सृष्टा ने जन्म के समय ही एक पारसमणि तुम्हें प्रदान की है और वह ऐसी है, जिसके आजीवन छिनने या गुमने का कोई खतरा नहीं है।
इस पारसमणि का नाम है— विचारणा। जो मस्तिष्क की बहुमूल्य पिटारी में इस प्रकार सुरक्षित रखी रहती है, जहाँ किसी चोर की पहुँच न हो सके। इसके रहते तुम्हें किसी पराभव का संकट आने की आशंका नहीं है।
विचार व्यर्थ के मनोरंजन समझे जाते हैं; पर वस्तुतः उनकी सृजनात्मक शक्ति अनंत है। वे एक प्रकार के चुंबक हैं, जो अपने अनुरूप परिस्थितियों को कहीं से भी खींच बुलाते हैं। साधन किसी को उपहार में नहीं मिले और यदि मिले हों, तो टिके नहीं। अपना पेट ही आहार पचाता और जीवित रहने योग्य रस, रक्त का उत्पादन करता है। ठीक इसी प्रकार विचार-प्रवाह ही व्यक्ति का स्तर विनिर्मित करता है। क्षमताएँ उसी के आधार पर उत्पन्न होती हैं। पराक्रम के प्रवाह को दिशाधारा उसी से मिलती है।
विचारणा द्वारा विनिर्मित व्यक्तित्व और पराक्रम ही वह अवसर प्रदान करते हैं, जैसा कि सोचा और चाहा गया था।
विचारों की सृजनात्मक क्षमता समझना और उन्हें सही दिशा में गतिशील करना ही वह सौभाग्य है, जिसे उपलब्ध पारसमणि प्राप्त कराती रहती है।
सज्जनता का माहात्म्य बताना और धर्म की दुहाई देना सरल है। उससे वक्ता को धर्मोपदेश कहलाने का अवसर मिलता है और श्रोता 'भक्तजन' समझे जाते हैं। यह सब सरल है। वाचाल और मूढ़मति इन दोनों कार्यों को सरलतापूर्वक करते और सस्ती वाहवाही लूटते रहते हैं।
कठिन कार्य है, अनीति का विरोध करना और अवांछनीयता से जूझना। ऐसे जुझारू शूरवीर यदि उत्पन्न न हों तो समझना चाहिए कि अधर्म और अनाचार अपने स्थान पर यथावत बना रहेगा। उसे हटाने और मिटाने का कोई सुयोग न बनेगा। प्रतिरोध के अभाव में अनाचार के हौसले बढ़ते हैं और वह चौगुनी-सौगुनी गति से बढ़कर उन लोगों को भी चपेट में लेता है, जो मुँह न खोलने के कारण अपने को सुरक्षित समझते थे और सोचते थे कि हम किसी को नहीं छेड़ते, तो हमें कोई क्यों छेड़ेगा?
स्मरण रखे जाने योग्य बात यह है कि अनाचारों का आक्रमण उन्हीं पर होता है, जो सज्जनता की आड़ में अपनी कायरता को छिपाए बैठे रहते हैं। बहेलिए चिड़ियों और मछलियों को ही जाल में समेटते हैं। जलाशयों में रहने वाले घड़ियालों और जंगलों में घूमते चीतों से उन्हें भी डर लगता है। कीड़े-मकोड़ों को लोग पैरों तले कुचलते चलते हैं; पर साँप बिच्छुओं से उन्हें भी बचकर चलना पड़ता है। बर्र के छत्ते में हाथ कौन डालता है?
अनीति करना बुरी बात है; पर उसे सहन करते रहना उससे भी बुरा। जीत की संभावना न हो तो पिसते रहने की अपेक्षा विद्रोह पर उतारू होकर मर-मिटना कहीं श्रेष्ठ है।
गाँधीजी अपने युग के सच्चे अहिंसावादी थे। उन्होंने धर्म और नीति की वकालत करने में कोई कोर-कसर रहने नहीं दी; पर साथ ही इस तथ्य की ओर से आँखें नहीं मूँदी कि आतताई को रास्ते लाने के लिए दाँत खट्टे किए जाने चाहिए और यह सिखाया जाना चाहिए कि औचित्य को अपनाए बिना और कोई मार्ग नहीं। अंग्रेजों ने भारत को स्वाधीनता दान में नहीं दी, यह उनकी विवशता थी। परिस्थितियों ने मजबूर कर दिया कि पैर पीछे हटाने में ही भलाई है।
धर्म-प्रवचन अच्छी बात है। उसको ध्यानपूर्वक सुनना और भी अधिक अच्छा है, क्योंकि इससे जनसाधारण का कर्त्तव्यबोध होता है; पर इतना ही पर्याप्त नहीं। विद्यालयों में शिक्षा-संवर्द्धन का कार्य होता है; पर उस भवन में पागल कुत्ता घुस आवे या साँप किसी बिल में से निकल पड़े, तो उसे लाठी से ही पाठ पढ़ाया जा सकता है। धर्मोपदेश सुनकर वे आक्रमण करना छोड़ देंगे, ऐसी आशा करना नासमझी की बात है।
काशी करवट लेकर स्वर्ग जाने की मान्यता सही हो सकती है; पर गीता का कृष्ण का अर्जुन को दिया गया संदेश भी मिथ्या नहीं है, जिसमें अनीति के विरुद्ध लड़ मरने की बात कही गई है। रामराज्य स्थापना से पूर्व भगवान को असुरों का दमन करना पड़ा था। धर्म की स्थापना एक इमारत उठाने की तरह है और अधर्म का नाश उससे भी अधिक आवश्यक नींव खोदने की तरह। धर्म का पालन और संरक्षण योद्धा ही करते हैं। कायर तो उसकी दुहाई भर देते रहते हैं।
आतंकों का दमन सशस्त्र सैनिकों का काम है; पर सामाजिक अवांछनीयताओं, कुरीतियों, मूढ़मान्यताओं से जूझना तो उन भावनाशीलों का कार्य है, जिसमें शौर्य और पराक्रम के तत्त्व भी जीवित हैं। धर्मोपदेश जितना आवश्यक है, उतना ही अभीष्ट। यह भी है कि शोषण-उत्पीड़न से नारी वर्ग या पिछड़े समुदायों को मुक्ति दिलाने के लिए आधार किए जाएँ। भले ही वे झगड़े-झंझट उकसाने जैसे प्रतीत होते हों।
ईश्वर सर्वसमर्थ है; पर उसने भी अपने को कुछ नियमों और व्यवस्थाओं के अनुशासन में बाँध रखा है। अपने बनाए नियमों का वह पालन न करे, तो अन्य लोग भी स्वेच्छाचार बरतें। यहाँ तक कि उस पर भी पक्षपात करने का दबाव डालें। लोग ऐसी ही तिकड़म भिड़ाते हैं। यदि ऐसा संभव रहा होता तो इस सुनियोजित संसार की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाती।
ईश्वर का अनुशासन पालते हुए हम चरित्रनिष्ठा और परमार्थपरायणता में संलग्न हैं, तो अपने पुरुषार्थ के अनुरूप दैवी अनुग्रह विपुल मात्रा में अनायास ही प्राप्त कर सकते हैं। इस तथ्य में ईश्वरविश्वास और ईश्वरभक्ति का सार-संक्षेप समाहित है। इतना भर जान लेने और तद्नुरूप अपनी कार्यपद्धति बना लेने पर हम ईश्वर के सच्चे कृपापात्र बन सकते हैं और वे सभी लाभ प्राप्त कर सकते हैं, जो सच्चे ईश्वरभक्तों को मिलते रहे। उसे कुछ चित्र-विचित्र हरकतों से बहकाया, फुसलाया नहीं जा सकता। इस बात को जितनी जल्दी, जितनी गहराई तक समझ लिया जाए, उतना ही अच्छा है।
परमात्मज्ञान के अतिरिक्त दूसरा ज्ञान है ‘आत्मबोध”। आत्मबोध का तात्पर्य है— अपनी सत्ता की महत्ता काे समझना और अपने आपको इस योग्य बनाना कि ईश्वर के जेष्ठ पुत्र, अंशधर, युवराज सच्चे अर्थों में कहला सकें। दीन-हीनों की तरह जिस-तिस के सामने सहायता के लिए हाथ न पसारते फिरें। बहुमूल्य जीवन-संपदा को निरर्थक न गँवा बैठें। यही है— आत्मबोध या आत्मसाक्षात्कार। आत्मा की प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति ही मानी गई है; क्योंकि ब्रह्मांडव्यापी निराकार भगवान को निकटतम और स्नेही सहायक के रूप में अपने भीतर ही प्राप्त कर सकते हैं। इससे समीप और सरलतापूर्वक पहुँच सकने योग्य और कोई स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ आत्मा का— परमात्मा से मिलन हो सके।
आत्मा और परमात्मा के मिलन को ही लौह-पारस के मिलन से स्वर्ण बनने की उपमा दी गई है। अपने स्वरूप समझ लेने और तद्नुरूप व्यक्तित्व को ढाल लेने के निमित्त ही योग-तप और साधना-उपासना का विधान बनाया जाता है। वस्तुतः साधनाएँ आत्मपरिष्कार के लिए ही की जाती हैं, ताकि पात्रता निखरे। जीवनपात्र का इतना विकास-विस्तार हो कि सावन की घटा की तरह सदा-सर्वदा बरसने वाली प्रभूकृपा का बड़े से बड़ा भाग अपने हिस्से में आ सके।
आत्मा के यथार्थ और पवित्र स्वरूप को समझना ही आत्मज्ञान है। होता यह है कि हम भ्रमवश अपने ‘स्व’ को शरीर में इस कदर घुला लेते हैं कि अनुभव में नहीं आता कि हम मात्र शरीर हैं। उसी की इच्छाओं को अपनी इच्छा मान लेते हैं और उसी की तुष्टि से प्रसन्नता अनुभव करने लगते हैं। आत्मा की चर्चा तो प्रसंगवश करते हैं; पर कभी ऐसा आभास नहीं होता है कि हमारा ‘स्व’ शरीर से पृथक है और उसकी समस्याएँ-आवश्यकताएँ शरीर से भिन्न हैं।
तत्त्वज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करते ही पहला चरण यही उठाया जाना चाहिए कि शरीर और आत्मा की पृथकता का प्रत्यक्ष बोध होने लगे। दोनों के बीच जो संबंध है, उसकी अनुभूति स्पष्ट होने लगे और दोनों के स्वार्थों में जो अंतर है, उसका पृथक्करण करने में तनिक भी भ्रम न रहे। इतनी बात जानकारी तक नहीं, वरन अनुभूति के रूप में निखरनी चाहिए।
इसके लिए एक विचारधारा विनिर्मित करनी चाहिए और उसे मंत्र-जप की तरह तो नहीं; वरन चिंतन और मनन के रूप गहराई तक, अधिक गहराई तक हृदयंगम करना चाहिए।
मैं ईश्वर का अंशधर परम पवित्र आत्मा हूँ।
शरीर मेरा वाहन-उपकरण-औजार है। वह जीवन भर साथ रहने वाला वफादार सेवक है।
स्वामी होने के नाते, शरीर के प्रति हमारी जिम्मेदारी यह है कि उसे निरोग, बलिष्ठ और दीर्घजीवी बनाने के लिए उपयुक्त अनुशासनबद्ध करें।
बहुमत की नकल न करें। प्रतिभावानों के आकर्षण या दबाव से ऐसा कुछ न सोचें, ऐसा कुछ न करें जो उपयुक्त न हो।
लोगों को नहीं, आत्मा के पवित्र अंश को अपना मानें और उसी के संकेतों पर एकाकी चल पड़ें। विचारधारा की एक परिधि शृंखला है। इसके शब्दों पर, भावों पर अति गंभीरतापूर्वक ध्यान दें और एक-एक सूत्र का कल्पना-चित्र मन में खड़ा करें। वैसा ही जैसा चित्रकार अपनी कल्पना को कागज, रंग, और तूलिका के सहारे चित्रित करने का प्रयत्न करता है।
यह कार्य एक दिन में समाप्त नहीं होता। लंबे समय तक— तब तक करना होता है; जब तक कि अंतराल इस स्थिति को यथार्थता के रूप में स्वीकार न कर ले और बिना प्रयत्न किए ही वैसे कल्पना-चित्र मस्तिष्क के सिनेमाघर में चलती-फिरती रंगीन प्रतिमाओं के रूप में प्रत्यक्ष की तरह सूक्ष्मनेत्रों से दृष्टिगोचर न होने लगें।
ध्यानयोग में यही किया जाता है। नेत्र बंद करके इष्टदेव की छवि-प्रतिमा का ध्यान करते हैं और उस अभ्यास को तब तक चलाते हैं जब तक कि वह उसी प्रकार भाव-जगत में प्रत्यक्ष न होने लगे जैसे कि अपने घनिष्ठतम मित्र या परिजन अनायास ही चिंतन में आ जाते हैं।
दो भाइयों के बीच बँटवारा हो जाने पर यह बातें ठीक तरह समझ में आती है कि अमुक वस्तुओं पर हमारा अधिकार है, अमुक पर दूसरे भाई का। अब यह व्यवसाय हमें करना है या भाई को। माता-पिता, भाई-बहिनों में से अमुक की जिम्मेदारी हमें निभानी है, अमुक की भाई को। अलग हो जाने पर भी बड़ा भाई परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखने और भाई को उपयुक्त मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी अपनी ही समझता है। व्यवहार में बँटवारा होते हुए भी बड़प्पन के नाते जो जिम्मेदारी स्वभावतः निभाई जाती है, उसे बड़ा भाई निबाहता है। छोटा आनाकानी करे तो भी उसे प्रेम या नाराजी से उस राह पर चलाया जाता है कि परिवार की प्रतिष्ठा और बड़े भाई के बड़प्पन पर उँगली न उठे। ऐसी ही नीति शरीर के साथ भी अपनाई जानी चाहिए।
इस नीति का औचित्य इसलिए भी है कि शरीर वाहन-उपकरण-औजार भी तो है, उसके टूटने-फूटने पर अपनी ही हानि तो होगी। जो कार्य उससे लिया जाता है, वह असमर्थता की स्थिति में कर नहीं सकेगा; इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी उसी को उठानी चाहिए। जो इससे लाभ उठाता है। नौकर के भरण-पोषण की तो व्यवस्था करनी ही पड़ती है। साथ ही यह भी देखना होता है कि वह नशा, जुआ आदि का कोई दुर्व्यसन तो नहीं सीख रहा है। कुसंग में तो नहीं बैठ रहा है। ऐसी सतर्कता न बरती जाए तो उसका प्रतिफल यह होगा कि कभी भी कोई उपद्रव अपने लिए खड़ा कर सकता है। उसके वफादार रहने में ही अपना लाभ है। सेवक की तरह शरीर की सुव्यवस्था पर भी अपना पूरा ध्यान रहना चाहिए।
(क्रमशः)
नेहरू जी एक बार कानपुर के प्रताप कार्यालय में गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने गए। विद्यार्थी वहाँ थे नहीं, प्रतीक्षा में नेहरू जी को बैठना पड़ा।
मेज पर कागज बेतरतीब बिखरे पड़े थे।
इस प्रतीक्षा के समय में नेहरू जी ने वे सभी कागज तरतीब से जमाए और कपड़े से मेज-कुर्सी पर जहाँ-तहाँ जमी सारी धूल साफ कर दी। विद्यार्थी जी लौटे तो उन्होंने नेहरू जी से क्षमा माँगी और आगे से आदत में सफाई रखने की आदत बना ली।
कैदी तीन जगह से बँधा होता है। हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी, गले में तौक या कमर में रस्सा। इस प्रकार सभी प्रमुख क्रिया अंग जकड़ जाने से वह उन बंधनों को छुड़ाकर भागने की स्थिति में नहीं रहता; किंतु जो प्रयत्नशील होते हैं, मुकदमा लड़ते या भूल का प्रायश्चित करते हैं, उनकी सजा समय से पहले ही छूट जाती है और बंधनों से छूट्टी मिल जाती है।
ठीक इस प्रकार मनुष्य के सूक्ष्मशरीर में कई जगहों पर बंधन बँधे हुए हैंं। उन्हें खोलने, काटने एवं छोडने का प्रयत्न मनुष्य को करना होता है। इसी को बंधनमुक्ति कहते हैं।
बंधनों को अध्यात्म की भाषा में ग्रंथिबेध कहते हैं। ग्रंथियाँ तीन बताई गई हैं (1) ब्रह्मग्रंथि (2) विष्णुग्रंथि (3) रुद्रग्रंथि। इनके स्थान (1) जननेंद्रिय मूल (2) नाभिस्थान (3) मस्तक प्रदेश हैं, इसलिए षट्चक्रों के बेधन एवं पंचकोशों के जागरण की तरह ग्रंथिबेध साधना का भी अपना महत्त्व एवं विधान है।
तीन शरीर माने गए हैं। स्थूल, सूक्ष्म, और कारण। यही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। इन्हें तीन लोक भी कहा गया है। गायत्री त्रिपदा है। यज्ञोपवीत में तीन लड़ें और तीन ग्रंथियाँ होती हैं। यह सब भी ग्रंथि विज्ञान की ओर ध्यान दिलाने के लिए हैं। यज्ञोपवीत कंधे पर धारण किया जाता है। उसका एक तात्पर्य यह भी है। मनुष्य पर देवऋण, ऋषि और पितर ऋण तीन लदे हुए हैंं। उन्हें चुकाकर संसार से प्रयाण करना चाहिए। अन्यथा ऋणी की जो दुर्गति होती है, वह अपनी भी होगी। कहीं अन्यत्र चला जाए और वहाँ से भी पकड़ा जाता है। घर-परिवार कुर्क हो जाता है। इन बातों का स्मरण दिलाने के लिए ग्रंथिबेध विज्ञान में बहुत कुछ तत्त्वदर्शन सन्निहित है।
ब्रह्मग्रंथि का स्थान जननेंद्रिय मूल-मूलाधार माना गया है। यह उत्पादन क्षेत्र है। मनुष्य शरीर की उत्पत्ति इसी केंद्र की हलचलों से होती है। ब्रह्मा सृष्टि उत्पन्न करते हैं, इसीलिए उन्हीं की तुलना दायित्व वहन करने वाले इस क्षेत्र पर ब्रह्मा का अधिकार माना गया है।
दूसरा नाभिचक्र है। गर्भावस्था में प्राणी माता के साथ इसी नाल द्वारा जुड़ा रहता है और पोषण प्राप्त करता हुआ क्रमशः बड़ा होता रहता है। प्रसव के उपरांत भी पेट ही पाचन का काम करता है, रक्त बनाता है। पोषण के दायित्व पेट के ऊपर आ जाते हैं, इसीलिए यह विष्णुक्षेत्र है। पालनकर्त्ता विष्णु ही माने गए हैं।
तीसरा केंद्र मस्तिष्क है। यहाँ विवेक-बुद्धि रहती है। उसी के आधार पर अनौचित्य का संहार होता है। जीवन में परिवर्तन भी यहीं से आता है। नर-पशु को नर-नारायण बनाने की क्षमता इसी में है। अभाव, अज्ञान और अशक्ति से निपटने वाला त्रिशूल भी यहाँ अवस्थित है, इसीलिए मस्तिष्क को रुद्र का अधिकार क्षेत्र सही माना गया है। कैलाश सहस्रारचक्र है और उसके इर्द-गिर्द भरा हुआ ग्रेमैटर मानसरोवर।
बंधन तीन हैं। वासना, तृष्णा, और अहंता। वासनाओं की स्वामिनी जननेंद्रिय है। वह यौनाचार से ही तृप्त नहीं होती, वरन चिंतन-क्षेत्र में भी कामुकता के रूप में समय-कुसमय छाई रहती और कल्पना-चित्र बनाती रहती है। मनुष्य इसी से बंधन में बँधता है। विवाह करता है। उसके साथ ही संतानोत्पादन का सिलसिला चल पड़ता है। स्त्री-बच्चों की जिम्मेदारी साधारण नहीं होती। पूरा जीवन इसी प्रयोजन के लिए खपा देने पर भी उसमें कमी ही रह जाती है और मरते समय तक मनुष्य इन्हीं की चिंता करता रहता है। इस पूरे प्रपंच को ऐसा बंधन समझना चाहिए, जिसे बाँधता तो मनुष्य हँसी-खुशी से है; पर फिर उसी बोझ से इतना लद जाता है कि अन्य कोई महत्त्वपूर्ण काम नहीं कर पाता।
दूसरी विष्णुग्रंथि का स्थान उदर क्षेत्र है। इसमें तृष्णा रहती है। यह तृष्णा पशु-पक्षियों में तो पेट भरने तक सीमित है। इन्हें इतना ही उपार्जन करना पड़ता है; किंतु मनुष्य का पेट तो समुद्र जितना बड़ा है। जिसमें आहार ही नहीं वैभव भी चाहिए। आज के लिए ही नहीं जन्म भर के लिए, औलाद के लिए, संग्रह और व्यसनों के लिए भी चाहिए। यही तृष्णा है जो प्रचुर परिमाण में धन-वैभव कमाने पर भी शांत नहीं होती। इसके लिए उचित-अनुचित सब कुछ करना पड़ता है। मनुष्य अनीति और पाप उत्पादन करने में भी नहीं चूकता।
तीसरी ग्रंथि रुद्रग्रंथि है। रुद्र को विक्षोभ का देवता माना गया है। वे जब तांडव नृत्य करते हैं तो प्रलय उपस्थित हो जाता है। मनुष्य जीवन में अहंता का भी वही स्थान है। दूसरों को तुच्छ और अपने को महान सिद्ध करने के लिए जो विक्षोभ मन में उत्पन्न होते रहते हैं। उनकी गणना अहंता में गिनी जाती है। इसी हेतु दूसरों पर अपने बड़प्पन की छाप डालने के लिए आत्मविज्ञापन करता है। ठाट-बाट बनाता है। अपव्यय का मार्ग अपनाकर अपनी अमीरी की धाक जमाता है। संस्थाओं में, शासन में, समाज में बड़ा पद पाने के लिए इतना आतुर रहता है कि आए दिन साथियों से झगड़ना पड़ता है और उन्हें समता करने से रोकना होता है। दर्प के कारण रावण, कंस, हिरण्यकश्यपु, वृत्रासुर, दुर्योधन आदि न जाने कितनों को नीचा देखना और संकटों में फँसना पड़ा।
ग्रंथिबेध का आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है— वासना, तृष्णा और अहंता में छिपी हुई दुष्प्रवृत्तियों का जितना अंश जिस रूप में भी छिपा पड़ा हो उसे ढूँढ़ निकाला जाए, उन पर कड़ी नजर रखी जाए और घटाने-हटाने का प्रयत्न निरंतर जारी रखा जाए।
“सादा जीवन उच्च विचार” के सूत्र-संकेत में बंधनमुक्ति के सभी सिद्धांतों का समावेश है। इस सूत्र को तीनों क्षेत्रों पर लागू किया जा सकता है। ब्रह्मग्रंथि के संबंध में दृष्टिकोण परिष्कृत करने का तरीका यह है कि जननेंद्रिय को मूत्रेंद्रियमात्र माना जाए। मल द्वारा की तरह मूत्रमार्ग को भी उसी काम तक सीमित रखा जाए। सभी वासनाग्रस्त प्राणी जब अपनी शक्ति-सामर्थ्य से कहीं अधिक प्रजनन में जुटे हुए हैंं तो कुछेक आदर्शवादी व्यक्ति परिवार में इतने लोगों के बीच रहकर अपना गुजारा बिना किसी कठिनाई के कर सकते हैं। विवाह करना ही हो तो जयप्रकाश नारायण एवं जापान के गाँधी जैसा स्तर अपनाया जा सकता है। दो मित्रों की तरह लक्ष्य की ओर बढ़ने में मिल-जुलकर काम करते रहा जा सकता है। बंधनकारी संतानोत्पादन से बच निकलने के लिए अब तो ब्रह्मचर्य भी अनिवार्य नहीं रहा। विज्ञान ने उससे बचे रहने के सरल उपाय भी निकाल दिए हैं। प्रजनन से शक्तियों को बचाकर उन्हें परमार्थ-प्रयोजनों में लगाया जा सकता है।
विष्णुग्रंथि का नियम एक सिद्धांत अपनाने भर से हो सकता है। औसत भारतीय स्तर का जीवन जिया जाए। उन लिप्साओं को निरस्त किया जाए तो लोभ, लालच, संग्रह एवं अपव्यय के लिए दौलत जमा करने की हवस भड़काती रहती हैं। परिवार भावना अपनाने पर यह ललक सहज मिल जाती है। विश्व परिवार की भावना रखी जा सके तो अपने लिए अधिक और दूसरों के लिए कम का अनौचित्य मन से हट सकता है और न्यायपूर्वक, श्रमपूर्वक कमाई से भी भली प्रकार गुजारा हो सकता है।
अहंता से छुटकारा पाने के लिए शिष्टता, नम्रता, विनयशीलता, सज्जनता अपनाने पर तो आत्मसंतोष और लोक-सम्मान का लाभ मिलता है। उस पर विचार करना चाहिए। उद्धत आचरणों में दूसरों पर छाप डालने के लिए जितना दंभ अपनाना पड़ता है, उसकाे बचकानापन समझा जा सके तो अहंकारी को अपने ऊपर आप हँसी आती है और शालीनता अपनाकर दूसरों को सम्मान देने का मार्ग चुना जा सके तो अहंकार का दुर्गुण सहज शांत हो सकता है। शरीरसत्ता को मल-मूत्र की गठरी मानने वाला, मृत्यु के मुख में ग्रास की तरह अटका हुआ तुच्छ प्राणी किस बात का अहंकार करे?
तीनों ग्रंथियों को हम विवेकदृष्टि से वस्तुस्तिथि का पर्यवेक्षण करते हुए सहज ही बंधनमुक्त हो सकते हैं।
गुरुकुलों के अध्यापक, प्राचार्य अपने छात्रों को पढ़ाकर सुयोग्य बना देते हैं। व्यक्तिगत संपर्क में भी ऐसा ही होता है। अरस्तू ने सिकंदर काे पढ़ाकर महान पुरुषार्थी बनाया था। चाणक्य ने चंद्रगुप्त को, समर्थ ने शिवा को, परमहंस ने विवेकानंद को, विरजांद ने दयानंद को, गाँधी ने विनोबा को इस प्रकार का शिष्य बनाया था कि गुरु और शिष्य दोनों ही धन्य हो गए। वसुदेव ने वासुदेव नाम को अपने पुत्र को प्रख्यात कर दिया। जनक की बेटी जानकी ने अपने पिता के गौरव में चार-चाँद लगा दिए। पिता के नाम से पुत्र भी यशस्वी होते हैं और कई बार पुत्र भी पिता को निहाल कर देते हैं। श्रवण कुमार के कारण उनके माता-पिता सर्वत्र जाने जाते हैं, भले ही उनका नाम बहुतों को मालूम न हो। भागीरथी गंगा को इसलिए कहा जाता है कि स्वर्ग से भूमि पर उन्हें उतारने का उत्कृष्ट प्रयत्न भागीरथ ने ही किया। अर्जुन को कौन्तेय इसी कारण कहा जाता है कि उनकी असाधारण प्रतिभा उनकी माता ने भरी थी।
हममें से प्रत्येक को एक विद्यार्थी पढ़ाने, एक शिष्य गढ़ने, एक प्रतिमा बनाने का काम अपने जिम्मे लेना चाहिए। यों प्रतिभावान व्यक्ति एक साथ कई-कई काम हाथ में लेते हैं और पूरा कर दिखाते हैं। व्यस्त लोग भी कइयों की जिम्मेदारी अपने ऊपर उठा लेते हैं। पी.एच.डी., वकालत, चार्टर्ड एकाउन्टेंट आदि पढ़ने वालों को अपने मार्गदर्शक के साथ संपर्क में रहना और समाधान करना, अनुभव बढ़ना आदि में तत्पर रहना पड़ता है। यों वे पढ़ाने वाले भी अपने कामों में व्यस्त रहते हैं फिर भी किसी न किसी प्रकार समय निकालकर उन्हें सिखाते-समझाते रहते हैं, जिन्हें सुयोग्य बनाने का जिम्मा उनने अपने कंधों पर लिया है।
हम एक छात्र को, शिष्य या पुत्र को सुयोग्य बनाने का जिम्मा लें। उसे स्वयं पढ़ाएँ। कितना, किस प्रकार उस पढ़ाई को हृदयंगम किया इसका भी ध्यान रखें। राजा लोग प्रत्येक राजकुमार के लिए एक ट्यूटर गार्जियन नियुक्त करते थे। विष्णु शर्मा ने एक राजा के उद्दंड बालकों को कथा कहानियाँ सुनाकर सुयोग्य बना दिया था। हम एक ऐसे बालक की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाएँ जो अपना सगा है। साथ रहता है और वफादार सेवक तक है।
इस विद्यार्थी का नाम है— ‘अपना मन’। बाहर के कितनों को ही सलाह, सहायता दी गई; पर खेद है कि इसकी ओर कभी आँख उठाकर भी नहीं देखा। यदि उसकी दुर्दशा का पर्यवेक्षण भर किया होता तो प्रतीत होता कि वह कैसी आवारागर्दी में फँस गया है, किस कुसंग में निरत रहने लगा है और कैसी अनगढ़ गतिविधियाँ अपना चुका है जो उसे नहीं ही अपनानी चाहिए। उसके पिछड़ेपन की— कुमार्गगामिता की जिम्मेदारी आपकी है। जब फेल होने वाले विद्यार्थी, स्कूल की, अध्यापक वर्ग की बदनामी भी कराते हैं। जब कपूत बेटा बाप को जलील करता है तो कोई कारण नहीं कि आपके साथ गुँथे हुए मन की अपनाई हुई अवांछनीयता, उद्दंडता, मूर्खता आपको बदनाम न करें। इस स्थिति में मात्र बदनामी ही नहीं प्रत्यक्ष हानि भी है। ऐसी हानि जिसकी क्षतिपूर्ति और कोई नहीं कर सकता।
मन को सुसंस्कृत बनाया जाना चाहिए। उसे हित-अनहित में, अनौचित्य-औचित्य में अंतर करना सिखाया जाना चाहिए। अब तक जो ढर्रा चलता रहा है, उनमें वह विवेचन-विश्लेषण करना उसे सिखाया ही नहीं गया, फिर बेचारा करता क्या? जो समीपवर्ती लोगों से देखता-सुनता रहा उसकी बंदर की तरह नकल और तोते की तरह रटंत हो जाती है। सुप्रचलन का स्वरूप कभी देखा ही नहीं, सुसंस्कारियों, विचारशीलों के साथ रहा ही नहीं तो उस मार्ग पर चलना कैसे सीखें?
