जीवन कलाकार हाथों से सँजोया जाय

कलाकारिता के अनेकों पक्ष हैं। पर सबकी व्याख्या एक ही है कि अनगढ़ को सुघड़ में परिणत कर दें। कुम्हार बेकार मिट्टी को खिलौनों में बदल देता है। स्वर्णकार धातु खण्डों से सुहावने आभूषण बनाता है। लोहे को गलाने वाले, उससे उपयोगी पुर्जे बनाकर अच्छी-खासी मशीन खड़ी कर देते हैं। मूर्तिकार पत्थर के छोटे-बड़े टुकड़ों को छैनी-हथौड़े की सहायता से देव प्रतिमा में बदल देते हैं।

मनुष्य के हाथ में सबसे बहुमूल्य वस्तु है - “जीवन” इसे हीरे के समतुल्य समझा जा सकता है। हीरा वस्तुतः पका हुआ कोयला है। उसी खदान में पड़ा रहे तो उसकी कीमत कानी-कौड़ी के बराबर भी नहीं, पर यदि वह जौहरी के हाथ पहुँचे तो उसे तराश कर ऐसा चमकदार नगीना बनाता है जिसे देखने वाले और खरीदने वाले का मन पुलकित हो उठे। सुयोग्य माली के हाथों बनाया हुआ उद्यान कितना मनोरम लगता है उसे सभी जानते हैं।

जीवन निरर्थक भी है। जब उसका उपयोग खाने और सोने से अधिक और क्या बन पड़ता है? अनगढ़ों के हाथ पहुँचने पर वह हेय, निन्दित और पिछड़ेपन से भर जाता है। पग-पग पर उसे दूसरों की सहायता माँगनी होती है।

पर जीवन के वास्तविक कलाकार वे हैं, जो इस पंच तत्वों से विनिर्मित खिलौने को ऐसा सुरुचिपूर्ण बना दें, जिस पर देवता अपने आपको निछावर करने के लिए ललचायें।


इस वर्ष का महत्वपूर्ण कार्यक्रम एक लाख यज्ञ एवं सामूहिक मंत्रोच्चारण

युग सन्धि की गतिविधियां अब क्रमशः तीव्र से तीव्रतम होती जा रही है। संसार बिखरा हुआ है इसलिए जो दुर्घटनाएं, दुरभिसन्धियाँ घटित हो रही हैं, उनका छितराया हुआ स्वरूप वैसा दृष्टिगोचर नहीं होता, जैसा कि यह सब एकत्रित होने पर दीख पड़ता है। फिर भी विश्व में जो कुछ इन दिनों घटित हो रहा है, निकट भविष्य में जो घटित होने जा रहा है, वह भयावह है। उसे एकत्रित करके देखा जाय तो प्रतीत होगा कि सृजन से पूर्ववर्ती होने वाला ध्वंस क्रमशः आगे ही बढ़ रहा है। पीछे नहीं हट रहा।

इसके पीछे अदृश्य वातावरण, प्रकृति का प्रकोप और मनुष्य समुदाय का विकृत अन्तःकरण है। कारण गहरे भी हैं और विषम भी। इसलिए स्थिति की गम्भीरता हमें समझनी चाहिए और विनाश के प्रतिरोध में जो करना चाहिए, वह करना चाहिए।

प्रस्तुत विपन्नताओं का निराकरण कैसे हो? इसके उत्तर में एक ही उपाय हाथ रहता है कि दुर्भावनाओं का समाधान कर सकने में समर्थ अध्यात्म उपचारों का आश्रय लिया जाय। आग ईंधन से नहीं, पानी डालने से बुझेगी।

भौतिक समस्याओं का भौतिक प्रयत्नों से समाधान होता है। लाठी का लाठी से, घूँसे का घूँसे से, धन का धन से, बल का बल से जवाब दिया जा सकता है। किन्तु आज की समस्या सूक्ष्म जगत तक जा पहुँची है। उसका निराकरण अन्तःकरण की गहराई में सन्निहित शक्ति के सहारे ही सम्भव है। वृत्रासुर की शक्ति से जब देवता भी न जीत सके तो ऋषि की अस्थियों से बना वज्र उस संकट को टालने में समर्थ हो सका। इन दिनों भी कुछेक की महती साधना तपश्चर्या चल रही है। पर इस बार उतना ही पर्याप्त न होगा। इन दिनों तो सामूहिक संकल्प शक्ति से महिषासुर वध की कथा ही पुनरावृत्ति के रूप में दुहरानी पड़ेगी।

प्रज्ञा परिवार एक समूचा देव परिवार है। उसमें जन्मान्तरों के संचित संस्कारों वाली आत्माएं ही प्रयत्नपूर्वक एकत्रित की गई हैं। आवश्यकता सभी के समन्वित प्रयत्न की है। अब तक जप और पाठ का ही क्रम चला है अब इसमें यज्ञ प्रक्रिया भी सम्मिलित करनी होगी। सम्भव हो तो हर रविवार या पूर्णिमा को सामूहिक यज्ञ का क्रम चलायें। जन्म दिनों के अवसर पर एक कुण्डी यज्ञ होता रहे तो भी इतने बड़े समुदाय के जन्म दिनों की संख्या एक लाख होती है। इतने तो अपने वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्र ही हैं। उन सबका जन्मदिन मनाने से एक वर्ष में एक लाख यज्ञ हो जाते हैं। इसमें सामूहिक मंत्रोच्चार से उत्पन्न प्राण ऊर्जा का समावेश होगा। अतएव उसकी शक्ति और भी अधिक बढ़ जायेगी। कुण्डों की और आहुतियों की संख्या से ही यज्ञ शक्ति की गरिमा नहीं बढ़ती वरन् सुपात्र मन्त्रोच्चारणकर्त्ताओं की कितनी प्राण-शक्ति सम्मिलित हुई, यह भी देखा जायेगा। चूँकि हर जन्म दिन में बड़ी उपस्थिति होती है और सभी मन्त्रोच्चारण करते हैं अतएव इन यज्ञों में वेदी एक ही होने और आहुतियों की संख्या सीमित रहने पर भी मन्त्रोच्चारण अधिक होने से स्वभावतः उसकी शक्ति बढ़ जायेगी। वातावरण संशोधन हेतु इस समवेत शक्ति की ही आवश्यकता है।

आजकल हमारे स्वयं के प्रवचन और मन्त्रोच्चारण नहीं होते, पर टेप रिकार्डर के माध्यम से हम अपने मनोभावों को दूसरों तक पहुँचाने की प्रक्रिया अपनाते हैं। बैखरी वाणी की सीमा इतनी ही है। मध्यमा, परा, पश्यन्ति वाणियों को प्रयोग इन दिनों भी होता है। पर वह होगा टेप रिकार्डर के माध्यम से। 24 गायत्री मन्त्रों का हमारी वाणी में एक लयबद्ध टेप रिकार्ड हुआ है। यह परा पश्यंति वाणी का है। जिन यज्ञों में हमारी वाणी भी सम्मिलित करनी हो वे इस टेप उच्चारण के साथ अपना उच्चारण भी मिला दें। इस प्रकार उसकी शक्ति और भी कई गुनी बढ़ जायगी। इस वर्ष 1 लाख यज्ञ होने और उसमें 24 लाख से भी कई गुने अधिक हमारे उच्चारण सम्मिलित रहने का आयोजन है। जिन्हें आवश्यकता है वे हमारे द्वारा उच्चारण किये टेपों को भी मँगा सकते हैं। वैसे बिना यज्ञ के भी हमारे उच्चारण में अपना उच्चारण मिलाकर दैनिक या साप्ताहिक अथवा जन्मदिन आदि के अवसर पर इस उपाय को सम्मिलित किया जा सकता है।


भय से बचे रहें

दार्शनिक इमर्सन कहा करते थे कि ‘भय’ एक मानसिक रोग है, जो मनुष्य की क्षमता और चेतना दोनों का अपहरण कर लेता है। यदि मनोबल बनाये रखा जाय तो काल्पनिक भयों से तीन चौथाई ऐसे होते हैं जिनसे कभी पाला ही नहीं पड़ता।

कहते हैं कि अमेरिका के इतिहास में ऐसा भयंकर तूफान कभी भी नहीं आया जैसा कि 19 मई सन् 1780 को आया था। इतिहासकार ह्वीटियर ने उसे “महान भयानकता का अविस्मरणीय दिन” लिखा है। ये न्यूयार्क से शुरू हुआ था और उसने पेन्सिलवानियाँ, कनेक्टीकट, रोड़ द्वीप- मैसाचूसेट्स वरमार, हैम्पशायर, पार्टलैण्ड आदि का सुविस्तृत भू-भाग अपने अंचल की काली छाया में ढक लिया था। कितने मरे और कितनी बर्बादी हुई इसका लेखा-जोखा पूरी तरह तो नहीं लगाया जा सका, पर इतना निश्चित था कि लगभग हर व्यक्ति अपने को मौत के शिकंजे में कसा हुआ अनुभव करता था। अब मरे तब मरे की कल्पना में उस क्षेत्र के हर निवासी की तब तक आंतें इठती ही रहीं जब तक कि यह सर्वनाशी तूफान टल नहीं गया।

जिस समय तूफान आया उस समय अमेरिकी विधानसभा का अधिवेशन चल रहा था। अन्धड़ ने सभा भवन में भी प्रवेश किया और क्षण भर सारी रोशनी गुल कर दी। प्रचंड हवा के झोंके दीवारों से टकराकर उन्हें उड़ा ले जाने की धमकी देने लगे। सदस्य गण अपनी-अपनी कुर्सियों से चिपक कर बैठ गये और कायरता पूर्वक एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। इस स्थिति में कई घण्टे बीत गये। किसी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था।

सन्नाटे की चीरते हुए विधानसभा के एक प्रतिभाशाली सदस्य डेवन पोर्ट अपने स्थान पर खड़े हुए और उनने जोरदार आवाज में अध्यक्ष को सम्बोधन करते हुए कहा- “सर! या तो यह कयामत का दिन है, या नहीं है। यदि है तो हमें डरना नहीं चाहिए जो होना है वह होकर ही रहेगा। यदि नहीं है तब तो डरने की कोई बात है ही नहीं। यदि कयामत का दिन ही हो तो भी हमें अपना कर्तव्य पालन करते हुए उसका स्वागत करना चाहिए। सर, मोमबत्तियाँ मँगाई जायँ और अधिवेशन का कार्य चालू रखा जाय।”

सारे सदन में बिजली सी कौंध गई। एक नये साहस का संचार हुआ। कई और सदस्य भी समर्थन में उठ खड़े हुए। अध्यक्ष ने उसे उचित समझा और मोमबत्ती जला कर अधिवेशन आरम्भ कर दिया गया।

उस मृत्यु विभीषिका के बीच अमेरिकी सीनेट का अधिवेशन चलना एक अविस्मरणीय घटना है उससे अधिक स्मरण रखने योग्य है- डेविन पोर्ट का सन्तुलन और साहस जिसने सदस्यों की भयाक्राँत मनःस्थिति को साहसिक कर्तव्य निष्ठा में नियोजित कर दिया था।

तूफान चला गया पर उस हिम्मत वाले और विचारशील व्यक्ति का मार्गदर्शन उस देश के इतिहास में एक अमर कहानी बन गया है और जब कभी कोई कठिन प्रसंग आता है तो उसी घटना का स्मरण दिलाते हुए कहा जाता है कि “भय” अपने आप में उतना बड़ा संकट है जितना कि विपत्ति का कोई क्षण कठिन नहीं होता।


Quotation

तत्वदर्शन हमें हमारे स्वरूप से परिचित कराता है और कर्तव्य की रहा पर प्रेरणापूर्वक चलाता है।

जो जन्म-जन्मान्तरों की संचित पशु-प्रवृत्तियों का नियमन कर सकता है वह योगी है।


अध्यात्म का प्रथम चरण परिमार्जन

गीता में अध्यात्म की विवेचना एवं व्याख्या में बहुत कुछ कहा गया है। पर जब अर्जुन ने पूछा- “जो आपका निर्देशन हो उसे कहिए, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा।”

तब भगवान ने साधक को अपने बलबूते संकेतों को न समझ सकने की स्थिति में देखा तो स्पष्ट शब्दों में कहा-

“मामनुस्मर युद्धय श्च” “युद्ध स्व विगत ज्वरः” जहि शत्रु महावाहो काम रूपं दुराशनम्”

इन शब्दों में भगवान ने निश्चित निर्देशन दिया है और लड़ने के लिए कहा है। किससे लड़ा जाय? यह भी उपरोक्त निर्देशनों में स्पष्ट हो गया है। अपने भीतर जो दोष दुर्गुण भरे पड़े हैं जिन कुसंस्कारों ने अड्डा. जमा लिया है उनको देख और उखाड़ फेंकने के लिए परिश्रम कर।

गीता आध्यात्मिक ग्रन्थ है। उसमें शान्ति प्राप्ति और धर्म धारणा का प्रमुख प्रसंग है फिर भी भगवान उसे ध्यान धारणा, प्रत्याहार समाधि आदि की शिक्षा न देकर लड़ने के लिए प्रोत्साहन देते हैं। यह बात कुछ अटपटी लगती है। बुद्धि उसे सहज स्वीकार नहीं करती। वह उन प्रयोगों में सरलता देखती है जो घर के एक कोने में बैठकर जप ध्यान आदि कष्ट साध्य कार्यों का समर्थन करती है। पूजा-पाठ में वह समय लगता है जो व्यापार व्यवसाय का नहीं होता। इसलिए उन कृत्यों में कुछ खर्च भी नहीं पड़ता। बैठे रहने, जीभ या उँगलियां धीरे-धीरे हिलाते रहने भर से जब स्वर्ग मुक्ति जैसे लाभ मिल जाते हैं। आत्म साक्षात्कार और ईश्वर दर्शन या अनुग्रह का लाभ मिलता है, तो उस सस्ते सौदे को क्यों छोड़ा जाय? बुद्धि तो थोड़ी लागत में बड़ा लाभ उठाने की तरकीबें सोचती रहती है। उसे जुआ सट्टा लाटरी स्तर के काम पसन्द आते हैं, या फिर छल प्रपंच में दूसरों को फंसाकर उल्लू सीधा करने का तरीका अच्छा लगता है। जोखिम उठाने और साहस पराक्रम का दायित्व वहन करने के लिए मन की दुर्बलता सहज सहमत नहीं होती। सरल छोड़कर कठिन काम के निर्देशन का जब आदेश मिलता है तो अपने इन्हीं भावों को, दलीलों को प्रस्तुत करते हुए अर्जुन कहता है- “तत्किं कर्मणि घोरे मो नियोजयसि माधवः” तब मुझे युद्ध जैसे घोर कर्म में क्यों नियोजित किया जाता है। मैं सरल को छोड़कर कठिन के झंझट में क्यों पडूँ?

अर्जुन जैसी मनःस्थिति में ही प्रायः साधक तर्क करते रहते हैं। सरल को ढूंढ़ते और कठिन से भागते हैं। पर उनकी मर्जी से तो संसार का विधान चक्र नहीं चलता। यहाँ तो उचित मूल्य चुकाने पर ही उपयुक्त वस्तु मिलने का शाश्वत नियम है। काँच सस्ता बिकता है पर असली हीरा तो उचित मूल्य चुकाने पर ही मिलेगा। एम. ए. की डिग्री प्राप्त करने के लिए चौदह वर्ष का कठोर श्रम और पुस्तक फीस आदि का पैसा चुकाना पड़ता है। पर यदि सस्ती डिग्री चाहिए तो कोई भी उन्हीं अक्षरों को उलटा करके लगा सकता है। AM (एम) का अर्थ होता है- “हूँ”। अपने नाम के आगे इस प्रकार कोई भी साक्षर लगा सकता है। इसमें कुछ भी खर्च नहीं करना होगा और फेल होने जैसा जोखिम भी नहीं है। किन्तु MA (एम. ए.) हर कोई अपने नाम के आगे नहीं लगा सकता।

अध्यात्म के सम्बन्ध में अनेकानेक लोगों की तरह अर्जुन की भी यही धारणा है। पर जब भगवान उसे वस्तुस्थिति बताते हैं। तब वह अपने भ्रम को स्वीकारता है और कहता है। “कार्पण्य दोषोपहत स्वभाव, पृच्छामित्वां धर्म संमूढ़ चेतः” मेरी बुद्धि तो सस्ते में महंगा पाने की कृपणता से भरी गई है। लोक व्यवहार का तो मुझे ज्ञान है कि बड़े पुरुषार्थ से ही बड़े काम सधते हैं पर धर्म के सम्बन्ध में मेरी स्थिति मूढ़मति लोगों जैसी हो गई है, और अनेकों की देखा-देखी मुझे भी यही सुहाता है कि जीभ की नोंक से कुछ शब्द कहते रहने भर से जब आध्यात्मिक उद्देश्य की- धर्म प्रयोजन की सिद्धि होती है तो जोखिम भरे दुस्साहस अपनाने का झंझट क्यों उठाऊँ?”

अर्जुन की बाल बुद्धि पर हँसते हुए, उसके तर्कों को झुठलाते हुए भगवान ने बहस में पड़ने की अपेक्षा स्पष्ट निर्देशन देना ही उचित समझा और कहा- तस्मात् युद्धाय युजस्व”- तो युद्ध के लिए तैयार हो और जुट।” अन्त में अर्जुन ने भी यही उचित समझा कि थोथे तर्क और ओछे उदाहरण प्रस्तुत करते रहने में कोई लाभ नहीं। निर्देशन का पालन करना ही उचित है। उसने अन्तिम क्षण कहा- ‘करिष्ये वचनं तव’ आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। उसने गाण्डीव उठाया और साथ ही जोखिम भी।

“ईश्वर उन्हीं की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं।” जब अर्जुन ने कठोर कर्त्तव्य पालन का साहस दिखाया तो भगवान ने उसे दो आश्वासन दिये। रथ के घोड़े चलाने का भी और विजय श्रीवरण करा देने का भी।

भगवान के मार्ग पर चलना, उनके बताये हुए निर्देशनों निर्धारणों को अपनाना ही प्रभु की सच्ची भक्ति है। सच्चे भक्त का लक्ष्य तक पहुँचना निश्चित है, पर उसे निमित्त मात्र तो बनना पड़ता ही है। ‘निमित्त मात्रं भव सत.य साचित” निमित्त मात्र बनाने में भी कुछ तो करना ही पड़ता है। इस कर्तृत्व पर ही भगवान का सारा जोर है। पूजा तो अर्जुन करते ही थे। मित्र भी थे और सम्बन्धी भी। हमेशा साथ में प्रत्यक्ष ही रहते थे। चित्र या प्रतिमा की बात भी नहीं थी कि उसे पूजा गया और फल न मिला। भगवान तो कर्म को देखते हैं। उन्हें किसी के शिष्टाचार उपचार मात्र, बच्चों की तरह फुसलाये जाने की आदत नहीं है। अर्जुन ने जब वस्तुस्थिति को समझ लिया तब कहा- “करिष्ये वचनं तव”- आपका कहना मानूंगा आपके आदेश अनुशासन का निर्वाह करूंगा।” उसने भगवान का मन्तव्य समझा और कर्मयोग अपनाया।

आत्मा को परमात्मा तक पहुंचाने के लिए जो प्रथम प्रयास करना पड़ता है परिमार्जन परिशोधन। गन्दगी हटाकर स्वच्छता का संस्थापन। पूजा गन्दे स्थान में कहाँ बन पड़ती है। मन्दिर में प्रवेश करने से पूर्व पैर धोकर भीतर जाने की प्रथा है। पुजारी भी भगवान की अर्चा करने से पूर्व उस कक्ष की पूरी तरह शुद्धि करते हैं। इसी परिशोधन को प्राथमिकता देने का भगवान का निर्देशन है।

अध्याय योग में अन्तरंग में जड़ जमाये हुए दोष दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों के निराकरण की आवश्यकता होती है। अपनी आदतों को सुधारना पड़ता है और स्वभाव में शालीनता का गहरा संस्थापन करना हाता है। मलिनता हटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। वह अनायास ही नहीं छूट जाती। मनोरथ करने भर से वह सब नहीं हो जाता, वरन् हर क्षण उनके उभरने की सम्भावना पर कड़ी नजर रखनी होती है और जहाँ भी जब भी वह उफान आया, आदर्शों का स्मरण दिलाते हुए उस पर तत्काल पानी डालना पड़ता है। दूध जब उफनने लगता है तो उसमें तनिक सा ठण्डा. पानी डाल देते हैं। यह बात सर्वतोमुखी आत्म-संयम अपनाने वाले को भी करनी पड़ती है। उपेक्षा करने से काम नहीं चलता।

मलीनता भगवान को सर्वाधिक अप्रिय है। बच्चे के कपड़े, हाथ पैर टट्टी में सने हों तो पहले माँ उसे भली प्रकार धोती है। नहलाती है, नये कपड़े बदलती है। इतना करने क बाद ही वह गोदी में उठाती है। ऐसा किये बिना वह बच्चे के रोने या आग्रह करने पर ध्यान नहीं देती और शुद्धि कृत्य पूरा होने तक उसे दूर ही रखती है। गीता के आरम्भ में भगवान और अर्जुन के बीच जो विवाद हुआ उसका यही सारांश है।

बात आंतरिक शुद्धि तक ही सीमित नहीं है। वह बाहरी क्षेत्र में भी कार्यान्वित होनी चाहिए। परिवार में, समाज में फैली हुई गन्दगियों से भी हमें जूझना चाहिए। अवाँछनीयताओं, कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं के विरुद्ध भी हमें लोहा लेना चाहिए। अपना पड़ौस, संपर्क क्षेत्र एवं प्रभाव क्षेत्र पर हमें अपने शरीर और मन की तरह ही दृष्टि रखनी चाहिए और उनका परिमार्जन करने के लिए गाण्डीव उठाना- प्रतिरोध करना भी ईश्वर का आदेश ही मानना चाहिए।


मन को समुन्नत बनाने का एक मात्र राजमार्ग

प्रत्येक पिता की इच्छा होती है की हमारा पुत्र हमारी तुलना में अधिक सम्पन्नता, ख्याति, पदवी, प्रतिष्ठा प्राप्त करे। गुरु भी अपने शिष्य को अपने से बढ़कर देखना चाहते हैं क्योंकि गढ़ी हुई प्रतिमा का श्रेय अन्तः उसके सृजनकर्ता को ही जाता है।

हमारा ‘स्व’ वस्तुतः आत्मा है। आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं। हमारे दो पुत्र हैं। एक मन दूसरा शरीर। इन दोनों के द्वारा ही गाड़ी के दो पहियों की तरह जीवन की रीति-नीति बनाई और चलाई जाती है। गाड़ी में दो बैल जुतते हैं उनके बीच ठीक तालमेल बना रहे तो राह आसानी से कटती है और गाड़ी लक्ष्य तक पहुँचती है।

आत्मा का कर्त्तव्य है कि वह अपनी वरिष्ठता विशिष्टता इस बात से सिद्ध करे कि वह अपने इन दोनों पुत्रों, शिष्यों को कितनी समुन्नत स्थिति तक पहुंचा सका। लक्ष्य को कितना ऊँचा रखने और उसे प्राप्त कर लेने की प्रतिज्ञा कितनी लगन और प्रतिष्ठापूर्वक सम्पादित की जा सकी।

अनुकरणीय, अभिनन्दनीय, महामानवों की तरह जीवनयापन कर सकना, किसी के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। उसके उपरान्त मेधा, प्रतिभा, क्षमता और साधन सुविधा हर किसी को मिली है। प्रश्न इतना भर है कि उनका सही रीति से सही प्रयोजन के लिए, सही समय पर उपयोग कर सकना जाना गया या नहीं।

जीवन का आयुष्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण भाग उठती आयु से लेकर- प्रौढ़ता बनी रहने तक का है। बचपन ऐसे ही बचकानेपन में बीत जाता है। ढलती आयु में थके माँदे दिन कटते हैं। जो कुछ भी कहने लायक पुरुषार्थ किसी से बन पड़े हैं वे उसी शक्ति और स्फूर्ति वाली अवधि में सम्पन्न हुए हैं। जिनने यह समय वासना तृष्णा, के चंगुल में कसे-कसे गँवा दिया। समझना चाहिए कि उसने बहुत भारी घाटा उठाया। इस तथ्य को प्रत्येक आत्मा स्वयं समझे और दोनों भुजाओं की तरह प्रयासों को सफल बनाने वाले मन और शरीर को समझाये।

मनुष्य स्वभावतः बहुत महत्वाकाँक्षी है। अबोध स्थिति से ही उसे मान और प्यार पाने की इच्छा होती है तनिक सी आयु बढ़ते ही विलास, वैभव और बड़प्पन की ललक जगती है। यही हैं वे ग्राह जो गज को सरोवर में घसीट ले जाते हैं। यही हैं वे कौरव जो द्रौपदी को भरी सभा में निर्वस्त्र करते हैं। सतर्कता इस बात की रहनी चाहिए कि शत्रुओं से बचा जाय। सज्जनों के साथ मित्रता का निर्वाह इसके उपरान्त ही बन पड़ता है। दल-दल में कंठ तक फँसा हुआ मनुष्य प्रगति पथ पर अग्रसर कैसे हो? पहला प्रयास डूबने की स्थिति से उबरने का होना चाहिए। मन को तृष्णाओं से और शरीर को वासनाओं के गर्त में गिरने से बचाया जाना चाहिए। उन्हें कहा जाना चाहिए कि कुसंग से पहले निकला जाय सत्संग का लाभ इसके उपरान्त ही मिलेगा। हेय पशु प्रवृत्तियों से पीछा पहले छुड़ाया जाय। ऊँचा उठने की चेष्टा तभी बन पड़ेगी।

पतन में गिरने से बचना और ऊँचा उठने का सुयोग बनना तभी सम्भव है जब साँसारिक एषणाओं की ओर सरपट, दौड़ने की आदत बदली जाय और उलटकर उन महत्वाकाँक्षाओं के मार्ग पर चला जाय जो महानता के लक्ष्य तक पहुँचाता है।

परिवर्तन की यह संधि बेला आई या नहीं, इसकी एक ही कसौटी है कि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार हुआ या नहीं। “सादा जीवन उच्च विचार” के आदर्श की महत्ता मानी गई या नहीं? अमीरी का बड़प्पन निरर्थक मानकर महानता का गौरव गले उतरा या नहीं। यदि इतना बन पड़े तो जीवन वस्तुतः नितान्त हलका-फुलका हो जायेगा। उसकी राई रत्ती जितनी आवश्यकता है तनिक सी सूझ-बूझ और मेहनत के सहारे पूरी होती चलेंगी। सांसारिक समस्याएँ और कठिनाइयाँ सरलता पूर्वक हल होती चलेंगी। अनसुलझी कोई गुत्थी रहेगी नहीं। जहाँ सन्तोष और सादगी का रसास्वादन हुआ नहीं कि वह परिस्थितियाँ देखते-देखते बदल जायेंगी जो व्यस्त रखतीं और त्रस्त करती थीं।

समस्याओं के समाधान के सौ उपाय हैं। हम हठ पूर्वक एक को ही पकड़ बैठते हैं और सोचते हैं कि काम इसी प्रकार बनना चाहिए। अपनाया हुआ रास्ता छूटना नहीं चाहिए। जिस प्रकार सोचा जाता रहा है, उसी प्रकार पूरा होना चाहिए। यदि इस दुराग्रह को छोड़ दिया जाय और जीवनयापन के सम्बन्ध में दूसरे उपाय उपचार सोचे जायं तो ऐसे अनेकों मार्ग मिल सकते हैं जिन्हें अपनाकर शरीर की आवश्यकताएं सरलतापूर्वक पूरी की जा सकें।

महत्वाकांक्षाऐं वही श्रेयस्कर हैं जो बड़ा नहीं महान बनायें। महान बनने का एक ही उपाय है कि दृष्टिकोण और कार्यक्रम महान बनाया जाय। उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार यह तीन ही ऐसे त्रिभुज हैं जो मिलकर महानता की समग्र आकृति बनाते हैं। इन्हीं का समन्वय त्रिवेणी संगम बनाता है।

महान जीवन मात्र अपने लिए नहीं जिया जा सकता। वह संकीर्ण स्वार्थपरता की सीमा में आबद्ध नहीं हो सकता। उदात्त दृष्टिकोण अपनाते ही सब अपने प्रतीत होते हैं। “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का शास्त्र वचन जीवन व्यवहार में उतर जाता है तब जैसी चिंता अपने लिए करनी पड़ती है वैसी ही सब के लिए उठ खड़ी होती है। जैसा व्यवहार दूसरों से अपने लिए चाहते हैं उसी प्रकार का दूसरों के साथ बन पड़ता है। दुर्गुण हटते ही सद्गुण उनका स्थान ग्रहण करने लगते हैं। आलस्य और प्रमाद गया नहीं कि पराक्रम और साहस जगा नहीं। मूढ़ता से पीछा छूटते ही सतर्कता व्यक्तित्व में समा जाती है। जो विवेक की कसौटी पर कसकर वस्तुएं खरीदता है- नीतियाँ अपनाता है, उसे खोटा खरीद लाने की शिकायत नहीं करनी पड़ती।

बल्ब बिजली के तार में सटते ही चमकने लगता है। आत्मा की गरिमा उसी क्षण प्रकाशवान हो उठती है, जिस क्षण कि वह प्रचलन की कीचड़ में से निकलकर भगवान के चरणों में जा बैठता है। आत्माओं कस समुच्चय ही परमात्मा है। विराट् विश्व को ही परब्रह्म कहते हैं सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन ही वह प्रयास है जिसे ईश्वर की सर्वोपरि आराधना कहा जा सकता है। उसके उद्यान को सुरम्य, सुविकसित बनाने में ईमानदार और परिश्रमी माली की तरह जुट पड़ना ही भगवान को प्रसन्न करने का एकमात्र उपाय है। इस तथ्य को स्मरण रखने के लिए ही बार-बार राम नाम रटा जाता है ताकि राम का सौंपा हुआ काम दृष्टि से ओझल न होने पावे।

इस संसार की समस्त समस्याओं का समाधान लोकमानस के परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन से है। इन्हीं प्रयासों में निरत रहकर समूचे वातावरण को बदला जा सकता है। इस प्रयास में निरत रहकर अपनी दबी सत्प्रवृत्तियों को उभारा जा सकता है और महामानवों की गणना में अपने को सम्मिलित किया जा सकता है।

व्यक्तित्व को पुण्यमय और क्रिया-कलाप को परमार्थ परायण बनाकर ही हम अपना और साथ ही अगणित अन्यान्यों का भला कर सकते हैं। नाविक अपनी नाव को भुजबल से चम्पू चलाकर किनारे लगाता है और उसमें बिठाकर असंख्यों को पार लगाता है। यह कार्य किसी को धन या सुविधा साधन देकर नहीं किया जा सकता है। इसका उपाय तो एक ही है कि व्यक्ति की स्वतन्त्र चेतना को जगाया जाय और सन्मार्ग अपनाने क लिए उसे मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और साहस प्रदान किया जाय। प्रत्यक्ष सहायता तो सामयिक आवश्यकता पूर्ति के लिए सहानुभूति अर्जित करके विश्वासपात्र बनने भर के लिए अर्जित करने के निमित्त की जाती है। वास्तविक हित साधन तो स्वावलम्बन और सुसंस्कार से ही बन पड़ता है। मन को यही पाठ हर घड़ी पढ़ाया जाय और उस हेतु व्यावहारिक कार्यक्रम बनाकर उन दोनों को दिया जाय तो समझना चाहिए कि आत्मा का शरीर और मन के प्रति जो कर्त्तव्य है, वह पूरा हुआ।


Quotation

तप से उच्चस्तरीय और अपराजेय समर्थता प्राप्त होती है।


तत्व ज्ञान का तीसरा चरण

पृथ्वी पर जीवधारियों की संख्या बढ़ती ही रही है। एक जोड़ा कई बच्चे जनता है। इसलिए जब तक कोई विशेष आपत्ति न टूट पड़े, प्राणियों की संख्या बढ़ती ही रहती है। मनुष्यों की संख्या बढ़ना तो और भी अधिक तेजी से हो रहा है, क्योंकि उसे निर्वाह के साधन अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक आसानी से और अधिक मात्रा में मिलते जाते हैं। कामुकता के क्षेत्र में भी अन्य प्राणियों को उसने पीछे छोड़ दिया है। इस कारण भी उसकी संख्या बढ़ती ही जाती है।

किसी परिवार या नगर में पहले की अपेक्षा जनसंख्या बढ़ी होने के आधार पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि यहाँ प्रगति का वातावरण बन रहा है। देखा यह जाना चाहिए कि स्तर गिरा या उठा। स्तर के साथ व्यक्ति की गरिमा भी जुड़ी हुई है और उस समुदाय की भी जिसमें वह जन्मा एवं कार्य करता रहा। देश, धर्म, समाज और संस्कृति का जहाँ भी भान हुआ है वहाँ उसके मूल में ऊँचे स्तर के व्यक्ति रहे हैं, चाहे उनकी संख्या थोड़ी ही क्यों न रही हो?

जनसंख्या की भांति बढ़ती ही समृद्धि के आधार पर भी किसी व्यक्ति या समुदाय का महत्व नहीं माना जाना चाहिए। धनियों में सभी बुद्धिमान् नहीं होते। कितने ही ऐसे होते हैं। जो चोरी चालाकी का आश्रय लेकर सम्पन्न बन जाते हैं। इस प्रकार आया हुआ पैसा वैसा ही अवाँछनीय रास्ता बनाता है और दुर्व्यसनों में चला जाता है। बिना परिश्रम और बिना न्याय का धन आता हुआ तो दिखाई पड़ता है, पर वह जाता कुपात्रों के ही हाथ है। कमाने वाले उस धन की दुर्गति होते हुए स्वयं ही देख लेते हैं।

इसी प्रकार माँसलता, प्रतिभा, सुन्दरता, कला-कौशल आदि का भी कोई मूल्य नहीं है। उससे लोग आकर्षित भर होते हैं, पर उसके प्रति श्रद्धा या सम्मान प्रदर्शित नहीं करते, ऐसे सफल मनुष्य अगले दिनों किसी मुसीबत में फंस जायं तो कोई आँसू नहीं बहाता। न किसी को उनके न रहने पर कोई अभाव अखरता है। उनकी बात अलग है, जो उन्हीं की कमाई पर पलते थे।

फिर जीवन की सफलता किस कसौटी पर कसी जाय? और कैसे जाना जाय कि किस ने मनुष्य जन्म लेकर उसे सार्थक बनाया और दूसरों के लिए अभिनन्दनीय अनुकरणीय परम्पराएं छोड़ कर गया?

