार अपनी कृति और प्रगति को देखकर सन्तोष कर बैठे या अहंकार करने लगे तो समझना चाहिए उसके विकास का अन्त हो गया। प्रगति का एक ही मार्ग है अकल्पनीय प्रगति तक पहुंचने की उत्कट आकाँक्षा और उसके लिए मजदूर जैसी कठोर श्रम साधना। जिसने थोड़ी सफलता पर अहंकार व्यक्त किया समझ लो वह मारा गया। प्रगति तो अनन्त है इसलिये उसकी साधना भी असीम ही होनी चाहिए।
78 वर्ष की आयु में जब कि आगस्टी केन्वायर बहुत अधिक वृद्ध हो गये थे और बीमारी ने उन्हें नर कंकाल मात्र बना दिया था तो भी उन्होंने अपनी कला-साधना छोड़ी नहीं। फेफड़ों की खराबी बेतरह तंग करती थी और लगता था कि वे अब महा प्रयाण करने ही वाले हैं तो भी उन्होंने अपनी साधना छोड़ नहीं। अन्तिम दिनों वे महिला मित्र नामक अत्यन्त कला-पूर्ण चित्र बनाने में निमग्न थे और अपने बेटे की मेज पर रखने के लिए एक गुलदस्ता चित्रित कर रहे थे।
डॉक्टरों ने पूर्व विश्राम के लिए कहा तो उन्होंने एक ही उत्तर दिया। कुछ न करने की, कुछ न सोचने की बात मेरी प्रकृति स्वीकार ही न कर पायेगी। अन्तिम दिन उन्हें श्वास का ऐसा विकट दौरा पड़ा जो उन्हें साथ लिए बिना गया ही नहीं। वे फर्श पर बेहोश होकर गिर पड़े वे होश में आये तो गृह सेविका लूसी ने पूछा अब आपकी तबियत कैसी है तो उन्होंने तबियत का मतलब अपनी कला साधना से समझा और बुझती हई आँखों को नये सिरे से चमकाते हुए कहा- लूसी मैं समझता हूँ कि चित्रकला के बारे में अब कुछ-कुछ समझ सकने योग्य हो चला। इसके बाद उन्होंने सदा के लिए आँखें बन्द कर ली।
मनुष्य एक भटका हुआ भगवान है। सही दिशा पर चल सके तो उससे बढ़कर इस संसार में श्रेष्ठ और कोई नहीं।
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ऐसे ईश्वर का सृजन करो जो आदमियों के साथ रहना और उन्हें अपने साथ रखना जानता हो।
यह संसार जिन तत्वों से बना है। उनमें भलाई, बुराई, नेकी-वदी, कुरूपता, सुन्दरता, अनुकूलता-प्रतिकूलता के परस्पर विरोधी स्तरों का समावेश है। इन दोनों ही परिस्थितियों से कोई बच नहीं सकता। समुद्र की बनावट ही ऐसी है कि उसमें ज्वार-भाटे आते रहते और हर वस्तु हिलती रहती है परमाणुओं से लेकर सौर मण्डल और ब्रह्माण्ड में कहीं स्थिरता नहीं। सर्वत्र हलचल की धूम है। इतना ही नहीं, उसके साथ ही प्रिय-अप्रिय भी जुड़ा है। यदि अपने चिन्तन को मात्र अप्रिय निषेधात्मक पक्ष के साथ जोड़ा जाये तो दुःखदायी घटनाएँ ही स्मरण रहेंगी और उन्हीं का स्मरण बाद में भी बना रहेगा। जो प्रिय एवं अनुकूल है वह सरसरी नजर से देखने पर आँखों के आगे से निकल जायेगा। उसकी विशेषता और स्थिति भी अनुभव में न आ सकेगी। निषेधात्मक चिन्तन के कारण जो श्रेष्ठ है वह भी निकृष्ट प्रतीत होगा। रंगी काँच का चश्मा पहन लेने पर सभी वस्तुएँ उसी रंग की रंगी हुई दिखाई पड़ती हैं।
यदि अपना चुनाव अशुभ के पक्ष में हो तो असंख्य लोगों में से असंख्यों प्रकार की बुराइयाँ दीख पड़ेंगी। अपने साथ किसने क्या और कैसा दुर्व्यवहार किया है यदि इसकी स्मृति दौड़ाई जाये तो प्रतीत होगा कि संसार में दानव स्तर के लोग ही रहते हैं और अनीतिपूर्ण अनाचार करने में ही निरत रहते हैं। अपने को कब कितने दुःख भुगतने पड़े और दूसरों में से किसको कितने दुःख दिये इसकी गणना करने पर प्रतीत होता है कि यह संसार सचमुच ही नरक है, भवसागर है। यहाँ से जितनी जल्दी जिस प्रकार भी सम्भव हो छुटकारा पाना चाहिए। ऐसी मनःस्थिति में जीवन भार रूप बन जाता है और उसका प्रभाव उद्विग्न अशान्त बने रहने के रूप में ही सामने आता है। यहाँ तक कि इस ऊबड़-खाबड़ दुनिया को बनाने वाले के प्रति भी आक्रोश उत्पन्न होता और भरपेट गाली देने को मन करता है। प्रतिकूलताएँ ही सर्वत्र छाई देखकर मनुष्य नास्तिक स्तर का बन जाता है। उसे कोई भी विश्वसनीय नहीं जँचता। सबके प्रति अविश्वास रहता है।
इसके विपरीत एक दूसरा दृष्टिकोण भी है। उसके अनुरूप अपनी दृष्टि बदल लेने पर समूचा दृश्य ही बदल जाता है और सुन्दरता, सज्जनता एवं सदाशयता का माहौल इतना बड़ा दीखता है जिसे देखते हुए लगता है कि भलाई की भी कहीं कमी नहीं। ईश्वर ने ऐसी अद्भुत विशेषताओं वाला शरीर दिया, साथ ही जादू की पिटारी जैसा मनःसंस्थान भी। अभिभावकों और कुटुम्बियों की दुलार भरी उदारता की एक घटना का स्मरण किया जाये तो प्रतीत होगा कि वे औरों के लिए कैसे भी क्यों न हों, अपने लिए तो देवता तुल्य ही रहे हैं। मित्र, सहपाठियों का स्नेह सौजन्य, अध्यापकों का ज्ञानदान ऐसे पक्ष हैं, जिनकी उपलब्धि बिना वह स्थिति न आ पाती जो आज है।
पत्नी का सौजन्य और सेवा भाव यदि उदार दृष्टि से देखा जाये तो प्रतीत होगा कि वह किसी भी प्रकार ऐसा नहीं है जिसे देवोपम न माना जाये। घर को खुशी और किलकारियों से भर देने वाले बच्चों को परिवार के अन्यान्य आश्रित जन सभी की सद्भावना मिलती है। समाज का ऐसा सुगठन है जिसमें आजीविका के साधन सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। दैनिक उपयोग की इतनी, इतने प्रकार की वस्तुएँ मिलती रहती हैं, जिनके सहारे प्रसन्नता और तृप्ति ही मिलती रहती है।
प्रकृति की ओर दृष्टि उठाकर देखा जाये तो चलते-फिरते खिलौनों जैसे पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, सरिता-सरोवर, पहाड़ वन, सूर्य, चन्द्र और तारागण, बादलों वाला आकाश, वृक्ष-वनस्पतियाँ सभी कुछ ऐसा है, जिसका मनोरम सौंदर्य देखते-देखते मन नहीं भरता।
सत्प्रयोजनों में संलग्न, चरित्रवान, उदारमना मनीषियों की खोज की जाये तो उनकी गाथाओं से इतिहास भरा पड़ा मिलेगा। आज भी उनकी कमी नहीं है। संख्या भले ही कम हो और वे निकट नहीं दूर रहते हों, किन्तु उनका अस्तित्व इतना अवश्य है कि प्रसन्नता व्यक्त की जा सके और सन्तोष की साँस ली जा सके।
तथ्य एक ही है कि अपना दृष्टिकोण किस स्तर का है। उद्यान में भौंरे को सुगन्ध की मस्ती और मधुमक्खियों को शहद की मंजूषाएँ लटकती दिखती हैं, पर गुबरीला कीड़ा पौधों की जड़ों में लगे हुए सड़े गोबर तक जा पहुँचता है और सर्वत्र दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध पाता है। एक बार बार गुरु ने दुर्योधन और युधिष्ठिर को एक ही गाँव में भले और बुरे लोगों की सूची बना लेने के लिए भेजा। दुर्योधन को सभी दुष्ट और युधिष्ठिर को सभी सज्जन दीखे। वहाँ थे दोनों ही प्रकार के लोग, पर अपने दृष्टिकोण के अनुरूप उनने उसी नजर से देखा तो उन्हें बहुलता अपनी खोजबीन के अनुरूप ही दिखाई दी।
संसार में बुराइयां न हों सो बात नहीं है। पर वे ऐसी हैं कि उन्हें सुधारने के माध्यम से हम अपना पुरुषार्थ जगा सकें, प्रगतिशीलता का परिचय दे सकें और परिवर्तन ला सकने का श्रेय प्राप्त कर सकें। अनीति न हो तो संघर्ष किससे किया जाये? शौर्य साहस प्रकट कर सकने का अवसर किस प्रकार आये?
दुष्टता की उपेक्षा की जाये या उसे सहते रहा जाये, बढ़ने दिया जाये, यह कोई नहीं कहता। उन्हें सुधारने-बदलने के लिए भी भरपूर प्रयास करना चाहिए, पर इसमें खीजने की- असन्तुलित होने की आवश्यकता नहीं है। डॉक्टर को सारे दिन उन्हीं के बीच रहना पड़ता है जिनने असंयम बरतकर अपने स्वास्थ्य को बिगाड़ लिया है। वे उनके घाव धोते, मरहम लगाते और आवश्यकतानुसार चीर-फाड़ भी करते हैं। वे रोग को मारते और रोगों को बचाते हैं। इस रीति-नीति को अपनाकर कुरूपता को सुन्दरता में और दुष्टता को सज्जनता में बदला जा सकता है। प्रेम-सौजन्य से काम न चलता हो तो आवश्यकतानुसार दण्ड नीति भी अपनाई जा सकती है और प्रताड़ना का प्रयोग भी किया जा सकता है, पर इसमें भी अपनी सुधार परायण सज्जनता की भाव सम्वेदना का ही अनुभव प्रयुक्त किया जा सकता है।
फिर अपनी निज की सद्भावना ही अपने लिए कम आनन्ददायक नहीं होती। वस्तुतः मनुष्य उद्विग्न अपने दृष्टिकोण के कारण ही होता है। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, छिद्रान्वेषण, असन्तोष, असंयम आदि के कारण ही ऐसी मनःस्थिति बनती है जिसमें खीज, खिन्नता और विद्वेष से मन भरा रहता है। कभी स्वल्प कारण होने पर भी तिल का ताड़ बनता है और चिन्ता, भय, निराशा, आशंका, अविश्वास, आदि मनोविकारों का समूह चढ़ दौड़ता है और स्थिति ऐसी पैदा कर देता है जिसमें चैन से रहना और संपर्क वालों को चैन से रहने देना बन ही नहीं पड़ता।
स्मरण रखने योग्य यह है कि अन्धकार कितना ही विस्तृत क्यों न हो, पर वह प्रकाश से अधिक मात्रा में नहीं हो सकता। संसार में अशुभ कितना ही क्यों न हो, पर वह शुभ से अधिक नहीं है। गन्दगी और स्वच्छता का अनुपात लगाया जाये तो स्वच्छता ही अधिक मिलेगी। यदि ऐसा न होता तो आत्मा इस संसार में आने और रहने की इच्छा न करती। कठिनाई अपना दृष्टिकोण उलझा लेने भर की है और वह ऐसा नहीं है जिसे सुधारा बदला न जा सके।
भयंकर वर्षा हो रही थी महर्षि आयोदधौम्य ने अपने शिष्य आरुणि को भेजा कि वह खेत में मेंड़ तोड़कर पानी को बहने से रोके। आरुणि बच्चा ही था। पानी जोरों से बह रहा था। कोई और उपाय न देखकर बच्चा वहाँ लेट गया जहाँ से पानी बह रहा था।
जब आरुणि को लौटने में बहुत देर हो गई तो तलाश हुई। पाया कि आरुणी मेंड़ रोके पड़ा है। ताकि खेत का पानी निकल जाने से नुकसान न हो। गुरु ने शिष्य को उठाकर छाती से लगा लिया। ऐसे गुरुभक्त और अनुशासन शील शिष्य का भविष्य उज्ज्वल ही होना था सो हुआ भी।
योग का प्रमुख उद्देश्य प्राण को नियमित पाना है। इसके लिए पहले मानसिक संवेगों को नियमित किया जाता है। यही प्राण शक्ति हमारे अन्तःकरण को शक्ति देती है। हटयोग से हम अपने शरीर और शक्तियों को संयमित रख सकते हैं। हठयोग, पाँच हजार वर्षों से चले आ रहे योगियों के अनुभवों का सार है और विज्ञान भी इसको मानता है। प्राणायाम मनुष्य के शरीर में प्राण को नियमित करने का यौगिक-विज्ञान है। शरीर की समस्त शक्तियाँ प्राण से मिलती हैं। शारीरिक, मानसिक और आन्तरिक शक्तियों को बढ़ाने का उत्कृष्ट साधन योग और प्राणायाम है।
अपने अंगों के द्वारा हम लगातार ब्रह्माण्ड से प्राण ग्रहण करते हैं। योगियों के अनुसार ये अंग निम्न चार हैं- (1) नाक के भीतर स्नायुओं के अन्तिम भाग (2) फेफड़ों में वायु कोश (3) जीभ और (4) चमड़ी (त्वचा) पाश्चात्य दर्शन के अनुसार त्वचा से हम लगातार प्राण को खींचते हैं। योगियों के अनुसार योग से हम इस प्राण शक्ति का आकर्षण, पाचन और नियमन अधिक सुगमता से और अधिक मात्रा में करते हैं। त्वचा के छिद्र प्राण शक्ति को पाने एवं अवशिष्ट वस्तुओं को शरीर से निकालने के लिए महत्वपूर्ण हैं। त्वचा को धूप में खुले रखने से हम अधिक प्राण पाते हैं। सूर्य स्नान इसी कारण बहुत लाभदायक है। अन्न, फल, शाक आदि सौर शक्ति से भरपूर हैं, इसलिये प्राणदायक कहलाते हैं।
पूर्वार्त्त और पाश्चात्य दर्शन, दोनों के अनुसार हम भोजन से बहुत अधिक प्राणशक्ति पाते हैं। इसे जीभ द्वारा हम पाते हैं, अन्य अंग (पेट आदि) प्राण नहीं ग्रहण करते। भोजन का स्वाद ही उसका प्राण है। योगी भोजन को तब तक चबाते हैं, जब तक उसका स्वाद समाप्त नहीं हो जाता। अन्न के सारे प्राण जीभ द्वारा सीखे जाते हैं। इसके बाद यह प्राण भोजन का कोई भी पाचन अंग ग्रहण नहीं कर सकता। थकावट और सुस्ती होने पर कुछ खाने से वह तुरन्त दूर हो जाती है। इसका कारण जीभ द्वारा उस अन्न के प्राण को ग्रहण करना ही है। अन्न का पाचन तो अनेक घण्टों के बाद होता है। तब वह मात्र अंगों को पोषण देता है, प्राण नहीं दे सकता। यह पाचन उन अंगों के 70 प्रतिशत प्राणशक्ति को खर्च कर देता है। प्राण की प्राप्ति इन अंगों (पेट, आंत्र, लिवर) से नहीं होती है। होमियोपैथी पद्धति इसका ज्वलन्त उदाहरण है। जिसमें दवा की सूक्ष्म मात्रा को जीभ पर रखना भर पड़ता है।
योगियों और पश्चिमी विज्ञानियों के अनुसार नाक, प्राण ग्रहण करने का एक और मुख्य अंग है। इस हवा के बिना हम क्षण भर जीवित नहीं रह सकते और रोगों एवं मृत्यु से ग्रस्त हो जाते हैं। मनुष्य प्रति मिनट 18 श्वास में एक लीटर हवा ग्रहण करता है और 24 घण्टे में 13000 लीटर। इसके समक्ष 2 लीटर पानी और एक किलो अन्न से प्राप्त शक्ति मनुष्य के लिए नगण्य है। हवा शरीर का मुख्य पोषक तत्व है। अतः नाक के भीतर हवा ग्रहण करने के लिए असीम मात्रा में अल्ट्रा सेंसिटिव नर्वस् रिसेप्टर्स होते हैं, जो हवा के समस्त गुणों को ग्रहण करते हैं।
नाक हवा को ग्रहण योग्य बनाती है, धूल गर्मी और नमी से मुक्त करती है और दुर्गन्ध को न ग्रहण करने की सूचना देती है। प्राकृतिक सुगन्ध में बहुत प्राण होता है, जिसे नाक ग्रहण करती है। सेन्ट पौधों और फूलों का प्राण तत्व है, जो अनेक प्रकार की मक्खियों को आकर्षित करता है। इससे इनके पराग इन मक्खियों द्वारा दूसरे पौधों में फूलों की उत्पत्ति के कारण बनते हैं। ये गन्ध अनेक प्रकार की मक्खियों को दूर भी भगाते हैं और कुछ को नष्ट भी करते हैं। फूलों की सुगन्ध को गहरे श्वासों से खींचने पर हम अधिक प्राण पाते हैं। एरोमाथैरेपी में सुगन्ध को सुँघाकर कई रोगों की चिकित्सा करते हैं। सुगन्ध की मालिश से भी कुछ कष्ट दूर होते हैं।
प्राकृतिक सुगन्ध ही लाभदायक है, कृत्रिम से लाभ नहीं होता, क्योंकि उसमें प्राण नहीं होता। सुगन्ध के ये आयन्स रक्त प्रवाह में पहुँचकर रोग ग्रस्त सेल्स और अंगों को शक्ति देते हैं, एवं अवाँछित तत्वों को घोलकर रक्त द्वारा विसर्जन अंगों तक पहुँचाते हैं और सेल्स को पुष्ट करते हैं। ये शक्तिशाली आयन्स सेल्स में स्वस्थ कंपन फिर से पैदा करते हैं और उसमें इलेक्ट्रो सैंगुइन (लाल कण) पैदा करते हैं। नासिका के नर्वस् का सम्बन्ध स्पाइनल कार्ड और आबलाँगेटा से है। अतः गन्ध से प्राप्त आयन्स की प्राण शक्ति शरीर की समस्त क्रियाओं पर गहरा एवं तुरन्त प्रभाव डालती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बेहोश मनुष्य को स्मेलिंग साल्ट सुँघाने से उसका तुरन्त होश में आ जाना है अथवा एनेस्थेसिया द्वारा बेहोश कर देना है।
नासिका के स्नायु तन्तुओं द्वारा गन्ध ग्रहण करने से उसका रिफ्लेक्स प्रभाव आमाशय, लिवर, किडनीज, प्लीहा आदि समस्त शारीरिक अंगों में स्नायु मण्डल के द्वारा पड़ता है। इससे एक अलग रिफ्लेक्स थैरेपी नये रोगों को दूर करने के लिए प्रचलित है। नासिका के स्नायु तन्तुओं का जाल अँगूठे के प्रिन्ट के समान निश्चित एवं विश्वसनीय है। फेफड़ों के वायु सेल्स से ऑक्सीजन का रक्त में मिलना रक्त की बायो इलेक्ट्रिक शक्ति पर निर्भर है। इस तरह फेफड़े भी प्राण ग्रहण की क्रिया करते हैं।
जैव भौतिकी (बायोफिजिक्स) के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्रत्येक सेल का जीवन उसमें प्रवाहित विद्युत तरंगें (प्राण) हैं। इसे समझने के लिए आजकल पाश्चात्य वैज्ञानिक आधुनिक साधनों से यौगिक क्रियाओं का समर्थन किस तरह करते हैं, इस पर हम विचार करें। इससे चीनी ‘एकूपंचर’ पद्धति से प्राण का शरीर में संचालन भी समझ सकते हैं। योगियों के अनुसार ब्रह्माण्ड में जो कुछ है, वे सब हमारे शरीर के विभिन्न अंगों के प्रत्येक सेल में सूक्ष्म रूप से हैं। यह प्राण जीवन के प्रारम्भ से अन्त तक निरन्तर बना रहता है। विज्ञान इसका सम्बन्ध रोगों और स्वास्थ्य से भी उतना ही घनिष्ठ मानता है, जिसे योगी लोग भी मानते हैं।
डॉ. वैलेस के अनुसार हमारा शरीर ब्रह्माण्डीय शक्ति को ग्रहण करके अपनी समस्त आन्तरिक क्रियाओं को करता है। बर्लिन के फ्रेक्रॉउस के अनुसार हमारे भीतरी भागों में लगातार ब्रह्माण्डीय प्राण ऊँचे अंगों से निम्नांगों की ओर प्रवाहित रहता है और यह प्राण स्नायु संस्थानों के अलावा समस्त झिल्लियों एवं द्रवों में होता है। योगियों के अनुसार हमारा सम्पूर्ण शरीर प्राण से भरा है और हमारी जीवनी शक्ति प्रचुर मात्रा में इस प्राण शक्ति के उपयुक्त पाचन पर ही निर्भर है। इसके समर्थन में पाश्चात्य वैज्ञानिक डॉ. बियांसिनी का कथन है-
पोषण की प्रत्येक क्रिया एवं संचालन से बायोजैव विद्युत उत्पन्न होती है और इस पर ही विद्युत का उत्पादन निर्भर है जो रेस्ट करेंट कहलाता है। अंगों का संचालन एक्शन करेंट (इन्टरमिटेंट) द्वारा होता है। रेस्ट करेंट्स की उत्पत्ति शरीर के प्रोटोप्लाज्म की रासायनिक क्रिया द्वारा होती है। इस तरह जीवित टिस्यूज अनन्त महीन बैटरियों की तरह निरन्तर विद्युत देते रहते हैं। शरीर की पेशियों, स्नायुओं, ग्रन्थियों एवं चमड़ी के स्तरों पर उनमें विद्युत प्रवाह एवं कैपिलरीज के कार्यों के सम्बन्ध से हम एक्शन करेंट को समझ सकते हैं।
डॉ. डिमिर ने शक्तिशाली गेलवेनोमीटर द्वारा इस विद्युत के मापन से पाया है कि अच्छे स्वास्थ्य के लोगों में यह विद्युत आठ माइक्रो एम्पीयर्स थी, कमजोर और थके लोगों में एक दो माइक्रो एम्पीयर्स थी और तनावग्रस्त लोगों में 15 माइक्रो एम्पीयर्स तक बढ़ी थी।
उनका निष्कर्ष था कि यही विद्युत जीवनी शक्ति कहलाती है, जो थकने पर कम हो जाती है। जीवनी शक्ति एवं अच्छा स्वास्थ्य प्रचुर बायो विद्युत् आयन्स के ग्रहण करने, विद्युत शक्ति में तनाव और समस्त कार्यों में सामंजस्य पर निर्भर है। इसका अर्थ यह हुआ कि उत्तम स्वास्थ्य इन करेन्ट्स के परस्पर विभाजन एवं सामंजस्य पर निर्भर है। ध्यानयोग एवं क्रियायोग के विभिन्न सोपान पूर्वार्त्त दर्शन द्वारा दूरदर्शिता पूर्वक निर्धारित ऐसे चरण हैं जिनका अवलम्बन लेकर अपनी सूक्ष्म शक्तियों को जगाया एवं इसी निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राण ऊर्जा से स्वयं को ओत-प्रोत कर कृत-कृत्य हुआ जा सकता है।
मनुष्य शरीर में अनेक रसायन ही नहीं, उसमें जैव-विद्युत का भी एक बड़ा भाग है। मशीनें लोहे से बनी होती हैं पर वे अपने आप नहीं चलती। उन्हें चलाने के लिए अतिरिक्त शक्ति चाहिए। बड़े कारखानों में बड़ी मोटरें लगी होती हैं और उन्हीं की शक्ति से सभी यन्त्र चलते हैं। बिजली फेल हो जाये तो समूचे कारखाने की गतिविधियाँ ठप्प हो जाती हैं।
मनुष्य शरीर की बिजली ही उसकी गतिविधियों का मुख्यतया सूत्र संचालन करती है। भोजन से उत्पन्न रस रक्त तो कल पुर्जों में चिकनाई भरता रहता है ताकि वे घिसने लड़खड़ाने न पायें।
मनुष्य का आकार उसकी विशिष्टता का आधार नहीं है। स्थूलता के आधार पर किसी को बलिष्ठ नहीं कह सकते। प्राण ऊर्जा ही जीवनी शक्ति के रूप में काम करती है और वही शरीर में बलिष्ठता, चेहरे पर सुन्दरता एवं मस्तिष्क में प्रतिभा बनकर प्रकट होती है।
अध्यात्म क्षेत्र में इस बिजली घर को कुण्डलिनी कहते हैं। उसका प्रभाव मनुष्य की इच्छा शक्ति एवं संकल्प शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता है। महत्वपूर्ण साहस एवं पराक्रम भी उसी के आधार पर बन पड़ता है। पतन पराभव के लिए तो व्यक्तित्व के साथ जुड़ी हुई जन्म-जन्मान्तरों की संग्रहित पशुता ही पर्याप्त है। किन्तु आदर्शों की दिशा में बढ़ते और महानता के अनुरूप उठने के लिए जिस विशिष्ट बल की आवश्यकता होती है उसी का मनोबल या आत्मबल कहा जाता है। इसी को परिपक्व करने के लिए कई आध्यात्मिक साधनाएं करनी पड़ती हैं।
इस अभ्युदय का एक और भी तरीका है। प्रतिभाशील व्यक्तित्वों का सान्निध्य- संपर्क एवं तद्नुरूप वातावरण में निवास उस क्षेत्र की गतिविधियों में रस लेना, योगदान देना और अभ्यास करना। यह भी व्यावहारिक स्तर का कुण्डलिनी जागरण है।
विद्युत शक्ति अपने केंद्र में समाहित तो रहती है पर उसके अनुकूल पदार्थ या प्राणी सम्पर्क में आते हैं तो उनमें भी दौड़ने लगती है। नल में बिजली का तार बाँध दिया जाय या कहीं शार्ट सर्किट हो रहा हो तो उससे पानी तक में करेंट आ जाता है और झटका मारता है। एक व्यक्ति को बिजली पकड़ ले और उसे दूसरा छुड़ाने लगे तो पकड़ में वह भी आ जायेगा। दूसरे को तीसरा पकड़े तो उसकी भी यही दशा होगी।
अध्यात्म क्षेत्र में भी ऐसे ही प्रयोग होते रहते हैं। हर व्यक्ति जनरेटर नहीं बना सकता। कठोर साधनाएं लम्बे समय तक करते रहने पर ऋषि कल्प लोग ही प्रचुर परिमाण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय कर पाते हैं। पर उनके सम्पर्क में आने वाले उस प्रभाव से एक सीमित मात्रा में पात्रता के अनुरूप अनायास ही लाभ उठा लेते हैं।
सत्संग और कुसंग की परिणति की हर कहीं चर्चा होती रहती है। कुसंग में फेर में पड़कर मनुष्य अपना चरित्र, यश और भविष्य गंवा बैठते हैं। पर सत्संग का परिणाम वैसा ही होता है जैसे कि इत्र के कारखाने में काम करने वाले कर्मचारियों के कपड़े अनायास ही महकने लगते हैं। राजा के, पी.एम. के चपरासी तक की शान और इज्जत होती है।
प्रतिभावानों में इस प्राण ऊर्जा की अधिकता होती है। वह सम्पर्क में रहने वालों के व्यक्तित्व को अनायास ही प्रभावित करते रहते हैं। जिस मिट्टी के ढेले पर सुगंधित फूल टूटकर गिरते रहते हैं, वह ढेला भी सुगंधित हो जाता है। चंदन वृक्ष के निकट उगे हुए झाड़ झंखाड़ भी सुगंधित होने लगते हैं। कोयले की खदान में काम करने वाले मजदूरों के कपड़े और हाथ पाँव सभी काले हो जाते हैं।
आत्मिक ऊर्जा का उपार्जन तो होता ही है। उसे योगी तपस्वी करते भी हैं। परंतु इस कमाई का लाभ उनके निकटवर्ती लोगों को भी मिलता रहता है। आम के बगीचे की रखवाली करने वाले मजदूरों को भी वे चखने के लिए मिलते रहते हैं।
उपार्जन की तरह अनुग्रह का भी महत्त्व है। एक व्यक्ति धन कमाता है तो उसके कुटुम्बी, संबंधी, सेवक, मित्र भी किसी न किसी प्रकार उसका लाभ उठाते हैं। तपस्वी अपने विश्वस्तों को अपने उपार्जन से लाभान्वित करते रहते हैं।
रामकृष्ण परमहंस ने अपनी तप साधना विवेकानंद में भर दी थी। समर्थ और शिवाजी के बीच में ऐसा ही हस्तांतरण हुआ था। ऐसे और भी अनेकों प्रमाण हैं।
दैनिक जीवन में भी ऐसा ही होता है। पति-पत्नी के बीच घनिष्ठता हो तो बलिष्ठ पक्ष की क्षमता दुर्बल पक्ष की ओर दौड़ने लगती है और उसका प्रतिफल भी असाधारण रूप में देखने को मिलता है। लक्ष्मी बाई रानी ने छोटी ही आयु में अपने पराक्रमी पीत का सारा कौशल हस्तगत कर लिया था। पार्वती राजा हिमाचल की पुत्री थी पर वे शिव के साथ विवाहे जाने पर शक्ति रूप में परिणत हो गईं। कस्तूरबा गाँधी को भी अपने पति की विशिष्टता के कारण ही इतना मान गौरव मिला था। पार्वती को गणेश और कार्तिकेय जैसे देवपुत्र शिवजी के अनुग्रह से ही प्राप्त हुए। साधारण राजाओं की लड़कियां तो साधारण राजकुमारों को ही जन्म देती हैं।
अध्यात्म क्षेत्र में समर्थ गुरू अपने साधारण शिष्यों को अपने जैसा महान महत्त्वपूर्ण बना लेते हैं। लोमस ऋषि के पुत्र या शिष्य शृंगी ऋषि बचपन से ही अपने पिता के समतुल्य बन गये थे।
ऐसे प्रसंगों में आंतरिक घनिष्ठता ही प्रधान कारण होती है। वह गहरी और गम्भीर न हो तो बात नहीं बनती। उथली चापलूसी या दिखावटी सेवा पूजा इस क्षेत्र में काम नहीं आती। वास्तविकता और बनावट अनायास ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर देती है। बनावट असफल ही रहती है ‘बहरूपिये’ कई तरह के मुखौटे और सज्जा साधन धारण करके कुछ से कुछ बनते रहते हैं। पर उनकी असली हैसियत किसी से छिपी नहीं रहती। अध्यात्म एक ठोस यथार्थता है उसमें गुरू शिष्य या मित्र की घनिष्ठता भी तभी आदान प्रदान का द्वार खोलती है, जब वह वास्तविक हो।
यहाँ सत्संग और कुसंग को ही एक प्रभावशाली तथ्य मान लेना चाहिए। मरते समय तो मनुष्य के साथ पाप पुण्य ही जाता है पर अपने भौतिक उपार्जन को सम्पन्न लोग अपने कुटुंबियों और संबंधियों को भी दे जाते हैं। आध्यात्मिक उपार्जन का संस्कार पक्ष तो तपस्वियों के साथ ही चला जाता है पर वे अपना सिद्धियों वाला पक्ष उन्हें भी दे जाते हैं जो उनके शरीर तक की निकटता नहीं रखते वरन् श्रद्धा– सद्भावना के आधार पर अंतराल की गहराई तक प्रवेश करके अपना स्थान बना लेते हैं।
ऋषि बनने के लिए तो मनुष्य को अपना अंतरंग और बहिरंग जीवन तपोमय बनाना पड़ता है। चेतना को व्यामोह से छुड़ाकर परब्रह्म के साथ सहयोगी बनाना पड़ता है। स्वयं की साधना के बिना ऋषि तो नहीं बना जा सकता। पर उनके सान्निध्य से महानता का लाभ मिल सकता है। यदि ऐसी आकांक्षा व पवित्रता अंदर विद्यमान है। ऐसी सम्पदा वे अनुग्रह पूर्वक सुपात्रों को देते भी रहते हैं।
याज्ञवल्क्य ऋषि अवतारों की कथा कह रहे थे। जनक ने पूछा—देव, भगवान ने कश्यप का अवतार लिया और समुद्र की गहराई में ही छिपे रहे इसका क्या कारण है?
