अन्धकार की अपनी शक्ति है। जब उसकी अनुकूलता का रात्रिकाल आता है तब प्रतीत होता है कि समस्त संसार को उसने अपने अंचल में लपेट लिया। उसका प्रभाव, पुरुषार्थ देखते ही बनता है। आँखें यथा स्थान बनी रहती हैं। वस्तुएँ भी अपनी जगह पर रखी रहती हैं किन्तु देखने लायक विडम्बना यह है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ पड़ता। पैरों के समीप रखी हुई वस्तुयें ठोकर लगने का कुयोग बना देती हैं।
अन्धकार डरावना होता है। उसके कारण एकाकीपन की अनुभूति होती है और रस्सी का साँप, झाड़ी का भूत बन कर खड़ा हो जाता है। नींद को धन्यवाद है कि वह विस्मृति के गर्त में धकेल देती है अन्यथा जागने पर करवटें बदलते वह अवधि पर्वत जैसी भारी पड़े।
इतनी बड़ी भयंकरता की सत्ता स्वीकार करते हुये भी हमें दीपक की सराहना करनी पड़ती है जो जब अपनी छोटी सी लौ प्रज्वलित करता है तो स्थिति में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हो जाता है। उसकी धुँधली आभा भी निकटवर्ती परिस्थिति तथा वस्तु व्यवस्था का ज्ञान करा देती है। वस्तु बोध की आधी समस्या हल हो जाती है।
दीपक छोटा ही सही- अल्प मूल्य का सही, पर वह प्रकाश का अंशधर होने के नाते अंधकार के सुदूर फैलाव को चुनौती देता है और निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है। इसी को कहते हैं नेतृत्त्व।
मनुष्य की काय संरचना और मस्तिष्कीय बुद्धि विचारणा का इतना बड़ा अनुदान हर किसी को मिला है कि वह अपना और संबद्ध परिकर का काम भली प्रकार चला सके। इस क्षमता से रहित कोई भी नहीं है। इतने पर भी व्यामोह का कुछ ऐसा कुचक्र चलता रहता है कि उपलब्धियों की न तो उपस्थिति का अनुभव होता है और न उससे किस प्रकार का क्या काम लिया जाना चाहिए?, इसका निर्धारण बन पड़ता है।
ऐसी दशा में असमर्थता अनुभव करने वालों को समर्थों का मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त करना होता है। उसके अभाव में विद्यमान क्षमताएं प्रसुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं और उनके द्वारा जिस प्रयोजन की पूर्ति की जा सकती थी, वह नहीं हो पाती।
कपड़े कोई भी धो सकता है पर अनभ्यास या आलस्य की स्थिति में धोबी का आश्रय लेना पड़ता है। पेट भरने योग्य भोजन बना लेने की आदत दो चार दिन में डाली जा सकती है पर देखा यह गया है कि आवश्यक वस्तुएँ घर में होते हुए भी रसोई बनाने का सरंजाम नहीं जुट पाता और भूखे रहने या बाजार से खाने की कठिनाई सामने आ खड़ी होती है। अनेक अपने हाथ से हजामत बनाते हैं पर कितनों ही का काम नाई का सहयोग लिए बिना चलता ही नहीं। अभ्यास से संगीत-संभाषण जैसे कौशल सहज ही सीखे जा सकते हैं, पर अपने से इस संदर्भ में कुछ करते धरते न बन पड़ने पर किसी दूसरे को बकौल प्रतिनिधि या माध्यम के खड़ा करना पड़ता है। इसे आलस्य, अनभ्यास भी कहा जा सकता है और अनुकूल सुविधा हस्तगत न होने का कुयोग भी।
इस हेय स्थिति में से निकलने का सभी को प्रयत्न करना पड़ता है और किया जाना चाहिए। इस अवलम्बन का नाम है- मार्गदर्शन। उसे प्राप्त करने में किसी को अपनी छुटाई या अवमानना अनुभव नहीं करनी चाहिए। वरन् इस तलाश में रहना चाहिए कि जो अब तक उपलब्ध नहीं है, वह आगे उपलब्ध हो। तालाबों में निज का पानी कहाँ होता है? वे बादलों से ही उधार लेकर अपना भण्डार भरते हैं। जलवायु जैसे प्रकृति अनुदानों को हम कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हैं, न इसमें अपनी हेठी मानते हैं और न अभावग्रस्तता।
छोटे बच्चे अभिभावकों का सहयोग लेकर ही अपनी भ्रूण स्थिति को पार करते स्तनपान का लाभ लेते, आच्छादनों और सेवाओं का लाभ उठाते हैं। इतना बन पड़ने पर ही वे घुटनों के बल चलने या खड़ा होने की स्थिति में आते हैं। भाषा बोध भी उन्हें परिवार के सदस्यों का अनुकरण करते-करते ही हस्तगत होता है। जिन बालकों का पालन पशु समुदाय के बीच हुआ है, उन अपवादों में मनुष्य बालक भी पशु स्तर का आचरण करते और शब्द बोलते देखे गये हैं। यह है समर्थ मनुष्य की असमर्थता। मौलिक रूप से वह सृष्टा की दी हुई अनेकानेक विशेषताओं से सम्पन्न है, किन्तु इसे प्रकृति का व्यंग्य ही कहना चाहिए कि वह अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने पैरों खड़ा नहीं हो पाता। उसे दूसरों के सहयोग, मार्गदर्शन या आश्रय की आवश्यकता पड़ती है, चाहे वह कितना ही न्यून क्यों न हो।
उपहार लेना हो तो इस विश्वास के साथ लो कि उसे समय रहते ब्याज समेत चुका दिया जायगा। अन्यथा उपहार के साथ तुम्हारा मूल्य गिरेगा।
बच्चे बाल कक्षाओं से लेकर स्नातक स्तर तक का- उससे भी आगे विशेष विषयों- का ज्ञान प्राप्त करते हैं, किन्तु यह सब अनायास ही नहीं हो जाता, इसके लिए स्कूली वातावरण का- अध्यापकों का- पुस्तकों का- सहारा लेना पड़ता है। यों हृदयंगम शिक्षार्थी स्वयं ही करता है पर इसके लिए विशेषताओं का, विशेष परिस्थितियों का आश्रय लेना अनिवार्य स्तर पर आवश्यक हो जाता है। बिना सहायता के किसी ने उच्चस्तरीय ज्ञान स्वयं अर्जित किया हो उसके उदाहरण कहीं कदाचित ही दीख पड़ते हैं। आत्म ज्ञान-तत्व दर्शन की उपलब्धि के लिए आरम्भ में प्रत्यक्ष गुरु की और बाद में “अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं विश्व चराचरम्” रूपी समष्टि चेतना के सम्मुख अपने को समर्पित करना पड़ता है। इसके बिना मनुष्य दिग्भ्रान्त और अनगढ़ ही बना रहता है।
मानवी सत्ता की महत्ता इसी दृष्टि से है कि उसे उपयुक्त माध्यमों से मोड़ा, मरोड़ा, सुधारा, संभाला जा सकता है। चतुर माली अपने उद्यान को रंग बिरंगे फूलों, सुमधुर फलों और नयनाभिराम शोभा सम्पदा से भरपूर बना देता है। इसमें पेड़ पौधों की अपनी विशेषता का जितना महत्व है उससे कहीं अधिक माली की कलाकारिता का है। यदि वह खाद-पानी, निराई-गुड़ाई, छँटाई-रखवाली की समग्र प्रक्रिया में चूक करे, तो समझना चाहिए कि झाड़ झंखाड़ों का झुरमुट ही खड़ा हो जायगा। प्रकृतितः पौधे झाड़ झंखाड़ों का रूप ही धारण करते हैं। यह कुशल कलाकार की साधना ही है जो तुच्छ वस्तुओं को कुछ से कुछ बना कर रख देती है।
कपड़ों के टुकड़े से दर्जी बढ़िया पोशाक सीकर देता है। धातुओं के टूटे-फूटे टुकड़ों को स्वर्णकार आकर्षक आभूषणों में बदल देता है। कागज और कूँची के सहारे चित्रकार बहुमूल्य तस्वीरें बनाते हैं और मूर्तिकार के छैनी-हथौड़े पत्थर के टुकड़े को देव प्रतिमा के रूप में पूजे जाने योग्य बना देते हैं। वाद्य यंत्रों में लगी सामग्री कौड़ी के मोल की होती है, पर वे जब कारीगर की तत्परता के साथ जुड़ते हैं, तो वादन का ऐसा सुयोग बिठाते हैं कि गायक के स्वर में चार चाँद लगने लगें। कला की, कला-कौशल की जितनी महिमा गाई, बताई और समझी-समझाई जाय उतनी ही कम है। आत्म चेतना और उसकी विलक्षण गरिमा का हमें बोध होना चाहिए किन्तु साथ ही यह भुला नहीं देना चाहिए कि अनगढ़ को सुगढ़ बनाने वाले तंत्र की भी अपनी महत्ता और आवश्यकता है। इसके बिना न हाथी पर सवारी गाँठी जा सकती है और न शेर से सरकस वाले करतब कौतूहल दिखाने का आधार खड़ा होता है। संसार की अगणित महती विभूतियों में एक यह भी है कि सामान्य को असामान्य बना देने वाले कलाकार के साथ गुँथ जाने का उसे सुयोग मिल जाय।
बहुमत की अपनी उपयोगिता है, पर वह वोटों की गिनती तथा जुलूस, प्रदर्शन, मेले ठेले की भीड़-भाड़ तक ही सीमित है। साधारणतया मनुष्य को बंदर की औलाद कहकर जीव विज्ञानियों द्वारा संबोधित किया जाता है। प्रकृति की उपज में वह भी एक पशु वर्ग का प्राणी है और उदरपूर्णा, आत्मरक्षा, वंश-वृद्धि जैसी मोटी जानकारियों से अवगत है।
“हे लोगो! मैं जो कुछ कहूँ वह परम्परागत है। इसलिए उसे सच मत मानना। तुम्हारी पूर्व परम्परा के अनुसार है, इसलिए उसे सच मत मानना। कदाचित् वैसा ही होगा, यह समझ कर उसे सच मत मानना। तर्क सिद्ध है ऐसा समझ कर उसे सच मत मानना। लौकिक प्रचलन है, ऐसा मानकर उसे सच मत मानना। सुन्दर लगता है इसलिए उसे सच मत मानना। तुम्हारी श्रद्धा पोषक है, इसलिए उसे सच मत मानना।”।
“मैं प्रसिद्ध साधु हूँ- पूज्य हूँ। ऐसा मानकर कथन को सच मत मानना। परन्तु यदि तुम्हारी विवेक बुद्धि को मेरा उपदेश सच मालूम हो तो ही उसे स्वीकार करना।”
-बुद्ध
जनसंख्या की वृद्धि यों जंगलों को बसाने और श्रमिकों को बटोरने में काम भी आ सकती है। पर इन दिनों जिस प्रकार जनसंख्या विस्फोट हो रहा है उस पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि यह भी महायुद्ध या महामारी स्तर की विपत्ति है। उत्पादन बरसाती मेंढ़कों और मक्खी मच्छरों को भी मात दे रहा है। खाद्य, शिक्षा, चिकित्सा, बेरोजगारी, आपाधापी, मूढ मान्यता, यातायात स्तर की दृश्य और अदृश्य समस्याएँ निरन्तर बढ़ती चली जा रही हैं। वे व्यक्ति परक, पदार्थ परक और घटना परक तीनों स्तर की हैं। उनका समुच्चय भयावह से भयावह तर और तम होता चला जाता है। कारण कि न तो वर्तमान पीढ़ी का बहुसंख्यक भाग ऐसा है जो अपनी समस्याओं का समाधान कर सके और न इस स्तर का है कि अपने द्वारा उत्पादित कोरे कागजों पर कुछ सुन्दर सी- लकीरें बना सके। स्पष्ट है कि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ समस्याओं की विद्रूपता अगले दिनों और भी अधिक बढ़ती जायगी। संग्रहित सुसंस्कारों का अभाव पूरा कर वर्तमान में सत्प्रवृत्तियों- सत्प्रयोजनों को बढ़ाने की दिशा में प्रयत्नशील होने का पौरुष दिखा सकें, यह कार्य हर परिवार में निजी रूप से होना चाहिए था, पर उनकी स्थिति और स्तर देखते हुये वैसी आशा करना व्यर्थ है। फलतः नया मार्ग ही खोजना पड़ेगा और प्राचीनतम परम्परा को पुनर्जीवित करना होगा। उन दिनों गृहस्थ, ब्राह्मणों और विरक्त परिव्राजकों का बहुत बड़ा समुदाय लोक शिक्षण की महती जिम्मेदारी को वहन करता था। अपने निजी स्वार्थ, निजी पराक्रम से इसी लक्ष्य को पूरी तरह नियोजित किये रहता था कि जन स्तर के किसी भी पक्ष में गिरावट न आने पाये। किसी क्षेत्र का, किसी भी परिस्थिति का व्यक्ति भौतिक या आत्मिक दृष्टि से गई गुजरी परिस्थितियों में न रहने पाये। इसके लिए वे लोगों को अपने यहाँ बुलाने जमा करने की आशा नहीं करते थे वरन् बादलों की तरह जाकर हर खेत पर बरसते और तालाब को पानी से लबालब भरते थे। यही थी, एक मात्र वह रहस्य भरी परम्परा जिसने इस देश के नागरिकों को तैंतीस कोटि देवता स्तर का बनाया था और इस भारत भूमि को स्वर्गादपि गरीयसी होने का सम्मान संसार भर की जनता से दिलाया था।
आज की स्थिति में उस सतयुगी परम्परा को पुनर्जीवित करने का और कोई उपाय नहीं। यद्यपि यह है अति कठिन। क्योंकि प्राचीन काल में इस परमार्थ प्रयोजन में असंख्यों व्यक्ति लगे मिलते थे और उन्हें देखकर एक दूसरे को प्रेरणा मिलती थी। समस्याओं को भी आपस में मिल बैठ कर समझते और सुलझाते थे। पर अब तो ऐसा कहीं भी कुछ भी दीख नहीं पड़ता। हर व्यक्ति स्वार्थ साधन में लगा है और पतन तथा कलह के बीज बो रहा है। ऐसी दशा में अन्तःप्रेरणा के आधार पर युग समस्या को समझते हुए लोक मानस के परिष्कार का कार्य कौन हाथ में ले? अकेले के बलबूते कोई व्यापक कार्यक्रम कैसे बने? और जब निराशा, असफलता और उपहास का वातावरण चारों ओर दीखे तो किस बलबूते अपने पैरों को लम्बे समय तक टिकाये रह सके? यह भावनात्मक कठिनाई ऐसी है जो विचारशीलों और साधन-सम्पन्नों को भी कुछ करने नहीं देती। फिर उनका तो कहना ही क्या जिन्हें शिक्षा की कमी, सहयोग का अभाव तथा आर्थिक तंगी जैसे अनेकों अवसाद घेरे खड़े रहते हैं।
लोक मानस इन दिनों महाभारत के चक्रव्यूह की तरह फंसा पड़ा है। इसे बिना उबारे काम चलता नहीं और उपेक्षा बरतने पर रही बची आशा पर भी तुषारापात होता है। मार्ग दर्शन आज की महती आवश्यकता है, पर उसकी पूर्ति के लिए उपयुक्त मार्ग दिखाने वाला अग्रगामी भी तो चाहिए।
एक ब्रह्मज्ञानी, समग्र सत्य और पूर्ण ब्रह्म को जानने के लिए व्याकुल रहते थे। तर्क असंख्यों उभरते पर समाधान एक का भी न मिलता। चिन्ता छाई रहती।
एक दिन वे सागर तट पर घूम रहे थे। देखा एक बच्चा हाथ में प्याली लिये निराश बैठा है। और उसे इधर उधर उलटता-पुलटता है। ब्रह्मज्ञानी ने बच्चे से चिन्ता और प्याली बार-बार उलटने-पुलटने का कारण पूछा। बच्चे ने सहज भाव से कहा- “इस प्याली में समुद्र भरना चाहता हूँ पर वैसा कोई मार्ग दीखता नहीं।”
ब्रह्मज्ञानी उसके भोलेपन पर हँस दिये। बोले, बच्चे यह प्रयत्न छोड़ दो, भला इतना बड़ा समुद्र इतनी छोटी प्याली में कैसे समा पायेगा?
बालक ने हठ छोड़ दिया और घर लौट गया पर ब्रह्मज्ञानी को नया प्रकाश दे गया। भावना में बसने वाला, श्रद्धा से पलने वाला भगवान भला तर्क बुद्धि की प्याली में किस प्रकार समेटा और बिठाया जा सकेगा।
अध्यापक और मार्ग दर्शक में मौलिक अन्तर यह है कि अध्यापक बिखरी दुनिया से संबंधित जानकारियाँ कराते और छात्रों को बहुज्ञ बनाते हैं। बहुज्ञता कुशलता में गिनी जाती है और वह अर्थ उपार्जन से लेकर बड़प्पन की पंक्ति में बिठाती है। परिवार एक प्रकार से अध्यापन कार्य ही करता है। भाषा, ज्ञान, शिष्टाचार, श्रृंगार, विनोद, स्वभाव आदि की विशेषताएँ परिवार के लोगों से ही सीखी जाती हैं। यह सब वह सब सहज रूप से सिखा देते हैं। नकल उतारते हुए, छोटे बालक भी यह सब सीख लेते हैं। इसके बाद स्कूली अध्यापकों का कार्य शुरू होता है। अक्षर ज्ञान, शब्द कोष, व्याकरण, गणित, इतिहास, भूगोल, ज्यामिती, शिल्प आदि सिखाने का उनका काम है। यों कहने को तो नैतिकशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति शास्त्र, भौतिकी आदि विषय भी पढ़ाये जाते हैं, पर वे सभी विषय ऐसे होते हैं जो संग्रहित जानकारियों एवं प्रचलनों का ही बोध कराते हैं। उस आधार पर विद्यार्थी को बहुज्ञ कहा जा सकता है। किन्तु उस सबका व्यक्तित्व से कोई सीधा संबंध नहीं होता। भावना, आस्था, आकाँक्षा, प्रेरणा, विचारणा, दूरदर्शिता, विवेकशीलता के ऐसे तत्व उसमें सम्मिलित नहीं होते जिनसे व्यक्तित्व का स्तर उभरे, प्रतिभा निखरे और चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता, आदर्शवादिता का समावेश हो। यह विषय ऐसे हैं भी नहीं जिन्हें किसी पुस्तक या पाठ को याद कर रटाने के साथ-साथ हृदयंगम भी कराया जा सके, व्यक्ति को किसी उच्चस्तरीय ढाँचे में ढाला जा सके। अतएव वर्तमान शिक्षा संस्थाओं तथा शिक्षकों से भी आशा नहीं की जाती कि वे अपने छात्रों को महापुरुष या देवपुरुष की पंक्ति में बिठा सकने की योग्यता प्रदर्शित कर सकेंगे। अधिक से अधिक इस प्रकार की आशा की जा सकती है कि यह पुस्तकी पढ़ाई अपने प्रमाण पत्रों के आधार पर कहीं नौकरी लगवा सके अथवा शार्टहैण्ड, टाइप, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कृषि, उद्योग, व्यवस्था, बावर्ची आदि के जो शिल्प सीखे हैं उन्हें व्यवसाय रूप में अपनाते हुए रोजी रोटी का साधन जुटा सके। हमारी आज की स्कूली शिक्षा का आदि अंत यही हो जाता है।
हँसी मन की गांठें खोलती है। अपनी ही नहीं, दूसरों की भी।
जो मन की लालसाओं का गुलाम है वह न कभी प्रतिभावान बन सकता है, और न दूसरों का नेतृत्व करने योग्य।
मनुष्य का व्यवहार ही वह दर्पण है, जिसमें उसका व्यक्तित्व भली भाँति देखा जा सकता है।
मूर्खता का सबसे अच्छा प्रतिकार उसकी उपेक्षा है। अहंकारी के नटखटपन पर ध्यान न देना ही समझदारी है।
मार्गदर्शन का तात्पर्य उस दिशा-धारा के– रीति नीति के– अपनाये जाने से है जिसके आधार पर क्या करना? क्यों करना? किसलिए करना? जैसे प्रश्नों का समावेश होता है। दूरगामी हित-अनहित का पर्यवेक्षण करते हुए ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है जिससे अपना आत्मिक-आत्यन्तिक हित साधन हो। परिस्थितियाँ ऐसी बनें जिनमें आत्मसंतोष, लोक सम्मान एवं दैवी अनुग्रह की कमी न रहे। ऐसा राजमार्ग लोक व्यवहार का कोई पक्ष नहीं सिखाता वरन् तत्वदर्शन के गहन मंथन से ही उपयोगी निष्कर्ष निकालता है। इसे अपनाने पर सर्वप्रथम निजी जीवन में कुछ हेर फेर करने पड़ते हैं। अभ्यस्त गतिविधियों में अंतर उत्पन्न करना पड़ता है। साथ ही उस मार्ग से तनिक हटकर चलना पड़ता है, जिस पर जन साधारण को अंधी भेड़ों के समूह की तरह दौड़ लगाते देखा जाता है। अपना निज का स्तर बदले बिना कोई व्यक्ति उस पदवी को प्राप्त नहीं कर सकता जिसे, मार्गदर्शक या धर्मोपदेशक नाम से जाना जाता है। वस्तुतः यह मानवी गरिमा को गौरवान्वित कार्यान्वित करने वाला स्तर है। इसके लिए कोई रहस्य भरी, कौतूहलमयी विद्या नहीं अपनानी पड़ती। सत्य और तथ्य को अपनाने भर से इस दिशा में प्रगतिक्रम चल पड़ता है। लोक शिक्षण का आरम्भ अपने आपे से होता है। जो अपने को नहीं सिखाया जा सका, जिसे अपनी जीवनचर्या में स्थान नहीं मिल सका उसे कथा, प्रवचनों के सहारे दूसरों को सहमत तत्पर किया जा सकेगा, यह आशा नहीं ही करनी चाहिए।
भौतिक सम्पदाओं का अपना महत्व और अपना स्थान है। उनके सहारे सुविधा साधन खरीदे जा सकते हैं। विलास-सामग्री का उपयोग हो सकता है। बड़प्पन का ठाट-बाट दिखाकर दर्शकों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न किया जा सकता है। अमीर कहलाने जितना वैभव भी संग्रह हो सकता है। किन्तु यह नहीं हो सकता कि ऐसा प्रभावी मार्गदर्शन बन पड़े, जिसका अभिनन्दन हो सके, अनुकरण किया जा सके। इसके लिए न्यूनतम योग्यता, आदर्शवादी चरित्र निष्ठा को अपनाया जाना है। ऐसों के प्रति ही श्रद्धा उत्पन्न होती है और उनकी कथनी को एक कोने पर रखकर करनी को अपनाने की अन्तः प्रेरणा उठती है। वही फलवती भी होती है। मार्गदर्शक ऐसे ही व्यक्ति हो सकते हैं। ऐसे ही व्यक्तियों के लिए कहा गया है “अप्प दीपो भव” अर्थात् तुम अपने दीपक स्वयं बनो, प्रकाशवान बनो। दूसरों को प्रकाश दिखाओ एवं स्वयं भी प्रकाशित होकर रहो। ऐसे व्यक्ति ही दूसरों को व्यक्तित्ववान, चरित्रवान, प्रतिभावान बना सकते हैं। सर्वतोमुखी प्रगति इसी तथ्य पर अवलम्बित है। दुर्भाग्य वश आज इन्हीं दीपकों की, प्रकाश स्तम्भों की कमी है। यह शून्यता समाज परिकर के विकास के लिए बड़ी हानिकारक है।
व्यक्तित्व को भारी भरकम बनाने की शिक्षा देने और उस पर चलने के लिए सहमत करने के लिए मार्गदर्शक की आर्थिक पवित्रता सर्वोपरि है। आर्थिक पवित्रता का अर्थ चोरी, बेईमानी, ठगी आदि नहीं वरन् “औसत नागरिक स्तर का जीवन” है। इसी सूत्र में समूची ईमानदारी एकत्रित हो जाती है। जो औसत नागरिक से बढ़कर आहार-विहार की शौक-मौज की, ठाटबाट-अहंकार की इच्छा नहीं करता, वह परिश्रम की कमाई से भली प्रकार पेट भर सकता है। उसे आर्थिक छल-प्रपंच करने की, शोषण, उत्पीड़न करने की आवश्यकता न पड़ेगी। इतना ही नहीं संयम की सहेली उदारता के साथ छाया की तरह साथ रहने पर यह भी बन पड़ेगा कि सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए समयदान, अंशदान के कुछ कहने योग्य अनुदान प्रस्तुत कर सकें। लीक से हट कर चल सकने का साहस अपनाते ही “सादा जीवन उच्च विचार” की परम्परा अपनानी पड़ती है। गुजारा इस स्तर का करना पड़ता है जिससे न तो किसी को विलासिता का, बेईमानी का लाँछन लगाना पड़े और न विषमताजन्य ईर्ष्या किसी का इस मार्ग में गला दबोचे। ईमानदारी का निर्वाह इससे कम में नहीं होता और उसके बिना वाणी में वह प्रभाव उत्पन्न नहीं होता, जो किसी को आदर्शवादिता अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकें।
किसकी मैत्री किन से है, यह पता लगा लेने के उपरान्त उसका चरित्र जानना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता।
अपनी प्रसन्नता दूसरे की प्रसन्नता में लीन कर देने का नाम ही प्रेम है।
सौंदर्य पर अपने को निछावर करना वैसा ही है जैसा कि किसी -बंदर का मदारी’ के हाथों पराधीन हो जाना।
प्राचीन काल में सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, तप, योग आदि की अनेक साधनाओं के विधान थे। इस युग में यदि औसत नागरिक स्तर का निर्वाह और छोटे से छोटा निजी परिवार रखा जा सके तो समझना चाहिए कि उन हजार व्यवधानों का हल निकल आया जो किसी सहृदय व्यक्ति को लोकमानस का परिष्कार करने के निमित्त कदम बढ़ाने में पग-पग पर अवरोध खड़े करते हैं। इतना आत्म-संयम बरतने के उपरान्त यह प्रश्न उठता है कि पुण्य परमार्थ की दृष्टि से क्या किया जाना चाहिए? विश्व संकट के दलदल में फँसे हुए जन समुदाय को उबारने के लिए क्या होना चाहिए?
कोई समय था जब अवसर न होने या आलसी, अनगढ़ आदतों से घिरे रहने के कारण लोग अभावग्रस्त रहते और भूखों मरते थे। आज वैसी स्थिति नहीं है। यदि परिश्रमशीलता, मितव्ययिता और दूरदर्शिता सिखायी जा सके, दुष्प्रवृत्तियों, कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं से बचाया जा सके तो रोजी रोटी का प्रश्न सहज ही हल हो सकता है। समय संयम, अर्थ संयम, इन्द्रिय संयम और विचार संयम अपनाने की बात यदि गले उतर सके तो कोई भी व्यक्ति प्रगतिशील बन सकता है। अज्ञान, अभाव और अशक्ति से बच सकता है। भलमनसाहत अपनाने पर मिल बाँटकर खाने और हँसते-हँसाते जीने का सुयोग किसी को भी समुचित मात्रा में उपलब्ध हो सकता है।
जिस मार्गदर्शन की आज आवश्यकता अनुभव की जा रही है, वह है निकृष्टता का निरस्तीकरण, दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन, भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण का निराकरण। इसी को दूसरे शब्दों में नैतिक, धार्मिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान कहा जा सकता है। यही करने योग्य है। यही होना चाहिए। मनुष्य ने अपने को भीतर और बाहर की सड़ी कीचड़ से लपेट लिया है। इसी की धुलाई, सफाई होनी चाहिए। टूटे हुए धातु खण्डों की गलाई ढलाई करके उसे ऐसे औजार उपकरणों में बदला जाना चाहिए जिससे उपयोगी प्रयोजन सध सकें। कष्ट पीड़ितों, गरीबों को रोटी कपड़ा, बीमारों को दवा दारू बाँटकर उनकी सामयिक सहायता हो सकती है पर सदा सर्वदा के लिए समाधान ढूँढ़ना है, तो उन्हें स्वावलम्बी बनाने की स्थिति तक पहुँचाना होगा। इसमें साधनों की कम और साहस भरे प्रयासों की अधिक आवश्यकता पड़ती है। संक्षेप में यही है व्यक्ति निर्माण या जन मानस का परिष्कार जिसे समग्र तत्परता के साथ प्राणपण से एकजुट होकर किया जाना चाहिए। यही है युग निर्माण योजना की, प्रज्ञा-अभियान की विचारणा एवं कार्य पद्धति। इसे विचार क्रान्ति अभियान या ज्ञानयज्ञ के रूप में भी जाना जाता है। इसे क्रियान्वित करने के लिए नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति का प्रज्ज्वलन किया गया है। लाल मशाल इसी का प्रतीक प्रतिबिम्ब है।
अपनी रोटी बाँट कर खाओ, ताकि बदले में स्नेह और सहयोग की बहुमूल्य सम्पदा लेकर वापिस लौटो।
इस मार्गदर्शन के लिए कोई विशाल भवन खड़े करने की आवश्यकता नहीं है। इसे जन संपर्क, जन समर्थन एवं जन सहयोग से ही सम्पन्न किया जा सकता है। इसके लिए घर-घर अलख जगाने और गाँव-गाँव धर्म प्रचार, आयोजन करने की पुरातन पद्धति को ही नये साधनों और नये कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न करना होगा। महामारी के मरीज प्रान्त भर से इकट्ठे होकर एक अस्पताल में जमा हों, इसकी अपेक्षा यही उचित है कि चिकित्सक गाँव-गाँव फेरी लगायें और जिन्हें मरीज पायें उन्हें परहेज बतायें, औषधि खिलायें और जिसे सेवा सहायता की आवश्यकता है उसका प्रबन्ध करें। मार्ग दर्शकों की आवश्यकता साधु ब्राह्मण स्तर के चरित्रवान और सेवाभावी व्यक्ति ही पूरी कर सकते हैं। उनका अभाव दीखता तो है पर वस्तुतः है नहीं। प्रज्ञा परिवार की सुसंस्कारी आत्माएँ आगे बढ़कर समय की इस पुकार को पूरा करने में समर्थ हो सकती है। महाकाल की चुनौती वे अस्वीकार न होगी।
गाँधी जी के सभी परिवार वाले चाहते थे कि लड़का मोहन दास एक अच्छा वकील बने। स्वयं कमाये, खाये तथा घर वालों की इज्जत बढ़ाये, सहायता करे। हर एक से एक ही परामर्श सुनते रहने के बाद वे सहमत भी हो गये और पूरी मेहनत करके नियत पढ़ाई पढ़ने लगे।
वकील को बहुत पैसा और बड़ा सम्मान मिलता है, यह मान्यता उनने भी बना ली होगी, पर परिस्थितियों ने साथ न दिया। पढ़ाई पूरी करके वकालत के क्षेत्र में उतरे तो पहले ही मुकदमें में प्रतिभा लड़खड़ा गई। बहस ठीक तरह न हो सकी, फलतः मजिस्ट्रेट भी मुस्कराया और मुवक्किल ने झल्ला कर अपनी दी हुई फीस का पैसा वापस ले लिया। अगर ऐसी ही वकालत जिन्दगी भर भी चलती रहती और थोड़ा-थोड़ा सुधार अभ्यास भी होता रहता तो भी संभावना यह न थी कि वे घर वालों की इच्छा के अनुरूप कोई बड़े वकील बन सके होते, ढेर सारी इज्जत या दौलत कमा सके होते।
किन्तु नियति का दूसरा ही विधान था। गान्धी जी ने बचपन में एक जगह राजा हरिश्चन्द्र का ड्रामा देखा। सोचते रहे, यदि अपनी आदर्शवादिता की छाप पीढ़ियों तक लोगों पर छोड़ी जाय और बनाये हुये मार्ग पर दूसरों को चलने के लिए प्रोत्साहित किया जाय तो इसमें बुराई क्या है?
विश्वामित्र नव युग निर्माण की अनेक योजनाएँ कार्यान्वित करने के लिए व्याकुल थे, पर उनके पास साधन न थे। एक एक बूँद साधन इकट्ठे करने में वह शक्ति चुक जाती है जिसके द्वारा कोई बड़ा काम सम्पन्न किया जा सकता है। इसलिए उनने सोचा राजा हरिश्चन्द्र को ही यह काम क्यों न सौंपा जाय। उसकी श्रद्धा भी परीक्षा की कसौटी पर कस जायेगी। कीर्ति भी अमर हो जायेगी। उनका अनुसरण करने वालों में से असंख्यों महान बनेंगे। इतना ही क्यों, जो उनका धन और वैभव परमार्थ में लग जायेगा उसे वापस लौटाने के लिए स्वयं धर्मराज, बृहस्पति और इन्द्र उनके दरवाजे पहुँचेंगे। इतना बड़ा लाभ कमाने में यदि हरिश्चन्द्र को कुछ आरम्भिक कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं तो यह घाटे का सौदा नहीं है। बीज को भी तो पल्लवित होने के लिए आरम्भ में गलने का साहस संजोना पड़ता है।
गान्धी जी ने नाटक को खेल तमाशे की तरह मनोविनोद के लिए नहीं देखा वरन् उस चरित्र के पीछे समाहित उद्देश्यों और परिणामों पर भी आदि से अन्त तक वे विचार करते रहे। बिना समय गँवाये उनने निश्चय कर लिया कि ऐसे ही आदर्शों के लिए जीवन समर्पित करना है। जीवन की सुनिश्चित रीति-नीति यही बनानी है। शरीर और दिमाग वकालत की पढ़ाई पढ़ता रहा और आत्मा हरिश्चन्द्र बनने के लिए किस कार्य पद्धति को अपनाना होगा? इसका ताना बाना बुनती रही। क्रम संतुलित ढंग से चलता रहा। अन्तःकरण में संकल्प परिपक्व होते रहे और शरीर उनका कहना मानता रहा, जिन अभिभावकों के ऊपर उनके शरीर का निर्वाह दायित्व था।
मेघ समुद्र से झपटता, खारे को मीठा बनाता, नीचे से ऊँचा उठता और बिना प्रतिफल की आशा के जी खोल कर बरसता है। इसी को कहते हैं- जीवन।
वकालत को बीच में ही छोड़कर उनने जो गतिविधियाँ अपनाई, उनकी जानकारी सभी को है। दक्षिण अफ्रीका में जाति भेद के विरुद्ध संग्राम में वे डटे। उनका साथ देने के लिए हजारों भारतीय आये और आन्दोलन की सफलता को एक बड़ी सीमा तक ले पहुँचे। आशंका यह थी कि दुनिया कायर कमजोरों से भरी पड़ी है। जिससे प्रत्यक्ष स्वार्थ सिद्ध न होता हो उसे करने के लिए कोई सहज तैयार नहीं होता, बगलें झाँकता है, बहाने बनाता है और आँखें चुराता है। आशंका अपनी जगह काम करती रही पर साथ ही यह भी होता रहा कि एक साहसी के आगे बढ़कर हुँकार जगाने पर जिनके अन्दर भावनायें जीवित थीं वे चुप न बैठ सके और दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह उन विकट परिस्थितियों में भी अपनी शान के साथ चला।
गाँधी जी भारत लौटे। गोखले जैसे रत्न पारखी ने इस चरित्र, साहस और आदर्श के धनी को पहचाना, परखा और काँग्रेस आन्दोलन में घसीट लिया। गोखले ने पहला काम उनसे भारत भ्रमण का कराया ताकि देश की दयनीय स्थिति को आँखों देखते हुये निर्णय किया जा सके कि इन असहायों की सहायता करना आवश्यक है या अपने लिए वैभव-बड़प्पन जमा करना। एक वर्ष के भारत भ्रमण से उनने दृढ़ संकल्प कर लिया कि भारत माता को विपन्नता के चंगुल से छुड़ाने से बढ़कर जीवन का और कोई श्रेष्ठ सदुपयोग हो नहीं सकता। स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने की योजना बनी और वह अनेकों मोड़-मरोड़ों, व्यतिरेक व्यवधानों को पार करती हुई गंगा की अविच्छिन्न धारा की तरह बहती रही। रुकी तब, जब उसने लक्ष्य को पूरी तरह प्राप्त कर लिया।
अहिंसात्मक स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के रहस्यों पर जिनने गंभीरतापूर्वक विचार किया है, वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि भारत माता को एक ऐसे सपूत का आधार अवलम्बन मिल गया जो अपने व्यक्तित्व, चरित्र, त्याग, साहस और सज्जनता का धनी था। यदि देश को गाँधी नहीं मिलते तो एक प्रश्न खड़ा होता है कि स्वतंत्रता आन्दोलन को जितनी तीव्रता और सरलता से सफलता मिली, वैसा बन भी पड़ती या नहीं?