सिखाने वाले मदारी साँप, बंदर, रीछ को नाचना सिखा लेते हैं। सरकस वाले शेर, हाथी, वनमानुष तक को ऐसा सधा लेते हैं कि दर्शकों का भरपूर मनोरंजन और कंपनी वाले को पर्याप्त मुनाफा होता रहे। सिखाने वाले के कौशल की सर्वत्र प्रशंसा होती रहे। फिर कोई कारण नहीं कि मन को सुसंस्कारी न बनाया जा सके। उसे गलाकर स्वर्ण आभूषणों की भाँति मनोरम न बनाया जा सके।
मन की शक्ति अपार है। उसकी सत्ता शरीर और आत्मा को मिलाकर ऐसी बनी है जैसी सीप और स्वातिकण का समन्वय होने से मोती बनता है। जीवन-संपदा का वही व्यवस्थापक और कोषाध्यक्ष है। साथ ही उसे इतना अधिकार भी प्राप्त है कि वह अपने मित्र को-अपने साधनों को पूरी तरह भला या बुरा उपयोग कर सके। इतने सत्तावान का अनगढ़ होना सचमुच ही एक सिर धुनने लायक दुर्भाग्य है।
इस विडंबना का और कोई कारण नहीं, हमारी उपेक्षा ही असमंजस जैसी परिस्थितियों का निमित्त है। महावत के बिना हाथी चाहे जिस दिशा में, चाहे जब चल सकता है और चाहे जिसका, चाहे जितना अनर्थ कर सकता है। हाथी वह है, जो अपनी और सवार की प्रतिष्ठा बढ़ाता है; पर छुट्टल और बिगड़ैल होने पर तो वह आतंकवादी-यमदूत जैसा डरावना बन जाता है।
हमारी सत्ता आत्मा है। हमारा साथी-सहकारी विवेक है। दोनों मिलकर मन को सही कल्पना, सही इच्छा करने की शिक्षा दे सकते हैं और संमार्ग पर चलना सिखा सकते हैं। मन अनाड़ी भर है, अवज्ञाकारी नहीं। अभ्यस्त दुर्गुणों को छोड़ने और नए सिरे से सिखाए गए सद्गुणों को अपनाने में अभ्यासवश आनाकानी अवश्य करता है; पर उसे कड़ा निर्देशन दिया जाए और जो करने योग्य है उसे करने के लिए बाधित किया जाए तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि सर्वथा इनकार करे और अपने को बदलने के लिए सहमत न हो।
मन को कुसंस्कारों से विरत करने के लिए चार पाठ पढ़ाए जाने चाहिए (1) विचार संयम (2) समय संयम (3) अर्थ संयम (4) इंद्रिय संयम। मस्तिष्क में जो भी विचार उठें उनका तत्काल परीक्षण किया जाना चाहिए कि वे नीतियुक्त, उपयोगी और रचनात्मक हैं या नहीं। बेतुकी कल्पना, ऐसी इच्छाएँ उठती हों तो उनकी जड़ आरंभ से ही काट देनी चाहिए। गाड़ी एक कदम आगे नहीं बढ़ने देनी चाहिए। उसके स्थान पर सामयिक समाधान एवं अभ्युत्थान की बात सोचने में उसे जुटा दिया जाना चाहिए। दूसरी बात सुनियोजित दिनचर्या बनाने की है। समय को हीरे-मोतियों के समान मानकर उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिए। उठने से लेकर सोने तक की समयचर्या ऐसी बनानी चाहिए, जिससे व्यक्तित्व का स्तर निखरता हो और योग्यता का, प्रगति का विस्तार होता हो। पैसे के संबंध में प्रदर्शन, और कौतुक-कौतूहल में एक पाई भी व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। खर्च करने से पहले अनेक बार विचारा जाए कि यह नितांत आवश्यक है या नहीं। पैसा और श्रम एक ही बात है। श्रम को निरर्थक प्रयासों में लगाना जिस प्रकार दुःखद परिणाम प्रस्तुत करता है, उसी प्रकार धन का अपव्यय भी बदले में विपत्ति लेकर वापस लौटता है। चौथा निर्देशन है— 'इंद्रियनिग्रह।' इंद्रियनिग्रह का अर्थ ही जीभ का चटोरापन और यौनाचार के प्रति अनावश्यक आकर्षण है। चटोरापन शरीर को विपत्ति में फँसाता है और कामुकता मस्तिष्क को खोखला करती है।
इन सभी असंयमों से बचते हुए ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का सिद्धांत मन को इस प्रकार पढ़ाना चाहिए कि वह उसे भुला देने की गलती न करे।
“अन्य व्यक्ति को मारने के लिए तलवार, ढाल आदि शस्त्रों की आवश्यकता पड़ती है; पर अपने को मारना हो तो एक नहन्नी (नाखून काटने वाली) ही काफी होती है। इसी प्रकार जनसमाज को उपदेश देने के लिए मनुष्य को अनेक शास्त्रों के अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है; पर यदि स्वयं धर्म प्राप्त करना हो तो केवल एक ही धर्म-वाक्य के ऊपर विश्वास रखकर वैसा किया जा सकता है।”
वातावरण का अपना प्रभाव है। उसकी क्षमता से इंकार नहीं किया जा सकता। ऋतुओं का प्रभाव प्रत्यक्ष है। सर्दी के दिनों धूप कितनी सुहाती है और भारी कपड़ों की आवश्यकता पड़ती है, तब कहीं ठंड छूटती है। गर्मी के दिनों में परिस्थितियाँ इससे बिल्कुल भिन्न होती हैं। धूप छोड़कर छाया की ओर भागने को मन करता है। कपड़े हल्के से पहनना ही पर्याप्त होता है और बाहर खुले में सोने को मन करता है।
वर्षा की स्थिति और भी विचित्र है। गीले कपड़े सूखते नहीं। मक्खी-मच्छरों का राज्य छा जाता है। बादल गरजते हैं, बिजली चमकती है और पानी इस-उस रास्ते, घर में घुसने का प्रयत्न करता है। सर्दी में पेड़ ठूँठ हो गए थे, पतझड़ ने सारे पत्ते गिरा दिए थे। गर्मी में घास तक सूख गई थी; पर बरसात आते ही समूची जमीन पर मखमली फर्श बिछ जाती है। बसंत की अपनी अलग ही बहार है, पेड़-पौधे फूलों से लद जाते हैं। ऋतुओं की अपनी-अपनी सुविधाएँ और अपनी-अपनी असुविधाएँ हैं। इस प्रभाव से हम यथासंभव बचाव कर सकते हैं; पर वातावरण से पूरी तरह छुटकारा नहीं पा सकते।
इसी प्रकार क्षेत्रों का भी अपना-अपना प्रभाव होता है। पर्वतीय ऊँचे शिखर स्वास्थ्यकर माने जाते हैं और तराई की सीलन भरे इलाकों में वहाँ के निवासी आए दिन मलेरिया से संत्रस्त रहते हैं। पहाड़ों पर गलगंड और उड़ीसा जैसे क्षेत्रों में कुष्ठ की भरमार रहती है, फाइलेरिया की भी। राजस्थान में नारू के फोड़े निकलने का संकट छाया रहता है। बंगाली नाटे, दुबले होते हैं जबकि पंजाब-बलूचिस्तान के लंब-तड़ंग। योरोपीय गोरे और अफ्रीका में काले चमड़े वाले लोग पाए जाते हैं। नागपुरी संतरे, बंबैया केले, लखनऊ के आम प्रसिद्ध हैं। यह क्षेत्रों की अपनी-अपनी विशेषता है। इसी का दूसरा नाम वातावरण भी है।
वातावरण से व्यक्ति प्रभावित होता है। संत-सज्जनों के सत्संग और दुष्ट-दुरात्माओं के कुसंग में भारी अंतर होता है। एक प्रकृति के अनेक लोग जहाँ रहते हैं, वहाँ उस प्रकार का वातावरण बन जाता है। उससे व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। वेश्याओं के मोहल्ले और नशेबाजी के अड्डे अपना प्रभाव बना लेते हैं और उसके चुंबकत्व से मनुष्य अनायास ही खिंचने लगता है। पहले उसी प्रकार सोचने लगता है, पीछे वैसी क्रियाएँ भी होने लगती हैं।
आवा जब गरम होता है, तो उसमें कुम्हार के बर्तन ही नहीं पकते; वरन आस-पास की वह जमीन भी जल जाती है, जिसे जलाने का कोई उद्देश्य नहीं था।
व्यक्ति अपने को जैसा भी बनाना चाहता हो, उसे उसके अनुकूल-अनुरूप वातावरण तलाशना चाहिए। वहाँ के निवासियों की गतिविधियाँ तो प्रभावित करती ही हैं, इसके अतिरिक्त वहाँ सूक्ष्म वातावरण भी ऐसा छाया रहता है, जिसका चुंबकत्व बिना कुछ कहे-सुने, देखे-भाले भी अपना प्रभाव छोड़ता है।
देखना यह है कि हमें अपना भावी जीवन किस ढाँचे में ढालना है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि उसी क्षेत्र में अपने निवास एवं संपर्क का सिलसिला आरंभ हो। उस क्षेत्र की अनेकों बारीकियाँ अपने आप ही खींचने, धकेलने और घसीटने का प्रयास करती दिखाई देंगी। व्यक्ति अनायास ही उस ढाँचे में ढलता हुआ पाया जाएगा।
प्राचीनकाल में महामानवों के निकटवर्ती वातावरण में ऐसी व्यवस्था रहती थी कि उस स्तर की ढलाई का कार्य अनायास ही चल पड़े। पक्षधर विचारों की शृंखला मस्तिष्क में चल पड़े और प्रतिरोधी विचारों का, शंकाओं का समाधान स्वयमेव होते चलें। उस क्षेत्र में परस्पर चर्चाएँ भी ऐसी होती रहती हैं, जो प्रत्यक्ष कानों से ही नहीं, सूक्ष्मकानों में से प्रवेश करती हुई अपने चिंतन से टकराती और अपने समर्थन का प्रभाव जमाती हैं।
यह सामान्य व्यक्तियों की बात हुई। वरिष्ठ व्यक्तियों का मनोबल इससे भिन्न होता है। उनकी निज की प्रतिभा इतनी पैनी और तीखी होती है कि वातावरण को बदलकर अपने अनुरूप बना सके। रस्सी खींचने के खेल में जिस ओर ताकत अधिक होती है, उसी ओर खिंचाव बढ़ता जाता है और वही पक्ष जीत बोलता है।
कुछ मनस्वी व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो वातावरण के प्रभाव को दुत्कार देते हैं और अपनी प्रतिभा से गिरे हुओं को उठाते और भटकों को संभालते हैं। ईसामसीह ने आजीवन बीमारों और दुर्जनों के साथ निवास किया, उनने अपने प्रभाव से उन्हें सुधारा, स्वयं उनके प्रभाव की ओर तनिक भी आकर्षित नहीं हुए। गाँधीजी जब आते, तब हरिजन मुहल्लों में ठहरते थे। ठक्कर बाबा पिछड़े लोगों के बीच ही काम करते रहे। गुजरात के रविशंकर महाराज ने चोर-डाकुओं के बीच अपना कार्यक्रम बनाया। बाबा राघवदास ने कुष्ठ आश्रम स्थापित किया। इतने पर भी उस समुदाय के लोगों में पा जाने वाले दुर्गुण उन्हें प्रभावित न कर सके, वरन पिछड़ों को ही उनने ऊँचा उठाने का आजीवन प्रयास किया। यह प्रयत्न निष्फल भी नहीं गया, उसने अपना चमत्कारी प्रभाव भी दिखाया।
ऐसी दशा में किस तथ्य को महत्त्वपूर्ण माना जाए? वातावरण को प्रमुखता दी जाए या प्रतिभा को? इस प्रश्न के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि मनोबल की प्रखरता ही प्रचंड है। यदि गए-गुजरों का संगठित मनोबल प्रबल है और उस क्षेत्र से संपर्क-साधने वाले के विचार ढिल-मिल जाते हैं, तो वह उसी ओर खिंचता चला जाएगा, अन्यथा निज की मनस्विता के सहारे न केवल उस क्षेत्र के निवासियों को सुधारेगा, वरन अपने आपे की सुरक्षा भी किए रहेगा।
संक्रामक रोगों के अस्पताल में डॉक्टरों की टीम काम करती है, बीमारों के बीच रहते हुए, उन्हें रोग-निवारण का अवसर देते हुए भी स्वयं अप्रभावित बने रहते हैं, अपने स्वास्थ्य को आँच नहीं आने देते। इसमें उनकी निजी सतर्कता और स्वच्छता ही प्रधान कारण होती है। इसी प्रकार ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वातावरण के प्रभाव से मलेरिया, फायलेरिया जैसे रोगों की भरमार होती है। जहाँ व्यभिचार का बोलबाला है, उस क्षेत्र के निवासियों को यौन रोग घेरे रहते हैं। डॉक्टर वहाँ भी काम करते हैं। चिकित्सक को छूत लगने का भी भय रहता है; पर अपनी बलिष्ठ मानसिकता के सहारे तनकर खड़े रहते हैं और कुप्रभाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते, वरन इस प्रकार लगनपूर्वक काम करते हैं कि उन क्षेत्रों से उन बीमारियों का प्रकोप ही चला जाए। साथ ही जिन कारणों से वह अस्वस्थता फैलती थी, उसके निवारण के ऐसे प्रयास भी आरंभ कराते हैं कि अस्वास्थ्यकर क्षेत्र अपनी बदनामी मिटाकर स्वास्थ्यकर क्षेत्र होने के रूप में प्रख्यात हो सकें।
साधारण मनःस्थिति के लोगों के लिए यही स्थिति है कि अनुपयुक्त वातावरण से बचें और जहाँ श्रेष्ठता अग्रणी हो, वहाँ संपर्क साधें तथा अधिक समय गुजारने का प्रयत्न करें। अपने कोमल प्रकृति के बच्चों को उसी संपर्क में अधिक से अधिक रखने का प्रयत्न करें; किंतु जिनकी प्रतिभा उच्चस्तरीय है, उन्हें दूसरी तरह सोचना चाहिए। उन्हें शंकर की तरह गले में साँप लटकाए रहने चाहिए और भूत-प्रेतों को अपनी सेना में भर्ती करना चाहिए। उन्हें सुधारने का कार्य अपने जिम्मे उठाना चाहिए, अन्यथा विलग रहने पर पिछड़े और पतित क्षेत्रों का तो उत्कर्ष ही नहीं हो सकेगा।
सुल्तान नासिरुद्दीन बड़ा धर्मनिष्ठ, स्वावलंबी व नेकदिल इंसान था। वह अपने खजाने से कुछ भी न लेकर अपने हाथ से किताबों की प्रतियाँ तैयार करके गुजर करता था। उसका खाना भी उसकी बेगम ही बनाया करती थी। एक रोज उसने बादशाह से प्रार्थना की— “खाना पकाने में मुझे काफी दिक्कत होती है, मेहरबानी करके एक नौकरानी रखवा दीजिए, जो मेरी मदद करती रहें।” बादशाह ने कहा— “खजाना कोई मेरा तो है नहीं, इस पर तो सारी रियाया का हक है, मेरी खुद की कमाई इतनी नहीं है; फिर नौकरानी कैसे रखूँ।”
सृष्टि के प्रारंभ से ही मनुष्य ने अपने साथियों के साथ मिलकर समाज में रहने के लिए कुछ नियम एवं नियंत्रण कायम किया है। विभिन्न उच्च ज्ञान प्राप्त लोगों ने अपनी-अपनी रुचि एवं अनुभव के आधार पर मनुष्य के चरित्र एवं व्यवहार को सुव्यवस्थित रखने के लिए अनेक नियम बनाए हैं। इन नियमों का पालन उनके लिए ही लाभदायक है, जो इन पर चलते हैं।
ये आचार संहिता क्रियाशीलता एवं उद्देश्यों के हैं। जुडाइज्म, ईसाई एवं मुस्लिम आदि संगठनों के अलग-अलग आचार संहिता हैं। प्राचीनकाल एवं अर्वाचीन— दोनों में चरित्र पर प्रभाव डालने का कार्य धार्मिक संस्थाएँ करती हैं। कहीं-कहीं सरकार भी इस ओर ध्यान देती है। आजकल दिनों-दिन लोगों का चरित्रबल उन संहिताओं के विपरीत घट रहा है।
अनेक विद्वानों के अनुसार चरित्रबल बढ़ाने के लिए अध्यात्मवाद उपयोगी है। इससे चरित्र और व्यवहार आदर्श बनते हैं। यह सभी समाजों (संगठनों) के लिए उपयुक्त है, क्योंकि यह किसी से भेद और पक्षपात नहीं करता। इसमें भावनाएँ एवं धारणाएँ अंतर्मन से होती हैं, इसलिए इससे समाजों का सर्वाधिक कल्याण होगा। इससे मानवमात्र अधिक उन्नत एवं सुखी होगा।
प्लूटिनस (आदि अनेक विद्वानों) ने कहा है कि अध्यात्मवाद ही आदर्श चरित्र एवं व्यवहार प्रदान करता है। यदि मनुष्य एक बार सही जीवनक्रम बना ले, तो नीतिशास्त्र और सच्चरित्रता मनुष्य को सभ्य एवं उन्नत बना सकते हैं। इस माध्यम से ही मनुष्य सर्वोच्च सत्ता से एकता स्थापित करता है, उसकी शक्तियों का ज्ञान पाता है एवं उपयोग में लाता है। प्रकृति के विरुद्ध चलने से मनुष्य दुखी होता है।
प्लूटिनस नित्य विश्व की भलाई की बात सोचता था। उसके अनुसार सर्वत्र अच्छाइयाँ हैं, मनुष्य उन्हें ग्रहण करे और उत्कृष्ट बने। यह सरल जीवन से मिलती है। ईश्वर अंतःदर्शन से मिलता है। उसका कुछ अंश प्रत्येक मनुष्य में है। उसे महसूस करने पर वह अच्छा बनता है। इससे उसे शांति और संतोष प्राप्त होते हैं।
शेल्डन चेने का कथन है कि प्लूटिनस के सभी विश्वासों और उपदेशों का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ा है। उसका उपदेश है कि नीतिशास्त्र का रहस्यमय सिद्धांत ईश्वर से संपर्क बनाना है। इससे दूर रहने के कारण ही झगड़े, छीना-झपटी, आक्रमण के भाव, स्वार्थता, निर्दयता, दुर्व्यवहार आदि अनेक बुराइयाँ मनुष्य में आती हैं। अधिकांश लोग रहस्यवाद के आदर्शों के अनुसार नहीं चलते। प्रत्येक मनुष्य के भीतर कुछ रहस्यमय अनुभव होते हैं, जो उसकी भावनाओं एवं जीवन को जाने-अनजाने प्रभावित करते हैं।
बुरे मनुष्यों में भी कभी-कभी प्यार, सद्भाव, दया और अच्छा व्यवहार जागृत होते हैं। यह आंतरिक पुकार होती है, जो उन्हें नीतिमय कार्यों को करने की प्रेरणा देती है। प्रत्येक की आत्मा से नीतिमय आचरण अपनाने की प्रेरणा होती है। जिन लोगों ने आत्मा उन्नति कर ली है और उस सर्वोच्च सत्ता से संपर्क कायम कर लिया है, उन्हें यह प्रेरणा अधिक होती है। रहस्यवादी इसमें सबसे अधिक अनुभवी होते हैं।
नैतिक सद्भावनाएँ वास्तव में अंतःकरण से आती हैं और प्रेम व सहानुभूति प्रकट करती हैं। यही अध्यात्म का सार है, जो ईश्वरीय प्रेरणाएँ देती हैं। ये मनुष्य द्वारा अर्जित नहीं है। अध्यात्मवादी अनुभव अंतः नैतिक आचरण के मूल हैं, जो प्रत्येक मनुष्य के अंतःमन या आत्मा में छिपे रहते हैं और समय आने पर उभरते हैं। इस तरह अध्यात्म का सार ‘प्रेम’ सर्वोच्च सत्ता का मानव को उपहार है।
तत्त्वज्ञ प्लूटिनस, बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म आदि सब मानते हैं कि सार्वभौम सत्ता प्रत्येक मनुष्य के भीतर है और समस्त प्रेरणाओं को देती है। एरवार्ट के अनुसार ईसाई धर्म भी इसे मानता है। इस तरह रहस्यवादी चेतना सब लोगों में शक्तिमान है। स्टेसी का कथन है कि रहस्यवादी चेतना व शक्तिशाली प्रेरक, (नैतिक और सामाजिक दृष्टि से) है। रहस्यवादी के अनुसार वह सार्वभौम सत्ता ही सबको सदाचार की प्रेरणा देती है, जिससे मानव सभ्य और परोपकारी बनता है। उद्योग, व्यवसाय, विज्ञान, प्रशासन, कला, चरित्र और धर्म का आधुनिक विकास भी उस सर्वोच्च सत्ता की उपस्थिति का बोध कराता है। उसकी सहायता के बिना ये उन्नतियाँ संभव नहीं हैं। अध्यात्मवादी का दृष्टिकोण मानव को आशाएँ एवं अच्छाइयाँ प्रदान कराता है।
प्लूटिनस के अध्यात्मवादी अनुभवों और सिद्धांतों ने विश्व को नया मार्गदर्शन दिया है। उसके अनुसार इससे आत्मा सौंदर्यता से भर जाता है और स्वार्थपरक जीवन त्याग देता है। उसे भरपूर अंतःदर्शन होता है और ईश्वर को अपने भीतर देखता है। वह परम सौंदर्य से जुड़ जाता है और सर्वत्र उसे ईश्वर दिखाई देता है।
प्लूटिनस का कथन है कि अध्यात्मवादी को मनोभाव एवं बौद्धिक प्रकाश मिलता है, जिससे वह असीम आनंद का अनुभव करता है। इससे वह ईश्वर को प्राप्त करता है। उसे बार-बार यह अनुभव होता है। डॉ. वुके और एरवार्ट के अनुसार इसके लिए मनुष्य को बहुत दिनों तक तैयारी करनी पड़ती है। उसे अपने शरीर और मन की सफाई करनी पड़ती है एवं इस योग्य उन्हें बनाना पड़ता है। संत टेरेसा को यह अंतःदर्शन कुछ घंटों की प्रार्थना एवं योग से हो गया था, जो एक अपवाद है।
आमतौर पर सर्वोच्च सत्ता के ज्ञान एवं भावों से स्वयं को प्रकाशित करने के लिए कठिन अभ्यास एवं साधना करनी पड़ती है। रोसीक्रुशन दर्शन के अनुसार अंतःदर्शन को विकसित करने के लिए धीरे-धीरे अभ्यास कराया जाता है। सभी मतों के अनुसार यह अभ्यास आवश्यक है। सब मनुष्य प्रयास और अभ्यास करने पर अंतःदर्शन कर सकते हैं। हमारे जीवन में अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं, जब हम भौतिक कठिनाइयों में घिर जाते हैं और उनसे निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता। ऐसे अवसरों पर अनेकों को अचानक यह अंतःप्रकाश मिलता है और उनकी कठिनाई का हल निकल आता है।
यह अंतःप्रकाश मन या ज्ञान की उपज नहीं हैं, वरन यह अंतःकरण का प्रकाश है जो कि सर्वोच्च सत्ता से संबंध स्थापित होने पर होता है। विचार के अनुसार प्रकृति का बाह्य स्वरूप ही हम जानते हैं; परंतु अंतःदर्शन से उसके गूढ़ रहस्यों का ज्ञान होता है। इससे सार्वभौम एकत्व का हमें ज्ञान होता है। यही स्व प्रकाश है।
देखा जाए तो आज मनुष्य पदार्थ विज्ञान की उन्नति करने और उपयोग करने में लगा है एवं आदर्शवाद को भूल गया है। आदर्शवाद सत्य के निकट है और पदार्थज्ञान सत्य से परे है। सत्य की प्राप्ति के लिए हम आदर्शवाद को अपनावें। रहस्यवाद समस्त आदर्शों का भंडार है। यह मन और इंद्रियों के अलावा अपने भीतर और विश्व का भी सही ज्ञान कराता है। अध्यात्मवाद से ही हम अभौतिक विश्व के रहस्य को स्थाई रूप से एवं सत्य के आधार पर जान सकते हैं। यह चेतना को जागृत करता है और पदार्थवाद से संबंध स्पष्ट करता है। पदार्थवाद और आदर्शवाद के बीच व्यवस्थित एवं मधुर संबंध स्थापित करने से ही हम विश्व व मनुष्य की प्रकृतियों को ठीक से जान सकते हैं।
यह सत्य का ज्ञान कराता है एवं उसे व्यवहार व सिद्धांतों में उपयोग में लाने का तरीका बतलाता है। यह मानव जीवन का उद्देश्य एवं विश्व में उसका स्थान (महत्त्व) का भी बोध करता है। प्लेटो का कथन है कि पदार्थ जगत में जो कुछ हम जानते हैं, वह सब इस दुनिया के बाहर स्थित पदार्थों की मात्र नकल है। आदर्शवाद के अनुसार अध्यात्म के सिद्धांतों का सार यही है कि सत्य एक है और वह यह है कि विश्व ‘अद्वैतवाद’ का प्रतीक है। अध्यात्मवादी के अनुभव के अनुसार अद्वैतवाद ही सत्य है, जो मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
ध्यान की विभिन्न स्थितियों का अनुसंधान कर रहे वैज्ञानिकों ने पाया है कि ध्यान की अतल गहराई में प्रविष्ट होने पर साधक के शारीरिक एवं मानसिक क्रियाकलापों में एकरसता— साम्यता आती है। ऐसी स्थिति में ऑक्सीजन की खपत और चयापचई-दर बहुत कम हो जाती है और रक्त में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ ऑक्साइड का आंशिक दबाव स्थिर हो जाता है। ध्यान के समय शारीरिक कोशिकाएँ गहरे विश्राम की स्थिति में चली जाती हैं और उस समय उन्हें अपनी गतिविधियाें के संचालन में ऑक्सीजन की स्वल्प मात्रा से ही काम चल जाता है।
ध्यान के समय श्वसन-दर असामान्य रूप से कम हो जाती है और तंत्रिका तंत्र के तंतुओं में शिथिलन एवं तनावरहित की स्थिति आ जाती है। ऐसी स्थिति में साधक को असीम आनंद की अनुभूति होती है। ध्यान की गहराई में उतरने पर कार्डिएक आउटपुट— हृदीय उत्पादन भी बहुत कम हो जाता है, क्योंकि उस समय हृदय पर कार्य का दबाव कम पड़ता है।
अमेरिका के डॉ. राबर्टकिथ वैलेस ने बताया है कि ध्यान के समय रक्त में उपस्थित ब्लड लैक्टेट का स्तर बहुत कम हो जाता है। तंत्रिका तंतुओं को उत्तेजित करने वाले चिंताजनक घटक— लैक्टेट की मात्रा कम हो जाने पर उच्च रक्तचाप और हृदयाघात जैसी भयानक बीमारियाँ स्वतः दूर हो जाती हैं। अतः ध्यान के माध्यम से इन बीमारियों पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है।
डाॅ. वैलेस का कहना है कि तनाव या चिंता की स्थिति में त्वचा की अवरोधक क्षमता कम हो जाती है। ध्यान के समय चिंता या तनाव कम हो जाता है, ध्यान का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर व्यक्ति पूर्णतया तनावमुक्त हो जाता है और उसके शारीरिक त्वचा की अवरोधक क्षमता असामान्य रूप से बढ़ जाती है।
अनुसंधानकर्त्ता वैज्ञानिकों— राबर्टकीथ वैलेस, हर्बर्ट वेन्सन और ए.एफ. विल्सन ने अपने अध्ययन में पाया कि ध्यान की एकाग्रता के समय साधक के मस्तिष्क के अग्रभाग से 8-9 साइकिल्स प्रति सेकेंड की दर से मस्तिष्कीय तरंगें निकलती हैं। साथ ही कभी-कभी 5-7 साइकिल्स प्रति सेकेंड की दर से प्रभावी समकालीन तरंगें भी निकलती हुई देखी गई हैं। ये मस्तिष्कीय तरंगें जागृत और सुषुप्ति अवस्था से भिन्न मस्तिष्कीय कार्यिकी के साम्यावस्था को प्रदर्शित करती हैं। यह प्रक्रिया मस्तिष्क के चैतन्यावस्था और विश्राम की स्थिति में होती है।
डाॅ. जीन पाल बैन्क्वेट ने अपने अनुसंधान ‘ई.ई.जी. और ध्यान’ में बताया है कि विश्राम की स्थिति में मानव मस्तिष्क से 10 साइकिल्स प्रति सेकेंड की दर से अल्फा तरंगें एक निश्चित क्रम में निकलती हैं और ध्यान के समय 22 साइकिल्स प्रति सेकेंड की दर से निकलने वाली बीटा तरंगें भी निश्चित क्रम में ही निकलती हैं। यह तरंगें मस्तिष्क के प्रत्येक भाग से निकलती हैं, जो मस्तिष्क के चेतनात्मक अवस्थापूर्ण जागृत अवस्था की परिचायक हैं। चेतना की सामान्य स्थितियों में अचानक, अनियमित क्रम में एवं मिश्रित रूप में ये तरंगें निकलती रहती हैं। ध्यान की प्रगाढ़ता में इन तरंगों का क्रम व्यवस्थित और नियमित हो जाता है।
सामान्यतया मानसिक सक्रियता की स्थिति में मानवी मस्तिष्क से ‘बीटा तरंगें’ निकलती रहती हैं। जिनकी आवृत्ति— फ्रीक्वेंसी 13 साइकिल्स (चक्र) प्रति सेकेंड एवं इससे अधिक होती हैं। ध्यानावस्था में मस्तिष्क से ‘अल्फा तरंगें’ 8-13 साइकिल्स (चक्र) प्रति सेकेंड की दर से निकलती हैं। ध्यान की प्रगाढ़ता एवं समाधि अवस्था में अल्फा तरंगों का स्थान ‘डेल्टा तरंगें’ ले लेती हैं, जिनकी आवृत्ति दर 3-5 चक्र प्रति सेकेंड होती है। शिशु अवस्था में भी यही डेल्टा तरंगें शिशु के मस्तिष्क से निस्सृत रहती हैं। शिशु जैसे-जैसे बड़े एवं परिपक्व होने लगते हैं, डेल्टा तरंगों का स्थान ‘थीटा तरंगें’ लेने लगती हैं, जिनकी आवृत्ति 3-7 चक्र प्रति सेकेंड होती है।
पूर्ण विश्रामयुक्त जागृत अवस्था में अल्फा तरंगें 8 चक्र प्रति सेकेंड की गति से निकलती हैं और उनींदेपन की स्थिति में इनका संवहन मंद आवृत्ति वाली सम्मिश्रित 4 चक्र प्रति सेकेंड वाली थीटा तरंगें और 2 चक्र प्रति सेकेंड की गति वाली कम आवृत्ति की डेल्टा तरंगों में हो जाता है। ध्यान की गहराई में प्रविष्ट होने पर थीटा तरंगों का परिवर्तन अल्फा तरंगों में हो जाता है। उनींदेपन की स्थिति में अल्फा तरंगों के साथ मिश्रित थीटा और डेल्टा तरंगें भी एकांतर क्रम से निकलती रहती हैं। जबकि ध्यान के समय एक निश्चित और लगातार क्रम में अल्फा और थीटा तरंगें मस्तिष्क से प्रस्फुटित होती हैं। हल्की नींद की स्थिति में अल्फा तरंगों का निकलना बंद हो जाता है; परंतु मिश्रित तरंगें [थीटा और डेल्टा] निकलती रहती हैं।
मानव मस्तिष्क के दाँए तथा बाँए सेरिब्रल हेमिस्फेयर से निकलने वाली विद्युतीय तरंगों का क्रम सामान्यतया अनियमित रहता है। ध्यान का अभ्यास करने पर इन मस्तिष्कीय तरंगों के क्रम में आपसी सामंजस्य स्थापित हो जाता है, जिसकी फलश्रुति— बुद्धि-विकास, स्मृति एवं विचार-क्षमता में वृद्धि, स्वास्थ्य-सुधार आदि के रूप में होती है। ध्यान के परिणाम स्वरूप तंत्रिका तंत्र की क्रियाशीलता बढ़ जाती है और वह सुचारु रूप से अपने सभी कार्यों को संपादित करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। ध्यान के समय अल्फा तरंगें मस्तिष्क के पिछले भाग से निकलती हुई आगे की ओर फैल जाती हैं, जिससे मस्तिष्क की पूर्ण क्षमता का विकास होता है।
ध्यान के समय हृदय और मस्तिष्क को कार्यिकी की दृष्टि से भी विश्राम करने का पूर्ण अवसर मिलता है। जैसे-जैसे ध्यान का अभ्यास बढ़ता जाता है, साधक के हृदय की गति— हृदय-स्पंदन कम होने लगता है। परिणामस्वरूप कार्डियो-वैस्कुलर की कार्य क्षमता बढ़ जाती है।
एक फ्रांसीसी हृदय विशेषज्ञ ने ध्यान की उपयोगिता को अनुभव करते हुए कुछ योगाभ्यासियों के शारीरिक परीक्षण किए और पाया कि ध्यान के समय उनकी श्वसन-क्रिया धीमी पड़ जाती है तथा त्वचा की प्रतिरोधी शक्ति बढ़ जाती है। मूर्धन्य वैज्ञानिक होइनिंग और राव ने अपने अनुसंधान में पाया है कि ध्यानावस्था में ऑक्सीजन उपयोग की मात्रा में कमी आती है।
बहुत से निपुण जैन-साधकों तथा अनेक योगियों में संगतिपूर्ण शारीरिक परिवर्तन को देखते हुए ऐसी अनुभूति होती है कि कहीं कोई एक ऐसी असाधारण शारीरिक अवस्था है, जिसे हम चैतन्यता का महत्त्वपूर्ण चतुर्थ आयाम कह सकते हैं। वस्तुतः यह प्राणचेतना ही है।
एक तपस्वी किसी धर्मात्मा राजा के महल में पहुँचे। राजा गद्-गद् हो गए और पूछा— "आज मेरी इच्छा है कि आप का मुँहमाँगा उपहार दूँ।" तपस्वी ने कहा— "आप ही अपने मन से सबसे अधिक प्रिय वस्तु दे दें। मैं क्या मांगूँ?"
