पाठकों से आग्रह भरा अनुरोध

मनुष्य का प्राण जिन भाव-संवेदनाओं के साथ गुँथ जाता है, उसी के अनुरूप उसकी विचारणाएँ और गतिविधियाँ चल पड़ती हैं। उत्थान और पतन का यही रहस्य है।

अखण्ड ज्योति का एक ही लक्ष्य है कि व्यक्ति के अंतःकरण को छूने वाला ऐसा तत्त्वदर्शन प्रस्तुत किया जाए, जो व्यक्तियों के परिष्कार में सुनिश्चित रूप से सफल हो सके। इसके लिए जिन तर्कों, तथ्यों, प्रमाण-प्रतिपादनों की आवश्यकता है, उन्हें विश्व साहित्य के महासागर में गहरे गोते लगाकर पाठकों के समक्ष पहुँचाया जाता है। इसका गंभीरतापूर्वक अध्ययन-अवगाहन जिनने भी किया है, वे द्रुत गति से आगे बढ़े हैं, ऊंचे उठे हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि इस आलोक को घर-घर में प्रकाश करने का अवसर मिले, उसके द्वारा जन-जन के मानस को प्रखरता, प्रतिभा, शालीनता और महानता से अनुप्राणित करने का अवसर मिले।

इस अग्रगमन का एक ही सरल तरीका है कि वर्तमान सदस्य न्यूनतम दो-दो नए ग्राहक और बना देने का संकल्प करें। इसके लिए अपने प्रभाव क्षेत्र में संपर्क साधें,पत्रिकाएँ दिखाए और उनके प्रभाव-महत्त्व को विस्तारपूर्वक समझाने का प्रयत्न करें। इतना साहस कर गुजरने पर कोई भी पाठक दो नए सदस्य बना सकता है। इतने भर से मिशन का कार्यक्षेत्र अब की अपेक्षा तीन गुना अधिक बढ़ सकता है, जो मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने और अधिकाधिक सशक्त बनाने में समर्थ है। विश्वकल्याण की दिशा में इतना प्रयत्न भी महान योगदान देता रह सकता है। पाठकों से इसके लिए आग्रह भरा अनुरोध किया जा रहा है।


उत्कर्ष का राजमार्ग

पालतू पशुओं को बंधन में बंधकर रहना पड़ता है, पर मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि स्वतंत्र जीवन जिए और इच्छित परिस्थितियों का वरण करें।

उत्थान और पतन के परस्पर विरोधी दो मार्गों में से हम जिसको भी चाहें, अपना सकते हैं। पतन के गर्त में गिरने की छूट है। यहाँ तक कि आत्महत्या पर उतारू व्यक्ति को भी बलपूर्वक बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता। यही बात उत्थान के संबंध में भी है। वह जितना चाहे उतना ऊँचा उठ सकता है। पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करके लंबी दूरी पार करते, सृष्टि के सौंदर्य का दर्शन करते हैं। पतंग भी हवा के सहारे आकाश चूमती है। आँधी के संपर्क में धूलि-कण और तिनके तक ऊंची उड़ाने भरते हैं। फिर मनुष्य को उत्कर्ष की दिशा धारा अपनाने से कौन रोक सकता है?

आश्चर्य है कि लोग अपनी क्षमता और बुद्धिमत्ता का उपयोग पतन के गर्त में गिरने के लिए करते हैं। यह तो अनायास भी हो सकता है। ढेला फेंकने पर नीचे गिरता है और बहाया हुआ पानी नीचे की दिशा में गति पकड़ लेता है।

दूरदर्शिता इसी में है कि ऊँचा उठने की बात सोची और वैसी योजना बनाई जाए। जिनके कदम इस दिशा में बढ़ते हैं, वे नर-पशु न रहकर महामानव बनते हैं।


गिलहरी का आदर्शवादी पुरुषार्थ

रावण का आतंक दक्षिण भारत में सर्वत्र व्याप्त था। उसने वनवासी दशरथ नंदन श्री राम की पत्नी का भी छलपूर्वक अपहरण कर लिया।

सीता की वापसी के जब संधि-प्रयत्न सफल न हुए तो युद्ध ही एकमात्र विकल्प रह गया। राम-रावण के युद्ध की भूमिका बन गई। रावण का तो अपना परिवार ही लाखों राक्षसों का था, पर रावण का आतंक इतना था कि राम का साथ देने के लिए तत्कालीन अनेक राजाओं में से भी कोई न आया। न्याय के पक्ष में अपना प्राण हथेली पर रखकर रीछ-वानरों का समुदाय ही जूझने को तैयार हुआ। इनमें भी हनुमान, जामवंत, अंगद, सुग्रीव जैसे कई प्रतापी योद्धा थे; पर जो साधारण थे, वे भी लकड़ी-पत्थर लेकर लड़ाई में उतरे और बढ़-चढ़कर पराक्रम दिखाने लगे।

युद्ध का सारा दृश्य एक पेड़ पर बैठी हुई गिलहरी देख रही थी। रावण की अनीति और सीताहरण की गाथा भी उसने सुन रखी थी। इस धर्मयुद्ध में वह राम की विजय के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही थी।

सद्भाव और प्रार्थना ही तो सब कुछ नहीं है। पुरुषार्थ भी तो सत्प्रयोजन में जुड़ता चाहिए। रीछ-वानर तक जब अपनी जान की बाजी लगा रहे थे, तो गिलहरी ही मूकदर्शक बनकर क्यों बैठी रहे? उसे भी तो अपनी सामर्थ्य के अनुरूप कुछ करना चाहिए। यही चिंतन उसके मन में चल रहा था।

कुछ समय पूर्व सीता को रावण के हाथ से छुड़ाने के लिए बूढ़ा गिद्ध जटायु अपने प्राण दे चुका था। अनीतिकर्त्ता आततायियों से जीता नहीं जा सकता, तो उनके विरुद्ध अपनी नीतिनिष्ठा का परिचय देने के लिए बढ़-चढ़कर बलिदान तो किया जा सकता है। जटायु अपनी और रावण की शक्ति के अंतर को जानता था तो भी वह लड़ा, उसने कायरता नहीं दिखाई। अन्याय देखते रहने की अपेक्षा अनीति से जूझने में उसने आदर्श का परिपालन समझा और रावण से लड़ते हुए ही अंततः जटायु ने अपने प्राण दिए।

गिलहरी को यह आदर्श निर्वाह बहुत भाया। सोचने लगी, वह भी इस धर्मयुद्ध में सहयोग देने के लिए पीछे न रहेगी, भले ही वह योगदान स्वल्प ही क्यों न हो?

गिलहरी को एक सूझ सूझी। वह रीछ-बानरों के लिए लंका पहुँचने तक का रास्ता बनाने के लिए समुद्र को उथला बनाने की बात सोचने लगी। उसके हाथ बहुत छोटे थे और कोई साधन था नहीं। बालों में बालू भरती और उसे समुद्र में झाड़ देती। लगातार वह इसी काम में लगी रहती। सबेरे से लेकर शाम तक इसी कृत्य में जुटी रहती। शरीर छोटा था। साधन स्वल्प थे; पर उसकी हिम्मत अटूट थी, जो बन पड़े सो नीति के समर्थन में करना ही चाहिए। यह लगन उसे पूरी तरह लगी हुई थी।

सब अपने-अपने हिस्से के काम में जुट हुए थे। गिलहरी का पुरुषार्थ तो और भी अधिक आश्चर्यजनक था। राम की दृष्टि उस पर पड़ी। साधन स्वल्प, पर पुरुषार्थ महान। यह दृश्य देखकर राम पुलकित हो उठे।

उसने गिलहरी के समीप जाकर उसके साहस को देखा और भावपूर्वक उसे हाथ में उठा लिया। हथेली पर बिठाया और दूसरे हाथ की उंगलियाँ अत्यंत स्नेहपूर्वक उसकी पीठ पर सहलाने लगे। गिलहरी ने भी अपने को धन्य माना। वह छोटी है तो क्या पर, उसकी हिम्मत और भावना तो ऊंची मानी गई। सराही गई।

कहते हैं कि राम सांवले थे। उनकी उंगलियाँ भी वैसी ही थी। पीठ पर हाथ फेरते रहने से गिलहरी की पीठ पर काली धारियाँ बन गई। इसके बाद उसके वंशजों की पीठ पर वह काली धारियाँ बनती चली आई। पहले उस वंश के प्राणी सफेद ही होते थे। राम के प्रति कृतज्ञता का चिह्न उस वर्ग के प्राणियों की पीठ पर अभी भी अंकित पाया जाता है।


आत्मबोध से लक्ष्यप्राप्ति

छोटा बच्चा जिसे अपना नाम, पता कुछ भी मालूम नहीं हैं, यदि भयंकर भीड़ वाले मेले में खो जाए तो उसका अपने अभिभावकों से मिल सकना कठिन है। ढूँढ़, खोज होते रहने पर भी कुछ पता न चलेगा। बच्चा किसी अजनबी के हाथ पड़ेगा और अभिभावक जन्म भर रोते-कलपते रहेंगे। जीवित रहते हुए वह अपने घर-परिवार के लिए मृतकतुल्य बन जाएगा। बच्चा भी उपेक्षित स्तर का जीवन जिएगा।

आत्मबोध न होने की स्थिति में वयस्कों की भी यही दुर्दशा होती है। वे अपना स्वपूर्व, आश्रय, कर्त्तव्य, भविष्य आदि के संबंध में समुचित जानकारी न रहने पर व्यामोहग्रस्तों जैसी स्थिति बना लेते है। वह भटकावों में भटकता रहता है। ऐसे मार्ग पर चल पड़ता है, जिसमें कटीले झाड़-झंखाड़ों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। उसी जंजाल में कपड़े फटते, अंग छिलते और पैरों में छाले पड़ते रहते हैं।

इस विडंबना से बचने के लिए एक ही उपाय है कि अपने संबंध में जानकारी प्राप्त की जाए। उस सुसंपन्न अभिभावक का अता-पता मालूम किया जाए, जिसका उत्तराधिकार मिलने भर से निहाल बना जा सकता है। दिशाज्ञान हो तो धीमी चाल से चलते हुए भी उस लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है और प्रसन्नता और सुसंपन्नता की कमी नहीं रहती। लक्ष्य भूल जाने पर सही राह कैसे मिलेगी? गन्तव्य का बोध ही न रहने पर वहाँ तक पहुँच सकना बन ही न पड़ेगा।

भटकाव के मार्ग में कटीली झाड़ियों के साथ उलझते-सुलझते रहना स्वाभाविक है। पैरों में ठोकरें लग सकती हैं। भूख-प्यास की शीत-ताप की व्यथाएँ भी सहनी पड़ सकती हैं। इन विग्रहों से बचने के लिए उपयुक्त यही है कि जैसे भी बने अपना अता-पता मालूम किया जाए, अभिभावकों के साथ संबंध जोड़ा जाए और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाए कि क्या रीति-नीति अपनाई जाए? क्या किया जाए और कहाँ पहुँचा जाए?

सामान्यता मनुष्य इसी विभ्रम में भटकता रहता है। वह अपने को शरीर के लबादे में लिपटा देखता है। विवेकदृष्टि न होने पर यही मान बैठता है कि वह वही है जो अपने को सबकी आँखों से दिख पड़ता है। दिखने वाला आवरण भर है; अस्तित्व नहीं। आवरण फटते-बदलते रहते हैं, पर अस्तित्व की सत्ता यथावत् बनी रहती है। भला-बुरा जो होना होता है, उसी का होता है। यह अंतर समझा जा सकता था,पर इस विडंबना ही कहना चाहिए कि न वास्तविकता सहज में समझ आती है और न समझने की चेष्टा की जाती है; फलतः भ्रम-जंजालों में भटकते ही समूची आयुष्य बीत जाती है। कोल्हू के बैल की तरह निरंतर जूते रहने पर भी मजूरी के नाम पर सूखा भूसा ही हाथ लगता है, असंतोषजनक अपर्याप्त, विवशता में भारभूत जीवन ही वहन करना पड़ता है।

किसी सेठ ने मरते समय अपने इकलौते छोटे बच्चे के गले में बहुमूल्य मोतियों का कंठा बाँध दिया था। बच्चा छोटा था। बड़ा हुआ तो घर में संपत्ति के नाम पर कुछ भी न पाया। भिक्षा से, पेट भरने लगा। समझदार होने पर उसने दर्पण में मुँह देखा, कंठा पाया। उसने एक, एक करके मोती जौहरियों के यहाँ बेचे। व्यापार किया और पिता जैसा सुसंपन्न बन गया।

यह उदाहरण हर व्यक्ति पर लागू होता है। व्यक्ति वस्तुतः अजर-अमर आत्मा है। परमात्मा का ज्येष्ठ पुत्र— युवराज। उसके अंतराल में बीजरूप से इतना कुछ भरा पड़ा है, जिसे यदि उगाया, उभारा जा सके तो जीवन-उद्यान नंदनवन की तरह महक सकता हैं, अपने आपको को सुव्यवस्थित कर लेने पर गौरव-गरिमा से भरे पूरे राजमार्ग पर चला और वहाँ पहुँचा जा सकता है, जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए देवता तक तरसते हैं। मनुष्य जन्म सुरदुर्लभ कहा गया है। देवता एक प्रकार की भोग योनि है। वे मात्र प्रारब्ध भुगतते हैं, किंतु मनुष्य को कर्म करने और भविष्य बनाने का पूरा अवसर है। इस सुयोग को आमतौर से उपेक्षा में ही अस्त−व्यस्त कर दिया जाता है।

योनियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि है। इतनी सुविधाएँ अन्य किसी प्राणी को उपलब्ध नहीं। मनुष्य कलेवर में प्रवेश करने के उपरांत भी अनुगमन की, अभ्युदय, उत्कर्ष की कई सीढ़ियाँ हैं। गए-गुजरे लोग तो नर-पशु जैसा वनमानुष या नर-वानर जैसा अनगढ़ जीवन ही जी पाते हैं, पर यदि उनके चरण प्रगति-पथ पर बढ़ चलें तो महामानव, नर-नारायण, पुरुष, पुरुषोत्तम, देवता, ऋषि, अवतार जैसा स्तर प्राप्त कर सकना कोई कठिन नहीं है। सही स्वरूप समझने पर सही मार्ग भी मिल जाता है। और सही लक्ष्य पर पहुँच सकना भी कठिन नहीं रहता। मनुष्य महान हैं। उसकी प्रगति भी महानता की दिशा में ही होनी चाहिए। वैसी ही उपलब्धियाँ भी हस्तगत होनी चाहिए।

जिन विभूतियों को प्राप्त कर लेने की समुचित संभावना है, उनसे वंचित क्यों रहना पड़ता हैं? इसका एक ही कारण है, आत्मस्वरूप के संबंध में भ्रम और कर्त्तव्य के संबंध में भटकाव। इस विपन्नता से यदि छुटकारा मिल सके तो वह सब कुछ मिल सकता है, जिसे इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखे हुए महामानव प्राप्त कर सके हैं।

इस मार्ग में सबसे बड़ी कठिनाई एक ही है, अपने को आत्मा के स्थान पर शरीर मान बैठना और उन्हीं प्रयासों में निरत हो जाना जो शरीर की ललक, लिप्सा की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। लोभ, मोह और अहंकार शरीर की ही अभिलाषाएँ हैं। वासनाएँ और तृष्णाएँ भी उसे मनः क्षेत्र से उभरती हैं, जिसे ग्यारहवीं अदृश्य इंद्रिय कहा जाता है। यह अभिलाषाएँ जब प्रचंड रूप धारण करती हैं, तो मर्यादाओं को तोड़ती, वर्जनाओं को लाँघती, बाढ़ के पानी की तरह मार्ग में जो आता है, उसी को डुबोती-मिटाती चलती हैं। आग ईंधन डालने से बुझती नहीं, वरन और भी अधिक भड़कती है। लिप्साओं को पूरा करने का जितना प्रयत्न किया जाता है, तृष्णा उसी अनुपात में और भी अधिक बढ़ती चली जाती है। जाल में फंसे हुए पक्षी के फंदे उसके फड़फड़ाने के साथ और भी अधिक जकड़ते चले जाते है।

शरीर को जितना दिया जाता है, उसकी तुलना में उसकी माँग बढ़ती ही जाती है। इसे पूरा करने के लिए अनाचार की सीमा तक पैर जा पहुँचते है। इतने पर भी तृप्ति का कोई ओर छोर नहीं दिखता। बढ़ते हुए विषयों की परिणति व्यसनों और संकटों के रूप में सामने आ खड़ी होती है। आयुष्य इसी प्रकार बीतता चला जाता है। अंत में कषाय-कल्मषों के कुसंस्कार और पाप-कर्मों के भयानक अभिशाप पीठ पर लदकर भुगतने के लिए साथ चलते है।

बहुमूल्य जीवन का यह अपव्यय मात्र इसलिए ही होता है कि मनुष्य अपने आत्मस्वरूप को समझने का प्रयत्न नहीं करता। उसे स्मरण ही नहीं रहता कि वह आत्मा है— ईश्वर का अविनाशी अंश। उसे सृष्टा के सुरम्य उद्यान का वरिष्ठ माली बनाकर भेजा गया है। उसका दायित्व है कि विश्व-वाटिका को संतुलन बनाने के लिए भरपूर परिश्रम करे और प्रेम तथा श्रेय का दुहरा लाभ प्राप्त करें। इस पुण्य-परमार्थ के साथ-साथ अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदलने का लाभ भी अनायास ही मिलता रहता है।

सच्चाई और सात्विकता का सीधा मार्ग है। न उसमे मोड़-तोड़ है, ना छल प्रपंच। सीधा सरल मार्ग हर किसी के लिए सरल हो सकता है और उस पर चलते हुए कोई भी सुख-शांति से भरे जीवनोद्येश्य को पूर्ण कर सकता है। शर्त एक ही है की अपना स्वरुप, आश्रय और कर्त्तव्य समझा जाए। यह समझने में कठिनाई तभी होती है, जब व्यक्ति अपने आपको शरीर मान बैठता है और उसी के लिए मरता-खपता है। यदि अपने को आत्मा माना जा सके, उसकी गरिमा को सँजोए रखा जा सके तो समझना चाहिए कि लक्ष्य प्राप्ति में कोई कठिनाई नहीं रह गई।


सद्वाक्य

शरीर के लिए जितना किया जाता है, उतना ही यदि आत्मा के लिए किया गया होता तो मनुष्य देवता बनता और इन्हीं परिस्थितियों में स्वर्ग का रसास्वादन करता।


बुद्धि-क्षेत्र से परे अपरोक्षानुभूति

वेदांत दर्शन में भारतीय तत्त्वचिंतन का सार निहित है। इसमें आस्तिकता का समर्थन व प्रतिपादन है। तत्त्वचिंतन की इस धारा में स्पष्ट किया गया है कि एक ऐसा परम तत्त्व विश्वचेतना जो सबकी नियामक, ‘एकमेवाद्वितीयं’ सर्वत्र परिव्याप्त है। सृष्टि के कण-कण, विश्व-ब्रह्मांड के प्रत्येक घटक में समाई हुए है। संपूर्ण विश्व उसी की अभिव्यक्ति है। इसी सत्ता को वेदांत पूर्ण ब्रह्म कहकर संबोधित करता है, पर नाम के प्रति उसका कोई संकीर्ण भाव नहीं। क्योंकि परम सत्ता नाम और रूप से परे है। यह बताते हुए ही “एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति” के सूत्र को प्रतिपादित किया गया है। विभिन्न मतावलंबी उसे भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं। ईसाइयों का गॉड, मुसलमानों का अल्लाह या खुदा; यहूदियों का जेहोवा, ताओवादियों का ताओ, पारसियों का आहुरमज्द। इसी दिव्य सत्ता के भिन्न-भिन्न प्रतीकात्मक नाम हैं। आधुनिक चिंतकों जैसे प्लेटो का शुभ, स्पिनोजा का सबस्टेंशिया, काण्ट का डिंग एन सिच,हरबर्ट स्पेन्सर का “अननोएबल”, शोपनेहावर की विल, इमर्सन का “ओवरसोल” इसी विश्वचेतना के भिन्न-भिन्न पर्याय हैं।

वेदांत ने इसी परमसत्ता को सत्, चित्, आनंद कहकर भी इंगित किया है। जिसका तात्पर्य है— यथार्थता, ज्ञान और स्वतंत्रता (आनंद)। यह आध्यात्मिक अनुभव के तीन रूप हैं। यह दार्शनिक प्रतिपादन कि “प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है” “जीवन का उद्देश्य इस अव्यक्तता को व्यक्त करना तथा दिव्य जीवन की प्राप्ति ही है” का संदेश देता है।

यह सत्य क्या है? यथार्थता— वास्तविकता क्या है? इसकी जानकारी तो परम ज्ञान की प्राप्ति से ही होती है। इसी से सतरूप अर्थात अपने दिव्य स्वरूप का बोध होता है। इस सत स्वरूप को जानकर, यथार्थता से अवगत होकर ही सच्चे आनंद की प्राप्ति होना संभव है।

पर यह ज्ञान है क्या? हम नित्य बड़ी-बड़ी पोथियाँ पढ़ते हैं, मोटे-मोटे ग्रंथों को तोते की तरह रटते और अनेकानेक ग्रंथालयों के चक्कर काटते हैं। सारे जीवन नाना विधि परीक्षाएँ पास करते, ढेर की ढेर उपाधियाँ बटोरते रहते हैं। फिर भी अपने स्वरूप से परम सत्य से अनभिज्ञ ही रहते हैं और जिंदगी के सुनिश्चित बँधे-बँधाए क्षण बीत जाते हैं। हमारा सारा का सारा अस्तित्व काल-कवलित हो जाता है। समयानुसार फिर पैदा होते और पुनः उसी श्रृंखला का प्रारंभ हो जाता है। यदि सचमुच ज्ञान की प्राप्ति होती तो अपनी दिव्यता का भान भी होता और आनंदामृत की प्राप्ति भी; पर ऐसा कुछ नहीं होता उल्टे दुःख, निराशा के चक्कर में रोते झींकते सारा का सारा जीवन बीत जाता है। “पुनरपि जननं पुनरपि मरणं” से छुटकारा नहीं। ऋषि के कथन से स्पष्ट है कि पी.एच.डी.; डी.लिट्, एफ.आर.सी.एस. जैसी उपाधियाँ अर्जित करना ज्ञान की प्राप्ति की द्योतक नहीं। इससे तो यही स्पष्ट होता है कि अमुक व्यक्ति ने सापेक्षिकता संसार में ढेर की ढेर जानकारियाँ इकट्ठी कर ली हैं और उसी के बलबूते नाना उपाधियों से अलंकरण और यश-कीर्ति की प्राप्ति हुई है; पर इसमें कुछ भी ऐसा नहीं,जिससे निरपेक्ष सत्ता का बोध हो सके, सही माने में सत्य की प्राप्ति संभव हो सके।

वस्तुतः ज्ञान दो प्रकार का होता है। एक है निरपेक्ष ज्ञान जिसका प्रतिपादन भारतीय ऋषियों तथा अंगोरवाट या क्योतो के संतों ने किया है। दूसरा है सापेक्ष ज्ञान— जिसे आक्सफोर्ड, बर्कले के प्रोफेसर और दुनिया भर के शिक्षाविद् कहते हैं।

ज्ञान के यह दो विभेद हैं, जिन्हें मानव मन ग्रहण करता है। इन विभेदों को दूसरे शब्दों में वो तर्क प्रधान (रेशनल) तथा अन्तर्ज्ञान (इन्ट्यूशन) कह सकते हैं। पश्चिमी जगत ने तथा नास्तिक मतवादियों ने इस अन्तर्ज्ञान की उपेक्षा-अवहेलना ही की है। जबकि पूर्वी जगत विशेषतया आर्यावर्त के ऋषि-मुनि कहे जाने वाले शोधकर्त्ता मनीषी-चिंतकों ने हजारों वर्षों पहले इसी अंतर्ज्ञान के बलबूते चेतना जगत की जानकारी हासिल की और परम सत्य की प्राप्ति गूँगे के गुड़ की तरह से है जिसकी मिठास अनुभव तो की जा सकती है; पर इसकी व्याख्या विवेचना करना असंभव है। इसीलिए संत सुकरात ने कहा— “मैं जानता हूँ, पर कह नहीं सकता।” चीनी संत लाओत्जू का कहना कि “नहीं बता सकता, इसका तात्पर्य यह है कि मैंने ज्ञान पाया है।” वेदांत दर्शन भी इसी परम ज्ञान के विषय में नेति-नेति कह कर चुप्पी साध लेता है। हाँ! इस परम तत्त्व की प्राप्ति के उपायों के बारे में संकेतमात्र किए गए हैं और इसी की विशद व्याख्या भी हुई है। परमहंस श्री रामकृष्ण कहा करते थे कि परम तत्त्व को मुख से उच्चारित— विश्लेषित करना असंभव है। ज्ञानस्वरूप परमात्मा मुख से उच्चारित नहीं हुआ; इसलिए झूठा नहीं हुआ है। जबकि शास्त्र बार-बार दुहराए जाने के कारण झूठे हो गए हैं। उपनिषदों में इसी को उच्च ज्ञान और निम्न ज्ञान भी कहा गया है। इसे अपरोक्ष ज्ञान अर्थात् ज्ञान स्वरूप ईश्वर की प्राप्ति का अनुभव जो अनुच्चरित— अविश्लेषित है। तथा परोक्ष ज्ञान अर्थात इस निरपेक्ष ज्ञान की प्राप्ति के संकेत और उसकी व्याख्या। बौद्धों ने इसे ही अपनी भाषा में पहले को पूर्ण ज्ञान दूसरे को सापेक्ष ज्ञान भी कहा है। चीनी दर्शन ने इसी बौद्धिक और अंतर्ज्ञान को यिन और याँग रूप में मान्यता दी है। ताओइज्म व कन्फ्यूशिज्म भी इसका समर्थन करते हैं।

बौद्धिक या सापेक्ष ज्ञान वह है, जो आस-पास के वातावरण में विभिन्न पदार्थों तथा होने वाली घटनाओं के बारे में इंद्रियों द्वारा होने वाले अनुभवों के माध्यम से पाया जाता है। इसकी परिधि बुद्धि तक सीमित है। सामान्यतया इसी ज्ञान को संसार में विविध भाषाओं, अक्षरों, वाक्यों के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है।

दूसरे शब्दों में सापेक्षिक ज्ञान सीमाबंधन वाले दृश्य जगत का ही ज्ञान है। विज्ञान अभी इसी तक सीमित है। विख्यात भौतिकवाद वार्नर हेसेनवर्ग ने अपनी पुस्तक “फिजिक्स एण्ड फिलॉसफी” में इस सीमा को स्वीकारते हुए कहा है कि विज्ञानरूपी विधा एक सीमा तक ही उपयोगी है। यह सीमा है सापेक्षिता।

सापेक्षिता की सीमाबद्धता क्या है? इसे जानना हम सभी के लिए कठिन तो अवश्य है। कारण कि हम, सापेक्ष और निरपेक्ष में विभेद नहीं जानते अथवा कर नहीं पाते। वेदांत दर्शन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि पूर्वकाल के ऋषियों ने इसी निरपेक्ष तत्त्व को जाना था। उससे एकत्व प्राप्त किया था तथा इस विभेद की कठोपनिषद् में श्रेयस् और प्रेयस के नाम से विशद् व्याख्या भी की है, साथ ही सापेक्षता के भ्रम जाल से उबरने का संदेश भी दिया है। बौद्धों के “जैन” संप्रदाय तथा ताओवादी संत चुआँगत्सू ने भी इसका समर्थन किया है।

पर ये दार्शनिक व्याख्याएँ हमारे लिए उपयोगी तभी हैं जब हम इनकी धारणा करें और व्यवहारिक जीवन में लाएँ अन्यथा शब्दजाल तो सापेक्षिता की सीमा में ही आता है। उससे निरपेक्ष तत्त्व की अनुभूति होना असंभव है। पश्चिम जगत में मूर्धन्य तत्त्ववेत्ता कोर्जीत्सकी ने इसी को पुष्ट करते हुए कहा है कि “नक्शा भूमि अथवा विजय नहीं है।” कठोपनिषद् का ऋषि स्पष्ट उद्घोष करता हुआ कहता है-

अशब्दमर्स्पशरुपमत्ययं तथा रसं निव्यममगन्धवच्चयत् अनाद्यन्तं महत परं धुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखत् प्रयुच्यते॥ (3-15)

अर्थात् परमात्मा प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध से परे हैं। इंद्रियों की पहुँच उस तक नहीं हैं। वे नित्य, अविनाशी, असीम हैं। इसी ज्ञानस्वरूप परम तत्त्व को जानकर मनुष्य सदा के लिए भ्रममुक्त (जन्म-मरण के बंधन से मुक्त) हो पाता है।

परमहंस रामकृष्ण ने इसी को और अधिक सरल-सुस्पष्ट करते हुए बताया है कि शास्त्र की आवश्यकता तो निर्देशन भर के लिए है। परम तत्त्व की प्राप्ति तो व्यावहारिक जीवन में उन निर्देशों को उतारने से ही पूरी होगी। जैसे— किसी के यहाँ उसके गाँव से पत्र आए कि चार किलो मिठाई, 4 धोती, तीन लोटे लेकर आ जाए। अब उसका कार्य यह है कि बाजार जाकर इन सब चीजों को खरीदे। तत्पश्चात घर जाए और सामान पहुँचाए। तभी प्रयोजन की पूर्ति होगी। यदि वह मात्र पत्र पढ़ता रहे याद कर डाले, उस पर बहस करे तो क्या फायदा?

पत्र पढ़ना है परोक्ष ज्ञान और सामान पहुँचाना अपरोक्ष ज्ञान। इस अपरोक्ष ज्ञान को पूर्ण ज्ञान या निरपेक्ष ज्ञान भी कहा गया है। मनीषियों का कहना है कि ज्ञान तर्क से परे है। इसी से आचार्य शंकर “शब्द जालं महारण्यं चित्त विभ्रम कारणम्।” अर्थात् तर्कों की लच्छेदार भाषा चित्त विभ्रम के कारण के अलावा और कुछ नहीं है। इसी कारण “ब्रह्मसूत्र” के सूत्रकार महर्षि व्यास ने “तर्क प्रतिष्ठानात्” का सूत्र प्रतिपादित किया है। जान स्टुअर्ट मिल ने भी यही स्पष्ट किया है कि ज्ञान का साम्राज्य तर्क से परे है; क्योंकि वह परम ज्ञान तर्क के लिए लालायित रहने वाली बुद्धि के क्षेत्र से परे हैं।

इसी परम ज्ञान को लोओत्जू ताओ कहते हैं और उपरोक्त तथ्य को ‘ताओतेचिंग’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट करते हैं कि ताओ शब्द से ताओ की अभिव्यक्ति नहीं होती यह; तो शब्द, मन, वाणी, बुद्धि के क्षेत्र से परे अनुभूतिगम्य है।

इस प्रकार यह दिव्य ज्ञान पूरी तरह से बुद्धि के क्षेत्र से परे अपरोक्षानुभूति है। एक ऐसी अनुभूति, जो असामान्य स्थिति के चेतनास्तर में होती है। इस स्थिति को समाधि की स्थिति भी कहा जा सकता है। इसी स्थिति में प्राप्त दिव्य ज्ञान के बारे में अनेकों पूर्वी व पश्चिमी गुह्यवादियों ने अपने अनुभव के आधार पर संकेत किए हैं। आधुनिक शोधकर्त्ताओ ने भी इसे माना है। विख्यात मनीषी विलियम जेम्स ने अपनी पुस्तक “दि वैरायटी ऑफ रिलीजियस एक्सपीरियेन्सेज” में सुस्पष्ट किया है कि हमारी सामान्य जागृत चेतना स्थिति जिसे बौद्धिक चेतना कहते है, से परे एक विशेष चेतना की स्थिति होती है, जो इससे पृथक है। वहाँ अव्यक्त रूप से बिल्कुल अलग प्रकार की दिव्य चेतना  होती है।  चेतना के इसी क्षेत्र में परम ज्ञान की उपलब्धि संभव हो पाती है।

इसी परम ज्ञान को निरपेक्ष ब्रह्म को प्राप्तकर ऋषि, मनीषी, ज्ञानी भ्रमजाल से परे होकर विश्व-उद्यान में जीवनमुक्त हो विहार करते हैं और परमपिता की इस वाटिका को सुरम्य बनाने में हाथ बँटाते हैं। वेदांत ज्ञान की यह सर्वोपरि उपलब्धि है।


आत्मा का स्वरूप (कहानी)

आत्मा का स्वरूप आनंदमय है। जिसे आत्मज्ञान हो जाता है, उसे निरंतर आनंदित ही देखा जा सकता है। आध्यात्मिकता का दूसरा नाम है— प्रसन्नता। जो प्रसन्न नहीं रह सकता, उसने न आत्मा को जाना और न ईश्वर को।शोक-संतप्त-उद्विग्न और विक्षुब्ध व्यक्ति तो अनात्मतत्त्वों के बहाने मात्र हैं। जो क्रोध से झल्लाया करता है, जिसे खीज और आवेश का बार-बार शिकार होना पड़ता है,उसकी आस्तिकता संदिग्ध ही मानी जाएगी।

इस संसार में सब कुछ हँसने के लिए उपजाया गया है। जो बुरा और अशुभ है, वह हमारी प्रखरता को चुनौती के रूप में है। परीक्षा के प्रश्न-पत्रों को देखकर जो छात्र रोने लगे, उसे अध्ययनशील नहीं माना जा सकता। जिसने थोड़ी-सी आपत्ति-असफलता एवं प्रतिकूलता को देखकर रोना-धोना शुरू कर दिया, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास कर सकता है?

प्रतिकूलता हमारे साहस बढ़ाने, धैर्य को मजबूत करने और सामर्थ्य को विकसित करने आती है। सरल जिंदगी यदि संयत हो सके, तो वह सबसे भद्दे ढंग की ही होगी; क्योंकि वह जो सरलतापूर्वक दिन गुजारता रहता है, उसमें न तो किसी प्रकार की विशेषता रह जाती है और न प्रतिभा। संघर्ष के बिना भी भला कहीं, इस दुनिया में किसी का जीना संभव हुआ है?

नई उपलब्धियों में हमें हँसना चाहिए, अब तक मिल चुका, उससे संतोष व्यक्त करना चाहिए और भविष्य की शुभ संभावनाओं की कल्पना करके सदा प्रमुदित होते रहना चाहिए। रोना एक अभिशाप है जो केवल अविवेकी लोगों को शोभा देता है। जिसे आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है और परमात्मा की महत्ता कुशलता और विनोद को समझता है, उसे हँसने-मुस्कराने की परिस्थितियों के अतिरिक्त और कुछ इस जीवन में अनुभव ही क्या हो सकता है?


दुर्बुद्धि एवं सद्द्बुद्धि

भस्मासुर और शतायुध दो भाई थे। दोनों ने वयस्क होने पर निश्चय किया कि तप करके शिवजी को प्रसन्न करना चाहिए और उनसे ऐसा वरदान प्राप्त करना चाहिए, जिससे संसार भर में अपनी महिमा गाई जाए। वरिष्ठ और समर्थ समझा जाए।

दोनों तप में जुट गए। लंबे समय तक कठोर साधना चली। शंकर जी का ध्यान खिंचा और वे उन्हें दर्शन देने जा पहुँचे और वर माँगने के लिए कहा।

दोनों ने आशुतोष को नमन किया और अपनी-अपनी मनोकामना कह सुनाई। भस्मासुर ने वर माँगा कि वह जिसके भी सिर हाथ रखे, वह जलकर भस्म हो जाए।

शतायुध ने माँगा कि वह जिसके शिर पर हाथ रखे वही रोगमुक्त हो जाए। दोनों को इच्छित वर देकर शंकर जी विदा हो गए।

भस्मासुर ने अपने शत्रुओं की गणना की और उनको किसी बहाने बुलाकर सभी के शिर पर हाथ रखा और जलाकर नष्ट कर दिया। सभी लोग भयभीत हो गए। उससे शत्रुता करने का किसी का साहस नहीं होता था। वह निर्द्वंद्व स्वच्छंद विचरने लगा; पर उसके पास डर के मारे कोई फटकता तक न था। विवाह की इच्छा थी पर कोई स्त्री उससे विवाह के लिए तैयार न होती। सोचती यदि प्यार में भी शिर पर हाथ रख दिया तो जीवन से हाथ धोना पड़ेगा।

एक दिन उसने पार्वती जी को पत्नी बनाने को विचार किया व असाधारण सुंदरी जो थीं। उसका प्रस्ताव जब पार्वती के पास पहुँचा तो वे सन्न रह गई। शिवजी भी सोचने लगे कि कुपात्र की सहायता करना भी पाप है। मुझसे यह भूल हो गई। अब कोई उपाय करके अपना और पार्वती का प्राण बचाना चाहिए।

पार्वती जी ने माया से एक रूपसी की रचना कर डाली। माँ पार्वती सदृश सुंदर दिखाई देने वाली उस रूपसी ने भस्मासुर से कहा— “शिवजी नृत्य बहुत सुंदर करते हैं। इसलिए मुझे वे परमप्रिय है। तुम भी वैसा कर दिखाओ तो ही मैं तुम्हारा स्वीकार करूँगी।"

मदाध भस्मासुर को रँगीले सपने छाए हुए थे। वह तत्काल नाचने लगा। उसमें इतना भावविभोर हो गया कि अपने ही सिर पर हाथ पड़ गया। उसी प्रमाद से जलकर भस्म हो गया।

इसका भाई शतायुध जिस दिन से आया, उसी दिन से पीड़ितों के सिर पर हाथ रखने और उन्हें अच्छा करने का उपक्रम आरंभ कर दिया। अच्छे होने वालों ने अपने कष्ट हरण की कथा अनेकों से की। सुनकर दूर-दूर से पीड़ित उसके पास आने और अच्छे होकर लौटने लगे।

दिन-दिन सहायता चाहने वालों की भीड़ बढ़ती गई। लाभ उठाने वालो की श्रद्धा-सद्भावना उसे मिलती गई और उसका तप और शिवजी का वरदान सार्थक हुआ। सद्बुद्धि की ही यह करामात थी कि शतायुद्ध अक्षय कीर्ति अर्जित करने वाला और सच्चे अर्थों में समर्थ समझा गया।

दुर्बुद्धि ने भस्मासुर का तप— शिवजी का वरदान निरर्थक किया। स्वयं नष्ट हुआ और दुरात्माओं की श्रेणी में गिना गया।

तप और वरदान की उपयोगिता तभी है, जब सद्बुद्धि का साथ में समावेश हो। आत्मपरिष्कार एवं पात्रता के अभाव में सदा मस्तिष्क पर दुर्बुद्धि छाई रहती है एवं अनायास ही कोई सुयोग आ टपके तो वही माँग बैठती है, जो अंततः आत्मघाती सिद्ध होती है।


तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः

ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने वाले नास्तिकों का मत है कि ईश्वर नामक अज्ञात सत्ता में विश्वास रखने से क्या लाभ है? यह मात्र एक अंधविश्वास है। जब विज्ञान के उपादान ईश्वरीय सत्ता को प्रमाणित न कर पाए तो हम इसे क्यों मानें? इस प्रकार की बातें नास्तिकों की चर्चा से जुड़ी कही जाती हैं। किंतु यह एक चिंतनीय बात है। क्या हम अपने जीवन में उन्हीं बातों को मानते— स्थान देते हैं, जिनका अस्तित्व विज्ञान द्वारा प्रमाणित हो? इस प्रश्न का एकमेव जवाब है— नहीं। जीवन से ऐसे कितने ही तथ्य एवं मूल्य जुड़े हैं, जिनके स्वरूप के संबंध में पुष्टि हेतु विज्ञान मौन है। उदाहरण के लिए नीतिशास्त्र को ही लें। विज्ञान की दृष्टि से यह निरर्थक ही है। वस्तुतः जिसे हम विज्ञान मानते हैं,वह मात्र पदार्थ विज्ञान है। इससे ईश्वरीय चेतना के सूक्ष्म रहस्यों की, जीवन मूल्यों की, गवेषणा भी कैसे की जा सकती है?