यह किस प्रकार बन पड़े? इसका एक ही तरीका है कि मनुष्य बहादुरी के साथ जिये। गौरव बहादुरी के साथ ही जुड़ा हुआ है। सेना में लड़ाई में जीतने या बहादुरी दिखाने वाले, या शहीद ही अभिनन्दन के पात्र बनते हैं। जंगल में सिंह वनराज कहलाता है क्योंकि उसका पराक्रम ऐसा है जो समूचे जंगल पर अपनी धाक जमाये रहता है। हाथी पहले लड़ाई में भी काम आते थे और जिस सेना में अधिक होते थे उसे जिताकर रख देते थे। अब भी वे जिस जुलूस में निकलते हैं, उसकी शोभा बढ़ा देते हैं।

मनुष्य शेर, हाथी या सेनापति तो नहीं बन सकता, पर लड़ाई के दूसरे मोर्चे उसके लिए खुले हुए हैं, जिन पर लड़कर वह आत्म गौरव और लोक सम्मान अर्जित कर सकता है।

इन मोर्चों में पहला मोर्चा है अपनी दुर्बलताओं की मंडली को परास्त करके रख देना। सामान्य मनुष्यों को लोभ, मोह, काम, क्रोध, व्यसन आदि दुर्गुण इस प्रकार दबोच लेते हैं कि वह किसी काम का नहीं रहता है। अपनी आँखों में स्वयं गिरता है और दूसरों की आँखों में भी। यह छापामार शत्रु ऐसे हैं जो अपने ही भीतर घुसे बैठे रहते हैं, पर दीख नहीं पड़ते। इस पर भी चोट इतनी करारी करते हैं कि उनका दबोचा आदमी किसी योग्य नहीं रह जाता। घटिया और गिरा हुआ व्यक्तित्व लेकर जहाँ भी जाता है, वहीं अपमानित होता है। सफलताएं ऐसे व्यक्ति को दूर से ही नमस्कार करती हैं। इनके विरुद्ध मोर्चा लगाना सहज नहीं है। जन्म-जन्मान्तरों के कुसंस्कारों से जूझना पड़ता है और वे जब भी अवसर पाते हैं तभी चढ़ दौड़ते हैं। हार नहीं मानते इस समुदाय के साथ जीत लिया जाय तो समझना चाहिए कि बड़ी बात हुई।

आदर्श जीवन जीने के लिए आत्म संयम बरतना पड़ता है। इन्द्रियसंयम, अर्थसंयम, समयसंयम, विचारसंयम वही बरत सकता है, जिसमें समझदारी, ईमानदारी जिम्मेदारी और बहादुरी की समुचित मात्रा हो। इस मोर्चे पर हारा हुआ व्यक्ति अपना, समय, श्रम, धन और यश सभी गंवा बैठता है। इसलिए इस प्रकार की रणनीति अपनानी पड़ती है जिससे इस क्षेत्र में भी विजयी बनकर तपे सोने की तरह खरा सिद्ध होकर निकला जाय।

समाज का तीसरा मोर्चा है। उसमें अनैतिकता, अन्ध मान्यताएँ, कुरीतियाँ, पग-पग पर बिखरी पड़ी हैं। वे अपने साथ सम्मिलित होने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देती हैं और इनकार करने पर विरोध, उपहास ही नहीं करतीं पर नीचा दिखाने का भी प्रयत्न करती हैं। दुष्टों के समुदाय में रहकर भले आदमी की खैर नहीं। वे समझते हैं, ईमानदार त्यागी कहलाकर हमें अपनी तुलना में हेय ठहरा रहा है। इसके अतिरिक्त उन्हें यह भय भी रहता है कि हमारी पोल न खोल दे, बदनाम न कर दे, आमदनी की राह में रोड़े न अटका दे। इस पर कुकल्पना से प्रेरित होकर वे अकारण शत्रुता पर उतर आते हैं और जैसे ही बन पड़ता है, षड्यन्त्र रचकर नीचा दिखाते हैं। इन सारी कठिनाइयों को जो झेलता रहे और अपने मार्ग पर चट्टान की तरह अविचल खड़ा रहे उसे बहादुर ही कहना चाहिए।

घर परिवार, मित्र सम्बन्धी, सभी तथाकथित हितैषियों का एक ही परामर्श रहता है कि कमाओ, खाओ जो समय बचे उसे इन्हीं लोगों के मोद-प्रमोद में लगाओ। मन संयम बरतो, न आत्मोत्कर्ष की बातें करो, न समाज सेवा की। इस प्रकार काम करना तो दूर, जो ऐसी सलाह देते हैं, उनसे भी दूर रहने की कहते हैं और मिलने जुलने का समाचार सुनते हैं जो जल-भुन कर खाक हो जाते हैं। घर की बर्बादी का लाँछन लगाते हैं। इन लोगों से कडुए मीठे शब्दों में किसी प्रकार निपटना ही पड़ता है। इनकी बात मानें तो जीवन का लक्ष्य नष्ट होता है। न मानें तो कलह उत्पन्न होता है। इस मोर्चे पर पूरी चतुराई की रणनीति बनानी पड़ती है। अन्यथा नर-पशुओं की बिरादरी में बंधे रहना पड़ता है।

स्वराज्य तो मिल गया, राजनैतिक लड़ाई तो बन्द हुई पर दुष्प्रवृत्तियाँ तो हर क्षेत्र में इतनी भरी पड़ी हैं कि उनसे जूझना ही नहीं उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन भी करना है। पहले मुट्ठी भर अंग्रेज थे, अब सामने कुरीतियां, दुष्प्रवृत्तियों के पक्षधरों की सेना खड़ी है। इनसे निपटना जेल जाने से नहीं हो सकता है। जन-जन के मन-मन को बदलना है। उलटे को उलट कर सीधा करना है। यह बहुत टेढ़ा काम है। पर करना तो उन्हीं को पड़ेगा जो अपने को जीवित या जागृत मानते हैं।

तत्व ज्ञान के तीसरे चरण के कुछ सूत्र हैं-

- अनीति से हर मोर्चे पर जूझना है। चाहे वह भीतर छिपी हो या बाहर खम ठोक रही हो।

- औचित्य का संस्थापन हर क्षेत्र में करेंगे। उसके लिए अपने पराये का पक्षपात न बरता जायेगा।

- बहादुरी का पूरा परिचय साहसी, शूरवीरों की तरह दिया जायेगा। पर साथ ही समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी का भी पूरी तरह निर्वाह किया जायेगा।

इन सूत्रों को विचारते रहा जाय और सोचते रहा जाय कि चक्रव्यूह में सब ओर से फँसे होने पर भी अपनी रणनीति कैसे बनाई जाय। कहाँ, कैसे, किन परिस्थितियों और दुष्प्रवृत्तियों से टकराने के साथ विजय प्राप्त करने का मनोरथ पूरा करके रहा जाय। तत्वज्ञान का यह तीसरा चरण पहले दो की तुलना में अधिक जटिल भी है और साथ ही अधिक महत्वपूर्ण भी।

प्रतीक पूजा की पद्धति और प्रक्रिया

आध्यात्म क्षेत्र के उत्कर्ष विकास में प्रतीक पूजा को माध्यम बनाकर इस विद्या के प्रवीण-पारंगतों ने असाधारण दूरदर्शिता का परिचय दिया है। यों विज्ञ विचारशील अपनी मानसिक समस्याओं का समाधान और उत्कर्ष का प्रयोजन अपने संकल्प बल के सहारे ही पूर्ण कर लेते हैं, पर वैसा सर्वसाधारण से नहीं बन पड़ता। यह क्षेत्र नया होने से- पूर्व संचित अनुभव की बहुलता न होने से- प्रतीकों के माध्यम से शिक्षण की गाड़ी आगे बढ़ाई जाती है।

बाल कक्षा के विद्यार्थियों की कठिनाई को समझते हुए उस क्षेत्र के विशेषज्ञों ने कितने ही उपाय निकाले हैं। प्रथम पुस्तक सचित्र होती है। उसमें ‘क’ के साथ कबूतर, ‘ख’ के साथ खरगोश, ‘ग’ के साथ गधा और ‘घ’ के साथ घड़ी के चित्र बने होते हैं। इन वस्तुओं या प्राणियों को बच्चों ने प्रायः देखा है। यदि नहीं देखा है तो उसकी आकृति-प्रकृति का ढांचा उनके मन पर बिठा दया जाता है। अब इन चित्रों की स्मृति के साथ अक्षर क्रम का तारतम्य जोड़ना कुछ अड़चन भरा तो है, पर बालकों की अनगढ़ मनःस्थिति को देखते हुए वही उपाय सरल और सीधा रह जाता है। किण्डर गार्डन पद्धति में लकड़ी के टुकड़ों को जोड़कर अक्षर बनाये जाते हैं। बालफ्रेम में लगी गोलियों के सहारे बच्चे गिनती गिनना जल्दी और सही तरीके से सीख जाते हैं।

चित्रों के सहारे अनेक प्रकार के पेड़-पौधे, पक्षी, जानवर आदि का परिचय घर बैठे प्राप्त कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया में चित्र बहुत सहायक होते हैं। प्राथमिक शालाओं की अधिकांश पुस्तकें चित्र समेत ही होती हैं। चित्रमाला सीरिज की किताबें बड़े बच्चे अधिक चाव से खरीदते, पढ़ते और साथ ही उनसे प्रभाव एवं अनुभव भी अर्जित करते हैं।

यह हो सकता है कि किसी की बड़ी आयु हो गई हो और दैनिक व्यवहार में आने वाले विषयों को छोड़कर अन्यान्य विषयों में उसकी जानकारी नगण्य हो, इतनी कम जितनी कि बच्चों की होती है। अध्यात्म विषय विशेष रूप में ऐसा ही है, जिसकी वास्तविकता के सम्बन्ध में लोग कम ही जानते हैं। विडम्बना यह बन पड़ी है कि अनेकानेक संप्रदायों ने परस्पर इतने विरोधी प्रचलन चलाये हैं कि उनमें असाधारण भिन्नता है। एक-दूसरे से बहुत बातों में भिन्न ही नहीं होते, वरन् विपरीत भी पड़ते हैं। ऐसी दशा में तथ्यों को किस प्रकार जाना समझा जाय- यह एक बड़ी कठिनाई रहती है। विषय तथा सत्य और तथ्यों को समझने के लिए प्रयत्नशील जिज्ञासुओं के सामने तो और भी बड़ी उलझन रहती है कि क्या मानें और क्या न मानें? विशेषतया यह कठिनाई उनको और भी हैरान करती है, जिनकी अध्यात्म विषय में गहरी पैठ नहीं है। इन्हें इस प्रकार से उस अनजान विषय में बालक ही कहा जायेगा, भले ही वे कामकाजी विषयों में कितने ही चतुर क्यों न हों।

इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए भारतीय तत्व वेत्ताओं ने नौसिखियों के लिए प्रतीक पूजा का प्रचलन किया है। दृश्यों के, कृत्यों के साथ आदर्शों, तथ्यों को इस प्रकार जोड़ा है कि उनकी सूझ-बूझ की भूरि-भूरि प्रशंसा करनी पड़ती है। यह पूर्णतः एक विज्ञान सम्मत, तर्क सम्मत प्रक्रिया है।

मन्दिरों में देवताओं की पुरुषाकृति प्रतिमायें प्रतिष्ठित की जाती हैं। उनमें कर्मकाण्डों सहित प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और यह मान्यता बना ली जाती है कि इसमें देवताओं का निवास है। इस प्रचलन में भावना की महत्ता स्पष्ट है। यदि प्राण प्रतिष्ठा न की जाय तो वे ही प्रतिमायें मूर्तिकारों के गोदाम में भरी रहने पर मात्र ‘असवाब’ या बड़े खिलौने भर रह जाती हैं। यहाँ प्रतिमा का महत्व कम और उस प्रक्रिया का अधिक है, जिसके आधार पर उसे प्राणवान कल्पित किया गया।

मूर्तियों को प्रणाम करते हैं। भोग लगाते हैं। सेवा अर्चा करते हैं, पर वह बदले में कुछ भी नहीं कहती। धन्यवाद तक नहीं देती, फिर भी साधक की श्रद्धा कम नहीं होती। यह एक पक्षीय सद्भावना का निर्वाह है। हम किसी के साथ नेकी करें, तो यह आशा न रखें कि यह इसका प्रतिफल चुकायेगा ही। प्रतिमा-पूजन में भावना की महत्ता के अतिरिक्त एक पक्षीय सद्व्यवहार निर्वाह को अपनाने का प्रतिपादन होता है।

देव प्रतिमायें नवयुवकों जैसी होती हैं। वे कभी वृद्ध नहीं होती। इस प्रतिपादन में भी यह निर्धारण है कि यदि मनुष्य देवत्व का पक्षधर है तो उसे मरण पर्यन्त युवकों जैसी स्फूर्ति और आशा बनाये रखनी चाहिए।

देवियों की प्रतिमायें नवयुवतियों जैसी होती हैं और उन्हें मातृ भाव से पूजा जाता है। यह दृष्टि नारी मात्र के साथ होनी चाहिए। उन्हें देवियाँ समझें। मातृ बुद्धि से निहारें। कुदृष्टि का आरोपण करके उन्हें रमणी, कामिनी, भोग्या स्तर की वेश्या न समझें। उसकी शृंगार सज्जा को श्रद्धा सम्वर्धन का निमित्त समझें, न कि वासना भड़काने का। देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के पीछे जो आदर्श सन्निहित है, जिस तत्व ज्ञान का समावेश है उसी को प्रतिमा पूजन का सार एवं रहस्य मानना चाहिए।

अनेक धर्मकृत्यों में विशेषतया विवाह प्रसंगों में चूल्हा, चौकी, कुआँ, घूरा आदि पूजने का रिवाज है। तर्क की दृष्टि से इन उपकरणों के पूजन का रहस्य न तो समझा जा सकता है और न समझाया जा सकता है, पर जब प्रत्येक काम में आने वाले जड़-चेतन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की आवश्यकता पर ध्यान दिया जाता है कि मानवी गरिमा के साथ यह तथ्य जुड़ा हुआ है कि कृतज्ञता हमारे भावना क्षेत्र में महत्वपूर्ण तथ्य बनकर प्रतिष्ठित रहे। हम कभी भी- किसी भी उपयोगी के प्रति कृतघ्न न बनें। विश्वकर्मा जयन्ती के दिने शिल्पी लोग अपने-अपने उपकरणों को पूजते हैं। दशहरा के दिन क्षत्रिय समाज में अस्त्र-शस्त्रों के पूजन करने का रिवाज है। व्यवसायी बहीखाता पूजते हैं और मुंशी लोग कलम दवात का अभिवन्दन करते हैं।

मरे हुए पूर्वजों के लिए श्राद्ध तर्पण करते हैं। इसमें कर्मकाण्डों के माध्यम से पूर्वजों का स्नेह-वात्सल्य पोषण स्मरण हो जाता है और पिण्डदान के माध्यम से दान-पुण्य की आवश्यकता- महत्ता भावना- क्षेत्र में सजग होती है।

विवाह के समय पति-पत्नी यज्ञाग्नि की परिक्रमा करते हैं। इतने भर से उनके अन्तराल में एक गहरी छाप पड़ती है कि अब हम एक-दूसरे के प्रति समर्पित हो गये और जीवन भर के लिए बँध गये। यह भावना न हो तो अँगीठी के या गैस के चूल्हे के इर्द-गिर्द बीस बार फिर लेने पर भी कोई श्रद्धा नहीं जगती और आत्मीयता की डोर नहीं बंधती।

तुलसी, आँवला, पीपल आदि की पूजा और उनके चरणों में जल चढ़ाने का तात्पर्य है कि वृक्ष मनुष्य समुदाय के लिए, प्राणियों के लिए, जीवन का आधार हैं, जिनके सहारे हमारा जीवन चलता है, उनका संरक्षण-अभिवर्धन हमारा कर्त्तव्य है।

दीवाली की रात को जलने वाले दीपक सघन अन्धकार में जगमग पैदा कर देते हैं। प्रतिभावानों का सहचरत्व संगठन भी ऐसा ही चमत्कार उत्पन्न करता है। होली बसन्त में गिरा बिखरा कूड़ा-करकट जलाकर धूलि नाली आदि की सफाई करके स्वच्छता का संदेश हृदयंगम करने और सर्वसाधारण तक उसकी प्रेरणा पहुँचाने की प्रतीक है।

शिखा, यज्ञोपवीत धारण के साथ यह तथ्य जुड़ा हुआ है कि इन प्रतीकों के माध्यम से हम गायत्री मन्त्र की शिक्षा और प्रेरणा को निरन्तर हृदयंगम किये रहें।

इसी प्रकार प्रत्येक पर्व-त्यौहार के पीछे कुछ शिक्षाएं हैं। गोवर्द्धन का त्यौहार वस्तुतः गो-संरक्षण-सम्वर्धन के लिए उत्साह भरता है। विद्या की देवी सरस्वती की, बसन्त पंचमी को जन्म जयन्ती मनाई जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि हममें से कोई अशिक्षित-अविद्याग्रस्त न रहे। शिक्षा प्रसार के लिए जितने भी उपाय सम्भव हों, उन सभी को तत्परता पूर्वक कार्यान्वित किया जाय। गुरु पूर्णिमा में बड़ों का अनुशासन अपनाने की शिक्षा है।

छोटे बच्चों के अन्नप्राशन आदि संस्कार किये जाते हैं। तात्पर्य यह है कि बालकों के आहार की नियमितता और सुव्यवस्था पर पूरा ध्यान रखा जाय। विद्यारम्भ संस्कार कराने का तात्पर्य है कि न केवल भरण-पोषण वरन् शिक्षा एवं सुसंस्कारिता का अभिवर्धन भी समूचे परिवार का कर्त्तव्य है। चिंता में शरीर को जलाना अन्त्येष्टि यज्ञ है। हमारे अंग-अवयव यज्ञीय उच्च प्रयोजन के लिए समर्पित रहें। यह संदेश उस प्रक्रिया में समाहित है। तीर्थयात्रा में जनसंपर्क साधने और जहाँ-तहाँ की समस्याओं का समाधान करने के लिए परिभ्रमण करने को एक उपयोगी पुण्य कर्म माना जाय। धनदान करने की स्थिति न हो तो भी श्रमदान तो सर्वसुलभ है ही। नदी-सरोवरों की देव मान्यता का कारण भी यही है कि जलाशयों को शुद्ध पवित्र और गहरा रखने में हम चूक न करें।

यज्ञ में अपने उपयोग की तथा आरोग्यवर्द्धक वस्तुओं को अपने लिए उपभोग न करके वायुभूत बनाकर विश्वकल्याण के लिए बिखेरा जाता है। यह परमार्थ भावना का प्रशिक्षण है। अग्नि पूजा में उसे ज्वाला की ऊष्मा और चमक का प्रतीक माना जाता है। अग्नि के संपर्क में जो भी आता है, उसी के समतुल्य हो जाता है। हमारा जन-संपर्क ऐसा होना चाहिए किये गये-गुजरों को भी अपने समतुल्य बनाले ओर अपने पास भस्म को जीवन का अन्तिम अवशेष के रूप में रखकर जो भी मिले, उसे संसार के निमित्त वितरित कर दे।

अहिंसा का पालन करें, पर अनीति से संघर्ष के लिए सदा साधन संजोकर रखें, यह ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ का दण्ड धारण- अनुशासन है। हर श्रेष्ठ काम के लिए स्नान के उपरान्त तत्पर होने का प्रयोजन यह है कि हमारे शरीर मन, व्यवहार, उपार्जन आदि में पवित्रता का समुचित समावेश रहे। स्वस्ति वाचन और शान्ति पाठ मंत्रों में वातावरण को शान्तिमय और कल्याणकारक बनाने का निर्देशन है।

देवपूजा में चन्दन, पुष्प, धूप, दीप की प्रस्तुत करने का तात्पर्य है कि हम अपना जीवन प्रकाशोत्पादक तथा चन्दन की तरह समीपवर्तियों को सुगन्धित बनाने का प्रयास करें। अक्षत चढ़ाने का तात्पर्य यह है कि हमारी कमाई का एक अंश सत् प्रयोजन के लिए नियमित रूप से लगता रहे।

इसी प्रकार देव-संस्कृति में अनेकों चित्र-विचित्र प्रथा प्रचलित हैं, पर उन सबके पीछे प्रतीकों के माध्यम से सद्-प्रेरणा अपनाना ही प्रयोजन है।


कृतज्ञता और प्रत्युपकार (kahani)

कभी कभी चिन्तन की विकृति भी ऐसे असमंजस का कारण बन जाती है, जिसमें व्यक्ति कर्त्तव्य, अकर्तव्य को भूल जाता है।

दो सन्त एक ही दिशा में जा रहे थे। एक कुछ आगे थे, दूसरे कुछ पीछे। रास्ते में एक चोट लगने से घायल स्त्री पड़ी थी। अगले सन्त उसे देखकर यह सोचते हुए आगे बढ़ गये कि स्त्री को छूना संन्यासी के लिए पाप है। पीछे वाले सन्त को उसे देखते ही करुणा उपजी और उसे कन्धे पर लादकर घर पहुँचा दिया।

आगे चलकर जब दोनों सन्त मिले तो स्त्री के प्रसंग को लेकर आपस में उलझ गये। महामुनि कौत्सय ने निर्णय दिया कि स्त्री-पुरुष दोनों भगवान की दो भुजाएं हैं इनमें कोई अछूत नहीं। वासना और पाप ही हेय हैं। उसके न होने पर सेवा भाव से नर-नारी किसी का भी स्पर्श कर सकते हैं।

काम वासना मन पर छाई रहे तो तपोवन में बैठा विरक्त व्यक्ति उस व्यक्ति से गया गुजरा होता है जो गृहस्थ जीवन निभाता, दाम्पत्य सुख भोगता हुआ अपना कर्त्तव्य पूरा करता है।

कृतज्ञ बनें मानव कहाएँ-

हमारी हँसी-खुशी और सुख-सुविधा स्वयं उपार्जित है। वह दूसरों के श्रम, सहयोग और अनुग्रह से मिली है। इस तथ्य को यदि ठीक तरह समझा जा सके तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि हम मनुष्य मात्र के ऋणी हैं। हमारी सुख-सुविधाओं में असंख्यों का असंख्य प्रकार का योगदान जुड़ा हुआ है। जीवित और मृतक लोगों के सतत् श्रम और अध्यवसाय का ही वह फल है, जिसका उपयोग करते हुए हम विविध-विधि सुख सुविधायें उपलब्ध कार रहे हैं। इस सच्चाई को जो जितनी अच्छी तरह समझ सकेगा, उसे मानव समाज के प्रति उतनी ही गहरी कृतज्ञता के साथ श्रद्धावनत होना पड़ेगा। अपने को उपकृत अनुभव करना पड़ेगा। यह मृदुल सम्वेदना प्रत्युपकार के लिए एक कसक उत्पन्न करती है और ऋण से उऋण होने का प्रयत्न करने के लिए उभारती है।

दूसरों द्वारा प्रदान किये अनुदानों का हम निरन्तर उपयोग करते रहें, किन्तु बदले में समाज को सुखी समुन्नत बनाने के लिए कोई महत्वपूर्ण योगदान न करें तो यह कृतघ्नता और निष्ठुरता हमारी मनःस्थिति को पाषाणवत् पिछड़ी और छिछली ही सिद्ध करेगी। अनुदान प्राप्त करते जाने में उत्साही रहना, किन्तु प्रतिदान की ओर से मुँह मोड़ लेना यों लाभदायक प्रतीत होता है, पर वह लाभ ऐसा है- जो अंतरात्मा के स्तर का पतित ओर घृणित ही बनाता चला जायेगा। जिसे खाना ही आता है, खिलाने के आनन्द का जिसे ज्ञान ही नहीं ऐसे स्वार्थी तथा संकीर्ण व्यक्ति को सज्जनों की पंक्ति में नहीं बिठाया जा सकता, भले ही वह कितना ही सम्पन्न एवं समृद्ध क्यों न बन गया हो।

बट्रेंड रसेल ने विलासिता और अहन्ता के साधन जुटाने तक सीमित सम्पदा की तुलना डाकुओं द्वारा आँखों पर फेंकी जाने वाली “सर्च लाइट” से की है। वे कहते हैं इस चकाचौंध से आदमी वस्तुस्थिति देख सकने में असमर्थ अन्धों जैसा बन जाता है, उसे दीखना-सूझना बन्द हो जाता है और यह समझ में नहीं आता कि आगे कदम बढ़ाने की दिशा कौन-सी है?

आमतौर से लोगों का लक्ष्य- सुविधा-साधनों का संचय दूसरों को चकाचौंध में डालने वाले आतंक तक सीमित बनकर रह गया है। यह उपयोग तक सीमाबद्ध रहने वाली विचारधारा वस्तुतः पशु-सभ्यता है। इसे अपनाकर कोई अपनी लिप्साओं की तुष्टि कर सकता है, पर उस आत्म-शांति से वंचित ही बना रहेगा, जिसे मनुष्य जीवन का श्रेष्ठ उपहार कह सकते हैं। भौतिक-प्रगति की दृष्टि से सफल और सुख-सुविधाओं से सम्पन्न व्यक्ति अपने संबंध में कुछ भी सोचे- मूल्याँकन की दृष्टि से वह नर पशु से आगे एक कदम भी बढ़ा हुआ नहीं समझा जा सकेगा।

कृतज्ञता और प्रत्युपकार मनुष्यता के प्राथमिक चिन्ह हैं। सज्जनता ओर सहकारिता के आधार पर ही आदमी आगे बढ़ा है, ऊँचा उठा है। यदि इन सत्य प्रवृत्तियों को गँवा दिया जाय तो फिर आदमी- माँस का लोथड़ा भर रह जाता है।

जो कुछ भी हम हैं- वस्तुतः समाज के अनुदान एवं अनुग्रह के फलस्वरूप ही हैं। सहज कृतज्ञता और प्रत्युपकार की वृत्ति यही कहती है कि अनुदान की पुण्य परंपरा को अविच्छिन्न रखने के लिए हमें भी अपना कर्त्तव्य पालन करना चाहिए और समुन्नत समाज की संरचना में समुचित योगदान करना चाहिए।


Quotation

भगवान ने जो तुम्हें दिया है, सो समेटने और फूँकने के लिए नहीं, वरन् इसलिए कि सत्पात्रों में बाँटो और अनेक गुना बढ़ा हुआ पाओ।


आध्यात्म साधना और आहार शुद्धि

मन सोचता है और तद्नुरूप शरीर कार्य करता है। शरीर का विष्लेषण करने पर प्रतीत होता है कि वह कुछ रासायनिक पदार्थों का संयोग कुछ है। यह रासायनिक पदार्थ पाँच तत्वों के संयोग से बनते हैं। तत्व जड़ हैं, इसलिए शरीर भी जड़ है। उसके गुण, कर्म, स्वभाव में जो उत्कृष्टता निकृष्टता पाई जाती है, वह वस्तुतः मन के स्तर पर निर्भर है। शरीर एक वाहन उपकरण मात्र है। वह चलाने वाले के इशारे पर चलता है। इन्द्रियलिप्सा भी वस्तुतः मनोविकारों के रूप में ही प्रादुर्भूत होती है। मन की चंचलता ही इन्द्रियों को चंचल बनाती है। निग्रहित मन लिप्साओं के प्रति अरुचि दिखाता है तो इन्द्रियों की लालसा भी सहज ही शान्त हो जाती है।

इतने पर भी दोष और श्रेय शरीर को ही मिलता है। क्योंकि वही व्यक्ति का दृश्य रूप है। उसकी स्वच्छता, सज्जा, सभ्यता ही नहीं आदतें भी मन पर ही निर्भर रहती हैं। उसका स्तर शरीर के हर क्रिया-कलाप से झलकता रहता है। शरीर और मन के सम्मिश्रण से ही व्यक्तित्व एवं स्तर बनता है।

मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है। वह भी शरीर का ही एक भाग है। जिस प्रकार मन की प्रेरणा से शरीर काम करता है, उसी प्रकार यह भी एक परोक्ष तथ्य है कि शरीर के अनुरूप मन का भी सम्मान विनिर्मित होता है।

शरीर का रासायनिक विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वह आहार का- अन्न का उत्पादन है। अन्न के आधार पर ही शरीर बनता, बढ़ता, गड़बड़ाता, परिपुष्टि होता, उसी का पाचन समाप्त होने पर वह मर भी जाता है।

शरीर आरम्भ में शुक्राणु और डिम्बाणु के समन्वय से बना पानी के एक छोटे बबूले की तरह होता है। इसके बाद माता के शरीर से शिशु के शरीर में आहार पहुँचना आरम्भ होता है। फलतः वह बढ़ने लगता है और नौ महीने में इतना परिपक्व हो जाता है कि प्रसव के उपरान्त संसार के दबावों को सहन कर सके। इस स्थिति तक पहुँचाने का श्रेय माता द्वारा दिये गये उस अन्न को है जो नाल मार्ग से शिशु को निरन्तर मिलता रहता है।

जन्मने के उपरान्त उसे आहार की जरूरत पड़ती है। वह दूध के रूप में मिलता है। दूध भी आहार है- आहार अर्थात् अन्न। कुछ दिन बाद अन्न के रूप में दूसरी वस्तुएँ खाने लगता है और अन्ततः पूर्णतया आहार पर निर्भर हो जाता है। अच्छे आहार से शरीर सुविकसित परिपुष्ट होता है और उसका स्तर घटिया रहने पर कुपोषण के शिकार बालक या व्यक्ति दुर्बल रह जाते हैं। आहार का स्तर एवं अनुपात पेट की आवश्यकता के अनुरूप न रहने पर अपच रहने लगता है और वह अपच ही चित्र-विचित्र बीमारियों प्रधान कारण होता है। विषाणुओं का आक्रमण भी रक्त की शुद्धता न होने पर ही होता है और अशुद्ध रक्त बनने का कारण अपच है। अपच आहार की क्रमव्यवस्था बिगड़ जाने की ही परिणति है। तात्पर्य यह है कि बलिष्ठता, सुन्दरता से लेकर दुर्बलता और रुग्णता का प्रमुख कारण आहार के स्तर को ही समझा जा सकता है।

आहार के आधार पर शरीर बनता और बढ़ता है। रुग्णता को दूर करने में काम आने वाली औषधियाँ भी आहार बनाकर ही शरीर में पहुँचती और पचती हैं। आहार में विषाक्तता रहने पर शरीर की मृत्यु होने में भी देर नहीं लगती। इसलिए प्रत्यक्ष जीवन का आधार आहार ही माना गया है। वह न मिले तो मनुष्य दुर्बल होने लगता है और अन्ततः प्राण त्याग देता है।

अन्न से रस, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से अस्थि और मज्जा भेद वीर्य आदि बनते-बनते अंत मन बनता है। मन में चेतना का समावेश तो है, पर मस्तिष्क संस्थान वस्तुतः अन्न शरीर का ही एक भाग है। इसलिए स्वाभाविक है कि जैसा अन्न खाया जाय वैसा मन बने। शरीर शास्त्री ओर मनोविज्ञानी इस सम्बन्ध में प्रायः एक मत हैं कि आहार से मन का स्तर बनता है। प्रकृति की कैसी विचित्रता है कि जहाँ मन की प्रेरणा से शरीर को चित्र-विचित्र काम करने पड़ते हैं वहाँ यह भी एक रहस्य है कि मन का स्तर शरीर द्वारा बनता है। वह शरीर जो अन्न द्वारा विनिर्मित होता है। शरीर जहाँ मन का अनुचर है वहाँ उसकी स्थिति को बनाने में प्रमुख भूमिका भी निभाता है। इस उलझन को देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि शरीर प्रधान है या मन। गुत्थी इस तरह सुलझती है कि दोनों का सृजेता अन्न है। इसलिए शरीर ओर मन का सूत्र-संचालक यदि अन्न को कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

जीवन का- व्यक्तित्व का स्तर निर्धारित करने के लिए सर्वप्रथम अन्न के स्वरूप को सम्भालना पड़ता है। क्योंकि वही शरीर को विनिर्मित करता है और उसी के अनुरूप मन की प्रवृत्ति बनती है। इस प्रधान आधार की शुद्धता पर ध्यान न दिया जाय तो न शरीर की स्थिति ठीक रहेगी और न मन की दिशाधारा में औचित्य बना रह सकेगा।

आध्यात्मिक साधना क्रम में लोग एक भूल करते हैं कि वर्णमाला पढ़े बिना, एम.ए. की पुस्तक खरीद लाते हैं। उसे पढ़ने का हठ और पढ़ाने का आग्रह करते हैं। कई प्रकार के उपासनात्मक कर्मकाण्ड सीखने और उन्हें जल्दी-पल्दी निपटा कर तुर्त-फुर्त सिद्ध चमत्कार बटोरने की फिराक में रहते हैं। अच्छा होता कि कोई इन बाल-बुद्धि लोगों को यह समझा सकने में समर्थ हुआ होता कि हर साधना मन की एकाग्रता और पवित्रता से सधती है। इस श्रीगणेश के बिना गाड़ी एक कदम नहीं चलती जो साधना उपचार में मन की भूमिका को समझ लेगा उसे मनोनिग्रह की साधना को प्राथमिकता देनी होगी। इसके बाद अन्यान्य कर्मकाण्डों में हाथ डालने की बात सोची जा सकेगी।

मन निग्रह हठयोग से नहीं हो सकता। हठयोग के लिए अन्यान्य क्रिया-कलापों का सुविस्तृत क्षेत्र पड़ा है। पर आहार शुद्धि तो हर हालत में आरम्भिक तथा अनिवार्य है। हठ का आश्रय लेना हो तो भी सर्वप्रथम यही हठयोग साधना चाहिए कि आहार को पवित्रतम बनाया जायेगा। उसका स्तर और अनुपात मर्यादाओं के बन्धन में जकड़ कर रखा जायेगा।

आहार के सम्बन्ध में विचार करत समय थाली में परोसी गई वस्तुओं का निरीक्षण परीक्षण करने से पूर्व यह देखना होगा कि वह ईमानदारी की कमाई है या नहीं? उसमें चोरी, ठगी, हरामखोरी जैसे तत्वों का सम्मिश्रण तो नहीं। जो बिना मेहनत के अथवा कम मेहनत में अधिक कमाने के लालच में अनीतिपूर्वक कमाया गया है। वह अभक्ष्य है। चाहे उस अनुपयुक्त कमाई से फल, दूध जैसी व्रत उपवास में खरीदी गई वस्तु ही क्यों न खरीदी या परोसी गई हो।

आहार की शुद्धता रासायनिक पदार्थों पर निर्भर नहीं है वरन् उसकी कारण शक्ति पर निर्भर है। तथाकथित सात्विक पदार्थ खाते रहा जाय पर उनके उपलब्ध करने के तरीके में यदि अनीति अनाचार का समावेश है तो समझना चाहिए कि उससे बना यह शरीर या मन, आत्मिक प्रगति की अगली कठिन यात्रा में चल न सकेगा। अपंग की तरह जहाँ का तहाँ खड़ा रहेगा।


व्यामोह में फंसे (kahani)

अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी न कर घर के व्यामोह में फंसे रहने वाले सदा दुत्कारे ही जाते हैं। छत की मुड़ेर पर नित्य काला कौआ आकर बैठता। छोटा बालक माता से रोज पूछता यह काला क्यों है? और इतनी जल्दी क्यों आता है? घर आकर क्या कहता है?

एक दिन माता को उत्तर सूझ पड़ा। उसने बताया- यह भक्ष-अभक्ष कुछ भी खाता है इसलिए इसका मुँह काला है। कटु-कर्कश बोलता है इसलिए जगह-जगह मारा-मारा फिरता है। घर-घर जल्दी पहुँच कर यह कहता है, मेरा जैसा अशांत, अपमानित जीवन और कोई न जिये। जीवन का उत्तरार्ध- पूर्वार्ध से श्रेष्ठ हो। परमार्थ के कार्य में लगे हर व्यक्ति को सोचना व इसके लिये सुनियोजित कदम पूर्व से ही उठाना चाहिए।


प्राणशक्ति और वैज्ञानिक अभिमत

डा. थेरेसे ब्रॉस ने निमोग्राफिक और कार्डियोग्राफिक मशीन से योग की स्थिति में अध्ययन से पाया है कि योगी द्वारा अपने हृदय पर नियन्त्रण करने से हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है और आइसो इलेक्ट्रिक ग्राफ पर इसका मापन नहीं किया जा सकता। परन्तु नियन्त्रण हटा देने पर यह धड़कन नॉरमल हो जाती है और योगी की इच्छा के अनुसार इसकी वोल्टेज बढ़ भी जाती है। यह प्रभाव योगी की प्राण शक्ति की इच्छानुसार प्रयोग का है।

विज्ञान द्वारा यह पाया गया है कि श्वास से खींचे गए आक्सीजन की शक्ति (ऋणात्मक आयन्स) को फेफड़े की महीन नलिकाएं कोलोइड्स को भेज देती हैं जिससे यह यौगिक नियन्त्रण हो पाता है। योगी बिना शरीर विज्ञान की जानकारी के इस तरह शारीरिक क्रियाओं पर पूर्ण नियन्त्रण कर लेते हैं। फिर भी पूर्ण स्वस्थ रहते हैं और सुख शान्ति से भरपूर रहते हैं, उनका स्वस्थ रहना असम्भव था, यदि वे शारीरिक नियमों का पालन न करते होते।

विज्ञान को अब विश्वास हो गया है कि वातावरण में संव्याप्त प्राण बिजली के कणों द्वारा आवेशित हैं, विशेषकर ऋण आयनों द्वारा और शरीर द्वारा ग्रहण किया गया प्राण का शरीर में ही वास्तविक चयापचय होता है। इस प्राण के पूर्ण रहस्य को जानने के लिए वान उत्सुक है। स्ट्रासबर्ग की चिकित्सा अकादमी के प्रोफेसर और जीव भौतिकी संस्थान के डायरेक्टर फ्रेड वैलेस ने अपनी पुस्तक “द बायोलाजिकल कंडिशन्स क्रीएटेड बाई द इलेक्ट्रिकल प्रापर्टीज ऑफ द एटमॉसफियर” में इस सम्बन्ध में पूर्ण वैज्ञानिक जानकारी लिखी है।

भू भौतिकी विज्ञानियों ने प्रयोगों में पाया है कि पृथ्वी की ऊपरी सतह ऋण आवेशित है और ऊपरी वायुमण्डल धनात्मक है। हमारा प्राणवान वायुमण्डल ऊर्ध्वाकार विद्युतीय क्षेत्र है जिसमें प्रति मीटर अल्टीट्यूड में 100 से 150 वोल्ट बिजली है। चीनी वैज्ञानिक सूली.डी. मोरेन्ट के अनुसार चीन के “यांग” और “यिन” परक विचार इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण हैं। शान्त वातावरण धनात्मक होता है। इसे चीनी “यांग कहते हैं।, जो सूर्य और तारों के कारण होता है। ऋणात्मक आवेश पृथ्वी के कारण होती है जिसे वे ‘यिन’ कहते हैं। सोलहवीं सदी की चीनी पुस्तक के अनुसार यांग हल्की और शुद्ध होती है। यह शक्ति ऊपर की ओर बढ़ती है जिससे आकाश बना है। यिन भारी और मोटी है जिससे पृथ्वी बनी है। आकाश की शक्ति ऊपर है और पृथ्वी की शक्ति वनस्पति में नीचे है। यह प्राण शक्ति समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार कम या अधिक होती रहती है।

सूर्य और तारे भी प्राणशक्ति को प्रभावित करते हैं। प्राण शक्ति में दो तरह के आयन्स होते हैं -

(1) ऋण आवेश युक्त, छोटे अधिक क्रियाशील, जो शरीर के सेल्स को शक्ति देते हैं और वायुमण्डल से प्राणियों को प्राप्त होते हैं। स्वच्छ आबोहवा में प्रत्येक बड़े आयन के साथ दो या तीन यह छोटे आयन्स होते हैं। ऋण आयन्स, धूल, धुंआ, कोहरा और गन्दी हवा से नष्ट होते हैं।

(2) बड़े, मन्द, अनेक अणुओं वाला न्यूक्लियस वाला आयन। ये गन्दे स्थानों पर अधिक होते हैं। ये वातावरण से छोटे आयन्स में मिल जाते हैं और अनेक आयन्स के मेल से बड़े आयन्स बनाते हैं। इनके बढ़ने से क्रियाशील (प्राणवान) छोटे आयन्स वातावरण में कम हो जाते हैं।

इन वैज्ञानिक निष्कर्षों से योगियों का यह कथन प्रामाणित होता है कि प्राण कोई आक्सीजन, नाइट्रोजन या रसायन नहीं है। बड़े आयनों की अधिकता के कारण ही शहर की हवा प्राणवान ओर स्फूर्तिदायक नहीं होती। धूल, कल-कारखानों एवं कारों से निकलने वाली गैस के समान ही हानिकारक है क्योंकि यह प्राण को नष्ट कर देती है। एयर कन्डीशन्स जगहों में भी प्राण नहीं पाये जाते, सिर्फ धूल का प्रवेश वहाँ रुकता है। धुंआ और कोहरा भी इसी तरह प्राणहीन होते हैं।

प्राण शक्ति का मुख्य श्रोत सूर्य के शार्ट वेव्ह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन्स हैं। वातावरण के क्रियाशील ऋण आवेशित आयन्स इसी के परिणाम हैं। यही मनुष्यों जीवन जन्तुओं, वनस्पति, पेड़-पौधों, अणु-परमाणुओं, प्रोटान्स, न्यूट्रान्स एवं समस्त पदार्थों की प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) है। प्राणवान ऋणात्मक आयनों का दूसरा प्रमुख स्रोत ब्रह्मांडीय किरणें हैं, जो लगातार दिन रात आती हैं।

