समग्र श्रेष्ठता विकसित करें

फूल की सुन्दरता और महक उसकी किसी पंखुड़ी तक सीमित नहीं है। वह उसकी समूची सत्ता के साथ गुंथी हुई है।

आत्मिक प्रगति के लिए कोई योगाभ्यास विशेष करने से हो सकता है कि स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर के कुछ क्षेत्र अधिक परिपुष्ट प्रतीत होने लगे और कई प्रकार की चमत्कारी सिद्धियाँ प्रदर्शित की जा सकें।

आत्मा की महानता के लिए इतने भर से काम नहीं चलता। उसके लिए जीवन के हर क्षेत्र को समर्थ, सुन्दर एवं सुविकसित होना चाहिए।

दूध के कण-कण में घी समाया होता है। हाथ डालकर उसे किसी एक जगह से नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए उस समूचे का मन्थन करना पड़ता है।

जीवन एकांगी नहीं है। उसके किसी अवयव विशेष को या प्रकृति विशेष को उभारने से काम नहीं चलता। आवश्यक है कि अन्तरंग और बहिरंग जीवन के हर पक्ष में उत्कृष्टता का समावेश किया जाय।

ईश्वर का निवास किसी एक स्थान पर नहीं है। वह सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय समझा जा सकता है। ईश्वर की आराधना के लिए आवश्यक है कि व्यक्तित्व के समग्र पक्ष को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाया जाय।


अभी कमी है देवि!

राजा भर्तृहरि ने वैराग्य दीक्षा ले ली। विशाल राजपाट, वैभव विलास, सुख सुविधाएं छोड़कर संन्यासी का बाना अपनाया।

पार्वती जी ने देखा सराहा “ वाह! कैसा प्रखर वैराग्य भाव उमड़ा, इतने विशाल वैभव को छोड़ दिया.........”। भगवती कोई प्रशस्ति पत्र दें, इससे पूर्व ही शिवजी बोल पड़े “ देवि! अभी कमी है, देखो!

पार्वती जी ने देखा सब कुछ त्यागने पर भी तीन वस्तुएँ आवश्यक समझकर भर्तृहरि ने साथ रख ली थीं-

1. जलपात्र, 2. तकिया और 3. हाथ का पंखा।

साधना चली, वैराग्य भाव और पुष्ट हुआ। क्रमशः वस्तुएँ छूटने लगीं। पहले पंखा छूटा हवा स्वतः मिलती है, दीवालों से घिरे होने पर ही तो कृत्रिम वायु प्रवाह पैदा करने के लिए पंखा चाहिए। दूसरे क्रम में तकिया निरर्थक लगने लगा। सिर के नीचे अपना हाथ लगाना पर्याप्त है तो तकिया क्यों लिए फिरे? तीसरे क्रम में जलपान भी निरर्थक लगने लगा। जगह-जगह निर्झर मिलते हैं, पीने के लिए अपने हाथ पात्र का आकार बना ही लेते हैं, फिर अलग से पात्र क्यों रखें। पात्र भी छोड़ दिया। पार्वती जी ने कुछ कहना चाहा, शिवजी ने पुनः “ कमी है” कहकर और देखने को कहा।

भर्तृहरि भिक्षा के लिए नियमित रूप से नगर गाँव में जाते। भिक्षा की सुविधा के लिए श्रद्धालुओं के निकट ही कहीं निवास की बात सोचते। वैराग्य भाव और परिपक्व हुआ। अपने अनुभव को मन हिताय समाज तक पहुँचाने के लिए “ वैराग्य शतक” लिखने लगे। श्मशान निवास, भोजन के लिए भिक्षार्थ भी जाना बन्द। कोई कुछ दे गया तो खा लिया अन्यथा निराहार ही साधना, चिन्तन, लेखन में तल्लीन रहने लगे।

एक बार ग्यारह दिन तक कोई आहार नहीं मिला। भर्तृहरि को शक्ति क्षीण होती अनुभव हुई। सोचा आहार न करने से शरीर असमय ही समाप्त हो जायगा, कार्य अधूरा रह जायगा। श्मशान भूमि में खोज की। पिण्ड-दान के क्रम में रखे गये आटे के पिण्ड मिल गये। एक पात्र में जल भी रखा था। चिता की अग्नि पर पिंडों के आटे की रोटी सेंकने लगे।

पार्वती जी से अब न रहा गया। बोलीं- “स्वामी! अब देखिए, विशाल साम्राज्य का अधिपति, सर्वस्व त्यागी किस निस्पृह भाव से पिण्डों के आटे की रोटी चिता पर सेंककर क्षुधा शान्त करने में तैयारी कर रहा है। ऐसा वैराग्य...........”

शिवजी पुनः बीच में ही बोल पड़े “देवि! अभी कमी है।” जगज्जननी अधीर हो उठीं। बोली “आपको क्या हुआ है? अब क्या कमी दीखती है?” शिवजी मुस्कराये बोले “देखना चाहती हो? तो आओ मेरे साथ।” दोनों उठे। वृद्ध ब्राह्मण ब्राह्मणी का स्वरूप बनाकर श्मशान भूमि में प्रकट हुए जहां भर्तृहरि चिता की अग्नि पर रोटी पकाकर, ग्यारह दिन की भूख मिटाने की तैयारी में थे, ब्राह्मण ने अपना भिक्षापात्र आगे कर दिया। भर्तृहरि ने भिक्षुक पर एक दृष्टि डाली और सहज भाव से रोटियां उसके पात्र में डाल दी। स्वयं जलपात्र लेकर पानी पीकर ही पेट की अग्नि को कम करने को तैयार हुए। ब्राह्मण वेशधारी शिव बोले- रोटी खाकर पानी कहां पीऊंगा? वह भी मिल जाता तो...........। भर्तृहरि ने जलपात्र भी उसे थमा दिया।

ब्राह्मणी वेश में पार्वती ने पति पर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली मानो पूछती हों, “अभी भी कुछ कमी है? शिवजी ने पुनः वही संकेत किया।

भर्तृहरि ने उनके हाव-भाव देखे, पूछा “आप नेत्रों की भाषा में क्या बात कर रहे हैं? ब्राह्मण बोले “यह कहती हैं कि तुमने इस बेचारे का सारा भोजन ले लिया, “इसे कष्ट होगा। अच्छा ऐसा करो आधा तुम वापस ले लो- हम आधे से काम चला लेंगे?” भर्तृहरि की भौहें टेढ़ी हुई, बोले “आप मुझे जानते नहीं। मैंने इतने बड़े साम्राज्य वैभव का मोह नहीं किया, इन रोटियों का मोह करूंगा?

शिवजी पात्र वहीं रखकर अंतर्ध्यान हो गये। पार्वती जी से बोले “ देखा देवि पदार्थों की आसक्ति तो नहीं रही पर, यश की आसक्ति अभी भी बनी हुई है। इसीलिए मैंने कहा था “अभी कमी है देवि!” पार्वती जी का समाधान हो गया।


सूक्ष्म शरीर का दिव्यीकरण

पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पदार्थों को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। पर साथ ही प्रकृति का दूसरा नियम भी काम करता है। ऊर्जा द्वारा पदार्थ से हलकापन उत्पन्न करके उसे नीचे से ऊपर को उड़ाना। वर्षा की बूँदें बादलों से जमीन पर गिरती है। वृक्षों की टहनियाँ भी टूटकर नीचे गिरती हैं। किन्तु साथ ही यह भी देखा जाता है कि उबलता हुआ पानी भाप बनकर ऊपर उड़ता है। ग्रीष्म ऋतु में हवा नीचे से ऊपर उठती है और आँधी चक्रवात के रूप में धूलिकणों को ऊपर की ओर उड़ा ले जाती है। मनुष्य के उत्थान-पतन का भी यही क्रम है। लोक प्रचलन में सम्मिलित पतन पराभव का साथी बनकर मनुष्य अपने अस्तित्व को भी निकृष्ट बनाता है। दुर्जन के कुसंग में दुर्गुण सीखता है। कुबुद्धि अपनाता और कुकर्म करता है। किन्तु सदा ऐसा ही नहीं होता। सज्जनों की प्राण ऊर्जा के सान्निध्य में आकर मनुष्य ऊँचा भी उठता है। उत्कृष्टता अपनाता और समुन्नत स्तर पर विकसित होता है। मनुष्य पशुता की ओर भी चल सकता है और देवत्व की दिशा में भी अग्रसर हो सकता है।

सूक्ष्म शरीर मनुष्य का मध्यवर्ती संस्थान है। उसके लिए भौतिक क्षेत्र में उलझे रहने की भी सम्भावना है और ऊँचे उठकर देव समाज में सम्मिलित होने की भी।

शरीर जड़ है। उसके संचालन में मस्तिष्कीय क्षमता ही कार्य करती है। चेतना को भौतिक जगत की आकर्षण शक्ति भी अधोगामी बना सकती है और ऊर्जा के साथ लिपटकर उसकी लपटें गगनचुम्बी भी हो सकती हैं।

वासना, तृष्णा और अहन्ता का गुरुत्वाकर्षण इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध होकर ऐसी गतिविधियां भी अपना सकता है जो अपने बहिरंग और अंतरंग जीवन में निकृष्टता की भरमार कर दे और ऐसा भी सम्भव है कि संयम, आदर्श, एवं उदार साहस अपना कर ऊँचा उठे। सज्जनतायुक्त महामानवों के साथ घनिष्ठता स्थापित करके ऊंचा उठे। साथ ही यह भी सम्भव है कि पिछड़ों को बढ़ाने, पतितों को उठाने एवं असमर्थों को सहारा देकर अपनी गरिमा को सार्थक समुन्नत करे। श्रेष्ठता का मार्ग ऐसा है जिसे अपनाकर व्यक्ति स्वयं भी ऊँचा उठता और दूसरों को भी उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर करता है। नीचे गिरना या ऊपर उठना, यह मनुष्य के अपने चयन एवं विवेक पर निर्भर है।

सूक्ष्म शरीर मेरुदण्ड के समान है। उसे मध्यवर्ती भी कह सकते हैं। उसका उपयोग दुर्बल व्यक्ति समर्थों का सहारा लेकर ऊपर उठाने के लिए भी कर सकते हैं जबकि समर्थ व्यक्ति हेय वातावरण में रहकर अपनी गरिमा भी गँवा सकते हैं। शबरी जगद्वंद्य बनी और मेनका विश्वामित्र के अधःपतन का कारण बनी। दिशा अपनाने में मनुष्य का स्वेच्छा चयन ही प्रधान है।

शक्तिवान उदार दानवीरों की तरह अपनी संचित तप साधना को अल्प प्राण वाले किन्तु व्रतशील लोगों को प्रदान करते और उनके माध्यम से संसार का हित साधन करते हैं। सद्भावनाओं और सत् प्रवृत्तियों को उकसाते हैं। यह सदुपयोग है। समर्थता का दुरुपयोग भी होता है। रावण और दुर्योधन का समूचा परिकर कुमार्गगामी हो गया था। उनकी निजी अशक्तता के दबाव में विरोध तक की गुंजाइश उनमें नहीं रही थी। उसे सज्जनता या उदारता का मार्ग कहा जा सकता है कि व्यक्ति अपनी वरिष्ठता की लगाम सम्भाले रहे और उसे केवल उत्कर्ष के निमित्त प्रयुक्त करे। यों कोई चाहे तो पतन और पराभव का मार्ग भी खुला हुआ है। यह व्यावहारिक कार्यक्षेत्र की चर्चा है।

उच्चस्तरीय प्रयोगों में सूक्ष्म शरीर की गतिविधियाँ संचय करने के लिए वरिष्ठता की दिशा में प्रयुक्त करने के लिए होती हैं। चमत्कार दिखाने और सिद्धियों की खिलवाड़ करने सूक्ष्म शरीर मदारी बाजीगर स्तर की भूमिका निभाता है। उस खिलवाड़ में अपने पूर्व उपार्जन को भी गँवा बैठता है। चापलूसों और जेबकटों से घिर जाता है और उनको अनुचित लाभ पहुँचाने का चस्का लगाकर अपनी वरिष्ठता को गँवाता चला जाता है।

सूक्ष्म शरीर को अधिक बलिष्ठ बनाना चाहिए ताकि उससे अधिक महत्वपूर्ण कार्य सध सकें। गधा कम और हाथी अधिक बोझ उठाता है। सामान्य मध्यवर्ती स्थिति में व्यक्ति विशेष की सामान्य सहायताएँ ही बन पड़ती हैं पर यदि शारीरिक तपश्चर्या और मानसिक योग साधना द्वारा सूक्ष्म शरीर को अधिक समुन्नत बनाया जा सके तो अपने को देवोपम बनते हुए ईश्वर का अनुग्रह पात्र बना जा सकता है और उसके निकटतम स्तर तक पहुँच सकता है।

ऐसी स्थिति तक पहुँचा हुआ साधन व्यक्ति विशेष की सामान्य लौकिक सहायताएँ ही करने में समर्थ नहीं होता वरन् व्यापक प्रवाह और वातावरण को भी बदलने, एवं सुधारने में समर्थ हो सकता है। उसकी परिधि बड़ी होती है इसलिए अपने क्रिया-कलापों को सीमित न रखकर व्यापक भी बना सकता है।

आवरण आवश्यकतानुसार सभी को धारण करना पड़ता है ईश्वर की मूलभूत सत्ता विश्व व्यवस्था में लगी रहती है। ब्रह्मांड का जड़ कलेवर कल्पनातीत विस्तार का है। फिर प्राणी परिकर का भी स्वरूप बुद्धि के लिए अगम्य है। पृथ्वी पर दृश्य और अदृश्य अगणित प्राणि प्रजातियाँ हैं। फिर पृथ्वी जैसे जीवनधारी पिण्ड इस ब्रह्मांड में अनेकों हैं। उन सब प्राणियों के कर्म विधान की साज सम्भाल भी ईश्वर के हाथ में है। इतना विस्तार सम्भालने में ही ईश्वर की मूल सत्ता संलग्न रहती है। उसके लिए यह सम्भव नहीं कि मनःस्थितियों एवं परिस्थितियों का सन्तुलन बिठाने में भी लगा रहे। यह कार्य उन देवमानवों का है जो ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करके उसी की क्षमताओं को उपार्जित कर सके हैं। लौक-लोकाचार को गड़बड़ाती हुई परिस्थितियों को यह देव मानव ही सम्भालते हैं। उनकी शक्ति एवं नियुक्ति का यही उपयोग होता है।

मलीनता उत्पन्न होते रहना स्वाभाविक है। मनुष्य शरीर के हर भाग से विकृतियाँ निकलती हैं। वायु मंडल भी कूड़ा-करकट बिखेरता रहता है। इसे स्वच्छ करने में समय भी लगता है और सामर्थ्य भी। देव मानव इसी दायित्व को समझते हैं। जहाँ कहीं टूट-फूट होती है उसे सम्भालने के लिए वे यथा समय यथा स्थान जा पहुंचते हैं और अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलते हैं।

कहने को हर श्रेष्ठ काम ईश्वर करता है। उसी की इच्छा से सब कुछ होता रहता है। पर यह कथन आँशिक सत्य है। यह कार्य देवमानवों का है। अपना अपना कार्य क्षेत्र उन्हें ही सम्भालना पड़ता है। किसी शासन की व्यवस्था उसके अफसर ही संभालते हैं। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर को ईश्वरीय चेतना के साथ लपेटकर उच्च स्तरीय देवमानव वही करते रहते हैं जिसे ईश्वर की इच्छा या कृपा कहा जाता है। कार्य कोई भी अफसर करे, उसे शासन का निर्देश समझा जाता है। इसी प्रकाश देव मानवों की सुधार एवं सन्तुलन प्रक्रिया ईश्वर की इच्छा या आज्ञा मानी जाती है।

बिगाड़ना शैतान का काम है। प्राणि की जन्मजात निकृष्टता एवं हेय वातावरण को सम्भालना ईश्वर का काम है। देव मानवों का जो अग्नि में ईंधन की तरह आत्म समर्पण करते हुए तद्रूप हो चुके हैं, सालोक्य, सामीप्य, सान्निध्य एवं सारूप्य की मोक्ष स्थिति के अधिकारी बन चुके हैं, इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए ही सूक्ष्म शरीर को दिव्य स्वरूप में परिवर्तित कर लेना माना जाता है।


जालन्धर का (kahani)

जालन्धर का समाचार है कि वहाँ की एक अधेड़ अध्यापिका के कोई बच्चा न था। अस्पताल से वह किसी कुमारी का अवैध बच्चा गोद ले आई। उसे साथ लेकर सोती। दूध बोतल का पिलाती, पर कौतुक में कभी-कभी उसके मुँह में अपना स्तन भी दे देती। आश्चर्य इस बात का कि ढीले स्तन तनने लगे और कुछ ही समय में उनमें से दूध उतरने लगा। बच्चे को अब बोतल के दूध के साथ-साथ इस नई माता का भी दूध मिलने लगा।


प्रेम एक - रूप अनेक

प्रेम शब्द इतना ऊँचा है कि उसे ईश्वर के समतुल्य ही कह सकते हैं। श्रुति वचन है- “रसौ वैसः” अर्थात् वह परमपिता प्रेम रूप ही है। जिसके अन्तराल में प्रेम की स्थापना एवं स्फुरणा विद्यमान है, समझना चाहिए कि उसके अन्तराल में ईश्वर का ही निवास है। ईश्वर भावमय है। उसकी छवि यह सारा ब्रह्मांड है। प्रतिमाएँ प्राणियों एवं पदार्थ की होती हैं। ईश्वर न पदार्थ है, न प्राणी। वह व्यापक और उत्कृष्टता सम्पन्न है। उसकी महत्ता की अनुभूति भाव-सम्वेदनाओं में ही अवतरित होती है। इसी से ईश्वर प्राप्ति का उपाय भक्ति मार्ग बताया गया है। भक्ति का अर्थ है- प्रेम, आत्मभाव- सेवा साधना।

भक्ति का आरम्भिक अभ्यास भले ही साकार या निराकार रूप में किया जाय पर उसका व्यावहारिक स्वरूप आत्मभाव ही है। हम अपने को सबसे अधिक प्यार करते हैं। अपने सुख साधनों के लिए कर्म-कुकर्म कुछ भी करते रहते हैं। अपने दुःख निवारण के लिए जो बन पड़ता है, उसे उठा नहीं रखते। यही आत्मभाव अपने तक सीमित न रहकर दूसरों में बिखर जाता है तो उसे प्रेम योग कहते हैं। उच्चस्तरीय स्वार्थ को ही परमार्थ कहते हैं। आत्मकल्याण के लिए जो आदर्शवादी प्रेरणाप्रद कार्य किये जाते हैं, उन्हें भी आत्मप्रेम कहा जाता है। वह जब ‘स्व’ की सीमित परिधि को लांघकर व्यापक बन जाता है, स्व के प्रति आत्मीयता उभरती है तो वे भी प्रेमी या प्रेम पात्र बन जाते हैं। जब अपने अन्तःकरण में संव्याप्त ईश्वर सीमित न रहकर असीम बन जाता है और उसका आनन्द एवं प्रतिफल भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है।

प्रेम शब्द प्रचलित अर्थ में लगभग महाशक्ति के रूप में परिणत हो गया है। किसी सुन्दर नर-नारी को देखकर वासनात्मक आकुलता उठती है और उसे सहमत करने के लिए जो प्रपंच रचा जाता है उसे भी प्रेम नाम की लपेट में ले लिया जाता है। यद्यपि वह है विशुद्ध व्यभिचार। अपने को व दूसरों को पतन के गर्त में गिराने के समान है। इसे लिप्सा भर कहा जा सकता है या विकृत कामुकता नाम दिया जा सकता है।

नर और नारी के मध्य प्रेम हो तो वह कोई बुरी बात नहीं है। पर वह आयु के हिसाब से माता, भगिनी, पुत्री के स्तर का होना चाहिए। पत्नी के प्रति भी रमणी कामिनी एवं भोग्या का रूप नहीं होना चाहिए। उसे भी मित्र, साथी, सहयोगी के स्वरूप में ही अंगीकार किया जाना चाहिए और दोनों को मिलजुलकर एक दूसरे के जीवन क्रम में उत्कृष्ट प्रगतिशीलता भरते हुए सहायक होना चाहिए। नारी निन्दा का शास्त्रों में कई जगह उल्लेख आता है। उसका तात्पर्य मात्र इतना ही समझा जाय कि जब कामुकता के नाग पाश में दोनों पक्ष बंधते हैं तो क्षणिक लिप्सा के निमित्त एक-दूसरे का शोषण ही करते हैं। उनको उत्थान से विरत करके शारीरिक और मानसिक दृष्टि से दुर्बल या हेय ही बनाते हैं। दांपत्ति जीवन स्नेह सद्भाव गहरे से गहरा हो किन्तु उसका प्रयोजन मात्र आत्मीयता को द्विगुणित करना और उस घनिष्ठता के माध्यम से संयुक्त जीवन को सुखद, समुन्नत एवं सरस बनाना होना चाहिए। पुरुष के लिए अन्य नारियाँ देवी तुल्य और नारी के लिए नर समुदाय भाई जैसी पवित्रता से बँधा होना चाहिए। रमणी की उत्तेजक मुद्रा ही ऐसी है, जिसे पतन के गर्त में गिरने वाली हेय स्तर की कहा गया है।

प्रेम का बखान इन दिनों नर-नारी के बीच उत्तेजक आकर्षण के रूप में सौंदर्य यौवन के रूप में ही किया जाता है। वृद्ध माता, दादी अथवा स्नेह सिक्त बालिका को प्रेम व श्रद्धा का भाजन बनाने में अभिरुचि नहीं होती। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए।

प्रेम नर और नर तथा नारी और नारी के बीच भी उतनी ही उत्कृष्टता के साथ निभ सकता है। परिवार की सीमा में भाई, भतीजे, पिता, चाचा, ताऊ के रूप में और नारियों में माता, दादी, चाची, भाभी, बुआ आदि के रूप में उतनी ही श्रद्धासिक्त घनिष्ठता को देखा जा सकता है। प्रेम बड़ों के साथ श्रद्धा के रूप में और छोटों के साथ वात्सल्य के रूप में प्रकट होता है। सज्जन, सद्गुणी, सेवाभावी लोगों के बीच वह ऐसी ही सम्मानास्पद भावना के साथ देखा जा सकता है।

परिवार की सीमा से आगे बढ़कर समाज का वह भाग आता है जो अपने संपर्क का है। इसमें पड़ौसी, परिचित, मित्र सम्बन्धी, कुटुम्बी आदि आते हैं। इनमें से प्रत्येक को अवसर विशेषों पर मित्र सम्बन्धियों की आवश्यकता पड़ती है। दुख बँटाने और सुख बाँटने की वस्तु है। जिनसे वास्ता पड़ता है, उनके सुख को बढ़ाने में दुःख घटाने में हमें भागीदार रहना चाहिए।

सबसे बड़ी सेवा यह है कि हर व्यक्ति का जीवन स्तर पवित्र ओर प्रखर बनाया जाय। इसके लिए सम्बन्धित समुदाय को सत्साहित्य द्वारा ऐसी सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए जिससे वे अपने दुर्गुणों का निराकरण कर सकें और सद्गुणों को बढ़ा सकें। ऐसा सत्संग जहाँ होता है, उन आयोजनों में, सत्साहित्य वाले पुस्तकालयों में उन्हें घसीट कर ले जाना चाहिए। ताकि दोषों के प्रति घृणा और गुणों के प्रति लगाव दिनोंदिन बढ़ता रहे। यह बिना खर्च किए दूसरों का वास्तविक हित साधन करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है।

इसके बाद चहुँ ओर संव्याप्त समाज आता है। वह समाज जिससे हमारा सीधा वास्ता नहीं पड़ता, उन तक हम अपनी सहानुभूति सम्वेदना पहुँचा सकते हैं। आर्थिक सहायता पहुँचा सकते हैं। अनीति की निन्दा करने से वह दुर्बल पड़ती है और नीति को प्रोत्साहन देने से उसको बल मिलता है। संसार में क्या हो रहा है, इस दिशा में हमें निरपेक्ष होकर नहीं बैठ जाना चाहिए। उसमें जितना भी सम्भव हो, उतना समर्थन या विरोध अवश्य करना चाहिए। मनुष्य जाति में फैली अवाँछनीयताओं, मूढ़ मान्यताओं- अन्धविश्वास- अनाचार को मिटाने या घटाने के लिए संघर्ष करना भी उतना ही आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है, जितना कि सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन और दान-पुण्य।

डाक्टर रोगी का आपरेशन करता है। उस शल्य क्रिया में भी चाकू का प्रयोग होता है और रक्त बहता है। इतने पर भी उसे कसाई नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उसका उद्देश्य रोग विकृति को हटाना और रोगी को निरोग बनाना है। इसी प्रकार अनीति के विरुद्ध संघर्ष करना भी उतना ही श्रेयस्कर है जितना कि अभाव ग्रस्तों को दान-पुण्य करना या उनकी सेवा सहायता करना।

प्रेम की परिधि मात्र मनुष्य समुदाय तक ही सीमित नहीं रहती। इस धरती पर अन्य प्राणी भी रहते हैं। पशु पक्षियों का तो विशेष रूप से संपर्क रहता है। कुछ तो उनमें से पालतू भी रहते हैं। इन सभी के साथ वैसा ही व्यवहार होना चाहिए जैसा कि सृष्टा के सभी पुत्रों के साथ किया जाना चाहिए। क्रूरता, निर्दयता, निष्ठुरता का व्यवहार किसी भी प्राणी के साथ करना मनुष्यता के अनुरूप नहीं है। प्राणियों के अतिरिक्त संसाधनों, पदार्थों की स्थिति है। वे भी सभी प्राणियों की सुविधा तथा सृष्टि का सन्तुलन बनाये रखने के लिए है। अगर उनको अनुचित रूप से बर्बाद किया जाएगा तो उस उद्दंडता का प्रतिफल समस्त सृष्टि को भुगतना पड़ेगा। इसलिये सृष्टि में उपलब्ध सभी पदार्थों को भी अनिवार्य आवश्यकता जितनी मात्रा में ही प्रयुक्त करना चाहिए। प्रेम का इतना विस्तार हो, तभी समझना चाहिए कि हमने भक्ति भाव का महत्व सही अर्थों में समझा और उसे सार्थक रूप में अपनाया।


Quotation

न रगड़ के बिना रत्न चमकते हैं और न कठिनाइयों का सामना किए बिना मनुष्य महान बनता है।

मनुष्य का अपने आप से बढ़कर न कोई शत्रु है न मित्र।


आत्मोत्कर्ष के चार साधन....

शरीर की देखभाल स्वयं करनी होती है। बीमार पड़ने पर उपचार के लिए ही चिकित्सक का परामर्श लेना पड़ता है। संयम बरतने की साधना का सीधा सम्बन्ध अपनी ही विवेक बुद्धि से है। दिनचर्या बनाने में दूसरों का परामर्श क्या काम देगा। अपनी परिस्थितियों का अपने को ही ज्ञान रहता है। नित्य कर्मों में यत्किंचित् सहायता ही दूसरा कर सकता है, पर उन कार्यों से निपटना तो स्वयं ही पड़ता है। विद्याध्ययन, कसरत, भोजन, शयन के लिए उपयुक्त सुविधाएँ जुटाना भी अपना निज का ही काम है। पैसा कहाँ खर्चना, समय को किसके साथ बिताना, कितने के साथ मधुर सम्बन्ध बनाना यह सब काम अपने निज के करने के ही हैं और उनके लिए अपना ही शरीर काम देता है। अपने ही बुद्धिबल के सहारे गाड़ी आगे चलती है।

यही बात आन्तरिक सुव्यवस्था और आत्मिक प्रगति के सम्बन्ध में भी है। दूसरों से परामर्श लिया जा सकता है। मार्गदर्शन तो प्रभावशाली व्यक्ति और अनुभव पूर्ण साहित्य के आधार पर भी चलता रह सकता है। किन्तु यह आशा नहीं करनी चाहिए कि अपने बदले के काम कोई और कर देगा।

भगवान से, देवता से प्रार्थना मनुहार करते रहना कि हमारे साँसारिक कार्यों को वे ही करके रखवाया करें और आत्मिक प्रगति का उद्देश्य भी वे अपने ही अनुग्रह से पूरा कर दें तो यह आशा दुराशा मात्र है। बिजली का करेंट प्रचण्ड होता है पर लकड़ी के , रबड़ के ऊपर इन्सुलेशन के कारण उसका भी कुछ असर नहीं होता। रक्त के विकृत हो जाने पर, कुष्ठ रोग पर अच्छी मरहम भी काम नहीं देती। चट्टानों पर वर्षा का पानी भी नहीं ठहरता। दुकानदार बिना ग्राहक के लाभ नहीं उठा सकता, इसलिए अपना पक्ष पूरा करने की शर्त ऐसी है जिसका कोई विकल्प नहीं।

जिस प्रकार बाह्य जीवन को अस्त-व्यस्त बनाना या सुधार लेना अपनी क्रिया पद्घति के ऊपर निर्भर है, कोई चाहे तो हर काम में अस्त-व्यस्तता बरत कर शरीर का सत्यानाश भी कर सकता है और उसे बलिष्ठ परिपुष्ट भी बना सकता है, ठीक उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र के उत्थान पतन के लिए भी कुछ आवश्यक अनुशासन बरतना पड़ता है। उससे अपरिचित रहा जाय, या जानबूझकर उपेक्षा बरती जाय तो इच्छा रहते हुए भी बात बनेगी नहीं, वरन् बिगड़ती ही चली जायगी। सफलताएं आसमान से नहीं बरसतीं उन्हें मनुष्य अपने निजी प्रयास पुरुषार्थ के बलबूते ही अर्जित करता है। परावलम्बन तो बच्चों का अभिभावकों के ऊपर चल सकता है। समर्थों को अपने दायित्व स्वयं ही वहन करने पड़ते हैं।

आहार-विहार, परिश्रम और मनोबल पर शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर है। इसी प्रकार आत्मिक उत्कर्ष के लिए भी चार कृत्य ऐसे हैं, जिनका नित्य नियमित रूप से पालन करना पड़ता है। उनके प्रतिफल पर श्रद्धा रहनी चाहिए और उन कृत्यों को आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी समझना चाहिए।

यह चार कृत्य हैं (1) आत्म निरीक्षण (2) आत्म सुधार (3) आत्म निर्माण (4) आत्म विकास। इस संबंध में मानसिक रूप रेखा बनाने के लिए एकाग्रता आवश्यक है। यह निरीक्षण निर्धारण एकान्त में अधिक अच्छी तरह बन पड़ते हैं। किन्तु उन्हें क्रियान्वित करने के लिए उठने से लेकर सोने तक सतर्कता करनी पड़ती है। भूल सुधार एवं अभिनव कार्यान्वयन का कार्य चालू रखना पड़ता है। उसमें आलस्य प्रमाद, उपेक्षा एवं ढील पोल बरतने से बात मखौल जैसी बन जाती है।

चूंकि यह योजना निर्माण प्रक्रिया है। निरीक्षण परीक्षण और निर्धारण भी है। इसलिए इस हेतु किन्हीं उपकरणों को जमा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। डायरी पेन्सिल भर पर्याप्त है। समय भले ही पन्द्रह मिनट का लगाया जाय, पर वह होना ऐसा चाहिए जिसमें दूसरे आकर विघ्न न डालें। सुविधानुसार समय को आगे-पीछे भी किया जा सकता है, पर उसमें नियमितता अवश्य रहनी चाहिए ताकि उस कृत्य को दिनचर्या में सम्मिलित रखे रहने की आदत पड़ जाय।

आत्म निरीक्षण से तात्पर्य यह है कि अपने भीतर जमी हुई दुष्प्रवृत्तियों का एकबार नये सिरे से पर्यवेक्षण किया जाय और उनके कारण अगले दिनों होने वाली हानियों पर विचार किया जाय। इसके साथ ही पिछले दिनों की अपेक्षा जो सत्प्रवृत्तियों बढ़ी हैं। उन पर भी दृष्टिपात करना चाहिए। व्यापारी जिस प्रकार घाटे की मद्दों को बन्द करता चलता है और लाभ के जो प्रयास है उन्हें बढ़ाता चलता है उसी प्रकार की दृष्टि निर्धारित समय के चौथाई भाग में पूरी कर लेनी चाहिए।