अनेकों बातें ऐसी है, जो नास्तिकों की दृष्टि में अर्थहीन हैं। उदाहरणार्थ इनका मत है कि “अंगनालिंगनाज्जन्यं सुखमेवपुमर्थता” अर्थात् “स्त्री का आलिंगन ही परम पुरुषार्थ है।” पदार्थ वैज्ञानिकों की दृष्टि में भी नर और मादा का यौन संबंध सहज और स्वाभाविक है। यही नहीं, वही मनुष्य का एकमेव लक्ष्य होना चाहिए, यह उनकी भोगवादी नीति कहती है। पशु-पक्षी भी ऐसा करते हैं। उसमें माता-पिता, भाई-बहिन जैसे संबंध कहाँ? परंतु मानव समाज में माता, बहिन या पुत्री के साथ यौनाचार की कल्पना भी हेय है। यदि वैज्ञानिक कसौटी मानकर सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन किया जाएगा तो समाज में विकृति ही आएगी। विवेकीजन इसे न मानना ही उचित समझते हैं।

विज्ञान के मतानुसार जीव,जीव का भोजन है। प्रत्येक प्राणी के लिए स्वार्थपरता-उदरपूर्ति और प्रजननप्रधान जीवन जीना ही एकमात्र लक्ष्य होता है। स्वार्थपरता प्रधान चार्वाक सदृश लोगों के मतों “यावत्जीवेत् सुखंजीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत”, विलासिताप्रधान वचनों का विरोध विज्ञान के आधार पर कैसे किया जाए? पर यदि दया, सेवा, स्नेह, करुणा, सहिष्णुता, त्याग, सहयोग-सहकार जैसे सद्गुणों को मानव जीवन से निकाल दिया जाए तो सामाजिक सुख, शांति स्वप्नमात्र रह जाएगी।

डार्विन जैसे विकासवादी भय को प्रत्येक प्राणी का स्वाभाविक धर्म मानते हैं तथा जानस्टुअर्ट मिल तथा उनके सहयोगी यूटीलिटेरियन भौतिक सुखों को ही जीवन में प्रधानता मानते हैं। इसकी प्राप्ति हेतु सभी प्रकार के कर्मों को उचित ठहराते हैं। यदि इन दोनों को बात का मान लिया जाए भय को सर्वथा त्यागकर सुखों की किंचित मात्र भी इच्छा न रखकर, जो वीर मातृभूमि के लिए बलिदान हो जाते हैं अथवा देश समाज लोकहित के लिए अपना समस्त जीवन कठोर तितिक्षापूर्वक बिता देते हैं, ऐसे लोग इनकी दृष्टि में मूर्ख ही कहे जाएँगे। वे जानबूझकर कठोरता क्यों अपनाते हैं, इसका कोई उत्तर इनके पास नहीं हैं। इस प्रकार यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि विज्ञान अभी ईश्वरीय सिद्धि-असिद्धि विषय में नितांत बौना है।

नास्तिकवाद के मतावलंबियो का मानना है कि प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर जिसकी सत्ता सिद्ध हो उसे ही माना जाए, परंतु यह तर्क भी उचित नहीं। प्रत्यक्ष प्रमाण को आधार मानकर हर चीज का सिद्ध कर सकना असंभव है। उसके द्वारा तो यह भी सिद्ध किया जा सकना असंभव है कि हमारा पिता कौन है? पर माता की साक्षी को इसके लिए पर्याप्त प्रमाण मान लिया जाता है।

ईश्वर स्थूलनेत्रों से नहीं दिखाई देता, अतएव उसे न माना जाए। नास्तिकों का यह तर्क भी निरर्थक और सारहीन है। अनेकों वस्तुएँ अपने जीवन में ऐसी हैं जो दिखलाई तो नहीं पड़ती, पर अनुभवगम्य हैं। उदाहरणार्थ सरोवर में बादल से गिरे जल बिंदुओं को कोई देख पाता है? यद्यपि तारागण दिन में भी विद्यमान रहते हैं, पर सूर्य के प्रकाश के कारण क्या उन्हें दिन में देख पाना संभव है? अत्यंत सूक्ष्मवस्तुएँ भी हमें दिखाई नहीं देती। दूध में मक्खन की सत्ता होती है पर दिखलाई नहीं पड़ता। इसी तरह फलों की मिठास और जल में घुला नमक, दिखाई नहीं पड़ता; पर इनमें उपरोक्त गुण नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। न्यूटन ने पृथ्वी की आकर्षणशक्ति को कहाँ प्रत्यक्ष देखा था? उनके साथ तो केवल सेब के गिरने की घटना ही प्रत्यक्ष हुई। आकर्षणशक्ति तो अदृश्य ही रही। अतएव प्रत्यक्ष नहीं है, इसका यह तात्पर्य नहीं है कि उसका सर्वथा अभाव है।

प्रत्यक्ष प्रमाण आज के अर्धविकसित विज्ञान से नहीं मिल पाते, केवल इसी कारण यह मान लिया जाए कि ईश्वर का अभाव है, यह युक्ति संगत नहीं हैं। मानव जीवन की अनेकानेक समस्याओं की उलझी गुत्थियाँ अध्यात्म विज्ञान से सुलझती हैं, जिसे पदार्थवादी अपनी अंधी दौड़ से भूलते जा रहे हैं। ईश्वर का अस्तित्व भी अध्यात्म विज्ञान से सिद्ध होता है। तपश्चर्या में रत मनीषी, ऋषिगण अपनी दिव्यदृष्टि से उस परम तत्त्व की अनुभूति भी करते हैं।

इस नाना-विध सुरम्य सृष्टि को बनाने वाला परम-पिता परमेश्वर है। कर्त्ता के बिना कोई क्रिया नहीं हो सकती। पेंट, ब्रश, बोर्ड आदि सभी सामान यदि इकट्ठे कर दिए जाएँ तो भी बिना चित्रकार के कोई चित्र बन सके, यह असंभव है। समग्र दृष्टि का संचालन करने वाला, कोटि-कोटि जीवों में चेतना का संचार करने वाला, सर्वशक्तिमान, नियंता एक ही कारीगर है। प्रकृति का अणु-अणु उससे ओत-प्रोत है। विश्व की सुंदरता— सुरम्यता में उसी की अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार सागर और उसकी एक बूँद में तत्त्व दृष्टि में कोई भेद नहीं, वह उसी का अंश है। उसी तरह आत्मा और परमात्मा में भी कोई विभेद नहीं। परमात्मा का शाश्वत-चिरंतन अंश ही परमात्मा है। परंतु जिस तरह बादलों के कारण सूर्य स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता है, उसी तरह अज्ञान से भावित होने के कारण हम आत्मतत्त्व से विमुख रहते हैं और यथार्थता से विमुख होकर इधर-उधर भटकते रहते हैं।

इस विश्व में हम देखते हैं कि कोई प्राणी सुखी जीवन व्यतीत करता है, परंतु कोई पीड़ा-कष्ट से दुःखी रहता है। जबकि सुख की प्राप्ति सभी की इच्छा है फिर यह विवशता क्यों? कोई गधा, बैल, चूहा बनता है, कोई सुसंपन्न परिवार में जन्म लेता है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई ऐसी नियामक सत्ता है, जो हमारे कर्म के अनुरूप व्यवस्था देती है। समाज की आँखों, पुलिस की दृष्टि में धूल झोंकना संभव है; पर घट-घटवासी परमेश्वर की दृष्टि से धूल झोंकना संभव नहीं। यही कारण है कि आस्तिकता को मानने वाले, सच्चे अर्थों में परमेश्वरपरायण व्यक्ति प्यार, स्नेह, उदारता जैसे सद्गुणों को धारण करते और अनीति, अत्याचार, दुष्टता से सर्वथा दूर रहते हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि जो “पश्यत्य” चक्षुश्यश्रण्येत्यकर्ण” बिना आँखों से देखता और बिना कानों से सुनता, ऐसी सर्वव्याप्त नियामक सत्ता हमारी अनुशासनकर्त्ता है। जबकि कामू, सिजविक जैसे नास्तिक स्वतंत्र आचारवादियों ने इसको कोई महत्वपूर्ण नहीं जाना है।

दूरदर्शी तत्त्ववेत्ता ऋषियों ने मानव जीवन में आस्तिकता को जो महत्वपूर्ण स्थान दिया है वह उन्हीं के सूक्ष्मदृष्टि का परिचायक है। उन्होंने अपनी परिष्कृत सूक्ष्मबुद्धि से यह जान लिया था जो स्वभावतः बहिर्मुखी मनुष्य अपनी बुद्धि और प्रकृति का दुरुपयोगकर पथ भ्रष्ट हो सकता है तथा शांति-सुव्यवस्था में बाधक सिद्ध हो सकता है। उसे कुमार्ग पर जाने से बचाने तथा उसके जीवन के समग्र विकास के लिए उन्होंने आस्तिकता को जीवन के सर्वांगपूर्ण विकास की आधारशिला बनाया। परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है। वह सबका नियामक, नियंता और समदर्शी है, इन तथ्यों को हृदयंगम कर एक आस्तिक व्यक्ति अनीति से दूर रह स्वयं से सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करता है। आस्तिकवाद ही समाज की प्रगति का मूलभूत आधार है, इसे सुनिश्चित माना जाना चाहिए। आज की सारी समस्याएँ जो मानवी दुर्बुद्धिजन्य है एवं दैवी प्रकोप की परिणति मानी जाती हैं, देखते-देखते मिट सकती हैं, यदि आस्तिकता के दर्शन से जन-जन को अनुप्राणित कर दिया जाए।


सद्वाक्य

बड़े काम करो, पर बड़ी डींगें मत हाँको।


इंद्रियनिग्रह और धमर्धारणा

धर्म के दस लक्षणों में छठा लक्षण है— इंद्रियनिग्रह। इंद्रियाँ अपने काम के लिए बनी है। यदि उनसे उनका उचित काम लिया जाए तो वे जीवन के आवश्यक क्रियाकलापों की पूर्ति में समुचित योगदान देती हैं।

आंखें ने हों तो रास्ता चलना घर की वस्तुओं को ढूँढ़ना, पढ़ना, कृषि, व्यवसाय आदि करना कैसे बन पड़े, अंधे को तो छोटे-छोटे कामों के लिए लकड़ी का सहारा लेने पड़ता है। कान न हों तो दूसरे दिखेंगे भर। उनका कथन, परामर्श कुछ भी न सुन पड़ेगा और संसारमात्र में सर्वत्र निस्तब्धता छाए होने का अनुभव होगा।

जीभ न हो तो स्वाद के आधार पर खाद्य-अखाद्य का निर्णय कैसे हो? ग्रास का मुँह में उलट-पुलट होती हैं, वह किस प्रकार हो सके? इसी प्रकार विचारों की अभिव्यक्ति, उनका आदान-प्रदान किस प्रकार बन पड़े? यह सब कुछ वाणी के माध्यम से ही संभव होता है। वाणी और स्वाद के दो प्रयोजनों में काम लाए जाने के कारण जिव्हा को दो इंद्रिय गिना गया है। नासिका से सुगंध और दुर्गंध का अंतर होता है और सड़न, प्रदूषण तक उपयुक्त महक का अनुभव करके यह निश्चय किया जाता है कि कहाँ रुका और कहाँ से चला दिया जाए। गंदगी को हटाकर स्वच्छता की स्थापना कैसे की जाए?

त्वचा की संवेदनशीलता सर्दी, गर्मी कोमलता कठोरता आदि का स्पष्ट बोध कराती है। उसके छिद्र पसीना बहाते, गंदगी निकालते और छूकर वस्तुओं के स्तर का अनुमान लगाने में मदद देते हैं। जननेंद्रियों को मूत्र-विसर्जन और विषयानंद को भी अलग से न गिनकर त्वचा इंद्रिय के क्षेत्र में ही सम्मिलित किया गया है। प्रजनन भी वंश परंपरा स्थिर रखने की दृष्टि से आवश्यक है।

कर्मेंद्रियों में हाथ पैर आदि आते हैं, वे श्रमिक है और मन के आदेशानुसार वफादार नौकर की तरह काम करते रहते है॥ उनकी अपनी निज की कोई इच्छा या स्वाद परायणता नहीं है तो भी उन्हें सुकृत करने, कुमार्ग पर न चलने की प्रेरणा तो दी जाती है। आलसी बनने का अर्थ हाथ पैरों का न चलना ही माना जाता है।

इंद्रियनिग्रह का तात्पर्य इन सही रूप में काम करते हुए जीवन को प्रगतिशील और सुव्यवस्थित बनाने वाले घटकों को क्रियाशील रहने से रोकना नहीं है। ऐसा करने पर जो जीवित रहते हुए भी मृतक बनकर रहना पड़ेगा इंद्रियनिग्रह का अर्थ इतना ही है कि इन्हें कुमार्गगामी न बनने दिया जाए। जो अनुचित है, वह इनके द्वारा न बन पड़े इसी की सतर्कता रखने से इंद्रियनिग्रह साधना सध जाती है। दसों इंद्रियों को अर्थात सशक्त काया-संस्था को मात्र सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करना उनका दुरुपयोग न होने देने ही इंद्रियनिग्रह है।

आदतें शालीनता, मर्यादा एवं सुव्यवस्था के अनुरूप ढालने की अपेक्षा उन्हें कुमार्ग पर भटका देना और स्वेच्छाचार का प्रदर्शन करना अति सरल है। पानी नीचे की तरफ बहता है। ढेला ऊपर से नीचे की ओर गिरता है पर किसी को भी ऊपर चढ़ाना हो तो उसके लिए जोर लगाने और निशाना साधने की जरूरत पड़ती है। वह कार्य अनायास ही नहीं हो जाता।

इंद्रियों को सन्मार्गगामी बनाने के संबंध में सक्रिय रखने का कौशल ऐसा हैं जो हर किसी से नहीं बन पड़ता; फलतः बहुमूल्य क्षमता सहज ही अस्त−व्यस्त होती रहती हैं। कई बार तो उनका गलत उपयोग अनेक प्रकार के संकट भी खड़े करता हैं। अतिशय काम लेने या बिलकुल ही न लेने से तो अपनी क्षमता ऐसे ही गँवा बैठती हैं।

दुरुपयोग तो और भी भयंकर हैं। आँखों देखकर किसी के सौंदर्य पर मुग्ध हो चला जाए और उसे हथियाने का कुचक्र चल पड़े तो समझना चाहिए नेत्रों का दुरुपयोग हुआ। सौंदर्य की तरह किसी के धन-वैभव को देखकर भी ईर्ष्या से जल मरने या अपहरण का भाव भी उठ सकता हैं।

कानाफूसी में अक्सर दुरभि संधियाँ रची जाती हैं। किसी को अपने अनुग्रह का विश्वास दिलाया जा सकता हैं। चुगलखोरी करके किन्हीं के बीच विद्वेष भड़काया जा सकता हैं। कानों से अश्लीलता भड़काने वाले कथन या गायनों में रस लिया जा सकता हैं। नाक को इत्र फुलेल की आदत डाली जा सकती हैं। जीभ को चटोरेपन की आदत डालने, स्वादिष्ट व्यंजनों को पेट में अनावश्यक रूप से ठूंसते रहने की उसकी कुचेष्टा न केवल पेट को अपच से लाद देती हैं, अपितु इस कारण उत्पन्न हुई विषाक्त सड़न से नाना प्रकार के रोगों का उद्भव भी होता हैं। कटु भाषण करने, शेखीखोरी, चुगलखोरी, व्यंग, उपहास जैसी आदतें समूचे जीवन को घिनौना एवं असफल बनाती हैं। नशेबाजी जैसे कुचक्रों का माध्यम भी सुख हैं। यदि जिव्हा उन्हें एकदम अस्वीकार करें, सहन करने को तैयार नव हो तो नशेबाजी का धीमा विष भी न छूटने वाली आदत बनकर इस प्रकार गले बँध जाता हैं कि आधी तंदुरुस्ती नष्ट हो, उम्र के आधे हिस्से में कटौती कर देती हैं। उनसे बचाव हेतु, जीव कर्त्तव्य हैं कि उन कुटेवों को भीतर घुसने देने के लिए इन द्वारों को ही न खोले।

जो इंद्रियाँ दस हैं। इनमें पाँच ज्ञानेंद्रियां मुख्य हैं। इनमें जिव्हा और जननेंद्रिय को प्रमुख माना गया है क्योंकि इनकी भ्रष्टता सर्वनाश के दृश्य उपस्थित करती हैं।

जननेंद्रियों का छोटी आयु से ही कामुकता के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया जाए और क्षरण की सीमा मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहा जाए और क्षरण की सीमा-मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहा जाए तो शरीर एवं मस्तिष्क असमय में ही खोखले हो जाते हैं। पेड़ के तने को गोद-गोदकर उनमें से गोंद या जीवन रस निकालते रहा जाए तो निश्चय ही वह न बढ़ सकेगा और न पूरी आयु तक स्थिर रह सकेगा। शरीर को यदि कामुकता के नियमित निचोड़ा जाता रहे तो उससे रूप-सौंदर्य का स्थिर रह सकना तो दूर काम-धाम करते रहने योग्य जीवनशक्ति का भंडार भी खाली हो जाएगा।

रतिक्रिया की मर्यादा तोड़ने में न केवल अपना; वरन अपने साथी का भी स्वास्थ्य चौपट होता हैं और यदि चिंतन में अश्लीलता चढ़ी रहे तो समझना चाहिए कि उपयोगी प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक सोच सकने की मेधाशक्ति का ही अपहरण हो गया।

अश्लीलता चिंतन अनैतिक भी हैं। उसमें नारीमात्र को रमणी, कामिनी, भोग्या, वैश्या के रूप में देखने सोचने की दुर्बुद्धि जड़ पकड़ती हैं और ऐसे ही लोग योग्य, अयोग्य का विचार किए बिना व्यभिचार, बलात्कार, असीमित यौनाचार, हस्तमैथुन जैसे आत्मघाती प्रयासों पर उतारू हो जाते हैं। पलंग का एक पाया टूटा तो बाकी तीन भी सुस्थिर नहीं रह सकते। कामुकता के प्रसंग में जो स्वच्छंद होते हैं, वे नैतिकता के सामाजिकता के अन्यान्य, उपयोगी पक्षों को भी छिन्न-विच्छिन्न करते चले जाते हैं और पतन के गहरे गर्त में गिरते हैं।

मन को ग्यारहवीं इंद्री माना गया है। यह भी शरीर के साथ जुड़ा रहने के कारण अदृश्य इंद्री माना जाता है। उसे स्वच्छंद छोड़ देने पर कुकल्पनाओं के अंबार अपने क्षेत्र में जमा कर लेता है। “खाली दिमाग शैतान की दुकान” वाली उक्ति में बहुत कुछ यथार्थता भरी पड़ी हैं।

वासना, तृष्णा और अहंता के चिशूल विकृत मन की ही उपज है। इस अचिंतन से अपने को न रोक पाने वाले व्यक्ति अपनी समूची गतिविधियों को ही अनुपयुक्तता के दल-दल में फँसा लेते हैं। लोभ, मोह और अहंकार को समस्त कुकृत्यों का जन्मदाता माना गया हैं। जहाँ मन पर यह तीनों विकृतियाँ छाई रहेंगी, वहाँ कोल्हू के बैल जैसी व्यस्तता भी छाई रहेगी और सत्प्रयोजनों के लिए कुछ करते धरते न बन पड़ेगा। सदाशयता को चरितार्थ करने में इन तीनों को ही प्रमुख व्यवधान माना जाना चाहिए।

जो अनुपयुक्त हैं, उसे कड़ाई से रोकने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। पालतू पशुओं से भी कुछ काम लेना सहज नहीं होता। हाथी को अंकुश, घोड़े को लगाम, ऊँट को नकेल, बैल को नाथ डालकर काबू में रखा जाता हैं और उन्हें सही काम करने के लिए बाधित किया जाता है। गाय-भैंस तक के गले में रस्सी बाँधनी पड़ती हैं। यदि इन सब को छूट दे दी जाए तो वे निर्धारित कार्य करना तो दूर कहीं भी, किसी भी दिशा में चल पड़ेंगे। स्वयं मुसीबत में फँसने के साथ-साथ स्वामी-सवार की भी दुर्गति करेंगे; इसलिए उन्हें स्वच्छंद छोड़ने का प्रचलन नहीं है।

इंद्रियों के संबंध में भी यही बात हैं। यही बात मनोविकारों के संबंध में भी हैं। इस समुदाय पर समुचित अंकुश रखा जाए, मजबूत रस्से से बाँधा जाए। इतने पर भी बगावत करने जैसे लक्षण दिखाई पड़ें तो फिर प्रताड़ना का भय ही एकमात्र उपाय हैं। इंद्रियनिग्रह के लिए सुविधा विरोधी तप-साधना करते हुए ऐसा साहस भरा मनोबल बढ़ाना पड़ता हैं जो अपने प्रताप से किसी भी घटक को उच्छृंखलता न बरतने दें।

प्रवाह को रोकने के लिए प्रतिपक्षी बाँध बनाना पड़ता है। अत्याचारों के विरुद्ध उनका सामना करने को तैयारी करनी पड़ती हैं। लात का जवाब लात और घूँसे का जवाब घूँसा माना जाता है। शठ के साथ शठता बरती जाती हैं और विष को विष से मारा जाता हैं। कुविचारों और बुरी आदतों के विरुद्ध प्रतिपक्षी मोर्चा खड़ा करना चाहिए और वह ऐसा होना चाहिए कि अभ्यस्त कुटेवों से डटकर मोर्चा ले सके।

कामुकता के विरुद्ध ब्रह्मचर्य के लाभों और नारी के देवी स्वरूप को हृदयंगम करने की भावनाएँ विकसित करनी चाहिए। चटोरेपन के विरुद्ध उन घटनाओं और लोगों के उदाहरणों को सामने रखना पड़ेगा, जिनने इस संदर्भ में आदर्शों को निबाहा और जन-जन द्वारा अभिनंदनीय माने गए। इसी प्रकार नशेबाजी, कुदृष्टि कानाफूसी जैसी बुरी आदतों के विरुद्ध तर्कों, तथ्यों, प्रभाव और उदाहरणों का ऐसा भंडार मनःक्षेत्र में जमाकर रखना चाहिए; जब कि उनके साथ टक्कर कराते हुए व्यक्तित्व के किसी भी कोने में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों के साथ करारा संघर्ष करने में सफलता मिल सके। नैतिकता और शालीनता का संयम और सदाचार का पक्ष स्वभावतः इतना मजबूत है कि उसके सहारे मानवी गरिमा सुस्थिर और सुनिश्चित बनाई जा सके। गड़बड़ी तो तब पड़ती है, हारना तो तब होता है जब अनीतिमूलक अभ्यास तो चिंतन पर सवार होकर अभ्यास का रूप ले ले और उन्हें निरस्त करने वाले देवपक्ष मूर्छित-तंद्रित रहकर अपनी प्रतिरोधी क्षमता गँवा बैठे।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय (कहानी)

स्वर्गीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्त्ताओं के साथ बंबई से नागपुर तक तीसरे दर्जे में रेल द्वारा यात्रा पर जा रहे थे। इन दिनों वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे।

उसी ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में गुरु मा. स. गोलवलकर भी जा रहे थे। उन्होंने किसी महत्वपूर्ण विषय पर विचार-विमर्श करने हेतु उपाध्याय जी को अपने पास बुलाया।

दो स्टेशन तक उनका प्रथम श्रेणी के डिब्बे में ही वार्तालाप होता रहा। अपने डिब्बे में आने पर वे टी.टी.ई. को खोजने को प्रयास करने लगे। हर स्टेशन पर नीचे उतरते और टी.टी. ई को खोजते।

तीसरे दर्जे का टिकट रखते हुए दो स्टेशन तक प्रथम श्रेणी में यात्रा करना किसी व्यक्ति को कोई असामान्य बात नहीं लगती; किंतु जो निरंतर आत्मनिरीक्षण करता चलता है, उसके लिए यह सामान्य नहीं, असामान्य बात हो जाती है। एक तो राष्ट्रीय संपदा का उपयोग बिना मूल्य चुकाए करना तथा अपने अंतःकरण को झुठलाना  श्री उपाध्याय को टी.टी.ई. की खोज करते देख उनके साथी यह जानने को उत्सुक थे आखिर उनको टी.टी.ई. से ऐसा कौन सा आवश्यक कार्य है। हर स्टेशन पर उतरकर दौड़-धुप करते है।

किंतु पंडित जी की दौड़-धूप का प्रयास सफल हुआ। उन्हें शीघ्र ही सामने से टी.टी.ई. आता दिखाई दिया। जब उन्होंने अपना अधिकतम किराया जमा करने को कहा तो वह विस्मय भरी दृष्टि से उनकी ओर देखने लगा। एक साधारण-सा दिखने वाला व्यक्ति प्रथम श्रेणी में यात्रा करे और वह भी स्वयं आकर अपना किराया जमा कराए; किंतु दुसरे ही क्षण वह कुछ नहीं बोला और चुपचाप हिसाब लगाकर पैसे ले लिए।

पैसे लेने के साथ ही पूछ बैठा—"क्या आप रसीद भी चाहते हैं?" पंडित जी ने तत्काल ही उतर दिया— "अवश्यमेव।"

टी.टी.ई. उन पैसों को अपनी जेब में रखना चाहता था, किंतु उपाध्याय जी ऐसे प्रसंगों पर हर क्षण सावधान रहते थे। उनकी ऐसी ही चारित्रिक विशेषताओं ने उन्हें सच्चे अर्थों में महामानव और लोकनायक बनाया था।


व्यामोह का मायाजाल

देवर्षि नारद को अपने वैराग्य और भजन का अहंकार हो गया था। अहंकार उठते ही मनुष्य आत्मप्रदर्शन के लिए लालायित हो उठता है। महत्वाकांक्षाएँ बढ़ा लेता है और इनकी पूर्ति के लिए अनेकों प्रपंच रचने लगता हैं। यही नारद के संबंध में भी घटित हुई।

किसी राजकुमारी का स्वयंवर था। पिता की इकलौती बेटी थी। राजा ने घोषणा कर रखी थी कि राजकुमारी के विवाह के समय आधा राज्य वर को दहेज में दिया जाएगा और शेष आधा राजा के उपरांत मिल जाएगा। नारद की भक्ति झीनी पड़ रही थी और अहंता प्रेरित महत्वाकांक्षा बढ़ रही थी। जब स्वयंवर का समाचार सुना, राजकुमारी का रूप देखा, विशाल राज्य वैभव के लिए मन ललचाया तो नारद सोचने लगे ब्रह्मचारी रहकर भक्ति का प्रचार करने में इतना समय लगा दिया अब संसार का भी कुछ आनंद देखना चाहिए। स्वयंवर जीतना चाहिए। मन पक्का हो गया। जरूरत ऐसे रूप की पड़ी तो राजकुमारी को पसंद आ सके। ऐसा रूप कहाँ से आए? वे स्वंय तो कुरूप थे। सोचा विष्णु भगवान के पास चलना चाहिए। उनसे मित्रता भी है। सदा उनका ही काम करते रहे हैं। अब की बार अपने निजी काम के लिए कहेंगे, तो मना कैसे करेंगे?

नारद विष्णुलोक पहुँचें। अपनी मनोकामना बताई। भगवान सन्न रह गए। भक्ति और कामना दोनों का एक साथ निर्वाह कहाँ? एक रहेगी तो दूसरी चली जाएगी। नारद का हित इसी में था कि वे भक्तिमार्ग न छोड़े, प्रपंच में न पड़े। सो भगवान मौन हो गए।

नारद ने मौन का अर्थ आधी स्वीकृति के रूप में लिया। चलते समय इतना और कह गए कि यह काम तो किसी भी प्रकार करना ही पड़ेगा। भक्त की मनोकामना पूरी न करें तो भगवान कैसे? विष्णु उपेक्षापूर्वक मुस्कराते भर रहे। नारद अनुमान लगाते रहे कि काम बन गया। वे सीधे स्वयंवर में जा पहुँचे।

रूप में कोई परिवर्तन न हुआ। राजकुमारी नारद की प्रणाम करती हुई वरमाला हाथ में लिए आगे बढ़ती गई और एक सुंदर राजकुमार के गले में माला डालकर उसकी पत्नी बन गई।

नारद की निराशा और खीज का ठिकाना न था। जहाँ वे पहले सदा प्रमुदित रहा करते थे, आज कामना ने उनका रौद्र रूप बनवा दिया। क्रोध में भरे हुए विष्णुलोक पहुँचे और भगवान पर अपशब्दों की झड़ी लगा दी। बहुत देर यही क्रम चलता रहा।

जब थककर शांत हुए तो भगवान ने कहा। मैं तो अपने भक्त का अहंकार मिटाता हूँ। कामनाओं के जंजाल से छुड़ाता हूँ। भला तुम्हें मैं अनर्थ में कैसे डुबो सकता था। संचित सद्भावना की पूँजी व्यामोह में कैसे लुट जाने देता। इस असफलता को मेरी अनुकंपा ही समझो।

जब कामना भरी महत्वाकांक्षा का नशा उतरा तो नारद ने अपने व्यामोह के साथ जुड़े हुए विनाश को समझा। अपनी भूल मानी और प्रायश्चित किया। इसके बाद वे कहीं भी भक्ति प्रचार करने जाते तो हर साधनामार्ग के पथिक को एक ही बात कहते कि भजन भले ही कम करना पर लोभ, मोह भरी अहंकार के मायाजाल से बचकर रहने का प्रयत्न करना।


आवेशग्रस्त होने का परिणाम (कहानी)

आग बोली— “मुर्ख पानी! यहाँ से हट, नहीं तो जलाकर नष्ट कर दूँगी।”

पानी कुछ नहीं बोला, शांतचित्त अपने काम से लगा रहा। इस पर अग्नि और भी आग बबूला होकर तथा पानी से टकराकर आप ही नष्ट हो गई। यह है— आवेशग्रस्त होने का परिणाम।


विचारों की असाधारण सामर्थ्य और परिणति

शक्ति की साधारणतः व्याख्या प्रकृति-पदार्थों की हलचलों के रूप में की जाती है। समझा जाता है कि पदार्थों के अंतराल में काम करने वाली हलचलें ही इस दृश्य जगत की अगणित गतिविधियों का सूत्रसंचालन करती हैं। मनुष्य के द्वारा भी जो कृत्य होते हैं, वे उसकी शारीरिक गतिविधियों द्वारा संपन्न होते प्रतीत होते हैं। इसमें इतना और जुड़ना चाहिए कि मानवी चेतना की विचार क्षमता भी एक शक्ति है। वह न केवल शारीरिक हलचलों को जन्म देती है; वरन व्यक्ति, पदार्थ एवं वातावरण पर भी अपना प्रभाव डालती है और उन्हें बदलने तक में अपनी आश्चर्यजनक भूमिका संपन्न करती है। अब विचारों को भी विद्युत के समतुल्य ही प्रभावोत्पादक माना जाने लगा है। कभी उन्हें चिंतन-क्षेत्र में घुमड़ती रहने और मस्तिष्क भर को कुछ काम देने वाली एक विशेषता भर समझा जाता था।

विचार निर्माण में मनुष्य स्वतंत्र है; किंतु उन्हें अपने ही कैदखाने में -— मस्तिष्कीय पिटारी में जकड़े रहना उसके लिए संभव नहीं। दूसरों के बारे में हमारे विचार-भाव शीघ्र ही उन तक गुप्त रूप से पहुँच जाते हैं। इनमें भी सज्जनोचित भाव तो पिछड़ जाते हैं, किंतु दुर्भावनायुक्त विचार अपेक्षाकृत अधिक शीघ्रता से पहुँचकर अपना भेद उसे बता देते है। परिणामस्वरूप अविज्ञात रूप से दूसरों के मन में अपने प्रति भी मनोमालिन्य के बीज अंकुरित होने लगते हैं। यही कारण है कि मित्रभावना के अभ्यासी विचारशील सज्जन व्यक्ति अपना स्वभाव ही कुछ इस प्रकार का बना लेते हैं कि अपरिचितों को भी वह प्रिय लगने लगते हैं। नाम मात्र के व्यवहार से ही मित्रता के निष्कर्ष निकलने लगते हैं। इसके विपरीत कलुषित विचारों वाले व्यक्ति आगन्तुकों से चाहे कितने कुशलतापूर्वक मिलें, उनका शंकालु हृदय प्रकट हो ही जाता है। प्रयत्न न करने पर भी नव्य परिचित व्यक्ति पहले उदासीन, तत्पश्चात शत्रु बन जाता है। यह सारा खेल अपने विचारों के कारण ही शक्य होता है।

रूस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एनारेबीन ने अपने अनुसंधान-निष्कर्ष में बताया है कि मनुष्य के विचार एवं भाव-तरंगों के अनुरूप मस्तिष्क से दो प्रकार के रस स्रावित होते हैं, जिनकी प्रमुख भूमिका व्यक्तित्व विकास के निर्धारण में होती है। यह रस शारीरिक एवं मानसिक प्रक्रियाओं को उत्तेजितकर व्यक्ति को सुख-दुख, शांति-अशांति, आशा-निराशा, प्रफुल्लता-उद्विग्नता प्रदान करते तथा उन्नति अथवा अवनति की ओर धकेलते हैं। इन रसों का निर्माण पूर्णतया अच्छे या बुरे विचारों और भावनाओं पर निर्भर रहता है। इससे स्पष्ट है कि विचारणा एवं भावना के प्रचंड-प्रवाह के अनुसार ही मनुष्य के व्यवहार एवं उसकी आदतों का निर्माण होता है।

मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक जे0 बी0 राइन ने विचारों की शक्ति की परख विभिन्न प्रयोग-परीक्षणों की श्रृंखलाओं के आधार पर करने में सफलता पाई है। उन्होंने विशेष प्रयोगों द्वारा केंद्रित विचारों के प्रभाव प्रदर्शित करके सिद्ध कर दिया है कि प्रयोगकर्ता के विचार निर्जीव-सजीव सभी पर अपनी छाप छोड़ते हैं। इन प्रभावों की प्रगाढ़ता एवं सत्यता की परख वैज्ञानिक विधियों द्वारा बारंबार हुई है।

प्राचीनज्ञान में विचार का स्वभाव बिजली के अनुरूप कहा गया है, जिसका गहन अध्ययन भी भौतिकी एवं आत्मिकी के क्षेत्र में होना हैं। विश्व के अनेक वैज्ञानिक परामनोवैज्ञानिक इस क्षेत्र में अनुसंधानरत है। विचारों के विद्युत-प्रवाह दूरस्थ व्यक्ति को उसी प्रकार से प्रभावित करते हैं जैसा कि चाहा जाता है। जब मानव विचार एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक भेजे जाते हैं तो उसे ‘टेलीपैथी’ कहते हैं। जीवन की अनंत शक्तियों पर पूर्ण विश्वास करने वाला सफल मनोचिकित्सक इस विधि द्वारा रोगी पर अपने विचार आरोपित करता है। यदि दोनों के विचारों का तारतम्य ठीक बैठ जाता है तो रोगी भी उन्हीं विचारों में डूब जाता है, जिनमें मनोचिकित्सक का विश्वास होता है। ऐसी स्थिति में रोगी चेतन अथवा अचेतन मन से उन्हीं अनंत शक्तियों पर अपना विश्वास जमाकर लाभान्वित होता है।

परामनोविज्ञानियों का कहना है कि विचार-संप्रेषणमात्र चिकित्साविदों तक ही सीमित नहीं। कोई भी व्यक्ति, कहीं भी इसका प्रयोग कर सकता हैं; क्योंकि विचार-संसार—आइडियोस्फियर में सभी प्रकार के विचार-प्रवाह निरंतर गतिमान हैं। उनमें से अपने अनुकूल विचार-तरंगों को आकर्षित किया और लाभान्वित हुआ जा सकता है। विश्व में प्रबल, स्वतंत्र, कल्याणकारी तथा प्रभावी विचारक बहुत थोड़े से हैं, अतः उनके द्वारा प्रवाहित आवृत्ति कम पड़ जाती है जो मात्र लड़खड़ाती, गिरती-पड़ती चलती रहती है, फिर भी सांसारिक लोगों पर वह अपना न्यूनाधिक प्रभाव तो छोड़ती ही रहती है और आशा,उत्साह, करुणा, दया एवं सद्भावनात्मक जल की वर्षा करके सिंचाई करती रहती है। यदि उनके द्वारा यह वर्षा बंद हो गई होती तो सदाशयता कभी की सूख गई होती।

‘थियोसोफिकल शोध संस्थान’ लंदन में अनुसंधानरत वैज्ञानिकों के अनुसार आधुनिक अनुसंधानों के द्वारा अब इस तथ्य का अधिकाधिक प्रकटीकरण होता जा रहा है कि प्रकृति में विचार एक विशेष प्रकार की प्रचंड शक्ति है। व्यक्तिगत रूप से यह भौतिक शरीर को निरंतर प्रभावित करते रहते हैं। व्यक्ति के विचार उसके अपने सहयोगी और वातावरण को सदैव अपने प्रभाव से अनुप्रमाणित करते रहते हैं। विचार-जगत में प्रवाहित अच्छी बुरी सभी प्रकार की तरंगें शंका, दुःख, क्रूरता, करुणा, दया, स्नेह, सहानुभूति फैलाती फिरती रहती हैं। यही कारण है कि कुवे एवं वर्नहम जैसे मूर्धन्य मनोचिकित्सकों ने विधेयात्मक चिंतन की दिशाधारा को प्रोत्साहन दिया है। प्रो0 सोरोकिन ने हारवर्ड अस्पताल के चिकित्सकों द्वारा सहानुभूतिपूर्वक सद्व्यवहार से रोगियों में संतोषजनक आशावादिता बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है। उनका कहना है कि कोई भी टॉनिक मूल रूप से उतना प्रभावकारी नहीं सिद्ध हो सकता जितना अच्छा किसी चिकित्सक द्वारा रोगी को प्रेरक विचारों के टॉनिक से एवं उसे समझाने और प्रोत्साहित किए जाने से मिलता है। महामारी जैसे प्रकृति-प्रकोपों में बचे हुए लोगों को चाहे “भाग्यवान” कह लें, किंतु प्रकारांतर से वे “समर्थ विचारवान” व्यक्ति ही होते हैं, जो सर्वसमर्थ उस जीवनधारा से सतत् शक्ति संचित करते रहते है।

सामान्यतया विचार शक्ति बिखरकर नष्ट होती रहती है। उसके केंद्रित करने एवं मानसिक शक्तिसंपन्न बनने के लिए हमें उत्कृष्ट विचारों की संपदा बढ़ाने के साथ ही अपने ‘स्व’ का विकास करना होगा। हमारा स्वार्थ जितना व्यापक होगा, हमारी शक्ति उतनी ही बढ़ती चली जाएगी। यदि स्वार्थ के साथ लोकोपकार का समावेश हो जाए तो यह शक्ति अपरिमितता की ओर अग्रसर होने लगेगी। अहंभाव के विनाश से ही सशक्त मनोबल का सृजन होता है। सैद्धांतिक प्रतिकूलताओं से लोहा लेने पर मनुष्य की इच्छा-शक्ति में वृद्धि होती जाती हैं। ऐसा आत्मविश्वास उत्पन्न होता है कि उसके सामने अशुभ विचार टिक ही नहीं सकते।

मानसिक शक्तियों के विकास में सहायक होता है — सरल एवं सदाचारी जीवन। चालाक एवं व्यवहारकुशल प्रदर्शन-पटु लोग अपने मन को चिंता एवं संशय का आश्रय बना लेते हैं। ऐसे चापलूस मित्रों द्वारा सदमार्ग पर चलने का प्रोत्साहन कभी भी नहीं मिलता। इसके विपरीत सदाचारी व्यक्ति व्यवहार एवं विचार में सरल होता है। ऐसे स्वार्थविहीन व्यक्ति के उद्गार बड़े-बड़े विद्वानों से अधिक प्रभावी पाए गए है।

अपने आपको प्रगति-पथ पर अग्रसर करने और सुखी सुसंस्कृत बनाने के लिए सद्विचारों का अवलंबन लेना ही पड़ता है। इसका और कोई विकल्प नहीं है। यही बात दूसरों के संबंध में भी है। दूसरों को सहयोगपरक सहायता का अपना महत्त्व है। पर किसी को रचनात्मक विचार देकर उसे स्वावलंबी और समुन्नत बनाया जा सके तो निश्चय ही उससे बढ़कर और कोई पुण्य-परमार्थ हो नहीं सकता।


भूलभुलैया में भटके हुए हम ......

