उनसे प्यार करो, जिन्हें लोग पतित, गर्हित और हेय समझते हैं। जिन्हें केवल निन्दा और भर्त्सना ही मिलती है। जो अपने ऊपर लदे हुए पिछड़ेपन के कारण न किसी के मित्र बन पाते हैं और न जिन्हें कोई प्यार करता है। प्यार करने योग्य वही लोग हैं, जिन्हें स्नेह सद्भाव देकर तुम अपने को गौरवान्वित करोगे। माँगो मत। चाहो मत। देकर ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करो।
उन्हें देखने के लिए मत दौड़ो जिनकी त्वचा चमकीली और गठन में सुन्दरता भरी है। ऐसा तो तितलियाँ और भौंरे भी कर सकते हैं। तुम उन्हें निहारो जो दरिद्रता और रुग्णता की चक्की में पिसकर कुरूप लगने लगे हैं। अभावों के कारण जिनकी अस्थियाँ उभर रही हैं और आँखों की चमक छिन गई है। निराशों में आशा का संचार करके तुम अपने को धन्य अनुभव करो।
कोलाहल और क्रन्दन के साथ जुड़ी हुई विपन्नताओं को देखकर न डरो और न भागो वरन् वह करो जिससे अशान्ति को निरस्त और शान्ति को प्रशस्त कर सको। शान्ति पाने के लिए न एकान्त ढूँढ़ो और न उद्यानों में भटको। वह तो तुम्हारे अन्दर है और तब प्रकट होती है जब तुम कोई ऐसा काम करते हो जिससे अनीतियों और भ्रान्तियों को निराकरण हो सके। सत्प्रयत्नों के साथ ही शान्ति जुड़ी हुई है।
प्रेम के पारस-पत्थर को छू जाने से मनुष्य दीन-हीन मानव से ऊपर उठकर परमात्मा की तरह उदार हो जाता है। सीमित से अनन्त, बद्ध से मुक्त, ससीम से असीम, दीन से समर्थ, पशु से मनुष्य बनाने वाला प्रेम ही है इसी कारण प्रेम को परमेश्वर माना है। इस प्रेम के अक्षर को जिसने पढ़ समझ लिया वह सन्त कबीर के शब्दों में सचमुच पण्डित हो गया।
ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र का शुभारम्भ क, ख, ग से आरम्भ होता है, पर यदि क, ख, ग को ही ज्ञान-विज्ञान मान लिया जाय तो यह बहुत बड़ी भूल होगी। प्रेम के साथ भी यही स्थिति है। प्रेम की पाठशाला का क, ख, ग, घ परिवार की पाठशाला में पढ़ा जाना आरम्भ होता है। अपनी आवश्यकताओं को कम करके स्त्री बच्चों के लिए साधन सुविधाएँ जुटाने वाला मनुष्य कुछ देना सीखता है। देने का यह क्रमिक विकास ही प्यार का मुख्य आधार है। यह देना ही देना यदि कुछ ही लोगों के प्रति न रहकर जीव मात्र के लिए हो जाता है तब इसे सच्चा प्यार कहा जाता है। ऐसे दाता की फिर कोई अपनी सत्ता रहती ही नहीं वह तो सभी को एकात्म भाव से देखता है। अपने आपको वह सभी प्राणियों में देखता है।
हम अक्षर ज्ञान तक ही सीमित न रह जाएँ। ज्ञान की पिपासा हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित न करे तो हम ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जो कुछ पाते हैं वह नगण्य सा होता है। इसी प्रकार प्यार करने के लिये यह देखना कि जिसके लिये मैं कुछ दे रहा हूँ, वह मेरा क्या लगता है। उसके साथ सम्बन्ध खोजना एक गतिरोध है जो हमें गलत दिशा की ओर प्रवृत्त करता है। सच्चा प्रेमी सम्बन्ध का चश्मा चढ़ाकर नहीं देखता। वह तो केवल देना चाहता है, दिये बिना वह रह नहीं सकता।
प्रेम की आरम्भिक अवस्था में तो पशु पक्षी भी जीते हैं यदि यह कहा जाय तो गलत न होगा कि वह मनुष्य की वर्तमान संकुचित वृत्तियों को देखते हुए कहीं अधिक उच्च श्रेणी का प्यार करना जानते हैं। कुत्ता रूखी-सूखी रोटी खाकर, चाहे कहीं पड़ा रहकर रात-दिन स्वामी के घर की रखवाली करता है। गाय को जैसा खिलाओ वैसा खाकर अमृत समान दूध देती है। गधा जरा सा भूसा खाकर रात-दिन बोझा ढोता है। इसी प्रकार के उदाहरण यत्र-तत्र आपको मिल जाएंगे। अपने बच्चों को तो साँप बिच्छू भी प्यार करते हैं वे भी उन्हें नहीं खाते।
मनुष्य जैसे समर्थ प्राणी का प्यार उसकी क्षमता, योग्यता व श्रेष्ठता के अनुरूप ही होना चाहिये। उसे प्रेम के श्रेष्ठतम शिखर पर चढ़ना चाहिये। प्यार में सम्बन्ध नहीं देखे जाते। केवल देना ही देना होता है। विश्व के लिये मोह, ममता और अहंकारजन्य सीमाबद्ध संकीर्णता को त्याग देना ही “उत्कृष्ट प्रेम” है। मेरा बेटा, मेरा भाई, मेरा मित्र मेरा परिचित, मेरा देशवासी इन सीमाओं से ऊपर उठता हुआ मानव एक दिन प्राणी मात्र के सुख में सुख व दुःख में दुःख होने लगेगा। उस दिन समझा जायेगा कि उसने प्रेम रूपी परमेश्वर के दर्शन कर लिये।
प्रेम प्रतिदान माँगें तो वह प्रेम ही कहाँ हुआ? वह तो सौदा हो गया। कुछ देकर लेने की चाह करना तो दुकानदार का काम है एक सच्चे प्रेमी का नहीं।
इस स्थिति में पहुँचने के लिए कोई प्रेम विद्या का विद्यालय है तो वह है लोक मंगल का क्षेत्र। युग की आवश्यकता को देखते हुए जो कुछ अपने पास है उसे धीरे-धीरे उनको देना जिनके पास कुछ भी नहीं है। इस प्रवृत्ति का विकास होते-होते वही अवस्था आ जाती है जिसे प्रेम कहा जा सकता है।
योग दर्शन का एक मूत्र है- “तपः स्वाध्याय, ईश्वर प्रणधाननि क्रियायोगः। अर्थात् क्रियायोग के तीन पक्ष हैं। (1) तप (2) स्वाध्याय (3) ईश्वर प्रणधान योग। साधना का यह क्रिया पक्ष है। अनेक प्रसंगों, विवादों संदर्भों में उलझने और अनेकानेक क्रिया-काण्डों में से किसे चुनना- यह कार्य बड़ा कठिन है। क्योंकि शास्त्रकार अपने-अपने प्रतिपादनों पर इतना जोर देते हैं कि विश्वासी के लिए वह सर्वोत्तम प्रतीत होता है। फिर जिज्ञासु के लिए अन्य ग्रन्थों को पढ़ने की भी मनाही नहीं है। उनका अवलोकन करने पर दूसरे पक्ष सामने आते हैं। इन पर अविश्वास कैसे किया जाय? वे ग्रन्थ और उनके लेखों को अप्रामाणिक कैसे कहा जाय? फिर भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि मनीषी या जिज्ञासु मिल कर कोई सर्वोपयोगी विधान निकाल लें और उसे विधान को सर्वमान्य करने का प्रयत्न करें। ऐसा सम्भव न होने पर जिज्ञासु के सामने यह कठिनाई आती है कि प्रतिपादनों, निर्धारणों की अनेकों दिशाएँ-धाराएँ होने के कारण यह कैसे सम्भव हो कि उनमें से किसी को सन्देह रहित होकर अपनाया जाय और जब तक समग्र विश्वास का समीकरण न हो तब तक उस कृत्य में सफलता कैसे मिले?
अध्यात्म मान्यताओं और साधना की विशिष्टता श्रद्धा विश्वास के आधार पर ही फलित होती है। इस धारणा में जब शास्त्रकार और गुरुजन ही परस्पर सहमत न हो पाये और जिज्ञासु के सम्मुख अनेक सिद्धान्तों का अनेक विधानों की हाट खोल कर रखें तब यह बड़ी कठिनाई होती है कि इनमें से किनका चयन किया जाय। निश्चय ही दिग्भ्रांत स्थिति में पड़ा हो तो किसी मार्ग को अपनाना कैसे बन पड़े। सन्देह सदा यही बना रहेगा कि जो किया जा रहा है वह भटकाव तो नहीं है। इसकी तुलना में यदि अन्य मार्ग अपनाया गया होता तो क्या बुरा होता?
इन कठिनाइयों में से निकालने वाले और साथ ही सरल, शक्य व्यावहारिक मार्ग ढूँढ़ने वाले के लिए योग दर्शन का उपरोक्त सूत्र बहुत ही उपयुक्त बैठता है जिसमें ‘क्रियायोग’ की व्याख्या करते हुए केवल तीन साधन बताये हैं। उन निर्देशनों का नाम क्रियायोग इसलिए दिया गया है कि वे व्यावहारिक जीवन में उतारने योग्य हैं उनमें ऐसे दुस्साहस नहीं करने पड़ते जैसे कि हठयोग आदि का अभ्यास में भूल-चूक रहने पर साधक को लाभ के स्थान पर घाटा देते और नये संकट में फँसाते हैं।
क्रियायोग के तीनों पक्ष ऐसे हैं जिनमें उतनी कठिनाई या उलझन नहीं है जिससे ऊँच नीच सोचनी पड़े और संकल्प विकल्पों के फेर में पड़ा रहना पड़े?
इन तीन में प्रथम है- ‘तप’। तप का अर्थ है तपाना। उस तरह जिस तरह कि धातुओं को शुद्ध करने के लिए उन्हें कसौटी पर कसा या आग में तपाया जाता है। इसके लिए कष्ट साध्य क्रियाएँ करने की आवश्यकता नहीं है। वरन् अपने असंयमी कुसंस्कारों में जूझना भर है। सर्वसाधारण के लिए ‘तप’ का अर्थ संयम होना चाहिए। वही सुलभ भी है। संयमशील व्यक्ति मन की दुर्वासनाओं से लड़ता है, पर हाथों हाथ उसका सत्परिणाम भी उपलब्ध करता है।
इन्द्रिय संयम- समय संयम- अर्थ संयम और विचार संयम का पालन करने में अपनी ही अस्त-व्यवस्थाओं से निपटना और उन्हें सुव्यवस्था के अनुशासन में बरतना पड़ता है। पुरानी आदतों को छोड़ने में कुछ समय तो अनख लगता है, पर सुव्यवस्था को व्यवहार में उतारते ही यह प्रतीत होने लगता है कि बर्बादी से बचकर सर्वतोमुखी प्रगति का मार्ग मिल गया।
नेकी, भलाई, पुण्य, परमार्थ, संयम, सदाचार के मार्ग पर चलने उद्धत बहुमत का उपहास विरोध भी सहना पड़ता है, किन्तु थोड़े ही दिन में जब उन्हें अपनी आदर्शवादिता परिपक्व दीखने लगती है तो सभी का मस्तक झुकता है और जन सम्मान एवं जन समर्थन मिलने में कमी नहीं पड़ती। परखा यही जाता है कि आदर्शवाद की बकवास, विज्ञापनबाजी की जा रही है या वस्तुतः उसे सच्चे मन से अपनाया गया है। यह प्रामाणिकता सिद्धान्तों के लिए कष्ट सहने के उपरान्त ही हस्तगत होती है।
दूसरा पक्ष है- स्वाध्याय। स्वाध्याय का तात्पर्य ऐसे युग मनीषियों के विचार प्रतिपादन पढ़ना है जो सामयिक समस्याओं का व्यवहारिक समाधान सुझाते हैं और चिन्तन, चरित्र, व्यवहार का स्तर ऊँचा उठाते हैं। ऐसी पुस्तकें युग मनीषियों द्वारा लिखी हुई हो सकती हैं। उसके लिए उन पुराने इतिहास पुराणों या निर्धारणों को पढ़ते रहने से उल्टा भ्रम जंजाल गले बंधता है, जो अब असामयिक हो गये। समय के साथ बहुत कुछ बदलता है, इसमें समाधानकारक विचारधारा भी सम्मिलित है।
जो पढ़ा या सुना है। उस पर निज का विचार मन्थन आवश्यक है। उसी के आधार पर यह समझा जा सकता है कि क्या ग्राह्य है क्या अग्राह्य। युग मनीषियों में भी मतभेद पाये जा सकते हैं। उनमें से जो सत्य विवेक और व्यवहार की दृष्टि से उपयुक्त जंचता हो। ऐसा साहित्य ही तलाशना और पड़ना चाहिए। इस संदर्भ में प्रज्ञा साहित्य से किसी भी विचारशील को अपेक्षाकृत अधिक औचित्य हस्तगत हो सकता है।
तीसरा मार्ग है- ईश्वर प्रणधान। ईश्वर क्या है? इसके सम्बन्ध में उसका विराट् ब्रह्मरूप सर्वोत्तम है। यह परमात्मा विश्व मानव या समष्टि ब्रह्म है। तुलसीदास जी ने इसी को ‘सियाराम मय सब जग जानी” कह कर प्रणाम किया और अपनाया था। कल्पित देवी देवताओं की अपेक्षा विश्वमानव को- आदर्शों के समुच्चय को आराध्य मानना प्रत्येक दृष्टि से उपयुक्त बैठता है। इसी के प्रति साधक का प्राणिधान- अर्थात् ईश्वर समर्पण करना चाहिए। समर्पण का तात्पर्य सेवारत होना है। विश्व सेवा का अर्थ है- आदर्शों का समर्थन और संवर्धन। इसका व्यावहारिक स्वरूप उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार से बन पड़ता है। आत्मपरिष्कार और लोक-मंगल ईश्वर भक्ति की दिशा में उठाये हुए सही कदम हैं।
तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणधान ही क्रियायोग है। यह अपेक्षातया अधिक सही है और सरल भी।
एक चुहिया, एक छिपकली, एक लोमड़ी एक बकरी चारों सहेलियां थीं। उन्हें मिल कर नदी पार करनी थी, पर पार जाने का कोई साधन न था।
नदी में एक मोटा कछुआ था। वह किनारे पर आया। तो चारों ने कहा। हम सच्ची सहेलियाँ हैं। एक दूसरे का साथ नहीं छोड़तीं। आप कृपा कर हम चारों को एक साथ उतार दें। कछुए को उनकी मित्रता बहुत भली लगी, उसने पीठ पर बिठाकर उतारने की बात स्वीकार कर ली। चारों बैठ गईं तो कछुआ चलने लगा।
कछुआ थोड़ी दूर चला होगा कि उसने कहा। इतने वजन को लेकर मैं नहीं चल सकता हूँ। तुममें से एक उतर जाओ। मुझ से चला नहीं जाता। चुहिया ने छिपकली को कमजोर देखा और पानी में धकेल दिया।
कुछ दूर चलने पर एक के और उतरने की माँग की। लोमड़ी ने चुहिया को कमजोर देखा तो उसे धकेल दिया। बकरी और लोमड़ी दो पीठ पर बैठी थीं। कछुए ने कहा। वजन भारी है एक को और धकेलना पड़ेगा। बकरी ने लोमड़ी धकेल दी। अकेली बकरी पीठ पर रह गई तो कछुए ने कहा। मुझे यह देखना था कि तुम सच्ची सहेलियाँ हो या झूठी। मजबूत ने कमजोर को गिराया तो मित्रता कहाँ रही? यह कह कर कछुए ने डुबकी लगाई और बकरी को भी नदी में बहा दिया।
एक ही मनुष्य में अक्सर दुहरा व्यक्तित्व पाया जाता है। कभी वह एक तरह सोचता है। कभी उससे भिन्न अथवा प्रतिकूल सोचने लगता है। इस दुहरे व्यक्तित्व का कारण भावनात्मक उतार-चढ़ाव अथवा नये-पुराने संस्कारों का मध्यवर्ती संघर्ष माना जाता रहा है। पर अब शरीर विज्ञान के शोधकर्ताओं ने मानवी मस्तिष्क के दो खण्डों का होना और दोनों की प्रकृति में भिन्नता रहना बताया है। ज्वार-भाटे की तरह यह उतार-चढ़ाव अपने आधिपत्य के समय अपना अधिकार जताते और चलाते हैं। यही दुहरा व्यक्तित्व है।
“क्या मानव शरीर में एक मन है या दो?” अजूबा लगने वाला प्रश्न आज से 20 वर्षों पूर्व नोबुल पुरस्कार विजेता राजर डब्लू. स्पेरी ने अपने आप से किया था। जब वह ऐसे मनःरोगियों पर कार्य कर रहे थे, जिनके मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों को जोड़ने वाला सेतु ‘कार्पस कैलासम’ अथवा ‘दी ग्रेट सेरीव्रल कमीशर’ शल्य क्रियान्तर्गत कट कर अलग हो गये थे। इस प्रक्रिया का कारण यह था कि यदि मस्तिष्क का एक भाग लकवाग्रस्त है तो यह रोग दूसरे भाग पर भी न हो जाय।
ऐसे रोगियों की जाँच करते समय स्पेरी ने यह पाया कि जब मस्तिष्क को दो गोलार्द्धों में विभक्त किया जाता है तो प्रत्येक गोलार्द्ध में अलग-अलग व्यक्तित्व की झलक पाई जाती है। प्रत्येक गोलार्द्ध की अपनी अलग स्मृति और अलग इच्छाशक्ति पाई गई जिसके फलस्वरूप दोनों गोलार्द्धों में स्पर्धा होने लगती है कि कौन-सा भाग शरीर पर अपना अधिकतम कब्जा जमा सकता है। नोबुल पुरस्कार विजेता के शब्दों में “विभाजित मस्तिष्कीय व्यक्तित्व इस प्रकार व्यवहार करता है जैसे प्रत्येक गोलार्द्ध का अपना अलग-अलग वाला निजी मन हो। इससे यह फलित होता है कि सामान्य स्थिति में मनुष्य जो अनुभव करता है वह इन दोनों मनों के संकलित होते हैं।
इस स्थिति का गहन अध्ययन करने से ऐसे प्रमाण उपलब्ध हुए हैं कि संकलित कार्यों का क्रमबद्ध लय होता है और इस लय को नियन्त्रित करने वाले तरीके भी हो सकते हैं।
एक प्रयोग में दोनों मस्तिष्कों का एक साथ ई. ई. जी. रिकार्ड किया गया। जब इन मस्तिष्कीय तरंगों की सूक्ष्म पड़ताल हुई तो पाया गया कि कुछ समय के लिए एक गोलार्द्ध का आधिपत्य होता है और यह अधिकार कुछ समय बाद दूसरे को दे दिया जाता है। प्रयोगों से पाया गया कि विभिन्न केसों में 25 मिनट से 200 मिनट तक या औसतन दो घण्टों तक इस क्रम का परिवर्तन होता है। सभी व्यक्तियों में तो यह परिवर्तन है ही, एक ही व्यक्ति के विभिन्न ई. ई. जी. भिन्न-भिन्न समयों में परिलक्षित हुए हैं। इस प्रकार के प्रयोग “स्क्रिप्स क्लीनिक के प्री क्लीनिकल न्यूरोसाइन्स एवं एण्डोक्राइनोलॉजी “प्रयोगशाला के निर्देशक फ्लाइड ई. ब्लूम एवं साडिन्गो स्थान (कैली वि. बि. के न्यूरोसाइन्स विभाग) में भी हुए हैं। बाँया गोलार्द्ध को, वाचिक नियन्त्रणकर्ता और दाहिनी को “स्पैशियल” अन्य क्रियाओं का नियन्त्रण कहा जाता है। आठ घण्टों तक लगातार एनकेफेलोग्राम द्वारा निरीक्षण होने पर पाया गया कि जब वाचिक नियन्त्रण गोलार्द्ध में क्रियाशीलता अधिकतम थी तब स्पैशियस में न्यूनतम। इसका उलटा भी पाया गया जबकि स्पैशियल में अधिकतम तो दूसरे में न्यूनतम सक्रियता थी। अत्यधिक क्रियाशीलता के का समय 90 मिनट से 100 मिनटों तक पाया गया।
हैलीफेक्स वि. वि. (कनाडा) के डलहौजी मनोविज्ञान विभाग में गोलार्द्धों की क्रियाशीलता के अध्ययन के साथ अनुसंधानकर्ताओं ने नाक के दोनों नथुनों से चलने वाले ‘नेशल साइकिल’ जैसे कि बांये या दाहिने नाड़ी से चलने वाली श्वास प्रश्वास का भी अध्ययन किया। दाँये बाँये नक्षत्रों से क्रम से चलने वाली श्वसन क्रिया और मस्तिष्कीय दोनों गोलार्द्धों में बारी-बारी वाली क्रियाशीलता का घनिष्ठ सम्बन्ध पाया गया। जो दाहिने नथुने से श्वसन होता रहता है तो बाँये गोलार्द्ध में ई.ई.जी. द्वारा अधिक क्रियाशीलता देखी जा सकती है। इसका उल्टा भी सही है अर्थात् बाँये नाड़ी से श्वसन क्रिया होते समय दाहिने गोलार्द्ध में अधिक क्रियाशीलता परिलक्षित हुई। इस तथ्य की जानकारी प्राप्त कर लेने से मस्तिष्कीय गोलार्द्धों की क्रियाशीलता को परिवर्तित करने का एक सूत्र हाथ लगा। यदि प्रयत्नों से बलपूर्वक दक्षिण स्वर को बांये में बदल दिया जाय, तो 10 या 15 मिनटों के अन्दर मस्तिष्कीय गोलार्ध का भी क्रम बदल जायेगा। दाहिनी भाव वाला गोलार्द्ध सक्रिय हो जायेगा।
यह निर्विवाद सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति का ‘मूड’ समय-समय पर बदलता रहता है। मूड बदलने के कारण का सूत्र नासिका से चलने वाली नाड़ी से सम्बन्धित है क्योंकि इस क्रम परिवर्तन के साथ मस्तिष्क के गोलार्द्धों की क्रियाशीलता और कार्य वैमिन्यता परिलक्षित होने लगती है। इस सूत्र के हाथ लगने से पहले जहाँ मूड ठीक करने के लिए अनेकानेक दवायें ली जाता थीं, वही कार्य स्वर परिवर्तन द्वारा आसानी से सम्पन्न हो सकता है।
अमेरिका में हाल में हुई एक कांफ्रेंस मस्तिष्क के विभिन्न गोलार्द्धों के अध्ययन तथा ‘लेटरलिटी साइकोपैथालाजी” पर हुई थी जिसके अध्यक्ष पीरी फ्लोर हैनरी ने बताया कि सभी मनःविक्षिप्त रोगियों में “बाइलेटरल सेरीब्रल डिसफंक्शन” मस्तिष्कीय गोलार्द्धों में असन्तुलन पाया गया है। जहाँ विषाद निराकरण हो वहाँ दाहिना गोलार्द्ध रोगग्रसित पाया गया। सीजोफेनिया या उन्माद के रोगियों में बाँया गोलार्द्ध क्षतिग्रस्त पाया गया। वे या तो अधिक या न्यूनतम सक्रिय थे।
स्वर विन्यास की जानकारी से शिक्षण प्रक्रिया में भी सहायता मिली है। क्रान्तिकारी परिवर्तन लाये गये। तर्क प्रधान भाषा गणित इत्यादि विषयों को समन्वय बांये गोलार्द्धों से है। इनमें पिछड़े बालकों को आगे बढ़ाने के लिए दाहिनी नाक से श्वसन का अभ्यास कराये जाने के सुझाव दिये गये हैं। भावनात्मक एवं सृजनात्मक क्रियाओं में पिछड़े बालकों को बाँई नाक से श्वसन का अभ्यास कराया जाना चाहिए क्योंकि इससे दाहिना मस्तिष्क अधिक क्रियाशील हो जाएगा। स्वर परिवर्तन से हम अपनी मानसिक क्षमताओं में परिवर्तन ला सकते हैं। इस दिशा में प्राचीनकाल से ही प्राणायाम, स्वर विधा, या हंसयोग का प्रावधान रहा है।
दोनों मस्तिष्क विभागों में एकरूपता लाने के लिए प्राणायाम उपचार विशेष रूप से फलप्रद पाया गया है। श्वास-प्रश्वास को विधिवत् चलाने का परिणाम यह होता है कि मस्तिष्क के दोनों भागों के बीच स्वसंचालित हेरा-फेरी पर अपना नियन्त्रण हो जाता है। दोनों भाग पराधीन होने के कारण अपनी मनमानी नहीं कर पाते। अध्यात्म शास्त्र के ज्ञाता कहते हैं कि प्राण को वश में करने से मन वश में हो जाता है। इसका तात्पर्य वही है जो आधुनिक वैज्ञानिकों में अपनी खोज प्रक्रिया के अंतर्गत पाया है। प्राणायाम द्वारा हम मन को वशवर्ती कर सकते हैं और उसे अभीष्ट मार्ग पर चलने के लिए बाधित कर सकते हैं।
बापू आनन्द भवन में ठहरे थे। प्रातः कुल्ला करने का समय बातचीत के लिए सुविधाजनक देखकर पं. जवाहर लाल नेहरू पानी लेकर स्वयं आए। बात-चीत में पूरा पानी खर्च हो गया। नया मंगाना पड़ा। बापू खिन्न हो रहे थे। पं. नेहरू ने कारण पूछा तो उनने कहा- ‘ध्यान न रहने से अधिक पानी खर्च हो गया।’
नेहरू जी हँसे और बोले- ‘यह गंगा यमुना का नगर है। आप थोड़े अधिक पानी खर्च कर लें तो भी हर्ज नहीं।’ बापू ने कहा- “गंगा यमुना मेरे ही लिए तो नहीं बनी हैं। हर व्यक्ति को सुविधाओं का उपयोग करते समय मितव्ययिता का ध्यान रखना चाहिए। “यह समष्टिवादी दृष्टिकोण अपनाकर ही हमें सबका ध्यान रखना है, तभी हम लोकहित की साधना कर सकते हैं।”
समर्थों का स्नेह-सान्निध्य या अनुग्रह उपलब्ध होने पर छोटों को, असमर्थों को लाभ-ही-लाभ रहता है। टिटहरी को समुद्र से अण्डे वापस लौटाने में यदि अगस्त्य मुनि का सहयोग न मिलता, तो जन्म भर समुद्र में चोंच भर कर बालू डालते रहने पर भी कृतकार्य न हो पाती। चन्दन वृक्ष के निकट उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी सुगन्धित हो जाते हैं। निजी प्रयत्न से कदाचित हो कोई उस प्रकार के लाभ से लाभान्वित हो पाता है।
स्वाति बूँदों की वर्षा से सीप में मोती, केले में कपूर, बाँस में बंशलोचन उत्पन्न हो जाने की उपलब्धियाँ हाथ लगती है। वैसा सुयोग न मिले, तो वे बेचारे यथा स्थिति में ही पड़े रहते हैं।
बेल जमीन पर फैल सकती है, क्योंकि उसकी कमर पतली होती है, किन्तु यदि उसे किसी पेड़ से लिपट जाने का अवसर मिल जाय, तो उतनी ऊंची उठ जाती है, जितना कि पेड़ ऊँचा होता है। बच्चे के हाथ में अपनी डोर थमा देने पर दस पैसे मूल्य वाली पतंग आकाश में बिहार करने लगती है। बाँस की पतली नली जब किसी वादक के हाथ लग लेती है, तो उसका सुन्दर स्वर असंख्यों का मन मोहता है, अन्यथा पतले बाँस का क्या उपयोग। उसकी निजी हैसियत कूड़ा ढोने की टोकरी बनने जितनी ही होती है। लकड़ी के तख्ते जब बढ़ई के हाथों नाव बनते और माँझी के द्वारा चलाये जाते हैं, तो वे नाव बनकर अथाह जलराशि पर तैरते और अपनी पीठ पर बिठा कर अनेकों को आये दिन इधर से उधर पार लगाते हैं। फूल खेत में खड़े रहते, सूखने पर मुरझा कर जमीन पर आ गिरते हैं, किन्तु यदि उन्हें माली का संयोग मिल जाय, तो गुलदस्ते के रूप में सज कर मेज पर बैठ सकते हैं एवं भगवान के गले का हार बन सकते हैं। संगति की महिमा ऐसी ही है। सान्निध्य का चमत्कार जितना समझा जा सके उतना ही कम है।
कोयले की दुकान पर बैठने से पकड़े काले होते हैं। काजल की कोठरी में घूमने पर कहीं-न-कहीं दाग लगता ही है, किन्तु इत्र बेचने वाले की दुकान पर जा बैठने पर नाक को सुगन्ध मिलती ही है, कपड़ों तक पर वैसी गन्ध आ जाती है। शराब का लेबल लगी शीशी में गंगाजल भरा होने पर भी उसे शराब माना जाता है, किन्तु गंगा जली के निमित्त बनने वाली विशेष प्रकार की शीशी में शराब भरी होने पर भी लोगों की दृष्टि में वह गंगाजल ही समझी जाती है।
कलार की दुकान पर बैठने वाले शराबी माने जाते हैं और वेश्या के घर से निकला हुआ पकड़ा सीने वाला दर्जी भी व्यभिचारी समझा जाता है, किन्तु देवालय में चटाई बिछाकर बैठे हुए भक्त माने जाते हैं और लाइब्रेरी में बैठने वाले अध्ययनशील।
नाले का पानी जब नदी में मिल जाता है, तो उसकी गन्दगी तिरोहित हो जाती है और पवित्र जल में उसकी गणना होती है। हिंस्र पशुओं के वन-क्षेत्र में भ्रमण करने वालों पर मरण का भय ही चढ़ा रहता है, पर भेड़ पालने वाले दूध, बच्चे और ऊन का लाभ उठाते हैं। यह संपर्क का ही लाभ है और भय है।
भगवान राम के सहायक होकर गिलहरी अजर अमर हो गई, केबट, शबरी और अहिल्या को शिला का उद्धार हो गया, नल-नील के पत्थर तैरने लगे और हनुमान पर्वत उखाड़ने, समुद्र लाँघने में समर्थ हो गये। यह संयोग न मिला होता, तो वे बेचारी पिछली गई गुजरी स्थिति में ही बने रहते। सुग्रीव को अपना खोया हुआ राज्य कैसे वापस मिलता और विभीषण को सिंहासनारूढ़ होने का अवसर कहाँ मिलता?
