बेल पेड़ से लिपटकर ऊँची तो उठ सकती है, पर उसे अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए आवश्यक रस भूमि के भीतर से ही प्राप्त करना होगा। पेड़ बेल को सहारा भर दे सकता है, पर उसे जीवित नहीं रखा सकता। अमरबेल जैसे अपवाद उदाहरण या नियम नहीं बन सकते।
व्यक्ति का गौरव या वैभव बाहर बिखरा दिखता है। उसका बड़प्पन आँकने के लिए उसके साधन एवं सहायक आधारभूत कारण प्रतीत होते हैं; पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। मानवी प्रगति के मूलभूत तत्त्व उसके अंतराल की गहराई में ही सन्निहित रहते हैं।
परिश्रमी, व्यवहारकुशल और मिलनसार प्रकृति के व्यक्ति संपत्ति-उपार्जन में समर्थ होते हैं। जिनमें इन गुणों का अभाव है, वे पूर्वजों की छोड़ी हुई संपदा की रखवाली तक नहीं कर सकते। भीतर का खोखलापन उन्हें बाहर से भी दरिद्र ही बनाए रहता है।
गरिमाशील व्यक्ति किसी देवी-देवता के अनुग्रह से महान नहीं बनते। संयमशीलता, उदारता और सज्जनता से मनुष्य सुदृढ़ बनता है; पर आवश्यक यह भी है कि उस दृढ़ता का उपयोग लोक-मंगल के लिए किया जाए। पूँजी का उपयोग सत्प्रयोजनों के निमित्त न किया जाए तो वह भारभूत ही होकर रह जाती है। आत्मशोधन की उपयोगिता तभी है, जब वह चंदन की तरह अपने समीपवर्त्ती वातावरण में सत्प्रवृत्तियों की सुगंध फैला सके।
सिद्धांतों की जानकारी को स्मृति तक पहुँचाकर उसे आगे बढ़ने से रोक देना ऐसा ही है, जैसे थाली में रसोई परोसी हो, उसे हाथ से उलटा-पलटा जा रहा हो; पर मुँह में ग्रास डालने और चबाकर पेट में उतारने से बचा जा रहा हो।
बुद्धि का गुण सीखना है, निर्णय करना भी। वह विचारों-परामर्शों की छान-बीन करने में प्रवीण होती है। व्यावसायिक मामले में उसकी सूझ-बूझ भली प्रकार काम करती है। आलोचना, समीक्षा का प्रसंग आता है तो भी वह अपना कमाल दिखाती है। छिद्रांवेषण में उसका कमाल देखने ही योग्य होता है। जहाँ तात्कालिक लाभ दिखता है वहाँ भी उसकी पकड़ खूब काम करती है। दुस्साहस भी उसका ऐसा देखा जाता है कि मर्यादाओं और वर्जनाओं को कैसे तोड़ा जाए ? पापों पर परदा कैसे डाला जाए, इसका चातुर्य भी कम नहीं होता। शासन, समाज और संपर्क-क्षेत्र को चकमा देकर किस प्रकार अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाए ? इस विद्या को एकदूसरे को, अन्यान्यों को प्रवीण-पारंगत बनाने में बुद्धि अपना कौशल आए दिन दिखाती रहती है। उसकी इन विलक्षण क्षमताओं को जितना सराहा जाए उतना ही कम है। इसीलिए बुद्धिमानों को सम्मान पाते और संपदा-सफलता अर्जित करते देखा और सराहा जाता है।
इतना होते हुए भी प्रसंग ऐसे हैं, जिसे अपनाने में बुद्धि आना-कानी करती है। देर तक प्रतीक्षा करना उसे सहन नहीं। बालबुद्धि की तरह तात्कालिक आकर्षण एवं लाभ उसे चाहिए। इतना विवेक भी नहीं होता कि दूरगामी परिणामों को सोच सके। प्रचलित ढर्रे को बदलने के लिए वह उत्कंठा नहीं जगती। इसका परिणाम यह होता है कि हमारी बुद्धि-वैभव कुछ खेल-खोलों का ही स्वांग कर पाता है। अभ्यास और साहस के अभाव में समुद्र की गहराई में उतरकर बहुमूल्य मणि-मुक्तक ढूँढ लाने की क्षमता अर्जित करने की न उसकी इच्छा होती है और न चेष्टा; फलस्वरूप तथाकथित बुद्धिमान भी बहुश्रुत, बहुपठित होकर रह जाते हैं। जीवन निर्माण की दिशा में ऐसा कुछ नहीं कर पाते, जिसे अनुकरणीय एवं अभिनंदनीय कहा जा सके।
बिल्ली के गले में घंटी बाँधने के लिए चूहों की पंचायत का एक भी सदस्य तैयार नहीं हुआ था। इसी प्रकार अनेकानेक बुद्धि-कौशल भी ऐसे सम्मिलित प्रयास नहीं कर पाते कि जिन आदर्शों की महिमा और गरिमा शास्त्रकारों, आप्तजनों और महान उदाहरणों से सुनी है। उसे स्मरण रखने और चर्चा का विषय बनाने तक ही सीमित न रखा जाए; वरन एक कदम आगे बढ़ाकर उसे जीवनक्रम में, स्वभाव-अभ्यास में सम्मिलित करने का उपाय भी सोचा और अंतराल तक पहुँचाया जाए।
ज्ञान कितना भी महत्त्वपूर्ण क्यों न हो; पर यदि वह बात-चीत अथवा जानकारी तक ही सीमित रह जाए तो समझना चाहिए कि ऐसा ही दुर्भाग्य आ अड़ा, मानो थाली में भोजन परोसा गया हो, पर उसे पेट में पहुँचाने के लिए प्रयत्न नहीं हुआ। मौखिकरूप से वक्तृत्व का अभ्यास कर लेने वाले बड़ी-बड़ी ऊँची बातें कहते और धुँआधार प्रवचन करते देखे गए हैं; पर जब उस कथनी को अपनी निज की करनी में उतारने का प्रसंग आता हैं तो अपना रुख ही बदल लेते हैं और ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो किसी प्रसंग की चर्चा करना ही पर्याप्त हो।
वक्तृत्व एक कला है; पर आदर्शों को जीवन में उतारना तो लोहे के चने चबाने जैसा है। अपने को गलाना और ढालना धातु उपकरण बनाने से कठिन है। उस कठिनाई को जो कोई पार कर सके, उसी को सच्चा शूरवीर कहना चाहिए। उन्हें तो पुस्तकों के भार से लदा हुआ गधा ही कहना चाहिए, जिनके मस्तिष्क पर ज्ञान का बोझ तो बहुत लदा है। पर वे स्वयं उससे कुछ लाभ नहीं उठा पाते।
श्रद्धा-विश्वास का समग्र संपुट लगी हुई एकाग्रता ध्यान कहलाती है। ध्यानयोगी इस विधान का महत्त्व समझते और अपनाते हैं। यदि कार्य उचित रीति से किया गया है तो उसका समुचित लाभ भी मिलता है।
पुरातनकाल में ध्यान देवताओं की निकटता पाने और उनके अनुग्रह-वरदान से लाभांवित होने के लिए किया जाता था। जिस देवता पर श्रद्धा होती, उसकी छवि की कल्पना-लोक में झाँकी करते रहने और उसके प्रति अपना प्रेमभाव जताते हुए मानसिक अभिव्यंजना की जाती थी। इसमें ध्यान की सफलता का बड़ा चिह्न यह समझा जाता था कि कल्पित प्रतिमा की झलक-झाँकी मिल सके। यों यह होती तो एकाग्रता के परिपाक समेत भावविभोरता की स्थिति में ही थी; पर इतने भर से ही साधक का मनोबल बढ़ता था और विश्वास होता था कि यह देवानुग्रह का आरंभिक चरण है। आगे चलकर इष्टदेव से प्रत्यक्ष भेंट होने लगेगी और आदान-प्रदान का क्रम चलने लगेगी, पर गाड़ी जहाँ की तहाँ रुक जाती थी; क्योंकि कल्पित देवता का प्रकटीकरण और उसके अनुग्रह का अकारण अभिवर्षण सृष्टि की क्रम-व्यवस्था के अनुरूप नहीं है; यों आए दिन जीवन में सफलता-असफलता के चलते चक्र में से सफलता वाले अंश के देवता की अनुकंपा मानकर किसी प्रकार संतोष कर लिया जाए तो मन को इसी आधार पर प्रसन्न कर लेने का इसे सहज तरीका भी माना जा सकता है। मध्यकालीन अंधविश्वासों के युग में ध्यानयोग का उपयोग प्रायः इसी रूप में इसी प्रयोजन के निमित्त होता था। बढ़ी-चढ़ी फलश्रुति बताकर गुरुजन अपने भक्त-शिष्यों को भी इस निमित्त आकर्षित करते थे। वस्तुतः उनका उद्देश्य अनेक शिष्य बटोरना और उनसे सम्मान तथा अर्थ सहयोग का लाभ अर्जित करना होता था। इस तथाकथित साधक-समुदाय में से किसी के हाथ कुछ लगता था या नहीं? अथवा आत्मप्रवंचना ही उनके पल्ले पड़ती थी; यह ठीक से नहीं कहा जा सकता।
ध्यान का बुद्धिसंगत एवं वैज्ञानिक स्वरूप यह है कि किसी कल्पित या प्रत्यक्ष चमकीले बिंदु पर अपनी अंतर्दृष्टि को इच्छाशक्ति के समन्वय सहित एकत्रित किया जाए। इस प्रयोग का प्रतिफल यह होता है; कि मन की घुड़दौड़ रुक जाती है और वह किसी एक प्रसंग पऱ समाहित होने लगती है। सूर्य किरणों को आतिशी शीशे पर एकत्रित करने से आग जलने लगती है। उसी प्रकार मन की भगदड़ को किसी विषय विशेष पर केंद्रीभूत कर लेने से उसकी वेधकशक्ति अत्यधिक हो जाती है। उसे जिस भी काम में नियोजित किया जाए उसे अधिक सशक्तता और विशेषता के साथ संपन्न करती है। वैज्ञानिक, कलाकार, शिल्पी, शोधकर्त्ता इसी आधार पर अपनी एकात्मता को विकसित करके अभीष्ट प्रयोजन में लगाते है और आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करते हैं। सरकस के कलाकारों की विशिष्टता इस एकाग्रता की साधना पर ही अवलंबित रहती हैं।
शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण में भी ध्यानयोग की परिपक्वावस्था अच्छा लाभ दिखाती है। रुग्ण अवयव को यदि विश्वासभरा संकेत-निर्देश दिया जाए और उसके रोगमुक्त होने की स्थिति तेजी से सुधर रही है, तो उस कथन पर विश्वास करने वाला निश्चय ही आरोग्य लाभ करता है। यह लाभ अपने को भी दिया जा सकता है और दूसरों को भी। मैस्मरेज्म-हिप्नोटिज्म में यह इच्छाशक्तियुक्त एकाग्रता से ही अनेक प्रयोजन सिद्ध किए जाते है। मानसिक रोगों में तो इसका उपचार अधिक परिमाण में उत्साहवर्द्धक होता देखा गया है।
मस्तिष्क के विभिन्न केंद्रों में अतींद्रिय क्षमताओं के भंडार भरे पड़े हैं; पर वे प्रायः प्रसुप्त स्थिति में ही पड़े रहते हैं। इनमें से कुछ को भी किसी अंश में जागृत किया जा सके, तो साधक को दूरदर्शन, दूरश्रवण, पूर्वाभास आदि अनेकों ऐसे लाभ मिल जाते हैं, जिनके कारण व्यक्ति अपना और दूसरों का बहुत भला कर सकता है। शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का लोग अनेक प्रकार से अधिकाधिक लाभ उठाते और देते हैं। इस संदर्भ में कोई आगे बढ़ता है और भौतिक-संपदाओं की तरह आत्मिक-संपदा भी अर्जित कर सकता हैं। यह कमाई अन्य किसी कमाई से कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
कीट, भृंग का उदाहरण प्रख्यात है। दोनों के बीच एकात्मता संव्याप्त हो जाती है, तो उसका प्रभाव आदान-प्रदान के रूप में सामने आता है। ध्यान की यही विशेषता है कि जिसके साथ भी तादात्म्यता-तन्मयता स्थापित की जाए उसकी विशेषताएँ अपनी ओर हावी होने लगती है। इसका हल्का-सा प्रभाव संगति के फल से उत्पन्न होते देखा जाता है। चंदन वृक्ष के समीप उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी सुगंधित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया अंयत्र भी चरितार्थ होती है। ध्यान में शारीरिक एवं प्रत्यक्ष समीपता न होने पर भी भावनात्मक समीपता से भी कुछ उपलब्ध किया जा सकता है।
इन दिनों कितने ही ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो देववाद को नहीं मानते, उन पर विश्वास नहीं करते। जैन, बौद्ध, वेदांती आदि ईश्वर की वैसी सत्ता स्वीकार नहीं करते जैसी कि सर्वसाधारण में प्रचलित है। निराकारवादी भगवान को तो मानते हैं; पर उसका कोई रूप होने का विश्वास नहीं करते हैं। नाद, बिंदु, लय के आधार पर अपनी साधनाएँ चलाते हैं। इनके लिए साकार ध्यान, देवपरक भूमिका में कर सकना कठिन है। इतने पर भी यह प्रतिबंध नहीं है कि ध्यान का लाभ उठाने में अड़चन है।
कलाकार, वैज्ञानिक एवं मैस्मरेज्म के मात्र प्रयोक्ता ध्यान को उपलब्धियों के भौतिक प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करते हैं। उन्हें आत्मोत्कर्ष का गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता के समावेश वाला प्रयोजन समझ में नहीं आया। इस विधा से रहित मात्र भौतिक विशेषता हस्तगत कराने वाला प्रयोग काम-काजी या लोक-व्यवहारी कहा जा सकता हैं। उससे वह लाभ नहीं मिलता जिससे पवित्रता एवं प्रतिभा का संवर्द्धन हो सके।
इसके लिए नया तरीका यह है, कि सद्गुणों से अभिप्रेरित किसी पदार्थ या व्यक्ति का नियत समय पर समग्र एकाग्रता के साथ ध्यान-प्रयोजन पूरा किया जाए। पदार्थ में गुलाब जैसे फूल और आम्र जैसे वृक्ष की निजी विशेषता की अनुभूति को अपने में उतारने का प्रयत्न किया जा सकता है। व्यक्तियों में विवेकानंद, गांधी, सुभाष, विनोबा, दयानंद, प्रताप, भामाशाह, हरिश्चंद्र भागीरथ जैसों को इष्टदेव के समतुल्य मानकर उनके गुणों का, सेवाकार्यों का ध्यान किया जा सकता है और साथ ही यह विश्वास भी जोड़ा जा सकता है कि उन सद्गुणों का प्रवेश अपने व्यक्तित्व में होता चला जा रहा है।
यह चिंतन जितना सघन होगा उतना ही उसका प्रभाव पड़ेगा। उसी अनुपात से ध्यान एवं विभूतियाँ अपने भीतर प्रवेश करती चली जाएँगी और गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि में अपने उत्कर्ष का क्रम उभरता चलेगा।
ध्यान का प्रभाव कभी भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। भूत-प्रेतों की कथा या कल्पना में जो लोग निरत रहते हैं उनमें डरने या डराने की प्रवृत्ति उभरती है। अश्लील चिंतन से मस्तिष्क तदनुरूप रंगरेलियों में उलझ जाता है और शरीर में स्वप्नदोष जैसी उत्तेजना अपना काम करने लगती है। अच्छा यही है साधना की दृष्टि से अथवा चिंतन को परिष्कृत करने की दृष्टि से हम श्रेष्ठता को साथ लिए रहें और उसी का ध्यान किया करें।
उन दिनों राशन का बड़ा कंट्रोल था। राशन कार्ड पर सीमित गेहूँ मिलता था। पुरुषोत्तम दास टंडन के घर में हजारों लोगों का तांता लगा रहता। उतने राशन से काम न चलता; फलतः वे ज्वार-बाजरा जैसे खुले बाजार में मिलने वाले सस्ते अनाज लेकर काम चलाते।
एक बार कई बड़े नेता और अफसर उनके मेहमान थे। सभी को ज्वार-बाजरे की रोटी परोसी गई। उन्हें चकित देखकर टंडन जी ने स्वयं कहा— “ब्लैक का अनैतिक तरीका अपनाकर आप लोगों को गेहूँ खिलाने की अपेक्षा ईमानदारी ने यही उपाय सुझाया, जो अभ्यस्त भोजन के रूप में आपके सामने है।”
गीताकार का कथन है, कि— ज्ञान से बढ़कर और कोई पवित्र वस्तु नहीं। वह जिस किसी का भी स्पर्श करती है, उसी को पवित्र कर देती है। ज्ञान की उपमा अग्नि से दी गई है। उसकी समीपता तद्वत् बना देती है। अग्नि में पड़ने वाला ईंधन भी अग्निरूप हो जाता है। स्वयं में नगण्य होने पर भी जब अग्नि का अवतरण उसमें होता है; तो फिर उसका कायाकल्प हो जाता है, तब वह जलता हुआ ईंधन दावानल भी बन सकता है। उसकी छोटी-सी चिनगारी विशालकाय विकरालरूप भी धारण कर सकती है। उसकी प्रभाव-परिधि में आने वाला सारा वातावरण उष्मा, ऊर्जा और आभा से भर जाता है।
यहाँ ज्ञान का अर्थ शिक्षा नहीं; वरन विद्या है। शिक्षा वह जो, भौतिक जगत की जानकारियाँ कराए। विद्या वह जो आत्मिक जगत का स्वरूप समझाए और उस क्षेत्र की सुव्यवस्था एवं प्रगति में सहायता करे। अशिक्षित को भौतिक स्तर की जानकारियों के अभाव में सांसारिक कठिनाइयाँ आती हैं। उसे अनगढ़-पिछड़ा माना जाता है, किंतु अज्ञानी तो अंधे के समान है। उसे पशुतुल्य भी कहा जाता है। कारण कि वह अपने अंतर्जगत के संबंध में निपट अनाड़ी जैसी स्थिति धारण किए रहता है। ऐसी दशा में उसे शोक-संताप ही घेरे रहते हैं। अबोध बालक को यह ज्ञान नहीं होता कि उसकी सामयिक आवश्यकताएँ क्या हैं? किन अभावों से ग्रसित है और उन्हें जुटाने के लिए क्या करना चाहिए ? सब कुछ दूसरों पर ही निर्भर रहता है। अभिभावक सहायता न करें तो उसे मल-मूत्र से सने हुए ठिठुरते शीत से काँपते हुए भूख-प्यास से पीड़ित स्थिति में ही पड़ा रहना पड़ेगा। बचपन में सामर्थ्य का अभाव तो होता ही है; किंतु उससे भी बढ़कर ज्ञान की कमी अड़चनें उत्पन्न करती हैं। शब्दज्ञान से वंचित होने के कारण वह अपने मनोभावों को जिह्वा के रहते हुए भी किसी प्रकार व्यक्त नहीं कर पाता।
मनुष्य में वरिष्ठ उसे माना जाता है, जिसकी जानकारियाँ अधिक है। बहुपठित, बहुश्रुत एवं अनुभवी दूरदर्शी लोग अपनी आवश्यकताएँ भी पूरी कर लेते हैं और दूसरों को उठाने, उबारने में सहायता करते हैं। अनजान का तो उपहास ही होता है, उसे दरिद्र से भी बढ़कर उपहासास्पद माना जाता है।
बाह्यजगत की तरह अंतर्जगत भी अपनी सत्ता और महत्ता रखे हुए हैं। भौतिक जगत में सभी सुखद, सुंदर, सुव्यवस्थित है, उसमें से अपनी योग्यता, पात्रता के अनुरूप किन्हीं को भी उपलब्ध किया जा सकता है। आदान-प्रदान की इस दुनिया में सामर्थ्य, प्रयास एवं साधनों की सहायता से इच्छित वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। यह नियम अंतर्जगत पर भी लागू होता है। उस क्षेत्र में भी विभूतियों की कमी नहीं। सही मार्ग और विधान अपनाकर उस प्रदेश में विद्यमान अमृत, पारस, कल्पवृक्ष सदृश उच्चस्तरीय वैभव की बहुलता पाई जा सकती है। उसे किसी अन्य की सहायता से तो यत्किंचित् मात्रा में ही पाया जा सकता है। किंतु यह संभव तभी है, जब उनका स्वरूप एवं स्थिति जान ली गई हो, प्राप्त करने की विद्या के साथ नाता जुड़ गया हो। इस पक्ष की अवहेलना भी की जा सकती है और अवधारणा भी। यह सब अपने ही रुझान एवं प्रयास पर निर्भर है।
ज्ञान, वह जिसे और भी अच्छी तरह समझने के लिए पूरा नाम आत्मज्ञान या तत्त्वज्ञान भी कहा जा सकता है। तात्पर्य यह है; कि अंतरंग की स्थिति को समझा जाए और बहिरंग क्षेत्र में अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्त्व को सही रूप से समझते हुए, तदनुरूप दृष्टिकोण तथा आचरण में ढाला जाए।
इसे आश्चर्यभरी विडंबना ही कहना चाहिए कि हम बाहर की परिस्थितियों के बारे में बहुत कुछ जानते हुए अनेक प्रकार के कौशलों से, अभ्यस्त साधनों से, संपन्न होते हुए भी यथार्थता से अपरिचित ही रहते हैं। अपने गुण−दोषों तक से परिचित नहीं होते, यद्यपि दूसरों की समीक्षा भली प्रकार कर सकते हैं। बाह्यवैभव का हिसाब-किताब रखते हैं और हानि-लाभ की स्थिति से प्रभावित रहते हैं; पर अंतर की छिपी संपदा के संबंध में अनजानों जैसी स्थिति अपनाए रहते हैं। साथ ही इस जानकारी से भी वंचित रह रहे होते हैं कि अपने आप को किस प्रकार सुधारा-उभारा जाए। कस्तूरी के हिरन की तरह सुख-शांति तलाश करते हैं। निराशा हाथ लगने पर थकान और खीज से व्यथित होते हैं। उस अबोध वन्यपशु जैसी स्थिति अपनी भी होती है। शांति और प्रगति का उद्गम स्रोत अपने ही भीतर होता है; पर उसे पाने के लिए प्रयास अंयत्र करते हैं, फलतः निराशा एवं उद्विग्न रहने की स्थिति ही बनी रहती है। इस भ्रम-जंजाल से छूटने के लिए उस ज्ञानदीप की आवश्यकता है, जो भटकावों से बचाकर वस्तुस्थिति का भान करा सके।
समझा यह जाता है, कि असहयोग, अभाव, वातावरण एवं भाग्य के फेर से अपनी स्थिति असंतोषजनक बनी हुई है। किंतु वास्तविकता यह है कि गुण, कर्म, स्वभाव जैसे व्यक्तित्व के अनेक पक्ष विकसित नहीं हो पाते। फलतः अबोधों की तरह जिस-तिस पर लाँछन लगाते हुए, किसी प्रकार आत्मप्रवंचना करते हुए मन का भार हलका करना पड़ता है। जिस कमी के कारण वास्तविक प्रगति एवं उच्चस्तरीय सफलता से वंचित रहना पड़ता है, वह अपने ही अंतर में खोजी जा सकती है। किंतु दुर्भाग्य यह है कि आत्मसमीक्षा के उपयुक्त गहरे उतर सकने और अंतर्जगत की वस्तुस्थिति को समझने की स्थिति अपनी नहीं बन पाती। जब रोग की खोज ही नहीं बन पड़ी तो फिर उपचार किस प्रकार संभव हो?
संसार में बहुत कुछ है, पर वह दौड़कर हमारे पास नहीं आ जाता। उसे पाने के साधन, मार्ग एवं पराक्रम से अभ्यस्त होना पड़ता है। इस ओर से आँखें बंद रखी जाएँ ,तो फिर सर्वत्र अंधकार ही बना रहेगा, भले ही आकाश के ज्योतिर्मय सूर्य का ही तेजस् सर्वत्र फैला हुआ क्यों न हो?
आत्मज्ञान का ही 'ज्ञान' नाम से अध्यात्म-क्षेत्र में विवेचन किया गया है। अपने वास्तविक अस्तित्व, स्वरूप एवं लक्ष्य की निरंतर प्रबल अनुभूति होती रहे तो समझना चाहिए कि वह तत्त्वज्ञान, हस्तगत हुआ, जिसे आत्मिकी का बोध पक्ष कहा जा सकता है। दर्पण में हम अपनी ही छाया देखते हैं। गुंबज में अपने ही शब्दों की प्रतिध्वनि गूंजती है। अपना ‘स्व’ जिस स्तर का होता है उसी के अनुरूप दृष्टिकोण, रुझान और प्रयास विनिर्मित होता है। यही है भली-बुरी परिस्थितियों का आधारभूत कारण।
सभी मनुष्य रक्त-मांस की दृष्टि से प्रायः एक जैसे हैं। उनके काय-कलेवर में बहुत अंतर नहीं होता। विभिन्नताएँ भीतरी गुण-अवगुणों के संबंध में होती हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण ही सुविकसित व्यक्तित्व का निर्माण करता है और उसी आधार पर सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुलता है। इस अनुभूति को अंतराल में गहराई तक प्रतिष्ठित करके हम उस सद्ज्ञान को आत्मज्ञान को संपादित कर सकते हैं, जिसे ज्ञानाग्नि का नाम दिया गया है और परम पवित्र बताया गया है।
एक किसान के चार बेटे थे। उनकी बुद्धिमत्ता जाँचने के लिए सभी बेटों को बुलाकर किसान ने एक-एक मुट्ठी धान दिया और कहा—" इनका जो मरजी हो सो करना।"
एक ने उसे छोटी वस्तु समझा और चिड़ियों को फेंक दिया। दूसरा उसे खाने के उपयोग में लाया। तीसरे ने सम्हालकर डिब्बे में रख दिया, ताकि कभी पिता माँगे तो उन्हें दिखा सकूँ। चौथे ने उन्हें खेत में बो दिया और टोकरा भरा धान पिता के सामने लाकर रख दिया।
पिता ने बोने वाले को अधिक समझदार पाया और बड़ी जिम्मेदारियों के काम उसी के सुपुर्द किए। भगवान भी यही करता है।
ईंधन न हो तो समर्थ माचिस या चिनगारी भी अग्नि प्रज्वलित करने में सफल नहीं रहती है। शालीनतासंपन्न जीवनक्रम सूखे ईंधन के समान है। जिसकी समुचित मात्रा भी संचित हो तो अग्नि के प्रज्वलित होने में फिर कोई कठिनाई नहीं रहती हैं।
सड़ी दुर्गंधयुक्त वस्तु के निकट जाने में सभी को घृणा होती है, देवताओं को भी। सड़े कचरे के ढेर से उठने वाली बदबू सभी का मन बिगाड़ती है। इसके विपरीत खिले फूलों वाला उद्यान राहगीरों तक का मन मोहता है। देवताओं के सिर पर चढ़ता है। मधुमक्खी, तितली आदि को इर्द-गिर्द मँडराकर शोभा बढ़ाने के लिए आमंत्रित करता रहता है। यही मनुष्य और दैवी शक्तियों के संबंध का आधारभूत माध्यम हैं।
पूजा-अर्चना में यों क्रिया-कृत्यों की प्रधानता रहती है। मंत्रोच्चारण का भी निर्धारण है, पर यह उपासना का परिधान पक्ष है— शृंगार। काया को सुंदर वस्त्राभूषण पहना देने में वह शोभायमान दिखती है। इत्र-फुलेल लगा देने से महकती भी है और शृंगार-प्रसाधनों से वह चमकती भी है। किंतु इतने पर भी यदि कोई व्यक्ति रोगग्रसित हो, जरा-जीर्ण हो अथवा मृत्यु का ग्रास बन चुका हो तो उस साज-सज्जा से भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। छूत के रोगी या मृतक पर डाले हुए कपड़े भी अस्पृश्य बन जाते हैं। उनके कारण शोभा-सज्जा बढ़ना तो दूर, चरित्रहीन, मन-मलीन व्यक्ति की पूजा फलित नहीं होती। उत्कृष्ट आदर्शवादिता मनुष्य का जीवन प्राण है। उसके रहते समग्र समर्थता का अनायास ही विकास होता है। सस्ते और कम कपड़े पहनने पर भी स्वस्थ सुदृढ़ शरीर अपनी शोभा-सुषमा से सबका मन अपनी ओर खींचता रहता है; किंतु मरणासन्न या मृतक मनुष्य पर कितने ही शृंगार-साधनों का कलेवर लपेटते रहा जाए उसे सम्मानास्पद नहीं बनाया जा सकता।
देवता स्वयं सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय होते हैं। उनके कण-कण में दिव्य तत्त्वों का समावेश होता है। प्रकृति के अनुकूल वातावरण ही सभी को सुहाता है। गाएँ-गौओं के झुंडों को मिला दिया जाए तो भी वे अपनी-अपनी बिरादरी छाँटकर अपने अलग झुंड बना लेती हैं। वन्य-पशुओं में हिरन, खरगोश आदि अपने ही साथियों का समूह बनाते और विचरण करते हैं, रीछों और हिरनों की प्रकृति भिन्न रहने से वे साथ-साथ नहीं रहते। विवशता में रहना भी पड़े तो परिस्थिति बदलते ही वे पृथक-पृथक हो जाते हैं। दैवी तत्त्वों के संबंध में भी यही बात है। सतोगुण सात्विकता से ही प्रभावित एवं आकर्षित होता है। विपरीत प्रकृति के साथ किसी का तालमेल नहीं बैठता। दार्शनिक, मनीषी और चोर-जुआरी समूह बनाकर स्नेह-सहयोगपूर्वक नहीं रहते। देवता भी इस सार्वभौम नियम के विपरीत अपनी अभिरुचि का परिचय नहीं देते।
देवता दरिद्र, अभावग्रस्त या ओछी प्रकृति के नहीं हैं। उन्हें उपहार, मनुहार अथवा शिष्टाचारप्रदर्शन मात्र से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। यह वस्तुएँ उन्हें अपने पराक्रम से उपलब्ध न हो सकें, ऐसी बात नहीं है। पुष्प, चंदन, अक्षत आदि प्रचुर परिमाण में इस विशाल संसार में विद्यमान हैं। इनमें से किसी वस्तु की उन्हें आवश्यकता हो तो वे सहज ही उनके जमा भंडारों में से इच्छित मात्रा में कभी भी उपलब्ध कर सकते हैं। फिर इनके लिए किसी व्यक्तिविशेष को क्यों कष्ट देंगे ? क्यों उसकी प्रतीक्षा करेंगे ? क्यों अपेक्षा रखेंगे ? ऐसी लिप्सा तो अपंग— असमर्थों में ही पाई जा सकती। भिक्षुक वर्ग के लोग जो खाने-कमाने में असमर्थ रहते हैं; वे ही दूसरों के आगे हाथ पसारते हैं। उन्हें ही याचना करनी पड़ती है। वे ही समर्थों-संपन्नों से आशा लगाए बैठे रहते हैं; किंतु जो परिश्रम और बुद्धि-विवेक के धनी हैं, वो अपनी आवश्यकताएँ अपने पराक्रम से पूरी करते हैं। साथ ही जो बच जाता है, उसे दूसरों को बाँटते हैं। देवताओं का स्वभाव भी ऐसा ही है। वे तथाकथित भक्तजनों से किसी भोग-प्रसाद की, पूजा-सामग्री की आशा नहीं करते, न उसके पाने पर प्रसन्न होते हैं और न उस क्रियाकृत्य के समर्पण बिना किसी पर क्रुद्ध-रुष्ट होते हैं।
जिनने केवल देवताओं का नाम सुना है, उनका स्वरूप उनकी सत्ता का तत्त्वज्ञान नहीं समझा है, उन्हीं के लिए यह कल्पना करना समझ में आता है, कि अनगढ़ देवताओं को कुछ दे-दिलाकर, कुछ कह-कहाकर अनुकूल बनाया जा सकता है। उनकी मनौती मानकर उचित-अनुचित कुछ भी मनोरथ पूरा कराया जा सकता है। ऐसा बहकावा, फुसलावा तो अल्प आयु और अल्प बुद्धि वाले बालकों के ऊपर ही असर डाल सकता है। वयस्कों, बुद्धिमानों और समर्थों के लिए तो यह मखौल ही समझा जाएगा। कुछ पूजापत्री की सामग्री प्राप्त होने की शर्त पर जो देवता मनौती के लिए लालायित रहते हैं और उसका प्राप्त होना निश्चित होने पर मनचाहे उपहार देने लगते हैं। भले ही उसे पाने की प्राप्तकर्त्ता में पात्रता हो या नहीं।
पात्रता के अनुरूप सेवा-सहायता करना देवताओं का धर्म हैं। गाय का स्वभाव: दूध देना है। इसके लिए किसी को उसकी अभ्यर्थना नहीं करनी पड़ती। इतना ही पर्याप्त होता है कि उसकी मौलिक आवश्यकता पूरी करने के लिए पेट भरा रखा जाए। देवताओं की व्यक्तिगत आवश्यकता कुछ भी नहीं है। यदि हो भी तो उसकी पूर्ति के लिए उनके आगे पल्ला नहीं पसारते, जो स्वयं ही अभावग्रस्त हैं। अनेकों कामनाओं, वासनाओं से उद्विग्न रहते और बिना परिश्रम किए कहीं से कुछ ले-देकर उल्लू सीधा करने की फिराक में रहते हैं। मनौती मनाने वालों का समुदाय प्रायः ऐसा ही होता है। वे भक्तिवश नहीं, कामनावश देवताओं का द्वार खटखटाते हैं। इनके स्तर की वास्तविकता उनसे छिपी नहीं रहती, जिन्हें त्रिकालदर्शी और अंतर्यामी देवस्तर के रूप में जाना-माना जाता है। यदि वे औचित्य का, पात्रता का, प्रयोजन का ध्यान न रखें और हर किसी की इच्छा पूरी करते चलें तो निश्चय ही इनमें से अधिकांश लोग ऐसे होंगे, जो अनुचित स्वार्थ-साधन कराना चाहते हैं। यदि पूजा-अर्चा के प्रलोभन से इनकी मनौती स्वीकार की जाने लगे तो भक्तजनों में ही परस्पर भयंकर विग्रह खड़ा हो जाएगा। एक ही देवता के दो भक्त परस्पर मुकदमा चलाते हैं। दोनों ही जीतने के लिए पूजा-विधान अपनाते हैं। अब देवता के सामने यह कठिनाई खड़ी होती है कि वह किस का पक्ष ले। यदि न्याय का समर्थन ही होता है, तब तो यह देवता की स्वाभाविक जिम्मेदारी पूरी हुई। फिर अनुचित लाभ माँगने वाले का मनोरथ तो व्यर्थ चला गया।
इस संदर्भ में आस्तिक समुदाय में भारी भ्रम फैला हुआ है। मनौती की शर्त पर देवताओं को लुभाने की चेष्टा वस्तुतः उसके स्तर की अवमानना करना, मखौल बनाना है। देवशक्तियाँ, दैवी सत्प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्हीं के समुच्चय रूप में उनकी सत्ता का अवगुंठन होता है। ऐसी दशा में उनके लिए यह संभव नहीं कि किसी संकीर्ण स्वार्थपरता एवं अनुचित कामना की पूर्ति के लिए किसी कुपात्र की सहायता करें। इस उद्देश्य के लिए की गई मनुहार, उपहार वाली चतुरता प्रायः व्यर्थ हो जाती है।
ब्रूसी को बार-बार हारना पड़ा। लड़ाई की नए सिरे से तैयारी करता, पर परिस्थिति अनुरूप न पड़ने से असफलता मिलती। ग्यारह बार हारने के उपरांत उसकी हिम्मत टूट गई और किसी अज्ञात स्थान में छिपकर दिन गुजारने लगा।
एक दिन ब्रूसी बिस्तर पर पड़ा था। छत पर मकड़ी जाला बुन रही थी। धागा बार-बार टूट जाता। फिर भी मकड़ी निराश नहीं हुई। मकड़ी को ठीक बारहवें प्रयत्न में सफलता मिली और जैसा चाहती थी वैसा जाला बुन लिया।
इस दृश्य का ब्रूसी पर बड़ा प्रभाव पड़ा। जब मकड़ी ग्यारह बार की असफलता से निराश नहीं हुई तो मैं क्यों निराश होऊँ और नए सिरे से प्रयत्न क्यों न करूंँ। बारहवें प्रयत्न में वह जीता और राजा बन गया।
साधना का एक ही उद्देश्य है— आत्मोत्कर्ष, व्यक्तित्व का परिष्कार। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि बहिरंग या अंतरंग क्षेत्र का जो भी काम हाथ में लिया जाएगा, वह पूरा होकर रहेगा। भले ही उसमें कुछ देर लगे, पर विकसित व्यक्तित्व वालों के लिए कोई कार्य असंभव नहीं। कोई कार्य इसलिए कहा जा रहा है कि उत्कृष्ट चिंतन के रहते उच्चस्तरीय लक्ष्य ही निर्धारित होते हैं। निकृष्टता न तो उन्हें रुचती है और न उनके पास फटकती है। वे जो कुछ भी सोचते हैं, वह खरा होता है। सोने को खरा-खोटा परखने के लिए उसे कसौटी पर कसा और आग पर तपाया जाता है। इसी प्रकार अध्यात्म प्रकृति के व्यक्ति आत्मकल्याण और लोक-मंगल के दो आधारों के साथ जुड़ा हुआ निर्धारण निश्चय करते हैं। सद्बुद्धि की देवी ऋतंभरा प्रज्ञा इसी स्तर के परामर्श देती है और सच्चा साधक अपने इष्ट द्वारा दिए गए परामर्श एवं आदर्श की अवहेलना नहीं कर सकता।
संसार में अनेक देवी-देवता हैं। अनेक जंत्र–मंत्र, अनेक दर्शन और अनेक पूजा-विधान। सभी के प्रतिपादनकर्त्ता अपनी बात की पुष्टि करने के लिए जो कुछ दार्शनिक पृष्ठभूमि पर समर्थन कर सकते हैं, अपने मत की पुष्टि करते हैं। उपदेशक भी व्यक्तित्ववान होते हैं। कथा-पुराण भी ऐसे सुनाते हैं, जिनको प्रमाण मानकर सामान्य जिज्ञासु का मन उसी ओर लुढ़कने लगता है। जिसने एक ही बात सुनी है, एक ही पगडंडी देखी है, उनके लिए पूर्वाग्रह और वातावरण के आधार पर मान्यता को अपना लेना कठिन नहीं।
किंतु जिन लोगों ने कई पक्षों का अध्ययन, श्रवण और मनन किया है उनके लिए असमंजस खड़ा होता है। एक संप्रदाय से दूसरे की पटरी नहीं खाती। कभी-कभी तो थोड़ा-बहुत ही अंतर होता है, किंतु कभी-कभी मतभेद जमीन-आसमान जितना हो जाता है। भक्तिपंथी राधा-कृष्ण के गुणानुवाद गाते-गाते नहीं थकते और उस स्मरण में भावविभोर हो जाते हैं; पर जो बौद्ध हैं; सांख्यवादी हैं, वे ईश्वर के अस्तित्व से ही इंकार करते हैं। बौद्ध और जैन धर्म की ऐसी ही मान्यता है। हिन्दू धर्म के अंतर्गत जैन धर्म, अहिंसा को सर्वप्रमुख धर्म-लक्षण मानता है; किंतु शाक्त लोगों की देवी पशुबलि लिए बिना संतुष्ट नहीं होती। वैदिक धर्म में पति-पत्नी का अविच्छिन्न युग्म होना चाहिए; पर किसी संप्रदाय में चार पत्नियाँ रखना भी धर्माचरण है और कुछ वर्गों में सभी भाइयों की एक सम्मिलित पत्नी होती है। कुछ जातियों के लड़के को दहेज दिया जाता है और कई जातियों में लड़की की कीमत वसूल की जाती है। धार्मिक कहे जाने वालों में शाकाहारी भी होते हैं और मांसाहारी भी। ईश्वर के संबंध में भी ऐसे कथन हैं। कुछ निराकारवादी हैं, कुछ साकारवादी। कुछ में पूजा आवश्यक है, कुछ में श्वास के साथ सोऽहम् की भावना करना ही पर्याप्त है। देवता भी हर संप्रदाय के चित्र-विचित्र हैं और उनके अनुग्रह के प्रतिफल तथा पूजा-पाठ के विधि-विधान भी सर्वथा पृथक।
ऐसी दशा में तर्क के जंजाल से बचने वाले तो पूर्वाग्रहों के सहारे अपनी गाड़ी खींच ले जाते हैं, पर जो तर्कवादी हैं, तथ्य तक पहुँचना चाहते हैं, प्रत्यक्ष प्रमाण और उदाहरण चाहते हैं, उनके लिए भारी कठिनाई आ खड़ी होती है कि इन भिन्नताओं के बीच किसे सच माने, किसे झूठ। दूसरों को झूठ कहते ही विग्रह खड़ा होता है और सच कहने पर अनुयायी बनना पड़ता है। सभी सच हैं, यह बात भी गले नहीं उतरती। जब सभी सच हैं, तो मतभेद कैसा? सूर्य गरम और गतिशील है, इस तथ्य को सभी मानते हैं। यदि संप्रदायों के बारे में भी यही बात रही होती तो उन सबकी मान्यता एक जैसी रही होती, ईश्वरस्वरूप एक होता, उसका आदर्श भी सभी के लिए एक जैसा रहता।
यदि झूठ कहते तो शास्त्रकारों और आप्तपुरुषों की अवमानना होती है। सब धर्मों की खिचड़ी मिलाई जाए, तो वह और भी अधिक विचित्र हो जाती है। अधिक- से-अधिक इतना ही हो सकता है कि नीतिशास्त्र के कुछ सिद्धांतों का समर्थन सभी धर्मों में से किसी प्रकार खोज निकाला जाए। ऊपरी सतह पर ही किसी प्रकार एकता का प्रतिपादन हो सकता है। गहराई की ओर एक कदम उतरते ही असाधारण भिन्नताएँ नजर आती हैं और ईश्वर तथा धर्म के संबंध में भारी मतिभ्रम उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में साधना किसकी की जाए, किस संप्रदाय एवं प्रतिपादन का आश्रय लिया जाए। यदि शंकाओं को कुतर्क कहकर एक का पल्ला पकड़ने की बात सोची जाए, तो मानवी अंतराल के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई बुद्धि और विवेकशीलता विद्रोह करती है।
ऐसी दशा में जब तक सर्वधर्म सम्मेलन होकर कोई एक निश्चय नहीं हो जाता, सर्वभौम धर्म नहीं बन जाता, तब तक हमें विवेक से ही काम लेना चाहिए। वही हमारा इष्ट होना चाहिए। उसी का आश्रय लेकर हम क्रमश: सत्य को अधिकाधिक समीप से देखने, समझने में समर्थ हो सकते हैं।
ब्राह्मण ग्रंथों में एक कथा आती है कि प्रलयकाल में जब सभी देवता, शास्त्र, ऋषि समाप्त हो जाएँगे तब फिर किसी का अनुशासन जीवित रहेगा? उत्तर में परब्रह्म कहता है कि तब भी एक ऋषि जीवित रहेगा। उसका नाम है 'विवेक'। तर्क तो वेश्या है। वह किसी की भी गोदी में बैठ सकती है और किसी का भी सहयोग-समर्थन कर सकती है; पर विवेक ही एक ऐसा है जो समुद्र की कीचड़ में से भी बहुमूल्य मोती निकाल सकता है। उसका आश्रय लेने पर मनुष्य धोखा नहीं खाता। भटक भी जाए, तो वही प्रवृत्ति फिर संकेत देती है और उसी राह पर चलने के लिए बाधित करती है, जो मानवी गरिमा के अनुकूल या अनुरूप है।
अगणित ईश्वरों, संप्रदायों और प्रचलनों में से बीन-कुरेदकर जो अधिकाधिक औचित्यपूर्ण है, उसी को अपनाना सर्वोत्तम है। इस अवलंबन को अपना लेने पर भी जो भ्रांतियाँ-भूले रह जाती हैं, वे अंतरात्मा के क्रमिक विकास के साथ-साथ रह जाती हैं और मनुष्य सत्य के अधिकाधिक निकट पहुँचता जाता है। इसी अवलंबन से यह संभव है कि पूर्ण सत्य को, परब्रह्म को प्राप्त किया जा सके और जीवन को सार्थक बनाया जा सके।
विवेकशीलता का अवलंबन ही गायत्री साधना है। गायत्री को ही ऋतंभरा प्रज्ञा या दूरदर्शिता कहते हैं। यह एक ही कसौटी ऐसी है, जो अपनी न्यायशीलता के कारण प्रस्तुत प्रतिपादनों में से जो सर्वश्रेष्ठ था, उसे अपना सकती है और अपनी नाव में बिठाकर भ्रांतियों के जंजाल में से पार निकालकर सुरक्षित तट तक पहुँचा सकती है। आत्मकल्याण और लोक-मंगल के सर्वानुमोदित तथ्यों को अपनाने में क्या छोड़ा और क्या ग्रहण किया जाना चाहिए? इसका निर्णय तुरंत कर देती है।
ईश्वर की निकटतम स्थिति अपने अंतःकरण में मानी गई है। वह किस रूप में हो सकती है, इसका सही उतर प्राप्त करना हो तो एक शब्द में दूरदर्शी विवेकशीलता ही कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त अंतराल में रहने वाली अनेक प्रकार की मान्यताएँ, भावनाएँ, आकांक्षाएँ सभी ऐसी होती हैं, जिनका व्यक्तिगत अभिरुचि एवं संपर्क-संस्कारों के साथ संबंध जुड़ता है, वे यथार्थवादी नहीं हो सकतीं। इसलिए गहन अंतराल में परब्रह्म की उपस्थिति का अनुभव करने के लिए हमें महाप्रज्ञा का ही आश्रय लेना पड़ेगा। उस अकेली में ही वह सामर्थ्य है कि कंटीली झाड़ियों में से उबारकर हमें सत्य के— ईश्वर के निकटतम पहुँचा सके।
गायत्री उपासना का दार्शनिक स्वरूप दूरदर्शी विवेकशीलता है, जो संकीर्ण स्वार्थपरता द्वारा समर्थित तात्कालिक लाभों से ऊँचा उठाती है और वहाँ ले पहुँचती है, जहाँ पैर टिकाने पर अपना ही नहीं समस्त सृष्टि का हित-साधन हो सकता है।
आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है। शरीर का एक अंश मजबूती से पकड़ लेने पर समूची काया को पकड़ा जा सकता है। अंतरात्मा में विद्यमान निष्पक्ष, न्यायनिष्ठ, उदात्त, आदर्शवादी, विवेकशीलता को अपना लेने पर समझना चाहिए कि ईश्वर की गरदन पकड़ ली गई और अब उस समूचे को भी आसानी से पकड़ा जा सकता है। यही है आत्मा का परमात्मा से मिलन। इसी को समर्पण कहते हैं। एकता या अद्वैत इसी को कहा गया है।
गायत्री मंत्र का सार तत्त्व "धियो यो नः प्रचोदयात्” शब्दों में है, जिसका तात्पर्य है कि हम सबको विवेकशीलता की प्रेरणा मिले। इसमें धर्म और दर्शन का सार तत्त्व आ जाता है। इस सूत्र के आधार पर व्यक्तिगत जीवन की अथवा विश्व-व्यवस्था की संरचना सोची जा सकती है और वही विश्वकल्याण की वास्तविक आधारशिला होगी। मनुष्य में देवत्त्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण मात्र इसी तत्त्व दर्शन के सहारे हो सकता है।
गायत्री मंत्र का अर्थ, चिंतन और उसकी निर्धारणा-प्रेरणा को हृदयंगम करने की प्रक्रिया का नाम उपासना है। इस आद्यशक्ति— महाशक्ति की उपासना, साधना एवं आराधना करने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर का परिमार्जन हो सकता है। दर्शन का काम, चिंतन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्व दर्शन भी समझें और उसके साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।
सृष्टि के आदि से लेकर आद्यावधि देवताओं, ऋषियों, मनीषियों, महामानवों द्वारा गायत्री उपासना का उपक्रम इतना अधिक हुआ है कि वह शब्दावली आकाश में अद्वितीय मात्रा में अनंत आकाश में परिभ्रमण कर रही है। शब्दशक्ति कभी नाश नहीं होती, वह अपने अनुरूप वातावरण पर अनायास ही बरस पड़ती है। गायत्री उपासकों को भूतकाल की उन साधनाओं को अपने ऊपर अवतरित होता, बरसता दृष्टिगोचर होता है। निजी प्रयत्नों में उसी स्तर का सृष्टि में भरा-पूरा अनुदान बरसने का लाभ भी उन्हें मिलता है। इस प्रकार वे असाधारण नफे में रहते हैं। चैत्र की नवरात्रि के संदर्भ में तो इस उपासना का महत्त्व और बढ़ जाता है।
आत्महत्या पर उतारू एक वैज्ञानिक साहस के अभाव में वैसा न कर सका तो घर छोड़कर वैरागी हो गया।
वह उस वैरागी के साथ रहने लगा जो शांति का जीवन जी लेने के बाद संन्यासी बना था। एक दिन दोनों में विवाद छिड़ा। विषय था चंद्रमा का अंत। पहले ने कहा— "वह दिन दूर नहीं जब चंद्रमा धरती पर गिरेगा और चकनाचूर हो जाएगा।" दूसरे ने कहा— "नहीं ऐसा नहीं हो सकता। जब चाँद-सितारे न तो बीमार पड़ते हैं और न खीजते हैं, तो मरेंगे क्यों?"
