इन दिनों हम बीसवीं सदी के अन्तिम चरण में रह रहे हैं। सन् 2000 में यह शताब्दी समाप्त हो जायेगी। यह सन् 1987 है। मात्र 13 वर्ष का समय बीतने-बीतते इक्कीसवीं सदी आ धमकेगी। शताब्दियों के अन्त में पिछले दिनों भी आश्चर्य भरे परिवर्तन होते रह हैं। इस बार तो इस मध्यान्तर में कुछ ऐसा होने जा रहा हैं। इस बार तो इस मध्यान्तर में कुछ ऐसा होने जा रहा है, जिसे अनुपम, अद्भुत और अभूतपूर्व कहा जा सके।
बीसवीं सदी को प्रगति की अवधि भी कह सकते हैं और साथ ही भयानक अवगति भी। पिछले दिनों विज्ञान और बुद्धिमान के दो देवताओं ने अपने चमत्कार दिखाये हैं, वे सशक्त भी रहे हैं और भयानक भी। दिन का अधिपति सूर्य और रात्रि का स्वामी चन्द्रमा कहा जाता है। पर राहु केतु अपने दाँव पर इनसे भी बलिष्ठ सिद्ध होते हैं। ग्रहण काल में वे इन दोनों को ग्रस लेते हैं। सम्पन्नता और शक्ति सभी को अभीष्ट है। इन्हें देने और छीनने में शताब्दी की उपरोक्त उपलब्धियों का बढ़ा-चढ़ा हाथ है। विज्ञान ने वे सुविधा साधन प्रदान किये हैं जिनकी पूर्वजों ने सभी कल्पना तक न की होगी। प्रत्यक्षवाद ने मान्यताओं के धुर्रे उड़ा दिये और चिन्तन को नये सिरे से सोचने की सामग्री दी। यह दोनों ही उत्साहवर्धक रहे और आश्चर्यचकित करने वाले भी। किन्तु जिस प्रकार दीपक तले अँधेरा और उसके धुएँ में कालिख पाई जाती है, उसी प्रकार आधुनिक उपलब्धियों के साथ-साथ कुछ ऐसा भी घुला रहा जिसे अवाँछनीय एवं अनुपयुक्त भी कहा जा सकें।
विज्ञान ने हमें जल, थल, नभ पर द्रुतगति से गमन करने की क्षमता दी। तार, रेडियो टेलीविजन, जैसे संचार साधन भी। साथ ही उसने बिजली बारूद, वैभव और विनाश के परस्पर विरोधी सरंजाम भी जुटाये। कल कारखाने खड़े किये। कम्प्यूटर और यंत्र मानव बनाये। इन उपलब्धियों पर गर्व किया जा सकता है, क्यों कि इनके पीछे इतना अध्यवसाय ओर शक्ति साधन है, कि उसे पुरातन काल के देव दानवों के साथ तुलना की जा सकती है।
दर्शन, अन्वेषण, प्रतिपादन के संदर्भ में भी यही हुआ है। चिर पुरातन मान्यताओं में से कितनी ही हवा में उड़ा दी गईं, कितनी ही संदिग्ध बना दी गई। कितनों को नये सिरे से नये ढाँचे में ढाला गया और सोचने का अभिनव आधार खड़ा किया गया। यों अशिक्षितों और पिछड़े क्षेत्रों में अन्धविश्वास अभी भी है, पर उसकी जड़ें खोखली होने लगी हैं। लोग समझने लगे हैं कि “बाबा वाक्यं प्रमाण” ही सब कुछ नहीं है। लकीर के फकीर बन कर सदा सर्वदा नहीं रहा जा सकता। तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण को साक्षी रखकर हर प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ा जाने लगा। इसे प्रत्यक्षवाद भी कह सकते हैं और बुद्धिवाद भी। शिक्षा के साथ ऐसे तत्वों को समावेश हुआ, जिनसे विश्व प्रवाह के संबंध में अभिनव आधारों को समावेश होता चला गया।
यह सब प्रशंसनीय है। सृष्टि आदिकाल से लेकर प्रगतिक्रम जिस गति से चल उसकी तुलना में इन दिनों की गति को चमत्कारी जादुई-कल्पनातीत ही कहा जा सकता है। यह सभी बातें ऐसी है। जिनके कारण मानवी प्रतिभा के ज्वालामुखी फटने जैसे विकास का यशगान ही किया जा सकता है और अभिनन्दन भी।
यदि इन उपलब्धियों के सदुपयोग की बेला में श्रद्धा सद्भावना का नीति और औचित्य का समावेश रहा होता तो प्रस्तुत साधनों से समूचा जन समुदाय अपेक्षाकृत अधिक सुखी और समुन्नत स्थिति में पहुँच चुका होता। जब पूर्वज स्वल्प साधनों साधनों में सुखी और समुन्नत जीवन जीते रहे तो कारण नहीं कि इन शताब्दियों की उपलब्धियाँ उसे हर क्षेत्र में अधिक सुविकसित न बना सकी होतीं।
दुरुपयोग से अमृत भी विष बन जाता है। रसोई घर में काम आने वाले चाकू, हँसिया जैसे छोटे से उपकरण किसी का सहज ही प्राण हरण कर सकते हैं। इसे बुद्धि के दुरुपयोग का तो कहना ही क्या? वह न केवल स्वयं उल्टा सोचती है, वरन् समूचे प्रभाव क्षेत्र को भी उसी अनौचित्य के मार्ग पर घसीट ले जाती हैं। हस्तगत सुविधा सामग्री का ऐसा दुरुपयोग करती है कि उससे लाभदायक परिस्थिति एवं सामग्री उलट कर ऐसे प्रहार करती है। जिससे शरीर अशक्त बने, मन बौराये, बुद्धि अनौचित्य का समर्थन करे, कुकर्मों में रुचि बढ़े। इसका प्रतिफल भी सुनिश्चित रूप से ऐसा ही होना चाहिए जिससे विग्रह खड़े हों, दुर्व्यसन पीछे पड़े और संकटों, उद्वेगों के पर्वत सामने आ खड़े हों। समस्यायें उत्पन्न हों, उलझनें इस प्रकार उलझें कि सँभालने में ही न आवें।
इन दिनों जिधर भी नजर पसार कर देखा जाय, उधर ही सुविधाओं की तुलना में संकटों की भारी भरमार दीख पड़ने लगी। संतुष्ट लोगों की तुलना में असंतुष्टों का वर्ग कहीं अधिक विस्तृत है। सुखिया की तुलना में दुखिया कई गुने अधिक विस्तृत है। सुखिया की तुलना में दुखिया कई गुने अधिक हैं। यह आश्चर्य की ही बात है। विज्ञान और बुद्धिवाद अपनी चमत्कारी सामर्थ्य के बावजूद मनुष्य जाति की ऐसी सेवा न कर सके जबकि उनमें से प्रत्येक अकेले ही बहुत कुछ कर सकता था।
शारीरिक रुग्णता, मानसिक उद्विग्नता, आर्थिक दरिद्रता, पारिवारिक विश्रृंखलता, सामाजिक अराजकता, धार्मिक विडम्बना का ऐसा दैत्य सर्वत्र व्याप्त है, जितना कि इससे पूर्व-आदिमकाल से लेकर अब तक कभी देखने को नहीं मिला। जिनके साथ में नेतृत्व और साधन हैं वे अपनी समझ बूझ के अनुसार निराकरण के उपाय भी करते हैं, पर परिस्थिति काबू में नहीं आती। सुलझने के स्थान पर उलझनें और भी अधिक उलझ जाती हैं।
ऐसा क्यों होता है? इसका कारण समझने वाले समझते हैं कि पदार्थों की कमी पड़ गई है, व्यवस्था लड़खड़ा गई है, कूटनीति या कानूनों में कमी पड़ रही है, आवश्यकताओं की तुलना में उपकरण या अफसर कम हैं आदि-आदि। इस समझ के अनुसार अधिक धन की आवश्यकता समझी जाती है। अधिक टैक्स लगते हैं। विशालकाय योजनाएँ बनती हैं। महंगाई और बढ़ा हुआ टैक्सेशन दोनों परस्पर सम्बद्ध है। आजीविका बढ़ती है तो महंगाई उसके प्रभाव को समाप्त कर देती है। जिधर मैत्री और सहयोग के हाथ बढ़ाये जाते हैं उधर से ही वे झटक दिये जाते हैं। भीतरी और बाहरी-राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय वैयक्तिक और सामाजिक कठिनाइयों का अभाव नहीं दीखता। यद्यपि उनके निराकरण का उपाय सोचने और प्रयास करने में किसी प्रकार की कमी नहीं दीख पड़ती।
इस असमंजस भरे भटकावों का कारण एक ही है साधनों और परिस्थितियों को ही सब कुछ मानना। उन्हीं की पूर्ति और व्यवस्था में लगे रहना। इससे सामर्थ्य तो जुटते रहती है, पर वह क्षेत्र छूट जाता है जिसके कारण उलझनें उभरती हैं। संकट गहराते है। पुरुषार्थ तो चलता रहता है, पर सफलता के दर्शन नहीं होते। वह विस्मृत एवं उपेक्षित पक्ष, विचारणा का परिशोधन जन मानस का परिष्कार।
इन दिनों विचार भी गड़बड़ाये हुए हैं और वातावरण भी बिगड़ा हुआ है। पर देखना यह है कि इन दोनों के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध तो काम नहीं कर रहा है। गंभीरता को साथ लेकर निरीक्षण, परीक्षण करने पर एक ही निष्कर्ष हाथ आता है कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदाता है। चिन्तन प्रधान है। चरित्र उसी आधार पर बनता है। व्यक्तित्व का गया गुजरा स्तर ही ऐसी रीति नीति अपनाता है, जिसमें बोये हुए विषवृक्ष के कड़ुवे फल खाने पड़ें, उगाई हुई नागफनी के काँटे पैरों में गड़ने लगें।