याज्ञवल्क्य ने कहा—यह भगवान ने लड़ने झगड़ने की अपेक्षा देवता और असुरों को रचनात्मक श्रम करने का परामर्श दिया। वे सहमत हो गये तो समुद्र मथन के असम्भव जैसा लगाने वाला काम करने लगे। भगवान ने श्रेय उन्हें दिया और सारा भार अपनी पीठ पर सम्भाला। साथ ही अदृश्य भी रहे। भगवान सभी सत्प्रयोजनों में यही भूमिका निभाते हैं।
‘विश्वामित्र कल्प’ में ब्रह्मदण्ड, ब्रह्मशाप, ब्रह्मास्त्र आदि ऐसे प्रसंगों का वर्णन है जिनके आधार पर किसी को दण्ड स्वरूप शाप देने के प्रारूप और विधान का वर्णन है। तपस्वियों की वाणी में इतनी विशिष्टता हो जाती है कि उनकी वाक् सिद्धि किसी को प्रसन्न होने पर वरदान भी दे सकती है और क्रुद्ध होने पर शाप भी। पर उसका कुछ कारण होना चाहिए। अकारण निर्दोषों को दिये हुये शाप प्रायः फलित भी नहीं होते। सिद्ध वाणी बादल की तरह अमृत भी बरसा सकती है।
परीक्षित ने समाधिस्थ लोमश ऋषि का तिरस्कार करने के लिए मरा हुआ सांप गले में डाल दिया। समाधि खुलने पर ऋषि लोमश को इस कुकृत्य पर क्षोभ हुआ और उनने शाप दिया कि यह मरा हुआ सांप जीवित हो उठे और जिस किसी ने यह कुकृत्य किया हो उसे एक सप्ताह के भीतर डस कर उसका प्राणान्त कर दे। यह शाप यथार्थ सिद्ध हुआ और तक्षक के काटने से एक सप्ताह के भीतर परीक्षित की मृत्यु हो गयी।
दशरथ ने तालाब से श्रवणकुमार को पानी का घड़ा भरते समय उसे हाथी जाना और उस पर तीर चला दिया। श्रवणकुमार को तीर लगा। उनके पिता ने शाप दिया कि मैं जिस प्रकार पुत्र शोक में तड़प कर मर रहा हूं, उसी प्रकार तुम्हारी भी मृत्यू पुत्र शोक में होगी। वैसा ही हुआ भी। दशरथ को पुत्र शोक में ही बिलख कर मरना पड़ा।
कृष्ण और राधा प्रेमालाप में इतने निमग्न थे कि वे आये हुये दुर्वासा पुरोहित की ओर ध्यान न दे सके। क्रुद्ध दुर्वासा ने शाप देकर राधा को तुलसी और कृष्ण को शालिग्राम के रूप में पेड़ और पाषाण बने रहने के लिए बाधित कर दिया था।
अहिल्या के साथ अश्लील व्यवहार करने पर गौतम ऋषि ने शाप दिया कि इन्द्र के शरीर में सहस्र छिद्र निकल पड़ें। और चन्द्रमा कभी एक रूप में स्थिर नहीं रहे। तदुपरान्त वे दोनों ही इसी स्थिति में रहकर दिन काटने लगे।
कालिदास ने मेघदूत में यक्ष विरह का वर्णन किया है। उन पति-पत्नी का वियोग भी ऋषि शापवश ही हुआ था।
रावण को, गुरु बृहस्पति ने शाप दिया था कि वह किसी महिला से दुराचार करने का प्रयास करेगा तो उसके शिर कटकर गिर पड़ेंगे। सीता का अपहरण तो वह कर लाया, पर बलात् उसी शाप के भय से उन्हें रानी बनने के लिए विवश न कर सका।
नहुष ने यज्ञ सम्पदा सम्पादित करके स्वर्ग तो प्राप्त कर लिया, पर वह पद पाते ही औचित्य को भूल बैठा और इन्द्राणी को अपनी पत्नी बनाने का प्रयास करने लगा। इन्द्राणी ने चाल चली कि ऋषियों को पालकी में जोतकर महल में आओ। वह मोहान्ध होकर वैसा ही करने को उतारू हो गया। ऋषियों ने पालकी पटक दी और उसे सर्प बनने का शाप दिया और वह सर्प हो गया। राजा नृग को भी इसी प्रकार गिरगिट की योनि मिली थी। अष्टावक्र जब माता के गर्भ में थे, तभी पिता के उच्चारण में रही व्याकरण सम्बन्धी उनकी गलतियां बताने लगे थे। पिता ने इसमें अपना अपमान समझा और शाप दिया कि जन्म होने पर तू आठ जगह से टूटा हुआ होगा। जब वे जन्मे तब आठ जगह से टूटे हुए थे।
बालि को शाप लगा हुआ था कि वह यदि चित्रकूट पर्वत पर जायगा तो मर जायगा। इसका सुग्रीव को स्मरण था। वह अपना प्राण बचाने के लिए उसी पर्वत पर निवास करता था। बालि उससे लड़ने कि लिए चित्रकूट पर नहीं जा पाता था।
अनुसूइया ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अबोध बालक बना दिया था। शिव के शाप से कामदेव भस्म हुआ था। सगर पुत्रों ने ऋषि पर अश्व चोरी का आरोप लगा दिया और उन्हें गंगा के पृथ्वी पर न आने तक नरक की अग्नि में जलते रहने का शाप दिया। दमयन्ती के शाप से व्याघ्र तत्काल भस्म हो गया था।
ऐसे अनेकों कथानकों का इतिहास-पुराणों में वर्णन है जिनके कारण अनेकों को तपस्वियों की प्रसन्नता का अभेद्य वरदान मिला और कितनों का सर्वनाश हो गया।
सत्यनारायण कथा में साधु वैश्य की नाव का धन घासपात हो गया था और उन्हें चोरी के लांछन में बन्दी रहना पड़ा था। यह वृद्ध ब्राह्मण का शाप ही था। तुंगध्वज राजा की ऐसी ही दुर्गति प्रसाद के परित्याग करने से शापवश ही हुई थी।
दुर्वासा का उपहास उड़ाने वाले एक लड़के को स्त्री बनना पड़ा। उद्दण्ड लड़के यह पूछने गये थे कि इसके पेट से लड़का होगा या लड़की। ऋषि ने पेट पर बंधे हुए उस लौह मूसल को देखा और शाप दिया कि इसी के बने शस्त्रों से तुम सब आपस में लड़-मर कर समाप्त हो जाओगे। वैसा ही हुआ भी। द्वारिका के समस्त यदुवंशी आपस में ही लड़-खपकर समाप्त हो गये।
इस प्रकार के कथानकों की कमी नहीं, जिनमें शाप और वरदान के फलस्वरूप अनेकों को वैभव मिला और अनेकों बर्बाद हो गये। इसीलिए वरदान को स्वाति वर्षा और शाप को शब्दबेधी बाण की उपमा दी गयी है। यह अपनी सामर्थ्य का भले या बुरे प्रयोजनों के लिए हस्तान्तरण ही है। यह किया जा सकता है। आद्य शंकराचार्य तो अपने शरीर में से प्राणों को निकाल कर एक राजा के शरीर में छह महीने अनुभव प्राप्त करते रहे थे, पीछे अपने शरीर में लौट आये थे। दक्ष के अपमान से क्रुद्ध शिवजी ने अपना एक बाल उखाड़ कर जमीन पर पटका। उससे भयंकर कृत्या उत्पन्न हुई और दक्ष का शिर काट डाला।
इतिहास पुराणों में ऐसी अनेकानेक घटनाओं का वर्णन है। यह आत्मशक्ति का भला-बुरा उपयोग करने पर उसके द्वारा हो सकने वाले परिणामों का दिग्दर्शन है। आत्म शक्ति एक प्रकार की प्राण ऊर्जा है। अग्नि से हित भी हो सकता है और अनर्थ भी। मकरध्वज जैसी रसायनें बनाने में चिकित्सक उसका सदुपयोग करते हैं और अग्निकाण्ड में उसका उपयोग होने पर उससे समूचा क्षेत्र जल कर भस्म हो सकता है। उपयोग किसने किस प्रकार का किया यह प्रश्न अलग है, पर इस मान्यता को स्वीकार करने में कोई अड़चन आने की गुंजाइश नहीं है कि तप साधना से शक्ति उत्पन्न होती है- विद्युत या अग्नि जैसी। उसके द्वारा अपना ही नहीं दूसरों का भी हित-अहित किया जा सकता है। शस्त्र सुरक्षा के काम भी आते हैं और आक्रमण के काम में भी।
तान्त्रिक क्रिया-कलापों में इस शक्ति को प्रायः दूसरों को आतंकित, भयभीत, संत्रस्त करने के काम में ही प्रयुक्त किया जाता है। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि के सभी विधान ऐसे हैं, जिनमें दुरात्माओं को आतंकित एवं प्रताड़ित करके उन्हें राह पर लाया जाता है। जिन पर सज्जनता का प्रभाव नहीं पड़ता, उन्हें दण्ड द्वारा सही राह पर लगाया जाता है। तपस्वियों के पास भी ब्रह्मदण्ड, ब्रह्मास्त्र जैसे साधन होते हैं। उन्हें असहाय नहीं मानना चाहिए।
तप के द्वारा वरदान प्राप्त करने का इतिहास भी ऐसा ही सुविस्तृत है। मनुष्य देवता बनते हैं। स्वर्ग में निवास करते हैं। भगवान के पार्षद बनकर, उनके सहचर बनकर हनुमान जैसा श्रेय प्राप्त करते हैं।
नारद के आशीर्वाद से बाल्मीकि, ध्रुव, प्रहलाद, पार्वती आदि को ऐसा ही श्रेय प्राप्त हुआ था, जो साधारण मनुष्यों जैसी जीवनचर्या अपनाने पर सम्भव नहीं था। असुरों में से भी कई ने कई तरह के वरदान पाये, पर दुरुपयोग होने पर उनके लिए हानिकारक ही सिद्ध हुए इसीलिए पात्रता का विधान अध्यात्म में अनिवार्यता बनाया गया है।
भगवान समुद्र की तरह एक है। देवताओं और नाम रूपों की भिन्नता मात्र उसमें उठने वाली तरंगों की तरह हैं।
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तिरस्कार का तिलमिलाने वाला तरीका है—उपेक्षा भरा मौन।
भारत में तैंतीस कोटि देवताओं की मान्यता है। जैन, बौद्ध, आदि के अलग-अलग देवता हैं। जनजातियों आदिवासियों में अपने-अपने कबीले और गाँव के अलग-अलग देवता हैं। मिश्र, रोम, जापान, चीन के देवताओं की प्रायः इतनी ही बड़ी संख्या है। इसके अतिरिक्त सतियों, पीरों, ऋषियों की मान्यता भी उसी गणना में सम्मिलित होती है। ग्राम देवताओं या कुल देवताओं क्षेत्र-देवताओं की संख्या इसके अतिरिक्त है।
इनमें से किन्हें माना पूजा जाये यह एक विचित्र समस्या है। विशेषतया जब एकेश्वरवादी एक ही ब्रह्म को ब्राह्मणों द्वारा अनेक प्रकार से कहा गया बताते हैं और वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार अपनी आत्मा ही अपने लिए परमेश्वर है।
इष्ट धारण देव-पूजन की आवश्यकता इसलिये पड़ती है कि विपत्तियों में अपनी सहायता करें और समृद्धियों सफलताओं को बढ़ावें। अपनी पीठ पर किसी समर्थ की छत्रछाया अपने ऊपर बनी रहे। देव पूजन उपरोक्त आधारों में से सर्वश्रेष्ठ यह है कि जब प्रतिमायें, मूर्तियाँ काल्पनिक ही हैं वास्तविक नहीं तो अपनी आत्म-सत्ता को ही अपने लिए एक स्वतन्त्र देव क्यों न मान लिया जाये। प्राचीन काल में जब विशाल भारत की आबादी तैंतीस कोटि थी, तब देवताओं की मान्यता भी तैंतीस कोटि ही थी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हर व्यक्ति की अपनी एक स्वतन्त्र मान्यता थी। जब सृष्टि के प्राणियों में से किसी का चेहरा किसी से नहीं मिलता और हर पत्ते की कतरन न्यारी है तो अपने लिये एक स्वतन्त्र देवता का अस्तित्व मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। वेदान्त दर्शन के अनुसार तो इस मान्यता का समर्थन ही होता है। जिसमें सोऽहम्, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म के रूप में परमेश्वर की विवेचना की गई है। अन्य सिद्धान्तों की तुलना में यह इसलिये भी अधिक उत्तम है कि इससे किसी दूसरे का पराधीन परावलम्बी नहीं होना पड़ता। अपने स्वाभिमान और स्वावलम्बन की सहज रक्षा हो जाती है। सूफी सन्तों ने भी इस मान्यता का समर्थन किया है। मंसूर जैसे सन्त प्राण संकट उत्पन्न होने पर भी इस सिद्धान्त को यथार्थ बताते रहे। उन्होंने शूली पर चढ़ते समय ‘अनल हक’ कहा।
धर्म शास्त्रों में अन्य मन्तव्यों की तरह आत्मा में परमात्मा के दर्शन करने की बात पर कम जोर नहीं दिया है। वेदांत, प्रतिपादन का समर्थन आधुनिक बुद्धिवाद और विस्तारवाद भी करता है।
जीव को ईश्वर का अंश भी माना जाता है। उदाहरण के रूप में लहरों पर चमकने वाले सूर्य को एक ही तत्व का प्रतिबिम्ब दीखने की बात कही जाती है। घटाकाश, मठाकाश का उदाहरण यही सिद्ध करता है। ब्रह्म की व्याख्या विवेचना भी तत्त्वदर्शियों ने इसी प्रकार की है।
उपासना की दृष्टि से आत्म दर्शन, या ईश्वर दर्शन का यह स्वरूप सर्वोत्तम प्रतीत होता है कि अपने भीतर के परब्रह्म परमात्मा की झाँकी की जाये। इसके लिये उपचार माध्यम यह है कि एक बड़ा या दर्पण सुसज्जित रूप में सामने रखा जाये। उसमें जो अपने शरीर की छवि दृष्टिगोचर होती है उसे दिव्य देवालय माना जाये और उसके भीतर निराकार भगवान की स्थापना अपनी प्रखर भावना के आधार पर की जाये।
मनुष्य में कई क्षुद्रतायें एवं त्रुटियाँ भी होती हैं। उन्हें उसी प्रकार माना जाये जैसा कि सूर्य, चन्द्र पर कभी-कभी ग्रहण लग जाता है। होली के हुड़दंग में भी कभी-कभी शरीर और कपड़ों पर कीचड़ या रंग पड़ जाते हैं उस समय वह कुरूप लगता है किन्तु जब साबुन लगाकर उस भद्दे रंग को साफ कर डाला जाता है तो वह पूर्ववत् अपने प्राकृतिक स्वरूप में आ जाता है। दोष-दुर्गुण आत्मा के स्वभाव में नहीं हैं। वह तो सत्, चित्, आनन्द स्वरूप हैं। मलीनतायें प्रकृति की विकृतियाँ हैं।
मल मूत्र त्यागते समय मनुष्य गन्दा गलीज लगता है। पर जब वह शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लेता है तो उसके चरण छूने, गले मिलने, गोदी में उठाने से किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। यही अवधारण अपने दोष-दुर्गुणों के सम्बन्ध में रखनी चाहिये। वे पश्चाताप, प्रायश्चित एवं रीति-नीति बदल देने पर शुद्ध किये जा सकते हैं। ऐसे तो मन्दिर की दीवारें भी ऋतु प्रभाव से मलीन हो जाती हैं। पुताई रंगाई के उपरान्त वे पहले की तरह फिर चमकने लगती हैं।
दर्पण में अपनी आकृति को देखते हुये समझना चाहिये कि यह ईंट चूने के द्वारा बनी हुई इमारत है। देवता इसके अन्दर बैठा है। वह निराकार है तो भी विश्व में, काया में भी सर्वत्र समाया हुआ है। उसे देखने के लिए अर्जुन जैसे दिव्य चक्षुओं को प्रकाशवान बनाना पड़ता है। दूध में मक्खन समाया होता है पर वह आँखों से नहीं विवेक से ही जाना जाता है, या मन्थन क्रिया द्वारा पृथक किया जाता है। यही बात पंचतत्व विनिर्मित काया के अन्तराल में समाहित परमात्मा के प्रतिनिधि आत्मा की झांकी करने के रूप में सही उतरती है।
काया में आत्मा की उपस्थिति का विश्वास जमाना दर्पण देखने की क्रिया का प्रथम चरण है। द्वितीय चरण में उसे सर्व समर्थ और स्वभावतः पवित्र होने की भावना का विकास करना होता है। “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है”, इस सत्य की पुष्टि इसी रूप में होती है कि अपनी आत्मा यदि उच्च दृष्टिकोण मान्यताओं और भावनाओं को अपना ले तो उसके गुण-कर्म-स्वभाव में तद्नुरूप परिवर्तन आरम्भ हो जाता है। उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श कर्त्तव्य और शालीन व्यवहार की रीति-नीति अभ्यास में उतर जाने के उपरान्त व्यक्तित्व निखरना और प्रतिभाओं, विभूतियों के चमकने में देर नहीं लगती। पवित्रता और प्रखरता का उदय होते ही व्यक्ति सामान्य से असामान्य स्थिति में पहुँच जाता है। उसे गई गुजरी में डाले रखने का अनाचार तो दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों का ही होता है। पर साथ ही यह बात भी है कि अनात्म तत्व से सम्बन्धित होने के कारण उन्हें धोया और हटाया जाता है।
पूजा वेदी के निकट जाते ही सर्वप्रथम स्वच्छता का काम हाथ में लेना पड़ता है। पुजारी मन्दिर में प्रवेश करने से पूर्व स्नान करता और धुले कपड़े पहनता है। फिर देवालय में प्रयुक्त होने वाले सभी उपकरणों की सफाई करता है। प्रतिभा के आवरण आच्छादनों को सुव्यवस्थित करता है। देवालयों में बुहारी लगाता है। पूजा पात्रों को माँज-धोकर चमकदार बनाता है। इसके पश्चात् पूजा-कृत्य आरम्भ होता है।
दर्पण में अपनी आकृति देख लेना भर ही पर्याप्त नहीं है। वरन् उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कराने जैसी भावना का समावेश करना चाहिये और यह विश्वास गहराई तक जमाना चाहिये कि इस पंच तत्वों से बने शरीर के अन्तराल में दिव्य, देव सत्ता विद्यमान है। उसकी सामर्थ्य में कोई कमी नहीं। अपनी सूझ-बूझ और प्रतिभा को निखारते हुये पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न करने से ही संसार के महामानवों ने अपने को श्रेष्ठ, वरिष्ठ एवं सफल बनाया है। हमें भी यही करना है। सर्वप्रथम इसके ऊपर छाये हुये कुसंस्कारों का परिमार्जन करना है। उन्हें बारीकी से देखना, परखना है। साथ ही उन्हें दूर हटाने का स्वच्छता अभियान हाथ में लेना है। जो दुर्गुण अब तक की आदतों में सम्मिलित रहे हैं, उन्हें गन्दगी मानकर हटाने का प्रबल प्रयास करना चाहिये। आरम्भ में यह उत्साह दर्पण देखते समय भावना क्षेत्र में उतरना होता है। संकल्प को सुदृढ़ करना होता है। पीछे तो वह परिमार्जन क्रिया जीवनचर्या का अंग बन जाती है और अपने ऊपर सुधार की पैनी दृष्टि रखने में निर्दोषता का अंश दिनों-दिन बढ़ता जाता है। भावना की प्रगाढ़ता के अनुरूप दुष्प्रवृत्तियाँ स्वयं ही घटने लगती हैं।
पूजा का तीसरा चरण है प्रतिमा की सुसज्जा। उसे भगवान का प्रतिनिधि मान लेने और स्वच्छता का उपक्रम पूरा कर लेना आवश्यक तो है पर पर्याप्त नहीं। इस कमी को पूरा करने के लिये पूजा उपचार की सामग्री का समर्पण करना, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, जल, अक्षत आदि यह सभी प्रतिमा की सुसज्जा के लिये मन्दिर का वातावरण सुवासित करने के लिये किये जाते हैं। इस स्थूल प्रक्रिया का सूक्ष्म स्वरूप दर्पण साधना के साधक को करना होता है। सद्गुण ही आत्मदेवता की सर्वोत्तम शोभा सज्जा है। संयम, सदाचार, साहस, पराक्रम पुरुषार्थ जैसी उच्च भावनाओं की दृढ़ता जैसे-जैसे अन्तराल में उपस्थित रहने लगती है, वैसे ही आत्मा का सौंदर्य कमल पुष्पवत् निखरने लगता है, भले ही वह शरीर की दृष्टि से काला, कुरूप, रुग्ण या जर्जर क्यों न हो?
