गहरे उतरें, विभूतियाँ हस्तगत करें

दृश्यमान व पदार्थ सम्पदा ही सब कुछ नहीं है जो गहराई में विद्यमान है, उसका भी महत्व है। पेड़ की छाया ऊपर दीखती है, पर जड़ें जमीन की गहराई में ही पाई जा सकती हैं।

समुद्र तट पर सीप और घोंघे बटोरे जा सकते हैं, पर मोती प्राप्त करने के लिए गहराई में उतरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। भूमि के ऊपर रेत और चट्टानें भी बिखरी पड़ी हैं। पर बहुमूल्य धातुओं के लिए जमीन खोदकर गहरी परतों तक प्रवेश करना पड़ता है।

पराक्रम के बलबूते वैभव हस्तगत किया जा सकता है किन्तु मानवी गरिमा विकसित करने के लिए अन्तर्मुखी बनना और पैनी दृष्टि से दोष दुर्गुणों को बुहारना पड़ता है। दैवी विभूतियाँ जो अन्तराल में विद्यमान हैं, गहन चिन्तन का समुद्र मंथन करने पर ही हस्तगत हो सकती हैं। वैभव की तृष्णा एक लुभावनी चमक मात्र है। पर आन्तरिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण रत्नों को खोद निकालने के समान है।

सौंदर्य बाहर दीखता है, पर वह वस्तुतः नेत्रों की ज्योति, अभिरुचि एवं आत्मीयता का समुच्चय मात्र है। अच्छा हो हम अपने अन्तर का खजाना खोजें और उन विभूतियों को प्राप्त करें जो अपने कल्याण तथा समष्टि के कल्याण के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं।


कार्तिकी अमावस्या का ज्योति पर्व

दीपावली भारतीय संस्कृति का प्रमुख त्यौहार है। उत्तर भारत के व्यवसायी इस अवसर पर अपना आर्थिक वर्ष आरंभ करते हैं। इस पर्व में कई देवताओं के पूजन का विधान सम्मिलित है। लक्ष्मी और गणेश की आमतौर से पूजा होती है। यों पौराणिक तारतम्य के अनुसार दोनों के बीच कोई संबंध-रिश्ता नहीं है; पर दोनों को एक केन्द्र पर जोड़ देने का दार्शनिक महत्व अवश्य है।

गणेश बुद्धि के देवता है और लक्ष्मी सम्पदा की देवी। सम्पत्ति की अपेक्षा व्यक्ति को बुद्धिमान होना चाहिए, साथ ही देवोपम-नीतिवान भी। धन का उपार्जन न्याय-नीति के आधार पर हो और उसका उपयोग करने में भी विवेकशीलता से काम लिया जाय। यदि अनीतिपूर्वक उपार्जन और अपव्यय जैसा खर्च किया जाय, तो लक्ष्मी की प्रसन्नता का लाभ न मिल सकेगा। दुरुपयोग से तो उल्टा अनर्थ ही होता है और लक्ष्मीवान गरीब ईमानदार की तुलना में अधिक घाटे में रहता है।

रावण विजय पर दीपावली के दिन राम का राज्याभिषेक हुआ था, इसलिए उसकी खुशी में दीपदान किया गया। नरकासुर वध की कथा भी इस पर्व के साथ जुड़ी हुई है। यहाँ नरक को गंदगी के रूप में व्याख्यापित किया गया है। वर्षा के बाद कीचड़, गंदगी, ज्वर या फुँसी आदि का प्रकोप होता है। इसका कारण भीतरी और बाहरी गंदगी का उबल पड़ना है। दीपावली के अवसर पर घरों की लिपाई-पुताई तो होती ही है। इसके अतिरिक्त जलाशयों, खाद-कूड़ा आदि जमा करने के स्थानों की स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

एक दार्शनिक प्रतिपादन है कि जब सूर्य-चन्द्र नहीं होते और अमावस्या की भयानक रात डरावनी लगती है, तब उस संकट का निवारण छोटे-छोटे दीपक मिलकर करते हैं। इसमें छोटों की उस गरिमा का प्रतिपादन है, जो उनके एकत्रित होने पर हो सकती है। गोवर्धन पूजा भी दीपावली के दूसरे ही दिन होती है। गोवर्धन का शब्दार्थ है- गौओं का संवर्धन, उनका पालन एवं अभ्युदय। दीपावली इतनी विशेषताओं से भरी हुई है।

इसके अतिरिक्त इस दिन कुछ ऐसी घटनाएँ भी हुई हैं, जो प्रेरणाप्रद भी हैं और अविस्मरणीय भी। इसी दिन जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान महावीर का स्वर्गवास हुआ था। उनका जीवन जितने समय रहा, जन-जन को प्रेरणा और प्रकाश देता रहा। उन्होंने अहिंसा, प्रेम, तप और त्याग को अपने जीवन का प्रतीक बनाया। जो कुछ कहा, लिखा और किया वह सभी इस आदर्शवादिता के अनुकूल था।


Quotation

एकाकी मत रहो अन्यथा अशक्त रहोगे। मिल-जुल कर रहने वाले तृणों से हाथी बाँधने वाला रस्सा बनता है।

स्वामी रामतीर्थ का भी देहावसान इसी दिन हुआ। वे टिहरी के समीप गंगा की पवित्र गोद में समा गये। वे वेदान्त के अनुयायी थे, आत्मा में परमात्मा की ज्योति सत्ता का दर्शन करते थे, साथ ही उन्होंने सब में एकात्मा के समावेश होने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की सनातन मान्यता को उनने और भी प्रखर किया।

स्वामी दयानन्द का देहावसान भी दीपावली को हुआ। वे एक चले गये, पर अपने पीछे अनेकों ऐसे ज्वलन्त दीपक छोड़ गये, जिनने तर्क और श्रद्धा का समन्वय किया और विवेक को प्रतिष्ठा दी।

दीपावली ज्योति पर्व है। भीतर और बाहर फैले हुए अन्धकार को निरस्त करने के लिए कटिबद्ध होने की उसमें प्रेरणा है। हम स्वयं प्रकाशवान बनें और समूचे वातावरण को जगमग बनायें, यही उत्साह हर वर्ष हम इस पावन पर्व से प्राप्त करते हैं।


ध्यानयोग का आधार और स्वरूप

ध्यानयोग की चर्चाएँ इन दिनों बहुत होती हैं। कितने ही सम्प्रदाय तो अपनी मूलभूत पूँजी और कार्य पद्धति ध्यान को ही मानते हैं। उनका कहना है कि इसी पद्धति को अपनाने से ईश्वर दर्शन या आत्म साक्षात्कार हो सकता है। कितने ही अतीन्द्रिय शक्तियों के उद्भव और कुंडलिनी जागरण प्रयोजनों के लिए इसे आवश्यक मानते हैं। तो भी ध्यान प्रक्रिया का रूप इतना बहुमुखी है कि एक जिज्ञासु के लिए यह जानना कठिन हो जाता है कि एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए जब अनेक मार्ग बताये जा रहे हैं, तो इनमें से किसे अपनाया जाय? एक को अपना लेने के बाद भी यह संदेह बना रहता है कि अपनाई गई प्रक्रिया की तुलना में यदि अन्य प्रचलित पद्धतियां श्रेष्ठ रहीं तो अपना चुनाव तो घाटे का सौदा रहेगा। यह ऊहापोह बना रहने से प्रायः साधक असमंजस की स्थिति में पड़े रहते हैं। पूरी तरह मन नहीं लगता या उसका कोई परिणाम सामने नहीं आता तो दूसरी विधा अपनानी पड़ती है। उससे भी कुछ दिनों में ऊब आने लगती है और कुछ दिन में बिना रसानुभूति के लकीर पिटना भी बन्द हो जाता है। जिनका दृढ़ संकल्प के साथ ध्यानयोग लम्बे समय तक चलता रहे, ऐसे कुछ ही लोग दीख पड़ते हैं। श्रद्धा के अभाव में आध्यात्मिक क्षेत्र में बढ़ाये हुए कदम लक्ष्य तक पहुँच ही नहीं पाते।

कदम को बढ़ाने से पूर्व अच्छा यह है कि इस विज्ञान का स्वरूप एवं आधार समझ लेने का प्रयत्न किया जाय।

जानने योग्य तथ्य है कि चेतना के साथ जुड़ी हुई प्राण ऊर्जा जहाँ शरीर की ज्ञात-अज्ञात, प्रयत्न साध्य एवं स्वसंचालित गति विधियों का सूत्र संचालन करती है और जीवित रहने के निमित्त कारणों को गतिशील रखती है, वहाँ उसकी एक और भी विशेषता है कि वह मस्तिष्कीय घटकों के सचेतन एवं अचेतन पक्षों को भी गतिशीलता प्रदान करती है। कल्पना, आकाँक्षा, विचारणा एवं निर्धारण की बौद्धिक क्षमता का सूत्र संचालन भी चेतना की जीवनी शक्ति द्वारा ही होता है।

बच्चों के शरीर दिन भर उछल कूद करते रहते हैं। उसका प्रयोजन अभी यह होता है अभी वह। जैसा मूड आया वैसी गतिविधियाँ अपनाने लगे। चिड़ियों तथा बन्दरों जैसे पशुओं की अनगढ़ गतिविधियाँ किसी उद्देश्य विशेष के लिए नहीं अपितु अस्त-व्यस्त, अनगढ़ और अर्ध विक्षिप्त सी, ऐसी ही कुछ ऊट-पटाँग सी होती है। जिधर मुँह उठ जाता है, उधर ही वे चल पड़ते हैं, भले ही उस श्रम से किसी प्रयोजन की सिद्धि न होती हो।

मन को यदि अपने प्राकृतिक रूप में रहने दिया जाय तो उसकी कल्पनाएँ अनगढ़ एवं अनियंत्रित होती हैं। मनुष्य कभी भी कुछ भी सोच सकता है, कभी यह, कभी वह, कल्पना की उड़ानों में ऐसी बातें भी सम्मिलित रहती हैं जिनकी कोई सार्थकता नहीं होती। वैसा बन पड़ना तो सम्भव ही नहीं होता। इन बिना पंखों की रंगीली या डरावनी उड़ानों पर बुद्धिमत्ता ही यत्किंचित् नियंत्रण लगा पाती है और बताती है कि इस प्रकार सोचने से कुछ काम की बात निकलेगी। जिनकी बुद्धिमत्ता कम और कल्पनाशक्ति बचकानी होती है वे कुछ भी सोच सकते हैं। ऐसी बातें भी, जिनका अपनी वर्तमान स्थिति के साथ किसी प्रकार का तारतम्य तक नहीं बैठता।

शक्तियों को क्रमबद्ध रूप से किसी एक प्रयोजन के लिए लगाया जाय तो ही उसका कोई प्रतिफल निकलता है। बिखराव से तो बर्बादी के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। शरीर को नियत निर्धारित काम पर लगाये रहने पर ही कृषि, व्यापार, मजूरी जैसे काम बन पड़ते हैं और उपयुक्त लाभ मिलता है। आवारागर्दी में घूमते रहने वाले आलसी, प्रमादी अपनी श्रम शक्ति का अपव्यय करते हैं, फलतः उन्हें उपलब्धियों की दृष्टि से छूँछ ही रहना पड़ता है। यही बात मन के संबंध में है। मस्तिष्कीय ऊर्जा, मानसिक तन्तुओं को उत्तेजित करती है। फलस्वरूप रात्रि स्वप्नों की तरह दिवा स्वप्न भी आते रहते हैं और मनुष्य कल्पना लोक में विचरता रहता है। यदि नियोजित बुद्धिबल कम हो तो व्यक्ति सनकी जैसा बन जाता है और उपहासास्पद कल्पनाएँ करता रहता है। भीतर की इच्छाएँ और आकाँक्षाएँ ही सुहावने और डरावने दिवा स्वप्न विनिर्मित करती रहती हैं और मस्तिष्क उन्हीं सनकों के जाल जंजाल में फंसा हुआ चित्र-विचित्र, संभव असंभव बातें सोचता रहता है। फलतः मस्तिष्क जैसे बहुमूल्य तंत्र का उत्पादन ऐसे ही बर्बाद होता है और उसका प्रतिफल नहीं के बराबर ही हस्तगत होता है। आवारागर्दी में बालकों, बन्दरों जैसी उछल कूद से मनोविनोद के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। मस्तिष्कीय बर्बादी, शरीरगत श्रम, समय की बर्बादी से भी अधिक हानिकारक होती है।

जिस प्रकार शरीर को सुनिश्चित दिनचर्या के अनुशासन में बाँधने वाला कुछ कहने लायक प्रगति कर सकता है, वैसी ही बात मानसिक नियंत्रण के बारे में भी है। बुद्धिमान लोग अपनी अनगढ़ कल्पनाओं को रोकते रहते हैं और चिन्तन को उसी क्षेत्र में कल्पनाएं करने की छूट देते हैं जिनसे कोई कारगर प्रयोजन सधता हो।

ऐसे ही लोग अपनी प्रखर बुद्धिमत्ता के सहारे किसी निष्कर्ष पर पहुँचते और दिशाधारा निर्धारित करते हैं। लक्ष्य निर्धारित हो जाने पर उसका मार्ग ढूँढ़ने और साधन जुटाने के निमित्त चेतना शक्ति लगती है और निश्चित मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलते हुए सफलता ही उस स्थिति तक पहुँचा जाता है जिस पर गर्व, हर्ष और संतोष की अनुभूति हो सके।

शरीरगत अनुशासन, मनोगत निर्धारण से आगे की भूमिका है- मन को इच्छित, उपयोगी दिशा में ले चलने की संकल्प शक्ति। यह स्वभावतः किन्हीं बिरलों में ही होती है। इसे अर्जित एवं समुन्नत करने के लिए मनुष्य को विशेष रूप से प्रयत्न करना पड़ता है। सरकस वाले जिस प्रकार अपने जानवरों को आश्चर्यजनक करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, ठीक उसी प्रकार साधनापरक हंटर के सहारे मन को मात्र सुविचारों में संलग्न होने के लिए- उपयुक्त एकाग्रता अर्जित करने के लिए- प्रयत्न करना पड़ता है। यही ध्यानयोग का स्वरूप एवं उद्देश्य है।

विचारक, मनीषी, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार वैज्ञानिक आदि अपनी कल्पना शक्ति को एक सीमित क्षेत्र में ही जुटाये रहने के कारण तद्विषयक असाधारण सूझबूझ का परिचय देते हैं और ऐसी कृतियाँ-उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर पाते हैं, जिन पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह एकाग्रता का चमत्कार है। बुद्धि की तीव्रता जन्मजात नहीं होती। वह चिन्तन को विषय विशेष में तन्मय करने के फलस्वरूप हस्तगत होती है। चाकू, उस्तरा जैसे औजारों को पत्थर पर घिस देने से वे चमकने लगते हैं और पैनी धार के बन जाते हैं। बुद्धि के संबंध में भी यही बात है। उसे तन्मयता की खराद पर खराद कर हीरे जैसा चमकीला बनाना पड़ता है। जिनका मन एक काम पर न लगेगा, जो शारीरिक, मानसिक दृष्टि से उचकते मचकते रहेंगे, वे अपना समय, श्रम बर्बाद करने के अतिरिक्त उपहासास्पद भी बनकर रहेंगे।

प्रवीणता और प्रतिभा निखारने के लिए- प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए- एकाग्रता का सम्पादन आवश्यक है। शरीरगत संयम बरतने से मनुष्य स्वस्थ रहता और दीर्घ जीवी बनता है, उसी प्रकार मनोगत संयम-एकाग्रभाव सम्पादित करने से वह बुद्धिमान, विचारकों की गणना में गिना जाने लगता है।

कछुए और खरगोश की कहानी बहुतों ने सुनी होगी, जिसमें अनवरत चलते रहने वाला उस खरगोश से आगे निकल गया था, जो अहंकार में इतराता हुआ अस्त-व्यस्त चलता था। वरदराज और कालिदास जैसे मूढ़मति समझे जाने वाले जब दत्तचित्त होकर पढ़ने में प्रवृत्त हुए तो मूर्धन्य विद्वान बन गये। यह तत्परता और तन्मयता के संयुक्त होने का चमत्कार है। बिजली के दोनों तार जब संयुक्त होते हैं तो करेण्ट बहने लगता है। गंगा और यमुना के मिलने पर पाताल से सरस्वती की तीसरी धारा उमड़ती है। ज्ञान और कर्म का प्रतिफल भी ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करता है। मन और चित्त के समन्वय से उत्पन्न होने वाली एकाग्रता के भी ऐसे ही असाधारण प्रतिफल उत्पन्न होते देखे गये हैं।

सूर्य की बिखरी किरणें मात्र गर्मी और रोशनी उत्पन्न करती हैं। किन्तु जब उन्हें छोटे से आतिशी शीशे द्वारा एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जाता है। तो देखते-देखते चिनगारियाँ उठती हैं और भयंकर अग्नि काण्ड कर सकने में समर्थ होती है। बिखरी हुई बारूद आग लगने पर भक् से जलकर समाप्त हो जाती है, किन्तु उसे बन्दूक की नली में सीमाबद्ध किया जाय तो भयंकर धमाका करती है और गोली से निशाना बेधती है। भाप ऐसे ही जहाँ-तहाँ से गर्मी पाकर उठती रहती है, पर केन्द्रित किया जा सके तो प्रेशर कुकर पकाने और रेलगाड़ी चलाने जैसे काम आती है। अर्जुन मत्स्य बेध करके द्रौपदी स्वयंवर इसीलिए जीत सका था कि उसने एकाग्रता की सिद्धि कर ली थी। इसी के बलबूते विद्यार्थी अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते, निशानेबाज लक्ष्य बेधते और सरकस वाले एक से एक बढ़कर कौतूहल दिखाते हैं। संसार के सफल व्यक्तियों की, एक विशेषता अनिवार्य रूप से रही है, कि वे अपने मस्तिष्क पर काबू प्राप्त किये रहे हैं। जो निश्चय कर लिया उसी पर अविचल भाव से चलते रहे हैं, बीच में चित्त को डगमगाने नहीं दिया है। यदि उनका मन अस्त-व्यस्त डाँवाडोल रहा होता तो कदाचित ही किसी कार्य में सफल हो सके होते।

योगाभ्यास में मनोनिग्रह को आत्मिक प्रगति की प्रधान भूमिका बताया गया है। इन्द्रिय संयम वस्तुतः मनोनिग्रह ही है। इन्द्रियां तो उपकरण मात्र हैं। वे स्वामिभक्त सेवक की तरह सदा आज्ञा पालन के लिए प्रस्तुत रहती हैं। आदेश तो मन ही देता है। उसी के कहने पर ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां ही नहीं, समूची काया भले बुरे आदेश पालन करने के लिए तैयार रहती है। अस्तु संयम साधना के लिए मन को साधना पड़ता है। संयम से शक्तियों का बिखराव रुकता है और समग्र क्षमता एक केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित होती है। फलतः उस मनःस्थिति में जो भी काम हाथ में लिया जाय, सफल होकर रहता है।

ध्यानयोग सांसारिक सफलताओं में भी आश्चर्यजनक योगदान प्रस्तुत करता है। उसके आधार पर अपना भी भला हो सकता है और दूसरों का भी किया जा सकता है।


राम ने वशिष्ठ से पूछा (kahani)

वशिष्ठ ने राम को कथा सुनाया। कहा- “एक जादूगर राजा की सभा में पहुंचा और उसे विचित्र दृश्य दिखाया। मोर पंख का पुछारा उसके ऊपर तीन बार फिराया। राजा को सिंहासन पर बैठे-बैठे ही गहरी नींद आ गई और प्रत्यक्ष लगने वाला स्वप्न देखना आरंभ कर दिया। देखा- किसी राजा ने उसे भेंट में एक बहुमूल्य घोड़ा भेजा है। वह उस पर सवार हो गया। घोड़ा तेज चाल से चला और मर्जी का रास्ता पकड़ा। राजा द्वारा पकड़ी लगाम की उसने तनिक भी परवा न की। बहुत दूर जाने पर राजा को अपनी विवशता का डर लगा। वह घोड़ा जैसे ही एक आम्र वृक्ष के नीचे से निकला उसने डाली पकड़ ली और पेड़ पर चढ़ गया। उतरा तो भूख प्यास और थकान से वह चूर हो रहा था। इतने में देखता क्या है कि सामने से एक अत्यंत कुरूप नवयुवती कन्या अपने पिता के लिये उबले चावल और जामुन का मद्य बना कर ले जा रही है। राजा ने प्रार्थना की। इसमें से उसे भी थोड़े मिलें तो उसके प्राण बचें। चाण्डाल कन्या ने पहले तो स्पष्ट इन्कार कर दिया, पर पीछे सोच समझकर कहा- आप मुझ से विवाह कर लें और आजीवन मेरे ही घर रहें तो मैं आपको भोजन दे सकती हूँ। राजा ने स्वीकृति दे दी। खाना खा  पीकर उसके पीछे-पीछे चल दिये। उसके झोंपड़े में हड्डियाँ, माँस, चमड़ा जैसी चीजें लटक रही थीं। पर मन मारकर राजा को वहीं रहना पड़ा। धूम धाम से उसी झोपड़ी में उसका विवाह हुआ क्रमशः कन्या के पेट से तीन पुत्र और तीन कन्याएँ जन्मीं। अपने निजी राज्य को तो वह सर्वथा भूल ही गया।

उस क्षेत्र में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। राजा अपने छहों बच्चों और पत्नी को लेकर किसी सुविधा वाले प्रदेश के लिए चल पड़ा। रास्ते में उनके बच्चों के प्राण भूख से निकलने लगे। कोई और उपाय न देख कर राजा ने ईंधन इकट्ठा किया और उसमें अपना शरीर चलाते हुए कहा। आज तुम इसी माँस को खाकर अपनी तृप्ति करो।

उस स्वप्न दृश्य को देखने में दो घंटे लग गये। जादूगर ने मोर पंख का पुछारा फिर उसके सिर पर फिराया सो वह फिर जागृत अवस्था में आ गया। स्वप्न उसके मन पर से उतर ही नहीं रहा था।

राम ने वशिष्ठ से पूछा- वह राजा कौन था। चाण्डाल कन्या कौन थी? वशिष्ठ ने कहा- अज्ञानी मनुष्य ही राजा है और वह मायाग्रस्त मन को बंधनों में बंधा कर जीवन भर ऐसी ही अनुभूतियाँ करती रहती है।


मेज गोविंदम् मूढ़मते

भगवान के सहस्र नाम “विष्णु सहस्र नाम” नामक स्तवन पुस्तिका में संकलित हैं। इसमें पहला नाम है- “विश्वम्।” यों विश्वम्भर, विश्वनाथ आदि नाम भी भगवान के ही हैं, पर उनसे द्वैत का बोध होता है। “विश्वम्” अद्वैत है। निराकार, क्षुब्ध-निरंजन आदि नामों में उस सत्ता के अस्तित्व का तो बोध है; पर स्वरूप का नाम, प्रतिमाओं के रूप में भगवान की स्थापना आदि में उनके अलंकारिक गुणों का ही विवेचन है, यथा- विष्णु की चार भुजा, चार दिशा, चार वर्ण, चार आश्रम का संकेत है। आयुध के रूप में सुदर्शन चक्र उनके महाकाल स्वरूप का संकेत है। पुष्प रूप में वे जहाँ वरदान देते हैं, वहाँ गदा प्रहार द्वारा आततायियों को प्रताड़ित भी करते हैं।

इसी प्रकार विष्णु की ही तरह ब्रह्मा, शिव, गणेश, सूर्य आदि की भी प्रतिमाएँ उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए गढ़ी गई हैं। वस्तुतः सर्वव्यापी सत्ता की कोई आकृति नहीं हो सकती। उसकी प्रकृति ही समग्र व्यवस्था जुटाती है।

फिर भगवान का दृश्य एवं प्रत्यक्ष रूप क्या हुआ? इसके उत्तर में “विश्व” शब्द का उल्लेख ही समीचीन है। उसके कण-कण में जो सत्ता समायी हुई है, उसे अशरीरी शक्ति के रूप में ही जाना जा सकता है। प्रतिमाएँ तो मनुष्य ने अपनी-अपनी भावना और कल्पना के आधार पर गढ़ी हैं। यदि वस्तुतः उसका कोई स्वरूप रहा होता, तो वह समस्त प्राणियों को एक ही जैसा दीखता। सूर्य सर्वत्र एक ही आकृति का है। उसे किसी धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, देश के आधार पर पृथकता के साथ निरूपित नहीं किया जा सकता।

दृश्य रूप में यदि भगवान की आकृति देखनी हो, तो वह विश्व ही हो सकता है। विश्व अर्थात् ब्रह्मांड और उसका छोटा रूप यह भूलोक भी। कृष्णावतार में अर्जुन और यशोदा को यही रूप दिखाया गया था। रामावतार के समय कौशल्या और काकभुसुण्डि ने यही रूप देखा। उन अलंकारिक आकृतियों को विराट ब्रह्म कहते हैं।

भगवान की उपासना का अर्थ है- विश्वात्मा के समीप बैठना। यह समीपता सब में अपने को और अपने में सब को देखने की भावना द्वारा ही संभव हो सकती है। इसका व्यावहारिक रूप यह है कि जैसा व्यवहार दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही हम भी दूसरों के साथ करें। स्पष्ट है कि हम दूसरों से अपने प्रति सज्जनता, शालीनता, उदारता एवं सहयोग की आशा करते हैं। ऐसी दशा में यह भी आवश्यक हो जाता है कि हम भी दूसरों से वैसा ही मृदुल व्यवहार करें।

ईश्वर भक्ति का तात्पर्य भगवान की सेवा करना है। भजन करना ईश्वर प्राप्ति का उपयुक्त माध्यम है। ‘भजन’ शब्द संस्कृत की ‘भज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है- सेवा। सेवा अर्थात् सहायता। भगवान अर्थात् विश्व को सुविकसित, समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न करना। यह प्रत्यक्ष व्यवहार हुआ। परोक्ष चेतना जगत में यही क्रिया सुसंस्कृति कही जा सकती है। संसार को प्रत्यक्षतः सुखी और उसकी भाव-चेतना को सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करना सच्चे अर्थों में भजन कहा जा सकता है। मात्रा नाम रट से यह प्रयोजन पूरा नहीं होता।

सेवा में दोनों ही पक्ष आते हैं- संवर्धन भी और प्रताड़ना भी। माता अपने बच्चे को प्यार भी करती है और उसे सुखी बनाने में निरत भी रहती है, पर उद्दण्डता बरतने पर उसकी प्रताड़ना भी करती है और फोड़ा हो जाने पर डॉक्टर के पास पीड़ा भरा आपरेशन कराने के लिए भी ले जाती है।

गंदगी को हटाना एवं स्वच्छता को बढ़ाना एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं। सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एक ही क्रिया की दो प्रक्रिया हैं। सेवा करना सुख बढ़ाना भी है और उन अनाचरों को निरस्त करना भी जो दुःख देते और पतन के गर्त में गिराते हैं। शैतान की अवहेलना और भगवान की उपासना एक ही बात है, यद्यपि यह दो क्रियाएँ एक-दूसरे से पृथक प्रकार की मालूम देती हैं। विश्व की सेवा और भगवान के भजन में कोई अन्तर नहीं है।


वेदान्त दर्शन का सार तत्व

प्रसिद्ध षट्दर्शनों के अतिरिक्त भी पूर्वात्य और पाश्चात्य अनेक दर्शन हैं। उनमें वेदान्त दर्शन की गरिमा सर्वोच्च मानी गयी है। उस मान्यता के अनुरूप विचारणा को परिष्कृत करने और जीवन ढालने पर मनुष्य ऐसा दृष्टिकोण अपना सकता है, जो उसके निज के लिए उत्साहवर्धक, प्रसन्नतादायक सिद्ध हो और दूसरों को सुविधा उत्पन्न करे तथा प्रगति का द्वार खोले।

वेदांत की व्याख्या सुविस्तृत है; किन्तु उसके सारतत्त्व दो ही हैं- एक अपने अन्तराल में परब्रह्म की उपस्थिति अवस्थित देखना और संसार को खेल जैसी क्रीड़ास्थली मानना, उसमें घटित होने वाली घटनाओं से अधिक प्रभावित न होना।

वेदान्त की आरंभिक शिक्षा है- “अयमात्मा ब्रह्म”- “तत्वमसि”- “सोऽहम्” आदि। अपनी जीवन सत्ता परमात्म स्वरूप है, सत्-चित्त-आनंद स्वरूप, अविनाशी और सुसंस्कारी। मैल तो उस पर दुर्गुणों और दुर्जनों के संपर्क से ही जमते हैं। यह ऐसे ही हैं, जैसे कपड़े मैले हो जाते हैं, शरीर पर मलीनता जम जाती है। यह ऐसी नहीं होती, जिन्हें छुड़ाया न जा सके। कपड़े को साबुन से धो देते हैं, शरीर को तौलिये से रगड़ देते हैं, कमरे को बुहारी से बुहार देते हैं। इस संसार की प्रकृति ही ऐसी है कि हवा के साथ उड़ने वाली धूलि जहाँ भी रुकने का स्थान पाती है, वहाँ मलीनता जमा कर देती है। वातावरण में सदाशयता कम और दोष-दुर्गुणों का बाहुल्य है। अस्तु संपर्क क्षेत्र का प्रभाव पड़े बिना रहता नहीं। जो चारों ओर दीखता है, उसके अनुकरण की इच्छा होती है। पानी नीचे की ओर बहता है, यह उसका स्वभाव है। मन का स्वभाव भी ऐसा ही है कि वह अपनी समीपवर्ती अवाँछनीयताओं को ही लपक कर अपनाता है। जो श्रेष्ठ है, वह उसकी ओर से आँखें मीचे रहता है। इस स्थिति को समझते हुए आत्म स्वरूप की पवित्रता और गुण-कर्म-स्वभाव की निकृष्टता का विश्लेषण करना चाहिए और जो विजातीय-अवांछनीय अपने से लिपट गया है, उसे छुड़ाना चाहिए।

यह प्रेरणा वेदान्त दर्शन से मिलती है। वह अपने आप को हेय प्राणी नहीं गिनता। मूल सत्ता की उत्कृष्टता पर विश्वास करता है। उसकी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहने के लिये यह प्रयत्न करता है कि चादर मैली न होने पाये। अच्छे खासे सुन्दर शरीर और सुसज्जित परिधान पर दाग-धब्बे न लगने पायें। श्रेष्ठजनों को अपनी श्रेष्ठता का ध्यान रहता है। इस हेतु वे निरन्तर यह प्रयत्न करते हैं कि उनका आवरण-आचरण ऐसा न बनने पाये, जिससे उनकी निकृष्टता परिलक्षित हो, घृणास्पद बनें और लोग उँगली उठायें, अन्तःकरण धिक्कारे, सज्जनों के बीच लज्जित होना पड़े।

जिस दर्शन में आत्मा को जन्मजात रूप से पापी स्वभाव का माना गया है, पशु प्रवृत्तियों से गुँथा हुआ भी, उस विचारणा से सहमत लोग इतना ही सोच पाते हैं कि जैसा कुछ बनाया गया है, वैसे हैं। जब अन्य जीव-जन्तुओं को मर्यादा पालन और वर्जनाओं से बचने का भाव पैदा नहीं होता, तो हमीं क्यों पवित्रता एवं प्रखरता अर्जित करने के लिए कष्ट सहें, क्यों उनसे जूझे और क्यों तपस्वी स्तर के अनुबन्ध अपने ऊपर लगायें। उन्हें मलीनताओं के बीच निवास-निर्वाह करते हुए भी ऐसी व्याकुलता नहीं होती कि दुष्प्रवृत्तियों से पीछा छुड़ाने के लिए कटिबद्ध हुआ जाय। उनसे बचे रहने के लिए विशेष रूप से सतर्क रहा जाय। जिसकी अपनी कोई मौलिक गरिमा नहीं, उसके मन में ऐसे संशोधक विचार उठने भी क्यों चाहिए ?

परमात्मा श्रेष्ठताओं का समुच्चय है। उसे सत्, चित् और आनन्द स्वरूप माना गया है। जीवधारी जब अपने को ईश्वर या उसका अंश मानता है, तो सहज ही यह दायित्व उसके ऊपर आता है कि अपने आधार के अनुरूप ही अपनी जीवनचर्या बनाये। व्यक्तित्व में उच्चस्तरीय महानता का समावेश करें। यह प्रेरणा मनुष्य को ऊँचा उठाने और देवोपम जीवनयापन करने के लिए प्रोत्साहित बाधित करती है। इसे एक बहुत बड़ी उपलब्धि ही माना जा सकता है। आत्मबोध के रूप में जब अपने को ईश्वर- ईश्वर का अंश मानने की आस्था जागती है, तो अन्तरंग और बहिरंग जीवन में दोनों ही पक्ष फड़फड़ाने लगते हैं। पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करने लगता है।

वेदान्त का दूसरा पक्ष है- संसार को माया मानना। जो घटित हो रहा है, उसे जादू स्तर की खिलवाड़ मानना, स्वप्न में देखे हुए दृश्यों की तरह अवास्तविक मानना। खिलाड़ी, ताश-शतरंज या दूसरे खेल खेलते हैं। उनमें बार-बार हार जीत होती रहती है। इसके लिए वे न तो हर्षोन्मत्त होते हैं और न शोक मनाते हैं। जानते हैं कि यह सब क्रीड़ा-विनोद है। इस माध्यम से अपनी बौद्धिक या शारीरिक कुशलता बढ़ाने का ही लाभ लेना चाहिए, हार-जीत के परिणामों को उतना महत्व नहीं देना चाहिए।

संसार में अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ पग-पग पर आती रहती हैं। जो उनसे प्रभावित होते हैं, वे चैन से समय गुजार नहीं पाते। कभी सफलता का आवेश-उन्माद जैसा चढ़ बैठता है और कभी स्थिति ऐसी आ जाती है कि शोक, रोष, वियोग, विछोह व्याकुल कर देते हैं। चिन्ता, निराशा, आशंका से मन प्रकम्पित रहता है और यही भय बना रहता है कि न जाने कब क्या आपत्ति आसमान से टूट पड़े। वर्तमान स्थिति से भी संतोष नहीं होता। निर्वाह योग्य साधन हों, तो भी अधिक बटोरने की लिप्सा बेचैन किये रहती है। संग्रह इतना करने की इच्छा होती है कि सात पीढ़ियों तक गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा बिना परिश्रम किये उस संचय के आधार पर ही मिलती रहे। इस लालच की जितनी पूर्ति की जाती है, वह उतनी ही अधिक तीव्र होती जाती है। रोज कमाने, रोज खाने वालों की अपेक्षा वे लोग अधिक चिन्तित पाये जाते हैं, जिनके सिर पर संग्रह, वैभव एवं प्रदर्शन का भूत चढ़ा है। हानि-लाभ के अवसर भी कम नहीं आते; उनकी सुखद और दुःखद प्रतिक्रियाएं मन में ज्वार भाटे जैसे उछाल लेती रहती हैं। ऐसी दशा में अशान्ति बनी रहना स्वाभाविक है और जो अशान्त हो उसके लिए सुख-चैन कहाँ?

मिलन और विछोह का जोड़ा है। मनुष्य जन्मते और मरते रहते हैं। सदा-सर्वदा जीवित रह सकना किसी के लिए भी संभव नहीं। जो जितनी आयुष्य लेकर आता है, उतना ही ठहरता है और समय आने पर अपनी राह चला जाता है। संसार एक रेलवे प्लेटफार्म है। इस पर मुसाफिरों का आवागमन बना ही रहता है। ज्ञानी इस तथ्य को समझते हैं और प्रिय-अप्रिय दोनों ही परिस्थितियों को अधिक महत्व नहीं देते। फलतः उनका चैन संतुलन भी गड़बड़ाने नहीं पाता। वेदान्त दर्शन हमें अनेक भ्रान्तियों और अवाँछनीयताओं से बचा लेता है।

‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’ का सिद्धान्त काल्पनिक नहीं है। वह हर कसौटी पर खरा उतरता है। आत्मा जिस दिशा धारा को मजबूती से पकड़ती है उसी से देव दानव की स्थिति प्राप्त कर लेती है। उसकी मूल सत्ता परब्रह्म के साथ जुड़ी होने के कारण महानता का समुच्चय है। अवसर मिले तो मनुष्य महामानव, सिद्ध पुरुष, तपस्वी, देवता, अवतार बन सकता है। इसी प्रकार वह माया के सिद्धान्त को समझने का प्रयत्न करे तो भव बंधनों से मुक्ति पाकर हर परिस्थिति में सन्तुष्ट और उल्लसित रह सकता है।


सर्दी में सिकुड़ रहा था (kahani)

एक बूढ़ा किसी ठूँठ के नीचे बैठा सर्दी में सिकुड़ रहा था। पेड़ पर ऊपर की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि वह भी उसी की तरह बूढ़ा हो गया है। बूढ़े ने अपने विगत वैभव की गाथा गाई और पेड़ के साथ सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहा- तुम्हें भी मेरी ही तरह भाग्य ने सताया है न?