समझ जाना चाहिए कि मनुष्य अपने आप में पूर्ण है। उसके पास ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेंद्रियां और मस्तिष्कीय विभूतियों का इतना बड़ा भण्डार है कि उसी के सहारे वह बहुत कुछ कर सकता हैं। बहुत कुछ बन और बदल सकता है। किन्तु यदि सद्विचारों का अभाव हो तो सम्पदा और समर्थता का बढ़ा-चढ़ा अम्बार भी ऐसे प्रयास करेगा, जिससे समाधान हाथ आना तो दूर उल्टा संकटों का प्रकोप ही बढ़ता चले। इतिहास साक्षी है कि विचारवानों ने स्वल्प साधनों और विषम परिस्थितियों के रहते हुए भी स्वयं ऊँचे उठे और दूसरों को आगे बढ़ाने में सफल हुए हैं। बुद्ध गान्धी जैसे व्यक्तित्वों ने अपने आपको धन्य बनाया और विषमता से भरे वातावरण को आश्चर्यजनक रीति से बदल दिया। संसार की महान क्रान्तियाँ विचारों की प्रचण्डता के साथ व्यापक हुई हैं और सफल बनी हैं। तोप तलवारों की ताकत मात्र रक्तपात कर सकती है, पर उसमें इतनी क्षमता नहीं कि न्याय माँगने वाले साहसी संकल्प के बढ़ते कदमों को पीछे मोड़ सकें। पिछली दो शताब्दियों में हुई राजक्रान्तियों का विश्वव्यापी सुविस्तृत इतिहास है। इन सफलताओं के पीछे संकल्प शक्ति ही काम करती दृष्टिगोचर होती हैं। राजतंत्रों के दुर्ग ढह गये। जमींदार, साहूकारों की सामन्ती शान धूलि चाटने लगी। दास-दासी पकड़े जाने और हाट बाजारों में पशुओं की तरह बिकने की प्रथा भी अब संसार भर में मिट गई। यद्यपि उन असहाय लोगों के पास अपने मालिकों से लड़ झगड़ कर त्राण पा सकने की सामर्थ्य नहीं थी। पर विश्व के लोकमत ने उस प्रचलन को सहन नहीं किया फलतः लम्बे समय से चली आने वाली उस प्रथा को अपने आप अपनी मौत करते देखा गया। यह विचार शक्ति के कुछ उदाहरण हैं। यदि इस धारा को विनाशकारी बाढ़ न बनने दिया जाय और उसे सिंचाई के लिए अनुबंधित किया जाय तो परिणाम निश्चित रूप से वैसा ही सुखद होगा जैसा कि सिंचाई वाले क्षेत्र में अच्छी उपज के रूप में हस्तगत होता हैं।
पाटलिपुत्र में उस वर्ष गंगा में भारी बाढ़ आई। पानी नगर में घुस गया। किसानों के घर और खेत डूब गये।
बाढ़ कैसे शान्त हो? उसका उपाय सिद्ध पुरुषों की मंडली से पूछा गया। उनने एक ही उपचार बताया कि कोई सच्ची पतिव्रता इस पानी में पैर डाले तो उस पुण्य से सन्तुष्ट होकर गंगा शान्त हो सकती है।
सच्ची पतिव्रता की खोज हुई पर किसी सुहागिन को अपनी स्थिति इस योग्य प्रतीत न हुई। खोज से निराशा हाथ लगी।
तब एक वेश्या आगे आई और उसने अपने को सच्ची पतिव्रता कहकर गंगा में पैर डाला फलतः बाढ़ शांत हो गई।
चकित दर्शकों का समाधान करते हुए वेश्या ने कहा - मैं जितने समय के लिए किसी को शरीर दान करती हूँ। उतने समय तन मन से उसकी सेवा करती हूँ। किसी अन्य की कल्पना तक नहीं करती।
साधन और सहायता मिलने की आवश्यकता को झुठलाया नहीं जा सकता वे हों तो कार्य में फुर्ती भी होती है और उपलब्धियाँ भी अधिक बड़ी मात्रा में हाथ लगती है। इसलिए साधनों की व्यवस्था करने के प्रयास सदा से चलते रहेंगे, चलते रहने भी चाहिए। किन्तु उनकी सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वस्तुस्थिति को समझा जाय। निदान के अनुरूप उपचार किया जाय। यह समझा जाय कि व्यक्तित्व को प्रभावी प्रतिभावान बनाने के लिए उसकी चिन्तन क्षमता उत्कृष्ट स्तर की होनी चाहिए। समाज का ढाँचा सुसम्पन्नता और सुसंस्कारिता से भरा पूरा तभी हो सकता है कि उसके प्रचलन नीतिमत्ता पर अवलम्बित हों। यह मूर्धन्यों का काम है कि चिन्तन का वातावरण वे समझाकर बदल सकते हैं या प्रताड़ना देकर अथवा दोनों के समन्वय से बात बनती है। उपाय जो भी कार्यान्वित किये जायँ, पर उनका लक्ष्य यह होना चाहिए कि मानवी आदर्शवादिता को नष्ट-भ्रष्ट होने से बचाया जाय, और उसे फलने फूलने का अवसर मिलने दिया जाय। यह जिस अनुपात में बन पड़ेगा, उसी के अनुरूप प्रतिकूलताएँ अनुकूलता में बदल जायेगी। संकट के शीतकालीन हिमखण्ड गलेंगे और उसके उपरान्त बसंत का ऐसा आगमन होगा जिसमें सर्वत्र वृक्ष वनस्पतियाँ फूलती, फलती और अपनी शोभा सुषमा का प्रदर्शन परिचय प्रस्तुत करती हुई, दृष्टिगोचर होने लगे।
साधनों का अपना महत्व है सुविधा सामग्री का सहायता से बहुत कुछ उत्पादित-उपार्जित किया जाता है, पर बात इतने पर ही रुक जाती है। आदर्शवादी पुरुषों का समन्वय हुये बिना उसके अग्रगामी हो सकने का सुयोग्य ही नहीं आता।
उदाहरण के लिए भारतीय कृषक समाज की आर्थिक स्थिति का सर्वेक्षण किया जा सकता है। खाद, पानी, बीज आदि के प्रबन्ध में सरकार ने बहुत कुछ किया है। फलतः उत्पादकों की आजीविका बढ़ी है। महंगाई का सबसे अधिक लाभ भी उन्हीं को मिला है। पचास वर्ष पूर्व वस्तुओं के जो भाव थे और अब बढ़कर वे कहाँ के कहाँ पहुँचे। इसका हिसाब लगाने से प्रतीत होगा कि महंगाई का सबसे अधिक लाभ कृषि उत्पादकों को मिला है। महंगाई के अंक उनके अधिक लाभान्वित होने का संकेत करते हैं। इतने पर भी उनकी स्थिति नाम मात्र को ही सुधरी है। गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन आदि के कुचक्र में वे पहले की तरह घिरे हुए हैं। उनमें से मुट्ठी भर लोग भी सुसम्पन्न कहला सकने की स्थिति में नहीं पहुँच पाये हैं।
ऐसा क्यों हुआ? क्यों होता है? इसका कारण मिल पाने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। तथ्य अपने मुँह बोलते हैं और वस्तुस्थिति को अनायास ही खोलकर रख देते हैं। मूढ़ मान्यताओं ने रूढ़िवादिताओं ने उनकी गाढ़ी कमाई को हाथों हाथ छीन लिया और फुलझड़ी की तरह जलाकर स्वाहा कर दिया। विवाह शादियों के ठाट-बाट दैन दहेज, प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा बढ़ी जो हाथ में आया था, दूसरे हाथ से बर्बाद हो गया। मृतक भोज, जैसी प्रथाओं ने भी कम बर्बादी नहीं कराई। नशेबाजी की लत पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ी है और उपार्जन इन्हीं खाई खड्डों में गिरकर विलुप्त हो गया। फूट, पार्टीबाजी, मुकद्दमाबाजी के रूप में सर्वनाशी अहंकार फूटा। समर्थता ने आतंक का बाना पहना और चोरी उठाईगिरी, डकैती हत्या का सिलसिला उन गाँवों में भी पड़ा जहाँ मुद्दतों से कभी कोई अवाँछनीय घटनाक्रम घटित नहीं हुआ था।
अनियन्त्रित प्रजनन ने जनसंख्या में आश्चर्यजनक अनुपात से अभिवृद्धि की। फलतः छोटे कुटुम्ब बड़े हो गये। शान और शेखी में परिश्रम से जी चुराया गया। फैशन का खर्च बढ़ा। फलतः किसान की वह आमदनी जो सँभालकर रखी गई होती तो परिवार को अच्छी शिक्षा दिला सकती थी। उन्हें स्वस्थ रख सकती थी। ऐसे ही मसखरी में उड़कर बर्बाद हो गई जो सुयोग मिला था, वह बिना पानी बादल की तरह अपनी झलक झाँकी दिखाकर आँखों से ओझल हो गया। नई पीढ़ियाँ कड़े परिश्रम से बचती हैं। तनिक-सी पढ़ाई पढ़कर शहरों की ओर आराम की नौकरी तलाश करने भागती हैं। किसी प्रकार वे बच्चे जहाँ-तहाँ गुजारा तो कर लेते हैं, पर घर के सभी सदस्य मिल जुलकर एक जुट परिश्रम करते और खेती का लाभ कई गुना बढ़ा कर सम्पन्नता स्वच्छता, और सम्मान अर्जित कर सकते थे। उस सभी से वंचित रह जाते हैं। इसे कहते हैं सुविधाओं के होते हुये भी दुर्बुद्धि के कारण उनका समुचित लाभ न उठा पाना।
यही हर क्षेत्र में हो रहा है। कमाई की दृष्टि से अधिकाँश क्षेत्रों को महंगाई होते हुए भी अधिक सुविधा साधन प्राप्त हैं। इतने पर भी फैशन और दुर्व्यसनों के फेर में इस कमाई का देखते-देखते पलायन हो जाता है और अच्छी आजीविका रहते हुए भी तंगी भुगतते और ऋणी रहते अधिकाँश लोग देखे जाते हैं। बढ़ी हुई तृष्णाएँ और आवश्यकताएँ जब साधारण रीति से पूरी नहीं हो पाती तो अपराधी दुष्प्रवृत्तियाँ अपनानी पड़ती है। शोषण, अपहरण, आक्रमण का सहारा लेना पड़ते हैं। सम्पन्न परिवारों के सुशिक्षित लोग भी जब डकैती जैसे अनाचारों में संलग्न पाये जाते हैं, तो यही सोचना पड़ता है कि उतनी आवश्यकता नहीं जितनी सत्साहस की।
देश के कर्णधारों का चिन्तन नए विशेष ढाँचे में ढल गया है, कि प्रगति के लिए सम्पन्नता बढ़ाने भर से काम चल जायगा। वे यह भूल जाते हैं कि बढ़ी हुई सम्पन्नता का उपयोग यदि अनर्थ कृत्यों में होने लगा तो वह दरिद्रता से भी महंगी पड़ेगी। इसलिए घोड़ा खरीदते समय उसकी लगाम और जीन का भी प्रबंध करना चाहिए अन्यथा वह उच्छृंखल होकर किसी भी दिशा में धर दौड़ेगा और किसी भी खाई खड्ड में सवार को ले गिरेगा।
साधनों का संवर्धन करते समय इस तथ्य पर पूरा-पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए कि उपलब्धियों का सही सदुपयोग बन पड़े, ऐसे दूरदर्शी विवेक से भरा पूरा प्रशिक्षण जन-साधारण को मिल रहा है या नहीं। व्यक्तित्वों को परिष्कृत किया जा रहा है या नहीं। चिन्तन चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादिता के रंग में रंगों जा रहा है या नहीं? उपार्जन और चिन्तन का अविच्छिन्न युग्म है। यह दोनों जब साथ-साथ रहेंगे तभी प्रसन्नता का वातावरण बनेगा। जैसे एक हाथ से ताली नहीं बजती। एक पहिए की गाड़ी दूर तक नहीं चलती, उसी प्रकार इन दोनों में से किसी एक को लेकर चल पड़ने पर अभीष्ट की उपलब्धि नहीं हो सकती और न उज्ज्वल भविष्य का आधार खड़ा किया जा सकता हैं।