समाधान के लिए पुराने परिचित वैज्ञानिकों की गोष्ठी बुलाई गई। उनमें से एक ने कहा— "चंद्रमा पृथ्वी से 3,89,000 किलो मीटर दूर है।" व्यास है — कुल 3500 किलोमीटर। अगर गिरेगा तो उसकी रफ्तार 11 कि.मी. प्रति सेकेंड से अधिक न होगी। जब तक वह गिरेगा तब तक हममें से कोई जीवित नहीं रहेगा। इसलिए चिंता करना ठीक नहीं।
दूसरे वैज्ञानिक ने कहा— "सभी ग्रहगोलक एकदूसरे के साथ बँधे हुए हैं। नियम-मर्यादा पर चलते हैं, फिर गिरने जैसी आशंका क्यों की जाए?"
एक तीसरा वैज्ञानिक बोला— "ईसा से 1200 वर्ष पूर्व से लेकर अब तक हुए 8000 सूर्यग्रहणों और 5200 चंद्रग्रहणों की गणना मैंने की है। चंद्र-सूर्य अपना रास्ता सहज ही बदलने वाले नहीं हैं।"
एक अन्य वैज्ञानिक ने कहा— "चंद्रमा ने पृथ्वी के निकट आने की गलती की, तो पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण एक बड़ा टुकड़ा तोड़कर अपनी जेब में रख लेगा और दूसरे छोटे को एक पतंग की तरह छितरायी कक्षा में उड़ने देगा।"
गोष्ठी के वैज्ञानिकों की बात सुनकर दोनों वैरागियों ने अपनी-अपनी बात का समर्थन माना और वे अपने-अपने कामों में शांतिपूर्वक लग गए।
छांदोग्य उपनिषद् में पंचप्राणों की पाँच आहुतियों का वर्णन मिलता है। यह प्राण-ऊर्जा की ही पंचस्तरीय साधना का संकेत है। इसे देवयज्ञ कहा गया है। चेतना-ऊर्जाएँ ही देवसत्ताएँ हैं। अतः इन चेतना-ऊर्जाओं की पंचस्तरीय सक्रियता ही पाँच आहुतियाँ हैं; जिनके संपन्न होने से देवयज्ञ संपन्न होता है।
जीवन चेतना जब द्रव्यगत रूपाकारों में ढलती है, तभी वह सामान्य प्राणियों के अनुभव में आती है। अपने शुद्ध रूप में निर्विकारी चेतना को सामान्यतः देखा- समझा नहीं जा सकता। चेतना-ऊर्जा या प्राण-ऊर्जा सर्वव्यापक है, सर्वसमर्थ है, किंतु उसकी हलचल जब प्रकृति-द्रव्य के संयोग के सामने आती है, तभी सृष्टि का क्रम प्रारंभ होता है। भूत-द्रव्य और चेतना-ऊर्जा का संयोग ही सृष्टि-चक्र के प्रवर्त्तन का आधार है। शास्त्रीय भाषाओं में इसे ही अनंत एवं प्राण का संयोग कहा गया है। वृहदारण्यक उपनिषद् में यह संकेत स्पष्ट है— “अन्नै वै व्यन्ने हीमानि, सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति, प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते .............।
अर्थात् 'वि' ही अन्न है, जिसमें सब प्राणी विष्ट रहते हैं, वही (भूत-द्रव्य) अन्न है तथा जिस (चेतना-ऊर्जा) के कारण सब प्राणी रमण करते हैं, गतिशील होते हैं, वह ‘रम’ ही प्राण है।
इस प्रकार सृष्टिगत जीवन का उदय अन्न और प्राण के भूत-द्रव्य एवं चेतना के प्रकृति और पुरुष के संयोग-संपर्क से होता है।
यद्यपि मूल रूप से एकमेव ब्रह्मसत्ता ही विद्यमान है, तो भी उसके संकल्प से दो प्रधान सत्ताएँ अभिव्यक्त होती हैं, जिनमें से एक भौतिक द्रव्य का आधार बनती है, दूसरी चेतना-ऊर्जा का । इन्हें ही भिन्न-भिन्न नाम देकर प्रकृति-पुरुष, अन्न-प्राण, रयि-प्राण आदि के रूप में विवेचित किया गया है। वस्तुतः यह संसार ब्रह्मसत्ता के संकल्प में प्रकट हुआ है। “स एकाकी न रमते” कहकर उस ब्रह्मसत्ता के सृष्टि-संकल्प का आधार खोजने की चेष्टा की गई है, जो मानवीय बुद्धि को संतुष्ट करने का प्रयास ही है; क्योंकि सर्वोच्च सत्ता के संकल्प का वास्तविक कारण अज्ञेय है। सत्ता का मूल स्वरूप ही आनंदमय एवं चिन्मय है। इसलिए उस आनंदमय चेतना के एकाकी न रमने का प्रश्न ही नहीं है। हाँ, यह अवश्य निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि जगत की उत्पत्ति संकल्प से हुई। प्रश्नोपनिषद् में इसी संकल्प की द्रव्य और चैतन्य-ऊर्जा के रूप में अभिव्यक्ति का वर्णन है —
“स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति॥” प्रश्नोप .1।4
अर्थात् । उसने रयि और प्राण का जोड़ा बनाया, ताकि उन्हीं से बहुशः प्रजाएँ उत्पन्न हो सकें। यहाँ रयि को द्रव्य या द्रव्य-ऊर्जा तथा प्राण को चेतना-ऊर्जा समझा जाना चाहिए।
ऊर्जस्विता के स्तर भेद से प्राणों के पाँच भेद हैं। ऊर्जा के सर्वोच्च रूप को प्राण, उसके बाद दूसरे रूप को उदान, तृतीय स्तरीय ऊर्जा को व्यान, चतुर्थ को समान और पंचम को अपान कहते हैं। चेतना की बलिष्ठता को ही अध्यात्म-शास्त्र में प्राण कहा गया है।
पाँच आहुतियों का औपनिषदिक वर्णन प्राण-ऊर्जा के पाँच स्तरों का तथा अमूर्त सूक्ष्मसत्ता के क्रमशः स्थूलतर रूप में अभिव्यक्त होने का वर्णन है। प्रथम आहुति का वर्णन यों है—
“असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अंगारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः। (छाँ 5।4।1)
अर्थात् राजा जैवालि ने ऋषि गौतम से कहा— " है गौतम! यह प्रसिद्ध घुलोक ही अग्नि है।" आदित्य ही उसका समिध है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चंद्रमा अंगार है और नक्षत्र विस्फुलिंग; यानी चिनगारियाँ हैं।
यह प्राण-ऊर्जा की प्रथम स्तरीय अभिव्यक्ति का वर्णन है। प्राण-ऊर्जा के प्राथमिक कंपनों से घुलोक में जो हलचलें होती हैं, उनका ही यह वर्णन है। सर्वव्यापी चिदाकाश ही घुलोक है। उसे ही सत्यलोक भी कहा जाता है। वहाँ संकल्प का ही साम्राज्य है, ऐसा छांदोग्य उपनिषद् में बताया गया है। भौतिकीय दृष्टि से जिन्हें गणितीय सत्य या वैज्ञानिक सत्य कहा जाता है, वे चिदाकाश के लिए या घुलोक के लिए कोई अर्थ नहीं रखतीं। वह इनसे परे का लोक है। उसे मनोमय या संकल्पमय लोक कहा जाता है। मनोमयलोक वह है, जहाँ सामान्य गतिविज्ञान के नियम नहीं लागू होते। यहाँ सामान्य गतिविज्ञान के नियम नहीं लागू होते। यहाँ पंचप्राण-ऊर्जाएं आदित्य, रश्मि, दिवस, चन्द्रमा तथा नक्षत्र के रूप में प्रथम आहुति के उपरांत अभिव्यक्त होती है। यह आहुति संकल्पमयी श्रद्धा के द्वारा दी जाती है।
“तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा सम्भवति।” (छां. 5।4।2)
अर्थात् उस द्युलोकरूपी अग्नि में देवगण श्रद्धा का हवन करते हैं, जिससे सोम की उत्पत्ति होती है।
यहाँ द्युलोक महत्तत्त्व का प्रतीक है। जो अभी तक आधुनिक भौतिक द्वारा अविज्ञात है। उसी की इन पाँच प्राथमिक अभिव्यक्तियों की यहाँ चर्चा है। चेतना का यह स्तर बुद्धि द्वारा नहीं, श्रद्धा द्वारा ही जाना जा सकता है। ऐसा श्रुति का स्पष्ट निर्देश है। अतः यहाँ वर्णित आदित्य, रश्मि, दिवस, चंद्रमा और नक्षत्र के सूक्ष्म अर्थों के आधुनिक भौतिक शास्त्रीय पर्याय नहीं बताए जा सकते। श्रद्धा द्वारा ही इन पाँच ऊर्जा स्तरों का ज्ञान संभव है। इस प्रथम आहुति से सोम उत्पन्न होता है।
जो ज्योतिर्मय प्राण द्युलोक से प्राणियों पर बरसता है, उसका ही नाम सोम है। वह सविता देवता से बरसने वाला चेतना-आलोक है। गायत्री साधना द्वारा इसी सोम को तीव्रता से आकर्षित किया जाता है।
पंचप्राणों की दूसरी आहुति का वर्णन यह है— “पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो, विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा, हृादनयो विस्फुल्लिङ्गाः।" (छाँ. 5।5।1)
अर्थात्। है गौतम! पर्जन्य ही अग्नि है, उसका वायु ही समिध है, बादल धूम है, विद्युत ज्वाला है, वज्र अंगार है तथा गर्जन विस्फुल्लिंग है।
यहाँ पर्जन्य उस प्राण-ऊर्जा का प्रतीक है, जो अनंत अंतरिक्ष से सर्वत्र निरंतर बरस रहा है। यह सोम का पर्याय ही है। उस पर्जन्याग्नि में देवगण अर्थात् चेतना ऊर्जाएँ सोम का हवन करते हैं, यानी जो सूक्ष्म ज्योतिर्मय प्राण इस संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है; उसे देवगण भिन्न-भिन्न रूपों में बदलते हैं। ये रूप हैं— वायु, अभ्र, विद्युत, वज्र और गर्जन। वायु उस शक्ति का नाम है जो इस प्राण-ऊर्जा को यथाक्रम वितरित करती है, जो वृहदारण्यक उपनिषद् में अमूर्त यत् और त्यत् अर्थात् अमूर्त गतिशील एवं अप्रत्यक्ष कही गई है। छान्दोग्य उपनिषद् में रैक्व ने संवर्गविद्या का वर्णन करते हुए कहा है कि, "जब अग्नि, सूर्य, चन्द्र या आपः अपने अस्तित्व से विमुक्त होते हैं, तो वे वायु में ही लीन होते हैं।"
“वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति, यदा। सुर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति। यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति।।” (छा. 4। 3।1)
यह वायु वायुभूत से भिन्न है, वायुभूत इलेक्ट्रोन-कण का शास्त्रीय नाम है, किंतु यहाँ प्राण-ऊर्जाओं की दूसरी आहुति से उत्पन्न वायु एक भिन्न ही शक्ति का द्योतक है। इलेक्ट्रोन इसकी ही अपेक्षाकृत स्थूल अभिव्यक्ति है। वृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने बताया है कि वायु ही वह सूत्र है, जिससे लोक-परलोक तथा सब भूत संग्रथित हैं।
ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि लेप्टान-कणों का मूल उद्गम यह वायु-शक्ति ही है। शेष चार तत्त्वों में से अभ्र मेसान-कणों की मूलभूत शक्ति का, विद्युत, फोटान-कणों के उद्गम स्रोत का, वज्र एल्फा कणों की उद्गम-स्रोतशक्ति का तथा गर्जन घेरियान-कणों की प्रसविनी शक्ति का पर्याय है।
आहुति का तीसरा स्तर संवत्सर, आकाश, रात्रि, दिशाओं और अवांतर दिशाओं से संबंधित है—
"......... संवत्सर एव समिदाकाशो, धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुल्लिङ्गाः॥" छाँ 5।6।1)
अर्थात्। संवत्सर ही समिध है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अंगार हैं, अवांतर दिशाएँ विस्फुलिंग हैं।
अभी तक के दो ऊर्जा-स्तर अतिसूक्ष्म थे। जो दिक्कालातीत हैं। यह तीसरा स्तर देशकाल का ‘टाइम’ और ‘स्पेस’ का स्तर है। प्राण-ऊर्जाएँ जब तीसरे स्तर पर सक्रिय होती हैं, तो वे दिक्काल में अभिव्यक्त देखी जा सकती हैं। इसके पहले का क्षेत्र दिक्कालातीत चेतना से संबंधित है। प्राण-ऊर्जाएँ जब तक चौथे एवं पाँचवें आयाम में सक्रिय रहती हैं, वे दिक्काल-सीमा से परे रहते हैं। तीसरा आयाम ही दिक्काल का आयाम है। त्रि-आयामीय जगत जो इंद्रियबोधात्मक जगत है, वह प्राण-ऊर्जाओं के इसी स्तर की अभिव्यक्ति है। तीसरी आहुति से ही अन्न का यानी पंचभूतात्मक दृश्य जगत का जन्म होता है। अगली दो आहुतियाँ इसी त्रि-आयमिय जगत से संबंधित है। चौथी आहुति का वर्णन यह है कि वाक् ही समिध है, प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अंगारे और श्रोत्र विस्फुल्लिंग हैं। इन्हें पंचतन्मात्रा के प्रतीक समझना चाहिए। शब्द, गंध, रस, रूप और स्पर्श की तन्मात्राएँ ही यहाँ अभिप्रेत हैं। इसी प्रकार पाँचवीं आहुति में पंचमुखी क्रिया-चेष्टाओं का वर्णन है।
पंचप्राणों की पाँच आहुतियों का यह औपनिषदिक वर्णन भी विवेचन की भारतीय शैली के अनुसार त्रिस्तरीय है। आधिदैहिक दृष्टि से पांचवीं आहुति उस रतिक्रिया का प्रतीक है, जिसके परिणामस्वरूप जीव का जन्म होता है। इसी प्रकार चौथी आहुति आधिदैहिक दृष्टि से पाँच ज्ञानेंद्रियों की अनुभूतियों का प्रतीक है तथा तीसरी आहुति मानसिक अनुभूतियों का प्रतीक। त्रि-आयामीय जगत में ही देह, मन और चेतना की भिन्नता है। उससे ऊपर उठने पर तो इनकी अभेदता ही प्रकट है। इसलिए प्रथम एवं द्वितीय आहुतियाँ सूक्ष्म चेतन-ऊर्जाओं के ही विवरण से संबंधित हैं। आधिदैविक दृष्टि से पाँचवीं आहुति को शरीरस्थ पंचदेवताओं की पंचोपचार पूजा-चेष्टाएँ समझा जा सकता है। चौथी आहुति पाँचों इंद्रियों के अधीश पाँच देवताओं की साधना है और तीसरी आहुति चारों दिशाओं तथा तीनों काल में व्याप्त देवताओं की उपासना है।
‘यत्पिण्डे तत्ब्रह्माण्डे' यही भारतीय दर्शन विज्ञान का निष्कर्ष है। अतः पाँच प्राणों की पाँच आहुतियों जिस प्रकार ब्रह्मांड की अभिव्यक्ति का विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं, उसी प्रकार वे मानवी काया में अंतर्निहित पाँच चेतना स्तरों पर भी प्रकाश डालती है। प्रथम स्तर आनंदमयकोश का है, जो सर्वाधिक सूक्ष्म है। दूसरा स्तर विज्ञानमयकोश का है। तीसरा मनोमय चौथा प्राणमय और पाँचवाँ स्तर अन्नमयकोश का है। सामान्य व्यक्ति अपने इसी पाँचवें बाह्यस्तर को ही अपना सर्वस्व समझते रहते हैं और उसे भी ठीक से जानने-समझने की ओर प्रवृत्त नहीं होते, किंतु जागृत प्रबुद्ध आत्माएँ प्राण तत्त्व के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए आकुल हो उठती हैं और प्राण विज्ञान तथा प्राण दर्शन का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर आत्मसत्ता में अभिव्यक्त प्राण-ऊर्जा के पाँचों स्तरों का साक्षात्कार किए बिना नहीं रहतीं। मानवीय सत्ता में पाँच प्राणों की पाँच आहुतियाँ अहिर्निश पड़ती रहती हैं। उसके बिना जीवन-यज्ञ का चल पाना ही संभव नहीं है, किंतु उस जीवन-यज्ञ देवयज्ञ के वास्तविक स्वरूप को जान थोड़े ही लोग पाते हैं। शेष तो उस ओर बेखबर-उदासीन ही रहे आते हैं और अपने भीतर बिखरी पड़ी इस अनंत वैभव की आदिस्रोत प्राणशक्ति की उपेक्षा करते हुए बाहर उसी प्राणतत्त्व के यत्किंचित् प्रकाश के प्रति आकर्षित होकर दौड़ते फिरते हैं। प्राणियों में जहाँ, जो कुछ भी जीवन है, चमक है, दीप्ति है, आकर्षण है, वह वस्तुतः प्राणांश के ही कारण है। प्राण विद्युत की अधिकता ही व्यक्ति को तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी बनाती है। उस प्राण-ऊर्जा का अभिवर्द्धन ही गायत्री साधना का प्रयोजन है। अपने ही काय-कलेवर की यज्ञशाला में पाँच प्राणों का जो पंचकुंडी यज्ञ निरंतर चलता रहता है, उस देवयज्ञ के प्रति जागृत होना, उसके रहस्य को समझना और उसकी प्रेरणाओं को ग्रहण करना प्रत्येक मनुष्य का पुनीत कर्त्तव्य है।
गेटे जर्मनी का एक बहुत बड़ा नाटककार हुआ है। वह अपने कार्य में इतना रम गया था कि अपने आपको इस विश्वनाटक का एक पात्र ही अनुभव करने लगा था।
मरते समय उसके चेहरे पर बच्चों जैसी मुस्कराहट थी। अंतिम सांस छोड़ते हुए उसने जोर से ताली बजाई और उपस्थित लोगों को उंगली के इशारे से बताया— “लो अब परदा गिरता है और एक बढ़िया नाटक का अंत होता है।”
प्राणी को भवबंधनों से आबद्ध माना जाता है। कैदी की स्थिति में जिस प्रकार कारागार में पड़े रहने पर अनेकानेक वेदनाएँ सहनी पड़ती हैं, समझा जाता है कि भवबंधनों में बँधे व्यक्ति की भी वही दुर्दशा होती है। आए दिन की शारीरिक पीड़ाएँ, स्वजन-संबंधियों द्वारा बरती जाने वाली अवज्ञा-उपेक्षा भी कम कष्टकर नहीं होतीं। घाटा, अपमान, असफलता, विछोह, विश्वासघात जैसी घटनाएँ भी मर्मांतक कष्ट पहुँचाती हैं।
दुर्घटनाओं का सिलसिला चलता रहता है। प्रतिकूलताएँ चित्र-विचित्र रूप बनाकर त्रास देती रहती हैं। वृद्धावस्था में शरीर की जरा-जीर्ण स्थिति हो जाती है। युवाकाल के विनोद, मनोरंजन, मित्रों के सहयोग याद आते रहते हैं और वे शूल की तरह चुभते हैं। इंद्रियों के शिथिल हो जाने पर शरीर-यात्रा भी अपने बलबूते नहीं चल पाती। इसके लिए दूसरों का सहारा ताकना पड़ता है। यदि वह उपलब्ध न हो तो उचित आहार-विहार की, चिकित्सा-स्वच्छता की विधि-व्यवस्था नहीं बन पाती और नरक जैसी स्थिति में पड़े हुए दूसरों की उपेक्षा-अवमानना का भाजन बनना पड़ता है। मृत्यु के समय होने वाले कष्टों को सभी को ज्ञान है। हृदयगति रुक जाने जैसी सरल मृत्यु तो किसी-किसी की ही होती हैं। अन्यथा अधिकांश को महीनों शय्या पर पड़े-पड़े मूल-मूत्र त्यागना पड़ता है। रातें जागते बीतती हैं और अंग-अंग में होने वाली पीड़ाओं से रोना-कराहना पड़ता है।
बचपन की स्थिति और भी अधिक दयनीय होती है। गर्भावस्था में चेतना तो रहती है, पर वह अविकसित और असहाय होती है। इसलिए हाथ-पैर बाँधकर कालकोठरी में कैद कर दिए जाने जैसी स्थिति में नौ महीने पड़ा रहना पड़ता है। साँस लेने, हाथ-पैर चलने और कुछ सुन सकने तक की सुविधा नहीं होती। जकड़े हुए गटर की स्थिति में मल-मूत्र के घड़े में पड़े-पड़े किसी प्रकार समय गुजारना पड़ता है। भ्रूण के परिपक्व हो जाने पर उसकी आकुलता बाहर निकलने के लिए मचलती है। द्वार बंद रहता है। उसे खोलने के लिए उस असहाय स्थिति में ही प्रबल पराक्रम करना पड़ता है। प्रसव जननी की तरह नवजात शिशु के लिए भी कम कष्टकर नहीं होता। दोनों जीवन-मरण की विभीषिका को विवशतापूर्वक सहन करते हैं। जन्मदात्री उस संकट से मुक्ति पाकर बहुत दिनों में सामान्य स्वास्थ्य प्राप्त कर सकने की स्थिति तक पहुँचती है। शिशु के लिए अनभ्यस्त परिस्थितियों में निर्वाह करना और भी अधिक भारी पड़ता है। कोमल त्वचा बाहर के तापमान में अपना गुजारा ज्यों-त्यों करके ही कर पाती है। उदरांत जिस वायुमंडल में रहना पड़ता है उसमें कभी शीत की अधिकता होती है, तो कभी उष्णता की। शरीर इतना दुर्बल, असमर्थ होता है कि साँस लेना तक भारी पड़ता है। सिकुड़े हुए फेफड़ों को गतिशील बनाने में सफलता प्राप्त करने के लिए जोर-जोर से रोना-चिल्लाना पड़ता है। हृदय की धड़कन अत्यंत मंद होती है। उसमें इतना दम नहीं होता कि नाड़ियों को अत्यंत सिकुड़ी हुई स्थिति से विकसित करके इस योग्य बना सके कि उनमें रक्त-संचार का नितांत आवश्यक क्रम स्वाभाविक रीति से चल पड़े। इसके लिए उस बालक को बार-बार तेजी से हाथ-पैर चलाने पड़ते हैं। रोना और हाथ-पैर फेंकना, यह एक अनिवार्य व्यायाम होता है। जिसके कारण त्वचा में बाह्य वातावरण को सहन कर सकने जितनी उष्णता पैदा होती है। रक्त-संचार, श्वास-प्रश्वास और पाचनतंत्र को क्रियाशीलता का आधार मिलता है।
नवजात शिशु से लेकर दो-तीन वर्ष तक ऐसी स्थिति रहती है जिसे निविड़ पराधीनता ही कहना चाहिए। मल-मूत्र त्यागकर उसकी सफाई करने का बोध नहीं होता। सर्दी-गर्मी से बचने के लिए वस्त्र धारण करना-उतारना तो दूर, करवट बदलने तक का बल नहीं होता। भोजन-जल के संबंध में तो नितांत पराधीनता रहती है। अपने मुख से तो अपनी आवश्यकता एवं कठिनाइयाँ बताने तक की स्थिति नहीं होती। इन सब बातों का अनुमान माता ही अपने अनुभव के आधार पर लगाती है और अपने ज्ञान तथा साधन के आधार पर उनकी पूर्ति करती है। भाषाज्ञान प्राप्त करने के लिए शिशु को अपना सारा कौशल दाँव पर लगाना पड़ता है। मुख, कंठ, तालु को शब्दोच्चारण के लिए अनुकूल बनाने में इतने बड़े पौरुष की आवश्यकता पड़ती है जितनी किसी दुर्बलकाय व्यक्ति को पहलवान बनाने के लिए वर्षों अखाड़े की साधना करनी पड़ती है। प्रायः दस वर्ष की आयु हो जाने तक यही स्थिति रहती है। अल्पज्ञान और बड़ों का विकसित ज्ञान परस्पर ताल-मेल नहीं बिठा पाते। न शिष्टाचार आता है, न व्यावहारिक ज्ञान होता है। ऐसी दशा में बचपन के प्रायः सभी क्रियाकलाप बालविनोद जैसी स्थिति में बने रहते हैं। उपहास होता रहता है, पर उसमें क्षमा और ममता का भाव जुड़ा रहने से रोष, प्रतिशोध से बचाव होता रहता है। दस वर्ष की आयु होने तक स्थिति केवल इतनी बन पाती है कि अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को व्यक्त कर सके। कुछ उलटे-सीधे क्रियाकलाप कर सके। सीखने और चाहने के निमित्त आवश्यक विलंबन प्राप्त कर सके।
दस से लेकर अठारह-बीस वर्ष की आयु तक बालक को सभी बातों के लिए अभिभावकों पर निर्भर रहना पड़ता है। भोजन, वस्त्र, चिकित्सा, शिक्षा आदि के लिए अभिभावकों की सहायता के बिना और कोई चारा नहीं। किशोरावस्था तक ऐसी ही पराधीनता रहती है, जैसी बंधुआ मजदूरों की होती है। अच्छाई इतनी ही है कि साथी-संगी में हँसने-खेलने की सुविधा मिलने से समय किसी प्रकार कटता रहता है। वयस्क होने तक यही स्थिति बनी रहती है। स्वच्छंदता के समय बिजली की चमक जैसा स्वस्थकाल नहीं आता है। उसमें जोश तो रहता है, पर होश नहीं। इस कारण लोक-व्यवहार में सही रीति से प्रवेश करने का अवसर भी नहीं मिल पाता।
अल्प वयस्कता से निबटने और क्रिया-कौशल में प्रवेश करने की उठती आयु में इस निश्चय की गुंजायश रहती है कि जीवन को महान प्रयोजनों, आदर्शों, सिद्धांतों एवं उत्कृष्टताओं के साथ जोड़कर महामानव जैसा साहसिक कदम बढ़ा सके। पर वह संभावना भी क्रियान्वित नहीं दिखती। पिंजड़े में चूहे के फँसने की तरह कामुकता की विलास-लिप्सा उभर पड़ती है और विवाह हो जाता है। विवाह आरंभ में ऐसा लगता है कि मानो परीलोक में गंधर्वों की बिरादरी में प्रवेश मिल रहा है। पर वह दिवास्वप्न देर तक नहीं टिकता। अभिभावकों के बंधन शिथिल होते हैं। पहले अपने लिए पराधीनता थी, अब अपने ऊपर पराधीनों का भारवहन करने की जिम्मेदारी लद जाती है। परिवार का संतान का भरण-पोषण सिर पर आ जाता है। इसके लिए उपार्जन के निमित्त निरंतर चिंतारत और प्रयत्नरत रहना पड़ता है।
यही है वह समय, जिसमें कुसंग दबोच लेता है। दुर्व्यसनों की लत पड़ जाती है। वातावरण के प्रचलन ओर जन्म-जन्मांतरों के कुसंस्कार उभरने लगते हैं। कुकर्म करने को मन चलता है। कुसंग उसे आग में घी पड़ने की तरह बढ़ाता है। फलतः दुष्कर्मों में मन निरत हो जाता है, अपराध और अनाचार बन पड़ते हैं। इनके दुष्परिणाम आरंभ में समझ में तो नहीं आते, पर वे मिलते निश्चित रूप से हैं। बीज बोने और फसल काटने का सिलसिला चल पड़ता है। अनाचार हाथों-हाथ अपना प्रतिफल दिखाने लगते हैं, समाज के प्रचलन ऐसे हैं जिनके अनुगमन करते हुए कदाचित ही कोई चैन से रह पाता है। दाद खुजाने की तरह अनर्थों को चावपूर्वक किया जाता है; जब खुजाते-खुजाते चमड़ी फटती और पीड़ा होती है तब पता चलता है कि जीवन में अनर्थ अपनाए ओर बदले में भाँति-भाँति के त्रास पाए जा रहे हैं।
दक्षिण इंग्लैंड की अधेड़ उम्र की एक महिला ने अपनी 1932 मॉडल आस्टिन कार की वसीयत में यह लिखवाया कि मरने के बाद उसके साथ कब्र में उसकी मोटरकार को भी सीधे कार समेत या कि कार को टुकड़ों में करके दफनाया जाए।
महिला को यह कार इतनी प्रिय थी कि, उसमें किसी को हाथ तक नहीं लगाने देती थी।
जीवन में सरसता भर देने वाले चार आधार धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह चार प्रकरण ऐसे हैं, जिन्हें जीवन-व्यापार में आवश्यक माना गया है और परस्पर गुँथे हुए भी। धर्म का अर्थ है— कर्त्तव्यपालन। मनुष्य अनेक कर्त्तव्यों और दायित्त्वों से जकड़ा हुआ है। वह पशुवत् स्वेच्छाचारी नहीं हो सकता। कोई होना चाहे तो समाज उसे वैसा न करने देगा। विरोध, निंदा, प्रताड़ना जैसे अनेक उपचार उसके लिए हैं, जो मर्यादाओं और वर्जनाओं का उल्लंघन करने का प्रयास करता है।
फिर मनुष्य की संरचना भी ऐसी है कि उसकी स्थिरता और प्रगति दूसरों के सहयोग पर पूर्णतः निर्भर है। अन्न, वस्त्र, शिक्षा, आजीविका आदि वह स्वयं ही नहीं कमा लेता। इसके लिए उसे दूसरों का आश्रय लेना पड़ता है। माता के संरक्षण में वह अपनी शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी करता है। परिवार के बीच रहकर वह भाषा और सभ्यता सीखता है। शिक्षा और व्यवसाय कोई अपने आप एकाकी नहीं कर सकता। विवाह किसी दूसरे की ही कन्या से होता है। उसका लालन-पालन करके ससुराल वाले अनुग्रहपूर्वक ही प्रदान करते हैं। मित्रों की सहायता से ही हँसी-खुशी का समय कटता है।
इन अनुदानों का प्रदान— देना ही कर्त्तव्यपालन है। जिस समाज के द्वारा हमें सुविधाएँ प्राप्त हैं और सुरक्षा मिलती है, उसे संतुलित, समुन्नत बनाने के लिए कुछ जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर आती हैं, उन्हें पूरा न किया जाए तो ऋणभार लदता और कृतघ्नता का आत्मदंड सहना पड़ता है। कोई कर्त्तव्यों से विमुख न हो, इसीलिए ईश्वर न्याय, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि का यह अध्यात्म दर्शन विनिर्मित किया गया है ।यह अध्यात्म दर्शन धर्म-मर्यादा के अंतर्गत ही आता है।
धर्म के उपरांत अर्थ की आवश्यकता पड़ती है। मनुष्य पशु-पक्षियों से भिन्न है। उसकी आवश्यकताएँ उनसे बढ़ी-चढ़ी हैं। पक्षियों के शरीर से चिपके हुए पंख उनकी कपड़े की आवश्यकता पूरी करते हैं। बिखरे हुए बीज और कीड़े-मकोड़े खाकर वे गुजारा कर लेते हैं। वन्य-पशुओं को भी ऐसी सुविधाएँ प्राप्त हैं। कि वे निजी पुरुषार्थ के सहारे अपनी जीवनयापन कर सकें। उनकी मोटी और बालों वाली त्वचा ऋतु-प्रवाह सहन कर लेती है। शाकाहारियों को वनस्पति और माँसाहारियों को जीव-जंतु सरलतापूर्वक मिल जाते हैं। किंतु मनुष्य की आवश्यकताएँ इतनी सीमित नहीं हैं। उसे वस्त्र, बिस्तर, जूते, पुस्तक, औषधि आदि की आवश्यकता पड़ती है। फिर उसके साथ एक परिवार भी जुड़ा होता है। समर्थ होते ही असमर्थों की आवश्यकताएँ पूरी करने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। इन सबके लिए साधन चाहिए। साधन अर्थात् धन। धन श्रम तथा बुद्धिबल के सहारे उपार्जित होता है। कृषि, व्यवसाय, मजूरी, शिल्प, कला आदि के माध्यम से अर्थ उपार्जन संभव होता है। इसलिए इस क्षेत्र में भी उसे प्रवीणता प्राप्त करनी होती है। अर्थ अपने निज के परिवार के तथा अनुदान के रूप में पुण्य-परमार्थ हेतु उसकी आवश्यकता होती है। समयक्षेप एवं अवयवों को सक्रिय रखने के लिए परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही अर्थ-उपार्जन भी होता रहता है। इसकी अपेक्षा करने पर तो समय काटना कठिन हो जाएगा। मनुष्य रोगी बनेगा और क्षमताएँ गँवाता चला जाएगा। बुद्धिकौशल भी सतेज और क्षमताएँ गँवाता चला जाएगा। बुद्धिकौशल भी सतेज न रहेगा। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए जीवन के सदुपयोग में धर्म के उपरांत अर्थ की गणना की गई है। मनुष्य इसी आधार पर स्वावलंबी बनता है।
तीसरी आवश्यकता विनोद की है— कामक्रीड़ा की। इस हेतु मोटा आधार दांपत्य जीवन के रूप में सामने आता है, पर उस परिधि में वह सीमित नहीं। कामुकता के कल्पना-चित्र कामक्रीड़ा को रंगीला बनाते हैं। यौनाचार का एक कारण प्रकृति की वंशवृद्धि प्रक्रिया भी है। प्रकृति प्राणियों का वंश चलते देखना चाहती है, इसके लिए नर के साथ सहयोग करने के फलस्वरूप मादा को भी अपार कष्ट सहना पड़ता है। प्रसव में मादा की तो जान पर ही बन आती है। नर को भी बच्चा के स्वावलंबी बनने तक उनके लिए विविध विधि सरंजाम जुटाने पड़ते हैं। इस कष्टसाध्य कार्य में बैलों की जोड़ी की तरह जुतने के लिए कोई समझदार स्वेच्छापूर्वक तैयार न होता, न अपनी जीवनीशक्ति का क्षरण करता, पर प्रकृति की विडंबना तो देखिए कि प्राणियों को कामुकता की नशेबाजी सिखा दी है। उससे उन्मत्त होकर वह ऐसा कुछ करता है, जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबाते समय अपने ही जबड़े का रक्तपान करता और उस रसास्वादन से प्रसन्न होता है। संक्षेप में यही है कामुकता और उसकी परिणति।
किंतु यह उन्माद तो चढ़ती उम्र में थोड़े वर्षों के लिए ही चढ़ता है। बचपन, वृद्धावस्था, रुग्णता आदि की अवधि में कामक्रीड़ा के अवसर नहीं रहते है। किंतु तत्त्वदर्शियों ने तो उसे जीवन की आवश्यकताओं में गिना है। इसलिए उसे सदा अपनाए रहने की आवश्यकता पड़ती है। बच्चे खिलौने से खेलते हैं, झूला-झूलते हैं। उछलते, कूदते तथा साथियों की मंडली में धमा-चौकड़ी करते हैं। गायन, वादन, अभिनय, कथा, कीर्तन, प्रतियोगिता आदि के सहारे मनोविनोद संपन्न किया जाता है। यह हर स्थिति में संभव है। किंतु उसे संपन्न करने के लिए एकाकी रहकर उस आनंद को नहीं लिया जा सकता। दो, कई या बहुत मिलकर उत्सव-समारोह मनाते हैं। विनोद के साधन जुटाते हैं। हँसने-हँसाने, प्रसन्न होने, प्रसन्न करने की सभी विधाएँ 'काम' विनोद के अंतर्गत आती हैं। मनुष्य जीवन की यह भी एक महती आवश्यकता है। इसके बिना जीवन रूखा, नीरस, कर्कश, बोझिल हो जाता है। गुमसुम बैठा रहने वाला आदमी अपने को अभागा अनुभव करता है। समय बिताना उसके लिए भार बन जाता है। मन की कली खिलती है तो कल्पनाएँ उभरती हैं, इच्छाएँ जगती हैं, योजनाएँ बनती हैं और क्रियाएँ चल पड़ती हैं। इसी को कहते हैं— सरस जीवन। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए हर कोई बेचैन रहता है और समय, मनोयोग और धन लुटाता है। इसे हास्य के संपर्क में बिना फूहड़पन को जोड़े विरत रहा जा सकता है।
मोक्ष का अर्थ है— कुत्साओं और कुंठाओं से छूटना, कषाय-कल्मषों से छुटकारा पाना। शारीरिक वासना, मानसिक तृष्णा और चित्त की अहंता से छुटकारा पाना। लोभ को हथकड़ी, मोह को बेड़ी और अहंता को जेल की तौक कहा गया है। यह जाल-जंजाल ऐसा है, जिसमें तात्कालिक लालच में मनुष्य फँसता जाता है, पर यह नहीं समझ पाता कि इस दलदल से निकला कैसे जाए?
