यह संसार चतुर प्राणियों से भरा पड़ा है। घात लगाकर दूसरों को उदरस्थ कर जाने वाले जीव-जंतुओं का बाहुल्य है। अपनी स्वार्थसिद्धि की कला में प्रवीण लोगों का ही यहाँ बहुमत है। इसके लिए उन्हें दूसरों को जो क्षति पहुँचानी पड़ती है, उस कुकृत्य से भी वे अभ्यस्त हो जाते हैं। ऐसे लोगों को ही चतुर कहते हैं। उनमें से अधिक प्रवीणों को जेलखानों में कैद और प्रतिशोधों की प्रताड़ना सहते कहीं भी देखा जा सकता है।
पक्षी पेड़ों पर बिना एकदूसरे को क्षति पहुँचाए, चहकते-फुदकते दिन बिताते हैं। चींटियाँ, मधुमक्खियाँ और तितलियाँ भी जीवनयापन की प्रकृतिप्रदत्त सुविधाओं के सहारे ही जीवन बिता लेते हैं। हिरणों के झुंड और कबूतरों की टोले भी बिना अनीति अपनाए अपनी सामान्य बुद्धि के सहारे गुजारा कर लेते हैं।
मानवी बुद्धिमत्ता का यदि सदुपयोग बन पड़े तो वह अपने लिए तो नहीं, दूसरों के लिए प्रगति और समृद्धि के उपादानों में सहायता कर ही सकता है, पर लगता है कि बुद्धिमत्ता अपनाने वाले लोग कम हैं। सबको चतुरता सुहाती है। चतुरता की परिभाषा है— ”दूसरों के उचित अधिकारों का अपहरण करते हुए अपनी वितृष्णाओं की पूर्ति करना।” चतुरता और बुद्धिमत्ता में से किसे अपनाया जाए, इस संदर्भ में मनुष्य भारी भूल करता देखा जाता है। यही है वह विभाजन रेखा, जो मनुष्य को सामान्य व असामान्य में बाँटती है।
परमात्मा द्वारा दी गई शक्तियों पर विश्वास करना ही आत्मविश्वास है। परमपिता ने हमें विवेचनाशक्ति दी है, जिसके द्वारा हम अपनी परिस्थितियों की समीक्षा कर सकते हैं। अपनी भूलों, अपनी कमियों का पता लगा सकते हैं। यही नहीं, ईश्वरप्रदत्त बुद्धि के द्वारा वर्तमान विषम स्थिति से निकलने के लिए योजना बना सकते हैं ,भावनाशक्ति का सदुपयोग करके अपनी मानसिक कमजोरियों का निराकरण करते हुए, एक-एक पग आगे बढ़ाते हुए सुख और समुन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ सकते हैं, वस्तुतः शक्तियों और साधनों की कमी नही है, जितनी कमी प्राप्त सुविधाओं और शक्तियों का आशावादी दृष्टिकोण से मूल्यांकन करने की है।
आत्मविश्वास का सीधा-सा अर्थ अपने पर विश्वास करना है। दूसरे से आशा करना, दूसरे पर विश्वास करके पुरुषार्थ छोड़ बैठना, आत्मशक्तियों का अनादर करना है। दूसरे मदद करते हैं, तो अच्छा है, नहीं मदद करते हैं तो क्या? हमको अपनी मदद खुद करनी है, अपनी टाँगों से ही सब चलते हैं। हमें भी अपनी टाँगों से ही यदि चलना पड़ रहा है, तो इसमें बुराई क्या है? इस प्रकार का दृढ़ निश्चय ही आत्मविश्वास कहलाता है।
आत्मविश्वासी अपने को दीन-हीन, अभागा नहीं मानता। वह अपने को परमपिता का पुत्र मानता है। वह अपने को परमपिता का परम कृपापात्र समझता है। वह जलचर, नभचर आदि समस्त प्राणियों से अपने को श्रेष्ठ अनुभव करता है, उसका यह पक्का विश्वास होता है कि समस्त शक्तियों के पुण्य प्रवाहरूप परमेश्वर मेरे हृदय में नित्य विराजते हैं। वह अनुभव करता है कि मैं ईश्वर का अंश हूँ; ईश्वरीय शक्तियों का पुँज हूँ; शरीर के नाश के साथ मैं मरता नहीं; मैं अजर-अमर हूँ; उज्ज्वल कर्मठता ही मेरा सहज स्वभाव है।
आत्मविश्वास मनुष्य के कार्यकलाप, जीवन-व्यवहार आदि में अद्भुत सामर्थ्य भर देता है। वह मनुष्य की बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करता है। समस्त शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शक्तियाँ उसके इशारे पर नाचने लगती हैं।
हर मनुष्य की अपनी अनोखी समस्याएँ होती हैं। कई बातों में वे दूसरों की उसी प्रकार की समस्याओं से सर्वथा भिन्न होती हैं। जिस प्रकार घायल आदमी ही अपने घाव की पीड़ा को यथार्थ रूप से अनुभव करता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपनी समस्याओं और उलझनों को अपने आप ही अच्छी तरह जानता है, दूसरा कोई उसको सही-सही नहीं समझ सकता है। अतः जब मनुष्य अपना ध्यान, अपनी परेशानियों और कठिनाइयों के स्वरूप को समझने में लगाता है, जब वह उनके कारणों को खोजने में दत्तचित्त होता है और उनके हल ढूँढ़ने का आप प्रयास करता है, उनके निवारण में लगन और तत्परता के साथ जुट जाता है, तो वह आत्मविश्वासी कहा जाता है; क्योंकि अपनी विषम परिस्थितियों और व्यथाओं का हल अपने आप करना ही आत्मविश्वास है।
आत्मा स्वयं पूर्ण है और अनंत शक्तियों का भंडार है। इन पर आस्था दृढ़ करना ही आत्मविश्वास का मुख्य लक्ष्य है। आत्मविश्वास से पग-पग पर आशा, सुरक्षा, निर्माण और अदृश्य सहायता का अनुभव अपने को आप मिलता है। जिससे आत्मविश्वास भी उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है।
आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम लिए हुए संकल्पों पर, निर्धारित लक्ष्य पर सामने पड़े कार्य पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखें। जितनी लगन और ईमानदारी के साथ इस दिशा में अग्रसर होंगे, उतनी ही तेजी के साथ हम अपने आत्मविश्वास को भी प्राणवान बनाएँगे। इसी क्रम में अनुकूल परिस्थितियाँ अपनी ओर खिंच-खिंचकर आती हुई हमें प्रतीत होंगी। आत्मावलंबन ही आस्तिकता का मेरुदंड है, यह हमें भली भाँति समझ लेना चाहिए।
पौधे खाद-पानी और भूमि की उर्वरता प्राप्त करके ऊँचे उठते हैं। मनुष्य का शरीर भी आहार, व्यायाम और संयम के सहारे परिपुष्ट होता है। दूसरी अगली भूमिका अंतःचेतना की है। विचारणा एवं भावना उसी क्षेत्र में आती है। इस क्षेत्र का विकसित होना और भी अधिक आवश्यक है। यह तत्त्व शरीरगत स्वर्णघटकों को देखता है। दुर्बल या रुग्ण रहने पर व्यक्ति अपने और अपने स्वजन-संबंधियों के लिए भारभूत हो जाता है। उपार्जन करने की क्षमता गँवा बैठने पर परावलंबी एवं तिरस्कृत जीवन जीना पड़ता है। इस प्रकार दिन गुजारने वाला व्यक्ति सोचता है, यदि उसने आहार, श्रम, और संयम का संतुलन बनाए रखा होता तो इस प्रकार की दुर्गति क्यों सहन करनी पड़ती? मनोभूमि को समुंनत बनाने के लिए शिक्षा, स्वाध्याय, सत्संग के अतिरिक्त मनन-चिंतन की भी आवश्यकता पड़ती है। इन्हें व्यक्ति स्वयं भी जुटा सकता है। आवश्यक नहीं कि इस संदर्भ में दूसरों की सहायता अनिवार्य ही हो। सद्ज्ञान-स्रोतों की कमी नहीं, उनके साथ संबंध जोड़ने के लिए उत्सुक व्यक्ति गई गुजरी स्थितियों में भी अवसर प्राप्त कर लेते हैं, जिनके सहारे वह विज्ञजनों की पंक्ति में बैठ सकें। सभ्य और सुसंस्कृत रहना सीखें। शारीरिक स्वास्थ्य के समतुल्य ही मानसिक विकास-परिष्कार की भी अपनी महत्ता है। उपलब्ध उसे भी किया जाना चाहिए।
अंतःकरण की ऊँचे स्तर वाली तीसरी भूमिका है। उसमें आस्थाएँ विराजती हैं। मान्यताएँ, आकांक्षाएँ, संवेदनाएँ, उसी परिकर में रहती हैं। साहस, उत्साह एवं संकल्प जैसे सद्गुण उसी क्षेत्र से उभरते हैं। पोषण अंतःकरण को भी चाहिए। खुराक की वहाँ भी आवश्यकता पड़ती है। विकास के लिए आवश्यक साधन जुटाए बिना काम नहीं चलता।
अंतःकरण की तीन आवश्यकताएँ हैं— एक प्यार, दूसरा प्रोत्साहन, तीसरा प्रशंसा। इनका सुयोग जितनी मात्रा में मिलता है, मनुष्य उतना ही अधिक आत्मबल अर्जित करता है। उस अर्जन के सहारे उस प्रकार का पुरुषार्थ बन पड़ता है, जिसके सहारे महापुरुष स्तर के गुण, कर्म, स्वभाव से सुसंपंन बना जा सके। इसी को व्यक्तित्व की वरीयता कहते हैं। शालीनता और प्रतिभा इसी आधार पर हस्तगत होती हैं। इनके होने पर अपने लिए आप प्रगति का मार्ग ढूँढ़ निकाला जा सकता है। मार्ग के अवरोधों को निरस्त कर सकना, इसी वर्चस्व के आधार पर बन पड़ता है। जो इन विभूतियों से वंचित हैं; उन्हें गई गुजरी-अनगढ़ स्थिति में पड़े रहने का दुर्भाग्य ही सहना पड़ता है।
मनुष्य भीतर से उठता है। वृक्ष का विकास जड़ों की गहराई पर निर्भर रहता है। छोटे पौधों को बाहरी खाद-पानी चाहिए, पर बड़े वृक्ष अपनी जड़ें गहराई में प्रवेश कराके स्वावलंबी बन जाते हैं। उन्हें गहरी जड़ें ही आवश्यक पोषण प्रदान करती रहती हैं। जड़ें वह दृढ़ता भी प्रदान करती हैं, जिनके सहारे ग्रीष्म ऋतु को सहन कर सके और आँधी-तूफानों के बीच भी तनकर खड़े रह सकें।
मानवी सत्ता का वास्तविक उद्गम उसका अंतराल ही है। मन, मस्तिष्क और काय-कलेवर उसके आवरण मात्र है। आवरणों का स्वच्छ-सुंदर होना भी आवश्यक है। उनसे भी शोभा-सज्जा की आवश्यकता पूरी होती है; किंतु जिस आधार पर किसी का मूल्यांकन किया जाता है, वह उसका अंतराल ही है। इसी के बलबूते उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त होती हैं।
कहा जा चुका है कि अंतराल को विकसित करने के लिए तीन आधार चाहिए। प्यार, प्रोत्साहन, प्रशंसा। यह तीनों ही ऐसे प्रतीत होते हैं, जो बाहर कहीं से उपलब्ध होने चाहिए। कोई प्यार करने वाला होना चाहिए। प्रोत्साहन दे सकने वाले मनस्वीजनों का सहयोग मिलना चाहिए, साथ ही ऐसे शुभचिंतक भी होने चाहिए, जो सद्गुणों की, सफलताओं की प्रशंसा करते रहें और मनोबल बढ़ाते रहें। अंतराल को इन्हीं की प्यास रहती है। वह जिसकी, जितनी मात्रा में पूरी होती रहती हैं, उसे अपना पौरुष-पराक्रम दिखाने में उतनी ही सफलता मिलती है।
जिन्हें इनकी उपलब्धि स्वाभाविक रूप से नहीं मिल पातीं, वे उन्हें खरीदकर जुटाने का प्रयत्न करते हैं। प्यार की प्यास बुझाने वेश्यालयों के चक्कर काटते हैं। प्रोत्साहन के लिए दरबारियों की भीड़ जुटाते हैं; जो मित्र-प्रशंसक जैसा दीख पड़े। प्रशंसा खरीदना तो और भी अधिक सस्ता है। पुराने जमाने में इसके लिए चारणों को मोटी रकम दी जाती थी। वे प्रशंसा के पुल बाँधने वाले गीत लिखा करते थे। अब यह कार्य प्रेस के माध्यम से कराया जा सकता है। समारोह-प्रवचनों में माइक रिकार्ड बजाने, साथियों से पहचान कराने पर भी यह कार्य बन पड़ता है। विज्ञापन, माल-असबाब को बेचने के लिए अनेक रंग से किये जाते हैं। अब आत्मश्लाघा की पूर्ति पैसा देकर, विज्ञापनबाजी के रूप में भी कराई जा सकती है। इसके लिए पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठ सदा स्वागत की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इन माध्यमों से अंतःकरण की प्यास बुझाने का जो उपक्रम किया जाता है, वह बहुत ही उथला होता है। छद्म को अपना मन तो पहचानता ही है। दूसरे लोग तो धोखे में आ भी सकते हैं, पर अपने को असली-नकली का भेद विदित ही रहता है। औरों को प्रपंच में फँसाकर, किसी प्रकार बहकाकर फुसलाया जा सकता है; परंतु अपने आप पर स्वनिर्मित वह छद्म कैसे लगे? अपने ही पाखंड में अपनी अंतरात्मा संतोष अनुभव कैसे करे? कीचड़ से प्यास कैसे बुझे?
अंतरात्मा को जिन तीन उपहारों की आवश्यकता है, वे देखने में तो नितांत वाजिब और सस्ते प्रतीत होते हैं, वस्तुतः वे उतने उथले हैं नहीं, जिन्हें प्रवंचना के रूप में पाकर मन को संतोष दिया जा सके। खरीदने पर नकल मिलती है— असल नहीं, सस्ते मोल के शेर-हाथी खिलौने के रूप में पाए जा सकते हैं, उनसे वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता है, जो सरकस में पलने पर वे कौतूहल करते दीख पड़ते रहे। वनराज या गजराज को अल्मारी के किसी कोने में बंद करके नहीं रखा जा सकता।
प्यार बहुमूल्य है, वह सच्चे रूप में किसी की प्रगाढ़, आत्मीयता में से झाँकता है। माँ बच्चे को निःस्वार्थ प्यार करती है। इसके बाद उसे उस दांपत्य जीवन में जहाँ-तहाँ देखा जाता है, जिसमें दोनों एकदूसरे के लिए समर्पित होकर जी रहे हैं। इसके बाद तो मित्रता शिष्टाचार की तरह निभती है, जिससे, जिसका, जितना स्वार्थसिद्ध होता है, वह उसी अनुपात से मित्रता का दम भरता है। स्वार्थ में कमी आने पर आँखें बदल जाती हैं। परिस्थितियाँ बदलने पर आज के मित्र, कल अपरिचित और परसों शत्रु बन जाते हैं।
प्रोत्साहन भी इसी आधार पर दिए जाते हैं। दूसरों को बड़ी जिम्मेदारियाँ लादने के लिए उन्हें गुब्बारे की तरह फुला दिया जाता है। भावावेश में किसी से कुछ कराया जा सकता है— पर पीछे उसका वजन लादने पर प्रोत्साहन देने वाले पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं। सामर्थ्य से अधिक कर गुजरने वाले, मित्रों से जिस सहायता की आशा करते थे, उन्हें मिल नहीं पाती, तो अकेले ही भार वहन करते हैं। उसी में दिवाला निकाल बैठते हैं, खर्चीली शादियों में, मृतकभोजों में, असाधारण आयोजन करने, धन जुटाने के लिए प्रोत्साहन देने वाले ही पतंग की डोरी चढ़ाते हैं। जीत की आशा न होते हुए भी चुनाव लड़ने के लिए मूजी को भी खड़ा कर देना और पीछे उसके उपहास में सम्मिलित होकर मूर्ख बताना भी उन्हीं का काम होता है, जो प्रोत्साहन देने में सर्वप्रथम अग्रणी थे।
प्रशंसा अब तक अत्यंत सस्ता ठगी का व्यवसाय बन गया है। चाटुकारिता, चापलूसी ही प्रशंसा के विविध रूप बनाती और चित्र-विचित्र नजारे दिखाती हैं। जो आघात शत्रु अस्त्र−शस्त्रों से नहीं, पहुँचा पाते, उसे मित्र का मुखौटा पहनकर प्रशंसा के तीर छोड़ते हुए बड़ी आसानी से संपन्न कर लेते हैं। किसी का विश्वास अर्जित करने और फिर उसे भयानक जाल-जंजाल में फँसा देने का सरल तरीका प्रशंसा ही ढूँढ़ निकाला गया है। कभी इस कार्य को मात्र चारण वर्ग के लोग किया करते थे, अब उस कला को अधिकांश लोगों ने सीख लिया है। इसी हुनर के सहारे वे कितनी ही चिड़ियाँ, कितनी ही मछलियाँ आए दिन फँसाते रहते हैं।
पहचानने वालों ने यह मान लिया है कि किसी को दावत खिलाकर उपदेश देकर, ज्ञान-साधन जुटाकर, अब उतनी जल्दी किसी को कृतज्ञ अथवा मित्र नहीं बनाया जा सकता। इसके बिना एक शिकार पर शिकंजा कैसे कसा जाए? उसका उत्तर प्रवंचना की दीवार से यही मिला है कि प्यार दिखाने, प्रोत्साहन देने, प्रशंसा करने के अमोघ अस्त्रों का प्रयोग किया जाए और लक्ष्य को वेधकर दिखाया जाए। निशाने को धराशाई बनाया जाए। इन दिनों इसी छद्म का सर्वत्र विभिन्न आकार-प्रकारों में प्रयोग होता देखा जाता है। यह कला अब व्यवहारकौशल में सम्मिलित हो गई है। बीन की मधुर झंकार सुनकर कितने ही मृग, बहेलियों के घर गरदन कटाने के लिए पहुँचते देखे गए हैं।
ऐसी दशा में मूल प्रश्न जहाँ का तहाँ रह जाता है कि आत्मोत्कर्ष के लिए जिन तीन साधनों की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है, उन्हें सच्चे रूप में प्राप्त कर सकने का सुयोग किस प्रकार बिठाया जाय। इन्हें जहाँ से, वस्तुतः पाया जा सकता है, उस भांडागार तक पहुँच सकने के लिए किस प्रकार आधार खड़ा किया जाए?
इस हेतु दूर जाने की आवश्यकता नहीं, न किसी के सामने पल्ला पसारने की। याचना तो उनसे की जाए, जिनके पास मनोरथ पूरा कर सकने वाली वस्तु हो। आत्मीयता भरा गहन-गंभीर, जो प्यार कर सकते, वे कहाँ हैं? यदि हैं भी, तो क्या आवश्यक है कि वे हमें इसका पात्र समझें और अपनी आत्मा का रस निचोड़ने की अनुकंपा दिखाएँ? प्रोत्साहन देना सरल है। किसी को भी एक के बदले लाख मिलने का सब्जबाग दिखाकर लाटरी को खरीदने के लिए सहमत किया जा सकता है। सामर्थ्य से बड़ी छलाँगें लगाने वालों में से अधिकांश ऐसे ही होते हैं, जिन्होंने दलाली के लालच में दिवांध बना दिया है। प्रशंसा के पुल बाँधते देखकर किसी भी समझदार को सावधान होना चाहिए कि दाल में कहीं काला है। ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों में क्या किसी भी प्यासे अंतःकरण को मन मसोसकर ही बैठना पड़ेगा या कोई ऐसा रास्ता भी मिल जाएगा, जहाँ से, अंतरात्मा की प्यास बुझाने का अवसर मिल सके।
इसके लिए नाभि में कस्तूरी होने पर भी सुगंध के लिए दिशा-दिशा में भटकने वाले हिरन का उदाहरण सही सिद्ध होता है। उसे शांति तब मिलती है, जब बाहर की ढूँढ़-खोज करने की अपेक्षा अपनी नाभि पर नाक रखकर देखता है कि जो अभीष्ट था; वह तो अपने ही निकटतम मौजूद है।
दूसरों का आश्रय ताकने की अपेक्षा यही अच्छा है कि हम अपने आप से स्वयं सच्चा प्यार करें। अपने कल्याण की बात स्वयं सोचें। शरीर के प्रति सच्ची मैत्री प्रदर्शित करके, उसे संयम-साधना द्वारा स्वस्थ सुदृढ़ बनाने का प्रयत्न किया जाए, उसे सर्वांग-सुंदर और दीर्घजीवी बनने का अवसर दिया जाए। मन को ज्ञानवान, विचारवान, एकाग्र एवं दूरदर्शी विवेकवान बनाने के लिए निजी प्रयत्न किया जाए। यह अपने निजी प्रयत्न से भी किया जा सकता है। सत्संग न मिले तो संसर्ग से काम चलाया जा सकता है। तर्क और तथ्य पर आधारित विवेक जगाया और उसका आश्रय लिया जा सकता है। कुटेवों का परिमार्जन किया जा सकता है। दोष-दुर्गुणों को ढूँढ़ और खोज-खोजकर उन्हें बुहार फेंकना चाहिए। अपनी स्वच्छता और सुसज्जा की कमान स्वयं ही सँभालनी चाहिए। दूसरों की हम सहायता करें या दूसरे हमारी सहायता करें? दूसरों की आशा करने की खोज-तलाश करने की आशा सँजोए रहने से, कुछ काम बनने वाला नहीं हैं। अपने आपे को ही अपने में सीमित करना चाहिए और वे सब साधन स्वयं ही जुटाने चाहिए। जिनकी अपने को आवश्यकता है।
रोटी स्वयं कमाई जा सकती है। अध्ययन अपने बलबूते किया जा सकता है। तो कोई कारण नहीं कि अपने को प्यार न दिया जा सके, अपने को प्रोत्साहित न किया जा सके। अपनी गरिमा का स्मरण करके आप की प्रशंसा न की जा सके। जो वस्तुएँ दूसरों को दी जा सकती हैं, जिनके लिए अन्यान्यों से अपेक्षा की जा सकती है, उन्हें अपने को अपने भंडार में से निकालकर दिया न जा सके, ऐसी कोई बात नहीं। आत्मा के अजस्र भांडागार में किसी वस्तु, की किसी विभूति की कोई कमी नहींं। जो अभीष्ट है; उसे जानना-जगाना भर है। अंतराल का चुम्बकत्व सक्षम होते ही, वह सभी सामग्री खिंचती चली आती है, जिसकी आवश्यकता समझी और चेष्टा की जाती है।
अपने आप को, शरीर तथा मन को सच्चा प्यार करें, ताकि इन तीनों का ही समग्र हितसाधन हो सके। अपने को अग्रगमन के लिए प्रोत्साहित करें और अपने उद्गम को, भविष्य को, वर्तमान को, जगा सकने को, निरंतर सराहें, ताकि वह वैसा ही बन सके, जिसे सर्वत्र प्रशंसा के योग्य समझा जा सके। हर कोई प्रोत्साहन भरा सहयोग प्रदान करें। अपने को प्यार करने वाले उसकी प्रखरता उभारने वाले, आत्मभाव के धनी पर सभी प्यार उछालते हैं। अपने भी पराए भी, मनुष्य भी, देवता भी।
एक ब्राह्मण ने बगीचा लगाया। उसे बड़े मनोयोगपूर्वक सम्हालता, पेड़ लगाता, पानी देता। एक दिन गाय चरती हुई बाग में आ गई और लगाए हुए कुछ पेड़ चरने लगी। ब्राह्मण का ध्यान उस ओर गया तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने एक लट्ठ लेकर उसे जोर से मारा। कोई चोट उस गाय पर इतने जोर से पड़ी कि वह वहीं मर गई। गाय को मरा जानकर ब्राह्मण बड़ा पछताया। कोई देख न ले, इससे गाय को घसीट के पास ही बाग के बाहर डाल दिया; किंतु पाप तो मनुष्य की आत्मा को कोंचता रहता है। उसे संतोष नहीं हुआ और गौहत्या के पाप की चिंता ब्राह्मण पर सवार हो गई।
बचपन में कुछ संस्कृत ब्राह्मण से पढ़ी थी। उसी समय एक श्लोक पढ़ा; जिसका आशय था कि हाथ इंद्र की शक्ति-प्रेरणा से काम करते हैं, अमुक अंग, अमुक देवता से करता है। तो इन हाथों ने गाय को मारा है, इसलिए इंद्र ही गौहत्या का पापी है, मैं नहीं?
मनुष्य की बुद्धि की कैसी विशेषता है, जब मन, जैसा चाहता है, वैसे ही हाँककर बुद्धि से अपने अनुकूल विचार का निर्णय करा लेता है। अपने आप कर्मों पर भी मिथ्या विचार करके अनुकूल निर्णय की चासनी चढ़ाकर कुछ समय के लिए कुनैन जैसे कडुए पाप से संतोष पा लेता है।
कुछ दिनों बाद, गौहत्या का पाप आकर ब्राह्मण से बोला— "मैं गौहत्या का पाप हूँ तुम्हारा विनाश करने आया हूँ।"
ब्राह्मण ने कहा— "गौहत्या मैंने नहीं की, इन्द्र ने की है।" पाप बेचारा इंद्र के पास गया और वैसा ही कहा। इंद्र अचंभे में पड़ गए। सोच विचारकर कहा— "अभी मैं जाता हूँ।" और वे उस ब्राह्मण के बाग में पास में बूढ़े ब्राह्मण का वेश बनाकर गए और तरह-तरह की बातें कहते करते हुए जोर-जोर से बाग और उसके लगाने वाले की प्रशंसा करने लगे। प्रशंसा सुनकर ब्राह्मण भी वहाँ आ गया और अपने बाग लगाने के काम और गुणों का बखान करने लगा। “देखो! मैंने ही यह बाग लगाया है। अपने हाथों पेड़ लगाएँ हैं, अपने हाथों से सींचता हूँ। सब काम बाग का अपने हाथों से करता हूँ। इस प्रकार बातें करते-करते इंद्र ब्राह्मण को उस तरफ ले गए, जहाँ गाय मरी पड़ी थी। अचानक उसे देखते इंद्र ने कहा— "यह गाय कैसे मर गई"? ब्राह्मण बोला— "इंद्र ने इसे मारा है।"
इंद्र अपने निजस्वरूप में प्रकट हुआ और बोला— ”जिसके हाथों ने यह बाग लगाया है, ये पेड़ लगाए हैं, जो अपने हाथों से सींचता है, उसके हाथों ने यह गाय मारी है, इंद्र ने नहीं। यह तुम्हारा पाप लो।” यह कहकर इंद्र चले गए। गौहत्या का पाप विकराल रूप में ब्राह्मण के सामने आ खड़ा हुआ।
भले ही मनुष्य अपने पापों को किसी भी तरह अनेक तर्क, युक्तियाँ लगाकर टालता रहे; किंतु अंत में समय आने पर उसे ही पाप का फल भोगना पड़ता, दूसरे को नहीं। यह मनुष्य की भूल है कि वह तरह-तरह की युक्ति से पाप से बचना चाहता है। अतः जो किया, उसका आरोप दूसरे पर न करते हुए स्वयं को भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए।
चोट खाया हुआ साँप आक्रमणकारी पर ऐसी फुँसकार मारकर दौड़ता है कि उसके होश छूट जाते हैं, बचाव के लिए भागना ही पड़ता है। सांसारिक व्यथाओं से विक्षुब्ध मनुष्य की भी ऐसी ही स्थिति होती है। जब मनुष्य को पीड़ायें चारों ओर से घेर लेती हैं और कोई सहारा नहीं सूझता तो वह निष्ठापूर्वक अपने परमेश्वर को पुकारता है। हार खाए हुए मनुष्य की कातर-पुकार से परमात्मा का आसन हिल जाता है और उन्हें सारी व्यवस्था छोड़कर भक्त की सेवा के लिए भागना पड़ता है। मनुष्य ने बुलाया हो और उसकी शुभेच्छा न आई हो, मनुष्य ने सहायता माँगी हो और परमात्मा ने मनोरथ पूर्ण न किया हो, मनुष्य की प्रार्थना पर परमात्मा दौड़कर न चला आया होगा। ऐसा कभी नहीं हुआ और न ही आगे कभी होगा। मनुष्य के विश्वास की शक्ति के आगे परमात्मा को सदैव ही झुकना पड़ा है।
उसे बुलाइए, वह आपके अंतःकरण में दिव्य प्रकाश बनकर उतरेगा, मधुर संगीत बनकर हृदय में गुंजन करेगा, आशीर्वाद बनकर आपके दुःख-दर्द दूर करेगा। पर उसे सच्चे हृदय से बुलाइए, निष्कपट और निश्चल होकर पुकारिए।
ऐसा समय आता है, जब मनुष्य संसार को भूलकर कुछ क्षण के लिए ऐसे दिव्य लोक में पहुँचता है, जहाँ उसे असीम सहानुभूति और शाश्वत शांति मिलती है। प्रार्थना की इस आंतरिक स्थिति और उसके आनंद को कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। परमात्मा के सन्निकट पहुँचकर आत्मा, जब भक्ति-भावना से अपनी संवेदनाएँ प्रस्तुत करती है तो अनिर्वचनीय आनंद मिलता है, इंद्रियों की चेष्टाएँ शांत हो जाती हैं, उस आनंद की अभिव्यक्ति करते हुए महाकवि सूर ने लिखा है—
ज्यों गूंगहि मीठे फल को रस उर अंतर ही भावैं।
अमित स्वादु सबही जुनिरंतर अमिततोष उपजावै।
मन वाणी को अगम अगोचर सो जानै जो पावै।
सूर की अनुभूति का आनंद ध्रुव ने पाया था, उसके दुःखी हृदय ने, संसार से संतप्त अंतःकरण ने, परमात्मा को करुण स्वरों में पुकारा था। भगवान उसके पास आए थे, कुमार ध्रुव ने पूर्णता की स्थिति प्राप्त की थी। परमात्मा का अनुग्रह न रहा होता, तो ध्रुव अजर-अमर कैसे होता?
हिरण्यकश्यप की हठधर्मिता से दुःखी बालक प्रहलाद ने उसे बार-बार पुकारा, उसका नारायण बार-बार उसकी मदद के लिए दौड़ा। विष पिया उसके भगवान ने। समुद्र के गर्त्त्त में पाथेय बना प्रहलाद का भगवान। इससे भी काम न चला, तो नृसिंह बनकर प्रहलाद का भगवान खंभा चीरकर दौड़ा आया। जिसने मनुष्य को पैदा किया, उसके हृदय में अपनी संतान के लिये मोह न हो? ममता न हो, यह कैसे हो सकता है? मनुष्य बुलावे और वह न आए ऐसा कभी हुआ नहीं।
द्रौपदी जान गई कि इस सभा में उसे बचाने वाला कोई नहीं है। दुःशासन चीर खींचता है। लाज न चली जाए। इस भय से निर्बल नारी अपने दीनानाथ को पुकारती है। भगवान श्रीकृष्ण आते हैं, उसका चीर बढ़ता है। दुःशासन थक गया, पर चीर समाप्त नहीं हुआ। परमात्मा की अनंत शक्ति को नापने की सामर्थ्य किसमें है? उसे तो उनका परमभक्त ही जान और समझ सकता है।
सामूहिक प्रार्थनाओं का बल सदैव परमात्मा को स्वर्ग से धरती पर उतार लाने में समर्थ रहा। देवासुर संग्राम की कथाओं में ऐसे अनेक वर्णन हैं। महाभारत के युद्ध की घटना है। युद्धभूमि में किसी टिटहरी ने अंडे दे रखे थे। युद्ध जोर का चल रहा था। पक्षियों को और कोई सहारा दिखाई न दिया, तो उन्होंने ईश्वर की शरण ली। परमात्मा ने उनके विश्वास की रक्षा की। एक हाथी का घंटा टूटकर अंडों को छुपाकर बैठ गया। युद्ध समाप्त होने पर उसमें से पक्षियों के बच्चे सकुशल निकाल लिए गए।
गजराज की पुकार पर उन्हें वाहन का भी परित्याग करना पड़ा था। नंगे पैरों वे दौड़े थे और गज को, ग्राह के फंदे से मुक्त किया था। जब भी, जिस अवस्था में भी, जिसने परमात्मा को सच्चे हृदय से पुकारा, वह अपने आवश्यक कार्य छोड़कर दौड़ा। जीवात्मा के प्रति उसकी दया अगाध है, अनंत है। वह भक्त का स्नेहबंधन ठुकराने में असमर्थ है।
बहुत से लोग हैं, जो ईश्वर और उसके अस्तित्व को मानने से इनकार करते हैं, पर यदि भली भाँति देखा जाए तो मूढ़ताग्रस्त व्यक्ति ही ऐसा कर सकते हैं। एक बहुत बड़ा आश्चर्य हमारे सामने बिखरा पड़ा है। उसे देखकर भी जिसका विवेक जागृत न हो, कौतूहल पैदा न हो, उसे और कहा भी क्या जाएगा? पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा कर रही है, यह दृश्य आज किसी अन्य ग्रह में बैठे देख रहे होते तो समझते, मनुष्य का अभिमान कितना छोटा है। ब्रह्मांडों की विशालता की तुलना में वह चींटी से भी हजार गुना छोटा लगेगा। अनंत आकाश और उस पर निरंतर होती रहती ग्रहों-नक्षत्रों की हलचल, सूर्य-चन्द्र, सागर, पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, वनस्पति मनुष्य के स्वयं के बदलते हुए क्षण, क्या यह सब मनुष्य का विवेक जागृत करने के लिए काफी नहीं हैं? परमात्मा का अस्तित्व मानने के लिए क्या इतने से संतोष नहीं होता? विचारवान व्यक्ति कभी ऐसा न सोचेगा। इतनी बड़ी विश्वव्यापी गतिविधि का नियंत्रणकर्ता तो कोई होना ही चाहिए। पृथ्वी ठीक 365.25 दिन में ही सूर्य की परिक्रमा लगाए, इतनी सूक्ष्मगति निकालने वाला कोई विधायक सृष्टा तो होना ही चाहिए। कोई नियामक न होता तो संभवतः स्थूल प्रकृति का अस्तित्व भी न होता। सर्वत्र शून्य बिखरा पड़ा होता।
संपूर्ण हिन्दू संस्कृति का आधार ईश्वरनिष्ठा ही है। कोई भी धार्मिककृत्य परमात्मा के ध्यान के बिना प्रारंभ नहीं करते। उसे स्मरण करते ही वह शक्ति मिल जाती है, जिससे मनुष्य कठिनाइयों को पार करता हुआ आगे बढ़ता चला जाए। मनुष्य जीवन में पग-पग पर ऐसी कठिनाइयाँ आती हैं कि उनमें ईश्वरीय सहयोग न मिले और परमात्मा का अनुग्रह न प्राप्त हो तो मनुष्य का जीवन विशृंखलित हो जाए। ईश्वर पर विश्वास कर लेने के बाद अंतःकरण में इतनी दृढ़ता आ जाती है कि फिर बाहरी कठिनाइयाँ विक्षेप नहीं कर पातीं और सफलता का मार्ग खुलता चला जाता है।
ऐसे उदाहरण इस युग में भी चरितार्थ होते रहते हैं। संत-ज्ञानेश्वर, जगद्गुरु शंकराचार्य, संत तुकाराम, सूर और तुलसी का जीवन बीते कुछ अधिक दिन नहीं हुये। भारतीय स्वतंत्रता की उपलब्धि अभी कुछ दिन पूर्व ही हुई है। उसका प्रणेता महात्मा गाँधी अकेला था। शरीर भी कुल 86 पौण्ड का। कोई सेना साथ में न थी। कोई शस्त्र भी न उठाया था उनने। “राम-नाम” का बल था गाँधी के पास। पर उस नाम के स्मरण और चिंतन में ऐसी प्रगाढ़ निष्ठा भरी थी कि गाँधी के नाम से लहर आती थी और उत्तर-दक्षिण में एक विकट तूफान-सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गाँधी की नहीं थी, जनता की भी नहीं थी; संपूर्ण क्रांति का बीज वह “राम-नाम” था जो हर वक्त गाँधी की जबान पर रहता था, उसके हृदय में गूँजता रहता था।
आदिकाल से लेकर अब तक जितने भी संत-महापुरुष हुए हैं और जिन्होंने भी आत्मकल्याण या लोक-कल्याण की दिशा में कदम उठाया है, उन्होंने परमात्मा का आश्रय मुख्य रूप से लिया है। मनुष्य के पास शक्ति भी कितनी है। बहुत थोड़ा शरीरबल, उस पर विषयों के प्रलोभन, बहुत थोड़ा साधनबल, उस पर भी, सांसारिक गतिरोध। अपनी ही सामर्थ्य पर वह न तो आत्मकल्याण कर सकता है, न संसार की ही कुछ भलाई कर सकता है। पर जब भी उसने ईश्वर की जयकार की, उसे अपना सहयोगी चुना और सहायता के लिए पुकार की, कि वह दौड़ा और उसकी शक्ति बनकर दिशा प्रदर्शित करने लगा। परमात्मा की कृपा पाकर मनुष्य अपना शंख बजाता हुआ चला जाता है, मोक्ष उसके पीछे-पीछे चलता है। ज्ञान की मशाल लेकर आगे बढ़ता है, लोक-कल्याण पीछे-पीछे भागता हुआ चला आता है। इसमें श्रेय मनुष्य का नहीं, परमात्मा का है। वही शक्ति बनकर पुरुष में अवतीर्ण होता है। जो भी उसे निष्ठापूर्वक बुलाता है, उसकी मदद के लिए परमात्मा आता अवश्य है। आज तक ईश्वर-विश्वास न किसी का निष्फल गया और न आगे इसकी संभावना है।
धूर्त्तता से बाज आओ। तुम अपने सिवाय और किसी को नहीं ठग सकते।
ईश्वर को पाने या दर्शन करने के लिए कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है; क्योंकि वह सर्वव्यापी है, घट-घट वासी भी। ऐसी दशा में उसे किसी एक रूप में अथवा एक स्थान से सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता है, जब वह निर्बंध हो तो उसे एक किसी स्थान विशेष में खोज निकालने की बात कैसे बने? कहीं एक स्थान में उसे कैसे खोजा और कैसे पाया जाए?