वेदांत दर्शन में भारतीय तत्त्वचिंतन का सार निहित है, इसीलिए इसे ज्ञान का अंत अर्थात् चरमोत्कर्ष भी कहा जाता है। इससे यह स्पष्ट किया जाता है कि संसार सापेक्ष है, जबकि परम सत्य पूर्णब्रह्म निरपेक्ष। जीवन क्या है? इसका लक्ष्य या उद्देश्य क्या है? आदि बातों से विमुख होकर यहाँ तक कि अपने यथार्थ स्वरूप को न जानते हुए भी हम सापेक्षता के इस मायाजाल की भूल भुलैयों में जा फंसे हैं, इसका कारण क्या है और निवारण करने के उपाय क्या हैं?, इसकी विवेचना— व्याख्या इसमें इतने सुदृढ़ ढँग से हुई है, जैसी अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है।

निस्संदेह सापेक्षता के इस संसार में भले ही कितनी चकाचौंध और ऐन्द्रजालिक आकर्षण क्यों न हो फिर भी न तो यह नित्य है, न ही महत। हम सभी अपने को चाहे जितना बुद्धिवादी, वाकपटु या चतुर क्यों न मानें, आत्मप्रशंसा का कितना ही गान क्यों न करते रहें, पर वास्तविकता यही है कि हम भ्रम में हैं और हमारा बुद्धि संस्थान जिस पर हमें गर्व है, उथला भर है, भ्रम-जंजालों में उलझा हुआ है।

भार को ही लें, जिसके सहारे वस्तुओं का आदान प्रदान चल रहा है। क्या इस संबंध में हमारी मान्यताएँ पूरी तरह से सही हैं इस पर गंभीरतापूर्वक चिंतन करने से सारा का सारा आधार डगमगाने लगता है। सही माने में तो वजन का कोई अपना अस्तित्व है ही नहीं। पृथ्वी की आकर्षणशक्ति का जितना प्रभाव जिस चीज पर पड़ रहा है, उसे रोकने के लिए जितनी शक्ति लगानी पड़ती है, उसी को उसका वजन मान लिया जाता है। यह आकर्षणशक्ति भिन्न-भिन्न हैं। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच एक जगह ऐसी भी आती है, जहाँ कोई आकर्षणशक्ति है ही नहीं तो वहाँ वजन कुछ भी नहीं रहता। ऐसी जगह यदि कोई भारी पहाड़ भी रख दिया जाए तो वह बिना वजन का होने के कारण जहाँ का तहाँ लटका रहेगा। ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि वजन सापेक्ष है। किसी पूर्वमान्यता पर इसका निर्णय असंभव है।

सामान्य जीवन में व्यवहार की दूसरी इकाई है— गति। भार की तरह यह भी आवश्यक और महत्वपूर्ण है; क्योंकि इसी के ज्ञान के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए भिन्न-भिन्न साधनों का चुनाव करते हैं; पर क्या गति के संबंध में हमारे द्वारा बनाई गई मान्यताएँ सही हैं।

हम मजे से अपनी कुर्सी पर बैठकर मेज पर कागज के कलम के सहारे लिखते हैं और जानते हैं कि वह स्थिर है; परंतु वस्तुतः हम एक हजार किलोमीटर प्रति घंटा की चाल से उड़े चले जा रहे हैं, क्योंकि पृथ्वी अपने अक्ष पर इसी गति से घूमती है। पृथ्वी पर हम बैठे हैं, अतएव स्वाभाविक ही उसी चाल से उड़ते हैं। यद्यपि यह तथ्य हमारी इंद्रियों की पकड़ में नहीं आता है, अतएव बड़ा विचित्र लगता है और स्थिरता प्रतीत होती है। पर यह तो एक प्रतीति भर है, वास्तविकता नहीं।

पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है; अतएव 24 घंटे बाद हम फिर अपने स्थान पर आ जाएँगे; यदि ऐसा सोचें तो भी व्यर्थ ही है। क्योंकि पृथ्वी 6,66,000 मील प्रतिघंटा की चाल से सूर्य की परिक्रमा हेतु भागी जा रही है। वह अंतरिक्ष में जिस स्थान पर है, वहाँ पर आना तो एक वर्ष बाद ही संभव है। परंतु यह मानना भी भ्रम ही है क्योंकि सूर्य महासूर्य की परिक्रमा लगा रहा है और अपने सौर परिवार के समस्त ग्रहों-उपग्रहों को लेकर तेजी से दौड़ा चला जा रहा है। यह महासूर्य भी किसी अतिसूर्य की परिक्रमा में लीन है। यह सिलसिला न जाने कितनी कड़ियों से जुड़ा है। अतएव जिस जगह पर हम वर्तमान समय में हैं, वहाँ पर पुनः लौट आना कम से कम इस जन्म में तो असंभव ही है।

स्थान और गति की भाँति दिशा-निर्धारण हेतु हम सब अपना सिर खपाते रहते हैं। लोक-व्यवहार में इसकी महती आवश्यकता हैं। इसके बिना भूगोल, नक्शा, यातायात जैसी कोई चीजें संभव न हो सकेंगी। दिशाज्ञान के बगैर न तो जलयान अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच सकेंगे, न वायुयान। पूरब, पश्चिम आदि आठ तथा ऊपर नीचे मिलकर इस दिशाओं की मान्यता को लोक-व्यवहार में प्रश्रय दिया जाता है; पर वास्तविकता और यथार्थता के बारे में चिंतन करने पर यह मान्यता भी पूरी तरह से ध्वस्त हो जाती है।

एक नाली यदि हम सीधी खोदते जाएँ तो ऐसा लगता है कि वह सीधी समतल जा रही है, पर यथार्थ यह है कि यह खुदाई गोलाई में चल रही है और यदि यह क्रम लगातार चलता रहे तो उसी जगह जा पहुँचेगी जहाँ से शुरू हुई थी। फुटबॉल या बालीबाॅल की गेंद पर सीधी रेखा खींचने पर भी वह गोलाई में ही खिंचती है। सीधी खींचने का मतलब है कि उसके दोनों सिरों का अंतर सदा-सर्वदा बना रहे, पर यदि वे एक में आकर मिल जाएँ तो फिर सीधी लकीर कैसी? इस तरह कहीं भी लकीर खींची जाए कभी भी सीधी नहीं हो सकती। जो धरती हमें समतल दिखाई देती है यथार्थ में वह भी गोल है। जमीन पर खड़े होकर जमीन और आसमान मिलने वाला क्षितिज प्रायः ६ मील पर दिखाई पड़ता है; पर यदि दो सौ फीट की ऊँचाई पर चढ़कर देखा जाए तो वह १० मील पर मिलता दिखाई देगा। इन सब बातों से पृथ्वी की गोलाई सिद्ध हो जाती है। भले ही हम अपनी स्थूलबुद्धि से उसे समझ न पाएँ। ऐसी दशा में दिशाज्ञान से संबंधित हमारी पूर्व मान्यताएँ विश्वसनीय नहीं हैं।

चंद्रमा हमें ऊँचा लगता है; पर चंद्र तल पर जा पहुँचने पर लगता है कि पृथ्वी ऊपर आकाश में उदय होती है जैसा कि चंद्र यात्रियों ने अपने विवरण में लिखा है। यदि हम सौरमंडल के बाहर कहीं अंतरिक्ष में जा खड़े हों तो प्रतीत होगा पूरब, पश्चिम आदि दस दिशाओं में से कोई दिशा नहीं है। दिशा-ज्ञान सर्वथा सापेक्षिक ही है।

इसी तरह समय की मान्यता भी असंदिग्ध नहीं है। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय वही नहीं है जिसे हम जानते हैं। वस्तुतः जब हमें सूर्य उदय होता दिखाई पड़ता है, उससे साढ़े आठ मिनट पूर्व ही उग चुका होता है। उसकी किरणें पृथ्वी तक इतनी देर में पहुँचती है। अस्त होता जब दिखाई पड़ता है, उससे साढ़े आठ मिनट पूर्व ही डूब चुका होता है। सौरमंडल के अन्य ग्रहों के संबंध में भी यही बात है। इस प्रकार दिशा ही नहीं, समय संबंधी मान्यताएँ भी भ्रांतिपूर्ण ही है।

उपरोक्त तथ्यों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि इंद्रियों से मिलने वाली जानकारियों को ही अंतिम सत्य मानकर हम कितने भ्रम में हैं। वस्तुओं का जो स्वरूप हम देखते हैं, वह हमारी पूर्व बताई गई मान्यताओं पर आश्रित है। यह स्वरूप भी किसी की सापेक्षता से ही निर्धारित किया जाता है। विभिन्न गुण व तत्संबंधी परिभाषाएँ भी सापेक्षता की ही उपज हैं। इन्हीं से ही नाना-विधि विवेचना-व्याख्या होती है। इनके द्वारा हम निरपेक्ष परम सत्य तक पहुँच सकें, यह असंभव है। परम तत्त्व निरपेक्ष है। हमारी गढ़ी गई मान्यताएँ तो इस स्थूलजगत का ही यथार्थ बोध करा पाने में सर्वथा अक्षम हैं, फिर जिसके लिए चिंतको ने  “नेति-नेति” ककर हार मान ली है, उस तक स्थूल मान्यताओं के सहारे कैसे पहुँचा जा सकता है? स्पष्ट है, नहीं।

वेदांत दर्शन स्पष्ट करता है कि हमें सापेक्षता की चकाचौंध और मोह के भ्रम-जंजाल से उबरना होगा। इस सम्मोहन के कारण हमने घृणा, द्वेष, ईर्ष्या को गले लगा लिया है और नाम, यश, महत्त्वाकांक्षा के पीछे भाग-दौड़ लगाए जा रहे हैं। इस तत्त्वचिंतन के प्रेरणाप्रद सिद्धांत इस सम्मोहन-निद्रा को एक झटके में तोड़कर चेतना-जगत में प्रविष्ट होने का सन्देश सुनाते हैं।

निःसंदेह शाश्वत चिरंतन सत्य की अनुभूति करने, उससे एकाकार होने हेतु इंद्रियातीत बोध की दुनिया में प्रवेश करना होगा। भ्रम-जंजाल की मृगमरीचिका से छुटकारा साधना के अवलंबन तथा सम्मोहन से जाग उठने पर ही हो सकता है। साधना से प्राप्त अंतर्दृष्टि से ही वास्तविकता और यथार्थता का ज्ञान होता है और परम सत्य से एकत्व हम पाते है। तब चतुर्दिक् पूर्ण सत्य, पूर्ण ज्ञान व पूर्ण आनंद का ही साम्राज्य संव्याप्त होता है। यथार्थता का यह बोध कोई भी वेदांत की शिक्षाओं को अपनाकर अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतारने पर कर सकता है।


तृतीय नेत्र : एक शक्तिशाली ऊर्जाकेंद्र

आँखें व्यक्तित्व के गहन मर्मस्थल का प्रतीक हैं। बचपन का भोलापन, यौवन की मादकता, प्रौढ़ता की परिपक्वता हम किसी के नेत्रों में नेत्र डालकर आसानी से अवलोकन कर सकते है।

सौम्यता— सज्जनता भी आँखों से झलकती है और क्रोध— आवेश भी उन्हें देखकर किस स्तर तक उभरा, इसे सहज ही अनुमान लगा लेने में देर नहीं लगती। मैत्री, शत्रुता, उपेक्षा के भाव भी चेहरे पर चमकते हैं और शत्रुता की वक्रता भी।

व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र को पढ़ने में यों समूचा चेहरा ही दर्पण का काम करता है, पर उसका केंद्र बिंदु नेत्र ही हैं। समूचे चेहरे पर यों भावभंगिमा उभरकर व्यक्ति के मानसिक धरातल की जानकारी देती हैं, पर उसका सार— संक्षेप नेत्रों में भी बोलते-झाँकते देखा जा सकता है। यदि पढ़ने की क्षमता हो तो उसे ध्यानपूर्वक देखने से वस्तु स्थिति की सहज ही पहचाना जा सकता है।

यों शरीर के सभी अवयव अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं, पर नेत्रों की उपयोगिता-आवश्यकता दोनों ही बढ़ी-चढ़ी हैं। कहते है कि “दाँत गए तो स्वाद गया और आँख गई तो जहान गया।” इस उक्ति में व्यावहारिक दृष्टि से समुचित तथ्य समाया हुआ है। यों अंधे भी किसी तरह काम करते और ढर्रा चलाते हैं; पर वे दूसरे व्यक्तियों व पदार्थों के संबंध में कुछ भी जान नहीं पाते। ऐसी दशा में कल्पना या स्पर्शशक्ति ही थोड़ा सहारा देकर काम चला देती है। इसके अतिरिक्त अध्ययन-अध्यापन का भी आधा रास्ता रुक जाता है। ब्रेल लिपि के आधार पर उभरे हुए अक्षरों के सहारे ही कुछ पढ़ा जा सकता है या किसी से सुनकर स्मरणशक्ति की धारणा ही कुछ काम चला पाने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं। उपयोगिता और आवश्यकता का बौद्धिक पक्ष बहुत करके नेत्रों पर ही निर्भर है। महत्ता इसलिए है कि देव दर्शन जैसी भावना उभारने वाले प्रयोजन भी एक सीमा तक ही सध पाते हैं।

आध्यात्मिक जगत में जिस अंतर्मुखी होने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, वह भी बहिर्मुखी प्रत्यक्ष जगत से अपने को अवरुद्ध करके भीतर घसीट ले जाने से ही बन पड़ती है। अन्यथा नेत्र न होने पर कल्पना क्षेत्र से विनिर्मित किया हुआ एक प्रपंच मस्तिष्क में घुस बैठता है। उसे अवरुद्ध करना और भी कठिन है। नेत्र चले जाने पर किसी का कथन सुना जा सकता हैं; पर ऐसा नहीं हो सकता कि मुखाकृति या सौंदर्य-सुषमा देखकर वस्तुस्थिति को अधिक अच्छी तरह समझना और उस आधार पर सही निष्कर्ष निकाल सकना संभव हो सके।

फिर भी प्रकृति इतनी उदार है कि नेत्र न रहने पर भी अपनी दयालुता से अन्य छुट-पुट सूत्रों के सहारे उसकी प्रतिभा निखार देती है। यही कारण है कि सूरदास जैसी प्रतिभाएँ नेत्रविहीन स्थिति में भी अपना काम करती रही।

जिनके नेत्र हैं, उन्हें दर्पण के सहारे बारीक दृष्टि से स्वयं अवलोकन करना चाहिए और यदि उसमें क्षुद्रताएँ समाविष्ट दिखें तो उनके परिमार्जन का प्रयत्न करना चाहिए। अहंता, वासना, कपट, कामना आदि अपनी भीतरी दुष्प्रवृत्तियों को नेत्र मात्र से उभरता देखा जा सकता है। इस अनगढ़ता को अपनी समीक्षा दूसरों से कराकर अपने द्वारा स्वयं ही मिटाना चाहिए। आत्मनिरीक्षण और आत्मपरीक्षण का प्रयोग अपने द्वारा अधिक अच्छी तरह किया जा सकता है। बाहर के सामान्य लोगों में सूक्ष्मबुद्धि का अभाव होता है, इसलिए वे अपने दृष्टिकोण से निंदा-स्तुति करते हैं और समीक्षा की दृष्टि से वे राग-द्वेषवश प्रायः भटके हुए ही होते हैं; अस्तु नेत्रों को माध्यम बनाकर आत्मसमीक्षा का प्रयोग-साधना यह अपना ही काम है अथवा फिर किसी दिव्यदर्शी साधक से, गुरुजन से इसकी समीक्षा करानी चाहिए। जो उसमें अनौचित्य झलका हो, उसका निराकरण करने के लिए सन्निद्ध होना चाहिए।

दोनों भृकुटियों के मध्य में तृतीय नेत्र का स्थान है। इसी को दिव्यदृष्टि या ज्ञानचक्षु कहते है। उसको जागृत करने की साधना साधारणतया त्राटक के आधार पर की जाती है। प्रत्यक्ष प्रकाशमान वस्तु को देखकर उसका स्वरूप नेत्र बंद करके चिंतन करते रहने की विधा को त्राटक साधना कहा गया है। इससे धर्मचक्षुओं में आत्मतेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है।

अंतःत्राटक का एक तरीका यह भी है कि बिना किसी बाहरी उपकरण के दोनों आँखें बंद करके मात्र तीसरे नेत्र से ही दिव्य जगत का अवलोकन किया जाए। आरंभ में कुछ विशेष स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं पड़ता। अपनी संचित कल्पनाएँ ही उभर कर आती हैं। पर थोड़े दिन अभ्यास करने पर तृतीय नेत्र के दिव्य प्रकाश का उभरना आरंभ होता है और आँखें मूँदे रहकर भी अन्यत्र होने वाली या चुकी घटनाओं का दर्शन किया जा सकता है।

तृतीय नेत्र की शक्ति कितनी विशिष्ट होती है, इसका पुरातन विवरण शंकर जी द्वारा कामदेव को जला दिया जाने के रूप में किया जाता है। दमयंती को छेड़ने वाला व्याध भी इसी शाप-प्रकोप से नेत्रों की तीव्र बेधकशक्ति से जल मरा था, वस्तुतः तृतीय नेत्र प्रकाश और ऊर्जा का पुँज भी है। उसके आधार पर ऐसा कुछ भी किया जा सकता है, जिससे दिव्य दर्शन के अतिरिक्त शाप वरदान का उद्देश्य भी पूरा हो सके। शक्तिपात में, हिप्नोटिज्म में उस नेत्रशक्ति का प्रयोग किया जाता है, जो पहले से ही तृतीय नेत्र के भंडार में भर ली गई होती है। इस शक्ति से उत्पन्न हुई दिव्यदृष्टि अनेकों का अनेक प्रकार से भला भी कर सकती है।

यह भंडार कदाचित् अनायास भी फूट पड़ता है। इटली के सुप्रसिद्ध पर्यटन केंद्र फसिया का निवासी बेनेदेतों सुपीनों जब 16 वर्ष का था, तब उसमें एक विलक्षण क्षमता उभरी कि वह जिस वस्तु को भी एकाग्र दृष्टि से देखता वही जलने लगती। आतिशी शीशे द्वारा सूर्य किरणों के एकत्रित करने पर जब जिस प्रकार अग्नि प्रकट हो जाती है, ठीक उसके दोनों नेत्रों की दृष्टि एकत्रित किए जाने पर वही स्थिति उभर आती है और वस्तुएँ जलने लगती हैं। घर का सामान जल जाता। जिसे भी वह घूर कर देखता, वह पसीने-पसीने हो जाता। आखिर इस व्यथा की जाँच इटली के मूर्धन्य वैज्ञानिक डा0 मार्सियों से कराई। उनने जाँच-पड़ताल के बाद इतना ही बताया कि इसके नेत्रों में ऊर्जा उगलने की विशेषता तो है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि इसका कारण और उपचार क्या है? टेलीविजन पर भी उसका प्रभाव दिखाया गया।

मूलतः यह शक्ति होती सभी में है, पर वह अनायास तो किसी-किसी में ही अपवादस्वरूप विकसित हो जाती है। उसका “लेसर” स्तर का मूल स्तोत्र तृतीय नेत्र में अवस्थित होता है। इसे योगाभ्यासपरक साधनों के लिए, तमाशा दिखाने के लिए नहीं,वरन मात्र उच्च उद्देश्यों के लिए विकसित किया जा सकता है।


सद्वाक्य

मनुष्य को कठिनाइयों से द्वेष नहीं, प्रेम मानना चाहिए। उन्हें जीवनरूपी पाठशाला का आदरणीय उपाध्याय समझना चाहिए। कठिनाइयों की शिक्षा से ही मनुष्य का मस्तिष्क विकसित होकर ज्ञान-विज्ञान की इस सीमा तक पहुँच सका है। यदि जीवन में कठिनाइयाँ न हों, आपत्तियाँ न आवें, मुसीबतें न पड़े, तो मनुष्य का जीवन नितांत, निष्क्रिय तथा निरुत्साहपूर्ण बन जाए। निरुत्साहित, निष्क्रिय एवं नीरस जीवन जीने में क्या आकर्षण रहता है? संसार में जो कुछ चहल-पहल, हलचल तथा कोलाहल दिखाई दे रहा है, वह सब कठिनाइयों से बचने, उन्हें दूर करने और उनसे लड़ने के कारण ही हैं। कठिनाइयों को जीवन-विकास का एक अनिवार्य उपाय मानकर, मनुष्य को उनका स्वागत करना चाहिए, उनको चुनौती स्वीकार करनी चाहिए और एक आपत्ति को सौ कष्ट सहकर भी दूर करते रहना चाहिए। यही पुरुषार्थ, यही मनुष्यता है और यही सफलता तथा उन्नति का एकमात्र उपाय भी है।

— कार्लाइल


सिद्धियाँ कब फलीभूत होती हैं?

मनुष्य सिद्धियों एवं चमत्कारों की ओर सहज ही आकर्षित होता देखा जाता है, लेकिन एक तथ्य जो सबसे महत्तवपूर्ण है और जिसे सदैव भुला दिया जाता है, वह यह कि चेतना के अंतराल को कुरेद कर प्रसुप्त शक्तियों को जागृत करके सिद्धिसंपन्न बनने की क्षमता प्रत्येक पात्रतासंपन्न व्यक्ति में अंतर्निहित हैं। मनुष्य योनि को सुर दुर्लभ इसीलिए कहा गया है कि इस काया में वह विकास करते हुए स्वयं को महामानव, देवमानस एवं ऋषिस्तर तक पहुँचाने की क्षमता रखता है। साधना के उच्च सोपानों पर चढ़ते हुए अवतार स्तर तक पहुँच सकता है।

वस्तुतः सिद्धिवान होना महामानव होने का प्रमाण नहीं है। सच्चे सिद्धपुरुष प्रदर्शन नहीं करते; वरन वे आवश्यकतानुसार सुपात्रों पर अपने अनुदान बरसाते हुए उनके माध्यम से सृष्टा का अभीष्ट प्रयोजन पूरा करते है। समष्टि की आराधना ही उनका लक्ष्य होता है एवं निरपेक्ष भाव से करते हुए वे कृतकृत्य होते हैं। उनके जीवन प्रसंग औरों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन जाते हैं। भारतवर्ष का सांस्कृतिक इतिहास ऋषिगणों, विभूतियों द्वारा आत्मसत्ता के प्रचंड पुरुषार्थ से अर्जित उपलब्धियों— कथा-प्रसंगों से भरा पड़ा हैं। ये पौराणिक मिथक किसी को चमत्कृत करने के लिए नहीं, वरन उन्हें अध्यात्मक्षेत्र की असीम संभावनाओं का परिचय देने के लिए वर्णित किए जाते रहे हैं। उनका बार-बार स्मरण इसीलिए कराया जाता है।

संपूर्ण आत्मिक विभूतियों, ऋद्धि-सिद्धियों का आधार आत्मशोधन की साधना एवं लोक-मंगल की कामना से जुड़ा प्रचंड तप पुरुषार्थ ही रहा हैं। शाप और वरदान देने की शक्ति इसी आधार पर मिलती है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने नूतन सृष्टि की रचना इसी आधार पर की थी। मुनि भारद्वाज ने अपने अग्रज को मनाने, वापस जाते भरत का राजसी सत्कार अपने तपोबल के आधार पर किया था। महर्षि वशिष्ठ की कामधेनु किसी भी क्षण ऐश्वर्य-साम्राज्य खड़ा करने में सक्षम थी। यह उनकी तपोबल द्वारा अर्जित सिद्धि ही थी।

सिद्धियाँ दो तरह की होती हैं। प्रथम निम्न स्तर की अपरिष्कृत, अतिभौतिक एवं मानसिक शक्तियों की, दूसरी आध्यात्मिक शक्तियों के उच्चतम अभ्यास की। श्री मद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा कि— “जो साधक योग कर्म में लगे हैं तथा जिन्होंने अपनी इंद्रियों को दमित या शांत कर लिया है अथवा जो जितेंद्रिय हो गए हैं तथा जिन्होंने अपने मन को मुझ में एकाग्र कर लिया है, ऐसे योगियों की सेवा के लिए सभी सिद्धियाँ तैयार खड़ी रहती है। उनके प्रति सभी की कृपादृष्टि बनी रहती हैं। हिंसक जीव-जंतु, पशु-पक्षी भी उनके समीप आकर अपनी क्रूरता, हिंसाभाव भूल जाते हैं और अपने परिवार के सदस्यों जैसा व्यवहार करने लगते हैं।”

संत एकनाथ शूलभंजन पर्वत पर तपस्या कर रहे थे। भगवान के ध्यान में इतना निमग्न थे कि उनके ऊपर एक विषधर नाग चढ़ गया, जिसका उन्हें पता ही नहीं चला। काया के स्पर्शमात्र से विषैले सर्प का भाव बदल गया। दंश मारने के स्थान पर वह सिर पर फन फैलाकर बैठ गया। एक ग्वाले ने उन्हें जब सावधान किया तो वे बोले— जब प्रभु कृपालु होते हैं तो, जड़-चेतन सभी उसके हितैषी और शुभचिंतक बन जाते हैं। इस सर्प की मेरे ऊपर विशेष कृपा है। इसी तरह महर्षि रमण के पास हिंसक जीव शांतभाव से बैठे रहते थे। आश्रम के बंदर, गिलहरी उनसे खेलते थे। दो सुंदर मोर, कुत्ता, ‘कुरुप्पन’ तथा ‘लक्ष्मी’ गौ उनके विशेष प्रेमियों में थे।

उच्चस्तरीय साधना शक्तिसंपन्न साधकों में अद्भुत क्षमताएँ आ जाती हैं। वे चाहें तो भौतिक सीमाओं, बंधनों, आघातों एवं दिक् काल की मर्यादाओं से मुक्त एवं अप्रभावित बने रह सकते है। ऐसे अनेकों संत एवं सिद्धपुरुष हुए हैं, जिन्हें अपने सुधारवादी दृष्टिकोण या आन्दोलन के कारण तत्कालीन शासकों एवं प्रशासकों के कोप का शिकार होना पड़ा; पर वे उनका कुछ भी न बिगाड़ सके।

बनारस के मुगल शासक के कट्टरपंथी मुल्लाओं ने संत कबीर की शिकायत कर दी। उससे कहा गया कि वे अल्लाह के नाम पर लोगों को बरगलाते हैं। शासक ने उन्हें हथकड़ी डालकर गंगा में फेंक देने का आदेश दिया। विज्ञ समुदाय ने जब ऐसा करने से उसे रोकना चाहा तो कहा गया कि यदि इसका भगवान या अल्लाह कोई सगा होगा तो नदी में डूबने से इसे बचा लेगा; अंततः उसके आदेशानुसार संत कबीर को नदी में फेंक दिया गया। थोड़ी ही देर में वे आराम से किनारे पर आकर बैठ गए। उन्हें देखकर अनाचारी नतमस्तक हो गए। इसी तरह प्रसिद्ध योगी तैलंग स्वामी को भी अपने अवधूतपन के कारण एक अंग्रेज अधिकारी का कोपभाजन बनाना पड़ा। उसने अपनी देख-रेख में उन्हें जेल की एक कोठरी में बंद करा दिया और चारों ओर पुलिस का पहरा बिठा दिया। कुछ देर पश्चात् देखा तो वे छत पर टहलते नजर आए। उन्हें पकड़कर जब दुबारा कालकोठरी में ठूँस दिया गया तो इस बार वे बाहर मैदान में टहलते पाए गए। पूछे जाने पर उन्होंने कहा— “ईश्वर की इच्छा को ताले की चाबी द्वारा नहीं रोका जा सकता। यदि ऐसा संभव होता तो मृत्यु के पूर्व प्रियजनों को ताले में बंद करके बचाया जा सकता था “ इस घटना से प्रभावित होकर वह अंग्रेज जिलाधीश उनका भक्त बन गया।

आचार्य शंकर को बलि चढ़ाने की इच्छा से एक तांत्रिक धोखे से उन्हें वध स्थल पर ले गया। आचार्य मुस्कराते हुए खड़े रहे और वह उनके शरीर पर अपना खड्ग चलाता रहा। प्रत्येक बार में खड्ग शरीर के आर-पार यों निकलता रहा, मानों हवा में घूम रहा हो। इस दृश्य को देखकर तांत्रिक घबरा गया और उनके चरणों में गिर पड़ा। शंकराचार्य परकाया प्रवेश जैसी अनेकानेक सिद्धियों के स्वामी थे। अपने दिग्विजय अभियान में उन्होंने मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित करने के पश्चात उनकी पत्नी भारती देवी के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए आमरु नामक राजा के मृत शरीर में प्रवेश करके कामशास्त्र का अध्ययन किया था। इसके बाद पुनः अपने शरीर में वापस आ गए थे। एक अंग्रेज सैनिक अधिकारी एल॰ पी0 फैरेल ने भी हिमालय के एक योगी को अपनी वृद्ध जर्जर काया को त्यागते एवं नदी के प्रवाह में बहते एक युवा के मृत शरीर में प्रवेश करते देखा था। इस घटना का विशद वर्णन उनने अपनी पुस्तक में भी किया है। इटली के प्रसिद्ध संत पादरी पियो स्वेच्छानुसार अपने सूक्ष्मशरीर से यात्रा करने दूरस्थ लोगों तक पहुँचने तथा उन्हें सहायता पहुँचाने के लिए प्रख्यात रहे है।

आत्मसत्ता की प्रचंड क्षमता से स्थूलजगत में पदार्थगत एवं सूक्ष्मचेतन-जगत में अद्भुत परिवर्तन किये जा सकते हैं। किसी को भी मोड़ा-मरोड़ा और अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। ऐसे कई संत, महात्मा एवं योगी हुए हैं, जिन्होंने अपनी आत्मशक्ति का— उपलब्ध सिद्धियों का सदुपयोग मात्र जनकल्याण में, लोगों को सही दिशा की ओर प्रेरित करने में किया है।

संत ज्ञानेश्वर जन्मजात सिद्धपुरुष थे। प्रकृति पर उनका पूर्ण नियंत्रण था। वे आत्मा की सर्वव्यापकता एवं एकरूपता पर विश्वास करते थे और वहीं— लोगों को उपदेश भी दिया करते थे। एक बार उन्होंने पंडितो के बीच कहा— “आत्मा सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है” इस पर एक पंडित ने व्यंग्य किया और सामने कुछ दूर खड़े एक भैंसे की ओर संकेत करते हुए कहा - “इसका भी नाम ज्ञान है। तुम दोनों एक हो।” ज्ञानेश्वर ने कहा - "हाँ, दोनों की आत्मा एक है।" तभी किसी ने भैंसे की पीठ पर लाठी से जोरदार प्रहार किया और उसके निशान ज्ञानेश्वर की पीठ पर उभर आए। इस पर दूसरे पंडित ने कहा —"फिर तो भैंसा भी वेदपाठी हो सकता है?" संत ने उसकी पीठ पर हाथ रखा और उसके मुख से सस्वर वेदपाठ निकलने लगा। पंडितो को उनकी महत्ता स्वीकारनी पड़ी।

सिद्धियाँ वस्तुतः अंतःकरण की पवित्रता एवं तपश्चर्या की प्रखरता के आधार पर ही अर्जित की जाती है। ऐसे महापुरुषों के अंतःकरण से निकले शब्द कभी निष्फल नहीं जाते। तपश्चर्या द्वारा उपार्जित प्राणशक्ति का एक अंश देकर वे अनेकों को आगे बढ़ाते, ऊँचे उठाते देखे गए हैं। समर्थ गुरु ने शिवाजी को, प्राणनाथ ने छत्रसाल को, रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद को, विरजानंद ने दयानंद को इसी तरह सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप दिशा दी और अपनी सिद्धियाँ हस्तांतरित कर उन्हें राष्ट्र, समाज एवं संस्कृति की महान सेवा करने के लिए प्रेरित किया। समर्थ ने शिवाजी की परीक्षा ली और उत्तीर्ण होने पर उन्हें भवानी से प्राप्त एक अजेय तलवार दी। आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा — “इस तलवार को लेकर तू कभी पराजित नहीं हो सकता।” वैसा ही हुआ भी। अर्जुन को तपस्या एवं चरित्रनिष्ठा में खरा सिद्ध होने पर ही शिवजी से पाशुपत अस्त्र, इंद्र से गाण्डीव तथा अग्नि से अक्षय तरकश प्राप्त हुआ था। बुंदेलखंड के छत्रसाल पर संत प्राणनाथ जी प्रसन्न हो गए थे। उन्होंने एक दिन प्रातःकाल उनसे कहा कि आप जितने क्षेत्र की परिक्रमा घोड़े पर चढ़कर लगा लोगे, उस भूमि में रत्नों की उपलब्धि होने लगेगी। मध्य प्रदेश का पन्ना क्षेत्र अभी भी हीरों का उत्पादक क्षेत्र बना हुआ हैं। वहाँ के निवासी इसे अपने राजा के गुरु की शक्ति का प्रताप ही मानते है।

परम योगी गोरखनाथ जी की सिद्धि-कथाएँ अभी भी लोक-मानस में छाई हुई हैं। उन्होंने अपने योग एवं तपशक्ति का उपयोग सदैव लोक-मंगल के लिए समर्पित प्रतिभाओं को खोजने और उन्हें दिशा देने के लिए किया है। कहा जाता है कि सियालकोट के राजा पूरण को उनकी विमाता ने हाथ-पैर कटवाकर कुँए में फिंकवा दिया था। गोरखनाथ ने उनका उद्धार किया और दीक्षा दी। कालांतर में चौरंगीनाथ के नाम से वे विख्यात संत हुए। मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा रावल को प्रसन्न होकर उन्होंने एक सिद्ध तलवार दी थी। जिसके बल पर बप्पा रावल ने चित्तौड़ राज्य की स्थापना की। वह तलवार पीढ़ियों तक राज्य चिह्न के रूप में चलती रही। राजा भर्तृहरि भी उन्हीं के शिष्य थे।

सिद्ध मुस्लिम संतों में दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया और शेख सलीम चिश्ती अधिक प्रसिद्ध हैं। उन दिनों संत निजामुद्दीन की सिद्धि-गाथाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थी, जिससे कुपित होकर एक बार तत्कालीन शासक ने उन्हें फरेबी समझकर उनके यहाँ भेजे जाने वाले तेल पर रोक लगा दी। इस तेल से दीपक जलाए जाते थे। जब इस स्थिति की जानकारी संत को हुई तो उन्होंने शिष्यों से कुएँ का पानी भरकर दीपकों में डालने को कहा। उनके आदेश का पालन हुआ और पानी तेल की तरह दीपकों में जलने लगा। दिल्ली का वही क्षेत्र आज “चिराग दिल्ली” के नाम से विख्यात है। इसी तरह बादशाह गयासुद्दीन एक बार उन्हें दंडित करने की घोषणा करके चला था। बल्लभगढ़ के पास शाही लश्कर पहुँच चुका था। लोगों ने संत को इसकी सूचना दी तो वे बोले अभी दिल्ली दूर है।” और दिल्ली पहुँचने के पहले ही गयासुद्दीन चल बसा।

तप-साधन से प्रसुप्त अंतःशक्तियों का जागरण होता है; किंतु प्रभावशाली वे तभी होती है जब उच्च उद्देश्यों से जागृत शक्तियाँ-सिद्धियाँ अंततः दुर्बल सिद्ध होती हैं और साधक के पतन तथा विनाश का कारण बनती हैं। दुर्वासा ने अहंकार से प्रेरित होकर तपशक्ति से कृत्या पैदा की और बदले की भावना से राजा अंबरीष पर छोड़ी। इस पर उन्होंने सदाशयता से भगवान का स्मरण किया तो चक्रसुदर्शन प्रकट हुआ। कृत्या पराजित हुई तथा दुर्वासा को अंबरीष से क्षमा माँगनी पड़ी। इसी तरह कणाद ऋषि को नीचा दिखाने की इच्छा से वे एक बार उनके यहाँ भोजन करने जा पहुँचे और असाधारण क्षुधा बढ़ा ली। कणाद ने सहज आतिथ्य भाव से कण-कण एकत्र किए गए अन्न को अक्षय बना दिया। दुर्वासा का पेट भर गया पर अन्न समाप्त नहीं हुआ।

राक्षस वस्तुतः भटके हुए साधक थे। उन्होंने उपलब्ध क्षमताओं का अहंकारवश दुरुपयोग करना चाहा और किया भी; इसीलिए सबके सब विनष्ट हुए, अन्यथा उन्हें असाधारण सामर्थ्य प्राप्त थी। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि में जलने की सिद्धि प्राप्त थी। प्रहलाद को लेकर लकड़ियों के ढेर पर बैठ गई। प्रज्वलित अग्नि में वह भस्म हो गई, पर प्रहलाद बच गए। सिद्धियाँ एक ओर रखी रह गई।

भस्मासुर, शुंभ-निशुंभ, मधुकैटभ, नरकासुर, वृत्रासुर जैसे अनेकों राक्षसों ने तप से ही सिद्धियाँ अर्जित की थीं। उनका लक्ष्य सदैव एक ही रहता था। देवतत्त्व को किस प्रकार हानि पहुँचाई जाए, उन्हें कैसे नष्ट किया जाए? पौराणिक मिथकों में देवासुर संग्राम की चर्चा प्रायः हर कल्पयुग के साथ जुड़ी पाई जाती है। संभवतः ऋषि-मनीषियों का इन कथानकों-मिथकों से यह तात्पर्य रहा हो कि मात्र तप-तितीक्षा ही सब कुछ नहीं। संयम से उपलब्ध क्षमताओं का क्षरण रोकना एवं पात्रता का उपार्जनकर इन सिद्धियों का सत्प्रयोजनों में प्रयोग हो रहा है अथवा नहीं, यही अनुशासित व्यवस्था परम सत्ता की ही है। देवपक्ष जहाँ असंयम से, विलासिता से समय-समय पर अपनी क्षमताएँ नष्ट करता रहा है, वहाँ असुरपक्ष ने सिद्धियों का दुरुपयोग मात्र किया है। दोनों को ही ऐसी दशा में पतन-पराभव का मुख देखना पड़ा हैं। संयम की प्रेरणा देकर अवतारसत्ता ने स्वयं अवतरित हो देवों का मनोबल बढ़ाया एवं उन्हें विजय के लक्ष्य तक पहुँचाया है। साथ ही जिन असुरों ने विद्वता में, शक्तिसंचय में, सिद्धि-सामर्थ्य में महारत हासिल की, किंतु दुर्मतिवश पथभ्रष्ट हो गए, उन्हें नष्ट करने का प्रयोजन भी उसी परम सत्ता ने पूरा किया है, जिसने वरदान दिया थ; किंतु जब उसने अनाचार की अति कर दी, अपनी सामर्थ्य से ऋषियों-तपस्वियों का जीना दूभर कर दिया, तो ऋषिरक्त को संचितकर स्वयं शक्ति ने सीता के रूप में अवतरित होने का निश्चय किया। इन्हीं सीता का रावण ने दुर्बुद्धिवश अपहरण किया एवं राम के रूप में बारह कलाओं से संपन्न स्वयं भगवत सत्ता ने उस रावण के सारे वंश को समूल नष्ट कर दिया। अनीति देर तक टिक नहीं पाती। सिद्धियाँ चाहे वे भौतिक हों अथवा आध्यात्मिक हर दृष्टि से सुनियोजित दिशा की अपेक्षा रखती हैं। नहीं तो, उनके लुप्त होने में तनिक भी विलंब नहीं लगता। हर साधक को यह तथ्य सदैव ध्यान में रखना चाहिए।

योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पातंजलि ने मानव द्वारा अर्जित की जा सकने वाली सिद्धियों का विभाजन योग्यता तथा शक्ति के आधार पर आठ वर्गों में किया हैं। ये हैं— अणिमा (परमाणु की तरह सूक्ष्म हो जाना), महिमा (अति विशाल हो जाना), लघिमा (अत्यंत हल्का हो जाना), गरिमा (सघन हो जाना), प्राप्ति (कहीं भी जा पहुँचने की शक्ति), प्रकाम्य (इच्छाओं तथा कामनाओं को जानने की सामर्थ्य), इश्वतत्त्व (नियंत्रण तथा निर्माण की शक्ति), वशितत्त्व (सभी पदार्थों पर शासन करने की सामर्थ्य)। ये सभी मूलतः भौतिक क्षेत्र से संबंधित शक्तियाँ हैं। इनसे आध्यात्मिक प्रगति, सद्गुण-संवर्द्धन, ईश्वरीयसत्ता से साक्षात्कार की, जीवनमुक्ति की आशा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि उच्चस्तरीय साधक इन सिद्धियों की कभी कामना नहीं करते। वे निष्काम योग-साधना में, समष्टि की आराधना में विश्वास रखते है। इसके बदले दैवी अनुग्रह एवं असीम जनसमुदाय का सहयोग-सम्मान पाते हैं, आत्मसंतोषरूपी अनुदान पाते हैं।


मौन की व्याख्या (कहानी)

जब महाभारत का अंतिम श्लोक महर्षि वेदव्यास के मुखारबिंद से निःसृत हुआ, गणेशजी के सुडौल सुपाठ्य अक्षरों में भूर्जपत्र पर अंकित हो चुका, तब गणेशजी से महर्षि ने कहा - “विघ्नेश्वर, धन्य है आपकी लेखनी! महाभारत का सृजन तो वस्तुतः उसी ने किया है, पर एक वस्तु आपकी लेखनी से भी अधिक विस्मयकारी है— वह है आपका मौन। सुदीर्घकाल तक आपका हमारा साथ रहा। इस अवधि में मैंने तो पंद्रह-बीस लाख शब्द बोल डाले, परंतु आपके मुख से मैंने एक भी शब्द नहीं सुना।"

इस पर गणेशजी ने मौन की व्याख्या करते हुए कहा —“बादरायण, किसी दीपक में अधिक तेल होता है, किसी में कम, परंतु तेल का अक्षय भंडार किसी दीपक में नहीं होता।उसी प्रकार देव, मानवदानव आदि जितने भी तनुधारी हैं, सबकी प्राणशक्ति सीमित है — किसी की कम है: किसी की कुछ अधिक, परंतु असीम किसी की नहीं। इस प्राणशक्ति का पूर्णतः लाभ वही पा सकता है, जो संयम से उसका उपयोग करता है। संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है, और संयम का प्रथम सोपान— वचोगुप्ति अर्थात् वाक् संयम। जो वाणी संयम नहीं रखता, उसका जिव्हा बोलती रहती है। बहुत बोलने वाली जिव्हा अनावश्यक बोलती रहती हैं, और अनावश्यक शब्द प्रायः विग्रह और वैमनस्य पैदा करते हैं, जो हमारी प्राणशक्ति को सोख डालते हैं। वचोगुप्ति से यह समस्त अनर्थ परंपरा दग्धबीज हो जाती है, इसलिए मैं मौन का उपासक हूँ।


नादयोग द्वारा आत्मपर्यवेक्षण

जिस प्रकार शरीर और प्राण मिलकर जीवन चलता है, उसी प्रकार प्रकृति और परब्रह्म के संयोग से यह सृष्टिचक्र चलता है। दोनों इतनी अधिक सघनता के साथ गुँथे हुए हैं कि उन्हें एकदूसरे से अलग नहीं कर सकते।

साधना शरीर और मन के संयोग से बन पड़ने वाली क्रिया का नाम है। इस माध्यम से हम पहले प्रकृति को पकड़ते हैं, इसके बाद पुरुष को पकड़ते हैं। साधना के क्रिया-कृत्यों में प्रथम भूमिका शरीर की होती है, शरीर के साथ मन की भी; क्योंकि मन और शरीर दोनों ही प्रकृति विनिर्मित हैं। मन को ग्यारहवीं इंद्रिय माना गया है। उसकी ऊँची भूमिका भावात्मक है, जो रसरूप परब्रह्म को अपने चंगुल में जकड़ती है।

ज्ञानेंद्रियो के सहारे सांसारिक ही नहीं आध्यात्मिक प्रयोजन भी सिद्ध होते हैं। शब्द नेत्रों का विषय है। उसकी सूक्ष्म भूमिका प्रत्यक्ष देव प्रतिमादर्शन अथवा ध्यानयोग के माध्यम से निभती है। इसके बाद दो धाराओं वाली जिव्हा को वश में करना पड़ता है। जिव्हा स्वाद एवं संभाषण की दुहरी कार्यपद्धति संपन्न करती है, इसलिए उसे द्विधा कहा गया है। इस निमित्त अस्वाद व्रत, मौनधारण, उपवास के अतिरिक्त खेचरी मुद्रा का विधान है। उससे शरीर, मन और आत्मा के तीनों क्षेत्र सधते हैं।

कर्णेंद्रियों का शब्द माध्यम है। इसे सत्संग के द्वारा विकसित किया जाता है। प्रवचन-उपदेश, संगीत-कीर्तन आदि के अतिरिक्त नादयोग की साधना करनी होती है। स्थूल और सूक्ष्मनाद इस समूचे ब्रह्मांड में संव्याप्त है। वह संभाषण में ही नहीं, घटनाओं से भी उत्पन्न होता है। भगदड़, मारपीट, धमाका, चीत्कार आदि ध्वनियाँ हैं, पर उनके सहारे यह जान लिया जाता है कि क्या घटना घटित हो रही है। आग लगने, आँधी चलने, पानी बरसने आदि की घटनाओं को अंधे भी जान लेते हैं। शब्दों की अपनी भाषा है। भाषा न समझने वाले संकेतों से भी अपने मनोभाव व्यक्त कर देते हैं।

स्थूलजगत की तरह सूक्ष्मजगत भी है और सूक्ष्मजगत में जो ध्वनियाँ गूँजती हैं, वे हमारे कानों की पकड़ में नहीं आतीं। यदि उन्हें सुना-समझा जा सके तो उनके आधार पर यह जाना जा सकता है कि कहाँ क्या घटनाक्रम घटित हो रहा है और उसका प्रभाव अपने पर तथा अपने क्षेत्र पर क्या पड़ेगा?