बाहरी प्रकाश बाहरी क्षेत्र को प्रकाशवान करता है, और आन्तरिक प्रकाश अन्तःक्षेत्र को। आत्मा ऐसे तो निराकार है पर उसकी कल्पना अंगुष्ठ मात्र प्रकाश ज्योति में की गई है और उसका स्थान उपनिषद्कारों ने हृदय बताया है। अपने शरीर की लक्ष्य की दृष्टि से झाँकी करते हुये आत्म-ज्योति का दर्शन भाव नेत्रों से हृदय स्थान में करना चाहिये। उसका प्रकाश अन्तराल की सभी दिव्य विभूतियों, सूक्ष्म शक्तियों को ज्योतिर्मय करता है। वे सब भी प्रकाशित हो उठती हैं और अन्तराल देवत्व की विशेषताओं से जगमग करने लगता है।
इतनी सी साधना आरम्भ में दस मिनट में की जा सकती है और फिर उसे क्रमशः आधे घन्टे तक बढ़ाया जा सकता है। मन की चंचलता को देखते हुए ध्यान प्रक्रिया एवं भाव साधना को आरम्भ में थोड़े में करके पीछे उसे क्रमशः बढ़ाने की परम्परा है। वही विषय इस प्रसंग में भी निर्वाह होना चाहिए।
यह दर्पण हर काम में न लाया जाये। मात्र पूजा के लिये ही प्रयुक्त किया जाये। उस पर कपड़े का पर्दा पड़ा रहने दिया जाये। उसे तभी उलटा जाना चाहिए, जब साधना करनी हो। प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। पर जिन्हें कोई अन्य समय उपयुक्त जंचता हो वे उसका अपना नियम बना सकते हैं।
स्वतन्त्रता संग्राम में जूझते हुए राणा प्रताप वन पर्वतों में अपने छोटे परिवार सहित मारे-मारे फिर रहे थे। एक दिन ऐसा अवसर आया कि खाने के लिए कुछ भी नहीं था। अनाज को पीसकर उनकी धर्मपत्नी ने जो रोटी बनायी थी उसे भी वन-बिलाव उठा ले गया। छोटी बच्ची भूख से व्याकुल होकर रोने लगी।
राणा प्रताप का साहस टूटने लगा। वे इस प्रकार बच्चों को भूख से तड़पकर मरते देखकर विचलित होने लगे। एक बार मन में आया शत्रु से सन्धि कर ली जाये और आराम की जिन्दगी जिया जाये। उनकी मुख मुद्रा गम्भीर विचारधारा में डूबी हुई दिखाई दे रही थी।
रानी को अपने पतिदेव की चिन्ता समझने में देर न लगी। वे स्नेह पूर्वक बोली- नाथ! किस चिन्ता में पड़ गये? बच्ची भूखों मर थोड़े ही जायेगी। मर भी जाये तो राष्ट्र पर जहाँ बड़ों-बड़ों का बलिदान हो रहा है, एक बालिका और सही। हम अपने परिवार को अनीति के विरुद्ध संघर्ष के लिए एक आदर्श इकाई के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें देखकर ही समाज में कष्टों से जूझकर आगे बढ़ने का उत्साह उभरेगा। इस साधना में बच्चे भी तो सहयोगी बनेंगे।
महाराणा को अपना संकल्प याद आ गया। राष्ट्र निर्माण की अपनी इकाई को आदर्श निष्ठा बनाये रखकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ गये।
हमें प्रकृति से बहुत कुछ सीखना है। सिखाने के लिए हर क्षेत्र में अध्यापक मौजूद हैं। दत्तात्रेय को जब सामान्य गुरुओं से समाधान नहीं हुआ तो उन्होंने प्रजापति के परामर्शानुसार प्रकृति एवं प्राणियों का पर्यवेक्षण किया और उनसे उन्हें सन्तोषजनक गुरु ज्ञान मिल गया। मकड़ी जैसे क्षुद्र प्राणी से उनने यह सीखा कि जाला बुनना और उसे समेट लेना पूरी तरह अपने बस की बात है। चींटी से उनने सीखा कि जब उस राई से भी छोटे जानवर को अनवरत श्रम किये बिना चैन नहीं तो मनुष्य जैसे बुद्धिमान को ही आलस्य प्रमाद में घिर कर क्यों अपना भविष्य अन्धकार मय बनाना चाहिए। हम भी यदि ऐसी ही दृष्टि रखें तो बड़े विद्वानों और बड़े शास्त्रों की तुलना में ही बहुत कुछ सीख सकते हैं।
पुरातन काल में महागज, महा सरीसृप और महागरुण जैसे समर्थ प्राणी थे, पर उनके मस्तिष्क बहुत छोटे थे। बुद्धिमत्ता का अभाव था इसलिए परिस्थितियों के साथ तालमेल न बिठा सके और इस धरती पर से सदा के लिए समाप्त हो गये। इसके विपरीत दक्षिण ध्रुव पर पाया जाने वाला पक्षी पेन्गुइन पंख होते हुए भी उड़ नहीं सकता। वहाँ जीवन निर्वाह की व्यवस्था बना ली है। वहीं वह पानी में डुबकी लगाकर खुराक प्राप्त कर लेता है गृहस्थ सम्बन्धी ऐसी व्यवस्था बना लेता है जिसे देखकर कठिनाइयों के साथ तालमेल बिठाने की उसकी दक्षता पर आश्चर्य होता है।
जिराफ ऊँट से भी ऊँचा होता है। पत्तियों पर अपना गुजारा करता है। बढ़ाते-बढ़ाते उसने अपनी जीभ को इतना बढ़ा लिया है कि वह डेढ़ फुट तक मुँह से बाहर निकाल सकता है और पेड़ की सबसे ऊँची कोपलों को भी हस्तगत कर सकता है।
मनुष्य की जीभ स्वाद तो चखती है, पर चखती तभी है जब वह घुलनशील हो। लोहे जैसी कड़ी वस्तु का वह स्वाद नहीं चख सकती। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अपनी इच्छा या योग्यता ही सब कुछ नहीं है। साधन भी वैसे होने चाहिए जिनके सहारे अपनी प्रतिभा काम दे सके।
ओइस्टर प्राणी अपने आप में पूर्ण है। वह कभी नगर बन जाता है कभी मादा। जब उसकी इच्छा प्रजनन की होती है तो अपने अंगों को मादा जैसा बना लेता है, किन्तु जब उसे नर स्तर का उत्साह उठता है तो बिना किसी का अनुग्रह पाये अपने आप को ही नर बना लेता है। हम भी अपने स्तर को घटिया या बढ़िया बनाने में स्वतन्त्र हैं।
ह्वेल मछली सिर्फ सामने देखती है उसे अगल-बगल का दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए वह तनिक-सी आवश्यकता के लिए समूचा शरीर घुमाने का कष्ट उठाती है। अदूरदर्शी भी इसी प्रकार हैरान होते हैं।
मधुमक्खियाँ 500 ग्राम शहद इकट्ठा करने के लिए प्रायः दो लाख फूलों से संपर्क साधती हैं। हमें महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत करने के लिए अधिक से अधिक लोगों के साथ जन संपर्क साधना चाहिए।
चारों ओर से घिर जाने पर एक पच्चीस किलो भारी जल जन्तु गेंद के बराबर छेद में से अपने को लचीला बनाकर निकल जाता है। हमें भी अकड़बाज नहीं लचीला विनम्र होना चाहिए।
जो परमेश्वर को आनन्द देने वाले काम करता है उसे वह सहज ही मिल जाता है।
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भगवान कठिनाइयों का भला करे, जिनके कारण समझदारी बढ़ती है और अपने पराये की परख होती है।
कोई मूर्ति- मूर्तिकार नहीं बन सकती। कोई चित्र- चित्रकार नहीं बन सकता। कोई पुत्र- पिता का स्थानापन्न नहीं कहलाता। पर मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि वह यदि सीधे मार्ग पर चले तो ईश्वर भक्त ही नहीं वह साक्षात् ईश्वर भी बन सकता है। अपने दर्पण में समस्त सृष्टि का दर्शन कर सकता है और अपनी आत्मा में सबको प्रतिष्ठित करके उसके साथ क्रीड़ा-कल्लोल कर सकता है। मनुष्य की सम्भावनाएँ असीम हैं। जितना असीम परमात्मा है उतना ही महान उसका पुत्र- आत्मा भी है।
हमारे शरीर की व्यवस्था ऐसी ही है जिसके अमूल्य रत्न संग्रहित तो हैं पर एक अच्छे सहयोग के लिये, त्याग और उदारतापूर्वक औरों की सुविधायें बढ़ाने के लिये हैं। 1. हर हड्डी के पोले भाग में, 2. प्लीहा (स्प्लीन) 3. यकृत (लिवर) में रक्त की मात्रा संग्रहित रहती है। कभी चोट या घाव हो जाने पर यह संस्थान अविलम्ब रक्त पहुँचा कर उस स्थान को ठीक रखने और कमजोर न होने देने का प्रयत्न करते हैं। सामूहिकता की इसी भावना पर समाज की सुख-शान्ति अवलम्बित है।
रक्त ही नहीं शरीर में चर्बी का भी स्टोर रहता है। चमड़ी और माँस के बीच चर्बी सुरक्षित रहती है। कई दिन तक भोजन न मिले तो भी सब अंग काम करते रहते हैं। चमड़ी पीली पड़ जाती है तो भी किसी की मृत्यु नहीं होने दी जाती।
‘नेमोनेक्टामी’ के अनुसार यदि एक फेफड़ा काटकर निकाल देना पड़े तो दूसरा फेफड़ा साधारण स्थिति के सारे काम संभाल लेता है। यह सहयोग और सहानुभूति क्रियायें बताती हैं कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें आये दिन दुर्घटनायें घटती हैं उनसे कुछ लोग पीड़ित होते हैं। उनके प्रति भी हमारे कर्त्तव्य वैसे ही हैं जैसे स्वयं अपने प्रति। मनुष्य इतना कठोर हृदय हो सकता है कि अपने भाई, अपने पड़ौसी को कष्ट और पीड़ित अवस्था में देखकर भी चुप रह जाये पर हमारे शरीर के सदस्य ऐसे हृदयहीन नहीं। परस्पर सहयोग और दूसरे के दुःख में हाथ बटाना ही उनका जीवन है। उदाहरणार्थ यदि एक गुर्दा खराब हो जाये जैसा कि पथरी की बीमारी के समय होता है, तो अच्छा गुर्दा दूसरे पीड़ित गुर्दे का सारा कार्यभार स्वयं संभाल लेता है। जब तक वह ठीक न हो जाये स्वयं कष्ट सहेगा किन्तु शरीर की साधारण क्रिया में कोई अन्तर न आने देगा।
ऑपरेशनों के दरम्यान कितने ही लोगों का एक फेफड़ा, एक गुर्दा, जिगर का एक भाग, आँतों का बड़ा भाग आदि काट कर अलग कर दिये जाते हैं, पर जो शेष बचा रहता है उतने से ही शरीर अपना काम चलाता रहता है और जीवित रहता है।
प्रो. एलेक्जोदर स्मिर्नोव ने कहा है कि- यह कोई अलौकिक बात नहीं है, वरन् सामान्य विज्ञान सम्मत सिद्धान्तों का ही एक दिलचस्प प्रतिपादन है। एक अंग की चेतना दूसरे अंगों में भी काम कर सकती है।
त्वचा का महत्व यदि समझा जाये तो वह अति महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध होगी। अन्य समस्त इन्द्रियों का तो वह कार्य कर सकने में समर्थ है ही, साथ ही अन्तःचेतना को विकसित एवं परिवर्तित करने में उसका और भी ऊँचा उपयोग है। साधना विज्ञान में त्वचा साधना को ‘स्पर्शा स्पर्श’ कहते हैं, इसका क्षेत्र अति व्यापक, विस्तृत और प्रभावोत्पादक माना गया है।
सारे शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े के बीच की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं, जबकि मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 8 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर हृदय भी 5 मिनट जी लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही बुझ जाता है। हृदय फेल होने की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना ही होता है। औसत दर्जे के मनुष्य शरीर में पाँच से छह लीटर तक खून रहता है। इसमें से 5 लीटर तो निरन्तर गतिशील रहता है और एक लीटर आपत्तिकालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घण्टे में हृदय को 13 हजार लीटर खून का आयात-निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका समेटा जाता है जिसे यदि एक साथ इकट्ठा कर लिया जाये तो उसे 400 फुट घेरे की 80 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा। इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी कि दस टन भार जमीन से 50 हजार फुट तक उठा ले जाने में लगानी पड़ेगी। शरीर में जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह के कारण उत्पन्न होने वाली ऊष्मा ही है। त्वचा में प्रवाहित रक्त ही इस ऊष्मा को यथावत् बनाये रखता है।
गुर्दों को देखें। वे और भी विलक्षण हैं। गुर्दे एक प्रकार की छलनी हैं। उसमें दस लाख से भी अधिक नलिकाएं होती हैं। इन सबको लम्बी कतार में रखा जाय तो वे 250 किलोमीटर लम्बी डोरी बन जायगी। एक घण्टे में गुर्दे रक्त छानते हैं जिसका वजन शरीर के भार से दूना होता है। विटामिन अमीनो, अम्ल,हारमोन, शकर जैसे उपयोगी तत्व रक्त को वापस कर दिये जाते हैं। नमक ही सबसे ज्यादा अनावश्यक मात्रा में होता है। यदि यह रुकना शुरू कर दे तो सारे शरीर पर सूजन चढ़ने लगेगी। गुर्दे ही हैं जो इन अनावश्यक को निरन्तर बाहर फेंकने में लगे रहते हैं।
प्रिज़्म या थ्रीडायमेन्शनल कैमरे अद्भुत माने जाते हैं। पर वे भी रंगों का वर्गीकरण उस तरह नहीं कर सकते जैसा कि आँखें करती हैं।सुरक्षा सफाई का प्रबन्ध जैसा आँखों में है वैसा किसी कैमरे में नहीं। पहले उलटा फोटो लेते हैं, फिर दुबारा प्रिन्ट करके उन्हें सीधा करना पड़ता है, किन्तु आंखें सीधा एक ही बार में सही फोटो उतार लेती हैं।
यों तो कर्त्ता की कारीगरी का परिचय रोम-रोम और कण-कण में दृष्टिगोचर होता है, पर आँख, कान जैसे अवयवों पर हुई कारीगरी तो अपनी विलक्षण संरचना से बुद्धि को चकित ही कर देती है। आँख जैसा कैमरा मनुष्य द्वारा क्या कभी बन सकेगा। इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कैमरों में नाभ्यान्तर- फोकल लेन्स को बदला जा सके ऐसे कैमरे कहीं-कहीं ही बने हैं। पर वे हैं एक सीमित परिधि के। फोटो लेने के लिए अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्यान्तर पर फिट करने होते हैं। फिल्मों तक में फोटो दृश्य और कैमरे की दूरी का सन्तुलन मिलाकर फोकस सही करना पड़ता है। इस व्यवस्था को बनाये बिना अभीष्ट फोटो खिंच ही नहीं सकेगा। किन्तु नेत्र संरचना में ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता। वे निकट से निकट और दूर से दूर को भी आँखों को बिना आगे-पीछे हटाये- मजे में देखते रह सकते हैं। प्रिज़्म या थ्रीडायमेन्शनल कैमरे अद्भुत माने जाते हैं, पर वे भी रंगों का वर्गीकरण उस तरह नहीं कर सकते जैसा कि आँखें या हमारा विजुअल कार्टेक्स करता है। फोटो खींचने का ‘प्रबन्ध’ जैसा आँखों में है। वैसा किसी कैमरे में नहीं होता। कैमरे पहले उलटा फोटो लेते हैं, फिर दुबारा प्रिन्ट करके उन्हें सीधा करना पड़ता है, किन्तु आँखें सीधा एक ही बार में सही फोटो उतार लेती हैं।
रोगों के कीटाणु हवा, पानी, आहार, छूत या चोट आदि के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। हमारा छोटा-सा शरीर वस्तुतः बहुत बड़ा है। एक पूरी पृथ्वी के बराबर जीवधारी उसमें रहते हैं। इसलिए उसके व्यवस्था कर्मचारियों की संख्या भी लगभग उसी अनुपात में रहती है। इन 2500 करोड़ लाल रक्त कणों को यदि एक सीधी पंक्ति में बिठा दिया जाये तो वह इतनी बड़ी होगी कि सारी पृथ्वी को चार बार लपेटे में लिया जा सके।
वस्तुतः मानव एक विलक्षण संरचना है। उसका ऐसा होना ही आस्तिकता के समर्थन हेतु एक महत्वपूर्ण तर्क है। उसे देखकर लगता है कि सृष्टा ने मनुष्य को उद्देश्य से किसी महान प्रयोजन हेतु बनाया है मजाक में नहीं।
व्यक्ति के सामान्य जीवन में ज्ञानेन्द्रियों के एक मामूली भाग के सदुपयोग से ही जीवन के सारे क्रिया कलाप चल रहे हैं। जबकि उनकी क्षमतायें अनन्त हैं। “रीडर डाइजेस्ट” में आपके मस्तिष्क की सीमा क्या है?” (ह्वाट इज दी लिमिट ऑफ यौर माइन्ड) शीर्षक से आर्डिस भिटमैन ने एक लेख छापा था। उसमें उन्होंने लिखा है कि सारे संसार में जितनी भी विद्युत और विद्युत उपकरणों की सामर्थ्य है, उसे पूरी तरह इकट्ठा करके तराजू के एक पलड़े में रख दिया जाये और दूसरी तरफ मस्तिष्क का 3 पिन्ट ग्रे मैटर (मस्तिष्क का भीतरी भाग) रखकर तौला जाये तो ग्रे मैटर की शक्ति कहीं अधिक होगी।
जिस व्यक्ति में जितनी अधिक मात्रा में संकल्प शक्ति तेजस्वी, उत्साही, आत्म-विश्वासी और आशावादी मनोवृत्तियाँ होंगी उतना ही वह अपनी ज्ञानेन्द्रियों को विकसित करने में सक्षम होगा। इस विषय में अब तक जो भी प्रमाण और उदाहरण प्राप्त हुए हैं उनसे यही निष्कर्ष निकला है कि कोई भी सामान्य स्तर का व्यक्ति अपने संकल्प बल, उपयुक्त प्रेरणा, प्रोत्साहन, अनुभव और प्रशिक्षण से महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ करतलगत कर सकता है।
सूडान प्रदेश में मवाना जाति को अत्यधिक शान्तिप्रिय कहा जाता है, जो कि जंगलों- वन-बीहड़ों और सुरम्य पर्वतीय- खोह- कोटरों में निवास करती है। इस जाति के लोगों ने अपनी कर्मेन्द्रियों को इतना अधिक विकसित कर लिया है कि उनकी दूर श्रवण की क्षमता वैज्ञानिकों तक के लिए चुनौती का विषय बन चुकी है। वे मीलों दूर से उठने वाली ‘धीमी-मन्द’ आवाज को भी भली प्रकार सुन समझ लेते हैं।
वर्तमान युग में दूर की आवाज सुनना कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं रह गई है। आज विज्ञान के युग में राडार एक ऐसा विलक्षण यन्त्र है जो सैकड़ों मील दूर से आ रही आवाज ही नहीं, वस्तु की तस्वीर का भी पता बता देता है। किन्तु आज से शताब्दियों पहले जबकि आधुनिक विज्ञान का जन्म भी नहीं हुआ था, हमारे भारतीय अध्यात्म विद्या के गुरु जब अपने शिष्यों को कोई निर्देश विशेष देना चाहते थे, तब उसके लिए आज की तरह टेलीफोन, आदि नहीं प्रयुक्त करते थे, प्रयुक्त टेलीपैथी के माध्यम से अपने विचार सम्प्रेषित करते थे। यद्यपि टेलीपैथी (दूरबोध, विचार सम्प्रेषण) की रिपोर्टें अभी भी समय-समय पर मिलती रहती हैं, किन्तु निश्चित वैज्ञानिक सम्मत प्रमाण न मिलने के पूर्वाग्रह पर अड़े होने के कारण यह बात वैज्ञानिकों के गले नहीं उतरती।
“टेलीपैथी’ विषय हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए अत्यधिक रहस्यपूर्ण विषय रहा है। मध्यकालीन इतिहास का अवलोकन करने से पता चलता है कि पहले-पहल टेलीपैथी के अस्तित्व को जानने के लिए छटवीं शताब्दी में लीडिया के राजा क्रौयसिस ने एक प्रणाली अपनायी थी। उसने अपने राजदूतों को राज्य के प्रसिद्ध भविष्य वक्ताओं के पास यह जानने के लिए भेजा कि “अमुक दिन अमुक समय पर राजा क्या कर रहा होगा?” इस संदर्भ में जब राज कर्मचारी अपने समय के प्रसिद्ध दिव्यदर्शी डैल्फी के पास पहुँचे और राजा का सन्देश सुनाया। भविष्य वक्ता डैल्फी ने थोड़ी देर के लिए गम्भीर होते हुए बताया कि इस समय राजा स्वयं एकाकी बिना किसी की मदद लिये तांबे की कड़ाही में भोजन पका रहा है।
इसी प्रकार की एक दूसरी प्रणाली रोम सम्राट ट्रैजन ने अपनायी थी। उन्होंने कुछ औषधियों की टेबलेटों को कई तहों के भीतर कपड़े में लपेटकर उस समय के प्रसिद्ध दिव्यदर्शी बैलवेक के पास पूछने के लिए राजदूतों के हाथ सूचना भिजवायी कि इस पैक के अन्दर रखी गई टेबलेटों पर क्या अंकित है। भविष्य वक्ता ने उस सील बन्द पैकेट को अपने हाथ में लेकर गम्भीर मुद्रा में एक कागज पर लिखा कि इस पैकेट के अन्दर “पपीरस” नामक औषधि है। जब लिखित कागज राजा के सामने प्रस्तुत किया गया तो दिव्यदर्शी विद्वान का कथन सत्य सिद्ध हुआ।
“टेलीपैथी” के गहन अध्ययन के लिए सर्वप्रथम इंग्लैण्ड के प्रमुख दण्डाधिकारी मैलकॉम गुथरे और ‘लिवरपूल लिटरेरी एण्ड फिलोसोफीकल सोसाइटी’ के ऑनरेरी सेक्रेटरी श्री जेम्स विरचॉल ने एक सुनियोजित रूप से “सोसाइटी फोर साइकिकल रिसर्च” नामक संस्था की स्थापना की। जिसके अंतर्गत अनेकों विद्वान वैज्ञानिक शोध-सर्वेक्षण को आमन्त्रित किए गए। विधिवत् रूप से वैज्ञानिकों की टीम, बैठकों-सत्रों में टेलीपैथी में विश्वास रखने वालों, लोगों से साक्षात्कार करती व उनके अनुभवों का अध्ययन करती। इसमें तत्कालीन समय के प्रख्यात टेलीपैथी के विशेषज्ञ औलीवर लॉज की टेलीपैथी क्षमता का अध्ययन करने के लिए आमन्त्रित किया गया था। सर्वप्रथम वैज्ञानिकों ने लकड़ी के ब्लैक बोर्ड पर कुछ अत्यधिक पेचीदी डिजाइनें बनायीं और श्याम पट को उलटकर रख दिया। तत्पश्चात् पुनः वैसी ही डिजाइनें बनाने के लिए निर्देश दिया। उपस्थित वैज्ञानिकों व अन्य शोध सर्वेक्षण कार्यों का समुदाय यह देखकर अत्यधिक हतप्रभ हो रह गया कि उसने हूबहू ठीक वैसी ही सभी जटिल डिजाइनें कुछ ही क्षणों में बनाकर प्रस्तुत कर दीं।
आगे चलकर प्रो. जे. बी. राइन और उनके सहयोगी शोध कर्मियों ने लन्दन की प्रसिद्ध ‘ड्यूक यूनीवर्सिटी’ में अनेकों प्रयोग-परीक्षण के अनन्तर यह निष्कर्ष निकाला कि अब तक हम लोगों ने जो भी टेलीपैथी विषय पर विचार संप्रेषण प्रक्रिया की जाँच की है वह सभी अतीन्द्रिय क्षमताओं के अंतर्गत है। यहाँ तक वैज्ञानिक उपकरणों की पहुँच अभी सम्भव नहीं हो पायी है।
रूस के प्रसिद्ध भौतिकविद् एडवार्ड नौमॉव ने अपने हजारों अध्ययनों के पश्चात् यह प्रतिवेदन प्रस्तुत किया कि टैलीपैथिक प्रक्रिया दो घनिष्ठ आत्माओं के बीच स्नेह और सुरक्षा से सम्बन्धित अधिक पायी जाती है। अपने इस कथन का विवेचन करने से पहले उन्होंने इसका परीक्षण मास्को के एक शिशु ग्रह में किया था। नीमॉव ने नवजात शिशु और माँ को काफी दूर-दूर अलग-अलग ऐसे कमरों में रखा, जहाँ कि एक दूसरे की आवाज तक सुनाई न दे। जब बालक ने रोना चिल्लाना शुरू किया, तो दूसरे कमरे में बिस्तर पर शान्तिपूर्वक लेटी हुई माँ यकायक व्यग्र और घबराहट सी महसूस करने लगी। इसी प्रकार जब शारीरिक दर्द से व्यथित होकर माँ कराहने लगी, तो उधर दूसरे कमरे में स्थित सोया हुआ बच्चा ठीक उसी समय यकायक रोने-चिल्लाने लगा। अपने इस प्रयोग परीक्षण से नौमॉव ने बताया कि- माँ और बच्चे में टैलीपैथिक प्रक्रिया अत्यधिक होती है।
“सुपर नेचर” नामक पुस्तक के लेखक लायैल वैस्टन ने एक अति महत्वपूर्ण तथ्य का विवेचन अपनी इस पुस्तक में किया है कि कोशिकीय स्तर पर पौधों में टैलीपैथिक प्रक्रिया अत्यधिक क्रियाशील रहती है। इस पर अब तक अनेकों प्रयोग हो चुके हैं व लाइडिटेक्टर का प्रयोग भी पौधों पर किया जा चुका है।
दूरस्थ टैलीपैथिक विचार सम्प्रेषण विषय पर न्यूयार्क कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के प्रधान डॉ. डॉगलस डीन ने गहन प्रयोग परीक्षण किये एवं अपने शोध परीक्षणों का निष्कर्ष देते हुए बताया कि यदि कोई व्यक्ति सैकड़ों मील दूरस्थ किसी घनिष्ठ मित्र, सम्बन्धी के बारे में तन्मयता पूर्वक, एकाग्र चित्त होकर विचार (ध्यान) करता है, तो उस सैकड़ों मील दूर स्थित व्यक्ति का ब्लड-प्रेशर चिन्तन, रक्त प्रवाह, हृदय की धड़कन, श्वास गति आदि में यकायक परिवर्तन पाया जाता है। ये सभी निष्कर्ष बताते हैं कि देर सबेर विज्ञान जगत को टेलीपैथी को एक विधा के रूप में स्वीकार करना ही होगा। “मेण्टल वार”, ”मेण्टल पावर” नामक ग्रन्थों के रचयिता वैज्ञानिक एल्विन टॉफलर का कहना है कि रूस ने अतीन्द्रिय क्षमता के द्वारा वैचारिक युद्ध में महारत हासिल कर ली है। वहाँ अतीन्द्रिय सामर्थ्य के इस पक्ष को विकसित कर शत्रु पक्ष के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के चिन्तन को प्रभावित करने के सफल प्रयोग किए गये हैं। अच्छा हो इस दैवी विभूति का सुनियोजन श्रेष्ठ कार्यों हेतु, सद्भावना विस्तार हेतु, वैचारिक प्रदूषण निवारण एवं समष्टिगत कल्याण हेतु प्रयुक्त हो न कि व्यक्तिगत स्वार्थ या किसी के अहित के लिए।
मिस्र के पिरामिडों का रहस्य अभी भी वैसा ही अविज्ञात बना हुआ है जैसा पहले कभी था। फराऊ-शासकों की यह कला कृत्य वास्तु कला विशेषज्ञों के लिए इसलिए रहस्यमय है कि उस क्षेत्र में दूर-दूर तक उस स्तर के पत्थर नहीं हैं जैसे कि उसमें प्रयुक्त हुए हैं। फिर व इतने भारी हैं कि उन्हें उतनी ऊंचाई तक उठा ले जाना और फिटिंग में कहीं रत्ती भर भी अन्तर दृष्टि-गोचर न होना मानवी श्रेय के लिए आज तो नितान्त असम्भव ही लगता है। इसके लिए उठाने वाली और रेतने वाली आधुनिकतम मशीनें ही कदाचित् सफल हो सकें जिनके उस जमाने में उपलब्ध होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। फिर वे इतने रहस्यमय ढंग से विचित्र आकृतियों में बनाये गये? जबकि संसार में उससे भी सुन्दर इमारतें रही हैं। उनकी अनुकृति की जाती तो और भी सरल सस्ते और सुन्दर बन सकते थे। पर ऐसा क्यों नहीं सोचा गया, क्यों नहीं किया गया? यह काफी समय तक एक रहस्य बना रहा।
मिस्र पर जब नैपोलियन ने चढ़ाई की और उसे जीता तो प्रचलित किंवदंतियों के संदर्भ में उसने इन पिरामिडों की नये सिरे से खोज की। उनने उन्हें ज्योतिर्विज्ञान की शोध दृष्टि के आधार पर बना पाया। मध्याह्न रेखा और ध्रुव वृत्त का सही स्थान ढूँढ़कर ही वह स्थान चुना गया जहाँ यह पिरामिड बने हैं। उनमें जहाँ-जहाँ ऐसे छिद्र भी हैं जो ब्रह्मांड की झाँकी कराते हैं और ग्रह नक्षत्रों की स्थिति में जो चल अन्तर पड़ा है उसका विवरण बताते हैं।
अंग्रेजों का शासन जब उस क्षेत्र पर हुआ तो उन्होंने कब्रों के साथ दबी हुई बहुमूल्य सम्पदा खोज निकालने और पुरातत्व विज्ञान से सम्बन्धित तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से भीतरी भागों की खोजबीन की पर शोधकर्ताओं की आश्चर्यजनक ढंग से ऐसी मृत्युएं होती रहीं जिनका कोई प्रत्यक्ष कारण समझा नहीं जा सका। उन दुर्घटनाओं को इस खोद कुरेद का अभिशाप माना जाता है तो भी वह क्रम साहसी लोगों ने आगे भी चलाया किन्तु अविज्ञात रहस्य या बात का बतंगड़ बनाकर उन लोगों ने भी विराम लिया।
कहा जाता रहा है कि पुरातन काल के फराऊ राजाओं की आत्माएं अभी भी पिरामिडों के अन्तराल में विद्यमान हैं और जब तब अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं। इसकी परख करने के लिए जो लोग किसी प्रकार उनमें घुस गये और रात्रि के दृश्य देखने के लिए रुक गये, उनमें से अधिकाँश मर गये या पागल बन कर लौटे। अभी भी उन विश्व के सात आश्चर्यों में से एक माने जाने वाले इन पिरामिडों को देखने कई व्यक्ति जाते हैं और फोटो खींचकर या इधर-उधर चक्कर लगाकर खाली लौट आते हैं। उस क्षेत्र में रहने वाले रक्षकों या दुकानदारों के मुंह चित्र-विचित्र किम्वदंतियां सुनने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। जिन भूतों के साथ छेड़खानी करने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती और उपयोगिता भी नहीं जान पड़ती।