ठूँठ ने कहा- मैं तुम्हारे जैसा दुःखी नहीं हूँ। निकट भविष्य में बसंत आ रहा है। मैं उसी की सुखद कल्पना में खोया रहता हूँ और मोद बनाये रहता हूँ कि न जाने कितने और बसंत देखने मेरे भाग्य में बदे हैं। मेरे भाग्यवान होने की धन्यवाद दो और अपने भूत की चिंता कर स्वयं ही रोते रहो।


अष्टाँग योग का महत्वपूर्ण सोपान समाधि

समाधि राजयोग का अन्तिम चरण है। योगों में प्रधान चार हैं। एक- राजयोग, दूसरा- हठयोग, तीसरा- मंत्रयोग, चौथा- लययोग। इन सबके अपने अपने प्रतिफल हैं। सर्व साधारण के लिए अधिक सरल और अधिक उपयोगी राजयोग बताया गया है। अन्य योग अधिक तैयारी अधिक तत्परता-तन्मयता चाहते हैं। पर राजयोग उतने एकान्त या विरक्ति की अपेक्षा नहीं करता। वह साधारण एवं स्वाभाविक जीवन-क्रम के साथ ही चलता रहता है।

राजयोग के निर्धारित क्रम में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान के सात चरणों को पूरे करने के उपरान्त अन्तिम प्रयोग समाधि का आता है। लोग उसे अधिक कौतूहलवर्धक, आश्चर्यजनक मानते हैं। इसलिए प्रदर्शनकारी जहाँ-तहाँ समाधि लगाने का कौतुक करते हैं। उस कौतूहल से प्रभावित भावुक भक्तजनों की उत्पन्न कौतुक मिश्रित श्रद्धा का दोहन यह प्रदर्शनकारी करते हैं। चढ़ावे के रूप में धन, सम्मान प्रचुर मात्रा में अर्जित करते हैं।

समाधि के बारे में उत्सुक लोगों को जानना चाहिए कि वह पके फल के बीच में निकलने वाला ऐसा बीज है जिसमें नया पौधा उत्पन्न करने की क्षमता विकसित हो चुकी होती है। उस स्थिति तक पहुँचने के लिए इससे पहले वाली सीढ़ियां पार करनी होती हैं। ऊँची छत पर पहुंचने के लिए एक-एक सीढ़ी पार करते हुए चढ़ना और पहुंचना पड़ता है ऐसा नहीं हो सकता कि जमीन पर खड़ा व्यक्ति छलांग लगाकर सीधा छत पर जा बैठे। स्कूल में प्रवेश करते ही एम.ए. की डिग्री हस्तगत हो जाय, ऐसा नहीं हो सकता है। इसके लिए एक-एक दर्जा पास करते हुए कालेज में भर्ती होना होता है और अन्त में स्नातकोत्तर परीक्षा पास करके कालेज छोड़ना पड़ता है। कालेज छोड़ने का तात्पर्य है कि स्थूल शरीर के बंधन ढीले करते हुए अपने अधिकाँश महत्वपूर्ण कार्य सूक्ष्म और कारण शरीरों द्वारा सम्पन्न करने लगना। इसमें योगी की सत्ता तो यथावत् बनी रहती है, किन्तु वह सामान्य शरीर धारण की तरह दृष्टिगोचर नहीं होती। उसे आहार-निद्रा आदि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। सूक्ष्म और कारण शरीर वायुभूत होते हैं। उन्हें वे आवश्यकताएँ नहीं पड़ती जिन पर स्थूल शरीर का निर्वाह होता है। इस स्थिति का ही नाम जीवन मुक्ति है। उसमें स्थूल शरीर की आवश्यकताएँ एवं समस्याएँ भर निवृत्त हो जाती हैं। जीवन प्रवाह यथावत बना रहता है। वरन् सच तो यह है कि वह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। शरीर का बोझिल झंझट अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए जो साधन सामग्री माँगता है उसकी आवश्यकता न रहने पर आत्मिक शरीर की गति, किसी भी दिशा में तीव्र हो जाती है। शरीरगत बोझ, दायित्व और संवेदन घट जाने के कारण यह स्वाभाविक भी है।

सिद्ध योगीजन प्रायः सूक्ष्म शरीर में रहते हैं। स्थूल शरीर को तो पीछे छोड़ देते हैं, या समय पर काम लाने के लिए उसे हिमि प्रदेश में जमा देते हैं। वैसे सूक्ष्म शरीर को भी संकल्प शक्ति के आधार पर प्रकट रूप में दर्शाया जा सकता है। जैसे प्रेत, पितर योनि वाले प्राणी सूक्ष्म शरीर धारी होते हैं पर कभी-कभी आवश्यकतानुसार प्रकट भी होते रहते हैं। उसी प्रकार जीवन मुक्त सूक्ष्म शरीरधारी योगीजन भी आवश्यकतानुसार दृश्य या अदृश्य होते रहते हैं। अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियां इसी की स्वाभाविक स्थिति हैं। सूक्ष्म शरीर हल्का होता है। उसे कितना ही सिकोड़ा या फैलाया जा सकता है। हनुमत् लीलाओं के संबंध में ऐसे विवरण आते भी हैं एक स्थान पर लिखा है- “तब कपि भयऊ भूधरा कारा” एक स्थान पर आता है- “मशक समान रूप कपिधारी” वायु वेग से चलकर संजीवनी बूटी लाना भी उसी स्थिति के विभिन्न प्रयोग हैं। पर यह स्थिति तब आती है जब राजयोग की आठों कक्षाएँ पढ़कर उनमें निष्णात् बना जाता है।

राजयोग के प्रथम दो चरण हैं- यम और नियम। यह पाँच-पाँच प्रकार के हैं। इन्हें आत्मशोधन कह सकते हैं। शरीर और मन की पवित्रता, शालीनता एवं अनुशासन अपनाना भी। शरीर संयम से चरित्र गठन होता है और चिन्तन की पवित्रता से दृष्टिकोण का परिमार्जन। संयमशीलता का यथा विधि परिपालन। इतना किये बिना गाड़ी नहीं बढ़ती। उसका ढाँचा कितना ही सुन्दर क्यों न हो पर दो पहिए तो सही स्थिति में रहने ही चाहिए।

दूसरा द्विविधि चरण है- आसन-प्राणायाम का। उसे कायगत स्वास्थ्य संतुलन कहा जा सकता है। आसनों को मर्मस्थलीय व्यायाम कह सकते हैं। पहलवानों द्वारा प्रयोग में आने वाले व्यायाम प्रधानतया माँसपेशियों के होते हैं, पर योगाभ्यास में प्रयुक्त होने वाले आसन ‘एक्यूप्रेशर’ विधान है। चीनी उपचार पद्धति में एक्यूपंचर और एक्यूप्रेशर विधान आदि हैं और उनमें मर्मस्थलों को छेदा या दबाया जाता है। इस विधि से वे शारीरिक और मानसिक रोगों से छुटकारा कराने में सफल होते हैं। आसनों में ऐसे ही मर्मस्थलों को उत्तेजित किया जाता है जिससे शरीर की मर्मस्थली नियमित होकर स्वास्थ्य संतुलन में सहायता करे।

प्राणायाम यों गहरी साँस लेकर फेफड़ों का व्यायाम करना- अधिक आक्सीजन प्राप्त करना मात्र मालूम देता है किन्तु उसका प्रधान लक्ष्य मानसिक संयम है। श्वासों के आरोह अवरोह में समस्वरता आ जाने पर मन स्थिर होने लगता है। ‘सोऽहम्’ साधना प्राणायाम विधा का अध्यात्म मिश्रित अगला चरण है। उससे ध्यान धारणा की पूर्व भूमिका बनती है और आत्मिक प्रगति की दिशा में और अधिक चल पड़ना संभव होता है।

प्रत्याहार और धारणा का युग्म अन्तःकरण चतुष्टय का परिमार्जन है। मन की दौड़ बंदर जैसी कुदक फुदक करते रहने की है। वह प्रधानतया अनगढ़ कल्पना करता रहता है। इसे ध्यान द्वारा एकाग्र किया जाता है और विवेक की खराद पर चढ़ा कर उसे हीरे की तरह अधिक रूपवान एवं चमकदार भी बनाता है। धारणा श्रद्धा विश्वास को कहते हैं। संदेहों, कुतर्कों का निराकरण भी। आस्था के परिपक्व होने से मन को कल्पना चित्र प्रत्यक्ष जीवन में साकार होने लगते हैं। आत्मिक प्रगति के यह बढ़ते हुए सोपान हैं। दोनों पक्ष अपने आप में प्रगति की दिशा में अग्रगामी बनाते हैं।

प्रत्याहार, धारणा और ध्यान से पूर्ववर्ती स्थिति है। पर है वह समाधि की तरह एकाकी। उसमें निरोध प्रधान है। मन का स्वभाव चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते रहने पर सभी के ऐसे स्वभाव संग्रह कर लेता है जो मानवी मान मर्यादा के अनुरूप नहीं पड़ते। इनकी काट करनी पड़ती है। लोहे से लोहा काटते हैं। सद्विचारों से कुविचार काटे जाते हैं। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन और मनन यह चार संस्कार मन पर रगड़ाई करने एवं कलई चढ़ाने के काम में लाये जाते हैं। प्रत्याहार वस्तुतः अवाँछनीयता विरोधी है, जिसके लिए सद्विचारों का सत्प्रवृत्तियों का- नीति मर्यादाओं का- अवगाहन करना पड़ता है।

उपरोक्त सातों पक्षों को पूरा कर लेने के उपरान्त राजयोग की अंतिम भूमिका समाधि में प्रवेश करने का अवसर आता है।

समाधि दो प्रकार की होती है- एक सविकल्प दूसरी निर्विकल्प। सविकल्प में जीवनचर्या के समस्त क्रिया कलाप अपने ढंग से यथा समय होते रहते हैं। मात्र दृष्टिकोण अपने संबंध में और साँसारिक वस्तुओं के संबंध में परिमार्जित करना पड़ता है। वायुयान पर चढ़कर नीचे देखने पर सभी वस्तुएँ छोटी लगती हैं। साथ ही आकाश का बड़ा भाग भी दीख पड़ता है। यही मनःस्थिति सविकल्प समाधि में होती है। अपना अस्तित्व आकाश की तरह विस्तृत और साँसारिक लोभ, मोह, अहंकार की क्षुद्रता का भान होता है। ऐसे व्यक्ति प्रज्ञावान या मनीषी कहे जाते हैं। उनकी जीवनचर्या देवोपम हो जाती है। गुण, कर्म, स्वभाव की शालीनता का परिष्कार उनके साथ-साथ चलता है। वे अकेले नहीं होते। दैवी विभूतियाँ, विशेषताएँ एवं क्षमताएँ उनके साथ होती हैं। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का अवलम्बन उनके साथ पूरी तरह जुड़ा रहता है। यही मध्यम मार्ग है जिसे बुद्ध ने कठोर तपश्चर्या छोड़कर अपनाया था। इसी के बारे में कबीर ने कहा है- “साधो सहज समाधि भली।

इसके अतिरिक्त दूसरी समाधि है- निर्विकल्प। इसका हठयोग एवं लययोग के साथ संबंध जुड़ता है। हृदय की धड़कन श्वास-प्रश्वास क्रिया को रोक देने पर शरीर जीवित रहते हुए निश्चेष्ट हो जाता है। उसे किसी गड्ढे में या कमरे में देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

अभ्यास करने पर इस साधना की सिद्धि तो हो जाती है, पर यदि प्राण को ऊपर से नीचे उतारना न बन पड़ा और धड़कन फिर से तेज न हो सकी तो उस मध्यवर्ती व्यवधान की अवाँछनीय प्रतिक्रिया भी हो सकती है। पक्षाघात उन्माद जैसा कोई रोग भी हो सकता है। निर्विकल्प समाधि की आवश्यकता इसलिए समझी गई है कि नियत समय तक स्थूल शरीर को निश्चेष्ट करके अचेतन मन को इष्टदेव में या किसी महान प्रयोजन में नियोजित किया जा सके। इतने भर काम के लिए इतना बड़ा झंझट मोल लेना जोखिम भरा है। यह कार्य तो प्रत्याहार, धारणा, ध्यान को परिपक्व करने से भी हो सकता है। जिन दिनों शरीर शुद्ध और सात्विक थे, उन दिनों यह सरल भी था और संभव भी। पर आज के जन साधारण की सामान्य स्थिति को देखते हुए निर्विकल्प समाधि का अभ्यास या प्रदर्शन जोखिम भरा ही है उसका विचार छोड़ दिया जाय तो ही अच्छा है। जो कार्य राजयोग के तीन अभ्यासों से हो सकता है, उसके लिए इतनी लम्बी छलाँग क्यों लगाई जाय?

यह युग बाजीगरी का है। इसमें ऋद्धि सिद्धियों के अनेक उपचार अनेक बाजीगर-जादूगर कर दिखाते हैं और लोगों को हैरत में डालते हैं। अब थोड़ा-सा क्रियाकुशल व्यक्ति जादूगरी के उन हथकंडों को सीख सकता है जो दर्शकों को किसी देवी देवताओं का यत्र-तंत्र की करामात दीखें। इस संदर्भ में समाधि का तमाशा दिखाने में भी कई लोगों ने प्रवीणता प्राप्त कर ली है और वे उस प्रदर्शन का लाभ जादूगरों की तरह कमाई करने के लिए दिखाते हैं। खोदे हुए बड़े गड्ढे के यदि चारों ओर की ऊपर की जमीन पुलपुली रखी जाय तो कणों के बीच इतनी हवा रह जाती है जिसके सहारे कोई स्थिर मन वाला सप्ताह दो सप्ताह भी आक्सीजन की आवश्यकता पूरी करता रहे और लोगों को अपनी विद्या का करतब दिखा सके।

जहाँ तक आध्यात्मिक प्रगति का संबंध है वहाँ तक राजयोग के युग्मों को पार करते हुए अपने व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी परिष्कार करना ही उपयुक्त है। समाधि स्तर तक पहुँचना हो तो सविकल्प समाधि का ही अभ्यास और अवगाहन करना चाहिए। वह सरल भी है और समुचित परिणाम में श्रेयस्कर भी।


देवता फिर प्रकट हुए (kahani)

एक गोताखोर बहुत दिन से असफल रह रहा था। घोर परिश्रम करने पर भी कुछ हाथ न लगा। पेट भरने के लाले पड़ गये। कोई रास्ता सूझता न था।

सो, एक दिन उसने किनारे पर बैठ कर देवता की बहुत प्रार्थना की। आप सहारा न देंगे तो मैं जीवित कैसे रहूँगा।

देवता पसीजे। इस बार की डुबकी में उसे एक पोटली हाथ लगी। खोलकर देखा उनमें छोटे-छोटे पत्थर भर बंधे थे। दुर्भाग्य को उसने कोसा। देवता को निष्ठुर बताया और पत्थर के टुकड़ों को पानी में फेंकना आरंभ किया।

सोचने लगा अब वह गोताखोर का धंधा छोड़ेगा। कल से मछली पकड़ेगा, उसमें हाथों हाथ लाभ भी है और जोखिम भी नहीं। इन्हीं विचारों के बीच एक-एक करके पत्थर के टुकड़े भी वह फेंकता चला गया।

अन्तिम टुकड़े को ध्यान से देखा तो वह बहुमूल्य नीलम था। देवता के अनुग्रह से मिली इतनी राशि उसने अपने हाथों गंवा दी। इस पर भारी रंज प्रकट कर रहा था।

देवता फिर प्रकट हुए और बोले, तुम अकेले ही इस दुनिया में प्रमादी नहीं हो और जो बचा है, उसे बेचकर आज का काम चलाओ। समझ बढ़ाओ ताकि धन पाने का ही नहीं उनके उपयोग का भी हो सके।


प्रेम तेरे रूप अनेक

प्रेम और भावावेश का अन्योन्याश्रित संबंध नहीं है। ऐसा उभार कवि कल्पनाओं में तो सम्मिलित हो सकता है। पर यथार्थ के साथ उसका कोई घनिष्ठ और वास्तविक संबंध नहीं है।

यह ठीक है कि प्रेम प्रसंग में कभी-कभी उचंग भी आ जाती है और माता बच्चे को चूमने दुलारने लगती है। पर यह एक आवेश स्थिति है। साधारणतया तो माँ का वात्सल्य उस स्तन पान कराने, स्वच्छ रखने, ऋतु प्रभावों से बचाने जैसे क्रिया कृत्य में सारे दिन लगा रहता है। बच्चे के कुछ बड़े होने पर वह दुलारने की उचंग घट जाती है और उसके मनोरंजन, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सुन्दरता आदि की व्यवस्था में जुड़ जाता है और बड़े होने पर तो उसकी गलतियों को सुधारना और सज्जनोचित शालीनता का अध्ययन, अध्यापन का कार्य ही प्रमुख रह जाता है। वह महत्वाकांक्षी कैसे बने? महत्वाकांक्षाओं को पूरी कैसे करे? यह विचार विनिमय, निर्देशन, परामर्श मुख्य रूप से कार्यान्वित होता है। प्रौढ़ और तरुणों को साहस प्रदान किया जाता है और ऐसा कुछ करने के लिए कहा जाता है जिससे महत्वाकांक्षी प्रगति बने पड़े।

प्रेम अनेक कारणों से, अनेक व्यक्तियों के बीच, अनेक रूपों में प्रकट होता है। साथ-साथ रहने, एक जैसा काम करने, समान रुचि और क्रिया वाले लोगों के बीच मैत्री के रूप में प्रेम प्रकट होता है। इसमें आदान-प्रदान की न्यूनाधिकता के कारण घट बढ़ भी होती रहती है।

दाम्पत्य स्तर का प्रेम चाहे पति-पत्नी के रूप में हो या जार व्यभिचार के रूप में। नवीनता के कारण उसमें उत्साह की अति देखी जाती है। एक दूसरे के साथ घुल-मिल जाना चाहते हैं। थोड़ी देर की पृथकता से व्याकुल होने लगते हैं। इसमें काम कौतुक विशेष रूप से अपनी भूमिका निभाता है। वैसी ही कल्पनाएँ मस्तिष्क में मंडराती रहती हैं और उस प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले अवयव बड़े सुन्दर और सरस भी लगते हैं। किन्तु यह सब आरंभिक दिनों में ही होता है। संबंध पुराने पड़ जाने पर घर गृहस्थी की, पारिवारिक व्यवस्था की बात प्रमुख हो जाता है। यौनाचार की लकीर तो पिटती रहती है, पर उसमें वह सरसता और व्याकुलता नहीं रहती जो आरंभिक दिनों में थी।

प्रश्न यह है कि क्या प्रेम का स्वरूप और रस चिरस्थायी है? क्या वह निर्विकार निःस्वार्थ है? तो यही उत्तर बन पड़ेगा कि स्वार्थपूर्ति एवं अभिरुचि की विशिष्टता इसे उत्पन्न भर कर सकती है पर उसे एक रस एवं चिरस्थायी नहीं बना सकती।

वास्तविक प्रेम वह है जो उच्च आदर्शों से प्रेरित हो जिसमें परमार्थ भावना और उदार करुणा का समावेश हो। ऐसा प्रेम सेवा प्रवृत्ति के रूप में दीख पड़ता है, उसमें निःस्वार्थता रहती है। प्राप्त करने के स्थान पर देने का ही मन रहता है। आवश्यक नहीं कि यह देना उपहार के रूप में धन साध्य हो। वह शारीरिक श्रम सेवा के रूप में हो सकता है और सद्भावना सहानुभूति के रूप में भी। सत्परामर्श एवं विशुद्ध सहयोग को भी इसी श्रेणी में गिन सकते हैं।

प्रेम की इन दिनों चर्चा बहुत है। उसका नाम लेकर ढेरों गीत सुने और सुनाये जाते हैं, किन्तु विश्लेषण करने पर प्रतीत होता है कि उनमें से अधिकाँश में काम कौतुक का ही समावेश होता है। प्रणय निवेदन एवं यौनाचार करी उत्तेजना में प्रेम की झाँकी करने की विडम्बना चलती है, किन्तु गहराई में खोजने पर प्रतीत होता है कि यह एक प्रकार का भावोन्माद है। जिसे आत्मीय समझा जाता है, अपनी इच्छा के अनुरूप बरतते देखा जाता है, वही प्रिय लगने लगता है। यह उभार नशे की खुमारी जैसा होता है और हल्का पड़ने पर ढलता चला जाता है। वास्तविक और चिरस्थायी प्रेम तो वही हो सकता है जिसमें आदर्श घुले हुए हों और सेवा सहायता का भाव हो।


मानवी विकास के प्रारम्भिक सोपान

मानवी विकास के आरंभिक दिनों की चर्चा करते हुए प्रसिद्ध नेतृत्त्व विज्ञानी डॉ. ईवान्स ने प्रगति काल को कुछ काले पृष्ठों में लिखा है कि आदिम युग में मनुष्य बहुत डरा और सहमा हुआ था। बुद्धि के विकास के आरंभिक दिनों में उसने अपने को विपत्तियों से घिरा पाया। आसमान में चमकने वाले सूर्य-चन्द्र, घुमड़ते बादल और कड़कती बिजली को उसने देवताओं का प्रकोप माना और समझा कि वे सब मनुष्य को डराने और उससे कुछ चाहने वाले आकाशस्थ देवगण हैं। तब देवों की डरावनी प्रकृति उसे दैत्यों जैसी लगती थी प्रेत, पिशाचों जैसी। उनसे अपने ऊपर भय बरसने की आशंका निरन्तर बनी रहती थी। आँधी-तूफान, चक्रवात भी उसे इसी समर्थ प्रतिपक्ष के सहचर प्रतीत होते थे। ऋतु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ भी उसे ऐसी ही भयानक लगती थीं। बुद्धि विकास के आरंभिक दिनों में वह अपने को बहुत डरा और घिरा हुआ अनुभव करता था। जब कि अन्य प्राणी सोच विचार के झंझट की मनःस्थिति तक न पहुँच पाने के कारण केवल सामयिक कठिनाइयों को झेलते भर थे। समय बदलते ही फिर निश्चिन्त होकर जीवन-क्रम चलाते थे।

मनुष्य का विकास इस भय के साथ होता है। उसे भयानक और विशालकाय पशुओं से भी पाला पड़ता था। उनके आक्रमण से बच न पाने के कारण वह अपने को निरीह अनुभव करता था। जब कि विपत्ति के समय पक्षी आकाश में उड़ जाते थे और कछुए आदि जलीय जीव पानी में खिसक जाते थे। बन्दर और बिलाव ऊँचे पेड़ों की डालियों पर उछल कूद लेते थे। यहाँ तक कि चूहे तक बिलों में छिप जाते थे। तब मनुष्य अपने को इन सबसे दुर्बल पाता था। बचाव के लिए जहाँ-तहाँ छिपते फिरने के अतिरिक्त और कोई साधन उसके पास न थे। हिंस्र जन्तुओं से पृथ्वी पर ऋतु प्रभाव से, आसमान से उसे विपत्ति टूटती दिखायी पड़ती थी। बुद्धि के आरंभिक विकास ने उसे एक डरावनी विभीषिका में फँसा दिया। आक्रमण तो दूर बचाव के लिए भी उसने अपने का असहाय पाया।

इस विपत्ति से बचने के लिए उसे कल्पित देवताओं की रचना करनी पड़ी और उनका सहारा प्राप्त करने की सूझ उठने लगी। पर यह करें कैसे? उन दिनों बलिष्ठ जन्तुओं में से कुछ को छोड़कर शेष माँसाहारी थे। माँसाहारी पराक्रमी माने जाते थे। सोचा गया कि देवता भी माँसाहारी ही हो सकते हैं और भूखे रहने पर मनुष्य पर आक्रमण की बात सोचते होंगे। उनके प्रसन्न होने का एक ही तरीका सोचा गया कि स्वेच्छापूर्वक उनके सम्मुख भेंट उपहार प्रस्तुत किया जाय।

ईवान्स के अनुसार मनुष्य आदिम दिनों में रीछ की तरह शाकाहारी भी था और माँसाहारी भी। उसने देवताओं के लिए स्वादिष्ट फल भेंट करने की और जो उसकी पकड़ में आ सकते थे ऐसे मेंढक, खरगोश, बकरी, मुर्गी जैसे प्राणी बलि करने की बात सोची। बलि पूजा उसके इसी आदिम काल की कल्पना है। वही वह करने लगा और सोचने लगा जो कुछ भी रक्षा हो सकी है इसी बलि का प्रताप है।

समय बीतता गया। ईवान्स कहते हैं कि प्रकृति की विचित्रताओं को अधिक गौर से देखने और समझने की क्षमता में वृद्धि होने के कारण उसने उपयोगी साधनों की डडडड डडडड डडडड में उसे अग्नि प्रज्वलित करना, गोलाई का चक्र रूप में उपयोग करना और धातुओं के उपकरण ढालने की विधियाँ हाथ लगीं। इनके सहारे पर अनेकों बातों में समर्थ हो गया। माँस पका सकता था। बीज भून सकता था। पशुओं को डरा सकता था। शीत के प्रकोप से बच सकता था, और ऐसे औजार बना सकता था जिनसे पेड़ काट सकता और कम समझ के प्राणियों का वध कर सकता था। इस विकास को उसने देवताओं का अनुग्रह माना। साथ ही यह भी समझा कि यह उपलब्धियाँ उसे देवताओं के अनुग्रह से प्राप्त हुई हैं। अपने भीतर बुद्धि स्फुरण भी देखी, पर उसे विकास क्रम से जोड़ने की बात न सूझी। वह पहले देवताओं से डरता भर था। पीछे उसे सूझा कि उन्हें अनुकूल बनाने के लिए भेंट पूजा ही अनुकूल साधन है। इस आधार पर उनकी क्रुद्धता को हलकी बनाया जा सकता है और अनुकम्पाजन्य लाभ उठाया जा सकता है। इस निर्णय ने उसे बर्बरता की ओर अग्रसर किया।

मानवी विकास और मनुष्य की सुविधा के बीच की कड़ी के रूप में उसे देवताओं को प्रसन्न करने की बात सूझी। इसके साधन जुटाने के लिए उसे भेंट पूजा के अधिकाधिक साधन जुटाने का उत्साह बढ़ा। इस बढ़े हुए उत्साह ने उसे अधिक बर्बर बनाया। इस बर्बरता में उसे कई लाभ भी थे। बलि किये हुए पशुओं की खाल खींच लेने से उसे आच्छादन और वस्त्र की सुविधा मिलने लगी। जो विशालकाय पशु उस पर सहज आक्रमण कर बैठते थे वे प्रज्वलित आग से भय खाने लगे। उपकरणों के सहारे वह इतनी मात्रा में सामग्री भी इकट्ठी करने लगा जो संकट के समय उसके आहार की आवश्यकता पूरी कर सके। इन सुविधाओं ने उसे भयाक्रान्त रहने की अपेक्षा गर्वशील बनाया। वह जंगल के कानून से परिचित हुआ कि समर्थ को असमर्थों के दमन का अधिकार है। उनसे लाभ उठा सकता है। इस प्रयोजन के लिए अपने इर्द-गिर्द बड़ी संख्या में पाये जाने वाले और सहज पकड़ में आ सकने वाले भेड़-बकरी, खरगोश, पक्षी और मछली जैसे प्राणी पकड़ने, मारने और उनके चमड़े का लाभ उठाने की सुविधा में अधिकाधिक प्रसन्नता होने लगी। इस क्रमिक प्रगति का कारण उसने देवताओं की अनुकम्पा को माना।

उन्हें अधिक प्रसन्न कैसे किया जा सकता है? अधिक आकर्षक उपहार क्या दिया जा सकता है? इस सोच विचार में उसे भूख के बाद दूसरा उत्साहप्रद कृत्य ‘मैथुन’ सूझ पड़ा। इसके लिए उसने देवताओं को स्त्रियाँ भेंट करनी शुरू कीं। देव पूजा में ही उन्हें समर्पण नहीं किया गया वरन् उनके अनुपयोगी होने पर भोज्य पदार्थ के रूप में बलि भी चढ़ाया जाने लगा।

पशुओं की तुलना में मनुष्य श्रेष्ठ गिना गया। इसलिए बलि प्रथा में मनुष्यों को भी आगे लाया गया। मनुष्यों में से ही कुछ ने अपने को देव एजेंट बताना आरंभ किया। यह प्रचार इतनी चतुरता से हुआ कि बर्बर मनुष्य देव मानवों की एक नई गुलामी में फंस गया। इतने पर भी यह प्रसन्नता थी कि जिन अन्तरिक्ष निवासी और प्रत्यक्ष इच्छा प्रकट करने वाले देवताओं की तुलना में ऐसे माध्यम मिल गये जो प्रत्यक्ष वार्ता कर सकते थे। कठिनाइयों का हल बता सकते थे और साधन जुटाने की विधि बता सकते थे।

इस विकास क्रम से अधिक चतुर होने से राजा और पुरोहित बन गये। इस बीच मनुष्य भी परिवार बसाना और खोलों में रहना सीख गया। हर कबीले के पास समय के अनुरूप सम्पदा भी होती थी। राजा और पुरोहितों के इशारे पर बलवान कबीले अल्पसंख्यकों और दुर्बलों पर चढ़ाई करके विजय प्राप्त करने लगे। विजय में जो साधन सामग्री, स्त्रियाँ तथा युवक मिले उन्हें हथिया लिया गया। बड़ा भाग राजा और पुरोहितों का रहा, शेष को लड़ाकुओं के बीच बाँट दिया गया। आदिम और बर्बर युग की अनेकों प्रथाएँ इसी आधार पर विनिर्मित हुईं। ईवान्स का यह प्रतिपादन तर्क की कसौटी पर कितना सही है, यह शोध का विषय है।

वृद्ध साधु, युवा शिष्य और एक शिकारी कुत्ता, तीनों ही एक निर्जन मार्ग से जा रहे थे। रास्ते में एक मृतक अत्यंत सुन्दरी युवती मरी हुई पड़ी मिली। लगता था किसी हृदयाघात जैसी घटना से अभी-अभी ही मरी है। उस लाश को देखकर तीनों के मन में तीन तरह के विचार उठे। वृद्ध ने सोचा इसका दाह संस्कार और श्राद्ध-तर्पण करना चाहिये, जिससे उसकी मृतात्मा को शान्ति मिले। युवक उसके गुप्ताँग देखने और कुकर्म करने की बात सोचने लगा। कुत्ते के मन में उठा कि इन दोनों की रोक टोक हटे तो ताजे माँस का स्वाद चखूँ और पेट भरूँ वस्तु एक दृष्टिकोण पृथक इसी को कहते हैं- “मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना”।


धर्मोहि परमोलोके, धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्

दर्शन क्षेत्र में इतनी अधिक विभिन्नताएँ हैं कि उन्हें एक सूत्र में बाँधा जाना कठिन है। प्राचीन काल में षड्दर्शन थे। इसके उपरान्त तो उनके अनेकानेक नाती-पोते निकल पड़े। अद्वैत, द्वैत, और त्रैत की मान्यताएँ उभरीं। जैन और बौद्ध दर्शन भी सशक्त थे। चार्वाकि दर्शन था तो नास्तिकवादी पर दलीलें उसकी भी ऐसी थीं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

पाश्चात्य दर्शन की अलग शृंखला विनिर्मित हुई। उनके आरम्भ और प्रौढ़ काल धूमधाम भरे रहे। पीछे नये दर्शनों ने उनका स्थान ग्रहण किया तो फिर पुरानों में वृद्धता आई पर जीवित वे भी रहे। इस प्रकार अब तक की खोजों में उनकी संख्या 100 के करीब पहुँच चुकी है। महापंडित राहुल सांस्कृत्यायना ने अपने ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ ग्रन्थ में इसी छोटी सीमा में उनमें से अधिकाँश पर प्रकाश डाला है।

यों सम्प्रदायों के पीछे भी अपने-अपने दर्शन हैं। वे मात्र क्रम काण्ड नहीं हैं, उनके पीछे ऐसे प्रतिपादन भी हैं जिन्हें दर्शन का नाम दिया जा सकता है। आर्य समाज की अपनी मान्यताएँ थीं, तो कबीर पंथियों की अपनी। इन सब सम्प्रदाय मिश्रित- लिखित और अलिखित दर्शनों की गणना की जाय तो वे एक हजार से ऊपर पहुँचती हैं। भक्तिवाद उन सबमें अनोखा है। उसमें भगवानों से लेकर देवताओं तक को अपना स्नेह प्रदर्शित करके वशवर्ती बनाने और अँगुलियों पर नचाने का प्रावधान है।

इन दर्शनों की वृद्धि के साथ-साथ उनके अनुयायियों की कट्टरता भी बढ़ी। वे अपने को सही और दूसरे सभी को गलत मानते थे। फलतः टकराव होना भी स्वाभाविक था। अपने सिवाय सभी झूठे हैं। झूठों को दबाना चाहिए। इस अत्युत्साह ने कलह के बीज बोये। मनोमालिन्य बढ़कर वैमनस्य तक पहुँचा। अपनी हठ के आगे अन्यान्यों को सिर झुकाने के लिए विवश करने की प्रथा चल पड़ी और संसार भर में इस आधार पर भारी रक्त पात हुए। मारने वाले अपने को धर्म सेवक और मरने वाले अपने को शहीद मानने लगे। उनकी भी अपने-अपने ढंग से पूजा होने लगी। एक ने दूसरे से बढ़कर अपने-अपने मान्य लोगों और देवताओं के स्मारक बनाये। इससे चिढ़ को और भी अधिक प्रोत्साहन मिला और लगा कि प्रचलित दर्शन किसी समस्या का समाधान नहीं करते वरन् कलह विद्वेष के बीज बोते हैं।

यह जानना अति कठिन है कि इतनी अधिक मान्यताओं में से कौन सही है? कौन गलत? ऐसा निर्णय तो निष्पक्ष लोगों की ऐसी सभा ही कर सकती है जिसका निर्णय मानने के लिए सभी बाध्य हों। पर मनुष्यों की वर्तमान स्थिति में ऐसा पंच निर्णय भी कठिन है क्योंकि कोई भी अपनी मान्यता से पीछे हटने को तैयार नहीं। सभी को अपने पूर्ववर्त्तियों का प्रतिपादन प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। कोई अपनी हेठी क्यों कराये? अपनी नाक सबसे ऊँची क्यों न रखे? ऐसी दशा में किसी सर्वमान्य निष्कर्ष की आशा रखना, दुराशा मात्र ही है।

नीति, न्याय, विवेक, तर्क, तथ्य, प्रमाण के आधार पर ऐसी आचार संहिता तो बन सकती है, जो मानवी गरिमा के अनुरूप हो। उसे मानव धर्म भी कहा जा सकता है। वैसे यह अधिक उचित है कि झगड़े की जड़ इन धर्म सम्प्रदायों से पृथक उस सार्वजनीन सार्वभौम निर्धारण को आचार संहिता जैसा नाम दिया जाय। वह हर देश के हर मत सम्प्रदाय के लोगों पर समान रूप से लागू होती हो।

जब तक वैसा संभव नहीं हो, तब तक एक मध्यवर्ती मार्ग निकल सकता है कि अपनी-अपनी मान्यताओं को अपने तथा अपने समकक्षी लोगों तक ही सीमित रखा जाय। दूसरों को न तो चुनौती दी जाय और न उन्हें अपना मत बदलने के लिए बाधित किया जाय। अपनी मान्यता अपने तक ही सीमित रहने दी जाय। उसे खण्डन, मण्डन के स्तर तक न पहुँचने दिया जाय। कलह या विद्वेष का निमित्त कारण न बनने दिया जाय।

इसे सर्व दर्शन या सर्वधर्म समन्वय तो नहीं कहा जा सकता है, पर उसे सहिष्णुता समझा जा सकता है। एक दूसरे को सहन करना सीखें और अपनी विचारणा को अपने तक ही सीमित रखें।

नीति नियम ऐसे हैं जिन पर चलने के लिए दूसरों को भी बाधित किया जा सकता है। चोरी, उठाईगीरी, लूट, अपहरण, हत्या, डकैती, व्यभिचार, धोखाधड़ी आदि को सभी देशों में अपराध ठहराया गया है। अपराधी प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए। सदाचरण को प्रोत्साहित करने वाले ऐसे दर्शन को मान्यता दी जानी चाहिए जो सर्व साधारण के हित में पड़ती हो और जिसमें अनीति पर बंधन लगाया जाता है। धर्म और अधर्म का अभिप्राय वस्तुतः औचित्य और अनौचित्य है। किसी सम्प्रदाय विशेष की मान्यताओं से नहीं है। नीति पालने और पालन कराने भर का औचित्य है। दर्शनों का समान हो सकता कठिन है। सब सम्प्रदायों का एकीकरण भी आज के वातावरण में कठिन है। यह भी नहीं हो सकता कि थोड़ी-थोड़ी बातें सब में से लेकर एक संयुक्त दर्शन या धर्म बनाया जाय। इतनी समझदारी, उदारता एवं यथार्थवादिता अपनाने के लिए लोग सहमत हो सकें, ऐसी विचारशीलता का युग आने में अभी देर है।

ऐसी दशा में अनेकान्तवाद की जैन मान्यता का अन्य धर्मावलंबियों द्वारा अपनाये जाने का भी मन होना चाहिए। उस प्रतिपादन में यही कहा गया है कि अपने से भिन्न मान्यताओं के संबंध में यह मत रखा जाय, कि संभव है, वह भी ठीक हो। अपना मत अपने लिए कितना ही उपयुक्त क्यों न प्रतीत हो, पर उसे दूसरों पर थोपने के लिए बाधित नहीं किया जा सकता। हम अपनी बात कहें तो पर दूसरों को झूठा ठहराने का प्रयत्न न करें। यही अनेकान्तवाद है। स्यादवाद की मान्यता भी इसी से मिलती जुलती है।

एक परिवार के कई सदस्य होते हैं। उनके खाने पहनने के समान अलग-अलग हो सकते हैं। इस मतभेद के कारण न तो कोई झगड़ता है न अपनी रुचि को दूसरों पर थोपने का प्रयत्न करता है। जब ऐसे छुट पुट मतभेद उपेक्षा में डाल दिये जाते हैं तो कोई कारण नहीं कि दार्शनिक साम्प्रदायिक मान्यताओं के संबंध में वैसी ही छूट क्यों न दी जाय। इसी सहिष्णुता का नाम है- अनेकान्तवाद। इसी को अपनाने से मतभेदों के रहते हुए भी शान्ति पूर्वक रहा जा सकता है।


आगे बढ़ने से इन्कार (kahani)

एक समय समुद्र की लहरों ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। आपसी मोह के कारण उनने गतिशीलता को वियोग और दुःख का जनक समझा। समुद्र ने काफी समझाने का प्रयास किया कि- “मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं, गति के साथ जुड़ा है- अतः गतिशील बनो।” परन्तु भविष्य की अनिश्चितता की कल्पना लहरों को भयभीत किए दे रही थी। तभी कुछ आगे की गतिशील लहरों ने मुड़कर देखा और समझाया- “सहेली, हमें देखो, उद्गम से बिछुड़कर ही हम अनन्त की ओर जा रही हैं, अपने प्रियतम की महानता के अंतर्गत ही तो क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं- हम उससे बिछुड़ी कहाँ हैं। सीमित से असीम बनने में और अधिक आनंद है।”

इन गूढ़ रहस्यों को सुनकर सूर्य की किरणों ने भी समर्थन प्रकट किया और कहा कि- “हमें अपने प्रियतम की विशालता में विचरण करते हुए अब अधिक उल्लास प्राप्त हुआ है।” फूलों की सुगन्ध ने भी सिर हिलाते हुए कहा कि- “पुष्प की गरिमा को विस्तृत करने में हम बिछुड़न का नहीं, पुलकन का अनुभव करती हैं।

इन्द्र ने समुद्र का ध्यान तोड़ते हुए मेघ के वाहन पर विराजमान होने को कहा। भाप बनकर वरुण ने उस पर आसन जमाया और इन्द्र के इशारे पर सुदूर यात्रा पर चल पड़े। किसी ने समुद्र के इस वियोग पर दुःख प्रकट किया। परन्तु समुद्र ने कहा- “भद्रे! यह बिछुड़न नहीं, नवीनीकरण है। जीवन इसी का नाम है। गति का परित्याग करने पर तो मरण ही हाथ रह जाएगा।

लहर की आंखें खुल गईं और वह आगे बढ़ चली, अनन्त की यात्रा पर।


विज्ञान और अध्यात्म बनेंगे अब पूरक

सन्त विनोबा कहते थे- “धर्म और राजनीति के दिन लद चुके हैं। अब विज्ञान और अध्यात्म मानव पर हावी रहेंगे। वह दिन दूर नहीं जब यह समन्वय सार्थक रूप से सामने प्रस्तुत होगा।”