पवन सर्वत्र संव्याप्त है। उसका कोई रूप नहीं हो सकता। पत्ते हिलने, तिनके उड़ने से उसकी उपस्थिति का आभास पाया जा सकता है, पर किसी जीवधारी की आकृति में उसे बोलते, बात करते, छवि दिखाते या किसी सिंहासन पर विराजमान नहीं देखा जा सकता। ऐसा यदि बन पड़े तो उसकी स्थिति किसी जीवधारी जैसी हो जाएगी। तब उसे स्थानवासी कहा जाएगा, निराकार नहीं। जबकि दिव्य शक्तियाँ सूक्ष्म होती हैं। यहाँ तक कि शरीर में रहने वाला प्राण तक सूक्ष्म हैं, वह समग्र काया में विद्यमान है, पर किसी एक स्थान से उसे पाया-पकड़ा नहीं जा सकता। देखना-छूना तो और भी अधिक असंभव है। प्राण की शक्ति काम करती है, उसी से अंग-प्रत्यंग का संचालन-नियमन होता है। निकल जाने पर काया को मृतक घोषित कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में प्राणी के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। इतने पर भी कोई यह आग्रह नहीं करता कि जीवन का अधिष्ठाता प्राण हमें प्रत्यक्ष दीखे, तभी संतोष मिले। जो सर्वव्यापी होगा। वह एक स्थानीय नहीं हो सकता। जो एक स्थानवासी है, उसे सर्वव्यापी नहीं माना जा सकता।
व्यक्तियों के साथ मैत्री या उपेक्षा चल सकती है। उससे आग्रह-अनुरोध भी किए जा सकते हैं। कुछ देने-पाने का भी प्रसंग चल सकता है। व्यक्ति, व्यक्तियों से प्रभावित होते हैं, उन पर उपहार-मनुहार का प्रभाव पड़ता है। अवज्ञा-अवमानना करने पर वे रुष्ट भी हो जाते हैं। अपने-पराये का इस लोक-व्यवहार में भेदभाव भी चलता है। अपनों के साथ पक्षपात बरता जाता है और परायों के साथ शिष्टाचार भर बरता जाता है; किंतु शक्तियों का स्वभाव-व्यवहार ऐसा नहीं होता। वे एक नियम-अनुशासन में बँधी रहती हैं और जिनके भी संपर्क में आती हैं; उन्हें उन मर्यादाओं का पालन करते देऩाता चाहती हैं, जिनसे कि वे स्वयं आबद्ध हैं।
अग्नि तत्त्व है, संव्यापक। उसकी उपस्थिति ईंधन में स्पष्टतया देखी जा सकती है। जब तक ईंधन का अस्तित्व समाप्त हुआ कि अग्नि का प्रकट रूप भी अदृश्य हो जाता है। यों वातावरण में तापमान को देखते हुए यह अनुभव किया जा सकता है कि अग्नि की सत्ता अदृश्य रूप में सर्वत्र संव्याप्त है।
अग्नि के उपयोग के कुछ नियम है। उन्हीं के अनुसार उसे जलाया और अभीष्ट प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि अग्नि का कोई भक्त है, या विश्वासी। अग्निपूजक के यहाँ भी वह जलती है, विद्वेषी के यहाँ भी। उसका अनुग्रह प्राप्त करते रहने का केवल एक ही तरीका है कि अग्नि से संबंधित नियमों का पालन किया जाए। जो इसमें व्यतिक्रम करता है, वह जोखिम उठाता है। अग्नि हवन करने वालों और दीपक जलाने वाले की भी असावधानी को क्षमा नहीं करती। वह बाल-वृद्ध का, शिक्षित-अशिक्षित का भी अंतर नहीं करती। व्यक्तिगत रूप से किसी से मैत्री भी नहीं निबाहती। साथ ही निंदा-प्रशंसा के फेरे में पड़कर किसी के प्रतिकूल भी नहीं करती उसे अपने नियमों के परिपालन में ही भक्ति दीखती है। सतर्कता बरतने और नियमों को पालने वाले मित्र की वह समुचित सेवा-सहायता भी करती है; पर जो कोई निर्धारित मर्यादा में व्यतिरेक करता है, वह तत्काल दंड पाता है। उसका यह मनोरथ पूरा नहीं होता कि पूजा-अर्चा के बदले, उसके साथ रियायत बरई जाए। भूलों की दर गुजर की जाएगी। प्रमादी हवनकर्त्ता भी हाथ जला देते हैं। अप्रमादी अनगढ़ होने पर भी गड़रिया-लुहारों की तरह उसके सहारे अपने परिवार का निर्वाह करते रहते हैं।
व्यापक शक्तियाँ निराकार होती हैं। आकार धारण करते ही, उनकी व्यापकता समाप्त हो जाती हैं। गुरुत्वाकर्षण, तापमान, पवन, ईथर, आदि तत्व की सत्ता व्यापक तो है, पर न तो हम उन्हें देख सकते हैं और न पकड़ ही पाते हैं। इसके लिए प्रयत्न करना निरर्थक है।
पदार्थों की सहायता से हम अदृश्य शक्तियों की उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं। शीत को देखा नहीं जा सकता, पर बर्फ पड़ने पर उसकी विशेष उपस्थिति का भान आसानी से हो सकता है। भट्टी में दुहकते अंगारों से अग्नि की उपस्थिति का प्रत्यक्ष भान होता है। यह सापेक्ष है। तत्वों की उपस्थिति किन्हीं आधारों के माध्यम से ही जान पड़ती है। अंधड़ में, तूफान में, पवन की विशेष गतिशीलता देखी जा सकती है। प्राणियों की चलती-फिरती काया ही उनके भीतर प्राण की उपस्थिति का भान कराती हैं। उसे पकड़ना या देखना अशक्य है।
प्रभुदर्शन को हम अपने भीतर भी देख सकते हैं और बाहर भी। वह सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों, सद्भावना और सत्कर्मों के रूप में दृष्टिगोचर हो सकता है। श्रद्धा, निष्ठा और प्रज्ञा के रूप में उसका परिचय मिल सकता है। आत्मसंयम और पुण्यपरमार्थ में उसकी बहुलता आँकी जा सकती है। पानी के गुण तो बूँद में भी वही रहते हैं; किंतु छोटी जगह में उसे स्वल्प और बड़े सरोवर में भी उसे अधिक मात्रा में विद्यमान देखा जा सकता है। पात्रता एवं पवित्रता के आधार पर कोई व्यक्ति अपने में ईश्वरतत्त्व की अधिक अवधारणा कर सकता है। दुष्ट और भ्रष्ट गीली लकड़ी की तरह धुँआ देते और बदबू फैलाते रहते है। यद्यपि अग्नि का अंश उनमें भी मौजूद रहता है, जिन्होंने अपने अंतराल को सुसंस्कारिता से भर लिया है, वे सरलतापूर्वक कपूर की तरह जलने और अपनी प्रभाव-परिधि में सुगंध फैलाने लगते हैं।
जिन्हें ईश्वरदर्शन की लगन है, उन्हें छवि विशेष के रूप में देख पाने की ललक छोड़नी चाहिए। उन्हें इस विश्व-विस्तार को देखकर, उसके कर्त्ता का अनुमान लगाना चाहिए। कुम्हार के बिना घड़े नहीं बनते, आभूषणों की संरचना स्वर्णकार ही करते हैं। इस प्रत्यक्ष जगत को देखकर उसके कर्त्ता का सुनिश्चित-सुनियोजित संसार की सुनिश्चित गतिविधियों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि यह अपने आप बन गया है। तिनके, पत्ते तक किसी व्यवस्था के अंतर्गत ही विनिर्मित होते हैं, यह व्यवस्थापक चेतना ही परब्रह्म या परमेश्वर है।
उसके साथ घनिष्ठता साबित करने, उसकी अनुकंपा का अधिकतम लाभ लेने का सीधा-सा तरीका है कि उनके अनुशासन को पालें और दायित्वों का निर्वाह करें। सदाशयता के रूप में अपने भीतर ईश्वर की अधिकाधिक अनुभूति की जा सकती है। दया, करुणा, मैत्री, सेवा, उदारता, संयम, सज्जनता आदि सद्गुणों के रूप में ईश्वर की उच्चस्तरीय रूप में ही अवधारणा होती है।
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लेनिन को विरोधियों ने आक्रमण करके घायल कर दिया, उन्हें अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। उन्हीं दिनों पास में एक रेल्वे लाइन बन रही थी। लेनिन चुपचाप अस्पताल से निकल जाते और श्रमिकों के साथ रहकर उनका हाथ बँटाते।
धृति के अतिरिक्त धर्म के दस लक्षण में दूसरा है— ‘क्षमा’। क्षमा अर्थ का दुरुपयोग करना हो, उसे अतिवाद की सीमा तक ले जाना हो, फिर उसे लगभग कायरता भी माना जा सकता है और धर्म का लक्षण न कहकर अधर्म का प्रोत्साहन किया जा सकता है।
क्षमा अपराध करने वाले को ही किया जाता है। सज्जन या सुव्यवस्थित-सुसंस्कृत व्यक्ति को तो क्षमा करने का प्रश्न ही नहीं उठता; किंतु कुकर्मियों और आक्रामकों को क्षमा करते रहने का परिणाम क्या होगा? प्रतिक्रिया क्या उभरेगी?
निश्चय ही उद्दंड और आतताई अपने द्वारा आक्रांता का कोई प्रतिरोध न देखकर रोकथाम के संबंध में निश्चय हो जाता है और क्षमाशील को कायर-दुर्बल समझकर अगली बार और भी बड़ा हाथ मारते है और बढ़ा-चढ़ा नुकसान करते है। इस प्रकार उनका एक बार की निर्वाध सफलता उनकी हिम्मत को अनेक गुना बढ़ाती जाती है। फलतः बड़े और अधिक आक्रमण करते हैं। पहला लाभ आक्रामकों के मिलने की बात तो स्पष्ट है ही। उद्दंड अपराधियों के गिरोह इसी प्रकार बढ़े हैं। एक द्वारा सस्ते लाभ उठाने की अहंकार तृप्त करने की, सफलता को देखते हुए उसी स्तर के अन्य लोगों की भी हिम्मत बढ़ती है और एकत्रित होकर अधिक बड़े दुस्साहस करते हैं। यह स्वतंत्र रूप से भी छुट-पुट अनर्थ करने लगते हैं। चोरी, उठाईगीरी जेबकटी, ठगी आदि के कितने ही अपराधी धंधे ऐसे हैं, जिनमें किन्हीं साथियों का रहना भी आवश्यक नहीं। उन्हें तो कोई अकेला भी करता रह सकता है।
क्षमा से अभिप्राय यह समझा जाता है कि जो अनीति सहनी पड़ी उसे भूल जाया जाए और जिसने वह अतिवाद अपनाया उसे कोई दंड न दिया जाए। क्षमा के कारण हृदय बदल जाने और दुष्टों के प्रकृति बदल लेने या सुधर जाने की आशा की जाए। ऐसा होता तो है पर विशिष्ट प्रतिभाएँ ही क्षमा के साथ भी ऐसा प्रभाव डाल सकती हैं कि उनकी दंड-क्षमता बढ़ी-चढ़ी होने पर भी क्षमा करने का कोई एहसान माने या अपने को बदलने-सुधारने की बात सोचे। यह प्रक्रिया साधनों की दृष्टि से निर्धनता वाले व्यक्तियों पर लागू नहीं होती, वे क्षमा करने पर कायर ही समझे जा सकते हैं, भले ही अपने भीतर वे कैसे ही संत, भक्त क्यों न हों?
क्षमा का तात्तिवक अर्थ है कि मनःक्षेत्र में वह आक्रोश न भरे रखा जाए, जो दुष्टता को तो प्रताड़ना के आधार पर सुधारने की क्षमता नहीं रखता है, उसकी प्रतिक्रिया को एक प्रकार की आत्मप्रताड़ना बनाकर उसमें स्वयं जलता-गलता रहता है। यह दुहरी हानि उठाने जैसी बात हुई। ऐसी दशा में यही अच्छा है कि जिन भी तर्कों के सहारे अपना रोष-आक्रोश शांत किया जा सकता हो, उनके साथ आत्मपीड़ा से छुटकारा पाने वाली मनःस्थिति बनाना चाहिए। अनीतिकार द्वारा जो हानि उठाई गई है, उसे उसी सीमा तक शांत किया जाए, जिस सीमा तक मानसिक संतुलन बनाए रखा जा सके और भविष्य में वैसी पुनरावृत्ति न होने के लिए योजनाबद्ध कदम उठाना और समुचित प्रतिकार कर सकना संभव हो। क्षमा का स्वरूप इसी उद्देश्य की पूर्ति है और उसे इसी सीमा तक सीमित रखा जाना चाहिए।
कहा गया है कि क्रोध को अक्रोध से जीता जाए। इसका अर्थ यह है कि अपनी भूल कहाँ हुई? उस संबंध में सोचने और आवश्यक सुधार करने का अवसर मिले। आक्रमण किसी गलतफहमी के कारण हुआ या लोभ एवं द्वेषवश, इसका वर्गीकरण करने, विवेचना कर सकने की क्षमता भी उत्पन्न की जानी चाहिए और यदि दुर्घटना किसी भ्रम-भ्रांति के कारण हुई, तो उस संदर्भ में स्वयं या किसी अन्य मध्वत्ती-विचारशील के माध्यम से विवेचना कराई जानी चाहिए। अधिकांश झंझट भ्रांतियों के कारण होते हैं। यथार्थता से अवगत होने पर यदि सर्वथा पाषाण स्तर का दुराग्रही और वज्रमूर्ख न हुआ तो सहम भी जाता है और सुधर भी । इतनी लंबी बात सोचने और उसकी योजना कार्यान्वित करते रहने पर आक्रमण-प्रत्याक्रमण का सिलसिला चलाते रहने की अपेक्षा अधिक समझदारी का काम है कि ऐसे अवसरों पर, क्षमा की वरिष्ठता अपनी आवश्यकता सिद्ध करती है।
अनर्थ तब खड़ा होता है, जब आक्रामक को सुधारने तक का प्रयास छोड़ दिया जाए और अपने पेट पर घूँसा मारकर किसी प्रकार संतोष कर बैठने का उपक्रम किया जाए। इस प्रकार उपयोग की गई क्षमा, नशा पीकर, गम गलत करने के समान है। उससे अपना आक्रोश भर ठंडा हुआ। आक्रांता को भविष्य में वैसा करने पर और भी अधिक घाटा उठाना पड़ेगा तथा इस बार की गई अनीति का प्रायश्चित्त-परिमार्जन किए बिना भी कम न चलेगा। इससे काम में विग्रह का समुचित समाधान निकलता नहीं।
क्षमा का एक और भी स्वरूप है— सज्जनता। यह मनुष्य का उच्चस्तरीय गुण है। इसे आए दिन खड़ी रहने वाली खटपटों से उत्तेजित होकर छोड़ दिया जाना चाहिए। आक्रांता प्रायः प्रतिरोध और प्रताड़ना की भाषा ही समझते हैं। इसलिए उनका उपयुक्त प्रवाह प्रतिबद्ध करने के लिए भी अपने साथ सज्जनता का समर्थन जुटाए रहा जा सकता है। प्रतिपक्षी के साथ तत्काल गुँथ जाया जाए तो कारण और न्याय को न समझने वाले रास्ता चलते लोग उसे ही दोष देंगे, जिसे देर से अधिक विवेकवान या भद्रजन समझा जाता रहा है। ऐसी दशा में आक्रांता का जोश और होश दुरुस्त करने के लिए यह भी आवश्यक है, कि आक्रामक द्वारा पहुँचाई गई चोट का अधिक विज्ञापन होने दिया जाए। इसमें खतरा तो है कि आक्रांता की सामर्थ्य के बारे में लोगों के मनों में भय समा जाए और उस कारण वे भी अपनी जान बचाने और किसी झंझट में न पड़ने की बात सोचें। इतने पर भी यह संभावना रहेगी ही कि समीवर्त्तीया न्यायनिष्ठ लोगों का शौर्य-पराक्रम जगे और वे अपने विरोध को पीड़ित पक्ष की सहायता में अपने विचार बनाएँ, यथार्थता की अभिव्यक्ति करें और उद्दंड के लिए किसी-न-किसी रूप में अवरोधकर्त्ता के रूप में उभरें।
क्षमा की शोभा वहाँ हैं, जहाँ मजा चखने के प्रत्यक्ष साधनों की अनुभूति कराते हुए यह समझने के अवसर मिलें कि मेरे साथ उदारता, सज्जनशीलता या क्षमाशीलता बरती गई। जहाँ इतना भी प्रयोजन सिद्ध न होता हो, वहाँ क्षमा का आडंबर ओढ़ना व्यर्थ है।
क्षमाशील के लिए यह भी आवश्यक है कि अपने मानसिक संतुलन को स्थिर बनाए रखने के साथ दुष्टताजन्य दुर्घटना रोकने का उपाय-उपचार इस या उस प्रकार करें। अनीति को प्रोत्साहन करके तथा अपने आप को दीन-दुर्बल, कायर-क्लीव कहलाने का लाँछन या उपहासास्पद न बनना ही श्रेयस्कर है।
क्षमा एक संवेदनशील शक्ति है, इसका सही उपयोग करते हुए औचित्य का ध्यान रखना ही चाहिए। छोटे बच्चे नासमझ होने के कारण काम बिगाड़ते और ऊँट-पटाँग करते या बोलते रहते हैं। अभिभावक उसकी सीमित समझ को हँसी-उपहास में टाल देते हैं और किस कार्य के स्थान, पर क्या करना चाहिए इसका प्रेमपूर्वक पाठ पढ़ा देना चाहिए। रोगी उन्मादी भी न करने योग्य करते और न कहने योग्य कहते रहते हैं, उनसे वैसा ही व्यवहार करके बदला नहीं चुकाया जा सकता, उनकी परिस्थितियों को समझते हुए क्षमा करने का ही औचित्य है।
छुट-पुट, अनजाने में हो गई गलतियाँ के लिए शिष्टाचार में भूल करने वाले को खेद व्यक्त करना पड़ता है और बदले में हानि उठाने वाले को कोई बात नहीं, कहकर बात को वहीं समाप्त कर दिया जाता है। सच तो यह है। अनगढ़, अनजान, भुलक्कड़, अशिष्ट स्तर के बालबुद्धि लोगों को क्षमा कर देना चाहिए; किंतु जो जानबूझकर दुष्टता पर उतारू हैं और अपने अहंकार के उन्माद में चाहे जिस पर टूट पड़ते हैं और शोषण-अपहरण का दुष्कृत्य करते रहने का स्वभाव बना लेते हैं, उन्हें जो उपाय उपयुक्त प्रतीत हो, उसे अपनाकर सुधारने के लिए बाधित तो किया ही जाना चाहिए। यहाँ क्षमा का उपयोग साँप को दूध पिलाने जैसा अहितकर ही सिद्ध होगा।
महान व्यक्तित्व झोपड़ों में भी शोभा पाते हैं, पर निकृष्टजन महलों में भी अभागे बंदी की तरह जीवन बिताते हैं।
मनुष्य बुद्धिमान तो है, पर उसने वास्तविकताएँ कम अपनाई और भ्रांतियाँ अधिक बटोरी हैं। वेदांती कहते हैं कि यह संसार भ्रम-जंजाल है। माया का बाजीगरी खेल है। दिवास्वप्न है। इतने अतिवाद तक न जाया जाए तो भी मानना पड़ेगा कि बुद्धिमान, शिक्षित, तार्किक होते हुए भी हम यथार्थता की अपेक्षा भ्रमग्रस्तता के दलदल में अधिक गहराई तक फँसे हुए हैं।
शरीर निर्वाह में षट्रस व्यंजनों का रसास्वादन करने वाली पाककला वस्तुतः अच्छे-खासे शरीर को बर्बा-बीमार कर देने की मूर्खता भर है। जिसका हर कहीं बोलबाला है। रसोईघर में उसी की तूती बोलती है। हलवाइयों की फौज यही सरंजाम जुटाती रहती है। जीभ इन्हीं के लिए ललचाती है। दावतों की शोभा इसी आधार पर बनती है। लोग यह भूल ही गए हैं कि उनका वास्तविक आहार शाक, फल एवं दालें उबले अन्न हैं, उनके तलने-भूनने पर वे कोयलामात्र रह जाते हैं। अपनी जीवनीशक्ति बुरी तरह गँवा बैठते हैं, फलतः तथाकथित पौष्टिक महँगा आहार खरीदने वाले भी कुपोषण के शिकार होते, बीमार पड़ते और बेमौत मरते हैं। आहार-क्षेत्र में यदि समझदारी से काम लिया गया होता, तो आरोग्य संबंधी कठिनाइयों में से अधिकांश का सहज समाधान निकल आता। न खाद्य की कमी पड़ती और न महँगाई के कारण किसी को भूखा मरना पड़ता।
ऋतु-प्रभाव से त्वचा को बचाने के लिए स्वल्प परिणाम में सादे कपड़े चाहिए। पर उनके अनेकानेक, डिजाइन, अनेकानेक फैशन, एक के ऊपर एक अनेकों परतें लगाने और कीमती कपड़ों से बक्से भरे रखने की क्या आवश्यकता पड़ती। यदि सामान्य आच्छादन पर्याप्त समझा जाता तो अमीर लोग इतने महँगे और इतने अधिक लिबास न बनाते, जिनके कारण असंख्यों को नंगा रहना पड़ता है।
धोने, सुखाने और बदलने के लिए आमतौर से दो जोड़ी कपड़े पर्याप्त होने चाहिए। अधिक संख्या में कीमती कपड़े तो वे लोग जमा करते हैं, जो सौंदर्य को लिबास के साथ जोड़ने की भूल करते हैं। जिन्हें यह विदित है कि ज्ञान, विवेक एवं सौजन्य के आधार पर व्यक्तित्व निखरता है, वे कपड़ों और जेवरों से अपने को सजाकर न स्वयं भ्रम में रहते हैं और न दूसरों को भ्रम में डालते हैं। सादगी ही शालीनता की निशानी है। जिन्हें यह तथ्य विदित है वे सज-धज की मूर्खता नहीं करते; वरन विचारों की उत्कृष्टता अपनाते और समग्र सम्मान के भाजन बनते हैं; किंतु प्रचलन इसी प्रकार का फैला पड़ा है कि पोशाकें बढ़ाओं और अमीर तथा सुंदर कहलाओ। इस मान्यता को उपहासास्पद तो कहा ही जाता है साथ ही वह खर्चीले भी हैं। इस अवधारणा में बचकानापन भी टपकता है।
समय को यदि उपयोगी कार्यों में व्यस्त रखा जा सके तो उससे योग्यता भी बढ़ती है, कुशलता भी और संपन्नता भी, पर कितने लोग हैं, जो आलस्य-प्रमाण के आदी बनते हैं, आवारागर्दी में भटकते हैं और बेसिलसिले के कार्यों में अस्त-व्यस्त समय गंवाते हैं, फलतः पिछड़ी स्थिति में पड़े रहते हैं। ज्यों-त्यों करके मौत के दिन पूरे करते हैं। उन्हें उन महामानवों की जीवनचर्या पर भी नजर नहीं जाती, जिनने समय को उपयोगी कार्यों में संलग्न रखा और उन उपलब्धियों-विभूतियों को हस्तगत किया, जिनके लिए असंख्यों तरसते रहते हैं। असफलताओं का रोना-रोते और दुर्भाग्य को कोसते हैं। ध्यान से देखा जाए तो प्रतीत होगा कि पिछड़ापन और कुछ नहीं, समय का अनुशासन पालना ही है। इसी का दूसरा नाम दुर्भाग्य है, असंख्यों है, जो यही भूल करते रहते हैं और ज्यों-त्यों करके जिंदगी के दिन पूरे करते हैं।
रात्रि विश्राम के लिए है। कुदरत इसीलिए उन घड़ियों में सूर्य का दीपक बुझा देती है। पर लोग हैं, जो गई रात तक जागते रहते हैं और दिन चढ़े तक सोते हैं। बिजली के तेज प्रकाश में रात को देर तक देखते-भालते रहने से ही आँखें खराब होती हैं। उनकी रोशनी समय से पूर्व ही धुँधली होने या बुझ जाने का कारण यही प्रमाद है। रात को देर तक बिजली की चकाचौंध में काम करना। इस आधार पर जो लाभ उठाया जाता है, उसकी तुलना में वह हानि अधिक है, जो अंधता के रूप में पल्ले बँधती है।
अपने सद्गुणों को बटाने के लिए परिवार के सदस्यों को साथ लेकर गृहकार्यों में साथ लेने का क्रम बनाया जाए तो परिवार के सभी सदस्य गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता के धनी हो सकते हैं। स्वयं सुखी-समुन्नत रह सकते हैं और परिवार के अन्य सदस्यों के सुविकसित बनने में सहायता कर सकते हैं। यह जिम्मेदारी घर के वरिष्ठ सदस्यों की है। वे परिजनों को साथ लेकर श्रमशीलता, मितव्ययिता, शिष्टता, स्वच्छता, सहकारिता का अभ्यास डालते रह सकते हैं, जिसे धरती पर स्वर्ग का अवतरण कहकर सराहा जा सके; किंतु इतनी मोटी बात भी किन्हीं बिरलों के ही गले उतरती है। लोग परिवार की शान-शौकत के लिए पैसा तो बहुत खर्चते हैं, पर यह नहीं सोचते कि इस उद्यान को फला-फूला बनाने के लिए गुण-कर्म-स्वभाव का स्तर ऊँचा उठाना आवश्यक है। इस तथ्य को अनदेखा रखने, उपेक्षित करने का ही प्रतिफल है। यह होता है कि परिवार में दुर्व्यसनों, दुर्गुणों, विग्रहों की भरमार बनी रहती है और एक बाड़े में रहने वाली भेड़ों की तरह वे संयुक्त परिवार को अवगति और अस्वच्छता का केंद्र बनाए रहते हैं, बच्चे बढ़ाते रहते हैं, पर नहीं देखते कि इन नवागंतुकों के लिए आवश्यक सुविधा जुटाने का प्रबंध किया गया है या नहीं। पति-पत्नी को मिलकर एक, एक और एक मिलाकर ग्यारह का उदाहरण बनना चाहिए, पर देखा यह गया है कि अदूरदर्शिता के कारण एकदूसरे को शोषण करते रहते हैं। और परस्पर गले में भारी पत्थर बनकर रहते हैं। यह वह भूल है, जिसमें कर्त्तव्य, दायित्व और स्नेहपरमार्थ की वर्णमाला पढ़े बिना ही साहब बन बैठने की ललक सँजोते हैं। परिणाम प्रत्यक्ष है। एक दूसरे का अधिकाधिक खिन्न-विपन्न बनाते चले जाते हैं। इस परिपाटी को अदूरदर्शिता, अनाड़ीपन के अतिरिक्त और क्या कहा जाए?
आदतों में ऐसी अनेकों होती हैं, जो नशेबाजी से मिलती-जुलती हैं। दुर्व्यसनों में व्यक्ति अपना शरीर, विवेक, सम्मान और वैभव गँवाता चला जाता है। हर खर्चीली आदत इसी प्रकार की होती है। कि उन्हें दरिद्रता की सहेलियाँ भी कहा जा सकता है। दुर्व्यसन अपनाने में पहल स्वयं ही की जाती है, पर एक बार उन्हें जकड़ लेने पर छूटने का नाम नहीं लेती और छूँछ बनाकर छोड़ती हैं। इस प्रकार के क्रियाकलापों को देखने से पता चलता है कि मनुष्य जितना बुद्धिमान है, उससे कहीं अधिक वह मूर्ख भी है। शरीर को सजाने के लिए, उसे इंद्रियों के माध्यम से चित्र-विचित्र रसास्वादन कराने के फेर में तो रहता है, पर यह नहीं देखता कि किन आदतों के कारण उसे रोगी एवं अल्पायु बनाया जा रहा है।
परिवार को प्रत्यक्षतः तो प्यार किया जाता है और इसके लिए अधिकाधिक सुविधा-साधन जुटाने का भी प्रयत्न किया जाता है। पर उन्हें यह नहीं बताया या सिखाया जाता कि वे प्रियजन अपना शरीर किस तरह स्वस्थ करें। परिवार के सदस्यों को मिल-जुलकर किस प्रकार सभ्य-सुसंस्कारी बनाएँ। स्नेह-सहयोग को किस प्रकार बढ़ाएँ और उसमें दृढ़ता लाएँ। कॉलेजों में ऊँची डिग्री और विश्वविद्यालय से डॉक्टर की उपाधि प्राप्त करने वाले भी जब जीवन विद्या के संबंध में अनाड़ी-अनजान रहते हैं तो कहना पड़ता है कि बुद्धिमत्ता की वर्णमाला नए सिरे से सीखनी और सिखानी पड़ेगी।
फकीरी धूल में मिल गई
फकीर पहले अकेला रहता था। पीछे उसने शादी कर ली। दोनों मिलकर जनता के बीच जाते। गीत गाते और भलाई का मार्ग बताते। दोनों की अच्छी-खासी जोड़ी थी।
बीबी ने एक दिन खुदा से बच्चे माँगे। दो बच्चे हुए भी। वहाँ उनको शिक्षा-दीक्षा का उचित वातावरण न मिला। फलतः वे आवारागर्दी में फँस गए और ऐसे काम करने लगे, जिससे माँ-बाप की फकीरी धूल में मिल गई।
गत अंक में असमंजस भरे शीर्षक से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के संबंध में प्रचलित मान्यताओं की अनुपयुक्तता पर प्रकाश डाला था, पर यह दोष ऋषि-प्रतिपादनों का, शास्त्रकारों का नहीं। उनने जिस दृष्टिकोण से उन्हें प्रतिपादित किया था, उन्हें समझने में ही आम लोग भूल करते रहे हैं। लगता है कि प्रतिपादकों ने भी इन निर्धारणों को पहेली की तरह बना दिया है। शब्दों का तात्पर्य द्वि अर्थी भी बन सके, ऐसा कुछ किया गया लगता है, अथवा अनायास ही संयोगवश बन पड़ा है।
धर्म का अर्थ सांप्रदायिक परंपराओं का निर्वाह नहीं; वरन कर्त्तव्यपालन है। मनुष्य जैसे-जैसे विकसित हुआ, वैसे-वैसे उसके ऊपर अनेकानेक उत्तरदायित्व लदते चले गए हैं। शरीर को देव मंदिर और मस्तिष्क को क्षीरसागर-मानसरोवर मानकर उनकी पवित्रता को अक्षुण्ण रखना ऐसा अनुबंध है, जिसकी उपेक्षा करके मानवी गरिमा को अक्षुण्ण नहीं रखा जा सकता। व्यक्तित्व को प्रखर-प्रामाणिक एवं प्रतिभावान बनाने के लिए स्वभाव-अभ्यास में, समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी का समुचित समावेश करना होता है। इसमें उपेक्षा बरतने पर नर-पशु को गई-गुजरी स्थिति में गुजारा करना पड़ता है। निजी जीवन की जिम्मेदारियाँ भी कम नहीं हैं। उसका दृढ़तापूर्वक निर्वाह करना भी एक बड़ा काम है। इसके अतिरिक्त पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी ऐसे हैं, जिन्हें समझे, अपनाए बिना कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने योग्य नहीं बनता। उसे महामानव, देवमानव, श्रेष्ठ, वरिष्ठ, आदर्श, उत्कृष्ट तो कह ही नहीं सकते।
धर्म इसी कर्त्तव्य-समुच्चय के परिपालन का नाम है। जिसने अपने आपको धर्म-परायण बना लिया, समझना चाहिए कि उसने जीवन को सार्थक बनाने वाली सर्वोपरि उपलब्धि प्राप्त कर ली। यह धर्मधारणा आदर्शों का अवलम्बन चाहती है और साथ ही मर्यादाओं के अनुबंधों का संकल्पपूर्वक प्रतिपालन भी। जिससे यह करते बन पड़े, समझना चाहिए कि उसने आत्मसंतोष, जनसहयोग और देवी अनुग्रह का द्वार खोल लिया। भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला सभी आवश्यक सामान जुटा लिया। इस अभिप्राय में धर्म शब्द की सार्थकता है। अन्यथा सांप्रदायिक जंजाल की उलझनें की बढ़ाते हैं। विग्रह के घृणा औऱ दुराग्रह के बीज होते हैं। उनके कारण लाभ कम और हानि अधिक होती है।
दूसरा निर्धारण है— ‘अर्थ’। यहाँ अर्थ का तात्पर्य अत्यधिक मात्रा में संग्रह, उसमें औचित्य न बरतना एवं जो इकट्ठा किया है, उसका दुर्व्यसनों के उपभोग में नियोजन समझा जाता है; क्योंकि आम आदमी यही करता है। अर्थ शब्द की चर्चा होते ही संपत्ति और उसकी सहचरी विलासिता सामने आ खड़ी होती है। हेय, उसे इन्हीं कारणों से माना जाता है। अपरिग्रह को पुण्य और संचय को पाप इसीलिए माना जाता है कि संकीर्ण स्वार्थपरता अपनाकर जहाँ व्यक्ति अनीति पर उतारू होता है, वहाँ दुर्व्यसनी भी बनाता है और ईर्ष्या के विषबीज बोता है। यदि अर्थ का यह प्रचलित स्वरूप न रहे, उसे ईमानदारी से परिश्रमपूर्वक कमाया जाए और न्यूनतम में निर्वाह करते हुए बचत को परमार्थ-प्ररयोजनों में लगाया जाए तो कोई कारण नहीं, ‘अर्थ’ की सार्थकता को सराहा न जाए। सदुपयोग बन पड़ने पर धन से अपनी और दूसरों की सर्वतोमुखी प्रगति ही होती है। इसीलिए जीवन की सार्थकता में, आरोग्य की फलश्रुति में यदि ‘अर्थ’ का उल्लेख किया गया है, तो वह उचित ही है।
तीसरा धर्मफल है— ’काम’। इस शब्द से आशय अधिक मेहनत करने या कामुकता में संलिप्त होने का मिलता है। काम-धन्धे वाला परिश्रम भी उतना ही करना चाहिए, जितना शरीर सहन करे। अधिक लालच में इतना व्यस्त रहना कि परमार्थ सोचते या करते ही न बन पड़े तो फिर समझना चाहिए कि यह लालच ऐसे ही बुरे परिणाम उत्पन्न करेगा। जैसा कि जाल में फँसने वाली चिड़िया-मछली को भुगतने पड़ते हैं। ऐसे व्यस्त आदमी मात्र व्यवसाय में तो तल्लीन रहते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि जीवनकाल का समुचित नियोजन कैसे करना चाहिए और सर्वतोमुखी प्रगति की योजना कैसे बनानी चाहिए? ऐसे लोग शरीर, विद्या, परिवार, आदि सभी विकासोन्मुख क्षेत्रों की उपेक्षा करते हैं और कोल्हू के बैल की तरह घिसते-पिसते जाते हैं। आठ घंटे काम के, आठ घंटे विश्राम के, चार घंटे अन्य संसारी कार्यों के और चार घंटे विशुद्ध परमार्थ-प्रयोजनों के लिए रखने पर ही सभी आवश्यक कार्य पूरे होते चलने का क्रम बनता है।
काम का अर्थ कामुकता करना तो अनर्थ को वरण करना है। मानसिक अश्लील चिंतन तो शारीरिक स्खलन से भी महँगा पड़ता है। वीर्यपात से अधिक हानि कामुक चिंतन से होती है। उस कारण मानस तंत्र जो उपयोगी योजनाएँ बनाने और उन्हें कार्यांवित करने में लग जाता था, ऐसे जंजाल में फँस जाता है, पर उपलब्धि कुछ भी हाथ लगती नहीं है। लगता भर ऐसा है कि किसी दूसरे के सहवास से आनंद उठाया जा रहा है, पर वस्तुतः होता यह है कि अपने जीवनरस को, इंद्रिय-सामर्थ्य को चिंतन की सरसता को जलाकर फुलझड़ी जलाने जैसा कौतूहल देखा जाता है। उससे जीवनीशक्ति कम पड़ती जाती है और मौत दिन-दिन निकट दीखती है। कामुकता अकालमृत्यु को आग्रहपूर्वक निमंत्रण देना है। इसलिए जीवनफल में जो ‘काम’ शब्द का प्रयोग हुआ है। पर अभिप्राय वस्तुतः कामुकता से नहीं। काम शब्द क्रीड़ा, विनोद मनोरंजन के अर्थ में आता है। यह हँसने-हँसाने के क्रियाकलाप को अपनाना है। भारी मन से न रहा जाए। स्वभाव ऐसा बनाया जाए कि सहज प्रसन्नता चेहरे पर दौड़ती रहे। ऐसा तभी हो सकता है, जब मन को हलका-फुलका रखा जाए, सौम्य-नम्र रहा जाए। खिलाड़ी जैसी भावना से जीवन का खेल खेला जाए। ऐसी दशा में प्रकृति के दृश्यों में तथा जीव-जंतुओं की हलचलों में सौंदर्य देखा जाए। वनस्पतियों में हरीतिमा छाती है, फूल खिलते हैं, फल लगते हैं यह सभी ऐसे हैं, जिन्हें सुंदर चित्र की तरह चित्रित देखकर प्रसन्न चित्त रहा जाता है। रात में नीले आकाश में दिखने वाले चाँद-सितारे भी कम आनंददायक नहीं है। यदि मनुष्य निराश, खिन्न-उद्विग्न प्रकृति का हो तो उसे अपने इर्द-गिर्द का सारा वातावरण प्रतिकूलता और उद्विग्नता से भरा-पूरा लगेगा; किंतु यदि अंतर की प्रफुल्लता और लगाव ही ऐसा रहने की आदत हो तो उसके लिए आवश्यक आधार ढूँढ़ निकालने में तनिक भी कठिनाई न पड़ेगी।
चौथा जीवन लाभ है— मोक्ष। मोक्ष को मुक्ति भी कहते हैं। इसके लिए मरना आवश्यक नहीं। जीवित स्थिति में इसी काय-कलेवर में यह रसास्वादन किया जा सकता है।
लोभ को हथकड़ी, मोह को बेड़ी और अहंकार को गले की तौक माना गया है। कमर का रस्सा भी। चोर इन्हीं के द्वारा जकड़े जाते हैं। इन्हीं को भवबंधन कहते हैं। इससे छुटकारा पा लेने पर जीवनकाल में ही मोक्ष का आनंद लिया जा सकता है। यह बंधन यों आँखों से प्रत्यक्ष तो नहीं दीखते। पकड़े अनुभव भी नहीं किए जा सकते; किंतु आत्मनिरीक्षण से इन्हें जाना-समझा अवश्य जा सकता है। विचारों और कृत्यों की समीक्षा करके यह सहज ही समझा जा सकता है कि वस्तुओं से व्यक्तियों मे लगाव कितना अधिक हैं। इसी कारण व्यक्ति साधनों को पाने और उन्हें अनुकूल, अनुरूप बनाने के लिए विविध-विधि प्रयत्न करता है। उद्धत-अहंकार में व्यक्ति अपने बड़प्पन का ढिंढोरा पीटता है और दूसरों को तुच्छ जताने में तिरस्कृत करने में चूकता नहीं। सदैव सौंदर्य-शृंगार से सज्जित होने तथा वाहवाही लूटने के लिए आतुरता बनी रहती है। कई बार तो दर्पवश आततायी स्वयं को आनंद देने ऐसे वाले कार्य भी करता है, जिनके कारण दूसरे भयभीत हों, आतंक मानें। इन्हीं सब दोष-दुर्गुणों को भव-बंधन कहा गया है। अन्यथा शरीरधारण करने या उससे छूट जाने में क्या अन्तर पड़ता है। सच तो यह है कि मनुष्य शरीर सुर-दुर्लभ है। उसमें इतनी विभूतियाँ, सिद्धियाँ भरी पड़ी हैं कि जीव उन्हें उपलब्ध करने के लिए यहाँ तक कि देवता भी उनमें आश्रय प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। ऐसी स्थिति में शरीररहित होकर भगवान जी के बंगले में रहने की बात सोचना सर्वथा दिवास्वप्न है। जीवन के चारों फल स्वास्थ्य एवं समग्र सदाशयता प्राप्त करके ही इसी जीवन में पाये जा सकते हैं।
देवताओं की संख्या 33 कोटि मानी गई है। कोटि का अर्थ श्रेणियाँ भी होती हैं और करोड़ भी। हो सकता है कि दिव्य मानवों की, भारतीय नागरिकों की संख्या कभी तैंतीस करोड़ रही हो। बृहत्तर भारत की परिधि में जम्बू द्वीप आता है, जिसे वर्तमान एशिया के समान ही माना जा सकता है। इतनी परिधि में इतने सभ्य, शालीन लोगों का निवास होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि देवमानवों के 33 स्तर एवं कार्य क्षेत्र रहे हों। श्रेष्ठताएँ अनेक प्रकार की हो सकती हैं। प्रतिभा के स्तर भी अनेकानेक हैं। सेवा के कार्यक्षेत्र भी अनेक प्रकार के हैं। इनमें से 33 को प्रमुख माना गया हो, यह भी माना जा सकता है।
उपरोक्त प्रकार के सभी देवों में पाँच प्रमुख माने गये हैं। इन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश और सूर्य माना गया है। सम्पदा, विद्या, बलिष्ठता, प्रतिभा एवं कला को देवियाँ माना गया है। पंच देवों में पंच तत्व, पंच प्राण, पाँच कोश भी गिने जाते हैं। ज्ञानेन्द्रियों की गणना भी पंच देवों में है। वे सामान्यतया रूप, रस, शब्द, गंध, स्पर्श की जानकारियाँ देती हैं। उनका सामान्य विकास इतना ही होता है, जितना कि दैनिक जीवन में प्रयोग होता है। शेष शक्ति निष्क्रिय, रहने के कारण प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। फिर भी मृत नहीं होती। प्रयत्न करने पर उसे अभीष्ट स्तर तक जगाया जा सकता है। असाधारण स्तर तक सक्षम बनाया जा सकता है।