गाँधी जी ने भ्रमण किया और जनसंपर्क साधा। इस प्रयास से उन्हें गहरे समुद्र में डुबकी मार कर मणि मुक्तक बटोरने वाले पनडुब्बों जैसी सफलता मिली। लक्ष्य के प्रति दूसरे लोगों में भी व्याकुलता थी, पर नेतृत्व एवं संगठन एवं निश्चित कार्यक्रम के अभाव में वे कुछ कर नहीं पा रहे थे। मन मसोसे बैठ थे। इन सभी को उन्होंने अपने अंचल में समेट लिया। एक से एक बढ़ कर व्यक्तित्व के धनी उन्हें मिलते चले गये। इतने ऊँचे स्तर के और इतनी बड़ी संख्या में अनेक को साथ घसीट ले चलने वाले सत्याग्रही नेता मिल गये, जिसकी मिसाल इतिहास में अन्यत्र नहीं मिलती। बिजली छूने वाले को भी करेंट पहुँचता है। गाँधी जी की लगन ने इतना जन सहयोग एकत्रित किया जिसने सारे वातावरण को हिला दिया। त्याग बलिदान के ढेर लग गये और अन्ततः उस सरकार को बोरिया बिस्तर बाँधना पड़ा जिसके साम्राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था। इस असंभव को संभव होते हुये देखकर हर किसी को कहना पड़ा कि खरे व्यक्तित्व में हजार हाथी के बराबर बल होता है और वह औचित्य की आवाज से जमीं आसमान तक उठा सकता है, अदम्य तूफान उठा सकता है।
गाँधी जी ‘महात्मा’ कहे जाते थे पर उनने जप, तप, योगाभ्यास, ध्यान, समाधि, मुद्रा, तंत्र मंत्र आदि कुछ भी नहीं किये थे। वे तो सच्चे मन से जनता में घुल भर गये थे। उनने देश की गरीबी को देखते हुये आधी धोती पहनने और आधी ओढ़ने का रवैया अपनाया था। सदा रेल के थर्ड क्लास में सफर करते थे। एक बार वायसराय ने जरूरी परामर्श के लिए हवाई जहाज से बुलाया पर वे अपने व्रत से डिगे नहीं। रेल के थर्ड क्लास में बैठकर ही दिल्ली पहुँचे। उनकी खजूर की चटाई, सरकंडे की कलम, रस्से की बनी चप्पल अभी तक सुरक्षित हैं जो बताती हैं कि नेता को जनता के स्तर से अधिक खर्च नहीं करना चाहिए। वे उन महात्माओं में से नहीं थे जो सोने चाँदी की अम्बारी वाले हाथी पर चँवर डुलाते हुये निकलते हैं। यदि गाँधी जी ने ठाट बाट बनाया होता तो उसके लिए भी पैसा मिल जाता पर ठाट और अहंकार को देखकर जनता की श्रद्धा आधी चली जाती।
खाली पात्र
दो मिट्टी के बर्तन आंगन में रखे थे। एक का मुँह ऊपर था दूसरे का नीचे। वर्षा हुई। जिसका मुँह ऊपर था वह बर्तन पानी से भर गया। जिसका नीचे था वह खाली रह गया। खाली पात्र साथी को भरा देखकर ईर्ष्या से कुड़मुड़ाया और उससे लड़ने लगा। वर्षा फिर आई लड़ने वाले से कहा- प्रिय, लड़ो मत, अपना मुँह ऊपर कर लो, तुम्हारा पेट भी वैसे ही भर दूँगी जैसा साथी का भरा है।
इस संसार में सभी प्रकार के मनुष्य हैं। बुरे ही नहीं, भले भी। चुम्बक लौह कणों को खींचता है। धातुओं के पर्वत इसी आकर्षण शक्ति के आधार पर खड़े होते हैं। गाँधी जी पर प्राण न्यौछावर करने वाले और पूरी तरह उनके आदेशों पर चलने वाले हजारों नेता ही नहीं, लाखों सत्याग्रही स्वयंसेवक भी थे। यदि इतना बड़ा परखा हुआ समुदाय साथ में न होता तो खादी आन्दोलन, सर्वोदय, हरिजन सेवा, प्राकृतिक चिकित्सा जैसे अनेक रचनात्मक कार्य भी वे स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही किस प्रकार चला पाते? इन्हें चलाने के लिए समर्थ प्रतिभाओं को जुटाना अनिवार्य रूप से आवश्यक था, सो जुट भी गया। अन्यथा अकेले गाँधी जी किस सीमा तक क्या कर पाते, यह आकलन करना मुश्किल है।
जौहरी की दुकान पर यहाँ-वहाँ टकराते हुये रत्न और स्वर्ण आभूषण पहुँचते हैं। गाँधी जी के पास हर काम के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में पहुँच गये थे। एक ब्राह्मणी ने अपने तीन पुत्रों को ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मचारी बनाया और उन्हें परमार्थ के लिए सौंप दिया। विनोबा, बालकोबा, शिवोबा ऐसे ही साथी थे जो गाँधी जी को ऊँचे वेतन पर नहीं, समर्पित स्थिति में मिले थे। विनोबा ने सर्वोदय भूदान सँभाला। वे ब्रह्म विद्या मंदिर भी चलाते थे और वामन अवतार की तरह अपने डगों से समूची भारत भूमि को नापते फिरे थे। बालकोबा को उरली काँचन का प्राकृतिक चिकित्सालय सौंपा तो उनने बिना रुचि परिवर्तन की बात सोचे सारी जिन्दगी उसी काम में खपा दी। शिवोबा (शिवाजी भाऊ) भी विनोबा के ही पद चिन्हों पर चले। हरिजन सेवा के लिए वरिष्ठ इंजीनियर ठक्कर बापा को एक काम थमाया गया, तो दूसरी ओर सिर उठाकर देखने की फुरसत ही न मिली।
गाँधी जी समुद्र जितने गहरे और हिमालय जितने ऊँचे थे। उनके व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व का उल्लेख यहाँ कर सकना संभव नहीं, पर उस सब का सार तत्व यहाँ से आरम्भ होता है कि उनने वकालत की शान-शौकत को लात मार कर अपनी समूची प्रतिभा को जन सेवा के लिए समर्पित कर दिया। बदले में जो उनने पाया वह भी कम नहीं था। उनके निमित्त श्रद्धा व्यक्त करने के लिए हजारों शानदार संस्थाओं और इमारतों के नामकरण हुये हैं। राजघाट पर उनकी समाधि के सामने अभी भी उतने आँसू और फूल बरसते हैं मानो देवता आरती उतार रहे हैं। धन्य है, ऐसे जीवन जो असंख्यों के सेवक और जन नेता बन कर संसार में आदर्शवादी लहर चला सके और पीछे वालों के लिए एक अमर गाथा छोड़ सके।
एक बार पाँच असमर्थ और अपंग लोग इकट्ठे हुए और कहने लगे, यदि भगवान ने हमें समर्थ बनाया होता तो बहुत बड़ा परमार्थ करते। अन्धे ने कहा- यदि मेरी आंखें होतीं तो जहाँ कहीं अनुपयुक्त देखता वहीं उसे सुधारने में लग जाता। लंगड़े ने कहा- पैर होते तो दौड़-दौड़ कर भलाई के काम करता। निर्बल ने कहा- बल होता तो अत्याचारियों को मजा चखा देता। निर्धन ने कहा- धनी होता तो दीन दुखियों के लिए सब कुछ लुटा देता। मूर्ख ने कहा- विद्वान होता तो संसार में ज्ञान की गंगा बहा देता।
वरुण देव उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी सचाई को परखने के लिए उनने आशीर्वाद दिया और इन पाँचों को उनकी इच्छित स्थिति मिल गई। अन्धे ने आँखें, लँगड़े ने पैर, निर्बल ने बल, निर्धन ने धन और मूर्ख ने विद्या पायी और वे फूले न समाये। परिस्थिति बदलते ही उनके विचार भी बदल गये। अन्धा सुन्दर वस्तुएँ देखने में लगा रहता और अपनी इतने दिन की अतृप्ति बुझाता। लँगड़ा सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ा। धनी ठाट-बाट जमा करने में लगा। बलवान ने दूसरों को आतंकित करना शुरू कर दिया। विद्वान ने अपनी चतुरता के बल पर जमाने को उल्लू बना दिया। बहुत दिन बाद वरुण देव उधर से लौटे और उन असमर्थों की प्रतिज्ञा निभी या नहीं, यह देखने के लिए रुक गये। पता लगाया तो वे पाँचों अपने-अपने स्वार्थ सिद्धि करने में लगे हुए थे।
वरुण देव बहुत खिन्न हुए और अपने दिये हुए वरदान वापस ले लिये। वे फिर जैसे के तैसे हो गये। अन्धे की आँखों का प्रकाश चला गया। लँगड़े के पैर जकड़ गये। धनी निर्धन हो गया। बलवान को निर्बलता ने आ घेरा। अब उन्हें अपनी पुरानी प्रतिज्ञायें याद आई और पछताने लगे कि पाये हुए सुअवसर को उन्होंने इस प्रकार प्रमाद में क्यों खो दिया। समय निकल चुका था, अब पछताने से बनता भी क्या था?
जापान का एक मेधावी छात्र कागाबा टोकियो विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। घर के लोग उसे बैरिस्टर बनने का आग्रह कर रहे थे। राजनीति के क्षेत्र में कुछ संपर्क था, सो वे उसे चुनाव लड़ने और मिनिस्टर बनने की योजना विस्तार पूर्वक समझा रहे थे। एक साथी मित्र ने अपने मिल में साझीदार बनने का प्रस्ताव किया। पूँजी लगाने के बदले वे मिल की व्यवस्था सँभालें, इसके लिए मित्र का पूरा परिवार सहमत था, और भी ऐसे ही कोई बड़े प्रस्ताव थे, जिनके सहारे वे कोई बड़े अफसर, व्यापारी, राजनेता, आदि बन सकते थे। सुखी और सम्पन्न बनाने की सलाह तथा सहायता देने के लिए कितने ही मित्र-सम्बन्धी अपनी तत्परता दिखा रहे थे। उनका व्यक्तित्व हर दृष्टि से आकर्षक जो था।
कागाबा की अपनी और कुछ निजी महत्वाकाँक्षा तथा योजना थी। वे दुखियारों का सहारा बनना चाहते थे। धनी अधिकारी बनने पर भी जब पेट ही भरना है, तो उतना सेवा कार्य करते हुए भी संभव हो सकता है। एक ओर महत्वाकाँक्षाओं के पर्वत थे। दूसरी ओर करुणा, जो चुपके से उन्हें सलाह दे रही थी कि किसी की मत मानो, आत्मा की आवाज सुनो। कितने दुखियारों का सहारा बन सकते हो, तुम जरा इसका भी विचार करो। जीवन का मूल्य समझो और इसे अमीरी के लिए न्यौछावर न करो। कागाबा ने आत्मा की पुकार सुनी ही नहीं, स्वीकारी भी। उनने सत्परापर्शदाताओं को निरुत्तर कर दिया।
कागाबा ने अपने नगर का कोना-कोना छान मारा। एक तिहाई हिस्सा ऐसा था जिनमें कंगाली, कोढ़ी, अपंग, भिखारी स्तर के लोग रहते थे, उन्हीं में कुछ उठाईगीरे, शराबी, जुआरी भी शामिल थे। फूस की झोपड़ियों में यह लोग रहते थे और इस तरह का जीवन बिताते थे, मानो साक्षात नरक में ही रह रहे हों। दुर्गन्ध का साम्राज्य था। आये दिन चोरी से लेकर हत्याओं तक की घटनाएँ उस क्षेत्र में होती रहती थीं। आफत की मारी कुछ अनपढ़ महिलाओं ने गुजारे के लिए वेश्यावृत्ति भी अपना रखी थी। सम्पन्न लोगों के महल अलग थे पर इन कंगलों की अपराधी बीमारों की संख्या भी कम न थी।
कागाबा ने निश्चय किया कि वे इसी मुहल्ले में रहेंगे और अपना कार्यक्रम इन दुखियारों की सेवा करते हुए जीवन बिताने का बनायेंगे। सेवा करने के हजार उपाय थे जो बिना पैसे के, शरीर सेवा या सत् परामर्श देने से भी हो सकते थे। उनकी सूची और विधि भी उनने बना ली, पर अपने निर्वाह का प्रश्न शेष रहा। इसके लिए उनने परिवार तथा मित्र समुदाय से भी कुछ न लेने का निश्चय किया। उनने कुछ बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूशन ढूँढ़ ली जो उन्हें आसानी से मिल भी गई। अपनी झोपड़ी, खाना पकाने का थोड़ा-सा सामान, एक सस्ता सा बिस्तर कुल यही थी उनकी पूँजी। निजी कामों में सोने समेत आठ घंटे से अधिक न लगाते। शेष सारा समय उन जीवित भूत-पलीतों की सेवा में रुचिपूर्वक बिता देते।
धूप और छाँव का विवाद हल न हुआ तो दोनों विधाता के पास पहुँची और बोली- “महाराज! पृथ्वी पर हम में से एक को ही रहने का अधिकार दीजिये दूसरे को वहाँ से अलग कर दीजिए।”
विधाता बड़ी देर तक चुप रहे फिर पीड़ा भरे स्वर में बोले- “मुझे दुःख है कि तुम दोनों का अस्तित्व तो एक दूसरे पर ही आश्रित है। ईर्ष्या छोड़कर प्रेम से रहो और अपनी उन्नति करो।”
कई वर्ष इस प्रकार बीत गये। उन मुहल्लों में रहने वाले पिछड़े लोगों में से एक भी ऐसा न बचा जो किसी न किसी सहायता या फरियाद के लिए उनके पास न पहुँचा हो। स्नेह और सहायता ने सारे समुदाय का मन जीत लिया। सभी उन्हें अपना कुटुम्बी, सम्बन्धी मानने लगे और पूरी तरह उनके साथ घुल-मिल गये।
एक उच्च परिवार की ग्रेजुएट महिला उस इलाके में टहलने आया करती थी। एक लोकसेवी का इतना बड़ा परिवार और बिना धन वितरण किए उनका इतना समर्थन, सहयोग एवं उनका स्वयं का उत्थान उसे जादू जैसा लगा। वह अधिकाधिक गंभीरता से सब देखती गई। अन्त में उसने भी निश्चय किया कि इसी प्रकार का जीवन जियेगी और ऐसा ही जीवन बितायेगी। उसने कागाबा के सम्मुख विवाह का प्रस्ताव रखा। वे हँसे- अपना घर, कार्यक्रम तथा दारिद्र बताया, लोक सेवा में व्यस्तता भी। ऐसी दशा में वे पत्नी की नई जिम्मेदारियाँ कैसे उठा सकते थे। पूरी बात स्पष्ट हो गई। युवती ने कहा- वह भी उसी प्रकार ट्यूशन करके गुजारा करेगी। बच्चे पैदा होने की स्थिति न आने देगी। सिर्फ साथ रहने और कार्यों में हाथ बँटाने की आज्ञा चाहती है। कई महीने प्रसंग चलता रहा, ताकि जल्दबाजी में कोई गलत कदम न उठ जाय। विवाह हो गया और साथ ही सेवा कार्य भी दूनी प्रगति से होने लगा। अब तक मात्र शरीर और वचन भर से सेवा थी। अब दोनों ने निश्चय किया, जरूरतमंदों के लिए वे सम्पन्न लोगों से कुछ माँगकर लाया करेंगे। पैसा मिलने लगा और अनेकों रचनात्मक प्रवृत्तियाँ उस क्षेत्र में चलने लगीं।
चर्चा धीरे-धीरे पूरे जापान में फैली। धनिकों, उदारमनाओं ने कई सुधारात्मक कार्यक्रम उस क्षेत्र में आरम्भ किए। इसके बाद सरकार का ध्यान उस ओर गया। उसने सहायता की और कार्य की उपयोगिता देखते हुए पिछड़ों की सहायता के लिए एक अलग से विभाग ही बना दिया। कागाबा उसके इंचार्ज बनाये गये। करोड़ों रुपया साल का बजट पास हुआ और उस धन का उपयोग ऐसी सुव्यवस्था के साथ हुआ कि कागाबा के जीवन काल में ही उस देश में कहीं पिछड़ापन न रहा और जो दुष्प्रवृत्तियाँ उस क्षेत्र में पनपी थीं, वे जड़ मूल से उखड़ गईं।
कागाबा और उनकी पत्नी पूर्ण आयु तक जिए। वे मरते दम तक पिछड़ों की सेवा कार्य में लगे रहे। उन्हें निजी क्षेत्र से तथा सरकारी क्षेत्र से इन कार्यों के लिए विपुल सहायता मिली। इसका कारण था उपलब्ध धन का श्रेष्ठतम सदुपयोग। कहीं एक पैसे की भी गड़बड़ी न होने देना। इस स्थिति ने हर किसी के मन में श्रद्धा उत्पन्न की। सहायता भी दी और उससे भी अधिक उनकी सहायता भी की।
कागाबा अब नहीं हैं। उन्हें और उनकी पत्नी को गुजरे मुद्दतें बीत गईं पर उनकी चर्चाएं पाठ्य पुस्तकों से लेकर छोटे-बड़े इतिहासों, ग्रन्थों के पृष्ठों पर बड़े सम्मान के साथ अंकित हैं। उन दोनों के चित्र जापानवासियों के घरों में अभी भी उसी श्रद्धा के साथ टाँगे जाते हैं, जैसे कि भारत में शिव-पार्वती या सीता-राम के।
कागाबा को जापान का गाँधी कहा जाता है। समीक्षकों और सलाहकारों की कागाबा से अक्सर भेंट होती रहती थी। वे लोग कहते थे- “हम लोगों की सलाह के अनुसार आप कहीं बैरिस्टर, अफसर, उद्योगपति, नेता या और कुछ बने होते तो स्वयं को अपने देश को और समूची मानवता को संभवतः इस प्रकार धन्य न बना पाते जैसा कि आपने पिछड़े लोगों के लिए श्रम करते हुए, कष्ट सहते हुए बनाया।” साथियों में से जिनने सम्पदा कमाई और मौज उड़ाई, वे अपनी तुलना कागाबा से करते तो अपने को मूर्ख और उन्हें बुद्धिमान बताते। सच्ची बुद्धिमानी और गहरी सफलता इसी मार्ग में है कि मनुष्य अपने को सेवा प्रयोजन के लिए उत्सर्ग करे और असंख्यों के लिए एक आदर्श, एक उदाहरण बने।
उदास क्यों हो बहन? - अकेली बैठी मधुमक्खी को देखकर चींटी ने पूछा। इस पर मधुमक्खी बोली- “क्या बताऊँ बहन, कितने परिश्रम से मधु एकत्रित किया था, यह अभागा मनुष्य आया और उसे थोड़ी देर में छला तोड़ ले गया।”
अनाज का कण आगे धकेलती हुई चींटी बोली- बहन! अब चिन्ता करने से क्या लाभ? अब तक तो तुम बहुत-सा मधु पुनः एकत्र कर लेतीं।
सरदार पटेल को सर्व सामान्य जन काँग्रेस नेता और सरकार के गृहमन्त्री मानते हैं। काम भी उतने ही याद रखते हैं जितने उन दोनों उत्तरदायित्वों के साथ जुड़े रहे और व्यवस्थापूर्वक सम्पन्न होते रहे। इतना तो हर आँख वाला देख सकता है और हर कान वाला सुन सकता है, किन्तु आवश्यकता इस बात की है कि हम कामों के गिनने की अपेक्षा उन गुणों और स्वभावों को ढूंढ़े, जिनके कारण सामान्य स्तर के मनुष्य पर्वत की ऊँचाई तक उठते हैं, एवं सभी के लिए आश्चर्य बन जाते हैं।
सरदार पटेल गुजरात के खेड़ा जिले के एक छोटे से गाँव में पैदा हुए। खेती मजे में गुजारा देती थी। परिवार के दूसरे सदस्य उसी में व्यस्त रहते थे। यदि प्रवाह के साथ बहा गया होता तो वल्लभ भाई भी उसी में बह रहे होते और जुताई, सिंचाई, बुआई, कटाई का पुश्तैनी धन्धा चलाते हुए निर्वाह कर रहे होते। चिन्तन को यदि विशेष रूप से उभारा न जाय तो वह परम्परागत रीति-नीति अपनाता है और कोल्हू के बैल की तरह ऊपरी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। सामान्य-जन इसी प्रकार मौत के दिन पूरा करते हैं। उन्हें न नया सोचने का कष्ट उठाना पड़ता है और न नया करने के लिए मार्ग ढूँढ़ना और नया सरंजाम जुटाने के झंझट में बिखरना पड़ता है।
उन दिनों स्कूली पढ़ाई का शौक शहरों से बढ़कर देहातों तक भी पहुँचने लगा था। पड़ौस के गाँव में स्कूल कालेज भी था। इच्छा व्यक्त की तो घर वालों ने रोका भी नहीं। उनके श्रम बिना कोई काम रुका भी न था और इतनी आर्थिक तंगी भी नहीं थी कि पढ़ाई का खर्च पूरा न किया जा सके। वे पढ़ते रहे और अन्ततः पड़ौस की तहसील में ही वकालत करने लगे। प्रतिष्ठित परिवार, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व, हाथ में लिए काम के लिए पूरी दिलचस्पी और मेहनत, इतना होना इस बात के लिए पर्याप्त है कि कोई व्यक्ति महान बने और महानता की हर शोभा सज्जा से अपने आपको सुशोभित करे।
गाँधी का सत्याग्रह संग्राम आरम्भ हुआ। देश का हर स्वाभिमानी युवक तिलमिला उठा। मातृभूमि की पराधीनता और सारे समाज पर लगी हुई पराधीनता की कलंक कालिमा का जब तक अहसास नहीं हुआ था, तब तक लोग उनींदे बैठे रहे पर जब जागृति की लहर आई तो जो जीवित थे, वे सभी तनकर खड़े हो गये। काँग्रेस में भर्ती होने का उन दिनों तात्पर्य था सरकार से दुश्मनी मोल लेना, जेल जाना, जुर्माना वसूल किया जाना और किसी शासकीय संदर्भ में अयोग्य ठहराया जाना। इन कठिनाइयों को वे स्वयं भी जानते थे। विशेष रूप से उनके प्रायः सभी साथी वकीलों ने यह समझाया कि चैन की जिन्दगी और अच्छी कमाई को ठुकराकर अपने को परेशानी में डालना अच्छा नहीं। घर वाले भी विरुद्ध थे। उन दिनों किसी को स्वप्न में भी आशा नहीं थी कि स्वराज्य मिलेगा और उसमें जेल जाने वालों को कोई सम्मानित पद भी मिल सकते हैं। किन्तु इन स्वप्नों से सर्वथा दूर रहते मातृभूमि की स्वाधीनता का प्रश्न ऐसा था, जिसके निमित्त गैरतमन्दों को कुछ कर गुजरने की अदम्य उमंग उठी।
पटेल ने आत्मा की पुकार सुनी और सब समझाने वालों को नमस्कार कर लिया। वे काँग्रेस के कार्यकर्ता बने और सत्याग्रह में सम्मिलित हो जेल गये। लड़ाई लम्बी चली और वह दावानल की तरह देश के कोने-कोने में फैली। पटेल ने अपने प्रभाव क्षेत्र बारदोली इलाके को व्यापक लगान बंदी के लिए तैयार कर लिया। इस मार्ग में उन्हें क्या कठिनाई उठानी पड़ेगी, यह भली भाँति समझा दिया। किसान चट्टान की तरह प्रतिज्ञा पर दृढ़ हो गये और उसे समूचे क्षेत्र में किसानों ने सरकार से सीधी टक्कर ली। एक भी पैसा लगान के नाम पर देने से इन्कार कर दिया। फलस्वरूप जब्तियाँ, कुर्कियाँ और गिरफ्तारियाँ हुईं। पर पटेल के नेतृत्व में वह समूचा समुदाय इतना दृढ़ निश्चयी निकला कि सरकार को किसानों की शर्तें मानने और समझौता करने पर विवश कर दिया।
स्वतन्त्रता मिली। सरदार पटेल पार्लियामेण्ट मेम्बर चुने गये और गृहमन्त्री नियुक्त हुए। उनके सामने एक से एक बड़ी समस्यायें आईं। सबसे बड़ी समस्या थी देश की लगभग 600 रियासतों को केन्द्र शासन में सम्मिलित करना। अधिकाँश राजा अपनी सम्पत्तियाँ और अधिकार छोड़ने को तैयार न थे, पर पटेल ही थे जिनने साम, दाम, दंड, भेद की नीति से सभी राजाओं को केन्द्र में सम्मिलित होने के लिए बाधित कर दिया। हैदराबाद और जूनागढ़ की रियासतों के साथ सख्ती बरतनी पड़ी और गोवा, पाँडिचेरी आदि को राजनैतिक दाव पेचों से काबू में लाया गया। पटेल की इस साहसिकता को संसार भर में अद्भुत माना गया।
मध्यकालीन विदेशी आक्रमणकारियों ने यों मंदिर तो अनेक तोड़े और लूटे थे, पर उन सबमें सोमनाथ मंदिर मूर्धन्य था। उसके विनष्ट कर दिये जाने से सारे हिन्दू समाज में भारी क्षोभ और निराशा फैली। उस घाव को भरने के लिए सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का काम हाथ में लिया और उस ध्वंसावशेष को नये सिरे से इस प्रकार बनाया कि पुराने की तुलना में उसे दसियों गुना शानदार माना जाने लगा। इस निर्माण से सारे समाज में एक उल्लास और सन्तोष की लहर उभरी।
सरकारी स्कूल, कालेजों, का जिन दिनों बहिष्कार हुआ था, उन दिनों निकले हुए छात्रों की शिक्षा का नया प्रबन्ध करना आवश्यक प्रतीत हुआ। इसके लिये गुजरात विद्यापीठ की स्थापना हुई। उसने हजारों सुयोग्य व्यक्ति ऐसे विनिर्मित करके दिये जो गुजरात के ही नहीं, सारे देश के पुनरुत्थान में भारी योगदान देते रहे। तब की गुजरात विद्यापीठ अब विकसित होकर शानदार युनिवर्सिटी में परिणित हो गई है। इसे सरदार पटेल के कर्त्तृत्व का एक शानदार स्मारक कह सकते हैं।
पटेल का व्यक्तित्व इतना सरल, सौम्य, कर्मठ और खरा था कि उनका लोहा पक्षधर और विपक्षी समान रूप से मानते रहे। काँग्रेस आन्दोलन को “करो या मरो” का नारा उन्होंने ही दिया था और परिस्थितियाँ इतनी विकट पैदा करदी थीं, जिन्हें पार करना ब्रिटिश सरकार के लिए संभव न रह गया। उन्हें देश का दूसरा चाणक्य समझा जाता था। वस्तुतः पटेल ऐसे हीरक बने जिनकी कीर्ति ने भारत माता के मुकुट को बहुमूल्य रत्न बनकर जगमगाया।
उनके जीवन का मोड़ वहाँ से शुरू होता है, जहाँ एक ओर पुरातन प्रवाह एवं वकालत का वैभव था और दूसरी ओर देश, धर्म, समाज, संस्कृति का पुनरुत्थान। उनने दूसरा मार्ग चुना। क्या वे घाटे में रहे? एक नया मार्ग चुनकर उनने तात्कालिक प्रलोभनों को कुचला तो जरूर, पर यश, पद, गौरव और आदर्श के क्षेत्र में वे इतने ऊँचे उठे जिसकी प्रशंसा हजारों वर्षों तक मुक्त कंठ से होती रहेगी।
राणा प्रताप ने बहुत दिन तक पर्वतों में छिपे रहकर अकबर की सेना से मोर्चा लिया पर जब उनके साधन समाप्त हो गये तो निराशा और दुःखी होकर लड़ाई समाप्त करने की बात सोचने लगे। भामाशाह नाम के एक धनी व्यक्ति ने जब यह सुना तो उसकी भावनाएँ उभर आईं। मेरे पास धन है, यदि वह देश जाति के काम न आया तो मेरा धनी रहना व्यर्थ है। वह दौड़ा हुआ राणा के पास गया और उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा- “मेरे पास जो कुछ है उसे आप ले लें और युद्ध जारी रखें।” राणा ने भामाशाह को छाती से लगा लिया और कहा- “तुम्हारा जैसे उदार व्यक्ति जिस भूमि में मौजूद हैं वह कभी गुलाम नहीं बन सकती।” वह धन बहुत था उसे लेकर राणा ने नई फौज का संगठन किया और फिर लड़ाई आरम्भ कर दी।
धन की सार्थकता इसी में है कि वह धर्म की रक्षा में व्यय हो। जो कंजूस समाज की अत्यन्त आवश्यक समस्याओं की ओर से मुँह मोड़कर अपने ही बेटे नाती के लिए धन जोड़ते रहते हैं उन मूर्खों के लिये भामाशाह अपना नाम अजर अमर करते हुये भी एक आदर्श उदाहरण छोड़ गये हैं।
भगवान की भक्ति के नाम पर लोग ऐसी विडम्बनाएँ रचते रहते हैं, जिसमें पूजा पाठ जैसी कुछ खिलवाड़ तो होती रहे, पर बदले में ऋद्धि सिद्धियाँ, चमत्कारों और वरदानों का जखीरा लूट के माल की तरह हाथ लगे। कई स्वर्ग और मुक्ति का वैभव स्वर्ग लोक में पहुँच कर बटोरना चाहते हैं। कइयों को दर्शन की इच्छा होती है मानो किसी रूपसी की समीपता का रसास्वादन करना चाहते हों। दस पैसे की मिठाई मनौती के लिए चढ़ाकर मालामाल बनने और मुफ्त में बढ़ चढ़कर सफलताएँ प्राप्त करने की हविश तो इस समुदाय के अधिकाँश लोगों को होती है। कहीं-कहीं रात भर नाच कूद चलते हैं ताकि भगवान की नींद हराम करके जितना कुछ लपक सकना संभव हो, लपक लिया जाय। बच्चों को बहकाने-फुसलाने या चिड़ियाँ मछलियाँ पकड़ने की धूर्त्तता तो कितने ही करते रहते हैं। भगवान की दुकान को आँखों में धूल झोंककर लूट लाने का कुचक्र तो उस क्षेत्र में आमतौर से रचे जाते देखा जा सकता है।
यथार्थता की कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त स्पष्ट होता है कि भगवान का दरबार “अन्धेर नगरी-बेबूझ राजा” की उक्ति चरितार्थ नहीं करता। वहाँ उन्हीं को अनुकम्पा का अनुदान मिलता है, जिन्हें प्रामाणिकता और उदारता की कसौटी पर खरा कस लिया जाता है। भक्ति का सीधा अर्थ सेवा है। सेवा अर्थात् परमार्थ लोकमंगल। यह उन्हीं से बन पड़ता है, जो अपने को हर दृष्टि से संयम की आग में तपाते हैं। औसत नागरिक का जीवन जीकर उससे ऐसा कुछ बचा लेते हैं जिसे समयदान, अंशदान के रूप में दरिद्र नारायण के चरणों पर अर्पित किया जा सके। सत्प्रवृत्ति संवर्धन में उसका बढ़ा चढ़ा उपयोग किया जा सके। सच्चे भगवद्-भक्त इसी स्तर के होते रहे हैं और बदले में आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह का प्रत्यक्ष प्रतिफल उपलब्ध करते रहे हैं।
सुदामा का उदाहरण सामने है। उनका विशालकाय गुरुकुल था। सुयोग्य अध्यापन और वातावरण जहाँ भी होगा, वहाँ छात्रों की कमी न रहेगी। पुरातन काल में गुरुकुल-विश्व विद्यालय ही छात्रों के शिक्षण और निर्वाह की दुहरी व्यवस्था वहन करते थे। पर उस क्षेत्र में उदार चेताओं की कमी पड़ जाने से गुरुकुलों के ऊपर भारी आर्थिक कठिनाई लदी रहने लगी। आसरा किसका लिया जाय। सोचा गया कि भगवान को पकड़ा जाय। वे द्वारिका पहुँचे। कृष्ण ने स्थिति को जाना और अपनी संपदा कुटुम्बियों के विलास हेतु छोड़ने की अपेक्षा यह उचित समझा कि जो पास में है वह सब कुछ उच्च आदर्श के हेतु विसर्जित कर दिया जाय। द्वारिकापुरी की सारी सम्पदा उठ कर सुदामापुरी चली आई। लक्ष्मी नारायण की अनुकम्पा ऐसों को ही प्राप्त होती है। जेब कटी का रास्ता अपनाने वालों को नहीं।
भक्तों में एक आते हैं- विभीषण। उनने अनीति में सगे भाई तक का साथ न दिया। अपमान और अभाव सहते रहे और समय आने पर अपनी समूची वफादारी उस न्याय और नीति के पक्ष में समर्पित करदी, जिसे प्रकारान्तर से भगवान कहते हैं। भगवान के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं आता। उसे सोने की लंका और अद्वितीय विदुषी मंदोदरी का लाभ मिला। ऐसे ही प्रसंग सिद्ध करते हैं कि भगवान भक्त-वत्सल और विभूतियों के अधिपति हैं।
सच्चे भक्तों की श्रेणी में सुग्रीव का नाम आता है। राम के साथ अनीति हुई। दुष्टों ने सीता हरण कर लिया। खोजने के लिए दूतों और लड़ने के लिए सैनिकों की आवश्यकता हुई। भक्त सुग्रीव ने जो कुछ भी अपने पास था मुक्तहस्त से दिया। दानी की खाली हुई जेबें भगवान भर देते हैं। सुग्रीव को अपना खोया हुआ राज्य और परिवार वापस मिल गया। भगवान की उदारता में कमी नहीं। पर उसे पाने के लिए घण्टी हिला देना भर काफी नहीं। सदुद्देश्यों के लिए बढ़ चढ़कर त्याग बलिदान प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
मनुष्यों की चालाकी में कमी नहीं। उनका बस चले तो उनके निवास और परिवार तक को बेच खायें। पर भक्त ऐसा नहीं कर सकते। सुग्रीव के सभी साथी सहचर समुद्र पर पुल बनाने और लंका का दमन करने के लिए निहत्थे होते हुए भी गये थे। नल नील ने इंजीनियर का कौशल दिखाया था। बेचारी गिलहरी तक बालों में बालू भर कर समुद्र पाटने में सहायता करने के लिए पहुँची थी। उसने राम की हथेली पर बैठकर दुलार भरा वह प्यार पाया जिसके लिए तथाकथित योगी-यती तरसते ही रहते हैं। भगवान का दर्शन पाने की जिन्हें सचमुच ललक है, उन्हें गिलहरी जैसा पुरुषार्थ और जटायु जैसा अनीति के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए, चाहे प्राण भले ही देने पड़ें। घायल जटायु को भगवान ने अपने आँसुओं से स्नान कराया था। जो इस झंझट से बचकर पंचामृत से शालिग्राम को स्नान कराने पर सम्पदाओं की गठरी लूटना चाहते हैं, उन्हें उनकी क्षुद्रता उस स्थान तक पहुँचने ही नहीं देती, जहाँ वे पहुँचना चाहते हैं।
हनुमान का समर्पण सर्वविदित है। राम का पक्ष न्याय का था और रावण का अन्याय का। धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करना ही अवतार का और उसके अनुयायियों का कर्त्तव्य है। इसमें चाहे निजी हानि कितनी ही होती हो, कठिनाई कितनी ही उठानी पड़ती हो। हनुमान ने यही किया। वे किसी व्यक्ति विशेष के दास या चाकर नहीं थे उन्होंने नीति को विजयी बनाने के लिए लंका दहन, संजीवनी पर्वत उखाड़ने से लेकर अनेकानेक कष्ट सहे। पर क्या वे घाटे में रहे? सुग्रीव के यहाँ साधारण सेवक की तरह कार्य करने का बंधन छूटा और वे देवताओं की गणना में गिने गये। राम पंचायत में छठे सदस्य बने और संसार भर में पूजे गये। जितने मंदिर राम के हैं उससे कहीं अधिक हनुमान के हैं। उन्हें जो बल, पराक्रम, विवेक, कौशल, यश प्राप्त हुआ वह सब उस भक्ति का प्रतिफल था जो सच्चे अर्थों में कर्त्तव्यपरायणता और उदार साहसिकता से भरी पूरी थी।
निषादराज की कथा प्रख्यात है। राम मिलन के लिए सेना समेत भरत के संबंध में उसने समझा कि वे लोग राम को मारकर निष्कंटक राज करने जा रहे हैं। निषाद ने भरत की सारी सेना को गंगा में डुबा देने की तैयारी कर ली। पीछे वस्तुस्थिति विदित होने पर डुबाने की अपेक्षा खर्चीले आतिथ्य की व्यवस्था सीमित साधनों में उसने की। भक्ति इसी को कहते हैं, जिसमें अनीति से लड़ना और नीति का समर्थन करना होता है।
शबरी के झूठे बेर भगवान ने खाये थे, पर वह सुयोग बना तब, जब उस भीलनी ने मातंग ऋषि के आश्रम का समीपवर्ती रास्ता साफ बनाए रखने का व्रत वर्षों निबाहा था।
अर्जुन के घोड़े भगवान ने चलाये, वे सारथी बने। पर कदम उठा तब जब दैन्य, हीनता का भाव मिटाकर विशाल भारत बनने की योजना कार्यान्वित करने के लिए वह तैयार हुआ। बलि के दरवाजे पर भगवान भिक्षा माँगने पहुँचे थे ताकि पृथ्वी पर सुव्यवस्था की स्थापना का अवसर मिल सके। द्रौपदी को उन्होंने लाज बचाने हेतु वस्त्र इसलिए दिया था कि वह इससे पूर्व एक संत को वस्त्र हीन देखकर अपनी आधी साड़ी फाड़ कर दान दे चुकी थी। भगवान दानी तो अवश्य हैं। एक बीज के बदले हर वर्ष हजारों फूल, फल, बीज देते हैं। पर यह होता तभी है जब आरंभ में एक बीज अपने को मिट्टी में मिलाकर गला देने के लिए तैयार होता है। भक्ति और उसके वरदान मिलने की बात इसी प्रकार सोची जा सकती है। मीरा को विष के प्याले और सर्पों के पिटारे से इसलिए बचाया था, कि वह राणा के भयंकर प्रतिबन्धों की चिंता न करते हुए गाँव-गाँव, घर-घर भक्ति का अमृत बाँटने के लिए प्रचार यात्रा पर निकल पड़ी थी।