ये शक्तिशाली ऋण आवेशी आयन्स पानी के लहराने और वाष्पीकरण से भी अधिक मात्रा में निकलते हैं, इसीलिए समुद्री हवा उत्साहवर्द्धक होती है। समुद्री तूफानों और धूल की अनुपस्थिति में भी ये अधिक होते हैं। समुद्र के किनारे और समुद्र में हम प्राण से स्नान करते हैं और इससे हमारे क्रियाशील एवं अति सम्वेदना वाले अंग अधिक पुष्ट होते हैं। चिड़चिड़े और स्नायविक लोगों को भी समुद्री हवा लाभप्रद है। प्राणायाम का उद्देश्य भी इस क्रियाशील आयन्स की शक्ति को ग्रहण करना, उन्हें अन्यान्य अंगों में भेजना एवं शक्ति अर्जित करना है।

अन्न और जल के चयापचय प्रणालियों की तरह मानव शरीर में विद्युत (प्राण) के चयापचय की प्रणाली भी है। पाश्चात्य वैज्ञानिक वैलेसे के अनुसार मनुष्य इस प्राण शक्ति के क्रियाशील ऋण आवेशी आयन्स को प्राप्त करके ऋण आवेशी हो जाता है। इस प्राण प्रणाली की शक्ति पर ही दूसरी प्रणालियाँ काम करती हैं। श्वास द्वारा ली गयी वायु से मनुष्य इन ऋण आवेशी आयन्स को तब तक ग्रहण करता है, जब तक वे अधिक होने के कारण त्वचा से बाहर नहीं निकलते। वैलेस ने अपने प्रयोगों में पाया है कि हमारे अंग ऋण आवेशी आयनों से क्रियाशील रहते हैं और इनकी वृद्धि से उसकी जीवनी शक्ति बढ़ती एवं स्फूर्ति एवं साहस में वृद्धि होती है। इस तरह पाश्चात्य विज्ञान पूर्णतः भारतीय योगियों के प्राण सम्बन्धी सिद्धान्तों की पुष्टि करता है।

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि गहरी और लम्बी श्वास लेने से हमें अधिक हवा मिलती है, और हम अधिक प्राण पाते हैं। इससे नर्वस सिस्टम फेफड़ों को हवा प्रदूषण करने के लिए उत्तेजित करता है। नासिका के नर्वस में थोड़ा भी विक्षेप पूरे श्वसनाँगों पर बहुत प्रभाव डालता है- यथा छींक। इसलिए प्राणायाम के द्वारा नथुनों को अधिक फैलाकर अधिक वायु ग्रहण करने का हम अभ्यास करें। इससे हमें अधिक प्राण मिलेगा और हमारे मन एवं अंग सशक्त एवं स्फूर्तिवान बने रहेंगे। लगातार अभ्यास से हम यह सतत् लाभ उठा सकते हैं।

इस गहरे श्वास से हमें दस प्रतिशत हवा अधिक मिलती है। प्रति मिनट 18 श्वास के हिसाब से एक वर्ष में हम पाँच लाख लीटर हवा अधिक पायेंगे जो हमारे श्वसनाँगों एवं अन्यान्य अंगों को अधिक शक्तिशाली बनायेगी। अभ्यास होने पर यह सुगम होगा और श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया इससे अधिक नियमित होगी।

डा. वैलेस के अनुसार मानव शरीर में बिजली (प्राण) के चयापचय से अनेक बातें मालूम होती हैं। ऋण आयन्स का पाचन शरीर के अंगों को क्रियाशील रखने के लिए अति आवश्यक है और क्षति ग्रस्त आयनों का शरीर से निष्कासन भी उतना ही जरूरी है।

वैलेस का कथन है कि यह प्राण सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों ( परा बैगनी किरणों ) की फोटोकेमिकल ( प्रकाश रसायन ) क्रिया के द्वारा प्राप्त होती है। सूर्य स्नान हमारे विद्युत चयापचय को क्रियाशील बनाकर हमें अधिक शक्ति (स्फूर्ति) देता है। शरीर को पृथ्वी से पृथक (इन्सुलेटेड) नहीं रखना चाहिए क्योंकि लगातार क्रियाशील ऋण आयन्स का प्रवाह तब शरीर में नहीं हो सकेगा। प्राणियों के फरवाली चमड़ी से उनमें प्राण अधिक आकर्षित होता है और सुरक्षित बना रहता है। मनुष्य के शरीर में कपड़े पहनने से वह इन्सुलेटेड हो जाता है और क्रियाशील आयन्स का लाभ नहीं उठा पाता। इससे वह सुस्त और रोगग्रस्त होता है। अच्छा यही है कि प्राणायाम की विज्ञान सम्मत प्रक्रिया हर क्षण अपनाते रहा जाय।


चिकित्सा क्षेत्र में ध्यानयोग का प्रवेश

वेलिंगटन विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक टाम ज.रौट ने अपने अध्ययन में पाया है कि- ध्यान का अभ्यास करने वाले साधक की शारीरिक क्षमता सामान्य और सुचारु रूप से सम्पादित होने लगती है। ध्यान के बाद भी अभ्यास कर्त्ता की श्वसन गति धीमी एवं आरामदायक रूप में चलती रहती है। धीरे-धीरे श्वसन गति की दर कम हो जाती है जो स्वास्थ्य के लिए सुखद मानी जाती है।

वैज्ञानिक डैविड डब्ल्यू. ओर्मे जान्सन ने “आटोनामिक स्टैबिलिटी एण्ड मेडीटेशन” पर अपने अनुसन्धान में पाया है कि- ध्यान के द्वारा तन्त्रिका तन्त्र के क्रियाकलापों में एक नई चेतना आ जाती है और उनके सभी कार्य नियमित एवं स्थायी रूप में होने लगते हैं। शरीर की त्वचा बाह्य वातावरण के प्रति प्रतिरोधी क्षमता धारण कर लेती है और उस पर आये दिन पड़ने वाले वातावरण के तनाव, मनःकायिक बीमारियां (साइकोसोमैटिक डिसीज), व्यावहारिक अस्थायित्व एवं तन्त्रिका तन्त्र की विभिन्न कमजोरियां आदि दूर हो जाती हैं। शरीर के अन्दर शक्ति का संरक्षण और भण्डारण होने लगता है और यह अतिरिक्त ऊर्जा शरीर और मन के विभिन्न कार्यों व्यवहारों को अच्छे ढंग से सम्पादित करने के कार्य में प्रयुक्त होने लगती है।

ध्यान का अभ्यास करने वाले व्यक्ति तनाव जैसी मानसिक बीमारियों से जल्दी ही छुटकारा पा लेते हैं। यह कार्य उनके शारीरिक ताँत्रिक तन्त्र की क्रियाशीलता बढ़ जाने के परिणाम स्वरूप होता है।

अमेरिका के वैज्ञानिक द्वय राबर्ट शा और डैविड कोल्ब ने ध्यान के अभ्यासियों पर किए गये अपने प्रयोगों में पाया है कि ध्यान करने वाले लोगों में शरीर और मस्तिष्क के बीच अच्छा समन्वय, सतर्कता में वृद्धि, मति मन्दता में कमी और प्रत्यक्ष ज्ञान, निष्पादन क्षमता, एवं रिएक्शन टाइम में वृद्धि असामान्य रूप से होती है।

मिरर स्टार- ट्रेसिंग टेस्ट में भी ऐसे व्यक्ति अग्रणी निकले हैं। उनके शारीरिक न्यूरोमस्कुलर समाकलन की दक्षता बहुत बढ़ी-चढ़ी हुई पाई गई।

आन्द्रे एस. जोआ ने हालैण्ड में हाई स्कूल के छात्रों को एक वर्ष तक ध्यान का अभ्यास कराया। नियमित ध्यान करने वाले छात्रों की सामान्य विद्यार्थियों की अपेक्षा बुद्धि क्षमता में बहुत अधिक वृद्धि पाई गई। कठिन मामलों के हल प्रश्नों के उत्तर देने में ध्यान करने वाले छात्र अग्रणी रहे। इनकी स्मृति क्षमता में भी वृद्धि हुई। शैक्षणिक-प्रदर्शन में ये छात्र सर्वश्रेष्ठ रहे।

वैज्ञानिक विलियम सीमैन ने बताया है कि प्रथम दो महीने तक ध्यान करने वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व में विकास होते देखा गया है। ध्यान का अभ्यास नियमित क्रम से करते रहने पर अन्तःवृत्तियों अंतःशक्तियों पर नियन्त्रण पाया जा सकता है और चिन्ता मुक्त हुआ जा सकता है।

थियोफेर नामक वैज्ञानिक ने अपने अध्ययन में पाया है कि ध्यान करने वाले व्यक्तियों की साइकोलाजी में असाधारण रूप से परिवर्तन होता है। ऐसे व्यक्तियों में घबराहट, उत्तेजना, मानसिक तनाव, साइकोसोमैटिक बीमारियाँ, स्वार्थपरता आदि विकारों में कमी पाई गई है तथा आत्म-विश्वास और सन्तोष में वृद्धि, सहन शक्ति, साहसिकता, सामाजिकता, मैत्री भावना, जीवटता, भावनात्मक स्थिरता, कार्यदक्षता, विनोदप्रियता, एकाग्रता जैसे सद्गुणों की वृद्धि ध्यान के प्रत्यक्ष लाभ मिलते हैं।

वैज्ञानिक द्वय विलियम पी. वानडेनबर्ग और बर्ट मुल्डर ने नीदरलैण्ड में विभिन्न उम्र, लिंग और शैक्षणिक योग्यता वाले ध्यान के अभ्यासकर्त्ताओं पर किये गये अपने सप्ताह के प्रयोगों में पाया है कि ध्यान कर्त्ताओं के दृष्टिकोण में आमूल-चूल परिवर्तन हो गया। उनमें भौतिक और सामाजिक अपर्याप्तता, दबाव एवं कठोरता युक्त व्यवहार में कमी आई तथा आत्म-सम्मान की वृद्धि हुई।

मिनेसोटा के प्रसिद्ध चिकित्सक डेविड डब्ल्यू. आर्मेजान्सन ने ध्यान का प्रयोग व्यक्तियों के मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में किया। कुछ महीनों तक ध्यान का अभ्यास करने पर उन्हें लोगों के व्यक्तित्व में आशाजनक सत्परिणाम देखने को मिले। हाइपोकोन्ड्रिया, साइजोफ्रेनिया, टायलर मेनीफेस्ट एंक्जाइटी जैसी बीमारियों को ध्यान द्वारा नियन्त्रित करने में भी जान्सन को सफलता मिली। अधिक दिनों तक ध्यान के नियमित अभ्यास का क्रम बनाये रखने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में असाधारण रूप से वृद्धि होती है।

मनोवैज्ञानिक द्वय फिलिप सी. फर्गुसन और जॉन सी. गोवान का निष्कर्ष है कि बहुत दिनों तक ध्यान का अभ्यास करते रहने पर व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है। छह सात सप्ताह तक नियमित ध्यान का अभ्यास करने वाले व्यक्ति चिन्ता और तनाव मुक्त होते देखे गये हैं। ध्यान में लगाया गया अधिकाधिक समय चक्रवृद्धि ब्याज सहित सत्परिणाम देता है।

वैज्ञानिकों का मत है कि ध्यान का प्रयोग उच्च रक्त चाप को कम करता है। हर्बर्ट बेन्सन और रार्बट कीथ वैलेस ने उच्च रक्तचाप युक्त 22 बीमार व्यक्तियों का ध्यान के पूर्व और ध्यान के बाद 1119 बार उनका सिस्टोलिक और आर्टीरियल ब्लड प्रेशर रिकार्ड किया। ध्यान करने के बाद उक्त रोगियों के रक्तचाप में महत्वपूर्ण कमी आँकी गई।

इन्हीं वैज्ञानिक द्वय ने शराब और सिगरेट पीने वाले नशा होने के आदी 1862 व्यक्तियों को 20 महीने तक ध्यान का अभ्यास कराया। धीरे-धीरे नशे की आदत छूटती गई और जो लोग पहले तनाव, श्वास-खाँसी के मरीज बने थे, उनके स्वास्थ्य सुधरने लगे।

वैज्ञानिक फ्रैंक पैपेन्टिन ने अपने अनुसन्धान- “ध्यान और शुद्धिकरण” में बताया है कि ध्यान का नियमित अभ्यास करने से मनुष्य के शरीर की जीवन शक्ति बढ़ती है- इम्यून सिस्टम विकसित होता है। फलतः आये दिने धर दबोचने वाली अनेकों छूत की बीमारियों- संक्रामक बीमारियों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। फ्रैंक का कहना है कि संक्रामक बीमारियों के ग्रस्त 408 व्यक्तियों को ध्यान का अभ्यास कराने पर 70 प्रतिशत व्यक्ति प्रतिवर्ष की दर से अच्छे होते देखे गये। एलर्जी से त्रस्त 156 व्यक्तियों में से 56 प्रतिशत व्यक्तियों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ अथवा वे एलर्जी से मुक्त हुए। इससे स्पष्ट होता है कि ध्यान करने से व्यक्ति की जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है।

40 घण्टों तक निद्रा से वंचित और तनाव से ग्रस्त व्यक्तियों को ध्यान का अभ्यास कराया गया। ध्यान के बाद उन्हें गहरी निद्रा आई और वे अपने को स्वस्थ अनुभव करने लगे। यह बात डा. डोनाल्ड ई. मिस्कीमैन ने अपने अनुसन्धान “क्षतिपूरक विरोधाभासी निद्रा पर ध्यान का प्रभाव” में कही है। उनके अनुसार ध्यान के अभ्यास द्वारा इन्सोम्निया- अनिद्रा रोग पर सहज में ही विजय पाई जा सकती है।

इरा एम. क्लेमोन्स नामक वैज्ञानिक ने ध्यान के प्रयोगों द्वारा 46 व्यक्तियों के दाँत की बीमारियों- मसूड़ों के रोगों पर जीवनी शक्ति बढ़ाकर नियन्त्रण कर दिखाया। क्लेमोन्स के अनुसार ध्यान करने से रोगी की प्रतिरोधी सामर्थ्य बढ़ जाती है और तब उसकी बीमारियों पर चिकित्सा द्वारा आसानी से नियन्त्रण पाया जा सकता है।

ध्यान योग अब चिकित्सा विज्ञान में एक विधा के रूप में प्रतिष्ठा पा चुका है और वह दिन दूर नहीं जब असाध्य रोगों का उपचार एवं सम्भावित रोगों से रोकथाम हेतु चिकित्सक किसी औषधि का प्रयोग न कर पहले रोगियों को ध्यान की कसौटी पर परखेंगे।


Quotation

प्रभु, तुम्हारे इस उद्यान में मुझे किस बात की कमी है। उमड़ते बादल, बहते निर्झर, हरीतिमा से भरे बिछावन मेरे लिए पर्याप्त हैं और फिर तुम मुझे खाली पेट भी तो नहीं सोने देते। भोजन दोनों बार मुझे मिल जाता है। तन भी उघाड़ा कहाँ रहा। मरे परमेश्वर तुम मुझे अब तक सत्पथ पर चलाते लाये हो। अगले दिनों इतना करना कि मेरी प्रीति तुम्हारे साथ छूटने न पाये। तुम्हारे प्रकाश में मुझे भटकाव न घेरे इतनी भर आकाँक्षा और प्रार्थना है।

-सेन्टपाल


अजपा जप-सोऽहम् साधना

प्राणायाम की एक विधा विशुद्ध आध्यात्मिक है, जिसे अजपा जप-सोऽहम् साधना या हंस योग कहते हैं। इसका सामान्य प्रयोग बहुत सरल है। स्थिर शरीर और शान्ति चित्त होकर श्वास के आवागमन की क्रिया आरम्भ की जाय। साँस लेते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम’ की ध्वनि श्रवण पर चित्त एकाग्र किया जाय।

इस विधान में कई प्रयोजन एक साथ जुड़ जाते हैं। नादयोग में सूक्ष्म ध्वनियों के श्रवण का अभ्यास किया जाता है और उसके लिए शब्द तन्मात्रा को विकसित करके दिव्य कर्णेन्द्रियों का प्रयोग किया जाता है। अन्यथा खुले कानों से तो आस-पास की हलचलों का कोलाहल ही सुनाई पड़ता है। श्वास के साथ धुली हुई ‘सो’ और ‘हम्’ की ध्वनियों को सुनने के लिए सूक्ष्म कर्णेंद्रियों की साधना करनी पड़ती है। इसलिए इस योगाभ्यास में नादयोग जुड़ा हुआ माना जा सकता है।

इस साधना में ध्यानयोग भी जुड़ा हुआ है। श्वास के आवागमन पर चित्र एकाग्र करना पड़ता है। वह न बन पड़े तो वायु प्रवेश के साथ ‘सो’ की और निकलने साथ ‘हम्’ के श्रवण का तालमेल ही नहीं बैठता। हर साँस की गतिविधि पर ध्यान रखना पड़ता है। इतना ध्यान जम जाने के उपरान्त ही ध्वनि श्रवण का अगला कदम उठता है।

‘सोऽहम्’ वेदान्त मन्त्र है। ‘सो’ का अर्थ वह और ‘हम्’ का अर्थ मैं है। ‘वह परमात्मा मैं हूँ, “मैं परमात्मा के समकक्ष हूँ की भावना का विकसित करना वेदान्त तत्वज्ञान का आधार है। तत्वमसि, शिवोऽहम्, सोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् अयमात्मा ब्रह्म, आदि सूत्रों में इसी तत्वज्ञान का प्रतिपादन है कि आत्मा और परमात्मा के मध्य अविच्छिन्न एकता है। दोनों के मध्य अंश, अंशी का सम्बन्ध है। चिनगारी और ज्वालमाल जैसा। इस अनुभूति का दर्शन एवं प्रयोग ‘पंचदशी’ आदि ग्रन्थों में विस्तार पूर्वक बताया गया है। उस अद्वैत साधना का अभ्यास भी इस प्रयोग प्रयोजन के साथ जुड़ जाता है।

गायत्री मन्त्र चौबीस अक्षरों का है। उसमें तीन व्याहृतियां भी संयुक्त हैं। किन्तु उस महामन्त्र में अनायास ही अचेतन जप किये जाने से प्रत्येक साँस के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का, ईश्वर दर्शन का, प्रयोजन भी सधता है। इसलिए इसे अजपा गायत्री जप भी कहा गया है। गायत्री साधना में उच्चस्तरीय भूमिका में प्रवेश करते हुए साधक को सोऽहम् साधना का भी अभ्यास करना पड़ता है। इसलिए यह जहाँ गायत्री का सार तत्व है वहीं सुसंचालित साधना क्रम भी। अन्य जपों में प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना होता है, पर यह अनायास ही बन पड़ता है। साँस के साथ स्वसंचालित रीति से यह बिना प्रत्यक्ष प्रयत्न किए हुए ही अनायास होता रहता है। यह श्वसन क्रिया सोते-जागते हर समय होती रहती है और साधना क्रम भी उसके साथ जुड़ा रहता है। इसलिए उसे बिना जप किये जप- “अजपा जाप” भी कहा जाता है।

योगों के अगणित प्रयोगों और विधानों में एक हंस योग भी है। हंस इसलिए कहा गया है कि ‘सोह’ को उलट देने पर हंस बन जाता है। जैसे लगातार बिना रुके राम-राम कहा जाय तो वह उलटकर अथवा गति चक्र के आधार पर मरा-मरा जैसा प्रतीत होने लगता है। संस्कृत में एक विधा के अनुसार ‘हिंस’ अर्थात् हिंसक शब्द उलटकर सिंह बन गया है। सोऽहम् में भी ऐसी ही बात है। ‘स+अहम्’ इसका वास्तविक रूप है। अ का इस मिश्रण में लोप हो गया है। उसके उलट जाने पर ‘हंस’ शब्द बनता है।

भगवान के चौबीस अवतारों में एक हंसावतार भी हुआ है। इसे उसकी साधना भी कहा जा सकता है। हंसयोग का प्रतिफल ‘राजहंस’ या परमहंस के रूप में प्रकट होता है। यह दोनों ही अध्यात्म क्षेत्र की उच्च स्थितियाँ हैं।

हंस का गुण है- नीर-क्षीर विवेक। वह दूध और पानी के सम्मिश्रण को अलग कर देता है। दूध को ग्रहण करता और पानी को छोड़ देता है। अर्थात् श्रेष्ठ को ग्रहण करने और निकृष्ट को त्याग देने की उसकी प्रवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति साधक में विकसित हो तो समझना चाहिए कि हंस वृत्ति का अवतरण हुआ। हंस श्वेत होता है। साधक का जीवन क्रम वैसा ही हो तो समझना चाहिए कि कबीर की वह उक्ति सार्थक हुई, जिसमें उनने कहा था- ‘दास कबीर जतन सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया।”

हंस के सम्बन्ध में कहते हैं कि वह मानसरोवर में रहता है। मोती चुगता है, कीड़े नहीं खाता। यह प्रतिपादन राजहंस स्तर के साधक की मनोवृत्ति का परिचय है। अन्यथा पक्षी हंस तो अन्य जलाशयों में रहते और कीड़े खाते भी देखे गये हैं। मोती ही खाने वाले हंस उस प्रवृत्ति के प्रतीक हैं कि भले ही भूख से प्राण निकले, घोर कठिनाइयाँ सहें पर अपना स्तर नीचे नहीं गिरने देते।

‘सोऽहम्’ की ध्वनि प्रकृति और पुरुष के मिलन से प्रादुर्भूत होती है। कहा गया है कि सृष्टि के आदि में परब्रह्म की इच्छा हुई कि मैं अकेला हूँ। अकेलेपन में क्या आनन्द, इसलिए मुझे एक से बहुत हो जाना चाहिए। यह इच्छा ही प्रकृति बन गई। प्रकृति जड़ थी, पुरुष चेतन। दोनों के संयोग से ही यह विश्व ब्रह्मांड बन सकता था। इसलिए दोनों का मिलना शब्दब्रह्म के रूप में प्रकट हुआ। जिस प्रकार घंटा, घड़ियाल में मोगरी की चोट पड़ने से झंकार थरथराहट जैसी ध्वनि होती है, वैसी ही कुछ प्रकट होने पर उस शब्द ब्रह्म को ओंकार कहा गया। प्रकृति और पुरुष के मिलन से जब जीव की उत्पत्ति हुई तो उसका वाचक शब्द हम् भी मिल गया। परमात्मा ‘स’। जीवन ‘अहम्’। दोनों के मध्यवर्ती प्रकृति का लोप हो गया। आत्मा और परमात्मा दो ही रह गये। उस द्वैत भाव का प्रतीक सोऽहम् है। इस प्रकार यह भी ओंकार का सहचर है। सृष्टि के आदि से ही इसका अस्तित्व है।

सोऽहम् साधना में आत्म बाध तत्व बोध का मिश्रित समावेश है। मैं कौन हूँ? उत्तर- ‘परमात्मा। इसे जीव और ईश्वर का मिलना, आत्म -दर्शन ब्रह्मदर्शन भी कह सकते हैं और आत्मा परमात्मा की एकता भी। यही ब्रह्मज्ञान है। ब्रह्मज्ञान के उदय होने पर ही आत्मज्ञान सद्ज्ञान, तत्वज्ञान, व्यवहार ज्ञान आदि सभी की शाखाएँ, प्रशाखाएं फूटने लगती हैं।

सोऽहम् साधना को अतीव उच्चकोटि की बताया गया है। उसे अद्वैत ब्रह्म की उपासना और वेदान्त दर्शन का सार संक्षेप भी कह सकते हैं।


सिद्ध पुरुष (kahani)

एक सिद्ध पुरुष थे। उनके बारे में किंवदंती थी कि ताँबे से सोना बनाने की विद्या जानते हैं। अनेक लोग सीखने आते महात्मा कहते- बारह वर्ष साथ रहकर सेवा करनी पड़ेगी। इसके उपरान्त ही सिखाया जा सकेगा। शिष्य बनने वालों में से इतना धैर्य किसी में नहीं था। सीखकर जल्दी लौटने वाले सभी थे। इतनी प्रतीक्षा कौन करे? एक संकल्पवान शिष्य निकला। वह पूरे बारह वर्ष तक निष्ठापूर्वक रहा। न उतावली दर्शाई न किसी प्रकार की आशंका की। बारह वर्ष पूर्ण हुए। गुरु ने शिष्य को निकट बुलाया और वचनानुसार सोना बनाने की विद्या सिखाने का उपक्रम आरम्भ किया। शिष्य ने वह सीखने से इन्कार कर दिया और कहा- “आपके साथ रहकर मैं स्वयं ही सोना हो गया हूँ। आपके रास्ते पर चलूंगा। सोना इकट्ठा करके लालच और विलास के नरक में क्यों गिरूंगा?”

गुरु ने उसे सच्चा सत्यान्वेषी बताया व कहा ऐसे ही साधक सुपात्र कहाते व दैवी अनुदान अनायास ही पाते हैं।


मनःक्षेत्र में चित्त की भूमिका

शरीर काम करता है और मन आदेश देता है। दोनों के बीच स्वामी सेवक का सम्बन्ध है। मन का स्थान मस्तिष्क है। मस्तिष्क शरीर का एक अंग है। उसके सम्बन्ध में व्यावहारिक जानकारियाँ भी हैं और वैज्ञानिक अन्वेषण भी हुए हैं। इसीलिए उस सम्बन्ध में बहुत कुछ जाना और कहा जा सकता है।

मस्तिष्क की तीन क्रियाएँ प्रसिद्ध हैं एक कल्पना, दूसरी धारणा, तीसरी निर्धारण है। कल्पना को मनस् कहते हैं। धारणा को चित्त और विवेचन एवं निर्धारण शक्ति को बुद्धि कहते हैं। इन तीनों के सहारे से मन इस स्थिति में होता है कि कोई निर्णय कर सके।

कल्पनाओं को आकाश में उन्मुक्त पक्षी की तरह किसी भी दशा में उड़ने की छूट है। वह कुछ भी सोच सकता है। उसे सरल दो दिशाएं दीखती हैं। एक वह जिसमें लाभ दीखते हैं। जिह्वा और जननेन्द्रिय के स्वाद मुख्य हैं। इसके बाद मनोरम दृश्य देखने का नम्बर आता है। धन, लाभ, पारिवारिक समृद्धि, यश, पद, सम्मान आदि की कल्पना लाभ पक्ष में गिनी जाती है। हानि पक्ष में शत्रु भय, अनिष्ट की आकाँक्षा, घाटा, चोरी, अभावों की खिन्नता, मरण आदि के कितने ही प्रसंगों की ओर जब कल्पनाएं चलती हैं तो उसी ओर दौड़ती चली जाती हैं।

अनुकूल और प्रतिकूल कल्पनाएँ मनुष्य चाहे जब चाहे जैसी कर सकता है। सम्भावना सभी की रहती है। असम्भव कुछ भी नहीं। विशेषतया कल्पना में तो कोई अड़चन ही नहीं। मनुष्य उन्हें किसी भी खाली समय में, किसी भी स्तर की, कितनी ही देर करता रह सकता है।

मन की दूसरी परत है “धारणा”, जिसका आधार पूर्व संचित अनुभव होता है। किसी व्यक्ति या परिस्थिति के सम्बन्ध में इससे पूर्व जो जाना, सुना है उसके आधार पर धारणा बन जाती है। यह अनुभव कल्पनाओं का समर्थन या विरोध कर सकते हैं। इसके लिए मनमर्जी की बात है कि वह अनुकूल या प्रतिकूल किसी भी प्रकार उदाहरण संचय करले। उदाहरणों की कमी नहीं। वे अनुकूल पक्ष के भी मिल सकते हैं और प्रतिकूल पक्ष के भी। अपने रुझान या अभ्यास के ऊपर निर्भर रहता है कि वह किस प्रकार की धारणाओं को महत्व दें और उन्हें विशेष मनोयोग पूर्वक स्मरण रखें।

इससे ऊपर की- आगे की परत ‘बुद्धि’ है। वह पक्ष और विपक्ष की बातें सुनती है। उचित अनुचित का- सम्भव असम्भव का- साधन अभावों का विचार करती है और उस आधार पर यह निर्णय करती है कि अन्तिम निर्णय क्या हो? किया क्या जाय? किस दिशा में कदम उठें। इन तीनों चरणों में होकर गुजरने के उपरान्त व्यक्ति का कोई कार्यक्रम बनता है। योजना निर्धारण में मन के इन तीनों विभागों का योगदान रहता है, तभी यह बन पड़ता है कि किस क्रम में, किन साधनों में कहाँ, किस प्रकार कार्यारम्भ किया जाय।

मनःसंस्थान की इन समस्त गतिविधियों में जितनी यथार्थता रहती है, परिस्थितियों के साथ जितना तालमेल रहता है, उतना ही उचित निर्णय ठहरता है। कार्य आरम्भ कर देने के उपरान्त भी मार्ग में कितनी ही अनुकूलताएँ प्रतिकूलताएँ आती हैं, इनका समाधान भी उसी मस्तिष्कगत तीक्ष्णता एवं व्यवहार कुशलता पर निर्भर रहता है जिसके आधार पर कि निर्धारण से पूर्व सोच-विचार किया गया था। साधारणतया इन्हीं परिस्थितियों में होकर चिन्तन तन्त्र को गुजरना पड़ता है। जो अपनी क्षमता और परिस्थितियों के साथ प्रयोजन का जितना तालमेल बिठा सकता है, उसकी बुद्धिमत्ता उतने ही ऊँचे स्तर की मानी जाती है। जो कल्पना तो करता है पर उसके साथ परिस्थितियों का तालमेल नहीं बिठाता, वह उतना ही मन्द मति या मूर्ख कहा जाता है।

यहाँ एक तथ्य को और भी अधिक गम्भीरतापूर्वक समझने की आवश्यकता कि स्वच्छन्द कल्पना और बुद्धि युक्त निर्धारण के मध्य जो धारणा पक्ष है, उसकी अदृश्य भूमिका सबसे अधिक होती है। इसे चित्त कहते हैं। यह मध्यवर्ती नाभिक है जो एक शक्तिशाली सत्ता की तरह काम करता है। कल्पनाओं को भी अपने साथ उड़ा ले जाता है और उसी के अनुरूप मन पर चिन्तन सवार रहता है। इसी प्रकार चित्त ही बुद्धि को भी अपने प्रभाव में समेट लेता है। यदि अवसर ही नहीं और कार्यान्वयन भी असम्भव दीखता हो, किसी बड़े जोखिम की आशंका हो तो ही बुद्धि अपनी दिशाधारा में परिवर्तन करती है अन्यथा वह भी अन्धी दौड़ में दुस्साहसपूर्वक लग जाती है। यहाँ चित्त का प्रभाव स्पष्ट है। इसी को परिष्कृत बनाने के लिए मनुष्य को अनेक साधनाएँ करनी पड़ती हैं। यह पक्ष, अनुभव, अभ्यास, और दबाव से ही किसी ढांचे में ढलता है और इस योग्य बनता है कि श्रेष्ठता से प्रभावित हो और अपनी दिशाधारा, रीति-नीति इस प्रकार बदले जिससे मानवी गरिमा के अनुरूप ऐसे काम बन पड़े जिसमें आत्म सम्मान और लोक सम्मान की उपयुक्त मात्रा उपलब्ध हो सके। चित्त का उत्कृष्टता का पक्षधर बनना ही वस्तुतः मनोयोग की साधना है।

इस प्रकार चित्त की प्रमुखता अध्यात्मवादी और भौतिक मनोविज्ञानी समान रूप से स्वीकार करते हैं। आध्यात्मवादी चित्त को आदतों का भाण्डागार कहते हैं। उसी में से वैसा कर गुजरने की प्रेरणाएं उठती रहती हैं जैसी कि चित्त की लालसाएँ उभरती हैं। आदतें इतनी प्रबल होती हैं कि वे समूचे व्यक्तित्व पर छाई रहती हैं और नशेबाजी की तरह छुड़ाये नहीं छूटती। इसलिए साधना विज्ञान में हठ पूर्वक चित्त का परिशोधन करने के लिए कहा गया है। अनेक प्रकार के साधनात्मक प्रयोग इसी निमित्त किए जाते हैं। तपश्चर्या की आग को चित्त भाग में ही परिमार्जित करना पड़ता है।

मनोविज्ञानियों की मान्यताएँ भी प्रत्यक्षतया भिन्न होते हुए वस्तुतः बहुत कुछ मिलती-जुलती हैं। उनका कथन है कि शरीर की स्वसंचालित क्रियाएँ भी अचेतन मन (चित्त) के आधार पर चलती हैं। सामान्य चेतन तो विचार करने में ही लगा रहता है। पर मनुष्य का स्वभाव और व्यक्तित्व मध्यवर्ती अचेतन के अनुरूप ही ढलता है।

मनोवैज्ञानिक परिभाषाओं के अनुरूप चेतन (कल्पना और बुद्धि) अचेतन (आदतें और शरीर की स्वसंचालित क्रियाओं का तारतम्य) सुपर चेतन (भावनाओं और सूझ-बूझ का केन्द्र) अपने-अपने काम करते रहते हैं और इन तीनों की सामर्थ्य से मानवी गतिविधियों का सूत्र संचालन होता है। मनोविज्ञान में अचेतन का कार्य रक्त संचार, आकुँचन-प्रकुँचन, निमेष-उन्मेष, शयन-जागरण, पाचन-विसर्जन आदि कार्यों की अनवरत प्रक्रिया को चलाते रहना है। इसी केन्द्र पर निरोगता और रुग्णता का बहुत कुछ आधार रहता है। शरीर की स्वाभाविक गतिविधियाँ इसी की स्थिति के अनुरूप ढलती और चलती हैं।

मन के सामान्य और असामान्य पक्षों का पुनर्निरीक्षण किया जाय तो उसमें मध्यवर्ती चित्त की ही महिमा गरिमा समझी गई है। सामान्य बुद्धि तो अनुभवी क्रिया-कुशल लोगों की संगति में सीमित कार्यों की चतुरता प्राप्त कर लेती है, पर जहाँ तक समग्र स्वस्थता, प्रतिभा एवं प्रज्ञा का सम्बन्ध है वहाँ चित्त को ही सम्भालने-सुधारने प्रशिक्षित करने का प्रयत्न करना आवश्यक हो जाता है।


साम्यवाद के जन्मदाता (kahani)

अन्य आदर्शवादियों की तरह साम्यवाद के जन्मदाता कार्लमार्क्स को भी गरीबी और कठिनाई के बीच दिन गुजारने पड़े। उनकी पुत्री दवा के लिए पैसा न होने के कारण बेमौत मर गई।

जब कर्जा भी न मिला तो उनकी पत्नी ने पुराने कपड़े खरीदकर उनमें से छोटे कपड़े निकालने और गली-गली घूमकर बेचने का धन्धा किया और पति को अपने महान कार्य में संलग्न रहने में कुछ व्यवधान न पड़ने दिया।


प्रगति में लगन का योगदान

किन्हीं-किन्हीं बच्चों में छोटी आयु से ही पढ़ने में असाधारण रुचि होती है। जो वे पढ़ते हैं वह याद भी हो जाता है और भविष्य में भी चिरकाल तक स्मरण बना रहता है। ऐसे बच्चे परीक्षाओं में साथियों की तुलना में अधिक जल्दी उत्तीर्ण होते जाते हैं और अपनी प्रतिभा से संपर्क में आने वाले सभी को प्रभावित करते हैं।

इन दिनों आयु का भी बन्धन है पर कुछ शताब्दियों पूर्व ऐसा बन्धन नहीं था। प्रतिभा और योग्यता की कसौटी पर खरे उतरने वाले पदाधिकारी बना दिये जाते थे चाहे उनकी आयु कम ही क्यों न हो? जो स्वयं पढ़ने के अतिरिक्त दूसरों को भी पढ़ाने की क्षमता प्रदर्शित करता था वह बिना रोक-टोक कम आयु होते हुए भी अध्यापन कार्य करने लगता था।

जिन्हें विद्या में वास्तविक रुचि है उनका शिक्षाकाल आजीवन चलता है। वे आजीविका उपार्जन भी करते रहते हैं और साथ ही विद्यार्थियों की भाँति आगे का शिक्षण कार्य भी जारी रखते हैं। ऐसों को ही उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचने का अवसर मिलता है।

शिक्षा में अभिरुचि का असाधारण स्तर का होना पूर्व जन्मों के संचित संस्कारों का भी प्रतिफल है।

जिन्हें विद्याध्ययन में रस आने लगता है, उनके लिए उस क्षुधा पूर्ति करते रहना एक प्रिय विषय बन जाता है। उसी तरह जिस तरह कि व्यसनी अपने शौक चाव की पूर्ति को ही एक बड़ी उपलब्धि मानकर उसके लिए किसी भी प्रकार समय निकाल लेते हैं और तन्मयता पूर्वक बिना ऊबे, उकताये अपनी गतिविधियों को निरन्तर जारी रखते हैं।

इंग्लैंड के प्रसिद्ध रोज पब्लिक स्कूल में जब फिलिप हैरंद्यम हैडमास्टर बने, तब वे पूर 18 वर्ष के भी नहीं होने पाये थे। वे व्यवस्था बड़ी कुशलतापूर्वक चलाते थे और साथ ही विद्यार्थियों को पढ़ाते भी थे। इसके अतिरिक्त उनने आगे की अपनी पढ़ाई भी जारी रखी।

अरकन्सास के एक असाधारण विद्वान और प्रबन्धक अपने जीवन काल में पाँच कालेजों के अध्यक्ष रहे और उन्हें आजीवन व्यवस्थापूर्वक चलाते रहे।

केन्टुकी लेबनान का एक प्रतिभाशाली बालक 14 वर्ष की आयु में सेन्ट मेरीज कालेज की उच्च कक्षाओं को गणित पढ़ाने वाला अध्यापक नियुक्त हुआ। बिना किसी की सहायता के वह अपनी प्रतिभा के बल पर ऊँचा उठता गया और वाल्टीमोर का आर्क बिशप बना।