कानों की ग्रहणशक्ति बहुत सीमित और भौंड़ी है। हमारे कान एक सेकेंड बीस से लेकर बीस हजार तक कंपन उत्पन्न करने वाली ध्वनियों को ही सुन सकते हैं, इससे न्यूनाधिक शक्ति वाली ध्वनियाँ उनकी पकड़ में नहीं आतीं। श्रवणातीत सुपरसोनिक ध्वनियाँ 10 लाख से लेकर 1000 करोड़ तक के कंपन हर सेकेंड उत्पन्न करती पाई गई हैं। वे हमारे कानों के इर्द-गिर्द होकर ही निकल जाने पर भी सुनाई नहीं देती। तात्पर्य यह है कि महाशब्द सागर में से हम अपने लिए उतना ही सुन पाते हैं, जितना कि जीवन निर्वाह के लिए नितांत आवश्यक है।

श्रवणातीत ध्वनियों का उपयोग जब से वैज्ञानिकों ने जाना है, तब से वे उनके प्रभावशाली उपयोग करने लगे हैं। शल्य चिकित्सा, कीटाणु, ऋतु-परिवर्तन, मोटे धातुखंडों को गला देना, जैसे प्रचंड कार्य उनसे लिए जा रहे हैं। उन्हें प्रकारांतर से बिजली या अणुशक्ति की तरह काम में लाया जाया जाने लगा है।

ताप और आकाश की गति का अपना महत्त्व है। उनकी गति भी कम नहीं है; किंतु जहाँ तक घटनाक्रमों एवं विचार चेतना का संबंध है, वहाँ तक ध्वनि ही मनुष्य की ज्ञानवृद्धि में अत्यधिक सहायक पाई गई है। समुद्रतल में होने वाली हलचलों या चलने वाली पनडुब्बियों की स्थिति एवं दूरी को जानने के लिए ध्वनि-तरंगों के आधार पर नाप-तौल करने वाले यंत्र ही काम करते हैं।

अंतरिक्ष में संव्याप्त अदृश्य जगत की हलचलों की ध्वनि-श्रवण की क्षमता समुन्नत करने की स्थिति को जाना जा सकता है। वे अभ्यस्त के लिए टेलीफोन, रेडियो स्तर की भूमिका निभा सकती हैं। यों कान के शब्द थोड़ी ही दूर तक सुनाई पड़ता है। पर रेडियो स्टेशनों से प्रसारणों को ‘सुपर इम्पोजिशन ऑफ साउण्ड बैव्स’ क सिद्धांत पर तीव्र बना दिया जाता है, तो एक सेकेंड से भी कम समय में वे तरंगें समूची पृथ्वी का चक्कर लगा लेती है। अंतरिक्ष में उड़ रहे कृत्रिम उपग्रहों की गतिविधियों के संबंध में इसी आधार पर जानकारी मिलती है या चालकों से बात-चीत होती है।

ध्वनि कहने-सुनने में एक प्रतीत होती है, पर उसके कई भाग-विभाग होते हैं। अल्ट्रासोनिक, इन्फ्रासोनिक, सोनिक, हाइपरसोनिक, सुपरसोनिक आदि के रूप में उनका वर्गीकरण एवं विभिन्न प्रयोजनों के लिए उनका प्रयोग होता है। फिर भी जितना जाना जा सकता है वह स्थूल जगत से संबद्ध है। अभी अदृश्य जगत और सुपरयूनीवर्स में काम करने वाली ध्वनियों का स्वरूप और क्रिया कलाप जानना बाकी है। यह कार्य शायद भौतिक उपकरणों के सहारे न हो सके। उसे मनुष्य के कानों में काम करने वाली झिल्ली को अधिक शक्तिशाली बनाकर, साथ ही उसके साथ मानसिक अतींद्रिय क्षमताओं को समावेश करके ही उस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है कि आकाश में भ्रमण करने वाले ग्रह-नक्षत्रों की हलचलों से अवगत हो सकें। जो घटनाक्रम घटित हो चुका अथवा भविष्य में घटित होने वाला है, उसकी संभावना का सही अनुमान लगा सकें। पितृलोक, देवलोक या ब्रह्मलोक की सत्ताओं से उसी प्रकार विचार-विनिमय कर सकें, जैसे कि टेलीफोन द्वारा मनुष्य के बीच किया जाता है।

नाद का आरंभिक अभ्यास कोलाहलरहित शांत एकांत स्थान में किया जाता है। दोनों कानों में उँगलियाँ, शीशियों के कार्क की, कपडेें की कड़ी गोली लगाई जाती है, जिससे बाहर के शब्द भीतर न पहुँचे। पालथी मारकर मेरुदंड और ग्रीवा को एक सीध में रखना आवश्यक है। प्रथम चरण में अंतर्मुखी होना पड़ता है और तरह-तरह की आवाजें, जो भीतर से अंग-प्रत्यंगों की हलचलों द्वारा उठती है, उन्हें ध्यानपूर्वक सुनना पड़ता है। डाॅक्टर स्टेथास्कोप को कान में लगाकर रोगी के हृदय की धड़कन सुनते हैं और उन्हें ‘लप-डप’ के रूप में धड़कन तथा खरखराहट (मरमर) के रूप में उस क्षेत्र की विकृतियाँ समझ में आती है। नादयोग के आधार पर उन्हें सुना और अभ्यास द्वारा यह जाना जा सकता है कि शरीर के भीतर किस अंग-अवयव में क्या सही और क्या गलत हो रहा है। यह नादयोग द्वारा अंतर निदान की विधि है, जिसके द्वारा वर्तमान का ही नहीं, शरीर का भावी घटनाक्रम भी जाना जा सकता है।

टोरेण्टों के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा साउण्ड प्रूफ केबिन बनाया, जिससे साँस लेने की व्यवस्था तो रहे पर बाहर का कोई शब्द सुनाई न पड़े। पाया गया कि उस स्थिति में बैठे हुए व्यक्ति को श्वास-प्रश्वास की क्रिया आँधी-तूफान चलने जैसे- हृदय की धड़कन पत्थर तोड़ने जैसे, पेट भीतर के पाचनतंत्र की क्रियाएँ रेलगाड़ी चलने जैसी सुनाई पड़ रही थी। इस आधार पर अब एक नयए विधान— विज्ञान का अन्वेषण हो रहा है। जिसके सहारे हर व्यक्ति अपने भीतरी अंगों की गतिविधियाँ सुन सके और रोग के स्वरूप को स्वयं ही दूसरों के निरीक्षण-परीक्षण के बिना ही आत्मपर्यवेक्षण कर सके।

योग विज्ञान ने नादयोग के द्वारा न केवल स्थूलशरीर को समझने में सफलता पाई थी; वरन सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर की स्थिति जानने, सुधारने एवं वलिष्ठ करने की विधा खोज निकालने में भी सफलता पाई है। यह अनुभूतियाँ अंतराल की गहन परतों में पहुँचती तथा यह बताती है कि विकृति का कहाँ  क्या स्वरुप है और उसके निराकरण के लिए भौतिक एवं आत्मिक स्तर का क्या उपचार होना चाहिए? यह प्रथम चरण ऐसा है जिसे नादयोग की आत्मनिरीक्षण प्रक्रिया के साथ जोड़ा जा सकता है।


जीवन की पग-पग पर परीक्षा की (कहानी)

अब्राहीम लिंकन से एक बार उनके जन्म दिन पर एक पत्रकार ने पूछा—"आप साधारण मनुष्य से राष्ट्रपति बने; इस सफलता का रहस्य क्या है? लिंकन बोले— "मैंने अपनी जीवन की पग-पग पर परीक्षा की। हर असफलता से कुछ सीखा, सँभला और नए रास्ते बनाता चला गया।"


अदृश्य चेतना का दृश्य उभार

जिस क्षेत्र में जिस प्रकार की गतिविधियाँ लंबे समय तक चलती रहती हैं, वहाँ का वातावरण उस प्रक्रिया से प्रभावित होता है। वहाँ रहने वाले उस चिरविनिर्मित प्रभाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। कोई विरल ही ऐसे होते हैं जो, उस दबाव या आकर्षण को अस्वीकार कर सकें,  इसलिए जिन्हें जिस स्तर का बनना होता है वे वहाँ खिंचते-घिसटते जा पहुँचते हैं। मन उधर ही चलता है। वातावरण भी अपने अनुरूप व्यक्तियों को अपनी ओर खींचता है। धातुओं की खदानें भी इसी प्रकार बनती हैं। जहाँ धातुखंड बड़ी मात्रा में जमा हो जाते हैं, वहाँ एक विशेष प्रकार का चुंबकत्व पैदा हो जाता है। उसकी आकर्षणशक्ति दूर-दूर तक बिखरे हुए उसी जाति के धातु-कणों को धीरे-धीरे अपनी ओर खींचती रहती है। फलतः वह संग्रह निरंतर बढ़ता रहता है और छोटी खदान कुछ ही समय में बड़ी बन जाती है। ऐसा ही आकर्षण व्यक्तियों में भी देखा गया है और क्षेत्रों में भी, वातावरण में भी।

शहरी सुविधाओं से अभावग्रस्त ग्रामीण अथवा आबू स्तर के मनचले लोग अनायास ही खिंचते चले आते हैं। स्वभाव के अनुरूप उन्हें अदृश्य निमंत्रण मिलता है और ऐसा संयोग बन जाता है, जिससे वे मनचाहे स्थान तक जा पहुँचने के लिए कोई संयोग प्राप्त कर सके। जुआघर, शराबखाने, व्यभिचार के अड्डे भी अपने-अपने ढंग के लोगों को अदृश्य आमंत्रण देकर बुलाते रहते हैं; फलतः एक ही प्रकृति के लोगों के गिरोह उन केंद्रों से संबद्ध हो जाते हैं। यही बात सत्संगों के संबंध में भी है। उत्कृष्ट स्तर के लोग भी परस्पर संबंध बनाते और एक श्रृंखला में बंधते देखते गए हैं। चोर-उचक्कों से लेकर तस्करों, हत्यारों तक के गिरोह इसी प्रकार बनते हैं। संत-सज्जनों की जमातें भी इसी आधार पर बनती देखी गई हैं। संभवतः देवलोक और नरक भी इसी सिद्धांत के अनुरूप बने हैं। शोध-संस्थानों से लेकर पुस्तकालयों तक में एक ही प्रकृति के लोग जमे पाए जाते हैं। इससे प्रकट है कि वातावरण और स्वभाव का आपस में सहज तारतम्य बैठ जाता है। हिमालय के सिद्धपुरुषों के संबंध में भी यही बात है ओर देवात्मा-क्षेत्र के संबंध में भी। वहाँ का परिकर बढ़ता भी जाता है और समर्थ बलिष्ठ होते जाने की स्थिति में भी होता जाता है। लंका के छोटे से क्षेत्र में रावण का सुविस्तृत परिकर जमा हो गया था। नैमिषारण्य में सूत और शौनक समुदाय का कथा-सत्संग जमा ही रहता है। इसी प्रकार हिमालय में देवात्मा क्षेत्र भी क्रमशः अधिक विस्तृत और परिपुष्ट होता चला गया हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

महाभारत के लिए कृष्ण को उपयुक्त भूमि तलाश करनी थी। जहाँ भाई-भाई की लड़ाई में मोह आड़े न आने पाए। दूतों को भेजा और वहाँ के क्षेत्रों के प्रचलन को तलाश कराया तो मालूम पड़ा कि कुरुक्षेत्र के इर्द-गिर्द भाई-भाई के साथ निर्ममतापूर्वक मार-काट करते रहने की घटनाएँ अधिक होती हैं। भूमि संस्कारों के प्रभाव को समझते हुए उसी क्षेत्र में महाभारत रचाऐ जाने का निश्चय हुआ। इसी प्रकार की एक पौराणिक घटना श्रवण कुमार की भी है। उनके कंधे पर रखी काँवर में बैठे बंधे माता-पिता को नीचे उतार दिया था और कहा था आप लोग पैदल चलें। मैं रस्सी के सहारे आपको रास्ता बता सकता हूँ। पैर ठीक होते हुए भी आप कंधे पर क्यों सवार होते हैं? माता-पिता पुत्र के यश को व्यापक बनाना चाहते थे। उसमें इस प्रकार का व्यवहार आया देखकर उनने जान लिया कि यह कुसंस्कारी भूमि का प्रभाव है। उनने पुत्र को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि रात्रि को वहाँ विश्राम न किया जाए। जल्दी ही यह क्षेत्र पार लिया जाए। जैसे ही वह परिधि पार हुई, श्रवण कुमार के विचार बदले। उसने माता-पिता से क्षमा याचना की और फिर कंधे पर काँवर में बिठाकर पहले की ही भाँति आगे की यात्रा प्रारंभ की। यह संस्कारित भूमि का प्रभाव है, जो मनुष्य में उत्कृष्टता एवं निष्कृष्टता के उतार-चढ़ाव उत्पन्न करता रहता है। हिमालय के देवात्मा क्षेत्र के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। उसमें सूक्ष्मशरीरधारी सिद्धपुरुषों का तो निवास रहता है, साथ ही उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप अन्यान्य साधन भी उत्पन्न एवं विकसित हुए हैं। वहाँ पाई जाने वाली वस्तुओं में अपनी विशेषता है। वहाँ रहने वाले मनुष्यों और प्राणियों में विशेष प्रकार का स्वभाव भी पाया जाता है।

जौनसार बावर (चकराता-त्यूंणी) इलाके में अभी भी बहुपति प्रथा का प्रचलन है। बहुपत्नि प्रथा का रिवाज जो पुराने जमाने की तरह अभी भी जहाँ-तहाँ दिख पड़ता है; किंतु बहुपति प्रथा का खुला प्रचलन कहीं नहीं है। वेश्यावृत्ति अवश्य होती है, पर वहाँ तो मात्र देह व्यापार भर है। गृहस्थ बनाकर बहुपतियों के समान रूप से सहयोगपूर्वक रहना इसलिए संभव नहीं होता कि पुरुषों में स्त्रियों से भी अधिक इस संबंध में ईर्ष्या पाई जाती है। वे अपनी पत्नि का अन्य पुरुषों से संबंध सहन नहीं कर पाते और पता चलते ही भयंकर विग्रह पर उतर आते हैं; किंतु पृथ्वी पर जौनार बावर ही एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ बड़े भाई का विवाह होता है। शेष सभी छोटे भाई अपनी बड़ी भावज के साथ पत्नीवत संबंध बनाए रहते हैं। यह गुप-चुप नहीं होता। सबकी जानकारी में होता है। संतानें भी बड़े पिताजी, मझले पिताजी, छोटे पिताजी आदि संबोधन करती हैं। ईर्ष्या और कलह जैसा कुछ रंचमात्र भी नहीं दिख पड़ता है। इतिहास पुराणों में एक द्रौपदी की ही ऐसी कथा है, किंतु आज के ईर्ष्या-द्वेष से ऊंचे उठकर दांपत्य जीवन में भी सहयोग मात्र जौनसार बावर क्षेत्र में ही दिख पड़ता है। यही मानवी ईर्ष्या पर सद्भाव की विजय है। यह क्षेत्र भी देवात्मा हिमालय की परिधि में ही आता है।

हिमालय की ऊँचाई पर स्त्रियों का सौंदर्य बढ़ता जाता है, वहाँ पर व्यभिचार जैसी घटनाएँ कभी ही सुनने में आती है। तलाक और पुनर्विवाह तो होते हैं, पर वह सारी व्यवस्था पंचों की आज्ञा व अनुमति से सभी की जानकारी में होती है। घरों में उधर ताले अभी भी कम लगते हैं। दरवाजों में कुंजी चढ़ाकर या रस्सी बाँधकर घर वाले काम पर चले जाते हैं। रोक-थाम मात्र जानवरों की होती है। कोई किसी की चोरी नहीं करता। पहाड़ी कुलियों की ईमानदारी प्रसिद्ध है। वे बोझा लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान को चलते हैं, जिसमें बहुमूल्य वस्तुएँ तथा नकदी भी होती है। कुली आगे पीछे निकल जाते हैं, पर कभी ऐसा नहीं सुनने में आया कि कोई कुली सामान लेकर गायब हुआ हो या उसमें से अवसर पाकर कुछ चुराया हो। यह सहज सज्जनता वहाँ के सामान्य निवासियों में पाई जाती है, फिर जो विचारशील है, उनकी भलमनसाहत का तो कहना ही क्या?

प्रकृति का चेतन से संबंध है और चेतना का प्रकृति से। दोनों की उत्कृष्टता-निकृष्टता का परस्पर संबंध बनता है। बसन्त जब महकता है, तो उसका प्रभाव कोकिल, भ्रमर आदि से लेकर अन्यान्य जीवधारियों में मस्ती बनकर झूमता है। मादाएँ, प्रायः उन्हें दिनों गर्भ धारण करती हैं। बसंत समूची धरती पर एक ही समय नहीं आता, विभिन्न भूखंडों पर उसके ऋतु, मास अलग-अलग होते हैं। जिस क्षेत्र में बसंत उमगता है, उसी में उसका मादक प्रभाव भी परिलक्षित होता है। देवात्मा हिमालय में वृक्षों का बसंत ग्रीष्म में और वनस्पतियों का श्रावण, भाद्रपद में आता है; पर आध्यात्मिक उमंग उस क्षेत्र पर सर्वदा छाई रहती है। इसमें वनस्पति, हिम, नदी, निर्झर आदि सभी की पुलकन समाहित है। यह प्रकृति के दबाव से होता है या चेतना के उल्लास से, इसका रहस्य गहराई में उतरकर देखा जाए तो प्रतीत होता है कि देवात्मा क्षेत्र में संव्याप्त चेतना-तरंगें ही वातावरण को प्रभावित करती हैं। जो भी उधर जाता है, रहता है, स्थिर है, वह सात्विकता से ओत-प्रोत होते देखा जाता है। उसमें सामान्य की तुलना में अनेकों प्रकार की विशेषताएँ पाई जाती हैं।

देवात्मा क्षेत्र हरिद्वार से आरंभ होकर यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ, सत्तोपंथ, गोमुख, तपोवन, नंदनवन, शिवलिंग वाले उत्तराखण्ड से आरंभ होकर कैलाश मानसरोवर तक चला गया है। कैलाश क्षेत्र को देवभूमि माना जाता है। शिव को कैलाश और पार्वती को मानसरोवर कहा जाता है। इस क्षेत्र के प्रत्येक शिखर को एक मूर्तिमान देव माना गया है। नदियाँ, सरोवर, झरने देवियाँ हैं। गुफाओं को देवालय कहा जा सकता है। इसी प्रकार यदि किसी को दिव्यदृष्टि प्राप्त हो तो वह सारा क्षेत्र प्रकटतः प्राकृतिक पदार्थों से बना है, किंतु तत्त्वतः देव चेतना से ओत-प्रोत दिखाई पड़ेगा। इस क्षेत्र में यदा-कदा तीर्थयात्री जो वहाँ जा पहुँचते हैं, वे प्रकृति की शांतिदायक शीतलता और साथ ही दिव्य चेतना की अभिनव प्रेरणा प्राप्त करते हैं। शर्त एक ही है कि पहुँचने वाला दिव्य भावना लेकर दिव्य प्रयोजन के लिए वहाँ पहुँचता हो। जहाँ शांति मिले, वहाँ कुछ समय शांत मन से ठहर सकने जितना अवकाश लेकर गया हो। जो भगदड़ की तरह धक्के देते और धक्के खाते भटकते-भटकते पहुँचते हैं, उन्हें मात्र कौतुक-कौतूहल ही दिख पड़ता है। ऐसे दिग्भ्रांत मुख को हर जगह पाए जाने वाले धूर्त आसानी से पहचान लेते हैं और उलटे उस्तरे से हजामत बनाते हैं। इस वरदान क्षेत्र में अभिशाप भी उसी प्रकार पाए जाते हैं, जैसे घर बिस्तर में चूहे, छिपकली, मकड़ी, खटमल, पिस्सू, जुएँ आदि का अड्डा जमा रहता है। मलीनता ही उनकी खुराक है। जो भाव-श्रद्धा लेकर नहीं, कामनाओं की पूर्ति और चित्र-विचित्र दृश्य देखने जाते हैं, वे खोज और थकान ही साथ लेकर वापस लौटते हैं।

चर्मचक्षुओं को दृश्य पदार्थ ही दिख पड़ते हैं। उन्हें देखकर ही उन्हें मन को संतोष देना पड़ता है। बालबोध की प्राथमिक पुस्तकों में प्रत्येक अक्षर के साथ एक तस्वीर जुड़ी रहती है। स्मरण रखने की दृष्टि से इस प्रकार की संगति बिठाने की उपयोगिता भी है। चित्रकला, मूर्तिकला का आधार यही है— प्रत्यक्ष को देखकर उसके साथ जुड़े हुए भावनात्मक संबंध सूत्र को, प्रतिपादित भाव-चेतना को, जागृत करना। प्रसन्नता की बात है कि यह आवश्यकता भी उदारचेतासंपन्न जनों ने अनुभव की है और ऐसे देवालय स्मारक इस क्षेत्र में विनिर्मित किए हैं, जिनके दर्शन, पूजन-वंदन के सहारे प्रसुप्त श्रद्धा को किसी सीमा तक लगाया जा सकता है। इस जागरण को यदि बिजली की कौंध जैसा क्षणिक न रहने दिया जाए, उस आलोक को अंतरात्मा में बसा कर मार्ग दर्शन के लिए आधार बनाया जाय तो यह सब प्रकार उपयुक्त ही होगा। ऐसी तीर्थयात्रा से भी आत्मिक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करने में सहायता मिलती है। फिर भी इतना तो स्मरण रखा ही जाना चाहिए कि पदार्थों से बने और आँखों से देखे गए दृश्य नेत्रों के माध्यम से आँखों को ही प्रभावित कर पाते हैं। दृश्य बदलने पर दृष्टि बदल जाती है और उसके माध्यम से मस्तिष्क पर पड़ी छाप भी तिरोहित हो जाती है।

विद्याध्ययन वर्णमाला याद करने से आरंभ होता है। दिव्य चेतना के साथ अंतराल के जोड़ने की प्रक्रिया विशुद्ध भावनात्मक है, अदृश्य भी। फिर भी उसके लिए आवरण की सहायता लेनी पड़ती है। देवात्मा हिमालय में दिख पड़ने वाले दृश्य एवं देवालय इसी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं।


लक्ष्मीजी का निवास (कहानी)

इस बार देवताओं की प्रार्थना स्वीकार हो गई। लक्ष्मीजी असुरों का वासस्थान सदैव के लिए परित्यागकर देवताओं के आश्रम पहुँच गई। देवराज इंद्र ने सविस्मय पूछा— “असुरों के पास से आपके चले आने का कारण जानने की प्रबल उत्कण्ठा है।” आगे बढ़कर स्वागत करते हुए इंद्र ने और भी कहा— "अंबे पहले आपने हमारी विनती नहीं सुनी, इसका भी कारण बताइए?”

इंद्रदेव के आमंत्रण से महालक्ष्मी गदगद हो गई और अपना वरदहस्त उठाकर बोली— "देवराज ! जब किसी राष्ट्र में प्रजा सदाचार खो देती है, तो वहाँ की भूमि, जल, अग्नि कोई भी मुझे स्थिर नहीं रख सकते। मैं लोक श्री हूँ, मुझे लोक सिंहासन चाहिए। मुझे आलस्य, अकर्मण्य, फूट, कलह, कटुता पसंद नहीं। व्यक्ति के सदाचारी मानस में ही मैं अचल निवास करती हूँ। जहाँ लोग रीतिपूर्वक रहते हैं और परिश्रमपूर्वक अपना उद्योग करते रहते हैं, उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ती, पर जहाँ अकारण बैरभाव, हिंसा, क्रोध, प्रमाद, अत्याचार आदि बढ़ जाते हैं, उस स्थान को छोड़कर मैं तत्काल अन्यत्र चली जाती हूँ। मैं शुभ कार्यों से उत्पन्न होती हूँ, उद्योग से बढ़ती हूँ और संयम से स्थिर रहती हूँ। जहाँ इन गुणों का अभाव होता है उस स्थान को छोड़ जाती हूँ। बस इतने से ही मेरे असुरों का निवास छोड़ने और देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर लेने का रहस्य जाना लेना।”


वाक्सिद्धि और मौन व्रत

शक्ति संस्थानों में विचार के उपरांत वाणी का स्थान है। विचार सूक्ष्म हैं, वाणी स्थूल। विचारों की परिधि को बेधकर किसी का अंतरंग पढ़ना कठिन है, किंतु वाणी के द्वारा उच्चारित शब्द दूसरों की विचारणा को ही नहीं, व्यक्तित्व को भी प्रभावित करते हैं। वाणी से मनुष्य के ज्ञान, स्वभाव एवं स्तर का पता चलता है। वह अपनी मिठास, तर्क क्षमता एवं भाव-संवेदना से दूसरों को प्रभावित ही नहीं, करती वरन् प्रतिकूल से अनुकूल भी बना लेती है। कुशल वक्ता जनमानस को बदलते और उसे अपनी विचारणा की दिशाधारा में बहा ले जाते हैं। लोकव्यवहार में सफलता-असफलता का बहुत कुछ आधार उसके भाषण-संभाषण स्तर के साथ जुड़ा रहता है, इसलिए जिव्हा को इंद्रियों की गणना में एक नहीं दो माना गया है। वही वाक्शक्ति भी है और वही स्वादेंद्रिय रसना भी। इसका शासन समूचे व्यक्तित्व एवं संपर्क-परिकर पर छाया रहता है।

जिव्हा को सुसंस्कृत बनाना बड़ा काम है। यदि वह बन पड़े तो जननेतृत्व से लेकर शासनसत्ता पर अधिकार करने, परायों को अपना बना लेने में सफलता मिलती है। यह कार्य कठिन भी है और सरल भी। कठिन इसलिए कि आदत और अभ्यास कई बार इसे अनगढ़ बना देते हैं, तब उसे काबू में लाना कठिन पड़ता है। चटोरापन सवार हो तो समझना चाहिए कि स्वास्थ्य चौपट हुआ। कटु वचन बोलने, निंदा, चुगली करने, बहकाने, डींग हाँकने, जैसे दुष्प्रवृत्तियाँ आदि जिव्हा में रम चले तो समझना चाहिए कि मित्र परिकर समाप्त हुआ।

जिव्हा का कार्यक्षेत्र लौकिक भी है और परलौकिक भी। लोकव्यवहार में यह सबसे बड़ी क्षमता है। अध्यात्म में सत्संग, विचार-विनिमय जिव्हा से ही संपन्न होते हैं। इन्हें मनन-चिंतन का प्रतीक मानना चाहिए। ईश्वर प्रार्थना, भजन, कीर्तन, प्रवचन, मंत्र-जप आदि जीभ से ही होते हैं। यदि जिव्हा का परिशोधन हो चुका है तो उपरोक्त सभी कार्य ठीक प्रकार बन पड़ेंगे और अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करेंगे। यदि जिव्हा कुधान्य खाने और कुसंस्कारिता के दुर्गुणों की अभ्यस्त, है तो फिर समझना चाहिए कि साधना-प्रयोजन के लिए जिव्हा माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।

आध्यात्म क्षेत्र में वाक्सिद्धि का प्रयोजन मौन व्रत का अभ्यास करने से बन पड़ता है। निरंतर बोलते रहने से वाणी का प्रभावक्षमता क्षीण होती है, इसलिए विज्ञजन कतरनी जैसी जीभ नहीं चलाते हैं। सोच-समझकर सीमित और अर्थपूर्ण शब्द कहते हैं। उनका थोड़ा-सा कथन भी घंटों बकवास करने की तुलना में कहीं अधिक कारगर होता है।

मौन के विश्रामकाल में इतना अवसर मिल जाता है कि पिछले अनगढ़ आदतों को विचारा, सुधारा जा सके और भावीकाल में उसे योजनाबद्ध बनाने के लिए प्रबंध अनुबंध किया जा सके। मौनकाल में विचारों की शक्ति सीमाबद्ध होती है। इसे इधर-उधर बिखेरने की अपेक्षा यदि वाक्शक्ति पर धार धरने में लगाया जा सके तो वह तीखी तलवार से भी अधिक सशक्त बनती है।

मौन की पृष्ठभूमि में जप-साधन ठीक प्रकार से बन पड़ता है। ध्यान के लिए मौन अनिवार्य है। किसी दिशा विशेष में प्राणशक्ति को नियोजित करने का अभ्यास करना हो तो उसका प्रथम चरण मौन व्रत ही हो सकता है। बाँध खोलने पर जल का प्रचंड प्रवाह उछलता है। यदि उसे सामान्य गति से बहने दिया जाए तो जलधारा सामान्य स्तर की ही बनकर रह जाती है। यही बात जिव्हा के संबंध में भी है। मौन व्रत से उपासना की शक्ति भी अनेक गुनी बढ़ती है और उस आधार पर निग्रहित की गई जिव्हा जो कहती है, वह भी सत्य होकर रहता है।

वाणी की सिद्धि प्राप्त करने के लिए मौन का ही अवलंबन लेना पड़ता है। यदि किसी लंबी अवधि तक मौन व्रत न बन पड़े तो सप्ताह में दो घंटे का मौन तो अपनाना ही चाहिए।


गहन परिवर्तन की आवश्यकता

विज्ञान ने भौतिक पदार्थों पर कुछ सीमा तक नियंत्रण पाया है और ऐसे अनेकानेक साधन-सुविधा उपलब्ध कराए हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण करने में सक्षम हुआ है। उसने मानवी काया के कुछ गुप्त रहस्यों के उद्घाटन में सफलता पाई है, पर है वह स्थूलकाया की हलचलों तक ही सीमित। पदार्थपरक विज्ञान का महत्त्व अधिक बढ़ जाने के कारण मनुष्य का पूरा ध्यान भौतिक उन्नति की ओर चला गया, परिणामस्वरूप उसके जीवन की रीति-नीति ही बदल गई। चिंतन, चरित्र, व्यवहार में भारी उलट-फेर हो गया एवं प्रगति अधूरी रह गई।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अलोक्सिस कैरल का कथन है कि समय आ गया है, जब मनुष्य को अपने सर्वांगीण विकास के लिए, उत्कर्ष के लिए, स्वयं का पुनर्निर्माण करना होगा। पुनर्निर्माण की यह प्रक्रिया कष्टसाध्य साधना के बिना पूरी नहीं हो सकती। कारण कि मानव स्वयं ही संगमरमर तथा स्वयं ही मूर्तिकार भी है। अपने हाथों ही उसे अपना निर्माण करना होगा। हथौड़े की कठिन मार— कष्ट साध्य साधनाओं द्वारा ही दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को दूर किया और अपने चरित्र को निर्मल बनाया जा सकता है। कठिन परिस्थितियों से गुजरे बिना व्यक्तित्व का विकास संभव नहीं है। जब तक आदमी विज्ञानप्रदत्त सुविधा, वासना, विलासिता द्वारा उपलब्ध अपूर्व संतोषों से घिरा रहेगा, तब तक उसकी समझ में नहीं आएगा कि उसका पतन हो रहा है।

मानव जीवन की गरिमा का इस तरह ह्रास होते देखकर विचारशील विवेकवानों ने अब इस दिशा में सोचना प्रारंभ कर दिया है कि कहीं आधुनिक जीवन-पद्धति के कारण पूरे विश्व का नैतिक, बौद्धिक एवं चारित्रिक पतन तो नहीं हो गया? बढ़ते अपराध, अत्याचार, अपहरण, उत्पीड़न आदि की बाढ़-सी आ गई है, जो रोके नहीं रुक रही; जबकि इस मद में धन भी बहुत खर्च हो रहा है और जनशक्ति भी अपेक्षाकृत अधिक नियोजित है। सभ्यजनों में इतने अधिक चंचल और भ्रांत चित्त व्यक्ति क्यों हैं? क्या विश्वसंकट आर्थिक परिस्थितियों की अपेक्षा व्यक्तिगत तथा सामाजिक परिस्थितियों पर अधिक निर्भर नहीं है?

अलेक्सिस कैरल आशा व्यक्त करते हैं कि तथाकथित वैज्ञानिक सभ्यता अपने पतन के पहले हमें यह पुनर्निर्धारण करने के लिए बाध्य कर देगी कि इस महान संकट की जड़ हमारे भीतर और हमारी सामाजिक संस्थाओं में तो नहीं है? इस तरह बाध्य होकर ही हम अपने उद्धार की आवश्यकता को यथार्थतः स्वीकार करेंगे। स्वयं के उत्थान में हमारे सामने एक ही बाधा उपस्थिति होगी— वह है हमारी जड़ता। ऐसा नहीं है कि हम पुनः उन्नति करने के अयोग्य हैं। वस्तुतः इस संकट का एक मात्र कारण यही है कि हमने सद्गुणों को भुलाकर आलस्य, भ्रष्टाचार और विलासी जीवन-पद्धति को अपनाया और नीचे गिरते चले गए।

बुद्धिहीनता, दुश्चरित्रता और अपराध-प्रवृत्ति परंपरागत नहीं होती। बहुत से बच्चों में जन्म से ही उनके श्रेष्ठ पैतृक गुणों की संभावना रहती है। तत्परतापूर्वक उनके जन्मजात सद्गुणों को विकसित किया जा सकता है। आधुनिक समाज ने उत्कृष्ट सभ्यता, सदाचार और साहस को तिलांजलि नहीं दे दी है। दुष्टता असाध्य रोग नहीं है; परंतु व्यक्ति का यह पुनर्निर्माण आधुनिक जीवन-पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन के द्वारा ही हो सकता है। सुसंस्कारिता एवं सभ्यता को नए सिरे से अवधारण करना ही, वर्तमान आदतों, मान्यताओं को बदलकर नई जीवन-पद्धति अपनाने के लिए हमारी मनोवृत्ति को सहमत कर सकता है।

क्या इतने विशाल एवं महत्त्वपूर्ण कार्य को करने के लिए मनुष्य के पास पर्याप्त क्षमता एवं सूक्ष्मदृष्टि है? सामान्य रूप से देखने पर इस क्षमता का अभाव-सा दिखता है, कारण कि आज आदमी वित्तेषणा में इतना डूब चुका है कि अन्य सारी बातों को भूल गया है। इसके उपरांत भी आशा की एक किरण दिखाई देती है। विश्व के नवनिर्माण के लिए जिनका उत्तरदायित्व है वे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। उनके मौलिक गुणों को अभी भी स्वरूप दिया जा सकता है। हो सकता है कि ऐसे व्यक्ति सर्वसाधारण के आवरण में छिप गए हों। उनकी संख्या बहुत कम है, परंतु वे हार नहीं मानेंगे।

उपर्युक्त वातावरण का नवसृजन तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि हमारे सोचने का मूलभूत दृष्टिकोण नहीं बदलता। आधुनिक समाज की पीड़ा और पतन का कारण केवल बुद्धिदोष— वैचारिक मलीनता है। पदार्थों के भौतिक गुणों की वैज्ञानिक जानकारी पाना उचित था और है भी, परंतु मानवी गुणों को महत्त्वहीन समझकर उनकी उपेक्षा करना न्यायोचित नहीं है। पिछले दिनों यही त्रुटि हुई है, जिसका विशेष प्रभाव हुआ। स्थूलजड़ पदार्थ को ही सब कुछ मानकर मनुष्य उसी में उलझ गया, जबकि स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्मचेतनतत्त्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है। विचारो की शक्ति अद्भुत और अपार है, परंतु जब शारीरिक संरचना ने ही यथार्थता ग्रहण कर ली तो मानसिक क्षमताओं को भुला दिया गया। इस महान भूल के कारण ही भौतिक विज्ञान का महत्त्व अधिकाधिक बढ़ता गया और आदमी विलासिता, स्वार्थपरता एवं चारित्रिक पतन के गर्त में गिरता चला गया। इससे ऊबने तथा सही दिशा की ओर बढ़ने के लिए हमें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। शरीर के साथ आत्मा को भी उचित महत्व देना होगा।

यदि वैज्ञानिक सभ्यता अपनी पाशविक परिपाटी को छोड़कर अध्यात्मवाद का राजमार्ग अपना ले तो शीघ्र ही अपूर्व घटनाएँ घटित होने लगेगी। तब पदार्थ अपने श्रेष्ठता खो देगा और उसका स्थान चेतना ले लेगी। मानसिक गतिविधियाँ इतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जावेगी जितनी कि शरीर विज्ञान संबंधी नैतिकता और धार्मिकता का अभ्यास उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना की गणित, भौतिकी एवं रसायन शास्त्र का। आज की शिक्षा-प्रणाली व्यर्थ प्रतीत होगी। स्कूल और विश्वविद्यालय अपने कार्यक्रम बदलने के लिए बाध्य होगी। आरोग्य संगठनों से, चिकित्सा विशेषज्ञों से यह पूछा जाने लगेगा कि वे विशेष रूप से शारीरिक बीमारियों की रोक-थाम की ओर ही ध्यान क्यों देते है? मानसिक एवं नाडी संस्थान की गड़बड़ी की ओर ध्यान क्यों नहीं देते? वे आध्यात्मिक स्वास्थ्य की ओर से आँख क्यों बंद कर लेते है। छूत की बीमारियों से ग्रस्त व्यक्ति ही क्यों अलग रखे जाते है? जो चारित्रिक तथा मानसिक दोषों से ग्रस्त है उन्हें पृथक क्यों नहीं रखा जाता? जिनके कारण शारीरिक बीमारियाँ होती है, मात्र उन्हीं आदतों, परिस्थितियों को क्यों गंभीर और भयानक माना जाता है, पर जिन आदतों के कारण भ्रष्टाचार, अपराधीवृत्ति तथा विक्षिप्तता पनपती है, उन्हें भयानक क्यों नहीं माना जाता? स्पष्ट है कि जड़वादी मान्यता से छुटकारा समग्र मानव जीवन को ही बदल देगा।

प्रगति के लिए— उत्कर्ष के लिए त्याग एक आवश्यक शर्त हैै। शिक्षा संस्थाओं एवं प्रयोगशालाओं में कार्यरत वैज्ञानिकों की कमजोरी उनके सामान्य संकुचित अर्थपरायण जीवन लक्ष्य के कारण है। आदमी जब उच्च आदर्शों से प्रेरित तथा उत्कृष्ट विचारों से ओत-प्रोत होता है तब वह ऊँचा उठता है। जिसका हृदय महान वीरोचित कार्य करने के लिए उमग रहा हो, उसके लिए त्याग करना कठिन नहीं होता। वर्तमान मानव को सुधारने के समान सुन्दर एवं साहसिक कार्य दूसरा नहीं। यह तथ्य हर विज्ञजन को समझना चाहिए। साथ ही खोज की जानी चाहिए कि आदमी के आवश्यक गुणों का हनन किए बिना आधुनिक सभ्यता में मोड़ किस तरह लाया जा सकता है।

निश्चय ही वर्तमान विलासी विज्ञान के सिद्धांतों का विरोध अथक उत्साह से करना पड़ेगा, कारण कि सुविधा विज्ञान द्वारा प्रदत्त जीवन-पद्धति मनुष्य को इतनी सुखकर लगने लगी है जितना कि मदिरा, अफीम और कोकीन। इस मद में आकंठ डूबा वह अपने जीवन लक्ष्य को भूल चुका है। इसे उलटने के लिए घोर प्रयत्न करने, उसे उसकी सांस्कृतिक व पारस्परिक गौरव-गरिमा का ज्ञान कराने और शिक्षापद्धति तथा सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं।


यह ब्रह्मांड न तो अनगढ़ है, न बेतुका

भौतिकीविद श्री फ्रांसिस थामसन ने सृष्टि की संरचना पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है कि “संसार की समस्त वस्तुएँ एक अखंड सत्ता से जुड़ी हैं, चाहे वे बड़ी हों या छोटी, उनका परस्पर संबंध इतना सुसंबद्ध है कि सभी को आश्चर्य होता है। उसी अखंड सत्ता के इशारे पर सृष्टि के सारे क्रियाकलाप संचालित होते हैं। उसकी इच्छा के बिना तो मनुष्य एक पत्ता भी नहीं हिला सकता।” यह कहकर श्री फ्रांसिस ने उस आप्तवचन का ही समर्थन किया है, जिसमें कहा गया है - “ईशावास्यमिदं सर्वं।"

सचमुच यह सारा ब्रह्मांड, उसके सारे घटक इतने सुनियोजित ढंग से अपना कार्य संपन्न कर रहे हैं, जिसे देखकर किसी न किसी नियामकसत्ता की कल्पना करनी ही पड़ती है। इसके बिना ब्रह्मांड की व्याख्या और उसकी निरंतरता की विवेचना अधूरी रह जाएगी। यदि ब्रह्मांड के इन सुव्यवस्थित क्रियाकलापों को कुछ क्षण के लिए संयोग मान भी लिया जाए तो भी यह सिद्धांत ब्रह्मांड की क्रमबद्धता की भली-भाँति व्याख्या नहीं कर पाएगा, क्योंकि तब प्रश्न उठेगा कि आखिर यह संयोग कब तक और किस-किस के साथ? ठीक भी है कि संयोग किसी एक ग्रहपिंड की कुछ घटनाओं को कुछ क्षण के लिए तो माना जा सकता है, पर सभी खगोलीय पिंडों के पूरे जीवनकाल में संयोग ही घटित होता रहता है, ऐसा मानना अविवेकपूर्ण होगा। इन्हीं सब बातों को देखते हुए विद्वान लेखक वैज्ञानिक डॉ0 कार्ल जुस्टांग ने एक स्थान पर लिखा है कि “संसार का हर परमाणु एक निर्धारित नियम-व्यवस्थानुसार कार्य करता है। यदि इसमें तनिक भी व्यतिक्रम और अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर होने लगे, तो विराट ब्रह्मांड एक क्षण भी अपने वर्तमान अस्तित्व को नहीं रख पाता तथा क्षण मात्र में विस्फोट से अनंत प्रकृति में आग लग जाती और यह संसार अग्नि की लपटों में घिरा एक तप्त पिंड भर होता; परंतु देखने में ऐसा नहीं आता, अतः यह किसी चेतन समष्टि का अस्तित्व में होना प्रमाणित करता है।”

एक पर्यवेक्षक की तरह यदि पूरे ब्रह्मांड के ग्रहपिंडों की अपनी गतियों, उनके सतह की परिस्थितियों और उनके पारस्परिक संबंधों का सूक्ष्मता से अध्ययन करें, तो हमें ज्ञात होगा कि इनकी व्यक्तिगत विशिष्टताएँ सोद्देश्य हैं। उदाहरण के लिए सूर्य को लिया जा सकता है। यह हमारी पृथ्वी से 10 करोड़ 60 लाख मील दूर है और आठ मिनट में अपनी संतुलित प्रकाश किरणें पृथ्वी तक पहुँचाता है, जिससे पृथ्वी के सभी जीवधारी अपना जीवनक्रम चलाते रह पाते हैं। इस सुनिश्चित दूरी पर अवस्थित सूर्य की सतह पर जो तापमान है, उसका 220 करोड़वाँ भाग मात्र पृथ्वी की सतह पर जीवधारियों तक पहुँचता है। यही जीवों में प्राण-स्पंदन बनाए रखने, वनस्पतियों को हरा-भरा रहने के लिए उत्तरदायी है। यदि इस दूरी में तनिक भी न्यूनाधिकता होती, तो यहाँ जीवधारणयोग्य वातावरण नहीं रह पाता। निकटता से गरमी बढ़ती और दूरी से शीतलता आती। दोनों ही स्थितियों में जीवन असंभव होता। इस बात को अब वैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं कि पृथ्वी इस मामले में अन्य ग्रह-नक्षत्रों से कहीं अधिक सौभाग्यशाली है। उनका कहना है कि सूर्य से इसकी दूरी तथा कक्षा में स्थिति इतनी उपयुक्त है कि उससे प्राणियों का जन्म, ऋतु, अनुकूलता एवं शोभा-सुषमा का सृजन संभव हो सका। यह स्थिति अन्य ग्रहों की नहीं है। उनका तापमान या तो इतना अधिक है या इतना कम है कि उनमें जीवन-विकास हो ही नहीं सका। संभवतः यही कारण है कि अभी तक पृथ्वी पर ही जीवन है, अन्य ग्रहों पर नहीं, यह कहा जाता है।

इतना ही नहीं, सूर्य की ताप-ऊर्जा का जो अनुदान पृथ्वी को मिलता है, उसमें भी एक प्रकार का नियंत्रण दिखाई पड़ता है। सूर्य आग का जलता हुआ एक गोला है। उसका बाह्य तापमान करीब 6000 डिग्री से.ग्रे. तथा भीतरी लगभग 15 करोड़ डिग्री से.ग्रे. है। इस प्रचंड ताप से वह 4 मील मोटाई वाले 9 करोड़ 30 लाख मील लंबे हिमखंड को क्षण मात्र से पिघला सकता है। सूर्य के एक वर्ग इंच क्षेत्र में जिस ऊर्जा की कल्पना की गई है, वह करीब 60 अश्वशक्ति के बराबर होती है। यदि उसके संपूर्ण 3393*12 वर्ग मील क्षेत्र में शक्ति का अनुमान करना हो, तो इस गुणनखंड को हल करना चाहिए - 3393*10 3393*10 1760* 3*12 इतने हार्स पावर की शक्ति उत्सर्जित होती है। यह सारी शक्ति एक साथ पृथ्वी पर फेंक दी जाती है, तो यह भी एक धधकता सूर्यपिंड बन जाती; पर देखा ऐसा नहीं जाता। सूर्यऊर्जा का सुनिश्चित 220 करोड़वाँ हिस्सा ही पृथ्वी को मिल पाता है। इसी से 5 अरब मनुष्य, 100 अरब पक्षी, 1000 अरब अन्य जीव-जंतु एवं विशाल वनस्पति जगत की संपूर्ण आवश्यकताएँ तथा ऋतु-संचालन की सारी क्रियाएँ संपन्न होती रहती है।