इस तथ्य को यदि गंभीरतापूर्वक समझा जा सके और उसकी पूर्ति का प्रयास किया जा सके तो ही यह आशा की जा सकती है कि अगली शताब्दी में जिस सम्पन्नता एवं प्रसन्नता की आशा की जाती है उसकी पूर्ति हो सकेगी। अन्यथा आज के समृद्ध देशों की तरह दुर्व्यसन की जहाँ भी गुंजाइश होगी वहाँ चढ़ दौड़ेंगे और बाहरी चमक-दमक पर पॉलिश फेरते रहने के साथ-साथ भीतर ही भीतर खोखलापन उत्पन्न करते रहेंगे। द्वितीय महायुद्ध में फ्राँस, जर्मनी के आगे एक सप्ताह भी न टिक सका। इसका एक ही कारण था, कि उसकी बाहरी चमक-दमक तो बढ़ी-चढ़ी थी, पर भीतर ही भीतर वह खोखला हो चुका था। आक्रमण होते ही वहाँ की प्रजा को पलायन ही करना पड़ा, जबकि रूस ने अपनी एक-एक इंच भूमि की रक्षा के लिए अपने जवान की लाशें बिछा दी। अणुबमों का प्रहार सहकर भी छोटा-सा जापान इने–गिने वर्षों में विश्व की बड़ी शक्ति बन गया है। यह उस देशवासियों के उत्कृष्ट चिन्तन और समर्थ पराक्रम का प्रतिफल है। इजराइल का उदाहरण सामने है। बेतुके रेगिस्तान में रहकर भी चारों और से विरोधियों के बीच रहता हुआ भी अपने अस्तित्व की रक्षा कर रहा हैं इसे उसकी आन्तरिक दृढ़ता ही कहना चाहिए।
प्राचीन भारत का इतिहास महानता से भरा हुआ है। उन दिनों जीवनयापन जितने ही साधन थे। कुबेर भण्डारी ने घरों में स्वर्णघाट गाढ़ नहीं रखे थे, किन्तु फिर भी उनकी चारित्रिक गरिमा इतनी बड़ी थी - दृष्टिकोण इतना सुधरा हुआ था, कि यहाँ के नागरिकों को देव मानव कहा जाता था। उसी देवत्व ने न केवल अपनी धरित्री को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाया था वरन् विश्व वसुंधरा के हर कोने में सभ्यता, सुसंस्कारिता के साथ-साथ भौतिक प्रगति का भी पथ-प्रशस्त किया था। ऋषि मनीषी तो भोज पत्र के वस्त्र पहनकर - कंद मूल पर निर्वाह चलाकर, गुफा झोंपड़ियों में समय बिता लेते थे, पर पुरुषार्थ इस स्तर का करते, जिसे मुक्त कंठ से सराहा जाता रहे। यह परीक्षित तथ्य है। खरे सोने को हजार बार परखा जा सकता है। विचारणा की उत्कृष्टता के समर्थन में विश्व के महामानवों का इतिहास भरा पड़ा है। मनुष्य भले ही सैनिक, व्यवसायी, शिल्पी, कलाकार, साहित्यकार, धर्मोपदेशक, ज्ञानी, तपस्वी कुछ भी क्यों न रहा हो, उसकी वरीयता तभी निखरी और उभरी है, जब वह अन्तस् की दृष्टि से प्रखर, प्रतिभावान और प्रामाणिकता से सुसम्पन्न रहा हो।
अगले दिनों जिस सर्वतोमुखी प्रगति की हम योजना बनाते और अपेक्षा करते हैं, उसके लिए साधनों के बलबूते ही लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकेंगे। उसको भावनात्मक विचारणा की भी अनिवार्य आवश्यकता पड़ेगी।
एक ज्योतिषी ने सुकरात का कुरूप चेहरा देखकर उनके अनेकों दुर्गुण गिनाये, जो उसी पोथी के हिसाब से हो सकते थे।
सुकरात ने सुना और नम्रता से कहा- आप जो कहते हैं सो सच है। दुर्गुण मुझमें भी हैं, पर मैं अपने विवेक का अंकुश किये रहता हूँ ताकि उनमें से कोई उभर न पाये।
उन दिनों अकाल पड़ा था। उस गाँव का एक मास्टर स्कूल बन्द हो जाने से बेकार हो गया और भूखा करने लगा।
उन्हीं दिनों सरकस वाले उस रास्ते अपने सरंजाम समेत उधर होकर निकले। मास्टर ने गिड़गिड़ा कर कहा-मुझे भी कोई नौकरी दे दें। आपके पास तो इतने आदमी हैं जो काम बतायेंगे सो ही कर लूँगा।
सरकस वाले ने मास्टर को रख लिया काम पूछा तो मालिक ने कहा तुम्हैं शेर का चमड़ा पहनकर शेर बनना है। और उसी का पार्ट अदा करना है। अभ्यास कराया गया सो वह बताए हुए पार्ट ठीक से करने लगा।
एक दिन उस गाँव के समीप ही सरकस का खेल हुआ। मास्टर के विद्यार्थी और पड़ौसी भी बड़ी संख्या में उसे देखने पहुँचे। नकली शेर ने उन्हें देखा तो हड़बड़ा गया। यह लोग मुझे यह स्वाँग करते देखेंगे तो क्या कहैंगे? लज्जा और ग्लानि से पसीना छूटने लगा। शेर का जो पार्ट उसे रस्से पर चढ़कर करना था सो उससे बना नहीं और हड़बड़ा कर नीचे गिर पड़ा। जहाँ गिरा वहाँ इर्द गिर्द चार और शेर पिंजड़े से निकाल कर लाए गए थे उनके बीच अपने को पाकर उसे मौत दिखाई पड़ने लगी और बचाओ, बचाओ का शोर बुरी तरह मचाने लगा।
दर्शकों का कौतूहल दूना हो गया वे सरकस की अलौकिकता पर तालियाँ बजाने लगे। शेर किस तरह मनुष्य की बोली बोलता है। उसे देखकर उनने उस तमाशे की भूरि-भूरि प्रशंसा की। रस्से पर से गिरने की असफलता पर उनने ध्यान तक न दिया।
नकली शेर को इस प्रकार चीखते चिल्लाते देखकर-पिंजड़े में से निकाले गए असली शेर एक - एक करके उसके पास आए और बारी-बारी से सान्त्वना देते हुए अपने-अपने पिंजड़ों में जा बैठे। मास्टर ने चिल्लाना बन्द करके सन्तोष की साँस ली और पाया कि वह अकेला नहीं यहाँ पूरे सरकस के सभी शेर उसी की तरह नकली हैं।
इन दिनों शेर जैसे मूर्धन्य दीखने वाले उच्च पदासीन लोग आत्म प्रदर्शन तो बहुत करते हैं, पर भीतर से खोखले और बनावटी होने से परीक्षा की घड़ी आने पर सन्तुलन गवाँ बैठते हैं।
पिछला कम जो किया जाता रहा है, उसकी परिणति सामने है, घटनाक्रम पिछले दिनों घटित होता रहा है, जो भी प्रयास पुरुषार्थ अपने द्वारा किया जाता रहा है, उसी के अनुरूप भली बुरी परिस्थितियाँ प्राप्त हैं। इन दिनों जो किया जा रहा है, उसके परिणाम अगले दिनों आकर रहेंगे। इस मोटे सिद्धान्त के आधार पर भी भावी परिस्थितियों का अनुमान लगा लेना भी कुछ कठिन नहीं होना चाहिए। आम आदमी इसी आधार पर भविष्यवाणियाँ करता हैं। बादलों को देखकर वर्षा होने का, तपती धूप का सिलसिला चलते देखकर सूखा पड़ने का, ठंडक आने पर पतझड़ होने का अनुमान लगाता है। कार्य कारण की संगतियाँ देखकर वर्तमान एवं भविष्य के रूप को सामने रखा जाता है। हरियाली खेतों में उगी देखकर अच्छी फसल होने का अनुमान लगता हैं। हमें आज की स्थिति के अनुरूप कल का आभास लग जाता हैं। बौर आने पर कोयल कूकती और फल लगते हैं। बसंत के आते ही तितलियों, मधुमक्खियों के झुण्ड जमा होने लगते हैं और खिले हुए फूल फल बनते हैं। बीज गलता है तो वृक्ष बनता है फलों में नये बीज उत्पन्न होते हैं और प्रकृति क्रम का सिलसिला जारी रहता हैं।
कृति की परिणति मोटी संभावना है। कोई अपवाद व्यवधान आड़े न आये तो वह सही होकर ही रहता है।
दूरदर्शी विशेषतः और भी दूरवर्ती अनुमान अपनी सूक्ष्म बुद्धि को गहराई में उतारकर लगाते हैं। स्कूली बच्चों में से आवारा प्रकृति के होते हैं, पढ़ने में ध्यान नहीं लगाते और अनुशासन में नहीं बढ़ते, उनके बारे में अनुमान लगा लिया जाता है कि यह अस्त−व्यस्त फिरेंगे और किसी उज्ज्वल भविष्य की संरचना न कर सकेंगे। इसी आधार पर मनोयोग पूर्वक पढ़ने वाले और अपने काम में तन्मयता बरतने वाले स्वभाव के मधुर लड़कों के बारे में अनुमान लगाया जाता है, कि इन्हें का प्यार, अध्यापकों का अनुग्रह एवं प्रतिस्पर्धा में छात्रवृत्ति जैसा उपहार मिलेगा। बड़े होने पर वे सफल सम्मानित लोगों में गिने जायेंगे। जमुहाई आने लगे, तो समझना चाहिए कि बुखार आने के लक्षण हैं। इन दिनों मानवी गतिविधियों का जो प्रवाह बह रहा है उससे प्रतीत होता है कि भविष्य में बुरे दिन आ रहे हैं। विपत्तियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
भविष्य का अनुमान लगाने वालों में कई वर्ग होते हैं। वे सूचनाएँ एकत्रित करते हैं। परिस्थितियों के परिवर्तन की संभावनाओं को खोजते हैं और अनुमान लगाते हैं कि अगले दिनों क्या घटित होने की संभावना है। ज्योतिषी नाम से तो इस क्षेत्र में एक विशेष वर्ग ही बन गया है। अतीन्द्रिय क्षमताओं में भविष्य दर्शन की भी क्षमता पाई जाती है। योगी और सिद्ध पुरुष भी भविष्य दर्शन की भी क्षमता पाई जाती है। योगी और सिद्ध पुरुष भी भविष्य को वर्तमान की तरह देख लेते हैं। इनके अधिकाँश कथन प्रायः सच निकलते हैं। कारण दो हैं। उनमें विशेष शक्तियों का होना दूसरा भूत और भविष्य के साथ तारतम्य बिठाते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचना कि आगे क्या होने वाला है?