राजा ने कहा— "अपना राज्यकोष समर्पण करता हूँ।" तपस्वी बोले— "वह तो प्रजाजनों का है। आप तो संरक्षकमात्र हैं।" राजा ने बात मानी और दूसरी बार कहा— "महल, सवारी आदि तो मेरे हैं, इन्हें ले लें।" तपस्वी हँस पड़े। राजन! आप भूल जाते हैं। यह सब भी प्रजाजनों का है। आपको कार्य की सुविधा के लिए दिया गया है।
अबकी बार राजा ने अपना शरीर दान देने का विचार रख दिया। उसमें तपस्वी ने कहा— "यह भी आपके बाल-बच्चों का है, इसे कैसे दे पाएँगे।" राजा को असमंजस में देखकर तपस्वी ने कहा— "आप अपनेपन का अहंकार दान कर दें। अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है।" राजा दूसरे दिन से अनासक्त योगी की तरह रहने लगे। तपस्वी की इच्छा पूर्ण हो गई।
वाणी सामान्य अर्थों में वह कही जाती है, जो जिह्वा से कही और कानों से सुनी जाए। इसका एक स्वरूप लेखन और वाचन भी हो सकता है। वैखरी स्थूलवाणी है, जो विचारों के आदान-प्रदान में काम आती है। इस माध्यम से अपनी मान्यताओं, भावनाओ, इच्छाओं एवं परिस्थितियों को प्रकट किया जाता है।
मध्यमा वाणी वह है, जिसमें शब्दों का उच्चारण तो नहीं होता; पर संकेतों से अभिप्राय प्रकट होता है। चेहरा एक प्रकार का दर्पण माना गया है। उस पर विचारणाएँ दौड़ती और भावनाएँ छाई रहती हैं। उन्हें पढ़ा जा सकता है और मनःस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। हाथों की मुद्राएँ भी कुछ सामान्य-संकेत करती हैं। उनके माध्यम से अभिप्राय प्रकट किया जा सकता है। भावना की अभिव्यक्ति तो आँखें और होठों के माध्यम से ही प्रधानतया होती है। इस प्रकार से अभिप्राय प्रकट करने वाली मध्यमा वाणी में कुछ कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं पड़ती, तो भी व्यक्ति एकदूसरे की मनःस्थिति से अवगत होते रहते हैं। विशेषतया भावनाओं और आकांक्षाओं का प्रकटीकरण तो सहज ही हो जाता है।
परा वाणी वह है, जो विचारों के रूप में मस्तिष्क में चलती रहती है। इसका प्रत्यक्ष प्रकटीकरण तो मुखाकृति से भी नगण्य होता है; पर उसका प्रभाव दूसरों पर पड़ने में कमी नहीं आती। विचार-प्रवाह एक सीमित क्षेत्र पर धूप की तरह फैला रहता है। उसका प्रभाव काम करता है। धूप और छाया के मध्य जो अंतर पाया जाता है, वही भले-बुरे विचारों का होता है। सत्संग और कुसंग में आवश्यक नहीं कि वार्त्तालाप द्वारा ही सब कुछ कहा-सुना जाए। विचारों की विद्युतीय तरंगें समीपवर्त्ती लोगों तक पहुँचती हैं और उन्हें परोक्ष रूप से अपनी प्रेरणा से अवगत एवं प्रभावित करती रहती हैं। इसमें अधिक मनस्वी दुर्बल मन वाले को परास्त करके अपना आधिपत्य जमा लेता है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह भी गायों के साथ पानी पिया करते थे। इसमें सिद्ध हुआ कि ऋषि की प्रभाव-प्रेरणा ने सिंह के स्वभाव को दबोच लिया और उसे वैसा ही व्यवहार करना पड़ा जैसा कि प्रेरणापुँज द्वारा उसे निर्देशन दिया गया था।
उपरोक्त वाणियों में एक से दूसरी का और दूसरी से तीसरी का अधिकाधिक प्रभाव होता है, क्योंकि उनके साथ अधिक ऊर्जा का समावेश होता है। धनुष की प्रत्यंचा को जितना पीछे खींचा जाता है उसी अनुपात से तीर में दूर तक जाने और गहरा घाव करने की सामर्थ्य होती है। मुख से मनुष्य ऐसे ही बेकार बकवास में अधिक शक्ति व्यय करता है। मखौलबाजी चलती रहती है। भीतर जो है उसके विपरीत भी शब्दाडंबर प्रकट किया जाता रहता है। विशेषतया धर्म, आदर्श, कर्त्तव्य, दर्शन आदि के प्रवचन करने वाले लोग ऐसे होते हैं, जो दूसरों को सदुपदेश देने में अपनी प्रवीणता प्रकट करते हैं। कथन को लच्छेदार शब्दों में गूँथकर ऐसा बना देते हैं जो कानों को सरस लगे। इतने पर भी श्रवणकर्त्ताओं पर उसका कोई कारगर प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि उसके पीछे आंतरिक विश्वासों की आस्था एवं निष्ठा का पुट नहीं रहता। हाथी का चित्र सुहावना तो लगता है; पर उसमें इतनी शक्ति नहीं होती हैं कि वजन उठाए या किसी को अपनी पीठ पर बिठाए।
आंतरिक भावनाओं का समावेश मध्यमा में होता है। दर्शक सूक्ष्मदर्शी है तो ही चेहरा पढ़ सकता है और उसके सूक्ष्म उतार-चढ़ावों को समझ सकता है, अन्यथा मंदबुद्धि लोग भूल भी कर सकते हैं। अपनी मनोवृत्ति के अनुरूप दूसरों की भावनाओं का अर्थ लगा सकते हैं। वाणी और मुद्रा की परिधि सीमित है। कान अपनी सामर्थ्य की दूरी से शब्द सुनते और आँखों की शक्ति, आकृति के ऊपर छाई हुई अभिव्यंजना को देख सकती है।
मध्यमा द्वारा निःसृत होने वाली विचार-तरंगें काफी दूर तक जाती हैं। यह चिंतक के व्यक्तित्व और प्राण-प्रवाह पर निर्भर है कि वह कितनी दूर तक पहुँचे और कितना प्रभाव उत्पन्न करे। इस संबंध में एक बात और भी है कि समान विचार के लोग परस्पर सरलतापूर्वक आदान-प्रदान कर लेते हैं, जबकि प्रतिकूल स्तर के साथ वे टकराकर छितरा जाते हैं और अस्वीकृत-तिरष्कृत होने पर वापस लौट जाते हैं। विश्वामित्र मनस्वी थे। उनके स्वप्नदर्शन का हरिश्चंद्र पर इतना प्रभाव पड़ा कि अपना राजपाट, शरीर, परिवार दान देने के लिए तैयार हो गया; किंतु ताड़का, सुबाहु, मारीच उनकी इच्छा के विपरीत यज्ञ में विघ्न ही डालते रहे। उनसे निपटने के लिए राम-लक्ष्मण को बुलाना पड़ा। कुश्ती का पहलवान अपने क्षेत्र में बाजी जीतता है; पर क्रिकेट से अनभ्यस्त होने पर हार जाता है।
चौथी वाणी पश्यंती है। इसमें उपरोक्त तीन वाणियों की तरह न्यूनाधिक मात्रा में भी शब्दों का प्रयोग नहीं करना पड़ता; वरन इसे जागृत करने के लिए मौन रहने का अभ्यास करना पड़ता है ताकि इस क्षमता को पूरी तरह संग्रहित करके रखा जा सके। मौन में शक्ति की बचत सबसे अधिक होती है। मनुष्य की प्राणशक्ति निरंतर वार्त्तालाप करने में बहुत अधिक खर्च हो जाती है। ऐसी दशा में उसके दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने जैसी क्षमता शेष नहीं रहती। वाचाल व्यक्ति दूसरों को उच्च प्रयोजनों के लिए प्रभावित नहीं कर सकता।
पश्यंती वाणी का भंडार भरने के लिए साधक को न केवल अधिक समय मौन रहना पड़ता है, वरन उसे अपने शारीरिक, मानसिक दोष-दुर्गुणों का निराकरण करते हुए सर्वतोमुखी पवित्रता अर्जित करनी पड़ती है।
पश्यंती वाणी यदि सामान्य क्षमता की ही हो तो अपने संकल्पबल से समीपवर्त्ती वातावरण में सद्विचारों का संचार कर सकती है। गिरों को उठा सकती है और उठों को बढ़ा सकती है। उसे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसका कथन संकल्पमय हो जाता है, अस्तु अनेकों को श्रेयपथ पर घसीट ले जाने की उसकी क्षमता काम करने लगती है। अरविंद-रमण जैसे आत्मबल के धनी लोगों ने अपने समय का वातावरण बदल देने में असाधारण स्तर की सफलता पाई थी। गाँधी और बुद्ध प्रभावशाली वक्ताओं में नहीं गिने जाते थे, फिर भी उनकी सामान्य वाणी के सामान्य परामर्शों ने अनेकों को कठिन मार्ग पर चलने के लिए कितने ही सामान्यजनों को दुस्साहस कर गुजरने के लिए सहमत कर लिया।
पश्यंती वाणी अत्यंत ओजमय होती है। वह सीमित क्षेत्र में अवरुद्ध नहीं रहती, वरन उसका प्रभाव दूरगामी और अत्यंत प्रभावी होता है। व्यापक जनमानस का प्रवाह-परिवर्तन करने में वैखरी वाणी काम नहीं आती। वक्ता-प्रचारक बहुत कुछ कहते रहते हैं; किंतु उनके कथन का प्रभाव सीमित ही होता है, किंतु पश्यंती वाणी बिना एक शब्द कहे ही अनेकों को अनुगमन करने के लिए प्रेरित करने में सफल होती देखी गई है।
पश्यंती वाणी को उभारने में मौन के अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि चरित्र और लक्ष्य ऊँचा रहे। आहार और दिनचर्या में उत्कृष्टता का स्तर गिरने न पाए।
पश्यंती का उद्गम अंतःकरण है, जिसमें से प्रभावशाली प्रवाह उद्भूत करने के लिए यह आवश्यक है कि स्थूलशरीर के क्रियाकलाप, सूक्ष्मशरीर के चिंतन और कारणशरीर के सद्भाव उच्चकोटि के रहें। इन सबकी संयुक्त उत्कृष्टता ही पश्यंती वाणी का निर्माण करती है। वह इतनी प्रचंड हो सकती है कि अनाचार से लोहा ले सके और सत्प्रवृत्तियाँ दूरगामी क्षेत्र में सफल बनाने की भूमिका निभा सकें।
“चकमक पत्थर चाहे सौ वर्ष तक जल में पड़ा रहे तो भी उसकी अग्नि नष्ट नहीं होती। उसे जल से निकालकर लोहे पर मारते ही चिनगारी निकलने लगती है। इसी प्रकार ईश्वर पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति चाहे हजारों अपवित्र— संसारी लोगों के बीच में पड़े रहें तो भी उनकी श्रद्धा और भक्ति बनी रहेगी।”
सिद्धियाें का वर्णन शरीरगत कौतूहलों के रूप में किया जाता है। काया का छोटा हो जाना, बड़ा हो जाना, पानी पर चलने लगना, हवा में उड़ जाना आदि विलक्षणताओं को शरीर द्वारा कर दिखाना सिद्धपुरुषों का, सफलता का लक्षण माना जाता है। बहुत से इन पर विश्वास भी करते हैं और तलाशते फिरते हैं कि जो ऐसे कृत्य कर दिखाएँ उन्हें सिद्धपुरुष या पहुँचा हुआ योगी मानें; किंतु ऐसे योगी लोग कदाचित ही कहीं होते हों।
तिब्बत को ऐसे योगियों की क्रीड़ास्थली बताया जाता रहा है। वह स्थान दुर्गम एवं प्रतिबंधित होने के कारण वहाँ सर्वसाधारण की पहुँच नही होती रही है, इसलिए किंवदंतियों का अन्वेषण भी नहीं होता। वहाँ लामा संप्रदाय का प्रभुत्व था। वे अपने ज्ञान, चरित्र और सेवा के आधार पर तो अपनी विशेषता बता नहीं पाते थे, अलौकिकताओं की मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ने वालों को बताते रहते थे। सुनने वाले उनमें और नमक-मिर्च मिलाकर तिल का ताड़ बना देते थे; पर जब चीन का हमला हुआ और तिब्बत-क्षेत्र हड़प लिया गया तो किसी भी लामासिद्ध की करामात काम न आई।
बुद्ध का एक शिष्य किसी राजा द्वारा ऊँचे बाँस पर टाँगे हुए कमंडलु को उस पर चढ़कर उतार लाया था और अपनी सिद्धाई से चमत्कृत करके उस राजा और उसकी प्रजा को अपना शिष्य बना लिया था। स्वर्णकमंडलु लेकर जब वह बुद्ध के पास पहुँचा तो उनने सारी बात जानी। वह शिष्य पहले नट था। बाँस पर चढ़ने की कला आती थी। उसी अनुभव के आधार पर वह ऐसी करामात दिखाने में सफल हुआ था। बुद्ध ने समस्त शिष्यमंडली को बुलाया और उस कमंडलु को तुड़वाकर नदी में बहा दिया, कहा कि मेरा कोई शिष्य कभी भी ऐसा आडंबर न रचे। यदि ऐसा हुआ तो बाजीगर लोग सिद्धपुरुष माने जाने लगेंगे और सच्चे योगी वैसा ढोंग न रच पाने के कारण उपेक्षित-तिरष्कृत होते रहेंगे। उनके सदुपदेश भी कोई न सुन सकेगा।
जिस प्रागैतिहासिककाल में शरीरों को वायुप्रधान, जलप्रधान, अग्निप्रधान बताया जाता था। उस जमाने में कोई ऐसा कुछ कर दिखाता भी होगा; पर इन दिनों तो पृथ्वीप्रधान शरीर होते हैं। ऐसी दशा में किसी के लिए ऐसा कर दिखाना संभव नहीं है। श्रीलंका के एक डॉक्टर का अभी भी बैंक में एक लाख रुपया इसलिए जमा पड़ा हुआ है कि कोई अलौकिक चमत्कार कर दिखाए तो उस रकम को सहर्ष उठाए; पर किसी ने भी उस चुनौती को स्वीकार नहीं किया है।
योग वस्तुतः मनोविज्ञान का विषय है। उसका संबंध चेतना के परिष्कार से है। गाँधी, बुद्ध, विवेकानंद, अरविंद आदि ने कोई करामातें नहीं दिखाई थीं। वे अपनी मानसिक उत्कृष्टता के आधार पर ही महानता के ऊँचे स्तर तक पहुँचे थे।
जहाँ ऐसे चमत्कारी वर्णन हैं, वे शारीरिक नहीं भावनात्मक या अलंकारिक हैं। व्यामोह की सुरसा, हनुमान को निगलना चाहती थी। वे अपने को वैभववान नहीं, अकिंचन बनकर उससे छुटकारा पा सके। साधारणजनों को अपने में डूबा लेने वाले भवसागर के ऊपर होकर जो चल सकता है, पार जा सकता है, उसे जल पर चलने की सिद्धी प्राप्त हुई, यह समझना चाहिए। हनुमान की नम्रता अकिंचन भावना ही उसकी अणिमा सिद्धि थी।
गाँधी, बुद्ध आदि को महात्मा सिद्धि थी। काया की दृष्टि से वे सामान्यजनों जैसी ही थे। प्रतिभा भी सामान्यजनों जैसी ही थी; पर लक्ष्य ऊँचा रखने और जीवन उसी में खपा देने के कारण वे महामानव माने गए। उनके आदेशों का पालन लाखों-करोड़ों ने किया, यह महिमा-सिद्धि कही जाए तो अत्युक्ति नहीं। शरीर से महापुरुष रावण, कुंभकरण जैसे विशाल नहीं होते; पर अपने महान व्यक्तित्व और कार्यों के कारण सामान्य लोगों की तुलना में असंख्य गुने महत्त्वपूर्ण गिने जाते हैं।
संत दादू के पास एक महिला आई। वह पति को वश में करने का जंत्र-मंत्र चाहती थी। दादू ने उसके विश्वास को देखते हुए एक कागज पर कुछ लिखकर ताबीज पहना दिया। साथ ही पति के मधुर व्यवहार की रीति-नीति भी समझा दी। पति वश में हो गया। वह स्त्री दादू के सामने थाल भरकर धन तथा उपहार लाई। बहुत से दर्शक भी मौजूद थे। दादू ने उस जंत्र-मंत्र को उससे वापस लिया और खोलकर सब लोगों को दिखाया था। उसमें कुछ भी अनोखापन नहीं था। अपने सद्व्यवहार से ही उसने पति को वश में किया था। जादू जंत्र-तंत्रो में नहीं होता, अपना स्वभाव और प्रयास के बदलने से ही अभीष्ट सफलताएँ उपलब्ध होती हैं। तथ्य दादू ने सब पर प्रकट कर दिया और उपहार जरूरतमंदों को बाँट दिया।
आकाश में उड़ जाने की सिद्धि में क्या कौतूहल है? मक्खी, मच्छर और पक्षी, पतंगे आकाश में उड़ते ही रहते हैं। जिन्हें पानी पर चलने की जल्दी हो वे नाव में बैठ सकते हैं और जिन्हें हवा में उड़ना हो वे हवाई जहाज का टिकट खरीद सकते हैं। इसके लिए किसी कष्टसाध्य योगाभ्यास की जरूरत नहीं है।
आकाश में उड़ने से मतलब है— अपना लक्ष्य ऊँचा रखना है; अपना व्यक्तित्व सामान्य लोगों की तुलना में ऊँचा उठाना।
वायुयान यात्रा में काँच की खिड़की से झाँककर नीचे की ओर देखा जाए तो रेलगाड़ी साँप-सी रेंगती दिखाई पड़ती है और हाथी-घोड़े जैसे बड़े जानवर चाबी वाले खिलौने की तरह दौड़ते हैं। नदियाँ पतली नाली जैसी दिखती हैं। ऐसा ही दृष्टिकोण दुनियादारों के प्रति महामानवों का होता है। लोग तुच्छ प्रतीत होते हैं। उनके क्रियाकलाप और परामर्श भी बच्चों जैसे। वे उनसे प्रभावित नहीं होते; वरन ओछे स्तर को बचकानापन मानकर हँस भर देते हैं। अपनी उनसे तुलना नहीं करते। वायुयान पर चढ़ा हुआ व्यक्ति दूर-दूर के दृश्य देखता है; किंतु घास चरने वाले छोटे जानवर आप-पास थोड़े ही दायरे में देख सकते हैं। कूपमंडूक की दुनिया बहुत छोटी होती है। गूलर के भुनगों की उनसे भी कम दायरे की, जबकि वायुयान पर बहुत ऊँचाई पर से देखने पर दुनिया बहुत विस्तृत दिखती है।
चंद्र यात्रियों ने चंद्रमा पर खड़े होकर उगती हुई पृथ्वी को देखा था, वह बड़े थाल के बराबर थी; पर हमारी दृष्टि में तो वही पूरा ब्रह्मांड है। इसी को कहते हैं— आकाश में उड़ना।
बच्चों को चाबी वाले खिलौने ही मनोरंजन के केंद्र बने रहते हैं; पर बड़ी आयु के व्यक्ति उन्हें खिलवाड़ भर मानते हुए तुच्छ आँकते हैं। सामान्य बुद्धि के दुनियादार लोग लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति को ही बहुत बड़ी वस्तु मानते हैं और उनकी उपलब्धि को भारी सफलता गिनते हैं; पर दूरदर्शी-विवेकशील इन खिलवाड़ों में अपने को उलझाते नहीं और सोचने की— करने की दिशाधारा ऐसी बनाते हैं, जो सृष्टा के युवराज की गरिमा को सुरक्षित रखे।
अन्य सभी अलौकिकताएँ भी इसी प्रकार की हैं। वे शारीरिक नहीं, मानसिक और भावनात्मक हैं। शरीर से अचंभे वाले करतब कर दिखाना जादूगरों-बाजीगरों का काम है— सिद्धपुरुषों का नहीं।
श्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर को उन दिनों 500 रु. मासिक वेतन मिलता था। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही उनने न्यायोचित समझा और अपने सीमित परिवार का खर्च 50 रु. मासिक से चलाया, शेष 450 रुपये की बचत को निर्धन छात्रों की आवश्यकताएँ जुटाने में लगाया करते थे। वे हमेशा कहते थे; अपने लौकिक उत्तरदायित्व घटाकर लोकसेवी को परमार्थ नियोजित कर देना चाहिए। उन्होंने यह कहा भी और आजीवन निबाहा भी।
पौराणिक मान्यता है कि जीव चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरांत मनुष्य शरीर प्राप्त करता है। इस ईश्वरीय अनुदान का सदुपयोग न करने पर उसे फिर उसी चौरासी के चक्कर में कोल्हू के बैल की तरह घूमना पड़ता है और अपने कर्मों का फल उन तुच्छ प्राणियों के शरीरों में रहकर प्राप्त करना पड़ता है।
पुनर्जन्म की जितनी भी घटनाएँ प्रकाश में आई हैं, उनसे यही सिद्ध हुआ है कि मनुष्य को मरने के उपरांत भी मनुष्य जन्म ही मिलता है।
कर्मफल भुगतने की बात अन्य योनियों में ही बन पड़े, सो बात नहीं है। मनुष्य जीवन में तो शारीरिक कष्टों के अतिरिक्त मानसिक कष्ट भी हैं, जिनसे उसे अन्य जीवों की तुलना में कम नहीं, अधिक ही त्रास मिलता है; जबकि पक्षी, तितली, मधुमक्खी आदि अनेक जीव-जंतु सुखपूर्वक जीवनयापन करते हैं।
ऐसी दशा में चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने वाली बात कटती है; किंतु वैज्ञानिको ने भ्रूण-विकास-प्रक्रिया का जो स्वरूप बताया है, उसके अनुसार यह भी सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य नौ महीने के गर्भवास में ही चौरासी लाख आकृतियाँ बदल लेता है। इस प्रकार पौराणिक मान्यता के साथ इस वैज्ञानिक विवेचना की संगति बैठ जाती है।
भ्रूण-विकास-प्रक्रिया के संबंध में अब तक जो पर्यवेक्षण किया गया है। उसकी विशालता और गंभीरता को देखते हुए उसे एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में वैज्ञानिक मान्यता मिल गई है। इस शाखा का नाम है— ‘हाउसे आन्दोजैनी रिपोट्स फायलॉजी”।
इस शोध के अनुसार भ्रूण की आकृति गर्भाधान से लेकर प्रसवकाल की अवधि में प्रति ढाई मिनट में भ्रूण की आकृति में अंतर होता रहता है। पहली से दूसरी में भारी हेर-फेर हो जाता है। इस प्रकार नौ महीने पेट में रहने की अवधि में भ्रूण प्रायः 80 लाख 60 हजार 666 आकृतियाँ बदल लेता है। कुछ बच्चे देर से प्रायः नौ महीने दस-दस दिन में भी पैदा होते हैं। इस प्रकार यह गणना पौराणिक मान्यता के अनुसार 84 लाख योनियों जितनी ही हो जाती है।
शरीर की तरह मन की स्थिति में भी अंतर पड़ता जाता है। जैसे-जैसे भ्रूण की आयु बढ़ती है वैसे-वैसे उसकी मानसिक स्थिति में भी अंतर पड़ता जाता है। प्रायः चार-पाँच महीने में ही उसे यह आभास होने लगता है कि किसी बंधन में बँधा हुआ है, इससे उसे छूटना चाहिए; इसलिए माता के पेट में ही हाथ-पैर चलाने और अंगों को फड़फड़ाने लगता है। कुछ और समय बीत जाने पर उनका हृदय धड़कने लगता है। रक्तसंचार चल पड़ता है और माता की मनःस्थिति को आत्मसात करता जाता है। यहाँ तक कि परिवार के वातावरण में से भी कुछ संस्कार ग्रहण करने लगता है।
प्रसव के समय शिशु को अच्छा-खासा मल्लयुद्ध करना पड़ता है। बाहर निकलने के लिए द्वार छोटा पड़ने पर जो कठिनाई उसे पड़ती है, उसका समाधान अपने ही पुरुषार्थ से उसे निकालना पड़ता है। यह भी एक चक्रव्यूहभेदन के समान है। इसी प्रकार शरीर के कण-कण में फैला हुआ प्राण समेटने और बाहर निकालने में भी जीव को कम संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ता है। शरीर का तथा स्वजनों का मोह अलग ही त्रास देता है।
इस प्रकार इस शंका का भी समाधान हो जाता है कि दूसरी योनियों में ही दुष्कर्मों के फल भुगते जाते हैं। मनुष्य जीवन में भी वे कठिनाइयाँ कम कहाँ हैं।
श्रेष्ठ को उपार्जित कर सकने की अक्षमता ही जीवन को नीरस— निरानंद बनाती है।
वायुयान के आविष्कार विल्वर राइट और आर्विल राइट बीस और तीस वर्ष की आयु के बीच ही वायुयान बनाकर, उस पर उड़ने का परीक्षण करने लगे थे। शक्तिचालित हवाई उड़ान भरने का लक्ष्य जब उन लोगों ने पूरा करके संसार को आश्चर्यचकित कर दिया तब आर्विल की आयु 32 वर्ष, बिल्वर की आयु 36 साल थी।
संत ज्ञानेश्वर ने अपनी प्रख्यात पुस्तक 15 वर्ष की आयु में लिखी थी। सिगमण्ड फ्राइड ने 29 वर्ष की आयु में मनोविज्ञान शास्त्र का प्रामाणिक ढाँचा संसार के सामने प्रस्तुत कर दिया था। चार्ल्स डार्विन ने अगणित जीव-जातियों का अध्ययन करके जब विकासवाद का क्रमबद्ध आधार खड़ा किया, तब उनकी आयु 27 वर्ष की थी। विज्ञान के महापंडित अलबर्ट आइन्स्टाइन ने 15 वर्ष की आयु में ही न्यूटन और स्थिनोजा के सिद्धांतों में प्रकांड पांडित्य प्राप्त कर लिया था। जब वे 26 वर्ष की आयु के निकट पहुँचे तो उन्होंने सापेक्षता सिद्धांत की रूपरेखा प्रस्तुत करके विज्ञान-जगत में हलचल मचा दी थी।
ऐली ह्विटवी ने 28 वर्ष की आयु में कपास ओटने की मशीन का आविष्कार किया। चार्ल्स मार्टिन हाल ने 23 वर्ष की आयु में विद्युत संश्लेषण द्वारा एल्युमिनियम उत्पादन की नई विधि पेटेंट कराई। जेम्स वाट ने 25 वर्ष की आयु में भाप इंजन की कल्पना की और 33 वर्ष का होने तक काम में आ सकने योग्य इंजन बना डाला। सैम्युअल कोल्ट ने 16 वर्ष की आयु में रिवाल्वर का लकड़ी का मॉडल बनाया। पीछे उसे धातु का बनाया और 21 वर्ष की आयु में गोली चलाने में पूरी तरह सफल रिवाल्वर बनाकर तैयार कर दी।
कला-क्षेत्र में भी कितनी प्रतिभाएँ हुई हैं, जिनने छोटी आयु में ही अपनी प्रतिभा का परिचय देना आरंभ कर दिया। माइक्लें जेलों ने 17 वर्ष की उम्र में ‘सेंटर का युद्ध’ नामक प्रतिमा बनाई। 26 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उसने पियेक्त और वाक्स मूर्तियाँ गढ़कर कला-क्षेत्र में अपने लिए अतिसम्मानास्पद स्थान प्राप्त कर लिया। लुडविग फान बीठोफेन का प्रथम संगीत-ग्रंथ जब प्रकाशित हुआ तब वह मात्र 13 वर्ष का था। 23 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते तो वह संगीत के संसार में मूर्धन्य कलाकार गिना जाने लगा। रविंद्रनाथ टैगोर की प्रथम कविता-पुस्तक तब छपी जब वे 16 वर्ष के थे। उस प्रथम कृति की भी उस समय के साहित्य मर्मज्ञों ने भूरी-भूरी प्रशंसा की थी।
सिकंदर महान 20 साल की आयु में सिंहासनारूढ़ हुआ और 27 वर्ष की आयु तक उसने दिग्विजय कर ली। महात्मा गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहे थे, तब वे 24 वर्ष के थे।
एलेग्जैण्डर ग्राहम बेल ने 20 वर्ष की आयु में टेलीफोन आविष्कार पर प्रयत्न आरंभ किए और 29 वर्ष की आयु में उसने सफल टेलीफोन-यंत्र को पेटेंट करा लिया। ‘बिजली का मतदान-यंत्र’ पेटेंट कराने वाले वैज्ञानिक केवल 21 वर्ष की आयु का है, यह देखकर लोग आश्चर्यचकित रह गए।
शिकागो विश्वविद्यालय के संस्थापक विलियम रैने हार्पर जब 12 वर्ष के थे, तभी उन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूरी करके ओहियो कॉलेज में प्रवेश पा लिया था। कानूनी वयस्कता प्राप्त होने से पूर्व ही उन्होंने प्रख्यात शिकागो विश्वविद्यालय की नींव डाली। प्रभावित जनता ने पूरा साथ दिया और वह विशाल संस्था बनकर खड़ी हो गई। अन्य कॉलेज उन्हें अपने यहाँ बुलाना चाहते थे, इसलिए उनमें से 9 के विभागाध्यक्षों ने त्यागपत्र देकर उनके लिए स्थान खाली किया था।
कितने ही व्यक्ति असाधारण प्रतिभा के धनी होते हैं। उनकी विशेषता को देखकर लोग आश्चर्य करते हैं; किंतु यह भूल जाते हैं कि मस्तिष्क की बनावट प्रायः सभी की एक जैसी होती है। जो उससे दत्त-चित्त होकर काम लेते हैं, उनका मानसिक स्तर असाधारण रूप से विकसित हो जाता है। जो उदासी, उपेक्षा अन्यमनस्कता से घिरे रहते हैं, ज्यों-त्यों करके काम की लकीर पीटते हैं, उनके काम तो फूहड़ ढंग के होते ही हैं, साथ ही मस्तिष्क भी मंदगति स्तर का होता है। लगनशील व्यक्ति जन्मजात प्रतिभा न होने पर भी अपनी तत्परता और अभिरुचि के सहारे मानसिक स्तर का असाधारण विकास कर लेते हैं।
रोम का सम्राट हैरियन एक ही समय में एक व्यक्ति से पत्र सुनता, दूसरे से उत्तर लिखवाता। उसे राज्य के सभी पेंशनयाफ्ताओं के नाम-पते जबानी याद थे।
पेपनहम जर्मनी के एल्फोर्ड विश्वविद्यालय के प्राचार्य रहे। साथ ही वे जर्मन जनरल की हैसियत से महायुद्ध में भी शामिल हुए।
फ्रांस के प्रधानमंत्री लियोनगम्बेटा को सरकारी फाइलों के उल्लेख जबानी याद रहते थे। कभी-कभी तो किसी महत्त्वपूर्ण भाषण को वह मुद्दतों बाद शब्दशः सुना सकते थे।
इंग्लैंड का विलियम लेगेट पढ़ना-लिखना नहीं जानता था तो भी उसे पूरी बाइबिल कंठाग्र याद थी। वह पूरे 50 वर्ष तक बिना एक भी नागा किए गिरजा जाता रहा।
इंडियाना स्टेट बैंक के कोषाध्यक्ष ने 500 सिक्कों के नाप का एक पीपा बना रखा था; पर गिनने-तोलने के झंझट से बचने के लिए पीपे में भरकर सिक्के समेटता और देता था। कभी 25 सिक्के भी कम-बढ़ होते तो वह उस पीपे को दुबारा गिनवाता।
ओयियोवा का जज जार्ज ग्रीन 1817 में जन्मा और 1880 में मरा। वह वकील, वैज्ञानिक, अध्यापक, पत्रकार, प्रकाशक, न्यायाधीश, मेयर, नर्सरी मालिक, 6 बैंकों और 17 कंपनियों का संचालक था। वह तीन कालेजों का अध्यक्ष भी था।
कई व्यक्ति प्रतिभावान होने के साथ-साथ उदार भी होते हैं। वे अपनी क्षमता का लाभ स्वयं ही नहीं उठाते; वरन अन्यायों के लिए अपनी उपलब्धियाँ वितरित-विसर्जित करते रहते हैं। ऐसे लोगों की विभूतियाँ सोने में सुगंध का काम करती हैं और अनेकों के लिए अनुकरणीय आदर्श बनती हैं।
पेरिस के ला फैजे ने अपनी बीमार माँ की चिकित्सा करने के लिए 66 वर्ष की उम्र में डाॅक्टरी का कोर्स करने का निश्चय किया। वह पढ़ता भी था और अध्यापकों से पूछकर माँ का इलाज भी करता था। माँ के मरने के उपरांत कुछ ही दिनों में उसकी भी मृत्यु हो गई।
यूनान के एक धनी नागरिक हेरोर्डस ने अपने देश की सामाजिक प्रगति की प्रथम योजना का पूरा खर्च अपने पास से उठाया था। यह राशि 21 करोड़ डाॅलर की थी। इसमें उसकी पीढ़ियों की संचित संपदा पूरी तरह खप गई।
फ्रांस के क्रांतिकारियों की अदालत में रानी एन्टाइनेट को बचावपक्ष का वकील एक ही मिला— क्लाउड़े। क्रांतिकारियों ने अदालत में वकील से उसे रानी की ओर से मिली फीस जमा करने को कहा, तो उसने एक डिब्बी जेब से निकालकर तुरंत अदालत की मेज पर रख दी। उसमें रानी के बालों की एक लट भर थी। इन दिनों रानी सर्वथा धनहीन और असहाय हो चुकी थी।
रोडेशिया में सावी नदी के ऊपर एक गोलाई में बना पुल सैम्युअल विर्शेनफ ने बनाया। उसकी लागत का पूरा खर्च भी उसी ने उठाया। मरने के बाद निर्माता और उसकी पत्नी के अवशेष उसी पुल में जड़ दिए गए।
मिश्र और सीरिया के विजेता सुल्तान सलीदान जब गद्दी पर बैठे तो उनने अपने जीवित पिता से कहा— "आप राज्य करें, मैं आपका गुमास्ता बनकर काम करूंगा।" पिता तैयार न हुए तो यह नियम बनाया गया कि दरबार होने पर पहले राज्यसिंहासन पर पिता बैठें। बेटा उन्हें सिर झुकाकर आदाब अर्ज करेगा। इसके बाद ही शासक अपना काम-धाम चलाता था।
आवश्यक नहीं कि धनी या प्रतिभावान ही उदारता भरे काम करें। निर्धन व्यक्ति भी अपने स्वल्प साधनों से पारमार्थिक कामों में थोड़ा-थोड़ा योगदान देकर भी प्रेरणाप्रद उदाहरण खड़ा कर सकते हैं।
फ्रांस का टेहारनटे चर्च उस क्षेत्र के निवासियों के पत्थर अनुदान से बना है। जो अन्यत्र ये पत्थर न पा सके, उनने अपनी दीवारों में से निकाल-निकालकर गिरजे के लिए पत्थर दिए।
यदि कार्य के प्रति तन्मयता हो तो बड़े से बड़ा कार्य छोटे दिखने वाले व्यक्तियों द्वारा संभव हो सकता है।
हे प्रभो! मेरी केवल एक ही कामना है कि मैं संकटों से डरकर भागूँ नहीं, उनका सामना करूँ। इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो, बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो। मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख-संताप से मेरा चित्त व्यथित हो जाए तब तुम मुझे सांत्वना दो। मैं अपनी अंजली के भाव-सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।
जब किसी कष्टप्रद और संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूँ। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाए। हे प्रभो! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना, जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर घड़ी अपने साथ देखते हुए उन्हें हँसी-खेल समझकर अपने चित्त को हल्का रखूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।
चाहे जैसी भी प्रतिकूलताएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े, इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है। लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ; मेरा सर्वस्व छिन गया।
प्रभु! तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहणकर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मैं इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए शक्ति बने याचना नहीं, संबल बने क्षीणता नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।
— रविंद्रनाथ टैगोर
वातानुकूलित कमरे या रेल के डिब्बे इसलिए बनाए जाते हैं कि उनमें काम या निवास करने वालों पर सर्दी-गर्मी का अनावश्यक दबाव न पड़े। उत्तेजना चाहे ऋतु के कारण हो या किसी अन्य के कारण से एक सीमा तक ही सहन होती है। अति की स्थिति में भी किसी प्रकार जिया तो जा सकता है; किंतु उत्साहपूर्वक उतना काम नहीं हो सकता, जितना कि होना चाहिए। बेचैनी सदा हैरान ही करती है।
बेचैनी मात्र ऋतु के कारण ही नहीं, अन्य कारणों से भी होती है। तापमान बढ़ने पर ज्वर चढ़ बैठता है और शीत रोग में शरीर का स्वाभाविक ताप घट जाता है। रक्तचाप का अधिक बढ़ना या घटना भी एक विपत्ति है। इसी प्रकार मन पर आवेश का छा जाना अथवा अवसाद के कारण निराश हो जाना ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति असंतुलित हो जाता है। जिसे तनाव भी कहते हैं। तनाव दो प्रकार के होते हैं— एक आवेशजन्य, दूसरे अवसादजन्य। क्रोध जैसी स्थिति को आवेश कहते हैं और निराशा-निष्क्रियता को अवसाद। दोनों ही असंतुलन व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गड़बड़ा देते हैं और अस्वाभाविक ऐसी स्थिति बना देते हैं, जिसमें कुछ सोचते-समझते, करते-धरते नहीं बनता। ऐसों की गणना एक प्रकार के मरीजों में होती है, जो स्वयं भी हैरान रहते हैं और संपर्क वालों को भी हैरान करते हैं।
संतुलन बनाए रहना वातानुकूलित मकान में रहने जैसा है, जिसमें अपेक्षाकृत व्यक्ति सुखी और संतुष्ट रहता है। प्रसन्नता में काम का अनुपात एवं स्तर भी बढ़ जाता है।
संसार की बनावट ऐसी है। परिस्थितियों का क्रम ज्वार-भाटे जैसा चलता है। कभी अनुकूलता आ जाती है तो कभी प्रतिकूलता का सामना करना पड़ता है। ऐसे अवसरों पर हलके, उथले, ओछे, बचकाने लोग उखड़ जाते हैं; पर जो भारी भरकम हैं, चट्टान की तरह अपनी जगह पर जमे रहते हैं, वे उतार-चढ़ावों को खिलाड़ी की दृष्टि से देखते रहते हैं, जिसमें कभी जीतना कभी हारना पड़ता है।
असंतुलन एक ऐसा रोग है जो प्रत्यक्षतः तो नहीं दिख पड़ता; पर भीतर ही भीतर मरोड़कर रख देता। यह प्रभाव न केवल स्वास्थ्य पर; वरन क्रियाकलापों पर भी पड़ता है। वे अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। सोचना और करना यदि मनोयोगपूर्वक न हो तो उसके सही होने की आशा नहीं की जा सकती। जो मन में उद्विग्न है, वह आज नहीं तो कल रुग्ण होकर रहेगा।
परिस्थितियाँ सदा अनुकूल ही रहें, यह नहीं हो सकता। जब संसार में सर्वत्र परिवर्तन का ही दौर है तो अनुकूलता ही स्थिर रहेगी, ऐसी आशा करना व्यर्थ है। यह हो सकता है कि कटीली राह पर चलना पड़े तो जूते का प्रबंध करें और तेज धूप पड़ रही हो तो छाता लगाकर चलें। मनःस्थिति गड़बड़ाने से पूर्व हमें ऐसा अभ्यास कर लेना चाहिए कि कुसमय आने पर अपना बचाव हो सके।
अनुपयुक्त स्थिति के दबाव को कम करने के लिए हमें शिथिलीकरण का अभ्यास करना चाहिए। यह साधना अर्धनिद्रा का काम दे जाती है और थकान को घटाती है। यों चिंतामुक्ति तो सर्वथा तभी मिलती है, जब गहरी नींद आए या मौत इस संसार से उठाए।
हमारे दैनिक व्यायामों, योगाभ्यासों में एक शिथिलीकरण भी सम्मिलित रहना चाहिए। शरीर को शिथिल और मन को उनींदा कर लेने की क्रिया कठिन नहीं है। कोमल बिस्तर पर लेटकर अपने को रुई जैसा हलका या उनींदा अनुभव करने से यह स्थिति कुछ दिन के अभ्यास से बन जाती है कि अपने को संकल्पबल के सहारे अर्धनिद्रित स्थिति में ले जाया जाए।
एक दूसरा अभ्यास यह है कि मन, वचन और शरीर को एक ही काम पर एकाग्र किया जाए। इन तीनों प्रमुख शक्तियों को बिखरने न दिया जाए। एकाग्रता की महिमा सभी बताते हैं और उसके प्रयोग भी सुझाते हैं; पर सबसे सरल और उपयोगी तरीका यह है कि सामने के काम को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाए और उसे सही रीति से करने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाए। जो पूरे मन और पूरे श्रम से काम करता है, उसकी वाणी भी इधर-उधर की बकवास नहीं करती। शक्तियों को बिखेरने में इधर-उधर की बेतुकी बकवास भी एक बड़ा दुर्गुण है। इसके कारण हर काम अधूरा रह जाता है। भोजन के अथवा पूजा के समय जिस प्रकार मौन रखा जाता है उसी प्रकार अपने हर छोटे-बड़े काम में तत्परता और तन्मयता बरतनी चाहिए और वाचालता पर अंकुश रखना चाहिए।