सन् 1900 में रदर फोर्ड कालेज से चार्ल्स बीवर सर्वोच्च परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ। वह प्रतिभाशाली छात्र उसी वर्ष कालेज का अध्यक्ष भी चुन लिया गया।

शिकागो विश्वविद्यालय के संस्थापक विलियम रैनेहायर ने हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करके मरकिंगम कालेज में प्रवेश पा लिया था। वे प्रसिद्ध शिक्षाविद् के रूप में प्रख्यात हुए। 9 कालेजों के अध्यापक बनाये। उनका प्रत्येक क्षण शिक्षा सेवा में ही संलग्न रहा।

सन् 1630 में जन्मा एक जर्मन छात्र 16 वर्ष की आयु में यूनानी, लेटिन और हिब्रू भाषाओं में कविता लिखने लगा था। तभी से वे छपने भी लगी थीं।

आँखें चली जाने और शरीर को लकवा मार जाने के बाद फ्राँसीसी इतिहासकार अगास्टि ने मुँह से बोलकर और दूसरों से लिखाकर इतिहास के अत्यन्त सम्पादित 28 ग्रन्थ लिखाये।

अंग्रेजी उपन्यासकार चार्लोट योन्ज 7 वर्ष की आयु से एक रविवासरीय स्कूल में धर्म शिक्षा लेने जाया करता था। बड़ा होने पर उसने उसी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया और 71 वर्ष की आयु तक उस व्रत को निवाहा।

वोडोइन कालेज के अध्यापक एल्फुअस लगातार 66 वर्ष तक अध्यापक का काम करत रहे। रिटायर होने के नियमों को उन्होंने स्वीकार नहीं किया। बिना वेतन लिए भी वे मरण तक अध्यापन करते रहे।

बेंजामिन शुल्क को 100 विदेशी भाषाएँ आती थीं। उसने आजीवन उन भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद किया। शुल्ज की मृत्यु 1760 में हुई।

एम्बडन की अध्यापिका ओजियन्स को नये स्कूल खोलने की भारी लगन थी। उसने 30 वर्षों तक पढ़ाया। प्रथम वर्ष स्वयं ही संचालिका और अध्यापिका रही। इस प्रकार उसे 30 स्कूलों की संस्थापिका और प्रधानाध्यापिका रहने का गौरव प्राप्त हुआ।

जहाँ तक प्रकाशन का सम्बन्ध है, पहला नम्बर बाइबिल का है। बाइबिल और उसके अन्यान्य हिस्से 1735 भाषाओं में अनूदित हुए। 1875 से 1875 के बीच इसकी 250 करोड़ प्रतियाँ छपी इसके बाद दूसरी पुस्तक चीन के अधिनायक माओ लिखित “लाल किताब” का नम्बर आता है जो अब तक 100 करोड़ बिकी या वितरित हुई। यह किसी एक व्यक्ति ने नहीं किया पर यह भी एक समूह की लगन का परिणाम है।

इस प्रकार की विधा, लगन और प्रतिभा कोई भी अर्जित कर सकता है। शर्त एक ही है कि अपने विषय में समूची तन्मयता और तत्परता को नियोजित कर दिया जाय और अपने विषय में रस आने लगे।

शिक्षा की ही भाँति चिकित्सा भी जनसेवा का कार्य है। उसमें दूसरों का स्वास्थ्य सुधारने के अतिरिक्त अपने स्वास्थ्य की साज सम्भाल रखने का भी ध्यान रहता है। ऐसे सेवाभावी चिकित्सक प्रायः दीर्घजीवी पाये जाते हैं और लम्बे समय तक उनका शरीर उस कार्य को करते रहने योग्य बना रहता है।

हारवर्ड विश्वविद्यालय में डाक्टर की डिग्री प्राप्त करने वाला एडवर्ड होलियोक सन् 1728 में जन्मा और पूरा सौ वर्ष का होकर 1828 में मरा। उसने 80 वर्ष तक चिकित्सा कार्य पूरी तत्परता के साथ किया। घर में अस्पताल तक वह 7 मील रोज पैदल चलकर जाता था। गम्भीर आपरेशन करने योग्य उसका शरीर 90 वर्ष की आयु तक बना रहा।

लैग हाम्स (स्काट लैण्ड) का एक डॉक्टर जेम्स पुअट सन् 1656 में पैदा हुआ और 1776 में 120 वर्ष जीवित रहने के उपरान्त मरा। वह 95 वर्ष की आयु तक सर्जरी में अपनी निपुणता सिद्ध करता रहा।

इस प्रकार की सफलताएँ भाग्य के ऊपर नहीं लगन और रुचि के ऊपर निर्भर हैं। इन विशेषताओं को अपने में उत्पन्न करके कोई भी ऐसी ही सराहनीय स्थिति तक पहुँच सकता है।


हमारा जन्म सिद्ध अधिकार (kahani)

‘स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’ के मन्त्रदाता लोकमान्य तिलक के आजीवन शिवाजी जैसी स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी। उनने दौरे करके अपने ‘केशरी’ पत्र द्वारा जन-जन में नव चेतना का संचार किया।

उनने वकालत पास भर की पर लगे सदा आजादी की वकालत करने में ही रहे। संगठन, जन-जागरण और संघर्ष के त्रिविधि कार्यक्रमों में वे सदा चक्रव्यूह रचते रहे। इसलिए अंग्रेजों की आँखों में सदा खटकते और जनता ने उन्हें अपना हृदय सम्राट माना। उनका धर्मशास्त्रों का ज्ञान अगाध था।

महाराष्ट्र में जन-चेतना भरने के लिए उन्होंने गणेशोत्सव और शिवाजी जयन्ती के दो पर्व इस प्रकार चलाये कि उन्होंने महाराष्ट्र के सोये पराक्रम को जगा दिया। उन्हें बार-बार जेल जाना पड़ा। एक बार तो उन्हें वर्मा की माँडले जेल में भेजा गया।

देश में राष्ट्रीयता का बिगुल बजाने में तिलक अग्रणी थे। उनके प्रभाव से काँग्रेस को बलवती होने का अवसर मिला।


कुण्डली साधना की पृष्ठ भूमि

कुण्डलिनी को सचेतन विद्युत शक्ति कह सकते हैं। बिजली की दो धाराएँ हैं। एक वह, जो जड़ पदार्थों में काम करती है और दूसरी वह जो जीवित शरीरधारियों में काम करती है। इसलिए एक को भौतिक और दूसरी को आत्मिक कहा जा सकता है।

भौतिक बिजली वह है जो घरों में बल्ब, पंखे, हीटर, कूलर रेफ्रिजरेटर आदि चलाती है ओर कल कारखानों में मोटरों को गतिशील बनाकर उनके द्वारा भारी भरकम काम करती है। इसका प्रयोग सीखने के लिए तद्विषयक विद्यालयों में पढ़ना और व्यावहारिक प्रयोग सीखना पड़ता है। इस स्तर के प्रशिक्षितों को इंजीनियर कहते हैं।

चेतन विद्युत वह है जो शरीर में प्राण रूप में काम करती है। इसका बटन बन्द होते ही सारा कारखाना फेल हो जाता है। वह यथास्थान खड़ा तक नहीं रह सकता, सड़ता है। इसलिए उसे जल्दी ही नष्ट करना पड़ता है। जलाने, गाड़ने, बहाने की जहाँ जैसी प्रथा है, अन्त्येष्टि की व्यवस्था करने में विलम्ब नहीं किया जाता।

इस जीवन्त प्राण विद्युत के सहारे शरीर की सभी मशीनें काम करती हैं। जहाँ कहीं उसकी पहुँच अवरुद्ध हो जाती है, वहाँ अशक्ति छा जाती है। पक्षाघात, मूढ़ता, नपुँसकता आदि ऐसे ही रोग हैं, जिनमें जैविक विद्युत शक्ति की सप्लाई घट जाती है, कई बार तो कोढ़, गैंगरिन नासूर जैसे रोगों में किन्हीं अंगों को काटना पड़ता है या वे स्वयं कट जाते हैं, आमाशय, आँतें, जिगर, गुर्दे आदि में जहाँ कहीं अशक्ति आती है वही अवयव अपना काम धीमा छोड़ देते हैं। फलस्वरूप संबंधित दूसरे अंग भी प्रभावित होते हैं। चित्र-विचित्र नाम रूपों वाली बीमारियाँ आ दबोचती हैं। कष्ट सहना और उपचार करना पड़ता है। हृदय जैसे कुछ अंग तो ऐसे हैं जिनकी शक्ति संचार में व्यवधान खड़ा होने पर कुछ ही क्षणों में मृत्यु हो जाती है।

मस्तिष्क का अपना निराला क्षेत्र है। उसमें अनेक विशेषताओं के लिए अपने-अपने केन्द्र और क्षेत्र निर्धारित हैं। समस्त शरीर का विद्युतीय संचार संचालन मस्तिष्क में ही होता है। इसलिए मर जाने पर ही किसी की पूर्ण मृत्यु मानी जाती है। हृदय की धड़कन रुक जाने पर तो उसे दुबारा भी चलाया जा सकता है।

मस्तिष्कीय क्षेत्र की बिजली की जिस केन्द्र में कम सप्लाई होती है, उसका प्रभाव मनुष्य की क्रियाशक्ति और चिन्तन-शक्ति पर पड़ता है। मन्द मति, अर्ध विक्षिप्त, सनकी, बेसिर-पैर की कल्पनाएँ करने वाले निराश, भयभीत आदि स्तर के लोग ऐसे ही होते हैं, जिनके मस्तिष्क के किसी क्षेत्र विशेष में विद्युत प्रवाह कम पड़ता है। आलसी और प्रमादी भी ऐसे ही होते हैं। उनका मन, श्रम करने को तथा आगा-पीछा सोचने को ही नहीं होता। यथास्थिति को सहन करते हुए वे किसी प्रकार दिन काटते रहते हैं।

इसके विपरीत बुद्धिमान, उत्साही, साहसी, पराक्रमी तत्पर तन्मय वे लोग होते हैं, जिनके मस्तिष्क में प्राण विद्युत की पर्याप्त मात्रा होती है, उनकी निर्णायक बुद्धि सतेज होती है। लाभ हानि के दोनों पक्षों पर विचार करने और उपयुक्त निष्कर्ष पर पहुँचने में उन्हें देर नहीं लगती। अवसर का लाभ ऐसे ही लोग उठा लेते हैं।

यहाँ मृगी, उन्माद, सिर दर्द या मूढ़मति लोगों की चर्चा नहीं हो रही है। क्योंकि उनका सम्बन्ध शरीर के अन्यान्य अवयवों से भी होता है। उनका उपचार अस्पतालों में ही किया जाता है। इनमें से कई तो वंशानुक्रम से भी सम्बन्धित होते हैं। ऐसी दशा में उनका उपचार शरीर विज्ञान के आधार पर किया जाना चाहिए। योग विज्ञान तो विशुद्धतः मनोविज्ञान पर आधारित है। कुण्डलिनी जागरण उसी क्षेत्र की एक शाखा है।

प्रत्येक शिल्पी को अपने-अपने विषय से सम्बन्धित उपकरण औजार एकत्रित करने पड़ते हैं। चिकित्सक निदान के काम आने वाले, शल्य क्रिया से सम्बन्धित उपकरण एकत्रित करते हैं। बढ़ई अपने प्रयोजन के कितने ही औजारों का थैला भरे रहते हैं। स्वर्णकार के पास आभूषण ढालने, खरादने, मोड़ने आदि के काम आने वाली वस्तुएँ होती हैं। कुम्हार के पास खिलौने बनाने के साँचे होते हैं। सैनिकों के पास ढाल, तलवार, गोला, बारूद, कवच, वाहन आदि का प्रबन्ध रहता है। कुण्डलिनी जागरण जैसे योग विज्ञानियों को मानसिक क्षेत्र के साधनों से लैस रहना पड़ता है।

अध्यात्म विज्ञानियों के पास संकल्प, साहस, प्राण, संयम, धैर्य के अतिरिक्त तन्मयता और तत्परता की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से एक भी कम हो तो गाड़ी लड़खड़ा जाती है और लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाती।

महत्व क्रियाओं का नहीं, आन्तरिक दक्षता का है। नट, बाजीगर अपने कौशल में प्रवीण होते हैं। यदि उन करतबों का रहस्य बता दिया जाय ओर विधि-विधान की व्याख्या-व्यवस्था समझा दी जाय, तो भी यह सम्भव नहीं कि कोई अजनबी उस कौशल को सबके सम्मुख प्रस्तुत कर सके। आपरेशन के समय वार्ड बॉय और सफाई कर्मचारी भी रहते हैं। वे उस कृत्य को आयेदिन आँखों से देखते रहते हैं तो भी उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे सर्जन की भूमिका निभा सकेंगे। दंगल में कुश्ती का दृश्य देखने अगणित लोग पहुँचते हैं। दाव-पेचों को भी आँखों से देखते रहते हैं। हार-जीत का कारण भी समझते हैं। फिर भी उन्हें अखाड़े में नहीं उतारा जा सकता। हथियार बनाने वाले तक उनका सही प्रयोग नहीं कर सकते। इसी प्रकार पुस्तकीय ज्ञान संचय कर लेने या उस विषय के विशेषज्ञों के व्याख्यान सुन लेने पर भी कोई योगी नहीं बन सकता। इसके लिए उसकी अपनी दक्षता होनी आवश्यक है। उसके लिए लम्बे समय तक श्रद्धा और निष्ठापूर्वक अनवरत अभ्यास न का गया हो तो यह आशा नहीं की जा सकती कि उन विषयों में प्रवीणता या सफलता हस्तगत हो जायेगी।

फिर प्रत्येक साधक का अपना लक्ष्य होता है। एक से दूसरे के प्रयोजन में अन्तर रहता है। तद्नुरूप साधना विधानों में अन्तर करना पड़ता है। हर रोगी को एक बीमारी में एक दवा नहीं दी जा सकती। यद्यपि कैमिस्टों से पूछ कर यह जाना जरूर जा सकता है कि किस नाम की दवा किस रोग में प्रयुक्त होती है। किन्तु उस आधार पर बिना चिकित्सक से परामर्श किये सेवन करने लगना खतरनाक है। चिकित्सक देखता है कि किस रोग के साथ क्या लक्षण मिले हुए हैं। रोगी की बीमारी कितनी हल्की या भारी है। उसकी सहन शक्ति कैसी है। बालक की, गर्भिणी की दवाओं की मात्रा में अन्तर करना होता है। फिर उसकी प्रतिक्रिया में अनुकूलता उत्पन्न हो रही है या प्रतिकूलता यह भी ध्यान रखना पड़ता है। इन्हीं सब उतार चढ़ावों पर विचार करने के लिए चिकित्सक की आवश्यकता पड़ती है। उसके यहाँ जाना या बुलाना पड़ता है। यदि ऐसी आवश्यकता न समझी जाती तो किताब में पढ़कर या कैमिस्ट से पूछकर कोई भी अपना इलाज कर लिया करता।

ऐसी ही आवश्यकता योग साधनाओं में भी पड़ती है। अपनी स्थिति का भली प्रकार पर्यवेक्षण जिसने किया हो और उपचार कृत्य में निजी अनुभव अभ्यास किया हो उस मार्गदर्शक का परामर्श योग साधनाओं में उपयुक्त हो सकता है, विशेषतया कुण्डलिनी जागरण में।

कुछ कार्य सरल होते हैं। कुछ कठिन। पानी को किसी पर फेंक देना या स्वयं नहाना, पीना उतना जोखिम का काम नहीं है जितना कि आग से खेलना। उसका उपयोग करते समय अनेक बातें ध्यान में रखनी पड़ती हैं। क्या पकाने के लिए कितनी धीमी या कितनी तेज आँच चाहिए, उसे कितनी देर जलने दिया जाय। पकड़ते, उठाते हटाते समय किन बातों का ध्यान रख जाय। इन विशेषताओं और भिन्नताओं की जिसे जानकारी है वह उसका उपयोग ठीक कर लेगा अन्यथा अपने कपड़े जला लेगा या चासनी की कड़ी करके पत्थर जैसी जमा देगा। यही बात बिजली के सम्बन्ध में भी है। उसके प्रयोग से अनेक लाभ हैं। अनेक सुविधाएं मिलती हैं, किन्तु प्रयोक्ता को अनेक सावधानियाँ भी बरतनी पड़ती हैं। अन्यथा आग लगने से लेकर अपनी जान जाने और संपर्क में आने वालों तक के लिए खतरा है।

कुण्डलिनी योग बिजली का प्रयोग है। वह गेंद खेलने की तरह सरल नहीं है कि उल्टी-सीधी फेंक देने पर भी कोई भी खेल बन जाए। गुलाम, बेगम, बादशाह के ताश काटने में मनोरंजन भर है, किन्तु किसी व्यक्ति को काट देने पर फाँसी के तख्ते पर झूलना पड़ता है। हलवाई को सतर्कता का हर घड़ी प्रयोग करना पड़ता है अन्यथा जो बनाने चला था वह पकवान मिष्ठान तो बनेगा नहीं। कुछ के बदले कुछ बन जायेगा या अपना हाथ-पैर गरम घी से जलेगा। कुछ काम ऐसे ही होते हैं जिनमें समग्र सतर्कता का प्रयोग करना पड़ता है। किसी व्यक्ति के हाथ में कागज, ब्रुश और रंगों की प्लेट थमा देने भर से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह बढ़िया किस्म के चित्र बना देगा। न किसी को पत्थर, छैनी हथौड़ा थमा कर यह आशा की जा सकती है कि बढ़िया स्तर की प्रतिमा बनाकर तैयार हो ही जायगी। चित्रकार या मूर्तिकार को इस कला में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए जो अभ्यास करना और अनुभव संचय करना पड़ता है उसी प्रवीणता के आधार पर श्रेय की उपलब्धि होती है। संगीतकार, नर्तक भी बहुत समय तक साधना करके अपने कौशल में पारंगत होते हैं।

कुण्डलिनी जागरण का विधि-विधान उतना महत्व पूर्ण नहीं है जितना कि साधक का परिपक्व मनोबल किसी भी योगाभ्यास की पुस्तकें बाजार में बिकती हैं उन्हें मुट्ठी भर पैसों में खरीदा जा सकता है। जो प्रयोग बताये गये हैं वे भी इतने सरल प्रतीत होते हैं कि उन्हें एक दो बार दुहरा लेने पर ही तद्नुसार कृत्य किया जा सके। इतने भर से कोई उन कृत्यों में सफल नहीं हो सकता। विधान तो हर कार्य के सरल होते हैं, पर उन्हें कार्यान्वित कर दिखाने के लिए अपनी मनःस्थिति एवं परिस्थिति भी तद्नुरूप विनिर्मित करनी पड़ती है। यह पूर्व तैयारी ही सफलता का, या अपयश का पक्ष पूरा करती है। साधना वस्तुतः साधना है। उसके प्रयोग में अपना समूचा व्यक्तित्व साधना और अनुभवी मार्गदर्शन का सहारा लेना पड़ता है। ( क्रमशः )


महाराज प्रसिचेत (kahani)

बिना किसी कारण के, तथ्य जाने बगैर यदि जीवन साथी को त्याग दिया जाय, तो ऐसे व्यक्ति अपयश के भागी होते हैं।

किसी बात पर रुष्ट होकर महाराज प्रसिचेत ने अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया। उनके इस अहंकार पूर्ण कृत्य से दुःखी होकर राजपुरोहित ने उनका साथ छोड़ दिया। धीरे-धीरे बात प्रजा के कानों में पहुँची। लोग स्पष्ट कहने लगे जो व्यक्ति अपने स्वजन सम्बन्धी की रक्षा नहीं कर सकता वह प्रजा की क्या रक्षा करेगा। लोग राजाज्ञाओं का उल्लंघन करने लगे। इस स्थिति में पड़ोसी राजा ने प्रसिचेत पर आक्रमण कर दिया।

प्रसिचेत सेना लेकर मुकाबले के लिए चल पड़े। मार्ग में महर्षि उद्दालक का आश्रम पड़ता था। वे महर्षि से मिलने को रुके पहले तो महर्षि ने शासकोचित स्वागत की तैयारी की पर तभी उन्हें पता चला कि महाराज ने अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया है तो उन्होंने स्वागत की सारी तैयारियाँ स्थगित कर दीं ओर उनसे एक साधारण नागरिक की तरह मिले।

राजा ने इसका कारण पूछा तो महर्षि ने कहा राजन् पत्नी का परित्याग करना अधर्म है और धर्म से पतित कोई भी क्यों न हो उसकी मान मर्यादा वैसे ही नष्ट हो जाती है, जैसे आपकी। राजा ने भूल समझी और पत्नी को फिर बुला लिया उससे उनकी शासन व्यवस्था भी सम्भल गयी।

साथी के स्वभाव में कोई कमजोरी हो तो उससे मुख मोड़ना लोक निन्दा, पतन और अपमान का कारण बनता है।


आये दिन की समस्याएँ और उनके समाधान

सामने प्रस्तुत समस्याओं में से अधिकांश की जड़ें अपने भीतर होती हैं। ऐसी घटनाएँ कम ही होती हैं जिन्हें दुर्घटना या आक्रमण कहा जा सके। ऐसी विपन्नताएँ सामने आने पर हड़बड़ाने की अपेक्षा धैर्यपूर्वक यह सोचना चाहिए कि तात्कालिक संकट का निवारण करने के लिए क्या किया जाना चाहिए। उपाय अवश्य सूझ पड़ेगा और उनका सहारा लेने पर, संकट से उबरने का अवसर भी मिल जाएगा।

यदि कमजोरी अपनी है तो उसे सुधारनी चाहिए अन्यथा शरीर में घुसा हुआ विष आज नहीं तो कल, इस रूप में नहीं तो उस रूप में सामने आये बिना न रहेगा। दूसरों को सुधारना कठिन है। जो प्रतिकूल हैं उन्हें अनुकूल बनाने में कठिनाई हो सकती है किन्तु यह सरल है कि अपने जिन दुर्गुणों के कारण दूसरे विरोध करते हैं या द्वेष मानते हैं, उन गलतियों को आत्म-निरीक्षण द्वारा स्वयं समझकर सुधारा जाय।

उत्तेजित मस्तिष्क में एक और भी दुर्गुण है कि वह वस्तुस्थिति को नहीं समझने देता। अपने को निर्दोष और दूसरों को दोषी ठहराने के लिए वकीलों जैसे तर्क करता है। इससे सामने वाले को सहमत करना और अनुकूल बनाना कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में यही उचित है कि किसी मध्यवर्ती को दोनों ओर की बात सुनाकर समाधान निकालने का प्रयत्न किया जाय।

समस्याओं के पीछे अधिकतर अपने ही दोष होते हैं। निजी व्यक्तित्व में शेष दुर्गुण भरे हों तो उसी स्तर के मित्र सहयोगी मिलेंगे। उनकी बढ़ोत्तरी और सलाह ऐसी होगी जिससे उलझन सुलझे नहीं वरन् और अधिक उलझे, इसलिए अपने स्वभाव और व्यवहार को ऐसा रखना चाहिए जिनके कारण घनिष्ठता क्षेत्र में सज्जनों का ही प्रवेश होने पाए। उनका सान्निध्य एवं सहयोग अपने को सुधारने एवं ऊपर उठाने में ही सहायक होता है।

भले या बुरों से घनिष्ठता बढ़ाने और समस्या उत्पन्न करके समाधान से सहायता लेने की अपेक्षा तीसरा एक और भी मार्ग है कि पूरी तरह आत्म निर्भर रहा जाय। सीधे रास्ते चला जाय। सज्जनोचित व्यवहार किया जाय। इतने पर भी यदि समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तो उनको महत्व न दिया जाय वरन् अपने दृष्टिकोण एवं व्यवहार में जितना हेर-फेर करने की आवश्यकता हो उसे कर लिया जाय। इसके उपरान्त साहस से काम लिया जाय। अपने ऊपर भरोसा रखा जाय और सोचा जाय कि इस संसार का नियम ही अनुकूलता प्रतिकूलता आते-जाते रहने का है। उसे बदला नहीं जा सकता अतः परिस्थिति के अनुसार तालमेल बिठाने के लिए सूझ-बूझ का परिचय दिया जाय।


Quotation

बहुत लोग ईश्वर की पूजा इस प्रकार करते हैं मानो सचमुच ही भक्त हों, पर जीवन ऐसा जीते हैं मानो उनकी नास्तिकता में कोई कसर नहीं रही।

दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन। दोनों के अपने -अपने उपयोग हैं और अपने-अपने तकाजे। हमें समय के अनुरूप बदलना चाहिए और किसी आग्रह विशेष पर अड़े नहीं रहना चाहिए।

नीति और कर्त्तव्य पालन के सम्बन्ध में दृढ़ता अपनाना आवश्यक है। बाकी यही सोचना चाहिए कि हर किसी को बदल सकना अपने हाथ की बात नहीं है। परामर्श किया जा सकता है पर इतना आग्रह न किया जाय कि टकराव की स्थिति उत्पन्न हो। सामान्य लोक व्यवहार में ऐसी ही काम चलाऊ नीति अपनानी पड़ती है। मात्र अनीति से असहयोग करना ही पर्याप्त है। विरोध की परिस्थितियां हों तो संघर्ष भी किया जा सकता है।


विज्ञानमय कोष और दिव्य दर्शन

मस्तिष्क में कल्पना और सूझ-बूझ उठती है। पर वह उपलब्ध ज्ञान और मन्थन से उत्पन्न हुए और मनन द्वारा ही उत्पन्न होती है। दिव्य प्रेरणाएं हृदय देश से भी उभरती हैं। ईश्वरीय संदेश वहीं मिलते हैं और वहीं से अविज्ञात प्रकृति रहस्यों की जानकारियाँ हस्तगत होती हैं। जिन वैज्ञानिकों ने अद्भुत आविष्कार किये हैं उनसे पूछा गया कि ऐसा अनोखा विचार आपको कैसे हस्तगत हुआ तो उनमें से प्रत्येक ने यही कहा कि “यह भीतर से उभरा” भीतर से शब्द से उनका तात्पर्य मस्तिष्क से नहीं, वरन् अन्तराल में उभरने से है।

यही वह क्षेत्र है, जहाँ अतीन्द्रिय शक्तियों का भण्डार है। बुद्धि क्षेत्र से बाहर की कितनी ही बातें कभी-कभी ऐसी सूझ पड़ती हैं जो विलक्षण प्रतीत होती हैं। पर परीक्षा की कसौटी पर वे सही उतरती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का क्षेत्र यही माना गया है। जिस किसी का विज्ञानमय कोष जाग पड़ता है उसे अविज्ञात भी- भूत और भविष्य भी इसी प्रकार प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है मानो उसकी प्रत्यक्ष जानकारी उन्हें पहले से हो रही है।

मनोविज्ञानी जिसे “सुपर चेतन” कहते हैं और जिसकी संगति अलौकिक आभासों के साथ जोड़ते हैं, वह मस्तिष्क का नहीं वरन् विज्ञानमय कोष का क्षेत्र है। मानसिक संरचना में चेतन और अचेतन के दो ही पक्ष हैं। मस्तिष्कीय संरचना का दो भागों में ही विभाजन हुआ है। अस्तु उसका कार्यक्षेत्र ज्ञानवान् सचेतन ओर स्वसंचालित अचेतन के साथ ही जुड़ता है। जिसे अविज्ञात कहा गया है, जिसे सुपर चेतन भी कहते हैं, वह वस्तुतः विज्ञानमय कोश ही है।

इसे किन्हीं ग्रन्थों में सूर्य चक्र भी कहा गया है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश उदय होने पर अन्धकार तिरोहित हो जाता है और प्रत्येक वस्तु प्रत्यक्ष दीख पड़ती है। उसी प्रकार विज्ञानमय कोष में प्रकाशित दिव्य ज्योति की छत्र छाया में व्यक्ति अपना स्वरूप लक्ष्य और कर्त्तव्य भी देख सकता है। उसे अपने सुसंस्कार और कुसंस्कार भी दीख पड़ते हैं। जबकि साधारण लोग इस सम्बन्ध में भ्रम भरी स्थिति में ही रहते हैं, उन्हें अपने में केवल गुण ही गुण दीख पड़ते हैं। दोषारोपण वे दूसरों पर करते रहते हैं। पर इससे किसी समस्या कसा समाधान नहीं होता। जिन दोषों को अपने भीतर ढूँढ़ना और सुधारना चाहिए, उन्हें यदि दूसरों से दोषी ठहराने की आत्म प्रवंचना की जायगी तो समाधान किस प्रकार बन पड़ेगा? विग्रह खड़ा होगा और गुत्थी उलझेगी।

आत्म-सत्ता में समाहित यथार्थता को यदि जाना जा सके तो व्यक्ति आत्म-कल्याण का मार्ग भी सरलतापूर्वक जान सकता है। अन्यथा भटकाव की स्थिति में हाथ कुछ नहीं लगता और खीज, थकान एवं निराशा ही पल्ले पड़ती है।

आत्मा को परमात्मा से मिलने की इच्छा रहती है। इस विलगाव के कारण ही सर्वदा असन्तोष छाया रहता है और समाधान ढूँढ़ने के लिए जिस-तिस वस्तु को निरखा, परखा जाता है, किन्तु निर्जीव जड़ पदार्थों में वह साधन कहाँ मिले जो चेतन स्तर का हो। व्यक्तियों का परिचय भी शरीर रूप में हो पाता है। वे कभी रुष्ट या पृथक भी हो सकते हैं, होते रहते हैं। ऐसी दशा में आन्तरिक शान्ति हस्तगत नहीं हो पाती और न जिनकी तलाश है, वह परमात्मा ही मिल पाता है।

तत्त्वदर्शियों ने इस समस्या को सुलझाया है और कहा है कि ईश्वर सर्वव्यापी होते हुए भी किसी ऐसे स्थान पर नहीं पाया जा सकता जहाँ मिलना सम्भव हो सके। ऐसा स्थान केवल अपना हृदय है। यही विज्ञानमय कोष है। कस्तूरी की तरह वह मृग की नाभि में ही सुगन्ध के भण्डार रूप में होता है पर वह उसे जहाँ-तहाँ ढूँढ़ता फिरता है। इस भ्रम का निवारण शास्त्रकारों ने इस प्रकार किया है।

योगवशिष्ठ का कथन है “जो हृदय गुफा में निवास करने वाले भगवान को छोड़कर अन्यत्र ढूँढ़ता फिरता है वह हाथ की कौस्तुभ मणि की उपेक्षा जहाँ-तहाँ काँच के टुकड़े बीनते फिरने वाले समान है।”

श्वेताश्वरोपनिषद् में उल्लेख है- “जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हृदय गुफा में प्रवेश करके विद्यमान महेश्वर को नहीं देख पाता, वह अन्धे के समान है।”

तैत्तरीयोपनिषद् का वचन है- “जो हृदय गुफा में निवास करने वाले परब्रह्म को देखता और उनका सान्निध्य अपनाता है, वह तद्रूप हो जाता है।

सुबालोपनिषद् का वचन है- “परब्रह्म हृदय रूपी गुफा में रहने वाला है। वह अविनाशी और प्रकाश स्वरूप जो उसकी अनुभूति करता है वह उसी में लीन हो जाता है।

मुण्डकोपनिषद् की उक्ति है- इस सम्पूर्ण जगत को बनाने वाला और सब में समाया हुआ परमेश्वर ढूँढ़ने पर हृदय गुफा में ही विराजमान मिलता हे। वह प्रकाश स्वरूप है, जो उसे देखता है वही उसी में विलीन होकर रहता है।

व्यास भाष्य का उल्लेख है- उस परमेश्वर को देवालयों, सरिताओं, तीर्थों, वनों में, पर्वतों में कहीं भी ढूँढ़ते रहा जाय, पर जब वह मिलेगा तो हृदय गुफा ही उसका सुस्थिर स्थान दृष्टिगोचर होगा। जो वहाँ उसे ढूँढ़ता है, तृप्त होकर रहता है।

गीता में भगवान कहते हैं- “ईश्वर सब प्राणियों के हृदय देश में रहता है। उसी का अनुग्रह प्राप्त करने से परम शान्ति का अनुभव होता है।”

मुण्डक का कथन है- “वह परब्रह्म ज्ञानियों की हृदय गुफा में प्रकट होता है।”

शंख संहिता का कथन है- “हृदय देश में परमज्योति प्रकाशवान है। उसी में समस्त देवता निवास करते हैं।”

कठोपनिषद् कहता है “वह दूर से भी दूर है, किन्तु समीप से भी समीप है। उसे हृदय देश में अंगूठे के बराबर आकार में जलती ज्योति जैसा पाया जा सकता है।”

जाबालोपनिषद् में उल्लेख है- “जो उसे हृदय रूपी गुफा में ढूँढ़ता है, उसे साक्षात्कार का सुयोग मिलता है। अन्य लोग तो जहाँ-तहाँ भटकते ही रहते हैं।”

बिन्दूपनिषद् का वचन है- “हृदय क्षेत्र में विद्यमान उस परम ब्रह्म की अंगुष्ठ मात्र ज्योति का हमें ध्यान करना चाहिए।”

महोपनिषद् का वचन है- “हृदय देश में प्रज्वलित दीप शिखा जैसी प्रकाश ज्योति में उस परब्रह्म की झाँकी होती है। इसी में समस्त देवता भी समाये हुए हैं।”

योग कुण्डलिमेवनिषद् का वचन है- “अंगुष्ठ आकृति की प्रकाश ज्योति हृदय देश में सदा जलती रहती है। उसी के फैले हुए प्रकाश में साधक अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है।”

महदोपनिषद् का वचन है- “हृदय गुफा में प्रवेश करें। वहाँ प्रज्वलित प्रकाश ज्योति का दर्शन करें। उसी में आत्मसात् होने का प्रयत्न करें और अपने आपको तद्रूप बना लें।”

मरुद उपनिषद् का कथन है- ”ज्ञान और विज्ञान का उद्गम विज्ञानमय कोश में है। उसका स्थान हृदय कमल में है। ज्ञानी साधक ध्यान रूप में उसका दर्शन उसी क्षेत्र में प्रकाश के रूप में प्रज्वलित देखत हैं।”

जाबालिउपनिषद् का कथन है- उसे हृदय देश में ढूँढ़ो। अन्यत्र मत भटको। वह प्रकाश रूप में अपने भीतर ही ज्वलन्त है। यही विज्ञानमयकोश है जिसके बारे में उपरोक्त आर्ष वचनों में संकेत किया गया है।


वैराग्य का नशा (kahani)

शैतान पर एक बार वैराग्य का नशा चढ़ा। उसने अपने सारे बहुमूल्य साधन लोगों को लुटा दिया। पर एक छोटी डिबिया छिपाकर रख ली। उसे भय था कि वैराग्य न सधा और फिर विग्रह फैलाने का मन हुआ तो उसके लिए एक वेश कीमती चीज हाथ में रखनी चाहिए।

डिबिया में रखी चीज थी ‘आलस’ जहाँ आलस होता है वहाँ और भी अनेक दोष अपने आप आ जाते हैं।


मनुष्य में संव्याप्त जैव विद्युत

इस विश्व ब्रह्मांड में दो शक्तियाँ संव्याप्त हैं। एक परब्रह्म ब्रह्मांडीय- चेतना। दूसरा पराशक्ति प्रकृति पदार्थ क्रिया। इन दोनों के ही संयोग से जड़-चेतन जगत की गतिविधियाँ चल रही हैं। सृजन, अभिवर्धन, परिवर्तन की त्रिविधि हलचलें इन दोनों के ही सुयोग सम्वर्धन से चलती रहती हैं। इन्हें ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहते हैं।

प्रकृति और पुरुष के समन्वय से जीव सत्ता उत्पन्न होती है। शरीर प्रकृति है, आत्मा पुरुष। दोनों के समन्वय से जीव बन जाता है। जीव का जीवन प्राण है। प्राण वह चेतना है जो सृष्टि के आरम्भ में प्रकृति पुरुष के समन्वय से उत्पन्न हुई। जीवधारियों में इच्छा के रूप में और पदार्थों की क्रिया शक्ति के रूप में अपनी गतिविधियां सुसंचालित रखने लगीं। प्राण को एक प्रकार की सचेतन विद्युत कहा जा सकता है।

अचेतन विद्युत पावर, एनर्जी, ताप प्रकाश, शब्द के रूप में काम करती है और समुद्र की लहरों जैसी हलचलें करती हुई एक से दूसरे को प्रभावित करती हैं। ब्रह्मांड में विद्यमान ग्रह-नक्षत्र इसी बल के सहारे अपनी-अपनी कक्षा और धुरी में घूमते हैं। उसी के द्वारा एक -दूसरे से बँधे हुए अधर में लटक रहे हैं। इसे पदार्थ गत प्राण कह सकते हैं। यही शरीर की कोशिकाओं और तंतुओं को परस्पर सम्बद्ध रखता और निरन्तर क्रियाशील बनाये रहता है।

चेतना का प्राण मन के रूप में है। मन निरन्तर हलचलों से भरा रहता है। उसकी कल्पनाएँ ज्वार-भाटों की तरह उठती रहती हैं। शरीर संचालन में भी उसका भारी योगदान है। मन उदास, खिन्न, उद्विग्न हो तो शरीर की पाचन शक्ति से लेकर निद्रा तक में अस्त व्यस्तता आ जाती है। कोई प्रसन्नता भरा समाचार मिले तो उत्साह में जरा-जीर्ण शरीर भी उठ खड़ा होता है और आवेश में ऐसा कुछ करने लगता है जैसा शरीर की रुग्णता या जीर्णता की स्थिति में सम्भव नहीं था।

शरीर का मोटा मजबूत होना एक बात है और प्राणवान होना दूसरी। मोटे व्यक्ति में प्राणशक्ति की कमी रहे तो वह निष्क्रिय डरपोक, निराश और शंकाशील रहेगा। किन्तु उसमें प्राण की मात्रा बढ़ी-चढ़ी हो तो साहसी, पराक्रमी, शूरवीर, निर्भय स्वभाव का होगा। उसकी इच्छाशक्ति, संकल्पशक्ति, स्फूर्ति, क्रियाशक्ति बढ़ी-चढ़ी होगी। जो ठानेगा उसमें जुट पड़ेगा और अनेक व्यवधानों को पार करता हुआ सफलता के लक्ष्य तक जा पहुँचेगा।

प्राण शक्ति मनुष्य के दुर्बल शरीर को भी ओजस्-तेजस्-वर्चस् से भर देती है और क्षीण काय-कलेवर से भी आश्चर्यजनक कार्य करा लेती है। गान्धी जी 92 पौण्ड के और पाँच फुट दो इंच ऊँचे थे। देखने और तौलने में वे चौदह वर्ष के लड़के जैसे लगते थे। पर उनके प्राण का प्रवाह ऐसा था जिससे ब्रिटिश सरकार जैसी समर्थ सत्ता काँपती थी। जिसकी उँगली के इशारे पर हजारों सत्याग्रही जान निछावर करते थे।

प्राण इस ब्रह्मांड में सर्वत्र संव्याप्त है। वह मनुष्य के साथ संकल्प बल के सहारे जुड़ता है। शरीर में उसका प्रवेश वायु के साथ होता है। विज्ञानी आक्सीजन को प्राण कहते थे और सोचते थे कि रक्त उसी के कारण शुद्ध रहता है और वही जीवनी शक्ति है। पर जब यह सोचा गया कि साँस में ऑक्सीजन घुली रहने और फेफड़े ठीक काम करने पर भी मनुष्य मर क्यों जाता है तो समझ में आया कि प्राण और आक्सीजन दो पृथक वस्तुएँ हैं। प्राण के निकल जाने पर शरीर में आक्सीजन सिलेंडरों के माध्यम से साँस पहुँचाई जाती रहे तो भी उसे जीवित नहीं किया जा सकता।

इतने पर भी गहरी साँस का अपना महत्व है। आक्सीजन जीवनी शक्ति बढ़ाती है, रक्त को शुद्ध करती है, तापमान बनाये रखती है आदि बातें सही हैं। इसलिए यह भी सही है कि मनुष्य को गहरी साँस लेने की आदत डालनी चाहिए। फेफड़ों को पूरी तरह हवा से भरना चाहिए और उन्हें पूरी तरह खाली करना चाहिए। इस प्रकार फेफड़ों में एक बार में 200 से सी.सी. तक हवा शरीर में भरी जा सकती है और उसमें समाविष्ट आक्सीजन का लाभ उठाया जा सकता है, किन्तु देखा गया है कि लोग आलस्य वश उथली साँस लेते हैं और एक बार में प्रायः 500 सी.सी. ही हवा भीतर ले जा पाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि फेफड़ों का मध्य भाग ही क्रियाशील रहता है और इर्द-गिर्द के कोष्ठक निष्क्रिय पड़े रहते हैं, जिनमें क्षय आदि के जीवाणु-विषाणु आसानी से टिक जाते हैं और वंश वृद्धि करते हुए जीवन के लिए संकट बन जाते हैं।

कुछ दिन पूर्व तक भारतीय योग पद्धति के महत्वपूर्ण अंश प्राणायाम का लाभ ‘डीप ब्रीदिंग’ के आधार पर माना जाता था और जो लाभ मिलते थे उन्हें गहरी साँस लेने का प्रतिफल माना जाता था।

पर अब समझा जाने लगा है कि प्राण एक जीवन्त विद्युत है, जो शरीर से भी अधिक मनःक्षेत्र को प्रभावित करती है। मनुष्य को साहनी, पराक्रमी, तेजस्वी और स्फूर्तिवान बनाती है। इस उपलब्धि को यदि समुचित मात्रा में हस्तगत किया जा सके तो सामान्य दीखने वाला मनुष्य भी अपनी असाधारण विशिष्टता का परिचय दे सकता है।

शरीर और मस्तिष्क में बिजली के असाधारण आवेश पाये गये हैं। वे ही मस्तिष्कीय घटकों और शारीरिक जीवकोशों में अभिनव ऊर्जा का संचार करते और मनुष्य को उत्साहित रखते हैं। उत्साहित ही नहीं, प्रसन्न और क्रियाशील भी, साहसी एवं उमंगों से भरा हुआ भी।

यह विद्युत शक्ति आक्सीजन से सर्वथा भिन्न है। वह अनन्त आकाश से मस्तिष्कीय केन्द्र संस्थानों द्वारा अवतरित आकर्षित होती है। इसे खींचने में मन को गंगावतरण के लिए किये गये भागीरथी तप की भाँति निरत होना पड़ता है।

प्राणायाम माध्यम सही है पर यदि उसके साथ श्रद्धा विश्वास का पुट न होगा तो साँस भर का लाभ मिलेगा। प्राण का अभिनव आविर्भाव न हो सकेगा।

मनुष्य शरीर में बिजली का कितना भण्डार है इसकी नाप-तौल अब होने लगी है। देखा गया है कि उससे 60 वाट का बल्ब तक जल सकता है। समस्त शरीर में संव्याप्त और कार्यरत बिजली का यदि पूरा आँकलन किया जा सके तो प्रतीत होगा कि व्यक्ति चलते-फिरत जनरेटर के रूप में गतिशील रहता है। अभी अमेरिका में ऐसे 20 से अधिक मनुष्य जीवित हैं, जिनका शरीर झटके देता है। वस्तुओं को इधर-उधर उठक-पटक कर देता है। कई व्यक्ति इस भीतरी विद्युत के उबल पड़ने पर अकारण ही जलकर भस्म हो चुके हैं। इससे हर मनुष्य में बिजली जैव विद्युत की एक अच्छी खासी मात्रा होने की सम्भावना देखी जा रही है और यह सोचा जा रहा है कि उसको बढ़ाने या लाभ उठाने का तरीका क्या हो सकता है?