निकट भविष्य की संभावना को कीट–पतंगे भी जान लेते हैं। ऋतु परिवर्तन के अनुरूप उनका कार्य क्षेत्र बढ़ता सिकुड़ता रहता है। वह अपने-अपने निवास एवं आहार के प्रबंध में समय अपने से पहले ही लग जाते हैं। मनुष्य की सामान्य बुद्धि भी इस संदर्भ में सही अनुमान लगाती है। फिर विशेषज्ञों का तो कहना ही क्या? वे तो स्वास्थ्य प्रमाण मिलते और हवा का रुख परखने पर भी बड़ी-बड़ी संभावना का निष्कर्ष निकाल लेते हैं। इन्हें हवाई उड़ानें नहीं कहा जा सकता। राजनैतिक क्षेत्र के नेता बड़ी-बड़ी योजनाएँ इसी आधार पर बनाते हैं। सेनापतियों की रणनीति भी तो सूझ-बूझ के सहारे ही विनिर्मित होती है। भविष्य कथन भी एक विज्ञान है। इसके बुद्धि संगत और दिव्य ज्ञान से जुड़े हुए दोनों ही पक्ष ऐसे हैं जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता।
भविष्य कथन के संबंध में एक क्रमबद्ध शास्त्र ही है जिसे ‘युटोपिया’ कहते हैं। इन्हें अनेक प्रतिभा सम्पन्नों ने लिखा है। यों उनका मूल आधार कल्पना है, किन्तु वे कल्पनाएँ ऐसी देखी गई हैं कि उनका अधिकाँश प्रतिपादन सही निकलता है। इसलिए बड़े चाव से पढ़ा भी जाता है। भविष्य जानने का कौतूहल सभी को रहता है। इसलिए ऐसी पुस्तकों की माँगें भी रहतीं हैं। इसलिए उन्हें भी कौतुकपूर्ण समझा जाता है। संभावना यही रहती है। कि उन प्रतिपादनकर्ता ने दूर की कौड़ी होगी और उसका साथ यथार्थता भी जुड़ी होगी।
पिछले दिनों जो भविष्यवाणियाँ शास्त्रकारों या आप्तजनों के द्वारा प्रकट की जाती रही हैं, उन्हें श्रद्धालु लोगों ने सुनिश्चित संभावना के रूप में माना है। भविष्य पुराण में प्रलय खण्ड बाइबिल में सेवन टाइम, कुरान में चौदहवीं सदी के समय को कठिन बताया है। ज्योतिर्विद् ग्रहाचार के आधार पर निकट भविष्य में बुरी परिस्थितियाँ आने का संकेत देते रहे। कितने ही संत महात्माओं ने भी अपने लिखित और मौखिक प्रवचनों में ऐसा ही कहा है, कि अगले दिनों प्रकृति प्रकोप के टूटने की भरमार तो रहेगी ही। इसके अतिरिक्त मनुष्यकृत आपदाओं की भी बढ़ोत्तरी होगी। पारस्परिक स्नेह सहयोग टूट, जाने पर पारस्परिक स्नेह सद्भाव घटेंगे और उनके स्थान पर द्वेष दुर्भाव के प्रकटीकरण वाले दृश्य उपस्थित होंगे। शीत युद्ध और गरम युद्ध के ज्वालामुखी जहाँ-तहाँ फूटते रहेंगे।
कुछ वर्षों पूर्व कोरिया देश में संसार भर के मूर्धन्य ज्योतिषियों की एक कान्फ्रेन्स हुई थी। बड़ी संख्या में खगोल विज्ञानी ने निकट भविष्य में किन्हीं भयावह विभीषिकाओं की संभावना घोषित की थी। इस प्रकार संसार के प्रमुख अर्थशास्त्रियों, राजनेताओं एवं परिस्थितियों का मूल्याँकन करने वाले विशेषज्ञों का यह मत एक स्वर से प्रकट हुआ था कि निकट भविष्य में जाति के कई संकटों में फँस जाने की आशंका है। प्रकृति पर्यवेक्षकों ने एक कान्फ्रेन्स में धरती के तापमान में निरन्तर बढ़ोत्तरी होते देखा। समुद्रों में तूफान उठने, से लौटे आने की संभावनाओं के संबंध में भूगर्भशास्त्री हैं, जितनी धरती की ऊर्जा खर्च हो रही है, उसके भंडारण की समाप्ति की आशंका है। खनिज तेल और धातुएँ कोयला आदि का जिस तेजी से उत्खनन हो रहा है उसे देखते हुए अगली शताब्दी में इनकी समाप्ति हो जायगी। बिजली भी उतनी उत्पन्न न हो सकेगी, जिनके द्वारा सुविधा साधन का ईंधन का और कल कारखानों का पेट भर सके। ऐसी दशा में यही उचित है कि खर्च घटाने की दृष्टि से इन निकायों से पीछा छुड़ाया जाय। वैसा किया गया तो भुखमरी, बेकारी, अशिक्षा, अनगढ़ जीवन पद्धति का, अपराधी मनोवृत्ति का विस्तार होगा। इस कारण सर्वसाधारण को आशंकाओं से विभ्रमों से असुरक्षा से घिरा रहना पड़ेगा।
प्रत्यक्षवादी भी ऐसी ही अशुभ संभावनाओं के स्वर में स्वर मिलाते हैं- विकिरण, पर्यावरण, जनसंख्या विस्फोट, परस्पर बढ़ा हुआ विश्वास यह सब मिलकर ऐसी परिस्थितियों को जन्म देंगे, जिसे एक शब्द में अशुभ एवं संकटपूर्ण ही कहा जा सकता है। युद्धों और महायुद्धों की संभावना इसलिए बढ़ती दिखाई दे रही हैं। युद्धों और महायुद्धों की संभावना इसलिए बढ़ती दिखाई है। युद्धों और महायुद्धों की संभावना इसलिए बढ़ती दिखाई दे रही है कि आयुध, प्रक्षेपास्त्र इतने जमा हो गये हैं, कि इस बारूद के ढेर में किसी भी और से चिनगारी फेंक दिये जाने पर वह सीमित न रहेगी वरन् समूचे विश्व को भी उदरस्थ करके रहेगी जब बेशकीमती जखीरे जमा होते ही चले जायेंगे तो एक दिन यह भी आशंका है कि उनका विस्फोट हो और उसके फलस्वरूप संसार का समूचा नक्शा ही बदल जाय। जनसंख्या वृद्धि के साथ उत्पादन का तालमेल बैठ ही नहीं रहा है ऐसी दशा में गरीबी से पीछा छूट सकना भी कठिन है।
वन कट रहे हैं। भूक्षरण, बाढ़ सुखा, रंगिस्तान की वृद्धि जैसी कठिनाइयाँ एक दूसरे के साथ गुथी हुई हैं। बड़े कारखानों की वृद्धि से गृह उद्योगों की बर्बादी गरीबों को अधिक गरीब और अमीरों को अधिक अमीर बनाती चली जा रही है। हर हाथ को काम न मिलने के कारण बेकारों द्वारा आये दिन उपद्रव अपनाये जाते रहे हैं। सम्प्रदायों के बीच कलह छिड़ी हुई हैं। एकता टूटती जा रही है। विषमता बढ़ रही है। सामूहिक समस्याओं की जिस प्रकार बाढ़ आई हुई है उतनी इससे पहले कभी देखी नहीं गई। व्यक्ति के जीवन का भी यही हाल है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से व्यक्ति दिन-दिन गिरता और छोटा होता जा रहा है। भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में उसे संकटों का सामना करना पड़ रहा है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए निकट भविष्य में विपत्तियाँ बढ़ने एवं संकटों के उभरने की आशंका की जाती है तो वह अतिशयोक्ति या अवास्तविकता भी नहीं है।
जो जितना ज्यादा समझदार है उसे अपने निज की, परिवार की, समाज की, विश्व की समस्याएँ ऐसी दीखती हैं, जिनके सुलझाने के उपाय अब तक सफल नहीं हुए हैं और न वे प्रस्तुत उपचारों के सहारे जल्दी ही हल होते दीखते हैं। ऐसी दशा में मूढ़ मति लोगों को छोड़ कर शेष सभी में एक कसक और तड़पन होती है, कि समस्याओं को किसी भी कीमत पर सुलझाना चाहिए। सृष्टा की इस अनुपम कलाकृति को विनाश के गर्त में गिरकर अपना सर्वनाश होते नहीं देखना चाहिए।
अनगढ़ लोग हर संकट के लिये दूसरों को दोष देते हैं। विवेकवान अपने दोष ढूंढ़ते हैं, और तत्व ज्ञानी प्रकृति के उठते रहने वाले ज्वार भाटों की विलक्षणता भर देखते हैं।
हिरण्याक्ष का वध करने के उपरान्त भी जब भगवान वाराह अपने लोक को वापिस नहीं लौटे तो वहाँ चिन्ता होने लगी। देवता व्याकुल हुये और शंकर जी को उन्हें तलाश करने भेजा गया।
शंकर जी ने भू लोक में उन्हें सर्वत्र खोज डाला। देखा तो वे अपना परिवार बनाये बैठे हैं। स्त्री-बच्चों के समक्ष क्रीड़ा संलग्न हो रहे हैं। शूकरी और उसके शिशु शावक उन्हें अपना विनोद साधन बनाये हुये हैं।
वापस ब्रह्मलोक चलने की प्रार्थना जब वाराह जी ने अस्वीकार कर दी और अपना क्रीड़ा विनोद छोड़ने को तैयार न हुए तो क्रुद्ध शंकर जी ने त्रिशूल से उनका पेट फाड़ डाला। शरीर क्षत-विक्षत हो गया तो विवश होकर वाराह भगवान अपने लोक जा पहुँचे।
प्रतीक्षा में चिन्तित बैठे देवताओं ने जब विलम्ब का कारण पूछा तो उनने कहा - “शरीर और उसकी ममता बड़ी प्रबल है। जीवधारी उसी में लिप्त होकर लक्ष को भूल जाते हैं, सुख साधनों के छूटे बिना उस माया से छुटकारा नहीं मिलता। अन्य शरीर धारियों की तरह मेरी भी दुर्गति हुयी। शंकर जी ने उस माया को विदीर्ण न किया होता तो मेरे लिए भी वापस लौटना कठिन था।
शिवजी हँस पड़े, उनने कहा-देवताओं! अब तुम समझे होंगे कि मेरे विरक्त विचरण का रहस्य क्या है। आसक्ति के बंधनों में बंधे हुये जीव, त्याग का आधार न लें तो उनका छुटकारा भी सम्भव नहीं। आसक्ति ग्रस्त वाराह जी की जब यह दुर्गति हुई तो दूसरों के बारे में कहना ही क्या है?
अगले दिनों संकट भरा समय आ रहा है। इस भविष्य कथन को अनेक स्रोतों से सुने जाने का प्रधान कारण यही है, कि भगवान के बाद दूसरा सृष्टि संचालक मनुष्य अपनी नीति मर्यादाओं और गरिमा से बहुत नीचे उतर आया है। ईश्वर की पराशक्ति का छोटा रूप मनुष्य की विचार शक्ति को समझा जा सकता है। वह जहाँ से उद्भूत होती है, उस व्यक्ति एवं संपर्क समुदाय को तो प्रभावित करती है, अदृश्य जगत की व्यापकता का ओर-छोर भी नापती है। रेडियो तरंगों से यह निखिल ब्रह्माण्ड भरा है। ताप, ध्वनि और प्रकाश की किरणों के लिए कोई सीमा बंधन नहीं। व समग्र ब्रह्माण्ड में परिभ्रमण करती है। रेडियो तरंगों का भी यही हाल है। ईथर तत्व से यह समूचा दृश्य अदृश्य जगत प्रभावित है। मनुष्य के विचार यों सूक्ष्म हैं किन्तु वे प्रकृति के साथ तादात्म्य जोड़े हुए इस समूचे संसार को प्रभावित करते हैं।
बिजली की शक्ति से हम परिचित हैं। वह कितनी शक्ति के साथ कितने प्रयोजन सिद्ध करती है। साथ ही यह भी प्रकट है कि जब मारक प्रयोजन में लग जाती हैं, तो धुँआधार भी कर देती है। विचारों के बारे में भी हमें इसी प्रकार सोचना चाहिए। वे सामान्यतया दैनिक काम काज निपटाने में ही खर्च होते रहते हैं; पर जब कभी इन्हें एकत्रित और संकलित किया जाता है, तो उसका प्रभाव देखते ही बनता है। वे मनुष्य को दिशाधारा, प्रेरणा और प्रतिभा प्रदान करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में उत्पन्न हुए व्यक्ति ऐसे काम करने लगते हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। वे महामानव, सिद्ध पुरुष योगी, यती बनते हैं। विशालकाय चुम्बक की तरह सहयोग एवं साधनों को घसीट कर प्रचुर परिणाम में अपने आस-पास एकत्रित कर लेते हैं।