मेनका के संपर्क में विश्वामित्र बदनाम हो गये, शकुन्तला कन्व ऋषि के आश्रम में पलने पर चक्रवर्ती भरत की माता बनी। सीता रावण की, अशोक वाटिका में रहने भर से बदनाम हो गई। अग्नि परीक्षा दे दी, फिर भी धोबी द्वारा लाँछित की गई और इतने पर भी गृहत्याग को विवश की गईं, किन्तु जब वे वाल्मीकि के आश्रम में रहीं, तो न केवल वे स्वयं तपस्विनी बनी, वरन् अपने दोनों पुत्रों को भी इतना समर्थ बनाने में समर्थ हुईं जितना वे अयोध्या में रहकर कदाचित् ही बन पाते।
पाण्डव अपने दुर्गुणों से राज्यपाट और द्रौपदी जुए में हार गये थे, वनवास में मारे-मारे फिरते थे, किन्तु कृष्ण का सहयोग मिल जाने से महाभारत जीत सके और चक्रवर्ती शासक बन सके। रीछ कन्या जाम्वती और टेढ़े-मेढ़े-कुबड़े शरीर वाली कुब्जा कृष्ण पत्नी बनी। इसे सहयोग-समर्थन प्राप्त कर लेने के अतिरिक्त और क्या कहा जाय।
कालिदास के तोता-मैना संस्कृत में भाषण करते थे। दूसरी और “एक चन्दन पूजा में राखत एक घर वधिक परयौ” वाली उक्ति चरितार्थ होती भी देखी गई है। नारद के क्षणिक सान्निध्य-परामर्श से ध्रुव, प्रहलाद, वाल्मीकि, पार्वती, सावित्री आदि का स्तर कितना बदल गया। अम्बपाली, अंगुलिमाल, अशोक आदि को बुद्ध की समीपता ने काया-कल्प जैसी स्थिति में बदल दिया। दत्तात्रेय का कुत्ता और शिव जी का बैल पशु होते हुए भी देवताओं की श्रेणी में गिने गये।
निर्धन और अशिक्षित लड़की किसी सम्पन्न के साथ विवाह होने पर दूसरे ही दिन लाख-करोड़ की मालकिन बन जाती है। ऋषि पत्नियाँ उतनी तपस्वी और विद्वान न थीं, तो भी अपने पतियों की गरिमा के अनुरूप जगतवंद्य और परम सम्मानास्पद बनीं।
समर्थ के बिना शिवाजी क्या रह जाते। चाणक्य से विलग रहकर चंद्रगुप्त की क्या हैसियत रहती। परमहंस के बिना विवेकानन्द और विरजानन्द के बिना दयानन्द वह न बन पाते, जो बन गये। गाँधी से पृथक विनोबा की कितनी गरिमा रह जाती।
पारस छूकर लोहे का सोना बन जाने की बात प्रसिद्ध है। अमृत पीकर प्राणी अजर-अमर हो जाते हैं। कामधेनु का दूध पीने वाला कभी वृद्ध नहीं होता। कल्पवृक्ष की छाया में बैठने वाले आप्त काम बनते हैं।
संगति की महिमा अपार हैं। यदि आत्मा को परमात्मा का सान्निध्य मिलता है और वह उसी में समर्पित हो जाता है, तो आग के संपर्क में आते ही ईंधन में जिस प्रकार की ऊर्जा का आविर्भाव होता है, वैसी ही स्थिति जीव की, ब्रह्म के साथ मिलने पर हो जाती है। पानी जब दूध में मिल जाता है, तो दोनों एक भाव बिकते हैं। महामानवों के संपर्क में आते ही क्षुद्रता हटती और महानता की गरिमा सिर पर आ विराजती है। राजा के अर्दली की भी अपनी शान और इज्जत होती है। इसमें व्यक्तिगत प्रभाव कम और महानता के साथ जुड़ जाने की महिमा अधिक है। पृथ्वी को सूर्य का संतुलित अनुदान मिला और वह इतनी सुन्दर-सम्पन्न बन गयी, जितनी कि परिचित ग्रह-मण्डल में से किसी की भी वरिष्ठता नहीं दीखती। चन्द्रमा दूर होते हुए भी समुद्र में ज्वार-भाटे उठाता और अंधेरी रात को प्रकाशवान बनाता रहता है। यह महानता की गरिमा है, जो अपने संपर्क में आने वाले को अनायास ही प्रभावित करती है।
इस संसार में अनेक सुयोग और सौभाग्य हैं। उनके अपने-अपने लाभ एवं अनुदान भी हैं, पर श्रेष्ठता के साथ गुँथ जाने की महिमा अपनी है। उसकी तुलना में और कोई सौभाग्य नहीं हो सकता। हम अपनी पात्रता इतनी विकसित करें, कि सर्व सम्पन्न प्रभु के साथ अपनी तादात्म्यता स्थापित कर सकें, तो समझना चाहिए कि भाग्योदय हुआ और वह मिला जिसको भूरि-भूरि सराहा जा सके।
जीभ से निकले शब्द कानों से टकरा कर बिखर जाते हैं, पर हृदय की वाणी कलेजे में घुस बैठती है और फिर उखड़ने का नाम नहीं लेती।
हृदय गूँगा हो सकता है, पर आकाश बहरा होने की कल्पना नहीं की जा सकती।
संसार में धर्म सम्प्रदाय अनेक हैं। यों मूल धर्म एक ही है जिसे न्याय, विवेक, संयम, स्नेह आदि सदाशयताओं का सम्मिश्रण कहा जा सकता है। विभिन्न धर्म के मूलभूत सिद्धान्तों में भी इनका प्रतिपादन है फिर बहुत सम्प्रदाय धर्मों की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि पड़ी तो क्या वह उचित थी? और यदि उचित थी तो क्या वह औचित्य सदा सर्वदा बना भी रहेगा।
पुरातत्व वेत्ताओं का कथन है कि आदिम काल के मनुष्य में जब बुद्धि का विकास हुआ तो उसने अन्य प्राणियों की तरह यह नहीं माना कि जो कुछ चल रहा है सो ठीक है। वही नियति है। उसी का अनुसरण करते हुए समय काटना है। वरन् उसे प्रकृति की विचित्रताओं को देखते हुए यह सोचना पड़ा कि व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों में अन्तर होने का कोई अदृश्य कारण होना चाहिए। समय-समय पर बदलती हुई परिस्थितियों ने भी यह सोचने को बाधित किया कि कोई शक्ति ऐसी है जो समस्वरता का उल्लंघन करके उथल-पुथल उत्पन्न करती रहती है। ऐसी परिस्थितियों का आवागमन होता रहता है जो न तो स्वयं किसी निश्चित नियम पर चलती हैं और न सब मनुष्यों के प्राणियों के साथ एक जैसा व्यवहार करती हैं। उन दिनों यह सोचने का अवकाश नहीं था कि प्रकृति की संरचना ही गतिशील है। वह न स्वयं स्थिर रहती है और न किसी को स्थिर रहने देती है। प्रकृति और परमेश्वर का भेद भी उन दिनों उभर कर ऊपर नहीं आया था।
बौद्धिक विकास के प्रथम चरण में परिस्थितियों पर दृष्टिपात करते हुए मनुष्य ने सोचा कि विभिन्न परिस्थितियों को सम्भालने या बिगाड़ने वाली कोई अनेकानेक सत्ता है। जैसे अपने-अपने क्षेत्र में शासक राज्य करते हैं अथवा सेना के सेनाध्यक्ष, विभागों के अधिकारी अपने सीमा क्षेत्र में इच्छानुसार योजनाएँ बनाते बिगाड़ते रहते हैं, उसी प्रकार ऐसा ही अदृश्य क्षेत्र में, सूक्ष्म जगत में भी चलता है। कोई विचारवान शक्तियाँ संसार, में इच्छानुसार परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। उनके भी प्रियपात्र, कुछ उपेक्षित और कुछ प्रतिकूल होते हैं। इसी आधार पर किसी को किसी अवसर पर लाभ मिलता है तो किसी को किसी प्रयोजन में हानि उठानी पड़ती है।
यह अनुमान बढ़ता भी गया और परिपक्व भी होता गया। देववाद की यही उत्पत्ति है। उनका कोप हटाने और अनुग्रह हथियाने के लिए समझा गया कि उन्हें अपने पक्ष में लिया जाय। उनमें से कुछ का पल्ला पकड़ा जाय। मनौतियाँ मनाने और उसके लिए सहमत करने के लिए पूजा उपचार के द्वारा अनुकम्पा प्राप्त करने की बात सूझी और उस संदर्भ में विचार करते-करते एक समूचा ताना-बाना बुन गया। उसमें पूजा प्रमुख थी। न्याय की दलील देने जैसी कोई गुंजाइश नहीं समझी गई। क्योंकि तब “सामर्थ्य” को नहिं दोष गुसाईं” की मान्यता ने अपना स्थान सृष्टि व्यवस्था के रूप में बना लिया था। जब राजा ईश्वर के प्रतिनिधि बन गये और उनके निर्णय पत्थर की लकीर बन गये तो देवताओं के सम्बन्ध में ऐसी मान्यता बनाने में क्या अड़चन थी। मनुष्यों में सिद्ध पुरुष और देवताओं में पितर, यक्ष, आदि की अनेकानेक श्रेणियाँ विकसित कर लेना मनुष्य की उर्वर बुद्धि के लिए क्या कठिन था? मनुष्य का चित्त जादू का पिटारा है। कल्पना की वैसी ही उड़ानें उड़ना उसके बाँये हाथ का खेल है। अपने सम्बन्ध में ही नहीं, देवताओं की आकृति-प्रकृति, इच्छा, अनुकम्पा तथा प्रतिकूलता की विवेचना करने वाला एक समूचा शास्त्र विनिर्मित कर लेना, उसके बुद्धि कौशल का ही चमत्कार है।
मान्यताएँ आरम्भिक स्थिति में संदिग्ध होती हैं। उनकी यथार्थता के सम्बन्ध में संकल्प, विकल्प, और सम्भव असम्भव की बात भी उठती रहती है। पक्ष प्रतिपक्ष का विरोध, समर्थन भी चलता रहता है। किन्तु मान्यताएँ जितनी पुरानी होती हैं, प्रथा परम्पराएँ बन जाती हैं और उन्हें अपनाये रहने वाले के लिए सत्य स्तर की बन जाती हैं।
आगे चलकर इस संदर्भ में यह निर्धारण होता चला गया कि चिन्तन, चरित्र, व्यवहार- प्रथा प्रचलन के संदर्भ में किस देवता को क्या पसन्द है और क्या नापसन्द। अपने भक्तों को कुछ भी करने की छूट मिली और साथ ही यह आश्वासन उपलब्ध हुआ कि विपक्षी के प्रति चाहे जैसा दुर्व्यवहार किया जाय अपने द्वारा समर्पित देवता उसका हिमायत करेगा। मनौतियाँ मनाने में दोनों ही तथ्य सम्मिलित हुए अपने प्रति अभीष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति और जिसके साथ अपना द्वेष है उनके प्रति कुछ भी करने की मनमाने उत्पीड़न की छूट। कहीं-कहीं तो ऐसा भी सोचा गया कि देवता के नाम पर कुछ भी कर गुजरने से मनुष्य पाप का भागी नहीं बनता या उसे लोक परलोक में किसी प्रकार का दण्ड नहीं मिलता। तथाकथित धर्मशास्त्रों की विविधता में यही सब भरा पड़ा है।
आदिमकाल की देव मान्यता और उसके साथ जुड़ी हुई धर्म परम्परा इसी प्रकार के प्रतिपादनों से भरी पड़ी है। अपने-अपने देवता, अपने-अपने ग्रन्थ, अपने-अपने पूजा-पाठ के साथ-साथ अपने पराये का भाव भी बढ़ा। इसमें नीति अनीति को बाधक नहीं माना गया। जो जिस सम्प्रदाय का, देवता का अनुयायी है वह अपना और जिसकी मान्यताएँ भिन्न हैं, वह पराया। आमतौर से यही माना जाने लगा।
मानवी विवेक की इसके आगे की अगली सीढ़ी आती है। उसमें मनुष्य मात्र की एकता और समता का वेध हुआ। न्याय सबके लिए मौलिक अधिकारों में सम्मिलित हुआ। सद्भावना, सहकारिता और उदारता जैसे सद्गुणों के सम्बन्ध में कहा गया कि वे सर्वत्र समान रूप से व्यवहृत होने चाहिए। किसी वर्ग या व्यक्ति का शोषण उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। मिल-जुलकर रहने और मिल-बाँटकर खाने की नीति अपनाई जानी चाहिए। यह विवेकशीलता के नवयुग का प्रतिपादन है।
आदिमकालीन तथा मध्यकालीन मान्यताओं, प्रचलनों और मनौतियों का जब यथार्थता की कसौटी पर विश्लेषण हुआ तो समझा गया कि बहुत समय अन्धविश्वासों और मूढ़ मान्यताओं में निकल गया। धर्म सदाचरण एवं सज्जनता के साथ जुड़ा होना चाहिए और ईश्वर की दृष्टि से सज्जनता तथा सद्भावना का मूल्य होना चाहिए। इसी आधार पर उसकी प्रसन्नता, अप्रसन्नता भी होनी चाहिए।
इस विवेक की कसौटी पर खरी सिद्ध होने वाली मान्यताओं को धर्म धारणा कहा जाना चाहिए और जहाँ उपहार या मनुहार के बल पर दैवी अनुग्रह की धारणा है उसे अमान्य ठहराया जाना चाहिए। इसलिए विवेक का नवयुग के सम्बन्ध में उद्घोष है कि पक्षपात एवं आक्रोश पर आधारित सम्प्रदायों का समापन एवं न्याय पर विवेक का उद्भव होने का ठीक यही समय है।
कबीर अपने दरवाजे पर बैठे ग्रामवासियों को उपदेश दे रहे थे। तभी एक युवक ने पूछा- ‘महाराज! यह तो बताइये कि विवाह करना ठीक होता है या नहीं?’ कबीर एक क्षण चुप रहे फिर अपनी पत्नी को आवाज देकर बुलाया और कहा- ‘देख यहाँ बड़ा अन्धकार फैला है दीपक तो जलाकर ले आ।’ धर्मपत्नी घर गई और दीपक जलाकर ले आई। युवक हँसकर बोला- ‘महाराज! आप तो विलक्षण हैं ही, आपकी पत्नी भी खूब हैं। आप दिन तो रात बताते हैं तो पत्नी ने दीपक लाकर आपकी बात का समर्थन भी कर दिया। क्या खूब नाटक रहा।
कबीर हँसकर बोले- नाटक नहीं, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर। यदि युवक युवती एक दूसरे पर इतना प्रगाढ़ विश्वास रख सकें तो ही उन्हें विवाह करना चाहिए।
अनुकरण सहज है। वह बहुमत के पीछे चलने से सम्पन्न हो जाता है। अनुसरण कठिन है क्योंकि उसके लिए श्रेष्ठ और सत्पात्रों को ढूँढ़ना पड़ता है जो अल्पमत में तो सदा ही रहते हैं। कभी-कभी तो वे इतने कम हो जाते हैं जिन्हें अभाववत् समझा जा सके।
सरलता सब को प्रिय है। कम परिश्रम में भरपूर सुविधा की प्राप्ति यही प्राणी की इच्छा रहती है। इसकी पूर्ति हो भी जाती है। किन्तु होता तभी है जब उचित अनुचित का विचार न किया जाय। जिस राह पर अधिकाँश चलते हैं उसी पर चला जाय।
श्रेष्ठता और वरिष्ठता के लिए दूरवर्ती विवेकशीलता अपनानी पड़ती है। साथियों का सहयोग तकने से विमुख होना पड़ता है और वरिष्ठता की दिशा में एकाकी चल पड़ना पड़ता है।
उपलब्धियाँ समुचित श्रम के बदले मिलती हैं। किन्तु जिन्हें सुविधाओं की अत्यधिक ललक है। वे नीति अनीति के झंझट में नहीं पड़ते वरन् यह देखते हैं कि किस प्रकार सरलतापूर्वक अभीष्ट सुख साधन उपलब्ध हों। किन्तु प्रकृति के नियम कुछ और ही हैं।
बगुले कीड़े खाते हैं वे उन्हें किसी भी नमी की जगह में सरलतापूर्वक मिल जाते हैं। पर जिन्हें मोतियों की तलाश है उन्हें हंसों की रीति-नीति अपनानी और मानसरोवर तक दौड़ लगानी पड़ती है। हंसों के झुण्ड नहीं होते वे कदाचित् ही कहीं दीख पड़ते हैं। बगुलों के झुण्ड तालाबों और खेतों पर छाये रहते हैं। संख्या उन्हीं की अधिक है। बहुमत में वे ही हैं। उन्हीं की गतिविधियाँ सरलतापूर्वक देखी जाती हैं। पर हंस कहाँ रहते हैं, किस तेजी से उड़ते हैं, मानसरोवर में डुबकी लगाकर कितनी कठिनाई से मोती ढूँढ़ने और उन्हें चुगने का आनन्द लेते हैं, यह किन्हीं जानकारों से पूछकर या पुस्तकें पढ़कर ही जाना जा सकता है। बगुलों की तरह उनकी गतिविधियाँ सर्वत्र देखने को नहीं मिलतीं। इसलिए अनुकरण को सरल और अनुसरण को कठिन बताया गया है।
बहुमत प्रकृति प्रेरणा पर चलता है। भूख उनसे शारीरिक श्रम कराती है और यौवन की तरंगें मस्तिष्क की कामुकता की पूर्ति का ताना-बाना बुनने में लगती है। इसके उपरान्त जो क्षमता बचती है उसे कुदकने, फुदकने या आराम करने में लगाने की प्राणि प्रवृत्ति देखी जाती है। इसी धुरी पर सब का जीवन चक्र घूमा रहता है और समय आने पर उनका अन्त भी हो जाता है। यही सामान्य क्रम है। बहुतों का साथ सबको सुहाता है। चींटी दीमक तक की गतिविधियाँ अपनी जैसी गतिविधियों के लिए साक्षी ढूँढ़ लेती हैं। टिड्डी जब निकलती है तो खेतों और पेड़ों को पूरी तरह आच्छादित कर लेती है। किन्तु भ्रमर, और कोकिलों का गुँजन सुनने के लिए पुष्पोद्यान की तलाश करते हुए वहाँ तक पहुँचना पड़ता है। जबकि मक्खी मच्छरों के झुण्ड किसी भी गन्दी नाली के इर्द-गिर्द झुण्ड के झुण्ड भिनभिनाते हुए देखे जाते हैं।
लोग क्या करते हैं, क्या सोचते हैं? क्या चाहते हैं? इसका अन्वेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इन्द्रिय तृप्ति और मनोवाँछाओं की पूर्ति ही उन्हें अभीष्ट है। मनोवाँछाओं में वह वैभव चाहिए जो वासना और तृष्णा की पूर्ति करता है। अपना आतंक दूसरों पर जमाता है। श्रेष्ठता अपनाकर दूसरों की श्रद्धा और सद्भावना जीत सकना तो किसी किसी से ही वन पड़ता है। अधिकाँश अपनी आक्रामकता, दुष्टता के बलबूते आतंक उत्पन्न करते और डराकर अपना वर्चस्व जमाने का प्रयत्न करते हैं। यही है सामान्य लोगों की गतिविधियाँ जिन्हें लोभ, मोह और अहंकार से वर्गीकृत किया जा सकता है। इसके बाद भी कुछ क्षमता भी बच रहती है तो उसे आलस्य प्रमाद और दुर्व्यसनों में व्यतीत करते हैं। न्यूनाधिक मात्रा में यही है बहुजन जीवन की रूपरेखा।
जिन्हें दूरदर्शी प्रज्ञा प्राप्त नहीं है। वे भीड़ के साथ चलते हैं। अन्धानुकरण करते हैं। फलतः दुर्बुद्धि अपनाते कुकर्म करते और कृमि कीटक स्तर का जीवनयापन करते दुनिया में मत्स्य न्याय ही चलता है। बड़ी मछली छोटी को खाती है और फिर बचती बड़ी भी नहीं। मछुओं के जाल और डोंगे उन्हें भी बटोरते और फाड़-चीरकर खा जाते हैं। मत्स्य न्याय की तरह जंगल का कानून भी है। हिंस्र जन्तु भोली प्रकृति वालों पर आक्रमण करते और अपना दर्प दिखाते, आतंक जमाते दृष्टिगोचर होते हैं।
जिन्हें नर-पशु की तरह जीना है। उनके लिए यह बहुमत का अनुसरण ही पर्याप्त है। पेट और प्रजनन ही उनका प्रिय विषय और लक्ष्य है। परिणाम सोचने की उन्हें फुरसत नहीं। नियति के चक्र में बचकर मानवी गरिमा के सम्बन्ध में सोचने और अपनाने के लिए उनका मानस ही नहीं उमंगता। निकृष्ट योनियों के संचित कुसंस्कार ही उन पर हावी रहते हैं। वे ही उनकी इच्छा आकाँक्षा का निर्माण, निर्धारण करते हैं। वही उनका गतिचक्र है। मनुष्य शरीर मिल जाने पर भी सामान्य होने पर नर पशु की तरह और असामान्य होने पर नर पिशाच की तरह जीते हैं। ध्वंस और पतन ही उनकी दिशाधारा होती है। उसी में बहते हुए अपना दुर्भाग्यपूर्ण अन्त करते हैं।
मनुष्यों में जो विशिष्ट और वरिष्ठ है। उन्हें जनसाधारण का अनुकरण करने की ललक को जीतना पड़ता है और वह मार्ग अपनाते हैं जो महामानवों ने अपनाया। किन्तु कठिनाई यह है कि अपने चारों ओर हेय जीवन ही बिखरा दीखता है। सरल यही पड़ता है कि इसी हेय वर्ग की गतिविधियों का अनुकरण किया जाय। उन्हीं के संकेतों और परामर्शों का अनुगमन किया जाय। मनुष्य एक दूसरे को इसी प्रकार पतन की दिशा में खींचता और धकेलता है। शुभ चिन्तन, हितैषी, कुटुम्बी, मित्र कहलाने वाले भी यही करते हैं जो उनने समझा, अपनाया और किया है उसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की शिक्षा वे दें तो दें भी कैसे? जिनने आदर्शों की मात्र चर्चा सुनी है। उस मार्ग पर प्रत्यक्षतः एक कदम भी नहीं उठाया, उनसे यह आशा करना कि वे सच्चे मन से किसी को श्रेष्ठता के उस मार्ग पर चलने का प्रयत्न करेंगे या सफल होंगे, आशा नहीं ही की जा सकती। वे स्वयं जिस प्रकार घिनौनेपन को अन्तरंग और बहिरंग में धारण किये रहे हैं। उनसे भिन्न प्रकार के परामर्श या सहयोग की आशा करना भी व्यर्थ है।
अनुसरण के लिए उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों की तलाश करनी पड़ती है। पर वे मिलते नहीं। ऐसी दशा में विश्व इतिहास के पुष्पोद्यान में खिले हुए परिजात पुष्पों को ही ढूँढ़ना पड़ता है। चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की आदर्शवादिता और व्यवहार की शालीनता जिनने व्यवहार में अपनाई हो उन्हें खोजने के लिए हमें इतिहास के पृष्ठ पढ़ने और महामानवों के जीवन क्रम ढूँढ़ने पड़ेंगे। आज की स्थिति में भी वे कहीं-कहीं हो सकते हैं पर उन्हें इतनी सूक्ष्म बुद्धि और गहन तत्परता से ढूँढ़ना होगा जैसे पर्वत शिखरों पर उगे हुए ब्रह्म कमलों को असाधारण प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ना पड़ता है। अनुसरण ऐसों का ही किया जाता है। उन्हें खोज निकालना भी किसी शोध प्रबन्ध के लेखन में अनुसन्धान भरी सफलता प्राप्त करने के ही समतुल्य है।
चमकने वाले लोग आकर्षित तो विशेष रूप से करते हैं, पर उनके पीछे विषाक्तता के खतरे भी इतने छिपे पाये जाते हैं कि उनकी ओर खिंच जाना और भी अधिक अनर्थ का कारण बनता है।
मुर्दे की चिता से ऊँची लपटें उठती दीखती हैं। सर्प का काय कलेवर कैसा सुहावना लगता है। छुरे की धार कैसी चमचमाती है। इनके समीप जाने और संपर्क साधने को मन सहज ही करता है। पर इन तथाकथित बड़े आदमियों की स्थिति और भी बुरी होती है। उनका वैभव आकर्षण ऐसा लगता है मानों यह पारस जैसे हो और उनके संपर्क में आने से हमें भी ऊँचा उठने का रास्ता मिलेगा किन्तु दुर्भाग्य यह है कि पानी में भँवरों और हवा में देखे जाने वाले चक्रवातों की तरह इनमें छद्म और प्रवंच सिखाने की ही क्षमता होती है क्योंकि वे स्वयं इसी आधार पर अवलम्बन करके बड़े बने होते हैं। पतन उनमें पाया जाता है जो हेय हैं, दीन दयनीय हैं। पर साथ ही बड़े भी ऐसे ही दिखाई पड़ते हैं जिनने आडम्बर बनाकर अनेकों का शोषण किया है। तथाकथित बड़े आदमी भी प्रकारान्तर से हमें जो सिखाते हैं वह क्षुद्र जनों की नीचता से कम भयंकर नहीं होता।
ऐसी दशा में प्रश्न यही रह जाता है कि ‘अनुसरण’ किसका करें, इसके लिए हमें खरा सोना परखने के लिए दहकती आग और सही कसौटी को आगे करना और उत्कृष्टता का पता लगाना पड़ेगा। यह जीवित मनुष्यों में भी कभी-कभी मिल जाती है। पर उनमें खतरा ही रहता है किन्तु चमकने वाला काँच वही चमक आने पर मात्र काँच पर नकली हीरा ही साबित न हो। मृत्यु ही जीवन के अध्याय की पूर्णता है। उसी के आधार पर यह जाना जाता है कि निजी जीवन की आदर्शवादिता और लोक व्यवहार में परमार्थ परायणता कितनी खरी और कितनी सही साबित हुई। इससे पूर्व यह आशंका ही रहती है कि कहीं जोरों से दहाड़ने वाले ढोल के भीतर खोखली चालें ही न भरी हों। यह आशंका इन दिनों और भी अधिक बढ़ गई है। लोगों ने विडम्बनाओं के अन्यान्य धन्धे जानकारी में आते जाने के कारण यह नई शैली अपनाई है कि अपने को भगवत् भक्त, या परमार्थ परायण लोकसेवी सिद्ध करें और इस आड़ में भावुक लोगों को चंगुल में फँसाकर अपना उल्लू सीधा करें। यह एक विचित्र समस्या है कि परमार्थ प्रदर्शन की आड़ में भी अब छल छद्म ने अपना विस्तार और जंजाल काफी मजबूत कर लिया है।
ऐसी दिशा में बिना जोखिम का क्षेत्र एक ही हो सकता है कि जिनने आदि से लेकर अन्त तक का अपना स्वरूप स्पष्ट कर दिया। हर कसौटी पर खरे सिद्ध होते रहे। उन दिवंगत महामानवों को अपना आदर्श माना जाय। उन पर श्रद्धा केन्द्रित की जाय और यथासम्भव उन्हीं के परखे हुए मार्ग का अनुसरण किया जाय। व्यक्तिगत जीवन की आदर्शवादिता क्रिया-कलापों से बढ़चढ़कर आदर्शवादिता, और समय के अनुरूप क्रिया की गतिशीलता यह तीनों ही तथ्य जिनके जीवन में कितनी सीमा तक चरितार्थ हुए, उन्हें उसी अनुपात से श्रद्धा भाजन माना जाय और अन्तःकरण में श्रेष्ठता का अवलंबन करने का उत्साह उठे तो उन्हीं लोगों की दिशाधारा का अवलम्बन किया जाय। भले ही वे शरीर धारण किये हुए हों या उसका परित्याग कर चुके हों।
महामानवों का अनुसरण ही हमारे लिए श्रेयस्कर है। उन्हीं की तरह अपनी जीवनचर्या का स्वरूप निर्धारित करें और उस लक्ष्य तक पहुँचें, जहाँ तक वे पहुँच चुके। इसी में अपनी विवेकशीलता और जीवनचर्या की सार्थकता है। न हमें उदर परायणों, दीन-हीनों की तरह जीना चाहिए और न उन पाखण्डियों की तरह जो अपनी कथनी और करनी में जमीन आसमान जैसा अन्तर बनाये रह रहे हैं।
बीता कल अहंकार में भरा हुआ था और अपनी कृतियों का बढ़-चढ़कर बखान कर रहा था।
इतने में भविष्य भी आ पहुँचा और अपनी सम्भावनाओं की भयंकरता और सुसम्भावनाओं से भरे-पूरे होने की बातें बढ़कर करने लगा।
महाकाल ने भूत से पूछा, ‘जो तुमने किया उसका समय बताओ?’ साथ ही उसने भविष्य से कहा- ‘तुम जो कुछ करने वाले हो वह कब करोगे? यह तो बताओ?’
आज चुप बैठा था। बारी आने पर उसने मुँह खोला और कहा यह दोनों ही अपना पौरुष तभी दिखा पायें या दिखा पायेंगे जब वर्तमान की स्थिति में होंगे।
आज की महत्ता समझी गई और उसे भूत और भविष्य ने झुककर प्रणाम किया।
कहा जाता है कि स्वर्ग में एक कल्पवृक्ष है। उसके नीचे जो भी बैठते हैं उन सभी की कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। कल्पनाओं को, इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है कल्प वृक्ष। वह देव लोक में ही उगा और स्थिर रहा है। उसको पातालवासी दैत्य-नाग अपने यहाँ ले जाने का प्रयत्न करते रहे पर उनकी इच्छा पूर्ण हुई ही नहीं। कल्प वृक्ष टस से मस नहीं हुआ। वहाँ के वातावरण की उसे कल्पना जानकारी थी। इसलिए वहाँ जाने या रहने के लिए वह तैयार नहीं हुआ।
कल्पवृक्ष क्या है? इसका यथार्थ ज्ञान करने के लिए हमें यह समझना चाहिए कि वह कोई पेड़ नहीं है। पेड़ों के लिए तो अपनी धरती ही उपयुक्त है : स्वर्ग या पाताल में ऐसी भूमि नहीं है जिनमें पेड़-पौधे उग सकें और न ही सम्भव है कि किसी पेड़ के नीचे बैठने भर से लोगों की इच्छाएँ पूरी हो जाया करें। यदि ऐसा हुआ होता तो किसी को पात्रता, योग्यता बढ़ाने और पराक्रम करने, साधन जुटाने की क्या आवश्यकता पड़ती। फिर तो बिना योग्यता, बिना परिश्रम के ही लोग अपने-अपने मनोरथ पूरे कर ले जाया करते। यह असम्भव है। कल्पवृक्ष एक अलंकारिक शब्द है जिसका अर्थ है कल्पनाओं, कामनाओं को पूरा करने का केन्द्र एवं तरीका। मनुष्य का जीवन ही कल्पवृक्ष है। उसकी जड़ें, तना, टहनियां, पत्ता, फल फूल सभी ऐसे हैं कि उनका यदि ठीक तरह उपयोग किया जाय तो व्यक्ति के मन में ऐसी ही कल्पनाएँ कामनाएँ उठेंगी जो उचित परिश्रम करने और अनुरूप व्यक्तित्व निखारने के उपरान्त सहज ही पूरी हो सकती हैं। श्रम से क्या नहीं हो सकता? प्रयास की उपयुक्तता क्या सम्भव करके दिखा नहीं सकती। संसार में ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिनने असम्भव को सम्भव करके दिखाया। यह कोई जादू चमत्कार नहीं हैं। देव-दानवों की सहायता से भी ऐसा नहीं बन पड़ता, किन्तु पुरुषार्थी गंगा को स्वर्ग से उतार कर भागीरथ की तरह जमीन पर ला सकते हैं। अर्जुन की तरह जमीन में तीर मारकर पानी को उछाल कर भीष्म की प्यास बुझाया करते हैं। अगस्त्य की तरह समुद्र सोख सकते हैं। हनुमान की तरह पर्वत उखाड़ सकते हैं। नल नील की तरह समुद्र पर सेतु बना सकते हैं। मनुष्य की सामर्थ्य असीम है। जिस प्रकार परमाणुओं में अनन्त शक्ति का भण्डार भरा है और उनके विस्फोट होते ही तहलका मच सकता है। उसी प्रकार मनुष्यों में से प्रत्येक में वह सामर्थ्य भरी पड़ी है जिसके सहारे कठिन से कठिन कार्य सरल हो सकते हैं।
जीवन के प्रत्येक घटक में ऐसी ऊर्जा भरी पड़ी है कि उसे जिस भी दिशा में बढ़ा दिया जाय उसी दिशा में तूफानी गति से बढ़ चलने का उपक्रम बन सकता है। यह निश्चय करना मनुष्य का अपना काम है कि उसे किस दिशा में मोड़े और बढ़ाये। वह चाहे तो उसे दुष्ट-दुरात्मा, नीच, पापी और पाखण्डी के रूप में अपने को अग्रसर कर सकता है और उस संदर्भ में भी इतनी सफलता प्राप्त कर सकता है जिसे देख सुनकर रोमांच हो उठे। वह चाहे तो उत्कृष्टता को भी इस सीमा तक धारण कर सकता है कि उसे शत-शत नमन करना पड़े और असंख्यों को भावभरी प्रेरणा तथा दिशा मिले।
हमारी अपनी कल्पनाएँ दुष्ट और भ्रष्ट भी हो सकती हैं, आकाँक्षाएँ निकृष्ट भी हो सकती हैं। पराक्रम से किसी हद तक उसे कार्यान्वित भी किया जा सकता है, पर अन्ततः उनका बुरा परिणाम होना निश्चित है। कुकर्म नरक की कीचड़ में ही घसीट ले जाते हैं। स्वर्ग में अवस्थिति कल्पवृक्ष का लाभ उन्हें ही मिलता है, जिनका लक्ष्य-प्रयोजन उच्चस्तरीय हो, जो ऊंचा सोचे और आदर्शों को अपनाये।
मनुष्य एक काय कलेवर है। जिसे घोंसले की उपमा दी जा सकती है। घोंसले की आकृतियों में थोड़ा बहुत अन्तर हो सकता है। किन्तु उसमें रहते पक्षी हैं। इन पक्षियों की आकृति एवं प्रकृति भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है और उनके नाम भी अलग-अलग। फिर भी उनकी बिरादरी पक्षियों में ही गिनी जाती है।
मनुष्यों के शरीर प्रायः एक जैसे ही होते हैं। गोरे काले, लम्बे, ठिगने का अन्तर भले ही दीख पड़ता हो, पर उन सबको कहा मनुष्य ही जाता है। इतने पर भी उनकी प्रकृति में जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है। उनमें से कुछ पशु प्रवृत्ति के होते हैं। मूर्ख, अनपढ़, कुसंस्कारी। इन्हें मात्र अपने पेट-प्रजनन से सम्बन्ध होता है। उन्हें किसी गरीब विधवा का खेत चर जाने में भी संकोच नहीं होता। माता, भगिनी, पुत्री के बीच कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता। वे इनमें से जो भी वयस्क हो उसे पत्नी भाव से देखते हैं। समर्थों से डरकर जान बचाते हैं और असमर्थों का हक छीनने में उन्हें चोट पहुँचाने में कोई संकोच नहीं करते। अपने स्वार्थ के अतिरिक्त और किसी की परवा नहीं करते। यह पशु-प्रवृत्ति है।
इससे भी गई बीती एक श्रेणी पिशाचों की होती है। पिशाच वे जो डरते-डराते, जलते-जलाते जीवन व्यतीत करते हैं। उनके आनन्द विनोद का एक ही केन्द्र होता है- पर पीड़न। दूसरों को बिलखते, चीखते-चिल्लाते काँपते, प्राण छोड़ने देखकर जिनके आनन्द का ठिकाना नहीं रहता। जीवों की हिंसा करते हुए शिकार खेलने में, तड़पाने और जान लेने में जिन्हें अपना पौरुष पुरुषार्थ प्रतीत होता है। दो को लड़ा देने में, विग्रह खड़ा करने में उन्हें इसलिए मजा आता है कि दोनों पक्ष उनका लोहा मानें और किसी प्रकार वे उस झंझट से निकलने में अनुग्रह पूर्वक सहायता माँगें। दो में से जो जीतता है उसे अपनी सहायता बताते हैं और जो हारते हैं उनसे कहते हैं, “हमारी उपेक्षा की मजा देख लिया।” विवश और बाधित करके अनुचित लाभ उठाना। मनुष्यों में से कोई हाथ न पड़ रहा हो तो भैंसे, मेंढ़े, मुर्गे, तीतर आदि लड़ाकर उनके लहू-लुहान होकर मजा देखना। लोगों को किसी प्रकार ठगना और उस कमाई को दुर्व्यसनों में उलीचते रहना। यही होता है उनका दैनिक कृत्य। ऐसे ही, घिनौने कामों में अपना दर्प प्रदर्शित करते हुए जीवन बिता देते हैं। इसे पिशाच वर्ग कहा जा सकता है। यों होते वे भी मनुष्य आकृति के ही हैं।
