कलाकार के हाथ अनगढ़ वस्तुओं को पकड़ते हैं और अपने उपकरणों के सहारे उन्हें नयनाभिराम सुंदरता से भरते और बहुमूल्य बनाते हैं। कुम्हार मिट्टी से सुंदर खिलौने बनाता है। मूर्तिकार पत्थर के टुकड़े को देव प्रतिमा में परिणत करता है। गायक बाँस के टुकड़े से बंशी की ध्वनि निनादित करता है। धातु का टुकड़ा स्वर्णकार के हथौड़े की चोट खाकर आकर्षक आभूषण बनता है। कागज, रंग और कलम से बहुमूल्य चित्र बनाने का चित्रकार का कर्तृत्व कितना चमत्कार उत्पन्न करता है, इसे कोई भी देख सकता है।
जीवन एक अनगढ़ तत्त्व है। इसे दयनीय दुर्गति से ग्रसित स्थिति में ही अधिकांश व्यक्ति किसी प्रकार गुजारते हैं। उससे लाभ और आनंद उठाना तो दूर, उलटे भार की तरह ढोने में ही कमर टूटती और गरदन मुड़ती दिखाई देती है।
क्या वस्तुतः जीवन ऐसा ही है, जिसे रोते-खीजते किसी प्रकार पूरा किया जाना है? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि अनाड़ी हाथों में पड़कर हीरा भी उपेक्षित होता है तो बहुमूल्य मनुष्य जीवन भी क्यों न भार बनकर लदा रहेगा। किंतु यह भी स्पष्ट है कि यदि उसे कलाकार की प्रतिभा से संभाला, संजोया जाए तो निश्चय ही उसे देवोपम स्तर का— स्वर्गीय परिस्थितियों से भरा-पूरा जिया जा सकता है।
साधना जीवन जीने की कला का नाम है। जो मानवी अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकालकर सुसंस्कृत पद्धति से जी सका, उसे सर्वोपरि कलाकार कह सकते हैं।
हमारा जीवन एक अखंड सत्ता नहीं है। वह अनेक खंडों में बँटा हुआ है। वह बरसों में बँटा है, वर्ष महीने में खंडित है और महीने दिवस-रात्रि में विभक्त हैं। हमारा जीवन बचपन, जवानी और बुढ़ापे की मंजिलों में भी बँटा है। हमारी चेष्टायें बँटी हुई हैं। हमारी चेष्टाएँ बँटी हुई हैं। हमारे प्राण भी श्वासोच्छवास में बँटे हुए हैं।
हम सबका व्यक्तित्व भी अलग-अलग है, गुण, कर्म, स्वभाव सब भिन्न-भिन्न हैं, काम जुदा है, काम के तरीके भी जुदा हैं। इच्छाएँ और भावनाएँ भी सबकी अलग-अलग हैं। रास्ते भी अलग हैं और रास्तों की पगडंडियाँ और चक्करदार भूलभुलैया भी अपनी-अपनी हैं।
मनुष्य-मनुष्य में व्याप्त यह विविधता अत्यंत आकर्षक और आश्चर्यजनक है; किंतु इन विविधताओं को एक सूत्र में बाँधने वाली एकता भी इसमें कम आश्चर्यजनक नहीं। कई ऐसी प्रवृत्तियाँ, आकांक्षाएँ और भावनाएँ हैं जो हम सब में समान हैं। इनमें सबसे प्रमुख आनंद की भावना है। आनंद के लिए ही हम जीते हैं, आनंद के लिए ज्ञान प्राप्त है और आनंद के लिए ही हमारे समस्त कार्यकलाप चलते हैं।
आनंद ही हमारे जीवन की प्रेरणा है; किंतु हमें भौतिक वस्तुओं से जो आनंद मिलता है वह क्षणिक एवं अस्थाई होता है और उस आनंद की अनुभूतियाँ भी कष्टों की अनुभूतियों में उलझी रहती हैं। परिणाम यह होता है कि परिपूर्ण आनंद का विकास हमारी अंतरात्मा में कभी हो ही नहीं पाता। आनंद की भावना हमारी अंतरात्मा की प्रमुख भावना है। आत्मा का अंग बनकर ही वह उसमें निवास करती है। इस भावना के स्वरूप को समझने से हमें आनंद के स्वरूप को समझने में सहायता मिल सकती है।
आत्मा की आनंदमूलक प्रवृत्तियों में पाँच मुख्य हैं— ज्ञान, सौंदर्य, प्रेम, कल्याण और निर्माण। इन स्वभावगत भावनाओं के संतोष के लिए ही हम पुरुषार्थ करते हैं और इनके परितोष में ही हमारी अंतरात्मा परिपूर्ण आनंद की अनुभूति करती है।
मनुष्य मात्र के चरित्र में ये पाँच भावनाएँ अनिवार्य रूप से विद्यमान रहती हैं। इसलिए इन्हें हम मनुष्य-चरित्र की अनिवार्य भावनाएँ कह सकते हैं। इनके विकास से मनुष्य का व्यक्तित्व निखरता है और इनका पूर्ण विकास ही मनुष्य को सार्थक जीवन बिताने का अवसर देता है।
आनंदमय विराट् विश्व की आत्मा में भी यही भावनाएँ काम करती हैं। भावनाएँ सदैव चेतन पुरुष में रहती हैं। इसीलिए हम विश्व को भी केवल अचेतन प्रकृति नहीं, बल्कि एक चेतन विश्वपुरुष मानते हैं। मनुष्य को भी हम विश्वपुरुष का एक अंग मानते हैं; अतः उसके चरित्र में भी इन्हीं मूल प्रवृत्तियों की प्रधानता है।
इस आधारभूत सत्य का अनुभव होने के बाद यह सत्य ही आनंदमय जीवन का प्रेरणास्रोत बन जाता है; क्योंकि मनुष्य के सब कार्य इन मूलभूत भावनाओं की तुष्टि के लिए ही होते हैं। सच तो यही है कि हम अपनी निर्माण मूलक प्रवृत्ति को संतुष्ट करने के लक्ष्य से ही सृजन कार्य करते हैं और दूसरों की प्रेमभावना की तृप्ति के लिए प्रेम करते हैं। सौंदर्य के प्रति आकर्षण भी सहज वृत्ति है। यह भावना हमें प्रतिक्षण जीवन के अनेक उल्लासप्रद कार्यों की प्रेरणा देती है। हमारा जीवन आनंदमय होने की अपेक्षा रखता है। अतः इन पाँच भावनाओं— निर्माण-भावना, ज्ञान-भावना, सौंदर्य-भावना, श्रद्धा एवं प्रेमभावना, कल्याण-भावना की परिपूर्णता से ही स्थाई आनंद की प्राप्ति होती है और जीवन का एक मात्र अंतिम लक्ष्य अखंड आनंद की प्राप्ति होकर जीवन पूर्ण आनंदमय बनता है। जीवन कृतार्थ, कृतकृत्य हो जाता है। हमारे सारे प्रयत्न इसी विशुद्ध परिपूर्ण परम आनंद की प्राप्ति के लिए हों।
संसार में सभी प्रकार के मनुष्य भरे पड़े हैं। उनका वर्गीकरण मोटे रूप में इस प्रकार किया जा सकता है। (1) सज्जन (2) दुःखी (3) समुन्नत (4) दुर्जन। इन सबसे व्यवहार भी तद्नुरूप ही करना होता है। सभी से एक जैसा व्यवहार नहीं हो सकता।
योग दर्शन में एक सूत्र आता है। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा। इसमें व्यक्ति के अनुरूप व्यवहार करने की आवश्यकता एवं उपयोगिता समझाई गई है। सज्जनों के साथ मित्रता करनी चाहिए, ताकि उनके सद्गुणों का प्रभाव अपने ऊपर भी पड़े और समयानुरूप सद्व्यवहार किये जाने की भी अपेक्षा रहे। दुःखी लोगों के— पिछड़ों के प्रति करुणा भाव रखा जाए और उनकी सेवा-सहायता करने, संकटों से उबारने की चेष्टा चल पड़े। कम से कम सहानुभूति प्रकट करने, धैर्य बँधाने, उबरने का मार्ग बताने का प्रयत्न तो किया ही जाना चाहिए।
जो सफल समुन्नत हैं उनको देखकर प्रसन्न हुआ जाए। उन्नतिशीलों को इतना उपहार तो मिलना ही चाहिए कि उनके पुरुषार्थ एवं कौशल की प्रशंसा हो, प्रोत्साहन मिले। इससे दूसरों को भी उत्कर्ष की प्रेरणा मिलती है।
दुष्ट-दुर्जनों से सदा लड़ना तो संभव नहीं हो सकता। रास्ता चलते किससे झगड़ा किया जाए और किस प्रकार सुधारा तथा ठिकाने लाया जाए? इसलिए उनकी उपेक्षा की जाए? कम से कम अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार की तो उपेक्षा की ही जा सकती है, ताकि जितना समय बदला लेने, नीचा दिखाने में लगे, उसे बचाकर किसी उपयोगी कार्य में लगाया जा सके। इतने पर भी इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए कि उन्हें असहयोग, विरोध और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने का भय तो दिखाया ही जाए। अन्यथा उनके निर्विरोध की स्थिति में अधिक दुस्साहस दिखाने का अवसर मिलता है। उपेक्षा इस सीमा तक ही होनी चाहिए, जिससे दुष्टों का हौंसला बढ़ने न पाए। उन्हें यह भय बना ही रहना चाहिए कि समाज सर्वथा निर्जीव नहीं हुआ है। एक के साथ दुर्व्यवहार करने पर कोई दूसरा जीवट वाला आदमी उसका मजा चखा सकता है अथवा शासन की प्रताड़ना उसे भुगतनी पड़ती है।
व्यक्ति के स्तर के अनुरूप व्यवहार करना ही कर्म-कौशल है, जिसे गीता में भगवान ने योग का ही एक प्रकार कहा है।
व्यवहार कुशलता के आधार पर व्यक्तियों से भिन्न व्यवहार करने की बात इसलिए कहनी पड़ी कि तत्त्व दर्शन में कई स्थानों पर ऐसा उल्लेख आता है कि सब में एक ही आत्मा है। इसलिए समदर्शी होना चाहिए और सबसे सद्व्यवहार करना चाहिए। गीता में ही एक स्थान ब्राह्मण, गौ, हस्ति, श्वान और चांडाल के साथ विचारशीलों को समदर्शी होने का परामर्श दिया गया है। इस परामर्श में ब्रह्मदृष्टि की मान्यता तो ठीक है, वह अंतःकरण में रहनी चाहिए। “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की मान्यता विचारबुद्धि तक ही सीमित रहने योग्य है। उसे व्यवहार में समान रूप से प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। व्यवहार में आने पर तो बड़ी अटपटी स्थिति हो जाएगी। सम्मानित गुरुजन और दुष्ट-दुरात्मा एक ही मंच पर बिठाए जाएँगे और उनकी समान रूप से पूजा-आरती की जाएगी अथवा दोनों की उपेक्षा-भर्त्सना की जाएगी, तो यह व्यवहार सर्वथा अटपटा हो जाएगा। उसका दुष्परिणाम भी होगा। साथ ही इस अटपटेपन को कार्यान्वित करने वाले को उपहास का सामना भी करना होगा।
दर्शन दृष्टिकोण तक सीमित है। व्यवहार लोकाचार से संबंधित। इसलिए दोनों के बीच का अंतर औचित्य का समर्थन करते हुए अनौचित्य का विरोध भी करना चाहिए। न्यायाधीश एक को ससम्मान बरी करता है। दूसरे को जेल या फाँसी की सजा देता है, तीसरे की क्षति पूर्ति करता है और चौथे को उपहार दिए जाने की सिफारिश करता है। इसमें उसका कोई निजी राग-द्वेष नहीं है, न कोई स्वार्थ, प्रतिशोध। वह न्यायपीठ पर बैठा हुआ होने से समदर्शी भी कहा जा सकता है; किंतु जब व्यवहार की बात आती है तो व्यक्ति का स्तर देखते हुए, उसके सुधार की कामना करते हुए भिन्न व्यक्तियों से उनके स्तर के अनुरूप भिन्न प्रकार का आचरण करना पड़ता है। इसके बिना काम नहीं चल सकता।
द्रोणाचार्य हाथ में वेद और कंधे पर धनुष रखते थे। गुरु गोविन्दसिंह ने शिष्यों को एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला रखने का आदेश दिया है। ईसा ने एक गाल पर थप्पड़ मारने वाले के सामने दूसरा गाल कर देने का उपदेश दिया है; किंतु कार्लमार्क्स ने अनाचार से घृणा करने और उसके उन्मूलन में जुटने की बात कही है। इनमें विसंगतियाँ दिखाई पड़ती हैं, पर वस्तुतः ऐसा कुछ है नहीं। जैसे को तैसा बरतना व्यवहारकौशल है।
समझदार सज्जनों को भ्रांतियों से मुक्त कराने हेतु तर्क, तथ्य और आदर्शों की चर्चा से यथार्थता का अनुभव कराया और राह पर लाया जा सकता है; किंतु हिंस्र पशु उस तरह के व्यवहार को नहीं समझते हैं। उनके लिए भय ही एक मात्र ऐसा आधार है जिससे डराकर उन्हें सीमा में रखा जा सकता है। नम्रता और सदुपदेश को तो दुर्बलता समझते हैं एवं उपहास उड़ाते हैं। इससे उनका आक्रमण रुकता नहीं। इन स्थिति-भिन्नताओं को देखते हुए व्यवहार में अंतर करना पड़ता है। द्रोणाचार्य, गोविंदसिंह ने एक ही व्यक्तित्व में दोनों बातों का समावेश रखने की बात कही है; जबकि ईसा और मार्क्स ने आधी-आधी बातें कहकर उनका सम्मिश्रण करने की बात विवेकवानों की सहज बुद्धि पर छोड़ दी है।
एक राजा के दरबार में तीन जुआरी पेश किए गए। राजा ने एक को काला मुँह करके गधे पर बिठाकर शहर भर में घुमाने की सजा दी। दूसरे का नाम पुकारा और पिता की बड़ाई करते हुए कहा— "आप भी?" तीसरे से कुछ नहीं कहा और कहा— "जाइए।"
तीनों को तीन तरह की सजा एक ही अपराध में मिलने की बात लोगों को अटपटी लगी। मंत्री ने तो कारण पूछ ही लिया। इस पर राजा ने दूसरे दिन यह तलाश कराया कि देखो, वे तीनों क्या कर रहे हैं। जिसे गधे पर घुमाया गया था, वह फिर दूसरे दिन भी जुआ खेल रहा था। दूसरा जिसके बाप की तुलना की गई थी, उसने वह नगर ही लज्जा के मारे छोड़ दिया। तीसरे को अपने ऊपर इतनी ग्लानि हुई कि उसने विष खाकर आत्महत्या कर ली। राजा ने सभासदों को संबोधन करते हुए कहा अब आप लोग समझे होंगे, भिन्न लोगों से भिन्न प्रकार का व्यवहार करने का कारण वस्तुतः औचित्य पर आधारित था।
ईश्वर और पाप के अतिरिक्त किसी से भी न डरो। मृत्यु से भी नहीं।
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अपने दोषों का इल्जाम ईश्वर पर न लगाओ और पाप करते हुए यह न कहो कि उसने कराया सो किया।
भैंसे को डंडे के बल पर चलाया जाता है; किंतु घोड़ा लगाम का इशारा करने पर ही दौड़ने लगता है। यह प्रकृति की भिन्नता है। उसी के अनुरूप व्यवहार का औचित्य भी है। इस वर्गीकरण के लिए योग दर्शन के सूत्र में मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा का संकेत किया है, पर हम आज की परिस्थितियों को देखते हुए वर्गीकरण के और भी भेद-उपभेद कर सकते हैं और तद्नुरूप व्यवहार के और भी तरीके निकाल सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि आवश्यकतानुसार व्यवहार में साम, दाम, दंड, भेद की चतुरता का समावेश किया जाए। जहाँ एक से काम न चलता हो, वहाँ दूसरे-तीसरे की नीति अपनाई जाए। भावना हमारी सुधार की है। व्यक्ति से नहीं अनीति से घृणा करें और डाॅक्टर के आॅपरेशन जैसी कठोरता को भी नीति के अंतर्गत ही समझें तो वह समन्वित व्यवहार सभी के लिए श्रेयस्कर हो सकता है।
ज्ञानयोग विश्व का सर्वोच्च एवं गूढ़ दर्शन है। इसका भावार्थ है— जीवन के लिए आवश्यक ज्ञान के प्रति प्रेम एवं सत्य का ज्ञान। मनुष्य का बाह्यजगत की वस्तुओं, लोगों, सहायकों एवं संबंधों के प्रति प्रेम अज्ञानता के कारण होता है। ये सब नश्वर हैं और कभी भी सुख नहीं दे सकते तथा ये सत्य का बोध भी नहीं कराते, तब मनुष्य सत्य एवं वास्तविक ज्ञान की खोज करता है। अंत में वह समझ पाता है कि ये अंतःकरण की पवित्रता से ही प्राप्त हो सकते हैं। इससे ही वह शांति और स्थाई सुख पा सकता है।
तब वह अपने समस्त कर्मों, विचारों एवं मन से ज्ञान एवं सत्य की खोज में व्यस्त हो जाता है। चिंतन से वह समझता है कि मन और इंद्रियों को वश में करके अंतःदर्शन किया जा सकता है। ज्ञानयोग मन को वश में करके अंतःज्ञान प्राप्त करने के लिए कहता है। इसके लिए वेदांत दर्शन के निर्देशों के अनुसार चलना होता है, जो सर्वोच्च ज्ञान एवं सत्य के रहस्य को बतलाता है। सत्य वह है, जो नहीं बदलता, न नष्ट होता, न मरता और न क्षय होता है। वह आत्मनिर्भर रहता है और किसी अन्य पर आश्रित नहीं रहता। ज्ञानयोग एक सुव्यवस्थित विज्ञान है, जो सत्य का ज्ञान कराता है।
आज के भौतिक जगत में मनुष्य सिर्फ अपनी वर्तमान स्थिति (शारीरिक ज्ञान) ही जानता है। वह नहीं जानता कि वह कौन है, कहाँ से आया है, क्यों आया है और कहाँ जावेगा? कोई शास्त्र, दर्शन, भाषा, राष्ट्र या धर्म इसे नहीं जानता। इसे सिर्फ अंतःकरण जानता है, जो आंतरिक शक्तियों का बोध कराता है। इसके पवित्र होने से सुपर इन्टेलिजेन्स (प्रज्ञा) की प्राप्ति होती है। इससे जीवन की गहराई और अंतःकरण का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।
पाश्चात्य दर्शन पदार्थ जगत की जानकारी को ही स्व (आत्मा) का ज्ञान मानता है, परंतु पूर्वार्त्त दर्शन अंतःज्ञान को आत्मज्ञान कहता है। प्लेटो भी इसे मानते थे। यही वास्तविक सत्य है और जीवन के उद्देश्यों एवं उत्पत्ति आदि का सही बोध कराता है। मनुष्य को सुख और स्वास्थ्य बाह्यज्ञान से नहीं मिलते। अंतःज्ञान ही सर्वोच्च सुख, शांति एवं स्वास्थ्य प्रदान करता है। यही जीवन का लक्ष्य है। वेदांत के अनुसार मनुष्य अपने शरीर और व्यवहार का अध्ययन करके, जो कि अंतःकरण का उत्पादन है, अनंत सुख एवं शांति पा सकता है। वेदांत अंतःकरण के विभिन्न अंगों का सूक्ष्म अध्ययन करने को कहता है। इसके लिए मन को शुद्ध एवं एक ही दिशा में चलने की प्रेरणा देना आवश्यक है। बिखरा मन कभी भी सत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।
अंतःकरण को समझना और पवित्र बनाना कठिन कार्य है। त्रुटि होने से मनुष्य गलत निर्णय पर पहुँचता है। वेदांत में आत्मबोध के द्वारा सत्य को जाना जाता है। आत्मबोध का अर्थ आत्मा की पूर्ण जानकारी है। इस आत्मज्ञान को ही वेदांत में बुद्धि कहते हैं। बुद्धि का अर्थ पदार्थ जगत का ज्ञान मात्र नहीं है, जो आजकल समझा जाता है। वेदांत और ज्ञानयोग इसी बुद्धि को प्रशिक्षित और शुद्ध करते हैं। वेदांत वेद का सार है और सर्वोच्च ज्ञान ‘सत्य’ का बोध कराता है। इससे परे कोई ज्ञान नहीं है। वेदांत दर्शन का उद्देश्य समाधि लगाना नहीं है, परंतु समत्व की स्थिति प्राप्त करना है। इसमें समस्त जिज्ञासाओं का हल होता है और यही सर्वोच्च ज्ञान है। यही आत्मज्योति या आत्मशक्ति है।
अपने बारे में पूर्ण जानकारी अंतःकरण ही प्रदान करता है। इसका अस्तित्व व्यक्ति के कारण नहीं है, वरन व्यक्ति का अस्तित्व इस आत्मा के कारण है। मन के गलत चिंतन के कारण ही मनुष्य इसे नहीं समझ पाता। सुख-दुःख, लाभ-हानि, ज्ञान-अज्ञान आदि का बोध मनुष्य को मन के द्वारा ही होता है। प्रत्येक मनुष्य के पास शरीर, ज्ञानेंद्रियाँ, मन और आत्मा होते हैं। इनको समझने से ही जीवन का उद्देश्य समझ में आता है। वेदांत के अनुसार यह उद्देश्य ईश्वर की खोज नहीं है, वरन अज्ञानताजन्य कष्टों एवं कमियों से मुक्त होकर सुख, शांति और बुद्धि प्राप्त करना है। केवल चतुर ज्ञानयोगी ही इसे प्राप्त करते हैं।
मनुष्य अपने त्रुटियों से तकलीफें पाता है और ईश्वर पर दोष लगाता है। सत्य का पथिक इसे गलत मानता है और अंतःकरण के जागरण में लग जाता है, वो आत्मा को मुक्त रखता है। ज्ञानयोग के प्रतिपादनों के अनुसार अंधविश्वास, हानिकारक एवं भ्रान्तियाँ पैदा करता है। सत्य को समझने से उस पर विश्वास होता है। इसमें बुद्धि शुद्ध और परिपक्व होती है। तब मनुष्य पदार्थ जगत् की नश्वरता को समझ पाता है। विश्व ब्रह्माण्ड की एवं व्यष्टिगत जीवन का गहराई से चिन्तन करने पर वह जान लेता है कि बाह्य दुनिया में होने वाली समस्त घटनाएँ अंतर्जगत में बहुत पहले ही घट चुकी हैं। अतः वह अपना पूर्ण ध्यान अन्तःकरण के विकास में ही लगाता है। समस्त कार्य मनुष्य के जीवन में उसके विचारों की ही फलश्रुति होते हैं। अतः उसे अपनी चिंतन-प्रक्रिया को स्वस्थ रखना आवश्यक है। मन ससीम है और वह स्थान, समय एवं कारण की परिधि के बाहर नहीं जा सकता। परंतु अंतरात्मा स्वतंत्र है। वह सर्वत्र देखता है।
अंतःमन के चार प्रमुख अंग हैं- मनस, बुद्धि, चित्त और अहंकार। मनस सूचनाओं को एकत्र करता है और आंतरिक भावनाओं एवं विचारों को व्यक्त करता है। पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ इसकी सहायता करती हैं। इनका सूक्ष्म अध्ययन एवं शिक्षण आवश्यक है। शुद्ध बुद्धि, मन को इंद्रियों को निश्चित रीति से उपयोग करने का निर्देश देती है। यह विवेचना करती है, न्याय देती है और सभी फैसलों के लिए यह जिम्मेदार है। जब मानस बुद्धि के अनुसार कार्य करता है, तब अंतः और बाह्य दोनों स्तरों में पूर्ण साम्य स्थिति रहती है। इससे मनुष्य उन्नति करता है और सुख-शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है। मानस के बुद्धि के निर्देशों पर नहीं चलने से मनुष्य को तमाम तरह से दुःख, अशांति एवं तकलीफें होती हैं। बुद्धि को समझने से एवं निर्देशों के पालन से मनुष्य आंतरिकशक्ति के सभी पक्षों को ठीक से समझता है और उनका लाभ उठाता है।
बाह्य पदार्थ मनुष्य को सुख-शांति नहीं दे सकते। मनुष्य को अंतः की आंतरिकशक्तियों के चारों अंगों का सही उपयोग करके आंतरिक विकास करना आवश्यक है। अंतःमन का तृतीय भाग चित्त है। यह ज्ञान, स्मृतियों, संस्कारों एवं प्रभावों का भंडारणगृह है। चित्त के द्वारा चेतना, मन और इंद्रियों तक पहुँचती है। यह आत्मा के प्रकाश को सर्वत्र फेंकती है। इंद्रियों के द्वारा प्राप्त हमारे समस्त संदेश स्नायुमंडल मस्तिष्क और चेतन मन द्वारा चित्त में ही जमा होते हैं। यह विशाल भंडार है और हमें पूर्व में देखे दृश्यों का स्मरण दिलाता है। विश्व का आकर्षण और प्रभाव मानस व बुद्धि पर सतत पड़ता हैं, परंतु चित्त उनसे जरा भी प्रभावित नहीं होता।
अंतःमन का चतुर्थ आयाम— अहंकार है। इसका बोध “मैं” से होता है और विश्व से व्यक्ति का संबंध कायम करता है। इसे इगो कहते हैं। इसका विकृत स्वरूप मनुष्य को स्वार्थी बनाता है और तुच्छता का बोध कराता है, जिससे उसकी सारी प्रगति रुक जाती है और वह विश्व में अकेला पड़ जाता है। इसको प्रकाशित करने पर, यह मानव जीवन को सफल बना देता है। विश्व से अपनत्व का बोध कराता है। तब मनुष्य परोपकारी बनता है और दूसरों के दुःख दूर करने में अपना तन, मन, धन सर्वस्व न्यौछावर करता है। इससे वह महामानव बनता है। आत्मा को जानने का सरल तरीका ‘ईगो’ को शिक्षित करना है। अहंकार को यह बोध कराना आवश्यक है, कि शक्ति का मूल स्रोत ‘वह’ नहीं है, वरन ‘आत्मा’ है। अतः यह आत्मा के अनुसार चले।
आत्मविकास के लिए शरीर के अंतःकरण को आत्मा का कहना मानने और उसके निर्देशों के अनुसार चलने की शिक्षा दी जाती है। इगो की विकृति के कारण ही आत्मा का पतन होता है। समस्त बंधनों, अड़चनों, तकलीफों और अशांति का कारण यह अशिक्षित-अनगढ़ अहंकार (इगो) ही है। इस तरह ज्ञान से ही सत्य की प्राप्ति हो सकती है और यह शाश्वत सत्य ही आत्मा को स्वतंत्र कराता है।
मनुष्य जीवन परमात्मा की असाधारण कला-कृति एवं अनुपम उपहार है। ऐसा सुयोग संसार के किसी प्राणी को नहीं मिला। न ऐसी विलक्षण शरीर-संरचना जिसे अनेक जगहों से तोड़ा-मरोड़ा जा सके और एक से एक अद्भुत कार्य किए जा सकें। न ऐसा जादू के पिटारे जैसा मस्तिष्क जिसके कण-कण में कला-कौशल, कण-कण में तत्त्वज्ञान और पदार्थ विज्ञान के भंडार भरे पड़े हों। इतना सौंदर्य और इतना कौशल अन्य किसी प्राणी में नहीं पाया जाता। यह अनुदान किसी पक्षपात या अनुग्रह के कारण नहीं मिला हैवरन सृष्टा ने बहुत सोच समझकर दिया है। इसलिए कि वह ज्येष्ठ पुत्र के नाते अपने विशिष्ट कर्त्तव्यों और दायित्वों का निर्वाह कर सके। अपनी अपूर्णता को पूर्णता में विकसित करने और सृष्टा के विश्व-उद्यान को सुरम्य, समुन्नत बनाने की जिम्मेदारी को भली प्रकार वहन कर सके।
अन्य प्राणियों के लिए उदरपूर्ति भी एक बड़ा काम है। वे सारे दिन परिश्रम करने पर अपना पेट भर पाते हैं; पर मनुष्य यदि चाहे तो दो मुट्ठी अनाज में पेट भर सकता है और उतना भर कमाने के लिए कुछ घंटे का श्रम पर्याप्त हो सकता है। परिवार को यदि अनावश्यक रूप से बड़ा बनाकर कंधों पर न लादा जाए तो उसे स्वावलंबी और सुसंस्कारी बनाने के लिए थोड़े से समय से काम चल जाना चाहिए। इसके उपरांत भी इतना समय तो बच ही जाता है कि यदि उसे आलस्य, प्रमाद या अनावश्यक स्वार्थसंचय में न गँवाया जाए तो उन कामों के लिए पर्याप्त अवसर मिल सकता है, जिनके लिए कि यह सुरदुर्लभ मनुष्य शरीर मिला है।
विश्व के महामानवों ने एक से एक बढ़कर श्रेष्ठ काम किए हैं और अपने को अनुकरणीय-अभिनंदनीय बनाया है। साथ ही पेट भरने और परिवार की जिम्मेदारी निभाते रहे हैं। व्यस्तता और अभावग्रस्तता ऐसे दो बहाने हैं, जिनकी आड़ में व्यक्ति अपने विशिष्ट कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों से लुकता-छिपता और अपने को— दूसरे को धोखा देने वाले बहाने बनाया करता है।
यदि कोई अपनी स्थिति का न्यायपूर्वक पर्यवेक्षण करे, तो पेट परिवार का भरण-पोषण करने के उपरांत भी उसे उतनी सुविधा मिल सकती है, जिससे अपनी पूर्णता और विश्व-वाटिका की सेवा-साधना भली प्रकार बन सके। पर जो ठाली जीते हुए भी व्यस्तता का बहाना करे और औसत भारतीय स्तर की सुविधाएँ रहते हुए भी अभावग्रस्तता का रोना रोए, तो उस प्रवंचना के लिए कोई क्या करे?