जिव्हा का सामान्य कार्य चखना और बोलना है। चखने में विकृत स्वाद ही उसके पल्ले बाँधा गया है। मसाले, मिठाई, चिकनाई उस पर एक व्यसन बनकर नशे की तरह चढ़ गये हैं। चटोरपन की आदत के कारण वह आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में अभक्ष्य खाती पीती रहती है। फलतः वह मौलिक क्षमता नष्ट हो जाती है, जिसके आधार पर चखने मात्र से पदार्थों के गुणों को जाना जा सकता है, जिनका विवेचन, विश्लेषण और वर्गीकरण हो सकता है। कोई समय था जब वनस्पतियों और कन्दमूल, फलों के गुणों का विश्लेषण किया गया था कि किस-किस मात्रा में किस प्रकार प्रयुक्त करके क्या प्रतिफल पाया जा सकता है। मुख एक अच्छी खासी प्रयोगशाला का काम करता है। चबाता और उदरस्थ करने का काम तो करता ही है साथ ही चखने मात्र से यह भी जान लेता है कि किस पदार्थ में क्या रसायन, किस अनुपात में मिले हुए हैं। उनका किस प्रकार किस निमित्त क्या उपयोग होना चाहिए? किन्तु अब उसकी वह क्षमता नष्ट हो गई। मात्र चबाने, निगलने भर के लिए ही उसका प्रयोग होता है। अविवेकी, अनाचारी परीक्षक की तरह वह स्वाद की रिश्वत लेकर उन वस्तुओं को भी पेट के भीतर तक पहुँचने देती है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से तो सर्वथा अहितकर हैं पर वेश्या के रूप की तरह आकर्षक लगते हैं और जादू चलाकर सर्वनाश के लिए सहमत करते हैं।
वाणी की कर्कशता, छलना, धूर्तता किस प्रकार लोगों को जाल में फँसाती, किस प्रकार दिग्भ्रान्त करके कहीं से कहीं पहुँचाती है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। मिथ्याचार, मायाचार का प्रपंच वाणी द्वारा ही रचा जाता है। ऐसा प्रयोग होते रहने से उसकी प्रभाव शक्ति नष्ट हो जाती है। मात्र कर्ण प्रिय लगने वाले विष घोलती रहती है। असत्य और प्रपंच उसका स्वभाव बन जाता है। फलतः बोलने पर भी दूसरों का विश्वास एवं सहयोग प्राप्त कर सकना संभव नहीं हो पाता। कुमार्गगामी मार्गदर्शन करके अनेकों को वह अनाचारी बनाती रहती है। स्वार्थ साधने के लिए अनेकों का अनेक प्रकार अहित करती रहती है।
जिव्हा का संयम यदि साधा जा सके तो उसके चमत्कारी प्रतिफल नकद धन की तरह हाथों हाथ परिलक्षित होते दीख पड़ सकते हैं। अस्वाद व्रत की साधना बन पड़े तो चटोरपन की नशेबाजी वाली लत छूट सकती है और भक्ष्य अभक्ष्य का बोध फिर से वापस लौट सकता है। इस आधार पर न केवल भोजन की मात्रा और सुव्यवस्था चल पड़ेगी वरन् बिगड़ा हुए स्वास्थ्य चल पड़ेगी वरन् बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य भी सुधर जायगा। पेट पर अनावश्यक भार न पड़े तो समझना चाहिए कि अस्वस्थता की समस्या का आधा समाधान निकल आवेगा। निरोगता और दीर्घ जीवन परस्पर मिले हुए है। जिव्हा की दूसरी साधना है-मौन। नित्य दो घण्टे सुविधा के समय पर मौन रहने की आदत डालनी चाहिए। इस व्रत के समय लगातार यह ध्यान रखना चाहिए कि अनावश्यक रूप से वाक् शक्ति का उपयोग नहीं करना चाहिए। बहुत बक-झक करने वाले को लवार समझें। उनकी बात में आत्मश्लाघा परनिंदा, चुगली आदि अनौचित्य भरे रहते हैं। इससे वाणी का प्रभाव चला जाता है। विश्वसनीयता और प्रामाणिकता घटती है। समय और शक्ति का अपव्यय होते रहना तो स्पष्ट ही है। अभ्यास यह किया जाना चाहिए कि आवश्यक वार्त्तालाप ही किया जाय। सम्भाषण में अपनी विनम्रता और दूसरों की प्रतिष्ठा का पुट समुचित मात्रा में लगाया जाय। जो भी कहा जाय वह आदर्शवादिता का पक्षधर होना चाहिए। परामर्श प्रतिपादन सभी ऐसे होने चाहिए जो इस कसौटी पर खरे उतरें। इस प्रकार मर्यादाओं का निर्वाह करते हुए जो बोला जाता है वह व्यावहारिक मौन की मर्यादाओं के अंतर्गत ही आता है। यह वाणी का तप है। ऐसी सधी गई वाणी प्रभावशाली होती हैं वह मात्र कानों की सरसता बन कर नहीं रह जाती वरन् मस्तिष्क एवं हृदय की गहराई तक पहुँचकर शब्द बेधी बाण की तरह अचूक निशाना साधती और अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करती है। सत् ऋत् हित् मित् यह वाणी के चार गुण है। सत्य ही बोला जाय। कल्याणकारी बोला जाय। सीमित बोला जाय। आदर्श युक्त बोला जाय तो समझना चाहिए कि वह सम्भाषण भी मौन साधना में सम्मिलित होकर रह रहा है। ऐसी परिशोधित वाणी शाप और वरदान देने की सामर्थ्य रखती है। उसके कथन सत्य होकर रहते हैं। मस्तिष्कीय विचार उच्चस्तरीय रहते हैं। और भावनाओं, आस्थाओं, आकाँक्षाओं का स्तर ऊँचा उठाते हैं।
अन्य प्राणी वाणी का उपयोग उद्देश्यपूर्ण प्रयोजनों के लिए ही करते हैं। इसलिए वे भले ही कम बोलते हैं, पर जितना भी बोलते हैं, उससे सम्बद्ध समुदाय को महत्वपूर्ण सूचनाएँ देते हैं। आवश्यक आदान-प्रदान करते हैं। उनका शब्द भण्डार सीमित रहते हुए भी उतना काम चला लेते हैं जितना कि सभ्य समुदाय के लोग परस्पर आवश्यक वार्त्तालाप करके निकलते हैं। अपनी जिव्हा सधी हुई हो तो उसका प्रभाव निकटवर्ती कर्णेन्द्रिय पर भी पड़ता है। दोनों के संयोग से अन्य वाणियों की अनगढ़ भाषा होने पर भी उनका अभिप्राय समझ की विशिष्टता से हस्तगत होते हैं। मनुष्य का साथ न रहने पर भी वे निकटवर्ती अन्य प्राणियों के साथ विचार विनियम करते रह सकते हैं। वे आपस में क्या कह सुन रहे हैं, इसका अनुमान लगा सकते हैं। इस प्रकार सुनसान भी उनके लिए अच्छे खासे मनोरंजन की आवश्यकता पूरी करता रहता है। इस आधार पर ज्ञान सम्पदा का दायरा तो विस्तृत होता ही है।
त्वचा इन्द्रिय की सक्षमता भी अन्य किसी ज्ञानेन्द्रिय से कम नहीं है। अन्य इन्द्रियों का आकार तो थोड़ा-थोड़ा ही होता है। त्वचा तो समूचे शरीर में लिपटी हुई हैं। इसके ज्ञान तन्तु साधारणतया स्पर्श का ही भान कराते हैं, छूकर किसी वस्तु का आकार वजन, ताप आदि की मोटे रूप में जाना जाता है, पर उसकी क्षमता इतनी सीमित है नहीं।
त्वचा में विद्युत प्रभाव निकलता है। जो शरीर के चारों ओर एक आभा मण्डल बना लेता है। यह आभा मण्डल समीप आने वालों को अपनी ओर खींचता है और उन्हें प्रभावित भी करता है। जिनने हिप्नोटिज्म विज्ञान की अतिरिक्त जानकारी प्राप्त की है, वे जानते हैं कि किस प्रकार शारीरिक विद्युत अपने क्षेत्र को प्रभावित करती है और किस प्रकार समीपवर्ती वातावरण में संव्याप्त रहस्यों को खोज निकालती है? मनुष्य के समूचे शरीर को ही एक सचेतन चुम्बक माना गया है। उसकी मात्रा चेहरे पर विशेष रूप से दीख पड़ती है। इसे सौंदर्य से भी आगे बढ़ी हुई क्षमता ओजस्, तेजस् कहा जाता है। सुन्दरता का आधार तो मात्र चमड़ी का रंग और चेहरे के साथ जुड़े हुए कान, आँख, होठ, गाल आदि की प्राकृतिक बनावट भर से संबंधित है। किन्तु यदि यह सारी बनावट सही होने पर भी स्फूर्ति, जागरुकता, प्रभावोत्पादक आकर्षण न हो, उत्तेजना देने वाली तरंग न उभरती हों तो समझना चाहिए कि बनावट सही होने पर भी स्फूर्ति, जागरुकता, प्रभावोत्पादक आकर्षण न हो, उत्तेजना देने वाली तरंग न उभरती हों तो समझना चाहिए कि बनावट सही होने पर भी चेहरे पर मुर्दनी छाई रहेगी और वह सौंदर्य किसी को प्रभावित न कर सकेगा। इसके विपरीत यदि बनावट साधारण सी हो, त्वचा काली हो, फिर भी ऐसा पाया जाता है कि प्रतिभा ओजस्विता चेहरे पर छाई रहती है और वजनदार व्यक्तित्व का परिचय देती है। यह सब त्वचा से बाहर निकलने वाले विद्युत चुम्बकत्व का प्रभाव है। इसकी मात्रा प्रकृत रूप से न्यूनाधिक हो तो उसे साधना द्वारा बढ़ाया भी जा सकता है।
त्वचा कितनी संवेदनशील है, इसका थोड़ा परिचय जननेन्द्रिय के स्पर्श या घर्षण से सहज पता चलता है। जंगलों में गरदन के दायें बायें उँगली फिरवाने पर गुदगुदी का अनुभव होता है। स्तर, कपोल, टुण्डी, होंठ आदि की त्वचा भी अधिक संवेदनशील होती है। दुलार मनुहार से इन अंगों का स्पर्श अनायास ही उत्तेजना उत्पन्न करता है। यह स्वाभाविक प्रकरण हुआ। साधना विज्ञान के आधार पर समूची त्वचा को संवेदनशील, प्रभावशाली और चमत्कारी बनाया जा सकता है। उसका स्पर्श दूसरों को कराने से उन्हें सत्संग शक्तिपात जैसा लाभ दिया जा सकता है। महाप्रभु ईसा अपना हाथ रोगियों के शरीर तथा अंगों पर फिराते और उनके रोग निवारण किया करते थे। ऐसी विलक्षणता अन्य जैव विद्युत के धनी लोगों की त्वचा में भी पाई जाती है।
कीट पतंग तथा छोटे पक्षी अपने समूचे शरीर को ही समग्र इन्द्रिय शक्ति से भरपूर रखते हैं। केंचुए की मुँह के अतिरिक्त अन्य कोई इन्द्रिय नहीं होती, पर वह मात्र त्वचा के सहारे उन सब प्रयोजनों की पूर्ति कर लेता है, जो मनुष्य अपनी सभी ज्ञानेन्द्रियों के समूह द्वारा प्राप्त करता है। चमगादड़ में त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ी-चढ़ी मात्रा में पाई जाती है। वह घने अंधकार के बीच पतले बिजली के तारों के बीच जहाँ थोड़ी जगह पाती है वहीं बिना कोई जोखिम उठाये सहज पार करती रहती है। इसी प्रकार अन्य रेंगने वाले कीड़े भी स्पष्टतः ज्ञानेन्द्रियों से रहित होते हैं, फिर भी उनकी त्वचा में रहने वाली संवेदनशीलता उन समस्त प्रयोजनों की पूर्ति करती रहती है जो बड़े प्राणियों में विकसित इन्द्रिय समूह के द्वारा ही बन पड़ता है। मनुष्य भी यदि चाहे तो अपनी उपेक्षित पड़ी रहने वाली त्वचा को मात्र पसीना निकालने वाली विसर्जन इन्द्रिय से आगे बढ़ाकर और अनेकों उपयोगी प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त हो सकने जैसे स्थिति में विकसित कर सकता है।
नाड़ी परीक्षा, जिव्हा परीक्षा, नेत्र परीक्षा, नाखून परीक्षा, हस्त रेखा, पैर रेखा आदि को देखकर वैद्य एवं सामुद्रिक ज्ञाता मनुष्य के संबंध में बहुत कुछ बता सकते हैं, यदि सूर्य विज्ञान द्वारा त्वचा की विद्युत शक्ति को अधिक बढ़ाया जा सके तो वह इतनी अधिक शक्ति सम्पन्न हो सकती है कि वह अकेली ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की संयुक्त भूमिका निभा सके।
हजरत मुहम्मद के अनेक विरोधी थे। पर वे उन सबकी परवाह न कर निरन्तर अपना धर्मप्रचार का कार्य करते रहते थे। विरोधी उन्हें इससे विरत करने के लिये तरह-तरह के प्रयास करते थे।
एक बार हजरत मुहम्मद अपने घर जा रहे थे तो उनके एक विरोधी ने ऊपर गन्दा कूड़ा-कचरा उनके सिर पर फेंक दिया। मुहम्मद साहब ने कोई विरोध नहीं किया और चुपचाप अपने रास्ते पर आगे बढ़ गये। अब उस व्यक्ति का यह नित्य का क्रम बन गया। जब भी हजरत मुहम्मद वहाँ से गुजरते, वह ऊपर से कूड़ा फेंक देता। अनेक दिनों तक ऐसा होता रहा। एक दिन सहसा इस क्रम का उल्लंघन हो गया। मुहम्मद साहब ने पड़ौसियों से पूछा ‘भाई वह व्यक्ति जो मुझ पर कूड़ा डालता था आज दिखाई नहीं दे रहा।’
पड़ौसियों ने बताया कि वह बहुत बीमार है। यह सुनते ही मुहम्मद साहब तुरन्त उसके घर गये, उसे दवा दिलवायी और कई दिनों तक उसकी सेवा सुश्रूषा करते रहे।
मुहम्मद साहब की इस उदारता और विशाल हृदयता ने विरोधी का मन जीत लिया। उसने उनके पैरों पर गिर कर अपने दुष्कर्मों के लिये क्षमा माँगी और धर्म प्रचार में उनका सहायक बन गया।
इस विश्व ब्रह्माण्ड में अनगिनत प्रकार के जीवधारी हैं जो मनुष्य के साथ ही बने रहते एवं परस्परावलम्बन के सिद्धान्त पर अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं। इकॉलाजी के नियमानुसार चित्र-विचित्र प्रकार के जीव-जन्तुओं के इस संसार में जो हमें दृष्टिगोचर होता है, प्रत्येक की अपनी कुछ न कुछ भूमिका है। यहाँ कुछ भी अकारण नहीं है।
गुबरैला एक घिनौना जीव माना जाता है। गोबर में ही आहार ढूँढ़ते रहने के कारण इसे गुबरैला नाम दिया गया है। किन्तु इसका अस्तित्व मानव के लिये एक वरदान है। हेय दृष्टि से देखे जाने से इस तुच्छ जीव की स्मृति में कैलीफोर्निया के कीट विशेषज्ञों द्वारा दो टन भार का एक कीर्ति स्तम्भ पिछले दिनों बनाया गया है। इसका उद्देश्य था, जन सामान्य को हमारे लिये हितकारी इस जीव की जानकारी देना, महत्त्व समझाना ताकि हम इसकी उपेक्षा न करे। अमेरिकावासियों के लिये यह छोटा सा अकिंचन प्राणी इतना महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ कि एक बार इसकी प्रजाति नष्ट हो जाने पर इसे आस्ट्रिया से आयात किया गया। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था।
कैलीफोर्निया प्रान्त, जो उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी भाग में राँकी माउन्टेन्स शृंखला से लगा हुआ है, में ‘क्लैमथ’ नामक एक विषैली घास का एकछत्र साम्राज्य था। प्रारम्भ में हरीतिमा लिये अंततः विषैली सिद्ध होने वाली यह खरपतवार इस प्रान्त के लगभग चार हजार वर्ग मील क्षेत्र में फैली हुई थी। इसकी बढ़ने की गति बड़ी तीव्र थी एवं किसी के लिये उपयोगी न होने के कारण यह निर्बाध फलती-फूलती रही। एक दिन ऐसा आया कि किसानों, जिनके पशु फार्म वादियों में बसे थे, के लिये यह एक मुसीबत बन गयी। प्रान्तीय स्तर पर इसे नष्ट करने के सारे प्रयास असफल रहे। अंततः एक कीट विज्ञानी ने इसका एक समाधान अनायास ही निकाला। कहीं गलती से विचरण करने आए एक गुबरैले को उन्होंने तेजी से इस खरपतवार को खाते, नष्ट करते पाया। कुछ प्रयास से उन्होंने उसे पकड़ लिया एवं प्रयोगशाला में उसे व खरपतवार के नमूने ले गए। देखा यह गया कि कुछ ही मिनटों में उस विषैली घास को इस कीड़े ने नष्ट कर उदरस्थ कर डाला और जीव−जंतु तो इससे दूर भागते थे, पर इस गुबरीले कीड़े के लिये तो यह एक स्वादिष्ट आहार था। इसकी तलाश जारी रही। पाया गया कि उस प्रजाति का गुबरीला आस्ट्रिया में बहुतायत से पाया जाता है। एक एजेंसी को इसकी भारी मात्रा में आयात करने का ठेका दे दिया गया एवं जैसे ही इन्हें मुक्त किया गया देखते ही देखते उस विषैली घास को उन्होंने नष्ट कर दिया। वे मूलतः पराग कणों व जड़ों पर हमला करते थे, जिससे उसकी वंशवृद्धि की संभावनाएँ रुक गयीं एवं एक मुसीबत से पूरे समुदाय को मुक्ति मिली।
उत्तरी कैलीफोर्निया के लास वेगास मेडफोर्ड तक के इस क्षेत्र में आज अनगिनत पशु फार्म हैं, औद्योगिक कारखाने हैं एवं वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र हैं। जबकि एक समय यहाँ चारों और यह सर्वनाशी विषैली वनस्पति अपनी जड़ जमाए बैठी थी। अब इसके समूल नष्ट हो जाने पर एक हजार पशु फार्म स्वामियों ने चैन की साँस ली है। वर्ष 1984 के जुलाई माह में फोर्टस्ट्रीवार नामक शहर में बीस हजार डॉलर मूल्य का यह कीर्ति स्तम्भ सबके सहयोग से विनिर्मित किया गया।
आस्ट्रिया, इंग्लैण्ड, फ्राँस में भी किसी समय इस क्लैमथ नामक विषैली खरपतवार का ही साम्राज्य था। वहाँ भी प्रकृति की व्यवस्था कुछ ऐसी बनी कि आस्ट्रेलिया से आये एक मालवाहक जहाज के साथ कुछ गुबरीले भी समुद्र पार कर इतनी दूर की यात्रा सम्पन्न कर यूरोप आ गये। उनने देखते-देखते अपने खाद्यान्न को ढूँढ़ कर नष्ट करना चालू कर दिया। इस तरह प्रकृति संतुलन की इस विलक्षण व्यवस्था के कारण यूरोपवासियों ने मुक्ति की साँस ली।
जिस अनावश्यक हानिकारक घास को समाप्त करने हेतु बहुत बड़ी राशि कीटनाशक दवाओं को छिड़कने के रूप में खर्च करनी पड़ती एवं बदले में मृदा-प्रदूषण हाथ लगता, उसे उपयोगी कीड़ों ने देखते नष्ट कर डाला। ऐसे शुभचिंतकों की रक्षा करना, पर्यावरण संतुलन हेतु समष्टि का हित ध्यान में रखना मनुष्य का कर्त्तव्य है, उसे निभाया जाना चाहिए।
साधनों के आधार पर ही सफलताएँ मिलती है। साधनों का ही बल भी कहते हैं। प्रत्यक्ष बलों में धनबल, बाहुबल, शास्त्रबल, बुद्धिबल आदि प्रमुख हैं। इस सबसे बढ़कर है मनोबल। मनोबल का तात्पर्य शिक्षा की कल्पना, बहुज्ञता, अनुभवशीलता से नहीं वरन् दृढ़ निश्चय से है। जब यदि आदर्शों के निमित्त प्रयोग किया जाता है तो उसी को संकल्प बल भी कहते हैं। जिसकी संकल्प शक्ति जितनी बलवान है, उसे उतने ही स्तर का बलवान कहना चाहिए।
बहुत साधन होते हुए भी लोग साधारण से काम भी नहीं कर पाते। इनके विचार डगमगाते रहते हैं। जो काम हाथ में लिया है वह उचित भी है या नहीं। अपने से बन पड़ेगा या नहीं। ऐसे विकल्प मन में उठते रहते हैं। कच्चामन में एक को छोड़ दूसरा काम हाथ में लेते हैं। कुछ दिन बाद दूसरा हाथ भी छूट जाता है और तीसरे को अपनाते हैं। इस तरह अनिश्चय की दशा में शक्ति का अपव्यय होता रहता है। दिशा निश्चित न होने पर कुछ दूर पूर्व को कुछ दूर उत्तर-पश्चिम दक्षिण को चलने वाले दिनभर घोर परिश्रम करते रहने पर भी थकान सिर पर ओढ़ते हैं। अच्छा यही है कि पहले ऊँच नीच के हर पहलू पर विचार कर लिया जाय। बुद्धिपूर्वक जो निश्चय निकले उसे दृढ़तापूर्वक अपनाया जाय।
काम देखने को शरीर से किया जाता प्रतीत होता है, पर वास्तविकता यह है कि वह मन में होता है। मनोयोग लगा देने से योजना के सब पक्ष सामने आते हैं। अन्यथा बाल कल्पनायें मन में उठती रहतीं और पानी के बबूले की तरह अस्त-व्यस्त होती रहती हैं। बच्चे सारे दिन उछल कूद करते रहते हैं। इनमें से हर एक क्रिया के पीछे कुल उद्देश्य होता है, पर ये उद्देश्य ठहरने नहीं पाते। एक के बात दूसरी इच्छा सामने आ जाती है और पिछली को छोड़कर अगली में हाथ डालते हैं। इस प्रकार दिन भर में ढेरों मनोरथ सामने आते हैं और वे सभी आधे अधूरे रहकर अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। इसी को ...सर्वांगपूर्ण बने। उसके लाभ हानि पर साँगोपाँग विचार किया जाय। साधन जुटाने के लिए जो करना पड़ेगा, उसका मानचित्र मस्तिष्क में रहना चाहिए। जो कार्य वर्तमान साधनों के सहारे किया जा सकना सम्भव है उसमें हाथ डाला जाय। भविष्य में जितने साधन बढ़ते जायं उतने काम बढ़ाते चला जाय। साधन कम पड़ें तो काम की रूप रेखा में काँट-छाँट कर ली जाय। यह सब तभी बन पड़ता है जब प्रस्तुत योजना पर समग्र मनोयोग एकत्रित किया जाय। अधूरे चिन्तन से न पूरी रूप−रेखा समक्ष में आती है और न उसका क्रम बनाने का तारतम्य ठीक से बनता है। दिलचस्पी जितनी जिस काम में रहेगी। कार्य ठीक तरह बन पड़ेगा। साधनों का नियोजन भी तभी होता है, जब पूरा मन उसमें लग पा रहा है अन्यथा उपयुक्त साधन होते हुए भी उनका उपयोग ठीक तरह नहीं हो पाता। ......... अधूरे मन से किये हुए काम सदा अधूरे रहे हैं।
मनोबल का एक अर्थ हिम्मत है। जिसमें दिलचस्प ...... शामिल है। किसी काम को रुचिपूर्वक किया जाय तो उसका प्रतिफल दूसरा होगा और बेगार भुगतने की तरह निबटाया जाय तो उसकी उपलब्धि बिल्कुल दूसरी होगी। रुचिपूर्वक बया घोंसला बनाती है तो उसकी सुँदरता और मजबूती देखते ही बनती है। मंदबुद्धि कबूतर आड़ी तिरछी लकड़ियाँ डाल देता है, उसका परिणाम ऐसे घोंसले के रूप में सामने आता है जो जरा सा हवा का झोंका भी बरदाश्त नहीं कर सकता। नौकरों द्वारा कराये गये काम में और मालिक के द्वारा अपने हाथों किये गये काम में जमीन आसमान जैसा अन्तर होता है। यह कारण है कि मजूरों द्वारा कराई गई लम्बी चौड़ी काश्त में भी कुछ लाभ नहीं होता वरन् उलटा पुलटा हो जाता है इसके विपरीत जिस खेती को घर मालिक मिलजुल कर करते हैं वह सोना उगलती है। सेना का इतिहास इसी तथ्य से भरा पड़ा है जिसके सैनिक भले ही थोड़े रहे हैं पर जो हार जीत को निजी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर लड़ते हैं वे कमाल दिखाते हैं। सफलता उनके चरण चूमती है किन्तु जो नौकर की तरह जान बचाते हुए लड़ते हैं उनकी संख्या बहुत होते हुए भी, साधन बढ़िया होते हुए भी हारते हैं। मनोबल ऊँचा बना रहे तो पीछे हटती हुई सेना भी पुनः आक्रमण करके अपने खोये हुए इलाके पुनः प्राप्त कर लेती है। इसके अभाव में वे खबरी से ग्रसित सेनापति अपने जीते हुए इलाके भी हाथ से गँवा बैठते हैं।
संसार में महापुरुषों का अपना विशेष इतिहास है। कोलम्बस, नैपोलियन आदि के पराक्रम ऐसे हैं कि जिन्हें पढ़ सुनकर दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है। इनकी शारीरिक, मानसिक बनावट में कोई खास विशेषता नहीं थी। वे भी दूसरे लोगों जैसे ही थे पर बढ़े चढ़े मनोबल के सहारे बड़ी योजनाएँ बनाने और उसे सफल बनाने में जो पराक्रम दिखाया उसके पीछे उनका बढ़ा हुआ मनोबल ही जादू चमत्कार दिखाता रहा है।
कितने ही महान आन्दोलन संसार में चले और व्यापक बने हैं। इनके मूल में एक दो व्यक्तियों का ही पराक्रम काम करता रहा है। जो अपनी लड़ाई आँधी के साथ अनेकों को आसमान तक उठा ले गये, वे न तो महाबली योद्धा थे और न साधन सम्पन्न करोड़पति। गाँधी ने जो आँधी चलाई उसके साथ लाखों पत्ते और तिनके जैसी हस्ती वाले गगनचुम्बी भूमिकायें निभाने लगे। ऐसे आन्दोलन समय-समय पर अपने देश और विदेशों में उठते रहे और व्यापक बनते रहे हैं। इनके मूल में एक दो मनस्वी लोगों के संकल्प और प्रयत्न ही काम करते रहे हैं। इसीलिए संसार के मनुष्यों में सबसे बड़ा बल मनोबल ही माना गया है। संकल्प और निश्चय तो कितने ही व्यक्ति करते हैं, पर उन पर टिके रहना और अन्त तक निर्वाह करना हर किसी का काम नहीं। विरोध, अवरोध सामने आने पर कितने ही हिम्मत हार बैठते हैं और किसी बहाने पीछे लौट पड़ते हैं पर जो हर परिस्थिति से लोहा लेते हुए अपने पैरों अपना रास्ता बनाने और अपने हाथों अपनी नाव खेकर उस पार तक पहुँचाते हैं, ऐसे मनस्वी विरले ही होते हैं। मनोबल ऐसे साहस का नाम है जो समझ सोचकर कदम उठाते और उसे प्राणपण से पूरा करते हैं।
चाहे व्यक्तिगत जीवन हो चाहे सामाजिक, सफलता के लिए मनुष्य का मनस्वी होना स्वाभाविक है। पैसा से पैसा कमाने की विद्या तो वणिक बुद्धि को भी आती है। अपराधियों जैसी हिम्मत तो चोर उचक्कों में भी होती है। आवेश में आकर लड़-झगड़ बैठना तो क्षुद्र स्तर के व्यक्ति भी कर सकते हैं किन्तु जिसमें अपना कोई व्यक्तिगत लाभ न होता हो, मात्र सिद्धान्तों का परिपोषण अथवा सार्वजनिक हित साधन ही बन पड़ता हो ऐसे कामों में हाथ डालना-उनके मार्ग में आने वाले अवरोधों से टकराना, बिगड़ती हुई परिस्थितियों में धैर्य न खोने और साथियों का उत्साह ढीला न पड़ने देना हर किसी का काम नहीं है। ऐसे लोगों में एक ही विशेषता पाई जाती है-उसका नाम है-मनोबल।
मनोबल किसी-किसी में जन्मजात भी होता है। पर यह आवश्यक नहीं। उसे अभ्यास से बढ़ाया जा सकता है। छोटे कामों में हाथ डालना और उन्हें पूरा करके ही चैन लेना यह मनोबल बढ़ाने का तरीका है। एक के बाद दूसरा काम हाथ में लेने और उनकी कठिनाइयों से निपटना यही है वह मार्ग जिस पर चलते हुए मनोबल अर्जित किया जा सकता है। यह विभूति जिसके हाथ लग गई समझना चाहिए कि महामानव बनने का सूत्र उसके हाथ लग गया।
एक सेठ की बड़ी दुकान थी। पड़ोसी का बकरा हर दिन उस पर चढ़ने का प्रयत्न करता पर युवक मालिक उसे मारकर भगाता रहता।
एक सिद्ध पुरुष उधर से गुजरे। दिव्य दृष्टि से इस घटना को देखा। उनके दुकान मालिक को बुलाकर कहा यह बकरा तुम्हारा मृत पिता है। मोहवश अपना कारोबार देखने और रखवाली करने की दृष्टि से बार-बार आता है। उसका मन दुकान को हानि पहुँचाने का नहीं। सुनने वालों ने मोह के बंधनों को समझा।
विकट समस्याएँ तो कभी-कभी ही आती हैं और उनके समाधान का परामर्श वकील, डॉक्टर विशेषज्ञों की तरह कभी-कभी ही प्राप्त करने की आवश्यकता पड़ती है। बड़े काम-काजों में भी मित्र पड़ौसियों से पूछताछ कर अपने असमंजस का समाधान करते रहते हैं, किन्तु छोटी-बड़ी ऐसी द्विविधाएँ पग-पग पर आती रहती हैं। जिनके संबंध में निर्णय लेने का काम स्वयं ही सँभालना पड़ता है।
कुछ गोपनीय बातें ऐसी होती हैं जिन्हें सहसा निकटवर्ती लोगों के सम्मुख भी विस्तारपूर्वक नहीं कहा जा सकता। कारण कि ऐसे भारी भरकम पेट वाले दुर्लभ होते चले जाते हैं, जो दूसरों की दुर्बलताओं को सुनकर उन्हें पचा सकें। अपने तक ही सीमित रख सकें। ओछे जनों के लिए बड़ी बात को पहचानना कठिन पड़ता है। बड़ी बात से तात्पर्य है, दूसरों की दुर्बलता और अपनी प्रशंसा। जब तक इन्हें उजागर नहीं कर लिया जाता तब तक चैन नहीं पड़ता।
पूर्ण तो केवल परमात्मा है। जन साधारण में गणों के साथ दोष भी बहुत पाये जाते हैं। जो भूलें हुई हैं, उन्हें मन में दबाये रहने से मनःक्षेत्र में ऐसी ग्रन्थियाँ बनती हैं, जो चुभे काँटे की तरह कसकती रहती हैं। उन्हें उजागर कर देने से चित हल्का होता है। प्रायश्चित कर लेने पर तो यह भार और भी अधिक हल्का होता है। इसके लिए ऐसा व्यक्ति कहाँ मिले जो भरोसे का हो। गैर भरोसे के व्यक्ति को दूसरों के छिद्र हस्तगत हो जाने पर उसकी क्षुद्रता तब तक चैन से नहीं बैठती जब तक चैन से नहीं बैठती जब तक वह अनेकों के सामने उस गोपनीयता को प्रकट नहीं कर देती। एक का कौतुक दूसरे का संकट बनता है। गोपनीय छिद्रों के उजागर हो जाने पर वह चर्चा का विषय बनते और प्रतिष्ठा गिराते हैं, इससे अनेक प्रकार की प्रत्यक्ष और परोक्ष हानियाँ सहनी पड़ती हैं। इसलिए समझदार लोग अपने गोपनीय रहस्यों को अपनी जानकारी तक ही सीमित रखे रहते हैं। उन्हें दूसरों के सम्मुख प्रकट नहीं करते। फिर भी वह घुटन तो बनी ही रहती हैं, कि इस निगले हुए कुकर्म को भयानक प्रारब्ध बनने के पूर्व ही उगल दिया जाय। वमन विरेचन जैसी क्रिया द्वारा उसे निकाल बाहर किया जाय। इतने पर भी यहाँ का स्वरूप निर्धारण स्वयं करते नहीं बन पड़ता। मूसल जैसे पाप के प्रायश्चित में सुई जितना प्रायश्चित करने की बात ही कृपणता स्वीकार करती है। बड़ा परमार्थ करके उसका निराकरण करने के लिए अभ्यस्त कृपणता बड़े कदम उठाने के लिए सहमति प्रदान नहीं करती। सत्परामर्श दे सकने योग्य कोई उदार चेता मित्र बन नहीं पाया हो, तो ऐसे अवसरों पर परामर्शदाता का अभाव खटकता है।
सच्चा शुभचिन्तक और सत्परामर्शदाता का न मिल सकना भी एक दुर्भाग्य है, पर इसका निवारण, समाधान कैसे किया जाय। अपने इर्द-गिर्द तो बौने लोगों की भरमार ही रहती है। उनमें से अधिकाँश ऐसे होते हैं, जो मित्र बन कर शत्रु जैसी घात लगाते हैं। सच तो यह है कि इन दिनों मित्रता बढ़ाना साँप पालने जैसा जोखिम भरा है। विश्वास का-भावुकता का-शोषण करने वाले ही अधिकतर लोग पाये जाते हैं। फिर मित्र किसे कहें? कहाँ मिले? न मिलने पर उसकी अभाव पूर्ति कैसे हो?
यह यदा कदा ही बड़ी अड़चनें सामने आयें, पर उस समाधान की चर्चा ही जिन्हें अपनी सामान्य बुद्धि खोज नहीं पाती। कभी-कभी मनुष्य चौराहे पर खड़ा होता है। सभी दिशाओं को जाने वाली सड़कें खड़ी दीखती हैं, सभी में लुभावने आकर्षण दृष्टिगोचर होते हैं। इनमें से किन्हें पकड़ा, किन्हें छोड़ा जाय? यह निर्णय करना कठिन हो जाता है। जिसमें अधिक लाभ होता है उसमें, अनीति अपनानी पड़ती है। जो सही प्रतीत होता है उसमें बढ़-चढ़ कर वैभव बटोरने, सस्ती वाहवाही का बालू जैसा महल खड़ा होने का अवसर कम ही होता है। फिर अधिक लाभ की तरफ हाथ बढ़ाया जाय या नीति निष्ठा को अपनाकर स्वल्प संतोष बनने का साहस जुटाया जाय? चयन की बेला अति कठिन होती है, उसके लिए न्याय-निष्ठा जज जैसी निष्पक्षता चाहिए। चुनाव का फैसला सही रीति से लेने वाले, विवेकवान जैसी ईमानदारी, इसे कहाँ पाया जाय? उसकी सहायता के बिना ऐसा कठारे निर्देश कहाँ से ले लें जो दल-दल में फँसने से बचा सके। सही राह दिखा सके। भले ही वह आरम्भ में कड़ुई ही प्रतीत क्यों न होती हो?
इसके अतिरिक्त सामान्य जीवनक्रम में भी पग-पग पर द्विविधा उत्पन्न होती रहती है। आदतों के प्रवाह में बहकर आगत के संकट में फँसने की अपेक्षा यह सोचना देखना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि ऐसा कदम न उठे जिसके लिए पीछे पछताना पड़े। उदाहरण के लिए दावत में परोसे गये व्यंजनों को सामने देखकर चटोरपन यह कहता है कि इसमें से प्रिय वस्तुओं को जितनी जल्दी जितनी अधिक मात्रा में सम्भव हो उन्हें उदरस्थ कर लेना चाहिए। भले ही पीछे पाचन−तंत्र की दुर्बलता के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई बड़ा विग्रह खड़ा होता जाये। इसी बीच विवेक की एक झीनी किरण यह भी परामर्श देती है कि सामने प्रस्तुत अम्बार में से मात्र उन्हीं को उतनी मात्रा में ग्रहण किया जाय जो आसानी से पच सकें। कोई संकट खड़ा न करें। परामर्श दोनों तरह के सामने हैं। इनमें से स्वीकारा किसे जाता है? इसके लिए ऐसे शुभचिन्तक की आवश्यकता है, जो उपयोगिता और औचित्य का पक्षधर परामर्श ही नहीं कठोर निर्देशन भी दे सके। उथले परामर्श आमतौर से अनसुने कर दिये जाते हैं, कान उन्हीं पर दिया जाता है जो किसी प्रभावी सहयोगी द्वारा कड़क कर दिये गये हों।
भारती तत्वज्ञान में किसी भी द्विविधा के उपस्थित होने पर सद्गुरु से परामर्श प्राप्त करने का विधान है। पर ऐसा गुरु कहाँ मिले? जो घड़ी-घड़ी पग-पग पर उपेक्षित होने वाले असमंजसों का तत्काल निराकरण कर सके। कई बार इतना समय भी नहीं होता कि दूरवासी किसी गुरु नामधारी तक अपनी समस्या सही रूप में पहुँचायी जाय और उसका उत्तर पाने के लिए प्रतीक्षारत बैठे रहा जाय। दैनिक जीवन में कई-कई बार ऐसे असमंजस सामने आते हैं, जिसमें लाभ-हानि का, पुण्य-पाप का, भावी परिणाम का सीध संबंध जुड़ा होता है। ऐसे अवसरों पर न सच्चा मित्र उपलब्ध होता है और न गुरु मार्ग-दर्शक। तब किस का आश्रय लिया जाय? श्रेयपथ का निर्धारण किससे कराया जाय? जिस प्रकार शरीर और मन सदा साथ रहते हैं, उसी प्रकार सर्वदा सहचर बनकर रहने वाले एक ‘सद्गुरु’ की आवश्यकता भी समझी गई है। उसे भीतर से ही उगाना और परिपुष्ट करना होता है। इसे दूरदर्शी विवेक कहा जा सकता है, जो उचित अनुचित का निर्णय भी करता है। साथ ही वह अपनी दिव्य दृष्टि से यह भी बताता है कि किस कार्य का परिणाम क्या होना चाहिए इन सम्भावनाओं पर ध्यान देने वाले व्यक्ति को सच्चे अर्थों में शिष्य या शालीन कहा जा सकता है।
गुरु शिष्य के रूप में एक प्रथा प्रचलन भी चरितार्थ होता रहता है। यह प्रतीक पूजा है। जिसके आधार पर उत्कृष्टता का अवलम्बन करने एवं लक्ष्य तक पहुँचने की बात बार-बार स्मरण कराई जाती रहती है। यों प्रतीक भी कई बार बड़े उपयोगी होते हैं, पर काम तो अपने को ही करना पड़ेगा। घड़ी समय की गति का परिचय देती रहती है। उसका उद्देश्य कलाई की शोभा बढ़ाना ही नहीं, यह भी है कि समय के छोटे से छोटे घटक को निरर्थक न जाने दिया जाय। उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करते रहा जाय। यह संकेत सुनते रहने पर भी घड़ी बाँधने वालों में से कितने समय की बर्बादी से बचे रहते हैं, यह ठीक से नहीं कहा जा सकता है। दूसरे सज्जनों से समय-समय पर परामर्श प्राप्त करने में हर्ज नहीं। पर सुप्रीम कोर्ट की अन्तिम अदालत तो अपने सद्गुरु को सद्विवेक को ही बताया जाना चाहिए, वही हर घड़ी साथ रह सकता है। मार्गदर्शन के साथ निर्देशन भी करता रह सकता है। जो ऐसा सद्गुरु उगा सके, उन्हीं को सौभाग्यशाली शिष्य कहना चाहिए।
अन्धा सड़क के किनारे बैठकर भीख माँगा करता और किसी प्रकार अपनी गुजर करता।
राह चलते एक पथिक ने अन्धे के दुर्भाग्य को कोसा। बात अन्धे ने भी सुन ली। बोला-अभागा मैं अकेला ही नहीं। अन्य लोग भी हैं जो आँखें होते हुए भी अपनी गतिविधियों का परिणाम नहीं सोचते और पग-पग पर ठोकरें खाते हैं।
अन्तर्मुखी ध्यान में किसी बाहरी वस्तु, दृश्य, आधार आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती। अपने आपको विश्व-ब्रह्माण्ड का, सौर मण्डल का, भूलोक का प्रतिनिधि मान कर उसी परिधि में सीमाबद्ध किया जाता है। इसके लिए किसी बाहरी अवलम्ब को अपनाने की तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती। अपना आपा पूर्ण है। वह पूर्ण से उत्पन्न हुआ, पूर्णता प्रदान करने वाली समस्त वैभवों और विभूतियों से सम्पन्न है। जब अपने घर में ही मणि मुक्तकों के भण्डार भरे पड़े हों तो किसी से मनुहार करने क्यों जाया जाये? किसलिए जिस-तिस के सामने पल्ला पसारकर अपना गौरव गिराया, मन छोटा किया जाय?