निरीक्षण पर्यवेक्षण का उद्देश्य केवल भली-बुरी स्थिति का निरीक्षण पर्यवेक्षण है। इसके बाद यह सोचना पड़ता है कि गलतियों को कैसे सुधारा जाय। जो अनुपयुक्त हैं उसे हटाने छोड़ने और दबोचने के लिए किस प्रकार की रीति-नीति अपनाई जाय। यह कपड़ा धोने बुहारी लगाने स्नान करने जैसी प्रक्रिया है। शरीर में खोट कम होने पर भी कई बार विचार क्षेत्रों में ढेरों गन्दगी भरी रहती हैं स्वभाव में अनेक बुरी आदतें जड़ जमायें होती हैं। उनका हटाया जाना उसी प्रकार आवश्यक है जैसे कि रोगों के उपचार में तत्परता बरती जाती है। उपेक्षा करने पर छोटे रोग ही प्राण घातक बन जाते हैं। इसलिए उन्हें सहन करते रहने, चलते रहने, देने की उपेक्षा बुद्धि भयंकर रोग ला खड़े करती है और प्राण संकट की सीमा तक जा पहुँचती है। इसलिए निरीक्षण परीक्षण के साथ-साथ सुधार पक्ष का भी नियोजन करना चाहिए। दोनों ही कार्यों को एक ही बात के दो अंग समझना चाहिए। उन्हें निदान और उपचार की समन्वित संज्ञा देनी चाहिए।

दूसरा भाग है निर्माण और विकास। इन दोनों का भी एक युग्म है। बहुत ही सत् प्रवृत्तियों ऐसी हैं जिनके न कभी मन में इच्छा उत्पन्न हुई न योजना बनी न चेष्टा की गई। जैसा कुछ ढर्रा चल रहा है उसी को पर्याप्त माना गया। इस मनःस्थिति में प्रगति की दिशा में कदम नहीं बढ़ता। ऐसी नई योग्यताएँ हस्तगत नहीं होतीं जो उत्थान के लिए आवश्यक हैं। बाजार में मूल्य तो वस्तु का ही मिलता है। यदि पेट भरने जितने गुण हैं तो उसी स्थिति में मृत्यु पर्यन्त पड़ा रहना पड़ेगा। यदि ऊँचा उठना और आगे बढ़ना है तो आवश्यकता इस बात की होगी कि नई योजनाएँ, विशेषताएँ प्राप्त की जाय इसलिए नये सिरे से शुभारम्भ करना और कार्यक्रम बनाना होगा।

स्मरण रखे जाने योग्य बात यह है कि यदि साँसारिक उन्नति करनी है तो उस क्षेत्र की योग्यता एवं कुशलता बढ़ानी होगी। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को ऐसा बनाना होगा जिससे संपर्क क्षेत्र पर अपनी प्रामाणिकता, सज्जनता और कुशलता की छाप पड़ सके। इन विशेषताओं को बढ़ाने के लिए बहुमुखी प्रयास करने पड़ते हैं और अनेकानेक सुयोग्यों के साथ अपना संपर्क बनाना होता है। इस कार्य को योजनाबद्ध रीति से करने पर “निर्माण” का उद्देश्य पूरा होता है।

आत्म विकास का तात्पर्य है स्वार्थ को परमार्थ में बदल देना। आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और ईश्वरीय अनुग्रह इसी आधार पर बन पड़ता है, लिप्साओं, लालसाओं, तृष्णाओं पर जो जितना अंकुश लगा सकता है, वह उतना ही ब्राह्मी चेतना की ओर उन्मुख होता है। लालची स्वार्थ और अहंकारी व्यक्ति पूजा पाठ के बहाने किसी देवता का अनुग्रह प्राप्त कर सके या आत्म कल्याण का लक्ष्य प्राप्त कर सके, यह असम्भव है। आत्म विकास के लिए अपनी दुर्बलताओं और लौकिक आकर्षणों से अपना बचाव करना पड़ता है। उन्हीं तत्परताओं के सहारे ही व्यक्ति समुन्नत होता और लक्ष्य तक पहुँचता है।


Quotation

महानता के अभ्यास जन समुदाय के बीच रहकर ही हो सकता है। तालाब में प्रवेश करके ही तैरना सीखा जाता है। एकान्त में अवसर के अभाव में किसी की वास्तविकता को किस प्रकार परखा जाय।


दृष्टिकोण का परिष्कार

जैसा कुछ दीख पड़ता है या समझ में आता है वह सदा सही ही नहीं होता। उसमें कभी-कभी असाधारण भ्रान्तियों का भी समावेश होता है। पानी की लहरों पर अनेकों सूर्य या चन्द्रमा दीख पड़ते हैं। वस्तुतः उतने होते नहीं। दूरबीन से बहुत दूर की वस्तुएँ निकट दीखती हैं। रंगीन चश्मे में जिस रंग के काँच होते हैं उसी रंग में रंगे हुए सारे पदार्थ दीखते हैं। लहरदार काँच ऐसे भी आते हैं जिसमें अपना चेहरा असाधारण रूप से लम्बा या चौड़ा दीख पड़ता है। नशा पीकर उन्मत्त हुआ दुर्बल व्यक्ति भी अपने को पहलवान समझने और बड़े-बड़ों को पछाड़ देने की चुनौती देने लगता है। यह वस्तुस्थिति का गलत मूल्याँकन है। इसे दृष्टिकोण ही कहा जा सकता है।

शरीर पर रंगीन कपड़े पहन लेने या चेहरे पर मुखौटा बाँध लेने पर अपना स्वरूप दर्पण में भी विचित्र दीखने लगता है। पर वस्तुतः होता नहीं। विवेक बुद्धि अपनाने से ही यह जान पड़ता है कि दर्पण धोखा दे रहा है। मात्र आवरण को वस्तुस्थिति बता रहा है। रंगमंच पर सामान्य मनुष्य चित्र-विचित्र पोशाकें बदल-बदलकर आते रहते हैं। दर्शकों की आँखें धोखा खाती रहती हैं। कभी वही व्यक्ति ऋषि बन जाता है कभी राजा। कभी भिक्षुक बन जाता है कभी दानी। कभी पुरुष बन जाता है कभी नारी। विदूषक- बहरूपिये इस प्रकार की कला में और भी प्रवीण होते हैं।

इन प्रसंगों में दर्शक ही धोखा खाते हैं। जिसने आवरण पहने हैं वह स्वयं तो अपने को जैसा है वैसा ही समझता रहता है। वह दृष्टि दोष और यथार्थता के मध्य रहने वाले अन्तर को समझता रहता है। रामलीला में बने देवता या राक्षस अपने बारे में धोखा नहीं खाते। वे अपने को वही समझते रहते हैं जैसे कि वस्तुतः हैं। रावण के दस सिर भी नकली होते हैं और हनुमान की पूंछ भी। बच्चे ही इस विनोद में रस लेते हैं। समझदारों से वह बनावट छिपी नहीं रहती।

पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मनुष्य वस्तुतः धोखा खाता है। सिनेमा के पर्दे पर चलती-फिरती तस्वीरें वस्तुतः स्थिर होती हैं। रील की घुमाने वाली मशीन इस तेजी से घूमती है कि एक सेकेंड में 26 चित्र आँखों के आगे से गुजर जायं। बस चलता फिरता सिनेमा दीखता है। लाउडस्पीकर अलग से बोलता है पर प्रतीत ऐसा होता है कि पात्र के मुँह में से ही आवाज आ रही है। यह बेजान मशीन द्वारा जानदार आदमी को दिया हुआ धोखा है। जो वास्तविकता को जानते हैं वे भी दृश्यों से इतने प्रभावित होते हैं कि कभी हंसने लगते हैं कभी रोने। कभी बेचैन हो जाते और कभी सन्तोष की अनुभूति में तल्लीन रहते हैं।

हिप्नोटिज्म के खेलों में भी ऐसा ही होता है प्रभावित व्यक्ति कुछ का कुछ देखता और कुछ का कुछ अनुभव करता है। ऐसे ही एक जादू क्षेत्र के बीच फंसे हुए हम भी भूल भुलैयों में घूमते रहते हैं और तिलस्म जैसे सपने देखते हैं।

मेलों में मदारी पेट से बाँस और कागज का बना घोड़ा बाँध लेते हैं। अपना आधा धड़ उसके पेट में फँसा देते हैं। अपने पैरों नाचते कूदते हैं। दर्शकों को प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति घोड़े पर चढ़ा सवारी का मजा ले रहा है किन्तु वास्तविकता दूसरी ही होती है। घोड़े की आकृति का लकड़ जंजाल उसके ऊपर लदा होता है। वह स्वयं अपने पैरों नाचता है साथ ही उस लकड़ जंजाल को भी उठाये-उठाये फिरता है। यह खेल तमाशा है। पर तब उसे बावला कहेंगे जब उस घोड़े का मोल भाव करने लगे या उसके सहारे लम्बी मंजिल आराम के साथ पार करने की बात सोचे।

हम सब ऐसे ही दृष्टिकोण में फंसे हैं। शरीर हमारे ऊपर एक लकड़ जंजाल की तरह लदा है और हम माया के दृष्टिकोण में बंधे हुए उसी को अपना वास्तविक रूप समझते हैं। उसकी मनःस्थिति ही हमें अपनी वास्तविक परिस्थितियां प्रतीत होती हैं।

मनुष्य चार मुट्ठी अन्न और छह गज कपड़े को लपेटे रहने का अधिकारी है। छह फुट की चारपाई और ओढ़ने-बिछाने का आच्छादन यही हम सबकी नियति है। इतना ही उपभोग हर किसी के लिए सम्भव है। सीमित आहार ही पचाने में हर किसी का पेट समर्थ है और नियत घण्टे ही नींद आती है। इस दृष्टि से सभी की स्थिति एक जैसी हुई। किन्तु देखते हैं कि कोई अपने को अमीर और गरीब मानता है और इसी आधार पर खिन्न रहता या इठलाता है। धनी के पास कितना ही वैभव क्यों न हो उसके उपयोग की सीमा निर्धारित है। उससे अधिक पर अधिकार जताया जा सकता है पर जमाया नहीं जा सकता है। जिस जमीन पर, जिस धन पर आज अपना अधिकार है। उस पर इससे पहले भी कितने ही अपना स्वामित्व बताते रहे हैं और हमारे न रहने के उपरान्त भी। कितने ही उसे अपनी कहते रहेंगे पर वस्तुस्थिति यह है कि सृष्टि के आरम्भ में जितना धन वैभव इस धरती पर था। उतना ही बना रहेगा। उस पर अधिकार जताने वाले ही बदलते रहे हैं यह हो सकता है कि कोई अपनी कुशलता का समावेश करके आकृति में हेर-फेर कर दे। स्वामित्व की मान्यता अवास्तविक है। पर किसी से इस तथ्य को स्वीकारने के लिए कहा जाय तो वह लड़ने मरने को उद्यत होगा।

शरीर पंचतत्वों के संयोग वियोग का जादू है। अभी शुक्राणु था, अभी भ्रूण बना, अभी शिशु का जन्म, अभी किशोर युवक , प्रौढ़ और वृद्ध बना और मरण के साथ ही इसी मिट्टी में मिल गया। अहन्ता जन्म से पूर्व भी हवा में थी और मरण के उपरान्त भी हवा में उड़ गई। किन्तु उस पर जिसका स्वामित्व था। वह अपने आप को ही भूला रहा और आवरण में इतना रम गया कि शिल्पी और उपकरण का मध्यवर्ती अन्तर तक समझ सकना कठिन हो गया। ‘अहम्’ कहने की अधिकारिणी आत्मा को अपनी सत्ता ही विस्मृत हो गई।

इन्द्रिय भोगों में अपने-अपने रसों का आस्वादन होता है पर मजा अपने ही पैसे से खरीदी हुई फुलझड़ी के जलने का है इसमें लाभ कहाँ? अपनी ही समर्थता को जताने भर का खेल है। होली जलते देखकर उछलने जैसा। कुत्ता सूखी हड्डी ले आता है चाबता है। जबड़े छिल जाते हैं। घाव से बहने वाले रक्त को चाटकर वह समझता है कि हड्डी का रसास्वादन हो रहा है। पर वस्तुतः वह अपने ही जबड़े का रक्त होता है। उसी के बारे में सूखी हड्डी से रस टपकने जैसी अनुभूति होती है। कामुकता के रसास्वादन में वह पाता कुछ नहीं, गिरह का गँवाता ही गँवाता है पर उसमें असाधारण रसानुभूति मानने वालों को क्या कहा जाय? जिह्वा और पदार्थ की अनुभूति ही स्वाद बनती है। वस्तुतः स्वाद कहीं कुछ है नहीं। यदि नीम कडुआ होता तो ऊँट को क्यों सुहाता। हमारे अपने स्राव और ताम्र ही जीभ के स्वाद बनकर लुभाते हैं। वस्तुतः बाह्य जगत में घास ही घास है। उसी का पशु पक्षी अपने ढंग से और मनुष्य अपने ढंग से स्वाद लेते हैं। आकाश में भ्रमण करने वाले ताप, ध्वनि और प्रकाश की तरंगें ही मस्तिष्क से, काय-कलेवर से टकराकर चित्र-विचित्र दृश्यों और अनुभवों का बोध कराती हैं। पर हेय है जो इस तिलस्म में अपना आपा खो बैठते हैं और तमाशे में इतने तन्मय हो जाते हैं कि अपने स्वरूप, गन्तव्य एवं उद्देश्य तक को स्मरण नहीं रख पाते।

जीवन की यथार्थता क्या है? एक अग्नि परीक्षा! एक धरोहर। एक अमूल्य अवसर जिसका यदि सही उपयोग बन पड़े तो उसका प्रतिफल ऐसा उभरे जिस पर इस जड़ जंजाल की सारी उपलब्धियों को निछावर किया जा सके। पर किया क्या जाय? कोई छलावा अमृत को छीनकर हमें चटपटी चटनी भर चखा जाता है और उस अलभ्य से वंचित कर जाता है जिसकी प्यास में जीव को मृग तृष्णा की भाँति, कस्तूरी के हिरन की भाँति जहाँ-तहाँ भटकना पड़ता है।

प्रदर्शन के लिए हम लालायित फिरते हैं पर जिन्हें दिखाना और जिनसे प्रशंसा करना चाहते हैं वे अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि अपने प्रयोजनों के अतिरिक्त किसी दूसरे की ओर देखने की फुरसत ही नहीं। देखते हैं तो तिरछी नजर से मन ही मन ढोंगी की उपाधि देकर मुस्करा भर देते हैं।

यश लूटने की ललक रहती तो है पर यह भूल जाते हैं कि शरीर के साथ ही वह दर्प ही तिरोहित हो जाता है। अगले जन्म में कोई राजा था, इस जन्म में रंक है। तो पिछली बार का यशस्वी होना आज हमारे क्या काम आ रहा है। आज हमारी विद्वान धनवान के रूप में ख्याति है पर अगले जन्म में गधा बनने पर वह ख्याति अपने किस काम आई। दूसरे कोई भले ही उस दिवंगत का ढोल पीटते रहें। धन बहुत कमाया था पर वह सब तो उत्तराधिकारियों के कब्जे में चला गया या दुर्व्यसनों में लुट गया। वह सम्पन्नता किस काम आई जिसके लिए जीवन भर कोल्हू में बैल की तरह पिलना पड़ा और कुकर्मों का बोझिल चट्टान सिर पर लादकर इतनी दूर जाना पड़ा जिसे ढोते-ढोते कचूमर ही निकल जाय।

यह सारी प्रवंचना क्या है? मात्र आत्म विस्मृति की विडंबना। अपने आप को भूलकर हम वह सब कुछ भूल जाते हैं जो हर घड़ी स्मरण रखा जाना चाहिए। साथ ही उस चिन्ता, आकांक्षा, अभिलाषा, वितृष्णा में डूबे रहते हैं जिसमें सार कुछ नहीं। बाजीगरी की खिलवाड़ भर है। हम बलिष्ठ, समर्थ, यशस्वी, सम्पन्न विद्वान बने तो ही वह दौड़ एक छोटी सीमा तक हो सकती है। इस संसार में इतने बड़े मगरमच्छ बैठे हैं जिनकी तुलना में हमारा, सम्पदा, विभूति, चतुरता और सफलता रत्ती के कण जितनी गिनी जा सकती है। फिर इस नक्कार खाने में तूती की आवाज कौन सुनने वाला है। अपने अहंकार का स्वयं ही परिपोषण करते रहा जा सकता है। दूसरों से इसकी आशा करनी हो तो उसे महंगे मोल पर नौकर ही रखना पड़ेगा।

हम काँच के बदले हीरा गंवाते हैं। शरीर को चटाने सजाने और बड़े बनने के लिए न जाने कैसा ताना-बाना बुनते रहते हैं जो प्रतीत तो कोई यक्ष गंधर्व स्तर की कलाकारिता प्रतीत होती है पर झाडू वाले की एक ही झड़प में उस अहंता को बटोर लेती है जो कभी सोने के पर्वत जैसी सुहावनी लगती थी।

मूर्खता को रचने कहने, सुनने और विचारने की अपेक्षा यह क्या बुरा है कि हम अपने को- अपने आत्मिक स्तर को समझें और जो करें उसके लिए करें। शरीर के लिए जितना करना पड़ता है इससे सौ गुने कम प्रयत्न परिश्रम में इतना पाया जा सकता है जो बाल-विनोद की तुलना में सहस्र गुना अधिक महत्वपूर्ण, मूल्यवान और चिरस्थायी कहा जा सके।

स्वाद वैभव ओर दर्प तुलना में पुण्य परमार्थ का मार्ग इतना सरल और श्रेयस्कर है कि उसकी उपलब्धि न सही, कल्पना भर से ही आत्म-सन्तोष, एवं आनन्द उल्लास में निमग्न रहा जा सकता है। उपास्य देवता है प्रेत पिशाच नहीं। हमें आत्म-कल्याण के लिए सोचना और करना चाहिए। उस शरीर के लिए जो मल मूत्र की गठरी की तरह हमारे सिर पर लदी है और जिसका स्थायित्व का तनिक भी भरोसा नहीं। अमर आत्मा को परमात्मा स्तर तक बैठा ले जाने में पुरुषार्थ है उसमें नहीं जिसे करते हुए हर समय डरना और डराना पड़ता है। जलना और जलाना पड़ता है।

आत्मा को देखें, समझें और उसी को प्राप्त करें। क्योंकि वही हमारा सच्चा साथी और शुभ चिन्तक है। आत्मा की प्राप्ति सरल है अन्तर में पवित्रता और बहिरंग में परमार्थ परायणता का समावेश कठिन इसलिए लगता है क्योंकि जरूरी है कि उसका हम अभ्यास करें, ऐसी रीति-नीति अपनायें जिसे महामानव ऋषि और देवात्मा भी पाते रहे। उस मार्ग पर न चलें जो कटीली झाड़ियों में उलझता और खाई खंदकों में धकेलता चलता है।


Quotation

शिक्षा वह जो हाथों को आजीविका उपार्जन सिखायें और मानवीय दायित्वों का निर्वाह सिखाये। जो शिक्षा पेट के लिए पराधीनता सिखाये और मन के लिए विलासिता का आवरण उड़ाये वह किस काम की?


जीता कौन?

एक प्रकार का संघर्ष चल रहा था- दार्शनिक सन्त सुकरात और सत्ता सम्पन्नों के बीच। दोनों का कहना था कि सामने वाला उचित बात स्वीकार नहीं कर रहा है।

सुकरात सन्त थे, दार्शनिक थे। वे लोगों को आध्यात्मिक जीवन का उपदेश देते, नैतिक दर्शन समझाते वहाँ तक किसी को कोई विरोध नहीं था। परन्तु वे अपने क्षेत्र से बाहर की बात करने लगे। कहने लगे “सूर्य नहीं घूमता, पृथ्वी घूमती है। यह अनर्गल बात सत्ता सम्पन्नों को अखरी। उन्होंने सुकरात को सूचित किया कि ऐसे भ्रम न फैलायें, लोगों को नेक जीवन जीने का उपदेश भी दिया करें। सुकरात को यह सूचना मिली तो उन्होंने कहा “मैं कोई भ्रम नहीं फैला रहा हूँ, भ्रम दूर कर रहा हूँ। जिनकी समझ में बात नहीं आ रही है, उनकी बुद्धि विकसित होने पर वे भी समझने लगेंगे।

सत्तावानों को यह बात और भी बुरी लगी। उन्हें अविकसित बुद्धि का ठहराया जाय, यह तो सीधे शालीनता की मर्यादा भंग करना माना जायगा, उन्होंने मान लिया कि सन्त का अहंकार बढ़ गया है, उन्हें अनर्गल प्रचार से बलपूर्वक रोकना होगा।

दोनों पक्षों के अपनी बात मनवाने के लिए चले पड़े। “सन्त स्वभावतः सामने वाले की समझ बढ़ने का अवसर और समय देते हैं। उन्होंने सोचा तमाम लोग समझने लगेंगे तो इनकी भी समझ में आ जायेगा कि कुछ सत्य है तभी तो सब मान रहे हैं।”

सुकरात न माने तो सत्ताधीशों ने घोषणा करवा दी “सन्त अपने स्तर से गिर गये हैं, भ्रम फैलाने लगे हैं, उनकी बात कोई न माने। पर वह क्रम रुका नहीं। जनता और सन्त का संपर्क तोड़ना आवश्यक समझकर उन्होंने सुकरात को जेल में डाल दिया।

पर फिर भी बात बनी नहीं। “सुकरात का कथन है” इसी आधार पर बात फैलती रही। भ्रम फैलने से रोकना जरूरी था। सुकरात से कहा गया अपनी बात वापस लो। पर वे न माने। अन्तिम अस्त्र के रूप में कहा गया “लिखकर दो कि पृथ्वी नहीं घूमती, अन्यथा भ्रम फैलाने के अपराध में मृत्युदंड भोगना होगा।

सुकरात के समर्थकों , विचारकों में खलबली मच गयी। विचार विमर्श हुआ। सोचा गया कि नासमझ तो समझेंगे नहीं, समझदार को ही समझाने का प्रयास किया जाय। सब सुकरात से मिले, कहा “आप समाज की मूल्यवान संपत्ति हैं। समाज को हानि से बचाने के लिए आप लिख दीजिए कि पृथ्वी नहीं घूमती।

सुकरात बोले “आपके कहने से लिख तो दूँ, पर मेरे लिखने के बावजूद भी वह घूमती ही है मेरे लिखने से वह रुकेगी थोड़े ही? विचारकों, शिष्यों ने कहा “पृथ्वी घूमती है, घूमती रहेगी। जिनकी समझ में बात आज नहीं आ रही है- वह कल आ जायेगी। परन्तु यदि आप हमारे हाथों से चले गये तो फिर कहां मिलेंगे? इसलिए बात मान लीजिए न!” सुकरात एक क्षण मौन रहे फिर बोले “मैंने रात एक स्वप्न देखा। एक व्यक्ति रेगिस्तान में प्यास से मरने की स्थिति में पहुँच गया। उसे एक घेरे में जल दीखा, वहाँ एक राक्षस भी था मनुष्य ने पानी पीना चाहा। राक्षस बोला “मैं घेरे से बाहर नहीं आ सकता, अन्दर आने वालों को खाकर भूख मिटाता हूँ। तुम पानी तो पी सकते हो, पर मैं तुम्हें खा जाऊँगा। वह व्यक्ति अन्दर घुसने लगा, किसी ने रोका कि “क्यों मौत के मुँह में जाता है। वह बोला यहाँ से आगे बढूँगा तो प्यास से छटपटा कर मर जाऊँगा। क्यों न तृप्त होकर मरूँ?”

इतना सुनाकर सन्त ने पूछा “तुम सब क्या सोचते हो, उस व्यक्ति ने ठीक किया या गलत? सभी ने कहा “उस व्यक्ति का निर्णय ठीक ही था।”

सुकरात मुस्कराये, बोले “उस व्यक्ति की जगह मुझे देखो। मैंने हमेशा सत्य का पान किया है, मुझे उसी से तुष्टि मिलती है। सत्य सुधा का पान करने से मेरा शरीर नष्ट कर दिया जायगा, पर उसका पान न करने से अन्दर वाला सन्त मर जायगा। बोलो तृप्त होकर मरूँ या तड़प-तड़पकर? सन्त मौन रह गये। गले रुंध गये, नेत्र बह उठे......। सुकरात ने जहर का प्याला पिया, झगड़ा शान्त हो गया। पर जीता कौन?

उत्तर आसान नहीं। ईश्वर बड़ा कौतुकी है। तत्काल को महत्व देने वाले को तत्काल जिता दिया, स्थायित्व को महत्व देने वाले को स्थाई जीत दे दी.......।


मनोनिग्रह और दिव्य शक्तियों का विकास

मन का संयम करने की आवश्यकता इसलिए समझी गई है कि उसकी चंचल वृत्ति के- भाग दौड़ के कारण किसी महत्वपूर्ण कार्य में तन्मय होने की आवश्यकता में विघ्न न पड़े।

यह स्पष्ट है कि कोई शारीरिक या मानसिक कार्य बिना तत्परता और तन्मयता के सम्पन्न नहीं होते। जिस प्रकार पनडुब्बे समुद्र में गहरा गोता लगाते हैं और जिस क्षेत्र में मोतियों वाली सीपें होती हैं उसी में सीधे उतर जाते हैं। तभी उन्हें अभीष्ट लाभ मिलता है। यदि वे जिधर-तिधर छितराते रहें और अभीष्ट लक्ष्य केन्द्र से अपरिचित रहें तो उनका श्रम निरर्थक ही चला जायगा और उनके हाथ खीज थकान के अतिरिक्त और कुछ न पड़ेगा। धनुष बाण कितने दाम का है। महत्व इस बात का नहीं वरन् इस बात का है कि चलाने वाले को निशाना साधना आता है कि नहीं। यह साधना एकाग्रता के बलबूते ही बन पड़ती है। यह बात किसी आध्यात्मिक भौतिक कोई भी कार्य क्यों न हो उसका सही रीति से सम्पन्न होते हैं यदि उसमें हवाई उड़ाने उड़ने वाला मन विघ्न उत्पन्न करे, तो उसी भी ठीक तरह सम्पन्न कर सकना सम्भव न हो सकेगा। अस्तु वैज्ञानिक, कलाकार, योगाभ्यास स्तर के कार्यों के लिए मन को निर्धारित प्रयोजन में एकाग्र रखना नितान्त आवश्यक है। यदि इतना भी न सध सकेगा तो लुहार-सुनार आदि मिस्त्री कारीगर तक अपना काम ठीक तरह न कर सकेगा। चोट यथास्थान मारने की अपेक्षा अपने हाथ में मार लेगा और घायल हो जायगा। बौद्धिक प्रयोजनों में तो यह और भी आधिक आवश्यक है। क्योंकि उनमें अधिकाँश काम मन को ही करना पड़ता है।

यह नितान्त आवश्यक है कि मन को कोई काम दिया जाय। यदि उसे छुट्टल रखा जाय तो वह घुड़दौड़ लगाये बिना न रहेगा और हिरन की सी चौकड़ी भरेगा। उसका कोई प्रयोजन पूरा न हो सकेगा चिड़ियों की तरह उछलता फुदकता फिरेगा। ऐसी दशा में उससे कोई काम ले सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा।

मन की एकाग्रता के लिए ध्यान की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है। जो लोग मन को स्थिर करने की बात सोचते हैं, और कल्पना करते हैं कि इच्छा करने भर से मन सध जायगा। ऐसा कभी नहीं हो सकता। इन प्रयत्नों में सफलता कहीं नहीं मिलती। कितने ही व्यक्ति मन को पकड़ने रोकने का प्रयत्न करते रहते हैं। यह हवा को रोकने के समान है।

जप भी इस सम्बन्ध में कारगर सिद्ध नहीं होगा। शब्दों और अक्षरों को दुहराते रहने का काम ऐसा है जो जिह्वा के सहारे होता रहता है। मन पर उससे कोई बन्धन नहीं बँधता। इसलिए शास्त्रकारों का कथन है कि जप के साथ इष्टदेव की प्रतिमा का प्रकाश केन्द्र सविता देवता का ध्यान उस समय करते रहना चाहिए।

ध्यान की कितनी ही शाखा प्रशाखाएँ हैं। इनमें श्वास-प्रश्वास पर ध्यान एकाग्र करना और उनके आवागमन के साथ ही सोऽहम् के गुंजन की आवाज सुनना यह मन को एकाग्र करने का एक अच्छा तरीका है। इसे अपनाने से ध्यान की एकाग्रता का उद्देश्य बहुत हद तक पूरा हो जाता है। यह सरल भी है। इसके उपरान्त नादयोग के अभ्यास की बात आती है। कानों के छेदों को शीशी के कार्मों से कड़ा बन्द करके बैठना चाहिए और समूचा ध्यान इस बात पर एकाग्र करना चाहिए कि उसमें से कहीं से कोई ध्वनि सुनाई पड़ती है क्या? यह ध्वनियाँ कई प्रकार की होती हैं। एक शरीर की धड़कनों से काया के भीतरी अवयव सभी क्रियाशील रहते हैं। उनमें से ध्वनियाँ होती हैं। कानों पर यदि ध्यान एकाग्र किया जाय। बाहर के शब्दों को भीतर प्रवेश न करने दिया जाय तो आन्तरिक ध्वनियां रेलगाड़ी चलने जैसी आवाजें आने लगती हैं। इसके पश्चात अन्तरिक्षव्यापी ब्रह्म चेतना के क्षेत्र में जो हलचलें हो रही हैं उनका आभास मिलना आरम्भ हो जाता है। इसका अनुभव समय साध्य है कि किस ध्वनि में क्या संकेत उठता है और उसका दृश्य जगत के साथ क्या सम्बन्ध रहता है। नादयोग के आधार पर भी अविज्ञात को विज्ञात स्वरूप में देख सकना सम्भव होता है। अतींद्रिय क्षमताओं को जागृत करना भी इस प्रकार के आधार पर सम्भव होता है। मस्तिष्क के विभिन्न कक्षों में विभिन्न शक्तियों का निवास है। उनमें से कौन कितनी मन्द और कौन कितनी तीव्र है इसका अनुमान भी उन क्षेत्रों से उठने वाली तरंगों को कान द्वारा समझा जा सकता है।

सूक्ष्म शरीर में षट्चक्र और 54 उपत्यिकाएं हैं। यह सभी शक्ति केन्द्र हैं। इन्हें अलंकारिक रूप से आध्यात्मिक विभूतियों का दिव्य मणियों का भण्डार कहा जा सकता है। इन्हें समर्थ रक्षण करने का अभ्यास भी यह है कि नासिका द्वारा खींची हुई वायु के साथ घुले हुए प्राण तत्व का मन की कल्पना और भावना शक्ति द्वारा वहाँ थपकी लगाई जाती है। यह थपकी मालिश करने या गुदगुदाने जैसी होती है। इन उपचारों का प्रभाव उन शक्ति केन्द्रों पर पड़ता है और क्रमशः उनमें समर्थता और प्रफुल्लता आती जाती है। इन्हीं उत्पादित क्षमताओं को ऋद्धि-सिद्धि आदि के नाम से जाना जाता है।

शरीर को उत्पीड़न करने और तपश्चर्या द्वारा उसे शीत ग्रष्मा, उपवास आदि करने के भी प्रयोग हैं, पर उन सबका प्रभाव शरीर के उथले क्षेत्र तक ही सीमित होकर रह जाता है। गहराई में प्रवेश करना उस मन का ही काम है जिन्हें एकाग्रता की साधनाओं से नुकीला सुई जैसा पतला बना लिया गया है। इसे इन्जेक्शन की तरह किसी ग्रन्थि में प्रवेश कराया जा सकता है और उसकी विकृतियों को खींचने और दिव्यताओं को बढ़ाने का काम लिया जा सकता है।

मन को साँसारिक प्रयोजनों से खींचकर आध्यात्मिक कार्यों में लगाने का यही तरीका है कि मन को उच्छृंखल उछल-कूद से रोककर अभीष्ट प्रयोजनों में लगाया जाय और उसका प्रयोग ऐसे कार्यों के निमित्त किया जाय जिससे सदाशयता का वातावरण बनता हो और साथ ही अपने और दूसरों के संकटों के निवारण की प्रक्रिया को भी पूरा किया जा सकता है।

मनोनिग्रह ही आत्म विजय हैं। आत्मिक क्षेत्र का कोई कल पुर्जा ऐसा नहीं है। जिनके सम्बन्ध में यह कहा जा सके कि उसका मन से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। या मन का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसी दशा में यही उचित है कि अपने मन पर शरीर से भी अधिक ध्यान दिया जाय। उसे एकाग्र ही नहीं , पवित्र, परिष्कृत और समर्थ बनाने में भी किसी प्रकार की कमी न रहने दी जाय?