बलगारिया के शोधकर्ता व्राम स्टोकर ने पाँच वर्ष पूर्व के नर पिशाच ड्रैकुला की नृशंसताओं का संकलन किया है और उसके द्वारा किये गये कृत्यों का रोमांचकारी वर्णन किया है। ड्रैकुला रूपानिया के बोरेसिया स्थान को राजधानी बनाकर शासन करता था। उसकी रक्त पिपासा ऐसी थी कि दोषी व निर्दोषों को आये दिन शूली पर चढ़वाया करता था। उसने विशाल सेना खड़ी की थी। पड़ौसी राज्यों पर अकस्मात ही चढ़ दौड़ता था और प्रजा का कत्लेआम करता हुआ राज्य कोष में जो कुछ होता ढोकर अपने यहाँ ले आता था। विशेष सैनिकों को छल बल से पकड़ कर उन्हें खम्भों में जड़ाता और अपने देश की सीमा के चारों ओर उन्हें बाड की तरह खड़ा कर देता ताकि पड़ौसी देशों के सिपाही उस पर प्रतिशोधात्मक हमला करने का साहस न करें। पकड़े हुए सैनिकों और प्रजाजनों को शिविर में बन्द करके वह आग लगवा देता और जीवित जलते हुए विशाल जन समुदाय की चीत्कारें सुन कर खुशी से चीख उठता।
कहते हैं कि उसने अपनी प्रौढ़ावस्था होने तक एक लाख से अधिक लोगों को अकारण मौत के घाट उतारा था। अपने लिए प्रायः दो हजार कमलों का एक विशाल भवन बनवाया। जिसमें वह अपने अंगरक्षकों के साथ अकेला रहता। जब मरा तो उसके नाक, कान, मुँह, आँख आदि सभी अंगों से खून की धार बहती रही। सियार, कुत्ते और गिद्ध उसकी मरणासन्न लाश के चारों ओर जमा हो गये और अपनी-अपनी बोली में भयंकर कर्णकटुनाद करते रहे। ताबूत दफना दिया गया तो उस पर चीलें और चमगादड़ें ही पर फैलाये बैठी रहतीं। बनाये मुहल्लों में बसने की घुसने की किसी की हिम्मत न पड़ती। उसमें चमगादड़े ही इकट्ठी हो गई थीं जो रात भर असामान्य कर्कश स्वर में बोलती थीं।
व्राम स्टोकर के उस इतिहास ग्रन्थ के आधार पर कई फिल्में बनाई गईं। वे जहाँ भी दिखाई गईं दर्शक काँपने लगते और सिसकियां भरने लगते फिर भी उन कुकृत्यों को देखने वालों की कमी नहीं रही। पाँच सौ वर्ष पुरानी उस वीभत्स घटना का महल देखने के लिए दुनिया भर के लोग पहुँचते हैं और उससे रूमानिया सरकार को दो करोड़ डालर की प्रतिवर्ष टिकट आमदनी होती है।
बात पुरानी हो गई पर जिन्होंने वह विवरण पुस्तकों में पढ़ा, फिल्मों में देखा है वे रात-रात बेचैन पाये जाते हैं और नींद खो बैठते हैं। इससे आगे पीछे भी अनेक नर पिशाच रक्त पिपाशु पैदा होते रहे। पर उनके कृत्य भुला दिये गये। ड्रैकुला का कथानक विज्ञापन की परिधि में आ गया इसलिए उसे सर्वविदित होने में देर न लगी। छोटे रूप में ऐसे ही ड्रैकुला अपने दुष्कृत्यों से आतंक उत्पन्न करते और मनुष्य जाति की गरिमा पर कलंक पोतते रहते हैं।
मनुष्यों में मनुष्य वे हैं जो सुयोग्य नागरिकों की तरह जीवनयापन करते हैं। अधिकारों को उपलब्ध करने के लिए संघर्ष करना जानते हैं और अपने कर्त्तव्यों को कभी भी नहीं भूलते। जो समझदारी से काम लेते हैं। ईमानदारी से निर्वाह करते हैं। जिम्मेदारी निबाहने में पीछे नहीं हटते और बहादुरी, हिम्मत और उदासी के प्रति जूझने की हिम्मत उनके रोम-रोम में भरी होती है।
मनुष्यों में ही एक और भी श्रेणी है- देव। उनके मन पर एक ही विचार छाया रहता है कि परमात्मा की इस सृष्टि को सुन्दर, सुविकसित और सुसंस्कृत बनाने के लिए अपने सर्वस्व का समर्पण किस प्रकार किया जा सकता है। धन न सही, साधन न सही। पर समय, श्रम, ज्ञान, प्रतिभा तो हर किसी के पास है। औसत नागरिक की तरह निर्वाह करने के उपरान्त जो कुछ बचता है उसे इस धरती को स्वर्गोपम बनाने के लिए अधिक से अधिक त्याग बलिदान किस प्रकार किया जा सकता है। यह कामना जितनी तृप्त होती है, कार्यान्वित बन पड़ती है, उतना ही वे प्रफुल्लित पुलकित होते हैं।
देव मानव वे हैं जिनकी जीवन गाथा में पिछड़ों को उठाने, उठतों को बढ़ाने और डूबतों को उबार कर कन्धे पर रखकर पार उतारने की गाथाएँ घटनाक्रम के रूप में पढ़ी और सुनी जाती हैं। जो कथन कम करते हैं, किन्तु अपने चरित्र का ऐसा आलीशान स्मारक छोड़ जाते हैं जिसे देखने वाले अनुकरण के लिए लालायित होते रहें और अभिनन्दनीय यश गाथाएँ कहते, सुनते आनन्द विभोर होते रहें।
दानव, पिशाच, मनुष्य और देव चारों ही प्रकृति के मनुष्य पाये जाते हैं। वे किसी और के बनाये हुए नहीं होते स्वेच्छापूर्वक ही मार्ग चुनते और जैसा बोते वैसा काटते हैं।
सन्त एकनाथ विनम्रता की मूर्ति थे। कुढ़ने वालों ने षडयन्त्र किया कि जो कोई एकनाथ को क्रुद्ध कर दे उसे पचास मुद्रा पुरस्कार मिलेंगे। एक उद्दण्ड व्यक्ति तैयार हो गया। वह सीधा मन्दिर पहुँचा जहाँ एकनाथ अपना जप, ध्यान कर रहे थे। वह उनकी पीठ पर चढ़ बैठा और गालियों के साथ घूँसे लगाने लगा। एकनाथ ने पीछे देखा और हँसकर कहा- “तुम मेरे सघन मित्र निकले। इतने प्रेम से तो कोई छाती से नहीं मिला था। अब आपका मेरे साथ घर चलकर भोजन भी करना पड़ेगा। उपद्रवी गद्-गद् हो गया।
बोल-चाल की भाषा में प्राण को- प्राण वायु समझा जाता है। पर वह वस्तुतः एक जीवन्त विद्युत शक्ति है जो इस विशाल ब्रह्मांड में ‘ईथर’ तत्व की तरह सूक्ष्म स्थिति में समाई हुई है। वह वायु से सूक्ष्म है। यद्यपि वैज्ञानिकों की पहुँच अभी ऑक्सीजन तक ही हुई है और वे उसी को प्राण कहते चले आते हैं। यह ठीक है कि ऑक्सीजन का अंश वायु में मिला होने से ही शरीर की भट्टी धधकती है और ज्योति जलती है। इसके अभाव में क्षण भर में दम फूल जाता है और मृत्यु हो जाती है। इतने पर भी यह मानना पड़ेगा कि जीवन ऊर्जा इससे कहीं ऊपर है और उसकी शक्ति तथा स्थिति की सूक्ष्म उत्कृष्टता माननी पड़ती है क्योंकि उसके साथ जीवन तत्व घुला हुआ जो सचेतन है। ऑक्सीजन तो भौतिक जगत का एक पदार्थ है जो वायु के साथ घुला हुआ पाया जाता है। वह प्राण वायु नहीं है। यदि वैसी बात रही होती तो मृत व्यक्ति को ऑक्सीजन के सिलेण्डरों से जीवित रखा जा सकता था।
शरीर शास्त्री कहते हैं कि गहरी साँस लेने से फेफड़ों में अधिक वायु भरती है। शरीर का प्रत्येक अंग उसका लाभ उठाता है। श्वसन तन्त्र मजबूत होता है और फेफड़ों के क्षय होने जैसी आशंका नहीं रहती। इसलिए शारीरिक प्राणायाम इतना ही है कि सीने को झुकाकर न बैठा न चला जाय। सीना चौड़ा और सीधा रखा जाय। जितनी गहरी साँस ली जा सके उतनी झटके से नहीं वरन् धीरे-धीरे ली जाय। इसके उपरान्त थोड़ा ही रुककर वायु को फिर धीरे-धीरे बाहर निकालकर फेफड़े पूरी तरह खाली कर दिये जाएं। यह क्रम बराबर दुहराया जाता रहे तो शरीर को वायु माध्यम से अधिक पोषण मिलेगा। रक्त की सफाई में इससे योगदान मिलेगा और स्वास्थ्य ठीक रहेगा। बहुत से लोग हलकी उथली साँस लेने के कारण ही अस्वस्थ होते हैं। पर्याप्त मात्रा में अवयवों का पोषण न मिलने से वे अशक्त होते जाते हैं। इसी प्रकार उत्पन्न होती रहने वाली मलीनता की जितनी सफाई गहरी साँस के आधार पर होनी चाहिए उतनी नहीं हो पाती। वैज्ञानिकों की प्राणायाम प्रक्रिया इसी आधार पर चलती है वे साँस नाक से ही लेने पर जोर देते हैं और मुँह से लेने के लिए मना करते हैं। मुँह से ली हुई साँस बिना छने सीधी कंठ के रास्ते फेफड़ों में उतर जाती है और उसका तापमान फेफड़ों की तुलना में न्यूनाधिक होता है जबकि नाक से साँस लेने पर वह नाक के वालों द्वारा छनती जाती है। धूल आदि के कण उन्हीं में उलझे रह जाते हैं। मस्तिष्क में सीधा पोषण मिलता है। इन सब लाभों को देखते हुए नाक से साँस लेना ही उपयुक्त है। पूरी साँस ली जा सके इसलिए सीने चौड़ा और सीधा रखना चाहिए। चलते समय पैर उठाने की तरह हाथों को भी आगे-पीछे हिलाते रहने का क्रम चलाना चाहिए। साँस लेने की यह अच्छी आदत ही शारीरिक दृष्टि से उपयुक्त प्राणायाम है।
किन्तु अध्यात्म प्रयोजनों में मात्र इतने से ही काम नहीं चलता। ब्रह्माण्डव्यापी प्राण चेतना का अधिकाधिक अंश अपने भीतर आकर्षित करना और उसको धारण करना शरीर की जीवनी शक्ति बढ़ाना है। जीवनी शक्ति साहसिकता, कार्यों में तत्परता एवं प्रतिभा के रूप में परिलक्षित होती है। इस तत्व में अधिक निरोग बलिष्ठ और दीर्घ जीवन प्रदान करने की भी क्षमता है। वह समग्र व्यक्तित्व को विकसित करने के भी काम आता है।
प्राण को प्रकृति और चेतना का सम्मिश्रण कह सकते हैं। वह व्यापक होने के कारण अन्तरिक्ष में तो विपुल मात्रा में भरा हुआ है। इसके अतिरिक्त जल थल में भी उसका अस्तित्व है। जहाँ ऑक्सीजन की पहुँच नहीं है वहाँ भी प्राण चेतना का अस्तित्व पाया जाता है। उसकी आवश्यकता शरीर पोषण से भी अधिक मनोबल बढ़ाने में पड़ती है।
सामान्य सरल प्राणायाम की विधि यह है कि पालथी लगाकर या अभ्यास हो तो पद्मासन में बैठना चाहिए। मेरुदण्ड सीधा रहे, पीठ और सिर के पिछले भाग की सीध एक रहे। इस प्रकार सीना स्वभावतः चौड़ी स्थिति में रहेगा।
आध्यात्मिक प्राणायामों में एक नथुने से हवा खींचने और दूसरे से छोड़ने की परम्परा है। बाँये नथुने से खींचना और दाहिने नथुने से छोड़ने का नियम है।
इसके लिए बाँये हाथ कोहनी पर से मोड़कर उसकी हथेली चौड़ी रखनी पड़ती है। दाहिने हाथ की कोहनी उस फैली हुई हथेली पर जमानी पड़ती है साथ ही चारों अँगुलियों की मुट्ठी बाँधकर अँगूठे से दाहिना नथुना दबाकर बन्द कर देना पड़ता है। इस प्रकार बाँये नथुने से ही श्वास भीतर जायेगी। खींचने का क्रम सीधा होना चाहिए। साँस इतनी गहरी लेनी चाहिए कि उसका प्रभाव फेफड़ा तक ही सीमित न रहकर पेट फूलने तक दृष्टिगोचर होने लगे। इस प्रयोग को प्राणायाम का पूरक भाग कहते हैं।
दूसरा पक्ष है साँस को भीतर रोकना। रोकने का समय खींचने की तुलना में आधा होना चाहिए। सांस खींचने की समूची प्रक्रिया में यदि दस तक गिनती गिनी जा सकती है। तो रोकने का कृत्य पाँच तक गिनने में ही समाप्त कर देना चाहिए। यह कुम्भक पक्ष है। कुछ लोगों का कथन कुम्भक को भी लम्बा खींचने का है, पर वह ठीक नहीं। साँस में घुले दूषित तत्वों को भीतर बहुत देर तक रुकने नहीं देना चाहिए। रोकने से विकार रुकते हैं। इसलिए जल्दी ही उसे निकाल बाहर करना चाहिए।
तीसरा पक्ष है- रेचक। रेचक अर्थात् निष्कासन। वायु को निकालने में वैसी ही धीमी गति अपनानी चाहिए जैसी कि खींचते समय अपनाई गई थी। प्रयत्न यह करना चाहिए कि साँस का समूचा अंश बाहर निकल जाय। फेफड़े ही नहीं पेट भी खाली हो जाय।
इसके बाद थोड़ी देर साँस को कुछ समय बाहर रोक रखना चाहिए। साँस को बाहर निकालते समय अँगूठे बदलकर दाहिने नथुने पर रख लेना चाहिए। इस दबाव के कारण श्वसन को बाँये नथुने से खींचना और दाहिने से निकालना सरल हो जायगा। जब बाह्य कुँभक करना हो। बाहर साँस रोकनी हो तो तर्जनी और अंगूठा दोनों का प्रयोग करके दोनों नथुने बन्द कर देने चाहिए। भीतर साँस रोकने की क्रिया को अन्तर कुँभक और बाहर साँस रोकने को बाह्य कुँभक कहते हैं। इस प्रकार रेचक कुम्भक, अन्तः कुम्भक, पूरक कुम्भक, बाह्य कुम्भक इन चार भागों में एक प्राणायाम विभक्त हो जाता है।
अध्यात्म परक प्राणायामों में संकल्प शक्ति का भी उपयोग करना पड़ता है। मानवी चेतना एक प्रकार का चुम्बक है। जो संकल्प शक्ति के नियोजन से सक्रिय एवं सक्षम होता है। सर्वप्रथम ब्रह्मांडव्यापी चेतन तत्व की दिव्य ऊर्जा के रूप में व्यापकता अनुभव करनी चाहिए। सोचना चाहिए कि समग्र अन्तरिक्ष प्राण ऊर्जा से भरा हुआ है। प्राणायाम द्वारा उसी का विशेष रूप से आकर्षण करना है। साँस खींचते समय यह मान्यता रहनी चाहिए कि भीतर मात्र हवा ही नहीं जा रही है वरन् प्राण तत्व भी उसमें प्रचुर परिमाण में मिलकर प्रवेश कर रहा है। वायु द्वारा शरीर को जिस तरह पोषण प्रदान किया जाता है उसी प्रकार यह भी मान्यता सुदृढ़ करनी चाहिए कि शरीर में दिव्यमान प्राण चेतना को बाहर से खींची गई प्राण चेतना के सहारे अपनी स्थिति मजबूत एवं बलवती बनाने का अवसर मिल रहा है।
अन्तः कुम्भक की स्थिति में मान्यता यह होनी चाहिए कि जो भरा गया है उसे उसी प्रकार सोखा जाता रहा है जैसे मिट्टी पर थोड़ा पानी डालने से वह उसे सोख लेती है। अपनी और दैवी प्राण चेतना के सम्मिश्रण से अपना प्राण दूना हो रहा है। अपनी क्षमता दुहरी बनने जा रही है।
साँस निकालते समय का संकल्प यह होना चाहिए कि न केवल शरीरगत गन्दगी वरन् मानसिक दोष दुर्गुण भी इस वायु निष्कासन के साथ बाहर निकल रहे हैं। निकलने वाली वायु अंधड़ की तरह बुरी आदतों को धूलि कणों की भाँति बाहर उड़ा लिये जा रहा है और अपनी स्थिति निर्मल निष्पाप जैसी हो रही है।
बाह्य कुंभक में एक प्रकार से दरवाजा बन्द कर दिया जाता है कि दुर्गुण लौटकर वापस न आने पावें। भीतर जो खींचा सोखा गया है वह स्थिर बना रहे। बाहर न जाने पावे। अँगूठे और तर्जनी के सहारे दोनों नथुने बन्द करने की प्रक्रिया इसी निमित्त है कि वायु शरीर के जितने भाग पर अधिकार जमाये रहती थी वह भी उससे छिन गया और न केवल समूची शरीर सत्ता पर वरन् मानसिक क्षेत्र पर भी प्राण चेतना का स्थिर आधिपत्य हो गया। इस प्रकार पहले की अपेक्षा शरीर कहीं अधिक मात्रा में प्राण तत्व की दिव्य ऊर्जा से सुसम्पन्न हो गया है।
यह एक प्राणायाम हुआ। चारों खण्डों को मिलाकर एक प्राणायाम बनता है। इसका न्यूनतम समय एक मिनट है। आरम्भ में स्वाभाविक स्थिति ही रहने देनी चाहिए। पीछे उसे बढ़ाना चाहिए। दो मिनट मध्यवर्ती और तीन मिनट अत्यन्त उच्च श्रेणी की साधना अवधि मानी गई है।
इसमें वायु के खींचने निकालने का जितना महत्व है। उससे कहीं अधिक दिव्य प्राण की अनुभूति को सुदृढ़ बनाने का है। यह संकल्प शक्ति पर निर्भर है। इसलिए प्राणायाम का आध्यात्मिक लाभ उठाने वालों के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने संकल्प बल को परिपक्व करें। कल्पना को उस स्तर तक सक्षम करें कि वे प्रत्यक्षवत् दीखने लगे।
प्राण शक्ति के भीतर जाते समय भावना रहनी चाहिए कि उसके साथ कुछ चिनगारियाँ भी उड़ रही हैं और तापमान साधारण श्वास-प्रश्वास की तुलना में कुछ बढ़ा हुआ है।
यह बैठकर अभ्यास करने की विधि है। जिन्हें अनुकूल पड़ती हो वे इसे जमीन पर लेटकर भी कर सकते हैं। उससे लाभ यह है कि पीठ और सिर एक सीध में अनायास ही आ जाते हैं। उनकी देखभाल करने या ध्यान रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती साथ ही नथुने को बन्द करने खोलने का कार्य भी एक ही हाथ में हो सकता है। कोहनी का सहारा देने के लिए दूसरे हाथ की हथेली का सहारा नहीं लेना पड़ता।
प्राणायामों के अनेक भेद उपभेद हैं। उनका उल्लेख योग ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक आता है। उनके प्रतिफल भी अलग-अलग प्रकार हैं। शरीर में ताप की या शीत की मात्रा कम बढ़ करने के वे काम आते हैं। कुछ का प्रयोजन शरीर विकारों को दूर करना। कुछ का मानसिक कष्ट का निराकरण करना और कुछ का आत्मशक्ति की प्रचुरता एवं प्रखरता बढ़ाना है। इनके प्रयोगों में जो अन्तर है उसे हमारी प्राणायाम सम्बन्धी पुस्तकों में पढ़ा या शान्ति-कुँज आकर सीखा जा सकता है।
अरस्तू के पास सिकन्दर पढ़ा करता था। न केवल पुस्तकें वरन् आत्मिक प्रगति एवं व्यावहारिक जीवन का नीति विज्ञान भी।
सिकन्दर एक युवती के फेर में पड़ गया और पढ़ने आने का समय वह उसी जंगल में खर्च करने लगा। इन्द्रिय शक्ति तो नष्ट होने ही लगी, भावी प्रतिभा को क्रमशः जंग लगने लगी। अरस्तू तक भेद पहुंच ही गया। उनने एक तरकीब खोज निकाली ताकि पानी सिर से ऊपर निकलने के पहले ही सुधार किया जा सके।
वे उस युवती के घर मौका पाकर जा पहुँचे और अपनी साठ-गाँठ जमाने लगे। युवती मन ही मन बुड्ढ़े की शौकीनी पर हँसी और कहा- ‘आज दिन भर के लिए आप मेरे घोड़ा बन जाइए दिन भर सवारी करूंगी। रात को आपकी इच्छा पूरी कर दूँगी।’ अरस्तू घोड़ा बन गये और युवती उन्हें हाँकती हुई कोड़े जमाने लगी।
सिकन्दर कोने में छिपे यह सब देख रहे थे। अरस्तू ने अब अपना अनजानपन छोड़कर कहा- बेवकूफ जिस रास्ते पर चलने से मेरे जैसे समझदार की यह दुर्गति हो रही है। उस पर चलने से तुझ जैसे कम अक्ल को क्या भुगतना पड़ सकता है। जरा सोच तो। सिकन्दर की आँखें खुल गईं उसने अपना रास्ता बदल दिया। इसी ने उसे सिकन्दर महान बनाया।
मनुष्य एक चुम्बक है जो सशक्त की ओर खिंचता और सम प्रकृति के लोगों को प्रभावित करता और अपनी ओर खींचता है। सत्संग और कुसंग का जादू इसी तथ्य पर आधारित है कि सहधर्मी और सत्कर्मी एक केन्द्र पर इकट्ठे होते हैं और अपनी क्षमताओं को एक दूसरे में वितरण करते हैं।
कथन का प्रभाव सीमित होता है। विशेषतया श्रेष्ठता के प्रशिक्षण में सीमित सफलता मिलती है। दोष और दुर्गुण बिना कहे भी साथियों को प्रभावित कर लेते हैं। पानी का स्वभाव नीचे की ओर बहता है। लोग भी अपनी निज की दुर्बलताओं और दुष्प्रवृत्तियों से घिरे रहते हैं। उन्हें यदि दूसरों का तनिक-सा भी सहयोग मिल जाय तो फिर गति पकड़ते देर नहीं लगती। आवश्यक नहीं कि दुष्कर्मों के लिए कोई तर्क और प्रमाण देकर प्रभावित करे और तब अपने साथ बुराई की दिशा में साथ चलने के लिए प्रोत्साहित करे। यह कार्य अदृश्य रूप से अनायास ही होता रहता है।
श्रेष्ठता की ओर बढ़ने के लिए आवश्यक है कि श्रेष्ठ लोगों से संपर्क साधा जाय और उनकी मनोवृत्तियाँ तथा प्रवृत्तियों को ध्यानपूर्वक देखा जाय। इतने भर से यह विश्वास हो जाता है कि श्रेष्ठता सरल है सुखद और सम्भव भी।
संपर्क साधने के लिए श्रेष्ठ व्यक्ति अपने संपर्क क्षेत्र में न मिले। या समय का अभाव इस प्रयोजन में बाधक हो तो दूसरा सरल तरीका यह है कि महामानवों के साथ भावनात्मक संपर्क जोड़ा जाय। उनके जीवन चरित्रों और कृत्यों को इतनी गहरी श्रद्धा भावना के साथ देखा जाय मानो अपने साथ ही उनका रहना होता है। या हम स्वयं उनके साथ रहते हैं।
स्वाति बूँदें आकाश में रहती हैं और सीप समुद्र तल में। फिर भी गुण धर्म की समानता दोनों के बीच सघन संपर्क बना देती है। चन्दन के पेड़ से समीपवर्ती झाड़-झंखाड़ सटे हुए ही हों यह आवश्यक नहीं। गुणात्मक एकता भी दोनों के बीच एकता बना लेती है और आदान-प्रदान का द्वारा खोलती है। श्रेष्ठता भले ही भूतकालीन या दूरवर्ती हो उसके साथ मनुष्य की अन्तःसत्ता जुड़ सकती है और प्रायः उतना ही प्रभाव छोड़ती है जितना कि सहधर्मी व्यक्ति निकट रहने पर प्राप्त करते हैं।
यह हो सकता है कि सत्संग के लिए श्रेष्ठ पुरुष सदा संपर्क क्षेत्र में न मिल सकें तो उनके सत्ता इतिहास के पृष्ठों पर सदा विद्यमान रहती है और उसे वहाँ से भी अपनी श्रद्धा के माध्यम से आकर्षित किया जा सकता है।
आवश्यक नहीं कि किसी का समूचा जीवन और क्रिया-कलाप सुना समझा जाय और यह भी हो सकता है कि अपनी परिस्थितियों और क्षमताओं के अनुरूप जो कार्य दृष्टिगोचर होते हैं, जीवनियों में से उन्हें विशेष रूप से पढ़ा और समझा जाय। यह आवश्यक नहीं कि हर महामानव की कार्य पद्धति के अनुकरण की बात सोची जाय। इतना समझना भी पर्याप्त है कि उनने अपनी निजी तात्कालिक क्षुद्र स्वार्थों का परित्याग किया। उन सुविधाओं के अभाव में जो कठिनाइयाँ सहनी पड़ीं वे प्रसन्नतापूर्वक उठाईं। साथ ही जनहित के कामों में अपनी सामर्थ्य का बड़े से बड़ा अंश होम दिया, झोंक दिया।
मधु मक्खी अनेक प्रकार के फूलों में से प्राप्त मधु वाला अंश ही संग्रहित करती है। हमें भी मात्र इतना ही करना चाहिए कि जिनके सत्संग का लाभ लेना है उनकी निस्वार्थता, सेवा साधना और उदारता को अपने में धारण करने का प्रयत्न करें।
पुनरावृत्ति से मस्तिष्क एक विशेष ढाँचे में ढलता है। जिस क्रिया को बार-बार किया जाता है वह आदत में सम्मिलित हो जाती है। जो पढ़ा, सुना, बोला या समझा जाता है वह भी मस्तिष्क में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लेता है। मानसिक संरचना ऐसी है, जिसमें कोई बात गहराई तक जमाने के लिए उसकी पुनरावृत्ति का अभ्यास करना होता है।
बच्चों को वर्णमाला के अक्षर और गिनती के अंक कण्ठाग्र करने पड़ते हैं। बार-बार दुहराने से ही यह प्रयोजन पूरा होता है। आगे चलकर भी विद्यार्थी को अपने पाठ रटने भी न पड़ें तो उन्हें कई बार पढ़ना अवश्य पड़ता है। परीक्षा में कुछ समय पिछले पढ़े हुये को याद करने के लिये कुछ दिनों का अवकाश मिलता है। उन दिनों शिक्षार्थी पिछले पढ़े हुए को बार-बार दुहराते हैं ताकि स्मृति में से कोई बात उतर गई हो तो पुनः स्मरण हो आये।
उपासना प्रसंग में जप का महत्वपूर्ण स्थान है। उसे सभी धर्म सम्प्रदायों में भक्ति प्रयोजन के लिये प्रमुख स्थान दिया गया है। मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, पारसी आदि सभी धर्मों के सन्तों के हाथ में, गले में, कमरे में माला लटकती देखी गई है। वे उसका उपयोग नाम जप के लिये करते भी हैं।
माला की महत्ता देखते हुये उसे सुसम्पन्नों ने आभूषणों तक का रूप दे डाला है। राजा, सेठ तथा उनकी पत्नियाँ मणि-मुक्तकों की विशेष सज्जा के साथ गूँथी हुई मालायें पहनती हैं। साधारण और गरीब हालत की महिलायें भी बाजार से सस्ते दाम की माला खरीद लाती हैं और उन्हें चावपूर्वक पहनती हैं। आभूषण रूप तक में बदल जाने से प्रतीत होता है कि कभी उसका कितना मान-सम्मान रहा होगा।
नाम जप के साथ माला की संगति सामयिक आवश्यकता के अनुरूप बिठाई गई है। कारण कि जप प्रयोजन को नियत समय पर, नियत संख्या में किया जाना चाहिये। इससे मन उस पर समय का अभ्यस्त बन जाता है और उसी कार्य के होने की प्रतीक्षा करता रहता है। शौच एवं भोजन के अपने-अपने समय हैं। नींद के भी समय पर सोने, उठने, खाने नहाने की आदत कुछ समय में इतनी परिपक्व हो जाती है कि उसके किये बिना चैन ही नहीं पड़ता है। बार-बार उस प्रयोजन का स्मरण आता है। इतना ही नहीं यह भी स्वभाव बन जाता है कि कोई काम कितनी देर किया जाय। खेलने का निर्धारित समय पूरा होते ही चलने को मन करता है। बच्चे तो छुट्टी की प्रतीक्षा में आधा घण्टा पहले से ही बस्ता बाँधने लगते हैं।
मन का ऐसा ही क्रम है। समय पर नियति अवधि तक काम सही प्रकार से बन पड़ता है। आगे-पीछे तो वह काम बेगार भुगतने जैसा हो जाता है।
जप प्रक्रिया जितनी संख्या में जितने समय चलानी हो उसका पूर्ण निर्धारण एवं संकल्प होना चाहिये। तभी मन उस कृत्य में ठीक तरह लगा रहेगा। अन्यथा उसकी उछल-कूद आरम्भ हो जायेगी।
प्राचीनकाल में घड़ियाँ नहीं थीं। इसीलिये जप की अवधि एवं संख्या का अनुमान लगाने के लिये माला की आवश्यकता पड़ती थी। उसी के आधार पर पता चलता था कि जप की संख्या एवं अवधि पूरी हुई कि नहीं। माला एक प्रकार से हाथ में घुमाकर चलाई जाने वाली घड़ी है। अब यह कार्य टाइम पीस से ही हो सकता है और छुट्टी का अलार्म भी बज सकता है। किन्तु पुरातन परम्परा अब इतने अभ्यास में आ गई है कि उसे जप का एक अंश ही माना जाने लगा है। इसमें कुछ हर्ज भी नहीं। साधक को परम्परा निर्वाह का सन्तोष ही होता है।
जप किसका किया जाय? इसका एक ही उत्तर है कि परमात्मा का। उसी की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है। आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति जब तक नहीं होती तब तक पति के वियोग में पत्नी की जो मनोदशा होती है, वही आत्मा की रहती है। प्यास जितनी तीव्र होती है, मिलन की सम्भावना उसी अनुपात में निकट आती है। एक ओर की बेचैनी दूसरे पक्ष को प्रभावित किये बिना भी नहीं रहती। यह भी एक प्रकार का टेलीफोन या रेडियो है जो निर्धारित लक्ष्य तक पहुँच कर रहता है। प्रेमिका की तिलमिलाहट प्रेमी को भी बेचैन करती है। जप को, नाम स्मरण को प्रेम प्रदर्शन का- लगन का एक अंग माना गया है। किसी को बुलाना होता है तो उसे नाम लेकर जोर से पुकारते हैं, जोर से इसलिये, क्योंकि मनुष्यों की श्रवण शक्ति सीमित होती है। पर परमात्मा के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है, वह धीमी आवाज भी यहाँ तक कि मानसिक जप स्मरण को भी सुन लेता है। वह अपने ही अन्तराल में विराजमान जो है।
पुनरावृत्ति हमेशा अधिक ही प्रभावशाली होती है। कपड़े धोने में उन्हें बार-बार फीचना पड़ता है। स्नान में भी रगड़ाई करनी पड़ती है। दाँतों को ब्रुश से घिसा जाता है। आटा पीसने की चक्की तथा तेल निकालने के कोल्हू में भी एक ही क्रिया का चक्रगति से प्रयोग चलता रहता है। पत्थर को चिकना करने के लिये घिसना पड़ता है। बहुमूल्य औषधियाँ बनाने के लिये उनकी घुटाई, पिसाई अधिक मात्रा में अधिक देर तक करनी होती है। रस्सी की रगड़ से कुंए की पत्थर जैसी कठोर जगत पर निशान बन जाते हैं। एक ही रास्ते पर पशुओं के चलने से पगडण्डियाँ बन जाती हैं। यह सब नियमित रूप से एक ही क्रम का गतिचक्र घुमाने का क्रम है। मशीनें सभी इसी आधार पर बनती और चलती हैं। उसका प्रभाव भी व्यक्तित्व पर अन्तराल पर ऐसा गहरा पड़ता है कि लक्ष्य के सम्बन्ध में स्मृति अपनी जगह मजबूती से पकड़ लेती है। इतनी की उन्हें उसका एक सुनिश्चित स्थान अचेतन मन में भी बन जाता है। फलतः बिना प्रयास के भी निद्रावस्था में भी जप चलने लगता है। जप में मात्र अक्षरों को दुहराते रहने की क्रिया तक ही सीमित नहीं रहना चाहिये, वरन् उसके साथ भावना भी जुड़नी चाहिए। भावना का आरोपण किसी नाम या रूप के साथ होता है। प्रेमिका जब प्रेमी का स्मरण करती है तो उसके प्रति प्रेम भावना आत्मीयता भी जुड़ी रहती है। यही जप का प्राण है। इष्ट के प्रति अन्यन्य भक्ति भावना होना चाहिये। माता जब बच्चे को पुकारती है तो उसके साथ वात्सल्य भी घुला होता है। छोटा बच्चा जब मम्मी-मम्मी पुकारता है तब उसे कुछ निवेदन नहीं करता होता। मात्र अपना प्रेम प्रदर्शित करता है। जप के साथ भावनाओं का गहरा सम्पुट होना चाहिये। प्रेम और आत्म भाव का इतना सघन समावेश होना चाहिये कि उससे मिलन की, दर्शन की, एकता की आत्मीयता की साथ ही समर्पण की असाधारण उत्कष्ठा हो। यह भावना सम्पुट जितना गहरा होता है, उतना ही नाम स्मरण अपने उद्देश्य की पूर्ति अधिक अच्छी तरह कर पाता है। अन्यथा तोते की तरह शब्द रटने या ग्रामोफोन की तरह शब्दोच्चारण में न भक्त की भावना झंकृत होती है और न भगवान तक वह पुकार-गुहार बन कर इस स्तर की बनती है कि उनका सिंहासन हिला दे। हमारी पुकार द्रौपदी स्तर की होनी चाहिए कि उस पर ध्यान देने और दौड़ आने के लिये विवश होना पड़े।
जप के लिये गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है। कारण कि उसमें जो शब्द प्रयुक्त हुये हैं उनका इस प्रकार क्रमिक गुँथन हुआ है कि वह स्थूल शरीर में सन्निहित अनेकों शक्ति भण्डारों को चक्र-उपत्यिकाओं को झकझोर कर उन्हें जगाती है और इस प्रकार योगाभ्यास का भी एक महत्वपूर्ण प्रयोजन अनायास सधता रहता है।
उसके शब्दार्थ भी ऐसे हैं जो चिन्तन को एक दिशा देते हैं, और सोचने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
तत् वह, सवितु-तेजस्वी गतिशील, वरेण्यं-धारण करने योग्य जीवन क्रम में घुला लेने योग। भर्ग-अवाँछनीयता को भून देने वाला। देवस्य-दिव्य। यह भगवान के चार अति महत्वपूर्ण विशेषण हैं। ऐसे तो भगवान के हजारों नाम और हजारों विशेषण हैं, पर इन चार में तत्वज्ञान का वह सार संक्षेप समाहित है जिसे हृदयंगम कर लेने पर मनुष्य में गतिशीलता उत्कृष्टता की ओर बढ़ चलती है। व्यक्ति इस प्रत्यक्ष को भौतिक में नहीं- परोक्ष को सचेतन को ईश्वर का रूप मानता है। संचार में भला बुरा सब कुछ है, पर वह श्रेष्ठ का ही वरण करता है। सविता के समान तेजस्वी, साहसी, पराक्रमी और कर्मनिष्ठ बनता है। जो अनुचित है, अनीति है, उससे जूझने के लिये अपने शौर्य, पराक्रम को तीक्ष्ण करता है। दिव्यता ही उसे रुचती है। स्वयं देव बनने की उत्कण्ठा से ओत-प्रोत रहता है। विशेषतायें कहने-सुनने भर तक सीमित नहीं रहतीं, वरन् वह उन्हें अपनाता है, धारण करता है। अन्त में उस सर्व समर्थ से प्रार्थना करता है कि मुझे अकेले को नहीं सर्वसाधारण को सद्बुद्धि की ओर चलने की शिक्षा मात्र न दे वरन् प्रेरणा, उत्कण्ठा अभिलाषा जागृत कर दे।
गायत्री मन्त्र के उपरोक्त भावार्थ में वह सब कुछ है जो मनुष्य को सोचना एवं करना चाहिये। इस प्रकार यह मंत्र तत्वज्ञान के अध्यवसाय का सार संक्षेप बन जाता है। जप के साथ-साथ इस अर्थ चिन्तन का समावेश रहने से मनुष्य अपने लिये सर्वश्रेष्ठ दिशाधारा का संकेत उपलब्ध करता है। इतना ही नहीं गायत्री की शब्द शक्ति से चिन्तन और चरित्र को अपने दिव्य प्रवाह के साथ घसीट ले जाता है।