कई बार मनुष्य की असहिष्णुता और अतिवादिता भी तिल का ताड़ बनाती है और छोटी-सी कठिनाई, हानि या असफलता को राई से पर्वत बनाकर मनुष्य को उद्विग्न कर देती है। उस कुटेव का उपचार यह है कि सदा हँसने-मुस्काने की आदत डाली जाए। मुस्कान सबसे बड़ा सौंदर्य-प्रसाधन है। इसको अपनाते ही कुरूप भी सुंदर लगने लगता है। मन का बोझ उतर जाता है। हलकी-फुल्की, हँसती-हँसाती जिंदगी जीना एक उच्चस्तरीय कलाकारिता है। इसे नित्यप्रति के अभ्यास में सम्मिलित करके अपने को निश्चिंत-निर्द्वंद्व रहने का आदी बनना चाहिए। उतार-चढ़ावों को कम से कम महत्त्व देना चाहिए।
कुछ लोग कुविचारों, कुकर्मों और मनोरोगों से ग्रसित होते हैं; फलतः उन्हें पग-पग पर असहयोग और अपमान का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए उचित है कि सफल-सम्मानित मनुष्यों के गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता का चिंतन किया करें और अपने को उसी ढाँचे में ढालने का प्रयत्न किया करें? आत्मसुधार का, आत्मनिरीक्षण का क्रम चल पड़ने पर व्यक्तित्व निखरने और सुधरने लगता है। गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता की अभिवृद्धि करते चलने वाला व्यक्ति आमतौर से मनस्वी होता है, संतुष्ट रहता और सम्मान पाता है।
कुछ व्यक्ति लोभ, मोह में अत्यधिक व्यस्त रहते हैं और ठाट-बाट बनाने की सनक में इतने डूबे रहते हैं कि आत्मिक आवश्यकता, मानवी गरिमा और सामयिक कर्त्तव्यों को एक प्रकार से भुला ही देते हैं। ऐसे लोगों को आत्मा और शरीर की भिन्नता का अभ्यास करना चाहिए।
प्रातःकाल उठते ही एक दिन की जिंदगी बालजन्म मिलने की भावना करनी चाहिए और साथ ही सोचना चाहिए कि यह सृष्टा की सर्वोपरि महत्त्व की कला-कृति उसे किस शर्त पर मिली है जीवन का स्वरूप, लक्ष्य और सदुपयोग क्या है? इसी निष्कर्ष के आधार पर ऐसी दिनचर्या बनानी चाहिए, जिसमें शरीर यात्रा के अतिरिक्त आत्मा के उत्कर्ष, लोक-मंगल में प्रवृत्ति और ईश्वरीय इच्छा की पूर्ति होती रहे।
रात को सोते समय निद्रा को मरण का रिहर्सल मानते हुए सोचना चाहिए कि जो भूलें शरीर के साथ पक्षपात और आत्मा के साथ अन्याय के रूप में आज हुई वे भविष्य में न होने पाएँगी। इस संध्यावंदन का निश्चित प्रभाव यह होता है कि जीवन-संपदा के दुरुपयोग पर अंकुश लगता और वह प्रयास चल पड़ता है, जिससे जीवन को सार्थक बनाया जा सके।
हर दिन किसी सुविधा के समय आत्मनिरीक्षण, आत्मसुरक्षा, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चारों विषयों पर गंभीर विचार करना चाहिए और भौतिक-क्षेत्र में आगे बढ़ने और आत्मिक-क्षेत्र में ऊँचा उठने की योजना बनानी चाहिए।
महानता के पक्षधर कार्य इसलिए नहीं हो पाते कि शक्तियों का अधिकांश भाग असंयम के छिद्रों में होकर बह जाता है और कुछ उत्कृष्ट कर सकने लायक सामर्थ्य ही नहीं बचती। आवश्यक है कि इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम पर निरंतर ध्यान रखा जाए और इस प्रकार बचे हुए वैभव को उन कार्यों में लगाया जाए, जिनसे आत्मकल्याण और लोक-मंगल के दोनों प्रयोजन सधते हैं। यही जीवन को वातानुकूलित बनाने की प्रक्रिया है।
उत्तम परिपाटी यह है कि विचारों को विचारों से काटा और सुधारा जाए। जीवन में मन की प्रमुखता है। उसी को बंधन और मोक्ष का निमित्त कारण माना गया है। गीताकार का कथन है कि मन ही बंधन बाँधता है, वही उनसे छुड़ाता भी है। सुधरा हुआ मन ही सर्वश्रेष्ठ मित्र है और वही कुमार्गगामी होने पर परले सिरे का शत्रु हो जाता है, इसलिए मन को अध्यात्म बनाकर अपनी संकल्पशक्ति के सहारे मानवी गरिमा के अनुरूप व्यक्तित्व का निर्माण करना चाहिए और भवबंधनों से सहज ही छूट जाना चाहिए।
जिनका मनोबल इस योग्य नहीं होता कि चिंतन और मनन के सहारे आत्मसुधार और आत्मविकास का प्रयोजन कर सके, उनके लिए वस्तुपरक एवं क्रियापरक कर्मकांडों का आश्रय लेना ही उपयुक्त पड़ता है। अपने दोष-दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालना और उन्हें सुधारने तक आत्मशोधन तक की साधना में निरत रहना होता है। विचारों से विचारों को काटने की प्रणाली अपनानी पड़ती है; पर इस सबके लिए बलिष्ठ मनोबल चाहिए। उसमें कमी पड़ती हो तो वस्तुओं से, वातावरण से, सहयोग से एवं क्रियाओं में सुधार कार्य को अग्रगामी बनाना पड़ता है। धार्मिक कर्मकांडों की संरचना इसी निमित्त हुई है कि उन हलचलों को प्रत्यक्ष देखते हुए आधार-अवलंबन अपनाकर साधक अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर सके। संकल्पबल में बलिष्ठता ला सके, उस प्रयोजन को पूरा कर सके, तो विचारों से विचारों की काट करने का आधार न बन पड़ने की दशा में अपनाया और लक्ष्य की दिशा में बढ़ा जा सकता है। एक टाँग न होने पर उसकी पूर्ति लकड़ी की टाँग लगाकर की जाती है। उसी प्रकार उपाय-उपचारों के माध्यम से भी आंतरिक समस्याओं के सुलझाने में सहायता मिल सकती है। पूजापरक कर्मकांडों की तरह योगाभ्यास की क्रिया-प्रक्रिया भी उसी प्रयोजन की पूर्ति करती है।
इतने पर भी यह निश्चित है कि कर्मकांडों या साधनाओं के साथ संकल्पबल का समावेश होना ही चाहिए। इसके अभाव में वे क्रिया-कृत्य मात्र कौतुक-कौतूहल बनकर रह जाते हैं। कृत्य उपचारों का प्रतिफल उनके साथ जुड़ी हुई भावनाओं की सहायता निश्चित रूप से घुली रहे, अन्यथा योगाभ्यास के नाम पर किए जाने वाले कृत्य भी एक प्रकार के व्यायाम ही बनकर रह जाते हैं और उनका प्रभाव शरीर श्रम के अनुरूप ही नगण्य स्तर का होता है।
तीन ग्रंथि से आबद्ध आत्मा को जीवधारी, प्राणी या नर-पशु माना गया है। वही भवबंधनों में बँधा हुआ कोल्हू के बैल की तरह परायों के लिए श्रम करता रहा है। ग्रंथियों को युक्तिपूर्वक खोलना पड़ता है। बंधनों को उपयुक्त साधनों से काटना पड़ता है।
योगाभ्यास के साधना-प्रकरण में भवबंधनों में जकड़ने वाली तीन ग्रंथियों को खोलने के लिए क्रियापक्ष के तीन अभ्यास भी बताए गए हैं। इनसे संबंधित क्षेत्रों का व्यायाम भी होता है और परिष्कार भी। साथ में श्रद्धा-विश्वास का समावेश रखा जाए तो उनका प्रभाव गहन अंतराल तक जा पहुँचता है।
बंधनों को खोलने या तोड़ने वाले तीन साधन बताए गए हैं। वे करने में सुगम; किंतु प्रतिफल की दृष्टि से आश्चर्यजनक हैं।
ब्रह्मग्रंथि के उन्मूलन के लिए मूलबंध, विष्णुग्रंथि खोलने के लिए उड्डियानबंध और रुद्रग्रंथि खोलने के लिए जालंधरबंध की साधनाओं का विधान है। इन्हें करते रहने से बंधनमुक्ति-प्रयोजन में सफलता-सहायता मिलती है।
मूलबंध की क्रिया को ध्यानपूर्वक समझने का प्रयास किया जाए तो वह सहज ही समझ में भी आ जाती है और अभ्यास में भी। मूलबंध के दो आधार हैं। एक मल-मूत्र के छिद्र भागों के मध्य स्थान पर एक एड़ी का हलका दबाव देना। दूसरा गुदा संकोचन के साथ-साथ मूत्रेंद्रिय का नाड़ियों के ऊपर खींचना।
इसके लिए कई आसन काम में लाए जा सकते हैं। पालथी मारकर एक पैर के ऊपर दूसरा रखना। इसके ऊपर स्वयं बैठकर जननेंद्रिय-मूल पर हलका दबाव पड़ने देना।
दूसरा आसन यह है कि एक पैर को आगे की ओर लंबा कर दिया जाए और दूसरे पैर को मोड़कर उसकी एड़ी का दबाव मल-मूत्रमार्ग के मध्यवर्ती भाग पर पड़ने दिया जाए। स्मरण रखने की बात यह है कि दबाव हलका हो। भारी दबाव डालने पर उस स्थान की नसों को क्षति पहुँच सकती है।
संकल्पशक्ति के सहारे गुदा को ऊपर की ओर धीरे-धीरे खींचा जाए और फिर धीरे-धीरे ही उसे छोड़ा जाए। गुदा-संकुचन के साथ-साथ मूत्र नाड़ियाँ भी स्वभावतः सिकुड़ती और ऊपर खिंचती हैं। उसके साथ ही सांस को भी ऊपर खींचना पड़ता है। यह क्रिया आरंभ में 10 बार करनी चाहिए। इसके उपरांत प्रति सप्ताह एक के क्रम को बढ़ाते हुए 25 तक पहुँचाया जा सकता है। यह क्रिया लगभग अश्विनी मुद्रा या वज्रोली क्रिया के नाम से भी जानी जाती है। इसे करते समय मन में भावना यह रहनी चाहिए कि कामोत्तेजना का केंद्र खिसककर मेरुदंड मार्ग से ऊपर की ओर रेंग रहा है और मस्तिष्क मध्य भाग में अवस्थित सहस्रारचक्र तक पहुंच रहा है। यह क्रिया कामुकता पर नियंत्रण करने और कुंडलिनी उत्थान का प्रयोजन पूरा करने में सहायक होती है।
दूसरा बंध उड्डियान है। इसमें पेट को फुलाना और सिकोड़ना पड़ता है। सामान्य आसन में बैठकर मेरुदंड सीधा रखते हुए बैठना चाहिए और पेट को सिकोड़ने-फुलाने का क्रम चलाना चाहिए।
इस स्थिति में सांस खींचें और पेट को जितना फुला सकें, फुलाएँ; फिर साँस छोड़ें और साथ ही पेट को जितना भीतर ले जा सकें; ले जाएँ। ऐसा बार-बार करना चाहिए। साँस खींचने और निकलने की क्रिया धीरे-धीरे करें ताकि पेट को पूरी तरह फैलने और पूरी तरह ऊपर खिंचने में समय लगे, जल्दी न हो।
इस क्रिया के साथ भावना करनी चाहिए कि पेट के भीतरी अवयवों का व्यायाम हो रहा है, उनकी सक्रियता बढ़ रही है। पाचनतंत्र सक्षम हो रहा, साथ ही मल विसर्जन की क्रिया भी ठीक होने जा रही है। इसके साथ भावना यह रहनी चाहिए की लालच का, अनीति उपार्जन का, असंयम का, आलस्य का अंत हो रहा है। इसका प्रभाव आमाशय, आँत, जिगर, गुर्दे, मूत्राशय, हृदय, फुफ्फुस आदि उदर के सभी अंग अवयवों पर पड़ रहा है और स्वास्थ्य की निर्बलता हटती और उसके स्थान पर बलिष्ठता सुदृढ़ होती जा रही है।
तीसरा जालंधरबंध है। इसमें पालथी मारकर सीधा बैठा जाता है। रीढ़ सीधी रखनी पड़ती है। ठोड़ी को झुकाकर छाती से लगाने का प्रयत्न करना पड़ता है। ठोड़ी जितनी सीमा तक छाती से लगा सके, उतने पर ही संतोष करना चाहिए। जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। अन्यथा गरदन को झटका लगने और दर्द होने लगने जैसा जोखिम रहेगा।
इस क्रिया में भी ठोड़ी को नीचे लाने और फिर ऊँची उठाकर सीधा कर देने का क्रम चलाया जाए। साँस को भरने और निकालने का क्रम भी जारी रखना चाहिए। इससे अनाहत, विशुद्धि और आज्ञाचक्र तीनों पर भी प्रभाव और दबाव पड़ता है। इससे मस्तिष्क-शोधन का ‘कपालभाति’ जैसा लाभ होता है। बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता दोनों ही जगते हैं। यही भावना मन में करनी चाहिए कि अहंकार छट रहा है और नम्रता भरी सज्जनता का विकास हो रहा है।
तीन ग्रंथियों को बंधनमुक्त करने में उपरोक्त तीन बंधों का निर्धारण है। क्रियाओं को करते और समाप्त करते हुए मन ही मन संकल्प दुहराना चाहिए कि यह सारा अभ्यास बंधनमुक्ति के लिए वासना, तृष्णा और अहंता को घटाने-मिटाने के लिए किया जा रहा है। भवबंधनों से मुक्ति जीवित अवस्था में ही होती है। मुक्ति मरने के बाद मिलेगी, ऐसा नहीं सोचना चाहिए। जन्म-मरण से छुटकारा पाने जैसी बात सोचना व्यर्थ है। आत्मकल्याण और लोक-मंगल का अभ्यास करने के लिए कई जन्म लेने पड़ें तो इसमें कोई हर्ज नहीं है।
मनुष्य की सत्ता का अंत उसकी मृत्यु के साथ ही हो जाता है। यह बात विज्ञान ने उन दिनों कही थी जब वह नितांत बचपन की स्थिति में था और अपनी बात मनवाने के लिए जिद्दी बच्चों की तरह मचलता था। तब उसने मनुष्य को एक चलता-फिरता पौधा भर कहा था, जिसकी हस्ती मरने के साथ ही समाप्त हो जाती है। उसने कहा था— यह शरीर कुछ रसायनों के समन्वय से उत्पन्न प्रतिक्रिया भर है। जो विघटन होते ही समाप्त भी हो जाता है।
पर अब वैसी बात नहीं रही। अब उसका स्थायित्व माना जाने लगा है और समझा जा रहा है कि मृत्यु के उपरांत भी मनुष्य का कुछ अवशेष रह जाता है। जिसमें अवसर मिलने पर एक स्वतंत्र इकाई बन सकने की क्षमता है।
शरीर की ऊर्जा विद्युत-मापक यंत्रों से आँकी जाने लगी है। इसके अतिरिक्त एक सचेतन-ऊर्जा का दूसरा प्रकार भी सामने आया है, जिसे ‘औरा’ या तेजोवलय कहते हैं। यह खुली आँख से तो किन्हीं विशेष व्यक्तियों को ही दिख पड़ता है; पर उसे स्पष्ट और प्रत्यक्ष देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी यंत्र उपकरण बन गए हैं, जो बताते हैं कि शरीर के ईद-गिर्द एक प्रकाश का घेरा फैला रहता है।
इस प्रकाश में चुंबकत्व भी रहता है, जो दूसरे समर्थ की ओर खिंचता है और दुर्बल को अपनी और खींचता है। यहाँ दुर्बलता और समर्थता शारीरिक नहीं; वरन मानसिक कही जा रही है। प्रतिभावान, सुंदर, किशोर, कलाकार, हँसोड़, प्रसन्नचित्त प्रकृति के मनुष्य मनोबल की दृष्टि से अधिक आकर्षक होते हैं; जबकि विद्वान, वयस्क, व्यस्त, उदास प्रकृति के मनुष्यों में आकर्षणशक्ति अधिक होती है। मित्रता को जल्दी बनाने और घनिष्ठ करने में यह तेजोवलय अधिक काम करता है। नर-नारी के बीच पाए जाने वाले आकर्षणों में इस चुंबकत्व का पूरक स्तर ही विशेष रूप से काम करता है। वह खिन्नता की स्थिति में साहस भी बढ़ाता है और सहायक भी सिद्ध होता है।
व्यक्तित्व के उत्कृष्ट, मध्यम या निकृष्ट होने की स्थिति में यह प्रकाश— तेजस् रंग भी बदलता रहता है। इसमें कई प्रकार के रंगों का मिश्रण भी पाया जाता है। इसका आधार विज्ञानी अल्फा, अल्ट्रा, गामा, वीटा आदि किरणों की न्यूनाधिकता बताते हैं और अनुमान लगाते हैं कि इस व्यक्ति की प्रतिभा किस स्तर की होनी चाहिए। अध्यात्मवादी इस हेर-फेर को चिंतन और चरित्र की ऊँचाई का अनुमान लगाते हैं।
सूक्ष्मशरीर की व्याख्या अध्यात्म-तत्त्वज्ञान में दूसरे ढंग से की जाती है; पर विज्ञानी इसे शरीर बिजली एवं ऊर्जा कहते हैं, जो एक स्थान पर रहने के उपरांत उस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य कर लेती है और प्रभाव बनाए रहती है। यह भी एक प्रकार का सूक्ष्मशरीर ही है, जो असली व्यक्ति के अन्यत्र चले जाने या मर जाने पर भी अपना अस्तित्व बनाए रहता है। मिश्र के पिरामिडों में हजारों वर्ष पूर्व मरे मृतकों की आत्मा का परिचय उन भवनों में मिलता है। यह आत्मा नहीं, वह तेजोवलय है जो लंबी अवधि तक बना रहता है। प्राणी के अन्यत्र जन्म ले लेने पर भी यह तेजोवलय अपने अभ्यस्त एवं प्रभाव क्षेत्र में बना रहता है। भूत-प्रेत की वैज्ञानिक व्याख्या इन दिनों इसी रूप में की जा रही है।
तेजस्वी— प्रतिभावान व्यक्तियों का तेजोवलय अधिक प्रभावी, प्रचंड एवं स्थिर होता है; जबकि दुर्बल प्राणों का वलय कुहरे की तरह जल्दी ही समाप्त हो जाता है।
जिन स्थानों में चौकाने वाली, अद्भुत, मार्मिक घटनाएँ घटित हुई होती हैं, वहाँ पर उसी वातावरण की अनुभूतियाँ लंबे समय तक होती रहती हैं। भले ही संबद्ध व्यक्ति बहुत पहले ही वहाँ से चले गए हों। व्यभिचार, अत्याचार, अहंकार के केंद्र बने हुए स्थान प्रायः बहुत समय तक उसी प्रकार का प्रभाव बनाए रहते हैं। उधर से गुजरने वाले मनुष्यों के मनों में उसी प्रकार के उभार उठते हैं।
महामानवों का यह सूक्ष्मप्राण भी उन स्थानों को प्रभावशाली बनाए रहता है। ऐसे ही स्थान तीर्थस्वरूप प्रेरणाप्रद बने रहते हैं और वहाँ आने वालों के मन पर अपनी छाप छोड़ते हैं।
मार्कोनी कहते थे कि कई बार सूक्ष्मशब्द भी चिरकाल तक अपना अस्तित्व बनाए रहते हैं। वे कहते थे कि ईसा द्वारा अंतिम समय पर कहे गए शब्द अभी भी प्रयत्न करने पर उसी रूप में सुने जा सकते हैं। कृष्ण के मुख से कहा गया गीता-प्रसंग भी।
वैज्ञानिक एडीसन कहते थे कि जीवित और दिवंगत मनुष्यों के बीच आदान-प्रदान का आधार बनी रहने वाली शक्ति, जो जीवित स्थिति में तेजोवलय कही जाती है और मरने के उपरांत अदृश्य महाप्राण।
ग्रीक दार्शनिक पाइथागोरस कहते थे कि जिस प्रकार परमात्मा का एक अंश जीव है। उसी प्रकार ब्रह्मांडीय चेतना का महाप्राण व्यक्तियों के साथ तेजोवलय के रूप में लिपटा रहता है।
गहराई में जाकर खोजने वालों ने इसे ‘सबकान्शियस माइण्ड आफ दि ऑपरेटर’ कहा है और भूतों के उपद्रवों तथा अनुदानों को इसी के साथ जोड़ा है।
सेन्ट थामस अस्पताल लंदन के जैवविज्ञानी वाल्टर जोकिलयर ने पुस्तक लिखी है— ‘दि ह्यूमन एटमोस्फियर’ इसमें उनने ह्यूमन औरा के आधार पर रोगियों की जीवनीशक्ति का सुविस्तृत वर्णन किया है।
स्वीडन के वेलैटिना क्रिलियन ने तीस वर्ष खोज के उपरांत एक पुस्तक अंग्रेजी में प्रकाशित कराई- “साइकिक डिस्कवरी बिहाइन्ड आइरन कर्टेन”। इसमें उनने मनुष्य के मस्तिष्क को नहीं; वरन तेजोवलय को ही अतींद्रिय क्षमताओं का आधार बताया है और असाधारण क्रिया-कर्तृत्व दिखा सकने वाले लोगों में एक अतिरिक्त क्षमतासंपन्न तेजोवलय पाया है।
लास ऐंजिल के विज्ञानी डाॅ. थैल्यामौस ने ‘औरा’ को प्रत्यक्ष करने वाली एक विशेष फोटोग्राफी का आविष्कार किया है और इस शक्ति को “बायोप्लाज्मा” नाम से संबोधित किया है।
तेजोवलय कई बार अतिरिक्त प्रतिभा के रूप में जन्मजात रूप से भी आता है; किंतु मरने के उपरांत वह पूरी तरह चला नहीं जाता। वह अपने मित्र-शत्रुओं के साथ विशिष्ट भावनाओं के साथ उत्तेजित होता है और साधारण स्तर के सरल हृदय लोगों को भी अपनी स्मृति दिलाने वाले परिचय देता है।
इस प्रकार सूक्ष्मशरीर की व्याख्या तेजोवलय के रूप में होने लगी है और आत्मा का परिचय ‘कास्मिक एनर्जी’ के रूप में दिया जा रहा है तो भी तत्त्वज्ञान और विज्ञान की व्याख्याओं में काफी अंतर शेष है, संभव है इसका निराकरण भविष्य में हो सके।
लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लोकसेवक मंडल संस्था के संचालक का स्थान लालाजी के स्वर्गवास से खाली हो गया। इस स्थान पर निर्वाहमात्र का वेतन मिलता था।
कम पैसे पर योग्य आदमी कौन मिले? अड़चन के कारण मंडल का काम रुक गया। उन दिनों श्री पुरुषोत्तम दास टंडन पंजाब नेशनल बैंक के प्रांतीय मैनेजर थे। लंबा वेतन मिलता था। उनने नौकरी छोड़ दी और मंडल के संचालन का काम संभाल लिया।
गाँधीजी ने इस त्याग से उत्पन्न आर्थिक कठिनाई के संबंध में पूछताछ की तो उनने सीधा सा उत्तर दिया— “जरूरत घटा लेने पर, अर्थ-संतुलन बिठा लेने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।”
मनुष्य शरीर में सात अंतःस्रावी ग्रंथियाँ होती हैं, जो सीधे ही अपने स्राव रक्त में मिला देती हैं। ये हारमोन्स शरीर में अनेक चमत्कारपूर्ण कार्य करते हैं। शरीर की प्रत्येक क्रिया को और मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व को ये प्रभावित करते हैं। ये ग्रंथियाँ बारह से भी अधिक प्रकार के हारमोन्स छोड़ती हैं। जब शरीर पर किसी रोग या कीटाणु का आक्रमण होता है तो इन ग्रंथियों से कुछ ऐसे हारमोन्स पैदा होते हैं, जो रक्तकणों में कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति गामा ग्लोबुलिन्स के रूप में उत्पन्न करते हैं और स्वयं भी कीटाणुओं से लड़ते हैं। इस प्रकार शरीर युद्धक्षेत्र बन जाता है। रुग्णावस्था में जो बेचैनी, क्षोभ और अशांति उत्पन्न होती है, उसका यही कारण है। भावनाओं का ज्वार आने पर ही यह अंतःस्रावी ग्रंथियाँ कुछ विशेष प्रकार के हारमोन्स छोड़ती हैं। ये हारमोन्स शरीर पर भावनाओं के पड़ने वाले भले-बुरे प्रभाव से मस्तिष्क में संघर्ष करते हैं और उसी कारण हर्ष, उत्साह अथवा क्लांति और थकान जैसे क्षण उत्पन्न होते हैं।
‘हाइपोथैलेमस नामक मस्तिष्कीय केंद्र से मनुष्य शरीर की अनैच्छिक गतिविधियाँ नियंत्रित होती हैं और भावनाएँ उसी केंद्र को प्रभावित करती है, इसलिए इनके द्वारा अनैच्छिक क्रियाओं पर, जो शरीर और जीवन-रक्षा के लिए आवश्यक हैं, प्रभाव पड़ना स्वाभाविक हैं। पिछले तीस वर्षों में मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुए अनेकानेक अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो गया है कि भावनाओं के द्वारा कई रोग उत्पन्न होते हैं, वहीं यह भी सिद्ध हो गया है कि मस्तिष्क को यदि ठीक ढंग से प्रशिक्षित किया जा सके, विचारपूर्वक नियंत्रण द्वारा उसका उपयोग किया जा सके तो शरीर, स्वास्थ्य एवं जीवन विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
यही नहीं, व्यक्ति का असाधारण रूप से लंबा, ठिगना, पतला या मोटा, कामासक्त या नपुंसक होना हारमोन्स की न्यूनाधिकता पर निर्भर है। नर में नारी और नारी में नर की प्रवृत्ति के उभार का कारण भी हारमोन्स ही हैं। ऐसी अगणित विचित्रताएँ हैं, जो हारमोन्स क्षेत्र में तनिक भी असाधारणता उत्पन्न होने पर काय-संरचना से लेकर मानसिक स्तर तक में विस्मयकारक हेर-फेर हो सकता है। इनका राई-रत्ती जैसा स्राव जादुई परिणति किस माध्यम से करता है, यह अभी अनबूझ पहेली जैसा ज्यों का त्यों बना हुआ है।
नवीनतम शोधों से निष्कर्ष निकला है कि हारमोन्स की सूक्ष्मता एक रासायनिक विद्युत-प्रवाह के रूप में जीवनकोश के अंतराल का स्पर्श करती और पारस्परिक सहयोग से विचित्र परिणति उत्पन्न करती है। यह ऐसी ही प्रक्रिया है, जैसे शुक्राणु और डिंब जैसे छोटे भ्रूण-कलल की। इसी प्रकार हारमोन्स रासायनिक विद्युत रूप में जीवकोशों के अंतराल में प्रवेश करते हैं।
कॉरनेल यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेज के मूर्धन्य डॉक्टर जूलियन मैकगिलन ने लंबी शोधों के उपरांत यह सिद्ध किया है कि किस प्रकार जीवकोशों में विकृति आने पर अनेकानेक रोग उपजते हैं और बढ़ते हैं। विषाणुओं का आक्रमण, आहार-विहार का व्यक्तिक्रम, आघात-विघात जैसे कारण ही अब तक रोगों के कारण माने जाते हैं। इनमें से एक के भी न होने पर रोग उपज पड़ने में जो असमंजस होता था, उसका समाधान इस तथ्य से निकला है कि जीवकोश के अंतराल में उत्पन्न विक्षेप बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के भयानक रोगों को जन्म दे सकते हैं।
हारमोन्सजन्य विचित्रताओं में कुछ आश्चर्य से भर देती हैं। आमस्टर-माइजे निवासी जान मिल्के 124 वर्ष तक जिए। उसने अंतिम विवाह 80 वर्ष की आयु मे एक अठारह वर्षीय युवती से किया। इसके बाद उसके दस बच्चे जन्मे और दीर्घजीवी रहे। मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व उसके सफेद बाल फिर से काले होने लगे थे। दीर्घायु जिजीविषा का यह कमाल हारमोन्स के ही कारण कहा जा सकता है।
मैक्सिस जर्मनी का प्रसिद्ध भारोत्तोलक हुआ है। उसका निज का वजन 147 पौंड था। एक प्रदर्शन में उसने अपने से 40 पौंड भारी 187 पौंड के व्यक्ति को एक हाथ पर बिठाकर 16 बार अपने शरीर से ऊपर तक उठाया। दूसरे हाथ में वह पानी से लबालब भरा गिलास इसलिए थामे रहा कि कोई यह न सोचे कि इतना वजन उठाने से उसके ऊपर कोई खिंचवा पड़ रहा है। खिंचवा पड़ेगा तो पानी फैलेगा, यह प्रमाण देने के लिए उसने दूसरे हाथ में गिलास थामे रहने का प्रदर्शन किया।
इन शारीरिक विचित्रताओं से भी बढ़कर है— मनःसंरचना एवं वहाँ स्रावित न्यूरो हारमोन्स। हमारी आकाशगंगा में जितने तारे हैं, लगभग उतने ही दस अरब न्यूरान्स (स्नायु-कोश) मस्तिष्क में हैं। पिछले दिनों जिस एक तथ्य ने वैज्ञानिकों का सर्वाधिक ध्यान आकर्षित किया है, वह है इन स्नायुओं को परस्पर जोड़ने वाले संधिस्थलों (सिनेप्सों) पर स्रवित होने वाले द्रव्य पदार्थ ‘न्यूरोट्रान्स मीटर्स”। आज वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित किया जा रहा है कि स्नायु तंत्र की संचार-प्रणाली इन रासायनिक तत्त्वों पर आधारित है। मानसिक-बौद्धिक क्षमता को इन रसायनों को प्रभावितकर बढ़ाया जा सकता है। दर्द एवं दुःख जिनसे सारा मानव समुदाय आज त्रस्त है, उससे राहत दिलाना भी इन रसायनों के माध्यम से संभव है। जिस आनंद की तलाश में भटकने के लिए मनुष्य स्वयं को अफीम, एल.एस.डी. अल्कोहल के नशे में डुबा देता है, वह आधुनिक विज्ञान के अनुसार अंदर से ही मस्तिष्कीय परतों को विकसितकर, रसायनों का स्राव उत्तेजितकर प्राप्त किया जा सकता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण पिछली दशाब्दी की खोज है, एण्डार्फीनग्रुफ का “एनकेफेलीन” नामक हारमोन। भावनाओं, उद्वेगों और मस्तिष्कीय नियंत्रण को विचलित करने वाले प्रवाहों पर काम करने वाले इन हारमोन्स को मस्तिष्क स्वयं बनाता है। जब वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की अफीम दर्द की अनुभूति को दबाने के लिए मस्तिष्क के किस भाग पर काम करती है तो उन्होंने मध्य मस्तिष्क के भावनाओं से संबंधित भाग में कुछ ऐसी व्यवस्था पाई, मानो वे अफीम के रसायनों से संयोग हेतु ही बनी हो। असली मुद्दा यह था कि आखिर प्रकृति ने मस्तिष्क के कोशों में अफीम से संयोग करने की विशिष्ट व्यवस्था क्यों बनाई? तब वैज्ञानिक द्वय जाॅन ह्यूजेज एवं ट्रासकोस्टर लिक्स (स्काटलैण्ड) ने अफीम से मिलती-जुलती रासायनिक संरचना वाले, पीड़ानाशक एवं आनंद की अनुभूति देने वाले (एनकेफेलीन) हारमोन्स की खोज की एवं सारे वैज्ञानिक जगत को भावनाओं की इस केमिस्ट्री का स्वरूप बनाकर शोध का एक नया आयाम ही खोल दिया।
जाॅन हॉपकिन्स मेडिकल स्कूल के सोलोमन स्नीडर के अनुसार मनोरोगों एवं तनावजन्य व्याधियाें में (एनकेफेलीन) की खोज से एक नई दिशा मिली है। मनोवैज्ञानिक रूप से दबाव डालने वाली परिस्थितियाें के विरुद्ध हम जिस प्रकार स्वयं को तैयार करते हैं, उसमें हमारे मनोबल को दृढ़ बनाने में, इस तनाव से मुक्ति दिलाने में इस हारमोन एनकेफेलीन की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। जो अपने इस आंतरिक स्राव का, 'अमृतकलश' का सदुपयोग कर लेता है, वह इन बाह्य विभ्रमों से व्यथित न होकर, हर परिस्थितियों में आनंद लेता है। इन ‘एनकेफेलीन’ व “एण्डारफिन’ रसों की सघनता मस्तिष्क एवं सुषुम्ना के उन हिस्सों में अधिक होती है, जो प्रसन्नता एवं दर्द की अनुभूतियों से संबंधित होते हैं, भाव-संवेदनाओं के लिए उत्तरदाई केंद्र माने जाते हैं। वैज्ञानिकों की ऐसी मान्यता है कि एक्युपंक्चर की चिरपुरातन चीनी पद्धति, मस्तिष्क का इलेक्ट्रोड के माध्यम से उत्तेजन अथवा हिप्नोसिस या योगनिद्रा की क्रियाएँ एवं आधुनिकतम तनावनिवारक बायोफिडबैक-पद्धति में एनकेफेलीनरूपी दर्दनाशक अफीम जैसे रसायनों का मस्तिष्क में स्राव और उत्सर्जन ही एक प्रमुख क्रिया है।
शरीर की ही बात करे तो लिंगभेद से संबंधित हारमोनों में गड़बड़ी हो जाए तो मनुष्य की आकृति एवं प्रकृति दोनों ही बदल सकती हैं। नारी में भी मूँछें निकल सकती हैं, पुरुष मूँछविहीन हो सकता है। नारी मनुष्य की तरह कठोर व्यवहार करने वाली और नर जनखों जैसे स्त्री स्वभाव के हो सकते हैं। यौन आकांक्षाएँ भी विपरीत वर्ग जैसी हो सकती हैं। इतना ही नहीं, कई बार हारमोन्स का उत्पात ऐसा हो सकता है कि प्रजनन अंगों की बनावट ही बदल जाए। सेक्स परिवर्तन के ऐसे समाचार समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं।
हारमोनों की विकृति कितनी ही बार प्रकृति के निर्धारित नियमों का भी उल्लंघन करती देखी गई है। 8 जनवरी 1910 को 8 वर्षीय एक चीनी बालिका ने एक बच्चे को जन्म दिया। अफ्रीका के कलावार नामक स्थान पर एक दंपत्ति रहते थे। पत्नी की आयु मात्र 8 वर्ष तथा पति की 17 वर्ष थी। पत्नि ने इस छोटी आयु में ही एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। आश्चर्य यह है कि यह बालिका भी 9 वर्ष की आयु में माँ बन गई। उल्लेखनीय है कि उस क्षेत्र में बालविवाह की परंपरा है।
पाश्चात्य वैज्ञानिक हारमोन्स की विलक्षणताओं के संबंध में कोई अभिमत निश्चय नहीं कर सके हैं; पर भारतीय तत्त्ववेत्ताओं का विश्वास है कि सूक्ष्मशरीर, स्थूलशरीर को अपने अनुदान इन हारमोन्स स्रावों के माध्यम से प्रदान करता है।
मनःशास्त्री एडलर ने काम-प्रवृत्ति की शोध करते हुए पाया कि बाहर से अतीव सुंदर, आकर्षक और कमनीय दिखाई देने वाली अनेक महिलाएँ कामशक्ति से सर्वथा रहित हैं। उनमें न तो रमणी प्रवृत्ति पाई गई, न ही नारी सुलभ कोमलता व उमंग। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि यौन हारमोन्स का संतुलन गड़बड़ा जाने के कारण ही ऐसा होता है। कितने ही युवकों का भी उन्होंने अध्ययन किया जो पूर्णतया स्वस्थ और सुंदर थे; पर उनमें न तो पुरुषत्व था और न ही काम के प्रति उमंग। वे पूर्णतया नपुंसक थे। कारण तलाशने पर उन्होंने उनमें सेक्स हारमोन का अभाव पाया। उसके विपरीत अध्ययन के दौरान एडलर को कितने ही वृद्ध नर-नारी भी मिले जो वृद्धावस्था में भी काम पीड़ित थे।
सोलन शहर की सुनीता का 4 वर्ष की अवस्था में छः डाॅक्टरों के दल ने ऑपरेशन किया तो बालिका बालक में परिवर्तित हो गई। चैकोस्लोवाकिया की कु. जेक्शन कौबकौवा यौवनावस्था में प्रवेश करते ही पेडू और पेट में दर्द की शिकायत अनुभव करने लगी। स्तन बढ़ने के बजाय घटने लगे। डाॅक्टरों से परीक्षण कराया तो ज्ञात हुआ कि वे तो पुरुष बनने जा रही हैं। ऑपरेशन के बाद पुरुष बन गई।
ये घटनाएँ बताती हैं कि पुरुष शरीर का विकास करने वाला कोश (सेल) स्त्री, पुरुष दोनों की संभावनाओं से परिपूर्ण था। लिंग वाले लक्षण बीज (जीन्स) में पहले उभार में आया, पीछे दूसरे ने उभार लिया और उस मनुष्य ने इसी शरीर में यौन परिवर्तन कर लिया।
वस्तुतः हारमोन्स की लीला विलक्षण है। इनके सूक्ष्म रसस्रावों में अनेकों महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं। आत्मिकी के प्रयोगों में पंचकोश व षट्चक्र जागरण-भेदन की साधनाएँ, इन्हें जगाने व इनसे उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा करने के लिए ही की जाती हैं।
जापान के मुसाशी प्रांत का निवासी हनावा हाकेची सात वर्ष की आयु में ही अंधा हो गया था; किंतु उसने अपनी मस्तिष्कीय चेतना को इतना प्रखर बनाया था कि 4,00,000 हस्तलिपि की विषय-सूची तैयार कर सकता था। उसने एक ऐसी पुस्तक संकलित की, जिसके 2820 खंड हैं। ऐसी विशाल पुस्तक आज तक दुनिया में किसी ने भी नहीं लिखी। उसने बागाक्सी में एक स्कूल भी खोला, जिसमें जापानी साहित्य का अध्यापन वह स्वयं किया करता था।
आइन्स्टीन की सूझ-बूझ और मस्तिष्कीय प्रखरता का समस्त संसार कायल था। उनने ब्रह्मांड को एक नए स्वरूप में प्रस्तुत किया था और विश्व-व्यवस्थाओं पर नई परिभाषाओं के साथ नया प्रकाश डाला था। टाइम, स्पेस और कॉजेशन की उनकी व्याख्याएँ अद्भुत थीं, फिर भी कसौटियों ने उन्हें खरा और प्रामाणिक सिद्ध किया। उनकी न केवल विज्ञान में; वरन दर्शन व गणित में भी गहरी गति थी। उन्हें मस्तिष्कीय क्षेत्र की एक अनुपम प्रतिभा माना जाता था।
शरीरशास्त्री उनके अंतिम दिनों में यह ताना-बाना बुनने लगे थे कि इसका कारण उनकी मस्तिष्कीय संरचना में किसी विलक्षणता का समावेश हो सकता है। वे उनके मस्तिष्क की जीवित स्थिति में या मरने के उपरांत विशेष जाँच-पड़ताल करना चाहते थे। इन संदर्भ में विशेषज्ञों ने आइन्स्टीन से भेंट करने का साहस किया और इस शोध-प्रयास में उनका अभिमत पूछा एवं सहयोग चाहा।
आइन्स्टीन ने कहा—" मेरे मस्तिष्क में कोई विलक्षणता नहीं। अपने काम को महत्त्वपूर्ण मानने और उसमें समान रसास्वादन करते हुए तन्मय हो जाना ही वह उपाय है, जिसे अपनाकर कोई भी साधारण बुद्धि का आदमी अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ, अन्वेषक एवं प्रतिभावान बन सकता है। लोग कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करते और अधूरे मन से कामों को निपटाते हैं, इसीलिए वे असफल होते रहते हैं। आप लोग तथ्य को समझें। मस्तिष्क में जादू न खोजें।"
इनकारी से उत्तर मिलने पर भी विशेषज्ञों ने अपना प्रयत्न न छोड़ा और उन्हें एक प्राइवेट कब्रिस्तान में दफनाया गया था। खोदकर उनका मस्तिष्क निकाल लिया गया और उस पर गंभीरतापूर्वक अनुसंधान होता रहा। लोगों को इस बात में बड़ी दिलचस्पी थी कि आखिर उस मस्तिष्क में क्या विशेषता पाई गई।
बात बहुत दिनों तक गुप्त न रह सकी। पता चला कि मस्तिष्क वोगारा के डाॅ. टामस हर्वे के पास है। उनने लंबे समय तक जाँच की; पर वे उसमें कुछ अनोखापन न ढूँढ़ सके।
वर्कले में युनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के मस्तिष्क विशेषज्ञ मारियन डायमंड ने भी उस मस्तिष्क की गोपनीय खोजों में हार्वे का साथ दिया था। उनमें ग्लायल कोशिकाएँ अवश्य अधिक पाई गईं; पर वे जैवरासायनिक-प्रक्रिया से संबंधित थीं। उनके कारण मानसिक विलक्षणता उत्पन्न होने की कोई संगति नहीं बैठी।
‘डिस्कवरी’ पत्रिका में इस संबंध में विशेष जानकारियाँ छपीं; पर उसमें भी कोई ऐसा सूत्र हाथ न लगा, जिसके कारण उन्हें मस्तिष्कीय विलक्षणता का धनी माना जा सके। अंततः वही बातें सही माननी पड़ीं जो शरीर त्यागने से पूर्व आइन्स्टीन ने स्वयं कही थीं।