इंग्लैण्ड के विश्व विख्यात आत्मिकी एवं पुरातत्वविद् कथा लेखक पाल ब्रन्टन ने इस संदर्भ में एक अनोखा साहस किया और वे जान हथेली पर रखकर किसी प्रकार गहराई में बनी कब्रों में रात बिताने के लिए उद्यत हो गये। साथ में चलने के लिए उनने एक मिस्री व्यक्ति से अनुरोध भी किया और लालच भी दिया किन्तु उसने अपनी जान गंवाने से स्पष्ट इनकार कर दिया और साथ ही उन्हें भी सलाह दी कि वे ऐसा कदम न उठायें जिससे अकारण ही जान गंवानी पड़े।
ब्रन्टन रहस्यों का पता लगाने में भी मानवी ज्ञान में एक कड़ी जोड़ने के काम को कम महत्वपूर्ण नहीं मानते थे। इसलिए वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहे और चौकीदारों से आँख बचाकर उस कक्ष में जा घुसे जिसमें सम्राट तूतन खामन की कब्र बनी हुई है और उसके भीतर बहुत सा लबाजमा भी गढ़ा हुआ है।
पाल ब्रन्टन इससे पूर्व रहस्यमयी विद्याओं की खोज करने के संदर्भ में भारत की यात्रा भी कर चुके थे। हिमालय की कन्दराओं तथा रहस्यमय योगियों से उनने भेटें भी की थीं। यहाँ आने पर उनकी जिज्ञासा घटी नहीं, बढ़ी ही थी। उनने प्रत्यक्ष देखा था कि अतीन्द्रिय क्षमताएं बहुतों में अनायास ही होती हैं और बहुत से उन्हें अपनी तप साधना के सहारे जागृत कर सकते हैं। यह बढ़ी हुई जिज्ञासा ही पिरामिडों में निवास करने वाली दिव्य आत्माओं के सम्बन्ध में अधिक, और अधिक जानने के लिए, मिस्र घसीट ले गई थी और वे पिरामिडों के सम्बन्ध में प्रचलित अनेकानेक किंवदंतियों की यथार्थता जानने के लिए अपनी जान हथेली पर रखने के लिए तुल गये थे।
कई दिन चक्कर काटने के उपरान्त ब्रन्टन ने भीतरी कक्ष में प्रवेश पा लिया तथा एक टार्च तथा चाय का थर्मस लेकर वहाँ एक पत्थर पर बैठ गये।
ब्रन्टन द्वारा प्रकट किये गये अनुभवों के आधार पर जाना गया कि वे उस अन्धेरे क्षेत्र में एक चट्टान पर इस प्रकार लेट गये थे कि किसी अविज्ञात आगन्तुक को उनकी उपस्थिति का सहज ही पता न चले। थोड़ी-सी रात्रि बीतते-बीतते वहाँ उन्हें भारी ठण्ड लगने लगी जबकि वह समूचा क्षेत्र बालू जपने से गरम रहता है। कसी हुई जाकिट पहनकर उनने अपनी शीतजन्य कठिनाई का समाधान किया। थोड़ी रात्रि बीतते ही वहाँ की निस्तब्धता टूटी और भयावह आकृतियों के आगमन की सूचना मिलने लगी। घने अन्धकार के बीच भी उन आत्माओं की आकृतियाँ उभर रही थीं और हाथ कुछ न सूझ पड़ने पर भी अपनी हरकतों का परिचय ध्वनि के आधार पर देते रहे। यह क्रम कई घण्टे चलता रहा। उनका उद्देश्य इस अजनबी को डराकर भय से घबराकर विक्षिप्त कर देने या प्राण छोड़ बैठने की स्थिति तक पहुँचा देने का था। पर ब्रन्टन इतने डरपोक नहीं थे। यदि होते तो उस क्षेत्र के निवासियों द्वारा सुनाई गई अनेकों डरावनी घटना पर ही विश्वास करके इरादा छोड़ बैठते। उन्हें बड़ी से बड़ी कठिनाई सहकर भी यथार्थता को खोज निकालने की धुन थी।
सन्नाटा छा गया। उसे चीरती हुई दो दिव्य छायाएँ प्रकट हुईं। उनमें से एक राजा प्रतीत होता था और दूसरा पुरोहित। दोनों शान्त मुद्रा में थे। उनने नवागन्तुक के आगमन का अभिप्राय बिना पूछे ही जान लिया और हाथ उठाकर सहायता करने जैसा आश्वासन दिया।
इसके उपरान्त वे आत्माएं उनके शरीर को तन्द्राग्रस्त बनाकर सूक्ष्म आत्मा रूप में अपने साथ ले गईं और किसी विचित्र लोक में पहुँची। वहाँ डरावना जैसा कुछ नहीं था, वरन् शान्ति का साम्राज्य था और निवासी अधिक ऊंची आत्मिक स्थिति में पहुँचने के लिए प्रयत्नशील थे। सम्भवतः मृतात्माओं में से जो विचारशील थे,आत्मिक दृष्टि से ऊंचे उठे हुए थे उनके लिए बना हुआ यह विचित्र क्षेत्र था।
उन आत्माओं में से जो प्रमुख थीं उनने एक ही परामर्श दिया कि बाहर से अपने को समेटो और भीतर के क्षेत्र में प्रवेश करो। वहाँ वह सब कुछ मिलेगा जिसकी तुम्हें तलाश है। दिव्य क्षमताओं की उपलब्धि के लिए बाहर के किसी का आश्रय लेने की अपेक्षा यह कहीं अधिक सरल है कि अपने को समझा जाये और उसका परिशोधन किया जाये। इतना संक्षिप्त और सारगर्भित मार्गदर्शन पाकर ब्रन्टन जैसे विद्वान का समाधान हो गया।
वे वापस शरीर चेतना में लौटे तो उस क्षेत्र में विद्यमान डरावनी आत्माएँ भयभीत करने की स्थिति में नहीं थीं। हलचलें उनकी चल रही थीं पर वह सब कुछ सामान्य प्राणियों की स्वाभाविक उछल-कूद जैसा लगता रहा। भोर होते ही जैसे ही पिरामिड का फाटक चौकीदारों ने खोला, वे बाहर निकल आये और नया दृष्टिकोण लेकर वापस लौटे कि प्राणि चाहे जीवित स्थिति में हों या मृतात्मा के रूप में, अपने स्वभाव के अनुरूप ही आचरण करते रहते हैं। उनसे न अधिक लाभ मिल सकता है, न हानि की सम्भावना है। अपनी आत्मा ही सब कुछ है।
मानव के अस्तित्व का प्रकटीकरण होते ही वह समय की परिधि में आबद्ध हो जाता है और उसी समय से ही उसका अनवरत क्षय होता रहता है। कुछ वर्षों पूर्व तक ऐसी मान्यता थी कि जब तक देह का विकास होता रहता है, तब तक उसका क्षय नहीं होता, किन्तु अब एक नया विश्वास पनपा है। जार्ज ए. डब्ल्यू वोहम ने अपनी पुस्तक, “द सर्च फॉर वेज टु कीप यूथफुल” में प्रतिपादित किया है कि हमारा शरीर नित्य प्रतिक्षय होता रहता है जिसका आरम्भ पलने से ही हो जाता है। लाखों कोशिकाएँ नित्य प्रति क्षय होती रहती हैं जिनका प्रतिस्थापन फिर कभी नहीं होता। इसका अर्थ हुआ कि मानव के जन्म से ही उसका भौतिक शरीर एक कठोर नियति के अपरिवर्तित नियम के अनुसार मृत्यु की ओर अग्रसर होता ही रहता है। उसकी आयु में जैसे-जैसे वृद्धि होती जाती है, इस रहस्य का स्पष्ट रूप से उसे बोध होता जाता है।
इसे हमारे अस्तित्व की दुर्गति ही कहना होगा। मानव जिस सीमित स्थिति में अपने आपको पाता है, वह उसे बिल्कुल ही नहीं सुहाती। वह धीरे-धीरे समझने लगता है कि जिस सुपरिचित सृष्टि में वह अनेक वर्षों से आमोद-प्रमोद से जीवनयापन करता रहा है, वह उससे एक अटल नियम के अंतर्गत निश्चित रूप से पृथक होकर ही रहेगी, और वह इस आत्मचेतन जीवन को अन्ततः समाप्त होते हुए एक पंगु की तरह, बिना किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न किये, असहाय और दीन-हीन बनकर देखता रहेगा। मनुष्य अपने आसपास के वातावरण की सृष्टि के बन्दीगृह में, जिसका मृत्यु एक सजग प्रहरी है, न केवल एक बन्दी की तरह रहता है, वरन् वह अपनी भावनात्मक मूल प्रवृत्ति व लालसा के बंधनों में भी सतत् आबद्ध रहता है।
मनुष्य को सजीव व निर्जीव के बीच की दरार का, जिसका प्रतीक मृत्यु है, बोध हो जाता है, किन्तु उसे किसी भी प्रकार से अथवा विचारों के द्वारा पाटा जाना सम्भव नहीं है। यह मानव की क्षण-भंगुरता की सत्यता और उसकी स्थायित्व हीनता को ही प्रकट करता है। अपनी परिस्थितियों को पूर्णरूप से नियन्त्रित करने के प्रयास में मानव को अनेकों शक्तिशाली अवरोधों का सामना करना पड़ता है, जिनसे उसे अपनी ससीमता का और अपने स्थायित्व की अनिश्चितता का बोध होता है। वह कभी किसी विशिष्ट दबाव के सामने घुटने न भी टेके, फिर भी उसे अस्तित्ववादियों के अनुसार अनिवार्यतः मानव की मूलभूत सीमाओं की मूल स्थिति को टिकाये रखने में अपनी अयोग्यता को स्वीकार करना ही होगा। यह स्थिति प्रायः अपराध और मृत्यु के समय देखी जा सकती है।
अस्तित्व विज्ञानियों ने मानव की दुःखती रग पर हाथ रखकर पहिचान लिया है और बलपूर्वक कहा है कि मनुष्य चाहे अपने मार्ग के अवरोधों से लोहा लेने में सफल हो भी जावे, किन्तु उसकी अन्तिम परिणति, उसकी सुनिश्चित मृत्यु को टाला नहीं जा सकता। मृत्यु के पश्चात एक शून्य? एक ऐसी अभेद्य दीवार मानव बुद्धि के सम्मुख एक प्रश्न चिन्ह के रूप में खड़ी है। जीवन के सम्पूर्ण ढांचे पर से मृत्यु का अवलोकन करने पर वह मानव के उच्च मनोभावों का एक संकटकालीन क्षण प्रतीत होता है, जब मनुष्य एकान्त में अपनी स्वयं की देह रूपी कारागृह की दीवारों पर दस्तक देता है और प्रत्युत्तर के अभाव में, निराशा की नीरवता में वह उन मित्रों और प्रिय स्वजनों को याद करता है जिन्होंने ऐसी ही असहाय स्थिति में उसके सामने ही देखते-देखते उस शून्य को भरने के लिए अन्तिम प्रयाण किया था और वह उनसे पुनर्मिलन की सुखद कल्पना तरंगों में खो जाता है।
इस प्रकार के विचारों पर अविश्वास करके उन्हें टाला भी नहीं जा सकता क्योंकि अनेक असाधारण अन्तर्ज्ञानियों ने समय-समय पर इनकी पुष्टि की है,अन्यथा इस प्रकार के विचारों के अस्तित्व का आज कोई अवशेष ही नहीं रहता। मृतात्माओं का किसी माध्यम से प्रकटीकरण और उनके द्वारा अनेक सार्वजनिक रूप से ज्ञात व अज्ञात असाधारण स्मृतियों का उद्घाटन करने से भी इन विचारों को बल मिलता है। परामनोवैज्ञानिक इन घटनाओं में पुनर्जन्म की सम्भावनाओं को खोजने का प्रयास करते हैं।
मनुष्य को मृत्यु विषयक भय, उसके भौतिक जीवन के अस्तित्व की समाप्ति अथवा उसकी चेतना के अन्त की चिन्ता उसे एकाकी बना देती है, किन्तु यदि कहा जाये कि मानव स्वेच्छा से इस संसार का, एक क्रिया विधि के रूप में त्याग कर मृत्यु का वरण करता है तो न तो इसे उपयुक्त ही कहा जावेगा और न ही तर्क संगत, कारण कि हममें से अनेक असाध्य रोगों से ग्रसित रहते हुए व कष्टमय जीवन जीते हुए भी कोई स्वेच्छा से मरना नहीं चाहता। यह तो मनुष्य जीवन की दुर्गति ही है कि जिस मिलनसार आकर्षक विश्व में वह एक सामाजिक प्राणी के रूप में जीवनयापन करता रहता है उसका इतना कारुणिक और दुःखद अन्त होता है और उसे आवश्यक रूप से अकेले ही मरना पड़ता है। उसे उसकी मृत्यु शैया से उठने में न तो कोई उसकी सहायता ही करने आता है न ही कोई स्वागत समिति उसके हाथ में हाथ देने को तत्पर रहती है। उसे नव-जीवन की देहरी का मार्गदर्शन कराने भी कोई नहीं आता। वास्तव में मनुष्य मृत्यु के भय से इतना भयभीत नहीं होता जितना कि इस संसार को अकेले ही छोड़कर जाने की और मार्ग के अनेक प्रकार के कष्टसाध्य अवरोधों की विभिन्न प्रकार की कल्पनाओं की चिन्ता से।
यहाँ यह बताना अनावश्यक न होगा कि सन्तजन जिन्हें इस संसार से किसी भी प्रकार की आसक्ति नहीं होती और वे एकाकी जीवन जीते हैं। उनके अपने विरक्त जीवन के कारण उन्हें अकेलेपन का न तो भय रहता है और न ही किसी प्रकार की चिन्ता ही सताती है। मनुष्य अपने अस्तित्व की समाप्ति और अकेलेपन की चिन्ता पर इस आशा और विश्वास के आधार पर विजय प्राप्त कर सकता है कि मृत्यु के पश्चात् भी उसका अस्तित्व किसी न किसी रूप में शेष अवश्य रहेगा। उसके इस हाड़-माँस के शरीर का ही केवल क्षय होगा, किन्तु इस जैविक और विकासात्मक शरीर से मुक्त होने पर वह एक नये उन्मुक्त जीवन की राह पर चल सकेगा। इंद्रियों के सीमित बन्धनों से मुक्त होकर अन्ततः मनुष्य अपनी विशुद्ध आत्मा को जान लेता है, वह अपने शारीरिक बन्धनों की सीमा से परे भारहीन होकर अपनी पूर्णता की सम्भावना का अनुभव करत है। मनुष्य ने इस आशा को बल देने का और इस विश्वास में सुदृढ़ता लाने का प्रयास किया है किन्तु इस गूढ़ विषय को समझने की क्षमता के अभाव में और इस पर चिन्तन करने में अपने को अयोग्य मानकर उसने ईश्वर का मानवीकरण कर लिया है। उसने ईश्वर के मानवाकारी काल्पनिक रूप की सृष्टि कर ली है ताकि उसकी शरण में पहुंचकर वह अनश्वर बना रह सके। उसने एक ऐसे स्वर्ग की भी कल्पना की है जहाँ कि उसकी आत्मा विश्राम करने के अतिरिक्त उसे देवदूतों सन्तों और मित्रों का साहचर्य भी प्राप्त होगा। उसने एक काल्पनिक नरक लोक की भी सृष्टि की है जहाँ कि बुरे कर्मों के लिये यथायोग्य यातनाओं की व्यवस्था भी होगी।
वास्तव में हमारी इस ज्ञात सृष्टि के प्रतिकूल एक रहस्यमय वातावरण की भी सृष्टि है। उसके कोई रहस्य अचानक प्रकट हो जाने से मनुष्य के मन में भय और भ्रम दोनों का ही संचार होता है। हमारी आधुनिक सभ्यता के इस युग में अब हमने इस अतीन्द्रिय अन्तः प्रवाह को अत्यन्त गम्भीरता से लेना आरम्भ किया है। जुंग ने 1933 में ही अपनी पुस्तक ‘माडर्न मेन इन सर्च ऑफ सोल’ में व्यक्त किया है- “आधुनिक सचेतन मानव ने कुछ श्रम साध्य और दृढ़ प्रयास किये हैं और अब वह अतीन्द्रिय क्षमताओं और उनकी शक्तियों को स्वीकार करने से इन्कार नहीं करता- हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि अचेतन की उत्तेजित क्रियाओं में क्रियाशील शक्तियाँ होती हैं” जुंग की इन स्वीकारोक्तियों से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि मनुष्य ने अब इस दिशा में सोचने और समझने का प्रयास किया है कि अतीन्द्रिय क्षमताएं कहीं बाहर से नहीं वरन् मनुष्य के इस भौतिक तन्त्र के भीतर से ही प्रस्फुटित होती हैं।
आज के विश्व की स्थिति जिसमें युद्ध, युद्ध की धमकियां, संधियों का टूटना सर्वोच्च अन्तर्राष्ट्रीय और राजनैतिक स्तर पर किये गये वायदों से मुकरना, सच्चे व निष्कपट नेताओं का अभाव आदि समस्याओं के कारण आज का मानव अपनी दैहिक आर्थिक व साँस्कृतिक सुरक्षा जिसके लिये उसने बड़े कठिन प्रयास किये हैं बड़ा सशंकित हो उठा है। इस प्रबुद्ध सभ्यता से उसने जिस मानवीय सुहृदयता की आशा की थी वह बालू से तेल प्राप्त करने के समान ही सिद्ध हुई है अपनी इस घोर असफलता से उसे बड़ा निराश होना पड़ा है। जुंग ने इसे इन शब्दों में व्यक्त किया है। “मनुष्य ने अब विश्व के किसी विवेक सम्मत संगठन के गठन की सम्भावनाओं में अपना विश्वास खो दिया है। स्वर्ण युग का हमारा पुराना स्वप्न जिसमें सुखी, समृद्ध व आदर्श जीवन की कल्पना की गई थी, वह अब केवल मृग मरीचिका ही सिद्ध हुआ है। भावी राजनीति और भावी विश्व के सुधार के प्रति सशंकित आधुनिक मानव को अपने आप में सुप्त अलौकिक क्षमताओं को खोजकर उन्हें जागृत करने को बाध्य किया है, जिससे वह ऐसी सृष्टि को आकार देने में समर्थ हो सके, जिसमें अपने भविष्य का वह स्वयं निर्माण और नियन्त्रण कर सकें।”
अब हम ऐसी स्थिति में पहुँच चुके हैं जहाँ से मानसिक या अतीन्द्रिय सामर्थ्य की क्रियाशील शक्तियों के अस्तित्व को नकारना सम्भव नहीं है और यही कारण है कि अब अति असामान्य, अनोखी अतीन्द्रिय, क्षमता,दिव्य दृष्टि, मनोगति, अज्ञात स्मृति पुनर्जन्म आदि के मूल्याँकन ने इस समय को पूर्व काल की अपेक्षा और कहीं अधिक विशिष्ट बना दिया है। जुंग ने आगे लिखा है कि “आधुनिक मानव अब केवल विश्वास के आधार पर ही किसी धर्म सिद्धान्त को स्वीकार करने वाला नहीं है। वह उनकी वैधता को तब ही स्वीकार करेगा जबकि वह उसके स्वयं के आत्मिक जीवन के गहन अनुभवों से मेल खाने की पात्रता रख सके।”
इस सम्बन्ध में अब दो राय नहीं रह गई हैं कि मनुष्य के जीवन में आत्मिक तथ्यों ने एक विशिष्ट स्थान बना लिया है, यह उसकी इस ओर की अभिरुचि में अभिवृद्धि से स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है, मनुष्य ने अपने भौतिक ज्ञान का और उसके द्वारा प्राप्त शक्तियों का उपयोग और दुरुपयोग करके उसे दोनों प्रकार से परखा है किन्तु उनके द्वारा न तो उसे शान्ति और न सुरक्षा ही मिल सकी है। अब वह उस प्रतीयमान, पराभौतिक परमसत्ता की शरण में जाकर आशा करता है कि वह अपनी प्रवीणता से ऐसे वातावरण की सृष्टि करेगा जिससे अविश्वास और अनिश्चितता का वातावरण समाप्त होकर रहेगा।
दो भिक्षु साथ-साथ जा रहे थे। रास्ते में नदी पड़ी। नाव थी नहीं। एक युवा महिला भी पार जाने का साधन ढूँढ़ने के लिए प्रतीक्षा में बैठी थी।
महिला ने साधुओं से कहा भाई जी, मुझे पार लगा दो। एक साधु ने उसे कन्धे पर बिठाकर पार लगा दिया। आगे चलकर दूसरे साधु ने कहा- तुमने तो भला नहीं किया, युवती को कन्धे पर नहीं बिठाना चाहिए था। निकालने वाला साधु चुप हो गया। आगे चलकर पहले साधु ने फिर वही बात कही। वह चुप रहा और आगे चलने पर फिर साधु ने कहा तुमने भला नहीं किया।
निकालने वाले साधु ने कहा मैंने तो कन्धे पर रखकर ही निकाल दिया था, पर तुम तो सिर पर ही बिठाये फिर रहे हो अब तक उसे सिर पर से उतार न सके।
13 मार्च सन् 1928 को ब्रिटेन विनिर्मित एक सशक्त वायुयान को अमेरिका भेजने का निश्चय हुआ। वह कप्तान रेमण्ड हिक्लिफ के संचालकत्व में जोश खरोश के साथ उड़ा तो पर भयंकर तूफान में फंस जाने के कारण वह बीच समुद्र में डूब गया। रेडियो संचार प्रणाली भी अस्त-व्यस्त हो गई और उसके गिरने के सही समय और स्थान की सूचना कहीं नहीं पहुँचाई जा सकी। अखबारों में इतनी सूचना छपी कि रात्रि के समय ब्रिटेन का एक शक्तिशाली वायुयान गुम हो गया। ढूंढ़ खोज होती रही पर उसका कोई पता न चला।
कप्तान हिक्लिफ की सत्ता प्रेत रूप में बदल गई। जब कि वह कभी भूत प्रेतों की चर्चा में तनिक भी रस नहीं लेता था और उसे कोरी बकवास बताता था।
कप्तान को आत्मा अपने घर पहुँची और पत्नी को बताया कि उसका जहाज डूब चुका है वह उससे सशरीर मिलने की आशा न रखे। बच्चों को प्यार करने के बाद वह आत्मा अदृश्य हो गई।
इसके बाद वायुयानों को खतरे से बचाने के कार्यों में उसको आत्मा ने रुचि लेना आरम्भ किया। एक बार अमेरिका से एक जहाज इंग्लैण्ड आ रहा था। दो चालकों में से एक सोया हुआ था कप्तान की चौकी के चौकीदार को एवं एक सोये चालक को प्रेत चालक ने सचेत किया कि वह रास्ता भटक गया है और गलत रास्ते पर जा रहा है। उसने सोते हुए साथी को जगाया और अदृश्य आत्मा की सूचना से अवगत किया। यन्त्रों के देखने से प्रतीत हुआ कि वह 200 मील भटक गया है। ईंधन भी चुकने वाला है। दोनों ने मिलकर जहाज को एक छोटे टापू पर उतारा। रेडियो से संचालक केन्द्र को सूचना दी। दूसरे दिन ईंधन लेकर नया वायुयान आया तभी उनके लिए नई उड़ान भर सकना सम्भव हुआ।
इसी प्रकार एक फ्राँसीसी विमान आग लगने से जलकर खाक हो गया वह एक देहाती इलाके की छोटी आर्वी पहाड़ी से टकरा गया था। सवारों में से शेष सभी मर गये थे। मात्र एक व्यक्ति बच गया था। समाचार पहुँचाने की कोई सम्भावना न थी क्योंकि जहाज में पहले से ही कई खराबियाँ उत्पन्न हो गई थीं। रेडियो संचार पहले से ही गड़बड़ा गया।
यह सूचना कप्तान की प्रेतात्मा ने मुख्य कार्यालय में पहुँचकर स्वयं पहुँचाई और वह अदृश्य हो गई। आर्वी नाम की कोई बड़ी जगह फ्राँस भर के नक्शों में न मिली। कठिनाइयों से “आर्वी रोड” एक रेलवे स्टेशन भर पाया गया। वहाँ उड़ानें भरते हुए दूसरे वायुयान पहुँचे तो सिर्फ जला हुआ मलबा और एक व्यक्ति बेहाल भूखी स्थिति में मिला। दुर्घटना की जाँच के लिए अफसरों ने प्रयत्न किया पर सूत्र हाथ न लगे जिससे सही स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सके।
इस प्रसंग में भी कप्तान की मृतात्मा उपस्थित हुई और उसने बताया कि जहाज के निर्माण में क्या त्रुटियाँ रह गई थीं। इसलिए उसे नीची उड़ान उड़ानी पड़ी और छोटी पहाड़ी से टकराकर जल गया। उसकी पड़ी रेडियो व्यवस्था पहले से ही अस्त-व्यस्त हो गई थी। इस गवाही को प्रामाणिक मानकर जाँच की कार्यवाही समाप्त हुई।
लगभग 60 वर्ष तक यह सिलसिला चला। कप्तान हिक्लिफ की आत्मा इंग्लैंड से अमेरिका के क्षेत्र में मंडराती पाई गई और उसने कितने ही जहाजों को मुसीबत से बचाया। सम्भवतः उसके बाद वह अपने उपकारों के कारण मुक्ति पा गई।
भगवान धर्म की स्थापना और अधर्म का
नाश करने के लिए जन्मते हैं और यही
अपने भक्तों से कराना चाहते हैं।
पुरातत्व विभाग ने ऐसी अनेकों प्रतिमाएं शोध उत्खनन में प्राप्त की हैं जो ताण्डव नृत्य की तरह अर्ध नारी नटेश्वर के रूप में भी हैं। लगता है सर्वप्रथम शिव प्रतिमा पवित्र नदियों में पाये जाने वाले लिंग स्तर के पाषाणों से ही बनी थीं। वैष्णव सम्प्रदाय में जिन पाषाण खण्डों में चौड़ाई अधिक देखी उन्हें शालिग्राम बना दिया। जिनमें लम्बाई का अनुपात ज्यादा था, उन्हें शिवलिंग की तरह प्रयोग किया गया।
मूर्ति कला का जब से विकास हुआ तब से काल की दृष्टि से शिव अधिक पुरातन हैं और विष्णु उसके उपरान्त के। विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमाएं बनीं। लक्ष्मी उनके साथ हैं। आयुध और वाहनों को देखते हुए विष्णु को भौतिक स्मृति का प्रतीक माना है और शिव को योग का, तप का प्रतीक। इन्हीं दोनों के मिलन को अध्यात्म कहते हैं। शिव का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संकेत इसी दिशा में है।
अध्यात्म का उद्गम मृत्यु चिन्तन से आरम्भ होता है। जिन्हें अपना जीवन लाखों करोड़ों वर्ष जितना लगता है, उन्हीं को वासना, तृष्णा और अहन्ता दबोचती है। वे ही हर्ष से इतराते और लिप्साओं के साथ गुड़ के साथ चींटे की तरह चिपकते हैं। पीछे भले ही उन्हें सिकन्दर की तरह पछताना और दौलत साथ जाने का कोई संयोग न बनते देखकर मृत शरीर के हाथ ताबूत से बाहर निकालने पड़ें।
शिव तांडव में प्रलय काल का पूर्वाभास है। उनका निवास मरघट में, विष कण्ठ में, सर्प भुजाओं में लिपटे रहने से मृत्यु की प्रधानता ही दर्शाई गई है। गले में मुण्ड माला, कटि प्रदेश में व्याघ्र चर्म हाथ में त्रिशूल, भस्म लेप यह सारा सरंजाम ज्ञानवान को एक ही बोध कराता है कि मृत्यु को कच्चे धागे से बंधी हुई, शिर पर लटकती तलवार समझा जाय और मरण की पूर्व तैयारी करके इतना निश्चित रहा जाये कि शरीर बदलते ओर परिकर का परित्याग करते समय कुछ भी अप्रत्याशित न लगे। ब्रह्मा सृजन के, विष्णु पालन के देवता हैं पर शिव तो परिवर्तन-मरण की ही व्यवस्था करते रहते हैं। इस तथ्य को जो ध्यान में रख सकेगा, वह भगवान की सर्वोत्तम अनुकम्पा के रूप में मिली काया का दुरुपयोग न करेगा। एक-एक साँस को हीरे-मोतियों से बढ़कर समझते हुए उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करेगा।
महान जीवन की सम्भावनाओं का परित्याग करके मनुष्य क्यों हेय जीवन जीता है, इसकी गहराई में उतरने पर प्रतीत होता है कि समस्त भव बंधनों की जड़ कामुकता है। उसके साथ जुड़ी हुई सरसता के प्रति मनुष्य इतना अधिक आसक्त हो जाता है कि फिर आगे-पीछे का कोई विवेक उसके हाथ नहीं रहता। यौनाचार के साथ प्रजनन जुड़ा हुआ है और वह इतना बोझिल तथा इतना जटिल है कि उन्हें सुलझाते सम्भालते मनुष्य का कचूमर निकल जाता है और ऐसा कुछ करने धरने के लिए मन एवं अवकाश नहीं रहता जिसे महान कहा जा सके। पेट और प्रजनन के दो चक्की के पाटों में गेहूँ के बीच फंसे हुए घुन की तरह लोग पिसते और बिलखते रहते हैं।
इस स्थिति से कैसे उबरा जाये? क्या नारी से सर्वथा पृथक रहा जाये? बैरागी की तरह एकाकी भ्रमण किया जाये? काम दमन में अपनी शक्ति को जुटाया जाये? यह सभी काम अति कठिन हैं और प्रकृति व्यवस्था के प्रतिकूल भी।
इस गुन्थी का समाधान करता है शिव का अर्धनारी नटेश्वर रूप। इस प्रकार की पुरातन प्रतिमाओं में आधा अंग नारी का और आधा नर का दिखाया गया है। इस कल्पना में कितने ही भाव छिपे हुए हैं।
एक यह कि नारी और नर एक ही मनुष्य जाति के दो अविच्छिन्न अंग हैं। उनके अधिकार और कर्त्तव्य समान हैं। दोनों को एक संयुक्त इकाई माना जाये। जिस प्रकार हाथ पैर आदि अंग अवयव मिलकर एक होते हैं उसी प्रकार नर और नारी की सत्ता पृथक-पृथक होते हुए भी उन्हें सम्मिलित इकाई माना जाये। उन्हें वैयक्तिक, सामाजिक एवं राजनैतिक दृष्टि से एक करके माना जाय। किसी को किसी से छोटा बड़ा न माना जाय, दोनों हिल-मिलकर एक रहें। इस प्रकार रहें जिसमें किसी को किसी से न्यूनाधिक न माना जाये। किसी को वरिष्ठ कनिष्ठ न माना जाये। गाड़ी के दो पहिए जिस प्रकार समान होते हैं, उसी प्रकार दोनों के बीच घनिष्ठता, एवं कर्त्तव्य उत्तरदायित्व की भावना में कहीं कोई न्यूनाधिकता न रहने पाये।
दूसरा भाव आत्मीयता का है। एक परिवार के सदस्य एक इकाई बनकर रहते हैं। सब के बीच आत्मीयता इस सीमा की रहती है कि परायेपन में जो कामुकता उत्पन्न होती है वह घर में प्रवेश नहीं कर पाती। सगी बहिन, सगी बेटी, सगी माता के प्रति कामुकता का उद्रेक नहीं होता, उसी प्रकार धर्मपत्नी के प्रति भी अपनापन रहे। दो पुरुष मित्रों या नारी मित्रों से साथ-साथ रहने पर कामुकता की कुदृष्टि नहीं उभरती उसी प्रकार निजी धर्मपत्नी को अपने शरीर का ही एक अंग मानकर उसके प्रति भावनाएं ऐसी ही उठें जैसे अपने निज के शरीर को देखकर उठती हैं। मल-मूत्र त्याग के समय अपनी जननेन्द्रिय पर दृष्टि पड़ती है। पर इतने भर से कोई उद्रेक नहीं उठता। फिर पत्नी को अपना ही अंश मानकर उसे स्वस्थ सुविकसित करने का ही भाव मन में क्यों रहे? उसका शरीर गलने और अपनी जिम्मेदारियाँ बढ़ाने के लिए मन क्यों ललके?