गायत्री का समग्र उच्चारण जो नहीं कर सकते। वे “ओम् भूर्भुवः स्वः” इतना पंचाक्षरी गायत्री मंत्र याद कर सकते हैं। जिन्हें संस्कृत बोलने या समझने में कठिनाई होती है वे “ओम् तत् सत्” जप सकते हैं। जिनके लिये इतना भी कठिन हो वे मात्र “ओम्” का जप भी कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार सर्व प्रथम “ओम्” था। फिर शब्द ब्रह्म भू भुवः स्व की व्याहृतियों में विकसित हुआ। इसके उपरान्त एक-एक व्याहृति से तीन चरणों वाला गायत्री मन्त्र बना। जिनसे पूरा या अधूरा जैसा भी बन पड़े। गायत्री को आधार मान कर जप की प्रक्रिया चलानी चाहिए।
बंगाल के प्रसिद्ध नेता और वायसराय की कौंसिल के सम्मानित सदस्य श्री कृष्णदास पाल बड़े ही सादे व्यक्ति थे। बाहरी आडम्बर उनको छू तक न गया था। किन्तु उनके पिता तो सादगी और सरलता की साक्षात् प्रतिमा ही थे।
एक बार एक अंग्रेज किसी कार्य से श्री कृष्णदास पाल से मिलने उनके बंगले पर गया। वह घोड़े पर सवार था। लान में जाकर उसने एक साधारण सी धोती पहने एक वृद्ध को फूल पौधों की संभाल करते देखा। अंग्रेज ने समझा कि यह पाल महोदय का नौकर होगा। बूढ़े को घोड़े की लगाम थमाकर उसने पूछा क्या पाल महोदय अन्दर हैं? इतने में पाल महाशय अन्दर से आये और वृद्ध के हाथ से घोड़े की लगाम लेकर आगन्तुक अंग्रेज से बोले- ‘इनसे मिलिये, ये हमारे पूज्य पिताजी हैं।’
अंग्रेज को अपने व्यवहार पर बड़ी लज्जा आयी। उसने तपाक से श्री कृष्णदास पाल के पिता से हाथ मिलाया और अपने व्यवहार के लिए क्षमा माँगते हुए कहा- ‘आप भारतीय लोग बड़े सरल और सादे होते हैं। मुझे अपने व्यवहार के लिए खेद है। किन्तु मैंने अपनी इस गलती से यह शिक्षा ग्रहण कर ली कि बिना परिचय के किसी की वेश भूषा देखकर ही उसका मूल्याँकन नहीं करना चाहिए।
वातावरण का अपना प्रभाव होता है और वह चुपके-चुपके मनुष्य की कोशिकाओं को इस प्रकार अपने अनुरूप ढालता है कि उसे पता भी नहीं चल पाता और व्यक्तित्व में भारी परिवर्तन हो जाता है।
यूनान के दक्षिण में एक सैन्तोरीनी नामक टापू है। उसमें आदिवासी तो रहते हैं पर अन्य वातावरण में अभ्यस्त लोग एक दो दिन से अधिक वहाँ नहीं ठहर पाते। उन्हें वहाँ बहुत बेचैनी मालूम होती है और लगता है कि जमीन के नीचे से शहद की मक्खियों जैसी भन-भनाहट होती रहती है। सहारा रेगिस्तान के कई क्षेत्रों में बालू से संगीत निकलता है और रोने हंसने की आवाजें आती रहती हैं। इसका तात्पर्य है कि उस क्षेत्र में जमीन के भीतर की कई परतें असामान्य स्थिति में हैं और उस क्षेत्र में ऐसे कम्पन उद्भूत हो रहे हैं जो किसी अतिशय प्रभाव से प्रभावित हैं और वे मनुष्य की अभ्यस्त प्रकृति के नहीं हैं।
रूसी विज्ञानी लेखेत्वस्की ने वायु मण्डल के साथ घुली हुई विभिन्न प्रकार की विद्युत तरंगों का विश्लेषण किया है और कहा कि जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में रहने के अभ्यस्त हैं उनके लिए वहीं का वातावरण अनुकूल पड़ता है। अन्य स्थानों की तरंगें अच्छी होने पर भी ऐसा अनावश्यक दबाव डालती हैं जो उनके लिए हानिकारक ही सिद्ध होता है।
आहार के सम्बन्ध में भी यहीं बात है। जिन क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, मक्का जैसी फसलें बहुलता से उत्पन्न होती हैं, उनके लिए वे ही अन्न शरीर के अनुकूल और उपयोगी सिद्ध होते हैं जबकि गेहूं, चावल खाये जाने वाले क्षेत्रों में उनकी उपयोगिता वैसी नहीं रह जाती। समुद्र तट पर खारी भूमि में जल जीव ही आहार बन जाते हैं। ध्रुव प्रदेश के निवासी एस्किमो मछली के सहारे ही अपनी जीवनचर्या चलाते हैं।
जलवायु बदलने के लिए सुदूर क्षेत्रों में जाने की योजना मनोरंजन की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है। किन्तु अभ्यस्त वातावरण में अधिक अन्तर पड़ जाने के कारण अन्ततः उनका प्रभाव बेतुका ही होता है। अच्छा यही है अपने ही क्षेत्र में खुली वायु, हरियाली और वनस्पतियों के बीच रहने का क्रम बनाया जाय और रहन-सहन के नियमों में अधिक प्राकृतिकता का समावेश करके अपने लिए उपयुक्त व्यवस्था बना ली जाय। मातृभूमि का महत्व देश भक्ति की दृष्टि से तो श्रद्धास्पद है ही। साथ ही उसमें यह भी विशेषता है कि स्थानीय भूमि के अनुरूप शरीर को विभिन्न प्रकार के पोषण मिलने से वह उसी वातावरण का अभ्यस्त बन जाता है।
मानसिक स्थिति के सम्बन्ध में भी वातावरण का प्रभाव पड़ता है। किसी क्षेत्र के निवासी क्रूर, किसी के मूर्ख, किसी के धूर्त और किसी के सौम्य होते हैं। शारीरिक दृष्टि से तो जो जहाँ का है उसे वहाँ का आहार-विहार अनुकूल पड़ता है पर मानसिक विषय में यह बात नहीं है। जहाँ का मानसिक धरातल सज्जनोचित न हो, वहाँ से अन्यत्र उपयोगी स्थान में जा बसना ही उत्तम है। या फिर प्रयत्नपूर्वक सामूहिक आन्दोलन के रूप में क्षेत्रीय परम्पराओं में हेर-फेर करना चाहिए। बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित होकर खून खराबी कर बैठने का प्रचलन है। अफ्रीका के ऐसे भी क्षेत्र हैं जिनमें पशु पक्षी नहीं नहीं नर-भक्षी लोग भी रहते हैं। उस क्षेत्र में रहते-रहते एक परम्परा बन जाती और वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। ऐसी स्थिति को सुधार सकना सम्भव न हो तो स्वयं वहाँ से उठकर किसी अन्य सभ्य प्रदेश में जा बसना अथवा उस क्षेत्र के सज्जनों के साथ अपना एक पृथक समुदाय बना लेना उपयुक्त है।
मातृभूमि में निवास शारीरिक दृष्टि से उपयोगी होता है। किन्तु मानसिक दृष्टि से प्रबुद्ध क्षेत्र में जा बसना ही ठीक है।
फूल अपनी सुगन्ध और शोभा निरन्तर बाँटते रहते हैं। उनके क्षेत्र से निकलने वाला कोई भी व्यक्ति इसका आनन्द लिये बिना नहीं जाता। चन्दन वन अनायास ही अपने परिकर को मँहकाते और पवन को शीतल सुगन्धित करते रहते हैं। बादल आसमान पर मंडराते देखकर असंख्यों के दिल उमंगते हैं। मोर नाचते, पपीहा कूकते, दादुर टर्राते और बालक उछलते हैं। वे किसी को कोई राशि देते या प्रत्यक्ष सहयोग देते हों ऐसी बात भी नहीं है, तो भी उनका अस्तित्व स्वभावतः ऐसा माहौल बनाता है जिसमें आनन्द एवं उल्लास की लहर दौड़ जाती है।
ऐसा ही एक सद्गुण कई मनुष्यों में भी पाया जाता है, वे सदैव हंसते और हंसाते रहते हैं। पुष्प उद्यान का यही क्रम है कि जब खिलने का मौसम आता है, तब एक के बाद दूसरा खिलता जाता है सारा उद्यान खिल-खिलाकर हंस पड़ता है।
प्रसन्न रहना, सुन्दर होने की तरह एक दैवी अनुदान है जिसे पाकर मनुष्य अनायास ही सफल, समर्थ, स्वस्थ एवं आकर्षक दीख पड़ता है। यह विभूति उसी तक सीमित नहीं रहती, वरन् जो पास से गुजरता है, देखता है, उसके संपर्क में भी आता है। उसी प्रकार प्रसन्नता वितरित करना भी ऐसा अनुदान है, जिसकी छाया जिस पर भी पड़ती है, झलक जिसको भी मिलती है वह अपनी व्यथा निराशा खोकर प्रमुदित होता है। सुर्य की धूप में गर्मी और चन्द्रमा की चाँदनी में शीतलता बिना माँगे ही मिलती है। उसी प्रकार प्रसन्न चित्त की समीपता निकटवर्ती का मन हलका करती है। इस अनुदान के लिए हर लाभान्वित होने वाला प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभान्वित होता है। इसे बिना धन दान किये दानशील होने के समान समझा जा सकता है।
यों बहुत से स्वभाव मनुष्य के व्यक्तित्व में आरम्भ से ही समा जाते हैं। पर पीछे भी प्रयत्न करने पर कोई सद्गुण या दुर्गुण ऐसा नहीं है, जो प्रयत्नपूर्वक दबाया या उभारा न जा सके। मनुष्य का दूसरों पर बस भले ही न चले, पर अपने ऊपर तो इतना अधिकार होता ही है कि अपने स्वभाव को बना या बिगाड़ सके। जिन्हें इस रहस्य का पता चल जाता है कि सुन्दर होने की तरह ही हंसमुख होना भी एक असाधारण आकर्षण है। वे उसे बढ़ाने का प्रयत्न करते और सफल भी रहते हैं।
सौंदर्य प्रसाधनों का, महंगे वस्त्र आभूषणों का लोग इसलिए उपयोग करते हैं कि वे आकर्षक दीख पड़ें। उनकी विशेषता देखकर प्रसन्न भी हों और आकर्षित भी। यह प्रयोजन अपने स्वभाव को मुसकान भरा बनाकर भी पूरा किया जा सकता है। इसके लिए किन्हीं इच्छित परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं है। यह कार्य हर स्थिति में किया जा सकता है। सफलताओं में भी और असफलता में भी और विपन्नता में भी। मात्र मन को एक ढर्रे पर चलाने भर की बात है। चेहरे को एक खास प्रकार की आदत डालने भर की बात है।
दर्पण के सम्मुख बैठकर कोई भी मनुष्य अपनी उदास और नीरस मुखमुद्रा के साथ दूसरी बार हंसती मुस्कराती स्थिति की तुलना कर सकता है। दोनों के स्तर में जमीन आसमान जैसा अन्तर प्रतीत होगा। मुसकान भरी मुख मुद्रा दर्शकों को ऐसी प्रतीत होती है, मानो उनके साथ आत्मीयता प्रकट की जा रही है ओर आतिथ्य की, स्वागत सत्कार की समुचित व्यवस्था की गई है। इसके प्रतिकूल संकटग्रस्तों या सब कुछ गंवा बैठने वालों की तरह उदासी में डूबे रहने पर जहाँ अपना मन भारी होता है, वहाँ संपर्क में आने वाले भी अपनी उपेक्षा समझते हैं और उपेक्षा की प्रतिक्रिया उपेक्षा के रूप में ही वापस लेकर लौटते हैं। यह अपने मित्र प्रशंसकों की संख्या घटाती है। अपने को एकाकी बनाती है। इस स्थिति में कोई-कोई अहंकारी तक समझ बैठते हैं। यह अपने व्यक्तित्व का मूल्य गिराना है और भविष्य में स्नेह सद्भाव बने रहने का द्वार बन्द करता है।
नेतृत्व विश्लेषणकर्ताओं ने अपने अनुभव प्रकाशित करते हुए कहा है कि प्रसन्न मुद्रा में रहना अपने आधे शारीरिक एवं मानसिक भार संकटों को घटा लेना है। प्रसन्नता उस औषधि के समान है, जो थकान ओर उद्वेग को घटाती है और छोटी-मोटी कठिनाइयों का निराकरण ऐसे ही चुटकी बजाते हल कर देती है। इतना ही नहीं, गम्भीर समझी जाने वाली समस्याओं को हलकी दृष्टि से देखती है और उसे निरस्त करने या बच निकलने का कोई सीधा रास्ता बता देती है।
मन को शरीर रूपी रथ का सारथी माना गया है। यदि सारथी ठीक है तो इन्द्रियों के घोड़े भी सही चाल से चलेंगे और रथ की शोभा तथा चाल भी देखते ही बनेगी। जिस प्रकार पेड़-पौधे, खाद, पानी और उपयुक्त भूमि वातावरण में जल्दी उगते बढ़ते हैं। उसी प्रकार मनुष्य का स्वास्थ्य भी प्रसन्नता के वातावरण में स्थिर रहता एवं विकसित होता है। अपने ऊपर तथा दूसरों पर झल्लाते रहने वाले व्यक्ति अन्यान्यों का कितना अहित कर पाते हैं, यह तो नहीं कहा जा सकता, पर अपने आप को उस खीज झल्लाहट से हानि निश्चित रूप से होती है।
मनोविज्ञान वेत्ता जेम्स चार्ल्स, जार्ज पेनोर, जेम्स एलन, स्टीव, रोकमॉन, अब्राहम मेस्लो आदि ने अपने प्रयोगों का उल्लेख और विवेचन करते हुए एक ही निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य के स्वास्थ्य का क्षीण होना एवं रोगों का शिकार होना बहुत कुछ उसकी खीज या चिन्ताग्रस्तता के कारण होता है। यदि इन कांटों को मन से निकाल दिया जाय तो निरन्तर कसकती रहने वाली व्यथा से छुटकारा बिना औषधि उपचार के भी हो जाता है। इसके विपरीत जो अपने भविष्य को अन्धकार से घिरा हुआ देखते हैं, आशंकाओं और अशुभ सम्भावनाओं को पाले रहते हैं, वे कोई बड़ा कारण न होने पर भी रोगियों की तरह व्यथित बने रहते हैं।
शारीरिक और मानसिक रोगों की चिकित्सा में रोगी के मन में आशा उत्साह का संचार करना एक बहुत बड़ा काम है। इसे चिकित्सक अपने ढंग से और मित्र सहयोगी अपने ढंग से कर सकते हैं। चिकित्सा शास्त्र के विशालकाय कलेवर का सार संक्षेप इतना ही है कि रोगी को आशान्वित रखा जाये। साथ ही बीमारी को हल्का मानने और उसके जल्दी अच्छा होने का विश्वास बनाये रखने की मनःस्थिति बनाये रखी जाये। अच्छा चिकित्सक और परिचर्या में संलग्न नर्सें यही करती हैं। जो रोग को बढ़ा-चढ़ा एवं भयंकर बताकर उसे परेशान करके अधिक पैसा झटकने का प्रयत्न करते हैं, वे सच्चे अर्थों में चिकित्सक नहीं कहे जा सकते। ऐसे जल्लाद उत्पन्न रोग को और भी अधिक बढ़ा देते हैं।
जीवन के सर्वतोमुखी विकास में व्यक्तिगत क्षमताऐं मित्रों की सहायताऐं तथा परिस्थितियों की अनुकूलता प्रधान कारण मानी जाती हैं। पर सच तो यह है कि मानसिक सन्तुलन और उत्साह सबसे अधिक कारगर होता है। यह विशेषताएं यह प्रकट करती हैं कि व्यक्ति आत्मविश्वासी और चिन्तन का सही तरीका समझने का अभ्यासी है। परिस्थितियों की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए जितनी बड़ी भूमिका उत्साही मन की होती है, उतनी और किसी की नहीं।
बैकुण्ठ में ऋषियों का प्रसंग चल रहा था। विष्णु भगवान ने कहा “देवर्षीमं च नारद” देवर्षियों में नारद में हूँ। अपनी और नारद की उनने अभिन्नता जताई।
इस पर उपस्थित देवताओं और ऋषियों ने पूछा- देव! जप, तप तो हमारा ही अधिक है। कष्ट भी हमने ही अधिक किये और योगाभ्यासों में भी हमीं अधिक लगे रहे। फिर श्रेष्ठता का श्रेय नारद को कैसे मिला। भगवान ने कहा। तुम सब मेरा अनुग्रह आप करके अपने लिए विभूतियाँ पाने में लगे रहे। जबकि नारद को अपनेपन का ध्यान ही न आया। वे जन-जन में भक्ति भावना और धर्मधारणा जगाकर उन्हीं के कल्याण की बात सोचते रहे।
स्वार्थ और परमार्थ का अन्तर हो गया न। यही नारद की वरिष्ठता है।
डार्विन के सिद्धांत के अनुसार सृष्टि में सर्वाधिक प्रभावशाली प्रेरक शक्ति जो सृष्टि के हर प्रकार के जीवों को क्रियाशील करती है वह है - सेक्स। लेकिन नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधानों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार अपने निवास स्थानों पर कब्जा जमाए रहने वाली, अधिकार जताने वाली प्रवृत्ति सबसे प्रबल है। सामान्यतः सेक्स प्रवृत्ति का सम्बन्ध उचित तापमान से जोड़ा जाता है। एक प्रयोग में किसी कृत्रिम जलाशय (जिसमें अनेक जल-चर जन्तु थे) का तापमान क्रमशः अधिकाधिक गिराया गया। तापमान यहाँ तक नीचे चला गया कि उनकी सेक्स वृत्ति सर्वथा सो गई। लेकिन यह देखा गया कि विभिन्न जलचरों के अपने-अपने रहने के लिए नियत किये हुए स्थान पर किसी ने कब्जा करने का प्रयास किया तो उनकी ओर से शत्रु का डटकर मुकाबला किया गया।
“अफ्रीकन जेनेसिसः रिवोल्यूगन इन दि नेचुरल साइन्सेस” (लेखक रोबर्ट आड्रे) एवं “टेरिटरी इन वर्ड लाइफ” लेखक ब्रिटिश एमेचर ऑर्नीथोलॉजिस्ट-इलियट हॉवर्ड) इन दोनों पुस्तकों में कई रोचक विवरण इस संदर्भ के छपे हैं। सुदूर स्थानों की यात्रा करने वाले पक्षियों में यह पाया गया है कि मादाओं की अपेक्षा नर पक्षी आगे रहते हैं। नये स्थान पर पहुँचकर किसी स्थान अथवा वृक्ष विशेष पर बैठकर नर पक्षी गीत गाता है। जिसका अर्थ होता है- यह स्थान हमारे लिए सुरक्षित है और इस पर किसी के द्वारा अधिकार जमाना वर्जित है। जो जितना अच्छा और सुरक्षित स्थान चुनता है उसके अनुसार उसे मादा मिल जाती है। डार्विन ने केवल सेक्स को ही महत्व दिया था। परन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। सेक्स से भी अधिक प्रबल भावना मनोविज्ञानवेत्ताओं के अनुसार अधिकार की है।
पक्षियों के अधिकार जताने का माध्यम उनके गीत और चहचहाहट हुआ करती है। जबकि पशु और कीट-पतंगों में स्थान जताने का माध्यम गंध हुआ करते हैं। विशेषकर स्तनधारी प्राणियों की घ्राण शक्ति बहुत तेज हुआ करती है। शेर और बाघ आदि किसी स्थान पर अधिकार जताने के लिए वहाँ पेशाब कर देते हैं जिससे तीव्र गन्ध आती है। कीट-पतंगों तथा कई पशुओं में गन्ध पैदा करने वाली ग्रन्थियाँ हुआ करती हैं। कई प्रकार के हिरनों में आँख के ऊपर एक ग्रन्थि होती है जिसके स्राव की गन्ध विशेष से उनके स्थान का पता लगता है अपने अधिकार क्षेत्र के पेड़ों व डाली-पत्तियों से वे इस स्राव को घिस देते हैं।
ज्यूरिख (पं. जर्मनी) के चिड़ियाघर के डायरेक्टर डॉ. हाइने हेढिगर लेखक को चिड़ियाघर में एक बन्दर के पिंजड़े के पास ले गये। उस समय बन्दर बैठा हुआ था। इन दोनों प्रेक्षकों को आते देखकर उनके ठीक सामने पड़ने वाले लोहे की छड़ पर कोई साँकेतिक निशान बनाकर पुनः अपने स्थान पर जा बैठा और ऊपर से अपनी मुखाकृति ऐसी बनाने लगा मानों उनसे कह रहा हो- “कहाँ घुसे चले आ रहे हो? देखते नहीं यह मेरा घर है।” इस घटना को देखकर लेखक को इसके पीछे छिपा सिद्धांत बताते हुए डॉ. हाइने हेडिगर ने बताया कि पिंजरे में कैद पशु-पक्षी प्रारम्भ में पिंजरे से छूट भागने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। लेकिन कुछ समय बीतने पर जब उससे स्थायित्व का भाव आ जाता है तो पिंजरे से खुद बाहर जाने की अपेक्षा- स्वयं तो उसी में रहना पसन्द करते हैं लेकिन बाहर से उसमें घुसने वालों को रोकने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। डॉ. हेडिगर ने आगे बताया कि निवास के प्रति लगाव के कई दृष्टान्त आप जंगल में भी पायेंगे। पशु-पक्षियों के निवास के लिए छत या दीवार की व्यवस्था नहीं होती फिर भी विभिन्न प्रयोगों के लिए वे अलग-अलग स्थान अंकित कर लेते हैं। जैसे भोजन का स्थान, सोने का स्थान, शिशु पालन का स्थान और सूर्य स्नान के लिए छतों की व्यवस्था वे स्वतः कर लेते हैं। यह पाया गया है कि प्रत्येक पशु-पक्षी अपने शरीर की स्वच्छता के प्रति विशेष रूप से जागरुक होता है। यदि मल विसर्जन, स्नान, स्वच्छता इत्यादि की आम व्यवस्था उपलब्ध न हो तो प्रत्येक जीवधारी अपने निजी निवास स्थान पर ही इसकी व्यवस्था बनाता है। सामान्यतः संपत्तिवान मनुष्य अपने अधिकार और सम्मान की अवहेलना पसन्द नहीं करते। कई पशुओं में यह प्रवृत्ति इसी रूप में पायी जाती है। पशुओं में सबसे उच्छृंखल और बर्बर भेड़िया होता है। लेकिन भेड़ियों में पाई जाने वाली अधिकार व सम्मान की परम्परा के बारे में एक विज्ञान पत्रिका “द इकोलाजीकल परबल” में तैंतीस पृष्ठों का विस्तृत लेख छपा है जिसमें स्विट्जरलैण्ड के वैसन नामक अभयारण्य में रहने वाले जंगली भेड़ियों का अध्ययन किया गया है। पाया गया है कि इन पशुओं में सिर एवं कान की विभिन्न भाव-भंगिमा एवं पूँछ तथा शरीर के विभिन्न भागों के बालों को हिलाने की अलग-अलग विधियाँ, आँख के भवों का विभिन्न तनाव, दाँत दिखाने के विभिन्न तरीकों का प्रत्येक की सामाजिक स्थिति के अनुरूप अलग-अलग विधान होता है।
मनुष्यों में अपनी जाति के लिए बलिदान होने की घटनाओं को इज्जत की दृष्टि से देखा जाता है। एक रात्रि को बबून अपनी गुफा में पंक्तिबद्ध होकर जा रहे थे। उसी रास्ते के नीचे झाड़ी में छिपकर एक चीता उन बबूनों में से किसी एक को अपना शिकार बनाने तथा उनकी गुफा में अपना कब्जा जमाने की घात लगाये बैठा था। उस समय अपनी जाति की सुरक्षा हेतु दो बबूनों ने ऊपर से अपनी जान की बाजी लगाकर छलाँग लगाई। एक ने उसकी गर्दन दबोची और दूसरा उसकी छाती पर घाव करने लगा। सुविदित है कि बबूनों की अपेक्षा चीता बहुत बलवान होता है। चीते ने अपने जबड़े से गर्दन दबोचे हुए बन्दर को पकड़ लिया और नीचे धर पटका तथा दूसरे बन्दर को अपने पंजे से दूर हटाया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। बन्दरों ने अपने पैने दांतों से उसकी धमनी को काट दिया था। चीते ने उन दो बन्दरों को तो मार दिया लेकिन अपना प्राण भी वह बचा नहीं पाया। मनुष्यों में यदि ऐसी घटना होती तो उसका बड़ा स्मारक बनाया जाता। बन्दरों का हुजूम विस्मय विस्फारित नेत्रों से इस दृश्य को देखता रहा और नाटक पटाक्षेप होते ही कुछ क्षणों की मौन प्रार्थना मृत बबूनों की शाँति के लिए कर चुपचाप पंक्तिबद्ध होकर अपनी कन्दरा की दिशा में बढ़ गया।
विश्व में आज समाजवाद और साम्यवाद के फैलने का मुख्य कारण मनुष्य की सम्पत्ति और अधिकार लिप्सा बताई जाती है तथा इसके लिए केवल मनुष्य को ही दोषी ठहराया जाता है। लेकिन सृष्टि के प्रायः सभी पशु-पक्षी-पतंगों में भी यह प्रकृति-प्रदत्त लिप्सा देखने में आती है।
तथ्यान्वेषी आधुनिक विज्ञान आज जिस निष्कर्ष पर पहुँच रहा है कि केवल मनुष्य ही नहीं अपितु मनुष्येत्तर प्राणियों में भी मूल प्रवृत्तियाँ एक-सी होती हैं। यही बात पूर्वकाल के तत्व वेत्ता भी कहते रहे हैं कि विश्व के प्राणिमात्र में मूल तत्व सर्वत्र एक ही है। भिन्नता केवल शारीरिक संरचना के अपेक्षाकृत अधिक विकसित मस्तिष्क ओर समस्याओं के समाधान हेतु दृष्टिकोण भर की है। भगवान द्वारा मनुष्य को दिये हुए विशेष अनुदान की सार्थकता तभी है जब मनुष्य अपनी भाव सम्वेदनाओं को उच्चस्तरीय बनाकर परस्पर स्नेह, सद्भाव और आपसी समझ-बूझ तथा तालमेल का विकास कर सके।
बगदाद के यादवचन्द्र राय के घर में चोर घुस गये और माल तलाशने लगे। रायबाबू चुपके से किवाड़ खोलकर अलाव तापने और हुक्का पीने लगे।
चोर खाली हाथ लौटे। अपरिग्रही ब्राह्मण के घर में था क्या? जब चोर निराश लौटने लगे तो रायबाबू ने कहा- ‘भाइयों ! अपने इस दरिद्र जीवन का क्या करूं? कुछ होता तो आप लोगों का सत्कार अवश्य करता। पर हुक्का पीते जाने का अनुग्रह तो करते ही जाइए।’ चोर लज्जा से शिर झुकाये हुक्का पीते और अलाव तापते रहे।
सामान्यतया यह कहा जाता है कि ईसाई और मुसलमान धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है, पर उनके धर्मग्रन्थों एवं मान्यताओं पर बारीक दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि प्रकारान्तर से वे भी पुनर्जन्म की वास्तविकता को मान्यता देते हैं और परोक्ष रूप से उसे स्वीकार करते हैं।
प्रो. मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ “सिक्स सिस्टम्स ऑफ इण्डियन फिलासफी” में ऐसे अनेक आधार एवं उद्धरण प्रस्तुत किये हैं जो बताते हैं कि ईसाई धर्म पुनर्जन्म की आस्था से सर्वथा मुक्त नहीं है। प्लेटो और पैथागोरस के दार्शनिक ग्रन्थों में इस मान्यता को स्वीकारा गया है। जोजेक्स ने अपनी पुस्तक में उन यहूदी सेनापतियों का हवाला दिया है जो अपने सैनिकों को मरने के बाद भी फिर पृथ्वी पर जन्म मिलने का आश्वासन देकर उत्साहपूर्वक लड़ने के लिए उभारते थे। “विजडम ऑफ सोलेमन” ग्रन्थ में महाप्रभु ईसा के वे कथन उद्धत हैं जिसमें उनने पुनर्जन्म का प्रतिपादन किया है। उन्होंने अपने शिष्यों से एक दिन कहा था- “पिछले जन्म का एलिजा ही अबजान बैपटिस्ट के रूप में जन्मा था।” बाइविल के चैप्टर 3 पैरा 3-7 में ईसा कहते हैं- मेरे इस कथन पर आश्चर्य मत करो कि तुम्हें निश्चित रूप से पुनर्जन्म लेना पड़ेगा। ईसाई धर्म के प्राचीन आचार्य फादर ओरिजिन कहते थे- “प्रत्येक मनुष्य को अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार अगला जन्म धारण करना पड़ता है।”
दार्शनिक गेटे, फिशर, शोलिंग, लेसिंग आदि ने पुनर्जन्म का प्रतिपादन किया है। अंग्रेज दार्शनिक ह्यूम तो किसी दार्शनिक को तात्विक दृष्टि की गहराई इस बात से परखते थे कि वह पुनर्जन्म को मान्यता देता है या नहीं।
सूफी सन्त, मौलाना रूम ने लिखा है, मैं पेड़-पौधे, कीट-पतंग, पशु-पक्षियों में योनियों में होकर मनुष्य वर्ग में प्रवेश हुआ हूँ और अब देव वर्ग में स्थान प्राप्त करने की तैयारी कर रहा हूँ।’
इन्साइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड एथिक्स के बारहवें खण्ड में अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के आदिवासियों के सम्बन्ध में यह अभिलेख है कि वे सभी समान रूप से पुनर्जन्म को मानते हैं। मरने से लेकर जन्मने तक की विधि-व्यवस्था में मतभेद होते हुए भी यह कहा जा सकता है कि इन महाद्वीपों कि आदिवासी आत्मा की सत्ता को मानते हैं और पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं।
थियासॉफी के जन्मदाताओं में से एक सर ओलिवर लाँज ने लिखा है- “जीवित ओर मृत भेद स्थूल जगत तक ही सीमित है। सूक्ष्म जगत में सभी जीवित हैं। मरने के बाद आत्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। जिस प्रकार हम जीवित लोग परस्पर विचार विनियम करते हैं, उसी प्रकार जीवित और मृतकों के बीच में आदान-प्रदान हो सकना सम्भव है। हमें विज्ञान के इस नये क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए और एक ऐसी दुनिया के साथ संपर्क बनाना चाहिए। इससे हम मानवी परिवार को कहीं अधिक सुविस्तृत, सुखी और प्रगतिशील बना सकेंगे।
सर आर्थर कानन डायल भी इसी विचार के थे। वे कहते थे अपनी दुनिया की ही तरह एक और सचेतन दुनिया है, जिसके निवासी न केवल हमसे अधिक बुद्धिमान हैं वरन् शुभ-चिन्तक भी हैं। इन दोनों संसारों के बीच यदि आदान-प्रदान का मार्ग खुल सके तो इसमें स्नेह-सम्वेदनाओं का सुखद सहयोग का एक नया अध्याय प्रारम्भ होगा। मृतकों और जीवितों के बीच संपर्क स्थापना का प्रयास यदि अधिक सच्चे मन से किया जा सके तो अब तक की प्राप्त वैज्ञानिक उपलब्धियों से कम नहीं वरन् बड़ी सफलता ही मानी जायेगी तथा यह भारतीय प्रतिपादन पुष्ट हो जाएगा कि जन्म और मृत्यु मात्र स्थूल जगत की घटनाऐं हैं। “आत्मा न कभी जन्म लेती है न मरती है” वाली गीताकार की उक्ति तब विज्ञान सम्मत लगेगी।
वाक्रले, कैलीफोर्निया (अमेरिका) में कार्यरत डॉ. सनेला और उनके साथियों ने इस विषय पर न केवल खोज की है, बल्कि “साइकोसिस एण्ड ट्रान्सेन्डेन्स” शीर्षक एक लेख में “द रिवर्थ प्रॉसेस” की गहरी छानबीन व दस्तावेजों से भरी व्याख्या भी प्रस्तुत की है।
डॉ. सनेला के समूह ने शीजोफ्रोनिया, मेनिअक, डिप्रेशन तथा मानसिक असन्तुलनजन्य अन्य रोगों के रोगानुसन्धानों का विवरण देते हुए यह तथ्य प्रदर्शित किया है कि उनमें से अधिकाँश उच्चत्तर मानसिक विकास की प्रक्रिया वाले वे लोग हैं, जो विराट आन्तरिक शक्तियों के अपरिपक्व तथा असन्तुलित प्रस्फुटन के कारण इस स्थिति में पहुँचे हैं। सनेला- समूह के अनुसार विकास की यह स्थिति वस्तुतः मानसिक रोग नहीं है बल्कि ‘पुनर्जन्म प्रक्रिया’ की ओर यह गति मात्र है।
तुर्की के अदना क्षेत्र में जन्मा इस्माइल नामक बालक जब डेढ़ वर्ष का था तभी वह अपने पूर्व जन्म की बातें सुनाते हुए कहता- मेरा नाम अवीत सुजुल्मस है। अपने सिर पर बने एक निशान को देखकर बताया करता कि इस जगह चोट मारकर मेरी हत्या की गई थी। जब बालक पाँच वर्ष का हुआ और अपने पुराने गाँव जाने का अधिक आग्रह करने लगा तो घर वाले इस शर्त पर रजामन्द हुए कि वह आगे-आगे चले और उस गाँव का रास्ता बिना किसी से पूछे स्वयं बताये। लड़का खुशी-खुशी चला गया और सबसे पहले अपनी कब्र पर पहुँचा। पीछे उसने अपनी पत्नी हातिश को पहचाना और प्यार किया। इसके बाद उसके एक आइसक्रीम बेचने वाले मुहम्मद को पहचाना और कहा तुम पहले तरबूज बेचते थे और मेरे इतने पैसे तुम पर उधार हैं। मोहम्मद ने वह बात मंजूर की और बदले में उसे बर्फ खिलाई। ऐसी अनेकों बातें इस छोटे बालक ने बताई जो पूछताछ करने पर सही निकलीं।
लेवनान के कारनाइल नगर से 67 किलोमीटर दूर खरेबी गाँव के एक अहमद नामक लड़के ने कुछ बड़ा होते ही अपने पूर्वजन्म के अनेक विवरण बताये जिसमें ट्रक दुर्घटना, पैरों का खराब होना, प्रेमिका से विफलता, भाई का चित्र, बहिन का नाम आदि के वे संदर्भ प्रकाश में आये जिनसे बालक का पूर्व परिचित होना सम्भव न था। बालक ड्रूज वंश का- इस्लाम धर्मावलम्बी था। आमतौर से उस वातावरण में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है तो भी इस घटना ने सभी को इस पर पुनर्विचार के लिए विवश कर दिया।
परामनोवैज्ञानिक मेयर ने अपनी पुस्तक “ह्यूमन पर्सनालिटी” में अमरीका की पेन्सिलवानिया यूनिवर्सिटी में असीरियन- सभ्यता के विशेषज्ञ प्राध्यापक हिल प्रेचट द्वारा वेबीलोनिया- साम्राज्य की एक मणि पर खुदे अक्षरों को सहसा पुनर्जन्म की स्मृति से पढ़ लेने का वर्णन किया है। इन प्राध्यापक को उस लिपि व भाषा का ज्ञान नहीं था। अकस्मात् दिवा स्वप्न की तरह उनके दिमाग में वह अर्थ कौंध गया, जो बाद में उस लिपि के विशेषज्ञों द्वारा सही बताया गया। इससे यह अनुमान किया गया कि वे प्राध्यापक पूर्वजन्म में असीरियाई नागरिक थे और उसका संस्कार इतना गहरा था कि अमरीका में जन्म लेने पर भी सतत् उन पर छाया रहा।
इन विभिन्न घटनाओं के सम्बन्ध में जो विवरण प्राप्त हुए हैं, तथ्य सामने आये हैं, उन्होंने पुनर्जन्म और परलोक के भारतीय सिद्धांत की पुष्टि करते हुए यह भी प्रामाणित कर दिया है कि मरने के बाद शरीर तो छुट जाता है पर मनुष्य की चेतना जीवित ही रहती है। अभी कुछ ही समय पूर्व विश्व-विख्यात ब्रिटिश परामनोवैज्ञानिक जे. बर्नार्ड हट्टन ने कुछ ऐसी घटनाओं पर शोध की है, जो यह सिद्ध करती है कि व्यक्ति ही नहीं घटनाओं का भी पुनर्जन्म होता है। इस विषय को इन्होंने अपनी पुस्तक ‘द अदर साइड ऑफ रियेलिटी’ में प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर प्रतिपादित किया
जीते जी तृष्णा ओर अहन्ता के बन्धन न तोड़ सके तो मरने के बाद मुक्ति पाने की आशा क्यों करते हो?