वेदान्त दर्शन में “अयमात्मा ब्रह्म” सूक्ति का उद्बोधन करते हुए इस आत्मा को ही परमात्मा का छोटा स्वरूप बताया गया है। छोटा इसलिए कि वह एक छोटे काय कलेवर में सीमाबद्ध होकर रह रहा है। यदि उसे विशालता का बोध हो चले तो सबको अपने में और अपने को सब में समाया हुआ देखेगा। तब उसे विलगता का दुःख न सहना पड़ेगा। अपने में ही विश्वात्मा के विराजमान होने का अनुभव करने लगेगा।
ब्रह्माण्डव्यापी गतिशीलता के अनुरूप अपना सौर मण्डल गति अपनाता है। उसका प्रत्येक सदस्य अपनी धुरी पर घूमता और कक्षा के परिभ्रमण करता है। यही उपक्रम प्रकृति के विशाल अंचल में खेलने वाले अनेकानेक परमाणु और जीवाणु अपनाते हैं, वे भी अपनी धुरी पर घूमते और कक्षा में भ्रमण करते हैं। सभी में मध्यवर्ती नाभिक पाया जाता है। सभी में शक्ति का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है। पर वह बीज रूप बनकर प्रसुप्त स्थिति में रहता है। जब भी उसे विकसित होने का अवसर मिलता है, वह अपनी महानता का-प्रचण्ड शक्तिमत्ता का प्रमाण परिचय देने लगता है। परमाणु विस्फोटों ने इस तथ्य को अपनी पीढ़ी के सामने सहज उजागर कर दिया है।
सामान्यजन गई-गुजरी परिस्थितियों से ऊँचे उठकर लोकनायक, महामानव, देवता, ऋषि, अवतार स्तर तक पहुँचते देखे गये हैं। इसमें बाहर के साधनों, व्यक्तियों, परिस्थितियों का यत्किंचित् ही योगदान होता है। प्रतिभा भीतर से उभरती है। महानता का उद्भव अन्तराल से होता है। बीज रूप से समस्त शक्तियों और विभूतियों की विशिष्टता हर किसी के भीतर विद्यमान है। आवश्यकता मात्र उस अवसर भर की रहती है, जिसमें उस बीज की खाद पानी पाकर अंकुरित और पल्लवित होने के लिए आवश्यक आधार मिल सके।
सर्वव्यापी तत्व निराकार ही हो सकते हैं। उन्हें चर्म चक्षुओं से नहीं देखा जा सकता। मात्र भाव संवेदना के सहारे अनुभव किया जा सकता है। बहिरंग क्षेत्र में परब्रह्म का, किसी देव का प्रतीक प्रतिनिधि मानकर उसका ध्यान किया जा सकता है। इसी आधार पर ईश्वर के दर्शन होते हैं। ध्याता की भाव संवेदना परिपक्व होकर दिवास्वप्न की तरह प्रत्यक्ष दीखने लगती है। इसी आधार पर ध्यान की परिपक्वता का प्रमाण परिचय मिलता है।
अन्तर्मुखी होकर भी इसी प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है। मानवी काय स्तर में जहाँ अवयवों का, नाड़ी संस्थान का, गुच्छकों, ग्रन्थियों, उपत्यिकाओं, जीव कोशों, ऊतकों की सुविस्तृत विधि व्यवस्था है। वहाँ उसकी अनेकानेक गतिविधियों में सृष्टा का कौशल एवं वर्चस्व भी झाँकता दीखता है। इस संदर्भ में उपेक्षा रखने पर तो दृश्यमान ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेंद्रियों की हलचलें ही विदित होती हैं। यहाँ तक की कलेवर के पर्दे में छिपे हुए आमाशय, आँतें, गुर्दे, फेफड़े, हृदय, मस्तिष्क तक दीख नहीं पड़ते पर, गहराई में उतरने पर उन सभी के अस्तित्व तथा क्रियाकलाप का परिचय मिल जाता है। मोती समुद्र की सतह पर नहीं तैरते, उन्हें पाने के लिए गहराई में उतर कर सतर्कता पूर्ण खोजबीन करनी पड़ती है।
अन्तरंग में सन्निहित दिव्य-शक्तियों की झाँकी करने के लिए और भी अधिक गहराई तक पहुँचने के लिए गोताखोरों से बढ़कर साहस दिखाने की आवश्यकता पड़ती है। अन्तरंग की ध्यान धारणा इसी प्रकार सधती है। पृथ्वी पर बिखरे दृश्यमान पदार्थों की तुलना में समुद्र का विस्तार ही बढ़ा-चढ़ा नहीं है, वरन् उसमें बिखरा हुआ वैभव भी कम मूल्यवान नहीं है। विज्ञान के विद्यार्थी भली-भाँति जानते हैं कि दृश्य की तुलना में अदृश्य क्षेत्र की शक्तियाँ कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। पृथ्वी के दृश्यमान पदार्थों की तुलना में समुद्र तल की सम्पदा कहीं अधिक है। आकाश में भी जिन तरंगों का क्रीड़ा क्षेत्र में उसे दृश्य जगत का भाग्य विधाता एवं जीवन दाता कहा जा सकता है। तत्वज्ञानी आरम्भ से ही इस तथ्य पर प्रकाश डालते रहे हैं कि स्थूल की तुलना में सूक्ष्म की सामर्थ्य एवं उपयोगिता असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी है।
मस्तिष्कीय क्षमता का मात्र सात प्रतिशत काम में आता है। शेष भाग प्रसुप्त स्थिति में अविज्ञात रूप में पड़ा रहता है। यदि इस समूचे कलेवर को किसी प्रकार जागृत सक्रिय किया जा सके तो उस व्यक्ति की सभी अतीन्द्रिय क्षमताएँ जाग पड़ेगी और प्रत्यक्ष स्थिति किसी देव मानव के समतुल्य हो जायगी। यही स्थिति अन्यान्य भागों की भी है। मस्तिष्क मध्य में पाया जाने वाला ब्रह्मरंध्र सहस्रार कमल यदि जग पड़े तो वह लोक-लोकान्तरों के साथ अपने संबंध सूत्र जोड़ सकता है। वहाँ पाई जाने वाली शक्तियों के साथ आदान-प्रदान का संबंध जोड़ सकता है। ऐसी दशा में ऐसी कोई व्यक्ति ब्रह्मपुरुष स्तर का हो सकता है।
इस दिशा में बढ़ने के लिए आरम्भ छोटे कदम उठाकर किया जाना चाहिए। पौधे क्रमशः बढ़ते हैं। अन्यत्र भी सृष्टिक्रम का यही अनुबंध देखा जाता है कि छोटे से बड़ा बनने का क्रम निर्धारण अपने ढंग से चलता रहे। साधना क्षेत्र में उतरने वालों को भी यही नीति अपनानी चाहिए। विशेषतया अन्तरंग क्षेत्र की साधनाओं में तो प्रयत्नरत होने के साथ क्रमिक विकास अपनाने की ही नीति अपनानी चाहिए। बड़े डग भरने की अपेक्षा छोटे कदम उठाते हुए प्रगति क्रम आरम्भ करना चाहिए। यही सरल भी है और इसी में सुविधा भी। सफलता की दिशा में इसी क्रम से बढ़ना चाहिए।
चेतना क्षेत्र में मन की ही तरह प्राण का भी स्थान है। दोनों परस्पर संबद्ध भी हैं और समानान्तर भी। इन्हें विद्युत के दो प्रवाहों की तरह ही समझा जा सकता है। मन को निग्रहित करने में ध्यान की आवश्यकता पड़ती है और प्राण को सशक्त बनाने में प्राणायाम प्रक्रिया का प्रयोग होता है। प्राणायामों के अनेक विधि विधान है। उनमें से ‘सोऽहम्’ साधना एक ऐसी है, जिसे अन्तर्मुखी ध्यान की संज्ञा दी जा सकती है।
प्राण को प्रकृति और चेतना का सम्मिश्रित स्वरूप कह सकते हैं। वह निखिल ब्रह्माण्ड के कण-कण में भरा पड़ा है। वायु वर्ग की दृष्टि से उसमें ‘आक्सीजन’ का बाहुल्य है फिर भी वह मात्र ‘आक्सीजन’ नहीं है उसमें चेतना भी पर्याप्त मात्रा में घुली हुई है। श्वास के साथ संकल्पपूर्वक उसे खींचा और धारण किया जा सकता है। साधारण श्वास प्रश्वास में स्वच्छ वायु का प्रवेश होता और निःश्वास में शरीर में उपजते रहने वाले मलों का निष्कासन होता है। यह क्रम जीवन भर स्वसंचालित रीति से चलता रहता है। किन्तु जब प्राण को आकर्षित करने का संकल्प लेकर उसे खींचा जाता है तो श्वास के साथ ही प्राण तत्व भी खिंचता चला आता है। इसका जितना अधिक संचय होता है उतना ही मनुष्य प्राणवान, प्रतिभावान, तेजस्वी बनता चला जाता है।
श्वास के प्रवेश और निसृजन पर ध्यान जमाये रहा जाय तो भी ध्यान के लिए एक आधार बनता है। मन की भगदड़ रुक जाती है। एकाग्रता अनायास ही बढ़ने लगती है। श्वास का नासिका मार्ग से प्रवेश करना-मस्तिष्क के प्रसुप्त घटकों को जगाना, फेफड़े में पहुँच कर उसके शिथिल मार्ग को सक्रिय करना, प्राण को प्रत्येक अवयवों में पहुँच कर नवजीवन प्रदान करना, श्वास के बाहर निकलने के साथ अन्दर की सभी मलीनताओं का धुल कर बाहर निकल जाना, यह एक श्वसन क्रिया है। इसी आकर्षण विकर्षण पर ध्यान जमाये रहा जाय तो संकल्प शक्ति में प्रखरता आने से अंग अवयवों में अभिनव शक्ति संचार का अनुभव होता है। उपेक्षा और अनुपेक्षा का यही अन्तर है। जहाँ निर्वाह मात्र निभ रहा था वहाँ प्राण शक्ति का अभिनव भण्डारण आरम्भ हो जाता है।
इससे एक कदम आगे की अध्यात्म साधना है ‘सोऽहम् साधना’। इसे अजपा जाप या हंसयोग भी कहते हैं। विधान इतना भर है कि श्वास के भीतर जाते समय ‘सो’ की ध्वनि अत्यन्त धीमे स्वर में होने की भावना की जाय। एकाग्रता बटोर कर उस ध्वनि को सुनने के लिए दत्तचित्त हुआ जाय। आरम्भ में वैसी मात्र कल्पना करते रहने भर की बात बनती है। पर कालान्तर में वह भावना मूर्त्तिमान भी होने लगती है और श्वास के प्रवेश काल में हल्की-सी ध्वनि के प्रकट होने जैसा अनुभव भी होने लगता है। ‘सो’ का अर्थ है-वह। वह अर्थात् परमेश्वर। श्वास का भीतर प्रवेश करना अर्थात् परब्रह्म का काय कलेवर में अवतरण।
कुछ समय श्वास ठहरती भी है। इस अवधि में प्राण के अंतरंग में प्रवेश करने की प्रक्रिया का ध्यान किया जा सकता है।
अब श्वास के बाहर निकलने की बारी आती है। इस निःश्वास के साथ ‘हम’ की ध्वनि का चिन्तन करना चाहिए। ‘हम’ वस्तुतः अहम् का ही संक्षिप्त रूप है। अहम् अर्थात् अहंकार। स्वार्थ लोभ, मोह आदि के काषाय कल्मष। यही हैं जो जीवात्मा के साथ लिपट कर उसे भव बंधनों के पाश में जकड़ते हैं। निःश्वास के साथ इसको बाहर निकलते अनुभव करने पर चित्त बहुत हल्का होता है। सिर पर लदा कोई भारी बोझ उतर रहा प्रतीत होता है। मलीनताओं का निष्कासन और दिव्य चेतना का प्रवेश यह उभय-पक्षीय प्रयोजन इस प्रयोग के आधार पर सम्पन्न होता है। इसी क्रम में निरन्तर चलते रहने पर मंत्र जप जैसी आत्मोत्कर्ष की विधि व्यवस्था बन पड़ने जैसा अनुभव होता है। यह क्रम दीर्घकाल तक निरन्तर चलता रहे तो उससे प्राण संचय बन पड़ता है और जीवन शक्ति का भण्डार भरता है। मलीनता के घटते जाने की भी अनुभूति होती है। श्वास कुछ समय बाहर भी रुकती है। इस भीतर और बाहर रुकने के कुछ क्षणों में अन्तः कुँभक और बाह्य कुँभक के नाम से जाना जाता है।
सोऽहम् को परमात्मा और आत्मा का मिलन भी कह सकते हैं। परमात्मा ‘सो’ ‘आत्मा-अहम्’। इस विद्या को दोनों का संगम समागम भी कह सकते हैं। इससे आनन्द और उल्लास की उत्पत्ति होती है।
‘सोऽहम्’ प्राणायाम में साधारण की अपेक्षा अधिक गहरे श्वास निःश्वास लेने छोड़ने पड़ते हैं। यह स्वास्थ्य संवर्धक प्रक्रिया भी है। साधारणतया लोग उथले साँस लेते हैं। इससे फेफड़ों का मध्य भाग ही प्रभावित होता है। शेष निष्क्रिय उपेक्षित पड़ा रहता है। उथली साँस से ऑक्सीजन भी शरीर को न्यून मात्रा में मिलती है। इसमें दोनों प्रकार की क्षतियाँ हैं। फेफड़े कमजोर रहते हैं और रक्त का परिशोधन पूरी तरह नहीं हो पाता। इस स्थिति के लगातार चलते रहने से दुर्बलता और रुग्णता का खतरा रहता है। जीवनी शक्ति में कमी पड़ती ही है, जिससे रोग निरोधक सामर्थ्य के कम पड़ने पर से छुट-पुट बीमारियों का सिलसिला चल पड़ता है और अंततः आयुष्य का एक बड़ा भाग चट करके अकाल मृत्यु का निमित्त कारण बनता है। किन्तु प्राण प्रक्रिया में गहरे साँस लेना छोड़ना अनिवार्य होता है। अस्तु उपरोक्त सभी संकट टलते हैं और आत्मिक स्वास्थ्य के साथ-साथ शरीर की बलिष्ठता भी बढ़ती है।
चार चोर एक गाय चुराकर लाये। बँटवारा इस प्रकार हुआ कि चारों बारी-बारी एक-एक दिन उसे अपने घर रखे।
चतुरता में चारों एक दूसरे से बढ़े चढ़े थे। बारी दिन गाय का दूध तो निकालते, पर घास यह सोचकर न खिलाते कि पिछले दिन वाले ने इसका पेट भरा ही होगा। अगले दिन वाला भी खिलायेगा ही। एक दिन मैं न खिलाऊँ तो क्या हर्ज है।
यही क्रम कई दिन चला। भूखी गाय का दूध सूखता गया और अन्त में उसके प्राण भी निकल गये। अधिकार के लिए आतुर और कर्त्तव्य से बचने वालों को घाटा भी पड़ता है और अपयश भी मिलता है।
मन की शक्ति अपार है। व्यावहारिक जीवन में प्रायः उसका 7 प्रतिशत ही काम में आता है। शेष 93 प्रतिशत प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ा रहता है। जो अवयव काम में नहीं आते वे निष्क्रिय रहने पर जंग खाये चाकू की तरह पक्षाघात पीड़ित की तरह निरर्थक हो जाते हैं। अपंग जैसी स्थिति में रहने लगते हैं। मस्तिष्क के संबंध में भी यही बात है। दैनिक क्रिया-कलाप में जिन घटकों से काम लिया जाता है, उन्हीं में जागृति एवं सक्रियता बनी रहती है। काम न मिलने पर हिम प्रदेश के भालुओं और सर्पों की तरह वे निद्राग्रस्त हो जाते हैं। मनःक्षेत्र के अनेकानेक घटकों के संबंध में भी यही बात लागू होती है। यदि अपेक्षाकृत अधिक क्षेत्रों को क्रियाशील रखा जा सका होता तो मनुष्य बौद्धिक दृष्टि से असामान्य स्थिति तक पहुँचा होता। उस विकास का प्रभाव समूचे जीवन पर पड़ता। प्रगति हर प्रयोजन में परिलक्षित होती। विशेषतया मनःसंस्थान तो उतना समुन्नत होता कि वह अतीन्द्रियातीत क्षमताओं से सुसम्पन्न होता और दिव्य ज्ञान के आधार पर इतना कुछ कर सकता जितना सौ बुद्धिमान मिल कर भी नहीं कर सकते।
शरीर और मस्तिष्क अनेकानेक अदृश्य घटकों से मिलकर बने हैं। उनके समूह समुच्चय अपना-अपना क्षेत्र सँभालते हैं और प्रत्यक्ष अंग-अवयवों के रूप में काम करते हैं। यों कहने को तो समस्त घटकों का परिपोषण संचालन कर सकने की क्षमता रक्त द्वारा सम्पन्न होती समझी जाती है, पर वस्तुतः उनकी हलचलें उन ज्ञान तन्तुओं द्वारा होती हैं जो मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए हैं। मस्तिष्क के सक्रिय केन्द्र इन ज्ञान तंतुओं के माध्यम से समस्त शरीर के साथ संबंध जोड़े रहते हैं और जानकारियों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। रक्त की न्यूनता एवं अशक्तता होने पर अवयव कुपोषण के शिकार होते हैं और रुग्णता तथा अकाल मृत्यु की दिशा में चलने लगते हैं, किन्तु जैव ऊर्जा का प्रभाव इससे भी अधिक है। जीवनी शक्ति रक्त में पाई तो जाती है, पर उस पर निर्भर नहीं है। वह स्वतंत्र है, तथा काय कलेवर से नहीं चेतना से उद्भूत होती है। चेतना से मनःसंस्थान का जितना क्षेत्र ज्वलन्त होता है उसी अनुपात से शरीर में जीवनी शक्ति, कोमलता, सुन्दरता बनी रहती है। निरोधक शक्ति की बहुलता होने पर रोगों का आक्रमण भी सफल नहीं होती। जीवट वाले व्यक्ति महामारियों में भी निरन्तर सेवा कार्य करते रहते हैं, किन्तु स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। यह मनोबल की प्रखरता है, जो अंग अवयवों को सुरक्षित रखे रहती है। बहुमुखी सफलताएँ इसी पर निर्भर रहती हैं।
कायिक घटकों को रक्त का पोषण ही नहीं मनोबल की वह विशिष्टता भी चाहिए जिसे जीवनी शक्ति कहते हैं। जिस प्रकार पोषण रक्त पर आश्रित हैं, उसी प्रकार प्रतिभा समेत जीवट के अनेक पक्ष मनःसंस्थान से उभरते तथा गतिशील होते हैं। प्रश्न यह है कि प्रचुर परिमाण में जैव ऊर्जा की समुचित मात्रा में उपलब्धि कैसे हो? प्रसुप्त निष्क्रिय कोष्ठकों को जागृत कैसे किया जाय? रहस्य भरी अदृश्य शक्तियों की चमत्कारी विशेषताओं से लाभान्वित कैसे हुआ जाय? उन्हें प्रखर प्रचण्ड कैसे बनाया जाय?
सोये व्यक्ति को झकझोर कर जगाया जाता है। निस्तब्ध पड़े घड़ियाल को घंटा मारकर झनझनाया जाता है। दबा खजाना खोदने के लिए कुदाल चलाया जाता है। विकृत-विक्षिप्त मस्तिष्क को बिजली का झटका दिया जाता है। इसी प्रकार शरीर के किसी अंग अवयव को विशेष रूप से सक्रिय समर्थ बनाना है, तो उसे किसी समर्थ उपकरण के सहारे हिलाया जुलाया, उठका, पटका जाता है। ऐसे उपकरण की भूमिका कौन निभाये? कैसे निभे? इसका सुनिश्चित उत्तर एक ही है कि मानसिक ऊर्जा का एक सघन समुच्चय एकत्रित किया जाय और इस योग्य बनाया जाय कि वह तिलमिलाने वाला प्रहार कर सके। इस उपलब्धि को हस्तगत करने का एक ही उपाय है। एकाग्रता और भाव निष्ठा सम्पन्न ध्यान।
आतिशी शीशे पर सूर्य किरणें एकत्रित की जायं तो उसका केन्द्र बिन्दु देखते-देखते अग्नि उगलने लगता है। बन्दूक दागने पर कारतूस की गोली कितनी तीव्र गति से उड़ती और कठोर लक्ष्य को बेधती है। यह सर्वविदित है।
सूर्य की किरणों की भाँति मानसिक शक्तियाँ भी बिखरी रहने के कारण अपना प्रभाव अतिस्वल्प मात्रा में ही पृथ्वी पर बिखेर पाती हैं। यह बात विचार शक्ति के बारे में भी हैं, वह अनेक क्षेत्रों की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति में नियोजित रहती है। इसे एकत्रित कर लिया जाय तो उसकी मूल शक्ति असाधारण रूप से शक्तिशाली हो जाती है। भाप के संबंध में भी यही बात है। सामान्यतया पानी गरम होकर हवा में उड़ता रहता है और उसका किसी को भी पता नहीं चलता, किन्तु जब उसे रेल इंजन के पिस्टन के साथ जोड़ दिया जाता है, तो बड़ी तादाद के माल के डिब्बों को घसीटती हुई वही भाप कहाँ से कहाँ पहुँचती है? प्रेशर कूकर इसी भाप के दबाव से घंटों में बनने वाला भोजन मिनटों में पका देती है। कल्पना शक्ति की क्षमता के संबंध में भी यही समझा जाना चाहिए। उसे बिखेरते रहने वाले लोग अति बुद्धिमान होते हुए भी अस्त-व्यस्त रहते हैं और जीवन भर में कोई महत्वपूर्ण कार्य कर नहीं पाते। किन्तु जो एकाग्रता साधने में समर्थ होते हैं, वे वैज्ञानिक, विद्वान, कलाकार, दार्शनिक कुशल शिल्पी, बनकर दिखा देते हैं। हमें एकाग्रता की महत्ता समझनी चाहिए और कछुए खरगोश की दौड़ वाली कहानी याद रखनी चाहिए, जिसमें मंद गति वाला कछुआ नियत लक्ष्य तक पहुँच कर बाजी जीत गया था, जबकि द्रुतगामी खरगोश अपने मन को जहाँ-तहाँ उलझाये रहने के कारण पिछड़ गया था। प्रत्यक्ष जीवन की सफलता का यही आधार है और यही आत्मिक उत्कर्ष का भी।
विचारों की एकाग्रता साधने का सरल और प्रभावी उपाय ध्यान है। ध्यान में केन्द्रीकरण के लिए कोई छवि निर्धारित करनी पड़ती है। ऐसी वस्तु जो आकर्षक भी हो और गुणवत्ता से भरपूर भी। सुन्दरी युवतियों की ओर अनायास ही ध्यान खिंच जाता है और उनकी छवि तथा भंगिमा के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगता है। यही बात ध्यान इष्ट के संबंध में है। उस निर्धारण से पूर्ण लक्ष्य पर गरिमा, महत्ता एवं चयन का आरोपण करना पड़ता है। यही सिद्धान्त सभी देवी-देवताओं के संबंध में लागू होता है।
सार्वभौम ध्यान के लिए प्रकाशपुँज प्रभात कालीन स्वर्णिम सूर्य सविता का चयन करना अति उत्तम एवं निर्विवाद है। जिन देवताओं की कथा गाथा होती है, उसके इतिहास में कितने ही उत्साहवर्धक तथ्य रहते हैं, तो कई खोट भरे भी। ध्यान के कारण वह सभी भलाइयाँ बुराइयाँ साधना पर सवार होती हैं, इसलिए अन्य देवता संदेहास्पद भी हों, तीखी समालोचना से उनके चरित्र एवं स्वभाव में ऐसी अवाँछनीयता भी सन्निहित रहती है जो साधक पर भी श्रेष्ठताओं के साथ-साथ हावी होती चली जाती है। इस दृष्टि से सूर्य सर्वथा दोष रहित है। उसमें गुण ही गुण है। साथ ही शक्ति का भण्डार एवं आकर्षक सुन्दरता से भरा-पूरा भी उसे समझा जा सकता है।
सविता गायत्री का अधिष्ठाता है। उसके द्वारा प्राण शक्ति का उद्भव और वितरण होता है। इसी कारण वह प्राणियों का-वनस्पतियों का-जन्मदाता माना जाता है। प्रकाश वितरण करने, चर्मचक्षुओं को दृश्य देखने और चक्षुओं को दिव्य दृष्टि से भरने का अनुदान प्रदान करता है। उसे निरन्तर निस्वार्थ विश्व में निरत देखा जाता है। अनुशासन का धनी है। समय साधना की दृष्टि से उसे आदर्श एवं अनुकरणीय माना जा सकता है। तेजस्विता उसकी विशिष्टता है। इन्हीं सब विभूतियों को ध्यान धारणा द्वारा आकर्षित और अन्तराल में प्रतिष्ठित किया जा सके तो समझना चाहिए कि साधक की सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल गया। जिस उद्देश्य के लिए ध्यान किया जाता है उस गन्तव्य तक पहुँचने का राजमार्ग मिल गया।
प्रभात काल के उदीयमान सूर्य में कुछ समय तक स्वर्णिम आभा रहती है। वही नेत्रों के लिए सह्य भी है। आरम्भ में तनिक देर आँखें खोलकर उसे देखना और फिर तुरन्त ही पलक बन्द कर लेना चाहिए। सूर्य के अभाव में दीपक की लौ को देखने से भी काम चल सकता है। दोनों ही त्राटक साधना के अंतर्गत आते हैं। खुले नेत्रों से प्रकाश को देखने की अवधि न्यूनतम होनी चाहिए। एक पल झाँकी भर। इसके उपरान्त पलक बंद लेने चाहिए और उस प्रकाश पुंज की मानसिक अवधारणा करनी चाहिए। कुछ दिन के अभ्यास से सूर्य को या दीपक को खुले नेत्रों से देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती, यह ध्यान स्वाभाविक हो जाता है और अनायास ही होता रहता है। उस समय सविता मंत्र का भी स्वचालित जप होता रहता है। प्राणयोग की ‘सोऽहम्’ साधना में श्वास-प्रश्वास के साथ निरन्तर चलते रहने की आदत स्वभाव का अंग बन जाती है।
प्रकाश पर संयम किया गया विचारों का एकत्रीकरण दोनों उपचारों के कारण एक विशेष शक्ति से सुसम्पन्न हो जाता है, उससे अन्तःक्षेत्र की दिव्य शक्ति का आविर्भाव होता है। इसका मनःक्षेत्र के किसी भी शक्ति केन्द्र पर आरोपण किया जाय तो वह प्रसुप्त अवस्था में न रहकर जागृत होने लगता है। इस जागृति का तात्पर्य है एक अतिरिक्त शक्ति की उपलब्धि हस्तगत होना। इस प्रयोग को शरीर के किसी अवयव पर या शक्ति केन्द्र चक्र, गुच्छक पर, उपत्यिका परिकर पर केन्द्रित किया जा सकता है। टार्च की रोशनी जिस स्थान पर पड़ती है वह परिधि चमकने लगती है। ठीक इसी प्रकार प्रकाश युक्त ध्यान को जिस भी स्थान के लिए जोड़ा जाता है। वहाँ अभिनव हलचल चल पड़ती है। कील ठोकने पर जिस पर छेद होता है उसकी नीचे की परतों में दबा हुआ पदार्थ ऊपर उछल कर आ जाता है, उसी प्रकार यह ध्यान धारणा भी फलित होती है। ऑपरेशन करने पर मवाद बाहर निकल पड़ता है। मधुमक्खी के छत्ते में नली डालने पर शहद टपकने लगता है। उसी प्रकार प्रकाश से समाहित एकाग्रता को किसी क्षेत्र पर आरोपण करने से कील ठोकने जैसी प्रतिक्रिया होती है। उससे भरी हुई अवाँछनीयताओं का आपरेशन की तरह निष्कासन होता है। साथ ही वहाँ जो कुछ श्रेष्ठ प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है, वह जागृत होकर अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष स्तर पर आ जाता है। आगे का प्रश्न यह है कि ध्यान द्वारा उपलब्ध की गई बेधक दिव्य दृष्टि को किस स्थान पर किस प्रयोजन के लिए-कितनी मात्रा में नियोजित किया जाय। यह निर्णय करने से पूर्व यह जानना होता है कि स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर में किसी दिव्य शक्ति का केन्द्र कहाँ है और उसके साथ संबंध जोड़ने के लिए बेधक दृष्टि की किस मार्ग से कितने मोड़ मरोड़ों में होकर गुजरते हुए पहुँचा जा सकता है।
इतनी बारीकी में जा सकने की यदि सिद्धहस्त सर्जन जैसी योग्यता किसी अनुभवी या सान्निध्य प्राप्त करके जान सकना सम्भव नहीं तो फिर सीधा मार्ग है स्थूल शरीर की दिव्य क्षमताओं को जागृत करने के लिए नाभिचक्र के दिव्य कमल को ऊर्जा प्रदान करते हुए प्रस्फुरण सूक्ष्म शरीर का केन्द्र हृदय चक्र है और धारण शरीर की भाव संवेदनाओं का उद्गम मस्तिष्क मध्य में अवस्थित सहस्र दल कमल ब्रह्म चक्र। इनको झकझोरने से भी भौंरे की तरह दिव्य रस एवं दिव्य गंध जैसा अलौकिक आनन्द प्राप्त किया जा सकता है।
एक सम्पन्न घर की कन्या बड़ी रूपवती गुणवती थी। विवाह योग्य हुई तो उसने घोषणा की कि जो दौड़ में मुझसे आगे निकल सकेगा उसी के साथ विवाह करूंगी।
अनेकों इच्छुक आये और बाजी हार कर वापस लौटते गये।
एक दिन एक दुर्बल किन्तु चतुर धावक शर्त में सम्मिलित हुआ। दौड़ का मार्ग निर्धारित था। मार्ग के दाहिने भाग में युवती को दौड़ना था। सो युवक ने उस भाग मार्ग पर जहाँ-तहाँ सोने के सिक्के बिखेर दिये।
दौड़ आरम्भ हुई। युवती की नजर सिक्के पर पड़ी। उसका मल ललचाया। दौड़ती रहने के साथ-साथ वह सिक्के भी बीनती चली। दौड़ में रुकावट पड़ती रही और बाजी युवक ने जीत ली।
अनमने मन से उसे कुरूप युवक से विवाह तो किया पर मन ही मन यही कहती रही कि लालच ने मुझे अभीष्ट से वंचित कर दिया।
सामान्य धारणा है कि प्रौढ़ावस्था में शरीर के साथ-साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी ढलने लगता है और चिन्तन तंत्र काम करना बन्द कर देता है, कल्पना शक्ति कमजोर पड़ जाती है व दिमाग की रचनात्मक सामर्थ्य क्षीण हो जाती है; पर वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। संसार में अनेक महत्वपूर्ण कार्य लोगों ने ढलती आयु में ही सम्पन्न किये हैं। कई लोगों ने जीवन की इस ढलान में अनेक ऐसी रचनाएँ कीं, जो उन्हें अमर बना गयी। कइयों ने इस अवस्था में ऐसी प्रतिभा का परिचय दिया, जिसे अद्भुत ही कहा जा सकता है। अनेकों ने इसी उम्र में अपने जीवन को सही-सही समझा और उसका सदुपयोग किया, जबकि अन्य अनेक ऐसे भी हुए हैं, जिनने जीवन के इसी दौर में कुछ ऐसे कार्य कर दिखाये, जिन्हें शेष जीवन की तुलना में श्रेष्ठ व मूल्यवान कहा जा सके।
ऐसे महान पुरुषों में कुछ हैं-महान दार्शनिक सन्त सुकरात, प्लेटो, पाइथागोरस, होमर, आगस्टन, खगोल शास्त्री गैलीलियो, प्रसिद्ध कवि हेनरी वर्ड्सवर्थ, वैज्ञानिक थाम अल्वा एडीसन, वैज्ञानिक निकोलस, कोपरनिकस, विख्यात वैज्ञानिक न्यूटन, सिसरो, अलबर्ट आइन्स्टीन, टेनिसन तथा महात्मा टॉलस्टाय।
सुकरात ने साठ वर्ष पार करने के उपरान्त यह अनुभव किया कि बुढ़ापे की थकान और उदासी को दूर करने के लिए संगीत अच्छा माध्यम हो सकता है, अतः उन्होंने गाना सीखना आरम्भ किया और बजाना भी। यह क्रम उन्होंने मरते दम तक जारी रखा। वे 60 वर्ष की उम्र में अपने अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्त्वदर्शन की विशद व्याख्या करने में भी जुटे हुए थे यह बात प्लेटो के संबंध में भी थी। वे अपनी 80 वर्ष की आयु तक बराबर कठोर परिश्रम करते रहे। 81 वर्ष की अवस्था में हाथ में कलम पकड़े हुए उन्होंने मृत्यु का आलिंगन किया
टेनिसन ने 80 वर्ष की परिपक्व अवस्था में अपनी सुन्दर रचना “क्रासिंग द वार” दुनिया को प्रदान किया। राबर्ट ब्राउनिंग अपने जीवन के संध्याकाल में बहुत सक्रिय बने रहे। उन्होंने 77 साल की उम्र में मृत्यु के कुछ पहले ही दो सर्व सुन्दर कविताएँ- ’रेवेरी’ और ‘एवीलाँग टु आसलेण्डी’ लिखी। एच.जी.वेल्स ने 70 वर्ष की अपनी वर्षगाँठ के उपरान्त भी पूरे चुस्त और कर्मठ रहते हुए एक दर्जन से ऊपर पुस्तकों की रचना की। सिसरो ने अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व 63 वर्ष की आयु में अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक- ”ट्रीटाइज आँन ओल्ड एज” की रचना की। कीरो ने 80 साल की उम्र में ग्रीक भाषा सीखी थी। थियोसाफी की संस्थापिका मैडम ब्लेवटस्की ने मृत्यु शय्या पर ही अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ “सिक्रेट डाँक्ट्रीन्स” की रचना की थी। जो कि 6 खण्डों में है। प्लटार्क यूनान के माने हुए साहित्यकार हुए हैं। उन्होंने 65 वर्ष की आयु के बाद लैटिन भाषा पढ़नी आरम्भ की थी। इटली के प्रख्यात उपन्यासकार वोकेशिया को ढलती उम्र में साहित्यकार बनने की बात सूझी। उस ओर वह पूरी दिलचस्पी के साथ जुटे और अन्ततः मूर्धन्य कथाकार बन कर चमके। इसी प्रकार दार्शनिक फ्रेंकलिन की विश्वव्यापी ख्याति है। वे 50 वर्ष की आयु तक दर्शन शास्त्र से अपरिचित रहे। इसके प्रति रुझान इसके बाद ही जन्मा और वह उन्हें विश्वविख्यात बनाकर ही रहा।
संसार में कुछ ऐसे भी व्यक्ति हुए हैं जिन्हें जीवन के पूर्वार्ध में विज्ञान का अक्षर-ज्ञान भी नहीं था; पर जीवन यात्रा के उत्तरार्ध में उनने विज्ञान को अपनी बहुमूल्य सेवाएँ दीं और मूर्धन्य विज्ञानी बने। सर हेनरी स्पेलमैन अग्रगण्य विज्ञानवेत्ता हुए हैं। वे 60 वर्ष तक दूसरी तरह के काम करते रहे। इस उम्र में उन्हें वैज्ञानिक बनने की सूझी सो उन्होंने साइन्स की पुस्तकें पढ़नी आरम्भ कीं और उस दिशा में उनकी बढ़ती दिलचस्पी ने उन्हें उच्चकोटि की वैज्ञानिक सफलताएँ प्रदान कीं।
अनेक भारतीय मनीषियों-विद्वानों ने भी जीवन के अन्तिम पड़ाव में ऐसी प्रतिभा का परिचय दिया है। बाण भट्ट की अपनी अमर कृति “कादम्बरी” का सृजन जीवन के अन्तिम दिनों में ही आरम्भ किया था और उसे अधूरा छोड़ कर चल बसे थे। बाद में उनके बेटे ने उस कार्य को पूरा किया। कालिदास की रुचि जीवन के उत्तरार्ध में ही साहित्य क्षेत्र में बढ़ी थी। आदि कवि कहलाने का सौभाग्य महर्षि बाल्मीकि ने अपनी प्रौढ़ावस्था में ही प्राप्त किया था। छायावाद के जनक कहलाने वाले कवि जयशंकर प्रसाद की जब मृत्यु हुई, तो वे “इरावती” नामक उपन्यास लिखने में जुटे हुए थे। जीवन के अन्तिम चरण में विनोबा चीनी भाषा सीख रहे थे। संस्कृत के पारंगत सातवलेकर जब 75 वर्ष के थे, तब वेदों का भाष्य आरम्भ किया और सारे आर्षग्रन्थों का सटीक अनुवाद कर “जीवेम् शरदः शत्म” की उक्ति सार्थक की।
पश्चिम एवं भारत के ये कुछ ऐसे मनीषी, विद्वान वैज्ञानिक थे, जिनकी रचनात्मक शक्ति का ह्रास उनकी ढलती उम्र के कारण कतई नहीं हुआ था और जिन्होंने अपने बुढ़ापे में भी बड़े महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी काम करके मानवता की अपूर्व सेवा की। पर देश-विदेश में ऐसी प्रतिभाएँ सिर्फ साहित्य क्षेत्र में पैदा नहीं हुई। राजनीति क्षेत्र में भी अनेक ऐसे नक्षत्र जन्मे, जो वृद्धावस्था के बावजूद राजनीति के अपना वर्चस्व बनाये रहे। महात्मा गाँधी, विन्स्टन चर्चिल बेंजामिन फ्रेंकलिन डिजरैली, ग्लेडस्टोन आदि ऐसे ऐतिहासिक पुरुष हैं जो अपनी वृद्धावस्था की चुनौतियों के बावजूद बहुत सक्रिय बने रहे। अपने देश की अमूल्य सेवा में वे अनवरत रूप से लगे रहे।
ये सारे उदाहरण इस बात की साक्षी देते हैं कि आयुष्य मनुष्य की रचनात्मक क्षमता में तनिक भी बाधक नहीं बनती। वस्तुतः यह मनुष्य की मनःस्थिति ही है, जो भ्रान्त धारणा घर कर लेने के बाद उसे वैसी ही प्रतीत कराने लगती है और व्यक्ति स्वयं को दीन-दयनीय स्थिति में अनुभव करने लगता है। भगवान ने हममें असीम क्षमताओं का समावेश किया है; पर हम उसका आधा अधूरा ही उपयोग कर पाते हैं। इसे हमारी भूल ही कहनी चाहिए, जो हम यह मान बैठते हैं कि समय के साथ-साथ हमारी मानसिक क्षमताओं का ह्रास होने लगता है, फलतः इसके एक बड़े भाग के सदुपयोग से हम वंचित रह जाते हैं। यदि इस भ्रान्ति से बचा जा सके, तो हर व्यक्ति जीवन पर्यन्त अपनी मानसिक शक्ति का उपयोग कर लाभान्वित होता रह सकता है।
नाम था शेरसिंह। अपनी बहादुरी की डींगें भी बहुत हाँका करते थे। एक दिन उनके मन में विचार आया। भुजा पर शेर का चित्र गुदवा लेने का। गोदने वाले को बुलाया और हाथ आगे कर दिया।
गोदने वाले ने सुई चुभोना आरम्भ किया तो दर्द से उनका बेहाल हो गया। बोला- अभी तो पूँछ बना रहे हो इसे छोड़ दो। बिना पूँछ के भी तो जानवर होते हैं। उसने कमर, गरदन, मुँह आदि बनाने के जैसे-जैसे क्रम चलाये, वैसे-वैसे हर स्थान पर वे पीड़ा अनुभव करते रहे और गोदने वाले को रोकते रहे।
जो गुद चुका था वह बेतुका था उसमें अस्त-व्यस्त अंगों का उभार था। शेरसिंह ने उतने भर से संतोष कर लिया और काम समाप्त कराते हुए बोले- मेरा नाम और रौब ही बहुत है। उसी से काम चल जायगा। जो थोड़े बहुत निशान बन गये हैं उनसे भी मेरे शेरपन की पुष्टि होती रहेगी।