प्रकृति की अद्भुत संरचना है— मनुष्य। यों उसने विभिन्न प्रकार के ग्रह-गोलक, जीव-जंतु, खनिज, पर्वत, जलाशय आदि बनाए हैं, पर मनुष्य उन सब में अनोखा है। ब्रह्मांडीय चेतना, और पदार्थसत्ता में जो कुछ विशेषताएँ हैं, वे सभी बीजरूप में मनुष्य के शरीर और मानस में इस प्रकार समाहित की गई हैं कि वह चाहे जिसे जितनी भी मात्रा में जब चाहे विकसित कर सकता है। प्रकृति के रहस्यों की जानकारी प्राप्त करके उसने अनेकानेक आविष्कार किए हैं, जो चेतना की अगम्य परतों को उखाड़कर अपने आप को देवोपम समर्थताओं से संपन्न करने की क्षमता, उसे प्रदान करते हैं। इतने महत्त्वपूर्ण अनुदान उसे अकारण नहीं मिले हैं। न व्यर्थ गँवाने के लिए, न दुरुपयोग के लिए।
देखना यह है कि वह उनका श्रेष्ठतम सदुपयोग करके अपनी बुद्धिमत्ता और गरिमा का किस प्रकार परिचय देता है। वह चाहे तो अपनी विशेषताओं का दुरुपयोग करके इस धरती को नरकतुल्य बना सकता है। चाहे तो अपने में देवत्व का उदय करके इसी धरती पर स्वर्ग का अवतरण कर सकता है। प्रश्न एक ही है कि वह अपनी समर्थता का सुनियोजन किस प्रकार करता है।
इसके लिए कई राहें खुली हुई हैं। वह चाहे तो अपनी सामर्थ्य का दुरुपयोग करके संसार में क्लेश, द्वेष, ध्वंस का संकट खड़ा कर दे। वह चाहे तो उनका श्रेष्ठ उपयोग करके संसार में सुख, शांति, प्रगति और समृद्धि का वातावरण उत्पन्न करे। वह चाहे तो उन्हें व्यर्थ गँवाए, प्रमाद अपनाए और अपना तथा विश्व का वर्तमान और भविष्य गुड़गोबर करके रख दे। विशेषता एक और भी है कि मनुष्य स्वयं गिरता है तो असंख्यों को अपने साथ गिरता है, उठता है तो उत्कर्ष का वातावरण दसों दिशाओं में बना देता है।
इस विवेचन की साक्षी अनेक रूपों में हमारे सामने हैं। पिछले दिनों उसने मानवी गरिमा से नीचे उतर कर पशुवत् हेय भूमिका निभाई और इसमें भी आगे पिशाच स्तर के कुकृत्य करके सर्वत्र हाहाकार मचा दिया। क्या उसके लिए यही योग्य था? क्या यही करना चाहिए था? क्या यही करता रहेगा? इन प्रश्नों का उत्तर यों सामुदायिक रूप से माँगा गया है, पर देना हममें से प्रत्येक को एकाकी चाहिए, क्योंकि हम सब एकदूसरे के साथ जुड़े और बंधे हुए हैं। अंधड़ जिस ओर चलता है, अपने साथ भली-बुरी वस्तुऐं सभी उड़ाता ले जाता है। अग्रगामी, दुस्साहसी जिधर भी चलता है उधर अनुयायियों की कमी नहीं रहती। वह जिधर बढ़ता है मार्ग के अवरोधों को ठुकराता चला जाता है। समष्टि का मूल्यांकन तो बहुत होता है, पर बिखरा तो कूड़ा-करकट ही रहता है। जो वरिष्ठ हैं, वे रेल के इंजन की तरह आगे बढ़ते हैं और टनों बोझ लदे हुए डिब्बों को अपने साथ घसीटते चलते हैं।
उत्तर पाने के लिए बहुत समय तक ठहरा नहीं जा सकता, क्योंकि परिस्थिति इस सीमा तक जा पहुँची है कि जीवन और मरण में से एक को चुनना पड़ेगा। सामूहिक रूप में जीवित रहना या सहमरण का आयोजन करना यह फैसला अब देर तक रुका नहीं रह सकता। दोनों में से एक को चुनना होगा। पतन का गर्त पसंद हो तो गहरे और दुर्गंध भरे दलदल में फँसकर आत्मघात करना होगा। यों अभी गुंजाइश इस बात की भी है कि वह उबरना चाहे तो ऊँची छलांग लगाए और तुरंत अनेक सहकारी कदम अपने साथ उठते हुए देखे।
कहा यह जा रहा है कि जीवन की महत्ता पर दूरदर्शी विवेकशीलता के साथ विचार करना चाहिए। प्रमाद की सड़न एकत्र न होने देकर ऐसे उत्कर्ष का विनियोग करना चाहिए, जिससे स्वयं उबरें और अपने सहचरों या अनुगामियों को नवजीवन का संदेश प्रदान करे। श्रेष्ठता के चयन में ही मानव का कल्याण है।
अनुकरण नर-पशु की तरह जीने वाले मृतकों का नहीं करना चाहिए। उनकी नियति तो बर्बादी है। हमें महानता के अनुसरण की बात सोचनी चाहिए, ताकि भीतर से महानता और बाहर से सुसंपन्न प्रगतिशीलता उभरे। जीवन का महत्त्व न समझा जा सके तो उसे अर्धमृतकों-अर्धमूर्च्छितों की तरह अपंग जैसी भारभूत स्थिति में बिताना पड़ेगा। पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सूझ न पड़ेगा। तृष्णा और वासना के अतिरिक्त और कहीं रस न मिलेगा। उद्दंडता उभरी तो अन्यान्यों का विनाश करते हुए अपना भी मरण आमंत्रित करना पड़ेगा।
सांसारिक सफलताओं में पुरुषार्थ की अत्यधिक प्रगति के लिए आत्मपरिष्कार एवं श्रद्धा की आवश्यकता पड़ती है।
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जो शिक्षा मनुष्य को धूर्त, परावलंबी और अहंकारी बनाती हो, वह अशिक्षा से भी बुरी है।
अपने जीवन का महत्त्व समझें। उसे भटकावों में न बिताए, गर्त में न गिराए और निर्जीवों की तरह अपने को दुर्गंधभरी सड़न के रूप में परिणत न करें। इसकी पूरी-पूरी गुंजाइश है कि महामानवों का ही अनुसरण किया जाए। उनके ही पदचिह्नो पर चला जाए और वह कर गुजारा जाए, जिससे अपनी गणना मनस्वी, यशस्वी वर्ग में हो सके और विनाश के वातावरण का आमूलचूल परिवर्तन हो सके।
कैमरे की सहायता से वस्तु या व्यक्ति का किसी भी कोण से फोटो लिया जा सकता है, पर उन सभी में भारी अंतर रहेगा। सामने से, पीठ पीछे से, अगल-बगल से, छल से, जमीन पर लेटकर फोटो लेने से जो चित्र खींचे जाएँगे, उन सभी में भारी अंतर पाया जाएगा; यों होंगे वे सभी सही।
जीवन के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। वह क्या है? क्यों है? इसका लाभदायक उपयोग क्या हो सकता है? जैसे प्रश्नों पर विचार करते हुए अनेकों उत्तर उभरकर आते हैं, और कितने ही निष्कर्ष निकलते हैं। अपनाए गए दृष्टिकोण के अनुसार वे सभी सही प्रतीत होते हैं, पर उसका उत्तम और उपयोगी पक्ष क्या है? इस संदर्भ में गहराई तक, अधिक गहराई तक उतरने की आवश्यकता है। उथले धरातल पर विचार करने से कई बार ऐसे उत्तर सामने आते हैं, जो यथार्थवत् प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः नितांत भ्रमपूर्ण होते हैं। भ्रम भी एक तथ्य है, जो अनेक बार असत्य होते हुए भी सत्यवत् प्रतीत होता है।
यहाँ अनेक अंधों द्वारा एक ही हाथी के अलग-अलग अवयव पकड़कर जो परस्पर विरोधी निष्कर्ष निकाले गए थे, वह कथा याद आ जाती है। जिसने जो अवयव पकड़ा था, उसी के अनुरूप हाथी की आकृति बताई थी। उसका बोध उस स्थिति में सही भी था। वह अपने निर्धारण को दृढ़तापूर्वक सही भी कह सकता था। इतने पर भी यह असमंजस बना ही रहता है कि सभी भिन्न तरह अनुभव करने वाले अपूर्ण हैं। समूचा हाथी जिसने देखा है और उसकी गतिविधियों को चरितार्थ होते देखा है, वही सही और समग्र रूप से यह बता सकता है कि हाथी किस प्रकार खरीदा, पाला और चलाया जाता है।
प्रश्न जीवन का है। यह देखने में तो खाने-सोने आदि नित्यकर्मों में दिन गुजारने वाले शरीर की, काम दें सकने योग्य समय-सीमा ही है, पर उसका मूल्याँकन एवं उसका उपयोग सुझाने वाला दृष्टिकोण अलग-अलग है। चिड़ीमार, मछलीमार बधिक भी अपने क्रियाकलाप में लगे रहते हैं और उनके अभ्यास में आ जाने पर किसी प्रकार अपना खाँचा भी उस प्रक्रिया के साथ जमा लेते हैं। चोर-उचक्के, व्यभिचारी भी अपने व्यवसाय में दिन गुजार लेते हैं। ठग चित्र-विचित्र प्रकार की तरकीबें सोचते, अपनाते और बदलते रहते हैं। मध्यवृत्ति के बुराई-भलाई के झंझट में नहीं पड़ते, श्रम करते और पेट भरते हैं। नियति के निर्धारण के अनुरूप बचपन, जवानी और बुढ़ापा काटकर मौत के मुँह में चले जाते हैं।
जीवन बहुमूल्य है। वह पेट भरने जैसे सामान्य क्रियाकलाप में व्यतीत कर देने जैसे घटिया स्तर का नहीं है। उस प्रकार तो पशु-पक्षी भी जी लेते और मौत के दिन पूरे कर लेते हैं। मनुष्य असाधारण है। शरीर-संरचना की दृष्टि से ही नहीं, वरन उसकी चेतना की गहराई और ऊँचाई को नापा-आँका जाए तो वह सचमुच ही असाधारण है। जिनने अपना उपयोग जिस भी दिशा में तन्मयतापूर्वक किया है, उसने उस स्तर की सफलताएँ भी पाई हैं, अभिरुचि के अनुरूप अपने को ढाला और उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचाया है। साहित्यकार, कलाकार, नेता, अभिनेता, पहलवान, विद्वान, धनवान आदि की अभिरुचि ही चेतना को दिशा विशेष में तत्पर और तन्मय किए रहती है। उसका प्रतिफल भी मिलता है। धीमी चाल से चलने वाले देर लगाते और थोड़ा पाते हैं; पर जिनकी गतिशीलता, प्रयत्नशीलता, तत्परता बढ़ी-चढ़ी हैं, वे सफलता के उच्च शिखर पर भी पहुँचते देखे जाते हैं।
जीवन का मूल्य और स्वरूप जो समझ नहीं पाते, उनके लिए वह एक प्रकार की घाम-पात है जो ग्रीष्म में अपना अस्तित्व गँवा बैठती है और वर्षा आने पर फिर अपना स्वरूप दृश्यमान करती रहती है। जीवन और मरण का चक्र नियति का एक सामान्य विधान है। वस्तुओं का उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन होता ही रहता है। शरीर भी एक पदार्थ है। वह भी इसी प्रकृति के साथ बँधा हुआ है। जो शरीर के अस्तित्व को ही जीवन मानते हैं, उनके लिए ईंधन जुटाना और इस अग्नि को सीमित अवधि तक प्रज्वलित रखना ही एकमात्र कृत्य है। कोटि-कोटि जीव-जंतुओं की तरह वे भी आए दिन विपुल संख्या में जन्मते और मरते रहते हैं। इनमें से कुछ प्राणी श्रम-सीमा में संतोष और औचित्यपूर्वक निर्वाह कर लेते हैं, पर जिनकी महत्वाकांक्षाएँ-एेषणाएँ अत्यधिक उग्र हैं, उनमें लालच व्यामोह और अहंकार एक प्रकार का ऐसा उन्माद भर देता है कि किसी भी रीति से वे साधनसम्पन्न बन सकें, बड़े कहला सकें और दूसरों के सामने अपनी वरिष्ठता का आतंक प्रस्तुत कर सकें। जीवन का यह वह स्वरूप है, जो सीमित तो शरीर तक रहता है, पर जिनकी मनोवांछा उबलती रहती है, वे लोगों की दृष्टि में अपना वजन, विस्तार और वैभव बढ़-बढ़कर प्रदर्शित करना चाहते हैं।
ऐसे लोग अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त करने के लिए आत्मसाधना एवं औचित्य-मर्यादा तक ही सीमित नहीं रह जाते, वे अनीति अपनाते, उद्धत कर्म करते, आतंक जमाते और जो भी संभव है, उसे बिना न्याय अन्याय का भेद किए कर गुजरते हैं। चर्चा का विषय बनते हैं और अपनी समर्थता का परिचय देते हैं। तथाकथित सफल मनोरथों और बड़े आदमियों में ऐसे ही लोगों की गणना होती है। सफलताओं का चमकीला सेहरा भी उनके सिर पर बँधता देखा गया है।
यह वे विडंबनाएँ हैं, जिनमें आम आदमी घिरा और बँधा रहता है। जो अपने को शरीर मानकर चलता है, वह शरीर के साथ जुड़ी हुई सफलताओं को ही अपने बड़प्पन का चिह्न मानता है और गिलहरी का मुँह जिस प्रकार कपास के छोटे गुच्छे से ही भर जाता है, उसी प्रकार अपने बड़प्पन पर इठलाते-इतराते, दर्प एवं गर्व का प्रदर्शन करते हैं।
जीवन का शरीर पक्ष इतना ही है, किंतु जो गहराई में उसे देखने और समझने का प्रयत्न करते हैं, उन्हें प्रतीत होता है कि वह इतनी छोटी वस्तु नहीं है, जितनी कि समझी और प्रयुक्त की गई। जीवन आत्मा का घोंसला है। घोंसला तिनकों का समूहमात्र है। कौशल और महत्व उस पक्षी का है, जो उसमें रहता और बुनता है। पक्षी के चले जाने पर घोंसले को हवा के झोंके ही तितर-बितर कर देते हैं। आत्मा की अग्नि का अस्तित्व ही शरीर के चूल्हे को गरम किए रहता है। उसके विलग होते ही सुंदर और समर्थ दिखने वाली काया देखते-देखते सड़ने-गलने लगती है और ढाँचे को उन्हीं पंचतत्त्वों में विलय कर देती है, जिनसे मिलकर वह बनी थी। आत्मा इसके पहले भी थी और बाद में भी बनी रहती है।
शरीर आधि-व्याधियों से घिर जाने पर अपंग- असमर्थ की तरह रोता-कलपता रहता है और दूसरों की सहायता से किसी प्रकार अपने अस्तित्व की रक्षा कर पाता है। कई बार तो दुर्घटनाएँ ही अकालमृत्यु का कारण बन जाती हैं। तब प्रगति के मनोरथ अवगति के दुर्भाग्य को ही कोसते-कलपते रहते हैं। स्वास्थ्य की स्थिरता गँवा बैठने पर महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति तो दूर, किसी प्रकार काया का ढाँचा खींचना तक भारी पड़ता है।
यही बात आत्मा के संबंध में भी है। उस पर एक ही रोग चढ़ता है; पर होता इतना भयंकर कि जिन्हें काया के शत-सहस्र रोगों से भी बढ़कर माना जा सकता है। इस रोग का नाम ही “माया” है। माया अर्थात अपना स्वरूप, उद्देश्य और कर्त्तव्य को भूल जाना। इस व्यथा के कारण दृष्टिकोण में भारी अंतर पड़ जाता है। पीलिया रोग हो जाने पर दूसरी सब वस्तुएँ पीली दिखती हैं। यहाँ तक कि अपनी आँखें भी पीले रंग की दिख पड़ती हैं। आत्मविस्मृति ऐसा ही पीलिया रोग है। उसे दिशाभ्रम से उत्पन्न भटकाव ही कह सकते हैं। इसे ऐसा विचित्र शीर्षासन कह सकते हैं, जिसमें वाहन, सवारी के काम आने की अपेक्षा मालिक पर चढ़ बैठता है और उसे ऐसे नाच नचाता है, जैसे मदारी अपने पालतू बंदर को नचाया करता है।
भगवान ने मनुष्य को अद्भुत काया और अनुपम मानस दिया है; पर एक काम उसके जिम्मे छोड़ा है कि इस बहुमूल्य वस्तु का ऐसा उपयोग करे जो उसकी गरिमा बनाए रखे और ऐसे परिणाम प्रस्तुत करे, जिन्हें गौरव के अनुरूप कहा जा सके। यह तभी बन पड़ता है जब दृष्टिकोण निर्भ्रांत हो। विशेषतया अपने स्वरूप, महत्त्व और कर्तृत्व का ज्ञान हो। परमात्मा का अविनाशी अंश आत्मा है, उसे प्रज्ञाप्रेरित होना चाहिए। प्रज्ञा, वह जो जीवन के स्वरूप और सदुपयोग समझा सके और अपनी प्रखरता के सहारे संमार्ग दिखा सके। उस पर चल सके और धकेलते-घसीटते हुए आगे बढ़ा सके।
अपूर्णता को पूरी करना और विश्व-वाटिका को सुरम्य बनाना, यह दो कार्य ऐसे हैं जो जीवनसत्ता- आत्मा के लिए अपनाने योग्य हैं। दूसरे शब्दों में इसे अंतरंग पुण्य और बहिरंग परमार्थ भी कह सकते हैं। परमार्थ शरीर करता है और पुण्य की पवित्रता से आत्मा को निर्मल-निरामय बनाया जाता है। यही है आत्मज्ञान का प्रमाण-परिचय। जिसने भटकाव से छुटकारा पा लिया, जिसने भवबंधन से छुटकारा पा लिया उसे अपनी सत्ता की वास्तविकता का आभास होता है, साथ ही यह भी सूझ पड़ता है कि किस राजमार्ग पर चलना चाहिए, किस उलझनभरी पगडंडी में भटकने में सतर्कता बरतनी चाहिए।
आध्यात्मिक जीवन वह है, जिसमें सर्वतोमुखी संयम-साधना के सहारे अपने को निखारा जाता है। संयम ही तप है। तप ही अंतःकरण की प्रचंडता को प्रदीप्त करता है। इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम के सहारे मनुष्य उन अनाचारों से बच सकता है, जो उसकी दुर्गति के प्रधान कारण हैं, शरीर के लिए औसत नागरिक स्तर पर निर्वाह और सृजन स्तर का बड़प्पन प्राप्त कर लेना पर्याप्त होना चाहिए। इस स्तर को अपना लेने भर से कोई व्यक्ति तपस्वी हो सकता है और संचित कुसंस्कारों, कषाय-कल्मषों से छुटकारा पा सकता है। पुण्यपथ यही है।
परमार्थ एक ही है— चिंतन में प्रज्ञा का समावेश, परमार्थ का अवलंबन। लोकमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन। व्यक्तिगत अंतरंग जीवन में यदि स्वरूप और लक्ष्य को समझते हुए अपनी प्रखरता को जगा लिया जाए और उसे इस योग्य बना लिया जाए कि संपर्क में आने वाला तद्रूप पाठ ग्रहण करते चला जाए, तो यह आज का सबसे बड़ा परमार्थ होगा। परमार्थ वस्तुओं को देकर सामयिक आवश्यकता की पूर्ति के रूप में भी हो सकता है; पर वास्तविक परमार्थ उस प्रकाश को कहते हैं, जो आत्मस्वरूप और उद्देश्य को जगने-जगाने में समर्थ हो सके।
मृत्यु के बाद एक साधु स्वर्ग पहुँचे। स्वर्ग के द्वार पर भगवान चित्रगुप्त खाता लिए बैठे थे। उन्होंने साधु का नाम ठिकाना सब कुछ पूछा। साधु ने कहा— ‘मुझे नहीं जानते, मैं तो धरती का प्रसिद्ध संत हूँ। मैं यौवन में राग में डूबा रहा किंतु बाद में अखंड साधना की।
चित्रगुप्त ने खाता खोला। शुरू से ही पृष्ठ पलटने आरंभ किए तो साधु ने कहा— “शुरू में क्या रखा है? मेरे पुण्य देखने हैं तो वृद्धावस्था का हिसाब देखो।”
चित्रगुप्त ने आरंभ के पृष्ठ देखने छोड़ दिए। उन्होंने पूरा अंतिम भाग पलटा, पर उन्हें पुण्य के नाम की एक पंक्ति भी नहीं मिली।
साधु चकित रह गए। यह क्या हुआ? अवश्य चित्रगुप्त के हिसाब में भूल है। बोले— “यह कैसा हिसाब है?”
चित्रगुप्त कुछ नहीं बोले। इत्मीनान से पृष्ठ उलटते गए। साधु ने आश्चर्य से देखा— यौवनावस्था में तो उसके पुण्यों की भरमार है।
‘गलत है आपका यह हिसाब। यौवन में तो मैं केवल प्रेम-प्रणय में लीन रहा।’
चित्रगुप्त सुनकर हँसे। बोले— “साधुजी! जिसे प्रेम कहा जाता है, उसी को तो हम लोग पूजा कहते हैं।”
हमारे दूरदृष्टा ऋषि-मुनियों ने विचारों की महत्ता पर बहुत अधिक बल दिया है। वृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है कि इच्छाप्रधान व्यक्ति जैसा संकल्प करता है, वैसा ही कर्म करता है। जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है। वस्तुतः जैसे हमारे विचार होते हैं, वैसा ही हमारा स्वभाव, हमारा आचार भी ढल जाता है। हमारा चेहरा, हमारा शरीर, हमारा स्वास्थ्य, हमारी सफलता-असफलताएँ सभी कुछ हमारे विचारों की प्रतिच्छाया है। अंग्रेजी में एक कहावत है— “तुम वह नहीं हो जो तुम अपने विषय में सोचते हो कि तुम यह हो; अपितु तुम जैसे विचार करते हो, वास्तव में तुम वही हो।” यदि हम अपने विचारों को उन्नत बना सकें, विचारशक्ति पर नियंत्रण रख सकें तो हमारे जीवन की अनगिनत समस्याओं, कष्टों और असफलताओं का स्वतः ही निदान हो जाए।
विचारों के नियंत्रण से वे बड़ी से बड़ी शक्तियाँ प्राप्त की जा सकती हैं, जो सहज ही लोगों को चमत्कृत कर दें। विचारों का संयमन और ध्यान की एकाग्रता, यह दो इतने बड़े जादू हैं कि समस्त पृथ्वी का कायाकल्प करने की शक्ति स्वयं में रखते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन सबकी सफलता का मूलमंत्र उन्नत विचारशक्ति और दृढ़ संकल्पबल ही है। उनके जीवन में अगणित कष्ट, कठिनाइयाँ आईं परंतु इन दो शक्तियों के बल पर उन्होंने उन सब पर विजय प्राप्त की। ईश्वरीय प्रतिभा लेकर तो विरले ही व्यक्ति आते हैं। संकल्प और साहस के अभाव में वह प्रतिभा भी धूमिल पड़ जाती है। कष्ट, कठिनाइयाँ किसके जीवन में नहीं आतीं? जो मन को निग्रहित कर कठिनाइयों में जीना सीख लेता है, संसार में वही महान और अनुकरणीय बनता है। यदि हम महापुरुषों के जीवन-चरित्र का अध्ययन करें तो पाएँगे कि उन्होंने कठिनाइयों को सहकर ही विजयश्री का वरण किया है। ईसा, सुकरात, गाँधी और दयानंद ने अपने सिद्धांतों के प्रचार और प्रसार के लिए क्या नहीं सहा? आज मरकर भी वे यशकाया से अजर अमर हैं; क्योंकि उन्होंने विचारशक्ति और संकल्पबल के द्वारा तूफानों-झंझावातों को हँसते-हँसते सहकर विश्व को नूतन प्रकाश दिखलाया। इसी प्रकार अन्य लोगों के उदाहरण भी हमारे सम्मुख हैं। कार्लमार्क्स जब अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ “कैपीटल” की रचना में पूरी तरह से डूबे थे तब उनके घर में खाना खाने को एक पैसा तक नहीं था। गोर्की सारे दिन साहित्य सृजन में लगे रहते और जब क्षुधा बहुत व्याकुल करती तो कूड़े के ढेर से डबलरोटी के टुकड़े ढूँढ़ते थे। ग्राहमबेल ने जब टेलीफोन का आविष्कार किया था, तब अंतिम राशि तक उसमें लगा दी थी और भूख की भी परवाह न कर वे अपने अंवेषण में जुटे रहे थे। वज्रमूर्ख कालिदास संकल्पशक्ति के बल से ही विश्ववन्द्य महाकवि बने थे। वस्तुतः हम में से कोई भी कार्लमार्क्स, गोर्की, कालिदास आदि से कम नहीं है। जो हाथ-पैर और प्रतिभाएँ-क्षमताएँ भगवान ने उन्हें दी थीं, वही हमें भी दी हैं। अंतर इतना ही है कि उन्होंने अपने दृढ़ निश्चय को, आगे बढ़ने के भाव को निरंतर बनाए रखा, कभी निराशा और कायरता को प्रश्रय नहीं दिया; परंतु हम छोटी-छोटी बाधाओं में ही हार मानकर, थककर और निराशा से चूर होकर बैठ जाते हैं। अपने विचारों को ऊँचा उठाइए। अपने संकल्पशक्ति को जगाइए। कायरता और निराशा-कुंठाओं के विचारों को पास न फटकने दीजिए। कौन ऐसा कार्य है, जो आपके लिए असंभव है? अपने पौरुष और कर्मठता पर विश्वास रखिए और पूरी शक्ति से लक्ष्य की ओर बढ़ जाइए। अंधकार से प्रकाश की ओर जाइए। तभी आप मनुष्य कहलाने के अधिकारी हैं। इसी में मनुष्य की गरिमा भी है।
अध्यात्म-साधनाओं के लिए व्यक्ति के स्तर के अनुरूप भिन्न-भिन्न प्रकार के विधि-विधान निर्धारित हैं। साधक की पात्रता, अभिरुचि और मनःस्थिति देखकर यह पता लगाना पड़ता है कि उसमें कितना भार वहन करने की क्षमता है। तद्नुरूप ही उसे मार्ग का चयन एवं निर्धारण करना होता है। सभी की क्षमता एवं रुझान एक जैसी नहीं होती, इसलिए उसे अपने स्थिति के अनुरूप जो उचित है वही अपनाना पड़ता है।
सर्वसाधारण को मध्यवृत्ति के लिए पुण्य और परमार्थ की संपदा का संचय पर्याप्त माना जाता है। पुण्य अर्थात आत्मपरिष्कार, परमार्थ अर्थात लोक-मंगल। इस समन्वय में स्वार्थ और परमार्थ दोनों की सिद्धि होती है। पुण्यसंचय के लिए संयम-साधना होती है। इंद्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम इन चारों के समग्र सम्मिलन से आत्मशोधन की प्रक्रिया पूरी होती है। इसके अतिरिक्त परमार्थ सेवा कार्यों से सधता है। पिछड़ों को ऊँचा उठाने की, विपत्तिग्रस्तों को सामयिक सहायता देकर उनका दुःख हलका करना होता है। साथ ही यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि बहानेबाज जिस-तिस बहाने किसी की श्रद्धा-सद्भावना का दोहन न करें।
यह सरल है। अपना सुख बाँट देना दूसरों का दुःख बँटा लेना। बालकों जैसा निर्मल-निष्कपट मन रखना। लोभ, मोह और अहंकार के भवबंधनों से अपने को न जकड़ जाने देना। इतनी ही योग-साधना सर्वसाधारण के लिए पर्याप्त है। सज्जनता अपनाए रहना, शालीनता को हाथ से न जाने देना, सहृदय एवं भाव-संवेदना से प्रेरित उदारता को स्वभाव में सम्मिलित रखना। नियमित, व्यवस्थित और आदर्शवादी जीवन जीना। यह गुण-कर्म-स्वभाव की वरिष्ठता किसी आध्यात्मिक साधना से कम नहीं। इसलिए सिद्धपुरुष न सही मानव गरिमा अक्षुण्ण रखे रहने वाले पुण्यपुरुष निश्चित रूप से बनकर रहता है। उसकी भी सद्गति ही होती है। जीवन की सार्थकता इतने भर से सध जाती है।
इससे अगले प्रकार की साधना वह है, जिसमें तप−तितिक्षा को सहना पड़ता है। जन्म-जन्मांतरों की पशु-प्रवृत्तियाँ मनुष्य जीवन के साथ भी बँधी-चिपकी चली आती हैं, वे सहज छूटती नहीं। अनगढ़ व्यक्ति नर-पशुओं-सा ही जीवन जीते हैं। उन्हें मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अंकुश अपनाते नहीं बनता। अस्तु मनःक्षेत्र में कुत्साएँ तज्जनित कुंठाएँ सदा घेरे रहती हैं और व्यक्ति को खिन्न-उद्विग्न बनाए रहती हैं। इस गंदगी से प्रयत्नपूर्वक जूझना- इंद्रियनिग्रह और मनोनिग्रह में कड़ाई बरतना तितिक्षा वर्ग में आता है। आदर्शों के परिपालन में त्याग करना और साहस दिखाना पड़ता है। यह मनोयोग ही आत्मोत्कर्ष है। उत्कृष्ट चिंतन, आदर्श चिंतन और मृदुल व्यवहार को स्वभाव का अंग बना लेना मध्यवृत्ति का योगाभ्यास है। इसी को कहते है— असंस्कृत से सुसंस्कृत बनना। शरीर से सत्कर्म और मन से सद्भाव क्रियांवित होते रहें तो समझना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष का उपक्रम अपनी गति से ठीक तरह से चल रहा है।
सेवा कार्य में कष्ट सहना पड़ता है। असुर अपराधीजनों का विरोध करने या उनके हाथ न आने पर कोप का भाजन बनना पड़ता है। इस आधार पर भी विपत्तियाँ टूटती हैं। आदर्शवादी से दुर्जनों को खतरा दिखता है, इसलिए वे उसे दूर हटाने की चेष्टा में भी कुछ कमी नहीं रहने देते। प्रतिकार करने या सहन करने में दोनों ही तरह क्षति उठानी पड़ती है, इसलिए आदर्शों के लिए कष्ट सहन भी तप माना गया है। गाँधी के सत्याग्रहियों, स्वतंत्रता सेनानियों को भी अपने ढंग का तपस्वी कह सकते हैं।
तीसरी श्रेणी उन वैज्ञानिक स्तर के योगियों की है, जो आत्मसत्ता में सन्निहित दिव्यशक्तियों को उठाते और जगाते हैं। इसके लिए उन्हें बीज की तरह गलना और खाद-पानी, रखवाली की आवश्यक व्यवस्था बनाते हुए परिपुष्ट वृक्ष के रूप में फलित होना पड़ता है। मस्तिष्क की मात्र 7 प्रतिशत शक्तियाँ प्रयोग में आती हैं। 93 प्रतिशत ऐसी हैं, जिसका न अभी तक खोजना संभव हुआ है, न प्रयोग करना। इस प्रकार मेरुदंड, जननेंद्रिय मूल आदि में अवस्थित नाड़ीगुच्छकों में भी भौतिक जगत की प्रकृतिगत अनेकानेक क्षमताएँ विद्यमान हैं। कार्यसत्ता वस्तुतः एक दिव्य प्रयोगशाला है, उसमें सूक्ष्मीकृत ऐसे यंत्र-उपकरण लगे हुए हैं, जिनके सहारे अणु-परमाणुओं के साथ संपर्क साधा और उन्हें जिस दिशा में, जिस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करना हो, उसे मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। यह तंत्रविधान है, शक्ति का उत्पादक। जिस प्रकार सामर्थ्यवान यंत्र काम करते हैं, उसी प्रकार तंत्र का भी अभीष्ट प्रयोग किया जा सकता है। इस राह पर चलने वाले सर्वप्रथम अपनी जीवनचर्या ऐसी बनाते हैं, जो उद्देश्य की पूर्ति में भी सहायक हो।
आत्मा के उत्कर्ष अभ्युदय में ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग का समावेश है। इसे व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय ढाँचे में ढालना भी कह सकते हैं। इस निमित्त गुण, कर्म, स्वभाव के सभी पक्ष इस प्रकार ढालने-बदलने, मोड़ने-मरोड़ने पड़ते हैं कि विधान सर्वप्रथम अपने ऊपर प्रभाव छोड़े। इसके उपरांत किसी अन्य को तदरूप प्रभावित करें।
मानवी शरीर और अंतःकरण के दोनों पक्षों में सूक्ष्मशक्तियों के अपार भंडार भरे पड़े हैं, पर उनका उपयोग न होने से निःचेष्ट और निर्जीव हो जाते हैं, इसलिए उनका उपयोग करते रहना आवश्यक है। सैनिकों को समय-समय पर चाँदमारी की प्रतियोगिता में सम्मिलित होना पड़ता है। इससे सैनिकों की पकड़ भी बनी रहती है और बंदूकों की सफाई भी होती रहती है।
सूर्य की बिखरी किरणों में सीमित गर्मी होती है; पर यदि छोटे से आतिशी शीशे पर उन्हें केंद्रित कर लिया जाए तो तत्काल अग्नि प्रकट होती है। इसी प्रकार व्यष्टिसत्ता के बिखराव को भी यदि समेट लेने की कला हस्तगत हो जाए तो उस प्रयोग के चमत्कारी प्रतिफल सामने आते हैं।
एकाग्रता के लिए यों लोग जप और ध्यान का प्रयोग अपनाते हैं और उसमें आंशिक सफलता भी मिलती है; पर यदि उच्चस्तरीय क्षमताओं का पुंज संचित करना हो तो फिर कुछ तपश्चर्या स्तर के कार्यक्रम भी अपनाने पड़ते हैं। ऐसे प्रयोगों में एकांत सेवन, मौन, आहारसंयम और ब्रह्मचर्य का विशेष महत्त्व है। योगीजन वन्य प्रदेश में रहकर पर्वतीय गुफाओं में जो साधनाएँ करते हैं, उनमें उन्हीं तीन अनुबंधों का समावेश होता है। कंद-मूल, फल का आहार ऋषि करते थे, पर अब वैसे बन नहीं रहे। अमृताशन-खिचड़ी, शाकाहार, छाछ जैसी वस्तुओं पर घर-गाँवों में रहने वाले तपस्वी भी निर्वाह कर सकते हैं। मौन जिह्वा पर जटिल अंकुश को नहीं कहते; वरन उसे मानते हैं जिसमें आदर्शों की कहने-सुनने की छूट किसी नियत समय पर रहे। एकांत सेवन गुफा की तरह ऐसे कमरे में भी हो सकता है जहाँ आवागमन, वार्त्तालाप या धमा-चौकड़ी का माहौल न हो। आत्मचिंतन में विघ्न उपस्थित करने वाली परिस्थितियाँ न हों। इस प्रयोजन के लिए ऐसे कमरे का चुनाव किया जाए जहाँ से आकाश दिखता हो। खुली वायु और सूर्य की ऊर्जा का आवागमन हो। कभी गुफाएँ इस कार्य के लिए आवश्यक मानी जाती थीं, पर अब उस कार्य के लिए उपयुक्त कमरे झोंपड़े भी काम दे सकते हैं। ऋषियों में से अधिकाँश झोंपड़े बनाकर रहते थे जिनमें वायु और धूप का आवागमन रहता था। आज मध्यवर्ती अध्यात्म प्रयोगों के लिए कोलाहलरहित एकांत, सार्थक सीमित कथन, श्रवण का मौन पर्याप्त है। आहार में जितनी अधिक सात्विकता बरती जा सके, मात्रा जितनी स्वल्प रखी जा सके, उतना ही उत्तम है। श्रद्धापूर्वक की गई साधना सिद्धि प्रदान किए बिना नहीं रहती।
प्रख्यात मौन वह है, जिसमें वाणी से बोलना बंद कर दिया जाता है। आवश्यकता होने पर इशारों से या लिखकर अपना अभिप्राय प्रकट कर देते हैं। यह मौन-साधना उनके लिए अच्छी है, जिन्हें बहुत बोलने की, शेखीखोरी की, गपबाजी करने, निंदा चुगली किए बिना चैन न पड़ने की आदत है। कई लोग पैरों को हिलाते, हाथों को मरोड़ते, बिना खुजली के खुजलाते रहते हैं। कुछ न कुछ किए बिना चैन नहीं पड़ता।