वीरपुर (गुजरात) के बापा जलाराम को भगवान ने दर्शन भी दिये थे और अखण्ड अन्नपूर्णा भण्डार वाली झोली दी थी, किन्तु यह अनुग्रह पाने से पहले जलाराम यह व्रत निभाते रहे थे कि वे दिन भर खेत पर काम करेंगे और पत्नी सत्पात्रों को तब तक भोजन पकाती खिलाती ही रहेगी जब तक घर में अनाज रहे। भगवान उदार तो हैं पर हैं उन्हीं के लिए जो प्रामाणिकता और उदारता की कसौटी पर खरे सिद्ध हो चुके। छल करने वालों के लिए उनका “छलिया” नाम भी प्रसिद्ध है। दुष्टों के दमन में उनका “रुद्र” रूप ही परिलक्षित होता है।
भगवान का दृश्य और प्रत्यक्ष रूप विराट् ब्रह्म ही है, जिसे अर्जुन, यशोदा, कौशल्या, काकभुशुण्ड जी आदि ने देखा था। इसे विश्व उद्यान या जनता-जनार्दन भी कह सकते हैं। लोक सेवा के रूप में भक्ति की यथार्थता का परिचय जिस प्रकार दिया जा सकता है उतना और किसी प्रकार नहीं।
सुदामा के पैर धोकर भगवान ने पिये थे। भृगु की लात सीने पर खाई थी। यह ब्राह्मण की गरिमा को अपने से बड़ी बताने के उद्देश्य से भगवान ने किया था। ब्राह्मण वे हैं, जो गृहस्थी संभालते हुए क्षेत्रीय सेवा साधना की योजना में संलग्न रहते हैं और अपना निर्वाह अपरिग्रही की तरह करते हैं। साधु, ब्राह्मण वर्ग का वह पक्ष है जो विरक्त वानप्रस्थ रहकर परिव्राजक की तरह अलख जगाता-वायु की तरह प्राण संजोता और बादलों की तरह सद्विचारों का अमृत बरसाता है। इस वर्ग को श्रेष्ठ, पूज्य और भगवान के अधिक समीप इसलिए माना गया है कि वे भगवान के परमार्थ परक प्रयोजनों में निरन्तर लगे रहते हैं, अपने स्वार्थ साधन को सर्वथा भुलाये रहते हैं।
भगवान की भक्ति में घाटा उन्हें पड़ता है जो पूजा पाठ का दाना बिखेर कर चिड़ियों की तरह देवी देवताओं को बहकाने फँसाने में लगे रहते हैं। किन्तु जिन्हें सेवा धर्म प्रिय है, जो लोक सेवा को भगवान का अविच्छिन्न अंग मानते हैं, वे जितना बोते हैं उससे अनेक गुना पाते हैं। मक्का का एक बोया हुआ दाना हजारों मक्का के दानों का समुच्चय बनकर वापस लौटता है। इसी प्रकार भक्ति का वास्तविक स्वरूप यदि सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के रूप में चरितार्थ किया जाय तो भक्त भगवान के प्राणप्रिय बनते हैं। नारद कभी-कभी विष्णुलोक जा पहुँचते थे। यह छूट इन्हें इसलिए मिली थी कि वे भक्ति प्रचार के लिए, धर्म विस्तार के लिए निरन्तर भ्रमण करते रहते थे। ढाई घड़ी से अधिक एक स्थान पर खड़े न होते थे। भगवान बुद्ध को मनुष्य होते हुए भी भगवान कहलाने का श्रेय इसलिए मिला कि संसार में फैले हुए अभाव को मिटाने और सर्वत्र धर्मचक्र प्रवर्तन की प्रक्रिया गतिशील करने के लिए अपने को उन्होंने पूर्णतः समर्पित कर दिया। सेवाभावी जहाँ जन समाज का नेतृत्व करता है, वहाँ प्रत्यक्ष और परोक्ष इतने लाभ पाता है जो त्याग की तुलना में हजारों गुने अधिक होते हैं।
उस जमाने में राजा दूसरे देशों पर आक्रमण करते और वहाँ का धन वैभव ही नहीं युवा नर-नारियों का अपहरण करके दास-दासियों के रूप में सभी अपने विलास भण्डार भरते थे।
पकड़े हुए गुलामों में एक का नाम था- एण्ड्री। और की तुलना में वह स्वाभिमानी भी था और झगड़ालू भी। सो उसे मालिकों की यह प्रताड़ना सहन न होती और चुप बैठने के साथ भी मन में उधेड़ बुन चलती रहती।
एक दिन अवसर पाकर वह भाग खड़ा हुआ और किसी घने जंगल में जा छिपा। कठिनाई से ही दिन गुजार रहा था कि कोढ़ में खाज की तरह एक और मुसीबत आ टपकी। कहीं से खिसकता हुआ एक शेर उसकी बगल में आ बैठा। बेचारा स्तब्ध रह गया। काटो तो खून नहीं। भागने तक की हिम्मत न कर सका।
शेर ने हमला नहीं किया। वरन् पंजा उठाकर उसकी गोद में रख दिया। एण्ड्री ने हिम्मत करके उसे देखा तो एक बड़ा काँटा चुभा हुआ था। एण्ड्री ने उसे निकाल दिया। खुश होता हुआ शेर वापस जंगल में चला गया।
मुसीबत दोनों पर नये सिरे से बरसी। राजा के नौकरों ने एण्ड्री को ढूँढ़ निकाला और जेल में पहुँचा दिया। उधर शिकारियों के एक दल ने लंगड़े शेर पर घात लगाई और उसे कैद करके राजा के अजायबघर में ठूँस दिया।
एण्ड्री दरबार में पेश हुआ। उन दिनों के कानून के अनुसार भगोड़े गुलामों को एक ही सजा थी- मौत! सो उसे जंगली शेर के पिंजड़े में धकेल देने का फैसला हुआ। उसे उस नये शेर के पिंजड़े में धकेला गया। देर न लगी उसने काँटा निकालने वाले उपकारी को पहचान लिया प्यार से अपना सिर उसकी गोद में रखने लगा।
दर्शक अवाक् थे। भूखा शेर- शिकार को उलटा प्यार करे यह अचंभे की बात थी। किस्सा विदित होने पर सभी ने जाना। हिंस्र पशु तक उपकारी का अहसान मानते हैं। मनुष्यों में जो कृतघ्न हैं उन्हें हिंस्र पशुओं से भी गया गुजरा समझा जाना चाहिए।
नेता और अभिनेता में थोड़ा-सा ही अन्तर होता है। सच पूछा जाय तो ‘अभि’ शब्द अतिरिक्त रूप से जुड़ जाने से उसका महत्व और भी अधिक प्रतीत होता है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। नेता को अपने त्याग, पुरुषार्थ, आदर्श और साहस के बल पर जनसाधारण के अन्तःकरण में इतनी गहरी जड़ें जमानी पड़ती हैं, जिसके आधार पर उनका श्रद्धा-विश्वास सदा अक्षुण्ण बना रहे और अनुकरण की, आदेश पालन की उत्कंठा स्वयमेव जग पड़े, वह समर्थन-सहयोग देने में आनाकानी न करे, अनुकरण की उत्कंठा रोक न सके और कदम मिलाते हुए हाथ बँटाते हुए साथ चल पड़े।
अभिनेता भीतर से पोला और बनाव-श्रृंगार में चतुर होता है। वाणी को आकाश-पाताल तक उछाल कर अपनी धाक जमाता है। वेष-विन्यास, हाव-भाव का आकर्षण-प्रदर्शन करता है और बीच-बीच में आत्म प्रशंसा का ऐसा पुट लगाता रहता है, जिससे अजनबी लोगों को निरीक्षण-परीक्षण के अभाव में उसकी संरचित प्रवंचना के प्रति आकर्षण उत्पन्न होने लगे और वे उस पर विश्वास न करें तो प्रशंसा तो करने ही लगें। उसके साथी भी बढ़ा-चढ़ा कर परिचय देते हैं, इससे भी कुछ सम्मोहन जैसा बन जाता है। इतने से कला-कौशल के आधार पर अनेक लोग नेता बनने का प्रयत्न करते हैं, पर सेवा और चरित्र के अभाव में वे उस कलई को देर तक स्थिर नहीं रख पाते, जाँच-पड़ताल की तनिक-सी गर्मी लगते ही वह कलई उड़ जाती है। ढोल की पोल नंगी करने में एक छोटी-सी लकड़ी की नोक भर काफी होती है। कागज के फूलों से सुगन्ध कहाँ आती है। वे गर्मी-नमी भी नहीं सह पाते।
प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत इन दिनों सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह किया जा रहा है कि जनसमुदाय का सर्वतोमुखी नेतृत्व कर सकने वाले एक लाख की संख्या में वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्र तैयार किये जा रहे हैं। दिग्भ्रान्त, पतनोन्मुख और शौर्य-साहस से विहीन बहुसंख्यक जनसमुदाय को हर दृष्टि से समर्थ, समुन्नत बनाने का काम बड़ा है। इसके लिए समर्थ नेतृत्व की अनिवार्य आवश्यकता है। इसे ढीले पोले लोग नहीं कर सकते हैं। जिनमें जीवट नहीं, क्षमता नहीं, प्राण भरी उमंग नहीं, वे अपनी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं कर पाते, फलतः उनकी वाणी भर लोग सुनते और मनोरंजन करते हैं, पर उनका आदेश पालने, अनुकरण करने के लिए ऐसी दशा में तो किसी भी प्रकार तैयार नहीं होते, जब उनसे आदर्श अपनाने और विवेक वादी दूरदर्शिता अपनाने के लिए कहा जाए।
रंगमंचों पर अभिनेताओं को योगी, राजा, विदूषक, धनाध्यक्ष आदि कुछ भी बनाया जा सकता है। इसके लिए उपकरणों की सज्जा जुटाने से काम चल जाता है, किन्तु साथ ही यह भी होता रहता है कि दर्शकों में से प्रत्येक को यह पता चलता रहता है कि यह मुखौटे सजाये गये हैं, इनमें से योगी, राजा कोई नहीं है। ये केवल वेष-मनोरंजन भर कर रहे हैं, नाटक कम्पनी की प्रशंसा भर करा रहे हैं। उनके निज के व्यक्तित्व के बारे में कोई धारणा नहीं बनती। कारण कि बिना कसौटी पर कसे-बिना इतिहास जाने कोई किसी की उत्कृष्टता के संबंध में विश्वास नहीं कर सकता। मात्र कलाकारिता ही होती है, जो अपने उथले अस्तित्व का उस माहौल में परिचय देती रहती है, इतने में ही मदारी का खेल खत्म हो जाता है।
वास्तविक नेतृत्व रेल के इंजन जैसा होता है, जो अपने में अकूत शक्ति भरे रहता है और अपनी क्षमता के आधार पर भारी बोझ से लदे ढेरों डिब्बों को द्रुतगति से सैकड़ों-हजारों मील घसीटता चला जा सकता है। यह कार्य लकड़ी का खिलौना इंजन नहीं कर सकता। आकार बन जाने पर भी शक्ति के अभाव में वह खिलौना इंजन कौतूहल का निमित्त कारण ही बनता है।
शक्ति उनमें होती है, जिनकी कथनी और करनी एक हो, जो प्रतिपादन करें, उसके पीछे मन, वचन और कर्म का त्रिविधि समावेश हो। ऐसे ही लोग महत्वपूर्ण कार्य कर और करा सकेंगे। उदाहरण के लिए पतनोन्मुख लोगों को लिया जा सकता है। शराबी, जुआरी, व्यभिचारी आदि जिनसे संपर्क साधते हैं, उन्हें अपने जैसा बना लेने में सहज सफलता प्राप्त कर लेते हैं। जीवन में अपने जैसे अनेक गढ़कर खड़े कर लेते हैं। महापुरुषों के संबंध में भी यही बात है। बुद्ध, गाँधी, आदि को अपने साथी सहयोगियों का विशाल समुदाय मिल गया था। सामर्थ्यवान व्यक्ति भले हों या बुरे, चुम्बक की तरह अपने जैसे गुण-स्वभाव के लोगों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर एकत्रित कर लेते हैं। वे उनके सच्चे साथी और सहयोगी भी सिद्ध होते हैं। इतिहास के पृष्ठ इसके साक्षी हैं। इसके विपरीत यह भी देखा गया है कि जिनमें पोल भरा ढकोसला ही आधार है, उनका दूसरों पर स्थाई प्रभाव छोड़ना तो दूर, अपने साथियों से भी बहुत दिन तक पटरी नहीं खाती। वे तनिक सी बातों पर आपस में लड़-झगड़ बैठते हैं और हिंस्र पशुओं की तरह एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। जिस प्रकार चोर पैसे के मामले में आपस में टकराते रहते हैं, उसी प्रकार नेता लोग भी प्रतिष्ठा एवं प्रशंसा बटोरने की आपाधापी में एक-दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। पुत्रेषणा, वित्तेषणा तो किसी प्रकार काबू में रखी जा सकती है, पर सस्ती कीमत में मिलने वाली लोकेषणा ऐसी है, जिसका लोभ संभाले नहीं संभलता। कारगर और प्रतिष्ठित संस्थाओं का सर्वनाश इसी एक कारण से हुआ है कि उनमें महत्वाकांक्षी लोग आपस में पटरी नहीं बिठा सके। कुछ ही वर्ष पूर्व जनता पार्टी का जो हाल हुआ था वह किसी से छिपा नहीं है। फिलहाल काँग्रेस की जो स्थिति है, उससे भी सभी अवगत हैं।
किसी की, उपहार-अनुदान में दी हुई या तिकड़म भिड़ाकर झपटी हुई, चमचों द्वारा ढोंग-ढकोसले की तरह खड़ी की गई नेतागिरी, बालू की भीत जैसी, बेपेंदी के लोटे जैसी होती है। उसे संध्या के बादलों जैसी, धूप-छाँव जैसी समझा जा सकता है। उसकी जड़ें नहीं होती। इसलिए बाजीगर द्वारा हथेली पर जमायी गयी सरसों की तरह उसका अवसान होते देर नहीं लगती। देखा गया है कि जिन अफसरों-मिनिस्टरों को लोग सौ-सौ सलाम झुकाते थे, कुर्सी छिन जाने के बाद उन्हें कोई कौड़ी मोल नहीं पूछता। साग बेचने वाले कुंजड़े तक उनसे कभी-कभी अकड़कर बात करते देखे गये हैं। यह अनुकम्पा का-अनुग्रह का उपहार तनिक-सी गड़बड़ी पर छिन भी सकता है, किन्तु जिसके पीछे ठोस आधार है, उसको कोई हिला नहीं सकता। गाँधी जी काँग्रेस के नियमित सदस्य तक नहीं थे, पर उनके बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। चौराचौरी काण्ड के बाद उनने सत्याग्रह बन्द किया था, इस पर सभी नेता रुष्ट थे, किन्तु जब नमक सत्याग्रह के लिए आवश्यकता पड़ी, तो उन्हीं को आगे लाना पड़ा। पं. नेहरू, पटेल, मालवीय, तिलक, गोखले आदि महामानवों का नेतृत्व किसी के द्वारा उपहार में दिया हुआ नहीं था। उसे उन्होंने पूरी-पूरी कीमत देकर खरीदा था।
महान-विराट् और उत्कृष्ट जीवन का नाम ही ईश्वर है। मनुष्य उसी का छोटा किन्तु दिव्य अंग है। वह स्वप्न नहीं है। न विडम्बना न दुर्भाग्य। वह ईश्वर का सब से सुन्दर और दिव्य वरदान है। वह अद्भुत है।
अपने भीतर प्रवेश करो। गहरे और गहरे। देखोगे कि जीवन प्रेम, आदर्श और आनन्द से भरा पूरा है।
साधु वास्वानी
प्रज्ञा मिशन को एक लाख नेताओं की आवश्यकता है। यह हर हालत में पूरी की जानी है, पर इसके लिए गायन-वादन, प्रवचन-पौरोहित्य जैसे उपचार श्रृंगार की तरह आवश्यकता तो है, पर इतने भर से काम नहीं चल सकता। इन योग्यताओं को प्राप्त करके लोगों को एकत्रित-आकर्षित किया जा सकता है और अपने प्रतिपादनों के सहारे उन्हें सहमत भी किया जा सकता है, किन्तु कठिनाई तब पड़ेगी, जब उन्हें भी अपने साथ लेने और कुछ महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए त्याग करने एवं साहस दिखाने के लिए कहा जायेगा। श्रद्धा के अभाव में वे परिस्थितियाँ अनुकूल होते हुए भी बगलें झाँकेंगे और कुछ ऐसे कदम न उठा सकेंगे, जिससे कारगर प्रयोजनों की सिद्धि हो, कर्त्ता एवं उसके निर्माता का प्रभावी संगठन खड़ा करने का श्रेय मिल सके।
पेड़ की सुन्दरता की कितनी ही कल्पना क्यों न की जायं, पर उसे प्रत्यक्ष देखने के लिए जड़ों में खाद-पानी पहुँचाने की सुव्यवस्था होनी चाहिए। इसके बिना पोली नेतागिरी दिखावटी रहेगी और आवेश उतरते ही ठंडी हो जायगी।
नेता के सेवा कार्यों का वर्णन होता है। उनके क्रिया-कलापों की गाथा गाई जाती है। पर ऐसा वस्तुतः बन सकना या कर सकना तभी संभव हो सकेगा, जब व्यक्ति निजी जीवन में दो शर्तों का निर्वाह करे। एक यह कि उसे चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से परिष्कृत एवं प्रामाणिक होना चाहिए। उसकी चादर पर ऐसे दाग-धब्बे लगे न हों, जिस पर हर किसी की आँख जाय और उँगली उठे। दूसरा यह कि उसके क्रिया-कलाप में सेवा भावना गुँथी होनी चाहिए। उसे प्रचार कार्य के अतिरिक्त ऐसे पुण्य-परमार्थ भी अपनाने चाहिए, जिसके सहारे उदारता, सज्जनता एवं आदर्शवादिता प्रकट होती हो। जिनके पास न चरित्र की पूँजी है और न जिनकी सेवा-साधना का कोई इतिहास, वे तो खेतों में खड़े हुए काग भगौओं की तरह हैं, जो दूर से देखने पर रखवाले जैसे प्रतीत होते हैं, पर निकट जाने पर प्रतीत होता है कि यह तो लकड़ी के ढाँचे पर घड़े का सिर और फटे कपड़े की पोशाक पहने हुए है। जिन्हें सच्चे अर्थों में किसी बड़े क्षेत्र का नेता बनना है, उन्हें चरित्र निष्ठा के अतिरिक्त सेवा प्रयोजनों के लिए समयदान-अंशदान की बढ़ी-चढ़ी उदारता भी दिखानी चाहिए। उपयोगी सेवा कार्यों में बिना किसी आमंत्रण के स्वयं दौड़ कर भागीदार बनना चाहिए। वस्तुतः चरित्रनिष्ठा और सेवा भावना एक दूसरे से पूरी तरह गुँथे हुए हैं। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ एक होगा, वहाँ दूसरा भी अनायास ही साथ हो जाएगा। इनमें से किसी को भी एकाकी नहीं माना जा सकता। लोक सेवा और चरित्र निष्ठा दोनों साथ हों तो वह नेतृत्व वास्तविक एवं प्रभावशाली जनोपयोगी नेतृत्व कहलाता है। जहाँ इस युग्म का अभाव है, वहाँ मात्र अभिनेता का तमाशा भर है। आवश्यकता है आज सही अर्थों में परमार्थ परायण नेताओं की जो मुखौटे लगाये अभिनेताओं की भीड़ में अलग से पहुंचाने जा सकें, जिनके पीछे चलने के लिए अगणित व्यक्ति सहर्ष तैयार हो जायँ।
बहुत प्राचीन काल की घटना है कि एक बार मिथिला नरेश ने कौशल राज्य के ऊपर चढ़ाई की। कौशल में सेना थोड़ी थी, राजा हार गया और वह किले को छोड़कर भाग निकला, उसे पकड़ने के लिए मिथिला नरेश ने एक हजार स्वर्ण मुद्राओं की घोषणा की।
कौशल नरेश इधर उधर जंगलों में अपनी जान बचाकर छिपते फिरते थे। एक दिन वे ऐसे नगर में पहुँचे जहाँ के सभी युवक उनकी फौज में भर्ती होकर अपने प्राण गँवा चुके थे, केवल स्त्रियाँ तथा छोटे बच्चे उस नगर में शेष थे। उनकी खेती भी इस वर्ष नष्ट हो गई थी, इसलिये गाँव आपत्ति ग्रस्त हो रहा था। कितने ही बाल, वृद्ध बीमार पड़े थे और कितने ही भूख से प्राण गँवा रहे थे। उन लोगों की ऐसी दुर्दशा देखकर राजा की आँखों में आँसू आ गये। इन लोगों को आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी पर वे तो स्वयं ही छिपते फिरते थे, किसी को क्या देते?
अन्त में एक उपाय उन्हें सूझा वे उस गाँव के कुछ वृद्ध पुरुषों को साथ लेकर मिथिला नरेश के यहाँ पहुँचे और कहा- मैं कौशल नरेश हूँ। मेरे पकड़ने के लिये एक हजार स्वर्ण मुद्रायें देने की जो घोषणा आपने की थी सो इन वृद्ध पुरुषों को दे दी जायें।
सब लोग आश्चर्य चकित रह गये कि अपनी इस प्रकार जान जोखिम में डालकर इनने क्यों आत्म समर्पण किया? जब सारी बात मालूम हुई कि इन भूखे मरते लोगों की सहायता के लिये अपना सर्वस्व दे रहे हैं तो उनकी उदारता देखकर श्रद्धा से सब का मस्तक नीचा हो गया। मिथिला नरेश ने उन्हें गले लगा लिया और यह कहते हुए उनका राज वापस कर दिया कि ऐसे उदार हृदय सत्पुरुष का राज लेकर मैं अपने को कलंकित नहीं करना चाहता।
उदार हृदय व्यक्ति दूसरों को दुख से बचाने के लिये अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करते।
यों बाल-विधवा पिसनहारी ने दो-दो पैसा बचा कर बुढ़ापे तक एक पक्का कुँआ बना सकने जितना पैसा इकट्ठा कर लिया था। उसी प्रकार कोई चाहे तो अन्य सम्पदाएँ एवं विभूतियाँ भी अपने बलबूते क्रमशः जमा करता रह सकता है और उस संचय के बल पर कोई बड़ा काम कर सकता है, पर यह अपवाद है, सामान्य या विशिष्ट रीति नहीं। आमतौर से होता यह है कि समर्थों का आश्रय लेकर असमर्थ तेजी से ऊँचे उठते और आगे बढ़ते हैं।
बेल अपने आप ही इधर-उधर बढ़ती-फैलती रहती है। उसे पानी में गलने, धूप में सूखने और जानवरों द्वारा चरे जाने का खतरा भी रहता है, किन्तु जब वह किसी ऊँचे पेड़ का आश्रय पकड़ लेती है तो उतनी ऊँची उठ जाती है, जितना कि लम्बा वाला बिल्व वृक्ष। बाढ़, धूप, पशु भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। “अमर बेल” तो पूरी तरह उस पेड़ से ही अपनी खुराक आजीवन प्राप्त करती रहती है, जिस पर कि वह फैलती है। यह तरीका और भी अधिक सरल है।
जीव की मूल सत्ता शुक्राणु के रूप में इतनी छोटी होती है कि आँख से देखी भी नहीं जा सकती, किंतु भ्रूण में प्रवेश करने के बाद माता की शरीर-सम्पदा उसे मिलने लगती है और नौ महीने में वह इस योग्य हो जाता है कि बाह्य संसार में प्रवेश कर सके। इसके बाद भी माता दूध पिलाने, खिलाने, पहनाने, सफाई रखने जैसी अनेकों सुरक्षात्मक सावधानियाँ रखती है। यदि ऐसा न करे, तो बालक का जीवित रह सकना संभव नहीं। अब पिता की बारी आती है। पोषण, शिक्षण, स्वावलम्बन, विवाह आदि के लिए वह अपनी कमाई का अधिकाँश भाग खर्च कर देता है। अध्यापक भी अपना दायित्व पूरा करता है और सभ्य-शिक्षित बनाने में योगदान देता है। इन सहायताओं के बल पर मनुष्य आगे बढ़ता है। यदि उसे उपरोक्त सभी प्रसंगों में अपने पैरों खड़ा होना पड़े, तो वह क्या कुछ बन सकेगा?, इस संबंध में असमंजस और संदेह ही बना रहेगा।
सुसभ्य छत्रछाया में सभी को विकसित होने का असाधारण अवसर मिलता है। चतुर माली बगीचे को ऐसा नयनाभिराम और लाभदायक बना देता है, उसे देखकर दर्शकों तक को प्रशंसा करनी पड़ती है। सुव्यवस्थित गुरुकुलों में पढ़कर छात्र अत्यन्त मेधावी नर-रत्न बन कर निकलते रहे। यह कार्य कोई विद्यार्थी अपने आप पोथी पढ़ कर सम्पन्न नहीं कर सकता है। पहलवान अखाड़ों में ही बना जाता है। अभिनेता बनने के लिए रंगमंच चाहिए। प्रगति के लिए आवश्यक वातावरण, मार्गदर्शन एवं अनुदान- इन सभी की आवश्यकता पड़ती है। स्वउत्पादित् तो जंगलों के झाड़-झंखाड़ ही होते हैं। अनगढ़ चट्टानें देव प्रतिमाओं का कलेवर धारण नहीं कर सकतीं, इसके लिए निर्माता, कलाकार चाहिए। आभूषण भी हर कोई नहीं बना सकता। यह स्वर्णकार का ही कौशल है, जो अनगढ़ धातु-खण्डों को अपनी कलाकारिता से ऐसे आभूषणों में बदल देता है, जिससे सिर और गले तक की शोभा बढ़ती है, नाक-कान तक सजते हैं, उँगली के पोरवे भी।
व्यक्ति की भौतिक अथवा आत्मिक प्रगति के लिए किसी सहायक मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है। गायक, वादक, मूर्तिकार, चित्रकार आदि को किसी-न-किसी निष्णात के यहाँ शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। आत्मिक क्षेत्र में तो यह एक प्रकार से अनिवार्य है, नितान्त आवश्यक। जिस प्रकार भ्रूण बिन्दु को माता का रस-रक्त चाहिए, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए ऐसे संरक्षण परिपोषक की आवश्यकता पड़ती है, जो अपने विषय का प्रवीण पारंगत भी हो और साथ ही उतना उदार भी कि अपनी उपार्जित सम्पदा को बिना संकोच के ‘इच्छुक’ को उदारतापूर्वक हस्तान्तरित करता रहे।
चर्चा गुरु-शिष्य संयोग-सुयोग की हो रही है। उसमें प्रमुखता एवं वरिष्ठता गुरु की है, क्योंकि वह अपने विषय का धनी भी होता है और दानी भी। इतिहास साक्षी है कि जहाँ कहीं, जब कभी कोई महत्वपूर्ण प्रसंग सामने आया है, तब उसमें गुरु की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका अपना चमत्कार प्रस्तुत करती दिखाई दी है। यों भटकते-पूछते भी पथिक देर-सबेर में ठिकाने तक जा पहुँचते हैं, पर उन्हें वह सुगमता और सफलता नहीं मिलती, जो गुरु और शिष्य का संयोग बनने पर संभव होती है। इस तथ्य को समझते हुए निराश एकलव्य को द्रोणाचार्य की प्रतिमा मिट्टी से बनानी पड़ी थी। श्रद्धा के बल पर उसने उस खिलौने को असली द्रोणाचार्य से कहीं अधिक सुयोग्य एवं सहायक शिक्षक बना लिया था।
विश्वामित्र यज्ञ रक्षा के बहाने राम-लक्ष्मण को अपने तपोवन में ले गये थे। वहाँ उन्हें बला और अतिबला-गायत्री और सावित्री की रहस्यमयी जानकारी दी थी। फलतः सीता स्वयंवर जीतने, लंका विजय करने, राम राज्य की प्रतिष्ठा करने एवं भगवान कहे जाने की स्थिति तक वे पहुँचे थे। ऐसा सुयोग भरत, शत्रुघ्न को नहीं मिला था। उन्हें सामान्य स्थिति में रहना पड़ा। वे विश्व विख्यात न बन सके।
नारद के परामर्श से भगीरथ गंगावतरण में प्रवृत्त हुए थे। उन्हीं का निर्देशन परशुराम को मिला था कि संव्याप्त अनीति के धुर्रे बिखेर दें। वे परामर्श मात्र देकर चले नहीं गये थे, वरन् आदि से अन्त तक उनकी साज-संभाल करते और कठिनाइयों का समाधान करते रहे थे। नचिकेता ने यमाचार्य से पंचाग्नि विद्याएँ प्राप्त की थीं और वे उस आधार पर ऊर्जा विज्ञान की समग्रता एवं प्रवीणता उपलब्ध कर सके थे। गुरुकुल की महत्ता इसी दृष्टि से थी कि वहाँ पुस्तकें ही नहीं पढ़ाई जाती थीं, वरन् छात्र में नये प्राण फूँकने और तुच्छ से महान बनाने की प्रक्रिया भी सम्पन्न की जाती थी।
भारतीय संस्कृति की पुण्य परम्परा में माता-पिता के अतिरिक्त संरक्षकों की तीसरी पदवी गुरु की है। यही प्रत्यक्ष त्रिदेव हैं। शिव के बिना जिस प्रकार देव समुच्चय अधूरा रहता है, उसी प्रकार उच्चस्तरीय शिक्षार्थी भी उपयुक्त गुरु के अभाव में अनाथ-अपंग की स्थिति में पड़ा रहता है। अभाव, अज्ञान एवं अशक्ति से उफनते इस भवसागर जैसे महानद को सुरक्षित रूप से पार करने के लिए जिस मजबूत पतवार वाले जहाज की जरूरत है, उसे ही गुरु कहा गया है।
महानता के पुरातन इतिहास में गुरु गरिमा की जितनी बड़ी भूमिका रही है, उतनी किसी और की नहीं। इसलिए भावनाशील शिक्षार्थी गुरुदक्षिणा में आचार्य को मुँह माँगा अनुदान अपनी समूची सामर्थ्य को भी न्यौछावर करते हुए हर संभावना को साकार कर दिखाते थे। हरिश्चंद्र ने अपना राजपाट ही नहीं, शरीर और परिवार तक इस गुरु दक्षिणा के निमित्त समर्पित कर दिया था। वाजिश्रवा, हरिश्चंद्र और बिम्बसार की भी ऐसी ही कथाएँ हैं। जो पाया था, उसका मूल्य चुकाते समय इन भावनाशील शिष्यों ने कृपणता का परिचय नहीं दिया। आरुणी, उद्दालक, सत्यकेतु और द्रुपद की कथाएँ सुप्रसिद्ध हैं और उनके गुरु ने अनुदानों को देखते हुए शिष्यों के लिए उपयुक्त प्रतिदान प्रस्तुत करने में भी कोताही नहीं की थी।
कुछ ही शताब्दियों के बीच घटित हुई घटनाओं में कई ऐसी हैं जो रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन करती हैं। भगवान बुद्ध ने अपने तपोबल से अनेकों को भागीदार बनाया और उनसे बड़े काम कराये। कुमार जीव को उन्होंने समूचे चीन का धर्मगुरु बना दिया। मंचूरिया, मंगोलिया, कोरिया, जापान तक में वह दूसरा बुद्ध माना जाने लगा था। तथागत का कार्यक्रम एक केन्द्र से धर्मचक्र प्रवर्तन की धुरी घुमाना था। वे स्वयं समूचे संसार और एशिया में किस प्रकार भ्रमण करते? उन्होंने अंगुलिमाल, अम्बपाली जैसों का कायाकल्प किया और उनके द्वारा पूर्वी-दक्षिणी एशिया में नवीन चेतना जगाई। एक दुर्दान्त डाकू उच्चकोटि का धर्म प्रचारक बन गया और अनेकों की पर्यंक शायिनी नर्तकी अम्बपाली ने सुविस्तृत क्षेत्र के नारी समुदाय में ऐसा प्राण फूँका मानो किसी ने उसे तपती जमीन पर अमृत बरसा दिया हो। वह देवी में बदल गई, साध्वी हो गयी। क्या यह पतित समझा जाने वाला परिकर बिना गुरु -कृपा के ऐसी स्थिति में पहुँच सकता था कि उनके चरणों पर कोटि-कोटि जन समुदाय के पलक पाँवड़े बिछे। बिम्बसार ने राज्यकोष बौद्ध विहार बनाने में चुका दिया और हर्षवर्धन ने तक्षशिला विश्वविद्यालय का समूचा भार उठाया। लगता है कि इन शिष्यों को घाटे में रहना पड़ा। पर उस घाटे पर कुबेर जैसे रतन भण्डारों को न्यौछावर किया जा सकता है, जिसने मनुष्यों को देवताओं से बढ़कर सम्माननीय बना दिया। कोटि-कोटि कण्ठों से गदगद कण्ठ में जिनकी यशोगाथा गाई गयी। ऐसा सौभाग्य क्या किसी छोटी मोटी धनराशि और सुख सम्पदा से लाखों गुना बढ़कर नहीं है? बुद्ध के अवतार होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उनने सामान्य स्तर के लोगों को लाखों की संख्या में महामानवों की पंक्ति में बिठाया। समर्थ गुरु के अभाव में यह लाखों भिक्षुओं और भिक्षुणियों की धर्म सेवा विश्वमानस का नवनिर्माण करने के लिए निकल न पाती।
तपस्वी चाणक्य की तप सम्पदा गाय के दूध भरे थनों की तरह निस्सृत हो रही थी, पर प्रश्न यह था कि सत्पात्र ढूंढ़े बिना यह अमृत किस पर लुटाया जाय। आखिर चन्द्रगुप्त मिल गया। एक क्षुद्र जाति के बालक को राजपूतों के बीच वरिष्ठता कैसे मिलती? पर चाणक्य की योजना, दक्षता और तप-सम्पदा थी जिसे लेकर चन्द्रगुप्त भारत के गौरव में चार चाँद लगा देने में समर्थ हुआ। यह मिला तब था जब उसने अपने पराक्रम का लाभ अपने निज के लिए नहीं, समस्त राष्ट्र के लिए अर्पित करने का व्रत लिया और आश्वासन दिया था।
समर्थ गुरु रामदास और छत्रपति शिवाजी की ऐसी ही गाथाएँ हैं। गुरु ने शिष्य को और शिष्य ने गुरु को अपना निजत्व पूरी तरह समर्पित कर दिया था। रामकृष्ण परमहंस ने अपनी तप साधना विश्व संस्कृति में नई हलचल पैदा करने के लिए प्रदान की और शिष्य ने अनुभव किया कि उनके प्राण और शरीर में गुरु ही काम कर रहा है। उनने संसार भर में रामकृष्ण मिशन मठों की स्थापना की। निजी महत्वाकाँक्षा से प्रेरित होकर विवेकानन्द नाम की एक कुटिया भी कहीं नहीं बनाई।
महायोगी और उद्भट विद्वान विरजानन्द की पाठशाला में ढेरों विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते थे और पढ़ाई पूरी करके कथा बाँचने, जन्मपत्री बनाने का धन्धा करते थे। गुरु को आवश्यकता ऐसे शिष्य की थी जो पेट पालने और मनोकामना पूरी कराने का आशीर्वाद न माँगकर अपने को देश, धर्म, समाज और संस्कृति के लिए समर्पित करे। अगणित छात्र आए और चले गए। पर एक छात्र मिला- दयानन्द, जिसने आचार्य से गुरु दक्षिणा माँगने के लिए कहा और जब उन्होंने तन, मन, धन पाखण्ड खण्डन करने के निमित्त समर्पित करने की माँग की तो शिष्य ने गुरु आदेश के लिए सर्वस्य समर्पित कर दिया। वे ब्रह्मचारी से संन्यासी बन गए और जब तक जिए, एक निष्ठ भाव से वेद धर्म का प्रचार करने में लगे रहे। आर्य समाज के रूप में उनका दिवंगत शरीर अभी भी जीवित है। उन्हें राष्ट्रीय आन्दोलन के- समाज सुधार अभियान के जन्मदाता के रूप में स्मरण किया जाता है।
ऊपर की पंक्तियों में कुछ ऐसे नेतृत्व करने वाले शिष्यों का उल्लेख है जिन्होंने पुरुष से पुरुषोत्तम, नर से नारायण बनने की दिशा में कदम बढ़ाये और असंख्यों के हृदय पटलों पर अपने आसन जमाए।
आज ऐसे ही नेताओं का, शिष्यों का आह्वान हो रहा है जिन्हें विपुल सहायता प्रदान करने के लिए देव सत्ता व्याकुल है। तलाशा उन्हें जा रहा है जो इस अनुदान को पाकर अपने को और गुरु परंपरा को धन्य बनावें। ढूंढ़ना गुरु को नहीं, शिष्यों को इस तरह पड़ रहा है मानो भारत माता की बहुमूल्य रत्न-राशि कहीं मिट्टी धूलि में गुम हो गई हो।
यह तथ्य याद रखा जाना चाहिए कि टंकी में पानी जब तक भरा रहता है, तब तक उसके साथ जुड़े हुए नल का प्रवाह चलता ही रहता है। बिजली घर के साथ जुड़े हुए बल्ब, पंखे, मोटर गतिशील रहते ही हैं। समर्थ गुरु सत्ता के साथ जो जुड़ सके, उसे थकने, हारने या निराश होने की कोई आशंका नहीं। नेतृत्व के शिक्षार्थी किसी प्रकार हताश न हों, अपने आपको समर्थता के साथ जोड़े रहने का संकल्प भर सुदृढ़ बनाये रहें।