इसके लिए संचित कुसंस्कारों से जूझना पड़ता है, अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को हठपूर्वक निरस्त करना पड़ता है, साथ ही दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाकर आत्मसंयम का अभ्यास करना पड़ता है। भवबंधन मकड़ी के जाले की तरह हम स्वयं ही बुनते हैं। आत्मस्फुरणा उठती है, तो उन्हें सरलतापूर्वक तोड़ भी फेंकते हैं। अनौचित्य के प्रति उपेक्षा बरतना ही मोक्ष है। इसे अंतिम पुरुषार्थ माना गया है।
ऋषि अगस्त्य की पत्नी ने एक बार रत्नजड़ित आभूषण पहनने की इच्छा की और किसी शिष्य से माँग लाने के लिए उन्हें बाधित किया। ऋषि किसी प्रकार जाने को तैयार तो हो गए, पर एक शर्त रखी, जिसके पास ईमानदारी की कमाई का धन होगा, उसी के आभूषण ग्रहण करूँगा।
ऋषि के शिष्यों में कितने ही सुसंपन्न भी थे। वे पहुँचे तो इच्छापूर्ति के लिए वे सभी सहर्ष तैयार थे, पर पूछने पर उन सभी का उपार्जन न नीतिपूर्ण था, न उनका कमाया। अस्तु वे उन्हें लेने से इन्कार करते हुए आगे बढ़ते गए। अंत में उनका ऐसा शिष्य मिला जो प्रतापी भी था और राजा भी, पर उसके कोष में कुछ भी न था जो मिलता उसे तत्काल लोक-मंगल के कार्यों में खर्च कर देता। ऋषि को देने के लिए उसके पास आभूषण जैसी कोई वस्तु थी ही नहीं। निदान ऋषि खाली हाथों घर वापस लौटे और पत्नी को अनीति उपार्जित आभूषण पहनने की हठ छोड़ने के लिए सहमत कर लिया।
बैंक से पैसा पाने के लिए आवश्यक है कि या तो पहले से जमा रखी हुई पूँजी खाते में हो या फिर कोई संपत्ति गिरवी रखकर उनके बदले आवश्यक राशि प्राप्त की जाए। बैंकों के पास प्रचुर धन होता है, तो भी वे बिना किसी आधार के हर माँगने वाले को उसकी इच्छित धनराशि देने के लिए तैयार नहीं होतीं। हों भी कैसे? उन्हें अपनी राशि ब्याज समेत लौटानी भी तो है। जब तक वैसी संभावना सामने न आए तब तक बैंकों की उधार देने की नीति कार्यान्वित नहीं हो पाती।
यह संसार भी एक बड़ा बैंक है। इसमें से प्रशंसा, प्रतिष्ठा, सहयोग, सहायता, सद्भावना जैसी अनेकों बहुमूल्य वस्तुओं का वितरण होता है। इन्हें कोई भी अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करके प्राप्त कर सकता हैं; यह सुलभ भी है, सही भी। किंतु यदि अप्रामाणिकता का असमंजस बीच में आ पड़े तो दाता और ग्रहीता के बीच में इतनी चौड़ी खाई आ जाती है, जिसे लांघना सरल नहीं होता।
मनुष्य का आद्यावधि इतिहास उस पूँजी के समान है, जो बैंक के खाते में पहले से ही जमा होती है और उसके बदले में माँगा धन सरलतापूर्वक दिया जाता है। समाजसेवा के रूप में, चरित्रनिष्ठा के रूप में, सज्जनता अवधारणा के रूप में, जिसने अपना व्यक्तित्व प्रामाणिक बनाया है, उसके लिए यह कठिन नहीं पड़ता कि अवसर आने पर उस हुंडी को भुना ले। उपयुक्त सहायता और प्रतिष्ठा प्रशंसा प्राप्त कर ले।
इस दुनिया में सज्जनता-भरे व्यवहार की कमी नहीं। उदारता और सहकारिता का व्यवहार सदा से जीवित रहा है और अंत काल तक जीवित रहेगा; किंतु यह आवश्यक है कि सद्व्यवहार प्राप्त करने का इच्छुक उसके लिए अपनी पात्रता और प्रामाणिकता का प्रमाण प्रस्तुत करे। दया, भिक्षा आदि के नाम पर अपवाद रूप में ही किसी को कुछ मिल सकता है और वह भी स्वल्प रूप में ही।
दूसरों की सदाशयता की उपेक्षा करना उचित है, किंतु साथ ही इस बात की उपेक्षा की जाती है कि जो दिया गया है वह वापस भी लौटे। मुफ्तखोरी के लिए इस संसार में कोई नैतिक-नियमित-विधान नहीं। आपत्तिग्रस्त या अपंग-असमर्थ ही करुणा के आधार पर उतना प्राप्त कर लेते हैं, जितने से कि वे अपना अस्तित्त्व बनाए रहें। अधिक मूल्यवान प्राप्त करने के लिए तो अनिवार्य है कि उसके प्रतिदान का उपयुक्त प्रयत्न किया जाए।
दूसरों से सद्भाव-सहयोग चाहा जाता है। प्रशंसा और प्रतिष्ठा की भी आशा की जाती है। यह उपयुक्त व्यक्तियों को प्रचुर परिमाण में प्राप्त होती है और होती भी रहेगी, किंतु यह सब लूट के माल की तरह बटोरा नहीं जा सकता। छलपूर्वक किसी को चंगुल में फँसाए रहने की बात देर तक नहीं निभती। वेश्याएँ वह स्नेह-सम्मान प्राप्त नहीं कर सकतीं, जो पतिव्रताओं को अनायास ही मिलता है। प्रपंच और पाखंड के बलबूते कुचक्री भी कुछ समय तक पूजा और पैसा झटक लेता है, किंतु यथार्थता प्रकट हुए बिना नहीं रहती। वह आज नहीं तो कल प्रकट होकर ही रहती है। तब पिछले सहकार की तुलना में अनेक गुणा तिरस्कार बरसता है। सज्जनता का पाखंड रचना किसी के भी गले नहीं उतरता, उसकी प्रतिक्रिया होती है। यह दुर्गंध की तरह दूर-दूर तक फैलती है।
दुर्गंध और सुगंध उपजती तो अपने निश्चित स्थान पर ही हैं, पर वे उतने ही दायरे में सीमित नहीं रहतीं; सुदूर क्षेत्रों तक अपनी उपस्थिति का आभास कराती है। रास्ता चलते लोग उनका आभास प्राप्त करते हैं। प्रसन्नता या उद्विग्न होते हैं। चंदन तरु के निकट पहुँचने पर कुछ समय उसकी छाया में बैठकर शांति एवं प्रसन्नता का लाभ लेने के लिए मन करता है। किंतु जहाँ सड़ी कीचड़ की श्मशान में जलने के धुएँ की दुर्गंध उठ रही हो वहाँ से जल्दी दूर निकल जाने के लिए पैर बढ़ाने पड़ते हैं, उद्गम अपने स्तर के अनुरूप आकर्षण और विकर्षण उत्पन्न करता है। व्यक्तित्त्व की प्रामाणिकता हर किसी को आश्वस्त करती है। सांत्वना देती है और सदाशयता को साथ देने के लिए न्योता बुलाती है। इन सद्भावनाओं का संचय ही किसी को आंतरिक दृष्टि से सुसंपन्न बनाता है। इस पूँजी के बल पर व्यक्ति स्वयं ऊँचा उठता है। संपर्क-क्षेत्र के अन्यान्य लोगों को ऊँचा उठाता है। इतने बड़े काम करने का साहस कर गुजरता है, जिनकी कि सामान्य लोग न कल्पना कर सकते हैं न हिम्मत। यह बल कहाँ से आता है? यह टॉनिक रसायनों से नहीं, मल्लविद्या अथवा शस्त्रास्त्रों से भी नहीं, उसका उद्गम है वह गौरव जो, प्रामाणिकता के आधार पर आत्मबल के रूप में प्राप्त होता है।
प्रामाणिकता जहाँ भी रहती है वहाँ श्रद्धा उत्पन्न करती है और विश्वास भी। विश्वासपात्र की आज सर्वत्र तलाश है, उसे बड़े-से-बड़ा काम सौंपा जा सकता है और बड़े-से-बड़ा अनुदान दिया जा सकता है। गाँधी और विनोबा इसके आधुनिक उदाहरण हैं। उनकी विद्या में प्रतिभा से लोग प्रभावित नहीं हुए, वरन लोकदृष्टि से जब हर कसौटी पर परख लिया कि वे विश्वासपात्र है, तो उन्हें भरपूर सहयोग दिया गया। अनेकों आदर्शों-परामर्शों को शिरोधार्य किया गया। लोगों ने अपने घर उजाड़े और उस पथ पर चले जो कष्ट कठिनाइयों से भरा होने पर भी उच्च आदर्शों के लक्ष्य तक ले जाता था।
हर व्यक्ति अपनी सयानी कन्या को सौंपने के लिए ऐसे वर की तलाश करता है, जिसके साथ में उसका भविष्य सुरक्षित हो, जिसकी चरित्रनिष्ठा और सद्भावना पर विश्वास किया जा सके। ऐसा सुयोग मिलने पर ही कन्या सुखी रहती है और अपने भाग्य को सराहती है, भले ही उसके साथ रहकर आर्थिक तंगी ही क्यों न भुगतनी पड़ती हो? इसके विपरीत सुंदर और संपन्न व्यक्ति ऐसे भी हो सकते हैं जो चरित्र भ्रष्ट, असहिष्णु और दुर्व्यसनी हों, ऐसी सुविधासंपन्नता के बीच रहकर भी वधू अपने भाग्य को कोसती ही रहेगी। दुश्चरित्रों को ही भ्रष्ट या दुष्ट कहते हैं। जिनने अपनी चरित्रनिष्ठा गँवाईं, समझना चाहिए कि वे भरे बाजार में लुट गए। उज्ज्वल भविष्य की सभी संभावनाएँ गँवा चुके।
अनाचारी व्यक्ति प्रलोभन देकर चापलूसों की मंडली खड़ी कर सकते हैं। उनके मिथ्या सुन सकते हैं और अनाचारी से सहयोग भी ले सकते हैं, किंतु आड़े समय में उनका एक भी मित्र नहीं रहता। एक-एक करके सभी छँट जाते हैं। दाव लगता है तो गहरे गर्त में गिराने से भी नहीं चूकते। क्योंकि वास्तविकता उनके ध्यान में बनी रहती है। जिन हथकंडों से काम लिया गया था, वे ध्यान में बने रहते और घृणा उत्पन्न करते रहते हैं। यह घृणा उत्पन्न करते रहते हैं। यह घृणा प्रतिशोध बनकर तब प्रकट होती है जब धूर्त्त का समय बदलता है और कोई संकट आ दबोचता है।
कौन क्या कहता है? इस पर ध्यान नहीं दिया जाता, वरन यह देखा जाता है कि कौन क्या करता है? कर्तृत्व ही प्रभावशाली कथन है। नशेबाज और व्यभिचारी अनेकों साथी-संगी-अनुयायी बना लेते हैं, क्योंकि उनकी कथनी और करनी में एकता रहती है, भले ही वह बुरे किस्म की ही क्यों न हो?
धर्मोपदेश देने वाले और आदर्शों की वकालत करने वाले लच्छेदार शब्दों का उच्चारण करके अपनी धाक तो जमा लेते हैं, पर छल नहीं छोड़ पाते। कारण एक ही है कि जो उनके द्वारा कहा जाता है, उसे जीवन में उतारते नहीं देखा जाता। इससे स्पष्टतया पाखंड की गंध आती है। सुनने वाले इस कान से जानकारी प्राप्त करते और उस कान से निकालते रहते हैं। शब्दों में शक्ति नहीं होती। वे तो जानकारी देने भर के माध्यम है। उन्हें शक्तिशाली बनाने के लिए सर्वप्रथम अपने आचरण में उतारना होता है।
चौदहवें लुई का दाँत हॉलैंड को हड़पने पर था। उसने अपने मंत्री कालवर्ट से कहा— " छोटे से देश हॉलैंड को अब तक क्यों नहीं जीता जा सका?" कालवर्ट ने नम्रतापूर्वक कहा— " श्रीमान्! किसी देश की महानता उसके विस्तार या क्षेत्र पर नहीं, वरन वहाँ के निवासियों के चरित्र पर निर्भर रहती है।"
धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष में “काम” शब्द को ठीक प्रकार समझ न पाने के कारण सर्वसाधारण ही नहीं, अध्यात्म-क्षेत्र के पथिकों को भी असमंजस में देखा जा सकता है। योगी, ब्रह्मचारी, तपस्वी कभी-कभी मन में सोचते हैं कि कहीं काम-वासना को दबाकर उसकी उपेक्षाकर वे भूल तो नहीं कर रहे। भौतिकवादी प्रतिपादनों ने तो काम-वासना को मानवी चेतना की मूल प्रवृत्ति ही ठहरा दिया है। फ्रायड, कामू एवं अन्य अनेक वैज्ञानिक-मनीषियों ने तो कामुकता की पूर्ति को आवश्यक मानते हुए उस पर बहुत जोर दिया है। उसे प्रकृति-प्रेरणा बताते हुए बच्चे के स्तनपान तक में कामक्रीड़ा का दर्शन किया है। भ्रांतियों का मूल कारण 'काम' का अर्थ यौन-लिप्सा की पूर्ति कर लेने तक मान लेना है।
काम वस्तुतः प्रत्येक प्राणी के अंतराल में सन्निहित एक उल्लास-आनंद है, जो आगे बढ़ने, ऊँचा उठने, विनोद का रस लेने एवं साहसिक प्रयास करने के लिए निरंतर उभरता रहता है। इसी को आकर्षणशक्ति कहते हैं। जड़ पदार्थों में यह ऋण और धन विद्युत के रूप में कार्य करती है, परस्पर उन्हें जोड़ती-खदेड़ती रहती हैं। भौतिकी के अनुसार सृष्टि की गतिविधियों का उद्गम यही है। अणु का नाभिक अपने भीतर इसी क्षमता का निर्झर दबाए बैठा है और समयानुसार उसे उभारकर विकिरण उत्पन्न करता है। शक्ति-तरंगें उसी से उद्भूत होती और संसार की अनेकानेक हलचलों का सृजन करती है।
प्राणियों में उसका उभार उत्साह, उल्लास एवं उमंगों के रूप में होता है। पारस्परिक प्रेम, सहयोग से उत्पन्न उपलब्धियों से परिचित होने के कारण आत्मा इस स्तर के प्रयासों में प्रवृत्त होती है। इसी को शास्त्रकारों ने “काम” कहा है; उसकी उपयोगिता का समर्थन किया है।
इसी प्रवृत्ति का एक छोटा रूप यौनाचार भी है। परिणाम की दृष्टि से यह नर और नारी दोनों के लिए बोझिल और कष्टकारक है। फिर भी प्राणियों के वंश-प्रवाह को स्थिर रखने की दृष्टि से उसे नियति ने एक विशेष प्रकार के रस एवं आकर्षण से भर दिया है कि जीवधारी उसमें विरत न होकर रुचि लेने लगें और प्रजनन का क्रम चलता रहे। यह कामतत्त्व का एक अति सामान्य प्रवृति है, जो यदा-कदा ही क्रियान्वित हो सकता है। जीवधारी ऋतु-गमन करते हैं और संतानोत्पादन के बाद लंबी अवधि के उपरांत उसकी पुनरावृत्ति का साहस करते हैं। समस्त प्राणी-जगत का यही उपक्रम है। एकमात्र मनुष्य ने ही इस संदर्भ में मर्यादा-उल्लंघन एवं स्वेच्छाचार का दुस्साहस किया है।
वनस्पति जगत में पुष्पों का सौंदर्य और सौरभ उनके अंतराल में उभरे हुए कामोल्लास का परिचय देते हैं। मयूर का नृत्य, भ्रमर का गुंजन, पक्षियों की फुदकन आदि में उसने उभरते हुए अंतःउल्लास का परिचय मिलता है। इसे चेतना की प्रगति के लिए उभरती हुई उमंग समझी जा सकती है। उत्साह के अभाव में नीरसता और निस्तब्धता का अंधकार ही छाने लगेगा। प्रगतिक्रम रुक जाने की इस स्थिति में पूरी आशंका है। अतएव प्रकृति ने जड़-चेतन में अपने-अपने स्तर का उत्साह उत्पन्न किया है और उनका कलेवर ऐसा सृजा है, जिसमें क्रीड़ा-कल्लोल की हलचलों को कार्यान्वित होने का अवसर मिलता है। प्राणियों की प्रगति और पदार्थों की हलचल इसी उभार पर निर्भर है। संक्षेप में यही काम-क्रीड़ा है, जो अगणित उमंगों के रूप में प्रकट होती है और विनोदभरे क्रिया-कृत्य करने की प्रेरणा देती है।
यह विनोद-उल्लास अनेक अवसरों पर अनेक स्तर के व्यक्तियों में अनेक प्रकार से उभरता है। यही कामोल्लास है। बच्चे अकारण उछलते-मचलते रहते हैं। किशोरों का खेल-कूद में अपनी स्फूर्ति का परिचय देते देखा जाता है। प्रौढ़ों को दूरदर्शी योजनाएँ कार्यांवित करने और गुत्थियाँ सुलझाने में भाव-विभोर देखा जाता है। गायन-वादन में झूमते हुए, नृत्य-अभिनय में थिरकते हुए कलाकार वस्तुतः अंतरंग के उल्लास का दर्शन दर्शकों को कराते और उन्हें भी अपनी ही तरह सरसता के निर्झर में आनंद लेने का अवसर देते हैं।
जीवन के सामान्य क्रियाकलापों में मन लगाने और आनंद पाने का अवसर जिस अंतःस्फूर्ति के आधार पर मिलता है, उसे शास्त्रकार के शब्दों में 'काम' कह सकते हैं। कामना की पूर्ति में उत्साह और उमंगों के साथ संलग्न होने वाली प्रवृत्ति ही काम है। इसका रसास्वादन जो न कर सका, वह अर्धमृतकवत् जीवित रहेगा। उसे महत्त्वपूर्ण सफलताओं के दर्शन जीवन में कभी न हो सकेंगे। हारा-थका, निराश, उदास बनकर समय काटेगा और धरती का भार बनकर मौत के दिन पूरे करेगा। संसार में जितने भी महत्त्वपूर्ण काम हुए हैं, जितने भी व्यक्ति उभरे हैं, उन सबके मूल में अदम्य अभिलाषा और उसकी पूर्ति के लिए आतुर साहसिक पुरुषार्थ ही प्रधान भूमिका निभाता रहा है।
हँसती-हँसाती, खिलती-खिलाती, उछलती-फुदकती, इतराती-इठलाती जिंदगी के मूल में जो भावभरा उल्लास काम करता है, वस्तुतः वही काम है। उसी की परिणति महत्वाकांक्षाओं के रूप में होती है और प्रयासरत होते समय पुरुषार्थता एवं साहस के रूप में ही उसे देखा जाता है।
भाव-संवेदनाओं में उत्कृष्टतम कोमलता प्रेमतत्त्व की है। उसे ईश्वर के साथ नियोजित करने पर उसका स्वरूप भक्ति जैसा बन जाता है। पारस्परिक प्रयोग में इसी को स्नेह-सौजन्य, सहयोग-मिलन के रूप में अनुभव किया जाता है। सहृदयता, करुणा, सेवा, सहायता, उदारता के रूप में उसी की परिणति होती है। रचनात्मक सत्प्रयोजनों के लिए किए जाने वाले त्याग-बलिदान में जो भाव-संवेदना काम करती है, उसे भी कामतत्त्व की उच्चस्तरीय फलश्रुति कह सकते हैं। संगीत, साहित्य, कला के रूप में प्रभावोत्पादक आकर्षण की जो मात्रा है, उसे उत्कृष्टतासंपन्न 'काम' ही कह सकते हैं।
काम को हेय तब से समझा जाने लगा, जबसे उसे यौनाचार के रूप में प्रतिपादित किया जाने लगा। यों रतिकर्म, अश्लील चिंतन और उस प्रयोजन के लिए होने वाले अन्य कृत्य भी कामुकता की व्याख्या परिधि में आते हैं। किंतु वास्तविकता यह है कि यह समस्त परिकर सुविस्तृत काम-क्षेत्र का बहुत ही छोटा और हेय स्वरूप है। वस्तुतः काम शब्द की परिभाषा क्रीड़ा, विनोद एवं उल्लास ही हो सकती है। उसे अंतरंग का उभार या उमंग भी कहा जा सकता है। यह प्रयोजन जिन भी उपाय-उपचारों से संभव होता हो, उन्हें काम की परिधि में सम्मिलित किया जा सकता है। धर्म और मोक्ष को आत्मिक एवं अर्थ और काम को भौतिक-प्रगति का माध्यम माना गया है। चतुर्दिक् महान उपलब्धियों में उसकी गरिमा के अनुरूप ही 'काम' को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वही सबको अपने जीवन में उतारते हुए वैसी ही अपनी जीवन-पद्धति बनानी चाहिए।
दो बहिनें थीं। एक का नाम यथार्थता, दूसरी का छलना। एक दिन दोनों सरोवर स्नान को गईं , कपड़े किनारे पर रखकर तैर तैरकर नहाईं।
आदत के अनुसार छलना ने यथार्थता के कपड़े पहन लिए। उसकी कुरूपता ढक गई और बहिन के परिधान पहनकर सुंदर लगने लगी।
यथार्थता बाहर निकली तो देखा कि छलना उसके कपड़े पहनकर जा चुकी है। वह करती भी क्या? जो कपड़े सामने थे, उन्हीं से तन ढका और कुरूप लगती, रोती-खीजती घर आई।
कपड़े दोनों के शरीर पर अभी, तक बदले हुए ही हैं। छलना सुंदर दिखती और अपने को यथार्थता कहकर लोगों को ठगती है। यथार्थता संकोच में डूबी, न कुछ कह पाती है न कुछ करते-धरते बनता है।
हठयोग की क्रियाओं में एक वज्रोली क्रिया भी है; उनमें मूत्रमार्ग से जल ऊपर खींचकर फिर बाहर निकाला जाता है। इस प्रकार उस मार्ग की शुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार किसी टब में बैठकर मलमार्ग द्वारा भी पानी खींचा जाता है। थोड़ी देर पेट में रखकर उसे घुमाया जाता है और फिर मलत्याग कर दिया जाता है। इस प्रकार आधुनिक एनिमा की पुरातन ढंग से पूर्ति हो जाती है।
नाड़ी-शोधन हठयोग में आरंभिक प्रयोग है। नेति, धोति, वस्ति, वज्रोली इन हठयोग की प्रक्रियाओं में उन स्थानों की सफाई की जाती हैं, जहाँ मल जमा रहता है— रुका रहता है। इस शारीरिक स्वच्छता के उपरांत षट्चक्र-वेधन आदि की अन्य अभिवर्द्धन क्रियाएँ की जाती है। शोधन के उपरांत ही अभिवर्द्धन-क्रियाओं को आरंभ करने का नियम है।
हठयोग की सारी क्रियाएँ शारीरिक है। उनका प्रभाव भी शरीर पर ही पड़ता है। शरीरगत समर्थता बढ़ती है और वे कार्य बन पड़ने हैं, जो कोई अतिबलिष्ठ शरीर कर कसता है। इस स्तर के लोगों को ही प्राचीनकाल में दैत्य कहा जाता था। दैत्य और दानव का अंतर समझा जाना चाहिए। मानव के विपरीत दुर्गुणों वाले को दानव कहते हैं, उनकी प्रवृत्तियाँ अधोगामी होती हैं और क्रियाएँ भी अनीतियुक्त ही बन पड़ती हैं। पर दैत्य में ऐसे दुर्गुण होना आवश्यक नहीं। अंग्रेजी के जाइंट शब्द में दैत्य स्तर का अनुमान लगाया गया है।
हठयोग की हर क्रिया प्रतिरोधक है। जिस प्रकार नदी-प्रवाह को रोककर बाँध बनाया जाता है और फिर उससे बिजली बनाने, नहर निकालने जैसी व्यवस्थाएँ बनाई जाती हैं। हठयोग में भी ऐसा ही होता हैं। उसमें प्रकृति-प्रेरणा से चल रहे क्रियाकलापों को उलटा जाता है। जैसे मल-मूत्र त्यागने के छिद्र स्वाभाविक स्थिति में अपने प्रवाह नीचे की ओर ही बहाते हैं, पर वज्रोली क्रिया द्वारा उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित किया जाता है कि वह नीचे से ऊपर की ओर जल खींचने का काम करें।
ऐसे उलटे कृत्यों को ही हठवाद कहते हैं— "हठयोग भी।" इन्हें सरकस के उस खेल की तरह समझना चाहिए, जिसमें शेर को बकरा अपनी पीठ पर लादकर चलने का कौतुक दिखाया जाता है। दर्शक इस अनहोनी बात को होता हुआ देखते हैं, तो आश्चर्य से चकित रह जाते है।
यह प्रशिक्षण अतिकठिन है। बकरे के मन में से भय निकालना और सिंह को बकरा देखते ही टूट पड़ने की प्रवृत्ति को काबू में लाया जाता है। यह सामान्य नहीं असामान्य बात है। इसमें असाधारण कौशल एवं साहस की आवश्यकता पड़ती है, पर साथ ही जोखिम भी रहता है। हठयोग की क्रियाओं में भूल हो जाने से उस मार्ग में संकट भी खड़े हो सकते हैं और कई बार तो अनर्थ तक की आशंका रहती है। इसलिए हठयोग का शिक्षण अनुभवी गुरु के पास रहकर ही किया जाता है। भयंकर घाव वाले रोगियों का अस्पताल में भरती करके ही इलाज होता है। ताकि समय-समय पर आने वाले उतार-चढ़ावों से निपटा जा सके।
किंतु मध्यवर्त्ती सामान्य रोगों की स्थिति में भरती किए जाने की आवश्यकता नहीं रहती। दवा दे देने, पथ्य बता देने तथा आवश्यक सावधानियाँ बरतने की हिदायत देकर उसे घर पर ही रहकर इलाज कराते रहने का परामर्श दे दिया जाता है; क्योंकि उससे किसी बड़ी आशंका की कोई संभावना पड़ती नहीं दिखती।
जोखिम वाले खेल निष्णातों को ही खिलाए जाते हैं। आरंभिक शिक्षार्थियों से हलकी-फुलकी क्रियाएँ ही कराई जाती हैं। आर्ट, कोमर्स आदि विषयों को लेकर पढ़ने वालों को पत्राचार विद्यालय में नाम लिखाने से भी काम चल जाता है, किंतु साइंस पढ़ने वाले को अध्यापकों से क्रियात्मक शिक्षण प्राप्त करना पड़ता है। इसलिए उनका स्कूल प्रवेश अनिवार्य माना जाता है।
राजयोग और हठयोग में यही अंतर है। हठयोग ऐसा है जैसा हिंसक पशुओं से भिड़ने उन्हें वशवर्त्ती बनाने का कौशल और राजयोग ऐसा है, जैसा गौपालन। गौपालन में थोड़ी उपेक्षा रहने पर इतनी ही हानि है कि दूध कम मिले। वैसे कोई जोखिम उसमें नहीं है। राजयोग के साधकों को देर लग सकती है, कम लाभ में संतोष करना पड़ सकता है, पर उसमें जोखिम उठाने जैसी कोई आशंका या कठिनाई नहीं है।
ब्रह्मचर्य के लिए वज्रोली क्रिया का हठयोग में विधान है। आरंभ में शुद्धि के लिए मूत्रमार्ग में जलचढ़ा कर स्वच्छ किया जाता है। पीछे जब नीचे से ऊपर खींचने की क्रिया का अभ्यास हो जाता है, तो वीर्य की अधोगामी प्रवृत्ति को प्रतिबंधित करके ऊपर चढ़ाने एवं मस्तिष्क तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाता है। इससे वीर्यपात की हानियाँ रुकती हैं और उस बहुमूल्य तत्त्व को मस्तिष्क में ले जाकर प्राणशक्ति बढ़ाने से लेकर मानसिक पराक्रमों को अधिक सरल एवं सफल बनाया जाता है। यह सफल हो सके तो शरीर में से निकलने वाले प्राण तक को रोककर ब्रह्मरंध्र में छिपाया जा सकता है और निर्धारित आयु से कहीं अधिक जिया जा सकता है।
हठयोग की इस वज्रोली क्रिया को राजयोग में अतिसरल बना दिया गया है। उससे लाभ लगभग उसी प्रकार के होते है, जैसे वज्रोली क्रिया में, पर गति अवश्य मंथर रहती हैं और सफलता भी समयसाध्य गतिशीलता के अनुरूप आगे बढ़ती है।
वज्रोली क्रिया में आसन इस प्रकार लगाया जाता है कि एड़ी या एड़ी से ऊपर की हड्डी, गुदा और जननेंद्रिय मूल को हलका-सा दबाती रहे। यह दबाव इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि उस क्षेत्र में अवस्थित पौरुष ग्रंथियों या जननेंद्रिय की ओर जाने वाली नसों पर अधिक दबाव डालें और उनकी स्वाभाविक क्रिया में अवरोध उत्पन्न करें। इस योजना के लिए उस केंद्र का हलका-सा स्पर्श ही पर्याप्त है, जिससे यह अनुभव होता रहे कि यहाँ कुछ हलकी रोक-थाम जैसी चेष्टा की गई है।
अब गुदामूल को ऊपर खींचना चाहिए। इसके लिए साँस भी खींचनी पड़ती है। गुदा को ऊपर खींचने के साथ-साथ जननेंद्रिय की मूत्रवाहिनी नसें भी ऊपर खींचती हैं। इस खिचाव को इसी स्तर का समझना चाहिए जैसे कि कभी-कभी मल-मूत्र त्यागने की इच्छा होती है, पर वैसा अवसर नहीं होता। अतएव उन वेगों को रोकना पड़ता है। रोकने का तरीका एक ही है कि उस क्षेत्र को ऊपर खींचा जाए। माँस-पेशियों को ऊपर सिकोड़ा जाए।
वज्रोली मुद्रा में यही करना पड़ता है। साँस ऊपर चढ़ाते हुए गुदा-क्षेत्र की समस्त माँस-पेशियों को ऊपर की तरफ इस प्रकार चढ़ाया जाता है कि मानो किसी पिचकारी द्वारा पानी ऊपर खींचा जा रहा है।
खींचने की शक्ति जब न रहे तो फिर जैसे धीरे-धीरे खींचने की क्रिया की गई थी, उसी प्रकार उसे नीचे उतारने-छोड़ने की क्रिया करनी चाहिए। दोनों ही बार जल्दबाजी न की जाए। उसे धीमी गति से ऊपर चढ़ाया और नीचे उतारा जाए। स्मरण रहे इस माँस-पेशीय संकोचन के साथ प्राणायाम की तरह वायु को भी ऊपर चढ़ाने-छोड़ने का तारतम्य मिलाए रहना पड़ता है।
आरंभ में यह क्रिया दस बार की जाए। फिर प्रति सप्ताह एक की संख्या और बढ़ाते चला जाए। इसका अंत 24 आकुंचन-प्रकुंचनों पर समाप्त हो जाना चाहिए।
यह क्रिया ब्रह्मचर्य में सहायक होती है। वीर्य का ऊर्ध्वगमन संभव करती है। वह ओजस्-तेजस् में बदलता है और शीघ्रपतन,स्वप्नदोष, प्रमेह जैसे रोगों में आशाजनक लाभ होता है।
एक महात्मा नाव पर जा रहे थे। उसी में कुछ दुष्ट भी बैठे थे। महात्मा का सिर घुटा हुआ देखकर दुष्टों को अति सूझी। वे धड़ा-धड़ उनकी खोपड़ी पर चपतें लगाने का मजा लूटने लगे।
आकाश के देवता यह दृश्य देखकर बहुत क्रुद्ध हुए। महात्मा से पूछा— “कहो तो नाव उलट दें और इन सभी को नदी में डुबा दें।” महात्मा हँसते हुए कहा— "उलटना और डुबोना तो सभी जानते हैं। आप देवता हैं तो इन्हें उलटकर सीधा कीजिए और डुबाने की अपेक्षा उबार दीजिए।"
देवताओं ने वैसा ही किया।
उत्कृष्ट और निकृष्ट सिद्धांतों की जानकारी सर्वसाधारण को अनायास ही होती है। अंतःकरण की आत्मचेतना पाप और पुण्य की विवेचना कर सकने में भली प्रकार समर्थ है। इसका वर्गीकरण-विश्लेषण कर सकना अपनी अंतरंग विशेषता है। किसी असत्यवादी से पूछा जाए कि सत्य बोलना ठीक है या झूठ बोलना, तो वह जनसाधारण के सामने सत्य बोलने का ही समर्थन करेगा, भले ही वह स्वयं झूठ बोलने का ही व्यवसाय-आचरण क्यों न करता हो? व्यभिचारी भी यह नहीं चाहते कि उनकी स्त्री या पुत्री इस अनौचित्य को अपनाए। कोई व्यक्ति अपने यहाँ चोर नौकर नहीं रखना चाहता, चाहे वह स्वयं चोरी करने का ही अभ्यस्त क्यों न हो? नशेबाज भी अपनी संतान को नशा न पीने की शिक्षा देता है। दूसरों को हर व्यक्ति अच्छी ही शिक्षा देता है। परामर्शों और प्रवचनों में आदर्शवादी रीति-नीति का ही सहारा लिया जाता है, ताकि सुनने वाले उसे सदाचारी एवं भला मानुष समझे। इस प्रकार की मनोभूमि रखते हुए जो सोचा जाता है, जो किया जाता है, उसमें सुख, चैन, शांति, संतोष की अनुभूति होती रहती है। पवित्र अंतःकरण गंगास्नान से परिशुद्ध हुई स्थिति में रहता है। जिसका चरित्र-चिंतन-व्यवहार, उत्कृष्ट आदर्शवादिता से समन्वित है, उसे अंतरंग से उभरते उल्लास की अनुभूति होती है। इसके साथ ही यदि पुण्य-परमार्थ का क्रियाकलाप में समावेश है; दूसरों की भलाई के लिए अपने से कुछ करते-धरते बन पड़े, तो वह बीजारोपण वर्षा ऋतु में सहज अंकुरित होने वाली हरीतिमा की तरह अपनी शोभा-सुषमा से समूचा वातावरण भर देता है। क्रिया की प्रतिक्रिया चल पड़ती है। सेवा-साधना का बीजारोपण कुछ ही समय में सुरम्य उद्यान की तरह विकसित हुआ दिख पड़ता है।
परमार्थी जीवन चंदनवन की तरह महकता है और समीपवर्त्ती झाड़-झंखाड़ों को भी सुवासित कर देता है। परमार्थी जीवन कल्पवृक्ष की तरह पल्लवित होता है। उसकी छत्रछाया में बैठने वाले अपनी तृष्णा-लिप्साओं की दरिद्रता से छुटकारा पाते हैं। परमार्थी जीवन स्वाति बूँद की तरह बरसता है। उसका संपर्क जिससे भी सधता है, वह सीप में मोती, बाँस में वंशलोचन, केले में कपूर उत्पन्न करता है। दूसरों के लिए लाभ देते रहने की प्रक्रिया तो प्रत्यक्ष ही है। इसके अतिरिक्त कर्त्ता का निज का जीवन अंतरंग की तृप्ति, तुष्टि और शांति से भर देने के अतिरिक्त ऐसी स्थिति में रहने लगता है, जिसे देवोपम कहा जा सके।
देवता स्वर्ग में रहते हैं। वे न वृद्ध होते हैं न रोगी, जरा-मृत्यु भी उन्हें नहीं सताती। उनकी आयु युवकों जितनी बनी रहती है, उसके पास दूसरों को देने के लिए कुछ होता है। यह विवरण अलंकारिक है, अन्यथा इस परिवर्तनशील विश्व-ब्रह्मांड में कोई भी पदार्थ या प्राणी ऐसा नहीं, जो परिवर्तन चक्र से प्रभावित न होता हो, सदा एक जैसी स्थिति में ही बना रहता हो। अवतार समय-समय पर हुए हैं, पर उनमें से एक भी अब जीवित स्थिति में नहीं है। समय उन सब को भी अपनी झोली में समेट ले गया, फिर देवात्माओं को ही इस उपक्रम में अपवाद करने का अवसर कहाँ मिल सकता है? सूर्य, चंद्र तक समयचक्र के अनुसार अपने आदि-अंत के साथ जुड़े हुए हैं। फिर देवात्माएँ ही क्यों कर जरा-जीर्ण न होंगी? कैसे सदा युवा शरीर धारण किए रहेंगी? कैसे मृत्यु के चंगुल से बची रहेंगी? यह संभव नहीं। किंतु अलंकार की दृष्टि से यह प्रतिपादन सही है। उनकी मनःस्थिति आशाओं से, उमंगों से, सक्रियता से, तत्परता से भरी रहती हैं, उसमें बुढ़ापे के कारण भी अंतर नहीं आता। शारीरिक अवयव दुर्बल पड़ जाते हैं, किंतु मनस्वी के मनोबल में इससे अंतर नहीं आता। कितने ही शतायु व्यक्ति ऐसे हुए हैं, जो जीवन के अंतकाल तक आशाओं से, उमंगों से भरे रहे। उनका मनोबल ठीक काम करता रहा। शरीर कुछ क्षीण हो गया, तो श्रमशील में थोड़ा-बहुत अंतर आया, पर उससे कुछ विशेष हानि नहीं होती। शारीरिक श्रम का मूल्य ही कितना है? उसे तो पैसे के बल पर श्रमिकों, स्वजन-संबंधियों से भी पूरा कराया जा सकता हैं। अंधे हो जाने पर भी कर्मचारी की सहायता से पढ़ने-लिखने का आने-जाने का अधिकांश काम चलता रह सकता है। सूरदास ने आँखें चली जाने के उपरांत अपनी रचनाएँ आरंभ की और इतना साहित्य सृजा, जिसके कारण उन्हें काव्य-क्षेत्र का सूर्य कहा जाने लगा। देवता सदा तरुण रहते हैं। वृद्ध नहीं होते, मुसकाते रहते हैं, उदासी-मलीनता चेहरे पर फटकती नहीं। यह सभी कथन उन लोगों की मनोदशा को देखते हुए यथार्थ सिद्ध होते हैं, जिन्हें जीवन का प्रत्येक क्षण सरस प्रतीत होता है और उसे तत्परता, तन्मयता के साथ सत्प्रयोजनों में नियोजित किए रहते हैं। गांधी, नेहरू, बुद्ध, कबीर, विनोवा आदि अस्सी पार कर चुके थे, पर उनकी तेजस्विता में अंतिम दिनों तक कोई अंतर नहीं आया।
देवता मरते नहीं; यह कथन उनके स्थूलशरीर पर तो नहीं; पर सूक्ष्मशरीर पर भली-भाँति लागू होता है। उनका यशस्वी जीवन हर किसी के लिए अनुकरणीय और अभिनंदनीय होता है। हरिश्चंद्र, भागीरथ, दधिचि, हनुमान, जैसों को मृतकों की श्रेणी में गिनकर उपेक्षा के गर्त्त में डाला नहीं जा सकता। वे इतिहास के पृष्ठों पर अपना अस्तित्त्व स्वर्णाक्षरों में अंकित कराए जाने जैसे स्थिति में अनंतकाल तक बने रहते हैं। इसके अतिरिक्त उनका सूक्ष्मशरीर कामना-वासनाओं के दबाव से मुक्त हो जाने के कारण जन्म-मरण के चक्र में परिभ्रमण करने के लिए बाधित नहीं होता। वे भगवान के पार्षद की स्थिति में रहकर रिजर्व फोर्स की स्थिति में बने रहते हैं। जब कभी विश्व-व्यवस्था में गड़बड़ी फैलती है, तो उसे सुधारने-संभालने के लिए अवतारी महामानवों की तरह भेजे जाते हैं। वे संत, सुधारक और शहीद की महती भूमिका संपन्न करते हैं, यह कार्य वे जन्म लेकर स्थूलशरीर धारण करके भी कर सकते हैं और ऐसा भी हो सकता है कि अदृश्य रहकर व ऋतु-प्रभाव की तरह वातावरण बदलें और बनाएँ। ऋतुएँ दीखती नहीं, उनका शरीर नहीं होता तो भी अपने पराक्रम का असाधारण परिचय देती हैं। वर्षा, शीत, बसंत, ग्रीष्म का आगमन अपने-अपने समय पर अपने प्रभाव-पराक्रम से जन-जन को अवगत कराता है। देवात्मा यदि स्थूलशरीर धारण न भी करे, तो भी उनका प्रभाव आँधी-तूफान की तरह प्रकट होता है और परिस्थितियों को उलट-पुलटकर रख देता है। ऐसी प्रभाव-प्रेरणा को देखते हुए उन्हें भवबंधनमुक्त या अजर-अमर कहा जाए, तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
देव नाम से उन्हें संबोधित इसलिए किया जाता है कि वे सदा दूसरों को देने की ही बात सोचते हैं। उनके पास पदार्थ, संपदा होती है, तो उसे देते हैं। अन्यथा वैभव तो मनुष्य अपने बाहुबल और बुद्धिबल से भी कमा लेता है, जो सहज नहीं मिल पाता, वह है— दिव्य-प्रेरणाओं से भरा-पूरा मार्गदर्शन एवं उन्हें कार्यान्वित कर सकने का दूरदर्शी विवेक एवं सत्साहस। आदर्शवादिता का दिव्य प्रकाश। यह देवसमुदाय द्वारा ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रदान किया जाता है। जो देते हैं, वे देवता। जो लेते हैं, वे लेवता। लेवता दूसरों से पाने, माँगने, छीनने की ही कुचेष्टा में लगे रहते हैं। देवताओं की भूमिका उनसे सर्वथा विपरीत होती है।
देवताओं का पारस्परिक व्यवहार, स्वच्छता ,व्यवस्था, प्रसन्नता, सद्भावना का क्रियाकलाप ऐसा होता है कि वे जिस भी स्थिति में, जहाँ भी रहें, वहाँ का वातावरण स्वर्गोपम हो जाता है। यही है देवात्माओं का स्वर्गसृजन, जिसकी छत्रछाया में सभी आनंद पाते हैं।
युधिष्ठिर को स्वर्ग ले चलने के लिए देव विमान आया। तब उनके साथ एक पालतू कुत्ता भी था। युधिष्ठिर ने कहा— "इतने प्रिय मित्र को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता, यह भी साथ चलेगा।"
देवताओं ने धर्मराज से उसके प्रवेश की व्यवस्था न होने की बात कही तो धर्मराज ने भी जाने से इंकार कर दिया। विमान लौट गया। देवलोक में सभा हुई। बृहस्पति ने कहा— "इतने महान धर्मात्मा के साथ रहते हुए कुत्ता भी धर्मात्मा हो गया होगा। उसे भी बुला लिया जाए।"
दुबारा विमान आया और युधिष्ठिर कुत्ते के साथ स्वर्ग गए।
मनुष्य के शरीर में विद्युतशक्ति का भांडागार छिपा होने की बात सर्वविदित है। उसी की क्षमता से हृदय के फेफड़े, आमाशय, जिगर, गुर्दे आदि अपना-अपना काम करते हैं। प्रतीत यह होता है कि रक्त, माँस तथा स्रवित होने वाले रसायन ही जीवन-शकट को खींचते हैं। पर वस्तुस्थिति यह है कि जिस प्रकार बिजली ही मोटर कारखाने की विभिन्न मशीनों को चलाती और खींचती है, उसी प्रकार शरीर में संव्याप्त बिजली भी अगणित जीव, कोशों, स्नायु-तंतुओं तथा अन्यान्य छोटे-बड़े घटकों का संचालन करती है।
विभिन्न अंग अवयवों को हम काम करते तो देखते हैं; उनमें रक्त-प्रवाह और वायुपोषण भी होते हैं, पर यह प्रत्यक्ष समझ नहीं पाते कि इस सबके मूल में कौन शक्ति काम करती है। उसका उद्गम स्रोत कहाँ है? यह सूत्रसंचालन कैसे और कहाँ से होता है?