इन अनावश्यक हरकतों से शरीर की-इंद्रियों की सामर्थ्य क्षीण होती है। अनावश्यक रूप से हुए अपव्यय से खजाने खाली हो जाते हैं। फिर अंगों की क्षमता को अकारण नष्ट करने की आदत का तो बुरा प्रभाव होना ही चाहिए। इस कुटेव को छुड़ाने के लिए मौन-साधना का महत्त्व है। विशेषतया जिह्वा का अवरोध तो इसलिए करना पड़ता है कि, असत्य या अनावश्यक वचन न निकालने का अभ्यास हो जाए और वह भी उस स्तर तक पहुँच जाए कि किसी से कहे हुए वचन अपना प्रभाव छोड़ने लगें। उसे सत्परामर्श देकर उपयोगी मार्ग पर चला सकें। वक्तृता में इतनी क्षमता उत्पन्न हो जाए कि उसका प्रभाव आशाजनक पड़ने लगे। वह वाणी किस काम की, जिसका कथन कतरनी की तरह चलता रहे। वस्तुतः जो कुछ कहा जाए, वह शब्दवेधी बाण की तरह काम में आ सके, ऐसी वाणी हो। विश्राम पाने के उपरांत नई शक्ति अर्जित होने की बात सर्वविदित है। थकान दूर करने, हृदयाघात, रक्तचाप आदि में डाक्टर अधिक समय विश्राम करने की बात कहते हैं। अतः जिह्वा को भी कुछ समय के लिए विश्राम दिया जाए तो उसकी कुटेवें छूटती हैं और विश्राम के उपरांत नए सिरे से कार्यरत होने पर उसे आवश्यक नया प्रशिक्षण भी आसानी से दिया जा सकता है।
पूजा, प्रार्थना, मंत्रोच्चारण जप आदि जिह्वा के सहारे ही बन पड़ते हैं। यदि जिह्वा पवित्र न हो तो उससे मंत्रशक्ति उत्पन्न नहीं होती, न उसकी पुकार देवलोक तक पहुँचती है। शाप, वरदान देने जैसी क्षमता भी उत्पन्न नहीं होती। इसलिए शरीर स्नान करने से भी प्रथम मुखमार्जन करना पड़ता है। उपासनात्मक कर्मकांडों का शुभारंभ आचमन से किया जाता है। कारण कि जिह्वा को पवित्र करने के उपरांत ही दिव्य प्रयोजनों का बन पड़ना संभव होता है। शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इसी की प्रमुखता है। जो सवेरे स्नान नहीं कर सकते वे भी उठते ही कुल्ला तो करते हैं। जितनी बार भोजन किया जाता है उतनी बार भोजन के अंत में कुल्ला करने-आचमन करने की प्रथा है। शरीर के समस्त अंगों की तुलना में शुद्धिकरण का ध्यान मुख-क्षेत्र में अधिकाधिक रक्खा जाता है। इससे पाचनतंत्र की समूची नलिकाएँ प्रभावित होती हैं। कितने ही व्यक्ति सवेरे उठकर एक गिलास पानी पीते हैं, इससे जिह्वा सहित पाचनतंत्र की शुद्धता होती है और उष्णता-उत्तेजना दूर होकर शांति का वातावरण बनता है।
अच्छा हो मौन साधने के अवसर पर आहारशुद्धि का भी ध्यान रक्खा जाय। जिह्वा को ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय दोनों ही माना गया है। भोजन प्रयोजन में वह कर्मेंद्रिय रहती है और वार्त्तालाप में ज्ञानेंद्रिय बन जाती है। उसकी द्विधा प्रक्रियाओं का परिशोधन करने के लिए आहारशुद्धि का ध्यान रखना भी नितांत आवश्यक है।
उपवास में दूध-छाछ, रसादि का प्रयोग किया जाए। इतना न बन पड़े तो शाकाहार, फलाहार का अवलंबन लिया जा सकता है। अन्यथा अस्वाद व्रत तो निभाना ही चाहिए। शक्कर और नमक, मसाले छोड़ देने भर से अस्वाद व्रत निभ जाता है। जिह्वाशुद्धि के लिए पानी में नींबू डालकर उसके कुल्ले प्रातः-मध्याह्न-सायंकाल तो करने ही चाहिए।
यह बहिर्मौन की विधा हुई। इसके अतिरिक्त अंतर्मौन अध्यात्म प्रयोजनों के लिए आवश्यक है। बहिर्मौन केवल बाह्यजीवन को प्रभावित करता है। इसलिए उसे अपूर्ण माना गया है। अंतर्जीवन और बहिर्जीवन दोनों पक्षों को मिलाकर एक पूर्ण जीवन बनता है। दोनों को मिला देने पर ही समग्रता आती है।
जिस प्रकार बहिर्जीवन में हाथ-पैर इंद्रियाँ और धड़ संस्थान के भीतरी अवयव काम करते हैं। उसी प्रकार अंतरंग जीवन में विचार संस्थान की घुड़दौड़ चलती है। कल्पना, विचारणा, इच्छा आदि के चित्र-विचित्र उफान उठते रहते हैं। कामनाएँ और कल्पनाएँ दोनों ही परस्पर प्रतिस्पर्धा ठाने रहती हैं। इस धमा-चौकड़ी में न चित्त स्थिर हो पाता है और न ध्यान-धारणा का क्रम बनता है। उच्च विचारों को प्रवेश करने की भी उसमें गुंजाइश नहीं रहती। न अध्यवसाय के लिए क्रम बनता है, न निदिध्यासन के लिए। ऐसी दशा में भगवत्भक्ति का सुयोग बने ही कैसे? ब्रह्मरंध्र और सहस्रार कमल का जागरण भी इस स्थिति में संभव नहीं और न कुंडलिनी जागरण, षट्चक्र-वेधन, पंचकोशों का उत्थान जैसी महती साधना के लिए मार्ग ही बनता है। मेले-ठेले की घिच-पिच में रास्ता चलना तक दूभर हो जाता है। एकदूसरे को धकेलते हुए ही आगे बढ़ते हैं। उस माहौल में कहीं शांत चित्त बैठना जैसा कृत्य तो बन ही नहीं पड़ता। इसलिए यह भी आवश्यक है कि अंतर्मौन का अभ्यास किया जाए। जिस प्रकार जीभ से हर समय बोलते और खाते रहने से वह चंचल, लोलुप और अस्त-व्यस्त होती है, उसी प्रकार मनःक्षेत्र में अनेक प्रकार की विचारणाएँ उठते रहने पर भी यही होता है। अध्यात्म-क्षेत्र की समस्त धाराएँ विलीन करके एक केंद्र पर ध्यान एकत्रित करना पड़ता है। इस स्थिति को निर्विचार कहते हैं। कहा जाता है कि मस्तिष्क को निर्विचार करना चाहिए। तब अनतर्मौन बनता है; पर यह कहने में जितना सरल है, उतना करने में नहीं। यह समाधिवस्था है, जिसमें कोई भी विचार मन में नहीं रहता, तब भी हृदयस्थ आत्मज्योति में अथवा ब्रह्मांड मध्य ब्रह्मरंध्र में लय करना पड़ता है। अन्यथा खुली छूट रहने पर तो वह एक स्थान पर टिकेगा नहीं। यदि रामायण पढ़ी जाए तो उसका कथानक कभी कहीं से-कभी कहीं से याद आता रहेगा। उस समय की परिस्थिति अथवा कथोपकथन मस्तिष्क में घूमता रहेगा। यही बात स्रोत-पाठ आदि के संबंध में भी है। इसमें इष्टदेव की जैसी आकृति-प्रकृति है, वह भी मस्तिष्क में घूमती रहेगी। विचार चाहे देवताओं के हों, अवतारों के हों; इतिहास के हों, पर अपना सुझाव, विचार मन में आते ही रहेंगे। तब विचारहीन स्थिति बन नहीं पड़ेगी और अंतर्मौन सधेगा नहीं। इसलिए अपने आपको महाप्रलय की स्थिति में शिवतांडव करते हुए अथवा आकाश में सूर्यवत् एकाकी चमकते रहने का ध्यान करना चाहिए और साथ ही यह धारणा भी करनी चाहिए कि महाप्रलय की स्थिति में संसार में कहीं कोई प्राणी या पदार्थ नहीं है। सर्वत्र महाशून्य की निस्तब्धता छाई हुई है। जब कोई पदार्थ कहीं है ही नहीं, यह मान्यता बनी तो फिर मन को आश्रय लेने का कोई क्षेत्र सीमित नहीं रह जाता। तब वह एकाकी स्थिति में अपने आप में ही लय होता है। तब सूर्य का प्रकाश, शिवतांडव इसके लिए उपयुक्त आधार बनते हैं। यही बात आत्मज्योति से ब्रह्मरंध्र में अपने आपको लय करने से भी बनती है; पर तब अपनी काया का विस्मरण करना पड़ता है। साथ ही शरीर और मस्तिष्क के कलेवर को विस्मरण कर देना चाहिए। यदि काया का स्मरण बना रहा तो मन को उन अवयवों के बिखरने की आशंका रहेगी।
पांडुचेरी अरविंदाश्रम के प्रसिद्ध संगीतज्ञ श्री दलीपराय एक बार इंग्लैण्ड गए और वहाँ के प्रसिद्ध दार्शनिक वर्टण्ड रसेल से मिले। दलीपराय ने अपना परिचय देते हुए अपनी कई पीढ़ियों का बड़प्पन भरा इतिहास सुनाया। यह बात रसेल को अच्छी न लगी उनने कहा— “पूर्वजों की बड़ाई एक सीमा तक ही ठीक है। यदि इसी ओर आगे बढ़ता चला जाए तो अंत में वहाँ पहुंचेंगे, जहाँ हमारे पूर्वज बंदर थे।"
विद्यार्थी नचिकेता अपने पिता वाजिश्रवा की आज्ञानुसार आचार्य यम के पास विद्या पढ़ने के लिए गए। वहाँ उन्होंने आचार्य के पुस्तकभंडार में कितने ही ग्रंथ देखे और पाया कि उनमें प्राणविद्या का असाधारण महत्त्व बताया और यश गाया गया है। उनने पाया कि हठयोग प्रदीपिका का कथन है कि— “प्राण वायु निग्रहित हो जाने से मन एकाग्र होने लगता है। जिसने प्राण को जीत लिया उसने मन जीत लिया और मनोनिग्रह से होने वाले लाभों पर अधिकार कर लिया।”
“इंद्रियों का स्वामी मन है और मन पर अंकुश प्राण का रहता है, इसलिए जितेंद्रिय बनने वाले को प्राण की साधना करनी चाहिए।”
जावाल दर्शनोपनिषद् का कथन है कि— “प्राणायाम से चित्त की शुद्धि होती है। चित्त शुद्ध होने पर अनेक तर्कों और जिज्ञासाओं का समाधान स्वयमेव हो जाता है।” प्रश्नोपनिषद् में उल्लेख है— “इस शरीररूपी ब्रह्मपुरी से प्राण ही कई प्रकार की अग्नियाँ बनकर दहकता है।”
प्राण का दर्शन किस रूप में किस स्थान पर हो सकता है, इस संदर्भ में त्रिशिखोपनिषद् में कहा गया है कि— “मूलाधार चक्र में निवास करने वाली आत्मतेजरूपी अग्नि जीवनीशक्ति है। यह प्राणरूपी आकाश में प्रकाशवान कुंडलिनी है।”
रुद्रषामल तंत्र में लिखा है— "बिजली की बेल के समान तपते हुए सूर्य के समान अग्निरूपी यह शक्ति मूलाधार-क्षेत्र से ऊपर चढ़ती हुई दिखती है।"
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में कहा है— “यह प्राण ही ब्रह्म है। यही सम्राट है। वाणी उसकी रानी है। कान उसके द्वारपाल हैं। नेत्र अंगरक्षक हैं। इंद्रियाँ दासी हैं। देवताओं ने यह सारे साधन प्राणब्रह्म के लिए जुटाए हैं।”
अथर्ववेद की श्रुति है- “उस प्राण को नमस्कार है, जिसके अधीन यह सारा जगत है, जो सबका ईश्वर है, जिसके भीतर यह सारा ब्रह्मांड समाया हुआ है।
ब्रह्मोपनिषद् का कथन है— “यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है। यही सूर्य, मेघ, इंद्र, वायु, पृथ्वी तथा मूल समुदाय है। सत्-असत् तथा अमृतस्वरूप ब्रह्म यही है।” शतपथ का कथन है। यह प्राण ही निश्चित रूप से अमृत है। छांदोग्य में कहा है— "इस प्राण की शक्ति आशा से अधिक है।” बृहदारण्यक में कहा गया है— “प्राण ही यश और बल है।”
ताण्डय का कथन है- “प्राण काे जागृत कर लेना ही महान जागरण है” जो ज्ञानी प्राण के रहस्य को जान लेता है, उसकी परंपरा अमर हो जाती है।
ऐसे-ऐसे अनेक कथनों को पढ़ने पर नचिकेता की जिज्ञासा प्राणतत्त्व को जानने हेतु जगी। उसने आचार्य ‘यम’ से उसके संबंध में अधिक जानने की जिज्ञासा प्रकट की। यम कितने ही दिनों तक उसकी पात्रता परखते रहे और बात को आगे के लिए टालते रहे। उनके अनेक प्रलोभनों वाले साधनों को सीख लेने की बात कही; पर जब वह उसी ज्ञान का आग्रह करता रहा तो यम ने पंचाग्नि विद्या का रहस्य बताया। इसके सूत्र-संकेत प्रश्नोपनिषद् में मिलते हैं।
अग्नियाँ तीन हैं। आह्वनीय, दक्षिणाग्नि और आहिताग्नि। फिर पंचाग्नि से क्या अभिप्राय? यह पाँच कोशों की साधना है। इसी को पंचाग्नि विद्या कहा गया है।
मंत्र विज्ञान सुविस्तृत है। मंत्र महोदधि और कुलार्णव तंत्र में अनेकानेक मंत्रों का उल्लेख और विधि-विधान बताया गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि- “प्राणरहित शरीर में जैसे कुछ काम करने की शक्ति नहीं रहती। उसी प्रकार बिना प्राण को जागृत किए किसी मंत्र की पुरश्चरण-साधना सफल नहीं होती।”
मारकण्डेय पुराण में कहा गया है कि— “जैसे हाथी महावत की इच्छानुसार अपनी चाल चलता और बदलता है, उसी प्रकार सिद्ध किया हुआ प्राण अभीष्ट प्रयोजनों में निरत रहता है।”
जैसे पाला हुआ चीता मृगों को ही मारता है, पालने वाले को नहीं। उसी प्रकार निग्रहित सिद्ध प्राण अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति करता है। साधक को हानि नहीं पहुँचाते।
प्राणतत्त्व को कितनों ने ही कास्मिक एनर्जी— 'दैवीतत्त्व' कहा है और कई उसे “विजुअल लाइफ” प्रत्यक्ष जीवन कहते हैं। वस्तुतः वह ऐसी शक्ति है, जिसे अपने निजी भंडार में भरते हुए अधिकाधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है। जो कार्य घर में जनरेटर होने पर उसके प्रयोग से हो सकते हैं, उसी स्तर के मानवी कार्य इस क्षमता के आधार पर हो सकते हैं। उसे परमार्थ प्रयोजनों में भी लगाया जा सकता है।
विशेषतया इसका प्रयोग रोगों के निवारण में हो सकता है। 'मैस्मरेजम विद्या' में उसके कुछ उपचार लिखे भी हैं और वे कारगर भी होते हैं। किसी दुर्बल मन वाले को यह अनुदान भी दिया जा सकता है। शक्तिपात के रूप में किसी दुर्बल प्राण वाले को सबल प्राण जैसा बनाया जा सकता है। इस क्षमता वाले के शाप-वरदान भी फलते हैं। उसको उपचार या प्राण-प्रहार दोनों ही रूपों में प्रयुक्त किया जा सकता है। प्राणायाम की गरिमा अखिल विश्व से प्राणतत्त्व— 'वायरल फोर्स' को खींचकर साधक के मनःक्षेत्र में भर देने के रूप में बताई गई है।
स्वसंचालित नाडी-संस्थान ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम जब किसी अन्य उपाय से नियंत्रण में नहीं आता तब प्राणतत्त्व ही उसे वश में करता है। हारमोन तत्त्वों-अंतःस्रावी ग्रंथियों पर अन्य किसी उपाय से नियंत्रण स्थापित नहीं किया जा सकता, किंतु जागृत हुए प्राण द्वारा यह नितांत कठिन कार्य भी सरल हो जाता है।
संस्कृत में प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से होती है। अन् धातु (प्राणने) जीवनीशक्ति चेतना वाचक है। इस प्रकार प्राण शब्द का अर्थ चेतनाशक्ति होता है। प्राण और जीवन प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।
यह प्राणतत्त्व, जीवनतत्त्व जब न्यून पड़ता है तो व्यक्ति हर दृष्टि से लड़खड़ाने लगता है और जब वह समुचित मात्रा में रहता है तो समस्त क्रियाकलाप ठीक तरह चलते हैं। जब वह बढ़ता है तो उस अभिवृद्धि को बलिष्ठता, समर्थता, सतर्कता, तेजस्विता, मनस्विता, प्रतिभा आदि के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति ही महाप्राण कहलाते हैं। वे अपना प्राण असंख्यों में वितरित करते और अनेकों को अपनी नाव पर बिठाकर पार करते हैं।
कई व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से समर्थ और मानसिक दृष्टि से सुयोग्य होते हैं; पर अंतःकरण में साहस न होने के कारण कोई महत्त्वपूर्ण कदम नहीं उठा पाते। शंका-आशंकाओं से असमंजस में पड़ी मनःस्थिति में न तो कोई साहसिक निर्णय कर सकना बन पड़ता है और न अवसर का लाभ उठा सकना ही संभव होता है। इसके विपरीत मनस्वी व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा, साधन, सहयोग, अवसर आदि की कठिनाइयाँ रहते हुए भी दुस्साहस भरे कदम उठाते और आश्चर्यचकित करने वाली सफलताँ प्राप्त करते हैं।
प्राणवान होने के लिए साहस भरे कामों में हाथ डालना और उन्हें पूरा करके ही रुकना ऐसा उपाय है, जिस आधार पर प्राणशक्ति निरंतर बढ़ती ही जाती है। इन्हीं उपायों में एक प्राणायाम का अभ्यास भी है, जिसके अनेकों रूप प्रचलित हैं।
एक व्यक्ति ने कितने ही योगाभ्यास करके कितनी ही सिद्धियाँ उपार्जित कीं। वह बत्तख की तरह पानी पर चल सकता था। चिड़ियों की तरह आसमान में उड़ सकता था।
प्रदर्शन हो चुका कि इस उपलब्धि से आपका और अन्य किसी का क्या लाभ हुआ। जो काम नाव और पतंग कर सकती है, उसके लिए इतना समय गँवाने और कष्ट सहने की क्या आवश्यकता थी।
आत्मविद्या के पारंगतों ने मनोनिग्रह के लिए नादयोग की साधना को अमोघ-अस्त्र की तरह पाया है और कहा है कि उस आधार पर मन की चंचलता को काबू में किया जा सकता है और निग्रहित मन अपनी एकाग्र शक्ति से भौतिक एवं आत्मिक स्तर की अनेकानेक सफलताएँ प्राप्त कर सकता है।
बाराहोपनिषद् में कहा गया है कि— जिस प्रकार सपेरा बीन बजाकर सर्प को मोहित करता और पकड़कर पिटारी में बंद कर लेता है, उसी प्रकार नादब्रह्म श्रवण द्वारा मन को एकाग्र रहने के लिए बाधित किया जा सकता है।
मारीचि तंत्र में इसी प्रसंग में हिरण और व्याघ की उपमा देते हुए कहा है कि वंशी की ध्वनि पर मोहित मृग भी इसी प्रकार पकड़ा जाता है। उसी प्रकार मन को भी कुमार्गगामी होने से रोककर इच्छित प्रयोजन में लगाया जा सकता है।
योग रसायनम् में नादयोग का प्रत्यक्ष जीवन पर प्रभाव बताते हुए कहा है कि- नादयोग द्वारा प्राण वायु को हृदय स्थान में रोग सकने वाला योगी-रूप लावण्यमयी दिव्य देह का स्वामी हो जाता है। प्रतापी बनता है, प्रतिभा निखरती है और उसके शरीर में से दिव्य गंध आने लगती है।
आगे उसी ग्रंथ में कहा गया है कि— इंद्रियों का स्वामी मन है। मन का स्वामी प्राण। प्राण का स्वामी लय और लय का अधिपति नाद है। इसलिए नाद की गरिमा सर्वोपरि है।
नादबिंदु उपनिषद् में कहा गया है कि— नादानुसंधान से चित्त शांत हो जाता है। दिव्य रस का आस्वादन करने लगता है। फिर उसका मन, वासना एवं तृष्णा की ओर नहीं दौड़ता।
शिव पुराण में नादयोगी को सुनाई पड़ने वाली ध्वनियों का वर्णन है (1) काँसे की थाली पर चोट मारने जैसी झनझनाहट (2) समुद्र गर्जन जैसा घोष (3) तुरही बजने जैसी आवाज (4) घंटा बजने जैसी (5) वीणा बजने जैसी (6) वंशी जैसी (7) दुंदुभि जैसी (8) नगाड़े जैसी (9) शंख जैसी (10) मेघ-गरजन जैसी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। बीच-बीच में पायल बजने, कोकिल कूकने, बुलबुल चहकने, सितार बजने और कभी सिंह दहाड़ने जैसी ध्वनियाँ भी सुनाई देती और लुप्त होती रहती हैं।
इन भिन्नताओं का कारण जावाल दर्शनोपनिषद् में बताया गया है कि नाद द्वारा प्राण अवरुद्ध होकर शरीर के किस क्षेत्र में ठहर रहा है, इसी के अनुसार इन ध्वनियों का उभार होता है। जिस क्षेत्र को बलिष्ठ बनाना हो वहाँ प्राण रोककर यह जानना चाहिए कि किस प्रकार के नाद का उत्थान हुआ। उस नाद को धारण-प्रगाढ़ करते रहने पर चित्त और प्राण दोनों ही उस स्थान पर रुककर सुधार एवं विकास का कार्य आरंभ कर देते हैं।
योगशास्त्रों में ध्वनियों का विभाजन दो भागों में किया गया है, एक आहत दूसरी अनाहत। आहत उसे कहते हैं जो किसी हलचल या टकराहट के कारण होती है। अनाहत उसे कहते हैं जो अधिक दिव्य होता है। चेतना, देवता अथवा ब्रह्मरंध्र में दैवी संपर्क से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें अनाहत कहते हैं।
आहत ध्वनियों का अभ्यास साधक को इस प्रकार की सिद्धावस्था में ले जाता है, जिससे वह जान सके कि दृश्य या अदृश्य जगत में पदार्थों की-घटनाओं की क्या संभावना पक रही है। हाँडी में चावल पकाने पर जो आवाज सुनाई पड़ती है, उससे प्रतीत होता है कि हाँडी के भीतर क्या स्थिति चल रही है। इसी प्रकार संसार के विभिन्न क्षेत्रों में कहाँ-क्या-कुछ हो रहा है या होने जा रहा है, इसका बोध आहत शब्दों के अभ्यास से होता है। तंत्र ग्रंथों में इस साधना को कर्णपिशाचिनी अथवा ‘यक्षिणी’ कहा गया है, जो पूछने पर दूर-दूर के समाचार एवं संभावित आधारों का विवरण इस प्रकार बताती है मानो कान में मुँह लगाकर सारा घटनाक्रम बता गई हो।
अनाहत शब्दों का स्वरूप विशुद्ध आध्यात्मिक होता है। उसमें आत्मा और परमात्मा के बीच का आदान-प्रदान चलता है और इतना मोदक एवं मोहक होता है कि अपने आपे का होश-हवाश भूलकर साधक समाधि जैसी योगनिद्रा में चला जाता है। इस स्थिति की उपमा रात्रि के समय भौंरे के कमलपुष्प में बंद हो जाने से दी है। वह उसके गंध पर इतना मुग्ध हो जाता है कि छोड़ने का वापस जाने का मन ही नहीं करता। इस स्थिति को लय कहा गया है। यह पूर्ण समाधि का पूर्व रूप है। जिस प्रकार प्राणयोग में जड़-समाधि लग जाती है और शरीर जीवित रहते हुए भी मृतकवत् हो जाता है, वैसी स्थिति तो नहीं आती, पर सुधि-बुधि भूल बैठना स्वाभाविक है। परमहंस स्तर के योगीजन की यही दशा निरंतर बनी रहती है।
नाथ संप्रदाय एवं कबीर संप्रदाय में जिस सुरति योग का वर्णन किया है और कई ऊँचे लोकों में जा पहुँचने का अनुभव बताया है, वह अध्यात्म-क्षेत्र की सात भूमिकाओं में से किस तक पहुँचना हो सका इसी का वर्णन है।
अद्वैतवादी नाद-साधना में ॐकार ध्वनि को प्रमुख मानते हैं। उनका कथन है कि सृष्टि के आदि में प्रकृति और पुरुष का समावेश होने पर घड़ियाल में हथौड़ा मारने पर जो थरथराहट भरी ध्वनि होती है। वही ॐकार का वास्तविक स्वरूप है। यह केंद्र अब भी उसी प्रकार चल रहा है। घड़ी के पेंडुलम में जिस पर एक छोर से दूसरे छोर पर पहुँचने से खट-खट की आवाज होती है। उसी प्रकार सृष्टिक्रम चलने में भी यही घड़ियाल एवं हथौड़ी के आघात से उत्पन्न होने वाली झनझनाहट के आधार पर ही विश्व-व्यवस्था चल रही है। यह परब्रह्म का अनाहत— स्वघोषित नाद है। अतएव ॐकार का उच्चारण नहीं, ध्यान किया जाना चाहिए। इसी रस्सी के सहारे उस स्थान तक पहुँचा जा सकता है। जहाँ से कि प्रकृति और पुरुष में समागम हुआ है।
इस ॐकार साधना के समतुल्य ही ‘सोऽहम्’ साधना है, उसमें नासिका से वायु खींचते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ का शब्द साँस के साथ होते रहने की धारणा की जाती है। इस सोऽहम् में भी बीजरूप में ॐकार छिपा हुआ है। वेदांत दर्शन के प्रमुख सूत्रों का विस्तार इसी आधार पर हुआ है। शिवोऽहम्–सच्चिदानंदोऽहम् का वेदांत भी ॐकार मूलक है।
गायत्री मंत्र का विस्तार भी इसी आधार पर हुआ है। प्रथम ॐकार की उत्पत्ति हुई। उससे तीन व्याहृतियाँ भू’ भुवः स्वः बनी। फिर इनमें ने एक-एक का विस्तार गायत्री के तीन चरणों में हो गया। वेदों का कोई भी मंत्र-उच्चारण करने से पूर्व उसके साथ सर्वप्रथम ‘ॐ’ जोड़ने का विधान है। इससे स्पष्ट है कि वेदज्ञान के बीज ॐकार का विस्मरण न किया जाय। गायत्री का अजपा जाप भी वस्तुतः नादयोग का ही एक प्रकार है।
शंख-ध्वनि मंदिरों में होती है। उसकी ध्वनि भी “ॐ”कार के सदृश्य है। शंख के साथ घड़ियाल बजाने की भी परंपरा है। नादयोग के अभ्यास में कई मार्गदर्शक अपने शिष्यों को शंख-ध्वनि और घड़ियाल की टंकार को मंदिर में सुनकर उसी की अनुकृति सूक्ष्मकर्णेंद्रिय में जमाने की सलाह देते हैं। सरस्वती का सितार, शंकर का डमरू, कृष्ण की वंशी आदि को भी नादयोग का माध्यम बनाया जाता है।
नादब्रह्म, शब्दब्रह्म का योगशास्त्रों में विशेष वर्णन है। नादब्रह्म से संगीत उपजा, सात स्वरों का आविर्भाव हुआ यही सात लोक हैं। शब्दब्रह्म में जप-नामोच्चार का प्रकरण आता है। यह सारा परिकर नादयोग से ही प्रादुर्भूत हुआ है। उसमें प्रकारांतर से हर क्षेत्र की ऋद्धियों और सिद्धियों का समावेश है।
महापुरुषों में ही महापुरुष उत्पन्न करने की क्षमता होती है। हाथियों के समूह में ही हाथी बढ़ते और पलते हैं। मूषक तो कुतरने वाली बिरादरी में ही बढ़ते हैं।
इच्छा करना और उसकी पूर्ति होना दो पृथक-पृथक बातें हैं। इच्छाएँ करते रहने भर से वे पूरी नहीं हो जातीं; वरन उनको प्राप्त करने लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है, अन्यथा कल्पनाएँ मनोरंजक बेपर की उड़ाने ही बनकर रह जातीं। मूल्यवान वस्तुएँ कूड़े या घूरे के ढेर में पड़ी नहीं मिलतीं। उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर साहसी पनडुब्बे की तरह मोती बीनने पड़ते हैं।
स्वयंवर में उपस्थितजनों में से हर किसी के गले में विजय-वैजंती नहीं पहनाई जाती। उनमें से जो अनुरूप लगता है, अन्यों से श्रेष्ठ प्रतीत होता है, उसी का चयन एवं वरण होता है। बादल पानी बरसाते तो सभी जगह हैं, पर उनका बड़ा भाग उन नदी-सरोवरों के हाथ आता है, जिनने अपनी गहराई पहले से ही अधिक बना रखी है। अनुग्रह में कोई पक्षपात न होने पर भी टीले और चट्टान पहले जैसे सूखे थे वैसे ही बने रहते हैं। उनके लिए समूची बरसात ऐसे ही चली जाती है, जबकि उर्वरभूमि में मानसून आते ही हरीतिमा उगने और बूँदें पड़ते ही इसकी हरियाली से सर्वत्र हरा फर्श बिछता है।
दाता के अनुग्रह की सराहना की जानी चाहिए, पर उसे भी अविवेकी नहीं मानना चाहिए। सोचना चाहिए कि “सब धान बाइस पसेरी पीसने वाले” “आँखों के अंधे-गाँठ के पूरे” कोई बिरले ही होते हैं। अन्न देने वाला हजार बार सोचता है कि जो दिया गया है, उसका सदुपयोग करने की क्षमता उसमें है या नहीं। जिसकी सुरक्षा नहीं की जा सकती, वह दूसरों के हाथ पड़ता है और इस छीन-झपट में वह घाटा ही उठाता है, जिसे किसी की कृपा का अप्रत्याशित अनुदान मिला था। प्राप्त करने के याचना से लेकर चोरी करने तक के अनेक तरीके हो सकते हैं, पर उपलब्धि की सुरक्षा बलिष्ठता, हिम्मत एवं सूझ-बूझ के सहारे ही बन पड़ती है।
सिंहासन बत्तीसी की कहानी है कि राजा विक्रमादित्य का स्वर्णसिंहासन किसी टीले में गड़ा था। उस टीले पर जो कोई भी जा बैठता, विद्वानों की-सी बातें करता। समाचार राजा भोज तक पहुँचा। वहाँ खुदवाया गया, तो शोभायमान सिंहासन निकला। राजा ने उसे अपने उपयोग में लेने का निश्चय किया। मुहूर्त निकला, पर जैसे ही वह पैर रखने को हुआ, वैसे ही सिंहासन की बत्तीस स्वर्णपुतलियों में से एक बोली— “विक्रमादित्य के से गुण होने पर ही इसमें बैठने के अधिकारी बन सकते हो।” पूछने पर पुतलियों ने बारी-बारी करके विक्रमादित्य की विशेषताओं का वर्णन किया। जब भोज ने अपने में वैसी विशेषताएँ नहीं पाई, तो पुतलियाँ सिंहासन को आकाश में उड़ा ले गई।
इस कथानक को उन सभी प्रसंगों में प्रयुक्त किया जा सकता है, जिनमें उपलब्धियों की सुरक्षा का प्रश्न सामने आता है और सदुपयोग— सुरक्षा का प्रश्न हल न कर पाने पर जो मिलने वाला था या मिल सकता था, उससे वंचित रहने की ही स्थिति बन जाती है। दाता की वरिष्ठता सभी मानते हैं, पर ग्रहीता की पात्रता के बिना या तो कुछ महत्त्वपूर्ण जैसा मिलता ही नहीं, यदि मिलता है तो वह ऐसे मार्ग से बह जाता है, जिसमें दोनों के रोने-रुलाने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं आता। इससे तो अच्छा होता कि कुछ प्राप्त करने से पूर्व अपनी स्थिति, योग्यता और पात्रता को संभाला-सुधारा जाए।
लोक-व्यवहार में यही चलता है और पारलौकिक सिद्धांतों में भी इसी का कार्यांवयन होता है, दानी लोग सुपात्रों की बढ़-चढ़कर सहायता करते हैं; किंतु कुपात्रों की ओर से मुँह फेर लेते हैं और किसी प्रकार कुछ दे-दिलाकर अपना पीछा छुड़ाते हैं। भिखारियों को कौन निहाल करता है? किंतु ऊँचा उद्देश्य लेकर चलने वाले गाँधी, मालवीय, श्रद्धानंद की झोलियाँ बात-की-बात में भरती रही हैं। यह पात्रता का ही प्रतिफल और चमत्कार है।
यह कथन सही नहीं है कि दानी नहीं रहे, याचक भटकते हैं, पर सही बात यह है कि दानी भटकते हैं और याचक को ढूँढते हैं, पर वे कहीं मिलते नहीं। कन्या के सयानी हो जाने पर उसका पिता उपयुक्त जामाता ढूँढता-फिरता है, मिल जाता है तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वह कन्या का हाथ उसके हाथ में सौंपता है। साथ ही वस्त्रालंकार भी सत्कार समेत भेंट करता है। यह बात महामानवों, सिद्धपुरुषों और देवी-देवताओं की भी है। वे अपनी दिव्यसंपदा सत्पात्रों को सौंपने के लिए आकुल-व्याकुल फिरते हैं, किंतु सत्पात्र कहीं खोजे नहीं मिलते। फिर वे दें किसे? अक्षत-गंध चढ़ाकर ओंधे-सीधे अक्षर रटकर इतने मात्र से जो भक्त बनते हैं और तरह-तरह की मनोकामनाएँ प्रस्तुत करते हैं। यह विचित्र जेबकटी जब सफल नहीं होती तो जिनसे आकांक्षाएँ लगाई थीं उन्हें दर्जनों गाली देते और भक्तिभाव को झूठा बताते हैं। यही है आज की विडंबना, जिससे पूजा और भक्ति के सिद्धांत गलत साबित होते हैं और उलाहने देने-सुनने का अवसर मिलता है।
देवी-देवता और परब्रह्म की विभिन्न फ्रीक्वेंसी हैं। रेडियो स्टेशन से प्रसारण विभिन्न तरंगों पर होते हैं। यह फ्रीक्वेंसी अपनी गतिशीलता पर अलग-अलग स्तर के गद्य-पद्य प्रसारण करती है; पर उन्हें खुले कानों से कहीं भी सुनना चाहें तो कुछ पल्ले न पड़ेगा। सुनने का सही तरीका यह है कि अपने पास रेडियो ट्रांजिस्टर होना चाहिए। उसी के भीतर लगे हुए यंत्र उपकरण प्रसारित आवाज को पकड़ते और सुनाते हैं। एक ही समय में अनेक स्टेशन बोलते हैं। अपनी-अपनी बात कहते हैं, पर वे आवाजें आपस में मिलती नहीं। अलग अलग तरंग-प्रवाहों पर उनकी आवाजें चलती हैं।
सिद्धपुरुष शिष्यों की तलाश में रहते हैं और देवता भक्तों की। समझा इससे ठीक उलटा जाता है कि देवता निर्गुण हैं और सिद्धपुरुष ढूँढे नहीं मिलते; पर बात इससे सर्वथा उलटी है। कुपात्र को कोई धनी-मानी भी अपनी दौलत नहीं लुटाता है। अनमने मन से ही कुछ देकर टालता है। ज्यादा गिड़गिड़ाने पर उसे दुत्कार भी देता है। जिसके पास देने को है उसमें इतनी बुद्धि भी होती है कि किसी को देते समय यह देखे कि लेने वाला प्रामाणिक है या नहीं। जो दिया जाएगा उसका सदुपयोग करेगा या नहीं? यदि प्रतीत हो कि जो दिया जा रहा है उससे दुष्टता या मूर्खता बढ़ने में सहायता मिलेगी तो उदार मन वाला भी हाथ सिकोड़ लेता है।
चापलूसी हर जगह काम नहीं देती। मात्र अहंकारी-अविवेकी ही उस जाल-जंजाल में फँसते हैं। देवताओं या सिद्धपुरुषों को इस स्तर का नहीं समझा जाना चाहिए कि सूखी और झूठी मनुहार के सहारे या छुट-पुट बालविनोद जैसे उपहारों से उन्हें फुसलाया जा सकता है। उचित-अनुचित कैसी ही मनोकामना की पूर्ति के लिए उनका वरदान-अनुदान पाया जा सकता है। ऐसे हथकंडों से तो सामान्य बुद्धि वाले भी अपनी जेब नहीं कटाते फिर देवताओं को क्यों इतना नासमझ माना जाए कि वे नाक रगड़ने-गिड़गिड़ाने वाले हर व्यक्ति को अपना भक्त, साथ ही प्रामाणिक सत्पात्र मान लेंगे। साथ ही कामनाओं की झोली मणि-मुक्तकों से भर देंगे।