दुर्बल मन वाले ऐसे ही डींगें हाँकते रहते हैं। समय आने पर किसी प्रकार जान छुड़ाते हैं।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के सुविख्यात न्यूक्लियर भौतिक विज्ञान डॉ. जॉन जुँगर मैने के अनुसार वैज्ञानिक खोजें वस्तुनिष्ठ होती हैं और यह अंतिम सत्य पर नहीं पहुँच सकतीं क्योंकि नित नूतन आविष्कारों से उनकी सत्यता पर प्रश्न चिन्ह लगता चला जाता है। अतः खोज अनुसंधान मानवी काया में सन्निहित सूक्ष्म दिव्य सत्ता का किया जाना चाहिए, जिसका समय-समय पर आइन्स्टीन, आइजक न्यूटन, लुईपाश्चर, जेम्स जीन्स जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिक मनीषियों तथा प्राच्य अध्यात्मवेत्ताओं ने अपनी कृतियों में प्रतिपादन किया है और कहा है कि मानवी चेतना एवं उसकी प्रचंड विचारशीलता का प्रभाव आस-पास के वातावरण, प्राणियों और निर्जीव पदार्थों को प्रभावित करता है।
प्रख्यात खगोलवेत्ता जेम्स जीन्स की मान्यता है कि विश्व ब्रह्माण्ड की संरचना जटिल रासायनिक क्रिया-प्रक्रियाओं के जोड़-तोड़ से बनी एक बड़े मशीन की अपेक्षा महान विचारों की पुँजीभूत शक्ति के रूप में दिखाई पड़ती है। मानवी चेतना का प्रभाव और आधिपत्य सृष्टि के कण-कण में अनुभव किया जा सकता है। डॉ. जुँगरमैन के अनुसार मानवी चेतना अपने आस-पास के वातावरण एवं उन उपकरणों, मशीनों, पदार्थों को भी प्रभावित करती है जिनके साथ वह कार्य करती है। इस तथ्य की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए जुँगरमैन ने एक अत्यंत संवेदनशील उपकरण-’इन्टरफेरोमीटर’ लेसर उपकरण का आविष्कार किया और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की सामान्य उपस्थिति से भी उपकरण को प्रभावित होते देखा।
“स्टेनफोर्ड रिसर्च इन्स्टीट्यूट” के मूर्धन्य भौतिक विज्ञानी डॉ. हेराल्ड पुथाफ ने इसी तरह का प्रयोग प्रतिभाशाली अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न इंगोस्वान नामक मनोविज्ञानी के साथ किया। डॉ. फुथाफ ने वैज्ञानिकों की उपस्थिति में एक शक्तिशाली मैग्नेटोमीटर धरती के गर्भ में छिपाकर उसे कक्रींट से बन्द कर दिया। स्वान ने अपनी अतीन्द्रिय मानसिक दक्षता के बल पर बिना किसी उपकरण की सहायता के मैग्नेटोमीटर की सुई में विक्षेप पैदा कर दिया। यह कार्य स्वान ने दूर से ही चेतन क्षमता द्वारा मशीन को प्रभावित करके दिखाया।
काया की विलक्षण क्षमताओं का अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिकों ने परामनोविज्ञान से संबंधित “साइक्रोटानिक्स” नामक एक स्वतंत्र विज्ञान का विकास किया है, जिसके अंतर्गत शरीर में सन्निहित बायो-इलेक्ट्रिसिटी, बायोमैग्नेटिज्म, बायोप्लाज्मा, आभामंडल-प्रभामंडल जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों के साथ मनुष्य और पदार्थों-जीवित और निर्जीव के मध्य होने वाली अन्यान्य क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान में पाया है कि मानवी काया सदैव चहुँ ओर से एक रहस्यमय शक्ति से घिरी रहती है। शक्ति प्रवाह के उस अदृश्य घेरे को इटली के मूर्धन्य वैज्ञानिक प्रोफेसर गैलवानी ने “एनीमल इलैकट्रिसिटी” तथा सुप्रसिद्ध आस्ट्रियन चिकित्सक अन्टन मेस्मर ने “एनिमल मैग्नेटिज्म” नाम से संबोधित किया है। उस समय इन आविष्कारों को धोखा-धड़ी और हैण्ड ट्रिक कहकर इन वैज्ञानिकों को अपमानित प्रताड़ित किया गया था, किन्तु आज मानवी काया की विलक्षण क्षमता, उससे सतत् निकलने वाले प्राण विद्युतीय-ऊर्जा प्रवाह, व्यक्तित्व का प्रभाव आदि वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान का स्वतंत्र विषय बन गये हैं। वैज्ञानिकों ने इसे बायो प्लाज्मा, बायोग्रेविटी, “आर्गान एनर्जीफील्ड”, माइटोजेनेटिक रेडियेशन, बायोल्युमूनीसेन्स, अल्ट्रासोनिक रेडिएशन, बायोफ्लक्स आदि कितने ही नाम दिये हैं।
दक्षिण कजाकिस्तान के अल्मा अता स्थित किरोव यूनीवर्सिटी के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर विक्टर इन्यूशिन ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में कहा है कि प्रत्येक जीवित प्राणी का मात्र भौतिक शरीर ही नहीं होता वरन् ‘बायोप्लाज्मा’ से निर्मित उसका एक ऊर्जा शरीर-’एनर्जी बाडी’ भी होता है। अध्यात्म शास्त्रों में इसे ही सूक्ष्म शरीर-’ईथरिक बाडी’ कहा गया है और बताया गया है कि प्राण ऊर्जा का विराट् समुद्र शरीर को घेरे रहता है। सूक्ष्म शरीर के माध्यम से प्राण तत्व समस्त नस नाड़ियों-तंत्रिका तंत्रों में संचरित संवहित होता रहता है। सूक्ष्म शरीर के करण स्थायी रूप से सतत् परिवर्तित होते रहते हैं। भौतिकविदों के अनुसार ठोस, द्रव, गैस के अतिरिक्त पदार्थ की चौथी अवस्था ‘प्लाज्मा’ है जो सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। इसी से सूर्य का निर्माण हुआ है। योगशास्त्रों में प्राण ऊर्जा को सूर्य-सविता के निर्माण में भाग लेने वो तत्त्व से संबंधित माना गया है और कहा गया है कि यह प्राण ऊर्जा विश्व ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक को प्रभावित परिवर्तित करने की सक्षम होती है।
वैज्ञानिकों की मान्यता है कि यह भौतिक संसार विभिन्न विकिरणों, प्रकंपनों, तरंग लम्बाइयों, ऊर्जा तथा बल क्षेत्रों में वाष्पीकृत को रहा है। विश्व ब्रह्माण्ड के समस्त पदार्थ ऊर्जा स्वरूप ही हैं, जैसा कि काया के संवेदी अग हमें इसका आभास कराते, और उन्हें प्रभावित करते हैं। सोवियत संघ के मूर्धन्य एकैडेमिशियन प्रोफेसर अलेक्जेण्डर डुब्रोव ने जैव गुरुत्वाकर्षण “बायोग्रैविटी” पर महत्वपूर्ण खोज की है और अपने शोध निष्कर्ष में बताया है कि जीवित प्राणियों में गुरुत्वाकर्षण तरंगों को उत्पन्न करने और उन्हें अलग करने पहचानने की क्षमता होती है। डुब्रोव के अनुसार मनुष्य की शारीरिक कोशिकाएँ इन तरंगों को सतत् विकसित करती रहती हैं और यही तरंगें दूरश्रवण, दूरभाष, दूरानुभूति, पूर्वाभास, आकाशगमन जैसे अतीन्द्रिय कार्यों को सम्पन्न कराती हैं। कोशिका विभाजन के समय कोशिकाओं से फोटोन कणों की ऊर्जा युक्त विकिरण किरणें तथा दस घात छह से दस घात सात साइकल्स प्रति सेकेंड की उच्च फ्रीक्वेंसी युक्त अल्ट्रासोनिक तरंगें भी निकलती हैं। नोवोसीविर्स्क विश्वविद्यालय (रूस) में अनुसंधानरत वैज्ञानिकों-सिमोन एस्चूरिन, एल.पी. मिखाइलोवा तथा उनके सहयोगियों ने अपने 500 से अधिक प्रयोग परीक्षणों के आधार पर भी यही निष्कर्ष निकाला है कि काया की प्रत्येक कोशिका से अल्ट्रावायलेट रेडिएशन, बायोग्रैविटेशनल वैव्स एवं अल्ट्रासोनिक वैव्स निकलती रहती हैं और पास तथा दूरस्थ की कोशिकाओं को अपने अदृश्य तरंगों-प्रकम्पनों के माध्यम से प्रभावित करती हैं। इनके अपने सुनिश्चित एवं गुप्त-’कोडेड इन्फार्मेशन’ सूचना-संदेश होते हैं। इन्हीं के आधार पर मनुष्य का अदृश्य प्रवाह आस पास के वातावरण, सजीव तथा निर्जीव जड़ पदार्थों को भी प्रभावित करता और अपने अनुकूल मोड़ता मरोड़ता है।
साइकोट्रानिक अनुसंधान के क्षेत्र में किर्लियन फोटोग्राफी के आविष्कारक रूसी दंपत्ति श्री सेम्योन और वैलेन्तीना किर्लियन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इलेक्ट्रिकल फोटोग्राफी की इस विधा पर सोवियत यूनियन के अतिरिक्त चैकोस्लोवाकिया, इंग्लैण्ड और अमेरिका के वैज्ञानिक अनुसंधानरत हैं। भारत के डॉ. नरेन्द्रन तथा डॉ. रमेश सिंह चौहान जैसे मूर्धन्य वैज्ञानिक चिकित्सक भी इस क्षेत्र में अनुसंधान कार्य कर रहे हैं। शीला ओस्ट्रैण्डर और लिन श्रोइडर की प्रसिद्ध पुस्तक “साइकिक डिस्कवरीज विहाइन्ड द आयरन कर्टेन” तथा सुविख्यात परामनोविज्ञानी डॉ. थेल्मामाँस की पुस्तक “द प्रौबेबिलिटी ऑफ द इम्पासिबुल” में प्राण ऊर्जा पर वैज्ञानिक अनुसंधानों का वर्णन किया गया है। इन अनुसंधानों से प्राण ऊर्जा-जैव विद्युतीय ऊर्जा के अनेक अविज्ञात तथ्य उद्घाटित हुए हैं।
सुप्रसिद्ध चेक इंजीनियर राबर्ट पैवलिता ने प्राण ऊर्जा का अध्ययन करने के लिए “साइकोट्रानिक-जनरेटर” नामक एक उपकरण का आविष्कार किया है। इसकी विशेषता यह है कि यह बायोएनर्जी से परिचालित है और एक बार चार्ज कर देने के बाद इससे कई प्रकार के प्रयोग परीक्षण किये जा सकते हैं। पैवलिता इसे स्वयं अपने प्राण ऊर्जा से चार्ज करते हैं और मटमैले मिट्टी युक्त पानी से भरे जार का जनरेटर के पास रखकर इच्छानुसार कीचड़ का अवक्षेपण शीघ्र करा देते हैं। इसी तरह किसी पौधे की वृद्धि दर में बढ़ोतरी करा लेते हैं, आदि। चैकोस्लोवाकिया के ही एक दूसरे इंजीनियर जुलियस क्रामेस्की ने पैवलिता से मिलते जुलते प्राण ऊर्जा के अनेक प्रयोग परीक्षण वैज्ञानिकों के समक्ष प्रस्तुत किये। क्रामस्की अपने प्राण विद्युतीय ऊर्जा के माध्यम से पानी पर तैरती हुई वस्तुओं की गति से अभिवृद्धि कर उसे मनोनुकूल दिशा में आगे पीछे तैरने के लिए बाध्य कर देते हैं। जार के अन्दर धागे से लटके हुए किसी वस्तु को दूर से ही हाथ से प्राण प्रवाह द्वारा उसे दक्षिणावर्त या वामावर्त दिशा में घुमाने लगते हैं। वे बोर्ड पर लगे स्विच पर आंखें को एकाग्र कर उसे आँन-आफ करके प्रकाश बल्व को जला देते हैं। सुप्रसिद्ध न्यूरोफिजियोलाजिस्ट ई. ग्रे वाल्टर के अनुसार मनुष्य अपने मस्तिष्क के कार्टेकस को इलेक्ट्रोड्स के माध्यम से टी.वी. सेट से संबंधित करके इच्छाशक्ति के सहारे अपने कल्पना लोक को पर्दे पर देखने की क्षमता रखता है। वाल्टर इस तरह के कई प्रयोग कर चुके हैं और सफलता के प्रति आशान्वित हैं।
किर्लियन फोटोग्राफी से अर्जित ज्ञान का उपयोग अब चिकित्सा विज्ञानी शारीरिक एवं मानसिक रोगों का पता लगाने में करने लगे हैं। कैंसर जैसी घातक बीमारियों को इस विधि द्वारा समय से पूर्व ही पहचान लिया जाता है। प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी डॉ. थेल्मामाँस और फ्राँसिस साबा ने अपने अनुसंधान में पाया है कि सिर दर्द जैसे मामूली स्वास्थ्य परिवर्तन से भी आभा मण्डल में परिवर्तन आ जाता है। स्वस्थ स्थिति में अंगुलियों के सिरे का आभा मण्डल लम्बे परिमण्डल युक्त होता है तथा बीमारी की स्थिति में यह बदल कर व्रणनुमा धब्बेदार हो जाता है, साथ ही इसका रंग भी परिवर्तित हो जाता है। शरीर में होने वाले विभिन्न रासायनिक परिवर्तनों और रुग्णावस्था में शरीर से निकलने वाले पसीने का स्वरूप और उसके गंध परिवर्तन की तरह ही शारीरिक, मानसिक परिवर्तन के साथ आभामण्डल भी परिवर्तित होता रहता है। इन अध्ययनों और अनुसंधानों के आधार पर शरीर क्रिया विज्ञान का अध्ययन करने वाले डॉ. डेविड शीनकिन, डॉ. जॉन ह्यूबेकर तथा टेड डॉन जैसे मूर्धन्य वैज्ञानिकों की यह धारणा अब बलवती होती जा रही है कि मानवी आभामण्डल या बायोफ्लक्स में होने वाले ये परिवर्तन भौतिक न होकर मानवी विचारणा तथा भाव संवेदना से बहुत हद तक संबंधित होते हैं। यही वैज्ञानिक कहते हैं कि एकाग्रता की स्थिति में जब साधक ध्यान धारणा की पराकाष्ठा पर पहुँचता है तो उसका आभामण्डल बहुत विस्तृत होता देखा गया है। इसमें रुग्णावस्था में पाये जाने वाले धब्बे नहीं पाये जाते। इससे यह सिद्ध होता है कि आभामण्डल की उज्ज्वलता मनुष्य की भावनात्मक चेतनात्मक उत्कृष्टता पर निर्भर करती है। कोई आश्चर्य नहीं कि अगले दिनों रोगों के निदान के साथ-साथ साधना क्षेत्र में प्रगति की जाँच पड़ताल आभामण्डल मापने वाले उपकरणों द्वारा होने लगे।
विज्ञान की उपलब्धियाँ यदि अध्यात्म शास्त्र की मान्यताओं एवं सिद्धान्तों से जोड़ी जा सकें तो मानव मात्र के लिए एक हितकारी चिकित्सा पद्धति सार्थक जीवन जीने की पद्धति-साधना उपचार प्रणाली विकसित की जानी भी संभव है। बायो फीडबैक की दिशा में चल रहे प्रयोगों को यदि सही दिशा लेकर आभा मण्डल परीक्षण प्रक्रिया तथा साधना निर्देशों से सूत्रबद्ध किया जा सके तो आत्मिक प्रगति के महत्व पूर्ण सोपानों को पार किया जा सकता है हम मात्र चिकित्सा तक सीमित न रहकर यदि अन्तरंग की सामर्थ्य को विकसित करने हेतु जैव भौतिकी के क्षेत्र में हुए इन अनुसंधानों का आश्रय लें तो न केवल बहुमूल्य रत्न हस्तगत होंगे, वैज्ञानिक जगत की जिज्ञासा को भी शान्त किया जा सकेगा, क्योंकि यह उन्हीं की भाषा में, यंत्रों द्वारा सम्पन्न किए गय पूर्णतः विज्ञान सम्मत प्रयोग होंगे।
यजमान की पत्नी का स्वर्गवास हो गया। वह इस असामयिक निधन पर शोकातुर होकर लगातार रोता रहा। पुरोहित उसे सान्त्वना देने गये। ब्रह्मज्ञान सुनाते रहे और उसके शाक को मूर्खता बताते रहे।
कुछ दिन बाद पुरोहित की लंगड़ी गाय मर गई। बच्चों को उसी के दूध का सहारा था। इस क्षति से पण्डित जी को भारी चोट लगी। आँखों से आँसू बहने लगे और हिचकी बंध गई।
जिनने पुरोहित को यजमान से ब्रह्म ज्ञान बघारते सुना था। उनमें से कुछ पड़ोसी गाय के निधन पर किये जा रहे विलाप को भी सुनकर आ पहुँचे। उनमें से कई ने कहा-देखा, अपने पराये का भेद।
विद्युत शक्ति की सामर्थ्य से सभी भली-भाँति परिचित हैं। बीसवीं सदी के इस अनुसंधान ने मानव जीवन को प्रगतिशील मोड़ देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अधिक से अधिक क्षमता की विद्युत का प्रयोग कर असंभव से दीख पड़ने वाले कृत्य भी अब किये जाने लगे हैं। न्यूनतम विद्युत विभव से परिचालित इलेक्ट्रानिक्स के सर्किट्स, माइक्रोचिट्स आदि ने गत दो दशक में विज्ञान में क्राँति ला दी है। अभी-अभी पिछले दिनों सुपर कन्डक्टर के अनुसंधान ने इस दिशा में अपरिमित संभावनाएँ जगा दी हैं। किन्तु यह वह पक्ष है जो हमें ज्ञात है। जिस काया से हम दैनन्दिन जीवन के क्रियाकलाप चलाते हैं, वह अपने आप में एक परिपूर्ण शक्ति सम्पन्न बिजली घर है, यह बहुतों को मालूम नहीं। हम तो इसे एक पुतला भर मानते हैं, जिसे भोग विलास में लगाकर इस शक्ति को निरन्तर नष्ट करते रहते हैं। यदि इस शक्ति भण्डार का सदुपयोग, सुनियोजन किया जा सके तो महत्वपूर्ण चमत्कारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकना संभव है।
शास्त्रकार ही नहीं, वैज्ञानिक भी अब कहते हैं कि मानवी सत्ता की गहराई में उतरने पर ऊर्जा निर्झर उछलते देखे जा सकते हैं। गहराई में दबे पड़े रहने पर तो खदानों की बहुमूल्य खनिज राशि का भी पता नहीं चल पाता। वह अन्दर अविज्ञात स्थिति में पड़ी रहती है। भूगर्भ में बहने वाले महानदों की जल-सम्पदा को ऊपरी सतह पर ढूँढ़ने वाले कहाँ पा पाते हैं। लाभ तो उन्हें मिलता है जो गहरी डुबकी लगा कर इनका पता लगा लाते हैं। बहुमूल्य मोती कमा लेने का लाभ व श्रेय गोताखोरों को ही मिलता है।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि यह प्रचण्ड प्राण ऊर्जा शोलों के रूप में बाहर स्वतः धधकने लगती है। अपनी उपस्थिति का परिचय यह भिन्न-भिन्न रूपों में देती देखी जाती है, यद्यपि ऐसा अपवाद रूप में होता है, फिर भी यह इस तथ्य को तो प्रमाणित करता ही है कि मानवी सत्ता विद्युत ऊर्जा से अभिपूरित है।
फ्रान्सिस हिचिंग की पुस्तक “दि वर्ल्ड एटलस ऑफ मिस्ट्रीज” में सन् 1938 की एक अमेरिकी घटना का उल्लेख है कि गर्मी के मौसम में एक दिन नारफाँक ब्राड्स नामक स्थान पर नौका विहार कर रही एक महिला के शरीर से अग्नि की लपटें स्वतः फूट पड़ीं। साथ में उसके पति व बच्चे भी थे। पानी से आग बुझाने का प्रयास किया गया। पर उस भभकती अग्नि पर काबू नहीं पाया जा सका। वह मेरी कारपेण्टर नामक उस महिला के शरीर को भस्मीभूत करके अपने आप बुझ गई।
“स्पान्टेनियस ह्यूमन कम्बशन” की इन घटनाओं की शृंखला में बिहार के भागलपुर जिले की पाँच वर्ष पूर्व 1982 के सूर्य ग्रहण के अवसर पर घटी एक घटना का उल्लेख यहाँ करना समीचीन होगा। एक युवक अपने घर के आँगन में मौन बैठा था। बारम्बार घर वालों के पूछने पर उसने बताया कि आज उसके जीवन का अन्तिम दिन है घर के सदस्यों ने उसके कथन की ओर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर तक, वह सूर्य की ओर मुँह किए ताकता रहा। अचानक उसके शरीर से अग्नि की नीली ज्वालाएँ फूटने लगीं। घर के सदस्यों ने शरीर पर पानी फेंका तथा कंबल से ढँक दिया पर शरीर उस तीव्र ज्वाला में बुरी तरह झुलस गया। आग तो बुझ गयी पर उसे बचाया न जा सका। अस्पताल पहुँचने पर उसने दम तोड़ दिया।
वैज्ञानिकों का ऐसा मत है कि पच्चीस वोल्ट से 60 वोल्ट तक का विद्युत बल्ब जला सकने योग्य बिजली की मात्रा प्रत्येक शरीर में न्यूनाधिक अनुपात में क्षेत्र में पायी जाती है। हाथों, आँखों और हृदय में इसकी सक्रियता कुछ अधिक सघन होती है। ट्राँजिस्टर के एण्टीना को हाथ की उँगलियाँ हटाने पर आवाज पहले जैसी हो जाती है। आँखों की विद्युत-शक्ति का त्राटक साधना में घनीभूत कर उपयोगी बनाया जाता है। हिप्नोटिज्म में इसी विद्युत शक्ति को प्रखर और वशीभूत बनाने की साधना की जाती है।
सत्रहवीं सदी का एक प्रसंग है। ससेक्स की एक वृद्धा की प्राण विद्युत सहसा धधक उठी और वह अपनी झोंपड़ी में झुलस कर जल मरी। ‘डेली टेलीग्राफ’, लन्दन ने एक बार एक ट्रक ड्राइवर के ट्रक के भीतर ही अपनी सीट पर जल जाने की खबर छापी थी। इसी प्रकार ‘रेनाल्ड न्यूज’ ने पश्चिमी लन्दन की एक खबर छापी थी कि एक व्यक्ति वहाँ सड़क से जा रहा था, तभी सहसा उसके भीतर से लपट निकली और वह वहीं झुलस कर सिमट गया।
ओहियो की एक फैक्टरी में आठ बार आग लग चुकी थी। इसके कारण का पता करने के लिए वैज्ञानिक जासूस रोबिन बीच को आमन्त्रित किया गया। रोबिन बीच ने सभी कर्मचारियों को एक-एक करके इलेक्ट्रोड और वोल्ट मीटर से जुड़ी एक धातु पट्टिका पर चलाया। फैक्टरी की एक महिला कर्मचारी ने जैसे ही धातु पट्टिका पर पाँव रखा, वोल्ट मीटर की संकेतक सुई उच्च बिन्दु पर जा टिकी, जबकि अन्य कर्मचारियों के समय यह औसत बिन्दुओं के बीच डोलती रही थी। फैक्टरी में आग लगने का कारण वह महिला ही थी जिसकी भीतर विद्युत-शक्ति अत्यधिक मात्रा में विद्यमान थी। उस महिला को दूसरे विभाग में भेजा गया तब से आग लगने का सिलसिला समाप्त हो गया।
कुछ वर्षों पूर्व लन्दन में एक डिस्कोथिक में नाच रहे एक प्रेमी युगल का सारा आनन्द महा शोक में बदल गया जब उस लड़के के साथ थिरक रही सुनहरे बालों वाली युवती सहसा चीख पड़ी। लड़की के सुनहरे केश आग की लपटों में लहरा रहे थे। लड़के ने आग बुझाने की कोशिश की, तो उसके हाथ जल गए। कुछ क्षणों बाद वह उन्नीस वर्ष की युवती राख की ढेरी में बदल गई। यह प्राण विद्युत के विस्फोट का ही परिणाम था। इसके पहले चेम्सफोर्ड में ऐसी ही घटना 20 सितम्बर 1938 को घटित हुई थी और एक महिला देखते-देखते अनेक व्यक्तियों के सामने नीली लपटों में खो गई थी।
ह्विटले (इंग्लैण्ड) का एक नागरिक जोनहार्ट 31 मार्च 1908 को अपने घर में बहन के साथ बैठा था। सहसा उसकी बहन के शरीर से आग की लपटें निकलने लगीं। जोनहार्ट ने उसे कम्बल से लपेट दिया, पर कम्बल, कुर्सी समेत वह आग में स्वाहा हो गई।
लन्दन के प्रसिद्ध स्नायु-चिकित्साविद् डॉ. जान ऐश क्राफ्ट ने उस लड़की के बारे में सुनने पर उसकी जाँच करनी चाही। उन्होंने सुन रखा था कि इस लड़की की प्राण विद्युत बहुत अधिक है और उसे छूने वाले को तेज झटका लगता है। वे पहुँचे और बड़ी गर्म जोशी से जेनी से हाथ मिलाया। हाथ मिलाते ही वे दूर फर्श पर जा गिरे और बेहोश हो गए। उपचार के बाद होश आया। इस लड़की में विद्युत्स्फुल्लिंग फूटने की यह स्थिति सन् 1950 तक रही। फिर धीरे-धीरे वह स्वयं समाप्त हो गयी।
सात दिसम्बर 1956 की प्रातः जब होनोलूलू (हवाई द्वीप) में घरों में काम करने वाली मार्गरेट कामेट नामक एक महिला अपने मालिकों के यहाँ बर्तन साफ करने नहीं पहुँची तो उनमें से कई के घर से बुलावा आया। उसके घर पहुँचने पर उनने पाया कि क्रामेट के शरीर से नीले रंग की लपटें निकल रही हैं जिनसे वह शनैःशनैः भस्म होती जा रही है। वह अर्धचेतनावस्था में थी, पर उसे किसी प्रकार की पीड़ा हो रही थी, ऐसा अनुभव नहीं हो रहा था। आग बुझाने के सारे प्रयास निरर्थक रहे वह कुछ ही क्षणों में वह आग का ढेर मात्र रह गई।
31 जनवरी 1959 का प्रसंग है। सान फ्रांसिस्को का एक वृद्ध जैक लार्चर दूध लेने के लिये पंक्तिबद्ध खड़ा था। उसके आस-पास वालों ने अचानक उसके शरीर से लपटें निकलती देखीं। आग बुझाने के लिए उसका शरीर कम्बलों से लपेट दिया गया, किन्तु 60 किलोग्राम की वह काया कुछ ग्राम राख का ढेर बनकर कुछ ही सेकेंडों में भस्मीभूत हो गई।
सन् 1835 में नेशविली विश्वविद्यालय के गणित विभाग के प्रोफेसर जेम्स हेमिल्टन के साथ भी इसी तरह स्वतः दहन की घटना घटी। किन्तु जेम्स हेमिल्टन उन दुर्लभ व्यक्तियों में से एक प्रतीत होते हैं जिन्होंने स्वतः उत्पन्न आग को बुझा दिया। उनके बायें पैर में उन्हें जैसे ही जलने जैसा दर्द अनुभव हुआ उन्होंने नीचे देखा। उन्होंने देखा कि एक शक्तिशाली सिगरेट लाइटर की लौ के समान एक 10 सेंटीमीटर लम्बी चमकदार लौ उनके पैर से फूट कर निकल रही है। उन्होंने उसे थप्पड़ मारा, कोई प्रभाव नहीं हुआ। फिर जब उन्होंने उसे हाथ से दबाये रखा ताकि उसे ऑक्सीजन मिलना बन्द हो जाये, तो वह धीरे-धीरे बुझ गई।
यू.सी.एल.ए. (अमेरिका) के जॉन डेक ने ऐसे कई व्यक्तियों की जाँच की है जो स्वतः दहन के आँशिक रूप से शिकार हुए। वे अपने शोध ग्रन्थ “ए ट्रिटाइज ऑन स्पान्टेनियन ह्यूमन कम्बशन” में लिखते हैं कि “यह समझ में नहीं आता कि इन आँशिक दहन वाले व्यक्तियों में ऐसा क्यों होता है। कि थोड़ा सा हिस्सा ही जलकर रह जाता है।” डॉ. बेन्टले के प्रकरण का वे विशेष रूप से हवाला देते हैं जिसमें उनके सहित दो और व्यक्ति कार में बैठे-बैठे जल कर भस्म हो गए। फलस्वरूप कार में भी आग लग गयी। किसी की भी पास जाने की हिम्मत न पड़ी। जब पूर्णाहुति हो चुकी एवं आग के शोलों की गर्मी ठण्डी पड़ी, तो भी अस्थि पिंजर, खोपड़ी, दाँत वह अन्दर के कई अवयव सुरक्षित बच गये थे। आग के बीच रहकर भी कुछ अंगों का न जलना आश्चर्य का विषय था।
वैज्ञानिकों का मत है कि मनुष्य शरीर में उसके भार का पैंसठ प्रतिशत (लगभग पैंतालीस लीटर) जल होता है। इसे वाष्पीभूत कर काय-अवयवों को जलाने के लिये लगभग पाँच हजार डिग्री फारेनहाइट की अग्नि चाहिए। यह कहाँ से पैदा हो जाती है? शरीर के जीवकोशों (लगभग 60 खरब) में से प्रत्येक में अग्नितत्त्व प्रोटोप्लाज्मा में सन्निहित होता है पर वह इतना सुव्यवस्थित व सूत्रबद्ध होता है कि उससे शरीर जले, यह संभावना दूर-दूर तक नहीं सोची जा सकती। जब तक प्रोटोप्लाज्मा को विखण्डन प्रक्रिया द्वारा उच्च प्लाज्मा में नहीं बदला जाता, तब तक अग्नि का स्वतः दहक उठना समझ से परे है। पर ऐसा होता है। दहकने के अतिरिक्त यह जैव विद्युत शरीर के अंग विशेषों से निस्सृत होकर दूसरों को प्रभावित करती भी पायी गयी है। उच्च स्तर को प्राप्त योगीजनों, महापुरुषों को चरण स्पर्श करने पर, सिर पर हाथ फेरे जाने, वात्सल्य, थपथपाने, अनुदान शक्तिपात आदि में इसी स्तर की विद्युत प्रयुक्त होती है। किसी उच्च मनोभूमि के महायोगी के समीप बैठने से भी मन व अंतःकरण में हलचल मचा देने वाली यही प्राण-विद्युत है। यह सामान्य विद्युत से भिन्न स्तर की, उपकरणों की पकड़ से बाहर की शक्ति है एवं मूलतः अनुभूति का विषय है। मात्र भावनात्मक माध्यम से इसे संप्रेषित किया जा सकता है।
एक पाश्चात्य वैज्ञानिक का मत है कि यदि सम्पूर्ण शरीरगत द्रव्य को विद्युत ऊर्जा में बदला जा सके तो 120 पौण्ड वाले शरीर से इतनी शक्ति प्राप्त की जा सकती है कि उससे उत्तरी अमेरिका जैसे विशाल देश के लगातार दस वर्ष तक विद्युत सप्लाई की जा सके। कितनी प्रचण्ड शक्ति सम्पन्न है काया? यह अनुमान हमें सहज ही नहीं हो पाता। किन्तु इस तथ्य को गीताकार ने काफी पहले ही प्रकट कर दिया है। वे कहते हैं-
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम् आश्चर्यवत् वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवत् चैनम् अन्यः श्रणोति श्रृत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥ (अध्याय 2/29)
अर्थात् कोई से आश्चर्य से देखता है, कोई इसके विषय में आश्चर्य की बात करता है, कोई इसे आश्चर्य से सुनता है; किन्तु फिर भी थोड़े ही लोग हैं जो इस सत्य को, अर्थात् मानवी सत्ता के इस शाश्वत महत्व को जानते हैं।
इसी प्रकार वृहदारण्यक में उपनिषद्कार कहता है-इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञान घन एवं (2/4/12) अर्थात्-”यह महद्भूत, महान सत्ता (व्यष्टिगत ब्राह्मी सत्ता) अनन्त और अपार है। वह केवल विज्ञान या चित् का घनत्व है।” वेदों में जिस शक्ति को “ज्योतिषाँ ज्योतिः कहा गया है, वह यही विद्युत तत्त्व है जो अपना परिचय कभी संकल्प बल के रूप में, कभी प्रचण्ड जिजीविषा के रूप में, कभी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाले अग्नि के दहकते शोलों के रूप में देता रहता है। इस महाशक्ति का यदि सुनियोजन सोचा जा सके एवं नष्ट होने से बचा कर प्रसुप्त पड़ी सामर्थ्य को जगाने में उसका सदुपयोग हो सके तो मनुष्य अपरिमित शक्ति का स्वामी हो सकता है। अपनी जागृत सामर्थ्य से वह ऋद्धि-सिद्धियों को करतलगत कर अपनी आत्मिक प्रगति का तथा समष्टि के कल्याण का पथ प्रशस्त करता रह सकता है।
जिन पदार्थों को निर्जीव या जड़ कहा जाता है, उनमें भी हरकतें, हलचलें होती हैं। यह समूचा विश्व परमाणुओं से बना है। उनके नाभिक एवं इर्द-गिर्द परिभ्रमण करने वाले घटक निरन्तर भ्रमणशील रहते हैं। इन्हीं इकाइयों का चित्र-विचित्र समीकरण विभिन्न पदार्थों के रूप में परिलक्षित होता है। इनका स्वरूप भी स्थायी नहीं रहता। वह बनता, बढ़ता, परिपक्व होता एवं वयोवृद्ध होकर मरता बदलता रहता है। समस्त पदार्थों की यही गति नियति हैं।
ताप, प्रकाश एवं ध्वनि तरंगें समूचे ब्रह्माण्ड में गतिशील हो रही हैं। अणु-परमाणु उन्हीं का परिस्थिति जन्य संगठन है। विनिर्मित पदार्थ तो स्थिर दीखते हैं पर उनका निर्माण एवं परिवर्तन तो स्थिर दीखते हैं पर उनका निर्माण एवं परिवर्तन करने वाली तरंगीय एवं आणविक इकाइयाँ द्रुत वेग से गतिशील रहती है। इसलिए आँखों में जो कुछ स्थिर दीखता है तत्त्वतः वह सभी गतिशील एवं परिवर्तनरत है। क्रिया उन सब के साथ सघन रूप से जुड़ी हुई है।
सृष्टि का एक भाग जड़ है। दूसरा सचेतन। सचेतन में जीवधारियों का समुदाय आता है। उनके शरीर में विचारणा काम करती है। वे पेट प्रजनन की व्यवस्था जुटाने के लिए सोचते और साधन जुटाते रहते हैं। ऋतु प्रभाव एवं अन्य कठिनाइयों से बचने निपटने के लिए आत्म रक्षा हेतु संघर्ष भी करते हैं। उनकी विचारणा इसी छोटी सीमा तक सीमित है। मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक विकसित है। अतएव उसका स्वार्थ चिन्तन भी विकसित है। उसे सरसता चाहिए और सुन्दरता, सम्पन्नता, प्रशंसा भी। अतएव उसका विचार क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। उसकी व्यावसायिक बुद्धि अनेक प्रकार के नीच ऊँच सोचती है, मोड़ मरोड़ों में होकर गुजरती है। इसलिए उसे विचारशील ही नहीं बुद्धिमान भी माना जाता है।
उपरोक्त दोनों उपक्रम स्थूल एवं सूक्ष्म की परिधि में आते ही हलचलें एवं विचारणाएँ इन्हीं वर्गों में गिनी जाती हैं। इन्हीं का आधार अपना कर जड़ चेतन की विविध विधि गतिविधियाँ चल रही हैं। इससे आगे का उत्कृष्ट क्षेत्र भावनाओं का है। दिव्य भावनाओं का। जिसमें राग द्वेष नहीं वरन् ऐसी संवेदनाओं की गणना होती है जो दया, करुणा, सेवा, पुण्य परमार्थ, संयम, साहस जैसी सद्भावनाओं के साथ जुड़ती है। यह मानवी संवेदनाएँ हैं जो स्वयं की सुख सुविधाओं पर अंकुश लगाती और दूसरों के प्रति उदार आत्मभाव जताती है। इसी संवेदना की आत्मीयता, उदारता एवं पुण्य प्रक्रिया रूप में निरूपित किया जाता है। यह मनुष्यता के साथ जुड़ी हुई दिव्य संवेदना है। इसका बाहुल्य तो नर देवों में भी होता है, पर माता और सन्तान के प्रति आरम्भिक दिनों में उभरता वात्सल्य अन्य प्राणियों में भी यत्किंचित् मात्रा में पाया जाता है। पालतू पशु भी मनुष्यों के साथ बहुत हद तक प्यार दुलार बरतते देखे गये हैं।
तथाकथित देवताओं की मूल प्रवृत्ति भी यही है। वे दयालु होते हैं जहाँ आवश्यकताओं समझते हैं, बादलों की तरह अनुदान वरदान बरसाते हैं। ऋषि, मुनि योगी, तपस्वी, भक्त, मनीषी अपनी साधनाओं को इसी निमित्त नियोजित करते हैं कि उनका लगाव क्रियाशीलता और कल्पना की प्रतिक्रिया से यथा सम्भव विरत होता चले। स्वार्थ की सीमा से उछल कर परमार्थ संवेदनाओं में प्रवेश कर सके।
भक्ति भावना जब कभी भी जहाँ कहीं भी उभरती है तो उसका प्रवाह सेवा सहायता के लिए मचलता है। पुण्य परमार्थ को चरितार्थ किये बिना चैन नहीं पड़ता। इसी मनः स्थिति को भक्ति या आत्मीयता कहते हैं। प्रेम प्रीति भी यही है। निराकार भगवान की भावानुभूति इसी रूप की होती हैं देवताओं की रीति−नीति भी यही है। सूर्य, चन्द्र, पवन, बादल आदि को निरन्तर परमार्थ में संलिप्त देखा जाता है। कारण शरीर के क्षेत्र में प्रवेश करने, उसे उभारने, उजागर करने में भी इसी परिपाटी को अपनाना पड़ता है। पति पत्नी परस्पर समर्पण योग की साधना करते हैं। माता का अजस्र वात्सल्य भी संतान पर इसी हेतु बरसता है। तत्व-ज्ञानी जब जीवन की गरिमा और महिमा पर विचार करते हैं तो उन्हें इसी में सार प्रतीत होता है कि द्वैत को अद्वैत में परिणत किया जाय। कामनाओं को भावनाओं में उलट दिया जाय। स्वार्थ को गलाकर परमार्थ में ढाल दिया जाय। मनुष्यों में उत्कृष्टता जिन्हें अर्पित की जाती है वे पुरोहित और परिव्राजक के पुण्य प्रयास में लगे होते हैं।
ब्रह्म परायणों में से जो गृहस्थ रहते थे वे पुरोहित का काम करते थे और जिन्हें विरक्त रहना बन पड़ता था वे परिव्राजकों की तरह परिभ्रमण करते, आलोक वितरण का कार्य करते और जनमानस के परिष्कार में संलग्न रहते थे। औसत नागरिक की तरह निर्वाह करना लोभ मोह के बंधन शिथिल रखना जिस किसी से भी बन पड़ा है। उसने कारण शरीर को सशक्त बनाने की प्रक्रिया में उत्साहवर्धक सफलता प्राप्त की है।
कारण शरीर को देव शरीर भी कहते हैं, कारण कि पाँचों प्रसिद्ध देवताओं की दिव्य शक्तियों का उसमें समावेश रहता है। परमेश्वर को परमपूज्य कहा है और पाँच देव तत्त्वों का अधिष्ठाता कहा है। परमात्मा की उपासना का तात्पर्य हैं-श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञा की त्रिधा, सद्भावनाओं का संगम। इस समागम को जिसने अन्तरात्मा में धारण कर लिया, समझना चाहिए कि उसने ब्राह्मी स्थिति उपलब्ध कर ली।
स्वर्ग मुक्ति और ऋद्धि, सिद्धि का भण्डार परब्रह्म को माना जाता है। उसका अवतरण जब कभी, जहाँ कहीं हुआ है उसे अन्तःकरण का उच्च स्तर एवं कारण शरीर का आधार बिन्दु के रूप में पाया गया है।