ऐसी ही एक घटना मास्को की है। वहाँ के 70 वर्षीय फिटर कोस्तलिन ने अपने 50 वर्ष के कार्यकाल में 250 लोकोपयोगी आविष्कार किए गए। वह एक प्रकाश कारखाने में मिकेनिक था; पर अपनी छोटी-सी प्रयोगशाला में कंप्यूटर स्तर की कितनी ही महत्त्वपूर्ण मशीनें बनाने में सफल हुआ।
उसने भी मस्तिष्कीय विशेषता वाली बात से इनकार किया था। कहा था खोपड़ी की उखाड़-पछाड़ करना बेकार है। हर व्यक्ति समान रूप से बुद्धिमान है। प्रश्न इतना भर है कि उसे अपनी क्षमता और प्रतिभा का उपयोग ठीक करना आता है या नहीं।
मस्तिष्कविज्ञानी ऐसे ही अन्य उदाहरणों से इसी नतीजे पर पहुँचे हैं कि शारीरिक विलक्षणता की बात सोचना बेकार है। प्रगति का कारण व्यक्ति का चिंतन व स्वभाव ही होता है।
सन् 1734 से सन् 1815 तक लगभग पूरे जीवन में डॉक्टर फ्रेडरिक मैस्मर ने प्राणशक्ति के अस्तित्व एवं उपयोग के संबंध में शोधकार्य किया। उन्होंने अपने अनुसंधानों के निष्कर्षों को क्रमबद्ध बनाया और मैस्मरेजम नाम दिया। आगे चलकर उनके शिष्य काँस्टेट युसिगर ने उसमें सम्मोहन विज्ञान की नई कड़ी जोड़ी और कृत्रिम निद्रा लाने की विधि को ‘हिप्नोटिज्म’ नाम दिया। फ्रांस के अन्य विद्वान भी इस दिशा में नई खोजें करते रहे। लाफान्टेन एवं डॉ. ब्रेड ने इन अन्वेषणों को और आगे बढ़ाकर इस योग्य बनाया कि चिकित्सा-उपचार में उसका प्रामाणिक उपयोग संभव हो सके।
पिछले दिनों अमेरिका में न्यू आरलीन्स तो ऐसे प्रयोगों का केंद्र ही बना रहा है। इस विज्ञान को अमरीकी वैज्ञानिक डारलिंग और फ्रांसीसी डॉक्टर द्रुराण्ड डे ग्रास की खोजों ने विज्ञान-जगत को यह विश्वास दिलाया कि प्राणशक्ति का उपयोग अन्य महत्त्वपूर्ण उपचारों से किसी भी प्रकार कम लाभदायक नहीं है। इस प्रक्रिया को “इलेक्ट्रो बायोलॉजिकल एक्सपेरीमेण्ट” नाम दिया गया है। ली वाल्ट की जीवविद्युत के आधार पर चिकित्सा-उपचार पुस्तक को प्रामाणिकता भी मिली और सराहना भी हुई। इस संदर्भ में जिन प्रमुख संस्थानों ने विशेष रूप से शोधकार्य किए हैं, उनके नाम हैं— (1) दि स्कूल ऑफ नेन्सी, (2) दि स्कूल ऑफ चारकोट, (3) दि स्कूल ऑफ मेस्मेरिस्ट। इनके अतिरिक्त भी छोटे-बड़े अन्य शोध-संस्थान व्यक्तिगत एवं सामूहिक अन्वेषणों को प्रोत्साहन देते रहे हैं।
आगे चलकर विज्ञानी मोडाव्यूज तथा काउण्ट पुलीगर के शोधों ने यह सिद्ध किया है कि प्राणशक्ति द्वारा रोग-उपचार तो एक हल्की-सी खिलवाड़मात्र है। वस्तुतः उसके उपयोग बहुत ही उच्च स्तर के हो सकते हैं। उसके आधार पर मनुष्य अपने निज के व्यक्तित्व में बहुमुखी प्रखरता उत्पन्न कर सकता है। प्रतिभाशाली बन सकता है। आत्मविकास की अनेकों मंजिलें पार कर सकता है। पदार्थों को प्रभावित करके अधिक उपयोगी बनाने तथा इस प्रभाव से जीवित प्राणियों की प्रकृति बदलने के लिए भी प्रयोग हो सकता है। जर्मन विद्युतविज्ञानी रीकनवेक इसे एक विशेष प्रकार की ‘अग्नि’ मानते हैं। उसका बाहुल्य चेहरे के इर्द-गिर्द मानते हैं और ‘औरा’ नाम देते हैं। प्रजनन अंगों में उन्होंने इस अग्नि की मात्रा चेहरे से भी अधिक परिमाण में पाई है। दूसरे शोधकर्त्ताओं ने नेत्रों में तथा उँगलियों के पोरुवों में उसका प्रवाह अधिक माना है।
हांग कांग के अमेरिकी डॉक्टर आर्नोल्ड फास्ट ने सम्मोहन विधि से निद्रित करके कई रोगियों के छोटे ऑपरेशन किए थे। पीछे डेंटल सर्जनों ने यह विधि अपनाई और उन्होंने दाँत उखाड़ने में सुन्न करने के प्रयोग बंद करके सम्मोहन विधि प्रयोग को सुविधाजनक पाया। दक्षिण अफ्रीका के जोहन्सबर्ग के टारा अस्पताल में डॉ. बर्नार्ड लेविन्सन ने बिना क्लोरोफार्म सुंघाए। इसी विधि से कितने ही कष्टरहित ऑपरेशन करके यह सिद्ध किया कि यह विधि कोई जादू-मंतर नहीं; वरन विशुद्ध वैज्ञानिक है। अंग्रेज विज्ञानी जेम्स ब्राइड ने भी नाड़ी-संस्थान में पाई जाने वाली विद्युतशक्ति की क्षमता को मात्र शरीर निर्वाह तक सीमित न रहने देकर उसमें अन्य उपयोगी कार्य संभव हो सकने का प्रतिपादन किया है।
द्वितीय महायुद्ध के समय लोगों के मन में छिपे हुए रहस्य उगलवा लेने के लिए प्राणविद्युत के प्रयोग की रहस्यमयी विधियाँ खोजी गई थीं। मनोविज्ञानी जे.एच.एट्स ब्रुक ने इस संदर्भ में कई नए सिद्धांत खोज निकाले थे और उनका प्रयोग जासूसी विभाग के अफसरों को सिखाया था। इसके लिए तब जर्मनी में एक ‘हिप्नोटाइज्ड इन्टेलिजेन्स’ विभाग ही अलग से बनाया गया था। उसके माध्यम से कितनी ही अद्भुत सफलताएँ भी मिली थीं।
मनीषियों का मत है कि प्रकृति कभी-कभी विलक्षण घटनाओं के सहारे इस तथ्य का बोध कराती है कि मानवी काया में इतनी प्रचंड विद्युत भरी पड़ी है कि यदि वह फुट पड़े तो शरीर को ही भस्मीभूत कर सकती है। ऐसी रहस्यमय घटनाओं के उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं।
काउडर स्पोर्ट पेन्सिलवानिया में डान. ई. गास्नेल मीटर रीडिंग का काम करता था। इसी क्षेत्र में एक वृद्ध फिजिशियन डॉ. जॉन इर्विन वेन्टले रहते थे। वृद्ध होते हुए भी वे पूर्णतया स्वस्थ थे। 5 दिसंबर 1966 को नित्य की तरह डान गास्नेल मीटर रीडिंग के लिए निकला। डॉ. जॉन इर्विन वेन्टले के दरवाजे पर उसने दस्तक दी। प्रत्युत्तर न मिलने पर उसने आवाज लगाई, फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला। वह मकान के ही एक पाइप के सहारे ऊपर के कमरे में पहुँचा। कारण यह था कि ऊपर कमरे की ओर से विचित्र प्रकार की जलने की गंध आ रही थी। कमरे में पहुँचकर देखा तो वहाँ से हल्का नीला धुँआ उड़ रहा था। कमरे की सतह पर राख का ढेर पड़ा हुआ था। अंदर कमरे का दृश्य अत्यंत वीभत्स था। डॉ. वेन्टले का दाहिना पैर जूते सहित मात्र अधजली स्थिति में पड़ा था और शरीर के सभी अंग जलकर राख हो गए थे। विशेषज्ञों ने भली-भाँति घटना का अध्ययन किया और अंततः स्वतः जलने की संज्ञा दी। ऐसा कोई सुराग नहीं मिला जो किसी अन्य प्रकार से आग जलने की पुष्टि कर सके। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि कमरे से निकलने वाली दुर्गंध मांस के जलने जैसी न होकर मीठी महक से युक्त थी।
इसी तरह की यह घटना जुलाई 1951 के एक दिन प्रातः सेंट पीटर्सबर्ग फ्लोरिडा में घटी। मेरीरिजर नामक एक अत्यंत हृष्ट-पुष्ट महिला अपनी कुर्सी पर ही बैठे-बैठे जल गई। इस कायिक दहन की विशेषता यह थी कि भयंकर अग्नि शरीर से निकली, उसे जलाती रही; पर मात्र एक मीटर के घेरे तक ही सीमित रही। मैरी का 80 किलो वजनी शरीर पूर्णतया भस्मीभूत होकर चार किलो राख में परिवर्तित हो गया। वेंटेल की भाँति उसका भी एक पैर अधजला उस घेरे में बच गया था। खोपड़ी सिकुड़कर संतरे के आकार में बदल गई थी।
अवशेषों की जाँच के लिए पेन्सिलवानिया स्कूल ऑफ मेडिसिन के फिजिकल एन्थ्रोपोलॉजी के प्रोफेसर डा. विल्टन क्रोगमॅन के पास भेजा गया तो खोपड़ी की आकृति देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। वह एक ख्याति प्राप्त फरेंसिक वैज्ञानिक थे तथा वर्षों का अनुभव था। अब तक की घटनाओं में ऐसी कोई घटना उनके पास नहीं आई थी की जलने के उपरांत खोपड़ी सिकुड़कर छोटी हो गई हो; क्योंकि विज्ञान के नियमानुसार जलने के बाद खोपड़ी को या तो फूल जाना चाहिए अथवा टुकड़े-टुकड़े हो जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस विचित्र अग्निकांड में खोपड़ी सिकुड़कर छोटा हो जाना निस्संदेह एक आश्चर्यजनक बात है। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने यह बताया कि बारह घंटे तक लगातार तीन हजार डिग्री फारेनहाइट तापक्रम रहने पर भी शरीर की संपूर्ण हड्डियाँ जलकर भस्मसात हों, ऐसा अब तक देखा-सुना नहीं गया था; पर यह घटना अपने में सबसे विलक्षण है, जिसकी यथार्थता पर बिल्कुल ही संदेह करने की गुंजाइश नहीं हैं।
नैशविल यूनिवर्सिटी के गणित विभाग के प्रो. जेम्स हैमिल्टन ने आपबीती एक घटना का उल्लेख किया है। 1835 में वे उक्त विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि “एकाएक मुझे अपने बाए पैर के निचले हिस्से में तीव्र जलन महसूस हुई। झुककर उस भाग को देखा तो स्तंभित रह गया। जलन वाले भाग से लगभग 10 सेंटीमीटर लंबी लौ निकल रही थी। यह लौ ठीक उसी प्रकार की थी जैसे कि लाइटर आदि जलाने से निकलती है; पर कुछ ही क्षणों बाद वह अपने आप बुझ गई। आग किन कारणों से लगी, यह आज भी हमारे लिए अविज्ञात है।”
पेरिस की 1851 में घटी एक घटना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। “ग्रेट मिस्ट्रीज” पुस्तक के लेखक हैं, इलेनार वान जान्ड्ट तथा राय स्टेमन। पुस्तक में वर्णित घटना के अनुसार एक व्यक्ति ने अपने एक मित्र से शर्त लगाई कि वह जलती मोमबत्ती को निगल सकता है। सत्यता को परखने के लिए दूसरे मित्र ने उसकी ओर तुरंत एक जलती मोमबत्ती बढ़ा दी। जैसे ही उस व्यक्ति ने निगलने के लिए मोमबत्ती को अपने मुँह की ओर बढ़ाया, वह जोर से चिल्लाया। मोमबत्ती की लौ से उसके होठों पर नीली लौ दिखने लगी। आधे घंटे के भीतर ही पूरे शरीर में आग फैल गई और कुछ ही समय में उसके शरीर के अंगों, मांसपेशियों, त्वचा एवं हड्डियों को जलाकर राख कर दिया।
अग्नि के भौतिक जगत में अगणित प्रयोग हैं। प्राणाग्नि का स्तर उससे कुछ ऊँचा ही है, नीचा नहीं। यदि उसका स्वरूप और प्रयोग जाना जा सकता है तो हानियों से बचना और लाभों को उठाना यह दोनों ही प्रयोजन भली प्रकार पूर्ण हो सकते हैं।
विशालकाय वृक्ष तना खड़ा था और आस-पास के छोटे पौधे हवा का तेज झोंका आते ही झुक जाते थे। तूफान आया। बड़ा वृक्ष खोखला हो गया था। वह उखड़ गया। छोटे पौधों ने हवा के सामने मस्तक झुका दिया और सभी सुरक्षित बच गए। इसे कहते हैं— 'घमंडी का सिर नीचा।'
यही धैर्य एवं सहनशक्ति उन्हें वह श्रेय प्रदान करती है, जिससे अन्य लोग शिक्षा ले सकें।
घटना 1914 की है। वैज्ञानिक टामस अल्बा एडीशन की प्रयोगशाला और कारखाना धू-धूकर जल रहा था। उसकी लपटें आकाश छूने की होड़ कर रही थीं। एडीसन उन लपटों में अपनी आशाओं को जलता देख रहा था। पास ही उसका पुत्र खड़ा था। इस भयंकर अग्निकांड को देखकर वह तो स्तब्ध रह गया।
वृद्ध एडीसन ने अपने युवा पुत्र से कहा— “देखते क्या हो? जाओ, अपनी माँ को बुला लाओ। उससे कहना कि जीवन में फिर कभी ऐसा दृश्य देखने को न मिलेगा।”
कुछ देर बाद उसकी पत्नी भी आ गई। उसने कहा— “बीस लाख डालर के कीमती यंत्रों के साथ आपके द्वारा संपूर्ण जीवन में जो आविष्कार किए गए, उनके संपूर्ण कागजात भी तो इस प्रयोगशाला में थे; वह भी अग्नि को समर्पित हो गए। अब क्या होगा?”
“पहले तो ईश्वर को धन्यवाद दो कि हम सबकी भूलें भी इसमें जलकर राख हो गई हैं। अब हम नए सिरे से अपने कार्य का आरंभ करेंगे। प्रत्येक हानि भी तो अपने साथ कुछ न कुछ लाभ छिपाकर लाती है।”
एडीसन दंपत्ति ऐसे सहज रूप से उस अग्निकांड को देखते रहे जैसे उनका उससे कोई सरोकार ही नहीं।
यही मनोवृत्ति जीवन के हर बदलते मोड़ पर हो तो खिन्नता का कोई कारण न रहे।
दर्शनशास्त्र, मनःशास्त्र या धर्म की पहुँच वस्तुतः आत्मसत्ता तक नहीं है। रहस्यवाद ही आत्मसत्ता के रहस्यों का बोध कराता है। व्यक्तित्व और मन दोनों अहम् (आत्मा) के भाग हैं, जो जानता है, समझता है और इच्छा करता है। मन चेतना का ही अंग एवं एकत्व है। व्यक्तित्व मन का प्रमुख अंग है।
समझदारी, स्मृति, मनोभाव और तर्क आदि मानसिक उपज नहीं हैं; वरन ये चेतना की प्रेरणाएँ हैं, जो मन द्वारा व्यक्त होते हैं। चेतना में अनेक अनुभूतियाँ हमेशा होती रहती हैं। हमारे शरीर और अंगों की संवेदनाएँ, तकलीफें और दर्द, इंद्रियों की अनुभूतियाँ, भूतकाल की मंद अनुभूतियाँ, वर्तमान और भविष्य की अनुभूतियाँ, आशाएँ, इच्छाएँ आदि हमेशा चेतना में रहती हैं। प्रत्येक मनुष्य की चेतना में नित्य एकता बनी रहती है और वह अपना कार्य व्यवस्थित रूप से करती है। नए अनुभव पहले के अनुभवों के परिष्करण के रूप में (इसमें) होते हैं और उनसे घुल-मिलकर एक हो जाते हैं। इन अनुभवों में चेतना के समस्त गुण एवं दृष्टिकोण होते हैं। यह मिश्रित व्यवस्था ‘सेल्फ’ कहलाती है।
सेल्फ की दो स्थितियाँ हैं- (1) बाह्यगत (2) आंतरिक। बाह्यगत सेल्फ से हम सोचने, समझने और अनुभव करने का काम लेते हैं, जो चेतना की ऊपरी परत है। इसके भीतर आंतरिक सेल्फ (इनर सेल्फ) गहराई में होता है। यह अतींद्रिय चेतना (अभौतिक) है और सबजेक्टिव कांशसनेस कहलाता है। इससे हमारे व्यवहार को प्रभावित करने वाले संवेग (अंतःप्रेरणाएँ) होते हैं। यह प्रभाव बाह्यगत चेतना (आबजेक्टिव सेल्फ) या स्मृति ज्ञान और अनुभव [जो अंतःचेतना में छिपी रहती हैं] के द्वारा अंतःचेतना पर पड़ता है।
अंतःचेतना आत्मा का आंतरिक भाग है और बाह्यचेतना आत्मा का बाह्य भाग है। आत्मा जीवन का स्रोत है और इसके रहते तक शरीर जीवित रहता है। यह स्वतंत्र है और अपनी इच्छानुसार नित्य कार्य करती है। अतः उससे समस्त ज्ञान प्राप्त होते हैं और सर्वोच्च शक्ति (परमात्मा) से वही संबंध स्थापित करती है। उसके रहस्यों का ज्ञान यह अंतःआत्मा ही देती है। यही रहस्यवादियों का आदर्श एवं प्रेरणा स्रोत है।
पदार्थ जगत में हम अधिक व्यस्त रहते हैं और अंतःजगत की भूले रहते हैं, इसीलिए हमें साधारणतः ये अनुभव नहीं होते। विषयगत विश्व से दूर रहने के कारण बच्चों को ये अनुभव कई बार होते हैं; परंतु उनके अभिभावक उन पर ध्यान नहीं देते। बच्चे ज्यों-ज्यों बड़े होते हैं, अनुभूतियाँ होना बंद हो जाती हैं।
बच्चों को अंतर्दर्शन की शिक्षा दी जानी चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण अनुभवों एवं ज्ञानों का श्रोत है। अंतर्दर्शन से हम ईश्वरी तत्त्व को जानते हैं और उसकी शक्तियों को समझते हैं। विश्व में सर्वत्र यह तत्त्व भरा है; परंतु हम अज्ञानता वश इसका लाभ नहीं उठा पाते। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर अंश है और उसमें ईश्वर की सारी शक्तियाँ सूक्ष्मरूप से भरी हैं। सारा विश्व ईश्वर का शरीर है और प्रत्येक वस्तु में वह विद्यमान है। अंतर्मन (आत्मा) मनुष्य के भाग्य का सूर्य है और संपूर्ण जीवन भर वह उसे प्रकाशित करता है। यह अंतरात्मा मनुष्य में ईश्वर की आवाजों, विचारों एवं शक्तियों को बतलाती है।
इनरसेल्फ (अंतरात्मा) पदार्थवाद से बहुत दूर सूक्ष्म अतींद्रिय क्षेत्र में रहता है, जहाँ तर्क समाप्त हो जाते हैं और अंतःदर्शन एवं अंतःज्ञान प्राप्त होते हैं। भौतिकवाद मन की उपज है और असत्य है। मन और अंतरात्मा समझ से परे हैं तथा इनको समझने के लिए विश्व में कोई भाषा या व्याकरण नहीं है। अतः अंतर्दर्शन एवं अंतरात्मा के विकास के लिए उपयोगी शिक्षा हम लोगों को अवश्य देनी चाहिए। भारतीय दर्शन का यह मौलिक सिद्धांत है।
सूर्यमंडल का सबसे दूरवर्ती ग्रह प्लूटो, शनि के इर्द-गिर्द घूमने वाला एक छल्ला, मंगल और बृहस्पति के बीच उल्काखंडों की एक भ्रमणशील माला, नेपच्यून के एक कोने पर उठा हुआ कूबड़, इन सब विलक्षणताओं की एक साथ संगति बिठाते हुए अंतरिक्ष विज्ञान के एक मूर्धन्य दल ने एक संगति बिठाई है कि मानवी सभ्यता के उत्कृष्ट अवशेष और विकसित विज्ञान के चिह्न उस पर पाए जाने चाहिए; क्योंकि वह सौरमंडल का सबसे विकसित ग्रह किसी समय रहा है और उसकी प्राकृतिक परिस्थितियाँ पृथ्वी की अपेक्षा कम नहीं; वरन अधिक सुखद थी। फलतः सौरमंडल का मनुष्योपम प्राणी उस पर जन्मा और फला-फूला हो तो आश्चर्य नहीं। प्रगति का मूल आधार प्रकृति के रहस्यों की खोज है। मनुष्य को आदिमकाल से लेकर अद्यावधि जो सुविधा साधन मिले हैं, वे प्रकृति की ही देन हैं; अस्तु यह भी निश्चित है कि उस छिन्न-भिन्न हुए पुरातन सौरमंडल सदस्य ग्रह ने विज्ञान की बढ़ी-चढ़ी खोज की हो।
वैज्ञानिकों ने उस अविज्ञात ग्रह का कल्पित नाम फैथान रखा है। उनका अनुमान है कि उस पर रहने वाले लोगों ने परमाणु रहस्य खोज लिए थे और उसका विस्फोट करके ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत हस्तगत करने का प्रयत्न किया था।
इसी खोज के बीच परस्पर युद्ध छिड़ गया या किसी तकनीकी भूल से परमाणुशक्तिभंडार में विस्फोट हो गया और उसके अत्यंत भयावह परिणाम हुए।
उस ग्रह की स्थिति मंगल और बृहस्पति के बीच जब फटा तो उसकी उखड़ी परत छर्रों के रूप में बिखर गई। छर्रे ही क्षुद्र ग्रहों की माला के रूप में मंगल और बृहस्पति के रूप में घूम रहे हैं।
इसके फैथान का भीतरी ठोसद्रव्य भीतर में शक्ति के बल पर आगे बढ़ा। शनि के एक बड़े चंद्रमा को टक्कर दी और उसे भी धूलि के रूप में बदल दिया। वह धूलि ही शनि के चारों और एक छल्ले के रूप में घूमती रहती है। इस धूलि में फैथान का भी कुछ अंश क्षत-विक्षत होकर मिल गया। इसके उपरांत भी उसका वेग रुका नहीं तेजी कुछ कम तो हुई; पर इतनी कम नहीं कि स्थिरता पकड़ ले। तब वह नेपच्यून से जा टकराया। उस पर उभरा हुआ कूबड़ प्लूटो का कोई टुकड़ा हो सकता है अथवा वही पिचककर एक ओर पहाड़ की शकल में बदल गया हो।
इतने में फैथान ने लंबी यात्रा कर ली थी और उसकी गर्मी कम और चाल शिथिल हो गई। सूर्य की आकर्षणशक्ति की पकड़ में वह आ गया और अन्य ग्रहों की तुलना में अतिशय दूर होते हुए भी सौरमंडल का सदस्य माना गया। औरों की भाँति प्लूटो भी सूर्य की परिक्रमा लगाने लगा; पर इतने पर भी अपनी संपदा का बहुत बड़ा अंश उसने गँवा दिया था और आकार में प्रायः एक चौथाई अंश रह गया। यह अंश वह है जो उसके मध्य भाग में पिघली हुई धातु के रूप में कठोर स्थिति का बचा हुआ था।
प्लूटो पृथ्वी पर से खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता। उसका पता अब से प्रायः 55 वर्ष पहले दूर दर्शन-यंत्रों की सहायता से लगाया। हमारी पृथ्वी सूर्य से 15 करोड़ किलोमीटर दूर है; पर प्लूटो की दूरी उससे 40 गुनी अधिक है, अर्थात् 15 गुणा 40 बराबर 600 करोड़ मील दूर। उसका सूर्य परिक्रमा वर्ष पृथ्वी के 250 वर्षों के बराबर होता है। दिन-रात भी प्रायः साढ़े पाँच गुने अधिक लंबे होते हैं। सूर्य से पृथ्वी को जितना प्रकाश मिलता है, उसकी तुलना में 1600 गुना कम प्रकाश ही उस तक पहुँच पाता है। वहाँ सदा सर्दी रहती है। शून्य से 200 डिग्री सेंटीग्रेड कम वहाँ का मौसम रहता है। उतने कड़ाके की ठंड में पृथ्वी पर पाए जाने वाले प्राणियों में से किसी का गुजारा नहीं हो सकता है।
इतना दूर और इतना छोटा होते हुए भी पृथ्वी के वैज्ञानिक उस तक पहुँचने और वहीं पर संभावित मानवी सभ्यता तथा वैज्ञानिक प्रगति का पता लगाने के लिए बहुत उत्सुक हैं। अंतर्ग्रही आवागमन की बात सोचने वालों के लिए सौरमंडल के एक सदस्य की खोज-बीन असंभव नहीं होनी चाहिए। इतनी लंबी यात्रा पर मनुष्य का जाना औरललौटना असंभव है; पर स्वसंचालित राकेट में संचालक ‘रोबोट’ तथा उसके साथ खोज-बीन के आवश्यक उपकरण भेजा जाना संभव है। रेडियो तरंगों द्वारा उसका संचालन भी पृथ्वी से हो सकता है।
फैथान ग्रह जैसे सुविकसित ग्रह की ऐसी दुर्दशा कैसे हुई, इसका कारण वैज्ञानिक एक ही बताते हैं कि उन लोगों ने अणुशक्ति का उपयोग जान-बूझकर युद्धरूप में किया होगा अथवा किसी भूल से वह शक्तिभंडार अनायास ही फट पड़ा होगा। इसका परिणाम यही हो सकता था जो होकर रहा।
आज के पृथ्वी निवासी भी उसी आग से खेल रहे हैं। वैज्ञानिक अपरिमित शक्ति के अणु आयुध तैयार कर रहे हैं और शासनाध्यक्ष उनके विपुल भंडार जमा कर रहें हैं। आत्मरक्षा का बहाना भर किया जाता है, वस्तुतः यह प्रयास प्रतिपक्षी को नष्ट करके उसकी भूमि तथा संपदा हथिया लेने भर का है पर यह मनोरथ जो भी कर रहे हों उन्हें इतिहास से शिक्षा लेनी चाहिए। अब जापान की तरह एक पक्षीय हमला नहीं हो सकता। सामने वाला प्रतिशोध की सामग्री से सुसज्जित होने के कारण चूकेगा क्यों? वह भी प्रत्याक्रमण करेगा। आगामी लड़ाई ऐसी नहीं होगी, जिसमें कुछ मरें कुछ बच जाएँ। होना है तो सर्वनाश ही होगा और उस सुंदर धरती का, समुन्नत सभ्यता का उसी प्रकार होगा जैसा कि तथाकथित फैथान का हुआ। उसने अनेक विपन्नताएँ सौरमंडल में उत्पन्न कीं और स्वयं सबसे पिछली पंक्ति में दयनीय स्थिति में जा बैठा। अगला परमाणु युद्ध हुआ तो पृथ्वी का भी ऐसा ही दुर्भाग्य भरा अंत होना निश्चित है।
मेवाड़ के राजा न रहे तो सिंहासनारूढ़ उदयसिंह को किया गया जो अभी पालने में झूलने वाली आयु के थे। संरक्षक बनवीर को नियुक्त किया गया।
बनवीर ने सोचा— क्यों न बालक को मारकर गद्दी हथिया ली जाए। लालच का नशा पूरे उभार पर था। रात्रि के समय नंगी तलवार लेकर बनवीर वहाँ पहुँचा जहाँ पन्ना धाय उसे दूध पिला रही थी। बगल में उसका अपना बच्चा भी सोया हुआ था।
धाय को झकझोरते हुए बनवीर ने पूछा— "बताओ इनमें से उदयसिंह कौन-सा है।" एक जैसे कपड़े होने के कारण वह पहचान नहीं पा रहा था।
पन्ना को वस्तुस्थिति समझने में देर न लगी। प्यार को महत्व दे या कर्त्तव्य को? सही बताने में अधिक उपयोगी बच्चा जाता था और कर्त्तव्य पर आँच आती थी। गलत बताने से अपना लाड़ला हाथ से जाता था।
असमंजस कुछ क्षण ही रहा। कर्त्तव्य निर्धारित करते देर न लगी। उसने अपने बच्चे की ओर उँगली से इशारा कर दिया, तलवार चली और बच्चे के दो टुकड़े हो गए।
पन्ना का प्राण चीत्कारकर उठा, पर रोने से भेद खुलता था। सो वह आँसू भी पी गई। काम समाप्त हुआ। राजकुमार धाय का बच्चा बना रहा और उसी प्रकार पलता रहा। किसी को कानों-कान खबर तक न पड़ी।
समय बीता। वस्तुस्थिति प्रकट हुई। उदयसिंह को गद्दी पर बिठाया गया। गद्दी पर बैठते समय उसने पन्ना धाय के चरण चूमें और कहा— “राजपूतों की बलिदान शृंखला में आप सदा मूर्धन्य गिनी जाती रहेंगी।"
पूर्वाभासों को वैज्ञानिक रूप देने वाले व इस विषय पर गंभीर अनुसंधान कार्य करने वालों में मिस्टर मैटले कैरिगंटन का नाम भी अत्यंत उल्लेखनीय है, वह प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान लंदन की ‘रॉयल फ्लाइंग कोर’ के वरिष्ठ पायलट रह चुके थे। पाश्चात्य प्राचीन दार्शनिक द्वय प्लेटो और हैराक्लिट्स ने मनोविज्ञान स्तर पर सपनों का मात्र सफेद झूठ नहीं बताया, अपितु उनकी धारणा थी कि व्यक्ति जिन भावनाओं के प्रति अधिक प्रवृत्त होता है, ठीक उसी दिशा में उसी प्रकार की प्रवृत्तियों के सपने भी अधिक आते हैं, जो अधिकांशतः देर-सबेर सत्य भी निकलते हैं।
जॉहन गॉडले को घुड़सवारी करने और ‘हार्स रेस’ देखने की बहुत अधिक ललक रहती थी, सो वह ज्यादातर सपने घुड़दौड़ और उसमें जीतने वाले घोड़ों के ही देखता था। एक बार नहीं, अपितु अनेकों बार घुड़दौड़ में जीतने वाले घोड़ों के नाम परिणाम घोषित किए जाने से पूर्व ही सपनों के माध्यम से उसे पता चल गए थे, जो कि समाचारपत्रों में प्रकाशित होने पर शत-प्रतिशत सत्य ही निकलते थे। उन्होंने अपने इन सभी पूर्वाभास जनित अनागत घटनाओं का विवरण अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “थ्योरी ऑफ प्रिडीक्शन’ में विस्तार से दिया है। इसी पुस्तक की एक घटना इस प्रकार से है।
घटना 8 मार्च 1946 की है, उन दिनों जॉहन गॉडले आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र थे। उन्होंने स्वप्न में दो विजेता घोड़ों के नाम समाचारपत्र में पढ़े। सुबह होते ही उसने अपने साथियों को उन दोनों विजेता घोड़ों के नामों को बतलाया, जो कि अगले दिन समाचारपत्र में घोषित किए जाने वाले थे। साथियों ने सपने की बात सच न मानते हुए उनका उपहास किया। इस प्रकार एक बड़ी धनराशि की शर्त रखी गई। अगले दिन जैसे ही घुड़दौड़ के परिणाम समाचारपत्रों में प्रकाशित किए गए तो पहली पंक्ति में उन्हीं दोनों विजेता घोड़ों के नाम मोटे-मोटे अक्षरों में छपे हुए पाए गए। तभी से उसके सभी साथी-संगी स्वप्नों को, पूर्वाभासों के संकेतों को महत्व देने लगे।
विश्वविद्यालयीय शिक्षा के दौरान जब वह अवकाश के दिनों अपने पैतृक घर आयरलैण्ड आया, तो यहाँ भी एक-एक करके समय-समय पर ऐसा विजेता घोड़े के एवं अन्यान्य आगत संभावनाओं के सपने देखते रहा, जो कि समाचारपत्रों को पढ़ने पर सत्य ही निकलते थे। उन्हें अपनी इस अविज्ञात विलक्षण विभूति पर स्वयं भी अत्यधिक आश्चर्य हुआ। उन्होंने तत्कालीन प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक पत्र “डेली मिरर” के कार्यालय से संपर्क किया तथा अपने गत सच निकलने वाले पूर्वाभासों की विलक्षणताओं को बतलाया। पहले तो उसे विश्वास न हुआ लेकिन प्रमाण पाने पर दैनिक पत्र का संपादकीय विभाग अत्यधिक प्रभावित हुआ और उन्हें सवैतनिक पत्रकार के रूप में सम्मान के साथ रख लिया। इस प्रकार स्वप्नों ने जॉहन गॉडले के जीवन को आमूलचूल परिवर्तित कर दिया।
दूसरी शती में एक विख्यात भविष्यवक्ता आर्टेमिडोरस का नाम अत्यंत उल्लेखनीय रहा है। इस यूनानी भविष्य दृष्टा ने सपनों पर कई पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने लिखा है कि मैं रात-दिन बस सपने ही देखता और उनका विश्लेषण करता रहा। इस प्रकार विशद अध्ययन से पता चलता है कि स्वप्नों की यथार्थता व उनके पूर्वाभासों का विश्लेषण शताब्दियों पहले से ही किया जाता रहा है। वर्तमान में प्रत्यक्ष को ही सब कुछ मानने वालों के लिए सर्वाधिक रुचिकर एवं अत्याधुनिक परीक्षण पूर्वाभास के रूप में आगत संबंधी भावी रहस्यों को जानने के लिए अमेरिका स्थित न्यूयार्क नगर के प्रख्यात शोधकर्मी डाॅ.डोन ने अपने हाथ में लिए हैं।
भूत की घटित और भविष्य के अघटित अनागत रहस्यों का ज्ञान किसी भी व्यक्ति को हो सकता है, वस्तुतः इसमें चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं है। व्यष्टि मन को समष्टि मन से जोड़ने के लिए साधना करनी होती है। जो जिस स्तर तक उस समष्टि चित्त से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उसकी भूत-भविष्य की दर्शन क्षमता उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। इस तथ्य का प्रतिपादन हमारे प्राचीन भारतीय महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन के विभूतिपाद के 52 वें सूत्र में स्पष्ट रूप से किया है।
“क्षण तत्क्रमयोः संयमाद विवेकजं ज्ञानम्” (3152)
अर्थात— समय के अत्यंत छोटे टुकड़े 'क्षण' के क्रम में चित्त संयम करने से संसार की सही स्थिति का निरीक्षण किया जा सकता है।
अतः कहना न होगा, कि मनुष्य के भीतर ऐसी विशिष्ट क्षमताएँ स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं, जिनका समुचित विकास कर, वह काल की मानव निर्मित सीमाओं को भेधकर भूत-भविष्य की घटित-अघटित घटनाओं का प्रत्यक्ष झाँकी दर्शन कर सकता है। योग-साधनाओं द्वारा यह विकास सहज रूप में हो जाता है और तब व्यक्ति को अपनी इस अनंत विस्तृत आत्मचेतना का बोध होता है, जिसे वह विस्मृत किए रहता है।
राजा महेंद्र प्रताप का राज्य अलीगढ़ जिले के मुरसान ठिकाने में था। वे आरंभिक जीवन में ही प्रगतिशीलता के संपर्क में आए और देश-धर्म के कल्याण की बात सोचने लगे।
अधेड़ हो जाने पर भी उनकी कोई संतान न हुई तो संबंधी लोग दूसरा विवाह करने, किसी का लड़का गोद लेने के लिए आग्रह करने लगे। उनने इन लोगों से पीछा छुड़ाने के लिए चतुरता से काम लिया और अचानक एक दिन घोषणा कर दी कि हमारे यहाँ पुत्र हुआ है। बड़ी धूमधाम से उत्सव हुआ। नामकरण के लिए मालवीय जी को बुलाया गया।
नामकरण का मुहूर्त्त आया तो राजा साहब ने घोषणा की कि मैंने एक गाँव की आमदनी अपने खर्च के लिए रखकर शेष अपने बेटे को उत्तराधिकार में देने का निश्चय किया है। यह बेटा एक विद्यालय होगा। उसका नाम प्रेम महाविद्यालय रखा गया। उसमें देश के मूर्धन्य कांग्रेस नेता पढ़ाने के लिए बुलाए गए। उनने छात्रों को देशभक्ति के ढाँचे में ढाल दिया। स्वतंत्रता-संग्राम आरंभ होते ही वे सभी छात्र आंदोलन मेें कूद पड़े। छात्र और अध्यापक सभी गिरफ्तार हो गए। विद्यालय जब्त कर लिया गया, जो स्वतंत्रता मिलने के बाद वापस किया गया। पीछे वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज बन गया।
राजा साहब गुप्त रूप से विदेश चले गए और भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रबल प्रयत्न करते रहे। स्वराज्य होने के उपरांत वे वापस लौटे।
रात को चैन की नींद सो सको, दिन में ऐसे काम करो और रात इस प्रकार बिताओ कि मुँह दिखाने लायक बने रहो।
विज्ञान की एक नई शाखा विकसित हो रही है जो मरणासन्न व्यक्तियों का अध्ययन करती है। क्या इन व्यक्तियों को मृत्यु का भय होता है? निकटतर आ रही मृत्यु के बारे में बोध होने पर इन व्यक्तियों को कैसा महसूस होता है? मृत्यु संबंधी ऐसे तथ्यों का अध्ययन करने वाले इस विज्ञान को ‘थेनाटालॉजी’ कहते हैं।
पश्चिमी जर्मनी के एक डॉक्टर लोथर विट्जल ने मरणासन्न मरीजों से उनकी मृत्यु के 24 घंटे पूर्व बातचीत की। उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे मृत्यु आती है, मरणासन्न व्यक्तियों में उसका भय मिटता जाता है। बीमारी की वृद्धि के साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों की धार्मिक आस्था दृढ़ होती चली जाती है और चिंताएँ कम होती जाती हैं।
“मैंसाचुसेरस मेडिकल सोसाइटी” के बोस्टन निवासी डाॅ. मूर रसेल फ्लेचर ने 25 वर्षों तक गहन अन्वेषण करने के पश्चात तथ्यों को “ट्रिटाइज आन सस्पेण्डेड— एनीमेशन” नामक ग्रंथ में लिपिबद्ध किया है, जिसमें मरने के उपरांत फिर से जी उठे लोगों के अनुभव हैं। डाॅ. फ्लैचर ने अपनी इसी पुस्तक में गार्थाइर शहर निवासी श्रीमती जान टी.डी.ब्लैक के बयान के अनुसार लिखा है कि वे तीन दिन तक मृतावस्था में पड़ी रहीं थीं। डाॅक्टरों ने मृत घोषित कर दिया; किंतु घरवालों ने किसी कारणवश नहीं दफनाया। तीन दिन बाद वे जी उठीं। पूछने पर उन्होंने बताया कि वे ऐसे लोक में पहुँच गईं, जिसे परीलोक कहा जा सके। वहाँ बहुत-सी आत्माएँ प्रसन्नचित्त रह, आसमान में बिना परों के ही उड़ती मालूम होती थीं।
डाॅ. रेमण्ड मूडी ने बड़े प्रयत्नपूर्वक किए गए अपने शोध का प्रकाशन ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ नामक ग्रंथ में किया है, जिसका विषय है— "पुनर्जीवन व मृत्यु के मध्यांतरकाल का अनुभव।" इस ग्रंथ में 150 घटनाओं के बीच अनेक घटनाएँ ऐसी हैं, जिसमें संबद्ध व्यक्ति ने बताया कि उनके मस्तिष्क में सनसनाहट-सी लगी और मक्खियों के भिनभिनाने जैसी गुंजन सुनाई पड़ी। इसके बाद सब कुछ ठंडा लगा और सुध-बुध समाप्त हो गई। दूसरे व्यक्ति का अनुभव था कि मानो उसे किसी अंधकारपूर्ण खड्ड में गिरा दिया गया हो और वह नीचे की दिशा में तेजी से डूबता जा रहा हो।
सत्य की शोध में चेतना के सिद्धांत का कम महत्वपूर्ण स्थान नहीं हैं। इस निष्कर्ष पर पहुँचे सर आलिवर लाज विलियम क्रुक्स जैसे वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को मुक्तकंठ से स्वीकारा है। उनका मत है कि चेतना पदार्थों के संघात का प्रतिफलमात्र नहीं; अपितु उससे भिन्न स्वतंत्र सत्तावान है, जो शरीर के विनष्ट हो जाने पर भी विद्यमान रहती है। इस तथ्य के प्रमाण में उन्होंने कई मृतात्माओं का सहयोगपरक आह्वान किया था और सहयोग प्रदान किया।
‘फ्राण्टियर आफ दी आफ्टर लाइफ’ के लेखक एडवर्ड सी रेण्डेल ने ऐसी ही एक दिवंगत आत्मा के अनुभवों को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है— “मरने के बाद अपने चारों ओर से स्वजन संबंधियों से घिरा हुआ पाया। पहले पहल तो अपने आपको ऊपर उठते हुए देखा, फिर धीरे-धीरे नीचे आ गया। एक शरीर बिस्तरे पर पड़ा था तो दूसरा मैं खड़ा था। शारीरिक वेदनाएँ समाप्त हो गई थीं। जो आत्माएँ मुझे लेने आई थीं, उन्होंने मुझसे चलने को कहा। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मैं मर चुका हूँ।
मूर्धन्य मनोविज्ञानी कार्ल जुंग ने अपने निजी मरणोत्तर जीवन का वृत्तांत स्वलिखित “मैमोरीज ड्रीम्स रिफ्लेक्सन” में लिखा है। सन् 1944 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। डॉक्टर उन्हें मरणासन्न स्थिति में अनुभव कर रहे थे और ऑक्सीजन के सहारे बचाने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी समय जुंग ने अनुभव किया कि वे हजारों मील ऊपर उड़ गए और अधर में लटके हुए हैंं। इतने हल्के हैं कि किसी भी दिशा में इच्छानुसार जा सकते हैं। ऊपर से ही मैंने यरुशलम नगर का दृश्य तथा और भी बहुत सी चीजें देखीं। उन्हें लगा वे अब पहले की अपेक्षा बहुत बदल गए हैं। बहुत देर की स्थिति में रहने के बाद उन्हें अपने पुराने शरीर में पुनः लौटना पड़ा और शरीरगत जीवन पुनः प्रारंभ हो गया। जुंग ने लिखा है, मरणोत्तर जीवन की इस अलौकिक अनुभूति ने मेरे समस्त संशय समाप्त कर दिए और यह मामला समझा दिया कि मरने के बाद क्या होता है?