देवताओं का-सिद्धपुरुषों का अनुग्रह हर सत्पात्र पर अनायास ही बरसता है। बादल बिना माँगे बरसते हैं। वृक्ष फलते-फूलते और छाया तथा लकड़ी से हर किसी को निहाल करते हैं, पर साथ ही यह शर्त भी जुड़ी हुई है कि जो माँगा जा रहा है उसके पीछे सत्प्रयोजन काम करते हैं। भागीरथ के अनुरोध को गंगा ने टाला नहीं और वे धरती पर बहने के लिए सहमत हो गईं। मारीच-भस्मासुर जैसे वरदान के अवसर पाकर भी अपना सर्वनाश कर बैठे। यह बात सब पर सर्वदा लागू होती है।
अंतःकरण का परीक्षण सुधार और परिष्कार जारी रक्खो, ताकि भौतिक प्रगति और आंतरिक शांति के मार्ग पर द्रुतगति से बढ़ सको।
जिसके साथ चलना या थोड़े समय भी रहना है उसका नाम, गाँव, पता-ठिकाना पूछते हैं। इससे निश्चिंतता होती है कि साथ रहते किसी का कोई उपकार बन पड़े या जोखिम-गदरबाजी हो उस मामले को आगे बढ़ाया जा सके। सर्वथा अपरिचित के प्रति संदेह ही बना रहता है।
अपना आपा सदा अपने साथ रहता है। उसका शरीर पक्ष एवं मन पक्ष इतना घनिष्ठ है कि चौबीस घंटे जागृति एवं सुषुप्ति स्थिति में अपने साथ ही बने रहते हैं। पत्नी को जीवन संगिनी, अर्धांगिनी, दो शरीर एक प्राण आदि विशेषणों से संबोधित करते हैं, पर वह भी कुछ घंटे ही साथ रह पाती है। सो भी कुछ गज फीट दूर। बच्चे कभी-कभी किसी प्रयोजन से निकट आते हैं, यह प्रिय समझे जाते हैं और उनके सुख-दुःख में साझी रहना होता है। इनके भविष्य के संबंध में सदा चिंता बनी रहती है और यथासंभव योजना-व्यवस्था बनती रहती है। फिर शरीर और मनरूपी अंगरक्षकों जैसे निरंतर के साथियों के संबंध में उपेक्षा बरती जाए, यह आश्चर्य की बात है। उनका परिचय एवं प्रयोजन न पूछा जाए, न जाना जाए तो यह कितने अचंभे की बात है।
जीवन जिस आत्मा को मिला है, वह उस प्रयोजन के निमित्त लग रहा है कि नहीं, जिसके लिए वह मिला था? अफसरों को सरकारी बंगला, वाहन आदि मिलते हैं तब उन्हें बाता दिया जाता है कि इनका उपयोग सरकारी कार्यों के लिए ही होना चाहिए, निजी कार्यों के लिए नहीं। कोई अफसर अपने बड़े बंगले में से आधा भाग किराए पर उठा दे, आधे में खुद रहे, मोटर की जब जरूरत पड़े तब स्वयं इस्तेमाल करे और बाकी समय में उसे किराए पर चलाने दिया करे, तो यह कार्य अनैतिक होंगे और पता चलने पर उसे दंड का भागी बनना पड़ सकता है।
जीवन बहुमूल्य है। सृजेता की अनुपम कला-कृति है। ऐसा साधनसंपन्न सुयोग सृष्टि के अन्य किसी प्राणी को नहीं मिला। बुद्धिमत्ता का पिटारा कल्पनाशील मस्तिष्क जैसा मनुष्य को मिला है, वैसा अन्य किसी प्राणी के भाग्य में नहीं बदा। ऐसे अनेक स्थानों से मुड़ने-तुड़ने और दस अँगुलियों वाले हाथ किसको मिले हैं। सीधा खड़ा होकर पैरों के बल चलने जैसी सुविधा और किस प्राणी को मिली है? ऐसे स्वादिष्ट भोजन नियमपूर्वक किसे उपलब्ध होते है? आजीविका उपार्जन और उसे पीछे के लिए भी संग्रह रख सकने की क्षमता किसको है? वस्त्र और मकान का उपयोग और कौन प्राणी करता है? सुव्यवस्थित परिवार बना पाने की बुद्धिमत्ता किसमें है? ज्ञानेंद्रियों की इतनी संवेदनशीलता किसमें है? प्राणियों में सर्वोत्तम स्तर का कलेवर किसे उपलब्ध है? फिर वह मनुष्य को ही मिले तो वह सृष्टा का पक्षपात हुआ। जबकि उसे समदर्शी और न्यायकारी कहा जाता है। मनुष्य को इतनी सुविधा मिले और अन्य प्राणी उससे वंचित रहें तो इसे देखते हुए यही सोचना पड़ता है कि या तो सृष्टा न्यायकारी नहीं है अथवा इतना सुविधासंपन्न जीवन उसे किसी ईश्वर इच्छित विशेष प्रयोजन के लिए मिला है। जैसा कि सरकारी अफसरों को अनेक सहायक सुयोग्य कर्मचारी मिलते हैं और टेलीफोन आदि साधनों की सुविधा रहती है।
यह प्रश्न अति महत्त्वपूर्ण है और ऐसे हैं जिनकी समग्र जानकारी मिलनी ही चाहिए। अन्यथा गलतफहमी में रहने से अनर्थ ही होगा। जब सौंपे हुए प्रयोजन के संबंध में समुचित प्रयास न किया गया होगा और आलस्य-प्रमाद में दिन भर मनोरंजन के सारे साधन खप जाएँ तो सौंपने वाला बड़ा अफसर, जिसकी व्यवस्था में राई-रत्ती अंतर नहीं आता, वह सौंपे गए उत्तरदायित्व के निर्वाह संबंधी लेखा-जोखा माँगेगा तब उत्तर देते न बन पड़ेगा। इतना ही नहीं उस प्रमाद के लिए दंड का भी भागी बनना पड़ेगा।
समुचित दायित्वों के निर्वाह के संबंध में हमें अपने आप का परिचय प्राप्त करना चाहिए और साथ ही समुचित कर्म निर्वाह के लिए जो मिला है उसका संचालन भी जानना चाहिए। इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें आत्मविस्मृति से उबरना चाहिए। यह आत्मविस्मृति ही मायाजाल है। इससे उबरकर जो यथार्थता है उसे समझ लेने को आत्मज्ञान कहते हैं। इसे प्राप्त कर लेने पर, माया की तंद्रा से अपने को उबार लेने पर मनुष्य उस ज्ञान का अधिकारी बन जाता है, जिसे सर्वश्रेष्ठ साध्य कहा गया है।
यहाँ जीव का निजी स्वरूप और उसे उपलब्ध जीवन-संपदा तथा विशिष्ट साधनों की जानकारी उपलब्ध करनी चाहिए। जीवन जिसे सौंपा गया है, वह असाधारण गरिमासंपन्न जीवात्मा है। जीवात्मा ईश्वर का एक अंश एवं युवराज है। उसे वरिष्ठता एवं विशिष्टता इसलिए दी गई है कि वह अपनी त्रुटियों का निष्कासन करते हुए पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचे। ईश्वर में जितनी कुछ विशेषताएँ व विभूतियाँ हैं, वे सभी मनुष्य के अंतराल में बीजरूप में छिपाकर रखी गई हैं। यह इसीलिए कि पात्रता के अनुरूप वह उसका महत्त्व समझे और प्रयत्नपूर्वक उन्हें खोजने का पुरुषार्थ करके हस्तगत करे।
मन को स्वस्थ, समर्थ एवं तत्पर रखना भी एक कला है। उसे जानकर अभ्यास में उतार लेने पर संकल्पबल एवं मनोबल के सहारे वह अपने तथा दूसरों के लिए बहुत कुछ कर सकता है। यही बात शरीर के संबंध में है। उसकी अनुचित छेड़-छाड़ न की जाए तो स्वस्थ, समर्थ, निरोग एवं बलिष्ठ रहकर वह दीर्घ जीवन का आनंद ले सकता है तथा इस समर्थ साधन के सहारे मन की प्रेरणाओं को प्रत्यक्ष चरितार्थ करके दिखा सकता है। इसके विपरीत यदि अनाड़ीपन से काम लिया जाए तो शरीर और मन दोनों ही रुग्ण रहने लगते हैं और ऐसी कुटेवें अपनाते हैं, जिनके कारण जीवन भारभूत लगे और उनका निर्वाह ही भारभूत प्रतीत होने लगे। मनोविकारों से ग्रसित व्यक्ति शरीर और संबंधियों के साथ अपनी कुटेवों के कारण दुर्व्यवहार करने लगते हैं। शरीर पर भी अनुचित भार लादते हैं। फलतः वे जीवात्मा के उत्तरदायित्वों में हाथ बँटाना तो दूर, उद्विग्नता और रुग्णता के शिकार हो जाते हैं। इस स्थिति से हमें बचना चाहिए। अनाड़ी ड्राइवर अच्छी-खासी मोटर को किसी पेड़ से टकराकर खाई-खड्ड में पटक देता है और न केवल वह बहुमूल्य वाहन का, वरन बैठी हुई सवारियों का भी कचूमर निकाल देता है। ऐसी दशा में उसका लाइसेंस भी जब्त हो जाता है।
जीवन की अपूर्णता को पूर्णता तक पहुँचा देना यह इस मानव जीवनरूपी सुयोग में उठाया जा सकने वाला सर्वोत्तम स्वार्थ है। इसे किस प्रकार पूरा किया जाए, उसका एक ही उत्तर है कि भगवान के इस विश्व-उद्यान को सुरम्य-समुन्नत बनाने के लिए कुशल माली की भूमिका निभाई जाए और मानव समुदाय को सुसंस्कृत बनाने के लिए एक भाव भरे अध्यापक की तरह कार्यरत रहा जाए। माली और अध्यापक की दुहरी भूमिका निभाने वाले को इतना वेतन तो सहज ही मिल जाता है कि वह औसत नागरिक स्तर का निर्वाह भली प्रकार कर सके। इसके लिए उसे किसी अनीति, अनाचार का आश्रय न लेना पड़े। मितव्ययिता और सात्विकता का आश्रय लेने वालों को उन दुष्कर्मों को करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती, जिनमें अज्ञानी लोग अनर्थ करते, दुःख पाते, निंदा के भाजन बनते, आत्मप्रताड़ना सहते और दैवी-प्रकोप के भाजन बनते हैं।
इस राजमार्ग पर चलने के लिए हमें आत्मोपासना करनी चाहिए। एक बड़ा-सा दर्पण सामने रखना चाहिए और उसमें अपनी छवि देखते हुए अनुभव करना चाहिए कि इस ईश्वर के राजकुमार को उसके सौभाग्य और उत्तरदायित्व का स्मरण कराने के लिए भाव भरा अनुरोध करना चाहिए। यह आत्मस्वरूप ही सबसे बड़ा देवता है। यदि यह अपने निर्धारित उत्तरदायित्वों को समझे और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर राजमार्ग पर चले तो अपना और समस्त संसार का श्रेयसाधन कर सकता है। यह दर्पण-दर्शन साधना नित्य करने से आत्मजागरण का लाभ मिल सकना सरल हो जाता है। जिसकी आत्मा जग पड़ी उसके लिए संसार देवलोक के नंदन वन से कम आनंददायक नहीं रहता।
मैक्सिको, अमेरिका की मध्यरात्रि। कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी और सुनसान सड़क पर एक व्यक्ति चला जा रहा था। अचानक वह फालिज का शिकार हो गया और सड़क पर ही लुढ़क गया। अचेतावस्था में ही बहुत देर तक पड़ा रहा। एक ट्रक उस रास्ते से गुजरा तो ड्राइवर का ध्यान गया और उसने अचेत व्यक्ति को कंबल में लपेटकर गाड़ी में सुला लिया।
एक विशाल भवन के सामने ट्रक रोका। उस इमारत का नाम था 'पुनर्वास संस्थान', जो अपंगों की आवास और निर्वाह व्यवस्था करती थी। अपंग व्यक्ति को संस्थान में ले जाया गया और परिचारकों ने उसकी आठ महीने तक सेवा-सुश्रूषा की। तदुपरांत वह “पट्टी” के सहारे अस्पताल से बाहर निकल आया।
दान देने वाले के मन में बड़प्पन और लेने वाले के मन में दीनभाव स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं। संस्थान ने इस बात को ध्यान में रखते हुए अपंगों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्यक्रम हाथ में लिया, ताकि कहीं भी रहते हुए उन्हें पराश्रित न होना पड़े। इसी संस्थान से उस व्यक्ति ने घड़ीसाजी का धंधा सीखा और उसी के सहारे अपना तथा अपने परिवार का समुचित निर्वाह करने लगा।
ऐसे महान संस्थान के संस्थापक हैं— 'डान रोमुलो ओ फेरिल'। वह मैक्सिको का सबसे बड़ा प्रकाशक और समाजसेवक है। सारा लैटिन अमेरिका उसके सत्कार्यों से परिचित है। समाजसेवा के लिए इस दिशा में लगने की प्रेरणा भी उसे एक ऐसी ही घटना से मिली जो उसके स्वयं के साथ ही बीती थी।
जुलाई 1955 की बात है, जैनेवा की एक व्यस्त सड़क पर रोमुलो की कार का एक पहिया पंचर हो गया। रोमुलो ने कार को वहीं रोक दिया और तेजी से पहिया बदलने लगा। उसी समय पीछे से आती हुई एक मोटर साइकिल उससे टकरा गई और उसकी बाई टांग कुचलती हुई निकल गई।
मैक्सिको के अस्थिविशेषज्ञ डॉ. जुआन फेरिलजा रोमुलो के अभिन्न मित्र थे, उन्होंने तुरंत रोमुलो की मदद की और टांग बचाने की पूरी-पूरी कोशिश की; परंतु सारे प्रयत्न असफल रहे। एक के बाद एक ग्यारह बार ऑपरेशन किए गए, मगर एक भी ऑपरेशन सफल नहीं हुआ। अंत में निराश होकर बारहवीं बार टांग ही देनी पड़ी।
सामान्य व्यक्ति के लिए ऐसी घटना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक हो सकती है; परंतु रोमुलो के लिए आशा और एक नए प्रकाश का उदय हुआ। संकल्प के धनी और आशावादी लोगों के लिए जो घटनाएँ सामान्य लोगों को स्मरण से भी ज्यादा भयभीत करती हैं— नए जीवन की प्रेरणा देती हैं। रोमुलो मात्र दौलतमंद ही नहीं, संकल्प का भी धनी था। उसने निश्चय किया कि मैं वैसाखियों का सहारा नहीं लूँगा। उस समय वह 60 वर्ष का था; परंतु तरुणों से भी ज्यादा उत्साही था। इष्ट मित्रों ने उसे ओकलैण्ड कैलीफोर्निया के विख्यात सैनिक अस्पताल में भर्ती करवाया। एक और एक कृत्रिम जलसिद्ध (वाटर प्रूफ) टांग लगाई गई। जिसे पहनकर तैरा भी जा सकता था। रोमुलो ने इस टाँग का इतनी कुशलता से उपयोग करने का अभ्यास कर लिया कि जब वह चलता था तो यह अनुमान भी नहीं होता कि यह टांग शरीर के अंगों से भिन्न है।
जिस समय रोमुलो को कृत्रिम टांग का उपयोग करने की विधि सिखाई जा रही थी, अस्पताल के डाॅक्टर ने चर्चा के दौरान बताया कि मैक्सिको में कोई छह लाख ऐसे अपंग है, जिनकी चिकित्सा आदि की कोई व्यवस्था नहीं है और नहीं राजकीय सहायता का कोई प्रबंध है। रोमुलो का मानवीय अंतःकरण आंदोलित हो उठा और इस दिशा में कुछ करने के लिए उसका अंतःकरण छटपटाने लगा। उसने अबकी बार संकल्प किया कि उन छह लाख अपंगों की सेवा करना मेरा धर्म है। ईश्वर ने मुझे फिर से काम करने की क्षमता दी है तो उसके ऋण से उन्मुक्त होने के लिए मुझे इन छह लाख लोगों को समर्थ बनाने में ही आत्मार्पण करना होगा।
उसने निश्चय किया कि अपंगों के अंग-भंग से लेकर पुनर्वास तक की व्यवस्था के लिए प्रयत्न करेगा। 'मैक्सिको लौटकर रिहैबिलिटेशन–एसोसिएशन' नाम से एक संस्था की स्थापना की और लोक-मंगल की दिशा में जब भी कोई नया कदम उठाया जाता है, तो बहुत से सहयोगी लंका विजय अभियान में रीछ-वानरों की तरह दौड़ उठते हैं। मैक्सिको के तत्कालीन राज्यपाल से लेकर सामान्य व्यक्ति ने रोमुलो के अभियान में अपनी सेवा-सहायता प्रस्तुत की। राष्ट्रपति ने एक विशाल दो मंजिली इमारत इस संस्थान के लिए देने की घोषणा की।
अपनी टांग कटने के ठीक पाँच वर्ष बाद रोमुलो ने सन् 1960 में लाजयान नामक स्थान में 'रिहैबिलिटेशन–एसोसिएशन संस्थान' का उद्घाटन किया। जैसे ही इस संस्थान की स्थापना का समाचार फैला। देश के कोने-कोने से अपंग लोग आने लगे। संस्थान में केवल चालीस व्यक्तियों के ठहरने का ही प्रबंध था; परंतु आगंतुक अपंगों की संख्या कम से कम हजार तक पहुँच चुकी थी। विवशताभरी लाचारी के कारण वे सब शहर में ही ठहरते थे। यह देखकर श्रीमती रोमुलो को बड़ी व्यथा हुई और उन्होंने एक अतिथि गृह का निर्माण करवा दिया। असमर्थ मानव परमात्मा की सेवा का लाभ मिल सके, इसलिए श्रीमती रोमुलो ने अतिथि गृह में अपंगों की स्वयं ही परिचर्या करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों के बाद सेवाभावी स्त्रियों का एक स्वयं सेविका दल श्रीमती रोमुलो के नेतृत्व में गठित कर लिया गया।
संस्थान की ओर से यह सार्वजनिक घोषणा कर दी गई कि जहाँ कहीं भी कोई अपंग किसी को भी दिख पड़े उसे तुरंत संस्थान तक पहुँचाने का प्रयत्न करें। संस्थान में ऐसी व्यवस्था है कि अपंग व्यक्ति स्वयं ही बिना किसी की सहायता लिए सामान्य लोगों की तरह अपना दैनंदिन जीवन व्यतीत कर सके तथा निर्वाह के लिए दूसरों पर निर्भर भी न रहना पड़े।
रोमुलो के इस संस्थान ने अपंग लोगों में नवजीवन का संचार किया है। इसमें से ही एक भूतपूर्व शिक्षक हेरीवरतो कास्त्रों की कहानी बहुत ही हृदयद्रावक है। बचपन में ही एक दुर्घटना से उसके दोनों हाथ और दोनों पाँव नष्ट हो चुके थे। उसके कई वर्ष बाद अपने फार्म पर जब उसने रोमुलो के इस संस्थान के बारे में सुना तो आशा की एक क्षीण रेखा दिख पड़ी और मैक्सिको आया। उसके माता-पिता ने कास्त्रों के संबंध में आवेदन भेजा। उसे संस्थान में भरती कर दिया। कास्त्रों को कृत्रिम अंग लगा दिए गए और वह शीघ्र ही बिना किसी की सहायता के चलने फिरने लगा। इस कृत्रिम अंगों से वह अन्य सामान्य लोगों की तरह चलने लगा। संस्थान में ही सेरानो प्रशिक्षण लेकर वहाँ शिक्षक भी हो गया और अपने कृत्रिम हाथों से ही टाइपिंग सीखकर कुशल टाइपिस्ट बन गया। उसके साहस और कौशल ने रोमुलो को बड़ा प्रभावित किया। उसने सेरानो को नगर के जकाते आफ युनिवर्सिटी में भर्ती करवा दिया। प्राकृतिक अंगों से विहीन अपंग सेरानो ने अपने कृत्रिम अंगों से भी इतनी योग्यता अर्जित करली जितनी कि समर्थ व्यक्ति भी नहीं कर पाते।
प्रायः लोकसेवी संस्थाएँ दान और चंदे पर चलती हैं। रोमुलो ने इस परंपरा को तोड़कर संस्थान को एक स्वावलंबी आधार दिया। यद्यपि संस्थान में अपंगों से किसी भी प्रकार का चिकित्सा शुल्क नहीं लिया जाता फिर संस्थान के आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करने के लिए रोमुलो ने कृत्रिम अंग बनाने का एक कारखाना खोल दिया है तथा जब रोमुलो ने देखा कि पूरे मैक्सिको में कार रेडियो बनाने का कोई कारखाना नहीं है, तो अमेरिका की बेडिक्स कंपनी से एक समझौता किया। जिसके अनुसार बेडिक्स ने संस्थान के कुछ कार्यकर्त्ताओं को कार रेडियो बनाने का प्रशिक्षण दिया। इन प्रशिक्षित कार्यकर्त्ताओं ने अपंग-रोगियों को प्रशिक्षण दिया। इस योजना के सफल होने पर संस्थान प्रतिवर्ष एक हजार से अधिक कार रेडियो तैयार करने लगी।
डान रोमुलो के इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि आज तक किसी भी अपंग रोगी को निराश कर नहीं लौटाया गया। जो भी कोई आया, अपनी आशा के अनुरूप लाभ उठाकर और उससे भी अधिक योग्य बनकर वापस गया। यहाँ तक कि किसी दुर्घटना में जिन लोगों का चेहरा कुरूप या विकृत हो चुका होता है, उनके लिए संस्थान ने एक अलग विभाग जो सौंदर्य-प्रसाधन विभाग के नाम से सक्रिय है। जहाँ प्लास्टिक के कान, नाक, हाथ आदि लगाए जाते हैं और आकार की दृष्टि से मनोनुकूल उपयुक्त उपकरण तैयार किये जाते हैं। इस विभाग के पीछे रोमुलो का यह विचार मूल सिद्धांत है कि- रूप और सौंदर्य का अपना मनोवैज्ञानिक महत्त्व है। व्यक्ति को उत्साही और साहसी बनाने के लिए सुंदरता भी एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
संस्थान के व्यावसायिक प्रशिक्षण विभाग, विद्युत-यंत्रों से लेकर घड़ी साजी, टाइपिंग, टाइपराइटर सुधारने की कला, सिलाई और मोचीगिरी तक का प्रशिक्षण दिया जाता है। रोगी बच्चे तो अपनी चिकित्सा के दौरान स्कूल पढ़ने भी जाया करते हैं। इस प्रकार रोमुलो का रिहैविलिटेशन एसोसिएशन अपने ढंग का एक अनूठा और अद्वितीय चिकित्सा संस्थान है। जिसकी कार्यपद्धति स्वयं रोमुलो ने अपने ऊपर किए गए प्रयोगों के आधार पर निर्धारित की।
डान रोमुलो अपनी कृत्रिम टांग के माध्यम से कूद-फाँद लेता है, दौड़ सकता है। उसे देखकर यह अनुमान लगाया जा सकना प्रायः असंभव है कि यह व्यक्ति प्रकृति और नियति से अभिशाप लेते हुए भी स्वयं के साहस और श्रम के बल पर अपने भाग्य पर विजयी हुआ।
डान रोमुलो अभी भी अठारह घंटे श्रमरत हैं। यद्यपि उनका पुनर्वास संस्थान पर्याप्त रूप से लोकसेवा कर रहा है; परंतु रोमुलो को इतने मात्र से ही संतोष नहीं है। वस्तुतः महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति का संतुष्ट हो जाना प्रगति में बाधक ही है। ज्यों-ज्यों वह अपनी उपलब्धियों से असंतुष्ट होता है, विकासपथ पर आगे बढ़ने की लगन उसी तीव्रता से बढ़ती चलेगी। रोमुलो का एक सपना है कि इस प्रकार के पुनर्वास संस्थान सारे विश्व के कोने-कोने में स्थापित किए जाएँ, जिनसे विकलांग और अंगहीन लोगों के जीवन में नये प्रभाव का प्रकाश फैल सके।
स्थूलरूप से ईश्वरपूजा के लिए कोई क्रिया-कांड ही अपनाते रहने की अपेक्षा साकार ईश्वर— मानवता की सेवा सार्थक एवं श्रेष्ठ उपासना है।
एक राजा ने अपने देश में लोहे का उद्योग बढ़ाने की ठानी। नई वस्तुएँ बनाने वालों को वचन दिया कि जो माल न बिकेगा, सरकार खरीद लेगी।
एक लुहार ने नवग्रहों की मूर्तियाँ ढालीं। आठ ग्रहों को तो लोग खरीद ले गए पर शनिदेव को किसी ने न लिया। ढेरों प्रतिमाएँ जमा हो गईं। लुहार उन्हें दरबार में ले पहुँचा। राजा ने वचन के अनुसार उन्हें खरीद लिया।
सपने में आठ देवताओं ने नाराजी प्रकट करते हुए कहा— शनि आपके यहाँ रहेंगे तो हम चले जाएँगे। आप घाटे में रहेंगे। या तो हमें रखिए या शनि को।
नींद खुली तो राजा ने अपने वचन का पालन करना उचित समझा। शनिदेव की सम्मानपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करके उन्हें देवालय में स्थापित कराया जा चुका था।
आठ ग्रह उस दिन तो रूठकर चले गए और राजा के वैभव में भी कमी पड़ी, पर कुछ ही दिन में देवताओं का मन बदल गया। उनने सोचा ऐसे व्रतशील व्यक्ति को छोड़ना उचित नहीं।
सपने में राजा ने फिर देखा कि वचनपालन की प्रशंसा करते हुए सभी देवताओं ने वापस लौटकर अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया है।
संसार में दुःख क्या है और सुख क्या है इसकी परिभाषा करना कठिन है। वस्तुतः यहाँ न तो कुछ सुख है और न कुछ दुःख। घटनाएँ अपने ढंग से घटित होती रहती हैं और वस्तुएँ अपने तरीके से बदलती रहती हैं। आने और जाने का, हानि और लाभ का परिवर्तन यहाँ अनवरत रूप से चल रहा है। जो वस्तु अभी जिस रूप में है, अगले ही क्षणों वह वैसी न रह जाएगी। तब जिस प्रकार उस क्षण उसे सुखद माना जा रहा था वैसा कुछ समय बाद न माना जा सकेगा। तब यह कैसे कहा जाए कि वह वस्तु या स्थिति सुखरूप है या दुःखरूप।
प्रातःकाल का सूर्य सुहावना लगता है और उसकी धूप तापने को जी करता है; किंतु कुछ समय बाद दोपहर की कड़ी धूप और चमक कष्टकारक लगती है और उससे बचने के लिए छाया तलाश करनी पड़ती है। तब कैसे कहा जाए कि सूर्य और उसकी धूप सुखद है या दुःखद। यह परिस्थितियों पर निर्भर है, सापेक्ष है। ठंड की स्थिति में सूर्य प्रिय है और गर्मी में अप्रिय।
भूख में भोजन की उत्कट लालसा रहती है। रूखा-सूखा भी स्वादिष्ट लगता है; किंतु पेट भरा होने अथवा रुग्ण रहने की दशा में स्वादिष्ट भोजन भी अरुचिकर लगता है और उसकी ओर देखने को भी जी नहीं करता। भोजन अपने आप में न स्वादिष्ट है, न अस्वादिष्ट वह एक पदार्थमात्र है। भूख के अनुरूप वह कभी प्रिय लगता है कभी अप्रिय। यदि भोजन की अपनी कुछ विशेषता होती तो वह सदा एक जैसी ही बनी रहती।
हम धनी हैं या निर्धन इसका कोई पैमाना नहीं। कितना धन होने पर किसी को धनी कहा जाए, और कितनी मात्रा को निर्धन की परिधि में लगाया जाए, इसका कोई मापदंड नहीं बन सकता। जब हम अपनी तुलना किसी साधनसंपन्न धनी के साथ करते हैं; तो पाते हैं कि अपनी स्थिति निर्धनों जैसी दयनीय है; किंतु यदि निर्धनों और अभावग्रस्तों के साथ अपनी तुलना करने लगें तो प्रतीत होगा कि हम कितने अधिक साधनसंपन्न, धनवान और भाग्यवान हैं। जिसके लिए दूसरे लोग बुरी तरह तरसते हैं, वे साधन अपने पास कितनी बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। इस तुलनाक्रम में हेर-फेर होते हैं, एक क्षण में धनी अपने को निर्धन और निर्धन अपने को धनवान मानने लग सकता है।
बलवान पहलवान की तुलना में अपनी दुर्बल काया दुर्भाग्यपूर्ण है, सुंदरों की तुलना में अपनी कुरूपता अभिशाप है; किंतु यदि अपंग एवं असाध्य रोगग्रस्त की ओर अपनी स्थिति का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि जो कुछ मिला हुआ है, वह भी सुख मानने और गर्व करने के लिए पर्याप्त है।
दुःखों से निवृत्ति पाने और सदा सुखी रहने के लिए अमुक प्रकार की परिस्थितियाँ प्राप्त होना आवश्यक है। यह नहीं सोचा जाना चाहिए, वरन अपनी तुलनात्मक चिंतन करने की शैली को बदलना चाहिए। अपने से छोटे और पिछड़े हुए लोग यदि दृष्टि में रहें तो जो मिला है, वह भी सुखद और पर्याप्त प्रतीत होता रहेगा और अपने को भी सुखी अनुभव करने की मनःस्थिति सदा ही बनी रहेगी। समुन्नत लोगों को अपना गुरु मानें, उनने जिन सद्गुणों को अपनाकर प्रगति की है, उन्हें अपनाने, बढ़ाने का प्रयास करें। इस क्षेत्र में तुलना करते हुए जो बढ़ाना आवश्यक है, उसे बढ़ाएँ तो बड़ों के साथ की जाने वाली तुलना भी श्रेयस्कर हो सकती है। दुःखों से स्थाई निवृत्ति और सुखों की सुस्थिर उपलब्धि का यही मार्ग है। प्रगति के लिए प्रयास तो तत्परतापूर्वक करें, पर दुःखी किसी भी स्थिति में न रहें यही बुद्धिमत्ता है।
तुम्हारी बनाई दुनिया अनोखी है। वह वैसी ही है, जैसी कि तुम्हारी भीतरी आस्था।
उस सर्प की कथा प्रसिद्ध है, जिसने एक महात्मा के उपदेश देने पर लोगों को काटना, उनका पीछा करना छोड़ दिया था। लेकिन उसके इस स्वभाव के कारण गाँव में बच्चों ने उसे तंग करना शुरू किया। लाठी से, कंकड़, पत्थरों से सर्प को घायल कर दिया, खेल ही खेल में उन्होंने। एक दिन वे ही महात्मा उधर से निकले तो सर्प की दुर्दशा पर दुःखी हुए, उन्होंने कहा- “मैंने तुझे दूसरों को काट कर प्राण नाश करने के लिए मना किया था, फुसकार के लिए नहीं”। महात्मा का आदेश पाकर सर्प अब फुसकार मारने लगा तो फिर बच्चों की या किसी की हिम्मत नहीं हुई उसे छेड़ने की, परेशान करने की।
उक्त सर्प की तरह मनुष्य को भी सामाजिक जीवन का निर्वाह पाने के लिए क्रोध की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन यह क्रोध उस क्रोध से सर्वथा भिन्न होता है, जिसकी प्रेरणा से हम अंधे होकर दूसरों को भारी नुकसान पहुँचाने पर उतर आते हैं। “स्वस्थ क्रोध” की जीवन में आवश्यकता होती है, ताकि मनुष्य दूसरों के द्वारा पहुँचाए जाने वाले कष्ट, अन्याय, उत्पीड़न का अंत कर सके।
उपनिषद्कार ने अग्नि की स्तुति करते हुए कहा है— “मन्युरसि मन्यु में देहि” हे अग्नि “तुम मन्यु हो, मुझे भी “मन्यु” प्रदान करो। यहाँ “मन्यु” का अर्थ- ‘स्वस्थ क्रोध’ से ही है।
जिस तरह विष का शोधन करके उसे जीवनदाता रसायन बना लिया जाता है उसी तरह क्रोध का शोधन करके उसे एक महत्त्वपूर्ण शक्ति में बदला जा सकता है। महात्मा गाँधी ने कहा है— “क्रोध को अपने अधीनकर उसका शोधन करके ऐसी शक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है जो सारे संसार को हिला दे।”
क्रोध और स्वस्थ क्रोध में यह अंतर है कि क्रोध में अपने ऊपर काबू नहीं रहता। वह आँधी-तूफान की तरह आता है। नशे की तरह यह मनुष्य के बुद्धि-विवेक को कुंठित कर देता है। स्वस्थ क्रोध में ऐसा नहीं होता। उसमें एक लंबा अनुभव होता है और धीरज होता है। वह मारात्मक न होकर उपचार प्रक्रिया है, जिसमें उछल-कूद या बौखलाहट नहीं होती। स्वस्थ क्रोध में उत्कृष्ट न्याय चेतना, परहित-चिंता ही मुख्य होती है। यह विचारपूर्वक, मननयुक्त होता है। समझ-बूझकर अंतिम उपाय के रूप में उपयोग में लाया जाता है। अस्वस्थ क्रोध में मनुष्य को सोचने-विचारने की शक्ति नहीं रहती।
“स्वस्थ क्रोध” कई बातों से प्रेरित होता है, जिसमें परदुःख-निवारण की भावना, दया, न्याय, बुद्धि, परहित-चिंतन, दुष्टता से लोहा लेने की प्रेरणाएँ ही मुख्य होती हैं।
स्वस्थ क्रोध की मुख्य प्रेरणा है— दूसरों का हित चिंतन। अग्नि में हाथ डालने की संभावना मालूम पड़ने पर माँ बच्चे पर बरस पड़ती है। इतना ही नहीं दो-चार चपत भी लगा देती है। विद्यार्थी के पढ़ने में लापरवाही करने पर अध्यापक डाँट-डपट देते हैं। इसमें परहित-साधन के लिए विचारपूर्वक क्रोध किया गया है।
दूसरों के दुःख को देखकर मनुष्य से नहीं रहा जाता और वह दुःख के कारण को दूर करने के लिए सक्रिय हो उठता है; वस्तुतः दूसरे के दुःख से प्रेरित क्रोध, जो उसका दुःख से उद्धार कर देता है, स्वस्थ क्रोध है। यह बुराई से बाहर समझा जाता है। स्मरण रहे, इनमें दुःख का संबंध अपनी सीमा से बाहर होता है।
शास्त्रकार ने कहा है— “क्रोधोवैवस्वतो राजा”। क्रोध यमराज है और यमराज का काम है— न्याय व्यवस्था को स्थिर रखना, बुराई करने वालों को दंड देना। स्वस्थ क्रोध न्यायबुद्धि पर चलता है। किसी पक्ष के साथ अन्याय हो रहा है तो चेतनासंपन्न व्यक्ति उसे देखकर अनदेखा नहीं कर सकता। वह अन्यायी को दंड देकर निर्बल पक्ष के अधिकारों की रक्षा करता है, न्याय का पक्ष करता है। यदि कोई दुष्ट अबला स्त्री पर अत्याचार कर रहा है तो यहाँ हमारे स्वस्थ क्रोध की आवश्यकता है, जिसका प्रयोगकर हम दुष्ट का दमन कर सकते हैं और उस स्त्री के न्यायानुकुल अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं। इसी तरह कोई आततायी किसी असहाय को प्रताड़ित कर रहा है, कोई श्रीमंत किसी गरीब पर अन्याय कर रहा है तो हमारे अंदर उस मन्युशक्ति के उदय होने की आवश्यकता है, जिससे हम न्याय की रक्षा कर सकें और अन्यायी को परास्त कर सकें।
स्वस्थ क्रोध में अचानक निवारक कार्यवाही को स्थान नहीं है, पहले बीच के और भी रास्ते हैं। समझाने-बुझाने, दलील, तर्क, साम, दाम, भेद आदि उपायों के बाद दंड अंतिम उपाय के रूप में काम में लाया जाता है। महाभारत भगवान कृष्ण की न्यायचेतना का अंतिम उपाय था। उन्होंने कौरवों को कई तरह से समझाया-बुझाया, संधि का प्रस्ताव रखा; लेकिन जब दुर्योधन ने एक दुराग्रह के रूप में कहा— “सूच्याग्रेन्नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव।” हे श्रीकृष्ण! मैं सुई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूँगा, बिना युद्ध किए।” इस तरह जब सब उपाय व्यर्थ चले गए तब तो महाभारत के रूप में श्रीकृष्ण की न्याय चेतना ने काम किया।
स्वस्थ क्रोध लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होता है। समाज में एक तरह के ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो शांति, प्रेम, दया, करुणा की भाषा को नहीं समझते। समझौते और शांतिवादी मार्ग को नहीं जानते। वे मनचाहा करते हैं, चाहे उससे दूसरों की हानि ही क्यों न हो। ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं, जो दूसरों को नष्टकर उन्हें अपने शोषण का साधन बना लेते हैं। ऐसे लोगों का इलाज मन्यु से ही होता है। आततायी, दुष्ट, अन्यायी व्यक्ति को जब यह शिक्षा न मिलेगी कि कोई हमसे भी बलवान है, वे सीधी राह नहीं चलेंगे।