सामुदायिक रूप से भी ऐसी ही मान्यता रखी जा सकती है। एक ही सड़क पर- एक ही रेल में अनेक नर नारी साथ-साथ चलते हैं। सभी आपस में हंसते-हंसते बात करते जाते हैं। पर उस समुदाय में कुदृष्टि से देखने का मन किसी का भी नहीं होता। ऐसी ही मनोदशा नर-नारी के बीच में भी रखी जाये, दोनों एक दूसरे का अपने ही वर्ग के समझें और भेद बुद्धि न करें यह पूर्णतया सम्भव है।
नर और नारी एक दूसरे की अपूर्णता दूर करते हैं। मिलकर मनुष्य जीवन के अनेक पक्षों को पूरा करते हैं। उसकी इस योग्यता का सदुपयोग इसलिए नहीं हो पाता कि काम कौतुक के वशीभूत होकर एक नया जाल-जंजाल बुन लेते हैं। अतएव नारी को घर की चहारदीवारी में बच्चों की देखभाल के लिए आजीवन कैद रहना पड़ता है। न वह अपनी शारीरिक, मानसिक, आत्मिक प्रगति कर पाती है और न ही देश, धर्म, समाज-संस्कृति के लिए कुछ कहने लायक काम कर पाती है। नारी के लिए बच्चे बन्धन होते जाती हैं और नर के लिए बच्चे ही नहीं, नारी भी बन्धन हो जाती है। वह चाहे कि कुछ युग धर्म का निर्वाह करने के लिए- समाज को ऊंचा उठाने के लिए कुछ कहने लायक काम कर सकें तो इसके लिए उसके पास न समय बचता है न मन, न साधन। ऐसी दशा में कामुक विवाह बन्धन रूप ही सिद्ध होते हैं और एक दूसरे की कोई कहने लायक सेवा सहायता नहीं कर पाते।
अर्ध नारी नटेश्वर की शिव प्रतिमा व्यक्ति और समाज को यही उच्चस्तरीय शिक्षण देती है कि काम-क्रीड़ा की अपेक्षा आत्मीयता विकसित करें और एक-दूसरे की सत्ता के सम्मिश्रण से एक विशिष्ट शक्ति उत्पन्न करें।
वानप्रस्थ लेने की बात सोचते तो कई हैं। तीर्थयात्रा तो दूर, इस दिशा में योजना बनाकर कदम उठा लेना एक बड़ी बात है। दो मित्र एक आम के बगीचे के पास से गुजरे। पके हुए सुन्दर आम देखकर उनका जी ललचाने लगा। माली उधर से निकला तो उसने बताया कि मालिक के आदेशानुसार तुम शाम तक जितने आम चाहो खा सकते हो। रात में यहाँ कोई नहीं ठहर सकता। दोनों प्रसन्नता पूर्वक बाग में घुस गये। एक पेड़ पर चढ़ गया और शाम वक खूब पेट भर आम खाये। दूसरा केवल मीठों की ही खोज करने में लगा रहा और शाम हो गई। दोनों बाहर निकल गये। एक का पेट भरा हुआ था दूसरे का खाली। योजना बनाते रहने की अपेक्षा काम में जुट पड़ना अच्छा।
कल्पना करें कि हम किसी ऐसे नक्षत्र पर पहुँच जायं जो पृथ्वी से दो हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर हो तथा किसी शक्तिशाली टेलिस्कोप से पृथ्वी की ओर देखें तो पूर्व काल में घटित हुए घटनाक्रमों का दृश्य उसी प्रकार दिखाई देगा जैसे आज ही घटित हो रहा हो। ऐसी स्थिति में राम-रावण युद्ध, महाभारत, भगवान बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन अभियान स्थल सब देखा जा सकता है। पृथ्वी वासियों के लिए जो वर्तमानकाल है वह अन्य ग्रहों के लिए भविष्य है, जो भूत था वह उनके लिए वर्तमान है। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों पर जो वर्तमान है, वही पृथ्वी वासियों के लिए भविष्य है, जो उनके लिए भूत था, वहीं यहाँ वर्तमान है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भूत, भविष्य, वर्तमान का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पृथ्वी से चला हुआ प्रकाश सभी दृश्यों को अपने साथ लेकर अरबों वर्ष बाद अन्यान्य दूरवर्ती ग्रहों पर पहुंचता है। यही बात अन्य ग्रहों के संदर्भ में है। सम्भव है कि घटनाएं प्रकाश के गर्भ में निवास करती हैं। सम्भव है आइन्स्टाइन ने इसी को चौथे आयाम की संज्ञा दी है। दृश्य घटनाएं कभी लुप्त नहीं होतीं वरन् कहीं न कहीं सूक्ष्म में विद्यमान रहती हैं, उन्हें दृश्यमान भी किया जा सकता है। विगत दिनों इन्फ्रारेड व अल्ट्रावायोलेट फोटोग्राफी से समीपवर्ती भूत के 45 घण्टों में घटे घटनाक्रमों के फोटोग्राफ लिए जा सकने सम्भव हो सके हैं। कुछ और उदाहरण देखे जायं।
मोटर और रेलगाड़ी प्रायः आगे की ओर ही चलती हैं, पर उन्हें पीछे की दिशा में लौटाते हुए भी कोई विशेष कठिनाई नहीं होती। इसी प्रकार समय का आगे की तरह पीछे लौट सकना भी सम्भव हो सकता है। आमतौर से नदी में प्रवाह की दशा में ही तैरा और बहा जाता है, किन्तु कुशल तैराक के लिए यह भी सम्भव है कि वह उल्टी दिशा में धारा को चीरता हुआ तैर सके। विज्ञान ने तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि भूत भी सर्वथा लुप्त नहीं हो जाता। वह मस्तिष्क के स्मृतिपटलों पर धुँधला भर होता है, किन्तु अपना अस्तित्व बनाये ही रहता है। इसी प्रकार भूत गुजर भले ही गया है, पर उसका अस्तित्व इस ब्रह्मांड में अपनी सत्ता बनाये ही रहता है। राम और हनुमान के शरीर अब नहीं रहे, पर उनका व्यक्तित्व और कर्तव्य अभी भी इस संसार में मौजूद है। यदि कोई मार्ग खोजा जा सके तो हम उल्टी दिशा में तैरने वाले तैराक की तरह उन महामानवों के संपर्क का उसी प्रकार लाभ उठा सकते हैं, जैसा कि उनके सहचर उठाया करते थे।
दिव्य दर्शन (क्लेयर वाइन्स) दिव्य अनुभव (साइको मैन्ट्री) प्रभाव प्रेषण ( टेलिपैथी) संकल्प प्रयोग। (हेट्रोसजेशन) जैसे प्रयोग थोड़ी आत्मशक्ति विकसित होते ही आसानी से किये जा सकते हैं। इन विद्याओं पर पिछले दिनों से काफी शोध कार्य होता चला आ रहा है और उन प्रयासों के फलस्वरूप उपयोगी, निष्कर्ष सामने आये हैं। परामनोविज्ञान अतीन्द्रिय विज्ञान, मैटाफिजिक्स जैसी चेतनात्मक विद्यायें भी अब रेडियो विज्ञान तथा इलेक्ट्रानिक्स की ही तरह विकसित हो रही हैं। अचेतन मन की सामर्थ्य के सम्बन्ध में जैसे-जैसे रहस्यमय जानकारियों के पर्त खुलते हैं, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होता जाता है कि नर पशु लगने वाला मनुष्य वस्तुतः असीम और अनन्त क्षमताओं का भंडार है। कठिनाई इतनी भर है कि उसकी अधिकाँश शक्तियाँ प्रसुप्त अविज्ञात स्थिति में पड़ती हैं।
जिस प्रकार ध्वनि तरंगों को पकड़ने के लिये रेडियो में एक विशेष प्रकार का क्रिस्टल फिट किया जाता है, शरीर अध्यात्म का भी एक क्रिस्टल है और वह मन है। विज्ञान जानने वालों को पता है ईथर नामक तत्व सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, हम जो भी बोलते हैं उनका भर एक प्रवाह है, पर वह बहुत हल्का होता है, किन्तु जब अपने शब्दों को विद्युत परमाणुओं में बदल देते हैं तो वह शब्द तरंगें भी विद्युत शक्ति के अनुरूप ही प्रचंड रूप धारण कर लेती हैं और बड़े वेग से चारों तरफ फैलने लगती हैं। वह शब्द तरंगें संपूर्ण आकाश में भरी रहती है, रेडियो उन लहरों को पकड़ता है और विद्युत परमाणुओं को रोककर केवल शब्द तरंगों को लाउडस्पीकर तक जाने देता है, जिससे दूर बैठे व्यक्ति की ध्वनि वहाँ सुनाई देने लगती है। शब्द को तरंग और तरंगों को फिर शब्द में बदलने का काम विद्युत करती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक चिकित्सा और विचार संप्रेषण (टेलीपैथी) का कार्य मन करता है। वह मन जो अभी तक एनाटॉमी विज्ञान द्वारा देखा नहीं जा सका। मात्र उसकी फलश्रुतियों से उसका अनुमान लगाया जाता है।
आकस्मिक मृत्यु की सूचना बिना किसी संचार साधन के जब स्वजन सम्बन्धियों को मिलती है तो उससे आत्मा के अस्तित्व और सूक्ष्म जगत में घटित होने वाली हलचलों का सूक्ष्म रूप से प्रमाण मिल जाता है। घनिष्ठता स्नेह सूत्र में बंधे हुए लोगों के साथ किसी विशेष उत्तेजना के समय विशेष रूप से प्रभावित करती है। इस तथ्य को हम मृत्यु की अदृश्य सूचनाओं का विश्लेषण करते हुए सहज ही जान सकते हैं। ऐसी घटनाएं एक नहीं अनेक हैं और ऐसी हैं जिन्हें किंवदंती नहीं, प्रामाणिकता की कसौटी पर खरा मानने में कोई अड़चन नहीं पड़ती। नेपोलियन ने मृत्यु की पूर्व संध्या पर अपनी माँ से साक्षात्कार किया था, मृत्यु की सूचना बाद में मिली थी। यह आत्मीयताजन्य सम्प्रेषण प्रक्रिया है।
कई वर्षों पूर्व दैनिक हिंदुस्तान में भी परिपूर्णानन्द वर्मा का एक लेख छपा जिसमें उन्होंने एक अंग्रेज वृद्धा की पूर्वाभास शक्ति का अद्भुत वर्णन किया है। यह महिला श्रीमती सरोजिनी नायडू के घनिष्ठ परिचय में थी। एक दिन श्रीमती नायडू के घर मुहम्मद अली जिन्ना और उनकी नव विवाहिता पारसी पत्नी आये। अंग्रेज वृद्धा आदि से अन्त तक उन्हें आंखें फाड़ कर देखती रही। जब वे चले गये तो श्रीमती नायडू ने उस अशिष्टता के लिए बुरा भला कहा कि किसी मेहमान की ओर इस तरह घूर-घूर कर देखना ठीक नहीं। क्षमा माँगते हुए उस अंग्रेज महिला ने कहा मुझे इनमें कुछ आश्चर्य दीखा। यह परम सुन्दरी महिला तीन वर्ष में आत्महत्या कर लेगी और मि. जिन्ना बादशाह बनेंगे। यह मैंने इन लोगों का भविष्य देखा है। इसी तथ्य को मैं उनके चेहरे पर पढ़ रही थी।
उपस्थित सभी लोग हंसे और उन दोनों बातों को असम्भव बताया। उस परम सुन्दरी पारसी महिला पर जिन्ना बेहद आसक्त थे। उसे सब प्रकार के सुख हैं फिर वह आत्महत्या क्यों करेगी? उसी प्रकार उन दिनों किसी की कल्पना तक न थी कि पाकिस्तान की माँग जोर पकड़ेगी और वह किसी दिन एक वास्तविकता बनेगी तथा जिन्ना उसके अध्यक्ष बनेंगे। दोनों ही बातें बुद्धि संगत न थीं इसलिए उस महिला की बात को निरर्थक माना गया।
पर कुछ दिन बाद दोनों ही बातें सच हो गईं। उस नवयुवती पत्नी को आत्महत्या करनी पड़ी। पाकिस्तान बना और जिन्ना उसके राष्ट्राध्यक्ष बने- बादशाह हुए।
अलीगढ़ विश्व विद्यालय के कुलपति जैदी को इस भविष्यवाणी की जानकारी थी। पाकिस्तान बनने के पाँच छह वर्ष बाद श्री जैदी को लन्दन जाना पड़ा। उन्हें उस अंग्रेज महिला की याद आई। पता उनकी डायरी में नोट था। वे उसके घर गये। उनने उस महिला से भारत तथा पाकिस्तान के भविष्य के बारे में पूछा तो उसने इतना ही कहाँ- पूर्वी पाकिस्तान टूट कर अलग हो जायेगा। समय कितना लगेगा कह नहीं सकती। उन दिनों पाकिस्तान के इस प्रकार विभाजन होने की कोई आशंका नहीं थी इसलिए वह कथन अविश्वस्त जँचा। पर समय ने बताया कि वह बात सच हो गई उस अंग्रेज महिला की पुरानी भविष्यवाणी अक्षरशः सच निकली। बाद में वह महिला कहाँ गई, उसका काई पता न चला।
अंतर्जगत विशाल और विराट् है उससे एक व्यक्ति ही नहीं बड़े समुदाय भी प्रेरित होते हैं। पूर्वाभास की ऐसी ही एक घटनायें यों है- अमेरफान वेल्स का एक छोटा कस्बा है। वर्षाकाल की बात है समूचे कस्बे में एक अजीब खलबली मची। अधिकाँश लोगों को या तो रात्रि के स्वप्नों में या दिन में यों अनायास ही पूर्वाभास होता है कि उनकी मृत्यु शीघ्र ही हो जायेगी। अमेरफान वासियों की इस बेचैनी ने इस तरह सार्वजनिक चर्चा का रूप ग्रहण किया कि जर्मनी के सुप्रसिद्ध मानस शास्त्री जान मार्कर को घटना के अध्ययन के लिए बाध्य होना पड़ा। सर्वेक्षण के मध्य उन्होंने पाया कि कस्बे के अधिकाँश व्यक्तियों को इस तरह का पूर्वाभास हो रहा है। यही नहीं लोगों के चेहरे पर भय की रेखायें स्पष्ट झलकती थीं।
मुश्किल से एक पखवाड़ा बीता था कि सचमुच समीप के पहाड़ से एक दिन ज्वालामुखी फटा- कोयले की राख का भयंकर तूफान उमड़ा और उसने देखते-देखते हजारों व्यक्तियों को मौत की नींद सुला दिया। एक स्कूल की दीवार में हुए भयंकर विस्फोट से तो 100 बच्चे एक ही स्थान पर मौत के घाट उतर गये। अभी-अभी मेक्सिको में आए भूकम्प तथा कोलम्बिया में फटे ज्वालामुखी के पूर्व भी इसी प्रकार की बेचैनी अनेकों समीपवर्ती नागरिकों में देखने को मिली। यह बताती है कि भविष्य के गर्भ में क्या पक रहा है, समष्टिगत हलचलों का यह आभास व्यष्टिमनों में होने लगता है।
इस विधा पर खोजबीन करने वाली एक अमरीकन महिला डॉ. लुईसा ई. राइन ने अपनी पुस्तक “ट्रेसिंग हिडन चैनेल्स" में लिखा है कि ये घटनायें यद्यपि पूर्व के देशों यथा भारत, बर्मा, स्याम आदि में संख्या में बहुत अधिक होती हैं पर आश्चर्य यह है कि वे कैसे घट जाती हैं? फिर लेखिका स्वयं ही उत्तर देती है कि “ये घटनायें किसी व्यक्ति के दैनिक जीवन के किसी बहुत छोटे अंश से सम्बन्धित होती हैं, चाहे वह देर से सिर के ऊपर मंडराती हुई हों और चाहे रास्ता चलते-चलते किसी सवारी गाड़ी से टकरा जाने जैसी सर्वथा आकस्मिक। इस प्रकार की घटनायें सर्वांगपूर्ण नहीं होतीं और न उनका जीवन से पूरी तरह सम्बन्ध होता है कुछ ही लोग अपनी देखी घटनाओं पर ऐसी विश्वास रखते हैं कि उनका सम्बन्ध उसके समग्र जीवन से है। पूर्वार्त्त दर्शन में वैज्ञानिक ऋषियों ने इसके तर्क सम्मत कारण भी दिए हैं।”
श्रीमती राइन ने आगे चलकर कहा है- “इस प्रकार की पूर्वदर्शन (प्राकोगनिशन) में एक मिलती-जुलती विशेषता यह होती है कि वे प्रायः सब की सब व्यक्ति सम्बन्धी ही होती हैं। राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय पैमाने की घटनाओं का पूर्वदर्शन शायद ही कभी किसी सामान्य व्यक्ति को होता हो। अधिकाँश में लोगों को अपने निकट सम्बन्धियों के सम्बन्ध में ही सूचना मिलती है।
अमेरिका के प्रसिद्ध विद्वान डा. जे. बी. राइन ने भी उक्त तथ्य की बाद में विस्तृत खोज की और पाया कि विचार, चिन्तन और किसी भी अभ्यास द्वारा यदि मन को विचारणाओं के सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर आकाश में घुमाया जा सके तो वह भूत ओर भविष्य की अनेक घटनाओं को बेतार के तार के सन्देश की तरह प्राप्त कर सकता है। “न्यू फ्रान्टियर्स आफ माइन्ड” नामक पुस्तक में उन्होंने ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण भी दिया है, जो उक्त कथन की सत्यता प्रतिपादित करती है। यह एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है, अंधविश्वास नहीं।
रीडर्स डाइजेस्ट नामक विश्वविख्यात मासिक पत्रिका में “सैमबेन्जोन की सूक्ष्म शक्तियां” नामक लेख में पूर्वाभास की घटनाओं का उल्लेख करते हुए लेखक ने स्वीकार किया है कि “संसार में कोई एक ऐसा तत्व भी है, जो हाथ पाँव विहीन होकर भी सब कुछ कर सकता है, कान न होकर भी सब कुछ सुन सकता है, आंखें उसके नहीं हैं, पर वह अपने आपके प्रकाश में ही सारे विश्व को एक ही दृष्टि में देख सकता है। त्रिकाल में क्या संभाव्य है, यह उसको पता है। उसका सम्बन्ध विचार और भावनाओं से है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि विचार और ज्ञान की शक्ति असीम, शाश्वत एवं एक ठोस सत्य है।
सत्य में हजार हाथियों के समान बल होता है, इसलिए अन्तिम विजय उसी की होती है, चाहे संघर्ष कितना ही लम्बा क्यों न चले।
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उपयोगी साहित्य पढ़ने से अधिक चिरस्थायी और उपयोगी मनोरंजन दूसरा कोई है नहीं।
यह आवश्यक नहीं कि किसी को उन्नतिशील बनने के लिए उसके पास समुचित साधन चाहिए, अथवा उसके अभिभावकों द्वारा उसके लिए शिक्षा तथा सुविधा जुटाने का प्रबन्ध किया ही जाये। यह हों तो अच्छी बात है किन्तु इनका अभाव रहने पर भी मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति एवं तत्परता के बल पर प्रतिकूलताओं को भी अनुकूलताओं में बदल सकता है और साधारण स्थिति की रुकावटों को अपने मनोबल के आधार पर दूर करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सकता है।
डिजराइली का कथन है कि “सफलता का रहस्य उस कार्य में दृढ़ता और मनोयोग पूर्वक जुटे रहना है” कुछ लोगों का कहना है कि भौतिक सफलता अर्थहीन और बकवास है सफलता के प्रतीक के रूप में धन का अपना महत्व है। लेखक, संगीतज्ञ, चित्रकार, मूर्तिकार, कृषक अथवा मजदूर पेट भर भोजन तो सबको चाहिए किन्तु रचनात्मक प्रवृत्तियों का लक्ष्य मात्र धनोपार्जन नहीं होना चाहिए। विश्व के अनेक मेधावी ऐसे हैं जो अभावों में जन्मे, असुविधाओं में पले और संघर्षों में जीकर भी सफलता के चरम लक्ष्य तक जा पहुँचे।
सफलताओं के लिए सुविधाएँ ही आवश्यक हों ऐसी बात नहीं है। जिन्हें जीवन भर सुविधाएँ नहीं मिलीं और गरीबी व अभाव में जीकर भी उन्होंने ऐसे कार्य किये जो सुख सुविधाओं में रहकर नहीं कर सके। सफलता के लिए सफलता की कामना और दृढ़ इच्छा ही मुख्य है।
अँध कवि होमर यूनान का विख्यात भिखारी था। किन्तु अपनी कृति से आज भी अमर है। इसी प्रकार रोम का महाकवि विर्जिल साधारण बावर्ची का पुत्र था। अपने ढंग की बेजोड़ कथाओं का रचनाकार ईसप एक कुरूप, काला गुलाम था। डिमास्थेनस सिकलीगर परिवार में जन्मा था उसका पिता छुरी चाकू बनाकर आजीविका चलाता था, किन्तु डिमास्थेनस के भाषणों को आज भी याद किया जाता है।
सुविख्यात पुस्तक “डान क्विस्कोट” का लेखक सर बैटेस सेना का साधारण सिपाही था। अंग्रेजी का महाकवि कीट्स एक साधारण सईस का लड़का था। उसने अपने जीवन की शुरुआत दवा विक्रेता के यहाँ नौकरी करके आरम्भ की। होमर की कृतियों का अनुवादक एलेक्जेण्डर पोप एक व्यवसायी का पुत्र था। कवि एके साइड के पिता का व्यवसाय कसाई का था। स्काटलैण्ड के राष्ट्र कवि राबर्ट बर्नस ने अपना जीवन हलवाहे से आरम्भ किया। पैराडाइज लॉस्ट के लेखक मिल्टन एक स्कूल में अध्यापक थे। विख्यात कोषकार जानसन के पिता साधारण पुस्तक विक्रेता थे। पामेला और कैरिसा जैसे रोमांटिक उपन्यासों के विख्यात लेखक सैमुएल रिचार्डसन के पिता साधारण बढ़ई थे।
अमेरिका की खोज करने वाला कोलम्बस जुलाहा था। बेंजामिन फ्रेंकलिन जी बाद में अमेरिका के राष्ट्रपति बने, छपाई का काम करते थे। पोप सिक्सटस पंचम कभी सुअर पालने का काम करता था। कलाकार होगेराथ बर्तनों पर पच्चीकारी का काम भी करते तथा उन्होंने रेशमी वस्त्र विक्रेता के यहाँ नौकरी भी की। अभी प्रचलित पुच्छल तारे के आविष्कारक “एडमण्ड हैली” जिसके नाम से यह प्रसिद्ध है, के यहाँ साबुन बनाने का धन्धा होता था। उसमें से निकलकर वह एक एस्ट्रानॉमर बन गया। हरशल एक गरीब संगीतकार था। रिचार्ड आर्क राइट बहुत दिनों तक हज्जाम का कार्य करते रहे। विख्यात वकील ब्लैक स्टोन बुनकर का पुत्र था।
इतिहास के पन्ने ऐसे प्रतिभाशालियों की पुरुषार्थ गाथाओं से भरे पड़े हैं, जिनने अपने को पुरुषार्थ के बल पर ऊँचा उठाया और स्वयं को कुछ से कुछ बनकर दिखाया।
इस संसार में ऐसी चित्र-विचित्र घटनाएँ घटती रहती है, जिनका कोई तर्क सम्मत आधार नहीं। पर वे घटित क्यों हैं? यह अभी भी अविज्ञात है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में 1960 और 1961 में लगातार कीचड़ की बारिश हुई। सारी सड़कें कीचड़ से भरी रहीं। सफाई एक समस्या बन गई। मार्च 1879 में स्टोनहाउस नेवेदा में भी इसी प्रकार कीचड़ की वर्षा एक घण्टे तक सतत् होती रही जिससे एक रेलगाड़ी का इंजिन एवं डिब्बे लाइन से उतरकर नष्ट हो गए अनेकों की जान गई। इसी प्रकार 26 मार्च 1948 को ओहियो के डेटन में हरी वर्षा हुई। वहाँ के पैट्रोल पम्प, मकान, कपड़े पहने, और दीवालें सब हरी हो गईं। यह रंग कुछ देर बाद अपने आप फीका पड़ गया। अगस्त 1870 में कैलीफोर्निया के सैक्रामेंटों शहर में जीवित अविज्ञात प्राणियों की वर्षा हुई जो 2 से 8 इंच तक लम्बे थे। ये सड़कों और दीवालों पर छा गए।
कैलीफोर्निया के बूट काउन्टी में 11 सितम्बर 1878 को पानी के साथ कैटफिश की बारिश हुई। लेबनान में जुलाई 1841 में वैज्ञानिकों के अनुसार माँस, खून और रंगीन पदार्थ की बारिश दिन में 11 और 12 बजे के बीच हुई। बादल उस समय लाल थे। खून पृथ्वी और पदार्थों में जमकर गाढ़ा हो गया। यह बारिश आधा मील लम्बे और 75 मीटर चौड़े क्षेत्र में हुई। विशेष डॉ. स्याल के अनुसार इस बारिश में सारे लेबनान देश में सैकड़ों पौण्ड खून और माँस की वर्षा हुई। प्रयोग करने पर पाया गया कि यह जीवधारियों का रक्त ही था। वर्जीनिया के क्लोवरली प्रान्त में 1850 को शाम 4 बजे खून की बूँदों और महीन कटे ताजे माँस के टुकड़ों की बारिश हुई। ये माँसपेशी, लिवर और हृदय के टुकड़ों के रूप में थे। रंगीन बादलों के छँटने पर यह खून व माँस की बारिश भी बन्द हो गई।
इसी प्रकार सिम्पसन काउन्टी, उत्तरी केरोलीना में 15 फरवरी 1850 को 900 फीट लम्बे और 30 फीट चौड़े क्षेत्र में ताजे खून, मस्तिष्क और भीतरी अंगों के टुकड़ों की वर्षा हुई। उस समय आकाश पर लाल बादल थे। 24 जुलाई 1851 को सनेफ्राँसिस्को में सेना के कैंप में खून और माँस के बारीक टुकड़ों की वर्षा हुई। हर माँस का टुकड़ा 1/8 इंच से भी कम मोटा और चतुरता से स्लाइस किया हुआ था। इस समय आकाश साफ था और कोई पक्षी नहीं मंडरा रहा था। समझ में नहीं आता कि मानवी रक्त व माँस क्योंकर कहीं से आकर किसी स्थान विशेष पर बरस गये।
अगस्त 1962 में सेनेडीयागो कैलीफोर्निया के केनेथ स्नाइडर के यहाँ मकान के आस-पास छोटे-छोटे पत्थरों की वर्षा प्रतिदिन सुबह 10 से 2 बजे दोपहर तक होती थी। ये पत्थर हल्के थे और शरीर में लगने पर इनसे चोट भी नहीं आती थी।
अक्टूबर 1978 में मैकेग्री के अनुसार उसके बगीचे में दो फ्रैंक का एक सिक्का आकाश से गिरा। उस समय मौसम साफ था। मैकेग्री 1005, वूडलैण्डड्राइव्ह, गेस्टोनिया नार्थ कैरोलिना में रहते हैं। अमेरिका में फ्रेंच करेंसी कैसे पहुँच गयी, इसका जवाब किसी के पास नहीं। इन समस्त घटनाओं का रहस्य नहीं जाना जा सका है। आश्चर्य यह कि इस प्रकार की विचित्र वस्तुओं की बारिश कहाँ से व क्योंकर हुई?