अध्यात्मशास्त्र में इस जीवनीशक्ति को प्राण कहा गया है। प्राण क्या है? उसे ऑक्सीजन नहीं समझा जाना चाहिए। इस संदर्भ में इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि ऑक्सीजन में भी प्राण मिला होता है; पर वह मात्र ऑक्सीजन ही नहीं हैं।
ब्रह्मांडव्यापी चेतनतत्त्व से यह समस्त संसार अनुप्राणित होता हैं। वह जड़ पदार्थों में क्रियाशक्ति के रूप में काम करती है। परमाणु घटकों का विस्फोट करके यह सहज ही जाना जा सकता है कि पदार्थ के अंतराल में कितनी प्रचंड क्षमता भरी हुई है। इसी प्रकार वही शक्ति जीवधारियों में उनकी इच्छाशक्ति के रूप में काम करती देखी जाती है। मनोविज्ञानियों के अनुसार उसका भंडार अचेतन मन में है। इसका स्थान मस्तिष्क का मध्य भाग माना गया है। जिसे ब्रह्मरंध्र या सहस्रारचक्र कहते हैं। अंतःस्रावी ग्रंथियों के हारमोन स्रावों की स्थिति को यही केंद्र प्रभावित करता है। ज्ञानतंतुओं की ज्ञानेंद्रिय की दौड़ मस्तिष्क तक ही रहती है। वहीं वे अपने अनुभव पहुँचाते और स्थिति के अनुरूप संदेश लेकर वापस लौटते हैं। यह घुड़दौड़ निरंतर चलती रहती है। इसी के साथ प्राणविद्युत का समग्र तंत्र जुड़ा होता है। मृत्यु के समय अन्य सभी अवयव या रसायन प्रायः यथावत् बने रहते हैं; केवल यह विद्युत-प्रवाह मस्तिष्क में अवस्थित उद्गम केंद्र से निःसृत होना बंद हो जाता है।
प्राणविद्युत मनुष्य की मानसिक विशिष्टताओं को भी प्रभावित करती है। प्रतिभा उसी का उभार है। स्फूर्ति, दृढ़ता, साहसिकता का सीधा संबंध भी उसी से है। ओजस्-तेजस्-वर्चस् के रूप में उसी को प्रकाशित होते देखा जाता है, योगी इसी को शक्तिपात के रूप में प्रयुक्त करके अल्पप्राण वालों को महाप्राण बनाते हैं। तांत्रिकों के अभिचारों में भी उसी का प्रयोग हेय प्रयोजनों के लिए होता हैं।
सत्संग-कुसंग से पड़ने वाले प्रभावों में भी यही ऊर्जा काम करती है और अल्पप्राण वालों को अपनी दिशा में आकर्षित करती है। हिप्नोटिज्म-मैस्मरेज्म जैसे छुट-पुट प्रयोग भी इसी आधार पर होते हैं। परकाया-प्रवेश का उच्चस्तरीय तो नहीं, पर साधारण उपक्रम इसी आधार पर चलता देखा गया है।
यह बिजली कभी-कभी अनायास, कभी-कभी प्रयत्नपूर्वक बाहर की ओर फुट पड़ने की स्थिति में उभरती देखी गई है। ईल नामक मछली जब चाहती है, तभी अपने शिकार पर आक्रमण करने के लिए अपने शरीर से इतनी तीव्र विद्युत धारा का प्रवाह फेंकती है कि उसे मरणासन्न स्थिति में पहुँचा देती है और फिर उसे सरलतापूर्वक उदरस्थ कर लेती है। अन्य कई जल-जंतुओं में भी ऐसी ही विशिष्टता पाई गई है।
ऐसा मनुष्य के संबंध में भी कई बार देखा जाता है। उनके शरीर से चुंबक या चिनगारी के रूप में यह प्रवाह निकलने लगता है। पर वे उसे इच्छापूर्वक न तो फेंकते ही हैं और न रोक ही सकते हैं। यह उनकी इच्छाशक्ति के आधार पर नहीं होता। जिस प्रकार नहर फूट जाती है तो उसका पानी तेजी के साथ समीपवर्त्ती क्षेत्र को जलमग्न कर देता है। यह सरल है। एक चूहा भी बिल बनाकर या एक कुदाल भी तोड़−फोड़ कर सकता है, पर छिद्र से बहते हुए पानी को रोकना सरल नहीं पड़ता। उसके लिए विशेष शक्तिशाली प्रदान करने पड़ते हैं, तभी स्थिति काबू में आती है।
बाघ पेड़ के नीचे बैठा रहता है और ऊपर चढ़े बंदर आदि को नजर भरकर देखता है। आँख-से-आँख मिलते ही बंदर होश-हवास गँवा बैठता है और नीचे पके फल की तरह टपककर उसका शिकार बन जाता है। इसी प्रकार अजगर अपनी दृष्टि द्वारा किए गए विद्युत-प्रहार से पेड़ पर बैठे पक्षियों को गिरा लेता है। शेर को देखकर बकरी जैसे दुर्बल मनोबल के पशु हक्का-बक्का रह जाते है और अपने स्थान पर खड़े हुए ही शिकार बन जाते हैं।
मनुष्य के शरीर से निकलने वाली बिजली छूने पर ही आघात मारती है। दूर बैठों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। बर्लिन (जर्मनी) की एक जैकलीन नामक लड़की थी। 17 वर्ष की आयु तक वह सामान्य रही। इसके बार उसके शरीर में से विद्युत-प्रवाह निकलने लगा। वह जिसे भी छूती वह गिर पड़ता। धातु के बरतन चिनगारियाँ छोड़ने लगे। उसे कपड़े भी रबड़ या प्लास्टिक के पहनने पड़ते थे, ताकि शरीर की विद्युत का इन्सुलेशन हो सके।
लंदन की एक युवती मेरी कैथेरीन की घटना इसी से मिलती-जुलती है। उसे यह आवेश दिन में ही आता था, तब उसका चेहरा बुखार जैसा तमतमा जाता था। कोई रबड़ के दस्ताने पहनकर ही उसे छू सकता था। रात को यह आवेश अनायास ही समाप्त हो जाता था। उसे भी यह शिकायत 16 वर्ष की आयु से आरंभ हुई। मात्र तीन वर्ष इसके बाद वह और न जी सकी। ब्राजील में भी एक चौदह वर्ष की लड़की को यह व्यथा लगी। वह अपना शरीर ठंडे बाथटब में डालती तो थोड़ी ही देर में पानी उबलने लगता। ऐसा लगता था, मानो उसका हाथ हीटिंग रॉड हो।
अमेरिका की कुमारी रिको डी फेल जब 15 वर्ष की थी, तब इसके शरीर में भी इसी प्रकार की विद्युत धारा बहने लगी। उसका गोरा शरीर काला होता चला गया। वह अधिक दिन जी न सकी।
ऐसी घटनाएँ भी हुई हैं कि किसी व्यक्ति के शरीर पर कुर्सी पर बैठे-बैठे ही आग की लपटें निकलना आरंभ हुई? उसके शरीर के कपड़े और अंग तो जल गए, पर कुर्सी को कोई नुकसान न हुआ। आयरलैंड की इस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि लपटें नीले रंग की थीं और बुझाने के सभी प्रयत्नों को निष्फल बनाती हुई वह उसके प्राण लेकर ही शांत हुई। इस प्रक्रिया को “स्पान्टेनियस कम्बशन” कहा जाता है।
यह आकस्मिक उपद्रव है। इस प्रकार की अन्यान्य घटनाएँ केवल यही बताती हैं कि उनके शरीर की बिजली किसी प्रकार ऊपर उछल आई थी और स्पर्श करने पर व्यक्तियों तथा पदार्थों को इस प्रकार प्रभावित करती थी कि वह खतरा बन जाती थी। या तो वह प्रभाव अपने आप घटते हुए समाप्त हो जाता था या फिर उसके प्राणों पर बन आती थी।
यह दुर्घटनाओं की चर्चा हुई। किंतु साधनात्मक प्रयत्नों से ऐसा भी हो सकता हैं कि नियंत्रित मात्रा में सुनियोजित करके नियंत्रित प्रकार की विद्युत धारा उभरे और बिना स्पर्श के भी इच्छित व्यक्ति को भले या बुरे स्तर पर प्रभावित करे। यह शक्ति अपने शरीर का तो संचालन करती ही है, पर ऐसा भी हो सकता है कि बढ़ी हुई या बढ़ाई गई ऊर्जा अन्यान्यों पर भी भला या बुरा प्रभाव छोड़ सके। इसी को शाप-वरदान के नाम से जाना जाता है।
अपने को खुश रखो। दूसरे भी तुमसे खुश रहेंगे। खिन्न रहने वाले किसी की खुशी हासिल नहीं कर सकते।
अपनी संपत्ति का ब्योरा तैयार मत करो और न उस पर इतराओ। अपने को ही संसार की संपत्ति समझो; क्योंकि अन्यान्यों के सहयोग से ही तुम्हारा व्यक्तित्त्व बना और वैभव बढ़ा है।
हर वस्तु या व्यक्ति के दो पक्ष हैं। एक भला दूसरा बुरा। एक काला दूसरा उजला। समय के भी दो पक्ष हैं— "एक दिन, दूसरा रात। दोनों की स्थितियाँ एक दूसरे से भिन्न होती हैं, फिर भी दोनों को मिलाकर ही एक समग्रता बनती है।"
मनुष्यों में गुण भी हैं और दोष भी। किसी में कोई तत्त्व अधिक होता है, किसी में कोई। हर किसी में गुण, दोष दोनों ही होते हैं। मात्रा की दृष्टि से न्यूनाधिक भले ही हो। न कोई पूर्णरूप से श्रेष्ठ है, न निकृष्ट। मात्रा का अंतर भले ही हो। सर्वथा निर्दोष कोई भी नहीं और न कोई ऐसा है, जिसे सर्वथा बुरा ही कहा जाए।
अच्छाईयों की प्रशंसा होती है और बुराईयों की निंदा। यह अच्छा तरीका है। चर्चा से वस्तुस्थिति से अनेकों अवगत होते हैं और जिसके संबंध में कहा जाए, उसको भी अपने संबंध में अधिक जानकारी मिलती है। आमतौर से लोग दूसरों की आलोचना-समीक्षा करते हैं। अपने संबंध में अनजान ही बने रहते हैं। अपनी बुराई कोई बिरला ही देख पाता है। जो दीख भी पड़ती है उनका मूल कारण दूसरों को समझाता है। भाग्यदोष, परिस्थिति-दोष कहकर मान-समझा लिया जाता है। अपने तो गुण ही दिखते हैं। इसलिए आत्मप्रशंसा करने की गर्वोक्ति से भी कोई नहीं चूकता। आत्मश्लाघा भरे बखान ही होते रहते हैं। चापलूस भी अपनी गोट बिठाने के लिए मुँह सामने प्रशंसा ही करते हैं। पीठ पीछे भले ही निंदा करते हों। सामने की प्रशंसा से मनुष्य भ्रम में पड़ जाता है। अपनी गुणवत्ता पर फूला नहीं समाता। उस ठकुरसुहाती को सच्चाई मान बैठता है। इससे अहंकार की वृद्धि होती है और मिथ्या-धारणा की जड़ें मजबूत होती हैं। इस विडंबना की आड़ में दोष छिप जाते हैं, उनका पता भी नहीं चलता। ऐसी दशा में सुधार का प्रयत्न बन ही नहीं पड़ता। जब दोषों को स्वयं देख सकने की क्षमता न हो, अन्य कोई बताए या सुझाए नहीं, ऐसी दशा में आत्मसुधार कैसे हो? उसके बिना प्रगति के अवरुद्ध द्वार खुले कैसे? जिसे वस्तुस्थिति का ज्ञान ही नहीं, वह अवगुणों को सुधारने और सद्गुणों को और अधिक बढ़ाने का प्रयत्न कैसे करे?
आलोचना आवश्यक है। इसे कोई निष्पक्ष, हितैषी, शुभचिंतक ही कर सकता है। सो भी तब, जब बुरा मान जाने का खतरा उठाने की हिम्मत हो। आमतौर से निष्पक्ष आलोचना कर सकने वाले निंदा करते हैं। असत्य लांछन भी लगाते हैं। बदनाम करके अपनी जलन शांत करते हैं। ईर्ष्या ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है। इसे सुनकर रोष एवं द्वेष बढ़ता है। सुधार करने के स्थान पर चिढ़ाने के लिए वैसी बुराई करके दिखाने की हठवादिता भी अपनाता है। इससे बुरा व्यक्ति और भी बुरा हो जाता है। दूसरी ओर ऐसा भी होता है कि मिथ्या प्रशंसा से अपनी श्रेष्ठता पर फूलकर कुप्पा हो जाने और समय--कुसमय शेखी बघारते रहने की लत पड़ जाती है। इससे वस्तुस्थिति जानने वाले उपहास उड़ाते हैं। ओछापन ताड़ लेते हैं। यह स्थिति निंदा के ही समतुल्य है।
सही आत्मसमीक्षा कोई विचारशील ही कर सकते है, अथवा कोई यथार्थवादी मित्र वस्तुस्थिति को समझने-समझाने का प्रयत्न करते है। ऐसे समीक्षक जिन्हें मिल जाए उन्हें अपने को भाग्यशाली ही मानना चाहिए; क्योंकि इसी आधार पर सुधरने एवं प्रगति करने का अवसर मिलता है। इसमें बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं है।
माता ने सात वर्षीय बालक को पीटा कि उसने बाप की जेब से पैसे क्यों चुराए?
बच्चा पिट तो गया, पर बाद में बोला—"मम्मी! पापा रोज दूध में पानी मिलाकर चोरी करते हैं। उन्हें क्यों नहीं पीटती। मैंने तो उन्हीं से सीखा है।"
मानव शरीर दिव्यशक्तियों का भांडागार है। योग-साधनाओं द्वारा इन्हें जागृत करके मनुष्य त्रिकालज्ञ बन जाता है और भूत, वर्त्तमान एवं भविष्य की सब बातें जान लेता है। उसके लिए देश, काल और समय की दूरी समाप्त हो जाती है। भारतीय दर्शन के अनुसार तात्कालीन सभी ऋषि-मुनि इस स्तर को प्राप्त थे।
मानव सुषुम्ना में स्थित कु्ंडलिनी, षट्चक्र, ग्रंथियाँ एवं उपग्रंथियाँरूपी विभूतियों का भंडार है। अनेक जन्मों के जमे कषाय-कल्मषों को योग-उपासना के माध्यम से मिटाने पर ये प्रज्वलित अग्नि की तरह दिव्य प्रकाश एवं ज्ञान से चमक जाते हैं और सारे ज्ञान का रहस्य व्यक्त कर देते हैं। तप, संयम एवं सादगी से कोई साधारण-सा मनुष्य भी ऐसा कर सकता है। आधुनिक जगत में भी अनेक लोगों ने यह सफलता पाई है।
गेरार्ड क्राइसे को यह अतींद्रियशक्ति बाल्यकाल से ही मिली थी। संभवतः यह उसके पूर्वजन्मों के सत्कर्मों एवं उपासना का परिणाम था, जो बिना प्रयास के उसे इस जन्म में मिली। परामनोविज्ञानी लेनहाॅफ ने गेरार्ड की अतींद्रियशक्ति की परीक्षा ली, जिसमें वह सफल पाया गया। सिनेमा हॉल के एक निश्चित नंबर की सीट पर पाँच दिनों तक बैठने वाले व्यक्तियों का नाम एवं हुलिए को सीट को स्पर्श करके गेरार्ड ने बता दिया। इस छोटी-सी परीक्षा के बाद वह अधिक लोकप्रिय हो गया और सर्वत्र उसकी चर्चा होने लगी।
हॉलैंड की पुलिस ने गेरार्ड की अतींद्रियशक्ति से अनेक क्लिष्ट अपराधियों का पता लगाया। 23 मई 1950 को एक नवयुवती के हत्यारे का पता गेरार्ड की अतींद्रियशक्ति के द्वारा लगाया गया। उन्होंने नवयुवती के कपड़ों को स्पर्श करके सब बातें बता दीं, जिससे अपराधी पकड़ा गया। एक अमरीकी महिला ने अपनी चप्पलें दूसरे व्यक्ति के द्वारा गेरार्ड के पास भेजीं और उसके पहनने वाले का परिचय पूछा। चप्पल को स्पर्श करके उन्होंने उस युवती का नाम, पता एवं हुलिया बता दिया। एक जर्मन सेनाधिकारी के कंकाल को छूकर उन्होंने एक दिन बताया कि यह अधिकारी जर्मन सेना का है, उसके गरदन पर घातक हमला करके एक व्यक्ति ने उसकी हत्या की थी, क्योंकि उसने उसकी बेटी के साथ पाशविक बलात्कार किया था।
फ्रांस के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक काउंट एगनर डि गैसपेरिन ने 'सुपर नेचुरल' कहे जाने वाले विलक्षण प्रदर्शनों एवं परीक्षणों का संकलन किया है। उन्होंने सत्य एवं प्रमाणित अनेक घटनाओं का इसमें वर्णन किया है। रूस के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने भी सुपर नेचुरल घटनाओं का संकलन किया है। अमेरिका के शोधकर्त्ता डॉ. विलियम ए. मैकगेरे अपने अनेक सहयोगियों के साथ 1970 में रूस में साइकिक रिसर्च हेतु आए। वहाँ उन्होंने परीक्षण में यह सत्य पाया कि श्रीमती सार्जेंट नेल्या मिरबाइलोवा की दृष्टि में बेधक क्षमता है। इसे टेलीकॉम में सीस नाम दिया गया है।
रेडियोमीटर के निर्माता मूर्धन्य वैज्ञानिक सर विलियम क्रूक्स ने डेनियल डगलस होम के संकल्पशक्ति की परीक्षा ली। उन्होंने पाया कि डगलस अपनी संकल्पशक्ति से भारी-भरकम मेज को अपने स्थान से हटाने एवं उछल-कूद कराने में पूर्ण सफल रहे। इसमें किसी तरह का छल-कपट या जादूगरी उन्होंने नहीं पाई। 1972 में क्रूक्स ने होम के 52 प्रदर्शनों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद घोषणा की कि डगलस होम में विलक्षण संकल्पशक्ति कार्य करती है, जिसका पता नहीं लगाया जा सकता। जाली के कटघरे में रखे वाद्य-यंत्रों को स्पर्श किए बिना, मात्र दृष्टि डालने से होम ने अनेक स्वर, लय एवं मधुर ध्वनियाँ निकाली। जिनेवा के प्रोफेसर यूरी ने भी 'मैटर ओवर दि माइंड' विषय पर अत्यधिक अनुसंधान एवं शोध-परीक्षण किया है। उन्होंने भी अतींद्रियशक्ति की विलक्षण सामर्थ्य को अनेक परीक्षणों में सत्य पाया है। वस्तुतः इस चिरंतन सत्य को स्वीकार करने हेतु अब क्रमशः सभी बाध्य हो रहे हैं।
इटली में प्रचलित एक लोकोक्ति के प्रसंग-संदर्भ में कहा जाता है कि 'वुरिडान का गधा' भूखा मर गया था। उसके दोनों ओर घास के ढेर जमा थे, पर यह निर्णय न कर पाया कि किस ढेर को खाए, किसे छोड़े? उलझन में वह कभी एक ओर मुँह करता और फिर दूसरी ओर ताकने लगता। किस ढेर को खाए, यह उसकी बुद्धि निर्णय न कर सकी; फलतः वह कई दिन बिना खाए ही खड़ा रहा और दुबला होकर मर गया।
हम में से यही स्थिति कितनों की होती है। वे सामने पड़े अनेक कार्यों में से यह चुनाव नहीं कर पाते कि किसे अपनाएँ और किस प्रसंग से मुँह मोड़ें; फलतः वे किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते और सब ओर मन डुलाते हुए किसी को भी ठीक तरह कर नहीं पाते। डाँवाडोल मन उन्हें किसी सुनिश्चित निर्णय तक पहुँचने नहीं देता; फलतः उनके सभी काम अधूरे रह जाते हैं।
फ्रांसीसी विद्वान वी. जैड डूँकले अनेक भाषाओं के विद्वान और पंडित थे, उनने सभी भाषाओं की एक-से-एक बढ़कर उत्तम पुस्तकें पढ़ीं। वे उनमें से कुछ का फ्रेंच में अनुवाद करना चाहते थे; पर वे जीवन भर में एक भी पुस्तक पूरी न कर सके। जब तक एक का अनुवाद हाथ में लेते तब तक दूसरी की ओर उनका मन बदल जाता। पहली को छोड़ देते दूसरी को करने लगते; फलतः पहली अधूरी रह जाती। यही क्रम चलता रहा और अंत समय वे प्रायः साठ पुस्तकें अधूरी छोड़कर परलोक चले गए। उनमें से एक भी ऐसी न थी, जो पूरी हो चुकी हो और उसे छापा जा सके।
अनिर्णित मनःस्थिति को बालबुद्धि कहते हैं। बच्चे अभी एक काम शुरू करते है। दूसरे ही क्षण मन बदलने पर दूसरा काम करने लगते है। अभी एक खिलौना पसंद किया, कुछ ही देर में उसे फेंककर दूसरे के लिए मचलने लगे। उठाकर संभालना और उन्हें सँजोकर रखना किंहीं विरलों को ही आता हैं। ऐसी ही बचकानी मनोवृत्ति कितने ही बड़ी आयु वालों में भी देखी जाती हैं।
जब एक प्रसंग पर विचार करते हैं, तो उसकी पक्षधर दलीलें और कल्पनाएँ ही सामने आती चली जाती हैं; फलतः वही पसंदगी सबसे अधिक सही और सुहावनी लगती हैं। उसी को अपनाए रहने को मन करता है। किंतु जब कुछ समय उपरांत अन्य प्रकार के विचार सामने आने लगते हैं, उनकी अच्छाइयाँ सूझने लगती हैं, अपेक्षाकृत अधिक सुविधा एवं लाभ दिख पड़ता है, तो मन उस ओर ढुल जाता है। पहले काम से मन उचटने लगता है। पूरी तरह न पिछला काम छूट पाता है और न नया चालू हो पाता है। ऐसी दशा में यत्किंचित मात्रा में दोनों ही प्रकार की हरकतें होने लगती हैं। समुचित मनोयोग न लगने से उनमें से एक भी काम पूरा नहीं हो पाता। दोनों ही आधे-अधूरे काने-कुबड़े रहते हैं। सफलता किसी भी पक्ष को नहीं मिलती।
अदालत में बैठकर यदि वकीलों की बहस सुनी जाए, तो जिस पक्ष की दलील, बहस, कारण और प्रमाण सुने जाते है, वही सही प्रतीत होने लगते हैं। किंतु जब दूसरे पक्ष को अपनी बात कहने का अवसर मिलता है, तो उसकी बात भी उतनी ही सही प्रतीत होती है, जितनी कि कुछ समय पहले का प्रतिपादन सही मालूम देता था। अपरिपक्व बुद्धि यह निर्णय नहीं कर पाती कि किसके कथन में कितना दम है और कितना जंजाली ताना-बाना बुनकर छोड़ा गया है। किंतु निष्पक्ष न्यायाधीश का विवेक यह आसानी से ताड़ लेता है कि इन परस्पर विरोधी प्रतिपादनों में से किसके कथन में कितना दम है। वह तथ्यों में से जो जानदार है उन्हें नोट करता है और उसी आधार पर अपना फैसला लिखता है।
इंजीनियर जब किसी बड़े कार्य को हाथ में लेते हैं, तो अनेक विकल्पों पर विचार करते हैं। अनेकों कल्पनाएँ और संभावनाएँ सामने रखते हैं। उनमें से प्रत्येक के गुण-दोषों का ब्यौरा तैयार करते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से काट-छाँट करते हैं और तैयार किए गए प्रस्तावों पर गंभीर विचार करने, दूसरों के परामर्श सुनने के उपरांत किसी निर्णय पर पहुँचते हैं। जब निश्चय हो जाता है, तो समूची तत्परता और तन्मयता के साथ उसे पूरा करने की योजना बनाते और साथियों, अनुयायियों समेत उस काम में जुट जाते हैं। ऐसी लगन से किए हुए काम ही पूरे होते और पार पड़ते हैं। जिनके मन में असमंजस बना रहता है, निर्धारित योजना को संदेह की दृष्टि से देखते रहते हैं और सोचते हैं कि इसकी अपेक्षा अन्य प्रस्ताव कार्यांवित किया गया होता, तो अच्छा होता। यह संदेह उनकी आधी क्षमता और प्रतिभा को नष्ट कर देता है; फलतः कार्य उतनी अच्छी तरह नहीं चल पाता, जितना कि चलना चाहिए। संदेह और असमंजस उनकी आधी सफलता को निरस्त कर देता है।
दुर्बल मनवालों की बालबुद्धि प्रायः ऐसी ही होती है। वे दूरदर्शिता के अभाव में कुछ भी सोचने लगते हैं और किसी के भी बहकाए में आ जाते हैं। परिणाम यह होता है कि वह अपने निर्णय तथा दूसरों के परामर्श में छलावा ही देखते रहते हैं। यह निश्चय ही नहीं हो पाता कि जो किया जाना चाहिए था, वही किया जा रहा है? या भटकावों में भटका जा रहा है। जब मन की निश्चिंतता और दृढ़ता हो तो हाथ-पैर पूरे उत्साहपूर्ण व्यवस्थित रूप से किसी कार्य में अपने को गतिशील करें। अधूरे मन से किये गए काम या तो पूर्णतया असफल होते हैं या इस प्रकार अधर में लटकते रह जाते हैं, जिन्हें असफलता के समतुल्य कहा जा सके । यह अनिश्चितता की स्थिति ऐसी है, जिसे आदत की तरह नहीं अपना लिया जाना चाहिए; अन्यथा असमंजस अपने कुचक्रों में फँसाकर मनुष्य को असफल ही बनाकर छोड़ता है। उसकी मनःस्थिति जो भी जानते हैं वे उसे सनकी, बचकाना या अर्धविक्षिप्त की संज्ञा देते हैं।
ऐसी स्थिति में फंसने की अपेक्षा उत्तम यह है कि जितने भी विकल्प हो सकते हो, उन्हें सामने रखते हुए काट-छाँट की जाए, कि अपनी सामर्थ्य एवं वर्त्तमान परिस्थिति के अनुरूप क्या संभव है? जो संभव हो उसे तत्काल पकड़ना चाहिए और अपनी दक्षता उसी कार्य में समाहित करते हुए यह सिद्ध करना चाहिए कि उनकी योग्यता अधिक ऊँचे काम कर सकने की भी है। देखने वाले देखते हैं कि कीमती रत्न का मूल्याँकन एक दुकान पर न सही दूसरी दुकान पर हो जाता है। सुयोग्य व्यक्तियों की प्रगतिशीलता का यही इतिहास है। उनने सर्वप्रथम बड़ी पदवी की माँग नहीं की और छोटे काम में बेइज्जती नहीं समझी। संयोगवश जो भी काम सामने आया उसे पूरा करने में एकाग्र मन से इस प्रकार जुट गए कि मात्र वही सर्वोत्तम है। कम की प्रतिष्ठा को उच्च बताकर मनोयोगपूर्वक किया जाना इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति की निर्णयात्मक बुद्धि सही है।
अनेक पक्षों और पहलुओं पर अनेक दृष्टियों से विचार किया जाना चाहिए। इसमें कुछ देर लगे तो उसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए। धैर्य इसी को कहते हैं कि सब्ज बाग न देखे जाएँ। दिवास्वप्नों में न उड़ा जाए, यथार्थता के साथ जुड़ा जाए और जब निष्कर्ष का नवनीत निकल आए, तो भटकन बंद कर देना चाहिए और एकाग्रता के साथ कार्य में जुट जाना चाहिए। सही दृष्टिकोण और सही व्यवस्था अपनाते हुए, जो भी काम किया जाता है, वह सफल होकर रहता है।
एक अध्ययनशील किसी पुस्तक को पढ़ने में तन्मय था। किसी कारीगर ने पूछा— "क्या पढ़ रहे हो?" विद्वान झल्लाया— "तुम जैसे मूर्ख दार्शनिक विषय के बारे में क्या जान सकते हैं?"
कारीगर ने हँसकर कहा— "बिन बताए ही मैंने समझ लिया कि यह ज्योतिष का ग्रंथ है।" अन्यथा आपको मेरे मूर्ख होने का पता कैसे लगता। इस पर विद्वान खीजा और बोला— "नहीं! यह व्यवहार ज्ञान का ग्रंथ है।"
कारीगर की हँसी न रुकी— " तभी तो! आपका व्यवहार इतना उत्तम है कि बात करने तक में चिढ़ते और झगड़ते हैं।"
विद्वान अपनी गलती पर लज्जित हुए बिना न रहा।
भावी पीढ़ी कैसी हो? इस संबंध में गत कुछ दशाब्दियों से मनीषी-वैज्ञानिक वर्ग में अच्छा खासा मंथन चलता आ रहा है। एक ओर पदार्थविज्ञानी है, जिनका चिंतन स्थूल धरातल पर चला एवं ऐसे ही निष्कर्ष उन्होंने निकाले भी हैं। बायोटेक्नोलॉजी आज की एक विकसित वैज्ञानिक विधि है, जिसमें नित नए अनुसंधान हो रहे हैं। पादप-वनस्पति एवं जीव−जंतु वर्ग से आरंंभ हुआ यह शोधक्रम अब मानव को भी एक स्थूल संसाधन मानते हुए उसे बदलने की— आने वाली पीढ़ी को बलिष्ठ बनाने की दिशा में अग्रसर हो रहा है। दूसरी ओर अध्यात्म के सौम्य प्रतिपादनों के पक्षधर मनीषीगण हैं, जो वंशानुक्रम विज्ञान का पूरा सम्मान करते हुए भावी पीढ़ी में संस्कारों के समावेश द्वारा पीढ़ी परिवर्तन की चर्चा करते हैं। वे मानवी नस्ल के साथ पशुओं की तरह प्रयोग किए जाने का समर्थन नहीं करते, अपितु विचार-संस्कार-स्वभाव को बदले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
अब अनुवांशिक इंजीनियरिंग में कोशिकाओं पर ऐसे प्रयोग किए जा चुके हैं कि किसी भी पुरुष के शरीर के अंग से निकाली गई कोशिकाओं के नाभिकीय द्रव्य- डी.एन.ए. तथा आर.एन.ए. को यदि स्त्री गर्भाशय में स्थापितकर निषेचित किया जाए, तो वह अपने ही समान अन्य कोशिकाओं को जन्म देती चली जाएगी और कायपिंड के विभिन्न अंग अवयवों का निर्माण होने लगेगा। अमैथुनी सृष्टि की संभावनाओं को बलवती बनाने वाले ये प्रयोग अब कल्पना या 'साइंस फिक्शन' तक सीमित नहीं रहे, अपितु यौन स्वच्छंदता के पक्षधर स्वयंसेवकों पर किए भी जा चुके हैं। 'डेविड रोरविक' जो कि अपने एक ऐसे ही प्रयोग के कारण बहुचर्चित रहे हैं, अपनी रिपोर्ट में कितना सही हैं, यह तो वही जानते हैं; क्योंकि वे इन चिकित्सकों व उस एशियाई महिला को वैज्ञानिक के समक्ष प्रस्तुत करने में असफल रहे ,जो प्रयोग साक्षी माने जाते हैं। फिर भी एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न अभी भी अनुत्तरित है कि बायोटेक्नोलॉजी का यह खेल मानवता का विनाश तो नहीं कर बैठेगा?