उपनिषदों में ईश्वर की परिभाषा “रसो वै सः” के रूप में की गई है। ईसा भी प्रेम को परमेश्वर कहते हैं। समस्त सत्प्रवृत्तियों एवं सद्भावनाओं का उद्गम केन्द्र कारण शरीर ही है। उसी को परिष्कृत करने के लिए भक्ति भाव की साधना की जाती है।
उच्चस्तरीय प्रेम भक्ति में द्वैत को अद्वैत बनाना पड़ता है। इस स्थिति को समर्पण योग भी कहते हैं। समर्पण में छोटी इकाई को बड़ी सत्ता में अपने को होमना, सौंपना पड़ता है। नाला नदी में मिलता है। नदी नाले में नहीं। आत्मा को अपनी संकीर्णता परमात्मा की महानता में विलीन करनी पड़ती है। निजी इच्छा आकाँक्षाओं का परित्याग परमात्मा के अनुशासन में विलीन करना होता है। ऐसी दशा में भक्त को दानी बनना पड़ता है, याचक नहीं।
कामना पूर्ति के लिए परमात्मा को अपने सेवक की तरह आदेश नहीं देने की धृष्टता का दुस्साहस नहीं अपनाना होता। इसमें तो महान् की महानता को ही आँच आती है। भक्त की भावना का स्तर गया-गुजरा होकर याचक जैसा बन जाता है। यह अनुचित है। अयोग्य है। परमात्मा की महानता छूने के लिए भक्ति साधक को अपना अन्तःकरण उतना ही विशाल एवं अद्भुत बनाना पड़ता है। स्वार्थ को परमार्थ में परिणत करना होता है।
एक सेठ के घर में आग लगी। तुरन्त पता चल जाने पर उसने पड़ौसियों को बुलाकर सारा कीमती सामान बाहर निकाल लिया।
पत्नी पड़ोस में गई थी। लौटी तो सेठ ने सारा कीमती सामान सुरक्षित निकाल लेने का समाचार सुनाया और संतोष की साँस ली।
सेठानी ने पूछा-मेरे इकलौते लड़के का क्या हुआ? जिसे भीतर के कमरे में सोता छोड़ गई थी। पता लगाया तो वह जलकर मर चुका था। दौलत उसी के लिए तो जमा की गई थी। लड़का मरने पर वह भी निरर्थक हो गई।
हम भी आत्मा को भूलकर उसे दुष्कर्मों में जल जाने देते हैं। दौलत भर के लिए आतुर रहते हैं।
मनुष्य के अन्तराल में अनेकानेक रहस्यमयी गुप्त शक्तियों का भाण्डागार विद्यमान है। स्थूल काया की अपेक्षा सूक्ष्म एवं कारण शरीर में अनुपम दिव्य क्षमताएँ भरी पड़ी हैं। पर हैं ये सभी प्रसुप्त स्थिति में दबी हुई। यदि इन्हें जागृत और विकसित किया जा सके तो वह उन अलौकिक शक्तियों का स्वामी बन सकता है, जिन्हें सामान्य जन आश्चर्यजनक कहते समझते हैं।
इस तरह की घटनाएँ कभी-कभी प्रकाश में भी रहती है जिनसे मानवी काया में अन्तर्निहित असीम क्षमताओं का परिचय मिलता है। एक घटना सत्रहवीं सदी की है। मूर्धन्य वैज्ञानिक एवं अनुसंधानकर्ता लार्ड एडोर ने एक व्यक्ति को हवा में पक्षियों की तरह उड़ते और तैरते हुए देखा था। इस विलक्षण विवरण को उन्होंने “रिपोर्ट ऑफ दि डायलेक्टिकल सोसायटी ऑन स्प्रिचुएलिज्म” नामक पत्रिका में प्रकाशित कराया था। प्रारम्भ में तार्किकों, प्रत्यक्षवादियों एवं वैज्ञानिकों को इस तथ्य पर विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई व्यक्ति हवा में भी उड़ सकता है। किन्तु इसी तरह की जब एक घटना इटली नगर में सन् 1663 में घटी तो समस्त विचारकों, तार्किकों एवं वैज्ञानिकों को चमत्कृत कर दिया। हुआ यह कि इटली के पादरी जोसेप अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व ही चिकित्सा कर रहे एक डॉक्टर को भी अपने साथ लेकर आकाश में उड़ गये। उस चिकित्सक ने अपने संस्मरण में लिखा कि-”जब मैं फादर जोसेप की देखभाल कर रहा था तो अचानक उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और हवा में तैरने लगे। उनसे जकड़ा हुआ मैं भी हवा में उड़ रहा था। वह मुझे उड़ाते हुए फ्राँस के गिरजाघर तक ले गये और वहाँ उतर कर प्रार्थना की। इसके बाद बोले-”अब मुझे आपकी चिकित्सा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अब मेरे शरीर त्यागने का समय आ गया है। मैं जल्दी ही भगवान के पास जाने वाला हूँ। यह सुनकर मैं सन्न रह गया। इसके बावजूद दूसरे ही दिन उनकी मृत्यु हो गयी।”
एडोर द्वारा प्रकाशित विवरण की यथार्थता को जानने के लिए “द रायल एस्ट्रोनामिकल सोसायटी” के मूर्धन्य अनुसंधानकर्त्ताओं ने व्यापक गवेषणाएँ की। इन शोधकर्मियों ने अपनी गहन खोजों के आधार पर पता लगाया कि इटली के सरकारी कागजातों में श्री जोसेप के हवा में तैरने के एक नहीं अनेकानेक प्रसंग रिकार्ड हैं, जिन्हें कि पुलिस वालों तथा अन्य कई प्रत्यक्षदर्शियों ने संग्रह किये थे। जोसेप के संबंध में पूरे इटली भर में यह ख्याति फैल चुकी थी कि प्रार्थना-उपासना करते वह हवा में उड़ने लगते हैं। हवा में उड़ने वाले साधु के नाम से प्रसिद्ध इस पादरी गिसप देसा जोसेप का जन्म 1603 में इटली के कापरटिनों नामक स्थान पर हुआ था। पिता बढ़ईगिरी का काम करते थे। बचपन से ही अन्तर्मुखी जोसेप घण्टों पूजावेदी के सामने बैठे उपासना किया करते थे।
एक दिन चर्च में प्रार्थना करते समय तीव्र गर्जन करते हुए वह हवा में ऊपर उठ गए तथा दोनों बाँहों को फैला कर अधर में तैरने लगे। थोड़ी देर बाद वह मोमबत्तियों व फूलों से सुसज्जित पूजा वेदी पर उतर आए। कुछ समय पश्चात पुनः उसी तरह गर्जन करते हुए अड़े और वापस नीचे उतरकर अपने स्थान पर पहुँच कर प्रार्थना करने लगे।
एक बार रोम में पोप अर्बन अष्टम को देखकर जोसेप भावावेश में इतना उत्साहित हो गए कि आधार छोड़कर हवा में उड़ चले तथा तब तक उड़ते ही रहे जब तक कि पोप ने उन्हें नीचे उतरने का संकेत नहीं दिया। रोम से वापस लौटने पर चर्च में अंकित चित्रों से प्रभावित होकर जोसेप ने एक चीत्कार के साथ लगभग 15 गज ऊँची उड़ान भरी। उसके बाद जोसेप ने एसेसी तथा कोपरटिनों में भी अनेकानेक उड़ानें भरी। यह सब वह भावावेश में आने पर ही करते थे, प्रदर्शन के लिए नहीं। दूसरों को साथ लेकर भी जोसेप कभी-कभी उड़ानें भरा करते थे। उनके बाल्यकाल की घटना है। एक बार जब वह अपने पिता का हाथ पकड़े हुए थे; एकाएक उन्हें लेकर आकाश में उड़ गए। इसी प्रकार एक समय वह किसी पागल की आध्यात्मिक चिकित्सा कर रहे थे, तभी उसके सिर के बालों को हाथ से पकड़े हुए वह उड़ गए तथा काफी समय तक इसी तरह उड़ते रहे।
फादर जोसेप की उड़ान देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। जर्मनी के ड्यूक ऑफ ब्रन्शविक ने छिपकर देखा कि जोसेप कहीं सामान्य जनता को सम्मोहित तो नहीं करते? वह अभी इसी ऊहापोह में उलझे थे कि गर्जन करते हुए वह प्रार्थना की मुद्रा में घुटना मोड़े हुए ही हवा में उड़ने लगे। दूसरे दिन पुनः उनने इस उड़ान की पुनरावृत्ति देखी। तब उन्हें इस साध की अलौकिक सामर्थ्य पर विश्वास हो गया।
दरअसल ये प्रसंग उस विभूति का परिचय देते हैं जिसका उल्लेख अणिमा, लघिमा जैसी सिद्धियों के रूप में एवं पवन पुत्र हनुमान की आकाश यात्रा व सुरसा से उनकी भेंट रूप में पौराणिक आख्यानों में आता है। पूर्व जन्मों के संचित संस्कार या साधना पराक्रम से जब अन्तर्निहित क्षमताएँ जाग उठती हैं तो असंभव चमत्कारी कृत्य मानवी काया द्वारा संभव होते देखा जाने लगता है।
अठारहवीं शताब्दी के एक बौद्ध भिक्षु बेनेडिक्टायन के बारे में प्रख्यात है कि वह हवा में उड़ जाते थे। एक बार वह संघाराम में चहलकदमी कर रहे थे, तभी उपस्थित जन समूह के सामने वह हवा में विहंगवत् उड़ने लगे। ऊँचाई पर वह उठते ही जा रहे थे कि जैतून की शाखाओं से टकरा गये और घंटों अधर में ही लटके रहे। शिष्यों ने सीढ़ी लगाकर प्रयत्नपूर्वक उन्हें धरती पर उतारा, फिर भी वे जमीन से 6 इंच ऊपर ही टंगे रहे और उनको संबोधित करते रहे।
उन्नीसवीं सदी में वैज्ञानिकों का ध्यान उपरोक्त आध्यात्मिक विभूतियों की ओर आकृष्ट हुआ। जब ये चमत्कारिक घटनाएँ लोक चर्चा का विषय बनने लगी थीं और संशयवादी इस पर अविश्वास व्यक्त करते हुए इसे अफवाह और धोखाधड़ी की संज्ञा दे रहे थे। उस समय की इन घटनाओं से प्रभावित हो महान अध्यात्मवेत्ता एवं सुप्रसिद्ध रसायन शास्त्री सर विलियम क्रुक्स ने एक शोध समिति बनाई। उन्होंने इन चमत्कारिक प्रदर्शनों की व्यापक छानबीन की एवं तत्संबंधित अनुसंधानों-परीक्षणों की विशद व्याख्या अपने प्रसिद्ध शोध ग्रन्थ “रिसर्च इन द फेनामेना ऑफ स्प्रिचुएलिज्म” में प्रकाशित किया। होम नाम एक व्यक्ति की विलक्षणताओं का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि-”जब मैं उससे वार्तालाप कर रहा था, तभी वह जिस कुर्सी पर बैठा हुआ था उस कुर्सी सहित हवा में तैरने लगा”। एक अन्य दूसरे साक्षात्कार का विवरण इस प्रकार दिया है-”मेरी उपस्थिति में कुर्सी पर बैठी हुई एक महिला को भी उसने हवा में काफी ऊँचाई तक उठा दिया था। इस स्थिति में वह महिला लगभग दस सेकेंड तक रही। इसके बाद धीरे-धीरे जमीन पर अपनी कुर्सी सहित वापस आई”।
क्रुक्स ने अपने एक अन्य शोध ग्रन्थ- ”मिसलीनियस अकरेन्सेस ऑफ ए काम्पलेक्स करैक्टर” में एक सौ से अधिक आकाशगामिता की अद्भुत घटनाओं का वर्णन किया है।
‘मास्टर ऑफ लिडेन्सी’ नाम से प्रख्यात एक अन्य शोध कर्मी वैज्ञानिक ने इस तथ्य को प्रमाणित किया है कि व्यक्ति अपनी सूक्ष्म शक्तियों को जागृत करके कई ऐसे कार्य कर सकता है जो स्थूल काया से बन पड़ना संभव नहीं है। एडोर द्वारा और होम के साथ बैठा आकाश गमन पर चर्चा कर रहा था, तभी एकाएक श्री होम धरती से आकाश की ओर उठने लगे। देखते-देखते वह जमीन से पचास फीट ऊँचाई तक पहुँच कर हवा में स्थिर हो गये। काफी समय तक इस स्थिति में रहने के पश्चात् वह धीरे-धीरे जमीन पर उतर आये।
उपरोक्त प्रदर्शन अथवा अद्भुत कहीं जाने वाली घटनाएँ सदा से वैज्ञानिकों, भौतिक शास्त्रियों एवं प्रत्यक्षवादियों के लिए चुनौती बनी रही हैं। उनके समाधान खोजने में भी उनने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। परन्तु शोध परिधि स्थूल शरीर तक ही सीमित होने के कारण उनकी खोजें अधूरी ही रहीं। इस संदर्भ में-”साइन्स एण्ड रिलीजन बाई सेविन मैन ऑफ साइन्स” के लेखक प्रो. डब्ल्यू. बी. वाटमाली द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त ध्यान देने योग्य है। उनके अनुसार “भौतिक अथवा रासायनिक विज्ञान मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकता है। स्थूल से बढ़कर और भी कोई सूक्ष्मसत्ता है। हममें से प्रत्येक के हृदय में ऐसी कोई गुप्त शक्ति है जो उच्च उद्देश्यों की और प्रेरित करती है। इसकी व्याख्या विवेचना विज्ञान के द्वारा नहीं हो सकती।”
भारतवर्ष में स्वामी विशुद्धानन्द तथा स्वामी निगमानन्द भी अपनी ऐसी अनुभूतियों को प्रत्यक्ष प्रमाणित कर चुके हैं। कहा जाता है कि तैलंग स्वामी को नंगे फिरने के अपराध में काशी के एक अंग्रेज अधिकारी ने हवालात में बन्द करा दिया। लेकिन दूसरे दिन वे जेल से बाहर टहलते हुए देखे गए। उन्हें किसी ने कभी कुछ खाते-पीते नहीं देखा, फिर भी प्रतिवर्ष उनका वजन 1 पौंड बढ़ जाता था। इस 300 वर्ष की अवस्था में उनका वजन 300 पौंड हो गया था, ऐसे अनेकानेक उदाहरणों का नाथ सम्प्रदाय के मछीन्द्रनाथ, गोरखनाथ, जालन्धरनाथ, कणप्पा आदि योगियों के जीवन प्रसंगों में भी ऐसा उल्लेख पाया जाता है। अभी भी हिमालय की दुर्गम एवं सामान्य जनों की पहुँच से दूर निर्जन गुफाओं में ऐसे कितने ही योगी तपस्वी साधनारत हैं।
वस्तुतः विशिष्ट साधनाओं और तपस्या द्वारा साधक, योगीजन, अनादि काल से उन विभूतियों एवं ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी बनते रहे हैं जिन्हें अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राकाम्य, वाशित्व आदि नामों से जाना जाता है। छोटे-बड़े आकार धारण करने, अदृश्य और प्रकट होने, आकाश गमन करने, अपने कार्यक्षेत्र को प्रभावित करके इच्छित दिशा में जन मानस को मोड़ने, मरोड़ने आदि कार्य वे सहजता से सम्पन्न कर लेते हैं। इस तरह के उदाहरणों से भारतीय अध्यात्मशास्त्र के पन्ने भरे पड़े हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सूक्ष्म की सामर्थ्य को महत्व दिया जाय एवं ऐसे घटनाक्रमों को कपोल कल्पित अथवा कौतूहल न मानकर सूक्ष्म को साधने का प्रयास किया जाय। उड़ने की कला तो मक्खी-मच्छरों को भी आती है। उसे सीखने से लिये जीवन खपाना जरूरी नहीं। जरूरी तो यह है कि अध्यात्म अनुशासनों को महत्व देने हेतु जन साधारण को सहमत किया जाय। इन्हें बताया जाय कि साधना द्वारा इस काया में वाँछित परिवर्तन कर बहुत कुछ कर दिखाना मनुष्य के लिए संभव है। असीम संभावनाओं से भरे इस पिण्ड में कितना कुछ भरा पड़ा है, इसे जाना व आत्मसात किया जा सके तो भौतिकी की दिशा में अग्रसर मानव को आत्मिकी का अवलम्बन हेतु भी सहमत किया जा सकता है।
एक तान्त्रिक ऐसी विद्या सीखकर आया कि उस अनुष्ठान की पूर्णाहुति रात्रि को बारह बजे हो। मंत्र पूरा होते ही उबलते पानी में मक्का के दाने डाल जायें तो वे सभी मोती बन जाय।
तान्त्रिक अपने काम में लग गया। पत्नी को पास बिठा लिया और सावधान कर दिया कि वह जैसे ही पूर्णाहुति सूचक हुँकार भरे वैसे ही खौलती हाँडी में मक्का डाल दें। विधान चल पड़ा।
पत्नी स्वभाव की आलसिन भी थी और अविश्वासी भी। उसने उपेक्षा पूर्वक सुना। पर आज्ञा पालन में भलाई देखी सो चूल्हे में आग जलाकर पानी चढ़ा दिया। मक्का का कटोरा भी पास था। रात बीतते-बीतते उन्हें नींद आने लगी सो पैर सिकोड़ कर वहीं सो गई।
पूर्णाहुति की हुँकार तान्त्रिक ने कई बार की, पर पत्नी तो सोई हुई थी। वह उठा, जगाया और पानी में मक्का डाला। पर कुछ हुआ नहीं। समय निकल चुका था। अविश्वास और आलस्य ने सारा प्रयास व्यर्थ कर डाला।
दूसरे दिन पड़ौस की बुढ़िया एक कटोरा भर कर मोती लेकर ताँत्रिक के पास आई। उन्हें सौंप दिये और कहा-आपकी बात मैं दीवार के छेद में से सुन रही थी। चूल्हे पर पानी उबालती रही और हुँकार की प्रतीक्षा करती रही। आपका संकेत सुनकर मैंने तत्काल पानी में मक्का डाल दी। उसी से बने यह मोती हैं।
जागरुकता और तत्परता सफलता की अनन्य सहायिका है।
एक पिन की नोंक पर लाखों बिठाये जा सकें, ऐसे भ्रूण कलल से इस काय पिण्ड का “एकोऽहं बहुस्यामि” की प्रतिज्ञानुसार विकास होता है और देखते-देखते एक मानव शरीर जन्म ले लेता है। इस शरीर में कितना कुछ वैभव भरा पड़ा है, सामान्यतः इसकी जानकारी हमें नहीं होती। हम इसे मल-मूत्र की गठरी भर मान बैठते एवं शिश्नोदर पारायण जीवन जीते हुए चंदन का कोयला बनाते रहते हैं। इसकी स्थूल संरचना ही हमें यह सोचने पर बाध्य कर देती है कि विराट् का लघु रूप ही जब इतना असीम भाण्डागार अपने अन्दर छिपा बैठा है तो उस विभु की, परब्रह्म की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। कुछ विलक्षण तथ्य इस प्रकार हैं-
(1) एक विकसित मानवी काया में लगभग 650 माँसपेशियाँ, 100 संधियाँ, साठ हजार मील लम्बी रक्तवाही नलिकाएँ तथा लगभग 1 खरब 13 अरब स्नायु कोशिकाएँ होती हैं।
(2) हमारे शरीर में जन्म के समय 300 हड्डियाँ होती हैं। इनमें से 94 विकास के साथ-साथ बाल्यकाल में परस्पर जुड़ जाती हैं। इस प्रकार वयस्क मानवी काया में 206 हड्डियाँ होती हैं। भार सँभालने के मामले में ये ग्रेनाइट से भी जबरदस्त शक्तिशाली हैं। एक माचिस के आकार का ब्लॉक इनके समुच्चय से बनाया जाय तो वह नौ टन भार सँभालने की क्षमता रखता है।
(3) विकसित मनुष्य के अण्डकोश (टेस्टीकल्स) प्रतिदिन एक करोड़ से भी अधिक नये स्पर्म सेल्स (शुक्राणु) बनाते रहते हैं। ये इतने हैं कि 6 माह की अवधि में सारी धरती को घेर सकें।
(4) औसत जीवन काल में हमारा हृदय लगभग बीस अरब बार धड़कता है एवं इतने समय में 5 अरब लीटर (110 मिलीयन गैलन) रक्त का पम्पिंग कर देता है। यहाँ तक की निद्रावस्था में भी हथेली के आकार का हमारा हृदय लगभग 340 लीटर प्रति घण्टे शुद्ध रक्त सारे शरीर में भेजने का कार्य जारी रखता है। यह मात्रा इतनी है जिससे कि एक औसत एम्बेसडर कार का पेट्रोल टैंक हर सात मिनट में भरता रह सकता है। इस पम्पिंग के कार्य में इसे इतना परिश्रम करना पड़ता है कि यह एक औसत भार की मोटर कार को 50 फीट ऊँचा उठा सके। हृदय जो औसतन 70 से 72 बार प्रति मिनट धड़कता है, जरूरत पड़ने पर व्यायाम की पराकाष्ठा की स्थिति में 200 बार प्रति मिनट भी धड़क सकता है।
(5) हमारे दोनों फेफड़ों में कुल मिलाकर 30 खरब बहुत पतली सूक्ष्म रक्तवाही नलिकाएँ (केपीलरीज) होता है, जिनका काम होता है-शरीर की कार्बनडाइ ऑक्साइड को प्रश्वास द्वारा बाहर कर श्वास के माध्यम से ऑक्सीजन को रक्त में प्रविष्ट करा देना। यदि इन्हें सिरे से सिरा मिलाकर फैलाया जाय तो ये चौबीस सौ किलोमीटर का क्षेत्रफल घेर लेंगी।
(6) आमाशय से प्रवाहित अम्ल इतने साँद्र व तीव्र क्षमता वाले होते हैं कि वे जस्ते को पिघला दें। किन्तु शरीर में वे इस अम्ल से कोई नुकसान इसलिए नहीं पहुँचता कि इस अंग आमाशय की अन्दर की सतह से पाँच लाख जीवकोश प्रति मिनट बदलते रहते हैं। यहाँ तक कि हर तीसरे दिन अंदर की पूरी झिल्ली आमूल-चूल बदल जाती है।
(7) हर गुर्दे के अन्दर 10 लाख फिल्टर (नेफ्रान्स) होते हैं। इन फिर्ल्टस की रक्तवाही कोशिकाओं को सिरे से सिरा मिलाकर फैलाया जाय तो पृथ्वी की विषुवत् रेखा के चारों और एक चक्कर लगाया जा सकता है। प्रति मिनट दोनों 1300 मिली लीटर रक्त को छानने की प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं। पूरे साठ वर्ष की आयु तक ये लगभग चार करोड़ लीटर रक्त छान चुके होते हैं।
(8) हड्डियों में अवस्थित मज्जा हर सेकेंड 12 लाख लाल रक्त कोशिकाएँ बनाती व परिवहन हेतु रक्त में छोड़ती रहती है। प्रत्येक की जीवनावधि 100 से 120 दिन की होती है। अपने पूरे जीवनकाल में मनुष्य अपनी मज्जा से आधा टन भार के बराबर रक्त कोशिकाएँ उत्पन्न कर चुका होता है।
(9) शरीर का सबसे बड़ा अवयव है-त्वचा, जिसने 20 वर्ग फीट का क्षेत्र घेर रखा है। यह लगभग हर पचास दिन में एक बार अपना पूरा कायाकल्प कर लेती है। नयी कोशिकाएँ पुरानी का स्थान ले लेती है। औसतन हर व्यक्ति अठारह किलोग्राम भार की त्वचा साँप की केंचुल की तरह गिरा चुका होता है।
(10) सबसे छोटी माँसपेशी शरीर में कान के अन्दर होती है। यह लगभग एक मिलीमीटर लम्बी होती है। यहाँ पर स्थित आँतरिक अवयव ही मात्र ऐसे हैं जो रक्त से पोषण नहीं पाते, एक विलक्षण रस द्रव्य में सतत् डूबे रहते हैं ताकि धड़कन की ध्वनि ही इन्हें नष्ट कर बहरा न बना दे।
मनुष्य हाड़ माँस का पुतला भर दिखाई देता है। परन्तु 60 किलोग्राम औसत भार के इस शरीर में इतना कुछ विलक्षण भरा पड़ा है, जिसे निखार-उभार कर उस सामर्थ्य से असंभव दीख पड़ने वाले कार्य भी संभव कर दिखाये जा सकते हैं। मात्र उड़ने या कलाबाजी को ही सिद्धियां समझने वाले भूल जाते हैं कि मानव के अन्दर जीवट के रूप में, जुझारूपन एवं प्रतिकूलताओं से जूझने की अजेय सामर्थ्य के रूप में एक ऐसी विभूति विद्यमान है, जिसकी उपमा किसी और से नहीं की जा सकती। ऐसे ही नरपुँगव असाधारण पराक्रम करते एवं स्वर्णाक्षरों में अपना नाम इतिहास में अंकित करते देखे जाते हैं।
क्रेस्टेई (स्पेन) के एक सैनिक स्वेटो का जवानी के आरंभिक दिनों में अपनी प्रेमिका के साथ संबंध था। रिश्ता निभा नहीं और दोनों अलग हो गये। फिर भी उस योद्धा ने गले में एक लोहे का छल्ला अपनी बिछुड़ी प्रेयसी की स्मृति में पहने रक्खा। वह बाँका लड़ाकू था। उन दिनों भला प्रधान शस्त्र था। उसने 68 योद्धाओं के साथ 727 भाला आक्रमणों के प्रहार का सामना किया। हर संघर्ष में उसने अपने स्मृति चिन्ह पर आँच न आने देने के लिए भरपूर सावधानी बरती। अंतिम बार इस प्रक्रिया में वह इस बुरी तरह घायल हुआ कि उसके जीवित बचे रहने की कोई उम्मीद ही शेष नहीं रही; पर इसे उसकी उत्कट जिजीविषा ही कहनी चाहिए कि जीवन-मृत्यु के इस अद्भुत संघर्ष में उसने मौत को भी पछाड़ दिया और कुछ दिनों की चिकित्सा-परिचर्या के उपरान्त वह पुनः स्वस्थ हो गया।
इतिहास में ऐसे भी व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने असाधारण साहसिकता का प्रदर्शन कर जीवन भर योद्धा की तरह जीवन जिया। परिस्थितियाँ उन्हें कभी भी झुका नहीं सकी।
फ्राँस के न्यूर्स प्रदेश का एक कप्तान मैलर मुस्टैमै जीवन भर युद्धों का अग्रिम मोर्चा सँभालता रहा। उसने 122 युद्धों में भाग लिया और प्रत्येक में कई-कई बार गंभीर घाव लगे। सभी का वह सामना करता रहा और अच्छा होता रहा। उसकी मृत्यु 134 वर्ष में हुई। अठारहवीं सदी में एक फ्राँसीसी जनरल के जीवन में भी ऐसी ही घटनाएँ घटी। वेपटिस्टे मान्टमारिन का जीवन अपने ढंग का अनोखा था। उन्होंने 20 वर्ष की आयु में सेना में प्रवेश लिया। 75 वर्ष की आयु होने पर सन् 1779 में मरे। इस बीच वे पूरे 55 वर्ष सेना के विभिन्न पदों पर काम करते रहे वे युद्ध मोर्चा पर पाँच बार भयंकर रूप से घायल हुए और मृतक घोषित किये जाते रहे। हर बार में कब्रिस्तान पहुँचने से पूर्व जी उठे। उनका सारा शरीर अनेकों ऑपरेशनों से बेतरह कटा-फटा था। उन्होंने मरने तक कभी भी हिम्मत नहीं हारी। उन्हें फ्राँस का राणा साँगा कहा जाये तो कोई अत्युक्ति न होगी।
आस्ट्रिया के एक जनरल काउन्ट एन्टम ने अपने देश की सेना में 47 वर्ष तक काम किया। इस बीच उन्होंने 89 लड़ाइयाँ लड़ीं। इनमें उन्हें 84 भयंकर और सैंकड़ों छोटे घाव लगे। उनकी मृत्यु युद्ध मोर्चे पर ही हुई। मरते समय उनके चेहरे पर कोई विषाद नहीं था। राष्ट्र के लिये संघर्ष करने-मरने-खपने वाले कभी अशांत स्थिति में शरीर नहीं छोड़ते।
समुद्र के आर्कटिक क्षेत्र में एक जहाज पोलरस बर्फ में जा फँसा और एक चट्टान से टकरा कर टूट गया। जीवित बचे 19 नाविकों ने एक बहते हुए हिम खण्ड पर सवारी गाँठी और मछलियाँ पकड़ते व खाते जाते। उसी चट्टान पर कई दिन काटते तथा आगे ढकेलते हुए बर्फ की चट्टान की नाव बनाकर वे 196 दिन में 1200 मील की यात्रा करके लैब्रैडोर तट पर पहुँचे और प्राण बचाने में सफल रहे बर्फ से आच्छादित उस हिम क्षेत्र में जहाँ प्राण वायु भी बड़ी दुर्लभता से उपलब्ध होती हैं, उन्हें भरपूर मात्रा में अन्तःशक्ति की प्रेरणा मिलती रही, मनोबल बना रहा एवं वे प्रतिकूलताओं से जूझते हुए राह बना सके।
ऐसे भी दुस्साहसी हुए हैं जिन्होंने वैज्ञानिक प्रगति के प्रारम्भिक दिनों में हवाई उड़ान से ध्रुवों की यात्रा की।
सन् 1783 में फ्रेंच वैज्ञानिक प्रो. एडविन चार्ल्स ने पहला गुब्बारा बनाया। इसके बाद उसकी क्षमता और आकृति में क्रमशः सुधार होता गया। उस समय के विकसित गुब्बारा जिसका नाम “जैपलीन” था को लेकर कुछ दुस्साहसी युवक “नौटिलस” नामक पनडुब्बी जहाज पर सवार हो उत्तरी ध्रुव की कठिन यात्रा के लिए चल पड़े।
उस योजना का संचालन किया जर्मन डॉ. उल्सवीन ने। जैपलीन में कुल 56 आदमी सवार थे-40 चलाने वाले और 16 अनुसंधान करने वाले। गुब्बारा एक छोटे फुटबाल मैदान के बराबर था और गिरजाघर जैसा ऊँचा जिसमें खटोले जैसी लटकनें थीं, यात्री उन्हीं पर बैठते थे।
लेक काँसटैंस से उड़कर वह गुब्बारा जर्मनी, स्वीडेन, एस्थोनिया, फिनलैण्ड, रुस की सीमाएँ पार करते हुए ध्रुव प्रदेश पर पहुँचा। एल्फोरा अन्तरीम से लेकर सुविस्तृत ध्रुवीय क्षेत्र पर उड़ानें भरी और चित्र-विचित्र फोटो लिए। लगभग एक सप्ताह तक वह गुब्बारा उड़ा और पनडुब्बी को उससे भी अधिक समय लगाना पड़ा। उस प्रारम्भिक साहस भरी यात्रा से अर्जित उपलब्धियाँ श्रेय की उतनी ही अधिकारी हैं जितनी कि आज के कम्प्यूटर युग की।
जुलाई 1957 का एक प्रसंग है। पैराट्रुपर-विंग (जर्मनी) के कमाँडर लै. कुर्त एंजील ने जहाज से उड़ान भरी। दुर्भाग्यवश विमान में आग लग गयी। 1500 फीट ऊँचाई से गिर एंजील का पूरा शरीर चकनाचूर हो गया। अस्पताल में हुये परीक्षणों के उपरान्त डॉक्टरों ने घोषणा की कि अब उन्हें बचा सकना बिल्कुल संभव नहीं है। इतनी असह्य पीड़ा में भी उनने हिम्मत न हारी। एंजील ने चिकित्सकों के सामने बड़े साहस एवं विश्वास के साथ कहा-”मैं मर नहीं सकता। अभी मुझे बहुत काम करने हैं। आप सभी अपना कर्त्तव्य पूरा करें।” दो महीने बाद जब अपनी पूर्व स्थिति में आ पहुँचे तो चिकित्सकों ने उनकी जिजीविषा एवं साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की। व्यक्ति स्वयं अपने हाथों मौत भी बुला सकता है एवं प्रचण्ड मनोबल के सहारे उसे परे भी भगा सकता है, इसका यह एक जीवन्त उदाहरण है।
सन् 1965 की एक घटना है। अमेरिका का एक हवाई जहाज समुद्र की उड़ते हुए आग लगने के कारण जल गया। उसका पायलट समुद्र में कूद पड़ा। इतनी ऊँचाई से कूदने और समुद्र के जल पर गिरने के कारण उसे चोट भी आयी। फिर भी बिना घबराये वह तैरता रहा और बुरी तरह चोट खाये शरीर को खींचता-खाँचता 40 घन्टे तक अविराम तैरते हुए किनारे पहुँचा। किनारे पहुँचने पर कुछ लोगों ने उसे देखा तो अस्पताल में भरती कराने ले गये। इतनी अस्वस्थ और आहत दशा में जब लोग उसे इमर्जेंसी वार्ड में सर्जरी हेतु ले गये तो जैसे ही सुरक्षा के प्रति उसका मन आश्वस्त हुआ, शरीर की जागृत और सक्रिय शक्तियाँ पूर्व स्थिति में जा पहुँची और निमोनिया, थकान, चोटों के दर्द और भूख के कारण वह बेहोश हो गया। उसकी हालत शारीरिक दृष्टि से इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों ने उसके अब तक बचे रहने पर आश्चर्य व्यक्त किया। पायलट जब वैसी परिस्थितियों में नहीं मरा तो अस्पताल में भर्ती हो जाने पर तो उसकी मृत्यु हो जाने का कोई प्रश्न ही नहीं था। वह जीवित भी रहा तथा स्वस्थ होने पर पुनः उड़ान भरने लगा।
कभी-कभी अनायास छोटी-सी काया में अपरिमित सामर्थ्य न जाने कहाँ से उद्भूत होने लगता है व उस कार्य को करने पर व्यक्ति स्वयं आश्चर्यचकित हो उठता है। विगोरीज, फ्राँस के एक शिकारी बैरन क्रिस्टोफरसन के घोड़े की टाँग आखेट की उछल कूद में टूट गई। घोड़े की उस दयनीय स्थिति में छोड़ना क्रिस्टोफर ने उचित न समझा। उसने 425 पौण्ड भारी घोड़े को कँधे पर उठाया और डेढ़ मील की दूरी तक उतना भार वहन करते हुए उसे पशु-चिकित्सालय तक पहुँचा। अपने भारवाहक के प्रति सहानुभूति ने ही उसके अंतः के साहस बल को उभारा और उससे यह पुरुषार्थ सम्पन्न करा डाला।
इटली के एक प्रमुख शहर गिएरुपे में फिनोज पी वेग नामक फोरमेन बारूद के एक कारखाने में काम करता था जहाँ धातुओं की परतों में बारूद के मिश्रण से छेद किये जाते थे। फिनोज पी वेग एक बरमे के पास जो कि चार फीट लम्बा और तेरह पौंड वजन का था, काम कर रहा था। अचानक कोई खराबी के कारण बरमा बड़े जोर से उचटा और वेग की आँखों के नीचे के भाग को छेदकर मस्तिष्क की हड्डियों को तोड़ता हुआ बाहर निकल गया। उसे अचेत अवस्था में ही एक मील दूर अस्पताल ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने उसकी मरहम पट्टी बड़ी ही निराशा से की क्योंकि वेग के बचने के कोई आसार उन्हें दिखाई नहीं दे रहे थे। किन्तु रात के दस बजे जब वह होश में आकर बातें करने लगा तो चिकित्सकों ने पूरे मनोवेग से उसकी चिकित्सा करना प्रारम्भ किया और तीन माह में ही वह पूर्ण स्वस्थ होकर घर चला गया।
चिकित्सकों की अंतिम रिपोर्ट आज के मूर्धन्य चिकित्सकों के लिये अध्ययन व आश्चर्य का विषय है। हावर्ड मेडिकल कॉलेज में वेग की टूटी खोपड़ी के अस्थि खंड व पदार्थ, कागजात व वह बरमा भी सुरक्षित रखा है जो कि वेग की खोपड़ी का तोड़ता हुए निकल गया था। शरीर विज्ञानियों को सहसा विश्वास नहीं होता कि इतने भयानक मस्तिष्कीय आघात के बाद भी कोई व्यक्ति जीवित रहकर भी अपना सामान्य जीवन क्रम चला सकता है।
साहस ने प्रसंगों की शृंखला में एक सन् 1891 की घटना है। एक अंग्रेज मछुआरा अपने दल-बल के साथ एक विशालकाय ह्वेल मछली का, जोकि आकलेंड द्वीप के पास दिखाई दी थी, शिकार करने की चेष्टा करने लगे। दो नावों पर सवार मछुओं ने उस पर भाले से आक्रमण किया। ह्वेल ने पलटा खाया तो एक नाव उसकी पूँछ के नीचे आ गई और एक नाविक डूब गया। दूसरे जेम्स वर्टली ने अपना मनोबल नहीं खोया। उसने अपने जेब से शिकारी चाकू को प्रयत्न करके निकाला और पेट में जकड़े रहने पर भी उसने मछली के पेट को काटना प्रारम्भ किया। कुछ घंटों के परिश्रम के बाद वह सफल हुआ। दो दिन बाद उसे नाविकों ने अचेत अवस्था में समुद्र की सतह पर से निकाला और अस्पताल पहुँचाया। जहाँ चिकित्सकों के तीन सप्ताह के प्रयास के बाद उसकी बेहोशी टूटी। मछली के पेट में उसका शरीर बुरी तरह क्षत विक्षत हो गया था, उसे सप्ताह के प्रयास के बाद उसकी बेहोशी टूटी। मछली के पेट में उसका शरीर बुरी तरह क्षत विक्षत हो गया था, उसे पूरी तरह स्वस्थ होने में दो महीने लगे। अपने धैर्य और मनोबल के कारण ही बर्टली जीवित ह्वेल के पेट में से जीवित निकल सका। प्रेस फोटोग्राफर्स व इंटरव्यू लेने वालों के लिये वह एक अजूबा बन गया था। उसने प्रमाणित कर दिखाया कि यदि संकल्प शक्ति हो तो किसी भी खतरे से निबटा जा सकता है। इतना ही नहीं, यदि व्यक्ति में जीने की अदम्य इच्छा हो, तो अपंग होने के बावजूद भी संकट कालीन घड़ी में उसमें इतनी शक्ति आ जाती है, कि वह विपत्ति से सफलतापूर्वक बच निकलता है।
‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने कुछ वर्षों पूर्व न्यूयार्क शहर के ही एक ऐसे व्यक्ति का विवरण छपा था जो बुरी तरह बीमार था। उसका धड़ से नीचे वाला भाग पक्षाघात के कारण जड़ जैसा हो गया था। चलने फिरने में असमर्थ होने के कारण वह बिस्तर पर ही पड़ा रहता था। जब उसके मकान में आग लग गयी तो घर के अन्य लोग अपनी-अपनी जान बचाकर भागे इस भगदड़ में उस व्यक्ति का किसी को ध्यान ही नहीं रहा। मकान से बाहर निकल आने पर परिवार के लोगों को उसकी याद आयी लेकिन उस समय घर के लोगों सहित वहाँ उपस्थित सभी व्यक्ति यह देखकर दंग रहे गये कि लकवाग्रस्त मरीज भी आग की लपटों से जूझता हुआ दौड़ता चला आ रहा है। यह घटना सिद्ध करती है कि मनुष्य की मानसिक ही नहीं शारीरिक शक्तियाँ भी सामान्य अवस्था में प्रसुप्त ही रहती है, परन्तु चुनौतियाँ सामने आने पर उभर कर प्रगट होती है।
यह सारे उदाहरण इस बात का प्रमाण हैं कि यदि मनुष्य तनिक साहस से काम ले, तो वह प्रतिकूल परिस्थिति में भी ऐसे करतब दिखा सकता है, जो सामान्य स्थिति में किसी भी प्रकार सम्भव नहीं।
देखा जाता है कि बहुधा ऐसी परिस्थितियाँ आने पर मनुष्य हतप्रभ हो जाता है जो उसकी जान को संकट में डाल देता है। ऐसे में धैर्य रखा जाय एवं प्रत्युत्पन्न मति से काम लेते हुए जीवट को जगाया जाय तो उस छोटे से काय विद्युत के भण्डार से ही इतनी शक्ति ऊर्जा निस्सृत होने लगती है, जो अकल्पनीय है। व्यक्ति समष्टि का घटक है। उसके अन्दर विराट् का सारा वैभव निहित है। फिर वह क्यों कर साहस खोता, मनोबल गिराता एवं असफल होता है, सृष्टा का यह खेल समझ में नहीं आता?