बुद्ध ने अपने ही मार्ग पर शिष्यों को भी चलाया (kahani)

बुद्ध के सामने भी स्त्री बच्चों की जिम्मेदारी थी। पर उसमें बिना व्यवधान प्रस्तुत किये उनने युग धर्म को अधिक महत्व दिया और परिवार के सहमत न होने पर भी समय की विभीषिकाओं से जूझने के लिये चले गये। यदि ऐसा न करते तो उन्हें भी अन्य व्यामोहग्रस्तों की तरह पेट प्रजनन की सीमा में अवरुद्ध रहकर ही जीवन गुजारना पड़ता।

बुद्ध ने अपने ही मार्ग पर शिष्यों को भी चलाया। घर के लोगों ने खुशी-खुशी कदाचित ही उनका परिव्राजक शिष्य बनने दिया हो। उनमें से प्रत्येक को कुटुम्बियों की असहमति का उल्लंघन करना पड़ा। गाँधी ने अपनी वकालत छोड़ी और नेहरू, पटेल, राजेन्द्रबाबू, राजा गोपालाचार्य जैसे अनेकों को छुड़ाकर अपनी राह पर घसीटा। व्यामोह के वातावरण में आदर्शों के मार्ग पर चलने ओर त्याग का मार्ग अपनाने में सहमति प्रदान करने की किसी भी महामानव ने आशा अपेक्षा नहीं की। इस कारण किसी के चरण रुके भी नहीं।


प्रत्याहार साधना का स्वरूप और उद्देश्य

प्रत्याहार का अर्थ है प्रतिरोध। जीवन प्रक्रिया के हर क्षेत्र में इसकी भी आवश्यकता पड़ती है। मलीनता लोक प्रवाह का एक प्रचलन है। शरीर में भीतर से पसीना निकलता है और बाहर से धूलि जमती है। कपड़े अभी धुले हुये पहने थे अभी धूलि धक्कड़ से मैले होने लगते हैं। कमरे की बुहारी लगाते देर नहीं हुई कि खिड़कियों, जंगलों में से उड़ते हुये गन्दगी के कण कमरे में प्रवेश करने लगते हैं और कुछ ही समय में मैल की परत जम जाती है। दाँत रात में साफ किये थे दूसरे दिन फिर बदबू आने लगती है। स्वच्छता को स्थिर न रहने देने के लिए अस्वच्छता का दौर हमेशा चलता रहता है। हेमन्त में पेड़ों के पत्ते गिरते हैं और वे ओस से सड़कर धूलि में सनकर समूचे उद्यान को गन्दा कर देते हैं।

इस प्रकृति परम्परा को प्रयत्नपूर्वक बुहारना हटाना पड़ता है। यदि ऐसा न किया जाय तो सर्वत्र गन्दगी का ढेर लग जाय। मरते रहने वाले पशु-पक्षियों के अस्थि पंजर अच्छे-खासे वनों को दुर्गन्धित कर दें। वन्य पशु-पक्षी हरीतिमा को चट कर डालें। हिंस्र प्राणियों की बढ़ोतरी चल पड़े तो एक भी शाकाहारी पशु जीवित न बचने पाये। प्रकृति की गन्दगी को मनुष्य सुधारता है मल-मूत्र की गन्दगी को खाद में बदल कर उपयोगी फसल उगता है। यही है मनुष्य की सौंदर्य दृष्टि जिसके अनुसार मलीनता को ढकने और सौंदर्य को उजागर करने का प्रयत्न चलता रहता है। सत्यं, शिवं, सुन्दरम् में से प्रथम मनुष्य का सरल उपक्रम सौंदर्य अपनाना होता है। सौंदर्य अपनाने का तात्पर्य होता है गन्दगी को हटाना। जो इस कार्य में तत्परता बरत सकेगा। वही सौंदर्य का आनन्द ले सकेगा।

बच्चा जन्म से ही गन्दगी में लिपटा हुआ आता है और शरीर छोड़ते ही गन्दगी का उद्भव करने लगता है। यदि मेरे शरीर को कुछ देर ऐसे ही पड़े रहने दिया जाय तो वह फूलने सड़ने लगेगा। और भीतर से ही कृमि कीटक उत्पन्न होकर उसे खा पी कर साफ कर देंगे। कौए, कुत्ते उस गन्दगी को साफ करने के लिए दौड़ पड़ेंगे। माली न हो तो बगीचा झाड़-झंखाड़ मात्र बनकर रह जायगा वही है जो उसे काट-छांट कर खाद पानी देकर सौंदर्य से भरपूर बनाता है।

हमारे मन की भी यह स्थिति है। उसमें पूर्व जन्मों के कुसंस्कारों से प्रेरित दुर्भाव उठते रहते हैं। समाज में सब ओर हेय प्रवृत्तियों का ही प्रचलन है। सज्जनता बड़ी कठिनाई से ढूंढ़ने पर जहाँ-तहाँ मिलती है। घर परिवार पड़ौसी मित्र, स्वजन सम्बन्धी भी अपने मतलब की ताक में रहते हैं और ऐसा परामर्श देते हैं, जिससे अधिक वैभव उपार्जित हो और उन्हें भी उसका लाभ मिले। सचाई, ईमानदारी, पुण्य-परोपकार की बात चलने पर तो वे सभी प्रसन्न होते और विरोध करते हैं।

संसार के प्रचलन की भाँति ही हमारी मानसिक संरचना है। सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयभोग माँगती हैं। सीमित नहीं असीमित। भले ही इसके लिए अनीति अपनानी पड़े और अपराधी तक बनना पड़े। स्वादेन्द्रिय और जननेन्द्रिय तो मर्यादाओं का उल्लंघन करने के लिए सदा उद्यत रहती है।

मन की अपनी दुष्प्रवृत्तियां हैं। क्रिया आरम्भ होने से पहले विचार मन में उठते हैं। उन्हीं बीजों से कर्म कुकर्मों के अंकुर फूटते हैं। इसलिए कुकर्म बन पड़ने के उपरान्त बदनामी या दण्ड सहने अथवा प्रायश्चित करने की अपेक्षा यह अच्छा है कि विष वृक्ष का जैसे ही जहां से भी अंकुर उठे उसे वहीं कुचल दिया जाय। तात्पर्य यह है कि कुविचारों के उदय होते ही उनके विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया जाय। इस संघर्ष के लिए पहले से ही उतनी मजबूत किलेबन्दी या सैन्द व्यवस्था जुटा ली जाय कि शत्रु को बढ़ने और फूलने-फलने का- जीतने का अवसर न आने पाये।

यथा मन में काम वासना के विचार अक्सर उठते हों तो उस कार्य को क्रियान्वित करने की हानियाँ पर उदाहरणों पर विचार किया जाय। साथ ही ब्रह्मचर्य पालन करने पर शारीरिक, मानसिक, आत्मिक प्रगति के फलितार्थों की लम्बी शृंखला बनाई जाय। साथ ही हनुमान, शंकराचार्य, विवेकानन्द, दयानन्द आदि को हस्तगत हुई उपलब्धियों की सचित्र रूपरेखा मानस पटल पर अंकित की जाय। इस प्रकार दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों-लाभों हानियों को सुनाते समझते हुये निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह निर्णय करना चाहिए कि किसे निरस्त किया जाय और किसे प्रश्रय दिया जाय।

इसी प्रकार लोभ, मोह, अहंकार आदि की लिप्साएं मन में उठती हैं, और उन्हें रोक-टोक का व्यवधान आड़े न आये। खुली छूट मिले तो वे कार्य रूप में प्रकट हुये बिना नहीं रह सकतीं। ऐसी स्थिति आने से पहले ही अनौचित्य के विरोध और औचित्य के समर्थन में इतना गोला बारूद इकट्ठा कर लेना चाहिए कि अवाँछनीयता का उत्साह ठण्डा पड़ जाय उसकी हिम्मत पश्त हो जाय।

ईर्ष्या द्वेष, क्रोध, आतुरता, भय, चिन्ता निराशा जैसे मनोविकार भी स्वभाव का अंग बन जाने पर उद्दण्ड हो जाते हैं कि रोके नहीं रुकते और अपना अनर्थकारी प्रभाव दिखा कर रहते हैं। ऐसी स्थिति आने से पूर्व ही सतर्क होने और कुविचारों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने की आवश्यकता है। इसमें आलस्य वश देरी नहीं करनी चाहिए अन्यथा अवाँछनीयता की चढ़ बनेगी और वह ऐसा कुछ कर गुजरेगी जिसके लिए पीछे पछताना ही पड़े।

अनुचित विचारों के पक्ष में तात्कालिक लाभों का सबसे बड़ा तर्क है और उदाहरण यह है कि वैसा ही अनौचित्य असंख्यों लोग अपनाते हैं साथ ही हितैषी बन कर वैसी ही सलाह देने आ जाते हैं। इतने बड़े परिकर के विरुद्ध जो मोर्चाबन्दी करनी है उसके साथ अनेकों तर्क, तथ्य, प्रमाण तथा उदाहरण होने चाहिए। इन्हें तत्काल एकत्रित नहीं किया जा सकता और न इतना प्रबल बनाया जा सकता है कि डटकर ले सके। इसलिए उस योजना को लगातार चिन्तन के उपरान्त इस प्रकार क्रमबद्ध प्रशिक्षित बना लेना चाहिए कि बिगुल बजते ही मोर्चे पर आ डटे और शत्रु को परास्त करके रहे।

प्रत्याहार इसी को कहा गया है। इसमें प्रतिपक्ष को पछाड़ना पड़ता है। यह लड़ाई विचार क्षेत्र में होती है। पानी फूट पड़ने से पहले ही छेद बन्द करना पड़ता है। आक्रमण हो जाने से पहले ही ऐसा प्रबन्ध करना पड़ता है कि अनर्थ को हावी हो जाने का अवसर न मिलने पाये।

इस तैयारी के लिए स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही चिन्तन-मनन की भी। अनौचित्य की हानियों को जितने विस्तार सहित सोचा जा सके। उन्हें अपनाने पर जिन्हें जो संकट सहना पड़ा है। उसका चित्र इतना स्पष्ट होना चाहिए कि उस दिशा में कदम बढ़ाना आग से खेलने के समान भयावह प्रतीत होने लगे। ठीक यही बात औचित्य के समर्थन के लिए भी है। चतुर वकील जिस पर अपना पक्ष प्रतिपादित करते हैं और इसके लिए कानून की पुस्तकों को बारीकी से उलटते हैं इसी का अनुकरण हमारे अन्तराल में विद्यमान औचित्य के समर्थन के लिए भी है। चतुर वकील जिस पर अपना पक्ष प्रतिपादित करते हैं और इसके लिए कानून की पुस्तकों को बारीकी से उलटते हैं उसी का अनुकरण हमारे अन्तराल में विद्यमान औचित्य को भी मिलना चाहिए। तर्कों से भी अधिक उदाहरणों की आवश्यकता पड़ती है। हो सकता है कि समीप के आज के जैसे उदाहरण न मिलें या कम मिलें पर इतिहास के पृष्ठ उलटने पर महामानवों के व्यक्तित्व और कर्तृत्व उनको ऐसे मिल सकते हैं जो हमारी सदाशयता का- आत्मा की पुकार का- न्याय नीति का समर्थन कर सकें।


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किसी शास्त्र को इस दृष्टि से मत पढ़ो कि उसमें जो कुछ लिखा है वह तुम्हारे ही लिए है। वे अनेकों के लिए अनेक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिखे गये हैं। उनमें से उतना ही चुनो जो तुम्हारे लिए अनुकूल हो।


आत्म साक्षात्कार - आत्मबोध

दूध में घी होता है, पर दीखता नहीं। मथानी से उसे बिलोने के उपरान्त मक्खन अलग निकल आता है और छाछ अलग पड़ी रह जाती है। फूल का रूप तो दीखता है, गन्ध नहीं। इत्र निकालने के उपरान्त वह गन्ध निथर कर ऊपर आ जाती है और फटी-टूटी पंखुड़ियां अलग से पड़ी रहती हैं। यह मंथन क्रिया ही साधन है, जिसमें ‘स्व’ और ‘पर’ के पृथक्करण का बोध होता है। सामान्यतया मनुष्य शरीर के रूप में ही दीखता है। बहुधा तो वस्त्र-पोशाक ही दीख पड़ती है। काया के दबे हुए अवयव भी दीख नहीं पड़ते। कलेवर दीखता है, प्राण नहीं। मरण के उपरान्त दोनों विलग हो जाने पर वस्तुस्थिति समझ में आती है। जीवन के दिनों में ही दिखता भी शरीर ही सब कुछ है और दूसरों की ही नहीं अपने के भी ऐसा ही लगता है। पर इस एकीकरण में भ्रम ही प्रबल है, वास्तविकता नगण्य। घोंसले में भी पक्षी बैठा रहता है, घोंसला दीखता है, पक्षी नहीं। पर जब वह उड़कर आकाश में स्वच्छन्द विचरता है तो प्रतीत होता है कि घोंसला जैसा कि एक समग्र इकाई के रूप में दीखता था, बात वैसी भी नहीं। उसके भीतर एक पक्षी भी बैठा था।

भौतिक ज्ञान के आधार पर हम शरीर में पूरी तरह रम जाते हैं और अपने को आच्छादन में सीमाबद्ध संबद्ध समझते हैं। शरीर और आत्मा की पृथकता की बात तो कथा-सत्संगों में सुनते रहते हैं। किसी की चिता जलाने जब मरघट में जाते हैं और उसका श्राद्ध-तर्पण करते हैं, तब भी कुछ कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है कि प्राणी और शरीर में पृथकता हैं, पर इस जानकारी को दूसरों तक ही सीमित समझते हैं। अपने सम्बन्ध में मान्यता अत्यन्त गहराई तक परिपक्व हो जाती है कि हम शरीर ही हैं। शरीर रूप में ही सदा बनें रहेंगे। जब भी कोई योजना बनाते हैं, तो वह शरीर सम्बन्धी ही होती है। हानि-लाभ का लेखा-जोखा लेते हैं तो भी वे तथ्य शरीर को प्रभावित करने के कारण ही भले-बुरे लगते हैं। शरीर को जो सुविधा पहुंचाते- प्रसन्नता देते- अपने लगते हैं, उन्हीं के साथ आत्मभाव जुड़ता है। इसके अतिरिक्त और सब विराने लगते हैं। बिरानों से कुछ मतलब रखने की, उनके सुख-दुःख की परवा करने की इच्छा नहीं होती। शरीर में इतनी गहराई तक रम जाने का परिणाम है कि परायों के साथ अनीति बरतने में भी अपने को कोई कष्ट नहीं होता और न अपनों के साथ पक्षपात करने में कुछ अनुचित प्रतीत होता है। काया को सुखी समुन्नत बनाने के लिए हमारे समस्त प्रयास चलते हैं और उन्हीं में सफलता-असफलता मिलने पर प्रसन्नता-अप्रसन्नता का अनुभव होता है। यही उपक्रम है जो दुनियादारों द्वारा अपनाया जाता है। उनका सोचना और करना इसी निमित्त होता है।

यहाँ सबसे बड़ी भूल एक ही होती है कि अपने आपे को भूल जाते हैं, जब आत्मसत्ता का विस्मरण ही हो गया तो उसके स्वरूप, लक्ष्य, दायित्व, उत्कर्ष आदि की बात कोई क्यों सोचे? देखा जाता है कि लोगों में से अधिकाँश इस संदर्भ में कुछ सोचते-समझते भी नहीं। कोई ज्ञानी इस रहस्य को गम्भीरतापूर्वक समझाता भी नहीं। जो कहा जाता है उसका साराँश इतना ही होता है कि भजन-पूजन या अन्य धार्मिक कर्मकाण्ड करने से ईश्वर प्रसन्न होता है। मरने के बाद अपने गाँव में बुलाकर विपुल सुविधा-साधन सौंप देता है। तब भी शरीर यही रहता है। स्वर्ग के उपभोग भी इसी शरीर द्वारा भोगे जाते हैं। कथा-वार्ताओं में जो सुनने को मिलता रहता है, उसका साराँश प्रायः इसी प्रकार समझा जाता है।

इसी भ्रान्ति को ‘माया’ कहते हैं। कहा जाता है कि जीव माया के बन्धनों में बँधा हुआ है और भवसागर में डूबता-उतराता है। यह भव सागर या माया-पोश और कोई नहीं- एक ही है कि हम शरीर में साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। वही हम हैं और हमारा वही एक है। इस समझ के दूरगामी परिणाम होते हैं। मनुष्य कायिक सुख और उसके साथ जुड़े हुए सम्बन्धियों के हित-साधन के अतिरिक्त उसे और कुछ सूझता ही नहीं। हित किस प्रकार का- इस सम्बन्ध में भी अपनी दृष्टि इतनी ही दूर तक जाती है जिसमें सम्पदा, विलासिता और अहंकार की अधिकाधिक अनुभूति बन पड़े। ऐसा चिन्तन असीम चाहता है। सृष्टि-व्यवस्था में सबको सीमित ही मिलता है। इस कारण अपने लिए, अपनों के लिए जिस असीम की चाहना होती है, उसकी आँशिक पूर्ति भी अनीति अपनाये बिना, दूसरों के हितों पर कुठाराघात किये बिना बन पड़ना सम्भव नहीं। अनीति अपनाने पर, आत्मिक एवं सामाजिक संकट उत्पन्न होते हैं। ऐसी दशा में वह तथाकथित हित-साधन भी प्रत्यक्ष या परोक्ष संकटों से भरा होता है। किन्तु परिणाम की बात कौन सोचे? तात्कालिक लाभों वाली संकीर्ण स्वार्थपरता ही जब विचारणा और कार्य पद्धति के साथ घुल जाती है, तो अनीति भी अभ्यास में घुल जाती है और वह भी स्वाभाविक प्रतीत होने लगती है। यही है सामान्य जीवन का उपक्रम जिसके आधार पर अधिकाँश लोग अपनी गाड़ी धकेलते हैं।

इस दयनीय एवं अवाँछनीय स्थिति को देखते हुए शास्त्रकारों ने अध्यात्म विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण आधार यह बताया है कि अपने को जानो, अपने को समझो, अपने को देखो और अपने कल्याण के निमित्त प्रयत्न करो। यहाँ अपनेपन का तात्पर्य उस आत्मा से है जिसकी चर्चा तो बहुत होती है, पर उसे देखने समझने का कोई प्रयत्न नहीं करता। आत्म विस्मृति ही अध्यात्म धर्म में सबसे बड़ा दुर्भाग्य माना गया है और उससे छूट सकने को परम पुरुषार्थ या परम सौभाग्य कहा गया है। भेड़ों के बीच पले सिंह-शावक की जब असली सिंह से भेंट हुई, तो उसने समझा कि मेरा वास्तविक रूप कुछ और है, वैसा नहीं, जैसा कि समुदाय के बीच रहते हुए मैंने समझा या माना है।

कथा है कि दस मूर्ख कहीं मेला देखने गए। सोचा कि भीड़ में कोई खो न जाय, इसलिए गिनती कर ली जाय। गिने गये तो दस थे। साथ-साथ लौटे तो गिनने पर नौ निकाले। सभी बैठकर रोने लगे। किसी समझदार ने कारण पूछा। उनने एक के खो जाने की बात कही। पर वे थे तो पूरे। समझदार ने सबके सिर में एक-एक चपत लगाई और गिनती गिनी तो वे बड़े प्रसन्न हुए और समझदार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए घर लौटे। वस्तुतः यह हो रहा था कि मूर्खों में से प्रत्येक औरों को गिन लेता था, पर अपने को नहीं गिनता था। इसी की गड़बड़ी थी। भ्रम निकल गया, तो रोना-धोना बन्द हुआ और प्रसन्नता फूट पड़ी। यही स्थिति हम सब की है। अपने को, अपनी आत्मा को, उसके हित को नहीं पहचानते और अपने उच्चस्तरीय स्वरूप और कर्तव्यों का ध्यान ही नहीं रहता। मानवी गरिमा स्मृति से उतर जाती है और यह सोचते नहीं बनता कि अपना वास्तविक स्वार्थ- जिसमें सबका स्वार्थ समाया हुआ है- वह परमार्थ कितना आवश्यक और कितना सुखद है।

इस भ्रान्ति के निवारण का उपाय है कि हम मृत्यु का नित्य स्मरण करें- रात को सोते समय तो निश्चित रूप से। विज्ञजन का कथन है कि “दिन ऐसा बिताओ जिससे निश्चिन्तता की गहरी नींद आये और रात इस प्रकार बिताओ जिससे दिन में मुंह दिखाने लायक बने रहो।”

अपना स्वरूप जानने पर भगवान बुद्ध सामान्य राजकुमार से भगवान हो गये थे। जिस पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें आत्मज्ञान हुआ था, वह बोधिवृक्ष कहलाया और उसकी टहनियाँ सभी बौद्ध देशों में पवित्र देवालय की तरह स्थापित की गईं। आत्मबोध हुआ या नहीं- इसकी एक ही पहचान है कि जीवनक्रम मोहग्रस्तों की तरह व्यतीत हो रहा है या उसमें उत्कृष्टता का, आदर्शवादिता का पुट लगने लगा या नहीं, स्वार्थ, परमार्थ में बदला या नहीं, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की मान्यता के अनुरूप चिन्तन एवं चरित्र में महानता का समावेश हुआ या नहीं?


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मुस्कान स्नेह सौजन्य की भाषा है। खीझ अपने दोष, असन्तोष और अशक्ति की अभिव्यक्ति।


विज्ञान ही नहीं अध्यात्म भी

विज्ञान ने अपने समय में अत्यधिक प्रतिष्ठा प्राप्त की है। वह प्रत्यक्षवाद का समर्थक है और सुविधा, क्षमताओं का अभिवर्धन करता है। प्रकृति के गुह्य रहस्यों को खोजने और हस्तगत करने के उपरान्त मनुष्य की साधन संपन्नता में अत्यधिक वृद्धि हुई है। इस पर उसे गर्व भी है और साथ ही पुरातन प्रतिपादनों के प्रति तिरस्कार भी।

वैज्ञानिक अन्वेषण यदि मनुष्य को अधिक सम्पन्न बनाने तक सीमित रहता तो हर्ज नहीं था। पर उस पर नीति निष्ठा और मानवी गरिमा का अंकुश रहना चाहिए था। मानवी चेतना का भी अपना विज्ञान है। पदार्थ की तुलना में उसकी शक्ति सामर्थ्य किसी प्रकार कम नहीं है। अन्तःचेतना की उत्कृष्टता का समावेश रहने पर वह मानवी गरिमा के अनुरूप, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार अपनाने के लिए बाधित करती है। किन्तु यदि उसे साधनों की अहंमन्यता से उपेक्षित तिरस्कृत किया जाने लगे तो फिर उद्दण्डता ही हाथ रह जाती है। व्यक्ति वर्जनाओं को तोड़ता-मरोड़ता वह करने पर उतारू होता है जिससे उसकी गरिमा और महिमा का दिवाला ही निकल जाय।

माना कि विज्ञान के पदार्थ शक्ति और प्रकृति गरिमा का बहुत बड़ा अंश अपने काबू में कर लिया है। जलचरों की तरह जलाशयों में- नभचरों की तरह आकाश में उसने प्रवेश पा लिया है। भूमि का गहरा उत्खनन करके उसकी खनिज सम्पदा को खुले हाथों से बटोरा है। जन संहार के ऐसे विचित्र आयुध विनिर्मित कर लिये हैं जो समूचे भू-मण्डल को भस्मसात् कर सके। किन्तु देखना यह भी होगा कि इन उपलब्धियों में मनुष्य की गरिमा और सुसम्पन्नता में प्रगति में कुछ वास्तविक योगदान मिला या नहीं। विचारने पर नकारात्मक और निराशाजनक उत्तर ही हाथ लगते हैं।

विज्ञान ने पदार्थ का- प्रकृति का स्वेच्छाचारी उपयोग किया है। इसलिए निस्सन्देह शक्ति और सामर्थ्य के अद्भुत स्रोत उसके हाथ आये हैं, पर उससे उसका लालच विलास और स्वार्थ ही उद्धत हुआ है। धनाढ्यों ने उन विलक्षणों को हस्तगत कर लिया है। कल-कारखाने उन्हीं के हाथ हैं। वे सोना उगलते हैं सम्पन्नों को कुबेर की पदवी तक पहुंचाने का प्रयत्न करते हैं। पर इसका दूसरा काला पहलू भी है। कारखाने विष उगलते हैं वे वायु, जल और भूमि की जीवनी शक्ति का नष्ट करते हैं और प्रयोक्ताओं को जर्जर बनाते हैं। बेकारी के साथ जुड़ी हुई व्यापक गरीबी भी इन्हीं कारखानों की देन है। मुट्ठी भर लोग उनमें काम तो प्राप्त करते हैं और वेतन भी अच्छा पाते हैं। किन्तु इस कारण जितने लोगों को बेकारी और गरीबी का अभिशाप सहना पड़ता है वह दर्द भरी कहानी है। औद्योगीकरण आकर्षण और चमकदार तो लगता है। उसके कारण बहुमंजिले भवन और होटल भी खड़े होते हैं पर इस तथ्य से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि यह सम्पदा के झोपड़ों की तरी खींच कर ही सम्भव होता है। यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि गरीब दिनोंदिन अधिक गरीब बन रहे हैं और अमीर अधिक अमीर। इसमें विज्ञान का प्रमुख योगदान है। ऐसी दशा में उसे श्रेयाधिकारी नहीं ठहराया जा सकता। भले ही उसने चमत्कार कितने ही बड़े क्यों न एकत्रित कर लिये हों।

कभी शरीर बल और बुद्धि बल का महत्व था। लोग उसे अर्जित करने के लिए श्रम एवं प्रयास करते थे पर अब मशीनगनों और कम्प्यूटरों के युग में इस प्रकार के प्रयत्नों की कोई आवश्यकता रह नहीं गई है। शक्ति का केन्द्रीकरण करने में विज्ञान की महती भूमिका है। उसमें सम्पदा सुविधा को जन-साधारण तक पहुँचने का मार्ग अवरुद्ध कर दिया है। वह चतुरों और सम्पन्नों तक ही सीमित बनकर रह गई है। कृत्रिम उत्पादनों ने सौम्य सुखद और सरल उर्वरता को निरर्थक बना दिया है। मानवी श्रम और कौशल धीरे-धीरे अधोगति की ओर चल रहा है। मानवी प्रतिभा अनावश्यक और निरुपयोगी बनकर रह गई है। कष्टसाध्य उपार्जन में कोई क्यों रुचि ले?

वैज्ञानिक उपकरण सहज सम्पन्नता बढ़ाते हैं। औसत स्तर से बढ़ी हुई सम्पन्नता उद्धत विलासिता को प्रोत्साहन देती है। उस जलाशय को खाली करने वाली यही एक नाली है जिसमें होकर वह गन्दगी निकलती है। शरीर में बढ़ा हुआ जलाशय मूत्र मार्ग से ही निकलता है। इसी प्रकार अनीति का अथवा जनसाधारण की अपेक्षा अत्यधिक बढ़ी-चढ़ी कमाई- विलास और अहंकार प्रदर्शन में ही खर्च होती है। व्यसन और दुष्प्रवृत्तियाँ ही उन पर झपटती हैं। ऐसी दशा में मनुष्य का अन्तस् पौरुष और वर्चस्व नीचे ही गिरता है। विलासी आधि-व्याधियों से ग्रसित होते, अपयश बटोरते और पाप के भागी बनते हैं, इसे हर कोई जानता है। इतना घाटा उठाकर विलासी सम्पन्नता का क्षणिक लाभ यदि किसी ने किसी मात्रा में उठा भी लिया तो क्या?

यहाँ विज्ञान की निन्दा नहीं की जा रही क्योंकि वह भी एक पौरुष और कौशल है। पर व्यवधान वहाँ अड़ जाता है जहाँ उसकी प्रतिक्रिया उस उद्दण्डता के रूप में उभरती है जो नीति-निष्ठा को भी प्रतिगामिता स्तर भी ठहराकर उसकी उपेक्षा अवज्ञा करती है।

सन्तुलन तब बनता है जब पदार्थ विज्ञान के समकक्ष आत्म विज्ञान का भी विकास विस्तार हो। मनुष्य के चिन्तन में आदर्शों का समुचित समावेश हो। चरित्र में उत्कृष्टता और व्यवहार में शालीनता की अभीष्ट मात्रा बनी रहे। यह एक चेतना की उत्कृष्टता की परिणतियाँ हैं। दया और करुणा का निर्झर इसी स्रोत से बहते हैं। अहंमन्यता पर अंकुश लगने का यही आधार है, सौम्य, सज्जन, सहिष्णुता और मृदुला और उद्धार बना अन्तःकरण की गरिमा में ही असम्भव है। अन्यथा अन्य कला-कौशलों की तरह चाटुकारिता और धूर्तता ही मनुष्य के स्वभाव में सम्मिलित होती है। उससे कोई स्वार्थ कितना ही क्यों न साध ले, पर नीति निष्ठा का निर्वाह बहुत हद तक नहीं कर सकता। यह न बन पड़े तो समझना चाहिए कि मनुष्य वनमानुष और नर पशु की तरह ही जीवन निर्वाह कर रहा है। भले ही वह चतुरता और धूर्तता के क्षेत्र में कितना ही बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो।

चेतना का परिष्कार उससे कहीं अधिक श्रेयस्कर है जितना कि पदार्थ विज्ञान का आविष्कार अभ्युदय। उस आधार पर लोग स्वल्प साधनों में भी मिल-बांटकर खा सकते और हँसती-हँसाती जिन्दगी जी सकते हैं। जबकि निष्ठुरों की सम्पन्नता समाज में अनेक विग्रह खड़े करती है। ईर्ष्या, द्वेष और छल कपट के बीज बोती है। विज्ञान के आधार पर हमें शक्ति सम्पन्नता और सुविधा कितनी ही उत्पन्न क्यों न करें पर उसका उपयोग सदुद्देश्यों के लिए श्रेष्ठता और समता के संवर्धन में ही होना चाहिए। यह प्रक्रिया सहज ही नहीं अपनाई जा सकती। क्योंकि प्रचलन स्वार्थपरता और धूर्तता का ही है। अनुकरण भी सामान्यजनों द्वारा उसी का होता है।

चेतना की उत्कृष्टता का नाम ही अध्यात्म है। उस को उपलब्ध करने के लिए स्वाध्याय सत्संग, जप, और पूजा पाठ की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अन्यथा वह सारा क्रिया-कृत्य विडंबना मात्र बनकर रह जाता है और मिथ्या भ्रम जंजाल में फंसे रहने की मनःस्थिति बन जाती है। अध्यात्म तत्वज्ञान का सार संक्षेप इतने ही है कि मनुष्य श्रेष्ठ और उदार बने, पवित्र और प्रखर रहे। विज्ञान अपनी जगह प्रशंसनीय है, अध्यात्म के साथ-साथ चलकर ही वह अभिनन्दनीय बनता है।


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आदर्शवादी बनो किन्तु व्यावहारिकता का भी ध्यान रखो। बिना तारतम्य की कल्पनाएँ कटी पतंग की तरह है जिनका गंतव्य सर्वथा अनिश्चित है।


धर्म गाथाओं के साथ इतिहास न जोड़ें

देवताओं, अवतारों और ऋषियों का जो स्वरूप विभिन्न धर्मों में बताया गया है। उसके प्रेरक अंश जन-साधारण को दिशा, प्रेरणा और शक्ति देते हैं। इसलिए उनकी जीवनचर्या पर ऐतिहासिक खोज की आवश्यकता नहीं समझी जाती। यदि पुराणों को इतिहास के रूप में खोजना आरम्भ किया जाय तो उनके कथन और शिक्षण से जो लाभ उठाया जाता रहा है और जो उठाया जायेगा, उसकी सम्भावना ही हाथ से चली जायगी। ऐसे ऐतिहासिक तथ्य जो धर्मश्रद्धा तथा उनके प्रतिपादकों प्रचारकों के अस्तित्व को ही संदिग्ध बना देती है, परिणामों की दृष्टि से हानिकारक ही सिद्ध होगी।

प्रहलाद, हरिश्चंद्र , शिवि, दधीचि, भागीरथ आदि की कथाओं को यदि काल्पनिक या संदिग्ध कहा जाय तो हो सकता है कि हम जानकारी की दृष्टि से तथ्यों के समीप जा पहुँचें। पर उन प्रभावों से कोसों दूर हट जायेंगे जिनके कारण लोक-मानस को उच्चस्तरीय दिशा-धारा मिलती है। आदर्श के प्रति निष्ठा जगती है। इसलिए ऐसी खोजों को उपयोगी कम और अनुपयोगी अधिक माना जाता है।