स्मरण रहे स्वस्थ क्रोध उस राख से ढकी चिनगारी की तरह है जो अपनी ज्वाला से किसी को दग्ध तो नहीं करती; किंतु आवश्यकता पड़ने पर बहुत कुछ जलाने की सामर्थ्य रखती है।
जहाँ मन्यु अर्थात- स्वस्थ क्रोध निवास करता है वहीं न्याय की, अधिकारों की रक्षा हो सकती है। जिस समाज में इसका अभाव हो जाता है वह कायर, नपुंसक, दीन-हीन बन जाता है। उसकी नैतिक क्षमता और चरित्र भी गिर जाता है। जिस समाज में अन्यायी-आततायी के प्रति रोष नहीं, शोषणकर्त्ता, अपराधी, अत्याचारी से निपटने की भावना नहीं, वह समाज कायरों का समाज है। वह सदैव दूसरों की गुलामी के दिन काटे तो इसमें कोई संदेह नहीं।
ऋषियों की हड्डियों के ढेर देखकर राम का आक्रोश, समुद्र के अहंकार पर लक्ष्मण का कोप, क्षत्रियों के अत्याचारों पर परशुराम का क्षोभ, आततायी कंस के प्रति, कौरवों के प्रति श्रीकृष्ण का विरोध इसी मन्युशक्ति की स्थिति का परिचायक है। आज हमें इसी का आह्वान अपने जीवन में करना चाहिए, जिससे हम अन्यायों से निपट सकें। दीन-हीन गरीब असहायों के अधिकारों की रक्षा कर सकें।
प्रतिभावान स्वतंत्र वातावरण में स्वतंत्रतापूर्वक साँस लेता है, उसे घुट मरने की परिस्थिति किसी भी शर्त पर स्वीकार नहीं।
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जो दूरदर्शी, परमार्थपरायण और चरित्रवान हैं उसके लिए समग्र प्रगति का द्वार खुला पड़ा है।
कहावत है— “इतने मीठे मत बनो कि लोग तुम्हें चट कर जाए, इतने कडुवे भी मत बनो कि लोग तुम्हें थूकते फिरें।” यही बात क्रोध पर भी लागू होती है। जिस क्रोध की ज्वाला से हम स्वयं और दूसरे लोग दग्ध हों, हमारा व दूसरों का अहित हो, वह त्याज्य है, लेकिन जो दवा बनकर हमारी सामाजिक बुराइयों की चिकित्सा करे, दूषित तत्त्वों का निवारण करे, बिगड़े हुओं को सुधारने के लिए मजबूर करे, भूल के लिए दंड दे, ऐसा स्वस्थ क्रोध, आवश्यक भी है, अनिवार्य भी।
(गताँक से आगे)
संतुलन के दो पक्ष हैं— एक अर्जन दूसरा विसर्जन। पेट मुख के द्वारा ग्रहण करता है और जो अनुपयुक्त है, उसे मलमार्ग से विसर्जित कर देता है। नौकरों की भर्ती और तरक्की भी होती रहती है और जो अयोग्य अपराधी सिद्ध होते हैं, उन्हें मुअत्तिल एवं बर्खास्त भी किया जाता रहता है। श्रेष्ठता का सम्मान, परिपोषण और निकृष्टता की भर्त्सना-प्रताड़ना भी होती रहती है। सज्जनों को अधिकार सौंपे जाते और गुणानुवाद होते हैं। दुर्जनों को विरोध-असहयोग ही नहीं सहना पड़ता; जेल मृत्युदंड जैसे त्रास भी मिलते हैं। सृष्टा की विधि-व्यवस्था में इसी दृष्टि से स्वर्ग-नरक का विधान है। समदर्शी का तात्पर्य जैसे को तैसा समझना है। गुड-गोबर को एक भाव खरीदना-बेचना नहीं।
अध्यात्म-साधना में कषाय-कल्मषों से जूझना और निरस्त करना पड़ता है। साथ ही सत्प्रवृत्तियों का उन्नयन-संवर्धन भी। संतुलन इसी प्रकार बनता है। लोक-व्यवहार में भी यह उभयपक्षीय विधि-व्यवस्था कार्यांवित की जाती है। इंजन उलटा भी चलता है और सीधा भी। बिजली के ए. सी., डी. सी. करेंटों में से एक खींचता है और दूसरा फेंकता है। तप द्वारा प्रतिभा को जगाया-झकझोरा जाता है और योग द्वारा उसे उपयुक्त कार्य में नियोजित किया जाता है।
आत्मचेतना के धनी जहाँ श्रेष्ठता को आकर्षित, संगठित और समुन्नत बनाते हैं वहाँ उसका एक कार्य यह भी है कि दुष्टता को विगठित, दुर्बल, बहिष्कृत और दंडित करे। यह संतुलन न बन पड़ने पर पदार्थों और प्राणियों की अधोगामी प्रवृत्ति निकृष्टता की दिशा में वह चलेगी और जो भी चपेट में आवेगा उसे साथ में लपेटती-घसीटती चलेगी। इसलिए प्रवाह के लिए जहाँ नहरें बनाई जाती हैं, वहाँ दूसरी ओर रोकथाम करने वाले बाँध भी बाँधे जाते हैं। न श्रेष्ठता की अवहेलना हो सकती है और न दुष्टता की पूजा-प्रतिष्ठा। संतुलन ही जीवन है। उसी के साथ प्रसन्नता और प्रगति जुड़ी हुई है। यह सिद्धांत भौतिक और आत्मिक जगत में समान रूप से लागू होता है।
मनीषियों ने जितना जोर सेवा-साधना पर दिया है, उतना ही अवांछनीयता की भर्त्सना और प्रताड़ना पर भी। यह नीति अपने ऊपर भी लागू होती है, दूसरों पर भी। दुष्कर्मों के लिए प्रायश्चित का विधान है और अनाचार के दमन का भी। रामराज्य की स्थापना से पूर्व असुरता दमन की आवश्यकता पड़ी थी। विशाल और सुसंस्कृत भारत के निर्माण में प्रथम भूमिका कुरुक्षेत्र में धर्मयुद्ध लड़ना पड़ा था। आमंत्रण और निष्कासन की अपनी-अपनी उपयोगिता है। रसोईघर और स्नानागार की तरह शौचालय और कूड़ेदान भी चाहिए। कचरे को गलाकर उर्वरता का आधार खाद सड़ाना पड़ता है। दोनों ही पक्षों का महत्त्व समान है। इनमें से एक को भी नहीं छोड़ा जा सकता और न किसी एकाकी से समग्र प्रयोजन सिद्ध हो सकता है।
योग में परब्रह्म की महत्ता के साथ आत्मचेतना को संयुक्त किया जाता है। ताप से तपाकर सोने के साथ मिले हुए घटिया को जलाकर उसे खरा बनाया जाता है। दोनों कार्य एकदूसरे में विपरीत भर प्रतीत होते हैं, पर हैं एकदूसरे के पूरक। धुलाई के बाद रंगाई होती है। भट्टी में गलाई किए जाने के बाद ढलाई वाला साँचा अपना प्रयोजन पूरा करता है।
न समाज एक पक्षीय है, न व्यक्ति। न लोक अपने आप में पूर्ण है, न परलोक। दोनों के संयोग से ही सुयोग बनता है। आत्मविद्या के प्रयोक्ता तथ्यों को समझते हैं और दो पैरों से एक के बाद दूसरा उठाते हुए निश्चित लक्ष्य तक पहुँचते हैं। विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को बला-अतिबला विद्या सिखाई थी। इन्हीं को सावित्री और गायत्री कहते हैं। सावित्री में संशोधन है और गायत्री में अभिवर्धन। संशोधित विषों से ही अमृतोपम रसायनें बनती हैं। आघात सहकर ही वाद्य यंत्र झंकृत होते हैं। सरकस के जानवर रिंग मास्टर के हंटर नचाने पर अपना प्रशिक्षण पूरा करते हैं।
तंत्र और योग का अन्योन्याश्रय संबंध है। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष हो सकता है। उपयोगी यंत्र चलाने वाली बिजली गलत ढंग से प्रयोग किए जाने पर प्राणघातक बन सकती है। तंत्र की निंदा तभी है, जब वह हेय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाए। उसे स्वार्थ, लोभ एवं दर्प के निमित्त कार्यांवित किया जाए। अन्यथा मवाद निकालने वाला आॅपरेशन और घाव भरने का मरहम उपचार अपने-अपने अवसर पर अपने-अपने स्थान पर उपयोगी एवं प्रशंसनीय ही कहे जाएँगे।
तंत्र दमनप्रधान है; यह आत्मदमन, मनोनिग्रह भी हो सकता है और दुष्टता का पददलन भी। देव मंदिर जितने उपयोगी हैं, उतने ही जेलखाने और फाँसीघर भी। दोनों ही समाज की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
तंत्र अपने आप में विशुद्ध विज्ञान है। हेय वह स्वयं नहीं उसका दुरुपयोग है। गणेश सद्बुद्धि का संवर्धन करते हैं तो कार्तिकेय असुरता का दमन। सरस्वती सद्बुद्धि का देवी है और दुर्गा महिषासुर मर्दिनी। दोनों के वाह्य स्वरूप में अंतर प्रतीत होता है, पर वस्तुतः उनकी दिशाधारा मिलकर उस संगम की भूमिका पूरी करती है, जो अवतार का मूल प्रयोजन है। धर्म की स्थापना के लिए अधर्म का नाश भी आवश्यक माना गया है। समय की आवश्यकता कभी नारद के भक्ति प्रचार को आमंत्रित करती है तो कभी परशुराम के कुठार को। दोनों ही अपने आप में अपूर्ण हैं। धर्मतंत्र और राजतंत्र का समन्वय ही सुव्यवस्था बना पाता है।
तंत्र की व्याख्या में दमन को प्रमुखता दी गई है। पशु प्रवृत्तियाँ अनुनय-विनय को मान्यता नहीं देतीं, उनके लिए भय ही एकमात्र सूत्रसंचालक हैं। मनुष्यों में आमतौर से पशुता अधिक और मनुष्यता स्वल्प मात्रा में पाई जाती है, इसलिए उसके लिए जितना आवश्यक शास्त्र है, उतना ही शस्त्र भी। द्रोणाचार्य और गुरु गोविंद सिंह ने दोनों को साथ-साथ ले चलने का प्रयत्न और निर्वाह किया था।
चाणक्य ने अपना कार्यक्षेत्र अक्षुण्ण रखते हुए भी चंद्रगुप्त को दिग्विजय के लिए प्रशिक्षित किया था। समर्थ गुरु रामदास की तपश्चर्या में शिवाजी को उत्साहित करके घमासान करने के लिए उठा देने में कोई विक्षेप नहीं पड़ा। कृष्ण सारथी रहे पर उनने अर्जुन को गांडीव का अनवरत प्रयोग करने के लिए आदेश दिया। योग की अपनी सीमा-मर्यादाएँ अक्षुण्ण रखनी चाहिए; पर उसे समय की आवश्यकता देखते हुए तंत्र को सजीव एवं सुगठित होने देना चाहिए।
शस्त्रों विशिष्टता हर किसी के मस्तिष्क पर छाई हुई है। आयुधों का निर्माण करने में पदार्थ विज्ञान की कलाएँ प्रधान रूप से नियोजित हैं। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रयोक्ताओं में किसका मनोरथ पूरा होगा, क्योंकि विजय और पराजय का परिणाम क्या निकला इस पर सब कुछ निर्धारित है। विजयी पराजित से भी अधिक घाटे में रह सकते हैं और पराजित के हाथ वह पूँजी लग सकती है, जिससे वह संकट का समाधान माना जाए और शांति एवं प्रगति का श्रेय प्राप्त करे।
सब कुछ पदार्थ-संपदा और अस्त्रों की बहुलता पर ही निर्भर नहीं है। किसने क्या रणनीति अपनाई और कितनी दूरदर्शिता दिखाई, इस तथ्य पर युद्ध का वास्तविक परिणाम निर्भर है। किसने-कितने अधिक प्राण हरण किए यदि इसी पर विजय निर्भर रही होती तो नाजी सारी दुनिया के अधिपति बनकर रहे होते। वास्तविकता यह है कि किसे अदृश्य की, परिस्थितियों की अनुकूलता मिली और किसने सही चाल चली और हारी बाजी जीती। इस स्तर का कौशल उपलब्ध करने के लिए अंतःप्रेरणा और वातावरण की अनुकूलता आवश्यक है। इस प्रयोजन की सिद्धि में तंत्र की महती भूमिका हो सकती है।
युद्ध मानवी भविष्य का प्रश्न चिह्न तो है; पर उसका निर्णायक या निर्धारणकर्त्ता नहीं। इसके लिए भाव-संवेदना, धर्म-धारणा की लोक-मानस में प्रतिष्ठापना के लिए अध्यात्म का योग पक्ष— तत्त्वज्ञान अपनी भूमिका निभा सकता है; किंतु वातावरण को उलटकर सीधा करने की क्षमता के लिए तंत्र का आश्रय लेना पड़ेगा।
बांग्लादेश की स्वतंत्रता में सैन्यशक्ति ने युद्धकौशल में वह कार्य नहीं किया जो अदृश्य वातावरण के द्वारा नई राह पकड़ लेने के कारण संभव हुआ। जापान और जर्मनी को हर दृष्टि से दीन-दुर्बल बना दिए जाने के उपरांत भी वे कुछ ही समय में जिस प्रकार उभरे उसे बौद्धिक तारतम्य बिठाकर सिद्ध नहीं किया जा सकता। इस पुनरुत्थान के पीछे अदृश्य शक्तियों का हाथ रहा है। भारत की स्वतंत्रता का इतिहासमात्र जेल यात्रियों के कारण ही इतनी आश्चर्यजनक सफलता के रूप में नहीं ढला; वरन उसके पीछे ऐसी अदृश्य शक्तियाँ, घटनाएँ एवं परिस्थितियाँ रही हैं, जिससे पर्वत जैसा कठिन कार्य सरल एवं हल्का हो गया। दासप्रथा, जमींदारी प्रथा आदि का जिस प्रकार उन्मूलन हुआ, उसमें आंदोलन कर्त्ताओं के प्रयासों को ही सब कुछ नहीं कहा जा सकता। बहते हुए विचार-प्रवाह और उठते हुए उभार ने भी इन प्रसंगों में अपना योगदान किया है। कोई चाहे तो इसे अदृश्य का निर्धारण कह सकता है। इससे भी गहराई में उतरा जाए तो उसे अदृश्य का अनुकूलन भी माना जा सकता है। इस प्रकार की उथल−पुथल करने में अध्यात्म का जीवट काम करता है। उसे यदि तंत्र-प्रक्रिया कहा जाए तो अनुचित न होगा।
धर्मशिक्षा में कुछ मनुष्यों को किसी सीमा तक सज्जन बनाया जा सकता है, पर उन पर छाई हुई दृष्प्रवृत्तियाँ इतने भर से निरस्त हो जाएगी, यह नहीं कहा जा सकता। उसके लिए चेतन मन को नीतिनिष्ठ एवं सामाजिकता के आधार पर उस स्तर का नहीं बनाया जा सकता, जिसकी कि आवश्यकता एवं अपेक्षा है। इसके लिए मानवी अचेतन को ही नहीं अदृश्य वातावरण को भी झकझोरना पड़ेगा। उसके लिए विचारणा ही सब कुछ नहीं हो सकती। इस संदर्भ में ऐसी शक्ति
का उद्भव होना चाहिए, जो लोक-मानस का आस्था, आकांक्षा, विचारणा, प्रवृत्ति एवं विधि व्यवस्था में जमीन-आसमान जैसा अंतर कर सके। इसके लिए तंत्र उपक्रम ही कारगर हो सकता है क्योंकि उसी में भक्ति और शक्ति का समन्वय है।
अदृश्य जगत और व्यापक वातावरण की तरह ही प्रतिभाओं और व्यक्तित्वों का भी निजी क्षेत्र में महत्त्व है। उनकी गलाई और ढलाई के लिए जितनी प्रचंड ऊर्जा चाहिए, उतनी अध्यात्म का तंत्र पक्ष ही उत्पन्न कर सकता है। जनसंख्या नहीं, प्रतिभाएँ ही गतिविधियों, परिस्थितियों का आधारभूत कारण रही हैं। उनकी प्रकृति बदलने विशेषतया अवांछनीयता से उत्कृष्टता की दिशा में उन्मुख करने के लिए मात्र स्वाध्याय-सत्संग ही काम नहीं दे सकता। उन पर ऐसा दबाव भी पड़ना चाहिए, जिससे आकृति बदलती हुई दृष्टिगोचर हो सके।
तंत्र की सीमा व्यक्तिगत लोभ से, द्वेष से आवृत होकर किसी को त्रास देना नहीं है। ऐसी रीति-नीति तो क्षुद्र स्तर के लोग ही अपनाते हैं। अपना दर्प दिखाने, बालबुद्धि लोगों को चमत्कृत करने से कुछ कौतुक इस आधार पर दिखाए जा सकते हैं। प्रतिशोध लिए जा सकते हैं और दंड दिए जा सकते हैं। सताया और भयभीत भी किया जा सकता है; पर इतने भर के लिए तंत्र जैसी महती शक्ति का उपार्जन-उपयोग करने की क्या आवश्यकता? यह कार्य तो बाहुबल, छद्म या आततायियों के सहयोग से भी हो सकते हैं। जो कार्य इतने सुगम तरीके से हो सकते हों, उनके लिए बाजीगरी एवं धूर्तों का कुचक्री प्रयास ही पर्याप्त हो सकता है। उसके लिए क्यों तो शक्ति उपार्जित की जाए और क्यों इतने उथले रूप में बर्बाद किया जाए?
तंत्र अध्यात्म का भौतिक पक्ष है, योग उसका अंतरंग पक्ष। दोनों की तुलना एवं समता प्रायः एक जैसी है। योगी-तपस्वी होना जितना कठिन है, उससे कम नहीं अधिक ही कष्टसाध्य प्रयास तंत्र-साधना में करना पड़ता है। यह दूसरों को हानि पहुँचाने की तुलना में अधिक मूल्यवान और कष्टसाध्य है। ऐसी दशा में उसका उपयोग भी दूरदृष्टि से महान प्रयोजन के लिए ही होना चाहिए, तभी इस महाविद्या की सार्थकता एवं सफलता है।
पिछले दिनों क्षुद्र प्रकृति के अनाचारी तांत्रिक इस विद्या का उपयोग दुर्बलों को त्रास देने, भटकाने, आतंक जमाने के लिए करते रहे हैं। बौद्धिक या शारीरिक दृष्टि से किसी को अपंग बना देते, त्रास देकर नीचा दिखाने और शरणागत होने के लिए विवश करने में ऐसी क्या विशिष्टता है, जिसके लिए स्वयं गर्व किया जा सके या दूसरों को अपना सहयोगी-समर्थक बनाकर प्रसन्न हुआ जा सके।
जनरेटर बनाना, चलाना और उसे बड़े कामों के लिए प्रयुक्त करना प्रशंसनीय कार्य हो सकता है; पर उससे असंख्य गुना महत्त्वपूर्ण यह है कि अपने व्यक्तित्व, स्तर एवं मानस को इतना प्रचंड-प्रखर बना लिया जाए जो परिस्थितियों की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सके। अपना तथा असंख्यों का भला कर सके। यह कार्य अध्यात्म विज्ञान के आधार पर ही हो सकता है। जहाँ तक लौकिक प्रयोजनों का संबंध है, वहाँ तक तंत्र की प्रमुखता है।
इस उपेक्षित एवं विस्तृत विज्ञान की नए सिरे से खोज, साधना एवं विद्या का अवगाहन होना चाहिए। इसके लिए प्राणशक्ति की धनी प्रतिभाओं को आगे आना चाहिए।
वह अंतरात्मा ही है जो पहले मित्र को सही सलाह और कड़ी चेतावनी देता है। न मानने पर वही है जो कठोर न्यायाधीश की तरह कड़ी सजा दिए बिना नहीं रहता।
पंडित जी के घर का तेल चुक गया। वे पड़ोस के गाँव से तेल खरीदने तेली के घर पहुँचे।
कोल्हू इससे पहले उनने कभी देखा न था। सो इस विचित्र सरंजाम की जानकारी तेली से पूछने लगे। खरीदने वाली बात पीछे पड़ गई।
पंडित जी ने पूछा— "खींचने वाले बैठक पर इतने पत्थर क्यों लादे गए हैं।"
तेली ने कहा— “बोझ भरा रहने पर बैल उसे खींचने में व्यस्त रहता है। हलका होने पर वह किधर भी दौड़ने की बात सोचेगा।”
पंडित जी को नई जिज्ञासा उभरी। पूछा— "अच्छा तो उसकी आँखों पर पट्टी क्यों बाँधी गई है।"
तेली ने कहा— उसे एक ही घेरे में घूमना पड़ता है। आँखें खुली रहने पर वह ऊबने लगेगा न, जब दिखता ही नहीं तो प्रगति-अवगति सब समान है।"
पंडित जी ने नया प्रश्न पूछा— "फिर उसके गले में घंटी क्यों बँधी है?"
तेली ने कहा— “मैं काम में लग जाता हूँ और बैल घूमता रहता है। जब खड़ा होने लगता है तो घंटी न बजने से पता चल जाता है और मैं आकर इसे हाँक देता हूँ।"
नया प्रश्न पूछने के स्थान पर पंडित जी तर्क करने लगे। यह न चलने पर भी सिर हिलाकर घंटी तो बजाता रह सकता है।
तेली हँस पड़ा बोला— "पंडित जी यह इतना पढ़ा-लिखा नहीं है जो चकमा देने का तरीका निकाल सके।"
पंडित जी झेंप गए। तेल लेकर वापस लौटे तो रास्ते भर सोचते रहे। आदमी भी एक प्रकार का कोल्हू का बैल ही है जो पत्थरों का भार खींचता, दायरे में घूमता और गले की घंटी से आफतों को बुलाता है। तिलहन को पीसता और स्वयं पिसते हुए दिन बिताता है।
राजनीति के क्षेत्र में बिन्सटन चर्चिल, वेंजामिन प्रेंकलिन, डिजरैली, ग्लेडस्टोन आदि अनेकों ऐसे ऐतिहासिक पुरुष हुए हैं; जो अपनी वृद्धावस्था की चुनौती के बावजूद बहुत सक्रिय रहे, अपने देश की अमूल्य सेवा में अनवरत रूप से लगे रहे।
पश्चिम एवं भारत के वे कुछ महान पुरुष उल्लेखनीय हैं, जिनकी रचनात्मक शक्ति का ह्रास उनकी ढलती उम्र के कारण कतई नहीं हुआ था और जिन्होंने अपने बुढ़ापे में बड़े महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी काम करके मानवता की अपूर्व सेवा की।
ऐसे महान पुरुषों में कुछ ये हैं— महान दार्शनिक संत सुकरात, प्लेटो, पाइथोगोरस, होमर, खगोलशास्त्री गैलीलियो, प्रसिद्ध कवि विलियम वर्डसवर्थ, वैज्ञानिक थामस अलका एडीशन, लेखक निकोलस कोपर निंकस, विख्यात वैज्ञानिक न्यूटन, सिसरो, अलबर्ट आइन्स्टीन, टैनीसन, महात्मा टॉलस्टाय, महात्मा गाँधी तथा जवाहर लाल नेहरू।
महात्मा सुकरात सत्तर वर्ष की उम्र में अपने अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्वदर्शन की विशद व्याख्या करने में जुटे हुए थे। यही बात प्लेटो के संबंध में भी थी। वे अपनी अस्सी वर्ष की आयु तक बराबर कठोर परिश्रम करते रहे। इक्यासी वर्ष की अवस्था में हाथ में कलम पकड़े हुए उन्होंने मृत्यु का आलिंगन किया।
टेनीसन ने अस्सी वर्ष की परिपक्व अवस्था में अपनी सुंदर रचना “क्रासिंग दी वार” दुनिया को प्रदान की। राबर्ट व्राउनिंग अपने जीवन के संध्याकाल में बहुत सक्रिय बने रहे। उन्होंने सत्तर साल की उम्र में मृत्यु के कुछ पहिले ही अपनी सर्वश्रेष्ठ कविताएँ लिखीं।
एच.जी. वैल्स ने सत्तर वर्ष की अपनी वर्षगाँठ के उपरांत भी पूरे चुस्त और कर्मठ रहते हुए एक दर्जन से ऊपर पुस्तकों की रचना की। यूरोपिया की कल्पना पर आधारित उनकी पुस्तकें जीवन के उत्तरार्ध में ही लिखी गईं।
सिसरो ने अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व तिरेसठ वर्ष की आयु में अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक “ट्रीटाइज ऑन ओल्ड एज” की रचना की। कीरो ने अस्सी साल की उम्र में ग्रीक भाषा सीखी।
प्लूटार्क यूनान के माने हुए साहित्यकार हुए हैं। उन्होंने पचहत्तर वर्ष की आयु के बाद लैटिन भाषा पढ़ना आरंभ की थी। इटली का प्रख्यात उपन्यासकार बोकेशियो को ढलती उम्र में साहित्यकार बनने की बात सूझी। उस ओर वह पूरी दिलचस्पी के साथ जुटा और अंततः मूर्धन्य कथाकार बनकर चमका।
दार्शनिक फ्रेंकलिन की विश्वव्यापी ख्याति है। वे पचास वर्ष की आयु तक दर्शनशास्त्र से अपरिचित रहे। रुझान इसके बाद ही उत्पन्न हुई और वह उन्हें विश्वविख्यात बनाकर ही रही।
सुकरात ने साठ वर्ष पार करने के उपरांत यह अनुभव किया कि बुढ़ापे की थकान और उदासी को दूर करने के लिए संगीत अच्छा माध्यम हो सकता है, अस्तु उन्होंने गाना सीखना आरंभ किया और बजाना भी। यह क्रम उन्होंने मरते दिनों तक जारी रखा। बिनोवा ने भाषाएँ सीखने का क्रम आजीवन चालू रखा। वे 24 भाषाओं के विद्वान थे तथा अंतिम वर्षों में सबसे कठिन चीनी भाषा सीख रहे थे। दामोदर सातवलेकर ने वेदों का भाष्य एवं आर्ष साहित्य पर अपना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य पिचहत्तर वर्ष के बाद आरंभ किया एवं सौ वर्ष की आयु तक बराबर लिखते रहे।
अंग्रेजी राजनीति का इतिहास जिनने पढ़ा है, वे ग्लेडस्टन के नाम से परिचित हैं। उनने अपना प्रायः सारा ही जीवन राजनीति की सेवा में लगाया और अच्छी लोकप्रियता प्राप्त की। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने राज्य का उत्तरदायित्व सँभाला और तीसरी बार भी जब वे प्रधानमंत्री बने तब उनकी आयु 79 वर्ष की थी। ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में होमर पर उनका भाषण अत्यंत शोधपूर्ण माना जाता है। वह उन्होंने 80 वर्ष की आयु में दिया था। बुढ़ापे में भी वे चैन से न बैठे। 85 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘ओडिसी ऑफ होरेस’ ग्रंथ की रचना की थी।
आठवीं जर्मन सेना का सेनापतित्व पालवान हिन्डैन वर्ग को जब सौंपा गया तब वे 67 वर्ष के थे। 78 वर्ष की आयु में वे पार्लियामेंट के अध्यक्ष चुने गए। वे 87 वर्ष की आयु तक जिए तब तक उसी अध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित रहे एवं सक्रियतापूर्वक संचालन करते रहे।
हैनरीफिलिप मिटेन जब फ्रांस के प्रधानमंत्री बने तब वे 84 वर्ष के थे। उसी देश की नेशनल असैम्बली के अध्यक्ष स्टवर्ड हैरियो 79 वर्ष की आयु में चुने गए। 86 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ, तब तक वे उस पद का बड़ी योग्यतापूर्वक निर्वाह करते रहे।
लायड जार्ज ब्रिटेन के मूर्धन्य राजनेता रहे हैं। 75 वर्ष की आयु में भी उनकी कार्यशक्ति नौजवानों जैसी थी। चर्चिल ने द्वितीय महायुद्धकाल में जब इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री पद सँभाला तब वे 80 वर्ष के थे। जनरल मेकआर्थर 73 वर्ष की आयु में 45 वर्ष जैसे सक्रिय थे। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति सिंगमन 80 वर्ष की आयु में भी पूरी तरह क्रियाशील थे एवं पुनः चुने गए थे।
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म सफलता समूची जीवन-साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है, वह कम है। उन्हें सफल जीवन जीने के लिए अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिए। सो वे काॅलेज जाने लगीं और 69 साल की उम्र में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की स्नातक बन गईं। इसके बाद उन्होंने हाॅलीवुड का दरवाजा खटखटाया। जिस आत्मविश्वास के साथ वे बातें करती थी उसे देखकर डायरेक्टरों ने उन्हें छोटा काम दे दिया। उनके परिश्रम मधुर-स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व ने उस क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम करने का अवसर दिया। अस्तु उन्होंने लगातार तेरह वर्षों तक प्रत्यक्ष फिल्मों में काम किया। 82 वर्ष की उम्र में वे एक विद्वान शरीरशास्त्री से वह परामर्श लेने गई कि उनके पेट का मांस थुलथुला हो गया है। यह कसा हुआ कैसे हो सकता है? डाॅक्टर गैलार्ड हॉजर ने उपचार बताए। तद्नुसार उनका पेट भारमुक्त हो गया। साथ ही डाक्टर ने उसकी इतनी लंबी आयु और चुस्ती का कारण पूछा तो उनने बताया कि आहार संबंधी सतर्कता, व्यायाम में नियमितता और जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण ही उनकी वृद्धावस्था को जवानी स्तर की बनाए रहने में समर्थ हुआ है। वे जिंदगी को प्यार करती हैं और हरपल बहुत ही आनंद का रसास्वादन करते हुए जीना चाहती हैं। मोटेतौर से यही था उनकी वृद्धावस्था में भी जवानी की स्थिति बनाए रहने का प्रमुख कारण।
अमेरिका के प्रख्यात तेल व्यवसायी अरबपति राक फेलर पूरे 100 वर्ष जिए। उन्हें कभी बेकार समय गुजारते नहीं देखा गया। एकदूसरे व्यवसायी कोमोडोर विन्डरबिट ने 70 वर्ष की आयु में व्यापार क्षेत्र में प्रवेश किया और दस वर्ष के भीतर ही वे सफल उद्योगपतियों की श्रेणी में जा पहुँचे। मोटर उत्पादक हैनरी फोर्ड 82 वर्ष की आयु में भी उतने ही चुस्त पाए गए थे, जितने कि जवानी में वे थे।
वस्तुतः स्फूर्ति, चुस्ती, उमंग, उल्लास ही जीवन का प्राण है। जब तक वह विद्यमान है, भले ही व्यक्ति आयु की दृष्टि से कितना ही बड़ा क्यों न हो वह चिर युवा है। उदासी, निरुत्साहिता, नैराश्य का नाम बुढ़ापा है। चेहरे पर छाई मुर्दनी बताती है कि यह व्यक्ति असमय बुढ़ा गया है। जिन्हें जीवन जीना हो उन्हें कभी भी बूढ़े होने की बात सोचनी ही नहीं चाहिए।
लोग स्वप्न की दुनिया में जीते हैं और वह देखते हैं, जो उनके भीतर है।
ठंडक प्राणियों की जीवनशक्ति बढ़ाने में सहायक होती है। यह कथन बहुत हद तक सही है। उष्णताप्रधान क्षेत्रों और देशों की तुलना में प्राणियों और मनुष्य की सहनशक्ति और आयुष्य अधिक होती है। इसके प्रमाण संसार भर में घूमकर सहज ही पाए जा सकते हैं। उत्तरी ध्रुव के भालू, बारह सिंघे, हिरन और कुत्ते अपनी दृढ़ता और दीर्घायुष्य के लिए विख्यात है। एस्किमो लोगों को मात्र मांस पर निर्वाह करना पड़ता है, पर वे अपनी निरोगता और दीर्घ जीवन के लिए प्रसिद्ध हैं।
दक्षिणी ध्रुव पर प्राणियों की प्रजातियाँ कम हैं। वहाँ खड़े होकर चलने और बर्फीले पानी में डुबकी लगाने वाले पेन्गुइन पक्षी पाए जाते हैं और बिना पंखों वाले चींटे भी। फिर भी वहाँ की ठंडक और कठिनाइयों को वे जिस साहस और प्रसन्नता के साथ अपनाए रहते हैं, वह कमाल का है।
यूरोप के ठंडे मुलक और उज़्बेकिस्तान सरीखे प्रांतों में जहाँ दीर्घजीवियों का बाहुल्य है, वहाँ अन्य सुविधाओं के अतिरिक्त ठंडा मौसम भी सहायक है। गर्मी की अधिकता जीवनीशक्ति का अपहरण करती है और बीमारियाों की भरमार भी बढ़ाए रहती है।
इतने पर भी इस अतिवाद तक जा पहुँचना उचित नहीं कि ठंडक में जमा देने पर भी मृतशरीर भी इस योग्य बने रहते हैं कि कुछ समय उपरांत उन्हें जीवित बनाया जा सके। इस संबंध में वैज्ञानिकों ने कई खोजें और कई कल्पनाएँ की हैं। उनने इस निमित्त प्रयोगशालाएँ भी स्थापित की हैं, जिनसे मुर्दों का हिमीकरण करके उन्हें सुरक्षित रख दिया जाता है और आशा की जाती है कि कुछ समय उपरांत शरीर की कोशिकाएँ अपनी थकान मिटाकर नवजीवन के योग्य परिस्थितियाँ संचय कर सकेगी। साथ ही जिन रोग कीटाणुओं के कारण मृत्यु हुई थी, उनसे पीछा छुड़ाया जा सकेगा। नोबुल पुरस्कार विजेता चिकित्सा वैज्ञानिक डॉ. एलेक्सिस कैरेल इस प्रतिपादन में अग्रणी हैं। इस सिद्धांत के पक्ष में अमेरिकी विज्ञानी कार्वर्ड एडिगर ने अपनी पुस्तक “द प्रास्पेक्ट ऑफ इम्मार्टेलिटी” में इस कथन के समर्थन में भी बहुत कुछ विस्तारपूर्वक लिखा है। इस संबंध में 55 मृतशरीर, हिमीकृत करके रख दिए गए हैं और 100 से अधिक धनिकों ने इसकी पूर्व से व्यवस्था कर दी है।
इसके अतिरिक्त, एक कानूनी कठिनाई भी है कि एक बार मरने के उपरांत मनुष्य अपनी संपत्ति पर से अधिकार खो बैठता है। जिन उत्तराधिकारियों के नाम वह हस्तांतरित हो गई है, उनसे पुनर्जीवित व्यक्ति को वापस लौटाने का कोई प्रावधान कानून में नहीं है, इसलिए भी उत्तराधिकारी वह प्रयास अनिश्चितकाल के लिए जारी रखने में उपेक्षा बरतते हैं।
एक ओर जहाँ इस नए प्रतिपादन के प्रति समर्थन और उत्साह उभर रहा है। दूसरी ओर उसे बकवास बताया जा रहा है। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के जीरीएट्रिशियन डॉ. कार्ल वैण्ट्रिन का कथन है कि प्राणियों के संबंध में प्रकृति के नियम इतने ठुलमुल नहीं हैं कि उन्हें सहज ही उतारा जा सके। पदार्थों में उलट-पुलट हो सकती है पर प्राण चेतना ऐसी नहीं है, जिसे मनुष्य इच्छानुसार उलट-पुलट कर सके।
अध्यात्म सिद्धांत के अनुसार मरण, परलोक, पुनर्जन्म के सारे सिद्धांत कट जाते हैं, यदि मुर्दे फिर से नवजीवन प्राप्त कर सकें। जीवकोशाओं के विशेषज्ञ भी यही कहते हैं कि जीवनतत्त्व घिसते-घिसते, घटते-घटते इस स्थिति में पहुँच जाता है कि उसकी मरम्मत नहीं हो सकती। उसे तो पुनर्जन्म के नए ढाँचे में ही ढाला जा सकता है।
हम प्रकृति के नियमों से लाभ तो उठा सके, पर ऐसा नहीं हो सकता कि उसका प्रवाह ही उलट दें। जन्म-मरण के प्रवाह को इतनी सरलता से नहीं बदला जा सकता जैसा कि आज के भौतिक विज्ञानी सोचते हैं।
बात सन् 1890 की है तब भारत में गवर्नर जनरल टलरिन थे। वे कुछ दिन के लिए इंग्लैण्ड छुट्टी पर गए। उनका घनिष्ठ मित्र आयरलैण्ड में रहता था। इसलिए उन्हीं दिनों उनने आयरलैण्ड जाने के लिए समय निकाल लिया।
समाचार मिलने पर मित्र को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसका घर छोटा था। इस घिचपिच में उन्हें असुविधा न हो, इसलिए उन्हें पड़ोस के एक शानदार होटल में ठहराया गया।