विज्ञान प्रत्यक्ष की कसौटी पर कस कर अपने सिद्धान्तों और आविष्कारों को मान्यता देता है। जो अन्वेषण इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते उन्हें रद्द कर दिया जाता है। फिर चाहे उसके पीछे कितना ही श्रम-धन या मूर्धन्यों का कर्मयोग ही क्यों न लगा हो। यह सत्य की खोज है- प्रकृति की परतों का रहस्योद्घाटन। इस सुदृढ़ आधार को अपना कर ही विज्ञान इतना आगे बढ़ा और सफल हुआ है।

भौतिक विज्ञान की तरह ही अध्यात्म विज्ञान है। उसका लक्ष्य भी चेतना पक्ष की प्रज्ञा और श्रद्धा का सार तत्व खोज निकालना है। इसलिए उसे भी सत्यान्वेषी कह सकते हैं और विज्ञान के समतुल्य ही कदम मिलाकर चलने वाला कह सकते हैं।

पर यह दोनों ही एकाँगी रहने पर अधूरे हैं। इन दोनों महाशक्तियों के समन्वय से ही वह विधा बन पड़ती है जो बिजली के ठंडे और गरम तारों के मिलने पर करेंट प्रवाह चलने के समकक्ष अपनी क्षमता और प्रामाणिकता का परिचय प्रस्तुत करती है। एक पहिये की गाड़ी चल नहीं सकती। एक हाथ से ताली बज नहीं सकती। समन्वय के बिना दोनों ही लँगड़े लूले रह जाते हैं। वह कहानी सर्वविदित है, जिसमें अंधे और पंगे ने पारस्परिक सहयोग से नदी पार की थी। विज्ञान अंधा है और अध्यात्म पंगा। दोनों को पारस्परिक सहयोग की आवश्यकता है।

भौतिक विज्ञान जिन आविष्कारों को करता है, उनमें क्रिया की सरलता मुख्य है। आविष्कार उपकरणों से पूंजी लगाने वाले मनचाहा लाभ कमाते हैं। उसके पीछे यह विवेक नहीं जुड़ता कि इससे किसी के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा। कोई अनुचित लाभ तो नहीं उठा रहा। इसके अतिरिक्त उसे यह भी पता नहीं है कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे? चिन्तन का विवेक पक्ष उसके साथ जुड़ नहीं पाया है। मात्र बुद्धि कौशल ने आविष्कार गढ़े हैं और इच्छित सुविधायें देने में मनुष्य का हाथ बंटाया है। यह सुविधायें कौन प्रयुक्त करता है? किसलिए प्रयुक्त करता है? और उसका अन्तिम परिणाम क्या होता है? यह समझने बूझने की फुरसत वैज्ञानिकों को नहीं है। वह ऐसे अस्त्र बना सकता है जो क्षण भर में जापान की तरह असंख्यों का प्राण हरण कर सकें- अपंग बना सकें। इस परिणति से निर्माता का कोई सम्बन्ध नहीं। वह अपनी प्रक्रिया की शोध और निर्माण क्षमता पर गर्व ही करता रहेगा। इस प्रकार स्वसंचालित यन्त्रों से बना कारखाना मालिक को कितना सुसम्पन्न बनाता है और कितने गरीब श्रमिकों की रोजी रोटी छीनता है। इस प्रसंग पर विचार करने की उसे कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती , क्योंकि धर्म या दर्शन उसका विषय नहीं है। एक दिन में हजारों पशुओं का वध करने वाला बूचड़खाना लगा देना विज्ञान को सफलता का श्रेय प्रदान करता है। उसे इससे क्या कि उन नव निर्मित उपकरणों से जो हो रहा है वह उचित है या अनुचित। विज्ञान विभिन्न नशे बनाने की फैक्ट्रियां लगाता चला जायगा पर यह नहीं सोचेगा कि इस उत्पादन से कितनों का कितना अहित होगा। भाव संवेदना एवं विवेक सम्मत दूरदर्शिता से उसका किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है। ट्रैक्टर कुछ ही दिन में टूट फूट कर कबाड़ा बन जाता है, वह गोबर तक नहीं देता फिर भी प्रशंसा उनकी है जो मनुष्य को जल्दी एवं अधिक काम करने की सुविधा देते हैं। रासायनिक खाद जमीन की जीवन-शक्ति को नष्ट करती जाती है। कारखाने हवा और पानी में विष घोलते जाते हैं। इस परिणति पर विज्ञान क्यों विचार करे? दूरगामी परिणति का निष्कर्ष निकालने के लिए माथापच्ची करना उसका काम नहीं है। उसका कार्यक्षेत्र जड़ पदार्थों तक सीमित है, अस्तु विवेचनात्मक विचारणा उसे प्रभावित नहीं करती।

धर्म श्रद्धा पर अवलम्बित है। वह अन्ध श्रद्धा भी हो सकती है और बौद्धिक विभ्रम भी, व्यक्ति और समाज के लिए अभिशाप भी। उसके माध्यम से कितना धन और कितना समय श्रम बर्बाद होता है इसका पर्यवेक्षण करने पर पता चलता है कि अवाँछनीय प्रचलन आध्यात्मिकी दलदल से ही उगते हैं। प्रपंच और पाखण्ड उसी की देने हैं। अवास्तविक रंगीली दुनिया, बेपर की उड़ाने भरने का कौतुक कौतूहल उसी ने विनिर्मित किया है। सम्प्रदायों की मनुष्य जाति की यही देन है उसने मनुष्य को मनुष्य का दुश्मन बनाया है। दुराग्रह की विडम्बना से विष बीज बोये और रक्तपात कराये हैं।

असली धर्म वह है जिसे सम्प्रदाय नहीं, अध्यात्म कहना चाहिए। जो न्याय और विवेक का समर्थक है। जिसकी आधारशिला शालीनता, सहकारिता और उदारता पर रखी हुई है। जो आत्मा और परमात्मा की चर्चा इस लिए करता है कि मनुष्य कर्मफल की सुनिश्चितता पर विश्वास करे। भाव संवेदनाओं को महत्व देकर दया, प्रेम, करुणा, नम्रता, सेवा जैसी उदात्त आदर्शवादिता को अपनाये।

भौतिक विज्ञान की क्रियाशीलता और आध्यात्मिकता की भाव संवेदना मिल कर जड़-चेतन का समन्वय कर सकती है और सुविधा सम्वर्धन के साथ-साथ भाव संवेदना को जोड़ सकती है। तब अध्यात्म को वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुरूप अपने आप को प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर कसे जाने के लिए तत्पर होना होगा। साथ ही यह भी बताना पड़ेगा कि अदृश्य की कल्पनाओं तक सीमित न रहकर अध्यात्म व्यक्ति को गरिमा सम्पन्न और समाज को सुव्यवस्थित बनाने में योगदान देता है। अन्ध विश्वासों के दलदल में से निकालकर यथार्थता के राजमार्ग पर चल सकने का अवसर देता है।

अध्यात्म विज्ञान का मार्गदर्शन करे, उसकी गतिविधियों का, नीतिमत्ता का अनुशासन स्थापित करे, उसे अंकुश में रखे और मदोन्मत्त हाथी की तरह विनाश-विग्रह न रचने दे। साथ ही अध्यात्म भी अपना ऐसा स्वरूप विनिर्मित करे जिसमें प्रपंच-पाखंड और अन्धविश्वास की विडंबनायें प्रवेश न पा सकें।

धर्म का तात्पर्य अब सम्प्रदाय से ही समझा जा रहा है। अन्यथा नैतिक नियम ही धर्म है। वे सर्वत्र एक जैसे ही हैं। इसलिए मानव धर्म एक ही हो सकता है, जिसे प्रकारान्तर से समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी नाम दिया जा सके। मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म के दस लक्षण अथवा योगसाधना के प्रथम चरण यम और नियम आदर्शवादी तो हैं, पर व्यवहार में साधारणजन सहज ही नहीं उतार सकते। इसलिए साम्प्रदायिक धर्म के दिन लद गए ऐसा कहा गया है। उसके स्थान पर अध्यात्म की प्रतिष्ठा होगी। अध्यात्म का एक शब्द में परिचय करना हो तो प्रामाणिकता और दूरदर्शिता उसे कह सकते हैं। भविष्य में न्याय और विवेक की प्रतिष्ठापना होगी ऐसा मानकर चला जा सकता है।


Quotation

स्वर्ण महल जितनी सम्पदा और समुद्र खाई जैसी सुरक्षा व्यवस्था बनाने वाला रावण जिस काल के गाल में चला गया, उससे और किसका बचाव हो सकता है।

संसार में तीन सम्मान सबसे बड़े हैं- सन्त, सुधारक और शहीद।

राजनीति का सीधा अर्थ शासन व्यवस्था है, जिसमें सुरक्षा और सुव्यवस्था दोनों ही आती हैं। यह तो सदा से थी और सदा रहेगी। पर उनके साथ क्षेत्रवाद, भाषावाद, आर्थिक विषमता, आपाधापी जैसे तत्व मिल जाने से वोटरों को बहकाकर चुनाव जीतने जैसी अवाँछनीयतायें घुस पड़ने से ही राजनीति बदनाम हुई है। उसका स्थान एकता, समता और व्यापकता, सहकारिता ग्रहण कर सके तो समझना चाहिए कि राजनीति शब्द का शुद्धिकरण हो गया और वह सुव्यवस्था के रूप में विकसित हो गई।

अगले दिनों साम्प्रदायिकता और गुटबन्दी के दिन लदेंगे। विज्ञान को अध्यात्म का पूरक और अध्यात्म को विज्ञान का मार्ग दर्शन बन कर रहना होगा। इसी में उज्ज्वल भविष्य की संभावनायें सन्निहित हैं।


29 वीं सदी की भवितव्यताएँ- 3 - क्या सृष्टि का अन्त सचमुच निकट है

पशु तात्कालिक समस्याओं पर सोचता है। उसे न भविष्य की चिन्ता होती है और न परिवर्तनों से बचाव करने की- न विपन्नता के बीच सुविधा सोचने की क्षमता होती है। किन्तु मनुष्य को सृष्टा का सर्वोपरि उपहार दूरदर्शी बुद्धिमत्ता के रूप में मिला है। वह भविष्य की कल्पना कर सकता है। आज की परिस्थितियाँ कल क्या प्रतिफल उत्पन्न करेंगी? इसका अनुमान तर्क, तथ्य और अनुभव के आधार पर लगाया जा सकता है। मानवी सुरक्षा और प्रगति का बहुत कुछ आधार इस विशेषता पर ही निर्भर है। भविष्य के प्रति उत्सुकता का अनुमान इस आधार पर भी लगाया जाता है कि ज्योतिषी, भविष्य वक्ता हर किसी को आकर्षित करते हैं। समाचार पत्रों में राशि फल, भविष्य फल छपते रहते हैं। प्रस्तुत समस्याओं के संबंध में मनीषी वर्ग प्रायः इस विषय पर चर्चा करता रहता है कि भविष्य की समस्याएँ क्या हो सकती हैं? और उनके समाधान क्या निकल सकते हैं?

शीतयुद्ध और गरमयुद्ध दो प्रकार की लड़ाइयाँ होती हैं। इसमें शीतयुद्ध कम कष्ट कर और गरमयुद्ध देखने में भयंकर वीभत्स लगते हैं पर परिणाम दोनों के लगभग एक जैसे होते हैं। शीतयुद्ध को कैन्सर और गरम युद्ध को हृदयाघात कह सकते हैं। पर दोनों ही ऐसे होते हैं जो प्राण हरण करके रहें।

आज का शीतयुद्ध जनसंख्या का अनियंत्रित अभिवर्धन है। वह चक्रवृद्धि गति से बढ़ता है। अब से 10 हजार वर्ष पूर्व संसार भर में 25 लाख आबादी कूती जाती है। पर चक्रवृद्धि का चमत्कार तो देखिए इन दोनों 500 करोड़ मनुष्य इस धरती पर रहते हैं और रोकथाम करते हुए भी अगली शताब्दी में कम से कम दूनी आबादी हो जाने की संभावना है। जब आज के मनुष्य की दैनिक आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती और महंगाई का बोझ औसत मनुष्य की कमर तोड़ता है तो जब आबादी दूनी हो जायगी तब स्थिति क्या होगी? इसकी भयावह कल्पना कर सकना किसी भी दूरदर्शी के लिए कठिन न होना चाहिए। हमें सर्वप्रथम इसी संकट का मुकाबला करना चाहिए। ‘सर्वप्रथम’ इसलिए कहा जा रहा है कि इसका समाधान जन सामान्य के हाथों है। लोग अपना चिन्तन बदल दें और व्यवहार में थोड़ा अन्तर करें तो इतने भर से विपत्ति की रोकथाम हो सकती है।

दौड़ती गाड़ी रुकने में कुछ देर लगती है। इस आधार पर दूनी जनसंख्या पहुँचने तक पूरी तरह ब्रेक न कसे जा सकें और विराम न मिले ऐसी आशंका है। यदि इतना बन पड़े तो भी संतोष की साँस ली जा सकती है और समुद्र पर तैरती खेती करके किसी हद तक समाधान सोचा जा सकता है। समुद्र में अभी भी जहाँ तहाँ ऐसे द्वीप हैं जिनमें भूमि की उर्वरता और पीने का पानी मिल सकता है। उनमें बसावट की अभी भी गुंजाइश है। तैरते उपनगर भी समुद्र तट के बड़े नगरों के इर्द गिर्द बसाये जा सकते हैं। आकाश में बस्ती बसाना तो क्लिष्ट कल्पना है पर इन प्रयोजनों के लिए समुद्र और भूमि के वीरान क्षेत्रों को उपजाऊ बनाने का रेगिस्तानों को नखलिस्तान बनाने का प्रयोग एक सीमा तक सफल हो सकता है। पर्वतों पर भी वृक्ष विकास के साथ-साथ आबादी बढ़ाने की कल्पना भी तथ्यहीन नहीं है। आपत्तिकाल में ऐसे ही उपायों से ठूँस ठाँस का प्रयोजन पूरा हो सकता है।

दूसरा गरम युद्ध है- तीसरे महायुद्ध का जिससे समूची मानव जाति आतंकित है। परमाणु युद्ध, विष गैसें तथा मृत्यु किरणें, उपग्रह आदि के मारक साधन जिस तेजी से बढ़ रहे हैं और उनका भण्डारण जिस विशाल परिमाण में हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि यह खेलने के खिलौने नहीं हैं। इतना विपुल धन और साधन इसके लिए लगाया जा रहा है, उसे सनक या अपव्यय नहीं माना जा रहा है। निर्माताओं का ख्याल है कि एक दिन वे शत्रु पक्ष पर इस जखीरे को अचानक उड़ेल देंगे। स्वयं बच जायेंगे और समूची धरती पर निष्कंटक राज्य करेंगे। समस्त संसार की जनशक्ति, धनशक्ति और कौशलशक्ति उनके हाथ में होगी। थल, नभ और जल पर उनका विशाल साम्राज्य स्थापित होगा।

पर यह योजना बनाने वाले यह भूल जाते हैं कि एक पक्षीय युद्ध नहीं हो सकता। विपक्षी भी हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठा रहेगा। उभयपक्षीय प्रहारों से कोई भी जीतेगा नहीं। दोनों हारेंगे। युद्ध भले ही एक दिन चले पर उनके उपरान्त की समस्याएँ ऐसी होंगी, जिनका हजार वर्ष में भी सुलझना कठिन है। ऐसी दशा में आशंका तो यहाँ तक की जाती है कि यह धरती मनुष्यों के रहने योग्य ही न रहे। इस अमृत पिण्ड को विष पिण्ड बनकर रहना पड़े और जीवन कदाचित विषपायी जीवों भर के लिए शेष रहे।

किन्तु बारीकी से हलचलों पर दृष्टि लगाये हुए लोग बदलते तेवरों और बदलते पैंतरों को देख रहे हैं। संभवतः अणु युद्ध की विभीषिका एक दूसरे को डराते रहने के ही काम आयेगी। उसका उस रूप में प्रयोग न होगा। प्रचलित हथियार ही आधी दुनिया का कतर व्यौंत कर देने के लिए काफी हैं।

मूर्धन्य युद्धलिप्सु अगले गरम युद्ध में लेसर किरणों का उपयोग करने की बात सोच रहे हैं। यह मृत्यु किरणें अदृश्य रहती हैं, पर जिस क्षेत्र में पहुँचती हैं वहाँ सब कुछ जलाकर रख देती हैं। जलाना भी ऐसा जिसमें अग्नि की लपटें न उठें। लेसर किरणें प्राणियों के प्राण हरण करती हैं। वस्तुओं को निःसत्व कर देती हैं। वृक्ष वनस्पतियों को सुखा देती हैं। पानी को सुखा देती हैं और भी बहुत कुछ ऐसा कर देती हैं जिससे वस्तु या प्राणी की शकल तो बनी रहे पर उसके भीतर जीवन जैसी कोई वस्तु न रहे। चट्टान जैसी स्थिर भर रहे। लेसर किरणें उपग्रहों को गिरा सकती हैं, प्रक्षेपास्त्रों की दिशा मोड़ सकती हैं। वायुयानों को गिरने के लिए विवश कर सकती हैं। उनके विनाश स्तरीय प्रयोगों को मृत्यु किरण नाम दिया गया है। इस प्रहार में यह सुविधा है कि आक्रमण अदृश्य होता है, धुँआ नहीं उठता, विकिरण नहीं फैलता और अंतरिक्ष में पृथ्वी पर चढ़े हुए आवरण कवचों को क्षति पहुँचने का खतरा नहीं रहता। इसलिए अणुयुद्ध के स्थान पर लेसर युद्ध सरल पड़ता है। प्रथम आक्रमण कर्त्ता नफे में भी रहता है। उसे पृथ्वी से ऊपर फेंकने की अपेक्षा उपग्रहों के माध्यम से धरती के अमुक क्षेत्र में गिराना सरल पड़ता है। यही स्टार वार है। आकाश में प्लेटफार्म बनाने के लुभावने सपने दिखाकर वस्तुतः आकाश में मृत्यु किरणों के भण्डारण किये जा रहे हैं। इस प्रहार में तात्कालिक लाभ तो है कि शत्रु एक प्रकार से अपंग हो जाता है पर एक खतरा भी है कि आक्रान्ता भूमि या वस्तुएँ समस्या बन कर रह जाती हैं जो विकिरण सोख लेती हैं और संपर्क में आने वाले को अपनी चपेट में लेती हैं। उनसे कब तक बचा रहा जाय? फिर जीती हुई भूमि से क्या लाभ उठाया जाय? वह तो विजेता के लिए भी उलटी समस्या बन जाती है।


Quotation

एक दिन कबीर और फरीद का मिलन हुआ। दोनों आत्मज्ञानी थे। दोनों दो दिन तक साथ रहे। पर बोला कोई किसी से नहीं। सत्संग सुनने के लिए दोनों के ढेरों शिष्य उस अवसर पर मौजूद थे। कुछ भी वार्ता न होने पर वे सभी उदास हुए। फरीद विदा हो गये, तब कबीर ने कहा- आत्मा को आत्मा से बात करते समय वार्त्तालाप की आवश्यकता नहीं पड़ती।

इसके अतिरिक्त एक प्रश्न और भी शेष रह जाता है कि अब तक जो अणु आयुध बन चुके हैं उनका क्या हो? उन्हें जमीन में गाड़ने, समुद्र में पटकने, अन्तरिक्ष में उड़ा देने पर भी खतरे ही खतरे हैं। इन उपायों के कारण पर भी आयुधों का प्रभाव और विकिरण तो बना ही रहता है। वह घूम फिर कर पृथ्वी के ऊपर या नीचे पहुँचकर विष बरसा सकता है या ज्वाला मुखी उगल सकता है। समुद्र जल को भाप बनाकर आकाश में उड़ा सकता है। हिम युग आरम्भ कर सकता है और सूर्य किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकने वाला काला आच्छादन बन कर आकाश को घेर सकता है। इसलिए उसे फिर कभी के लिए सुरक्षित भी नहीं रखा जा सकता है। प्रयोग में जो खतरे हैं, उसी से मिलते जुलते खतरे भण्डारण के भी हैं। बोतल में फिर से बन्द होने के लिए जिन्न तैयार नहीं और उसे खुला छोड़ा जाता है, तो विघातक उपद्रव खड़े करता है।

यह गरम युद्ध की चर्चा हुई। बिना अणु आयुधों के सामान्य एवं विकसित आयुधों से लड़े गये इसी शताब्दी के दो महायुद्धों की विनाशलीला देखी जा चुकी है। जितने रक्तपात से मरे उससे दूने काली मौत बनकर तरह-तरह की महामारियाँ खा गई हैं। कितने अनाथ और अपंग हुए, कितनी आर्थिक क्षति हुई। इसका लेखा जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि जीता कोई नहीं, हारे सभी। अगला, अधिक विघातक अस्त्रों द्वारा यदि युद्ध होता है, तो कहा जा सकता है कि मरेंगे सभी, जीवित कोई नहीं रहेगा। जो जीवित रहेंगे वे भी इस योग्य न रह सकेंगे कि स्वावलम्बी जीवन जी सकें। फिर परायों की सहायता कर सकना भी किसके बल-बूते की बात रहेगी। विषाक्तता के वातावरण में जीवन इस योग्य भी नहीं रहेगा, जिसे कोई प्रसन्नता पूर्वक जीना चाहे। ऐसी-ऐसी अगणित समस्यायें और विपत्तियों पैदा करेगा- होने वाला या न होने वाला गरम युद्ध।

तब अन्त क्या होगा? अदृश्य दूरदर्शियों का निष्कर्ष है कि इतने बड़े भारी बोझ को लादते ढोते वे लोग थक जायेंगे जिन्हें युद्ध विजय का लालच इन दिनों आवेश ग्रस्त किये हुए है। वे मद्यपी जैसे आवेश ही हैं जो हारे हुए जुआरी की बाजी खेल रहे हैं। किन्तु यह निश्चित है कि इसे इसी तरह बहुत दिन आगे न धकेला जा सकेगा। युद्ध जितनी ही महँगी उसकी तैयारी पड़ रही है। लूट कर धनवान बनने से पहले उस लालच की पूर्व तैयारी की खोखला किये दे रही है।

कुश्ती के दाँव पेचों में जो दाँव पेच तुर्त-फुर्त चल जाते हैं, उनमें बल भी रहता है और उत्साह भी। पर जब पहलवान आपस में गुँथ जाते हैं और रगड़ाई शुरू हो जाती है तो दोनों का कचूमर निकल जाता है। वे ऊब जाते हैं। मनःस्थिति को देखकर बीच में ही उन्हें बिना हार-जीत की कुश्ती समाप्त हुई घोषित करके जोड़ छुड़ा देते हैं। वे अपने मन में भी छूट जाने की ही बात सोचते हैं। वह समय दूर नहीं जब ऐसी ही स्थिति आने वाली है। तैयारी का भार ही इतना बोझिल होगा, जिस वहन नहीं किया जा सकेगा। अतः तर्क के आधार पर भी यही कहा जा सकता है कि थकों को विराम लेना पड़ेगा और अनुभव तथा विवेक के आधार पर अन्तिम दुष्परिणाम की बात समझते हुए विनाश विग्रह को बंद करना पड़ेगा। यह कथन भविष्य वक्ताओं का भी है।

तैयारी में जो व्यय हुआ है उसकी क्षतिपूर्ति की बात सूझ पड़ेगी। भय और अविश्वास करते रहने की अपेक्षा एक बार साहस पूर्वक विश्वास कर देखने की बात सूझेगी। संधि समय की आवश्यकता बनेगी और वह फिर अनुभवों का स्मरण दिलाते हुए तत्पर भी रहेगी।

संक्षेप में समस्त भयावह संभावनाओं के होते हुए भी दूरदर्शियों की भाषा में यह कहा जा सकता है कि प्रलय युद्ध नहीं होगा। एक दूसरे को धमकी देने के लिए जहाँ-तहाँ छेड़ छाड़ करते रहेंगे। धमकी और घुड़की चलती रहेगी और इसी प्रकार बीसवीं शताब्दी बीत जायगी।

एक राजा के चतुर मंत्री ने उसका खजाना पूरी तरह भर दिया, तो भी उसे सन्तोष नहीं हो रहा था। प्रजा पर अधिक कर लगाने और अधिक कोष जमा करने का दबाव डाल रहा था। देते-देते प्रजा का बुरा हाल हो रहा था, पर राजा को किस प्रकार समझाया जाय, यह मंत्री के लिए कठिन हो रहा था।

वह राजा के साथ नगर भ्रमण के लिए गया। हर बाजार में बने ऊँचे भवनों की प्रशंसा की। पर जब नगर के दूसरे सिरे पर पहुँचे तो गड्ढे में नगर का सड़ा पानी भरा था और दूर-दूर तक हरियाली नजर नहीं आ रही थी। इस गंदगी का कारण राजा ने पूछा तो मंत्री ने कहा कि यहाँ की मिट्ठी उठ कर ईंटें बनीं। ईंटें पकाने के लिए भट्ठों ने जमीन जला दी। इसी से इस क्षेत्र की यह दुर्दशा हो रही है।

राजा दोनों छोरों के बीच हुए अंतर का ताल मेल बिठा नहीं पा रहे थे। मंत्री ने सुझाया- खुशहाली बढ़ाने के लिए दूसरी ओर बर्बादी भी होती है। राजा ने अनुभव किया कि राज्य कोष बढ़ाने में प्रजा की दरिद्रता ओर बर्बादी होकर ही रहती है।

राजा ने नये सिरे से सोचा ओर प्रजा की कठिनाइयों का ध्यान रखते हुए राज्य कोष न बढ़ने की नीति अपनाई।


दरारें पड़ने और बढ़ने न पायें

हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर भी घूमती है और कक्षा में भी भ्रमण करती है। यह गतिशीलता ऐसी है जो मनुष्य अपने क्रिया-कलाप करते हुए उसे सहज अनुभव नहीं कर सकता। जो प्रतीत होता है वह उलटा समझ में आता है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, पर प्रतीत ऐसा होता है मानो सूर्य ही 24 घंटे में पृथ्वी की एक परिक्रमा कर लेता है। सर्दी-गर्मी पृथ्वी के सूर्य के समीप पहुँचने और दूर हटने के कारण आती हैं। पर हमें वास्तविक कारण का पता नहीं चलता। उसे एक परम्परा भर मान लेते हैं। तारों के चलते दीख पड़ने और उदय अस्त दीखने में पृथ्वी की स्थिति बदलती रहना ही मुख्य कारण है जब कि प्रतीत यह होता है कि तारामण्डल ही भ्रमणशील है।

पृथ्वी की चाल पूर्ण गोलाई में नहीं है। उसकी कक्षा अण्डाकार है। वह लट्टू की तरह लहराती हुई भी चलती है। मनुष्य का छोटापन और पृथ्वी की विशालता ऐसा संयोग बना देती है कि मनुष्य को धरित्री की यह भगदड़ सहज समझ में नहीं आती। लहराते चलने का अनुभव कर सकना तो और भी कठिन है।

मनुष्य का मस्तिष्क अनुभव न कर सके, इसका तात्पर्य यह तो नहीं होता है कि जो घटित हो रहा है, उसकी मान्यता से इन्कार किया जा सके। पृथ्वी स्थिर प्रतीत होती है, पर विज्ञान की दृष्टि से उसकी चलन शीलता सुनिश्चित ही मानी जायगी। गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की महती क्षमता है, पर उसका प्रत्यक्ष अनुभव हम कहाँ कर पाते हैं?

इस प्रकार का एक रहस्य यह भी है कि भूखण्ड इस हलचल से प्रभावित होते हैं। पर उसकी गति इतनी धीमी होती है कि उसे हाथों-हाथ नहीं समझा जा सकता। प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता।

पहाड़ उठते और धँसकते रहते हैं। उनका आकार भी विस्तृत होता और सिकुड़ता रहता है। ढलान में अन्तर पड़ने से चट्टानें टूटती रहती हैं। कोई जल स्रोत पृथ्वी गोलक के मध्य से प्रज्ज्वलित अग्नि तक जा पहुँचने पर भाप बनती है उसके फटने से भूकम्प आते तथा ज्वालामुखी फूटते हैं। इतना ही नहीं पृथ्वी फूलती सिकुड़ती भी रहती है उसकी व्यास परिधि न्यूनाधिक होती रहती है।

चिर पुरातन काल में पृथ्वी के दो विभाग थे- एक नीचा, दूसरा ऊँचा। नीचे भाग में पानी भरा था। ऊँचे में सूखी भूमि थी, जिस पर मनुष्यों समेत अन्य जीवधारी भी रहते थे। हरीतिमा भी इसी भाग में थी। स्वभावतः कालान्तर में थल भाग में दरारें पड़ीं और वे आगे की ओर खिसकने लगे। खाली जगह में समुद्र भरने लगा और उसका वेग भूखण्ड के खिसकने में और भी तेजी लाने लगा। पृथ्वी के वर्तमान नक्शे में हम कई समुद्र देखते हैं और कई महाद्वीप। यह बिखराव और विलगाव उन दरारों ने पैदा किया जो भीतरी अव्यवस्था के करण उत्पन्न हुई थीं।

यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। पुरातन काल में खिसकते हुए भूखण्ड जब जड़ें खोखली हो जाने के कारण खिसकने में तीव्रता अपनाने लगे हैं तो पीछे से समुद्र ने भी उन्हें रौंदा है फलतः भूखण्डों में टकराव होता रहा है। उनकी नोकें एक दूसरे के नीचे घुसती या ऊपर चढ़ती रही हैं। इस टकराव से पहाड़ उभरे या बिखराव से नये द्वीप प्रकट हुए हैं। कहा नहीं जा सकता कि पृथ्वी की आन्तरिक गतिशीलता न जाने वर्तमान भू-खण्डों का क्या से क्या स्वरूप बनाकर रख दे। यह दरार पड़ने की लीला और प्रतिक्रिया है।

मनुष्य समुदाय भी धरातल की तरह कभी एक था। वर्गों, वर्णों, जातियों, सम्प्रदायों ने उसे विभक्त किया और टकराव पैदा किया है। विषमता और बिखराव की स्थिति ही यह दरारें उत्पन्न करती हैं। इसी से परिवार और समुदाय विसंगठित होते और टूटते, बिखरते देखे जाते हैं। अच्छा हो दरारों से सावधान रहा जाय और जब भी वे आरम्भ हों तभी उन्हें भर दिया जाय।


प्रकृति ही नहीं, पुरुष भी

लाखों करोड़ों वर्ष पुरानी बात है। वैज्ञानिकों के अनुसार उस काल में एक बदली इस अनन्त आकाश में छाई हुई थी। लम्बे समय तक वह इसी प्रकार कुछ हलचलें करती हुई, अपने समीपवर्ती क्षेत्र में घूमती रही। फिर अचानक उसके भीतर से एक तीव्र ऊर्जा उत्पन्न हुई। वह असाधारण थी। गर्मी की अति हो जाने पर वह फूट पड़ी। विस्फोट अति भयानक था। इतने जोर का कि उसके पीछे काम करने वाली शक्ति की प्रचण्डता का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बदली बड़ी थी। आगे बढ़ी तो उसके खपच्चे उड़ गए। समूचे अन्तरिक्ष में वे छा गए। इनमें से प्रत्येक अत्यन्त ऊँचे स्तर के आवेश से भरे थे। सो आगे की ओर बढ़ते गए। इस तीव्रता में थोड़ी न्यूनता आई तो उनने अपनी-अपनी धुरी पर घूमना आरम्भ कर दिया। जो इनमें अधिक बड़े और बलिष्ठ थे उनने अपने प्रभाव क्षेत्र को दूर-दूर तक फैलाया और उस परिधि में जो भी पिण्ड आ गए, उन्हें अपने परिकर में जकड़ कर एक मण्डल बना लिया।

एक बदली के स्थान पर अन्तरिक्ष में अनेक नक्षत्र मण्डल बने और जिनने पकड़ स्वीकार कर ली वे उस परिवार के स्थायी सदस्य बन गए। अपना सौर मंडल ऐसे ही नवग्रहों और 43 उपग्रहों का एक छोटा-सा समुदाय है। ऐसे-ऐसे असंख्यों हैं। कुछ तो इतने बड़े हैं, जिनमें से एक-एक के पेट में हमारे सौर मण्डल जैसे लाखों घटकों के समा जाने जैसी स्थिति है। सूर्य से लाखों गुने सूर्य भी नक्षत्र परिवार के बीच पाये गए हैं।

कहा जाता है कि आरम्भ में सभी पिण्ड अग्नि जैसे तप्त थे। कुछ समय बाद उनकी ऊपरी परत ठंडी होने लगी। इस ठंडक और गर्मी के संयोग ने हवा पानी को जन्म दिया और हमारी पृथ्वी पर घटाटोप वर्षा होने लगी। अन्य गोलकों का क्या हुआ? इसका अनुमान लगाने के कोई प्रत्यक्ष एवं विश्वसनीय प्रमाण नहीं हैं। पृथ्वी की परतों की खोज कर और समुद्र की गहराई में घुसकर, समीपवर्ती वातावरण का विश्वस्त आधारों पर निरीक्षण-परीक्षण करके जाना जा सका है कि भूमण्डल की स्थिति क्या है? किन्तु अन्य तारक बहुत दूर हैं इसलिए उनकी स्थिति का पर्यवेक्षण उतनी अच्छी तरह लगाया नहीं जा सका है। केवल अनुमान के आधार पर ही कुछ मान्यता बनती है।

पर पृथ्वी के बारे में ऐसी बात नहीं है। उन्हें प्रत्यक्ष इन्द्रिय-ज्ञान, बुद्धि-कौशल और उपकरणों के सहारे बहुत कुछ समझा गया और ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ क्रमशः अधिकाधिक जाना जाता रहेगा। पृथ्वी के सम्बन्ध में उपलब्ध और संचित जानकारी में बहुत कुछ यथार्थता है। यों उन मान्यताओं में नये प्रमाणों के आधार पर आए दिन सैद्धान्तिक परिवर्तन भी होते रहते हैं।

विषय वस्तु यह है कि प्रकृति का मूल पिण्ड और उसके घटक सभी जड़ पदार्थों के बने थे। उनकी संरचना पंचतत्वों के आधार पर थी। फिर जीवधारियों की उत्पत्ति कैसे हुई? जड़ से इच्छा-ज्ञान और स्वतंत्र-ज्ञान वाला प्राणी कैसे उत्पन्न हुआ? जड़ और चेतन के बीच मौलिक भिन्नता है। जड़ के भीतर हलचल तो है पर बुद्धि नहीं। इच्छा, कल्पना, भावना और ऐसी चेष्टा भी नहीं जो प्रतिकूलताओं को अनुकूल बनाने के लिए प्रयत्न कर सके। प्रकृतिगत विशेषताओं से जन्मने, बढ़ने और परिवर्तित होने की क्रियाशक्ति तो है पर वह परिस्थितियों को अधिक अनुकूल एवं उन्नत बनाने के लिए नीति निर्धारण करने और उनमें समय-समय पर हेरफेर करने का गुण जड़ में नहीं है। इस विशेषता और भिन्नता के कारण ही उसे चेतन कहा जाता है। जड़ चेतन एक दूसरे की सहायता तो करते हैं, पर कोई किसी को जन्म नहीं दे सकता। उसका निमित्त कारण नहीं बन सकता। इसलिए दार्शनिकों ने जड़ चेतन के अस्तित्वों को पृथक और स्वतंत्र माना है। द्वैतवाद इसी को कहते हैं जिसमें ईश्वर और प्रकृति को सहचरी भर माना गया है, किसी को किसी का जन्मदाता नहीं।

भौतिक विज्ञान की मान्यता अलग और अनोखी है। उसका कहना है कि वस्तु की सड़न और हवा पानी के सम्मिश्रण से ऐसे रसायनों का जन्म होता है जो सचेतन स्थिति को अपने अस्तित्व का स्वतंत्र परिचय देने लगते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि प्रकृति के गर्भ से ही चेतन की उत्पत्ति हुई। वही उसकी अधिष्ठात्री है। इस कथन पर जोर देते हुए भी विज्ञान इस प्रश्न पर निरुत्तर है कि माता स्वयं ही बालक को जन्म नहीं दे लेती। उसमें पिता की दूसरी सत्ता का भी सहयोग एवं अंशदान है। प्रकृति को यदि माता माने और उसी के रासायनिक घटकों से जीवों की उत्पत्ति की मान्यता हो तो फिर पिता की जरूरत नहीं रह जाती। ऐसा तो फूलों में भी नहीं होता। वे नर मादा स्तर के परागों के मिलन का सुयोग बिठाते हैं, तब फलते-फूलते हैं। प्राणियों के प्रजनन में तो यह तथ्य और भी स्पष्ट है। उनमें नर मादा का संयोग विशेषतः आवश्यक होता है। इसी आधार पर प्रजातियाँ जन्म लेतीं और क्रमिक विकास के पथ पर आगे बढ़ती हैं।

वैज्ञानिक आग्रह यह अभी भी बना हुआ है कि पृथ्वी पर पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थ ही विशेष परिस्थितियों में बदलकर प्राणी बन जाते हैं। इसलिए पृथक सचेतन स्तर की मान्यता देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती। प्रकृति ही सर्वेसर्वा है।

सहस्राब्दियों से चली आने वाली इस मान्यता का-खोज के नये चरणों ने खण्डन करना शुरू कर दिया है। अन्य ग्रह तारकों से टूट-टूट कर जो उल्का पिण्ड धरती पर गिरे हैं, उनका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि उनमें मात्र प्रकृति पदार्थ ही नहीं वरन् सचेतन जीवाणु भी मौजूद हैं। साथ ही वे इस स्थिति में भी हैं कि किसी भी जटिल स्थिति में रहकर अपना निर्वाह कर सकें। चट्टानों के भीतर ऐसे जीवन पाये गए हैं, जो हवा पानी का प्रत्यक्ष प्रवेश न होने पर भी लम्बी अवधि तक जीवन धारण किये रह सकें। उन पर शीत ग्रीष्म का प्रभाव भी नहीं पड़ता। घोर शीत और अत्यधिक उष्णता के बीच भी वे अपना क्रिया-कलाप चलाते रह सकते हैं। उन्हें प्रकृति की किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती और न किसी पदार्थ का सहयोग पाने की अनिवार्यता रहती है। ग्रह निर्माण से बचा हुआ कचरा धूमकेतुओं को समझा जा सकता है। निरीक्षण ने उनमें भी जीवाणु पाये हैं। इतना ही नहीं अति शीतल और अति उष्ण ग्रहों के मध्य भी जीवन सत्ता का अस्तित्व देखा गया है।