महात्मा गाँधी ने अनासिक्त योग की भूमिका में कृष्ण को ऐतिहासिक पुरुष नहीं माना है। इसी प्रकार भगवान राम के सम्बन्ध में भारत के तथा विदेशों के कितने ही प्रतिपादकों ने राम चरित्र के बारे में इतनी भिन्नताएँ प्रस्तुत की हैं कि उन सबको मिलाकर पढ़ने पर तथ्यों के सम्बन्ध में किसी निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन होता है।

देवताओं और ऋषियों की कथा गाथाओं के सम्बन्ध में से इतिहास पुराणों में इतनी भिन्नताएँ हैं कि उनकी प्रामाणिकता मानने पर हम भारतीय धर्म परम्पराओं और संस्कृति के आधारों से ही पीछे हटने को विवश होते हैं। ऐसी दशा में ‘गढ़े मुर्दे न उखाड़ने’ वाली युक्ति ही सार्थक प्रतीत होती है। पुराण प्रतिपादनों का एक ही लाभ है कि उनमें मनुष्य की उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, श्रेष्ठता, गरिमा एवं सदाशयता को प्रोत्साहित करने वाले जितने अंश हैं उन्हें श्रद्धापूर्वक अंगीकार किया जाय। इसी में भलाई है। यदि कोई तर्कों पर अपनी मान्यताओं को प्रतिष्ठित करना चाहे तो यह सिद्ध करना भी कठिन हो जायगा कि वस्तुतः हमारा पिता वही है जिसका उल्लेख करते हैं या कोई और। इसे तो केवल माता ही जानती होगी। कई बार तो माताओं के लिए भी उस तथ्य को कहना और समझना कठिन होता है। सत्यकाम जावाल की माता अपने पुत्र को उसके असली पिता का नाम बताने में असमर्थ रही थी।

ऐतिहासिक खोजों एवं पुरातत्व शोधों के लिए अनेक विषय खाली पड़े हैं हम उन्हीं को हाथ में लेना चाहिए। मथुरा कृष्णकालीन है या नहीं, राम इसी अयोध्या में जन्मे थे। इन विषयों पर खोज-बीन की दृष्टि से किया गया परिश्रम परिणाम की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध नहीं होता।

ईसा मसीह को ही लें। कहा जाता है कि उनके धर्म के मानने वाले लगभग 230 करोड़ हैं। वे न तो केवल ईसाई धर्म की मान्यताओं पर विश्वास करते हैं। वह क्राइस्ट के पहाड़ धर्मोपदेशों और उनके क्रूस बोधन को भी सही मानते हैं। पर तार्किकों और शोधकर्ताओं इस पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

विद्वान इतिहास वेत्ता ए. कैवर कैसर ने अपने शोध निष्कर्षों में ईसा को ऐतिहासिक नहीं काल्पनिक माना है। मैनवेस्टर विश्व-विद्यालय के जान पोले ने अपने ग्रन्थ “दि सैक्रेड मशरूम एण्ड दि क्रास” में लिखा है कि पुराने समय में एक गुप्त सम्प्रदाय का संकेत चिन्ह था ‘जीसस’ बहुत समय बाद उस सांकेतिक भाषा चिन्ह को ही मनुष्य मान लिया गया और उसका चरित्र गढ़ लिया गया।

जर्मन भाषा के प्रोफेसर जी. ए. वेल्स ने अपनी पुस्तक “दि हिस्टॉरिकल इवीडेन्स फॉर जीसस” में कहा है कि ईसा ऐतिहासिक पुरुष नहीं है। सेन्टपाल के ईसा सम्बन्धी विचारों का विस्तार किया पर उनने भी अपने लेखों में ईसा के माता-पिता, जन्मस्थान, मरण आदि के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा और न उनके चमत्कारों के सम्बन्ध में कुछ लिखा है। सिर्फ अपने कथन को स्वप्न में मिले आभास के आधार पर कहा गया बताया।

ईसाई धर्म गाथाओं में मार्क का गोस्पिल और मेथ्यू , ल्यूका, आदि के गाथा प्रकरणों को आपस में मिलाकर देखने में इतना तक पता नहीं चलता कि ईसा के जन्म की वास्तविक तिथि क्या है। उनके कथनों में भारी अन्तर है। उनकी वंश परम्परा के सम्बन्ध में भी अन्तर है। इसी प्रकार ईसा के अन्तिम भोज दिये जाने के समय में भी इतना अधिक अन्तर है कि कहा नहीं जा सकता कि वह कब हुआ था और हुआ भी था या नहीं।

इतिहासकार तैकिल्सु और क्लाडियस के ईसा सम्बन्धी उल्लेख में इतना अन्तर है कि उनके आधार पर किसी सही निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है। यहूदी इतिहासकार क्रेस्तुतस का कथन उपरोक्त दोनों से भिन्न है।

विद्वान ए. फेवर कैसर ने अपनी पुस्तक “जीसस डाइड इन कश्मीर” में ऐसे घटनाक्रम का तारतम्य बिठाया है जिससे प्रतीत है कि ईसा का अधिकाँश जीवन भारत में बीता। वे तेरह वर्ष की उम्र में एक काफिले के साथ भारत आ गये और विभिन्न शिक्षा केन्द्रों में ब्रह्मविद्या तथा बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन करते रहे। इसके बाद के कुछ समय के लिए मरुत्सलेम गये। बाद में वे अपनी माता मेरी के साथ भारत लौटे और कश्मीर में उनकी मृत्यु हो गई। श्रीनगर क्षेत्र के रोजावेल स्थान में बनी एक कब्र को ईसा की कब्र बताया जाता है।

इन प्रतिपादनों को एक साथ मिलाकर पढ़ने पर प्रतीत होता है कि वे एक दूसरे को काटते हैं। इसलिए उनमें से किसी को भी प्रामाणिक नहीं माना जा सका।

यदि उस धर्म के मूल संस्थापक का व्यक्तित्व और कथन अप्रामाणिक ठहरता है तो उस मत का अवलम्बन करने वाले 200 करोड़ व्यक्तियों की श्रद्धा को भ्रान्त ठहराना पड़ेगा और उस समुदाय के धर्म श्रद्धा ने जो अनेकों उपयोगी कार्य जिस तत्परता के साथ किये हैं उनके आधार पर प्रश्न चिन्ह लगा।

यही बात अन्य धर्मों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। देवता, अवतार, ऋषि, धर्म संस्थापक, शास्त्रकार सभी इस सन्देह की चपेट में आते हैं। इससे तो वे विद्वान अधिक व्यवहारवादी प्रतीत होते हैं जो इन्हें प्रागैतिहासिक कहकर दलदल में फँसने से अपना हाथ खींच लेते हैं।

इतिहास के शोधकर्ता जिन आधारों को अपनाते हैं वे सही ही हैं, उनकी काट करने वाले दूसरे प्रमाण प्रस्तुत न किये जा सकें ऐसी बात भी नहीं है। जो सामने है जिसके सम्बन्ध में प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर कुछ कहा जा सकता है। इतनी बात दूसरी है पर जब से प्रामाणिक इतिहास का लेखन कार्य संकलन आरम्भ हुआ है। उससे बहुत पहले की वे पौराणिक गाथाएँ हैं जिन्हें धर्म धारणाओं का आधार माना जाता है। पुरातन इतिहास लेखकों को भी आज जैसी यातायात या अन्वेषण की सुविधा नहीं थी। इसलिए उन्होंने भी जहाँ-तहाँ से सुनकर ही उथली दृष्टि से लेखन कार्य किया होगा। उन्हें यह विदित कहाँ होगा कि भविष्य में उनके कथन पर इतनी बारीकी से विवेचन किया जायगा।

हमें धार्मिकता का स्पर्श करने वाले प्रतिपादनों को, मान्यताओं को ही उपयोगिता अनुपयोगिता की कसौटी पर कसना चाहिए। इसके साथ इतिहास को नहीं जोड़ना चाहिए।


चुम्बकत्व का असाधारण प्रभाव

अमेरिका के डाक्टर मेडलेनी वार्नेथी ने अपनी पुस्तक “बायोलॉजीकल इफेक्टस् ऑफ मेग्नेटिक फील्ड” पुस्तक के विस्तारपूर्वक यह सिद्ध किया है कि ब्रह्मांड के अगणित ग्रह घटक परस्पर चुम्बकीय शक्ति के आधार पर एक दूसरे के साथ जकड़े हुए हैं और अपनी-अपनी नियत कक्षा में परिभ्रमण करते हैं। पृथ्वी भी एक प्रकार का चुम्बक है। उसके दो सिरे उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव के रूप में जाने जाते हैं। ऊपर निवास करने वाले प्राणी और पाये जाने वाले पदार्थ भी चुम्बकीय शक्ति से अनुप्राणित होते हैं और अपने हिस्से की गतिविधियों को संचारित करते एवं अन्यायों की क्षमता को खींचकर अपने में धारण करते हैं। इसी प्रकार अनेक प्रकार की गतिविधियों का क्रमबद्ध सुसंचालन होता रहता है। वस्तुओं के बीच जकड़न पकड़ एवं स्थिरता में चुम्बकत्व का बहुत बड़ा योगदान रहता है।

रक्त संचार में जीवकोशों के पारस्परिक योगदान में शरीर में संव्याप्त चुम्बकत्व का अपने-अपने ढंग का योगदान होता है।

मैस्मरेजम विज्ञान में एक शरीर का बिजली का कुछ अंश दूसरे में प्रवेश करके रोगोपचार का निमित्त कारण बनता है। पुराने समय के चिकित्सक चुम्बक पत्थर को जादुई पाषाण कहते थे और उसे रोगियों के पीड़ित अंगों पर फिराकर उपचार करते थे। इस तथ्य को उनने इस आधार पर जाना और माना था कि शरीर के विभिन्न अव्यय किसी विशेष चुम्बकीय विधा से परस्पर बँधे और जकड़े हैं। साथ ही उनका तारतम्य एवं सामंजस्य भी बना रहता है। यदि उसमें किसी कारण अन्तर पड़ जाता है तो माँसपेशियाँ तथा जोड़ों की किसी जकड़न में शिथिलता आ जाती है और कई प्रकार के रोग उठ खड़े होते हैं।

चुम्बकीय चिकित्सा पद्धति का आविष्कार सोलहवीं शताब्दी के रसायनशास्त्री फिलिप्स पेरासेल्स ने किया था। उनने उन संदर्भ में अनेकों खोजें भी की थीं और मनुष्य शरीर में काम करने वाले अनेक क्षमताओं का सन्तुलन बिठाने और उनकी विकृतियों को सुधारने में अनेकों प्रयोग किये और सफल पाये थे। वे चुम्बक को पीड़ित स्थानों पर फिराकर जकड़न अकड़न, सूजन में कमी करते और पीड़ित स्थानों को राहत पहुँचाते थे। पीछे इस पद्धति का विधिवत् शास्त्र बना। जिसे समस्त योरोप में मान मिला और अनेक चिकित्सकों ने अपनी उपचार पद्धति में उसे सम्मिलित किया। उसे ‘मेग्निटों-थैरेपी’ के नाम से जाना जाने लगा। दर्द दूर करने में उसकी विशेष उपयोगिता सिद्ध हुई चुम्बक प्रभावित पानी से कुल्ले करने पर दाँत दर्द से राहत मिलने की जानकारी सर्वसाधारण में प्रचलित हो गई और वह घरेलू चिकित्सा की तरह अपनाई जाने लगी। सूजन दूर करने के लिए चुम्बक घिसकर उसका लेप किया जाने लगा।

स्विट्जरलैण्ड के डाक्टर मैस्मर ने तो इस पद्धति को वैज्ञानिक स्वरूप दिया और उपचार पद्धति को मैस्मरेजम नाम ही दे डाला। वे खनिज चुम्बक के स्थान पर मनुष्य के शरीर में रहने वाली चुम्बकीय शक्ति को दूसरे के शरीर में स्थानान्तरित करने की विधा अपनाते और अनेक रोगियों को कष्टमुक्त करते थे। होम्योपैथी के आविष्कर्ता हैनीमैन ने भी उस पद्धति की वैज्ञानिकता और क्षमता पर अपनी मुहर लगाई थी।

मालिश की विधि पहलवानों में प्रयुक्त होती है। सिर दर्द में सिर दबाया एवं मसला जाता है। थकान दूर करने के लिए हाथ पैरों की मालिश की जाती है। जन्म-जात शिशुओं एवं प्रसूताओं को लाभ देने का अभी भी प्रचलन है। दांपत्ति जीवन में कामोत्तेजना एवं नपुंसकता में इसी विद्युत शक्ति की बढ़ोतरी एवं कमी देखी की गई है।

मनुष्य के चेहरे पर प्रभावोत्पादक शक्ति जिसे ओजस्, तेजस्, सौंदर्य प्रतिभा आदि के रूप में देखा और जाना जाता है। वस्तुतः जैव चुम्बकत्व का ही उभार है।


धरती पर चेतना अंतरिक्ष से उतरी

जीवन की उत्पत्ति धरती पर पाये जाने वाले रसायनों से हुई, इस मान्यता पर जोर भले ही दिया जाता हो पर बात वस्तुतः ऐसी है नहीं। एक कोशी द्विकोशी जीव वनस्पति वर्ग के घटक इस प्रकार उत्पन्न होने की बात एक सीमा तक समझ में आती है। पर मनुष्य जैसे सुविकसित संरचना वाले प्राणी में इसी प्रकार सड़ी घास या पानी के संयोग से उत्पन्न हो सकते हैं यह कथन सहज ही गले नहीं उतरता। फिर एक जाति के जीव दूसरी जाति में बदल जाते हैं यह कथन सब प्राणियों के सम्बन्ध में लागू नहीं होता।

सड़न से उत्पन्न कृमि कीटकों की भी अपनी-अपनी प्रजातियाँ भी अपना वंशानुक्रम बनाये रहते हैं। तितलियां और मछलियां भी अपनी पूर्वज परम्परा को धारण किये रहती हैं। वे विशेष परिस्थितियों में ही अपने काय कलेवर में थोड़ा बहुत अन्तर करती हैं और फिर उसे दृढ़तापूर्वक बनाये रहती हैं। आये दिन बदलाव नहीं लातीं। पीढ़ियों तक अभ्यस्त वातावरण को निर्वाह करने का अपना ढाँचा एवं स्वभाव अपनाये रहती हैं।

यह कथन भी सही नहीं है कि एक प्राणी विकास क्रम के अनुसार अधिक बुद्धिमान और कार्य कलेवर विकसित करता रहता है यदि ऐसा होता तो सृष्टि के आदि से ही प्राणी जिस रूप में चले आ रहे हैं वे वैसे न बने रहते। देखा जाता है कि हाथी, घोड़े, ऊँट, बैल आदि आरम्भ में जैसे थे वैसे ही अब भी बने हुए हैं। क्षेत्रीय जलवायु के कारण ही उनके स्वभाव और आकृति में यत्किंचित् अन्तर आता है। पर वह भी अपने क्षेत्र में निपुण हो जाते हैं। फिर उनकी प्रजातियाँ भी निश्चित हो जाती हैं।

पदार्थों में से कोई ऐसा नहीं है जो सड़न द्वारा उत्पन्न होने वाले कृमि कीटकों के अतिरिक्त किसी बुद्धिमान प्राणी को जन्म दे सके। प्रकृति की विलक्षणता तो बहुत है पर वह ऐसी नहीं कि विकसित चेतना का सृजन कर सके। यदि ऐसा होता तो उन सभी ग्रह पिण्डों में जीवधारी पाये जाते जिनमें तापमान और आहार, आवास की गुंजाइश है। ऐसे ग्रह तो अपने सौर मण्डल में ही कई हैं। फिर समस्त ब्रह्मांड में ऐसी स्थिति अरबों-खरबों में हो सकती थी। पर वैसा है नहीं। इससे प्रकट है कि प्राणियों का उत्पादन एवं विकास उस प्रकार नहीं हुआ है जैसा कि कहा और समझा जाता है।

अब वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इस तथ्य को स्वीकार करने लगा है कि पदार्थ की भाँति ही चेतना प्रवाह भी अनादि काल से इस ब्रह्मांड में मौजूद है और वह कारणवश एक से दूसरे ग्रह पिण्ड पर पहुँचता रहता है। वहाँ की परिस्थितियाँ जैसी होती उसी के अनुरूप अपने मूलभूत वर्ग की रक्षा करते हुए कलेवर का सुजन कर लेता है।

पृथ्वी पर हर दिन आकाश से अगणित उल्काएँ (प्रति दो मिनट दो करोड़ की संख्या में) बरसती हैं। उनमें से कुछ तो वायुमण्डल में प्रवेश करते ही जल जाती हैं। जो साबुत स्थिति में धरातल तक आ जाती हैं उनका विश्लेषण करने पर पाया गया है कि उनमें पृथ्वी पर पाये जाने वाले खनिज एवं रसायन तो हैं ही साथ ही विभिन्न प्रकार के जीवन तत्व भी हैं जो उपयुक्त परिस्थितियों में विकसित होकर शरीरधारी बन सकती है। इन तथ्यों के आधार पर यह माना जा सकता है कि किसी बुद्धिमान ग्रह का जीवन पृथ्वी पर उतरा होगा और उसने अपने स्वरूप के अनुसार कलेवर धारण किया। बीज के अनुरूप अंकुर और वृक्ष बनते गये होंगे। विभिन्न प्राणियों की सृष्टि होती गई होगी।

प्राणियों में जन्मजात रूप में पाये जाने वाले विभिन्न कौशलों से भरपूर स्थिति में होना आनुवाँशिक स्वभाव धारण किये रहना इस तथ्य को प्रकट करता है कि जीवन कृत्रिम नहीं मौलिक है और वह सनातन काल से नियत निर्धारित विधा के अनुरूप विकसित होता चला आया है। रसायनों के संयोग से किसी प्रयोगशाला में कोई मौलिक प्राणी नहीं बन सका इससे भी चेतना की मौलिकता सिद्ध होती है।


मनुष्य की बलिष्ठ आत्म चेतना

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डा. नेलसन वाल्ट का कथन है कि- मनुष्य के अन्दर एक बलवती आत्म-चेतना रहती है, जिसे जिजीविषा एवं प्राणधात्री कह सकते हैं। यह न केवल रोग निरोध अथवा अन्य आत्म-रक्षा जैसे अस्तित्व संरक्षण के अविज्ञात साधन जुटाती है वरन् चेतना जगत में चल रही हलचलों का पता लगा लेती है जो अपने आगे विपत्ति के रूप में आने वाली हैं। पूर्वाभास बहुधा अपने तथा अपने सम्बन्धियों के ऊपर आने वाले संकटों के ही होते हैं। सुख-सुविधा की परिस्थितियों का ज्ञान कभी-कभी या किसी-किसी को ही हो पाता है।

मनःशास्त्री हेनब्रुक ने अपनी शोधों में इस बात का उल्लेख किया है कि अतीन्द्रिय क्षमता पुरुषों की अपेक्षा नारियों में कहीं अधिक होती है। दिव्य अनुभूतियों की अधिकता उन्हें ही क्यों मिलती इसका कारण वे नारी स्वभाव में कोमलता, सहृदयता जैसे सौम्य गुणों के आधिक्य को ही महत्व देते हैं। उनकी दृष्टि में अध्यात्म क्षेत्र नारी को अपनी प्रकृति प्रदत्त विशेषताओं के कारण सहज ही अधिक सफलता मिलती रहती है।

पाया गया है कि अब लोगों में एक अपूर्व जिज्ञासा विकसित होती जा रही है कि आखिर मनुष्य शरीर और उसकी बुद्धि में ऐसे कौन से तत्व विद्यमान हैं जो बहुत अधिक समय बाद में होने वाली घटनाओं का भी बोध करा देते हैं। अब तक मनुष्य शरीर और उसकी रचना को मात्र भौतिक दृष्टि से देखा जाता था, पर समय की इन सिमटती हुई दूरियों ने मनुष्य को अब इतना ध्यानस्थ कर दिया कि उसे मनुष्य जीवन के प्रति सुनिश्चित दृष्टिकोण प्राप्त किये बिना चैन न मिलेगा।

इन भविष्य वाणियों से जहाँ उच्चसत्ता की उपस्थिति, मानवता के उज्ज्वल भविष्य, इस देश की अकल्पित प्रगति और इससे आध्यात्मिक पुनरुत्थान की आशा बँधती है, वहीं हमारे चिन्तन में स्वस्थ अध्यात्मवादी दृष्टिकोण का भी समावेश होता है जो व्यक्ति, समाज और संसार सभी के लिए उज्ज्वल सम्भावनाओं का अध्याय है। संसार की शान्ति और प्रगति इसी दृष्टिकोण पर आधारित है यह सुनिश्चित मानना चाहिए।

महायुद्ध छिड़ने से पहले की बात है लन्दन के स्पेन दूतावास में एक भोज दिया जिसमें ब्रिटेन का तत्कालीन विदेश मन्त्री लार्ड हैली फैक्स सम्मिलित थे। आमन्त्रित अतिथियों में भविष्य वक्ता डी. ह्वोल भी थे संयोग से विदेश मन्त्री महोदय भी बगल में ही बैठे थे। उन्होंने चुपके से भावी महायुद्ध और उसके सम्बन्ध में हिटलर को पूर्व योजनाओं की जानकारी बताने का अनुरोध किया। उसके उत्तर में ह्वोल ने कई ऐसी बातें बताई जो अप्रत्याशित थीं। हैली फैक्स ने वायदा किया कि यदि उनकी भविष्यवाणी सच निकाली तो उन्हें सम्मानित सरकारी पद दिया जायगा। पद की उन्हें आकांक्षा नहीं थी। उनकी बताई सभी बातें सच निकलीं।

हिटलर के सलाहकारों में पाँच दिव्यदर्शी भी थे उनका नेतृत्व विलियम क्राफ्ट करते थे। उनकी सलाह को हिटलर बहुत महत्व देता था। इस मण्डली के एक सदस्य किसी समय ह्वोल भी रह चुके थे। वे जानते थे हिटलर के ज्योतिषी उसे क्या सलाह दे रहे होंगे। उस जानकारी को वह इंग्लैण्ड के अधिकारियों को बता देता। इन जानकारियों से ब्रिटेन बहुत लाभान्वित हुआ और उसने अपनी रणनीति में काफी हेर-फेर किये। फौज के महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व कुछ फौजी अफसरों को सौंपे जाने थे। उनमें से किसी का भविष्य उज्ज्वल है इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने एक आदमी से जनरल मान्टगुमरी की ओर इशारा किया। उन्हें ही वह पद दिया गया और अंततः उन्होंने आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करके दिखाई। जापान के जहाजी बेड़े को बुरी तरह नष्ट करने की जो सफल योजना बनाई गई थी उसमें से भी व्होल से गम्भीर परामर्श किया गया था। महायुद्ध समाप्त होने तक ही उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भविष्यवाणियों का लाभ दिया। पीछे उन्होंने वह कार्य पूरी तरह छोड़ दिया और अपने पुराने धार्मिक लेखन कार्य में लग गये।

विज्ञानी डा. मोरे बर्सटीन ने लेडी वंडर के बारे में एक दिन अपने एक मित्र से सुना, इसके पूर्व विमान-यात्रा में उनका बिस्तर व सामान खो गया था। जिसमें जरूरी कागजातों वाला बक्सा भी था। विमान कम्पनी ने खोए सामान के न मिलने की घोषणा करदी थी तथा मुआवजे का प्रस्ताव रखा था, जिसे वर्सटीन ने अस्वीकार कर खोज जारी रखने को कहा था।

अब मित्र से सुन वर्सटीन को अपने सामान की चिन्ता तो जाती रही। भीतर की जिज्ञासा- वृति उमड़ उठी। वे चल पड़े लेडी वन्डर से मिलने। वहाँ सर्वप्रथम वर्सटीन ने पूछा- बताइये, पेरिस में मैंने जो बिल्ली पाल रखी थी, उसका नाम क्या था? लेडी वंडर ने उसे विस्मित करते हुए बताया- भर्तिनी। फिर वर्सटीन ने अपने सामान की बावत पूछा। लेडी वन्डर ने बताया तुम्हारा सामान न्यूयार्क हवाई अड्डे में है।

पहले तो वर्सटीन को अविश्वास हुआ। क्योंकि न्यूयार्क हवाई अड्डा छाना जा चुका था। पर फिर उसने हवाई अड्डे के अधिकारियों को फोन किया- “महोदय, मुझे विश्वस्त सूत्रों से जानकारी मिली है कि मेरा सामान न्यूयार्क हवाई अड्डे के भवन के ही भीतर है। कृपया दुबारा तलाश करें।” तलाशी शुरू हुई और सामान सचमुच मिल गया।

‘लन्दन से हाँगकाँग तक’ पुस्तक के विद्वान लेखक हुसेन रोफे एक बार अपने घनिष्ठ मित्र श्री जे. बी. से मिलने गये। यह अवसर बहुत दिन बाद आया था, इसलिए हुसेन रोफे अनेक कल्पनायें अनेक योजनाएँ लेकर मित्र महोदय के पास गये थे, किन्तु जैसे-जैसे वह घर के समीप पहुंचते गये न जाने क्यों उनके मस्तिष्क में निराशा बढ़ती गई। अपनी इस अनायास स्थिति पर स्वयं रोफे को भी हैरानी थी। धीरे-धीरे उनके मस्तिष्क में न जाने कहाँ से दबे-दबे विचार उठने लगे कि “ जे. बी. की आत्महत्या” और भी इतना जोरदार कि उन विचारों के आगे कोई और विचार टिक ही न पा रहा था।

रोफे के आश्चर्य का उस समय ठिकाना न रहा जब मित्र के घर पहुंचते ही उसने पाया कि वह जहर खरीद लाया है और आत्म हत्या की बिल्कुल तैयारी में ही है। हुसेन रोफे ठीक समय पर न पहुँच गये होते तो उन सज्जन ने अपना प्राभान्त ही कर लिया होता।

इस प्रकार की अतींद्रिय दिव्य शक्ति कोई भी व्यक्ति अपने में विकसित करा सकता है। इसके लिए योग साधनाओं का विधान है।

मैस्मरेजम के आविष्कर्ता डा. मैस्मर ने लिखा है- “मन को यदि संसार के पदार्थों और तुच्छ इन्द्रिय भोगों से उठाकर ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके तो वह ऐसी विलक्षण शक्ति और सामर्थ्यों से परिपूर्ण हो सकता है, जो साधारण लोगों के लिये चमत्कार सी जान पड़े। मन आकाश में भ्रमण कर सकता है और उन घटनाओं को ग्रहण करने में समर्थ हो सकता है, जिन्हें हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ग्रहण न कर सकें और हमारा तर्क जिन्हें व्यक्त करने में असमर्थ हो।”

सन् 1759 की वह घटना प्रामाणिक उल्लेखों में दर्ज है जिसके अनुसार स्वीडन के इमेनुअल स्वीडन वर्ग नामक साधक ने सैंकड़ों मील दूर पर ठीक उसी समय हो रहे भयंकर अग्निकांड का सुविस्तृत विवरण अपनी मित्र मण्डली को सुनाया था। इस अग्निकाण्ड में घायल तथा मरने वालों के नाम तक उसने सुनाये थे जो पीछे पता लगाने पर अक्षरशः सच निकले।

“इन सर्च आफ दि ट्रुथ” पुस्तक में श्रीमती रूथ मान्टगुमरी लिखती हैं कि युद्धों के समय पाशविक वृत्तियाँ एकाएक आत्म-मुखी हो उठती हैं तब कैसे भी व्यक्तियों को अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ स्पष्ट रूप से होने लगती हैं। युद्ध के मैदानों में लड़ने वाले सैनिक और उसके सम्बन्धी रिश्तेदारों के बीच एक प्रगाढ़ भावुक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है वही इन अति मानसिक अनुभूतियों की सत्यता का कारण होता है। ध्यान की गहन अवस्था में होने वाले भविष्य की घटनाओं के पूर्वाभ्यास भी इसी कारण होते हैं कि उस समय एक ओर से मानसिक विद्युत दूसरी ओर से पूरी क्षमता के साथ सम्बन्ध जोड़ देती और जिस प्रकार लेजर यन्त्र, टेलीविजन, राडार आदि हमें दूर के दृश्य व समाचार बताने दिखाने लगते हैं उसी प्रकार यह भाव सम्बन्ध हमें दूरवर्ती स्थानों की घटनाओं के सत्य आभास कराने लगते हैं।

यह जीव-कोशों के मन ही मिलकर अवयव मन का निर्माण करते हैं, इसलिये मन को एक वस्तु न मानकर अध्यात्म-शास्त्र में उसे ‘मनोमय कोश’ कहा गया है। एक अवस्था ऐसी होती है, जब शरीर के सब मन उसके अधीन काम करते हैं, जब यह अनुशासन स्थापित हो जाता है तो मन की क्षमता बड़ी प्रचण्ड हो जाती है और उसे जिस तरफ लगा दिया जाये उसी ओर वह तूफान की सी तीव्र हलचल पैदा कर देता है।

इन सभी का वैज्ञानिक समाधान ढूंढ़ें तो हम पाते हैं कि इलेक्ट्रान और प्रकाश यदि शक्ति है तो पदार्थ भी हैं। कण हैं तो लहर भी। इलेक्ट्रान सृष्टि के हर कण में है, पर वह अपनी उत्पादकता न होकर नाभिक से बंधा है उसी प्रकार प्रकाश ब्रह्मांड भर में कहीं विचरण कर सकता है पर वह स्वयं उसका अपना उत्पादन नहीं है अपने जीवन के अन्तिम समय में आइन्स्टीन, जो कि ऋषियों के मायावाद सिद्धान्त तक पहुँच गये थे, ने यह बताया कि काल और स्थान सापेक्ष हैं और वे प्रकाश की माप पर निर्भर है, वे अब यह सिद्ध करना चाहते थे कि कोई यूनीफाईड फील्ड ऐसा है जिसमें एलेक्ड्रोमेगनेटिक फोर्स भी है और गुरुत्वाकर्षण भी। वह क्षेत्र इन दोनों से युक्त भी है और मुक्त भी। यह इलेक्ट्रॉन की तरह ही द्वैत गुण युक्त था और आइन्स्टीन ने उसके अस्तित्व से इनकार नहीं किया वरन् माना था कि “मस्तिष्कीय द्रव्य” में वह गुण है वह समय और पदार्थ से परे तत्व है उसकी गति और अगति में कोई अन्तर नहीं है अर्थात् वह मस्तिष्कीय द्रव्य- माइण्ड स्टाफ एक ही समय में मद्रास या बम्बई में भी हो सकता है और उसी समय वह हरिद्वार में भी उपस्थित रह सकता है। यही वह तत्व है जो प्रकाश को धारण करके उसकी गति से किसी भी वस्तु का स्थानान्तरण कर सकता है। पदार्थ को शक्ति में बदलकर उसे कहीं भी सूक्ष्म अणुओं के रूप में बहाकर ले जा सकता है और उसे सेकेंड से भी कम समय में बदल सकता है।

योगी और साधक ध्यान द्वारा मस्तिष्क के इसी एकान्त क्षेत्र पर अवस्थित होकर इलेक्ट्रान और प्रकाश कणों द्वारा ई.=एम. सी. के आधार पर वह शक्ति अपने भीतर से उत्पन्न करते हैं जो किसी भी परमाणविक शक्ति से बढ़कर होती है, उसमें इलेक्ट्रान और प्रकाश कणों की द्वैत शक्ति ही होती है। जिससे वे स्थूल और क्रियायें सम्भव हैं जो अतीन्द्रिय घटनाओं के रूप में प्रकट होती हैं।

हमें सामान्य जानकारियाँ इन्द्रिय शक्ति के आधार पर मिलती हैं। पर यदि प्रसुप्त अतीन्द्रिय शक्ति को जागृत किया जा सके तो व्यापक ब्रह्मांड सत्ता के साथ अपना संपर्क जुड़ सकता है और असीम से असीम स्थिति में पहुँचा जा सकता है।

इस विश्व में जड़ और चेतना की द्विधा अपने-अपने नियत प्रयोजनों में संलग्न है। उनका वैभव भी महासमुद्र की तरह है जिसके किनारे पर बैठकर मनुष्य ने सीप और घोंघे ही ढूंढ़े हैं। प्रकृत परमाणुओं में और जीवाणु घटकों में जो सामर्थ्य तथा चेतना विद्यमान है उसका बहुत छोटा अंश ही जानना, हथियाना सम्भव हो सका है। सब कुछ पाना खींच-तान से- झीना झपटी से नहीं उसमें घुल जाने से ही सम्भव हो सकता है। समुद्र के पानी को कोई घड़ा कितनी मात्रा में अपने में भर सकेगा? सम्पूर्ण समुद्र के साथ एकता स्थापित करनी हो तो घड़े को अपना जल समुद्र में मिला देना पड़ेगा तभी तुच्छता को सुविस्तृत स्थिति में अनुभव कर सकना सम्भव होगा।