डफरिन के सोने का प्रबंध बढ़िया था। जिस कमरे में उन्हें ठहराया गया उसकी खिड़की में से हरा-भरा पार्क दिखता था। मौसम भी अनुकूल था, पर उन्हें बहुत रात बीत जाने पर भी नींद नहीं आ रही थी। हैरान होकर उनने बिस्तर छोड़ दिया और कमरे में चहलकदमी करने लगे। इतने में अचानक हवा का एक तेज झोंका आया, जिसने उनकी मेज पर रखे हुए जरूरी कागज तितर-वितर कर दिये।
अंधड़ तो नहीं चल रहा है, यह देखने के लिए उनने खिड़की में से बाहर झाँका। आँधी तो नहीं थी, पर पार्क में खड़ा एक भयानक मनुष्य पीठ पर ताबूत लादे खड़ा था। वह बहुत डरावना लगता था। लगातार डफरिन की ओर ही आँखें फाड़-फाड़कर देख रहा था।
डफरिन हैरान थे। उनने पास के कमरे में सोए हुए नौकर को जगाया और टार्च लेकर उस स्थान पर पार्क में पहुँचे। रिवाल्वर साधा था। उस स्थान पर ताबूत तो पड़ा पाया पर उसे लादकर लाने वाला गायब था। डरे हुए होने पर भी वे किसी प्रकार सो गए।
दूसरे दिन मित्र के यहाँ गये और सारा विवरण सुनाया तो उन्होंने पास के कब्रिस्तान के प्रेतों द्वारा ऐसे उत्पात किए जाते रहने की बात स्वीकार की। दिन भर घूमने-फिरने के बाद रात को डफरिन फिर अपने होटल पहुँचे। संयोगवश लिफ्ट ऊपर ले जाने वाला कर्मचारी वह रात वाला भयानक आदमी ही था। वे सिहर उठे। उसके साथ जाने को वे तैयार न हुए; हालांकि लिफ्ट मैन उन्हें साथ चलने के लिए बहुत आग्रह करता रहा। आखिर उसने लिफ्ट चलाई और रास्ते में ही एक बड़ी दुर्घटना कर दी। जिसमें सभी 22 व्यक्ति मारे गए।
होटल मालिक से इस ड्राइवर के बारे में पूछा गया तो वे भी इतना ही बता सके कि उनका स्थाई लिफ्ट मैन एक दिन की छुट्टी पर गया था। उसके स्थान पर एक दिन के लिए इस नए आदमी को उसका नाम पता एवं लाइसेन्स आदि देखकर रख लिया था; पर दुर्घटना के बाद वह वहाँ से भी गायब हो गया, न उसका शव लिफ्ट में पाई लाशों में मिला।
विषय चर्चा का बन गया। पास-पड़ोस के लोगों ने सुना तो वे भी यह बताने आए कि पास के कब्रिस्तान में रहने वाले प्रेत अक्सर इस क्षेत्र के लोगों को इसी प्रकार डराते और हैरान करते रहते हैं।
डफरिन और उनके मित्र दोनों ही सुशिक्षित थे वे भूत प्रेतों की बात को केवल अंधविश्वास मानते थे; पर उस दिन जो घटना उनने देखी, इसके उपरांत वे मानने लगे कि प्रेत भी कोई होते हैं और उनमें से अधिकांश दूसरों को डराने या हैरान करने में रस लेते हैं।
भारत में भूतों के संबंध में अनेक दंत कथाएँ सुनी जाती हैं और घटनाओं के विवरण कान में आते रहते हैं। डफरिन जब लौटकर भारत आए तो उन्होंने प्रेत संबंधी गतिविधियों में दिलचस्पी लेने और यथार्थता को समझने का नए सिरे से प्रयत्न आरंभ किया।
भलाई कभी मरती नहीं और न भला आदमी कभी मरता है।
विश्वविख्यात अंग्रेज साहित्यकार ऑस्कर वाइन्ड अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध थे। मरणोत्तर जीवन और प्रेतात्माओं के अस्तित्व के संबंध में वे सदा असहमति प्रकट करते और मजाक उड़ाते रहे; किंतु कुछ घटनाओं ने उन्हें विचार बदलने के लिए विवश कर दिया। उनकी सतडडडडड पुत्री ने एक माध्यम के द्वारा ऐसे विवरण बताये और प्रश्न पूछे जिनके संबंध में उपस्थित लोगों में से किसी को कोई जानकारी न थी। यह घटना 8 जून 1925 की है। इसके बाद उनने इस विषय में रुचि लेना आरंभ किया और जो देखा-पाया उसका विवरण ऐसा था, जिससे उन्हें मृतात्माओं के अस्तित्व का पूर्ण विश्वासी कहा जा सके।
माइन्ड ओवर स्पेस, न्यू एप्रोचेज टु ड्रीम इन्टर प्रटेशन, एन साइक्लोपीडिया आफ साइकिक साइन्स, डिक्शनरी आफ दि अन्कान्शप्त आदि ग्रंथों के लेखक परामनोविज्ञानी नैनदोर फोदोर ने अपनी नई पुस्तक “दि इन एकाउन्टेबुल” में ऐसी कितनी ही घटनाओं का उल्लेख किया है, जिससे न केवल प्रेतात्माओं के अस्तित्व का; वरन उनकी प्रकृति तथा गतिविधियों पर भी प्रकाश पड़ता है। उन्होंने अपने परिचित दिवंगतों में से कितनों से ही संपर्क स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। इस संपर्क के माध्यम से जो तथ्य उन्हें उपलब्ध हुए वे ऐसे हैं, जिन्हें मनगढ़ंत नहीं कहा जा सकता। बताए गए विवरणों में से अधिकांश ऐसे थे, जिन्हें मृतात्मा के अतिरिक्त अन्य उँगलियों पर गिनने जितने लोग ही जानते हैं। उन विवरणों की यथार्थता ने अविश्वासियों में भी विश्वास उत्पन्न कर दिए।
मोनेरो रिसर्च इन्स्टीट्यूट वर्जिनिया के राबर्ट ए. मोनेरो ने मरणोत्तर जीवन पर आयोजित एक सम्मेलन में लगभग एक हजार व्यक्तियों के मरणोपरांत अनुभवों का संप्रेषण अवगत कराया। उन्होंने स्वयं दूसरी दुनिया में प्रवेश करने तथा एक अत्यंत विकसित सभ्यता से संपर्क साधने, उससे वार्त्तालाप करने की विस्मयकारी घटना को प्रस्तुत किया। अपने रोमांचकारी अनुभवों को उनने अपनी पुस्तक, जर्नीज आउट ऑफ दी बॉडी’ में भी प्रतिपादित किया है, जिसके अंतर्गत उनने बाल्यकाल से ही ऐसे परोक्ष अनुभवों से संबंधित घटनाओं का जिक्र किया है।
मनोविज्ञान के व्याख्याता डॉ. एन्ड्रियॉज रीस्क ने अमेरिका के एक वैज्ञानिक डॉ. केरियोस ओसिस का उदाहरण प्रस्तुत किया, जिनने लगभग एक हजार शरीर से परे के अनुभवों को प्रमाणित किया है। इन सबों में यह अनुभव व्यक्त किया गया— मृत्यु के बाद वे शरीर के बाहर निकले, ऊपर को उड़े, मृतक संबंधियों का आगमन हुआ आदि। इस बात की पुष्टि स्विट्जरलैंड के एक शिल्पकार- हरीफन जैकोविच की इस उद्घोषणा से होती है कि जो दुर्घटनाग्रस्त होने से मृत्यु के शिकार हुए, वे हॉस्पिटल में पुनः जीवित हो उठे। कुछेक लोगों द्वारा स्वेत दिव्य प्रकाश तथा संबंधियों द्वारा आशीर्वचन का अनुभव व्यक्त किया पाया गया है। कुछ ने तो यह भी कहा कि मृत्योपरांत हमने शांति व प्रसन्नता का अनुभव किया; परंतु शरीर में प्रविष्ट होते ही पुनः कष्ट सा अनुभव होने लगा।
अमेरिका के जॉन अलेक्जेन्डर ने भी मृत्युपरांत जीवन की बात को सत्य बतलाया है। उनने यह भी कहा कि अपूर्ण इच्छाओं के कारण व्यक्ति मृत्यु के बाद भी कष्ट का अनुभव करता है तथा उसे अंधकार के वातावरण में रहना पड़ता है। इसके विपरीत संतोषी स्वभाव के सज्जन व्यक्ति चिर आनंद की अनुभूति लेते रहते हैं। जॉन अलेक्जेण्डर ने अपनी पुस्तक ‘घोस्ट’ में अब्राहम लिंकन के भूत शरीर को अमेरिका के ‘व्हाइट हाउस’ में चलने, दरवाजा खटखटाने तथा तत्कालीन राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत होने की घटना को संकलित किया है। राष्ट्रपति रुजवेल्ट प्रायः लिंकन के दुःखी चेहरे को देखने तथा सभी कमरों में टहलने का अनुभव व्यक्त करते थे। ऐसा दृश्य यूनाइटेड स्टेट्स के जन आंदोलन समय तक देखा जाता रहा।
नीदरलैंड की रानी विथहेलमिनिया एक बार ‘रोज रूम’ में ठहरी थीं। रात को अचानक दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई। उन्होंने दरवाजा खोला, परंतु सामने लिंकन को प्रत्यक्ष रूप में खड़े देखकर भयाक्रांत हो गईं। विंस्टन चर्चिल भी लिंकन के कमरे में जब भी सोते तो रात को लिंकन भी वहाँ उपस्थित पाते थे।
डॉ. मोनेरो ने इस रहस्यात्मक तथ्य के ऊपर विशेष अध्ययन करने हेतु एक ‘सिगनल जनरेटर’ का विकास किया है, जिसके द्वारा शरीर से आत्मा के पृथक होते समय शरीर में होने वाले धड़कनों की ध्वनि को रिकार्ड किया जा सकता है तथा इस आधार पर विशेष अध्ययन आरंभ किया जा सकता है। अभी इस दिशा में अंवेषण चल रहे हैं।
पुनर्जन्म प्रकरण में अगले जन्मों में पिछले जन्म से मिलती-जुलती प्रकृति एवं परिस्थिति प्राप्त होती है, ऐसा भी देखा गया है। कई बार तो कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें किन्हीं पूर्ववर्ती लोगों की ‘ट्रू कापी’ कहा जा सके। ऐसी परिस्थितियों को भी पुनर्जन्म के रूप में स्मरण किया जाता है।
दार्शनिक एम. एच. विलिस की मान्यता के अनुसार शोपेन हावर बुद्ध के अवतार थे। ऐनीवीसेन्ट पहले ब्रूनो थीं। सिसरो ने दूसरा जन्म ग्लैड स्टोन के रूप में लिया था।
पादरी जिम विशेष शत कैनेडी को अब्राहमलिंकन का अवतार मानते थे। फ्रांस के सन्त लुइस तो 539 वर्ष बाद सम्राट लुइस सोलहवें के रूप में जन्मे। दोनों की बहने भी साथ-साथ जन्मी और एक जैसी स्वभाव की थीं, इतना ही नहीं उन दोनों का नाम भी संयोगवश एक ही रखा गया। दोनों लुइसों की जीवनचर्या एवं घटनाक्रम में भी असाधारण समानता रही।
वर्जीनिया युनिवर्सिटी के परामनोविज्ञानी डॉ. स्टीवेन्सन ने मानवी अतींद्रिय क्षमताओं के खोज संदर्भ में यह मंतव्य भी प्रकट किया है कि पुनर्जन्म की घटनाओं का स्मरण हो आना भी एक वास्तविकता है। ऐसे विवरणों को कपोल-कल्पना मनगढ़ंत नहीं कहा जा सकता। यदि ऐसा होता तो उन अविज्ञात घटनाक्रमों का वर्णन सही न मिलता जो ऐसे लोगों द्वारा बताया गया। सिखाई-पढ़ाई बातें तो ऐसी ही हो सकती हैं, जो विदित हैं; किंतु जो सर्वथा अविज्ञात, नितांत व्यक्तिगत एवं महत्त्वरहित थीं, उनका विवरण बताने की घटना सुनी या मन से गढ़ी हुई नहीं हो सकती।
कौत्स ऋषि कण्व के आश्रम में तप-साधना करते थे। एक दिन वन से लौटते हुए मार्ग में उन्हें एक आहत रूपवती स्त्री पड़ी दिखाई दी। कौत्स एक क्षण इसे देखने व उसकी सहायता करने को रुके; परंतु दूसरे ही क्षण वे अपने आश्रम की ओर चल दिए।
उनके पीछे महर्षि कण्व भी आ रहे थे। उन्हें अपने शिष्य की हृदयहीनता व असहाय अबला के प्रति दर्शाई गई उदासीनता पर आश्चर्य हो रहा था। कण्व ने उस महिला कि सहायता की, उसकी चिकित्सा की तथा उसे वे आश्रम में ले आए।
आश्रम में उन्होंने कौत्स को बुलाकर पूछा तो कौत्स बोले— “भगवान! मैंने देखा वह स्त्री इतनी रूपवती व सौंदर्यशाली थी कि मुझे अपने पर ही आशंका होने लगी थी कि ऐसा न हो उसका सान्निध्य मुझे साधना से विचलित कर दे, अतः मैंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आसक्ति विषय को टाल देना ही उचित समझा।" महर्षि कण्व ने कौत्स को समझाया— “वत्स! निर्धन, दरिद्र व अकर्मण्य मनुष्यों की सहायता करना ही सबसे बड़ी साधना है।”
कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया गया। अबला की सहायता किसी मनुष्य द्वारा न की जा सकी। वस्त्र रूप में ईश्वरीय शक्ति प्रकट हुई और अबला की लाज बचा ली गई। दमयन्ती अकेली बीहड़ वन में घिर गई और व्याध उनके सतीत्व को नष्ट करने पर तुल गया। दमयन्ती के नेत्रज्योति में भगवान प्रकट हुए, व्याध जलकर भस्म हो गया। प्रहलाद का पिता ही उसकी जान का ग्राहक बन बैठा, असहाय बालक बचकर कहाँ जाए? खंभे से नृसिंह भगवान के रूप में वह शक्ति अवतरित हुई। राज्य से निष्कासित पांडवों की रक्षा सदैव भगवान करते रहे, अंततः महाभारत में घोड़ों को जोतने स्वयं आए। नरसी मेहता के सम्मान की रक्षा भी उनने की व ग्राह से गज की रक्षा के लिए भी स्वयं भगवान आगे आए।
ये पौराणिक उदाहरण बताते हैं कि भक्तों पर भगवान की अहैतुकी कृपा सतत बरसती रहती है। भगवान कष्ट में पड़े भक्त की रक्षा हेतु स्वयं आते व उनका त्राण करते हैं। यह भगवान किसी धर्मविशेष का नहीं है। उसे सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय या नियामक तंत्र नाम दिया जा सकता है।
एक घटना सन् 1874 की है। इंग्लैंड का एक जहाज धर्मप्रचार के सिलसिले में 214 यात्रियों को लेकर रवाना हुआ। विस्के की खाड़ी में पहुँचकर जहाज के पेंदे में छेद हो गया। अब जहाज का डूबना निश्चित था। जहाज के कर्मचारियों ने यात्रियों को लाइफ बोट के सहारे बचाने का प्रयास करना प्रारंभ कर दिया। कुछ मल्लाह पंपों से जहाज का पानी निकालने लगे। अचानक पम्पों पर काम करने वाले मल्लाहों में खुशी की लहर दौड़ गई, पानी आना बंद हो गया। जहाज तेजी से बंदरगाह की ओर दौड़ाया गया। जहाँ जांच पड़ताल की गई तो पाया कि एक मोटी मछली जहाज के पेंदे के छेद में फँस गई है और अब जहाज के डूबने की कोई संभावना नहीं है। न जाने कौन-सी शक्ति आई व विशाल मत्स्य का रूप धारणकर सभी को बचा ले गई।
दूसरी ओर उस व्यवस्था तंत्र में यह भी सही है कि दूसरों के विनाश का ताना-बाना बुनने वाले स्वयं उससे बच नहीं पाते प्रत्युत अधिक ही हानि हिस्से में आती है। इसका एक उदाहरण उस समय देखने को मिला जब एक वैज्ञानिक स्वयमेव तोप के गोले के साथ निकलकर अपनी पत्नी से टकराकर चकनाचूर हो गया।
वेनिस के फ्रांसिस्को डीले वार्च नामक वैज्ञानिक की उन दिनों बड़ी चर्चा थी, जब उसने एक ऐसे सशक्त राकेट का निर्माण किया था, जो 3000 पौंड के वजन का गोला लेकर उड़ लेता था। एक बार जब यूगोस्लाविया की घेराबंदी तोड़ने के लिए उसका उपयोग हो रहा था, तभी अचानक आविष्कारक भी गोले के साथ मशीन में फँस जाने से निकल पड़ा और किसी काम से आई हुई अपनी पत्नी के साथ टकराकर चकनाचूर हो गया। दोनों को एक साथ ही दफनाया गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जो घटना घटी, वह भी चौंका देने वाली थी। आर्कटिक क्षेत्र में घूमते हुए एक जर्मन विध्वंसक जहाज का लक्ष्य बनाकर जैसे ही ब्रिटेन के युद्धपोत ट्रिनीडाड ने टारपीडो छोड़ा वैसे ही कुछ क्षणों में लक्ष्य से भटककर वह ‘टारपीडो’ लौटा व अपने ही युद्धपोत से टकराकर उसने उसे नष्ट कर दिया।
पश्चिमी योरोप के केलगाल इलाके में 1257 ई. में एक बागी सेनापति पॉस्थुमस ने अपनी सैनिक टुकड़ी के माध्यम से भारी लूट-पाट मचाई। लुटेरे सैनिक स्वयं मालामाल हो गए और अपने सेनापति को रोम का राजा घोषित कर दिया, परंतु ‘पॉस्थुमस’ की दुर्गति होने में भी अधिक दिन नहीं लगे। सैनिकों की अपनी मनमानी चल ही रही थी। इसी बीच एक बार उनने जर्मनी का एक नगर ‘मेज’ को लूटने की अनुमति माँगी, अनुमति न मिलने पर ‘पॉस्थुमस’ को ही गोली से उड़ा दिया और स्वच्छंद होकर लूट-पाट करते रहे। अनीति का साम्राज्य अधिक दिन नहीं टिकता।
एक घटना 30 मई 1887 की है। इटली के टोरियो ठिकाने की राजकुमारी का विवाह इटली के राजकुमार ड्यूक डिआडस्टा के साथ हुआ; किंतु उस अभागे विवाह दिन की जितनी भर्त्सना की जाए कम है, जिसने वर-वधू के अनेकों संबद्ध व्यक्तियों को काल के गाल में झोंक दिया। राजकुमारी की निजी नौकरानी द्वारा फाँसी लगा लेना, द्वारपाल द्वारा अपना गला काट लेना, बारात का नेतृत्व करने वाले की लू लगने से मृत्यु, सुहागरात मनाने के लिए जाने वाली ट्रेन से स्टेशन मास्टर का कुचलकर मर जाना, राजा के व्यक्तिगत सहायक का घोड़े से शिर के बल गिरकर मर जाना, विवाह के विशिष्ट प्रबंधक वेस्टमैन का अर्धविक्षिप्त होकर प्राण गवाँ देना, आदि घटनाएँ उस दर्दनाक क्षणों की याद दिलाकर अभिशप्त विवाह दिन को विस्मृत नहीं होने देतीं।
कुछ व्यक्ति भी अभिशप्त स्थिति में होते हैं, जिनके संपर्क में आने वालों को दुर्गतिपूर्ण दिन देखने पड़ते हैं। रोम के राजा क्लाउडियस की अद्वितीय सुंदरी बेटी एन्टोनिया से शादी करने के अनेकों प्रस्ताव अनेकों लोगों के आते थे, परन्तु उसे सदैव असफल ही रहना पड़ा।
दो बार उसने विवाह किया, परंतु दोनों बार उसके पति किसी न किसी आरोप में फँसकर मृत्युदंड के शिकार बने। तीसरी बार सम्राट नीरो ने शादी का प्रस्ताव भेजा, परंतु प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाने से वे इस अपमान को सहन न कर सके, और अपनी हत्या स्वयं ही कर ली।
अभिशप्त वस्तुओं का बुरा परिणाम किस प्रकार उसके स्वामी को भुगतना पड़ता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत घटना में मिल जाता है। 5 मार्च 1784 को लेडन नगर के शस्त्रागार रक्षक ‘डेनियल’ को लुटेरों ने दो गोली दागकर मार डाला, जिसके कीमती कोट को उसके छोटे भाई ने पहनना शुरू कर दिया। वह भी उसी विभाग में नौकरी करता था। एक दिन लुटेरों ने उसकी भी दो गोली दागकर उसी प्रकार हत्या कर दी जैसे उसके बड़े भाई की हुई थी। आश्चर्य तो इसमें था कि बड़े भाई को जहाँ गोली लगी थी, कोट के उसी छेद से गोली जाकर छोटे भाई को लगी और वह भी मारा गया।
अनीति मार्ग से उपार्जित वस्तुएँ भी अभिशप्त बन जाती हैं। आॅस्ट्रेलिया के युवराज अंक ड्यूक फ्राज फर्निनेड की खरीदी हुई आलीशान कार एक ऐसे ही दुर्भाग्य की कहानी है, जिसमें अनेकों व्यक्तियों की जानें गईं। 28 जून 1914 में वह अपनी पत्नी को ‘बोस्तियाँ’ के गवर्नर के यहाँ निमंत्रण में ले जा रहा था कि बम का सनसनाता गोला आ फूटा, जिससे चार अंगरक्षक बुरी तरह घायल हो गए और थोड़ा आगे चलते ही पति-पत्नी दोनों को ही गोली का शिकार सेराजेलो नगर में बनना पड़ा। सेराजेलो के एक सेनापति जनरल पोत्येरेक ने इस कार पर अपना आधिपत्य जमाया। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि 21 वें दिन युद्ध में उसकी पराजय हुई और देहावसान भी। पोत्येरेक की मृत्यु के बाद उसकी सेना के एक कप्तान ने इस कार का इस्तेमाल किया तो तीन व्यक्तियों की जान ले बैठी। आकर्षणयुक्त कार को गवर्नर के पास भेजा गया। मरम्मत कराने के दो माह बाद पाँच दुर्घटनाएँ हुई। गवर्नर को अपने दाहिने बाजू से हाथ धोना पड़ा।
स्विट्जरलैंड के एक रेस ड्राइवर ने प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कार को खरीदा तो उसकी भी जीवन लीला समाप्त हो गई। फिर से कार ‘सेराजेलो’ में ही एक किसान के यहाँ आ पहुँची। किसान कार को अपनी गाड़ी से बाँधकर चला तो अचानक ही दौड़ पड़ी और उसे तो मारा ही साथ ही साथ गाड़ी-बैलों का भी चकनाचूर कर दिया। कार हर्शफील्ड नामक व्यक्ति के पास आई तो उसके चार मित्रों की जानें चली गई। उपर्युक्त दुर्घटनाओं की जानकारी जब आस्ट्रेलिया सरकार को हुई तो उसे मुर्दाघर को सौंप दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया। मुर्दाघर में एक साथ कई गोले फट पड़े। कार तो ध्वस्त हुई, पर साथ ही अनेकों व्यक्तियों को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। अनीति उपार्जन जहाँ भी जाता है, सर्वनाश करता है। यही भगवान की न्याय-व्यवस्था है।
धन की अनावश्यक मात्रा ओछी बुद्धि के लोगों को एक प्रकार का सनकी बना देती है। वे यह नहीं सोच पाते कि उपलब्ध साधनों का सदुपयोग कैसे किया जाए, उनके ऊपर यही सनक सवार रहती है कि लोग किसी प्रकार हमें बड़ा आदमी माने और हमारे सौभाग्य की प्रशंसा करें। इसी में वे अपनी दौलत को उड़ा देते हैं। काश, उनमें दूरदर्शिता रही होती तो इन्हीं साधनों का कितना उत्तम सदुपयोग बन पड़ता और कितना लोकहित होता।
कांगो अफ्रीका की जनजाति बाकुला का मुखिया ऐसी कसीदाकारी के वस्त्र पहनता था जो 230 पौंड भारी होते थे। मध्यकालीन जिरहबख्तर से भी तीन गुने अधिक भारी।
स्पेन के उपनिवेश अफ्रीका के गायना का हब्शी राजा न्यूविस अपने लिए एक नया सिंहासन रोज बनवाता था। यद्यपि वह जंगली लकड़ियों का होता था, पर उसे बनाने और लकड़ी काटने के लिए 100 श्रमिकों की टोली को नित्य काम करना पड़ता था।
टुल्ली वार्डाइन के अमीर सर डेविड के 17 पुत्र थे। वे उन्हें साथ-साथ रखना चाहते थे, इसलिए एक ऐसा विशालकाय गोल पलंग बनवाया था, जिसमें गोलाकार सभी छोटे-बड़े बच्चे एक साथ सो सकें।
गुजरात के शासक खांडेराव को कबूतर पालने का शौक था। उनने एक जोड़ा कबूतर के विवाह में धूमधाम की अति बरती। दावत, दहेज तथा धूमधाम में 20 लाख रुपया खर्च किया।
अफ्रीका में बोर्नू इलाके के शासक अमीर अली ने पड़ोसी राज्य अहेर पर इसलिए 1000 घुड़सवारों के साथ हमला बोला कि उसके राज्य की एक महिला की तीलियों से बनी टोकरी उस राज्य का कोई प्रजाजन क्यों छीन ले गया। खाली टोकरी वापस मिल गई, पर इस आक्रमण और बचाव में सैकड़ों व्यक्ति मरे और घायल हुए।
चार्ल्स डी वोल्ड जिस राजमुकुट को पहनते थे, उसमें 5 लाख डालर मूल्य के रत्न जड़े हुए थे।
प्रतापगढ़ (उ.प्र.) के राजा ने गाडरवारा के शासक को हरा दिया। भागकर उसने अपनी जान बचाई। उसे गीदड़ सिद्ध करने और उपहास उड़ाने की दृष्टि से एक सियार को पकड़ कर गाडरवारा का राजा बना दिया। वह वन्य पशु राजा की पोशाक पहनकर राज सिंहासन पर बैठता था। इस प्रकार 12 वर्ष तक सियार राजा की तूती बोली।
हैदराबाद का छठा निजाम मीर महबूबअली सन् 1856 में जन्मा और 1901 में मरा। जिसे बेशकीमती कपड़े पहनने का शौक था; पर वह उन्हें एक दिन ही पहनता था और दूसरे दिन नौकरों को दे देता था।
भूटान पर कभी लामाओं का राज्य था। उन्हीं का सिक्का चलता था। उस देश के एक शासक ने अपना सिक्का चलाया, जिसमें उसके 16 गुणों का उल्लेख था। उसी में यह भी लिखा था कि मैं पवित्रता और ज्ञान का भंडार हूँ।
बगदाद के खलीफा हीरुँ रसीद का प्रधानमंत्री याहिया अलवरमरी रोज घोड़े पर चलकर शहर का चक्कर लगाता। जहाँ अजनबी लोग दिख पड़ते वहीं अपने सौ रुपये के सिक्कों की थैली उछाल देते। भीड़ उसे लूट लेती। इस प्रकार उसने सन् 786 से 798 के बीच 24 करोड़ डालर की चाँदी बखेरी।
फारस का बादशाह फतहअली शाही उसका राज्याभिषेक 1797 में हुआ, तब उसकी शाही पोशाक पर 170 पौंड हीरे और जवाहरात जड़े हुए थे। वह पोशाक उसने एक दिन के लिए भी छोड़ी नहीं। जब भी राजसिंहासन पर बैठता तभी उस वजनी पोशाक को धारण किए रहता।
वर्मा से मिला हुआ एक 60 वर्ग मील का इलाका है पागान। इसके निवासियों की संख्या 40 लाख है; पर उसी दायरे में 5000 से अधिक मंदिरों के अवशेष अभी भी मौजूद हैं। अनुमान है कि इससे दूने पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं।
मिश्र का एक धन कुबेर 1233 में उत्पन्न हुआ और 60 साल का होकर मरा, नाम था उसका अमीर बेसरी। वह सोच नहीं पाता था कि इतने धन का क्या करे। वह रोज नए सोने-चाँदी के प्यालों में शराब पीता था। पिछले दिन का प्याला वह ऐसे ही किसी को दे देता था। मिश्र का बादशाह बनने का उसके लिए अवसर था; पर उसने यह कहकर ठुकरा दिया कि मैं अपने आराम की जिंदगी में बेकार खलल नहीं डालना चाहता।
वेनिस इटली में सम्राट पियस छटे के आगमन पर एक दिन के लिए एक भव्य भवन खड़ा किया गया था। उनके चले जाने के बाद वह महल भी गिरा दिया गया।
मोरियक के शासक द्वारा बनाया हुआ एक किला फ्रांस की इस शर्त पर मिला कि वह एक अंडा वार्षिक किराया देता रहेगा। अंडा बड़ी सजधज के साथ शानदार गाड़ी में रखकर सैन्यसज्जा के साथ पहुँचाया जाता था। यह क्रम 350 वर्ष चला और सन् 1779 में समाप्त हुआ।
दिल्ली के बादशाह मुहम्मद तुगलक को नई राजधानी दौलताबाद बनाने की सनक आई। उसने दिल्ली के सभी नागरिकों को घर छोड़कर उसके साथ चलने का हुक्म दिया। इस सनक से हजारों साथ चलने वालों को भूख और थकान से प्राण छोड़ने पड़े।
कैरेमियन्स पर 13 वर्ष राज्य करने वाला सुलतान जत्वरी को अपने साथियों और दरबारियों से ही षड्यंत्र करके मार डालने का भय सताता रहता था। रात को वह हथियारों से लैस होकर सोता था और आँखें खुली रखकर सोने का आदी हो गया था। रात भर कड़ा पहरा रहता था, तो भी अंत में षड्यंत्रकारियों द्वारा ही मारा गया।
फ्रांस के ओपेरा हाउस की शानदार बिल्डिंग सन् 1824 में इसलिए शाही फरमान से ढहा दी गई थी कि उसमें वेरी के ड्यूक की हत्या हुई थी। हत्या करने वालों में इस इमारत को भी दोषी माना गया।
गंजी खोपड़ी का एक सनकी अंग्रेज मोटेगू नकली बालों की एक टोपी हर वक्त इसलिए पहने फिरता था कि उसकी खामी का किसी को पता न चले। टोपी के ऊपर जमे बाल उसके सीने तक लहराते थे।
यमन के शासक मालिक अजीज ने अपने शाही कोट के पीछे 60 फुट लंबा पुछल्ला सिलवाया था। उसे उठाकर चार नौकर चलते थे। ऐसी ही शेखीखोरी की और भी कई लतें उसमें थीं। प्रजा ने इस फिजूलखर्ची से क्रुद्ध होकर बगावत कर दी और राजा मार डाला गया।
भारत के एक राजा ने इंग्लैण्ड में ऐसा चाँदी-सोने का पलंग बनवाया था, जिसके चारों ओर नंगी पुतलियाँ लगी थीं और पलंग के नीचे लगी मोटर पुतलियों के हाथ से पंखा झलती थी।
मंगोलिया, फारस, भारत, तुर्किस्तान पर शासन करने वाले शाहरुख ने अपने 43 वें जन्मदिवस पर दावत में अतिथियों को एक-एक जवाहरात की भरी प्लेट भेंट में दी थी।
आॅस्ट्रिया का चांसलर काडनिटस ठंड से भारी डरता था। वह गर्मी में भी एक के ऊपर एक छह कपड़े पहने रहता था। तो भी वह 1798 में ठंड लगने से ही मरा।
लग्जम्बर्ग के शासक ऐडोल्फ की यह सनक थी कि सातवाँ बच्चा अधिक भाग्यवान होता है। उसने अपने राज्य के सभी सातवें बालकों को एकत्रित करके उनका धर्मपिता कहलाने की सनक थी।
मार्किन्स सेनाड़ा स्पेन का मूर्धन्य राजनेता था। उसने अपनी पोशाक में नए जवाहरात जड़वाने का शौक आजीवन जारी रखा। उसकी पोशाक में 7 लाख डालर के रत्न जड़े थे।
व्रिक्शन आॅस्ट्रिया का शासक मेल्शियरवान जब मरा तो उसने अपनी आस्तीन में 3 लाख सोने के सिक्के छुपा लिए ताकि वे परलोक में उसके काम आवें; पर जब उसे ताबूत में बंद करने से पूर्व नए कपड़े पहनाए गए तो वे सभी सिक्के पकड़ में आ गए और सरकारी खजाने में जमा कर दिए गए।
रोम का एक सम्राट कामोडस को नामवरी की इतनी भूख थी कि उसने अपने शासन की सभी इमारतों के नाम अपना नाम जोड़ते हुए 1, 2, 3, 4 आदि क्रम से रखवाए। सेनाओं का नामकरण भी उसी के नाम पर किया गया। तिथियों और वारों को भी अपने नाम के साथ जोड़कर बदलवाया। शासन के सभी विभागों में अपना नाम जोड़ा और शताब्दी को कामोडस सुनहरी शताब्दी कहलवाया; पर उसके मरते ही उत्तराधिकारियों ने इस सनक का पूरी तरह परिमार्जन करके वही पुराने नाम ठीक करा दिए। दुनिया सनकियों से भरी पड़ी है। चित्र-विचित्र दुनिया में मात्र प्रकृति ही नहीं, मानव की स्वयं की प्रकृति भी कम विलक्षण व हास्यास्पद नहीं है।
कौन, कितना जिया इसका लेखा-जोखा इस आधार पर लिया जाना चाहिए कि उसने कितना आनंद पाया और कितना लुटाया।
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जब मनुष्य के भीतर उचित और अनुचित का अंतर्द्वन्द्व उठ खड़ा हो तो समझना चाहिए कि सुख-शांति के दिन नजदीक आ गए।
श्रावस्ती क्षेत्र में उस वर्ष भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। अन्न के अभाव से असंख्यों को प्राण त्यागना पड़ा। आजीविका की खोज में अगणित लोग देश त्यागकर अन्यत्र चले गए।
प्रश्न उन माताओं का था जिनके बच्चे छोटे थे और घर के पुरुष या तो मर गए थे या अन्यत्र जा चुके थे। वे दयनीय स्थिति में मरणमुख में जा रही थीं।
बुद्ध से यह करुण दृश्य देखा न गया। उस क्षेत्र के साधनसंपन्नों की उनने गोष्ठी बुलाई और इस अनाथ समुदाय की प्राण-रक्षा का उपाय करने के लिए अनुरोध किया।
श्रीमंतों के पास साधन तो थे, पर थे इतने ही कि अपने परिवार का एक वर्ष तक निर्वाह कर सकें। उनमें से किसी ने भी व्यवस्था जुटाने की पहल करने का साहस न दिखाया। सभी सिर झुकाए बैठे थे।
स्तब्धता को चीरते हुए एक बारह वर्ष की कन्या उठी। उसने कहा— "देव, आज्ञा दें तो मैं इस समुदाय के निर्वाह का उत्तरदायित्व उठाऊँ।"
तथागत ने चकित होकर पूछा— "वत्स! तुम कौन हो? और किस प्रकार यह व्यवस्था कर सकोगी?"
बालिका ने कहा— "देव! मनुष्य कितना ही निष्ठुर क्यों न हो, उसके अंतराल में कहीं न कहीं करुणा अवश्य छिपी रहती है। मैं उसी को जिनके घर चूल्हा जलेगा उन्हीं से आधी रोटी उन मरणासन्नों की स्थिति का परिचय कराकर ममता जगाऊँगी। आधी रोटी लेकर रहूँगी।"
बुद्ध ने उसके शिर पर हाथ फिराया और कहा— "श्रीमंतों से अधिक जनभावना की संपन्नता अधिक है तुम उसे उभारने में सफल हो", ऐसा आशीर्वाद दिया।
सुचेता का वह व्रत एक वर्ष तक चला। वर्षारहित दुर्भिक्ष दूर होने तक की इस अवधि में सुचेता ने एक सहस्र अनाश्रितों को नित्य भोजन कराने में श्रेयमात्र अपने पुरुषार्थबल पर अर्जित किया।
पानी की लहरें जब उठती हैं तो एकदूसरे को आगे धकेलती चलती हैं। अगली आगे बढ़ती है तो पिछली उनकी जगह घेर लेती है। यही बात तीव्र पवन के विषय में भी है। जब हवा के तेज झोंके उठते हैं तो अगले प्रवाह को आगे धकेलने और पिछले को साथ समेटते चलते हैं। मानसिक आवेशों का भी यही क्रम है।
शांत चित्त मनुष्य एकाकी चिंतन करता और किसी निष्कर्ष पर स्वेच्छा-विवेक के सहारे पहुँचता रहता है; पर जब जन आवेश के चक्रवात में फँसता है तो उन्मादी जैसी स्थिति अपना लेता है। मंडलियाँ एक वातावरण बनाती हैं। समुदायों के मिले-जुले कृत्य भी ऐसे षड्यंत्र रचते हैं कि उनके परिणाम सूझ ही नहीं पड़ते। प्रतिभावानों का उन्माद दुर्बल मन वालों को इस स्थिति में पहुँचा देता है कि नदी के प्रवाह में बहते हुए पत्ते की तरह दिशा पकड़ लेते हैं और भूल जाते हैं कि इस प्रवाह में बहते-बहते वे कहाँ जा पहुँचेंगे?