परामनोवैज्ञानिक डाॅ. किंग ह्वेलर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दी इम्मॉर्टल सोल’ में मृत्यु से वापस लौटे व्यक्तियों की अनेकों घटनाओं को उल्लेखित किया है।
ओन्टोरियो (कनाडा) में कोस्टल क्षेत्र के मानव संपदा निर्देशक हर्वग्रिफिन को सन् 1974 में तीन बार हृदय के दौरे पड़े। डाॅक्टरों द्वारा कई बार मृतक घोषित किए जाने पर भी कुछ मिनटों बाद पुनर्जीवित हो उठते थे। ग्रिफिन ने मरणोत्तर जीवन की अनुभूतियों का विश्लेषण करते हुए बताया है कि— प्रत्येक मृत्यु के उपरांत के अनुभवों में मैंने अपने को तेज प्रकाश से घिरा पाया। वह प्रकाश मेरी ओर बढ़ रहा था। मेरे और प्रकाश के बीच एक काली छाया थी जो इस तेज प्रकाश से मेरी रक्षा कर रही थी। मैं अपने को समुद्रतट पर खड़ा एक भ्रूण महसूस कर रहा था। जिस पर सूर्य की तेज रोशनी के समान प्रकाश था। वह प्रकाश मेरी ओर बढ़ ही रहा था कि अचानक एक जाना-पहिचाना चेहरा प्रकट हुआ जो सलेटी रंग का सूट पहने हुए था। उसने निडर भाव से कहा— "आ जाओ, सब ठीक है", अचानक मेरे सीने पर तेज आघात हुआ, आवाज भी सुनाई दी "क्या मैं बिजली के झटके दूँ।” दूसरी ओर से आवाज आई नहीं, अभी नहीं। इसकी आयु अभी पूरी नहीं हुई। इसे जिंदा रहना चाहिए। इसके बाद में अस्पताल में पड़े अपने शरीर में वापस पहुँच गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अगस्त सन् 1944 को एक फौजी अफसर की घटना मित्र राज्य गजेटियर में प्रकाशित हुई। आफीसर स्काइट कार द्वारा जा रहा था, तभी जर्मन ऐण्टी टैंक ने उस पर सीधा प्रहार किया। उसकी कार में भी विस्फोटक पदार्थ भरा था उनमें विस्फोट हो गया। गजेटियर में लिखा है— जैसे ही विस्फोट हुआ, मैं 20 फुट दूर जा गिरा। ऐसा लगा मैं दो भागों में विभक्त हो गया। मेरा एक शरीर नीचे जमीन में पड़ा तड़प रहा है, उसके कपड़ों में आग लगी है। दूसरा ऊपर आकाश में हवा की तरह तैर रहा है। वहाँ से सड़क पार की वस्तु युद्ध का दृश्य, झाड़ियां, जलती कार मैं सब कुछ देख रहा था। तभी अंतःप्रेरणा उठी कि तड़फड़ाने से कुछ लाभ नहीं, शरीर को मिट्टी से रगड़ दो ताकि आग बुझ जाए। शरीर ने ऐसा ही किया। वह लुढ़ककर बगल की नम खाड़ी में जा गिरा, आग बुझ गई। फिर मैं वापस उसी शरीर में आ गया। अब मुझे शरीर की पीड़ा का पुनः भान होने लगा, जबकि थोड़ी देर पूर्व यही दृश्य मैं मात्र दर्शक बना देख रहा था।
सुकरात को जहर दिए जाने के समय उनके सभी संबंधी वहाँ आँसू बहा रहे थे। बिना किसी कुप्रभाव के उनके मुखमंडल पर प्रसन्नता, प्रफुल्लता और भी अधिक परिलक्षित हो रही थी। ऐसा लगता था कि किसी प्रियजन से मिलने की उमंगें उठ रही हों। पास में खड़े शिष्यों ने जब इनका कारण पूछा तो उन्होंने कहा— “मैं मृत्यु से साक्षात्कार करना चाहता हूँ और यह जानना चाहता हूँ कि मृत्यु के बाद हमारा अस्तित्व रहता है या नहीं। मृत्यु जीवन का अंत है अथवा एक सामान्य जीवनक्रम।” सुकरात को निर्धारित समय पर विष देते समय सभी दर्शकों के नेत्र सजल हो उठे। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा— “मेरे शरीर के सभी अवयव गतिहीन हो चुके हैं, लेकिन मेरा अस्तित्व पूर्ववत ही है। जीवन की वास्तविकता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं एक अविरल प्रवाह है। जीवन की सत्ता मरणोपरांत भी बनी रहती है।”
सुकरात को जहर दिए जाने के समय उनके सभी संबंधी वहाँ आँसू बहा रहे थे। बिना किसी कुप्रभाव के उनके मुखमंडल पर प्रसन्नता, प्रफुल्लता और भी अधिक परिलक्षित हो रही थी। ऐसा लगता था कि किसी प्रियजन से मिलने की उमंगें उठ रही हों। पास में खड़े शिष्यों ने जब इनका कारण पूछा तो उन्होंने कहा— “मैं मृत्यु से साक्षात्कार करना चाहता हूँ और यह जानना चाहता हूँ कि मृत्यु के बाद हमारा अस्तित्व रहता है या नहीं। मृत्यु जीवन का अंत है अथवा एक सामान्य जीवनक्रम।” सुकरात को निर्धारित समय पर विष देते समय सभी दर्शकों के नेत्र सजल हो उठे। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा— “मेरे शरीर के सभी अवयव गतिहीन हो चुके हैं, लेकिन मेरा अस्तित्व पूर्ववत ही है। जीवन की वास्तविकता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं एक अविरल प्रवाह है। जीवन की सत्ता मरणोपरांत भी बनी रहती है।”
मृत्यु से मत डरो। डरो उस अपयश एवं पश्चात्ताप से जो मरने के बाद भी चिरकाल तक बना रहता है।
आवश्यकता या इच्छा के अनुरूप सभी साधन उपलब्ध हो सकेंगे, इसकी आशा करना समय को देखते हुए दुराशामात्र है। परिस्थितियाँ अपने इच्छानुसार बनाने के लिए आवश्यक साधन जुटाने होते हैं और उनमें देर लगती है। तब तक खीजते रहने की अपेक्षा यह अधिक सही है कि परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर चला जाए और उस भविष्य की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की जाए, जिसमें अपने पुरुषार्थ से इच्छित साधन जुटाए जा सकें। लेकिन इसके लिए यह नहीं कहा जा सकता कि उस स्थिति के उपलब्ध करने में कितना समय लगेगा। तब तक खिन्न, रुष्ट, असंतुष्ट बैठे रहने से कोई लाभ नहीं। ऐसी मनोदशा में रहने पर तो अनुकूलता प्राप्त करा सकने वाला पुरुषार्थ और भी ढीला पड़ जाएगा जो संभावनाओं के जल्दी समीप आने की अपेक्षा उनकी दूरी और देरी बढ़ाती ही जाएगी।
अनिच्छा रहने पर भी परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है। न बिठाया जाए तो जो संभव है, वह अवसर भी हाथ से निकल जाता है। अधीर और अदूरदर्शी लोग ऐसे ही कदम उठाते हैं, जिसमें उछलकर चलने पर हाथ-पैर टूटने का जोखिम बढ़े। इससे तो धीरे चलना और कम में काम चलाना अच्छा, जिसमें धीमी किंतु आशाजनक प्रगति हो सकती है।
असंतोष तब भड़कता है जब अपनी तुलना सुसंपन्नों के साथ की जाती है और चाहा जाता है कि ऐसे ही सुविधा-साधन हमें क्यों न मिलें? साधनसंपन्न जीवन की ललक बुरी नहीं है; पर उसके लिए आवश्यक क्षमता एवं उपलब्धि के लिए अनुकूलता होनी चाहिए। कठोर परिश्रम करने पर भी किन्हीं क्षेत्रों में रहते हुए यह संभव नहीं कि संपन्नता अर्जित की जा सके और उस तरह रहा जा सके, जिस तरह अमीर एवं बड़े लोग रहते हैं।
ऐसी दशा मे तीन प्रतिक्रियाएँ होती हैं— एक यह कि निरंतर रुकते रहा जाए, दूसरा यह कि किन्हीं अपराधी प्रवृत्तियों को अपनाकर धन जुटाया जाए, तीसरी यह कि अपनी भड़ास निकालने के लिए संपन्नों को गालियाँ देते, आक्षेप लगाते रहा जाए। ईर्ष्याजन्य आक्रोश को शांत करने का यह भी एक तरीका है।
यह तीनों ही कदम ऐसे हैं, जिनमें लाभ मात्र मन हलका कर लेने भर का है, हानि बहुत है। अपराधों में कड़े दंड भुगतने का स्पष्ट जोखिम है। दूसरे दो का पता, जब दूसरों को चलता है तो अपनी अयोग्यता एवं क्षुद्रता ही स्पष्ट होती है। ऐसे लोगों के साथ कोई संपर्क बढ़ाना पसंद नहीं करता। उन्हें खतरनाक स्तर का मानता है। इससे उपेक्षा और असहयोग पल्ले पड़ता है; किंतु किसी समस्या का हल नहीं होता। जो मस्तिष्क रचनात्मक कदम उठाने, योग्यता अर्जित करने एवं उपयुक्त अवसर तलाशने में लगना चाहिए था वह कुढ़ने में नष्ट हो जाता है।
उन्नति के लिए प्रयत्न करें पर साथ ही जो उपलब्ध है, उसमें संतोष भी करें। संपन्नता ही प्रसन्नता दे सकती है, यह आवश्यक नहीं। जो हस्तगत है उसी को सुनियोजित करके प्रसन्न रहा जा सकता है। अपने स्वभाव में मिलनसारी और सहनशीलता की मात्रा बढ़ाकर स्वल्प साधनों में भी हँसती-हँसाती जिंदगी जियी जा सकती है।
मनुष्य अपने को दरिद्र या पिछड़ा हुआ तब अनुभव करता है, जब बड़ों के साथ अपने को तौलता है। संसार में ऐसे भी अगणित लोग हैं जो उस स्थिति के लिए भी तरसते हैं, जो अपनी है। उनके साथ तुलना करने पर अनुभव करते हुए ईश्वर को धन्यवाद देने और गौरव अनुभव करने का अवसर मिल सकता है। धन की प्रचुर मात्रा संग्रह करना तो परिस्थितिजन्य है। अपने सद्गुणों को-दृष्टिकोण को परिष्कृत करते हुए हम किसी भी स्थिति में प्रमुदित रह सकते हैं।
अपने को पवित्र रखें। रीति-नीति में शालीनता का समावेश करें और इसके लिए प्रयत्नरत रहें कि अपनी शालीनता का स्तर गिरने न पाए।
किंतु साथ ही यह सतर्कता रखने की भी आवश्यकता है कि, बरती गई भलमनसाहत का लोग अनुचित लाभ न उठाने पाएँ। इस संसार में भले लोग कम हैं, बुरे अधिक। बुरे लोग बुरों से टकराकर अपना पराक्रम दिखाने और विजयी बनकर अपनी प्रतिभा का परिचय देने के झंझट में नहीं पड़ते; वरन यह देखते हैं कि किसी भावुक की सज्जनता को उसकी मूर्खता समझकर अनुचित लाभ कैसे उठाया जाए। सज्जनों को ठग लेना, अन्य किसी प्रकार बढ़-चढ़कर लाभ उठाना कठिन है, इसलिए भले लोग ही अक्सर ठगे जाते हैं और कृतघ्नता या विश्वासघात की शिकायत करते हैं।
अपने अंदर सज्जनता के साथ बुद्धिमत्ता को भी जोड़कर रखना चाहिए। इतना भावुक या उदारचेता नहीं बनना चाहिए कि किसी की मोहनी बातों में आकर अपने कपड़े उतार दिए जाएँ और खुद ठंड सहकर बीमार पड़ा जाए।
संकटग्रस्तों की सहायता करना उचित है; पर इससे पूर्व यह जाँच-पड़ताल करनी चाहिए कि संकट की बात बनावटी तो नहीं है, विपत्ति की बात मनगढ़ंत तो नहीं है, हितैषी बनकर जेब काटने का कोई कुचक्र तो नहीं चल रहा है?
जहाँ वस्तुस्थिति समझने में भूल होती है, वहाँ अनावश्यक उदारता भी पीछे पश्चाताप बनती है। जेब कटाना और आपत्तिग्रस्त की सहायता करना, दो पृथक बातें हैं। उदारता को सद्गुण माना गया है; पर कुपात्रों के बहकावे में आकर अपना सर्वस्व गँवा देना लोक-व्यवहार नहीं है।
दुर्जन बनना इसलिए बुरा है कि उससे आत्मा का पतन होता है। व्यक्तित्तव का स्तर गिरता है और अप्रामाणिक समझे जाने पर स्नेह-सहयोग का रास्ता बंद होता है। सज्जनता के अनेक गुण हैं। उनके कारण मनुष्य देवोपम एवं श्रद्धा का पात्र बनता है। उसमें बुराई का समावेश तब होता है जब अतिशय भावुकता प्रदर्शित की जाती है और वह सतर्कता चली जाती है, जिसकी कसौटी पर कसकर वस्तुस्थिति समझी जाती है।
यथासंभव शारीरिक श्रम और मानसिक सत्परामर्श से, सहानुभूति और सेवा-भावना को चरितार्थ करने तक ही सीमित रहना चाहिए। आर्थिक लेन-देन का सिलसिला वहाँ से चलाना चाहिए जहाँ वस्तुतः कोई व्यक्ति संकट में घिर गया हो। ऐसी सहायता करते हुए यह आशा नहीं करनी चाहिए कि जो दिया गया है, वह वापस लौटेगा। सच तो यह है कि जो अपव्ययी या दुर्गुणी होते हैं, वे ही आर्थिक संकट में फँसते और संतुलन बिठाने के लिए अनेकों से ऋण या सहायता प्राप्त करने का कुचक्र रचते रहते हैं। उनकी स्थिति कभी ऐसी नहीं बन पाती जो उपकार का बदला चुका सके, इसलिए इन दिनों उदारता के साथ सतर्कता को सम्मिलित रखना भी आवश्यक है।
सत्रहवीं सदी में जापान के प्रधानमंत्री जी.पी. शाद्र का परिवार एक हजार आदमियों का था, वे सभी सम्मिलित रहते थे। इसका सभी जगह आश्चर्य माना जाता था कि दस पाँच आदमी एक परिवार में नहीं रह पाते तो एक हजार इतने मिल-जुलकर किस प्रकार रहते हैं।
इसके रहस्य पूछने तीसरी पीढ़ी के सम्राट उनके पास पहुँचे। मंत्री बहुत बूढ़े हो चुके थे। ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे, पर एक कागज मँगाकर उत्तर लिख दिया। उसमें लिखा था— “पारस्परिक सौजन्य एवं एकदूसरे का सम्मान।”
एक हाथी युगल अपने जीवनकाल में अधिकतम दो या तीन बच्चों को जन्म देता है। यह उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक जीवों में प्रायः एक ही बार के सहजीवन से गर्भाधान की क्रिया संपन्न हो जाती है, क्योंकि उसके सहजीवन की संख्या सारे जीवन में अधिकतम पाँच से अधिक नहीं होती है। अपनी इस विशेषता के कारण कहीं भी उनकी जनसंख्या के विस्फोट की समस्या नहीं उठी। इतने जंगल कट जाने पर भी उनके लिए कभी खाद्य का अभाव नहीं पैदा हुआ।
जंगली बतखें भी पारिवारिकनिष्ठा से ओत-प्रोत होती हैं। अपनी जाति के अतिरिक्त, यह बतखों की 140 लगभग जातियों में से किसी से भी संबंध नहीं बनाती हैं।
बोनिला नर पक्षी को आजीवन मादा का बनकर रहना पड़ता है। भोजन जुटाने का काम मादा करती है, इसके बदले बच्चों के लालन-पालन का भार उसे ही वहन करना पड़ता है। हिपोकेम्पस, पाइपफिश और फोटोकोरिनस मछलियाँ इतनी दबंग होती हैं कि जिस नर को वशवर्ती बना लेती हैं, उससे दास जैसा व्यवहार करती हैं।
योरोप में गोहों की कुछ जातियाँ हैं, जो जीवन में एक ही बार हमसफर चुनती हैं। विधवा या विधुरगोह, दूसरे गोह को देखकर उस पर आक्रमण कर बैठती है। प्यार कभी दुबारा नहीं करती। कबूतर कट्टर पतिव्रती एवं पत्नीव्रती होते हैं। कुछ मछलियाँ प्रेम-प्रसंग के बाद ही विवाह करती हैं। ऐसी मछलियाँ झीलों या शांतगति वाली नदियों में ही पाई जाती हैं। ये मछलियाँ सदैव एकनिष्ठ होती हैं।
अल्बर्ट श्वाइत्जर जहाँ रहते थे, उनके समीप ही बंदरों का एक दल रहता था। दल के एक बंदर और बंदरिया में गहरी मित्रता हो गई। दोनों जहाँ जाते साथ-साथ जाते, एक कुछ खाने को पाता तो यही प्रयत्न करता कि उसका अधिकांश उसका साथी खाए। कोई भी वस्तु उनमें से एक ने कभी भी अकेले न खाई। उनकी इस प्रेम-भावना ने अल्बर्ट श्वाइत्जर को बहुत प्रभावित किया, वे प्रायः प्रतिदिन इन मित्रों की प्रणय-लीला देखने जाते और एकांत स्थान में बैठकर घंटों उनके दृश्य देखा करते। कैसे भी संकट में उनमें से एक ने भी स्वार्थ का परिचय न दिया। अपने मित्र के लिए वे प्राणोत्सर्ग तक के लिए तैयार रहते, ऐसी थी उनकी अविचल प्रेमनिष्ठा।
विधि की विडंबना— बंदरिया कुछ दिन पीछे बीमार पड़ी, बंदर ने उसकी दिन-दिन भर भूखे-प्यासे रहकर सेवा-सुश्रूषा की; पर बंदरिया बच न सकी, मर गई। बंदर के जीवन में मानो व्रजाघात हो गया। वह गुमसुम जीवन बिताने लगा।
बंदर एक स्थान पर बैठा रहता। अपने कबीले या दूसरे कबीले का कोई अनाथ बंदर मिल जाता तो वह उसे प्यार करता खाना खिलाता, भटक गए बच्चे को ठीक उसकी माँ तक पहुँचाकर आता, लड़ने वाले बंदरों को अलग-अलग कर देता। इसमें तो कई बार अतिउग्र पक्ष को मार भी देता था, पर तब तक चैन न लेता जब तक उनमें मेल-जोल नहीं करा देता। उसने कितने ही वृद्ध, अपाहिज बंदरों को पाला, कितनों का ही बोझ उठाया। बंदर की इस निष्ठा ने ही अल्बर्ट श्वाइत्जर को एकांतवादी जीवन से हटाकर सेवा-भावी जीवन बिताने के लिए अफ्रीका जाने की प्रेरणा दी। श्वाइत्जर बंदर की इस आत्मनिष्ठा को जीवन भर नहीं भूले।
“डिक-डिक” जाति का हिरन एक पत्नीव्रती होता है। वह सदैव जोड़े में रहता है। अपने जीवनकाल में वह कभी किसी अन्य हिरणी के साथ सहवास नहीं करता। शेर और हाथी के बारे में भी ऐसी ही बातें होती हैं। जोड़ा बनाने से पूर्व तो वह पूर्ण सतर्कता बरतते हैं, किंतु एक बार जोड़ा बना लेने के बाद वे तब तक इस मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते, जब तक कि नर या मादा में से किसी एक की मृत्यु न हो जाए। मृत्यु के बाद भी कई ऐसे होते हैं, जो पुनर्विवाह की अपेक्षा विधुर जीवन व्यतीत करते हैं, उस स्थिति में उनकी संवेदना नष्ट हो जाती है और वे प्रायः बहुत अधिक खूँखार हो जाते हैं। उस स्थिति में भी वे जब कभी अपनी मादा की याद में आँसू टपकाते दिखते हैं तो करुणा उभरे बिना नहीं रहती। तब पता चलता है कि जीवन का आनंद भावनाओं में है, पदार्थ में नहीं।
चिंपाजियों की भी पारिवारिक और दांपत्यनिष्ठा मनुष्य के लिए एक उदाहरण है। यह अपना निवास पेड़ों पर बनाते हैं, जोड़ा बनाने के बाद चिंपाजी अपने दांपत्य जीवन को निष्ठापूर्वक निबाहते हैं और किसी अन्य मादा या नर की ओर वे कभी भी आकृष्ट नहीं होते। नर अपने समस्त परिवार की रक्षा करता है। जब वे वृक्ष पर बने विश्रामगृह में आराम करते हैं तो वह नीचे बैठकर उनकी पहरेदारी करता है, कर्त्तव्य भावना से ओत-प्रोत चिंपाजी की तेजस्विता देखते ही बनती है।
बाघ बड़ा उत्पाती जीव है, भूख लगने पर प्राकृतिक प्रेरणा से उसे आक्रमण भी करना पड़ता है किंतु उस जैसा एकनिष्ठ पतिव्रत और पत्नीव्रत देखते ही बनता है।
कबूतर के बारे में यजुर्वेद तक का उद्धरण देते हुए बताया है— “मित्रवरुणाभ्यां कपोतान्” मित्रता, प्रेम और दांपत्यनिष्ठा हममें कपोतों जैसी हो। सारस भी ऐसा ही पक्षी है, जोड़े में कोई एक बिछुड़ जाए तो दूसरा बहुत दुःखी हो जाता है। पंडुक नर मर जाता है तो उसकी मादा उसके शव में शरीर कूट-कूटकर विलाप करती है। उसका वह आर्तनाद देखकर मनुष्य के भी आँसू आ जाते हैं और ऐसा लगता है कि मनुष्य में भी ऐसी निष्ठा होती तो उसका जीवन कितना सुखमय होता।
रोज की तरह आज भी हजरत इब्राहिम अपने तंबू के दरवाजे पर बैठे हुए थे कि उधर से कोई राहगीर गुजरे तो बुलाकर उसका आतिथ्य करें। इतने में उन्होंने देखा कि जिंदगी और सफर से थका-झुका सौ बरस का एक बूढ़ा राहगीर लठिया टेकता हुआ उन्हीं की ओर चला आ रहा है। इब्राहिम ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया, उसके पाँव धोए और उसे बैठाकर खाना परोसा। लेकिन उन्होंने देखा कि बूढ़े ने न तो प्रार्थना की, न ईश्वर को धन्यवाद दिया, बल्कि एकदम खाने पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया। उन्होंने बूढ़े से पूछा— “बाबा तुम ईश्वर की इबादत नहीं करते?” बूढ़े ने उत्तर दिया— “मैं तो अग्नि की पूजा करता हूँ और दूसरे किसी ईश्वर को नहीं मानता।”
यह सुनना था कि हजरत इब्राहिम आग बबूला हो गए और उन्होंने बूढ़े को उसी क्षण धक्का देकर तंबू से निकाल दिया। यह भी न सोचा कि रात गहरी हो चुकी है और चारों तरफ बियाबान रेगिस्तान है। बूढ़े के चले जाने के बाद ईश्वर ने इब्राहिम को पुकारा और उनसे पूछा कि बूढ़ा अजनबी कहाँ गया? इब्राहिम ने उत्तर दिया— “भगवन! मैंने तो उसे निकाल दिया, क्योंकि वह तुम्हारी इबादत नहीं करता।
ईश्वर इस पर बोला— “इब्राहिम! वह हमेशा मेरी तौहीन करता है, फिर भी सौ साल से मैं उसे सहता चला आया हूँ। क्या तुम एक रात के लिए भी उसे नहीं सह सकते थे! तुम तो अपना कर्त्तव्य जानते थे।”
मनुष्य आत्मा है। आत्मा न स्त्री है, न पुरुष। वह इच्छा और अभ्यास के अनुरूप अपने कलेवर बदलता रहता है। अभ्यास से अपनी काया सुहाने लगती है, इसलिए स्त्रियाँ प्रायः अगले जन्म में भी स्त्रियाँ होती हैं और पुरुष— पुरुष।
पर यह अनिवार्य नियम नहीं है। यदि कोई अपनी स्थिति से असंतुष्ट हो और दूसरे पक्ष की काया में सुविधा समझता है या उसके प्रति अधिक अनुरक्त रहता हो तो भावना के अनुरूप उसका यौन परिवर्तन भी हो सकता है। ऐसा परिवर्तन प्रायः अगले जन्म में होता है; पर यदि मन डावाँडोल रहे तो फिर परिवर्तन भी अधूरा रह जाता है और अगले जन्म में ऐसी स्थिति बनती है, जिसे मध्यवर्ती या उभयलिंगी कहा जा सके।
इनमें से कुछ जनखे हिजड़े स्तर के होते हैं; पर कुछ की दोनों प्रकार की जननेंद्रियाँ होती हैं और वे दोनों पक्षों की क्रियाएँ संपन्न करते रह सकते हैं।
कइयों को इस स्थिति में लज्जा अनुभव होती है और वे एक पक्ष में रहना चाहते हैं। इसका सीधा तरीका यह है कि इस जन्म में अपने प्रियपक्ष का अधिक चिंतन करें, उसकी उपयोगिता स्वीकारें और रुझान उसी पक्ष में रखें अगला जन्म आने पर वह अधूरी स्थिति पूर्ण हो जाएगी और इच्छित कलेवर मिल जाएगा।
पर कई तत्काल की इच्छा उत्सुकता व्यक्त करते हैं और यौन परिवर्तन का ऑपरेशन करा लेते हैं। दोनों में से जो लिंग स्पष्ट या समर्थ हो उसे रहने देते हैं और दूसरे को हटा देते हैं। पहले यह विषय गोपनीय माना जाता था; पर अब वैसा प्रचलन नहीं रहा, अस्तु लोग अपनी स्थिति स्पष्ट करने में झिझकते नहीं। कितने ही व्यक्ति जैसी भी कुछ अपनी स्थिति है, उसे बनाए रहते हैं और प्रकृति का चमत्कार बताकर अपने को आकर्षण का केंद्र बनाए रहते हैं। ऐसे दोनों पक्षों के चिह्न वाले अब बहुत दिखाई देने लगे हैं। पहले इस तथ्य को छिपाया जाता था। स्त्रियाँ दाढ़ी-मूँछ रोज बनाती थीं और अविवाहित जीवन व्यतीत करती थीं; पर अब वैसी जरूरत नहीं समझी जाती, इसलिए द्विलिंगी स्त्री-पुरुष अनेकों दिख पड़ते हैं।
यूनानी देवता हर्माफ्रोदित के बारे में मान्यता है कि एक परी उससे बहुत अधिक प्यार करती थी। वह उसके शरीर में समा गई और उसका आधा शरीर पुरुष का और आधा शरीर नारी का हो गया।
भारत में शिवजी को भी अर्धनारीनटेश्वर कहा जाता है। उनका आधा शरीर पुरुष का और आधा स्त्री का है।
उत्तरी कैरोलिना में जन्मी लेडी ओल्गा एक रूसी यहूदी की लकडी थी। जन्म से ही उसके चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ के बाल थे। बड़ी होने पर उसकी दाढ़ी 35 इंच की हो गई जो उसके पेट को ढक लेती थी। उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें भी थीं। 1932 में उसमें एक अद्भुत फिल्म अभिनेत्री की तरह काम किया। इसके धनी होने के कारण एक पुरुष ने उससे विवाह भी कर लिया था; पर वह अधिक समय जीवित न रहा।
डालकास्का-मिशिगन में सुनहरी दाढ़ी-मूँछों वाली ग्रेस गोलवर्ट सन् 1880 में पैदा हुई। इसकी दाढ़ी 6 इंच लंबी थी। इसी क्षेत्र में एक महिला स्टेला ग्रेगर भी दाढ़ी-मूँछों वाली थी। उसने नर्स का काम किया। सेना में भर्ती हुई और अध्यापिका भी बनी।
नीदरलैण्ड की शाशिका मारग्रेटे के भी दाढ़ी-मूँछ थी। स्वीडन की एक ऐसी ही महिला चार्ल्स सप्तम के जमाने में सेना में थी। स्विट्जरलैण्ड की जोडफिन के चेहरे पर 5 इंच की दाढ़ी थी। उसने कई देशों में अपनी इस प्रकृतिजन्य विशेषता का प्रदर्शन किया और धन कमाया।
बर्जीनिया की एनीजीन्स 1965 में जन्मी थी। विवाह उसने भी कर लिया था। शरीर से बहुत हृष्ट-पुष्ट थी और तगड़े पुरुष जैसी लगती थी।
इसी प्रकार योरोप, अमेरिका के कई देशों में लंबी दाढ़ी-मूँछों वाली महिलाएँ प्रख्यात हो चुकी हैं। इनमें उनकी गिनती नहीं है जो दिन निकलने से पूर्व अपनी हजामत बनाकर नारी जैसी लगने लगती थीं।
जार्ज डब्ल्यू लुई के सरकस में एक द्विलिंगी नारी विली क्रिस्टीना थी। उसकी एक ओर की छाती उठी हुई दूसरी और की सपाट थी। उसकी दाढ़ी-मूँछ भी निकलती थी; पर वह रोजाना शेव करके अपना स्त्रीप्रधान रूप बनाए रहती थी। उसके शरीर में नर और नारी की जननेंद्रियाँ थीं। पर्दे के पीछे जाकर 50 सेन्ट देने वाला व्यक्ति उसे नंगी करके देख सकता था। जो अतिरिक्त 50 सेन्ट दे वह उसकी इंद्रियों को छू भी सकता था।
हैरी लोस्टन के सरकस में काम करने वाली मोना हैरिस यों स्त्री के रूप में प्रख्यात थी; पर उनकी नारी जननेंद्रिय के ऊपर 5 इंच का मर्दाना शिश्न भी था।
ब्लैकपोल ब्रिटेन में जन्मी मोण्डू भी आधी नारी और आधा नर थी। उसकी दोनों ही जननेंद्रियाँ सक्रिय थीं।
अब तक जितने यौन परिवर्तन ऑपरेशन हुए हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे थे जो नारी से नर बनने जा रहे थे। प्रकृति का नियम है कि जो पक्ष सताया जाता है, असंतुष्ट या दुःखी रहता है, उसको मिटा या घटा देती है। पिछली जनगणनाएँ बताती हैं कि पुरुष बढ़ रहे हैं और स्त्रियाँ घट रही हैं। परिणाम यह होगा कि अगणित पुरुषों को अविवाहित रहना पड़ेगा। स्त्रियों की प्रवृत्ति पुरुष की दासता से मुक्ति पाने की ओर बढ़ रही है। नारीमुक्ति आंदोलन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
चीन के निंगयो स्थान में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, उसमें केवल वे स्त्रियाँ जाती हैं जो अगले जन्म में पुरुष बनना चाहती हैं। इस मंदिर में महिलाओं की सबसे अधिक भीड़ रहती है।
हवा का रुख बताता है कि लालच या उत्पीड़न के बंधनों में बाँधकर नारी को जिस प्रकार सताया और गिराया जा रहा है, उसकी प्रतिक्रिया होकर रहेगी। नारी दुर्लभ होती जाएगी। उसके अभाव में लोग उसे देखने तक के लिए विवश होंगे।
अंबपाली वैशाली की अनुपम रूपवती नगर वधू थी। उसके पास धन-दौलत का अंबार था। प्रशंसकों और सहयोगियों की कमी न थी।
उन्हीं दिनों भगवान का धर्मचक्र-प्रवर्तन अभियान चल रहा था। सहस्रों नर-नारी, घर-गृहस्थी का मोह छोड़कर बौद्ध बिहारों में शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करके देश-देशांतरों में धर्मप्रचार के लिए निकल जाते। अपने प्रयास से वातावरण को बदलने में सफल होते।
उस तूफानी प्रवाह से अंबपाली भी अप्रभावित न रह सकी। उसने जीवन के महत्त्व और साथ ही उसके वर्तमान दुरुपयोग को समझने का प्रयत्न किया तो आत्मा से यही आवाज आई कि भगवान की दी हुई रूप और कंठ की विभूति को अपने तथा दूसरों के पतन हेतु नियोजित नहीं किया जाना चाहिए।
वह आत्मा की पुकार को अधिक दिन दबाए न रह सकी। बुद्ध की शरण में गई और अपनी वृत्ति छोड़कर लोक-कल्याण के लिए निकल पड़ी। सारा संचित धन उसने प्रायश्चित स्वरूप बुद्ध बिहार को दान में दे दिया और भिक्षुणी बन गई।
तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्नावली के प्रताड़ना भरे उपदेश सुनकर ही श्रेयमार्गगामी बने और अमर हो गए।
प्रकृति के नियमों में एक रहस्य बड़ा ही विचित्र, अद्भुत एवं रहस्यपूर्ण है। वह यह है कि हर एक विपत्ति के बाद उसकी विरोधी सुविधा प्राप्त होती है। जब मनुष्य बीमारी से उठता है तो बड़े जोरों की भूख लगती है, निरोगिता शक्ति बड़ी तीव्रता से जागृत होती है और जितनी थकान बीमारी के दिनों आई थी वह तेजी के साथ पूरी हो जाती है। ग्रीष्म की जलन को चुनौती देती हुई वर्षा की मेघमालाएँ आती हैं और धरती को शीतल, शांतिमय हरियाली से ढक देती हैं। हाथ-पैरों को अकड़ा देने वाली ठंड जब उग्ररूप से अपना जौहर दिखा चुकती है तो उसकी प्रतिक्रिया से एक ऐसा मौसम आता है, जिसके द्वारा यह शीत सर्वथा नष्ट हो जाती है। रात्रि के बाद दिन का आना सुनिश्चित है, अंधकार के बाद प्रकाश का दर्शन भी अवश्य ही होता है। मृत्यु के बाद जन्म भी होता ही है। रोग, घाटा, शोक आदि विपत्तियाँ चिरस्थाई नहीं हैं, वे आँधी की तरह आती हैं और तूफान की तरह चली जाती हैं। उनके चले जाने के पश्चात एक दैवी प्रतिक्रिया होती है, जिसके द्वारा उस क्षति की पूर्ति के लिए ऐसा विचित्र मार्ग निकल आता है, जिसे बड़ी तेजी से उस क्षति की किसी न किसी प्रकार पूर्ति हो जाती है, जो आपत्ति के कारण हुई थी।
एक बार नष्ट हुई वस्तु फिर ज्यों की त्यों उसी रूप में नहीं आ सकती यह सत्य है; परंतु यह भी सत्य है कि मनुष्य को सुसंपन्न, सुखी बनाने वाले और भी कितने ही साधन हैं और उन नए साधनों में से कई एक उस क्षतिग्रस्त व्यक्ति को प्राप्त होते हैं, हो सकते हैं। जब घास को हम बार-बार हरी होते हुए देखते हैं, जब अंधकार को हम बार-बार नष्ट होते देखते हैं, जब रोगियों को पुनः आरोग्य लाभ करते देखते हैं, तो कोई कारण नहीं कि विपत्ति के बाद पुनः संपत्ति प्राप्त होने की आशा न की जाए। जो उज्ज्वल भविष्य की आशा नहीं करता, जिसे यह विश्वास नहीं कि मुझे पुनः अच्छी स्थिति प्राप्त होगी, वह नास्तिक है। जिसे ईश्वर की दयालुता पर विश्वास न होगा वह ऐसा सोच सकता है, कि मेरा भविष्य सदा के लिए अंधकार में पड़ गया। जो पर्वत को राई कर सकता है, उसकी शक्ति पर यह भी भरोसा करना चाहिए कि वह राई को पर्वत भी कर सकता है। जो आज रो रहा है, उसे यह न सोचना चाहिए कि उसे सदा ही रोता रहना पड़ेगा। निराशा परमात्मा के परम प्रिय पुत्र को किसी प्रकार शोभा नहीं देती।
जब किसी की एक टांग टूट जाती है, उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि एक टांग से चलना तो दूर खड़ा रहना भी मुश्किल है। अब उससे किसी प्रकार चला-फिरा न जा सकेगा; पर जब अधीरता छोड़कर विवेक से काम लिया जाता है तो काम चलाऊ तरकीब निकल आती है। लकड़ी का पैर लगाकर वह आदमी अपना काम करने लगता है। इसी प्रकार अन्य कोई अंग भंग हो जाने पर भी उसकी क्षतिपूर्ति किसी अन्य प्रकार हो जाती है और फिर कुछ दिन बाद उस अभाव का खटकना बंद हो जाता है।
“मैं पहले इतनी अच्छी दशा में था, अब इतनी खराब दशा में आ गया” यह सोचकर रोते रहना और अपने चित्त को क्लेशांवित बनाए रहना कोई लाभदायक तरीका नहीं। इससे लाभ कुछ नहीं होता, हानि अधिक होती है। दुर्भाग्य का रोना-रोने से, अपने भाग्य को कोसने से मन में एक प्रकार की आत्महीनता का भाव उत्पन्न होता है। मेरे ऊपर ईश्वर का कोप है, देवता रुठ गए हैं, भाग्य फूट गया है, इस प्रकार का भाव मन में आने से मस्तिष्क की शिराएँ शिथिल हो जाती हैं। शरीर की नाड़ियाँ ढीली पड़ जाती हैं, आशा और प्रसन्नता की कमी के कारण नेत्रों की चमक मंद पड़ जाती है। निराश व्यक्ति चाहे किसी भी आयु का क्यों न हो उसमें बूढ़ों के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, मुँह लटक जाता है, चेहरे पर रूखापन और उदासी छाई रहती है, निराशा और नीरसता उसकी हर एक चेष्टा से टपकती है। इससे आदमी अपने शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य को खो बैठते हैं। मंदाग्नि, दस्त साफ न होना, दाँत का दर्द, मुँह के छाले या सोते समय मुँह से लार बहना, सिर दर्द, जुकाम, बाल पकना, नींद कम आना, डरावने स्वप्न दिखना, पेशाब में पीलापन व गदलापन, मुँह या बगलों से अधिक बदबू आना, हाथ पैरों में हड़फूटन, दृष्टि कम होना, कान में सनसन होना जैसे रोगों के उपद्रव आए दिन खड़े रहते हैं। निराशा के कारण शरीर की अग्नि मंद हो जाती है, अग्नि की मंदता से उपरोक्त प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते हैं। शनै-शनै स्वास्थ्य को घुलाता हुआ वह व्यक्ति अल्पायु में ही मृत्यु के मुख में चला जाता है।