कुछ दिन पूर्व तक भौतिक विज्ञानी आत्मा-परमात्मा के अस्तित्व को नकारते थे। क्योंकि उन्हें प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। पीछे विज्ञान की बाल्यावस्था विकसित हुई और उसने प्रौढ़ावस्था में प्रवेश किया। इस प्रगति चरण में मस्तिष्कीय रहस्यमय परतों की खोज की गई और उसमें अतीन्द्रिय क्षमताओं से भरे-पूरे अनेकों केन्द्र पाये गये। साधारणतया वे प्रसुप्त स्थिति में रहते हैं, पर कारणवश उनका उभार भी देखा गया है। ऐसा उभार जो मात्र चमत्कारी ही नहीं होता वरन् आत्मा के अस्तित्व को भी सिद्ध करता है।
मानव मस्तिष्क की रहस्यमय परतों पर प्रकाश डालने वाले विज्ञान जगत के कई ग्रन्थ बहुत प्रख्यात हैं। मैकलिन डिक्शन लिखित- “दि ह्यूमन सीचुएशन एवं ऐरिक फ्रौम के “साइकोलॉजी एण्ड रिलीजन” में हुए विषय पर गहरा प्रकाश डाला गया है। उनने परामनोविज्ञान को विज्ञान की एक विशेषधारा के रूप में प्रतिपादित किया है और इस संदर्भ में पिछले दिनों से होती रहने वाली चर्चाओं में पुनर्जन्म को भी सम्मिलित किया है। इससे पूर्व मात्र दूर-दर्शन, दूर श्रवण, विचार संचालन आदि की ही चर्चा होती रहती थी।
पुनर्जन्म की मान्यता में सबसे बड़ी अड़चन ईसाई धर्म की यह मान्यता है कि जन्म एक ही बार होता है। ऐसी मान्यताएं इस प्रतिपादन में पूर्वाग्रहों के कारण बाधक होती हैं। इसलिए प्रयोग प्रतिपादनों का जब भी समय आता है तो उन क्षेत्रों के वैज्ञानिक लड़खड़ा जाते हैं और तथ्यों और सत्यों तक पहुँचने में विलम्ब कर देते हैं।
फिर भी अनेकानेक प्रमाणों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मृत्यु के उपरान्त मनुष्य का पुनर्जन्म होना एक वास्तविकता है। इस तथ्य को गहराई से जानने के लिए यह आवश्यक समझा जाये कि इस सम्बन्ध में जो प्रमाण इस समय उपलब्ध हैं, उनके विवरण तैयार कराने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयत्न किये जायें। अतएव खोजी जत्थे भी इस संदर्भ में भेजे गये।
इस सम्बन्ध में बर्जीनिया, अमेरिका के इयान स्टीवेन्सन, भारत आये थे। उनका सहयोग इस प्रसंग में रुचि लेने वाले अन्यान्य कितने ही मनोविज्ञानियों ने किया। भारत प्रायः 150 से अधिक ऐसे प्रमाण पाये गये जिसमें बालकों ने अपने पूर्व जन्मों के विवरण बताये। उनको अनजान स्थानों पर ले जाने पर उन्होंने अपने घर पहचाने। कुटुम्बियों से इसी प्रकार वार्तालाप किया कि मानों वे पूर्व जन्मों के संस्मरणों को भली प्रकार दुहरा सकते हैं। इतना ही नहीं, जिन वस्तुओं से उनका सीधा संपर्क रहा था, उन्हें भी उनने बताया। वे यह भी नहीं भूले थे कि उनकी मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई।
इन विवरणों को प्रकाशित भी किया गया है। इनमें एक विलक्षण घटना ऐसी भी है जिसमें ब्यावर (राजस्थान) की एक सोलह वर्षीय लड़की ने अपने पिछले छह जन्मों के विवरण बताये। यह विलक्षण इसलिए भी है कि आमतौर से छोटी आयु के बच्चों में ही यह स्मृतियों पाई जाती हैं। वे जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, उन स्मृतियों को भूलते जाते हैं। इसलिए प्रायः एक ही जन्म की स्मृति ध्यान में रहती है। कई जन्मों का स्मरण रहने की बात तो कदाचित ही कभी देखने को आती है।
मनुष्य की आत्मा अमर है। उसका जीवन अनन्त है। बार-बार जन्म-मरण का चक्र तो उसी प्रकार चलता रहता है, जैसे पुराने वस्त्रों के स्थान पर नये वस्त्र पहनने पड़ते हैं। यदि कर्म फल सत्य है तो यह भी मानना पड़ेगा कि इस जन्म में उसे भोगे जाने में जो कमी रह गई है, अगले जन्मों में जाकर पूरी हो सके।
पुनर्जन्म का एक और भी प्रमाण है कि कुछ बच्चे साधारण विकास का क्रमशः उल्लंघन करके छोटी आयु में ही अपनी साधारण प्रतिभा का परिचय देने लगते हैं। जबकि उनकी जन्मजात परिस्थितियाँ वैसी नहीं होतीं और न वातावरण ही ऐसा होता है जिससे वे असाधारण साधनों की सहायता से असाधारण उन्नति कर सकें। फिर भी वे अपनी निजी प्रतिभा के सहारे प्रगति-पथ पर अत्यंत तेजी से चले और उस स्तर तक जा पहुँचे, जहाँ तक लोग नहीं पहुँच पाते।
नेत्रहीनों के लिए शिक्षा में काम आने वाली ब्रेल लिपि फ्राँस के 15 वर्षीय बालक लुइस ब्रेल ने आविष्कृत की थी। पाकिस्तानी बालक मुश्ताक मुहम्मद ने 12 वर्ष की आयु में क्रिकेट खिलाड़ियों में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी। खेल जगत का ही बोरिस वेकर (टेनिस) का एक और उदाहरण है। वैज्ञानिक जगत के यशस्वी, अलबर्ट आइन्स्टीन ने 16 वर्ष की आयु में सापेक्षिकता के सिद्धांत पर एक लेख था। बाद में वे उसी अन्वेषण में लगे रहे और एक अन्य भौतिक के विषय पर नोबुल पुरस्कार प्राप्त कर सके। आस्ट्रेलिया के एक कबीले में जन्मी आदिवासी किशोरी ईवान गुलगांस ने संसार के मूर्धन्य टेनिस खिलाड़ियों में अपना स्थान प्राप्त किया था। फ्राँस में क्रान्ति का शंखनाद फूंकने और शत्रु पक्ष की जड़ें हिला देने वाली “जोन ऑफ आर्क” जब कार्य क्षेत्र में उतरी तब मात्र 16 वर्ष की थी। 19 वर्ष की उम्र में जो उनने अपने प्राण उन्मार्ग कर दिये थे। ईसाई जगत में पोप पन्थियों के गुरुडम की नींव हिला देने वाली क्राँति की आग भड़का देने वाले पादरी मार्टिन लूथर जब कार्य क्षेत्र में उतरे तब वे मात्र 20 साल के थे।
अंग्रेज वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने जब विकासवाद के अपने अनुपम सिद्धांतों का प्रतिपादन किया तो संसार के बुद्धिजीवी आश्चर्यचकित रह गये। तब वे मात्र किशोर अवस्था को पार करके युवक वर्ग में पहला चरण ही रख पाये थे। इतना ही नहीं उन्होंने प्राणि जगत सम्बन्धी खोजों के सिलसिले में 25 वर्ष तक संसार भर में भ्रमण किया और खोजपूर्ण ग्रन्थ “दि औरिजीन आफ स्पेसीज” लिखा।
अंग्रेजी साहित्य के साहित्यकार चार्ल्स डिकेन्स ने 25 वर्ष की आयु तक इतने ग्रन्थ लिख दिये थे कि वे संसार के माने हुए लेखनी के धनी माने जाने लगे। इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री विलियम पिट जब उस महत्वपूर्ण पद पर आसीन हुए तब मात्र 24 वर्ष के थे। इशाक पिट मैननेरा वर्ष की आयु में स्टेनोग्राफिक साउण्ड के सम्बन्ध में वैज्ञानिक जगत को चकित कर दिया था। अमेरिका के नीग्रो धावक कार्ल लुईस ने कितने ही स्वर्ण पदक जीते, तब उसकी आयु मात्र 13 वर्ष के थी। इशाक न्यूटन जब 23 वर्ष के थे तभी उनने 342 अपने प्रतिपादनों से वैज्ञानिक जगत को आश्चर्य में डाल दिया था। उनकी खोजें अभूत पूर्व मानी जाती हैं। अमेरिका की अन्धी और गूँगी हेलन केलर ने विकलाँग होते हुए भी अपनी प्रतिभा से सर्वत्र हलचल मचा दी थी। कार्टून फिल्मों के निर्माता वाल्ट डिस्ने जब 22 वर्ष के थे तभी उन्होंने सिनेमा जगत को नई दिशा दी थी।
भारत में ध्रुव, प्रहलाद, लव-कुश, भरत चक्रवर्ती, शंकराचार्य, कबीर, ज्ञानेश्वर, रामतीर्थ, विवेकानन्द आदि छोटी ही आयु में वह कार्य करने लगे थे जो बड़ी आयु वालों के लिए भी सम्भव नहीं होते।
ऐसी विलक्षणताएं जिन बालकों में पाई गई हैं, उनके बारे में यह भी खोजा गया है कि परिस्थितियों ने उन्हें ऊँचा उठाया या अपनी जन्मजात प्रतिभा के सहारे ही वे आश्चर्यजनक प्रगति कर सकने में सफल हुए। इन विशेषताओं के कारण ढूंढ़ने पर पूर्व जन्म की संचित प्रतिभा के अतिरिक्त और कोई कारण ऐसा नहीं दीख पड़ता जिससे उनकी विशिष्टता को साँसारिक किसी प्रयोजन के साथ जोड़ा जा सके।
मनुष्य के मात्र कर्म ही अगले जन्म तक साथ नहीं चलते वरन् विद्या, योग्यता, प्रतिभा भी उनके साथ-साथ चलते हैं।
महामानव प्रायः अपने जीवन काल में नहीं पहचाने जाते। चले जाने पर ही उनकी गरिमा जानी जाती है। वह गरिमा भी अनंत काल तक रहती है और असंख्यों का हित साधन करती है।
स्वप्नों के सम्बन्ध में यह भी एक मान्यता है कि सोते समय जीव भ्रमण पर निकल जाता है और जहाँ जो देखता है उसकी स्मृति ध्यान में रखते हुए सवेरे उठता है। उनमें से बहुतेरे साँकेतिक भाषा में देखे या समझे गये होते हैं। उनका फलितार्थ लगाना पड़ता है।
कई भूत प्रेतों के आवेशों और उनके द्वारा उत्पन्न किये गये। रोग शोकों को मृतात्माओं की देन मानते हैं।
समाधि में सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर की डोर तो बंधी रहती है पर प्राणों के ब्रह्मरन्ध्र में विलीन हो जाने पर स्थिति अर्ध मृतक जैसी हो जाती है।
शरीर के चारों और विशेषतया मुख मण्डल के इर्द-गिर्द छाये हुए तेजोवलय को सूक्ष्म शरीर की अनुकृति मानते हैं। उसके साथ एक प्रकार का चुम्बकत्व घुला रहता है जो संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करता या प्रभावित होता रहना है। परलोक वासियों के सम्बन्ध में कहाँ जाता है कि वह सूक्ष्म शरीर से स्वर्ग नरक में रहता है। इसके बाद पुनर्जन्म लेता है।
वैज्ञानिक परीक्षणों से भी उनकी पुष्टि हुई है। मरने से ठीक पहले और उसके उपरान्त शरीर के भार में अन्तर पड़ता है और प्राण निकलते ही अपेक्षाकृत हल्का हो जाता है। इस हल्केपन को सूक्ष्म शरीर का भार माना जाता है।
कई प्रिय वस्तुओं में मृतात्मा को बहुत लगाव होता है। उन्हें बहुधा उसमें इर्द-गिर्द मंडराता अनुभव किया गया है। इसलिए एक मान्यता यह भी है कि उन वस्तुओं को किसी सत्पात्र को दान कर देना चाहिए। स्मृति के रूप में उसे सुरक्षित भी नहीं रखना चाहिए। अन्यथा वह लगाव न छूटने से मृतात्मा प्रगति की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाती।
किसी प्रियजन की विपत्ति में सहायता करने से मृतात्माएं दौड़ी चली आती हैं और यथा सम्भव उनकी सहायता भी करती हैं और उनकी कठिनाइयों के निवारण का उपयुक्त मार्गदर्शन भी करती हैं।
कई मरणासन्न व्यक्तियों के सम्बन्ध में ऐसा अनुभव किया गया है कि उस समय उन्हें मृतक घोषित कर दिया गया। सभी लक्षण भी मृत जैसे ही थे। फिर भी चिकित्सकों ने आक्सीजन देकर, हृदय की मालिश करके, बिजली के झटके देकर उन्हें जीवित रखा और किसी प्रकार उनके प्राण लौट आये। इस मरण और पुनर्जीवन के मध्यवर्ती समय में जीवात्मा यह अनुभव करती रही कि उनका सूक्ष्म शरीर ऊपर उठकर हवा में तैरता रहा। डॉक्टर नर्सों की बातें सुनता रहा। इसके बाद शरीर में फिर से चेतना जागी और उनका उड़ता हुआ शरीर पुराने शरीर में प्रविष्ट कर गया।
इसी प्रकार एक और मरणासन्न रोगी ने कहा कि उसके स्वर्गीय प्रियजन ऊपर आकाश से उतर रहे हैं और कह रहे हैं कि हमें साथ लेने आये हैं। वहाँ हमारे साथ रहने में तुम्हें कोई कष्ट न होगा। इसके बाद की अनुभूतियों का वर्णन करने-करते उसके प्राण पखेरू उड़ गये।
किन्हीं आत्माओं ने अपने प्रियजनों को ऐसे स्वप्न देने की विधा अपनाई है, जिसके आधार पर उनका जन्म अमुक स्त्री के पेट से अमुक समय होना था। प्रमाण स्वरूप कुछ चिन्ह भी उनके शरीर पर पहले वाले थे। जन्म होने के उपरान्त उनके शरीर पर न केवल ऐसे ही चिन्ह पाये गये वरन् मुखाकृति और शरीर भी वैसा ही पाया गया। बड़े होने पर उनने उन्हीं कामों में रुचि ली जिनमें कि उनकी पूर्व रुचि थी।
एक मृतात्मा को किसी ने कत्ल करके नाले में फेंक दिया था। मृतात्मा ने घरवालों को सूचित किया कि उसका शरीर अमुक स्थान पर दुर्दशाग्रस्त स्थिति में पड़ा है। उसे निकालकर मरण संस्कार कराया जाये। उसने मारने वालों के नाम भी बताये। पता लगाने पर मृतात्मा का संकेत बिल्कुल सच निकला और अपराधियों के पास मारने के प्रमाण भी पकड़े गये।
यों स्थूल शरीर के सूक्ष्म शरीर मरण के उपरान्त ही अलग होता है। किन्तु योगाभ्यास से उसे पृथक करने की कला भी सीखी जा सकती है और एक ही शरीर को दो स्थानों में काम करते हुए देखा जाता है। परकाया प्रवेश की घटना में स्थूल शरीर के सुरक्षित रखने की व्यवस्था बनाकर आद्य शंकराचार्य जैसी आत्मा दूसरे के शरीर में प्रवेश करके अन्य प्रकार के अनुभव प्राप्त करती रही है। कई मृत बालकों ने अपनी बहुत शोकाकुल माताओं के गर्भ में पुनः प्रवेश करके उसी प्रकार का जन्म लिया है। कुछ बालकों को पुनर्जन्म की घटनाओं की स्मृति रहती है। किन्तु वे यह नहीं बता पाये कि मरण और जन्म के बीच में वे कहाँ किस स्थिति में रहे। यों नया जन्म लेने के उपरान्त उनने पूर्व जन्म के सम्बन्धियों को, घर को पहचाना, और अपनी वस्तुओं को देखकर न केवल अपनी होने की बात कही वरन् यह भी बताया कि वे उन्हें किस प्रकार प्राप्त हुईं और उनका क्या उपयोग करते थे। यह स्मृति कुछ वर्षों ही रही, बड़े होने पर वे सभी बातें उन्हें विस्मरण हो गईं।
श्मशान साधना करने वाले कापालिक भी ऐसी विलक्षणताएं प्राप्त कर लेते हैं कि वे किसी को क्षति पहुँचा सकें। लाभ तो वे बेचारे क्या पहुँचा सकते हैं। हाँ किसी कुकर्म में किसी को सफलता दिलाकर उसके बदले में उपहार पा सकते हैं।
छाया पुरुष सिद्धि में भी यही होता है कि अपने ही शरीर और स्वभाव का एक सूक्ष्म शरीरधारी नया व्यक्ति उत्पन्न कर लिया जाता है और उससे वह काम लिया जाता है जो समान शक्ति एवं योग्यता वाला व्यक्ति कर सकता है। आरम्भ में छाया पुरुष का कार्य क्षेत्र सीमित होता है। पर अभ्यास परिपक्व हो जाने से सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से ही चिपका नहीं रहता, वरन् उसे कितनी ही दूर तक कितने ही दिन को, कितने ही कठिन काम के लिए भेजा जा सकता है और वह पुराने स्थूल शरीर की तुलना में सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियों के सहारे ऐसी जानकारियां प्राप्त कर सकता है, जिसका किसी को कानों-कान पता नहीं होता।
सिद्ध पुरुष जब अपने सूक्ष्म शरीर की शक्ति को सुविकसित देखते हैं तो स्थूल शरीर को त्याग देते हैं और सूक्ष्म शरीर के सहारे अपने निर्धारित कार्यों को चौगुना सौगुना करते रहते हैं। तब उन्हें स्थूल शरीर के लिए अन्न, वस्त्र, निवास के लिए भी कोई प्रबन्ध नहीं करना पड़ता और साथ ही यदि आवश्यकता पड़ती है तो अपना सारा स्थूल शरीर वाला प्रयोजन सूक्ष्म शरीर से ही पूरा कर लेते हैं।
उन दिनों अल्जीरिया को फ्राँस ने अपना गुलाम बना लिया था। साथ ही स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए उनका संघर्ष कम नहीं हुआ था।
फ्राँस के प्रख्यात लेखक “सार्त्र” अल्जीरिया को स्वतंत्र बनाने के पक्ष में बराबर अपनी लौल लेखनी चला रहे थे। यहाँ तक कि उनने फ्राँस के सैनिकों तक अनीति के पक्ष में न लड़ने के लिए भड़काया था। जनता पूरी तरह उनके साथ थी।
फ्राँसीसी सरकार ने सार्त्र को दबाने के लिए सभी उपाय किये। उनके घर पर बम फेंके गये। पर वे बच गये। अन्त में दरबारियों ने शासक चार्ल्स डी जाल को सलाह दी कि उन्हें पकड़कर काल-कोठरी में बन्द कर दिया जाये।
डी जाल बहुत देर विचार करते रहे और फिर गम्भीर मुद्रा में बोले ‘सार्त्र” एक व्यक्ति नहीं है। उसके साथ समूचा फ्राँस है। ऐसे व्यक्ति को कोठरी में कैद नहीं किया जा सकता।
भगवान एक है। उसकी प्रतिकृतियाँ भर अनेकों प्रकार की अनेकानेक क्षेत्रों में गतिशील हो सकती हैं। पर ऐसा नहीं हो सकता कि एक ही भगवान एक ही समय में विभिन्न व्यक्तियों के रूप में अवतार धारण करे। भगवान सर्वव्यापक है। जो सर्वव्यापक होगा वह अवतार धारण नहीं कर सकता। करें तो सृष्टि में जो अन्य गतिविधियाँ चल रही हैं, उनका सूत्र संचालन कौन करेगा? इसलिए तत्वज्ञानियों ने भगवान को निराकार ही माना है। साकार प्रतिमायें तो ध्यान-धारणा के लिए कल्पना के सहारे गढ़ी जाती हैं। यही कारण है कि अपने-अपने वर्गों और क्षेत्रों के अनुसार गढ़ी गई भगवान की अनेकानेक प्रतिमायें देखने को मिलती हैं। यह मात्र ध्यान धारणा के लिए है। ध्यान का उपक्रम ही ऐसा है कि उसे किसी रूप का आश्रय लेने की आवश्यकता पड़ती है। भले ही वह सूर्य प्रकाश के रूप में हो अथवा किसी देवी देवता के रूप में। इनमें श्रद्धा का समावेश करके इस स्तर को शक्तिशाली बनाया जाता है कि जीवन्तों की तरह अपना प्रभाव प्रदर्शित कर सके।
भगवान निराकार होने से वे कार्य नहीं कर पाते जिसमें ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेंद्रियों की आवश्यकता होती है। ऐसे कार्य वे अपने पार्षदों से कराते हैं। “पार्षद” का अर्थ है निकटवर्ती। जो ईश्वर की दिव्य विभूतियों को जितनी अधिक मात्रा में अपने भीतर धारण कर पाते हैं वे उसी मात्रा में भगवान के निकटवर्ती या कृपा पात्र माने जाते हैं। उन्हें संसार का सन्तुलन सही बनाये रखने वाले कार्य करने का निर्देशन दिया जाता है और वे उसे पूरा कर भी दिखाते हैं। इस पराक्रम में दैवी शक्ति उनका साथ देती है। प्रतीत ऐसा होता है कि यह व्यक्ति विशेष की क्षमता का चमत्कार है। साँसारिक प्रयोजनों में तो व्यक्ति की प्रतिभा ही काम करती है, पर उत्कृष्टतावादी, आदर्शवादी प्रयोजनों में सामान्य व्यक्ति अपनी लोलुपवृत्ति के कारण न तो रस ले पाते हैं और न उसमें मन ही लगता है। फिर जोखिम उठाने की बात तो बने ही कैसे? जो असंख्यों के लिए अनुकरणीय, अभिनन्दनीय कार्य करते हैं, उन्हें उतना कुछ साँसारिक जीवन या परिकर नहीं करने देता, उसमें विघ्न ही उपस्थित करता है। ऋषिकल्प आत्मा ही महापुरुषों की भूमिका निभाती हैं और वे ही इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णिम पद चिन्ह छोड़ जाती हैं।
किन्तु बहुधा ऐसा देखा गया है कि धूर्त स्तर के लोग अपने को भगवान घोषित करके भावुक भक्तजनों को ठगते और उनकी हजामत उलटे उस्तरे से बनाते हैं। सामान्यों की तुलना में अपने को असामान्य बताने के लिए उन्हें सरल उपाय बाजीगरी की दृष्टिगोचर होता है। वे लोगों को कौतुक-कौतूहल दिखाते हैं ताकि अदूरदर्शी यह समझ सकें कि उनकी विक्रिता दिखाने की क्षमता ही कोई सिद्धि है और वह सिद्धि उन्हें भगवान के रूप में मिली है। इसलिए वे भी भगवान ही हैं।
ऐसे वेशधारी भगवानों में से इसी शताब्दी में सैकड़ों की संख्या में प्रकट हुए और मर गये। जीवित वर्ग में भगवानों की कोई कमी नहीं है। भारत में ही करीब 200 व्यक्ति अपने को भगवान कहते हैं या उनके अवतार बनते हैं। प्रमाण स्वरूप उनसे और तो कोई बड़ा काम नहीं बन पड़ता। जादूगरों के हथकण्डे वे अपनाते हैं। बालों में से बालू निकालते हैं। किसी को आकाश में हाथ मार कर लौंग इलायची, मिठाई, मिश्री आदि खिलाते हैं। यदि देखा जाय तो कोई घटिया दर्जे का बाजीगर ही ऐसे हस्त कौशल दिखा सकता है। फिर भी इतनी ईमानदारी तो उसमें रहती है कि “मैं हाथ की सफाई दिखा करके आपका मनोरंजन कर रहा हूँ।” किन्तु यह भगवान बनने वाले अपने कौतूहलों की सिद्धि एवं भगवान प्रतीति ही बताते जाते हैं। आश्चर्य यह है कि इस भरी दुनिया में ऐसे मूर्खों की भी कमी नहीं जो ऐसे नगण्य बहकावों में ही आ जाते हैं और अपना बहुत कुछ गंवा बैठते हैं।
यदि कोई मनुष्य ईश्वर है तो उसे बाढ़, दुर्भिक्ष, भूकम्प जैसे प्रकृति प्रकोपों को रोकना चाहिए। देशों और वर्गों के मध्य जो भयंकर कलह चल रहे हैं, उनका निराकरण करना चाहिए। वातावरण का संशोधन सम्भव न हो तो इतना तो करना ही चाहिए कि देश में जो भयंकर अशान्ति मची हुई है, अपराधों की बाढ़ आई हुई है, व्यक्ति और समाज को अपराधों की भरमार से इतना त्रास सहना पड़ रहा है। उसे दूर करें। भगवान का वचन है कि “मैं धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश करने के लिए अवतार धारण करता हूँ” प्रस्तुतः 200 अवतारों को ऐसा कुछ करना चाहिए ताकि उनकी उद्देश्यपूर्ति मानी जा सके। यदि ऐसा नहीं है तो अबकी बार जो भी भगवान हाथ पड़े, उसी से यह कहलवाना चाहिए कि “मैं जादू कौतुक कौतूहल दिखा कर सिर फिरे लोगों को बहकाने आया हूँ।”
हिन्दुओं की देखा-देखी यह बीमारी भारत के ईसाइयों में भी फैली है। ईसाई बहुत क्षेत्रों में प्रायः 10 व्यक्ति अपने आपको ईसा का अवतार बताते हैं और शेष 9 को झुठलाते हैं। इस प्रकार उनकी जूतम पैजार चलती रहती है, पर हिन्दू अवतार इस मामले में डरपोक है। वे अपनी चमड़ी भर बचाते हैं। दूसरों का विरोध करके अपनी खाल खिंचवाने के झंझट में नहीं पड़ते। जो मेंढक जहाँ बैठा है, उसी के आसपास वाले मच्छरों को गटकता रहता है।
जादूगरों और अवतारों के चित्र-विचित्र जादूगरी के मायाचार को देखते हुए श्रीलंका के डॉक्टर कोबूर ने एक लाख रुपये की रकम इसलिये जमा करके रखी थी ताकि कोई चमत्कार दिखाने वाला तथाकथित भगवान वैज्ञानिक समिति को जाँच-पड़ताल की सुविधा देते हुए यह सिद्ध करे कि प्रकृति के सामान्य नियमों के ऊपर उठकर क्या वह कोई करामातें दिखा सकता है? यदि वह ऐसा कर दिखा दे, तो इस एक लाख रुपये की राशि को उठा ले।
इसी धन्धे में माहिर और अपनी धाक जमाए हुए करामाती लोगों को- “भगवानों को उपरोक्त डॉक्टरों ने प्रत्येक को पत्र लिखे पर उनमें से एक भी तैयार न हुआ। जबानी यह कहलवाया कि हमें रुपये की जरूरत नहीं। इस पर भी डॉक्टर कोबूर यही घोषणाएँ छपाते रहे कि “यदि उनको उस धन की आवश्यकता न हो तो वे उस धन को किन्हीं जरूरतमंदों को बाँट दें और अपनी प्रतिष्ठा को बचा लें। अन्यथा मेरे जैसे लोग ठगबाजी का इल्जाम ही लगाते रहेंगे और विचारशील लोगों के मन पर अध्यात्म सम्बन्धी विकृत स्वरूप ही छाया रहेगा।”
उस रुपये को बैंक में जमा हुए प्रायः 25 वर्ष हो गये। पर चुनौती स्वीकार करने के लिए कोई अवतारी या सिद्ध पुरुष आगे न आया।
बहकाने वाले तो भूत-पलीतों के नाम पर भी ठगते खाते हैं। विचित्र प्रकार का पेश परिधान पहनकर गाँजे की चिलम फूँकते हुए अन्यों को सट्टा का नम्बर बताने या जुआँ, चोरी में फायदा कराने का दम मारते रहते हैं, पर जब-जब भी उन्हें परीक्षा की कसौटी पर चढ़कर परखा है, तब-तब बगलें ही झाँकते रहे हैं।
अध्यात्म जितना उच्चस्तरीय है, उसे उतना ही ऊँचा रहने देना चाहिए। जादू कौतुक की दलदल में घसीट कर उसे उपहासास्पद नहीं बनाना चाहिए। भगवान बनने का दावा करने वाले यदि बुद्ध, गाँधी जैसा महान जीवन जी सकें और लोक-मंगल के लिए अपने को खपा सकें तो भगवान कहलाने का तो नहीं पर महामानव और ऋषिकल्प कहलाने का श्रेय तो उन्हें मिल ही सकता है। इसी में जनसाधारण की तथा अध्यात्म तत्वज्ञान की भलाई है।
अपनापन जिसके साथ जुड़ता है उसे कष्ट देते नहीं बन पड़ता। अपनेपन का दायरा बढ़ाओ ताकि किसी को दुःख देना न बन पड़े। अपने शरीर या सन्तान को कौन सताना चाहता है?
बाजार में अनेक पंचांग बिकते हैं। उनमें से प्रख्यातों की संख्या तीस से अधिक है। इनके गणित में भारी अन्तर भी पाया जाता है। मुद्रण और विनिमय व्यवस्था के कारण जो पंचांग जिस क्षेत्र या समुदाय में बिकने लगता है। उसका प्रचलन प्रचार भी उन्हीं क्षेत्रों में होता है। इन विषमताओं का कारण पंचांग बनाने की वे पद्धतियाँ हैं जो विभिन्न पुरोहितों की पूर्वाग्रहों में सम्मिलित हो गई हैं और जिनकी शुद्धता पर वे सभी एक दूसरे में बढ़कर दावा करते हैं।
जिस प्रकार एक आदर्श कल्पना बहुत दिनों से यह चली आती है कि कई धर्मों को मिलाकर एक मानव धर्म बनाया जाय जो सार्वभौम एवं सर्वमान्य हो, उसी प्रकार गत एक शताब्दी में ज्योतिर्विज्ञान के विद्वानों ने यह भी प्रयत्न किया है कि एक सर्वमान्य पंचांग ऐसा बने जिसकी भारतीय पक्ष में तो सामान्यता हो ही, पर इन दोनों प्रयासों में से एक को भी कहीं कोई सफलता नहीं मिली। खींच-तान की स्थिति ऐसी बनी रही जिसमें होली दिवाली जैसे प्रमुख त्यौहार भी दो हो जाते हैं। रामनवमी और कृष्ण जन्माष्टमी से लेकर एकादशी व्रतों तक के बारे में आगा-पीछा चलता है। पंचांग जगत के लिए यह स्थिति लज्जास्पद है कि उन्हें किस दिन कौन-सा व्रत त्यौहार मनाया जाय, इसकी सही जानकारी न दी जाय और मतभेदों के शिकार लोग अपने को अधिक सही या गलत कहते रहें।
ऐसी दशा में अंग्रेजी कैलेण्डर की मान्यता और प्रामाणिकता बढ़ रही है। दिसम्बर जनवरी में कैलेण्डर बेचने या उपहार देने का प्रचलन है। उसमें अंग्रेजी तारीखों वाला ही कैलेण्डर छपा होता है। कारण उसका एक तो यह है कि उनने धीरे-धीरे अधिकाँशतः मूर्धन्य देशों में मान्यता प्राप्त कर ली है। दूसरे अन्तरिक्ष विद्या के अनुरूप कम्प्यूटरी या रेडियो संपर्क की पद्धति में उसी का प्रयोग होता है। यह ग्रेगोरी पंचांग कहलाता है। अन्तरिक्ष विज्ञान के संदर्भ में जो इन दिनों पर्यवेक्षण किया जाता है वह इसी के आधार पर होता है। क्योंकि उसकी प्रमाणिकता पर अधिक विश्वास किया जाता है।
देश में कुछ पंचांग सूर्य सिद्धान्त के आधार पर बने हैं, कुछ चन्द्र सिद्धान्त के आधार पर। इनमें संक्रान्ति काल गणना को प्रमुख महत्व दिया जाता है। इस्लामी मान्यता में जिस चंद्र पंचांग का प्रयोग होता है, वह अपने ढंग का अनोखा है। चन्द्र दर्शन के साथ उसका आरम्भ होता है। पर उसमें भी यह निश्चित नहीं रहता कि अमुक दिन निश्चय ही चन्द्र दर्शन होगा। बहुत बार उसमें एक दिन का अन्तर पड़ जाता है।
काल गणना में कई वस्तुएँ ऐसी हैं जो अपना महत्व रखती हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर जितने समय में घूमती है उससे दिन-रात बनते हैं। उसका परिभ्रमण उपक्रम कुछ ऐसा है जिसमें ऋतुओं के अनुरूप दिन-रात की लम्बाई में अन्तर पड़ता रहता है। चन्द्रमा की घटती बढ़ती कलाएँ भी समय का बोध कराती हैं एवं तिथियों की जानकारी देती हैं।
सूर्य की अपनी कक्षा पर परिभ्रमण और उसके कारण पृथ्वी का उसके समीप या दूर पहुँचना ऋतु परिवर्तन का कारण है। शीत, ग्रीष्म और वर्षा का यह परिवर्तन आधार है।
सौर मण्डल के परिभ्रमण क्षेत्र को 28 भागों में बाँटा गया है। यही नक्षत्र हैं। यों नक्षत्र ब्रह्मांड स्थित ग्रहों सूर्यों को भी कहते हैं। पर जहाँ तक पंचांगों की काल गणना का सम्बन्ध है, वहाँ तक सौर मण्डल के परिभ्रमण क्षेत्र को ही नक्षत्र कहते और उसी आधार पर वे स्पष्टीकरण करते हैं कि अमुक समय अमुक सौर मण्डलीय ग्रह या उपग्रह किस स्थान पर था।
तिथि, वार और नक्षत्रों का सम्बन्ध सूर्य चन्द्र और पृथ्वी से सम्बन्धित है, पर पंचांगों में उल्लिखित योगों और कारणों के बारे में कोई सन्तोषजनक आधार अभी तक नहीं मिला है। संक्रान्ति से, अमावस्या से, पूर्णिमा से आरम्भ होने वाले महीनों के आधार पर अलग-अलग पंचांग बनते और जहाँ जिनका प्रचलन चला आया है, वहाँ उनको मान मिलता है। यों पूर्वार्त्त और पाश्चात्य मान्यताओं के सम्मिश्रण से एक राष्ट्रीय पंचांग भी छपता है पर उनकी बिक्री एवं मान्यता नगण्य ही है।
पंचांगों में महीनों का मान समान नहीं पाया जाता। पूरे तीस दिनों का महीना किसी ने भी नहीं माना है। महीने का मान 2903055 दिनों से लेकर 2908125 दिनों तक बदलता रहता है। इस अस्थिरता का एक मध्यवर्ती मार्ग 29,05306 सौर दिनों का मध्यवर्ती वर्ष माना गया है। पर यह भी पूर्ण नहीं है गणित की कोई पद्धति अभी तक ऐसी नहीं निकाली जा सकी है जो घण्टा, मिनट या घड़ी-पल के हिसाब से वर्ष का कोई सुनिश्चित मापदण्ड स्थिर कर सके। इसलिए भारतीय पंचांग मास वृद्धि या मास क्षय का बीच-बीच से ऐसा जोड़-तोड़ लगाते रहते हैं ताकि अन्तर की खाई को कम चौड़ा किया जा सके। पाश्चात्य पद्धति महीने को 30 या 31 का कर देते हैं। किसी को 28 या 29 दिन का बना देते हैं। यह सब इसलिए करना पड़ता है कि पंचांग बनाने के लिए जो गणित पद्धतियाँ बनानी पड़ती हैं। उनमें से किसी को पूर्व या सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता है। सभी अनुमान के लगभग हैं और पूरी तरह न मिलने पर आधी से काम चलाने की नीति के अनुसार काम चलाना पड़ता है।
सॉयन और विरचन पंचांग पद्धतियों को अपनाने पर विवाद सहज ही गहरा हो जाता है। वह मुद्दतों से चला आता है और अभी तक नियन्त्रण में नहीं आया।
वस्तुतः कालचक्र का विभाजन इस तथ्य को ध्यान में रखकर किया गया है कि सौर परिवार के सभी ग्रह नियत अवधि में सूर्य की परिक्रमा करके अपने स्थान पर आ जाते हैं पर बात ऐसी है नहीं। अपना सूर्य अपने पुत्र-पौत्रों की मण्डली को साथ लेकर एक महासूर्य की परिक्रमा भी करता है। उसके अपने ग्रह-उपग्रह भी साथ में खिंचे चले आते हैं और उस महासूर्य की पदयात्रा में अपनी-अपनी परिधि को पकड़े हुए आगे बढ़ते रहते हैं। बात इतने पर ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् वह महासूर्य भी अति सूर्य की ओर दौड़ता है। इस प्रकार ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि उसकी अनन्त परिक्रमा को करते हुए कोई भी ग्रह कदाचित् सृष्टि के अन्त तक ही अपने पूर्व स्थान पर लौटकर आता हो। इस सृष्टि से निखिल ब्रह्मांड में कौन ग्रह कब कहाँ होगा? इसका निश्चय करने का एकमात्र उपाय यही है कि विनिर्मित वेधशालाओं के माध्यम से ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति को हर समय परखते और जो अन्तर पड़ता जाता है, उसका परिशोधन करते रहा जाय।
पंचांग बनते हैं, वे किसी नगर विशेष की पलभा को ध्यान में रखते हुए उस आधार पर गणित करने के बाद बनते हैं, जबकि होना यह चाहिए कि जन्मकुण्डली बनाते समय अपने स्थान की पलभा स्वयं निकाली जाय और उसके आधार पर स्थानीय पंचांग स्वयं बनाया जाय।
कलकत्ता की पलभा पर बने हुए पंचांग में बम्बई की पलभा देखते हुए प्रायः आधे घण्टे का अन्तर रहेगा। ऐसी दशा में शुद्ध कुण्डली का बन सकना सम्भव नहीं। शुद्ध तब बने जब ग्रहों की स्थिति को प्रामाणिक वेधशाला के सहारे जानकर वस्तुस्थिति को समझा जाय। जिन दिनों ज्योतिर्विज्ञान का सही स्वरूप स्पष्ट था, उन दिनों वेधशालाओं को बनाने और उनका उपयोग करने का विधान समझने का भी कष्ट किया जाता था। पर अब तो सब धान बाईस पंसेरी के भाव बिक रहे हैं और नकल-टीप करके उत्तीर्ण होने और तीस मारखाँ बनने का घमासान चल रहा है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए, समय की आवश्यकता को समझते हुए शान्ति-कुँज हरिद्वार में एक प्रामाणिक वेधशाला बनाई गई है और उसे माध्यम मानकर ब्रह्मवर्चस् दृश्य गणित पंचांग को कई वर्षों से प्रकाशित किया जा रहा है।
बढ़-बढ़कर बातें मत करो। शेखी न बघारो। तुम क्या हो, इसका परिचय अपने कृत्यों से दो।
संस्कृति शब्द का उपयोग आज विभिन्न अर्थों में होता है। नाच, गाना, प्रहसन, अभिनय आदि का बोध साँस्कृतिक कार्यक्रमों से होता है। इस प्रकार का कोई विज्ञापन प्रकाशित हो तो यही समझा जाता है कि इस आयोजन में इसी प्रकार की गतिविधियाँ अपनाई जायेंगी और दर्शकों का मनोरंजन ही किया जायेगा। यह मनोरंजन कार्य प्रकार उसको अर्थ एवं स्वरूप में विज्ञापित करने वाला रहा होता तो अधिक अच्छा होता।
दूसरे संस्कृति का अर्थ खान-पान, रहन-सहन वस्त्र परिधान एवं प्रथा परम्पराओं के रूप में होता है। ऐसी संस्कृति प्रायः परम्पराजन्य होती है उसके साथ क्षेत्रीय सुविधाओं का भी समावेश होता है। भारत जैसे उष्ण प्रदेश में बार-बार का स्नान, नदी, सरोवरों का अवगाहन संस्कृति है, पर जहाँ पानी का घोर अभाव है, वहाँ हाथ धोने के लिए भी पानी नहीं फैलाया जाता वरन् हाथ पर उलटा बहा लिया जाता है ताकि वह भाग भी स्नानसिक्त मान लिया जाय। हिमानी क्षेत्रों में शीत ऋतु में कोई विरले ही कभी-कभी शरीर को धोते पोतते हैं। यह वहाँ की संस्कृति है जो उष्णता और जल की बहुलता वाले क्षेत्रों से पृथक है।
शिष्टाचारों के निर्धारण पुरातन काल से चले आते हैं उनमें सुविधा असुविधा की बात आरम्भ काल में सोची गई होगी, पर अब तो वह प्रचलन मात्र है। पाश्चात्य देशों में पर नारी और पर पुरुष का नृत्य स्टेजों पर होता है और फुर्तीले नर्तकों के कौशल पर तालियाँ बजती हैं। पर जिन देशों में कड़े पर्दे का रिवाज है। उन समुदायों में ऐसा करना अश्लीलता समझा और अक्षम्य माना जाता है।
ऐसी दशा में संस्कृति का क्या अर्थ माना जाय? अरब लोग जिस प्रकार की पोशाक पहनते हैं, अफ्रीकी वैसी नहीं पहनते। इसी प्रकार भाषाओं में भी अन्तर है और पितरों तथा देवी-देवताओं की मान्यता के सम्बन्ध में भी। इन सब प्रसंगों को प्रचलन या अभिरुचि, परम्परा भले ही कहा जाय पर उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती, जिसको लेकर उस गौरवास्पद शब्द का सृजन हुआ है। संस्कृति का अर्थ है- सुसंस्कारिता। सुसंस्कारिता से तात्पर्य है मानवी गरिमा के अनुरूप, चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार। इस संदर्भ में बहुत अधिक मतभेद की गुँजा नहीं है। देश, क्षेत्र जाति, वर्ण, सम्प्रदाय के कारण शालीनता का स्तर नहीं गिरता। संयम, सज्जनता, उदारता, नम्रता जैसे शब्दों में उसका विवेचन किया जा सकता है। दूसरों से हम अपने लिए जैसे व्यवहार की आशा करते हैं वैसा ही यदि दूसरे के साथ करने लगें तो समझना चाहिए कि संस्कृति का पूर्वार्ध हुआ। उत्तरार्ध में उदारता, सेवा-साधना, पुण्य-परमार्थ जैसे विषय आते हैं। उनका तात्पर्य मिल बाँटकर खाने और हँसती-हँसाती जिन्दगी जीने से है। इसे “वसुधैव कुटुम्बकम्” सूत्र के अंतर्गत समेटा जा सकता है। कोई व्यक्ति दूसरों को सुखी समुन्नत बनाने की सचमुच ही इच्छा करें तो उसका एक ही आधार हो सकता है कि अपने आपको संयमी, मितव्ययी, अपरिग्रही और महत्वाकाँक्षाओं से रहित बनाये। स्पष्ट है कि आदर्शवादी महत्वाकाँक्षाएँ पूरी करने के लिए अपनी सुविधा एवं विलासताओं, तृष्णाओं में कमी करनी पड़ती है और औसत भारतीय स्तर का जीवनयापन करते हुए निर्वाह करना पड़ता है। यही वह बचत है जिसे परमार्थ कार्यों में नियोजित किया जा सकता है।
साधु और ब्राह्मणों की उच्चस्तरीय संस्कृति रही है। उनके व्यक्तिगत जीवन एवं जन साधारण के भावनात्मक नव निर्माणों में संलग्न रहने को ही देव-संस्कृति कहते हैं। भारतीय संस्कृति देव-संस्कृति है। उसके हर पक्ष और प्रतिपादन में उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श कर्तृत्व एवं शालीन व्यवहार के लिए निर्देश है। इस विधा को व्यावहारिक रूप देने हेतु, सादा जीवन उच्च विचार का व्यवहार करना पड़ता है। यह ऋषियों, ब्राह्मणों और संत सज्जनों की परिपाटी रही है। इसी को गान्धी, विनोबा जैसे महामानव अपनाते और सर्व साधारण को अपने प्रवचनों से ही नहीं, जीवनयापन के विधि-विधानों से परिचय देते रहते रहे हैं।
भारतीय संस्कृति का एक नाम यज्ञ संस्कृति भी है। यज्ञ का अर्थ है- त्याग, बलिदान, सेवा, पवित्रता। उन गुणों का कथा प्रवचनों में बखान करने से काम नहीं चलता, वरन् निज की जीवनचर्या को खुली पुस्तक की तरह रख कर सर्वसाधारण को यह बताना पड़ता है कि राजमार्ग क्या है? जिस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।
अग्निहोत्र की क्रिया में अपने उपयोग के पदार्थ वायु-भूत बनाकर जन साधारण के लिए वितरित किये जाते हैं। प्रत्यक्षतः इस प्रकार के रासायनिक यजन का प्रभाव सीमित क्षेत्र में हो सकता है। किन्तु इस क्रिया-कृत्य के पीछे जो भावनाएँ जुड़ी हुई हैं, वे सर्व साधारण के मर्मस्थल तक पहुँचती हैं और उसे उसी प्रकार विकसित करती हैं, जिस प्रकार बन्द कलियाँ सूर्य का प्रकाश उदय होते ही खिलना आरम्भ कर देती है।
मनुष्य मात्र शरीर नहीं है, जिसकी गतिविधियाँ, आकाँक्षाएँ किस दिशा में चल रही हैं, मात्र इसी आधार पर किसी का व्यक्तित्व परखा जा सकता है। गुण, कर्म, स्वभाव से ही यह जाना जा सकता है कि आन्तरिक व्यक्तित्व किस प्रकार का है। उसमें उत्कृष्टता या निकृष्टता के कितने अंश हैं। बाहर से साज-सज्जा या खर्चों में ठाट-बाट बनाकर कोई व्यक्ति महान नहीं बन सकता। यह बहरूपिया स्तर की विडम्बना है। मुखौटा चेहरे पर बाँध कर कोई व्यक्ति वह नहीं हो सकता जैसा कि अपने को प्रदर्शित करता है। नाटकों में लोग भगवान या महापुरुषों के वेश विन्यास बनाते हैं। पर दर्शक उससे चमत्कृत होते हुए भी यह नहीं मानते कि यह व्यक्ति वैसा ही है जैसा कि आवरण ओढ़कर अपने को प्रदर्शित कर रहा है। संस्कृति शब्द का सरल और सार संक्षेप समझना हो तो उसे “सादा जीवन उच्च विचार” के थोड़े से शब्दों में प्रकट अभिव्यक्त किया जा सकता है।
महा याजक शाल्वनेक का अनायास ही आगमन हुआ। श्रेष्ठि उदयन ने उनका समुचित स्वागत सत्कार किया। दूसरे दिन ज्ञान दीक्षा का क्रम चल पड़ा। महा याजक ने अपनी अनेक संग्रहित विद्याओं का परिचय देते हुए उदयन से पूछा वे जिसमें भी रुचि रखते हों, उनके सम्बन्ध में पूछें और प्राप्त करें। श्रेष्ठि ने पूछा- “क्या ऐसा सम्भव है आपने जो-जो जाना है, उस सबके मूल आधार को ही मुझे प्रदान करने का अनुग्रह कर दिया जाय?”