कृत्रिम जीवकोशों के आधार पर क्या कुछ परिवर्तन मानव जाति में किए जा सकते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में ब्रिटेन के जीवविज्ञानी जेम्स डेनियल ने कहा है कि,"अगले दिनों कृत्रिम जीवकोश बनाने में सफलता मिलने के बाद निकट भविष्य में ही यह संभव हो जाएगा कि मनुष्य की डिजाइन की हुई मानव आकृतियाँ सृजी जा सकें।" वे यह संभावना भी व्यक्त करते हैं कि, " अब ऐसे मनुष्यों को ढालना भी संभव हो जाएगा, जो अन्य ग्रहों में जीवनयापन कर सकें।" उनका कहना है कि, "इस बायोतकनीकी-प्रक्रिया में न तो रतिक्रिया आवश्यक है और न कृत्रिम गर्भाधान का आश्रय लेना ही। मनुष्य शरीर की हर कोशिका में वे तत्त्व मौजूद हैं जो गर्भस्थापन के लिए उत्तरदायी है। यदि इस कोशिकाद्रव्य को सही स्थान पर पहुँचाया जा सके तो गर्भ-स्थापना का उद्देश्य पूरा हो सकेगा।" पर एक बात वे और कहते हैं कि, "यंत्र-मानवों की तरह मानव आकृति तैयार की जा सकती है, पर प्रकृति पर विज्ञान का कोई नियंत्रण नहीं है। हो सकता है, वे मात्र रोबोट हों अथवा विनाश की ओर ले जाने वाले रक्तबीज से उपजे असुर।"
इसमें कोई संदेह नहीं कि बायो-इंजीनियरिंग के जीन-यांत्रिकी-प्रयोग जानवरों एवं पादपों की नई- नई किस्में उपलब्ध कराने में सफल रहे हैं। डी.एन.ए. केमीस्ट्री में परिवर्तन के द्वारा मॉलीक्युलर बायोलॉजी के इन प्रयोगों से जींस की कलमें बनाने (क्लोनिंग) में वैज्ञानिकों को अभूतपूर्व सफलता मिली है। एक और बड़ी उपलब्धि, जो वैज्ञानिक हासिल कर सके हैं, वह है— एक जीव के ग्रोथ हारमोन के लिए उत्तरदायी जींस का दूसरे के डी.एन.ए. के साथ प्रत्यारोपण। इस प्रयोग को मानव पर जब लागू किया गया तो इस रिकाम्बीनेट डी.एन.ए. टेक्नोलॉजी द्वारा मधुमेह के रोगियों में इंसुलिन पैदा करने वाले जीन्स आरोपित करने में सफलता मिली। यद्यपि ये प्रयोग सीमित स्तर पर हुए हैं, पर इनसे लगता है कि अगले दिनों जब यह प्रयोग अधिक सस्ता एवं व्यापक स्तर पर होने लगेगा तो संभवतः मधुमेह जैसी और भी जटिल अनुवांशिकीय व्याधियों से मनुष्य को मुक्ति मिल जाए। कार्य कठिन है, समय साध्य भी, पर इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों के लिए आशा की एक किरण भी जागी है। इस जीन प्रत्यारोपण के प्रयोग को छोड़कर अन्यान्य प्रयोग असफल रहे हैं। देखा यह गया है कि जब बेहतर नस्लों के उत्पादन हेतु क्रास-बीडिंग अथवा अमीनो एसिड प्रत्यारोपण के प्रयोग किए गए, तो नई नस्लें तो विकसित हुईं, पर इनकी जीवनीशक्ति— रोगों से जूझने की सामर्थ्य एवं गुणवत्ता अत्यंत घटिया पाई गईं। भारत में गाय पर किए गए प्रयोग एवं अमेरिका जैसे मांसाहार प्रधान देश में सुअरों पर किए गए प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकला कि इससे कमजोर प्रकृति की नस्लें जन्मती हैं, उनमें मूलभूत विशेषताएँ विद्यमान नहीं पाई जातीं।
अब ये प्रयोग मनुष्य की विभिन्न व्याधियों के निवारणार्थ, जो मूलतः आनुवांशिकीय हैं, के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही 'वैस्ट मैटेरियल' से प्रोटीन या उच्च कोटि के खाद्य पदार्थ पैदा करने के प्रयोग भी हो रहे हैं, पर विडंबना यह है कि इन्हें किया तृतीय विश्व के देशों में जा रहा है। संभावना यह उठती है कि मानव पर किए गए इन प्रयोगों से हो सकता है, नई असाध्य व्याधियाँ जन्मने लगें अथवा जीवनीशक्ति की दृष्टि से कमजोर व घटिया पीढ़ियाँ पैदा हों अथवा कोई ऐसा पदार्थ जन्म लेने लगे, जो घातक सिद्ध हों। कृषि, चिकित्सा, विज्ञान एवं इंडस्ट्रीज के क्षेत्र में ऐसे प्रयोग एक सीमा में किए जाएँ, तो ही मानव जाति के लिए कोई लाभप्रद निष्कर्ष निकल सकते हैं। कुछ प्रयास जो इस दिशा में किये गए व जनसाधारण की जानकारी में लाए गए, वे तो डराते हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध के माध्यम से व्यापक संहार करने वाला नस्लवाद का समर्थक हिटलर इस क्षेत्र में प्रथम व्यक्ति माना जाता है। जिसने नीत्से की परिकल्पना को साकार करने के लिए शुद्ध आर्य नस्ल का व्यापक प्रचार किया एवं ऐसे वैज्ञानिकों को प्रश्रय दिया, जो प्रयोग कर सकते हों। हिटलर ने सभी जर्मन तथा यूरोपवासियों के मन में यह धारणा बिठाई थी कि जर्मनी को ही समूचे संसार पर शासन करने का अधिकार है; चूँकि वह शुद्ध आर्य नस्ल है। उसने कमजोर जर्मनों का बंध्याकरण करने, यहूदियों को पूरी तरह नष्ट करने व विवाहेतर यौन प्रसंगों द्वारा बलिष्ठ व मेधावी बच्चों को जन्म देने की बात पर जोर ही नहीं दिया, उसे लागू भी किया। ऐसा कहा जाता है कि हिटलर के चिकित्सक डॉ. जोसेफ मेंजेले ने तो यहाँ तक प्रयास किया था कि जर्मनी का बच्चा-बच्चा हिटलर की प्रतिकृति बने। दुर्भाग्य से समय से पूर्व हिटलर का पतन हो गया, पर डॉ. मेंजेले हिटलर की कोशिकाओं का नमूना लेकर भाग गया। कुछ दिन बवेरिया में छिपा रहकर अर्जेंटाइना, पैराग्वे आदि स्थानों में पहुँचा व अपने प्रयोग जारी रखा। इरालेविन नामक लेखक की पुस्तक 'ब्वायज फ्राम ब्राजील' नामक पुस्तक में लिखा है कि मेंजेले ने हिटलर की कोशिकाद्रव्य द्वारा रेड इंडियन जाति की 94 औरतों के गर्भ में भ्रूण स्थापित किए, जिनसे इतने ही बच्चे पैदा हुए। वे बच्चे हू-ब-हू हिटलर की प्रतिलिपि हैं व प्रत्येक की आयु चौबीस वर्ष की हो चुकी है। यह कहाँ तक सही है, कोई नहीं जानता; क्योंकि किसी ने इन बच्चों को नहीं देखा ,पर एक संभावना का पता तो लगता है, जो दानवी विभीषिका का आभास देती है।
ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों प्रकाश में आया है, जिसमें "सरोगेट मदर" के रूप में प्रख्यात न्यूजर्सी (अमेरिका) की मेरीबेथ व्हाइटहेड नामक महिला ने नौ माह तक कृत्रिम गर्भाधान द्वारा एक डॉक्टर दंपत्ति के भ्रूण को अपने गर्भ में पालकर, एक लड़की को जन्म देकर उसे मूल माता-पिता को देने से मनाकर दिया। यह बच्ची मार्च में एक वर्ष की हो जाएगी। वह चूँकि मामला कोर्ट में चला गया है। एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न सबके सामने लग गया है कि बेबी एम. नाम से प्रख्यात इस बालिका को किराए की माँ के रूप में जन्म देकर श्रीमती व्हाइटहेड ने क्या गलत काम किया है? दूसरी ओर डॉ. विलियम र्स्टन, जो कि एक बायोकेमिस्ट व उनकी पत्नी एलिजाबेथ शिशुरोग विशेषज्ञ है, कहाँ तक सही हैं, जो 10 हजार डॉलर की कीमत पर कृत्रिम गर्भाधान द्वारा दूसरी महिला के गर्भाशय को किराए पर लेकर उससे जन्मी बच्ची पर अपना अधिकार जता रहे हैं । गतवर्ष बच्ची 'सारा' (बेबी एम.) को जन्म देने के बाद पहले से ही 2 बच्चों की माँ 29 वर्षीय मेरीबेथ व्हाईटहेड रो पड़ीं, जब उनसे बच्ची लेने र्स्टन-दंपत्ति गए। उसकी भाव-विह्वलता देख उन्होंने उसे दो हफ्ते अपने पास रखने का आश्वासन दिया; पर पुनः पहुँचने पर उसे जिस स्थिति में पाया, उससे लगा कि उसका 9 माह तक गर्भ में रही बालिका से जो भावनात्मक लगाव है, उस नाते वह बच्ची को देना नहीं चाहती, बदले में सारी राशि उसने लौटा दी। स्टर्न-दंपती तो बच्ची चाहते थे, अतः उन्होंने पुलिस की मदद ली एवं जब वे बच्ची लेने पहुँचे तो उसे लेकर व्हाइटहेड-दंपती पिछले दरवाजे से भाग चुके थे। उन्हें फ्लोरिडा में गिरफ्तारकर मुकदमा चालाया गया, जो अभी सुनवाई के लिए न्यूजर्सी के सुपीरियर कोर्ट जज हार्वे साकेवि के पा पहुँचा है। वे मार्च के अंत तक अपना निर्णय दे चुके होंगे। तब तक बेबी एम. र्स्टन-दंपत्ति के पास रहेगी, मात्र सप्ताह में दो बार दो-दो घंटों के लिए उसे श्रीमती व्हाइटहेड अपने पास रख सकेंगे।
इस विवाद ने कई मुद्दों पर विचार करने के लिए इस प्रगतिशील कहे जाने वाले देश के मनीषियों को विवश कर दिया है। 'टाइम' पत्रिका (19 जनवरी 1987) में 'बायोएथीक्स' का मुद्दा उठाते हुए रिचार्ड लोकायो, ऐगर फ्रैकलीन एवं रसेल लेविट लिखते हैं कि." क्या इस प्रक्रिया को प्रश्रय देकर हम माँ व बच्चे के मध्य स्नेह-संबंधों से खिलवाड़ नहीं कर रहे?" इसे एक “‘बेबी इंडस्ट्री” नाम देते हुए उन्होंने कहा कि' "गर्भावस्था की तोहमत से बचने के लिए धनिकों द्वारा क्या यह निर्धनों का शोषण नहीं है?" मिशिगन के नार्मन रॉबिन्स लिखते हैं कि, "नवजात शिशु को 'सामान' या ‘संपत्ति’ नहीं माना जाना चाहिए। इससे तो गरीबों में 'प्रोफेशनल ब्रीडर' बनने की ललक जागेगी एवं इससे मानवी गरिमा को बड़ी ठेस पहुँचेगी।" उनका अंदाज है कि, "ठेके के आधार पर गर्भाशय किराए पर लेने की प्रक्रिया 1976 के आस-पास आरंभ हुई, तब से अभी तक मात्र अमेरिका में ऐसे 500 बच्चे जन्म ले चुके हैं। ऐसे एक दर्जन केंद्र अमेरिका में काम कर रहे हैं, जो संतानहीन दंपत्तियों को किराए की महिलाओं से मिलाते व गर्भाशय में कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा उपलब्ध कराते हैं।" वे कहते हैं कि, "तकनीकी प्रगति ने हमें किस स्थिति में पहुँचा दिया है कि हम संवेदनाहीन बच्चा पैदा होने की प्रक्रिया को मशीनीकरण के समकक्ष मानने लगे हैं।"
वैज्ञानिक जैवयांत्रिकी एवं कृत्रिम गर्भाधान के इन प्रयोगों के समय यह भूल जाते हैं कि दांपत्य जीवन की सरसता ही उन्हें एकदूसरे के लिए वफादार बनाती है और परस्पर सघन सहयोग की मनःस्थिति उत्पन्न करती है। यदि बच्चे गाजर-मूली की तरह किसी भी दुकान से खरीदे जा सकें तो दांपत्य जीवन की नींव हिल जाएगी और बच्चों में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा या कर्त्तव्यपालन का कोई भाव शेष न रहेगा।
इससे भी बड़ी बात है— सृष्टि में भिन्नता की विलक्षणता, जिससे परस्पर प्रतिस्पर्धा की आगे बढ़ने की भावना जन्म लेती है। संत चोर को लज्जित करता है और चोर संत से अपने परिवर्तन की प्रेरणा प्राप्त करता है। जब सभी एक जैसी प्रकृति के होंगे तो पीढ़ियाँ बलिष्ठ या सुंदर भले ही हों, वे विलक्षणताएँ जीवित न रहेंगी, जो मानव जाति के वर्चस्व को बढ़ाती हैं।
इसलिए इन प्रयासों को भी अणु विस्फोट की तरह खतरनाक मानकर उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। प्रयोगशाला की सीमा तक ही यह प्रयास सीमित रखना हो, तो परिणाम अन्य पशु-पक्षियों पर प्रयोग करके देखे जा सकते हैं।
युद्ध कौरव-पांडवों के मध्य हुआ। वे लड़े और नियति के अनुसार उनमें से जिसे मरना था, वे उस गति को प्राप्त कर गए। धृतराष्ट्र और गांधारी थे तो कौरवों के माता-पिता; पर उनने सदा नीति को सराहा। अपनों के अनौचित्य का कभी पक्ष लिया नहीं।
कुंती की मनःस्थिति भी वैसी ही थी। वह युद्ध को रोक तो नहीं सकी; पर अपने-पराए जैसा पक्षपात उनके मन में भी नहीं था; फलतः वह सदा धृतराष्ट्र-गांधारी को जेठ-जेठानी के रूप में श्रद्धास्पद ही मानती रही।
महाभारत समाप्ति के बाद उन्हें कुंती आग्रहपूर्वक घर ले आई और वैसा ही मान देती रही जैसा कि बड़ों को दिया जाता है। अंत में जब वे वनवास— वानप्रस्थ का आग्रह करने लगे तो कुंती भी उनकी सेवा करने के लिए साथ ही वनवास चली गई।
मस्तिष्क स्थूल दृष्टि से सबका एक-सा होता है, पर उसमें सन्निहित विभूतियों का भांडागार भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न प्रकार का पाया जाता है। वैज्ञानिक प्रयास मस्तिष्क के 7 से 13 प्रतिशत ज्ञात पक्ष को जानकर आगे नहीं बढ़ पाए हैं। प्रखरता, विलक्षण प्रतिभा, हतप्रभ कर देने वाली स्मरणशक्ति के विषय में मनःशास्त्रियों का मत है कि यह उस अविज्ञात जखीरे का कमाल है, जो 87 से 93 प्रतिशत मस्तिष्क के 'सायलेण्ट एरिया' के रूप में विद्यमान है।
वैज्ञानिकों ने स्मरणशक्ति पर काफी कार्य किया है और यह निष्कर्ष निकाला है कि न्यूरोकेमिस्ट्री एवं न्यूरोफार्मेकोलॉजी के आधार पर मस्तिष्कीय आर.एन.ए., जो कि विशिष्टतः स्मृति से ही संबंधित होता है, की विशिष्ट मात्रा व सक्रियता ऐसे व्यक्तियों में पाई गई है, जो कि विलक्षण स्मरणशक्ति के धनी होते हैं। दस अरब न्यूट्रॉन एवं इनसे सौगुने सिनेप्सों से बने मस्तिष्क में कुछ न्यूरान्स विशेष में संरचना व कार्य दोनों ही दृष्टि से परिवर्धित केंद्र पाए जाते हैं, जो 'मेमारी' की 'एनकोडिंग' करते हैं। इस संबंध में डॉ. बैरोंडेस ('द मिरर फोकस एण्ड लांगटर्न स्टोरेज' 1969) एवं डॉ. एग्रेनॉफ ('प्रोटीन सिन्थेसिस एण्ड मेमोरी फार्मेशन' 1969) द्वारा किया गया शोधकार्य उल्लेखनीय है। बहुत पहले कनाडा के न्यूरोसांइटिस्ट डॉ. डब्ल्यू. जी. पेनफील्ड ने प्रायोगिक जीवों पर इलेक्ट्रोड द्वारा मस्तिष्क को उत्तेजितकर ऐसे संभावित केंद्रों का पता लगाया था, जो स्मरणशक्ति व व्यक्ति की सीखने की क्षमता से संबंधित हो सकते थे। उन्होंने कुछ वालंटियर्स पर प्रयोगकर यह बताया कि, "मनुष्य-मस्तिष्क की कुछ विशेष कोशिकाओं से, चेतना के स्फुल्लिंग प्रवाह— 'रेक्टीकूलर एक्टीवेटिंग सिस्टम' के जुड़ने पर वे अतीत की घटनाएँ सुदूर बाल्यकाल तक अपने अंदर होती अनुभव कर सके।"
स्नायुविज्ञानी डॉ. कार्ललैसले अपने अनुसंधानों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि, "मस्तिष्क के किस खंड पर, किस शक्ति से, कितना विद्युत-प्रवाह किए जाने पर, कितनी पुरातन व किस-किस किस्म की स्मृतियाँ ताजी हो सकती हैं। इस तरह स्नायुविज्ञानियों ने विचार, ध्वनि और दृश्य का संबंध स्थापित करते हुए उस दिशा में प्रगति की असीम संभावनाएँ व्यक्त की हैं। जहाँ वांछित विद्युत-प्रवाह द्वारा लोगों के मस्तिष्कों को निर्दिष्ट चिंतन हेतु प्रेरित-प्रशिक्षित किया जा सकता है। इस तरह चिरपुरातन संस्कारों को मिटाकर चिंतन को नए अभ्यास में ढलने का मौका भी दिया जा सकता है। यह सारी प्रक्रिया मस्तिष्क के स्मृतिकोशों में हो रहे स्ट्रक्चरल एवं फंक्शनल परिवर्तनों की ही प्रतिक्रिया रूप में संपन्न होती मानी गई है।
वस्तुतः स्नायुविज्ञानी सारे शोधकार्य के बावजूद बड़े असमंजस में हैं कि सेरिब्रल कार्टेक्स की पेराइटल व टेंपोरल क्षेत्र की परतें स्मृति के संबंध में बड़ा विचित्र व्यवहार करती देखी गई हैं। कनपटी के ठीक नीचे व कान से ऊपर ब्रह्मरंध्र क्षेत्र तक दोनों ओर के मस्तिष्क के गोलार्द्धों में पच्चीस वर्ग इंच क्षेत्रफल व एक इंच के दसवें भाग तक की मोटी परतों में उन्होंने न केवल बाल्यकाल तक की, अपितु पूर्वजन्मों की एवं मनुष्य की संग्रहण क्षमता से भी कई गुना अधिक विलक्षण स्मृति जागी हुई पाई है। वे यह समझ पाने में असफल रहे हैं कि ऐसा क्यों कर होता है कि कुछ व्यक्ति विलक्षण व अपरिमित स्मरणशक्ति के धनी होते हैं, जबकि अन्य क्रियाकलापों में सामान्य या उससे कुछ कम ही होते हैं।
भारतवर्ष में ही ऐसे अनेक व्यक्ति हुए हैं, जो देखने वालों के लिए अचंभा बने रहे। राजा भोज का एक दरबारी था— श्रुतिवर। वह एक घड़ी (24 मिनट) तक सुने हुए प्रसंग को तत्काल ज्यों-का-ज्यों दुहरा देता था। स्वामी विवेकानंद पुस्तक पर हाथ रखकर कुछ क्षण पलटकर उसे शब्दशः दुहरा देते थे। शकुंतला देवी अपनी स्मरणशक्ति व अतींद्रिय प्रतिभा के कारण चलता-फिरता कंप्युटर मानी जाती हैं। ढूंढ़ने पर ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएँगे। कइयों में यह क्षमता अकारण— अनायास ही जागी दिखाई पड़ती है व कई इसे योग-साधना द्वारा जगाकर अर्जित करते हैं। कुछ में यह पूर्वजन्म के संस्कारों की फलश्रुति मानी जाती है व कुछ में संत-महामानवों के शक्तिपात की। जो भी हो, यह अद्भुत सामर्थ्य अपनी उपस्थिति जताकर मस्तिष्क की पिटारी में छिपे बहुमूल्य वैभव-भंडारण की, जो कि अविज्ञात है, एक झलक दिखाती एवं इसे अर्जित करने की प्रेरणा देती है।
शरीर से निकलने वाले वाष्प-प्रकाश को मापे जाने के प्रयास बहुत तरीके से किए जाते रहे है। ऐसा कहते है कि इस आभामंडल या तेजोवलय को सूक्ष्मदर्शी अपने ज्ञानचक्षुओं से भी देख सकते हैं। इसे थियोसाॅफीस्ट ईथरीक बॉडी या ईथरीक डबल कहते हैं, जबकि मनोवैज्ञानिकों-चिकित्सकों ने इसे आयडियोस्फियर नाम दिया है।
स्थूलरूप से वाष्प-ऊर्जा को मापे जाने के प्रयास थर्मोग्राफी से हुए हैं। वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि अंदर की सक्रिय ऊर्जा त्वचा में रक्त-प्रवाह के माध्यम से बाहर अभिसरित होती है व इस प्रकार पूरे शरीर का मैपिंग (मापन) किया जा सकना संभव है। एक विचित्र बात इस अनुसंधान से सामने आई है कि जो अंग व्याधिग्रस्त रहते हैं या आगे चलकर जिनके प्रभावित होने की संभावना रहती है, काफी पहले से ऊष्मा परिवर्तन बताने लगते हैं, इन्हें कोल्ड एवं हॉट क्षेत्र कहते हैं। जहाँ कैंसर होता या होने की संभावना रहती है, वे स्थान आस-पास के हल्के आसमानी या ग्रे रंग की तुलना में लाल या काले रंग की ऊष्मा फेंकते हैं। एक औसत वजन व क्षेत्रफल (1.75 वर्ग मीटर) वाले शरीर से 875 वॉट शक्ति की ऊर्जा उत्सर्जित होती है। इस प्रकार थर्मोग्राफी के माध्यम से सारे शरीर से निकलने वाला रेडिएशन मापा जाता है, जो कि आँखों से न देखी जा सकने वाली इंफ्रारेड से भी परे की तरंगों के स्तर का होता है।
थर्मोग्राफी से आगे चलें तो किर्लियन फोटोग्राफी एवं आर्गोन एनर्जी मापे जाने वाले यंत्र की बारी आती है, जो तथाकथित वाष्प-प्रकाश का मापन करते हैं। किर्लियन फोटाग्राफी बहुत दिनों तक विवाद का विषय बनी रही, पर ड्यूक विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग विभाग के लैरीबर्टन, विलियम जाॅइन्स एवं ब्रेड स्टीवेन्स ने 1974 में पैरासाइकोलॉजिकल एसोशिएशन कन्वेन्शन न्यूयार्क में यह प्रमाणित किया कि जो स्पेक्ट्रम औरा के रूप में रिकार्ड होता है, उसे विशेष फोटोमल्टीप्लायर ट्यूब्स एवं ऑप्टीकल फिल्टर्स द्वारा देखा जा सकता है एवं यह लाल वर्णक्रम के 660 नैनोमीटर रेंज में अंकित होता है। इसी तथ्य का डॉ. थेल्मा माॅस (यू.सी.एल.ए. न्यूरोसाइकिएट्री संस्थान) ने भी अपने प्रयोगों से सत्यापन किया है। यह कि शरीर से नीले ऑयन डाॅट्स निकलते हैं, जो उत्सर्जित किरणों के माध्यम से शरीर के आस-पास एक ऊर्जामंडल बनाते हैं, 'जनरल ऑफ ऑगोनाॅमी' में विल्हेम राइख द्वारा नवंबर 1971 में प्रकाशित हो चुका है। किर्लियन संयंत्र की अपेक्षा डॉ. राइख के आर्गोन एक्युमुलेटर्स को निदान व चिकित्सा दोनों ही क्षेत्रों में काफी मान्यता मिली है।
अब वैज्ञानिक तेजोवलय के स्पेक्ट्रम दिखाई देने वाले रंगों के आधार पर यह जान सकते हैं कि अमुक व्यक्ति का व्यक्तित्व एवं स्तर क्या है? उसके गुण व स्वभाव में किस प्रकार की कमी-बेशी है? इतना ही नहीं, उसकी प्रकृति और शारीरिक-मानसिक स्थिति का भी बहुत हद तक पता लगाया जा सकता है। निदान होने पर तदनुरूप औषधि चिकित्सा या अध्यात्म उपचार भी बन पड़ता है। इस निदान पद्धति में चिकित्सक अपने रोगी की स्थिति का विश्लेषण अपनी सूक्ष्म इंद्रियों के सहारे ही कर लेता है, जबकि सामान्य तथा पैथालॉजी के विभिन्न परीक्षणों एवं इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी की जाँच के आधार पर अनेक प्रकार के जटिल यंत्रों की सहायता से वस्तुस्थिति का पता लगाया जाता है।
दृश्य जगत से भी आगे बढ़कर अब स्पर्शेंद्रियों से वर्ण पहचानकर एवं गंध विज्ञान के सहारे व्यक्ति की स्थिति का पता लगाने का सूक्ष्म उपाय हस्तगत हुआ है। मास्को की सोवियत अकादमी ऑफ साइंसेज के बायोफिजीक्स विभाग के अनुसंधानकर्ता डॉक्टर नोवोमस्कि ने रोजा कुल शोवा नामक रूसी महिला की क्षमता का गहन अध्ययन किया व पाया कि वह आँख बंद करके भिन्न-भिन्न वेवलेंग्थ्स की प्रकाश किरणों से अपनी स्पर्शेंद्रियों को उत्तेजितकर प्रकाश डाले गए व्यक्ति की काया व मन के बारे में विस्तार से बता देती है। उन्होंने यह संभावना मन में रखते हुए की, कि यह क्षमता औरों में भी विकसित की जा सकती है, बच्चों पर अपनी प्रयोगशाला में प्रयोग किए। जन्मांध बच्चों में यह क्षमता सर्वाधिक विकसित पाई गई । इन बच्चों ने यह भी बताया कि लाल रंग का स्पर्श खुरदरा, पीले रंग का चिकना और हल्के नीले रंग का स्पर्श फिसलने वाला होता है।
न केवल रसिया में, अपितु बल्गारिया की सोफिया-परामनोविज्ञान प्रयोगशाला में भी स्कीन विजन (त्वचादृष्टि) में विभिन्न स्तर की प्रवीणता विकसित करने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। 80 वर्षीय फ्रेंच चिकित्सक-साहित्यकार डॉ. जुल्सु रोमेइन ने 'इंटरनेशनल जनरल ऑफ पैरासाइकोलॉजी' में 'पैरो आप्टिक पॉवर' शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया है, जिसमें 'स्पर्शेंद्रिय से अतींद्रिय ज्ञान' पर विस्तार से प्रकाश डाला है। गीताकार ने भी “स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्च” तथा “मात्रा-स्पर्शास्तु कौन्तेय, 'बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा' के माध्यम से त्वचा के माध्यम से असंभाव्य जानकारी होने की संभावना व्यक्त की है।
स्पर्शेंद्रियों के समान ही शरीर की गंध भी किसी के शरीर, मन एवं स्वभाव के बारे में बहुत कुछ बता सकती है। कुत्ते, बिल्ली सरीखे प्राणी इस घ्राणशक्ति के सहारे ही सुदूर अवस्थित अपने शिकार का व कभी-कभी मीलों दूर तक पहुँचकर अपने मालिकों का पता लगा लेते हैं। फेराॅमाॅन नामक हारमोन द्वारा संचालित यह प्रक्रिया जीवों में मस्तिष्क के अग्रभाग के ऑलफेक्ट्री कार्टेक्स एवं हिप्पोकेंपस क्षेत्र में घटित होती बताई गई है। यह क्षेत्र प्राणियों में सुविकसित होता है, यही कारण है कि पुलिस द्वारा प्रशिक्षित कुत्ते अपराधी की विशेष प्रकार की गंध का परिचय प्राप्त करके उसका पीछा करने व कई बार पकड़ने में सफल हो जाते हैं। नर व मादा पशुओं में आकर्षण-सहवास का माध्यम गंध ही होती है। शरीर से उत्सर्जित गंध नर को उत्तेजित करती व समय आने पर प्रणय निवेदन हेतु वे पहुँच जाते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी ही एक विशेष प्रकार की गंध प्रत्येक व्यक्ति के शरीर से निकला करती है, जो प्रकाशमंडल की तरह ही एक गंध का मंडल उसके चारों ओर बनाती है। हर व्यक्ति की गंध भिन्न-भिन्न होती है। जिस प्रकार उँगलियों की छाप के निशान हरेक के अलग-अलग होते है, उसी प्रकार गंध की विशिष्टता भी हरेक की अलग-अलग होती है। वांडर बिस्ट विश्वविद्यालय के जॉन एफ. कैनेडी शोधकेंद्र में कार्यरत डॉ. रिचार्ड पाॅटर एवं जॉन मरे नामक वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों द्वारा यही सिद्ध किया है कि मनुष्य की काया से निकलने वाली गंध उनके सगे-संबंधी पहचान सकते हैं। उन्होंने 16 लड़के व 8 लड़कियों को तीन रात तक एक ही कमीज पहनने को दी, जिनकी डिजाइन एवं रंग एक जैसे ही थे। दिन के समय ये कमीजें प्लास्टिक के विशेष लिफाफों में बंद कर दी गई, ताकि वे वातावरण से प्रभावित न हो सकें। चौथी सुबह एक प्लास्टिक की ढक्कनदार बाल्टी में इन कमीजों को रखकर एक छिद्र द्वारा इन्हें सूँघने के लिए कहा गया। इन 24 सब्जेक्ट्स में 8 जोड़े सहोदर भाईयों व 8 जोड़े सहोदर बहिनों के थे। 24 में से बीस बच्चों ने मात्र सूँघकर अपने भाई या बहन की कमीज पहचान ली।
स्पर्श, गंध, ऊष्मा व प्रकाश— इन सभी अदृश्य घटकों द्वारा अपनी पंचतन्मात्राओं को विकसितकर सामने वाले के बारे में वह जानकारी हस्तगत की जा सकती है ,जो सामान्यतया स्थूल काय-कलेवर से प्राप्त नहीं होती। यदि इस विज्ञान को गहराई से समझने का प्रयत्न किया जाए तो दूसरों के संबंध में वह अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जो चर्मचक्षुओं से इन स्थूल इंद्रियों से परे है। उपनिषद्कार ने 'त्वचिविद्युति हृदये च एका देवता' सूत्र में त्वचा, कायविद्युत व हृदय के स्पंदनों को एक ही शक्ति द्वारा संचालित बताया है। यदि योग विज्ञान का आश्रय लेकर कायपिंड के विभिन्न घटकों की सामर्थ्य को विकसित किया जा सके, तो मनुष्य अनन्य विभूतियों का स्वामी बन सकता है।
प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए सारी आयु खपानी पड़ती है। बदनामी तो एक दिन में भी हवा के साथ फैल सकती है।
मनुष्य जितना विलक्षण एवं दैवी क्षमताओं से सुसंपन्न है, उतना ही वह विचित्र, विकृत एवं कुरूप भी है। एक तस्वीर के दोनों ही पहलू होते हैं। मनुष्य के अंत में छिपा नर-पशु जितना ही उसके नियंत्रण के बाहर होता जाता है, उतनी ही उसकी कुरूपता बहिरंग जीवन में दृष्टिगोचर होती जाती है।
बहुपुरुषों से भोग करने वाली स्त्री को वेश्या कहते हैं और उसी से मिलता-जुलता शब्द उस पुरुष के लिए भी प्रयुक्त होता है, जो विषय-लोलुपता के वशीभूत होकर अनेक उपपत्नियों की तुक बिठाता रहता है। मध्यकालीन अनीतियुग में इस प्रकार का घोषित व्यभिचार चल पड़ा, जिसमें एक ही घर में अनेक उपपत्नियाँ रहती थीं। राजा-सामंतों से चलकर तथाकथित बड़े आदमियों तक यह प्रथा व्यापक होती गई। आज भी यह प्रचलन किसी न किसी रूप में जिंदा है।
उन दिनों उच्छृंखल कामुकता के अतिरिक्त अपनों की संख्या अधिक बढ़ाने और उनके कारण एक प्रकार की पारिवारिक सेना जमा करने का भी लाभ संभवतः ऐसे लोगों की दृष्टि में रहा हो। उस काल में बहुपत्नियों और बहुसंतानों का विवरण ज्ञात करके दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है।
व्यसनों में सबसे आकर्षक और उत्तेजक है— कामुकता। इंद्रिय रसों में मायाचार को सर्वप्रमुख माना गया है। मनुष्य उसी में सबसे अधिक रस-लोलुपता अनुभव करता है। गृहस्थ जीवन के लिए पति-पत्नी का युग्म पर्याप्त है। जीवन की बहुमुखी समस्याओं का समाधान और प्रगति का अभीष्ट आयोजन करने के लिए दो पहिए की गाड़ी की तरह इन्हीं के सहारे गाड़ी खिंच जाती है। इसी में परंपरा एवं औचित्य का निर्वाह है।
पुरुषों में अनेक विवाह करने वाले और अपने जीवनकाल में आश्चर्यजनक संख्या में वंशज छोड़ मरने वालों में मोरक्को के बादशाह शरीफी की बीबियाँ कितनी थीं, इसकी तो कुछ गणना न हो सकी; क्योंकि आज शादी कल तलाक; इस पर भी हरम भरा रहता था। मात्र वंशजों की गिनती की जा सकी। वे नाती-पोतों समेत 325 थे। इनसे भी बाजी मारने वाले मध्य अफ्रीका के बोलोका गोहान थे, जिनके वंशज 650 गिने गए। उनकी पत्नियों की गणना कभी भी नहीं की जा सकी।
यों अफ्रीका के आदिवासियों में प्रत्येक संपन्न नीग्रो बहुपत्नियाँ रखते हैं। पत्नियाँ भी अपने को भाग्यवान मानती हैं। सब मिल-जुलकर ढेरों जमीन घेर लेते हैं और एक कबीला बनाकर लड़ाई-झगड़े का मुकाबला मिल-जुलकर कर लेते हैं। वहाँ मजदूर किराए के नहीं मिलते। घर के जितने अधिक लोग हों, उतनी ही आमदनी बढ़ती है और उस खुशहाली को अच्छा समझा जाता है। आज भले ही आबादी इतनी बढ़ गई हो कि कहीं पैर रखने, कब्र में उन्हें मरणोपरांत गाड़ने योग्य जमीन भी नहीं है, यह प्रचलन वहाँ बखूबी चलता रहा है। लगभग यही स्थिति अफगानिस्तान व उत्तर-पश्चिमी सीमांत पाकिस्तान की भी है।
हिंदुस्तान में उत्तराधिकारी पुत्र होने की लालसा से ही कई-कई विवाहों की परंपरा समकालीन युग से चली आ रही है। इतने पर भी कन्या जन्मने पर वह मनोकामना भी पूरी नहीं हो पाती। तंजौर के राजा का कोई पुत्र न था, सो उसने एक ही सप्ताह में 17 शादियाँ की। फिर भी उन्हें कोई पुत्र न हुआ और अंततः राजगद्दी अंग्रेजों के हाथ में चली गई।
मिस्र के राजा फरॉओह द्वितीय ने 77 वर्ष तक राज्य किया। उसके 60 लड़के और 59 लड़कियाँ थीं। मंदिर की दीवार पर इन सब बच्चों की मूर्तियाँ उसने खुदवाई थीं।
बहुप्रजनन में स्त्रियों ने भी बाजी मारने का प्रयत्न किया है। चिली की एक महिला गोंसाल्बीज मेरी जब तक जीवित रही तब तक उसके जीवनकाल में नाती-परपोते समेत 124 लड़के और 16 लड़कियाँ हो चुकीं थीं। सबसे अधिक संतानें पैदा करने का श्रेय शुया (मास्को) की श्रीमती फिओडोर वैसील्येव (1707 से 1782 ई. तक) को जाता है, जिसकी 69 संतानें थीं। वे अपने पति की दो पत्नियों में से एक थीं। 27 बार वह गर्भवती हुईं, जिसमें 16 जुड़वाँ, सात तिकड़ीयाँ (ट्रीपलेट्स) एवं चार चौकड़ियाँ (क्वाडुप्लेट्स) थीं। इनमें से 67 बच्चे जीवित रहे। सॉन एण्टोनिओ (चीलि) की लिओण्टीना एल्बीना आज के समय की सबसे अधिक संतानों को जन्म देने वाली महिला है, जिसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज है। इन्होंने 1981 में अपनी पचपनवीं संतान को जन्म दिया है। ये 1925 में जन्मी थीं और इनका विवाह 1943 में जिरार्डो सेकण्डा अल्बीना से हुआ। 5 इनके ट्रीपलेट्स हुए हैं। अभी ‘केवल’ 24 लड़के एवं 16 लड़कियाँ इनकी जीवित हैं। वे बताते हैं कि उनकी 11 संतानें चिली आने से पहले अर्जेण्टाइना में एक भूकंप में दबकर मर गईं। 1720 में मरीं एलीजाबेथ जॉन मॉट (वारविक शायर) को इंग्लैंड में सबसे अधिक (42) संतानें पैदा करने का श्रेय प्राप्त है।
प्रायः 45 वर्ष की आयु में स्त्रियों का मासिकधर्म बंद हो जाता है और तब तक औसत 4-5 बच्चे जनने के बाद स्त्रियाँ प्रसव बंद कर देती हैं; पर ये रिकार्ड ऊपर वर्णित ये महिलाएँ तोड़ चुकी हैं व शरीरविज्ञानियों को चुनौती देती हैं। चिकित्सा जगत के इतिहास में ब्रिटेन की एलन एलीस का नाम देखने को आता है, जिसने 75 वर्ष की आयु में 15 मई 1776 को, जो उनकी शादी का छियालीसवाँ साल था, अपने तेरहवें बच्चे को जन्म दिया था, जो जन्म के तुरंत बाद मर गया। पोर्टलैण्ड ऑरिगोन की रुथएलिस किसलर ने 57 वर्ष की आयु में 18 अक्टूबर 1856 को अपनी लड़की सूजन को जन्म दिया था। प्राकृतिक रूप में तेजी से एक साथ तीन बच्चों को जन्म देने का रिकार्ड श्रीमती जेम्स डक (मेक्फिस) के नाम दर्ज है, जिन्होंने 1977 में 2 मिनट में यह कर दिखाया। डॉ. जेनारो मोण्टेनियो (रोम) ने 22 जुलाई 1971 को 35 वर्षीय एक महिला के गर्भाशय से 10 मादा एवं 5 नर बच्चों के भ्रूण मृतावस्था में निकाले। समझ में नहीं आता, एक साथ इतने भ्रूण छोटे से गर्भाशय में कैसे पल एवं विकसित हो गए।
देखा जाए तो पशुओं की तरह कामसेवन कर बच्चे पैदा करना सरल है; किंतु बहुत स्त्रियों का और उनके बच्चों का लालन-पालन कितना कठिन है, इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं। उनके लिए धनसंग्रह करने के लिए अनीतिपूर्ण तरीके अपनाने पड़ते हैं, जिसके लिए वे किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहते हैं। जिन्हें बच्चों के उत्तरदायित्त्वों का कुछ भान है, वे उन्हें अपने समान सुयोग्य बनाने का प्रयत्न भी करते हैं।
ट्यूम्स बरी के डॉ. बेंजामीन के आठों पुत्र डॉक्टर बने। विक्टर शीनन का पूरा परिवार पादरी था। उनके चारों भाई, तीनों भतीजे व चारों लड़के पादरी बने। इसी प्रकार वेल्स के विल्सन परिवार में जन्मे पाँचों भाई पादरी बने, उनके नाम से पाँचों गिरजे बने। उन्हें दफनाया भी एक ही जगह गया।
समझदार लोगों की बात दूसरी है, जो अपनी संतानों को संस्कार भी देते हैं व भली प्रकार पालते भी हैं। अन्यथा जिस प्रकार बहुत बच्चे जनने वाले जानवरों की संतान “स्ट्रगल फॉर एक्जीस्टेन्स’ के लिए भूखों मरती हैं या जिस-तिस की शिकार बन जाती है, उसी प्रकार मनुष्यों द्वारा बहुत बच्चे जनने पर उनकी भी वैसी ही दुर्गति होती है। वैसे एक साथ अधिक बच्चे जनने का रिकार्ड पेंसिलवानिया की लीलाकुतिया ने स्थापित किया था। जिसने एक बार में 23 बच्चे जने। रीजेण्ट फार्म लंदन के एमहर्स्ट के पालतू कुत्ते जिमी ने पिता बनने का पंजीकृत रिकार्ड 2414 पिल्लों का स्थापित किया था। 600 इसके अतिरिक्त थे, जो पंजीकृत नहीं हुए। ओपोसम ऑस्ट्रेलिया का एक प्रख्यात जानवर है, जिसकी अनगिनत संतानें होती हैं। माँ के पास दूध हेतु पहुँचने के संघर्ष में तीन-चौथाई मर जाते हैं या माँ के ऊपर चढ़कर उसे घुटन से मार देते हैं। मनुष्य को भी यदि अपना इसी प्रकार उपहास कराना है और बच्चों को विपत्ति में, स्वयं को संकट में धकेलना हो तो बात दूसरी है। नहीं तो समझदारी तो यही कहती है कि यौनाचार पर अंकुश रखा जाए, उच्छृंखलता से बचा जाए एवं संयमजन्य शक्ति द्वारा उस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया जाए, जिसके लिए मानवयोनि मिली है।
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भूत-प्रेतों का अस्तित्व उनका अशांत स्थिति में परिभ्रमण, संपर्क में आने वालों की उलट-पुलट करते इसी रूप में बहुधा देखा जाता है। इस संबंध में कहा जाता है कि इन मान्यताओं के पीछे भ्रम या अपडर ही विशेष रूप से काम करते हैं। संदेही और डरपोक प्रकृति के व्यक्ति उन्हें अपनी कल्पनाओं के सहारे गढ़ते हैं और तिल का ताड़ बनाकर खड़ा कर देते हैं। झाड़ी का भूत बनने, रस्सी का साँप दिखने वाली उक्ति यहाँ सही होती प्रतीत होती है।
यह बात पिछड़े लोगों के संबंध में सही हो सकती है एवं उन पर भी फिट बैठती है, जो इसी मानवी शंकाशील मनोवृत्ति को उभारकर अपना धंधा चलाते हैं। फिर भी कभी-कभी विज्ञ-विद्वज्जनों के समक्ष भी ऐसा कुछ घटित होता रहता है, जिसके बारे में संदेह-निवारण के सभी उपाय कर लेने पर भी तथ्य यथावत रहते हैं और भूतों के, उनकी करतूतों के प्रमाण मिलते रहते हैं। यहाँ इस विवेचन का उद्देश्य भूत की चर्चा द्वारा किसी को डराना नहीं है, अपितु विक्षुब्ध मनःस्थिति के मरणोत्तर जीवन में प्रेतयोनि में भटकने की, आत्मसत्ता की नश्वरता की पुष्टि करना है। बहुत से अनीतिपरक कृत्य मात्र इसीलिए होते देखे जाते हैं कि जनसाधारण जो भी कुछ दृश्यमान है, स्थूल है, वर्तमान है, उसी को सब कुछ मानते हुए उपभोगवादी वृत्तियों में निरत रहता है। काया का सुख ही सब कुछ है और इसके लिए कुछ भी किया जाए, चाहे वह गलत ही क्यों न हो, दंड तो मिलना नहीं है। यही मान्यता कर्मफल के सिद्धांत के प्रति अवज्ञा को और फिर अनास्था को जन्म देती है और मनुष्य पशुवत्-पिशाचवत् आचरण में लिप्त होता देखा जाता है। प्रेत किसी सज्जन को अकारण कष्ट नहीं देते; पर अपनी विक्षुब्ध स्थिति में उस योनि में विचरते हुए शंकालु मनःस्थिति वालों, अनीतिजन्य कृत्यों की कीच में सने व्यक्तियों को अवश्य परेशान करते एवं उस स्थान को, जो उनके क्रिया-कृत्यों की साक्षी होता है, अभिशप्त कर देते हैं। सभी सूक्ष्म आत्माएँ प्रेतरूप में अथवा दुष्ट प्रकृति की नहीं होतीं, पर अदृश्य सहायक पितर आत्माओं से इतर अन्यान्य प्रेतात्माओं के जो प्रमाण मिलते हैं, वे मरणोत्तर जीवन की सत्ता में हमारा चिर पुरातन विश्वास सुदृढ़ करते हैं।
लार्ड क्लाइव ने ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ें स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थीं। अनगिनत व्यक्तियों को उसने इस प्रयोजन हेतु प्रताड़ित किया।कई महिलाएँ उसके कारण विधवा हुईं। कईयों को उसने बिना किसी अपराध के सूली पर लटका दिया। जब ईस्ट इण्डिया कंपनी ब्रिटिश राज के रूप में परिणत हुई, ग्रेट ब्रिटेन की राजसत्ता ने उसे ससम्मान रिटायरकर इंग्लैण्ड की एक काउंटी में रियासत दे दी। अपने साथ विपुल संपदा वह जहाज में लेकर आया था। आखिर सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत देश पर आधिपत्य जमाने में उसने महत्त्वपूर्ण भूमिका जो निभाई थी। इंग्लैण्ड आने पर उसने देखा कि कोई रिश्तेदार उसके साथ रहने को तैयार नहीं; जबकि वह असीम संपदा का स्वामी था। अकेला वह अपनी रियासत के भव्य भवन में बैठा विगत जीवन पर विचार करता रहता था। ज्यों-ज्यों पिछले जीवन के क्षण फिल्म की तरह उसकी स्मृति पटलकर आने लगे, उसे लगने लगा कि वे सभी, जिन्हें उसने सताया था, उसके आस-पास खड़े हैं एवं कभी भी उसे मार डालेंगे। वह अपनी रायफल लेकर बैठने लगा व उन छायाओं पर, जो उसे दिखाई पड़ती थी, गोली चलाता रहता। साथ ही उन्हें गाली भी देता, धमकाता रहता कि वह सबको गोली मार देगा। 'शंकाडायन मनसाभूत' की तरह वे गोलियाँ उन कल्पित भूतों को तो लगती नहीं थीं, खिड़की से बाहर जाकर महल के चारों ओर घूमने वाली एक सड़क पर जाने वाले वाहनों से टकराती थीं। वहाँ एक बोर्ड लगा दिया गया कि इस सड़क पर सावधानी से गाड़ी चलाएँ, कभी भी गोली आपके विंडस्क्रीन से टकरा सकती है। प्रयास क्लाइव के पास पहुँचकर समझाने के भी हुए, पर हिम्मत किसी की न हुई। एक दिन एक व्यक्ति ने समीप पहुँचकर देखने की कोशिश की तो पाया कि लार्ड क्लाइव तो कभी का अपनी ही राइफल से घोड़ा दबाकर आत्महत्या कर चुका है। उसकी लाश व राइफल वहीं पड़ी थी। उसे दफना दिया गया, पर गोलियाँ चलने का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ। लोग उसे भुतहा महल मानने लगे। वह बोर्ड अभी भी वहाँ टंगा है। गोलियाँ अभी भी तीर की तरह सनसनाती आती हैं व कारों से टकराती हैं। उस रोड पर तकरीबन यातायात बंद है। लोगों का कहना है कि लार्ड क्लाइव का भूत ही गोलियाँ चलाता है और उसकी विक्षुब्ध आत्मा वहीं मँडरा रही है। यह एक ऐसे व्यक्ति की अंतिम परिणति है, जिसने ग्रेट ब्रिटेन के औपनिवेशिक विस्तार में महत्त्वपूर्ण रोल अदा किया एवं अनगिनत मासूमों की आहें उसे लगीं।