ब्रह्माजी के पास पहुँचा (kahani)

मनुष्य ब्रह्माजी के पास पहुँचा और उन्नति एवं सुख -शांति का वरदान माँगा।

ब्रह्मा जी ने उपहार स्वरूप उसे दो भरे हुए थैले दिये। एक को पीठ पर बाँध दिया और दूसरे को गले में लटका दिया। मनुष्य ने आश्चर्यचकित होकर इन थैलों का रहस्य और उपयोग पूछा। ब्रह्मा जी ने कहा- पीछे वाले थैले में पड़ौसियों की बुराइयाँ भरी हुई हैं इन्हें पीछे करना इन्हें देखना मत अन्यथा तुम्हें अकारण क्षोभ होगा और प्रगति के लिए जो करना चाहिए वह न करके उस क्षोभ में उलझ जाओगे।

गले में लटके हुए थैले का रहस्य बताते हुए उन्होंने कहा- इसमें तुम्हारी बुराइयाँ भरी हुई है। आँखों के सामने इसे रखना। बार-बार देखना और उन्हें सुधारने के प्रयत्न में लगे रहना।

इन दोनों थैलों का यदि तुम ठीक उपयोग कर सके तो निश्चय ही तुम्हें सुख-शांति मिलेगी।


मानवी काया का अदृश्य अस्तित्व

मनुष्य मात्र वह शरीर नहीं है, जो बाह्य रूप से दीखता है परन्तु वह चेतना कस सूक्ष्म रूप है, जो मृत्यु के बाद भी बचा रहता है। मनुष्य के चारों और एक ऑरा होता है, जो ज्ञानी, भक्त और सिद्ध पुरुषों में स्पष्ट दीखता है। यही ऑरा (प्रभामण्डल) मनुष्य की चेतना का शरीर या सूक्ष्म शरीर है, जो कि उसकी वास्तविकता है। यह ऑरा प्रकाश के रंगों और लहरों के रूप में होता है एवं समस्त विषयों में भावनाएँ व्यक्त करता है। यह भिन्न-भिन्न लोगों में भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। यह मनुष्य के धार्मिक, दार्शनिक, राजनैतिक, आर्थिक, दूसरों के प्रति उसके सम्बन्धों उसके व्यवहारों और अधिकारों आदि बातों को व्यक्त करता है। चिन्तन के अनुरूप बदलता रहता है।

“मेन विजीबल- इन विजीबल” पुस्तक के लेखक सी.डब्ल्यू लेडवीटर के अनुसार हमारे मन के अनेकों दिशाओं में दौड़ लगाते रहने के कारण और परिस्थितियों के कारण यह ऑरा अनेक भागों में विभाजित हो जाता है। हम नित्य अनेक सुख साधनों को चाहते हैं और अनेक आकाँक्षाएँ रखते हैं। इनकी पूर्ति न होने के कारण, ये भाव अचेतन मन में अंकित हो जाते हैं। इनका प्रभाव हमारे चरित्र और चिन्तन पर बुरा पड़ता है। हमारे जाने-अनजाने असंख्य विद्वेषों, प्रतिशोधों का अंकन नित्य चेतना पर होता है। हिप्नोटिज्म से या ध्यान द्वारा मस्तिष्क को उत्तेजित करके इन्हें ज्ञात किया जा सकता है। इससे मन का मस्तिष्क से कितना घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

हमारे असंख्य विचारों और भावनाओं के कारण आदतों में भी परिवर्तन होते रहते हैं। हमें प्रेम, घृणा, सुन्दरता, कुरूपता, सहानुभूति, साहस, धैर्य, शत्रुता या मैत्री की भावनाएँ नित्य पीड़ित करती रहती हैं। इस परिवर्तन के अनुसार हमारी चेतना मण्डल या ऑरा भी बदलता रहता है। ईसा का कथन है कि स्वर्ग का राज्य कहीं नहीं है। स्वर्ग मात्र मनुष्य के मन और हृदय की एक स्थिति भर है। जब वह अपनी त्रुटियाँ देखकर उन्हें सुधरता है और सत्य को समझता है तो उस दृष्टिकोण से वह स्वयं को स्वर्ग जैसी स्थिति में पहुँचा लेता है।” इस सत्य या ज्ञान को जान लेने पर वह हमेशा दूसरे मनुष्यों की सहायता करता है। साथ ही आन्तरिक शाँति और मन की स्थिरता से चेतना शुद्ध होती है और शीघ्र ही परमात्मा से एकत्व स्थापित करती है। वैज्ञानिकों और अनुसन्धान कर्त्ताओं को अपने अनुसन्धानों में शान्ति एवं स्थिरता से ही मन के नए-नए आयामों का रहस्योद्घाटन करने में सफलता मिली है।

विभाजित चेतना भी एक बार अवसर मिलने पर तनावों एवं दबावों से मुक्त होकर एकत्व स्थापित कर सकती है। इसके लिए उसका स्वतन्त्र, शान्त एवं स्थिर होना आवश्यक है। उसे लालसाओं, आदतों और आकर्षणों से सर्वथा मुक्त होना चाहिए तब उसकी प्रकृति और समझदारी सही दिशा में नियोजित होती है तथा वह अपने एवं दूसरों के प्रति व्यवहार सत्य के आधार पर करता है। इससे वह समस्याओं से मुक्त रहता है और सभी परिस्थितियों एवं कठिनाइयों का मुकाबला आसानी एवं धैर्य के साथ कर लेता है। इस शुद्ध चेतना के स्वतः प्रकाशित होने से ब्रह्मांड से सीधा संपर्क कायम हो जाता है और वह वहाँ की समस्त शक्तियों का लाभ उठाता है।

साधारणतः हम सोचने, सुनने और सामान्य काम करने आदि में अपनी शक्ति का एक अंश ही लगाते हैं। परन्तु विपत्तियों में हम अपनी पूरी शक्ति लगा देते हैं और उससे प्रायः मुक्त हो जाते हैं। यह चेतना की कुल शक्ति तब अपनी पूरी सामर्थ्य से काम करती है, जो उसकी स्वतन्त्रता की द्योतक है। यह अज्ञात शक्ति मनुष्य के भीतर से ही आती है। इस शक्ति का आभास मनुष्य के ऑरा के प्रत्येक भाग से होता है। ऑरा की असीम शक्ति जीवन और चेतना की एकता का प्रतीक है। डा. एनी बेसेन्ट के अनुसार ऑरा का प्रकाश भीतर से बाहर की और चक्राकार में प्रवाहित रहता है एवं यह प्रकाश अनेक रंगों में जीवन की स्थितियों को प्रकट करता है। दिव्य दृष्टा पुरुष इसे देख सकते हैं।

यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन हमेशा वर्तमान स्थिति में होता है। भूतकाल की बातों को भूलने पर ही वर्तमान की स्थिति आती है और आत्मा (या चेतना) शुद्ध होती है। तब जीवन शुद्ध और स्वतन्त्र होता है। यही आत्म सत्ता का शाश्वत सौंदर्य है। मृत्यु एक प्रकार का पटाक्षेप है। वह आत्मा को शुद्ध करती है और भूतकाल के अनुभवों को समाप्त करती है। शुद्ध चेतना फिर भौतिक आकर्षणों और भाग-दौड़ में नहीं पड़ती। परमात्मा से उसका एकत्व कभी नष्ट नहीं होता। जीवन अविनाशी है, यद्यपि शरीर का नाष हो जाता है। पूर्वार्त्त दर्शन के अनुसार हर आत्मा का दुबारा जन्म फिर होता है, क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। किन्तु अपवाद रूप में कोई-कोई मनुष्य अपने जीवन काल में ही चेतना को शुद्ध एवं स्वतंत्र कर लेते हैं, तब दुबारा जन्म लेना या न लेना उनकी इच्छा पर निर्भर होता है। ऋषि, महामानव, देवदूत इसी श्रेणी में आते हैं।

मनुष्य जब अपनी चेतना की क्षमता को समझ लेता है, और शुद्ध बना लेता है तब उनके जीवन एवं मृत्यु की अनेक समस्याएँ एवं पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं। आत्म-सत्ता सम्बन्धी यह जीवन दर्शन जो भली-भाँति हृदयंगम कर लेता है, वह जीवित रहते हुए भी बन्धनों से, कषाय-कल्मषों से सर्वथा मुक्त रहता है।

मन को शक्ति इस प्राण शरीर या सूक्ष्म चेतना से ही मिलती है। मन बहुत संवेदनशील और शक्तिशाली है और प्रत्येक परिस्थिति का उस पर प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य का मन दूसरे के मन से अलग-अलग विचारों, भावनाओं एवं अनुभवों का समुच्चय होता है। इस आधार पर ही प्रत्येक का व्यवहार एवं आदतें दूसरों से भिन्न विकसित होती हैं। उनकी अभिलाषाएं भी भिन्न-भिन्न होती हैं। मन का व्यावहारिक प्रकटीकरण अपने आप निरन्तर जाने अनजाने में होता रहता है।

मृत्यु से शरीर नष्ट होता है परन्तु उसके सारे जीवन के अनुभव एवं उसकी सक्रियता के सूत्र सूक्ष्म शरीर में बीज रूप में विद्यमान रहते हैं। ये आत्मा के साथ हर जीवन में साथ देते हैं। आत्म-सत्ता प्रकृति में पूर्ण चैतन्यता एवं स्वतन्त्रता बनी रहती है। अपनी इस आन्तरिक विभूति की स्वतन्त्रता एवं शक्ति को समझने से मनुष्य असीम शक्तिशाली एवं क्रियाशील बन सकता है। इससे उसका हर नया पल सफल एवं महान् विकसित होता रह सकता है। महापुरुषों में हमेशा ताजगी, तरुणाई एवं सहृदयता आदि गुण पाये जाते हैं। यह शक्ति शरीर और मन की ही नहीं होती वरन् अंतरात्मा की होती है। चेतना के स्वतन्त्र होते ही यह जीवन-शक्ति विस्फोटक हो जाती है। यह स्थिति स्वैच्छिक मृत्यु होने के बाद नए जीवन में सुगमता से विकसित होती है और ऐसी आत्मा का हृदय शुद्ध होता है।

नित नूतन नवीनता और सुन्दरता बाह्य विश्व और पदार्थों में नहीं है, वरन् वे चेतना में हैं। चेतना ही सोचती, समझती और प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। मानव चेतना अति महत्वपूर्ण एवं सूक्ष्म है। दैनन्दिन क्रिया-कलापों की स्मृति उसकी भाव प्रवीणता को कमजोर करती है। पर स्मृति के बिना हम संसार में नहीं रह सकते। हमारे सम्पूर्ण क्रिया-कलाप स्मृति के आधार पर ही होते हैं। यह स्मृति जीवन के असंख्य आकर्षणों के कारण संकुचित हो जाती है। किन्तु शुद्ध चेतना पर समय और दूरी का प्रभाव नहीं पड़ता।

हमारी आत्म-सत्ता जीवन की संपूर्ण हलचलों को बिना किसी प्रतिरोध के अंकित करती रहती है, क्योंकि प्रतिरोध से कठिनाइयाँ, बाधाएं और समस्याएँ पैदा होती हैं। गीताकार के अनुसार शुद्ध चेतना असंख्य प्रकार के जीवन प्रवाहों को बिना प्रभावित हुए सहन करती रहती है। कौन कितना, किस सीमा तक स्वयं को शुद्ध बनाकर आत्म-चेतना को विकसित करता है, इसी पर उसकी अन्तरंग एवं बहिरंग क्षेत्र में सफलता निर्भर करती है। यही है वह तत्वज्ञान जो किसी भी साधारण से मनुष्य को बोध होने पर महामानव बना देता है।


स्वेच्छा मरण- एक उलझी गुत्थी

आहार विहार के व्यक्तिक्रम से लोग अपनी जीवनी शक्ति बुरी तरह गंवाते जा रहे हैं। ऐसी दशा में न अपनी स्थिरता बनाये रखना सम्भव होता है और न कठिन रोगों से जूझते हुए निरस्त कर पाना। जिनने अपने बचपन और यौवन में समर्थता की पूँजी संग्रह नहीं की है, उनके लिए बुढ़ापा बहुत कष्ट साध्य होता है। सामान्य दिनचर्या के लिए भी दूसरों का सहारा तकना पड़ता है और यदि वह साधन उपलब्ध न हों तो दिनचर्या का क्रम भी यथावत् नहीं चल पाता। स्वच्छता का क्रम भी गड़बड़ा जाने से नये किस्म की बीमारियाँ उठती रहती हैं।

कई बार शरीर अत्यधिक जर्जर हो जाता है। इतना ही नहीं, कभी-कभी कोई ऐसे भयंकर रोग घेर लेते हैं, जिससे शरीर की अपनी दैनिक सफाई और उपचार व्यवस्था भी नहीं बन पड़ती। विशेषतया वहाँ के लोगों के लिए तो और भी कठिनाई होती है, जहाँ सरकारी अस्पताल नहीं है।

रोगों की पीड़ा कई बार इतनी जकड़न पैदा कर देती है। इस पीड़ा की बहुलता के साथ जिन्दगी के बचे हुए दिन काटना कठिन पड़ता है और स्थिति दयनीय दुर्गति स्तर की बन जाती है।

विचारकों के सामने यह प्रश्न है कि जिनकी बीमारी असह्य स्थिति तक पहुँच गयी है, उन्हें शान्तिपूर्ण मृत्यु के आह्वान का कोई उपाय करना चाहिए या नहीं। असह्य पीड़ा की तुलना में कई बार गहरी निद्रा में ले जाने वाली या सरलतापूर्वक जीवन का अन्त कर देने वाली व्यवस्था अधिक सुविधाजनक प्रतीत होती है।

प्रचलित कानून के अनुसार आत्महत्या करना या उसमें सहायता करना अपराध है। प्रयास करने वाले पकड़े जाने पर दण्ड के भागी होते हैं। अतएव जिनके दिमाग में असह्य व्यथा से छूटने का विचार उठता है वे भी विवशता में उसे कार्यान्वित नहीं कर पाते। इस कठिनाई को हल करना उचित है या नहीं, उस प्रश्न पर बहुत समय से विचार किया जा रहा है।

आवेश में, प्रतिशोध रूप में हत्या या आत्म-हत्या करना गर्हित है। इस सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते। आदमी ऐसी स्थिति में आपे से बाहर हो जाता है। उचित अनुचित का विवेक भूल बैठता है एवं छोटी बात के लिए भी प्राण घातक आक्रमण जैसी नृशंसता कर बैठता है। किसी से असन्तुष्ट या रुष्ट होने पर उस पर प्राण घातक आक्रमण ही कर बैठा जाय, यह न्याय की कोई भी विचारणा समर्थन नहीं कर सकती। फिर आवेशग्रस्त की तो ऐसी स्थिति रहती ही नहीं, जिसमें वह अपराध और दण्ड के मध्यवर्ती और सत्य का निर्णय कर सके। इसके लिए न्यायालय बने हुए हैं। कानून की धाराएँ निर्धारित हैं। किसने किस परिस्थिति में, किस स्तर पर अपराध किया और उसके लिए कितने दण्ड की आवश्यकता है, इसका निर्णय करना निष्पक्ष एवं विचारशील न्यायाधीश का ही काम है। क्षतिग्रस्त तो आवेश में आपे से बाहर होता है। औचित्य वाली बात सोचने की उसकी मनःस्थिति ही नहीं होती। ऐसी दशा में उसका प्रतिशोध या आक्रोश इतना उग्र भी हो सकता है कि प्रति पक्षी का प्राण हरण भी कर ले। इसलिए न्याय का अधिकार विचारशील न्यायाधीशों को निर्धारित संहिता के अनुरूप देने का ही विधान है। जो कानून हाथ में लेता है वह अपराधी माना जाता है और कानून हाथ में लेने का दण्ड स्वयं उसे भुगतना पड़ता है।

आत्महत्या भी लगभग इसी प्रकार का अनुचित प्रयास है। व्यक्ति किसी के व्यवहार से रुष्ट होकर जब उसे दंड दे सकने की स्थिति में नहीं होता तो उस आक्रोश को अपने ऊपर उतारता है और स्वयं आत्महत्या कर बैठता है। इस प्रयास के अनेकों कारणों में से दो प्रमुख हैं। एक यह है कि दूसरों से जिस प्रकार के सहयोग सद्व्यवहार की आशा नहीं होती, वह न मिलने पर जो क्षोभ उत्पन्न होता है, उसके बदले वह आत्म हत्या कर बैठता है। इसका वास्तविक उद्देश्य अपने अभाव में जो दुःख या कष्ट दूसरों को देना होता है उसकी पूर्ति आत्महत्या जैसे उपाय से करना होता है।

महत्वाकाँक्षाओं को बहुत हद तक बढ़ा लेने और उनकी पूर्ति का सुयोग न बन पड़ने पर भी मनुष्य कातर जैसी मनःस्थिति में जा पहुँचता है और उस व्यथा से छुटकारा पाने के लिए आत्म-हनन जैसा कुकृत्य कर बैठता है।

यह सभी स्थितियाँ विवेक हीनता की परिचायक है। जब मस्तिष्क संतुलित नहीं होता तो उसके लिए यह सोच सकना भी कठिन होता है कि उन्हें स्थिति से निपटने के लिए क्या करना चाहिए? शान्त चित्त से सोचने पर ऐसे अनेकों उपाय सूझ सकते हैं कि बिना कोई दुर्घटना किये भी समस्या का हल निकल सके ओर गुत्थी एक तरह न सही दूसरी तरह सुलझ जाय। आवेशजन्य आक्रमणों को इसलिए एक स्वतन्त्र अपराध गिना जाता है और उसके लिए पूर्व प्रकरण को ध्यान में न रखते हुए इस दृष्टि से दण्ड दिया जाता है कि उसने न्याय व्यवस्था होते हुए भी कानून को अपने हाथ में क्यों लिया? यह बर्बर तरीका है। इसलिए निन्दनीय भी है और दंडनीय भी।

किन्तु शरीर के इतना गल जाने पर कि चिकित्सक भी उसके बचने की आशा छोड़ दें और रोगी अपने आप में अत्यधिक कष्ट सहन कर रहा हो तो स्वेच्छामरण का प्रश्न इन दोनों परिस्थितियों में भिन्न हो जाता है। यह पीड़ा के असह्य होने पर उसको सहने के कार्यकाल का स्तर घटा देने की एक प्रकार से दया याचना है, जो किसी की सहायता से भी ली जा सकती है और उसका उपाय स्वयं भी खोजा जा सकता है। प्रश्न यह है कि ऐसी दशा में भी वह कृत्य आत्महत्या के अपराध में सम्मिलित होता है या नहीं। इसके संदर्भ में दो मत हैं। एक वह जिसका कथन है कि ईश्वरीय विधान को पूरा करके ही शरीर दफनाना या जलाना चाहिए। दूसरे पक्ष का कथन है कि जिस प्रकार रोगों के उपचार में ईश्वर की इच्छा को ध्यान में रखते हुए अपनी स्वतन्त्र बुद्धि कष्ट निवारण का प्रयत्न चिकित्सक करते हैं तो अनिवार्य स्थिति में स्वेच्छामरण को क्यों उचित नहीं समझा जा सकता?

गाँधी जी के आश्रम में एक बछड़ा अत्यधिक बीमार था। उसके बचने की कोई आशा नहीं थी। अहिंसा के समर्थक गाँधी जी ने डाक्टरों को परामर्श देकर उसे विष का इन्जेक्शन लगवा दिया था और उसकी जल्दी ही कष्ट रहित मृत्यु हो गई। इस प्रश्न को लेकर उन दिनों पक्ष और विपक्ष में बहुत चर्चाएं हुईं। पर गाँधी जी ने अपने निर्णय में कोई अनौचित्य न माना।

पिछले दिनों महाराष्ट्र की विधान सभा में ऐसे ही एक प्रस्ताव पर विचार हुआ कि इस स्तर के स्वेच्छामरण में सहायता करना दया धर्म का परिपालन माना जाय और डाक्टरों की समिति उसे जीवन का बचाना असम्भव घोषित कर दे तो उसे ऐसा उपचार दिया जाना चाहिए कि उसके स्वेच्छामरण में विलम्ब न लगे। ऐसा प्रस्ताव अमेरिका की कुछ फेडरल सरकारों ने तो पास कर नियम लागू भी कर दिया है। इसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में “यूथेनेसिया” कहा जाता है।

इस संदर्भ में संसार भर में अनेकों विचार चल रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि जब मनुष्य अपने शरीर का भार उठाने लायक नहीं रहा तो उसे दूसरों का समय और धन क्यों नष्ट करना चाहिए और स्वेच्छामरण के लिए अपने को प्रस्तुत क्यों नहीं रहना चाहिए? इसके विपरीत नरमपन्थी विचारशील पक्ष का यह मत है कि ऐसा करने पर मनुष्यों को एक-दूसरे के प्रति दया धर्म का पालन करने की गुंजाइश ही न रहेगी और मनुष्य पूरी तरह निष्ठुर उपयोगिता वादी बन जायेगा। कुछ भी हो, कैन्सर व अन्य असाध्य रोग तथा वृद्धों की बढ़ती संख्या के साथ यह पक्ष भी जोर पकड़ता जा रहा है।


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किसने कितना दान दिया यह मत देखो, वरन् यह पूछो कि किस प्रयोजन के लिए किसके हाथ सौंपा।


संकल्पशक्ति सर्वोपरि

मनुष्य शरीर में सबसे अधिक संवेदनशील अवयव मस्तिष्क है। वह मात्र सोचने विचारने के ही काम नहीं आता वरन् उसमें उत्पन्न होने वाली विद्युत सम्पूर्ण शरीर का क्रिया संचालन करती है। अचेतन मस्तिष्क से सम्बन्धित असंख्यों तार शरीर के प्रत्येक घटक तक पहुँचते हैं। उसकी सुव्यवस्था रखते हैं, आवश्यक आदेश देते हैं तथा समस्याओं का समाधान करते हैं।

यह शरीर चर्चा की बात हुई इसके अतिरिक्त सचेतन भाग द्वारा विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मन और बुद्धि द्वारा निर्णय किये जाते हैं और उनकी पूर्ति के लिए योजना बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने का उत्तरदायित्व उठाया जाता है। इसके प्रखर होने पर ही मनुष्य प्रतिभावान बनता है और अनेक सफलताएँ अर्जित करता है। बाह्य मस्तिष्क का स्तर मन्द होने पर मनुष्य मूर्ख कहलाता है और उसका चिन्तन अटपटा रहता है।

जीवन के हर क्षेत्र को मस्तिष्क प्रभावित करता है। उसके स्तर के अनुरूप शारीरिक स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। मनोविकार स्वास्थ्य को गिराने और व्यक्तित्व को अटपटा बनाने के प्रधान कारण होते हैं। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की- गुण कर्म स्वभाव की दिशाधारा इसी आधार पर बनती है कि मस्तिष्क को किस प्रकार प्रशिक्षित एवं अभ्यस्त किया गया।

यों कोई व्यक्ति आकाँक्षाओं के अनुरूप अपने मनोबल को विकसित कर सकता है और तद्नुरूप साधन जुटा सकता है और उस दिशा में सहायक सिद्ध होने वाले व्यक्तियों के साथ संपर्क बना सकता है। पर यह अपवाद रूप में ही होता है। आम बात यह है कि संपर्क और वातावरण से मनुष्य प्रभावित होता है और साथी, सहयोगी, कुटुम्बी जिस मार्ग पर चलते हैं उसी का अनुकरण होने लगता है। सत्संग की ही तुलना में स्वाध्याय भी प्रभावशाली होता है। यदि उन्नतिशील बनाने वाले तथ्यों से भरा-पूरा साहित्य मिलता रहे और उसमें प्रस्तुत किये गये विवेक पूर्ण तथ्यों को विवेक पूर्वक अपनाया जाता रहे तो भी संवेदनशील मस्तिष्क उसी प्रकार ढांचे में ढलने लगते हैं जैसे कि वातावरण प्रभावित करता है।

प्रकृति भी ऋतुओं के- वय के अनुरूप मनुष्य में कई परिवर्तन करती रहती है। काम वासना, मनोरंजन के लिए उमंग यों हारमोनों से सम्बन्धित है किन्तु संचित संस्कार भी भले बुरे कामों के लिए उत्साह प्रदान करते हैं। मस्तिष्क माता के गुण कर्मों से अत्यधिक प्रभावित होता है। इसलिए कहा जाता है कि सुसन्तति प्राप्त करने की आकाँक्षा की पूर्ति के लिए जननी का स्तर ऊँचा उठाया जाना चाहिए। उसके स्वास्थ्य, शिक्षण के अतिरिक्त ऐसा वातावरण दिया जाना चाहिए जिसमें प्रसन्नता के साथ-साथ नैतिकता की प्रेरणा भी मिलती रहे। सुयोग्य सन्तान के लिए जननी का स्तर उठाने का प्रयत्न करना चाहिए। दूध पीने की तरह वह स्वभाव की विशेषताएं भी बहुत कुछ माता से ही प्राप्त करता है।

यह मानसिक विकास का प्रथम अध्याय है। दूसरे अध्याय में स्कूली प्रशिक्षण को महत्व दिया जाता है। पाठ्यक्रम के सहारे विविध विधि जानकारियों की आवश्यकता है। किन्तु अध्यापकों और साथियों के स्वभाव से बनने वाला वातावरण भी मानसिक विकास में कम सहायक नहीं होता। इसलिए जिन्हें बुद्धिमान बनना है उन्हें ऐसे वातावरण में पढ़ाया जाना चाहिए जहाँ मूर्खतापूर्ण बातें न होती हों।

मानव मन की भिन्नताओं और विशेषताओं में प्रकृतिगत सूक्ष्म प्रवाहों का भी प्रवाह पड़ता है। हर मस्तिष्क की संरचना देखने पर एक जैसी लगते हुए भी उसके न्यूरान घटकों के आकार-प्रकार में बहुत अन्तर होता है। जिस प्रकार हथेली की लकीरें और पोरवों पर रहने वाले अंकनों में प्रत्येक मनुष्य की स्थिति भिन्न होती है, उसी प्रकार मस्तिष्कीय न्यूरान, जीव कोष तथा विद्युत कम्पनों में भिन्नता रहती है। मस्तिष्क में दो प्रधान ग्रन्थियाँ हैं। एक पिट्यूटरी, दूसरी पीनियल। इनसे हारमोन स्तर के स्रावों का प्रवाह बहता रहता है। उसकी न्यूनाधिकता तथा दिशाधारा के अनुरूप मनुष्य की अभिरुचि तथा प्रतिभा प्रवाहित होती है। वंशानुक्रम से पीढ़ियों के मिले उत्तराधिकार भी इसी क्षेत्र में विद्यमान रहते हैं। ग्रह-नक्षत्रों के विकिरण एक मस्तिष्क पर एक प्रकार का प्रभाव डालते हैं तो दूसरे पर दूसरे प्रकार का। ऐसे ही अनेक कारणों से हर मस्तिष्क दूसरों से भिन्न स्तर का होता है। इन सब कारणों को देखते हुए लगता है कि मस्तिष्क एक प्रकृतिगत देन है और उसी आधार पर मनुष्य मूर्ख या बुद्धिमान होता है। स्वभाव और चिंतन की दृष्टि से भी वह इन्हीं कारणों से प्रभावित रहता है। यह तथ्य बताते हैं कि सौंदर्य और कुरूपता की तरह मस्तिष्कीय विलक्षणतायें भी प्राकृतिक कारणों एवं जन्मजात संस्कारों से प्रभावित होती हैं। इतने पर भी वातावरण एवं संकल्प का अपना महत्व है। वह इन सब प्राकृतिक कारणों को बदल सकने में समर्थ हैं। कालिदास, वरदराज आदि के उदाहरण ऐसे हैं जिनमें उनकी आरंभिक स्थिति देखते हुए अनुमान होता था कि ये सदा मूर्ख रहेंगे। विद्याध्ययन में भी इन्हें सफलता न मिलेगी। पर जब उनने संकल्पपूर्वक विद्वान बनने का निश्चय किया तो प्राकृतिक संरचना को उलटकर उनने तीक्ष्णता अर्जित कर ली और सामान्यजनों की अपेक्षा अधिक ऊँचे स्तर के विद्वान बन गये। इससे प्रतीत होता है कि संरचना और वातावरण का प्रभाव कैसा ही क्यों न हो मनुष्य उसमें आश्चर्यजनक परिवर्तन कर सकता है। सुधारना ही नहीं बिगाड़ना भी सम्भव है।

जिस प्रकार औषधियों का शरीर के विभिन्न अवयवों पर प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार संकल्प भी शरीर के ढाँचे को- स्वास्थ्य को ही नहीं, मानसिक क्षमता को भी प्रभावित करता है और स्वभाव तक में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाता है। जिस प्रकार आहार का शरीर क्रम के साथ भारी सम्बन्ध है, उसी प्रकार आकाँक्षा, चिंतन प्रक्रिया और संकल्प शक्ति मनःसंस्थान को प्रभावित करती है। उसकी संरचना का कितना ही महत्व क्यों न हो- वातावरण से, प्रकृति प्रवाहों से वह कितना ही प्रभावित क्यों न रहता हो, पर इस सबमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह निश्चय पूर्ण संकल्पों के दबाव से अस्वीकार कर सके। शरीर के अन्यान्य अवयवों को हम इच्छानुसार मोड़ने मरोड़ने में एक सीमा तक ही सफल हो सकते हैं पर मस्तिष्क के सम्बन्ध में बात दूसरी है। उसे सुधारा, बदला ही नहीं उलटा तक जा सकता है। इस दृष्टि से वह जितना सशक्त और महत्वपूर्ण है, उतना ही कोमल भी है। वह शरीर में सबसे ऊँचे स्थान पर अवस्थित है। इतने पर भी वह संकल्प शक्ति से ऊपर नहीं है। संसार में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए हैं, जिनका आरम्भिक जीवन साधारण ही नहीं हेय स्तर का भी था, किन्तु जब उनने अपने आपे को उच्चस्तरीय बनाने का निश्चय कर लिया तो अभ्यस्त आदतें जो परिवर्तन स्वीकारने में आना-कानी करती थीं, संकल्प शक्ति के दबाव से आमूल-चूल परिवर्तन हो गईं। सामान्य व्यक्ति असामान्य बन गये। इसीलिए मानव जीवन में इच्छा शक्ति का महत्व मस्तिष्कीय संरचना से भी अधिक माना गया है।


जीवन के अन्तिम दिन (kahani)

सार्त्र ने जीवन के अन्तिम दिन तक उपयोगी काम करते रहने का सिलसिला जारी रखा। वे अपने को कभी थका हुआ या परिस्थितियों की प्रतिकूलता से हारा हुआ नहीं मानते थे। वे समझौते की नीति पर विश्वास करते थे और कहते थे कि यदि परिस्थितियां अपने अनुकूल नहीं बन सकती तो हमें उनके अनुकूल बनना चाहिए। खींच-तान की अपेक्षा समझौते की नीति अपनानी चाहिए। केवल अनीति ही एक ऐसा असमंजस है जिसके साथ न तो सहमत ही हुआ जा सकता है और न उसका साथ दिया जा सकता है।


रोग निवारण हेतु मनोबल का उपयोग

रोग पहले मन में प्रवेश करते हैं पीछे शरीर में उभरते हैं। शरीर पर चेतना का अधिकार है। चेतना में विकृतियाँ उत्पन्न होने पर शरीर भी विकारग्रस्त होता है। जिस आहार-विहार के अनाचार की निन्दा की गई है और रोगों का निमित्त कारण बताया गया है, वह वस्तुतः मानसिक दोष ही है। असंयम मन में उभरता है। उसका प्रयोग भर इन्द्रियों द्वारा होता है। मन पर कोई तीव्र आघात लगे तो बड़ी से बड़ी लालसा भी तत्काल समाप्त होगी। मन लगने तक ही इन्द्रियों में उत्साह रहता है। मन के शान्त होने पर अनाचार बन पड़े ऐसा हो ही नहीं सकता।

शरीर पर मन का अधिकार है। मस्तिष्क जैसे ही निद्राग्रस्त होता है वैसे ही शरीर मृतक तुल्य निःचेष्ठ हो जाता है। शोक, हानि विग्रह जैसे समाचार सुनते ही चित्त बेचैन हो जाता है। भूख प्यास, निद्रा सभी गायब हो जाती है। क्रोध की अवस्था में शरीर की उतनी ही क्षति होती है जितनी तेज बुखार में। मन लगने पर काम अच्छा और जल्दी होता है किन्तु यदि अन्यमनस्कता छाई रहे तो बेगार भुगतने की तरह किया हुआ काम अधूरा और घटिया ही रहेगा। चेहरे की तेजस्विता और मुर्दनी बहुत कुछ मन की स्थिति पर अवलम्बित रहती है। मात्र शरीर रचना ही जन्मजात होती है। आकृति पर आमतौर से प्रकृति ही छाई रहती है। उसी को देखकर लोग किसी के व्यक्तित्व का स्तर परखते हैं।