युग नेतृत्व के उदाहरणों की शृंखला में निकटवर्ती, अभी तक जीवित व्यक्ति को तलाशना हो तो प्रज्ञा अभियान के सूत्र संचालक को उलट पुलट कर परखा जा सकता है। उनने ऐसे अनेक काम किए हैं जिनसे असंभव शब्द को संभव में बदलने की नेपोलियन वाली उक्ति को चरितार्थ होते देखा जा सकता है। यह हाड़ माँस से बनी काया के व्यक्ति का कर्त्तव्य नहीं हो सकता। मनुष्य की कार्यक्षमता सीमित है, कौशल और साधन भी सीमित हैं पर जब असीम साधनों की आवश्यकता पड़े और वे सभी यथा समय जुटते चले जायँ तो एक शब्द में यही कहना होगा कि यह किसी दैवी शक्ति का पृष्ठ पोषण है। इसके उपलब्ध प्रत्यक्ष प्रमाणों में से हर एक यही कहता है कि इस प्रत्यक्ष के पीछे परोक्ष भूमिका गुरु तत्व की है।
एक लाख “नेता”, सच्चे अर्थों में नेता विनिर्मित करने का संकल्प अकेला ही इतना भारी है जिसे तराजू के एक पलड़े में रखने के बाद दूसरे में पुरातन काल के नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों को रखते हुए बराबरी की बात सोचनी पड़ेगी। क्या यह सम्भव है? क्या यह सब हो सकेगा? क्या एक लाख युग शिल्पी नवसृजन में संलग्न होकर सतयुग की वापसी का वह प्रयोजन पूरा कर सकेंगे जिसे समुद्र सेतु बाँधने के समतुल्य माना जा सके। बात अचंभे की है, पर तब-जब सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य से इतने बड़े उत्तरदायित्व को तौला जाय। जब स्थिति ऐसी हो कि प्रस्तुत संकल्प की प्रेरणा, निर्धारणा, योजना ही नहीं, उसकी सफलता की जिम्मेदारी भी किसी महान शक्ति ने उठाई हो तो उसकी सफलता में किसी प्रकार का सन्देह यह असमंजस करने की गुँजाइश नहीं है। इस अवसर का लाभ उठाने पर वही उक्ति लागू होगी जिसमें कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि “शत्रु को मैंने पहले ही मार कर रख दिया है, तुझे तो विजय का श्रेय भर लूटना है”।
कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी। ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया।
दूसरे दिन वह एक सद्गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहस्वामिनी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा- “भगवन्, थोड़ी देर ठहरो अभी आपको भिक्षा दूँगी।” इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति-सेवा को अधिक महत्व दे रही है। गृहस्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा- “क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूंगी।”
ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई? ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिलापुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे।
भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा। वह तौल-नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया और कहा- “तपोधन कौशिक देव? आपको उस सद्गृहस्थ गृहस्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लूँ तब आपकी सेवा करूंगा। कृपया थोड़ी देर बैठिये। “ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना? थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोक-हित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजाता चाण्डाल के पास जाइए।
कौशिक मगध चल दिये और चाण्डाल के यहाँ पहुँचे। वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टाँग प्रणाम किया और कहा- “भगवन् आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुये यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लूँ, तब आपसे बात करूंगा। तब तक आप विश्राम कीजिये।”
चाण्डाल जब सेवा-वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा- “अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरन्तर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।”
तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य, कर्म निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिक का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।
निर्माण का मोर्चा एकाकी ही नहीं चलता रह सकता, उसके साथ सुधार का प्रकरण भी जुड़ा रहना चाहिए। खेत में खाद पानी भी लगता है और उसकी निराई, गुड़ाई रखवाली भी होती है। इस काट-छाँट के बिना न कोई खेत पनप सकता है न उद्यान। समाज में सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन हेतु ज्ञान, कर्म, भक्ति की शिक्षा देना, कथा प्रवचन करना भी आवश्यक है पर है एक पक्षीय एकाँगी ही। रसोई घर की तरह शौचालय, स्नान घर, कूड़े दान और नाली को साफ सुथरी रखना चाहिए, अन्यथा वहाँ उत्पन्न हुई सड़न, जो श्रेष्ठ है उसे भी बिगाड़ने, बरबाद करने में कोई कमी शेष न रहने देगी।
पुराने मकान जहाँ-तहाँ से जीर्ण होकर टूटते फूटते रहते हैं। उनकी हाथोंहाथ मरम्मत करा देने से इसी घर से मुद्दतों काम लिया जा सकता है, किन्तु यदि बिगड़ने की उपेक्षा बरती जाय तो जिस प्रकार एक सड़ा हुआ अवयव दूसरे समीपवर्ती अंगों को भी काटने योग्य बना देता है, पीछे बड़ी परेशानी का कारण बनता है, उसी तरह समाज का सारा ढाँचा गड़बड़ा जाएगा। इसकी अपेक्षा तो यह अच्छा है कि सुधार के लिए आवश्यक साधनों-उपकरणों को सदा तैयार रखा जाय।
द्रोणाचार्य हाथ में शास्त्र और कंधे पर शस्त्र रख कर चलते थे। गुरु गोविन्दसिंह ने एक हाथ में माला और दूसरे में भाला रखने की नीति अपनाई थी, सज्जनों को प्यार एवं विवेक से भी समझाया जा सकता है। किन्तु पशु प्रवृत्ति के लिए प्रताड़ना ही एक मात्र शिक्षा विधि है। हिंसक पशुओं को धमकाये बिना न आत्मरक्षा का साधन सधता है और न उन्हें सर्कस में कोई कौतूहल दिखा सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। जिस प्रकार समाज को अध्यापकों, साहित्यकारों, शिल्पियों की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार पुलिस और सेना को भी सशक्त बनाना पड़ता है। कचहरी, जेल का प्रबंध इसीलिए किया जाता है कि उद्दंडता पर नियंत्रण किया जा सके, अन्यथा वे विरोध न होने की दशा में दूने चौगुने उत्साह से कुचक्र रचते एवं अनाचार फैलाते हैं। खेत को पानी मेंड़ बाँध कर रोका न जाय तो वह पौधे सींचने की अपेक्षा जमीन को काटकर खाई-खड्ड बना देगा।
अपना देश, धर्म और समाज विश्व के प्राचीनतम निर्धारणों में से है। इसलिए स्वाभाविक ही है कि उसमें विकृतियों का अनुपात बढ़े और वह पूर्वजों की गरिमा पर कलंक कालिमा लगाने में निरत रहे और विनाश के विष बीज बोये। यही कारण है कि सदा-सदा से सुधारक वर्ग की आवश्यकता अनुभव की जाती रही है। उसे सेना या पुलिस की उपमा दी जाती है। यदि वह सतर्क न रहे तो किसी की सम्पदा एवं इज्जत सुरक्षित न रहे। सुधारक रूपी सफाई कर्मचारी अपनी झाडू-टोकरी को निरन्तर गतिशील न रखें तो समाज रूपी नगर में हैजा जैसी महामारी फैलने में देर न लगे।
संसार में ऐसा कोई नहीं हुआ जिसकी आलोचना या निंदा न की गई हो।
धर्मोपदेशकों, संत, सदाचारी परमार्थी, पुण्यात्माओं की भक्ति भावना को जितना महत्व और सम्मान दिया जाता है उससे किसी भी प्रकार सुधारकों की गरिमा कम नहीं है। वे अगर अपना काम मुस्तैदी से न करें तो फिर समझना चाहिए कि वही स्थिति फिर आ पहुँचेगी जिसमें राम ने ऋषि आरण्यकों में अस्थि समूहों के पर्वत खड़े देखे थे और तपसी वेष धारी भगवान ने भुजा उठा कर प्रतिज्ञा की थी “निशिचर हीन करहुँ महि”। समाज सुधारकों को इसी वर्ग के रघुवंशी, तेजस्वी, क्षत्री कहा जा सकता है जो अपनी जान हथेली पर रख कर अनीति से टकराते और उसे उखाड़ फेंकने के उपरान्त दम लेते हैं।
भारत दो हजार वर्ष तक इसलिए पराधीन नहीं रहा कि यहाँ योद्धाओं या शस्त्रों की कमी थी। बात यह हुई कि समाज को कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं, अन्धविश्वासों ने जराजीर्ण कर दिया था और वह आक्रान्ताओं के छोटे-मोटे आघात भी न सह सका।
सामाजिक कुरीतियों में कितनी तो ऐसी हैं जिनकी भयंकरता किसी प्राणघातक महामारी से कम नहीं आँकी जा सकती। बाल विवाह, बहु विवाह, पर्दा प्रथा, स्त्रियों को पालतू पशुओं की श्रेणी में रखा जाना वह अनर्थ है जिसके कारण आधी जनसंख्या की स्थिति अपंग असहाय जैसी हो जाती है और अविकसित नारियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी अधिक योग्य सन्तानें जनती जाती हैं। यह पतन का एक क्रमबद्ध सिलसिला है जिसे हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। दहेज, खर्चीली शादियाँ, वर विक्रय, कन्या विक्रय, वधू दाह, वेश्यावृत्ति इन्हीं कुरीतियों का प्रतिफल है। मध्यकाल में तो विधवाओं के भरण पोषण के दायित्व से बचने के लिए परिवार वाले उन्हें सती हो जाने के लिए उकसाते थे और नशा पिलाकर अर्धमूर्छित स्थिति में पति की चिता पर धकेले देते थे। यह अनाचार राजाराम मोहनराय ने अपनी भावज की लोमहर्षक मृत्यु के रूप में देखा था। उनने प्रतिज्ञा की कि इस नारी वध को वे किसी भी कीमत पर रुकवा कर रहेंगे। इसके लिए उनने साहित्य लिखा, आन्दोलन चलाया और सरकारी सहायता लेकर कानून बनवाया। सती प्रथा विरोध और विधवा विवाह की मान्यता उन्हीं के भागीरथ प्रयत्नों से संभव हो सकी।
मात्र अनीति रोकना ही काफी नहीं, उसका उत्तरार्ध सत्प्रवृत्तियों की स्थापना से बनता है। महर्षि कर्वे ने नारी शिक्षा के लिए ऐसा कारगर प्रयत्न किया कि न केवल महाराष्ट्र में वरन् समूचे देश में उसकी हवा फैली। जयपुर वनस्पति में हीरालाल शास्त्री ने बालिका विद्यालय की शानदार स्थापना की जो अब विश्वविद्यालय स्तर तक जा पहुँचा है। अलीगढ़, सासनी की एकाकी महिला लक्ष्मी देवी ने जंगल में वीरान पड़ी भूमि को समतल बनाकर कन्या गुरुकुल बनाया। गांवों से कन्याओं को लाने पहुँचाने, पढ़ाने तक का आद्योपान्त कार्य उनने किया और कन्या शिक्षा की लहर एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँची। प्रयत्न कर्त्ताओं का ही प्रभाव है कि जो कार्य कभी निरन्तर असंभव प्रतीत होते थे वह सरल और संभव ही नहीं व्यापक भी हो गये। आज की बढ़ती नारी शिक्षा हेतु श्रेय इन्हीं शुभारंभ करने वाले नर-रत्नों को दिया जा सकता है।
दूसरी भयावह कुरीति है जाति-पाँति के आधार पर ऊँच नीच की मान्यता। यह सवर्ण और असवर्णों में अपने अपने ढंग से सर्वत्र फैली हुई है। परिणाम यह हुआ है कि एक समाज हजारों टुकड़ों में बंट कर रह गया। जाति-पाँति के साथ सम्प्रदायवाद और भाषावाद का जहर भी घुल कर त्रिदोष जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी।
एक ही मक्खी दूध में पहुँचकर उसे अभक्ष्य बना देती है। एक ही दुर्गुण मनुष्य की अनेक विशेषताओं को नष्ट कर देता है।
विद्या उसे कहते हैं जो सन्मार्ग पर चलाये और विनयशील बनाए।
इस अराजकता जैसी अव्यवस्था से लोहा लेने के लिए कितने ही सुधारक कटिबद्ध होकर आगे आये और उन्होंने कुप्रचलनों के दुष्परिणाम सर्वसाधारण को समझाते हुये उससे विरत करने तक का घनघोर प्रयत्न किया और वह प्रयत्न इतना सफल रहा कि उस कृत्य में अनेक भावनाशील जुट गये। स्वामी दयानंद का नाम इस संदर्भ में बढ़-चढ़ कर लिया जा सकता है। महात्मा गाँधी का हरिजन सेवक संघ, ठक्कर बापा जैसे समर्थ समर्पितों की टोली साथ लेकर उस प्रयास में निरत ही रहा। इसके पूर्व कबीर, रैदास, तिरुवल्लुवर जैसे संत इस सुधार के लिए मजबूत पृष्ठभूमि बनाते रहे। सिख धर्म, बौद्ध धर्म, आर्य समाज आदि ने भी इस संदर्भ में बढ़-चढ़कर काम किया। अब संविधान और शासन ने भी इस प्रकार के भेदभाव को दण्डनीय अपराध ठहरा दिया है, तो भी प्रगति वैसी नहीं हुई जैसी कि होनी चाहिए थी। कानून तो दहेज और रिश्वत-खोरी, व्यभिचार आदि के विरुद्ध भी बना हुआ है पर मूढ़मति और धूर्तराज उस शिकंजे से अपने आपको किसी प्रकार बचा ही लेते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रज्ञा अभियान इन कमियों की पूर्ति करने के लिए अपने को पूर्णाहुति की तरह समर्पित करे और किसी भी परिवार में जाति भेद, स्त्री उत्पीड़न की कहीं कोई भी घटना घटित न होने पाये। परिवार, व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती कड़ी है, भावी पीढ़ियों और वर्तमान जन समुदाय में से नररत्न निकालने की खदान भी। इसलिए परिवार निर्माण में जहाँ श्रमशीलता, मितव्ययिता, शिष्टता, सहकारिता, उदारता जैसे सद्गुणों का समावेश आवश्यक है, उतना ही यह भी अभीष्ट है कि नैतिक, बौद्धिक, और सामाजिक क्षेत्र की किसी भी दुष्प्रवृत्ति को प्रश्रय न मिले। समाज सुधार के लिए मार्टिन लूथर ने जिस प्रकार काम किया था और पोप के पडावाद के शोषण को उखाड़ फेंका था। उसी प्रकार की विचार क्रान्ति-धर्मक्रान्ति अपने देश में भी होनी चाहिए। मात्र वंश और वेश के कारण किसी को सम्मान मिले और देवताओं का एजेण्ट बन कर कोई जन साधारण को भ्रम-जंजाल में न फंसाये। निषिद्ध व्यापारों में एक भिक्षा व्यवसाय की कड़ी भी जुड़नी चाहिए। लोकसेवी ब्राह्मण कहलाते हैं। उन्हें निर्वाह प्राप्त करने का अधिकार है। इसी प्रकार जो अपंग, असमर्थ या विपत्तिग्रस्त हैं, उन्हें भी स्वावलम्बी न होने तक सहायता ग्रहण करते रहने का अधिकार है, पर जो ऋद्धि-सिद्धि, स्वर्ग-मुक्ति कमाने की स्वार्थ साधना में निरत होते हुए भी भगवान की दुहाई देकर अपनी श्रमशीलता से बचते हैं, मुफ्त का सम्मान और धन लूटते हैं, उन्हें रास्ते पर लाया जाना चाहिए और बताना चाहिए कि देश के 7 लाख गाँवों के लिए 60 लाख संत-महात्मा यदि लोक सेवी के रूप में उभरें तो नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक स्थिति में उत्साहजनक परिवर्तन कर सकते हैं।
समाज को ऊँचा उठाने के लिए शिक्षा क्रान्ति आवश्यक है। निरक्षरों को साक्षर बनाया जाय। वयस्क नर-नारियों के लिए प्रौढ़ पाठशाला चलायी जायं। स्कूली बच्चों को अवकाश के समय में बाल संस्कारशाला में सम्मिलित किया जाय ताकि जो कमी स्कूली पढ़ाई में रह जाती है उसकी पूर्ति हर गाँव हर मुहल्ले में स्थापित संस्कार-शालाओं में पूरी की जा सके। 78 करोड़ की आबादी में 70 प्रतिशत अशिक्षित भरे पड़े हैं। इन सबको शिक्षा और संस्कार प्रदान करने के लिए हर सुशिक्षित से शिक्षा-ऋण वसूल करने का अभियान चलाया जाय। यदि लोग अध्यापन के लिए निःशुल्क सेवाएँ देने लगेंगे और प्रतिभाशाली लोग जनसंपर्क बनाकर अशिक्षितों को पढ़ाने के लिए तैयार कर सकेंगे, तो जनआन्दोलन के रूप में शिक्षा समस्या का समाधान हो सकेगा।
शेखावाटी के स्वामी केशवानन्द ने यही किया था। उनने घर-घर में अनाज के मुट्ठी फण्ड रखवाये थे और उसी संग्रहित अन्न के सहारे हर गाँव में पाठशाला स्थापित करायी थी। वह सिलसिला उनके जीवन भर चलता ही रहा। इसी आधार पर अनेक हाईस्कूल, कालेज खुले और सफलतापूर्वक चले। राठ-हमीरपुर में भी स्वामी ब्रह्मानन्द जी ने अकेले ही अपने उस पिछड़े देहात में एक कालेज खड़ा किया। हम सभी को इस सामयिक शिक्षा चुनौती को स्वीकार करना चाहिए।
गृहस्थ होते हुये भी विरक्त कैसे रहा जा सकता है? बिना संतानोत्पादन के भी किस प्रकार पत्नी के सहयोग से आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण में निरत रहा जा सकता है? इस आदर्श को प्रत्यक्ष कर दिखाने वालों में रामकृष्ण परमहंस का जीवन एक प्रेरणाप्रद उदाहरण है।
उन्होंने सभी धर्मों का सार समझने के लिये उनके सिद्धान्तों और कर्म-काण्डों को समझने का प्रयत्न किया ताकि मतान्धता में उनकी मान्यताऐं एक पक्षीय हठवादी न रहें। सत्य तक पहुँचने के लिये वे समग्र चिन्तन के पक्षपाती थे। ईसाई, मुसलमान धर्मों का तथा तन्त्र-विज्ञान का भी उनने अवगाहन किया था। निराकारी वेदान्त दर्शन और साकारी प्रतीकोपासना की खाई उन्होंने पाटी और दार्शनिक दृष्टि से वेदान्ती और व्यवहारतः प्रतिमा पुजारी रहकर उन्होंने विग्रह को समन्वय में बदलकर दिखाया। दीन दुखियों की सेवा-सहायता में उनका अधिकांश समय बीतता था। चिकित्सा उपदेश तथा आशीर्वाद से उनने असंख्यों के कष्ट मिटाये।
परमहंस सिद्ध पुरुष माने जाते थे। उनने अपनी सिद्धियों का कभी प्रदर्शन नहीं किया। उन उपलब्धियों को वे लोक-मंगल में ही लगाते रहे। उनके प्रमुख शिष्यों में विवेकानन्द प्रसिद्ध हैं, जिनने अपना समूचा जीवन भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा से संसार भर को अवगत कराने में उत्सर्ग किया।
आत्मा शक्ति है और शरीर साधन। दोनों के सम्मिलित प्रयासों से दो पहिये की गाड़ी की तरह जीवन रथ चलता है। आत्मा की महत्ता कितनी ही बड़ी क्यों न हो, किन्तु वह शरीर साधन के बिना कुछ कर सकना तो दूर अपने अस्तित्व का परिचय तक नहीं दे पाती। दोनों के बिछुड़ते ही मरण सामने आ खड़ा होता है। संसार-क्रम में भी यही बात है। व्यक्ति की गरिमा और महिमा से इन्कार नहीं किया जा सकता। किन्तु यदि साधनों का अभाव हो, तो फिर दीन-हीन, दरिद्र, अनगढ़, पिछड़ेपन और अभावों के कारण स्थिति उपहासास्पद बनी रहती है। बिना अन्न, वस्त्र, आच्छादन के निर्वाह तक नहीं चलता। प्रगति का कोई भी पक्ष अपनाने के लिए साधन-सम्पदा अनिवार्य रूप से चाहिए। मात्र हाथ पैरों के श्रम से तो मनुष्य पेट भरने जितनी रोटी ही कमा सकता है। उद्योग, व्यवसाय जैसे तंत्र खड़े करने में, व्यापक विशालकाय अभियान चलाने में तो जन-शक्ति ही नहीं, साधन शक्ति भी चाहिए।
बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन में प्रधान भूमिका तो भिक्षु भिक्षुणियों की ही रही, पर उनके निर्वाह, निवास एवं यातायात-प्रचार आदि के लिए विपुल साधनों की आवश्यकता पड़ती रही, जिसे बिम्बसार, हर्षवर्धन, अशोक जैसे पुण्यात्माओं से लेकर अंगुलिमाल, अम्बपाली जैसे हेय समझे जाने वालों द्वारा समर्पित किये गये साधनों से पूरा किया जाता रहा। यदि यह सब न जुटा होता, तो भिक्षुओं-परिव्राजकों के लिए महान परिवर्तन की भूमिका निभा सकना तो दूर, जीवित रहने के लिए कन्द-मूल तलाश करने में ही अपना समय गुजारना पड़ता। देश, धर्म और समाज-संस्कृति की सेवा तो वे कर ही कैसे पाते?
राणा प्रताप साधनों के अभाव में एक बार नितान्त हताश हो गये थे। घास की रोटी भी जब बिलाव उठा ले गया, तो अबोध बालिका भूखी मरने लगी। प्रताप का पत्थर जैसा कलेजा मोम जैसा हो गया और वे बादशाह से संधि करके हथियार डाल देने और पराधीनता स्वीकार करने की बात सोचने लगे। बेचारे करते भी क्या? साथी सैनिकों को भी तो अन्न-वस्त्र चाहिए। शस्त्रों की निरन्तर रहने वाली आवश्यकता भी तो पूरी होनी चाहिए, अन्यथा योद्धा मात्र पत्थर फेंक कर तो दुर्दान्त शत्रु का सामना नहीं कर सकता। प्राण त्यागना अपने वश की बात है, वैसा तो चित्तौड़ की रानियों ने भी जौहर के रूप में कर डाला था। पर विजयश्री का वरण करने के लिए, अकेले भुजबल से भी काम नहीं चलता। साथ में सैनिक भी चाहिए। शस्त्र भी और राशन-वाहन भी। इसके बिना कर्त्तव्य निभाना भर हो सकता है, विजय प्राप्त करके दुँदुभी बजाना और जीत का उद्घोष करना संभव नहीं हो सकता। साधनों का भी अपनी जगह महत्व है। विशेषतया तब, जब शरीर सेवा से बढ़कर किसी बड़े अभियान का सरंजाम जुटाना हो तब।
प्रकृति अपनी परम्परा नहीं बदलती। वह हर अकर्मण्य पर रद्दी की मुहर लगाती और कूड़े के ढेर में पटकती जाती है।
प्रताप के सम्मुख प्रस्तुत जीवन-मरण की कठिनाई का हल उदारचेता भामाशाह ने किया। उनके पास व्यवसाय संग्रहित सम्पदा थी, जिस पर कुटुम्बी और रिश्तेदार दाँत लगाये हुए थे। उन सबकी मान्यता थी कि उत्तराधिकार में जो हिस्सा मिलेगा, उसी के सहारे-मौज की जिन्दगी कटेगी। जब उनने यह सुना कि भामाशाह राणा की सहायता के लिए अपनी सम्पदा समर्पित करने वाले हैं, तो वे सभी आग बबूला हो गये। गृह कलह चर्म सीमा तक पहुँच गया, किन्तु शाह ने अपने विवेक को इतने पर भी जीवित रखा। कर्त्तव्य भी पाला और आदर्श भी निभाया। उनके पास जो विपुल सम्पदा थी उस सबको समेट कर राणा के चरणों पर सत्प्रयोजनों के निमित्त अर्पित कर दिया। परिवार के किसी सदस्य से सलाह नहीं ली और न उनके विरोध की परवाह की। परिणाम स्पष्ट है। राणा की रगों में नया रक्त उछला। नई योजना बनी। नये सिरे से संग्राम शुरू हो गया और इतिहास के पृष्ठों में वह वीरता अमर हो गई। श्रेय तो वीरता को ही मिला, पर जो गहराई तक प्रवेश कर सकते हैं, वे उसके पीछे अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए भामाशाह के उदार साहस को जोड़े बिना नहीं रह सकते।
ऐसे उदाहरण एक नहीं अनेक हैं। नवयुग निर्माण के लिए प्रयत्नरत विश्वामित्र को राजा हरिश्चन्द्र ने अपना धन ही नहीं, परिवार और शरीर तक समर्पित कर दिया था। आद्य-शंकराचार्य जब देश के चार कोनों में चार मठ बनाने के लिए व्याकुल थे, तब साधनों का अभाव उनके सामने प्रमुख बाधा बनकर खड़ा था। मान्धाता ने अपनी सारी सम्पदा उसी प्रयोजन के लिए लगा देने की प्रतिज्ञा की और निभायी। यदि वे वैसा साहस न कर सके होते, कोई और वैसा उदार न मिला होता, तो देश के चार कोनों पर चार धाम देश की एकता और अखण्डता को साँस्कृतिक आधार पर सुदृढ़ एवं सुनिश्चित बनाने की योजना का कौन जाने क्या हुआ होता? इस संबंध में कौन क्या कह सकता है?
गान्धी जी ने स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व तो किया ही, साथ ही वे रचनात्मक कार्यों को सँभालने के लिए भी व्याकुल थे। खादी, चरखा, सर्वोदय, बुनियादी तालीम, कुटीर उद्योग, हरिजन उत्कर्ष, प्राकृतिक चिकित्सा आदि कितने ही कामों को हाथ में लिया हुआ था। साबरमती आश्रम, सेवाग्राम, पवनार, उरली काँचन आदि स्थानों में अपने-अपने ढंग की प्रवृत्तियाँ चलती थीं। इन सभी के लिए पैसे की आवश्यकता रहती थी। वह अन्य साधनों से भी जुटता था। पर आत्यन्तिक उत्तरदायित्व जमनालाल बजाज ने उठाया था। उनने अपने आप को गान्धी जी का चौथा पुत्र घोषित किया था। समर्थ बेटे की जिम्मेदारी है कि अपनी उचित आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार की भूमिका निभाए। श्री बजाज ने स्वेच्छा से यही उत्तरदायित्व वहन किया। वे पता लगाते रहते थे कि बापू की कोई प्रवृत्ति पैसे के अभाव में रुक तो नहीं रही है। अड़ी हुई आवश्यकता को वे अपने पास से-साथियों को दबाकर उतना साधन हर हालत में जुटा देते थे, जिससे बापू को अर्थ संकट के कारण अपनी योजनाओं में कटौती न करनी पड़े। जानने वाले जमनालाल बजाज को दूसरा भामाशाह कहते हैं।
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। वह भले-बुरे जिस भी रास्ते को अपनाता है, उसी के अनुरूप भाग्य बना लेता है।
स्वराज्य के दिनों में उठती उमंगों वाले युवकों को प्रशिक्षित करके स्वतंत्रता संग्राम को अंगद-हनुमान की तरह उठा ले जाने की आवश्यकता अनुभव की गई। राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओं का उत्पादन उस समय की महती आवश्यकता थी। इसके लिए पैसा चाहिए था। अँग्रेज सरकार के डर से सम्पन्न लोग भी ऐसे कामों में कुछ धन देने से अपने ऊपर आफत आने की आशंकाएँ करते थे। छात्र और उनके अभिभावक भी कुछ अधिक देने की स्थिति में नहीं थे। पैसे के बिना काम अड़ गया। इस व्यवधान को अकेले एक आदमी ने पूरा किया। उनका नाम था- महेन्द्र प्रताप। अलीगढ़ जिले के मुड़सान कस्बे में उनके पास लगभग सौ गाँवों की जागीरदारी थी। उनमें से एक गाँव अपने गुजारे के लिए रखकर शेष 99 गाँवों को उनके अपने नवजात पुत्र के नाम हस्ताँतरित कर दिया। वे निःसंतान थे। पुत्र की चर्चा चलती रहती थी। उनने अपने संकल्पित विद्यालय को ही “मानस पुत्र” माना और उसी दिन प्रेम महाविद्यालय को जन्म देते हुए अपनी सम्पदा उसके नाम हस्तान्तरित कर दी। प्रेम महाविद्यालय बनने और चलने में देर न लगी। देश के लिए उत्सर्ग होने वाले छात्रों के ठठ लग गये। उच्चस्तरीय अध्यापक खोजे गये। डॉ. सम्पूर्णानन्द, आचार्य जुगल किशोर, प्रो. कृष्णचन्द्र जैसे देश के मूर्धन्य समझे जाने वाले नेता प्रविष्ट छात्रों को स्वयं पढ़ाते थे। फलतः पूरा विद्यालय स्वतंत्रता सैनिकों की छावनी बन गया। आन्दोलन आरम्भ होते ही सरकार ने उसे जब्त कर लिया। विद्यार्थी और अध्यापक अपनी गतिविधियों से इस प्रकार आन्दोलन चलाते रहे कि उस जमाने में उत्तर प्रदेश सत्याग्रही सैनिकों की खदान माना जाने लगा। विचारणीय यह है कि राजा महेन्द्र प्रताप की वह विपुल सम्पदा यदि आड़े समय में राष्ट्र के काम न आई होती, तो आन्दोलन में जो चार चाँद लगे, उसमें निश्चित रूप से कमी रह जाती। जमींदारी देते समय उनके परिवार वाले सहमत रहे हों या मित्रों ने उसे बुद्धिमत्तापूर्ण कदम बताया हो, ऐसी बात नहीं है। सभी कहते थे कि पहले अपने मौज-मजे का प्रबंध करना चाहिए और दान के नाम पर इतना थोड़ा-सा देना चाहिए, जिससे अखबारों में फोटो छपने लगे और चापलूस चमचे, चारणों की तरह कीर्ति ध्वजा फहराने और जय-जयकार करने की कीमत प्राप्त कर सकें। यह सब अपने स्थान पर होता रहा और महेन्द्र प्रताप का संकल्प अपने स्थान पर फलित होता रहा।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर उन दिनों 500 रुपए के लगभग वेतन पाते थे। पर उनने अपने परिवार के खर्च के लिए 50 रुपए की राशि ही निश्चित की थी। उतने में ही गुजारा चला लेते थे और शेष बचा हुआ पैसा उन निर्धन विद्यार्थियों की शिक्षा-व्यवस्था में काम आता था, जो पढ़ाई के आवश्यक साधन अपने घरों से प्राप्त नहीं कर सकते थे। ऐसे छात्रों के लिए विद्यासागर ही अभिभावक की भूमिका निभाते थे।
पोलैण्ड की शान्ति के लिए नोबुल पुरस्कार विजेता एक श्रमिक नेता लेक वालेसा ने अपने को मिली राशि में से एक पाई को भी अपने लिए नहीं छुआ, वरन् वह सारा धन श्रमिक आन्दोलन को गतिशील बनाने के लिए हाथों हाथ हस्तान्तरित कर दिया।
ठीक इस प्रकार एक नोबुल पुरस्कार विजेता उच्च शिक्षित पादरी अलबर्ट श्वाइत्जर ने अपने को अफ्रीका के कोढ़ियों के लिए समर्पित किया। यह छूत उन्हें भी लग गई थी, तो भी वे मरते दिन तक उस व्रतशीलता को निबाहते रहे। उन्हें भी नोबुल पुरस्कार मिला था। उस लाखों की रकम को उनने कोढ़ी परित्राण के लिए ही दान कर दिया। शरीर और मन तो वे पहले ही दे चुके थे।
अल्फ्रेड नोबुल स्वयं एक बड़े व्यापारी थे। युद्ध के दिनों उनका व्यापार खूब चमका और करोड़ों डालर उनके पास इकट्ठे हो गये। ओछे मनुष्य, विलास संग्रह, ठाटबाट, प्रशंसा आदि के लिए खर्च करते हैं और जो बचता है, उसे कानूनी उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ जाते हैं। आम प्रचलन यही है। पर लकीर से हटकर नोबुल ने दूसरी तरह सोचा। अपनी सारी सम्पदा बैंक में जमा कर दी और ट्रस्ट बना दिया ताकि उसकी ब्याज से विश्व में उदाहरण प्रस्तुत करने वाले विभिन्न फैकल्टीज के मूर्धन्य जनों को पुरस्कार में वह ब्याज की राशि प्रति वर्ष दी जाया करे। हर वर्ष दर्जनों लोगों को उसी राशि में से लाखों के पुरस्कार मिलते हैं और बढ़-चढ़कर काम करने के लिए अगणित-जन प्रोत्साहित होते हैं। नोबुल को भी अन्य धनाढ्यों की तरह दुर्बुद्धि ही घेरे रहती, तो उनका धन गंदी नालियों में होकर बहता और जहाँ कहीं भी पहुँचता, वहीं अनर्थ करता।
अमेरिका के एक करोड़पति पैसे को इतना प्यार करते थे कि उनने शादी तक नहीं की कि स्त्री-बच्चों पर खर्च करना पड़ेगा। उनसे कोई मिलने आता था तो सिर्फ एक बत्ती कमरे में जलने देते थे, ताकि अधिक बिजली जलने से पैसे की हानि न हो।
एक चिकित्सक कन्फ्यूशियस के पास पहुँचा और बोला- “मुझे अनेक रोगों ने घेर रखा है। अपना और दूसरों का इलाज करते-करते थक गया। कोई ऐसा उपाय बतायें जिससे निरोग हो सकूँ।”
कन्फ्यूशियस ने कहा- रोगों की जड़ मन में है। अपने चिन्तन में शालीनता और व्यवहार में उदारता बढ़ाओ। जड़ कटने पर शरीर में बीमारियों की पौदें सहज ही सूख जायेंगी।
सज्जनता और निरोगता दोनों अन्योन्याश्रित हैं।
उस देश में एक प्रशिक्षकों का विश्वविद्यालय बन रहा था। उसके लिए चंदा इकट्ठा किया जा रहा था। धन कमेटी ने अनुत्साह पूर्वक उस कृपण के यहाँ चलने का भी निश्चय किया। घुसते ही एक को छोड़कर सब बत्तियाँ बुझ गईं, तो उनने समझ लिया कि इस कृपण के यहाँ से कुछ मिलना-जाना नहीं है। संकोच पूर्वक समिति ने पाँच हजार डालर की प्रार्थना की। चूँकि योजना धनाढ्य के मन की थी और वह उसी निमित्त एक-एक कौड़ी करके धन जमा करता रहा था, ऐसी यूनिवर्सिटी खुलने की उसे हार्दिक प्रसन्नता हुई। उसने पाँच हजार के स्थान पर पचास हजार डालर का चैक दिया। जब समिति आश्चर्य व्यक्त करने लगी, तो उसने कहा- “चूँकि काम मेरे मन का है, इसलिए मैं अपनी पचास करोड़ डालर की पूरी सम्पदा दूँगा, पर पच्चीस पच्चीस लाख की किश्तों में, ताकि यह देखता चलूँ कि काम उसी स्तर का उसी प्रकार हो रहा है या नहीं, जैसा कि मैं चाहता हूँ।” अन्ततः उसकी सारी पूँजी उस विश्वविद्यालय में ही लगी।
यह सम्पन्न लोगों की एकाकी साहसिकता के उदाहरण हैं, पर यह आवश्यक नहीं कि अधिक लोग ऐसी स्थिति में हों और ऐसा बड़ा साहस कर सकें, किन्तु जिसकी जितनी क्षमता और उदार साहसिकता है, वह उस अनुपात में कुछ तो दे ही सकता है, उन कामों के लिए जिनकी परिणति असंदिग्ध हो, जिनसे वस्तुतः लोक कल्याण सधता हो।