मार्च 1939 में पश्चिम अफ्रीका के मध्य अंगोला में भीषण अकाल पड़ा। मनुष्य, जानवर और पक्षी सब मर गए या अन्यत्र चले गये। वहाँ की पुरानी एक जाति सीलिज को भूखा रहने की आदत है और वे प्रायः सब बिना भोजन के भी किसी तरह जीवित रहे। दो सप्ताह बाद देखा गया कि वहाँ झाड़ियों के मध्य आधा एकड़ के क्षेत्र में अचानक मधु जैसा गाढ़ा पदार्थ जमा होने लगा। इसे सभी लोगों ने थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खाकर प्राण रक्षा की। यह पदार्थ प्रतिदिन जमा होने लगा। आश्चर्य यह कि यह कहाँ से आया और किसने उन लोगों की जान बचाई।
एक और घटना ऐसी है जिसका कोई जवाब वैज्ञानिकों के पास नहीं है। 1960 में अमेरिका का 300 पौंड का डिसकवर सेटेलाइट जमीन पर उतरा तब उसका वजन 125 पौंड था और रोज इसका वजन कम होता रहा। इसके गिरने से जिस मकान में आग लगी उसमें धातुओं के मिश्रण का एक टुकड़ा मिला जो बहुत हल्का था। इससे खूब रेडिएशन निकल रहा था। यह ऐसी धातु थी जिसका प्रयोग निर्माण में नहीं किया गया था। एयर फोर्स ने इसे सत्य घटना बताया और वैज्ञानिक आश्चर्य करने लगे कि अन्तरिक्ष में वजन क्यों घटा? यह वस्तु कहाँ से आयी? उस वस्तु में रेडिएशन कहाँ से आया?
1921 के जाड़े में मिनीआपोलिस में एक लड़की एडना एलिस की हत्या हो गई। डॉ. ओ. ए. अल्स्टे का कथन है कि उसी मृतक लड़की ने जो उनसे पूर्व में चिकित्सा कराती रही थी, उनसे प्रार्थना करने सूक्ष्म रूप में कुछ घण्टों बाद आयी व बोली- कि मेरी मृत्यु का सही पता मिसोरी पुलिस से लगाकर इसकी सूचना मेरे माता-पिता को भेज दें ताकि उन्हें सही स्थिति मालूम हो जाये।
पुलिस से पता लगा कि वास्तव में एडीना एलिस की मृत्यु हो गई है और उसका हत्यारा बताए विवरण अनुसार पकड़ा गया है। रहस्यमय बात यह है कि मृतक एलीस सशरीर प्रकट हुई और बोली भी !!
डॉ. डब्लू विन वेस्काट 2.30 बजे दोपहर में 12 अप्रैल 1288 को एक ब्रिटिश म्यूजियम में गए। वहाँ उनने चार लोगों से बातचीत की और एक कुर्सी पर बैठ गए। थोड़ी देर बात वे गायब हो गए पर किसी ने उन्हें बाहर जाते नहीं देखा, यद्यपि वे पास ही बैठे थे।
वेस्काट के घर वालों का कहना है कि उस समय डॉ. वेस्काट घर से बाहर निकले ही नहीं। जब वे घर से बाहर निकले, तो म्यूजियम में कैसे आए? म्यूजियम में आए तब वे अचानक गायब कैसे हो गए? इस प्रकार के अचानक गायब हो जाने के ऐसे घटनाक्रमों, जिनमें व्यक्तियों का फिर कभी पता न चला, से भरी अनगिनत फाइलें न्यूयार्क, स्काटलैण्ड यार्ड व फ्राँस के एस.ए.एस. विभाग के पास हैं। वे व्यक्तियों की लाशें, यदि वे मारे गये, तक पाने में अब तक असफल रहे हैं। इसका कोई प्रत्युत्तर उनके पास नहीं है कि ऐसा क्यों व कैसे हुआ?
ऐसे ही कभी-कभी कुछ अविज्ञात वस्तुओं के प्रकटीकरण के घटनाक्रम भी घटते रहे हैं। 1962 में एक दिन शिकागो के डेविड डीट्स ने देखा कि एक अग्नि का गोला, एक फुट व्यास का, ऊपर से आया और कुछ देर मँडराने के बाद गायब हो गया।
1953 की एक रात्रि को वाशिंगटन के मि. व मिसेज फ्रेड ने देखा कि एक प्रकाश पुँज पेन्सिल के आकार में आया जो थोड़ी ही देर में बॉल जितना बड़ा गोला बन गया। वह अग्नि का गोला कुछ देर तक मँडराया, फिर अदृश्य हो गया। जनवरी 1962 में आस्ट्रेलिया, चेल्टनहम की श्रीमती डोरिस विल ने देखा कि उनके कन्धे के पास एक अग्नि गोला आया जो उनके बेडरूम में चला गया और वहाँ तत्काल हानि रहित विस्फोट हो गया। इस तरह के अग्नि के गोले कहाँ से आते हैं और क्यों आते हैं यह रहस्यमय है।
दिसम्बर 1942 को निकोलस ह्वाइट के यहाँ पचास बार आग एक ही रात्रि में जगह-जगह प्रकट हुई। अलग-अलग जगह विभिन्न वस्तुएँ इससे जल गईं। बार-बार आग को बुझाया गया कई बार फायर ब्रिगेड और इन्श्योरोन्स कम्पनी वाले आए। कागज, परदा, कपड़ा, सूट, बिस्तर, फर्नीचर, टेबल आदि में एक बार में एक ही जगह आग पकड़ती और वह वस्तु जलती। ऐसी अपने देश में अनेकों घटनाएँ घटित होती रही हैं व जादू तन्त्र के मत्थे मड़ी जाती रही हैं। पर वस्तुतः उनका कारण अभी तक ज्ञात नहीं। 1956 में श्रीमती एवा ओला गोल्डफ्रे का शरीर अचानक सिर से पैर तक तब जल गया, जब वह सोई थी। परन्तु उनके ढके कपड़ों और उनके बालों में जलने का कोई निशान नहीं था। यह घटना विचिटा, कन्सास की है।
1955 के ग्रीष्मकाल में शाम को केस्टन, इंग्लैण्ड की श्रीमती विनीफ्रेड मानसेल बगीचे में काम कर रही थी। वहाँ उसे डायमंड के अनेक टुकड़े मिले जिनमें से प्रत्येक की कीमत 100 डालर थी। आश्चर्य! कि यह हीरा कहाँ से आया? उसकी प्यारी बिल्ली के पैर से चिपके ये हीरे रहस्यमय हैं। अमेरिकी महाद्वीप में बंकर हिल सिल्वर माइन इडाहो उत्कृष्ट श्रेणी की है जिसे एक खच्चर ने ढूँढ़ा था। उसका मालिक उस खच्चर पर कहीं जा रहा था। रास्ते में एक जगह खच्चर ने मालिक को गिरा दिया और उसे फिर लात मारना चाहा। क्रोधित मालिक ने वहाँ पड़े पत्थर को उठाकर उससे खच्चर को मारना चाहा। आश्चर्य कि यह पत्थर चाँदी का था और बाद में वहाँ एक बड़ी चाँदी की खदान मिली।
ऐसे अविज्ञात घटनाक्रमों से जुड़े कुछ ऐसे संयोग भी हैं जो यदा-कदा घटते रहते हैं पर अंकात्मक दृष्टि से उनकी सुनिश्चितता हमें आश्चर्यचकित कर देती है।
आस्ट्रेलिया के लोगों का विश्वास है कि अकारण लाटरी जीतने वालों या पैसा प्राप्त करने वालों की शीघ्र मौत हो जाती है। अनेक घटनाओं से यह बात सही मालूम पड़ती है यथा- मुर्गी का हर्बर्ट चुन 70000 डालर जीता पर उसी दिन हार्ट फेल से वह मर गया। विलियम लोन 250000 डालर जीता परन्तु 6 सप्ताह बाद कैंसर से मर गया। हेरोल्ड रिचर्ड्स 200000 डालर जाती पर चार माह के भीतर उसकी मृत्यु हो गई। कारण अज्ञात था। एनी हेरिम 20000 डालर जीती पर वह खबर सुनकर ही मर गई। जेम्स कपूर 25000 डालर जीता परन्तु उसने एक पुलिस मैन की हत्या कर दी। अन्ततः वह पागलखाने में डाल दिया गया। वाल्टर वेस्टरर ने एक प्रतियोगिता में एक लाख डालर का इनाम जीता, उसी दिन उसकी मृत्यु हो गई। ये सारे घटनाक्रम आस्ट्रेलिया में घटे हैं।
जान टी. विलियमसन ने कैनेडा के उत्तम हीरों की खदान टाँगानिका में अपने माँगरेल कुत्ते के ढूंढ़ने से पाई और पृथ्वी का वह सर्वाधिक धनी व्यक्ति बन गया। घटना यों थी कि- थका, गरमी से त्रस्त और निरुत्साहित विलियमसन पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था। वहीं पास में उसका कुत्ता गड्ढा खोद रहा था। उस गड्ढे में हीरे की एक बड़ी खदान मिली। कुत्ते की होशियारी ने उसे धनी बनाया। उसने अपने कुत्ते के नाम पर उस स्थान का नाम रखा व अन्त तक वे साथ रहे। मरे भी साथ-साथ।
1912 में उत्तरी मिचिगन में हल्बर्ट नामक एक किसान अपना सुअर ढूँढ़ रहा था। जहाँ पर उसका सुअर खड़ा था, वहाँ एक बड़ी ताँबे की खदान मिली। इससे 5 लाख डालर से अधिक वार्षिक आय उन्हें हुई।
11 मार्च 1962 को इण्डियानापोलिस में श्रीमती रीनेट बेक के यहाँ अनेकों आश्चर्यजनक घटनाऐं एक साथ घटीं। रात्रि में एक दर्पण को किसी शक्ति द्वारा दीवाल पर फेंका गया। वह टूटकर फर्श पर बिखर गया। फिर एक भारी तस्तरी दीवाल में जाकर लगी। तब ग्लास फेंका गया। फिर चीनी-मिट्टी का कप फेंका गया और फूट गया। फ्रीज के भीतर रखे 125 डालर का बैग गायब हो गया। आवाज भी आने लगी। फिर उस घर में रहने वाली तीनों औरतों के शरीरों को विभिन्न जगहों में कोई काटने लगा। जिससे जगह-जगह छिद्र के निशान शरीर में पड़ गए। पुलिस पार्टी ने खूब जाँच पड़ताल की। पर कुछ भी समझ में नहीं आया। कोई रहस्य इसका नहीं खुल पाया। तब समझा गया कि यह किसी अविज्ञात शक्ति की करामात है। परन्तु इसका कोई कारण प्रत्यक्षतः नहीं मिला। घटनाक्रम सहसा स्वयमेव बन्द हो गए।
क्या वस्तुतः उपरोक्त घटनाक्रमों का किसी के पास कोई तर्क सम्मत समाधान है? वैज्ञानिक तो इस सम्बन्ध में जवाब देने में असमर्थ हैं।
ईश्वर का दर्शन और अनुग्रह दुर्बल दुरात्माओं के लिए सम्भव नहीं। उसे उपलब्ध करना मात्र तपस्वी और विवेकवानों के लिए सम्भव है।
ज्ञान से मनुष्य की उत्कृष्टता निखरती है और विज्ञान क्षमता एवं प्रतिभा का परिचय देता है। यह युग विज्ञान का है। बुद्धिवाद का भी। बुद्धिवाद इस श्रेणी का, जिसमें स्वार्थ के लिए परमार्थ की पूरी तरह उपेक्षा की जाये। आधुनिक दर्शन का विकास एवं विस्तार को हुआ है, पर उसका लक्ष्य और स्तर बुरी तरह गिर गया है।
यही बात विज्ञान के सम्बन्ध में भी है। इन दिनों वैज्ञानिकों की बिरादरी एक ही खोज में लगी है कि अधिक से अधिक लोगों का विनाश सरलतापूर्वक करने के साधन किस प्रकार जुटाये जायं। इन दिनों विभिन्न देशों के मूर्धन्य वैज्ञानिक हजारों की संख्या में इसी प्रयोजन के लिए दिन रात अथक श्रम कर रहे हैं। बदले में उन्हें ऊंची तनख्वाहें तथा सुविधाएँ मिल रही हैं। इससे अधिक उन्हें चाहिए ही क्या?
दो महायुद्ध बीत चुके। तीसरे की जोर-शोर से तैयारी है। आधुनिक विज्ञान इसी प्रयास में लगा है कि जिस प्रकार दो युद्धों में करोड़ों व्यक्ति मारे गये और विपुल संख्या में उनके परिवार बिलखते रह गये। इस बार उससे भी अधिक भयंकर विनाश लीला रचकर दिखाई जाये। सो हर देश सोचने लगा है कि उसके पास ऐसे वैज्ञानिक उपकरण हों कि वह समस्त संसार को पैरों तले रौंदकर स्वयं ही अधिपति बन सके। ऐसे ही आयुध उपकरण निरंतर बन भी रहे हैं।
एक समय था जब वैज्ञानिकों का ध्यान जन सुविधा की ओर था। वे अपना कर्त्तव्य धर्म यह समझते थे कि संसार में सुविधा और उन्नति के साधन विकसित किये जायें। उस मनःस्थिति में कुछ ही समय के भीतर उतनी मशीनें आविष्कृत हुईं जिनकी प्रशंसा तब भी हुई थी, अब भी हो रही है और भविष्य में भी आधुनिक सुविधाओं के विकास के बावजूद होती रहेगी।
घरेलू उपयोग की वस्तुओं में सेफ्टी रेजर, थर्मस, धुलाई की मशीन, रेफ्रिजरेटर तथा स्टेन लैस स्टील के बर्तन इसी बीच बनने लगे थे। वातानुकूलित कमरे, इलेक्ट्रिक सैल, नकली रेशम, बिजली के बल्ब, प्लास्टिक का सामान, बेल्डिंग, पनडुब्बी के जैसे आविष्कार भी इन्हीं दस वर्षों में हुए।
सन् 1910 से 1930 के बीच उपरोक्त आविष्कारों में इतना अधिक सुधार और विकास हुआ कि वे कुछ व्यक्तियों तक सीमित न रहकर सर्वसाधारण के काम आने लगे। ग्रामोफोन और उनके रिकार्ड बनने लगे। सिनेमा घर हर बड़े नगर कस्बे में स्थापित होने लगे। पैट्रोल का स्थान डीजल लेने लगा।
अब ऐसे आविष्कारों की आवश्यकता नहीं रही, सो बात नहीं है। बढ़ती हुई जनसंख्या ने मनुष्य की अगणित आवश्यकताएँ बढ़ा दी हैं। गरीबी और बेकारी निरन्तर बढ़ रही है। इसे दूर करने के लिए छोटे-छोटे ऐसे यन्त्र बनाने की अत्यधिक आवश्यकता है जो छोटे गाँवों में भी लगाये जा सकें और बढ़ी हुआ आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। किन्तु यह बन पड़ना तभी सम्भव है जब हमारे मूर्धन्य राजनैतिक व वैज्ञानिक जन साधारण की आवश्यकताओं पर ध्यान दे सकें। प्रतिभा का, मति का, सही उपयोग हो सके, आज तो सबके सिर पर क्षमताओं को कुण्ठित करने वाला महाविनाश का दैत्य ही अपना आधिपत्य जमाये हुए है। नीतिमत्ता को बुद्धिमत्ता पर अपना अंकुश अगले दिनों जमाना ही होगा। उसी में मानव के धरती पर अवतरण की सार्थकता है।
गीताकार ने समता अपनाने और कर्म की कुशलता को योग कहा है। आत्मा को परमात्मा में मिला देने को भी।
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जिस भी साधना से दुष्प्रवृत्तियां तपाई, जलाई जा सकें ऐसा कोई भी कृत्य तप है।
गायत्री महाशक्ति का उपयोग दक्षिण मार्गी भी है और वाममार्गी भी। दक्षिण मार्ग, अर्थात् सीधा रास्ता शुभ लक्ष्य तक ले जाने वाला रास्ता। वाम मार्ग माने कठिन रास्ता- भयानक लक्ष्य तक ले पहुँचने वाला रास्ता।
चाकू के दोनों ही प्रयोग हो सकते हैं- कागज काटने, पेन्सिल बनाने, फल काटने आदि के उपयोगी कार्यों के लिए भी और किसी को चोट पहुँचाने, अंग-भंग करने- प्राण लेने के लिए भी। यह प्रयोक्ता की समझ ओर चेष्टा के ऊपर निर्भर है कि वह उसका किस प्रकार उपयोग करे।
गायत्री का दक्षिण मार्गी प्रयोग हमने सीखा और सिखाया है। वह व्यक्तित्वों का परिष्कार करती है। जन स्तर को ऊँचा उठाना एक बहुत बड़ा काम है। वह सदा सर्वदा प्रयोग करने योग्य है। उसमें लाभ-ही-लाभ है। भले ही वह समग्र विधान के अभाव में सीमित प्रतिफल प्रस्तुत करे, पर उसमें किसी प्रकार की हानि की- प्रतिकूल परिणति की आशंका नहीं है। माचिस का प्रयोग भी चाकू जैसा ही है। उससे आग जलाकर शीत से बचने, भोजन पकाने, शतपुटी आयुर्वेदीय रसायनें- रस भस्में बनाने जैसे उपयोगी कार्य भी हो सकते हैं और ऐसा भी हो सकता है कि उसी माचिस से घर में आग लगाकर समूचे गाँव को भस्म कर दिया जाये। आग लगाकर आत्महत्या भी की जा सकती है और किसी दूसरे का प्राण हरण भी हो सकता है।
गायत्री के तान्त्रिक प्रयोग भी हैं। देवी भागवत में गायत्री तन्त्र का एक स्वतन्त्र प्रकरण भी है। विश्वामित्र कल्प में उसके विशेष विधानों का वर्णन है। लंकेश तंत्र में भी उसकी विधियाँ हैं, पर हैं वे सभी संकेत मात्र! तान्त्रिक प्रयोगों को गोपनीय इसलिए रखा जाता है कि उसे कुपात्र की जानकारी में पहुँचा देने से भस्मासुर जैसे संकट बताने सिखाने वाले के लिए भी खड़े किये जा सकते हैं। द्रोणाचार्य ने जिन शिष्यों को वाण विद्या सिखाई थी, उन्होंने उसी शिक्षा के सहारे शिक्षक का ही कचूमर निकाल दिया। इसलिए उसके प्रयोगों को, विधानों को गुरु परम्परा में ही आगे बढ़ाया जाता है, ताकि पात्रता की परख करने के उपरान्त ही शिक्षण का प्रयोग आगे बढ़े।
रावण वेदों का विद्वान था। उसने चारों वेदों के भाष्य भी किये थे, जिनमें से कोई-कोई भाग अभी भी मिलते हैं, पर उसने वेदमाता गायत्री का वाम मार्ग अपना कर उसे अनर्थकारी प्रयोजनों में ही लगाया, स्वार्थ ही साधे, सोने की लंका बनाई, पारिवारियों को अपने जैसा ही दुष्ट बनाया, देवताओं को सताया, मारीच को वेश बदलने की विद्या सिखाकर सीता हरण का षड्यन्त्र बनाया। इन तात्कालिक सफलताओं का लाभ लेते हुए भी अन्ततः अपना सर्वनाश किया और अनेकों ऋषि-मुनियों को त्रास देने में कोई कमी न रखी। यही है तन्त्र मार्ग- वाममार्ग। यह मनुष्य की अपनी इच्छा है कि शक्तियों को सत्प्रयोजनों में लगाये या अनर्थ के लिए प्रयुक्त करे।
तन्त्र मार्ग एक प्रकार की भौतिकी है। उसकी परिधि भी सीमित है और प्रयोग भी कुछ दुर्बल स्तर के लोगों पर ही हो सकता है। बहेलिये लोमड़ी, खरगोश, कबूतर जैसे प्राणियों पर ही घात लगाते हैं। उनकी हिम्मत शेर, बाघ, चीते, घड़ियाल जैसे जानवर पकड़ने की नहीं होती। उनकी खाल की कीमत भी बहुत मिल सकती है, पर साथ में जान जोखिम का खतरा भी है। इसलिए प्रहार दुर्बलों पर ही होते हैं। जाल में वे ही फँसते हैं।
तान्त्रिक प्रयोग भी मनस्वी लोगों पर नहीं चलते। उनकी तेजस्विता से टकराकर वापस लौट आते हैं। ऐसा न होता तो हिटलर, मुसोलिनी जैसे खलनायकों को तो किसी तान्त्रिक ने ही मार दिया होता। पुरातन काल में तंत्र प्रचलित था। पर वह वृत्रासुर, महिषासुर, हिरण्यकश्यपु जैसों पर नहीं चला। हीन मनोभूमि के लोग उसे गुलेल की तरह दुर्बल प्राणियों को आहत करने में ही प्रयुक्त करते हैं। हिप्नोटिज्म में भी दुर्बल मन वाले लोग से प्रभावित होते हैं।
तन्त्र के अनेक माध्यम हैं। उन्हीं में एक गायत्री तन्त्र भी है। उसकी साधना किसी व्यक्ति विशेष को ही हानि पहुँचा सकती है। व्यापक क्षेत्र में उसका प्रयोग नहीं हो सकता। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन आदि प्रयोगों के तन्त्र विधान हैं। इनमें किसी व्यक्ति विशेष को कठिनाइयों में फँसाया जा सकता है, प्रतिशोध लिया जा सकता है, पर ऐसा कुछ नहीं है जिसमें किसी को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने या संकट से उबारने का उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा हो सके।
गायत्री त्रिपदा है। दक्षिण मार्ग में उसका सही स्वरूप प्रयुक्त होता है। ब्राह्मी, वैष्णवी, शाम्भवी के रूप में वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता के रूप में उसका तत्वज्ञान हृदयंगम किया जाता है और विधान अपनाया जाता है। किन्तु जब उसका तान्त्रिक प्रयोग करना हो तो वह नाम रूप नहीं रहता। तब उसे त्रिपुरा या ‘त्रिपुर भैरवी’ कहते हैं। यह शिव के भूत-पिशाचों में सम्मिलित है। इसे ‘रौद्री’ या ‘चण्डी’ कहते हैं। यह तमोगुणी शक्तियाँ हैं और अनर्थ करने में ही समर्थ हैं। रक्तपात में ही उन्हें मजा आता है, किन्तु साथ ही यह जोखिम भी है कि वह तनिक-सी भूल हो जाने पर अपना क्रोध उलटकर प्रयोक्ता पर ही निकाल दे और उसे उन्मादी, उद्धत, अपराधी स्तर का बना दे। दूसरे को हानि पहुँचाने वाले, प्रयोग उलटा पड़ने पर स्वयं भी कम जोखिम नहीं उठाते हैं। व्यभिचारी जूतों से पिटते, हत्यारे फाँसी पर चढ़ते और उद्दण्ड घूँसे का जवाब लाठी से प्राप्त करते देखे गये हैं। इसलिए तन्त्र साधना को प्रोत्साहन नहीं दिया गया, उसे गोपनीय रखा गया है।
बन्दूक की गोली आगे को चलती है, पर चलते समय पीछे को धक्का भी मारती है। यदि चलाने वाला अनाड़ी हुआ तो अपनी हँसली की हड्डी तोड़ लेता है। ऐसे लोग निन्दा के पात्र तो बनते ही हैं, उनका कोई सच्चा मित्र नहीं बनता, क्योंकि डर लगा रहता है कि अनैतिक व्यक्ति तनिक से कारण पर मित्र से शत्रु बन सकता है, आज सहयोगी है, कल अनर्थ करने पर उतारू हो सकता है। इसलिए गायत्री उपासकों से दक्षिण मार्गी साधना करने और माता जैसा स्नेह-दुलार का रिश्ता बनाने के लिए कहा गया है।
गायत्री के तान्त्रिक प्रयोगों में ब्रह्मदण्ड, ब्रह्मास्त्र और ब्रह्मशीर्ष के प्रयोग का वर्णन आता है। दण्ड कहते हैं लाठी को या प्रताड़ना को। ब्रह्मदण्ड का प्रयोक्ता किसी को आर्थिक, पारिवारिक, शारीरिक, मानसिक क्षति पहुँचा सकता है। डंडे से पीटने की तरह या न्यायाधीश द्वारा दिये गये जेल जुर्माने की सजा की तरह। ब्रह्मास्त्र इससे बड़ा हथियार है। वह व्यर्थ नहीं जाता। उसमें सिंह से लड़ने जैसा पराक्रम और जोखिम उठाना पड़ता है। मेघनाद ने लक्ष्मण जी पर ब्रह्मास्त्र का ही प्रहार किया था। कोई दूसरा होता तो निश्चय ही जान से हाथ धो बैठता। स्वयं शेष जी के अवतार होने तथा सुखेन वैद्य और हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी की व्यवस्था करने पर ही उनके प्राण बच सके।
ब्रह्मशीर्ष दुर्बुद्धि उत्पन्न करने के काम आता है। जिस पर यह प्रयोग होता है वह सन्मार्ग छोड़कर कुमार्ग अपनाता है, दुर्बुद्धि का आश्रय लेता है। हर आक्रमणकारी आरम्भ में सामने वाले के असावधान होने के कारण लाभ उठा लेता है पर जब लोकमत और शासन उसके विरुद्ध पड़ता है तो साँसारिक क्षति भी कम नहीं उठानी पड़ती। इसके अतिरिक्त ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था का अपना विधान है, उससे किसी का बच निकलना नितान्त असम्भव है। देर भले ही लगे पर अनाचारी अपने कुकृत्य का फल अवश्य पाते हैं। देर हो सकती है, पर इस विश्व व्यवस्था में अन्धेर नहीं है। इसलिए तन्त्र विज्ञान का गोपनीय ही रखा गया है और चाहे जिसके हाथ में थमा देने का निषेध किया गया है। रिवाल्वर को खिलौने की तरह खेलने के लिए नहीं दिया जा सकता।
विज्ञान का प्रत्येक पक्ष हर किसी के लिए खुला नहीं होता। अणु बम बनाने वाले देश उसके रहस्यों को दूसरे देशों को बताने के लिए तैयार नहीं होते। उसे नितान्त गोपनीय रखते हैं। अमेरिका स्टार वार की तैयारी वाले अस्त्र बना रहा है, पर उनकी प्रक्रिया इतनी गोपनीय रखी जा रही है कि रूस को या अन्य किसी देश को उसकी जानकारी न मिल जाये। इसलिए काम करने वाले वैज्ञानिकों की भी इतनी चौकीदारी रखी जाती है कि उनका कोई देश अपहरण न कर ले अथवा किसी रीति से उनके निर्माण की विधि जानकर उसकी वरिष्ठता छीनकर समानता की प्रतिद्वंद्विता न करने लगे।
तन्त्र ऐसा ही गोपनीय है। उसमें विपक्ष के बलिष्ठ हो जाने और अपने पक्ष की वरिष्ठता छिन जाने का खतरा तो है। एक और भी बड़ी बात है दुरुपयोग करके अपना या पराया अनर्थ न होने लगे। बारूद के गोदाम में किसी प्रकार एक चिनगारी जा पहुँचे तो विरोधी का नहीं, निर्माता एवं संग्राहक का ही अनर्थ होगा।
बच्चे अपनी ही होते हैं, पर उनसे पैसा-आभूषण आदि छिपाते हैं। भेद पूछकर कोई चोर-उचक्का उन्हें लूट सकता है। वे बच्चों के हाथ पड़े तो भी उनसे छिन जाने का या जान जाने का खतरा है। वे लोभ में तो कोई ऐसी चीज भी खरीद सकते हैं, जिनसे उनको या परिवार को भारी हानि सहन करनी पड़े। पैसा चुराकर शराब खरीदा जावे और उसे पी मरे, तो पैसा भी गया, बालक भी गया और सावधानी न बरतने के कारण अपनी भर्त्सना भी हुई।
वरदान देने की शक्ति दक्षिण मार्गी साधनाओं से जाती है और शाप देने की तान्त्रिक विधानों से। दुर्वासा के बारे में प्रसिद्ध है कि वे जरा-जरा सी बात से तुनक कर चाहे जिसको शाप दे डालते थे और पीछे पछताते थे। अम्बरीष को, शकुन्तला को शाप देकर उन निर्दोषों को कष्ट में डाला और स्वयं बदनाम हुए। तान्त्रिक साधना का विधान हो ऐसा है, जिसमें साधक नीति-अनीति का बोध खो बैठता है और अपना दर्प दिखाने के लिए जिस-तिस के छोटे कारणों से आक्रोश में भर शाप देने लगता है।
जिस प्रकार दक्षिण मार्गी साधनाओं में गायत्री महाशक्ति को धारण करके पात्रता विकसित करने के लिए अधिक-से-अधिक पवित्र और सात्विक बनना पड़ता है। उसी प्रकार तान्त्रिकों को क्रूर कर्म करने के लिए स्वयं भी क्रूर-अनाचारी बनना पड़ता है, ताकि उस प्रयोग को करते समय मन में आत्मग्लानि न उठे। आत्मा को दबाने, दबोचने और अपवित्रता, दुस्साहसिकता से भरे-पूरे ही तन्त्र साधना के प्रयोग पहले साधक को अपने ऊपर करने पड़ते हैं।
हत्यारे अक्सर उस क्रूर कर्म को करने से पूर्व डटकर मद्यपान कर लेते हैं, ताकि उस कृत्य को करते हुए आत्मा में करुणा न उपजे और हाथ न रुकें। तान्त्रिकी साधना अक्सर श्मशानों में होती है। मुर्दों की चिताओं पर भोजन पकाते-खाते हैं। कापालिक मनुष्य के कपालों में भोजन करते, पानी पीते और मुण्ड-मालाएँ गले में लटकाये रहते हैं। अघोरी मल-मूत्र तक खा जाते हैं, ताकि अनौचित्य के प्रति घृणा भाव समाप्त हो जाये।
वाम मार्ग में साधक को पंच मकारों का अभ्यास करना पड़ता है- (1) मघं (2) मासं च (3) मीनं च (4) मुद्रा (5) मैथुन एव च। यह पाँचों मकार हेय कर्म हैं। शराब, गाँजा, भाँग आदि तीव्र नशों का सेवन। माँस भक्षण और इस प्रयोजन के लिए देवता के नाम पर पशु-पक्षियों का ही नहीं, मनुष्यों तक को वध करना। मछली, मेढ़क जैसे आसानी से मिल सकने वाले प्राणियों की आये दिन हत्या करना और उन्हें भूनते-तलते रहना। मुद्रा का एक अर्थ भयंकर आकृति बना कर त्रिशूल जैसे शस्त्र लेकर नग्न नृत्य करना भी है और अनीति युक्त धन संग्रह करना भी, ताकि उसके सहारे व्यभिचार-बलात्कार आदि कुकृत्य किये जा सकें। बुद्धकाल में ऐसे वाममार्गी अनाचार शस्त्रों और देवताओं के नाम पर चल रहे थे। भगवान बुद्ध ने इस अनाचार के विरुद्ध क्रान्ति की और जिन शास्त्रों में ऐसा उल्लेख और जो देवता ऐसे क्रूर कर्म में सहायता करते हैं, उन्हें मान्यता देने से इन्कार कर दिया।
उस अनाचार को घटाने और मिटाने के लिए- अहिंसा धर्म का प्रचार करने के लिए उन्हें संगठित संघर्ष करना पड़ा। यहाँ तक कि देववाद ही नहीं, ईश्वरवाद तक का खण्डन करने, अपने को शून्यवादी तक घोषित करना पड़ा। हमने भी तन्त्रवाद से सर्वथा असहयोग रखा है। न सीखा है, न किसी को सिखाया है।
प्रकारान्तर से यह तान्त्रिक मनोवृत्ति अनायास ही लोगों के स्वभाव में बरसात के उद्भिजों की भाँति ही पनप रही है। ऐसी दशा में कहीं तान्त्रिक विधान का आश्रय भी मिल जाये, तो स्थिति दुर्गति की चरम सीमा तक जा पहुँचेगी।
यहाँ स्थिति का स्पष्टीकरण इसलिए करना पड़ा कि सावित्री की सविता की प्रचण्डता देखते हुए कोई उसकी संगति तान्त्रिक विधान या विज्ञान के साथ न जोड़ने लगे। सविता परब्रह्म का स्वरूप है और सावित्री उसकी ब्राह्मी शक्ति। वह आदि से अन्त तक सात्विकता से सराबोर है। किन्तु सार्वजनिक और विशाल-प्रचण्ड कार्यों के लिए उसका प्रयोग आवश्यक हो जाता है। इसलिए उस विज्ञान पर प्रकाश डालना पड़ा, उसे पुनर्जीवन देना पड़ा और स्वयं भी उसकी साधना में संलग्न होना पड़ा। इसे बिना हम या हमारे अनुयायी निजी व्यक्तित्व की दृष्टि से कितने ही परिष्कृत क्यों न हों निजी व्यक्तित्व में भले ही स्वर्ग मुक्ति या दूसरों की सीमित भलाई कर सकने वाली शक्ति क्यों न प्राप्त कर लें, विश्व कल्याण एवं युग परिवर्तन के लिए उससे बड़ी शक्ति चाहिए। वही है सविता महाकाल की महाकाली सावित्री।
बाहर के कौतूहलों को देखने भर से किसी की प्यास नहीं बुझती। देखने योग्य भीतर है। उसी को खोजों और भावनापूर्वक देखो।
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ईश्वर कैसा है और कहाँ है? इस झंझट में भले ही न पड़ो पर यह तो देखो कि तुम्हें किस लिए बनाया और किस तरह जीने के लिए कहा।
शतं जीवो शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ता ऋतणु वसतान्। -अथर्व.