मरणासन्न डार्विन (kahani)

मरणासन्न डार्विन को थोड़ा होश हो गया। उनने अपनी पुत्री से कहा- “बेटी, मैं न स्वर्ग जाना चाहता हूँ, न नरक। मैं तो यदि परलोक कहीं होता होगा तो उसके द्वार पर अड़ा रहूँगा और इन पण्डितों को भी न स्वर्ग में प्रवेश करने दूँगा और न नरक में। अन्यथा ये इस लोक की तरह परलोक में भी पाखण्ड फैलाये बिना न मानेंगे।


भेड़ियों द्वारा पाले गये मनुष्य के बच्चे

जिनका सीधा संपर्क मनुष्य से ही पड़ता, वे वन्य जीवों का शिकार तो अपने ढंग से कर लेते हैं, पर मनुष्य स्तर की धूर्तता के अभ्यस्त नहीं होते। उनमें वात्सल्य भी पाया जाता है और छोटी आयु के बच्चे किसी प्रकार उनके संपर्क में आ जाते हैं तो उन्हें भी अपना ही समझ कर पाल लेते हैं। खतरा उन्हें बड़ी उम्र वालों से होता है और इसलिए उन पर आक्रमण कर बैठते हैं कि कहीं वे उन पर घात न लगाये हुए हों।

जंगलों में एकाकी रहने वाले तपस्वियों का वास्ता जंगली जीव जन्तुओं से ही पड़ता है। दोनों आपस में पहचान लेते हैं। इतना ही नहीं प्रवृत्ति को भी भाँप लेते हैं कि यहाँ खतरे जैसी कोई बात नहीं है। इतना निश्चय हो जाने पर दोनों पक्षों में से कोई किसी पर आक्रमण की योजना नहीं बनाता। अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं और यदि स्नेह सहयोग का सिलसिला चल पड़े तो एक दूसरे के लिए उपयोगी भी सिद्ध होते हैं।

भेड़ियों के सम्बन्ध में यह बात विशेष रूप से कही जाती है कि वे कुत्ते की बिरादरी से मिलते-जुलते होने के कारण मनुष्य के साथ सद्भावना और बिरादरी का रिश्ता जोड़ लेते हैं। कुत्ता मनुष्य का सबसे अधिक वफादार साथी है इसे सभी जानते हैं।

भेड़ियों द्वारा मनुष्य के बच्चे अपनी माँद में पाल लेने की कितनी ही घटनाएँ जानकारी में आई हैं। यह उदारता मादा द्वारा बरती गई होती है। वह मनुष्य के बच्चों को भी अपने बच्चे की तरह दूध पिलाकर पाल लेती है और उसकी सुरक्षा भी रखती है। नर भेड़िये अक्सर उपेक्षा बरतते हैं। फिर भी साथ रहने वाली मादा के कार्य में विघ्न नहीं डालते। कुछ दिन में नर भेड़िये भी उन बच्चों को अपने ही कुटुंब का सदस्य मान लेते हैं।

मिदनापुर बंगाल की घटना है कि वहाँ आदिवासी क्षेत्र में इसाइयों का एक छोटा चर्च था। उसमें एक पादरी रहता था। जान रेवेण्डकर उसका काम पहाड़ी क्षेत्र में फैले हुए आदिवासियों के साथ संपर्क साधना और उन्हें ईसाई धर्म में दीक्षित करना था।

एक बार जान पहाड़ी क्षेत्र में भ्रमण कार्यक्रम पर जा रहा था। साथ में दो एग्लो इण्डियन अतिथि भी थे जो शिकार खेलने के उद्देश्य से उधर आये थे। तीनों को पता चला कि ऊपर वाली पहाड़ी पर एक भेड़ियों की माँद है। उसमें एक पूरा झुण्ड रहता है। उनके साथ दो मनुष्य के बालक भी हैं। भेड़ियों का शिकार करने और मनुष्य बालकों को पकड़ने की उनने योजना बनाई और पहाड़ी पर चढ़ गये। शाम को झुण्ड अपनी माँद में घुसा तो उनने वैसा ही देखा जैसा कि आदिवासियों ने कहा था। अब उनकी योजना निश्चित हो गई।

दूसरे दिन पड़ौस के आदिवासियों को मजूरी पर लिया और माँद की खुदाई का काम शुरू किया। खुदाई जादा गहरी नहीं हो पाई थी कि बड़े दो भेड़िये भागे और घने जंगल में गायब हो गये। तीसरा भेड़िया निकला तो उसे शिकारियों ने गोली मार गिराया। खुदाई फिर भी चलती रही। माँद में अन्त में दो छोटे बच्चे भेड़ियों के और दो मानुषी के पाये गये चारों सटे हुए बैठे थे। उन्हें मारा नहीं गया। भेड़िये बच्चों को आदिवासी ले गये। मनुष्य वालों को ईसाई पादरी ने उठा लिया और चर्च के अनाथालय में ले चले।

बच्चों में दोनों लड़कियाँ थी। एक आठ वर्ष की दूसरी तीन वर्ष की। छोटी बुद्धि की दृष्टि से कुछ तीव्र थी। बड़ी उसी को अपनी मार्ग दर्शक मानती थी। उसके पीछे चलती और अनुकरण करती थी।

मनुष्य की आदतें सिखाने में उन्हें प्रायः दो वर्ष लग गये, पर कपड़े पहनना और मनुष्य के बच्चों के साथ खेलना सीख गई थी। उन्हें प्रायः 50-60 शब्द मनुष्य की भाषा के सीख भी लिये थे। फिर भी वे मनुष्य बुद्धि जैसी तीव्रता न अपना सकीं। पूर्ण वयस्क होने से पहले ही थोड़े-थोड़े अन्तर पर दोनों का देहावसान हो गया।


जीवधारियों की विलक्षण चेतना शक्ति

सन 1904 में अमरीका के पश्चिमी द्वीप समूह का 5000 फुट ऊँचा माउन्ट पीरो नामक पर्वत ज्वालामुखी बनकर फूटा था और उसके टुकड़े-टुकड़े उड़ गये थे। कोई तीस हजार व्यक्ति मरे थे और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हुई थी। इस दुर्घटना की आशंका मनुष्यों में से किसी को न थी किन्तु वहाँ के पशु पक्षी महीनों पहले घबराते हुए लगते थे। रात को एक स्वर में रोते थे और धीरे-धीरे अन्यत्र खिसकते जाते थे। विस्फोट के मुख्य केन्द्र से सर्प, कुत्ते, सियार कहीं अन्यत्र चले गये थे और उनके दर्शन दुर्लभ बन गये थे। पक्षियों ने तो वह पूरा ही द्वीप खाली कर दिया था।

प्राणिविद्या विशारद विलियम जे. लॉग ने पशुओं की इन्द्रियातीत शक्ति के बारे में अपनी पुस्तकें ‘हाड एनिमल्स टाक’ में विस्तृत प्रकाश डालते हुए बताया है कि भले ही बुद्धि-कौशल में मनुष्य की तुलना में पशु पिछड़े हुए हों पर उनमें इंद्रियातीत शक्ति कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है, उसी के आधार पर वे अपनी जीवनचर्या का सुविधापूर्वक संचालन करते हैं।

लॉग महोदय ने अपनी पुस्तक में ऐसे अनेकों प्रसंग भी लिखे हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि जीव-जन्तुओं को, निकट भविष्य में घटित होने वाले घटनाक्रम का भी सही पूर्वाभास मिल जाता है। यदि उनकी वाणी होती तो वे कहीं अधिक सही भविष्य कथन कर सकते।

पुस्तक के कुछ संस्मरण इस प्रकार हैं- एक मैदान में हिरनों का झुण्ड ऐसी अस्वाभाविक तेजी से घास चर रहा था मानो उन्हें कहीं जाने की आतुरता हो। उस समय कुछ कारण समझ में नहीं आ रहा था, पर कुछ घण्टे बाद ही बर्फानी तूफान आ गया और कई दिन तक घास मिलने की सम्भावना नहीं रही। स्थिति का पूर्वाभास प्राप्त करके हिरन अत्यन्त तीव्रता से इतनी घास चरने में लगे थे कि कई दिन तक उनसे गुजारे हो सकें।

जब बर्फ पड़ने को होती है तब रीछ अपनी गुफा में चले जाते हैं और उनमें पहले कई दिन का आहार जमा कर लेते हैं। उत्तरी कनाडा में झील की मछलियाँ बर्फ की मोटी सतह झील पर जमने से पहले ही गर्म जगह में पलायन कर जाती हैं।

वियना में एक कुत्ता माल उठाने उतारने की क्रेन के समीप ही पड़ा सुस्ता रहा था। अचानक वह चौंका उछला और बहुत दूर जाकर बैठा। इसके कुछ देर बाद क्रेन की रस्सी टूटी और भारी लौह खण्ड उसी स्थान पर गिरा जहाँ कुत्ता बैठा था। कुत्ते के चौंककर भागने का कारण उसका पूर्वाभास ही था।

एक बार स्पेलनजानी नामक एक इटैलियन ने चमगादड़ की उड़ान का परीक्षण किया। उसने एक कमरे की छत से बहुत से धागे लटकाये और उनमें घण्टियाँ बाँध दी कि जिससे धागों से टकराने पर वे घण्टियाँ बजें। उसके बाद उसमें एक चमगादड़ को दौड़ाया। चमगादड़ बड़ी देर तक बन्द कमरे में दौड़ता रहा पर एक भी घंटी न बजी। चमगादड़ की दृष्टि बहुत कमजोर होती है, उसने किस तरह अपने आपको उन धागों से बचाया यह बड़ा आश्चर्य है। कहते हैं, चमगादड़ प्रति सेकेंड 30 बार ध्वनि तरंगें भेजता है और जितने समय में उसे उनकी प्रतिध्वनि आती है, वह सामने वाली बाधाओं का पता लगा लेता है और उनसे बचकर निकल जाता है।

वर्मा की कलादान घाटी में एक बिल्ली की एक विचित्र समाधि बनी है। इसके चारों ओर लिखा है- “यह बिल्ली यदि हमारी समय पर सहायता न करती तो हम मारे जाते और पराजित होते”- इन शब्दों में वास्तव में जीवों में अद्भुत अतीन्द्रिय क्षमता का इतिहास अंकित है। बात उन दिनों की है जब वर्मा में अँग्रेजों और जापानियों के बीच युद्ध चल रहा था। एक दिन अंग्रेजों की टुकड़ी ने एक जापानी टुकड़ी पर आक्रमण कर दिया। जापानियों ने पीछे हटने का नाटक खेला वास्तव में वे पीछे नहीं हटे वरन् खदकों में छिप गये मानों वे सचमुच भाग गये हों। एक मेज पर वे ताजा पका पकाया खाना भी छोड़ गये उसे देखते ही अंग्रेज सैनिक उस खाने पर टूट पड़े किन्तु अभी वे प्लेटों तक नहीं पहुँच पाये थे कि उनमें से एक सार्जेट रैडी की काली बिल्ली उस खाने पर जा टूटी और बुरी तरह गुर्राकर अंग्रेज सैनिकों को पीछे हटा दिया अँग्रेजों ने बिल्ली को धमकाया भी वह अपनी क्रुद्ध मुद्रा में तब तक गुर्राती ही रही जब तक वहाँ एक भयंकर धमाका नहीं हो गया। वास्तव में उस खाने के साथ बारूदी सुरंग का संपर्क जुड़ा था उन सैनिकों के प्राण ले सकता था पर बिल्ली ने अपनी आत्माहुति देकर न केवल अपनी स्वामिभक्ति का परिचय दिया अपितु उसने यह भी बता दिया कि जीव जिन्हें हम तुच्छ समझते हैं किस तरह विलक्षण आत्मिक गुणों- अतीन्द्रिय क्षमताओं से ओत-प्रोत होते हैं।

समुद्री तूफान आने से बहुत पहले ही समुद्री बतखें आकाश में उड़ जाती हैं और तूफान की परिधि के क्षेत्र से बाहर निकल जाती हैं। डालफिन मछलियाँ चट्टानों में जा छिपती हैं, तारा मछली गहरी डुबकी लगा लेती है और ह्वेल उस दिशा में भाग जाती है, जिसमें तूफान न पहुँचे। यह पूर्व ज्ञान इन जल-जन्तुओं का जितना सही होता है उतना ऋतु विशेषज्ञों के बहुमूल्य उपकरणों को भी नहीं होता।

किसी अँधेरे कमरे में बहुत पतले ढेरों तार बंधे हों उसमें चमगादड़ छोड़ दी जाय तो वह बिना तारों से टकराये रात भर उड़ती रहेगी। ऐसा इसलिए होता है कि उसके शरीर से निकलने वाले कम्पन तारों से टकरा कर जो ध्वनि उत्पन्न करते हैं उन्हें उसके संवेदनशील कान सुन लेते हैं और यह बता देते हैं कि तार कहाँ बिखरे पड़े हैं। बिना आँखों के ही उसे इस ध्वनि माध्यम से अपने क्षेत्र में बिखरी पड़ी वस्तुएँ दीखती रहती हैं।

इस घटना को लेकर जार्जिया विज्ञान एकेडेमी के शरीर शास्त्री आई. एस. बेकेताश्विली ने शोध कार्य आरम्भ किया कि क्या पशुओं में अतिरिक्त अतीन्द्रिय चेतना होती है? और क्यों वे उसके आधार पर बिना इन्द्रियों का प्रत्यक्ष सहारा लिये वह काम कर सकते हैं जो आँख, कान आदि से ही सम्भव है।

उन्होंने यह परीक्षण कई जानवरों पर किये कि क्या उनमें इतनी अतीन्द्रिय चेतना होती है जिसके सहारे वे प्रधान ज्ञानेन्द्रिय आँख का काम कर सकें। इसके लिए उन्होंने एक बिल्ली पाली। नाम रखा- ल्योवा। उसकी आँखों पर ऐसी पट्टी बाँधी गई जिससे वह कुछ भी न देख सके। उसे साधारणतया बाँधकर रखा जाता, पर जब खाने का वक्त होता तो उसे खोला जाता और खाने की तश्तरी कमरे के एक कोने पर दूर रख दी जाती। शुरू में तो उसे अपना भोजन तलाश करने में कठिनाई हुई पर पीछे वह इतनी अभ्यस्त हो गयी कि कमरे के किसी भी स्थान पर खाना रखा जाय वह वहीं पहुंच जाती।

नाक की गन्ध से सूंघ कर उसके आधार पर वह ऐसा कर सकती है यह बात वैज्ञानिक जानते थे इसलिये उन्होंने इसके साथ ही अतीन्द्रिय ज्ञान की एक कठिन परीक्षा यह रखी कि तश्तरी में ही पत्थर के टुकड़े भी रख दिये जाते। गन्ध तो सारे प्लेट में से उठती थी इसलिये उसमें रखी हुई किसी चीज को वह मुँह में डाल सकती थी, पर देखा गया कि बहुत ही निश्चित रीति से उसने अपना खाना ही खाया और पत्थर के टुकड़ों को चाटा तक नहीं। इसी प्रकार कुछ दिन में वह रास्ते में रखी हुई कुर्सी, सन्दूक आदि को बचाकर इस तरह अपना रास्ता निकालने लगी जिससे किसी चीज के गिरने की दुर्घटना भी न हो और चलना भी कम पड़े। इसका विज्ञान सम्मत समाधान वैज्ञानिक दे नहीं पाए।

क्षुद्र समझे जाने वाले जीवधारियों की चेतना अति विलक्षण सामर्थ्य सम्पन्न होती है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य का द्योतक है कि यही शक्ति का पुँज मानव में भी है पर प्रसुप्त स्थिति में विद्यमान है। उसे जगाया, उभारा व विकसित किया जा सकता है। आत्म सत्ता के वैभव का बोध तो पहले व्यक्ति को हो।


रंगों की दुनिया का वैज्ञानिक विवेचन

प्रकाश क्या है? देखने में उसे सफेद चमक भर कहा जाता है पर विश्लेषण करने पर उसके अन्तराल में कुछ विशिष्ट शक्ति धाराओं का समुच्चय पाया जाता है। उन्हें रंग कहते हैं। सूर्य किरणों में सात रंग हैं इसलिए सविता देवता को सात अश्वों के रथ पर सवार होकर परिभ्रमण करते हुए निश्चित किया गया है। किरणों का विश्लेषण करने या उन्हें सात विशेषताओं से युक्त सात रंगों के रूप में देखा गया है।

इन रंगों की अपनी-अपनी विशेषता है। इन सबके पृथक-पृथक प्रभाव शरीर और मन पर पड़ते हैं। इसलिए उनका उपयोग उसी प्रकार करने के लिए परामर्श दिया जाता है जैसा कि भोजन से आवश्यक तत्वों का समन्वय रखने का प्रतिपादन किया जाता है।

मनुष्य जीवन की एक अविज्ञात आवश्यकता प्रकाश की है। प्रकाश के साथ गर्मी भी जुड़ी होती है। दोनों के समन्वय से विस्तार और हलचल का लाभ मिलता है। इसके अभाव से जड़ता छाने लगेगी और विकास विस्तार का क्रम अवरुद्ध हो जायगा।

धरती पर जीवन का अवतरण स्थानीय रासायनिक सम्पदा के साथ सूर्या ऊर्जा का सम्मिश्रण होने पर ही सम्भव हुआ है। यदि यह सुयोग न बना होता तो फिर नेपच्यून, प्लूटो ग्रहों की तरह धरती भी शून्य तापमान से नीचे की स्थिति में रहकर निर्जीव स्थिति में दिन गुजार रही होती। सूर्य को जीवन कहा गया है। पुराणों में आदित्य का पति के, पृथ्वी का पत्नी के रूप में वर्णन हुआ है और प्राणियों की उत्पत्ति उन्हीं दोनों के सुयोग से सम्भव हुई बताई गई है। वैदिक प्रतिपादन में सूर्य को ही उस जगत की आत्मा कहा गया है।

श्रुति का वचन है- सौर किरणों में विद्यमान सभी वर्गों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। जो पदार्थ जिन किरणों को अधिक मात्रा में ग्रहण करता है वह उसी रंग का दृष्टिगोचर होने लगता है यह हमारी आँखों की कमी है जिसके कारण प्रकाश केवल सफेद ही दीखता है। वस्तुतः उसमें स्थूल रूप से सात रंगों का सम्मिश्रण है। जिसे इन्द्रधनुष के रूप में किरणों पर जल कण चमकते समय देखा जा सकता है।

सूर्य की प्रकाश किरणों में सात रंग हैं। किन्तु उनके हलके भारी सम्मिश्रणों से प्रायः 10 लाख रंग बन सकते हैं इनमें से विभिन्न जीव जन्तु अपनी नेत्र क्षमता के अनुरूप ही रंग देख पाते हैं। मनुष्य की आँखें मात्र 378 रंग देख सकने में समर्थ हैं। हमें उतने पर ही सन्तोष करना पड़ता है।

एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि यद्यपि हमारे नेत्र सात की प्रख्यात प्रकाश किरणों को ही देख पाते हैं तथापि नेत्रों की पकड़ से बाहर भी उनकी विलक्षणता और भी अद्भुत दृश्यमान ज्योति की तुलना में अत्यधिक विस्तृत है। ब्रह्मांडीय किरणें, गामा किरणें, एक्स किरणें, परा बैंगनी, प्रकाश ऊष्मा तरंगें, रेडियो तरंगें ये सभी प्रकाश परिवार के अंतर्गत ही आते हैं।

विभिन्न प्रकार के रंग विभिन्न प्रकार के मनोभाव जागृत करने की चमत्कारिक क्षमता रखते हैं। विवाह शादियों और किन्हीं धर्मोत्सवों में हरी, पीली, लाल, नीली झण्डियों से द्वार सजाते हैं तो सम्बन्धित व्यक्ति ही नहीं सभी वहां से गुजरने वाले दर्शक भी प्रसन्न हो उठते हैं यह रंगों का अविज्ञात मनोवैज्ञानिक प्रभाव ही है। वास्तविकता यह है कि रंगों का सौंदर्य और साज-सजावट से सीधा सम्बन्ध है। सौंदर्य आत्मा का एक गुण है। यदि उसकी उपयुक्त जानकारी न हो तो लाभ उठाने के स्थान पर हानि हो सकती है। घर दरवाजे खिड़कियाँ दीवालों के बेल-बूटों वस्त्र का चयन इस सम्बन्ध में कौन-सा रंग कैसी मनोभूमि उत्पन्न करता है इसकी जानकारी हो जाय तो जीवन में प्रसन्नता का अभिवर्धन किया जा सकता है। उसे सुधारा और संवारा जा सकता है।

रंगों से विशेष प्रकार का वातावरण बनता है। वस्त्रों में कमरे की दीवारों में फर्नीचर में किस प्रकार के रंग लगे होते हैं वे अपना प्रभाव उनका उपयोग करने वालों पर भी छोड़ते हैं। लाल रंग गर्मी, उत्तेजना और चिड़चिड़ापन उत्पन्न करता है। इससे स्नायु विकार हो सकते हैं। इसके विपरीत नीला रंग शीतल और शांतिदायक होता है।

भगवती सरस्वती ज्ञान और मधुरता की देवी हैं। उनकी कल्पना में रंग का विशेष महत्व है। ऋषि ने कहा है-

“ या कुन्देन्दु तुषारहार धवला, या शुभ्र वरुणां वृता॥”

अर्थात्- श्वेत वर्ण के वस्त्र धारण किये हुए हैं यहाँ श्वेत रंग ज्ञान, मधुरता गम्भीरता एवं पवित्रता का उद्बोधक है। इसलिए कुंआरी कन्याओं और उन महिलाओं को जिनके पतियों का निधन हो गया होता है श्वेत वस्त्र धारण कराने की भारतीय परम्परा है। श्वेत वस्त्र दूसरों के मन में भी द्वेष दुर्भाव नहीं लाते इसलिए विद्यालय में जाने वाली कन्याओं को श्वेत अथवा हल्की एक रंग की ही साड़ी पहननी चाहिए ऐसी मान्यता है।

शरीर की धातुओं और कार्य पद्धतियों पर रंगों का विभिन्न प्रभाव होता है और इस पर नये रंग चिकित्सा विज्ञान का नया ढाँचा खड़ा हो रहा है। सर्दी, गर्मी की मात्रा घटाने बढ़ाने में भी रंग सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त उनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी कम नहीं है। हर रंग में कुछ विशेष भावनाएँ उत्तेजित एवं शान्त करने का गुण है। जो लोग जिस प्रवृत्ति की विशेषता अपने भीतर बनाए होते हैं वे तद्नुरूप रंग पसन्द करते और चुनते हैं। इसी प्रकार जिन्हें जिस भावना से प्रेरित प्रभावित करना होता है उसके लिए उस रंग के आवरण आच्छादित जुटाने का प्रबन्ध आवश्यक होता है। फूलों के बगीचे में परिभ्रमण करने उन्हें घर-आँगन में लगाने मेज पर गुलदस्ता सजाने में रंगों से मस्तिष्क को प्रभावित करने की आवश्यकता पूर्ण होती है। शोभा सुरुचि और कला सौंदर्य का इसमें समावेश तो है ही।

रंग विशेषज्ञ एन्थोनी एल्डर के अनुसार बहिर्मुखी जीवन लालिमा प्रधान होती है। अंतर्मुखी जीवन में नीलाकाश जैसी उदात्त मनःस्थिति होती है। पीले रंग की कर्मठता, तत्परता और उत्तरदायित्व निर्वाह की भाव चेतना का प्रतीक माना जा सकता है। हरें रंग को स्थिरता और बुद्धिमता का प्रतिनिधि समझा गया है। एल्डर कहते हैं। स्वभावगत विशेषताओं को घटाने बढ़ाने के लिए उन रंगों का उपयोग या बहिष्कार करना चाहिए जिनमें अभीष्ट विशेषताओं का समावेश है।

रत्नों की अँगूठी नाक कान गले में पहनने में जहाँ मनुष्य की सम्पन्नता का बोध होता है वहाँ उस रंग के कारण पहनने वाले को लाभ भी होते देखा गया है।

सन् 1938 में आड्रियन हिल नामक चित्रकार ने एक पुस्तक छपाई, जिसका नाम था ‘कला बनाम रोग’। उसने इस पुस्तक में चित्रकला एवं वर्ण विज्ञान को स्वास्थ्य संवर्धन और रोग निवारण के लिए महत्वपूर्ण माध्यम बताया है।

विश्व-विख्यात मनःचिकित्सक डा. गोल्ड स्टीन ने भिन्न-भिन्न रोगों का कठिनाइयों, कुण्ठाओं से ग्रसित लोगों पर किये गये रंगों के प्रयोगों का विस्तृत विवेचन “न्यू इंग्लैण्ड जरनल आफ मेडिसिन” में करते हुए लिखा था कि रोजमर्रा के जीवन में प्रयुक्त होने वाले अथवा आकर्षण हेतु पहने जाने वाले वस्त्राभूषणों के रंगों का मानव शरीर पर कितना व कैसा प्रभाव होता है उनका निष्कर्ष था कि रंगों में परिवर्तन के माध्यम से अनेकों मनोविकार तथा मनो शारीरिक रोगों का शमन सम्भव हैं।


स्वामी रामतीर्थ (kahani)

स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे तब उनके बोर्ड पर एक लाइन खींचकर विद्यार्थियों से कहा- “इसे बिना मिटाये छोटा करके दिखाओ।” एक चतुर विद्यार्थी उठा, उसने उसकी बराबर ही एक लाइन कुछ बड़ी खींच दी। रामतीर्थ बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने कहा- “छात्रों ! यही क्रम जीवन में भी है। यदि तुम दूसरों से बड़े होना चाहते हो तो किसी को पीछे धकेलने या उससे ईर्ष्या करने की जरूरत नहीं है। अपने गुणों और कार्यों को उससे अच्छा बनाओ, तुम स्वयं उनसे बड़े हो जाओगे।


अन्य लोकों में भी जीवन है।

हमारी आकाश गंगा में प्रायः एक करोड़ नक्षत्र हैं। ऐसी अगणित आकाश गंगाएँ विराट् ब्रह्मांड में हैं। प्रत्येक आकाश गंगा में प्रायः इतने ही नक्षत्रों की सम्भावना है जितनी कि अपनी आकाश गंगा में। इतने ग्रह नक्षत्रों को सर्वथा निर्जीव नहीं माना जा सकता। अनुमान है कि समूचे ब्रह्मांड में प्रायः एक हजार तो ऐसे नक्षत्र होने चाहिए जैसे कि पृथ्वी की विकसित सभ्यता है। उनमें से कितने ही अविकसित स्तर के प्राणी हो सकते हैं पर कितनों में ही मनुष्य की तुलना में अधिक बुद्धिमान प्राणी हो सकते हैं।

दक्षिण अमेरिका के सेरो डिपास्को क्षेत्र के प्लूरियोरिकन कस्बे में एक शक्तिशाली रेडियो दूरबीन लगाई गई है, जिसका व्यास एक हजार फुट है। इसके शक्तिशाली लेन्सों द्वारा देखे जाने पर ब्रह्मांड की स्थिति सम्बन्धी बहुत कुछ जानकारियाँ मिलती हैं। मिली सूचनाओं में से एक यह भी है कि सम्भवतः मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक बुद्धिमान प्राणी अन्य लोकों में विद्यमान है। इतना ही नहीं, वे अन्य ग्रहवासी बुद्धिमानों के साथ अपने सम्बन्ध बनाने के लिए, उनकी जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए निरन्तर अपने विकसित साधनों के सहारे प्रयत्न करते रहते हैं।

सुप्रसिद्ध खगोल शास्त्री कार्ल एडवर्ड साँगा ने खगोल विज्ञान सम्बन्धी नई शोधें की हैं और इस निश्चय पर पहुँचें हैं कि ब्रह्मांड में अन्यत्र भी जीवन है और वह मनुष्य से कहीं अधिक बुद्धिमान तथा साधन सम्पन्न हैं।

कहा जाता है कि अन्य ग्रहों में भी पृथ्वी जैसी परिस्थितियों न होने से वहाँ विकसित स्तर का जीवन होने में सन्देह है। इस सन्देह का निवारण शिकागो विश्व-विद्यालय के विज्ञानी स्टेनले मिलर ने अपनी प्रयोगशाला में अन्यान्य परिस्थितियों में जीवन को विकसित करके दिखाया है। रूस के वैज्ञानिक इयोशेफ्लेवलीवस्की ने अपने ग्रन्थ “द इन्टेलिजेण्ट लाइफ इन द यूनीवर्स” में इस तथ्य की पुष्टि की है कि अकेले पृथ्वी पर ही बुद्धिमान प्राणी नहीं रहते।

अमेरिकन ऐसोसिएशन फार द एडवान्समेण्ट ऑफ साइंसेज (ए. ए. ए. एस) नामक संस्था ने उड़न तश्तरियों के सम्बन्ध में अपना अभिमत “साइन्स” पत्रिका में व्यक्त किया है कि वे दृष्टिभ्रम अथवा प्रकृति प्रवाह का मायाजाल नहीं है। इनमें से अनेकों में जीवनधारी प्राणियों और खोजी उपकरणों का प्रमाण पाया गया है। अमेरिका की यू. एफ. ओ. ऐसोसिएशन तो बाकायदा ऐसे कई प्रामाणिक तथ्यों का संकलन कर चुकी है।

कहा जाता है कि शीत या ताप की अधिकता में जीवन विकसित नहीं हो सकता। किन्तु पाया गया है कि 160 अंश फा. तक के उबलते हुए तापमान में भी जीवन अपना अस्तित्व बनाये रखता है। साथ ही शून्य से 100 डिग्री फा. कम वाली ठण्डक में भी वे हो सकते हैं। उनकी शारीरिक संरचना ऐसी होती है कि असह्य शीत या ताप के मध्य भी अपना क्रिया-कलाप जारी रख सकते हैं।

सौर मण्डल के अन्य ग्रहों के सम्बन्ध में भी जो नवीनतम खोजें हुई हैं, उनसे सिद्ध होता है कि उनमें भी विकसित जीवन रहा है और वह सिकुड़े हुए रूप में अभी भी स्वाभाविक स्थिति में अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। जीवन तत्व (प्रोटोप्लाज्म) अन्तरिक्ष की घातक किरणों से केवल मूर्च्छित होता है, नष्ट नहीं। पानी को जीवन का आधार माना गया है। वह ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के सम्मिश्रण से बनता है, किन्तु उसके दूसरे विकल्प भी हैं। पृथ्वी के आरम्भिक काल में जब जीवन का प्रादुर्भाव हो रहा था, तब यहाँ के वायुमण्डल में हाइड्रोजन, अमोनिया, मीथेन आदि गैसीय तत्वों का बाहुल्य था। पानी इस रूप में नहीं था। पानी की आवश्यकता अमोनिया से भी पूरी होती रह सकती है, ऐसा ब्रह्मांड वैज्ञानिकों का मत है।

चन्द्रमा, मंगल और शुक पृथ्वी के निकटतम पड़ौसी हैं। इनके बीच कितनी ही तरंगों का आदान-प्रदान चलता रहता है। इस आधार पर अभी भी वैज्ञानिक क्षेत्र की यह मान्यता है कि इन ग्रहों से पृथ्वी पर या पृथ्वी से इन ग्रहों पर भी जीवन तत्व का आदान-प्रदान होता रहता होगा। इससे निष्कर्ष निकलता है कि वहाँ किसी न किसी प्रकार का ऐसा जीवन होगा जो अपने क्षेत्र में न पाई जाने वाली सामग्री को एक दूसरे के अनुदानों के सहारे उपलब्ध करता होगा।

सेविले (स्पेन) में सम्पन्न हुए जीव विज्ञान के 24 वें अन्तरिक्षीय सम्मेलन (कास्मो बायोलॉजीस्टर कान्फ्रेन्स) में विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को मान्यता प्रदान की कि ब्रह्मांड में विकसित स्तर का जीवन मौजूद है। उसके साथ संपर्क बढ़ाकर हमें अपने ज्ञान एवं सुविधा साधनों की अभिवृद्धि करना चाहिए।

मेरी लैण्ड यूनिवर्सिटी (यू. एस. ए.) के विकास विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डा. सिरिल पेरुमान ने कहा कि परिस्थितियां जीवन को सीमित नहीं कर सकतीं। जीवन तत्व की यह विशेषता है कि वह हर प्रकार की परिस्थितियों के अनुरूप ढांचे में ढालकर अपनी सत्ता बनाये रह सकता है।