ऐसे उदाहरणों में मथुरा जिले की एक बाल विधवा का प्रसंग है, जो दिन भर आटा पीसती और दो आने रोज कमाती थी। उसने सोचा कि कमाई में पुण्य का भी एक अंश होना चाहिए, वह दो पैसे रोज बचाती रही। बूढ़ी हुई तब उसने एक पक्का कुँआ बनवा दिया। उसका पानी असाधारण रूप से मीठा, ठंडा और गुणकारी निकला। पिसनहारी का कुँआ अब भी विद्यमान है और उससे लाभ उठाने वाले निर्माणकर्ता की उदारता को भूरि-भूरि सराहा करते हैं।
भगवान बुद्ध ने एक विशाल संघाराम निर्माण के लिए धनिकों की गोष्ठी बुलाई। सभी ने उदारतापूर्वक दान दिया। पीछे यह पूछा गया कि सबसे बड़ी राशि कितनी थी, तो एक घसियारे के पचास पैसे की घोषणा की गई। यह उसकी शत-प्रतिशत पूँजी थी और उसे दे चुकने के बाद उस दिन उसे भूखा सोना पड़ा था। पुण्य, धन की मात्रा पर निर्भर नहीं, वरन् इस तथ्य पर अवलम्बित है कि किसने अपने साधनों का कितना बड़ा अंश पुण्य कार्य के निमित्त भावपूर्वक समर्पित किया।
महाभारत के बाद पाँडवों का विशाल राजसूय यज्ञ सानन्द पूर्ण हो गया तो एक दिन उस यज्ञ की कीच में लोटने वाला नेवला निराश होकर रोते हुये देखा गया। लोगों ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि एक यज्ञ की कीच में लोटने से मेरा आधा शरीर सोने का हो गया था। उठा तब तक कीच सूख गई, इसलिये शरीर का दूसरा भाग सुनहरा न हो सका। मैं इस तलाश में कि और कोई बड़ा यज्ञ हो तो उसकी कीच में लोटकर शेष शरीर को भी सुनहरा करूं। इसी आशा से इस बहुविख्यात यज्ञ की कीच में लोटने बहुत दूर की कष्ट साध्य यात्रा करता हुआ, मैं आया था। पर यहाँ कुछ भी फल न मिलने से मैं दुःखी हो रहा हूँ।
लोगों ने पूछा इस अत्यन्त विशाल यज्ञ से भी बड़ा यज्ञ और कौन सा हुआ था? उसका विवरण बताओ। तब नेवले ने कहा एक बार बड़ा दुर्भिक्ष पड़ा। अन्न दुर्लभ हो गया। एक भिक्षाजीवी ब्राह्मण को सात दिन के बाद चार रोटी का अन्न मिला। ब्राह्मण, उसकी स्त्री, लड़का तथा लड़की चारों के लिये एक-एक रोटी बनी। पर पहले अपने से भी अधिक जरूरतमंद को देकर तब खाना यह धर्म मर्यादा है। इसलिये ब्राह्मण ने छप पर चढ़कर पुकारा कि हमसे अधिक भूखों का इस भोजन में हिस्सा है, कोई वैसा हो तो आवे, भोजन करे। इतने में एक चांडाल जो कंठगत प्राण हो रहा था, आया और उसने अपनी आवश्यकता बताई। ब्राह्मण ने अपनी रोटी दी पर उससे उसकी तृप्ति न हुई। तब ब्राह्मणी, पुत्र तथा कन्या ने भी क्रमशः उसे अपनी रोटियाँ दे दीं। उन्हें खाकर पानी पीने के पश्चात् उस चाँडाल ने जिस जमीन पर कुल्ला किया उस गीली जमीन में, मैं कुछ देर पड़ा रहा था। उठा तो अपना गीला आधा शरीर सुनहरा देखा। इसका कारण मालूम करने पर पता चला कि ब्राह्मण का चार रोटी देना एक विशाल यज्ञ के समान पुण्य कार्य था।
अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं की परवाह न करके भी जो दूसरों का उपकार करते हैं उनकी भावना के अनुरूप ही पुण्य भी महान होता है, कार्य चाहे छोटा ही क्यों न हो।
नेतृत्व आत्मश्लाघा के लिए- लोक कल्याण के लिए- प्रयुक्त करना हो तो उसके लिए भारी भरकम व्यक्तित्व चाहिए। भारी भरकम से मतलब यहाँ मोटे, रौबीले होने से नहीं वरन् इससे है कि उसके प्रति जनसाधारण में प्रामाणिकता एवं श्रद्धा कितनी गहरी है, यही वह मौलिकता है जिसके सहारे इस योग्य बना जाता है कि जो सुने, वह मिलने, भेंटने, देखने के लिए चला आवे और लौटे तब सहयोगी बन कर जाय। यह स्थिति एक ही प्रकार आ सकती है कि अपने को प्रामाणिक एवं उदार कर्मठ हर कसौटी पर कस कर सिद्ध कर दिया गया हो।
सस्ता तरीका गाल बजाने का है। कुछ थोड़ी-सी बातें रट ली जांय और उन्हीं को अभिनयपूर्वक दुहराया जाता रहे। कुछ गायकों के कंठ में मिठास और वक्ताओं की जीभ में रस होता है। उस सम्मोहन के सहारे वे मजमे लगाते और बाजीगरों जैसे कौतुक कौतूहल दिखाते रहते हैं। पर यह नट विदूषकों जैसा प्रहसन है, इससे कानों को रस मिलता है और उस विडम्बना को कौतूहल की तरह मंत्रमुग्ध होकर सुना जाता है। प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को यह समझ लेना चाहिए कि अपना लक्ष्य प्रयोजन तथा क्षेत्र इतना गम्भीर और महत्वपूर्ण है कि उसके लिए वाचालता का श्रृंगार देर तक अपना आकर्षण नहीं बनाये रह सकता। ढोल की पोल एक नुकीली लकड़ी चुभाते ही खुल कर उजागर हो जाती है। बड़े बोल बोलने और बौना व्यक्तित्व लिए फिरने से अन्ततः उपहास के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
व्यक्तिगत परामर्श और समाधान करने– घर-घर अलख जगाने और जन्म दिन, पर्व संस्कार, नवरात्रि आयोजन आदि के अवसर पर वक्ताओं की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए उस संदर्भ में भी प्रवीणता प्राप्त कर ली जाय तो अच्छा है। इस कौशल का अभ्यास प्रज्ञा प्रशिक्षण सत्रों में करा भी दिया जाता है। पर यह भली भाँति समझ लेना चाहिए कि यह स्वस्थ बलिष्ठता नहीं, शृंगार सज्जा भर है। मात्र इतने के ही सहारे प्रगति पथ पर दूर तक द्रुतगति से नहीं बढ़ाया जा सकता। ठोस आधार वह है जो खरे सोने का होता है। प्रामाणिकता और उदार साहसिकता की अग्नि परीक्षा में से उन सभी को गुजरना पड़ेगा जो अपने प्राणवान नेतृत्व के सहारे जन मानस को सुधारना, उभारना एवं उछालना चाहते हैं।
इसके लिए आवश्यक नहीं कि मनुष्य के पास पहले से ही विद्या का भंडार, सहयोगियों का समर्थन एवं सेवा प्रयोजन के लिए कार्यक्षेत्र बना हुआ तैयार हो। व्यक्ति यदि खरा है तो उसकी निजी प्रतिभा इतनी समर्थ होती है कि वह अन्तःकरण से अन्तःकरण में प्रवेश कर सके और उपेक्षा बरतने वालों को भी कदम से कदम मिलाकर चलने और सहयोगी के रूप में विकसित होने के लिए तत्परता दिखा सके। यही तो मिशन को- मिशन के अंग अवयवों को चाहिए।
क्रोध आवे तो उसे जल्दी विदा कर दो रात भर अपने साथ मत सोने दो।
जो विवेक का अपहरण करले, वह क्रोध नहीं पागलपन है।
भाग्य एक कोरा कागज है, उस पर जो चाहो सो लिख सकते हो।
ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जिनमें मनस्वी लोगों ने अपना श्रम समय नियोजित करके अपनी निजी योग्यता भी बढ़ाई और सेवा इस स्तर की कि जिसका उत्कर्ष आश्चर्यजनक रीति से होता रहा।
स्वामी विवेकानंद जब विदेश यात्रा पर गये तो किराये भर का प्रबंध किसी प्रकार एक छोटे से (खेतड़ी) राज्य के नरेश ने कर दिया था। पर उनकी लगन इतनी गहरी थी कि हर किसी पर वे अपना प्रभाव छोड़ते चले गये। विश्व के मूर्धन्य बुद्धिजीवियों को उनने प्रभावित किया। भारत वासियों ने उन्हें संस्कृति का विश्व रत्न माना। अनेक देशों में उनने धन साध्य रामकृष्ण मिशन खड़े किये। वेल्लूर (दक्षिणेश्वर) में संगमरमर का रामकृष्ण मठ बनवाया। इसके लिए कितने साधनों की, कितने सहयोगियों की आवश्यकता पड़ी होगी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
अमेरिका के तीन राष्ट्रपतियों के नाम ऐसी गणना में आते हैं जिनके घर परिवार की स्थिति दयनीय थी। वे पोषण और निर्वाह का आवश्यक खर्च जुटाने की स्थिति में नहीं थे। गरीबों के सहयोगी भी माँगने वाले होते हैं देने वाले नहीं। उनका सहायक उनका निजी चरित्र और प्रयास भर था जिनके कारण वे जनता के हृदय सम्राट बने और राष्ट्रपति की उच्च पदवी तक जा पहुँचने में सफल हुये। अब्राहम लिंकन चुनावों में बार-बार हारते रहे। पर उन्हें विश्वास था कि आज नहीं तो कल वे वह कर या करा सकेंगे जो चाहते हैं। लिंकन वकील थे पर उनने झूठा मुकदमा एक भी नहीं लड़ा। मुवक्किलों के प्रति उनकी पूरी सहानुभूति थी। इसलिए कोट के पीछे जेब लगा रखी थी कि परिश्रम उनकी योग्यता या मेहनत को देखते हुये नहीं वरन् अपनी सामर्थ्य जितना ही चुकायें और जेब में डालकर चले जायं। इससे यह प्रतिफल होता था कि लिंकन को यह पता तक नहीं चल पाता था कि उन्हें किसने क्या दिया। किसी प्रकार रोटी मिल जाती थी, इतना ही बहुत था। वे पूरी सचाई और मेहनत से काम करते, साथ ही अपनी योग्यता भी बढ़ाते रहते। इसका ही प्रतिफल था कि प्रत्येक न्यायाधीश उनका सम्मान करता था और उन्हें एक वकील की तरह नहीं, प्रत्यक्षदर्शी गवाह की तरह मानता, अनुभव करता था। यही कारण है कि उनके हाथ में गये मुकदमे प्रायः सभी जीते जाते थे। ऐसी ही अपने-अपने ढंग की विशेषतायें गारफील्ड और वाशिंगटन में थीं। उनने अपना अध्ययन माँगी हुई पुस्तकों से पूरा किया था। बचपन में वे मजदूरों जैसा श्रम करते थे और अपने गुजारे की व्यवस्था अपनी निज की कमाई मजदूरी के सहारे पूरी करते थे। इस गरीबी से उनका मान घटा नहीं वरन् बढ़ता ही चला गया और अन्त में वे बेताज के बादशाह बने।
स्वामी श्रद्धानंद ने अपना घर बेचकर झोंपड़े बनाये थे। उन्हीं का नाम गुरुकुल काँगड़ी रखा। दस विद्यार्थी वे कहीं से ढूँढ़ कर लाये। उन्हें पढ़ाने का ही नहीं, रोटी बनाने खिलाने तक का काम वे स्वयं करते थे। इसका प्रतिफल यह हुआ कि वे छात्रों के अध्यापक ही नहीं अभिभावक और मार्ग दर्शक भी बन गये। गुरुकुल काँगड़ी से आरंभिक दिनों में जो छात्र निकलते थे उनने अपनी छवि से अगणित लोगों को प्रभावित किया था और जनसाधारण के मन में इतनी श्रद्धा उत्पन्न की थी कि वह संस्था आज विशाल विश्वविद्यालय के स्तर तक पहुँच चुकी है।
वास्तविक उल्लास मन को संतुष्ट रखने पर मिलता है। इसलिये उन बातों से बचो जो असंतोष भड़काती हैं।
सुसंस्कारिता की परीक्षा तब होती है जब झगड़े के अवसर पर किस प्रकार सोचा और किस तरह व्यवहार किया गया, इस पर विचार किया जाये।
हरिद्वार में ही गुरुकुल काँगड़ी के समीप ही एक दूसरी संस्था है ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम। उसका आरम्भ साधन सम्पन्नता के साथ हुआ था, पर पीछे उन प्रयोजनों का कहीं अता पता भी नहीं रहा। इस भव्य इमारत के ध्वंसावशेष में से जो हिस्सा साबुत बच गया है उसमें कुछ सरकारी संस्थायें चलती हैं। संस्थापकों की योजना और इच्छा का वहाँ कहीं दर्शन भी नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि साधन कितने ही विपुल क्यों न हों पर यदि संस्था के संचालकों में उत्कृष्टता का अभाव है तो उससे उनके संचालकों की गरिमा में कमी न हो तो भी उसका पतन पराभव तो निश्चित है ही।
यदि पास में धन नहीं है या पूर्व संचित कोई बड़ी प्रतिष्ठा साथ में नहीं है तो इतने भर से किसी को उदास या निराश होने की आवश्यकता नहीं है। व्यक्ति का श्रम, समय एवं मन जब एकजुट होकर उसे उस सीमा तक पहुँचा देते हैं जिसे आश्चर्यचकित होकर देखना पड़े।
बाबा साहब आमटे महाराष्ट्र की एक कोर्ट में वकील थे पर उनकी अन्तरात्मा में एक उत्क्रान्ति हुई। सड़क पर पड़े भीख माँगते दुर्दशाग्रस्त कोढ़ियों को देखा। मन उबला कि क्यों न इस सुविस्तृत समुदाय को वापस मानवी गरिमा के अनुरूप जीवनयापन का अवसर दिलाया जाय। यह कार्य अनायास या स्वमेव नहीं हो सकता था। इसके लिए ऐसा नेता चाहिए जो कार्य में अपना शरीर और मन भी खपा दे। मात्र लेक्चर झाड़ने या लेख लिखने की विडम्बना ही न रचता रहे। नजर दौड़ाई तो ऐसा व्यक्ति एक ही दीखा-अपना आपा।
उनने कचहरी जाती साइकिल वापस लौटा ली। कोढ़ियों से बात की और उन्हें इसके लिए रजामंद किया कि वे अपनी मेहनत की कमाई से पेट भरेंगे और चिकित्सा के नियमों का पालन करते हुये रोग से छुटकारा पाने की भी पूरी चेष्टा करेंगे।
बाबा साहब आमटे ने वकालत छोड़ दी। वे कोढ़ियों के अतिरिक्त अपने आश्रितों को भी लेकर चन्द्रपुर (महाराष्ट्र) के समीप देहात में चले गये। वहाँ श्रमपूर्वक झोंपड़े बनाये। पशुपालन का धंधा शुरू किया, साथ ही कुष्ठ चिकित्सा का सरंजाम भी बिठाया। यह छोटा सा शुभारंभ क्रमशः आगे बढ़ता चला गया। सैकड़ों की संख्या में कोढ़ी और दूसरे प्रकार के अपंग आने शुरू हो गये। आवश्यकता ने नये आविष्कार किये। साथी और सहयोगी मिले। उनके अपने ही घर में बेटे, पुत्र-वधू व अन्य साथियों के रूप में। सफलता ने भरपूर वरदान दिये। इन दिनों वह स्थान अपंग सेवा कर्मियों का एक समर्थ विश्वविद्यालय है। इसमें चिकित्सा के लिए- स्वावलम्बन के शिक्षण के लिए भी आने वालों की संख्या बढ़ती ही रहती है। साधनों की कमी नहीं पड़ी। पिछले दिनों “भारत जोड़ो” अभियान जब उन्होंने चलाया तो अनेक युवा साथी इस चिरयुवा वृद्ध के साथ साइकिलों से भारत की यात्रा पर चले। यह जन सहयोग एवं सम्मान बताता है कि साधन एवं सहयोगी श्रद्धास्पदों के लिए सदा सुरक्षित रहे हैं और रहेंगे भी।
उदाहरणों की शृंखला में एक कड़ी और जुड़ती है- महामना मालवीय जी की। वे आरंभिक दिनों में एक छोटे वकील थे। कालाकाँकर नरेश का अखबार निकालने के लिए उनने नौकरी भी की। गुजारे भर की महत्वाकाँक्षा रही होती तो गाड़ी ऐसे भी चलती रह सकती थी, पर उनकी उमंग तो जनहित के लिए कोई ठोस काम करने के लिए प्रेरित कर रही थी। उनने योजना बनाई हिन्दू विश्व विद्यालय की स्थापना की पिछड़ेपन से लदी हिन्दू जाति को गतिशीलता अपनाने हेतु समर्थ बनाने की। आरम्भ जमीन से होता था सो योजना की उत्कृष्टता सुनकर काशी नरेश ने वह प्रबंध कर दिया। इमारत में करोड़ों व्यय होने थे। वे भिक्षा की झोली लेकर निकल पड़े। उन पर सहयोग बरसा और काम द्रुतगति से पूरा होने लगा। दुत्कारे जाते हैं अशिष्ट, अप्रामाणिक, बेतुके और चोर। मालवीय जी ऐसे नहीं थे फिर उन्हें सहयोग से वंचित क्यों रहना पड़ता। भव्य इमारत बनी। इसके बाद देश के मूर्धन्य स्तर के अध्यापक ढूंढ़े और नियुक्त किये जाने लगे। उस कार्य में भी बाधा न पड़ी। विद्यार्थियों की देश विदेश से इतनी बड़ी संख्या दौड़ी कि उन्हें संभालना कठिन हो गया। महानता की ख्याति और प्रतिष्ठा ने उन्हें शासन में काँग्रेस में ऊँचे पद प्रदान किये। अंग्रेजी सरकार “सर” की, विश्वविद्यालय ‘डाक्टर की’ विद्वत् सभाएँ पंडित शिरोमणि की पदवियाँ स्वीकार करने का आग्रह करती रहीं। पर उनने सब को नकारते हुये इतना ही कहा कि पंडित की जो पदवी अनायास ही मिल गई है, उसका दायित्व निभाने के लिए ही मुझे अभी बहुत कुछ करना है। फिर अन्य पदवियों का भार वहन किस प्रकार संभव हो सकेगा। समय, श्रम और मन साथ में लेकर महर्षि कर्वे महिला उत्कर्ष के लिए समर्पित हुये और उन्होंने महाराष्ट्र के लिए ही नहीं सारे भारत के लिए महिला जागरण और उत्थान का नया द्वार खोला। उनने अपने उपार्जन की ब्याज से बच्चों को पढ़ाया और मूलधन विनिर्मित मिशन के लिए समर्पित कर दिया। अपने आप से अपनाया गया श्रद्धासिक्त उदार साहस सदा फलता फूलता रहा है। कर्वे साधारण गृहस्थ थे, पर उनकी सेवा चेतना ने उन्हें “महर्षि” की पदवी प्रदान की। उनकी शताब्दी मनी और डाक टिकट प्रकाशित हुई।
क्रोधी तुम्हारे विवेक की परीक्षा लेता है, और क्रोध यह पूँछता है कि तुम तर्क और प्रेम से उसका सामना कर सकते हो या नहीं?
सच बोलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह याद नहीं रखना पड़ता कि तुमने कहाँ, कब, किससे क्या कहा था?
तपस्वी चाणक्य को कौन भूलेगा? वे स्वनिर्मित एकाकी कुटिया में रहते थे और न्यूनतम में निर्वाह करते थे। पर उनका व्यक्तित्व ही था जिसने एक से एक बड़े काम उन्हें सौंपे और पूरे कराये। वे उस बड़े साम्राज्य के प्रधान मंत्री थे। साथ ही तक्षशिला विश्व विद्यालय के सूत्र संचालक भी। उसके निमित्त भव्य भवन बने। दस हजार छात्रों की शिक्षा तथा निर्वाह व्यवस्था का साधन जुटा। योग्यतम अध्यापक दूर देशों से चलकर वहाँ समर्पित भाव से आ बसे। एक महान शक्ति के तत्वावधान में बने नालंदा व तक्षशिला विश्वविद्यालय उनके जीवन भर भारतीय संस्कृति की गरिमा को गगनचुम्बी बनाते रहे। न साधनों की कमी पड़ी, न सहयोग की। उन्हें इतना सम्मान प्राप्त था जिसके लिए बड़े-बड़े राजा भी तरसते रह सकते हैं। इस महान व्यक्ति के पास निज की पूँजी के रूप में उनका शरीर और मन ही था, जिसे उनने उच्च लक्ष्य के लिए- बिना आगा पीछा सोचे, बिना मन डुलाये पूरी तरह समर्पित कर दिया।
सम्राट अशोक के पास जब तक धन रहा तब तक वे बुद्ध मिशन के लिए मुक्तहस्त से देते रहे। अनेक समर्थ शिक्षण संस्थाएँ उनने बौद्ध प्रचारकों के लिए खड़ी कीं। अनेक शानदार स्मारक बनाये। स्वयं संन्यासी के रूप में धर्म प्रचार करते रहे। जब पूँजी चुक गई तब उनके पास दो बालक और बच रहे थे। बेटा महेन्द्र और बेटी संघ मित्रा। उन दोनों को भी उन्होंने परिव्राजक बनाया और सुदूर देशों में धर्म प्रचार के लिए भेज दिया। इससे पूर्व उनके मार्ग दर्शक भगवान बुद्ध ने भी तो अपने पुत्र राहुल को राजपाट करने से विरक्ति दिला कर बौद्धिक क्रान्ति के लिए लगा दिया था। इसी सब का प्रतिफल था कि साम्राज्य परिसर के सहस्रों युवक और युवतियाँ प्रव्रज्या लेकर देश देशान्तरों में परिभ्रमण के लिए चले गये।
बीज अपने खेत में बोया गया और उसकी जो फसल उगी उसने फिर से उगकर समूचे क्षेत्र को शस्य सम्पदा से भर दिया। परिस्थितियाँ किसी के अनुकूल नहीं होतीं जो उन्हें प्रतिकूल न रहने देकर अनुकूल बनाने में अपना तन, मन लगाता है और अनेक दिशाओं से साधनों और सहयोग की वर्षा होती दीखती है। आवश्यकता मात्र अवसर का लाभ उठाने एवं मानव जीवन की गरिमा समझने भर की है। महामानवों के जीवन के ये उदाहरण प्रत्यक्ष साक्षी हैं इस तथ्य के कि गलने वाला बीज कभी घाटे में नहीं रहता। प्रतिकूलताओं के बीच जलता एक दीपक भी अन्य अनेक दीपकों को प्रकाश ऊर्जा से ज्वलनशील बना दीपमालिका का उत्सव सजा देता है। यह धरती अभी बाँझ नहीं हुई है। साँस्कृतिक गरिमा से अनुप्राणित यह देवभूमि भारतवर्ष अभी अनेक महामानवों का सृजन करेगी, जो नवयुग की संभावना को साकार कर दिखाएंगे।
हजरत मूसा उस दिन घने जंगल से होकर गुजर रहे थे कि सामने से एक भयानक सर्प फुसकारता हुआ आ गया।
मूसा घबरा गये। घिग्गी बँध गई। न बढ़ते बन पड़ा न हटते। मौत उन्हें सामने खड़ी दीखने लगी।
आसमान से आवाज आई “मुसीबत देखकर डरो मत। हिम्मत करो और जो हाथ में है उसी के सहारे लड़ पड़ो”।
नया प्रकाश मिला। मूसा सर्प से गुथ गये और उसका थूथन पकड़ लिया।” छोड़ूंगा नहीं, तोड़ कर रख दूँगा।”
सर्प सहम गया, और उसने एक सोने का डंडा मूसा के हाथ उपहार की तरह थमा दिया। साथ ही कहा- “जो हिम्मत करते हैं उन्हें मुसीबत से ही छुटकारा नहीं मिलता, उपहार भी हाथ लगता है।”
संसार का सबसे बड़ा नेता है- सूर्य। वह आजीवन व्रतशील तपस्वी की तरह निरन्तर नियमित रूप से अपने कार्य में संलग्न रहता है। नव ग्रह उसी से गति और पोषण प्राप्त करते हैं। चन्द्रमा उसी की चमक से चमकता है। प्राणियों की आँखें उसी के प्रकाश से देख सकने की क्षमता उपलब्ध करती हैं। बादल वही बनाता है। वर्षा उसी के कारण होती है। पौधों के उगने उगाने से लेकर फूलने और फलने तक की व्यवस्था उसी के कारण बनती है। पदार्थों को गति और प्राणियों को जीवन वही प्रदान करता है। दिन ही क्रिया है। रात आते ही निष्क्रियता छा जाती है। इसलिए उसे सूर्य भगवान भी कहते हैं और सविता देवता भी।
क्षुद्रजनों से पूछा जाय कि इसके बदले वह कितना पैसा कमाता है, कितना विलास बटोरता है?, तो उन बेचारों से जवाब देते न बन पड़े, क्योंकि उनने जो सदा सीखा, जाना और माना है। उसमें वैभव और विलास इन दो के अतिरिक्त तीसरा कोई तथ्य संसार में है नहीं। आदर्शों की, सेवा-उदारता की पाठशाला उनने पढ़ी ही नहीं, इसलिए वे यह भी नहीं जानते कि आत्म संतोष और गौरव किसे कहते हैं? श्रद्धा, प्रतिष्ठा भी उनके अनुभव में कभी आई नहीं होती। महानता से कभी पाला नहीं पड़ा। ऐसी दशा में वे सूर्य को मूर्ख बतायें तो आश्चर्य की कोई बात नहीं। इनके हिसाब से संसार का हर सेवाभावी जिसे दूसरे शब्दों में नेता कहना चाहिए, कोई लाभदायक प्रयोजन नहीं पूरा करता। बुद्धिमान केवल वे हैं जिन्हें स्वार्थी, विलासी, चार-चालाक, कुचक्री एवं दंभी कहा जाता है।
नेतृत्व ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है, क्योंकि वह प्रामाणिकता, उदारता, और साहसिकता के बदले खरीदा जाता है। इन्हीं को पूजा उपकरण अथवा योगाभ्यास-तप साधन कहा जा सकता है। भक्ति वही है। स्वर्ग और मुक्ति इसी परिधि के ईद-गिर्द चक्कर काटते हैं। यह कितना मूल्यवान अनुदान है, इसका मूल्यांकन हजार कुबेर मिलकर भी नहीं कर सकते। जिन्हें सच्चे अर्थों में नेता बनने का अवसर मिला, समझना चाहिए कि चक्रवर्ती शासन और जगद्गुरु स्तर का ज्ञान, दिग्गजों जैसा कार्य उस पर निछावर हो सकता है, पर उस भीलनी को क्या कहा जाय जो रास्ते में पड़े रत्न को चमकीला पत्थर बताती है और भेड़ के गले में उपेक्षापूर्वक बाँधती है। जौहरी जानते हैं कि नेतृत्व का अलंकार, कोहनूर हीरे की तुलना में कोटि गुना अधिक मूल्यवान है। जिसे वह हस्तगत हुआ, समझना चाहिए कि कृतकृत्य हो गया।
शाहजहाँ को उसके बेटे ने कैद कर लिया। समय काटने के लिए कुछ काम करने की इच्छा पूछी गई तो उसने बच्चों को पढ़ाने का काम माँगा। उसमें नेतृत्व की क्षमता भी थी, अध्ययन सम्पदा भी। पुण्य के साथ-साथ निज प्रतिभा को अक्षुण्ण बनाये रखने का सुयोग भी। कैदी को उसका इच्छित कार्य दे दिया गया। वह इतने भर से संतुष्ट हो गया। जिन्हें अनगढ़ जन समुदाय को मानवी गरिमा के अनुरूप ढलने और ढालने का सुयोग मिलता है, उन्हें भाग्यशाली ही कहा जा सकता है, भले ही इसके बदले उन्हें नोटों का बण्डल या विलास वैभव का अम्बार न मिलता हो।
नेतृत्व इसलिए आवश्यक है कि उसमें अनेक को साथ लेकर उन सब के सहयोग से महानतम कार्य कर गुजरने का अवसर मिलता है। सदाचारी-ब्रह्मचारी तो अपना ही भला करता है। दानी, पुण्यात्मा गरीबों की दुआएँ लेते हैं। पर सामूहिक प्रयास से कोई बड़ा काम हो सके यह प्रक्रिया अनेक को, आदर्शवादी-श्रमशीलों को संगठित किये बिना नहीं बन पड़ती। अकेला चना भाड़ कहाँ फोड़ता है? अकेले दूल्हे की बरात कहाँ सजती है? संसार के अधिकाँश महत्वपूर्ण कार्य मिल-जुलकर ही संभव हुए हैं। इस एकत्रीकरण के लिए विश्वस्त और खरा परखा नेतृत्व चाहिए। मधुमक्खियाँ मिल जुलकर ही छत्ता बनाती और मधु संचय करती हैं। अकेली मक्खी चाहे कितनी ही श्रमशील क्यों न हो तितली की तरह यहाँ-वहाँ उड़ती और ध्यान बँटाने में ही समर्थ होती है।
चीन की प्राचीन प्रख्यात दीवार के सहारे अभी कुछ ही समय पूर्व दस मील चौड़ी और 1500 मील लम्बी सघन वृक्षों की दीवार खड़ी की गई है। इस दूरदर्शी कदम के पीछे वर्षा, प्रदूषण, हवाओं की रोकथाम, कटाव, ईंधन, लकड़ी आदि के अनेक लाभ सोचे गये हैं। जिनका प्रतिफल सामने भी आ रहा है। यह उत्पादन एक स्थान या गाँव के लोगों ने नहीं किया वरन् समूचे चीन के बिखरे हुये लोगों को एकत्रित करके यह संसार का अनोखा आश्चर्य खड़ा किया गया। काम तो हुआ। श्रमिकों ने किया। योजनाकारों ने निर्धारण किया, सरकार ने खर्च जुटाया, पर इन सबसे बड़ा काम उनका रहा जिनने घर में मौज उड़ाते लोगों को देश की प्रगति का माहात्म्य और उपयोगिता बताकर उन्हें बीहड़ में रहने, कठोर श्रम करने और सुविधायें छोड़ने के लिए प्रोत्साहित एवं सहमत किया। इस स्तर के नेतृत्व को जितना सराहा जाय, उतना ही कम है।
ठीक इसी से मिलती जुलती योजनाएँ स्वेज और पनामा नहर बनाने के संबंध में भी हैं। छोटे-छोटे भूमि खण्ड दो-दो समुद्रों को अलग-अलग किये हुये थे। उस प्रदेश से गुजरने वाले जहाजों को हजारों मील का चक्कर काटना और विपुल धन खर्च करना पड़ता था। इस असुविधा को मिटाने के लिए उपरोक्त दो नहरें विभिन्न समयों पर बनीं। उनमें सबसे बड़ी प्रमुखता विशाल परिमाण में मानवी श्रम जुटाने की थी। जहाँ यह भूखण्ड थे, वहाँ की स्थानीय जनसंख्या नगण्य थी। वह अपने निर्वाह कार्य ही किसी प्रकार निपटा पाती थी। फिर इतनी बड़ी श्रम सेना कहाँ से जुटे? मात्र पैसे के प्रलोभन से ऐसे सीलन भरे क्षेत्र में रहने और जानलेवा श्रम करने के लिए इतने श्रमिकों को सहज ही सहमत नहीं किया जा सकता। इसके लिए भावनायें जगानी और उभारनी चाहिए, त्याग और शौर्य उछलना चाहिए। यह कार्य लेखों से, भाषणों से प्रसारणों से नहीं हो गया, वरन् उनने किया जो स्वयं लोक सेवा के लिए अनेक बार दुस्साहस कर चुके थे। सोचा जा रहा था इतने श्रमिक कहाँ मिलेंगे? फिर वे प्रसन्नतापूर्वक इतनी तेजी से काम क्यों करेंगे, जिसके लिये जानें की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। यह कार्य उनने जन मानस का अन्तराल झकझोर कर वह आवश्यकता पूरी की, जिसके लिए संसार की अनेक पीढ़ियाँ उस दुस्साहस के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती रहेंगी।
युद्ध भूमि में सैनिक प्राण हथेली पर रख कर लड़ने जाते हैं। इस प्रयास में सम्मिलित होने वालों के मनों में देश भक्ति का, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा गरिमा का बोध कराया जाता है। अन्यथा पैसे के लिए जान कौन बेचेगा? इन भावनाओं को भरने और उन्हें परिपक्व करने में सैनिक विद्यालयों से लेकर प्रशिक्षकों और व्यवस्थापकों की गहरी भूमिका रहती है। अन्यथा लड़ाई के दिनों में जुझारू सैनिकों का मिलना कठिन हो जाय।
हैराल्ड हाब्स के अनुसार- बीस चापलूसों की अपेक्षा एक निन्दक भला है, जो कमियाँ दर्शाता रहकर कसौटी का कार्य करता है। जिनमें निन्दा सहन करने की शक्ति नहीं है अथवा जिनके निन्दक नहीं है, उनकी प्रगति में सन्देह है। प्रशंसकों और चापलूसों द्वारा वस्तुस्थिति को सदैव बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किये जाने से अहं, दंभ और प्रदर्शन की वृत्ति पनपती हैं। इससे व्यक्ति का पतन अवश्यंभावी है।
हालैण्ड के पास भूमि की कमी थी। उसकी अधिकाँश जमीन समुद्र की सतह से नीचे है। उथले समुद्र ने सुविस्तृत क्षेत्र पर कब्जा कर रखा था। उस देश के निवासियों ने सोचा कि समुद्र द्वारा अधिग्रहण की गई जमीन को फिर से वापस लौटाया जा सकता है। टिटहरी के अंडे समुद्र द्वारा वापस किये जाये, अगस्त्य मुनि द्वारा समुद्र सोखे जाने का पौराणिक उपाख्यान यथार्थता बन कर उभरा। उस देश के निवासियों ने योजना बनाई कि लगभग 750 मील चौड़े और 200 मील लम्बे भूखण्ड को समुद्र के अजगर को सदा निगले ही नहीं रहने देना चाहिए। इसके लिए सुनियोजित योजना बनी। एक सुविस्तृत और लोहे जैसे मजबूत बाँध का निर्माण किया गया। जब तक समुद्र की लहरें पीछे हटती थी इतनी ही देर में उस प्राचीर को कुछ न कुछ ऊँचा उठा ही लिया जाता रहा। समय तो लगा और साधन भी खपे किन्तु श्रमदान द्वारा कार्य पूरा होकर रहा। साथ ही पवन चक्कियों एवं अन्य पम्पों द्वारा पानी उलीचने का कार्य भी चालू रखा गया। प्रकृति ने साथ दिया। समुद्र से छीनी गई जमीन पर अब अच्छा खासा विकसित राज्य खड़ा है और सोना उगलने वाले कारखाने चल रहे हैं। इसमें प्रधान श्रेय उन नागरिकों को दिया जा सकता है जिन्होंने बिना थके, हठीले समुद्र से सामूहिक श्रमदान के माध्यम से लड़ाई लड़ी और विजय श्री वरण करके दिखाई।
यह प्रयोग भारत में निरन्तर होता रहा है। ब्राह्मण और साधुओं की जीवन वाहिनी अपने इस प्रण को पूरा करके दिखाती रही हैं कि राष्ट्र को हर कीमत पर जीवंत और जागृत रखेंगे। उनने अपरिग्रही, नितान्त निर्धनों जैसा जीवन जिया और इतना कठोर श्रम किया जिसके लिए अलग से ‘तपश्चर्या’ शब्द गढ़ना पड़ा। सतयुग इन्हीं प्रयासों की परिणति थी। ईसाई पादरी एक लाख की संख्या में उन्हीं पद चिन्हों पर चल रहे हैं और शेष एक तिहाई जन समुदाय को भी ईसाई धर्म में दीक्षित कर लेने का दावा कर रहे हैं। इस शक्ति को निरर्थक भी गँवाया जा सकता है और भले चंगे लोगों के सिरों पर अनौचित्य की विडंबनाएं थोप देने में भी खपाया जा सकता है। पर यदि देश के सात लाख गाँव में से 60 लाख संत-बाबा शिक्षा, स्वच्छता, कुरीति उन्मूलन जैसे कार्यों में लग सकें तो उस कर्त्तव्य के लिए देश का बच्चा-बच्चा, कण-कण उनका कृतज्ञ हो सकता है।
शिक्षा संवर्धन, खर्चीली शादियों का उन्मूलन, नशेबाजी, ऊँच नीच, पर्दा प्रथा, भिक्षा व्यवसाय, अस्वच्छता निवारण ऐसे कार्य हैं जिन्हें उथले साधनों के बलबूते समाहित नहीं किया जा सकता। इसके लिए रचनात्मक और सुधारात्मक कदम क्रान्ति स्तर के उठाने पड़ेंगे। प्रचार से लेकर कानूनी अनुबंधों, लेख-भाषणों तक के अनेक छुटपुट प्रयत्न चल चुके हैं और चल रहे हैं, पर यदि कुछ ठोस काम किया जाता है तो ऐसा समुदाय संगठित करना पड़ेगा जो स्वयं तो सुधरे और बदले में, साथ ही अपने प्रभाव क्षेत्र में भी आग्रह अनुरोध से लेकर विरोध असहयोग तक के कदम उठा सके। क्रान्ति चाहे नैतिक स्तर की हो, बौद्धिक स्तर की या सामाजिक क्षेत्र की। उसके लिए भी वैसी ही योजना बनानी और कार्यान्वित करनी होगी जैसी कि राजनैतिक क्रान्तियों की व्यवस्थापूर्ण योजनाएँ जन-शक्ति के सहारे बनती और कार्यान्वित होती रही हैं।
एक बूढ़ा राहगीर था। रात हो गई, थक कर कहीं टिकने का स्थान खोजने लगा। एक महिला को दया आयी। उसने बाड़े में पेड़ के नीचे ठहरने का स्थान बता दिया। बूढ़ा चैन पूर्वक सो गया। गहरी नींद आई। सबेरे चलने से पूर्व उसने सोचा अच्छी जगह है। खिचड़ी पका लें। खाकर चलेंगे। सो वहीं वह लकड़ी बटोर कर खिचड़ी पकाने लगा। बटलोई उसी महिला से माँग ली।
गृहस्वामिनी अपने काम काज में लगी थी। बूढ़े ने उसका ध्यान बटाते हुए पूछा- “एक बात पूँछू? बाड़े का दरवाजा कम चौड़ा है। अगर सामने वाली मोटी भैंस मर जाय तो फिर उठाकर बाहर कैसे ले जाया जायगा? “गृह स्वामिनी को इस व्यर्थ की कड़वी बात का बुरा तो बहुत लगा पर यह सोच कर चुप रह गई। बूढ़ा जाने ही वाला है, इसके मुँह क्यों लगा जाय?