चीन की दीवार, मिश्र के पिरामिड, स्वेज और पनामा नहरें-देखकर अनुमान लगता है कि इनका प्रारंभ किसी के कल्पना क्षेत्र में ही हुआ होगा। निश्चय और साहस ने उसे बल दिया होगा और फिर साधन जुटने आरम्भ हो गये होंगे। संसार में बड़े-बड़े शासकीय और सामाजिक परिवर्तन हुए हैं। वह बदलाव अचानक ही नहीं हो गया। उसके लिए योजनाबद्ध संगठन, विचारणा और क्रियाशक्ति का नियोजन हुआ होगा। इसे विचारों की शक्ति के रूप में ही देखा जा सकता है।
राजतंत्र के स्थान पर इन दिनों प्रजातंत्र और समाजवाद का बोलबाला है। विश्व के कोने-कोने में छोटी-बड़ी राजनैतिक क्रान्तियाँ हो चुकी हैं। लोगों ने जो सोचा सो कर दिखाया, भले ही इसके लिए असंख्यों को प्राण गँवाने पड़े हों। सामाजिक क्षेत्र में दास दासी प्रथा, जमींदारी, साहूकारी, सामन्ती आदि के परखच्चे उड़ गये। वर-कन्या विक्रय भी सभी देशों में अपने-अपने ढंग से चलता था। नारी का शोषण उत्पीड़न, नर का जन्मजात अधिकार, माना जाता था। वे प्रचलन या तो मिटाये या मिटने जा रहे हैं। यह सब कैसे हुआ? इन परिवर्तनों उन्मूलनों की योजना रूसों, मार्क्स जैसे विचारकों ने बनाई। भारत में यह कार्य दयानंद विवेकानन्द-गाँधी-बुद्ध जैसों की प्रबल प्रेरणा ने सम्पन्न किया। इस स्तर के महामानवों ने न केवल भारतीय जनता को वरन् विश्व के लोकमत को भी झकझोर कर रख दिया।
वातावरण बिगड़ने के अवसर जब भी सुविस्तृत हुए हैं तब-तब उनके पीछे वृत्तासुर, महिषासुर, हिरण्यकश्यप, रावण, कंस, दुर्योधन, जरासन्ध, कालनेमि जैसों की दुर्बुद्धि ही विकसित और फलित होती रही है। उनका दैत्य वर्चस्व न केवल उनके व्यक्तित्वों को ही दुर्दान्त बनाता रहा है, वरन् कोटि-कोटि मानवों को भी त्रास देता रहा है। सबल संकल्प वाले साहसी एवं पराक्रमी व्यक्ति ही विशिष्ट- वरिष्ठ कहलाते हैं और वे अपने महान् कर्तृत्वों से तहलका मचाते हैं। सिकन्दर नेपोलियन जैसों के शरीर नहीं मन ही प्रबल थे। अशोक हर्षवर्धन, विम्बसार का मिला-जुला पराक्रम अपने समय में बुद्ध धर्म को विश्वव्यापी बनाने में सफल हुआ हैं। ईसा के मनस्वी अनुयायियों ने उस विचारधारा से दो तिहाई जनता को अपने अंचल में समेट लिया। साम्यवादी विचारधारा संसार के तीन चौथाई जनमानस को प्रभावित कर रही है और अपने प्रतिपादनों को कार्य रूप में परिणत करने के लिए भी अग्रसर हो रही है। इजराइल, जापान जैसे छोटे-छोटे देशों की प्रगति के पीछे साधन सामग्री का नहीं उनकी उबलती हुई मनस्विता का ही चमत्कार है।
इन दिनों भौतिक विज्ञान और बौद्धिक प्रत्यक्षवाद ने असाधारण उन्नति की है। इनने दो शताब्दियों के भीतर इतने परिवर्तन प्रस्तुत कर दिये कि समूची दुनिया बदली हुई प्रतीत होती है। जलयान, वायुयान, रेल, मोटर जैसे वाहन, तार, रेडियो, टेलीविजन से लेकर, बिजली, भाप से चलने वाले कारखानों का विस्तार और पराक्रम देखकर विज्ञान की जय बोलने का मन करता है। प्रत्यक्षानुयायी बुद्धिवाद ने पुरातन मान्यताओं में अधिकाँश की जड़ें हिला दी हैं। आस्तिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता का ढाँचा तो बना हुआ है, पर उसके भीतर से प्राण खिंच गये प्रतीत होते हैं। तर्कों के प्रहार से श्रद्धा का किला खण्डहर जैसा बन गया है। इसी बुद्धिवाद ने नीति धर्म, सदाचार, न्याय, औचित्य आदि की आदर्शवादी मान्यताओं को धराशायी न सही जीर्ण शीर्ण तो विचित्र रूप से कर दिया हैं।
भौतिक विज्ञान और बौद्धिक प्रत्यक्षवाद ने समर्थों के लिए अपार सुविधा साधन उत्पन्न किये हैं। साथ ही यह भी हुआ है कि दुर्बल चेतना वाले, घुड़दौड़ में पिछड़े हुए लोगों को नवीनतम प्रगति के सामने नतमस्तक होने के लिए बाधित कर दिया है। पिछड़ा पन उनके कंधों पर और भी अधिक कर दिया है। पिछड़ापन उनके कंधों पर और भी अधिक लदा है। पिछड़ापन उनके कंधों पर और भी अधिक लदा है। आर्थिक और नैतिक दृष्टि से वे और भी अधिक दुर्बल हुए हैं। मन्दता और अन्धता ने उनके हाथों से स्वच्छता का सौंदर्य तक छीन लिया है। आलस्य प्रमाद का आदी बना कर इस योग्य भी नहीं छोड़ा है, कि अपनी अवगति का कारण जानने और उसके निवारण कर सकने तक में समर्थ हो सके। अमर्यादित सम्पन्नता और अतिशय स्तर की दरिद्रता जब मनुष्य के प्रत्यक्ष और परोक्ष जीवन पर अधिकार जमाती है तो दोनों को ही मानवी गरिमा से कोसों दूर हटा देती है। सम्पन्न वर्ग उद्धत बन जाता है और दुर्बलों की न केवल विचारणा टूटती है वरन् हिम्मत सूझ बूझ और पुरुषार्थ परायणता कर जाती है।
आज की अगणित विभीषिकाओं और समस्याओं को इसी प्रगति के उद्धत उपयोग के साथ जुड़ी हुई सोचना और खोजना चाहिए।
ईश्वर ने मनुष्य को सर्वोच्च स्तर का साधन सम्पन्न बनाया है। इस वैभव पर अंकुश रखने के लिए मनीषियों ने नीति - सदाचार, विवेक न्याय, औचित्य का निर्धारण किया है। उसे कर्त्तव्यों और दायित्वों के आदर्शवादी अनुबंधों में बाँधा है। मानवी गौरव गरिमा की मर्यादाएँ बनाई हैं और नीचे गिरने से रोकने वाली वर्जनाओं का नियम निर्धारित किया है।
हाथी को अंकुश, घोड़े को लगाम, ऊँट को नकेल, बैल को नाथ काबू में रखती है और उचित दिशा में चलने, उचित कृत्य करने के लिए बाधित करती है। मनुष्य को भी नीति मर्यादाओं का दर्शन ही ऐसी राह पर ले चलता है, जिस पर चलते हुए व्यक्तिगत गरिमा का संरक्षण हो सके और सामाजिक प्रगति में, सुव्यवस्था में बाधा न पड़े। जब तक इस अनुशासन का पालन होता है तब तक सृष्टि संतुलन बना रहता है। मनुष्य स्वयं सुखी रहता है और दूसरों को भी चैन से रहने देता है; किन्तु जब वह उद्धत आतंकवाद स्तर की अनैतिकता फैलती है। उद्धत मनुष्य की अपराधी दुष्प्रवृत्तियों को राजदंड, लोकापवाद, बहिष्कार, तिरस्कार के सहारे यत्किंचित् ही रोका जा सकता है। जिसके अन्तराल में अश्रद्धा और उद्दंडता ने जड़ें जमा ली हैं। जो अपने आप को समग्र शासन को धोखा देने की कला में प्रवीण हो चुका है उसे औपचारिक नियंत्रणों से काबू में नहीं लाया जा सकता। जिनने छल छद्म दुराव कपट की अनेकानेक विधियाँ सीख ली हैं। जो कुचक्र और तरह रोक पाये? यदि वह अनाचार से रुकता नहीं तो निश्चय ही अनर्थ उत्पन्न करता है। यह अनर्थ अपराध ही प्रकारान्तर से वैयक्तिक और सामूहिक जीवन में अनेकानेक विपत्तियों के कारण बनते हैं। उन्हीं के कारण उपलब्ध अनुकूलता, उलट कर त्रासदायक, प्रतिकूलता में बदल जाती है।
प्रस्तुत विपत्तियों और उलझनों के प्रत्यक्ष कारण कुछ भी क्यों न दिखाई पड़ते हों, उनका स्वरूप कुछ भी क्यों न हो, पर तात्विक निष्कर्ष यही है कि मनुष्य ने अपनी विचारणा का स्तर गिराया फलतः उसका चरित्र एवं व्यवहार गये गुजरे स्तर का बन गया। सद्बुद्धि घटते ही उस रिक्तता को दुर्बुद्धि भर देती है। सदाचरण की उपेक्षा होते ही दुराचरणों की बन आती है। कर्त्तव्य की उपेक्षा हुई नहीं कि अधिकार इस सीमा तक उग्र उद्दंड हो उठता है कि उसे निम्न स्तरीय सीमा तक उग्र उद्दंड हो उठता है कि उसे निम्न स्तरीय स्वार्थपरता के अतिरिक्त और कोई ना नहीं दिया जा सकता है।
प्रकृति का अकाट्य नियम है कि शालीनता की रक्षा होते रहने तक अदृश्य जगत मनुष्य के लिए अनुकूलताएँ और सुविधाएँ उत्पन्न करता रहता है। ऐसे ही सुसंतुलित समय को सतयुग कहते हैं। सतयुग में कोई व्यक्ति न तो विपन्न होता है। न उद्विग्न पर जब मर्यादाओं और वर्जनाओं के उल्लंघन का दुस्साहस उभरता है, तो बहिरंग जगत में भी प्रतिकूलताओं के आँधी तूफान चलने लगते है। समाज की व्यवस्था बिगड़ती है। शासक हो उठता है। धनिकों की लिप्सा आकाश चूमने लगती हैं। मनीषा का स्थान कुटिलता ले लेती है। मार्ग दर्शन करने वाली प्रज्ञा दुर्बुद्धि बन कर वेश्यावृत्ति अपनाने लगती है। वह उसी की वकालत करती है, जिसके पीछे न्याय नहीं होता। तर्क-कुतर्क में बदल जाता है। एक ही मनोरथ शेष रह जाता है कि जिस प्रकार भी बन पड़े- जितनी जल्दी संभव हो अधिकाधिक स्वार्थ साधन किया जाय। भले ही इस निमित्त हेय से हेय स्तर के कुकर्म क्यों न करने पड़े?
स्पष्ट है कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों को निरूपण करती है। प्रतिकूल परिस्थितियों का नाम ही संकट विग्रह एवं अनाचार है। इन दिनों यही सब घटाटोप बन कर उमड़ रहा है। समुद्र का जल ही बादल बन कर बरसता है। मनुष्य की दुर्बुद्धि ही दुष्कर्म बनती है और विपत्ति बन कर जन-जन को संत्रस्त करती है। इन दिनों हम सब इसी चक्रव्यूह में फँसे हुए हैं। कुविचारों का बाजीगर ही हमें कठपुतली की तरह निर्लज्ज नाच-नचा रहा है।
महाभारत में नर संहार के पाप से खिन्न होकर-पुण्यार्जन के लिए पाण्डव तीर्थ यात्रा पर निकले। इसके लिए सर्वप्रथम उन्हें महर्षि व्यास का आशीर्वाद प्राप्त करना उपयुक्त लगा। वे उनके आश्रम में पहुँचे।
व्यासजी इस आगमन पर प्रसन्न हुए। आतिथ्य किया। सफलता का आशीर्वाद दिया। साथ ही अपना तूँबा उन्हें थमाते हुए एक नया काम भी सौंपा कि वे जहाँ भी जायँ इस तूँबा को पवित्र जलाशयों का स्नान करायें और जिस देवालय का दर्शन करें उसे भी वह लाभ देते रहें। जब तीर्थ यात्रा से लौटें तो तूँबा उन्हें वापस कर दें।
पाण्डवों ने ऐसा ही किया। वे कई वर्षों तक परिभ्रमण में रहे। लौटे तो फिर व्यास आश्रम पहुँचे। और तूँबा लोटा दिया आदेशानुसार उसे तभी तीर्थों में स्नान और दर्शन कराया गया था।
लौटने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए व्यास जी ने तूंबा को तोड़ा और उसका एक-एक टुकड़ा पाण्डवों को खाने के लिए दिया। इतने तीर्थों के सान्निध्य में उसकी स्थिति में परिवर्तन सामान्य असामान्य बनी ही होगी। प्रसाद देते समय उनका यही भी कथन था।