महा याजक असमंजस में पड़े धीरे-धीरे सिर हिला रहे थे। उनकी कठिनाई दूर करने के लिए उदयन ने घर में प्रयुक्त होने वाले अनेकों पात्र उपकरण प्रस्तुत कर दिये और फिर पूछा- “देव! इन सबको क्या एक ही रथ में भरकर नहीं ले जाया जा सकता।” शाल्वनेक की आँखें खुल गईं। उन्होंने नव चेतना अनुभव की और कहा- “ऐसा हो सकता है। एक ही आत्म-ज्ञान के समुद्र में ज्ञान की समस्त सरिताओं का समावेश हो सकता है। मैं अब उसी को उपलब्ध करूंगा और जब प्राप्त कर सकूँगा तो आपको ज्ञान दीक्षा का साहस करूंगा।”
महा याजक चले गये। श्रेष्ठि ने श्रद्धापूर्वक उनके इस प्रयाण को मस्तक झुका दिया।
ब्रिटेन में जन्मा जान हैरिसन अपनी पालदार नौका के सहारे लम्बी यात्रा करते हुए अमेरिका पहुँचा। कुछ दिन कमाने धमाने में लगा रहा। पीछे कुछ पूँजी जमा होते ही यह धुन सवार हुई कि दक्षिण अमेरिका के उस क्षेत्र में चलना चाहिए जहाँ पुरातन काल में देवताओं के धरती पर आवागमन के प्रमाण अभी भी मौजूद हैं। जानसन विश्वास करता था कि धरती पर पाये जाने वाले पदार्थ प्रकृति की देन हो सकते हैं परन्तु मनुष्य जैसा विलक्षण प्राणी और उसमें पाई जाने वाली अद्भुत विभूतियाँ अनायास ही विकसित नहीं हुईं। वे किसी अन्य लोकवासी देवमानवों की देन हैं। अपनी इस मान्यता की पुष्टि में उसने अनेकानेक प्रमाण भी एकत्रित कर रखे थे।
सन् 1908 में तीन दिन रात तक भयंकर अन्धेरा यूरोप भर में जिस भयानक विस्फोट के कारण छाया रहा था वह किस विस्फोट के कारण उपजा। ईस्ट द्वीप में बनी विशालकाय मानव मूर्तियाँ किसने किस प्रकार और क्यों बनाई? सहारा रेगिस्तान में बड़ी विचित्र गुफाओं में देवलोक वासियों के चित्र किसने बनाये? ओडारा नदी के तट पर पाये गये अस्थि उपकरणों को किन औजारों की सहायता से बनाया गया था? जैसे प्रश्न उसके मस्तिष्क में निरन्तर उभरते थे और उनके सम्बन्ध में अधिक कुरेदबीन करने पर उसे यह विश्वास दिलाते थे कि हो न हो, पृथ्वी पर कभी देवताओं का आवागमन ही नहीं रहा हो पर उसे प्रगतिशील स्थिति तक पहुँचने में उनका असाधारण योगदान रहा है। वह यह भी मानता था कि मनुष्य के आदिम जन्मदाता जिन्हें आदिमहवा कहा जाता है किसी दिव्य लोक से ही धरती पर पधारे थे।
यह जिज्ञासाएँ ऐसी थीं जो सदा जानसन को बेचैन किये रहती थीं। अस्तु उसने दक्षिण अमेरिका के उस क्षेत्र में जाने की ठान ठानी जिसमें कि देवताओं के अवतरण चिन्ह विशेष रूप से पाये जाने की बात कही जाती थी। वह मात्र जिज्ञासाएँ ही नहीं थीं वरन् उनके पीछे यह आतुरता भी थी कि किस प्रकार देव लोकवासियों के साथ संपर्क साधा और उनकी महती विशेषताओं का कोई उपयोगी अंश पाया जा सकता है। इस संदर्भ में उसने मजबूत घोड़े खरीदे। चिली बीजील क्षेत्र की जानकारी रखने वाले मार्गदर्शक साथ लिए और चार अतिरिक्त घोड़ों पर रास्ते की आवश्यक सामग्री लादी और वह उस भयानक क्षेत्र के लिए चल पड़ा। कई वर्ष उसने इसी प्रयास में लगाये।
लौटने के उपरान्त जानसन ने एक दिलचस्प पुस्तक लिखी- ‘मिस्ट्रीज ऑफ एन्शिएन्ट साउथ अमेरिका’ उनमें उसने इतने प्रमाणों और अवशेषों का अंकन किया है जिससे प्रतीत होता है कि इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि पृथ्वी को सर्वमान रूप में विकसित करने के लिए अन्य लोकवासियों का असाधारण योगदान रहा है। वे इस भूलोक में गहरी दिलचस्पी लेते रहे हैं।
इन विवरणों में उसने दक्षिण सागर के मध्य पाये जाने वाले एक ऐसे द्वीप का वर्णन किया है जिसमें देवता कुछ समय निवास और विश्राम भी करते थे। योजनाएँ बनाते और उन्हें कार्यान्वित करने में जुटते थे।
उसने बाल्डीविया क्षेत्र के चिलुए द्वीप समूहों की शृंखला का वर्णन किया है जिनमें एक द्वीप था ‘मणि द्वीप’ उसे उसी की खोज थी। अन्ततः उसने उसे प्राप्त भी कर लिया। इसकी बावत उसने अनेकों किम्वदंतियां पढ़ी और सुनी थीं।
नाव को समुद्री तट के एक वृक्ष में बाँधकर जानसन अपने साथियों समेत मणि द्वीप का भूगोल समझने के लिए एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ा, उसने देखा कि कुछ दूर समतल मैदान में अनेक महलों और मन्दिरों के अवशेष अभी भी हैं।
जानसन लिखता है कि उस मैदान में हम पहुँचे। दो-तीन महल अच्छी हालत में थे। एक पानी की बावड़ी थी। अनेकों टूटे खंडहर। सुनहरे शिखर का भव्य मन्दिर। मन्दिर 1000 वर्ग फुट के घेरे में बना था। दीवारों में पच्चीकारी। स्तम्भों में खुदी मूर्तियाँ, बड़े स्तम्भ से फूटती प्रकाश की किरणें। स्तम्भों में जड़े हुए वेश कीमती पत्थर। फूटती हुई मशाल जैसी किरणें। मंदिर में सिंहासन पर बैठी रत्न आभूषणों से जटित देवी की प्रतिमा। अद्भुत वृक्ष। इसे द्वीप में वे लोग जो ला सकते थे सो साथ भी लाये। 15 दिन रुके और वापस लौट आये। इन सबको देखने से प्रतीत होता था कि ऐसे दूरवर्ती एकाकी टापू में इतने भव्य और अलौकिक भवन बनाने का मानवी प्रयोजन नहीं हो सकता है, वह किसी दिव्यलोक की संरचना थी।
बात पुरानी हो गई। अब उस द्वीप का पता लगाना कठिन पड़ रहा है। हो सकता है कि दिव्य लोकवासियों को उनके गुप्त अवतरण स्थल का पता लग जाने से उसे समुद्र में डुबा दिया हो और कहीं अन्य अविज्ञात स्थल पर अपना नया केन्द्र स्थापित किया हो।
उड़न तश्तरियाँ वस्तुतः अन्तरिक्ष यान ही हैं जिनमें बैठकर अन्य लोकों के वैज्ञानिक यहाँ आते और अपने अनुदान देने तथा यहाँ की प्रगति का लाभ उठाने का अन्वेषण करने के लिए जानकारियों का आदान-प्रदान करने का उद्देश्य लेकर चलते हैं।
जार्ज एडमस्की ने अपनी पुस्तक “फ्लाइंग सोसिर्थ” हैव लैण्डैड में लिखा है कि उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई जो शुक्र लोक से आया था। आकृति मनुष्य से मिलती-जुलती थी पर भाषा सम्बन्धी कठिनाई के कारण विचार विनियम न हो सका, केवल संकेतों से ही कुछ काम चलाया जा सका।
स्काटलैण्ड के मेडरिक अलिंगहम ने अन्तरिक्ष यात्रियों के एक समूह के साथ अपने साक्षात्कार का वर्णन किया है।
मंगल गृह पर जमी हुई बर्फ पहाड़ों के रूप में पाई गई है और उन क्षेत्रों में जीवधारियों की हलचलों का दृश्य दूरबीनों से देखा गया है।
मैक्सिको के समीप अलस्का गार्डो में गिरी एक उड़न तश्तरी में ऐसे छोटे-छोटे मनुष्य के शरीर उपलब्ध हुए जो अन्तरिक्ष सूट पहने हुये थे पर यान के गिरने पर वे भी नष्ट हो गये थे। उनकी संख्या 6 थी।
डॉ. रोमनीडक का कहना है कि ऐसा ही एक टूटा यान रूस को भी मिल चुका है, पर उन्होंने उस घटना को प्रचारित नहीं किया।
कार्नेल विश्व विद्यालय के खोजियों ने शनि के उपग्रह ‘टिटान’ पर जीवन होने के प्रमाण प्रस्तुत किये हैं।
चीन की बायनकाराउल नामक गुफा में ऐसे अवशेष पाये गये हैं, जिन्हें किन्हीं अन्य लोकवासियों के उपकरण एवं अस्थि पिंजर कहा जा सकता है।
आवश्यक नहीं कि जिन तत्वों से पृथ्वीवासियों के शरीर बने हैं और निर्वाह के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है, उनकी ही अन्य लोकवासियों को आवश्यकता पड़े। यह हो सकता है कि उनके शरीर अन्य रसायनों के बने हों और वहाँ जो सामग्री मिलती है उसी पर निर्वाह करने के आदी हो गये हों।
ईस्टर लैण्ड द्वीप पर विशालकाय मानव मूर्तियाँ जगह-जगह बनी हुई हैं। वहाँ के निवासी उन्हें आकू-आकू कहते हैं। उनकी ऊंचाई और बनावट देखकर यह प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में ऐसे मन्त्र उपकरण नहीं थे जिनके द्वारा ऐसी विशालकाय मूर्तियाँ बनाई जातीं। फिर यह भी विचारणीय है कि इन्हें क्यों बनाया गया। प्रतीत होता है कि किसी अन्य लोक के वासियों ने अपने यहाँ के निवासियों की प्रतिकृति यहाँ बनाई हो ताकि देखने वाले यह समझे सकें कि पृथ्वी के प्रति दिलचस्पी रखने वाले अन्य लोकवासियों की प्रतिमा कैसी रही होगी।
दक्षिण अमेरिका की ऐंडीज पर्वतमाला में टिटिकाँग क्षेत्र में अति प्राचीन काल का एक बन्दरगाह और सूर्य मंदिर पाया गया है। इसके समीप ही एक कैलेंडर खुदा है इससे प्रतीत होता है कि जिस ग्रह के लोगों ने इसे बनाया वहाँ 290 दिन का वर्ष और 24 दिनों का महीना होता था।
प्रो. ल्होत ने एक ऐसी विशाल घाटी खोज निकाली है, जिसमें 16 फुट ऊँची मानवाकृतियाँ हैं उनके साथ कितने ही बारीक तारों से बने यन्त्र भी हैं। इन्हें मंगल ग्रह के निवासियों की प्रतिकृत मानी गई है।
आल्पस् पर्वत माला में 785 ग्राम भारी एक पाइप का टुकड़ा मिला है वह किसी ऐसी धातु का बना है जिस पर लाखों वर्षों में भी जंग नहीं लगी। वह इस प्रकार ढाला गया है जिसके लिए उच्चस्तरीय धातु विज्ञान की आवश्यकता है।
गोवी मरुस्थल की कुछ चट्टानों पर मनुष्य के पद चिन्ह पाये गये हैं। समझा जाता है कि पृथ्वी के जन्मदिनों यहाँ दलदल रहा होगा और उस पर होकर अन्तरिक्ष यात्री चले होंगे। सूखने पर वे अमिट प्रमाण बन गये।
ओडेसा नदी के तट पर गुफाओं का एक लम्बा सिलसिला है। उसमें ऐसे औजार पाये गये हैं जिनसे हड्डियों से तरह-तरह के उपकरण भी बने हुये मिले हैं।
रूस के इर्कतुस्क क्षेत्र की वेधशाला में नोट किया गया कि साइबेरिया के ताइगा प्रदेश में सैकड़ों ऐटम बम जैसा भयंकर धमाका हुआ जिसका प्रभाव हजारों मील तक पड़ा। ऐसा प्रकाश उत्पन्न हुआ कि तीन दिन तक रूस से लेकर फ्राँस तक रात को भी दिन जैसी चमक बनी रही। रंग बिरंगी किरणें उठती और चमकती रहीं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी से तीन मील ऊपर कोई अन्तरिक्ष यान धरती तक पहुँचने से पहले ही फट गया और उसी से इस उत्पात का सृजन हुआ।
एच.जी. वेल्स की प्रख्यात पुस्तक ‘दि वार आफ वर्ल्डस’ यों कथानक की दृष्टि से लिखी गई है पर उसमें वर्णित तथ्यों से पता चलता है कि अन्य लोकों में भी बुद्धिमान मनुष्यों का अस्तित्व है और वे अपनी जैसी बिरादरी के लोगों के प्रति अभीष्ट दिलचस्पी रखते हैं।
पृथ्वी स्वर्ग लोक की ही प्रतिकृति है। यह देवताओं की किसी समय क्रीडा स्थली रही है। धरती का जीवन देव जीव है। इस दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि वह मध्यकालीन अन्धकार से घिरती चली आई और यह अनाचार अविचार फलने फूलने लगा। मनुष्यों ने अपनी गरिमा को गिराकर प्रेत पिशाच स्तर की बना दिया। दुर्बुद्धि बढ़ी और कुकर्मों की शृंखला चली। प्रेम तिरोहित हुआ और द्वेष दुर्भाव पनपकर दशों दिशाओं को घेरने लगा। उसी का परिणाम है कि निर्वाह के प्रचुर साधन होते हुये भी सर्वत्र शोक संताप के घटाटोप छाने लगे हैं।
पर स्मरण रखना चाहिए कि सूर्यास्त के उपराँत अन्धकार आता है पर वह देर तक ठहरता नहीं । कुछ देर स्तब्धता का साम्राज्य रहता है इसके बाद पुनः ब्राह्ममुहूर्त आता है। उषा काल की लालिमा चमकती है और प्रभातकालीन अरुणोदय होता है।
अगले दिन फिर श्रेष्ठता और प्रगति को लेकर आ रहे हैं। जिन देवताओं ने पृथ्वी को स्वर्ग की प्रतिकृति बनाया था मनुष्य में देवत्व का अंश भरा था। वे अब पुनः इस गई-गुजरी स्थिति को जीर्णोद्धार करने कटिबद्ध हो रहे हैं। इन लोक की खबर सुधि ले रहे हैं। हमारा भाग्योदय और पुनरुत्थान सुनिश्चित हैं।
बंगाल के प्रसिद्ध रसायनवेत्ता आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय अपने समय के ऋषि थे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर थे। वे अनेक भाषाओं के विद्वान और भारतीय रसायन शास्त्र के उद्घाटन कर्ता थे। उनके कितने ही ग्रन्थ विश्व विख्यात हैं।
उनने ‘बंगाल केमीकल्स’ की स्थापना की। जिसकी विनिर्मित औषधियों की प्रामाणिकता अक्षुण्ण मानी जाती है।
आचार्य राज विश्व-विद्यालय के एक छोटे कमरे में रहते थे। उसी में अनेकों असहाय विद्यार्थी आश्रय पाते थे। जीवन भर की कमाई जो लाखों रुपयों में थी। रसायन शास्त्री की खोज की उन्नति के लिए सार्वजनिक सम्पत्ति बनाकर छोड़ गये। उनकी विद्वता, शोध, सेवा और व्यक्तिगत जीवन ऋषियों जैसा था।
समझदार समझे जाने वालों में से कई परीक्षा की कसौटी के समय बेवकूफ सिद्ध होते हैं और कितने ही ऐसे होते हैं जो समझे तो बेवकूफ जाते हैं, पर अवसर आने पर अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हैं। यह नहीं समझा जाना चाहिए कि जिन्हें लोग प्रतिभावान समझते हैं, वे भाग्यवान ही होते हैं। उथली परख से वस्तुस्थिति का पता चलना कठिन है।
जो समझदार समझे जाते थे, पर समय आने पर बेअक्ल सिद्ध हुए। ऐसी कुछ बहुचर्चित घटनाएं इस प्रकार हैं।
चित्रकार कोरिगियो को एक चित्र के बदले 50 पौण्ड तांबे की मुद्राएं मिलीं। उन्हें वाहन पर लादने के स्थान पर पीठ पर लाद कर लम्बा सफर पार करते हुए वह घर पहुंचा और बोझे की थकान से चूर होकर इस प्रकार बीमार पड़ा कि फिर उठ ही न सका।
वन्य जगत का एक उदाहरण है कि एशियानी जंगली बकरी जब जाल में फंसाई जाती है तो डर के मारे बेहोश हो जाती है और हिलती-डुलती तक नहीं। ऐसी ही स्थिति बहुधा मनुष्यों की होती है। उनकी जिन्हें समझदार समझा जाता है।
उच्च चित्रकार पीटर पीटुमन ने एक अपनी चित्रशाला में एक नर कंकाल का चित्र बनाया। 18 सितम्बर 1672 को एक अंधेरी रात में भूकम्प आया और कंकाल चित्र सारे कमरे में नाचने लगा। पीटर ने उसे सचमुच का प्रेत समझा और डर के मारे उसी डरावने वातावरण में दम तोड़ दिया। उसे अपने बनाये चित्र की बात भय के विभ्रम में याद ही नहीं रही।
उत्तरी स्वीडन में पिटिया नामक एक नगर है। जिसमें करीब 500 अच्छे खासे मकान और हाट बाजार है, पर वहां के सभी लोग उसे भुतहा गांव समझकर अन्यत्र चले गये हैं। जब पादरी लोग स्थानीय गिरजे की सफाई करने तथा प्रार्थना करने वर्ष में एक बार आते हैं तभी कुछ चहल-पहल होती है अन्यथा सभी घरों में ताले पड़े रहते हैं।
आस्ट्रियाई अभिनेता फरार्डेनेन्ड को एक छोटे पालतू पिल्ले ने काट खाया। पर वह इतने भर से अत्यधिक आतंकित हुआ और अपनी पिस्तौल सीने में मारकर उसने आत्महत्या कर ली।
बादशाह हुमायू को पानी में डूबने से बचाने के इनाम में उसके भिश्ती ने 6 घण्टे को सल्तनत मांगी। और इतनी ही देर में उसने अपना चमड़े का सिक्का चलवा दिया। भिश्ती का नाम निजाम था। वह 1555 में 6 घण्टे का बादशाह बना था।
वह चाहता तो इन छह घण्टों में राज्य कोष मांग सकता था और जिन्दगी भर मौज में रह सकता था।
टियानी रियान अपने को बड़ा समर्थ मानता था, पर सन् 1814 में उसके गले में एक मधुमक्खी फंस गयी और प्राण घातक बन गयी।
उसकी कब्र पर लिखा गया “बलवान टिमागी रियान जो एक मक्खी का भी मुकाबला न कर सका।”
फ्रांस का हेनरी डी गाइट- अपनी प्रेमिका गॉनेय को हर महीने एक प्रेम पत्र अपने रक्त से लिखकर भेजता रहा कि वह उसी से विवाह करेगा। किन्तु जब वह विवाह करने के लिए परिवार की ओर से स्वतन्त्र हुआ तो प्रेम पत्रों को भुला कर अधिक सुन्दर लड़की से विवाह कर लिया। उसके प्रेम पत्र मखौल बनकर ही रह गये।
दिवास्वप्न न देखो। बिना पंख उड़ानें न भरो। वह करो जो आज की परिस्थितियों में किया जा सकता है।
अनुचित लाभ तत्काल तो बहुत प्रिय लगते हैं। किन्तु पीछे असीम त्रास देते हुए विदा होते हैं।
82 वर्षों से लावारिस पड़े एक शराब खाने तथा सराय को इंग्लैण्ड के हैम्पटन ने खरीद लिया। उसमें एक ऐसी पेटी पाई गई जिसमें 25 हजार सोने की अशर्फी थी। वह किसी ऐसे व्यक्ति की थीं जो यहाँ छिपा गया था और फिर वापस न लौट सका।
इसे कहते हैं, छप्पर फाड़कर सोना बरसाना।
रवाड जार्डन का एक भविष्य वक्ता शेख अब्दुल रजव भविष्य वक्ता था। उसने भविष्यवाणी की कि सम्राट अब्दुला का कत्ल होने ही वाला है। वैसा ही हुआ। इसके बाद भविष्य वक्ता ने मौन धारण कर लिया और फिर वह जीवन भर बोला ही नहीं। ताकि उसके मुख से कोई अशुभ वचन न निकलें।
भविष्य कथन के लिए वक्ता को ही प्रायश्चित करना पड़ा।
ओहियो के फिलिप केंइंडेल के बांये फेफड़े में गोली लगी। शल्य चिकित्सकों ने उसे बाहर निकाल सकने में अपनी असमर्थता बताई। पर खाँसी के साथ एक दिन वह गोली अपने आप ही निकल गई।
‘जाको राखै साइयाँ मार न सके ना कोय।’
सन् 1927 में लाइबेरिया के राष्ट्रपति चुनाव में चार्ल्स को प्रतिद्वन्द्वी की तुलना में 2,34,000 मतों से जीता घोषित किया गया। यह संख्या उस देश के कुल मतदाताओं से 15 गुनी अधिक है।
“झूँठ बोला जाय तो इतना।”
बेविलिया देश में पिछले 150 वर्षों में 149 राज्य विप्लव हो चुके हैं।
‘इसे कहते हैं क्रान्ति का जूनून।’
हार्बट काउण्टी की एक बुढ़िया सैली ईगर 90 वर्ष की आयु में अपनी ऐनक खो बैठी। बाद में उसने नई ली ही नहीं। वह बिना ऐनक की सहायता के सुई में धागा पिरो लेती थी।
बुढ़िया में जवानी जैसी क्षमता फिर लौटने लगी थी। उसका प्रत्येक अवयव नये सिरे से चमकने लगा था।
मिस्र के शासक हसन के हत्यारे सईद को पकड़ा गया तो उससे सवाल पूछते हुये हत्या का विवरण पूछा। उसने अपनी कमर में से छुरा निकाल कर अपने ही सीने में भोंक लिया और कहा- ‘ऐसे’।
निष्ठुरों को न दूसरों के ऊपर दया आती है न अपने ऊपर। इसकी यह घटना एक प्रत्यक्ष प्रमाण थी।
थाईलैण्ड के राजा कांग द्वारा अपने पुत्र फार्म को देश निकाला दे दिया। बड़ा होने पर लड़के ने सेना गठित की और पिता के राज्य पर चढ़ाई करके उसे मार डाला।
लोगों के द्वारा पिता को मारने के लिए धिक्कारे जाने पर उसके नाम पर एक भव्य मंदिर बनाया। इसमें उसने राज्यकोष में मिली सारी सम्पत्ति लगा दी।
पितृ द्रोह और पितृ भक्ति का कैसा है यह संयुक्त उपाय?