जो व्यक्ति अपने आप को दुर्भाग्यग्रस्त मान लेते हैं, उनमें मानसिक शिथिलता भी आ जाती है। कपाल की भूरी मज्जा कुंहला जाती है। उसमें से चिकनाई कम हो जाती है, विचारशक्तियों का संचालन करने वाले नाड़ी तंतु कठोर और शुष्क हो जाते हैं, उनमें से जो विद्युत-धारा बहा करती है, उसका प्रवाह नाममात्र का रह जाता है, स्फुरण, कंपन, संकुचन, प्रसारण, सरीखी वे क्रियाएँ जिनके द्वारा मानसिक शक्तियों में स्थिरता एवं वृद्धि होती है, बहुत ही धीमी पड़ जाती है। फल यह होता है कि अच्छा भला मस्तिष्क कुछ ही दिन में अपना काम छोड़ बैठता है, उसकी क्रियाशक्ति लुप्त हो जाती है।
कहते हैं कि विपत्ति अकेली नहीं आती। वह अपने साथ और भी अनेक विपत्तियों का जंजाल लाती है। एक के बाद दूसरी आपत्ति सिर पर चढ़ती है। यह बात असत्य नहीं है। निस्संदेह एक कष्ट के बाद दूसरे कष्टों का भी सामना करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि विपत्ति के कारण मनुष्य निराश, दुःखी और शिथिल हो जाता है। भूतकाल का स्मरण करने, रोने-धोने और भविष्य का अंधकारमय कल्पना-चित्र तैयार करने में ही उसका मस्तिष्क लगा रहता है। समय और शक्ति का अधिकांश भाग इसी कार्य में नष्ट होता रहता है, जिससे पुनः सुस्थिति प्राप्त करने की दिशा में सोचने और साहसपूर्ण मजबूत कदम उठाने की व्यवस्था नहीं बनती। उधर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य चौपट होने लगता है, एक ओर स्वभाव के बिगड़ जाने के कारण विरोधी बढ़ जाते हैं और मित्रों की कमी हो जाती है। सब ओर असावधानी पर असावधानी होने लगती है। दुष्टता की सत्ता का ऐसे ही अवसरों पर दाव लगता है, मौका देखकर उनके वाण भी चलने लगते हैं। निर्बल एवं अव्यवस्थित मनःस्थिति का होना मानों विपत्तियों को खुला निमंत्रण देना है। मरे हुए पशु की लाश पड़ी देखकर दूर आकाश में उड़ते हुए चील, कौवे उसके ऊपर टूट पड़ते हैं, इसी प्रकार निराशा से शिथिल और चतुर्मुखी अव्यवस्था से ग्रस्त उस अर्धमृत मनुष्य पर आपत्ति और कष्टों के चील-कौए टूट पड़ते हैं और इस उक्ति को चरितार्थ करते हैं कि विपत्ति अकेली नहीं आती।
आकस्मिक विपत्ति का सिर पर आ पड़ना मनुष्य के लिए सचमुच बड़ा दुखदाई है। इसमें उसकी बड़ी हानि होती है; किंतु उस विपत्ति की हानि से अनेकों गुनी हानि करने वाला एक और कारण है, और वह है “विपत्ति की घबराहट”। विपत्ति कही जाने वाली घटना चाहे वह कैसी ही बड़ी क्यों न हो किसी का अत्यधिक अनिष्ट नहीं कर सकती। वह अधिक समय ठहरती भी नहीं, एक प्रहार करके चली जाती है; परंतु “विपत्ति की घबराहट” ऐसी दुष्टा पिशाचिनी है कि वह जिसके पीछे पड़ती है, उसके गले से खून की प्यासी जोंक की तरह चिपक जाती है और जब तक उस मनुष्य को पूर्णतया निःसत्व नहीं कर देती तब तक उसका पीछा नहीं छोड़ती। विपत्ति के पश्चात् आने वाले अनेकानेक जंजाल इस घबराहट के कारण ही आते हैं। शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुस्थिति का सत्यानाश करके वह मनुष्य की जीवनशक्ति को चूस जाती है।
आकस्मिक विपत्तियों से मनुष्य नहीं बच सकता। राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र, नल, पांडव, प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह जैसी आत्माओं को विपत्ति ने नहीं छोड़ा तो अन्य कोई उसकी चपेटों से बच जाएगा, ऐसी आशा न करनी चाहिए। इस सृष्टि का विधि-विधान कुछ ऐसा ही है कि हानि-लाभ का चक्र हर एक के ऊपर चलता रहता है।
मनुष्य भूलवश अपनी वस्तुओं को खोता-गँवाता तो रहता ही है; पर कई बार ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं, जिनमें गायब हुई वस्तु के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह रास्ते में कहीं छूट गई होगी या किसी ने चुरा लिया होगा।
भारी चीजें धीरे-धीरे गुम हों तो यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि किसी ने उन्हें काट-पीटकर कहीं से कहीं पहुँचाया होगा; पर उसमें भी समय तो लगेगा ही और जहाँ ले जाई गई है, वहाँ तक कोई पदचिह्न-सुराग तो मिलेगा ही; पर जब ऐसा कुछ नहीं होता और भारी चीजें यकायक लुप्त हो जाती हैं तो उनका बुद्धिसंगत समाधान नहीं सूझता और उसके पीछे कोई देव-दानव काम करता प्रतीत होता है। ऐसी आश्चर्यजनक घटनाएँ भूतकाल में भी होती रही हैं और कभी-कभी अभी भी घटित होती हैं।
बरमूडा त्रिकोण के संबंध में प्रसिद्ध है कि उस क्षेत्र में से गुजरने वाले अनेकों जलयान एवं वायुयान खो चुके हैं। साधारण खोजबीन से पता न चला तो वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष संबंधी रहस्यों को आधार बनाया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इस क्षेत्र में किसी छोटे ‘ब्लैक होल’ का प्रभाव होना चाहिए। बड़ा ब्लैक होल तो समूची पृथ्वी को भी निगल सकता है। मृत तारों का प्रेत ब्लैक होल बन जाता है, उसके मुँह में जो भी समाता है उसे निगल लेता है। उसका अंत कहाँ है? इसके बारे में अभी कोई निर्णय नहीं हो सका; किंतु छुट-पुट स्थानों से जब बड़ी वस्तुओं के गायब होने के समाचार मिलते हैं तो ब्लैक होल की करतूत उसे नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसका मुँह चौड़ा होता है और एक दायरे की समूची वस्तुओं को प्रचंड चक्रवात की तरह उड़ा ले जाता है; पर कम वस्तुओं की, कम घेर की वस्तुओं के संबंध में वैसा अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
सेन्ट न्याटस के गैरिज से 16 फुट लंबा एक केबिन जहाज गुम हो गया। उसे कौन ले गया, कहाँ ले गया, कैसे ले गया? इसकी मुद्दतों तलाशी होती रही पर कुछ पता न चला।
एक जलयान गुम होने की ऐसी ही घटना इसी प्रकार की और घटी। एक 16 हजार टन का जहाज 211 यात्रियों को लेकर रवाना हुआ। लाइफ वोट आदि का पूरा सुरक्षा सामान साथ था, सूचना देने के रेडियो-यंत्र भी; पर वह बिना कोई सूचना दिए, बिना एक आदमी के जीवित बचे अचानक गायब हो गया। संभावित क्षेत्र की गहराई में उसके मलबे की तलाश की गई पर इस घटना का कोई सूत्र हाथ न लगा।
इसके कुछ ही समय पश्चात सन् 1872 की घटना है। यह जहाज मिसीसिपी बंदरगाह से रवाना हुआ था। इस व्यापारी जहाज में कपास लदा था और 88 यात्री भी सवार थे। कुछ दूर चलने के बाद वह भी यकायक गुम हो गया। अग्निकांड जैसी दुर्घटना का भी कोई चिह्न कहीं नहीं था। एक शताब्दी तक सब स्तर की खोज चलती रही बाद में निराश होकर उसकी खोज फाइल बंद करनी पड़ी।
अबरैल नदी में एक 35 फुट लंबा जलयान एक नाविक ने खाली बहता हुआ देखा। वह अपनी डोंगी लेकर उस तक पहुँचा और चढ़ने पर देखा कि उसमें न तो कोई सामान है और न व्यक्ति। वह उसे किसी प्रकार घसीटता हुआ निकटवर्ती नगर तक लाया और पुलिस को सौंप दिया। पुलिस ने सभी साधनों से संसार भर के सभी देशों को इस संबंध में सूचना दी; पर उसके मालिक का कोई पता न चलने पर उस पकड़ने वाले नाविक की सुपुर्दगी में तब तक के लिए छोड़ दिया जब तक असली मालिक का पता न चले। फिर पता चला ही नहीं।
सन् 1945 में पाँच बमवर्षक-प्रशिक्षण की उड़ानों पर उड़ रहे थे। अचानक कंट्रोल रुम से उन सभी का संबंध टूट गया और वे कहाँ गए इसका किसी भी प्रकार पता नहीं चला। हवाई जहाजों के एक बड़े-बेड़े ने भी उनका समूचा मार्ग छान मारा; पर कहीं कोई पता नहीं चला।
ऐसी ही एक विचित्र घटना आक्सफोर्ड शायन की है। उस क्षेत्र में जमीन के नीचे एक बड़ी नाली बनाई जा रही थी। इस निमित्त एक खास जगह के लिए 6 टन भारी पत्थर की आवश्यकता हुई और उसे काट-छाँटकर काम योग्य बनाया गया। कई दिनों ढूँढ़ने और जासूस छोड़ने के उपरांत भी जब कुछ पता न लगा तो उसे ढूँढ़ने के लिए 5 हजार का सरकारी इनाम घोषित किया गया, फिर भी उसकी कोई जानकारी न मिल सकी। गुम सो गुम।
18 वीं सदी की सबसे बड़ी चोरी वह है, जिसमें स्पेनिश युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों की एक पूरी कंपनी ही गायब हो गई। उसमें चार हजार सैनिक थे। रात को अच्छे-भले सोए; पर सवेरे उनका कोई अता-पता न लगा। न भागने का कोई चिह्न था, न शत्रुपक्ष से मिलने का। शत्रुपक्ष से संपर्क मिलाया तो उसने भी इस सेना के संबंध में कोई जानकारी न होने का उत्तर दिया। सेना का कैंप पियरेनीस के बाद दूसरे दिन मार्चकिन में पड़ाव डाले थे। सैनिकों के घरों पर इन्क्वायरी की गई तो इस कंपनी का एक भी आदमी अपने घर-परिवार में नहीं लौटा था।
इस प्रकार की छूट-पुट घटनाएँ तो होती रहती हैं; पर उन्हें मनुष्यकृत चोरी-छिपे की घटना माना जाता है, पर ऐसी घटनाएँ जिसमें जमीन में समा जाने या आकाश में उड़ जाने भर की कल्पना की जा सके, कदाचित ही कभी-कभी घटित होती है।
उड़न तश्तरियों के संबंध में कभी-कभी अवश्य सुना जाता है कि वे जीवित मनुष्यों या बहुमूल्य उपकरणों को अंतरिक्ष में पृथ्वी संबंधी जानकारियाँ अधिक विस्तारपूर्वक जानने के लिए उड़ा ले जाती हैं। कहा जाता है कि विकसित सभ्यता वाले किसी अन्य लोकवासी पृथ्वी के संबंध में विशेष दिलचस्पी रखते हैं। वे पहले भी यहाँ आते रहे हैं और अपने आगमन के प्रमाण छोड़ते रहे हैं। इस आधार पर कल्पना की जाती है कि उपरोक्त घटनाओं में उसका हाथ रहा हो। ऐसा है कि अंतरिक्ष में पड़ने वाले वायुमंडलीय या विद्युत चुंबकीय भँवरों की कोई लहर इस तरह अपनी चपेट में लेकर उसका अस्तित्व विलुप्त कर देती हो।
पर यह सभी कल्पनाएँ हैं। मानवी सूझ-बूझ और खोजबीन की भी एक छोटी सीमा है और उससे बाहर भी बहुत कुछ होता रहता है, अभी तो इतना ही कहा जा सकता है।
भगवान बुद्ध काशी के एक संपन्न किसान के पास गए। उससे भिक्षा माँगी। किसान ने भिक्षापात्र लिए भिक्षु प्रवर की ओर देखा और व्यंग-भाव से कहा, “मैं परिश्रम से खेत जोतता-बोता हूँ, तब तो फसल उपलब्ध होती है उसी से उदरपूर्ति करता हूँ, किंतु आप बिना खेती किए भोजन पाना चाहते हैं।”
“मैं भी तो किसान हूँ। खेती करता हूँ।" बुद्ध ने प्रशांत स्वर में उत्तर दिया।
“खेती”! किसान ने काषाय वस्त्रधारी भिक्षु की ओर अचरज से देखा। “हाँ, वत्स!" तथागत ने कहा— “मैं आत्मा की खेती करता हूँ। ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूँ। तपस्या के जल से सींचता हूँ। विनय मेरे हल की हरिस, विचारशीलता फल और मन नरैली है। सतत प्रयास का यान मुझे उस गंतव्य की ओर ले जा रहा है जहाँ न दुख है, न संताप। मेरी इस खेती से अमरता की फसल लहलहाती है, वत्स !”
मनुष्य का चिरंतन अस्तित्त्व आत्मा के रूप में ही रहता है। राजपुत्र गौतम को उसी प्रेरणा ने भगवान बुद्ध बना दिया था। यह पथ प्रत्येक आत्मदर्शी के लिए खुला है।
शांति की खोज में भटकता, भौतिकवादी मानव को कहीं शांति नहीं मिलती। पाश्चात्य भौतिकवादी राष्ट्र ने, भौतिक आवश्यकताओं से ऊबा अपने को संगीत में पिरो देने का एक नया नुस्खा खोज निकाला है।
पाश्चात्य राष्ट्रों में पियानो के प्रति आकर्षण पैदा करने में जापान की “यामाहा” कंपनी की भूमिका प्रमुख है। इसने 4 वर्ष के बच्चों को संगीत की शिक्षा के लिए पियानो वादन का कार्यक्रम शुरू किया था जो आज इंग्लैण्ड, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि विकसित राष्ट्रों के प्रौढ़ों तक के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। आज विश्व भर में 10 हजार से भी ज्यादा यामाहा स्कूल हैं, जहाँ बच्चों के स्कूल जाने के पूर्व संगीत का प्रशिक्षण दिया जाता है।
पाश्चात्य राष्ट्रों में पियानो के प्रति बढ़ता आकर्षण निम्न आँकड़ों से स्पष्ट हो जाता है। इटली के एक पियानो विक्रेता ने 1977 ई. में 2,300 पियानो जापान से आयात किए थे, जबकि 1980 में 5,500 तथा 1981 में अमेरिका एवं पश्चिमी राष्ट्रों में इतने अधिक पियानो बिके जितने कि 128 वर्ष के इतिहास में एक नया रिकार्ड बन गया। यह तो मात्र 'स्टाइनवे एण्ड सन्स' कंपनी की बिक्री थी। अन्य कंपनियों की बिक्री का हिसाब इससे बाहर है।
अभी तक पश्चिमी योरोप में संगीत के कार्यक्रम मात्र वसंत ऋतु में ही आयोजित किए जाते थे; किंतु अब यह कार्यक्रम बारह महीने चलते रहते हैं। 1982 ई. में सिर्फ फ्रांस में ही 250 संगीत समारोहों का आयोजन हुआ, जो हफ्तों चला करते थे। इसी प्रकार 82 ई. में ही स्विट्जरलैण्ड में लगभग 65000 लोग मोन्ने अंतर्राष्ट्रीय जैज समारोह में 1000 जैज वादकों को श्रवण करने हेतु इकट्ठा हुए थे। इस समय पश्चिमी योरोप में कोई भी संगीत कार्यक्रम आशा से ज्यादा आर्थिक लाभ का सिद्ध हो रहा है।
पश्चिमी देशों में संगीत के प्रति बढ़ता आकर्षण इस बात से भी सिद्ध हो जाता है कि कोई भी संगीत वादक अपना खुद का बनाया संगीत बजाना एवं गाना ज्यादा पसंद करता है। 1982 ई. गिटार वादन का एक धारावाहिक पाठ्यक्रम मिलान समाचारपत्र वालों ने प्रकाशित करना प्रारंभ किया, जिसकी 2,50,000 प्रतियाँ प्रथम संस्करण की बिक गईं। बाध्य होकर इससे बड़ी संख्या में दूसरा संस्करण उन्हें छपवाना पड़ा था।
गत 10 वर्षों में ब्रिटेन में भी संगीत के प्रति आशातीत आकर्षण पैदा हुआ है। इस समय यहाँ पर संगीत केंद्रों की संख्या हजारों में है। जहाँ से 1981 ई. में म्यूजिक से संबंधित बोर्ड परीक्षा में 3,50,000 के करीब परीक्षार्थी बैठे थे। इसी प्रकार फ्रांस में 5000 के लगभग संगीत विद्यालय हैं। पश्चिमी जर्मनी में 375 संगीत विद्यालयों में 24000 संगीत शिक्षक तथा 6,50,000 विद्यार्थी हैं तथा 50,000 से ज्यादा संगीत शिक्षा प्रेमी स्कूलों की तलाश में हैं।
“युवाओं द्वारा संगीत सृजन” कार्यक्रम के अंतर्गत पश्चिमी जर्मनी में प्रति वर्ष 10,000 छात्र-छात्राओं को प्रादेशिक परीक्षा में भाग लेने दिया जाता है; अंततः 100 युवा विजेताओं को राष्ट्रीय युवा वाद्य संघ में वादन के लिए चुना जाता है, जो देश-विदेश में अपना कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
पाश्चात्य राष्ट्रों में संगीत के प्रति बढ़ रहे आकर्षण को ध्यान में रखते हुए जापान ने एक कंप्यूटर-प्रणाली विकसित की है, जिसमें अशिक्षित भी संगीत की रचना कर सकेंगे। एक नमूना ‘वीएल-टोन’ नाम से निकाला गया है जो 1981 में ही 40 लाख से ज्यादा की संख्या में बिक चुका है।
संगीत से रोने वाले को हँसाया जा सकता है तथा हँसने वालों को करुणाकर रोते भी संगीत के प्रभाव से देखा गया है। संगीत की इस अनुपम क्षमता का वैज्ञानिकों ने वनस्पति-जगत पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन किया है। सोवियत विशेषज्ञों ने इस विषय पर काफी शोधकार्य किया है। अपने शोध में इन वैज्ञानिकों ने गेहूँ पर कर्णातीत ध्वनी का प्रयोग किया। इस ध्वनि का प्रयोग 10 मिनट तक कई दिनों तक गेहूँ के खेतों में किया तो पाया गया— इस ध्वनि के प्रभाव से गेहूँ में पालारोधक क्षमता पैदा हो जाती है। साथ ही उसी खाद-पानी एवं सुरक्षा के उपायों के समान रहने पर संगीत के प्रभाव वाले गेहूँ की पैदावार भी बढ़ी हुई पाई गई है।
कोलाहल और समस्याओं से घनीभूत संसार में यदि परमात्मा का कोई उत्तम वरदान मनुष्य को मिला है तो वह संगीत ही है। संगीत से पीड़ित हृदय को शांति और संतोष मिलता है। संगीत से मनुष्य सृजनशक्ति का विकास और आत्मिक प्रफुल्लता मिलती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, शादी-विवाहोत्सव से लेकर धार्मिक समारोह तक के लिए उपयुक्त संगीत-निधि देकर परमात्मा ने मनुष्य की पीड़ा को कम किया, मानवीय गुणों से प्रेम और प्रसन्नता को बढ़ाया।
अकबर की राज्य-सभा में संगीत प्रतियोगिता रखी गई। प्रमुख प्रतिद्वंदी थे— तानसेन और बैजूबावरा। यह आयोजन आगरे के पास वन में किया गया। तानसेन ने ‘टोडी’ राग गाया और कहा जाता है कि उसकी स्वर लहरियाँ जैसे ही वनखंड में गूँजित हुई मृगों का एक झुंड वहाँ दौड़ता हुआ चला आया। भावविभोर तानसेन ने अपने गले में पड़ी माला एक हिरण के गले में डाल दी। इस क्रिया से संगीत-प्रवाह रुक गया और तभी सब के सब सम्मोहित हिरण जंगल में भाग गए।
टोड़ी राग गाकर तानसेन ने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत मनुष्यों को ही नहीं, प्राणिमात्र की आत्मिक प्यास है, उसे सभी लोग पसंद करते हैं। इसके बाद बैजूबावरा ने ‘मृग-रजनी टोड़ी’ राग का अलाप किया। तब केवल एक वह मृग दौड़ता हुआ राज्य-सभा में आ गया, जिसे तानसेन ने माला पहनाई थी। इस प्रयोग से बैजूबावरा ने यह सिद्ध कर दिया कि शब्द के सूक्ष्मतम कंपनों में कुछ ऐसी शक्ति और सम्मोहन भरा पड़ा है कि उससे किसी भी दिशा के कितनी ही दूरस्थ किसी भी प्राणी तक अपना संदेश भेजा जा सकता है।
इसी बैजूबावरा ने अपने गुरु हरिदास की आज्ञा से चंदेरी गुना (मध्यप्रदेश) जिले में स्थित निवासी नरवर के कछवाह राजा राजसिंह को ‘रागपुरिया’ सुनाया था और उन्हें अनिद्रा रोग से बचाया था। दीपक राग का उपयोग बुझे हुए दीपक जला देने, ‘श्री राग’ का क्षय रोग-निवारण में, ‘भैरवी राग’ प्रजा की सुख-शांतिवर्द्धन में, ‘शकरा राग’ द्वारा युद्ध के लिए प्रस्थान करने वाले सैनिकों में अजस्र शौर्य भर देने में आदिकाल से उपयोग होता रहा है। वर्षा ऋतु में गाँव-गाँव मेघ व मल्हार राग गाया जाता था, उससे दुष्ट से दुष्ट लोगों में भी प्रेम, उल्लास और आनंद का झरना प्रवाहित होने लगता था। स्वर और लय की गति में बँधे भारतीय जीवन की सौमनस्यता जो तब थी, अब वह कल्पनामात्र रह गई है। सस्ते सिनेमा संगीत ने उन महान शास्त्रीय उपलब्धियों को एक तरह से नष्ट करके रख दिया है।
ब्रिटिश सर्जन चीफ डॉन मैककैनसी का कथन है कि विगत युद्धों में परोक्ष रूप से ध्वनि के भाव से जितने व्यक्ति मरे हैं, उतने बम की मार से नहीं। वैज्ञानिक भविष्य में ध्वनि को युद्धों में मारक अस्त्र की भाँति प्रयुक्त करने का विचार कर रहे हैं। केवल धीमी आवाज एक नियत फ्रीक्वेंसी में धीरे-धीरे फेंककर किस प्रकार एक समूह विशेष में मानसिक तनाव फैलाया जा सकता है, इसका उदाहरण पिछले दिनों कनाडा पर रशिया द्वारा किए गए “ध्वनि आक्रमण” के रूप में देखा गया। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि कोलाहल रूप में ध्वनि पागलपन व मनोविकारों को बढ़ाती एवं मधुर समवेत स्वर-प्रवाह के रूप में संचरित होने पर रोग-निवारण करती है, मनःशक्तियों को बढ़ाती है। संगीत एवं सामूहिक गान को अब विदेशों में चिकित्सा के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा है।
दिल के दौरे का सबसे बढ़िया व सशक्त साधन योगाभ्यास है। यह कथन है जे.जे. अस्पताल समूह के एसोसियेटेड, प्रोफेसर डॉ. अशोक तिलपुले का। हृदय रोग पर योगाभ्यास के लंबे अध्ययन के उपरांत डॉ. अशोक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं।
अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने देखा कि जिन रोगियों ने लगातार पाँच वर्ष तक योगाभ्यास किया, उनमें से मात्र सात प्रतिशत को ही इस दौरान दूसरा दौरा पड़ा, जबकि प्रायः 20 से 30 प्रतिशत रोगियों में दूसरा दौरा पड़ता देखा जाता है।
बंबई में आयोजित एक संगोष्ठी में उन्होंने उपरोक्त जानकारी दी। साथ ही यह भी बताया कि योगाभ्यास को शारीरिक व्यायाम नहीं मानना चाहिए, न ही उसे अन्यमनस्कतापूर्वक जैसे-तैसे मात्र रुटिन पूरा करने की तरह करना चाहिए; वरन उल्लासपूर्वक तद्नुरूप विचारणा— भावना के साथ किया जाना चाहिए, तभी उसका अधिकतम लाभ भी मिल सकेगा।
योग के माध्यम से कोई भी रोगी अपने शरीर का निरीक्षण-पर्यवेक्षण करना सीखकर, शरीरगत कमियों व बीमारियों का पता लगा सकता है तथा अपनी प्राणशक्ति के द्वारा उन्हें ठीक भी कर सकता है।
वैज्ञानिक योगक्रिया का अब फिजियोलॉजिकल, न्यूरो फिजियोलॉजिकल तथा साइकोलॉजिकल धरातल पर अध्ययन कर रहे हैं, जो कि रोगी के स्पाइनल कॉर्ड की क्षति से बहुत गहन रूप से संबद्ध है। यौगिक क्रिया से इस प्रकार की क्षति ठीक हो जाती है तथा मांसपेशियों को भी आराम मिलता है।
इससे चयापचय दर भी ठीक रहती है तथा प्राण ऊर्जा का संरक्षण भी होता रहता है, जिससे शरीर की सारी क्रियाएँ भली प्रकार व सामंजस्यपूर्ण रीति से होती रहती हैं।
इस सिलसिले में मुद्रा और प्राणायाम भी काफी सहायक सिद्ध होते हैं। कषाय-कल्मषों को हटाकर प्रसुप्त केंद्रों को जागृत करने में उसकी उल्लेखनीय भूमिका रहती है।
इनके द्वारा कम खर्च पर विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ दूर की जा सकती हैं। इन्हीं में से एक है स्पाइनल कॉर्ड संबंधी शिकायत। इनके नियमित अभ्यास से इसमें काफी आराम मिलता है। पाराण्लेजिक्स रोगी भी इससे लाभ उठा सकते हैं। पाराण्लेजिया रोग में क्रियाओं का मुख्य उद्देश्य होता है— अवरुद्ध अंतःस्रावी ग्रंथियों को उचित परिमाण में रक्त की आपूर्ति करना, ताकि वे सामान्य ढंग से क्रियाशील रह सकें और स्पाइनल कॉर्ड को ठीक कर सकें।
खेलों एवं फिजियोथेरेपी का तो अपना महत्त्व है ही; किंतु ये योग-क्रियाओं का स्थानापन्न कदापि नहीं बन सकते। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के अनुसार योग-साधनाओं का शरीर, मन और आत्मा तीनों पर प्रभाव पड़ता है, जबकि व्यायाम और खेलों के प्रभाव मात्र शरीरगत होते हैं।
हमारे ग्रंथि तंत्र ही जीवनीशक्ति के संप्रेषक हैं। स्पाइनल कालम द्वारा यह संप्रेषण कार्यरूप में परिणत होता है। यौगिक क्रियाओं से जीवनीशक्ति की मात्रा और स्तर हमारे शरीर में शनै-शनै बढ़ती जाती है। जब इनके द्वारा रक्तसंचरण की क्रिया सही हो जाती है तो इससे ग्रंथियों की अक्षमता भी दूर हो जाती है और स्वास्थ्य में सुधार होने लगता है।
सुषुम्ना संबंधी रोग एवं हृदय के दौरे पड़ने की तरह ही एक दूसरी व्यथा है— रक्तचाप का बढ़ना-घटना। रक्त की गति स्वाभाविक न रहकर जब अतितीव्र या अतिमंद हो जाती है तब उसे हाई ब्लडप्रेशर या लो ब्लडप्रेशर कहते हैं। दोनों ही स्थितियों में रोगी की बेचैनी बढ़ जाती है। हाई ब्लडप्रेशर में वह उत्तेजित होता है तो लो ब्लडप्रेशर में बेहद थका हुआ, अशक्त लुँज-पुँज हो जाता है। बेचैनी दोनों ही स्थितियों में रहती है और गहरी नींद नहीं आती, पाचन भी गड़बड़ा जाता है।
चिकित्सा उपचार तो अनेकों चिकित्सा-प्रणालियों में अनेक प्रकार के हैं; पर आत्मिक उपचारों में सफलता है— करवट बदल लेना। इसी को स्वर परिवर्तन भी कहते हैं।
दाहिना स्वर चलने पर शरीर में गर्मी बढ़ जाती है और बायाँ चलने पर शीतलता की मात्रा अधिक रहती है। यह स्वर बदलना अपने हाथ की बात है। कुछ देर बाँए करवट सोते रहने पर दाहिना स्वर चलने लगेगा। इसी प्रकार दाहिने करवट से सोने पर बाँया चल पड़ेगा। स्वर परिवर्तन के साथ ही सर्दी-गर्मी की घट-बढ़ होने लगती है।
हाई ब्लडप्रेशर में गर्मी और लो में शीतलता का अनुपात अधिक हो जाता है। इसे संतुलित बनाने के लिए करवट बदलकर लेटे रहने और शरीर को तनावरहित शिथिल बना लेने की प्रक्रिया ऐसी है, जिसमें लाभ तुरंत होता है और किसी भी चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इसमें कोई खतरा नहीं है।
यों आसन और प्राणायाम की अपनी चिकित्सापद्धति है। उसके माध्यम से शारीरिक और मानसिक रोगों से भी छुटकारा पाया जा सकता है। उनकी अधिक जानकारी कभी शान्तिकुञ्ज हरिद्वार आकर प्राप्त की जा सकती है।
साधारणतया दोनों प्रकार के ब्लडप्रेशर में वृषभासन-शिथिलासन से अधिक लाभ होते देख गया है। इसी प्रकार सर्वांगासन सभी प्रकार की मेरुदंड संबंधी, अंतःस्रावी ग्रंथियों संबंधी विकृतियों के लिए उत्तम है। यदि उचित मार्गदर्शन में यह सब कुछ करना, भले ही अल्पावधि के लिए ही सही, संभव हो सके तो बीमारी से मुक्ति संभव है। यहाँ फिर यह ध्यान रखना चाहिए कि यह स्थूलउपचार वाला, व्यायामपरक 'योगा' भर है, वह ध्यानयोग नहीं जो अध्यात्म पथ पर व्यक्ति को आगे बढ़ाता है।
बिहार के वैशाली नगर के निकटवर्ती एक गाँव में जन्मे वर्धमान विवेक और दूरदृष्टि अपने साथ लेकर आए थे। सामान्य जन लोभ और मोह से आगे की बात सोच नहीं पाते। फलतः उन्हें समाज को ऊँचा उठाने जैसे सर्वोत्कृष्ट परामर्श के लिए न साहस होता है और न समय ही मिलता है; पर वर्धमान जल में कमल की तरह रहे। परिवार को भी उनने संभाला; पर सबसे अधिक ध्यान उस विराट का रखा, जिसे समाज कहते हैं। उनकी जीवनचर्या भगवान बुद्ध से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। दोनों के समय में भी थोड़ा-सा ही अंतर है।
वर्धमान जब तपस्वी बनकर लोक-मंगल के लिए निकले तब वे महाबली महावीर हो गए। वे उलटे प्रवाह को उलटने में बहुत हद तक अपने ही पराक्रम से सफल हुए। अगणित प्रतिभाएँ उनके सहयोगी बने और तत्कालीन प्रचलनों में क्रांति उत्पन्न हो गई।
लोग भगवान के पीछे लाठी लेकर पड़े थे। उनने कहा— “कर्म ही ईश्वर है।” निरर्थक भ्रमजाल में फँसकर भक्ति का ढकोसला पीटने से कोई लाभ नहीं। उनने अहिंसा को, प्रेम को, सृजन को परमार्थ बताया है। अहिंसा धर्म का तात्पर्य उनने यही बताया कि सबके कल्याण के लिए रचनात्मक काम किया जाए। उनकी अहिंसामात्र निषेधात्मक नहीं, वरन सृजनात्मक थी।
पुराणों में सृष्टि के आरंभ का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ। कमलपुष्प पर ब्रह्मा विराजे। विधाता ने आकाशवाणी के माध्यम से ब्रह्मा से कहा— "आपको सृष्टि-संरचना के लिए उत्पन्न किया गया है। उसकी क्षमता उत्पन्न करने के लिए तप कीजिए।" तप से शक्ति उपलब्ध होती है और उसी विशिष्टता के आधार पर महत्त्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं। ब्रह्माजी ने तप का आधार व स्वरूप पूछा तो आकाशवाणी ने कहा— “गायत्री मंत्र की सम्यक उपासना ही तप है।" पीछे उन्हें गायत्री मंत्र बताया गया, जिसकी वे उपासना करने लगे। इस आधार पर उनकी चेतना जगी और सृष्टि-निर्माण का ताना-बाना बुन लिया गया। उसकी सुव्यवस्थित योजना बना ली गई।
किंतु उस समय महाप्रलय का जल ही जल सर्वत्र भरा पड़ा था, कोई पदार्थ नहीं था। अब सृष्टि बने तो किस आधार पर बने? इसके लिए पदार्थ की आवश्यकता पड़ी। उसे जुटाने के लिए उन्हें दुबारा तप करना पड़ा। इस बार उन्हें सावित्री का आश्रय लेना पड़ा। सावित्री प्रकट हुईं और उसका उनने उपयोग करके सृष्टि की संरचना कर डाली।
इस कथानक के अनुसार गायत्री और सावित्री दो का सहयोग ब्रह्मा जी को लेना पड़ा, इसलिए यह दोनों ही उनकी सहायिकाएँ, सहभागिनी पत्नियाँ कहलाईं। गायत्री अर्थात आत्मिकी। सावित्री अर्थात भौतिकी। भौतिकी का मूलभूत आधार पंचतत्त्व है। तत्त्व जड़ है, इसलिए प्रकृति को जड़ कहा जाता है। जड़ प्रकृति से समस्त ब्रह्मांड भरा पड़ा है। उसमें अनेकों ग्रहपिंड और छुट्टल पदार्थ प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं; पर उनमें चेतना न होने से मात्र क्रिया भर होती है। उनके परमाणु और पिंड अपनी धुरी एवं कक्षा में भ्रमण करते हैं। कणों के साथ-साथ पिंड की मूलभूत संरचना में प्रतिकण भी विद्यमान है। छाया की तरह प्रतिच्छाया जुड़ी होने की तरह यह क्रिया का व्यापार सब ओर चल रहा है। यह प्रक्रिया भी किन्हीं नियमों के अंतर्गत व्यवस्थित रूप से इकॉलाजी विज्ञान के अनुशासनों के अंतर्गत चलती है। पृथ्वी पर बिखरा हुआ पदार्थ भी इसका अपवाद नहीं है; पर जड़ सृष्टि अपर्याप्त है। उसका न कोई उद्देश्य है, न प्रयास, न प्रतिफल, न आनंद। इसका समावेश हुए बिना जड़ पदार्थ दृश्यमान, गतिशील होते हुए भी निरर्थक ही बना रहा। इस अभाव की पूर्ति के लिए ब्रह्माजी को आत्मिकी का, चेतना का और गायत्री का उपयोग करना पड़ा। इसी आधार पर प्राणी बने। इस प्रसंग का माहात्म्य शास्त्रों में बड़े विशद रूप में प्रकट हुआ है।
परब्रह्मस्वरूपा च निर्वाण पददायिनी।
ब्रह्मतेजोमयी शक्तिस्तदधिष्ठातृ देवता॥
— देवी भागवत स्कन्घ 9 अ. 1/42
गायत्री मोक्ष देने वाली परमात्मा स्वरूप और ब्रह्मतेज से युक्त शक्ति है और मंत्रों की अधिष्ठात्री है।
गायत्री वा इदं सर्वम्।
— नृसिंहपूर्वतापनीयोप 4/3
यह समस्त जो कुछ है, गायत्री स्वरूप है।
गायत्री परमात्मा।
— गायत्री तत्त्वे.