यह अन्वेषण फिर विज्ञान को उसी द्वैतवाद की ओर ले जाता है जिसके अनुसार सीताराम, उमा महेश, राधा कृष्ण, शची पुरन्दर आदि के युग्मों को साथी सहचर तो माना गया है पर अभिन्न नहीं। प्रकृति में उत्पादन की क्षमता तो हो सकती है पर उनका बीज तंत्र परमात्मा को ही मानने के लिए विवश होना पड़ता है। परमात्मा प्रकृति में विलीन नहीं है और न ही जोड़ा जा सकता है। उसकी स्वतंत्र सत्ता मानने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। वस्तुतः प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही जीव का जन्म हुआ है। यह जानते हुए ही मूल सृष्टा परमात्मा को ही मानकर चलना पड़ेगा।


शंका का समाधान (kahani)

परमयोगी शुकदेव को आश्चर्य हुआ कि राजभवन में वैभवपूर्ण जीवन बिताने वाले महाराज जनक विदेह व परमज्ञानी क्यों माने जाते हैं। शंका समाधान हेतु वे मिथिला आकर महाराजा जनक के  पास अतिथि हुये।

एक दिन प्रातःकाल सम्राट ने तपस्वी से सरयू नदी में स्नान के लिये चलने की प्रार्थना की। तट पर पहुँच कर जनक ने अपने बहुमूल्य वस्त्र उतारे व नदी में उतर गये। शुकदेव ने भी अपने वल्कल उतारे और स्नान करने लगे। स्नान के बाद वे दोनों सन्ध्या पूजन में मग्न हो गये। तभी कहीं से आवाज आयी- “आग! आग!” शुकदेव ने आँख खोली। घाट से लगा भवन धू-धूकर जल रहा था। शुकदेव अपने वल्कल उठाने तट की ओर भागे किन्तु सम्राट निष्कंप दीप शिखा की भाँति अचल रहे। तट का चीत्कार उन्हें रंच मात्र भी हिला न सका। सम्राट पूजा समाप्त कर चुके तो तपस्वी ने उन्हें अग्निकाँड का समाचार दिया। वे हँस कर बोले- “मिथिलायाम प्रदग्धायाम ना में दहति किंचिन” तपस्वी श्रेष्ठ! समस्त मिथिला के जल जाने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता।

महाराज जनक की इस निर्लिप्तता ने तपस्वी की शंका का समाधान कर दिया।


मानवी काया में विलक्षणताओं के केन्द्र

ज्ञानेन्द्रियाँ यों अपने-अपने काम प्रत्येक केन्द्रों में करती दीख पड़ती हैं। पर वास्तविकता यह है कि इन्द्रियों के ज्ञान-तन्तु मस्तिष्क के भीतरी भाग में विभिन्न केन्द्रों के साथ जुड़े होते हैं। दृश्य को देखती तो आँख ही हैं; पर उसकी पूर्ण परिसंगति मिलाने और अपनी निज की प्रतिक्रिया उत्पन्न करने में यह मस्तिष्क का अदृश्य केन्द्र ही महत्वपूर्ण निर्धारण करता है। यदि मस्तिष्क गड़बड़ा जाय, तो आँख-कान आदि के देखे सुने हुए का सही निष्कर्ष न निकल सकेगा। यहाँ तक कि कर्मेन्द्रियों से ठीक प्रकार काम भी न लिया जा सकेगा। शराबी के पैर लड़खड़ाते और हाथ काँपते देखे गये हैं। कुछ कहना चाहता है और कुछ बोल बैठता है। अपना आपा गड़बड़ा लेता है। इसका कारण शराब का वह नशा है, जिसने मस्तिष्क के उस भाग को अस्त-व्यस्त कर दिया, जो इन्द्रियों के मूल में अवस्थित रहकर सुने देखें का स्वरूप एवं दायित्व निश्चित करता है। यह जानकारी शरीर-शास्त्र की उच्च कक्षाओं में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी जानते हैं।

मस्तिष्क सहित शरीर के हर अवयव का यह स्वभाव है कि यदि उससे काम लिया जाता रहे, तो वह सक्रिय रहता है और निष्क्रिय पड़ा रहने पर अशक्त, निर्बल हो जाता है। मानवी सत्ता के साथ पूर्वकाल में जो विशेषताएँ जुड़ी हुई थीं, वे अब लुप्त हो गईं और उनके स्थान पर नई उभर आयीं। इसका कारण अभ्यास का घटना-बढ़ना ही है। यह परिणति बहुधा पीढ़ियों तक चलती है।

ज्ञानेन्द्रियों के मस्तिष्कीय आधार केन्द्र प्रायः सामान्य जीवन में एक सीमा तक ही काम आते हैं। किन्तु पाया गया है कि उनमें इसके अतिरिक्त भी क्षमता के बड़े भंडार विद्यमान हैं, जो आमतौर से दैनिक जीवन में आते हैं। इससे आगे वाली रहस्यमयी परतों में अतीन्द्रिय क्षमता रहती है। यह एक अवयव का काम दूसरे से भी चला लेती है। सर्प के कान नहीं होते; पर उसकी त्वचा ऐसी संवेदनशील होती है कि 50 मीटर पर हुए किसी हलके खटके को भी वह पहचान लेती है। ऐसे अनेक जीव हैं, जिनके शरीर में कम इन्द्रियाँ पायी जाती हैं; पर वे उसकी आवश्यकता दूसरी से निकाल लेते हैं। आँख पर पट्टी बांधकर कई व्यक्ति पुस्तकें पढ़ देते हैं या आंख वालों की तरह बिना आँख वाले होने पर भी अनुमान के आधार पर अपने सब काम करते रहते हैं।

इस प्रकार की अतीन्द्रिय क्षमताओं का मूलभूत आधार मानवी मस्तिष्क में मौजूद है। यदि उसे तद्नुरूप अभ्यासों द्वारा विकसित किया जा सके, तो वे केन्द्र इस प्रकार काम करने लगते हैं मानो वे कोई चमत्कारी रहस्यवादी सिद्ध पुरुष हों। वस्तुतः एकाग्रता की अनेकों ध्यान-धारणाएँ जिन प्रयोजनों को लेकर की जाती हैं, उनमें एक महत्वपूर्ण प्रयोजन अतीन्द्रिय क्षमताओं का जागरण भी है। वे यदि जग पड़ें, तो सामान्य मनुष्य में अप्रत्याशित क्षमताएँ जागृत कर देती हैं। उसे देखकर दर्शकों को कौतूहल चकित रह जाना पड़ता है।

अभ्यास से किसी भी क्षेत्र में प्रगति हो सकती है; पर कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि किन्हीं अविज्ञात कारणों से किन्हीं में कोई विशिष्ट शक्ति अनायास ही उभर आती है। खेत में बोने पर तो जौ-चावल आदि उपजते हैं, फसल देते ही हैं। पर ऐसा भी देखा गया है कि जंगली जौ और जंगली चावल भी खादरों और जंगलों में उगे खड़े होते हैं। समुद्र के मध्य जिन टापुओं पर मनुष्य की पहुँच नहीं हुई है, वहाँ भी विशालकाय और फलदार वृक्ष उगे वृक्ष उगे खड़े हैं। इनका बीज संभवतः चिड़ियों की बीट द्वारा वहाँ पहुँचा होगा। जो हो सुनसान टापुओं में भी वृक्ष वनस्पति और जंगली किस्म के अन्न, शाक पाये गये हैं इसी प्रकार बिना किसी प्रकार की साधना किये कुछ व्यक्तियों में अतीन्द्रिय क्षमताएँ अनायास ही विकसित हुई देखी गयी हैं।

इजराइल के तेल अबीब कस्बे में जन्मे यूरीगैलर में ऐसी चुम्बकीय विलक्षणता थी कि उसकी आँखें ही एक सशक्त चुम्बक का काम करती थीं। बचपन से ही उसमें ऐसी विशेषताएँ प्रकट होने लगी थीं। एक बार वह चोट खाकर अस्पताल में भर्ती हुआ, तो दीवार पर लगी क्लाक से ही उसने खिलवाड़ शुरू कर दी। सुईयों को वह दृष्टि मात्र से आगे-पीछे कर देता। समय का घंटा आगे पीछे कर देता और फिर उन्हें जहाँ-का-तहाँ ला देता। उसका विचित्र खेल था। यह अपनी चारपाई पर पड़ा-पड़ा ही कर देता था। अस्पताल के मरीज और स्टॉफ के कर्मचारी इस विलक्षणता को दिखाने उसके पास बार-बार आग्रह करने आते।

एक बार वह एक दावत में गया। उसके सामने मेज पर कई प्लेटें और खाद्य सामग्री रखी गईं। बिना हाथ का सहारा लगाये प्लेटें और वस्तुएँ उसके पास खिसके कर आती रहीं और जिन्हें वह नहीं चाहता था, वे दूर हटती रहीं। भोज में सम्मिलित आगंतुकों ने बहुत देर तक यह बे पैसे का तमाशा देखा। जिन्हें इसमें किसी चालाकी का शक था, उन्होंने उसे दूसरी मेज पर दूसरे बर्तनों में दूसरी वस्तुएँ परोसवा कर परीक्षा ली। पर उसने बिना चिढ़े घंटों तक लोगों की इच्छानुसार प्रदर्शन किया। वह एक बार भी फेल नहीं हुआ।

बड़े होने पर उसने कई बड़े प्रदर्शन विशाल जनसमूह के सामने जांच-पड़ताल करने वाले वैज्ञानिकों की उपस्थिति में किये। इसने इजराइल की भरी सड़कों पर आँखों पर पट्टी बँधवाकर साइकिल दौड़ाई थी। आँखों पर पट्टी विशेषज्ञों ने बाँधी थी जिससे किधर से भी दीख न सके, इसलिए पूरी तरह सील कर दी गई थी। एक दूसरे प्रदर्शन में उसने मेज पर रखी 4 औंस तक की विभिन्न वस्तुओं को दृष्टि मात्र से मोड़-मरोड़ दिया था। उन वस्तुओं की पहले भी और बाद में भी जाँच-पड़ताल की गई कि वे वस्तुएँ किसी अन्य शक्ति से मोड़ा-मरोड़ी नहीं जातीं। पर छल फरेब का कहीं कोई कारण नहीं देखा गया।

अमेरिका के एक अन्य प्रदर्शन में उसने इतनी भारी वस्तुओं को एक जगह-से दूसरी जगह पहुँचाकर दिखाया, जिन्हें उठाने के लिए कई मजदूरों की आवश्यकता थी। एक स्थान पर रखी मूर्ति को उसने हवा में उड़ाकर अपने कंधे पर बैठने के लिए विवश कर दिया।

पूछने पर वह सीधे शब्दों में जन्मजात प्रतिभा कहता था। परीक्षण वैज्ञानिक इसे चुम्बकीय विद्युत शक्ति कहते थे। यह शक्ति तभी काम करती थी, जब गैलर उसका प्रयोग करने के लिए अपनी इच्छा शक्ति को एकत्रित करके प्रयोग में लगाता। सामान्य समय में उसकी स्थिति सामान्य मनुष्यों जैसी साधारण ही रहती थी।

न्यूजीलैण्ड के एक गड़रिये में यह शक्ति थी कि अपने या पराये झुण्ड की जिन भेड़ों पर वह हाथ फेर देता वे उसी के साथ चल पड़तीं और मालिकों द्वारा खींचने पर भी वापस न लौटतीं। गड़रिया ही उलटा हाथ फिरा कर उन्हें अपनी पकड़ से मुक्त करता, तब वे वापस लौटतीं।

तलाश करने पर इस प्रकार की विलक्षण क्षमताएँ अनेकों व्यक्तियों में अपने-अपने ढंग की पायी जा सकती हैं। विधिवत् प्रयत्न करने पर तो कोई भी व्यक्ति अतीन्द्रिय क्षमताओं को विकसित करने एवं प्रयुक्त करने में समर्थ हो सकता है।


दस प्रतिमाएँ बनाईं (kahani)

एक मूर्तिकार ने अपनी ही आकृति की दस प्रतिमाएँ बनाईं और उन्हीं में एक स्वयं खड़ा हो गया। अनेकों दर्शक आये पर असली नकली का भेद कोई न कर सका। उसी अवसर पर उनकी मृत्यु का समय आ गया और यमदूत पकड़ने आ गये। उन्हें भी पहचान न हो सकी तो उनने एक युक्ति काम में लाई, मूर्तियों में दोष निकालने आरंभ किये तो असली की भौहें टेढ़ी होने लगीं। दूसरे यमदूत ने बात की पुष्टि के लिए मूर्तिकार की प्रशंसा करनी आरंभ कर दी। इस पर उसकी मंद मुस्कान खिलने लगी।

पहचान हो गई। मनुष्य अपनी निन्दा पर अप्रसन्नता और प्रशंसा पर प्रसन्नता प्रकट करने से रुक नहीं पाता।


एक ही काया में दो व्यक्तित्व

एक ही व्यक्ति जब एक ही जीवन या समय में परस्पर विरोधी काम करता है या गिरगिट की तरह कई बाने बदलता है, तो उसे मनोविज्ञान की भाषा में खंडित व्यक्तित्व अथवा कई व्यक्तित्वों का मनुष्य कहा जाता है। एक ही शरीर में जब अधिक अंग-अवयव निकल पड़ते हैं तो उससे कुरूपता बढ़ती है और असुविधा भी होती है। जैसे पेट में रसौली, पैर में गठिया, चेहरे पर मुंहासे या मस्सा निकल पड़ने पर उसे अहितकर ही गिना जाता है और शल्यक्रिया द्वारा निकलवा देने का प्रयत्न किया जाता है। इसी प्रकार दुहरा व्यक्तित्व मनुष्य को उपहासास्पद बनाता है और सोचा जाता है कि एक ही व्यक्तित्व होता तो उसका वास्तविक स्वरूप समझने तथा उसके सम्बन्ध में भला-बुरा मत बनाने में सुविधा होती।

जो व्यक्ति वक्ता के रूप में मंच पर बैठकर आदर्शवादिता की दुहाई देता है, धर्मोपदेशक या देशभक्त बनता है; किन्तु जब आचरण का प्रसंग आता है तो उस कथन के विपरीत आचरण करता है, तो आश्चर्य होता है कि यह परस्पर विरोधी व्यवहार किस प्रकार बन पड़ता है। क्षण भर पूर्व जिन बातों का तर्क, तथ्य, उदाहरण, प्रमाण प्रस्तुत करते हुए अपने निजी अनुभव और विश्वास को साक्षी देते हुए कहा जा रहा था, उसे इतनी जल्दी कैसे भुला दिया गया। उसके विपरीत आचरण करने के लिए कैसे हाथ उठा और कैसे कदम बढ़ा? अपने आप को ठगने एवं झुठलाने का प्रयास कैसे चल पड़ा?

दूसरों को ठगने का प्रयास करना वस्तुतः अपनी आत्मा के साथ ही छल करना है। दूसरों को बहकाया जा सकता है। उसे भ्रम में डाला जा सकता है। पर अपने आपे के सम्मुख तो असली चेहरा ही रहेगा। कथनी और करनी का अन्तर स्वयं को तो विदित रहेगा ही। इसे अपने को ठगना या झुठलाना ही कहा जायगा। दूसरे लोग तो ठगी में आ भी सकते हैं और बहकावा कारगर हो भी सकता है; पर अपनी आत्मा के दरबार में दोषी और निर्दोष का दुहरा रोल कैसे अदा किया जा सकता है। अपनी यह चतुरता या धूर्त्तता अपने सामने तो नंगे रूप में ही खड़ी रहेगी। तब दूसरा कोई गलती से सम्मान भी कर ले, प्रशंसा भरे शब्द भी कह दे; किन्तु अन्तःकरण तो इस तो इस फरेब के लिए सदा धिक्कारता ही रहेगा।

इस धिक्कारणा का बढ़ा हुआ स्वरूप आत्म प्रताड़ना है। जिससे किसी का हर्ज या पतन नहीं होता- ऐसे वाक-विनोद, व्यंग-उपहास श्रेणी के समझे और मनोरंजन गिने जा सकते हैं। किन्तु वे आचरण जो नीतिवानों द्वारा अनीति स्तर पर किये जाते हैं, वस्तुतः छद्म हैं। उस पाखंड में अपना और पराया अहित ही होता है।

एक शरीर में एक ही दिल, पेट, मस्तिष्क हो सकता है। वे दुहरे हों तो इससे शान्ति नहीं बढ़ेगी, सौभाग्य नहीं समझा जायगा, वरन् कौतुक समझा और कुरूपता-असुविधा का निमित्त कारण माना जायगा। एक म्यान में दो तलवारें नहीं ठूँसी जा सकती। एक शरीर में दो व्यक्तित्व नहीं रह सकते हैं। कभी-कभी किसी पर भूत-प्रेत आवेश आ जाता है, तो उसकी कायिक और मानसिक स्थिति विलक्षण हो जाती है। जो करता है, कहता है वह सब अटपटा ही होता है। यह बात दुहरे व्यक्तित्व के सम्बन्ध में भी समझी जा सकती है।

सत्य और असत्य परस्पर एक-दूसरे के विरोधी-प्रतिद्वंद्वी हैं। एक ही कोंत्तर में साँप चूहे का निवास कैसे हो दोनों की दिशा भिन्न होना ही आश्चर्यजनक नहीं है, वरन् प्रतिद्वंद्वी की तरह जब वे एक-दूसरे से विग्रह खड़ा करते हैं, तो उसका प्रतिफल मल्ल युद्ध की तरह सामने आता है। हल के दो बैल यदि आपस में लड़ने लगें, तो मालिक का नुकसान तो होगा ही, परस्पर भी एक दूसरे को घायल कर देंगे।

व्यक्तित्व जैसा भी भला-बुरा हो भीतर और बाहर एक जैसा रहना चाहिए। सती-साध्वी बनने वाली और अपने को इसी रूप में प्रख्यात करने वाली महिला को कुलटा नहीं होना चाहिए। वेश्या की बात दूसरी है, वह जिस प्रकार का आचरण व्यवसाय करती है, उसे प्रकट भी कर देती है। बहरूपिये तमाशा दिखाते समय कई तरह के वेष बनाते हैं; पर अपने परिवार पड़ौस में वे अपने बारे में कोई गलत कुछ भी वैसा नहीं करते हैं। पूछताछ करने पर वे अपना व्यवसाय स्पष्ट रूप से “बहरूपिया” लिखते हैं।

एक गाड़ी पर मनुष्य तो कई बैठ सकते हैं; किन्तु भेड़िये और खरगोश दो एक साथ एक गाड़ी में नहीं बैठ सकते। आक्रमण होगा और अशान्ति पनपेगी। प्रकृति विरुद्ध स्थिति के रहने पर एक साथ रहने का तालमेल नहीं बनता। समझौता भी नहीं होता। अशान्ति और आशंका पनपती है।

आत्मा का स्वरूप सौम्य और सरल है। उसे यथार्थता ही ग्राह्य है। बात मन में हो वही कही जानी चाहिए और जो कहा जाय वही करना चाहिए। मन, वचन, कर्म में अन्तर रहने पर मनुष्य कपटी रहता है। कपट उस चिनगारी के समान है, जो जहाँ सुलगाई जाती है, पहले उसी को जलाती है। ज्वाला बनकर फूटने और दूसरों के घरों को जला डालने का काम तो इसके पश्चात् होता है। चमड़ी में काँटा चुभ जाने पर दर्द होने लगता है। दूध में नीबू निचोड़ देने से वह फट जाता है। प्रकृति भिन्नता में विसंगतियाँ ही पैदा होती हैं।

मनुष्य मानवी गरिमा का धनी है। उसमें सद्गुणों, सत्कर्मों, सद्स्वभावों और सत्प्रवृत्तियों का ही गुजारा है। ईश्वर का ज्येष्ठ पुत्र युवराज अपने पिता से आदर्शवादी श्रेष्ठताएँ साथ लेकर जन्मा है। उसका जीवन प्रवाह इसी दिशा में बहना चाहिए। उसके क्रियाकृत्य इसी स्तर के होने चाहिए। उसे अपनी गरिमा, सज्जनता और शालीनता के रूप में ही बनाये रहनी चाहिए। इसी में उसे आत्मसन्तोष मिल सकता है और लोक-सम्मान भी। हो सकता है कि ऐसा व्यक्ति बड़ा आदमी न कहला सके, पर उसकी सज्जनता और सरलता हर स्थिति में सराही जायगी। वे सुसम्पन्न किस काम के, जिनके पास कुबेर जितना वैभव तो जमा है; किन्तु वस्तुस्थिति जानने वाले उसे छली और पाखण्डी ठहराते हैं।

दुहरे व्यक्तित्व की स्थिति ऐसी ही होती है जो एक क्षण शूरवीर बनकर तलवार घुमाता है और दूसरे ही क्षण जनाने कपड़े पहनकर तालियाँ बजाने और नाचने लगता है। ऐसे व्यक्ति का किसी भी क्षेत्र में भरोसा नहीं किया जाता और न उसे कोई उत्तरदायित्व सौंपा जाता है।

दुहरा, दुरंगा, दोगला व्यक्तित्व बनाने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि मनुष्य अनगढ़, अशिक्षित, दरिद्र यहाँ तक कि चोर के रूप में जाना जाय। उसकी आत्मा उसे नहीं धिक्कारेगी। योग्यता और क्षमता के अभाव में उसे तुच्छ या सामान्य रहना पड़ा; किन्तु उसने अपने को छिपाया तो नहीं। कपट दुनिया में बुरे किस्म का अपराध है। इसकी अपेक्षा तो अयोग्य बनना और तिरस्कृत स्थिति में रहना भला।

दुहरा, दुरंगा, दोगला व्यक्तित्व बनाने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि मनुष्य अनगढ़, अशिक्षित, दरिद्र यहाँ तक कि चोर के रूप में जाना जाय। उसकी आत्मा उसे नहीं धिक्कारेगी। योग्यता और क्षमता के अभाव में उसे तुच्छ या सामान्य रहना पड़ा; किन्तु किस्म का अपराध है। इसकी अपेक्षा तो अयोग्य बनना और तिरस्कृतम स्थिति में रहना भला।


राजा चित्रकेतु (kahani)

राजा चित्रकेतु के कोई संतान न थी। आयु ढलने पर उनके एक पुत्र हुआ। वह देखने में सुन्दर और क्रीड़ाओं में मनोरंजक था। पर वह अधिक समय जीवित न रहा। पाँच वर्ष की आयु में ही उसका देहान्त हो गया। सारा राज परिवार शोक मग्न रहने लगा।

इसी बीच महर्षि अंगिरा वहाँ आ गये। और उस मृतात्मा को बुलाकर वार्त्तालाप करा देने का आग्रह करने लगे। अंगिरा ने अपने योगबल से वैसा ही किया।

मृत पुत्र का सूक्ष्म शरीर आया उसने अंगड़ाई लेते हुए कहा- आप लोग किस जन्म में मेरे पिता रहे, यह बताएं? अब तक सौ जन्मों का विवरण मुझे याद है। मरने पर परिवार और संबंध के लिए कुछ दिन रोते रहे, बाद में प्रकृति के नियमानुसार उन सब का शोक शान्त हो गया। आप लोग भी कुछ समय में संतोष कर लेंगे।

राजा और रानी ने कहा- तो तुम अब हम लोगों के बीच नहीं रहोगे? पुत्र ने कहा- मुझे अपने प्रारब्ध भुगतने दें और आप अपने भुगतें। यह कहते हुए वह आत्मा परलोक वापस लौट गई। राजा रानी को बोध हो गया।


रहस्यमय सिद्धियाँ जो प्रत्यक्ष होती जा रही हैं।

आदिम काल के मनुष्य की न कोई भाषा थी न लिपि। बन्दरों की तरह अनगढ़ शब्द बोलकर वह अपनी बिरादरी वालों से तात्कालिक आवश्यकताओं के सम्बन्ध में साधारण-सा विचारों का आदान-प्रदान कर लेता था। पर प्रगति के लिए उसकी उत्कट अभिलाषा बनी रही। चेष्टा भी होती रही। इसका परिणाम हुआ उसने बहुत कुछ ऐसा सीखा और पाया जो अनादि काल से उसे उपलब्ध नहीं था। आग जलाने, पहिया बनाने, वनस्पति उगाने, पशु पालने, वस्त्र बुनने और निवास आच्छादन बनाने जैसे आविष्कारों में जब वह सफल हुआ तो माना गया कि देवों ने सुख सुविधा के अनेक साधन उस पर बरसा दिए।

इस प्रगतिशीलता पर विराम नहीं लगा। उसकी अग्रगामिता निरन्तर जारी रही। फलतः साहित्य, कला, संगीत, दर्शन, तर्क जैसे बौद्धिक और रेल, मोटर, तार, रेडियो जैसे विद्युत संचालित उपकरण बनाने का अवसर मिला। एक-एक करके प्रकृति के रहस्य खुले और मनुष्य क्रमशः अधिक कुशल, अधिक समर्थ बनता चला गया। वह गति अभी रुकी नहीं है। जल-थल मथ डालने के बाद वह अन्तरिक्ष पर अधिकार करने की फिराक में है। महा विनाश के परमाणु बम जैसे साधन तो बना लिए हैं। आत्मघाती नशों का अभ्यास कर लिया है। पर संतुलित सृजन का क्षेत्र अधूरा पड़ा है। उस क्षेत्र में श्रीमन्त ही लाभान्वित हो रहे हैं। सामान्य जनों की- पिछड़े हुओं की- प्रगति अभी भी रुकी हुई है।

प्रगति के अनेक क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण धारा अध्यात्म की भी है। सामान्य मनुष्य उपार्जन, विलास, वैभव एवं सुरक्षा के ही सरंजाम जुटाता रहता है। उसे दौलत की असीम प्यास है ताकि उस आधार पर मनचाही वस्तुयें खरीद सके।

यह रहस्य चिन्तन की गहराई में उतरने वालों के ही हाथ लगा है कि मानवी चेतना को सुगठित, सुनियोजित एवं समुन्नत बना लेने पर व्यक्तित्व में चार चाँद लगते हैं। वह प्रतिभावान बनता है एवं सज्जनता के चुम्बकत्व से अनेकों का स्नेह-सहयोग अपनी ओर आकर्षित करता है। लोक व्यवहार में प्रामाणिकता को ही सबसे बड़ी पूँजी माना गया है। जिसे सज्जनोचित व्यवहार आ गया- तत्परता तन्मयता का अभ्यास कर लिया, समझना चाहिए कि उसने सर्वतोमुखी उत्कर्ष का द्वार खोल लिया।

व्यक्तित्व निर्माण से आगे का चरण, रहस्य भरे अध्यात्म क्षेत्र की अधिक जानकारी प्राप्त करना और उस परिधि पर छाई हुई मूर्छना को जागृति में बदल देना है। यह साधना मार्ग है। इस पर चलते हुए सचेष्ट व्यक्ति उन क्षमताओं को जगाकर हस्तगत करता है, जो सर्व साधारण को आश्चर्य चकित करती हैं। उन चमत्कारों को लोग देवी देवताओं का वरदान उपहार मानते हैं और इसे अदृश्य शक्तियों की अनुकम्पा मानते हैं किन्तु तथ्यतः वह आत्म-जागरण का ही प्रतिफल होता है। बौद्धिक तथा भावनात्मक संपदाओं का केन्द्र बिन्दु अपना अन्तःकरण ही है। साधारण स्थिति में पड़ा रहने पर वह पेट-प्रजनन और प्रदर्शन की क्षुद्रताओं को पूरा करने के प्रयत्न में ही जुटा रहता है। प्रबल प्रयत्न करने पर भी यत्किंचित् ही हाथ लगता है।

अध्यात्म विज्ञान का क्षेत्र इतना सीमित नहीं है कि उससे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का ही निर्माण, उपार्जन हो सके। वरन् इतना भी है कि गहन अन्तराल में छिपी हुई शक्तियों को जगाया और उभारा जा सके। उन बीज सूत्रों की कृषि करके विभूतियों की अच्छी खासी फसल उगाई जा सके।

मानवी चेतना की केन्द्र स्थली मस्तिष्क को माना जाता है। उसकी ऊपरी परत परिस्थिति को सुलझाने में कर्मरत रहती है। मध्यवर्ती परत को अचेतन कहते हैं। उससे शरीर और मन के विविध क्रिया एवं कलापों का सूत्र-संचालन सूक्ष्म रूप से होता रहता है। अन्तिम परिधि उच्चस्तरीय है। उसे प्रज्ञा, भूमा, दिव्यचेतना आदि नामों से जाना जाता है। इसी में ऋद्धि सिद्धियाँ सन्निहित रहतीं तथा साधना मार्ग अपनाने पर प्रस्फुटित भी होती हैं। शरीर अपने आप में एक उच्चस्तरीय बिजली घर है। उसकी साधना कर लेने पर अगणित वैज्ञानिक उपकरणों तथा अवलंबनों का समुच्चय एक ही स्थान पर मिल जाता है। अन्तराल में छिपे हुए यह शक्ति स्रोत जब गतिशील होते हैं तो मनुष्य देव मानव की सिद्ध पुरुष की- भूमिका निभाने लगता है। यह विभूतिमत्ता कहीं बाहर से नहीं आती अपितु भीतर से ही उगती है। साधना किसी देवता को फुसलाने या अनुगृहीत करके बदले में अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए नहीं की जाती। उनका उद्देश्य अन्तराल की उस तिजोरी की चाभी प्राप्त करना है जिसमें दिव्य-लोक की अनेकानेक रहस्यमयी सिद्धियों के भण्डार भरे पड़े हैं।

सिद्धि चर्चा सभी को आकर्षक और आश्चर्यजनक लगती है। वह प्रभावित एवं आकर्षित भी करती है। इसलिए आत्मिक प्रगति का लेखा जोखा लेते समय यह पूछा जाता है कि इस प्रयास से क्या विशेषतायें हस्तगत हुईं। धन न सही, वर्चस्व तो उपलब्ध होना ही चाहिए।

अणिमा, महिमा, लघिमा और अष्टसिद्धियों की बात पुरानी हो गई। पूर्व युगों में काय संरचना आकाश और वायु प्रधान होती थी। तब अभ्यासी के लिए अदृश्य हो जाना, विशाल या छद्म रूप बना लेना जैसी विशेषताओं का प्रदर्शन संभव था। पर अब तो युग के अनुरूप मानवी काया में पृथ्वी तथा जल तत्व की प्रधानता रह गई है। अन्न, जल पर ही वह आश्रित है, इसलिए प्राचीन काल जैसी दिव्य क्षमताओं का प्रदर्शन तो संभव नहीं रहा, पर सामान्य सिद्धियों का प्रदर्शन अभी भी हो सकता है होता रहता है।

प्रत्यक्षवादी विज्ञान-वेत्ताओं ने अकाट्य प्रमाण उदाहरणों के आधार पर यह पाया है कि थोड़े से अभ्यास से कुछ सिद्धियाँ मजबूत मनोबल वाले सहज ही अपने में विकसित कर सकते हैं। इनमें कुछ बहुचर्चित एवं सर्वविदित हैं। उन्हें अविश्वासी दृष्टि रखकर इस प्रकार कितनी ही कसौटियों पर कसा गया है ताकि उसमें छल प्रपंच की कहीं कोई गुंजाइश न रहे। इन सिद्धियों में चार प्रमुख हैं। (1) टेलीपैथी (2) अतीन्द्रिय दृष्टि (3) पूर्वज्ञान (4) साइको काइनोसिस जिसे विलक्षण अनुभूतियों का सम्मिश्रण भी कह सकते हैं।

टेलीपैथी- विचार संचरण है। एक स्थान पर बैठा हुआ व्यक्ति किसी दूरवासी के साथ मानसिक संपर्क मिला सकता है। उसके विचार जान सकता है और अपने विचारों से उसे अवगत करा सकता है। यह रेडियो टेलीविजन से मिलती जुलती पद्धति है। जो कार्य तार टेलीफोन जैसे यंत्रों की सहायता से होता है वह बिना किसी प्रत्यक्ष माध्यम के सम्पन्न होने लगता है। पति-पत्नी के - माँ-बच्चों के वात्सल्य में तो भावनाओं का आदान-प्रदान दूरी का व्यवधान रहते हुए भी चलता रहता है। इसी को किसी साधारण परिचित या अपरिचित पर भी प्रयोग किया जा सकता है। बड़े परिमाण में जन समुदाय पर एक विशेष प्रकार का मानसिक दबाव डालने के लिए ब्रेन वाशिंग का प्रयोग होता है। वैज्ञानिक सेज में इसे ब्रेन वाशिंग का नाम दिया जाता है। एक तरह की विचार धारा को दूसरे प्रकार की दिशा में उलट देना इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।


Quotation

धन गया तो कुछ गया। स्वास्थ्य गया तो बहुत कुछ गया और चरित्र गया तो समझो कि सब कुछ चला गया।

अतीन्द्रिय दृष्टि में एक्स-रे, लेसर किरणों जैसी विशेषता पैदा होती है। इसे तीसरा नेत्र खुलना भी कहते हैं। ज्ञान चक्षुओं का उन्मीलन भी। किसी के मन की बात, उसकी जेब या अटैची टटोल लेना, जमीन में गड़े धन या खोये कागजों, पदार्थों को ढूंढ़ निकालना भी इस आधार पर सम्भव हो सकता है। भूमि के भीतर जल स्रोतों का पता लगाया जा सकता है। जिन गोपनीय बातों को साधारण बुद्धि रहने या साक्षी के अभाव में साधारण रीति से नहीं जाना जा सकता है, उनका ज्ञान अतीन्द्रिय दृष्टि के विकसित होने पर सहज ही प्राप्त किया जा सकता है।

पूर्व जन्म की स्मृति साधारणतया छोटे बालकों में देखी गई है। प्रस्तुत परिवार के साथ सम्बन्ध घने न होने और पिछले जन्म के सम्बन्धों में झोल ने पड़ पाने की दशा में अक्सर अपने पिछले जन्म का विवरण बताते हैं और बताये हुए स्थान तक ले पहुँचने पर वे अपने सम्बन्धियों तथा वस्तुओं को पहचानते और घटित हुई घटनाओं को बताते भी हैं। पर यह स्थिति आयु बढ़ने के साथ-साथ समाप्त होती जाती है। इस साधारण क्रम में असाधारण साधना विज्ञान द्वारा की जा सकती है। अपना पूर्व जन्म जाना जा सकता है और दूसरों के सम्बन्ध में ऐसा विवरण बताया जा सकता है जो परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरे।

पूर्व ज्ञान सिद्धि को भविष्य कथन भी कह सकते हैं। व्यक्ति विशेष का जीवन-क्रम किस दिशा में मोड़ लेने जा रहा है। साँसारिक गतिविधियाँ किस रूप में विकसित होने जा रही हैं। इसका पूर्वज्ञान आत्म-साधना से हो सकता है। प्रत्यक्ष में प्रकट होने से पूर्व किसी भी घटना का पूर्व रूप अदृश्य जगत में बन जाता है। यह अभ्यास अनेक पशु पक्षियों को होता है। कोई दुर्घटना घटित होने वाली होती है या ऋतु परिवर्तन होना है तो वे अपनी सूक्ष्म क्षमता से उसकी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं और बचाव के उपाय समय रहते करने लगते हैं। मौसमी गुब्बारे उड़ाकर यह जाना जाता है कि वर्षा कब और कहाँ होने वाली है। इस पूर्वज्ञान क्षमता को मनुष्य भी विकसित कर सकता है। अनिष्टों से बच सकता है और जो शुभ संभावना है उसकी तैयारी पहले से ही करने पर उपलब्धियों का सदुपयोग हो सकता है। यकायक विपत्ति या सम्पत्ति आ धमकने पर मनुष्य घबरा जाता है और यह नहीं सोच पाता कि आगत परिस्थिति से कैसे निपटा जाय। पर यदि पूर्व ज्ञान के आधार पर संभावनाओं को जाना जा सके तो आवश्यक प्रबन्ध कर लेने की बात बन सकती है। इस ज्ञान के अभाव में कितने ही व्यक्ति मरते समय अपने पीछे अनेक झंझट छोड़ जाते हैं। यदि उन्हें संभावना का ज्ञान रहा होता तो समय रहते वे काम निपटा सकते थे जो पीछे उलझते और समस्यायें पैदा करते रहे।

अदृश्य जगत के प्राणियों से सम्बन्ध स्थापित करने की सिद्धि में- भूत प्रेतों के कष्ट दायक आक्रमणों से बचा जा सकता है। साथ ही यह भी हो सकता है कि जो उनमें से उदार प्रतिभावान् हैं उनकी अनुकंपा उपलब्ध की जाय और उसकी सहायता से ऐसा लाभ उठाया जाय जिसे एकाकी व्यक्ति बिना किसी सहायता के आश्चर्यजनक रूप से उपलब्ध नहीं कर सकता। समर्थ व्यक्ति प्रत्यक्षतः जो किसी को लाभ हानि पहुँचा सकते हैं उससे अधिक मात्रा में वे सूक्ष्म शरीर से संभव कर सकते हैं।

परकाया प्रवेश की सिद्धि में अपनी विशेषतायें दूसरे के शरीर में प्रवेश की जा सकती हैं। मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म के समस्त क्रिया-कलाप इसी आधार पर सम्पन्न होते हैं। अपनी विद्युत शक्ति से दूसरों के शारीरिक, मानसिक रोग दूर किये जा सकते हैं। सम्मोहित करके मन की गांठें खोली जा सकती हैं। उसके छिपे रहस्य उगलवाये जा सकते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है। इस प्रयोग को एक प्रकार का वशीकरण भी कह सकते हैं।

यह सामान्य उपचार है जिसकी यथार्थता के अनेकानेक प्रमाण आये दिन मिलते रहते हैं। शोधकार्य में निरत रहकर हम ऐसी सिद्धियों को भी पा सकते हैं जो सामान्य मनुष्य को असाधारण शक्ति सम्पन्न बना दे।


भगवान के दर्शन (kahani)

एक स्त्री को सपने में भगवान के दर्शन हुआ करते थे। पीछे वह बन्द हो गये। स्त्री ने नारद जी के आगमन पर कहा- “भगवान से पूछकर आना कि वे अब दर्शन क्यों नहीं देते।

स्त्री कर्कश स्वभाव की थी सब से लड़ती झगड़ती थी। चटोरी थी और पति को बेईमानी से कमाने की शिक्षा देती थी, ताकि बन-ठन कर रह सके। यह पता नारदजी ने लगा लिया। बहुत दिन बाद वे लौटे तो कहा- भगवान जी तुम से नाराज हो गये हैं। उन्हीं के बच्चों से तुम कलह करती हो। पति के द्वारा उन्हें ठगाती हो। तुम्हारे मस्तिष्क में तो नर्क की गंदगी भरी रहती है। ऐसी दशा में वे क्यों आये? और कैसे सपने में दर्शन दें?