इसकी ऊर्जा वितरण-प्रणाली भी बुद्धिमत्तापूर्ण है। प्रतिदिन सूर्य की रोशनी द्वारा डेढ़ वर्गमील क्षेत्र के भूभाग पर लगभग उतनी ही ऊर्जा उत्पन्न होती है, जितनी सन् 1945 में हिरोशिमा पर गिराये गए परमाणु बम द्वारा उत्पन्न हुई थी। दोनों प्रकार की ऊर्जाओं में अंतर मात्र इतना है कि सूर्य रोशनी के द्वारा बहुत बड़े क्षेत्र में तथा लगभग बारह घंटे की लंबी अवधि में उतनी ऊर्जा उत्पन्न होती है, जितनी परमाणु बम द्वारा बहुत छोटे क्षेत्र में तथा एक सेकेंड से भी कम समय में उत्पन्न हो गई। यही कारण है कि परमाणु बम लोगों को मृत्यु का ग्रास बना देने वाली भयंकर ताप-तरंगें उत्पन्न करता है, जबकि सूर्य प्रकाश द्वारा उत्सर्जित ताप बहुत हल्का एवं सुखद होता है। इतना विस्तरित व विरल भी कि नन्हें पौधे भी बिना किसी हानि के उसे स्वयं में अवशोषित कर लेते हैं।

इसी प्रकार पृथ्वी का स्वयं का वातावरण और परिस्थितियाँ भी विवेकपूर्ण ढंग से विनिर्मित है। इसके चारों ओर गैसों के अनेक ऐसे कवच बने हुए हैं, जो अनावश्यक और हानिकारक ब्रह्मांडीय विकिरणों को पृथ्वी के साथ छेड़खानी करने से रोकते हैं। इनकी सघनता-विरलता में कमी-बेशी तो होती रहती है, पर ऐसा अब तक कभी नहीं हुआ कि ये सुरक्षाकवच ही विनष्ट हो गए हों। यदि ऐसा हुआ होता, तो धरती के जीवधारी शायद अब तक सुरक्षित नहीं रह पाते। इसकी दैनिक और वार्षिक गतियाँ भी इस तरह निर्धारित है कि जीवन-धारण के लिए वे तनिक भी अन्यथा नहीं पड़ती। ऐसे ही अन्य सभी ग्रह-नक्षत्र अपनी अपनी कक्षा में निर्बाध रूप से गतिमान है। उनमें अब तक किसी तरह का व्यतिरेक नहीं आया।

इस प्रकार इन सभी तथ्यों पर गंभीरतापूर्वक विचार करें, तो इन्हें महज संयोग कहकर नहीं टाला जा सकता। इनके पीछे सुव्यवस्था-सुसंतुलन, सुनियोजन-सुनियंत्रण का जो अद्भुत सामंजस्य दिखाई पड़ता है, वह निश्चय ही किसी अदृश्य नियंता के बिना शक्य नहीं। संभव है ब्रह्मांड की इन्हीं सब विशिष्टताओं को देखते हुए सर जेम्स जीन्स के यह उद्गार निकल पड़े हों, कि “यह विश्व-ब्रह्मांड किसी तीर-तुक्के की परिणति नहीं है, वरन सुनियोजित ढंग से विनिर्मित किसी बुद्धिमानसत्ता की सुंदरतम अभिव्यक्ति है।” दार्शनिक स्पिनोजा भी मिलते-जुलते मत प्रकट करते हुए कहते हैं कि “यह ब्रह्मांड ईश्वर के ही विचारों का मूर्तरूप है।” मूर्धन्य वैज्ञानिक पास्कल का कहना था कि “दृश्य पदार्थों में अदृश्य रूप से काम करने वाली एक ही सत्ता है। वही इस विराट् विश्व का संचालन करती है।” प्रख्यात खगोलविद् कॉपरनिकस इस रहस्यमय संरचना से इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि वे अपने वेधशाला में अंतरिक्ष का टेलिस्कोप से विश्लेषण करते हुए गदगद होकर कह उठे थे — “हे ईश्वर! यह संसार तेरी कितनी सुंदर संरचना है! धन्य है, तेरी यह सृष्टि!।”

इस प्रकार उपरोक्त पंक्तियों में विद्वान, वैज्ञानिक, मनीषियों ने प्रकारांतर से इसी बात को स्वीकारा है कि यह विश्व-ब्रह्मांड किसी आकस्मिक महाविस्फोट की परिणति नहीं, वरन योजनाबद्ध ढंग से परम सत्ता द्वारा विनिर्मित एक कृति है। यह न तो अनगढ़ है और न बेतुकी।


वस्तुस्वरूपं स्फुटबोधचक्षुषा

मनुष्य की मस्तिष्कीय चेतना के गहन अंतराल में अनेकानेक दिव्य विभूतियाँ— अद्भुत क्षमताएँ विद्यमान हैं, जिन्हें कुरेदा और हस्तगत किया जा सकना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, पूर्वाभास, विचार, संप्रेषण आदि अतींद्रिय क्षमताएँ मस्तिष्क की ही देन है। इन रहस्यमयी शक्तियों का जागरण और विकास विशेष मनःस्थिति एवं परिस्थितियों में ही संभव है, किंतु किन्हीं-किन्हीं में यह सामर्थ्य अनायास ही फूट पड़ती है, जिसे देखकर आश्चर्यचकित होना पड़ता है। विश्व में ऐसे अनेकों उदाहरण देखने को मिलते हैं जो मनुष्य की विलक्षण अतींद्रिय सामर्थ्य का परिचय देते हैं।

घटना सोवियत रूस की है, जहाँ विगत दिनों यूलिया वोरोबियेवा नामक एक महिला क्रेन चालिका विद्युत करेंट लगने से मूर्च्छित हो गई। मृतक समझकर उसे मुर्दाघर में ले जाया गया। अन्त्य-परीक्षा के लिए नियुक्त चिकित्सकों ने देखा, तो पाया कि वह अभी जीवित है। अतः उसका गहन चिकित्सा-उपचार किया गया और कुछ ही महीनों में वह पूर्ण स्वस्थ होकर अपने घर वापस आ गई; किंतु उसे तब आश्चर्य हुआ जब उसने सामान्य से कहीं अधिक गहराई तक देखने की क्षमता को अपने में विकसित पाया। वस्तुतः शरीर पर हुए उस आकस्मिक विद्युत-संचार से उसकी अतींद्रिय शक्तियाँ जागृत हो गई थीं। काया की अंदरूनी संरचना को खुले नेत्रों से अब वह उसी प्रकार देख लेती है, जिस तरह एक्स-रे मशीन द्वारा किसी अंग-अवयव के चित्र उतारे और देखे जाते हैं। प्रकृति के गर्भ में छिपे किसी वस्तु या भंडार को वह आसानी से देख लेती है। सूर्य की सूक्ष्म अल्ट्रावायलेट किरणों को भी देखने में उसकी आँखें सक्षम हैं। निकट भविष्य में आने वाले तूफान, महामारियों जैसी प्राकृतिक विपदाओं की जानकारी उसे पहले से ही हो जाती है। सोवियत वैज्ञानिकों के लिए जूलिया परीक्षण और अनुसंधान का विषय बनी हुई है।

सुप्रसिद्ध परामनोविज्ञानी विलियम मोक्स ने अपनी कृति “ह्वाट मक्स लाइफ सिग्नीफिकेन्ट” में कई प्रमाणों द्वारा यह बताया है कि मनुष्य के अंतराल में अतिविलक्षण सामर्थ्य विद्यमान है, जिसे जागृत कर सकना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव है। कनाडा के मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ0 ऐनफील्ड ने तो ऐसे इलेक्ट्रोड का आविष्कार भी कर लिया था, जिसकी सहायता से वे मनुष्य की अतींद्रिय क्षमताओं को जागृत कर सकने में सफल हुए। इस इलेक्ट्रोड को शरीर के या मस्तिष्क के किसी विशिष्ट कोशिका के साथ संबद्ध कर देने पर व्यक्ति अपने भूतकाल की घटनाओं को चित्रपट की तरह प्रत्यक्ष देख सकता था। उनका मत था कि मानवी मस्तिष्क अतींद्रिय क्षमताओं का भांडागार है, जिसे विकसित करके कोई भी व्यक्ति त्रिकालदर्शी— दिव्यद्रष्टा बन सकता है। इससे संबंधित कई उदाहरण भी उसने प्रस्तुत किए।

नियेचन नामक एक महिला के बारे में पेनफील्ड का कहना है कि वह किसी अजनबी की कोई भी वस्तु स्पर्श करके उस व्यक्ति के भूत, वर्तमान और भविष्य को बता देती है। मूर्धन्य वैज्ञानिकों एवं चिकित्सा विशेषज्ञों ने भी जाँच करने पर उन सभी घटनाओं को शत-प्रतिशत सही पाया, कजिन का उल्लेख नियेशन ने किया। इसी तरह एक किशोरीकुमारी एडम किन्हीं दूरस्थ वस्तुओं के बारे में पूछे जाने पर उसका परिचय इस प्रकार बता देती, जैसे वे वस्तुएँ उसके सामने ही रखी हुई हों। एक ल्यूथीनियन लड़का भी विशिष्ट अतींद्रिय सामर्थ्य संपंन पाया गया। वह किसी भी आधुनिक या प्राचीनतम लुप्त भाषाओं — जैसे फ्रेंच, लैटिन, अंग्रेजी, ग्रिक, हिब्रू आदि के शब्दों को उच्चारणकर्त्ता के साथ अक्षरशः दोहरा देता, मानो वह उन भाषाओं का पूर्ण ज्ञाता हो और उसे पहले से ही यह ज्ञात हो कि उच्चारणकर्ता आगे कौन-सा शब्द बोलने वाला है।

लंदन के दक्षिणी भाग में रहने वाली नेला जोंस नामक अधेड़ आयु की एक महिला को “अतींद्रिय क्षमतासंपन्न गुप्तचर” के नाम से संबोधित किया जाता है। यद्यपि गुप्तचरों से उसका कोई संबंध नहीं है, फिर भी स्काटलैण्ड यार्ड का खुफिया विभाग अपराध के जिन संगीन मामलों की छानबीन नहीं कर पाता, उसकी जानकारी के लिए जोंस की मदद लेता है। घर बैठे ही वह समस्त घटना का पूरा विवरण बता देती है और अपराधी पकड़ लिया जाता है या समस्या सुलझ जाती है। विगत बारह वर्षों से वह इस कार्य में लगी है। भविष्य में घटित होने वाले घटनाक्रमों के बारे में भी वह कभी-कभी पुलिस विभाग को सतर्क करती रहती है। वैज्ञानिकों एवं विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों ने भी निरीक्षण-परीक्षण के बाद उसके अतींद्रिय शक्तिसंपन्न होने की पुष्टि की है।

“एनसाइक्लोपीडिया ऑफ दी आकॅल्ट” में एन्टीन मेसियर नामक एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन है जो पेट के माध्यम से अप्रत्यक्ष वस्तुओं का विवरण बताने में समर्थ था।

रूस के प्रख्यात मनोवैज्ञानिक एवं वरिष्ठ अनुसंधानकर्त्ता प्रो0 कोन्स्टाटिन प्लातोनोव ने भी अपने शोध-निष्कर्ष में कहा है कि मनुष्य की चेतना-विद्युत असीम और व्यापक है तथा शरीर के प्रत्येक कण में समाई हुई है। मस्तिष्क में जो शक्ति क्रियाशील है, वही अन्यत्र ज्ञानतंतुओं में भी काम करती है। उसे विकसित और प्रशिक्षित करने पर वैसी ही जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जैसे कि दोनों नेत्रों से। यदि त्वचा को अधिक संवेदनशील बनाया जा सके तो अन्तःचेतना त्वचा से ही अन्य सभी इंद्रियों का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हो सकती है। उन्होंने इस तरह के अतींद्रिय शक्तिसंपन्न व्यक्तियों के कई उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं। इनमें से एक है— मास्को की 26 वर्षीय कुमारी रोजा कुलेशोवा, जो अपने हाथ की तीसरी और चौथी अंगुलियों के स्पर्श मात्र से समाचारपत्र का पूरा लेख पढ़ लेती है और उपस्थित लोगों को सुनाकर उन्हें आश्चर्यचकित कर देती है। रोजा ने अंगुलियों की त्वचा को इतना अधिक संवेदनशील और पारदर्शी बना लिया है कि आँखों पर पट्टी बंधी होने पर भी वह आँखों का काम अंगुलियों से कर लेती है।

इसी तरह अद्भुत पराशक्तिसंपन्न खार्कोव (रूस) की श्रीमती ओलगा ब्जिजनोवा की 11 वर्षीय बालिका भी है। आँख पर अपारदर्शी पट्टी बाँधकर शतरंज की काली सफेद गोटियों को हाथ के स्पर्श मात्र से पहचानकर वह उन्हें अलग-अलग कर देती है। कागज की कतरनों के ढेर में से उन्हें रंगों के आधार पर छाँटकर अलग कर देना, अंगुलियों के स्पर्श से पुस्तकें पढ़कर सुना देना, उसके लिए सामान्य-सी बात है। उसने अपनी भुजाओं, कन्धों, पीठ, पैर आदि शरीर के अंग-अवयवों को भी इसी तरह प्रशिक्षित और क्षमतासंपन्न बना लिया है, जो स्पर्श मात्र से वही परिणाम प्रस्तुत करते हैं, जो अतिसंवेदनशील अंगुलियाँसम्पन्न करती है। दस सेंटीमीटर दूर रखी वस्तुओं के रंग, रूप, रचना आदि को वह बालिका उसी प्रकार बता देती है, जैसे कोई व्यक्ति अपने खुले नेत्रों से देखकर बताता है। उसकी इस अतींद्रिय सामर्थ्य का प्रदर्शन प्रयोगकर्त्ता मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने देखा और परखा है तथा उपरोक्त कथन को सत्य पाया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि त्वचा में एक विशेष प्रकार की संवेदनशील कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जो स्पर्श के आधार पर देखने का बहुत कुछ प्रयोजन पूरा करती है; किंतु बहुत से प्रकरण ऐसे हैं, जिनका विज्ञानसम्मत समाधान ढूंढ़ने में वे भी असमर्थ रहे हैं। फ्रांस की एक किशोरी वैज्ञानिकों के लिए सदैव चुनौती बनी रही। एन्नेट फ्रेलान नामक इस किशोरी ने योगियों जैसी अद्भुत अतींद्रिय क्षमताएँ अर्जित कर ली थी। उसने अधिकांशतः मौन रहने का नियम बना लिया था। जब कभी बोलती भी तो अत्यंत सारगर्भित एवं संक्षिप्त। कोई प्रश्न पूछे जाने पर वह एकाग्रचित्त हो जाती और उसका उत्तर उभरे हुए बड़े-बड़े लाल अक्षरों में उसकी बाहों, पैरों तथा कंधों पर लिख जाता था। कुछ देर द्रष्टव्य रहने के पश्चात् वह कोई छाप छोड़े बिना गायब हो जाते।

वस्तुतः मनुष्य अपनी चेतनाक्षमता के बारे में अनभिज्ञ ही बना रहता है और जहाँ-कहीं उसकी झलक मिलती भी है तो उसे प्रकृति की देन अथवा संयोग या देवी चमत्कार मानकर आश्चर्य भर प्रकट करता है। यदि चित्तवृत्तियों को समेटा एवं उन्हें जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में नियोजित किया जा सके, तो हर कोई पराशक्तिसंपन्न बन सकता है।


प्रतिकूलताएँ कभी बाधक नहीं बनतीं!

अल्फ्रेड एडलर के अनुसार मानवी व्यक्तित्व के विकास में कठिनाइयों— प्रतिकूल परिस्थितियों का होना भी आवश्यक है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक — “ह्वाट लाइफ शुड मीन टू यू” में उन्होंने लिखा है कि “यदि हम किसी एक ऐसे व्यक्ति अथवा मानव समाज के विषय में यह कल्पना करें कि वे इस स्थिति में पहुँच गए हैं, जहाँ अब कोई कठिनाइयाँ नहीं रहीं तो हमारे विचार से ऐसे वातावरण में मनुष्य का विकास रुक जाएगा और जीवन आकर्षणहीन रह जाएगा। ऐसी स्थिति में भविष्य में प्रतीक्षायोग्य उत्साहवर्धन कोई बात नहीं रह जाएगी। सब कुछ पूर्वनिश्चित होने से तत्परता का प्रयास का स्थान जड़ता ले लेगी। ऐसी दशा में न तो ज्ञान का विकास होगा और न ही विज्ञान का। कला और धर्म जो अप्राप्य ध्येयों की कल्पना हमारे सामने रखकर हमें प्रफुल्लित रखते हैं, सब अर्थहीन हो जाएँगे। वस्तुतः हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारा जीवन कष्ट-कठिनाइयों से भरा है, उतना सरल नहीं है।”

बहुत से लोग कठिनाइयों से बचने के लिए दूसरों को अपनी ओर आकृष्ट करने और अपना काम बनाने के अनेकानेक तरीके अपनाते हैं; पर प्रायः देखा यही जाता है कि अंततः उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। प्रख्यात मनोवैज्ञानिक ग्रीनवी ने अपनी पुस्तक — “सुपर पर्सनालिटी” में लिखा है कि “यह मान्यता सही नहीं है कि लोगों को प्रभावित करने के लिए आकर्षक शरीर संरचना, बढ़ी-चढ़ी विद्वता, प्रचुर संपदा, ठाठ-बाट की साज-सज्जा या किसी विशेष प्रकार की कला-कुशलता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यह विशेषताएँ दूसरों का ध्यान भर आकर्षित करती है, बहुत हुआ तो कोई इनसे किसी प्रकार लाभांवित होने के लिए पीछे लग सकता है; पर जब वैसा कुछ हाथ लगते दिखता नहीं तो निराश होते ही मुँह मोड़ लिया जाता है। वैभव से अपना ही स्वार्थ सिद्ध हो सकता है। दूसरे जिन्हें उनसे कोई लाभ मिलने वाला नहीं है, देर तक आकर्षित नहीं रह सकते।”

वस्तुतः जिनका दूसरों पर प्रभाव पड़ता है, वे सद्गुणों एवं सत्प्रवृत्तियों से युक्त विभूतियाँ होती है। उन्हें जहाँ भी पाया जाता है, उनके प्रति अंतःकरण में सहज श्रद्धा उमड़ पड़ती है। सज्जनता, नम्रता, उदारता और शिष्टता का अर्थ है — परिपक्व व्यक्तित्व। खिला हुआ फूल अपनी सुंदरता और सुगंध से दर्शकों को सहज प्रसन्नता प्रदान करता है। सद्गुणों की विभूतियों से भरे हुए व्यक्ति भी इसी प्रकार सहज श्रद्धा के पात्र बनते हैं। सही तरीके से प्राप्त की गई सफला सर्वत्र सराही जाती है; क्योंकि इनसे प्राप्त करने वाले की लगन और तत्परता का परिचय मिलता है। इनकी शालीनता देखकर भी यही अनुमान लगता है कि यहाँ आत्मपरिष्कार के लिए दूरदर्शिता से भरी-पूरी सतत् साधना की गई है।

विभिन्न स्तर की सफलताओं में सर्वोपरि है— सामान्य स्तर के अनगढ़ व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बना सकना। मूर्तिकार पत्थर को गढ़ते और प्रतिमा बनाते हैं। चित्रकार कागज और कलम की सहायता से हृदयग्राही चित्र विनिर्मित करते हैं। वादक बांसुरी से राग-रागनियों की स्वरलहरी बहाते हैं। कलाकारिता के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावोत्पादक कला है— पेट-प्रजनन भर में व्यतीत होते रहने वाले जीवन को उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श गतिविधियों का अभ्यस्त कर लेना। इन सफलता के श्रेयाधिकारियों की जन-जन का सहज सम्मान मिलना ही चाहिए।

पेड़ की शीतल छाया और सुषमा में बैठने वालों को ही नहीं, उसे देखने वालों को भी प्रसन्नता होती है और शांति मिलती है। इसी प्रकार सहृदयता, नीतिमत्ता, साहसिकता, सज्जनता, नम्रता, उदारता, सुरुचि, सुव्यवस्था जैसे सद्गुणों का जहाँ भी विस्तार दिखता है, वहाँ संपर्क में आने वाले हर किसी की सहज श्रद्धा उमगने लगती है।

एल.एच. स्नीडर अपने ग्रंथ— “बिहेवियोरल साइकोलॉजी” में लिखते हैं कि “विचारों और कार्यों का स्तर सुनिश्चित होना चाहिए। तभी उन्हें निजी पुरुषार्थ का— उपलब्ध साधनों का, परिपोषण मिलेगा और सफलता का द्वार खुलेगा। दूसरों का समर्थन सहयोग भी प्रायः उन्हीं को मिलता है, जिन्हें दृढ़ निश्चयी और प्रयास में समग्र तत्परता जुटा सकने वाला समझा जाता है।”

चंचल, उथले और अधूरे मन से किए जाने वाले काम ही प्रायः असफल होते हैं। ऐसा क्यों होता है? अस्थिरता का कारण क्या है? यह खोजने पर प्रतीत होता है कि सैद्धांतिक अपरिपक्वता ही चंचलता का प्रमुख कारण है। दृढ़ता उन निर्णयों में नहीं हो सकती जो उथली स्वार्थपूर्ति पर अवलंबित है। लाभ की न्यूनाधिकता का प्रसंग सामने आते ही मन डगमगाने लगता है और एक काम को छोड़कर दूसरे को अपनाने लगता है।

आदर्शवादिता का आधार लाभ या लोभ नहीं, आत्मसंतोष एवं आत्मकल्याण होता है। ऐसी दशा में एक बार पकड़े हुए काम को इसलिए छोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि उसे हटाकर दूसरा करने लगे तो अधिक लाभ मिलेगा। कोई काम न तो छोटा है न बड़ा। हर कार्य की गरिमा उसके पीछे काम करने वाली निष्ठा के साथ जुड़ी होती है। इस प्रकार छोटे दिखने वाले काम भी सन्निहित सदाशयता को सुविस्तृत करने में सहायक हो सकते हैं और बड़े दिखने वाले काम भी अंतःक्षेत्र की निकृष्टता से प्रेरित होने पर सदाशयता के संवर्द्धन में सर्वथा निष्फल रह सकते हैं। उच्चस्तरीय सिद्धांत अपनाकर किसी काम में हाथ डालने पर उसमें आत्मसंतोष का रसास्वादन होता है। फिर प्रतिक्रिया में शिथिलता रहने पर भी उत्साह गिरने या मनोयोग घटने जैसी कोई बात नहीं होती।

आत्मविश्वास और आत्मानुशासन ही उच्चस्तरीय कामों में अंत तक निष्ठा बनाए रहने में समर्थ होते हैं। आत्मविश्वास श्रेष्ठ कामों की सफलता में ही सुनिश्चित रह सकता है। ओछे और खोटे काम अंतःकरण में ऐसा विश्वास जगने ही नहीं देते कि कार्य की सफलता एवं उपयोगिता मिल ही जाएगी या मिलने पर सराही ही जाएगी। यही कारण है कि ओछे मनोरथों से प्रेरित कार्य सदा कर्त्ता को अविश्वासी बनाए रहते हैं। उस अस्थिरता में पूरे मनोयोग से काम नहीं हो पाता और न केवल सफलता संदिग्ध रहती है, वरन् उसमें उदासी, निराशा एवं ऊब तक उत्पन्न हो सकती है। आए दिन काम बदलते रहने वालों में अधिकांश आदर्शविहीन ही होते हैं। जिन्हें परिस्थितियों ने काम बदलने के लिए विवश— बाधित कर दिया हो, ऐसे अपवाद तो कम ही देखने को मिलते हैं।

दरबारी बगीचों में लगे कोमल पौधे तनिक-सी गर्मी-सर्दी पाते ही हिचकियाँ भरने लगते और दम तोड़ने लगते हैं। छुईमुई किसी के उंगली छू जाने से ही सकुचाती, सिकुड़ती और मुरझाई दिखती है; किंतु पर्वतों और रेगिस्तानों में उगने वाले पौधे ऋतु प्रभावों की कठोरता को धैर्यपूर्वक सहन करते हुए अपना अस्तित्व सुरक्षित रखे रहते हैं।

इसके विपरीत जिन्हें अभावों, प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ता है, वे अपने भीतर ऐसी क्षमता विकसित करते हैं जो आगत कठिनाइयों का सामना करते हुए अस्तित्व की रक्षा कर सकने में समर्थ हो सके। हिमाच्छादित पर्वतों पर उगने वाले पेड़ों को उस तरह पाला नहीं मारता, जैसे कि मध्यम ताप वाले प्रदेशों में तनिक-सी ठंड बढ़ते ही उनका सिकुड़ना-सूखना आरंभ हो जाता है। रेगिस्तानी सूखे इलाकों की तपती बालू और पानी की कमी में भी कैक्टस आदि पौधे भली प्रकार हरे-भरे बने रहते हैं। उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले “एस्किमो” बर्फ की मोटी परतों पर ही समूचा जीवनयापन करते हैं। कठोर श्रम से आहार प्राप्त करने वाले वनवासी स्थिति के अनुरूप सुदृढ़ भी रहते हैं और अभ्यस्त तथा प्रसन्न भी।

पूरे प्रतिपादन का निष्कर्ष यही है कि कठिनाइयों से— प्रतिकूलताओं से घिरे होने पर भी जीवन का वास्तविक प्रयोजन समझने वाले व्यक्ति कभी निराश नहीं होते। वे हर प्रकार की परिस्थितियों में अपने लक्ष्य से ही प्रेरणा प्राप्त करते तथा श्रेष्ठता के पथ पर क्रमशः आगे बढ़ते जाते हैं।


सद्वाक्य

कीचड़ में भी कमल उगते हैं। खाद के ढेर में गुलाब महकते हैं। आज विपन्न परिस्थितियों में भी सुंदर जीवन क्यों नहीं जी पाते?


स्वप्न की सत्ता का वैज्ञानिक विवेचन

मूर्धन्य मनोविज्ञानी सिग्मंड फ्रायड ने स्वप्नों को जीवन का व्यक्तिगत दस्तावेज बताते हुए अपनी प्रसिद्ध पुस्तक— “दि इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स” में कहा है कि व्यक्तिगत जीवन में जो इच्छाएँ पूरी नहीं हो पातीं, वह अचेतन मन में चली जाती है और सुषुप्तिकाल में वही स्वप्न बनकर प्रकट होती है। उनका कहना है कि पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाओं से बंधे होने के कारण व्यक्ति की हरेक आकांक्षा उसके जीवन में पूरी नहीं हो पातीं। ऐसी लालसाएँ दमित होकर मन के गहन गर्त में समा जाती है और समय-समय पर चित्र-विचित्र दृश्यों के रूप में सामने आती है। मन इसी से संतोष कर लेता है। अपने जीवन में विभिन्न व्यक्तियों के 2900 सपनों के अध्ययन-विश्लेषणकर फ्रायड उपरोक्त निष्कर्ष पर पहुँचे थे।

जबकि जर्मनी के मनःशास्त्री जिम रिचर्ड ने “एक्स्ट्रा सेन्सरी परसेप्शन” के साथ स्वप्न को जोड़ा है। वे कहते हैं कि बाह्य परिस्थितियाँ मनुष्य को जिस रूप में प्रभावित करती है, उसी के अनुसार वह स्वप्न देखता है। इसमें उसकी स्वतः की भागीदारी मात्र इतनी होती है कि वह घटनाक्रम को किस नजरिये से देखता और अपनाता है। इसी का समर्थन करते हुए डॉ0 फिशर कहते हैं कि स्थानों के सूक्ष्मसंस्कार भी व्यक्ति को कोई कम प्रभावित नहीं करते। उनका कथन है कि विचारों और घटनाओं के सूक्ष्मपरमाणु चिरकाल तक अस्तित्व में बने रहते हैं। इस प्रकार यदि वातावरण के परमाणु मंदिरों जैसे सात्विकताप्रधान हों, तो ऐसी जगहों के सपने भी शुद्ध— सात्विक होते हैं, किंतु यदि उसमें मरघट की पैशाचिकता और भयंकरता घुली हो, तो सपने डरावने और भयंकर होते हैं। इसके विपरीत स्वप्नशास्त्री डॉ0 शेरनल का मत है कि शरीर और मन की पीड़ा ही स्वप्न के रूप में अभिव्यक्त होती है। वे कहते हैं कि यद्यपि वे लक्ष्य पर आधारित होते हैं, किंतु उनमें किसी प्रकार का सीमा-बंधन नहीं होता। काल्पनिक उड़ानें भी इसी कारण उनमें बहुत होती है।

वर्तमान समय के प्रख्यात अमेरिकी खगोल भौतिकविद् कार्ल सैगन ने स्वन को विकासवाद से जोड़ा है। उनने जब कॉलेज-छात्रों के स्वप्नों का सर्वेक्षण किया, तो उनमें तीन मुख्य प्रकार के सपने पाए गए - (1) गिरने का स्वप्न, (2) अनुसरण अथवा आक्रमण किए जाने का स्वप्न एवं (3) किसी काम में निरंतर असफलता संबंधी स्वप्न। इनकी व्याख्या करते हुए अपनी प्रसिद्ध पुस्तक—“दि ड्रेगन्स ऑफ ईडन” में वे लिखते हैं कि गिरने संबंधी स्वप्न मनुष्य के विकासक्रम की उस अवस्था का बोध कराता है, जब वह “प्राइमेट” के रूप में जंगलों में अपना जीवन बिता रहा था। उस समय संभवतः हिंस्र पशुओं से बचने के लिए उसने वृक्षीय आवास अपनाया होगा, पर साथ ही उसके मन-मस्तिष्क में सदा यह भय समाया रहता होगा कि येन-केन-प्रकारेण गिरकर व अपनी जान न गँवा बैठे। सोते वक्त इसका पूरा ध्यान रखने के कारण यह उसकी मूल प्रवृत्ति (इंस्टिंक्ट) बन गई। कालक्रम में जैसे-जैसे उसका विकास हुआ, वह मूल प्रवृत्ति भी साथ गयी और अब जबकि वह मनुष्य के रूप में विकसित हो चुका है, यहाँ भी वह प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है और अचेतन मन में अब भी उसकी हल्की-सी छाया विद्यमान है। सपने में समय-समय पर इसी की झाँकी होती है। ज्ञात है कि ट्रेन की ऊपरी बर्थ में सफर करने वाले व्यक्तियों को अक्सर ऐसे सपने आते देखे जाते हैं।

मानवी विकास के उस आरंभिक दौर में उन्हें सबसे अधिक भय जिस बात का होगा, वह हिंस्र पशुओं से अपने अस्तित्व की रक्षा संबंधी रहा होगा। इसके लिए वे हर प्रकार के बचाव करते होंगे और हर स्थिति में इस खतरे के प्रति सावधान रहते होंगे। उस समय की अतिशय सावधानी ही अब अनुसरण एवं आक्रमण जैसे सपने के रूप में झलकती है।

फिर जब और विकासकर वृक्षीय निवास से धरती पर (बाईपेडल लोकोमोशन के रूप में) आए होंगे, तो मुख्य समस्या भोजन और शिकार संबंधी रही होगी। उस आदिम— अविकसित स्थिति में शस्त्रों के अभाव के कारण प्रायः उन्हें असफलता हाथ लगती होगी। यही असफलता अचेतन मन मे आज सपने के रूप में दिखाती है। इस प्रकार अपनी उक्त पुस्तक में लेखक ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि हमारे अधिकांश सपने मानवी विकासवादी अवस्थाओं के द्योतक हैं।

किंतु मनोविज्ञानवेत्ता कार्लजुँग का विचार है कि सपनों में भूत के स्फुरण के साथ-साथ भविष्य का भी ज्ञान छिपा होता है। उनका कहना है कि जब हम सो रहे होते हैं, तो हमारा अचेतन मन सक्रिय रहता है एवं अनंत ब्रह्मांड से सूचनाएँ एकत्रकर व्यक्तिसत्ता को देता है। उनका विश्वास है कि यदि सपनों द्वारा प्राप्त संकेतों तथा संदेशों का भली-भाँति विश्लेषण किया जा सके, तो जीवन की कितनी ही गुत्थियाँ सुलझाई जा सकती हैं। इटली के मनःशास्त्री उगदियानी का भी ऐसा ही मत है। वे कहते हैं कि यदि स्वप्न-संकेतों को समझा जा सके, तो दूरदर्शन, अविज्ञात का ज्ञान एवं भविष्य की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का पूर्वाभास समय रहते प्राप्त किया जा सकता है। जबकि मनःशास्त्र के विशेषज्ञ हैफनर माॅरेस का मानना है कि मनःचेतना को परिष्कृत-प्रशिक्षित कर सार्थक स्वप्न प्राप्त किए जा सकते हैं। तिब्बत के “बाँन-जादूगर” प्रायः इसी कार्य में निष्णात् पाए जाते हैं। “मि-लाम” नामक एक विशेष कर्मकांड द्वारा वे ऐसी स्थिति पैदा कर लेते हैं, जिसमें उनके सपने नियंत्रित हो जाते हैं, फिर चाहे कभी भी वे इच्छानुसार अपनी स्वप्नावस्था में जा सकते हैं। इतना ही नहीं, दूसरों की स्वप्नावस्था में भी प्रवेश करने की वे अद्भुत सामर्थ्य रखते हैं। इस दौरान वे पूरी तरह चेत्यावस्था में रहकर सपने की सभी बात याद रखते हैं।

सापेक्षवाद के जनक आइंस्टीन ने अपने प्रसिद्ध सिद्धांत के आधार पर यह सिद्ध कर दिया कि अतीत की जो घटनाएँ हमारे लिए घटित एवं समाप्त हो चुकी है, उनकी सूक्ष्मतरंगें विश्व-ब्रह्मांड में अब भी मौजूद है। उनका कहना था कि यदि पृथ्वी के अतिरिक्त किसी अन्य ग्रह पिंड में इस प्रकार की कोई विकसित सभ्यता हो और उनके पास उपयुक्त साधन हो, तो हो सकता है कि वे उन घटनाओं को ऐसे देख रहे हों, जैसे कि वे इसी समय उनके सामने घट रही हों। इसी सिद्धांत के आधार पर “आर्कियोविडियोफोन” जैसे यंत्र की रचना की कल्पना आज विज्ञान जगत में की जा रही है। इस आधार पर वैज्ञानिक यह विश्वास कर रहे हैं कि निकट भविष्य में ही वे चिर अतीत के दृश्यों को इच्छानुसार प्रत्यक्ष देख सकेंगे। इतना ही नहीं, आइन्स्टीन का यह भी कहना था कि जिस प्रकार भूतकालीन घटनाओं को देख सकना संभव है, उसी प्रकार भविष्य की घटनाओं की जानकारी भी अचेतन मन के माध्यम से विराट् ब्रह्मांड के साथ संपर्ककर प्राप्त की जा सकती है। इसी आधार पर पिछले दिनों कैलीफोर्निया में मूर्धन्य वैज्ञानिक एरिक ग्रीनफील के तत्त्वावधान में अनागत की घटनाओं को वर्तमान में रिकार्ड करने की एक स्वप्न-प्रयोगशाला स्थापित की गई है। डॉ0 एरिक का विश्वास है कि इस प्रयोगशाला के माध्यम से वे स्वप्न संबंधी एक ऐसी विधा का विकास कर सकेंगे, जो दैनिक जीवन में मनुष्य के लिए अनंत उपयोगी सिद्ध होगी।

यह सत्य है कि चेतना जब गई-गुजरी स्थिति में होती है, तो वह उथली स्तर की ही जानकारी देती है, पर यदि उसे साध लिया जाए तो उसकी क्षमता अनेक गुनी अधिक हो जाती है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी “राजयोग” पुस्तक में कहा है कि संसार में जितने प्रकार की शक्तियाँ काम कर रही हैं, उन सबका मूल रूप प्राण है। यदि मन की इस प्राण-चेतना को तनिक उच्चस्तरीय बना लिया जाए, उस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया जाए तो फिर उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि फ्रायड ने जो स्वप्न-सिद्धांत प्रस्तुत किया, वह एकांगी है। मनःचेतना जब सामान्य स्तर की होती है, तो इससे अधिक और कुछ कर भी नहीं सकती; किंतु उसे ही जब परिष्कृत कर लिया जाता है तो इस अगम्य— अज्ञात विश्व-ब्रह्मांड की संपूर्ण जानकारियाँ हस्तगत की जा सकती है। फिर सोते-जागते आगत-अनागत की महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ देकर वह अपने असामान्य स्तर का परिचय देने लगती है।


अंतर्ग्रही प्रभावों के घेरे में मनुष्य एवं पर्यावरण

ज्योतिर्विज्ञान के ज्ञाता यह भली भाँति जानते हैं कि पृथ्वी से करोड़ों मील दूर स्थित अंतरिक्षीय ग्रहों का प्रभाव धरतीवासियों पर किस तरह पड़ता है। वैज्ञानिकों द्वारा भी अब इसकी पुष्टि की जा चुकी है कि गुरु-शुक्र आदि सभी ग्रह अपने अच्छे-बुरे प्रभाव से मनुष्य सहित सभी प्राणियों में हलचल उत्पन्न करते हैं। सूर्य से निकलने वाली विभिन्न प्रकार की किरणों का अपना प्रभाव होता है तो चंद्रकलाओं का अपना। धूमकेतुओं के उदय से पृथ्वी के वातावरण में अनेकानेक परिवर्तन होते हैं, जिन्हें अनेक तरह की बीमारियाँ उत्पन्न करने वाला माना जाता है।

सौरपरिवार का सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति अर्थात् गुरु है। यूनान के साहित्य में इसे ‘आकाश का राजा’ कहा गया है। पृथ्वी से 5 करोड़ 40 लाख किलोमीटर दूरी; पर स्थित गुरु का भार पृथ्वी का 300 गुना, व्यास 11 गुना भारी है, तथा गुरुत्वाकर्षण ढाई गुना अधिक है। इस आकर्षणशक्ति के कारण यह पुच्छल तारा, धूमकेतु तथा उल्काओं (एस्टेराइडस) को अपनी ओर सतत् तीव्र वेग से खींचा करता है। प्रत्येक 13 माह के बाद बृहस्पति, पृथ्वी तथा सूर्य एक सीध में आ जाते हैं, तब इसके रजकण प्रचुर मात्रा में निकलकर पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कर जाते हैं। गुरु और शनि जब एक सीध में आ जाते हैं तो दोनों का चुंबकत्व सौरमंडल के चुंबकत्व के आधे से अधिक हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि सौरमंडल के सभी ग्रह एक पंक्ति में आ जाए तो उस समय चुंबकत्व की जो अभिवृद्धि होती है, प्राणिजगत पर उसका विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। पिछले दिनों इस प्रकार के सुपर कन्जक्शन— ‘बृहत्तम युति’ की स्थिति आ चुकी है।

खगोल विज्ञान तथा ज्योतिर्विज्ञान दोनों में गुरु प्रभाव— ‘जुपिटर इफेक्ट’ को बहुत महत्त्वपूर्ण माना गया है। एक ओर सूर्य तथा दूसरी ओर अन्य सभी ग्रहों के एक लाइन में आ जाने पर यह स्थिति बनती है। इस समय सूर्य की क्रियाशीलता अधिकतम हो जाती है और उस पर बनने वाले धब्बों की संख्या में अभिवृद्धि होती है। कई खगोलीय घटनाओं के साथ पृथ्वी के वातावरण में भी परिवर्तन आ जाता है। जैसे— वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधानों में पाया है कि आकाश के कुछ चमकीले पल्सार्स, तारों से प्राप्त विकिरण के कारण पृथ्वी के वातावरण में विद्युत आवेश पैदा होता है जो अनेक विसंगतियों को जन्म देता है।

मूर्धन्य वैज्ञानिक द्वय डॉ0 जाँन रिबिन तथा डॉ0 स्ट्रीफेन ब्लेवमान ने 1981 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “जुपिटर इफेक्ट” में लिखा था कि “सूर्य कलंक बढ़ने के साथ ही जलवायु में विषमता आ जाएगी। शीत ऋतु या ठंडे प्रांत अधिक ठंडे एवं गरमी वाले स्थान अत्यधिक गरम हो जाएँगे।” ये परिवर्तन उनके अनुसार आने वाले दो दशकों तक मनुष्यों को प्राकृतिक संतुलन एवं वृक्ष वनस्पतियों की क्रियापद्धति को प्रभावित करेंगे। वे लिखते हैं कि “आँधी-तूफान एवं वर्षा की अधिकता से सारे विश्व को जान-माल की भारी क्षति उठानी पड़ सकती है। घनी आबादी वाले स्थानों में विनाशकारी भूकंप आ सकते हैं।” मेक्सिको व कोलंबिया के भूकंप व हेलेना के ज्वालामुखी विस्फोट की घटनाएँ, इस वर्ष का विश्वव्यापी सूखा व कहीं बाढ़ इसकी साक्षी देते हैं।

अन्य वैज्ञानिकों ने भी चेतावनी देते हुए कहा है कि सूर्य कलंकों की अत्यधिक संख्या बढ़ने के कारण हृदयाघात तथा सड़क दुर्घटनाओं की अभिवृद्धि तो होगी ही, अनेकानेक नई महामारियाँ भी व्यापक रूप से फैल जाएगी। विगत इंटरनेशनल जियोफिजिकल वर्ष में सभी देशों के चिकित्सकों ने एक मत से यह स्वीकार किया था कि सूर्य के धब्बों की संख्या में वृद्धि के साथ अस्पतालों के कार्डियालाजी विभाग एवं पागलखानों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। इसी हेतु अनुसंधान की दो नई शाखाएँ (1) हेलियोबायलाॅजी तथा (2) कास्माॅस साइकोलॉजी विकसित की गई है।