तूँबा पुराना था। कड़ुवा भी। चखा तो स्वाद और जीभ दोनों से वह अप्रिय लगा। गले न उतरा तो वे इधर-उधर थूकने लगे।
दूसरे दिन प्रभात प्रवचन में व्यास जी ने कहाँ- तात! तूँबा की तरह शरीर को तीर्थ दर्शन कराने भर से अभीप्सित लाभ नहीं मिलता। परिवर्तन स्थान का नहीं मन का होना चाहिए। पाप के बदले पुण्य कर्मों की योजना बनाओ। इसी में खेद घटेगा ग्लानि मिटेगी।
पाण्डव परमार्थ प्रयोजन में रत हो गए और उससे सन्तोश समाधान उपलब्ध हुआ।
दृष्टि पसार कर जिधर भी देखा जाय, उधर ही असंतोष, उद्वेग, विग्रह, कष्ट संकट विभिन्न रूपों में विभिन्न क्षेत्रों में इस प्रकार मँडराते दीखते हैं जैसे मरे हुए पशु की लाश को गिद्ध, कौए, चील, कुत्ते, सियार आदि घर कर बैठते हैं। कुरुचि, दुर्गंध, व्यवधान से वह क्षेत्र बुरी- तरह घिरा हुआ है।
व्यक्ति के निजी जीवन में रुग्णता, दरिद्रता, आशंका, अविश्वास डेरा डाले हुए हैं। विलास वैभव की महत्वाकांक्षाएं आकाश चूमती हैं; पर प्रतिभा, प्रमाणिकता, उदार सहकारिता के बिना वह सम्पत्ति भी वेश्याओं के यहाँ, दुर्व्यसनों में दवादारु में, मुकदमे, रिश्वत आदि में ही खर्च होती है। मुफ्त में गुलछर्रे उड़ाने कि लिए यदि उत्तराधिकारियोँ के लिए सम्पत्ति के साथ-साथ अपना व्यक्तित्व भी गवाँ बैठते हैं। हराम की कमाई भी पारे के विष की तरह किसी को हजम नहीं होती।
विलासिता रुग्णता की जड़ है। जीभ के चटोरे अपना पेट खराब कर लेते हैं और अपच की सड़न रक्त के साथ मिलकर चित्र विचित्र रोग उत्पन्न करती है। जीवनी शक्ति का बेहिसाब क्षरण करती है। लम्पट व्यक्ति कभी मूत्र मार्ग से अपना ओजस तेजस और वर्चस बहा कर खोखले बनते रहते हैं। अनिद्रा, विस्मृति, थकान, उद्विग्नता से मस्तिष्क बेचैन रहता है। मानसिक असन्तुलन ज्ञान तन्तुओं को उत्तेजित करता और रक्तचाप, मधुमेह, धड़कन जैसे रोगों को आमंत्रित है। नशेबाज अपनी जिन्दगी में एक तिहाई कटौती कर लेते हैं। आवेशग्रस्त क्रोधी, अतिवादी चिन्तनतंत्र की विकृति कर लेते हैं। जिन पर फैशन का प्रदर्शन का ठाट बाट का सजधज का भूत सवार है उनका अहंकार समय और धन ही बर्बाद नहीं करता वरन् समझदारों की दृष्टि में ओछा बचकाना भी सिद्ध होता है। अपव्यय के लिए धन लुटाते रहने वाले के चरित्र पर भी अपव्यय के लिए धन लुटाते रहने वाले के चरित्र पर भी संदेह किया जाता है। मेहनत की कमाई सोच समझ कर खर्च की जाती है। एक-एक पाई को सदुपयोग की कसौटी पर कसकर खर्चा जाता है। जो सजधज में बेहिसाब लुटाता है उसके बारे में सहज अनुमान लगाया जाता है कि यह मुफ्तखोरी या बेईमानी की-हराम की कमाई रही होगी। शालीनता के साथ सादगी जुड़ी हुई है। सादाजीवन उच्चविचार की उक्ति सौ टंच खरी हैं अपव्ययी ही प्रायः आर्थिक तंगी का कर्जदार होने का रोना रोते है। यदि संभलकर चला जाय तो उपरोक्त सभी झंझटों से बचा जा सकता है और व्यक्तिगत जीवन में मनुष्य सुखी रह सकता है।
शरीर के उपरान्त परिवार का नम्बर आता है। अधिक सन्तानोत्पादन करने वाले लम्पट व्यक्ति अपनी अर्थव्यवस्था, पत्नी का स्वास्थ्य, बच्चों का भविष्य और कुटुम्बियों पर संकट बढ़ाते हैं। जिन्हें दूसरोँ से अधिक पाने और बदलें में कम से कम देने की स्वार्थान्धता छाई रहती है, वे कुटुम्बियों के साथ भी हिल-मिल कर नहीं रह सकती। पत्नी बच्चों तक से पटरी नहीं बैठती। भाई भावजों के माता-पिता के साथ खींच तान बैठती। भाई भावजों के माता-पिता के साथ खींच तान रहती है। सौजन्य सहकार के अभाव में कोई परिवार फलता फूलता नहीं देखा गया। जो मीठा नहीं बोल सकते, शिष्टाचार नहीं निभा सकते। दूसरों की मान मर्यादा का ध्यान नहीं रखते। ऐसे लोगों का घर एक प्रकार का मुसाफिर खाना या भेड़ों का बाड़ा ही समझा जाना चाहिए। एक घर में तो जले में कैदी भी रहते हैं। पारिवारिकता का तात्पर्य है- दूसरों की सुसंस्कारिता का संवर्धन - शालीनता और प्रगतिशीलता का मार्गदर्शन। आवश्यक नहीं कि अंश-वंश के लोगों को ही कुटुम्बी माना जाय और उन्हीं की उचित अनुचित माँगों को पूरा करने रहने के लिए खपते रहा जाय।
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन गरीबी में रहते हुए भी सद्गुणों के आधार पर सुखपूर्वक हँसते हँसते जिया जा सकता है, इन क्षेत्रों में अशान्ति छाई रहने का एकमात्र कारण है- गुण, कर्म, स्वभाव में निकृष्टता का घुसा होना। शिक्षा, सम्पदा, सुन्दरता के अभाव में किसी को नीचा नहीं देखना पड़ता। मरघट के भूत की तरह वे ही जलते जलाते रहते हैं जिनमें मानवी गरिमा के अनुरूप सौजन्य कम दिखाई पड़ता है।
समाज की संरचना, पारिवारिकता के सिद्धान्त पर हुई है। उसकी सादा और संतुलित आदान-प्रदान चलाते रहने में ही सुव्यवस्था बनी रहती है। दूरदर्शी विवेकशीलता विद्यमान हो तो कुरीतियों, रूढ़ियों, अन्ध परम्पराओं के पैर कैसे टिकें? ठगी और विश्वासघात की अपराधी मनोवृत्ति को प्रश्रय न मिले तो सामाजिक विग्रहों और अपराधों की विभीषिका क्यों कर अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न करे समता, ममता और एकता की मानवी गरिमा यदि अक्षुण्ण बनी रहे तो पारस्परिक सहयोग में आँच आने का कोई कारण नहीं हो सकता। हरामखोरी, कामचोरी,सीनाजोरी से ही विघटन और उत्पात उत्पन्न होते हैं। जब जंगल में हिरन और पेड़ों पर पखेरू हिल मिलकर रह सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य सुख बाँटने और दुःख बँटाने में कृपणता बरते।
जाति भेद, लिंग भेद के आधार पर चल रही विषमता ऊँच नीच की भावना मानवी आचार संहिता के विपरीत है मौलिक अधिकारों की उपलब्धि सभी को होनी चाहिए। न कोई किसी का दास बने न स्वामी। धरती माता के सभी पुत्र समान सुविधा प्राप्त करें। सभी को सम्मान और सद्भाव मिले। न कोई किसी का शोषण करे और न किसी को अनीतिजन्य उत्पीड़न का शिकार बनना पड़े। दबाव और प्रलोभन के शिकंजे में कस कर कोई किसी बोधित न करे। न्याय, नीति कर्त्तव्य, अधिकार के क्षेत्र में सभी को समानता का लाभ मिले। तभी समझना चाहिए कि मानव बिरादरी की सहकारी सामाजिकता का ठीक प्रकार निर्वाह हो रहा इस संदर्भ में यदि विषमता बरती जाती है तो समझना चाहिए कि एक दूसरे पर झपटने वाले भेड़ियों और कुत्तों का समुदाय ही मानवी कलेवर ओढ़ कर रह रहा है। मनुष्यों के बीच जंगल का कानून नहीं चल सकता, मत्स्य न्याय नहीं अपनाया जा सकता। जिसकी लाठी उसकी भैंस की नीति अपनाई गई तो बड़ी मछली छोटी को खाती रहेगी। समर्थ, असमर्थों का रक्त निचोड़ते और उसे पीकर बड़प्पन की डींग हाँकते रहेंगे।
शासन सत्ता का उद्देश्य है सुरक्षा, सुव्यवस्था, संरक्षण सुविधा संवर्धन और प्रगतिशीलता का वातावरण बनाये रहना। नीति निष्ठा पर आँच न आने देना ही राज सत्ता का उद्देश्य है। शासन इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपनी समर्थता का उपयोग करता है। इस यथार्थता का जहाँ आदर्शवादी अनुशासन है समझना चाहिए कि यही राजनीति और धर्मनीति का एकीकरण है।
साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, व्यापारिक शोषण, सहायता के नाम पर घर में घुसकर लूट पाट, आक्रमण छद्म, प्रोपेगैंडा जैसे हथकंडे हिटलरी राजनीति के अंग हो संकेत हैं। इसे पहले से ही गोरी चमड़ी वाले प्रधान रूप से अपनाते रहे हैं। सामंतवाद इसी नीति के कारण बदनाम हुआ। कत्लेआम, खुली लूट, युवक युवतियों को पशुओं की तरह हाँक ले जाना और इन्हें दास दासी के रूप में नीलाम करना। इन्हीं अनाचारों के इर्द-गिर्द मध्य कालीन राजनीति मंडराती रही है। तरीके बदले पर रवैये यथावत् बने रहे। तलवारों वाला कत्लेआम रुका तो अणुबमों से जापानी क्षेत्र का सफाया नये रूप में आ गया।
राजनीति के पीछे शोषण नहीं, न्याय एवं संरक्षण होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था बन पड़े तो अपराध करने की किसी की हिम्मत ही न पड़े। जो दुस्साहस बरते उसे अपने स्तर, वैभव और अहंकार से सदा, सर्वदा के लिए हाथ धोना पड़े तो समझना चाहिए कि राजनीति वस्तुतः अपने उस रूप में है जिसमें कि उसे होना चाहिए। राजतंत्र हो या प्रजातंत्र शासन संचालकों का समुदाय ऐसा होना चाहिए, जिससे चरित्र एवं न्याय पर उंगली उठने की गुंजाइश न हो। अच्छा हो एक व्यक्ति एक बोट के स्थान पर चुनाव की ऐसी पद्धति हो, शासन संचालन का कार्य सौंपा जा सके।
व्यक्तित्व परिवार उपार्जन, समाज आदि सभी धाराओं के पीछे दूरदर्शी विवेकशील का समावेश होना चाहिए। तभी इन क्षेत्रों में सुख शाँति का स्थायित्व रह सकता है। प्रगति का द्वार खुल सकता है। और न्याय नीति का व्यवहार चल सकता है।
मानवी आचार संहित क्या होनी चाहिए उसका अयास किस प्रकार जन-जन द्वारा किया जाना चाहिए। यह निर्धारण करना तत्व दर्शन का काम है। यही अध्यात्मिकता है, यही आस्तिकता। इसी को धार्मिकता भी कहते हैं। धर्म तंत्र का आधार इसी हेतु खड़ा किया गया है कि वह व्यक्ति और समाज को मानवी गरिमा के अनुरूप चलने के लिए बाधित करे। सोचने का ऐसा तरीका दिखाये जो आत्म परिष्कार और लोक मंगल के दोनों ही आधारों को सुसंतुलित रखे। सुसंस्कारिता की किसी भी क्षेत्र में कमी न पड़ने दे। अनीति रखे। सुसंस्कारिता की किसी भी क्षेत्र में किसी न पड़ने दे। अनीति को उपजने और फैलने का अवसर ही न दे। धर्म का समूचा ढाँचा इसी आधार पर ही खड़ा किया गया था। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि वह एकात्म तत्व अनेक सम्प्रदायों में विभाजित हो गया और प्रथा परम्पराओं के आवरण से उसका समूचा ढाँचा ढक गया।