इसी प्रकार ब्रिटेन के राजपरिवार के कब्जे में मुद्दतों से रहता आया ग्लैमिस नामक महल का शयनकक्ष भी अपने भुतहे क्रियाकलापों के कारण कुख्यात है। राजमाता ने उस स्थान को शांतिदायक समझकर वहीं अपना शयनकक्ष बनाया था। जब वे उथली नींद में होतीं तभी उन्हें उस सुनसान में बाहर से आने वाली चहलकदमी, धमाचौकड़ी, भगदड़ और उठक-पटक दिखाई पड़ती। कुछ दिन उन्होंने इन आवाजों की उपेक्षा की। जब आए दिन ऐसा ही उपक्रम दिखा तो चौकीदार-पहरेदारों की कड़ी व्यवस्था की गई।
अधिक मुस्तैदी से रात्रि का पहरा चलने पर भी आवाजों में कहीं कोई अंतर न आया। प्रकाश की अच्छी व्यवस्था की गई थी, पर कोई ऐसा न दिख पड़ा, जिसे उन हरकतों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। फिर राजमाता ने शयन हेतु अपना कक्ष बदल लिया। वह कक्ष बदल लिया। वह कक्ष उसके बाद खाली ही रहा। इतिहास टटोलने पर पता चला कि कुछ सौ वर्ष पूर्व वहाँ कई लड़कियों को बंद रखा गया था, व उन पर अमानुषिक अत्याचार किए गए थे। राजमाता ने बाद में महल ही छोड़ दिया।
एक घटना छठी शताब्दी की है। विडंसोर के एक महल में जब भी किसी मेहमान को ठहराया जाता तो कभी उनका पलंग अपने आप ऊपर उठने लगता, कभी भयानक दुर्गंध आने लगती। हमेशा मेहमानों को उस भव्य प्रसाद से हटाकर अन्यत्र ले जाना पड़ा। प्रत्येक ने देखा कि कमरे में जो वस्तुएँ, फर्नीचर तथा सजावट आदि का सामान शाम को जहाँ रखा जाता वहाँ प्रातः नहीं मिलता। तितर-बितर हुआ मिलता। नौकरों से पूछा जाता तो वे अपने को निर्दोष बतलाते। कहा जाता है कि एक विक्षिप्त राजकुमार की उसी महल में मृत्यु हो गई थी। बात फैलने न पाए इसलिए उसके ताबूत को उसी महल के एक एकांत कोने में दफन कर दिया गया था। जिनने भी उस पागल को देखा था वे उसी आकृति को अपने साथियों समेत उस महल में जहाँ-तहाँ टहलता देखते थे। बाद में सन् 1034 में स्कॉटलैंड के राजा माल्कम द्वितीय की हत्या हुई थी। इसके बाद उपद्रवों का सिलसिला और भी अधिक बढ़ गया।
उस महल को खाली न पड़ा रहने की दृष्टि से एक वृद्धा चौकीदारिन को उसमें रख दिया गया था। एक और वयोवृद्ध क्राफोर्ड भी उस महल में दूसरे कोने में रहता था। दोनों के लिए दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ जुटा दी जाती थीं, पर आयु अधिक होने से वे बहुत दिन जीवित न रहे। समयानुसार वे दिवंगत हो गए। बात समाप्त हुई, पर उस महल के मालियों और चौकीदारों ने उन दोनों मृतात्माओं को कई-कई बार अपने-अपने कक्ष के निकट टहलते देखा। कारण पूछने के लिए उनके पास पहुँचने से पहले वे गायब हो जाते। क्राफोर्ड को तो कई बार अंगीठी पर आग सेकते और दोस्तों के साथ ताश खेलते देखा गया।
कहा जाता है कि सम्राट हेनरी अष्टम ने अपने एक सामंत के पुत्र की हत्या इसी महल में करवाई थी। हेनरी पंचम की पत्नी की हत्या भी इसी महल में हुई थी। इन सभी मृतात्माओं की चीखे वहाँ अभी भी बड़े जोरों से सुनाई देती हैं।
प्रथम महायुद्ध के समय इस महल को रक्षाकेंद्र बना दिया गया था और वहाँ सैनिक रहते थे। एक दिन सैनिकों को न जाने क्या सूझा कि आपस में ही लड़- झगड़कर उन्होंने एकदूसरे को मार डाला, तब से ही अभिशप्त किले के रूप में मांयता प्राप्तकर वह अनेक ऐसे ही भुतहे महलों की सूची में आ गया, व खाली पड़ा है।
एकदूसरी घटना केंया पूर्वी अफ्रीका की है, इस देश का गेटी नामक नगर कभी काफी संपंन और सुहावना था, पर भूतों ने उसमें प्रवेश किया और पूर्वनिवासियों को इस प्रकार सताया, कि वे अपना घर और खेत, धंधा छोड़कर अंयत्र चले गए और पूरा नगर भूतों के कब्जे में चला गया। कोई असाधारण हिम्मत वाले ही “जहाँ जन्मे हैं, वहीं मरेंगे” यह सोचकर वहीं रह गए।
इस नगर का समीपवर्ती वन-प्रदेश असाधारण रूप से सुहावना था। खंडहरों के टीले भी कम सुहावने न लगते थे। यूरोप की सोफिया नामक एक चित्रकार अपनी सयानी बेटी के साथ उस क्षेत्र के चित्र उतारने आई। उनके साथ एक चित्रकार दांपत्य और चल पड़े। इन चार कलाकारों की मंडली का ख्याल था, कि वे ऐसे सुंदर वन-प्रदेश के चित्र बनाकर अच्छी कीमत उठा सकेंगे। भूत-प्रेतों की बात उनने हँसी में उड़ा दी। कहा कि यह मात्र पिछड़े लोगों का वहम है। कार्य कई दिन उत्साहपूर्वक चला। जीव साथ थी। ठहरने के लिए मकानों की कमी न थी। उनने अपना डेरा डाला और खाने पीने के सामान का भी प्रबंध कर लिया। चित्र बनने का सिलसिला शुरू ही हुआ था कि सोफिया का पैर फिसला और घुटने की हड्डी टूट गई। एक वृद्ध ने चेतावनी दी कि वे जल्द ही यहाँ से चले जाएँ, नहीं तो उनकी खैर नहीं है। उन्होंने उसे एक साधारण व्यक्ति समझकर खाने को दिया व हँसते हुए विदा कर दिया; पर घटनाक्रम यहीं समाप्त नहीं हुआ, तीसरे दिन सोफिया की बेटी एक टीले से फिसली और उसकी रीढ़ की हड्डी में भारी चोट लगी। दोनों माँ-बेटी को समीप के एक कस्बे में अस्पताल में भर्ती कराया गया।
इतने पर भी दो बचे हुए चित्रकारों ने बीमारों की रोज देखभाल करते हुए अपना काम जारी रखा। बंदूक की नली साफ करते समय एक कारतूस अनायास ही पुरुष चित्रकार के हाथों से छूटा व पत्नी के पेट से होकर पार निकल गया। वह बच तो गई पर अस्पताल में गंभीर अवस्था में पड़ी रही।
इतने में समाचार आया कि अमेरिका की जिस फर्म ने उन्हें चित्र उतारने का खर्च देकर भेजा था, व पहले से सौदा कर लिया था, उसके घर में आग लगी और वह सब कुछ गँवा बैठा। अब लौटने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। स्थानीय अस्पताल में तब तक पड़े रहे, जब तक कि उन्हें बड़े अस्पताल में पहुँचाए जाने योग्य स्थिति नहीं बनी। भुतहे नगर की असलियत का वह पार्टी भी अनुमान लगाकर अंततः चली ही गई। इस अकेले समूह का ही नहीं ,कइयों का सामना इस नगर से हुआ व वे मुँह की खाकर गए।
वस्तुतः जो दृश्यमान है, वही सब कुछ है, यह नजरिया अब हमें बदलना होगा। परोक्ष जगत का भी परमाणु की सूक्ष्म सत्त की तरह महत्त्व है। आत्मसत्ता अपने सूक्ष्मरूप में विक्षुब्ध स्थिति में प्रेत बनकर इसी में डोलती-मंडराती रहती है, जब तक कि उसे शांति न मिल जाए। भुतहे क्रियाकलाप एवं उनसे जुड़े अभिशप्त स्थान इसी तथ्य की बानगी है।
भगवान ने सर्वप्रथम बैल बनाया और उसे पचास वर्ष की आयु दी। बैल ने कहा— "जब इतना कठोर जीवन जीना पड़ेगा, तो इतने दिन जीकर क्या करूँगा ?" भगवान आधी उम्र कम कर दीजिए। भगवान ने आधी काट कर अपनी फीती में रख ली।
दूसरा कुत्ता बनाया उनकी भी आयु इतनी ही थी। इंकार करने पर उसकी भी उम्र आधी काट ली गई।
तीसरा मनुष्य बनाया। उसे भी पचास वर्ष जीना थ; पर वह इतने से संतुष्ट नहीं था, उसने अधिक जीना चाहा। सो भगवान ने पच्चीस वर्ष बैल और पच्चीस वर्ष कुत्ते की आयु भी उसे दे दी।
पचास वर्ष तक मनुष्य का अपना वैभव काम देता है। फिर शेष भगवान के अनुदान को वह उसी काम में लगाए, तो फिर बैल और कुत्ते की तरह पशुजीवन जीना पड़ता है।
चोरी उन घरों में होती है, जहाँ रखवाली का प्रबंध नहीं होता। मनुष्य में अनेक दोष, दुर्गुण तब घुस पड़ते हैं, जब आत्मनिरीक्षण और आत्मसुधार के चौकीदार अपनी जिम्मेदारी छोड़कर ऊँघने लगते हैं। जेबकट, उठाईगीरे वहाँ अपनी घात चलाते हैं, जहाँ देखते हैं कि मुसाफिर अपने सामान की चौकसी बरतने की अपेक्षा इधर-उधर के दृश्य देखने में दिल बहलता है।
दुर्गुण पास-पड़ौस के वातावरण में से आते हैं। छूत की तरह लगते और महामारी की तरह फैलते हैं। खरपतवार के बीज हवा के साथ उड़कर उपजाऊ खेतों में बिना बुलाए जा पहुँचते और नमी पाते ही जड़े जमा लेते हैं। सद्गुणों की उपयोगी खेती तो प्रयत्नपूर्वक होती है, परिश्रम और साधन चाहती है, तब कहीं जड़ पकड़ती और पनपती है। पनपने के बाद भी खाद-पानी आए दिन माँगती रहती है; किंतु घास-पास के गुच्छे अपने लिए खुद जगह बनाते और हर परिस्थिति में बढ़ने, फैलने में समर्थ रहते हैं। दुर्गुणों में ढीठता और समर्थता ऐसी ही है, जो अनायास ही अपना विस्तार करती है। उखाड़ने-काटने पर भी दुबारा हरी-भरी हो जाती है। जन्म-जंमांतरों के संग्रहित कुसंस्कार उन्हें पोषण प्रदान करते हैं और बढ़ोत्तरी के लिए वातावरण बनाते हैं।
सफाई की सतर्कता न बरती जाए तो गंदगी स्वयमेव एकत्रित होने लगती है और सड़कर दुर्गंध फैलाती, कुरूपता उत्पन्न करती और बीमारियाँ फैलाने का निमित्त कारण बनती है। बुहारी हाथ में रहे, आँखें कचरे को तलाशती रहें, हाथ उसे उठाने में फुर्ती दिखाएँ तो कोई कारण नहीं कि मलीनता आसन जमाए बैठी रहे। असावधानी अकेली ही ऐसी दुष्प्रवृत्ति है, जो अनेकों बुराइयों, गंदगियों, क्षतियों और विपत्तियों को न्यौत बुलाती है और उन्हें टिके रहने का अवसर प्रदान करती है।
प्रगति के अवसर निरंतर आते रहते हैं, उन्हें पहचानना और उपयोग में लाना उन्हीं के लिए संभव होता है, जो ध्यानपूर्वक यह देखते रहते है; इस समय किस प्रकार क्या किया जा सकता है? समय चूकने वाले पछताने हैं। हाथ में घड़ी बँधी रहने पर भी कितने ही लोग टिकट लेने और प्लेटफार्म तक पहुँचने में विलंब लगा लेते हैं, फलतः गाड़ी निकल जाती है और दूसरे दिन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
अरुचि और उपेक्षा बरतने पर व्यक्ति अनगढ़ ही बना रहता है और पिछड़ेपन के दल दल में फँसा रह जाता है जिसे अपने भविष्य को उज्ज्वल देखना है वह वर्तमान के प्रति पूरी-पूरी सावधानी बरतता है और एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता।
प्रगतिशील व्यक्तियों की गतिविधियों आदतों और रीति-नीतियों पर दृष्टिपात किया जाए, तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि उनमें से प्रत्येक सदा जागरूक रहे हैं ।अवसर को पहचानने में चूके नहीं है। प्रयास-पुरुषार्थ में ढील नहीं बरती और गई-गुजरी परिस्थितियों में भी क्रमश: उठने एवं बढ़ने का प्रयास जारी रखा। आशांवित साहसी और पुरुषार्थपरायण अपनी जागरूक बुद्धि के कारण सदा उन्नति की ओर बढ़ते हैं। कोई व्यवधान उन्हें देर तक रोके नहीं रह सकता।
ऊँट नदी के उस पार हो गया। इस पार खड़े गधे ने पूछा— "पानी कितना है?" ऊँट ने कहा पेट तक। बेखटके चले आओ।
गधे ने कहा— "पर मेरी तो पीठ पर से उतर जाएगा और डुबे बिना न रहूँगा। आपकी नकल में कैसे करूं? मुझे तो अपनी हैसियत देखकर चलना है।"
शक्तियों के संबंध में अभी लोगों का ध्यान उन्हीं की ओर गया है, जो प्रत्यक्ष हैं। धन, शस्त्र, बल और कौशल इन्हीं को सब कुछ समझा जाता है और इन्हीं के संवर्द्धन पर समाज के, शासन के मूर्धन्य लोगों का ध्यान केंद्रित है। गरीबी दूर करने हेतु बड़े-बड़े कलकारखाने, सुरक्षा हेतु शस्त्र बनाने व खरीदने की प्रक्रिया तथा स्वास्थ्य-संवर्द्धनहेतु चिकित्सकों, चिकित्सालयों व औषधियों के निर्माण हेतु बहुत कुछ हो रहा है। सामान्य जनशिक्षा की दिशा में भी बहुत कुछ हो रहा है। ये सभी प्रत्यक्ष शक्तियाँ है, जिनका महत्त्व समझा और अभिवृद्धि के लिए भरसक प्रयास किया जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस अभिवर्धन से हमारी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी होगी।
परंतु मनुष्य मात्र भौतिक ही नहीं है, उसके भीतर आध्यात्मिक-संपदा भी अच्छी खासी मात्रा में है। वह परोक्ष होते हुए, भी भौतिक सामर्थ्यों से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। चिंतन, चरित्र और भावनाएँ यह तीनों व्यक्ति की भीतरी शक्तियाँ हैं। इनके बल पर व्यक्ति और समाज ऊँचे उठते हैं। यदि इनमें खोखलापन आ जाए तो भौतिक सामर्थ्यों की प्रचुरता होते हुए भी सब कुछ गुड़-गोबर हो जाएगा।
आदर्शविहीन, आस्थाविहीन मनुष्य बेपैंदी के लोटे के समान होते हैं, जो आकर्षण और दबाव के आगे किसी भी ओर झुक सकते हैं। अनीति का समर्थन भी हो सकता है और कायरता अपनाकर औचित्य का परित्याग भी किया जा सकता है। आदर्शों के प्रति निष्ठा में वह शक्ति है, जिसके सहारे साधनविहीन व्यक्ति भी बड़ी से बड़ी हिम्मत कर सकता है और गांधी-विनोबा की तरह वह कर सकता है जो चमत्कार जैसे प्रतीत होते हैं।
विचारों की अपनी शक्ति है; जिनमें प्रजातंत्र और साम्यवाद जैसे असंभव लगने वाले प्रचलनों को संभव कर दिखाया। राजसामंतों की जड़े पाताल तक गहरी घुसी हुई प्रतीत होती थीं। पर वह उलटकर औंधी हो गई। दास-दासियों की खरीद-फरोख्त अब कहाँ होती है? छूत-अछूत का चक्कर अपना दम तोड़ रहा है। आर्थिक विषमता के विरुद्ध प्रत्यक्ष आंदोलन और परोक्ष ईर्ष्या, आतंकवाद का जन्म हो रहा है। विचारों की आत्मिक संपदा ऐसी है जिसके समर्थ रहने पर जापान और इजराइल जैसे छोटे-देश बड़े-बड़ों के कान काट रहे हैं। विचार-क्षेत्र में जो क्रांतियाँ चल रही हैं, उनके सही और गलत रूप कभी-कभी देखने को मिलते रहते हैं।
इन सबसे भी बढ़ी-चढ़ी शक्ति है— भावना। इसी के ऊपर देश, धर्म, समाज, संस्कृति, दया,करुणा, पुण्य, परमार्थ, संयम सदाचार आदि की आधारशिला रखी हुई है। यदि भावनाओं का लोप हो जाए तो मनुष्य या तो पशु हो सकता है, या पिशाच। उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, उदारता के पक्ष में कोई तर्क या तथ्य शेष न रह जाएगा। बहिन और पत्नी के बीच जो अंतर है, उसका समर्थन न हो सकेगा। वयोवृद्ध की सेवा करने की अपेक्षा अर्थशास्त्र के आधार पर उन्हें कसाईखाने के सुपुर्द करना पड़ेगा।
अध्यात्म और धर्म की समूची आधारशिला भावनाओं के ऊपर रखी हुई है। उसे सक्षम बनाए रहने के लिए तत्त्वज्ञान, दर्शन और धर्म का समूचा ढाँचा खड़ा किया गया है। भावना की शक्ति पत्थर में से भगवान प्रकट कर सकती है। वह न रहे तो भगवान भी पत्थर हो जाएगा और परमार्थ स्वार्थ के बीच अंतर कर सकना कठिन हो जाएगा। भावना के ऊपर यह सारा समाज टिका हुआ है और साथ ही मनुष्य का गौरव भी। इतना ही नहीं, उसकी अपनी शक्ति भी है, प्रेरणा भी देशभक्ति एवं पुण्य-परमार्थ के नाम पर मनुष्य अपना सब कुछ दान कर बैठता है। भक्ति भावना में तल्लीन होकर शरीर की सुध-बुध खो बैठता है। झाड़ी में से भूत निकल पड़ता है और प्राण लेकर हटता है। भय और आशंका से ग्रस्त होने पर नींद हराम हो जाती है। निराश व्यक्ति जीवन की लाश भर ढोता है। भावना ही है, जिसके कारण बालक माता के पेट में स्थान पाते दूध पीते और उसकी सेवा से लाभ उठाते हैं। यदि भावनाएँ निकल जाँए तो यह संसार नीरस और श्मशान के तुल्य भयानक प्रतीत होगा।
कहा जा चुका है कि भावनाओं को जीवंत रखने के लिए आध्यात्मिक साधनों और धार्मिक क्रियाकांडों का ढाँचा खड़ा किया गया है और उसे जीवंत रखा गया है। यज्ञ भी उनमें से एक है। वह हमारे विचार, व्यवहार और आचरण में सम्मिलित होकर वैसे फलितार्थ उत्पन्न करता है; जिसके गुणगान गाते-गाते शास्त्रकार और आप्तजन थकते नहीं है।
इन पंक्तियों में यज्ञ के कर्मकांड की वैज्ञानिकता पर प्रकाश नहीं डाला जा रहा है; वरन् यह कहा जा रहा है कि उसकी शक्ति सामर्थ्य, श्रद्धाभावना को बढ़ाती है एवं उस प्रयोग के चमत्कार दिखाती है।
यज्ञाग्नि को परमात्मा का मुख माना गया है, जिसमें जो कुछ डाला जाता है उसे तत्काल ग्रहण कर लिया जाता है। प्रतिमाओं को भोग लगाने में वस्तुएँ जहाँ की तहाँ रखी रहती हैं। यज्ञ की साक्षी में किए गए कार्यों के संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि इसमें देवसाक्षी सम्मिलित हो गई और निर्धारण पत्थर की लकीर हो गया। विवाह में पति-पत्नी अग्नि की परिक्रमा करके विश्वास करते हैं कि जन्म-जन्मांतरों के लिए एकदूसरे के साथ वैसे ही जुड़ गए हैं, जैसे कि वैल्डिंग द्वारा धातुओं को एक साथ जोड़ दिया जाता है।
इसमें भावनाप्रधान है। बच्चों के संस्कार होते हैं। नामकरण, अंन प्राशन, मुँडन, विद्यारंभ आदि में यज्ञ के बिना पूर्णता नहीं आती। यज्ञोपवीत का तो नामकरण ही इस आधार पर हुआ है कि यज्ञाग्नि के इस प्रतीक-प्रसाद को कंधे पर, हृदय पर कलेजे पर, लपेटकर मनुष्य तादात्म्य बनता है और नर-पशु से नर-देव बनने की द्विजत्व की संकल्पपूर्वक अवधारण करता है। वानप्रस्थ प्रभूति संस्कारों में भी यही ध्यान आजीवन रखा जाता है कि लोकमंगल और आत्मकल्याण के लिए जीवन समर्पित करने का जो व्रत लिया गया है, उसे आजीवन निवाहा जायेगा।
मरने के उपरांत शरीर को चिता में समर्पित किया जाता है वह भी अन्त्येष्टि यज्ञ है। उसमें मंत्र बोले जाते है, जिनका अर्थ होता है— हमार प्राण यज्ञ प्रयोजनों में लगा रहे और जिस शरीर से आजीवन प्यार किया है उसे भी यज्ञाग्नि की गोद में समर्पित करते हैं। वह हमारा जीवन-मरण का साथी है।
होली का त्यौहार प्रसिद्ध है। उसका वर्तमान स्वरूप तो कूड़ा, कचरा जला देना जैसा है; पर वस्तुतः वह नवांहयज्ञ है। खेतों में फसल जब तक पक कर तैयार होती है तब स्वयं उसका उपयोग करने के स्थान पर सर्वप्रथम सामूहिक होलिका के रूप में यजन करते हैं। कच्चे अन्न को ही होली कहते हैं। यह उस उक्ति का क्रियान्वयन है कि यज्ञ से बचा हुआ ही खाना चाहिए। इसका सीधा अर्थ होता है कि प्रथम-परमार्थ को प्रश्रय दिया जाए। बाद में पेट भरने की बात सोची जाए। यह मांयता भारतीय देव संस्कृति की मूलभूत भावनाओं का स्मरण कराती है और उसे अपनाने की प्रेरणा देती है।
सभी शुभकर्म यज्ञ के साथ संपंन होते हैं। पितरों की सद्गति के लिए उनका आयोजन किया जाता है। नित्यकर्म में पंचयज्ञ-विधान सम्मिलित है। भले ही उसकी चिह्न पूजा चूल्हे में पाँच छोटे ग्रास होमकर बलिवैश्व के रूप में कर ली जाए; पर उस माध्यम से इस तथ्य का स्मरण किया जाता है कि अपने खाने से पहले पिछलों की अपनी कमाई में साझेदारी स्वीकार की जाए। सत्प्रयोजनों की सहायता करने में यदि अपने ग्रास कम करने पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहा जाए। पेट भरना आवश्यक है। किंतु उससे भी बड़ी बात है, पारमार्थिक भावनाओं को जीवित रखना। इसके लिए प्रतीक रूप में कुछ क्रिया-कृत्य करते रहा जाए ताकि दायित्वों का विस्मरण न होने पाए।
यज्ञ एक दर्शन है। उसके साथ पारमार्थिक भाव-संवेदनाएँ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। हमें प्रतीक पूजन के साथ आदर्शों को भी जीवन चर्या के साथ जोड़कर रखना चाहिए, जो सद्भावना, संयम, उदारता के रूप में आहुतियाँ देते हुए कार्यांवित की जाती हैं। इस आधार पर ही मनुष्य सच्चे अर्थों में गौरवशाली एवं सशक्त बनता है।
यज्ञीय क्रिया-कृत्य में जितनी तकनीक है उससे कहीं अधिक भाव-श्रद्धा का समावेश होता है। प्रयोग में आने वाली हर वस्तु को अभिमंत्रित किया जाता है। हवनकुंड, समिधा, शाकल्य, धृतपात्र यहाँ तक कि विभिन्न कार्यों में काम आने वाले जल तक को अभिमंत्रित किया जाता है। वह पानी नल या कुएँ से उसी प्रकार उपलब्ध नहीं किया जाता, जैसे कि पीने, नहाने, कपड़ा धोने आदि के लिए प्राप्त किया जाता है। किसी पवित्र सरोवर या जलाशय तक पीतवस्त्रधारी महिलाएँ रंगे हुए घट लेकर जाती है और जलाशय पर पूजा उपचार करके उस जल को देवप्रसाद मानकर यज्ञमंडप में लाती हैं। कुंड का गड्ढे की तरह उपयोग नहीं किया जाता; वरन् उसके पंच भू संस्कार करके इस योग्य बनाया जाता है कि यज्ञ के निमित्त स्थापित की गई देव अग्नि को उस पवित्र आसन पर स्थापित किया जा सके।
आहुति देने वालों को स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर सम्मिलित होना आवश्यक है। जब यज्ञमंडप में प्रवेश किया जाता है तब फिऱ एक बार पैर धोने पड़ते हैं। होताओं के लिए व्रत उपवास एवं ब्रह्मचर्य का अनुशासन है। कोई वस्तु या कृत्य जो यज्ञ के संदर्भ में प्रयुक्त होती है, उसे श्रद्धाभावनाओं एवं पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है।
यज्ञप्रक्रिया में कोई भी विधि-विधान ऐसे नहीं है; जिसे उद्देश्यहीन कहा जा सके। पूजा की वेदी पर महादेवता की स्थापना हो जाती है। प्राणप्रतिष्ठा के साथ वे सभी उपचार संपंन किए जाते हैं; जो किसी मान्य अतिथि के आगमन पर किए जाते हैं। यह सारे विधान इस निमित्त हैं कि प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं का श्रद्धासिक्त बनाया जाए और जो होता, यजमान, आचार्य, उद्गाता, अध्वर्यु आदि इस अनुशासन को संभालते हैं उन्हें अपने आपको देवोपम स्थिति में रखना होता है।
यह बाह्य एवं आभ्यांतरिक पवित्रीकरण से जुड़ा श्रद्धा-संयोजन ही यज्ञ का प्राण है। यजन प्रक्रिया किसी गढ्ढे में हवन सामग्री डालकर, जलाकर चिह्नपूजा के रूप में नहीं की जाति, बल्कि उसे हर विधि-विधान द्वारा उस प्रयोजन की पूर्ति की जाति है, जिसके लिए यज्ञ किया गया है। यज्ञ अर्थात संघबद्ध होकर किया गया एक उच्चस्तरीय परमार्थ-प्रयोजन, जो अंतर्जगत् में दिव्यता के समावेश की प्रक्रिया पूरी करता है।
एक घना जंगल था। उसमें कई शूकर परिवार रहते थे। आक्रमणकारी सिंह एक ही था। वह जब चाहता हमला करता और किसी भी मोटे-दुबले शूकर को चटकर जाता। झुंड के अन्य सदस्य घबराकर सिर पर पैर रखकर जिधर-तिधर भागते।
एक दिन बूढे शूकर ने सजातियों के सभी परिवारों को एकत्रित किया और कहा मरना है; तो बहादुरी से क्यों न मरें। रहना है, तो मिल-जुलकर क्यों न रहें ! बात सभी की अच्छी लगी और वे उसके कहने से चलने को सहमत हो गए।
दूसरे दिन तगड़े-तगड़े शूकरों ने एक दल गठित किया और योजना बनी कि आक्रमण की प्रतीक्षा न करके शेर की मांद पर चला जाए और वहाँ उस पर हमला बोल दिया जाए। नई, योजना, नई हिम्मत और नई आशा से तगड़े शूकरों के हौसले बहुत बढ़ गए थे। सो वे बहादुरी के साथ चले और मांद में सीधे शेर पर बिजली की तरह टूट पड़े।
शेर को ऐसी मुसीबत का सामना इससे पहले कभी भी नहीं करना पड़ा था। वह घबड़ा गया और जान बचाकर इतनी तेजी से भागा कि यह देख तक न सका कि हमला करने वाले कौन हैं और कितने हैं? भयाक्रांत शेर ने उस जंगल में भूतों का निवास माना और फिर कभी उधर न लौटने का निश्चय करके दूरस्थ वन में अपना डेरा डाला। शूकरों के परिवार निश्चिंततापूर्वक रहने और वन विहार का आनंद लेने लगे।
उसी क्षेत्र में रहने वाले एक श्रृंगाल ने रात को अपने बच्चों का मनोरंजन करते हुए शूकरों द्वारा सिंह पर किए गए आक्रमण की कथा सुनाई और कहा— "बड़ी ताकत नहीं, सूझ-बूझ है, जिसे अपनाकर शूकरों को श्रेय मिला, जिसके अभाव में सिंह को अपना राज्य अकारण ही छोड़ना पड़ा ।"
“जैसा खाए अंन, वैसा बने मन” की उक्ति शत-प्रतिशत सच है। आहार से रस, रक्त, मांस, अस्थि वीर्य आदि बनते-बनाते अततः वह मस्तिष्क के रूप में विकसित होकर मन-बुद्धि में परिणत हो जाता है।
शरीर विज्ञानी और आहारशास्त्री बहुधा संतुलित भोजन का यश बखानते रहते हैं। उसमें वे प्रोटीन और विटामिन 'ए' का उल्लेख करते हुए मांस, मछली, अंडा आदि की भी सिफारिश करते हैं। हो सकता है कि मांस बढ़ाने के लिए मांस खाना उपयोगी बैठता हो, पर साथ ही उसका चेतनात्मक पक्ष भी है; जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। आहार में सूक्ष्मशक्ति भी होती है। छनते-छनते, छूटते-छूटते, अंत में आहार की कारणशक्ति ही मन की चेतना बन जाती है। पशु विवेक-बुद्धि से रहित होता है। उसके शरीर में मनुष्यों की तरह रोग के कीटाणु भी हो सकते हैं, होते ही हैं। वे तत्त्व भी खाने वाले के शरीर में पहुँचे बिना नहीं रहते। इसके साथ प्राण-हरण करते समय का, अंत: का रुदन भी उस आहार में सम्मिलित हो जाता है और क्रिया की प्रतिक्रिया-कर्म का प्रतिफल सिद्धांत सेवनकर्त्ता के लिए अभिशाप बनकर बरसता है; उसकी प्रकृति में क्रूरता बढ़ती है, जिसके कारण वह अपने परायों के लिए निष्ठुर आक्रामक बनता जाता है।
मदिरा या दूसरे नशों के संबंध में भी यही बात है, अनुपयुक्त पेयों की कमी नहीं। कोका–कोला जैसे पदार्थ में मादक द्रव्यों का अंश रहता है। चाय-काॅफी भी नशा स्तर की उत्तेजना भरे रहती है; जो शरीर में पहुँचकर काय पंजर तक सीमित नहीं रहतीं; वरन्, मन: संस्थान को भी प्रभावित करती है। वे स्वभाव को चिड़चिड़ा और आवेशग्रस्त बना देती है।
आहार का एक अध्यात्म पक्ष यह भी है कि वह न्यायपूर्वक ईमानदारी की कमाई से उपलब्ध किया गया है या नहीं। मुनाफाखोरी कर चोरी-मिलावट कम नापतोल या बिना समुचित परिश्रम किए मुफ्त के माल के रूप में जो कमाया, खाया जाता है, वह भी अखाघा है। रिश्वत, जुआ, चोरी, हरामखोरी से जो कुछ हथियाया गया है वह अन्न रूप में प्रयुक्त हो या वस्त्र-आभूषण आदि के रूप में व्यवहृत हो, अपने साथ जुड़े हुए अशुद्ध संस्कारों के कारण प्रभाव उत्पन्न किए बिना न रहेंगे। उसका प्रभाव शरीर पर रुग्णता, अक्षमता, दुर्बलता के रूप में पड़ सकता है और मानसिक स्वास्थ्य में विकृतियाँ भर सकता है। ऐसे लोग तनावग्रस्त रह सकते हैं, चिंताशील, निराश, उद्विग्न देखे जा सकते हैं। उन्हें दुःस्वप्न अक्सर सताते रह सकते हैं।
कुधान्य दुर्बुद्धि उत्पंन करता है। उसे आत्मसात करने वाला जो सोचता है, उसमें सदाशयता की मात्रा कम होती है और मायाचार की अधिक। ऐसे लोगों का वास्ता कुमार्गगामियों से अधिक पड़ता है। वे ही उनके घनिष्ठ बनते हैं और ऐसे मार्ग पर घसीट ले जाते हैं, जिनमें छल, प्रपंच और अनाचार-अपराध के जाल-जंजाल बिछे होते हैं। हेय कमाई प्रायः व्यभिचार, नशेबाजी एवं रोगोपचार में खर्च होती रहती है। कई बार वह मित्रों द्वारा ठग ली जाती है। या गुंडों द्वारा दबाव देकर उगलवा ली जाती है।
यदि कुधान्य किसी दूसरे द्वारा आतिथ्य उपहार में दिया गया है, तो भी उसका प्रभाव पड़े बिना न रहेगा। स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि से आहार के हर पक्ष पर ध्यान रखा जाना चाहिए, अन्यथा अशुद्धता रोगकारक हो सकती है। अध्यात्म पक्ष में यह स्वच्छता पकाने-परोसने वाले की चारित्रिक स्थिति तक पहुँचती है। यदि कोई स्वार्थ-साधनों के लिए उपहार दिया गया अथवा भोजन कराया गया है तो नीयत के अनुरूप उसका प्रभाव पड़ेगा।
आहारशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र यहाँ दोनों एक मत है कि ताजा, स्वच्छ, बिना तला-भुना सरल भोजन किया जाए और उसे भूख से कम खाया जाए। अधिक प्रगति के लिए की जाने वाली सभी साधनाओं को सर्वोपरि यह सोपान है।
भविष्योत्तर पुराण में घोर कलियुग के पिछले दौर का ऐसा वर्णन किया गया है, जिसमें परिस्थितियाँ अनेक दृष्टीयों से प्रतिकुलाना भारी कष्टदायक और पतन-पराभव से युक्त होंगी। मनुष्य पहले मानसिक दृष्टि से दुर्बल, रुग्ण और अपंग-असमर्थ जैसा होगा। उसके साथ ही उसके चिंतन का स्तर भी अधोगामी होगा। खींच-निराशा से उद्विग्न रहेगा और पुरुषार्थ की दिशा धारा छल प्रपंच, पाखंड, अनाचार जैसी दुष्प्रवृत्तियों में निरत रहने की रहेगी। नीति-मर्यादाओं को वह तोड़ चुका होगा और वर्जनाओं का ध्यान न करते हुए ऐसे कुकृत्यों में संलग्न रहेगा जिनके दुष्परिणाम उसे हाथों-हाथ भोगने पड़े। यह विपन्नता दूरदर्शिता का अभाव हो जाने के कारण होगी, मनुष्य बाहर से बौना, मानसिक दृष्टि से छोटा और व्यवहार में खिलौनामात्र बनकर रह जाएगा आदि-आदि।
इसके अतिरिक्त भी ऐसी अनेक भविष्यवाणियों का उल्लेख है, जिनमें व्यक्ति और समाज के अधःपतन का डरावना रूप प्रस्तुत किया गया है।
संप्रति संसार की वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा कुछ लगता नहीं। सब ओर प्रगति का माहौल है। सबमें ऊँचा उठने, आगे बढ़ने की योजनाएँ बन और कार्यांवित हो रही है। इसका लाभ कितने ही क्षेत्रों में प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर भी हो रहा है। शिक्षा बढ़ रही है। उपार्जन की क्षमता में भी क्रमश: बढ़ोतरी ही हुई है। विज्ञान ने जहाँ विनाशकारी साधनों में अपना कौशल नियोजित किया है, वहाँ उसने सुविधा-साधनों के अंबार खड़े करने में भी कमी नहीं रहने दी। साज-सज्जा के ऐसे उपाय-उपचार विनिर्मित हुए हैं, जिनका उपयोग करने पर मनुष्य अधिक सुंदर और आकर्षक दिख पड़ता है। मनोरंजन के पुराने साधन तो नहीं रहे; पर उनके स्थान पर नए सरंजाम जुट गए हैं । सिनेमा का विस्तार-क्षेत्र समाचारपत्रों की संयुक्तशक्ति से कहीं आगे हैं। जितने लोग पत्र-पत्रिकाएँ पकाते हैं, उससे कहीं अधिक वे सिनेमा देखते है। बड़े-बड़े लोगों के लिए ऊँचे स्तर का विनोद करने के लिए क्लबों की भरमार है। घटिया लोग अश्लील कामुकता के चित्र-विचित्र स्वरूपों का रसास्वादन करते हैं। ब्लू फिल्मों व साहित्य का आश्रय लेते हैं।
यह तथाकथित प्रगति गाथा उसकी अपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष है, जैसी भविष्योत्तर पुराण में भयावह संभावनाओं को चित्रण करते हुए बताई गई है। प्रश्न उठता है कि इन परस्पर विरोधी प्रतिपादनों में से अधिक विश्वस्त किसे माना जाए? खासतौर से तब जब कि मस्तिष्क की जटिलताएँ सुलझाने के लिए कंप्यूटर बाजार में आ रहे हैं। श्रमशक्ति बचाने के लिए पुराने ढर्रे को स्वचालित मशीनों से दस कदम आगे बढ़कर ऐसे यंत्रमानवों का निर्माण हो रहा है, जो कठिन कार्यों को भी सरलतापूर्वक करके रख देते हैं। न उन्हें खाने की सोने की, आवश्यकता है और न वेतन वृद्धि संबंधी कोई माँग। स्वास्थ्य सुविधाओं तथा अस्पतालों का विकास विस्तार हो रहा है। इससे रोगों से निपटने और दुर्बल अंगों को हटाकर उनके स्थान पर नयों का प्रत्यारोपण भी अब एक सामान्य बात हो गई है। ऐसी दशा में कैसे माना जाए कि अगले दिनों मानवी भविष्य तमस् से घिरा हुआ है। पतन की घड़ी निकट आ रही है।
यहाँ एक ऐसा कारण भी है ;जो दृश्यमान प्रगति को खोखला एवं छलावे स्तर का बताता है। संकेत उन छोटी समझी जाने वाली विकृतियों की ओर है, जो आकार में लघु होते हुए भी प्रहार क्षमता में किसी दैत्य-दाव से कम नहीं। वे चुपके-चुपके प्रवेश करती है, जड़े जमाती और तब हटती है, जब पूरी तरह सर्वनाश कर देती है। मजबूत शहतीरों में घुन लग जाते है तो बाहर से न दिख पड़ने पर भी भीतर ही भीतर कतरव्यौंत करते रहते हैं, जिससे उसकी सुदृढ़ता धूलि में मिल जाए और पता तब चले जब बह बाहर से सही दिखते रहने पर भी खोखलेपन के दबाव से धराशाई हो चले। तपेदिक स्तर के विषाणु एवं कैंसर के जीवकोश भी ऐसे खतरनाक होते हैं। वे खुली आँखों से दिख नहीं पड़ते; पर भीतर ही भीतर अपनी वंशवृद्धि करते रहते हैं, जीवनीशक्ति को चाटते रहते हैं और अकालमृत्यु के लिए अपने शिकार को विवश कर देते हैं।
भविष्यपुराण के अविश्वस्त लगने वाले कथन के अगले ही दिनों फलित होने वाले कारणों में से कुछ ऐसे हैं जो बताते है कि तथाकथित प्रगति की तुलना में अवगति की दौड़ कहीं अधिक है और वह अब, तब में बाजी मारने ही जा रही है।
ऐसे अनेक कारणों में प्रगति का एक सशक्त प्रतिरोधी है। युवापीढ़ी के भविष्य को अंधकारमय बना देने वाला नशा जो दिन-दूनी, रात-चौगुनी गति से समझदारों से लेकर ना समझो तक को अपने चंगुल में फँसाता जा रहा है। उसके दुष्परिणाम तत्काल तो सामने नहीं आते; पर कुछ ही दिनों में ऐसी भयावह परिणति प्रस्तुत करने लगते हैं, जिनकी पकड़ मजबूत हो जाने पर प्राण बचाने का कोई उपाय शेष नहीं रह जाता। इस कुटेव को पहले मनुष्य अपनाता है, पीछे वह स्वयं अपने मेजबान को इतनी मजबूती से पकड़ती है कि उस चंगुल से छूट पड़ना कठिन जान पड़ता है। असंभव जैसा हो जाता है।
इनके अतिरिक्त अधिक अदृश्य एवं अधिक अविज्ञात स्थिति एक और है। वह है संतान का स्वास्थ्य, बुद्धिबल और सत्साहस का बुरी तरह गिर जाना। नशेबाजों और बिना नशा पीने वालों की संतानों का दीर्घकालीन सतर्कतापूर्वक सर्वेक्षण किया गया, तो प्रतीत हुआ कि नशेबाज वर्ग द्वारा उत्पादित संतति में शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अनेक दोष-दुर्गुण पाए गए। समयानुसार बढ़ते रहने पर वे उन्हें किशोरावस्था से लेकर तरुणाई की परिधि में प्रवेश करते-करते बुरी तरह अपने को शिकंजे में कस लेते हैं। इनके चिंतन पर अनाचार ही छाया रहता है। इस कारण उनसे मानवी गरिमा के अनुरूप कुछ किए जाने की आशा नहीं की जा सकती।
बीज का जैसा स्तर होता है वैसी ही पौध उत्पन्न होती है। सड़े-घुने बीज से अंकुर निकलते हैं वे गए गुजरे ही होते हैं। नस्ल बिगड़ने का यही कारण है और सुधारने के लिए बीज में सुधार करना भी। नशेबाजों की पीढ़ियों की पीढ़ियाँ किस प्रकार मिटती चली जाती हैं इसका प्रयोग छोटे जानवरों को नशे की आदत डालकर देखा गया। उनकी हर पीढ़ी छोटी, रुग्ण, अशक्त और अल्पजीवी होती चली गई थी। उसमें समझदारी भी कम थी। यही हाल उन मनुष्यों के वंशजों का भी होता है, जो नशा पीकर अपने शरीर का ही नहीं, प्रजनन क्षेत्र को भी विषाक्त कर लेते हैं और यह क्रम चलते रहने पर उत्तरोत्तर पीढ़ियों का क्रम इतना गिरता जाता है, जिससे न उनका व्यक्तिगत जीवन सही रह पाता है और सामाजिक स्तर। पतन बढ़ता रहे तो नाव की तली में होने वाले छेद की तरह उसे पूरी तरह डुबोकर ही रहता है। इस आधार पर भविष्योत्तर पुराण में अगले दिनों के संबंध में आशंकाएँ व्यक्त की गई हैं, उनमें बहुत कुछ सार एवं तथ्य प्रतीत होता है।
रामकृष्ण परमहंस के गले में कैंसर हो गया और वे उसका भारी कष्ट सहते हुए मरणासन्न स्थिति में जा पहुँचे
उनके एक भक्त ने कहा— आप भवानी से प्रार्थना क्यों नहीं करते,जिससे वे आपका कष्ट दूर कर दें। उत्तर में उन्होंने कहा कि एक तो मैंने जीवन भर देना ही देना जाना है। माता को भी समर्पण किया। माँगने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं हुई। अब चलते-चलते दानियों में से नाम कटाकर याचकों में गणना क्यों कराऊँ? आत्मसम्मान क्यों गंवाऊँ।
इसके अतिरिक्त दूसरी बात यह है कि दुखियों को अपना पुण्यफल देकर उनके कष्ट घटाता रहा, जितना पुण्य जमा था उससे अधिक खर्च कर डाला। उस घाटे की भरपाई के लिए याचकों वाला कष्टभार मुझे ही सहना होगा। विधि-विधान मूल्य पाकर ही किसी को कुछ देता है।
भले ही किसी की जेब से उसे चुकाया जाए। कैंसर कष्ट सहकर उसी असंतुलन की भरपाई कर रहा हूँ। जो पीड़ितों को कष्टमुक्त करने के लिए पेशगी खर्च किया था।
पारसमणि की कल्पना अतिपुरातन है। मांयता के अनुसार उस पाषाण खंड को छूने से लोहा सोना बन जाता है। ऐसा कोई पदार्थ अभी तक दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि ऐसा कुछ कहीं रहा होता तो उसके स्पर्श का क्रम चल पड़ता और प्रकारांतर से संसार भर का लोहा सोना बन गया होता। तब सोने से अधिक उपयोगी धातु लोहे का मूल्य उतना हो गया जितना कि अब सोने का है और लोहा इस भाव बिकता, जितना इन दिनों सोना।
यह अलंकारमात्र है। कल्पना तब उठी होगी जब रात्रि का काला अंधकार लोहे जैसा समझा गया होगा और प्रातःकाल का उदीयमान सूर्य अपनी प्रथम आभा स्वर्ण के रूप में बिखेर रहा होगा। काले अंधकार और सुनहरे का पारस्परिक मिलन पारस की उपमा सार्थक कर संभवत ऊषाकाल के इस स्वर्णिम सूर्य की अलंकारिक विवेचनाकर ऋषिगणों ने पारस के वर्णन द्वारा उसके माहात्म्य को प्रतिपादित किया होगा।
यह मात्र दृश्य-प्रयोजन ही नहीं, वरन अवसर भी वैसा ही मूल्यवान, महत्त्वपूर्ण है। दिन-रात मिलाकर चौबीस घंटे होते है; पर उनमें इतना प्रभावोत्पादक समय और कोई नहीं होता, जितना प्रभातकाल का। उसमें कुछ ही घंटे का समय होता है, सायंकाल संध्या समय का। रात्रि बढ़ती आती है और अस्त होता सूर्य श्वेत से स्वर्णिम बनता जाता है। इस असाधारण परिवर्तनकाल का समूची प्रकृति पर प्रभाव पड़ता है। भौतिक दृष्टि से भी और आध्यात्मिक दृष्टि से भी ।
इस संकेतकाल का उद्बोधन-स्पंदन सभी पदार्थ और प्राणी अनुभव करते है। पदार्थों के तापमान और गुणधर्म में अंतर पड़ता है। चेतना में उल्लास और अवसाद बढ़ता है। प्रातःकाल सभी प्रफुल्लित, पुलकित दिखते हैं और सायंकाल को रात्रि के आगमन के साथ ही निद्रा का दबाव बढ़ने लगता है। अपराधों की, अपराधियों की संख्या बढ़ जाती है, किंतु प्रभातकाल हर किसी को सात्विकता-सक्रियता अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह सूर्य का अनुदान है। ब्रह्ममुहूर्त में साधना करने का निर्देश ऋषिगणों ने इस अनुदान का भरपूर सदुपयोग करने हेतु ही किया है। सविता देवता के माहात्म्य पर आर्षग्रंथों में प्रचूर संख्या में उदाहरण मिलते हैं।
“य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृष्यते “
- महर्षि व्यास
-अर्थात् - “इस स्वर्णिम सूर्य के अंतराल में परम पुरुष के दर्शन होते हैं।”
”य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्यमयः-......... हिरण्यश्म. . . हिरण्यकेश:” ...............