मनोविकार रोगों के जन्मदाता हैं। अनेक प्रकार के असंयमों का सृजन भी विकृत मन ही करता है। इसके अतिरिक्त क्रोध, आवेश, निराशा, भय आशंका चिन्ता आदि का भी ऐसा कुप्रभाव पड़ता है कि अच्छा खाते-पीते और सुविधाएँ रहते हुए भी शरीर क्षीण होता जाता है। इसके विपरीत यह भी देखा गया है कि हँसोड़, उत्साही और निर्द्वन्द्व मनुष्य घटिया खान-पान रहते हुए भी हट्टे-कट्टे रहते हैं और निरोग देखे जाते हैं।

चिकित्सा उपचार में भी श्रद्धा विश्वास का भारी योगदान रहता है। जिस चिकित्सक पर- जिस औषधि पर गहरा विश्वास हो, उसका प्रभाव विलक्षण होता है और रोग मुक्ति का सुयोग जल्दी ही बन जाता है। किन्तु यदि अविश्वास हो, सन्देह या आशंका रहे तो न चिकित्सक का उपयुक्त प्रभाव पड़ेगा और न उनकी दी हुई दवा कारगर सिद्ध होगी।

देखा गया है कि “शंका डायन- मनसा भूत” बाली उक्ति अनेक बार सही सिद्ध होती है। भूत पलीत हो या न हो पर उन पर विश्वास करने वाले तो अवश्य ही हावी रहते हैं। अन्धेरे में दौड़ता हुआ चूहा भी भूत लगता है और विश्वासी मरघट के समीप ही खेतों में काम करते रहते हैं, झोंपड़ी बनाकर बाल-बच्चों समेत रहते हैं। उन्हें खटका तक नहीं होता।

ग्रह नक्षत्रों की दशा विपरीत होने की बात जिनके मन में जम जाती है उनका मन काम में हाथ डालते हुए भी डरता है और असमंजस की स्थिति में काम प्रायः उलटा ही पड़ता है। इससे देव प्रतिकूल होने की बात पर ओर भी अधिक विश्वास जम जाता है। ऐसे व्यक्तित्वों का भविष्य अंधकारमय ही बनता जाता है। सामने आये हुए सुयोग का भी वे लाभ नहीं उठा पाते।

छोटे रोग को बड़ा मान लेने पर वह विपत्ति बन जाता है। शरीर में भरा हुआ विजातीय द्रव्य जितनी हानि पहुँचाता है, उससे अनेक गुनी हानि मन की कुशंका में उत्पन्न होती है। जो जल्दी मरने की बात सोचते रहते हैं उसका सोचना ही आधी आयु को खा जाता है। जितने व्यक्ति मौत से मरते हैं, उससे अधिक लोग मौत के भय से मर जाते हैं।

आरोग्य के सम्बन्ध में भी यही बात है। जिन्हें अपने दीर्घ जीवन पर विश्वास है उनका दुर्बल शरीर भी लम्बी आयु तक साथ देता रहता है। बड़े रोग को छोटा गिनने की लापरवाही तो नहीं करनी चाहिए किन्तु ऐसा भी नहीं होना चाहिए। किन्तु रोग होते ही घबरा जाना और अपने तथा घर वालों के हाथ-पैर फुला देना। प्रकृति के अनुरूप आहार-विहार को नये सिरे से ढाल लिया जाय तो शरीर की जीवनी शक्ति में ही इतनी क्षमता विद्यमान है कि वह बिगाड़ को सुधार दे। प्रकृति ने शरीर दिया है तो उसके साथ इतनी क्षमता भी दी है कि टूट-फूट की मरम्मत भी करती रहे। रोग वस्तुतः प्रकृति की भीतरी क्षमता के अनुरूप उभरते और समाप्त होते रहते हैं। चिकित्सा का प्रधान कार्य रोगी का मनोबल बनाये रहना है। जितना काम दवा करती है उससे कहीं अधिक रोगी का धैर्य, संयम और विश्वास काम करता है। इन्हें गँवा बैठने पर तो रोगी बेमौत मरने की तैयारी करता है।

मानसिक चिकित्सा का एक स्वर्णिम सूत्र यह है कि जिस अवयव में कष्ट हो उस पर ध्यान एकाग्र किया जाय और भावना की जाय कि इस स्थान की जीवनी शक्ति रोग द्रव्य को मार भगाने में तत्परतापूर्वक जुट रही है और उसका उपयोगी प्रभाव भी हो रहा है। इसमें उस स्थान पर उसी भावना से हाथ फिराते रहने का भी अच्छा प्रभाव होता है।

प्राण चिकित्सा के उपचारक हाथ फिराकर या उँगलियों के छोरों का स्पर्श कराकर रोगों की चिकित्सा करते हैं। चुम्बक को उस स्थान पर फिराकर भी चिकित्सा की जाती है। रंगीन बोतलों में पानी भरकर सूर्य की धूप में रखने और उस पानी के उपयोग से रोग निवारण करने तथा होम्योपैथी चिकित्सा में अधिकांश लाभ रोगी के मन पर विश्वास जमा देने के कारण मिलता है। यह प्रभाव उपचार प्रक्रिया से काम किसी प्रकार नहीं होता। सन्त महात्मा अपनी धूनी की भभूत देकर अनेकों का रोग निवारण करते देखे गये हैं। इसमें उनकी प्राण शक्ति का जितना योगदान होता है उतना ही रोगी के विश्वास करने का भी होता है।

अपने विश्वास की शक्ति को दूसरों के माध्यम बनाकर प्रयुक्त करने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि हम बाल क्रीड़ा न करें। यथार्थता को समझें। अपने विश्वास की क्षमता की गरिमा समझें और बिना किसी का अहसान लिए स्वयं अपने लिए प्रयुक्त करें। यह सभी प्रकारान्तर से “स्व संकेत” (आटो सजेशन) हैं। इन्हें जब सीधे अपने लिए या दूसरों के लिए प्रयुक्त करके उसका प्रत्यक्ष लाभ देखा जा सकता है तो तथ्य से अनजान रहकर पराश्रित क्यों बने रहें? अपनी सम्पन्नता और विभूति की गौरव गरिमा स्वयं ही क्यों न अनुभव करें। शक्ति अपनी है तो उसका श्रेय किसी और को क्यों लूटने दें।

बीमारियों के सम्बन्ध में अपनी अत्यधिक क्षमता- संकल्प शक्ति की प्रखरता का उपयोग हमें स्वयं करना चाहिए। पीड़ित अंग पर अपनी भावनाओं को केन्द्रित करना चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि अन्तराल में सन्निहित जीवनी शक्ति अपनी मानसिक शक्ति के समन्वय से दूनी सामर्थ्यवान बन रही है और वैसा ही प्रयुक्त करने में सफल हो रही है जितना कि मनोबल के मिल जाने से औषधि उपचार दूना काम करता है। यह एक प्रकार की “बायोफीड बैक” प्रक्रिया है।

रोग में चिकित्सा की मनाही नहीं है। यदि उपचार करना ही हो तो प्राकृतिक चिकित्सा या वनौषधि उपचार का आश्रय लेना चाहिए। उसमें मलों के निष्कासन, विश्राम और शिथिलीकरण जैसे मनोवैज्ञानिक उपचारों तथा जीवनीशक्ति सम्वर्धन का समन्वय है। उसमें एक रोग को मारने के लिए दूसरा रोग उत्पन्न करने वाली हानिकारक प्रक्रिया से बचाव होता है। ऐलोपैथी उपचार में तो रोग मारण के नाम पर जीवनी शक्ति को ही मारा जाता है। चिकित्सा चलते रहने के साथ भी यदि मानसिक क्षमता संकल्प बल का भी प्रयोग किया जाता रहे तो इससे अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में और अधिक जल्दी लाभ मिलने की आशा है।


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देवता न भूखे हैं न प्यासे उन्हें न शृंगार चाहिए न उपहार। श्रेष्ठ सत्कर्मों को देखकर ही उनकी तृप्ति हो जाती है।


पूर्वार्त्त और पाश्चात्य लोगों का बुढ़ापा

इन दिनों बच्चों की अधिक उत्पत्ति की तरह बूढ़ों की संख्या में भी अतिशय बढ़ोत्तरी हो रही है। एक अनुमान के अनुसार इस सदी के अन्त तक तीन चौथाई जनसंख्या बूढ़ों की होगी। इसे चिकित्सा शास्त्री अपनी औषधियों का चमत्कार और अर्थशास्त्री सुविधा सम्वर्धन का प्रतिफल मानते हैं। पर वस्तुतः इसमें खुशी मनाने जैसा कोई कारण नहीं है। यह बढ़ती हुई विपत्ति का चिन्ह है।

आहार-विहार में उत्तेजनाओं की भरमार होने से कामुकता भड़कती है। इस भड़काव में अश्लील साहित्य, कामुक फिल्मों का उत्तेजनात्मक वातावरण बनाने में भी असाधारण योगदान मिलता है। फलतः अल्पायु में ही प्रजनन महत्वाकाँक्षा उभर पड़ती है। नर-नारी के बीच रहने वाला एक झीना अन्तर चिरकाल से चला आया है। इसके फलस्वरूप इस प्रसंग में थोड़ी रोकथाम भी थी। पर अब उस प्रकार का प्रतिबन्ध उठ जाने से नर-नारी का कार्यक्षेत्र घुल-मिल गया है। सहशिक्षा से लेकर दफ्तरों में साथ काम करने तक की परिपाटी ने उन प्रतिबन्धों को उठा लिया है जो नर-नारी के सहचरत्व में अब तक बाधक होते रहे हैं। उस नैतिकता की भी एक प्रकार से समाप्ति हो गई जो नर-नारी के बीच पवित्रता बनाये रखने वाला पूज्यभाव रखती थी। अब पशु परम्परा का मनुष्यों में भी प्रचलन बढ़ा है। भगिनी, पुत्री, माता और पत्नी का अन्तर पशु वर्ग में नहीं होता। मनुष्य भी अब प्रकृति अनुगमन की दुहाई देकर उसी मार्ग पर चलने लगा है। वह लज्जा और संकोचशीलता अब उठती जा रही है जो इन वर्गों को विशेषतया एक दूसरे से पृथक रखती थी। अब बचपन के बाद सीधे यौवन आने लगा है। किशोरावस्था में बे-हिसाब कटौती हुई है। अल्पायु में ही किशोर अब माता-पिता बन जाते हैं और जो व्यवस्था प्रजनन संख्या को रोकती थी, वह किशोर प्रजनन के रूप में नये सृजन का आधार बनती जा रही है। अल्पायु में उभरी हुई कामुकता, गर्भपात, कृत्रिम निग्रह के रूप में स्वास्थ्य पर घातक असर डालती है। विशेषतया लड़कियाँ तो इस दबाव में बुरी तरह पिस जाती हैं। पढ़ने में मन नहीं लगता। गृहस्थी का अरुचिकर काम सम्भालना पड़ता है। बच्चे की उपेक्षा, नारी को सुलभ वात्सल्य नहीं करने देता। कृत्रिम साज-सज्जा भी जिनकी विवशता है अन्यथा वे रूपवती कैसे लगे और पुरुष वर्ग में अपना आकर्षण कैसे स्थिर रहे, इस कुचक्र में पाश्चात्य जगत की एवं आधुनिकता की शिकार अपने देश की नारियाँ बुरी तरह पिसती हैं और वे किसी प्रकार बाहरी साज-सज्जा बनाये रहकर भी भीतर से खोखली होती जाती हैं।

पुरुष को उपार्जन के लिए श्रम तो करना ही पड़ता है। पाश्चात्य देशों में और कितनी ही बुराइयाँ क्यों न हों, आलस्य नहीं है। पूरा वेतन प्राप्त करने के बदले उन्हें पूरा श्रम भी करना पड़ता है। इस थकान को वे शराब सिगरेट से पूरा करते हैं। नशे से थकान तो कुछ हलकी होती है पर नींद लाने का काम उतने भर से नहीं होता, इसके लिए नींद की गोलियाँ का आश्रय अलग से लेना पड़ता है।

इतनी वस्तुएँ मिलकर उनकी जीवनी शक्ति का सफाया करती जाती हैं। यों वंश परम्परा के कारण शरीरों की बनावट भारी भरकम बनी रहती है।

आज पूरे समुदाय में विनोद, आनन्द का माध्यम कामुकता ही रह गया है। मानसिक क्षेत्र में उसे उत्तेजित करने और शारीरिक क्षेत्र में जीवन रस को निचोड़ने की दुहरी मार से शरीर इस योग्य नहीं रहता कि उचित वेतन मिलने के लिए जितना श्रम आवश्यक है उतना कर सके। ऐसी दशा में उनकी गणना वयोवृद्धों में होने लगती है। वयोवृद्ध होने का अर्थ है- “जवानी में पाली हुई कुटैवों को पूरा करने के लिए प्रचुर परिणाम में सामर्थ्य व धन उपलब्ध न कर सकना।” बुढ़ापे के साथ यह एक नई व्यथा और सम्मिलित हो जाती है।

जिनने अपने शरीर को असंयम से खोखला और विषाक्त औषधियों से गीली लकड़ी जैसा बना लिया है वे धुंआ तो बहुत देर देते रहते हैं पर न जलने की स्थिति में होते हैं, न बुझने की। जिनने जवानी में असंयम और दुर्व्यसनों से अपने को जीर्ण-शीर्ण बना लिया है वे नशे की तरह बीमारियों के भी अभ्यस्त हो जाते हैं। न वे जल्दी मरते हैं ने अच्छे होते हैं। धुंआ देने वाली लकड़ी की तरह अपना अस्तित्व भर देर तक बनाये रहते हैं।

पूर्वार्त्त बुढ़ापे में एक अच्छाई यह है कि वे आयु को भगवान की देन मानते हैं। वृद्धावस्था को वे सन्तोषपूर्ण काट लेते हैं। अपने जैसे अन्य साथियों से मेल मिलाप रखते हुए बुढ़ापे में सन्तोषपूर्वक रहने की बात स्वभाव में सहज ही उतार लेते हैं। अच्छा परलोक प्राप्त करने की आशा में भजन-पूजन, तीर्थ यात्रा आदि में समय काट लेते हैं। साधु-सन्तों का दरवाजा ऐसे ही खाली समय वाले लोगों के साथ बेतुकी बातें करने के लिए खाली रहता है। नाती-पोते, परपोते आदि के हाथों लकड़ी मिल जाने पर स्वर्ग सद्गति की आशा करते हैं। इन सब बातों को लेकर बढ़ती आधुनिकता व टूटते परिवारों के बावजूद पूर्व के वृद्धों का जीवन अपेक्षाकृत अधिक अभाव ग्रस्त होते हुए भी चैन पूर्वक बीतता है। वे अपने यत्किंचित् पूजा पाठ या देवी देवताओं की सहायता से स्वर्ग सद्गति की आशा अपेक्षा करते हैं। मन हलका रहने के कारण मृत्यु के समय व्यथा वेदना भी कम होती है।

पाश्चात्य जीवन की स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। उन्हें भविष्य नहीं, भूत याद आता है। भूतकाल में जो विलासिता-कामुकता व्यवहार में लाते रहे, उसकी स्मृतियाँ उन्हें बहुत बेचैन करती हैं। धन और यौवन के अभाव में भूतकालीन विलासिता की वन्दना भर कर सकते हैं। व्यवहार में परिणत करने की कोई स्थिति “ओल्डमेन्स होम” में रहते हुए बनती नहीं।

पाश्चात्य मरणोत्तर जीवन बहुत लम्बा होता है। धारण यह है कि प्रलय के बाद नया जन्म मिलता है, तब तक कब्र में जीवन की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी यह लम्बे समय की कष्टसाध्य प्रतीक्षा की चिन्ता ही निराशा उत्पन्न करती है। संयुक्त परिवार प्रथा न होने के कारण अंश-वंश के कितने ही सदस्य होते हुए भी यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे लोग कम से कम मन बहलाने के लिए ही सही, कभी-कभी, पर्व पर ही सही साथ हो लिया करेंगे। उठती आयु वालों को अपनी समान आयु के सहचर चाहिए। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच इतनी बढ़ी खाई पैदा हो चुकी है कि उनका साथ-साथ रहना तो दूर, यदा-कदा मिलना-जुलना भी दुर्लभ होता है। ऐसी दशा में उन्हें सर्वथा नीरस और निराश जीवन जीना पड़ता है। यों वयोवृद्धों को सरकारी पेन्शन मिल जाती है, पर उनसे निर्वाह भर ही कठिनाई से पूरा हो पाता है। साथी सहचर कोई होता नहीं। होता है तो वे सभी मिल-जुलकर अपने भूतकाल के साथ वर्तमान की तुलना करते हुए खिन्न निराश और वर्तमान स्थिति के प्रति असन्तोष व्यक्त करते ही पाये जाते हैं।

वृद्धों की आयु तो भारत में भी बढ़ी है। पर वे बाल-बच्चों के साथ खेलने-खिलाने में अपने बीते बचपन को वापस लौटा लेते हैं। साथ ही भजन और देवी देवताओं की कृपा से परलोक में सद्गति के सपने भी देखते हैं। इस प्रकार पूर्वात्य वृद्धजनों का बुढ़ापा अपेक्षाकृत अधिक शक्ति से बीत जाता है। हर कोई वानप्रस्थ लेकर समाजसेवी बना जाएगा। यह कल्पना तो नहीं करनी चाहिए। फिर भी अभावों के बावजूद पूर्व के देशों के वृद्धों की आयुष्य का उत्तरार्ध पश्चिम की तुलना में अधिक शान्तिदायक है। फिर भी बुढ़ापा एक समस्या तो है ही।


सत्याग्रह की योजना (kahani)

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्वाभिमान रक्षा के लिए गान्धी जी ने सत्याग्रह की योजना बनाई और पता लगाया कि इस कार्य में सहयोग देने के लिए सच्चे सत्याग्रही कितने हैं। ऐसे सिर्फ 40 गिने गये, शेष सहानुभूति तो दिखाते थे पर झंझट में पड़ने को तैयार न थे।

गाँधी जी ने कहा- यदि सच्चे 40 साथी मौजूद हैं तो सत्याग्रह चलेगा और सफल होगा। हुआ भी वैसा ही। सच्चे आदर्शवादी दृढ़ निश्चयी थोड़े से भी हों तो बहुत काम हो सकता है।


यह सब कैसे सम्भव हुआ?

यह विचित्र घटना अठारहवीं सदी के आरम्भ की है। उन दिनों स्पेन और फ्राँस के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। 5000 स्पेनी सैनिकों का नेतृत्व कर थे कमाण्डर ली. जोर्नबाव। सैनिक दो तीन टुकड़ियों में बँटकर चल रहे थे। एकाएक लगभग 1500 सैनिकों की टुकड़ी देखते ही देखते लुप्त हो गई। इस घटना के घटने में कुछ सेकेंड लगे होंगे। कमाण्डर ली. जोर्नबाव को इसकी सूचना मिली। उक्त स्थान को खतरनाक घोषित करते हुए जोर्नबाव ने शीघ्राति-शीघ्र पर करने के लिए सैनिकों को आदेश दिया। सैनिकों को ढूंढ़ने के लिए विशेषज्ञों की एक टोली भेजी गई जो समीपवर्ती स्थानों से पूर्णतया परिचित थी। ढूँढ़-खोज का कार्य कई दिन तक चलता रहा, पर उनका कोई सुराग न मिल सका। इस घटना का विवरण पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ वन्डरफुल इवेन्ट्स” में मिलता है।

इसी से मिलती-जुलती एक घटना सन् 1856 में प्रशिया में घटी। 650 फ्रांसीसी सैनिकों का एक ग्रुप निकटवर्ती जर्मन चौकी पर हमला करने के लिए बढ़ रहा था। सभी सैनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे। अचानक हवा का हल्का बवण्डर आया और देखते ही देखते 645 सैनिक हवा में विलुप्त हो गये। बचे हुए पाँच सैनिकों के लिए यह घटना अचम्भित कर देने वाली थी। अब शेष सैनिकों ने उस स्थान की एक-एक इंच भूमि देख डाली, पर उनका कोई पता न लग सका। सेना की दूसरी टुकड़ी को जाकर इन पाँचों ने घटना की सूचना दी। महीनों खोज बीन चलती रही, पर उन सैनिकों को कोई चिन्ह तक नहीं मिल सका।

सन् 1939 में चीन और जापान के बीच युद्ध चल रहा था। चीनी सेना की एक टुकड़ी जिसमें 3000 सैनिक थे, का पड़ाव नानकिंग नामक स्थान पर पड़ा था। टुकड़ी का संपर्क सूत्र केन्द्र से निरन्तर बना हुआ था। एक दिन प्रातः अचानक केन्द्र से संचार संपर्क टूट गया। केन्द्रीय सैनिक कमाण्डर ने अविलम्ब उक्त टुकड़ी के सैनिकों की खोज आरम्भ कर दी। पड़ाव के स्थान पर सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र एवं खाद्य-सामग्री तो विद्यमान थे, पर वहाँ न तो किसी प्रकार के युद्ध का चिन्ह मिला और न ही सैनिकों के अवशेष। खोजी कुत्ते उक्त स्थान पर जाकर भौंकते रहे। वे वहाँ से आगे बढ़ने का नाम नहीं लेते थे। दो फर्लांग दूरी पर दो सैनिक सुरक्षा पहरे पर नियुक्त थे, मात्र वे ही बच सके। इन दोनों सैनिकों ने किसी प्रकार के बाहरी आक्रमण होने अथवा सैनिकों के वहाँ से भाग जाने की सम्भावना से इनकार कर दिया।

व्यक्तियों के अचानक लुप्त हो जाने की घटनाएँ नई नहीं हैं। अभी पिछले दिनों जून 1979 में लन्दन की श्रीमती क्रिस्टीन जान्सटन नामक महिला ने वहाँ के न्यायालय में सम्बन्ध-विच्छेद का एक विचित्र मुकदमा दायर किया। उक्त मुकदमे का आधार रोचक किन्तु आश्चर्यजनक था। त्याग पत्र में उल्लेख था कि उसके पति श्री एलन हवा में गायब हो गये, उस कारण वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद की अनुमति दी जाय। घटना इस प्रकार बताई जाती है कि श्रीमती क्रिस्टीन जान्सटन एवं उनके पति श्री एलन सन् 1975 के गर्मियों के अवकाश में उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर गये। दोनों पति-पत्नी रूसी सीमा से लगे लैपलैण्ड में स्थित एक गिरजा घर के निकट से होकर गुजर रहे थे। शीतल वायु के झोंकों का आनन्द उठाते हुए दोनों आगे बढ़ रहे थे। पत्नी कुछ कदम आगे बढ़ गई। पीछे मुड़कर देखा तो मि. एलन का कहीं पता न था। इस घटना को घटित होने में मात्र कुछ सेकेंड लगे होंगे। श्रीमती क्रिस्टीन ने ढूँढ़ने के असफल प्रयासों के बाद स्थानीय लोगों से मदद माँगी। ‘फिनिश’ जाति के लोगों ने खोजी कुत्तों की सहायता से एलन के खोजने का अथक प्रयास किया, पर कुत्ते उस मोड़ पर जाकर रुक जाते थे जहाँ से ‘एलन’ गायब हुए थे। रूसी सेना का कैम्प निकट होने से सेना विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया गया। पर अब तक इस रहस्य का उद्घाटन न हो सका कि एलन का क्या हुआ? इन तथ्यों पर अवलोकन करने के बाद, उनके बर्फ में दबने की सम्भावना के भी निवारण के बाद लन्दन की अदालत ने मि. एलन को “लापता” घोषित करते हुए श्रीमती क्रिस्टन के पक्ष में फैसला दिया। उन्होंने पुनर्विवाह कर लिया। मि. एलन कहाँ गए? यह अब तक पता नहीं चल पाया।

पूर्वार्त्त दर्शन में एक व्यक्ति के अन्तर्ध्यान होकर कहीं और, किसी और काया में प्रकट होने के प्रसंग विवेचन सहित मिलते हैं। ऐसी ही परकाया प्रवेश की अनेकों पाश्चात्य जगत में घटी घटनाओं का उल्लेख बीसवीं सदी में “अचेतन मनोविज्ञान की खोज” नामक पुस्तक में किया गया है। एक प्रमुख घटना इस प्रकार है-

रोड्स नगर के एक नागरिक ऐसेलबर्न बैंक से दस हजार का चैक भुनाकर निकले और सहसा गायब हो गये। सैकड़ों मील दूर जाकर वहाँ चीनी का व्यापार करने लगे। अपना नाम उन्होंने एलेक्स ब्राउन रख लिया। उसके पूर्व उन्होंने कभी चीनी का व्यापार नहीं किया था। दो माह बाद स्वप्न टूटा और पुनः वे अपने पुराने स्थान पर पहुँचे। परामनोवैज्ञानिकों ने घटना का अध्ययन करने के उपरान्त बताया कि ब्राउन नाम का एक दूसरा चीनी व्यापारी उस नगर में रहता था जिसकी मृत्यु कुछ ही दिनों पूर्व हुई थी। उसी की आत्मा उन दो महीनों ऐसेलवर्न पर सवार रही।

सेन्टपीटर्स वर्ग से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “वीकली मेडिकल जनरल” में छपी दूसरी घटना का वर्णन इस तरह है-

22 सितम्बर 1874 को रूस के यूराल पर्वत स्थित नगर औरेनवर्ग का एक धनी यहूदी बीमार पड़ा। डाक्टरों ने सन्निपात बताया। यहूदी इब्राहिम चारको ठीक तो हो गया पर उसका व्यवहार अब पहले जैसा न था। अब वह ऐसी भाषा बोलता एवं लिखता था जो किसी की समझ में न आती। भाषा विशेषज्ञों से संपर्क साधा गया तो उन्होंने बताया कि यह भाषा लैटिन थी, जिसकी जानकारी इब्राहिम को पहले नहीं थी। अधिक पूछने पर उसने बताया कि उसका नाम इब्राहिम चारको नहीं इब्राहिम उरहम है तथा घर ब्रिटिश कोलम्बिया में है।

संयोग ही था कि ठीक उसी दिन उसी समय ब्रिटिश कोलम्बिया में इब्राहिम उरहम नामक व्यक्ति बीमार पड़ा। बीमारी से उठते ही वह यहूदी भाषा बोलने लगा तथा अपना नाम इब्राहिम चारको बतलाता था। अपना घर उसने औरेनबर्ग बताया।

शक्ल सूरत दोनों की एक जैसी थी। परामनोवैज्ञानिकों ने उसे आत्म सत्ता का प्रत्यावर्तन माना। यह कैसे हुआ? इसका कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण किसी परामनोवैज्ञानिक के पास नहीं है। शंकराचार्य के परकाया प्रवेश एवं देवदत्त के पाटलिपुत्र के राजा की काया में प्रवेश के घटनाक्रम भी इसी प्रकार के हैं। पूर्वार्त्त दर्शन इनकी समुचित व्याख्या भी करता है।

कभी-कभी कुछ व्यक्तियों को दूर घट रहे घटनाक्रमों की अनुभूति पूर्व से ही होने लगती है। ये प्रसंग भी ऐसे हैं जो विज्ञान की समझ की परिधि से बाहर के हैं। यद्यपि परामनोवैज्ञानिक के लिए ये प्रसंग सामान्य माने जाते हैं।

गेटे ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि एक बार वह अपने निवास स्थान वाइमार में थे तो उन्हें अचानक तीव्र अनुभूति हुई कि वहाँ से हजारों मील दूर सिसली में एक भयंकर भूकम्प आया है। गेटे ने इस अनुभूति के सम्बन्ध में अपने मित्रों को बताया लेकिन किसी ने गेटे की इस बात पर विश्वास नहीं किया कि बिना किसी आधार के, बिना किसी सूत्र के इतनी दूर की बात इस प्रकार कैसे मालूम हो सकती है? लेकिन कुछ दिन बाद आये समाचारों से पता चला कि ठीक उसी समय सिसली में वैसा ही भूकम्प आया था जैसा कि गेटे ने अपने मित्रों को बताया था।

पोलैंड की एक लड़की कुमारी मेरीना का प्रेमी स्टानी स्लोनिस जिसके साथ उसकी सगाई हो चुकी थी, प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों में सेना में भरती होकर लड़ाई के मैदान में चला गया। युद्ध समाप्त होने के बाद अक्टूबर 1918 से वह लगभग नियमित रूप से काफी समय तक मसजरेंक (पोलैण्ड) के अधिकारियों का दरवाजा खटखटाती और अपने युवा मित्र के जीवित अथवा मृत होने की जानकारी पाने का आग्रह अनुरोध करती रही। मित्र का पता ठिकाना बताने के लिए कहने पर वह अपने एक स्वप्न का जिक्र करती और कहती कि उसका साथी एक अन्धेरी सुरंग में रास्ता ढूँढ़ रहा है। घोर अंधकार है, अन्धकार में रास्ता टटोलने के लिए उसके साथी ने मोमबत्ती जलाई, इसके बाद चारों ओर बिखरे पड़े मलबे को हटाने की कोशिश की। मलबा हटाते-हटाते वह थक गया। उसकी शक्ति जवाब दे गई। हार कर घुटनों के बल झुक गया और सिसकने लगा। मैरीना ने ठीक यही स्वप्न बार-बार देखा। परन्तु लोग उसकी बातों को सुनते-सुनते न केवल ऊब गए थे, बल्कि उसे पागल तक समझने लगे थे। कुछ समय उपरान्त उसके स्वप्न में थोड़ा सा परिवर्तन आया। अब वह स्पष्ट देखती है कि इंग्लैंड के मध्य प्रान्त में एक पहाड़ी है, उस पहाड़ी की चोटी के पास एक दुर्ग है। उस दुर्ग का बुर्ज टूटा हुआ है। वह टूटे हुए बुर्ज के मलबे तक पहुँचती है। वहाँ जाकर खड़ी होती है तो मलबे में से उसे अपने खोये हुए मित्र की जानी पहचानी आवाज सुनाई देती है, जो मदद के लिए पुकार रहा है। यह आवाज उन पत्थरों के नीचे से आ रही है। मैरीना ने मलबा हटाने की कोशिश की, पर मलबा था कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेता था। मलबा हटाते-हटाते वह बुरी तरह थक जाती है और निराश होकर हाँफती हुई वापस लौटती है। इसी निराश और हताशा के क्षणों में उसकी नींद टूट जाती है। अब यही सपना उसे बार-बार आता। मैरीना ने इन चिन्हों के आधार पर खोज करने के लिए अनेकों मित्र-परिचित व सम्बन्धियों से सहायता की याचना की। लेकिन स्वप्न में दिखे तथ्यों को यथार्थ सत्य मानने को कोई राजी नहीं हुआ। न ही किसी ने सहायता का आश्वासन तक दिया।

फिर भी मैरीना ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी अन्तःप्रेरणा को ही मार्गदर्शक माना और एकाकी अपने प्रिय मित्र की तलाश में निकल पड़ी। भूख-प्यास व भटकन की परवाह किए बिना, सड़कों के किनारे रात काटते हुए वह किसी तरह उस दुर्ग के पास पहुँचने में सफल हो गई। स्थानीय लोगों से अपनी बात कहने पर कुछ लोग सहायता करने को भी आगे बढ़ आये। सबके सम्मिलित प्रयास से दुर्ग का मलबा हटा तो भीतर के सुरंग का रास्ता स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा। उस संकरे मार्ग से अपने मित्र को जीवित देखकर मैरीना हर्षातिरेक से विह्वल हो उठी। उसने अपने हाथों से चट्टान तोड़कर उसे बाहर निकाल लिया। उसका चेहरा पीला और सख्त पड़ गया था। इतना लम्बा समय उसने अपने पास इकट्ठे रखे हुए पनीर और शराब पर बिताया था। प्रकाश के लिए उसके पास मोमबत्तियाँ थीं उन्हीं का उपयोग किया था। उसका कहना था कि कैद रहने की स्थिति में वह अपनी प्रियतमा का ध्यान करता था व मन ही मन कहता था कि “तुम मुझे इस संकट से अवश्य उबारोगी।”

परोक्ष जगत के ये क्रिया कलाप जितने विचित्र हैं, उतने ही विलक्षण हैं प्रकृति एवं मन का यह समष्टिगत संसार। इनके रहस्यों को न कोई अभी तक समझ पाया है न आगे भी समझ पायेगा। “असम्भव” शब्द विज्ञान की डिक्शनरी में नहीं है, पर उपरोक्त घटनाक्रमों का क्या तर्क सम्मत समाधान है? इसका कोई उत्तर किसी के पास नहीं।


सदा के लिए वह कुप्रथा बन्द (kahani)

उन दिनों बिहार में अंग्रेजों के विरुद्ध किसान आन्दोलन चल रहा था। गान्धी जी उसका नेतृत्व कर रहे थे। गाँव-गाँव घूमना होता था। एक गाँव पहुँचे तो बकरे को आगे करके भीड़ नाचती कूदती ढोल बजाती जा रही थी। उसे देवी के आगे बलि दिया जाना था।

गान्धी जी ने उस अनीति से उन्हें रोका तो गाँधी जी देवी के सामने बैठ गये और बोले बकरे की जगह मनुष्य का माँस देवी को और भी अच्छा लगेगा। लो मेरी बलि चढ़ा दो। भीड़ के हौसले पस्त हो गये। बकरा लौटा लिया और सदा के लिए वह कुप्रथा बन्द हो गई।


धर्मतंत्र के परिशोधन मार्टिन लूथर

मध्य युग में जन-मानस का रुझान आदर्शवादिता की ओर न होकर भौतिकवादी दर्शन की तरफ खिंचता चला जा रहा था। एक तरफ तो अत्याचार और अनाचार की लहर निरन्तर फैल रही थी तो दूसरी ओर पुरोहित वर्ग ने पाप विमोचन की एक नयी नीति को अपना रखा था। धर्म के पुरोहितों ने जनता का जमकर शोषण कर स्वर्ग के सपने दिखाकर टिकट देना आरम्भ कर दिया था।

मार्टिन लूथर ने इसी प्रचलन के प्रतिरोध में अपनी आवाज उठाई कि मात्र आदर्शवादी सिद्धाँतों को ही इस भूलोक पर मान्यता दी जाय। अपने क्रान्तिकारी प्रतिपादनों का प्रस्तुतीकरण करने से पूर्व लूथर ने सर्वप्रथम विटनवर्ग में अवस्थित कैसल चर्च में उन तथ्यों का गहन अध्ययन किया जो ईसाई धर्म से संबंध रखते थे। धर्मतन्त्र की वास्तविकता को प्रकट करते हुए उन्होंने 95 विषयों पर शोध प्रबन्धों को लिखा। विटनवर्ग चर्च में लूथर ने ‘आल सेन्टस चर्च’ की मान्यताओं को धर्मतन्त्र में समाविष्ट करते हुए परिशोधन का अभियान छेड़ा। लूथर की ये विचारधारायें प्रायोगिक स्तर की थीं। पोप के विशेषाधिकारों की ओर तो उन्होंने तुरन्त उँगली नहीं उठायी लेकिन धर्म में संव्याप्त विकृत मान्यताओं का खण्डन अवश्य किया। ईसाई धर्म की उन मान्यताओं की भी अवहेलना की जो इस बात पर दबाव देती थीं कि स्वर्ग उसी व्यक्ति को मिलेगा जिसने अपने को क्रूस पर लटकाया है।

जर्मन राष्ट्र की कुलीनता के संदर्भ में उन्हें सम्बोधित करते हुए लूथर ने बताया कि सम्राटों एवं शासनाध्यक्षों को आतंकवादी, दमनकारी नीतियों के स्थान पर मानव-कल्याण की भावनाओं से ओत-प्रोत नीति बनाना चाहिए। इसी के परिणाम स्वरूप रोम और जर्मनी में धर्मतन्त्र के सही स्वरूप की पुनः स्थापना संभव हो सकी। सन् 1520 में चार्ल्स पंचम के साम्राज्य काल में सर्वप्रथम मैनीफैस्टो “ऐड्रेस टू दी क्रिश्चियन नोबिलिटी आफ दी जर्मन नेशन” में उस धर्म परायण प्रभु सत्ता का उन्होंने खण्डन किया, जो मनुष्य को बजाय मुक्ति के उलटा बंधन में बाँधती थी।

प्रतिकूलताओं के बीच काम करने वाले इस समाज सुधारक मार्टिन लूथर ने कभी चिंता नहीं की कि स्वार्थी धर्माचार्य रुष्ट होकर उसका कुछ बिगाड़ भी सकते हैं। जनता के राजनीतिक एवं सामाजिक विद्रोह के समय उन्होंने ‘सैक्सौनी’ के प्रशासक को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने गर्जना की कि कृषकों, दलितों के ऊपर अमानवीय, अनैतिक एवं अत्याचारपूर्ण किसी भी सिद्धान्त का सरकारी तौर पर न थोपा जाय वरन् ईश्वरीय सिद्धान्तों को ही उनके ऊपर लागू होने दें। उनका कहना था कि “हमारा प्रशासक तो एक मात्र परमात्मा ही है। हमें मात्र उससे डरना चाहिए सामंतशाही व पोपशाही से नहीं। सन् 1524 में राजा महाराजाओं में क्रोध की ज्वाला भभक उठी और लूथर के अन्य सहयोगियों को जो आन्दोलन में उनके साथी थे, देश से बाहर निकाल दिया गया, लेकिन लूथर फिर भी नहीं घबराये। पाखण्डवादी पुरोहितों के प्रति उन्होंने अपना संघर्ष अन्त तक चालू रखा।

इसी का परिणाम था कि धनाध्यक्षों एवं धर्माचार्यों की मिली भगत से जन साधारण के हो रहे शोषण के विरुद्ध एक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ जिसने एक सुधारवादी समुदाय को जन्म दिया। यूरोप व पाश्चात्य जगत के कई देशों की प्रगति जो आज दृष्टिगोचर होती है, का मूल श्रेय इस सन्त मार्टिन लूथर को जाता है जिसने अपने समय में सत्ता व आतंक के खिलाफ एकाकी क्रान्तिकारी मोर्चा लड़ा था।


Quotation

जो तलवार पर ही भरोसा करता है ईश्वर उसका भरोसा नहीं करता।


चौथी क्रान्ति सर्वनाश नहीं ला रही

पिछली तीन शताब्दियों में तीन क्रान्तियाँ हो चुकीं, अब चौथी की तैयारी है। यह सिलसिला क्रमशः इसी प्रकार से चलता नहीं रहेगा, वरन् इन उथल-पुथलों को विराम लेकर किसी निर्णयात्मक केन्द्र पर पहुँचना पड़ेगा।

पहली श्रमिक क्रान्ति थी जिसे सामाजिक क्रान्ति भी कह सकते हैं। जिसमें दास-दासी सेवक और स्वामी, राजा और प्रजा के मध्य चलते रहे जमीन आसमान जैसे अन्तरों को समतल पर लाया गया। इसके लिए कोई संगठित सार्वभौम क्रान्ति नहीं हुई। जहाँ-तहाँ ज्वालामुखी फूटे वहाँ उन्होंने समय की गति से सबको अवगत कराया। इसमें मनुष्य को, उसके मौलिक अधिकारों की मान्यता मिली। साम्राज्यवाद का शिकंजा ढीला हुआ और वह उपनिवेशवाद में बदल गया। इसे राजनैतिक क्रान्तियों का युग भी कह सकते हैं जिसने जनतन्त्रों की नींव रखी।

दूसरी क्रान्ति को वैज्ञानिक क्रान्ति कह सकते हैं। यह आविष्कारों का युग रहा। इसमें सुविधा-साधनों का सम्वर्धन किया गया और व्यवसायी उनके आधार पर बड़े उद्योग खड़े करने लगे। इसे पूँजीवाद का युग भी कह सकते हैं। इसमें धनी वर्ग के हाथों अपार शक्ति आई। उसने इतना उत्पादन बढ़ाया, जिसने खपाने की- आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं वरन् खपाने की समस्या भी खड़ी कर दी। परिवहन के लिए रेल और जलयान भी आशातीत संख्या में बढ़े ताकि सुविधा साधनों को दूसरे देशों तक ही नहीं, छोटे देहातों तक भी पहुँचाया जा सके। यह पूँजीवादी जमाना रहा।

तीसरी क्रान्ति प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के निमित्त राजनेताओं की आपा-धापी और प्रतिस्पर्धा चरम सीमा तक पहुँची। पिछले दो युद्ध उसी की देन हैं। उसने वायुयानों से लेकर डायनामाइट तक के अनेकों उत्पादन किये। बम आयुध उसी की देन है। यह मण्डियों को कब्जे में करने का प्रच्छन्न साम्राज्यवाद था। यही माहौल विश्व युद्धों के रुक जाने पर भी अभी तक बना हुआ है। अब तक 134 के करीब क्षेत्रीय युद्ध हो चुके हैं। विज्ञान की प्रौढ़ता के साथ-साथ उसका लोभ संवरण शासक न कर सके और वह प्रगति अन्तरिक्षीय उपग्रहों, मिसाइलों और अणु आयुधों तक समय को घसीट लाया।

इसी बीच एक बड़ी घटना जापान पर अणु बम गिराने की थी। उसका मतलब था “दबो या मरो” पर उसका भी एकाधिकार न रहा। रूस प्रतिद्वन्द्वी के रूप में उभरकर आया। समुन्नत जापान रूस के साथ मिलकर शक्ति सन्तुलन न बना ले, इसी प्रयोजन के लिए जापान को आतंकित किया गया था। इसे आतंकवाद के महादैत्य का जन्म कह सकते हैं, जिसके बाल-बच्चे छापा मारों के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय बेरुत से लेकर जापान, अमेरिकी तक दे रहे हैं।

चौथी क्रान्ति क्या अणु आयुधों की वर्षा से होगी? क्या उसमें अन्तरिक्ष युद्ध छिड़ेगा और धरती का वातावरण मनुष्यों और प्राणियों रहने लायक न रह जायेगा?