खिचड़ी आधी ही पक पाई थी कि दूसरी बार गृह स्वामिनी फिर उधर से निकली। इस बार बूढ़े ने फिर दूसरा प्रश्न पूछा- “आपके हाथों का चूड़ा बहुत कीमती है। यदि विधवा हो जायँ तो इसे तोड़ना पड़ेगा और बहुत हानि होगी न?” अब की बार महिला से न सहा गया। उसने बुढ़े के गमछे में अधपकी खिचड़ी उलट दी। चूल्हे की आग बुझा दी। बटलोई छीन ली और धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया।
गमछे से अधपकी खिचड़ी का पानी टपकता रहा और बुढ़े के सारे कपड़े उससे लथ-पथ होते रहे। इसी स्थिति में वह आगे चलता रहा। रास्ते में लोगों ने कपड़ों पर कीचड़ चिपकी और मक्खियाँ भिनकती देखी तो पूछा- यह सब क्या है? बुढ़े ने तथ्य का सार बताते हुए कहा- “यह मेरी जीभ का रस टपका है, जिसने तिरस्कार कराया और अब घिनौनी वेष भूषा से उपहासास्पद बना है।
नारी को देवी की उपमा दी गई है। गायत्री, सावित्री, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, गंगा आदि के रूप में उसे पूजा जाता है। साथ ही माता, धर्मपत्नी, भगिनी, पुत्री के रूप में भी उसकी वरिष्ठता और पवित्रता है। क्षमता की दृष्टि से उसे भौतिक विज्ञानियों ने भी अपेक्षाकृत अधिक बलिष्ठ माना है। वे अपेक्षाकृत दीर्घजीवी, कष्ट-सहिष्णु, उदार और बुद्धिमान-भावनाशील भी होती हैं। उन्हें गृहलक्ष्मी के रूप में असाधारण सम्मान दिया गया है।
इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मानवीय समता-एकता पर व्याघात करते हुए लोगों ने अछूतों और स्त्रियों को जन्मजात शोषित वर्ग में गिना और उनकी क्षमता को कुँठित रखते हुए अपंग, असमर्थ, अनगढ़-सी स्थिति में पड़े रहने के लिए बाधित कर दिया।
मनुष्य जाति भी अन्य प्राणियों की तरह नर-मादा में विभक्त है। यह प्रकृति का प्रजनन संबंधी अपना कौतुक है, पर इससे न्याय और समता की तराजू उलटी नहीं जा सकती। आधी जनसंख्या नारी है। उसे यदि प्रतिबंधित, सीमित, संकुचित रखा रहने दिया गया, तो वह चरणदासी से बढ़कर और कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा सकेगी, मानवीय प्रगति में कोई कहने लायक योगदान न दे सकेगी। परिणाम यह होगा कि आधे पुरुष वर्ग का, दूसरा अर्धांग गले में पत्थर की तरह बाँधना और ढोना पड़ेगा। मध्यकालीन सामन्तवादी युग में बाल विवाह, पर्दा, बहुपत्नीत्व आदि कुरीतियों के कुचक्र में नारी को अभी तक पिसना पड़ रहा है। प्रगति के लिए शिक्षा आवश्यक है। वह नर और नारी दोनों को ही मिलनी चाहिए, पर स्थिति यह है कि 30 प्रतिशत शिक्षितों में नारी के हिस्से में 10 प्रतिशत भी नहीं आती। वह भी शहरों में सवर्णों और सम्पन्नों की लड़कियाँ कुछ पढ़-लिख लेती हैं। देहातों में गरीब परिवार स्त्री-शिक्षा का न तो महत्व समझते हैं और न उसके लिए प्रयत्न करते हैं।
समाज के सर्वतोमुखी पुनरुत्थान में अगले दिनों नारी को दूनी गति से बढ़ना होगा, ताकि पिछले दिनों जो खाई खुद गयी है, उसे पाटा जा सके। नारी को न केवल स्वावलम्बी-सुसंस्कारी होना चाहिए, वरन् समग्र नेतृत्व के क्षेत्र में भी उसे अपनी प्रतिभा का परिचय देना चाहिए। पुरुषों का कर्त्तव्य है कि जिस प्रकार उसने नारी पर पिछड़ापन लादा है, उसी प्रकार उस पाप का प्रायश्चित करें और नारी को आगे बढ़ने में, बढ़ाने में विशेष उत्साहपूर्वक काम करें। उसके प्रति जो हीनता के भाव जम गये हैं, उनका अब अन्त होना चाहिए। उसे प्रगतिशीलता अपनाने के लिए समुचित अवसर और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
भूतकाल में नारी को जब भी अवसर मिला है, पुरुष की तुलना में कभी पीछे नहीं रही। पुरातन काल में मनु की पुत्री इला ने अपने पिता की पुरोहित बनकर धर्म क्षेत्र में प्रवेश कर उसे आगे बढ़ाया था। वेद ऋचाओं की दृष्टा नारियाँ भी कम नहीं। अपाला, घोषा आदि कितने ही नाम ऐसे हैं, जिन्हें ब्रह्मवेत्ताओं की तरह ब्रह्मवादिनी की संज्ञा मिली है।
प्राचीन काल में विवाहित या अविवाहित रहना नर और नारी के लिए समान रूप से ऐच्छिक विषय था। जिसको जिसमें सुविधा पड़ती थी, वह उस मार्ग को अपना लेता था। विरक्त ब्रह्मचारियों की तरह ऐसी महिलाओं की कमी नहीं रही, जिन्होंने मानवीय प्रगति के लिए अपने को समर्पित किया और विवाह के बन्धन में बँधने से कतराती रहीं। कितनी ही ऐसी भी हुई हैं, जिन्होंने सहयोग की सुविधा देखते हुए विवाह तो किया, पर सन्तानोत्पादन से कोसों दूर रहीं। ऋषि याज्ञवल्क्य की दोनों पत्नियाँ उनकी सहयोगिनी भर थीं। उन्हें गृहिणी के रूप में अपना कार्यक्षेत्र सीमित नहीं करना पड़ा।
देश के नवीन नारी इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कमला चट्टोपाध्याय, सुमित्रा चौहान, दुर्गाभाभी आदि के नाम जन-जन की जुबान पर हैं। क्रान्तिकारी, सत्याग्रही और साहित्य सृजेताओं में उनकी बड़ी संख्या रही है। उनकी कथा-गाथा इतनी विस्तृत है कि पुरुषों की तुलना में उनके पिछड़े होने की बात पूरी तरह कट जाती है। जहाँ दबाया-दबोचा गया है, वहाँ तो उत्पीड़न-शोषण की स्थिति रहती ही थी, पर जहाँ उन्हें खुली हवा में साँस लेने का अवसर मिला है, वहाँ उनने अपनी वरिष्ठता में चार चाँद लगा कर दिखाये हैं।
शासकों में भारत की इन्दिरा गाँधी, इजराइल की गोल्डा मेयर, इंग्लैण्ड की मार्गरेट थ्रेचर, श्रीलंका की सिरिमाओ भण्डारनायके, फिलीपीन्स की एक्विनों आदि के नाम प्रख्यात हैं। रूस, यूगोस्लाविया में शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, शिशु कल्याण जैसे अनेक विभागों में 90 प्रतिशत महिलाएँ काम संभालती हैं। न्यायालय में जजों में उनकी संख्या का अनुपात निरन्तर बढ़ता जाता है। कभी मैडम क्यूरी जैसी महिला विज्ञान क्षेत्र में कुछ ही थीं, पर वे अब विज्ञान, इंजीनियरिंग एवं कम्प्यूटर विभागों में तेजी से प्रवेश पा रही हैं।
विदेशी महिलाओं ने अपने-अपने देशों में कितने ही सार्वजनिक आन्दोलन चलाये हैं। दास प्रथा के विरुद्ध आग उगलने वाली हैरियटस्ट्रो से लेकर परिवार नियोजन को गति देने वाली मार्गरेट मेरी स्टोप्स के नाम प्रख्यात हैं। महिला मुक्ति आन्दोलन की जन्मदात्री उसी वर्ग में है। ईसाई धर्म प्रचारकों में पादरियों की तरह महिला “नन्स” भी अच्छी खासी दिलचस्पी ले रही हैं। नर्सों में उन्हीं की प्रमुखता है। मर्द नर्स तो जहाँ कहीं ही दीखते हैं वे महिला नर्सों की तुलना में सेवा की दृष्टि से कहीं नहीं ठहरते।
विदेशी महिलाओं ने भारत के साँस्कृतिक एवं समाज सुधार क्षेत्र में उत्साहवर्धक काम किया है। अरविंद आश्रम की माताजी, मदर टेरेसा, गाँधी आश्रम की मीरा बेन, सरला बेन ने जितना काम किया, उसका मूल्याँकन असामान्य समझा गया है। स्वामी विवेकानन्द की पुकार पर सिस्टर निवेदिता भारत आयी थीं और वे विशेष रूप से महिला उत्थान के काम में लगी रहीं। थियोसॉफी की एनीबीसेण्ट ने तो भारत और हिन्दू धर्म को अपना प्राणप्रिय बना लिया था। सरदार पटेल की पुत्री मनु बेन अविवाहित रहकर सतत् रचनात्मक कार्यों में जुटी रहीं।
यह सभी बीते समय की बातें हैं। अगला समय नारी प्रधान युग के रूप में मान्यता प्राप्त करेगा। इसलिए उसकी भूमिका अभी से बनानी चाहिए। परिवार निर्माण से संबंधित अनेक पक्षों को उन्हें ही संभालना चाहिए। सामाजिक कुरीतियों से जकड़े रहने में नारी को अधिक अनुदार और रूढ़िवादी समझा जाता है। इस क्षेत्र में सुधार होना चाहिए और प्रगतिशीलता पनपनी चाहिए। स्त्री शिक्षा के लिए स्कूली क्षेत्र से भी अधिक बड़ा क्षेत्र “प्रौढ़ नारी शिक्षा” का है। इसके लिए अपरान्हशालाएँ गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले में होनी चाहिए।
प्राणी और पदार्थ स्थिर नहीं रहते वे आते हैं और चले जाते हैं। व्यक्तियों की प्रकृति में भी स्थिरता नहीं। उनकी घनिष्ठता, उपेक्षा और शत्रुता में भी बदलती रहती है। इसलिए तुम उनके साथ कर्त्तव्य के नाते उसी सीमा तक जुड़ो, जिसमें वियोग या परिवर्तन पर पश्चाताप न करना पड़े।
प्यार करने योग्य एक परमेश्वर ही है। उसी की प्रीति सच्ची है। सब के बदल जाने पर भी वह बदलने वाला नहीं है। उसी को पकड़ो जो तुम्हें छोड़ने वाला नहीं है।
टामस केम्पस
नारी का निजी जीवन, शिशु निर्माण, परिवार और समाज, गृह उद्योग आदि अनेक विषयों से संबंधित है। इन प्रसंगों पर प्रामाणिक पुस्तकें उन महिलाओं तक पहुँचती रहनी चाहिए, जो स्कूली पढ़ाई तो पूरी कर चुकीं, पर बाद में आवश्यक विषयों को पढ़ने समझने के लिए न अवसर मिला, न साधन। इस कमी को पूरा करने के लिए ऐसे झोला पुस्तकालय चलाने चाहिए जो बिना कुछ फीस लिए सत्साहित्य शिक्षित महिलाओं तक पहुँचाने और वापस लेने का काम करते रहें। शिक्षित महिलाओं का कर्त्तव्य है कि वे अशिक्षित बहिनों में प्रगतिशील पुस्तकों के माध्यम से युग चेतना उत्पन्न करें।
महिलाओं में से अनेक विधवाएँ, परित्यक्ताएँ, कुमारिकाएँ ऐसी हैं, जिन पर घरेलू बंधन बहुत कड़े नहीं हैं। वे अपने समय का बड़ा भाग महिला प्रगति के लिए लगायें तो इस क्षेत्र में उत्कर्ष का प्रयोजन बड़ी मात्रा में सिद्ध हो सकता है।
देवताओं के गुरु बृहस्पति थे और दैत्यों के शुक्राचार्य। दोनों ही समुदाय बड़े थे और सशक्त भी। महत्वाकाँक्षा भी उनकी कम न थी और वर्चस्व बनाये रहना चाहते थे। इतने पर भी यह जानते थे कि अपनी-अपनी मनमर्जी चलाने पर काम नहीं चलता। एक अनुभवी, दूरदर्शी एवं परिस्थितियों का सही मूल्याँकन कर सकने वाला नेतृत्व भी चाहिए अन्यथा बुहारी की सींकों की तरह बिखराव होता है, पारस्परिक मन मुटाव बढ़ता है और उस आपा-धापी में सशक्तता अपव्यय के गर्त में जा गिरती है।
देवताओं का स्वर्गलोक ऊर्ध्वगमन के साथ जुड़ता था, दैत्य अधःपतन के पाताल में रहते थे। इतने पर भी मार्ग दर्शन दोनों को चाहिए। सज्जनता का आरंभ में आक्रान्ताओं का शिकार बनना और शठ के साथ शठता न बरतने के कारण घाटा रहता है किन्तु अन्ततः चिरस्थायी विजय उन्हीं की होती है। पूजा प्रतिष्ठा में आगे वे ही रहते हैं। यह तथ्य बृहस्पति के तत्वावधान में देवताओं ने भली प्रकार जान लिया था। बीच-बीच में अड़चने आते रहने पर भी वे उसी स्थिर नीति को अपनाये रहते हैं। दैत्यों की दिशा धारा दूसरी थी। आक्रमण करते थे। उसका लाभ भी मिलता था पर पीछे सारी कमाई गँवा बैठते थे और बुरी तरह पिटते थे। जो भी हो दर्शन तो एक उनका भी था और उसे शुक्राचार्य की रणनीति कहते हैं। शुक्र की चतुरता में कमी नहीं थी वे अपने शिष्य बलि को वामन की याचना पर भूमिदान के विरुद्ध थे। यहाँ तक कि उनने जल पात्र में सूक्ष्म शरीर से प्रवेश करके संकल्प में अड़ंगा लगा दिया था। भले ही पीछे इस दुराग्रह में उन्हें एक आँख गंवानी पड़ी। देवता और दैत्य अपना-अपना अस्तित्व लम्बे समय तक इसीलिए बनाये रह सके कि उन्हें समर्थ नेतृत्व का लाभ मिलता रहा।
पाँचों पाण्डव साधन रहित थे। कौरव स्वयं भी सौ थे और उनके पास सुगठित विशाल सेना भी थी। न बराबरी थी, न धर्म पक्ष के जीतने की आशा। फिर भी कृष्ण ने ऐसी योजना बनाई जिससे सत्य ही जीता और धर्मराज ही सिंहासनारूढ़ हुये। राम के लंका युद्ध में भी बराबरी नहीं थी। दुर्दान्त दैत्यों से निहत्थे रीछ वानरों को लड़ाना प्रत्यक्षतः एक खिलवाड़ ही था, पर सलाहकार जाम्बवन्त का लम्बा अनुभव काम आया और उस स्तर की सफलतायें हाथ लगीं जिन्हें चमत्कार ही कहा जा सकता है।
जिसमें आत्मबल नहीं होता, उसकी श्रद्धा भी नहीं टिकती।
कथा श्रवण से मात्र कर्त्तव्य बोध होता है। उसे सुनने में न स्वर्ग मिलता है न भगवान।
अच्छे संकल्प करो ताकि अच्छे मार्ग पर चल सकना सम्भव हो सके।
मार्गदर्शक की महिमा उस दिन देखी गई, जब श्रावस्ती क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था और नित्य ढेरों प्राण त्याग रहे थे। इनमें से कम से कम बालकों को तो बचाया ही जाता था। तथागत ने श्रेष्ठजनों को बुलाया और इतने धन की माँग की जिससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सके। माँग बड़ी थी। अनुदान थोड़ा। सर्वत्र निराशा छाई हुई थी। इस वातावरण को चीरती हुई एक लड़की उठी-सुप्रिया। उसने कहा- “यह दायित्व मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। मैं उसे पूरा कर दिखा दूँगी।” वह घर-घर गयी और जिस भी रसोई में धुँआ निकलता दीखा, उसमें प्रवेश करके घर मालिकों की करुणा जगाई और आग्रहपूर्वक आधी रोटी पाई। प्रातः से रात तक वह इसी प्रयास में जुटी रहती और इतना खाद्य एकत्रित कर लेती जिससे भूखे बालकों का पेट भर जाता। भूख से उसने किसी भी शिशु को मरने नहीं दिया। अगणित धनाढ्यों से बढ़कर थी उसकी योजना और तत्परता जिसकी सफलता को चिरकाल तक स्मरण किया जाता रहेगा। नेतृत्व आखिर नेतृत्व ही है, वह साधन और सहयोग कहीं से भी जुटा लेता है।
जिन दिनों 2400 प्रज्ञा पीठों के लिए इमारतें खड़ी करने का निर्धारण हुआ था। उन दिनों उस संकल्प की पूर्ति के लिए प्रायः धनहीन लोग ही आगे आये थे और उनने सहयोग जुटाकर उस अभूतपूर्व देश भर में फैले हुये संकल्प को पूरा कर दिखाया।
बम्बई में एक ट्रस्ट है- “बाप का घर” जिसमें विधवायें, परित्यक्तायें, अपंग, अनाश्रित महिलायें जब ससुराल और पितृगृह से निराश हो जाती हैं, तो बान्द्रा के उस “ बाप के घर” में जा पहुँचती हैं और मान मर्यादा के साथ अपना पूरा जीवन काट लेती हैं। बच्चों को भी स्वावलम्बी बना लेती हैं। इस ट्रस्ट का निर्माण किसी करोड़पति ने नहीं किया। भावनाशीलों की एक प्रामाणिक मंडली उठ खड़ी हुई। सहयोग की किसी महान कार्य के लिए कभी कमी नहीं पड़ी। “बाप के घर” की इमारत और खर्च के लिए स्थायी पूँजी का प्रबंध भी सहज ही होता गया और वह विनिर्मित हो गया जिसकी संसार भर में चर्चा है।
बम्बई में ही एक दम्पत्ति ने यह निश्चय किया कि वे निराश्रित घूमने वाले अनाथ बालकों की शिक्षा व्यवस्था करेंगे और उनके लिए निर्वाह साधन भी जुटायेंगे। उनने नगर में होते रहने वाली शादियों की सूची बनाई ओर शुभकामना के साथ संदेश भेजने शुरू किये कि यदि उत्सव के उपरान्त कुछ खाद्य पदार्थ बच जाय तो इसे अनाथालय को दिया जाये। जूठन जो इधर उधर फेंकनी पड़ती थी, संभालकर रखी जाने लगी। शिन्दे दम्पत्ति ने एक पुरानी-सी गाड़ी का भी प्रबंध कर लिया और उसमें दिन भर बचे हुये खाद्य को ढोया और जमा किया जाता रहता। अनाथालय के बालक ही नहीं, निराश्रित अपंग जन भी वहाँ से क्षुधा निवारण के साधन प्राप्त कर लेते।
‘बाप का घर’ हो या अनाथालय इसकी व्यवस्था किन्हीं उर्वर और भावनाशील पुरुषार्थी मस्तिष्कों ने ही की। यदि वे आलस्य प्रमाद में लोभ-मोह में दूसरों की तरह डूबे रहते तो न ऐसी सुन्दर कल्पनाएँ उठती और न उनकी पूर्ति के लिए स्त्रोत खुलते।
विहार प्रान्त के एक गाँव का एक किसान पारिवारिक कामों को समर्थ देख कर स्वयं किसी महत्वपूर्ण कार्य में जुट जाने की बात सोचने लगा। उसने अपने खेत पर आम के कुछ पेड़ लगा रखे थे। उनसे मनुष्य, पशु और पक्षी तक प्रसन्नता भरा लाभ उठाते थे। किसान को सूझा कि ऐसे ही आम्र कुँज लोग अपने-अपने खेतों पर लगाने लगें तो कितना अच्छा हो। विचार संकल्प में बदला और उसने क्रियान्वित होना आरंभ कर दिया। हजारी किसान हर किसान के घर गया। उसने दूर गाँव के लोगों से संपर्क साधा और आम्र कुँज लगाने के लाभ बताने के साथ-साथ उनकी स्थापना के लिए आग्रह किया। कितनी ही जगह तो वह अपने घर से पौधे लेकर पहुँचा और सिंचाई रखवाली के उपाय बताता रहा। फलस्वरूप उसके जीवन काल में ही हजार आम्र उद्यान उस क्षेत्र में लग गये और वह क्षेत्र “हजारी बाग” जिला कहलाया। इसे कहते हैं- नेतृत्व।
[दाँतों से किसी ने पूछा- तुम हर चीज को काटते हो, पर अपने शिकंजे में रहने वाली जीभ को क्यों नहीं काटते....?
दाँत ने कहा- हम उससे डरते हैं कि कोई कड़ुई बातें कह देगी तो किसी से हम बत्तीसों को तुड़वा देगी।]
महापुरुषों की विशिष्टताओं से अपरिचित रहना- बालकपन का जीवन बिताना ही है।
आँखें सिर्फ सफलता देखती हैं पर विवेक यह पूछता है कि इसके लिए किन परिस्थितियों में कितना प्रयत्न किया गया।
ऊँचे कहलाने वाले जब अन्याय पर उतरते हैं तो छोटे वर्ग भी उनके विरुद्ध क्रान्ति के रूप में उबल पड़ते हैं।
आमतौर से वाणी से परामर्श और प्रोत्साहन दिये जाते हैं। पर वह क्रम पुराना हो गया। एक मनुष्य साधारणतः इतना स्वर उठा सकता है जिसे सौ मनुष्य आस पास बैठकर सुन सकें। प्राचीन काल में ऐसी ही धर्म गोष्ठियां होती थीं। लाउडस्पीकर तो उस जमाने में थे नहीं। जब से विज्ञान ने यह आविष्कार प्रस्तुत किया। हजारों लाखों की विशाल सभायें होने लगी हैं और अधिक लोगों तक एक ही समय में विचार पहुँचाना संभव हो गया है। जन जागरण के लिए भी इसका प्रयोग हो रहा है और वक्ताओं की सहायक मंडली के रूप में उसका उपयोग पूरी तरह हो रहा है, इसीलिए कहा जाता रहा है कि हर प्रज्ञा मंडल के पास अपना लाउडस्पीकर होना ही चाहिए ताकि न केवल प्रवचन परामर्श वरन् अन्यत्र रहने वाले विशेषज्ञों के गायन तथा संदेश भी सुनाये जा सकें। स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से देहाती स्तर का बोलता रंगीन छोटा सिनेमा भी घर-घर दिखाया जा सकता है। यों चलते फिरते दृश्य तो उसमें नहीं आ सकते।
लाउडस्पीकर की ही भाँति दूसरा और भी सशक्त माध्यम है- प्रेस प्रकाशन। कोई विचारक अपने गंभीर गरिमा भरे विचारों को जन-जन से मिलकर दुहराता रहे यह समय साध्य और स्वल्प परिणाम उत्पन्न करने वाला साधन है। इस प्रयास में चार चाँद लगा देने की प्रतिक्रिया लेखन कार्य से भी हो सकती है। प्रेस उन्हें छाप कर इतने लोगों तक पहुँचा देता है कि प्रचार कार्य का बहुत बड़ा प्रयोजन उससे सधता है।
प्रजातंत्र सिद्धान्त के जन्मदाता ‘रूसो’ ने अपने ग्रन्थ में उस तथ्य को जब उगाकर किया तो पढ़ने वाले इतना ही कहते थे कि कल्पना सुन्दर है, पर व्यावहारिक नहीं। विचारों को शक्ति किसी जमाने में समझी नहीं जाती थी। “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का जंगली कानून ही सब जगह चलता था। पर पीछे वह बात नहीं रही। विचारों की शक्ति भी समझी जाने लगी और लोग उन पर गंभीरता पूर्वक ध्यान भी देने लगे। लेखनी थी तो पहले भी। पर हस्तलिखित क्रम बड़ा मंद और सीमित रहता था। प्रेस प्रकाशन ने उसमें बिजली जैसी गति भर दी।
रूसो प्रतिपादित प्रजातंत्र की पुस्तक के माध्यम से ही ऐसी हवा फैली कि समूचे संसार में हड़कम्प जैसा मच गया। उस हेतु राज्य-क्रान्तियाँ हुई और अधिकाँश देशों में प्रजातंत्र की स्थापना हो गई। जमींदारियाँ, जागीरदारियाँ सभी मिट गयीं। वह प्रवाह अभी भी चल रहा है। प्रजातंत्र का बीजारोपण और उन्नयन अभी भी पिछड़े क्षेत्रों में तेजी से चल रहा है राजतंत्र की जड़ें इस तूफान ने उखाड़ कर फेंक दी।
सहज जीवन नितान्त सरल है, पर लोगों ने जान बूझकर उसे जटिल बना लिया है।
दूसरा क्रान्तिकारी लेखक है- कार्लमार्क्स। उसने साम्यवाद के सभी पक्षों पर गहनतम विचार किया। इसके पक्ष विपक्ष में कहे जा सकने वाले तथ्यों को उसने न केवल सोचा वरन् इतिहास के घटनाक्रमों से भी उन्हें निचोड़ निकाला। साम्यवादी विचार धारा का ढाँचा और खाका सुनिश्चित हो गया। वह अपने आप में इतना सर्वांगपूर्ण था कि उससे शासकीय परिवर्तनों में महती भूमिका सम्पन्न हुई। मात्र विवाद ही नहीं वरन् संघर्ष फूट पड़े और वे तथ्यों के आधार पर इतने समर्थ थे कि साधन हीन लोगों द्वारा खड़े किये गये संघर्ष भी सफल होकर रहे।
इस सिद्धान्त का जन्म हुए, प्रकटीकरण ही स्थिति में आय प्रायः एक शताब्दी गुजरी है कि आधी से अधिक दुनिया उसके प्रभाव क्षेत्र में आ गयी है। रूस इनमें अग्रणी है। उसके समीपवर्ती सहयोगियों का एक बड़ा मंडल है। इससे लेनिन, स्टालिन से लेकर ख्रुश्चैव, गोर्बाचौफ तक अनेकों प्रतापी शासक न केवल रूस में वरन् उस क्षेत्र अन्यान्य देशों में भी हो चुके हैं। यह कार्लमार्क्स की लौह लेखनी का चमत्कार है। उस लेखन प्रतिपादन में भी अनेक मूर्धन्य विचारक सम्मिलित हुये। प्रेस ने उसे सर्व साधारण के लिए उपलब्ध किया और यथार्थवाद पर अवलम्बित विचार धारा देखते देखते गगनचुम्बी बनने लगी।
चीन की एक करोड़ जनता भी इसी आन्दोलन के उभार से उभरी है। दीख पड़ता है कि व्यक्तिगत रूप से साम्यवाद पर विश्वास करने वाले संसार के अधिकाँश लोग हैं। उस शासन के अंतर्गत भी आधी से अधिक जनसंख्या आ गई है।
दास प्रथा के उन्मूलन की प्रतिज्ञा तो अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन ने ली थी। पर उस हेतु जन साधारण की भावनायें उभारने और न्याय के पक्ष में जनमानस को कार्य-बद्ध करने का काम श्रीमती हैरियट स्टो की कलम ने किया। उनने “टाम काका की कुटिया” रची और पत्थर जैसे कठोर हृदयों को फूट-फूट कर रोने और प्रचलन को उखाड़ फेंकने के लिए विवश कर दिया।
आदर्शवादिता की हिम्मत करने वाले लौह लेखनी के धनी संसार में किन्हीं महान सेनापतियों से कम नहीं गिने जाते। प्रिंस क्रौपाट्किन, बिस्मार्क, रस्किन, टॉलस्टाय, गोर्की, तुगनेव आदि ने जो लिखा है उसने कोटि-कोटि मानवों को सड़ी गली मान्यताओं से विरत होने, तथ्यपूर्ण सिद्धान्त अपनाने के लिए स्वेच्छा या सहमत कर दिया। आर्य समाज की हवा स्वामी दयानंद ने लेखनी और वाणी दोनों से ही भर दी। यही कार्य विवेकानंद व बाद में अभेदानन्द ने भी किया।
गीता बड़ा पुराना ग्रंथ है। लोग उसे पूजा पाठ के लिए रखते थे। पर बाल गंगाधर तिलक और पंडित सातवलेकर ने जो गीता की व्याख्यायें की, युग की आवश्यकता के अनुरूप पूरी तरह फिट बैठीं। उनने विचारशील पीढ़ी को नया जीवन दर्शन दिया और अनेकों कर्मयोगी कार्य क्षेत्र में उतरे।
यहाँ हम ऐसे बुद्धिजीवियों को भी नहीं भूल सकते जिनने विचारणा और श्रमशीलता का समन्वय कर संसार के लिए अनेक सुविधाओं का द्वार खोला। अंधों के लिए छेदों वाली ब्रेल लिपि बनाने वाले को भुलाया नहीं जा सकता, जिसने बिना नेत्र वालों के लिए पढ़ना लिखना संभव कर दिया।
शिक्षा के क्षेत्र में मान्टेसरी की कल्पनायें और स्थापनायें अपना महत्व रखती हैं। नाइटिंगेल ने लड़कियों की नर्स स्तर की सेवा अपनाने के लिए ऐसा प्रवाह बहाया जिसे रूढ़िवादी मान्यताओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने की प्रतिष्ठा दी जा सकती है। हेलेन कीलर ने अंधी, गूँगी, बहरी होते हुये भी अठारह विश्व विद्यालयों में डाक्टरेट की डिग्री प्राप्त करके यह सिद्ध किया कि मनुष्य के लिए साधन और परिस्थितियाँ ही सब कुछ नहीं हैं। उसकी लगन, निष्ठा और तत्परता यदि जीवित हो गई- तो गई गुजरी स्थिति को चीरते हुये आसमान छूने जैसे उदाहरण वह प्रस्तुत कर सकता है। यह बुद्धिजीवियों का कर्तृत्व है जो वक्ताओं, लेखकों की तरह अपने ढँग से जनमानस को बदलते रहे हैं।
रेशम का कीड़ा अपना खोखला बुनता है और उसी में कैद हो जाता है। मकड़ी अपना जाला बुनती है और उसी में जकड़ कर बैठ जाती है। मनुष्य भी अपनी अहंता का विस्तार करता है और उसमें अवरुद्ध होकर भव-बंधन की जकड़ में त्राहि-त्राहि करता है। माया की गाँठ मनुष्य की बाँधता है और खोल भी लेता है।
लूथर किंग ने अमेरिका की काली बिरादरी में स्वाभिमान और स्वावलम्बन के बीज बोते रहे। वे चोट पर चोट खाते रहे, किन्तु उनके अथक प्रयत्नों ने वह स्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे अमेरिका के हब्शी अब वैसी दयनीय दुर्दशा से ग्रसित नहीं हैं, जैसे पहले थे।
साहस किसी भी क्षेत्र का क्यों न हो, वह अपना गौरवशाली कर्तृत्व इस प्रकार प्रस्तुत करता है जिससे न केवल अपना, अन्यों का भला हो वरन् सारी दुनिया की स्थिति बदल जाय। कोलम्बस की कल्पना, योजना और चेष्टा ही थी, जिसने अमेरिका को खोज निकाला। यदि वह आलसी भाग्यवादियों गुमसुम संकोची लोगों की तरह बैठा रहता तो अमेरिका का नाम कोई देश इस पृथ्वी के नक्शे में सम्मिलित न हो सका होता। यही नेतृत्व है।
विज्ञजनों को यह आवश्यकता सदा टोंचती, कचोटती रही है कि विश्व में उपयोगी परिवर्तन लाने के लिए कर्मठ लोग सेवियों की आवश्यकता पूरी होती रहनी चाहिए। परमार्थ के लिए उदार साहसिकता की तो प्रधान आवश्यकता है ही, पर उनका शिक्षण और निर्वाह भी ऐसे पक्ष हैं जिनकी ओर से आँख मूँद कर नहीं रहा जा सकता।
कोई समय था जब भिक्षा और दान दक्षिणा के आधार पर समाज सेवी अपनी व्यवस्था स्वयं कर लेते थे। जन मानस भी ऐसा था कि जन जीवन में प्राण फूँकने वालों की उपयोगिता अनुभव करते हुए उनकी निर्वाह आवश्यकता सहज ही जुट जाती थी। पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। हट्टे-कट्टे भिखमंगे चित्र-विचित्र आडम्बर बनाकर जब जनता को बुरी तरह लूटने खाने लगे हैं, तो विवेकवानों की मुट्ठी उनका पोषण करने के लिए नहीं खुलती। इसका परिणाम यह होता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है। स्थिति को देखते हुए स्वाभिमानी लोक सेवी अपने निर्वाह की व्यवस्था के लिए मित्र साथियों से भी नहीं कहते। भूखे भजन होता नहीं। इस कुचक्र में लोक सेवियों का एक बड़ा दल मन मसोस कर बैठा रहता है। जो निर्वाह की सुविधा होने पर अपना जीवन समर्पित कर सकता था और ऐसा कुछ कर दिखा सकता था जिससे समय की महती आवश्यकताएँ पूरी हो सकतीं।
इस दिशा में सर्वप्रथम ध्यान बौद्ध संघारामों का गया था। उनने भिक्षुओं को दीक्षा ही नहीं दी, उनके निर्वाह, प्रशिक्षण और मार्ग व्यय की व्यवस्था के लिए स्थायी कोष बनाये। हर्षवर्धन, बिम्बसार, अशोक, चन्द्रगुप्त ने अपने राज्यकोष इस निमित्त खाली कर दिये थे कि लोक सेवी अपनी उमंगों पर तुषारापात हुआ अनुभव न करें। अम्बपाली और अंगुलिमाल ने अपना करोड़ों का उपार्जन तथागत के चरणों में इसी प्रयोजन के निमित्त सौंपा था। इससे बढ़कर अनीति उपार्जन का और कोई प्रायश्चित हो भी नहीं सकता। दान की श्रेष्ठता तभी है, जब उसके सत्परिणाम प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर हों।
ईसाई मिशन ने उसी परम्परा का अनुकरण किया। उनके पास स्थिर सम्पदाएँ जमा हैं, पर उसका उपयोग विश्व के कोने-कोने में फैले हुए पादरियों के निर्वाह हेतु तथा लोकसेवा के प्रभावोत्पादक कार्यों में ही होता है। ईसाई मिशनों ने 600 भाषाओं में बाइबिल तथा अरबों की संख्या में धर्म पुस्तकें छाप कर सस्ते मोल में उन्हें शिक्षित वर्ग तक पहुँचाया तथा अशिक्षितों को सुनाने का प्रबंध किया है। हर छोटे बड़े चर्च में एक पाठशाला और एक डिस्पेन्सरी काम करती हुई देखी जा सकती है।
राजपूत परिवारों में परम्परा थी कि घर का एक व्यक्ति देश रक्षा के लिए सेना में भर्ती होता था। जिन दिनों सिख धर्म का उदय हुआ था, उन दिनों भी यह प्रथा चली थी कि दीक्षित परिवारों में से एक सदस्य ‘सिख’ वर्ग में सम्मिलित हो और उसका खर्च परिवार के अन्य सदस्य मिल जुलकर उठायें। मुस्लिम धर्म में हर ईमान वाले को जकात देने के लिए बाधित किया गया है, ताकि धर्म कार्यों के लिए आवश्यकताएँ रुकने न पायें।
इस दिशा में राष्ट्रीय आन्दोलनों के दिनों दो प्रयास ऐसे ही ठोस स्तर के हुए। गोखले ने “सर्वेन्ट्स आफ इंडिया सोसाइटी” के नाम से तथा लाला लाजपतराय ने “पीपुल्स आफ इंडिया सोसाइटी” के नाम से कोष जमा किये। इनकी ब्याज से उन कार्यकर्त्ताओं की निर्वाह व्यवस्था होती थी जो समर्पित भाव से देश सेवा के कामों में निरन्तर लगे रहते थे। इन छोटे-छोटे आधारों ने देश को इतने महत्वपूर्ण एवं उच्चस्तरीय नेता प्रदान किये कि आन्दोलन प्राणवान हो उठा।
यो गाँधी स्मारक निधि, कस्तूरबा स्मृति निधि, तिलक स्वराज्य फण्ड आदि भी ऐसे ही उद्देश्यों के लिए एकत्रित किये गये थे, पर उनकी कार्य पद्धति बहुमुखी तथा बिखरी रहने के कारण ऐसा परिणाम दृष्टिगोचर न हुआ जैसा कि प्राचीन धर्म ट्रस्टों का हुआ करता था। बुद्ध संघाराम इसके प्रत्यक्ष उदाहरण थे।
श्राद्ध प्रथा का एकमात्र यही उद्देश्य था कि यदि पूर्वजों की छोड़ी पूँजी में से आश्रितों का निर्वाह काटकर यदि कुछ बचता है तो उसे धर्म चेतना के अभिवर्धन में लगा दिया जाय। धर्मशालाएँ ऐसे ही कार्यक्रमों के केन्द्र रूप में बनती थीं। उनका लाभ सैलानी नहीं उठाते थे। उठाते थे तो तत्काल किराये से अधिक राशि उन धर्म संस्थानों में अभीष्ट प्रयोजनों के लिए जमा कर देते थे।
रासबिहारी बसु एवं सुभाषचन्द्र बोस ने भी अपनी सम्पदा का ट्रस्ट बनाया था ताकि उससे विदेशों में देश की स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन चलता रहे। इसी प्रयोजन से एक फण्ड राजा महेन्द्रप्रताप ने भी बनाया था।
इन्हें सदुपयोग कहा जा सकता है। दुरुपयोग की तो चर्चा ही क्या करनी। सिनेमा आज का सबसे प्रबल प्रचार माध्यम है। उसके उत्पादनों में कामुकता भड़काने वाले तत्व ही अधिक भरे रहते हैं। अखबार भी बहुत कुछ कर सकते हैं, पर उनकी अपनाई गई रीति-नीति में भी विचित्रता और विडम्बना ही भरी दीखती है। धर्मार्थ न्यासों की कमी नहीं, पर उस राशि से भी निठल्लों का ही भरण-पोषण होता रहता है। यह राशि अथवा साधन सामग्री यदि योजनाबद्ध रूप में सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगी होती तो उसके परिणाम भी कुछ और ही दीख पड़ते।
बकिर्धम के एक व्यक्ति का वात्सल्य उमड़ा, उसने विवाह करने और बच्चे पैदा करने की अपेक्षा, गई गुजरी स्थिति में पड़े हुए बालक एकत्रित किये और उन्हें सुशिक्षित स्वावलम्बी बनाने का निश्चय किया। अपनी निज की पूँजी समाप्त करने के उपरान्त उसने दूसरों से माँगना आरम्भ किया। प्रभाव इसी प्रकार पड़ता है कि अग्रगामी पहले स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें और बाद में दूसरों से याचना करे। उस विद्यालय में आजकल 2500 बच्चे शिक्षा प्राप्त करते और सभ्यता के क्षेत्र में साधारणों की तुलना में कहीं अधिक भारी बैठते हैं। संस्थापक ही उनका अभिभावक है। वह उनकी व्यवस्था ही नहीं करता वरन् प्यार भरी आत्मीयता की आवश्यकता भी पूरी करता है। नेपल्स (इटली) के पादरी बोरेली ने भी इसी प्रकार निराश्रित आवारा बच्चों के अभिभावक की भूमिका निभाई। प्रत्येक को स्वावलम्बी बनाया एवं वे सभी अब स्वाभिमान भरी जिन्दगी जी रहे हैं। अभी भी वहाँ प्रतिवर्ष बच्चे आते हैं व वैसा ही प्यार पाते हैं, जैसा उनके माँ-पिता उन्हें देते।
पंडित पुरोहितों को तीर्थ आश्रमों में देवताओं या कर्मकाण्डों के बहाने दान की राशि इसीलिए दी जाती थी कि उसका उपयोग मानवी गरिमा को ऊँचा उठाने वाले सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यों में हो। भिक्षा को व्यवसाय बनाकर गुलछर्रे उड़ाने का प्रचलन न कभी प्रबुद्ध धर्म में रहा है और न अगले दिनों रहने वाला है। जिन्हें ऋद्धि-सिद्धि, स्वर्ग मुक्ति की मौज खरीदनी है, उन्हें उसका मूल्य जनसाधारण में ईश्वर या धर्म की दुहाई देकर वसूल नहीं करना चाहिए।
प्रगति के लिए संघर्ष करो। अनीति को रोकने के लिए संघर्ष करो, और इसलिए भी संघर्ष करो कि संघर्ष के कारणों का अन्त हो सके।
क्या जन साधारण के सामान्य प्रयासों से भी ऐसा कुछ हो सकता है, जिसे महान कहा और गर्व किया जा सके? इस प्रश्न के उत्तर में शान्ति कुँज की कार्यपद्धति, आवक एवं व्यय-व्यवस्था का बारीकी के साथ अध्ययन करना चाहिए। एक मुट्ठी अनाज या दस पैसा जैसा तुच्छ अनुदान एकत्रित करके नालंदा विश्वविद्यालय स्तर का प्रशिक्षण, ईसाई चर्चों जैसा संगठन और कम्युनिस्टों से बढ़कर युग साहित्य किस तरह लिखा एवं फैलाया जा सकता है, यदि इसमें सन्तोषजनक जैसा कुछ दीख पड़े तो उसे सही स्तर पर नेतृत्व की क्षमता एवं व्यवस्था ही माना जाना चाहिए।
हिन्दू समाज में धर्म के नाम पर इतना दान पुण्य होता है जितना संसार भर की इस मद में दी जाने वाली राशि से बढ़कर माना जा सकता है। पर दुर्भाग्य इतना ही है कि यह सूझ नहीं पड़ता कि गाढ़ी कमाई से अर्जित और श्रद्धासिक्त इस राशि को किन प्रयोजनों में खर्च किया जाय। सौंपते समय ग्रहणकर्त्ता की प्रामाणिकता जाँची जाय कि वह उस उपलब्धि को कहाँ, कब, किन कार्यों में खर्च करेगा?