-छान्दोग्य(1/6/6)
-अर्थात्-”यह आदितय सवर्णमय है। सुनहरे ही उसके रोम और केश हैं।”
स्वर्णिम होने के साथ-साथ सूर्य निरंतर गतिशील भी है। उसे किसी के आश्रय की, सहयोग की आवश्यकता नहीं। इसलिए उसका रथ एक चक्र वाला माना गया है। उसे सुदर्शनचक्र अथवा कालचक्र भी कह सकते हैं।
इस रथ में सात घोड़े जुते हुए है और सप्तक स्वर विज्ञान से लेकर कालगणना की आधारभूत इकाई सप्ताह वारों के रूप में निर्धारित हुआ है। पुष्टि आप्तवचनों से होती है—
“सप्ताश्वरथिनं हिरण्यवर्णं।”
- सूर्योपनिषद्
“ जिसके रथ में सात घोड़े जुते हुए है, जो सुवर्ण वर्ण है, यही सूर्य का ध्यान करने योग्य सामान्य स्वरूप है।”
“सप्ताश्वं चैव चक्रं”
- सूर्य पुराण
-अर्थात्- “सूर्य के रथ में एक पहिया है। सात घोड़े जुते हुए है।”
सप्तद्वीप, सप्तसागर, सप्तवर्ण, सप्तपर्वत, सप्तसरिता, सप्तधातु, सप्तलोक, सप्तचक्र, सप्तअग्नि, सप्तऋषि, सप्तदिवस, सप्तस्वर आदि अनेक प्रकार से उपमा देते है। सूर्य के सप्तअश्वों की अलंकारिक विवेचना की गई है।
विज्ञान क्षेत्र में सात प्रकार की विकिरण - ऊर्जाएँ ब्रह्मांड में सक्रिय हैं। (1) कास्मिक ऊर्जा (2) पराबैंगनी विकिरण ऊर्जा (3) दृश्य-प्रकाश विकिरण-ऊर्जा (4) अवरक्त-विकिरण-ऊर्जा (5) रेडियो-विकिरण ऊर्जा (6) एक्स विकिरण ऊर्जा औऱ (7) गामा-विकिरण ऊर्जा।
सूर्य के सप्तअश्वों से प्रार्थना करते हुए साधक आत्मविजय एवं ऊर्जा सुनियोजन की अपेक्षा रखता है।
“जयोजयश्च विजितो जयः प्राणोजित श्रमः।
मनोजवोजित क्रोधो वाजिन: सप्तकीर्तताः। “
-आदित्य ह्रदय
-अर्थात्- “जहाँ जय की आवश्यकता है। वहाँ जय मिलती है। विजेता को भी जीता जा सकता है। प्राण,थकन,मन और क्रोध को जीता जा सकता है। आपके सप्तअश्व क्या नहीं कर सकते?
मनीषी कहते है— कि सूर्य की सात रंग की सात किरणें जब मनुष्य के व्यक्तित्व में समाहित होती है, वे कुछ विभूति विशिष्टताओं के रूप में परिलक्षित होती हैं। ये हैं— (1) साहस (2) पराक्रम (3) संयम (4) संतुलन (5) एकाग्रता (6) प्रफुल्लता एवं (7) उत्साह। यही है वेविशेषताएँ जिनके आधार पर साधारण सामान्य स्तर का मनुष्य भी प्रतिभावान एवं सफल संपन्न बनता है। इन गुणों का अभाव या न्यूनता ही मनुष्यों को पिछड़ेपन से ग्रस्त रखती है।
विभिन्न प्रयोजनों के लिए सूर्यशक्ति के अनेकानेक उपयोग हैं। कुंडलिनी जागरण में प्रधान भूमिका सूर्यशक्ति की ही है। उसी के आधार पर षट्चक्र, पंचकोश, मूलाधार गह्वर,सहस्रार कमल, इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना का त्रिवर्ग ही प्रसुप्त स्थिति छोड़कर उत्तेजित होता है और साधक को प्रचंड दिव्य क्षमता से संपन्न करता है।
इन सात चक्रों को सप्तप्राण केंद्र कहा गया है। इन्हीं को सात ऋषि, सात यज्ञ, सात समिधा, सात लोक आदि कहा गया है। ये सभी सात-सात अंतर्गुहा में निहित है। इस रहस्य को मुंडकोपनिषद् में इस प्रकार प्रकट किया गया है।
“सप्तप्राणः प्रमवन्ति तस्मात्,
सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा,
गुहाशया निहिताः सप्त सप्त“॥ 8॥
- मुण्डक 2।1।8
अर्थात्— “सात चक्रों में समस्त तीर्थ प्रतिनिधि के रूप में विद्यमान हैं। इनका अवगाहन करने से समस्त तीर्थों का पुण्यफल साधक को प्राप्त होता है।“
विज्ञान के विद्यार्थी प्रकृतिशक्ति की सात धाराओं से परिचित हैं। उन्हें (1) गति (2) ध्वनि (3) उष्मा (4) प्रकाश (5) कोहेजन (6) विद्युत (7) चुम्बक कहते है। इन सातों का प्रतिनिधित्व मानवी काया में अवस्थित सात चक्र करते है।
चेतनाशक्ति के भी सात विभाग है (1) पराशक्ति (2) ज्ञानशक्ति (3) इच्छाशक्ति (4) क्रियाशक्ति (5) कुंडलिनीशक्ति (6) मातृकाशक्ति (7) गुप्तशक्ति। इन सबके संयुक्त स्वरूप को “लाइट ऑफ लोगोस” कहते है। इसी को लेटेंट लाइट, एस्ट्रल लाइट आदि नामों से पुकारते है। यही ब्राह्मीचेतना का दिव्य-प्रकाश है, जो सविता की किरणों के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
सविता एवं कुंडलिनी का परस्पर सघन संबंध है।
“यदा कुंडलिनी शक्तिरार्विमति साधके।
तदास पंचकोशे मत्तेजेनुभवति ध्रुवम्“ ।।
- सूर्य गीता
अर्थात्— जब कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है तो साधक को पाँचों कोशों में प्रकाश भरा गया अनुभव होता है। पाँचों कोश, छहों चक्र, तीन ग्रन्थियाँ, चौबीस उपत्यिकायें साधक को प्रकाशवान हुए परिलक्षित होने लगते है।
“भुवन ज्ञानं सूर्य सयमात्“
— योग दर्शन
अर्थात्— “सूर्य की ध्यान-साधना करने से विश्व-ब्रह्मांड का रहस्यमयज्ञान प्राप्त होता है। यही कुंडलिनी सिद्धि है। “
सूर्यग्रहण के समय उस मंडल की विचित्र स्थिति होती है। दिन में रात्रि का बोध होता है। इसका प्रभाव तो भौतिक-जगत पर भी पड़ता है; पर आध्यात्मिक-साधनाओं पर उसका चमत्कारी प्रतिफल दृष्टिगोचर होता है। इसलिए आगम और निगम दोनों ही संप्रदायों के लोग सूर्यग्रहण के अवसर पर बिना कुछ विशेष कोई साधना किए चूकते नहीं।
“सूर्य ग्रहण कालेन समोन्योनासि कश्चन।
तत्र यत् तत् कृतं सर्वमनन्तफलं भवेत्“।
—अगस्त्य संहिता
अर्थात्— “सूर्यग्रहणकाल अंय सामांय समयों की भाँति नहीं है। उस समय जो कुछ भी किया जाए उसका अनंतगुना फल होता है।“
अग्निहोत्र भी प्रकारांतर से सूर्यआराधना ही है। दिव्यअग्नि का सूर्य के साथ महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान संभव होता है। याज्ञिक उस दिव्य विद्या द्वारा पूर्ण शक्ति का आवश्यक भाग अपनी ओर आकर्षित करते है। साथ ही सूर्य अनुदानों में उन तत्त्वों की अभिवृद्धि करते हैं, जो प्राणियों,वनस्पतियों एवं ऋतु-चक्र वातावरण को अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक है।
“ एतस्मिन् मण्डले सोऽग्नि।
अर्थात्— “जो इस सूर्य मंडल में है वही तत्त्व यज्ञाग्नि, रूप में प्रकट होता है।
यच्चाग्नो ततेजो विद्वि मामकम् “
— गीता
अर्थात्— “जो याग्नि की ज्वलनशीलता है वह मेरी ही है। “
“यत्र-यत्र च संकीर्णमात्मनं मन्यते सुधीः
तत्र तत्र तिलै होमो गायन्न्या अग्निहोत्र वै। “
अर्थात्— “जहाँ साधक को अनुष्ठान का निश्चित विधि-विधान विदित न हो, वहाँ तिल का गायत्री मंत्र से हवन करके काम चलाना चाहिए।
अग्निहोत्र में विभिन्न जड़ी-बूटियों और शाकल्यों का उपयोग किया जाता है; पर यदि वे उपलब्ध न हों तो सविता या सावित्री का यजन मात्र तिलों से भी हो सकता है।
सूर्य भौतिक ऊर्जा का अक्षयभंडार है। पृथ्वी की आवश्यकताओं से कहीं अधिक क्षमता उसके आकार के विस्तार में विद्यमान है। अब तक अभावों की आवश्यकता खनिजों से, विभिन्न प्रकार के ईंधनों से पूरी की जाती रही है; पर अब जब कि स्रोत सूखते जा रहे हैं, सूर्य से ही उन आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ेगी।
अमेरिका की 'टाइम्स' पत्रिका के अनुसार इन दिनों अमेरिका में 40 लाख घरों में सूर्यशक्ति से प्रकाश लेने, मकान गर्म रखने, भोजन पकाने जैसे कार्य किए जा रहे है। इज्राइल में उसकी आबादी का पँचमांश अर्थात् 2,20,000 व्यक्ति सूर्य से विभिन्न कार्यों के लिए ऊर्जा और प्रकाश प्राप्त करते हैं। जापान में 20 लाख घरों में यह सुविधा उपलब्ध है। फ्रांस, जर्मनी आदि, अनेक देश इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 3 मई 1978 में विश्व भर में सूर्य दिवस मनाया गया था और उपाय सोचा गया था कि सूर्य-ऊर्जा का अधिक प्रयोग किस प्रकार किया जाना संभव हो सकता है। यह सौर-ऊर्जा का दृश्यमान प्रत्यक्ष उपभोग है।
पुरातन सूर्योपासना के स्थान पर अर्वाचीनकाल में शिव प्रतीक को अपना लिया गया था। ज्योतिर्लिंग का पुरातन स्वरूप सूर्यमंडल था। अब उसी आकृति को शिवलिंग के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा है। इस प्रकार परिवर्तित रूप से सूर्योपासना अभी प्राचीनकाल की तरह ही प्रचलित है।
इसकी साक्षी आर्षग्रंथ देते है :—
“आदित्यं च शिवं विद्यात् शिव आदित्य रुपिणम्।
उभयोंरंतरंनास्ति आदित्यस्य च शिवस्य च। “
—शिव पुराण
अर्थात्— “शिव और आदित्य को एक ही समझना चाहिए।इन दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है।”
शिव के साथ अनेक कथानक जुड़ गए है। उनमें कुछ बुद्धि संगति भी है और कुछ नहीं भी। किंतु सूर्य के संबंध में ऐसी कथा गाथाएँ नहीं जुड़ी है, जिससे उनके शिवत्त्व पर किसी प्रकार की उँगली उठती हो।
भौतिक दृश्यमान सूर्य को सवितादेव का, शिवसत्ता का कलेवर माना गया है। वस्तुतः उस कलेवर के अंतर्गत विद्यमान चेतनाभंडार को ही उपास्य माना गया है। जीवन उसी से हर किसी को उपलब्ध होता है। जीवन में उत्कृष्ट वरिष्ठता भर देने का कार्य भी उसी की उपासना द्वारा संपन्न होता है। हर साधक को इसका अवलंबन लेकर अपना जीवन धन्य बनाना चाहिए।
आस्तिकजनों की प्राचीनतम उपासना का पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि भगवान के दृश्य प्रतीकों में सर्वप्रथम मान्यता सूर्य को प्राप्त हुई। वह प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान भी है। अंयान्य देवताओं के नामरूप कल्पित हैं। जिस आकार-प्रकार में उनका वर्णन हुआ है, वैसा कहीं प्रत्यक्ष दृश्यमान नहीं होता। प्रतिमाएँ उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर कल्पित एवं विनिर्मित की गई हैं। यही कारण है कि अंयान्य देवताओं के मुखमंडल, वाहन, आयुध, परिधान, आच्छादन आदि में अंतर मिलता है। किंतु सूर्य के प्रत्यक्ष उदीयमान रहने के कारण उसका आकार सुस्थिर रखा गया है। पुरातनकाल से लेकर अद्यावधि सूर्य प्रतीकों में कोई अंतर नहीं पड़ा हैं।
सूर्य को चतुर्भुजी माना गया है। यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का प्रतीक है। चार वर्ण और चार आश्रम भी इन्हें कहा जा सकता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश और गणेश यह चार देव भी सूर्य की चार भुजाओं में समाहित हैं।
एक चक्र का रथ प्रकारांतर से सुदर्शनचक्र है। इसे विश्वव्यापी गतिशीलता कह सकते है। ऊर्जा का शक्तिस्रोत भी यही है। भगवान का प्रधान आघु सुदर्शनचक्र है। विश्व-ब्रह्मांड, सौरमंडल, परमाणु-परिभ्रमण का चक्र इसी आधार पर गतिशील है। भ्रमण से शक्ति उत्पन्न होने का सिद्धांत पदार्थ विज्ञानियों को भी मान्य है। उत्पादन, अभिवर्धन, परिवर्तन का एक सुनियोजित चक्र है, जिसके अनुसार प्राणियों, वनस्पतियों एवं पदार्थों का उत्पादन-विसर्जन होता रहता है। अस्त्रों में वे ही अधिक शक्तिशाली होते हैं, जिनके पीछे भ्रमणगति काम करती है। जिन दिनों रण-क्षेत्र पर हाथियों का प्रभुत्व था, उन दिनों उसकी सूंड से लोहे की जंजीर बाँध दी जाती थी। वह उसे घुमाता था और सामने उपस्थित शत्रु-समुदाय को तितर-बितर कर देता था। सौरमंडल और अंयान्य ग्रह-नक्षत्रों में यह गतिशीलता ही गुरुत्वाकर्षण से लेकर अनेकानेक प्रकार की क्षमताएँ उत्पन्न करती है, फलतः प्रकृति के अनेकानेक प्रकट-अप्रकट क्रियाकलाप गतिशील रहते है। भ्रमणशीलता के अद्भुत प्रवाह में यह ब्रह्मांड सतत् नियत निर्धारित गति से चल रहा है और अधर में लटका हुआ है।
सूर्य को सचेतन माना गया है— 'सविता'। उसका रथ कलेवर ही वह है, जो अंयान्य ग्रहों की भाँति गतिशील रहता है चमकता है, उदय-अस्त होता है, जिसे अग्निपिंड भी कहते हैं। यह कलेवर ही अरुण है, जो ऊषाकाल के उपरांत स्वर्णिम आभा के साथ उदय होता है।
सूर्यरथ में सातअश्व जुते हुए है। यह दिव्य अश्व हैं। इन्हें सप्तवर्ण भी कह सकते हैं। जिन्हें इंद्रधनुष दिखाई पड़ने पर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। अनादिकाल में जब आदिम मनुष्य को दिनभर समूचे आकाश में एक सूर्य ही प्रकाशवान दिखा तो उसे विदित हुआ कि रात्रि के सघन अंधकार को यही भगाता है। दिख पड़ने वाली वस्तुओं को यह रूप देता है, शीत को भगाता है, वर्षा लाता है। उसकी गर्मी से अंडों से लेकर फल तक पकते है। उसकी अनुकूलता से ही बसंत आता है और धऱती पर हरीतिमा छाती है। जिस समय चारों ओर अंधकार और शीत का साम्राज्य होता है, उन दिनों विकास की हर दिशा-अवरुद्ध हो जाती है। इस प्रकार के अनेकानेक गुण तों प्रत्यक्ष ही हैं। जीवितों की भाँति वह चलता भी हैं। प्रातः उगना और रात्रि में अस्त होना मनुष्यों की तरह जब आदिमकाल से जब मनुष्य को दिख पड़ा, इसलिए उसे प्रत्यक्षदेव माना गया। प्रकृति की चित्र-विचित्र घटनाएँ जब सामान्य बुद्धि से न समझी जा सकीं तो उन्हें देवकृत ही माना जाने लगा और यहाँ तक समझा जाने लगा कि मनुष्य के जीवन में जो शुभ-अशुभ घटित होता है, उसके पीछे दैवी-अनुग्रह या आक्रोश ही निमित्त कारण है। बहुदैववाद की कल्पना पीछे जगी। विभिन्न प्रयोजनों के साथ विभिन्न देवताओं का संबंध पीछे जुड़ा; पर पहले एक से ही काम चलता रहा। सूर्य को ही एकमात्र सर्वशक्तिमान प्रत्यक्षदेव माना गया। जब बहुदैव मान्यता भी विकसित हुई तो भी सूर्य को देवाधिदेव सब प्राणियों और देवताओं की आत्मा उसे माना गया।
ऋग्वेद संसार में सबसे प्राचीन ग्रंथ है। उसमें आठ सूक्त सिर्फ सूर्य की प्रार्थना और विवेचना के संबंध में ही है। देव मांयताओं के साथ यह तथ्य भी जुड़ा कि उनकी पूजा, प्रार्थना से अपने अंदर दैवी गुण को समाविष्ट कर उन्हें अपने अनुकूल बनाया जा सकता है और अभिष्ट वरदान पाया जा सकता है। प्रत्यक्ष जीवन में उस की अनेकानेक उपलब्धियों के साथ जब यह विश्वास बढ़ा कि उसकी पूजा से मनोकामनाएँ पूरी होती है, कठिनाइयाँ विपत्तियां दूर होती हैं, तो उसके साथ भक्ति-भावना का संबंध और भी सघन हो गया।
संसार में सूर्योपासना का प्रचलन सर्वोपरि है। सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख भी। जब वाणी द्वारा प्रार्थना, अभ्यर्थना करके ही उपासना का काम चलाया जाता था, तब गायत्री महामंत्र के शब्द समुच्चय को सूर्योपासना का प्रधान मंत्र माना गया। प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य स्वर्णिम होता है। जिस प्रकार नवागंतुक के आगमन के समय ही स्वागत सत्कार की परंपरा है, उसी प्रयोग को सूर्योपासना के लिए भी प्रयुक्त किया गया।
जब तक वाणी का विकास-परिष्कार नहीं हुआ था, जब तक संकेतों द्वारा अपना उपासना अभिप्राय: व्यक्त किया जाता था। यथा-सूर्यार्घ्यदान, सूर्योपस्थान, सूर्यनमस्कार, सूर्यस्नान, सूर्यसांनिध्य, सूर्य सेवन, सूर्यदर्शन, सूर्य-परिक्रमा आदि-आदि। यह सभी क्रिया-कृत्य ऐसे थे, जो जलाशय की समीपता में आसानी से हो सकते हैं। यहाँ तक कि सूर्य प्रभावित जल को सौम या अमृत की संज्ञा दी जाने लगी। उसका पान करके रोग-निवारण या दीर्घायुष्य की कामना की जाने लगी सूर्योदयकाल को पवित्र समय मानकर उपासना हेतु निर्धारित किया गया।
भूत-प्रेत, राक्षस, यक्ष आदि का भय आरंभिक युग में चल पड़ा था। समझा जाता था कि ये दुष्ट आत्माएँ रोग, भय, मनोविकार आदि के रूप में मानवमात्र को संत्रस्त करती हैं। उनका दौर सूर्य की अनुपस्थिति में ही चलता है। अस्तु उन्हें निशाचर वर्ग में गिना गया। मनुष्य में जो भी अपराधी-आततायी थे, उनके बारे में भी यही मान्यता रही कि इनकी घात अँधेरे में ही लगती है, इसलिए रात्रि में भी अंधकार को दूर करने के लिए दीपक या अग्निप्रज्ज्वलन का प्रचलन चला। पूजा उपचारों में भी इन प्रकाश प्रतीकों का प्रयोग होने लगा।
अखंड अग्नि ज्योति की स्थापना अखंड दीपकों का प्रज्ज्वलन, होम, यज्ञ, अग्निहोत्र की विद्या सूर्यपूजा के रूप में अपनाई गई। इन्हें अभिमंत्रित करने के लिए सावित्री मंत्र को परमशक्तिशाली माना गया। जब भाषा का प्राज्जल विकास हो चला तो गायत्री मंत्र का प्रयोग सूर्यउपासना के रूप में होने लगा। इससे पूर्व ‘ॐ शं सूर्याय नमः’ इतना कहकर ही काम चलाया जाता था। शं— सूर्य का बीज मंत्र है। इसे पूर्व गायत्री का छोटा रूप माना गया। ए और भी छोटा रूप गायत्री का है—’ हरि ॐ तत् सत्’ एक तीसरा प्रयोग है, मात्र तीन व्याह़तियों का उच्चारण “ॐ भूर्भुवः स्वः” इन लघु स्वरूपों का आश्रय इसलिए लेना पड़ा कि 24 अक्षरों और तीन पदों वाली गायत्री का उच्चारण करने के लिए भाषा संबंधी इसलिए जानकारी आवश्यक थी। साथ में व्याकरन के पद प्रत्ययों की भी इतना जान-पाना और स्मरन रखना उन दिनों सर्वसाधरण के लिए संभव न था। विद्वान लोग ही गायत्री मंत्र का उच्चारण-अवगाहन कर पाते थे। अशिक्षितों को संक्षिप्त शब्दावली से ही काम चलाना पड़ता है।
सूर्य-साधना के संबंध में शास्त्रकार लिखते हैं —
"स्मरतां संध्ययोनृणं हरन्तं हो दिने दिने"
— भागवत्
अर्थात्— "दोनों संध्याओं के समय सूर्य का ध्यान करने से मनुष्य दिन-दिन पवित्र बनता जाता है।"
"संध्ययो अर्चयेत् सूर्य।"
— सूर्यपुराण
अर्थात्— "दोनों उदय-अस्त की संध्याओं में सूर्य की उपासना करें। अंय प्रकार की उपासनाएँ न बन पड़ें तो कम से कम इतना तो प्रत्येक साधक को करना ही चाहिए।"
"प्रातर्भजामि सविता रमनन्त शक्तिं
पापैश्च शत्रु भय रोग हरं परं च "
अर्थात्— "अनंत शक्ति वाले सविता का प्रातःकाल स्मरण करना चाहिए। जो शत्रु भय तथा रोगों को हरने वाला परमतत्त्व है।"
"सूर्य सम्पूजयेनित्यं
सावित्रीं च जपत् तथा।
सूर्यार्ध्यं संधयोर्दद्यान्नम स्कूर्याच्च भास्करम्।"
अर्थात्— "सूर्य की नित्य पूजा करें, तथा गायत्री का जप करें। दोनों संध्याओं में अर्घ्य दें। भास्कर को नमस्कार करें।
संध्यावंदन के अनेक विधि-विधान हैं। वे कितने ही क्रिया-कृत्यों के साथ जुड़े हुए हैं, पर उन सब में सबसे संक्षिप्त और सरल यह है कि प्रातःसायं सूर्योपासना की जाए।"
" सूर्योदय यः सुमगहितः भास्करः
धृति प्रज्ञाँ च मेघाँ च सविन्दयते समहित"
—महाभारत
अर्थात्— " सूर्योदय के समय जो भगवान भास्कर की भली प्रकार उपासना करता है। वह धृति, मेधा और प्रज्ञा को प्रचूर-परिमाण में प्राप्त करता है।"
उद्यते नमः उदीयते नमः उदिताय नमः
अस्तंयेते नमो स्तमें प्यते
अर्थात्— " उदय होने वाले को नमस्कार। उदय करने वाले को नमस्कार ।उदीयमान को नमस्कार। अस्त होने वाले को नमस्कार। अस्त करने वाले को नमस्कार।अंधकार हरने वाले को नमस्कार। "
"अद्यादेवा उदिता सूर्यस्य निरहंस "
— ऋग्वेद
अर्थात्— " हे उदीयमान सूर्य आप हमें पाप कर्मों से उबारें। सूर्यउपासना से अपने मनःक्षेत्र में ऐसा परिवर्तन होता है कि पापकर्मों से अनायास ही घृणा होने लगती है।"
"उद्यन्तमस्त यन्तमादित्य भभिध्यायन कुर्वन् सकलं भद्रयश्नुते "
—तैत्तरीय
अर्थात्— "उदय होते हुए, अस्त होते हुए सूर्य का ध्यान करें। इससे सब प्रकार के कल्याण होते हैं। "
अधिक लोग, एक ही समय, एक नियत-निर्धारित साधना करें, तो उसका अधिक प्रतिफल उपलब्ध होता है। इस्लाम धर्म में अजान देने, नमाज पढ़ने के नियत समय होते है। ईसाई धर्म में भी नियत समय पर ही प्रार्थनाएँ होती हैं। भारतीय धर्म संस्कृति में प्रातःकाल सूर्योदय के समय और सायंकाल सूर्यअस्त होने के समय के समय गायत्री मंत्र के माध्यम से जप-ध्यान करने पर बहुत जोर दिया गया है। नियत समय में अनुशासन पालने से उसका अधिक महत्त्व व सत्परिणाम माना गया है।
चीन में एक अमीर चांग भेड़ पालने का धंधा करता था एक बार उसने दो लड़के नौकर रखे और चराने के लिए भेड़ें बाँट दी। देखने पर पता चला कि भेड़ें दुबली भी हो गईं और कितनी ही मर भी गई।
अमीर ने चरवाहों को जिम्मेदार ठहराया। जाँच करवाई कि किस कारण इतनी हानि हुई। पता लगा दोनों अपने-अपने व्यसनों में लगे रहे। एक जो जुआ खेलने की आदत थी।
जब भी दाव लगाता भेड़ों की तरफ उसका ध्यान नहीं रहता। भेड़े कहीं से कहीं जा पहुँचती और भूखी-प्यासी कष्ट पातीं। यही बात दूसरे की थी, वह पूजा पाठ का व्यसनी था। भेड़ों पर ध्यान न देता अपने रुचि के काम में लगा रहता।
दोनों पकड़े गए। न्यायाधीश के सामने न्याय के लिए प्रस्तुत किए गए। दोनों के कारण में भेद तो था; पर कत्र्तव्यपालन की उपेक्षा करने में दोनों ही समानरूप से दोषी थे। न्यायाधीश ने दोनों को समान दंड दिया और कह— "पूजा से कत्र्तव्य बड़ा है। कत्र्तव्य छोड़कर पूजा करने या जुआ खेलने में कोई अंतर नहीं है।"
गायत्री मंत्र का प्रत्येक अक्षर अपरिमित शक्ति का भांडागार है, अपने में दिव्य प्रेरणाएँ एवं शिक्षाएँ निहित किए हुए है। इस मंत्र की उपासना व इन प्रेरणाओं को जीवन में उतारकर भौतिक एंव आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्र में प्रगति-पथ परं बढ़ा जा सकता है। चौबीस अक्षरों में से चौबीस शक्तिधाराएँ फूटती है जो आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर साधक का मार्गदर्शन करती है।
गायत्री मंत्र का भावार्थ है— “उस प्राण स्वरूप, पाप नाशक सुख स्वरूप परमात्मा के सविता तेज को हम अपने अंदर धारण करते हैं, जो हमारी बुद्धि को संमार्ग की ओर प्रेरित करता है इस मंत्र के अंतिम चरण में 'धीमहि' आता है, जिससे हम यह अर्थ समझते है कि इन दिव्य गुणों को हम अपने अंदर धारण करते है, जिसका समुच्चय यह परमात्मा है। इसमें भी “धी” अक्षर मानव को सर्वांगपूर्ण प्रगति की प्रेरणा व व्यक्तित्व के विकास हेतु महत्त्वपूर्ण दिशा देता है। “गायत्री स्मृति” में कहा गया है—
'"धीरस्तुष्टो भजेन्नैव ह्येकस्याँ हि समुन्नतो।
क्रियतामुन्नतिस्तेन सर्वास्वाशासु जीवने॥"
अर्थात्— "धीरपुरुष को एक ही प्रकार की उन्नति से संतुष्ट न होकर जीवन की सभी दिशाओं में प्रगति का प्रयास करना चाहिए।"
किसी इंग्लिश कवि ने कहा है— “ नेवर बी कंटेण्टेड विद युअर एफर्टस” अर्थात्— “अपने प्रयासों में सदैव पूर्णता लाने का प्रयास करो, संतुष्ट होकर रुको मत। जिस दिन तुम मन में यह भाव मन में लाने लगोने कि तुम अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो, तुम्हारी प्रगति-यात्रा रुक जाएगी। “
वस्तुतः मनुष्य को बहुमुखी विकास का प्रयास सतत् करते ही रहना ही चाहिए। जीवन की विभिन्न दिशाएँ हैं। उन सबमें प्रगति करना मानव के लिए अभीष्ट है। शरीर के विभिन्न अंग है, उन सभी का पुष्ट होना आवश्यक है। पेट बहुत बढ़ जाए एवं हाथ-पाँव पतले रह जाएँ, तो इस विषमता से शरीर कुरूप ही होगा। इसी प्रकार उस विध्दता का क्या महत्त्व? जिसमें मनुष्य सदा रोगग्रस्त, चिंतित बना रहे। उस वैभववान् का धन अर्थ हीन है, जिसके पास न विद्या है, न स्वास्थ्य
गायत्री महामंत्र का ‘धी’ अक्षर आठ प्रकार की शक्तियाँ अर्जितकर जीवन की समग्र-प्रगति की प्रेरणा देता है। ये है स्वास्थ्यबल, विद्याबल, धनबल, मित्रबल, प्रतिष्ठाबल, बुद्धिबल, मनोबल, आत्मबल। इनका समुचित मात्रा में संचयकर आदमी व्यक्तित्वसंपंन पूर्णरूप पुरुष बनता है।
गायत्री की चौबीस शक्ति धाराओं में एक शक्तिधारा है— दुर्गा की— 'भवानी' की। भवानी को अष्टभुजा भी कहते हैं। अष्टभुजा आठ पुरुषार्थों की ही प्रतीक है। दुर्गा अष्टभुजा की उपासना का अर्थ है— आठों प्रकार की शक्तियाँ साधक को मिलती है। उसका जीवन एकांगी नहीं होता, बहुमुखी होता है।
इन आठों शक्तियों की अपनी उपयोगिता एवं महत्ता है। स्वास्थ्य की महत्ता से सभी परिचित है। जीवन की समस्त स्थूल गतिविधियाँ सुस्वास्थ्य पर ही ठीक प्रकार से संचालित होती है। निरोग एवं स्वस्थ काया एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। स्वस्थ शरीर द्वारा ही वस्तुओं के विषयों का रसास्वादन किया जा सकता है। रोगग्रस्त रहने पर तो अच्छे से अच्छा भोजन भी नहीं अच्छा लगता। वस्तुओं की पौष्टिकता का लाभ भी तभी मिल पाता है, जब उन्हें पचाने के लिए पाचन संस्थान सही हो। रोगी होने पर तो पौष्टिक तत्त्व तक उल्टे हानि पहुँचाते हैं। वस्तुओं के रसास्वादन से लेकर श्रम करने तक में नीरोग शरीर ही समर्थ होता है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन के निवास करने की उक्ति अकारण नहीं है। साँसारिक सफलताओं से लेकर आत्मिक उपलब्धियों में शरीर सामर्थ्य की आवश्यकता पड़ती है।
विद्याबल की भी उतनी ही आवश्यकता है। विद्या अर्थात् सत-असत्, औचित्य-अनौचित्य के बीच अंतर कर सकने योग्य सद्बुद्धि। शास्त्रों में इसे ही दूरदर्शी विवेकशीलता कहा गया है। विद्या पुस्तकीय ज्ञान से अलग है। यह स्कूल-कॉलेजों में दी जाने वाली शिक्षा नहीं है। यह तो चिंतन एवं मनन द्वारा प्राप्त होती है, जिसके लिये आत्मनिरीक्षण करना होता है। ब्रह्मविघा का अवलंबन लेना पड़ता है। सत्यासत्य के बीच अंतर करने एवं सत्यावलम्बन के लिए प्रेरित करने वाली बुद्धि का नाम ही विद्या है।
अविद्या के कारण ही जीवसत्ता काम, क्रोध, लोभ मोह के बंधनों में जकड़ी भटकती रहती है। विद्या-सद्बुद्धि का अवलंबन इस तमिस्रा को मिटाता, सही राह दिखाता है। मनुष्य संसार में सांसारिक आकर्षणों के मध्य रहता, वस्तुओं का उपयोग करता हुआ भी उनसे निर्लिप्त बना रहता है। फलस्वरूप बंधनों में आबद्ध नहीं होता, मुक्त बना रहता है। ‘धी’ अक्षर मानवमात्र को विद्याबल संचित करने की प्रेरणा देता है।
मानव की सर्वांगपूर्ण प्रगति के लिए गायत्री मंत्र का धी शब्द तीसरे प्रकार के बल, धनबल को नीतियुक्त उपायों से प्राप्त करने का मार्गदर्शन करता है। सुख-सुविधाओं जीवन निर्वाह के साधनों की प्राप्ति श्री शक्ति से ही होती है। शरीर को रोटी, वस्त्र, निवास के लिए मकान की जरूरत पड़ती है। इनके बिना शरीर को सुरक्षित एवं जीवित नहीं रखा जा सकता। जीवन निर्वाह के लिए जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है उनकी आपूर्ति धन से होती है। साधनों के अभाव में न स्वार्थ सध सकता है और न ही परमार्थ। अतएव ‘श्री’ बल का उपार्जन भी उतना ही आवश्यक है।
बहुमुखी विकास में सहायक चौथी शक्ति है— "मित्र परिकर की सहयोगियों की।" मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। प्रगति और अवगति सामाजिक सहयोग-असहयोग के ऊपर निर्भर करती है। सहयोगियों की संख्या बढ़े उसके लिए मनुष्य को शालीन, उदार एवं व्यावहारिक होना चाहिए। अपने व्यक्तित्व को ऐसा आकर्षक बनाना चाहिए कि उससे सभी प्रभावित हो अपना साथ चाहें, सहयोग दें व माँगे।
स्वार्थों पर आघात होते ही मित्रगण संकीर्ण व्यक्ति का साथ छोड़कर भाग जाते हैं। स्थाई और सच्चे सहयोगी तो वे ही बना पाते हैं, जिन्होंने अपने अंतःकरण को महान बना लिए हो। संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठ चुके हो। विपुल परिमाण में जनसहयोग ऐसे ही व्यक्तियों को मिलता है।
पाँचवा बल है— "श्रेय और सम्मान का।" जिन कार्यों को करने से अंतरात्मा प्रफुल्लित एवं गौरवांवित होती हो सही अर्थों में वही सम्मान है। गायत्री का धी अक्षर आत्मगौरवरूपी दैवी विभूति अर्जित करने की शिक्षा देता है है। सुनिश्चित है कि यह सद्मार्ग पर चलने से, परमार्थ अपनाने से ही यह मिल सकना संभव है। स्वार्थों की परिधि से निकला लोक-कल्याण में निरत व्यक्ति ही सच्चे श्रेय एवं सम्मान का अधिकारी बनता है। उसकी कीर्ति सर्वत्र फैलती है। आत्मगौरव को बढ़ाने वाला, स्वतः मिलने वाला श्रेय एवं सम्मान मनुष्य जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है।
छठी शक्ति है— 'बुद्धिबल' । सांसारिक उपलब्धियाँ इसी आधार पर अर्जित की जाती है। अपनी योग्यता बढ़ाने, प्रतिभासंपंन बनने की शिक्षा “धी” अक्षर में सन्निहित है। मूर्ख, अज्ञानी, अशिक्षित व्यक्ति न तो विशेष सांसारिक सफलता प्राप्त कर सकता और न ही आध्यात्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकता है। धनवान मूर्ख अपनी संपत्ति की सुरक्षा नहीं कर पाते। अज्ञानी अभावग्रस्त रहते, हेय स्थिति में पड़े कष्ट झेलते हैं। संपदा मिल भी जाए तो भी उनके पास अधिक दिनों टिक नहीं पाती। बौद्धिक क्षमता विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि शरीरबल एवं धनबल एकत्रित करना।
समग्र प्रगति के लिए सातवाँ बल है— 'मनोबल'। मनोबल को एक प्रचंड शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है। साहस, शौर्य, पराक्रम जैसे गुण मनोबल की ही उपलब्धि है। भौतिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति के शिखर पर जा पहुँचने वाले व्यक्ति का पर्यवेक्षण करने पर पता चलता है कि उनकी सफलता में मनोबल का असामान्य योगदान रहा है।
सर्वतोमुखी प्रगति का अंतिम और सबसे प्रमुख आधार है— "आत्मबल का संपादन।" यह वह आधार है। जिसके द्वारा मनुष्य आंतरिक विकारों एवं बाह्य आकर्षण पर विजय प्राप्त करता है। आत्मबलसंपंन व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। गायत्री उपासना आत्मबल-संवर्धन की सशक्त साधना है। मंत्र का “धी” अक्षर मनुष्य की अंतशक्ति जागृत करने की शिक्षा देता है। जीवात्मा ही परमात्मा का अंश है। बीजरूप में वे सभी शक्तियाँ विद्यमान है, जो ईश्वर में हैं। आवश्यकता उन्हें जागृत करने की है। उच्चस्तरीय साधनाओं से यह अंतशक्ति जागृत होती है और प्रचंड आत्मबल के रूप में परिलक्षित होती है।
आठों शक्तियों में एक से बढ़कर एक संभावनाएँ सन्निहित हैं। 'धी' अक्षर सभी प्रकार की सामर्थ्यों को अर्जित करने की प्रेरणा देता है। गायत्री महामंत्र की उपासना द्वारा साधक के मन में सर्वतोमुखी उन्नति की उमंग उठनी चाहिए। गायत्री उपासना के अवलम्बन से साधक ऐसी प्रेरणा प्राप्त करता है, जिससे समग्र प्रगति के लिए समग्र प्रयास चल सकें।