इस मान्यता को यू.सी.एल.ए. के मैलकिन कालनन शिकागो यूनिवर्सिटी के डॉ. हैराल्ड पूरे, मियामी यूनिवर्सिटी के सिडनी फाक्स आदि ने अपने-अपने ढंग से व्यक्त किया है। एल्डुअस हक्सले ने अपने ग्रन्थ “दि ब्रेव न्यू वर्ल्ड” में यह अनुमान लगाया है कि किस ग्रह की कैसी परिस्थितियों में वहाँ किस प्रकार के, किस आकृति-प्रकृति के जीवधारी हो सकते हैं और वे किस प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं।

पृथ्वी पर उल्कापात का सिलसिला बराबर चलता रहता है। जैसाकि सभी जानते हैं, आयन मण्डल रूपी छत्र के कारण कुछ तो वायुमण्डल में प्रवेश करते ही जल जाती हैं। लेकिन कुछ कभी-कभी जमीन तक आ पहुँचती है। ऐसे कितने ही खण्ड अभी तक पाये गए हैं, उनसे पता चलता है कि उल्का क्षेत्र में खनिजों, गैसों तथा रसायन का ऐसा बाहुल्य है, जिनमें किसी न किसी प्रकार के जीवन का उद्भव हो सकता है। जीवन विकास के मूल-भूत सिद्धान्तों के आधार पर अन्य लोकों में जीवन विकास की पूरी-पूरी गुँजाइश है।

आज तो हम मनुष्य-मनुष्य के बीच सद्भाव-सहकार का क्रम तक चलता रहता नहीं देखा जाता। मनुष्यों और पालतू पशुओं के बीच तक यह तारतम्य नहीं बना है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि समानता और एकता के सिद्धान्तों का निर्वाह बन पड़ा है। एक दूसरे शोषण की आपाधापी ही इन दिनों चल रही है। किन्तु वह दिन दूर नहीं कि प्रस्तुत अनगढ़पन का अन्त होगा और स्नेह सहयोग न्यायोचित निर्वाह का क्रम चल पड़ेगा। नवयुग की यही विशेषता होगी कि पदार्थों को ही सब कुछ न मानकर आदर्शों को व्यवहार में उतारा जायेगा।

इससे भी एक कदम आगे बढ़कर सच्चे विज्ञान की प्रगति हमें यह भी सिखायेगी कि ग्रह नक्षत्रों के बीच भी जीवधारी आदान-प्रदान की शैली अपनायें और अपनी उपलब्धियों से अन्य लोकवासियों को उसी प्रकार का लाभ पहुंचायें जैसा कि जीवात्मा की गरिमा के अनुरूप पहुँचाया जाना चाहिए।


Quotation

प्रकृति प्रकोपों- विक्षोभों के काले बादल सारे संसार के ऊपर मंडरा रहे हैं। उसकी कुछ बूँदें विभिन्न क्षेत्रों में बरसनी आरम्भ भी हो चुकी हैं जिनका प्रमाण विभिन्न प्रकार के दुर्भिक्षों के रूप में मिल रहा है। अगले दिनों वे और भी उग्र होंगे, इसके स्पष्ट संकेत मिलने लगे हैं। मानवी दुष्कृत्यों की अदूरदर्शी प्रयासों की इतनी भयंकर प्रतिक्रियाएँ हो सकती हैं, यह पहली बार अनुभव किया जा रहा है।


प्राण विद्युत के भले-बुरे उपयोग - 1

यह विश्व-ब्रह्मांड शक्तियों का भण्डार है। इसमें प्रकृति परक और चेतना परक शक्तियों के भण्डार भरे पड़े हैं। वे अपने ढंग से अपना काम करते रहते हैं और उन्हीं के आधार पर सृष्टि -सन्तुलन बना रहता है। एक ओर जहाँ सर्दी में पतझड़ होता है वहीं बसन्त से उसकी पूर्ति हो जाती है। ग्रीष्म से घात-पात और कुएँ, तालाब सूख जाते हैं, तो वर्षा के आगमन पर उस क्षति की पूर्ति भी भली-भाँति हो जाती है। दिन की तपन को रात्रि शान्त कर देती है और रात्रि की निस्तब्धता को दिनमान मिटा कर रहता है। पापी अपनी दुष्प्रवृत्तियों का दण्ड भोगते हैं और पुण्यात्माओं के लिए सुख-शांति का मार्ग खुला रहता है। आलसी अनगढ़ स्थिति में पड़े रहते हैं और पुरुषार्थी प्रगति-पथ पर आगे बढ़ते हैं। जन्म दर की बढ़ोतरी को मृत्यु की कैंची काट-छांट करती और धरती पर उतना ही बोझ रहने देती है, जितनी कि उसमें वहन करने की क्षमता है।

यह प्रकृति का सामान्य क्रम हुआ, जिसे भौतिक विज्ञान के सहारे जाना जा सकता है और समझा जा सकता है कि प्रत्यक्ष पदार्थों के पीछे सूक्ष्म शक्तियों का कितना बड़ा हाथ है। अनन्त अन्तरिक्ष में अधर लटके हुये- घूमते और चलते ग्रह-तारकों को उनकी धुरी और कक्षा में बिना कुछ सेकेंडों की भूल-चूक हुये कौन सम्भालता है? इस आश्चर्य का समाधान उनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के प्रवाह और पकड़ स्तर को समझने से मिलता है। यदि ऐसा न होता, तो ब्रह्मांड के सदस्य परस्पर टकरा जाते और किसी ऐसे गर्त में जा गिरते जहाँ से उनका वापस लौटना सम्भव न होता। जल, थल और वायु का त्रिवर्ग अपने को घुलाता-मिलाता अठखेलियाँ करता और इस धरती की सुन्दरता तथा सजीवता को अक्षुण्ण रखता है। जहाँ अड़चन आ जाती है, वहाँ उसे तूफान, भूकम्प, ज्वालामुखी आदि अपने आघातों से ठीक कर देते हैं। नेत्रों से दीख पड़ने वाले तथा अन्य इन्द्रियों उपकरणों से अनुभव में आने वाले प्रायः सभी पदार्थ ताप, शब्द और ध्वनि की सूक्ष्मता के स्थल परिचय हैं। यह प्रकृति कौतुक है, जिसे हम पदार्थ विज्ञान के आधार पर समझते और उसमें से जितना हस्तगत हो सकता है, उसका लाभ उठाते हैं।

दूसरा अदृश्य जगत चेतना का है। जिस प्रकार दृश्यमान शरीर और अदृश्य प्राण के समन्वय से मानवी सत्ता कार्यरत रहती है। ठीक उसी प्रकार इस निखिल ब्रह्मांड में दृश्यमान अनुभव गम्य पदार्थ सत्ता है। उसकी पूरक आत्म चेतना है, जो प्राण रूप में जीवधारियों को कठपुतली की तरह नचाती है। शरीर में से प्राण निकल जाय, तो वह तेजी से सड़ने लगेगा। उसी प्रकार यदि इस दृश्य जगत में से अदृश्य चेतना न रहे, या गड़बड़ा जाय, व्यतिक्रम करने लगे , तो समझना चाहिए कि महा प्रलय, खण्ड प्रलय अथवा भयंकर उथल-पुथल का कोई विग्रह खड़ा हुआ। विश्व-चेतना न स्वयं गड़बड़ाती है और न सम्बद्ध क्षेत्र को गड़बड़ाने देती है। जहाँ भी व्यतिक्रम खड़ा होता है, वहीं उसे ठोक-पीटकर व्यवस्थित करती है।

प्राण चेतना का अपना स्वतन्त्र विज्ञान है। उसका स्वरूप, स्वभाव एवं वर्चस्व आत्म विज्ञान द्वारा जाना जा सकता है। उस प्रवाह में से जो उपयोगी है, उसे पकड़ा और खींचा जा सकता है। परब्रह्म इसी सत्ता को कहते हैं। वह स्वयं में क्रमबद्ध है और सृष्टि क्रम का तारतम्य बिठाये रहती है। उसका अनुनय विनय से सम्बन्ध नहीं है। नियमों को समझने और उनके अनुकूलन से ही ब्राह्मी सत्ता का अनुग्रह-अनुदान प्राप्त किया जा सकता है। उसकी न्यूनाधिकता व्यक्ति की पात्रता एवं प्रतिभा पर निर्भर है। ब्रह्म चेतना का भी एक चुम्बकीय क्षेत्र है। ठीक वैसा ही, जैसा कि ग्रह नक्षत्रों का चुम्बकत्व होता है।

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की सुस्थिरता ही अपनी दुनिया को सुव्यवस्थित और सुनियोजित बनाये हुए है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उसके क्रम स्वरूप और नियम को समझें, उसके उपयोगी अंश को ग्रहण कर सकने योग्य अपने को बनावें। यह प्रयोजन ज्ञान, कर्म और भक्ति की तात्विक प्रक्रिया का अवलम्बन करके पूरा किया जा सकता है।

परम सत्ता की ब्रह्मांडीय चेतना को समझने और पकड़ने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। उसे अपने ही काय कलेवर के अंतर्गत ओत-प्रोत पाया जा सकता है और उस महासागर में से अपने उपयोग का वैभव हथियाया जा सकता है। परमात्मा अत्यन्त विशाल है, परब्रह्म की परिधि अत्यन्त विस्तृत है। बुद्धि के लिए अगम्य भी, पर उसका छोटा मॉडल आत्म चेतना के रूप में अपेक्षाकृत अधिक सरलता से समझा जा सकता है।

ब्रह्मांड की- उसके एक घटक सौर मण्डल की विधा को छोटे परमाणु में भी उसी रूप में काम करते हुये देखा जा सकता है। परमाणु सामान्यतः अदृश्य धूल कण हैं, पर उसकी एक छोटी-सी इकाई का विस्फोट कर सकने पर इतनी प्रचण्ड ऊर्जा प्रकट होते देख सकते हैं, कि उसकी विभीषिका का अनुमान लगाने भर से रोमाँच होने लगे। विराट ब्रह्म का लघुतम घटक परमाणु है। इसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा का प्रतिनिधित्व काय कलेवर में समाहित आत्मा करती है। आत्मा पूर्ण भी है और अपूर्ण भी। अपूर्ण इस अर्थ में कि उस जैसी अगणित कोशाओं से यह निखिल ब्रह्मांड भरा पड़ा है। उसका अंशधर तो अपूर्ण ही माना जायेगा। पूर्ण इस अर्थ में कि उसमें बीज रूप से वह सब कुछ विद्यमान है, जो इस विराट् में है। छोटे-से बीज में विशालकाय वृक्ष की समूची सत्ता भरी रहती है। वीर्य कण में एक मनुष्य की समूची सत्ता विद्यमान पाई जाती है। एक आत्मा में भी परमात्मा का समूचा वैभव विद्यमान रहता है। आवश्यकता उस प्रसुप्त को जागृत करने भर की है। तप और योग का साधनाभ्यास इसी उद्देश्य के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य आत्मोत्कर्ष भी हो सकता है और भौतिक क्षेत्र में अपनी विशिष्टता का, विभूति-वैभव का चमत्कारी परिचय देना भी। आत्मोत्कर्ष क्षेत्र में स्वर्ग और मुक्ति का समावेश है। साँसारिक चमत्कार प्रस्तुत कर सकने की क्षमता को ऋद्धि-सिद्धि कहते हैं।

चेतना का ऊर्ध्वलोक भी है, मध्यम भी और कनिष्ठ भी। इसी को स्वः लोक, भुवः लोक और भूः लोक कहते हैं। ऊर्ध्व चेता अपनी चेतना का परब्रह्म के साथ घुला लेते हैं। ईंधन आग के साथ लिपटकर स्वयं भी अग्निरूप हो जाता है। लकड़ी के साधारण टुकड़े में अग्नि तत्व के सारे गुणों का समावेश हो जाता है और वह स्थिति के अनुरूप दावानल-बड़वानल का रूप धारण कर सकता है। ऐसी ही चेतनाएँ देवर्षि , बह्मर्षि, महर्षि आदि नामों से जानी जाती हैं। वे प्रायः वही प्रयोजन पूरा करती हैं, जो परमसत्ता को अभीष्ट है। इन्हें पार्षद या जीवन मुक्त भी सकते हैं।

जिन्हें दृश्यमान साकार विराट् ब्रह्म से प्रीति है, वे लोकमंगल में, जन-कल्याण में निरत रहते हैं। इसमें उन्हें दुहरा लाभ मिलता है। प्रथम, अन्तराल में सत् प्रवृत्तियों का सम्वर्धन, कषाय-कल्मषों का निराकरण। दूसरा, पुण्य परमार्थ के पराक्रम से अनेकानेकों का विदित और अविदित हित-साधन। पुण्य फल से सुख-शांति की अभिवृद्धि और प्रगति की सुनिश्चित सम्भावना का शास्त्रकारों ने वर्णन किया है। लोकसेवी पुण्यात्मा अपने कर्तृत्व का, प्रतिफल हाथों हाथ प्राप्त करते हैं। आत्म-सन्तोष, लोक-सम्मान और कठिन प्रयोजनों को सरल बनाने वाली दैवी अनुग्रह उन्हें मिलता है। इन्हीं आधारों को अपना कर लोग महापुरुष, देवमानव बनते हैं। लोकनायक और अनुकरणीय अभिनन्दनीय अग्रगामी ऐसे ही लोगों को कहा जाता है। इतिहासकार उनकी गुण-गाथाएँ गाते-लिखते नहीं थकते। दोनों ही उच्चकोटि की भूमिकाएँ हैं, जिनमें से प्रथम को दैवी और दूसरी को मानवी कहते हैं। इन्हीं को निराकार- साकार उपासना भी कहा गया है।

तीसरी भूमिका वह है, जिसे नियमन, निरोध एवं प्रतिरोध कह सकते हैं। यही है- प्रताड़ता भी। इसे वाममार्ग या तन्त्र मार्ग कहते हैं। इसमें किन्हीं अनाचारों को रोका जा सकता है, अनाचारी प्रवाह को रोका जा सकता है। तन्त्र का सारा विधान-विज्ञान इसी उपक्रम से भर पड़ा है। यों कई अविवेकी इसका लोभ एवं द्वेष वश दुरुपयोग भी करते हैं और निर्दोषों को सताकर अपनी दुष्टता का परिचय भी देते हैं, पर इसमें विज्ञान का कोई दोष नहीं। दोष व्यक्ति का है। लाठी के सहारे चलने में सुगमता भी होती है और दुरुपयोग करके किसी का सिर भी फोड़ा जा सकता है। तन्त्र का पिछले दिनों अनर्थ मूलक उपयोग ही अधिक हुआ है, इसलिए वह बदनाम भी अधिक है।

तन्त्र में मानवी चेतना की विद्युत शक्ति ही काम करती है। शरीर और प्राण का सम्मिलित उत्पादन वैसा ही शक्तिशाली होता है, जैसा कारतूस में भरी हुई बारूद और गोली का तालमेल। तन्त्र का प्रयोग हर कोई नहीं कर सकता और न वह हर किसी पर सफल हो सकता है। बिजली धातुओं में होकर प्रवाहित होती है, जनरेटर द्वारा उत्पन्न की जाती है। उसी प्रकार तन्त्र शक्ति का उत्पादन और प्रयोग कठिन तो है, किन्तु असाध्य या असम्भव नहीं।

आमतौर से तान्त्रिक प्रयोग अनाचार या अनाचारियों के विरुद्ध किये जाते हैं। यह भी राजदण्ड की तरह आत्मदण्ड की एक प्रक्रिया है, जिसमें दोषी ही प्रताड़ित होने चाहिए, द्वेष या लोभ के लिए इस शक्ति का प्रयोग तो सर्वथा अनुचित है, पर जिनकी दाढ़ में खून का चस्का लग जाता है, वे आतंकवादियों की तरह इस प्रकार के प्रयोग अपना प्रत्यक्ष लाभ और अहंकार का पोषण हुआ अनुभव करते हैं।

मानवी काय-कलेवर में विद्युत शक्ति की उपस्थिति सर्वमान्य है। बिजली अनेक उत्तम उपयोगों में भी काम आती है और उसके झटके भर से किसी का प्राण हरण भी हो सकता है। सामान्य हानि पहुँचाना तो और भी सरल है। विशेषतया व्यक्तिगत प्रयोजनों में तो उसकी परिधि सीमित होती है, इसलिए आघात भी जल्दी लगता है। मारण, मोहन, उच्चाटन, स्तम्भन आदि के प्रयोग व्यक्तियों द्वारा व्यक्तियों पर ही किये जाते हैं, पर वे बन तभी पड़ते हैं, जब योगाभ्यास की भाँति तन्त्र शक्ति के उपार्जन में प्रचण्ड परिश्रम कर लिया जाय, अन्यथा डराने-धमकाने का छद्म तो लोक-व्यवहार में भी प्रयुक्त होता रहता है। तन्त्र के लिए इससे बढ़ा-बढ़ा आधार चाहिए।

योगी योगाग्नि में अपना शरीर स्वयं जला लेते हैं और आवश्यकता पड़ने पर दूसरों को भी शाप देकर भस्म या अहित कर सकते हैं। यह विद्युत शक्ति जीवितों में तो होती ही है, वह मृतकों में भी भूत-पिशाच के रूप में बनी रहती है और ब्रह्मराक्षस बनकर पीछा करती है। उस प्रकार के आक्रमण उसे तोड़-मरोड़कर रख सकते हैं, जिस पर कि उसका प्रकार हुआ है।

मिश्र के पिरामिडों में से एक तूतन खामन की कब्र को खोदने वाले अनेक अनुसन्धान कर्त्ताओं में से प्रायः सभी बेमौत मरे थे। दुर्वासा की क्षमता शाप प्रधान थी। भस्मासुर ने भी यह कौशल प्राप्त कर लिया था। सुरसा, ताड़का, सूर्पणखा, पूतना आदि नारियों को भी यह शक्ति प्राप्त थी। दमयन्ती ने व्याघ्र को भस्म किया था और शृंगी के शाप-प्रहार से परीक्षित को तक्षक ने डसा था।

विज्ञान सदा एक रस रहता है। उसके सिद्धान्त और प्रभावों का प्रतिपादन सदा अविच्छिन्न बना रहता है। आदिम विज्ञान भी अपनी मौलिक गरिमा सदा बनाये रहता है। उसके द्वारा जहाँ अपना और दूसरों का हित साधन होता है, वहाँ तन्त्र पक्ष को अपना कर भयंकर कृत्य भी हो सकते हैं। इसकी चपेट में व्यक्ति भी आ सकते हैं और प्रयास भी। किसी के शरीर को अपंग-अल्पजीवी बना देने की तरह उसके व्यवसाय, कारोबार, परिवार में भी ऐसा व्यवधान डाला जा सकता है, जिससे लाभ के लिए किये गये प्रयास हानिकारक सिद्ध होते चलें।

व्यक्तिगत तान्त्रिक प्रयोगों में प्रतिपक्षी की बुद्धि भ्रमित होती और हिम्मत टूटती है। सही सोचने और सही कदम उठाने की प्रक्रिया भी गड़बड़ा जाती है। अनिद्रा जैसे रोग घेरते हैं। तनाव की उत्तेजना छायी रहती है। ऐंठन होती है और डरावने स्वप्न आते हैं- यह प्रारम्भिक लक्षण हैं। तन्त्र प्रयोगों से आहत व्यक्ति की चोटें यदि हलकी हैं, तो वह बहुत समय तक उस पीड़ा को सहता और धीरे-धीरे गलत-घुलता रहता है, किन्तु यदि आक्रमण तीव्र हुआ, तो वह समग्र अनिष्ट कर सकता है।

सत्संग और कुसंग का जैसा प्रभाव होता है, वैसा ही मानवी विद्युत से उच्चस्तरीय एवं अनिष्टतम हो सकता है। कालिदास, वरदराज की तरह उसे विद्वान, भीम घटोत्कच की तरह बलवान, कर्ण-सुदामा की तरह धन-वान भी बनाया जा सकता है। किन्तु प्रयोग यदि अनिष्ट के निमित्त हुआ है तो उसका प्रभाव ऐसा हो सकता है जिससे अच्छा-खासा व्यक्ति अपंग, असहाय की तरह कष्ट भोगे और यत्र-तत्र ठोकरें खाता फिरे। यह शक्ति की प्रकृति का परिचय है। चाकू साग काट सकने के भी काम आ सकता है और गला काटने के लिए भी, सदुपयोग और दुरुपयोग कर्ता के अधीन है। इसमें शक्ति माध्यमों पर दोषारोपण नहीं किया जा सकता।

प्राचीन काल में महाभारत जैसे युद्धों में जिन दिव्य अस्त्रों का प्रयोग हुआ था, वे धातु विनिर्मित ही नहीं वरन् मानवी विद्युत द्वारा विनिर्मित दिव्य आयुध ही थे जो वर्तमान मृत्यु किरण, लेसर किरणों की तरह प्रतिपक्षी पर छोड़े जाते थे और निष्णातों द्वारा उन्हें मन्त्र बल से निरस्त भी किया जाता था। उनकी समता लौहकारों द्वारा विनिर्मित अस्त्र-शस्त्र नहीं कर सकते थे। कालपाश, नागपाश आदि ऐसे ही दिव्य आग्नेयास्त्र थे जो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर न होते हुए भी लक्ष्य को बेधकर हटते थे।

यह प्रयोग व्यक्तिगत लक्ष्य को रखकर नहीं अपितु किसी योजना को असफल बनाने के लिए भी हो सकते हैं। इन्हीं दिनों अमेरिका के चार अन्तरिक्ष यान लगातार ब्रह्मांड में प्रवेश करने में असफल रहे हैं। हो सकता है कि इन असफलताओं के पीछे कहीं कोई मानवी विद्युत एवं तन्त्रधारा काम कर रही हो। कुछ वर्ष पूर्व ‘स्काइलैब” उपग्रह का गिरना भी ऐसा ही अनिष्ट विधा में सम्मिलित किया जा सकता है।

अमेरिका के अन्तरिक्ष यानों के चैलेन्जर अन्तरिक्ष शटल के दुर्घटनाग्रस्त होकर सभी सात व्यक्तियों के वायुमंडल में जलने के बाद नासा के दो अन्तरिक्षीय अभियान भी ऐसी ही ट्रेजेडी के शिकार हुए हैं। नासा की क्षमता व कार्य प्रणाली पर एक प्रश्न चिन्ह लग गया है। सम्भव है कोई दैवी शक्ति नहीं चाहती हो कि अणु आयुधों की दौड़, अन्तरिक्ष में मनुष्य का संहार प्रयोजनों हेतु आवागमन बन्द हो। चेरनोबिल रिएक्टर (रूस) में विगत 28 अप्रैल को हुई दुर्घटना जिसमें हजारों व्यक्तियों के मरने के साथ रेडियोधर्मिता के सारे वातावरण में संव्याप्त होने की सम्भावना ने विश्व को दहला दिया है। इस रेडियोधर्मिता के दूरगामी परिणाम हिरोशिमा काण्ड से भी भयंकर होने की सम्भावना है। किन्तु यह चेरनोविल अकेला नहीं है। यदि स्वतः दहन की नौबत आ ही जाय तो अमेरिका में 101, कनाडा में 15, अमेरिका में 52, भारत में 6, ब्रिटेन में 37, फांस में 44, प. जर्मनी में 20, चीन में 2 एवं जापान में ऐसे 32 रिएक्टर हैं जो सारी पृथ्वी को क्षण भर में नष्ट कर सकते हैं। परोक्ष सत्ता नहीं चाहती कि विक्षिप्त मनुष्य के हाथों यह आत्मघाती तलवार सौंपी जाय। यह इस खबर से स्पष्ट होता है जो अभी-अभी अमेरिका से आई है, जिसमें वहाँ के 5600 उच्च पदस्थ वैज्ञानिकों, जिनमें पन्द्रह नोबेल पुरस्कार विजेता भी शामिल हैं, ने रोनाल्ड रीगन की स्टार वार योजना (एस. डी. आय.) से अपने हाथ खींचकर असहयोग करने तथा विश्व भर के वैज्ञानिकों से साथ देने की अपील की है। हो सकता है कि यह भी दैवी चेतना का परोक्ष कार्य हो जो वैज्ञानिकों की बदलती मनःस्थिति के रूप में सामने आई है।

अगले दिनों व्यक्तित्वों और प्रयासों की वर्तमान स्थिति को मोड़ने, मरोड़ने में सम्भव है अध्यात्म प्रयोगों की कोई बड़ी भूमिका हो। विनाशकारी और लाभदायक प्रयोजनों में आत्म शक्ति उतना बड़ा काम कर सकती है जो प्रत्यक्ष उपायों और उपकरणों से सम्भव नहीं। ( अगले अंक में जारी )


Quotation

मनुष्य जितना अहंकारी होगा उसका व्यक्तित्व उतना ही छोटा घटिया होगा।


आयुर्वेद की पुरातन महिमा किस प्रकार जीवन्त हो

किसी जमाने में आयुर्वेद चिकित्सा विश्व में मूर्धन्य थी। यों क्षेत्रीय प्रचलनों में अन्य प्रकार के उपचार भी काम आते थे पर उनकी न इतनी प्रामाणिकता थी और न प्रतिक्रिया ही अनुकूल पड़ती थी।

आयुर्वेद में जड़ी बूटियों द्वारा उपचार करने की पद्घति को सुलभ, निर्दोष और अधिक फलप्रद मानते हुए उसे प्राथमिकता दी गई है। पर पीछे उसमें रस, भस्में भी सम्मिलित होती गईं और चमत्कारी प्रभाव की दृष्टि से उन्हें भी समुचित श्रेय सम्मान मिला।

जिन दिनों युद्धों की भरमार बढ़ चली थी उन दिनों आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का भी आविष्कार एवं शानदार प्रयोग हुआ। युद्धों में तीर, तलवार, वरछे, छुरे, फरसे आदि का प्रयोग होता था। उनसे सैनिक घायल तो बहुत होते थे पर अंग कटने पर भी जीवित रहते थे। उनके अंगों में शस्त्र छिदे और हड्डियों में अस्त्र फँसे रहते थे। उन्हें निकालना एक कठिन एवं जटिल काम था। ऐसी दशा में शल्य चिकित्सा का विकास करके आयुर्वेद के माध्यम से आहतों एवं पीड़ितों की भारी सेवा हुई। इतिहास बताता है कि ईसा से छह शताब्दी पूर्व विद्वान आत्रेय, सुश्रुत आदि मनीषियों ने शल्य चिकित्सा का उच्चस्तरीय विकास किया था। तक्षशिला में इस प्रशिक्षण के लिए समुचित व्यवस्था थी। इस सन्दर्भ में अनेक विशेषज्ञों ने अपने-अपने अनुभवों के आधार पर अनेक ग्रन्थ भी लिखे थे। शल्य प्रयोजनों में काम आने वाले छोटे-बड़े उपकरणों की संख्या 180 तक पहुंच गई थी। शूची भेद चिकित्सा, (इन्जेक्शन) और धूम्र चिकित्सा (यज्ञोपचार) आदि आविष्कारों ने तो भारत की ख्याति संसार भर में पहुंचाई थी। इस विद्या का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सुयोग्य छात्र आते थे और अपने-अपने प्रदेशों में स्वास्थ्य रक्षा की महती सेवा साधना करते थे। एक्युपंक्चर का शिक्षण तिब्बतियों व चीनी चिकित्सकों ने भारत में ही किया था।

किसी समय भारत दर्शन, अध्यात्म, साहित्य, कला, विज्ञान आदि की तरह ही आयुर्वेद का भी ऊँचा दर्जा था और वह चिरकाल तक चलता रहा। मानव जाति का इस आविष्कार से महानतम हित साधन हुआ।

समय चक्र बदला। मुसलमानी शासन स्थापित हुआ। उसके साथ तिब्बी चिकित्सा पद्धति का भी आगमन हुआ। उसे प्रोत्साहन मिला। यों उस पद्धति में भी अधिकांश प्रयोग और सिद्धान्त आयुर्वेद के ही सम्मिलित है। फिर भी छाप तो अलग से ही लगी थी। इसलिए शासकीय छत्र छाया में उसी को प्रधानता मिली। आयुर्वेद क्षेत्र में निराशा फैल चली। जहाँ सम्मान और पैसा अधिक मिले उधर ही ढुल जाने की मनुष्य की प्रवृत्ति है। इसलिए वैद्यों की अपेक्षा तबीवों का बोलबाला बढ़ता गया। फिर भी आयुर्वेद अपनी मौलिक विशेषताओं के कारण अपने पैर दृढ़तापूर्वक जमाये रहा। सम्पन्न लोगों के बीच न सही, देहाती और गरीब वर्ग में उसे यथावत् प्रश्रय मिलता रहा। सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि घरेलू चिकित्सा के रूप में आस-पास उगने वाली जड़ी-बूटियाँ और रसोई में काम आने वाले मसालों से ही वह लाभ मिल जाता था, जो ढेरों पैसा खर्च करने और बड़ों के दरवाजे पर सिर पटकते रहने पर भी नहीं मिल पाता यही वह विशेषता है जो अँग्रेजी शासन काल में अतिशय सम्मान पाने वाली एलोपैथी के व्यापक प्रभाव के सामने भी। आयुर्वेद पद्धति किसी प्रकार अपना अस्तित्व बनाये रही। सरकारी अस्पतालों में प्रायः ऐलोपैथी चिकित्सक और उनसे सम्बन्धित दवाओं की भरमार है। विदेशी सरकार के चले जाने पर भी पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति का प्रभाव अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। शहरों में सही- सम्पन्नों में न सही- देहाती गरीब क्षेत्र में इन दिनों भी आयुर्वेद से सम्बन्धित उपचार ही कार्यान्वित होते हैं।

समय का फेर और प्रभाव तो आयुर्वेद के पिछड़ जाने का एक बड़ा कारण है ही। राज्याश्रय में शासकों की पसन्दगी भी बड़ा काम करती है। उनके द्वारा दिया हुआ प्रोत्साहन भी अपना काम करता है। इस प्रकार तिब्बी के उपरान्त एलोपैथी को श्रेय सम्मान मिलता रहा तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि आयुर्वेद क्षेत्र का नेतृत्व करने वालों ने समय का सामना करने के लिए जिस तत्परता को बरता जाना चाहिए था, वह उनने बरती नहीं।

आयुर्वेद वस्तुतः जड़ी-बूटी (वनौषधि) प्रधान है। उनका सही और शुद्ध होना अत्यन्त आवश्यक है। यदि वे सड़ी-गली हों, शकल से मिलती हुई कुछ के बदले कुछ को देने प्रयास चल पड़े तो प्रामाणिकता की रक्षा नहीं हो सकती और न उसका समुचित प्रतिफल ही दृष्टिगोचर हो सकता है। पंसारियों की दुकान पर मिलने वाली वनस्पतियाँ वर्षों पुरानी होती हैं जबकि उनका गुण मुश्किल से एक वर्ष की अवधि (तोड़े जाने के बाद) बीतने पर ही समाप्त हो जाता है। ऐसी दशा में गुण हीन वनौषधियों से यह आशा नहीं की जा सकती कि वे अपना समुचित प्रभाव उत्पन्न कर सकेंगी। एक ही शक्ल की कई वनस्पतियाँ होती हैं। ऐसी दशा में कठिनाई से मिलने वाली औषधियों के स्थान पर सस्ती चीजों को खपा देना भी ही दोष है जिसके कारण रोगी को लाभ से वंचित रहना पड़ता है और चिकित्सक को अपयश का भागी बनना पड़ता है। वनस्पतियों को प्रौढ़ावस्था में ही लिया जाना चाहिए ताकि उनके गुण और रस परिपक्व हो सकें। किन्तु देखा जाता है कि उखाड़ने वाले कच्ची-पक्की का ध्यान न करके वजन बढ़ाने के लिए जो भी खुरपी के नीचे आता है उसी को खोद लाते हैं। पंसारी भी उनकी छाँट धुलाई और सफाई नहीं करते। ऐसी दशा में यह जोखिम और भी बढ़ जाती है कि वे गुणहीन स्थिति में रहें और अपना समुचित प्रभाव न दिखा सकें।

औषधियों के गुणों का भूमि से भी भारी सम्बन्ध है। ठण्डे, गरम, पथरीले, रेतीले आदि क्षेत्रों की उत्पत्ति में भूमि के अनुसार गुण होते हैं। अस्तु आयुर्वेद विशेषज्ञों को वनस्पतियाँ संचय करते समय यह भी देखना चाहिए कि वह उत्पादन उपयुक्त क्षेत्र का है या नहीं। प्रयोग की अवधि बीत जाने पर तो वे कूड़ा-कचरा ही हो जाती है और फिर उनकी विशेषता समाप्त हो जाती है।