हे याज्ञिक तू सौ वर्ष तक बलवान होकर जी। सौ शीत और बसन्त ऋतुओं को इसी जीवन में देख।
गुजरात के एक देहात में जन्मे सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टरी पास की थी और उनकी वकालत भी अच्छी चल रही थी। पर जब स्वतन्त्रता का शंख बजा, तो वे अपने घरेलू जीवन से मुक्त होकर पूरी निष्ठा के साथ उसी एक कार्य में लग गये। उनके पराक्रमों का इतिहास ऐसा है, जिसके कारण उन्हें लौह पुरुष की संज्ञा दी जाती थी।
वारदोली का लगान बन्दी आन्दोलन, नागपुर का झण्डा सत्याग्रह, करो या मरो का नारा, गुजरात विद्यापीठ की स्थापना जैसे अनेकों कार्य ऐसे हैं, जिनमें उनके पराक्रम को अविस्मरणीय ही कहा जायेगा। उन्हें कितनी ही बार जेल जाना पड़ा।
स्वराज्य के बाद इतनी समस्यायें अंग्रेजों ने छोड़ी थीं, जिनसे सभी चिन्तित थे। 600 रजवाड़ों को भारत में मिलाना। जूनागढ़ और हैदराबाद की पाकिस्तान परस्ती को नीचा दिखाना, उन्हीं का काम था। पाकिस्तान का बंटवारा होने के बाद जो दंगे हुए, उनसे निपटने में उनकी महती भूमिका थी। पटेल यों केन्द्रीय सरकार के गृहमन्त्री थे, पर उन्हें भारत का हृदय सम्राट ही कहना चाहिए।
इस वर्ष का एक अति महत्वपूर्ण निर्धारण
युग परिवर्तन के प्रयासों को मानवकृत नहीं मानना चाहिए, अन्यथा उसमें ढेरों त्रुटियाँ रहतीं, ढेरों विरोध या असहयोग करते , ढेरों बीच-बीच में ऐसे व्यवधान खड़े हो जाते, जिनका समाधान ही नहीं हो पाता। सफलता मिलती भी, तो बहुत धीमी गति से क्योंकि लोकरुचि में मनोरंजन और उद्धत आचरणों के प्रति ही रुझान है। वे अनायास ही बढ़ते और फलते-फूलते हैं। उनके लिए समय और धन लगाने वाले भी असंख्यों हो जाते हैं, साथ ही सत्प्रयोजनों का उपहास करने वाले एवं अड़ंगे अटकाने वालों की भी कमी नहीं रहती। ऐसा इस योजना में सर्वथा न हुआ हो, सो बात तो नहीं है, पर सफलताओं को देखते हुए अड़चनों का अनुपात नगण्य रहा है। ऐसी कल्पना नहीं की गई थी। मनुष्यकृत आन्दोलन अनेकों उठे और पानी के बबूले की तरह फूट गये, जबकि उनके पीछे प्रतिभा और संपदा की कमी नहीं थी, पर युग परिवर्तन में यह विचित्रता रही कि दो घण्टे समय और बीस पैसा नित्य जैसे अनुपम आधार को अपनाकर वह उमग उठा, बढ़ा और देखते-देखते अपनी शाखा-प्रशाखाओं से समूचे देश को एवं विश्व को भी आच्छादित करने लगा। दो दशाब्दियों पहले उसका श्रीगणेश हुआ और इतनी-सी कम अवधि में उसने विशालकाय कल्पवृक्ष की तरह लाखों की संख्या में अपने पत्र-पल्लव विनिर्मित और सुविस्तृत कर लिये।
भूतकाल के कृत्यों के सम्बन्ध में मिशन के सघन परिचय में आने वालों को अब तक की गतिविधियों का परिचय है। जो जान-बूझकर अविज्ञात रखी गई हैं, उनका विवरण भी समय आने पर प्रकट और प्रतीत होता जायेगा। उदाहरण के लिए जहाँ समस्त विश्व में एक स्वर से विनाश की सम्भावनाओं को सुनिश्चित बताया जा रहा है, उसके कारण प्रमाण, तर्क और तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं, वहाँ सिर्फ एक आवाज उठी है कि ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा नहीं होने दिया जायेगा। समस्त विश्व की चिन्ता एक ओर, और दूसरी ओर एक आदमी का निश्चय और उद्घोष कि कोई डरे नहीं, सभी निश्चिन्त रहें। इस विश्व-वसुधा के ऊपर इतनी बड़ी ढाल तानी गई है कि उसे वेध सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। कठिनाइयाँ न आयें, सो बात नहीं, पर वे समयानुसार निरस्त होती चलेंगी। सृजन की आवश्यकताऐं बहुत बढ़ी हैं इतनी बड़ी कि उनका जुट सकना आज तो असम्भव जैसा दीखता है, पर यह पंक्तियाँ कह रही हैं कि हर साधन जुटता जायेगा। कौन जुटायेगा? कैसे जुटायेगा? इसका उल्लेख यहाँ आवश्यक नहीं, क्योंकि जब परोक्ष कर्त्तृत्व किसी महान सत्ता का है, तो व्यक्ति विशेष को श्रेय देना व्यर्थ है, उसका अहंकार बढ़ाने के समान है। इस प्रकार की बढ़ोत्तरी से संसार में कोई उठा नहीं, वरन् गिरा ही है। इसलिए कहा इतना भर जा रहा है कि विनाश की विभीषिकाएँ निरस्त होंगी और विकास उस तेजी से बढ़ेगा जिसकी घोषणा करना तो दूर, आज तो उसकी रूपरेखा तक समझना कठिन है, क्योंकि उस कथन को भी अत्युक्ति समझा जा सकता है।
कुछ दिन पूर्व मिशन की गतिविधियों के समाचार छापने का प्रबन्ध किया गया था, पर अब तो वह किसी प्रकार सम्भव नहीं रहा। एक भरापूरा दैनिक यदि 40 पृष्ठों का छपे, तब कहीं लोगों की कृतियों का उल्लेख सार-संक्षेप बनाकर छापा जा सकता है। जिन्हें अपना नाम छपाने की उतावली है, वे अपने अलग अखबार छाप भी रहे हैं, पर उनमें समस्त विश्व की विशालकाय गतिविधियों का उल्लेख एवं समावेश सम्भव नहीं। अच्छा हो, लोग मिशन को ही अपना अध्यात्म स्वरूप मान लें और समझ लें कि यह मत्स्यावतार इतना छोटा नहीं है, जिसे चुल्लू में भरा जा सके।
पिछले दिनों जो हो चुका है उसका उल्लेख करना आवश्यक है। उस संदर्भ में इतना ही समझ लेना चाहिए कि प्रत्येक बसन्त पर्व एक नया तूफानी उभार साथ लाता है और वह आरम्भ में असाध्य या कष्टसाध्य दीखते हुए भी समय के साथ बढ़ता और फूलता जाता है। तालाब में घनघोर वर्षा का पानी जितना बढ़ता है उसी हिसाब से कमल का डण्ठल भी रातों-रात बढ़ जाता है और फूल पानी में डूबने नहीं पाता, वरन् ऊपर ही उठा आ दीखता है। इसी प्रकार भावी कार्यक्रमों की जो घनघोर वर्षा बरसती है बसन्त के उपरान्त प्रतीत होता है कि उसके साधन भी उसी अनुपात में बरसे और अभावों एवं संकटों का उतना सामना नहीं करना पड़ा, जितना कि कल्पना की गई थी। कोई शक्ति कठिन को सरल बनाती गई और समुद्र पर पुल बँधता चला गया।
जिन दिनाँक यह पंक्तियाँ पाठकों को पढ़ने के लिए मिलेंगी, तब तक सन् 86 के बसन्त पर्व का माहौल होगा और वह जिज्ञासा पूरी हो जायेगी कि इस बसन्त पर देवी प्रेरणा ने अन्तरिक्ष से स्वाति कणों की कैसी व कितनी घटाटोप वर्षा की है।
अगले वर्ष से बसन्त पर्व के तुरन्त उपरान्त ही वे कार्यक्रम चल पड़ेंगे, जिन्हें वर्गीकरण की दृष्टि से दो विभागों में भी बाँटा जा सकता है। समय के सेकेण्ड- मिली सेकेण्ड जैसे अगणित भाग हो सकते हैं, पर उसे सुविधा की दृष्टि से दो भागों में भी बाँटा जा सकता है- एक दिन, दूसरी रात। इसी प्रकार प्रस्तुत बसन्त के उपरान्त दो कार्यक्रम चलेंगे, पर उनकी शाखा-प्रशाखाएँ इतनी होंगी जिनकी संख्या की गिनती एक शब्द ‘अगणित’ में ही करनी होगी।
एक कार्य है- देश के गाँव-गाँव में युग चेतना का सन्देश सुनाना, जन-जन के मन-मन में अलख जगाना। दूसरा कार्य है- देश के अपेक्षित अर्धमृत तीर्थों में प्राण फूँकना, उनका पुनरुद्धार करना। कहने और सुनने में यह दोनों योजनाएँ कुछ ही क्षणों में कहीं और सुनी जा सकती हैं, उनका विस्तार इतना बड़ा है, जिसे मानवी कर्तृत्व से बाहर की बात समझा जाये, तो भी अत्युक्ति न होगी।
भारत में बड़े सात लाख गाँव हैं। नगले, छोटे कस्बे, मजरे जोड़कर वे बीस लाख हो जाते हैं। इन सभी गाँवों में युग चेतना की जानकारी पहुँचानी और उसके सिद्धान्त समझाने हैं। प्रज्ञायुग का अवतरण समीप है। उसमें दूरदर्शी विवेकशीलता का स्वरूप उद्देश्य और व्यवहार जन-जन को समझाना है, साथ ही प्रस्तुत अवाँछनीयता, अनैतिकता, मूढ़-मान्यता तथा कुरीतियों के कारण होने वाले भयंकर अनर्थों से भी अवगत कराया जाना है। हमें अगले दिनों जिस समता, एकता, सहकारिता, सज्जनता की नीति को अपनाना है, उसके महत्व को भी हृदयंगम कराना है। प्रज्ञायुग के चार आधार होंगे- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी। इन सब बातों के लिए मनों में गुंजाइश पैदा करनी है और प्रचलन के नाम पर जो अविवेक और अनर्थ हर दिशा में छाया हुआ है, उसका उन्मूलन भी करना है। यह कृत्य “हम बदलेंगे, युग बदलेगा” की नीति के अनुरूप चलेगा और “नर और नारी एक समान, जाति वंश सब एक समान” का आदर्श हृदयंगम करने पर ही सम्भव होगा। इन दिनों नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में अनेकों अनीतियाँ प्रचलित हैं। उनके विरुद्ध जनमत और आक्रोश भी जागृत करना है। विषमता का हर क्षेत्र में बाहुल्य है। उनके स्थान पर एकता और समता के सिद्धान्तों को मान्यता मिल सके, ऐसा वातावरण बनाना है।
इसके लिए जन-संपर्क साधने की आवश्यकता होगी। हर भाषा में सस्ता प्रचार साहित्य छपना है और दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन का प्रचलन इस स्तर पर करना है, जिसे शिक्षित पढ़ सकें और अशिक्षित पढ़ों द्वारा सुन सकें। यह प्रचार कार्य परस्पर वार्त्तालाप द्वारा छोटी गोष्ठियों द्वारा और बड़े सम्मेलनों द्वारा चल पड़ेगा, तो एक व्यक्ति भी ऐसा न रहने पायेगा, जिसे युग परिवर्तन का आभास न मिले और आदर्शों को अपनाने का वातावरण न बने।
इसके लिए जहाँ जैसा सुयोग बनेगा, विचार विनिमय प्रवचन एवं वक्ताओं द्वारा छोटे बड़े समूहों को इस प्रकार समझाने का प्रयत्न चलेगा तो लोगों को अन्तराल की गहराई तक प्रवेश करता चला जाये। अभीष्ट प्रयोजन के लिए लेखनी और वाणी द्वारा तो प्रचण्ड प्रचार कार्य चलाया ही जाएगा, साथ ही बरसाती हरीतिमा की तरह दिन दूने रात चौगुने वेग से बढ़ने वाली प्रज्ञा परिजनों की हरीतिमा को इतना शौर्य पराक्रम प्रस्तुत करने के लिए भी कटिबद्ध किया जायेगा कि वे अपने निज के क्रियाकलापों के द्वारा असंख्यों के सामने अनुकरणीय आदर्श भी प्रस्तुत कर सकें। मनुष्य का स्वभाव अनुकरणशील है। इन दिनों दुष्प्रवृत्तियां और दुर्भावनाएँ भी एक से दूसरे ने सीखी हैं। तब यह भी असम्भव नहीं कि अग्रगामी व्रतशील जब सत्प्रयोजनों के लिए अपना आदर्श प्रस्तुत करें तो उसका अनुकरण दूसरे लोग न करें। जब दुर्बुद्धि की छूत एक से दूसरे को लगी है तो कोई कारण नहीं कि शक्तिशाली सदाशयता का प्रभाव एक दूसरे पर न पड़े। जब कुछ ही दिनों में ईसाई धर्म और साम्यवादी सिद्धान्तों ने अधिकाँश जन समुदाय को अपने अंचल में समेट लिया तो यह नितान्त असम्भव नहीं कि उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और सौम्य व्यवहार का प्रभाव एक दूसरे पर न पड़े और आज की अवाँछनीय परिस्थितियाँ बदली हुई मनःस्थिति के आधार पर उलट न सकें।
यह है जन संपर्क प्रक्रिया जिसे प्राचीन काल के धर्मपरायण व्यक्ति “अलख जगाना” या आलोक वितरण कहते थे। कोई कारण नहीं कि एक समय जो सम्भव हो सका व उन्हीं प्रयत्नों के आधार पर दूसरी बार सम्भव न हो सके। चिरकाल तक सतयुगी वातावरण इसी धरती पर रहा है तो कोई कारण नहीं कि उसकी वापसी न हो सके। सूर्य अस्त होने के बाद जब दूसरे दिन फिर अरुणोदय के रूप में प्रकट हो सकता है तो सतयुग के अभिनव प्रज्ञा युग के रूप में पुनरावर्तन हो सकने में शंका क्यों अभिव्यक्त की जाये?
ब्रह्मपरायण वर्ग सदा से धर्म धारणा और भाव सम्वेदना का संरक्षक रहा है तो कोई कारण नहीं कि नवयुग के सृजन शिल्पी उस परम्परा को पुनर्जीवित करके और स्वार्थ को ठुकराकर विश्व मानव की हित साधना के लिए लोभ, मोह और अहंकार का परित्याग करके राष्ट्र को जीवित और जागृत रख सकने वाले पुरोहितों के रूप में नये सिरे से प्रकट न हो सकें। दूब मरती नहीं। गर्मी में सूख जाती है किन्तु पहली वर्षा होते ही वह इतनी तेजी से उठती है कि धरातल पर मखमली फर्श बिछा देती है। क्षुद्र संकीर्णता से ऊँचे उठने वाली आत्माओं का बीज नाश नहीं हुआ है। युग चेतना की पावस आते ही वे लोक प्रचलन का कायाकल्प कर सकेंगी। योजना ऐसी ही बनी है कि 80 करोड़ भारतवासी देवमानवों का लोकमानस बदल सकें और उनके पराक्रम से संसार भर का वातावरण बदल सकें। प्राचीन काल में भारत के देव-मानवों ने संसार भर को अजस्र अनुदान दिये हैं। अब वह परम्परा पुनर्जीवित न हो सके ऐसा कोई कारण नहीं। पिछले दिनों छोटे से प्रयत्नों से 74 देशों में युग परिवर्तन की हवा फैल सकी तो अगले दिनों उस दिशा में सशक्त प्रयत्न किये जाने पर समस्त संसार को उस लपेट में न लिया जा सके, इसका कोई कारण नहीं।
पिछले दिनों जन जागरण के लिए, लोकमानस परिष्कार के लिए जो सामान्य प्रयत्न हुए हैं, उनने आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम उत्पन्न किये हैं तो कोई कारण नहीं कि अगले दिनों ऐसा न हो सके जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।
गत वर्षों की योजना यह रही है कि 30 जीप गाड़ियों के माध्यम से 2400 प्रज्ञापीठ और 24 हजार प्रज्ञा संस्थानों में प्रज्ञा आयोजन होते रहे हैं। जीपों में संगीत मंडलियां जाती रही हैं और प्रज्ञा पुराण की कथाओं के संदर्भ देते हुए प्रवचन होते रहे हैं।
अब अगले दिनों योजना यह है कि गाड़ियों की संख्या 100 कर दी जायेगी। जहाँ पहले आयोजन हो चुके हैं वे बार-बार अपने यहाँ की जनता तक ही सीमित न रहें वरन् यह उत्तरदायित्व उठावें कि समीपवर्ती कम से कम दो गांवों में अपने जैसे प्रज्ञा आयोजनों की व्यवस्था करें। यह कार्य उनसे कह देने मात्र से न हो सकेगा। वरन् स्वयं पूरे समय उन सम्मेलनों में साथ रहकर आदि से अन्त तक की व्यवस्था बनानी होगी। आयोजनों में अनेक प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ती है। दो रात्रियों में जन सभायें होती हैं। एक दिन स्थानीय लोगों के साथ संपर्क में लगता है। एक दिन आने जाने में लग जात है। आगे से यह व्यवस्था भी चलेगी कि रास्ते में पड़ने वाले सभी गाँवों में जीप मण्डली के लोग आदर्श वाक्य भी दीवारों पर लिखते चलेंगे जिससे उधर से निकलने वालों को युग चेतना की विचारधारा से अवगत होने का अवसर मिले और यह प्रतीत हो कि इस क्षेत्र में युग परिवर्तन की हवा गुजरी है। यह प्रक्रिया लगभग गत वर्षों के कार्यक्रमों से मिलती-जुलती है। अन्तर इतना ही है कि हर वर्ष एक ही गाँव या क्षेत्र में कार्यक्रम होने की अपेक्षा उस प्रकाश को अब नये गाँवों में पहुँचाना होगा।
गत वर्षों में मात्र संगीत गायन, लाउडस्पीकर, टेप रिकार्डर आदि का ही प्रबन्ध था। कहीं-कहीं वीडियो कैसेट्स भी भेजे गये थे। अगले वर्षों में यह प्रबन्ध किया जा रहा है कि माताजी और गुरुजी के प्रकाश चित्र एवं प्रवचन भी जीपों के साथ रहें। कहीं-कहीं बिजली नहीं होती ऐसी दशा में गाड़ी के साथ अपना जनरेटर भी भेजा जायेगा। ताकि बिजली के अभाव में कार्यक्रम ही रद्द न करना पड़े।
पिछले कार्यक्रमों में यह विशेषता रही है कि प्रज्ञा पीठों और प्रज्ञा संस्थानों ने हरिद्वार के भारी खर्च को देखते हुये जीप खर्च के अतिरिक्त भी कुछ आर्थिक सहायता दी है। अबकी बार चूँकि अधिकाँश नयी जगहें होंगी, उन्हें मिशन का विशेष परिचय भी नहीं होगा। इसलिए असली खर्चे से भी कहीं कम 200 रु. ही लिया जायेगा। कहीं से अधिक मिले तो बात दूसरी है।
जीपें अभी 30 हैं। नई योजना के हिसाब से यह 100 करनी पड़ेंगी। इसके लिए अर्थ प्रबन्ध की जरूरत पड़ेगी पर आशा की गई है कि जिस भगवान ने राई को पर्वत बना दिया है वे किसी न किसी प्रकार इस व्यवस्था को भी पूरी करेंगे। इस लेख से तो उन सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए कि जिनके यहाँ गत वर्षों में कोई आयोजन हो चुका है। वे अपना दायित्व समझें कि दो नये स्थानों पर उन्हें आयोजन कराने हैं और अनजानों को जानकारी देने के लिए दोनों आयोजनों में आदि से अन्त तक साथ रहते हुए यह मानना है कि यह आयोजन किन्हीं अन्यों द्वारा आमन्त्रित किया हुआ नहीं है वरन् उन्हीं के द्वारा सम्पन्न किया जा रहा है। इसलिए उसकी सफलता- असफलता भी उन्हीं की मानी जायेगी।
अगले वर्ष के लिए दूसरा कार्यक्रम है तीर्थों का जीर्णोद्धार। भारत में तीर्थ, यात्रा का सबसे अधिक पुण्यफल माना गया है। धर्म प्रचारक अपने-अपने क्षेत्रों में धर्म प्रचार की पदयात्रा करते थे। उस क्षेत्र में बने हुये देवालयों- धर्मशालाओं में प्रचार करते थे और स्थानीय जनता में धर्म प्रवचन भी करते थे। इसलिए अधिकाँश गाँवों में देवालय बने हुये थे चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों। वे भी क्षेत्रीय तीर्थ माने जा सकते हैं। आज तो जहाँ भव्य मन्दिर हैं, रेल या बस की सुविधा है, वहीं तीर्थ रह गये हैं। लोग प्रतिमा झाँकते, जलाशयों में डुबकी लगाते और चिन्ह पूजा करके घुड़दौड़ की तरह यहाँ-वहाँ भागते रहते हैं। पर प्राचीन काल में ऐसा न था। हर गाँव का मन्दिर तक तीर्थ था। तीर्थाटन करने वाले छोटे प्रवासों की परिक्रमा करके वहाँ ठहरते, आयोजन करते और आगे बढ़ते थे। अब वह न तीर्थयात्रा रही और न मन्दिरों का गौरवशाली स्वरूप। उद्देश्यों को भूलने और चिन्ह पूजा निबाहने से मन्दिर के ध्वंसावशेष तो ढेरों बन गए हैं, पर लगता है मानो इनमें से प्राण निकल गये हों। उद्देश्य पूर्ति के लिए कोई अर्थ व्यवस्था होती नहीं। जो चढ़ावा आता है वह पुजारी की जेब में चला जाता है। जिनके साथ कुछ स्थायी आजीविका लगी हुई है उनका तो दिया बत्ती जल जाता है अन्यथा वर्षों बुहारी नहीं लगती। चमगादड़, अबाबील घोंसले बना लेती हैं। प्रतिमाओं पर कबूतर बीट करते रहते हैं। दीवारों में दरार पड़ती जाती है। फर्श उखड़ते जाते हैं और धीरे-धीरे वे टूटते-फूटते समाप्त हो जाते हैं।
गणना के आधार पर जाना गया है कि ऐसे दुर्दशाग्रस्त मन्दिरों की संख्या 1 लाख के लगभग है। आने-जाने वालों की संख्या भी नहीं के बराबर होती है। उन्हें कोई सम्भालते ही नहीं तो ऐसी स्थिति होना स्वाभाविक है। यह हिन्दू धर्म पर एक कलंक है। मन्दिर अपने नाम के लिए पर देवता को प्रसन्न करके उसकी जेब काट लेने के लिए नये तो बनते जाते हैं पर यह नहीं देखते कि पुराने का जीर्णोद्धार तक न होने से समूचे समाज की विशेषतया देव भक्ति का कितना भारी उपहास या अपमान हो रहा है।
संसार में गिरजे, मस्जिद गुरुद्वारे अनेकों हैं। पर जिनने उन्हें बनाया है वे तथा उन धर्मों के अनुयायी उनकी समुचित देखभाल करते हैं। कभी उसे समाप्त करना है या बेचना हो तो ऐसी व्यवस्था करते हैं जिससे उस धर्म स्थान की उपेक्षा अवज्ञा न होने पावे। पर अपने देश में काने, कुबड़े, लंगड़े-लूले को मन्दिर बनाने का तो शौक चर्राता है पर उनकी भावी देखभाल का दायित्व संभालने का किसी को ज्ञान नहीं है।
नई योजना के अनुसार ऐसे देवालयों के जीर्णोद्धार की व्यवस्था करना है जो गाँव के समीप हैं और जिनका कुछ सदुपयोग हो सकता है। समर्थ गुरु रामदास ने जितने ही 700 के करीब महावीर मन्दिर बनाये थे, उन सबके साथ व्यायामशाला और पाठशाला, सत्संग क्रम का प्रबन्ध किया था। वे सभी सोद्देश्य थे। उनका निर्माण ऐसे स्थानों पर हुआ था जहाँ लोग आसानी से पहुँच सकें, कथा सुन सकें, बच्चों को पढ़ा सकें और व्यायामशाला चला सकें। फलतः वे कम लागत के होने के कारण दीर्घजीवी तो न हो सके पर जब तक वे रहे तब तक उनकी उपयोगिता बराबर बनी रही।
महामना मालवीय जी का विनिर्मित एक श्लोक है-
‘ग्रामे ग्रामे सभा कार्या, ग्रामे ग्रामे कथा शुभा। पाठशाला, मल्लशाला, प्रति पर्व महोत्सवा॥”
इस श्लोक में उन्होंने रामदास की व्यायामशाला, पाठशाला, कथा प्रवचन की बात का यथावत् रखते हुए सभा-संगठन एवं पर्वोत्सवों को और जोड़ दिया है अपनी योजना कुछ इसी प्रकार की है। हम चाहते हैं कि मालिकी एक की नहीं हो वरन् मन्दिरों के ट्रस्ट बनें। साथ ही हिन्दू धर्म में इतने संस्कार और पर्व होते हैं उनके लिए भी वहाँ जाया जाय ताकि सबका अपनापन उनके साथ जुड़ा रहे और साथ ही श्रमदान और धनवान से उनकी मरम्मत- शोभा सज्जा भी होती रहे। किन्तु अपना समाज भी विलक्षण है। शैक चर्रायेगा तो सभी अपना-अपना मन्दिर खड़ा कर देंगे और जब उपेक्षा होगी तो उनकी ओर कोई मुँह भी नहीं करेगा।
इस स्थिति को बदलने का मिशन का मन है। जो मन्दिर उपयोगी हैं, गाँव के समीप हैं जिनमें देवता की काल कोठरी के अतिरिक्त कोई सार्वजनिक कार्यक्रम चलाने की भी गुंजाइश है, उनकी मरम्मत कराने के लिए समस्त ग्रामवासियों को संगठित किया जाये। घरों में मुट्ठी फण्ड के घड़े रखवाये जायें अथवा जो सम्पन्न हैं। उन्हें समझाया जाय कि नया मन्दिर बनाने की अपेक्षा शास्त्रकारों ने पुरानों का जीर्णोद्धार करने का पुण्य सौ गुना अधिक बताया है। अपने इतने मन्दिर हैं कि यदि इन्हें उपयोगी बनाने का क्रम चल पड़े तो अनेकों धर्म स्थान उसे उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं जिनके लिए कि पूर्वजों ने उनका निर्माण किया था। इस प्रकार देवता हिन्दू धर्म और उसके अनुयायियों को कलंक से बचने का अवसर मिलेगा। साथ ही उन्हें निरर्थक पड़े न रहने देकर ऐसा उपयोग भी होने लगेगा, जिससे नव जीवन के चिन्ह प्रकट हों और उपहास के स्थान पर उपयोग का क्रम चल पड़े।