कहते हैं कि लिफाफे को देखकर मजमून पहचाना जा सकता है। मानवी काया एवं मन भी एक ऐसा बन्द लिफाफा है, जिसे विशिष्ट विधा के ज्ञाता देखकर अन्दर की बात बता देते हैं। व्यक्ति की भाव मुद्रा, चलने-बैठने का ढंग, बातचीत आदि से भी बहुत कुछ उसके बारे में पता चलता है। कुछ व्यक्ति हथेली की रेखाओं को देखकर भविष्य बताते हैं, एवं चिकित्सक इन रेखाओं (डर्मेटोग्लाइफिक्स) के आधार पर रोगों का निदान करते देखे जाते हैं। किन्तु अब उँगली के पौरुवों-नाखूनों पर अंकित रेखाकृति तथा धब्बों को देखकर चिकित्सक व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक स्थिति का विश्लेषण करने लगे हैं।
चिकित्सा शास्त्री यूजिन शीमान की मान्यता है कि मधुमेह रक्तवाही नलिकाओं के रोग तथा मनोविकारों के प्रारम्भिक लक्षण नाखून रूपी दर्पण में पढ़ जा सकते हैं। उन्होंने स्कीजोफ्रेनिया (मनो-अवसाद संबंधी रोग जिसमें व्यक्ति निरन्तर आत्म-हत्या का विचार करता एवं कर भी लेता है) से पीड़ित व्यक्तियों के नाखूनों की रक्त शिराओं की बनावट से ही अस्सी प्रतिशत रोगियों की डायग्नोसिस की एवं यह भी बताया कि चिकित्सा उपचार से किसके किस सीमा तक रोग मुक्त होने की आशा है। उन्होंने पाया है कि ऐसे रोगियों के पौरुवों पर अपरिपक्व टेड़ी मेढ़ी रक्त शिराएँ होती हैं जैसे-जैसे ये सुव्यवस्थित होती जाती है, रोगी स्वस्थ होता चला जाता है।
डॉ. हाँफ मैन (बर्कले यूनिवर्सिटी) का मत है कि नाखून पतले होते चले जाने का अर्थ हैं रक्त संचालन की प्रणाली दोष पूर्ण होना। ऐसे रोगी आगे चलकर हृदय में रक्तावरोध अथवा मस्तिष्क में रक्तवाही नलियों में थक्का जमने से लकवाग्रस्त हो सकते हैं।
फेफड़ों के ट्यूमर, क्षयरोग तथा यकृत विकारों के होने की जिनमें संभावना रहती है, उनके नाखूनों को “हिप्पोक्रेटिक” नाम दिया जाता है। इनका रंग नीला होता जाता है तथा वे ऊपर की ओर मुड़े होते हैं। इसी विधा के एक विशेषज्ञ डॉ. बी पारडो काँस्टेलों के अनुसार जैसे ही व्यक्ति रोग मुक्त हो जाता है, नाखून अपनी पूर्व स्थिति में पहुँच जाते हैं।
जिन व्यक्तियों के नाखून चम्मच की आकृति के होते हैं, उन्हें चर्म रोग, सिफिलिस, अपच अथवा मानसिक कमजोरी का शिकार मानना चाहिए। ऐसे लोग शीघ्र निर्णय नहीं ले पाते। एक चिकित्सक डॉ. व्यू ने नाखूनों पर आड़ी गहरी रेखाओं को इन्फ्लुएंजा, टाइफ़ाइड, स्कारलेट फीवर तथा न्यूरोसिस का प्रतीक चिन्ह माना है। उनके नाम पर इन रेखाओं को व्यू रेखाएँ कहा जाने लगा है। नाखूनों पर जो श्वेत रेखाएँ पाई जाती हैं, उनसे शरीर में आर्सेनिक विष होने, तेज बुखार अथवा हृदय रोगों की संभावना रहती है। नाखूनों पर यदि खड़ी रेखाएँ हों तो त्वचा विकार, थाइराइड की अतिसक्रियता अथवा गठिया रोग का चिन्ह उन्हें मानना चाहिए। जिनकी अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ पूरी तरह विकसित नहीं होती, उनके नाखून बहुत छोटे होते हैं। वे कुतरे हुए, पतले दिखाई देते हैं। स्नायविक तनाव की स्थिति में नाखूनों पर श्वेत रंग के बिन्दु दिखाई देने लगते हैं। तनाव मिटते ही वे स्वतः गायब हो जाते हैं। पौरुओं पर यदि श्वेत रेखाएँ उभरने लगें तो ऐसा व्यक्ति लोकेषणा ग्रस्त, अत्यधिक महत्वाकांक्षी माना जाना चाहिए। मध्यमा उँगली पर श्वेत बिन्दु उभरने का अभिप्राय है-लम्बा प्रवास एवं काले बिन्दु दिखाई देने का अर्थ है-आसन्न विपन्नताएँ टल गई। सफदे बिन्दु तर्जनी उँगली के पौरुवों पर उभरने से यह आशा करनी चाहिए कि व्यक्ति को धन, यश एवं जन सम्मान मिलेगा। यदि इसके स्थान पर काले बिन्दु दिखें तो समझना चाहिए कि हाथ से अधिक खर्च होने, दरिद्रात के आ घेरने एवं सम्मान मिट्टी में मिलने का यह संकेत है।
कुछ कहा नहीं जा सकता कि हस्त रेखा एवं पौरुवों के विशेषज्ञों ने जो उपरोक्त मान्यताएँ बताई हैं, कहाँ तक सही हैं, पर यह तो हो ही सकता है कि ऐसी कोई संभावना दिखाई दे तो व्यक्ति पहले ही सचेत हो जाय, ताकि समस्याओं के घुमड़ते बादल छँट सकें, एवं रोग शरीर व मन को अपना घर न बना सके। जहाँ यह सही है कि ये चिन्ह अंदर की स्थिति बताते हैं, वहाँ यह भी सही है कि प्रचण्ड मनोबल एवं पुरुषार्थ से इन चिन्हों व हथेली की रेखाओं को बदला भी जा सकता है।
ब्रह्माण्ड के विकास के संबंध में तरह-तरह के सिद्धान्त, परिकल्पनाएँ प्रस्तुत किये जाते रहे हैं, पर कोई भी यथार्थता के समीप नहीं लगता क्योंकि ब्रह्माण्ड अति विराट् एवं व्यापक है। धरती पर तो दूरियाँ, समय व गुरुत्वाकर्षण की समस्याएँ भौतिकी के सामान्य नियमों व साधारण ज्यामिती के आधार पर समझी जा सकती हैं। परन्तु जब हम ब्रह्माण्ड का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि ये दूरियाँ अरबों, खरबों मील व समय करोड़ों-अरबों वर्षों में नापने पर भी समझ से बाहर हैं। इन्हें आँखों से देखा भी नहीं जा सकता।
ब्रह्माण्ड के विभिन्न मॉडल इसके विकास को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने बनाये हैं। इसके मूल में यह परिकल्पना है कि ब्रह्माण्ड की संरचना अन्दर से बाहर तक एक समान है यदि इसे गेंद मान लिया जाय, तो यह भी संभव है कि इसका मात्र वह ही भाग “यूनिफार्म” हो, जिसे हम देख पाए हैं। यदि खगोल का अविज्ञात भाग किसी भी रूप में ज्ञात भाग से भिन्न है तो सभी बनाए गए मॉडल गलत ही माने जायेंगे। वैज्ञानिक यह भी परिकल्पना करते हैं कि ब्रह्माण्ड की संरचना सभी दिशाओं में एक सही है। किन्तु हो सकता है कि ऐसा न हो। संभव है विभिन्न दिशाओं में उसकी संरचना असम हो। विश्वविख्यात ज्योतिर्विद् जार्ज ऐबल अपनी पुस्तक “ड्रामा ऑफ द यूनीवर्स” में लिखते हैं कि उपरोक्त सभी आशंकाओं-उलझनों का समाधान अध्यात्म ही दे सकता है।
ब्रह्माण्ड के विकास का सिद्धान्तवाद सापेक्षवाद से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए। वैसे गुरुत्वाकर्षण के सामान्य सिद्धान्तानुसार तो उत्पत्ति के थोड़े ही समय बाद विभिन्न तारों, निहारिकाओं आदि को गुरुत्व बल को कारण खिंचकर परस्पर समीप आ जाना तथा परस्पर टकराकर खत्म हो जाना चाहिए था। चूँकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए स्पष्टतः न्यूटन के सिद्धांत ब्रह्माण्ड के परिप्रेक्ष्य में गलत हो जाते हैं। सापेक्षवाद कहता है कि समस्त सृष्टि में कोई भी गति प्रकाश की गति से अधिक नहीं हो सकती। यहाँ तक कि गुरुत्वाकर्षण की गति भी प्रकाश के वेग से चलती है अर्थात् उसका वेग ससीम है, असीम नहीं।
किन्तु यह नहीं भूला जाना चाहिए कि धरती की दूरियाँ ब्रह्माण्डीय दूरियों से अगणित गुना छोटी हैं। ब्रह्मांडीय दूरियाँ करोड़ों-अरबों प्रकाश वर्ष होती हैं, अतः यदि वहाँ गुरुत्वाकर्षण की गति असीम मान ली गई तो बहुत बड़ी गलती होगी। वस्तुतः गुरुत्वाकर्षण की गति का ससीम होना ही सामान्य सापेक्षवाद के सिद्धान्त की मूलभूत मान्यता है। इसी थ्योरी को यदि स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी से जोड़ दिया जाय तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि अन्तरिक्ष सपाट या समतल नहीं, वक्राकार है। धरती हमें मैदान सी नजर आती है, किन्तु है गोलाकार इसी प्रकार यदि हमें विराट् रूप मिल जाय एवं हम अन्तरिक्ष में खड़े होकर इसका अध्ययन करें तो हमें ज्ञात होगा कि जब हम धरती की सतह पर चल रहे थे तो एक वक्राकार सतह पर चल रहे थे। वैज्ञानिक इसी प्रकार यह निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रकाश या कोई भी अन्य विद्युत चुम्बकीय तरंग जब अन्तरिक्ष में चलती है, तो उसका मार्ग सीधा न होकर वक्राकार होता है।
हमारे ज्ञान की एक सीमा है। फिर भी अन्तः से उद्भूत जिज्ञासा एवं वैज्ञानिक गवेषणाएँ हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती हैं कि ब्रह्माण्ड की यह शैशव अवस्था है। अभी वह सतत् फैलता जा रहा है। इसकी पुष्टि भौतिकी की उन गणनाओं से मिलती है जो विश्लेषण कर बताती हैं कि प्रकाश जो हम तक पहुँचता है वह अति दूरवर्ती तारों व निहारिकाओं से करोड़ों प्रकाश वर्षों की दूरी तय करके धरती पर आ रहा है। प्रकाश एक सेकेंड में एक लाख छियासी हजार मील चलता रहा है। इस तरह - 60फ्60फ्24फ्36.575 अर्थात् एक वर्ष तक चलने में प्रकाश जो दूरी तय करता है, उसे एक प्रकाश वर्ष कहा जाता है। कुछ खरबों मील जैसे जब करोड़ों प्रकाश वर्षों की दूरी निरन्तर पार की जा रही हो तो सहज ही अन्दाज लगाया जा सकता है कि इस ब्रह्माण्ड का विस्तार कितना है व हमारी हस्ती कितनी नगण्य। हमारे सौर मण्डल के अधिपति सूर्य को ही लिया जाय। उसके व धरती के बीच की दूरी 9 करोड़ 8 लाख मील एवं दूसरी परिभाषा के अनुसार सवा आठ प्रकाश मिनट हैं क्योंकि इस दूरी को तय करने में प्रकाश को सवा आठ मिनट लगते हैं। इस आधार पर कोई एक प्रकाश वर्ष एवं फिर करोड़ों प्रकाश वर्श की दूरी का अनुमान लगाने का प्रयास करे तो हतप्रभ हो कर रह जायेगा।
ऐसी अकल्पनीय दूरियों से धरती पर आते हुए प्रकाश का अध्ययन करने के बाद खगोल वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि ये दूरियाँ निरन्तर हजारों किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से बढ़ती चली जा रही हैं। जैसे-जैसे ये दूरियाँ बढ़ रही हैं, ऐसा अनुमान है कि जब कोई दूरी दस लाख प्रकाश वर्ष बढ़ जाती है तो उसके विस्तार की गति भी पचास किलोमीटर प्रति सेकेंड बढ़ जाती है। इस पचास किलोमीटर की संख्या को “हबल स्थिराँक” (॥क्चक्चरुश्व ष्टह्रहृस्ञ्ज्नहृञ्ज) नाम दिया गया है। इस स्थिराँक का मान मात्र पचास किलोमीटर होना बताता है कि हमारा ब्रह्माण्ड विकास की दृष्टि से अभी लड़कपन में ही है। आज से पचास वर्ष पूर्व इस स्थिराँक का मान त्रुटिवश साढ़े पाँच सौ किलोमीटर प्रति सेकेंड, प्रति दस लाख प्रकाश वर्ष मान लिया गया था। इस मान को आधार मानकर गणना करने वाले वैज्ञानिक यह अनुमान लगाने लगे थे कि ब्रह्माण्ड अब बूढ़ा हो चला। इसका अन्त अब समीप है। किन्तु आधुनिक यंत्रों एवं संकल्पनाओं ने शोध को नये आयाम दिये हैं और अब यह प्रमाणित हो चुका है कि ब्रह्माण्ड अभी शिशु से किशोरावस्था में भी प्रवेश नहीं कर पाया है। विस्तार होते-होते बूढ़ा होने व उसके नष्ट होने की कल्पना तो करनी ही नहीं चाहिए।
निहारिकाओं का एक निश्चित गति से दूर हटाना व क्रमशः दूर हटते जाने की गति बढ़ते जाने के “हबल” सिद्धान्त को समस्त ब्रह्माण्ड पर लागू होते देखा जा सकता है। खगोल वैज्ञानिक हबल यह भी कहते हैं कि जो निहारिकाएं अब दूर हटती जा रही है, जो वस्तुतः कभी हमारे समीप ही अवस्थित थी। किन्तु उनके दूर हटते जाने की अवधारणा ने ब्रह्माण्ड के निरन्तर फैलने के सिद्धान्त की अब पुष्टि कर दी है। किन्तु इस फैलाव की कुछ तो सीमा होनी चाहिए। इसे समझाने के लिये वैज्ञानिकों ने परिकल्पनाओं के आधार पर एक मॉडल बनाया है।
वे कहते हैं कि ब्रह्माण्ड का उद्भव एक अति सघन पदार्थ के विस्फोट (बिग बैंग) से हुआ। हो सकता है कि इसके बाद यह अमीस पदार्थ अपनी अनन्त यात्रा पर चल पड़ा हो एवं विस्फोट की परिणति स्वरूप इस पदार्थ के अनेक टुकड़े एक दूसरे से दूर भागने लगे। कोई तारे, कोई ग्रह, कोई उपग्रह तथा कोई निहारिकाओं में परिवर्तित हो गये। एक ओर गुरुत्व की शक्ति इन्हें समीप खींचती है एवं दूसरी ओर विस्फोट की शक्ति इन्हें दूर करती जा रही है। कितना विचित्र सृष्टा का खेल है-यह। एक दूसरी विलक्षणता यह है कि स्पेस की वक्रता के कारण ब्रह्माण्ड एक नियत स्थान पर प्रकाश या पदार्थ कणों को वापस लौटा देता है। पृथ्वी पर हम चलें तो चक्कर लगाते हुए वापस वहीं आ जायेंगे। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड की संरचना इस प्रकार की है कि ब्रह्माण्ड फैलते-फैलते अन्ततः एक ऐसे स्थान पर पहुँच जायेगा जहाँ स्थान-काल की वक्रता के कारण वह वापस मुड़ गया है। इस प्रकार ब्रह्माण्ड इस चरमावस्था में पुनः सिकुड़कर उसी स्थिति में पहुँच जायेगा तो विस्फोट से पूर्व थी। पुनः यह विस्तार क्रम चालू होगा और वही अनन्त यात्रा पुनः चल पड़ेगी।
ब्रह्माण्ड की यह विकास यात्रा क्या हमें अनवरत चलने की प्रेरणा नहीं देती? विराट् को ही हम परब्रह्म मानते हैं जो कि अचिन्तय, अगोचर, असीम है उसी की अनुकृति यह पिण्ड है। हम सभी उस विराट् की तरह अपना यात्रा पथ बनायें, सदैव स्फूर्तिवान बने रह कर इस अनन्त यात्रा का आनन्द लेते रहें।
अन्धा सड़क के किनारे बैठकर भीख माँगा करता और किसी प्रकार अपनी गुजर करता।
राह चलते एक पथिक ने अन्धे के दुर्भाग्य को कोसा। बात अन्धे ने भी सुन ली। बोला-अभागा मैं अकेला ही नहीं। अन्य लोग भी हैं जो आँखें होते हुए भी अपनी गतिविधियों का परिणाम नहीं सोचते और पग-पग पर ठोकरें खाते हैं।
इस पृथ्वी पर मनुष्य तो मात्र 500 करोड़ ही रहते हैं, पर उनकी तुलना में हजारों गुने अन्यान्य प्राणी रहते हैं। इनमें से पशु-पक्षी, मगर, मछली जैसे परिचित प्राणी तो थोड़े से ही हैं। वे भी मनुष्यों की तुलना में 100 गुने अधिक हो सकते हैं, पर सूक्ष्म जीवी नेत्रों की दृश्य सीमा से बाहर वालों की संख्या तो इतनी अधिक है कि उनकी गणना नहीं, कल्पना ही की जा सकती है। जल, थल, और नभ में जो भी असंख्यों हैं, उनकी उपस्थिति से कोई जगह खाली नहीं है। पर उनके संबंध में हम बहुत ही कम जानते हैं। उनके स्वार्थों के साथ अपने स्वार्थ मिलाकर चलने की बात तो कभी सोचते नहीं। सोचते भी हैं तो शोषण ही ध्यान में रहता है। संरक्षण और पोषण नहीं।
भूमि की उर्वरता इन्हीं सूक्ष्म जीवियों पर निर्भर हैं। वे ही वनस्पति के उगने और बढ़ने में सहायता करते और संतुलन बनाये रहते हैं। यदि उनकी संख्या कम हो जाय तो प्रकृति विकृति में बदल जाती है और वनस्पति को नष्ट करने वाले कृमि कीटक उपज पड़ते हैं। कीटनाशक औषधियों के द्वारा उनका विनाश करने का प्रयास किया जाने लगा, पर प्रकृति को तो अपने संतुलन का ज्ञान है। उसने उन कीटकों को यह अभ्यास करा दिया कि वे इन मारक विषों को ही पचाने लगें और उनका नशे की तरह सेवन करके उल्टे अधिक ढीठ बनने लगें।
प्रकृति ने सभी प्राणियों को भावनाशील और कर्त्तव्य परायण बनाया है। जो व्यतिरेक करता है वह अपनी करनी का फल भोगता है। बच्चा माता का दूध ठीक तरह पीता है तब तक वह दुलार से छाती पर चिपकाये रहती है, पर जब वह उद्दण्डता पर उतारू होता है और स्तनों को काट कर लहूलुहान करने का तरीका अपनाता है तो माँ उसके लिए समुचित उपाय अपनाती है। बोतल का दूध पिलाती है और छाती लगाने की बजाय पालने में झुलाने का प्रबंध करती है। प्रकृति सभी जीवधारियों का भरण-पोषण ठीक प्रकार करती है। उनमें प्रत्येक को इतनी क्षमता और बुद्धिमत्ता भी देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपना काम चलाते रहें। मनुष्य का यह अहंकार ठीक नहीं कि उसकी चतुरता असाधारण एवं सर्वोपरि है। जीव को अपने-अपने प्रयोजन के उपयुक्त ऐसी क्षमता एवं भावनाएँ प्रदान की हैं कि उन्हें देख कर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
जिस प्रकार पृथ्वी की उर्वरता बढ़ाने वाली प्रजातियों का बाहुल्य है, उसी प्रकार मनुष्य के साथ रहने वाले कीड़े मकोड़े भी उसे स्वच्छता, सुव्यवस्था का पाठ पढ़ाते हैं। साथ ही गलती करने पर करारा पाठ भी पढ़ाया है। शरीर की स्वच्छता ठीक न रखने पर जूँ उत्पन्न हो जाते हैं।
बिस्तर को अस्वच्छ रखने पर खटमल आ घुसते हैं। घर में अनाज या दूसरी वस्तुएँ फैली बिखरी फिरें और गंदगी फैलायें, इसकी सफाई का काम चूहों के जिम्मे है। मकान में सीलन उत्पन्न होने पर जो कृमि उत्पन्न होते हैं उन्हें छिपकली, तिलचट्टे ठिकाने लगाते रहते हैं। जहाँ-तहाँ सड़न कीचड़ से उत्पन्न होने वाले जन्तुओं को मक्खी-मच्छर निगलते रहते हैं। मक्खी गंदगी बटोरती है पर स्वयं असाधारण रूप से स्वच्छ रहती है। दोनों पंखों से शरीर पर कहीं भी मैल जमा नहीं होने देती।
वन में अनावश्यक रूप से बढ़ते हुए घास पत्ते को वन जीव खाते रहते हैं। वनजीवों की संख्या अनावश्यक रूप से न बढ़ने पाये, इसलिए सिंह व्याघ्र उनका नियंत्रण रखते हैं, पर साथ ही इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि अनावश्यक रूप से मारकाट न की जाय। जब पेट खाली होता है तभी आखेट करता है, अन्यथा पेट भरा होने पर अन्य वन जीव उसके निकट ही घास चरते रहते हैं न किसी को डराया जाता है न सताया।
वात्सल्य सभी मादाओं में बहुलता से देखा गया है। वे अपने बच्चों को दुलार, पोषण एवं संरक्षण देने में महिलाओं से पीछे नहीं रहतीं। अण्डे सेने के समय वे उन्हें छाती से लगाये बैठी रहती हैं नर पत्नी तथा बच्चे के प्रति अपने दायित्व को निबाहता है, उनके लिए आहार जुटाना तथा सुरक्षा में चौकस रहता है। कंगारू, बन्दर, चिंपांजी आदि मादाएँ, अपने बच्चों की कैसा संभाल करती हैं यह देखते ही बनता है। भेड़िया मादा को मनुष्य बालक मिल जाय तो वह उसे खाती नहीं वरन् अपने बच्चे की तरह पाल लेती है। ऐसी घटनाएँ अनेकों देखी गई है। हथिनी जब बच्चा देती है तो बच्चे को सारा झुण्ड अपनी सम्पत्ति मानता है, बीच में लेकर चलता है और कोमल वनस्पतियाँ ढूँढ़-ढूँढ़ कर उसे खाने को देते हैं। क्योंकि मादा का दूध इतना पर्याप्त नहीं होता कि उसका पेट भर सके। पक्षियों के बच्चे जब तक उड़ने लायक नहीं हो जाते तब तक उनके माता-पिता चोंच में खाना पहुँचाते रहते हैं। सारस प्रकृति के पक्षी पति-व्रत, पत्नी-व्रत निबाहते हैं। जोड़ा बिछुड़ जाने पर वे पुनर्विवाह नहीं करते। कछुए, घड़ियाल, जैसे जल जन्तु अपने अण्डों को बालू में गाढ़ देते हैं और जब पकने की हलचल होती है तभी निकालकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने में जुट जाते हैं। बिल्ली अपने बच्चों को न केवल शिकार मारना सिखाती है वरन् मुहल्ले के सभी घरों के लिए इसलिए फिरती है कि वे वहाँ की परिस्थितियों से अवगत हो सकें। कंगारू मादा अपने पेट में बनी थैली में ही बच्चों को दूध पिलाती है, और पालती है।
बुद्धिमत्ता की दृष्टि से सभी जीव जन्तुओं में अपने अपने काम की बुद्धि है। खटमलों को यदि चारपाई के पाये पर मिट्टी का तेल आदि लगाकर रोका जाय तो वे दीवार के सहारे छत तक पहुँच जाते हैं और जिस बिस्तर में पहुँचना है उस पर ऊपर से कूद पड़ते हैं। झींगुर अपने पैरों को रगड़ कर ऐसी ध्वनि उत्पन्न करता है जो गायक को ही नहीं सुनने वालों को भी लुभाती है। तिलचट्टे रसोईघरों, पाखाने आदि में फैली हुई गंदगी को साफ करने में लगे रहते हैं, वे अपने को छिपाये रहने की कला में भी बहुत प्रवीण होते हैं।
शारीरिक शक्ति की दृष्टि से कई प्राणी मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक बढ़−चढ़ कर हैं। नील गाय की एक छलाँग 12 मीटर तक देखी गई। कंगारू एक घण्टे में तीस मील की चाल से दौड़ सकता है। बिना पंख वाले आस्ट्रिच पक्षी की दौड़ 80 किलोमीटर प्रति घंटा देखी गई है। चीता सबसे बड़ा धावक है। वह 20 सेकेंड में 650 मीटर की दूरी पार कर लेता है।
मक्खी की एक छलाँग शरीर की तुलना में 60 गुनी होती है। इस अनुपात से यदि मनुष्य कूद सके तो उसकी हर छलाँग 120 मीटर की होनी चाहिए। मछलियों में से तेज दौड़ाने वाली 1 घंटे में 120 किलोमीटर तक दूरी पार कर लेती हैं। आर्किटिकटैन पक्षी उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक की यात्रा बिना रुके करता है। इसमें उसे 4 महीने लगते हैं और 40 हजार किलोमीटर दूरी पार करनी पड़ती है।
शिकागो क्षेत्र में एक घनी पूँछ वाली बिल्ली पाई जाती है-स्कंक। यह दौड़ने, नाचने और पेड़ों की चोटियों तक जा पहुँचने में माहिर होती है। वह किसी संकट में घिर जाने पर अपनी पूँछ में से भी विषैली गैस निकालती है कि पीछा करने वाले शिकारी बेहोश तथा अंधे तक हो जाते हैं।
पशु-पक्षियों की अपनी-अपनी साँकेतिक भाषाएँ भी हैं, जिससे वे अपने स्वजातियों से विचारों का आदान-प्रदान कर लेते हैं। तोता तो 60 तरह के शब्द बोल सकता है। दूसरे पशु-पक्षियों तथा कीट पतंगों में भी 15-20 प्रकार के शब्द बोल सकने की क्षमता होती है। इससे वे एक दूसरे को अपने मनोभाव प्रकट करते रहते हैं। मधुमक्खियाँ इस संबंध में बहुत माहिर होती है। चींटी तथा दीमक भी।
प्रकृति न मनुष्य को ही नहीं अन्य प्राणियों में अनेक प्रकार की क्षमताएँ दी हैं। कुत्ते की घ्राण शक्ति अन्यों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।
“यह शरीर क्षणभंगुर है, इसमें रहते हुये जो तप का उपार्जन नहीं करता, वह मूर्ख मरने के बाद जब अपने कर्मों का फल पाता है तो बहुत पश्चाताप करता है।”
चिकित्सा विज्ञान में इस क्षेत्र में प्रवेश करते ही मनुष्य ने जड़ी बूटियों पर दृष्टि डाली तो आश्चर्य के साथ देखा कि उगी हुई घास में से कुछ को वनचारी पशु छोड़ देते हैं और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अमुक स्तर की वनस्पति को प्राप्त करने के लिए वे सुदूर क्षेत्रों में भ्रमण करते हैं। इतना ही नहीं उनकी बनावट, स्वाद और स्थान को भी अपने स्मृति पटल पर जमा लेते हैं। यद्यपि उनकी बौद्धिक संरचना इतने भेद उपभेद में उतरने की होती नहीं। मात्र अपने स्वाद और गंध संस्थानों की सहायता से खाद्य अखाद्य का वर्गीकरण कर लेते हैं और उसी आधार पर अपना पेट भरते रहते हैं।
विशेष वनस्पतियों के गुणों और उनकी उभरी हुई शारीरिक आवश्यकताओं के साथ ताल-मेल बिठाते हुए उनका अचेतन मन यह परामर्श देता है कि वे अपनी सामयिक चिकित्सा के लिए किन वनस्पतियों का, कितनी मात्रा में उपयोग करें। प्रसिद्ध है कि साँप और नेवले की लड़ाई में नेवला सर्प दंश की विषाक्तता से अपनी प्राण रक्षा के लिए बार-बार किसी वनस्पति विशेष की दौड़कर खाता है और फिर मल्ल युद्ध में आ जुटता है। विष का प्रभाव होने पर उसे बार-बार इसी प्रयोग को दुहराना पड़ता है। यह बात अन्य कई प्राणियों के संबंध में भी कही जाती है कि वे किसी शारीरिक विपत्ति में फँस जाने पर उसके निवारण के लिए उपयुक्त वनस्पतियाँ अपनी सहज बुद्धि से खोज निकालते हैं।
मध्यकाल में खनिजों की भस्में और विषों के शोधन का उपाय भी खोजा गया और उसे चिकित्सा प्रयोजनों के काम में लाया गया, किन्तु सबसे पुरातन और विश्वस्त रोगोपचार वनौषधियों का ही है। रस, भस्मों और विषों के औषधि स्तर पर बदलने में कहीं कोई भूल-चूक रह जाने पर उसका दुष्प्रभाव भी होते देखा गया है। वह जोखिम भरा कदम है जिसे विशेषज्ञों द्वारा ही उठाया जाना चाहिए। किन्तु वनौषधियों के संबंध में ऐसी बात नहीं है। उसमें थोड़ी भूल-चूक हो जाने पर भी ऐसे भयंकर परिणाम की आशंका नहीं रहती, जिसके संबंध में यह कहा जा सके कि कुछ अनर्थ उठ खड़ा होगा।
मनुष्य की चंचलता एवं कौतूहल प्रियता उसे अन्य वन्य प्राणियों की तरह प्रकृति के कड़े शिकंजे में नहीं कसा रहने देती। वह हर क्षेत्र में अपनी कौतुक प्रियता का परिचय देता और विचित्रताएँ अपनाकर अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता का प्रमाण प्रस्तुत करता रहा है। यह प्रयोग वस्तुओं के रूपांतरण में तो सफल भी हो जाता है पर जीवनचर्या में ऐसी घुस-पैठ सहज नहीं पचती और अपनी प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त किये बिना नहीं रहता। आहार-विहार के स्वाभाविक क्रम को उसने एक प्रकार से उलट ही दिया है। कृत्रिमताओं से अपने को असाधारण रूप से लपेट लिया है। फलतः उसे आये दिन चित्र-विचित्र रोगों का भी सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही उसने सामान्य इन्द्रिय क्षमताओं को भी ऐसा विकृत कर लिया है कि अपनी बुद्धि के सहारे चिकित्सा के लिए उस प्रकार वनस्पतियों का चयन नहीं कर सकता। जिस प्रकार कि अन्य वन्य-प्राणी कर लेते हैं। इसके लिए उसे दूसरे विज्ञजनों की शोध द्वारा निकले हुए निराकरणों पर आश्रित रहना पड़ता है। चिकित्सक के परामर्श बिना स्वेच्छा उपचार उसके लिए कठिन हो गया है। यद्यपि मसाला वर्ग में आने वाली कई वस्तुओं का प्रयोग घरेलू चिकित्सा के रूप में होता रहता है, वह इतना प्रामाणिक नहीं होता कि उस पर निर्भर और निश्चिन्त रहा जा सके।
वनौषधियों की गुणवत्ता असंदिग्ध है। इस वैज्ञानिक युग में जब कि रसायनों का आश्रय अधिक मात्रा में लिया जा रहा है, तब वनस्पतियों द्वारा चिकित्सा पद्धति आकर्षण विहीन होती जा रही है। यद्यपि उनके उपचार में वैसी अनुपयुक्त प्रतिक्रियाओं का जोखिम नहीं रहता-जैसा कि आमतौर से एन्टी बायोटिक्स औषधियों का होता है। वे एक रोग का शमन करते हुए दूसरे की उत्पत्ति करती रहती हैं, किन्तु वनौषधियों में प्रायः ऐसा नहीं होता। उनके सेवर से रोग निवारण में कुछ निवारण में कुछ विलम्ब लग सकता है पर परिशोधन का क्रम ऐसा होता है जिसमें अहितकर प्रतिक्रियाओं की आशंका नहीं रहती।
वनौषधि उपचार मनुष्य के बढ़ते हुए रोगों की रोकथाम में असाधारण रूप से सहायक हो सकता है। वह निर्दोष भी है और हानिकारक प्रतिक्रिया से रहित भी। उनमें मारक गुण कम और शोधक विशेष होते हैं। वे रोगों को दबाती नहीं वरन् उखाड़ती और भगाती हैं। साथ ही सस्ती भी हैं। शाकाहारी प्रकृति वाले मानवी संरचना के अनुरूप भी। इसलिए अच्छा हो हम आहार विहार की कृत्रिमता को पूर्णरूप से नहीं हटा सकते तो कम से कम इतना तो करें ही कि यह विज्ञान उपेक्षा के गर्त में गिरने से अपनी गुणवत्ता खो बैठा है उसे तो सुधार ही लें। यह वनस्पति चिकित्सकों का काम है कि वे इस संबंध में जो अनुपयुक्तता घुस पड़ी है, उसका संशोधन करें और इस क्षेत्र की खोई हुई गरिमा को फिर से वापस लौटायें।
इस संदर्भ में अधिक विचारणीय यह है कि औषधि रूप में प्रयुक्त होने वाली वनौषधियाँ एक वर्ष से अधिक पुरानी न हों। अन्यथा सूखने और पुरानी पड़ने के साथ ही उनके गुण घटेंगे या समाप्त हो जायेंगे।
होता यह है कि पंसारियों से जो जड़ी बूटियाँ खरीदी जाती हैं उनके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि वे कितनी पुरानी हैं। जिस प्रकार इंजेक्शनों, अंग्रेजी औषधियों पर लिखा रहता है कि यह कब बनी और कब तक काम देंगी। उसी प्रकार वनौषधियों के साथ भी यह प्रामाणिकता जुड़नी चाहिए कि उन्हें कब किस स्थिति में लाया गया और वह कब तक काम देगी। किस स्तर से तात्पर्य वही है कि वनस्पति को प्रौढ़ परिपक्वावस्था में लिया गया। यदि उसे कच्ची स्थिति में ही उखाड़ लिया गया है तो वह गुण न कर सकेगी जो उसे करने चाहिए। बहुत दिन रखी रहने के उपरान्त तो वे एक प्रकार से कूड़ा करकट स्तर की हो जाती हैं। इसीलिए अच्छा हो कि वनौषधि चिकित्सक सजधज वाला दवाखाना बनाने की अपेक्षा अपना निजी जड़ी बूटियों का उद्यान रक्खें और यथा सम्भव ताजी वनस्पतियों का ही उपयोग करें।
दूसरा एक परिवर्तन जलवायु एवं भूमि का भी होता है। जिस प्रकार नागपुर के संतरे, लखनवी आम, बम्बईया, केले, मैसूरी चन्दन अपनी उत्पादन भूमि के विशेष गुणों के कारण अधिक स्वादिष्ट और गुणकारी होते हैं, उसी प्रकार वनौषधियों के संबंध में भी यह बात है कि वे ठंडे, गर्म, पथरीले, रेतीले आदि क्षेत्र में उपजने और वहीं की भूमि तथा जलवायु में अन्तर रहने के कारण गुणों में भी हेर-फेर हो जाता है। कई बार एक ही रंग रूप की कई औषधियाँ होती हैं। मात्र उनके आकार प्रकार को देखने या स्वाद चखने भर से यह नहीं जाना जा सकता है कि जिस वस्तु की आवश्यकता थी वही मिली या उसके स्थान पर कोई दूसरी वस्तु लेकर मन बहलाया गया।
गंगा तट पर उत्पन्न होने वाली ब्राह्मी और नहर रजवाहों के किनारे उगने वाली मंडूकपर्णी की आकृति मिलती जुलती होती है। बाजार में एक के स्थान पर दूसरी भी मिल सकती है या उसमें मिलावट भी हो सकती है। ऐसी दशा में उपयुक्त यही है कि आँखें यदि ठीक परिचय प्राप्त न कर सकें तो पर्यवेक्षण यंत्रों से उनकी जाँच पड़ताल करा ली जाय कि उसमें आवश्यक रसायन या गुण हैं या नहीं। इस प्रकार यदि वनौषधि के आधार पर सही चिकित्सा की जा सके तो उससे रोग निवारण में भारी सहायता मिल सकती है।
गाय सूखा भूसा अनमने मन से खाती। रुचिकर न लगने से वह प्रायः भूखी रहती है।
चतुर मालिक ने एक तरकीब निकाली। उसने हरे रंग की प्लास्टिक उसकी आँखों पर लपेट दिया। गाय को सब कुछ हरा दिखने लगा। भूसे को घास समझने लगी और रुचि पूर्वक खाने लगी।
दृष्टिकोण विकृत हो जाने पर हेय को भी श्रेय समझने और अपनाने लगते हैं।
बादल आकाश में जितने घुमड़ते हैं उतने बरसते नहीं। तेज धूप गर्मी के दिनों को छोड़कर वर्षा में प्रचुरता से और सर्दी में यदा-कदा उनका दर्शन होता है। पर इनमें से कितने बरसेंगे यह नहीं कहा जा सकता।
पृथ्वी की आवश्यकता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पन्द्रह-पन्द्रह दिन के अन्तर से सर्वत्र काम चलाऊ वर्षा होती रहे तो हरियाली की अभिवृद्धि का क्रम बना रहे और पानी की बर्बादी तथा धरती के कटाव का संकट भी पैदा न हो। किन्तु बादल मनमौजी होते हैं। प्रकृति का कोई ऐसा नियम नहीं है कि भूमि की जरूरत देखकर पानी बरसायें। विशालकाय रेगिस्तान सूखे पड़े रहते हैं जबकि चेरापूँजी जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में अन्धाधुन्ध वर्षा होती है। तिहाई बादल तो समुद्र में से उठकर उसी में बरस जाते हैं।
इच्छित वर्षा होने की लालसा लगाये तो मनुष्य बैठा रहता है। मनौती मनाता रहता है, फिर भी बात अधूरी ही रहती है। बादल किसी का कहना मान लेंगे यह आशा नहीं की जाती। भले ही इसके लिए मोर, पपीहे, दादुर कुहराम ही मचाते रहें।
कुओं, तालाबों में पानी मूलतः वर्षा का ही होता है। यदि बारिश न हो तो वे सभी सूख जाते हैं। फिर सिंचाई के साधनों के लिए बर्फीले पर्वतों से निकलने वाली नदियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। उनकी पहुँच भी सर्वत्र नहीं है। फिर जाड़े के दिनों में बर्फ जमती है और ऊपर से उतरने वाली नदियों में भी प्रवाह नाम मात्र का रह जाता है। ऐसी दशा में सिंचाई के माध्यम सभी कठिन हो जाते हैं और कृषि उत्पादन में कमी पड़ने से लोगों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
समुद्र जल को मीठा बनाने के प्रयत्न चल रहे हैं और ज्वार-भाटों से बिजली बनाने के सूर्य ताप को एकत्रित करके उससे ईंधन की आवश्यकता पूरी करने की बात सोची जा रही है। बहते हुए पवन को रोक कर पनचक्की और बहते जल प्रवाह को रोक कर बिजली घर बनाने, बाँध खड़े करके नहरें निकालने के प्रयत्न चल रहे हैं और बहुत हद तक सफल भी हुए हैं। अब आवश्यकता अनुभव की जा रही है कि बादलों पर भी नियंत्रण स्थापित किया जाय और उन्हें बरसने को आवश्यकतानुसार बाधित किया जाय।
बादल दो प्रकार के होते हैं। बहुत ऊँचे उड़ने वाले जिनका तापमान अधिक होता है वे छिरछिरे भी होते हैं। दूसरे प्रकार के वे जो भारी होते हैं, जिनमें जल का आधिक्य होता है और नीचे उड़ते हैं। हवा की गति तेजी पकड़ ले तो बात दूसरी है, अन्यथा उनकी चाल भी धीमी होती है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि कौन बादल कहाँ कितनी मात्रा में वर्षा करेगा? कितनी देर टिकेगा? इस अनिश्चितता को निश्चितता में बदलने के लिए ऐसे उपाय सोचे जा रहे हैं, जिनसे वर्षा कराने के संबंध में कुछ निश्चित आश्वासन मिल सकें और मनुष्य की आवश्यकता की एक बड़ी जटिलता हल हो सकें।
इस संदर्भ में वैज्ञानिकों का दावा है कि बादलों में रहने वाले छितराव को यदि घनीभूत कर दिया जाय तो वे भारी भी हो जाते हैं। नीचे भी उतरते हैं और पृथ्वी की आकर्षण शक्ति उन्हें नीचे घसीट लेती है। फलतः वर्षा होने लगती है। यह दबाव जितना अधिक होता है, उतने ही घेरे में उतना ही अधिक जल बरसता है।
इस प्रयोग के संदर्भ में कुछ समय पूर्व बर्फ के चूरे का सूखी कार्बनडाइ आक्साइड का प्रयोग किया गया था। वायुयानों में बर्फ के चूरे के पिंजड़े लटका कर बादलों के बीच उड़ाये गये थे। इस ठंडक वितरण का अच्छा प्रभाव देखा गया और पाया गया कि इसी रीति से भी वर्षा कराई जा सकती है। फिर भी यह अनिश्चित ही रहा कि कितने बादलों को किस हद तक ठंडा किया जा सकता है और उसके कितनी देर कितने परिणाम में वर्षा हो सकती है। वे प्रयोग अभी भी बन्द नहीं हुए हैं, पर यह नहीं निश्चय हुआ कि छुट-पुट कौतूहल देखने के अतिरिक्त और कोई व्यापक या बड़ा प्रयोजन भारी मात्रा में भी हो सकता है या नहीं?
इसके उपरान्त डॉ. लेंगमूर ने एक नया प्रयोग प्रस्तुत किया नमक का। उनने अपने प्रयोगों में यह कर दिखाया कि नमक का छिड़काव भी छितराये जल कणों को सघन बना सकता है। भाप बूँदों के रूप में घनीभूत होकर नीचे की ओर उतरने के लिए बाधित हो सकती है।
एक तीसरा प्रयोग और प्रस्तुत किया गया। वह था सिल्वर आयोडाइड का। इसे धरती से ऊपर उड़ाया जा सकता है और बादलों तक पहुँचाया जा सकता है। इसे जलाया कैसे जाय? आग से उसके कण हवा में बिखर जाते हैं। इसलिए एस्ट्रा फ्यूल नाम ज्वलनशील के द्वारा सिल्वर आयोडीन को जलने और उसे निश्चित दिशा में फैंकने वाले पम्प के सहारे बादलों तक पहुँचाने का प्रयोग अधिक सफल पाया गया उसमें वायुयान उड़ाने का खर्च और जोखिम दोनों ही बनते थे।
भारत की वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद ने देश के विभिन्न भागों में इस प्रकार के प्रयोग, परीक्षण किये कि बादलों की उपस्थिति वर्षा के काम आये और वह बेसिलसिले की उड़ानें न भरते फिरें। कृत्रिम वर्षा के प्रयोगों में रासायनिक उपयोग का प्रतिफल सीमित रहा। उससे सिद्धान्त की पुष्टि भर हुई। पर वह उपाय न निकला जिससे अभीष्ट आवश्यकता की पूर्ति हो सके।
ऊँचे वृक्षों की सघनता एक प्रकार की विद्युत शक्ति लिए हुए होती है। उसमें चुम्बक के गुण पाये जाते हैं। उसका प्रभाव और संकेत बादलों को वृक्षों की ओर खिसकने का होता है। फलतः सघन वृक्षों वाले इलाकों में वर्षा अधिक होती है। यह सबसे सस्ता और सरल उपाय है कि जिस क्षेत्र में अधिक पानी बरसने की आवश्यकता अनुभव की जाय वहाँ अधिक लम्बाई वाले देवतरु स्तर के पेड़ बहुलता के साथ लगाये जायं। छोटे गुल्मों और पौधों में यह कार्य नहीं होता, क्योंकि उनकी निज की आकर्षण शक्ति पृथ्वी के इर्द-गिर्द ही बिखरी रहती है। वह ऊपर की दिशा में अधिक दूरी तक अपना प्रभाव नहीं फेंक पाते। वृक्ष वर्षा बुलाते हैं यह मान्यता लौकिक कथाओं से लेकर वैज्ञानिक परीक्षणों तक सिद्ध होती रही है।
अग्निहोत्र का इस विषय में योगदान शास्त्र सम्मत है। गीताकार को ‘यज्ञाद् भावति पर्जन्य’ उक्ति में यह बताया है कि यज्ञ से वर्षा होती है और वर्षा होने के कारण अन्न का आहार का सुयोग बनाया है। जिससे मनुष्य तथा इतर प्राणी अपनी क्षुधा पिपासा शान्त सकते हैं। यज्ञ से वर्षा का होना किंवदंती मात्र नहीं है।
अग्निहोत्र में जो शाकल्य यजन किये जाते हैं उनमें कुछ भस्म में रह जाते हैं। जो भारी होते हैं वे उड़ नहीं पाते। किन्तु जो विटामिन स्तर के हलके क्षार होते हैं वे तैलीय जलीय, भागों के साथ मिलकर ऊपर अंतरिक्ष में उड़ जाते हैं। उनका जब बादल वाष्प से संयोग होता है तो दूसरे ढंग से वही प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है जो शुष्क बर्फ या सिलवर आक्साइड के द्वारा होती है। अन्ततः विरल वाष्प बूँदों के रूप में तभी परिणत होती है जब किसी ओर से दबाव या खिंचाव पड़ता है। यह वायु दबाव से मानसूनों की हलचलों से प्रकृतितः भी होती है और स्वाभाविक वर्षा का क्रम चलता है। किन्तु इसमें मानवी बुद्धि सर्वथा असहाय हो ऐसी बात भी नहीं है। वह कृत्रिम प्रयत्नों से भी प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकती है। बादलों की बरसने वाली परिस्थितियाँ पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति वायु का दबाव अन्तरिक्ष का तापमान उत्पन्न करता है। हम भी उन्हें बरसने के लिए आमंत्रित करते हैं। अग्निहोत्र यदि विधिवत किया जाय तो उसका परिणाम भी वैसा ही होता है।
बोझा भरी गाड़ी को मजबूत बैल ढो रहे थे। उसके नीचे एक कुत्ता भी चल रहा था। उसे भ्रम हुआ कि गाड़ी उसी के बलबूते चल रही है। अहंकर से वह जा रहा है।
गाड़ीवान ने कुत्ते की विचित्र भाव-मुद्रा देखी तो उसके भ्रम को ताड़ लिया।
कुत्ते की पीठ पर गाड़ीवान की एक चाबुक पड़ी। वह तिलमिलाकर दूर जा खड़ा हुआ। गाड़ी चलती रही।
भ्रम का नशा उतरा तो कुत्ते ने समझा कि उसका अहंकार अवास्तविक था।
सतयुग में सब प्रकार की सुख शान्ति थी। प्रगति की कहीं कुछ कमी न थी। भावनात्मक दृष्टि से सभी उदारचेता और आदर्शवादी थे। इसलिए क्लेश, कलह, के अभाव दारिद्रय के-कोई अवसर ही कभी नहीं आते थे। सर्वत्र सद्-भावना का-उत्कर्ष अभ्युदय का-वातावरण भरा पूरा रहता था। कमी लेने वालों की रहती थी, देने वालों की नहीं। सभी इसके लिए लालायित रहते थे कि उन्हें परमार्थ, परोपकार के लिए अवसर मिले, पर वैसी परिस्थितियाँ ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलती थीं। जब जन साधारण की परिस्थितियाँ सुसम्पन्नता युक्त हों और मनः स्थिति में सन्तोष, पराक्रम और उदारता का बाहुल्य हो तो फिर कोई किसी की सहायता के लिए क्यों आशा करे और मिलने पर भी कोई क्यों उसे ग्रहण करे?