पुरानी औषधियों में से अनेकों दुर्लभ हो गई हैं या होती जा रही हैं। “फ्लोरा “ क्रमशः मिटता जा रहा है। नई कितनी ही ऐसी हैं जो अपना विशेष गुण प्रदर्शित करती हैं। इस संदर्भ में ऐसी प्रयोगशालाएँ और अनुसन्धान गतिविधियां आधुनिकतम परीक्षणों के साथ चलनी चाहिए जिससे वस्तुस्थिति की जानकारी मिलती रहे और आयुर्वेद अपनी पुरातन गरिमा बनाये रहने के साथ-साथ नवीन विशेषताओं की जानकारी भी अपने क्षेत्र में सम्मिलित कर सके। एक ऐसा ही प्रयोग गायत्री तीर्थ- ब्रह्मवर्चस् की वनौषधि अनुसन्धान प्रयोगशाला में चल रहा है। अगणित व्यक्ति ताजी औषधियों के प्रयोग से लाभान्वित हुए हैं एवं विज्ञान जगत भी इस ओर आकर्षित हो रहा है।


कवि वल्लातोल (kahani)

कवि वल्लातोल की एक कविता है- मैंने एक नदी देखी, जो बाढ़ के द्वारा तटवर्तियों को उजाड़ने के उपरान्त वैभव गँवा बैठी और सूखकर बालू मात्र रह गई।

एक दिन मैंने समुद्र देखा। वह गहरा भी बहुत था और जल सम्पदा से भरपूर भी पर वह ज्वारभाटों में सिर पटकने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पा रहा था।

मैंने एक कुआँ देखा जो असीम संचय की लालसा से स्रोतों से जल खींचता। पर नियति उसका साथ न देती। नियति उसे निश्चित सतह से ऊपर उठने ही नहीं दे रही थी।

इन विडम्बनाओं को देखकर सोचता हूँ कि कहीं जीवन भी तो ऐसा ही मखौल नहीं है।


संगीत से सरसता की अभिवृद्धि

सम्पन्नता, बलिष्ठता, सुन्दरता, विद्वता, प्रतिभा आदि विभूतियों की क्षमता से सभी परिचित हैं। जिनके पास यह विशिष्टताएँ जितनी अधिक मात्रा में हैं वह उतना ही अधिक गौरवान्वित होता और प्रसन्नता अनुभव करता है। इनमें से जो जितनी मात्रा में कम है, उन्हें उतना ही दरिद्र या पिछड़ा हुआ समझा जाता है।

पर यह सभी ऐसी हैं जो प्रयत्न और परिस्थितियों के तालमेल से हस्तगत होती हैं जिन्हें अवसर नहीं मिलता वे इच्छा रहते हुए भी उनमें से किन्हीं को भी प्राप्त नहीं कर पाते।

पर इन सबसे बढ़कर एक और सम्पन्न है, वह है प्रसन्नता। यह पूर्णतया अपने व्यक्तित्व पर निर्भर है। उसे प्राप्त करने के लिए सरसता की आवश्यकता है न कि साधनों की। उमंगें ही स्वभाव को भावनाशील बना कर इस विभूति को अभीष्ट मात्रा में उपलब्ध कराती हैं। अपनी परिस्थितियों, उपलब्धियों पर सन्तोष करके और पिछड़ों के साथ अपनी तुलना करते हुए यह सोचा जा सकता है कि जो असंख्यों को नहीं मिला, वह हमें मिला है। पूर्णतया तो किसी को भी नहीं मिली, पर जो जिसे जितना मिला है उसके लिए भी हो सकता है कि अनेकों तरसते हों। यह विचार सन्तुलन है, जो सहज ही प्रसन्नता प्रदान कर सकता है। अपने से सम्पन्नों के साथ अपनी तुलना की जायेगी तो सदा अपनी दरिद्रता का ही भान होता रहेगा और खिन्नता बनी रहेगी।

विचारणा से भी अन्तराल की गहराई में है- भावना। भावनाएँ प्रत्यक्ष विशेषताओं की तुलना में कहीं अधिक गहराई पर है। वे यदि उच्चस्तरीय हों तो संसार में जहाँ कहीं भी आनन्द है, उसमें से अपना भाग ले सकती हैं फूलों में प्रत्यक्ष नहीं, उनके अप्रत्यक्ष कलेवर में ऐसा मधुर रस होता है जिसे मधुमक्खी अपने मुख स्राव के साथ सम्मिलित करके मीठा बना लेती है। यों प्रत्यक्षतः फूल मीठे नहीं होते परन्तु वे जैसे भी कुछ हैं, मधुमक्खी के मुख में पहुँचने भर से मीठे बन जाते हैं।

अनेक सुखद वस्तुओं के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य भी ऐसा है कि यदि उसे भावनापूर्वक निहारते रहा जाय तो सब ओर आनन्द का निर्झर झरता दिखाई पड़ेगा। वन्य जीवन, घोंसले के पक्षी, एकान्तसेवी साधु इसी को भावनापूर्वक देखते और फूले नहीं समाते। बालकों को भी अपनी निश्छलता और निश्चिन्तता के कारण यह प्रकृति सौंदर्य लिपटने के लिए आमन्त्रित करता है और वे उसके निकट दौड़े चले जाते हैं।

आनन्द दायक अनेक प्रयोजनों में एक है- संगीत। वह यों वाद्य यन्त्रों और कण्ठ की मधुरता के साथ निस्सृत होता है। किन्तु बिना इनके भी आन्तरिक मस्ती के साथ अपने आपको लहराया जा सकता है। तरंगित करके उमंगों से भरा जा सकता है। प्रत्यक्ष साधनों से अपने अन्तरंग में उभरने वाले मस्ती अपने को ही नहीं, दर्शकों को भी तरंगित करती है। गायन, वादन, अभिनय तीनों को मिलाने से संगीत बनता है। इसका प्रयत्नपूर्वक अभ्यास भी किया जा सकता है। अथवा जहाँ इसका माहौल हो, वहाँ जाकर उस रस वर्षा का आनन्द लिया जा सकता है।

प्रसन्नता भरे अवसरों पर अक्सर संगीत का प्रबन्ध किया जाता है क्योंकि यह लागत की तुलना में लाभदायक अधिक है। भीतर से भावनापूर्वक संगीत की तरंगें उभारना निजी कौशल है। पर जिनमें यह स्वतः उद्भूत नहीं होता, वे संगीत के वातावरण में जाकर उसका आनन्द लाभ कर सकते हैं।

यों अमृत में भी विष मिलाया जा सकता है। दूध में खटाई डालकर उसे फाड़ा जा सकता है। रस में विष मिलाकर उसे मृत्युदूत बनाया जा सकता है। संगीत में कामुकता से मिलाकर उसे उत्तेजक तो बनाया जा सकता है, पर वह उत्तेजना ऐसी होती है, जैसी कि मद्यपान से मिलती है। क्षणिक उल्लास उत्पन्न करके मनुष्य की दशा वैसी हेय बना देती है जैसे नशे की खुमारी उतरने पर शराबी की होती है।

संगीत यदि निर्दोष हो तो उसमें मनुष्य की भावुकता भरी प्रसन्नता थिरकती है और वह नाड़ी समूह में सम्मिलित होकर एक ऐसा पोषण प्रदान करती है जो मन की हलका बनाने और उत्साह को जगाने में विशेष रूप से काम आता है।

थके हुओं की थकान उतारने के लिए विवाह शादियों में मंगल आयोजनों पर संगीत चलता है। लड़ाई में जाने वाले सैनिकों में उत्साह भरने के लिए बाजे बजाये जाते हैं। कथा के साथ कीर्तन जुड़ता है क्योंकि उत्तेजित भावनाओं में धर्मश्रद्धा का समावेश करना कहीं अधिक सरल पड़ता है। मध्यकालीन सन्तों ने अपनी प्रचार प्रक्रिया को सजीव,समर्थ और अन्तराल के मर्मस्थलों तक पहुँचाने के लिए संगीत का माध्यम अपनाया था। मीरा, सूर, कबीर आदि अधिकांश भाव जागृति के क्षेत्र में काम करने वालों ने संगीत का माध्यम अपनाया था। जो बड़ी मण्डली बना सकते थे वे चैतन्य महाप्रभु की तरह शानदार माहौल बनाते थे। जिन्हें उतना सरंजाम जुटाने की सुविधा नहीं थी, वे नारद की तरह एकाकी गायन वादन के दोनों कृत्य कर लेते थे।

शंकर का डमरू, सरस्वती की वीणा, कृष्ण की मुरली देवता और अवतारों के साथ भी आ जुड़ी थी। सच्चिदानन्द को, परब्रह्म की प्राप्ति में आनन्द का महत्वपूर्ण स्थान है और उसे जगाने बढ़ाने के लिए संगीत को भली प्रकार माध्यम बनाया जा सकता है।

शब्द ब्रह्म, नाद ब्रह्म की अध्यात्म तत्वज्ञान और साधना विधान में गहरी चर्चा है। इस साधना के प्रवीण पारंगत मेघ मल्हार गाकर वर्षा कराते और दीपक राग गाकर बुझी हुई ज्योति जलाते रहे हैं। यह प्रत्यक्ष भी हो सकता है और अलंकारिक भी। संगीत से शुष्क नीरस मनों में सरसता बरस सकती है और बुझे हुए उत्साह में नए सिरे से स्फूर्ति की ज्योति का उभार दृष्टिगोचर हो सकता है।

संगीत पर साँप लहराता है और हिरन चौकड़ी भरना भूल जाता है। यह उदाहरण मन की चंचलता और उद्दण्डता को भी नियन्त्रण में लाने के लिए प्रयुक्त हो सकता है। उद्विग्न, चिन्तित और असन्तुष्ट खिन्न विपन्न मनःस्थिति में संगीत का उपचार की तरह प्रयोग किया जा सकता है।

चिकित्सा विज्ञान के शोध संदर्भ में यह एक नया अध्याय जुड़ा है कि शारीरिक रोगों को संगीत की सहायता से सरलतापूर्वक अच्छा किया जा सकता है। इससे रक्त संचार और स्नायु शैथिल्य पर चमत्कारी प्रभाव प्रस्तुत होता देखा गया है। मानसिक रोगों में तो इसका प्रभाव और भी अधिक उत्साहवर्धक देखा गया है।

मन्दबुद्धि, विक्षिप्त, उद्विग्न, सनकी, आतुर आवेशग्रस्त लोगों को विशेष प्रकार की संगीत ध्वनियाँ सुनाकर रोगमुक्त किया गया है।

जापान में संगीत को बाल कक्षाओं में एक अनिवार्य विषय बना दिया गया है और बड़ी कक्षाओं में उसकी प्रवीणता प्राप्त करने के लिए कहा जाता है। सद्भावनाओं को उभारने और जीवन दिशा को आनन्द की ओर अग्रसर करने के लिए संगीत का महत्व सर्वत्र माना गया है।


अपने पाप सबके सामने प्रकट करना (kahani)

एक चोर सन्त नानक के पास पहुँचा और इस बुरी आदत से छुटकारा पाने का उपाय पूछा। नानक ने जो उपाय बताये वे उससे निभते न थे। एक के बाद एक उपाय बदलते-बदलते जब बहुत दिन बीत गये और किसी से भी वह आदत न छूटी तो उन्होंने चोर को बताया कि तुम अपने पाप सबके सामने प्रकट करने लगो।

चोर का बार-बार आना और पूछना समाप्त हो गया और आदत भी सुधर गई। पाप प्रकट करने से उसे लज्जा लगती थी, सो उसने चोरी करना ही बन्द कर दिया।


इक्कीसवीं सदी की परिणति

इक्कीसवीं सदी निकट आ रही है। उसमें अब मात्र 20 वर्ष शेष रह गये हैं। उस संदर्भ में मूर्धन्य मनीषियों से लेकर गवई गँवारों तक अनेकानेक ‘चर्चाएँ चलने लगी हैं। राजनेता और समाजशास्त्री एवं अर्थशास्त्री अपने-अपने अनुमान लगा रहे हैं। इनमें से बहुतों के पीछे ऐसे तर्क और तथ्य भी हैं जिन्हें अनदेखा, अनसुना नहीं किया जा सकता और न झुठलाया जा सकता है। हर प्रतिपादन में ऐसे तथ्य किसी न किसी मात्रा में रहते हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है।

भविष्य वक्ताओं में से जिन पर विश्वास किया जा सकता है, उनकी धारणाएँ इस सम्बन्ध में ऐसी हैं, जिनके सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा और सुना गया है। ईसाई धर्म में सेविंथ टाइम, मुस्लिम धर्म में चौदहवीं सदी और भविष्य पुराण में जिस काल को भयानक विपत्तियों, विभीषिकाओं से भरा हुआ बताया गया है, वह बीसवीं सदी का वह अन्तिम छोर है, जिसमें हम सब इन दिनों जीवन यापन कर रहे हैं।

जनसंख्या विस्फोट, दुर्भिक्ष, प्रदूषण, विकिरण, प्रकृति प्रकोप, अणु आयुध अन्तरिक्ष अधिकार जैसे कितने ही प्रसंग ऐसे हैं जो डरावने भविष्य की भयंकर तस्वीर उपस्थित करते हैं। लगता है कि अगली पीढ़ी को जीवनयापन उससे कहीं अधिक कठिन पड़ेगा जैसा कि अब है। हो सकता है कि उस दबाव में वर्तमान ही नहीं भावी पीढ़ी का भी कचूमर निकल जाय।

इसके ठीक विपरीत ऐसी आशा बाँधने वालों की भी कमी नहीं, जो भविष्य को आशा, उल्लास, प्रगति और समृद्धि से भरा पूरा बताते हैं। इनमें वैज्ञानिकों की मंडली अग्रणी है, जो विनाश के सरंजामों की समस्या को अत्यधिक महत्व देते हैं। उन्हें छोड़कर ऐसा एक वर्ग भी है जो कहता है कि विज्ञान की सहायता से इतने अधिक सुविधा साधन उत्पन्न कर लिए जायेंगे कि स्वल्प श्रम और धन खर्च करके ही विपुल सुविधा साधन उपलब्ध किये जा सकेंगे। फलतः लोग सुख चैन की जिन्दगी व्यतीत करेंगे। उनके कथन का आधार यह है कि अभाव स्वाभाविक उत्पादन का हो सकता है किन्तु उसके स्थान पर इतने कृत्रिम उपार्जन हस्तगत हो चलेंगे, जिनके सहारे मानवी आवश्यकताओं की सरलता पूर्वक पूर्ति हो।

इन दिनों बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या सबसे विकट है। पिछड़ापन संसार के दो तिहाई भाग पर छाया हुआ है। यह वह वर्ग है जो बिना, आगा पीछा सोचे अन्धाधुन्ध सन्तानोत्पादन करता है। फलतः प्रगति के लिए किये गये प्रयास पिछड़ जाते हैं और प्रजनन की घुड़-दौड़ कहीं आगे बढ़ जाती है। किन्तु अगले दिनों यह स्थिति न रहेगी। विज्ञान, प्रतिगामिता को पछाड़ेगा और अशिक्षा के अभिशाप से मनुष्य जाति को उबारेगा। लोग समझेंगे कि अनावश्यक प्रजनन जन्मदात्री के लिए एक प्रकार का प्राण लेवा संकट है। पिता के लिए- परिवार के लिए गरीबी को द्रुतगति से बढ़ाने वाला अभिशाप है। समूचे समाज पर तो वह देशद्रोह, समाजद्रोह की तरह विपत्ति बनकर उतरता है। विशेषतया इन परिस्थितियों में जिनमें कि अभाव और दरिद्र के दो पाटों में फँसा हुआ समाज बेतरह दम तोड़ रहा है। इस बुद्धि संगत विचारणा को अपनाने के लिए बाधित मनुष्य अपनी राह बदलेगा और प्रजनन की दर घटेगी। यह बदलाव बुद्धिपूर्वक न हो सका तो प्रकृति प्रकोपों के हण्टर चमड़ी उखाड़ लेंगे और विनाश के गर्त में गिरने की सम्भावना को रोकथाम के शिकंजे में कसेंगे।

अर्थशास्त्री कहते हैं कि अन्न वस्त्र की समस्या को ऐसे साधनों से हल किया जा सकेगा जिनका प्रयोग करने की अभी आवश्यकता नहीं पड़ी है। घास से आहार और भूसे से वस्त्र बनाये जा सकेंगे बहुमंजिली इमारतें बनाकर आवास व्यवस्था को इस सीमा तक बढ़ाया जा सकेगा जिसमें अबकी अपेक्षा इन चौगुने मनुष्य भी समा सकें। शिक्षा शास्त्री कहते हैं कि पढ़ने पढ़ाने के लिए स्कूलों अध्यापकों की आवश्यकता न पड़ेगी यह कार्य घर बैठे रेडियो, टेलीविजन के माध्यम से सम्पन्न हो जाया करेगा, जैसाकि इन दिनों खुले विश्व-विद्यालयों के माध्यम से हो रहा है।

भूगर्भ शास्त्री कहते हैं कि पृथ्वी की सह्य तापमान वाली परत के नीचे ऐसी सुरंगें बनाई जा सकेंगी जिनमें बिजली से चलने वाली रेलें यातायात एवं परिवहन की समस्या हल कर सकें। ऊर्जा की बढ़ती आवश्यकता हेतु सौर बैटरियां बार-बार चार्ज करते रहने से उतनी गर्मी उपलब्ध की जा सकेगी जिससे मनुष्य की दैनिक आवश्यकता तथा कल-कारखानों के लिए बिजली पैदा की जा सकेगी। कचरे को खाद के रूप में सड़ा कर उससे उर्वरता बढ़ाई जा सकेगी और शासन तन्त्र में साम्यवादी स्तर का ऐसा हेर-फेर होगा जिसमें ललचाने, अपराध करने पर उतारू होने की गुंजाइश ही न रहे। जब पैसा किसी के पास ही न होगा, जब वस्तु और श्रम का परिवर्तन होने लगेगा तो चोरी कोई किस चीज की करेगा? ईर्ष्या और प्रतिशोध उत्पन्न करने वाली वर्तमान विद्या ही जब बदल जायगी तो पुलिस कचहरी, जेल पर होने वाला विपुल खर्च सहज ही समाप्त हो जायेगा।

इतने पर भी एक समस्या ऐसी है जो प्रतिगामी और प्रगतिशील हर किसी को उलझन में डाले हुए है कि धरती का बढ़ता भार और हवा में कार्बन का अनुपात बढ़ने से मनुष्य आक्सीजन कहाँ से प्राप्त कर सकेगा? उस अभिवृद्धि में पेड़ों और जंगलों का तो सफाया ही होकर रहेगा। ऐसे दम से दम घुटने के प्राणघाती संकट से कैसे बचा जा सकेगा?

सीमित समुदाय के बीच ही मैत्री, सद्भावना, स्नेह, सौजन्य जैसे गुणों का निर्वाह हो सकता है। पर जब टिड्डी दल की तरह मनुष्य की भीड़ में पारस्परिक पहचान तक कठिन हो जायेगी तो सौजन्य का निर्वाह किस प्रकार, किसके साथ बन पड़ेगा। टिड्डी दल के बीच कौन पतंगा अपनी मैत्री निभा पाता है?

इक्कीसवीं शताब्दी कैसी होगी? इस संदर्भ में यों निश्चित रूप से तो कुछ नहीं कहा जा सकता है कि वह विनाश को साथ लेकर आ रही है या विकास को। पर इतना अवश्य है कि यह परिस्थिति मानवी सभ्यता के सम्मुख इस रूप में प्रस्तुत कभी नहीं हुई थी। भूतकाल की किसी समस्या और समाधान के साथ आज के समय की नाप-तौल नहीं हो सकती, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि इक्कीसवीं सदी में किस स्तर की कितनी जटिल समस्याएँ उत्पन्न होंगी और किसी अवगत, अनुभव के आधार पर उनका किस प्रकार हल निकल सकेगा।

दीपक के नीचे अँधेरा भी होता है। तथाकथित बहुमुखी प्रगति के साथ इन दिनों भी जटिलताओं और समस्याओं के अम्बार उबल रहे हैं। अगले दिनों की परिस्थितियों का ताना-बाना इतना उलझा हुआ होगा कि उसका हल निकलना तो दूर, यह कल्पना करना अभी तो कठिन प्रतीत होता है कि उसका स्वरूप क्या होगा और उसे सुलझाया कैसे जा सकेगा?

बढ़ता हुआ बुद्धिवाद, विज्ञान, अर्थशास्त्र, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार सब मिलकर एक ऐसा घोटाला बनते जा रहे हैं कि उनकी परिणति के सम्बन्ध में कुछ ठीक से कह सकना कठिन है। फिर भी हमें मनुष्य से आशा करनी चाहिए कि अनेकों संकटों के बीच गुजरते हुए उसने वर्तमान स्थिति तक पहुँच पाने में सफलता प्राप्त की है तो यह आशा भी करनी चाहिए कि वह भविष्य की डरावनी विभीषिकाओं को भी पार करके रहेगा।


विशेषज्ञ के पास पहुँचा (kahani)

एक महत्वाकाँक्षी व्यक्ति विशालकाय योजना बनाकर किसी विशेषज्ञ के पास पहुँचा और उसे कार्यान्वित करने के लिए क्या करना चाहिए, यह पूछा।

विशेषज्ञ ने कहा- “योजना को कार्यान्वित करने से पहले अपनी योग्यता और कुशलता बढ़ाओ। इसके बिना साधन और अवसर रहने पर भी कोई व्यक्ति बड़ी सफलताएँ नहीं पा सकता।”


गायत्री की महान महत्ता

देव संस्कृति को गायत्री महामन्त्र का उद्गम माना गया है। पुराणों में कथा है कि सृष्टि के आदि में जब ब्रह्माजी को विश्व-ब्रह्मांड की संरचना का काम सौंपा गया तो वे विचारने लगे कि मैं एकाकी उस महान कार्य को सम्पन्न करूं, न उनका ज्ञान अनुभव है और न साधन-उपकरण, फिर सौंपा हुआ कार्य कैसे पूरा हो?

असमंजस को दूर करने के लिए आकाश से आकाशवाणी हुई कि इन उपलब्धियों के लिए तप करना चाहिए तप शब्द से क्या तात्पर्य है, यह वे न समझ सके, तो दूसरी बार बताया गया कि गायत्री मन्त्र के अवगाहन को ‘तप’ कहते हैं। अगली जिज्ञासा के उत्तर में उन्हें गायत्री मन्त्र के 24 अक्षर बताये गये। उसके साथ तीन व्याहृतियां लगी हुई थीं। आदेशानुसार ब्रह्माजी गायत्री उपासना करने लगे। इसके पश्चात समयानुसार उन्हें ज्ञान और विज्ञान के रूप में दो उपलब्धियाँ हस्तगत हुईं। ज्ञान पक्ष को ‘गायत्री’ और विज्ञान पक्ष को ‘सावित्री’ कहा गया। गायत्री चेतना हुई और सावित्री प्रकृति। प्रकृति से पदार्थ बना और उसे गतिशील रखने वाली चेतना का इस विश्व-व्यवस्था में समावेश हुआ।

प्राणी बने। उनके शरीर पंच तत्वों से बने और उन सब में चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। अन्य जीवों में साधारण चेतना थी, किन्तु मनुष्य में पाँच प्राणों से मिली आत्म चेतना। इस प्रकार जड़ और चेतना का ढाँचा बनकर खड़ा हो गया। अन्य प्राणी तो प्रकृति पदार्थों से अपना निर्वाह करने लगे, पर मनुष्य को उचित अनुचित का निर्णय करने के लिए विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता पड़ी। ब्रह्मा जी ने इस प्रयोजन के निमित्त चार मुखों से चार वेदों के व्याख्यान किये। वेदों में कर्तव्य का- उचित-अनुचित का ज्ञान भी था और प्रकृति वस्तुओं का उपयुक्त उपयोग करके प्रगति साधनों की उपलब्धि का विज्ञान भी।

वेद दुरुह थे। उनकी विवेचना क्रमशः अन्यान्य ग्रन्थों में होती गई। उपनिषदें , ब्राह्मण ग्रन्थ, सूत्र, स्मृतियाँ, दर्शन आदि का विकास उन्हीं वेदों की सरल सुबोध विवेचना के रूप में हुआ, जिन्हें गायत्री के चार पुत्र माना जाता है। यह चार वेद ही ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। इस प्रकार धर्म शास्त्रों का समग्र ढाँचा बन गया। यह सभी एक वृक्ष के शाखा-पल्लव हैं। इन्हें ज्ञान-विज्ञान का भाण्डागार, उद्गम केन्द्र कह सकते हैं। ऐसे हैं यह गायत्री के चार पुत्र। प्रकारान्तर से भारतीय संस्कृति का, ज्ञान-विज्ञान का समग्र ढाँचा इसी एक महामन्त्र के प्रसार विस्तार के रूप में खड़ा हुआ है। इस महा समुद्र में से जिसे जिस स्तर के मणि-मुक्तकों की आवश्यकता होती है, वे उन्हें उसी के अनुपात में उपलब्ध कर सकते हैं।

इन विद्याओं के विस्तार ने ही इस भारत भूमि को “स्वर्गादपि गरीयसी” कहलाने का सौभाग्य प्रदान किया और इस तत्व ज्ञान का अवगाहन करने वाले मनीषियों की 33 कोटि गणना को धरती निवासी देव मानव के रूप में समस्त संसार में प्रख्यात किया। इन्हीं विशेषताओं, विभूतियों के कारण इस देव-भूमि को चक्रवर्ती , शासक, जगद्गुरु एवं स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी बनाया। उपलब्ध ज्ञान-चेतना से हमारे महान पूर्वज स्वयं ही लाभान्वित नहीं हुए, वरन् संसार के प्रत्येक क्षेत्र में जहां जिस प्रकार की आवश्यकता समझी, वहाँ उस प्रकार के अनुदान देकर उन्हें ऊँचा उठाया, आगे बढ़ाया। पुरातत्व शोधों से यह तथ्य प्रकट होता है कि भारत ने समस्त विश्व को अजस्र अनुदान प्रदान किये। उन अनुग्रहों के लिए समस्त विश्व उनका सदा ऋणी रहेगा। प्रकारान्तर से यह सम्पदा गायत्री के रत्न भण्डार से ही विकसित हुई, जिसका समस्त संसार ने लाभ उठाया।

पुरातन काल में मानवी काया में से देव-संस्कृति और देव-सम्पदा उपलब्ध करने का एक ही आधार था गायत्री मन्त्र। उसके दक्षिणमार्गी प्रयोग करके देवत्व विकसित हुआ और वाममार्गी तन्त्र-उपचारों से, दैत्य प्रकृति चमत्कारों से साधन सम्पन्न बढ़े। दिति की- अदिति की सन्तानें देव और दैत्य हुईं। दिति गायत्री का अदिति सावित्री का ही नाम है। दोनों ही प्रजापति ब्रह्मा की पत्नियाँ थीं।

इन महाविधाओं का आगे चलकर विशेष विस्तार होता गया। कालान्तर में वे एक से दो और दो से नौ हो गईं। इन्हीं को नव दुर्गायें कहते हैं। नवग्रहों में भी इनका देव आरोपण है। विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के बहाने अपने आश्रम में ले जाकर बला और अतिबला विद्यायें सिखाई थीं। बला अर्थात् ‘सावित्री’ अतिबला अर्थात् ‘गायत्री’। बला के प्रताप से समुद्र सेतु बाँधा गया और लंकादहन हुआ। अतिबला के प्रताप से रामराज्य की स्थापना हुई। बला के बलबूते शिव धनुष तोड़ा गया और अतिबला के माध्यम से शक्ति रूपा सीता को प्राप्त किया गया। इसी प्रकार अन्य अवतार भी गायत्री का अवलम्बन लेते रहे हैं। देवताओं ने भी उसी को माध्यम बनाया। ऋषि उसी के उपासक रहे।

भूः भुवः स्वः की तीन व्याहृतियां ब्रह्मा, विष्णु, महेश बनीं। इन्हीं से सरस्वती, लक्ष्मी और काली का प्रादुर्भाव हुआ। आगे का देव परिवार इन्हीं की शाखायें, प्रशाखायें हैं। ‘षट्शास्त्रों’ पर्ड्दशनों का प्रादुर्भाव भी इन्हीं से हुआ। समुद्र मन्थन का उपाख्यान भी इसी प्रकरण के साथ जुड़ता है।

गायत्री के चौबीस अक्षर 24 अवतार, 24 देवता, 24 ऋषि माने गये हैं। दत्तात्रेय के 24 गुरु भी यही हैं।

शरीर में 24 प्रमुख शक्ति केन्द्र माने गये हैं। मस्तिष्क में 24 शक्ति केन्द्र। गायत्री उपासना में जिन चौबीस अक्षरों का उच्चारण किया जाता है, उनसे इन सभी केन्द्रों में मन्थन जैसी हलचल मचती है और वे प्रसुप्त स्थिति से जागृत हो अपने-अपने चमत्कार दिखाने लगते हैं। उन्हीं को ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है।

स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर- यह आत्मा के ऊपर चढ़े हुये तीन आवरण हैं, उन्हें तीन व्याहृतियां समझा जा सकता है। ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग में इन्हीं तीनों की विवेचना हुई हैं। आकाश, पाताल और भू-भाग यही तीन हैं। उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन भी इन तीनों को कह सकते हैं। उपासना, साधना और आराधना का विज्ञान भी इन तीन व्याहृतियों के साथ जुड़ा हुआ है।

गायत्री को अमृत कल्पवृक्ष और पारस कहा गया है। कल्पवृक्ष वह जिसकी छाया में बैठने से सभी मनोकामनायें पूर्ण हों। अमृत वह जिसे पीकर अमर बना जाय। पारस वह जो स्पर्श मात्र से लौह जैसी सस्ती धातु को स्वर्णवत् बहुमूल्य बना दें। यह तीनों वस्तुयें कहाँ हैं? या कहाँ हो सकती हैं? यह पता नहीं। यह अलंकारिक हैं। कल्पवृक्ष नाम इसलिए दिया गया है कि अनावश्यक कामनाओं का समापन हो जाता है। जो उपयुक्त कामनायें हैं, उन्हें तो मनुष्य अपने भुजबल और बुद्धिबल के सहारे सहज पूरा करता रह सकता है। अमर शरीर तो नहीं हो सकता। अवतारी तक अमर नहीं हुये। जो जन्मा है उसे मरना भी पड़ेगा, पर जिसका यश विद्यमान है उसे अमर ही समझना चाहिए। ऋषि अमर हैं, महामानव अमर हैं। यही बात पारस के बारे में कही जा सकती है। साधारण और हेय परिस्थितियों में जन्मे, रहे व्यक्ति जिस ज्ञान के सहारे प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचे। कायाकल्प जैसी स्थिति प्राप्त कर सके उस तत्वज्ञान को पारस काया कल्प कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति न होगी।

गायत्री की प्रतिमा नव यौवना नारी के रूप में की गयी है और साथ ही उसे माता के रूप में मान्यता मिली है। इसका तात्पर्य नारी की श्रेष्ठता और वरिष्ठता स्वीकार करने से है। मनु ने कहा है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता बसते हैं। इस तथ्य को प्रत्यक्ष करने के लिए नव यौवना गायत्री के कलेवर में मातृ बुद्धि स्थापित करने के साथ अभ्यास में उतारने के लिए की गई है। यह अभ्यास नारी मात्र के लिए विकसित होना चाहिए और जिस अर्जुन एवं शिवाजी ने नारियों के प्रति मातृभाव का प्रदर्शन किया था वैसी ही अवधारणा नर की नारी के प्रति और नारी की नर के प्रति होनी चाहिए। पवित्र एवं उच्चस्तरीय समाज की स्थापना का यही आधार हो सकता है।

संसार में अपनी-अपनी रुचि के अनुरूप अनेक लोग अनेक वस्तुओं को महत्व देते हैं, किन्तु आप्त पुरुषों ने सद्बुद्धि को सर्वोपरि विभूति माना है। रामायणकार ने कहा है कि “जहाँ सुमति तहँ संपत्ति नाना।” गीताकार का कथन है- “नहि ज्ञानेन सदृश्य पवित्र मिह विद्यते” अर्थात् इस संसार में ज्ञान के समान और कुछ पवित्र नहीं है। जिसे सद्बुद्धि उपलब्ध हुई वह अपनी और दूसरों की अनेकानेक समस्याओं का सहज समाधान निकाल लेता है, किन्तु जिसे दुर्बुद्धि ने आ घेरा है उसका निज का तथा संपर्क क्षेत्र का सर्वनाश निश्चित है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री गायत्री को यदि प्रथम स्थान मिला है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

गायत्री के तीन चरणों में एकता, समता और ममता के तीन सूत्रों का समावेश है। भविष्य में एक राष्ट्र, एक भाषा, एक कानून विश्व में चलेगा। सभी लोगों के मौलिक अधिकार और सुविधा साधन समानता के स्तर तक लाने होंगे। विषमता चाहे आर्थिक क्षेत्र की हो, चाहे सामाजिक क्षेत्र की, वह हटानी होगी। तीसरा चरण ममता है, जिसका तात्पर्य है- उदारता आत्मीयता। इसी के अंतर्गत वसुधैव कुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु की मान्यता आती है और यह निर्देशन मिलता है कि जो बरताव हम दूसरों द्वारा अपने लिए किया जाना पसन्द नहीं करते। वह दूसरों के साथ भी न बरतें। इसमें सज्जनता, शालीनता और सद्भावना का उत्कृष्टता का पूरी तरह समावेश हो गया है।

चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में न्याय निष्ठा का समावेश- यह तीनों मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखती हैं। गायत्री के तीन चरणों में इन तीनों को अपनायें जाने का निर्देश है।

सत्य, प्रेम, न्याय के आदर्शों को गायत्री के तीन चरण माना जा सकता है। इस मन्त्र को संसार का सबसे छोटा, किन्तु सबसे सारगर्भित धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। गायत्री ने हमारा भूतकाल शानदार बनाया, भविष्य को समुन्नत बनाने जा रही है। आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान में हम उसका महत्व समझें और दूसरों को समझाने का प्रयत्न करें।


महाभारत युद्ध में मरे योद्धा(kahani)

कुरुक्षेत्र के सुविस्तृत मैदान में दूर-दूर तक महाभारत युद्ध में मरे योद्धाओं की लाशें बिछी पड़ी थीं। गिद्ध और कौए उन्हें नोंच-नोंच कर खा रहे थे। उसे घमासान के कारण सब कुछ कुचला ही कुचला पड़ा था।

शिष्यों समेत शमीक ऋषि उधर से निकले तो इस महानाश के बीच दो पक्षि-शावकों को एक गज घंटा के पास चहचहाते देखा गया। शिष्यों को आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने महर्षि से पूछा- “भला, यह सब कुछ कुचल डालने वाले घमासान में ये बच्चे कैसे बच गये?”