दूसरा कार्यक्रम इसी उद्देश्य के लिए है। सात लाख गाँव और उनके 20 लाख नगले-मजरी में से अधिकाँश को तीर्थ के रूप में परिणत किया जाये। जिस देश का कभी प्रत्येक देवालय तीर्थ था। उनकी परिक्रमाओं के अपने-अपने क्षेत्र थे। उन परिक्रमाओं के आधार पर एक स्थान के लोग दूसरे स्थानों में संपर्क साधते थे। धर्म चर्चा करते थे और जहाँ जो त्रुटि दिखाई पड़ती थी वहाँ उसे दूर करने की व्यवस्था बनाते थे। अब फिर वही क्रम चलना चाहिए। भव्य नगरों में बड़ी-बड़ी इमारतों वाले तीर्थों को ही नहीं छोटे-छोटे क्षेत्रों के देवालयों को भी तीर्थ माना जाये और उनके मार्ग में पड़ने वाले ग्रामों को धर्म प्रचार का एक प्रभाव क्षेत्र माना जाये। उनमें से जो केन्द्रीय स्थान हो जहाँ जलाशय की अच्छी व्यवस्था हो वहाँ धार्मिक मेले भरने, सभा समारोह होने के भी ऐसे दिन निर्धारित किये जायं जो एक दूसरे से टकरायें नहीं। अलग-अलग महीनों या तिथियों में अलग-अलग मेले हों और उनका उद्देश्य मात्र मनोरंजन न होकर धर्म सम्मेलन हो तो उस क्षेत्र से अन्ध परम्पराओं और रूढ़ियों का उन्मूलन हो सकता है। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए नया उत्साह जग सकता है। सामूहिक विवाह शादियों के संस्कारों के आयोजन भी हो सकते हैं। पर्वों को मनाने की प्रथा जो सिमटकर घर में देवता के नाम पर पकवान बनाने खाने तक सीमित रह गयी है। उसके पीछे छिपे हुए उद्देश्यों को जानने एवं क्रियान्वित करने का अवसर मिल सकता है।
कभी इस देश में दस हजार तीर्थ और एक हजार सरिताएं थीं, जिनके अपने-अपने माहात्म्य थे। जिन सरिताओं को पवित्र माना जाता था, उन्हें लोग शुद्ध करते थे, गहरा करते थे और उनसे प्रभावित क्षेत्र में कृषि, शाक उत्पादन आदि की बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते थे, बाँध बाँधते और नहरें निकालते थे, पर अब तो वे नदियाँ- नाला मात्र रह गई हैं। न उनके प्रति देव भावना की श्रद्धा रही, और न उनके किनारे मेलों का, धर्म सम्मेलनों का जो प्रचलन था, वह अब शेष रहा।
देव संस्कृति के पुनर्जागरण की योजना को कार्यान्वित करने के लिए समीपवर्ती क्षेत्रों के प्रतिभाशाली लोगों को आमन्त्रित करके ऐसी योजनाएँ बन सकती हैं। क्षेत्रीय जलाशयों को गहरा एवं शुद्ध बनाने की बात सोची जा सकती है। इसके लिए अपने प्रज्ञा आयोजनों का अवसर समीपवर्ती लोगों को बुलाकर उपयोगी विचार विनिमय करने की दृष्टि से बड़ा कारगर सिद्ध हो सकता है।
“तीर्थयात्रा” शब्द के साथ अभी भी बड़ी श्रद्धा जुड़ी हुई है, पर वे देश भर में फैले हुए न रहकर बड़े-बड़े शहरों तक सीमित रह गये हैं। वहाँ कोई सत्प्रवृत्तियां नहीं चलतीं, न लोकोपयोगी कार्य होते हैं। यहाँ तक कि कहीं एक स्थान पर जन-जीवन तथा सामाजिक विकृतियों के सम्बन्ध में विचार नहीं होते। देव पूजा के नाम पर कुछ लोग धन्धा भर चला लेते हैं, पर तीर्थों में कोई साधना-सत्र, धार्मिक समारोह, सामयिक समस्याओं के समाधानों के सम्बन्ध में कोई निर्धारण नहीं होते। बसों और रेलगाड़ियों को पर्यटकों की सवारियाँ भरने जैसी आर्थिक सुविधा भले ही मिल जाती हो। इसके स्थान पर भार वाहन का स्थान साइकिल से लेकर समीपवर्ती क्षेत्रों की प्रायः एक-एक सप्ताह की धर्म यात्राऐं बनायी जायें। तो उनकी लपेट में देश का हर कोना आ सकता है और अपने देहात में बसे अशिक्षित तथा पिछड़े हुए देश में एक सामाजिक क्राँति हो सकती है।
इसका सूत्र-संचालन अन्य किसी को असम्भव या कठिन प्रतीत हो सकता है, पर प्रज्ञा-परिवार के लिए यह सब तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए, क्योंकि परिजनों में धार्मिक विचारधारा एवं समाज-सुधार की भावना पहले से ही मनों में कूट-कूटकर भरी गयी है।
तीर्थयात्रा की शास्त्रकारों और आप्तजनों ने जो महिमा गायी है,वह मिथ्या नहीं है। अन्तर केवल इतना भर है कि जिस आधार पर उसकी उपयोगिता और गरिमा थी, वह एक प्रकार से समाप्त हो गई। लोकोपयोगी जिन क्रिया-कृत्यों के साथ उनके अविच्छिन्न सम्बन्ध थे, वे समाप्त हो गये और उनके स्थान पर भीड़ की धकापेल ने जेबकतरों की कारगुजारी को दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने का अवसर दिया। अब वे पर्यटन केन्द्र मात्र रह गये हैं और उस प्रयोजन को सफाचट कर रहे हैं, जिसमें साधना, श्रद्धा, आत्मशोधन, लोक हित आदि का समावेश था।
जिस मार्ग पर तीर्थों की दिशाधारा चल रही है, यदि वही चलती रही, तो लोग पिकनिक के लिए उपयुक्त स्थानों में जाना पसन्द करेंगे। जहाँ तीर्थों की गरिमा और पिकनिक की सुविधा दोनों ही न हों, वहाँ जाकर लोग करेंगे क्या? यही कारण है कि तीर्थों में जिन धार्मिक मेलों में भारी भीड़ होती थी, अब वहाँ आधी चौथाई मात्र में अन्ध-विश्वासी भर पहुँचते हैं।
यह स्थिति दयनीय है। हमें इसे उबारना चाहिए और साँस्कृतिक पुनर्जीवन की इस बेला में वह सुधार करना चाहिए, जो आवश्यक है। इस दिशा में प्रज्ञा अभियान ने कदम उठाये। जीप टोलियां इस दृष्टि से सही कदम कहा जा सकता है। प्राचीन काल में भी तीर्थयात्री टोली बनाकर जाते थे और अपने साथ का बिस्तर, भोजन बनाने का सामान आदि साथ ले जाने के लिए बैलगाड़ी रखते थे, ताकि सामान के अतिरिक्त किसी अस्वस्थ साथ को भी बिठाया जा सके। आज की परिस्थितियों में पुरानी जीप गाड़ी बैलगाड़ी से सस्ती पड़ती है। दो बैल दिनभर में जितना चारा खाते हैं, प्रायः उतना ही जीप में तेल जलता है। फिर इन दिनों जो सामान ले जाया जा रहा है उसमें संगीत साधन, लाउडस्पीकर, बिस्तर, जनरेटर, स्टेज आदि वस्तुएँ उससे कहीं अधिक भारी हो जाती हैं, जितने कि बैलगाड़ी सफर करती है। फिर उसमें कार्यकर्त्ताओं के बैठ जाने की सुविधा भी होती है और ज्यादा दूरी तक भी द्रुतगति से जाया जा सकता है। ऐसे-ऐसे अनेक कारणों का पर्यवेक्षण करने के उपरान्त पुरानी मोटरें ही मरम्मत कराने के उपरान्त काम में लाये जाने की बात अधिक सुविधाजनक पायी गई है। अस्तु समग्र योजना को पूरी करने के लिए जीपों एवं कारों की संख्या बढ़ा देने का ही निश्चय किया गया है।
इनमें जाने वाले यात्री मात्र धर्म प्रचारक होंगे। उन्हें दुहरा पुण्य मिलेगा। एक तो वक्ता, गायन बनने का अवसर मिलेगा एवं मोटरों के सम्बन्ध में इतना ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे कि थोड़े और अभ्यास कर लेने के उपरान्त वे ड्राइवर बन सकें। दूसरे वे सच्ची तीर्थयात्रा का पुण्यफल अर्जित करेंगे, जो अनेकों अनुष्ठानों से बढ़कर है।
इन तीर्थयात्रियों को तीन महीने के लिए बाहर भेजा जायेगा। एक महीना ट्रेनिंग दी जायेगी। इस प्रकार घर से बाहर चार महीने ही रहना पड़ेगा। इस अवधि में वे प्रायः 100 सभाओं में उद्बोधन कर सकेंगे। रास्ते में पड़ने वाली प्रायः 100 सरिताओं का स्नान एवं मार्जन कर सकेंगे। टूटे-फूटे मन्दिरों की सफाई करने के अतिरिक्त उनके जीर्णोद्धार की योजना का श्रमदान भी कर सकेंगे।
जिन स्थानों पर प्रज्ञा आयोजन होंगे, वहाँ ‘प्रज्ञा प्रशिक्षण’ पाठशाला की स्थापना का उद्घाटन भी करना होगा। एक सम्मेलन पीछे एक समय का यज्ञ भी होगा। इस प्रकार उन्हें 100 यज्ञों के संचालन का अवसर भी मिलेगा।
जीपें जिस रास्ते से जायेंगी वहाँ दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने का भी अवसर मिलेगा। नये क्षेत्रों की स्थिति और संस्कृति को देखने-समझने का अवसर मिलने से इसे ‘देश-दर्शन’ के रूप में भी समझा जा सकेगा। जिसे हम मातृभूमि, “स्वर्गादपि गरीयसी” कहते हैं, उसका वास्तविक स्वरूप देखने का अवसर मिले तो इसे क्या कम महत्व का काम समझा जा सकता है। कवीन्द्र-रवीन्द्र ने बैलगाड़ी में देश की यात्रा की थी। गान्धी जी ने आन्दोलन शुरू करने से पूर्व मातृभूमि का प्रत्यक्ष दर्शन आवश्यक समझा था। यह प्रयास प्रतिमा दर्शन की अपेक्षा कहीं अधिक सार्थक है।
इसके लिए प्रतिभावान प्रज्ञा परिजनों को ही चुना जायेगा। बूढ़े, बीमार , अशक्त, अशिक्षित उपरोक्त कामों में से एक भी नहीं कर सकेंगे। इसलिए उन अर्धमृतकों को गाड़ी में लाद ले जाने जैसा कोई इरादा नहीं है। उपरोक्त कार्यों के स्वरूप और श्रम का लेखा-जोखा लिया जाये तो वह इतना भारी हो जाता है कि एक हट्टा-कट्टा मजूर ही उन सब कामों को करने में समर्थ हो सकता है। फिर संगीत प्रवचन और मशीनों की टूट-फूट को सम्भालते चलने लायक गिरह की अक्ल भी चाहिए।
इसलिए इन पंक्तियों द्वारा इस भ्रम को निकाल दिया गया है कि सैर-सपाटा करने हेतु बुड्ढे-दुर्बल भी इस यात्रा में जायेंगे। तीर्थयात्रियों को प्रायः 12 घण्टे कड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। इस अवधि में भोजन व्यय को जेब से नहीं खर्च करना पड़ेगा, पर प्रतिभा में दस गुनी वृद्धि हो जाने के अतिरिक्त परोक्ष लाभ वास्तविक तीर्थ यात्रा का ही मिल सकेगा। इसे एक योगाभ्यास, तप-साधन एवं पुण्य-परमार्थ स्तर का ही समझा जा सकता है। जिन्हें अपने समय के बदले इतना ही पर्याप्त लगता हो, उन्हीं के लिए यह आमन्त्रण लिखा जा रहा है। गाड़ी में जगह भी उतनी ही है कि उसमें 4-5 कार्यकर्ता मुश्किल से बैठ सकेंगे। शेष में तो आवश्यक सामान ही भरा होगा। इसलिए किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि तीर्थयात्रा का नाम सुनकर अपनी दादी-नानी को भी साथ चलने के लिए कह दें। उन्हें तत्काल बैरंग वापस लौटना पड़ेगा। यह तीर्थ यात्रा बलिष्ठ, शिक्षित, कर्मठ और संगीत आदि में थोड़ी गति रखने वालों के काम की है।
रास्ते भर तो दीवार लिखने टूटे-फूटे मन्दिरों को साफ करने का काम तो है ही, रात को भी संगीत प्रवचन आदि के काम में जुटे रहने के कारण रात को भी देर से ही सोने को मिलेगा। जहाँ-तहाँ, जैसा-तैसा भोजन मिलने पर भी जो सन्तोष कर सके और पचा सके, ऐसे ही लोगों को इस उपक्रम में लिया गया है।
जन-जन को जो सन्देश सुनाना है, उसमें नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति का कार्य शेष पड़ा है। स्वराज्य मिल जाने से अभी केवल राजनैतिक स्वतन्त्रता उपलब्ध हुई है। हमारे दैनिक जीवन में जो नैतिकता की दृष्टि होनी चाहिए, मान्यताओं को विवेचन की कसौटी पर जिस तरह कसा जाना चाहिए समाज में जैसा न्यायपूर्ण प्रचलन होना चाहिए वह अभी नहीं बन पाया है। जब तक यह सब सम्भव न हो तब तक समझना चाहिए कि अपूर्णता का एक बड़ा भाग बाकी है। संघर्ष की लड़ाई पिछली पीढ़ी ने लड़ी है। सृजन के लिए प्राणपण से संघर्ष हमें करना है। सरकारी उत्तरदायित्व यों गरीबी भगाने का है, पर वह कार्य भी जन सहयोग के बिना सम्भव नहीं। कठोर श्रम, और अपव्यय की रोकथाम के बिना न आर्थिक समस्याएँ हल हो सकती है और न गरीबी भगाओ का उद्देश्य पूरा हो सकेगा। एक क्रान्ति और भी बाकी है वह है स्वच्छता क्रान्ति। शरीर, वस्त्र, घर, गाँव और मन की सफाई का आन्दोलन भी ऐसा है जिसके बिना हम न अपने को सभ्य कह सकते हैं, न सुसंस्कृत।
गाँव-गाँव प्रज्ञा अभियान के जो छोटे-बड़े आन्दोलन चल रहे होंगे वे और भी द्रुतगति से चलेंगे। उनके साथ उपरोक्त पाँचों क्रान्तियों की पृष्ठभूमि बनानी है। विशेषतया कुछ स्थापनाएँ ऐसी हैं, जिन्हें भले ही छोटे रूप में किया जाये पर आरम्भ इन्हीं दिनों करना है।
सरकारी शिक्षा तन्त्र अधूरा है। उनके द्वारा बच्चों की शिक्षा का क्रम पूरा नहीं हो पा रहा है फिर 70 प्रतिशत अशिक्षितों को साक्षर किस प्रकार बना पायेंगे। बच्चे तो बड़े होने पर अपने दायित्व संभालेंगे किन्तु आज की समस्याएँ तो प्रौढ़ों को ही सुलझानी हैं। स्पष्ट है कि गरी
न अकेला ज्ञान पर्याप्त है न केवल तप। दोनों का समन्वय ही आत्मिक प्रगति का आधार बनता है।
उच्चस्तरीय स्वार्थ का नाम ही परमार्थ है। परमार्थी को त्याग तो करना पड़ता है, पर घाटा उठाने की स्थिति नहीं आती।
कर्ण की बलिष्ठता महाभारत की समस्त सेनापतियों से अधिक थी। उसने दुर्योधन से कहा उसे शल्य सारथी मिले तो निश्चय पूर्वक जीतकर दिखाये। दुर्योधन ने वैसी ही व्यवस्था कर दी।
पासा उलटते देखकर कृष्ण ने शल्य को अपने पक्ष में मिला लिया और ऐसा अनुबन्ध किया कि शल्य, समय-समय पर कर्ण का मनोबल तोड़ता रहेगा और पराजय एवं संकट की सम्भावना व्यक्त करता रहेगा। उसने वैसा ही किया। जब भी अवसर आया, कुछ बात कहकर मनोबल गिराया। इस पर अवरोध ने कर्ण की आधी शक्ति समाप्त कर दी और उन्हें पराजित होना पड़ा।
एक तत्त्वज्ञानी परब्रह्म की गतिविधियों को जानने के लिए निरन्तर खोज-बीन में लगे रहते।
एक दिन वे समुद्र तट पर गये और उदास बैठे बच्चे की परेशानी पूछी। बच्चा बोला इस कटोरी में समूचा समुद्र भरना चाहता हूँ पर कोई उपाय नहीं सूझा। ब्रह्मज्ञानी ने बच्चे को समझाया कि ऐसा नहीं हो सकता। बालक तो लौट गया पर ब्रह्मज्ञानी को परोक्ष रूप से यह शिक्षा दे गया कि अनन्त का तुच्छ बुद्धि से निर्णय करने की अपेक्षा अपने कर्त्तव्य भर को सोचे और उसी में संलग्न रहें।
भगवान ने नारद को भूलोक निवासियों के समाचार लाने भेजा।
नारद कुछ समुदायों से मिले। कुशल समाचार पूछे। पाया कि सभी दुःखी, असन्तुष्ट थे, और भगवान से सहायता चाहते थे।
दरिद्रों ने कहा- हम अभावों से पीड़ित हैं। भगवान से धन दिलाइए।
धनियों ने कहा- ईर्ष्यालु और चोर पीछे पड़े हैं इनसे रक्षा कराइए।
साधुओं से पूछा- साधना की कठिनाइयों से बचाइए। जल्दी से सिद्धियाँ दिलाइए।
आगे बढ़ने की इच्छा हुई। देखा सभी दुःखी हैं और सभी भगवान से याचना करते हैं। कुछ को देखकर- सबका अनुमान लगाने में नारद जैसे तत्वदर्शी को क्या कठिनाई पड़ती।
भगवान ने समाचार सुने। और नारद को दुबारा भेजा। कहना-भगवान पुरुषार्थ के बदले ही वरदान देते हैं। दुःखी लोग, अपने कर्तव्य में प्राणपण से जुटें। इससे कम में भगवान से किसी सहायता की आशा न रखें।
नारद फिर लौटे। सभी से दुबारा मिले। दरिद्रों से कहा- अब लोग अधिक श्रम करें और व्यवस्था अपनायें। धनियों से कहा- जमा न करें, विलास में न खर्चें जो कमायें परमार्थ में लगायें। साधुओं से कहा- सेवा धर्म अपनायें, निस्पृह बनें। इसी प्रकार अन्य वर्गों ने ईश्वरीय सन्देश सुना। पुरुषार्थ और सद्गुणी बने। भगवान के अनुग्रह की किसी को कमी न रही।
राम के नीति पक्ष तथा महान निर्धारण से प्रभावित होने वाली गिलहरी तक से सहयोग किये बिना न रहा गया। वह अपनी स्वल्प शक्ति के अनुरूप बालों में बालू भरकर समुद्र में डालने और उसे उथला करने, पार जाने योग्य बनाने के प्रयास में जुट गई। कार्य असम्भव था यह वह भी जानती थी पर सोचा यही कि आदर्श की स्थापना के लिए जो बन पड़े करना ही चाहिए। भले ही अभीष्ट सफलता उपलब्ध न हो सके। राम ने सुना तो भरपूर प्यार दिया। उसका सहयोग इतिहासकारों के लिए एक सराहना का विषय बन गया।
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक से अनुरोध है कि जनवरी और फरवरी के सम्पादकीय लेखों को वह दो बार पढ़े। एक बार इस दृष्टि से कि उन्हें मिशन के सूत्र-संचालकों ने लिखा है। एक बार इस दृष्टि से कि उन्हें प्रत्येक परिजन के व्यक्तिगत नाम से लिखा गया है। उसे सामान्य योजना विवरण न मानें वरन् यह समझें कि उनके साथ उनके कुछ विशेष उत्तरदायित्व भी जुड़ गये हैं।
जनवरी के लेख को यह समझें कि वह छोटे रूप में धीमी गति के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक व्यक्ति विशेष ने लिखा था। फरवरी अंक को इस दृष्टि से पढ़ा जाये कि वह हिमालय से बसन्त पर्व पर भेजा हुआ विशेष आदेश है। समय जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है और परिस्थितियों की माँग जिस तेजी से उभर रही है वह सामान्य नहीं असामान्य है। कठिनाइयाँ मुँहबाये खड़ी हैं उनका सामना करने के लिए जिस स्तर की शक्ति चाहिए उसे दधीचि और भागीरथ के उभयपक्षीय प्रयोगों का सम्मिलित स्वरूप समझा जाना चाहिए। अतएव जिस गति से हमारी व्यक्तिगत साधना चल रही थी एवं सम्मिलित रूप से प्रज्ञा परिजनों के जो दो सामूहिक अनुष्ठान चल रहे थे उनमें विशेष अभिवृद्धि का नया संकेत समझा जाना चाहिए। प्रतिदिन 240 करोड़ मन्त्रों का जप चल रहा है। अब 240 लाख गायत्री चालीसाओं का पाठ उस प्रक्रिया में नया अध्याय जुड़ता है। दैनिक जप में भी जिनसे अभिवृद्धि हो सके वह उन्हें करनी चाहिए। गायत्री चालीसा 100 वितरण करने वालों को उनके नाम की एक मुहर भी दी जायेगी जिसमें उल्लेख होगा कि यह किनने किसकी स्मृति में कितनी संख्या में वितरित किये हैं। हो सका तो यह उल्लेख प्रेस द्वारा छाप भी दिया जाएगा। इस प्रकार आशा की गई है कि प्रतिदिन 24 लाख गायत्री चालीसा पाठ भी इस बसन्त पर्व से होने लगेंगे।
एक बार इन दोनों लेखों को इस दृष्टि से पढ़ें कि प्रस्तुत योजना का स्वरूप अब की अपेक्षा कितने गुना बड़ा है। अभी शान्ति-कुंज में युग शिल्पी सत्र, पाँच दिन के परामर्श सत्र चलते हैं। कुछ स्थायी कार्यकर्ता हैं और कुछ प्रज्ञा प्रवास पर जाने वाली प्रवास टोलियाँ। इन्हीं सबका निर्वाह खर्च संख्या को वहन करना पड़ता है। वह ज्यों-त्यों करके हर महीने पूरा हो जाता है।
किन्तु अगले दिनों जिस निर्देशन को शिरोधार्य करना है वह पहले की अपेक्षा सैकड़ों गुना बड़ा होगा। नालन्दा, तक्षशिला विश्वविद्यालयों जितना प्रशिक्षण- एक लाख कार्यकर्त्ताओं को जुटाना ही नहीं उनका खर्च वहन करना भी प्रायः ऐसा है जिस सम्राट अशोक एवं राजा हर्षवर्धन जैसे ही वहन कर सके थे। जन साधारण के द्वारा तो इतनी बड़ी व्यवस्था बन ही कैसे पाती। नये कदम इतने बड़े हैं जिनको वामन द्वारा तीन पगों में धरती नाम लेने या मत्स्यावतार के आकार बढ़ने के समतुल्य कहे जा सकते हैं। इनमें कुरीति निवारण ही नहीं सतयुग की वापसी का दुहरा कार्यक्रम एक साथ सम्मिलित है। पहले लंकादहन और रामराज्य का संस्थापन दो बाद में हुआ था। इस बार की तीव्र गति को देखते हुए दोनों कार्य एक साथ होने हैं।
अन्य पक्षों पर पाठक विचार न करें। वे ठीक समय पर ठीक प्रकार सम्पन्न होंगे। उन्हें दो बातों पर ही विचार करना है कि जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से समर्थ हैं वे एक वर्ष का समय निकालें जो अत्यधिक व्यस्त हैं वे छह महीने की जेल तो अनिवार्य जैसी मानें इसे भुगतने के बाद वे तपे सोने की तरह निखरने का विश्वास कर सकते हैं।
शान्ति-कुंज का व्यय भार वहन करने के लिए जो अपना पेट भरने के अतिरिक्त कुछ बचा लेते हैं उन सबसे कहा जा रहा है कि शान्ति-कुंज के लिए अपनी महीने की आय में से एक दिन का अंशदान निकालने का संकल्पपूर्वक शपथ धारण करें और उसे निबाहें। आय-व्यय का सन्तुलन बिठाने के लिए यह एक ही संकल्प सामने है। इसे पूरा करने का संकल्प वे सभी लोग लें जो पेट भरने के अतिरिक्त महीने में कुछ बचा भी लेते हैं। उत्तर हर प्रज्ञा परिजन से माँगा जा रहा है।
(लाखन सिंह भदौरिया)
तुम अधूरे नहीं, तुम अभागे नहीं, बात इतनी ही है, आप जागे नहीं।
बीज, वट-वृक्ष होना भुलाये हुये, उर्वरा भूमि की कोख पाये हुये; प्राण गलना नहीं चाहते धूल में- फूल-फल, लालसायें, लगाये हुये।
मेघ माली विकल, सींचने को खड़े, अंकुरों ने अमिय घूँट माँगे नहीं।
देन, तक दृष्टि, पहुँची नहीं, चाह की, लक्ष्य ने खोज की है, नहीं राह की; प्राप्ति का मूल्य, आँका नहीं, ध्यान दे, और पाये हुए की, न परवाह की।
शक्ति, प्रतिभा, प्रभा, खो रही व्यर्थ ही- लक्ष्य की दौड़ में, पाँव भागे नहीं।
भाग्य क्या है? विधाता स्वयं आप हैं, दीनता हीनता, आपके पाप हैं। दे खजाना तुम्हें, सौंप दी कुंजियाँ- बोध-विस्मृति, बनें, घोर सन्ताप हैं।
भाग्य के देवता, भाल को पीटते, हाथ बाँधे खड़े, पाँव आगे नहीं।
*समाप्त*