अग्रिणी नेतृत्व करते हैं और पिछलग्गू उस अनुकरण में ही अपनी भलाई सोच लेते हैं। हिप्नोटिज्म के सिद्धांत में यही कार्यपद्धति काम करती है। प्रचंड मनोबल वाला दुर्बलों पर हावी हो जाता है और उन्हें उसी प्रकार सोचने तथा करने के लिए बाधित करता है जैसा कि अग्रगामी चाहता है।
लोकमानस भी सर्वथा स्वतंत्र एकाकी नहीं है; वरन मिल-जुलकर सोचने और करने की उसमें आदत है। हवा और नदी की तरह मन का भी एक प्रवाह होता है और वह अन्यमनस्क न रहकर एक दूसरे से प्रभावित होता और करता है, इसलिए विशेषतया मनस्वी लोगों को यह विचार विशेष रूप से करना चाहिए कि उनकी विशेषता मात्र शिक्षा, संपन्न, परंपरा आदि के साथ जुड़ी हुई नहीं है; वरन वे अनेकों को मोड़ते मरोड़ते, धकेलते और घसीटते भी हैं। एक का एकाकी चिंतन या कृत्य अनेकों पर हावी होता है और वैसा ही करने की न केवल प्रेरणा देता है; वरन एक प्रकार से परंपरा बना देता है। इसलिए मनस्वीजनों के बीच विचार-मंथन होते रहना चाहिए, ताकि जनमानस को एक दिशा में बहने न लगकर उचित-अनुचित का विचार करने और अपना मार्ग स्वयं निर्धारित करने का अवसर मिले।
समय-समय पर उभरते रहने वाले युद्धोन्मादों की हल्की समीक्षा भी की जा सकती है। आदिमकाल में सामूहिक युद्ध नहीं होते थे। खाद्य-व्यवस्था, परिवार और आत्मरक्षा के प्रसंगों पर ही छुट-पुट लड़ाइयाँ होती थीं। उन्हें भी समुदाय का मुखिया फैसला देकर शांत करा देता था। ईसा के 2000 वर्ष तक का पुराना इतिहास ऐसा है, जिसमें आहार के लिए पशुवध को छोड़कर युद्ध या महायुद्ध जैसे संगठित विग्रह नहीं हुए हैं, पर जब सामंतवादी प्रचलन चला तो महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति अपने या अपने समुदाय के लिए अधिक सुविधा-सामग्री एकत्रित करने के लिए युद्ध करने लगे। उन दिनों के युद्धों को एक प्रकार की दलीय लूट-पाट कहा जा सकता है। सामंत कुछ मजबूत डाकुओं का गिरोह अपने साथ जमा करते थे और विजेता पक्ष को यह छूट रहती थी कि पराजित वर्ग के सैनिकों को ही नहीं मारे; वरन उस क्षेत्र की जनता की धन-संपदा लूट लें और जवान स्त्री-पुरुषों को दास-दासी के रूप में खदेड़ ले जाए। बलिष्ठों के लिए यह लाभदायक सौदा था। मिल-जुलकर बलिष्ठ सेना के सहारे छोटे क्षेत्रों और समुदायों पर आक्रमण करने में लाभ अधिक और घाटा कम पड़ता था, इसलिए छोटे-छोटे राजवाड़े भी स्वतंत्र न रहकर किन्हीं शक्तिगुटों का आश्रय टटोलने लगे और उसका मूल्य नजराने के रूप में चुकने लगा। यह व्यवसाय मुद्दतों चलते रहे। कोई सामना न करे इसलिए कत्लेआम होते रहे।
पर्यवेक्षणों की गणना है कि बारूद के बल पर लड़ा जाने वाला प्रथम विश्वयुद्ध जो लड़ा गया है, उसमें 90 लाख व्यक्ति मारे गए। इस संसार की तत्कालीन जनगणना को देखते हुए प्रति एक लाख व्यक्तियों के पीछे 58 का कत्ल कहा जा सकता है। यों बारूद की जानकारी क्षेत्रीय डकैतों ने पहले ही प्राप्त कर ली; थी पर उसका भरपूर उपयोग प्रथम महायुद्ध में हुआ। वह सन् 1919 से 1929 तक चला और उससे 90 लाख व्यक्ति मरे। द्वितीय महायुद्ध में यह संख्या और भी तेजी से बढ़ी और देखते-देखते 5 करोड़ व्यक्ति मृत्यु के मुँह में समा गए। इस प्रयोग में प्रति मिनट 10 लाख डालर तक खर्च होता रहा। सुयोग्य वैज्ञानिकों में से 49 प्रतिशत को ऊँचे प्रलोभन देकर युद्ध सामग्री का स्तर और बाहुल्य बढ़ाने के लिए लगा दिया गया। वे एक ही बात सोचते रहे कि सरलतापूर्वक किस प्रकार सैनिकों का वध हो सके।
द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत तृतीय विश्वयुद्ध तो नहीं हुआ पर क्षेत्रीय लड़ाइयाँ बराबर चलती रहीं। पिछले मध्यकाल में 14513 क्षेत्रीय युद्ध लड़े गए और चूँकि उनके पीछे बड़ी सत्ताएँ और बड़े साधन थे इसलिए खर्च मालूम नहीं पड़ा। इन युद्धों में इतना धन व्यय हुआ कि अरब के आगे 20 शून्य और लगा दिए जाए तब उनकी गणना हो सकती है। दूसरे शब्दों में इसे यों भी कहा जा सकता है कि समूची पृथ्वी को लपेटने वाली (160 किलोमीटर चौड़ी और 20 मीटर मोटी दीवार) सोने की एक दीवार खड़ी की जा सकती थी।
सामंतवादी संघर्षों में जनता की लूट-पाट के रूप में धन-जन की भयानक क्षति तो उठानी पड़ी, पर 1815 से 1915 तक के 100 वर्षों में 25 लाख व्यक्ति ही समस्त संसार में मारे गए। गति क्रमशः तेज ही होती गई और 1914 के उपरांत मात्र 30 वर्षों में ही 10 करोड़ की हत्या हुई।
सन् 85 और 45 के मध्य 40 वर्षों में 119 युद्ध हुए। वे अपेक्षाकृत महँगे पड़े। उनमें प्रति मिनट 1 करोड़ से 10डडडडड लाख रुपये के हिसाब से विशाल धनराशि स्वाहा होती चली गई।
अब पनडुब्बियों और मिसाइलों का युद्धकाल आ रहा है। एक पनडुब्बी बनाने में प्रायः इतना पैसा खर्च हो जाता है जितना कि 23 विकासशील देशों का संयुक्त बजट है। पनडुब्बी की तुलना में उपग्रहों का खर्च कम नहीं, वरन अधिक ही पड़ता है। इन सबके निर्माण में युद्धरत राष्ट्रों को जो खर्च करना पड़ता है वह इतना है कि उतने भर से संसार की गरीबी, बेकारी, बीमारी और अशिक्षा की चारों समस्याएँ सरलतापूर्वक पूरी हो सकती हैं।
धन व्यय और मनुष्य हनन के जो आंकड़े प्रकाशित होते हैं, विश्वस्त नहीं है। वस्तुतः इससे कहीं अधिक धन-जन की क्षति होती है।
इन युद्धों के कारणों पर प्रकाश डालते हुए रूस की फिस्सेवी लिखित “एविडेन्स फार प्रोसीक्युशन” तथा अमेरिका के “वाशिंगटन वर्ड प्रायोरिटी” द्वारा प्रकाशित तथ्यों द्वारा प्रकट है कि वास्तविक कारण ऐसे नहीं थे, जिनका कोई संयुक्त पंचायत सरलतापूर्वक न निपटा देती और बिना एक गोली चलाए काम न चल जाता।
फिर युद्ध क्यों होते रहे और दोनों पक्षों में से किसने क्या पाया? इसका अनुमान लगाने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि संकीर्ण स्वार्थपरता और उद्धत अहंता के सम्मिश्रण से उत्पन्न युद्धोन्माद का मानसिक नशा ही इन महाविनाशों का कारण रहा है।
इतिहास टॉलेमी और बाल्टेयर ने अपने ग्रंथों में समय-समय पर उभरते अनाचारों और उस चक्की में पिसते अनेकों निरीह निर्दोषों का वर्णन किया है और कहा है कि यह सामूहिक उन्माद मनुष्य जाति के प्रतिभावानों से अलग होने वाली एक प्रकार की छूत की बीमारी है जो चित्र-विचित्र रूप में संक्रामक रोगों की तरह उभरती है जो मानवी गरिमा को गिराकर उसे एक आवेशग्रस्त उन्मादी बना देती है। इसका परिणाम किसी के लिए भी सुखद नहीं होता। पागल दूसरों को हैरान करता है, पर स्वयं भी चैन से नहीं बैठता।
युद्धोन्माद की तरह इतिहासकारों ने यौन उन्माद की गणना की है और लिखा कि इस कुचक्र में अब तक अप्रत्याशित संख्या में युवतियों में रखैलों की तरह भेड़-बाड़े में कैद रहना पड़ता है। लाखों को अपने मालिकों के मृतशरीरों के साथ जीवित स्थिति में गड़ना या चलना पड़ा है। दासियाँ जितनी बिकी हैं उसकी तुलना में दासों को पकड़ा और बेचा जाना कम ही हुआ है। दांपत्य जीवन दो साथियों से ही बन सकता है। सामंतों ने अपने हरम में हजारों की संख्या में सुंदरियों को शिकार की तरह बाँधा, बेचा और हलाक किया। यह भी युद्ध उन्माद स्तर का एक नशा ही है।
प्रचलित जन आवेशों में नशेबाजी की आदत आसमान छूने लगी है और लोग प्रायः आधी आयु और आधी कमाई उसको स्वेच्छापूर्वक भेंट कर रहे हैं। पूर्वकाल जैसा उत्पीड़न न होते हुए भी नशेबाजी का विवरण इतना बड़ा है, जिसको बड़ी से बड़ी बीमारी से कम नहीं कहा जाता है।
नृशंस उत्पीड़न से आनंद की अनुभूति किसी समय हाथी, भैंसे, मुर्गे, तीतर आदि की लड़ाई देखने के रूप में मनोरंजन का विषय थी। अब वह खाद्य के नाम पर प्रायः उतने ही प्राणियों का वध करा देती है जितने कि मनुष्य धरती पर रह रहे हैं। कीड़े-मकोड़े, मेंढ़कों की टांगे, प्राणियों के अंग विशेषों के लजीज खाने बनते हैं और शेष भाग कुत्तों को डाल दिया जाता है। सर्कसों के शौक में कितना वध और कितना उत्पीड़न होता है, इसका हिसाब लगाया जाए तो प्रतीत होगा कि विनोद के लिए उत्पीड़न की नृशंसता किस कदर मनुष्य में समय-समय पर उभरती रही है। ऐसे दृश्य उपस्थित करती रही है जिसे देखकर ही नहीं, सुनकर भी मनुष्य का कलेजा काँपने लगे।
अभी भी जनजातियों को, पराधीनों को किस स्थिति में रहना पड़ता है। इसका विवरण तैयार किया जाए तो उसे नृशंसता का उन्माद ही कहा जा सकता है।
आवश्यक नहीं कि प्रतिभाएँ लोक-मानस के अनाचार की दिशा में ही ढालें। वे यदि विवेक और न्याय को अपनी मनोभूमि में स्थान दें तो वैसे उभार ला सकती है, जैसे सतयुग में, बुद्धकाल में, गाँधी युग में कार्यांवित हुए और असंख्यों को सुख-शांति के मार्ग पर घसीट ले गए।
प्रतिभाओं का दायित्व है कि वे अपनी विभूति भरी विशेषताओं को अनीति के लिए नहीं, न्याय, स्नेह और सहयोग के लिए प्रयुक्त करें, ताकि नरक की दिशा में बहने वाले तूफानों को स्वर्ग की ओर भेजा जा सके।
शोषक ही सिर पर लदने के कुचक्र रचता है। सेवाभावना वालों को लोग सिर पर बिठाने के लिए आतुर रहते हैं।
एक व्यक्ति था। उसकी पत्नी कर्कश थी। घर में लड़ती और अवसर मिलते ही पड़ोस में जा पहुँचती और वहाँ भी आए दिन उपद्रव खड़े करती। अलग घर बसा देने पर भी उसका यहाँ-वहाँ पहुँचना और झंझट मोल लेना रुका नहीं।
पति को एक उपाय सूझा। घर से बाहर जाने से लेकर लौटने तक के लिए एक काम सौंप दिया और कहा यदि वह पूरा न हुआ तो बुरी तरह खबर ली जाएगी।
काम था थाली भरकर मिले हुए दाल चावल में से दोनों को बीन कर अलग-अलग करना। उतना काम पूरे आठ घंटे में पूरा हो पाता तब तक पति घर में वापस लौट आता। इस व्यस्तता ने कलह की गुंजाइश ही न छोड़ी। झंझट भी मिटा और स्वभाव भी सुधर गया।
खाली समय को शैतान की दुकान कहा जाता है। यदि व्यस्त रहने की व्यवस्था बन सके तो अनेकानेक दुर्गुणों से बचा जा सकता है।
वैज्ञानिक प्रयोग विगत कुछ दशकों से ऐसी गतिविधियों में संलग्न हैं, जिन्हें देखते हुए एक प्रश्न चिह्न सामने आ खड़ा हुआ है कि क्या ये हमें सही दिशा में ले जा रहे हैं। जब तक विज्ञान का सृजनात्मक प्रयोग होता रहा; तब तक उसे पूजा जाता रहा। पर अब स्थिति बदलती जा रही है। घातक प्रयोग युद्ध तक ही सीमित नहीं रहे, वरन अब मानव की आकृति-प्रकृति से भी छेड़खानी करने लगे हैं।
प. जर्मनी के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. ऐलन जैक एवं मार्क रोजेन बर्ग इन दिनों जेनेटिक इंजीनियरिंग एवं न्यूरो बायो केमिस्ट्री के क्षेत्र में प्रयोग कर यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या सुविकसित मस्तिष्क की प्रतिभा का स्वल्प विकसित अथवा इसके ठीक विपरीत परिवर्तन संभव है? क्या मनुष्य को नितांत बुद्धिहीन, मात्र आदेश मानने वाला एक रोबोट बनाया जा सकता है।
इलेक्ट्रिकल एस्ट्रीमुलेशन आफ ब्रेन (ई.एस.बी.) पद्धति के अनुसार जब कई एशियन विश्वविद्यालयों ने आंशिक रूप से मस्तिष्क की धुलाई (ब्रेन वाशिंग) में सफलता प्राप्त कर ली है। अभी तो बंदर, कुत्ते, बिल्ली, खरगोश, चूहे जैसे छोटे स्तर के जीवों पर ही प्रयोग किए गए हैं। इनमें आहार की रुचि, शत्रुता, मित्रता, भय, आक्रमण आदि के सामान्य स्वभाव को जिन परिस्थितियों में जिस प्रकार चरितार्थ करना चाहिए, उसे वे बिलकुल भूल जाते हैं और चित्र-विचित्र प्रकार का आचरण करते हैं। बिल्ली के सामने जब एक चूहा छोड़ा गया तो वह आक्रमण करना दूर उससे डरकर एक कोने में जा छिपी। क्षण-भर में एकदूसरे पर खूनी आक्रमण करना, एक आधे मिनट बाद परस्पर लिपटकर प्यार करना ये परिवर्तन मस्तिष्क में किए गए विद्युतीय धारा-प्रवाह से देखे गए।
डॉ. डेलगाडो ने मस्तिष्क के अचेतन भाग को प्रभावित करने के संदर्भ में कितने ही वैज्ञानिक प्रयोग करके दिखाए और सफल रहे। एक प्रयोग में ‘अली’ नामक एक बंदर को केला खाने के लिए दिया गया। केला खाते समय ही उसे ई.ई.जी. के माध्यम से संदेश दिया गया कि केला खाने की अपेक्षा भूखा रहना चाहिए तो बंदर ने भूखा रहते हुए भी केला फेंक दिया।
दूसरे प्रयोग में डॉ. डेलगाडो ने दो खूँखार सांडों को सार्वजनिक प्रयोग में दिखाया। दोनों सांडों के दो इलेक्ट्रोड (एरियल) लगाकर डेलगाडो उनके मध्य खड़े हो गए। दोनों सांड ऐसी भयंकर मुद्रा में खड़े थे जैसे वे दोनों डॉ. डेलगाडो पर आक्रमण करने वाले ही हों। जैसे ही वे डेलगाडो के पास पहुँचे, उन्होंने अपने ट्रांसमीटर द्वारा शांत रहने का आदेश दिया तो दोनों सांड फुसकारते भर रहे। धीरे-धीरे शांत हो प्रेम से दो बकरियों की तरह खड़े हो गए।
मस्तिष्कीय क्षमता को ही व्यक्तित्व का विकास समझने वाले वैज्ञानिकों ने इन दिनों इस संदर्भ में कई दृष्टियों से विचार किया और कई उपाय सोचे हैं। वे यह भी मानते हैं कि परिवार एवं समाज के वातावरण का मनुष्य के चिंतन और स्वभाव पर असर पड़ता है, इसलिए शिक्षा तथा परंपरा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए, जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य कल अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान, साहसी और सद्गुणी हो सके।
इसके अतिरिक्त उनका विशेष ध्यान इस बात पर है कि “ब्रेन वाशिंग” के कोई कारगर उपाय ढूँढ़ निकाले जाएँ। इस संदर्भ में कम्युनिस्ट देश सबसे आगे हैं। उन्होंने अपने विरोधियों का सफाया करके सिरदर्द से छुटकारा पाने के उपायों में अत्यधिक उत्साह दिखाया है। वहाँ हल्का-फुल्का यह प्रयोग भी किया गया है कि प्रतिपक्षी मान्यता वालों पर ऐसे मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाएँ ताकि वे अपनी पूर्व मान्यता को छोड़कर नए निर्देशों को हृदयंगम करने के लिए स्वेच्छापूर्वक सहमत हो जाएँ।
अठारहवीं सदी के अंत में सर विलियम पेनफील्ड (1886) ने ब्रेन सेण्टर्स को जानने के लिए जो प्रयोग आरंभ किए, उनकी शृंखला अभी चल ही रही है। मस्तिष्क विज्ञानी कहते हैं कि स्थूलमस्तिष्क के दो भाग होते हैं— एक पुराना एनिमल ब्रेन (पूर्व संचित पाशविक कुसंस्कारों एवं अंतःप्रवृत्तियों से युक्त) तथा दूसरा ऊँचे स्तर का नया मस्तिष्क जो मात्र मनुष्य को ही मिला है। पहले में दर्द, भय, भूख, यौनेच्छा, थकान, आक्रमण आदि के केंद्र होते हैं, जो मुख्यतः जीवन को बनाए रखने एवं नस्ल को जीवित रखने के लिए जरूरी है। जो दूसरा नया मस्तिष्क है उसमें और भी अधिक विकसित प्रीक्राण्टल लोव होते हैं, जिनका कार्यक्षेत्र विशुद्ध रूप से भौतिक है। तर्कबुद्धि, सिविल सेन्स, आपसी व्यवहार, योजनाबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण आदि यहीं निश्चित किए जाते हैं। भावनात्मक आवेगों पर नियंत्रण यहीं से होता है।
उदाहरण के लिए— प्रयोगशाला में विद्युतीय इलेक्ट्रोडों के माध्यम से बिल्ली की मानसिक स्थिति ऐसी बना दी गई कि वह चूहे पर आक्रमण का स्वभाव भूलकर उनसे डरने लगी। खरगोश और शेर की कुश्ती कराई गई तो शेर दुम दबाकर एक कोने में जा बैठा और खरगोश ने इस प्रकार हमला बोला मानो उसे अपनी बहादुरी-जीत का पूरा भरोसा हो। आमतौर से पशु अपने सजातियों से ही यौन संबंध स्थापित करते हैं; पर इलेक्ट्रोडों से प्रभावित जीवों ने अन्य जाति वालों के साथ यौन संबंध स्वीकारने में उत्साह दिखाया। इसी प्रकार वे अपने अभ्यस्त आहार को छोड़कर अन्य प्रकार का आहार अपनाने लगे। अधिक नींद लिए बिना या बिना सोए ही बहुत समय तक स्वेच्छापूर्वक कार्यरत रहने में भी सफलता मिल गई।
विद्युतीय उपचारों के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के प्रयोग भी पिछले दिनों चलते रहे हैं। इनमें से एक है प्राण-प्रहार— हिप्नोटिज्म। दूसरा है— रासायनिक उपचार। मस्तिष्क को एक सीमा तक इन दोनों साधनों से प्रभावित करने से सफलता बहुत दिनों से मिलती आ रही है। अब उन साधनों को नए ढंग से नए प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करने की बात सोची गई है। हिप्नोटिज्म से प्रभावित व्यक्ति अपनी स्वाभाविक मनःस्थिति को भूल जाते और प्रयोक्ता के संदेशों को शिरोधार्य करते हुए वैसा ही सोचते और करते हैं। हिप्नोटिज्म का भी बायो मैग्नेटिज्म से जुड़कर अब आधुनिकीकरण हो गया है।
चीन के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डॉ. चू-फुट सेन ने एक बार प्रदर्शन के तौर पर बड़ा ही मनोरंजन प्रयोग किया। प्रयोग के लिए छह कैदियों को चुना गया, जिनमें तीन महिलाएँ भी थीं। छहों को एक कमरे में लाया गया। फिर उनके सिर के पिछले हिस्से के थोड़े बाल साफ करके उसमें अत्यंत पतला तार जोड़ दिया। यह साधारण दिखने वाला तार मस्तिष्क की अनेक नाडियों से जोड़ा जा सकता था और उनके नियंत्रण के लिए तार का संबंध एक रेडियो ट्रांजिस्टर रिसीवर से कर दिया गया। फिर उन कैदियों के सामने 20 दिन का एक छोटा-सा पिल्ला लाकर छोड़ा गया। उनकी स्थिति सामान्य बनी रही और वे पिल्ले को देखकर प्रसन्न होते रहे। इसी बीच डॉ. चू-फुट सेन ने उस तार का संबंध मस्तिष्क की भय वाली नाड़ी से जोड़कर ट्रांजिस्टर चालू कर दिया। विद्युत-प्रवाह काे एक निश्चित आवृत्ति पर दौड़ना शुरू हुआ ही था कि उस छोटे से कमरे में तूफान खड़ा हो गया। कैदी ‘शेर-शेर’ चिल्लाते हुए भागे। कई तो इतने भयभीत हुए कि उन्हें तत्काल मूर्छा आ गई। जैसे ही उसे बंद किया गया कैदी फिर शांत हो गए।
मिशिगन विश्वविद्यालय के डॉ. बर्नार्ड एग्रानोफ ने सुनहरी मछलियों पर यह प्रयोग किया कि उन्हें यदि भोजन के बाद प्यूरोमाइसिन नामक मारक औषधि खिला दी जाए तो वे यह भूल जाती हैं कि वे भोजन कर चुकी हैं। ये प्रयोग अब मनुष्यों पर भी किए जा रहे हैं, विशेषकर कम्युनिस्ट देशों में भी। इन प्रयत्नों का तात्पर्य है, मनुष्य की अंतरात्मा का समापन। यह प्रयत्न यदि सफल हो सके तो मनुष्य समुदाय भेड़ों के झुंड की तरह रह जाएगा, जिसे किसी भी दिशा में चलने के लिए एक चरवाहा बाधित कर सके।
जैसे एक ही व्यक्ति पहलवान, चिकित्सक, व्यापारी, सांसद आदि हो सकता है उसी प्रकार एक ही भगवान अनेक देवताओं के रूप में प्रतिपादित किया जा सकता है। जिस प्रकार विष्णु सहस्रनाम में एक ही भगवान के हजार नाम बताए गए हैं। वही बात देवताओं के संबंध में भी समझी जानी चाहिए। विष्णु हजार नहीं हो सकते, उनके नाम ही हजार हैं। उसी प्रकार परम सत्ता एक ही है। विभिन्न प्रयोजनों के लिए उनके अनेक नाम रखे जा सकते हैं। देवशक्ति के अनुकूलन में एक ही सबसे बड़ा तथ्य है कि वह पात्रता चाहता है। पात्रता के बिना मात्र मनुहार या उपहार के सहारे उसे कोई अपना वशवर्ती नहीं बना सकता। यज्ञ इसी प्रक्रिया का नाम है। जिसके माध्यम से शिक्षा और प्रेरणा ग्रहण करके मनुष्य सत्पात्र बनता है। जिस प्रकार गहरे गड्ढे में वर्षा का जल उसी मात्रा में भर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर सत्प्रवृत्तियाँ गहराई से भरने पर दैवी-अनुग्रह अपने आप बरसने लगता है। वृक्षों की आकर्षणशक्ति से बादल अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में बरसने लगते हैं। उसी प्रकार भगवान से अनुकंपा माँगनी नहीं पड़ती। माता-पिता से छोटा बालक अपनी आवश्यकता या फरियाद कहाँ व्यक्त करता है। उसी प्रकार भक्त भी भगवान से अपनी भौतिक या आत्मिक आवश्यकताएँ न तो समझ पाया है और न कह पाता है। कहना भी चाहे तो उसकी सुनवाई नहीं होती, क्योंकि जब तक जो व्यक्ति जिस अनुदान का सदुपयोग न कर पाए तब तक उस पर उन वैभवों को लाद देने से मनुष्य का अहंकार और अनाचार बढ़ता है, इसलिए भगवान के दरबार में किसी को कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु देने की एक ही शर्त है कि वह उसका सदुपयोग कर पाएगा या नहीं। दुरुपयोग में तो उलटी विपत्ति ही बढ़ती है। सदुपयोग करने न करने के संबंध में किसी व्यक्ति के भावी आश्वासनों पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। विवाह के समय वर-वधू आपस में प्रतिज्ञाएँ करते हैं; पर दिन बीतने नहीं पाते कि उन्हें भूला देते हैं और अपनी पुरानी आदतों के अनुरूप उद्धत आचरण करने लगते हैं। ईश्वर को विश्वास दिलाने के लिए अपने क्रियाकलाप एवं वर्तमान रीति-नीति ही संतोष दे सकती है।
यज्ञ एक कृत्य भी है और एक दर्शन भी। दृश्य के माध्यम से भावनाएँ उभारने की परंपरा पुरानी है। चित्रों और प्रतिमाओं का निर्माण इसी निमित्त हुआ है। यज्ञ-प्रक्रिया भी एक कृत्य है, जिसका तत्त्वज्ञान हृदयंगम करने पर मनुष्य को पवित्र, प्रखर और परमार्थपरायण बनना पड़ता है। इस दिशा में जितनी प्रगति होती जाती है, उसी अनुपात से भगवान की अनुकंपा मनुष्य पर बरसने लगती है।
गीताकार ने कहा है कि तुम देवताओं की भावना करो। देवता तुम्हारी भावना पूरी करेंगे। यहाँ भावना में अर्थ आवश्यकता नहीं है। देवतत्त्वों को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं। भगवान के पास क्या नहीं है? उसे किससे क्या चाहिए यहाँ अभिप्राय हवन, शाकल्य, घृत आदि देने में नहीं; वरन यह है कि वे किससे क्या चाहते हैं और मिल जाने पर वे किसी प्रकार बलिष्ठ बनते और सहयोग प्रदान करते हैं। आग की आवश्यकता ईंधन की है, जहाँ ईंधन मिला नहीं कि अग्नि प्रज्वलित हुई नहीं। उसी प्रकार मनुष्य पवित्र और प्रखर बना नहीं कि उस पर दैव अनुकंपा अनायास ही बरसी नहीं। संसार भर के महापुरुष इसी एक तथ्य के उदाहरण हैं। उन्होंने सर्वप्रथम अपने चिंतन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाया। यह प्रथम सोपान पूरा होते ही प्रामाणिकता सिद्ध होती है। लोकश्रद्धा उमड़ती है। सब ओर से सहयोग का माहौल बनता है और उस आधार पर अप्रत्याशित दैवी सहायता भी मिलने लगती है। इस तथ्य की साक्षी में हम किसी भी महापुरुष का जीवनक्रम उलट-पुलटकर देखते हैं। मात्र याचना में किसे क्या मिलता है। भिखारी को संपन्न लोग भी पाई पैसा ही देते हैं, उनके नाम अपनी जमीन जायदाद थोड़े ही कर देते हैं। सिद्धियाँ भगवान की बेटियाँ हैं उन्हें वे उसी के हाथों सौंपते हैं, जिनसे सदुपयोग की, परमार्थ-प्रयोजनों में लगाए जाने का विश्वास हो। हेय और हीन व्यक्ति को अपनी सुयोग्य कन्या कोई नहीं सौंपता। देवता भी यही करते हैं वे हर किसी की मनोकामना पूरी नहीं करते। यज्ञीय जीवन जीने वाले— जीवन में यज्ञ परंपराओं का समावेश करने वाले ही सिद्धि चमत्कारों का अनुदान प्राप्त करने के अधिकारी माने जाते हैं और उन्हें ही वे मिलती भी हैं।
यज्ञ द्वारा देवशक्तियों का आह्वान, अनुमोदन एवं बदले में उनके अनुग्रह की प्राप्ति का शास्त्रकारों ने पूरा जोर देते हुए प्रतिपादन किया है। यहाँ देवताओं से आशय ईश्वर की दिव्यशक्तियों से है। ईश्वर एक है। उसकी जिस सामर्थ्य के साथ संबंध बनाना होता है तब उसे उसी रूप में ध्यान-धारणा क्षेत्र में उतारते हैं। श्रद्धा-विश्वास के अनुरूप वे प्रतिफल भी देती हैं।
अदृश्य दैवीशक्तियों के अतिरिक्त मनुष्यों में भी वे साकार रूप से विचरते और दृश्यमान होते हैं। मनुष्यों की तीन श्रेणियाँ हैं— पिशाच, पशु और देव। पिशाच वे हैं जो हृदय हीन, निष्ठुर, कुकर्मी और अपराधी प्रवृत्तियों को अपनाते हैं। नरपशु वे हैं जो पेट, प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सोचते ही नहीं। श्रेष्ठ या निकृष्ट करने के लिए जिस साहस और पराक्रम की आवश्यकता होती है वह उनमें होता ही नहीं इसलिए हेय, अनगढ़ और अस्त-व्यस्त जीवन जीकर मौत के दिन पूरे करते हैं। नर-देव या नर-नारायण वे हैं जो शरीर की दृष्टि से तो वे सामान्य मनुष्यों जैसी आकृति के ही होते हैं; पर प्रकृति उनकी उत्कृष्ट स्तर की देवोपम होती है। ऐसे ही लोगों को संत, सुधारक और शहीद श्रेणी में गिना जाता है। ऐसों को ही ऋषि, महामानव या देवात्मा कहते हैं।
गीताकार की वह उक्ति यहाँ भी लागू होती है कि तुम देवताओं की भावना करो और देवता तुम्हारी भावनाएँ पूरी करेंगे। यहाँ भावना और कामना का अंतर स्पष्टतया समझ लेना चाहिए। भावनाएँ परमार्थपरक होती हैं और कामनाएँ स्वार्थपरक। उनमें वासना, तृष्णा और अहंता की महत्वाकांक्षाएँ भरी रहती हैं, जबकि भावनाओं में, उत्कृष्टता, आदर्शवादिता और उदारता ओत-प्रोत रहती है।
ऐसे देवमानवों की सेवा, सहायता करने से वैसा ही लाभ मिलता है जैसा कि राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी आदि के सहयोगियों को मिला और वे सामान्य से असामान्य हो गए। कलेक्टर के चपरासी का जब मान बढ़ जाता है तो कोई कारण नहीं कि ईश्वर के समतुल्य बन जाने वाले ईश्वरपरायण व्यक्तियों, धर्मात्माओं, तपस्वियों का संपर्क-सान्निध्य प्राप्त करने का उपयुक्त लाभ न मिले किंतु स्मरण रहे यह सान्निध्य चापलूसी करने से नहीं सधता, वरन उनकी इच्छानुसार अपना चिंतन, चरित्र और व्यवहार बदलने से ही सम्भव होता है।
इसी प्रकार का नाम योग है। योग अर्थात जुड़ना। इसी को यज्ञ कहते हैं। यज्ञ अर्थात महानता के प्रति आत्मसमर्पण करना। उन्हीं उच्च आदर्श के अनुरूप अपने को ढालना— गतिशील रखना।
स्वामी रामतीर्थ की विद्वत्ता तथा ओजस्वी वाणी से प्रभावित होकर अमेरिका की 18 युनिवर्सिटियों ने मिलकर उन्हें एल.एल.डी. की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। जिसे उन्होंने सधन्यवाद अस्वीकार करते हुए कहा— ‘स्वामी’ और ‘एम.ए.’ ये दो कलंक पहले ही नाम के आगे पीछे लगे हुए हैं, अब तीसरे कलंक को कहाँ रखूँगा?