शमीक ने कहा- शिष्यों! युद्ध के समय आकाश में उड़ती हुई चिड़िया को तीर लगने से वह भूमि पर गिर पड़ी और उसने दो अण्डे प्रसव किये। संयोगवश एक हाथी के गले का घण्टा टूटकर अण्डों पर गिरा जिससे उनकी रक्षा हो गई। अब परिपक्व होकर वे बच्चे के रूप में घण्टे के नीचे की मिट्टी हटाकर बाहर निकले हैं, सो तुम इन्हें उठालो और आश्रम में ले जाकर इनका पालन-पोषण करो।

एक शिष्य ने पूछा- “जिस दैव ने इन बच्चों की, ऐसे महासमर में रक्षा की क्या वह इनका पोषण न करेगा? महर्षि ने कहा- प्रिय, जहाँ दैव का काम समाप्त हो जाता है वहाँ से मनुष्य का कार्य आरम्भ होता है। दैव ने मनुष्य को दया और सामर्थ्य का वरदान इसलिए दिया है कि उनके द्वारा दैव के छोड़े हुये शेष कार्य को पूरा किया जाय।”


भोजन के साथ श्रद्धा और आनन्द जुड़ा रखें

खाने को तो जीवित रहने वाले प्राणी सभी खाते हैं पर उनमें बिरले ही ऐसे हैं जो उसके गुण दोष देखते और सऊर सलीकों के साथ खाते हैं। आमतौर से विभिन्न प्रकार के स्वादों के जायके लेने के लिए थाली में अनेक कटोरियाँ, टपालियाँ सजाई जाती हैं और एक-एक ग्रास सबका स्वाद लेते हुए खाया जाता है। यह बुरी आदत है। एक हाड़ी में चावल, चना, नमक, चीनी आदि डालकर पकाई जाय तो वह नियत समय पर पक नहीं पावेगी। उसमें से कुछ कच्चा रह जायगा कुछ पक्का स्वाद और गुणों की विचित्रता भी उसके परिपाक को बिगाड़ कर रख देगी। इससे खाने वाला स्वाद का जायका भले ही उठाले पर उसके पालन में- रस बनने में तो भारी कठिनाई पड़ेगी व्यंजनों के भरे थाल एक प्रकार से पेट खराब करने और स्वास्थ्य बिगाड़ने का आमन्त्रण है।

अच्छा यही है कि एक समय में एक सूखी और एक गीली वस्तु का ही उपयोग किया जाय। मसाले कम से कम डाले जायं और शक्कर के बिना काम चलता हो तो गुड़ या शहद काम में लाया जाय। हरी सब्जियाँ उबली हुई और फल तथा सलाद का सहकार रखा जाय। बस इस परिधि में भोजन का चयन करना चाहिए। मिष्ठान्न पकवान, अचार, आदि से परहेज रखा जाये तो ही अच्छा है। देखना यह है कि स्वास्थ्य बिगाड़ का स्वाद चखना या स्वाद का ध्यान रखते हुए स्वाद पर नियन्त्रण करना। दोनों कदम एक साथ नहीं उठ सकते। एक आगे रहता है। दूसरा पीछे। उत्तेजक स्वाद और सन्तुलित स्वास्थ्य एक साथ नहीं रह सकते।

खाने के समय उतावली करना बुरी आदत है। कहा जाता है कि रोटी को पिया जाय और पानी को खाया जाय। इसका तात्पर्य यह है कि अन्न हो या जल उसे मात्र पेट में ही नहीं मुँह में भी टिकने का समय मिलना चाहिए। भोजन भले ही दलिया खिचड़ी जैसा पतला हो रोटी-बाटी की पर ग्रास को दाँतों में इतना अधिक पीसना चाहिए कि उसे निगलने के लिए कुछ प्रयास न करना पड़े। मुँह के स्रावों का इतना समावेश हो जाय कि वह भीतर गले से नीचे कब खिसक गया इसका पता भी न चले। जल्दी-पल्दी में दो चार-बार उलट-पुलट कर पानी के सहारे निगल जाने का सीधा तात्पर्य यह है कि मुँह के बदले का काम भी पेट पर लाद देना और उसे दुहरी मेहनत करने के लिए बाधित करना। यही हुआ रोटी को पीना। पानी को पीना खाना का तात्पर्य है कि हर घूँट को मुँह में कुछ समय के लिए ठहरने देना, ताकि उसमें भी मुंह के स्रावों का समावेश हो जाय। जिनके लिए चम्मच से पानी सम्भव है वे वैसा करे अन्यथा घूँट मुँह में भरकर कुल्ला करने करने की तरह एक दो बार उसे मुंह में घुमाये और फिर पी ले।

भोजन के साथ श्रद्धा और आनन्द का समावेश होना भी उतना ही आवश्यक है। भोजन को पोषक औषधि एवं भगवान का प्रसाद माना जाय। इसी भाव से उसे ग्रहण किया जाय। औषधि रूप आहार हमारी दुर्बलता और रुग्णता को दूर करता है इसका भाव मन में भरे रखा जाय। जो आहार थाली में सामने आये हैं उसे भी भावनापूर्वक शिरोधार्य किया जाय। किसी वस्तु में रुचि हो या उसका स्वाद प्रिय न हो तो उठाकर अलग रखा जा सकता है। यह एक स्वाभाविक और सहज चयन हुआ। किसी वस्तु के मन में अनुरूप न होने पर चिढ़ जाना, बड़बड़ाना, या उठाकर फेंक देना। यह अन्न भगवान का प्रत्यक्ष निरादर है। बनाने में रोटी का कोई भाग कच्चा रह गया हो या जल गया हो तो उतना अंश बिना मुँह पर किसी प्रकार का तनाव लाये उसे हटाया जा सकता है। किन्तु अश्रद्धा या नाराजी किसी भी स्थिति में मन पर नहीं आने देना चाहिए। मन के कुपात्र में अमृतोपम भोजन भी विष तुल्य हो जाता है।

भोजन करते समय बात-चीत करनी पड़े तो उतनी ही करनी चाहिए जितनी नितान्त आवश्यक हो। ज्यादा बातें सुनते हुए भोजन करने से वह न ठीक तरह पिस पाता है और न उनका मनोरम स्वाद ही आता है।


बिगड़ती परिस्थितियों का एक मात्र उपचार

यज्ञ पुरुष के अन्याय चेतन सत्ताओं की तरह दो पक्ष माने गये हैं। एक कलेवर दूसरा प्राण। दोनों के संयोग से ही एक पूर्णता बनती है। इनमें से एक के विलग हो जाने पर दूसरा पक्ष महत्वहीन बन जाता है।

यज्ञ का कलेवर है अग्निहोत्र- हवन। प्राण है, परमार्थ, समर्पण। विचारणा और क्रिया का संयोग ही पूर्णता के रूप में विकसित होता है और अभीष्ट की पूर्ति करता है।

अग्निहोत्र प्रतीक है और परमार्थ उसकी मूल सत्ता। अग्नि तो चूल्हे में भी जलती है। उसके अलग से भट्टी में जलाकर यजन शाकल्प डाला और जलाया जा सकता है। फिर होत्र के संयम, नियम पुरोहित के स्तर एवं मन्त्रोच्चारण, कर्मकाण्डों के सुविस्तृत समुच्चय की क्या आवश्यकता रहती है। पदार्थ को वायुभूत बनाकर उसे अन्तरिक्ष में सुविस्तृत बनाने और वातावरण को ऊर्जामय बनाने का प्रयोजन तभी पूरा होता है जब विधिवत् उसे सम्पन्न किया जाय। इसलिए है तो अग्निहोत्र भी आवश्यक। पर उससे भी अधिक आवश्यक है कर्ताओं, आयोजकों की सेवा भावना। उसी आधार पर अदृश्य चेतन जगत में सद्भावनाओं का संचार होता है। अन्यथा केवल वायु प्रदूषण का परिशोधन होने भर का प्रयोजन पूरा होता है।

कार्य दोनों ही आवश्यक हैं। वायुमण्डल संशोधन के लिए अग्निहोत्र और वातावरण परिमार्जन के लिए यज्ञ। इन दोनों का समन्वय ही समग्र उद्देश्य की पूर्ति करता है। इन दिनों कारखानों, रेल मोटर जैसे वाहनों से निकलने वाला धुँआ, लोगों के स्वास्थ्य को बुरी तरह बिगाड़ रहा है। जमीन को खनिज, कोयला, तेल आदि निकालने के लिए पोला किया जा रहा है, जिससे आये दिन भूकम्प आते और ज्वालामुखी फटते हैं। इतना ही नहीं कीटनाशक दवाओं और कारखानों के विषैले रसायनों से मिश्रित नदी नालों में जाता है। विषैले बादल बरसते हैं। अणु आयुधों का परीक्षण विकिरण का विस्तार करता है। यह सभी विडम्बनाएँ मिलाकर मनुष्य, पशुओं को रोगी बनाती और वनस्पतियों को क्रमशः विषैला करती जा रही हैं। फलतः नये-नये किस्म के रोग फैलते और मन्दबुद्धि, अविकसित बच्चे पैदा होते हैं। नये-नये प्रकार के रोग कीटाणु पैदा होते और संकट उत्पन्न करते हैं। इनके निवारण का संयुक्त उपचार सामूहिक मन्त्रोच्चार मिश्रित अग्निहोत्र है। उसे भौतिक जगत के बिगड़ते हुए सन्तुलन को बनाने का अचूक उपाय समझा जा सकता है।

इसलिए हर स्थान की स्थानीय विपत्तियों का निवारण करने के लिए जगह-जगह अग्निहोत्रों की व्यवस्था की गई है। प्रज्ञा परिजनों से कहा गया है कि वे अपने-अपने जन्म दिवसोत्सव मनायें। जिससे उनके घर परिवार की, गाँव क्षेत्र की विषाक्तता दूर हो।

साथ ही यह भी कहा गया है कि युग सन्धि के इन विपत्ति भरे वर्षों में हर गाँव में एक छोटा सामूहिक यज्ञ हो। प्रयोजन है पाँच वेदी वाले यज्ञ से। इसमें सभी प्राण प्रतिभा सम्पन्न लोगों को सम्मिलित होना चाहिए। आवश्यक नहीं कि सभी आहुतियाँ दें और वेदियों पर बैठें। सह मंत्रोच्चारण एवं पूर्णाहुति देवपूजन आदि में सम्मिलित रहने, भस्म धारण, घृत अवघ्राण, मार्जन जल सिंचन, परिक्रमा करना भी अग्निहोत्र में सम्मिलित होता है। भले ही वेदियों पर कम व्यक्ति ही बैठें। पांच वेदियों पर चारों ओर एक-एक व्यक्तियों को यजन के लिए बीस व्यक्ति बिठाने से भी काम चल सकता है।

यज्ञ शब्द पुण्य, परमार्थ त्याग बलिदान, सेवा आदि के अर्थ में आता है। यही अग्निहोत्र का प्राण है। गणना में 29 स्थानों पर यज्ञ शब्द आया है। उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजन के लिए हुआ है। यज्ञकर्ताओं को, होता, यज्ञमानो और संयोजकों को अग्निहोत्र के साथ ही सत्प्रवृत्ति संवर्धन का ऐसा कार्य भी हाथ में लेना चाहिए, ऐसे पथ पर कदम बढ़ाना चाहिए जिससे लोकमानस का परिष्कार एवं पुण्य परम्पराओं का प्रचलन होता हो।

त्याग के साथ परमार्थ जुड़ा हुआ है। इसलिए व्यक्तिगत यज्ञों में अपने दोष-दुर्गुणों में से कम से कम एक का परित्याग और सद्गुणों में से एक का अभिवर्धन करना चाहिए। यह बन पड़े तो समझना चाहिए कि यजन कर्म को प्राणवान भी बनाया गया मात्र शाकल्प हो जाय तो समझना चाहिए कि अग्निहोत्र का क्रिया कलाप भर सम्पन्न हुआ। यदि उसके साथ सत्प्रवृत्ति संवर्धन का प्रयास भी चला तो समझना चाहिए कि अग्निहोत्र के साथ उसके प्राण यज्ञ प्रयोजन का भी समावेश हो गया और उसकी स्थिति जीवन्त जैसी बन गई।

परमार्थ क्या होना चाहिए? यों असमर्थ को दान एवं लोकसेवियों को दक्षिणा देना भी परमार्थ है, पर आज की स्थिति में वातावरण में प्रदूषण भरने वाला आस्था संकट ही है। जन मानस में लोभ, मोह और अहंकार अत्यधिक भर गया है। मर्यादाओं के उल्लंघन में हर कोई शूरवीर बनता है। इन्हीं बढ़ती हुई अनास्थाओं ने सूक्ष्म जगत में दुर्बुद्धि का दुष्प्रवृत्तियों का घटाटोप भर दिया जाता है। इसका शमन करना, सामयिक पुण्य परमार्थ है। जन साधारण को सद्बुद्धि प्रदान करने वाली प्रेरणाएँ भर देना, यही है इन दिनों सबसे बड़ा परमार्थ। चिन्तन से चरित्र, चरित्र से व्यवहार- व्यवहार से वातावरण बनने की बात स्पष्ट है। अस्तु लोकचिन्तन में सदाशयता का अनुपात अधिकाधिक भरने के लिए विचार क्रान्ति का- प्रज्ञा विस्तार का कार्यक्रम हाथ में लेना चाहिए। समस्त समस्याओं का यह एक ही हल है। यज्ञों के अनेक स्वरूप हैं। इनमें से इन दिनों हमें ज्ञानयज्ञ को ही प्राथमिकता देनी चाहिए और इसके लिए जितना कुछ न्यूनाधिक बन पड़े उसे करना चाहिए। इस संदर्भ में झोला पुस्तकालय के निमित्त प्रयास करना ऐसा है जिसे युग धर्म एवं आपत्तिकालीन अनिवार्य सेवा कार्य कहा जा सकता है। याज्ञिकों को- यज्ञ प्रेमियों को युग साहित्य पढ़ने पढ़ाने के लिए समयदान, अंशदान लगाने के लिए व्रतशील होना चाहिए। इसकी कार्य पद्धति बनाने और संकल्पपूर्वक उसे चलाने का साहसिक कदम बढ़ाना चाहिए। अदृश्य जगत का चेतनात्मक वातावरण उसी उपाय से परिशोधित किया जा सकता है। यही प्रक्रिया यज्ञ आयोजनों के साथ जोड़ रखनी चाहिए। प्रज्ञा अभियान के आयोजनों के साथ जुड़े हुए विभिन्न दृश्य-श्रव्य क्रिया-कलाप इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं।

चेतनात्मक वातावरण का परिशोधन साधनात्मक कृत्यों की भी माँग करता है। इन दिनों 240 करोड़ प्रतिदिन का गायत्री जप और 240 लाख गायत्री चालीसा पाठ का भी व्यापक कार्यक्रम चलाया गया है। इनकी संख्या में और भी जितना अधिक अभिवर्धन हो सके करना एवं कराना चाहिए। यह साधना जितनी बढ़ेगी उतना ही अदृश्य वातावरण में दैवी तत्वों का अभिवर्धन होगा।

इन दिनों प्रज्ञा प्रशिक्षण की विश्व विद्यालय स्तर की योजना हाथ में ली गई है। इसके लिए सभी समर्थ शाखाओं एवं स्वाध्याय मण्डलों को अपने-अपने यहाँ एक विद्यालय की स्थापना करनी चाहिए जिसमें कम से कम दस प्रज्ञा प्रचारक प्रशिक्षण प्राप्त करें। प्रशिक्षण के उपरान्त वे न्यूनाधिक मात्रा में जो गतिविधियाँ अपनायेंगे उनसे चेतनात्मक वातावरण का स्तर ऊँचा उठाने में असाधारण सहायता मिलेगी।

जहाँ भी यज्ञ आयोजन हों वहाँ उसमें भाग लेने वालों, सहयोग देने वालों में से प्रत्येक को प्रेरणा दी जानी चाहिए कि वे उस प्रयोजन के लिए जितना सम्भव हो उतना करने का प्रयत्न करें।

यज्ञ की देव-दक्षिणा में यही समयदान, अंशदान प्रत्येक भावनाशील को करना चाहिए और निश्चय को दृढ़तापूर्वक निबाहना चाहिए।

यज्ञ के अवसर पर यदि जीप टोलियों का पैट्रोल खर्च देने के उपरान्त कुछ बनता है तो उसे पड़े बाबाजियों को बिखेरने की अपेक्षा यह हजार गुना उत्तम है कि शास्त्र को समर्थ बनाने के लिए जिन प्रचार उपकरणों की व्यवस्था करने के लिए कहा जाता रहा है उसे जुटाने में वह पैसा लगा दिया जाय। हर समर्थ शाखा के पास प्रज्ञा प्रशिक्षण सिखाने के लिए साहित्य तथा संगीत साधन होने ही चाहिए। शिक्षितों के लिए प्रज्ञा पुस्तकालय, अशिक्षितों के लिए टेप रिकार्डर, स्लाइड प्रोजेक्टर, लाउडस्पीकर का प्रबन्ध किया जाय। इन सब साधनों की जहाँ भी व्यवस्था है समझना चाहिए कि वहाँ प्राणवान प्रज्ञापीठ बनकर खड़ी हो गई। यों निष्प्राण ईंट चूने की इमारतें तो प्रज्ञापीठ के साथ से बनी खड़ी है जहाँ आरती, बुहारी भर की चिन्ह पूजा हो जाती है। भले ही निजी इमारत न हो पर प्रचार उपकरणों का सरंजाम यदि जुटा लिया गया है तो समझना चाहिए कि इमारत का अभाव कुछ खटकने वाला नहीं है। चलती फिरती प्रज्ञापीठ की आत्मा भी उस प्रयोजन की पूर्ति कर सकती है जिसके लिए प्रज्ञापीठें बनाई गई थीं।

यह भी हो सकता है कि गाँव के निकट ही कोई पुराना देवालय धर्मशाला आदि हो तो उसका जीर्णोद्धार करके वहाँ व्यायामशाला एवं स्कूली छात्रों के लिए संस्कार प्रशिक्षण का प्रबन्ध कर लिया जाय।

उपरोक्त कार्यों में से जो भी कृत्य करना हो तो एक वेदी या पाँच वेदी वाले यज्ञ आयोजनों के साथ शुभारम्भ किया जाय।

अग्निहोत्र खर्चीले हों यह आवश्यक नहीं। अपने यज्ञों में अन्न नहीं जलाया जाता। वनस्पतियों का ही प्रयोग होता है, पर यदि उसमें भी कमी पड़ती दीखे उतना प्रबन्ध न हो सके तो घी और गुड की बतासे जितने आकार की गोलियां बना लेनी चाहिए और उन्हीं की आहुतियाँ देते रहना चाहिए। यह सबसे सस्ता माध्यम है। एक रुपये में प्रायः 240 आहुतियाँ हो सकती हैं। कुण्ड खोदने की अपेक्षा वेदियाँ बनाने का उपक्रम इसीलिए किया गया है कि लोगों को अधिक भाग-दौड़ का, अधिक साधन जुटाने का झंझट न उठाना पड़े। बाँस के खम्भे। पत्र-पल्लवों की सज्जा। पीली मिट्टी या बालू की वेदी। लीप-पोतकर उस पर रंग-बिरंगे चौक पूर दिये जायँ तो इतने भर से यह कार्य सम्पन्न हो जाता है जिसके लिए भारी भाग-दौड़ करने और पैसा खर्चने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

शतपथ ब्राह्मण में जनक और याज्ञवल्क्य का संवाद आता है। जिसमें जनक पूछते हैं कि जिसके पास यज्ञ के साधन नहीं हैं। वे उस आवश्यक धर्म कृत्य का निर्वाह कैसे करें। इस प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य अपेक्षाकृत अधिक सस्ती और सुगम वस्तुएँ बताते चले गये हैं और अन्त में यहाँ तक उतर आये हैं कि मात्र समिधा के टुकड़े लेकर उन्हीं को शाकल्प मान लिया जाय और अग्निहोत्र कर लिया जाय, किन्तु उसकी उपेक्षा किसी भी स्थिति में न की जाय। शरीर को भोजन देने की तरह आत्मा के परिपोषण के लिए यज्ञ कर्म का दिनचर्या में सम्मिलित रहना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। उसमें भूल करना धर्म कर्तव्य की अवहेलना है।

इन दिनों समय का अभाव, पैसे का अभाव, साधनों का अभाव सर्वविदित है। खाद्य-पदार्थों की कमी और उन्हें जलाने या तार्किक लोगों द्वारा कटु आलोचना होने की बात स्पष्ट है। इसलिए बहुत सोच विचार के उपरान्त वह रास्ता ढूंढ़ निकाला है जिसमें शास्त्र मर्यादा का निर्वाह एवं युग अनुष्ठान का निर्वाह भी भली प्रकार सम्पन्न हो सके और भागदौड़ पैसे की कमी, कटू आलोचना आदि के झंझटों से बचा जा सके।

हीरक जयन्ती के उपलक्ष में एक लाख यज्ञों का जो संकल्प है वह मात्र अग्निहोत्र नहीं है और न किसी निहित स्वार्थी की प्रवंचना है वरन् उसके साथ-साथ इतने अधिक कार्यक्रमों का समावेश है जिसे पुण्य परमार्थ ही नहीं युग परिवर्तन का वातावरण विनिर्मित करने की दृष्टि से अतीव उपयोगी भी कहा जा सकता है। हर यज्ञ आयोजन के साथ ऐसी वनस्पति वाटिका लगाने का भी प्रावधान है जो न केवल वायुमण्डल को शुद्धि करे वरन् भविष्य में यज्ञ सामग्री बनाने के भी काम आ सके।

उपयोगिता और आवश्यकता समझी जानी चाहिए और वायुमण्डल तथा वातावरण संशोधन की दृष्टि से उपरोक्त कार्यक्रमों को पूरा करने की उमंग जागनी चाहिए।


Quotation

उचित कार्य साहसपूर्वक करने वाले को किसी के आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं। श्रेष्ठ कार्य स्वयं ही आशीष स्वरूप होते हैं।


शरीर की रुग्णता में मनोविकार प्रधान कारण

शरीर पर मात्र भोजन का ही प्रभाव नहीं होता। विचारों का भी उस पर प्रभाव होता है। विशेषकर मनोविकारों की प्रतिक्रिया किसी न किसी रोग के रूप में प्रकट होती है। जल्दी उत्तेजित होने वाले, आतुर, क्रोधी व्यक्ति का रक्त आवश्यकता से अधिक दौड़ने लगता है। बढ़ा हुआ रक्तचाप ऐसे ही लोगों में देखा जाता है। चिकित्सा करनी हो तो रक्त दौड़ हलकी करने वाली दवाएं सेवन करने से ही काम न चलेगा वरन् स्वभाव की उत्तेजना को हटाने, मन को शान्त रहने की भी आदत डालनी होगी।

हृदय की धड़कन बढ़ने का चिन्ता से विशेष सम्बन्ध है। भय की आशंका मन पर छाई रहे तो हृदय की चाल असामान्य हो जाती है कभी धड़कन बढ़ जाती है कभी उसकी चाल धीमी पड़ जाती है। हृदय की कमजोरी को ही इसका कारण मानना ठीक न होगा। हृदय का बल बढ़ाने वाली औषधियों से ही काम न चलेगा वरन् स्वयं में निश्चिन्तता, स्थिरता और धैर्य जैसे गुण स्वभाव का अभ्यास करना होगा।

शरीर में कमजोरी, आँखों के आगे अँधेरा आना, प्रमेह, बहुमूत्र जैसे रोगों के लिए पौष्टिक औषधियाँ सेवन करना अपर्याप्त है। कामुकता के विचार मन में भरे रहना और विषय भोग की आदत बढ़ा लेना ऐसे रोगों का प्रमुख कारण है। उन्हें स्थायी रूप से दूर करना हो तो ब्रह्मचर्य का महत्व समझना चाहिए और संयमशीलता अपनाने का स्वभाव बनाना चाहिए।

ईर्ष्यालु स्वभाव वालों का पेट खराब हो जाता है। अपच रहता है। दस्त, पेट फूलना, डकारें आना उन लोगों को विशेष रूप में होता है जिन्हें कुढ़न की आदत होती है। जरूरत से अधिक कृपणता अपनाने वाले, पैसा होते हुए भी आवश्यक कामों के लिए खर्च न करने वाले, संग्रह करने और मालदार बनने की आदत वाले अपनी पाचन शक्ति गँवा बैठते हैं। उन्हें पाचक चूर्ण गोली, अरिष्ट, आसव आदि देते रहने पर भी पेट ठीक नहीं होता। आदत सुधारने और दिनचर्या शुद्ध रखने पर इन शिकायतों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है।

शत्रुता, ईर्ष्या, कुढ़न, भय, आशंका के कारण कई प्रकार के रक्त विकार हो जाते हैं। अनिद्रा का प्रधान कारण चिन्तातुर या भयभीत रहना होता है। इन रोगों का इलाज कराते समय निर्भयता का अभ्यास करना चाहिए, साहस बटोरना चाहिए और हिम्मत बढ़ानी चाहिए कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। स्वभाव में निर्भीकता बढ़ने पर बिना दवा के भी ऐसे रोग अच्छे हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि सदा जी घबराता रहे, किसी विपत्ति के आ टूटने की आशंका बनी रहे तो कीमती दवाओं का इलाज भी व्यर्थ चला जाता है।

बदला लेने की, नीचा दिखाने की, षड़यन्त्र रचने की मनः स्थिति हो चले और वैसी ही योजनाएँ बनाते रहने पर प्रत्यक्षतः कुछ कर न पाने पर भी भीतर की उधेड़ बुन सिर दर्द जैसी बीमारियाँ खड़ी कर देती है। इलाज कराते रहने पर भी कारगर लाभ नहीं होता। ऐसे लोग अपना मन हलका रखें, वैर भाव निकाल दें, हँसते-हंसाते रहें तो अनेकों बीमारियों से ऐसे पिण्ड छूट जाता है मानों वे थी ही नहीं।

मन को हल्का रखा जाय, सदैव मुसकाते, दूसरों को प्रसन्न करते रहने की आदत डाल ली जाय, सात्विक विचार रखे जाएँ तो शरीर भी अनायास ही रोगमुक्त रहने लगेगा। स्वस्थ जीवन की यह एक महत्वपूर्ण कुँजी है।


Quotation

दुराग्रहपूर्वक गलत राह पर चलते जाने की अपेक्षा भूल प्रतीत होने पर लौट पड़ना ही बुद्धिमानी है।


अपनों से अपनी बात


तुम्हें अपने किये का फल मिल गया (kahani)

विश्व विख्यात हकीम लुकमान जिस नगर में रहते थे वहीं एक सेठ भी रहता था जो अपने नौकरों पर सख्ती करने के लिए मशहूर था। उसका एक नौकर जो हकीम लुकमान के ही रूप रंग का था एक दिन भाग खड़ा हुआ। उसकी खोज करते हुए सेठ की भेंट लुकमान से हो गयी। उसने लुकमान को ही नौकर समझकर पकड़ लिया और घर लाकर काम में लगा दिया। लुकमान ने भी कोई प्रतिरोध नहीं किया, मेहनत से काम में जुट गये। एक वर्ष में मकान बन गया। तब एकाएक पुराना नौकर भी आ उपस्थित हुआ और अपनी भूल के लिए सेठ से क्षमा-याचना करने लगा। सेठ को यह बात तो भूल गया और यह चिन्ता छा गयी कि धोखे से किसे पकड़ लिया। वह लुकमान के पास गया बोला- सच सच कहिये आप कौन हैं, मुझसे बड़ी गलती हो गयी। “हकीम लुकमान’ लुकमान ने हँसकर कहा जो हुआ उसका दुःख न करो, तुम्हें अपने किये का फल मिल गया और मुझे मकान बनाने की विद्या मालूम हो गयी।


पंचकोशी-संपदा

(मंगल विजय)


पंचकोशी-संपदा (kavita)

देव-दुर्लभ हमें देह दी आपने। कम नहीं यह कृपा जो कि की आपने। निम्नतम योनियों में भटकते कई, तब हमें दी, मनुज देह दी आपने॥

‘अन्नमय-कोश’ सब साधनों के सहित, पुण्य-पूंजी कमाने हमें दे दिये। जब तरसते कई, कौड़ियों के लिये, तब अनूठे खजाने हमें दे दिये॥1॥

‘प्राणमय-कोश’ की श्रेष्ठ-सम्पत्तियाँ। वीर बजरंग की सात्विक-शक्तियाँ। प्राण का हो मिलन बस महा प्राण से, वे मचलती हुई प्राण-अनुरक्तियाँ॥ साहसी-प्राण, अन्याय से जूझने , लोक हित में जुटाने हमें दे दिये। जब तरसते कई, कौड़ियों के लिये, तब अनूठे-खजाने हमें दे दिये॥2॥

दे दिया आपने शुद्ध अन्तःकरण। कर सके चेतना ताकि प्रज्ञा वरण। हो सके मानवी-चेतना में उदय, दिव्य-अलोक की किलकिलाती किरण॥ दीप ज्योतिर्मय-‘मनोमय-कोश’ के लोक-पथ जगमगाते हमें दे दिये। जब तरसते कई कौड़ियों के लिये, तब अनूठे-खजाने हमें दे दिये॥3॥

सम्पदाएँ ये ‘विज्ञान मय-कोश’ की। भाव-संवेदनाएँ, विमल-बोध की। आत्मवत् सर्व भूतेषु की भावना, कर रही है शमन अग्नि-विद्वेष की॥ भक्ति के भाव-विह्वल कि पर-पीर पर, स्नेह रस छलछलाने हमें दे दिये। जब तरसते कई, कौड़ियों के लिये, तब अनूठे-खजाने हमें दे दिया॥4॥

दिव्य ‘आनंदमय-कोश’ का क्या कहें। आत्म-आनंद के मौन-निर्झर बहें। शेष रहती नहीं, द्वैत की भावना, ब्रह्म रस से सने हम अहिर्निश रहें॥ शाँति, संतोष के, तृप्ति के, तुष्टि के, स्त्रोत पीने, पिलाने हमें दे दिये। जब तरसते कई, कौड़ियों के लिये, तब अनूठे-खजाने हमें दे दिये॥5॥

कोश सौंपे नहीं हैं, क्षरण के लिये। भोग में ही खपाकर मरण के लिये। बाँटने के लिये दी अतुल-सम्पदा, हर अभावों ग्रसित दीन-जन के लिये॥ देवता हों प्रकट इस, मनुज-देह में, पुण्य पावन सोम, अमृत पिये। जब तरसते कई, कौड़ियों के लिये, तब अनूठे-खजाने हमें दिये॥6॥

*समाप्त*