स्त्री ने जाना कि भगवान अकारण मारे-मारे नहीं फिरते जिनका जीवन उदार होता है, उसी से संपर्क साधते हैं।


मनुष्य मात्र एक कोरा कागज है।

फिलीपाइन्स के एक कबाइली इलाके में ऐसे परिवार पाये गये हैं, जिन्हें आदिम सभ्यता का अवशेष समझा जा सकता है। वे पत्तों से वस्त्र का काम लेते हैं और वनस्पतियों तथा जन्तुओं को आहार बनाते हैं। वे घुमन्तू स्तर के हैं। जब तक मर्जी होती है पर्वतीय गुफाओं में या पेड़ों के झुरमुटों में बस जाते हैं और जब उचंग आती है, इच्छानुसार किसी भी दिशा में चल पड़ते हैं।

किन्तु रहते कबाइली सीमा में ही हैं। सभ्य मनुष्यों के संपर्क में लाने के लिए अब तक के किये गये सभी प्रयत्न निष्फल हुए हैं। उन्हें अपना ढर्रा ही पसन्द है। बदलने की अपेक्षा जान देना लेना उन्हें अधिक पसन्द है। समुदाय में नरों की संख्या अधिक है, नारियों की कम। क्योंकि वे प्रजनन तथा कष्ट साध्य जीवन को वहन करने में पिछड़ जाते हैं।

इस खोज से पता चलता है कि यदि मनुष्य को सभ्यता, सुसंस्कारिता का वातावरण न मिले, तो वह आदिम काल की पशु परिस्थितियों में ही बना रहेगा।

ऐसे और भी कबीले संसार के अन्यान्य स्थानों में हैं, जिनके रहन-सहन, आचार-व्यवहार सामान्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक पिछड़ा हुआ है। वे पशुओं से कुछ ही ऊँचे दर्जे तक पहुँच पाते हैं।

यह सोचना गलत है कि मनुष्य जन्मजात रूप से अनेक विशेषताएँ लेकर साथ आता है। साथ तो मनुष्य की संरचना ही अपवाद रूप मान लेना पर्याप्त है। ऐसे हाथ किसी को नहीं मिले। दो पैरों के सहारे चलना भी किसी को नहीं आता और मस्तिष्कीय ग्रहणशीलता का- संवेदना का उपहार और किसी प्राणी को नहीं मिला। किन्तु साथ ही निश्चित है कि इनका अद्भुत उपयोग सिखाने पर ही सीखा जा सकता है। इसलिए विकास की दिशा में अग्रसर करने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उसे समुचित प्रशिक्षण प्राप्त हो, भले ही वह अभिभावकों, कुटुम्बियों, सम्बन्धियों या पड़ौसियों द्वारा दिया जाय। मनुष्य दूसरों को देखकर उसकी नकल बनाने में प्रवीण है, जबकि दूसरे प्राणी वैसा नहीं कर पाते।

ऐसे उदाहरण संसार में कितने ही हैं कि भेड़िया या चिम्पेंजियों द्वारा मनुष्य बालकों का अपहरण किया गया। उनने उन्हें मारा नहीं, वरन् अपना बच्चा समझकर पाल लिया। बड़े होने पर वे शिकारियों द्वारा प्रयत्नपूर्वक पकड़े गये। पाया गया कि उनमें अपने पालकों की सभी आदतें अभ्यास में उतर गयी हैं। वे उसी प्रकार रहते, खाते और बोलते, जैसे कि उनके पालने वाले। पकड़े जाने के उपरान्त उन्हें मनुष्योचित रहन-सहन एवं शिष्टाचार, उच्चारण सिखाने का बहुत प्रयत्न किया गया, पर इसमें आँशिक सफलता ही मिली। परिपूर्ण मनुष्य वे न बन सके। कारण कि बालक जन्म के उपरान्त आरम्भिक तीन वर्षों में जो सीख लेता है, वह इतना अधिक होता है कि जिसकी तुलना जीवन के शेष भागों में सम्पादित किये गये अनुभव से नहीं हो सकती। मानसिक बीजाँकुर इसी अवधि में उगते और बढ़ते हैं। पूर्णता-परिपक्वता शेष जीवन में आती है।

इस वास्तविकता को देखते हुए आवश्यक हो जाता है कि बच्चों के लिए भोजन-वस्त्र का ही प्रबन्ध न किया जाय, वरन् उनमें उन संस्कारों के बीजारोपण का भी प्रबन्ध किया जाय। जिससे वे समझदार, बुद्धिमान और नीतिवान नागरिक बन सकें।


Quotation

तथागत बोध वृक्ष को साष्टांग दण्डवत् कर रहे थे। शिष्यों ने आश्चर्य से पूछा- आप तो पूर्ण हैं। फिर इस तुच्छ वृक्ष को इतना सम्मान क्यों देते हैं? बुद्ध ने कहा- आप सबको यह बोध कराने के लिए कि जो नमता है सो बड़ा होता है। ऐसा न हो कि आप लोग अहंकारी बनकर नमन की परम्परा भुला दें।


बड़प्पन बोझ पर नहीं, व्यक्तित्व पर निर्भर

प्रदर्शन के आधार पर बड़ा बनने की महत्वाकाँक्षा ऐसी है जो मनुष्य को उपहासास्पद ही बनाती है।

बड़प्पन मनुष्य की योग्यता एवं सत्प्रवृत्ति पर निर्भर है। शालीन और परोपकारी हर जगह सम्मान पाते हैं, किन्तु अपना साँसारिक वैभव बढ़ा लेने भर से मनुष्य न तो अपने आप में प्रसन्न रहता है और न दूसरों की दृष्टि में ही आदरणीय बनता है।

शरीर से मोटे भारी और लम्बे मनुष्य देखने भर में सर्व साधारण की तुलना में आश्चर्यजनक प्रतीत होते हैं किन्तु उन्हें अतिशय धनवानों की तरह आन्तरिक खिन्नता में ही दिन बिताने पड़ते हैं। जिनका स्तर औसत नागरिक जैसा है, वे ही सबके साथ हिल मिल सकते और प्रसन्न रहने की सुख शान्ति की स्थिति में बने रहते हैं।

कोवी आइलैण्ड में जन्मी जौली इरन का वजन 21 वर्ष की आयु में बढ़ना शुरू हुआ और वह कुछ ही दिनों में 227 किलोग्राम भारी हो गई। वह कुछ कर नहीं सकती थी पर स्वयं हँसती और दूसरों को हँसाती रहती थी।

इलिनाय अमेरिका का राबर्ट अर्ल ह्यूज सन् 1926 में पैदा हुआ। जन्म के समय ही वह 5.22 किलोग्राम भारी था। क्रमशः उसका वजन बढ़ता ही गया और फरवरी 1952 में वह 485 किलोग्राम भारी हो गया। वह ज्यादा दूर चल फिर नहीं सकता था। कोई सवारी उसके उपयुक्त नहीं बैठती थी। इसलिए उसे ट्रक के साथ एक ट्राली में रखकर ले जाया जाता था। उसी में उसे बैठे-बैठे सोना पड़ता था।

10 जुलाई 1954 को वह बीमार पड़ा। ब्रेमन कम्यूनिटी अस्पताल में उसे ले जाया गया। पर वहाँ उसके लायक न कोई पलंग था और न कोई दरवाजा इतना चौड़ा था जिसमें होकर उसे भीतर ले जाया जा सके। अन्ततः ट्रक के ट्रेलर में ही उसका इलाज हुआ और वहीं उसकी मृत्यु हो गई। कब्रिस्तान में उसे उतारने के लिए क्रेन बुलवाई गई और एक विशेष साइज का ताबूत उसके लिए बनवाया गया।

उत्तरी कैरियाना में सन् 1853 में जन्मा जानी ऐली असाधारण मोटा और भारी था। उसका वजन 524 किलोग्राम था। उसे खड़ा होने के लिए किसी का सहारा लेना पड़ता था। सन् 1887 में एक दिन वह अपनी छत पर खड़ा था कि वह वजन न सह सकी और नीचे गिर पड़ी। जब तक लोग छत और उसके शरीर को संभालने दौड़े तब तक उसका प्राण निकल गया।

ओहियो (अमेरिका) में जन्मी सेलेस्टा गेयर 252 किलोग्राम की थी। उसकी भूख भी गजब की थी। 10 किलो भोजन वह एक दिन में कर लेती थी। डाक्टरों के कहने पर उसने खुराक तो कम की पर वजन न घटा।


Quotation

सुकरात को जहर का प्याला मृत्यु दंड के रूप में पिलाया गया। जब वे मरने लगे तो शिष्यों ने पूछा कि आपको जलायें या दफनायें?

उत्तर में हँसते हुए सुकरात ने कहा- न जलाने वाले मुझे जला पायेंगे और न दफनाने वाले अपना काम कर सकेगा। मैं सदा जीवित रहूँगा और मेरी आवाज कानों के बजाय हृदयों में गूँजती रहेगी। जो सचाई की तलाश में निकलेगा उसे मेरी रूह रास्ता बताने के लिए भी साथ चला करेगी।”

भी 318 किलो था। दोनों के बीच खूब पटती थी। उनका प्रदर्शन सरकस में होता था।

उसकी ननद जाली पर्ल का वजन भी 318 किलो था। दोनों के बीच खूब पटती थी। उनका प्रदर्शन सरकस में होता था।

जैक इकर्ड 336 किलोग्राम भारी था और उसकी ऊँचाई 147 इंच। और किसी काम का न रहने से उसने वर्नम ऐण्ड वेली सर्कस में नौकरी कर ली। जहाँ उसे एक माँस के पहाड़ की तरह दिखाया जाता था। उसके लिए एक ट्रक पर घर बनाया गया। उसका अधिकाँश जीवन उसी में बीता। एक दूसरे ट्रक से उसका ट्रक टकरा गया। घायल होने पर अस्पताल जाते-जाते उसकी मृत्यु हो गई। वह 62 वर्ष की आयु तक जिया।

सन् 1904 में इण्डियाना में जन्मी बेबीरूथ 317 किलोग्राम की थी। वह एक खास तरह की कुर्सी पर जमी बैठी रहती थी। कमरे में कुछ कदम भी चल नहीं सकती थी। इस अजूबे को भी सरकस वाले ही जहाँ-तहाँ दिखाने के लिए ले गए।

एवेवरी (इंग्लैण्ड) के एक गाँव में जन्मा फ्रेड आठ फुट पाँच इंच का था। वह माली का काम करता था।

इलिनाम अमेरिका का राबर्ट वैडली 9 फुट का था। वह केवल 22 वर्षा जिया।

शिकागो में जन्मा केनिया का नागरिक 9 फुट लम्बा था। उसे गुजारे के लिए पाकिस्तान का सहारा लेना पड़ा।

प्रशिया के शासक फ्रेडरिक विलियम प्रथम ने पोटास्डम की रक्षा के लिए जो सेना भर्ती की थी। उसमें 2900 सैनिक सात फुट से अधिक ऊँचाई के थे।

फ्रांस के बादशाह फ्रान्सिस प्रथम का दरबान डेनियल साढ़े सात फुट का था।

स्काटलैण्ड का ऐंगस मैकेस्लिक सात फुट नौ इंच का था।

सन् 1846 में पैदा हुई एन्ना स्वान 7 फुट साढ़े सात इंच की थी। उसका पति वेटस उससे कुछ ही इंच छोटा था।

जैक अर्ल, क्लिफर्ड थामसन साढ़े आठ फुट को पार कर चुके थे।

लेविस मिसौरी की इला इविंग साढ़े सात फुट की थीं।

चीन का फूचोमे 1882 में उत्पन्न हुआ अति लम्बा मनुष्य 9 फुट का था।

स्काटलैण्ड का राबर्ट वैडली 9 फुट का था। उसकी खुराक किसी कुश्ती पछाड़ने वाले पहलवान जितनी थी।

आयरलैण्ड का चार्ली वायर्न 8 फुट 3 इंच का था।

लन्दन की नुमाइश में पैट्रिक कार्डर को लोग घूर-घूर कर देखते थे। वह साढ़े आठ फुट का था।

वाशिंगटन के निकट वैनव्रिज टापू का निवासी राबर्ट अर्ल 464 किलोग्राम का है।

वाशिंगटन की एक महिला पर्सीपल 419 किलोग्राम की थी।

अमेरिका का राबर्ट वाडला दुनिया का सबसे लम्बा आदमी है। यह 9 फुट का है। इससे कुछ ही छोटा पाकिस्तान का मुहम्मद आलम चन्न है जो आठ फुट तीन इंच का है।

दुनिया की सबसे लम्बी महिला चीन की साँगैल 8 फुट 1 इंच ऊँची है। अभी भी अमेरिका में एक सवा आठ फुट की महिला एलन कनाडा में मौजूद है।

यह सभी मोटे मनुष्य और महिलायें दूसरों के लिए उपहास का कारण बने, पर स्वयं इस भारीपन और लम्बाई के कारण दुःखी रहे और अल्प जीवन में ही कूच कर गए। अपने को धन ऐश्वर्य के आधार पर भारी बनाने वालों की भी ऐसी ही दुर्गति होती है।


राम में ही समा गये (kahani)

भगवान बुद्ध जब मरने लगे तो रोते हुए अपने प्रिय शिष्य आनन्द को दुलारते हुए उन्होंने कहा, ‘आनन्द, रोओ मत, यह रोने का अवसर नहीं है। स्वयं अपने लिये दीपक बनो। निर्वाण तो नितान्त स्वाभाविक है। उसके लिये तो पहले से ही तैयार रहना है।’ बिल्सन ने मृत्यु की बेला में मुस्कराते हुए किसी अज्ञात से कहा, ‘मैं तो बिलकुल तैयार हूँ और उन्होंने आँखें मूँद लीं। वाल्टेयर ने उपस्थित लोगों से मरते समय कहा, आप लोग, गड़बड़ न करें, शान्ति से मरने दें। बेटे ने भरण की उपस्थिति को प्रकाश के रूप में देखा और वे बड़े उत्साह से चिल्लाये प्रकाश-प्रकाश, अनन्त प्रकाश। इतनी अनुभूति व्यक्त करते उनकी वाणी मौन हो गई। स्वामी दयानन्द ने सन्तोष भरी लम्बी साँस खींची और कहा, ‘हे! दयामय तेरी इच्छा पूर्ण हो।’ गाँधी जी के मुख से अन्तिम शब्द निकला, ‘हे राम’ और वे राम में ही समा गये।


ज्योतिर्विज्ञान की असंदिग्ध प्रामाणिकता

मनुष्य की प्रकृति एवं उसके स्वभाव का गहरा सम्बन्ध ज्योतिर्विज्ञान से है। जिसके अंतर्गत पिण्ड और ब्रह्माण्ड-व्यष्टि और समष्टि- आत्मा और परमात्मा के सम्बन्धों का अध्ययन सम्मिलित रूप से किया जाता है। ग्रह, नक्षत्र, तारे, राशियाँ, मन्दाकिनियाँ, निहारिकाएं एवं मनुष्य, प्राणी, वृक्ष, चट्टानों आदि विश्वब्रह्माण्डीय घटक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक दूसरे को प्रभावित आकर्षित करते हैं। इन ग्रह नक्षत्रों का मानव जीवन पर सम्मिलित प्रभाव पड़ता है। वे कभी कष्ट दूर करते हैं तो कभी कष्ट भी देते हैं। ये तत्व मनुष्य की सूक्ष्म संरचना एवं मनः संस्थानों पर कार्य करते हैं और उसकी भावनाओं तथा मानसिक स्थितियों को अधिक प्रभावित करते हैं। ज्योतिर्विज्ञान के अध्ययन और उपयोग से ज्योतिषी को मानव जीवन के सभी क्षेत्रों के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्राप्त हो जाती है।

आरंभिक काल से ज्योतिर्विज्ञान अध्यात्मविज्ञान की ही एक शाखा थी। इसे एक पवित्र विद्या माना जाता था जिसका स्वरूप स्पष्टतः धर्म विज्ञान पर आधारित था। अपने इसी रूप में इसने चालडियन एवं मिस्री धर्मों तथा प्राचीन भारत, चीन एवं पश्चिमी योरोप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय इसकी विश्वसनीयता असंदिग्ध मानी जाती थी और उसका प्रचार-प्रसार लगभग विश्व के समस्त भागों में था। परन्तु मध्यकाल में ज्योतिर्विज्ञान पर अनेकों आघात हुए और अल्पज्ञ तथा निहित स्वार्थी लोगों के हाथों पहुँच जाने पर इस विद्या की अवनति हुई। ज्योतिष की मूलभूत तत्व मीमाँसा एवं उसके आध्यात्मिक तत्व दर्शन से उस समय के ज्योतिषी बहुत अंशों में अनभिज्ञ थे। उन्होंने ज्योतिर्विद्या के केवल उन सिद्धान्तों पर अमल किया जिसका मेल नये याँत्रिक भौतिक विज्ञान के तथ्यों से बैठता था। उस समय केवल वही सिद्धान्त मान्य रहे जो दृश्य जगत् की बाह्य भौतिक घटनाओं एवं तथ्यों पर आधारित थे। केपलर के ज्योतिष विज्ञान को ग्रहों के चाल पर आधारित मानने के कारण भी ज्योतिष विज्ञान की दुर्गति हुई।

वास्तव में ज्योतिर्विज्ञान के सिद्धान्तों का सुदृढ़ आधार अभौतिक एवं आध्यात्मिक है। इसे भौतिक यंत्रवाद और मात्र ग्रहों, तारों, राशियों एवं भावों को निर्धारण करने वाले एवं व्यवस्था क्रम दर्शाने वाले खगोलीय विज्ञान के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इस स्थिति से बचने के लिए समय-समय पर कुछ महान संत ज्योतिषियों ने अपने-अपने सुधार प्रयत्न भी प्रस्तुत किये। आठवीं सदी में हिन्दुओं की खगोल विद्या एवं ट्रिगनामेट्री पर लिखे गये प्रख्यात शोध ग्रंथ- “सिद्धान्तस्”, तेरहवीं शताब्दी के योरोपीय ज्योतिषी गीडी बोनाटी का लैटिन भाषा में लिखा गया ग्रंथ- “लिबर एस्ट्रोनामिया” और सत्रहवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध संत ज्योतिषी जीनमोरिन की श्रेष्ठ रचना- “एस्ट्रोलाजिया गोल्लिका” में ज्योतिष का प्रतिपादन विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक एवं तात्विक सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। ज्योतिष विज्ञान के क्षेत्र में इन रचनाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। आधुनिक ज्योतिर्विज्ञान इन्हीं कि देन है।

मूर्धन्य ज्योतिर्विद् राबर्ट जोलर ने अपनी पुस्तक “द लास्ट की टू प्रेडिक्सन”- (द अरेबिक पार्ट्स इन एस्ट्रालॉजी) में अरबी ज्योतिष तत्व के प्राचीनतम किन्तु अत्यन्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण सिद्धान्त पर प्रकाश डाला है। अरेबिक पार्ट्स से संबंधित सिद्धान्त प्राचीन काल से ही प्रचलित हैं और वे मानव जीवन के सभी क्षेत्रों पर गहराई से प्रकाश डालते हैं। इस पुस्तक में ज्योतिष के 97 मूलभूत पार्ट्स दिये गये हैं, जो प्राचीन समय में प्रयुक्त होते थे। इसके अतिरिक्त 73 अन्य पार्ट्स भी प्रस्तुत किये गये हैं जिन्हें मध्यकालीन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया गया था। इस ग्रंथ की विशेषता है कि यह मनुष्य के दिव्य स्वरूप की ओर इंगित करता है और ज्योतिर्विज्ञान के माध्यम से मनुष्य के आत्मतत्व की उस महानता को उद्घाटित करता है जिसमें मान हाड़ माँस का पुतला और यंत्रवत संचालित मशीन मात्र नहीं वरन् वह इस धरती का मुकुटमणि ईश्वर का अविनाशी अंश उसका वरिष्ठ राजकुमार है। जो इस विश्व ब्रह्माण्ड में समष्टि में विद्यमान है, वही व्यष्टिगत मानवी काया में सूक्ष्म रूप में विद्यमान है। सृष्टि के कण-कण में विराजमान सृष्टा मनुष्य के पवित्र हृदय में बैठा उसे ऊर्ध्वगामी बनने के लिए सदैव प्रेरित करता रहता है।

अरेबिक पार्ट्स के अनुसार ज्योतिष की सम्पूर्ण कला जिसमें पार्ट्स की कला भी सम्मिलित है, अंक- संख्या पर आधारित है। ज्योतिर्विज्ञान को जानने के लिए सर्वप्रथम उसके कार्य कारण संबंधी ज्ञान की जानकारी होना आवश्यक है। संसार के सभी पदार्थ मूल रूप में एक ही तत्व से बाहर निकले हैं। ज्योतिष का प्रथम मूल तत्व-फर्स्ट प्रिंसिपल एक अद्वितीय चेतन सत्ता मोनेड- परमात्मा है। यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड का- समष्टि जीवन का आधारभूत मूल तत्व है। जिसे ही अध्यात्मवादियों- संतों ने विभिन्न नामों से पुकार है। ज्योतिर्विज्ञान का प्रथम सिद्धान्त मनुष्य को आत्म-सत्ता की महानता से परिचय कराता है, जिससे सम्पूर्ण जीव जगत की विराट् सत्ता समाविष्ट है।

“हरमेटिक सिद्धान्त” के अनुसार- जो नियम-विधि विधान सृष्टि-विश्व ब्रह्माण्ड में लागू हैं वे ही पिण्ड-व्यष्टि अर्थात् मनुष्य में भी लागू हैं। मनुष्य और सृष्टि समान नियमों से बँधी हुई हैं। अतः जेनेथियोलाजी एवं मुण्डेन एस्ट्रालॉजी- लौकिक ज्योतिष के माध्यम से पिण्ड और ब्रह्माण्ड का अध्ययन साथ-साथ किया जाता है। मनुष्य की प्रकृति एवं स्वभाव का गहरा संबंध ज्योतिर्विज्ञान से होने के कारण प्राचीन दार्शनिक ज्योतिषियों ने मानव प्रकृति समझने पर बहुत अधिक जोर दिया है। कुछ प्रमुख दार्शनिक ज्योतिषियों- हेनरी कार्नेलियस एग्रीपा, गिआरडेनो ब्रूनो, हरमेस ट्रिसमेजिस्टस एवं पिकोडेला मिरानडोलो ने अपनी-अपनी रचनाओं में मानव प्रकृति और विश्व ब्रह्माण्ड से उसके सम्बन्धों की पूर्ण विवेचना प्रस्तुत की है। इन्होंने कहा है कि मनुष्य की आत्मा एक तात्विक अंक है, जिसका प्रकटीकरण सीधे ईश्वर से होता है। मानव आत्मा एक अलौकिक दिव्य प्रकाश है। यह अविकारी, एकरस, आत्मनिर्भर, सर्वज्ञ एवं सभी शरीरों एवं भौतिक पदार्थों से परे है। यह मूल तत्व ही सही अर्थों में मनुष्य है।

दार्शनिक ज्योतिषी एग्रीपा ने अपनी रचना में बताया है कि मनुष्य का विश्व ब्रह्माण्ड और मोनेड-ईश्वर से क्या संबंध है। उन्होंने आगे कहा है कि इस जगत का केन्द्र बिन्दु ईश्वर ही है और उसी से सृष्टि का स्फुरण हुआ है। इन दार्शनिक ज्योतिषियों ने यह भी प्रतिपादित किया है कि ईश्वर विश्व ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है। ब्रूनो, हरमेस और मिरानडोला के मतानुसार मनुष्य विश्वब्रह्मांड के मध्य में स्थित है। अतः ईश्वर और मनुष्य दोनों में समानता है, दोनों एक दूसरे के अनुरूप हैं। दोनों की अनुरूपता एवं मिलन का स्थान मनुष्य का हृदय ही हो सकता है। यही जगत का केन्द्र भी है। ईश्वर मनुष्य एवं विश्व ब्रह्माण्ड में स्वरूपतः अभिन्नता, समरूपता एवं मूलभूत एकता होने के कारण ही सभी धर्मों एवं तत्व दर्शनों में हृदय की पवित्रता-शुचिता पर बहुत जोर दिया गया है।

ज्योतिर्विदों के अनुसार मनुष्य की जन्मराशि हृदय की आकृति को चित्रित करती है। जिस तरह इसी मैक्रोकाज्म-विश्व-ब्रह्माण्ड में स्वर्ग लोक है और यह विश्वब्रह्माण्ड मनुष्य के हृदय में स्थित है। उसी प्रकार जिस मनुष्य की जन्मपत्री बनाई जाती है, उसके जन्म-पुनर्जन्म लेने के समय आकाशीय राशि उसके हृदय की प्रतिमूर्ति होती है। ये ज्योतिष की राशियां या अंक पुनर्जन्म लेने वाले मनुष्य विशेष अथवा विश्व ब्रह्माण्ड के हृदय के संकल्पों-इच्छाओं की प्रतिमूर्ति भी होती है।

खगोल विज्ञान में आकाशीय भौतिक नक्षत्रों एवं ग्रहों का अध्ययन किया जाता है जबकि ज्योतिष विज्ञान में मनुष्य के हृदय में स्थित ग्रहों एवं नक्षत्रों का अध्ययन किया जाता है। अर्थात् मानव हृदय में स्थित आन्तरिक ग्रहों एवं तारों की गति का समय सूचित करने के लिए ही भौतिक नक्षत्रों का उपयोग किया जाता है। इस तथ्य को समझे बिना ज्योतिर्विज्ञान के सिद्धान्तों को भली भाँति हृदयंगम नहीं किया जा सकता।

मानव जीवात्मा के केन्द्र हृदय का सृष्टि के केन्द्र से अनुरूपता होने के फलस्वरूप संकल्प स्थल हृदय में विविध प्रकार के विश्व ब्रह्माण्ड घटना चक्र जैसे- राजनैतिक, मौसम संबंधी, प्राकृतिक प्रकोप, जन्म क्रम में अन्तर, आध्यात्मिक धार्मिक परिवर्तन, सम्प्रदायों का उत्थान-पतन, युगपरिवर्तन आदि तथा व्यक्तिगत मानवी जीवन के घटना चक्र उदय होते रहते हैं। व्यक्ति एवं जगत में उनके उदय हो जाने पर उक्त विभिन्न इच्छाएं निर्धारित ईश्वरीय नियमों के अनुसार समय-समय पर प्रकट होती हैं। इन निर्धारित नियमों की झलक इस रूप में देखी जा सकती है किस तरह व्यवस्थित रूप में सौर मण्डल के समस्त ग्रह अपने सूर्य के तथा विश्व-ब्रह्माण्ड के सूर्य महासूर्य की परिक्रमा करते हैं। यह क्रम हिन्दुओं के कर्म सिद्धान्तों पर भी लागू होता है।

मनुष्य के शरीर के समान ही जगत का भी विराट् शरीर है। उसकी समस्त विविधताएँ एवं भिन्नताएँ मूलभूत एकत्व से ही प्रस्फुटित होती हैं तथा वे सभी अंक स्वरूप ही होती हैं। इन अंकों द्वारा सभी पदार्थों का स्वरूप एवं व्यवहार तथा कार्यविधि मापा जाता है। सृष्टि के भीतर पाया जाने वाला सामंजस्य एवं सुव्यवस्था बुनियादी रूप में संख्यापरक है इसलिए गूढ़ एवं रहस्यमय ज्योतिर्विज्ञान भी संख्या-अंक आधारित है।

प्रख्यात ज्योतिर्विद् दार्शनिक बोथियस से अपनी कृति ‘फर्स्ट नेचर आफ दी थिंग्स’ में लिखा है कि प्रथम अनादि सत्ता से जब सृष्टि के सभी पदार्थों की रचना हुई तब ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी रचना संख्या के अनुपात से की गई। वास्तविक रूप यह सृष्टा का आद्य स्वरूप ही है कि वह जगत के रूप में अपनी अभिव्यक्ति अंकों के अनुपात से करता है। सुप्रसिद्ध दार्शनिक ज्योतिषी जॉन डी ने इस संबंध में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है कि संख्या का तिगुना स्वरूप होता है- प्रथम स्वरूप सृष्टि कर्त्ता में, दूसरा सभी प्राणियों में और तीसरा देवदूतों, दिव्य आत्माओं एवं मनुष्य की आत्मा में होता है। मनुष्य की आत्मा से अंक-संख्या की इतनी अधिक घनिष्ठता एवं सजातीयता है, इसका इतना अधिक प्रभाव है कि कुछ प्राचीन दार्शनिकों ने अपना मत व्यक्त करते हुए आत्मा को अंकस्वरूप कहा है। जॉन डी के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ईश्वरीय ज्ञान के फलस्वरूप जगत के सभी पदार्थों की उत्पत्ति सुव्यवस्थित ढंग से हुई। ग्रह, नक्षत्र, तारे, राशियाँ, मनुष्य तथा परमाणु साथ-साथ और अविभाजित रूप से एक हैं और इनकी अनुभूति एक शुद्ध पूर्ण सत्ता के रूप में ही की जा सकती है। अंकों के आदि रूप का महत्व है, जिसके अनुसार सृष्टि की रचना हुई। इसलिए अंक सृष्टि जगत की विभिन्नताओं एवं अनेकताओं को प्रकट करने का माध्यम है। जिसके निमित्त से मूल चेतन स्वरूप दिव्य प्रकाश शक्ति ग्रहों तथा राशियों के रूप में स्वयं को रूपांतरित करता है। यह अनन्त प्रकाश ही प्राण को प्रज्वलित करता है तथा प्राण को शाश्वत और अनंत सत्ता के साथ जोड़ता है। यह सारा काम एक से दस अंकों तक पूरा हो जाता है। दूसरे शब्दों में सृष्टि का सम्पूर्ण रचनाक्रम और उसका प्रकटीकरण दस चरणों में पूरा होता है। इन अंकों से यह विदित होता है कि किस प्रकार अज्ञात अव्यक्त स्रोत से मूल उद्गम अज्ञेय स्रोत में समा जाना हुआ।

यथार्थ में सृष्टि के रचना क्रम को समझाने तथा मानवी आत्म सत्ता के विराट् स्वरूप से परिचित कराने- उसकी गौरव गरिमा का बोध कराने एवं उसका सदुपयोग करने के उद्देश्य से ही ज्योतिर्विज्ञान की रचना की गई थी। परन्तु वर्तमान समय में ज्योतिष का स्वरूप ही बदल गया है। आजकल के प्रचलित फलित ज्योतिष, अंक ज्योतिष के आधार पर लोगों को उनके भविष्य बताकर, ग्रह-नक्षत्रों के बुरे प्रभाव बताकर एवं डरा धमका कर उनसे अपना उल्लू सीधा करना और उन्हें उल्टे उस्तरे से मूड़ना तथाकथित आधुनिक ज्योतिषियों का उद्देश्य रह गया है। इस माध्यम से अर्थोपार्जन करना उनका धंधा बन गया है। यह प्रचलन विशुद्ध रूप से ज्योतिर्विज्ञान का मखौल उड़ाना है। लाभ के स्थान पर इससे लोगों को अनेकों मानसिक परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं, गाँठ का पैसा तो कटता ही है।

वास्तव में ग्रह नक्षत्रों में या पदार्थों में कोई अच्छाई या बुराई नहीं होती। यह तो मात्र मनुष्य की अपनी आकर्षण शक्तियों के अनुसार भले-बुरे परिणाम देते हैं। दृढ़ संकल्प वाला व्यक्ति इनके कुप्रभावों से बच जाता है परन्तु कमजोर व्यक्ति इनसे पीड़ित रहता है। सफलता-असफलता और सुख-दुःख वास्तव में मनुष्य के भले बुरे चिंतन के ही परिणाम हैं। इसके अनुसार ही ग्रह, नक्षत्रों का प्रभाव पड़ता है।


कान व आँख खुले रखें

जो प्रत्यक्ष रूप से दीख पड़ता है, वही सब कुछ नहीं है। इसके अतिरिक्त भी अपने इर्द-गिर्द ऐसा बहुत कुछ भरा हुआ है, जिसकी जानकारी सूक्ष्म निरीक्षण, परीक्षण एवं अन्वेषण से ही जानी जा सकती है। इस विधा को यदि विकसित न किया जाय तो हमारा ज्ञान पुरातन मान्यताओं और किंवदंतियों तक ही सीमित रह जायगा।

खुली आँखों से सौर मण्डल के पाँच ग्रह हमें दीखते हैं। बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि। सूर्य इनका केन्द्र है। पृथ्वी पर हम रहते हैं, इसलिए उसकी उतनी ही भूमि देख पाते हैं जो आँखों या दूरबीनों की पकड़ में आती है। चन्द्रमा पूर्ण ग्रह नहीं है, पृथ्वी का उपग्रह मात्र है। इसकी जानकारी बहुत पहले से ही उपलब्ध हो चुकी है।

अब पिछली शताब्दी में और इस शताब्दी में तीन और नये ग्रह खोज निकाले गये हैं- (1) यूरेनस (2) नेपच्यून (3) प्लूटो। इस प्रकार सौर मण्डल में तीन नये सदस्य और शामिल हुए। इन सभी के अपने-अपने चन्द्रमा हैं। इसकी जानकारी खोजी उपग्रह ‘वायजर -दो’ ने दी है। अब समूचे सौर मण्डल में 60 चन्द्रमा हो गये हैं। कोई अपने चन्द्रमा से छोटे, कोई बड़े।

यूरेनस पृथ्वी से बहुत दूर है। यह दूरी सूर्य और पृथ्वी की दूरी की अपेक्षा 29 गुनी अधिक है। यूरेनस का भार पृथ्वी से 24 गुना अधिक है। वह 84 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करता है, इसलिए, 42 वर्ष सर्दी और 42 वर्ष गर्मी रहती है। वह अपनी धुरी पर तेजी से चक्कर लगाता है इसलिए उसके दिन-रात हमारी अपेक्षा 25 गुने अधिक बड़े होते हैं। यूरेनस की चाल अन्य ग्रहों की तुलना में उल्टी समझी जाती है। वहाँ पश्चिम में सूर्य उदय होता है और पूर्व में अस्त। उसके ऊपर 20 किलोमीटर ऊँचा हाइड्रोजन और मीथेन का मिश्रित वायुमंडल है। साथ ही उसके 25 चन्द्रमा भी हैं, जो बारी-बारी से निकलते हैं और कभी-कभी एक साथ भी।

उल्काओं में न केवल धातुएँ, चट्टान और रसायन मिले हैं, वरन् ऐसे जीवकोष भी पाये गये हैं, जो जीवन को स्वतन्त्र रूप से अस्तित्व में लाने के आधार हो सकते हैं। पृथ्वी पर जीवन समुद्र से एक कोषीय जीवों के रूप में विकसित हुआ। इस मान्यता को यह उल्काएँ काटती हैं, जिनमें समग्र जीवन के विकसित जीवाणु पाये गये हैं। इन्हें शरीरधारी कैसे बताया जा सकता है यही पेचीदा प्रश्न है।

यह भी कहा जाता है कि धूमकेतु जब किसी ग्रह तारक के समीप पहुँचते हैं तो वे भी जीवाणुओं और विषाणुओं की बौछार फेंकते हैं। उनमें जीवन का अस्तित्व पाया गया है। यह सुविधा पाकर कहीं अपनी सत्ता का स्वतन्त्र परिचय भी दे सकता है ओर प्राणियों की उत्पत्ति कर सकता है।


Quotation

क्या आप बतायेंगे मूर्ख कौन है और बुद्धिमान कौन? एक बार एक मित्र ने प्रेसीडेन्ट जानसन से यह प्रश्न किया। जानसन ने सहज भाव से उत्तर दिया- जो केवल अपने अनुभवों को प्राथमिकता देता है, उन्हें ही सब कुछ मानता है वह मूर्ख है। जो दूसरों के अनुभवों से भी लाभ उठाये वह बुद्धिमान्। जानसन ने इसी तारतम्य में मुस्कराते हुये कहा- और जो अपने, पराये किसी के अनुभव से लाभ न उठाये वह तो निरा पशु ही कहा जायेगा।

ग्रीनलैण्ड में एक निकिल और लोहे जैसी मिश्रित धातु का उल्का पिण्ड गिरा। वह 67 टन का था। वायु का घर्षण उसे गरम भर कर सका, जला नहीं सका।

उत्तरी कनाडा में एक उल्कापात के कारण 70 फुट गहरा क्रेटर बना। उसकी लम्बाई एक सिरे से दूसरे सिरे तक 6 मील थी।

हम जो कुछ जानते और समझते रहे हैं, उसी को सब कुछ न मानते हुए हमें यह भी सोचना चाहिए कि जानने योग्य अभी बहुत कुछ बाकी है। उसे जानने के लिए हमें अपने कानों और आँखों को खुला ही रखना चाहिए।


शक्ति सम्प्रेषण का तत्वज्ञान

विचार हमारे मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा तरंगें हैं। जो कल्पना, बुद्धिमत्ता, प्रतिभा आदि अनेक रूपों में निरन्तर गतिशील रहती हैं। जीवन अनेकानेक भागों में बंटा हुआ है। उसे प्रत्यक्ष जीवन से संबंधित अनेकों कार्यों में व्यस्त रहना पड़ता है। अस्तु वह स्थिर नहीं रह पाती, सदा इधर से उधर उड़ती रहती है। भगदड़ में थोड़ा थोड़ा प्रयोजन सभी का पूरा होता है, पर स्थिरता एवं एकाग्रता के आधार पर किसी विशेष प्रयास में जो प्रवीणता, पारंगता होनी चाहिए वह नहीं हो पाती।

सांसारिक महत्वपूर्ण प्रयोजनों में एकाग्रता की ही महती भूमिका होती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार, यहाँ तक कि सरकस के नट तक अपनी एकाग्रता के सहारे ही आश्चर्यजनक सफलताएँ प्राप्त करते देखे जाते हैं। बिखरे विचारों वाले अस्त-व्यस्त, अनिश्चित होते हैं, पर जिन्हें एकाग्रता में रस आने लगता है वे मन्दबुद्धि होते हुए भी कालिदास, वरदराज की तरह उच्चकोटि के विद्वान हो जाते हैं। द्रौपदी स्वयंवर के समय अर्जुन का लक्ष्य बेध उसकी संसाधित एकाग्रता का ही प्रतिफल था।

अध्यात्म जगत में भी अनेकानेक साधनाओं का उद्देश्य एकाग्रता को हस्तगत करना है। इसी निमित्त ध्यान, नाद और प्राणायाम की त्रिविधि साधनाएँ की जाती हैं। एकाग्रता से यह साधनाएँ सफल होती हैं अथवा इन साधनाओं के सहारे एकाग्रता की सिद्धि होती है। यह नहीं कहा जा सकता।

दो व्यक्तियों के बीच घनिष्ठता उत्पन्न करने की प्रक्रिया भी इसी आधार पर सम्पन्न होती है। माता और बालक, पति और पत्नी एक दूसरे का जितनी तन्मयता से ध्यान करते हैं, उसी अनुपात से वे न केवल मैत्री बढ़ाते हैं वरन् एक दूसरे के प्रति सूक्ष्म आदान-प्रदान का सिलसिला भी चालू कर देते हैं।