मनुष्य में उपार्जन की क्षमता भी है और अभ्युदय की भी। बिना कुछ किये कोई निरर्थक बैठा भी नहीं रह सकता। ऐसी दशा में करने के लिए कोई उपयोगी दिशा तो तलाश करनी ही पड़ती थी। पुरुषार्थ को कहीं तो प्रयुक्त करना ही होगा। इस खोज-बीन में एक ही प्रयोजन हस्तगत होता था वह था-आत्मोत्कर्ष। जब दूसरों को अपनी सेवा सहायता की आवश्यकता नहीं तो फिर पराक्रम प्रिय व्यक्ति एक ही काम कर सकता है कि अपनी चेतना को अधिकाधिक परिष्कृत बनाने के लिए जो उपाय संभव हों उन्हें अपनाया जाय। इस संदर्भ में योग और तप दो ही पुरुषार्थ सामने रहते थे। इनके माध्यम से व्यक्तित्व को अपेक्षाकृत अधिक पवित्र, परिष्कृत बनाया जाता था। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में अधिकाधिक उत्कृष्टता का समावेश किया जाता था। इस उत्कर्ष का प्रतिफल मनुष्य में देवत्व के-उद्भव के-रूप में दृष्टिगोचर होता था।
यों मनुष्य आकृति वालों में प्रकृति भेद पाया जाता है। पिशाच, पशु भी देखे जाते हैं। पशु वर्ग के लोग आलसी, प्रमादी, गंदे, दरिद्र और पिछड़ेपन से घिरे रहते हैं। पिशाचों को पाप कर्मों में लिप्त पाया जाता है। वे अपराध, अनाचार, कुकर्म, दुर्व्यसन, मनोविकार आदि में लिप्त रहकर ऐसी स्थिति में जीवन गुजारते हैं, जिसे दैत्य, दानव, असुर, दुष्ट, दुराचारी आदि नामों से संबोधित किया जा सके। ऐसे मनुष्यों का बाहुल्य कलियुग में होता है। तब उनसे निपटने, सुधारने के लिए भी प्रयास करने पड़ते हैं और प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ प्रताड़ना के विधान भी निर्धारित करने होते हैं। यह पिशाच वर्ग के लिए किये जाते वाले उपचार हैं। पशु वर्ग आयु की दृष्टि से भले ही वयस्क हों पर उसे बाल बुद्धि की स्थिति में रहते हुए ही माना जाता है। अपंग असमर्थ असहाय पिछड़े लोग इसी स्तर के होते हैं। उन्हें न कर्त्तव्य का बोध होता है न अनुशासन का। पराक्रम, साहस, और विवेक के अभावग्रस्त रहना ही पड़ेगा। उसे परावलम्बन सहन करना ही पड़ेगा और उपेक्षा, अवमानना, भर्त्सना सहन करने के साथ-साथ दीन दरिद्र भी रहना पड़ेगा। यह परिस्थितियाँ कलियुग की हैं, जिनमें मनुष्य देहधारी पशुओं और पिशाचों की बहुलता बिखर पड़ती है।
परिस्थितियों के इस अंतर को देखते हुए विचारशीलों की अपनी गतिविधियों में, योजनाओं में, दिशा धारा और क्रिया-कलापों में भी अन्तर करना आवश्यक हो जाता है। सतयुग और कलियुग में जितना असाधारण अन्तर है, उसी अनुपात से विवेचना, निर्धारणा, क्रिया-प्रक्रिया में भी अन्तर करना पड़ता है। विवेक का यही तो तकाजा है। परिस्थितियों के अनुरूप क्रिया पद्धति में भी हेर-फेर करना अनिवार्य हो जाता है।
सतयुग में न कोई पशु था और न पिशाच कहीं दृष्टिगोचर होते थे। इसलिए उनके लिए कुछ सोचने करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। अविकसित पशुओं की सेवा सहायता की आवश्यकता पड़ती थी। इसके बिना वे अपना निर्वाह ठीक नहीं कर सकते। पशुओं को चारा, पानी, छाया आदि का प्रबंध न किया जाय तो वे भूखे, प्यासे रहकर सर्दी, गर्मी से प्रभावित होकर अपनी जान गँवा बैठेंगे। रोगियों को परिचर्या चिकित्सा न मिले, अपंगों को सहारे की व्यवस्था न हो तो वे भी अपने बलबूते जीवित नहीं रह सकते। कैदियों, पागलों के लिए भी उनके संरक्षकों को ही व्यवस्था बनानी पड़ती है। पिछड़े हुओं के लिए सेवा-सहायता की अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है। उदार चेताओं के मन में उसके लिए करुणा भी उमँगती है और सेवा सहायता करने की भाव-भरी प्रेरणा भी उठती है।
पिशाच वर्ग को वशवर्ती रखने के लिए एक ही उपाय है-प्रताड़ना प्रतिबंध, अवरोध, संघर्ष। इसके बिना वे और किसी उपाय से अपनी दुष्टता से विरत नहीं होते। सिंह, व्याघ्र, भेड़िये, सर्प, बिच्छू आदि को न तो सदुपदेशों से सन्मार्ग पर लाया जा सकता है और न विनय, नम्रता, क्षमा आदि का ही कोई प्रभाव पड़ता है। वे सज्जनता की भाषा समझते ही नहीं। क्षमा को वे कायरता या दुर्बलता के अर्थ में लेते हैं। समझते हैं असमर्थता अपनी जान बचाने के लिए दयालुता का आडम्बर बना रही है। इस उपाय को अपनाने से उनके हौंसले बढ़ते हैं। अपने कुकृत्यों के लिए द्वार खुला देखकर वे चौगुने-सौगुने उत्साह से दुष्टता पर उतारू होते हैं। अनाचार निर्भय होकर अपना कार्यक्षेत्र अनेक गुना बढ़ा लेता है। इसकी चपेट में सबसे पहले वे ही आते हैं जो दया धर्म की दुहाई देकर किसी प्रकार झगड़ा टालने की बात सोचते हैं।
सतयुग और कलियुग की परिस्थितियों में जमीन आसमान जैसा अन्तर हुआ। इसलिए विचारशैली और क्रिया पद्धति में भी तद्नुरूप हेर-फेर आवश्यक हो जाता है। जब कोई दीन हीन है ही नहीं-पिछड़ा और अभावग्रस्त दीख ही नहीं पड़ता तो सेवा सहायता किसकी की जाय। जब कोई अनाचारी, आततायी है ही नहीं तो प्रताड़ित किसे किया जाय? संघर्ष किससे ठाना जाय? ऐसी दशा में पुरातन काल का वह सतयुगी व्यवहार उचित ही था कि योगाभ्यास, तप साधना जैसे आत्मोत्कर्ष के प्रयासों में निरत हुआ जाय। इसका लाभ भी था कि चेतना की प्रसुप्त क्षमता को अधिक समुन्नत बनाने का अवसर मिलता था। देवत्व की मात्रा बढ़ाकर महामानव बनने का ऋषि, मनीषी बनने का सुयोग हस्तगत होता था। जिस भूमि में देव समुदाय की अभिवृद्धि होती थी उसे, ‘स्वर्गादपि गरीयसी’, कहलाने का सुयोग मिलता था। उस समय के लिए वही चिन्तन, निर्धारण एवं क्रिया, कलाप उचित था कि सामाजिक जीवन में कोई अस्त-व्यस्तता न रहने पर आत्म-कल्याण की आत्मोत्कर्ष की बात सोची जाय। स्वर्ग की, मुक्ति की, सिद्धि की सुखद कल्पनाओं एवं चेष्टाओं में निरत रहा जाय।
पुरातन काल का रहन-सहन दूसरे ढंग का था, आबादी कम थी जंगल बहुत। लोग कृषि पशुपालन के लिए अपने-अपने क्षेत्र बाँट कर दूर-दूर झोंपड़े बनाकर रहते थे। स्वावलम्बी निर्वाह करते थे। समाज का सघन विकास नहीं हुआ था ऐसी दशा में कोई सार्वजनिक समस्याएँ या आवश्यकताएँ थी भी नहीं। उन परिस्थितियों में व्यक्ति की मानसिकता एवं व्यवहारिकता व्यक्तिवादी रही हो तो आश्चर्य ही क्या? व्यक्तिवादी चिन्तन या तो भौतिक वैभव बटोरता है या फिर स्वर्ग मोक्ष जैसी महत्वाकाँक्षाओं को संजोता है। सतयुग की यही विशेषता थी कि तब न तो सामूहिकता इस सीमा तक विकसित हुई थी कि किन्हीं समस्याओं को सुलझाने की आवश्यकता पड़े और न व्यक्ति ही स्तर के थे कि जिनके पास सज्जनता, सम्पन्नता की कमी हो। ऐसी दशा में उन दिनों पशु वर्ग के लिए आवश्यक सेवा सहायता के संबंध में भी विचार नहीं करना पड़ता था और न मनुष्यों में कोई पिशाच वर्ग के ऐसे दुष्ट, भ्रष्ट ही होते थे, जो मर्यादाओं की उपेक्षा, वर्जनाओं की अवहेलना करें। ऐसी दशा में प्रतिरोध, संघर्ष करने और प्रताड़ना देने प्रतिबंध लगाने की भी योजना नहीं बनानी पड़ती थी। दोनों ही प्रकार के आपत्तिकाल सामने नहीं आते थे। इसलिए लोगों की कल्पनाएँ स्वर्ग लोक मुक्ति की, स्वतंत्रता सिद्धियों की प्रगतिशीलता तक ही प्रयत्नशीलता सीमित रही होगी। पारस्परिक व्यवहार में शालीनता का ही भरपूर समावेश रहा होगा।
उन दिनों पारस्परिक व्यवहार के चार सूत्र थे। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा। सज्जनों से मैत्री। व्यथितों के प्रति करुणा, सुखियों को देखकर मुदिता, प्रसन्नता और गड़बड़ाने वाले बाल बुद्धि लोगों के प्रति उपेक्षा। यह चारों ही प्रयोग ऐसे हैं जिन्हें मध्यवृत्ति के लोगों के साथ व्यवहृत किया जा सकता है। उन दिनों न तो पशुवर्ग के लोग थे और न पिशाच वर्ग के। इसलिए उपरोक्त चार निर्धारणों को ही पर्याप्त मान लिया गया, उनमें सेवा और संघर्ष के दो अन्य तथ्यों को जोड़ना आवश्यक नहीं समझा गया। क्योंकि तब न तो असंयमी लोग पनपे थे और न आततायियों ने पैर पसारना आरम्भ किया था।
जो समस्या सामने ही नहीं थी उसका समाधान भी क्या सोचा, खोजा जाय, किन्तु आज की स्थिति सर्वथा भिन्न है। जो परिस्थितियाँ सतयुग में दृष्टिगोचर तक नहीं होती थी। वे अब सर्वत्र तूफानी गति से बढ़ी हैं और घटाटोप की तरह छा गई हैं। संसार में दो तिहाई लोग आर्थिक, नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक दृष्टि से दयनीय स्थिति में रह रहे हैं। पिछड़ेपन का अभावग्रस्त दीन-हीन जीवन जी रहे हैं। इनकी गुहार उदारचेताओं से सेवा सहायता की है, जिसके सहारे वे कुछ ऊँचे उठकर आगे बढ़ सकें और राहत प्राप्त कर सकें। बाढ़, दुर्भिक्ष, महामारी, भूकम्प, दुर्घटना जैसी आकस्मिक विपत्तियों के आज जाने पर भावनाशील लोग निजी काम में हर्ज करते और धन, श्रम लगाकर आपत्तिग्रस्तों की सहायता करते थे। आज भी संसार के बहुसंख्यक लोग ऐसी ही सेवा सहायता की आशा करते हैं।
पिशाच वर्ग का उत्पीड़न असंख्यों को असहनीय त्रास देता है। निर्दोषों को अकारण अनाचार करने वालों के उद्धत कुकर्म जहाँ अशक्तों का उत्पीड़न करते रहे वहाँ उस सफलता को पाकर अपनी उद्दण्डता को अनेक गुना बढ़ा लेते हैं और लाभ उपार्जन से लेकर अहंकार प्रदर्शन तक के लिए घिनौने स्तर की उद्दण्डता पर उतर आते हैं। इस सस्ती सफलता के लिए मन ललचाता है। सहज ही साथियों का समुदाय जुट जाता है और अनाचारियों की चाण्डाल चौकड़ी बन जाती है।
इनसे निपटने के लिए असहयोग, विरोध, संघर्ष जैसे उपाय अपनाये बिना उन्हें रोकने का कोई और उपाय नहीं है। इन दिनों दो तिहाई पशु जीवन जी रहे हैं। एक तिहाई से कुछ ही कम पिशाच प्रवृत्ति में संलग्न है। सज्जनों, सदाचारियों, विवेकवानों और कर्त्तव्य परायणों की संख्या इतनी कम है जिन्हें कठिनाई से ही एक प्रतिशत ढूँढ़ा खोजा जा सकता है। ऐसी दशा में आत्म-कल्याण की साधना किसी के लिए भी कठिन है। आत्म-कल्याण के लिए व्रत पालन और पूजा उपचार का नियमित रूप से कर पाना कदाचित ही किन्हीं के लिए संभव हो सकता है। उन प्रयत्नों में पशु या पिशाच पग-पग पर अड़चन उत्पन्न करते हैं और सफलता के स्तर पर पहुँचने ही नहीं देते। वातावरण का प्रभाव एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने देता।
युग धर्म को देखते हुए दीन दुर्बलों की सेवा और दुष्ट, भ्रष्ट पिशाचों के लिए अवरोध खड़े करना आज की सर्वप्रधान, सर्वोपरि, सामयिक साधना है। इनको अपनाने पर भी आत्म-कल्याण का प्रयोजन पूरा हो सकता है क्योंकि सेवा सहायता भी सद्भावना के बिना नहीं हो सकती और दुष्टता से निपटने के लिए भी त्याग बलिदान की विवेक और साहस की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। इन सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन भी आत्मिक प्रगति का वैसा ही द्वार खोलता है जैसा कि सतयुग में जप, तप के माध्यम से सम्पन्न किया जाता था।
एक दयालु राजा ने चिड़ियों को बहेलियों द्वारा हत्या किये जाने से बचाने के लिए घोषणा की कि जो पकड़ी हुई चिड़ियाँ लावेगा उसे पुरस्कार मिलेगा। जो चिड़ियाँ इस प्रकार लाई जातीं राजा उन्हें मुक्त करा देता। उसकी दयालुता का यश फैलने लगा।
थोड़े ही दिनों में आम लोगों ने यह धंधा अपना लिया। वे दिन भर चिड़ियाँ पकड़ते। राजा के पास ले जाते और इनाम लेकर लौटते। हजारों नये बहेलिये बन गये और राज्य कोष खाली हो चला।
मंत्री ने राजा को रोका और कहा-निष्ठुरों को उपहार देने के स्थान पर उन्हें दण्ड देना उपयुक्त रहेगा। राजा ने नीति बदल ली।
जून में सम्पन्न राष्ट्रीय-एकता सम्मेलनों की शृंखला के बाद प्रज्ञा संस्थान रचनात्मक कार्यक्रमों में जुट पड़े हैं। कितने प्रेरक है? वह कदम प्रस्तुत हैं, उसके कुछ प्रेरक प्रसंग हैं-
आदर्श विवाह सम्पन्न
औरेया (इटावा) राष्ट्रीय-एकता सम्मेलन के पुनीत अवसर पर (1) चि. रजनी गुप्ता का चि. अरुण कुमार गुप्ता (2) चि. रमाकान्ती प्रजापति का चि. शिवनारायण प्रजापति (3) चि. संध्या पोरवाल का चि. अवनीश कुमार गुप्ता से-तीन दहेज और धूम-धाम रहित आदर्श-विवाह सम्पन्न हुये। एक-एक मंत्र और कर्मकाण्ड की भाव परक व्याख्या से उपस्थित जन समुदाय भाव विभोर हो उठा। सभी ने अनुभव किया कि विवाह के उद्देश्य इस तरह के आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न संस्कार से ही सार्थक हो सकते हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने वर-वधुओं को आशीर्वाद दिया और अपने बच्चों के विवाह भी इसी तरह सम्पन्न करने का संकल्प लिया।
प्रतिज्ञा अभियान
गोसाई गंज। गायत्री परिवार शाखा के कर्मठ कार्यकर्त्ताओं में से सर्व श्री रघुनंदन शर्मा, दिवाकर नाथ, गोप बन्धु बागीश तथा प्रफुल्ल कुमार दास ने इस वर्ष 108 आदर्श विवाहों के प्रतिज्ञा पत्र भरवाने का संकल्प लिया हैं। अब तक 31 संकल्प पत्र भरे जा चुके हैं।
निर्धारित योजना के अनुसार यह लोग उन घरों में जाते हैं जिनके यहाँ विवाह योग्य लड़के या लड़कियाँ होती हैं। उन्हें विवाहों के धार्मिक उद्देश्य और खर्चीली शादियों के दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हैं। उनकी परिस्थितियों पर चर्चा करके इस बात के लिये सहमत करते हैं कि वे दहेज रहित आदर्श विवाह ही करें। इस संकल्प अभियान की व्यापक प्रतिक्रिया उभर रही है।
मुँडकेरिया के रामा तेली
देवगढ़। राजस्थान चित्तौड़ का सर्वाधिक साक्षर गाँव जहाँ के युवक आज बड़ी संख्या में प्रशासनिक सेवाओं में हैं- मुँडकेरिया गाँव में एक भी अशिक्षित व्यक्ति नहीं हैं। इसका श्रेय वहाँ के एक वयोवृद्ध रामा तेली को है। इस घटना ने स्थानीय गायत्री परिवार के सदस्य श्री टीकाराम धुनिया और श्री चन्द्र प्रसाद भौमिक को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने भी अपने गाँव को साक्षर बनाने का संकल्प तो लिया। उन्होंने घर-घर जाकर निरक्षरों को ज्ञान का महत्व समझाया तथा अपने ही कमरे में प्रौढ़ पाठशाला प्रारम्भ कर दी। इस समय प्रातः 54 प्रौढ़ उसमें अक्षर ज्ञान और विद्याध्ययन कर रहे हैं। पाठशाला प्रातःकाल सायंकाल दो बार चलती है। विद्यार्थी अपनी-अपनी सुविधा के समय आते हैं, पूरी रुचि से पढ़ते हैं।
साक्षरता संगोष्ठी सम्पन्न
भदोही (विक्रमपुर) गायत्री परिवार के तत्त्वावधान में स्थानीय शिक्षितों की संगोष्ठी आमंत्रित की गई, उसमें साक्षरता विस्तार पर व्यापक चर्चा की गई।
वयोवृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री राजकिशोर सुरीर ने इस क्षेत्र में गायत्री परिवार द्वारा उठाये गये आन्दोलन की भूरि-भूरि सराहना की तथा प्रत्येक शिक्षित से न्यूनतम पाँच व्यक्तियों को साक्षर बनाने का आग्रह किया। संगोष्ठी में आमंत्रित सभी ने न्यूनतम एक घंटे से लेकर 4 घंटे तक का समयदान इस पुनीत प्रयोजन के लिये देने का प्रतिज्ञा पत्र भरा। प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम का विधिवत् शुभारम्भ गुरुपूर्णिमा से किया जा रहा है।
दूरदर्शन पर सद्वाक्य प्रदर्शन
अहमदाबाद (गुज.) का दूरदर्शन केन्द्र युग निर्माण के सद्वाक्य अपने कार्यक्रमों में नियमित रूप से प्रदर्शित कर रहा है, इससे थोड़े समय में ही लाखों लोगों का नैतिक बौद्धिक शिक्षण होता है।
दिल्ली दूरदर्शन पर भी सद्वाक्य प्रदर्शन के प्रयास पूर्णता पर है। दिल्ली दूरदर्शन के सचिव महोदय ने कुछ सद्वाक्यों को बहुत अधिक पसन्द किया है और अब वह व्यवस्था करने जा रहे हैं, जिससे उनका दिल्ली से भी प्रदर्शन प्रारम्भ हो जायेगा। उससे यह क्रम सारे देश भर में चल पड़ने की संभावना सुनिश्चित हो चली है।
सम्मेलन शृंखला-अभिनव जागरण
हरिद्वार। शान्ति कुँज के शक्ति पीठों के सम्मेलनों का क्रम अभूतपूर्व उत्साह के साथ प्रारम्भ हुआ। बिहार सौराष्ट्र और मध्य गुजरात के तीन सम्मेलन सफलता पूर्वक सम्पन्न हो चुके हैं। भारी संख्या में परिजन सम्मिलित हुये। एक और राष्ट्रीय-एकता सम्मेलनों के निर्धारण की धूम, दूसरी ओर नये उभरे दो महा संकल्प-आदर्श विवाहों के प्रचलन और साक्षरता अभियान के लिये सदस्यों में भारी उत्साह देखा गया। इस दृष्टि से इन सम्मेलनों को अभिनव जागरण की संज्ञा देना सर्वथा सार्थक है।
इसी बीच महापर्व गुरुपूर्णिमा भी सम्पन्न हुआ। जिसमें हजारों की संख्या में अन्य परिजन भी सम्मिलित हुये और इस तरह क्षेत्रीय सम्मेलन में राष्ट्रीय सम्मेलन का अद्भुत दृश्य उमड़ पड़ा।
जहाँ दीवारें बोलती हैं
मुन्दकी। कस्बे की पैठ दिलाराम को जाने वाली सड़क के किनारे की शायद ही कोई दीवाल ऐसी बची हो जो बोलती न हो। यह आवश्यक नहीं कि हर कोई मुँह से ही बोले। दीवारों में लिखे सद्वाक्य उधर से निकलने वाला प्रत्येक राहगीर पढ़ता है-हुआ न यह दीवालों का बोलना-शिक्षा देना और लोगों को आदर्शों के प्रति सहमत करना।
यह कार्य शांति कुँज से 9 दिवसीय गायत्री पुरश्चरण सम्पन्न कर लौटे श्री अरविन्द उपाध्याय और उनके साथी श्री जनार्दन प्रसाद सिंह ने प्रायश्चित विधान के अंतर्गत किये गये हेमाद्रि संकल्प की पूर्ति स्वरूप किया गया। उनके इस कार्य की सारे कस्बे में सराहना हो रही है। इसे नई पीढ़ी के लिये एक भाव-भरा निःशुल्क शिक्षण माना जा रहा है।
झोला पुस्तकालयों की धूल झड़ी
मरोही-बानपुर। में इस समय लगभग एक दर्जन झोला पुस्तकालय चलने लगे और घर-घर जाकर सद्ज्ञान वितरण करने लगे हैं।
इन झोला पुस्तकालयों के संकल्प तो प्रायः पिछले दो वर्ष से होते आये हैं। प्रज्ञा परिजन झोले और साहित्य लाये तो पर उनमें सिवाय धूल जमने के और कुछ नहीं हुआ, पर विगत माह अप्रैल मई में साधना शिविर सम्पन्न कर लौटे साहू दम्पत्ति ने दो माह नियमित रूप से झोला पुस्तकालय चलाया जो सम्मान अर्जित किया उसने पूर्व संकल्प कर्त्ताओं को भी झोलों की धूल झाड़ने को विवश किया। एक साथ बड़ी संख्या में झोला पुस्तकालय चल पड़ने से यहाँ का वातावरण प्रज्ञामय हो उठा है। घर-घर यज्ञ, जन्म दिन आदि संस्कारों का प्रचलन उसी का चमत्कार माना जा रहा है।
विराट् आयोजन की व्यापक तैयारी
चन्द्रनगर। अगली शृंखला के शतकुण्डी गायत्री महायज्ञ तथा राष्ट्रीय-एकता सम्मेलन को विराट् रूप देने की तैयारियाँ व्यापक स्तर पर प्रारम्भ की गई है। इसके लिये प्रशासनिक सहयोग और स्वीकृति प्राप्त करने से लेकर जन संपर्क तक के सभी कार्यक्रमों की रूप-रेखा तैयार कर ली गई है।
यह तैयारियाँ शान्ति कुँज में कार्यक्रम की तिथियों के निर्धारण के बाद प्रारम्भ की गई। सभी संकल्पकर्त्ताओं को शासकीय सहयोग, कलश यात्रा, भोजन व्यवस्था, यज्ञ संचालन, आमंत्रण आतिथ्य, समिधा सामग्री, साहित्य प्रचार आदि की अलग-अलग जिम्मेदारियाँ सौंप दी गई है। कार्यकारिणी, यज्ञ समिति और टोलियों का निर्धारण कर देने से सभी कार्य समान गति और उत्साह के साथ प्रारम्भ हो गये हैं। अभूतपूर्व आयोजन की सभी कार्य समान गति और उत्साह के साथ प्रारम्भ हो गये हैं। अभूतपूर्व आयोजन की सभी तैयारियाँ संकल्पबद्ध ढंग से प्रारम्भ होने से सफलता भी सुनिश्चित समझी जा रही है।
कितने पावन, कितने प्रेरक जन्म दिन संस्कार
पट्टीसराय। प्रायः प्रतिदिन किसी न किसी घर जन्म दिन संस्कार सम्पन्न करने का अभियान व्यापक होता जा रहा है। अकेले जून माह में 21 जन्म-दिन संस्कार सम्पन्न हुये। जन्म दिन संस्कार सम्पन्न कराने वालों में प्रसिद्ध अधिवक्ता श्री सत्यनारायण जी दवे भी हैं जिनके घर बार एसोसिएशन के प्रायः एक सौ सदस्य सम्मिलित हुये और सभी ने जन्म दिन संस्कार मानने की युग निर्माण परम्परा को अत्यन्त पावन और प्रेरक बताया।
इसके प्रभाव का इसी से अनुपात लगाया जा सकता है कि जहाँ एक संस्कार सम्पन्न होता है, वहीं कई अन्य संस्कार स्वतः उपज पड़ते हैं।
स्थानीय प्रज्ञापीठ ने उसके लिये छोटी यज्ञशाला उसकी सजावट सामग्री बनाई और पूजा उपकरणों के तथा प्रज्ञासैट व लाउडस्पीकर का भी प्रबंध किया है, जिससे प्रायः दो सौ व्यक्तियों तक का एक सुन्दर सम्मेलन हो जाता है। ढपलियों पर गीत सुनाने के लिये एक टोली भी गठित की।
नव निर्माण की दिशा में एक-एक कदम बढ़ाते हुए हमें युग परिवर्तन के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अपने प्रयासों को अधिक द्रुतगामी बनाना है। पीछे की तरफ मुड़कर देखते हैं तो प्रतीत होता है कि लम्बी मंजिल तय कर चुके, सफलता के अनेक पड़ाव पार कर चुके। फिर भी जो करना शेष है वह भी कम नहीं है। विराम, विश्राम की अभी किसी को छूट नहीं। इक्कीसवीं सदी के दिव्य अवतरण से पूर्व हमें भागीरथ जैसी तप साधना में निष्ठापूर्वक निरत रहना है।
गत वर्ष राष्ट्रीय एकता सम्मेलन का नया दौर चला था। उसमें एक करोड़ भावनाशीलों को अग्नि की साक्षी में यह संकल्प दिलाना लक्ष्य था। आशा की गयी कि वे सम्प्रदायवाद, जातिवाद, प्रान्तवाद, भाषावाद आदि के नाम पर फैली हुई विषमता के विरुद्ध मोर्चा खोलेंगे। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता को सुदृढ़ बनाये रखने के लिए स्वयं कटिबद्ध रहेंगे तथा दूसरों को वैसी ही प्रेरणा देंगे। विलगाव को, फुट को, विषमता को पनपने न देंगे। जाति और लिंग के नाम पर चल रहे भेदभावों को भी निरस्त करेंगे और एकता-समता के सर्वतोमुखी सृजन में प्राण-पण से संलग्न रहेंगे। इन सम्मेलनों, समारोहों में जनता ने असाधारण संख्या में भाग लिया। भाव भरे भजनों और प्रवचनों ने जन-जन का मन हिलाया। सभी ने समता, सहयोग और संगठन की प्रतिज्ञा यज्ञाग्नि की साक्षी में ली और विश्वास दिलाया कि जो प्रतिज्ञायें की हैं वे आजीवन निभेंगी भी। गत वर्ष 50 लाख भावनाशीलों ने प्रतिज्ञायें लीं। इनमें सभी धर्म-सम्प्रदायों के लोग सम्मिलित थे। वह क्रम इस वर्ष भी चलेगा। प्रचार वाहन इस बार नवरात्रि के आरम्भ से ही निकल पड़ेंगे और गर्मियाँ आने से पूर्व, शेष 50 लाख संकल्प और भी करा कर रहेंगे। इस प्रकार एक करोड़ जनता को राष्ट्रीय-एकता का संकल्प करा कर रहेंगे। आगे भी यह क्रम बन्द होने वाला नहीं है। जब तक देश जापान, इजराइल की तरह एक जुट नहीं हो जाता, तब तक विभेदों को मिटाने और हर दृष्टि से समीप आने वाले समता अपनाने की प्रक्रिया द्रुतगति से अविराम जारी रहेगी।
इस वर्ष दो नए कदम उठे हैं (1) धूम-धाम, दान-दहेज वाली शादियों का प्रचलन मिटाना। उसके स्थान पर बिना जेवर, बिना दहेज एवं बिना किसी प्रकार के प्रदर्शन की शादियों का नए सिरे से नया रिवाज चलाना। (2) एक करोड़ अशिक्षित प्रौढ़ों को सुशिक्षित बनाना।
पिछड़ेपन का अभिशाप इन्हीं दो कारणों से है-एक अशिक्षा, दूसरा गरीबी। इन दोनों के विरुद्ध खुली जंग छेड़कर ही हम प्रगतिशीलता और खुशहाली के दर्शन कर सकते हैं। इन दोनों कार्यों को जन शक्ति के माध्यम से ही सम्पन्न करना होगा। इसमें जन सहयोग और सृजन शिल्पियों का परामर्श ही कारगर सिद्ध होगा।
धूमधाम एवं दहेज से मुक्त विवाहों का प्रचलन
उक्त संदर्भ में सरकार यथासंभव अपना काम कर रही है। उसके द्वारा स्कूल, कॉलेजों का खर्चीला संचालन बड़े पैमाने पर हो रहा है। दहेज विरोधी कानून भी उसने बना दिया है। यह अपने स्थान पर सही है, पर मात्र इतने भर से काम कहाँ चलने वाला है? भ्रष्टाचार के हर पक्ष को दण्डनीय ठहराने वाले कानून बने हुए हैं, पर उस पर अंकुश कहाँ लगा? फिर दहेज ही कैसे मिट सकता है? पहले नम्बर एक का धन दहेज में लिया जाता था, अब नम्बर दो में लिया जाने लगा है। फिर धूम-धाम, बरात-प्रदर्शन जेवर पर तो कोई प्रतिबन्ध है नहीं। खर्च तो वर-कन्या पक्ष दोनों पक्षों को ही करना पड़ता है। वे एक दूसरे की बर्बादी से ही अपनी तपन बुझाते हैं। लड़के वाला दहेज माँगता है, लड़की वाला वधू के लिए कीमती जेवरों की फरमाइश करता है। जब दहेज मिटेगा, तब जेवर ही नहीं, धूम-धाम का प्रदर्शन भी बन्द होगा। सोने का भाव आसमान चूम रहा है। उसके थोड़े से भी जेवर बनवाये जायें, तो वे उतनी ही लागत में बनते हैं, जितना कि दहेज मिलता है। दोनों कुप्रथाएँ एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं। बन्द करना है, तो दोनों को ही एक साथ समाप्त करना होगा।
बारात, दावत सजी सवारियाँ, बैण्ड-बाजे, आतिशबाजी, लेन-देन के फर्नीचर आदि वस्तुओं का प्रदर्शन-यह तीसरी बुराई है। इस मद में प्रायः उतना ही खर्च पड़ जाता है, जितना कि जेवर में या दहेज में। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जहाँ संसार भर में शादियाँ पारिवारिक उत्सव के रूप में अत्यन्त सादगी के साथ पूरी होती रहती हैं, वहाँ भारत के गरीब लोग विवाहों के अवसर पर अमीरी का स्वाँग बनाते और दोनों पक्ष के संबंधी एक-दूसरे को बर्बाद करने में पूरी शत्रुता का परिचय देते हैं।
गरीबी की समस्या बड़ी है। सभी चाहते हैं कि गरीबी दूर हो। हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से अधिक कमाने का प्रयत्न करता है। सरकार भी इसके लिए सुविधाएँ उत्पन्न करती है। पर इस सबसे साधारणतया उतना ही जुट पाता है जिसमें औसत गृहस्थ अपने परिवार का किसी प्रकार इस घोर महंगाई के जमाने में अपना गुजारा कर सके। संयुक्त परिवार में आये दिन लड़के-लड़कियों की शादियाँ का सिलसिला चलता रहता है। उसे मद में इतना खर्च करना पड़ता है, कि इसकी पूर्ति के लिए कर्ज लेने वर्तमान सुविधा साधन बेच देने, चोरी बेईमानी करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। इस तथ्य में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। वर्तन में पानी कितना ही क्यों न भरा जाय पर पैंदे में छेद रहते वह टिक नहीं सकेगा, जमीन पर बिखर जायेगा। आमदनी बढ़ाने के लिए कितने ही प्रयत्न किये जायें पर वह उपार्जन शादियों के छेद में होकर बह जायगा, गरीबी जहाँ की तहाँ बनी रहेगी। इसलिए गरीबी हटाओ, आन्दोलन के लिए आमदनी बढ़ाने के उपाय सोचते-अपनाते रहना ही पर्याप्त नहीं। होना यह भी चाहिए कि खर्चीली शादियों जैसे छिद्रों को भी बन्द करके बर्बादी पर अंकुश लगाया जाय।
इस दिशा में लेखनी-वाणी से बहुत कुछ लिखा-कहा जाता रहा है। अब समय आ गया है कि इस दिशा में कोई ठोस और सुनिश्चित कार्यक्रम योजनाबद्ध रूप से अपनाया जाय। एक कुरीति मिटेगी तो दूसरी अन्य अनेक मूढ़ मान्यताओं की भी जड़ें हिलने लगेंगी। गान्धी जी ने नमक सत्याग्रह का छोटा कदम बढ़ाया था, वह बढ़ते-बढ़ते ‘करो या मरो’ के स्तर तक जा पहुँचा था। हमें भी नशेबाजी, ऊँच-नीच, पर्दा-प्रथा, भिक्षा-व्यवसाय, मृतक भोज जैसी अनेकों कुरीतियों को समाप्त करने के लिए पहला कदम अनेकों कुरीतियों को समाप्त करने के लिए पहला कदम खर्चीली शादियों के उन्मूलन के रूप में उठाना चाहिए। आशा करनी चाहिए कि इस माध्यम से दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाकर अगले ही दिनों अन्यान्य कुरीतियों का उन्मूलन कर सकना भी संभव हो जायगा।
यह कार्य प्रज्ञा परिजनों को अपने घरों से आरम्भ करना चाहिए। मिशन की सभी पत्रिकाओं की ग्राहक संख्या मिला कर प्रायः 5 लाख है। प्रत्येक पत्रिका को औसतन पाँच-पाँच अन्य लोग भी पढ़ते हैं। इस प्रकार ग्राहक पाठक मिलकर पच्चीस लाख हुए। प्रत्येक परिवार में चार सदस्य भी हों तो वह संख्या एक करोड़ जा पहुँचती है। एक शब्द में यों कहा जा सकता है कि अपना सुनियोजित एक करोड़ का परिवार है, जिनमें सामान्य लोगों की तुलना में अधिक समझ-बुझ है। आदर्श शादियों का प्रचलन हमें अपने समुदाय से आरम्भ करना चाहिए। इसके बाद तो यह उपयोगी परम्परा असंख्यों द्वारा अपनाई जायेगी, क्योंकि इसमें सभी का हित है, मात्र मूढ़ मान्यता ही इसमें बाधक है। यदि इस सड़ी गली दीवार पर एक करारा प्रहार किया जाय तो बाकी का सीराजा अपने आप बिखर जायगा।
प्रज्ञा परिवार का हर परिजन यह प्रतिज्ञा करे कि वह अपने लड़के-लड़कियों के विवाह आदर्श विधि से ही करेंगे। हर विवाह योग्य लड़की लड़का यह प्रतिज्ञा करे कि वह खर्चीली शादियों का निमित्त बनने की अपेक्षा आजीवन अविवाहित रहना पसन्द करेगा। हम सभी को अपने प्रभाव क्षेत्र में, पड़ोसी मित्र संबंधियों में इसका प्रचार करना चाहिए और इन्हें भी शादियों के प्रचलन में यह नई क्रान्ति नियोजित करने के लिए सहमत करना चाहिए। साथ ही जहाँ धूम-धाम वाले विवाह हों, उनमें सम्मिलित न होने का भी संकल्प लेना चाहिए। भले ही वे सगे संबंधियों के यहाँ ही क्यों न होते हों? इस बहिष्कार का भी समझाने, बुझाने से कम दबाव न पड़ेगा। अपेक्षा की गयी है कि अपने 5 लाख पत्रिकाओं के ग्राहक अपने समूचे क्षेत्र में यह सब प्रचार करने के लिए संलग्न होंगे। अपने परिवार के बारे में तो एक प्रकार से शपथ ही ले लें कि उस परिधि में सत्यानाशी खर्चीली शादियाँ तो नहीं ही होंगी। इतना कर गुजरने पर समझना चाहिए कि मार्ग का अवरोध गिर गया और प्रगतिशीलता के युग में प्रवेश करने के लिए द्वार खुल गया।
खर्चीली शादियों को कोसते हुए भी लोग अन्ततः उसी प्रथा को अपना लेते हैं। इसके दो कारण हैं-एक तो हर लड़की वाले का धनाढ्य घर में लड़की देने का मनोरथ। दूसरा उपजातियों के छोटे दायरे में ही संबंध करने का आग्रह। सुधारवाद अपनाने वाले को इन दो कारणों को भी निरस्त करना चाहिए। मध्यम घर के काम-धन्धे से लगे हुए सुसंस्कारी लड़का ढूंढ़ें। धनाढ्यों के दरवाजे पर दस्तक न दें। बहुत इच्छुक होने के कारण उनका माथा चढ़ जाता है। नीलामी बोली बुलाते हैं। साथ ही एक तथ्य यह भी है कि अमीरों के यहाँ लड़कियां तिरस्कृत होती रहती हैं। वधुओं की मृत्यु, तलाक, परित्याग जैसी घटनायें अमीर घरों में ही होती हैं। साधारण दहेज उन लोगों की आँखों में ही नहीं आता। दूसरा विवाह कर लेने की धमकी देते रहते हैं। इसलिए अच्छा यह है कि सम्पन्न घर खोजने पर खर्चा करने की अपेक्षा लड़की को सुयोग्य बनने दिया जाय, अधिक पढ़ाया जाय। फिर चाहे मध्यम परिवार में ही विवाह क्यों न करना पड़े और लड़का एक दो वर्ष छोटी आयु का भले ही हो।
दहेज देने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है। कि दहेज और जेवर की रकम दोनों पक्ष वाले एकत्रित करके उसे स्त्री-धन के रूप में वधु के नाम “फिक्स डिपाजिट” में जमा करा दें। वह धन पाँच वर्ष में दूना, दस वर्ष में चौगुना हो जाता है। उस पैसे की ब्याज, लड़की का श्रम, लड़के का श्रम तीनों मिलकर इतनी राशि हो जाती है कि उससे अमीर घरों की तुलना में कहीं अधिक अच्छा जीवन बिताया जा सके।
इस प्रक्रिया को सब प्रकार से सामाजिक क्रान्ति का शुभारम्भ कहा जा सकता है। क्रान्ति-काल में प्रतिगामी वर्ग भी रोड़े अटकाने में कमी नहीं रहने देता। उपरोक्त आदर्शों के अनुरूप विवाह पक्का करने पर यह हो सकता है कि मित्र, पड़ोसी, संबंधी उपहास उड़ायें, अड़ंगे अटकायें, विरोध करें। यदि उसका सामना करते न बन पड़े तो यह सरल उपाय है कि दोनों पक्ष के लोग, अपन साथ पाँच-पाँच, सात-सात सगे-स्वजनों को लेकर हरिद्वार चले आएँ और शाँति कुँज में विवाह करा ले जायं। इसमें विवाह के नाम पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता। तीर्थ-यात्रा भी हो जाती है और ऐसे पुनीत संस्कार विधान के साथ विवाह सम्पन्न होने पर विवाह की सफलता की भी सुनिश्चित जड़ जमती है। ऐसे जोड़ों को सुसंतति प्राप्त करने का भी सुयोग मिलता है। यहाँ का वातावरण ही ऐसा है।
पहली लहर में यही उपयुक्त होगा कि प्रज्ञा परिवार के हर घर का कम से कम एक विवाह तो हरिद्वार आकर ही हो। घर लौटने पर सुविधानुसार सगे-संबंधियों को जल-पान पर बुलाया जा सकता है, छोटा प्रीति भोज दिया जा सकता है। बिगड़े हुए ढर्रे को बदलने के लिए पहले चरण में तो यही उपयुक्त होगा कि ऐसे विवाह शान्ति कुँज में सम्पन्न हों। बाद में निर्झर का प्रवाह बहने लगते पर उसमें असंख्य लहरें अनायास ही उठने लगेंगी।
गरीबी मिटाओ आन्दोलन का यह एक महत्वपूर्ण पक्ष है। आदमी बढ़ना एक पहलू है। खर्च घटना दूसरा। आदर्श विवाहों में खर्च घटता है और “गरीबी हटाओ” का आधा पक्ष पूरा होता है। इस प्रयास में सभी परिजनों की एक आदर्श-वादी भूमिका होना चाहिए।
अशिक्षा हटाओ अभियान
कहा जा चुका है कि गरीबी और अशिक्षा एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं। अब समय की माँग यह है कि मनुष्य को बहुज्ञ होना चाहिए। उसके पास जानकारियों का भण्डार रहना चाहिए अन्यथा उसे पग-पग पर पिछड़ना पड़ेगा और गई-गुजरी स्थिति में जीवन गुजारना पड़ेगा।
अपने देश में प्रायः दो तिहाई जनसंख्या अशिक्षित है। इनमें से अधिकाँश प्रौढ़ और कार्य व्यस्त हैं। बचपन में उन्हें पढ़ने का अवसर नहीं मिला। बड़ी आयु आने पर उनका उत्साह समाप्त हो गया। पढ़ाना इस वर्ग को भी पड़ेगा, क्योंकि वर्तमान में इन्हीं की प्रमुख भूमिका है। जो बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, वे तो पन्द्रह वर्ष बाद समाज में कोई बड़ी भूमिका निबाहने योग्य बनेंगे। प्रज्ञा परिजनों का दूसरा उत्तरदायित्व प्रौढ़ शिक्षा को अपने कंधों पर उठाना है।
काम चलाऊ पढ़ने-लिखने की शिक्षा प्राप्त करने के लिए 6 महीने की अवधि चाहिए। इस प्रकार वर्ष में दो सत्र चल सकते हैं। केवल प्रज्ञा परिवार के परिजनों द्वारा एक करोड़ को अशिक्षित से शिक्षित बनाने की प्रतिज्ञा है। वह दो वर्ष में पूरी हो सकती है। यदि यह उत्साह दूसरों में भी उभरने लगे तो देश के 55 करोड़ अशिक्षितों को कुछ ही वर्षों में शिक्षित बनाया जा सकता है।
जिनमें संपर्क क्षेत्र बढ़ाने, मिलन-सारी का स्वभाव बनाने, संगठन खड़ा करने की क्षमता है, उन्हें यह करना चाहिए कि अपने गली, मुहल्ले, गाँव में घर-घर संपर्क साधें। अशिक्षितों को शिक्षा का महत्व समझायें। उनमें पढ़ने का उत्साह पैदा करें। जो निरुत्साहित करते, अड़ंगा लगाते हैं, उन्हें तर्कों, प्रभावों के आधार पर सहमत करने का प्रयत्न करें और मुहल्ले की एक प्रौढ़ पाठशाला चलाने की योजना को कार्यान्वित करें। पुरुषों के लिए रात्रि का और महिलाओं के लिए तीसरे प्रहर का समय प्रायः सुविधाजनक होता है। स्थान की व्यवस्था किसी की जगह माँग कर की जा सकती है।
पढ़ने वालों के अतिरिक्त दूसरी आवश्यकता पढ़ाने वाले ढूँढ़ने की है। इसके लिए शिक्षित समुदाय को भावनाशील ऐसे लोगों से संपर्क साधना चाहिए जो अत्यधिक व्यस्त, स्वार्थी या निष्ठुर नहीं हैं, जिनमें सेवा साधना के बीजाँकुर हैं, जो “विद्या-ऋण” चुकाने के लिए नित्य थोड़ा समय पढ़ाने के लिए देते रह सकते हैं। तलाश करने पर अपने ही क्षेत्र में ऐसे उदार नर नारी अवश्य मिल जायेंगे जो निःशुल्क विशुद्ध सेवा भावना से इस उच्च-कोटि के पुण्य परमार्थ को करते रहने के लिए सहमत हो सकें।
छात्रों से फीस लेकर अध्यापकों को थोड़े समय का भी वेतन देकर यह योजना नहीं चल सकती। उसे व्यापक आन्दोलन का रूप नहीं दिया जा सकता। 5 करोड़ अशिक्षितों को शिक्षित नहीं बनाया जा सकता। यह कार्य तो उसी परमार्थ भावना से पूरा हो सकता है जिस प्रकार देश के असंख्यों धर्म कार्य चलते रहते हैं। जीवट वाले व्यक्ति इस आन्दोलन को चलायें, तो उसका शानदार ढाँचा खड़ा हो सकता है और निश्चित रूप से सफलता मिल सकती है। क्यूबा जैसे देशों ने अपने यहाँ इस समस्या का समाधान इसी प्रकार किया है।
प्रथम चरण में निरक्षरों को साक्षर बनाया जाना है जो छः महीने के परिश्रम से काम चलाऊ सीमा तक सहज ही पूरा हो सकता है। इसके बाद विद्या का वह क्षेत्र आरम्भ होता है जिसमें व्यक्तित्व विकास, परिवार-निर्माण और समाज सुधार से संबंधित समस्याओं का स्वरूप एवं समाधान समझाना होता है। इसके लिए एक पुस्तकालय होना चाहिए, जिसमें हर शिक्षित के लिए उपयोगी उद्देश्य के अनुरूप पुस्तकों का संग्रह हो। उन्हें नव शिक्षितों के घरों पर पढ़ने के लिए पहुँचाने और वापस लाने का प्रबन्ध पुस्तकालय ही करे। अक्षर ज्ञान के साथ ही समय के अनुरूप जीवनोपयोगी ज्ञान पहुँचाना आवश्यक है। इन दोनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती है। अन्यथा अभ्यास के अभाव में पढ़ा हुआ भी विस्मृत हो जायगा, साथ ही युग चेतना से जन-जन का मन आलोकित करने का प्रधान उद्देश्य भी पूरा न हो सकेगा। व्यक्ति, परिवार और समाज निर्माण की हर समस्या को हर शिक्षित अशिक्षित जान सके। इसकी पाठ्य पुस्तकें बनाने और प्रौढ़ शिक्षा पुस्तकालयों द्वारा उन्हें प्रसारित करते रहने का क्रम अपनाया जाना चाहिए।
स्मरण रहे अपने पिछड़ेपन के दो ही कारण हैं-गरीबी और अशिक्षा। इन दोनों को हटाने के लिए बिना खर्च के विवाहों का प्रचलन और प्रौढ़ शिक्षा का अभिवर्धन यही दो प्रमुख उपाय हैं। इन्हें पूरा करने के लिए परिजनों में से प्रत्येक का किसी न किसी रूप में अपनी भूमिका निभानी ही चाहिए। मिशन के उपरोक्त संकल्प अधूरे न रहने पायें, इसकी चिन्ता निजी कामों से अधिक करनी चाहिए। उनकी सफलता को निजी सफलता मानते हुए अपनी भूमिका की योजना अभी से बनानी चाहिए।
(माया वर्मा)
हृदय-हृदय को मरे पुलक से, देव! रचो कुछ ऐसा गान। आत्मा-आत्मा झूम उठे फिर, आज रचो कुछ ऐसी तान॥
जीवन क मरुथल को दे दो, स्नेह-सुधा की निर्मल धार। मन के मुरझाये मधुबन में, ले आओ तुम पुनः बहार॥
तिनके, आशा के जोड़ो, बस जाये फिर से उजड़ा नीड़। पाल धैर्य का बाँधो! डुबा न पाये तूफानों की भीड़॥
जन-जन में उत्साह भरो वह, दिखे न कोई भी मुख म्लान। हृदय-हृदय को भरे पुलक से, देव! रचो कुछ ऐसा गान॥
निशि बीते शंकाओं की, चमके विवेक का नया प्रभात। भ्रम के बादल छटे, दमकने लगे, उषा का स्वर्णिम गात॥
रूढ़िवाद की राख हटे, तो दहके तथ्यों के अंगार। करें सत्य, शिव, सुन्दर मिलकर, नव जीवन का नव शृंगार॥
मनुज, मनुज निभ्राँत हो सके, बाँटो सबको ऐसा ज्ञान। हृदय-हृदय को भरे पुलक से, देव! रचो कुछ ऐसा गान॥
संवेदन का अमृत पिलाओ, कुँठित उर पा जायें प्राण। बहे गंध उल्लास भरो बन, दो विषाद से सबको त्राण॥
स्वाति बूँद ममता की डालो, खोलो सखे! हृदय की सीप। हो चहुँ ओर प्रकाश प्रेम का, जलता रहे स्नेह का दीप॥
मानस-मानस में जग जाये, औरों की पीड़ा का भान। हृदय-हृदय को भरे पुलक से, देव! रचो कुछ ऐसा गान॥
*समाप्त*