संसार में अनेक भविष्यवक्ता हुए हैं, पर वे व्यक्तियों के निजी हानि-लाभ का ही विवरण बताते रहे हैं। जिनने विश्व की राजनैतिक स्थिति पर विचार किया हो या अभिमत प्रकट किया हो, ऐसा उदाहरण फ्राँस के नास्ट्रॉडामस के अतिरिक्त और किसी का नहीं दीखता।
उन्हें यह प्रतिभा जन्मजात रूप से प्राप्त थी। शिक्षा, संपर्क, विचार-विनिमय, परिभ्रमण आदि से उनका हल्का-सा ही संबंध रहा। न वे अपने को योगी कहते, न ताँत्रिक, ज्योतिषी। अपनी ही धुन में मस्त रहते थे। मिलनसार भी न थे, इसलिए कोई-कोई उन्हें बावला तक कह बैठते थे।
यह रहस्यवादी फ्राँसीसी अब से कोई 500 वर्ष पूर्व जन्मा था। उस समय का भूगोल, इतिहास, प्रभाव प्रचलन-प्रवाह कुछ दूसरे ही ढंग का था। आज की परिस्थितियों का उस समय के साथ बहुत कम तालमेल बैठता है, तो भी उनकी भविष्यवाणियाँ संसार भर में भारी दिलचस्पी का कारण बनी हुई हैं।
उनने अपनी भविष्यवाणियाँ सन् 1555 में लिखी। वे छन्दबद्ध रहस्यमयी साँकेतिक शैली में हैं।
विश्वराजनीति में दिलचस्पी रखने वाले उनकी पुस्तक को असाधारण महत्व इसलिए देते हैं कि अब तक के संबंधित समय की प्रायः 800 भविष्यवाणियाँ अक्षरशः सही सिद्ध हो चुकी हैं। यह बात सन् 2000 तक के संबंध में कहीं जा रही हैं। यों उनकी पुस्तक में सन् 3800 तक के घटनाक्रमों पर प्रकाश डाला गया है।
उनकी लिखी पुस्तक का नाम है “सेंचुरीज”। वह किसी कूड़े-कबाड़ में से एक छात्रा ने ढूँढ़ निकाली थीं, पर जब उसके प्रसंगों और बीते विवरणों पर ध्यान दिया गया तो उसका महत्व आंका गया और उसे मुद्दतों बाद इस योग्य समझा गया कि इसे छापा भी जाना चाहिए। एक जगह छपी तो उसके चमत्कारी प्रसंगों ने अनेकों का ध्यान आकर्षित किया और उसकी अनेक भाषाओं में अनुवादित प्रतियाँ छपीं।
सबसे प्रथम उसका प्रकाशन सन् 1655 ए.डी. में हुआ। तब से ही लकड़ी के ठप्पों पर पुस्तकें छपती थीं। उसकी दो प्रतियाँ अभी फ्रेंच नेशनल लाइब्रेरी में सुरक्षित रखी हैं। इसके बाद तो वह अपनी लोकप्रियता के कारण संसार भर का ध्यान खींचती रही और अनेक देश तथा अनेक भाषाओं में छपती रही।
सन् 1672 में उसका प्रथम अंग्रेजी अनुवाद थियोडोर कम्पनी ने छापा। दूसरा अनुवाद एक पादरी द्वारा 1715 में छापा। चार्ल्सवार्ड ने उसका अगला संस्करण 1891 में छापा। इसके बाद अमेरिका की माडर्न लाइब्रेरी द्वारा इसका संस्करण ऐसी टिप्पणियों समेत छपा, जिसमें उलझनों को सुझाने वाली टिप्पणियों की भरमार थी।
सुन्दर चेहरा आकर्षक भर होता है। पर सुन्दर चरित्र की प्रामाणिकता तो अकाट्य होती है।
‘सेंचुरीज’ पुस्तक में अब तक ही खरी उतरी भविष्यवाणियों में से अनेक ऐसी हैं, जिनकी लेखक के समय में कोई संभावना नहीं थी और न उस प्रकार की कोई कल्पना ही की जा सकती थी।
उन दिनों “ब्रिटेन” नाम का कोई देश भूगोल में नहीं था। स्काटलैण्ड को मिलाकर वह बाद में बना है, पर उसकी स्थापना से पूर्व ही भविष्यवक्ता ने उसके उदय की बात लिखी है। उसका साम्राज्य विश्वभर में छा जाने का उल्लेख है, साथ ही यह भी लिखा है कि सन् 1984 में उसका सारा विस्तार सिमट कर मुट्ठी भर का रहा जायेगा। यह कथन अक्षरशः सही सिद्ध हो चुका है।
फ्राँसीसी राजक्राँति 1792 में अपने चरम उबाल पर थी, पर 200 वर्ष पूर्व ऐसी कल्पना कर सकना किसी व्यवहार बुद्धि वाले या अनुमानों का सहारा लेने वाले के लिए संभव नहीं।
टर्की का पड़ौसी देशों पर आक्रमण ईसाई समुदाय का पददलन और बाद में उस लूट खसोट का बिखराव “सेंचुरीज” में लिखा है। वह होकर भी रहा, किन्तु लिखे जाने के समय इस प्रकार की कोई कल्पना तक न थी। अमेरिका बाद में बना और विकसित हुआ, पर पुस्तक में अमेरिका का भी उल्लेख है। उसके विकसित देश के रूप में उभर आने का प्रसंग भी वर्णित है।
वर्तमान शताब्दी में दो विश्व युद्ध हो चुके हैं। अब से 600 वर्ष पूर्व कोई इनकी इस रूप में परिणति होने की कल्पना तक नहीं कर सकता था, पर भवितव्यता होकर रही। ऐसी ही अनेक भविष्यवाणियों ने विश्व के अनास्थावादी और बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों को भी इस बात के लिए विवश किया है कि उसे ध्यानपूर्वक पढ़ें और उसमें दिये हुए संकेतों के साथ अपनी परिस्थितियों की संगति बिठायें। कहा जाता है कि फ्राँस के वर्तमान शासक मित्तरां के लिए यह पुस्तक अत्यधिक दिलचस्पी का विषय बनी हुई है।
पुस्तक की गंभीरता और लोकप्रियता को देखते हुए अमेरिकी दूरदर्शन में इसका सार-संक्षेप सरल ढंग से प्रस्तुत भी किया था। इतने पर भी उसमें सन्निहित रहस्यवाद पर से पर्दा पूरी तरह नहीं उठा है।
भविष्यवाणियों में से जिनकी अवधि बीत चुकी, उनकी चर्चा करना अनावश्यक होगा। उनके संबंध में इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी 800 भविष्यवाणियाँ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की सही सिद्ध हो चुकी हैं, ऐसा दूसरा उदाहरण खोजा जा सकना कठिन है।
पुस्तक के एक प्रतिपादन के अनुसार “जुलाई 1999 में एक अति भयंकर युद्ध होगा। इसे चीनी आक्रमणकारी आरम्भ करेंगे, पर वे जीत नहीं सकेंगे।”
“अमेरिका और चीन की दोस्ती स्थायी नहीं रहेगी। वह बिदक जायेगा और रूप अमेरिका के बीच ऐसी दोस्ती होगी, जो निर्णायक वातावरण बना सके।”
“ईसाई और मुसलमान धर्म में संव्याप्त कट्टरता को आघात लगेगी। वे सम्प्रदायों की अपेक्षा बुद्धिवादी प्रतिपादनों को अपनाने लगेंगे। धर्म परिवर्तन का उत्साह ठंडा पड़ जायेगा।”
“इक्कीसवीं सदी में भारत की महती भूमिका रहेगी। वह विश्व की अनेक समस्याओं के समाधान में योगदान देगा।”
नास्ट्रॉडामस ने भारतवासियों के उत्कर्ष और उनके द्वारा विश्व भर में निभाई जाने वाली भूमिका को स्पष्ट किन्तु साँकेतिक भाषा में लिखा है तीन समुद्रों की सीमा जिस देश से मिलती हैं, जिसका नामकरण सागर शब्द के साथ मिलकर हुआ है। (हिन्द महासागर), जहाँ गुरुवार को पूज्य दिन माना जाता है, उस देश के लोग विश्वशाँति की दिशा में असाधारण पुरुषार्थ करेंगे। यह सभी बातें भारत पर लागू होती हैं। शुक्र मुसलमानों का, रविवार ईसाइयों का, शनिवार मिश्रियों का और गुरुवार हिन्दू समुदाय का ही पूज्य दिवस है।
मुक्ति अपनी विचारणा पर अंकुश रखने का नाम है। उसके लिये परलोक नहीं जाना पड़ता।
“हिन्दू संस्कृति को विश्व मान्यता मिलेगी। इसमें प्रथम रूस होगा, जो उन सिद्धान्तों को तथ्यों के अनुरूप पायेगा और अपनायेगा, साथ ही भारत के विद्वान भी ऐसा प्रयत्न करेंगे, जिससे उनका दर्शन साम्यवादी दर्शन के अनुरूप ढल जाये।
नास्ट्रॉडामस के अनुसार “विश्व का भविष्य उज्ज्वल है, किन्तु बीच-बीच में संकटों से युक्त है। इस भँवर से नाव पार ले जाने में भारत की, उसके मूर्धन्य व्यक्तियों की भारी भूमिका होगी।”
इन भविष्य कथनों को यदि विश्वस्त माना जाय तो इसका निष्कर्ष यह निकलता है कि विश्व के भविष्य निर्माण में मूर्धन्य भारतीयों की महती भूमिका होगी।
हो सकता है कि उपरोक्त संभावनाओं को साकार करने में वर्तमान तथा भावी प्रज्ञा पुत्र अंगद-हनुमान जैसी भूमिका निबाहें। संकटों को निरस्त करने एवं उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करने में उनका इतना बड़ा योगदान संभावित है कि समस्त मानवता उनकी सदा-सर्वदा के लिए ऋणी रहेगी।
नेतृत्व का अर्थ है वह वर्चस्व जिसके सहारे परिचितों और अपरिचितों को अंकुश में रखा जा सके, अनुशासन में चलाया जा सके। आमतौर से मनुष्य अनगढ़ होते हैं। वह बंदर की औलाद भले ही न हो, पर उसकी प्रवृत्ति बंदर जैसी अवश्य है। अस्थिर, अनिश्चित माहौल से प्रभावित, वह कभी कुछ सोचता है, कभी कुछ। कभी कुछ करता है, कभी कुछ। मदारी ही है जो उसे लकड़ी का भय दिखाकर बताई हुई रीति-नीति अपनाने के लिए प्रशिक्षित करता है। मन की उपमा भी बंदर से दी गई है। वह बे सिलसिले की कल्पना उछल कूद करने में लगाता रहता है और दाँव लगाता है तो ऐसा भी कुछ कर गुजरता है जिसे बेतुका उपहासास्पद ही नहीं, प्रताड़ना योग्य ठहराया जा सके। छोटे बच्चे जगने से लेकर सोने तक ऐसी ही उछल कूद करते रहते हैं। उनकी भाग दौड़ का न कोई प्रयोजन होता है न लाभ। मन मर्जी चलाने में उन्हें मजा आता है। इशारे से समझाने पर मानते नहीं। उन्हें काबू में रखना, शिष्टाचार बरतने के लिए सहमत करना, पढ़ने जैसे किसी उपयोगी काम में लगाना तभी संभव होता है, जब उनके पीछे व्यवहार कुशल अध्यापक या अभिभावक लगें। यही नेतृत्व है।
जंगली हाथी की उद्दंडता सभी जानते हैं। पर महावत है जो अंकुश के सहारे सीधे रास्ते चलाता है, युद्ध कौशल सिखाता है। बोझ उठाने या क्रियाएँ बदलने के लिए बाधित कर देता है। इससे एक कदम बढ़कर सरकस के रिंग मास्टर अपना कौशल दिखाते हैं। वे सिंह जैसे खूँखार की पीठ पर बकरा बिठाकर उसका वाहन बनाने के लिए तत्पर करते हैं। यही नेतृत्व है। सेनापति को शत्रु से लड़ने की रणनीति ही नहीं बनानी पड़ती, नये रंगरूटों को ढंग से कवायद करना और निशाना साधने की शिक्षा भी देनी पड़ती है। इससे भी बढ़कर वह अनुशासन गले उतारना पड़ता है जिसके कारण वह मशीन की तरह काम करे। अपनी मर्जी को कहीं आड़े न आने दे।
सभी महत्वपूर्ण कार्य होते तो श्रम, साधन आदि के सहारे हैं। पर उनका नियोजन-नियंत्रण किसी अनुभवी साहसी और सूझबूझ वाले क्रियाकुशल आदमी के ही बस की बात होती है।
पानी का स्वभाव निचाई की ओर बहना है। मनुष्य का स्वभाव भी ऐसा ही है। उसे दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए आसानी से उत्तेजित और प्रोत्साहित किया जा सकता है। उथले स्वार्थ को लोग तनिक से लाभ के लिए स्वीकार कर लेते हैं भले ही उसमें उनके गौरव और भविष्य को चोट लगती हो। आदर्शों की दिशा में स्वयं को घसीट ले जाना असाधारण साहस भरा कौशल है। प्रज्ञा परिजनों के कंधों पर यही जिम्मेदारी आई है। उसे निबाहने के लिए उन्हें काफी सुदृढ़ और अनुभवी होना चाहिए। यह अनुभव-अभ्यास अपने आपे से आरंभ करना चाहिए। अपनी दुर्बलताओं, त्रुटियों, भूलों एवं बेतुकी आदतों से निपटने का पहला मोर्चा संभाला और जीता जाना चाहिए।
बुद्धिमान मनुष्य कहलाता है और दयावान भगवान।
धनी वह है जो सोचता है कि अपनी सामर्थ्य से हर किसी के आँसू पोंछ दूँ।
ओछा मनुष्य अपना बखान बहुत करता है, पर आदर्शों के लिए साहस दिखाने में उसकी हिम्मत नहीं पड़ती। सच्चा आदमी साहसी होता है। पर हर साहसी सच्चा भी हो यह आवश्यक नहीं।
अपने सबसे नजदीक अपना मन है। वहीं घनिष्ठ, आत्मीय एवं उत्थान पतन में साझीदार भी है। ऐसी दशा में सबसे प्रथम हाथ भी उसी पर डाला जाना चाहिए तथा बदला और सुधारा भी उसी को जाना चाहिए। यह सरल भी है, क्योंकि निकटवर्ती, आत्मीय, अविच्छिन्न पर जितना प्रभाव अपना होता है उतना और किसी पर नहीं। मन का सबसे बड़ा खोट यह है कि वह जीवन सम्पदा के सदुपयोग की योजना नहीं बना पाता। आम लोगों की तरह इतना ही सोचता रहता है कि लोभ और मोह से प्रेरित होकर धन संचय, परिवार पोषण, विलास और ठाठ बाट में ही संलग्न रहा जाय। अपना श्रम, समय, साधन और बुद्धि कौशल पूरी तरह उसी में खपाते रहा जाय। विचारणा के इस खोट से ही समस्त क्रिया-कलाप भी वैसे ही बन पड़ते हैं। चिन्तन बदले तो क्रियाकृत्य में भी अन्तर पड़े। नेतृत्व सर्वप्रथम अपने मन का करना चाहिए और उसे इस तथ्य को समझना चाहिए कि ईश्वर प्रदत्त इस अमानत को आत्म परिष्कार एवं लोक मंगल में ही लगाया जाना चाहिए। बार-बार कहते रहने और इस परिवर्तन के दूरगामी परिणाम सुझाते रहने पर वह परामर्श भी मान सकता है और दबाव डालने, तपस्वी जैसा संकल्प कर बैठने की धमकी देकर विवश भी किया जा सकता है। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह और परिवार के लिए “एक आँख प्यार की- दूसरी सुधार की” रखते हुए उसको सदस्यों के लिए सहमत ही नहीं बाधित भी किया जाय तो इस सफलता की परिणति अपनी प्रतिभा में चार चाँद लगाने जैसी होगी। उसका प्रयोग मित्र-परिचित पड़ौसी संबंधी पर ही नहीं, अपरिचित लोगों के साथ संपर्क साधते हुये किया और मनाया-झुकाया उन्हें भी जा सकता है। नेतृत्व का सार संक्षेप यही है।
आत्मानुभूति यह भी होनी चाहिए कि सबसे बड़ी पदवी इस संसार में मार्गदर्शक की है। नाविक और अध्यापक जो स्नेह सम्मान पाते हैं। अगणितों को कृतज्ञ बनाते और ठिकाने लगाते हैं, वह साधारण नहीं- असाधारण बात है। उतना कर पाना आत्म संतोष के लिए सबसे बड़ा आधार है। लोक श्रद्धा इसी के सहारे अर्जित होती है। संसार में जो भी महामानवों की श्रेणी में पहुँचे हैं, उन सभी को जन समर्थन- जन सहयोग निश्चित रूप से मिला है। यह किस प्रकार सुलभ संभव है, उसकी विद्या अनुभव-अभ्यास में उतार लेना महती सफलताओं में एक गिनी जा सकती है।
ध्यान से देखा जाय तो भौतिक प्रगति के समस्त क्रिया कलाप अपनी गरिमा दूसरों की तुलना में बढ़ी-चढ़ी सिद्ध करने के लिए ही किये जाते हैं। मनुष्य की निजी आवश्यकताएँ तो जरा-सी हैं। वे दस मुट्ठी अनाज, छह गज कपड़े और रात बिताने के आच्छादन भर से पूरी हो जाती हैं। फिर वैभव बटोरने की इतनी दौड़ धूप किसलिए? इसके पीछे अन्तराल की गहराई में छिपी एक ही महत्वाकाँक्षा काम करती रहती है कि दूसरे हमें अपने से बड़ा, अमीर, समझदार, साहसी, क्रियाकुशल, सुन्दर सौभाग्यशाली आदि मानें। वैभव के सहारे जहाँ दूसरों से बड़प्पन प्राप्त होता है वहाँ अपना गर्व गौरव- अहं भी तृप्त होता है। किन्तु विडम्बना यह है कि ये भौतिक उपार्जन अपने निज के किसी काम नहीं आते। उनसे दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने का क्षणिक-सा खेल मेल भर बनता है। यही आम नीति है। प्रचलन इसी का है। अनेकों को इसी राह पर चलता देखा जाता है। इसलिए अपना मन भी उसी अनुकरण के लिए ललचाता और मचलता रहता है। छोटे बच्चों को रंग-बिरंगे चाबी वाले खिलौने ही तो मन भाते हैं। किन्तु वयस्क उस खिलवाड़ में रस नहीं लेते। उन्हें मिट्टी का नहीं सचमुच का बैल-घोड़ा चाहिए, जो अधिक दाम में खरीदे जाते हैं और उनकी साज सँभाल भी तत्परता चाहती है। नेतृत्व सचमुच का हाथी है। उसे खरीदने और सवारी करने पर बड़प्पन दूर से ही हर किसी को दृष्टिगोचर होता है।
शरीर के रोगी होने पर भूख, प्यास, नींद सभी चली जाती है। मन के रोगी होने पर साहस, विवेक, धन और मित्र साथ छोड़ देते हैं।
योद्धा वह है जो बुराई को भलाई से जीते।
उसके चेहरे पर सदा बसन्त ऋतु बनी रहती है जो हँसना और हँसाना जानता है।
अपने स्वभाव में आलस्य, प्रमाद, अपव्यय, दर्प, कटु, भाषण, व्यसन विलास आदि दुर्गुण भरे होते हैं। मोर्चा इनके विरुद्ध लगना चाहिए और संकल्प उठना चाहिए कि गरिमा को गिराने वाली इन दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ने के लिए निरन्तर प्रयत्न जारी रखा जायेगा और लिपटी हुई मलीनता को साफ करके ही रहा जायेगा। अपने दुर्गुण, कुविचारों एवं हेय कार्यों पर कड़ी नजर रखी जाय, उनका विरोध-असहयोग जारी रखा जाय तो कोई कारण नहीं कि जीवन को उच्चस्तरीय बनाने वाली सत्प्रवृत्ति अपने अभ्यास में न उतर सके। यह बहुत बड़ी बात है। नम्रता, सज्जनता, शिष्टता, उदारता, सेवा भावना के बलबूते कोई भी व्यक्ति लोकप्रिय एवं श्रद्धास्पद बन सकता है। साथ ही उस समर्थन के कारण हर क्षेत्र में प्रगति के लिए अवसर मिलते रहने का सिलसिला अनायास ही चल पड़ता है।
वरिष्ठ व्यक्तियों को समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को अपने व्यक्तित्व में समाविष्ट करना पड़ा है। इससे कम में सस्ते मोल खरीदी गई नेतागिरी एक धूर्त्तता है। जिसकी कलई खुले बिना रह नहीं सकती। चापलूसों को प्रलोभन देकर खरीदा जा सकता है। पर उनके द्वारा की गई प्रशंसा या दी गई पदवी बालू की भीति की तरह बेसिरपैर की होती है। उससे तात्कालिक वाहवाही लूटी जा सकती है। किसी संस्था का पदाधिकारी बना जा सकता है। अखबारों में नाम फोटो छप सकता है। जय-जयकार सुनाई दे सकता है। पर उस विडम्बना के पीछे स्थायित्व जैसा कुछ नहीं होता। बिना जड़ का खोखला पेड़ कब तक खड़ा रह सकता है। वाणी की वाचालता और शेखीखोरी किसी को क्षण भर के लिए प्रभावित कर सकती है किन्तु उसे जन साधारण के अन्तराल में श्रद्धा भरा स्थान नहीं दिला सकती और इसके बिना नेतृत्व गहरा एवं चिरस्थाई नहीं हो सकता।
अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को संभालने सुधारने के साथ ही उस समुदाय को संभालने का कदम बढ़ता है जिसके साथ हम बंधे हुए हैं। परिवार अपना निकटवर्ती समुदाय है। इसकी इच्छानुकूल विलास सुविधा जुटाने का कार्य तो कठिन है क्योंकि एक की देखा देखी दूसरों का मन चलता है और घर में उपलब्ध सुविधाओं की तुलना में उनकी माँगे बढ़ती ही जाती हैं। जिसे रोका-टोका जाय, वही विरोधी बनता है और सहयोग के स्थान पर बिगाड़ने वाले कदम उठाता है इसलिए नीति पहले से ही निश्चित रखनी चाहिए कि उत्तराधिकारी में सम्पदा पाने की कोई भी परिजन आशा न करे। गरिमा बढ़ाने और भविष्य चमकाने वाले सद्गुणों का परिवार संस्था की छत्र छाया में अभ्यास करे।
श्रमशीलता, मितव्ययिता, स्वच्छता, सुव्यवस्था, सज्जनता, शिष्टता, सहकारिता, उदारता, संयमशीलता, मिलनसारी जैसे गुणों को परिजनों के स्वभाव में उतारने के लिए उनका कार्यक्रम ऐसा बनाना चाहिए जिसके सहारे इन प्रवृत्तियों को दैनिक क्रिया कलापों में सम्मिलित रख कर चलना पड़े। यह वस्तुतः बहुत बड़ा उपार्जन या अनुदान है। सद्गुणी व्यक्ति अपनी योग्यता भी बढ़ाते चलते हैं, प्रामाणिकता भी विकसित करते चलते हैं और सेवा प्रयोजनों में दूसरों का सहयोग भी करते रहते हैं। आन्तरिक प्रगति की गरिमा और व्यवस्था लोगों के गले उतारते रहा जाय तो भावी जीवन में वह अपनाये गये हर काम में प्रगति करता और सफलता उपलब्ध करता चलता है।
संगति का असर इसलिये पड़ता है कि वह सोये हुए संस्कारों को जगा देती है। भले बुरे संस्कार सभी में हैं, पर वे तब तक नहीं जागते जब तक कि आग को ईंधन की तरह संगति न मिले।
वस्तुतः समय की नियमितता और व्यस्तता ऐसा गुण है जिसके सहारे सामान्य मनुष्य भी दूसरों की तुलना में अनेक गुनी प्रतिभा अर्जित कर सकता है। आश्चर्यजनक रीति से उत्कर्ष के आधार हस्तगत करता चल सकता है।
आत्म निर्माण, परिवार निमार्ण के साथ प्रगति का तीसरा क्षेत्र है- समाज निर्माण। यह तीनों एक साथ चल सकते हैं। अन्न, जल और वायु तीनों ही एक साथ प्रयुक्त किये जाते हैं। उसी प्रकार आत्म निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के तीनों ही काम साथ-साथ चलाए जा सकते हैं।
इन दिनों सभी का ध्यान राजनैतिक नेता बनने का है। पर उस डिब्बे में भीड़ अत्यधिक भर गई है। साथ ही पहले जगह प्राप्त करने और ऊँची कुर्सी पर बैठने की ललक भी इतनी तीव्र है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए जो हथकण्डे अपनाये जाते रहते हैं, नौसिखिये को इससे भी बढ़कर अपनाने पड़ेंगे, जो बन भी न पड़ेंगे और बेकार की बदमगजी खड़ी होगी।
स्वयं चुनाव लड़ने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि अपने हाथ में इतना प्रभाव रखा जाय कि जन साधारण को इशारा करते ही इच्छित प्रयोजन की पूर्ति हो जाय। चुनाव जीतने पर माला पहनने का तात्कालिक लाभ तो मिलता है, पर जिनने भी वोट दिये थे वे अपने और अपने परिचित संबंधियों के उचित अनुचित काम कराने के लिए दबाव डालते हैं। वे हो तो पाते नहीं। ऐसी दशा में समझा यह जाता है कि हमारी उपेक्षा हुई। फलतः जहाँ पुरानी संचित मित्रता थी, वह टूट जाती है और बेकार का विग्रह मनोमालिन्य खड़ा होता है। इस झंझट में स्वयं न पड़ कर दूसरों को, अधिक आतुर लोगों को उस स्थान पर खड़ा करना चाहिए और अपने प्रतिनिधि के रूप में वे कार्य करने चाहिए जो उचित एवं आवश्यक हैं।
समाज सेवा के क्षेत्र में सबसे बड़ा काम जन मानस का परिष्कार है। इस हेतु प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत चलाये गये कार्यक्रमों की पूर्ति में जुटाना चाहिए। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का निर्धारित लक्ष्य यदि पूरा किया जा सके तो समझना चाहिए कि कायाकल्प जैसा परिवर्तन हुआ और उसके फलस्वरूप वह माहौल बना जिस कारण मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा हो सकेगा।
रचनात्मक कामों में जन्मदिवसोत्सव और झोला पुस्तकालय की दो प्रक्रियाएं ऐसी हैं जो देखने में सामान्य प्रतीत होते हुये भी व्यक्ति निर्माण और परिवार निर्माण की अति महत्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पन्न कर सकती हैं। यद्यपि इनमें अन्य काम करते हुये बचा हुआ समय लगाने के ही प्रयास नियमित रूप से चलता रह सकता है एवं उनका प्रभाव परिणाम हाथों हाथ देखा जा सकता है। दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखना भी ऐसा कार्य है जो हर रास्ता चलते को प्रभावित करता है।
अपने समाज में प्रचलित अनेक बुराइयों में सबसे बुरी और बड़ी है- दान-दहेज वाली खर्चीली शादियों की धूमधाम। इससे बाल विवाहों की भी बढ़ोत्तरी होती है और दोनों परिवारों की इस प्रदर्शन में बर्बादी भी हो जाती है। इस तथ्य को जन साधारण को समझने-समझाने की स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए और ऐसे सामूहिक विवाह कराने चाहिए जिनमें दहेज, जेवर, बारात, धूमधाम जैसी विडम्बनाओं का नाम भी न हो। इस आन्दोलन के लिए अभिभावकों और विवाह योग्य बालक बालिकाओं से प्रतिज्ञा पत्र भराये जाने चाहिए। जहाँ यह निर्वाह हो रहा हो, उन्हीं में अपनी उपस्थिति रखनी चाहिए अन्यथा विरोध में असहयोग तो किया ही जा सकता है। ऐसे आयोजन किन्हीं शुभ दिनों में सामूहिक रूप से करते रहने चाहिए, जिनसे दोनों पक्षों को सम्मान भी मिले और साथ ही दर्शकों के मन में उसी का अनुकरण करने का उत्साह भी उत्पन्न हो। यह अपने समाज की भारी समस्या और विपत्ति है। उसके समाधान में यदि हम सब जुट सकें तो इतने भर से विचारशीलता की वृद्धि और आर्थिक बर्बादी की रोकथाम का बड़ा काम हो सकता है।
इसी के समतुल्य शिक्षा संवर्धन भी है। बड़ों के लिए प्रौढ़शालाएँ और स्कूली बच्चों के लिए बाल संस्कार शाला, व्यायामशाला जैसे सरंजाम जुटाये जा सकें तो सामाजिक प्रगति का स्वरूप अविलम्ब निखर सकता है। हमें ऐसे ही कार्य में संलग्न होकर अपना सेवा भावी नेतृत्व अर्जित करना चाहिए।
अनाड़ी को समझाना आसान है। ज्ञानवान को समझाना और भी आसान है पर जो अहंकार में इठा फिरता है उसे कुछ भी समझाना कठिन है।
क्रान्तियाँ तलवारों से नहीं आदर्शों से होती हैं। जो मात्र तलवार से पायी जाती हैं। चह तलवार से छिन भी जाती हैं।
जीवन का लक्ष्य है- आन्तरिक परिशोधन, साहस और परमार्थ। जो उन्हें पकड़े रहता है वह मार्ग से भटकता नहीं।
गुरूपर्व पर आकांक्षा की अभिव्यक्ति
उन दिनों दुहरे उत्तरदायित्व सामने थे। लंका दमन और राम-राज्य संस्थापन। इन्हीं को दूसरे शब्दों में दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन भी जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों ने अपना केन्द्र लंका दण्डकारण्य आदि को बनाया था, पर उनका प्रभाव व्यापक क्षेत्र में फैल चुका था। समर्थता का प्रभाव ही ऐसा होता है कि वह दुर्बलों को भय या प्रलोभन से अपना वशवर्ती कर लेती है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो तथाकथित बड़ों का अन्धानुकरण करते हैं और जैसा भी कुछ भला बुरा प्रवाह बहता है, उसी के साथ हो लेते हैं। तिनके आँधी की दिशाधारा में ही उड़ते चले जाते हैं। उन दिनों सभी ने असाधारण दैत्यों के सामने सिर झुका दिये थे और उन्हीं के पीछे चलने लगे थे। इसलिए प्रथम कार्य उस भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट चरित्र का उन्मूलन करना था। दूसरा वह जिससे मानवी गरिमा के अनुरूप वातावरण बने और हँसती-हँसाती सुख चैन की जिन्दगी जीने का अवसर मिले। इसे सतयुग की वापसी, रामराज्य संस्थापन अथवा युग सृजन कह सकते हैं। काम दोनों ही एक से बढ़कर एक महत्वपूर्ण थे। किये दोनों ही जाने थे। न इनमें से किसी एक को कर गुजरना भर पर्याप्त होता और न किसी को छोड़ा जा सकता था। इसलिए महाकाल ने अपने प्रतिनिधि भेजे और दोनों को ही साथ-साथ सम्पन्न करा दिया।
दोनों ही कार्य एक दूसरे से कठिन थे। पहला चरण तो महा कठिन। दुर्दान्त असुरों से कौन जूझे? प्राणों की बाजी, प्रत्यक्ष लाभ न दीखने पर भी कौन लगाए? सीता हरण के उपरान्त लंकादमन आवश्यक हो गया था, पर दैत्यों से जूझने में तो विपत्ति है। मनुष्य हानि-लाभ का हिसाब जोड़ता और तब फूँक-फूँक कर कदम बढ़ाता है। अयोध्या से लेकर मिथिला तक राज्याध्यक्ष और बड़ी-बड़ी सेनाओं के नायक विद्यमान थे। पर कहीं से पता नहीं खड़का। रावण से लड़ने की- लंका पर चढ़ाई करने की किसी में भी हिम्मत न थी।
स्वर्ग के देवताओं ने सोचा कि हमें देवासुर संग्राम का अनुभव है और समय की प्रचण्ड पुकार भी हमें बुला रही है। हमें आगे चलना व मोर्चा संभालना चाहिए। उन सब ने रीछ-वानरों का स्वरूप बनाया और वे सुग्रीव-हनुमान-जाम्बवन्त की सेना में भर्ती हो गए। अंगद और नल-नील के साथी बनकर वे सभी अपना पुरुषार्थ दिखाने लगे। लंका विजय के उपरान्त अयोध्या लौटने के उपरान्त गुरु वशिष्ठ का इस दल से परिचय कराते हुए श्रीराम ने कहा- “यह सामान्य शरीरधारी असाधारण काम कर चुके हैं और मुझे भरत के समान प्रिय हैं” विजयोत्सव मनाने के उपरान्त वे राम राज्य स्थापना के रचनात्मक कार्यों में लगे और उस पूर्ति के उपरान्त ऊर्ध्व-उत्कृष्ट उस लोक को वापस चले गए, जिसे स्वर्ग के नाम से जाना जाता है।
घटनाक्रम की पुनरावृत्ति फिर होती है। सारी दुनिया में लंका पसर गई और कुंभकरण मेघनाद से लेकर खरदूषण, मारीचि अपने-अपने ढंग के माया जाल बिछाए बैठे हैं। शालीनता की, सज्जनता की, न्याय-विवेक की कमर टूट गयी है और नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्षेत्र में अनाचार पूरी तरह संव्याप्त है। देवसंस्कृति का- मानवी गरिमा का- अपहरण सीता की तरह हो गया है। इस स्थिति में असुरता उन्मूलन का सरंजाम जुटाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। पर इस संघर्ष के लिए जुझारू योद्धा कहाँ से आएँ? लालची और विलासी नरपशुओं के बलबूते का यह काम नहीं। वे तात्कालिक लाभ छोड़कर आदर्शों के लिए त्याग-बलिदान की बात सोच भी नहीं सकते। इस प्रयोजन के लिए देवलोकवासी देवमानव ही चाहिए। भले ही वे प्रत्यक्षतः रीछ वानरों की तरह दुर्बल और साधन हीन प्रतीत होते हों। बल तो आत्मा में होता है, सो उनकी बलिष्ठ निकली। विजय तो होनी ही थी, समय तो बदलना ही था, अनाचार का पराभव सुनिश्चित था। भवितव्यता होकर रही। श्रेय के अधिकारी रीछ-वानर बने और एक दृष्टि से वे अजर-अमर हो गए।
यह उदाहरण प्रज्ञा परिवार के परिजनों पर पूरी तरह लागू होता है। युग संस्करण में दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन ही लंका-दमन है और सत्प्रवृत्ति संवर्धन को राम राज्य की स्थापना कहा जा सकता है। दोनों कार्य एक दूसरे से गुँथे हुए हैं। डाक्टर आपरेशन करके मवाद निकालता भी जाता है और साथ ही घाव भरने के लिए मरहम पट्टी का भी प्रयोग करता है। समय यही कर रहा है और उस कर्त्तव्य का श्रेय उन उँगलियों को मिल रहा है, जिन्हें अपने शब्दों में प्रज्ञा परिजन कह सकते हैं।
प्रज्ञा परिवार के साथ जुड़े हुए 24 लाख के लगभग व्यक्ति हैं। पर इनमें से पाँच लाख ऐसे हैं जो हिन्दी सहित विभिन्न भाषाओं में छपने वाली पत्रिकाओं के ग्राहक व नियमित पाठक हैं। वे उस देववाणी का एक-एक अक्षर हृदयंगम करते और जीवन-व्यवहार में उतारते हैं। इन्हीं के समर्थन-सहयोग से इतना बड़ा मिशन आकाश-पाताल चूम रहा है। उस रत्नराशि में से कुछ बड़े हीरे छाँटे गए हैं, जिनकी संख्या एक लाख निर्धारित की गई है। गुरुपूर्णिमा के अवसर पर ये पंक्तियाँ विशेष रूप से इन्हीं को संबोधित करके लिखी गई हैं। उस दिन जो शाँति कुंज में उपस्थित थे, उनने इस कथन को मुख से बोले जाते व कानों से सुने जाते भी अनुभव किया है।
कथन का प्रथम निष्कर्ष यह है कि वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्र अपने को देव मानव समझें और अनुभव करें कि यह जन्म उन्हें सम्पदा एवं विलासिता के व्यामोह में डूबे रहने के लिए नहीं मिला है। नियति का निर्धारण यह है कि वे युग की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने आपको भीम-अर्जुन समझें, अंगद-हनुमान मानें और वह करें जो नल-नील द्वारा असंभव को संभव करके दिखा दिया गया था।
प्रज्ञा पुत्रों को इस आपत्ति काल में लालसा, लिप्सा, तृष्णा, वासना और अहंता की महत्वाकांक्षाएं पूरी करने की छूट नहीं है। उन्हें दूसरा प्रयोजन देकर भेजा गया है, उसी को तत्परतापूर्वक करना है- सफलता-असफलता का, लाभ-हानि का विचार किए बिना। क्योंकि महाभारत विजय की तरह पाण्डवों की जीत निश्चित है। इससे पीछे हटकर अपयश ही कमाया जा सकता है, अपना लोक-परलोक ही बिगाड़ा जा सकता है। अच्छा हो कि ऐसा अवसर न आए। अच्छा हो कि यह सुनने के लिए, यह देखने के लिए कान व नेत्र, सक्रिय न रहें कि जिनके ऊपर आदर्शवादिता और उत्कृष्टता को जीवन्त रखने का दायित्व था, वे परीक्षा की घड़ी आने पर खोटे सिक्के की तरह काले पड़ गए और कूड़े के ढेर में छिप गए।
अवतार व्यक्ति के रूप में नहीं आदर्शवादी प्रवाह के रूप में होते हैं और हर जीवन्त आत्मा को युग धर्म निबाहने के लिये बाधित करते हैं।
युग संधि को पूरा होने में अभी 14 वर्ष का समय शेष है। इतनी अवधि राम ने अज्ञातवास में काट ली थी और पाण्डवगण भी निर्वासित स्थिति में रह लिए थे। प्रज्ञा परिजनों को भी इतना समय उसी प्रकार नवसृजन के लिए उत्सर्ग करना चाहिए, जिस प्रकार कि बुद्ध के परिव्राजकों और गाँधी के सत्याग्रहियों ने बिना लोभ-लालच की ओर मन डुलाए कष्ट के दिन हँसते हुए बिताये। क्या करना होगा? इसके लिए अनेक बार बताया जा चुका है कि इस अवधि को गृहस्थ ब्राह्मणों और विरक्त सन्तों की तरह लोक मानस के परिष्कार में, घर-घर अलख जगाने में, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की विचारक्रान्ति में और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के पुण्य-परमार्थ में नियोजित किया जा सकता है। प्रश्न अनुदान-योगदान का है। जिसने इसे स्वीकार कर लिया, उसके लिए समय और अंशदान कोई समस्या नहीं। उसे तो सुदामा के तंदुलों और शबरी के बेरों की तरह कोई भी प्रस्तुत कर सकता है। शरीर से बालू चिपटाकर समुद्र पाटने का दुस्साहस करने वाली गिलहरी से अधिक गई-गुजरी स्थिति में हम में से कोई भी नहीं है। कृपणता तो पापी मन में घुसी रहती है। वही चित्र-विचित्र, बहाने गढ़ती और व्यस्तता असमर्थता की आड़ ढूँढ़ती है।