इस मार्ग का उपयोग ओछे प्रयोजनों के लिए भी किया जा सकता है। ताँत्रिक वर्ग के लोग इसी क्षमता को कुत्सित स्तर पर विकसित करके मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि की सिद्धि प्राप्त करते हैं और परायों को नुकसान पहुँचाकर अपनों को लाभ देने के बदले उपहार भी प्राप्त करते हैं। यह उपहार प्रतिष्ठा एवं धन दोनों ही रूपों में हो सकता है। पर यह तरीका घिनौना है। ऐसा ही जैसा-कि किराये के हत्यारे या गुण्डे अपना अनैतिक धंधा चलाते हैं।

घनिष्ठता का एक और तरीका है। स्नेह, आत्मभाव एवं समर्पण। इस सम्मिश्रण को भक्ति कहते हैं। भाव जगत में इस भक्ति की भी असाधारण शक्ति मानी गयी है। यह व्यक्तियों के साथ भी जुड़ सकती है और अदृश्य शक्तियों के साथ भी। मीरा और रामकृष्ण परमहंस ने अदृश्य शक्तियों को वशवर्ती एवं साकार कर लिया था। एकलव्य ने अपनी भावना से ही एक ऐसा गुरु विनिर्मित कर लिया था जो द्रोणाचार्य की तुलना में अधिक ही सक्षम था।


Quotation

अगर किसी और को न रोक सको तो कम से कम जुबान पर जरूर लगाम लगाओ, ताकि वह कटु वचन बोलने की उद्दंडता न कर पाये।

विचारों और क्षमताओं का आदान-प्रदान इस आकर्षण शक्ति के सहारे भी हो सकता है। पर यह द्विपक्षीप होना चाहिए। टेलीफोन के दोनों सिरों पर विद्युत प्रवाह होना चाहिए। एक ओर बिजली न हो तो वह काम नहीं करेगा। रेडियो ब्राडकास्ट व्यापक अन्तरिक्ष में फैलता है पर उसे पकड़ा सुना वहीं जा सकता है जहाँ रेडियो या ट्रांजिस्टर उपकरण भी विद्यमान हों। हवा मात्र के माध्यम से वायरलैस नहीं सुना जा सकता है। सामान्य शब्दों की गति धीमी होती है, थोड़ी ही दूर तक चलकर समाप्त हो जाती है। किन्तु इसी वाणी से जब विद्युत प्रवाह जुड़ जाता है तो संसार के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक पहुँच जाती है।

कछुवी रेत में अण्डे देती है स्वयं पानी में चली जाती है किन्तु वहीं से अपनी प्राण शक्ति अंडे तक भेजती रहती है। उस पोषण के सहारे वह पकता और पलता रहता है। यदि किसी कारणवश इसी बीच कछुवी की मृत्यु हो जाती है तो बालू में गड़ा हुआ अंडा वहाँ सड़ जाता है। पकता और बढ़ता नहीं। यही बात सिद्ध पुरुषों में भी देखी गई है। वे अपने वरिष्ठ शिष्यों को अपनी शक्ति हस्तान्तरित करते रहते हैं। उन्हें इसके लिए समीप जाने और आने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह कार्य टेलीविजन की तरह होता रहता है और एक स्थान के दृश्य एवं कथन दूसरे स्थान तक पहुँचते रहते हैं। अध्यात्म प्रयोजनों में इसके साथ-साथ शक्ति भी चलती है। जनरेटर अपने स्थान पर गतिशील रहता है पर तारों के माध्यम से उसकी शक्ति दूसरे स्थानों तक जा पहुँचती है और अपनी शक्ति से छुट-पुट उपकरणों को भी भली भाँति चलाता रहता है।

सभी सिद्ध पुरुष आदि से अन्त तक शक्ति उपार्जन पूरे का पूरा स्वयं ही नहीं कर लेते। ऐसा करने में ही उसे क्रमिक विकास के अनुसार हजारों वर्ष भी लग सकते हैं। पर जल्दी तब होती है जब शिष्य को अनुदान में यह सब भी मिलता रहता है। विवेकानन्द के पास अपना निज का उपार्जन नहीं था। उन्हें वह रामकृष्ण परमहंस से अनुदान में मिला था। इसी प्रकार साधना क्षेत्र में अनुदानों के और भी अनेक उदाहरण हैं।

गुरुदेव को उनके हिमालय वासी गुरु के अनुदानों का अनुग्रह सर्वविदित है। इन्हीं के सहारे उनसे विगत जीवन में वह कार्य बन पड़े जो दस समर्थ व्यक्ति मिलकर भी नहीं कर सकते।

विगत बसंत पर्व पर सत्र में आये हुए परिजनों से कहा था कि आप लोग किसी पूछताछ के लिए हरिद्वार आने का कष्ट न उठाया करें और इतना किराया भाड़ा खर्च न किया करें। दूर प्रेषण की इतनी सिद्धि तो हमें अपनी दो वर्ष की साधना में ही मिल गई है कि आवश्यकता पड़ने पर हम आप में से किसी आमंत्रित करने वाले तक अपने विचारों का सम्प्रेषण कर सकें।

इसका सरल तरीका यह है कि रविवार के दिन प्रातःकाल शुद्ध होकर दस बार लम्बी सांसें खींच। इसमें छाती से लेकर पेट तक पूरी सांस भरी जानी चाहिए और फिर धीरे-धीरे उसे पूरी तरह बाहर निकाल देना चाहिए। इसके बाद दाहिना हाथ दस बार सिर पर पीछे से आगे की ओर फिराया जाय। ऐसा करने से अपने निज के प्रश्न, निज के कल्पनात्मक उत्तर बाहर निकल जायेंगे। मस्तिष्क खाली हो जायेगा। नेत्र बन्द कर लें। ध्यान करें कि हरिद्वार से हमारी जिज्ञासाओं का उत्तर अन्तरिक्ष के माध्यम से चला आ रहा है और अपने मस्तिष्क में उभर रहा है। इसके उपरांत नये प्रकार के विचार मस्तिष्क में भ्रमण करना शुरू करेंगे। इन्हें ध्यानपूर्वक समझें और अपनायें। प्रतीत होगा कि आपकी समस्याओं का ऐसा समाधान सुझाया गया है जिससे प्रस्तुत कठिनाई का निराकरण भी हो जाय और नैतिक स्तर पर आप यथावत् बने रहें और आगे बढ़ते रह सकें।

उपरोक्त उपचार मात्र साँसारिक समस्याओं के समाधान संदर्भ में ही नहीं हैं वरन् इस दृष्टि से भी हैं कि जिन्हें आन्तरिक प्रगति और शान्ति की अपेक्षा है वे भी अभीष्ट आवश्यकता की पूर्ति कर सकें।


अहिंसा धर्म पालन करने लगा (kahani)

एक असुर मुनि सत्संग से अहिंसा धर्म पालन करने लगा। उसने हिंसा छोड़ दी। वह एक गुफा में चिरकाल से रहता आ रहा था।

वर्षा हुई, भीगता हुआ व्याघ्र उस गुफा में घुस गया। असुर देर से आया। उसने आये हुए अतिथि की सुविधा का ध्यान रखते हुए स्वयं समीपवर्ती पेड़ के नीचे रात काटी। सवेरा होते ही व्याघ्र ने भीगते असुर का उपकार तो नहीं माना उल्टा उस पर आक्रमण करके मार डाला।

जो मुनि अहिंसा धर्म का उपदेश देते और दया उपकार की महिमा गाया करते थे उन्हें भी इस घटना को सुनकर दुःख हुआ और कहने लगे- पात्र कुपात्र का भी उदारता बरतते समय सतर्कतापूर्वक ध्यान रखना आवश्यक है।


कामुकता का भ्रमजंजाल

पाश्चात्य मनोविज्ञान ने यह प्रतिपादित किया है कि मनोविकारों का दमन न किया जाय अन्यथा वे दमित होकर कई प्रकार की कुँठाएँ उत्पन्न करते हैं। मानसिक संतुलन को गड़बड़ा देते हैं और शारीरिक रोगों का सृजन करते हैं। उद्विग्न मन वाला मानसिक और शारीरिक दोनों ही प्रकार के स्वास्थ्य गँवा बैठता है।

स्वाभाविक इच्छाओं में वे कामुकता को प्रधानता देते हैं। उसे जन्मजात और सदा रहने वाली भी मानते हैं। उसके समाधान का उपाय काम सेवन की तृप्ति बताते हैं। आनाकानी करने पर कई प्रकार के शारीरिक-मानसिक रोग होने का भय दिखाते हैं। अजीब है यह मनोविज्ञान और अजीब हैं उनके शोध निष्कर्ष। इन्हें सही मानकर चला जाय तो मनुष्य जाति को ऐसे दलदल में फँसना पड़ेगा कि उसमें से निकल सकना ही संभव न रहे।

बच्चे द्वारा माँ का दूध पीने को इन मनोविज्ञानियों ने रति आनंद के समकक्ष बताया है। यदि इस स्तन पान को रति सुख गिना जाय तो आयु बढ़ने के साथ-साथ वह उत्कंठा भी प्रबल होती जानी चाहिए और वयस्क होने तक बालक को माता का दूध ही पीते रहना चाहिए। यह किस प्रकार संभव है।

कामुकता अन्यान्य जीव जन्तुओं में शारीरिक उमंग के रूप में उठती है और गर्भाधान का प्रयोजन पूरा करके कुछ ही समय में शान्त समाप्त हो जाती है। यह प्रस्ताव आमतौर से मादा ही करती है, क्योंकि गर्भ धारण उसी को करना पड़ता है। इस संदर्भ में काम आने वाले भीतरी प्रजनन अंग जब अपने लिए काम माँगते हैं, तो मादा का मन यौनाचार के लिए उत्साह प्रकट करता है। नर उसकी स्थिति को पहचानने के उपरान्त समाधान का सहयोग कर देना है। पशु पक्षियों में- कीट पतंगों में यही प्रथा चलती है परन्तु उस में इच्छा की प्रधानता मादा ही करती है। बिना उसका प्रस्ताव आगे आये, नर झुण्ड में साथ-साथ रहते हुए भी मादा से किसी प्रकार छेड़खानी नहीं करता। सार्वभौम मनोविज्ञान यही है। कामुकता और उसकी तृप्ति का अनुबंध भी यहीं है। मनुष्य भी प्रकृति परिवार का एक सामान्य प्राणी है। उसके ऊपर भी वही नियम अनुबंध लागू होते हैं, जो अन्य प्राणियों पर। फिर मनोवैज्ञानिकों का यह प्रतिपादन किस प्रकार व्यवहृत हो सकता है कि मनुष्य की इच्छाएँ कामुकता प्रधान हैं उनका दमन नहीं किया जाना चाहिए। तृप्ति से ही चैन पड़ता है, अन्यथा स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।

यह प्रस्ताव ऐसा है जिसे मनुष्य के सभ्यताभिमानी ढाँचे के अंतर्गत किसी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। समाज में विवाह एक अनिवार्य बंधन है। उसके कानूनों में ढील या कड़ाई हो सकती है पर विवाह तो विवाह ही है वह आदिम लोगों में भी होता है। यहाँ तक कि कई पशु पक्षी तक जोड़ा बनाकर रहते हैं। एक दूसरे पर अपने अधिकार की स्वेच्छा स्वीकृति देते हैं। मनुष्यों में तो यह प्रचलन सभ्यता का प्रमुख आधार समझकर उसे माना अपनाया जाता है। नारी की वासना गर्भ धारण करते ही शान्त हो जाती है, पर मनुष्य के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उसने काम को एक कौतुक, विनोद और रसास्वादन जैसा मान लिया है। हर घड़ी नवीनता खोजता है। इस प्रकार उसकी शारीरिक तृप्ति एक ही से भले हो जाय, पर मानसिक तृप्ति के लिए तो अलिफ लैला जैसी नित नई शृंखला चाहिए। इतने पर भी मन की कल्पनाओं का क्या ठिकाना। उनका परीलोक तो हर घड़ी नया बन सकता है और फिल्म की लड़ी में उसे बदला जा सकता है। इतना उपभोग किस प्रकार संभव हो सके और फिर अभीष्ट तृप्ति किस प्रकार मिल सके। यदि इसी तृप्ति पर शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन टिका है तो उस बालू की भीत का गिरना निश्चित है। वह देर तक अपने पांवों पर खड़ी नहीं रह सकती। उसका प्रस्तावित उपचार वर्तमान मनुष्य की सामाजिक- पारिवारिक व्यवस्था रहते तो बन नहीं सकता। नये सिरे से नया स्वेच्छाचारी समाज गढ़ा जाय तो बात दूसरी है। उसमें भी बालकों, वृद्धों, नपुंसकों की इच्छा फिर भी अतृप्त ही बनी रहेगी और स्वास्थ्य संकट खड़ा ही रहेगा।

मान्यताएँ सर्वथा अधूरी और बेतुकी हैं। मन की मूलभूत संरचना को देखने से प्रतीत होता है कि जिस बात को जितने अधिक रसास्वादन का समावेश करते हुए स्मरण किया जाय वह मनःलोक पर उतनी ही गहराई तक छाती चली जायगी। जिसे स्मरण ही न किया जाय, जिसका महत्व ही अविदित अथवा स्वल्प हो उसकी न तो ललक उठेगी और न कामना ही जगेगी। जिन घोड़ों, बैलों या बकरों को नपुँसक बना दिया जाता है वे अपनी बिरादरी की मादाओं के साथ रहते हुए भी छेड़खानी नहीं करते, एक जाति के जीव ही यदि एक साथ रहें तो भी उनके मन में कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। साध्वी बाल विधवाएं आरंभ से ही पर पुरुष गमन की कल्पना तक में पाप मानती हैं। फलतः उन्हें वैसा सोचते नहीं बनता। यदि कोई छेड़ भी दे तो वे सर्पिणी की तरह फुंसकार उठती हैं। यह शारीरिक या मानसिक बनावट की भिन्नता नहीं, वरन् संकल्प शक्ति की प्रमुखता है। कितने ही बाल ब्रह्मचारी संत महात्मा अपने व्रत के सच्चे भी होते हैं। उन्हें न तो वासना सताती है न दमन करने की आवश्यकता पड़ती है और न इस कारण उन्हें कोई रोग सताते हैं।

सच्चाई तो मनोवैज्ञानिक प्रतिपादन के सर्वथा विपरीत है। पाश्चात्य देशों में जहाँ यौन सदाचार का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। वहाँ भी लाखों की संख्या में अविवाहित रहने वाले पादरी और महिलाएँ पाई जाती हैं। जैन साधु और साध्वी भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं। यह सभी आमतौर से अपना व्रत निबाह लेते हैं। अपवाद व्यतिक्रम तो यदा-कदा ही देखने सुनने को मिलते हैं। पाया गया है कि इन ब्रह्मचारियों के स्वास्थ्य भी अपेक्षाकृत अच्छे रहते हैं और वे दीर्घजीवी भी होते हैं। वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, कलाकारों में से कितनों ने ही जानबूझकर विवाह नहीं किया। प्रसंग आने पर वे सदा यही कहते रहे कि इस झंझट में पड़ने से उनकी तन्मयता एवं एकाग्रता में बाधा पड़ेगी। काम हर्ज होगा और वे अपने विषय में जितनी अधिक प्रगति कर सकते हैं, न कर सकेंगे। उनका कथन बहुत हद तक सही था। जिनके पीछे घर गृहस्थी का परिवार व्यवसाय का जितना बड़ा जाल-जंजाल बँधा रहता है, उनकी क्षमता छुटपुट प्रसंगों और चित्र-विचित्र समस्याओं में ही उलझी रहती है। वे एकनिष्ठा होकर किसी प्रयोजन में तन्मय नहीं हो पाते। फलतः उनकी विशेषतया आध्यात्मिक प्रगति आधी अधूरी ही रहती है।

कितने ही ऐसे उदाहरण भी देखे गये हैं कि पति-पत्नी उद्देश्य विशेष में एक दूसरे के सहायक रहने की दृष्टि से ही परस्पर बँधे रहे। उनने काम कौतुक में कोई रस नहीं लिया। रामकृष्ण परमहंस, जापान के गान्धी कागावा आदि के ऐसे ही उदाहरण हैं। जिनने अपने मन को ही साथी मान लिया उनमें जार्ज वर्नाडशा, राम मनोहर लोहिया जैसे कितने ही व्यक्ति हुए हैं जिनने अपनी जिन्दगी हँसी खुशी से काटी और उन्हें किसी प्रकार का अभाव नहीं खटका।


Quotation

महाराज प्रद्युम्न का स्वर्गवास हो गया पूरे परिवार में कुहराम मच गया। महर्षि कौत्स पुनर्जन्म विज्ञान के ज्ञाता थे उन्हें बुलाया गया और कहा राजा जिस रूप में भी हों, हम उनका दर्शन करना चाहते हैं।

राजा काष्ठ कीट हो गये थे। उनका छोटा सा परिवार भी बन गया। कीड़े को पकड़ने का प्रयत्न किया गया तो उसने कहा- मुझे छेड़ो मत, मैं अब इसी योनि में प्रसन्न हूँ। नये मोह ने मेरा पुराना मोह समाप्त कर दिया है साँसारिक संबंध शरीर रहने तक के ही हैं।

विचारों को उत्तेजित करना और फिर उनको रोकने का प्रयत्न करना, यह रीति ऐसी हो सकती है जिसमें झंझट खड़ा हो, अतः उत्तेजक अश्लील वातावरण से दूर रहा जाय। वासना की अतिवादी तुष्टि के भयानक दुष्परिणामों का अनुमान लगा सकें तो प्रतीत होगा कि रसास्वादन राई रत्ती जितना था पर उसका दुष्परिणाम इतना सामने आया जिसे प्रतिभा का सर्वनाश ही कहा जा सकता है। यौनाचार से तो शरीर का स्वत्व नष्ट होता ही है, साथ ही व्यक्तित्व के गहन अन्तराल को हर दृष्टि से समर्थ बनाने वाले ओजस्, तेजस् और वर्चस् की भी भयंकर कमी पड़ती है, जिनके कारण मनुष्य के खोखला बनकर रहना पड़ता है। उसकी वह विशिष्टता नष्ट हो जाती है, जो ब्रह्मचर्य पालन करने के उपरान्त काय कलेवर और जीवन ऊर्जा के रूप में बलिष्ठता और वरिष्ठता बढ़ाती रहती है।

नारी को रमणी, कामिनी, रूपसी, वेश्या की दृष्टि से देखने उसकी कल्पना करने से ही चिन्तन चंचल होता है और अश्लीलता का खुमार चढ़ता है। उनके अश्लील अवयवों की छवि मानस पटल पर जमाने और उनके साथ खिलवाड़ करने की कल्पना ही उत्तेजना उत्पन्न करती है। यह स्वनिर्मित उन्माद है जिससे मद्यपान की तरह बचा भी जा सकता है।

नारी को माता, भगिनी, पुत्री की दृष्टि से देखने पर कुविचार मन में नहीं उठते। धर्मपत्नी के संबंध में भी साथी, सहचर, मित्र, भाई जैसी मान्यताएँ रखी जा सकती हैं। पुरुष-पुरुष के बीच और नारी-नारी के बीच अश्लील विचार नहीं उठते हैं, वरन् उनकी मित्रता घनिष्ठता आत्मीय स्तर की हो जाती है। मनुष्य जाति के दो वर्ग हैं नर और नारी। पर उन दोनों के बीच ऐसी कोई विशेषता नहीं है, जो अश्लील स्तर की उत्तेजना उत्पन्न करे। रेलगाड़ी, मुसाफिरखाने, मेल ठेले, पर्व स्नान आदि के अवसर पर असंख्यों नर नारियाँ आते जाते, मिलते बिछुड़ते रहते हैं। किन्तु उस माहौल में किसी के मन में अश्लील विचार नहीं आते। इसी दृष्टि से संसार को देखा जाय और इसमें नर नारी वर्ग के दोनों प्राणियों की भीड़ भरी हुई देखी जाय तो किसी विशेष आकृति के सौंदर्य पर मन लुभाने जैसी कोई विचारणा उठेगी ही नहीं।

मानव शरीर की नर नारी दो आकृतियाँ हैं। दोनों में पूर्णतया समानता है। अन्तर इतना ही है कि प्रकृति की विनोद क्रीड़ा, वंश परंपरा चलाने के लिए एक पक्ष जो कुछ अधिक दायित्व भार उठाना पड़ता है, जबकि दूसरे को प्रजनन के उपरान्त बालक की दीर्घकालीन सुव्यवस्था बनाने के लिए अन्यान्य भारी भरकम दायित्व उठाने पड़ते हैं। उसमें प्रकृति का वंश-वृद्धि प्रयोजन तो पूरा होता है, पर नर और नारी उस प्रयोजन की पूर्ति के लिए यौनाचार अपनाते और उसकी परिणति को कोल्हू के बैल की तरह वहन करते हैं। यौनाचार का रत्ती भर कौतुक दोनों ही पक्षों को ऐसे निविड़ जंजाल में फँसाता है कि सारा जीवन उसी जंजाल की उलझन सुलझाने में व्यतीत हो जाता है।

कामुकता के आरंभ, मध्य और अन्त की बदलती हुई परिस्थितियों को देखा जाय तो प्रतीत होगा की यह किसी माया नगरी में बुना गया जाल जंजाल मात्र है। पत्नी की सहायता से जीवन क्रम में सुविधा होने की बात भी रंगीली कल्पना मात्र है। वास्तविकता यह है कि दोनों पक्षों को एक दूसरे के लिए इतना करना खपना पड़ता है जिसकी तुलना में एकाकी निर्वाह कहीं अधिक सरल और सस्ता पड़ता है।

कामुकता एक मद्यपान जैसी खुमारी है जिसमें कल्पित मजेदारी दीख पड़ती है। इसी को पाश्चात्य वैज्ञानिक आवश्यक बताते हैं और उस रसास्वादन की महिमा बखानते हुए कहते हैं कि इससे बचा गया, इसे रोका गया तो स्वास्थ्य बिगड़ेगा और मानसिक उद्वेग उठेंगे। धन्य हैं प्रतिपादनकर्ता और धन्य है, उनकी उलटा सोचने की दृष्टि। जो उनकी बातों पर भरोसा करते और समर्थन का सिर हिलाते हैं, उन्हें भी किसी सनक लोक के वासी ही कहा जा सकता है।


पाप की जड़ यह “मैं” (Kahani)

एक व्यक्ति कुछ धन लेकर उपहार में मित्र को देने के लिए चला। रात्रि बहुत हो गई। सभी सोये हुए थे। मित्र ने दरवाजा खटखटाया अन्दर से आवाज आयी- कौन! उत्तर में आगन्तुक ने कहा- मैं। उलटकर उसने भी पूछा बात कौन कर रहा है? उत्तर मिला मैं। इस प्रकार दोनों ओर से कई बार ‘मैं’ कहा जाता रहा। इससे संदेह बढ़ा और दरवाजा नहीं खुला। मित्र रात भर बाहर बैठा रहा। सवेरे लौटने लगा तो दरवाजा भी खुला गया। रात को दरवाजा न खुलने का कारण दोनों ने ही समझा, कि “मैं” ही प्रधान बाधा रही।

लोभ-मोह– संघर्ष पाप की जड़ यह “मैं” ही है। अहन्ता हर प्रगति द्वार के दरवाजे बन्द करती है।


संसार हमारी ही प्रतिध्वनि, प्रतिच्छाया है।

बहिरंग जगत में सुन्दर और असुन्दर- श्रेय और प्रिय दोनों ही हैं। संसार में दुर्गन्ध भरा अनय और सुगन्ध-सौंदर्य से भरा पूरा कमल जैसा श्रेय भी है। यहाँ वह सब कुछ दीख पड़ता है जिसे अपने शुभ या अशुभ दृष्टिकोण से देखा जाता है।

अवाँछनीयता की तलाश है तो एक से एक बढ़कर कुकर्म और उन्हें करने वाले कुकर्मी सरलतापूर्वक खोजे जा सकते हैं। पर दृष्टि की अपेक्षा श्रेष्ठता की हो तो दृष्टिकोण सुधारना पड़ेगा। एक से एक बढ़कर सज्जन और सत्कर्मी भी अपने निकटवर्ती क्षेत्र में विद्यमान दृष्टिगोचर होंगे।

वस्तुतः हर किसी का संसार अपना-अपना है। भीतरी मान्यताएँ परिपक्व होकर आकाँक्षाओं के रूप में परिणत होती हैं। आकाँक्षाओं में चुम्बकत्व होता है वह अपने सजातीय व्यक्ति और घटनाक्रम तलाश लेते हैं।

आँख पर जिस रंग का चश्मा चढ़ा लिया जाय, संसार की सभी वस्तुएँ उसी रंग में रंगी दीखती हैं। चश्मा बदल देने पर नये काँच जिस रंग के हैं वस्तुओं का स्वरूप भी उसी रंग में बदल जाता है। अपना दृष्टिकोण ही चश्मा है वह जैसा भी होता है उसी रंग का संसार बन जाता है। वस्तुतः यहाँ भला बुरा सभी कुछ है पर उसमें से अपना संबंध उसी के साथ जुड़ता है जिस प्रकृति का अपना मन हो। अपने स्वभाव के अनुरूप वस्तुएँ खोजने में हमें कठिनाई नहीं होती। वे स्वयं ही अपने स्वभाव के अनुरूप जिसे पाती हैं उसके साथ चिपक जाती है।

बगीचे में फूल भी खिले होते हैं और उन पौधों की जड़ों में दिया गया दुर्गंधित खाद भी होता है। तितली, मधुमक्खी और भौंरे खिले हुए पुष्पों में असाधारण सौन्दर्य, सुगंध और रस देखते और ग्रहण करते हैं, किन्तु गुबरीले कीड़े को इस सबसे कोई सीधा संबंध नहीं होता। वे पौधे की जड़ में जाते और सड़े गोबर में विरमते तथा उसी को भोजन बनाते हैं।

संसार में भलाई और बुराई के भण्डार भरे पड़े हैं। उनमें से जिसे जिसकी आवश्यकता है, जिसमें रुचि है वह उसे ढूँढ़ लेता है। मिलने में कोई कठिनाई नहीं होती। नशेबाजों का शराब की दुकान पर जमघट रहता है। दुराचारी वेश्याओं के अड्डों के इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहते हैं। जुआरियों को जुआरी और चोरों को चोर तलाशने, ताड़ने और दोस्ती करने में देर नहीं लगती।


Quotation

सदा मृत्यु का स्मरण रहे तो दुष्कर्म बन भी न पड़ें। चक्रवर्ती भरत निरन्तर जन समुदाय में घिरे रहते थे। उन्हें भय हुआ कि कहीं इस मेले में अपने को ही न भूल बैठूँ। प्रातः आशीर्वचनों की ध्वनि बजाकर जगाने वाले बादकों को बुलाकर उसने कहा- कल से यह ध्वनि बजाया करो वर्धते भंय-वर्धते भयम् अर्थात्- भय बढ़ रहा है। खतरे को ध्यान में रखो और जागो।

मूल इकाई अपनी आत्मा है। उसके गुण, कर्म, स्वभाव जैसे भी होते हैं दूसरे समीपवर्तियों के साथ टकराते और तद्नुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। हमारे चारों ओर द्वेष, विग्रह और आक्रोश से घिरा वातावरण तभी हो सकता है जब उन दुष्प्रवृत्तियों को अपने भीतर उगाकर दूसरों पर आरोपित करें।

सज्जनता और सद्व्यवहार-परायण, सेवाभाव, सहृदय लोगों की भी कमी नहीं, पर अपना संबंध उनके साथ तभी जुड़ता है जब वैसी ही प्रकृति अपनी हो। संसार हमारी ही प्रतिध्वनि और प्रतिच्छाया है।


अग्निहोत्र का अंतरिक्ष पर प्रभाव

हवा में जीवन पोषक तत्त्वों का बाहुल्य है। यों उसमें कई प्रकार की गैसें मिली रहती हैं, परन्तु जिसे प्राणवायु कहते हैं, वह ऑक्सीजन है। इसी के आधार पर शरीर में तथा संसार में तापमान सहज एवं आवश्यक मात्रा में बना रहता है। हमारे क्रिया-कलाप ऐसे होने चाहिए, जिससे वायु-संतुलन सही बना रहे।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि वायुमंडल का महत्व उतना नहीं समझा जाता, जितना कि उसे समझना चाहिए। आहार और जल के संबंध में यथासंभव अपनी-अपनी मति के अनुसार शुद्ध रखने का प्रयत्न करते हैं। वे अलग-अलग रखे जाने के कारण अपेक्षाकृत अच्छी तरह संभाल कर रखे भी जा सकते हैं, पर वायु के संबंध में ऐसी बात नहीं। वह सार्वजनिक है। सर्वत्र संव्याप्त है। चलती-दौड़ती रहती है। कुछ ही क्षण में कहीं-से-कहीं जा पहुँचती है। इसलिए अपने घर-कमरे की हवा रोशनी आने-जाने का प्रबन्ध रखते हुए भी यदि वायुमंडल में प्रदूषण की मात्रा बढ़ गई है, तो फिर उस पर नियंत्रण रखना कठिन है। पानी में यदि जहर घोल दिया जाय, तो उसमें रहने वाले सभी जल-जन्तु मरेंगे। इसी प्रकार यदि वायु प्रदूषण बढ़े, तो उसका परिणाम सावधान असावधान सभी को भुगतना पड़ेगा।

इस दिनों मनुष्य का बुद्धि-कौशल ऐसे कारखाने चलाने, ऐसे रसायन बनाने में लगा है, जिनके कारण हवा में जहर घुलता है। यों साधारण क्रियाकलापों से भी यह गंदगी बढ़ती है, जो वायु की शुद्धता पर आघात लगाती है। चूल्हे में जलने वाली आग- शरीर से निःसृत होने वाले मलमूत्र, स्वेद, श्वास-प्रश्वास द्वारा वायु प्रदूषण बढ़ता है, पर उसका संतुलन वृक्ष वनस्पतियों की बहुलता से बन जाता है। वृक्ष प्रायः कार्बन खाते हैं और ऑक्सीजन उगलते हैं। इसके ठीक विपरीत मनुष्य ऑक्सीजन खाता है और कार्बन उगलता है। इस प्रकार मनुष्य और वृक्ष वनस्पति मिलकर ऐसा ताल मेल बिठा लेते हैं कि अनिवार्य रूप से ऑक्सीजन में होने वाली कमी की पूर्ति होती रहे। चिर अतीत से संतुलन का यही क्रम चलता आ रहा है।

यह समय विचित्र युग है। मनुष्य की बुद्धि बढ़ी है, साथ ही उपार्जन और विलास की ललक भी। वैज्ञानिक प्रगति को इसी कार्य में प्रयुक्त किया गया। कल कारखाने, बढ़ती हुई जनसंख्या, धूम्रपान एवं वृक्षों के अंधाधुंध कटाव ने वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा घटा दी है और प्रदूषण का अनुपात बढ़ा दिया है। अणु विस्फोटों से उत्पन्न विकिरण भी इस विषाक्तता को बढ़ाता है। इस प्रकार हम क्रमशः ऐसे दल-दल में फँसते जा रहे हैं, जिसमें शुद्ध वायु का मिलना कठिन हो रहा है। यह उपक्रम जिस तेजी के साथ निर्वाध रूप से आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुये भविष्य अंधकारमय दीखता है।


Quotation

हमारा एक मात्र सच्चा अध्यापक है- आदर्श। उसकी शिक्षा दीक्षा लेने वाले छात्र नर रत्न बनकर निकलते हैं। इस पाठशाला से बढ़कर और कोई शिक्षा संस्थान नहीं।

यों शुद्धता तो अन्न-जल की भी आवश्यक है। पर वायु का नम्बर तो उनमें भी पहला है। जिस प्रकार क्लोरोफार्म को सुँघाकर मनुष्य क्षण भर में बेहोश किया जा सकता है या मारा जा सकता है, उसी प्रकार बढ़े हुये वायु प्रदूषण से भारी अहित हो सकता है। उससे सामान्य स्वास्थ्य बुरी तरह गड़बड़ा सकता है। मानसिक चेतना में कमी आ सकती है और लोगों के बीच सद्भाव मिटकर विग्रह खड़े हो सकते हैं। यह दुष्प्रभाव मनुष्य तक ही सीमित नहीं है। उसका प्रभाव पशु-पक्षियों सूक्ष्मजीवी कृमियों तथा अन्यान्य वर्गों के सभी प्राणियों पर पड़ता है, क्योंकि वायु पर सभी निर्भर हैं। यहाँ तक कि गहरे पानी में रहने वाले प्राणी भी अपने ढंग से जल में ही प्राण वायु प्राप्त कर लेते हैं।

जन्म संख्या बढ़ने पर अधिक चूल्हें जलने और अधिक मलमूत्र, पसीना आदि छोड़े जाने से गंदगी बढ़ती है। इस अनुपात से वृक्ष भी बढ़ने चाहिए थे, ताकि संतुलन बना रहे, किन्तु समय पर दुहरी मार पड़ रही है। एक ओर गंदगी बढ़ रही है दूसरी ओर उसे शुद्ध करने के स्रोत सूख रहे हैं। हरीतिमा का सफाया होता जाता है। खुले मैदान घट रहे हैं। घिचपिच के वातावरण में सीलन, सड़न, कोलाहल आदि की भी बढ़ोत्तरी होती है। तंग गलियों में जहाँ सूर्य का प्रकाश और हवा का प्रवाह रुक-रुक कर धीमा-धीमा पहुँचे वहाँ गंदगी बढ़ेगी ही और उस अस्वच्छता से जीवन संकट में पड़ेगा ही।

आवश्यक है कि समय रहते इस समस्या का समाधान सोचा जाय। इस संदर्भ में पूर्वजों के चिन्तन और सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित एक ही उपाय है- अग्निहोत्र। यदि उसे समुचित मात्रा में करते रहा जाय, तो हम इस प्रस्तुत विपत्ति से बच सकते हैं।

दुर्गन्ध को सुगंध से मारने की विधा को सभी जानते हैं। गंदी नालियों में फिनायल छिड़की जाती है। सीलन भरे घरों में कोयले दहकाने का प्रचलन है। मच्छर भगाने के लिए कछुआ छाप बत्ती का प्रयोग अब बहुत जगह होने लगा है। डी.डी.टी. की गंध कृमियों को भगाती है। कमरों में अच्छा वातावरण बनाने के लिए धूपबत्ती, अगरबत्ती, लोहबान, गूगल आदि जलाये जाते हैं। ग्रह दशा का अनिष्ट टालने और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए सुगंधित द्रव्यों की आहुति दी जाती है।

अग्निहोत्र के अनेकानेक लाभ हैं। उनमें से एक यह भी है कि आकाश में संव्याप्त गंदगी की काट करने की उसमें अपूर्व क्षमता है। इस कथन से मूल प्रतिपादन में कोई अन्तर नहीं पड़ता कि अग्निहोत्र से उत्पन्न कार्बन फैली हुई कार्बन में सम्मिलित होकर उसे बढ़ायेगी ही, घटायेगी कैसे?

यह ठीक है कि अग्नि जहाँ भी चलेगी, वहाँ ऑक्सीजन जलेगी और कार्बन उपजेगी। किन्तु यह नहीं मान लेना चाहिए कि गंदगी से उत्पन्न तथा सुगंध से उत्पन्न हुई कार्बन दोनों एक ही स्तर की हैं। उनमें जमीन-आसमान जैसा अंतर हैं। इतना ही नहीं, वे परस्पर विरोधी भी हैं। उनमें काटने की ही नहीं, बचाने की भी क्षमता है। तलवार आक्रमण के लिए ही काम नहीं आती, उससे आत्मरक्षा भी हो सकती है। सर्वमान्य सिद्धान्त है- “विषस्य विषमौषधम्। “विष की काट दूसरा विष करता है। होम्योपैथी के सिद्धान्त में तो पूरी तरह इस तथ्य को अपनाया गया है। उसमें रोगों की उत्पत्ति का कारण भी विष माना गया है और निवारण भी उसी को औषधि रूप में देकर किया गया है। यह बात अग्निहोत्र द्वारा कार्बन के उपाय द्वारा वायुमंडलीय विषाक्तता के शमन का प्रयोजन पूरा होते देखा गया है।


Quotation

जीवन का एक पक्ष संघर्ष भी है। भीतर के कुविचार और बाहर के अनाचार ऐसे हैं जिन्हें बिना लड़े, मात्र भलमनसाहत के आधार पर निरस्त किया जा सकता है।

बढ़ते हुये वायु प्रदूषण के साथ-साथ जल और आहार में भी विषाक्तता भर रही है। इन सभी का निराकरण अग्निहोत्र द्वारा होता देखा गया है। प्रदूषण का अनुपात नाप कर यदि अग्निहोत्र किया जाय, तो पीछे उसका प्रभाव दूसरा ही देखा गया है। वह प्रदूषण उड़ जाता है और वायु की शुद्धता स्पष्ट प्रकट होती है। यदि बड़ी संख्या में यज्ञ हों और उनकी शृंखला बराबर चलती रहे, तो बढ़ा हुआ वायु प्रदूषण जो दमा, कैंसर, अनिद्रा, तनाव, हृदयरोग, मधुमेह उत्पन्न करता है, उस आधार पर शमित हो सकते हैं। विशाल अन्तरिक्ष के वायुमण्डल का परिशोधन करने के लिए छोटी मात्रा में किये गये अग्निहोत्र भी काम दे सकते हैं। आवश्यक नहीं कि उतनी ही बड़ी तैयारी की जाय। बीमारियाँ समूचे शरीर के प्रकट और अप्रकट अवयवों में समाई होती हैं। पर उनका निराकरण औषधि की छोटी मात्रा ही कर सकती है। आवश्यक नहीं कि शरीर के भार या विस्तार जितनी औषधि का ही प्रयोग हो। इसी प्रकार यह सोचना भी व्यर्थ है कि जब समूचा वायुमंडल विकृतियों से ग्रसित हो रहा है, तो थोड़ी मात्रा में अग्निहोत्र से शोधन कैसे हो सकेगा?