इन दिनों देश, धर्म, समाज और संस्कृति वर्गों में विभाजित होते-होते इस स्तर तक जा पहुँचे हैं कि उनकी गुत्थियाँ सुलझने में नहीं आ रही हैं और विभाजन से लेकर विग्रह तक के आसार खड़े कर रहे हैं।
धर्म का तात्पर्य है- कर्म। तथा कर्तव्यपालन और श्रम सम्पदा का सम विभाजन। व्यक्ति को बोध कराना है कि वह महान सत्ता का प्रतिनिधि है उसे महान बने रहना है, और प्रचलन से लेकर वातावरण तक के इस प्रकार परिष्कृत करना है जिसमें नर पशु का नर नारायण में, क्षुद्र को महान में परिवर्तित होने का अवसर मिले। आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की भावना जगे और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की मान्यता को मूर्तिमान प्रश्रय मिले।
धर्म का तात्पर्य है- कर्म। तथा कर्तव्यपालन और श्रम सम्पदा का सम विभाजन। व्यक्ति को बोध कराना है कि वह महान सत्ता का प्रतिनिधि है उसे महान बने रहना है, और प्रचलन से लेकर वातावरण तक के इस प्रकार परिष्कृत करना है जिसमें नर पशु का नर नारायण में, क्षुद्र को महान में परिवर्तित होने का अवसर मिले। आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की भावना जगे और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की मान्यता को मूर्तिमान प्रश्रय मिले।
पानी से भरे घड़े के मुँह पर खाली कटोरी रखी थी। सभी घड़े का पानी पी रहे थे पर कटोरी को खाली ही रहना पड़ रहा था। वह उपस्थित जनों से रहना पड़ा रहा था। वह उपस्थित जनों से अपने दुर्भाग्य का बखान कर रही थीं और घड़े की निष्ठुरता की भी।
घड़े ने कहा जो पानी लेता है वह अपनी स्थिति दाता से विनती रखता है। एक तुम हो जो सिर पर बैठी हो और मुँह आसमान की ओर किए हुए हो।
एक शिष्य किसी सन्त पुरुष की सेवा में नित था और ऐसा मंत्र चाहता था जिसके सहारे वह ऋद्धियां दिख सके। पर सन्त थे जो सब को राम नाम ही बताते थे शिष्य को चमत्कारी मंत्र चाहिए था। राम नाम तो मामूली बात है उसे निराशा होने लगी। गुरु ने उसकी मनःस्थिति को ताड़ लिया।
एक दिन गुरु ने उस शिष्य को एक चिकना पत्थर दिया और कहा इसे सब्जी वालों से पूछकर आओ कितने में खरीदेंगे। शिष्य दिन भर घूमा। बटखरे के काम में आ सकता है। यह मान कर उनने दो चार पैसे भर की कीमत लगाई।
दूसरे दिन वही पत्थर लेकर सुनारों के मुहल्ले में भेजा वहाँ उसका दाम एक हजार तक लगाया गया। तीसरे दिन उसे जौहरी बाजार में उसकी कीमत मालूम करने को कहा गया। कइयों को दिखाने पर उसकी कीमत बढ़ते-बढ़ते एक लाख तक पहुँच गई। गुरु ने शिष्य को समझाया पत्थर तो वही था पर पारखियों ने अपनी-अपनी जानकारी के आधार पर उसका मोल बताया। राम नाम है तो एक ही पर मान्यता के अनुरूप उसका मूल्य और महत्व घटता बढ़ना रहता है।
अन्ध-विश्वासों से मनुष्य इस कदर जकड़ा हुआ है कि आँखों के अतिरिक्त और किसी पर भी विश्वास नहीं करता। बुद्धि का भोंतरापन इतना बढ़ गया है कि पर्दे के पीछे रखे हुए प्रत्यक्ष पदार्थ को देख समझ पाने में भी कठिनाई होती है।
प्रकाश का अभाव ही अंधकार है। वैसे अंधकार की कोई सत्ता नहीं। उसे नापा नहीं जा सकता। फिर भी अन्धकार की सत्ता प्रायः सर्वमान्य दीख पड़ती है। पृथ्वी घूमती है; पर आम आदमी उसे स्थिर ही मानता है। हर व्यक्ति अपने आप को शरीर ही मानता है और उसी सुख सुविधा जुटाने में लगा रहता है। प्राण को जीवन तथ्य मानने और उसे परिपुष्ट बनाने में-कोई उतना प्रयत्न करने को तैयार नहीं जितना कि शारीरिक सुविधा के लिए किया जाता है। कर्मफल की सुनिश्चितता परयदि विश्वास जम सका हाता तो कुकर्म करने से भी लोग उतना ही डरते जितना कि आग छूने से। कुप्रचलन में नशेबाजी ऐसा दुर्व्यसन है कि उसके समर्थन में कुछ कहा नहीं जा सकता फिर भी अरबों खरबों का नशा पिया जाता है। लगता है कि जो ततकल सातने है, प्रत्यक्ष प्रतीत होता है, उससे आगे देख समझ सकने की क्षमता रह ही न गई हो। कुरीतियाँ और अवाँछनीयताओं के दुष्परिणामों को लोग आधे मन से ही अनुपयुक्तता समझते हैं अन्यथा उन्हें अपनाये क्यों रहते? अन्ध मान्यताओं की एक अनोखी दुनिया है और वह ऐसी है जो अधिकाँश लोगों को अपने चंगुल में जकड़े रहती हैं ईश्वर और देवताओं के सम्बन्ध में भी ऐसी ही चित्र विचित्र मान्यताएँ हैं जिन्हें देखते हुए उन्हें जो कुछ जैसा कुछ रुचता है इसी के लिए मचल पड़ते हैं। यथार्थता को ढूँढ़ने और पाने का का प्रयास न जाने कब से आरम्भ किया जायेगा। लोगों की तथ्यान्वेषी दार्शनिक दृष्टि न जाने किस मुहूर्त से विकसित होना आरम्भ करेगी?
अंध विश्वासों में एक बड़ी कड़ी यह भी जुड़ी हुई है कि परिस्थितियाँ किसी अविज्ञात कारण से उतरती हैं। संकट किसी सुदूर क्षेत्र में उड़-उड़ कर आते हैं। वैभव का बाहुल्य ही मनुष्य को सुखी बनता है। पदार्थों की अनुकूलता ही प्रसन्नता को निमित्त कारण होती है।
अच्छा हो कि इतना प्रत्यक्षवादी न बना जाय कि कार्य कारण की संगति ही न सूझ पड़े। तथ्य यह है कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वामी आप है। उसका पास विचार शक्ति का ऐसा चुम्बक है कि अपने मान्य स्तर के सहयोगियों को ढूँढ़ निकालता है और साधनों को उसी आकर्षण के बलबूते खींच बुलाता है। प्रगतिशील और अनगढ़ों के बीच जो जमीन आसमान जैसा अंतर दीख पड़ता है उसका एक ही कारण है विचार तंत्र का सुव्यवस्थित अथवा अस्त−व्यस्त होना। देखा गया है कि हेय और हीन परिस्थितियों में जन्में मनुष्य भी संसार के मुकुटमणि बने हैं ऐसे भी अगणित उदाहरण हैं कि पूर्वजों की छोड़ी सम्पदा ओर प्रतिष्ठा को मटियामेट करके अगली पीढ़ी वाले दुर्दशाग्रस्त परिस्थितियों में भटक गये। असुविधाओं भरे दलदल में बुरी तरह फँस गये। मानवी सत्ता में उसके पास अपने अस्तित्व के उपरान्त उसके विचारों में वैभव ही है। इसी के आधार पर वह उन्नति उसके विचारों में वैभव ही है। इसी के आधार पर वह उन्नति उसके विचारों में वैभव ही है। इसी के आधार पर वह उन्नति के शिखर पर पहुँचता है। और इसी क्षेत्र के भटकाव से विपत्तियों के जाल जंजाल में अपने आपको फँसाता है।
इन दिनों हर क्षेत्र में विपन्नता और विद्रूपता दीख पड़ती है। कारणों का निदान तलाशने वाले लोग अपने अपने रुझान के अनुरूप निमित्त को खोजते और निराकरण संबंधी उपायों पर विचार करते हैं। विचार ही नहीं करते वरन् समाधान के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएँ भी बनाते और खर्चीले उपाय भी करते हैं। पर देखा गया है कि प्रयत्नों के बावजूद सफलता कोसों दूर ही बनी रहती है।
एक बड़ा अनुमान यह है कि धन बढ़े तो विपत्ति टले। यह मान्यता अधूरी है क्योंकि जिनके पास धन है, वे भी उसका सही सदुपयोग कहाँ कर पाते है? अपव्यय के दुष्परिणाम भुगतते हैं और दूसरों को ललचा कर उन्हें भी ऐसी ऐसी राह पर घसीटते हैं कि भ्रमित वे भी भटकाव में पड़ें और दुख भोगें।
धन की निन्दा कोई नहीं करता, उसकी उपयोगिता से भी इनकार नहीं किया जाता, पर कठिनाई यह है कि उसे सही तरीके से कमाने और सही दिशा में खर्च करने की आदत न हो तो उसका परिणाम ऐसा ही होगा जैसा साँप को में धातु खंड या कागज के टुकड़ों से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उसकी उपयोगिता तब निखरती है, जब चिन्तन की गरिमा भी साथ दे। यदि वह भटकती रही तो मात्र धन से फुलझड़ी जलाने का तमाशा भर देखा जा सकता है। कोई उपयोगी प्रयोजन सिद्ध नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, दूरदर्शिता के अभाव में उसकी सुरक्षा तक कठिन है। चारे मसखरे उसका अपहरण करेंगे या ऐसे ठाट बाट का सुझाव सुझायेंगे जिसे अपनाते ही अपकीर्ति मिले ओर कंगाली चढ़ दौड़े।
धनी देशों में अमेरिका अग्रणी है। उसका पास संसार की आधी दौलत बताई जाती है। इस उपलब्धि के बल पर वहाँ विलास का ही दौर बढ़ा है। अपराधों की संख्या चरम सीमा तक पहुँची है। व्यसनों ने मैत्री और पारिवारिकता को छिन्न-भिन्न कर दिया। कामुकता का तूफान उठा और दुनिया का सर्वनाश कर गुजरने वाले अणु आयुधों का भण्डार भरा अर्थ परायण बुद्धिमत्ता ने इतना ही सुझाया कि अधिक सम्पदा कैसे जमा की जा सकती हैं और अधिक भयंकर लड़ाई-लड़ने के लिए अंतरिक्ष में नया मोर्चा कैसे खोला जा सकता है।
यदि धन के स्थान पर विवेकशीलता का बाहुल्य रहा होता तो उस देश ने अपने वैभव के वरण की योजना बनाई होती और संसार की आधी जनसंख्या को गरीबी रेखा से ऊँचा उठकर हँसता-हँसता जीवन जीने की सुविधा मिली होती, पर हुआ ठीक उलटा है। समृद्धि ने शोषण और विनाश के नये द्वार खोले हैं।
इसकी अपेक्षा तो अपने काम से काम रखने वाले और मेहनत के लिए कमर कसे रहने वाले जापान जैसे देशों के लोग भले, जो प्रगति की बात तो सोचते हैं। बाँटते नहीं तो किसी का हड़पते नहीं।
धन के बाद शिक्षा नम्बर आता है। बुद्धि कौशल के गुण जाते हैं और अधिक चतुर लोग तैयार करने कारखाने खोले जाते हैं। देखा गया है कि आदर्शवादी विचारशीलता के अभाव में उस प्रगति से भी संसार का कोई हित साधन नहीं हुआ है। कॉलेजों ने स्नातक उगले हैं और प्रेस ने प्रकाशन की सुविधा उत्पन्न की है। फलस्वरूप साहित्य सृजा गया है। बुकसेलरों का व्यवसाय अच्छा खासा फला फूला है, पर संसार भर की किताबें ओर पत्रिकाओं का ढेर जमा करके उसकी ऐसी छाँट की जाय कि इस प्रकाशन में से मनुष्य को अपनी गरिमा की ओर चलने की प्रेरणा देने वाला साहित्य कितना है, तो वह नगण्य मात्रा में ही उपलब्ध होगा। अधिकाँश तो उसका है जो पशुता और पैशाचिकता को भड़काता है। ज्ञान के स्थान पर अज्ञान थोपता है और छद्म प्रपंचों को सहारा लेने के लिए प्रोत्साहित करता है। यदि साहित्य सृजन में लगी हुई प्रतिभा ओर सम्पदा आदर्शवाद के समर्थन में जुटी होती तो जनमानस में इतनी सड़ाँध न दीखती जितनी कि आज है।