गायत्री ही परमात्मा है।
ब्रह्म गायत्रीति— ब्रह्म वै गायत्री।
—शतपथ ब्राह्मण 8।5।3।7— ऐतरेय ब्रा. अ. 17 ख. 5
ब्रह्म गायत्री है, गायत्री ही ब्रह्म है।
परमात्मनस्तु या लोके ब्रह्म शक्तिर्विराजते।
सूक्ष्मा च सात्विकी चैव गायत्रीत्यभिधीयते॥ 9 ॥
— गायत्री संहिता
संसार में परमात्मा की जो सूक्ष्म और सात्विक ब्रह्मशक्ति विद्यमान है, वही गायत्री कही जाती है।
प्रभावादेव गायत्र्या भूतानामभिजायते।
अन्तःकरणेषु दैवानां तत्त्वानां हि समुद्भवः॥ 10 ॥
— गायत्री संहिता
प्राणियों के अंतःकरण में दैवी तत्त्वों का प्रादुर्भाव गायत्री के प्रभाव से ही होता है।
प्राणियों के, सभी जीवधारियों के शरीर तो पदार्थ विनिर्मित थे; पर इसके अंतर्गत चेतना का समावेश एक विलक्षणता थी। चेतना न होने पर प्राणी अपने शरीरों का उपयोग किस प्रकार, किस निमित्त कर पाते। संसार में बिखरे हुए साधनों का किस प्रकार उपयोग कर पाते? इस उपयोग के बिना उन्हें संतोष, उत्कर्ष और आनंद की प्राप्ति कैसे होती? यह काम चेतना का है। प्राणियों के शरीर पंचतत्त्वों से बने हैं और उनके भीतर काम करने वाली चेतना गायत्री है। इस चेतना को प्राण कहा गया है। प्राण रहने तक ही प्राणी जीवित रहते है। इनके निकल जाने पर शरीर मृतक बन जाता है। अपनी सत्ता नष्ट करने के लिए अपने भीतर से ही सड़न के कृमि-कीटक उत्पन्न हो जाते हैं और वे उसका सफाया करके स्वयं भी समाप्त हो जाते हैं। अन्यथा चील, कौए, सियार, कुत्ते आदि उसे खाकर समाप्त कर देते हैं। जल में डाल देने पर मछलियाँ, कछुए आदि उसे खा जाते हैं। इस प्रकार चेतना के बिना शरीर का स्वस्थ— सक्रिय रहना तो दूर, वह अपनी सत्ता को बनाए रहने में भी समर्थ नहीं होता, इसलिए सावित्री से गायत्री का महत्त्व अधिक माना जा सकता है; किंतु यह मान्यता भी अपूर्ण है, क्योंकि चेतना की चिंतनात्मक क्षमता आधारहीन होने पर अपने पराक्रम का, अस्तित्व का परिचय नहीं दे सकती। इस तर्क के अनुसार सावित्री की भी समान महत्ता स्वीकार करनी पड़ती है।
जहाँ तक चेतन जगत का संबंध है, वहाँ आत्मिकी और भौतिकी की सम्मिश्रित प्रक्रिया ही काम करती दिखती है और दोनों एकदूसरे पर निर्भर प्रतीत होती हैं। दो पत्नियाँ होने पर वे मिल-जुलकर सृष्टि की समग्र गृह व्यवस्था चलाती हैं। इसी प्रकार चेतन जगत का समस्त क्रियाकलाप सावित्री और गायत्री के भौतिकी और आत्मिकी के संयुक्त प्रयास से ही चलना प्रत्यक्ष है।
गायत्री पंचप्राणों से विनिर्मित है। प्राणों की गणना पाँच में होती है। उपप्राण भी पाँच ही हैं, इसलिए उसे प्राणविद्या कहा गया है। शास्त्रकारों ने गायत्री का स्वरूप निर्धारित करते समय उसे प्राणचेतना या प्राणविद्या कहा है। इस संबध में शास्त्रमतों को देखा जा सकता है।
पाँच कोशों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए “सर्वसारोपनिषद” में कहा गया है—
अन्नकार्याणां कोशानां समूहोऽन्नमयः कोश इत्युच्यते । प्राणादि चतुर्दश वायुभेदा अन्नमयकोशे यदा वर्तन्ते तदा प्राणमयः कोश इत्युच्यते। एतत्कोशद्वयसंसक्तं मन आदि चतुर्दशकरणैरात्मा शब्दादि विषय संकल्पादिन्धर्मान् यदा करोति तदा मनोमयः कोश इत्युच्यते। एतत्कोशत्रयसंसक्तं तद्गत विशेषज्ञो यदा भासते तदा विज्ञानमयः कोश इत्युच्यते। एतत्कोशचतुष्ट्यसंसक्तं स्वाकारणाज्ञाने वटकणिकायामिव वृक्षो यदा वर्तते तदा आनन्दमयकोश इत्युच्यते।। 5।।
— सर्वसारोपनिषद्
अर्थात— अन्न से अन्न के स्वरूप एवं शक्तिसत्ता से प्रत्यक्षतः विनिर्मित कोशों को अन्नमयकोश कहते हैं। इस अन्नमयकोश में संचरित प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान इन पंचप्राणों, पंच उपप्राणों आदि प्राणवायु के सभी शरीरस्थ रूपों का समुच्चय प्राणमयकोश है। मन समेत समस्त इंद्रियों द्वारा किए जाने और किए जा सकने वाले सूक्ष्म कार्यक्षेत्र का नाम मनोमय कोश है। इन तीनों कोशों के संयुक्त स्वरूप से आत्मा, बुद्धि द्वारा जो कुछ ज्ञानात्मक क्रिया-व्यापार करती है, उसे विज्ञानमयकोश कहते हैं। इन चारों कोशों से संसक्त आत्मा जब अपने कारणरूप के प्रति अनभिज्ञ रहती है और स्वतः में ही रमती रहती है, जैसे वटबीज में वृक्ष रहता है, तब उसे आनंदमयकोश कहते हैं।
पाँच प्राणों को ही पाँच देव बताया गया है।
पंचदेव मयं जीवः, पंच प्राणमयं शिवः।
कुण्डली शक्ति संयुक्तं, शुभ्र विद्युल्लतोपमम्॥
— तंत्रार्णव
यह जीव पाँच देवसहित है। प्राणवान होने पर शिव है। यह परिकर कुंडलिनी शक्ति युक्त है। इनका आकार चमकती बिजली के समान है।
कुंडलिनी जागरण का परिचय पंचकोशों की जागृति के रूप में मिलता है।
कुण्डलिनी शक्तिराविर्भवति साधके।
तदा स पंचकोशे मत्तेजोऽनुभवति ध्रुवम्॥
— महायोग विज्ञान
जब कुंडलिनी जागृत होती है। तो साधक के पाँचों कोश ज्योतिर्मय हो उठते हैं।
ब्रह्मविद्या समर्थित पंचकोशों के जागरण से उत्पन्न ब्राह्मीशक्ति की पराशक्ति के रूप में अभ्यर्थना की गई है। देवी भागवत में कहा गया है—
पंचप्राणाधिदेवी या पंचप्राणस्वरूपिणी।
प्राणाधिकप्रियतमा सर्वाभ्यः सुन्दरी परा।। 44 ।।
— देवी भागवत
पाँच प्राण उसी पंचकोश-संपदा के पाँच स्वरूप हैं। प्राणों की अधिष्ठात्री देवी वे ही हैं। सर्वांग सुंदरी है, पराशक्ति है। भगवान को प्राणों से प्यारी है।
वस्तुतः गायत्री प्राणिसत्ता में समाई हुई है, इसलिए उसे वह अपने सदृश ही मानता है। मनुष्य की उपासना में वह मानुषी है और उसकी आकृति वैसी ही है। दो हाथ दो पैर ज्ञानेंद्रियाँ-कर्मेंद्रियाँ भी उतनी हैं। किसी और प्राणी की यदि मनुष्य जैसी बुद्धिमता होती तो वह अपनी जैसी आकृति, वैसा ही चेतना के स्वरूप को समझ पाता। बैल का भगवान बैल जैसा और पक्षी का भगवान पक्षी जैसा होता।
चर्चा प्रतीक के प्रसंग में चल रही है। गायत्री महाविज्ञान का ऊहा-पोह करते समय उपासना विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए ध्यान की अनिवार्य आवश्यकता प्रतीत होती है। एकाग्रता और श्रद्धा के आधार पर ही ध्यान बन पड़ता है, इसलिए उस हेतु कोई न कोई नामरूप वाली प्रतिमा बुद्धि कल्पित करती है। कल्पना बेपर की उड़ान भर ही हो तो बात दूसरी है, अन्यथा यह ध्यान के अनुरूप ही साधक की आकृति बना लेती है। ध्यान, श्रद्धा एवं विश्वास के संयोग से ठीक उसी प्रकार फलित होने लगता है, जैसी कि उस पर आस्था जमाई गई थी। इसी दृष्टि से गायत्री की प्रतिमा ठीक मानुषी जैसी गढ़ी गई है। उसके साथ दो उपकरण जोड़े गए हैं। एक जल भरा कमंडलु, दूसरे हाथ में पुस्तक। पुस्तक विवेक का प्रतिनिधित्त्व करती है और जल भावना का। विवेक और भावना का समन्वय ही मानवी गरिमा के अनुरूप आस्था एवं आकांक्षा उत्पन्न करता है।
गायत्री का वाहन राजहंस है। यह हंस भी साधक की अंतःचेतना के स्तर की ओर ही इंगित करता है। सामान्य जलाशयों में रहने वाला हंस नामक पक्षी नही। हंस और राजहंस में मौलिक अंतर है। राजहंस नीर-क्षीर-विवेक से संपन्न है। दूध और पानी मिला होने पर उसमें से दूध पीता है और पानी को छाँट देता है। इसी प्रकार वह मोती चुगता है, न मिलने पर प्राण त्याग देता है। यह विशेषताएँ साधारण हंसों में नहीं होती। वे जलाशयों में पाएँ जाने वाले कीड़े-मकोड़े खाते हैं। दूध उन बेचारों को कहाँ मिलता है? इसी प्रकार वे मोती पाने की स्थिति में भी नहीं होते। मोती बहुत गहरे पानी में मिलते हैं। उतनी डुबकी साधारण हंस नहीं लगा सकते। राजहंस नाम का कोई पक्षी भी नहीं होता। यह एक अलंकारिक कल्पना है, जिसका तात्पर्य आदर्शवादिता से है। जो आत्मिकी का, चेतना का असाधारण अनुदान प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें अपना जीवन सर्वथा श्वेत, उज्ज्वल रखना चाहिए। कषायों की, विकारों की कलौंच तनिक भी नहीं रहने देनी चाहिए; किंतु साधारण हंसों में तो चोंच के इर्द-गिर्द तथा पंखों के नीचे कालापन भी होता है, इसलिए यह अलंकारिक निरूपण ही समझा जा सकता है।
सावित्री की, भौतिकी की सूक्ष्म विशिष्टता अपने शरीर में जिन्हें जागृत करनी होती है उन्हें अध्यात्म की भाषा में उसी के साथ तद्रूप होना पड़ता है। ध्यान की तन्मयता स्तर तक विकसित करनी होती है। इसके लिए भी अलंकारित चित्रण किया गया है। सावित्री पंचमुखी है, उसकी दश भुजाएँ हैं। कमलासन पर विराजमान है। आयुधों और आभूषणों से सुसज्जित है।
पंचमुख अर्थात प्रकृति के पाँच तत्त्व और चेतना के पाँच प्राण। दश भुजाएँ अर्थात पाँच ज्ञानेंद्रियाँ का समुच्चय। आभूषण-आयुध का अर्थ सुविधासंपन्न करने वाले साधन और कठिनाइयों को निरस्त करने वाले उपकरण। भौतिकी के क्षेत्र में प्रगति करने वालों के लिए यह सारा सरंजाम जुटाना आवश्यक है।
सावित्री का वाहन-आसन कमलपुष्प है। इसके कई तात्पर्य हैं। हृदय को कमल कहा गया है। हृदय संवेदना, सहानुभूति, सहयोग जैसी प्रवृत्तियों का उद्गम माना गया है। उसे मात्र रक्त समेटने-फेंकने की थैली तो शरीरशास्त्री ही मानते हैं। आत्मिकी के तत्त्ववेत्ताओं ने शरीर अवयवों के साथ प्रवृत्तियों को भी जोड़ा है। मस्तिष्क के मध्य में रहने वाला सहस्रारकमल भी पुष्प की उपमा में प्रयुक्त होता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मस्तिष्क की बुद्धि तीक्ष्ण और हृदय का स्वभाव संवेदना-सहकारिता का, संतुलन का माध्यम होना चाहिए। इस प्रकार गायत्री और सावित्री की प्रतिमाओं का पृथक्करण होता है। इस संदर्भ में शास्त्रकारों का अभिमत स्पष्ट है।
सविता सर्वभूतानां सर्वभावाश्च सूयत।
सर्वनात्प्रेरणाच्चैव सविता तेन चोत्यते॥
— गायत्री तन्त्र
अर्थात— समस्त तत्त्वों, सभी प्राणियों और समस्त भावनाओं की प्रेरणा देने के कारण ही उस शक्ति को सविता कहा गया है। प्रतीक रूप में सविता देवता की उपासना की जाने का विधान है।
गायत्री को सद्भावनाओं का और सावित्री को सत्प्रवृत्तियों का माध्यम मानना चाहिए। सद्भावनाओं के सहारे मनुष्य आत्मिक-क्षेत्र में ऊँचा उठता है। महामानव, ऋषि, देवता बनता है। उसकी प्रज्ञा, श्रद्धा, निष्ठा बलवती होती है। दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाता है और पवित्र जीवनवाला बनता है। निजी कठिनाइयों से जूझता और उन्हें परास्त करता है। ऐसी सूझ-बूझ दिशाधारा और रीति-नीति अपनाता है, जिससे आत्मिक कल्याण हो सके और दूसरों को भी उपयुक्त प्रकाश मिल सके।
सावित्री भौतिक-क्षेत्र में प्रगति और समृद्धि को कहते हैं। इस प्रकार की सफलताओं को अध्यात्म की भाषा में सिद्धियाँ कहा गया है। गायत्री द्वारा उपलब्ध उत्कृष्टताओं को ऋद्धियाँ कहते हैं।
भौतिक-क्षेत्र में भी वैसी ही दो आवश्यकताएँ पड़ती हैं जैसी आत्मिकी के क्षेत्र में। कठिनाई से जूझना और गुत्थियों को सुलझाना अपने-अपने ढंग से दोनों ही क्षेत्रों में अभीष्ट हैं। साधनों को जुटाना और उपयोगी सहयोग अर्जित करना दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से आवश्यक हैं। स्वरूप और तरीके दोनों क्षेत्रों के अलग-अलग अवश्य हैं।
संघर्ष के बिना कोई गति नहीं। आत्मिकी-क्षेत्र कुसंस्कारों, दुर्गुणों, पाप-कर्मों के अधोगामी प्रवाह को रोकना पड़ता है। संयमशील और तपस्वी बनकर आत्मशोधन करना होता है। इतना ही नहीं ऋद्धियों, विभूतियों को उपलब्ध करने के लिए व्यक्तित्व को अधिक पवित्र और प्रखर बनाना पड़ता है। इससे कम में कोई इन्हें पाने का अधिकारी बन नहीं सकता।
यही बात भौतिकी-क्षेत्र के संबंध में भी है। स्वभावगत आलस्य-प्रमाद को परास्त करके अपने को नियमित, व्यवस्थित, सक्रिय बनाना होता है और साथ ही बहिरंग क्षेत्र के ईर्ष्यालुओं, प्रतिद्वंद्वियों, दुष्टों, आक्रामक-आततायियों से अपनी आत्मरक्षा के लिए इतनी साहसिकता और सहकारिता अर्जित करनी पड़ती है कि उसे देखते हुए आक्रामक दुष्प्रवृत्तियों का साहस ही शिथिल हो जाए और यदि वे दुस्साहस करें तो उन्हें नीचा देखना पड़े। इस प्रकार की तैयारी रखने वाले ही भौतिक प्रगति के क्षेत्र में सफल होते हैं।
जिस प्रकार शरीर और प्राण, पुरुषार्थ और स्वस्थचित्त के समन्वय से ही कोई व्यक्ति आत्मिक विभूतियों का धनी बन सकता है, ठीक उसी प्रकार आंतरिक साहस और बाह्य पुरुषार्थ के बलबूते भौतिक-क्षेत्र की समृद्धि, संपत्ति, प्रतिभा, विजय जैसी सिद्धियाँ हस्तगत होती हैं। दोनों क्षेत्रों में दोनों ही प्रकार की विशेषताओं की आवश्यकताएँ पड़ती हैं, इसलिए दोनों को सर्वथा परस्पर संबद्ध माना जाता है। एक क्षेत्र की तैयारियाँ समग्र एवं स्थिर प्रगति का आधार नहीं बन सकतीं। सुपात्र साधक जब साधना की परिपक्वता पा लेते हैं तो उनमें दैवी चेतन शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। श्रुति कहती है—
प्रादुर्भवन्ति वै सूक्ष्माश्चतुर्विंशति शक्तयः।
अक्षरेभ्यस्तु गायत्र्या मानवानां हि मानसे॥ 66॥
— गायत्री संहिता
“मनुष्य के अंतःकरण में गायत्री के चौबीस अक्षरों से चौबीस सूक्ष्मशक्तियाँ प्रकट होती हैं।
जागृता ग्रन्थयस्त्वेताः सूक्ष्माः साधकमानसे।
दिव्यशक्तिसमुद्भूतिं क्षिप्रं कुर्वन्त्यसंशयम्॥ 26॥
— गायत्री संहिता
जागृत हुई ये सूक्ष्मयौगिक ग्रंथियाँ साधक के मन में निःसंदेह शीघ्र ही दिव्यशक्तियाे को पैदा कर देती हैं।
जनयन्ति कृते पुंसामेता वै दिव्यशक्तयः।
विविधान् वै परिणामान् भव्यान् मङ्गलपूरितान्॥ 27॥
— गायत्री संहिता
ये दिव्यशक्तियाँ मनुष्यों के लिए नाना प्रकार के मंगलमय परिणामों को उत्पन्न करती हैं। ये हैं— 1- प्रज्ञा 2- वैभव 3- सहयोग 4- प्रतिभा 5- ओजस् 6- तेजस् 7- वर्चस् 8- कांति 9- साहसिकता 10- दिव्यदृष्टि 11- पूर्वाभास 12- विचार-संचार 13- वरदान 14- शाप 15- शांति 16- प्राण प्रयोग 17- देहांतर संपर्क 18- प्राणाकर्षण 19- ऐश्वर्य 20- दूरश्रवण 21- दूरदर्शन 22- लोकांतर संपर्क 23- देव संपर्क 24- कीर्ति। इन्हीं को गायत्री की 24 सिद्धियाँ कहा जाता है।
गायत्री व सावित्री साधना के समन्वय के विषय में शास्त्रकारों का सत स्पष्ट है—
पृष्ठतोऽस्याः साधनाया राजतेऽतितरं सदा।
मनस्विसाधकानां हि बहूनां साधनाबलम्॥ 76॥
— गायत्री संहिता
इन साधनाओं के पीछे आदिकाल से लेकर अब तक असंख्य मनस्वी साधकों का साधन बल शोभित है।
इस समन्वय के पीछे भी दोनों का अपना महत्त्व है, अपना-अपना स्वरूप भी, इसलिए शास्त्रकारों ने जान-बूझकर या अनजाने दोनों का ही बहुत जगहों पर, एक ही स्तर पर वर्णन किया है और एक ही नाम से पुकारा है। एक ही प्रकार का प्रतिफल बताया है, जबकि दोनों की दिशाधाराएँ पृथक-पृथक हैं। त्रिवेणी में गंगा-यमुना का संगम होने से उनका एकीकरण हो जाने की बात भी सही है; पर यह भी गलत नहीं है कि दोनों का उद्गम और प्रवाह क्षेत्र अलग-अलग है। इनका समन्वय एकीकरण तो बहुत आगे चलकर होता है।
एकता के बीच भिन्नता का निरूपण करने के लिए गायत्री और सावित्री के दो रूप विनिर्मित किए गए हैं। गायत्री एकमुखी एवं द्विभुजी। सावित्री पंचमुखी एवं दस भुजी। दोनों के वाहन और अस्त्र-आयुध भी भिन्न-भिन्न हैं। हमें दोनों की एकता भी समझनी चाहिए और भिन्नता भी। आत्मिक-प्रगति के लिए गायत्री का आश्रय लिया जाता है और भौतिक समस्याओं के लिए सावित्री का अवलंबन ग्रहण करना होता है। इसी को कहते हैं द्वैत में अद्वैत की दृष्टि और अद्वैत में द्वैत का पर्यवेक्षण।
( क्रमशः )
शकडाल भाग्यवादी था। वह पुरुषार्थ की उपेक्षा करता और हर बात में भाग्य की दुहाई देता। जाति का वह कुंभकार था।
एक दिन वह अपनी बात की पुष्टि कराने भगवान महावीर के पास पहुँचा और अपनी मान्यताओं के समर्थन में उनका अभिमत प्राप्त करने का हठ करने लगा।
भगवान ने उससे उलटकर प्रश्न पूछा— "कोई तुम्हारे बनाए बर्तनों की तोड़-फोड़ करने लगे तो, कोई तुम्हारी पत्नी का शील भंग करने लगे तो, कोई तुम्हारे धन का अपहरण करने लगे तो?" शकडाल ने कहा—"देव! ऐसा अनाचार सहन नहीं हो सकेगा। मैं उसके साथ लड़ पडूँगा और अच्छी तरह खबर लूँगा।"
भगवान ने कहा— "तो फिर तुम्हारा भाग्यवाद कहाँ रहा? मान्यता तो तब सही होती जब सब कुछ होते देखकर भी चुप बैठे रहते। यहाँ तक कि बर्तन बनाने और रोग की चिकित्सा तक न करते।" शकडाल समझ गया कि भाग्यवाद का सिद्धांत निरर्थक है, पुरुषार्थ ही सब कुछ है। कर्म ही भाग्य बनाता है।
जिन्हें अनीति का लाभ लेते रहने की आदत पड़ गई है, उनसे यह आशा नहीं की जा सकती कि वे अपने सहज विवेक से न्याय का औचित्य समझेंगे और उसे स्वेच्छापूर्वक अपनाने के लिए सहमत होंगे।
परिवर्तन लाने के लिए पीड़ित पक्ष को अपनी दुर्दशा का इजहार करना होगा और यह भय छोड़ना होगा कि अत्याचारी कुछ अधिक क्रुद्ध होंगे और अधिक अत्याचार करेंगे। इस प्रकार सहते रहने और आँसू बहाते रहने से तो अनंतकाल तक वही स्थिति बनी रह सकती है।
भावनाशीलों का दायित्व है कि पीड़ितपक्ष के समर्थन में अनीतिकर्त्ताओं से जूझने के लिए संगठित हों और अपने साथ ऐसों को लें जिनमें शौर्य और साहस विद्यमान हैं। ऐसे गुट भले ही छोटे हों, पर उनकी संगठित शक्ति बड़ी कारगर होती है और जब वे तनकर खड़े हो जाते तो इतने भर से एक सीमा तक अनौचित्य से निपटने का माहौल बन जाता है।
कई बार पिछड़ापन लोगों के उस मनोबल का भी हरण कर लेता है जो अपने मानवीय अधिकारों के लिए विरोध कर, संघर्ष कर सकें। शारीरिक दृष्टि से सामान्य होते हुए भी मनोबल की दृष्टि से पिछड़े हुए लोग बीमारों, दुर्बलों, अपंगों, की तरह असमर्थ हो जाते हैं। अब अपने बलबूते न अपने ऊपर चल रहे शेष उत्पीड़न से निपट सकते हैं और न न्याय ही माँग या पा सकते हैं।
इस पीड़ित पक्ष को साहस, प्रोत्साहन और समर्थन देने की आवश्यकता है। इसके लिए ऐसा मध्यवर्ती समुदाय उभरना चाहिए, जो दूसरों पर होने वाले अत्याचारों को भी ऐसा ही अनुभव करे मानो वह विपत्ति उन्हीं पर टूट रही है।
समर्थ और संगठित उद्दंडों की हरकतें रोकने के लिए विरोध भरे आंदोलनों की आवश्यकता होती है।
जिस समुदाय में ऐसे आंदोलनकारी हों, समझना चाहिए कि वह वर्ग जीवित है। इस जीवन को भगवान का मूर्तिमान प्रकाश समझा जा सकता है। उसे समाज का आशाकेंद्र और मेरुदंड भी समझा जा सकता है। पीड़ितव र्ग को न्याय दिलाने में उसी की भूमिका सराही जा सकती है।
अनाचारी कायर होता है। वह तभी तक शेर रहता है जब तक उसके सामने विरोध नहीं आता। जब कभी उससे बड़ा मिल जाता है तो उसे बिल्ली की तरह पूँछ दबाकर भागते भी देखा जा सकता है।
न्याय के समर्थन में उठ जाने वालों को ही वस्तुतः न्यायमूर्ति कहा जाना चाहिए। वे आंदोलनकारी के रूप में अपने शौर्य-पराक्रम का परिचय देते हैं। हो सकता है कि उसमें उन्हें अनाचारियों के आक्रमण का सामना करना पड़े और उसमें जोखिम उठाने पड़े; पर इस प्रकार का मोर्चा बनाए बिना भी तो गति नहीं।
संत ही महान नहीं होते, सुधारक और शहीदों को भी महामानव ही गिना जाता है। आवश्यक नहीं कि धन कमाकर सदावर्त्त ही लुटाए जाए और कीर्तिस्तंभ ही खड़े किए जाएँ। यह भी एक बड़ा काम है कि जो वर्ग साहस के अभाव में अपनी विपत्तियों से आप नहीं जूझ सकता, उसे साथ लेकर न्याय की पुकार को बुलंद किया जाए।
अनीति के विरोध में कानून तो है; पर उससे भी लाभ उठाने की स्थिति जिनकी नहीं हैं उनका उद्धार कर सकना उन्हीं के लिए संभव है जो पीड़ितों का मनोबल बढ़ाते, समर्थन करते और सहयोग देते हैं। संसार के इतिहास में दासप्रथा, सामंतवाद जैसे अनेकों से छुटकारा वे ही दिला सके हैं जो उत्पीड़न के विरुद्ध डटकर लड़े हैं। भले ही जो स्वयं सताए न गए हों; पर जो उत्पीड़न के विरुद्ध बगावत का नियोजन करते हैं, उन्हें ही त्राता कहा जा सकता है। आज दाताओं से अधिक त्राताओं की आवश्यकता है।
(मंगल विजय)
(मंगल विजय)
‘आज’ का हम अभिनंदन करें।
विगत ‘कल’ का क्यों क्रंदन करें॥
आज में ही जीना है हमें, जहर-अमृत पीना है हमें।
विगत-आगत का बोझा लाद, व्यर्थ ही क्यों भारी मन करें ॥
दिखा तो स्वप्न ‘भूत’ की रात, कल्पना है ‘भविष्य’ की बात।
हाथ के खिले पुष्प क्यों छोड़, व्यर्थ कल्पित नंदन वन करें॥
करें यदि ‘वर्तमान’ को प्यार, ‘भूत’ के सुखद स्वप्न साकार।
व्यर्थ क्यों बुन भविष्य का जाल, शेखचिल्ली-सा जीवन करें॥
समस्याएँ अगणित हैं आज, ग्रसित है जिनसे मनुज समाज।
विगत-आगत की चिंता छोड़, आज का ही हम चिंतन करें॥
मिली हैं अमित शक्तियाँ हमें, लोक-मंगल विभूतियाँ हमें।
खपाकर उन्हें भोग में अरे! न पशुवत् हम पागलपन करें॥
‘भूत’ का मोह ‘भविष्य’ का लोभ, व्यक्तिगत स्वार्थ बनेगा क्षोभ।
साधना ‘वर्तमान’ की साध, धरा पर स्वर्ग अवतरण करें॥
सात्त्विक-साधन, लक्ष्य महान, किया करते देवी उत्थान।
आत्मसंतोष, लोक-सम्मान, दिव्य वरदान संवरण करें॥
— मंगल विजय
*समाप्त*