स्वीडन के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सैन्टी अरहेनिस ने विभिन्न अस्पतालों में उपलब्ध रिकार्डों का अध्ययन करने के पश्चात् अपने शोध-निष्कर्ष में बताया है कि अमावस्या को जब पृथ्वी तथा सूर्य के बीच अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण होता है, उस समय मिरगी, चर्मरोग, विक्षिप्त मनोदशा के रोगियों की संख्या बढ़ जाती है। जब सूर्य तथा चंद्रमा 150 अंश पर होते हैं, तब कई रोगों में अधिक उभार 24वें दिन आता है। वस्तुतः चंद्रकलाओं के घट-बढ़ के साथ पृथ्वी पर अनेक परिवर्तन होते हैं - समुद्र में ज्वार-भाटे आते हैं। इसके अतिरिक्त मनुष्यों तथा इंतर प्राणियों पर भी इनका व्यापक प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि पृथ्वी पर जितना भी तरल द्रव्य है, वह चंद्रमा की वृद्धि और क्षय से संबंधित है। मनुष्य के शरीर में अधिकंश भाग द्रव का है। रक्त को ‘तरल संयोजी ऊतक’— लिक्विड कनेक्टिव टिशू कहा जाता है, जिसके अंतर्गत रक्त कणिकाएँ, तरल सीरम और प्लाज्मा आता है। काया की प्रत्येक कोशिका में आधे से अधिक भाग जल का होता है। इस तरलता के कारण ही समुद्र की तरह काया में भी चंद्र कलाओं के प्रभाव से तूफान उठता और शांत होता रहता है। इसका सबसे अधिक व्यापक प्रभाव रक्त पर पड़ता है। विभिन्न अध्ययनों में यह देखा गया है कि पूर्णिमा के दिन विश्व भर में जितने अपराध होते हैं, उतने शेष दिनों में नहीं होते। पूर्णिमा के चाँद का मनुष्य के शरीर ही नहीं, चरित्र पर भी विशेष प्रभाव पड़ता है। इसी तरह अमावस्या की काली छाया भी मन-मस्तिष्क को प्रभावित किए बिना नहीं रहती।

अनेक वैज्ञानिक प्रयोग-परीक्षणों से अब यह ज्ञात हो चुका है कि पूर्णिमा का चंद्रमा मनुष्य की बायोलॉजिकल एवं भावनात्मक प्रक्रिया में भारी हलचल उत्पन्न करता है। उस काल में एन्जाइम्स तथा हारमोन्स अपनी क्रियाशीलता बढ़ा देते हैं। चयापचय की क्रिया में तेजी आ जाती है। रक्तचाप एवं हृदय की धड़कन भी इस मध्य बढ़ जाती है।

शिकागो के इलिनाॅइस विश्वविद्यालय में अनुसंधानरत मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ0 राल्फ डब्ल्यू. मोरिस के शोध का प्रमुख विषय है— “पूर्णिमा के चंद्रमा का मनुष्य पर प्रभाव।” इसके लिए उन्होंने अनेक अस्पतालों के रोगियों का अध्ययन किया है। उनका कहना है कि पूर्ण चाँद मनुष्य के दुख-दर्द को बढ़ाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करता। इस काल में रक्तस्राव करने वाले अल्सर अन्य अवसरों की तुलना में अपनी क्रियाशीलता बढ़ाते हुए देखे गए हैं। हैमरेज, अपस्मार, मधुमेह जैसे रोग इन दिनों गंभीर रूप धारण कर लेते हैं। हृदय रोगी इस दौरान एन्जाइना पेक्टोरिस के प्रति अधिक संवेदनशील बन जाते हैं। इस विशेष काल में दवाइयों के प्रति रोगियों के व्यवहार में भी विशिष्ट परिवर्तन देखे गए हैं। मोरिस का कहना है कि यदि इस संबंध में अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके तो चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय जुड़ सकता है।

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में रखे गए चूहे जैसे प्राणियों पर चंद्रकलाओं के प्रभाव का अध्ययन किया है। देखा गया है कि चंद्र कलाओं की अभिवृद्धि के साथ ही उनकी भी सक्रियता बढ़ जाती है। फ्लोरिडा के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ0 एडीसन एन्डूस के अनुसार यदि कोई ऑपरेशन पूर्णिमा के दिन होता है तो उस दिन रक्तस्राव ज्यादा होता है। कई बार तो कुशल चिकित्सक भी इस प्रकार के रक्तबहाव को नहीं रोक पाते। तेनहा से मेमोरियल हॉस्पिटल की एक नर्स ने अत्यधिक रक्तस्राव वाले रोगियों के भर्ती होने की तिथि अंकित की है। उसके अनुसार इस तरह के सभी रोग प्रायः पूर्णिमा को ही आते थे।

मनःचिकित्सकों का कहना है कि पूर्णिमा का चंद्रमा तनाव और चिंता को बढ़ा देता है। उस दिन व्यक्ति की हठधर्मिता एवं आक्रामकता अन्य दिनों की अपेक्षा बढ़ी-चढ़ी देखी जाती है। यही कारण है कि पूर्णिमा एवं अमावस्या को पागलखानों में कर्मचारियों को विशेष जागरुक एवं सन्नद्ध रखा जाता है। न्यूयार्क के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार इस काल में अपराधों एवं आगजनी की घटनाओं में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है। “सन ऑफ सैम” नामक बहुचर्चित हत्याकांड का अभियुक्त डेविड बरकोविज डाक तार विभाग का एक कर्मचारी था। उसने अनेक जघन्य हत्याएँ की थीं, जिनमें से अधिकांश पूर्णिमा की रात को की गई थीं।

डॉ0 मोरिस के अनुसार मनुष्य के व्यवहार एवं चिंतन में उन्माद भरने वाले इन चंद्रप्रभावों की व्याख्या करना अत्यंत जटिल है, क्योंकि पूर्णिमाकाल में पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा तीनों एक सीध में आ जाते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी और चंद्रमा के बीच विद्युत चुंबकीय एवं गुरुत्वाकर्षण संबंध के ही यह परिणाम हैं, वस्तुतः लंबे समय से चिकित्सा जगत में इस संबंध में अनुसंधान चल रहा है कि चंद्रकला के साथ शारीरिक एवं मानसिकता रुग्णता का क्या संबंध हो सकता है। अब यह बात क्रमशः समझ में आने लगी है।

अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की तरह धूमकेतु भी धरतीवासियों पर अपना विघातक प्रभाव डालते हैं। सुप्रसिद्ध खगोलविद फ्रेड ह्वाइल के अनुसार जब धूमकेतु पृथ्वी के निकट से गुजरते हैं तो यहाँ के वातावरण में पर्याप्त परिवर्तन हुआ करते हैं। उन्होंने अपने शोध-निष्कर्ष में बताया है कि जब पृथ्वी धूमकेतु के धूम्र-प्रसार को पार करती है तब अनेक महामारियाँ फैलती है।

धूमकेतु के बारे में कहा जाता है कि वह सौरमंडल बनते समय का ही अवशेष पदार्थ है जो किसी ग्रह पिंड का रूप धारण नहीं कर सका और ऐसे ही अनगढ़ स्वरूप में रह गया। उसमें प्रायः वे ही पदार्थ पाए जाते हैं, जिनसे अपनी पृथ्वी का गठन हुआ है। उस धूलि में बैक्टीरिया और वायरस— जीवकोश तथा विषाणु दोनों ही बड़ी मात्रा में पाए गए हैं। इससे पता चलता है कि विकासवाद के कथनानुसार पृथ्वी पर जीवन बाद में उत्पन्न हुआ कहना गलत है। जीवन अनादिकाल से पदार्थ की ही भांति विद्यमान है।

धूमकेतु जब धूलि भरे अन्धड़ की तरह पृथ्वी के निकट आते हैं तो बारीक धूलि कणों की आँधी अपने साथ लाते हैं और छोटी-बड़ी उल्काएँ भी बरसती है। इतना ही नहीं, जीवाणुओं-विषाणुओं की ऐसी बौछार भी करते हैं, जो धरती के प्राणियों के लिए उपयोगी कम और हानिकारक अधिक होते हैं।

पृथ्वी बनते समय की विनिर्मित चट्टानों में जीवन पाया गया है। निश्चय ही यह उसका अपना उत्पादन नहीं, वरन अंतरिक्षीय अनुदान है। इतना ही नहीं, धूमकेतु के मध्यवर्ती नाभिक में वह क्षमता भी विद्यमान है जो भयंकर विकिरण उत्पन्न करती है और उसके प्रभाव क्षेत्र की लंबी परिधि होती है।

प्रथम बार जिस खगोलवेत्ता ‘हेली’ ने इसका एक प्रामाणिक भित्ति-चित्र तैयार किया था, उसी के नाम पर इसका नामकरण किया गया है। गत वर्ष उसके समीप पहुँचकर प्रथम बार उसे सही चित्र खींचने तथा उसका कुछ पदार्थ बटोरकर धरती पर लाने का प्रयास किया गया। इससे उसकी संरचना तथा प्रभाव-प्रक्रिया के संबंध में प्रामाणिक रूप से अधिक कुछ जानने का प्रयास किया गया है।

कभी-कभी पृथ्वी पर उल्काओं की जलती हुई फुलझड़ी जैसा आभा बरसती दृष्टिगोचर होती है। उस अद्भुत दृश्य को देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। ऐसी अग्नि वर्षा का दृश्य पिछले दिनों सन् 1972. में देखा गया था। इसके पूर्व भी इन दृश्यों की पुनरावृत्ति होती रही है। कारण यह होता है कि पृथ्वी अपने कक्ष में परिभ्रमण करती हुई ऐसे स्थान पर जा पहुँचती है, जहाँ किसी धूमकेतु के छोड़े हुए अवशेष बिखरे होते हैं। वे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से खींचकर जब वायुमंडल में प्रवेश करते हैं और जलकर भस्म हो जाते हैं। यही होता है इन आकाशीय ज्योतियों के दृष्टिगोचर होने का कारण।

रूस के साइबेरिया प्रांत के अंतर्गत तुम्मुस्का नामक एक स्थान में सन् 1908 में एक भयंकर विस्फोट हुआ था, जिसमें पृथ्वी की टक्कर एक विशाल उल्का से हो गई थी। ऐसे अनेक छोटे धूमकेतु हैं जो सूर्य से 25 करोड़ मील दूर रह जाने पर वापस लौट पड़ते हैं और आगे का रास्ता अपनाते हैं। हमारी पृथ्वी भी सूर्य से प्रायः 25 करोड़ मील पर ही परिक्रमा करती है। ऐसी दशा में यह संभावना बनी ही रहती है कि उनका आवागमन पृथ्वी के साथ मुठभेड़ करे या अपना कोई अतिरिक्त अनुपयुक्त प्रभाव छोड़े। कुछ भी हो, यह तो सत्य है कि अंतर्ग्रही धाराएँ अपना प्रभाव जीव जगत एवं पर्यावरण-संतुलन ही नहीं, सूक्ष्म वातावरण पर भी छोड़ती है। इनसे बचने व अनुकूलन का मध्य का मार्ग निकालने की विधा ज्योतिर्विज्ञान के अंतर्गत आर्षग्रंथों में काफी समय से समझाई जाती रही है। साधना-उपचारों की नियमितता निश्चित ही प्रतिकूल प्रभावों से रक्षा करती है।


कर्त्तव्यपालन— एक योगाभ्यास

एक योगी भिक्षा माँगने गाँव में गया। गृहस्वामिनी ने कहा— “मैं योग साध रही हूँ। कृपा करके आप बाहर बैठ जाएँ। निपटते ही मैं भिक्षा दूँगी।”

योगी को आश्चर्य हुआ कि यह कैसी योग-साधना, जिसमें यह घर में इधर-उधर घूम रही है और मुझे बहाना बताती है। कुछ देर प्रतीक्षा करने पर योगी को क्रोध आने लगा और वे शाप देने की धमकी देने लगे।

योगी की झोपड़ी उपवन में जिस पेड़ के नीचे थे, उस पर बैठी हुई एक चिड़िया ने एक दिन साधना के समय साधु पर बीट कर दी। साधु को क्रोध आया। उसने आँखें तरेर कर देखा तो चिड़िया जल गई और नीचे गिर पड़ी। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी मात्र योगीराज ही थे।

यह घटना गृहस्वामिनी ने अपनी दिव्यदृष्टि से देख ली और साधु से कहा— “शाप की धमकी न दें। मैं चिड़िया नहीं हूँ जो जल जाऊँगी।”

साधु को उस एकांत प्रसंग की जानकारी प्राप्त किए जाने पर भारी आश्चर्य हुआ। कुछ ही देर बाद जब गृहस्वामिनी भिक्षा लेकर बाहर आई, तो साधु ने उस चिड़िया वाली घटना की जानकारी कैसे मिली? यह पूछा।

गृह स्वामिनी ने कहा— “मैंने आपको कहा था कि मैं योग साधना कर रही हूँ।” वस्तुतः वह अपने वृद्ध सास, ससुर की आवश्यक सेवाओं में समग्र श्रद्धा के साथ लगी थी। वही उसकी साधना थी। साधु ने इस संबंध में अनेक तर्क किए तो उस अनपढ़ महिला ने इतना ही कहा कि मेरे गुरु तुलाधार वैश्य अमुक गाँव में रहते हैं। उनसे तत्त्वज्ञान पूछें। मैं तो उनके बताये हुए मार्ग पर चली आ रही हूँ।”

संत बताए हुए पते पर तुलाधार से मिलने चले। वे दुकान चला रहे थे। योगी को देखते ही उसने उनका सारा विवरण बता दिया, “आप अमुक स्थान से आए हैं। आपने ही क्रोध से चिड़िया जलाई थी न?”

योगी को इस बार और आश्चर्य हुआ। बिना बताए सारी पूर्व घटनाएँ इसने कैसे जानी? दुकान चलती रही। साधु प्रतीक्षा करते रहे। अंत में बिना पूछे ही वैश्य ने कह दिया— “मैं पूर्ण ईमानदारी से दुकान चलाता हूँ। किसी को खराब माल नहीं देता और न अधिक मुनाफा लेता हूँ। योग का तत्त्वज्ञान मैं नहीं जानता। वह जानना हो तो मेरे गुरु श्वेनाक चांडाल से मिलें। वे काशी में रहते हैं, पहुँचे हुए तत्त्वज्ञानी हैं। वे आपको तर्क, तथ्य प्रकार समझा सकेंगे। मैं तो ईमानदारी से दुकान चलाना, इतना भर ही जानकारी रखता हूँ।”

योगी काशी पहुँचे। नगर से बाहर ही एक व्यक्ति खड़ा मिला। उसने योगी को साष्टांग प्रणाम किया और कहा— “मेरा ही नाम श्वेनाक है। मेरा पता लगाने और नियत स्थान न होने से आपको कठिनाई पड़ती। सो मैं स्वयं ही आपसे भेंट करने चला आया। आप वही हैं न जो तुलाधार से, गृहस्वामिनी से मिलते हुए आए हैं। आपने ही चिड़िया जलाई थी? मैं भी योग साधना करता हूँ। मेरे साथ चलें तो मैं अपनी क्रिया-प्रक्रिया दिखाकर आपका समाधान कर दूँगा।”

चांडाल अतिथि योगी को लेकर गंगातट पर गया, वहाँ एक छाया के स्थान में उनको बिठाया। स्वयं नालियाँ साफ करने आदि के कामों में लग गया। शाम को जब निवृत्त हुए, तो साधु को साथ लेकर अपनी झोपड़ी में गया। साधु खड़े सारे दृश्य देख रहे थे। उसने अपने अंधे माँ-बाप को स्नान कराया, भोजन कराया। हाथ पैर दाबे, कपड़े धोए और सुलाया।

अब उसने अचंभित योगी को कहा— “मुझे जो भूत-भविष्य ज्ञान की सिद्धियाँ मिली है, उसका निमित्त कारण यही योगाभ्यास है, जिसे मैं कर्त्तव्यपालन के रूप में करता आ रहा हूँ।”

योगी ने समझ लिया कि पूरी निष्ठा से कर्त्तव्य का पालना करना भी एक योगाभ्यास है।


काय-ऊर्जा के सुनियोजन से प्रखरता का विकास

मानवी शरीर चेतना का एक विशाल भंडार है। इसी ऊर्जा-प्रवाह से शरीर के सारे आंतरिक क्रियाकलाप चलते रहते हैं और वह स्वस्थ— सबल बना रहता है, पर कई बार इस शक्ति-प्रवाह में व्यतिक्रम उत्पन्न हो जाने से विद्युत सभी अंगों को समान रूप में नहीं मिल पाती। ऐसी असंतुलन की स्थिति में उनमें तरह-तरह के असामान्य लक्षण उभरने लगते हैं, जो अन्ततः व्याधि का रूप धारण कर लेते हैं। इस स्थिति में यदि चेतना-प्रवाह के व्यवधान को किसी बाह्य माध्यम द्वारा ठीक किया जा सके, तो शरीर के अंग पुनः स्वस्थता को प्राप्त कर सकते हैं।

आजकल चिकित्सा जगत में इसी सिद्धांत का उपयोगकर कृत्रिम यांत्रिक विद्युत द्वारा विभिन्न प्रकार के रोगों का उपचार किया जा रहा है। उपचार जगत में चिकित्सा विज्ञान की इस नवविकसित तकनीकी को “इलैक्ट्रोथेरेपुटिक डिवाइसेज” के नाम से जाना जाता है। इस प्रयोजन हेतु रुग्ण शरीर के भीतर के ऊर्जा केंद्रों को विकसित किया जाता है और बाह्य विद्युत के हस्तांतरण का कार्य संपन्न भी। जिससे शरीर को अनुभव होने वाले दुख-दर्दों को आसानी से दूर किया जा सके। इतना ही नहीं गूँगे का बोलना, अंधे का देखना और अपंग का चल सकना तथा पागलों का ठीक होना भी संभव हो सका है।

गत दो दशकों की उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञों ने विश्वास प्रकट किया है कि बिना किसी औषधि और शल्य-प्रक्रिया के क्षतिग्रस्त तंत्रिकाओं को आसानी से जोड़ा और सक्रिय बनाया जा सकता है। लगभग 2000 वर्ष पूर्व रोमन चिकित्सकों द्वारा ईल मछली पर किए गए परीक्षणों से यह सिद्ध हो गया था कि मछली की टाँग कटकर भी कुदकने-फुदकने लगती है, अर्थात् शरीर से अंगों के पृथक हो जाने पर भी उनमें विद्युत-प्रवाह अनवरत बना ही रहता है। यदि इस विद्युत-प्रवाह को पुनः शरीर में हस्तांतरित किया जा सके तो टूटी हुई अस्थि पुनः जुड़ सकती है। सन् 1812 में इसी स्तर के सफल प्रयोग-परीक्षण बहुत बड़ी संख्या में संपन्न किए गए। इसके बाद ही फैराडे का “इलैक्ट्रोमेग्नेटिक काॅयल” का सिद्धांत प्रकाश में आया। यदि इस चिकित्सा के विकास का यही क्रम निरंतर चलता रहा तो इस शताब्दी के आखिर तक जनसाधारण भी इसके प्रभावकारी सत्परिणामों से अवगत होकर विभिन्न रोगों से बचाव हेतु इनका लाभ उठा सकेंगे।

काय-विद्युतीय क्षमता के सिद्धांत पर ही सन् 1970 में ल्यूगी गैल्वेनी ने एक मेंढक की टाँग को एक धातु के टुकड़े से स्पर्श कराया तो उससे जुड़े यंत्र में विद्युत करेंट जैसे झटके महसूस होने लगे। यानी धातु में विद्युत धारा का संचार हो उठा। यही ऊर्जा प्रवाह माँसपेशियों, कोशिकाओं और त्वचा की क्रियाशीलता बढ़ाने में सक्रिय योगदान देता रहता है।

विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक आलसेंडो वोल्टा ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि विद्युत उद्दीपनों की न्यूनाधिकता के कारण ही मांसपेशियाँ सिकुड़ती-फैलती रहती हैं। शरीर के स्नायुतंत्र की संरचना को देखकर यही कहा जा सकता है कि कोशिकाओं का संबंध विद्युत धारा के साथ स्थापित होने से विद्युत रसायन तरंगों में परिवर्तित हो जाती है, जो टूटी हुई अस्थि को फिर से जोड़ देने में सफल होती है। इसी विद्युतीय क्षमता के आधार पर हृदय रोगियों को भी स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा है। हृदय की धड़कनों में परिवर्तन तथा अन्यान्य प्रकार की दुर्बलताओं में इन्हीं विद्युत रसायन तरंगों का प्रयोग आरोग्य लाभ के लिए किए जाने लगा है। पेसमेकर के आरोपण की प्रक्रिया भी इसी सूत्र के आधार पर सफल हुई है।

जाॅन हाॅपकिन्स संसार का सबसे पहला व्यक्ति है, जिसने हृदय रोगियों की पीड़ा को भलीभाँति समझा और उपचार हेतु चिकित्सा के नए आयाम खोज निकाले। “ओटोमैटिक इम्पलान्टेबल डीफ्रिब्रीलेटर” की खोज का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत विद्युत आघात का ही प्रयोग किया जाता है, जिससे रोगों के हृदय की धड़कन सामान्य एवं लयबद्ध तरीके से सुसंचालित होने लगती है। बाल्टीमोर के सिनाई हॉस्पिटल की कोरोनरी केअर यूनिट के निदेशक डॉ0 माइकल मिरोवस्की ने 900 वोल्ट की ऐसी बैटरी का निर्माण करके दिखाया है, जो हृदय की अत्यधिक अनियंत्रित एवं असामान्य धड़कनों को सुगमतापूर्वक नियंत्रित कर सकती है।

कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के डॉ0 एन्ड्रयू बैसेट ने अस्थि भंग के पाँच रोगियों को परीक्षण हेतु चुना। जिनकी चिकित्सा असंभव-सी दिखती थी। विद्युत-प्रवाह को शरीर में पहुँचाने से उनमें से चार लोगों की टूटी हड्डी पाँच माह के अंदर ही पुनः पूर्ववत् हो गई। उनके कथनानुसार विद्युत-प्रवाह अस्थियों की जीवित कोशिकाओं को सीधा प्रभावित करता है और केल्शियम आयन्स एकत्रित होने की प्रक्रिया को प्रभावहीन बनाकर छोड़ता है। यह ऊर्जा-प्रवाह शरीर में पहुँचते ही कोशिकाओं में समाविष्ट ऑक्सीजन की मात्रा कम करता और क्षारीयता को बढ़ाता है, जिससे हड्डियाँ जुड़ने की प्रक्रिया संपन्न होती है।

मस्तिष्क को ऊर्जाशक्ति का मूल स्रोत माना जाता है। शरीर तंत्र के कुशल संचालन में इसी क्षमता की आवश्यकता पड़ती है। यह देखने में भले ही छोटा हो, किंतु इसकी प्रभावी क्षमता देखते ही बनती है। छोटे से परमाणु को जब अपनी शक्ति प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है, तो वह धरती-आसमान हिलाकर रख देता है। मानव शरीर की ऊर्जा में चेतनतत्त्व घुले रहने के कारण इसकी सामर्थ्य और भी बढ़ जाती है। मस्तिष्क के मध्य अर्थात् पेरीएक्वेडक्टल ग्रे मैटर में ऊर्जा-प्रवाह पहुँचाने से प्रतिक्रियास्वरूप इनडोर्फिन नाम का एक प्राकृतिक रसद्रव्य निस्सृत होने लगता है, जो दर्द के प्रभाव को तुरंत समाप्त कर देता है। कैलीफोर्निया यूनीवर्सिटी के डॉ0 योशिया होसोबुची ने इस तरह के परीक्षण कैंसर रोगियों पर भी किए, जिनमें अप्रत्याशित सफलता मिली है। अलबर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के डॉ0 स्टीफन वेज के अनुसार आज कई चिकित्सा केंद्रों में इस स्तर के प्रयोग 75 प्रतिशत रोगियों पर किए जाने लगे हैं, जिसके आशातीत सत्परिणाम सामने हैं।

ट्यूलेन यूनीवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के डॉ0 राबर्ट हीथ के अनुसार यह ऊर्जा-प्रवाह शरीर में पहुँचकर न केवल दर्द को ही मिटाता है, वरन चेतन तत्त्व मिले रहने के फलस्वरूप विचारों की श्रृंखला को भी पूरी तरह प्रभावित करता है। योग-साधना के द्वारा इसी काय-ऊर्जा को, संतुलित-नियंत्रित करके मस्तिष्क के ‘प्लेजर सेंटर्स’ को सरलता से उकसाया जाता है, जिससे व्यक्ति का जीवन सदा स्वस्थ एवं सुखद बना रहता है। स्पेन के सुप्रसिद्ध चिकित्सक जोस डलगाडो द्वारा किए गए परीक्षणों से पता चला है कि यदि मस्तिष्क को विद्युत द्वारा उत्तेजितकर उसकी आंतरिक ऊर्जा को सुविकसित कर लिया जाए और उसे उपयुक्त दिशाधारा दी जा सके, तो व्यक्ति के चिंतन-प्रवाह को विधेयात्मक मोड़ दिया जा सकता है, उसे परिमार्जित-परिष्कृत किया जा सकता है और व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाया जा सकता है। योग-साधनाओं द्वारा योगीजन इसी प्रक्रिया को संपन्न करते हैं। विभिन्न प्रकार के योगाभ्यासों द्वारा शरीर विद्युत को नियंत्रित-सुनियोजितकर वे न सिर्फ शरीर-मन से स्वस्थ बने रहते हैं, वरन अपनी मलीनता को हटाकर प्रखरता उभारने में भी सफल होते हैं। यह प्रखरता वस्तुतः काय-ऊर्जा के सुनियोजन से ही सफल— संभव बन पाती है। श्रेष्ठ, प्रखर-व्यक्तित्वसंपन्न व्यक्ति संभवतः अगले दिनों इसी आधार पर बनाए जाएँगे।


हजरत मूसा (कहानी)

हजरत मूसा बीमार पड़े। उनने अल्लाह से स्वास्थ्य के लिए दुआ माँगी। अल्लाह ने उनकी दुआ सुनी और अच्छा कर दिया। मूसा फिर बीमार पड़े और उनने फिर दुआ माँगी। अबकी बार अल्लाह ने संदेश भेजा कि हकीम बुअली सोनाअ के पास जा और उससे इलाज करा। मूसा गिड़गिड़ाए और कहने लगे— आप सर्वशक्तिमान हैं। आप ही अच्छा क्यों नहीं कर देते? अल्लाह ने कहा— "मैं समर्थ हूँ इसीलिए मरीज, ठीक करने की जगह ठीक करने वालों को बनाने का काम अपने जिम्मे लिया है।"


कीर्तिमानों की सनक

लोकेषणा का नशा इतना मादक होता है कि व्यक्ति जीवन और शरीर के मूल उद्देश्य को भूल बहुधा भ्रमित हो जाता है और ऐसे क्रिया-कौतुक में उलझ पड़ता है, जिसमें लाभ तो कुछ नहीं उल्टे समय, श्रम और धन की बर्बादी ही होती है। कोई ऐसा साहस-पराक्रम किया जाए, जो अपनी गरिमा बढ़ाए या समाज के हित-साधन में काम आए तो कष्ट-सहन की उपयोगिता भी समझी जा सकती है, पर केवल इसलिए कि दूसरे लोग जो काम नहीं कर सकते, वह हम कर सकते हैं— ऐसा कुछ कर दिखाना और जोखिम उठाना, तो लोकेषणा का, आत्मश्लाघा का भौंड़ा प्रदर्शन ही कहा जाएगा। इन दिनों ऐसे ही कीर्तिमान स्थापित करने का प्रचलन चल पड़ा है। इन कार्यों को देखकर अचंभा तो होता है, पर यह समझ में नहीं आता कि ऐसा करने की योजना बनाते समय किन आदर्शों की पूर्ति ध्यान में रखी गई।

पूना के धनंजय जैन ने साढ़े चार घंटों में 194 कप चाय पी डाली। एक बार में नींद की 64 गोलियाँ खाईं तथा पाँच मिनट में 49 सिगरेट फूँक डाली। उन्होंने लोनोवला में पूना तक उल्टे पीठ चलकर यात्रा भी की। वे इसी प्रकार करतब दिखाकर अपना नाम कमाना चाहते हैं।

गहरे पानी में गोता लगाने वालों में जैकिस मैओर (फ्रांस) का नाम सर्वप्रथम गिना जाता है। 9 नवंबर 1973 को उसका 282 फुट गोता लगाने का रिकार्ड है।

स्त्रियों में ज्यूलिना ढिलेनी (इटली) के रिकार्ड को मान्यता दी गई है। सितंबर 1987 में उसका रिकार्ड एक सौ अड़तालीस फीट गहरे पानी में गोता लगाने का है।

संसार में सबसे अधिक शादी करने का रिकार्ड गिल्म डी मौस (यू.एस.ए.) के नाम है। एक पादरी होते हुए भी उसने अपने जीवन में कई शादियाँ कीं। 23वीं शादी उसने 22 जून 1979 में की। अरब देशों के आँकड़े लिए जाएँ तो वे इन्हें पीछे छोड़ देंगे। सबसे अधिक आयु में शादी बैलग्रेड यूगोस्लाविया में हुई। नवंबर 1963 को डोटा एब्रौमौविच (101) ने यूला जीविच (15) से शादी करके नया रिकार्ड बनाया।

परस्पर सबसे अधिक बार शादी की वर्षगाँठ भव्य समारोह के रूप में मनाने हेतु और ऐडिना मोटन (वाशिंगटन) का नाम लिया जाता है। इन्होंने अपने पूरे जीवन में 40 विवाह समारोहों का आयोजन किया, जिसमें अंतिम समारोह वैस्टमिनिस्टर ऐवी, (लंदन) में सन् 1975 में मनाया गया।

एक दिन में विश्व में सबसे अधिक विवाह समारोह सिओल (दक्षिण कोरिया) में मनाये गए। 14 फरवरी 1975 को 1800 दंपत्तियों के समारोह मनाए गए।

सबसे अधिक देर तक बैगपाइप वाद्य बजाने वाले व्यक्ति चर्च स्कूल पाइप बैंड, सेलिसवरी (जिम्बाब्वे) के हैं। 9 से 13 जुलाई 1976 तक चारों व्यक्तियों (नेविले वर्क मैन, क्लाइव हिगिन्स, पैट्रिक फोर्थ और बौल हैरिस) ने 100 घंटे तक निरंतर बैगपाइप को बजाया।

एक पैर पर निरंतर संतुलन बनाए रखने का प्रमाण ऐन्टन क्रस्टी जैफिन (श्री लंका) का है, जिसने 27-28 मई, 1979 को 31 घंटे 45 मिनट तक बिना किसी लकड़ी का सहारा लिए ही खड़ा रहने का उदाहरण विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया। ऐसे हठयोगी भारत में भी मिल जाएँगे, जो अध्यात्म के नाम पर साधना का ढिंढोरा पीटते दिखाई देंगे, पर इसमें अध्यात्म कहीं है नहीं।

हाथ से ताली बजाने का रिकार्ड 140 ताली प्रति मिनट का मिला है, जो 100 गज की दूरी तक भी सुना जा सका। 19-20 अगस्त 1977 को इन ध्वनियों को जेम्स डटन स्टैवन वैसमोर मैलौडी गौडरिच और टैमी राबर्टसन के हाथों से रिचमौंड वर्जीनिया (यू.एस.ए.) में रिकार्ड किया गया।

“गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड” में लिखा है कि ज्यौफ सिलमौन (हेम्पशायर) ने 19 एवं 20 फरवरी सन् 1977 को 24 घंटे तक निरंतर बंशी बजाई। रिकार्ड बुक में अपना नाम अंकित करने के इच्छुक ऐसे अनेकों व्यक्तियों के विचित्र विवरण इसमें पढ़ने को मिलते हैं।

गिटार बजाने का सबसे लंबा कीर्तिमान (20 से 28 जून 1978 तक) डैविट हेथवे मैटिअन (इण्डियाना) का 200 घंटे 2 मिनट तक निरंतर बजाने का है।

पाँच से लेकर 19 मार्च 1979 की अवधि में गैरी स्ट्रपल (डोवर-कैन्ट-इंग्लैंड) ने 341 घंटे 58 मिनट तक लगातार बालों को संवारने का कीर्तिमान स्थापित किया।

सैक्टन ऑफ एल्डनबर्ग (जर्मनी) निवासी जोन हिनरिच कार्ल ने अपने 50 वर्ष के जीवनकाल में 23 हजार 3 सौ ग्यारह कब्रें खोदीं और सन् 1826 में उसने अपने ही अध्ययन कक्ष को अपनी कब्र बना लिया, जहाँ अंत में उसका दफन किया गया।

सबसे अधिक पत्र लेखन का रिकार्ड रेमोन्ड एल कैन्टवैल (औक्सफोर्ड इंग्लैंड) का है, जिसने 25 अगस्त से 16 सितंबर 1978 तक 3998 पत्रों को उनके लिफाफों के साथ पूरा किया। हर पत्र अपने आप में एक 32 पृष्ठ की पुस्तक के बराबर था। यह बात अलग है कि उसमें जो लिखा था, वह सब बेसिरपैर का था।

विश्व की सबसे लंबी पैदल यात्रा (सिंगापुर से लन्दन तक) 14 राष्ट्रों को पार करते हुए 22 वर्षीय नवयुवक डैविड क्वान ने की। 4 मई 1957 को 81 सप्ताह में इस अभूतपूर्व यात्रा का समापन हुआ, जिसमें उसे कुल 18 हजार 500 मील का पैदल मार्ग तय करना पड़ा। इसी तरह सायंकाल पर विश्व यात्रा हेतु कई व्यक्ति निकलते रहते हैं।

क्यूबा के हवाना नगर में डाकिए का कार्य करने वाला फेलिक्स चाबलिया ठिगने कद का व्यक्ति था, परंतु था वह जिद्दी प्रकृति का। 1904 में सेंट लुईस मिसूरी के विश्व मेले में आयोजित होने वाले मैराथन दौड़ में भाग लेने की उसकी तीव्र उत्कंठा हुई। 26 मील की मैराथन दौड़ में भाग लेने प्रतियोगिता जीतने और क्यूबा का नाम रोशन करने की उसने सार्वजनिक घोषणा कर दी। लोग फेलिक्स की घोषणा सुनकर दंग रह गए; क्योंकि इस अदने से व्यक्ति ने अब तक किसी भी छोटी-मोटी दौड़ में भाग नहीं लिया था, फिर मैराथन तो एक जानलेवा दौड़ थी, जिसमें विजय श्री पाना तो और भी मुश्किल था।

सेंटलुईस तक की यात्रा के लिए फेलिक्स के पास पैसे भी नहीं थे। चंदा करके कुछ रुपये एकत्र किए और चल पड़ा मैराथन में भाग लेने; परंतु दुर्भाग्य से न्यू ओरलिन्स में उसके सभी पैसे छिन गए। उस अजनबी शहर में वह अकेला था और उसकी जेब खाली थी। इस विषय परिस्थिति में भी फेलिक्स संतुलित बना रहा। मैराथन दौड़ में भाग लेने और विजयी बनने के उसमें हौसले अब भी बुलंद थे। फेलिक्स ने 700 मील की लंबी दूरी को दौड़ लगाकर तय करने और मैराथन में भाग लेने का निश्चय कर लिया और दौड़ लगाना आरंभ कर दिया। रास्ते में माँगने पर जो कुछ मिल जाता, उसी पर जीवन निर्वाह करते हुए आगे बढ़ता रहा। मैराथन आरंभ होने में कुछ ही दिन बाकी थे, अतः फेलिक्स को अपने सोने के समय में कटौती करनी पड़ी। एक-एक पग कम होते पूरे सात सौ मील की दूरी तय करके फेलिक्स जब सेंट लुइस पहुँचा तो मैराथन दौड़ शुरू होने ही वाली थी।

शरीर से थका, जर्जरित, भूखा-प्यासा फेलिक्स 31 धावकों की दौड़ में नाम लिखा उनकी पंक्ति में झट-पट सम्मिलित हो गया। गर्मी की चिलचिलाती धूप में मैराथन दौड़ की शुरुआत हुई, जिसमें 13 धावक ही उस दौड़ को पूरा कर सके। फेलिक्स उनमें से एक था और उसे अंतिम स्थान प्राप्त हुआ। इसके बाद वह थकान से जर्जर हो बिस्तर पकड़ बैठा एवं अंततः कम उम्र में ही मृत्यु की गोद में चला गया।

वस्तुतः कीर्तिमान बनाने की धुन एक प्रकार की सनक ही है, जिनसे हर किसी को बचना चाहिए और इससे बचे समय-श्रम को किसी जीवनपयोगी-मानवोपयोगी कार्य में लगाना चाहिए। यदि कुछ करना ही है जो जीवन निर्माण के क्षेत्र में स्वयं को महामानवों के समकक्ष बनाने का पुरुषार्थ किया जाता रहे तो उसे सार्थक कहा जा सकता है।


आकृतियों की असाधारण प्रभाव क्षमता

संरचनाओं के आकार का शरीर मन और वस्तुओं पर गहरा प्रभाव है, यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। अब यह भी सत्य सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्मांडीय उद्दीपनों को ग्रहण करने में आकृति विशेष की प्रमुख भूमिका रहती है। इसके ज्वलंत उदाहरण हैं — मिश्र के पिरामिड।

मिश्र के सबसे प्राचीनतम पिरामिडों में गीजा के पिरामिडों की गणना होती है। कुछ वर्ष पूर्व बौविस नामक एक पर्यटक इसके निरीक्षण के उद्देश्य से आया और फराओं के ग्रेट पिरामिड में कुछ घंटे बिताए। यहाँ बोविस को जिस बात ने सबसे अधिक अचंभे में डाला वह थे कुछ वन्य-जंतुओं के शव, जो पूरी तरह सूख चुके थे। आर्द्रता के बावजूद उनमें किसी प्रकार की सड़न नहीं आईं थी। इस घटना को देखने के बाद उसे यह जिज्ञासा हुई कि क्या सचमुच कोई रहस्यमय ऊर्जा इसके भीतर काम करती है अथवा “ममीज” को सुरक्षित रखने के लिए किसी प्रकार के रसायन के लेपन की आवश्यकता पड़ती है।

यह जानने के लिए बोविस ने हूबहू ग्रेट पिरामिड की एक अनुकृति बनाई और उसके अंदर दिशा विशेष में एक मरी बिल्ली रखी। उसने देखा कि कुछ दिनों में इसकी ममी बन गई। इस आधार पर उसने निष्कर्ष निकाला कि पिरामिड डिहाइड्रेशन क्रिया की गति को तेज कर देता है। बोविस के इस परीक्षण के बाद अनेक वैज्ञानिकों ने भी इस विशेष संरचना पर प्रयोग-परीक्षण किए। 'प्राग' के रेडियो इंजीनियर कैरेल डर्बल ने भी इस विशेष संरचना और उसके साथ जुड़ी मान्यताओं की सत्यता अनेक प्रयो-परीक्षणों द्वारा परखी। अंंत में अपना निष्कर्ष देते हुए उनने कहा कि पिरामिड के अंदर बंद आकाश की आकृति विशेष एवं उसके अंदर सतत् क्रियाशील भौतिक, रासायनिक एवं जैविक प्रक्रियाओं के बीच किसी न किसी प्रकार का संबंध अवश्य है। उनका यह भी कहना था कि उपयुक्त आकार-प्रकार के माध्यम से हम इन क्रियाओं की गति तेज अथवा मंद कर सकते हैं।

अब डर्बल यह जानने की इच्छुक हुए कि वस्तुओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है, अस्तु उनने कुछ भोंथरे छुरी एवं ब्लेड को पिरामिड के अंदर रखा और 24 घंटे के बाद उनकी धार देखी। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उनने यह पाया कि उनकी धार तेज हो गई है। वस्तुतः रेजर ब्लेड की धार की संरचना रवादार क्रिस्टल की तरह होती है। भोंथरेपन की स्थिति में उनकी धार के रवे घिर जाते हैं, किंतु जब उसे पिरामिड की सायुज्य आकृति रखा जाता है, तो उसके रवे फिर से प्रारंभिक स्थिति में आ जाते है और धार तेज हो जाती है।

ऐसे ही प्रयोग उनने मनुष्यों पर किए। एक मानसिक रूप से परेशान महिला को जब उसके अंदर कुछ दिन तक रखा गया तो उसकी मानसिक स्थिति में आश्चर्यजनक परिवर्तन परिलक्षित हुआ। अनुभवों के बारे में पूछे जाने पर उसने बताया कि पहले वह बहुत उद्विग्न रहती थी। छोटे मोटे कामों में ही थकान महसूस करने लगती थी और जो कुछ पढ़ती, तुरंत भूल जाती, किंतु इस विशेष संरचना के अंदर कुछ दिन बिताने के बाद तो थोड़े ही समय में उसके सारे मनोविकार दूर हो गए और उच्चकोटि की एकाग्रता व शांति प्राप्त हुई। यह भी देखा गया कि जटिल समस्याओं के समाधान पिरामिड अनुकृति के अंदर अपेक्षाकृत कम समय और कम मानसिक श्रम से ही उपलब्ध हो जाते हैं। उनके व्यक्तियों ने इसके अंदर प्राप्त दिव्य व रहस्यमय अनुभूतियों का वर्णन किया। अंग्रेज पर्यटक पाल ब्रण्टन ने ऐसी ही अनुभूतियाँ अपने एक रात के प्रयास के दौरान गीजा में प्राप्त की थी, जिसका विशद वर्णन अपनी प्रमुख पुस्तक 'ए सर्च इन एनसिएण्ट इजिप्ट' में किया है।

इतना ही नहीं विशेषज्ञों का विश्वास है कि व्यक्ति यदि इसके भीतर बैठकर योगाभ्यास करे तो वह आत्मोन्नति और आत्मपरिष्कृति का लाभ स्वल्पकाल में ही हस्तगतकर ब्राह्मी चेतना से संपर्क में भी सफल हो सकेगा। कई ने व्यक्तिगत रूप से ऐसे अभ्यास किए भी, जिसके परिणाम चमत्कारी देखने को मिले।

इन प्रयोगों में लंबे काल तक वस्तु सुरक्षित क्यों पड़ी रहीं? मनुष्य सदा ताजगी क्यों अनुभव करता है? ब्लेड की धार स्वतः तेज कैसे हो जाती है? इसकी प्रक्रिया को वैज्ञानिक नहीं समझा सकें; परंतु एक बात अवश्य स्वीकारी कि यह विशेष आकार लेन्स की तरह व्यवहार करता है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने अंदर रखी वस्तुओं पर केंद्रीभूत करता रहता है; फलतः यह चमत्कार देखने को मिलते हैं।

वस्तु और मनुष्य पर किए गए प्रयोगों की इस श्रृंखला के बाद डर्बल को यह संदेह हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं, कि हर प्रकार का कृत्रिम मॉडल ऐसा ही प्रभाव छोड़ता हो? इस भ्रान्ति के निवारण के लिए उन्होंने दो प्रकार के मॉडल बनाए; एक तो हूबहू ग्रेट पिरामिड की नकल था एवं दूसरा एक आयताकार कार्ड-बोर्ड की बक्सनुमा संरचना। दोनों में उनने कुछ अंंडे, सब्जियाँ व दूध रखे। पिरामिड मॉडल में जो वस्तुएँ रखी गई थीं, वे सुरक्षित बनी रहीं; मगर जिन्हें आयताकार बक्से में रखा गया था, उनमें तुरंत सड़न व बदबू आने लगी। जो इस बात का प्रमाण था कि पिरामिड की बनावट कोई तीर और तुक्के का संयोग नहीं, वरन निश्चित नियमों व सिद्धांतों का परिपालन करने वाली विज्ञान पर आधारित संरचना है। वैज्ञानिकों ने जब ग्रेट पिरामिड का आधार और इसके विभिन्न फलकों का अनुपात निकाला, तो इनमें से अधिकांश से गणितीय राशि “पाई” का मान प्राप्त होता था। इसके अतिरिक्त इसके अन्यान्य अनुपातों से विभिन्न खगोलीय पिंडों की दूरियाँ भी ज्ञात होती थीं। यह सब तथ्य इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध करते हैं।