छोटे बच्चों को स्तनपान, गोदी चढ़ना, कंधे पर बैठना प्रिय लगता है। वे लेमनचूस, टॉफी, चुइंगगम, गुब्बारा, बिस्किट आदि के लिए मचलते हैं। अभिभावक यथा शक्ति उनकी इन इच्छाओं को पूरा करते हुए हर्ष और संतोष भी अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं, जब वे बड़े हो जाते हैं, उनके लिए स्कूली ड्रेस, फीस, चिकित्सा, साइकिल आदि का भी प्रबन्ध करते हैं। अधिक समर्थ हो जाने पर उनके विवाह में ढेरों पैसा भी लगाते हैं। व्यवसाय जमाने के लिए पूँजी का प्रबन्ध करते हैं। अगला समय ऐसा भी आता है कि तिजोरी से लेकर प्रतिष्ठा तक सारा वैभव बच्चे को हस्तान्तरित कर देते हैं।
गुरुपूर्णिमा के अवसर पर यह आश्वासन पड़ौसी, संबंधी 24 लाख के लिए न सही, प्राणप्रिय आत्मीयता अनुशासन निबाहने वालों के लिए तो है ही कि उनकी साँसारिक कठिनाइयाँ, समस्याएँ, चिन्ताएँ, आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हम पहले की अपेक्षा अधिक कुछ करते रहेंगे। क्योंकि अपनी पूंजी एवं सामर्थ्य पहले की अपेक्षा कुछ बढ़ी है। दूध पास में न हो तो द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा को खड़िया मिट्टी का दूध पिला देते थे पर जिन नन्द बाबा के यहाँ एक लाख गाएँ थीं। वे अपने कन्हैया को माखन खाने और सखाओं में बाँटने पर रोकथाम क्यों करते? उनने ऐसी कृपणता बरती भी नहीं। अपना मन भी कृपण नहीं है। जिनने लम्बे समय तक संपर्क बनाए रखा है, वे इस तथ्य को जानते भी हैं कि आत्मीयता और उदारता हमारी नस-नस में रक्त प्रवाह की तरह भरी है। इन दिनों हमें विशिष्ट साधना में संलग्न रहना पड़ रहा है। संपर्क की सुविधा में कटौती हुई है। फिर भी इतना निश्चित है कि हम अपनों की पहचान भूले नहीं हैं। किसकी सहायता करनी चाहिए, किसके लिए क्या करना चाहिए, यह वात्सल्य अभी भी टूटा नहीं है। आशा की जानी चाहिए कि प्राणों में घुली यह विशेषता भविष्य में भी ज्यों की त्यों बनी रहेगी। उनमें कमी आने का तो प्रश्न ही नहीं है। शरीर बदलना पड़े, तब भी इस स्थिति में अन्तर आने वाला नहीं है।
मनुष्य पहले अपनी प्रत्यक्ष आवश्यकताओं पर सोचता है और उसी निमित्त तृप्ति और तुष्टि चाहता है। आदर्शों की, कर्तव्यों की बात तो बाद में सूझ पड़ती है। परिजनों को हम बच्चों के रूप में देखते रहे हैं। माताजी कभी चौबीस लाख शिशुओं की, पाँच लाख बालकों की और एक लाख समर्थों की गणना करती हैं तो साथ ही यह भी सोचती हैं कि इनमें से किन के लिए क्या किया जाना चाहिए? किसको क्या दिया जाना चाहिए? इस संबंध में इतना आश्वासन तो हर किसी को दे सकने की अपनी स्थिति है कि वे स्वावलम्बी रहेंगे और सुखी, सुसंस्कारी भी। उनकी हँसी-खुशी में कोई कटौती न कर सकेगा। उनका पुण्य कम पड़ रहा होगा तो हम अपने में से काटकर उसकी पूर्ति करते रहेंगे। रक्ताल्पता की स्थिति में समर्थ अपना रक्त दान करते और आवश्यकता वाले को चढ़ाते हैं। मुसीबत से छुड़ाने के लिये कई लोग कर्ज लेकर, घर बेचकर भी संकट से मुक्ति पायी जाती है। यह स्थिति हमारे परिवार में किसी को न आये और आनी हो तो उसकी किसी अदृश्य प्रकार से क्षतिपूर्ति होती रहे, इसका हम पूरा ध्यान रखेंगे। दिये गये वचनों का अभी तक पालन करते रहे हैं, तो जीवन के इस अन्तिम अध्याय में भी उस पर उँगली न उठने देंगे। रामकृष्ण परमहंस ने इतने वरदान आशीर्वाद दे डाले थे कि उनने जमा खर्च पूरा करने के लिए मरते समय गले के कैन्सर का कष्ट सहन किया था। अपने सामने कोई ऐसा संकट नहीं है। पर यदि हो भी तो अपने बच्चों को सुखी बनाने के लिए, प्रसन्न रखने के लिए हम उत्साह एवं उल्लासपूर्वक सहन करेंगे। अपने आत्मीयों को इस गुरुपर्व पर हमारा सुनिश्चित आश्वासन है कि उन्हें, उनके परिवार को सुखी समुन्नत बनाने में माता जी समेत हम पूरी तत्परता के साथ संलग्न रहेंगे। जो कुछ भी संभव है, उसमें रत्ती भर भी कमी न रखेंगे। इस आधार पर परिजनों में से प्रत्येक अपने उज्ज्वल भविष्य के निर्माण निर्धारण में हमारे परिपूर्ण मार्ग-दर्शन-योगदान की आशा कर सकता है।
जो तुम्हें बुरा लगता है उसका समर्थन, अनुमोदन भी न करो।
सद्गुण चिथड़ों में भी उतने ही चमकते हैं जितने कि मखमली वेषभूषा में।
सभी को ईश्वर श्रेष्ठ उत्तरदायित्व सौंपता है, पर प्रसन्न उन्हीं पर होता है जो उन्हें निभाते हैं।
हर बाप चाहता है कि उसका बेटा उसकी अपेक्षा अधिक बड़ा आदमी बने। हर माँ चाहती है कि उसकी बेटी उसकी तुलना में अधिक सुखी रहे। हमारी आन्तरिक भावना ही नहीं, चेष्टा भी यही है कि प्रज्ञा-परिजनों को वह सुयोग मिले, जिसके आधार पर वे महामानवों में गिने जा सकने की स्थिति तक पहुँचें और इतिहास के पृष्ठों पर अपने अन्तिम चिन्ह छोड़ जायँ।
एक चीज हमारे मन में है उसे लेने वाला कोई हो, ऐसा जी ललचाता है। गाय थनों में दूध भरे फिरती है और उन्हें खाली करने के लिए बच्चे को रंभा-रंभाकर ढूँढ़ती और पुकारती है। हमारे पास कुछ ऐसा भी है, जो उच्चस्तरीय है और हमारे मार्ग दर्शक ने समूची अनुकम्पा समेट कर हमें दी है। उसे साथ लेकर नहीं मरना चाहते, वरन् यह चाहते हैं कि उस पारस मणि का प्रियजन भी लाभ उठावें जो हमें सौभाग्य वश मिली है। यह स्वाति बूँद की तरह बरसी और नगण्य-सी सीप के पेट से बहुमूल्य मोती उगाने में समर्थ हुई है।
यह दैवी अनुग्रह है- “नेतृत्व”। हमें एक समग्र नेता के रूप में जीवन-यापन करने का अवसर मिला है। अपने अन्तःकरण को मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को हमने ऐसी दिशा दी है जिसके सहारे व्यक्तित्व को ब्राह्मणोचित बनने का- ब्राह्मी-सम्पदा से लद जाने का अवसर मिला है। अपने आपे का- वैभव, वर्चस्व और साधनों का हमने उच्चस्तरीय उपयोग किया है। एक शब्द में हम अपने आपके नेता बनकर जिये हैं। इसके अतिरिक्त 24 लाख परिजनों के माध्यम से कोटि-कोटि मनुष्यों को प्रेरणा, प्रकाश, अभ्युदय और ज्ञान विज्ञान से भरपूर बनाया है। प्रज्ञा परिवार की संगठना, प्रज्ञापीठों की संरचना, युग साहित्य की सर्जना तथा विश्वविद्यालय स्तर की प्रशिक्षण क्षमता का परिचय दिया है। उन घटनाओं और कृतत्त्वों का उल्लेख करना इन पंक्तियों में अनावश्यक होगा, जिन्हें परिजनों में से सभी निजी तौर पर जानते हैं और अनुभव करते हैं कि निशा-निराशा के वातावरण में एक ऐसी चाँदनी उगी जिसने सुदूर क्षेत्र में प्रकाश उत्पन्न करके भटके हुए लोगों को मार्ग दिखाया। इतना ही नहीं, दलदल में फँसे हुओं को उखाड़ा, उछाला और इस योग्य बनाया कि वे अन्यायों को भी सहारा दे सकें। इस क्षमता को दूसरे शब्दों में नेतृत्व भी कह सकते हैं। यह हमें मिला है। आकाँक्षा यह है कि अपने स्वजन सम्बन्धियों में से प्रत्येक को यह सम्पदा हस्तगत हो। उसकी क्षमता, अभिरुचि एवं कार्य पद्धति ऐसी हो जिसे युग नेतृत्व के रूप में देखा और सराहा जा सके।
मनुष्यों पशुओं से इसलिए अधिक श्रेष्ठ है कि उसमें बुद्धिमत्ता और भावना की विशेषता रहती है।
जो पुस्तकें तुम्हें अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं, उनको ही जानदार मानो।
कायर केवल नीति की बातें करते हैं बहादुर उसकी रक्षा के लिए मिटते हैं।
दृष्टि के अनुरूप सृष्टि बनती है। अपनी दृष्टि बदलो ताकि नई सृष्टि का दर्शन और संपर्क ले सको।
सिंह, हाथी अपनी शक्ल-सूरत व सामर्थ्य वाले बच्चे जनते हैं। हमारी आन्तरिक अभिलाषा एक ही है जो हमें अपना समझते हैं, जिन्हें हम अपना समझते हैं, वे युग नेतृत्व करें। अपने आपको आदर्शों के राजमार्ग पर चलाएँ और नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्षेत्र में प्रगतिशीलता की क्रिया-प्रक्रिया अपनायें। समर्थ नाविक की तरह अपनी मजबूत पतवार वाली नाव पर बिठाकर स्वयं पार हों, अन्यान्य असंख्यों को पार लगाएँ, ऊँचा उठाएँ और ऐसा वातावरण बनायें जिससे सर्वत्र बसन्त-सुषमा बिखरी दृष्टिगोचर हो।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है, आरण्यक पद्धति से गुरुकुलों में शिक्षण एवं समाज को ऊँचा उठाने वाले नर रत्नों का सृजन। ऋषि परम्परा के आश्रमों में ज्ञान, विज्ञान ही नहीं पढ़ाया जाता था, अपितु व्यक्तित्व को उभारने की प्रक्रिया भी सम्पन्न होती थी। संदीपन आश्रम में कृष्ण एवं सुदामा का, विश्वामित्र के गुरुकुल में राम एवं लक्ष्मण का, दुर्वासा ऋषि के आश्रम में परशुराम का, धौम्य ऋषि के पास भागीरथ का एवं अपने पिता लोमश ऋषि के पास शृंगी ऋषि के सर्वांगपूर्ण शिक्षण-प्रशिक्षण के उदाहरण उसी परम्परा के परिचायक हैं।
शिक्षा, पत्राचार विद्यालय भी देते हैं और ट्यूशन मास्टर लगाकर घर पर भी पढ़ा जा सकता है। किन्तु वह प्रशिक्षण कुछ और ही है जो मस्तिष्क, हृदय, प्राण और अन्तःकरण तक पहुँचता एवं शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच आदान-प्रदान करता है। जीवन्त व्यक्तित्व और ऊर्जा भरा वातावरण कुछ ऐसा प्रभाव छोड़ता है जिसे अनुदान स्तर का कहा जा सके। आग से सट जाने पर ईंधन जलने लगता है। बाढ़ में नाव तैरने लगती है। घटाएँ जिस भी खेत पर बरसती हैं, उसी में कीचड़ बहार देने लगती है। यह संपर्क का प्रभाव है। शिक्षण संकेत मात्र से यह प्रयोजन पूरे नहीं होते। गुरुकुलों और आरण्यकों की खदानें नर रत्न उगलती थीं। उन्हीं परम्पराओं का निर्वाह सप्तऋषियों की तपस्थली पर बना शान्ति कुंज कर रहा है।
इन दिनों शान्ति कुंज नालन्दा, तक्षशिला विश्व विद्यालयों के स्तर का काम कर रहा है। एक लाख वरिष्ठ परिजनों को युग नेतृत्व कर सकने की समर्थता प्रदान करने वाली शिक्षा का क्रम यहाँ चल रहा है। जागृत आत्माओं को समय रहते इसमें सम्मिलित एवं लाभान्वित होने के लिए आग्रह किया जा रहा है। इसे गुरु पूर्णिमा का निमंत्रण आह्वान माना जाय और प्रस्तुत अवसर से लाभान्वित होने में चूका न जाय। अग्रिम पंक्ति में खड़े होने वाले मूर्धन्यों में वे सभी गिने जाने योग्य होने चाहिए, जो इन पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़ रहे हैं।
सुसंस्कारी आत्माओं में से प्रत्येक से इस वर्ष कहा गया है कि वे अपना निजी प्रज्ञा प्रशिक्षण एक वर्ष के भीतर पूरा करने के लिए समय निकाल लें, ताकि पुराने परिपक्व प्रथम पंक्ति में निश्चिन्त हो लें। इसके बाद के शेष 14 वर्ष नई पीढ़ी के लिए है। विश्व की वर्तमान 480 करोड़ आबादी अगले 14 वर्षों में लगभग सात सौ करोड़ हो जायेगी। तब अपना कार्यक्षेत्र भारत की बीस भाषाओं तक सीमित न रह कर समस्त विश्व की 600 से भी अधिक भाषाएँ बोलने वाली जनता तक फैल जायेगा। अतएव युगसृजेताओं की आवश्यकता बढ़ती ही जायेगी और उसकी पूर्ति के लिए अपनायी जाने वाली तत्परता भी। अस्त हममें से किसी को भी पिछली पंक्ति के लिए मुहूर्त नहीं निकालना चाहिए, वरन् समय रहते निपट लेना चाहिए, ताकि अगली पंक्तियों, पीढ़ियों के लिए जगह खाली मिल सके। आशा की गई है कि इस गुरु पर्व पर जो अदृश्य का आमंत्रण सुन-समझ सके होंगे, वे इस अवसर का लाभ उठाने के लिए प्राथमिकता देंगे और आतुर कदम बढ़ायेंगे।
समृद्धि के समय मित्र तो बहुत बनते हैं। पर उनमें से सच्चा कौन है? यह संकट के समय ही जाना जाता है।
वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों को मिशन का मूर्तिमान संदेशवाहक बनना चाहिए और अपने परिचय क्षेत्र में जो भी मिशन से अवगत परिजन हों, उन्हें जगाना-झकझोरना चाहिए, निष्क्रिय न रहने देकर सक्रियता अपनाने के लिए बाधित करना चाहिए। उन्हें प्रस्तुत प्रज्ञा प्रशिक्षण की महत्ता उपयोगिता समझाते हुए इस सुयोग से लाभान्वित होने के लिए तत्पर करना चाहिए। मिशन की महती आवश्यकता यह है कि बड़ी संख्या में प्राणवान प्रतिभाएँ अग्रिम पंक्ति में खड़ी हो सकने योग्य बनें और नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्राँति के साथ जुड़े हुए अनेकानेक कार्यक्रमों को जादुई फुर्ती के साथ सम्पन्न करें। इसके लिए प्रारंभिक उपाय शाँति कुंज की प्रशिक्षण योजना में उत्साह भरी भागीदारी ग्रहण करना है। आश्रम यों इन दिनों भी भरा रहता है, फिर भी अगले दिनों उसमें वृद्धि होने की ही आशा-अपेक्षा की जाती है।
दूसरा कार्य इसी शृंखला में एक और भी है कि जो भी शिक्षार्थी शाँति-कुँज के एक मासीय प्रज्ञा प्रशिक्षण में सम्मिलित होकर लौटें, वे अपने-अपने यहाँ इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए एक सामयिक पाठशाला प्रशिक्षण सत्र के रूप में चलाएँ। अपने गाँव, नगर अथवा समीपवर्ती लोगों को एकत्रित कर वैसा ही प्रशिक्षण सत्र चलायें जैसे कि बड़े रूप में हरिद्वार में चलता है।
सभी प्रज्ञा पुत्रों के सामने इन दिनों लक्ष्य रहे कि वे अधिक-से-अधिक पौत्र पैदा करें। यहाँ तात्पर्य संतानोत्पादन से नहीं है, वरन् यह है कि जिस प्रकार बुद्ध को आत्म ज्ञान देने वाले बोधि वृक्ष-अश्वस्थ की टहनियाँ काट-काट कर लोग संसार भर में ले गये थे और भक्तजनों ने अपने-अपने यहाँ उसको पाल पोसकर नया वृक्ष खड़ा किया था। ठीक उसी भाँति केन्द्रीय प्रज्ञा-प्रशिक्षण का बोधिवृक्ष लाखों टहनियों में आरोपित किया और पोसा-बढ़ाया जाना चाहिए। यह इसी प्रकार हो सकता है कि ये क्षेत्रीय प्रज्ञा पाठशालाएँ न केवल बौद्धिक शिक्षण की आवश्यकता पूरी करें, वरन् अपने निकटवर्ती दस गाँवों में भी उसका प्रभाव उत्पन्न करें।
एक छोटा जनरेटर भी दस गांवों को रोशनी दे सकता है। एक मँझोला बाँध दस गाँवों की भूमि सींचकर हरी-भरी कर सकता है। तब कोई कारण नहीं कि एक प्रज्ञा पाठशाला छोटे, किन्तु सुदृढ़ संगठन के रूप में परिणत न हो सके और निर्धारित दस-सूत्री कार्यक्रम की शानदार ढंग से पूर्ति न कर सके।
सघन क्षेत्रों में तीन-तीन मील चारों दिशाओं में परिधि बना लेने पर उसमें छोटे-बड़े दस गाँव आसानी से आ जाते हैं। विरल आबादी में कम गाँव भी हो सकते हैं। तीन मील का वर्ग दायरा या दस गाँव इन दिनों में से जो सुविधाजनक पड़ता हो, उस क्रम को अपना लेना चाहिए। कस्बे और नगरों में गाँवों का स्थान मुहल्ले ले सकते हैं। दस मुहल्लों का एक यूनिट बना कर काम करते रहा जाय, तो बेकाबू बिखराव की अपेक्षा यह सुनियोजित कहीं अच्छा रहेगा।
यह प्रक्रिया इस प्रकार से सुनियोजित है कि उस आधार पर किसी क्षेत्र या समुदाय को निश्चित रूप से पूरी तरह सुगठित किया जा सकता है। बन्दर जैसी छलाँगें लगाते हुए इस पेड़ से उस पेड़ पर जा पहुँचना कौतुक-कौतूहल भर है। इसमें आत्मश्लाघा की झलक है कि हमने इतने विस्तार में उछल कूद की। किन्तु ऐसे कार्य पानी के बबूले की तरह क्षण उभरते और दूसरे ही क्षण तिरोहित हो जाते हैं।
अन्तःकरण जितना भ्रष्ट होता जाता है, बुद्धि का वैभव उतना ही संकीर्णता अपनाता जाता है।
हर वर्ष समर्थ शाखाऐं अपने यहाँ वार्षिक प्रज्ञा आयोजन करती हैं और उसके लिए शान्ति कुंज से प्रचारक जीप गाड़ियाँ बुलाती हैं। उनमें पाँच वक्ता प्रचारक वाद्य यंत्र, लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर, विद्युत उत्पादक यंत्र, यज्ञशाला प्रवचन मंच आदि सभी आवश्यक उपकरण साथ रहते हैं। 48 घंटे के कार्यक्रम में दो बार यज्ञ, दो बार संगीत प्रवचन और एक मध्याह्न को कार्यकर्ताओं की विचारगोष्ठी सम्पन्न हो जाती है यह उपक्रम अत्यंत ही लोक प्रिय हुआ है और जहाँ भी जागृति के चिन्ह हैं वहाँ सभी स्थानों से वर्ष में एक बार ऐसे आयोजनों की माँग रही है। इससे केन्द्र और शाखा के बीच विचार विनिमय का आदान-प्रदान भी भली भाँति चलता है। साथ ही वह मार्ग दर्शन भी मिलता है, जिससे बदले हुए समय के अनुरूप हमें अपने में, अपने क्षेत्र में, कार्यक्रम में क्या परिवर्तन करना चाहिए। केन्द्र और शाखा का यह मिलन क्रम, एक प्रकार से बादल बरसने, बसन्त ऋतु उतरने जैसा उल्लास भरा नवजीवन से परिपूर्ण वातावरण बनाता है।
इसी मिलन क्रम को नया रूप देते हुए इस वर्ष जीप कार्यक्रमों में थोड़ी कटौती की गई है और सारा ध्यान इस धुरी पर केन्द्रित किया गया है कि वरिष्ठ कार्यकर्ता शान्ति कुँज एक महीने का प्रशिक्षण प्राप्त करने आवें। तथा यहाँ से लौटने के उपरान्त अपने यहाँ छोटे रूप में वैसी ही प्रशिक्षण पाठशाला चलायें जिसे शान्ति कुंज के बड़े प्रशिक्षण का छोटा रूप कहा जा सके।
इसके लिए प्रयत्न यह चलना चाहिए कि अपने यहाँ के समीपवर्ती क्षेत्र के जो भी उत्साही शिक्षित नर-नारी हैं उन सब से संपर्क साधकर प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा स्थानीय प्रज्ञा पाठशाला में सम्मिलित रहने के लिए नये व्यक्तियों को तैयार किया जाय। चूँकि सभी को अपने-अपने घरेलू काम भी करने होते हैं। इसलिए सवेरे दो घण्टे- शाम को दो घण्टे मिलाकर इस पाठ्यक्रम को चार घण्टा प्रतिदिन का बनाया जा सकता है। यह एक व्यवस्था हुई जिसमें वहीं के व्यक्तियों का शिक्षण वहाँ के ही वरिष्ठ परिजनों द्वारा होगा।
इसमें बाहर के अध्यापकों की भी आवश्यकता पड़ सकती है। कारण कि स्थानीय लोगों का सहयोग तो प्रमुख होता है, पर अध्यापक केन्द्र की ओर से आने पर उत्साह नये सिरे से उभरता है। इस वर्ष जीप टोलियों में की गयी कमी की पूर्ति वरिष्ठ स्तर के दो-दो अध्यापकों टोलियों द्वारा होगी एवं सभी समर्थ शाखाओं में पन्द्रह दिवसीय क्षेत्रीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने के लिए केन्द्र से यह भेजी जाएगी। चार घण्टे नित्य पाठशाला चलेगी। जिनके पास अधिक समय होवे उस समय में पाठशाला कक्ष में अभ्यास करेंगे। जहाँ ऐसे व्यक्तियों की संख्या अधिक होगी, वहाँ मध्याह्न में भी सुनियोजित प्रशिक्षण चलाया जा सकता है। इस प्रकार शान्ति कुँज के समग्र प्रशिक्षण की तुलना में समय की दृष्टि से क्षेत्रीय प्रशिक्षण आधा-चौथाई होने पर भी उसे सार संक्षेप एवं काम चलाऊ कहा जा सकेगा। भावी अभ्यास के लिए उतने से भी गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगेगी। प्रारम्भिक धक्का केन्द्र से आए प्रशिक्षकों द्वारा लगाने के बाद वह क्रम फिर नियमित चलने लगेगा। क्षेत्र में नई चेतना जागेगी एवं नये व्यक्ति मिशन से जुड़ने लगेंगे।
शान्ति कुँज के सत्रों में जो होकर गये हैं और जिनने अध्यापन स्तर की क्षमता उत्पन्न कर ली है, उन सबसे नये सिरे से दो महीने का समयदान देने के लिए आग्रह किया जा रहा है। इतने में वे समीपवर्ती तीन पाठशालाओं का अध्यापन कार्य कर लेंगे। पाँच दिन आने जाने तथा वहाँ की प्रारम्भिक व्यवस्था जमाने के लिए रखे गये हैं। सत्र 15 दिनों का होते हुए भी अध्यापकों को बीस दिन ही लगा करेंगे। साठ दिन एक साथ या बीस-बीस दिन तीन बार देकर वे इस सत्र विस्तार योजन के भागीदार बन सकते हैं। जितने प्रशिक्षित स्थायी कार्यकर्ता शान्ति कुँज में हैं उन्हें तो दो-दो की टोली में भेजा ही जाएगा, पर साथ ही यह प्रयत्न भी चल रहा है कि इस वर्ष जिनने एक मास के मई माह से प्रारम्भ हुए युग नेतृत्व सत्र शान्ति कुँज में पूरे कर लिये हैं, उनमें से सुयोग्य प्रतिभाएं अधिक से अधिक संख्या में मिलें और वे हर मंडल में नये कार्यकर्ता उत्पन्न करने उन्हें प्रवचन संगीत यज्ञ कृत्य, जड़ी बूटी चिकित्सा, दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखना, जन्म दिन, झोला पुस्तकालय आदि की क्रिया प्रक्रियाओं में प्रवीणता प्राप्त कर लें।
लोग क्या कहते हैं इस पर ध्यान न दो। सिर्फ यह देखो कि जो करने योग्य था, वह बन पड़ा या नहीं।
जिस प्रकार हरिद्वार में एक महीने में परीक्षा होती है और प्रमाण पत्र मिलता है उसी प्रकार इन क्षेत्रीय प्रज्ञा प्रशिक्षण सत्रों में भी 15 दिन में परीक्षा हो जाया करेगी और केन्द्र की ओर से प्रमाण पत्र दिया जाया करेगा। एक लाख प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार करने के संकल्प को केन्द्रीय तथा स्थानीय सत्र मिल जुलकर पूरा करने पर उतरेंगे तो वह भी अन्य संकल्पों की तरह पूरा होकर रहेगा।
जिन्हें अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशाला चलाने की उमंग है, जो प्रशिक्षण सत्र की व्यवस्था कर सकते हैं, वे अपना प्रयोजन शान्ति कुंज लिख भेजें, साथ ही जो कार्यकर्ताओं के 20-20 दिन के जितने खण्ड अध्यापन कार्य के लिए निकल सकते हों वे भी इसके लिए सूचित करें। पूर्व तैयारी अभी से आरंभ की जा सकती है। कार्यान्वित करने का कदम तो किसी भी दिन उठाया जा सकता है।
यह भी आशा की जा रही है कि प्रज्ञा पाठशालाओं प्रशिक्षण सत्रों का शुभारम्भ सभी प्रज्ञा पीठों और प्रज्ञा मंडलों में भी होने लगेगा। इनकी संख्या भी उतनी ही अपेक्षित है जितने कि प्रशिक्षित परिजन हैं। उनमें से प्रत्येक प्रज्ञा संस्थान को एक प्रशिक्षण क्रम अपने यहाँ तो आरंभ कर ही देना चाहिए। प्रयत्न यह भी करना चाहिए कि उनके संयोजकत्व में एक या दो ऐसे ही प्रज्ञा सत्रों का और भी शुभारम्भ हो।
प्रथम पन्द्रह दिन का शुभारम्भ क्रम चलाने के लिए केन्द्र से दो प्रशिक्षक भेजे जाने की जो व्यवस्था बनी है। उसे एक शुभारम्भ भर कहना चाहिए, अन्त नहीं। पन्द्रह दिन पढ़े छात्रों को अपना अभ्यास वर्षों चलाना और अनुभव वर्षों बढ़ाना होगा। यह कार्य स्थानीय लोगों में से जो अतिरिक्त प्रतिभा एवं उदार साहसिकता वाले हों वे उसे आगे भी चलाते रहें और यह प्रयत्न करते रहें कि हर प्रज्ञा मंडल में जिन गाँवों या मुहल्लों को सम्मिलित किया गया है, उन सब में कुछ दिनों के लिए थोड़े-थोड़े समय की पाठशालाएँ चलें और वे अपनी विशिष्टता को क्रमशः बढ़ाती रहें। हर सत्र या पाठशाला में न्यूनतम बीस या चौबीस व्यक्ति तो होने ही चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति 15 दिनों में इतना सक्षम हो जाएगा कि वह अपना, परिवारजनों एवं अन्यों का जन्म दिवस पर्व एक कुण्डी यज्ञ के माध्यम से मना सके, अपनी झिझक मिटाकर जन संपर्क के लिये अनिवार्य सम्भाषण की क्षमता हस्तगत कर सके, युग-नेतृत्व की क्षमता अर्जित कर सके। एक लाख यज्ञों एवं एक लाख देव मानवों के सृजन का उद्देश्य इसी प्रकार पूरा होगा।
जहाँ भी प्रज्ञा सत्र आयोजित हों अथवा नियमित शिक्षण चले, वहाँ शिक्षण के लिए आवश्यक सामग्री संगीत उपकरण, निर्धारित पाठ्य पुस्तकों के सैट, यज्ञ मण्डप बनाने की सामग्री एवं दृश्य-श्रव्य साधनों को जुटाने की अर्थ-व्यवस्था भी कर लेनी चाहिए। हर छात्र की न्यूनतम चालीस-पैंतालीस रुपये की सामग्री अपने पास रखनी चाहिए, ताकि उसके सहारे अपनी योग्यता बढ़ाने के अतिरिक्त अन्यान्यों को भी सिखाते रहने का क्रम चल सके। केन्द्र से भेजे गए दो अध्यापकों के ठहरने, भोजन-प्रबन्ध की व्यवस्था के अतिरिक्त मार्ग व्यय आदि देने की आवश्यक अर्थ व्यवस्था तो क्षेत्रीय आयोजन समिति को करनी ही होगी।
अगले दिनों जैसे-जैसे मिशन का स्वरूप, क्रियाकलाप एवं विस्तार बढ़ेगा, वैसे-वैसे अधिक जन शक्ति की ही नहीं, साधन शक्ति की भी आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए एक ही सरल उपाय है कि बीस पैसा नित्य वाले ज्ञान घट और एक मुट्ठी अन्न दैनिक रूप से देने वाले धर्म घट बड़ी-से-बड़ी संख्या में स्थापित किये जाएँ। उनकी मासिक वसूली का भी प्रबन्ध हो। इतना ही नहीं, उस राशि के आय-व्यय का पूरा हिसाब हर महीने सदस्यों को सुना समझा दिया जाय, ताकि संदेह, अविश्वास की कहीं कोई गुंजाइश न रहे। इस आधार पर मिशन के वे सभी बढ़ते हुए कार्यक्रम पूरे होते रह सकते हैं, जो दस सूत्री कार्यक्रम के अंतर्गत आते हैं तथा आवश्यकतानुसार और भी अधिक बढ़ाये जा सकते हैं।
गुरु पर्व को आदान-प्रदान का आधार माना जाय। इस वर्ष के उच्चस्तरीय अनुदान में यह आशा की जाय कि वाह्य जीवन की कठिनाइयों को सरल बनाने तथा प्रगति का पथ-प्रशस्त करने का अवसर मिलेगा। साथ ही जीवन को प्रकाश, प्रतिभा से, यश प्रतिष्ठा से भर देने वाली नेतृत्व की क्षमता भी हस्तगत होगी। इसमें आत्म संतोष और आत्म गौरव का भी गहरा पुट लगा हुआ है। इस प्रकार के अनुदान का आश्वासन निश्चित ही साकार होकर रहता है।
निर्धन वह नहीं जिसके पास उपयोग के साधन कम हैं, वरन् वह है जिसकी तृष्णा अधिक है।
निष्ठावान परिजनों को इस अनुदान के बदले कुछ देने की बात भी सोचनी चाहिए। गुरु दीक्षा के बदले गुरुदक्षिणा देनी पड़ती है। यहाँ तो दक्षिणा युग परिवर्तन के निमित्त समयदान, अंशदान के रूप में, लोभ-मोह के पाश से छूटने के रूप में माँगी जा रही है। दीक्षा यों पहले भी कितने ही ले चुके हैं। अब जिनके साथ प्रत्यक्ष संपर्क नहीं है, उन्हें सूक्ष्म रूप में वह अनुदान पहुँचाया जा रहा है। पारस के साथ संपर्क होने पर जंग लगा लोहा भी सोना बन जाता है। ईंधन आग से मिलते ही जलने लगता है। अगले दिनों हमारे व परिजनों के बीच यही आदान-प्रदान की प्रक्रिया चलनी है। मिशन के लिए अधिकाधिक समयदान, अंशदान के रूप में गुरुदक्षिणा की बात सभी को सोचनी चाहिए एवं देव मानव बनने के इस सुयोग को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।
युग के अनुरूप प्रगतिशीलता समझने और समझाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रज्ञा पुत्रों में से प्रत्येक मुखर हो। उसे समझने और समझाने की शैली से अवगत और अभ्यस्त होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि युग शिल्पियों को इस अभ्यास के लिए बार-बार अवसर मिलता रहे।
कठिनाई यह है कि समारोह बार-बार आयोजित करना समय साध्य भी है और व्यय साध्य भी। फिर जो, निखरे हुए वक्ता होते हैं, उन्हीं को समारोहों में बोलने का अवसर दिया जाता है। जनता को प्रभावित करने की समस्या भी सामने रहती है, इसलिए सर्वत्र कुशल वक्ताओं की ही माँग रहती है। नौसिखियों को अवसर देने में लड़खड़ाता हुआ भाषण उपस्थित लोगों को अरुचिकर लगता है।
इस कठिनाई को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय स्लाइड प्रोजेक्टर है। उसमें एक-एक घंटा में पूरे हो सकने वाले दो प्रवचनों का नया समावेश किया गया है। प्रत्येक प्रवचन में 40-40 स्लाइडें हैं। इनकी व्याख्या करने के लिए मार्ग दर्शिका पुस्तक भी छपी हुई है। इन लेखों को पढ़कर स्लाइडों की व्याख्या सरलतापूर्वक हो सकती है। चित्रों का सहारा बीच-बीच में मिलते रहने से एक घंटा भाषण देना कुछ भी कठिन नहीं पड़ता।
इसमें किसी सहायक की आवश्यकता नहीं पड़ती। अकेला एक व्यक्ति ही सारा सरंजाम जुटा सकता है। स्लाइड प्रोजेक्टर हलका यंत्र है, उसे थैले में डालकर कहीं भी ले जाया जा सकता है। गली मुहल्ले में स्वयं ही जानकारी तथा देखने का निमंत्रण दिया जा सकता है। मुफ्त का सिनेमा देखने के लिए नर, नारी, बाल-वृद्ध शिक्षित, अशिक्षित जिनके पास भी समय होता है, वह उत्साहपूर्वक एकत्रित हो जाते हैं, और अगर बैठने को जगह हो तो आसानी से पचास सौ आदमी एकत्रित हो जाते हैं। एक मध्यवर्ती सभा सम्मेलन सहज ही जुट जाता है। इन्हीं लोगों के बीच स्लाइडों की व्याख्या वाला प्रवचन आसानी से आरम्भ किया जा सकता है। एक घर में दो दिन यह क्रम चलाया जा सकता है। दोनों के बीच संगति है। एक पूर्वार्ध है तो दूसरा उत्तरार्ध। इसलिए उपस्थिति कम नहीं होती वरन् परस्पर चर्चायें और भी अधिक बढ़ जाती हैं। यही क्रम गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले चलाया जा सकता है। वक्ता को नित्य प्रवचन का अवसर मिलता रह सकता है। इस आधार पर उसकी भाषण शक्ति का दिन-दिन निखार हो सकता है।
यह यंत्र बिजली के प्रकाश से चलता है। जहाँ बिजली का प्रबंध नहीं है, वहाँ 12 बोल्ट की बिजली से इसे चलाया जा सकता है। चार्जर साथ में रखने से बैटरी चार्ज भी होती रहती है। इस प्रकार इस यंत्र को वहाँ भी ले जाया जा सकता है, जहाँ बिजली नहीं है, पर इसके लिए बैटरी और चार्जर सैट का अतिरिक्त प्रबंध करना पड़ेगा जो एक हजार के लगभग में बन जाता है। इस उपकरण को एक छोटा विद्युत उत्पादक यंत्र समझा जा सकता है। इसे आवश्यकता पड़ने पर लाउडस्पीकर में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।
स्लाइड प्रोजेक्टर मशीन की लागत ट्रांस फार्मर बल्ब व पैकिंग बाक्स सहित तीन सौ आठ रुपये है और दो दिन-रात चलने वाली 80 स्लाइडों की कीमत अस्सी रुपया (प्रति स्लाइड एक रुपया) कुल मिलाकर यह उपकरण लगभग 390) में बन जाता है बिना बिजली वाले स्थानों के लिए एक हजार का विद्युत उत्पादक सरंजाम अलग से खरीदना पड़ता है।
यह आधार ऐसा है जिसके सहारे एक व्यक्ति प्रचारक के रूप में घर-घर मुहल्ले-मुहल्ले में जाकर नवयुग की विचार धारा से निरन्तर अवगत करता रह सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके सहारे भाषण शक्ति का सहज ही निखार हो सकता है और कोई भी व्यक्ति उस समय के अभ्यास से अच्छा वक्ता बन सकता है। व्यक्तिगत रूप से इस साधन को खरीदना संभव न हो तो शाखा उसे खरीदने और पारी-पारी से अपने सभी सदस्यों को वक्तृता सीखने का अवसर प्रदान करती रह सकती है। चित्र परिचय की व्याख्यान पुस्तिका साथ में मुफ्त मिलती है।
( बाबू लाल जैन “जलज” )
ऊंचा मस्तक चौड़ी छाती, फौलादी हैं बांहें। देव मानवो उठो तुम्हीं पर, सबकी टिकी निगाहें। शक्ति-पुंज तुम करो सामना, बाधायें यदि आयें। देख तुम्हारे मन की दृढ़ता, पर्वत शीश झुकायें।
यह कुरीतियां रोक न सकतीं, कभी तुम्हारी राहें। देव मानवो उठो तुम्हीं पर, सबकी टिकी निगाहें।।
सृजन-शक्ति अद्भुत है तुम में, तुम हो युग निर्माता। कब से तुम्हें पुकार रही है, प्यारी भारत माता। आज जागरण की बेला में, लो नूतन अंगड़ाई। देश समाज मांगता तुमसे, शक्ति भक्ति तरुणाई।
अनय आंधियां भी अजमालें, यदि अजमाना चाहें। देव मानवो उठो तुम्हीं पर, सब की टिकी निगाहें।।
जीवन जल से तुम्हें सींचनी, मानवता की क्यारी। मानवता के घर से लाना है, पूनम की उजियारी। नैतिकता कर्तव्य निभाने, कालकूट पी जाना। लेकिन बर्बरता के आगे, कभी न शीश झुकाना।
जीते जी अनसुनी न करना, दीन हीन की आहें। देव मानवो उठो तुम्हीं पर, सब की टिकी निगाहें।।
ज्ञान-मशाल हाथ में लेकर, आगे बढ़ते जाना। मन-मन्दिर में संकल्पों के, पूजा-थाल सजाना। श्रद्धा दृढ़ विश्वास तुम्हारा, जीवन का हो संबल। हृदय सरोवर में खिल जायें, श्रम संयम के शतदल।
जीवन का हो लक्ष्य तुम्हारा, सब से नेह निबाहें। देव मानवो उठो तुम्हीं पर, सब की टिकी निगाहें।।
नयी विचार क्रान्ति करके तुम, मन की भ्रान्ति भगाओ। आत्म-त्याग पौरुष तप-बल से, सोया भाग्य जगाओ। जाति-पांति के ऊंच-नीच के, सारे बन्धन तोड़ो। रखो मनोबल अपना ऊंचा, विष-धारा को मोड़ो।
सुन न पड़े मानव देहरी पर, निर्मम नियति कराहें। देव मानवो उठो तुम्हीं पर, सब की टिकी निगाहें।।
*समाप्त*