इस संदर्भ में अनेक दृष्टिकोणों और तथ्यों को सामने रखकर विश्वदर्शी महा-मनीषी ऑरवेल एवं हक्सले कामा ने सुविस्तृत विवेचन किया है। उनकी पुस्तक है “व्रेव न्यू वर्ल्ड”। इसी स्तर के दो ग्रन्थ और पिछले दिनों सामने आये हैं एलविन टाफलन का “दि थर्ड वेव” एवं फ्रिटजॉफ काप्ना का “द टर्निंग पाइण्ट”। इनमें बताया गया है कि चौथी क्रान्ति अति निकट है। वह आरम्भ भी हो गई है और अपना प्रभाव अगले दिनों चमत्कारी ढंग से प्रकट करने लगेगी।

उपरोक्त तथ्यान्वेषी और क्रांतिदर्शी कहते हैं कि मनुष्य की मूर्खता में कमी नहीं पर वह इतनी अधिक कभी भी नहीं बढ़ सकेगी कि विपक्षी की जीतने के लालच में अपना भी सर्वनाश कर बैठे। जो माहौल कभी जापान पर बम गिराकर उत्पन्न किया गया था वही अब नये रूप में “स्टार वार” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। धमकी बरकरार है कि ‘दबो या मरो’। किन्तु स्पष्ट है कि प्रतिपक्ष भी समय रहते काट निकाल लेगा और स्थिति वही बनेगी जिसमें अणु आयुध बनते और जमा होते रहें पर उनके प्रयोग का अवसर नहीं आए। जापान ने सिद्ध कर दिया कि एकाधिपत्य का प्रयास जो प्रथम बार हुआ वह अन्तिम भी था। अब उसकी पुनरावृत्ति नहीं हो सकती। भले ही धमकी के साधन कितने ही बड़े एवं बहुसंख्या में बनते रहें।

चौथी क्रान्ति महाविनाश की दीखती भर है पर वह होगी नहीं। उसका स्थान समझदारी ग्रहण करेगी और नव सृजन की हवा चलेगी। यह सृजन कृत्य धीमी चाल से चल सकता है पर सर्वतोमुखी एवं सफल होकर रहेगा। यह समता का युग होगा। सम्पन्नता और प्रभुता का उन्माद समय रहते उतर जायेगा और प्रयास वे चलेंगे जिसमें विषमता ही नहीं विलगता भी अपना अस्तित्व गवाँ दे।

औसत आदमी सोचने लगा है कि अब समता और एकता की ओर बढ़ने से ही काम चलेगा। विषमता और विलगता से टकराव ही उत्पन्न होते रहेंगे और उनमें शक्ति का अपव्यय करने के अतिरिक्त और किसी प्रकार की उपलब्धि किसी के हाथ नहीं लगेगी।

यह चिन्तन हवा के साथ उड़ रहा है और वास्तविकता से जन-जन को अवगत कर रहा है। वह समय बहुत पीछे रह गया जब लोक चिन्तन का कोई महत्व न था। जब समर्थों की मनमानी चलती थी। अब लोक मानस अपने आप में एक शक्ति बनकर उभरा है और अपनी सामर्थ्य को इस सीमा तक विकसित परिपुष्ट कर रहा है कि आज के सामर्थ्यवानों को कल अपना सिर नीचे झुकाना पड़ेगा दुनिया में इतने साधन मौजूद हैं कि वर्तमान जन समुदाय का उससे भली-भाँति निर्वाह हो सके और सभी सुख पूर्वक जी सकें। महत्वाकांक्षाऐं अगले दिनों आपा-धापी में नहीं लगेंगी, वरन् उनकी दिशा धारा होगी- न्याय और विवेक का कार्यान्वयन। प्रकारान्तर में यही आदर्शवादिता है इसी के साथ मानवी गरिमा भी जुड़ी हुई है।

पुरुषार्थ भरे चिन्तन और प्रयास का ही परिणाम है कि आदिम युग से अब तक कछुए की चाल चलता हुआ वन्य मनुष्यों जैसा जीवन जिया जा रहा था, धरती पर थोड़े से साधन थे और थोड़े से मनुष्य, परन्तु अब इन शताब्दियों में यह वैभव विस्तार इतना बढ़ गया है , मानो आसमान से उतरा हो। क्या यह प्रगतिक्रम भविष्य में रुक जायेगा? क्या इस प्रगति क्रम की परिणति दुर्भाग्यपूर्ण होगी? क्या रुदन ही मनुष्य के भाग्य में बदा है?

प्रकृति के अन्तराल में से आश्वासन उभरता है कि आशंकाएं और सम्भावनाएं कुछ भी क्यों न हों, अन्ततः मनुष्य की समझदारी और दूरदर्शिता जीतेगी। साथ ही न्याय निष्ठा भी जीवित रहेगी। चौथी क्रान्ति सर्वनाश की विभीषिकाओं से भरी-पूरी दीखती भर है। पर यह बन्दर घुड़की मात्र है। हमें उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का स्वप्न देखना चाहिए और नव सृजन का ताना बाना बुनना चाहिए।


चन्द्रगुप्त के शासन काल में (kahani)

चन्द्रगुप्त के शासन काल में प्रजा बहुत सुखी थी। उनने कितने ही लोकोपयोगी काम कराये थे। पर सीमा से लगे क्षेत्र में हूण अक्सर आक्रमण करके लूटपाट करते रहते। इसका स्थाई हल सोचते-सोचते राजकुमार स्कंद गुप्त ने यह हल निकाला कि एक बार हूण देश पर करारा आक्रमण किया जाय ताकि वे भविष्य में वैसी हिम्मत न करें। ऐसा ही किया गया। चन्द्रगुप्त से आज्ञा लेकर राजकुमार एक लाख सेना लेकर हूणों पर आक्रमण किया। तदनन्तर हूणों के भारत पर आक्रमण सदा के लिए बन्द हो गये।


विशेष धारावाहिक -लेखमाला-सावित्री-सविता की ऊर्जा एवं आत्मा

गायत्री का युग्म है- यज्ञ और सावित्री का- सविता। गायत्री जप अनुष्ठान की पूर्ति पर यज्ञ की व्यवस्था करना आवश्यक माना गया है। सामान्य जप में भी यदि सम्भव हो तो तिल, घी, शक्कर और जो सुगन्धित पौष्टिक वनस्पतियाँ सम्भव हों उन्हें मिलाकर 24 आहुतियाँ तांबे के या मिट्टी के बने कुण्ड में दी जा सकती है। नित्य न बन पड़े तो महीने में एक दिन संक्राति के दिन अथवा पूर्णिमा को हवन कर लेना चाहिए।

अनुष्ठानों के अन्त में दोनों प्रकार के विधान हैं। एक प्रतिदिन का, दूसरा अन्तिम दिन पूर्णाहुति का। दोनों में से जिसमें सुविधा हो उस उपचार को अपना लेना चाहिए।

गायत्री व्यक्तिगत साधना है। उसमें “नः” शब्द बहुवचन परक आता तो है। तो भी यह “नः” (याने हम सब) शब्द निजी परिवार या निजी संपर्क क्षेत्र तक सीमित है। उस व्यक्तिगत साधना को एकान्त में, किसी शुद्ध वातावरण वाले स्थान में बैठकर करने का विधान है। निजी अनुष्ठान में सार्वजनिक सहयोग का निषेध है। इसे तो अपनी सामर्थ्य भर स्वयं ही करना चाहिए। हवन प्राचीन काल में जप का दशांश होता था। अब महंगाई की परिस्थितियों को देखते हुए शतांश की संगति बिठा दी गई है। शुद्ध गो घृत मिलना कठिन हो गया है। इसलिए जड़ी-बूटी पंचाँग के अलावा तिल, गुड़ और थोड़ा सा गौ दुग्ध किसी प्रकार मिल सके तो उतने से ही काम चला लेना चाहिए। चर्बी मिले वेजीटेबिल की अपेक्षा तो मात्र तिल का हवन कर लेना भी अच्छा है। चन्दन चूरा, देवदारू चूरा आदि मिल सके तो अभाव में उससे भी परम्परा की पूर्ति हो सकती है।

सावित्री का सविता सूर्य है। उसके लिए सूर्योपस्थान आवश्यक है। सूर्य के दर्शन तो प्रातःकाल स्वर्णिम आभा रहने तक ही हो सकते हैं। पीछे तेज धूप हो जाने पर दर्शन करने से आँखें खराब होती हैं। तब जल में सूर्य की परछाई देखकर उसके ध्यान में सविता के इष्ट की उपस्थिति मानी जा सकती है।

सावित्री सामूहिक है। जब अनेक व्यक्तियों को जप अनुष्ठान यज्ञ में सम्मिलित करके वह संकल्प पूरा किया जाता है, तब वह सावित्री बन जाती है। सूर्य को ‘सप्त ऋषि’ अर्थात् सात रंग की किरणों वाला और ‘सहस्रांशु’ सहस्र किरणों वाला कहा गया है। नवग्रहों का अधिपति होने से उसे नवधिपति भी कहते हैं। इस आधार पर कुण्डों की संख्या निर्धारित कर सामूहिक यज्ञ किया जा सकता है। सामूहिक अर्थात् सार्वजनिक, जिसमें अनेकों लोग सम्मिलित हों। अनेकों कुण्ड हों। अनेकों व्यक्ति सम्मिलित हों। जहाँ सार्वजनिक धन का उपयोग किया जाय, वह सविता यज्ञ है।

व्यक्तिगत जीवन के दोष-दुर्गुणों, संचित कुसंस्कारों का निवारण करने के लिए, व्यक्तिगत मेधा, प्रज्ञा प्रतिभा, श्रद्धा बढ़ाने के लिए वेदमाता गायत्री की उपासना की जाती है। इससे मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार परिष्कृत होता है। इसलिए उसे देव माता भी कहा गया है। सावित्री विश्वमाता है उसका प्रभाव व्यक्ति विशेष तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी पड़ता है। जनमानस का परिष्कार, लोककल्याण, वायुमण्डल की शुद्धि, वातावरण की परिष्कृति यह सब सावित्री शक्ति के प्रतिफल हैं। उसमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना सन्निहित है।

इन दिनों मनुष्य व्यक्तिगत कठिनाइयों से ही संत्रस्त है। व्यक्तिगत भ्रष्टता ही बढ़ी हुई है। व्यक्तिगत आकाँक्षाओं की ही प्रबलता है। इसलिए उस स्तर के लोगों को गायत्री उपासना करनी होती है। जिन साधकों को स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि शान्ति आदि निजी आकाँक्षा है उन्हें गायत्री साधना का अवलम्बन लेना ही उचित है।

जिनकी अहन्ता मिट गई, जो निस्पृह हो गये, जिनने भव-बंधन तोड़ डाले, उन जीवनमुक्तों का स्वार्थ विकसित होकर परमार्थ बन जाता है। उन्हें उसी की चिन्ता रहती है, वह ऋषि की वाणी बोलता है- “न मुझे राज्य चाहिए, न स्वर्ग, न मुक्ति। दुःखीजनों के दुःखों को दूर करने की ही एक मात्र कामना है। भगवान बुद्ध ने भी मरते समय यही कहा था कि “जब तक संसार का एक भी प्राणी बन्धन में बँधा है तब तक न मुझे स्वर्ग में जाना है न मुक्ति पानी है। मैं इन दुखियारों का दुःख दूर करने के लिए बार-बार जन्मता और मरता रहूँगा।” यही है सावित्री का तत्वज्ञान।

गायत्री और सावित्री का अन्तर समझने के लिए दीपक और सूर्य का उदाहरण ठीक पड़ता है। दीपक अपने घर में प्रकाश भर देता है। निजी काम-काज के लिए वह पर्याप्त भी है। उसे जलाना सुगम है। कोई बड़ा जोखिम भी नहीं है। तनिक-सी सावधानी से उसका उपयोग सदा सर्वदा होता रहता है। उसके प्रयोग की परम्परा पीढ़ियों से चली आ रही है। उसे आँख खोल कर देखा भी जा सकता है। त्राटक साधना में उस पर दृष्टि भी जमाई जाती है, पर इससे आँखों को कोई हानि नहीं होती।

सूर्य की बात बड़ी है। उसका प्रकाश सर्वत्र फैलता है। सौर-मण्डल के सभी ग्रह-उपग्रह उससे प्रकाशवान होते हैं। हमारे निकटवर्ती चन्द्रमा में अपना कोई प्रकाश नहीं वह मिट्टी का ढेला मात्र है, पर सूर्य का प्रकाश पड़ने से वह ऐसा चमकता है कि रात्रि की उसकी चाँदनी ही दिन जैसा काम कर देती है। अनय ग्रह-उपग्रहों के सम्बन्ध में भी यही बात है। सौर-मंडल का कोई पिंड अपने प्रकाश से नहीं चमकता, उन सभी को सूर्य की आभा ही प्रकाशित करती है। अपनी पृथ्वी भी अन्य ग्रहों से देखने पर ऐसी ही चमकदार दीखती होगी। सम्भव है वह ब्रह्मांड के अन्य नक्षत्रों पर खड़े होकर देखने पर एक प्रकाशवान तारे जैसी दीखती हो।

यहाँ यह ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि सूर्य ताप का मात्र 220 करोड़वाँ भाग पृथ्वी पर जीवधारियों के लिये जीने योग्य समुचित परिस्थितियाँ बनाये रखने हेतु सक्षम है। इतना ही मिलने की सृष्टा ने व्यवस्था भी बनायी है। दस करोड़ मील दूर अवस्थित सूर्य से प्रकाश ऊर्जा पृथ्वी पर सतत् आती व जीवों को प्राण चेतना से अनुप्राणित करती रहती है। इसमें न्यूनाधिक भी कमी आ जाए तो पृथ्वी पर प्रतिकूल परिस्थितियां उठ खड़ी होती हैं। सविता देवता की पृथ्वी पर जीवन योग्य वातावरण बनाये रखने के लिए कितनी आवश्यकता है, इसे वैज्ञानिक उदाहरणों से आसानी से समझा जा सकता है और फिर यह सूर्य तो मात्र हमारी पृथ्वी जिस सौर मण्डल की सदस्य है, उसका अधिपति है। ऐसे अगणित अरबों सूर्य परब्रह्म की इस विश्व व्यवस्था में सतत् ज्वलन्त बने रहकर ऊर्जा वितरण करते हैं। सविता से अर्थ परब्रह्म की इस समष्टिगत व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। इसे हमारे सौर-मण्डल तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए।

सूर्य की ऊर्जा जब गर्मी के दिनों में अधिक प्रखर एवं निकटवर्ती होती है तो उसकी तीव्र धूप में देर तक खड़ा होना मुश्किल हो जाता है। घासपात सूख जाते हैं। रेतीली धरती तवे जैसी जलने लगती है। पसीना छूटता है और बार-बार प्यास लगती है। बचने के लिए भागकर छाया का, पंखे का, कूलर का, आश्रय लेना पड़ता है। लू लगने, फुन्सियां उठने जैसी व्यथाऐं उठ खड़ी होती हैं। यह उसके तेजस्वी प्रताप का प्रतिफल है।

दूसरी ओर अनेकानेक लाभ भी हैं। प्राणियों में सक्रियता आती है। पौधे विकसित होते हैं। फलों का बाहुल्य होता है। उसी से बादल बनते और बरसते हैं। समुद्र के खारे जल को मेघ बनाकर मीठे जल में परिवर्तित करता है। ऐसे ही अनेक कारणों को देखते हुए उसे “जगत की आत्मा” कहा गया है। यदि उसका सन्तुलित प्रकाश पृथ्वी पर न आये तो फिर यह भी या तो बुध की तरह अग्नि पिण्ड बन जाय। या फिर प्लूटो, नेपचून की तरह सदा बर्फ से ढकी रहे और उनमें जीवन क विकास की कोई सम्भावना न रहे। पृथ्वी की अन्य ग्रह गोलकों की तुलना में जो सुन्दरता एवं सर्वांगीणता है वह सूर्य की सन्तुलित ऊर्जा के कारण ही बन पड़ी है।

दीपक सीमित है और सूर्य असीम। इस तथ्य को समझने के साथ ही यह भी समझा जा सकता है कि व्यक्ति एवं परिवार के लिए रात्रि के अन्धकारजन्य कठिनाइयों से निपटने के लिए दीपक ही जीवन प्राण है। उसी का उपयोग शक्य है। सूर्य को चाहे जब, चाहे जहाँ न्यौत बुलाना सम्भव नहीं है। वह अपने क्रम और नियम से ही आता चला जाता है, पर दीपक अपने हाथ की बात है। भले ही वह थोड़ा प्रकाश करे पर अपने प्रयास के अंतर्गत है। गायत्री को सर्वसुलभ, सर्वोपयोगी इसीलिए माना गया है कि उसका प्रयोग कोई भी कभी भी कर सकता है और उसकी व्यवस्था करने में भी ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता जो अपनी सामर्थ्य से बाहर हो।पर सूर्य के उपयोग के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। सूर्य चूल्हे बनाये गये हैं। पर वे भी रात्रि के समय और घने बादल कुहरे आदि की विपन्नता में काम नहीं करते। जबकि साधारण चूल्हे में आग एक माचिस भर के सहारे जलाई जा सकती है।

वस्तुतः सावित्री, सविता की ऊर्जा एवं आत्मा है। उसके प्रयोग से व्यापक क्षेत्र में विशाल और व्यापक कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। किन्तु उसका उपयोग सरल नहीं है। वह अत्यन्त कठिन भी है और जोखिम भरा भी। छोटे से आतिशी शीशे पर सूर्य किरणें एकत्रित करने भर से आग जल उठती है और उससे भयंकर अग्निकांड हो सकता है। बिखरी हुई किरणें भी यदि एकत्रित की जा सकें तो उससे पृथ्वी की सारी सम्पदा कुछ ही क्षणों में जल भुन कर नष्ट हो सकती है। उसकी निकटता और दूरी दोनों ही एक से एक बढ़कर जोखिम भरी हैं। पर जो साहसी उसका विवेकपूर्ण प्रयोग कर पाते हैं, वे उससे लाभ भी कम नहीं उठाते।

सूर्य की सप्तधा किरणों से संसार के सभी रोग दूर हो सकते हैं। सूर्य चिकित्सा विज्ञान का अभी आरम्भिक प्रयोग ही चल रहा है। रंगीन काँचों के सहारे उस रंग की किरणें शरीर के किसी रुग्ण अवयव पर विधानपूर्वक डाली जाय तो उसका आश्चर्यजनक प्रभाव होता है। रंगीन बोतलों में पानी भरके धूप में रखने क उपरान्त वह पानी ही औषधि बन जाता है और बाजार औषधियों की तुलना में कहीं अधिक काम करता है। क्रोमोपैथी के ऐसे वैज्ञानिक प्रयोग चल भी रहे हैं कि मात्र सूर्य किरणों से सभी रोगों की चिकित्सा की जाय। वह सरल भी रहेगी और सस्ती भी। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वर्तमान प्रचलित चिकित्सा प्रणालियों में से सभी को पीछे धकेल कर अगले दिनों सूर्य शक्ति के उपयोग से मनुष्य के शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों को दूर करने की सर्वांगपूर्ण चिकित्सा पद्धति काम में आने लगे। यह एक बड़ी समस्या है। रोग निवारण और आरोग्य सम्वर्धन का कोई सर्वसुलभ माध्यम अगले प्रयोग परीक्षणों द्वारा निकलता है तो इसे एक बहुत बड़ी उपलब्धि ही माना जायेगा।

दूसरा एक और प्रयोग भौतिक जगत में यह भी सोचा जा रहा है कि पेय जल की जो भारी कमी पड़ने जा रही है। उसका समाधान कैसे हो? बढ़ती हुई आबादी और बढ़ती हुई सभ्यता मनुष्य के दैनिक जीवन में अधिक पेय जल की माँग करती है। कारखानों में भी उसके बिना काम नहीं चलता। खाद्य उत्पादन के प्रयासों में सिंचाई की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उसमें भी मीठा पानी चाहिए।

समुद्रों में यद्यपि भारी मात्रा में जल विद्यमान है, पर वह खारी होने के कारण न पीने के काम आ सकता है और न सिंचाई। न दैनिक जीवन में पीने, सफाई आदि के कामों में उसका उपयोग हो सकता है। ऐसी दशा में खारी पानी को मीठा बनाने का उपाय ढूँढ़े बिना गुजारा नहीं। यदि इस संकट का निराकरण सम्भव न हुआ तो पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, मनुष्य उत्पादन उद्योग सभी का सर्वनाश होगा और धरती पर निवास करने वाले प्राणियों और पदार्थों के लिए सर्वनाश का संकट आ उपस्थित होगा।

इसका समाधान पानी को उबालकर भाप बनाना ही हो सकता है। यह बिजली से बनाने में तो बहुत महंगा पड़ता है। फिर आवश्यकता के अनुरूप पानी की विशाल मात्रा तैयार करने में तो संसार भर में प्रयुक्त होने वाली बिजली ही खप जायगी। तब अन्य कार्य कैसे चलेंगे। सूर्य में ऊर्जा का विशाल भण्डार है। वह बिखरा पड़ा होने के कारण हजारवाँ भाग ही धूप के रूप में काम आता है। इस ऊर्जा को एकत्रित कर लेने पर समुद्र के पानी को भाप बना कर जहाँ उसका उपयोग है वहाँ ले जाया जा सकता है। अभी तो बादल, समुद्रों, पर्वतों और दलदलों में भी बरसते हैं जहाँ उनका कोई उपयोग नहीं। सूर्य शक्ति का एकत्रीकरण और उसका अभीष्ट उपयोग कुछ असम्भव नहीं है। जिन वैज्ञानिक अनुसंधानों ने अणु शक्ति, हाइड्रोजन शक्ति, लेसर शक्ति, इन्फ्रारेड, अल्ट्रावायलेटरेज, माइक्रोवेव्ज जैसी अनेकों शक्तियों को ढूँढ़ निकाला है उनके लिए अगले दिनों यह प्रयास भी सम्भव होगा कि बढ़ती हुई जल समस्या का समाधान समुद्रों को भाप बनाकर उड़ाने और एक बड़े संकट का समाधान करने में समर्थ हो सकें। अरब देशों में ऐसे प्रयोग हो भी रहे हैं। यह एक मोटा प्रत्यक्ष विवेचन हुआ।

कहा जा चुका है कि गायत्री आत्मिकी और सावित्री भौतिकी है। उसे सहारे ही ब्रह्मा जी ने प्रत्यक्ष सृष्टि का सृजन किया है। उसमें वह सामर्थ्य भी मौजूद है कि समय-समय पर उपस्थित होने वाली चित्र-विचित्र समस्याओं का भी समाधान कर सके।

इन दिनों व्यक्ति का अध्यात्मिक जीवन ही नहीं, भौतिक परिस्थितियाँ भी प्रतिकूल चल रही हैं। अभावों, विपत्तियों और उलझनों का सामना करना पड़ रहा है। उपायों सीमित प्रयासों से वह इनका हल निकालने की चेष्टा भी करता है, पर उसमें सफल नहीं हो पाता। बुद्धि तथा साधनों के होते हुए भी हर घड़ी खिन्न, विपन्न और तनावग्रस्त दीख पड़ता है। इसका समाधान सावित्री विद्या के सहारे ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रयोग पूर्वकाल में विदित था, पर अब तो वह एक प्रकार से लुप्त ही हो गया। आवश्यकता अब इस बात की है कि उसको फिर से खोज निकाला जाय। उसे पुनर्जीवन दिया जाय।

इन दिनों सामूहिक समस्याओं का तो कहना ही क्या? अकेला अणु युद्ध भी निकट से निकटतम आता चला आ रहा है। वरन् उसके अतिरिक्त भी पर्यावरण प्रदूषण जनसंख्या विस्फोट, विकिरण, विषाक्तता की अभिवृद्धि नित नये-नये रोगों की उत्पत्ति जैसे अनेकानेक कारण हैं जो मनुष्य को उसकी निवास स्थली पृथ्वी को महाविनाश की चुनौतियाँ दे रहे हैं। इनका सामना करने के लिए सविता शक्ति का प्रयोग असाधारण रूप से कारगर हो सकता है। सर्वत्र जल की कमी पड़ने से भागीरथ ने तप करके गंगा को पृथ्वी पर लाने और उस समस्या को हल करने में सफलता पाई थी। दैत्यों से पराजित होने पर देवताओं को आत्मरक्षा के लिए किसी अचूक अस्त्र की आवश्यकता पड़ी तब दधीचि की अस्थियों से इन्द्र वज्र बना और संकट दूर हुआ। आज भी सविता शक्ति के अनुसन्धान, एवं प्रयोगों की वैसी ही आवश्यकता है। समाधान का यह दैवी अस्त्र ब्रह्मास्त्र कारगर होकर रहेगा, ऐसा सहज विश्वास किया जा सकता है। विधि-विधान क्या हो, इस पर विवेचन आगे किया जाएगा।


VigyapanSuchana

फार्म 8

1- प्रकाशन स्थान - मथुरा

2- प्रकाशन अवधि - मासिक

3- मुद्रक का नाम - मृत्युंजय शर्मा

(क्या भारत सरकार का नागरिक है) - भारतीय

पता - जन जागरण प्रेस, वृन्दावन रोड, मथुरा

4- प्रकाशक नाम - मृत्युंजय शर्मा

(क्या भारत सरकार का नागरिक है) - भारतीय

पता - अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा

5- सम्पादक का नाम - माता भगवती देवी शर्मा

(क्या भारत सरकार का नागरिक है) - भारतीय

पता - शांति कुँज, हरिद्वार

6- उन व्यक्तियों के नाम व पते जो समाचार-पत्र के स्वामी हों तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदारी या हिस्सेदार हों।

-मृत्युंजय शर्मा

मैं मृत्युंजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य हैं।

प्रकाशक के हस्ताक्षर

मृत्युंजय शर्मा


यज्ञ द्वारा प्राण पर्जन्य की वर्षा

गीता में यज्ञ से पर्जन्य बरसने पर्जन्य से अन्न उत्पन्न होने और अन्न से बाहुल्य से सुख सम्पदा उपलब्ध होने का तथ्य प्रकाश में लाया गया है।

यहाँ पर्जन्य का अर्थ आमतौर से बादल किया जाता है और यज्ञ का माहात्म्य वर्षा होना बताया जाता है। यह तात्पर्य सही नहीं है। यदि यज्ञ करने से वर्षा हो जाया करती तो कहीं कभी सूखा के कारण दुर्भिक्ष न पड़ता और जिन देशों में हवन का प्रचलन है वहाँ वर्षा की कमी न रहती। अन्य देशों की बात जाने दें अकेले भारत को ही लें। देश के किसी न किसी भाग में वर्षा कम पड़ जाती है और उस दुर्भिक्ष में मनुष्यों तथा पशुओं को भारी कष्ट सहना पड़ता है। यदि उस आपत्ति का निवारण इतना सस्ता होता कि हवन करते ही पानी बरसने लगे तो इससे अधिक प्रसन्नता की बात क्या हो सकती है? जो लोग ऐसा अर्थ या दावा करते हैं वे सिद्ध चमत्कारी समझे जाते हैं। उन पर यश की वर्षा होती है और जितना व्यय उस यज्ञ पर आता उसे जनता प्रसन्नता पूर्वक वहन कर लेती। रेगिस्तान हरे-भरे हो जाते और संसार भर में सुख-सुविधाओं का अन्त न रहता। पर ऐसा होता कहाँ है? अर्थ या दावा करने वाले भी इस चुनौती को स्वीकार करने में समर्थ नहीं हो पाते। कर लेते तो तेल वाले देशों में जहाँ मीठे पानी के लिए लोग तरसते हैं। यज्ञ का बोलबाला होता और उस विज्ञान को सबसे ऊँचा विज्ञान माना जाता। ऐसे वैज्ञानिकों के प्रति सारी दुनिया कृतज्ञ बनकर रहती। बात सही सिद्ध न होने पर उपहास भी कम न होता और झूठे कथन के लिए लाँछन कम नहीं लगता।

वस्तुतः पर्जन्य का तात्पर्य अन्तरिक्ष से प्राण वर्षा होने का है। जिस प्रकार भूमि में रासायनिक खाद लगा देने से उत्पादन कहीं अधिक बढ़ जाता है। उसी प्रकार यह प्राण शक्ति बादलों के साथ या बिना बादलों के भी धरती पर बरसती है तो उसका लाभ वनस्पतियों, जीवधारियों विशेषकर मनुष्य को मिलता है।

प्राण, वायु के साथ मिला होता है। गहरी साँस खींचकर संकल्प शक्ति के चुम्बकत्व द्वारा इसी को प्राणायाम द्वारा खींचा और धारण किया जाता है। प्राणशक्ति का मनुष्य के लिए कितना महत्व है, इसका वर्णन शास्त्रों में भरा पड़ा है। प्रश्नोपनिषद् में तो इस विद्या पर अत्यधिक गम्भीर प्रकाश डाला और महत्व बताया गया है।

पाश्चात्य शरीर शास्त्री गहरी साँस का महत्व मानते हैं और प्राणायाम की विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा रोग निवारण का दावा करते हैं। इतना ही नहीं इसे मानसिक विकास और साहस सम्वर्धन की दृष्टि से भी उपयोगी मानते हैं। भारत में कभी इस विद्या का इतना विकास हुआ था कि प्राणों को ब्रह्मरंध्र में रोक कर मृत्यु को जीवन और परकाया प्रवेश जैसे असम्भव समझे जाने वाले कार्यों को सम्भव कर दिखाया जाता था। आद्य शंकराचार्य द्वारा भारती देवी के साथ शास्त्रार्थ करने के प्रसंग में इस विद्या का उपयोग किया गया था।

मैस्मरेजम के उपचारों में एक व्यक्ति दूसरे के शरीर में अपनी प्राणशक्ति का प्रवेश करके रोगी को कष्टमुक्त करता है। भारत में संपर्क सान्निध्य की घनिष्ठता स्थापित करने के सम्बन्ध में कितने ही अनुबंध प्रतिबंध लगाये गये हैं। क्योंकि इसमें एक व्यक्ति का प्राण दूसरे की चेतना में हस्तान्तरित होता है। मानवी शरीर की विद्युत के सम्बन्ध में अब किसी को शंका नहीं रही है। साथ ही यह भी एक प्रामाणिक मान्यता है कि अनन्त अन्तरिक्ष से प्राणशक्ति जीवनी विद्युत के रूप में प्रचुर परिमाण में भरी पड़ी है। उसे यदि धरातल पर अवतीर्ण किया जा सके तो वे क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक सुविकसित और सुसम्पन्न हो सकते हैं। मनुष्यों के शरीरों के सम्बन्ध में भी यह बात है। वंशानुगत विशेषताओं के कारण, प्रकृति के विशेष प्रवाह के कारण या मानवी प्रयत्नों द्वारा इस शक्ति का जिन शरीरों में अधिक अवतरण होता है, उनका शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक साहस अपेक्षाकृत अधिक बढ़ा-चढ़ा पाया जाता है।

यह प्राणशक्ति किसी क्षेत्र में प्रयत्नपूर्वक अधिक मात्रा में बरसाई जा सकती है और उसमें से जो जितना अवधारण कर पाते हैं वे उतने ही अधिक लाभान्वित होते हैं।

एक किलो दूध पीने का शरीर पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना 5 सी.सी. लैक्टोस का इन्जेक्शन लगा देने पर उसकी उपयोगी प्रतिक्रिया तत्काल दृष्टिगोचर होती है। यही बात अनन्त अन्तरिक्ष में से किसी स्थान, क्षेत्र समूह या व्यक्ति पर बरसाने के रूप में अग्निहोत्र के माध्यम से ऐसा प्रयोग सम्भव हो सकता है, जिससे उस क्षेत्र में छायी हुई उदासी या रुग्णता, अशक्तता का निवारण हो सके।

यह पर्जन्य है। इसी को प्राण वर्षा कहते हैं। प्राण सचेतन और विश्वव्यापी है इसलिए उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष तो नहीं देखा जा सकता पर उसके कारण उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

अंतरिक्षीय प्राण वर्षा बादलों के पानी के साथ आसानी से होती रह सकती है और उसका प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। उस जल को पीने वाले अधिक परिपुष्ट होते हैं। जिस घास में प्राण तत्व अधिक घुला होता है, उसे खाकर खाने वालों की पौष्टिकता कई गुना बढ़ जाती है। अन्न में उसकी मात्रा बढ़ी-चढ़ी होने से खाने वाले मनुष्य सुदृढ़, निरोग एवं दीर्घजीवी होते हैं। यहाँ तक कि बुद्धिमता और साहसिकता की अभिवृद्धि भी होती देखी गई है। यह अन्तर यज्ञ सम्पन्न होने वाले क्षेत्रों में- और न होने वाले क्षेत्रों का अन्तर देखते हुए सहज ही जाना जा सकता है।

इस प्रकार के प्रयोग शाँति-कुज के ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में बहुत दिनों से चल रहे हैं। काम करने वाले वैज्ञानिक प्रयोगशाला के बहुमूल्य उपकरणों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि यज्ञ प्रक्रिया द्वारा सामान्य वायु और यज्ञ ऊर्जा सम्मिलित साँस में क्या अन्तर पड़ता है, तथा यह भी देखा जाता है कि उस क्षेत्र में पेड़-पौधों की उत्पत्ति पर क्या असर पड़ता है। जल जीवों पर भी यह प्रयोग सफल रहा है। रोगियों के रोग निवारण और अस्वस्थ व्यक्तियों के शारीरिक एवं मानसिक रोगों के निवारण में कितना चमत्कारी लाभ होता है?