मिश्र के पिरामिडों के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए वैज्ञानिक समय-समय पर प्रयोग-परीक्षण करते रहे हैं। 1979 में यूनाइटेड स्टेट्स के वैज्ञानिकों और ईन शाम्स यूनिवर्सिटी, कैरो के वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से एक प्रयोग किया। उन्होंने सोचा कि पिरामिड का एक्स-रे लेने से शायद कोई ऐसा सूत्र हाथ लग जाए, जो रहस्य का पर्दा अनावृत कर सके। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर उन्होंने पिरामिड के एक कक्ष में एक डिटेक्टर लगाया, ताकि ब्रह्मांडीय किरणों की उपस्थिति का पता लगाया जा सके। मशीन दिन-रात एक वर्ष तक अविराम चलती रही। इसके बाद प्राप्त आँकड़ों का उच्च कोटि के परिष्कृत कम्प्यूटरों द्वारा विश्लेषण किया गया। विश्लेषण से ऐसे तथ्य हाथ लगे, जो विज्ञान के नियमों का उल्लंघन करते थे। दल के प्रधान गोहेड का कहना था कि एक ही मशीन द्वारा किसी एक ही बिंदु पर नित्यप्रति लिए गए “काॅस्मिक-रे-पैटर्न” में भारी व्यतिरेक हो, ऐसा विज्ञान के नियमों के सर्वथा प्रतिकूल है और विज्ञान के दायरे में असंभव भी। इसे तो रहस्यवाद के अंतर्गत रखना ही समीचीन होगा; किंतु इतना उन्होंने अवश्य स्वीकारा कि इसके भीतर किसी न किसी प्रकार की शक्ति अवश्य कार्य करती है, जो विज्ञान के लिए चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। कुछ वैज्ञानिकों ने इसे एलेक्ट्रोमैगनेटिक स्तर की सूक्ष्मऊर्जा बताया है, जबकि एक अन्य दल का कहना है कि यह और कुछ नहीं, वरन् ब्रह्मांडीय ऊर्जा ही है। हर प्रकार की खोखली आकृति में इसकी न्यूनाधिक उपस्थिति होती है; मगर पिरामिड के विशेष आकार के कारण इसमें उसकी सक्रियता अपेक्षाकृत अधिक बढ़ जाती है; फलतः चमत्कारिक परिणाम प्रस्तुत करती है।

यह तो पिरामिड और उसके प्रभाव की चर्चा हुई; मगर यही आकृति वस्तुओं और मनुष्यों पर अपना प्रभाव छोड़ती हो, ऐसी बात नहीं है। अन्यान्य विशिष्ट आकृतियाँ भी अपने भले-बुरे प्रभाव से वस्तुओं को प्रभावित करती हैं, अब यह एक प्रमाणित तथ्य है।

जापान के एक उद्योगपति योशुको को यह धुन सवार हुई कि एक ऐसी इमारत बनवाई जाए, जो विलक्षण हो। उसने एक बहुभुजी और बहुकोणीय इमारत की डिजाइन तैयार करवाई और उसी के आधार पर एक विशाल भवन बनवाया। भवन के भीतर पुनः एक बहुकोणीय मकान था; पर भवन और मकान के कोणों में भिन्नता थी। इमारत जब बनकर तैयार हुई, तो योशुको सपरिवार अपने पुराने मकान से नए में स्थानांतरित हो गया। नए मकान में आए अभी पाँच दिन भी नहीं हुए थे कि सभी के सिर में दर्द रहने लगा। धीरे-धीरे मिचली और बेचैनी भी सताने लगी। आरंभ में योशुको इसे संयोग मानकर दर्द और मिचली की सामान्य दवाएँ लेता रहा, पर जब शिकायत स्थाई बन गई, तो उसे चिंता हुई। उसने डॉक्टर से संपर्क किया। पूरी कहानी सुनने के बाद डॉक्टर ने उसे मकान छोड़ने की सलाद ही। योशुको परिवार सहित अपने पुराने मकान में पुनः आ गया। स्थानांतरण के बाद सभी की समस्याएँ स्वतः समाप्त हो गई।

फ्रांस की एक कंपनी ने दही बनाने और रखने के लिए एक विशेष आकार के पात्र का आविष्कार किया। इस पात्र की विशेषता यह थी कि यह बैक्टीरिया की क्रियाशीलता को बढ़ा देता था, जिससे दही अन्य पात्रों की तुलना में इसमें अधिक जल्दी जम जाता था।

इसी प्रकार का एक नकारात्मक प्रयोगों चैकोस्लोवाकिया की एक शराब-निर्मात्री कंपनी ने भी किया; पर उसे लाखों का घाटा उठाना पड़ा था। कंपनी ने शराब रखने वाले पात्रों का गोल आकार बदलकर कोणीय कर दिया था। परिणाम यह हुआ कि शराब जल्दी ही उसमें खराब होने लगी, यद्यपि निर्माण-विधि पूर्ववत् ही थी।

कनाडा के डॉक्टरों का शोध-निष्कर्ष यह है कि सामान्य आकार-प्रकार वाले हॉस्पिटल वाॅर्डों की तुलना में मरीज वैसे वाॅर्डों में अधिक शीघ्रता से स्वस्थ होते हैं, जिनकी दीवारें परस्पर असमांतर (टैपेज्वायड आकार की) होती है।

रूसी वैज्ञानिकों ने जब एक घायल बंदर को कोणीय कक्ष में रखा, तो उसकी पीड़ा बढ़ती देखी गई। जर्मन शोधकर्ताओं ने भी एक ऐसा ही प्रयोग बिल्ली पर किया। उन्होंने अपने प्रयोग में एक ही प्रकार के जख्म से जख्मी दो बिल्लियों को लिया। एक को गोलाकार पिंजरे में रखा, जबकि दूसरी को एक आयताकार पिंजरे में। जिस बिल्ली को गोलाकार पिंजरे में रखा गया था, उसके जख्म अपेक्षाकृत तेजी से भरते देखे गए और दूसरी बिल्ली की तुलना में वह स्वस्थ भी जल्दी बनी, जबकि आयताकार पिंजरे वाली बिल्ली के स्वास्थ्य लाभ में कुछ लंबा समय लगा। यह भी देखा गया है कि सिरदर्द की स्थिति में यदि व्यक्ति पिरामिड के आकार की टोपी पहन ले, तो सिर दर्द अविलंब जाता रहता है।

यह सब इस बात के प्रमाण हैं, जो सिद्ध करते हैं कि संरचना के आकार का हम पर गहरा असर पड़ता है। यदि शोध द्वारा यह पता लगाया जा सके, कि किन संरचनाओं का हम पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है और कौन से आकार हम पर बुरे असर डालते हैं? तो समयसाध्य बीमारियों से न केवल जल्दी लाभ पाया जा सकता है, अपितु उपयुक्त आकार के कक्ष में बैठकर एकाग्रचित्त हो ध्यान द्वारा समष्टिगत ऊर्जा से संपर्क स्थापितकर कायसंस्थान के सूक्ष्मकेंद्रों एवं मस्तिष्क के सोए न्यूरान्स को जागृतकर आध्यात्मिक विभूतियाँ भी अर्जित की जा सकती हैं। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की ध्यान-अनुसंधान-प्रक्रिया में इसी तथ्य को दृष्टिगत रख विशिष्ट आकृति के कक्ष बनाए गए हैं व अतिमहत्त्वपूर्ण निष्कर्ष उपकरणों के माध्यम से निकाले गए हैं।


अपने स्वार्थ के लिए (कहानी)

यदि किसी को अधिक भौतिक अधिकार प्राप्त हुए हैं, तो इसका अर्थ कदापि नहीं होता है कि दूसरों का उत्पीड़न किया जाए। आपका स्वास्थ्य उत्तम है, तो दुर्बलों को सताइए नहीं।

अपनी योग्यताओं का लाभ प्राप्त करिए, पर दूसरों के अधिकार तो न छीनिए। संसार में सभी प्राणी स्वतंत्र और स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने के लिए आए हैं, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को कष्ट पहुँचाना अन्याय है। सभी आपकी तरह सुख और सुविधा प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आपकी तरह वे भी अपने प्रयत्नों में लगे हैं, यदि किसी तरह उनकी सहायता नहीं कर सकते तो इतना कीजिए कि आपकी तरफ से उनके प्रयत्नों में किसी तरह की रुकावट न पैदा की जाए।

धरती माता के सारे अनुदान मिल-बाँटकर उपयोग करने के लिए हैं। अधिक पुरुषार्थ करके आप अधिक सुख प्राप्त कर रहे हैं, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं, किंतु अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के सुख छीनकर उनकी बेचैनी बढ़ाने का आपको कोई अधिकार नहीं।


जीवन : सीमित अवधि के लिए मिला पारस

एक लोभी भक्त किन्हीं सिद्धपुरुष के पास जाया करता था। इच्छा उनके आशीर्वाद से बहुत धन प्राप्त करने की थी।

भक्त को बहुत दिन आते और सेवा करते बीत गए, तो उसने अधिक समय गँवाने की अपेक्षा अपने मन की बात कह देना ही उचित समझा। सो नम्रतापूर्वक संत से कहा‌— "मुझे कुछ ऐसा अनुदान दीजिए कि रोज-रोज दरिद्रता का कष्ट न भोगना पड़े।"

भक्त आलसी भी था और उतावला भी। वह तुर्त-फुर्त कोई विपुल संपदा चाहता था, जिसके सहारे बैठे-ठाले समस्त सुविधाएँ मिलती रहें और ठाठ की जिंदगी कटती रहे।

भक्त गिड़गिड़ाता ही रहा। उसने कहा— पुरुषार्थ कहाँ बन पड़ता है? भाग्य साथ कहाँ देता है। यदि दोनों की अनुकूलता बन जाती, तो दारिद्रय क्यों भोगता और आपसे इतनी विनती क्यों करता?

संत वास्तविकता को समझ गए। उनने ऐसा उपाय सोचा, जिससे भक्त का मन भी रह जाए और मुफ्तखोरी को भी प्रोत्साहन न मिले।

संत भक्त को एकांत में ले गए। उसके हाथ में एक पारसमणि थमाई और कहा इसे मात्र एक सप्ताह के लिए दिया जा रहा है। इसके बाद इसकी शक्ति समाप्त हो जाएगी। तब तुम इसे यहीं लौटा जाना। भक्त ने संत का बहुत अनुग्रह माना और पारस को लेकर घर चला गया।

वह रात भर विचार करता रहा कि अधिक मात्रा में लोहा सस्ते भाव में कैसे मिले? जिससे अधिक सोना सरलतापूर्वक एकत्रित किया जा सके।

सबेरे उठकर वह लोहा मंडी में गया। दुकानदारों से लोहे के भाव पूछे। उसे लगा कि यह लोहा मँहगा बेच रहे हैं। वहाँ चलना चाहिए जहाँ सस्ता मिलता हो। उसने जानकारों से पूछताछ की और पता लगाया कि अधिक मात्रा में अधिक सस्ता लोहा कहाँ से मिल सकता है। जो पता मालूम किया था, वहाँ पहुँचा। दाम पहले स्थान की तुलना में तो कम थे, पर उतने भर से संतोष नहीं हुआ। सोचने लगा जब थोक माल बड़ी मात्रा में ही खरीदना है, तो वहाँ क्यों न चला जाए, जहाँ लोहा बनाने का कारखाना है। उसने वहीं की राह पकड़ी। स्थान दूर था, सो पहुँचने में समय तो लगना ही था। नियत स्थान पर पहुँचकर उसने लोहे के भाव तय किए। अनुकूल भाव पर सौदा पक्का हो गया।

लदान कराने से पूर्व कारखाने वालों ने मूल्य जमा करने को कहा। सो वह भी तैयार हो गया। सोचा अभी थोड़ा लोहा लेकर सोना बनाए देते हैं और खरीद का मूल्य चुकाए देते हैं।

इस भाग-दौड़ में पूछताछ में समय बहुत निकल गया। एक सप्ताह के लिए यह अनुदान मिला है, इसका स्मरण ही नहीं रहा। अवधि निकल जाने पर पारस का प्रभाव समाप्त होना ही था, सो हो गया। उसने बार-बार लोहे और पारस का संयोग कराया, पर उसका कोई प्रतिफल न निकला। पैसा न चुका पाने पर कारखाने वाले ने उसे कोई सनकी समझा और अपमानपूर्वक बाहर निकलवा दिया।

लालची लौटकर फिर गुरु के पास वापस पहुँचा और अपनी असफलता की सारी कथा कह सुनाई। संत दूसरी बार वैसा योग देने के लिए तैयार न हुए।

सत्संग चल रहा था। संत ने वह पारस वाली कथा प्रसंग सुनने वालों को कह सुनाई और कहा— “जीवन पारस से भी अधिक बहुमूल्य है। सभी को गिनी-चुनी अवधि में, सात दिनों के भीतर ही अपनी जीवन लीला समाप्त करनी है, इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि इसका अधिकतम उपयोग करने में आवश्यक विलंब न किया जाए, अन्यथा इस पारसमणि से लाभ न उठा पाने वाले की तरह आप सभी को पछताना पड़ेगा।”


वह जो कभी आपने देखा नहीं

एण्डले, फ्रांस में एक ऐसा विशाल पत्थर है, जो छोटे-से आधार पर नाचते लट्टू की-सी स्थिति में खड़ा है। इसे देखने पर ऐसा लगता है, जैसे यह किसी विद्युत चुंबकीय शक्ति के प्रभाव से टिका हो। वैज्ञानिकों ने वहाँ ऐसे किसी बल की संभावना की सूक्ष्मता से जाँच-परख की; पर वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। विचित्र बात यह है कि वह मौसमसंबंधी भविष्यवाणी भी करता है। मौसम साफ रहेगा, तो वह अपनी उसी धुरी पर चुपचाप खड़ा रहेगा, किंतु यदि मौसम खराब होने वाला हो, तो इसकी सूचना वह धीरे-धीरे हिल-डुलकर देता है। विशेषज्ञ इस बात से हैरान हैं कि उसमें गति कहाँ से आती है और इस स्थिति में उसका संतुलन क्यों नहीं बिगड़ता?

इसी प्रकार स्काटलैण्ड के डंकलस नामक स्थान पर 14 फुट लंबा 7 फुट चौड़ा तथा 5 फुट ऊँचा एक पत्थर तीन छोटे-छोटे आधारों पर इस तरह स्थिर है, जैसे कोई विशालकाय कछुआ विश्राम कर रहा हो। पुरातत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि यह शिलाखंड विगत बीस लाख वर्षों से इसी स्थिति में पड़ा हुआ है, जबकि इस कालखंड में आँधी-तूफान से अगणित पहाड़ ध्वस्त हो गए।

आयरलैण्ड के कार्क नगर में “ब्लानी” नामक एक ऐसा पत्थर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे चूमने वाले में वाक्पटुता की अद्भुत क्षमता का विकास हो जाता है। प्रतिवर्ष मात्र इस पत्थर को चूमने के उद्देश्य से हजारों व्यक्ति दूर-दूर से यहाँ आते हैं।

वृक्ष-वनस्पतियों की दुनिया भी कोई कम विचित्र नहीं है। कुछ पेड़ तो सामान्य आकार से इतने अधिक मोटे हो जाते है। कि उनमें घर बनाया जा सके और कुछ पादप जगत के सारे नियमों को तोड़ते हुए विज्ञान के समक्ष उसे समझने के लिए चुनौती प्रस्तुत करते हैं।

नारमैण्डी, फ्रांस में एक विशालकाय ओक वृक्ष है, जिसकी आयु हजार वर्ष बताई जाती है। इसके तने की दानवी मोटाई को देखकर एक अंग्रेज के मन में विचार आया कि क्यों न इसमें एक गिरजाघर बनाया जाए, ताकि अधिकांश लोग इस वृक्ष के बारे में जान सकें। इसी उद्देश्य को लेकर उसने तने को खोखला बनाकर एक दो मंजिला चर्च बनाया, जो 1996 से लेकर अब तक ज्यों का त्यों बना हुआ है।

कृषि अनुसंधान केंद्र, खरगोन के फार्म में कुछ समय पूर्व गुलाब के तीन ऐसे पौधे उग आए थे, जिसमें गुलाब के फूल की जगह गुड़हल के फूल खिलते थे। एक जाति के पौधे में दूसरी जाति के फूल कैसे निकल आए? इसका कारण बताने के वनस्पतिशास्त्री सर्वथा विफल रहे।

इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप और अमेरिका के चिली देश में एक ऐसा पेड़ है, जो सदा आँसू बहाता रहता है। दिन भर में यह इतना रोता है कि उसके आँसू से एक छोटा गड्ढा भर जाता है।

ध्रुवप्रदेशों के बारे में कहा जाता है कि वहाँ एक साथ कई-कई सूर्य, कई-कई चंद्रमा उदित होते हैं। सूर्य भी वहाँ हरे रंग का होता है। इसके अतिरिक्त दूर की वस्तुएँ हवा में लटकती दिखाई पड़ती है। छोटे टीले पहाड़ जितने बड़े प्रतीत होते हैं। यथार्थ में ऐसा होता तो नहीं है; पर किरणों की वक्रता के कारण पर्यवेक्षक को यह दृष्टिभ्रम हो जाता है।

प्रकृति में कई बार इसी प्रकार की ऐसी घटनाएँ घटती है, ऐसा कुछ देखने को मिलता है, जिनकी समीक्षा में मात्र यही कहना पड़ता है कि प्रकृति भी कितनी सुगढ़ और श्रेष्ठ कलाकार है, जो स्वयं भी समय और नियमितता की इतनी पाबंद है, जितना मनुष्य भी नहीं।

अमेरिका के केंचुकी प्रांत में मैमथ नामक एक ऐसी गुफा है, जिसे प्रकृति ने अपने सुंदर और सधे हाथों से निर्मित किया है। सुंदर डिजाइनों से युक्त खंभे और बड़े-बड़े कमरे कोई 200 मील क्षेत्र में फैले हुए हैं। इसका सबसे आश्चर्यजनक भाग इसकी गगनचुंबी दीवारें हैं। जो कार्य किसी कुशल इंजीनियर से हो सकता है, उसे प्रकृति ने स्वतः कर दिखाया, सहसा इस पर विश्वास नहीं होता; पर यह सत्य है कि उसे प्रकृति ने बनाया है।

संसार में अगणित ऐसे स्थान हैं, जहाँ भूगर्भ से अधिक ताप व दबाव के कारण धरती को फोड़कर फव्वारे निकल पड़ते हैं और गर्म गीजर्स का रूप धारण कर लेते हैं। यह गीजर्स स्वयं में एक विचित्रता लिए होते हैं, वह यह कि वे लगभग एक घंटे के अंतर से बराबर छूटते रहते हैं और इस तरह का सिद्ध करते हैं कि प्रकृति को समय और नियमितता का भी ज्ञान है।

प्राचीनकाल में ऐसे अनेक अखंड दीपकों के प्रमाण मिले हैं, जो सैंकड़ों वर्षों से जलते आ रहे थे। मूर्धन्य इतिहास वेत्ता कैमडन ने खुदाई में मिले ऐसे अनेक जलते दीपकों का वर्णन अपनी पुस्तक में किया है। सेण्ट आगस्टाइन ने अपनी संस्मरण पुस्तक में लिखा है कि वीनस देवी के मन्दिर में एक ऐसा दीपक था, जिस पर तेज हवा और वर्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। पुरातत्त्व विभाग ने सन् 1840 में स्पेन में कुर्तण क्षेत्र में एक कब्र की खुदाई के वक्त ऐसा ही जलता दीपक प्राप्त किया था। विशेषज्ञों का मत था कि यह कई सौ वर्षों से जलता चला आ रहा है। इटली के नसीदा द्वीप में खेत की जुताई के समय एक किसान का एक कब्र मिली। जब उसे खोदा गया, तो काँच के बक्से में बंद एक अखंड ज्योति मिली, जो लंबे काल से उसी में बंद जल रही थी।

आयुष्य बढ़ने के साथ-साथ काले बाल सफेद हो जाते हैं-यह शरीर तंत्र का सामान्य नियम है; किंतु चीन के एक 98 वर्षीय कृषक के बाल विगत दस वर्षों में पहले काले से श्वेत हुए, फिर श्वेत से श्याम और अब पुनः एक बार काले से सफेद हो गए हैं।

पिछले दिनों डबरा की एक अद्भुत घटना का विवरण समाचारपत्रों में छपा था। वहाँ पर कस्टम रोड पर एक जैन मंदिर है, जिसमें भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा स्थापित है। एक दिन अचानक दर्शकों की भीड़ भरे मंदिर में विग्रह की देह से पसीना आने लगा। बहुत छान बीन करने के बाद भी जब पसीने के किसी बाह्यस्त्रोत का पता न चला, तो अध्ययन के लिए विशेषज्ञों को बुलाया गया। रसायनवेत्ताओं ने उस नमूने का जब सूक्ष्मविश्लेषण किया, तो उसमें मानवी पसीने के सारे घटक पाए गए, पर यह न जाना जा सका कि वह पसीना उस पत्थर की मूर्ति से क्यों और कैसे बह रहा है?

सन् 1883 में इटली के सैन ब्रूनो क्षेत्र में एक विचित्र भूकंपयुक्त विस्फोट हुआ। इसमें अगणित इमारतें टूटीं और धन-जन की क्षति हुई। आश्चर्य की बात यह है कि इस विस्फोट ने नगर के प्रधान मठ के प्रार्थना-कक्ष को चाक पर पढ़े बर्तन की तरह घुमा दिया और बिना किसी क्षति पहुँचाए दूसरी जगह ज्यों का त्यों खड़ा कर दिया, जबकि मठ का अन्य भाग टूटकर विस्मार हो गया।

इसी देश के टोरैण्टो शहर के समीप समुद्र में एक सफेद रंग के पानी का फुहारा फूटता है। इसका पानी मीठा है। खारे समुद्र में मीठे पानी का फुहारा फूटना किस प्राकृतिक विचित्रता का परिणाम है, यह अभी जाना नहीं जा सका है।

ब्राजील के एक नगर वैलेस डोपारा पर दोपहर को 2 से 4 बजे तक पूरे दो घंटे नियमित रूप से वर्षा होती है। इसमें व्यतिरेक कदाचित् ही कभी होता है। उस क्षेत्र के निवासी इन दो घंटों में मध्याह्न अवकाश मानते हैं।

उपरोक्त घटनाक्रम एक विचित्रताएँ मात्र वाक्विलास या मनोरंजन के लिये नहीं वर्णित की गईं। वैज्ञानिक कहते हैं कि हर पदार्थ को कोई जन्म देने वाला पदार्थ एवं घटनाक्रम का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यही बात अध्यात्मवादी भी कहते हैं— आप्तवचनों— वेदांतमतों के अनुसार यहाँ सब कुछ सोद्देश्य है। कुछ भी अकारण नहीं है। इन प्रतिपादनों के अनुसार इन अपवादस्वरूप घटने वाले प्रसंगों के मूल में भी कोई सत्ता होनी चाहिए। वह कौन सी सत्ता है, कैसे यह सब इस रूप में संपन्न हो जाता है? यह ऊहा-पोह वैज्ञानिकों के लिए उसने छोड़ रखा है। क्या ये मात्र संयोग है? अथवा कभी-कभी होने वाले अपवाद हैं? उत्तर वैज्ञानिकों को देना है।


सद्वाक्य

परामर्श देने वालों की कमी नहीं पर, अंतरात्मा से बढ़कर उत्तम सलाह देने वाला और कोई नहीं। भटकाने वाले बहुत हैं, पर लालच से बढ़कर धूर्त और कोई नहीं।


पृथ्वी से परे भी जीवन विद्यमान है!

प्राचीनकाल से लोकांतरवासियों का सीधा संबंध धरतीवासियों से था। पृथ्वीवासियों से संपर्क-साधन एवं ज्ञान-विज्ञान के आदान-प्रदान के लिए वे अपने विशेष यानों-विमानों में बैठकर आते-जाते रहते थे। इसके अनेकों प्रमाण आज भी विश्व के विभिन्न भागों में जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं। वर्तमान में धरती पर उतरने वाली उड़न तश्तरियाँ अंतर्ग्रही आवागमन के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

वैदिक ग्रंथों में देवी-देवताओं का विमानों में सवार होकर आकाशगमन का वर्णन मिलता है। सुमेरु पर्वत, विंंध्याचल, हिमालय की घाटियों में देवयानों के उतरने का भी उल्लेख है। ऋग्वेद में एक ऐसे रथ का वर्णन है, जो पृथ्वी, जल और आकाश तीनों में चलता था। अश्विनी कुमारों का त्रिचक्र रथ अश्व के बिना ही अंतरिक्ष में भ्रमण करता था। महर्षि भारद्वाज ने ‘यंत्र सर्वस्व’ में बिजली, वाष्प, सौर ऊर्जा, जल, वायु, तेल और चुंबक से चलने वालों विमानों का वर्णन किया है। रामायण में पुष्पक विमान, गरुड़ विमान, “यंत्र कल्पतरु” में व्योम विमान,'महाभारत' में शाल्व के विमान का उल्लेख मिलता है। प्राचीन चीनी लोककथाओं में भी आकाश-गमन करने वाले विमानों का वर्णन मिलता है। बाइबिल में कहा गया है कि उत्तर दिशा में एक प्रकाश का बवंडर उत्पन्न हुआ, जिसमें से एक विमान प्रकट हुआ। उसके अंदर चार सजीव प्राणी थे, जिनकी आकृति मनुष्यों जैसी थी।

यूनानी कथाओं में आकाशगमन करने वाले देवी-देवताओं का वर्णन मिलता है। मिश्र और बेबीलोन की प्राचीन सम्भयता में भी ऐसे अनेक प्रमाण मिले हैं, जिनसे अंतर्ग्रही विमानों में आवागमन का वर्णन सही सिद्ध होता है।

स्विट्जरलैंड के सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता एरिकफ्राॅम के अनुसार प्रागैतिहासिककाल में बाह्य अंतरिक्ष से यात्री यानों में बैठकर आते थे। इस कथन की पुष्टि मूर्धन्य वैज्ञानिक डा. पीटर कोलोसिमों ने भी की है। उनका कहना हैं कि कभी-कभी तो अंतरिक्ष यात्री धरतीवासियों से विवाह संबंध बनाकर घर बसा लेते थे और गृहस्थी का सुख भोगकर लंबे समय बाद अंतरिक्ष में लौट जाते थे।

विश्व के अनेक भागों-जैसे उत्तरी अमेरिका, पेरु तथा चिली आदि की गुफाओं में ऐसे अनेक भित्ति चित्र मिले हैं। जिनसे प्रकट होता है कि पुरातनकाल में इस धरती पर दूर ग्रहों के उन्नत सभ्यता वाले लोग आते रहे हैं। इसकी पुष्टि आस्ट्रेलिया में सिडनी के पास गुफा में शिला पर अंकित सुसज्जित स्पेश शूट पहने उस अंतरिक्ष यात्री से भी होती है, जिसके सिर पर पृथ्वी से अन्य लोकों को संकेत मात्र सूत्र भेजने वाले ऐन्टिनायुक्त उपकरण बने हैं।

पेरु के एक पार्वत्य प्रदेश में “नाजका” नामक एक अतिप्राचीन; किंतु सुविकसित नगर के ध्वंसावशेष पाए गए हैं। इस क्षेत्र का निरीक्षण करने पर पार्श्व की पाल्पाघाटी में ज्यामितीय ढंग से विनिर्मित एवं एकदूसरे के समानांतर अनेकानेक हवाई पट्टियाँ पाई गई हैं। ये पट्टियाँ 40 मील लंबी तथा एक मील चौड़ी सपाट-समतल भूमि पर बड़े ही व्यवस्थितक्रम से बनी हुई हैं। जिस तरह इन पट्टियों का आकस्मिक शुभारंभ होता है, ठीक उसी तरह एकाएक अंत भी होता है। अतः इन्हें सामान्य आवागमन के मार्ग अथवा सड़क नहीं कहा जा सकता।

लीमा के दक्षिण में एक पर्वत श्रृँखला पर 820 फुट ऊँचा प्रस्तर का एक विशालकाय त्रिशूल खड़ा है, जिसे जमीन पर 12 मील की दूरी से एवं अंतरिक्ष में उतुँग ऊँचाई से देखा जा सकता है। इसी तरह उत्तर चिली के तारापाकार मरुस्थल के बगल में स्थित एक पहाड़ी पर 330 फुट ऊँची एक मानव मूर्ति खड़ी है। इस प्रतिमा का आकार आयताकार, है किंतु उसका सिर वर्गाकार है, जिसमें समान लंबाई के बारह एंटिना लगे हैं। मूर्ति के कटि प्रदेश में सुपरसोनिक फाइटर्स की भाँति अनेक त्रिभुजाकार पंख लगे हैं।

सन् 1968 में चिली में ही एक अन्य रहस्यमय पठार का अन्वेषण किया गया। “एन्ला ड्रिल्लोडो” नामक दो मील लंबे एवं 850 गज चौड़े इस पठार पर सर्वत्र 12 से 16 फुट ऊँचे और 20 से 30 फुट लंबे शिलाखंड बिछे हुए हैं। एक अन्य गवेषणा में “नाजका” शहर से एक सौ मील की दूरी पर विशालकाय पत्थरों पर पशु-पक्षियों के चित्र-विचित्र रेखांकन मिले हैं। इनमें से एक चित्र 300 गज लंबा है।

उपरोक्त तथ्यों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों की मान्यता है कि इन पट्टियों का उपयोग प्राच्यकाल में हवाई पट्टियों के रूप में किया जाता था। इन स्थलों का निरीक्षण करने वाले “एरिक वाॅन डैनिकेन” का कहना है कि ये स्थान अवश्य ही अंतरिक्ष से आने वाले वायुयानों के अवतरण क्षेत्र रहे होंगे, जिनका उपयोग अन्य ग्रहवासी अपने यानों को उतारने के लिए करते रहे होंगे। विशालकाय त्रिशूल, मानव प्रतिमा एवं पशु−पक्षियों के चित्र हवाई पट्टी के संकेत के रूप में प्रयुक्त होते रहे होंगे, जिन्हें देखते ही विमान चालकों को हवाई पट्टियों का सही-सही अनुमान प्राप्त होता होगा।

प्रसिद्ध पुस्तक “चैरियट्स ऑफ गाड्स” में डेनिकेन ने एक ऐसे नक्शे का वर्णन किया है, जिसमें भूमध्यसागर, मृत सागर, उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका के साथ-साथ अन्टार्कटिका के कुछ प्रांत स्पष्ट दिखाए गए हैं। यह नक्शा टोपकाॅपी पैलेस में मिला है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नक्शा हजारों वर्ष पुराना है, जो किसी अन्य ग्रहवासियों द्वारा वायुयान से खींचा गया है।

वैज्ञानिकों ने अन्य कई ऐसे प्रामाणिक तथ्य ढूँढ़ निकाले हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि कभी धरती पर अन्य ग्रहों से लोग आते थे। डा. पीटर कोलोसिमों ने तिब्बत के मठों में सुरक्षित रखे हुए कुछ ऐसे शवों का वर्णन किया है। जो अंतरिक्ष शूट पहने हुए हैं। पीटर के अनुसार ये शव उन लोकांतरवासियों के हैं, जिनके अंतरिक्ष यान में खराबी आ गई थी और वे वापस अपने लोक को नहीं लौट सके। उनने मय सभ्यताकालीन एक खंडहर में ऐसी समाधि का भी उल्लेख किया है, जो किसी यान-आकृति की है और उसके अंदर अंतरिक्ष यात्री बैठा है।

वैज्ञानिक निरंतर इसी दिशा में प्रयत्नशील हैं कि अन्य ग्रहों में जीवन की खोज की जाए। अब तक जो भी शोध-अनुसंधान इस संबंध में हुए हैं, उनसे स्पष्ट संकेत मिलता है कि आकाशगंगा में ऐसे अनेक ग्रह होने चाहिए, जिनमें विकसित सभ्यता का निवास हो सकता है। मूर्धन्य वैज्ञानिक डा. बिली के अनुसार हमारी आकाशगंगा में ऐसे ग्रहों की संख्या बीस हजार होनी चाहिए, जिनमें पृथ्वी जैसे बुद्धिमान प्राणी निवास करते हैं।

यों उल्काएँ जो पृथ्वी पर आती रहती हैं, उनके धूलि-कणों का अन्वेषण करने से भी प्रतीत होता है कि सौरमंडलीय धूलि में भी जीवन तत्त्व मौजूद हैं। भले ही वह अविकसित रूप में ही क्यों न हो? उल्काओं में जीवित एवं मृतक बैक्टीरिया तथा दूसरे तरह के जीवन चिह्न पाए जाते हैं। इस आधार पर अनुमान लगाया जाना भी असंगत नहीं है कि पृथ्वी पर पाया जाने वाला जीवन बहुत करके अंतरिक्ष से उतरा है और इनसे संबंध स्थापित करने के लिए ही अंतरिक्षवासी यहाँ आते रहे हैं।

उड़न तश्तरियों तथा अन्य दृश्य-अदृश्य माध्यमों से यह आवागमन अभी भी किसी रूप में चल रहा हो, तो आश्चर्य नहीं। सौरमंडल के ग्रह-उपग्रहों की खोज में यों मनुष्य जैसे विकसित प्राणियों का पता नहीं चला है तो भी यह नहीं माना जाना चाहिए कि उनमें जीवन का सर्वथा अभाव हैं। फिर यह भी हो सकता है कि सौरमंडल से बाहर के जीवधारी प्रकृति नियमों से भिन्न चेतना नियमों के आधार पर पृथ्वी के साथ भूतकाल में अधिक संबंध बनाए रहे हों और अब यहाँ की स्थिति कामचलाऊ देखकर अन्य किसी उपयुक्त ग्रह को विकसित करने में लग गए हों और यदा-कदा यहाँ की भी खोज खबर लेते रहते हों।


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नवग्रहों की गणना में राहु और केतु भी गिने जाते हैं, पर वस्तुतः वे कोई ग्रहगोलक नहीं हैं। सूर्य और चंद्रमा की आड़ में पृथ्वी की ऐसी सघन छाया पड़ती है। जो इस दोनों के प्रकाश पर कालिमा बनकर छा जाती है। यही राहु-केतु हैं। ऐसी छायाबिंदु इस ब्रह्मांड में अनेकों हैं, उनमें से कुछ तो पृथ्वी पर भी हैं।


बढ़ती अनैतिकता और डायनी महौल

आहार-विहार के असंयम से रोग होने की पुरातन मान्यता में अब कुछ और नए आयाम जुड़े हैं। वायु-प्रदूषण से श्वसन-नलिका में कीचड़ जमने और उसके प्रभाव से समूचे शरीर में विषाक्तता भर जाने की भी एक प्रक्रिया है, जिससे कहीं भी गुँजाइश मिलने पर बीमारियाँ फूट पड़ती हैं। आहार-विहार सही होने पर भी यह एक बाहरी आक्रमण है, जो प्रकृति-प्रकोप एवं संक्रामक रोगों की तरह अनेक निर्दोषों को भी अपनी चपेट में लेते रहते हैं। इन दिनों श्वास, खाँसी, अपच, उल्टी, दस्त, सूजन के उपद्रव इसी प्रकार उभरते पाए गए हैं, जिनके लिए यह नहीं कहा जा सकता कि रोगी ने जानबूझकर कोई ऐसी गलती की है, जिसका दंड उसे इस प्रकार भुगतना ही चाहिए था।

इसी शृंखला में एक कड़ी और इन्हीं दिनों नई-नई जुड़ी है, जिसमें मनुष्य के सिर पर एक प्रकार का उन्माद चढ़ता है, जो उसे अपराध करने या अपराधों के माहौल में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करता है। उत्तेजक आवेश ही नहीं, घोर निराशा में डुबोकर अपंग जैसी स्थिति में ले पहुँचने वाला अवसाद भी इसी कारण होता है। मनःक्षेत्र को विशेष रूप से प्रभावित करने वाली इस लहर को 'डायनी हवा' कहते हैं। यों डायन शब्द प्रेत-पिशाच स्तर की महिला वर्ग के लिए प्रयुक्त किया जाता है। हर हवा को किस प्रकार यह नाम दिया जाए? फिर भी उसकी प्रतिक्रिया को इसी स्तर की प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के कारण यह नाम सहज ही प्रचलित हो गया है। कारण कि कुछ दिन पहले तक ऐसे अपराधी प्रवाह किसी क्षेत्र विशेष को घेरते नहीं देखे गए, जिसमें लोग शरीर की अपेक्षा मन और भावना की दृष्टि से अपंग हो जाते हैं। उस राक्षसी प्रभाव में स्नेह, सौजन्य, वात्सल्य आदि मानवोचित गुण अनायास ही तिरोहित हो जाते हैं और व्यक्ति अपने-पराए तक का भेदभूल कर नृशंसता अपनाने लगता है। अपराधों की ऐसी बाढ़ आती है, जिसके पीछे कोई ठोस कारण नहीं होते; वरन् एक प्रकार का उन्माद ही विचित्र प्रकार के कुकृत्य करा लेता है।

मध्य पूर्व के रेगिस्तानी इलाके, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रिया, जर्मनी आदि देशों के कुछ हिस्से इस तरह की चपेट में आते देखे गए हैं, जबकि ऐसी कोई समस्या प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर नहीं होती, जिनके कारण अपराधों का ऐसा उभार चल पड़े और हजारों व्यक्तियों को मरने-मारने के लिए उतारू हो चले। इसी सिलसिले में अनेक व्यक्ति ऐसे शारीरिक रोगों से भी ग्रसित हो चलते हैं, जिनके कोई पूर्व लक्षण नहीं देखे गए थे। हृदय रोग और मस्तिष्क रोग इनमें प्रमुख होते हैं, जो भले-चंगों को अपने शिकंजे में अनायास ही कस लेते हैं।

"जनरल ऑफ इलेक्ट्रो केमिकल सोसाइटी" की पत्रिका के जनवरी 83 अंक में इस संदर्भ में एक लेख छपा था— "निगेटिव आयन्स एण्ड देयर इफेक्ट" इसमें इस नई उपजी व्यथा के ऊपर प्रकाश डाला गया था और कहा गया था कि क्षेत्र विशेष में कभी कभी विद्युत चुम्बकीय प्रवाह आते हैं और वे ऋणात्मक एवं धनात्मक कणों का संतुलन गड़बड़ा देते है। उस प्रभाव से मनुष्य की भाव चेतना गड़बड़ाती है और क्या करना चाहिए, क्या नहीं; इसकी बुद्धिमता भी साथ देना छोड़ देती है; किंतु इस कथन के साथ यह नहीं बताया गया कि क्यों तो विद्युतकण गड़बड़ाते है और क्यों उनका प्रभाव भावना-क्षेत्र पर उद्दंडता के रूप में पड़ता है?

यह व्यथा अभी-अभी ही उपजी है। प्राचीनकाल में ऐसा कभी होता रहा हो, ऐसा उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए वैज्ञानिक क्षेत्र में खलबली मची है और कितने ही देशों में इस विषय का पर्यवेक्षण चल पड़ा है। आश्चर्य इस बात पर किया जा रहा है कि ऐसा एक सीमित क्षेत्र में ही क्यों होता है? अकारण कोई विशेष परिस्थिति न होने पर भी ऐसा माहौल क्यों कर बनता है?

यरुशलेम विश्वविद्यालय के मूर्धन्य वैज्ञानिक प्रो. फिलक्स सुलमान की शोध है कि यह शरीर में सेरोटोनिन नामक न्यूरो हारमोन के बढ़ जाने से होता है। विद्युतकणों से इसका कोई संबंध नहीं है। कारण बताने में वे भी असमर्थ रहे। सिर्फ इतना बता सके कि कूलर और एअर कंडीशनर का प्रभाव बाहरी गरम हवा के साथ मिलकर ऐसा उपद्रव खड़ा करता है। पर वे भी यह नहीं बता सके कि जिनके घर उपरोक्त उपकरण नहीं है, वे क्यों इस विपत्ति के शिकार बनते हैं?