अग्निहोत्र का वायुशोधन मारक पक्ष है। उसका एक विधायक पक्ष भी है। वह है- प्राण पर्जन्य की वर्षा। बादलों के साथ जो पानी बरसता है वह जमीन पर फैला हुआ जल ही भाप बन कर आसमान में उड़ता है और जहाँ उसे उपयुक्त-सा वातावरण मिल जाता है, वहीं बरस पड़ता है। वृक्षों की सघनता वर्षा को विशेष रूप से आमंत्रित करती है। इतना होते हुये भी यह बरसने वाला जल सामान्य ही होता है। उसे पीने, सिंचाई, धुलाई आदि के सामान्य कामों में ही लाया जा सकता है।

जल को विशेष शक्तिशाली बनाने के लिए उसमें कुछ उच्चस्तरीय तत्व मिला देने की योजना भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाई है। अग्निहोत्र की ऊर्जा जब आकाश में फैलती है, तो वह किसी एक क्षेत्र में नहीं रहती, वरन् व्यापक बन जाती है। थोड़ा-सा तेल यदि पानी के बड़े पात्र में डाला जाय तो उसकी एक पतली परत समूचे जल पर छा जाती है। ठीक इसी प्रकार अंतरिक्ष में अग्निहोत्र की विशिष्टता एक आवरण बना लेती है। उस आवरण को एक विशेष प्रकार का प्राण माना गया है। उसे समेटते हुये जो वर्षा होती है उसमें प्राण-पर्जन्य घुला होता है। इसे एक प्रकार से जीवनी शक्ति ही कहना चाहिए। उस पानी की सिंचाई से जो घास, वृक्ष या अन्न, शाक, फल आदि पैदा होते हैं, उन सभी में अपेक्षाकृत अधिक जीवनी शक्ति होती है। उपभोक्ता पर वह तुरन्त अपना प्रभाव दिखाती है। उस विशिष्ट वर्षा से उत्पन्न घास को सेवन करके पशु अधिक बलिष्ठ होते हैं और उनमें से जो दुधारू हैं वे अधिक दूध देते हैं। दूध भी हलका नहीं होता, वरन् उस दूध, दही, घी में ऐसे रसायनों की अधिक मात्रा होती है, जो निरोग एवं बलिष्ठ बनाने में समर्थ हैं। इस विशिष्ट जल के आधार पर उत्पन्न हुये अन्न तथा शाक भी सामान्य के स्थान पर अधिक गुणकारी होते हैं और उपभोक्ताओं की जीवनी शक्ति बढ़ाते हैं। उस जल से उत्पन्न हुई औषधियों में पोषक एवं निवारक गुण अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होते हैं। दूध पीने से तो तनिक-सा ही गुण करता है, पर यदि मिल्क इंजेक्शन के रूप में थोड़ी मात्रा में भी दूध को रक्त में सम्मिश्रित कर दिया जाय, तो उसका परिणाम तत्काल आवेश उत्पन्न करने के रूप में होता है। भाप से बनाई शराब में अल्कोहल होता है और उसके नशे में मनुष्य उत्तेजित हो उठता है। प्राण पर्जन्य में भी ऐसी ही विशेषतायें भरी होती हैं। उसकी वर्षा का पानी पीने से तथा उसके माध्यम से उपजे पदार्थों में ऐसी विशेषतायें होती हैं कि मात्रा में सीमित होते भी गुणों की दृष्टि से असाधारण एवं असीम होती हैं।

कई व्यक्ति अग्निहोत्र से वर्षा होने या कराने का दावा करते हैं। यह व्यर्थ है। यदि ऐसा हुआ होता तो रेगिस्तानों को सहज ही हरा-भरा बनाया जा सकता था। जिन क्षेत्रों में सूखा पड़ जाती है, वहाँ यज्ञ आयोजन से उस अभाव को दूर किया जा सकता है। तब संसार के सामने से एक बड़ी कठिनाई दूर हो जाती और यज्ञ का महत्व अन्यान्य वैज्ञानिक आविष्कारों की तुलना में कहीं अधिक माना जाता और खाद्य पदार्थों की, पानी के अभाव की कहीं कोई शिकायत न रही होती। ऐसे दावे लोग इसलिए करते हैं कि गीता में आये पर्जन्य शब्द का अर्थ सामान्य वर्षा बादलों से करने लगते हैं। जब कि उसका वास्तविक तात्पर्य प्राण पर्जन्य से है।


स्थिति का निराकरण (Kahani)

नाले का पानी सड़ रहा था। शिष्यों ने गुरु से पूछा- पिछली बार जब हम इधर से निकले थे तो न सड़न थी न बदबू। अब की बार यह कैसे उत्पन्न हो गई?

गुरु ने कहा- “प्रवाह रुक गया है। जो बहता नहीं वह सड़ेगा ही।?

तो फिर क्या उस विपन्नता से त्राण का कोई मार्ग नहीं है?

शिष्यों का समाधान करते हुए गुरु देव बोले- प्रायश्चित्त की मूसलाधार वर्षा होते ही यह सड़न आगे बढ़ेगी और दुर्गन्ध से त्राण मिलेगा।

गुरु का अभिप्राय था, कृपणता द्वारा उदारता का बहाव अवरुद्ध कर दिए जाने का दुष्परिणाम समझाना साथ ही यह बताना है कि उदारता के उफान द्वारा ही इस स्थिति का निराकरण होगा।


गरीबों के साथ गरीब बनकर रहो!

खलीफा अबूबक्र के उपरान्त उस स्थान पर हजरत उमर नियुक्त हुए। उनकी शासकीय कुशलता, बहादुरी और दूरदृष्टि में कोई कमी न थी। पर वे निज की सुविधाओं में कटौती ही करते रहते। रूखा-सूखा खाते और मोटा-झोटा पहनते।

दरबारियों ने उन्हें सुख सुविधापूर्वक रहने और अच्छी पोशाक पहनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्पष्ट इन्कार करते हुए कहा- “राजकोष प्रजा की अमानत है। मैं उसका सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए संरक्षक मात्र हूँ। उसकी दौलत का भक्षक नहीं बन सकता।”

वे जौ की रोटी खाते थे। किसी ने कहा देश में गेहूं उपजता है फिर आप उसका उपयोग क्यों नहीं करते? उनने कहा- “कि क्या इतना गेहूं उपजता है कि हर एक के हिस्से में पर्याप्त मात्रा में आ सके? यदि नहीं तो किन्हीं को तो मोटे अनाज पर गुजर करनी ही पड़ेगी। यदि वह कार्य मैं करने लगूँ तो यह अच्छा ही रहेगा। इससे विषमता न पनपेगी और ईर्ष्या फैलने की गुँजाइश न रहेगी।”

वे मोटा कपड़ा ही नहीं पहनते थे वरन् फट जाने पर उसमें पैबन्द लगा लेते थे। उनकी निजी पोशाक में बारह पैबन्द थे। कपड़े की कमी से उसे बाहर न धुलाते। स्वयं ही धोते और एक ही होने के कारण तब तक बाहर न निकलते जब तक कि वह सूख न जाता। सीरिया की विदेश यात्रा पर भी उनने शाही पोशाक बनवाने की जरूरत नहीं समझी। वहाँ के लोग इस सादगी पर मुग्ध होकर रह गये।

हजरत गरीब अमीर सभी को अपने साथ बिठाकर खाने की प्रार्थना कराते। भोजन इतना सादा होता था कि न खाने वालों को संकोच होता और न राजकोष पर कोई बड़ा भार पड़ता। बावर्ची भी खीजता नहीं था। वे स्वयं किसी के यहाँ भोजन करने जाते तो कीमती पकवानों को हाथ न लगाते। कहते- “इस प्रचलन से देश में फिजूलखर्ची, विलासिता और गरीबी बढ़ेगी।” राजदूतों को भी वे वैसा ही खाना खिलाते, ताकि वे अपने यहाँ ऐसी ही सादगी की आवश्यकता पर जोर दें।

एक बार अकाल पड़ा। उन दिनों साधन जुटाने के प्रयत्नों के साथ उनने जनता को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया कि सभी मिल-बांट कर खायें और अपने हिस्से में कमी करें।

एक बार निजी खर्च में तंगी पड़ी। मित्र से उधार ले लिया। उसने दे तो दिया पर साथ ही यह भी कहा- “आप तो शासनाध्यक्ष हैं। इतनी छोटी रकम तो राजकोष से भी उठा सकते हैं।” उनने कहा- “यह परम्परा डालने पर अन्य कर्मचारियों से ऐसा कराना कैसे रोक पाऊंगा?”

राजकर्मचारियों की नियुक्ति करते समय वे हिदायत देते- “महीन कपड़े न पहनना। मैदा प्रयोग न करना। दरवाजे पर द्वारपाल न बिठाना। ताकि बिना रोक टोक के प्रजाजन तुम तक अपनी बात कहने जा सकें।” नौकर नियुक्त करते समय उसकी निजी सम्पदा का हिसाब लिया जाता और बीच-बीच में उसे जाँचा जाता कि वह बढ़ तो नहीं रही है।

मिश्र के इलाके की ओर नियुक्त किया गया एक अफसर महीन कपड़े पहनने व ठाट वाट बनाने लगा था। शिकायत सही पाई गई तो उन्होंने उस अफसर को बुलवाकर कपड़े उतरवा लिए और एक कम्बल लपेटकर रहने तथा बकरियाँ चराने का काम दे दिया। अफसर अचकचाया तो उनने कहा- “तेरा बाप भी तो बकरियाँ चराता था। किसी काम को छोटा समझना और बड़ी पदवी के लिए आग्रह करना बुरी बात है।”

उस जमाने में शासकों के सामने हाथ बाँधकर खड़े होने और सिर पैरों पर रखने का रिवाज था। हजरत उमर ने उस रिवाज को बिल्कुल बन्द करा दिया और घोषित किया कि सभी इंसान खुदा के बन्दे और समान हैं।

वे विचारशील लोगों से कहा करते थे कि ऊँट की तरह न रहो जो नकेल ढीली करते ही बेकाबू हो जाता है और लगाम खींचते ही गरदन मरोड़कर पीछे रख लेता है। दबाव का इन्तजार न करो। उसे स्वेच्छापूर्वक अपनाओ जो विवेकपूर्ण व न्यायोचित है।


मृत्यु से भयभीत क्यों?

मृत्यु के समय अधिकतर लोग बहुत व्यथित और उद्विग्न पाये जाते हैं। इसका कारण शारीरिक नहीं मानसिक है। एक तो मनुष्य मोह, ममता के बन्धन में बेतरह जकड़ जाता है और उन्हें तोड़ते हुए कष्ट होता है। ढीली हथकड़ी-बेड़ी आसानी से कट जाती हैं पर यदि वे शरीर में बहुत कस कर बँधी हों तो काटने में कष्ट होगा। मेरा पैसा, मेरा घर, मेरा कुटुम्ब यह ‘मेरा’ जितना गहरा और कड़ा होगा उसका टूटना मानसिक दृष्टि से उतना ही भारी पड़ेगा। यदि पहले से ही मनुष्य यह सोचता रहे कि धन, सम्पदा, समाज या परमेश्वर की है। मैं उसको कार्यों में प्रयुक्त करने वाला कर्मचारी भर हूँ। स्वामित्व मेरा किसी पर नहीं, तो उसे वस्तुओं से मोह न बढ़ेगा और वे छूटते समय कष्ट न देंगी। इसी प्रकार सब जीवों को ईश्वर का अंश और पुत्र समझ कर स्वतन्त्र इकाई माना जाय। उनके साथ रास्ता चलते पथिक जैसा संयोग माना जाय। परिवार रूपी उद्यान का अपने को माली भर समझा जाय तो फिर कुटुंबियों से ममता न बढ़ेगी। स्नेह सद्भाव के निर्वाह और कर्त्तव्य पालन भर में संतोष और आनन्द होता रहेगा। उनके वियोग में वैसी पीड़ा न होगी जैसी आमतौर से अज्ञानग्रस्त लोगों को होती है।

बहुत से लोग अपने बाद की स्थिति पर विचार करते-करते मृत्यु से भयभीत होने लगते हैं। मेरे बाद न जाने क्या होगा? मेरे मर जाने पर बीबी बच्चे क्या करेंगे? कहाँ किसका आश्रय लेंगे? पता नहीं उन्हें क्या-क्या कष्ट उठाने पड़ेंगे? इस प्रकार की कल्पनायें निरर्थक हैं। ऐसे लोग अपने को ही बीबी बच्चों का विधाता समझते हैं। वे समझते हैं कि जब तक वे जिन्दा हैं, बीबी बच्चों के लिये स्वर्ग संचय कर रहे हैं। उनके न रहने के बाद वे यातनापूर्ण नरक में गिर जायेंगे। मानों उन सबकी जीवन गाड़ी उनकी जिन्दगी से चल रही है, जिसके खत्म होते ही सबका खेल खत्म हो जायेगा। दूसरों के लिये अपने को सब कुछ समझना दम्भ है। जब हम नहीं थे, संसार का सारा काम चल रहा था और जब नहीं रहेंगे तब भी सब काम चलना रहेगा। संसार का कोई काम किसी के न रहने से रुकता नहीं। यह बात सही है कि हमारा जीवन आश्रितों के लिए आवश्यक है। किन्तु इस आवश्यकता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने न रहने की कल्पना के साथ उनका जीवन जोड़कर कायरों की तरह मृत्यु भय से रोते कलपते रहें। अपने बाद की कल्पना के भयावह चित्र बनाने के बदले हमारी बुद्धिमानी इसी में है कि हम मरने से पूर्व ईमानदारी के साथ अपने आश्रितों की बहबूदी के लिए जो कुछ कर सकें करें। ऐसा करने से ही अपने बाद की चिन्ता की सार्थकता है, केवल कल्पना करते रहना मूर्खता ही होगी। मृत्यु को भय का कारण बनाने की अपेक्षा उसे अपने कर्मों का सजग प्रहरी बनाकर चलने वाले सदाशयी व्यक्ति यशस्वी जीवन के अधिकारी बनते हैं।

मृत्यु उतनी कष्टप्रद नहीं है, जितनी कि समझी जाती है। बीमारी आदि के कारण मरने से पूर्व कितना ही कष्ट क्यों न रहा हो, मरने का ठीक समय आने से पूर्व बेहोशी आने लगती है और पीड़ा के समस्त लक्षण विदा हो जाते हैं। मरने पर मनुष्य अनन्त शून्य में विलीन हो जाता है। जहाँ उसके सुखद स्वागत की तैयारी पहले से ही रहती है। आमतौर से बूढ़े लोग शान्ति और सन्तोषपूर्वक मरते हैं और जवानी में अधिक बेचैनी होती है यह उद्विग्नता उनकी महत्वकाँक्षाओं की अतृप्ति के कारण होती है। जिनके सपने अधूरे रहते हैं वे मरते समय उतने ही बेचैन पाये जाते हैं। मौत का डर भी कई बार मरने वालों को व्यथित करता है।

मृत्यु का भय अधिकतर सताता उन्हीं लोगों को है जो इस मानव जीवन का महत्व नहीं समझते और इसकी लम्बी अवधि को आलस्य, विलास एवं प्रमाद में बिता देते हैं और अपने आवश्यक कर्त्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों के प्रति ईमानदार नहीं रहते। कामों को अधूरा छोड़कर ढेर लगा लेने वाले जब देखते हैं कि उनकी जीवन अवधि की परिसमाप्ति निकट आ गई है और उनके तमाम काम अधूरे पड़े हैं, तब वे मृत्यु के भय से काँप उठते हैं। सोचते हैं मेरी जिन्दगी बढ़ जाती, मृत्यु का निरन्तर बढ़ा चला आ रहा अभियान रुक जाता तो मैं अपने काम पूरे कर लेता। किन्तु उनकी यह कामना पूरी नहीं हो पाती। मृत्यु आती है और अकर्मण्यता के फलस्वरूप उनकी चोटी पकड़ कर घसीट ले जाती है।

इसके विपरित जिसने अपने कर्त्तव्यों तथा उत्तर दायित्वों को रुचि एवं तत्परता से पूरा किया है, जीवन भर करने योग्य कार्यों की उपेक्षा नहीं की है, आयु के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग किया है, उसे मृत्यु से डरने का कोई कारण ही नहीं रह जाता। वह मृत्यु आने पर हँसता मुसकाता हुआ उसका स्वागत करता है और मृत्यु उससे सन्तुष्ट माता की तरह प्यार से गोद में उठाकर ले जाती और उन दिव्य स्थानों में पहुँचा देती है, जहाँ उसके कर्त्तव्य के पुरस्कार उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। अकर्तव्यता एवं अकर्मण्यता दोनों ही ऐसे दोष हैं, जो मृत्यु भय को न केवल जागृत ही रखते हैं, बल्कि बढ़ाकर भयानक से भयानकतर बना देते हैं। मृत्यु का भय कायर की वृत्ति है कर्मवीर तो उसे मित्र तथा माता मानकर किसी समय भी उसका स्वागत करने को तैयार रहा करते हैं।

यदि मृत्यु से भयभीत होने का स्वभाव स्थायी हो गया है और वह किसी प्रकार भी बदलते नहीं बनता तो भी उसका लाभ उठाया जा सकता है। जिस प्रकार शत्रु का भय सदैव सतर्क एवं सन्नद्ध बना देता है, सुरक्षा के प्रबन्धों तथा व्यवस्था के लिए सक्रिय रखता है उसी प्रकार मृत्यु को एक आकस्मिक आपत्ति समझकर सतर्क एवं सावधान हुआ जा सकता है। यह बात सत्य है कि मनुष्य शरीर छोड़ने से उतना नहीं डरता जितना ‘मृत्यु’ के बाद न जाने क्या गति होगी? इस विचार से भयभीत होता है। उसे आशंका रहती है कि मृत्यु के बाद उसे भयानक तथा अंधेरे लोकों में भटकना होगा। कीट-पतंगों की निकृष्ट योनियों में जाना होगा। बैल, भैंसा, ऊँट, घोड़ा, गधा आदि बनकर वह सब दण्ड भोगना होगा, वह सब यातना सहनी होगी, जिसे हम आज अपनी आँखों से उन्हें भोगते देख रहे हैं।

यदि यह आशंका मृत्यु भय को जन्म देती है- तब क्यों न ऐसे कर्मों, ऐसी गतिविधियों में संलग्न हो जाया जाये जिससे कि अँधेरे तथा अधम योनियों की आशंका ही दूर हो जाये। अधिक से अधिक जितना प्रकाश, जितना आलोक और जितना उजाला हम इकट्ठा कर सकें क्यों न कर लें। जिससे कि परगति में अपनी आत्मा के प्रकाश से अपना पथ प्रकाशित कर लें। इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं कि उजेले की प्राप्ति उज्ज्वल एवं आदर्श कर्मों से ही होती है। पुण्य, परमार्थ, परोपकार, परसेवा और पावन जीवन पद्धति से आत्मा में अक्षय प्रकाश के भण्डार भर जाते हैं। इससे पूर्व कि मृत्यु आये और अपमानपूर्वक चोटी पकड़ कर घसीट ले जाये क्यों न सत्पथ पर अग्रसर होकर प्रकाश का प्रबन्ध कर लिया जाये। क्यों न उस पुण्य प्रधान संबल को एकत्र कर लिया जाये जो हमारा, हमारी आत्मा के अनन्त एवं अगत पथ में सहायक बने।

मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियों में भय की गणना भी की गई है। किन्तु वह भय कायरता का नहीं, सतर्कता का लक्षण है। यों तो कोई भी मरना नहीं चाहता। मृत्यु से बचने का हर सम्भव उपाय किया करता है। सड़क पर चलते मोटर से बचना, नदी में नहाते समय डूबने से सावधान रहना, मृत्यु भय नहीं है। हिंस्र जन्तुओं, रोगों तथा शत्रुओं से जीवन रक्षा करने में यथासम्भव उपायों का करना स्वाभाविक है। निरर्थक एवं निरुद्देश्य मर जाना कोई वीरता नहीं, मूर्खता है। ‘हाय मैं मर जाऊँगा’ की भावना ही मृत्यु का वह भय है जो कायरता की कोटि में आता है। मनुष्य को “हाय मैं मर जाऊँगा” की हीन भावना के वशीभूत होकर कायरता का परिचय नहीं देना चाहिये।

‘हाय मर जाऊँगा’ की भावना में रो तड़प कर मृत्यु से बचा तो जा ही नहीं सकता। उल्टे यह भावना जीवन को बोझिल एवं भयावह बना देती है। मृत्यु से निरपेक्ष रह कर जीवन रक्षा का हर संभव उपाय करते हुए आ जाने पर साहसपूर्वक उसका सहर्ष आलिंगन करने में ही पुरुषार्थ की शोभा है। महान् मृत्यु के अवसर पर जीवन का मोह एक अश्रेयस्कर दुर्बलता है।

मृत्यु का भय उत्पन्न करने में परलोक की चिन्ता का बहुत बड़ा हाथ है। वस्तुतः लोगों का यह सोचते रहना कि मर जाने के बाद न जाने हमारा क्या होगा? हम कहाँ किस लोक अथवा योनि में भ्रमण करेंगे? न जाने हमारी सद्गति होगी अथवा अगति, मृत्यु भय को एक बड़ी सीमा तक बढ़ा देता है? परलोक की चिन्ता ठीक है। वह करनी भी चाहिये। किन्तु इस शुभ चिन्ता से मृत्यु के अशुभ भय का पैदा होना बड़ी ही असंगत तथा अस्वाभाविक बात है। फिर भी परलोक की चिन्ता से लोगों में मृत्यु का भय उत्पन्न होता है। इसका एकमात्र कारण लोक को बिगाड़ कर चलना है। परलोक का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। परलोक इस लोक की ही परिणति है। जिस प्रकार का हमारा लोक होगा हमारे लिये उसी प्रकार के परलोक की रचना होगी। यदि हमने अपने आलस्य, अकर्म, अकर्तव्य अथवा अनीति अत्याचार से अपने लोक को दग्ध कर लिया है और ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, काम, क्रोध, मोह आदि विकारों तथा वासनाओं से विषैला बना लिया है तो निश्चय ही उसी के अनुसार हमें चलते हुए लोकों को साकार करने पर विवश होना ही होगा। यदि हम जानते हुये भी अपने कर्मों से पतित परलोकों की रचना के लिये लोक में नींव रख रहे हैं तो मृत्यु का भय हमें सताएगा ही, क्योंकि हम जानते हैं कि जो कुछ हम कर रहे हैं, मृत्यु के उपरान्त उसका दण्ड भोगना ही है और इसीलिये मृत्यु की कल्पना आते ही भय से सिहर उठते हैं।

इसके विपरीत यदि हम लोक को परलोक का आधार मानकर उसे सजाने, सँवारने और सुन्दर बनाने के शुभ प्रयत्नों को ईमानदारी से करते रहें, तो मृत्यु कल्पना हमें विभोर करती रहे, क्योंकि हम जानते हैं कि हम जो कुछ शिव तथा सुन्दर कर रहे हैं। वह हमारे लिये मंगलमय परलोक की रचना कर रहा है जिसको हम मृत्यु के उपरान्त पुरस्कार के रूप में पायेंगे।

मनुष्य का विचार सान्निध्य भी मृत्यु के विषय में भय अभय का कारण होता है। जिसकी चिन्तन-धारा जितनी अधिक जीवन के समीप रहेगी वह उतना ही कम मृत्यु से डरेगा और जिसके विचार जितना अधिक मृत्यु का चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यू का चिन्तन क्या करना? वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता। कर्त्तव्यों की आपूर्ति इस विचार के साथ मृत्यु का भय लाती है कि यह नहीं कर पाया, वह करने को रह गया है। सारा जीवन बेकार जा रहा है। यों ही दिन गुजर जायेंगे और एक दिन मृत्यु के मुख में चला जाना होगा। मनुष्य अपने स्थिति के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन तत्परता से करता रहे तो भी मृत्यु का भय उसे नहीं सताने पायेगा। फिर वह कर्तव्य छोटे हों अथवा बड़े, साधारण हों अथवा असाधारण, कर्तव्यहीन, अकर्मण्यता तो साक्षात मृत्यु ही कही गई है। ऐसी मृत्यु से तो सार्थक जीवन जीकर बंधनमुक्त होना एक सौभाग्य समझना चाहिए।

मनुष्य का विचार सान्निध्य भी मृत्यु के विषय में भय अभय का कारण होता है। जिसकी चिन्तन-धारा जितनी अधिक जीवन के समीप रहेगी वह उतना ही कम मृत्यु से डरेगा और जिसके विचार जितना अधिक मृत्यु का चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यु का चिन्तन क्या करना? वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एका बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता। कर्त्तव्यों की आपूर्ति इस विचार के साथ मृत्यु का भय लाती है कि यह नहीं कर पाया, वह करने को रह गया है। सारा जीवन बेकार जा रहा है। यों ही दिन गुजर जायेंगे और एक दिन मृत्यु के मुख में चला जाना होगा। मनुष्य अपने स्थिति के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन तत्परता से करता रहे तो भी मृत्यु का भय उसे नहीं सताने पायेगा। फिर वह कर्तव्य छोटे हों अथवा बड़े, साधारण हों अथवा असाधारण, कर्तव्यहीन, अकर्मण्यता तो साक्षात मृत्यु ही कही गई है। ऐसी मृत्यु से तो सार्थक जीवन जीकर बंधनमुक्त होना एक सौभाग्य समझना चाहिए।


पैर में ठोकर लगी (Kahani)

दार्शनिक च्वांगत्से को रात्रि के समय कब्रिस्तान से होकर गुजरते समय पैर में ठोकर लगी। टटोल कर देखा तो किसी मुर्दे की खोपड़ी थी। उठाकर उनने उसे झोली में रख लिया और सदा साथ रखने लगे।

शिष्य ने इस पर उनसे पूछा यह कितना गंदा और कुरूप है। उसे आप साथ क्यों रखते हैं?

च्वांगत्से ने उत्तर दिया- यह मेरे दिमाग का तनाव दूर करने की अच्छी दवा है। जब अहंकार का आवेश चढ़ता है- लालच सताता है, तो इस खोपड़ी को गौर से देखता हूँ। कल परसों अपनी भी ऐसी ही दुर्गति होगी तो अहंकार और लालच किसका किया जाय?

वे मृत्यु को स्मरण रखने, अनुचित आवेशों के समय का उपयुक्त उपचार बताया करते थे और इसके लिए मुर्दे की खोपड़ी का ध्यान करने की सलाह दिया करते थे। खुद तो उसे साथ रखते ही थे।


बुद्ध का लोकसेवी परिव्राजकों को सन्देश

भगवान बुद्ध ने उस दिन नवदीक्षितों के साथ-साथ पुराने परिव्राजकों को भी बुलाया और उनके कर्त्तव्यों का नये सिरे से बोध कराया और कहा कि “इन साधु मर्यादाओं का परित्याग करने या उनमें उपेक्षा बरतने से तुम अपने कार्य से भटक जाओगे। पथरीला मार्ग अपनाकर जहाँ-तहाँ ठोकर खाओगे। लक्ष्य से भटककर ऐसी जगह जा पहुँचोगे जिससे तुम्हारा व्रत प्रवेश आत्म प्रवंचना एवं जन उपहास का निमित्त कारण बनेगा।”

“हे तात! साधु धर्म का परिपालन बड़ा कठिन है। उसमें अपने आप पर ऐसी बड़ी दृष्टि रखनी पड़ती है, जैसे कि शासक अपराधियों के मुक्त होने पर भी उनके आचरणों की जाँच करते रहते हैं। भव बन्धनों से निकल कर आये हो, इसलिए पूर्व संचित लिप्सा, लालसाओं का यह दौर बना रहता है। अवसर पाते ही नई परिस्थितियों में नए ढंग से वे अपना कुचक्र चलाती हैं। बुद्धी को मोहित करती और पतन के गर्त्त में धकेलती हैं। इसलिए तुम्हें निरन्तर सावधान रहना चाहिए। बाह्य व्यवस्था के अनुशासन में प्रत्यक्ष कृत्यों को ही अनुबंधित किया जा सकता है, किन्तु यदि मानसिक दुर्बलता बनी रही तो चिन्तन की निकृष्टता ही कालान्तर में विपत्ति बन जाती है। छल छद्म चल पड़ता है। बड़प्पन का अहंकार सवार होता है तो उनकी पूर्ति का ताना-बाना बुनता चलता है और लुकछिप कर छद्म को चरितार्थ करने वाली रीति-नीति चुपके-चुपके स्वभाव में सम्मिलित हो जाती है।”

सो हे धर्म के पथिकों! पूरी तरह सावधान रहो ताकि पथ भ्रष्ट करने वाली विडम्बनाएँ तुम्हें ऊँचे से नीचे न गिरा दें।”

“अपना आहार स्वल्प, सस्ता और नियमित रखो। स्वादों का स्मरण मत करो। अन्यथा इच्छा, क्रिया रूप में परिणत हुए बिना न रहेगी। प्रत्यक्ष सन्त-परिव्राजक दीखते हुए भी परोक्ष रूप से असन्तों जैसे आचरण करने लगोगे।”

“पुत्रेषणा, कामकौतुक, धन की लालसा, बड़प्पन प्रदर्शन करने वाले ठाट बाटों को अपनाना, यह तो लौकिक प्रतिबंधों और अवसर न मिल पाने की व्यवस्था के कारण भी संयत रह सकते हैं। पर मनोभूमि पर केवल आन्तरिक अंकुश ही काम देते हैं। सतर्कता न बरती जाय तो लोकेषणा उग्र से उग्रतम होने लगती है और फिर अपनी पूर्ति के लिए कितने ही प्रपंच रचती और पाखण्ड फैलाती है।”

“लोकेषणा जब भड़कती है, तो उसकी अस्वाभाविक पूर्ति के लिए अनेकों ढोंग रचने पड़ते हैं। चमत्कार प्रदर्शन द्वारा मूर्खों को अपना भक्त बनाना और उनका शोषण करना चल पड़ता है। इसलिए इन चित्तवृत्तियों को ही संयत रखना योग कहा गया है। योगी अपने पहले चरण में गहरा आत्म विश्लेषण करते हैं और कषाय कल्मषों में से जो कचरा जमा होता है, उसे बारीकी से निकाल बाहर करते हैं। आत्मावलोकन का यह पहला सोपान तुम सभी जीवन में उतार सको, तो ही सच्चे योगी बन पाओगे”।


Quotation

महाभारत व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा जब तक यह लेखन कार्य चला गणेश जी मौन धारण किये रहे ताकि वाचालता के कारण एकाग्रता भंग न हो और इतनी तेजी से लिखने का दायित्व ठीक तरह निभ सके।

“लोक सेवा और धर्मोपदेश सामयिक कार्य हैं। वे कुछ ठहर कर भी किए जा सकते हैं। पर जिसको जो करना है, उसकी योग्यता पहले प्राप्त करनी पड़ती है। तुम सेवा कार्यों के साथ सत्साहस एवं आत्मानुशासन को भी जोड़ कर चलो, क्योंकि आन्तरिक दुर्बलताओं के रहते सेवा-कार्य बन नहीं पड़ता। पहले क्षमता अर्जित करो, फिर कार्य क्षेत्र में उतरो। पहले अपनी दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाओ और उसके बाद जनकल्याण का कार्य हाथ में लो।”


भारतीय संस्कृति – बनाम आरण्यक संस्कृति

श्रीमद्भागवत में भगवान् के विराट रूप का वर्णन करते हुए वृक्षों को परब्रह्म के केश रोम कहा गया है। केश किसी शरीर की शोभा, सज्जा एवं सुरक्षा को बढ़ाते हैं। भगवान् के सौंदर्य का वर्णन करना हो तो उगी हुई हरीतिमा के रूप में ही उसकी विरुदावलि गानी पड़ेगी। प्रकृति का सौंदर्य समीप से देखना हो तो आकाश के सूर्य, चंद्र, तारागणों का वर्णन करने की अपेक्षा नयनाभिराम हरीतिमा का ही वर्णन करना पड़ेगा।

भारतीय संस्कृति के तत्वज्ञान की अपेक्षा यदि उसके दर्शनीय स्वरूप का विवेचन करने के लिये कहा जाय तो उसे आरण्यक-संस्कृति कहना पड़ेगा। आरण्यक अर्थात् वन। धर्मशास्त्रों में आचार संहिता प्रकरण ‘आरण्यक’ वाङ्मय के रूप में ही हुआ है। आरण्यक ही भारतीय तत्वज्ञान का उद्गम स्रोत है।

प्राचीन काल में सुविधा सम्पन्न बड़े नगर न रहे हों, ऐसी बात नहीं है, पर मनीषियों और तपस्वियों ने अपने लिये जो कार्य क्षेत्र चुना वह आरण्यक ही रहा। तरुणाई की हिलोरें स्थिर होते ही विज्ञ जन वन गमन की योजना बनाते थे। वानप्रस्थ व्रत ग्रहण करते थे। वानप्रस्थ का तात्पर्य है वन में रहना। जीवन का पूर्वार्ध अध्ययन और उपार्जन में लगाने के उपरान्त शेष जो प्रौढ़ता और परिपक्वता हाथ रहती थी उसका श्रेष्ठतम उपयोग वन क्षेत्र में निवास करते हुये बन पड़ता था।

आत्मिक प्रगति और परिष्कृत जीवनचर्या के लिये वन पर्वतों से, नदी- सरोवरों से भरा पूरा क्षेत्र ही उपयोगी वातावरण की पूर्ति करता है। यह प्रयोजन भव्य भवनों और सघन शहरों में रहकर नहीं हो सकता। वहाँ का वातावरण ही ऐसा होता है जिसमें लिप्साएँ, लालसायें घटती नहीं, बढ़ती ही हैं। इसलिये उस वातावरण में कभी कोई ऋषि, मनीषी नहीं रहा। वरन् जिस पर अपना प्रभाव रहा उन्हें भी अपने साथ घसीट ले गये। वशिष्ठ रघुवंशियों के कुलगुरु थे, पर उनका निवास शिवालिक पर्वत की वशिष्ठ गुफा में ही रहा। विश्वामित्र राम लक्ष्मण को उच्चस्तरीय विद्यायें सिखाने के लिये उन्हें अपने आश्रम में ले गये। अयोध्या की शोभा, सुन्दरता कम नहीं थी पर वहाँ न तो वशिष्ठ रहे न विश्वमित्र। अन्य ऋषियों के आश्रम, आरण्यक व गुरुकुल वन प्रदेशों में ही थे।

सुसम्पन्न लोगों के लिये सुविधा इसी में थी कि अपने महलों में किन्हीं अध्यापकों को नियुक्त करके बालकों की शिक्षा पूरी करायें। जो सुविधा स्वयं उपलब्ध करते हैं, उन्हें ही बालकों को करायें। आँखों के तारों को, आँख के सामने ही रखें। पर दूरदर्शी विवेकशीलता ने उन्हें यही सुझाया, समझाया कि उन्हें प्रकृति की मनीषी की निकटता में रहने दिया जाय। मोहग्रस्त होकर बालकों को सुविधाओं के लालच में फँसाना उनकी प्रतिभा को कुण्ठित करना है। यह प्रयोग रावण सरीखों ने किया भी था। उसका सुविस्तृत परिवार हेय दृष्टिकोण अपनाये रहा और खरदूषण, मारीचि, सूर्पणखा, सुरसा जैसे व्यक्तित्व विनिर्मित करता रहा।

अरण्कों में रहकर प्रकृति का वैभव आत्मसात् करना तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही यह भी कम गौरव का विषय नहीं है कि वन सम्पदा को अधिकाधिक समुन्नत और सुविकसित किया जाय।

पेड़ों का लगाना, दस पुत्र उत्पन्न करने जैसा सौभाग्य माना गया है और वृक्ष काटना ब्रह्म हत्या के समतुल्य जघन्य कहा गया है। इस प्रसंग में कहीं कोई व्यतिरेक तो नहीं हो रहा। उसकी चौकीदारी ऋषि-मुनि ही सम्हालते थे। अपने समय के वे ही रेंजर थे और वे ही फोरेस्टर। अमृतोपम जड़ी बूटियों का विकास एवं संरक्षण उसी क्षेत्र में किया जाता था। तभी लक्ष्मण को जीवन दान देने वाली संजीवनी बूट वहाँ उपलब्ध होती थी और तभी यह संभव था कि च्यवन जैसे वयोवृद्धों को पुनः यौवन प्रदान करने वाला ‘अष्टवर्ग’ वहाँ उगे और बढ़े। सोम- वल्लरियाँ इसी क्षेत्र में उगती थीं और वही देवता उस दिव्य मधुपान के लिये लालायित होकर आते और निवास करते थे।

बुद्ध की तपश्चर्या जिस वट वृक्ष के नीचे हुई उसे बोधिवृक्ष के नाम से गौरवान्वित किया गया, और भी कितने ही ऐसे दिव्य वृक्ष हैं, जिनकी महिमा जितनी गाई जाय उतनी ही कम है। पिप्पलाद पीपल के फल खाकर ही अपना व्रतधारी जीवन क्रम चलाते थे।

विल्व, अश्वत्थ, आंवला, वट, अशोक आदि को देव प्रतिमा की तरह पूजा जाता था और उनके झुरमुटों में कुटी बनाकर मनीषिगण अपने शिष्यों सहित निवास करते थे। आयुर्वेद, से लेकर रसायन भस्मों तक की प्रयोगशालाएँ उसी क्षेत्र में थी। भारतीय रसायन शास्त्र का विकास इसी वातावरण में हुआ है। शास्त्रों और सद्ग्रन्थों का सृजन, अनुवाद एवं प्रतिलिपि करने का काम यहीं होता था। इन आरण्यकों से लाभ उठाने के लिये संसार भर के मूर्धन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचते और अभिलाषा पूर्ण करके वापस लौटते थे।

राजा दिलीप को संतान की इच्छा पूरी कराने के लिये वशिष्ठ की गौयें चराने के लिये धर्मपत्नी सहित जाना पड़ा। शृंगी ऋषि को पुत्रेष्टि यज्ञ के निमित्त इसी क्षेत्र से दशरथ किसी प्रकार ले गये थे। व्यास गुफा में महाभारत समेत अठारह पुराण लिखे गये थे। कण्व ऋषि के आश्रम में भरत चक्रवर्ती की गढ़ाई और ढलाई हुई थी। बाल्मीकि के आश्रम में लव कुश ने जो प्रशिक्षण प्राप्त किया था वह दशरथ कुमारों से हल्के दर्जे का नहीं था। राम ने चौदह वर्ष के वनवास को अपना सौभाग्य माना था। शारीरिक असुविधाओं के रहते हुये भी उस क्षेत्र में पति के साथ रहने का लोभ सीता भी संवरण नहीं कर सकी थीं। राजकुमारी सावित्री ने वनवासी सत्यवान से विवाह किया था।

समुद्र मंथन में चौदह रत्न निकले थे। भारतीय संस्कृति का अनमोल रत्न आरण्यक संस्कृति के सुव्यवस्थित क्षेत्र में ही निकला और संसार भर को सभ्यता का पाठ पढ़ाने में समर्थ हुआ। उसकी गुरु-गरिमा और चक्रवर्ती स्तर की क्षमता इसी क्षेत्र में विकसित हुई थी। दिव्य मंत्र, दिव्य तंत्र, मूल मंत्र इन्हीं क्षेत्रों की प्रयोगशालाओं में विकसित होते थे।

भारत में प्राचीन काल के भव्य भवन दृष्टिगोचर नहीं होते, क्योंकि ऋषि युग में उनकी आवश्यकता ही न थी। विलास वैभव तो मात्र दो हजार वर्ष की अवधि में ही विकसित हुआ है। आरण्यक सभ्यता जब सम्पन्न सभ्यता के खण्डहरों में विलीन होने लगी तभी से देश पर दुर्भाग्य टूटा और पतन पराभव का अन्धकार उदय हुआ।


आवाज बंद करने को कहा (Kahani)

खेत सींचने के लिए रहट चल रहा था। घुड़सवार ने अपने घोड़े को उसकी नाली पर पानी पिलाने के लिए मोड़ा।

रहट चलने की आवाज हो रही थी। घोड़ा अजनबी था। आवाज उसने पहले कभी सुनी न थी सो भड़का और पानी तक पहुँचने से पहले ही बिदक गया।

सवार ने रहट चलाने वाले से आवाज बंद करने को कहा। सो उसने चलाना बंद कर दिया। घोड़े को पकड़ कर नाली तक लाया गया तो उसमें पानी ही नहीं चल रहा था। घोड़ा पीता क्या?