मानसिक विकृतियों और सनकों के निवारण के लिए अभी तक कोई कारगर उपचार चिकित्सकों को हस्तगत नहीं हुआ था। मात्र पागलों के लिए बिजली के झटके दिमाग में लगाने जैसे प्रयोग चलते थे और उनका ही आधा अधूरा लाभ उठाने की स्थिति थी। किन्तु अर्ध विक्षिप्तों, सनकियों, एवं आवेशग्रस्तों, तनाव पीड़ितों के लिए कोई औषधि या “थैरेपी” हस्तगत नहीं हुई थी। यज्ञ चिकित्सा का ऐसे लोगों पर भी आश्चर्यजनक प्रभाव देखा गया है। इन लाभों के मूल में प्राण पर्जन्य को अन्तरिक्ष से आकर्षित करना और विविध प्रयोजनों के लिए सफल प्रयोग की सम्भावना इसी कारण बनी है। इस प्राण पर्जन्य को स्तर एवं मात्रा के अनुरूप बरसाना, आकाश से जमीन पर खींच लाना ही यज्ञोपचार का स्थूल लाभ है। पानी बरसाने वाली बात तो वस्तुस्थिति की जानकारी न होने के कारण ही चल पड़ी है। इस कथन से यज्ञ की उपयोगिता का महत्व बढ़ा नहीं, वरन् घटा ही है।


शान्तनु ने स्वप्न देखा (kahani)

शान्तनु ने स्वप्न देखा कि राज लक्ष्मी महल से विदा हो रही है। इसके बाद दान भी चल दिया। दोनों को जाते देखकर राजा को वैभव और यश में कमी पड़ने की आशंका हुई।

इसके बाद सदाचार जाने लगा। राजा ने उसे हाथ पकड़कर रोक लिया और कहा आपको किसी भी मूल्य पर नहीं जाने दिया जायेगा।

सदाचार रुक जाने के बाद लक्ष्मी भी लौट आई और दान भी। राजा ने वैभव और यश का मूल्य समझ लिया।


ब्राह्मणत्व का उद्देश्य एवं स्वरूप

सफाई कर्मचारी हड़ताल कर दें तो सर्वत्र गन्दगी ही गन्दगी फैली दिखाई पड़ेगी। धोबियों की भट्टी चढ़ना बन्द हो जाय तो भकाभक कपड़े पहनने का अवसर किसी को भी न मिले। फूल न खिलें तो संसार से सौंदर्य की सबसे बड़ी इकाई समाप्त हो जाय। दीपक न जलें तो रात्रि की भयावहता विकराल ही बनी रहे। घर में भी हाथों हाथ न सूझे। ठीक यही घटना तब घटित होती है जब ब्राह्मण वर्ग की संख्या और स्थिति घटती चली जाती है। उसी की जिम्मेदारी है कि व्यक्ति और समाज को मलीनताओं से उबारे, उन्हें साफ सुथरा बनाकर रखे।

दूसरे वर्ग यह काम नहीं कर सकते क्योंकि जिनने जिस सिद्धांत को अपने निजी जीवन में समाविष्ट नहीं किया है, उसके द्वारा दिये गये उपदेश प्रभावी नहीं हो सकते, भले ही वे प्राँजल भाषा या मधुर कण्ठ से ही क्यों न दिये गये हों। बुराइयां कोई भी सिखा सकता है। चोरी, जुआ, बेईमानी, बदमाशी के स्कूल कहीं भी नहीं खुले हैं। इन्हें एक दूसरे की नकल करने भर सीखा जाता है। पानी को ढलान की ओर बहने में कोई कठिनाई नहीं पड़ती। मुश्किल तब प्रतीत होती है जब किसी को बहुत ही ऊँचा उछालना या किसी मनुष्य को अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों से छुड़ाकर साफ-सुथरा बनाना हो। मक्खी पेट में चले जाने भर से मितली आने लगती और वमन का सिलसिला चल पड़ता है। कठिनाई तो तब पड़ती है, जब किसी रोगग्रस्त को उस संकट से मुक्त करके दिखाया जाता है। अग्निकाण्ड जैसे ध्वंस कार्य तो एक माचिस भी कर सकती है। उस छोटी-सी तीली से समूचा घर या खलिहान जलकर स्वाहा हो सकता है। किन्तु यदि वह सब पूर्ववत फिर से विनिर्मित करना हो तो ढेरों श्रम, समय, और साधन चाहिए।

ब्राह्मण को दुहरा काम करना पड़ता है। जहाँ कहीं भी ठहरना या आना-जाना हो वहीं गन्दी बिखरी मिलेगी और बहुत पहले से ही उसके आगमन का इन्तजार कर रही होगी कि कौन देवदूत आये और यहाँ का वातावरण स्वच्छ बनाये। इसी प्रकार खण्डहरों की कहीं कमी नहीं, जो जीर्णोद्धार के लिए उधर से निकलने वालों में से प्रत्येक का मुँह तकते रहते हैं। हर घाट पर उतरने वालों की भीड़ लगी रहती है और वे भी नाव वाले माँझी की प्रतीक्षा में बैठे होते हैं। माँझी अर्थात् ब्राह्मण। सफाई कर्मचारी अर्थात् ब्राह्मण। धोबी अर्थात् ब्राह्मण। स्वच्छता और सृजन प्रक्रिया को जारी रखने की उसी को जिम्मेदारी है।

भौतिक क्षेत्र में तो इन कार्यों को मजूरी पर करने वाले सर्वत्र असंख्यों मिल जाते हैं। जहाँ, जितने, जिस काम के लिए श्रमिक चाहिए, वे वहाँ अनायास ही मिल जाते हैं। अभाव उनका नहीं। अभाव है- चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में सुधार परिवर्तन लाने वालों का। व्यक्तित्व का इस प्रकार निर्माण करने की आवश्यकता है, जिसमें कोई लुंज-पुंज, दीन-हीन, समर्थता और तेजस्विता के ढांचे में ढल जाय। यह कार्य केवल वही कर सकता है जो अपनी कला की प्रवीणता के लिए अपने आप पर सफल प्रयोग कर चुका हो। ऐसे ही लोगों को प्रवीण पारंगत कहा जा सकता है। ऐसे ही लोग सड़े गोबर को पुष्प उद्यान में परिणत करके दिखाते हैं। ऐसे ही लोग सामान्य से कपड़े को कुछ ही पैसे के रंगों में बहुमूल्य चित्र बनाकर दिखाते हैं। उन्हीं की छैनी हथौड़ी अनगढ़ पत्थर को तराश कर देव प्रतिमा का स्वरूप देती है। जिसने अपना सुधार नहीं किया वह दूसरों को सुधार सकेगा इसकी आशा करना व्यर्थ है।

चिन्तन और चरित्र की एकता होने पर ही दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता उपलब्ध होती है। एक नशेबाज अपने जीवन में दूसरे नये नशेबाज उत्पन्न कर लेता है और एक वेश्या कितने ही अनजानों को व्यभिचार के मार्ग पर घसीट लेती है। इसका कारण यही है यह लोग जैसा सोचते हैं वैसा ही करते भी हैं। कथनी और करनी के बीच का अन्तर हट जाय तो व्यक्ति निश्चित रूप से प्रभावशाली हो जाता है। भलाई सिखाई जाय या बुराई यह आगे की बात है। पर चिन्तन और चरित्र की एकता तो नितान्त आवश्यक है। विशेषतया कुसंस्कारों से घिरे हुए लोगों को सुसंस्कारी बनाने के लिए।

ऐसे व्यक्तित्व अब क्रमशः घटते जा रहे हैं जो निजी जीवन में आदर्शों की सभी कसौटियों पर खरे उतरें। साथ ही उस विशिष्टता का उपयोग लोक मंगल के लिए जन-मानस का परिष्कार करने के निमित्त करने में भावनापूर्ण समग्र तत्परता और तन्मयता के साथ संलग्न रहें। जहाँ यह दोनों बातें मिलती हैं, वहीं ब्राह्मणत्व की क्षमता परिपक्व होती है।

ब्राह्मण वर्ग की दो धाराएं हैं एक गृहस्थ, दूसरी विरक्त। जिनके ऊपर पारिवारिक उत्तरदायित्व लदे हैं, जिन्हें निर्वाह के साधन भी जुटाने पड़ते हैं और सीमित संपर्क क्षेत्र में ही सेवा कार्य कर सकते हैं, वे ब्राह्मण हैं। वे अपने परिवार क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों का प्रयोग अभ्यास करके देश को उत्कृष्ट स्तर क नर-रत्न प्रदान करते रहते हैं। साथ ही सम्पर्क क्षेत्र को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने में भी पीछे नहीं रहते।

दूसरा वर्ग है- साधु। निजी परिवार न बसाने या उसके निर्वाह दायित्वों से व्यवस्थापूर्वक छुटकारा पा लेने वाले यदि प्रव्रज्या पर निकलते हैं, परिव्राजक की तरह परिभ्रमण को अपनी रीति-नीति बनाते हैं, उनकी अधिक उपयोगिता और प्रतिष्ठा इसलिए है कि उनका कार्यक्षेत्र सुविस्तृत होता है। जहाँ भी पिछड़ापन अधिक बड़ी मात्रा में दीखता है वहीं जा पहुँचते हैं। वे दीपक की तरह जलते और बादल की तरह बरसते हुए अपना जीवन बिताते हैं। जहाँ भी दुर्घटना हो रही होती है, वहीं दौड़कर जा पहुँचने का उपक्रम करते हैं। यह बात गृहस्थों के लिए कठिन पड़ती है। वह निरन्तर या बहुत समय तक घर से बाहर नहीं रह सकते।

ब्राह्मण और साधु वर्गों में से दोनों को ही परमार्थ परायण होना चाहिए। लोकसेवा में निरत यदि आदर्शों के अपनाने में निजी जीवन में प्रयोग तो किया गया। व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य मृदुल व्यवहार आदि का अभ्यास करने में अन्तः संघर्ष तो किया गया पर उसका मूलभूत उद्देश्य स्वार्थ साधन ही रहा तो बात बनी नहीं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, चमत्कार, यश, सम्मान जैसे स्वार्थ यदि छूटे नहीं और घूम फिरकर उसी मलीनता में लिपट गया तो प्रयत्न की गरिमा चली गई। हाथी सरोवर में नहाने के उपरांत बाहर निकलता है तो सूँड से ऊपर बालू छिड़क लेता है और पहले जैसा ही मलीन हो जाता है। ऐसा ही प्रयत्न यदि सम्मानास्पद साधु ब्राह्मण भी करें और चित्र-विचित्र साधनाओं तक सीमित रहें तो समझना चाहिए कि उपार्जन तो सीखा पर उपयोग नहीं आया। कहा गया है कि- “यषा बिनु सन्त कराई।” स्पष्ट है जिसके भी हृदय में दया करुणा का भाव होगा वह स्नेह की आत्मीयता की अभिव्यक्ति किये बिना रह नहीं सकेगा। सेवा धर्म अपनाये बिना अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश या श्रेय प्राप्त करने की कुछ उपयोगिता नहीं रह जाती। स्वार्थ सिद्धि में निरत रहना संकीर्णता है क्षुद्रता भी। सामान्यजन धन वैभव उपार्जित करने में मरते खटते रहे हैं और जो करते हैं उसे विलासों में उड़ा देते हैं। ठीक यही बात उन साधु ब्राह्मणों के लिए भी कही जा सकती है जो मनोकामना की पूर्ति के लिए देवताओं की मनुहार करते हैं। भले ही वह इच्छा स्वर्ग मुक्ति जैसी परलोक से सम्बन्धित ही क्यों न हो? (क्रमशः)


राजा महेन्द्र प्रताप (kahani)

मथुरा जिले के राजा महेन्द्र प्रताप के कोई सन्तान न थी। उत्तराधिकार के लिए लोग कोई पुत्र गोद लेने या दूसरा विवाह करने का आग्रह करते रहे। उनने किसी की न मानी। उन्होंने अपनी जमींदारी के 100 गाँव प्रेम महाविद्यालय को दान कर दिए। वृन्दावन में स्थापित इस विद्यालय में लोकसेवी उत्पन्न करने का काम चला। उच्चस्तरीय अध्यापक रखे गये। इस विद्यालय के छात्रों ने स्वतंत्रता संग्राम में असाधारण भूमिका निभाई। राजा साहब थोड़ी-सी आजीविका बचाकर उससे अपना गुजारा करते रहे।


अपनों से अपनी बात

पृथ्वी पर अनेकों बार संकट आये हैं और यह डूबते-डूबते उबरी है। एक बार हिरण्याक्ष उसे पाताल ले गया था। एक बार वृत्रासुर ने उसका अपहरण कर लिया था और इन्द्र समेत समस्त देव समुदाय को पलायन करना पड़ा था। भस्मासुर, महिषासुर ने भी विनाश की घड़ी समीप ला दी थी। ऐसे अनेकों प्रसंगों में दैवी शक्तियों ने ही उसका उद्धार किया था। देवों की करुण पुकार सुनकर प्रजापति ने कहा था- “तुम देव लोग उपेक्षा या अहंकार वश एकत्र नहीं हो पाते, इसलिए बलिष्ठ होने पर भी दैत्य समुदाय के सामने हार जाते हो।” उनकी संयुक्त शक्ति दुर्गा के रूप में विनिर्मित हुई और उनने असुरों के संकट से देवों को बचाया।

यह तो पौराणिक प्रसंग हुआ। वैज्ञानिकों के अनुसार पुरातन काल में एक ग्रह था- ”फैथॉन”। उसकी सभ्यता आज से भी बढ़ी-चढ़ी थी और विज्ञान ने महाघातक उस अस्त्र उस ग्रह के वासियों ने एकत्रित कर लिए थे। शक्तियाँ प्राप्त कर लेना एक बात है और उनका सदुपयोग करना दूसरी। वे अहंकारी सत्ताधारी परमाणु आयुधों से लड़ पड़े और न केवल जीव सत्त का- पदार्थों का वरन् समूचे ग्रह का सर्वनाश कर दिया। फलस्वरूप उस ग्रह के छर्रे-छर्रे उड़ गए। उन्हीं टुकड़ों में से कुछ मंगल और बृहस्पति के बीच में एक उल्का माला के रूप में घूमते हैं। कुछ शनि के इर्द-गिर्द छल्ले के रूप में एवं कुछ प्लेटो, नेपच्यून तक उड़ गए। कहते हैं उसी कबाड़ से सृष्टा ने पृथ्वी की नूतन संरचना की। जो हो, सृष्टा के इस ब्रह्मांड में पृथ्वी सबसे सुन्दर कलाकृति है। जब जब भी इस पर विनाश संकट आते रहे, तब-तब उसकी रक्षा होती रही है। कोई न कोई उपाय निकलता रहा है। एक बार दधीचि की अस्थियों का वज्र बना था। एकबार संघ शक्ति दुर्गा ने विनाश की विपत्ति बचाई थी। इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है।

प्रस्तुत संकट के संदर्भ में दिव्यदर्शी आत्मवेत्ता कहते रहते हैं कि चौदहवीं सदी, सेविन टाइम्स, खण्ड प्रलय, हिमयुग, समुद्री उफान के रूप में पृथ्वी पर ऐसी विपत्ति बरसेगी जिससे कुछ बचेगा नहीं। मूर्धन्य मनीषियों का भी यही कहना है कि प्रदूषण, पर्यावरण, विकिरण, अणुयुद्ध, जनसंख्या विस्फोट आदि के फलस्वरूप संसार तेजी से महाविनाश की ओर जा रहा है। तीसरे अन्तरिक्षीय युद्ध की संभावना तो हर पल सामने है ही।

सृष्टा ने महाविनाश से पूर्व ही बचाव की व्यवस्था बनाई है। संसार में सृजन को जन्म देने वाली सबसे बड़ी शक्ति तप है। उसी ने ब्रह्मा को सृष्टि बनाने की शक्ति दी थी। उसी के बल से संसार में सुव्यवस्था स्थिर है। सारे ऋषिगण तपस्वी रहे हैं। उन्होंने तप विज्ञान से उत्तराखण्ड को देवलोक बनाने के लिए हिमालय के इस ध्रुव केन्द्र में प्रचंड तप किए और व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, विश्वामित्र, भारद्वाज, जमदग्नि, कश्यप प्रभृति ऋषिगणों एवं ध्रुव पार्वती इत्यादि साधकों ने इसे देवभूमि बना दिया। उन्होंने संसार को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने वाले अपने नेक प्रयास तप शक्ति से इस प्रकार सम्पन्न किए जिनके कारण यह धरती समूचे ब्रह्मांड में मुकुटमणि बन गयी।

इस बार भी तप शक्ति को महाविनाश के सम्मुख जुटाया गया है और वह प्रयास व्यर्थ नहीं गया है। पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक जो विनाश की घटाएं उमड़ रही थीं, वे अब छंटने लगी हैं। स्थिति को अपनी दिव्य दृष्टि से देखने वाले कहते हैं कि अदृश्य वातावरण में रावण, कुंभकरण, जरासन्ध, हिरण्यकश्यपु जैसों की जो हुँकारें गरज रही थीं, वे अब शान्त हो चली हैं। जो विभीषिकाएं अभी शेष हैं, उनका भी समाधान होकर रहेगा। अब भयाक्रान्त होने की आवश्यकता नहीं रही। रामराज्य का उषाकाल समीप है। अब यह किसी कुहरे के नीचे देर तक छिपा नहीं रहेगा।

नई सृष्टि बनाने के लिए ब्रह्मा ने, विश्वामित्र ने जो तप किया था, उसका प्रयोग इन दिनों चल रहा है। अपने युग के इस तपस्वी से जन-जन परिचित है और यही विदित है कि अब तक जो काम उसने अपने हाथ में लिए हैं, वे पूरा करके दिखाए हैं। आर्ष ग्रन्थों को सर्वसुलभ करना, विशाल प्रज्ञा परिवार का असाधारण संगठन, सहस्र कुँडी गायत्री यज्ञ, लोक मानस के परिष्कार का युग साहित्य, विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय के अभिनव प्रयास, परमार्थ प्रयोजनों के लिए जीवन दान देने वाले सहस्रों देवमानवों का निर्माण आदि-आदि ऐसे काम हैं जो आज की परिस्थितियों में किसी सामान्य मानवी शक्ति के बलबूते की बात नहीं है। ऐसे महान कार्य तप शक्ति के बिना और किसी प्रकार नहीं हो सकते। तप के प्रभाव से ऋषियों और देवताओं का अनुग्रह प्राप्त होता है और इन सबके संगठन से एक ऐसी शक्ति उत्पन्न होती है, जिसे अद्भुत अनुपम कहा जा सके। सामान्य मनुष्य जब कभी अद्भुत काम करते हैं, युग परिवर्तन जैसे काम हाथ में लेते हैं तो समझना चाहिए कि इसके लिए इन्होंने तप की शक्ति एकत्रित कर ली है। वस्तुतः ये काम साधारण व्यक्ति नहीं करते, उनके पीछे कोई परोक्ष महती शक्ति काम कर रही होती है।

प्रज्ञा अभियान के मूल में तप शक्ति ही काम कर रही है, ऐसा तप जिसके बल पर शेषनाग धरती को अपने सिर पर उठाए हुए हैं, ऐसा तप जिसके कारण तपता हुआ सूर्य लोक-लोकान्तरों में आलोक और ऊर्जा का वितरण करता परिभ्रमण करता, रहता है। इन दिनों इस तप शक्ति के सहारे ही मनुष्य में से विष निचोड़ा जा रहा है और उसकी आकृति वही बनी रहने पर भी प्रकृति में आमूल चूल परिवर्तन लाया जा रहा है। इसे एक दैवी आश्वासन समझा जाना चाहिए कि कल तक जो महाविनाश के हजारों कारण और लक्षण दीख पड़ रहे थे, वे घट चले और हट भी चले।

युग परिवर्तन के इस पूर्वार्ध में विश्व को महाविनाश की चुनौती देने वाली प्रलय की घटाएँ अब किसी अदृश्य तूफान में उड़ गईं। इस आश्वासन के साथ एक दैवी अभिवचन यह भी प्रकट हुआ है कि अगले दिनों परिवर्तन प्रक्रिया के उत्तरार्ध में सतयुग के अभिनव सृजन में जिस स्तर के व्यक्तियों की कौशल साधनों की जरूरत है वे एकत्रित होते चले जायेंगे। मनुष्य को समझाया और यह मानने के लिए विवश किया जायेगा कि वह औसत नागरिक की तरह निर्वाह करने में सन्तोष व्यक्त करे। पतन और पाप के गर्त में जान-बूझकर न गिरे। सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति में ही सन्तोष करे। परिवार के जो लोग सेवा-सहायता कर चुके हैं उन्हीं का ऋण चुकाए। नये कर्जदार एकत्रित न करे जो देने से पहले ही वसूल करना आरम्भ कर दें। यदि इन विडम्बनाओं से आज के मानव समाज को बचाया जा सका तो समझना चाहिए कि स्वर्ग का राजमार्ग अपना लिया गया। दैत्यों को देवों में बदलना कठिन नहीं है। उसमें केवल उनकी मनःस्थिति बदलनी पड़ती है, उसके उपरान्त परिस्थितियाँ तो स्वतः ही बदल जाती हैं। नरक से स्वर्ग में प्रवेश पाना पूरी तरह मनुष्य के हाथों में है, दैवी शक्तियाँ तो परोक्ष वातावरण बनाती व प्रेरणा का शंख फूँकती भर हैं।

नवयुग का आगमन सुनिश्चित है। प्रज्ञा युग उसका नाम होगा। गंगावतरण का मन बना चुकी है। उसे स्वर्ग से जमीन पर ला उतारने वाले तप की आवश्यकता थी जो हो रहा है वह चलता रहेगा। कठिनाई हल करने के लिए शिवजी ने अपनी जटाएँ बिखेर दी हैं। अब आवश्यकता भागीरथ जैसे राजपुत्र की रह गई है जो अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो और अपने को भागीरथी का अवतरण कर्त्ता कहलाने का श्रेय भर लेने का साहस करे। अर्जुन को भी यही कहा गया है कि धरती पर दिखाई देने वाले जीवितों का प्राण हरण किया जा चुका है। यदि इच्छा हो तो विजयश्री का वरण कर, अन्यथा चुप बैठ। तेरे बिना महाभारत अनजीता न पड़ा रहेगा। यों भागीरथ न आते तो भी विधिचक्र ने गंगावतरण तो सुनिश्चित कर रखा ही था।

इन दिनों देव मानवों की महती आवश्यकता अनुभव की जा रही है और उन्हें मनुहार-आग्रह-अनुरोध करके बुलाया भी जा रहा है। पर कोई यह न समझे कि हम नखरे दिखाएंगे, ननुनच करेंगे, बहाने बनायेंगे तो गाड़ी रुकी पड़ी रहेगी। जो भवितव्यता है वह हमारे हाथ लगाए बिना रुकी रह जायेगी। युग परिवर्तन सुनिश्चित है। मनुष्य से देवत्व का उदय होगा और उस समुदाय का बहुमत हो जाने पर धरती पर स्वर्ग का वातावरण बनेगा। जो शक्ति भयंकर भवितव्यता को टाल सकती है, वह उर्वर भूमि में हरे-भरे पौधे भी उगा सकती है।

युद्ध सैनिकों में लड़े जाते हैं। सड़कें मजदूर बनाते हैं। पुल खड़े करने के लिए कारीगरों की जरूरत पड़ती है। साधन जुटाने में धन किसी का भी क्यों न लगा हो पर हर इंजीनियर, कारीगर, मजदूर यही कहता है कि “यह पुल हमने बनाया था।” उसकी यह गर्वोक्ति सही भी है। नवयुग के अवतरण के लिए ऐसे ही शिल्पी कारीगर चाहिए- जीवन्त, प्राणवान, मनस्वी, योद्धा, देवमानव। उन्हीं को कभी साधु, ब्राह्मण कहा जाता था, पर जब वे रह नहीं गए तो दूसरा नामकरण करना पड़ रहा है।

अखण्ड ज्योति परिजनों में देवमानवों की एक बड़ी संख्या है। उन्हें ही सर्वप्रथम बुलाया गया है। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बच्चे बलि चढ़ा दिए तो दूसरों की मनुहार नहीं करनी पड़ी। वे सच्चाई देखकर प्रभावित हुए और बड़ी संख्या में “सन्त सिपाही” रूप में भर्ती होते चले गए। लक्ष्य पूरा करके ही रुके। आज देवमानवों को बुलाया गया है व कहा गया है कि लोभ, मोह और अहंकार के जाल-जंजाल से सदा के लिए न छूट सकें तो कम से कम एक साल का समय निकालें। इतने समय का छोटा वानप्रस्थ छोटा संन्यास ग्रहण करें उस पुनीत कार्य में लगें जिसमें पुरातन काल के देवमानव लगा करते थे। 86 हजार ऋषियों की टोली किसी समय इसी कार्य में प्रवृत्त थी। बुद्ध के लाखों भिक्षु और महावीर के असंख्यों श्रावक देश-देशांतरों में भ्रमण करते हुए जन-जन का सोया देवत्व जगाते थे और दृष्प्रवृत्तियों की जड़ों को बल पूर्वक उखाड़ फेंकते थे। “सत्य के अनुयायी में हजार हाथी के बराबर बल होता है,” इस युक्ति को उन्होंने प्रत्यक्ष सार्थक करके दिखा दिया।

आज से ही हमारा भविष्य निर्धारण आरम्भ होता है। भविष्य किसका? समूचे धरातल का, समूचे मानव समुदाय का- समूचे प्राणि परिवार का। क्या यह सम्भव है? इसके उत्तर में हमें एक ही शब्द कहना है- “हाँ”। क्योंकि भूत का अनुभव और वर्तमान की प्रगति हमें विश्वास दिलाती है कि भविष्य के बारे में जो सोचा गया है, वह बाल कल्पना नहीं है। उसके पीछे सच्चाई का गहरा पुट है। भविष्य के ये निर्धारण हैं-

(1) एक लाख देव ब्राह्मण उत्पन्न करना (2) युग साहित्य के माध्यम से जन-जन को समय के पक्ष में प्रशिक्षित करना (3) युग धर्म के प्रशिक्षण की 2400 पाठशालाएं खोलना (4) 24 हजार की संख्या में बाल संस्कार शालाऐं स्थापित करना (5) भारत भूमि के कोने-कोने से तीर्थ स्थापित करना (6) शान्ति कुंज गायत्री तीर्थ के रूप में ऐसा आरण्यक विकसित करना, जहाँ से रत्नों की खदान की तरह धर्म प्रचारक निरन्तर निकलते रहें। बुद्ध काल में नालन्दा, तक्षशिला विश्वविद्यालयों ने विश्व के कोने-कोने में धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए अगणित तपस्वी और तपस्विनियाँ उत्पन्न किए थे। साथ ही यह भी कहा था कि तीन दिन से अधिक एक जगह ठहरना मत। दो से अधिक एक साथ समय चलना मत। उन दिनों वातावरण ऐसा था कि यह अनुशासन भी बन पड़ा था एवं बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए अनेकों जीवन दानी बन गये थे, जिन्होंने सारे विश्व को झकझोर कर रख दिया था।

आज की हवा में ऊर्जा नहीं रही। फिर भी घोर दुर्भिक्ष नहीं है। भूमि में उर्वरता अभी भी जीवित है। उतनी शानदार फसल तो उगा न सकेगी, पर स्थिति ऐसी नहीं आयेगी कि योजना को शेखचिल्ली के सपने कहकर उपहास उड़ाया जा सके। युग परिवर्तन की दिशा में तपश्चर्या का बल जो चमत्कार दिखा चुका है उसे ध्यान में रखने पर यह पूरा विश्वास होता है कि भविष्य की सम्भावनाएं भी सार्थक होकर रहेंगी।


सब कुछ कहने के लिए विवश न करें

युग परिवर्तन के महान् प्रयोजन में एक वर्ष के समयदान की याचना महाकाल ने की है। काम बड़ा और लम्बा भी। किन्तु एक वर्ष की ही माँग क्यों की गयी, जबकि इक्कीसवीं शताब्दी को आने में अभी 15 वर्ष और बाकी हैं और इस अवधि में महान घटनाएं होने वाली हैं। अशुभ से लड़ने और सृजन में जुटने के लिए असंख्यों एक से एक महत्व के काम सामने आने वाले हैं। पूरा जीवनदान कर भी दिया जाय तो भी आवश्यकता और उपयोगिता को देखते हुए भी वह कम है। फिर विचारणीय है कि बारम्बार एक वर्ष के समयदान की याचना ही क्यों दुहराई जा रही है?

फिर एक वर्ष की शर्त ही क्यों? किस लिए? पिछले वर्षों में भी कितने ही व्यक्तियों ने अपने जीवनदान मिशन के लिए दिए हैं और वे अपनी प्रतिभा का भली प्रकार निर्वाह कर रहे हैं। पूछने पर बताते ही हैं “कि जिस प्रकार जीवन दान, कन्यादान आदि को वापस नहीं लिया जाता, उसी प्रकार जीवन-दान को भी वापस लेकर प्रतिज्ञा तोड़ने की अपेक्षा और कुछ कर बैठना अच्छा। इसलिए जीवन यदि लोकमंगल के लिए समर्पित किया है तो इसी भूमि में प्राण त्यागेंगे। इसमें हेरा-फेरी करना न हमें शोभा देता है और न इसमें मिशन का गुरुदेव का गौरव है। हमारी तो प्रत्यक्ष बदनामी है ही, जो सुनेगा वह धिक्कारेगा। इसलिए निश्चय तो निश्चय ही है। इस छोटी-सी आयु में ऐसा कलंक सिर पर लादकर क्यों चलें जिसकी कालिख-कालिमा फिर कभी छूटे ही नहीं।”

“अब तक एक सौ से अधिक जीवनदानियों का समुदाय प्राण-पण से अपनी प्रतिज्ञा पर आरुढ़ है तो हमारे ही ऊपर क्यों ऐसी शर्त लगायी जा रही है कि एक ही वर्ष के लिए समय दिया जाय?” इसका मोटा उत्तर तो प्रश्नकर्त्ताओं को यही लिखाया जा रहा है कि यह दोनों पक्षों के लिये परीक्षा का समय है। आप लोग मिशन को देख लें, भली-भाँति परख लें, साथ ही हमें भी। साथ ही एक अवसर परखने का हमें भी दें कि आप इस “क्षुरस्य-धारा” तलवार की धार पर चल सकेंगे या नहीं? अपना चिन्तन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध कर सकेंगे या नहीं? बीच में कोई पक्ष अनुत्तीर्ण होता है तो उसके लिए यह छूट रहनी चाहिये कि वापस जाने या भेजने का उपाय अपना लिया जाय। जीवनदान बहुत बड़ी बात है। यदि वह दूसरों के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत कर सकने की स्थिति में बना रह सकता हो तो ही उस अनुदान का गौरव है, अन्यथा मिथ्या वचन देने और उसे वापस लौटाने में किसी का भी गौरव नहीं है।

घटिया कदम ओछे लोग ही उठाते हैं। हममें से किसी पक्ष को भी अपनी गणना ओछे लोगों में नहीं करनी चाहिये। इसलिए परीक्षा-काल एक वर्ष की जाँच पड़ताल रखने में ही उत्तम है। बाद में फिर नये सिरे से विचार किया जा सकता है और नया कदम उठाया जा सकता है।

आमतौर से एक वर्ष की बात के सम्बन्ध में सन्देह उठाने वालों का यही उत्तर लिखाये जा रहे हैं। किन्तु इतने भर से किसी को सन्तोष नहीं होता। वे इसके अतिरिक्त और भी कई तरह की कल्पनाएं करते हैं। दिए हुये उत्तरों को पर्याप्त नहीं मानते। उसके पीछे कोई रहस्य खोजते हैं। मनुष्य का स्वभाव भी है कि हर गम्भीर प्रश्न पर कई प्रकार से सोचे। इसे अनुचित भी नहीं कहा जा सकता।

कितने ही पत्रों में इस संदर्भ में कितनी ही बातें पूछी गई हैं। उनमें से कुछ का उल्लेख भी यहाँ किया जा रहा है। कितनों ने ही पूछा है कि (1) आपकी आयु एक वर्ष ही शेष रह गई है क्या? जिसमें उतने ही समय में अपने घोषित संकल्पों को पूरा करना चाहते हैं? (2) एक वर्ष बाद हिमालय चले जाने और तपस्वियों की ऊँची बिरादरी में सम्मिलित होने का मन है क्या? (3) अगले वर्ष कोई भयावह दुर्घटनाएं तो घटित होने वाली नहीं हैं? (4) एक वर्ष बाद आपको प्रज्ञा अभियान दूसरों के जिम्मे छोड़कर कोई असाधारण उत्तरदायित्व वहन करने की भूमिका तो नहीं निभानी है? (5) कहीं माताजी का स्वास्थ्य तो नहीं गड़बड़ा रहा है? (6) जिनके मन में इतने दिनों से उद्भट उत्कण्ठाएं उठाई जाती रही हैं, उन्हें ऐसा तो नहीं समझा गया है कि यह समय चुका देने पर फिर उन्हें कभी ऐसा अवसर नहीं मिलेगा? (7) युग परिवर्तन के सम्बन्ध में कोई ऐसा घटनाक्रम तो घटित नहीं होने जा रहा जिसकी सुरक्षा के लिए उन्हें अपने पास बुला रहे हों? (8) किन्हीं को कोई ऐसा सौभाग्य तो प्रदान करने वाले नहीं हैं, जिन्हें निकटवर्ती लोगों को ही दिया जा सकता हो? भविष्य में ऊँचे उत्तरदायित्वों के साथ जुड़ा हुआ महामानवों जैसा श्रेय तो नहीं मिलने जा रहा है, जिसका रहस्य कुछ विशेष लोगों के कान में ही कहा जाना हो? (9) पात्रता जाँचकर अपनी विशिष्ट क्षमताओं का वितरण विभाजन तो नहीं कर रहे हैं?

ऐसे-ऐसे अनेकों प्रश्न हैं, जिनमें से कितनों का ही उल्लेख अप्रकाशित रहना ही उपयुक्त है। इस प्रकार के रहस्यमय प्रश्नों में से किसी का भी उत्तर “न” या “हाँ” में नहीं दिया जा सकता। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें स्वीकार कर लिया जाता है। कुछ को अस्वीकार करने में भी हर्ज नहीं होता। पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनके सम्बन्ध में मौन धारण करना, कुछ न कहना ही उचित है। कई बातें ऐसी होती हैं, जिनके सम्बन्ध में गोपनीयता को रखना ही लगभग सत्य के समतुल्य नीतिकारों ने बतलाया है।

जिन की झड़ी इन दिनों लगी हुई है उनसे किसी महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन की आशा नहीं करनी चाहिए। उन्हें इतना ही पर्याप्त समझना चाहिए, जितना कि एक दूसरे की जाँच पड़ताल का हवाला देते हुये कहा गया है।

हमने अपने भूतकाल की घटनाओं का भी पत्रिका के अंकों में सीमित ही उल्लेख किया है। पूछने पर भी नपा तुला ही वर्णन किया है, जो नहीं प्रकट किया गया वह इसलिए सुरक्षित है कि उसे हमारा शरीर न रहने से पहले न जाना जाय। उपरान्त जो लोग चाहें अपने अनुभव प्रकट कर सकते हैं। यदि इन घटनाओं की चर्चा होती है तो इन्हें प्रत्यक्ष कहने पर सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में अपने को प्रख्यात करने की महत्वाकाँक्षा आँकी जा सकती है।

शासन संचालकों को शपथ दिलाई जाती है, उनमें एक गोपनीयता की भी होती है। हमें भी ऐसा ही वचन अपने मार्गदर्शक को देना पड़ा है कि लोकसेवी ब्राह्मण के रूप में ही अपनी जानकारी सर्वसाधारण को दी जाय। जो अध्यात्म की गरिमा सिद्ध करने के लिए आवश्यक समझा जाय उतना ही प्रकट किया जाय। जो हमारी व्यक्तिगत साधना, तपश्चर्या, सिद्धि, जिम्मेदारी एवं भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं से सम्बन्धित है, उन्हें समय से पूर्व वर्णन न किया जाय।

युग परिवर्तन की अवधि में अनेकों घटनाएं घटित होंगी। अनेकों महत्वपूर्ण व्यक्तियों के वर्तमान रुख एवं कार्यक्रम में जमीन-आसमान जैसा अन्तर उत्पन्न होगा। ये बातें अभी से नहीं कही जा सकतीं। रहस्यमयी भविष्यवाणियाँ करने के लिए अपनी सिद्धियाँ प्रकट करने के लिए हमें मनाही की गई है, उस प्रतिज्ञा का निश्चय ही पालन किया जाएगा। इसलिए कोई सज्जन वे प्रश्न इस वर्ष के संदर्भ में न पूछें, जो भविष्य के सम्बन्ध में न कहने के लिए हम वचनबद्ध हैं, उन्हें नहीं ही कहेंगे।


जिन्दगी का स्वरूप

(माया वर्मा)


जिन्दगी का स्वरूप (kavita)

जिन्दगी बस, मावसी तम ही नहीं है। वह उषा का शारदी शृंगार भी है।।

है न कोई भार जो बंटता न बाँटे। फूल भी हैं बाग में, केवल न काँटे।।

जिंदगी संत्रास कुँठा ही नहीं है। वह अमल पोषक सुधामय प्यार भी है।।

ठीक है- होगी किसी की रिक्त गागर। पी चुके हम तीन अंजलि बाँध, सागर।।

जिन्दगी बस क्रम अभावों का नहीं है। प्राप्ति हित संघर्ष की जयकार भी है।।

कक्ष में उत्सव अकेले मत मनाओ। द्वार खोल पड़ोसियों को भी बुलाओ।।

जिंदगी बस वद्ध सीमित सर नहीं है। मुक्त पावस की सरस जल धर भी है।।

है मनुज वह कब? कि थक कर बैठ जाये। वक्त पर वह बाहुबल को आजमाये।।

जिंदगी मंझधार का भय ही नहीं है। नाव की उड़ती सुदृढ़ पतवार भी है।।

देह है नश्वर सभी यह जानते हैं। किन्तु ऋषियों को मृतक कब मानते हैं।।

जिन्दगी बस मरण का क्रम ही नहीं है। चेतना का चिर जयी त्यौहार भी है।।

जिंदगी बस मावसी तम ही नहीं है। वह उषा का शारदी शृंगार भी है।।

*समाप्त*