कई वैज्ञानिकों ने इसे वायु-प्रदूषण और विशेषतया भीड़-भाड़ का प्रतिफल बताया है। वे कहते हैं कि घिच-पिच क्षेत्रों में मनुष्यों की विद्युतशक्ति धूल-मिलकर ऐसी विडंबना रचती है, जिसके कारण मनुष्य सामान्य मनोदशा में नहीं रह पाता। इसका अभाव वे यह बताते हैं कि यह 'डायनी हवा' बड़े शहरों या व्यावसायिक केंद्रों के इर्द-गिर्द ही मँडराती है।

मनोविज्ञानी अन्वेषक इसका कारण यह बताते हैं कि किसी विशेष प्रकार के आचरण जिस क्षेत्र में होने लगते हैं, उसी की नकल करने की इच्छा दूसरों में भी उभरती है। उल्टी आने पर दूसरों का भी जी मिचलाने लगता है। दुखती आंखें देखकर अच्छी आंखें भी दुखने लगती है। उसी प्रकार अपराधप्रधान क्षेत्रों में बसने या रहने वाले लोग अज्ञात प्रभावों के वशीभूत होकर उसी प्रकार के कृत्य करने लगते हैं; किंतु इस कथन में भी असमंजस यह रह जाता है कि ऐसे केंद्रों में भी अपराधी लोग ही अपना धंधा चलाते रहते हैं। सर्वसाधारण पर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता और न अपराधी क्षेत्र घोषित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त यह उपद्रव ऐसे क्षेत्रों में भी उभरते देखे गए हैं, जहाँ पहले इस प्रकार का कोई प्रचलन नहीं रहा है और न उन क्षेत्रों का वर्तमान स्तर ही इस प्रकार का हैं।

सुप्रसिद्ध आणविक जीव विज्ञानी डा. जैम्बिसमोनाड का कहना है कि इस तरह के विचार एवं भाव-तरंगे आकस्मिक नहीं पैदा हो जाती है, बल्कि वे गणितीय नियमों के अनुसार तथा संकल्पों के कारण निःसृत एवं विस्तृत होती है। उनके अनुसार भौतिक जगत में पृथ्वी के ऊपर सैकड़ों मील ऊपर तक घेरे हुए बायोस्फीयर की तरह ही सूक्ष्मजगत में चेतना-प्रवाह की अत्यंत सूक्ष्मपरतें विद्यमान है। उनमें से एक परत 'आइडियोस्फीयर' है, जिसमें वैचारिक संपदा का वह भंडार छिपा पड़ा है, जो सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक मानव मस्तिष्क द्वारा छोड़ा गया है। यह विचार तरंगें ही अपनी समर्थता के कारण समय-समय पर मनुष्य जाति के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण बनी है। जीवधारियों की तरह विचार भी अपनी वंशपरंपरा में ही यथावत् न बने रहकर विकास के लिए सतत् आतुर रहते हैं। समानधर्मी विचार आपस में मिलने और घनीभूत होते रहते हैं। अनुकूल मानसिक संपर्क पाकर उसकी ओर चढ़ दौड़ते हैं और अपने संपर्क में सभी को लपेट लेते हैं।

इस संदर्भ में बेल्जिम के प्रख्यात परामनोविज्ञानी डा. डगसन का यह कथन अधिक युक्तिसंगत प्रतीत होता है कि जिस प्रकार समुद्र में पानी की, जमीन में खनिजों की, हवा में प्रवाहों की परत होती है, उसी प्रकार चेतना के विश्वव्यापी क्षेत्र में भी अपराधी प्रवृत्तियों की सम्मिलित घटनाएँ बन जाती है और वे परिस्थितियों के अनुसार किसी दिशा विशेष में चल पड़ती है। जहाँ उन्हें उपयुक्त अवसर प्रतीत होता है, वही नीचे उतरकर मनुष्य को ही नहीं, पशु-पक्षियों को भी प्रभावित करने लगती हैं और वे भी शांति से रहने की अपेक्षा अधिक क्रोधी एवं उपद्रवी हो जाते हैं।

चूँकि अब अपराधी प्रवृत्तियाँ सर्वत्र अधिक बढ़ रही हैं, इसलिए उनके समूह भी अधिक मात्रा में बन रहे हैं और संसार की शांति एवं मानवी गरिमा में भारी विक्षेप उत्पन्न कर रहे हैं। इसका उपचार स्थानीय नहीं हो सकता, वरन विश्वव्यापी सदाचार एवं नीति-मर्यादाओं के संरक्षण तथा आत्मिक के उपचार-प्रयत्नों द्वारा ही संभव हो सकता है।


सद्वाक्य

बुराई आदमी से पहले अज्ञानी व्यक्ति के समान मिलती है और हाथ बाँधकर नौकर की तरह उसके सामने खड़ी हो जाती है। फिर मित्र बन जाती है और निकट आ जाती है, फिर मालिक बनती है और आदमी के सिर पर सवार हो जाती है एवं उस को सदा के लिए अपना दास बना लेती है।


विनाश की संभावना भूलें नहीं

अटलांटिक महासागर के मध्य में एक द्वीप था— “अटलांटिक द्वीप”, मुद्दतों पुरानी बात है। उस देश के निवासी बड़े सशक्त और संपन्न बनकर रह रहे थे। उनके पास बड़ा-सा जहाजी बेड़ा भी था, जिससे वे समुद्र के तटवर्ती क्षेत्रों पर दूर-दूर तक धावा बोलते। निवासियों की संपदा लूटकर लाते और तरुण नर-नारियों को कैद करके उन्हें अपना गुलाम बनाते। मनचाहा श्रम उनसे लेते। मन चाहा व्यवहार करते।

वह द्वीप तो अकेला था, पर उनके निकटवर्ती क्षेत्र में सुविस्तृत समतल भूमि भी थी। उस पर उन्हीं का अधिकार था। प्रकृति संपदा पर्याप्त मात्रा में थी, जो उन्हें समृद्ध बनाने में सहायता करती थीं। साथ ही वे दूर-दूर तक डाका मारने के लिए छापे डालते। इस प्रकार संपदा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती थी। सोने-चाँदी की भव्य कला-कृतियाँ जहाँ-तहाँ बनी थी। असीम संपदा का उपयोग दुर्व्यसनों में ही हो सकता है। सो वहाँ भी होने लगा। जो बुद्धिमान थे, उनने उस सुविधा का उपयोग भौतिक ज्ञान के अभिवर्धन में लगाया। उनने अणुबम बनाने के स्तर की क्षमता प्राप्त कर ली थी। वे अपने क्षेत्र को स्वर्ग कहने लगे थे। पेड़ों पर बिजली की बत्तियाँ जलती थीं और झरनों के किनारे ऐसी अतिथिशालाएँ थीं, जिससे दूध और शहद स्वल्प मूल्य में हर किसी को उपलब्ध होता था। दूर-दूर तक यह चर्चा थी कि द्वीप कुछ समय मे अति प्राचीनकाल की लंका को भी पीछे छोड़ देगा।

प्रकृति का नियम है कि वह संतुलन बनाए रहती है। छोटों को उठाती है और बड़ों को घटने के लिए मजबूर करती है। यह नियम अनादिकाल से हर क्षेत्र पर लागू होता रहा है। एक ओर लोग लुटते और गुलाम बनते रहे। दूसरी ओर विलास-वैभव के अंबार लगते रहे। यह उस नियति को सहन नहीं हुआ। उसकी अदृश्य अदालत में उन गर्वीलों को धूलि चटाने का निर्धारण हुआ।

अटलांटिक द्वीप पर एक ऊँचा पहाड़ था। उस पर कभी-कभी छोटे-मोटे ज्वालामुखी भी फूटते रहते थे, पर उस बार तो गजब ही हो गया। ज्वालामुखी ने अपनी सभी सीमा— मर्यादाएँ तोड़ दीं। जमीन थरथराकर लोगों को आतंकित करने लगी। समुद्री पानी का रंग बदल गया। लोग हक्के-बक्के रह गए। अन्यत्र भाग चलने के लिए न कोई उपाय सूझा और न अवसर मिला। ज्वालामुखी ने आग उगलना शुरू किया। पहले अग्नि जैसे तपते टुकड़े और लावा आसमान में उड़ा। इसके बाद विशालकाय चट्टानें उचट-उचटकर उसी समूचे द्वीप पर छाने लगीं। वे इतनी ऊँचाई तक उठ गईं, जिसमें नगर और गाँव सभी उस मलबे के गर्त में समा गए। यह क्रम थोड़े ही दिनों चला; पर इतने में ही काली धूलि आसमान में छा गई, हफ्तों दिन नहीं दिखा। घनघोर अंधेरा सर्वत्र छाया रहा। समीपवर्ती द्वीपों और देशों में काली जहरीली धूलि ने उड़-उड़कर अपनी परत जमा ली। वह आतंक समूचे क्षेत्र में दूर-दूर तक फैल गया। दूरवासी दर्शक तक आतंकित हो रहे थे कि वह महाप्रलय बढ़ती हुई उनके यहाँ तक न आ पहुँचे।

ज्वालामुखी पर्वत इतना मलबा ऊपर फेंक चुका था कि उसकी भीतरी परतें खोखली हो गई और वह समूचा टापू समुद्र के अथाह गर्त में समा गया। उस खाली जगह को भरने के लिए आस-पास से समुद्र की लहरें दौड़ी और वहाँ एक भयावह गह्वर बन गया। उस भंवर ने समुद्र की लंबी परिधि को प्रभावित किया; फलतः उस महासागर के अनेकों द्वीप प्रभावित हुए। लोगों ने महाप्रलय की मान्यता को आँखों के आगे सक्रिय होते हुए देखा। वैसी भयंकर घटना का कोई विवरण किसी ने पूर्वजों तक से नहीं सुना था।

ज्वालामुखी विस्फोट की शक्ति प्रायः एक हजार छोटे अणुबम एक साथ फटने जैसी थी। उसके कारण टूट-फूट तो हुई ही, इसके अतिरिक्त मौसम भी प्रभावित हुआ। विकिरण की विषाक्तता ने सुदूर क्षेत्रों पर अपने प्रभाव का परिचय दिया।

ऐसी विपत्ति उसी क्षेत्र क्यों आई, इसका निरूपण करते हुए दूर के महाद्वीपों के बचे-खुचे लोगों के मुँह पर एक ही बात थी कि विलास, वैभव और आतंक को चरम सीमा तक बटोरने का लालच और अन्य किसी को चैन से न बैठने देने का दर्द, ईश्वर को सहन नहीं। वह ऐसी उद्दंडता को देर-सवेर में ठिकाने लगाकर ही रहता है। सृष्टा के न्याय में देर है, अंधेर नहीं।

उस द्वीप का सफाया हो गया। समीपवर्ती जल डमरुमध्य में जमीन फटी और उन दरारों में पानी भरने से पृथ्वी का पुराना नक्शा ही बदल गया। जल की जगह थल उभर आए और जल पानी के गर्त में समा गए। उस क्षेत्र के भूगोल में इतना अंतर आया कि नए-पुराने की तुलना करना कठिन हो गया। लगा, मानों नए सिरे से सृष्टि का सृजन हुआ है। समुद्र में से कमल पुष्प जैसे द्वीप समूह निकले हों। उन पर मनुष्यों के पहुँचने और बस्तियाँ बसाने, निर्वाह के साधन जुटाने में भी शताब्दियाँ लग गईं।

घटना बहुत पुरानी हो गईं। तो भी विश्व इतिहास उसे भूला नहीं है। प्लेटो, अरस्तू आदि के उल्लेख उस घटना की साक्षी में अपनी मान्यताओं का सुविस्तृत उल्लेख छोड़ गये है। इसलिए उसे झुठलाया भी नहीं जा सकता।

आधुनिक पुरातत्ववेत्ता इतिहास और भूगोल की टूटी कड़ियों को जोड़ने के लिए और समुद्र विज्ञानी गर्त में छिपी प्रचुर संपदा को हस्तगत करने के लिए उस क्षेत्र पर पैनी नजर रखे हुए हैं और गहराई में उतरकर ऐसे प्रमाण एकत्रित कर रहे है, ताकि उस द्वीप के डूबने वाले स्थान तथा गहराई का पता लगा सके। अब तक की ढूंढ़-खोज में उस क्षेत्र के समुद्रतल में लंबी पहाड़ियाँ ही वे पा सके हैं। उन पहाड़ी पर खोदने पर ऐसे प्रमाण भर मिले है, जिसके आधार पर यह जाना जा सके कि यहाँ पर कभी मनुष्यों का अस्तित्व भी रहा है। उसके काम आने वाले उपकरणों का मिलना यह साक्षी देता है कि वह पहाड़ियाँ समुद्रतल की ऊबड़-खाबड़ संरचना नहीं है, वरन यह धरातल की ऊपरी परत से गहराई में धँसी हैं।

इस संदर्भ में संसार के अनेक लेखकों ने अपने-अपने उपलब्ध साक्षी प्रमाणों का हवाला देते हुए कोई दो हजार पुस्तकें लिखी हैं। तथ्य यह पता लगाने के लिए उपलब्ध सामग्री तथा मान्यता को एक सूत्र में बाँधकर किसी सही निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए इस निमित्त विज्ञान की एक स्वतंत्र शाखा ही बन गई है, जिसे “अटलांटोलाॅजी” नाम दिया गया हैं। उसमें हस्तगत प्रमाणों के आधार पर पृथ्वी के अंतराल की संरचना, उस पर अनेक कारणों से पड़ने वाले प्रभाव, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट आदि से संबंधित कुछ तथ्यों की नई जानकारी प्रस्तुत की है, जिससे पता चलाता हैं कि हम सब बारूद के ढेर पर बैठे है। पृथ्वी का अंतराल इतना उष्ण और अस्थिर है कि उसे अपने ढंग से शांत होते रहने देना ही उचित है। उस आग्नेय परत तक कभी समुद्र की नमी या मनुष्यों की न्यूक्लियर बमों के विस्फोट के माध्यम से छेड़-छाड़ जा पहुँचती है, तो वह धरातल पर ऐसे कारण उत्पन्न करती है, जिसे प्रकृति प्रकोप कहा जा सकता है।

अध्यात्मवादी उपरोक्त घटना तथा उससे मिलते-जुलते अन्य अप्रत्याशित हादसों के बारे में यह सोचते हैं कि मनुष्य जब तक ईश्वर का आदेश और प्रकृति का अनुशासन मानता है, तब तक उसके लिए सुख-चैन की परिस्थितियाँ बनी रहती हैं। पर जब वह उद्दंडता करने लगता है तो तात्कालिक प्रतिफल रोग-शोक के रूप में उसे मिलते ही रहते हैं, इसके अतिरिक्त ऐसे प्रकृति-प्रकोप भी टूट पड़ते है, जिनसे उद्दंडता तो नियंत्रित होती है, इसके अतिरिक्त देखने, सुनने और विचारने वाले व्यक्ति भी यह अनुमान लगा सकें कि मर्यादापालन ही विपत्तियों से बचे रहने का उपयुक्त उपाय है।


मत्स्य भगवान (कहानी)

एक बार मनु नाव में वेद रखे हुए जा रहे थे कि समुद्र में तूफान आ गया। तूफान शांत हुआ तो उन्होंने देखा कि एक बड़ी मछली उनकी नाव को सहारा दिए खड़ी है। मनु ने विनीत भाव से पूछा— "भगवान! आपने ही मेरी रक्षा की, आप कौन हैं? मत्स्य भगवान दिव्य रूप में प्रकट होकर बोले"— वत्स! तू ने ज्ञान की रक्षा का व्रत लिया, इसलिए तेरी सहायता के लिए मुझे आना पड़ा।


नवसृजन हेतु कटिबद्ध प्रज्ञापरिवार की नूतन गतिविधियाँ

लोकमानस को नए सिरे से ढालना, एक व्यापक समुदाय में वैचारिक क्रांति की हलचलें उत्पन्न करना, एक असंभव नहीं, तो कठिन कष्टसाध्य पुरुषार्थ था, किंतु मिशन के सूत्रसंचालकों ने इस भागीरथी कार्य को संपन्न करने का दृढ़ संकल्प लिया एवं सुनियोजित क्रियाकलापों को दिशा दी। निम्न गतिविधियाँ उसी सृजन-पुरुषार्थ का दिग्दर्शन कराती हैं।

गीता विश्वकोश: सृजन प्रगति

शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में “गीता का विश्वकोश” निर्माण कार्य निर्धारित योजना के अनुसार चल रहा है। दुर्लभ ग्रंथों की प्रतिलिपि उतारने के लिए जीराॅक्स (इलेक्ट्राेस्टेट) मशीन लग गई है। देश भर के पुस्तकालयों से गीता पर लिखे गए शोध प्रबंधों को एकत्रकर संदर्भ हेतु उनके महत्त्वपूर्ण अंश सारबद्ध करने की व्यवस्था बनाई गई है। माइक्रो फिल्में बनाने व उसके द्वारा दुर्लभ महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का अवलोकन करने की व्यवस्था बनाई जा रही है। देश के कोने-कोने से खोजकर एवं प्रतिनिधि भेजकर ऐसे संदर्भ ग्रंथों का संकलन किया जा रहा है। “अखण्ड ज्योति” पाठकों से अनुरोध किया गया है, कि यदि उनके पास इस विषय पर महत्त्वपूर्ण साहित्य हो तो उनकी जानकारी भेजें। आवश्यकता समझी जाने पर उन्हें मँगा लिया जाएगा और काम पूरा होते ही उन्हें सुरक्षित रूप से वापस कर दिया जाएगा। पाठक इस पुण्य प्रयास में सहयोग दे भी रहे हैं। अच्छा-खासा गीता पुस्तकालय बनने भी जा रहे है, जिसमें बैठकर इस विषय पर अनेकों शोधकर्त्ता अध्ययनकर विश्वकोश निर्माण में सहयोग देंगे।

दीपयज्ञों का व्यापक विस्तार

दीपयज्ञों का अभिनव प्रचलन अत्यंत लोकप्रिय हुआ है। पारिवारिक एवं सामूहिक स्तर पर आए दिन ये नूतन आयोजन अनेकानेक संख्या में संपन्न हो रहे हैं। इस प्रक्रिया की दो परिपाटी चल रही हैं। एक यह कि हर याजक अपने घर से थाली लाए और अपने अगरबत्ती गुच्छक तथा दीपक सजाए। दूसरा यह कि ऊंचे मंच पर दीपकों की पंक्ति सजा दी जाए और लोग नीचे बैठकर गायत्री मंत्र का सामूहिक गान करें। इन दोनों पद्धतियों में से जो जहाँ अनुकूल पड़ती है, वह वहाँ अपना ली जाती है। कम खर्च और कम समय में धार्मिक वातावरण बनाने एवं सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के संकल्पों को लेने, क्रियान्वित करने का यह सरल और प्रभावी तरीका अधिकाधिक विस्तृत होता जाता हैं।

प्रज्ञा संस्थानों के अनवरत कार्यक्रम

स्थापित सभी प्रज्ञापीठों को केंद्र से निर्देश भेजा गया है, कि वे अपने यहाँ झोला पुस्तकालय, दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन, दीपयज्ञ एवं पत्रिकाओं के सदस्य बढ़ाने का न्यूनतम कार्यक्रम अनवरत रूप से जारी रखें। उन्हीं अवलंबनों को अपनाकर जनसंपर्क करने और समर्थन-सहयोग पाने में सफलता मिल सकती है। इस नए निर्देश को सभी केंद्रों ने भावनापूर्वक अपनाया है।

सत्रों के लिए उभरता उत्साह

जीवन साधना सत्रों में आने के लिए इन दिनों असाधारण उत्साह उमड़ा है। मिशन के सूत्रसंचालक का नित्य नियमित संदेश घर-घर पहुँचाने वाली अखण्ड ज्योति और युग निर्माण योजना, युग शक्ति, के पाठकों को उनमें प्राथमिकता दी जा रही है। गुरुदेव के वर्तमान कार्यकाल में ही एक बार प्रत्यक्ष संपर्क साधने के लिए सभी परिजन लालायित हैं। स्थान सीमित और इच्छुक अधिक होने से बारी-बारी से ही उनको आने की स्वीकृति भेजी जा रही हैं। हर माह से सत्र अनवरत रूप से जारी रहते है— दिनाँक 1 से 9 तक, 11 से 19 तक एवं 21 से 29 तक। आवेदन पत्र भेजने पर ही सत्पात्रों को स्वीकृति मिलती है।

श्रम सेवा

सूखा और बाढ़ क्षेत्रों के परिजनों ने अपने-अपने यहाँ श्रम सेवा की टोलियाँ गठित की हैं। वे पानी एवं अन्य आवश्यक साधन लाने, पहुँचाने, सफाई करने, असमर्थों की सहायता करने जैसे सेवा कार्यों में जुटे रहते हैं। इस उभरे उत्साह में नये-नये सेवाभावी भी जुड़ते जाते हैं। सभी परिजनों ने पतन-निवारण सेवा के साथ-साथ पीड़ा-निवारण की सेवा, तात्कालिक सहायता की महत्ता को भली-भाँति समझा एवं अपने क्रियाकलापों को उसी अनुरूप में ढाल दिया है।

दहेज विरोधी आंदोलन

दहेज विरोधी आंदोलन ने इस वर्ष असाधारण रूप से गति पकड़ी हैं। वयस्क युवकों एवं युवतियों ने हजारों की संख्या में प्रतिज्ञाएँ की हैं कि वे बिना दहेज का संबंध ही स्वीकारेंगे। अभिभावकों के असहमत होने पर वे आजीवन कुँवारे बने रहना पसंद करेंगे।

श्री शंकराचार्य द्वारा शाल उपहार

शान्तिकुञ्ज द्वारा भारत वर्ष में धर्मतंत्र से जनमानस का परिष्कार के रूप में की गई सेवाओं की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए कांचीकाम कोटि पीठ के 69 वें शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती जी ने आचार्य जी के लिए एक ऊनीशाल उपहार से भेजा है। साथ ही युग चेतना के विस्तार की, अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य करने की सामर्थ्य बढ़ते रहने की कामना की है।

बिना खर्च के विवाहों की सुविधा

अपने लड़की-लड़कों के बिना धूम-धाम वाले बिना देन-दहेज के विवाह करने के इच्छुक अभिभावकों के समक्ष एक बड़ी कठिनाई कुटुंबियों संबंधियों के विरोध की थी। वे इसे पसंद भी नहीं करते और रोड़े भी अटकाते हैं। इस झंझट से बचने के लिए एक नया उपाय मिल गया हैं। शान्तिकुञ्ज में बिना दहेज और धूम-धाम की शादियाँ संपन्न करा देने की व्यवस्था कर दी गई हैं। दोनों पक्षों के दस-दस, पाँच-पाँच व्यक्ति बरात-घरात के आ पहुँचें। वर-वधू वयस्क और अभिभावक सहमत हों तो ऐसी शादियाँ, यहाँ बिना किसी खर्च के संपन्न हो जाती हैं। ऐसे अब तक सैंकड़ों विवाह संपन्न हुए भी हैं। तीर्थस्थान संस्कारित पुण्यस्थली में होने वाले विवाह शुभ होते है और सफल सिद्ध होते हैं।

प्रयोगशाला का नूतन कायाकल्प

विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय हेतु तर्क, तथ्य, प्रमाणों, प्रतिपादनों के प्रस्तुतीकरण के लिए ही ब्रह्मवर्चस की आज से १ वर्ष पूर्व स्थापना की गई थी। काफी बड़ी मंजिल यह संस्थान पार कर चुका है। विगतदिनों शोध-संदर्भ में नए प्रकरण जोड़े गए है तथा वैज्ञानिक प्रस्तुति हेतु आधुनिकतम उपकरण लगाए गए हैं। यज्ञ-विज्ञान पर चल रही शोध-प्रक्रिया के साथ-साथ शब्दशक्ति-संगीत चिकित्सा पर अनुसंधान हेतु उपकरण देश-विदेश से खरीदकर लगाए गए हैं। यज्ञशाला, जिसे चारों-ओर से काँच से बंदकर प्रयोगशाला का रूप दिया गया था, अब ब्रह्मवर्चस के प्रांगण में अकेली नहीं रही। उसके साथ एक कक्ष और जोड़ा गया है। यह पूरी तरह वातानुकूलित होगा, क्योंकि इसमें नूतन कंप्यूटरीकृत उपकरण लगाए जा रहे हैं। ड्युअल बीम स्टोरेज ऑसीलोस्कोप, हारमोनी एनालायजर व डेसिबल मीटर जैसे उपकरण ध्वनी विज्ञान(फोनेरिक्स) पर शोध हेतु लगाए गए है। ध्वनी के विभिन्न स्वरूपों का क्या प्रभाव मानव, जीव-जगत, पादपों एवं वातावरण पर पड़ता हैं, यह जानने के लिए संवेदनशील सेंसर्स लगाए गए हैं। एक एक्वेरियम तथा प्लांट फिजियालाॅजी प्रयोगशाला की व्यवस्था की गई है। यही नहीं, यज्ञधूम्रों को विश्लेषण हेतु अब आधुनिकतम गैस लिक्विड क्रोमेटोग्राफ लगाया गया हैं, जो न केवल वाष्पीभूत औषधि अपितु वनौषधियों में विद्यमान विभिन्न कार्यकारी घटकों का विश्लेषण करेगा। आकृति-संरचनाओ के क्या प्रभाव जीव-जगत पर पड़ते हैं, यह जानने के लिए एक "पायरेमिड" भी इस प्रयोगशाला में बनाया गया हैं। प्रयोगशाला का यह नूतन-स्वरुप नित्य बुद्धिजीवी वर्ग के व्यक्तियों को आकर्षित व अध्यात्म-विधा में अनुसंधान हेतु प्रेरित के रहा हैं।


सद्वाक्य

डरावनी काली छाया आगे-आगे ही बढ़ती रहने नहीं देती है, तो छुटकारा पाने का एक ही उपाय है— अपना रुख बदलो और प्रकाश की ओर मुँह करके चलो।


अपनों से अपनी बात— हम बौने बनकर न रह जाएँ!

उत्पादन कितने ही कठोर तप द्वारा, कितने ही महत्त्वपूर्ण स्तर का क्यों न किया जाए, पर उसकी उपयोगिता तभी है, जब उसके द्वारा अधिक लोगों का हित साधन हो सके। समुद्रमंथन में अमृतकलश निकला, पर वह धन्वंतरि व देव परिकर की निजी धरोहर बनकर रह गया। निकटवर्ती परिकर ने तो लाभ उठा लिया, पर अन्य लोकवासी विशाल जनसमुदाय के लिए उसका उपयोग कर सकना तो दूरदर्शन भी दुर्लभ बना रहा। असंख्य लोग आए दिन मरते रहे। उनके स्वजन-संबंधियों को विछोह की आग में चलते रहना पड़ा। असंख्यों बाल-वृद्ध, नर-नारी, अपंग-असहायों की तरह तरसते रह गए। कदाचित वह अमृत सर्वसाधारण को मिल सका होता, तो वे भी देवताओं जैसी सुविधा प्राप्त करते और उसी स्तर का सुख-शांति भरा जीवन जीते; पर दुर्भाग्य ही रहा है कि अमृत उपलब्ध हुआ, पर उसका लाभ एक छोटा परिकर ही उठा सका। इसके लिए संकीर्णता को भी दोष दिया जा सकता है और वितरण-प्रणाली का कोई सुयोग न बन पाने की अस्त-व्यस्तता को कोसा भी।

अमृतघट की तुलना में मेघमाला की क्रिया-प्रतिक्रिया को असंख्य गुना अधिक सराहा जा सकता है, जो अस्तित्व की दृष्टि से भाप का एक छोटा समूह भर है। उसके पास निज की कोई संपदा भी नहीं हैं। फिर भी उसकी वितरण-प्रवृत्ति इस धरातल के असंख्यकों प्राणियों और वृक्ष-वनस्पतियों का जीवन पराण बनकर रहती हैं। बादलों को स्वल्प जीवन मिला हैं। वे वर्षा के साथ ही अपना अस्तित्व खो बैठते हैं, फिर भी सभी जलसिंचन हेतु उनकी अनुकम्पा के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाये रहता हैं। अमृतकलश की निजी विशिष्टता कितनी ही क्यों न हो, पर वह सर्वसाधारण के काम न आ सकने पर ललकमात्र बनकर रह जाती हैं। उसकी तुलना में अकिंचन बादलों की महिमा ऐसी है, जिसके लिए विश्व का कण-कण मौन या मुखर वाणी से कृतज्ञता व्यक्त करता हैं।

पत्र या लेख किसी ने कितना ही सारगर्भित क्यों न  लिखा हो, पर उसे संबद्ध व्यक्तियों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी पोस्टमैन ही वहन करते हैं। उसकी प्रतिक्षा में कितने ही लोग बहुत पहले से दरवाजे पर खड़े रहते हैं। उसे देखते ही, घर की ओर आते ही प्रतीक्षारत हृदय की कली खिल जाती है। सेठ-साहूकारों से बढ़कर पोस्टमैन के प्रति हर प्रतीक्षारत की असाधारण श्रद्धा और आत्मीयता बोलती है। उसे घर के एक सदस्य की तरह ही उस क्षेत्र के लोग मान देते हैं।

अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर काले अक्षर ही नहीं छपते वरन् उसके साथ प्रचंड प्राण-प्रवाह भी बहता है। ऐसा प्रवाह जो स्रोतों को जगाता है। जागों का खड़ा करता है। खड़ों को चलाता हैं और चलतों को उछाल देता हैं। उसकी दिव्य क्षमता में कही कोई संदेह की गुंजाइश हैं नहीं। विगत पचास वर्षों में उसने पच्चीस लाख से भी अधिक वटवृक्ष, कल्पवृक्ष एवं चंदन वृक्ष लगाए, पोसे और परिपक्व किए हैं। इसके द्वारा अपने-अपने स्तर और पौरुष के अनुरूप अपने क्षेत्र में जो विज्ञापनबाजी से सर्वथा दूर सत्प्रवृत्ति संवर्धन किया है, उसका यदि समग्र लेखा-जोखा लेना संभव हो, तो उसे एक स्वर से अद्भुत एवं अभूतपूर्व ही कहा जा सकता हैं। जो हो चुका, उसे इतिहास के प्रेरणा-पृष्ठ भर कहा जा सकता हैं। दर्शनीय वह हैं, जो वर्तमान में योजनाबद्ध हो रहा हैं। उत्साहवर्धक वह हैं, जो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ हैं, जिसकी संभावना का कल्पना-चित्र, जो खींच सके हैं, वे पुलकन अनुभव करते हैं और विश्वास करते हैं कि सतयुग के समान नवयुग का अवतरण निकट भविष्य में हो सकना मात्र आशा नहीं, एक तथ्यपूर्ण यथार्थता है।

यह बहुमूल्य उत्पादन समुद्र-मंथन में उपलब्ध हुए अमृतकलश जैसा है। इसकी महिमा गाई जा सकती है, पर वह वहाँ जाकर अवरुद्ध हो जाती है, जब उसकी वितरण-व्यवस्था अपंग, असहाय जैसी अस्त−व्यस्त दिखती है। उसे जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए अभीष्ट संख्या में कर्मवीर बादलों की तरह मैदान में नहीं उतरते। उस आलोक से अपने संपर्क क्षेत्र को आलोकित करने के लिए कोई अपनी क्षमता का दीपकों जैसा उपयोग करते नहीं दीख पड़ते। इतना भी न बने पड़े तो पोस्टमैन जैसी सरल रीति-नीति तो अपनाई ही जा सकती है। उमंग उठे तब तो! उत्साह जगे तब तो!

अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिपटी प्राणवान ऊर्जा और उसके द्वारा बन पड़ने वाली क्रिया-प्रक्रिया ‘हस्तामलकवत्’ प्रत्यक्ष है। उसकी उपयोगिता एवं क्षमता को हर पारखी ने भूरि-भूरि सराहा हैं। इसे तर्क, तथ्य और प्रमाण के अंबार प्रस्तुत करते हुए कहीं भी कोई भी सिद्ध कर सकता है। उसे पारस की उपमा देने वाले कहते हैं कि जो उसे छूते हैं वे अपने कलुष-कल्मष धो डालते हैं और ऐसा व्यक्तित्व विकसित करते हैं, जिसे कायकल्प की उपमा दी जा सके। यदि ऐसा न होता तो सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दुहरे मोर्चे पर जो लाखों शूरवीर लड़ रहे हैं, उनका कहीं अता-पता भी न होता। उज्ज्वल भविष्य का जो विश्वास जन-जन के मन में जाग रहा हैं, उसका बीजांकुर भी कहीं दृष्टिगोचर न होता। इस दिव्य ऊर्जा की गरिमा और क्षमता को हर कसौटी पर कसा और खरा पाया जा सकता हैं। उसमें जन-जन को देवमानव में विकसित करने की भागीरथी ललक को युग चेतना के रूप में प्रज्वलित देखा ही सकता हैं।

घर-घर अलख जगाना, जन-जन की अंतःज्योति जगाना इस प्रयास के द्वारा संभव हैं। पर एक ही चट्टान बुरी तरह अवरुद्ध हो जाती हैं और आशा-संभावना पर तुषारापात होने जैसा भय लगता हैं।

यह अवरोध इतना भर हैं कि पाठक उसका रसास्वादन करके झूठी पत्तल की तरह कचरे के ढेर में फेंक देते हैं। ऐसी नहीं बन पड़ता जैसा सद्गृहस्थों को आचरण करते देखा जाता हैं। पिता कुछ स्वादिष्ट पदार्थ बाहर से लाता हैं, तो उसे घर के हर सदस्य को बाँटता है। उसकी सहज वृति होती है कि जिससे अपने रसास्वादन करने की प्रसन्नता प्राप्त होती है, उससे अपने परिवार के हर सदस्य को भी लाभांवित होने देना चाहिए। विवाह-शादी के दिनों में मिठाई बनती है, तो उन्हें पास-पड़ोसियों, स्वजन-संबंधियों के यहाँ भी पहुँचाया जाता हैं। जो ऐसा नहीं करते, उनका व्यवहार कृपण, संकीर्ण, स्वार्थपरता से भरा माना जाता हैं। यही उदाहरण उन पर भी लागू होता हैं, जो स्वयं तो अखण्ड ज्योति नियमित रूप से मँगाते हैं— पढ़ते और रसास्वादन का लाभ भी लेते हैं, पर इतना नहीं बन पड़ता कि इस दीपक की नांद के नीचे बंद कर देने की अपेक्षा उस ज्योति से संपर्क क्षेत्र को आलोकित करने की उदारता दिखाई जाए।

जो उपयोगी है, जिसकी प्रकाश-प्रेरणा में जीवन का ज्योतिर्मय होना माना जाता है, उसे अग्रगामी होने के लिए अवसर क्यों न दिया जाए? इसके लिए यदि जब तक मुँह खोलना पड़ता है और परिचितों तक पहुँचने के लिए कुछ कदम बढ़ाने पड़ते हैं, तो इतना छोटा श्रम सहन करने में कृपणता क्यों दिखाई जाए? आलस्य, प्रमाद, संकोच और अहंकार को क्यों आड़े आने दिया जाए? यह उत्साह मन में क्यों न जगाया जाए कि अपने घर परिवार के सभी सदस्य उसे पढ़ें या सुनें। एक कदम और आगे बढ़कर मित्रों-संबंधियों, पड़ोसियों, परिचितों तक भी तो इस प्रयास को गतिशील किया जा सकता है। जो इस अमृतकलश के महत्त्व से सर्वथा अपरिचित हैं, उन्हें एक-एक करके पुराने अंक पढ़ाने-वापस लेते रहने पर इस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है कि वे स्वयं ही इसे नियमित रूप से प्राप्त करते रहने के लिए चंदा जमा करें।

यदि वर्तमान सदस्यों में से प्रत्येक यह धारणा बना लें, निश्चय कर लें कि उसे अपने प्रभाव क्षेत्र पर दबाव डालकर दो नए सदस्य और बनाने हैं, तो निश्चय ही यह छोटा निर्धारण पूरा होकर रहेगा। इतना भी न बन पड़ने या उसमें असफलता रहने जैसा तो प्रश्न ही नहीं उठता।

परिजनों का इतना-सा स्वल्प सहयोग परिणाम की दृष्टि से इतना प्रभावी सिद्ध हो सकता है कि उसकी कल्पनामात्र से रोमांच हो उठे। मिशन का जितना विस्तार अब है, उसकी तुलना में वह देखते-देखते तीन गुना अधिक कार्यक्षेत्र प्राप्त कर सकता हैं। तीन गुने अधिक सहयोगी उपलब्ध हो सकते हैं। उसी अनुपात में युग-अवतरण की सृजन-साधना को तीन गुने कम समय में सफल होते देखा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति पत्रिका कलेवर में दिखती भर है। उससे वाचनकाल के स्वल्प रसास्वादन मात्र मिलने से मन बहलता तो है; पर वस्तुतः वह इतनी ही तुच्छ नहीं है। इसके साथ लिपटी प्राण-उर्जा में वह क्षमता है कि अपने संपर्क-क्षेत्र को उसी प्रकार अपनी लपेट में ले सके जैसे ज्वलंतशिखा सूखे ईंधन को अपनी पकड़ में लेकर अपने जैसा बना लेती है।

अब तक जो कुछ कार्य विस्तार बन पड़ा है, उसमे अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को जितना श्रेय दिया जा सकता है, उससे हजार गुना श्रेय उनको है, जो इस परिकर से जुड़े है और अपने श्रम-सहयोग से अपने क्षेत्र में अपनी-अपनी रूचि एवं सामर्थ्यानुसार नवसृजन प्रयासों में लगे हैं। उन्हीं ने क्रियात्मक रूप से सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की क्रियात्मक भूमिका निबाही है। अखण्ड ज्योति को मस्तिष्क कहा जाए तो उसके परिकर को समर्थतासंपन्न काय-कलेवर। काया के माध्यम से ही तो मस्तिष्क अपने मनोरथों को पूरा करता है। अखण्ड ज्योति की योजनाएँ उसके पाठक परिजनों के विशालकाय परिकर के द्वारा ही संपन्न होती हैं। शरीर न हो तो अकेला प्राण कहीं आकाश में ही अदृश्य रूप में उड़ता-फिरता रह सकता है।

अखण्ड ज्योति की, उसके सुत्रसंचालाकों की एकमात्र अभिलाषा यही रही है कि उसे अब की अपेक्षा अधिक घरों में प्रवेश करने का, अधिक विचारशीलों के साथ जुड़ने का अवसर मिले। वह अपने परिवार को तीन गुना बढा हुआ देखे। उसे अपने पुत्र-पौत्रों की अधिक सार्थक सेवा करने का अवसर मिले, जिससे सभी का मन हुलसे और युगचेतना का कार्य-विस्तार अधिक लोगों में अधिक जीवन-संचार कर सके।

संभावनाएँ विशाल वटवृक्ष जैसी असीम अनंत हैं, पर वे धूमिल इसलिए हो जाती हैं कि अंकुर को खाद-पानी मिलने की सुविधा नहीं मिलती। प्रचार-प्रसार में परिजन उतना उत्साह प्रदर्शित नहीं करते जितना कि उन्हें करना चाहिए। यही कारण है कि उगते अंकुर कुम्हला जाते है। माली के उपेक्षा दिखाने पर बगीचे की भी तो शोभा-संभावना चली जाती है। अखण्ड ज्योति इक्यावन वर्ष की होने पर भी इतनी बौनी बनी रहे कि हिंदी भाषी प्रदेशों के घर-घर में उसकी पहुँच न हो सके तो समझना चाहिए कि दुर्भाग्य आड़े आ गया।

अखण्ड ज्योति के संचालक अपनी भावनाओं और प्रेरणाओं का वितरण करने हेतु हर विचारशील के घर में प्रवेश पाने के लिए व्याकुल हैं। इस व्याकुलता में उत्सुकों के हाथ तो आत्मसंतोष ही पड़ने वाला है; पर जो दरवाजे खोल देंगे और प्रवेश की अनुमति देंगे, उनके लिए विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे दो रुपये मासिक का अतिथि सत्कार करके बदले में इतना कुछ प्राप्त कर सकेंगे, जिसे दिव्य वरदान-अनुदान की उपमा दी जा सके। जिसका अभाव जीवन के हर क्षेत्र में उत्साहवर्धक विभूतियाँ उत्पन्न करते हुए प्रत्यक्ष देखा जा सके।

वर्त्तमान पाठकों में से प्रत्येक के पास अखण्ड ज्योति का— उसके सुत्रसंचालको का भावभरा अनुरोध पहुँचना चाहिए कि वे इन दिनों एक आदर्शवादी लक्ष्य सामने रखें कि उन्हें अखण्ड ज्योति के दो नए ग्राहक बनाए बिना चैन नहीं लेना है। अपनी सदस्यता तो जीवनभर स्थिर रखनी ही है।


आएगा ऐसा वसन्त

/akhandjyoti/edition/1987/Dec/51


आएगा ऐसा वसन्त

/akhandjyoti/edition/1987/Dec/51


पानी कुछ नहीं बोला (Kahani)

आग बोली मूर्ख पानी यहाँ से हट नहीं तो जलाकर नष्ट कर दूँगी।

पानी कुछ नहीं बोला, शांतचित्त अपने काम से लगा रहा। इस पर अग्नि और भी आग बबूला होकर तथा पानी से टकरा कर आप ही नष्ट हो गयी। यह है आवेशग्रस्त होने का परिणाम।



आएगा एसा


                     
मानव जीवन में आएँगे गौरव गरिमा और सुख अंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

यह समय है प्रत्यावर्तन का, अब ऐसा नवयुवक आएगा।

जो भोग चुका है दुःख मानव, उससे निजात पा जाएगा।

सुख की सरसों लहराएगी आनंदित होंगे सब दिग्दिगंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

भावनाहीन हो सुख गए हैं, खेत जो कि अंतस्तल के।

उनको ममता से खींच प्रेम के दाने बोएँगे मिल के॥

फिर फसल उगेगी संवेदन की, हम सब होंगे श्रीमंत

अब आएगा ऐसा वसंत॥

फिर आएगा जो युग उसमें, मानव होंगे शुभ संस्कारी।

परहितकारी, निष्काम, विमल मन सात्विक और सदाचारी।

तब सद्गृहस्थ ही बना करेंगे, परिव्राजक, ऋषि और संत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

नव नव अंकुर सद्भावों के, और हरियाली सज्जनता की।

नूतन युग की वासंती ऋतु, परचम होगी मानवता की॥

विकसित होगी प्रज्ञा, मेघा आंतरिक चेतनाएँ अनंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

मानव अपनी सोयी विभूतियों, का भी ज्ञान जाएगा।

यों होगा सुख का सृजन इसी धरती को स्वर्ग बनाएगा।

इस धरती पर लेंगे फिर जन्म देवता भी हो कृपावत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥


आएगा एसा


                     
मानव जीवन में आएँगे गौरव गरिमा और सुख अंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

यह समय है प्रत्यावर्तन का, अब ऐसा नवयुवक आएगा।

जो भोग चुका है दुःख मानव, उससे निजात पा जाएगा।

सुख की सरसों लहराएगी आनंदित होंगे सब दिग्दिगंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

भावनाहीन हो सुख गए हैं, खेत जो कि अंतस्तल के।

उनको ममता से खींच प्रेम के दाने बोएँगे मिल के॥

फिर फसल उगेगी संवेदन की, हम सब होंगे श्रीमंत

अब आएगा ऐसा वसंत॥

फिर आएगा जो युग उसमें, मानव होंगे शुभ संस्कारी।

परहितकारी, निष्काम, विमल मन सात्विक और सदाचारी।

तब सद्गृहस्थ ही बना करेंगे, परिव्राजक, ऋषि और संत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

नव नव अंकुर सद्भावों के, और हरियाली सज्जनता की।

नूतन युग की वासंती ऋतु, परचम होगी मानवता की॥

विकसित होगी प्रज्ञा, मेघा आंतरिक चेतनाएँ अनंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

मानव अपनी सोयी विभूतियों, का भी ज्ञान जाएगा।

यों होगा सुख का सृजन इसी धरती को स्वर्ग बनाएगा।

इस धरती पर लेंगे फिर जन्म देवता भी हो कृपावत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥


आएगा ऐसा बसंत

मानव जीवन में आएँगे गौरव गरिमा और सुख अंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

यह समय है प्रत्यावर्तन का, अब ऐसा नवयुवक आएगा।

जो भोग चुका है दुःख मानव, उससे निजात पा जाएगा।

सुख की सरसों लहराएगी आनंदित होंगे सब दिग्दिगंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

भावनाहीन हो सुख गए हैं, खेत जो कि अंतस्तल के।

उनको ममता से खींच प्रेम के दाने बोएँगे मिल के॥

फिर फसल उगेगी संवेदन की, हम सब होंगे श्रीमंत

अब आएगा ऐसा वसंत॥

फिर आएगा जो युग उसमें, मानव होंगे शुभ संस्कारी।

परहितकारी, निष्काम, विमल मन सात्विक और सदाचारी।

तब सद्गृहस्थ ही बना करेंगे, परिव्राजक, ऋषि और संत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

नव नव अंकुर सद्भावों के, और हरियाली सज्जनता की।

नूतन युग की वासंती ऋतु, परचम होगी मानवता की॥

विकसित होगी प्रज्ञा, मेघा आंतरिक चेतनाएँ अनंत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

मानव अपनी सोयी विभूतियों, का भी ज्ञान जाएगा।

यों होगा सुख का सृजन इसी धरती को स्वर्ग बनाएगा।

इस धरती पर लेंगे फिर जन्म देवता भी हो कृपावत।

अब आएगा ऐसा वसंत॥

*समाप्त*