समय की दुरूहता को देखते हुए पिछले तीन वर्षों में महाकुंडलिनी जागरण की विशिष्ट तपश्चर्या संपंन की गई है। 'महा' शब्द इसलिए जोड़ा गया है कि वह व्यक्ति विशेष के लाभ या उपयोग के लिए उसका साधनाक्रम नहीं बनाया गया; वरन् समस्त विश्व की अगणित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस तपश्चर्या में ऐसी विशिष्टता और उच्चस्तरीय उत्कृष्टता का समावेश किया गया है कि सुविस्तृत क्षेत्र की अगणित आवश्यकताओं को पूरा कर सके। इसे राष्ट्रगत, विश्वगत अनुपम आध्यात्मिक प्रयास कहा जा सकता है। विश्वगत अनुपम आध्यात्मिक प्रयास कहा जा सकता है। इससे पूर्व ऐसे प्रयास यदा-कदा ही हुए हैं। एक घटना विश्वमित्र की हमें स्मरण है। उनका तप, अनुष्ठान, यज्ञ ऐसे ही महान प्रयोजनों के लिए थे। उसे असफल करने के लिए आसुरी शक्तियाँ विघ्न भी कम नहीं फैला रही थीं। स्थिति को देखते हुए इसका संरक्षण करने राम-लक्ष्मण को जाना पड़ा था। उसी से मिलता जुलता यह महान तप संकल्प भी पूरा हुआ है।bb
कहा और समझाया जाता रहा है कि प्रज्ञा मिशन का सूत्रसंचालक मात्र काय-कलेवर में परिवेष्ठित एक व्यक्ति विशेष नहीं है। उसकी समग्र सत्ता एक मिशन के लक्ष्य के निमित्त उपजी और कार्यरत हुई है। आदि से ही इस दिशाधारा को राजमार्ग को अपनाया गया है। अब आपत्तिकालीन युगसंधि की ऐतिहासिक बेला में तो उस प्रक्रिया को और भी अधिक तेज कर दिया गया है। प्रस्तुत महाकुंडलिनी जागरण उसी का एक स्वरूप है। इसमें कर्त्ता का कोई निजी मनोरथ जुड़ा हुआ नहीं है। स्पष्टतः यह युग परिवर्तन के लिए ही है। यह अदृश्य कार्य दृश्य रूप में इस प्रकार क्रियांवित हो रहा है कि प्रतिभाओं को और भी अधिक प्रखर-आत्मबलसंपंन बनाया जाए। उन्हें साधारण से असाधारण स्तर तक पहुँचाया जा सके। इस सामूहिक शक्ति से ही उस लक्ष्य की पूर्ति हो सकेगी जो स्पष्टतः सामने है।
प्रज्ञा परिकर एक समुदाय है। इसे मणि-मुक्तकों का बहुमूल्य हार भी कह सकते हैं। गहरे गोते लगाकर उन्हें ढूँढ़ा, एकत्रित किया और एक सुदृढ़ रत्नमणि सूत्र में पिरोया गया है। यह समुदाय अखंड ज्योति के सदस्यों के रूप में, सृजनरत प्रज्ञापुत्रों के रूप में देखा जाता हैं। व्यक्तिविशेष भले ही इसे गूँथने, चमकाने का कार्य करता हो, पर उसका सुविस्तृत स्वरूप प्रायः चौबीस लाख भावनाशील उदारचेताओं तक फैला हुआ है। इन्हें केंद्रीय सत्ता से अलग करके नहीं देखा, सोचा जा सकता है। गेंडे का सींग अत्यंत सशक्त होता है, तो भी वह नथुने के ऊपर उगे कड़े बालों का सघन समुच्चय भर होता है। प्रज्ञा मिशन के रूप में जिस केंद्र को कार्यरत देखा जाता है उसे एकाकी व्यक्ति नहीं माना जा सकता है। वह गेंडे के नथुने पर उगा हुआ सींग भर है, यह बालों से मिलकर बना सींग टक्कर मारकर हाथी को उलट और शेर को उछाल देता है।
विश्वामित्र का ऊर्जा उत्पादन, तप-जब अपने प्रखर स्वरूप में प्रकट हुआ था, तो उसने असुरता के दमन और सतयुग की स्थापना का वातावरण बनाया था। दुर्बल रीछ-बानरों को इतना सशक्त बनाया था कि समुद्र पर पुल बना सके, निशाचरों के दुर्ग को विस्मार कर सके, राम-राज्य की स्थापना में महती भूमिका निभा सके। हनुमान, अंगद आदि के नाम प्रख्यात है; पर वास्तविकता यह है कि उस सुगठित वानर मंडली का प्रत्येक सदस्य अपने-अपने स्तर की प्रतिभा का धनी था । उनमें से प्रत्येक का अलग-अलग विशेषण-विवेचन किया जाए; तो प्रतीत होगा कि राम का पराक्रम जो विश्वामित्र के तप से ही प्रखर हुआ था, इन सभी रीछ, वानरों में अप्रत्यक्ष रूप से काम कर रहा था। उन सब की संयुक्त प्रक्रिया की इसी प्रकार तात्विक विवेचना हो सकती है।
इतिहास की पुनरावृत्ति भी होती रहती है। इन दिनों भी वैसा ही हो रहा है। रीछ-वानर, ग्वालबाल, बौद्ध परिव्राजक, स्वतंत्रता सेनानी आदि समुदायों की तरह प्राणवान प्रज्ञा पुत्रों की भी गणना हो सकती है। सामान्य मनुष्य तो नर-पशुओं की तरह पेट-प्रजननमात्र के लिए जीवन गुजारते हैं। उन्हें लोभ, मोह एवं अहंकार से हटकर कुछ सूझता ही नहीं; पर जिनमें देवत्व की सुसंस्कारिता विद्यमान है, वे देवमानवों की तरह जीते हैं। पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नारायण बनते हैं। विभूतियों को परमार्थ और नर से नारायण बनते हैं। विभूतियों को परमार्थ-प्रयोजन के लिए, स्वयं को युग धर्म के निर्वाह के लिए खपाते हैं। वे बीज के रूप में गलते और कल्पवृक्ष की तरह फलते हैं। अखंड ज्योति परिजनों में से अधिकांश ऐसी ही स्थिति में है। अपने संपर्क-क्षेत्र में वे संभवतः साधारण माने जाते हो; पर दिव्यदृष्टि से उनकी विशिष्टता प्रकट हुए बिना नहीं रहती।
अगले दिन कठिन समस्याओं और संकटों से भरे हैं। उन्हें संघर्ष किए बिना निपटाया नहीं जा सकता। यह महामारी ऐसी नहीं है, जिसके लिए उपचारकर्त्ताओं की आवश्यकता न पड़े और अनायास ही निपट जाए। इस मुहीम पर अनेकों को मोर्चा संभालना पड़ेगा। इससे पूर्व अपनी निजी स्थिति को इतनी सुदृढ़ बनाना पड़ेगा कि वह जहाँ भी गिरे इंद्रवज्र जैसा धमाका करे। जहाँ जमे गंगावतरण जैसा दृश्य उपस्थित करके उठे।
केंद्रीय प्रयास द्वारा जागृत महाकुंडलिनी का लाभ हर आवश्यकता के अवसर पर अपना चमत्कार दिखा सके, इसके लिए आवश्यक है, इस सहकारी समिति के प्रज्ञा मंडली के हर सदस्य के पास कुछ कारगर गोला-बारूद हो। प्रयोजन समझते हुए यह आवश्यक समझा गया है कि सभी साथी इस नव उपार्जित अध्यात्म संपदा में भागीदार बन जाएँ, एक पर आश्रित न रहा जाए और अनेकों में वह समर्थता भरी जाए जिससे असंख्य क्षेत्रों में अनेक प्रकार की अनेक समस्याओं का समाधान करने के लिए अनेक देवयोद्धा कटिबद्ध खड़े मिल सकें। सेनापति की सूझ-बूझ भंडारना कितनी ही बड़ी क्यों न हो, पर मोर्चे पर जूझते तो विभिन्न योग्यताओं और साधन-उपकरणों वाले सैनिक ही हैं।
रक्षा विभाग के सभी संचित सघन सैनिकों की क्षमता बढ़ाने में और आवश्यकता के समय उपकरणों को हाथों में थमाने में संकोच नहीं किया जाता। संचित तपश्चर्या का अब वितरण-विकेंद्रीकरण चलेगा। इसमें उन सभी को भाग लेने का निमंत्रण है, जो संयम-साधना के द्वारा अपना उदात्तीकरण करने में व्रतशील हो सकें। पानी कितना ही क्यों न बरसे पर गड्ढे, तालाब, सरोवर में उसकी गहराई-चौड़ाई के अनुसार ही जल जमा होता है। देने वाले की उदारता या संपदा बढ़ी-चढ़ी होना ही सब कुछ नहीं है। प्राप्तकर्ता में उसे पचाने की सामर्थ्य भी होनी चाहिए अंयथा अनावश्यक मात्रा में पकवान खाने पर वे पेट खराब ही करते हैं। हाथ लगी दौलत दुर्व्यसनों में चोर-ठगों में बँट जाती हैं। कुंडलिनी जागरण का विधि-विधान अति कठिन है। उनमें तनिक भी व्यतिक्रम रहने पर खतरे भरे जोखिम भी हैं। फिर उसके लिए भी तपश्चर्या करने वाली संयम-साधना तो अनिवार्य है ही, समय भी लगता है। जो कार्य केंद्र में तीन वर्ष में हुआ है उसे निजी रूप में करने पर सामांय साधकों को न्यूनतम पचास वर्ष तो धैर्यपूर्वक लगाना ही चाहिए। इतना समय निकलना, उपयुक्त स्थान में रहना अनुकूल मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना कठिन है। इसलिए इस आपत्तिकाल में कुंडलिनी जागरण की व्यक्तिगत साधना कठिन तो नहीं बन पड़ेगी, पर उतना ही लाभ इस वितरण व्यवस्था के आधार पर उठाया जा सकता है, जो इसी बसंत पूर्व से आरंभ कर दी गई है। यह अनुदान लेना उन्हीं को चाहिए, जो उसका उपयोग परमार्थ में कर सकें। परमार्थी का स्वार्थ तो उसी प्रकार सधता रहता है जिस प्रकार मेंहदी पीसने वाले के हाथ लाल हो जाते हैं, इत्र का व्यवसाय करने वाले के कपड़े अनायास ही महकने लगते हैं। परमार्थी को आत्मसंतोष लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह के तीन लाभ तो सदा-सर्वदा मिलते रहते हैं और मिलते रहेंगे।
वितरण अनुदान को ग्रहण करने का तरीका अत्यंत सरल है। प्रातः सूर्योदय के एक घंटा पूर्व से लेकर एक घंटे बाद तक का समय इस ऊर्जा-प्रवाह को सभी दिशाओं में बहाने का समय है। इस समय में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय अपने अधिक ग्रहण के लिए निश्चित किया जा सकता है। उस समय ध्यान और प्राणायाम की समंवित विधि अपनाई जाए। साँस को धीमी गति से इस प्रकार खींचा जाए कि पेट और फेफड़े पूरी तरह भर जाएँ। फिर धीरे-धीरे उस संचित वायु को इस प्रकार निकाला जाए कि पूरी वायु बाहर निकल जाए। यह पूरक-रेचक हुआ। इस अवसर पर रोकने की “कुम्भक” की आवश्यकता नहीं। प्राण-प्रक्रिया के साथ-साथ ध्यान-धारण भी जुड़नी है। प्रभाव कालीन स्वर्णिम सूर्य हिमालय से उदय होता हुआ आंखें बंद करके भाव नेत्रों से देखा जाए। प्राणायाम के साथ उदीयमान सूर्य की प्राण-ऊर्जा अपनी समग्र सत्ता में ओत-प्रोत हुआ विश्वास माना जाए।
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“जीवात्मा के तीन आवरण हैं— 1) स्थूलशरीर (२) सूक्ष्मशरीर (3) कारणशरीर। स्थूलशरीर का संचारचक्र है— नाभिकमल। सूक्ष्मशरीर का केंद्र है — “ह्रदयकमल। तीसरे कारणशरीर का मध्य बिंदु है— ब्रह्मरंध्र। सहस्रारकमल सूर्य की ऊर्जा पहुँचते ही कमलपुष्प भी अन्यान्य पुष्पों की भाँति खिल पड़ते हैं। खिल पड़ने का अर्थ है— शोभा, सुषमा, प्रौढ़तायुक्त होना और अपनी गंधगरिमा बिखेरने लगना। हिमालय के ध्रुवस्थान से उदय होने वाले सविता का ध्यानयुक्त प्राणायाम करने से नाभिकमल में कुंडलिनी प्राण प्रवाह, ह्रदयकमल में उदार सौर्य-साहस, सहस्रारकमल में विवेक-आत्मबल जाग पड़ता है। नाभिकमल में ओजस्, ह्रदयकमल में तेजस् और ब्रह्मकमल में वर्चस् का भंडार है । उपरोक्त ध्यान से यह तीनों ही प्रस्फुटित ,प्रज्वलित, प्रकीर्ण होते हैं। पंद्रह मिनट की दैनिक साधना में पांच-पांच मिनट इन तीनों केंद्रों में सविता तेजस् भरते-विभाजित करते हुए समष्टि प्राण का प्राणायम करते रहना चाहिए।
इतनी भर सरल साधना संग्रहित केंद्रीय कुंडलिनी भंडार में सभागीदार बनाने की है। इसके लिए स्नान का, नियत स्थान का बंधन तो नही है, पर यथासंभव अधिकाधिक शुद्ध वातावरण का प्रबंध करना चाहिए। कुछ ही दिनों में शरीर में स्फूर्ति, मन में उमंग और ब्रह्मरंध्र में भाव-संवेदना बहने लगती है। यह निजी अनुभूति का प्रसंग है।
दुसरे व्यक्तियों या विपन्न परिस्थितियों का संतुलन बनाने के लिए इस शक्ति का कब, कितना, किस प्रकार प्रयोग करना चाहिए ? इसके लिए केंद्रीय सत्ता से परामर्श कर लेना चाहिए। अनुपयुक्तता से निपटने के लिए इस उपलब्धी को ब्रह्मरंध्र, ब्रह्मपाश, ब्रह्मशाप, ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। जिन सत्प्रवृत्तियों का उन्नयन, अभिवर्द्धन, अभ्युदय करना हो, वहाँ इसे प्रेरणा-प्रतिभा-प्रखरता के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
अगले दिनों दुहरे प्रयोजनों की पूर्ति करनी होगी। सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन । दोनों ही प्रयोग अपने-अपने स्थान पर उपयुक्त एवं आवश्यक है। उन्मुलन का प्रयोजन, अधर्म का निराकरण, संवर्द्धन का प्रयोजन, धर्मचेतना का अभ्युदय है। इन क्षत्रों में असंतुलन उत्पन्न हो जाने से ही असंख्य समस्याएँ एवं आपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इनका संतुलन बनाने के लिए दमन और उन्नयन के दोनों ही उपचार अपनाने पड़ते हैं।
अभी वातावरण संशोधन के लिए, रूठी प्रकृति को मनाने के लिए, केंद्रीय प्रयास ही अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं। वायुमंडल के परिस्थिति प्रवाह के अनुमुलं के लिए परिजनों द्वारा सम्मिलित गायत्री महायज्ञों की शृंखला चल रही है। इस बसंत पर्व से उसमे प्रज्ञा संकीर्तनों की एक नई धारा का समन्वय किया गया है। साथ ही सभी सहयोगियों को कहा गया है कि वे तपश्चर्या के रूप में चतुर्विधि संयम साधना को अपनी सामर्थ्य भर अपनाते रहें । इंद्रिय संयम, अर्थ संयम,
समय संयम विचार संयम इन चारों की समंवित विधि व्यवस्था व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट करते रहने को सर्व सुलभ तप साधना कह सकते हैं। इनका जिससे जितना निर्वाह होता रहेगा, उनके लिए उतना ही कुण्डलिनी अनुदान बटोर सकना सम्भव बन पड़ेगा। समयानुसार वे उसका उन्नयन उपचार अथवा दमनात्मक प्रहार भी कर सकेंगे।
परिजनों में से जो इस अनुदान को समेटने के लिए लग पड़े हों उन्हें अपना नाम शांतिकुंज में नोट करा देना चाहिए ताकि उनके लिए प्रेषण की समुचित मात्रा उपलब्ध कराई जाती रहे और जब जरूरी हो परिवर्तन परिवर्धन या मार्गदर्शन भी प्रस्तुत किया जाता रहे।
जो इस अनुदान श्रृंखला में जुड़ रहे हों, उन्हें अपनी स्थिति फायरब्रिगेड या जेनरेटर की जैसी समझनी चाहिए और आवश्यकतानुसार अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए। फायरब्रिगेड जलाशय से पानी खींचता है और जहाँ अग्निकांड की विभीषिका उबल रही है, वहाँ अपनी तेजधारा से पानी उलीच कर उपद्रव को शांत करता है। अगले दिनों ऐसे अवसर आ सकते हैं जब व्यापक अग्निकांड का शमन करने के लिए अनेकों फायरब्रिगेड शमन पानी उलीचने के लिए लगाने पड़ें। पानी की अथाह गहराई वाली टंकी हिमालय के ध्रुवकेंद्र में विद्यमान है। उससे प्रत्यक्ष संपर्क-साधना हो, तो शांतिकुंज को देखा टटोला जा सकता है।
जेनरेटर विद्युत उत्पादन केंद्र होता है, उससे चलने वाले तार जहाँ तहाँ लगे हुए बल्ब, पंखे हीटर, कूलर, मोटर आदि को गतिशील करते हैं। कुंडलिनी परिकर को सहभागियों को समयानुसार ऐसा भी करना पड़ सकता है कि प्रतिभाओं को उभारें उछालें और सृजन के सामाजिक प्रयोजनों में जुटाएँ।
आरंभ में तो अपने को साझीदार बनाकर महाकाली, महाकुंडलिनी की सामर्थ्य से अपने का सशक्त बनाना है। इसका उपयोग उचितमात्रा में समयानुसार ही किया जाए। इसकी सूचना दिव्य संकेत देते रहेंगे।
नारद को अभिमान हो गया कि मैं भगवान को बहुत प्यार करता हूँ। भगवान ने इस बात को जाना और अभिमान के निवारण का प्रयत्न किया, क्योंकि अभिमान ही अध्यात्म मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।
भगवान नारद को साथ लेकर भ्रमण को चल दिए। चलते-चलते एक तपस्वी ब्राह्मण मिला जो सूखे पत्ते खाकर तप कर रहा था, शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था। फिर भी कमर में तलवार लटकाए था।
भगवान साधारण वेश में थे। उनने तपस्वी से पूछा— "आपके पत्ते खाने और तलवार धारण करने का क्या कारण है। तपस्वी ने कहा पत्ते इसलिए खाता हूँ कि मेरे भगवान की प्रजा को अंन, दूध आदि वस्तुँ पर्याप्त मात्रा में मिलें। मेरे खाने के कारण किसी जीव के आहार में कमी न पड़े और तलवार इसलिए बाँधे हुए हूँ कि संसार में तीन भक्ति को कलंकित करने वाले हैं, ये कभी मिल जाएँ तो इस तलवार से उनका सिर काट दूँ।"
नरवेशधारी भगवान ने पूछा— "भक्ति को कलंकित करने वाले तीन भला वे कौन-कौन हैं?" तपस्वी ने कहा— "एक अर्जुन जिसने मेरे भगवान से अपने स्वार्थ के लिये रथ हँकवाया, दूसरी द्रौपदी जिसके चीर के बढ़ाने के लिए भगवान को नंगे पैरों दौड़ना पड़ा, तीसरा नारद जिसे आत्मज्ञान पर संतोश नहीं। कभी कुछ कभी कुछ पूछकर मेरे भगवान का सिर खाता रहता है।"
दोनों तपस्वी को प्रणाम करके चल दिए। नारद की समझ में अब आया कि उच्च कोटि के प्रेम का क्या लक्षण है? अपने प्रेमी को ही नहीं उसके प्रियजनों को भी अपने कारण कुछ कष्ट न पहुँचने देना और अपने सुख के लिए किसी प्रकार की भी प्रेमी से याचना न करना।
नारद ने अपनी प्रेम की तुलना उस तपस्वी के प्रेम से की तो उनका अभिमान चूर हो गया।
उपरोक्त पंक्तियाँ उन गगनभेदी नारों में से हैं ;जिनसे पिछले दिनों संपंन हुए राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों शतकुंडी महायज्ञों में असंख्यों नागरिकों द्वारा वातावरण गुंजित हुआ है। देश के कोने-कोने से प्रतिदिन मिल रहे समाचार बताते हैं कि राष्ट्र की संघबद्धता-अखंडता के लिए किए जा रहे प्रज्ञा अभियान के प्रयासों ने दुर्धर्ष प्रतिगामियों के पैर उखाड़ दिए हैं। संव्याप्त वैचारिक प्रदूषण एवं आस्था संकट के निवारण हेतु इन सम्मेलनों ने सत्प्रवृत्तियों का पक्षधर वातावरण बनाया है। आशा की एक किरण जागी है कि ऊषाकाल के पूर्व का यह तिमिर मिटने ही वाला है, नवयुग का सूर्योदय होने ही वाला है।
अब दूर नहीं है वह दिन जब से मानवता आएगी
अहमदाबाद (गुज.) परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मशक्ति का प्रभाव यहाँ संपंन हुए शतकुंडी गायत्री महायज्ञ एवं विशाल राष्ट्रय एकता सम्मेलन में दृष्टिगोचर हुआ। जलकलशयात्रा का इतना लंबा जुलूस अहमदाबाद के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं निकला; जिसमें पचास हजार विभिन्न धर्मों के व्यक्ति व्यवस्थित और अनुशासित रहकर युग संदेश देते और राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने के संकल्प का उद्घोष करते रहे।
स्थानीय अखबारों ने इस जलकलशयात्रा को वहाँ की प्रतिवर्ष निकलने वाली रथयात्रा में कई गुना बड़ी बताया है। आकाशवाणी व दूरदर्शन के स्थानीय केंद्र से आयोजन के समाचार प्रतिदिन प्रसारित किए जाते रहे।
इस कार्यक्रम में सभी धर्म-संप्रदाय के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने के लिए एकजुट होकर काम करने का संकल्प सभी ने सामूहिक शपथ रूप में लिया।
सिहोरी (राज.) पच्चीस जीप, गाड़ियों में सजी झाँकियों के साथ पाँच सौ कलशधारी पीतवस्त्र धारी कुमारिकाओं द्वारा संपंन जलकलशयात्रा से आरंभ हुआ ।शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन समुचे-क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया।
शानदार कलशयात्रा की शुरुआत का प्रभाव समूचे कार्यक्रम में अपार जनसमूह की उपस्थिति के रूप में हुआ। पूज्य गुरुदेव के संदेश से प्रभावित होकर कई भावनाशील परियोजना ने हजारों के साहित्य खरीदकर आयोजन में सम्मिलित हुए परिजनों तक पहुँचाया। सभी धर्म-संप्रदाय के अनुयायी इस कार्यक्रम में सम्मिलित होकर लाभांवित होते रहे।
टाटानगर (बिहार) गोलमुरी मैदान में आयोजित राष्ट्रीय एकता सम्मेलन व शतकुंडीय महायज्ञ अपूर्व उमंग एवं उल्लास के साथ संपंन हुआ। इस आयोजन में सम्मिलित सभी लोगों ने अनेकता में एकता के गुणों का दिग्दर्शन किया।
कलशयात्रा में सम्मिलित सिक्ख, ईसाई व आदिवासी जत्थों के साथ स्वतंत्रता सेनानियों का जत्थादर्शकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहा। सायंकाल एकता सम्मेलन का उद्घाटन बिहार के सिंचाई राज्य मंत्री श्री सनातन सरदार ने किया। अपने उद्बोधन में री सरदार ने गायत्री मंत्र के भावार्थ को चिंतन एवं जीवन में उतारने की प्रेरणा दी। सम्मेलन में सांसद गपेश्वर कौमी एकता के अध्यक्ष जलाल अहमद सिडकी रजीउद्दीन खान, डॉ. एस.एम. हुसैन, उाँ. मतलूब हुसैन, केदार दास मेहता, सरदार बलवंत सिंह सिराजुद्दीन तथा मौलवी अजीत भी उपस्थित थे। सभी ने देश की एकता और अखंडता के लिए एक जुट होने की शपथ ली। उपायुक्त जिला मजिस्ट्रेट आदि सभी उच्च अधिकारी इसमें प्रतिदिन उपस्थित रहे।
इंदौर (म.प्र.) शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन समूचे-क्षेत्र को युगचेतना से अनुप्राणित करने के साथ संपंन हुआ। कुंभ मेले के समान बना वातावरण सहज ही आकर्षण का केंद्र रहा। जनसमुदाय को यज्ञस्थल तक पहुँचने के लिए अतिरिक्त वाहनों की व्यवस्था उपलब्ध कराई गई। सम्मेलन स्थल पर बासंती छटा बिखरी हुई थी।
कार्यक्रम का शुभारंभ श्री महेश शास्त्री व प्रो. रमेश मंगल ने दीप प्रज्वलित करके किया। जलकलशयात्रा में हाथी, घोड़े, झाँकियाँ तथा हर संप्रदाय के प्रतिनिधियों का आकर्षण सहज ही लोगों का ध्यान आकर्षित करता रहा। जुलूस में जगह-जगह पुष्प वर्षा की गई। इंदौर के इतिहास में ऐस जुलूस पहले कभी नहीं निकला सम्मेलन में शहर इंका के अध्यक्ष समजा सेवी श्री हरिकिशन मुदातल पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री प्रकाश चन्द्र सेठी, महापौर श्री बल्लभ तिवारी, विधानसभा उपाध्यक्ष श्री कन्हैयालाल यादव सहित लगभ 15 राजनेताओं ने अपने-अपने विचार व्यक्त करते हुए इस आयोजन को अभूत पूर्व बतलाया।
सम्मेलन का समापन सहकारिता एवं कृषि मंत्री श्री शिवभानू सिंह सोलंकी ने किया। इस अवसर पर बोलते हुए श्री सोलंकी ने युगनिर्माण योजना के कार्यक्रमों को राष्ट्र की प्राणवायु की उपमा दी। सभी से इस एकता यज्ञ में आहुति देने की अपील की।
आयोजकों का अथक श्रम तब सार्थक हुआ जब लगभग 10 हजार अखंड ज्योति पत्रिकाओं के नए सदस्य व 300 साधक शांतिकुंज के सत्रों में भेजने का संकल्प सभी ने मिल जुलकर लिया। एवं यज्ञ पूरा होने तक चरितार्थ भी कर दिखाया। इंदौर से एक पूरी टोली शांतिकुंज जा रही है।
फैजाबाद (उ. प्र.) ठंड व घनघोर कोहरे के बावजूद कार्यकर्ताओं का परिश्रम जब सार्थक दिखा जब आसपास के क्षेत्रों से शतकुंडीय महायज्ञ व राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए विशाल जन समूह उमड़ा पड़ा। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने इस अवसर पर पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म उपस्थिति का भानकर अपने आप को कृतकृत्य माना।
राष्ट्रीय एकता सम्मेलन का उद्घाटन डॉ. श्रीमती राजेन्द्र कुमारी वाजपेयी, जनकल्याण एवं राष्ट्रीय एकीकरण राज्यमंत्री भारत सरकार ने राष्ट्रीय एकता दीप जलाकर किया ।आयोजन में स्वामी कृष्णानन्द जी, जिला न्यायाधीश श्री कृष्ण मोहन पाण्डेय आचार्य नरेन्द्र देव तथा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. कीर्तिसिंह सम्मिलित होकर जनसमूह एकता के लिए प्रेरित करते रहे।
भोपाल (मा.प्र.) मध्य प्रदेश की राजधानी तालाब नगरी में शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ की जलकलशयात्रा में भारत माँ के नक्शे पर मंदिर, मस्जिद, गिरिजा और गुरुद्वारा की झाँकी आकर्षण का केंद्र बनी रही। डेढ़ किलोमीटर जुलूस ने अपनी ऐतिहासिक छाप छोड़ी।
राष्ट्रीय एकता सम्मेलन का उद्घाटन श्री तनवत सिंह कीर ने किया। प्रदेश की राजधानी होने के मंत्री, साँसद विधायकों में से अधिकांश कार्यक्रम में सम्मिलित होते रहे। इनमें से प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष श्री राजेन्द्र शुक्ल प्रदेश के वित्तमंत्री राम किशोर शुक्ल, साँसद सुभाष यादव तथा विधायक बाबू लाल गौर प्रमुखरूप से उपस्थित रहकर परिजनों का उत्साहवर्धन करते रहे। भोपाल के नागरिकों ने अनुभव किया कि गैस त्रासदी के 2 वर्ष बाद संपंन हुए इस विशाल आयोजन ने आशा और खुशहाली का वातावरण बनाने में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सूरत (गुजरात) शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ का शुभारंभ विशाल मंगलकलशयात्रा के साथ हुआ जिसमें हजारों नर-नारी पीले वस्त्रधारण करके सम्मिलित हुए।
राष्ट्रीय एकता सम्मेलन का उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने किया। सम्मेलन में उपस्थित लोगों से श्री देसाई ने भाई चारे की भावना को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय एकता व अखंडता को मजबूत करने की अपील की। इस दिशा में युगनिर्माण योजना द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए श्री देसाई ने परम पूज्य गुरुदेव को इस युग का मसीहा बताया। साथ ही विश्वास व्यक्त किया कि यह मिशन ही प्रस्तुत वर्तमान की विभीषिकाओं में मानव जाति को बचा सकेगा।
पूर्णाहुति के दिन पाँच हजार लोगों ने दीक्षा ली। यज्ञ की अग्नि के समक्ष उपस्थित लोगों ने अपनी बुराइयों का त्याग किया व सत्साहित्य के अध्ययन का संकल्प लिया।
रीवा (म.प्र.) शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ की जलकलशयात्रा विभिन्न संप्रदायों की झाँकियों के साथ देखकर दर्शकों के मुँह से सहज ही निकल पड़ा कि ऐसे आयोजन ही समाज को सही दिशा देकर राष्ट्रीय एकता स्थापित कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता स्थापित कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में म. प्र. शासन के वित्तमंत्री पं. रामकिशोर शुक्ल ने संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय एकता में युगनिर्माण योजना द्वारा आयोजित सम्मेलन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। म.प्र. साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पं. भगवती शुक्ल व महाराजा मार्तंड सिंहजू देव भी आयोजन में सम्मिलित हुए।
स्थानीय आकाशवाणी केंद्र ने मिशन के गीतों से प्रभावित कई टेप किऐ जो समय-समय पर युवावाणी कार्यक्रम में प्रसारित हो रहे हैं।
बलसाड (गुजरात) परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकृत साधना का प्रत्यक्ष अनुभव यहाँ संपंन हुए शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में परिजनों ने किया। एक सुनिश्चित अनुमान के आधार पर यज्ञशाला व पंडाल की व्यवस्था की गई थी, पर समुद्र के उफान की तरह जन समूह जो उमड़ा तो रुका नहीं। यज्ञशाला की प्रदक्षिणा निरंतर चलती रही।
राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में पारसी धर्म के मुख्य धर्मगुरु के अलावा मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी संप्रदायों के धर्म गुरुओं ने अपने-अपने संदेश में राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता बतलाई। स्थानीय पत्रकारों ने तो यहाँ तक कहा कि गुजरात में विभिन्न कथावाचकों, धर्मोपदेशकों, राजनीतिज्ञों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों से भी अधिक जन समुदाय इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ तथा भावी जीवन के लिए एक नई प्रेरणा व प्रकाश लेकर गया।
छापी (बनासकांठा, गुज.) शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में ढाई लाख लोगों ने युग संदेश सुनकर अपने आप को कृतकृत्य किया।
सम्मेलन में पूज्य गुरुदेव का संदेश गायत्री तपोभूमि मथुरा के व्यवस्थापक पं. लीलापति जी शर्मा ने सुनाया वर्तमान परिस्थितियों में व्यावहारिक समाधान लोगों ने पहली बार पाया। पंडित जी की ओजस्वी वाणी ने कार्यकर्त्ताओं को युगधर्म निभाने के लिए प्रेरित किया। सभी ने यह अनुभव किया कि मानों स्वयं पूज्य गुरुदेव उनके बीच उपस्थिति है।कर्त्ता
शिवपुरी (म.प्र.) कार्यक्रम शुरू होने तक लगातार गिर रहे पानी को देखकर सभी कार्यकर्त्ता हतोत्साहित थे लेकिन जलकलशयात्रा के समय से लेकर पूर्णाहुति तक खुला आसमान देखकर लोगों ने सहज ही पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना का प्रत्यक्ष अनुभव किया।
सम्मेलन का उद्घाटन रेल राज्य मंत्री श्री माधव राव सिंधिया ने किया। ऐसे ही अन्य सम्मेलनों का उल्लेख करते हुए मंत्री महोदय ने प्रज्ञा मिशन द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। राष्ट्रीय एकता सम्मेलन को अन्य धर्म व संप्रदाय के लोगों ने भी संबोधित किया।
सब्जी बेचने वाले मुस्लिम भाइयों ने आयोजन में लगी सब्जी का भार स्वयं उठाया मुनीर खाँ टेंट हाउस का भी सराहनीय योगदान रहा।
ढोलका (अहमदाबाद) शतकुंडीय महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन का उद्घाटन गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष श्री नटवर लाल शाह ने किया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए श्री शाह ने कहा कि राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिए इन दिनों सभी को एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए। इस दिशा में गायत्री परिवार की महत्त्वपूर्ण भूमिक की उन्होंने सराहना की।
यज्ञायोजन में सभी धर्म-संप्रदाय के लोगों ने भाग लिया सभी ने यज्ञाग्नि की साक्षी में राष्ट्रीय एकता की शपथ ली।
गोंडा (उ.प्र.) यहाँ संपंन अभी तक के सभी आयोजनों को राष्ट्रीय एकता सम्मेलन ने फीकाकर दिया। प्रभावशाली 20 परिजनों की टोली ने इस आयोजन को अभूतपूर्व बना दिया।
आयोजन में स्थानीय जिलाधीश महोदय का सराहनीय योगदान रहा। सम्मेलन में सभी धर्म-संप्रदाय के लोगों ने भाग लिया। सभी ने युगनिर्माण मिशन द्वारा किए जा रहे प्रयासों को दैवी प्रयास बतलाया।
धानेरा (गुज.) शतकुंडी यज्ञ और राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में मुस्लिम, वोरा, जैन, बौद्ध सभी धर्मावलम्बियों ने भाग लिया। शोभायात्रा में प्रायः दस हजार व्यक्ति थे। तीन हजार लोगों ने राष्ट्रीय एकता व अखंडता के लिए संकल्प लिया।
प्रस्तुत समय की विपन्नताओं एवं विभीषिकाओं को देखते हुए इन आयोजनों से उद्भूत उत्कृष्ट विचारधारा के प्रवाह की प्रभावोत्पादकता को नकारा नहीं जा सकता। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हर धर्म-संप्रदाय तथा विभिन्न धार्मिक साँस्कृतिक संगठनों ने पहली बार ऐसी एकता का परिचय दिया है। सब एकजुट होकर कार्यक्रम को सफल बनाने में लगे रहे है। क्या यह सब नहीं बताता कि विभिन्नताओं से भरे हमारे राष्ट्र में परिवर्तन की नई लहर जन्म ले रही है?
(मंगल विजय)
स्वर्णिम-ज्योति पुंज सविता को, बारंबार प्रणाम है।
गायत्री के देव! आप का दर्शन दिव्य ललाम है॥1॥
सविता ! हम को प्राण दो। ओजस का वरदान दो।
दुर्व्यसनों से त्राण दो।जीवन दीर्घ,महान दो।
विषय-विकार जला दो सारे, यह विनती अविराम है।
स्वर्णिम-ज्योति पुंज सविता को बारंबार प्रणाम है॥2॥
हम इतने मेधावी हों। मनोविकार न हावी हों।
षडरिपु नहीं प्रभावी हों। तेजसवान प्रतापी हों॥
सविता देव! स्वरूप आपका तेज-ओज का धाम है।
स्वर्णिम-ज्योति पुंज सविता को, बारंबार प्रणाम है॥3॥
अंतःकरण परिष्कृत हो। चिंतन तंत्र न विकृत हो।
जीवन सात्विक, संस्कृत हो। वह व्यक्तित्व विनिर्मित हो॥
सविता देव! आपका वर्चस्, ही ऐसा आयाम है।
स्वर्णिम-ज्योति पुंज सविता को, बारंबार प्रणाम है॥4॥
सविता को आराधें हम। दिव्य गुणों को साधें हम।
स्वर्ग धरा पर ला दें हमें। धरती स्वर्ग बना दें हम॥
सविता के ही अनुदानों का प्रज्ञायुग परिणाम है।
स्वर्णिम-ज्योति पुंज सविता को, बारंबार प्रणाम है॥5॥
—मंगलविजयसमाप्त*