सन् 1900 में तत्कालीन चुनाव विजय पर सरकार की ओर से एक विशाल भोज दिया गया था। उसमें करीब 13 हजार संभ्रान्त नागरिक आमन्त्रित किये थे। भोज में 50 हजार बोतलें शराब की खर्च हुईं।
जनता का धन जनता के लिए उड़ा देने का यह एक अनोखा नमूना था।
वुड स्टाक कनाडा में दो ऐसे व्यक्तियों का संयोग हो गया जिसमें से एक की बिल्कुल टाँगे नहीं थी और एक के दोनों हाथ नहीं थे। बिना हाथ वाले का नाम था चार्ल्स ट्रिप और बिना टाँग वाला था- एली ब्राउन। लोगों ने तलाश कर दोनों का जोड़ा मिला दिया। वे दोनों जीवन भर साथ रहे। दोनों के मिलने पर एक पूरे मनुष्य की पूर्ति हो गई और वे बिना किसी प्रकार का अभाव अनुभव किये जीवन यापन करते रहे।
रोम का सम्राट कलाउडिस की पुत्री ऐन्टोनिया अतिशय सुन्दर थी। उसे प्राप्त करने के लिए अनेकों का मन ललचाता रहता। वह एक के बाद जिन दो युवकों के साथ विवाही गई। उन्हें किसी न किसी दोषारोपण से उन्हें फाँसी पर बढ़ावा दिया। अन्त में सम्राट नीरों उस पर ललचाया। प्रस्ताव अस्वीकार करने पर नीरो ने एन्टोनिया को फाँसी लगवा दी।
अति की सुन्दरता भी बुरी। अति की हर बात बुरी।
गैरिट डी. बाल न्यूजर्सी अमेरिका का गवर्नर निर्वाचित हुआ। किन्तु उसने उस पर आसीन होने से इन्कार कर दिया। उसने कहा राजनीति में पड़ने की अपेक्षा में लोक शिक्षा जैसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य में ही अपने जीवन का सदुपयोग करना चाहूँगा। इस संदर्भ में उसने अपने विचार राष्ट्रपति तक के आग्रह से भी नहीं बदले।
आदर्शों पर टिकने वाले ऐसे होते हैं।
विचु आनलिण्ड की खाली हाथों एक जंगली शेर से अफ्रीका के जंगलों में मुठभेड़ हो गई। उसे 23 जख्म आये तो भी उसने गरदन दबोच कर उस शेर को मार ही डाला।
साहस ओर पराक्रम ऐसे ही अवसरों पर काम आता है।
मद्रास सेन्ट जार्ज किले के अंग्रेज कमाण्डर एडवर्ड विक्टर की जंगल में बाघ के साथ मुठभेड़ हो गई, उसने बाघ को गला घोट कर मार दिया था। हिम्मत सबसे बड़ा हथियार है।
मैसूर के एक राजा ने किसी साधु पर अप्रसन्न होकर उसे तोप के मुँह में डालकर तीन बार उड़ाया। एक बार वह हाथी की अम्बारी पर, दूसरी बार ऊँची छत पर और तीसरी बार बालू के टीले पर जा बैठा। न मरते देखकर राजा ने उसे क्षमा कर दिया।
इसे कहते हैं- बिना मौत आये कोई नहीं मरता।
एक धनी व्यक्ति ने सुन रखा था कि भागवत पुराण सुनने से मुक्ति हो जाती है। राजा परीक्षित की इसी से मुक्ति हुई थी। उसने एक पंडित जी को भगवान की कथा सुनाने को कहा। पूरी कथा हो गई पर उस व्यक्ति के मुक्ति के कोई लक्षण नजर न आये। उसने पंडित जी से इसका कारण पूछा पण्डित जी ने लालच वश उत्तर दिया। यह कलियुग है। इसमें चौथाई पुण्य होता है। चार बार कथा सुनो तो एक कथा की बराबर पुण्य होगा। धनी से तीन कथा की दक्षिणा पेशगी दे दी और कथाएँ आरम्भ करने को कहा। वे तीनों भी पूरी हो गईं पर मुक्ति का कोई लक्षण तो भी प्रतीत न हुआ इस पर कथा कहने और सुनने वाले में कहा-सुनी होने लगी।
विवाद एक उच्चकोटि के महात्मा के पास पहुँचा। उसने दोनों को समझाया कि केवल बाह्य क्रिया से नहीं आन्तरिक स्थिति के आधार पर पुण्य-फल मिलता है। राजा परीक्षित मृत्यु को निश्चित जान संसार के वैराग्य लेकर आत्म कल्याण में मन लगाकर कथा सुन रहा था। बीतराग शुकदेव जी भी पूर्ण निलोभ होकर परमार्थ की दृष्टि से कथा सुना रहे थे। दोनों की अन्तःस्थिति ऊंची थी, इसलिए उन्हें वैसा ही फल मिला। तुम दोनों लोभ, मोह में डूबे हो। जैसे कथा कहने वाले वैसे सुनने वाले, इसलिए तुम लोगों को पुण्य तो मिलेगा पर वह थोड़ा ही होगा। परीक्षित जैसी स्थिति न होने के कारण वैसे फल की भी तुम्हें आशा नहीं करनी चाहिए।
आत्म कल्याण के लिए बाह्य कर्मकाण्ड से ही काम नहीं चलता। उसके लिए उच्च भावनाएं होना भी आवश्यक है।
अमेरिका की नौ सैनिक वैधशाला के अनुसंधान में अपनी चिरकालीन शोध के आधार पर सिद्ध किया है कि अब से लाखों वर्ष पूर्व सौरमण्डल का एक और सदस्य था-- ‘फैथान’। वह बाद में लुप्त हो गया। पृथ्वी की तुलना में वह प्रायः 90 गुना बड़ा था और पृथ्वीवासियों को दिन में भी दीखना था। रात्रि में तो उसकी चमक चन्द्रमा से कहीं अधिक थी। पर अब उसके ध्वंसावशेष जहाँ-तहाँ बिखरे ही दीख पड़ते हैं। उसका मूल स्वरूप समाप्त हो गया।
कहा गया है कि उस पर रहने वालों ने आज की पृथ्वी की तुलना में ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में कहीं अधिक प्रगति कर ली थी। सम्भवतः परमाणु आयुध स्तर के अस्त्र भी उनके पास थे। आपा-धापी और अहंमन्यता के आवेश में वे परस्पर भिड़ गये और अणु अस्त्रों का ऐसा प्रयोग हुआ जिससे उसका प्राणी सम्पदा एवं पदार्थ वैभव ही नष्ट नहीं हुआ, वरन् उस समूचे ग्रह के ही परखचे उड़ गये। टुकड़ों की समूचे सौरमण्डल पर वर्षा हुई और जिसे जहाँ जगह मिली वहाँ उसने अपने लिए स्थान बना लिया। यह टुकड़े ही बड़े ग्रहों के उपग्रह बन गये। चंद्रमा की तरह पराक्रम करने लगे। शनि के इर्द-गिर्द घूमने वाला धूलिवलय उसके बारीक कणों में गठित हुआ है।
मंगल ग्रह पर इससे पूर्व जलाशय थे। बड़ी-बड़ी नदियों और सरोवरों पर उस विघटित ग्रह का चूरा उससे टकराया तो बढ़ी हुई गर्मी ने उसे भाप बनाकर अन्तरिक्ष में उड़ा दिया। शनि और बृहस्पति भी तब समृद्ध थे, उनमें भी जल का अस्तित्व था। जो सर्दी में जमता और गर्मी में पिघलता, बरसता रहता था, पर टकराव की ऊर्जा ने समूचे सौरमण्डल को प्रभावित किया फलतः पानी का अस्तित्व इन दिनों पृथ्वी के अतिरिक्त प्लेटो नेपच्यून में भी बर्फ की तरफ जमा हुआ पाया जाता है। चन्द्रमा पर बड़े-बड़े खाई खड्ड उसी आघात से उत्पन्न हुए। नेपच्यून जैसे ग्रहों में जहाँ-जहाँ कूबड़ उठे हुये दिखाई पड़ते हैं।
मंगल और बृहस्पति के बीच में प्रायः 50 हजार पथरीले टुकड़ों की एक शृंखला अभी भी अपनी एक निर्धारित कक्षा बनाकर उसमें भ्रमण करती रहती है। उसके गुरुत्वाकर्षण की न्यूनता से इधर-उधर छितरा जाते हैं और समीपवर्ती ग्रहों से टकराकर उल्कापात के दृश्य उपस्थित करते रहते हैं। जब वे पृथ्वी के वायु मण्डल में प्रवेश करते हैं तो घर्षण से पिघलकर जलती हुई रेखा के रूप में दिखाई देते हैं। उसी को तारा टूटना कहते हैं।
विशाल अन्तरिक्ष में और विशेषतया सौर मण्डल की परिधि में अनेक पुच्छल तारे भ्रमण करते रहे हैं। वे धूलि, बर्फ, पत्थर खनिज आदि के समुच्चय हैं। हलके होने के कारण उनकी कक्षाएं भी बहुत बड़ी बन जाती हैं। इसलिए उनका परिभ्रमण मुद्दतों में एक चक्कर काट पाता है। प्रस्तुत हैली पुच्छल तारा जो पिछले दिनों दिखाई दिया 78 वर्षों में एक यात्रा पूरी कर पाता है।
कोलम्बिया विश्वविद्यालय के खगोल शास्त्री ओवेन डेन ने अन्तरिक्ष के पुच्छल तारों का विशेष रूप से अध्ययन किया है। उनकी संरचना का भी विश्लेषण किया है। उनका कथन है कि यह उसी ग्रह के विस्फोट से उत्पन्न हुई धूलि है जो हलकी होने के कारण द्रुतगति से उड़ती चली गई। भ्रमण तो करने लगी, कक्षा भी बनाली किन्तु साधना अपनाने और पिण्ड रूप में ढाल सकने में समर्थ ही हुई।
वैज्ञानिक वोर्डे का कथन है कि उसके कई बड़े टुकड़े सूर्य की निजी कक्षा में जा पहुँचे और उसके गुरुत्वाकर्षण में जकड़कर समीपवर्ती क्षेत्र में भी परिभ्रमण करने लगे। उन्हीं का व्यतिक्रम चुम्बकीय तूफानों के रूप में जब तब अपने अवशिष्ट सता का परिचय देता है। उससे पृथ्वी की सुव्यवस्था में असाधारण उथल-पुथल पैदा हो जाती है। यह चुम्बकीय तूफान उन टुकड़ों से उत्पन्न ऊर्जा के कारण अन्य ग्रहों में भी चुम्बकीय तूफानों या दूसरे प्रकार के तूफान के रूप में देखे जाते हैं।
शोधकर्ता फ्लेडर्च ने उस टूटे तारे की धूलि वर्षा का सम्बन्ध धरती पर पाये जाने वाले रेगिस्तानों में जोड़ा है और उनमें उर्वरता का न होना तथा रेत कणों की विरलता को एक प्रकार से विजातीय पदार्थ माना है और कहा कि इनका सुधरना सम्भव तो है पर है अत्यन्त कष्टसाध्य और व्यय साध्य। इस रेगिस्तानी पट्टियों को यथावत रहने दिया गया तो वे सिकुड़ने के स्थान पर फैलती ही रहेंगी और समीपवर्ती क्षेत्रों की उर्वरता को निगलेगी।
इन अन्वेषणों और परिकल्पनाओं का अभी अन्त नहीं हुआ है। यह खोज-बीन जारी ही है कि उसे विस्फोट से पूर्व सौर मण्डल क्षेत्र में कितनी विशेषताएँ थीं, जो उस उपद्रव के कारण तिरोहित हो गईं और अभी भी धूमकेतुओं पुच्छलतारों के रूप में जो धूलि उड़ती रहती है वह अपने बचकानेपन का प्रभाव कहाँ किस प्रकार, कितना भयंकर उत्पन्न कर सकती है, इसका ठीक से अनुमान नहीं लगाया जा सकता। लाखों वर्ष बीत जाने पर भी उसकी प्रतिक्रिया अभी भी चल रही है। उसने अभी भी स्थिरता अपनाने जैसी स्थिति अभी भी प्राप्त नहीं की है। रुष्ट, असन्तुष्ट प्रेत की तरह वह अभी भी उपद्रवों से बाज नहीं आई है।
पुरातन इस घटनाक्रम का कथन, प्रतिपादन इसलिए आवश्यक हो गया कि वैसी ही पुनरावृत्ति की संभावना अब नये सिरे से बन रही है। जिस प्रकार के तृतीय विश्व की भूमिका इन दिनों बन रही है। उसके साथ वे पुरातन संभावनाएं पूरी तरह जुड़ी हुई हैं, जिनका स्मरण मात्र भूतकालीन दुर्गति का स्मरण करने मात्र से रोमाँच खड़ा कर देती है।
इस स्तर का जितना अजस्र भण्डार विश्व के मूर्धन्य राजनेताओं ने जमा कर रखा है उसका उद्देश्य इतने महंगे खिलौने खेलना मन बहलाना नहीं हो सका। वे सदा इस प्रकार शान्त निष्क्रिय बने रहेंगे यह आशा भी नहीं की जा सकती। बनाने और इकट्ठा करने में तो बुद्धिमता और साधन सामग्री की भी आवश्यकता पड़ी है। पर इस बारूद के ढेर में एक तीली जलाकर फेंक देने का कार्य तो कोई मूर्ख असमर्थ भी कर सकता है। यह कल्पना नहीं संभावना है जिसका परिणाम उससे भयंकर न होगा जैसा कि लाखों वर्ष पूर्व आपाधापी भी अहन्ता के कुचक्र में घटित हो चुका है।
अणु आयुधों से पृथ्वी पर लड़ा जाने वाला युद्ध ही इस भूमण्डल को उड़ा देने बिखेरने के लिए पर्याप्त है। अब “स्टार वार” अन्तरिक्ष युद्ध का जो नया कदम बढ़ाया जा रहा है। वह पृथ्वी के लिए ही नहीं सौर मण्डल के अन्यान्य सदस्यों की स्थिति को भी वर्तमान जैसी नहीं बनी रहने दे सकता।
बुद्धिमानों की मूर्खता और दुर्बुद्धि से भगवान ही बचाये। उन कदमों को पीछे लौटायें जो सर्वनाश की दिशा में गतिशील हो रहे हैं।
महात्मा गाँधी से एक मारवाड़ी सेठ भेंट के लिए आये। वह बड़ी-सी पगड़ी बाँधे थे और मारवाड़ी वेशभूषा में थे। बात-चीत के बीच उन्होंने पूछा-- “गाँधीजी। आपके नाम पर लोग देश भर में गाँधी टोपी पहनते हैं और आप इसका इस्तेमाल नहीं करते, ऐसा क्यों?”
गाँधीजी मुस्कराते हुये बोले- “आपका कहना बिल्कुल ठीक है, पर आप अपनी पगड़ी को उतारकर तो देखिये। इसमें कम से कम बीस टोपियाँ बन सकती हैं। जब बीस टोपियों के बराबर कपड़ा आप जैसे धनी व्यक्ति अपनी पगड़ी में लगा सकते हैं तो बेचारे उन्नीस आदमियों को नंगे सिर रहना ही पड़ेगा। उन्हीं उन्नीस आदमियों में मैं भी एक हूँ।”
गाँधीजी का उत्तर सुनकर सेठजी को कुछ कहते न बना। वह चुप हो गये। पर गाँधीजी ने अपनी बात को जारी रखते हुये कहा-- “अपव्यय संचय की वृति अन्य व्यक्तियों को अपने हिस्से से वंचित कर देती है।” तो मेरे जैसे अनेक व्यक्तियों को टोपी से वंचित रहकर उस संचय की पूर्ति करनी पड़ती है।
मनुष्य समाज के दो विभाग हैं एक नर दूसरी नारी। आधी मनुष्य जाति नर के रूप में है आधी नारी के रूप में। दोनों के सहयोग से ही वे सब क्रिया-कलाप चलते हैं मनुष्य के उत्तरदायित्वों की परिधि में आते हैं। दोनों के बीच असहयोग या व्यवधान खड़ा हो जाय तो समझना चाहिए कि प्रगति तो दूर निर्वाह का साधारण क्रम भी ठीक तरह न चल सकेगा।
वंश परम्परा चलने और पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य का अस्तित्व बनाये रखने में नारी का 99 प्रतिशत योगदान है। नर तो विलास का बुखार उतारने और गृहस्थ की अर्थ व्यवस्था सम्भालने भर का एक सीमित दायित्व सँभालता है। नारी ही परिवार का सृजन, विकास एवं नियन्त्रण करती है। नर तो इस क्षेत्र का प्रहरी भर कहा जा सकता है। वह बिना नारी का समुचित सहयोग पाये न तो परिवार का सृजन कर सकता है और न निजी जीवन को सुव्यवस्थित रख सकता है।
इक्कीसवीं सदी को महिला शताब्दी का नाम दिया गया है। कारण कि प्रकृति उनके पक्ष में, विशेषताओं की दृष्टि से वह पुरुष की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ है। साथ ही समय की माँग ध्वंस से मुड़कर सृजन की दिशा पकड़ रही है। उसमें भी नारी ही फिट बैठती है।
प्रकृति नर को निरीह मानती है। उनके अधिक संख्या में तथा जल्दी मरने के तथ्य को समझती है। इसलिए भ्रूण रूप में लड़के ही अधिक आते हैं पर वे ऐसे छुईमुई होते हैं कि गर्भपातों के पर्यवेक्षण में लड़के ही अधिक संख्या में होते हैं। लड़कियाँ कम। शिशु रोगों में लड़के ही अधिक ग्रस्त होते हैं और जल्दी मरते हैं। औसतन प्रकृति 140 लड़के और 100 लड़कियां विनिर्मित करती है। पर बारह वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते दोनों बराबर हो जाते हैं।
दीर्घजीवन की दृष्टि से नारी का जीवन पुरुष की तुलना में 4 वर्ष अधिक होता है। बीमारों की गणना में पुरुषों की तुलना में स्त्री बीमारों की संख्या आधी होती है। पगलाने और सनकीपन में भी पुरुष ही आगे रहते हैं। स्त्री की सन्तोषी प्रवृत्ति, सहज मुस्कान और रोकर मन की व्यथा हलकी कर लेती हैं जबकि पुरुष अहंकार में इठा फिरता है। उच्छृंखलता अधिक बरतता है। महत्वाकांक्षाएं भी लदी फिरती हैं। शत्रुता, प्रतिशोध और अनाचार में अड़ी रहने के कारण उनकी जीवनी शक्ति अधिक तेजी से क्षय होती है और मस्तिष्कीय असन्तुलन का आये दिन शिकार बनता रहता है। यही सब कारण हैं जो उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति को गड़बड़ा देते हैं। उपार्जन की तुलना में जिसका खर्च ज्यादा होगा वह देवालिया बनेगा ही। वासनाओं में वही अधिक रस लेता है और अपने आप को गलाता घुलाता जाता है।
नारी यद्यपि प्रजनन की व्यथा सहती और मासिक धर्म में भी बहुत कुछ गँवाती है। फिर भी कामुक उत्तेजनाओं के क्षेत्र में संयत होने के कारण उसका जीवन सत्व सुरक्षित रहता है। हाड़-माँस और कद की दृष्टि से वह भले ही हलकी पड़ती हो, लड़ने-झगड़ने से भी वह कतराती है। इस पर भी उसकी कल्पना और मेधा कहीं अधिक विकसित रहती है। यही कारण है कि वे स्कूलों परीक्षाओं में लड़कों की तुलना में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होती हैं। अनुत्तीर्ण होने में लड़कों का ही अनुपात अधिक पाया गया है।
सृजन प्रक्रिया के शोधकर्ताओं ने पाया है कि भाषा ज्ञान, कृषि, पशुपालन जैसे आर्कों का आरम्भ पुरुष नहीं कर सका, उसने नारी के प्रयासों में सहायता भर दी। वस्त्र निर्माण का कौशल उसी का है। अन्यथा आदिम काल में पुरुष पशुओं का चमड़ा ही कमर में बाँधे फिरता था। शिकार भर मार लाता था, पर उसे पकाने के लिए जिस अग्नि की आवश्यकता पड़ती है, उसे घर्षण क्रिया द्वारा उत्पन्न करने में नारी ही सफलता का श्रेय प्राप्त कर सकी।
प्रकृति अनुशासन को पग-पग पर तोड़ने, आपस में लड़ने-झगड़ने और आखेट में आहत होने का दण्ड दुष्परिणाम भी उसी को अधिक भुगतना पड़ा। नारी इस प्रकार के जंजाल से बची रही। इसलिए शारीरिक रोग और अकाल मृत्यु ने उसे उतना नहीं सताया जितना पुरुषों को। यह ऐतिहासिक अन्वेषण है। नृतत्व विशेषज्ञों ने अपनी शोधों में ऐसे ही निष्कर्ष निकाले हैं जिनसे सिद्ध होता है कि औचित्य को अपनाने की प्रवृत्ति ने नारी को घाटे में नहीं रहने दिया।
विदित इतिहास में जितने भी छोटे बड़े युद्ध हुये हैं, उनमें पुरुषों को ही अधिक मरना और घायल होना पड़ा है। महिलाओं को अनिश्चित एवं विपत्तिग्रस्त भले ही रहना पड़ा हो पर उन्हें मोर्चे की लड़ाई में न तो जूझना पड़ा और न रक्तचाप की नृशंसता में उतना कोई विशेष भाग रहा।
इतने पर भी नारी अपनी स्वाभाविक वरिष्ठता की अधिकारिणी नहीं बन सकी। इसका एकमात्र कारण पुरुषों द्वारा उसे अनेक प्रकार प्रतिबन्धित करना एवं सताया दबाया जाना ही है। उसे ऐसी परिस्थितियों में रहना पड़ा जिसमें वे न अपनी प्रतिभा का विकास कर सकती थीं और न कौशल का प्रदर्शन। उसे कभी सती होने के लिए विवश किया गया तो कभी दहेज कम लाने के कारण मौत के घाट उतार दिया गया। बहुपत्नी प्रथा में भी यौवन ढलते ही उसे निचोड़े हुए नीबू के छिलके की तरह अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया गया। चोर जैसी चौकीदारी उस पर की गई। खरीदी हुई दासी या पैर की जूती की तरह किसी प्रकार वह अपना अस्तित्व बनाये या बचाये रहने में समर्थ हुईं। पिंजड़े जैसे घर और उस पर पर्दे का प्रतिबन्ध इस स्थिति में डाले रहा कि वे अपने अस्तित्व तथा अधिकारों तक के सम्बन्ध में कुछ समझ न सकी। पालतू पशुओं की तरह मालिक के बताये हुए कामों में जुटे रहकर अपना निर्वाह भर करती रहीं। ऐसी बंदी जैसी परिस्थितियों में कोई भी व्यक्ति हार या टूट सकता है। खीज ओर घुटन के शिकंजे में कसे जाते रहने पर वह जर्जर एवं अक्षम बन सकता है।
समय अब तेजी से बदल रहा है। विषमता एवं विपन्नता के विरुद्ध आवाज उठाने की हिम्मत सब और उभर रही है। मात्र अधिकार जताना ही कर्तव्य पालन करना भी मानवी चेतना को झकझोर रहा है। परिस्थितियों ने समाज को विवश कर दिया है कि वह नारी के प्रति अपना दृष्टिकोण बदले और मनुष्य वर्ग का ही उपयोगी अंग माने। फलतः उनकी शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है साथ ही स्वावलम्बी और सुसंस्कृति, सुयोग्य, समुन्नत बनाने पर भी। जहाँ कहीं भी अवसर मिला है वे वर्षा की बूँद की तरह विकासोन्मुख हुई है और बसन्त की तरह फूलों से लदी हैं। उनकी स्वाभाविक प्रतिभा को देखकर सर्वसाधारण को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा है। प्रगतिशील देशों में उनने वे काम संभाले हैं। जिन्हें पुरुष की ही बपौती समझा जाता था और जिन्हें कर गुजरने की पिछले दिनों नारी परम्परा रही भी नयी।
विज्ञान, कला, साहित्य, प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा आदि के जो भी काम उन्हें सौंपे गये उनमें वे पुरुषों की तुलना में अधिक ही सफल सक्षम रहीं। मात्र उनकी भावुकता, स्नेह, सद्भावना की प्रकृति ही बाधक बनी। जिसका लाभ उठाकर पुरुषों ने उन्हें प्रेम के नाम पर वासना के कोल्हू में पेल देने का प्रयत्न किया। जो इस कुचक्र में फँसकर अपना भविष्य बिगाड़ बैठी उनके अगणित उदाहरण शेष नारी जाति को सावधान करने और खतरे की पूर्व सूचना देने में समर्थ हुए। फलतः आज की विकसित नारी इतनी दृढ़ता अपना चुकी है कि कोई भी चिड़ीमार मछलीमार उन्हें सहज शिकार न बना सके। ऐसी प्रबुद्ध नारी पुरुषों के लिए शिकार नहीं रही। मात्र सहयोगिनी बनने के लिए उचित परीक्षण के उपरान्त सहमत हो सकी।
नारी का शोषण उत्पीड़न, पिछड़ापन सब क्षेत्रों में से तो हटा नहीं है। पर उसे अनेक क्षेत्रों में विकसित स्थिति में देखा जा रहा है और समझा जा रहा है कि उसे दबोचकर पुरुष न पाया कम और गँवाया बहुत। अब उनींदी आँखें खुली हैं और खुमारी की अकड़ घटी है। नये परिवर्तित माहौल में नारी को शिक्षित, स्वावलम्बी और समुन्नत बनने का अवसर मिल रहा है। यह प्रवाह ऐसा है जो प्रगति की दिशा में द्रुतगति से बढ़ेगा। फलतः वह नये उत्साह और नये कौशल के साथ समय की सृजन आवश्यकता को पूरा करने में लगेगा। अपने स्नेह, सहयोग और वात्सल्य से नर में ऐसा परिवर्तन करेगी कि वह अनाचार बरतने में आज जैसा स्वेच्छाचारी न रह सके।
समय की विकृतियाँ पुरुष द्वारा बरती जाने वाली दृष्टता की देन है। उसके हाथ में धन है, साधन है, आयुध है और ऐसे धूर्त हथकण्डे जिनके सहारे वह दूसरों को फँसाने के फेर में अपनी भी दुर्गति कराने वाले दल-दल में फँस सके। इतने पर भी यह स्पष्टतया समझा जाना चाहिए कि वह माता के रूप में, बहिन के रूप में, पुत्री के रूप में, पत्नी के रूप में पुरुष को नियन्त्रण में रख सकने में समर्थ है। इतना ही नहीं वह चंडी के रूप में अपनी विकरालता भी प्रकट कर सकती है।
इक्कीसवीं सदी सृजन की शताब्दी है। विनाश का उपक्रम इस बीसवीं सदी का अन्त होते-होते दम तोड़ चुका है। पुरुष ने कठोरता बरती और नृशंसता सीखी है। उसकी उपयोगिता मात्र युद्ध अपहरण, शोषण उत्साह भर में काम आ सकती थी। सो अगले दिनों ऐसा प्रवाह बहेगा, माहौल बनेगा जिसमें इस प्रकार की उद्दंडता सहज ही निरर्थक हो जायगी। आवश्यकता सृजन की पड़ेगी। उसमें पुरुष का अद्यावधि प्रयास मात्र छद्म बनकर ही अपना चकाचौंध चमकाता रहा है। अगले दिनों यह प्रपंच न चलेंगे। तब सद्भावना और सहकारिता की ही आवश्यकता रह जायगी। यह प्रयोजन पूरा कर सकने में नारी शक्ति ही समर्थ हो सकेगी। अतएव समय की आवश्यकता उसी के द्वारा पूरी हो सकेगी।
जनसंख्या विशेषज्ञों और भावी सम्भावना के पर्यवेक्षकों का कथन है कि अगली शताब्दी में पुरुष अल्पमत में होंगे। और नारी बहुमत में। नारी को वश में रखने की कठोरता छोड़कर नर उस शक्ति के सम्मुख समर्पण करेगा। जो हर दृष्टि से उसकी तुलना में वरिष्ठ है। नेतृत्व नारी का होगा और अनुगमन नर का। यह परिवर्तन युग परिवर्तन की ठोस और चिरस्थायी भूमिका निभा सकेगा।
हमें भविष्य का ध्यान रखते हुए- समय को पहचानते हुए- नारी उत्थान के लिए अग्रसर होना चाहिए। इसी में हम सबकी भलाई है। यह सुनिश्चित है कि इक्कीसवीं शताब्दी महिलाओं की होगी। हरेक का यह दायित्व है, कि वह नारी शक्ति को आगे बढ़ाने में कोई कसर न उठा रखे।
एक अन्धा भीख माँगा करता था। जो पाई पैसे मिल जाते उसी से अपनी गुजर करता। एक दिन एक धनी उधर से निकला। उसे अंधे के फटे हाल पर बहुत दया आई और उसने पाँच रुपये का नोट उसके हाथ पर रखकर आगे की राह ली।
उन दिनों नोटों का चलन शुरू ही हुआ था। अन्धे को उनके सम्बन्ध में जानकारी न थी। उसने कागज को टटोल-टटोल कर देखा और समझा कि किसी ने ठठोली की है और उस नोट को खिन्न मन से जमीन पर फेंक दिया।
एक सज्जन पुरुष यह सब देख रहे थे। उनने नोट को उठाकर अन्धे को दिया और बताया यह तो पाँच रुपये का है। तब वह प्रसन्न हुआ और उससे भोजन वस्त्र खरीदकर अपनी आवश्यकतायें पूरी कीं।
ज्ञान चक्षुओं के अभाव में हम भी परमात्मा के अपार दान को देख और समझ नहीं पाते और सदा यही कहते रहते हैं कि हमारे पास कुछ नहीं, हमें कुछ नहीं मिला, हम साधनहीन हैं। पर यदि हमें जो नहीं मिला है उसकी शिकायत करना छोड़कर जो मिला है, उसी की महत्ता को समझें तो मालूम पड़ेगा कि जो कुछ मिला हुआ है वह भी कम नहीं है।
संगीत किसी जमाने में मात्र मनोरंजन का विषय था। उससे शरीर में उमंगें उठती थीं और मन में तरंगें। थका-उदास व्यक्ति भी अपने में नवीन स्फूर्ति अनुभव करता था और टूटी हिम्मत भी पराक्रम दिखाने के लिए मचल उठती थी। उदासी की वह रामबाण दवा समझी जाती थी। प्रसन्नता द्विगुणित होकर आनन्द भरे वातावरण को और भी अधिक उत्तेजित कर देती थी। पुरातन मान्यताएं इतने तक ही सीमित थीं। इसीलिए गायकों-वादकों की सर्वत्र माँग रहती थी। उनका समुचित सम्मान भी होता था और निर्वाह से अधिक ही पुरस्कार मिलता था।
पुरातन मान्यताओं के अनुसार स्वर्गलोक में अप्सराएं प्रसन्नता का वातावरण बनाये रखकर अपनी महती भूमिका से उसका प्रभाव अनेकों गुना बढ़ा देती थीं। वहाँ की अन्य सुविधाओं की तुलना में अप्सराओं की उपस्थिति के कारण विनिर्मित संगीतमय वातावरण ही था जिसका काम जादू जैसा प्रभाव बनाकर उस स्थिति का निर्माण करना था, जिसे नादब्रह्म या शब्दब्रह्म का सान्निध्य कहा जा सकता है।
पृथ्वी के सतयुगी वातावरण में यक्ष, गंधर्व, किन्नर वही माहौल बनाते थे, जो स्वर्ग में देवियाँ-देवताओं की पत्नियाँ या कुमारिकाएं बनाती थीं।
पृथ्वी पर जिन देवताओं का बहुत परिचय है, उनमें शंकर को डमरू, सरस्वती को वीणा, कुण्डलिनी को नृसिहा कृष्ण को मुरली निनादित करते हुए दिखाया गया है। भक्त राज हनुमान करताल बजाते थे। यह सब अपनी क्षमता को सूक्ष्म जगत में उपयोगी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए होता था। लोग ब्रह्म-चेतना द्वारा प्रस्फुटित नादयोग का श्रवण करते थे और ब्रह्मलीन रहने की स्थिति में पहुँचे जाते थे।
विषाक्तता का सम्मिश्रण मध्यकाल में हुआ, जब उससे साथ दिव्य चेतना के स्थान पर कामुकता भड़काने वाले हेय प्रयोग आरम्भ हुए। सामंतवादी युग में शोषण उत्पीड़न के षड्यन्त्र ही चलते रहते थे। उसकी करुणा भरी चीत्कारों से पत्थर भी हिल उठते थे। उन दिनों आत्म प्रताड़ना एवं लोक भर्त्सना से नरमेघों के कर्त्ता भी हिल उठते थे, आत्मा बेचैन हो उठती थी। उस प्रहार की तिलमिलाहट को हल्का करने के लिए सुरा-सुन्दरी का आश्रय लिया जाने लगा। नृशंस नीरसता की कटुता को हल्का करने के लिए संगीत में कामुकता का समावेश किया गया। अमृत को विष बनाने की यह प्रक्रिया कलाकारों से तो बन नहीं पड़ी, मात्र वेश्याओं ने लोभ-लालच के लिए उन नृशंसों का मन बहलाना शुरू किया। इसके लिए अश्लील गायन-वादन के साथ-साथ अपना शरीर भी बेचना आरम्भ कर दिया। सामन्तों के सहकारी दरबारी भी अपनी प्रचण्डता दिखाने के लिए यही सब करने लगे। अनुकरण से ही तो उनका बड़प्पन सिद्ध होता था, अस्तु उनके भी विजयोत्सव रचने लगे। लूटमार से मिला वैभव कहाँ खर्च हो, इसके लिए सुरा-सुन्दरी के साथ-साथ कामुक संगीत की भी तीसरी विद्या जुड़ गई। यह संगीत के दुर्दिनों का दर्द भरा इतिहास है। अस मादकता में शोषितों ने कुछ राह पायी और शोषकों की उद्दण्डता द्विगुणित हो उठी।
सूर्य, चन्द्र पर ग्रहण लगते तो हैं, पर वे अधिक समय टिकते नहीं। अंधड़ उगते हैं, चक्रवात उठते, पर वे कुछ ही समय अपनी विभीषिका दिखा पाते हैं, टिकाऊपन उनमें कहाँ होता है। साधारण मौसम ही सुहाता है और उसी में देर तक टिके रहने का प्रभाव होता है। दुर्दिन आते तो हैं, पर भूत की तरह उनकी आयु थोड़ी ही होती है।
मध्यकालीन अन्धकार युग के विनाश को सम्भालने सुधारने के लिए सन्तों का उदय हुआ। जनता के गिरे हुए मनोबल और छाये हुए अज्ञान को देखते हुए उन्हें लोकशिक्षण के लिए एकमात्र संगीत माध्यम ही उपयुक्त जंचा, फलतः अधिकाँश ने उसे अपनाया और कीर्तन का अवलम्बन अपनाया। नारद परम्परा को- चैतन्य महाप्रभु ने नवजीवन प्रदान किया। इसके अतिरिक्त उस सन्तकाल में प्रायः सभी ने यही एक राह अपनायी। सन्तों की मण्डलियाँ वस्तुतः कीर्तन मण्डलियाँ थीं। जिस प्रकार तीर्थयात्राएं धर्म प्रचार की पद यात्राएं होती थीं, उसी पुरातन व्यवस्था को इन सन्त मण्डलियों ने अपनाया और समय की विद्रूपता से अपना बचाव करते हुए भक्ति प्रचार को आगे रखते हुए समय के अनुरूप ढलने, बदलने के लिए जन-साधारण को प्रबुद्ध किया। भक्ति को उनने शक्ति का माध्यम बनाया। संगीत से भावनाओं को उभारते हुए उसे उस दिशा में बहाया, जिससे विदेशियों, विधर्मियों, बेदर्दियों के विरुद्ध तन कर खड़े होने और चींटियों के मिल कर आक्रमण करने पर हाथी को गिरा देने की बात कही।
देश के सुदिन लौटाने में इस संगीत आन्दोलन ने वह भूमिका निबाही जो प्रतिकार के लिए सन्निद्ध हुई सेना कर सकती थी। मनुष्य बुद्धि-प्रधान दीखता तो है, पर वस्तुतः उसकी मूल सत्ता है- भाव-प्रधान। भावनाओं से उद्वेलित व्यक्ति साधनों के अभाव में भी शिवाजी प्रताप, छत्रसाल, वन्दा बैरागी जैसी आदर्शवादिताएं अपना सकता है। बुद्धि तो नफा-नुकसान का लेखा जोखा ही लेती रहती है। अनाचारों से जूझने और अनुकरणीय आदर्श उपस्थिति करने में भावनाएं ही उच्चस्तरीय भूमिकाएं निभाती हैं। बुद्धि तो केवल योजनाएं बनाती रहती है, लाभ पक्ष को प्रमुखता देती रहती है। पर आदर्शों को अपनाने में जो कष्ट सहन करने पड़ते हैं, उनके लिए आवश्यक प्रेरणा एवं क्षमता भाव क्षेत्र से ही उपलब्ध होता है। भावनाओं को मर्मस्थल तक पहुँचाने के लिए संगीत से बढ़कर और कोई माध्यम नहीं है। सृजनात्मक हो या संघर्षात्मक, गुरुद्वारों को विशेष रूप से यह विद्या अपनानी पड़ी, क्यों कि सन्त-सिपाही खड़े करने थे। देवालयों में अर्चना का यह एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया। कहीं-कहीं तो अखण्ड कीर्तनों का भी आयोजन होने लगा। उन्हें नारद की वीणा का वह चमत्कार ध्यान में छाया रहा, जिससे उत्पन्न प्रवाह शक्ति ने वाल्मीकि जैसों को उलटा था और ध्रुव, प्रहलाद ही नहीं, पार्वती, सुकन्या, सावित्री तक को दिशा दी थी। उसे अपनाना सामान्य आधार पर सम्भव नहीं था। जहाँ व्यक्ति का व्यक्तित्व अपनी ऊर्जा से जन-साधारण को उभारता है, वहां उसमें संगीत सोने में सुगन्ध का काम करता है। भावनाएं उभरने पर ही व्यक्ति जोखिम भरे काम कर सकता है और उच्च आदर्शवादी प्रयोजनों में जुट सकता है। चन्द्रवरदायी ने पृथ्वीराज को और शिवावावनी ने शिवाजी को मृत्यु तक से जूझने का साहस दिया था।
संगीत की महत्ता इसलिए घटी, उसकी अवमानना इसलिए हुई कि उसे घटिया लोगों द्वारा घटिया प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। फिल्मी गानों से नाक भौं इसीलिए सिकोड़ी जाती है कि उनके प्रभाव से अपरिपक्व बुद्धि को कुमार्ग पर चल पड़ने का खतरा उठाते हुए देखा गया है। दूध में मक्खी पड़ जाने से वह रस से विष हो जाता है। कामुकता और शृंगारिकता की उत्तेजना भर देने पर उसकी गरिमा भी नष्ट होती है और उपयोगिता भी। सामंतीयुग के उपरान्त शृंगारिकता ने फिल्मों के कोंतर में छिपकर अपना व्यवसाय जारी रखा। यही कारण है कि ऐसे माहौल में समझदार लोग अपने लड़के-लड़कियों को जाने से रोकते हैं। यदि उस प्रवाह में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को प्रश्रय मिला होता तो संगीत ने आज की विकृतियों के निवारण और सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में महती भूमिका निभाई होती। जिनने इस तथ्य को समझा और अपनाया है, उनने आज की परिस्थितियों में भी संगीत की गरिमा को स्थिर रखा है।
युद्धों में कभी तीर कमान का प्रचलन था। बाद में तलवारें काम आने लगी। पीछे बन्दूकें चलीं और अब बमों का जमाना है। समय और परिस्थिति के अनुसार प्रचार माध्यम भी बदलते हैं। युग सन्धि की इस प्रभात बेला में हमें संसार के तीन चौथाई अशिक्षितों को अभीष्ट जानकारियाँ और प्रेरणाएं देने के लिए युग संगीत को ही अपनाना पड़ेगा। अभी भी लोकगीत अपने-अपने क्षेत्रों में स्थानीय संस्कृति को बचाये हुए हैं। मानव-संस्कृति को बचाने के लिए हमें इस दिशा में अधिक व्यापक रूप से अधिक योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ना होगा। वही किया भी जा रहा है।
शान्ति-कुंज के युग शिल्पी सत्रों में प्रायः आधा श्रम संगीत प्रशिक्षण के लिए कराया जाता है। उसी के साथ बीच-बीच में टिप्पणियाँ लगा देने से एक नया स्वरूप निखरता है, जिसे भजनोपदेशक स्तर कहा जा सकता है। सर्वसाधारण को युग चेतना हृदयंगम कराने के लिए यह सर्व सुलभ और व्यापक क्षेत्र में अपना आलोक वितरण करने वाला माध्यम है।