सवार ने रहट वाले से कहा- मैंने आवाज बंद करने के लिए कहा था, तुमने तो पानी भी बंद कर दिया।


आवाज और पानी (Kahani)

किसान ने कहा- आवाज और पानी का अटूट संबंध है। ऐसा नहीं हो सकता कि आवाज तो बंद हो जाय पर पानी चलता रहे। आप घोड़े को सधाइए कि वह आवाज रहते हुए भी पानी पी सके।

सवार ने वैसा ही किया। खींच-तान करने पर घोड़े ने पानी पी लिया। सवार रास्ते भर यही सोचता रहा। झंझटों के चलते रहने पर भी संतुलन बनाये रखना और कठिनाइयों के साथ तालमेल बिठाने की नीति ही सही और व्यावहारिक है।


देव ऋण से उऋण कैसे हो?

जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का जीवन की गतिशीलता के साथ घनिष्ठ संबन्ध है, उसी प्रकार मानवी चेतना के विकास में तीन तत्व घुलते हैं। एक पितृऋण, दूसरा ऋषिऋण तीसरा देवऋण। इन तीनों के संयुक्त अनुदान से ही चेतना विकसित एवं परिष्कृत होती है। इनमें से जिसकी जितनी कमी रह जाती है, व्यक्ति उतना ही पिछड़ा और गया बीता रह जाता है।

पिता की वंश परम्परा लेकर शुक्राणु निःसृत होते हैं। माता अपने शरीर और मन का महत्वपूर्ण भाग शिशु को देती है। परिवार के लोग भी बाल विकास में अपने-अपने ढंग से सहायक होते हैं। पूर्वजों की सुख-सुविधा एवं प्रगति प्रसन्नता के निमित्त जो लोकोपयोगी परम्पराओं के साथ जुड़े हुये कार्य किये जाते हैं वे पितृऋण से मुक्ति दिलाते हैं।

शिक्षा और विद्या का प्रसार विस्तार ऋषिऋण से मुक्ति प्राप्त करना है। हर शिक्षित का कर्तव्य है कि वह अपना समय निजी कार्यों में से बचाकर पिछड़ों को समुन्नत बनाने वाली ज्ञान गंगा के साथ संपर्क क्षेत्र के लोगों को संबंधित कराने का प्रयत्न करे। अपनी चेष्टाओं को विद्यालय और पुस्तकालय के संयुक्त रूप में विकसित करें और उस संगम का लाभ अधिकाधिक लोगों को देने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहें। ऋषिऋण से- गुरुऋण से मुक्ति इसी प्रकार हो सकती है। जो सर्वथा अशिक्षित हैं वे भी विद्या विकास के लिए अपने साधनों को जोड़ते हुये उस उत्कृष्ट के निमित्त जो कुछ कर सकते हैं उसमें कमी न रहने दें। विद्यादान के निमित्त धनदान करने से भी यह प्रयोजन पूरा हो सकता है।

तीसरा ऋण है- देवऋण। मनुष्य के भीतर दैत्य भी रहता है और देव भी। दैत्य पतन-पराभव के लिए आकर्षित करता है। कुबुद्धि उत्पन्न करना, कुमार्ग पर चलने के लिए फुसलाता है। देवत्व की प्रकृति इससे सर्वथा उलटी है। वह निरन्तर यह प्रेरणा देता है कि मनुष्य आगे बढ़े ऊँचा उठे। दुष्प्रवृत्तियों से लड़े और सत्प्रवृत्तियों को बलिष्ठ बनाये सत्प्रवृत्तियों की दिशा में कदम बढ़ाये। पाप से जूझे और पुण्य को पोषे। यह देवांश जिसके अंदर जितनी अधिक मात्रा में होता है। वह उतना ही व्यक्तित्व का धनी, महामानव एवं देवात्मा बनता जाता है। ऐसे ही व्यक्ति नर नारायण कहलाते हैं। पुरुष स्तर से ऊँचे उठकर पुरुषोत्तम वर्ग तक जा पहुँचते हैं। भव सागर से स्वयं पार उतरते हैं और अपने कंधों पर बिठा कर अनेकानेक दुर्बल असमर्थों को पार उतारते हैं।

देवासुर संग्राम मानस लोक में सदा चलता रहा है। पतनोन्मुख बनने में दैत्य तत्व कुछ कमी नहीं रहने देते और इसका प्रतिरोध करने के लिए देव वर्ग का प्रयत्न परामर्श निरन्तर चलता रहता है। यही शाश्वत महाभारत है। यह मल्ल युद्ध निरन्तर चलता रहता है। दोनों एक दूसरे को गिराने और अपना वर्चस्व जमाने के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। निकृष्टता के अंश गिराने में कभी नहीं रहने देते किन्तु उत्कृष्टता का प्रयास यह रहता है कि पतन विजयी न होने पावे। वह देव संस्कृति के अधिष्ठाता मनुष्य की गौरव गरिमा को बचाये रहने के लिए अपने पक्ष का हर विधि से परिपोषण करे।

यह गज ग्राह की लड़ाई है। यही कौरव पाण्डवों का युद्ध है। इसी को वृत्रासुर और इन्द्र का देवासुर संग्राम कहा जाता है। इनमें से विजयी कौन हो? यह संतुलन मनुष्य के हाथ है। वह जिधर भी सहारा लगा देता है उधर का ही पलड़ा भारी हो जाता है। मानवी चेतना किसे सहारा दे? उसकी बुद्धि किसका समर्थन करे? उसका पुरुषार्थ किसका पक्षधर बने? यह निर्णय करना मानवी अंतराल का काम है। वह जिस पक्ष में अपने को सम्मिलित कर लेता है। वही भारी पड़ता है और वही विजयी होता है।

देवऋण चुकाने की आवश्यकता इसलिए है कि उसी परब्रह्म के अनुग्रह से साधारण जीवधारी को देव संस्कृति का अनुयायी बनने का अवसर मिला है। ईश्वर का युवराज उत्तराधिकारी, निकटतम बनने का सुयोग उसी की अनुकम्पा से मिला है। जो किसी भी प्राणी को नहीं मिला उसे प्रदान करते समय एक शर्त जोड़ी कि अपनी अपूर्णता को पूर्णता में विकसित करे तो साथ ही उसकी विश्व वाटिका को सुरम्य बनाने के लिए अपने कौशल का अधिकाधिक प्रदर्शन करे।

यों यह दोनों काम एक दूसरे के साथ जुड़े हुये हैं। अपूर्णता को पूर्णता में विकसित करने के लिए जिन सत्प्रवृत्तियों की आवश्यकता पड़ती है। वे लोकोपयोगी पुण्य परमार्थ को संजोये बिना बन नहीं सकते और जो पुण्य परमार्थ का लक्ष्य लेकर चलेगा। धर्म धारणा और भाव संवेदना में उत्कृष्टता भरेगा। उसकी अपूर्णतायें अनायास ही पूर्ण होती चलेगी।

दोनों पक्ष अन्योन्याश्रित हैं। सेवा और सज्जनता एक ही बात है। पर उनकी भाव चेतना में परमार्थ के तत्व नहीं होते। कीट पतंग भी किसी बड़े जीवधारी के उदरस्थ होते रहते हैं, पर उनमें त्याग बलिदान जैसी कोई भावना नहीं होती। भावना को सम्मिश्रित किये बिना तो क्रिया-कलापों में जड़ पदार्थ भी संलग्न रहते हैं। इन निरपेक्षण के कारण ही निस्पृह स्तर के बने रहते हैं और उस सद्गति को प्राप्त नहीं करते जो उदारचेता, पुण्यात्माओं को मिलती है। इससे स्पष्ट है कि महत्व क्रिया का नहीं भावना का है। सत्प्रयोजनों के लिए जिनने बढ़-चढ़ कर त्याग, बलिदान किये, कष्ट सहे और प्राण दिये उनकी यश गाथा इतिहास पुराण गाते हैं और देवलोक में सम्मान पाते हैं। इसके विपरीत भाव रहित कृमि कीटकों को पक्षी मारते खाते रहते हैं। पर उन मरने वालों को कोई श्रेय नहीं मिलता। इसका कारण उनकी भाव रहित मनःस्थिति ही है।

देवऋण चुकाने का एक ही तरीका है कि दैत्य का समर्थन सहयोग करने से इनकार करें। दुष्प्रवृत्तियों को लोभ-मोह के वशीभूत होकर स्वीकार न करें और कष्ट सहते हुये भी पुण्य प्रयोजनों में अपनी चेतना और क्रिया को नियोजित रखें। इतना ही नहीं दूसरों के प्रसंगों में भी इसी नीति को अपनायें। असुरता का प्रतिरोध करें और पुण्य प्रयोजनों में अपनी बुद्धि, शक्ति और सम्पन्नता को होम दें। देवऋण से मुक्ति पाने के लिए यही रीति-नीति अपनानी पड़ती है।

वातावरण का प्रभाव और अन्तःकरण का उभार लोक प्रचलन से प्रभावित होकर अनीति के आकर्षणों की ओर ही खींचते हैं, जो इस दबाव के विरुद्ध लोहा लेते हैं और टूट जाने तक झुकते नहीं, समझना चाहिए कि वे देवऋण चुका रहे हैं एवं देवलोक के अधिकारी बन रहे हैं।


“द” का अर्थ (Kahani)

आदर्श निर्धारित हैं। पर उन्हें प्रयुक्त, परिस्थिति के अनुसार किया जाता है। इस तथ्य को सत्संग समागम में एक मनीषी उपस्थित जिज्ञासुओं को समझा रहे थे। उनने एक कथा कही-

देवता, मनुष्य और असुर प्रजापति के पास एक कोई उपदेश प्राप्त करने के लिए गए।

ब्रह्माजी ने उनका मनोरथ समझा और एक ही संकेत शब्द कह दिया- “द” साथ ही यह भी कहा- इसका तात्पर्य समझो और स्वयं ही यह बताओ कि उस निर्देश का पालन कैसे करोगे?

देवताओं ने कहा- “द” का अर्थ है ‘दमन’। हम संयम बरतेंगे और अपने को अधिक प्रखर करेंगे। मनुष्यों ने कहा- ‘द’ का अर्थ है ‘दान’। जो कमाएंगे मिल बाँटकर खाएंगे। असुरों ने कहा- ‘द’ का अर्थ है- ‘दया’। हम अहिंसा और क्रूरता छोड़ेंगे, अपनी सामर्थ्य को पीड़ितों की सहायता में नियोजित करेंगे।

आदर्श एक पर उसे व्यक्ति विशेष की परिस्थिति के अनुरूप प्रयुक्त किया जाता है। यह तथ्य सबों ने भली-प्रकार समझ लिया।


प्रगति और अवगति से भरी इक्कीसवीं सदी

इक्कीसवीं सदी आने में अब बहुत दिन नहीं रहे। मात्र चौदह वर्ष शेष हैं। विश्व इतिहास और मानव-जीवन की दृष्टि से यह कोई बड़ी अवधि नहीं है। दूरदर्शी इसे समीप आया समझकर सामने ही पाते हैं। यह बहुचर्चित है कि इक्कीसवीं सदी महत्वपूर्ण होगी। उसमें प्रगति की दर अधिक बढ़ जायेगी। इस दृष्टि से उसे आशा भरी दृष्टि से देखा जाता है और प्रतीक्षा की जाती है कि वह समय जल्दी आये, जिसमें सुख-सुविधाओं का अनुपात अब की अपेक्षा अधिक बढ़ा-चढ़ा हो।

यह कथन एक सीमा तक ही सही है। निःसंदेह वैज्ञानिक प्रगति तेजी से हो रही है। नित नये आविष्कार सामने आ रहे हैं। इनका उद्देश्य काम को सरल बनाना और सुविधाओं को सस्ते मोल में, बड़ी संख्या में उपलब्ध कराना है। सुविधाएं कौन नहीं चाहता? सरलता किसे पसन्द नहीं? सस्ते को खरीदने के लिये किसका मन नहीं चलता। इस दृष्टि से भविष्य के सम्बन्ध में अच्छी आशा करना उचित ही है। किन्तु इस प्रगति से कुछ खतरे भी हैं, जिन्हें समय रहते हमें समझ लेना चाहिये।

हाथ से होने वाला काम यदि मशीनें करने लगेंगी तो मनुष्य का कौशल भी घटेगा और परिश्रम करने की इच्छा एवं योग्यता भी घटेगी। मनुष्य का काम मशीनें जितनी अधिक मात्रा में करेंगी, उसी अनुपात में बेकारी बढ़ेगी। रोजगार मिलने के साधन घट जायेंगे। जिनके पास पर्याप्त धन है, वे निश्चय ही उनका उपयोग करके मोद मनायेंगे। पर साधनहीन लोगों के लिए कठिनाई और भी अधिक बढ़ जायेगी। उन्हें बेरोजगारी का सामना करना पड़ेगा। समीप में ही खुशहाल लोग रहें और पड़ौस में ही गरीब भुखमरे भरे हों तो उसका परिणाम ईर्ष्या-द्वेष के रूप में बढ़ेगा। जिनके सामने अधिक कमाने के अवसर नहीं हैं, वे भी सुसम्पन्नों जैसी सुविधा का उपभोग करना चाहेंगे। इसके लिये उन्हें चोरी बेईमानी का रास्ता अपनाना पड़ेगा। फलतः समाज की सुव्यवस्था टूटेगी। अराजकता जैसी स्थिति बनेगी। इस खतरे को देखते हुये, अगले दिनों वैज्ञानिक प्रगति का ध्यान रखते हुये हमें चाहिये कि उपार्जन का वितरण इस प्रकार संभव बनावें कि बेरोजगारी न बढ़े, और अपराधों के लिये उस स्तर के लोगों की भरमार न हो, जिन्हें ईर्ष्यालु, आलसी अनपढ़ एवं दरिद्र कहा जाता है।

बुद्धिवाद की वृद्धि इन दिनों भी हो रही है। शिक्षा-सम्वर्धन के प्रयास अगले दिनों भी चलेंगे। आबादी भले ही बढ़ती रहे पर शिक्षा प्रसार के प्रयास उससे आगे ही रहेंगे। अगले दिनों शिक्षितों की दूसरे शब्दों में बुद्धिमानों की अभिवृद्धि होगी। इसे प्रसन्नता और सौभाग्य की बात ही कहा जा सकता है। पर साथ ही संकट यह भी जुड़ता है कि शिक्षा की दिशा धारा, अर्थ-परायण एवं स्वार्थ पर आधारित बन रही है। उसके साथ नीति का सम्बन्ध जोड़ने की अपेक्षा तोड़ने का प्रतिपादन जुड़ रहा है। बूढ़े बैल को कसाई के हाथों बेच देने में आर्थिक लाभ दीखता है। इसलिये उस दया भाव की उपेक्षा की जा रही है। जिसके अनुसार अपंगों, वृद्धों, रोगियों को जीवित रखने के लिये मनुष्य जाति की सीमा में प्रयत्न होते रहते हैं। वयोवृद्ध अभिभावकों की सेवा-सुश्रूषा को कर्तव्य माना जाता है। भले ही उसमें वंशजों को असुविधा ही क्यों न उठानी पड़े। पर बुद्धिवाद, प्रत्यक्षवाद, उपयोगितावाद अर्थ लाभ वे बढ़ते हुये तर्क बूढ़े बैल या गाय को उपार्जन की दृष्टि से लाभदायक न रहने पर, कसाई के हाथों बिकवा देने वाला ‘दर्शन’ बूढ़े माँ बाप के साथ वैसा ही व्यवहार करने से क्यों चूकेगा? हो सकता है कि न कमाने वालों को भार रूप माना जाने लगे और बालकों का अन्त गर्भपात कराने से और बूढ़ों को विषैली सुई लगाने से अन्त करने की प्रथा चल पड़े। अर्थ-लाभ ही जब प्रधान है तो उदारता, सेवा पुण्य-परमार्थ जैसे कार्यों की सहज उपेक्षा की जाने लगेगी। अन्न का उत्पादन कम पड़ता दीखेगा तो अन्य प्राणियों को उदरस्थ किया जाने लगेगा। तब विश्व बंधुत्व और जीव दया जैसे सिद्धान्तों का परिपालन करना तो दूर, उन्हें मूर्खतापूर्ण बताया जाने लगेगा। जब पशु वध करने में दया भावना को आड़े नहीं आने दिया जायेगा तो मनुष्य-मनुष्य पर भी छोटे-छोटे प्रयोजनों के लिये आक्रमण करने में क्यों चूकेगा? तब छल, अपहरण शोषण जैसे हल्के आक्रमणों तक ही लोग सीमित न रहेंगे, वरन् हत्याओं को भी समर्थ लोग एक खिलवाड़ जैसा मानेंगे।

अगले दिनों खतरा यह है कि बढ़ता हुआ बुद्धिवाद जिसमें अर्थ लाभ ही सब कुछ है; नीतिमत्ता और उदारता को किस हद तक जीवित बने रहने दे सकता है।

उच्च आदर्शों का प्रचलन, प्रशिक्षण एवं वातावरण घट रहा है। चतुरता को ही बुद्धिमत्ता माना जाने लगा है। जो दूसरे को जितना मूर्ख बना सके, वह उतना ही बड़ा बुद्धिमान है। इस परिभाषा के सामने न नीतिमत्ता का कोई अस्तित्व रह जाता है और न आदर्शवादिता का। मर्यादाओं और वर्जनाओं से मुक्ति पाकर स्वेच्छाचारी मनुष्य वासना और अहंता की पूर्ति के लिये झुकेगा उसका परिणाम यह होगा कि नर-नारी एक दूसरे के कार्यों के सहयोगी न रहकर शोषण में प्रवृत्त होंगे। इससे उनका शरीर बल भी टूटेगा और मनोबल भी गिरेगा। समर्थता, दुर्बलता में बदलती रहेगी।

नर नारी के बीच माता, भगिनी, पुत्री, धर्मपत्नी की पवित्र भावनायें आत्म संबंधों का अंकुश लगाती हैं। मर्यादाओं के पालन का दबाव डालती हैं। पर जब नारी को रमणी, कामिनी के रूप में चित्रित, सज्जित, सहमत किया जाने लगेगा और वह मनोरंजन भर कहा जाने लगेगा तो समझना चाहिये कि दाम्पत्य जीवन की पवित्रता एवं वफादारी चली जायेगी। फलतः उस परिवार संस्था का विनाश होगा जिसे नर रत्नों की खदान समझा जाता था अविश्वासी दम्पत्ति जीवन की अस्थिरता, अभिभावक की कुटिलता से प्रभावित बालक महामानव बन सकेंगे, इसकी आशा करना आकाश कुसुम तोड़ने के समान है।

आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता का तत्व दर्शन नये बुद्धिवाद की दृष्टि में अन्धविश्वास माना जाने लगा है। यदि यह मान्यता अधिकाँशतः लोगों पर चढ़ दौड़ी तो समझना चाहिये कि कर्मफल, परलोक, ईश्वरीय न्याय की मान्यता को कोई श्रेय न मिलेगा और मनुष्यों में जंगल का कानून चल पड़ेगा।

नीतिमत्ता की उपेक्षा करके स्वार्थ साधना को प्रमुखता देने का परिणाम यह हुआ कि प्रदूषण, विकिरण, बहुप्रजनन, अणु युद्ध जैसी विभीषिकाएँ सामान्य जीवन को राहु-केतु बनकर आतंकित कर रही हैं। अब अगले चरणों की तैयारी है। उसमें नीतिमत्ता, धर्मनिष्ठा का स्थान जब विडम्बनायें ग्रहण करेंगी तो न कहीं सत्साहित्य दृष्टिगोचर होगा, न सत्संग। न निर्दोष मनोरंजन होगा, न आदर्शवादी प्रचलन। इन परिस्थितियों में घिरी हुई मनुष्य जाति दीन-हीन और दयनीय ही बनकर रहेगी। भले ही उसके पास विपुल सुविधाएँ और भरमाने फुसलाने वाली बुद्धिमत्ता के अम्बार ही क्यों न लगे हों?

इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य के आकर्षणों को ध्यान में रखते हुये हमें प्रसन्न और आशान्वित होना चाहिये। किन्तु साथ ही उन खतरों को भी भूल नहीं जाना चाहिये जो प्रगति को अवगति में बदलने के लिये उतारू हैं।


उद्योग-लक्ष्मी से भिन्न (Kahani)

बलि अपने समय के धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में सतयुग विराजता था।

सौभाग्य-लक्ष्मी बहुत समय तो उस क्षेत्र में रही पर पीछे अनमनी होकर किसी अन्य लोक चली गई

इन्द्र को असमंजस हुआ और इस स्थान परिवर्तन का कारण पूछ ही बैठे।

सौभाग्य-लक्ष्मी ने कहा- मैं उद्योग-लक्ष्मी से भिन्न हूँ। मात्र पराक्रमियों के यहाँ ही उसकी तरह नहीं रहती। मेरे निवास में चार आधार अपेक्षित होते हैं। (1) परिश्रम में रस (2) दूरदर्शी निर्धारण (3) धैर्य और साहस (4) उदार सहकार। बलि के राज्य में जब तक यह चारों आधार बने रहे तब तक वहाँ रहने में मुझे प्रसन्नता थी। पर अब जब सुसम्पन्नों द्वारा उन गुणों की उपेक्षा होने लगी तो मेरे लिए अन्यत्र चले जाने के अतिरिक्त और कोई चारा न था।


अपनों से अपनी बात

इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग रह नहीं गया है

“अखण्ड-ज्योति” पत्रिका पाठकों के हितों को प्रधानता देते हुए प्रकाशित होती रही है। उसके हर पृष्ठ पर गुरुदेव की अमृतवाणी लेखनी के द्वारा इस प्रकार लिखी जाती है कि अर्धमृतकों और अर्धमूर्च्छितों में भी नव जागरण का- नवजीवन का- संचार होता रहे। यही कारण है कि साज सज्जा से रहित होने पर भी उसे दो लाख पाठक मँगाते व पढ़ते हैं। प्रत्येक पाठक न्यूनतम दस को पढ़ाता है, इस प्रकार यह संख्या 10 लाख तक जा पहुँचती है।

पत्रिका का मूल्य निर्धारित करते समय एक ही बात का ध्यान रखा जाता है कि लागत मात्र ही चन्दा वसूल किया जाय। उसे “नो प्रॉफिट नो लॉस” के सिद्धान्त पर चलाया जाता है। कागज, छपाई, बाइंडिंग, डिजाइनें, पोस्टेज इत्यादि का पैसा जोड़कर जितना बनता है, उतना ही मूल्य रखा जाता है। इसी नीति के आधार पर उसे अब तक चलाया जाता रहा है और भविष्य में भी इसी नीति को पूरी ईमानदारी के साथ अपनाये रहा जाएगा।

विगत तीन वर्षों में मुद्रण सामग्री में असाधारण वृद्धि हुई है। न्यूजप्रिण्ट की कीमतें बड़ी तेजी से बढ़ी हैं। कागज के साथ छपाई, स्याही, पोस्टेज आदि सभी में चालीस से पचास प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। तद्नुसार अधिकाँश पत्र-पत्रिकाओं ने उनके मूल्य बढ़ा दिये हैं। पर अखण्ड ज्योति इन वर्षों में यही प्रतीक्षा करती रही कि यदि लागत में थोड़ा घाटा आता है तो भी उसे सहकर मूल्य यथावत् बनाये रहा जाय। इसी प्रतीक्षा काल में प्रायः एक लाख का घाटा हो गया। बाहर की यह राशि अभी चुकाना शेष है।

अन्य पत्रिकाएँ दूसरी प्रकार अपने घाटे पूरे कर लेती हैं। उनमें चालीस प्रतिशत स्थान विज्ञापनों के लिए सुरक्षित रहता है। महँगाई बढ़ते ही विज्ञापन रेट बढ़ा देते हैं। वार्षिक मूल्य भी बढ़ा देते हैं। कुछ पत्रिकाएँ निकालने वाली संस्थाओं का खर्च दान-दक्षिणा के आधार पर चलता है। पर अखण्ड-ज्योति के पास इनमें से एक भी साधन नहीं है। उसे ग्राहकों से वसूल होने वाले चन्दे से ही अपना संतुलन बिठाना पड़ता है।

एक मोटी दृष्टि आज के दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं पर डालें तो पाते हैं कि मूल्यों में 50 प्रतिशत से भी अधिक वृद्धि हुई है। दैनिक जनसत्ता जहाँ नवम्बर 84 में 60 पैसे थी, वहाँ नवम्बर 85 में 70 पैसा एवं अब 80 पैसे हो गयी है। दैनिक हिन्दुस्तान दिसम्बर 84 तक 60 पैसे प्रति कॉपी था। मार्च 85 में यह 64 पैसे, मई 86 में 70 पैसे व अब सितम्बर में 80 पैसे हो गया है। नवभारत टाइम्स भी 60 पैसे से बढ़कर मई 86 में 70 पैसे व अब 80 पैसे का है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान जहाँ 84 अंत तक 2.50 प्रति कॉपी था, वहाँ मई 85 में 3.50 एवं अब 4.00 प्रति कॉपी है। धर्मयुग का 1984 में 3.00 एक प्रति का मूल्य था, वह दिसंबर 85 में 4.00 एवं अप्रैल 83 में 5.00 हो गया। टाइम्स ऑफ इण्डिया नवम्बर 84 में 80 पैसे, मार्च 86 में 90 पैसे एवं सितम्बर 86 में 1/प्रति कॉपी है। इंडियन एक्सप्रेस भी अब 60 पैसे से बढ़कर 1/ प्रति कॉपी हो गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स मार्च 84 में 80, जुलाई 86 में 90 पैसे व अब 1/प्रति कॉपी है। सर्वोत्तम एवं रीडर्स डायजेस्ट की कीमतें तो देखते-देखते 6/ व 8/ से बढ़कर क्रमशः 9/ एवं 12/ मासिक तक जा पहुंची हैं। कादम्बिनी पत्रिका अप्रैल 84 में 3.50 की थी जो अब अप्रैल से 4/ प्रति कॉपी है। नवनीत 1984 में 3/प्रति कॉपी था, 1987-76 में 6.75/ हो गया है। ज्ञातव्य है कि ये सभी पत्रिकाएं विज्ञापन लेती हैं जबकि ऐसा प्रावधान अखण्ड-ज्योति पत्रिका के साथ नहीं है, जो ऐसी ही स्थिति में पचास वर्षों से छपती आ रही है। कल्याण जैसी धार्मिक पत्रिका का वार्षिक मूल्य अब 60 रुपये है जबकि यही पत्रिका- 1983-84 तक मात्र 20/मूल्य में प्रकाशित होती रही है।

अखण्ड-ज्योति का वार्षिक चन्दा बढ़ाने की बात पिछले तीन वर्षों से हर साल सोची जाती रही है पर वैसा कदम संकोचवश उठ ही नहीं सका। मँगाने वाले परिजनों को सीमित आजीविका में ही घर खर्च चलाने की व्यवस्था बनानी पड़ती है। वे निर्वाह के आवश्यक साधनों को छोड़कर अन्य प्रसंगों में खर्च की बढ़ोत्तरी करने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसी दशा में उन पर पत्रिका की मूल्य अभिवृद्धि का दबाव डालने का किसी तरह मन नहीं होता। कई अंकों में कुछ पृष्ठ घटाकर भी संतुलन बनाने की बात सोची गई पर उससे भी बात बनी नहीं। पत्रिका का कलेवर, सौंदर्य, पाठ्य सामग्री का स्तर गिराने की अपेक्षा तो उसे बन्द कर देना अच्छा। यह सोचकर पत्रिका का पूर्व इतिहास और आत्म गौरव यही कहता रहा कि जिसे अपने ढंग की अद्भुत और अनोखी पत्रिका माना जाता रहा है उसे घटिया श्रेणी की बनाकर रख देना किसी भी परिस्थिति में उचित न होगा। इस प्रकार की कटौती करने के पक्ष में पाठक भी न थे। उनसे भी पूछताछ कर ली गई है।

अन्ततः सब कुछ सोच विचारने के बाद चन्दा बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग रह नहीं गया है। इसका विकल्प पत्रिका को घटिया बना देना, कलेवर क्षीण कर देना अथवा बंद कर देना ही हो सकता है। यदि इस मार्ग को न अपनाना हो तो उपाय एक ही रह जाता है कि लागत के अनुरूप चन्दा बढ़ा दिया जाय। अनेक दृष्टिकोणों से विचार करने के उपरान्त इसी बिन्दु पर ठहरना पड़ता है। उसका मूल्य अब बढ़ाया जा रहा है एवं बीस रुपया वार्षिक के स्थान पर पच्चीस रुपया किया जा रहा है।

यह अखण्ड-ज्योति का पचासवाँ वर्ष है। इसे स्वर्ण जयन्ती वर्ष के रूप में उद्घोषित किया गया है। तद्नुसार निश्चय किया गया है कि उसे हर दृष्टि से अब की अपेक्षा और भी अधिक उच्चस्तरीय बनाया जाय। पाठ्य सामग्री के रूप में भी यही किया जा रहा है और कलेवर के संबंध में भी। कलेवर सुनहरा छपेगा। फोटोटाइप सेटिंग से छपाई तो अगस्त 86 से ही आरम्भ कर दी गई थी। अब कतिपय लेखों के साथ विषय वस्तु को समझाने वाले फोटोग्राफ भी होंगे। जनवरी का अंक “कुण्डलिनी साधना” अंक होगा। इसमें विगत तीन वर्षों की गुरुदेव की कठोर सावित्री साधना का स्वरूप, आधार और विधान का दिग्दर्शन रहेगा। फरवरी अंक को “इक्कीसवीं सदी” अंक के रूप में निकाला जा रहा है, जिसमें उस भवितव्यता का विवरण रहेगा जो अगली शताब्दी में घटित होकर रहेगा। इसे ऐसी भविष्यवाणी का समुच्चय कहा जा सकता है, जिसके घटित होने की संभावना पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। इसके उपरान्त भी पाठ्य सामग्री से लेकर पृष्ठ संख्या और कलेवर में जो कुछ अभिवृद्धि संभव होगी, उसमें कुछ उठा न रखा जाएगा।

पिछला घाटा अभी चुकाना शेष है। इसके लिए थोक पत्रिकाएँ मँगाने वाले जिन सज्जनों के नाम उधारी निकल रही है, उन्हें इन्हीं दिनों चुकाने का अनुरोध किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि हिसाब नकद का ही रखें। किसी ग्राहक पर चन्दा उधार न करें और उसे फिर कभी दे देने की छूट देकर वसूली में विलम्ब न होने दें। जो वसूल होता जाय उसे तुरन्त मथुरा भेजा जाय। उधारी मथुरा की जिम्मेदारी पर नहीं, अपनी निजी जिम्मेदारी पर ही रखनी चाहिए। पत्रिका पर जो इन दिनों कर्ज है उसमें अधिकाँश उधारी का ही है।

एक विशेष अनुरोध यह है कि इस स्वर्ण जयंती वर्ष में अखण्ड-ज्योति के रूप में युग चेतना को अधिकाधिक व्यापक विस्तृत करने में इस बार पूरी शक्ति झोंक दी जाय। दो-दो की टोली बनाकर अपने प्रभाव क्षेत्र के सभी विचारशील परिजनों के पास जाया जाय और उन्हें पत्रिका के प्रतिपादनों का महत्त्व समझाते हुए कहा जाय कि उसमें जीवनक्रम का कायाकल्प करने की क्षमता है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादी बनाने की सामर्थ्य है। अध्यात्म तत्वज्ञान का विज्ञान, तर्क, तथ्य समेह ऐसा प्रतिपादन अन्यत्र कदाचित ही देखने को मिलते। आत्मा को समर्थता देने वाले इस अमृतोपम आहार को उपलब्ध किया ही जाना चाहिए।

आशा की गई है कि स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर मनाई जा रही पूर्णाहुति के उपलक्ष में पत्रिका के नये ग्राहकों के रूप में वसोधारा ज्ञान यज्ञ में अवश्य डाली जाएगी। वस्तुतः घर-परिवार में पत्रिका का प्रवेश ऐसा है कि जिसके लिए रोटी में कटौती करके भी आत्मा के लिए परम श्रेयस्कर इस कल्याणकारक भोजन को ग्रहण किया ही जाना चाहिए।

स्मरण रहे अब अखण्ड-ज्योति का चन्दा पच्चीस रुपया वार्षिक होगा और वही वसूला जाना चाहिए। इस हेतु पत्रिका में रसीदें लगाई जा रही हैं- और अधिक आवश्यकता होने पर संस्थान से मँगाई जा सकती हैं।


क्या करें? क्यों करे? कितना करें?

चिन्तन क्षेत्र की अनेक गुत्थियां हैं। परस्पर विरोधी प्रतिपादनों से मनुष्य दिग्भ्रान्त जैसी स्थिति में जा पहुंचता है। किंकर्तव्य विमूढ़ जैसी स्थिति में वह सोचने लगता है कि इनमें से किस मार्ग को चुना और किस मार्ग को छोड़ा जाय।

कोई कर्तव्य को ही सब कुछ मानने का परामर्श देते हैं और किन्हीं का कथन है कि अधिकारों के लिए लड़ो अन्यथा चतुर लोग तुम्हारी सज्जनता का अनुचित लाभ उठाते और ठगाते।

कहा सुना जाता है कि भगवान जिस भी स्थिति में रखें, रह लो। किसी के दोष न देखो और सबको क्षमा करो। इसके ठीक विपरीत यह भी कहा जाता है कि प्रगति के लिए घोर प्रयासों का वरण करें। चैन से बैठने वाले आलसी बनते और दूसरों को अकर्मण्य बनाते हैं। क्षमा का अर्थ है, दुष्टता को निरन्तर बढ़ने के लिए प्रोत्साहन करना और समर्थन देना।

चतुरता अपनायें या भोले बनकर जियें। शठ के साथ शठता बरतें या उपहासपूर्वक उसे अपनी मर्जी पर चलने दें। बिच्छू का डंक कुचल दें या उसे बार-बार पानी में बहने या बार-बार निकालते रहने की उदारता दर्शायें।

नेकी मात्र सज्जनों के साथ बरतें या भले बुरे का विचार किये बिना हर किसी को उदार अनुदान दें। यदि “सब धान बाईस पसेरी” तोले जायेंगे तो फिर श्रेष्ठ और निकृष्ट के बीच अन्तर ही क्या रह जायगा? जब दुर्जन भी सहयोगी के समान और सहयोग के अधिकारी हैं तो कोई इन्हें छोड़ने या घटाने की बात क्यों सोचेगा? सहिष्णुता अपनाये रहेंगे तो फिर दुरात्माओं के कोल्हू में पिसने से किस प्रकार बच सकेंगे।

सबसे प्यार करो। यह कथन देखने और सुनने में बहुत सुहाता है, पर सबकी परिधि में तो दुरात्मा भी आते हैं। उन्हें प्यार देने या प्रसन्न करने में अपने स्वभाव, चरित्र और भविष्य का भी तो नाश होता है। भले और बुरे का अन्तर किये बिना यदि सभी से प्यार करने लगा जायगा तो दुनिया में अधिकांश लोग बुरे ही भरे पड़े मिलेंगे। प्रेम के नाम पर हम उन्हीं का समर्थन कर रहे होंगे और सहयोग दे रहे होंगे।

एक शिक्षा है मौन रहने की, एकान्त सेवन की, किसी से कुछ अपेक्षा न करने की। पर इसके बिना अपने अन्तराल का अमृत दूसरों पर कैसे बखेरा जा सकेगा। भटकों का मार्गदर्शन किस प्रकार बन पड़ेगा? किसी से कुछ अपेक्षा की जायगी तो उसे कर्मनिष्ठ और दायित्वों का वहन करने के लिए विवश कैसे किया जा सकेगा? ऐसे तो निष्क्रियता ही फैलती फूलती रहेगी।

यह ठीक है कि बुराई से दूर रहें, पर जहां गंदगी जमा है, वहां गंदगी जमा है, वहां से उसे हटाया और स्वच्छता की सुसज्जा बनाने का काम कौन लेगा? मल, मूत्र, पसीना, कफ आदि शरीर में निरन्तर पैदा होते हैं। सिर में जुंए और बिस्तर में खटमल भी पलते हैं, उन्हें हटाये बिना और कौन सा ऐसा कार्य है जिनसे बचकर रहा जा सकेगा। ऐसे तो मक्खी, मच्छर भी घर में बढ़ते रहेंगे, और हम उनसे दूर रहने के लिए पलायन की योजना बनाते रहेंगे।

समय का एक पल भी व्यर्थ न गंवाओ, सिद्धान्त के ठीक विपरीत यह है कि धैर्य रक्खें और प्रतीक्षा करें। दोनों बातें एक साथ कैसे निभ सकेंगी?

अच्छा यह है कि हम गुण, दोषों का वर्गीकरण और विश्लेषण करें किसी कथन को पत्थर की लकीर न मानें, विवेक से काम लें और जहां जितना औचित्य प्रतीत हो वहां उतना ही अपनायें।


महाकाल का आमंत्रण

लाखनसिंह भदौरिया


महाकाल का आमंत्रण (Kahani)

आज समय लेता अंगड़ाई। शब्द ब्रह्म चैतन्य हो रहा, ऋचा चाहती है तरुणाई।

जागो उपनिषदों के चिन्तन, मांग रहा तप, युग का क्रन्दन,

महाप्रलय का शंख बजाती सिर पर आन चढ़ी असुराई। आज समय लेता अंगड़ाई।

भस्मासुर शिवता पर झपटे, सर्वनाश, मानव को डपटे,

सभी दिशायें मूक देखती, महानाश कर रहा चढ़ाई। आज समय लेता अंगडाई।

अमृतपुत्र, तुम्हारा परिचय, इसमें कहां तनिक भी संशय,

होकर अभय वीर बलिदानी, तुमको करनी है अगुवायी। आज समय लेता अंगड़ायी।

तुम न रहोगे, कौन रहेगा, स्वर्ग, धरा की कौन करेगा,

उठो सृजन के समर सपूतो, महाकाल दे रहा बधाई। आज समय लेता अंगड़ाई।

*समाप्त*