यश, कीर्ति, लोकेषणा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, पूजा, मान, बड़ाई के फेरे में पड़कर संतों और लोकसेवियों का अहंकार उभरता है, इसलिए सच्चे संत मान बड़ाई से सदा बचते रहते हैं।
सद्गुणों में कृतज्ञता की गणना मूर्धन्य मानी गई है, क्योंकि हर उपयोगी वस्तु से हम लाभ उठाते हैं और उसके अनुदान को स्मरण रखते हैं। इसके उपरांत प्रतिदान देने की इच्छा स्वयं ही होती है और हमें उस व्यक्ति, वस्तु या वर्ग को बदले में सेवा-सहायता करने की इच्छा होती है।
अपनी ओर से सेवा करने में अहंकार होने की भी संभावना रहती है; पर यदि बदला चुकाने के लिए- ऋणमुक्त होने के भाव से उसी कृत्य को किया जाए तो नम्रता और निरहंकारिता का भाव तो रहता ही है साथ ही किए हुए उपकारों का स्मरण करते रहने से यह ध्यान रहता है कि कितनों के कितने सहयोग से हम इस स्थिति में पहुँच सके एवं बचे हुए हैं। ऐसी दशा में ऋणमुक्ति की भावना से किया गया सेवा कार्य अथवा स्मरण रखा गया कृतज्ञता का भाव कहीं अधिक उच्चकोटि का होता है।
परमार्थकृत्यों से उसके साथ जुड़ी हुई भावना का बहुत महत्त्व है। दान तिरस्कारपूर्वक, विवशता की स्थिति, में अहंकारपूर्वक, विज्ञापन के निमित्त, प्रतिफल के लिए, छल के लिए अनेक भावों का समन्वय हो सकता है। आत्मलाभ या पुण्यफल उसी भाव से होता है, जिस भाव से कि कृत्य को किया गया है। देखने में तो चिड़ीमार, मछलीमार भी सर्वप्रथम दानी की भूमिका निभाते हैं, पर उनका उद्देश्य दूसरा ही होता है। अतएव विश्लेषण करने वाले उद्देश्य को ही महत्व देते हैं। साथ ही आत्मा और परमात्मा के दरबार में भी उनकी गणना भाव स्तर के अनुकूल ही होती है, इसीलिए परमार्थकृत्य करते समय अपनी कामना का उल्लेख नहीं किया जाता; वरन ईश्वर-समर्पण की भावना से ही किया जाता है। इस भाव की अभिव्यक्ति एक दोहे से होती है—
मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर॥
कृतज्ञता की स्मृति में प्रत्यक्ष पितृ ऋण है, क्योंकि शरीर को उन्हीं ने पाला, पोसा बड़ा किया और योग्य बनाया एवं आश्रय दिया है। उन्हीं की प्रत्यक्ष सेवा से हम इस योग्य बन सके हैं, जिसमें आज हैं। इसलिए पितृ ऋण को प्रमुखता देते हुए उनके स्मरण रखने के लिए नित्य प्रातःकाल चरणवंदन का नियम है। अभिवादन न्यूनतम तर्पण है। इसमें माता-पिता ही नहीं उनकी समान आयु या स्तर के सभी लोग समझे जा सकते हैं। बड़े भाई को भी पितृतुल्य माना गया है। यह सभी प्रकारांतर से गुरुजन हैं। इनका जीवित अवस्था में नित्य प्रति नमन-वंदन का नियम है।
जो पितृगण दिवंगत हो चुके हैं, उनके लिए तर्पण-श्राद्ध का विधान है। श्रद्धांजलि पूजा उपचार का सरलतम प्रयोग है। अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है, वे कभी उपलब्ध होती हैं कभी नहीं; किंतु जल ऐसी वस्तु है, जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यतः प्रयोग करते हैं। वह सर्वत्र सुविधापूर्वक मिल भी जाता है, इसलिए पुष्पांजलि आदि श्रमसाध्य श्रद्धांजलियों में जलांजलि को सर्वसुलभ माना गया है। उसके प्रयोग में आलस्य और अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं हो सकता, इसलिए सूर्यनारायण को अर्घ्य, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ्य तथा पितरगणों को तर्पण का विधान है। प्रश्न यह नहीं कि इस पानी की उन्हें आवश्यकता है या नहीं। प्रश्न केवल अपनी अभिव्यक्ति भर का है। उसे निर्धारित मंत्र बोलते हुए, गायत्री महामंत्र से अथवा बिना मंत्र के भी जलांजलि दी जा सकती है। यही है उनके प्रति पूजा-अर्चा का सुगमतम विधान। शास्त्रीय भाषा में इसे ‘तर्पण’ कहा जाता है। इसमें यह तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यह पानी उन पूर्वजों तक या सूर्य तक पहुँचा या नहीं। इसके पीछे अपनी कृतज्ञता भरी भावनाओं को सींचते रहने की अभिव्यक्ति की ही प्रमुखता है, इसलिए उसे किसी पर अहसान करने के लिए नहीं, वरन अपनी निज की श्रद्धा को सींचते रहने के लिए किया जाता रहना चाहिए।
पितृ ऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है— ‘श्राद्ध’। श्राद्ध का प्रचलित रूप तो ‘ब्राह्मण भोजन’ मात्र रह गया है, पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ-प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए, जिससे लोक-कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।
ऐसे श्राद्धकृत्यों में समय की आवश्यकता को देखते हुए वृक्षारोपण ऐसा कार्य हो सकता है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्त्व का माना जा सके। किसी व्यक्ति को भोजन करा देने से उसकी एक समय की भूख बुझती है, दूसरा समय आते ही फिर वह आवश्यकता जाग पड़ती है। उसे कोई दूसरा व्यक्ति कहाँ तक, कब तक पूरा करता रहे। फिर यदि कोई व्यक्ति अपंग, मुसीबत ग्रस्त या लोकसेवी नहीं है तो उसे मुफ्त में भोजन कराते रहने के पीछे किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। मात्र लकीर पिटने जैसी चिह्न पूजा की परंपरा ही निभती है।
इससे अच्छा यह है कि श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाए जाए जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों। अपने पास कृषि योग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, महुआ आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए। बेर, अमरूद तो और भी कम जगह में लग सकते हैं। यदि अपने पास जमीन न हो तो किसी की भी या सरकार की जमीन में भी वृक्षारोपण इस शर्त पर हो सकता है कि उसका स्वामित्व जमीन मालिक का ही रहे। केवल सींचने, रखवाली करने आदि की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर दूसरों की जमीन में वृक्ष लगा देने में भी पुण्यफल की प्राप्ति हो सकती है।
वृक्ष वायुशोधन करते हैं, छाया देते हैं, फल-फूल भी मिलते हैं। हरे पत्ते पशुओं का भोजन बन सकते हैं। सूखे पत्तों से जमीन को खाद मिलती है। लकड़ी के अनेकों उपयोग हैं। वृक्षों से बादल बरसते हैं। भूमि का कटाव रुकता है। पक्षी घोंसले बनाते हैं, उनकी छाया में मनुष्यों-पशुओं को विश्राम मिलता है। इस प्रकार वृक्षारोपण भी एक उपयोगी प्राणी के पोषण के समान है। वृक्षों की भांति ही जलाशयों के निर्माण का भी उपयोग है। तालाबों में हर साल वर्षा के पानी के साथ मिट्टी भर जाती है और उनकी सतह ऊँची हो जाने से कम पानी समाता है, जो जल्दी ही सूख जाता है। इन्हें यदि हर साल श्रमदान से गहरे करते रहा जाए तो पशुओं को पानी, सिंघाड़ा, कमल जैसी बेलें तथा तल में जमने वाली चिकनी मिट्टी से मकानों की मरम्मत हो सकती है।
मंदिर, धर्मशाला तो कोई विरले ही धनी मानी बना पाते हैं; किंतु उद्यान और जलाशय बनाने, साफ करने का काम ऐसा है जिसे अपने मित्र पड़ोसियों के साथ मिल-जुलकर पूरा किया जा सकता है और साथ ही उनसे किसी न किसी रूप में लाभ भी उठाया जा सकता है। इस प्रकार के उपयोगी काम वे भी कर सकते हैं जो धन खर्च करने की स्थिति में तो नहीं है, पर जो शरीर से स्वस्थ हैं और श्रमदान के रूप में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव चरितार्थ करते रहने की स्थिति में तो हैं ही।
गाँवों के कच्चे रास्तों की टूट-फूट होती रहती है। ऊँचे-नीचे खाई-खड्डे बनते रहते हैं। पड़ौसी किसान उस रास्ते की जमीन को तोड़कर अपने खेत में मिलाते रहते हैं। इस प्रकार रास्ते छोटे और ऐसे बेतुके हो जाते हैं कि उनमें से निकलने वाले मनुष्यों या जानवरों को चोट लगती मोच आती रहे। बैलगाड़ियाँ टूटती, उलटती रहें। इस कठिनाई को दूर करने के लिए पूर्वजों के श्राद्ध रूप में रास्तों की मरम्मत का काम भी श्रमदान के रूप में किया जा सकता है।
इस प्रकार की समाजसेवा के कार्यों से जीवित या दिवंगत पितृगण निश्चय ही प्रसन्न होंगे। अपने कृतज्ञता भाव को जीवित रखने का पुण्य-परमार्थ तो प्रत्यक्ष ही मिलता रहेगा।
समझदारी, साहसिकता और पुरुषार्थपरायणता के समन्वय को प्रतिभा कहते हैं।
सूर्य की ऊर्जा वस्तुओं को ऊपर उठाती है, समुद्र से बादलों को उठाना, तूफान खड़े करना, गीलेपन को भाप में बदलकर अंतरिक्ष में उड़ा देना। यह सब हम नित्य देखते हैं और सूर्य को उन्नयन-उत्कर्ष का प्रतीक मानते हैं, पर साथ ही यह भी स्पष्ट है कि पृथ्वी की आकर्षणशक्ति कम बलवती नहीं है, वह पकड़ती और गिराती है। यह दोनों ही शक्तियाँ अपनी चमत्कारी बलिदान का प्रदर्शन निरंतर करती रहती हैं। तत्त्वज्ञान के क्षेत्र में उत्कर्ष को पुण्य और अपकर्ष को पतन या पाप की संज्ञा दी जा सकती है। मनुष्यों की विचारधारा और गतिविधियाँ प्रायः इन्हीं के आकर्षण-विकर्षण से प्रभावित होती रहती हैं। दिन और रात की तरह अपने-अपने अवसर पर इनका प्रभाव परिलक्षित होता रहता है। दोनों के बीच संघर्ष भी बना रहता है। प्रवाह, वातावरण और प्रभाव के अनुरूप उनका उतार-चढ़ाव भी प्रत्यक्ष होता रहता है। देवासुर संग्राम का पौराणिक उपाख्यान तो है ही; परंतु मनुष्यों के चिंतन और चरित्र इन दोनों के बीच रस्साकशी निरंतर बनी रहती है।
एक का मरण, दूसरे का जीवन है। पुण्य मरेगा और पाप फैलेगा। सद्ज्ञान की समाप्ति होगी तो अज्ञान बिखरेगा। आग-पानी जैसा यह बैर। आग को अवसर मिलता है तो पानी को भाप बनाकर उड़ा देती है और पानी का दाव लगे तो वह आग को बुझाए बिना नहीं रहता। सर्दी और गर्मी जैसा, गरीबी और अमीरी जैसा दोनों के बीच अंतर है। चूहे-बिल्ली जैसा बैर। एक का अस्तित्व दूसरे को सुहाता ही नहीं। अपना बचाव दूसरे पर आक्रमण करने से ही संभव है। इन दिनों यही लोकमान्यता है। यह अस्तित्व और समन्वय की मध्यवर्ती विधि-व्यवस्था किसी को सुहाती ही नहीं।
धर्मधारणा को सबल— समर्थ बनाने के लिए जब भी, जहाँ भी प्रयत्न होते हैं वहाँ उन पर प्रत्यक्ष आक्रमण होते ही हैं। चोर-डाकू समाज को संत्रस्त करते हैं; अस्तु उन्हें काबू में रखने के लिए पुलिस, जेल, कचहरी, सरंजाम कटिबद्ध रहता है। संतों को दुष्टों द्वारा इसलिए त्रास दिए जाते हैं कि उनके द्वारा मार्ग में जो अवरोध उत्पन्न किए जाते हैं, उसे सफलता न मिलने पाए। दीपक जब बुझने को होता है तो पूरी तेजी से लपकता है। चींटी जब मरने को होती है, तो उसके पंख उगते हैं। रात्रि के अंतिम प्रहर में तमिस्रा अधिक सघन हो जाती है, 'मरता वह क्या न करता' की उक्ति पाप पर भी लागू होती है। जब धर्मधारणा के प्रयास तीव्र होते हैं, सफल होते चलते हैं, तब असुरता उसे अपने लिए प्राणसंकट की चेतावनी समझती है और समूची शक्ति के साथ आक्रमण करती है।
देवताओं का बढ़ता हुआ प्रताप दैत्यों से सहन नहीं होता। उस सफलता में उन्हें अपना विनाश जो दिखता है, इसलिए अस्तित्व की लड़ाई में वे चूकते नहीं। अनाचारियों को उनसे अधिक खतरा रहता है, जो सत्य के लिए संघर्ष करने हेतु जनता को उकसाते हैं। सामने की लड़ाई की अपेक्षा यह पीठ पीछे की लड़ाई उन्हें इसलिए भारी पड़ती है कि उसमें जड़ कट जाने का खतरा जो है।
राजनैतिक या सामाजिक अनाचारों के विरुद्ध जिनने भी आवाज उठाई है, जनता को इसके लिए संघर्षरत होने के लिए उकसाया है, उन सभी अग्रगामियों को शास्त्र या समाज का कोप सहना पड़ा है। यदि जनता लाभ उठाती है तो निहित स्वार्थियों को हानि पहुँचती है और यदि निहित स्वार्थियों को मनमर्जी करने दी जाए तो सर्वसाधारण का कचूमर निकलता है, इसलिए संघर्ष आवश्यक भी है और अनिवार्य भी। भले ही वह मार-काट स्तर तक न पहुँचने दिया जाए तो भी विरोध, असहयोग, प्रतिरोध, घराव, घिराव स्तर तक तो परिस्थिति के अनुरूप उसे ले ही जाना पड़ेगा। इस संघर्ष की उत्तेजना तब न्यायपक्ष को,पीड़ितपक्ष को ही देनी पड़ती है। भले ही उसे रोकने के लिए आक्रमण अनाचारियों की ओर से ही क्यों न हो।
देखा गया है कि दफ्तरों में जहाँ एक आदमी अधिक काम करता है या ईमानदारी बरतता है तो अन्य सभी बाबू लोग, साहब लोग विरोधी बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि इस उदाहरण से तो हमारी आरामतलबी या आमदनी में कमी पड़ेगी। ऐसी दशा में उचित यही है कि इस पर इल्जाम लगाया या भगाया जाए। यह कुचक्र प्रायः सफल भी होता है। ईमानदार परिश्रमी को हैरान करने में अन्य सभी एकमत हो जाते हैं और मिल-जुलकर षड्यंत्र बनाते हैं।
स्वतंत्रता-संग्राम के दिनों में रियासती या अंग्रेजी इलाके के जनसेवक चुन-चुनकर पकड़े और जेल में बंद किए जाते थे, ताकि उनकी जनसंपर्क शृंखला टूट जाए और आंदोलन न पनपे। चोर-डाकू भी उन्हीं पर हमला करते हैं, जिनसे उनके काम में बाधा पड़ने की संभावना प्रतीत होती है। भले ही उनसे कोई निजी दुश्मनी न हो।
पाप जब मरने की स्थिति में होता है तो पुण्य पर पूरी शक्ति के साथ आक्रमण करता है। यह आक्रमण प्रत्यक्ष आक्रमण, इल्जाम, चरित्रहनन, फूट, षड्यंत्र आदि अनेकों प्रकार का हो सकता है; पर होता अवश्य है। दुष्ट शक्तियाँ अपनी पराजय चुपचाप होते सहन नहीं कर सकतीं।
गाँधी जी गोली से मारे गए। दयानंद को विष दिया गया। श्रीकृष्ण पर स्यमंतकमणि की चोरी लगाई गई। जटायु के पंख कटे। ईसा को फाँसी पर चढ़ाया गया। सुकरात को विष का प्याला पिलाकर मारा गया। इसके अतिरिक्त क्रांतिकारियों, शहीदों, बलिदानियों का लंबा इतिहास है, जिसमें ऐसे अगणित महामानवों की नामावली सम्मिलित है, जिनमें उनका दोष नहीं के बराबर था; पर उन्हें प्राणघातक कष्ट दिए गए। हरीबल राय जैसे मासूम बच्चों का वध इसी नृशंस-प्रक्रिया में सम्मिलित होता है। मंसूर को मात्र उच्चविचारों के कारण ही शूली पर चढ़ना पड़ा। इतिहास के अगणित हत्याकांडों में यही नृशंसता काम करती रही है।
यह प्रक्रिया परोक्ष रूप में भी चलती है। अदृश्य जगत में छाया हुआ पाप ऐसे कुचक्र रचता है, जिसमें कोई प्रत्यक्ष कारण न होते हुए भी अपने पराभव की आशंकामात्र से दुष्टताएँ अपनाई गई हैं।
कंस ने अपना शत्रु पैदा होने की संभावना को ध्यान में रखते हुए अगणित नवजात बालकों का वध करा दिया था। मूसा के डर से पूर्व मिश्र के बादशाहों ने भी यह बालघात की मुहिम पूरी सतर्कता के साथ चलाई थी। श्रीकृष्ण के जन्मकाल से ही पूतना, तृणावर्त, वृत्तासुर, अघासुर, कालिया नाग उनका प्राण-हरण करने के लिए भरसक प्रयास करते रहे। रामावतार के समय ताड़का, सूर्पणखा, सुरसा, त्रिजटा जैसी महिलाएँ और मारीचि, खर-दूषण जैसे दुष्ट समय पाते ही त्रास देते रहे। तपस्वियों को बीन-बीन असुरों ने मारा था और उनकी अस्थियों के पहाड़ खड़े कर दिए थे। जिन्हें देखकर राम को भुजा उठाकर प्रतिशोध की प्रतिज्ञा लेनी पड़ी थी।
मध्यकालीन संतों को शासकों, पुरोहितों तथा दूसरे दुष्टजनों द्वारा अनेकानेक त्रास सहने पड़े। पारसी धर्म के संस्थापक जरथुस्त को अनेकानेक स्थानों पर अपमान व उत्पीड़न सहने पड़े। जैन तपस्वियों को विचलित कर देने वाले त्रास असामान्य रूप में सहने पड़े हैं।
रामकृष्ण परमहंस को केंसर रोग से पीड़ित होना, भीष्म का छः महीने शरशैय्या पर पड़े रहना, तपस्वियों को प्रलोभन तथा भय दिखाकर उनको अपनाया, मार्ग छोड़ देने के लिए दबाव डालने की अनेक घटनाएँ घटित होती रही हैं। इन कार्यों में अदृश्य दानवों के भी कुटिल हाथ काम करते रहे हैं। इसे अग्नि परीक्षा ही कहना चाहिए, जिससे सोने की तरह बहुमूल्य एवं खरे होकर निकलते हैं। हीरा घिसे जाने पर ही चमकता है।
पड़ौसी वह नहीं, जिसकी दीवार तुम्हारे घर के साथ सटी है; वरन वह है जिसके साथ विचार मिलते और कदम उठते हैं।
हम अपना काम करेंगे, आए अपने काम में लगें
छोटे बालक पूरी तरह अभिभावकों पर निर्भर रहते हैं। अपने शरीर की साज-संभाल तक स्वयं नहीं रख पाते। अन्न, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा विनोद आदि के साधनों तक के लिए उन्हें बड़ों पर आश्रित रहना पड़ता है। इस सुविधा-सामग्री को जुटाते हुए बड़ों को प्रसन्नता भी होती है। गुरु-शिष्य परंपरा में भी यही बात है। पिता पैसा कमाता है। तपस्वी तप। तप का मूल्य पैसे से कम नहीं, वरन अधिक ही है। जो वस्तुएँ तप से उपलब्ध होती हैं, वे धन से उपलब्ध नहीं हो सकतीं, इसीलिए सांसारिक-संपदाओं की तुलना में आध्यात्मिक विभूतियों को अधिक श्रेष्ठ माना गया है, बहूमूल्य भी।
ओछेपन की पूर्ति बड़ों के बड़प्पन की सहायता से ही होती है। इसी अनुग्रह को वरदान, अनुदान कहते हैं। छोटों को सुविधासंपन्न बनाने से लेकर प्रगति-पथ पर अग्रसर करने तक में यह स्नेह-भावना, अनुकंपा काम करती है; किंतु स्थिति बदल जाने पर उस क्रम में भी परिवर्तन होता है। बालक के बड़े होते ही, समर्थ-स्वावलंबी बनते ही पिता अपनी व्यावसायिक जिम्मेदारियाँ तक उसे सौंप देता है। बचपन की तरह उसे गोदी में उठाने, नहलाने, कपड़े-धोने, खिलाने-पिलाने की आवश्यकता नहीं होती। अपनी निजी आवश्यकताएँ वह स्वयं ही पूरी कर लेता है। उसे वे वस्तुएँ अभिभावकों से नहीं मँगानी पड़तीं, बचपन में जिसके लिए हठ करना पड़ता था।
समर्थता पर दायित्व भी अधिक है। तरुण को पिता का व्यवसाय ही नहीं चलाना पड़ता; वरन अपनी तथा अन्य सदस्यों की जिम्मेदारियाँ भी संभालनी पड़ती हैं, जिन्हें पहले पिता संभाला करता था। छोटे बहिन-भाइयों की शिक्षा, सगाई तथा उन्हें सुयोग्य-स्वावलंबी बनाने के लिए उसे कहना नहीं पड़ता; वरन निज की स्फुरणा ही इस सारी साज-संभाला के लिए उसे बाधित करती है। इसमें आलस-उपेक्षा बरतने पर अपमान होता है और अंतरात्मा कचोटती है।
प्रज्ञा परिवार के शरीर से बड़े किन्तु मन से छोटे प्रियजनों की साज-संभाल का उत्तरदायित्व हमने उठाया है। धन की न सही, उससे कहीं अधिक मूल्य की तप-साधना की संपदा का अहिर्निश उपार्जन चलता रहता है और उसे खुले हाथों से खर्च किया जाता रहा है, जिसका लाभ उठाने से किसी को रोका नहीं गया है। प्याऊ या सदावर्त से भूखे-प्यासे एवं अस्पताल से किसी घायल को लौटाया नहीं जाता, अपने पराए का भेद नहीं जाता, किंतु साथ ही यह भी सही है कि अपनों का सुनिश्चित दायित्व पूरा करने में कभी आनाकानी नहीं की जाती। न बच्चों को भूखा-नंगा रहने दिया जाता है, न वयस्कों को कुँआरा, न वृद्धों को उपेक्षित। निजी परिवार की जिम्मेदारियाँ ऐसी हैं, जिन्हें अनिवार्य माना जाता है। बच्चों को भूखा रखकर भिखारियों को दान वितरण कोई असामान्य ही भले करते हों, पर नीति और दायित्व की मर्यादा पहले अपनों की, फिर बिरानों की देखभाल की व्यावहारिकता सुझाती है। हमने इसी नीति का अवलंबन किया है। जिस गाय से दूध, जिस भेड़ से ऊन पाने की आशा रही है, उसके चारे-दाने का प्रथम प्रबंध किया है। कबूतरों को दाना चुगाने का पुण्यलाभ इसके पश्चात् ही सोचने की परिधि में आता है।
गायत्री परिवार के परिजनों की ऐसी ही देखभाल रखी जाती रही है। प्रत्यक्ष दृश्यमान भी और परोक्ष अदृश्य भी। हमने अपने हर बोए पौधे को सींचा और हरा-भरा बनाया है। भले ही बाद में उसी ने हमें कांटे चुभाने की जुर्रत की हो, पर हमने अपनी ओर से कोई कसर नहीं रखी है कि किसी को यह कहने का मौका मिले कि किसान की उपेक्षा रही है।
परोक्ष रूप से हमने अपने 24 लाख परिजनों को भले ही वे सभी समीप नहीं रहते, कभी उपेक्षित, विस्मृत नहीं किया है। दूरवर्ती व्यवस्था में ही आत्मीयता पलती है। सुदूर परदेशों में नौकरी करने वाले भी परिवार के गुजारे का मनीआर्डर नियमित रूप से भेजते रहते हैं। कछुवी बालू में अंडे देती व उन्हें निरंतर ध्यान-संचार के बल पर सेती और पकाती है। सभी जानते हैं कि कछुवी मर जाए तो अंडे भी सड़ जाते हैं। हम जीवंत हैं और हमारे अंडे भी। हमारी प्रक्रिया मुर्गी की तरह छाती से लगाकर सोने की नहीं, कछुवी की तरह दूरवर्ती प्राणस्तर की है। दोनों में किसी प्रकार का अंतर नहीं।
व्यक्ति की समस्याएँ और कठिनाइयाँ भौतिक ही नहीं, आत्मिक, आंतरिक-परोक्ष भी होती हैं। प्रत्यक्ष सहायता तब अनुभव होती है, जब उसे प्रत्यक्ष आँखों से मिलते वस्तुरूप में देखा जाए, किंतु परोक्ष सहायता ऐसी होती है, जिसमें प्रत्यक्ष से भी अधिक परोक्ष अनुदान काम करता है। देवताओं के अनुग्रह, तपस्वियों के आशीर्वाद इसी स्तर के होते हैं। उनसे वस्तु नहीं, शक्ति-प्रेरणा दिशा मिलती है, मनःस्थिति बनती और परिस्थिति सुधरती है। माहौल बनता और वातावरण सुधरता है। इस दृष्टि से प्रज्ञा परिजनों में से शत-प्रतिशत नहीं तो, अधिकांश लाभांवित होते रहे हैं। गंगातट पर बैठकर हर किसी ने शीतलता और पवित्रता का लाभ ही लिया है। प्यास बुझाई और मलिनता धोई सो अलग। विश्वास किया जाना चाहिए कि परिजन इस दृष्टि से आगे भी किसी प्रकार की कमी अनुभव नहीं करेंगे।
स्थूलशरीर जीर्ण हो जाए तो इससे कुछ बनता, बिगड़ता नहीं। सामर्थ्य का स्रोत तो सूक्ष्मशरीर है। वह काय-कलेवर का झंझट हलका हो जाने पर चौगुनी-सौगुनी शक्ति से काम करने लगेगा। युग संधि की अवधि में तो हमें अन्य लोक या शरीर में जाना नहीं है। वर्तमान कार्य पूरा न होने तक सूक्ष्मशरीर को और भी अधिक प्रचंड और प्रभावी बनाकर वे सभी काम करते रहेंगे जो करने हैं, जिन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी सिर पर है, इसलिए हमारी प्रस्तुत एकांत साधना जैसी स्थिति सन् 2000 तक मानी जा सकती है। पिछले ढाई वर्षों से हम जो कर रहे हैं, वह परोक्ष ही है और इतना अधिक है कि उसे प्रत्यक्ष की तुलना में असंख्य गुना कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति न होगी। इन गतिविधियों का एक छोटा-सा प्रसंग प्रज्ञा परिजनों की देखभाल, साज-संभाल करने के लिए है, जिसमें रत्ती भर भी कमी नहीं आने वाली है।
अब बात आगे बढ़ती है। हमारी जिम्मेदारी का क्षेत्र विस्तृत होता है और साथ ही परिजनों के कर्त्तृत्व का स्वरूप भी। स्पष्ट है कि दृश्य जगत और अदृश्य जगत की गतिविधियों में विनाशकारी तत्त्व निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। दुरभिसंधियाँ और विभीषिकाएँ प्रचंड वेग से बढ़ती जा रही हैं। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिस पर संकटों के घटाटोप गहरा न रहे हों। इस उबलते लावे में हमें ऐसी मेघमाला बनकर बरसना है जिसमें ज्वलनशीलता को शीतलता में परिणति होते देखा जा सके। लक्ष्य महान है, पर सरल नहीं है। उसके लिए दधीचि और भगीरथ की भूमिका निभानी होगी। अर्जुन और हनुमान जैसा पराक्रम संजोना पड़ेगा। हमारा कार्यक्षेत्र यही बन चुका है। इसमें शिथिलता नहीं कठोरता ही बढ़ेगी। प्रत्यंचा ढीली नहीं पड़ेगी; वरन और भी अधिक खिंचेगी ताकि शब्दबेधी बाण अपने सही निशाने पर पहुँच सके।
अब प्रज्ञा परिवार का, प्रज्ञा परिजनों का स्वरूप पुराने स्तर से उछलकर एक बहुत लंबी छलांग लगा रहा है। इसका आधार और स्वरूप समझाने की आवश्यकता समझी गई है, इसलिए एक-एक मास के प्रज्ञा सत्रों में सम्मिलित होने के लिए कुछ अनगढ़ों को छोड़कर प्रायः सभी स्वजनों को बुलाया गया है, ताकि वे अपने भावी जीवन के भावी कार्यक्रम के संबंध में नए सिरे से अनुभव कर सकें। समय की विशिष्टता और अपने व्यक्तित्व की वरिष्ठता का आभास प्राप्त कर सकें।
गतमास की अखण्ड ज्योति में वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों के करने योग्य पाँच कार्य बताए गए हैं। वे सभी एक-एक लाख की संख्या में पूरे होने हैं। पाँचों को मिलाकर वे पाँच लाख होते हैं। इनकी पूर्ति प्रज्ञा परिवार की विशालता को देखते हुए कुछ भी कठिन नहीं है। भावना और साहसिकता विद्यमान हो तो इतने काम मुट्ठी भर लोग भी कर सकते हैं। हजार आम के बगीचे लगाने वाले हजारी किसान की समता करने वालों की संख्या अपने परिवार में कम नहीं है।
जहाँ तक उत्साही परिजनों का संबंध है, अच्छा हो न्यूनतम एक वर्ष का वानप्रस्थ लिया जाए और उस समय में शान्तिकुञ्ज हरिद्वार रहकर या वहाँ के द्वार भेजे गए अन्य कार्यक्रमों में संलग्न रहने का व्रत लिया जाए। जिनकी घर से बाहर जाने की स्थिति है, उनके लिए ऐसा ही उदार साहस अपनाया जाना योग्य है।
जो घर से बाहर जितने समय जा सकते हैं, वे उसे जनजागरण की तीर्थयात्रा में लगावेंगे। जैसी उनकी योग्यता है, जिस प्रकार के कार्यक्रमों में उनकी उपयोगिता है, उसके लिए वे तत्पर रहेंगे। शान्तिकुञ्ज में रहकर या जहाँ भी उन्हें भेजा जाएगा, वह सौंपे हुए उत्तरदायित्व को पूरा करेंगे। जो घर छोड़कर अधिक समय के लिए बाहर नहीं जा सकते, वे स्थानीय क्रियाकलापों में ही संलग्न रहने का प्रयास पूरे उत्साह के साथ करते रहेंगे। घर रहकर या बाहर जाकर अनेक प्रकार की रचनात्मक क्रियाओं में अपना कौशल दिखाया जा सकता है।
स्थानीय क्रियाकलापों में संलग्न रहकर भी अभियान का सूत्रसंचालन उस क्षेत्र में किया जा सकता है। (1) झोला पुस्तकालय (2) जन्म दिवसोत्सव (3) दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन (4) प्रौढ़ शिक्षा (5) बालसंस्कारशाला (6) व्यायामशाला (7) अशोक-वाटिका एवं अन्य औषधीय वृक्षों का आरोपण (8) स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन (9) टेप रिकार्डर से युग संदेश सुनाना जैसे कार्य आसानी से किए जा सकते हैं। श्रमदान-समयदान देने वाले कुछ साथी और भी मिल जाएँ तो स्वच्छता आंदोलन चलाया जा सकता है। घरेलू शाक-वाटिका लगाने के लिए लोगों को सहमत एवं उद्यत करना भी कुछ कठिन नहीं होना चाहिए। बालविवाह, खर्चीली शादियाँ, पर्दाप्रथा, मृतक भोज, नशेबाजी आदि कुरीतियों को मिटाने का सुधारात्मक कदम अपने घर में उठाकर दूसरों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। भिक्षा व्यवसाय को प्रोत्साहन न मिले, ऐसा माहौल बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अल्प बचत, परिवार कल्याण जैसे कार्यों को समर्थन और प्रोत्साहन दिया जा सकता है। अपने ही इर्द-गिर्द नजर उठाकर देखा जाए तो ढेरों कार्य ऐसे दृष्टिगोचर होंगे, जिन्हें कार्यांवित करने के लिए कोई भी प्रतिभावान अपने प्रभाव का उपयोग कर सकता है। स्वयं करने लगना दूसरों से उन्हीं बातों का कराने के लिए कारगर तरीका है। मनस्वी जिस दिशा में चलते हैं, उसी दिशा में अन्यान्य लोगों के कदम भी उठने लगते हैं।
कार्यकर्त्ता उत्पादन और प्रशिक्षण ऐसा कार्य है, जिसे सर्वोत्कृष्ट और सर्वप्रथम श्रेणी में गिना जा सकता है। शान्तिकुञ्ज में इस बार जो “महा अभियान सत्र” आरंभ हुए हैं उनकी विशेषता बहुमुखी नेतृत्व कर सकने की क्षमता जगाना, तद्विषयक कौशल उभारना है। एक महीने के इस प्रशिक्षण से लौटने वाले शिक्षार्थी से यह आशा की गई है कि उसी से मिलता-जुलता प्रशिक्षण अपने गाँव में भी चलाएँगे और इसी स्तर की छोटी पाठशाला का गठन करेंगे। यह पाठशालाएँ शान्तिकुञ्ज के एक मासीय प्रशिक्षण की अनुकृति होंगी। इसमें चिंतन, चरित्र और व्यवहार को उत्कृष्टता तथा शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक प्रगतिशीलता के सिद्धांत और व्यवहार सिखाएँ-समझाएँ जाएँगे। इतना ही नहीं, सुगम संगीत, भाषण, संभाषण, धर्मकृत्यों के माध्यम से लोक-शिक्षण के विभिन्न पहलुओं के अध्यापनक्रम भी चलते रहेंगे। मूल उद्देश्य यह है कि आत्मनिर्माण और समाज-निर्माण के दोनों पक्षों से जनमानस को अवगत और अभ्यस्त किया जाए। शान्तिकुञ्ज में सीमित स्थान है। उसी तक सभी का प्रशिक्षण सीमित कर दिया जाए तो अभीष्ट प्रगति में वर्षों लगेंगे, इसलिए उचित यही समझा गया कि शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षित शिक्षार्थी अपने-अपने स्थानों में सुविधा के समय कुछ घंटे की नित्य नवसृजन कक्षाएँ चलाया करें और नए-नए व्यक्तियों को मिशन के चिंतन एवं कार्यक्रमों से परिचित कराया करें, प्रशिक्षित करें। इस प्रकार अगले कुछ ही समय में वर्तमान प्रज्ञा-प्रशिक्षण लाखों नए सृजनशिल्पी तैयार कर देगा।
तीर्थयात्रा-पदयात्रा का स्वरूप साइकिल यात्रा काे दे दिया गया है। अपने-अपने क्षेत्र में प्रवास चक्र बनाकर दिन में दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखना और रात्रि को संगीत-प्रवचन कार्यक्रम रखना, यह जनजागरण की सरल एवं प्रभावी-प्रक्रिया है। 7 दिन से 15 दिन तक की चार-चार व्यक्तियों की ऐसी प्रवास टोलियाँ निकलें तो तीर्थयात्रा का युग-प्रयोजन पूरा हो। बड़े शहर या कस्बे में तीर्थयात्रा करनी है तो उसके सात मुहल्लों को सात गाँव मानकर कार्यक्रम बनाया जा सकता है।
अपने गाँव या क्षेत्र में जनजागृति उत्पन्न करने के लिए एक ढाई दिवसीय प्रचार कार्यक्रम सभी समर्थ शाखाओं को संपन्न करना चाहिए। इसके लिए बहुत दौड़-धूप या तैयारी की आवश्यकता नहीं है। शान्तिकुञ्ज से प्रचार जीप गाड़ियाँ इसी प्रयोजन के लिए भेजी जाती हैं, जिनमें पाँच प्रचारक होते हैं। सभी में गायक और वक्ता की योग्यता होती है। वादन के सभी यंत्र साथ रहते हैं। साथ ही लाउडस्पीकर भी। यज्ञशाला मंच तथा प्रवचन मंच भी। यह सभी साधन जीपों में होने से स्थानीय कार्यकर्त्ताओं को स्थान का, विद्यालय का, रोशनी का प्रबंध करना भर बाकी रह जाता है। दो-दो की टोलियाँ आयोजन, निमंत्रण के पीले चावल घर-घर बाँटे तो प्राचीनकाल की निमंत्रण शैली बन पड़ती है और सुयोग्य विचारशील लोगों की उपस्थिति पर्याप्त संख्या में होती है। समय मालूम होने से जनता ठीक समय पर पहुँच भी जाती है।
किसी बड़े कस्बे या शहर में आयोजन करने हों तो यह अधिक अच्छा है कि एक दिन नगर के इस कोने पर, दूसरे दिन दूसरे कोने पर आयोजन किए जाएँ। इससे अधिक लोगों के सम्मिलित होने की, अधिक लोगों तक प्रचार प्रकाश पहुँचने की संभावना रहती है। जनसंपर्क से जनसमर्थन, जनसमर्थन से जनसहयोग और जनसहयोग से किसी भी संस्था का संगठन मजबूत होता है और अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य बन पड़ता है। प्रचार जीपें आश्विन नवरात्रि से चलेंगी और चैत्र की नवरात्रि तक उनका दौरा रहेगा। जिन्हें अपने यहाँ आयोजन करने हों उन्हें अभी से पत्र-व्यवहार करके स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए।
चूँकि अब हर महीने एक लाख के करीब प्रचारात्मक, रचनात्मक, सुधारात्मक कार्यक्रम संपन्न होने लगे हैं। उन सबके समाचार छापने के लिए हर महीने, हर प्रांत का विवरण छापने वाली दस अखण्ड ज्योतियाँ छपनी चाहिए। यह संभव नहीं, इसलिए नाम छपने की महत्त्वाकांक्षा को तिलांजलि देकर हमें निस्पृह सेवाभाव से ही कार्य में संलग्न रहना चाहिए।
सुकरात से उनके शिष्यों में से एक ने पूछा— "मूर्ख और बुद्धिमान की क्या पहचान है?" सुकरात ने सहज भाव से उत्तर दिया, जो अपने अनुभव से भी लाभ न उठाए वह मूर्ख और जो अनुभव संचय से पहले ही दूसरों के उदाहरणों से काम की बात सीख ले— वह बुद्धिमान।
बात पूरी होते-होते एक दूसरा शिष्य बोल पड़ा— "जो अपने और पराए किसी के भी अनुभव पर ध्यान न दे उसे क्या कहा जाए"? सुकरात मुस्कराए और बोले—उसे कहना हो तो नर-पशु भी कहा जा सकता है।
यज्ञकृत्य की ही तरह एक भिन्न आकृति का कार्य वृक्षारोपण है। इसके लिए परिजनों को समय-समय पर प्रोत्साहित किया जाता रहा है। जिनके पास अधिक भूमि है, वे बड़े वृक्ष लगाएँ। धार्मिक दृष्टि से पीपल, वट, बिल्व, आँवला आदि का विशेष महत्त्व माना गया है। यों फलदार तथा दूसरे किस्म के पेड़ अपनी-अपनी उपयोगिता रखते हैं। अशोक-वाटिका आंदोलन को इन दिनों अधिक महत्व दिया गया है कि वह शोक की मनःस्थिति में भी अशोक की— शांति-सात्विकता की मनःस्थिति बनाती है। ऐसा झुरमुट एक ग्राम्य देवालय की पूर्ति करता है। वृक्ष भगवान की स्थापना देवालयों में स्थापित पाषाण-प्रतिमाओं से किसी भी प्रकार कम महत्त्व की नहीं है; चूँकि अशोक धीमे बढ़ने वाला वृक्ष है, एक वृक्ष अशोक का, शेष आँवला, अर्जुन, सहजन, कचनार के चार वृक्ष मिलाकर एक वाटिका बनाई जा सकती है। ये सभी औषधीय पौधे हैं।
अपनी या किसी पूर्वज की स्मृति में सभी को वृक्ष लगाना चाहिए। पुत्रवत् उसका पालन करना चाहिए। उन्हें देव संज्ञा देनी चाहिए। भूमि अपने पास न हो तो दूसरे की भूमि में उसी के लिए अपने श्रम से पेड़ लगाने चाहिए।
शान्तिकुञ्ज में महर्षि चरक की परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए एक जड़ी-बूटी उद्यान लगा है। उसकी उपयोगिता और चमत्कारी परिणतियाँ दिन-दिन अधिक प्रखर और प्रख्यात होती जा रही हैं।
चाहा गया है कि जिनकी इस संदर्भ में अभिरुचि है, जिनके पास भूमि की, सिंचाई की व्यवस्था है, वे भी एक छोटा जड़ी-बूटी उद्यान लगाएँ। देखभाल, साज-संभाल की उसमें विशेष आवश्यकता है। इस विषय में शान्तिकुञ्ज से अपने यहाँ लग सकने वाली बूटियों की पौध प्राप्त की जा सकती है। इससे बिना फीस कीमत का एक ग्रामीण अस्पताल चल सकता है। जो हजारों रुपयों को डाक्टरों की जेब में अनावश्यक रूप से डालना नहीं चाहते अथवा उनकी वैसी स्थिति नहीं है, वे इन वनौषधियों के सहारे जीवन लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अच्छा होता प्रज्ञा परिजनों ने एक-एक लाख के जहाँ पाँच संकल्प लिए हैं, वहाँ अशोक-वाटिका के साथ ही जड़ी-बूटी उद्यान लगाने की बात भी ध्यान में रखें। स्वयं लगाएँ या जो लगा सकने की स्थिति में हैं, उन्हें प्रोत्साहित करें। यह एक लाख अस्पताल निर्धन किंतु सघन-क्षेत्र में खोलने जैसा पुण्य है। इसका महत्त्व समझा जाना चाहिए और उत्साहपूर्वक सतत प्रयत्न किया जाना चाहिए।
इस वर्ष इस पक्ष का सबसे सरल कदम तुरंत उठाने के लिए प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को कहा गया है। यह इस रूप में कि घर-आँगन में तुलसी का बिरवा रोपा जाए। बच्चों की खिलवाड़ से कुछ ऊँचे साइज की एक चबूतरी बनाई जाए और उसके बीच में खाद-पानी की सुविधा वाला गड्ढा बनाकर तुलसी की पौध लगाई जाए।
इसके लिए एक लाख पौधे शान्तिकुञ्ज में तैयार किए गए हैं, जिन्हें स्थापना के लिए हर परिजन को दिया जाएगा। जो ले जाएँगे, उनसे आशा की जाएगी कि जब मार्गशीर्ष में उसके बीज पक जाएँ तो स्वयं नई पौध बना लें और बसंत पंचमी के दिन उसी प्रकार की स्थापना 24 घरों में कराने की पहले से ही तैयारी कराकर रखें। इस प्रकार शान्तिकुञ्ज में प्रेरित पौधों की दूसरी पीढ़ी 24 लाख की संख्या में लहराती हुई दृष्टिगोचर होनी चाहिए। मार्गशीर्ष में पके बीजों की पौध बसंत पंचमी तक बढ़ाने और लहलहाने की स्थिति में हो सकती है।
तुलसी के हजारों लाभ हैं। वह वायुशोधक, कृमि-निवारक और रोग-संहारक है। किस रोग में तुलसी किस प्रकार दी जाए इसकी जानकारी अनुपान भेद से चिकित्सारूप में मिशन द्वारा प्रकाशित इस संबंध में पुस्तकों से ली जा सकती है।
*समाप्त*