सभी समर्थ शाखाओं में प्रज्ञा प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम चालू होने जा रहे हैं। उसमें भी प्रायः आधार संगीत ही है। नये संगीत भी गायकों को मिलते रहें, इसकी विशेष व्यवस्था की जा रही है। अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में प्रज्ञा गीतों के अनुवाद होते चलें, इसका क्रम भी चलेगा। भारत की 16 मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं। उन सभी में, यहाँ तक कि विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न आदिवासियों में बोली जाने वाली बोलियों में भी इनके अनुवाद होंगे। संगीतों के ऑडियो टेप तथा वीडियो पर दिखाये जाने वाले अभिनय समेत संगीत बनाने की भी व्यवस्था साथ ही की जा रही है।
साहित्य माध्यम से युग चेतना का प्रचार-संचार पहले से ही किया जा रहा है। अब संगीत माध्यम को भी उसके साथ जोड़कर शिक्षितों की तरह अशिक्षितों के लिए भी नया मार्ग खोला जा रहा है। इस प्रकार को हीरक जयन्ती का नया उपहार, नया प्रयोग समझा जा सकता है।
मुकुट बनकर इतराने वाले फूल की क्या प्रशंसा ! सराहो उन शूलों को जो कली की लाज बचाने के लिए कमर कसे रहते हैं।
लोग प्रशंसा करते हैं या निन्दा इसकी चिन्ता छोड़ो। सिर्फ एक बात सोचो कि ईमानदारी से जिम्मेदारियाँ पूरी की गईं या नहीं।
चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथपुरी से दक्षिण की यात्रा पर जा रहे थे तो उन्होंने एक सरोवर के किनारे कोई ब्राह्मण गीता पाठ करता हुआ देखा। वह संस्कृत नहीं जानता था और श्लोक अशुद्ध बोलता था। चैतन्य महाप्रभु वहाँ ठहर गये कि उसकी अशुद्धि के लिए टोकें पर देखा कि भक्ति में विह्वल होने से उसकी आँखों से अश्रु पात हो रहे हैं।
चैतन्य महाप्रभु ने आश्चर्य से पूछा- आप संस्कृत तो जानते नहीं, फिर श्लोकों का अर्थ क्या समझ में आता होगा और बिना अर्थ जाने आप इतने भाव-विभोर कैसे हो पाते हैं? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- आपका यह कथन सर्वथा सत्य है कि मैं न तो संस्कृत जानता हूँ और न श्लोकों का अर्थ समझता हूँ। फिर भी जब में पाठ करता हूँ तो लगता है मानो कुरुक्षेत्र में खड़े हुये भगवान अमृतमय वाणी बोल रहे हैं और मैं उस वाणी को दुहरा रहा हूँ। इस भावना से मेरी आत्मा आनन्द विभोर हो जाती है।
चैतन्य महाप्रभु उस भक्त के चरणों पर गिर पड़े और उनने कहा तुम हजार विद्वानों से बढ़कर हो, तुम्हारा गीता पाठ धन्य है।
भक्ति में भावना ही प्रधान है, कर्मकांड तो उसका कलेवर मात्र है। जिसकी भावना श्रेष्ठ है उसका कर्मकाण्ड अशुद्ध होने पर भी वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। केवल भावना हीन व्यक्ति शुद्ध कर्मकाण्ड होने पर भी कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
सावित्री उपासना के दो स्तर हैं। एक सर्व साधारण के लिए सर्वोपयोगी, सुगम और सरल जिसे सामान्य स्थिति का भावनाशील व्यक्ति भली प्रकार करता रह सकता है। दूसरा स्तर वह है जो विशिष्ट व्यक्तियों के लिए, परिशोधित और परिष्कृत लोगों के लिए ही संभव है। इसमें इतने कठोर प्रतिबन्ध, विधान और अनुशासन हैं कि उनका निर्वाह कर सकता हर किसी के लिए सम्भव नहीं है। इसलिए वह प्रयोजन अभी अपने तक ही सुरक्षित रखा है। जो सर्वसाधारणों के लिए विशेषतया प्रज्ञा परिजनों के लिए सम्भव है। उसी का उल्लेख यहाँ कर रहे हैं।
व्यक्तिगत भौतिक या आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए जो एकाकी साधना की जाती है उसे गायत्री उपासना समझा जाय। आध्यात्मिक प्रयोजनों में स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि आदि की गणना होती है और भौतिक प्रयोजनों में रोग, शोक, उद्वेग, दरिद्व, शत्रुता, आक्रमण, अभाव जैसे कारणों की गणना होती है। इन वस्तुओं के लिए दयालु माता से प्रार्थना की जा सकती कि वे अपनी और दूसरे सम्बन्धित लोगों की बुद्धि में सुधार करके उपस्थित संकटों का निराकरण करें।
सविता व्यापक है। उसकी शक्ति सावित्री भी उसी स्तर की है। सूर्य समूचे सौर मण्डल को ऊर्जा, प्रकाश एवं गति देता है। सावित्री का उपयोग भी सामूहिक और व्यापक समस्याओं के लिए ही किया जा सकता है। वस्तुतः समूचा मानव समाज एक दूसरे से प्रभावित होता और प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग का आदान प्रदान करता है। मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के कारण एक ऐसी विशाल नाव पर बैठा है जिसमें डूबना और पार होना साथ-साथ ही हो सकता है। जिनकी दृष्टि इतनी विशाल है कि स्वार्थ और परमार्थ को एक दूसरे का अविच्छिन्न अंग मान सकें, उन्हीं के लिए सावित्री उपासना का अवलम्बन लेना चाहिए। उसका प्रभाव सार्वभौम है और उपयोग सार्वजनीन समस्याओं का समाधान है। इस सर्व के अंतर्गत ही अपना “स्व” भी आता है।
सार्वजनिक आयोजनों को सावित्री साधना कह सकते हैं। इसी प्रयोजन के लिए सुर्योदय के समय एक माला गायत्री जप विधि पूर्वक या मानसिक रूप से करने के लिए कहा गया है। 24 लाख साधक इसे कर रहे हैं और 24 करोड़ का जप प्रतिदिन हो रहा है। इसे और भी आगे बढ़ाने का प्रयत्न किया जाय तो यह संख्या और भी बढ़ सकती है और उससे अदृश्य वातावरण के परिशोधन में भारी सहायता मिल सकती है।
यज्ञ यों वैयक्तिक भी होते हैं। अमुक प्रयोजनों के लिए लोग निजी खर्च से होताओं को पारिश्रमिक देकर निज के निमित्त ग्रह शान्ति आदि के यज्ञ करते हैं। यह व्यक्तिगत बात हुई। पर यदि सामूहिक गायत्री यज्ञ किया जाय उसमें सभी उपयुक्त व्यक्ति भाग लें और खर्च की मिल-जुलकर व्यवस्था करें तो वह प्रयोग भी सावित्री के अंतर्गत ही आता है और उसका लाभ व्यक्ति विशेष को तो उसके श्रम सहयोग के अनुरूप ही स्वल्प मात्रा में मिलता है पर उसका वास्तविक सम्बन्ध लोक कल्याण के साथ जुड़ा होने के कारण इस प्रकार के आयोजनों को विश्व शान्ति यज्ञ कहते हैं। यह छोटे या बड़े रूप में जितने अधिक किये जा सकें उसे सावित्री को प्रखर बनाने के लिए किया गया प्रयास ही माना जायेगा।
नवरात्रि आयोजनों को सामूहिक रूप में मनाने की आवश्यकता इसीलिए माहात्म्य समझाते हुए बताई जाती है। यों लोग अपने घर में भी एकाकी अनुष्ठान करते रहते हैं और उसका हवन भी स्वयं या परिवार समेत कर लेते हैं। पर इसी को यदि सार्वजनिक आयोजन की तरह सम्पन्न किया जाय। सभी साधक एक जगह मिल बैठकर जप करें। एक साथ स्वस्ति वाचन- पूजा-अर्चा करें। पूर्णाहुति भी एक साथ हो और अन्तिम दिन अमृताशन (खिचड़ी आदि) उबले अन्न का सहभोज करें तो उसे भी सविता साधना में ही गिना जायगा।
अधिक लोगों की अधिक संयुक्त प्राण शक्ति मिलने से अधिक सार्वजनिक हित होता है। इसलिए अनुष्ठानों का एक छोटा प्रयोग 107 माला का भी आरम्भ किया गया है। अब तक 24 हजार, सवा लक्ष और चौबीस लक्ष के तीन ही अनुष्ठानों के प्रकार थे। अब चौथा प्रकार 107 माला का इसलिए निर्धारित किया गया है कि जो लोग बहुत व्यस्त हैं, वे भी प्रतिदिन एक घण्टे का समय निकालकर इन अनुष्ठानों में सम्मिलित होने का श्रेय प्राप्त करें।
सावित्री साधना वस्तुतः पंचकोशों की साधना है। उसे बड़े स्तर पर किया जाता है। यह कठिन कार्य है। अपनी एक सता को पाँच भागों में विभक्त करके पाँच पाण्डवों जैसा एक यूनिट खड़ा करने जैसा। इसके लिए कुन्ती जैसी लगन, श्रद्धा, हिम्मत और कष्ट सहिष्णुता चाहिए। वह उच्चस्तरीय कार्य हमने अपने जिम्मे लिया है। उसमें कष्टसाध्य शरीर और मन को निचोड़कर इत्र निकालने जैसा कठोर कार्य भी पूर्व संस्कारित और परिष्कृत अभ्यास से ही सफल हो सकता है। सामान्य परिजनों को उस कठोरता को उत्साह में अपनाने और कुछ ही दिन में, किसी बहाने छोड़ बैठने के लिए आमन्त्रित नहीं किया गया है।
फिर भी उन्हें हमारा हाथ बंटाना है। इस उच्चतम स्तर की साधना में वे भागीदार होना चाहते हों तो उनके लिए एक सरल तरीका ढूँढ़ निकाला गया है। वह यह कि वे पाँच कोशों की साधना को अपने व्यावहारिक जीवन में- गुण, कर्म, स्वभाव की तरह सम्मिलित करने का प्रयत्न करें।
अन्नमय कोश की साधना के लिए आहार को अधिकाधिक सात्विक और सीमित बनाया जाय ताकि अन्न के अनुरूप मन में भी सात्विकता उमंगे।
प्राणमय कोश के जागरण के लिए आन्तरिक साहस और पराक्रम को प्रखर करना पड़ता है। इसके लिए छोटे-छोटे- थोड़े-थोड़े दिनों के संकल्प करके उनकी पूर्ति हर हालत में करनी चाहिए। पूरा करने पर मनोबल बढ़ता और मनस्विता में निखार आता है। रामायण का गीता का नवाह्न पारायण सहज ही हो सकता है। इसी प्रकार गायत्री अनुष्ठान भी। चल पुस्तकालय, झोला पुस्तकालय जैसे उच्चस्तरीय परमार्थों को इतने दिन तक इतने समय तक चलाते रहने का व्रत लिया जा सकता है। इसी प्रकार श्रम दान, साधन दान देकर सत्प्रवृत्तियों को समाज में अग्रसर करने में योगदान दिया जा सकता है। अपने बच्चे के विद्यारम्भ से लेकर उपनयन, विवाह तक की प्रतिज्ञा शान्ति-कुँज में कराने का संकल्प लेना भी ऐसी ही व्रतशीलता के अंग हैं जिनसे मनुष्य में दूसरों की तुलना में अधिक प्राण- अधिक साहस होने का परिचय मिलता है।
मनोमय कोश की साधना में अन्तर्द्वन्द्व को आमन्त्रित करना होता है। अपने गुण कर्म, स्वभाव, रीति-नीति एवं आदतों को कड़ी दृष्टि से नित्य निरीक्षण करना और जो अनुपयुक्तता भीतर घुसी हुई हो उनके विरुद्ध विद्रोह खड़ा करके कूड़े करकट की तरह बुहार फेंकना, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को हठपूर्वक स्थापना करना। कुकल्पनाओं के उठते ही उनके विरुद्ध उच्च विचारों को भिड़ा देने में विलम्ब न करना यही मनोमय कोश की साधना है।
मनोबल बढ़ाने के लिए सप्ताह में एक दिन कुछ व्रतों का भी पालन करना चाहिए। इन्हें एक प्रकार से अणु व्रत कहा जा सकता है। यथा (1) एक समय बिना नमक शक्कर का भोजन और एक समय रस, दूध, छाछ आदि प्रवाही पदार्थों पर गुजारा करना। (2) उस दिन शारीरिक और मानसिक दोनों ही दृष्टियों से ब्रह्मचर्य का पालन करना। (3) किसी सुविधा के समय पर दो घण्टे का मौन रखना। उस समय में एकान्त में रखना। लिखकर या इशारों से भी बात न करना। इन दो घण्टों में आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्मविकास के सम्बन्ध की परिधि में ही विचार करते रहना। अब या पिछले दिनों की तुलना में अगले दिनों अपने को अधिक पवित्र और प्रखर बनाने की योजना बनाना और उसे कार्यान्वित करने के तौर तरीके निर्धारित करना। मनोमय कोश इतनी साधना भर से क्रमशः अधिक तेजस्वी हो सकता है।
विज्ञानमय कोश से मोटा आशय प्रायः दूरदर्शी विवेकशीलता को इतना तेजस्वी बनाने से है कि अपने को अकेले भी किसी मार्ग पर चलना पड़े- कोई कार्यक्रम अपनाना पड़े तो उसमें कोई झिझक संकोच आड़े न आने पाये। अपने व्यक्तिगत जीवन में कितनी ही अवांछनीयताएं घुसी बैठी होती हैं और आदत का रूप धारण कर लेने पर उन्हें छोड़ना तो दूर उलटे अपनाये रहने का दुराग्रह जड़ जमाकर बैठा होता है। इसी प्रकार समाज में अनेकों कुरीतियाँ, मूढ़ मान्यताएँ अनीतियाँ, दुष्प्रवृत्तियाँ जड़ जमाये बैठी होती हैं। पर उन्हें देखते, सहते रहने पर वे भी अखरती नहीं और एक परम्परा के रूप में अचेतन मन उन्हें स्वीकार कर लेता है।
आनन्दमय कोश के जागरण की प्रक्रिया यह है कि हलकी-फुलकी, हँसती-हँसाती जिन्दगी जियी जाय। अनुकूलता-प्रतिकूलता के संदर्भ में आवश्यक उपाय तो किये जाये पर मनःस्थिति खिलाड़ी जैसी रखी जाय तो आये दिन हारते जीतते रहने पर भी अपने को खिन्न उद्विग्न नहीं होने देते।
बड़ों का कहना है कि अच्छी से अच्छी आशाएँ रखो और बुरी से बुरी सम्भावनाओं के लिए तैयार रहो। परिस्थितियाँ सदा अनुकूल ही बनी रहें, कभी प्रतिकूलताओं का सामना न करना पड़े यह सम्भव नहीं। दिन और रात की तरह हार-जीत का भी जोड़ा है। जो दोनों ही स्थिति में अपने को सन्तुलित रखे रहता है। उपार्जन के लिए प्रयत्नशील एवं उपलब्धियों के सदुपयोग के लिए सदा दूरदर्शिता भरे कदम उठाता है। उसे दोनों ही प्रकार की परिस्थितियाँ बड़े उपयोगी पाठ पढ़ा जाती हैं। दोनों का ही मनुष्य जीवन में अपना-अपना उपयोग है। यह मान्यता जो स्थिर सुनिश्चित कर लेते हैं, उनका आनन्द किसी के छीने छिनता नहीं।
आनन्दित रहना ही सौंदर्य की उपासना है। हँसते-मुस्कराते रहने की आदत ऐसी है जो अपनी अन्तरंग और बहिरंग क्षमताओं को उल्लसित करती हैं और अनायास ही अनेकों को मित्र सहयोगी एवं प्रशंसक बना देती है।
जीवनचर्या में इतना भर करते रहा जाय तो समझना चाहिए कि गहरे स्तर का न सही, सामान्य जीवन को अधिक सुविकसित करने का वरदान उपलब्ध कराने वाला पंचकोशी साधना का सूर्य हाथ लग गया और प्रगति पथ पर चलने- लक्ष्य तक पहुंचने का शुभारम्भ हो गया।
सावित्री साधना से “तप” का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। तपस्वी ही उस दिव्यता को उपार्जित एवं धारण कर सकते हैं। शरीर, मन और प्राणों को तपाकर पानी को भाप- पारे को मकरध्वज बनाने वाली प्रक्रिया कठिन है। उसकी और अनधिकारी चल पड़े तो अच्छे-खासे स्वास्थ्य को भी बिगाड़ बैठते हैं। वह काया-कल्प जैसी अद्भुत और अनुभवी लोगों के संरक्षण से सफल हो सकने वाली प्रक्रिया है। सर्व साधारण को ‘संयम’ ही तप का पर्यायवाची मानकर चलना पर्याप्त है।
अब एक ही प्रश्न शेष रहता है कि गायत्री और सावित्री के अन्तर को समझा जाय। दोनों में ही 24 अक्षर हैं। दोनों में ही 24 अवतार, 24 देवता, चौबीस ऋषि और चौबीस अक्षरों में 24 शक्ति स्रोत समाहित हैं।
अन्तर इतना ही है कि गायत्री त्रिपदा होने के कारण उसमें “भूर्भुवः स्वः” की तीन व्याहृतियां आरम्भ में लगाई जाती हैं और सावित्री में सप्त व्याहृतियां हैं। यही सूर्य के सात अश्व हैं। किरणों के सात रंग हैं। इनमें भूर्भुवः स्वः के उपरान्त जप जनः, तपः, महः, सत्यम लगाया जाता है। इसलिए वह सावित्री हो जाती है। प्राणायाम मन्त्र में तो उनका समावेश होता ही है। सावित्री उपासना करने वाले साधारण जप में भूर्भुवः स्वः जनः, तपः, महः, सत्यम् का भी प्रयोग करते हैं। ध्यान माता की अपेक्षा पिता का, सविता का- प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य का किया जाता है। (क्रमशः)
भगवान अन्तरात्मा में छिपा बैठा है पर लोग उसे कहां-कहां ढूंढ़ते फिरते हैं और थककर निराश लौटते हैं।
बाँध में दरार पड़ जाती है और संग्रहित पानी जब तेजी से खेत खलिहानों में बिखरने लगता है तब उसकी रोकथाम के कड़े प्रयत्न करने पड़ते हैं। रोकने के लिए डाली गई मिट्टी बात की बात में बह जाती है तब उस कटाव को सीमेन्ट के बोरों और बड़े पत्थरों से भरना पड़ता है। उस प्रयास में सैकड़ों मजूरों के श्रम और नागरिकों के सहयोग की जरूरत पड़ती है। इसके बिना काबू पाना कठिन पड़ता है। यदि स्थिति वही बनी रहे तो दूर-दूर का इलाका डूबता और बाढ़ में फंसता चला जायगा। उपेक्षा बरतने पर जो असीम हानि होती है उसकी क्षतिपूर्ति कठिन पड़ती है। इसलिए उस आकस्मिक विपत्ति का सामना दृढ़तापूर्वक किया जाता है।
इन दिनों सुख-शान्ति के- प्रगति और संस्कृति के- बाँध में जगह-जगह मोटी दरारें पड़ गई हैं। सभ्यता और प्रगति के निमित्त खोदी गई गह्वर इन दिनों मर्यादा से बाहर होकर व्यापक विनाश का कारण बन रही है। सम्पदा की अभिवृद्धि के निमित्त बढ़ा हुआ औद्योगीकरण जन-साधारण के लिए बेकारी और गरीबी का कारण बनता चला जा रहा है। प्रदूषण, विकिरण, जनसंख्या विस्फोट, प्रकृति प्रकोप, विश्वयुद्ध के बजते हुए नगाड़े जन-जन को आशंकित और आतंकित किये हुए हैं। विज्ञान और बुद्धिवाद की बढ़ोतरी ने जहाँ सुविधा साधनों का अभिवर्धन किया है वहीं मानवी गरिमा को तोड़ने उखाड़ने के लिए उत्पात भी कम नहीं मचाया है। मर्यादाओं और वर्जनाओं का उल्लंघन इस प्रकार हो रहा है मानों उनकी कभी कोई सत्ता, आवश्यकता या परम्परा ही नहीं रही थी।
इन विषम और विकट परिस्थितियों पर काबू पाने के लिए ऐसे समर्थ व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो अपने जैसे अनेक प्रतिभावान उत्पन्न, तलाश एवं प्रशिक्षित कर सकें और उन्हें अवाँछनीयता से जूझने में लगा सके। साथ ही जो कार्य सृजन प्रयोजन के लिए नये सिरे से किये जाने हैं उनमें भी योगदान दे सकें। चल रहे ध्वंस को निरस्त करना ही नहीं। आज ही की आवश्यकता यह है कि नई दुनिया का नया नक्शा बनाया जाय। समय के उलटी दिशा में बहते हुए प्रवाह को उलटकर सीधा किया जाय।
समय की समस्याओं से जूझना मनस्वी लोगों के लिए चुनौती भरा दुस्साहस है। इसमें पग बढ़ाने और हाथ डालने के लिए मनोबल के धनी, आदर्शवादी और साहसिक प्रतिभा के धनी हों। युग की इस परिवर्तन भरी बेला में नेतृत्व उन्हीं को करना है। बड़े परिवर्तन में जन सहयोग, जन समर्थन की आवश्यकता पड़ती है। पर उसका नेतृत्व तो कुछेक को ही करना पड़ता है। हनुमान का नेतृत्व पाकर ही रीछ-वानरों का साहस उमड़ा था। प्रचण्ड सामर्थ्य और सूझ-बूझ वाले सेनापतियों के नेतृत्व में सेना कट-कट कर लड़ती है। नैपोलियन का सेनापतित्व इसका जीता जागता उदाहरण है।
युग परिवर्तन की तैयारी के निमित्त जो सर्वोपरि महत्व की साधन सामग्री जुटानी है वह ऐसी ही प्रतिभाओं की आवश्यकता पड़ेगी जिन्हें समस्याओं को सुलझाना आता है। जो बिगड़ी को बना सकें और ऊसर में उद्यान उगाने का कौशल प्रदर्शित कर सकें। यह कार्य अनायास ही बन पड़ने वाला नहीं है इसके लिए वैसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जैसी कि सैन्य संचालकों को उपलब्ध कराई जाती है।
प्रश्न केवल सामूहिक समस्याओं का ही नहीं- वैयक्तिक उलझनों का भी है। उन्हें सुलझाने पर ही कोई व्यक्ति बड़े कदम उठा सकता है और व्यापक संकट निरस्त करने में समर्थ हो सकता है। निजी जीवन में शारीरिक अस्वस्थता, मानसिक उत्तेजना, आर्थिक विपन्नता, पारिवारिक अस्तव्यस्तता जैसा व्यवधान निरन्तर खड़े रहते हैं। संपर्क क्षेत्र में मित्र कम और शत्रु अधिक होते हैं। विद्वेषी सिर पर चढ़े रहते हैं और सज्जनता, सहकारिता का सहयोग ढूंढ़े नहीं मिलता। यह छोटा क्षेत्र यों है तो निजी जीवन का, पर उनको भी सुव्यवस्थित बनाने का कला-कौशल प्रदर्शित कर सकने वाले ही ऐसा कुछ कर पाते हैं जिससे समाज का बड़ा क्षेत्र प्रभावित हो। पाठशाला में आरम्भ वर्णमाला और गिनती गिनने से होता है। अन्य जटिल विषयों को पढ़ने का प्रसंग तो इसके बाद ही आता है।
जहाज चलाने और नावें खेने वाले भी सर्वप्रथम छोटे छोटे तालाबों में तैरना सीखते हैं। अभ्यास बढ़ने पर वे बड़े काम संभालते हैं। प्रशिक्षण आरम्भ में छोटा ही क्यों न हो पर वह चाहिए तो अवश्य ही। आज के वैयक्तिक एवं सामूहिक जीवन में इतनी विपन्नतायें भर गई हैं कि उनके कारण और निवारण का स्वरूप तो समझना ही होगा। इसके अतिरिक्त सामूहिक समस्याओं के समाधान में भी हस्तक्षेप करना होगा। अच्छे व्यक्तियों के बिना अच्छे समाज की रचना नहीं हो सकती। इसी प्रकार अच्छा समाज बनाने के लिए अच्छे व्यक्तियों का समुदाय बनाना और मजबूत करना आवश्यक है।
युग पुरुष- महामानव उत्पन्न करने की शिक्षा प्राचीन ऋषि कुलों में दी जाती थी। वे ही नर रत्नों के उत्पादन की खदान जैसी भूमिका निभाते थे, पर अब तो वैसी व्यवस्था रही नहीं। सामान्य ज्ञान और अर्थ उपार्जन जैसे छोटे प्रयोजन ही उनके आधार पर किसी प्रकार पूरे हो पाते हैं।
आज की विपन्नता और कल की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए यह अनिवार्य लगा कि युग पुरुष उत्पन्न कर सकने वाले स्तर की शिक्षा का तत्काल प्रबन्ध किया जाय ताकि विडम्बनाओं से जूझा और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं का आधार खड़ा किया जा सके।
ईश्वर की महती कृपा ही है कि इस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध बन पड़ा। शान्ति कुँज में अब तक ऋषि परम्पराओं को पुनर्जीवित करने वाली बहुमुखी प्रवृत्तियाँ चलती रही हैं और अपना प्रभाव भी प्रदर्शित करती रही हैं। किन्तु अब वहाँ इस केन्द्र पर प्रवृत्तियों को एकाग्र किया गया है कि व्यक्तित्व उभारने प्रतिभा निखारने और आदर्शवादी साहसी उत्पन्न करने की व्यवस्था विशेष रूप से की जाय। इस प्रक्रिया को ‘प्रज्ञा प्रशिक्षण’ नाम दिया गया है। उस नये रूप का आरम्भ भी इसी एक मई से चला पड़ा है। यों युग शिल्पी सत्र एक-एक महीने की अवधि के विगत कई वर्षों से चल रहे थे और उसके माध्यम से प्रज्ञा परिवार की गतिविधियों को अग्रगामी बनाने की शिक्षा दी जा रही थी। उसे प्राप्त करने के उपरान्त सहस्रों ने अपने-अपने क्षेत्रों में जन-जागृति का शंख बजाया और युग चेतना का आलोक फैलाया है। मिशन की प्रगतिशीलता का अभिवर्धन करने की दृष्टि से वह आरम्भिक प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं था, पर अब इस वर्ष से उसे अधिक समर्थ व्यापक एवं सुसम्पन्न बनाया गया है। उसकी शैली नालन्दा विश्वविद्यालय, तक्षशिला, विश्वविद्यालय के अनुरूप बनाई गई है। उनमें पाठ्यपुस्तकें तो कम थीं, पर व्यावहारिक शिक्षा का इतना अधिक समावेश था कि प्रत्येक शिक्षार्थी चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्च स्तरीय बनाने की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करते थे। उसे हृदयंगम करते और जीवनचर्या में गहराई तक सुसम्बद्ध करने की स्थिति तक पहुँचते थे, वैसा ही प्रबन्ध शान्ति कुँज में नये सिरे से किया गया है।
इमारतों को जोड़-तोड़ कर उन्हें छात्रावास और शिक्षालय के रूप में परिणत किया गया है। पाँच सौ शिक्षार्थियों की जगह तो आसानी से निकल आई है। प्रयत्न आगे भी जारी है और यह प्रयत्न किया जा रहा है कि एक हजार शिक्षार्थियों तक के आवास और प्रशिक्षण की व्यवस्था इसी क्षेत्र में हो सके। इसके लिए उपयुक्त अध्यापक प्रशिक्षित करने के अतिरिक्त एक दौर शिक्षार्थियों को प्रज्ञा सम्पन्न बनाने के साथ-साथ ही चल रहा है। विषयों का- पाठ्यक्रम का निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि व्यक्ति अपने निज की तथा समाज की प्रस्तुत समस्याओं का निराकरण करने में सफल भूमिका निभा सके।
पुरातन शिक्षा शैली में गुरुकुल मात्र चित्र-विचित्र प्रकार की जानकारियाँ भर लादने की दुकानें नहीं थीं। वरन् उनमें शिक्षा संचालकों को व्यावहारिक रूप से अभिभावक की भूमिका निभानी होती थी। प्रशिक्षण निवास देखभाल ही नहीं भोजन व्यवस्था भी गुरुकुल ही जुटाते थे। वही प्रबन्ध शान्ति कुँज की अभिनव विधिव्यवस्था में भी समाविष्ट किया गया है। पाँच सौ शिक्षार्थी और दो सौ अतिथि इस प्रकार आश्रम में न्यूनतम 700 से लेकर एक हजार तक का भोजनालय गतिशील रहता है। इसका आर्थिक भार ही इतना बड़ा है कि उसका हिसाब लगाते और बजट बनाने में ही बुद्धि आश्चर्यचकित रह जाती है। फिर भी विश्वास किया गया है कि जिस प्रकार मिशन का एक भी संकल्प अब तक अधूरा नहीं रहा, उसी प्रकार भविष्य में भी महाकाल अपनी आवश्यकता पूर्ति के साधन जुटा लेगा और प्रशिक्षण के निर्धारित स्वरूप में कहीं कोई बाँधा न पड़ने पायेगी।
पाठ्यक्रम मात्र एक महीने का रखा गया है, जो निरन्तर चलता रहेगा। यों समय की आवश्यकता और प्रज्ञा परिजनों में से उत्सुक भावनाशीलों की संख्या को देखते हुए प्रशिक्षण छोटा पड़ता है। जब डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, कला आदि विषयों की प्रवीणता प्राप्त करने के लिए लम्बे समय का प्रशिक्षण प्राप्त करना पड़ता है। तो कोई कारण नहीं कि युग चेतना को उभारने और विपन्नताओं से जूझने वाली शिक्षा का समय इतना थोड़ा रहे। उसे लम्बी अवधि का बनाये जाने और भर्ती बड़ी संख्या में होने की आवश्यकता सहज ही प्रतीत होती है, पर साधनों के सीमित होने की कठिनाई तथा समय की आवश्यकता को पूरा कर सकने वाले व्यक्तित्व अधिक संख्या में विनिर्मित करने और उसमें देर न लगने देने की बात को भी कम वजनदार नहीं माना जा सकता। स्थिति और आवश्यकता का संतुलन बिठाते हुए ही योजना बनानी पड़ती है। इसमें विषय का महत्व कम करना नहीं वरन् अनेकों विवशतायें हैं जिससे शिक्षण का समय सीमित ही रखना पड़ा है।
इस प्रसंग में एक कठिनाई और है कि उपयुक्त मनोभूमि के शिक्षार्थी तलाश करना सामान्य काम नहीं है। समय की विचित्रता कुछ ऐसी है, जिसमें मनुष्य पेट और प्रजनन से- लोभ, मोह और अहंकार के कुचक्र में इतना व्यस्त है कि मानवी गरिमा के अनुरूप किसी कदर आदर्शवादिता की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए इच्छुक नहीं। वासना, तृष्णा और अहन्ता की पूर्ति में ही उसकी आकाँक्षा, विचारणा और कार्यशीलता खप जाती है। यही कारण है कि जब कभी आदर्शवादी प्रयोजनों का प्रसंग आता है, तब वह वासना, तृष्णा, अहन्ता की पूर्ति को प्रमुखता देता है और उच्च प्रयोजनों को अपनाने में अपनी व्यस्तता, असमर्थता, कृपणता आदि कठिनाईयाँ व्यक्ति करता है। ऐसी दशा में उपयुक्त स्तर के छात्र मिल भी सकेंगे या नहीं? इस प्रकार का असमंजस उठता है, किन्तु साथ ही विश्वास भी बँधता है कि नियन्ता को अपनी अनुपम कलाकृति इस विश्व वसुधा की गरिमा सत्ता बनाये रखनी है तो वह प्राणवान-जीवन्तों में ऐसी प्रेरणा भरेगा भी कि वे आगे बढ़े और युग नेतृत्व कर सकने की क्षमता सम्पादित करने का अवसर चूकें नहीं। ऐसी दशा में उपयुक्त स्तर के छात्रों का मिलते रहना कुछ बहुत कठिन नहीं होना चाहिए।
समस्याएँ और आवश्यकताएँ अगणित हैं, उनसे प्रभावित और प्रताड़ित भी कोटि-कोटि लोग हैं। उन्हें सही स्थिति तक पहुँचाने के लिए ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता पड़ेगी, जो विभिन्न क्षेत्रों में अपना सृजनात्मक कौशल दिखा सकें। वैज्ञानिक, बौद्धिक, आर्थिक, चारित्रिक ऐसे हैं, जिनमें वर्तमान स्थिति को असाधारण रूप से उलटना और सही दिशा में अग्रसर करना है। यह कौन करे? इसके लिए ऐसे कर्मवीर चाहिए, जो विनाश को निरस्त करने के लिए दधीचि जैसा त्याग और भागीरथ जैसा तप कर सके। जिनमें पूर्व संचित संस्कारों का बीजाँकुर होगा, उन्हीं को खाद-पानी देकर सींचा और सुविकसित किया जा सकेगा।
विश्वामित्र ने दशरथ पुत्रों को उनके आश्रम में पढ़ने भेजने के लिए असाधारण दबाव डाला था। मोहवश राजा इसके लिए तैयार न थे, तो भी उन्होंने मोह-बन्धन को छुड़ाने के लिए प्रबल प्रयास किया फलतः राम-लक्ष्मण शिक्षा के साथ-साथ असाधारण शक्ति भी साथ लेकर आये। धनुष भंग, सीता-स्वयंवर, लंका-दमन, धर्म-संस्थापन जैसे अनेकों अद्भुत कार्य उनको कर दिखाये। यह सब उच्चस्तरीय प्रशिक्षण का ही प्रतिफल था, जिसमें मात्र जानकारियाँ ही नहीं, शक्तियाँ और विभूतियाँ भी भरी पड़ी थीं। शान्ति कुँज के प्रज्ञा प्रशिक्षण को इसी स्तर का समझा जा सकता है।
यों प्रत्यक्षतः उसमें भाषण कला, सम्भाषण कौशल, सुगम संगीत, जड़ी-बूटी उपचार, पौरोहित्य जैसे प्रसंग ही प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होंगे, पर उसके साथ ही उन विषयों का भी समावेश रहेगा, जिससे व्यक्तित्व निखरता और दृष्टिकोण सुधरता है। साथ में ऐसी भावनाओं का भी समावेश रखा गया है, जो अन्तराल की विभूतियों को उभारती और दुष्प्रवृत्तियों को जड़मूल से उखाड़ती है।
प्रज्ञा परिवार के, विशेषतया मिशन की पत्रिकाओं के सदस्यों से आग्रह-अनुरोध किया गया है कि वे अपना आवेदन पत्र भेजकर किसी निश्चित महीने के लिए प्रस्तुत सत्र में सम्मिलित होने की अनुमति प्राप्त कर लें। बिना अनुमति आना वर्जित है। कारण कि इनमें प्रखरता सम्पन्न व्यक्ति ही सम्मिलित हो सकेंगे। बूढ़े, बीमार, अपंग, असमर्थ, उद्दण्ड, अशिक्षित, मिशन से अनजान, अनगढ़ बच्चे लोगों को मनमर्जी से चल पड़ने और दूसरे सुयोग्य व्यक्तियों का स्थान घेरने से उनका, दूसरों का, तथा समाज का अनहित ही हो सकता है। व्यक्तिगत परामर्श के लिए, पर्यटन के लिए एक-दो दिन का आना ही पर्याप्त है। उन्हें एक महीना पड़े रहने की आवश्यकता नहीं है।
प्रवेश का आवेदन-पत्र हाथ से लिखकर भेजा जा सकता है। उसमें (1) नाम, पूरा पता (2) आयु (3) शिक्षा (4) जन्म-तिथि (5) व्यवसाय (6) मिशन की पत्रिकाओं से संपर्क अवधि (7) मिशन के लिए कोई कार्य किये हों, तो उनका उल्लेख (8) अनुशासन पालन का आश्वासन लिख भेजना पर्याप्त है। साथ ही यह भी लिखना चाहिए कि किस महीने में आना है, और यदि वह सत्र भर चुका हो, तो अन्य किस महीने में स्थान मिले, यह भी लिख भेजना चाहिए।
अपने क्षेत्र के उदीयमान प्रतिभाओं को ढूँढ़ने, उन्हें अवगत एवं उत्साहित करने, प्रवेश लेने के लिए भी उत्साहित करने में सभी प्रज्ञा परिजनों को शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।
जिनने कभी पिछले दिनों युग शिल्पी सत्र की शिक्षा प्राप्त कर ली हो, उन्हें इन अभिनव सत्रों में नये सिरे से सम्मिलित होने की आवश्यकता है, क्योंकि उनमें अनेक ऐसे विषयों का समावेश किया गया है, जो पहले नहीं थे।
एक बार महात्मा ईसा अपने विचार प्रकट करने और प्रश्नों का उत्तर देने के लिये एक सभा में बुलाये गये। सभा में पहुँचते ही उन्होंने देखा कि वहाँ उपस्थित एक व्यक्ति हाथ की पीड़ा से बहुत कष्ट पाता हुआ कराह रहा है। महात्मा ईसा तुरन्त उसका उपचार करने में लग गये। उनका यह कृत्य देख विरोधियों ने समझा कि वे सभा की कार्यवाही से कतरा रहे हैं। निदान एक ने व्यंग करते हुए कहा- “ईसा, तू तो शास्त्रार्थ करने आया है फिर उस मुख्य कार्य को छोड़कर हकीमी कैसे करने लगा?”
महात्मा ईसा ने बड़े शान्त भाव से उत्तर दिया- क्या तुममें से कोई ऐसा है, जिसके एक ही भेड़ हो और वह कुएँ में गिर जाय तो वह सारा काम छोड़कर उसे निकालने में न लग जाये? मेरा मुख्य काम तो पीड़ितों की सेवा करना है, लोगों का दुःख-दर्द दूर करने का है। शास्त्रार्थ तथा व्याख्यान तो जीवन के साधारण कार्यक्रम हैं।
(माया वर्मा)
उनके लिये जियें हम, जो मर-मर कर जीते हैं यह जीवन। गंध बनें उनके हित जो न जानते क्या होता है चन्दन॥
जिनको जहर वेदनाओं का पीना पड़ता नित्य यहाँ पर। जिनकी साँसों में बस गये रुदन के और सिसकियों के स्वर
उनके लिये खिलायें खुशियों एवं मुस्कानों का उपवन॥ जो गिर पड़े, हाथ उनको दें, आगे बढ़कर उन्हें उठाएँ।
जिनने दिशा गंवायी उनके हित हम ध्रुवतारा बन जाएँ चुक जाये पाथेय किसी का, उसे जुटाएं दें तन, मन, धन
उन्हें महत्व झरोखों का समझाएँ, जो दीवारें चुनते। उनको दे सुलझाव, मनो में जो विभ्रम का जाला बुनते
उनके घर के आगे स्वयं उगादें प्रेम प्यार का मधुवन॥ जिनका कोई नहीं जगत में उनका हम बन जायें सहारा।
अपने रहते कोई न कहने पाये- “मैं किस्मत का मारा”॥ ऐसे एकाकी हृदयों को बाँटे हम मधुमय अपनापन॥
प्यास बनी सहगामिनी जिनकी, उनके हित गंगा सरसायें। अंतर के छालों के ऊपर, संवेदन का लेप लगायें॥ अपने प्राण तत्व से गतिमय कर दें हर धीमी सी धड़कन॥
*समाप्त*