शिक्षण संस्थाओं ने छात्रों पर अधिक प्रकार की अधिक मात्रा में जानकारियाँ लादने की अपेक्षा यदि जीवन कला ओर समाज संरचना के लिए कार्यान्वित हो सकने वाले प्रसंगों को पढ़ाया होता तो असुविधा भरो प्राचीन गुरुकुलों की तुलना में आज के साधन सम्पन्न विद्यालय नर रत्नों की एक नयी पीढ़ी प्रस्तुत कर सकने में समर्थ रहे होते।
साहित्य से कम नहीं वरन् कला और भी दो कदम आगे। गायन वादन अभिनय आदि उसी के अंतर्गत आते हैं। व्यक्तिगत क्षेत्र में फिल्म नाटक आदि चलते हैं और सरकारी तंत्र रेडियो, टेलीविजन चलाता है। यह समूचा कलामंच यदि लोक रंजन के लिए कम ओर लोक मंगल के लिए अधिक प्रयास करता तो जनजीवन की लोकमानस की स्थिति अपेक्षाकृत कहीं अधिक अच्छी रही होती और अनैतिकताओं अवाँछनीयताओं, अन्धविश्वासों, कुप्रचलनों, दुर्व्यसनोँ के जंजाल से अपनी दुनिया को कब की मुक्ति मिल गई होती। किन्तु इस दुर्भाग्य ही कहना चाहिए किस सम्पदा शिक्षा की तरह कला का कलेवर तो फूल रहा है, पर उसके भीतर विजातीय द्रव्य की ही भरमार पाई जाती है।
व्यवसाय, उत्पादन क्षेत्र में कल कारखानों की भरमार होती जा रही है। स्वसंचालित मशीनें लग रही हैं। विशालकाय उद्योग खड़े हो रहे हैं, पर इससे मुट्ठी भर लोगों की ही अमीरी बढ़ती है। गृह उद्योगों के अभाव में देहाती श्रमिकों की खुशहाली छिनती चली जा रही है। विज्ञान का शोधकार्य तेजी से चल रहा है, पर वह मारक अस्त्रों और रसायनों को विनिर्मित करते रहने के अतिरिक्त ऐसा कुछ नहीं कर पाता कि प्रकृति सम्पदा का अधिकाधिक सदुपयोग करके मनुष्य खुशहाली की स्थिति उपलब्ध कर सके।
गरीबी बीमारी, अशिक्षा, नशेबाजी, बेईमानी जैसी अनेकों विभीषिकाओं का दोष परिस्थितियों या साधनों की कमी को देना उचित नहीं होगा। यह संकटों का पहाड़ दुर्बुद्धि ने पटका है। कुविचार अपना कर ही हम अनेकों संकट झेलते और रोते कलपते दिन बिता रहे हैं।
गाँधी जी कहते थे कि जब जनता यह अनुभव करने लगे कि वह अपनी समस्याओं को खुद हल कर सती है। अपनी मर्जी का भाग्य अपने हाथों बना सकती है। तब समझना चाहिए कि पूरा स्वराज्य मिल गया।
अनुमान और आशंका भर से किसी को अपराधी घोषित न करो। जिस पर संदेह है उसे सफाई का अवसर दो और तथ्यों का पता लगाने से पूर्व किसी पर दोषारोपण न करो।
काम और क्रोध पर विजय पाकर एक दिन विचित्र वेश बनाकर एक व्यक्ति किसी गृहस्थ के यहाँ गया, गृहस्थी ने उसकी उपस्थिति को अशुभ मान उससे पूछा- “तुमने हय कैसा विचित्र-सा वेश बना रखा है” नवागन्तुक ने बताया उसने काम, क्रोध पर विजय पा ली है व उनके दुःख में उसने यह वेश बना लिया है। गृहस्थ ने उसे पागल समझ अपने नौकर से बाहर निकलवा दिया। आगन्तुक फिर आ गया तो फिर निकलवा दिया गया। इस तरह पच्चीसौं बार उसे तिरस्कृत हो निकलना पड़ा व बार-बार वह उसी गृहस्थ के पास आया। गृहस्थ द्वारा बार-बार तिरस्कृत व अपमानित कर दिये जाने पर उसको लेश मात्र भी क्रोध नहीं आया अन्त में गृहस्थ ने आगन्तुक से क्षम याचना की वह उसे विनयपूर्वक कहा- “महानुभाव आप वास्तव में महान् हैं मेरे द्वारा तना अपमानित व तिरस्कृत होने पर भी आप शान्त बने रहे, आपने वास्तव में क्रोध को जीत लिया है। “अतिथि ने कहा” - वत्स मेरी अधिक प्रशंसा न करो अधिक प्रशंसा सुनकर तो मुझमें अहंकार का भाव जाग जायेगा।” गृहस्थ ने अपना भाग्य सराहा कि आज उसने एक ऐसे सन्त के दर्शन किये जो काम क्रोध व अहंकार से मुक्त है।
रसोईघर में सब सामग्री जमा हो; आग जलाने के लिए माचिस जैसा एक साधन न हो तो सारे संचय को निरर्थक ही मानना चाहिए। शरीर में सारे अंग अवयव मजबूत हों पर एक आँखें न हो तो व्यक्ति की दुनिया सूरज चाँद उगने पर भी अँधेरी ही रहेगी। प्राण रहित लम्बा-चौड़ा शरीर किस काम का? दरिद्रता खलती है, अशिक्षा खटकती है, रुग्णता व्यथित करती है; किन्तु इतना बड़ा है कि उसके अभाव में न तो संकटों से उबरना संभव होता है और न प्रगति पथ पर दो कदम आगे बढ़ सकने की व्यवस्था बनती है।
विचारशीलता का तात्पर्य यहाँ उस सूक्ष्मदर्शी विचारणा से है, जो आवरणों के पीछे छिपे हुए तथ्यों का उद्घाटन कर सकने में समर्थ होती है, जो औचित्य-न्याय का समर्थन करती है, उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अभिवर्धन में अपने कौशल को नियोजित करती है, समस्याओं का यथार्थवादी और दूरगामी समाधान सुझाती है।
यहाँ उस अक्लमंदी की चर्चा भी नहीं हो रही है, जो स्वार्थ-साधन के लिए किसी भी प्रकार के छल-प्रपंच रच सकती है, कुचक्र और षड्यंत्र रच सकती है। वेश्या की तरह मुट्ठी भर पैसों के लिए जिन्हें ईमान धर्म तथा शर्म बेचने में लाज नहीं आती, ऐसे, अक्लमंद लोगों से जिले डिवीजन के जेलखाने ठसाठस भरे मिलेंगे। वे छूटते ही दूसरा आक्रमण करते हैं, तथा अनेकों मुकदमें चलने, सर्वत्र बदनामी होने, ओर समाज दण्ड भुगतने, राजदण्ड के कटघरे में खड़े किये जाने पर जिन्हें कुछ भी अचरज नहीं लगता।
ऐसी अक्ल शिक्षित और अशिक्षितों में गरीब और अमीरों में समान रूप से पायी जाती है। महत्वाकाँक्षी विपुल वैभव के लिए सदा आकुल-व्याकुल रहते हैं, सामान्य नागरिकों का स्तर उन्हें स्वीकार नहीं। बड़प्पन के लिए धूर्तता भी चाहिए ओर कुटिलता भी। जिसमें यह सारी विशेषताएँ हों, उसे उन्मादी कहते है; यह किन्हीं मर्यादाओं में वर्जनाओं में नहीं बँधना चाहता, उच्छृंखल उद्दण्डता बरतता है; उसे दूसरों का शोषण - उत्पीड़न करने में अपनी विशिष्टता का भान होता है। छल-प्रपंच में जो जितना सिद्धहस्त है, वह अपने को उतना ही माहिर कहता है। जिसने जितनोँ को सताया और अनीतिपूर्वक जितना कमाया, वह अपनी चतुरता की उतनी ही बढ़ी-चढ़ी शेखी बघारता है। इस प्रकार की अक्लमंदी कहीं कम नहीं है। अनीति पक्ष में तर्कों के अम्बार लगा देने, असत्य के समर्थन में प्रमाण गढ़ लेने के संबंध में प्रवीण परिकर की दिन-दिन बढ़ोत्तरी होती रहती है। मित्रता के नाम पर शत्रुता का विश्वास घाती जाती है। मित्रता के नाम पर शत्रुता का विश्वासघाती आचरण करने की कला में लोग एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर सिद्ध कर रहे हैं।
मात्र धूर्तता ही नहीं, बुद्धि की तीक्ष्णता भी बढ़ी हैं वैज्ञानिक आविष्कारों को देखते हुए प्रतीत होता है कि प्रकृति की समस्त परतों को उधेड़ लेने और अविज्ञात रहस्यों का उद्घाटन करने की बौद्धिक तीक्ष्णता ने कसम जैसी खाई हो। प्रत्यक्षवाद का इस हद तक समर्थन हुआ है कि आत्मा-परमात्मा तक हो झुठलाने वाला दर्शन मान्यता प्राप्त करता चला जा रहा है। स्वेच्छा बरतने में इस हद तक दुस्साहस दिखाया गया है, कि दया, धर्म और हया, शर्म के लिए कोई गुंजाइश नहीं हर गई हैं।
जिस तर्क के आधार पर बूढ़े बैल को कसाई के सुपुर्द किया जाता है उसी कर्त को बूढ़े माँ-बाप के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। जिस उपयोगितावाद पर पशु पक्षियों का प्राण हरण किया जा सकता है वही अपने पड़ौसी, कुटुम्बी की हत्या के अवसर पर भी उचित ठहराया जा सकता है। वहीं अपने पड़ौसी, कुटुम्बी की हत्या के अवसर पर भी उचित ठहराया जा सकता है। जब मनुष्य बंदर की औलाद ही ठहरा तो उसे माता, भगिनी, पुत्री के साथ यौनाचार बरतने में क्यों संकोच होना चाहिए? जब प्रकृति प्रेरणा ही सब कुछ है तो समर्थों द्वारा असमर्थों का शोषण किये जाने में क्या कुछ अनुचित कहा जायगा? जब कर्मफल प्रत्यक्ष न मिले तो फिर स्वर्ग-नरक या परलोक में उसके मिलने पर क्यों विश्वास किया जाय? जब प्राणि जगत में दया, सेवा, संवेदना के लिए स्थान नहीं है तो मनुष्य ही क्यों पुण्य परमार्थ करे और क्यों कष्ट सहे, क्यों घाटा उठाये, क्यों समय गँवाये?
अक्लमंदी पहले भी बहुत थी; पर अब तो वह चरम सीमा तक ऊँची उठ रही है। इसके रहते दुनिया में चैन के दर्शन नहीं हो सकते। मानवी गरिमा सेवा, सहानुभूति, सहकार, पुण्य, परमार्थ के ऊपर टिकी हुई है। यदि उन स्तंभों को गिरा दिया जाय तो स्नेह सद्भाव के दर्शन कहाँ होंगे? सामूहिकता और सहकारिता कैसे पनपेगी? दुर्बलों को संरक्षण कौन देगा? प्रत्यक्षवादी दर्शन वस्तुतः पशुता का समर्थन है। उसके दो कदम और आगे बढ़ जाने पर पैशाचिकता उभर आती है।
विचारों के स्तर का यह अधःपतन है। व्यक्तिगत जीवन में रोष, असंतोष, अनाचार, आक्रमण इसी आधार पर समाविष्ट होते हैं और उन्हीं की प्रतिक्रिया रोग, शोक, कलह, दारिद्र्य, असहयोग, द्वेश के रूप में सामने आते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया तो दर्शन नहीं प्रत्यक्षवाद ही है। बोते है सो काटते हैं। करते है सो भरते हैं। आदान-प्रदान की तरह क्रिया की प्रतिक्रिया भी निश्चित है। विष खाकर जीवित नहीं रहा जा सकता है। आग पकड़ने पर जलना निश्चित है। अनीति बरतने, अत्याचार करने, कुमार्ग पर चलने, कुकर्मों में निरत रहने पर उसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत जीवन में तो होगी ही। उसका प्रभाव सामाजिक प्रचलन के रूप में भी प्रकट हुए बिना न रहेगा। चारों के मुहल्ले में चोरियों का ताँता लगा रहता है। एक दूसरे का सामान चुराने में नहीं चूकते। नशेबाजी के लपेट में थोड़े लोग अन्य अनेक भोले भालों को भी जकड़ लेते हैं। व्यभिचारी प्रचलन को बढ़ावा देकर कोई कोई अपनी बहन बेटी की इज्जत सुरक्षित नहीं रख सकता।
महामारियाँ फैलती हैं तो छूत के शिकार के लोग भी होते है जो नियम, संयम से रहते और आहार विहार में औचित्य का ध्यान रखते थे। दुर्जनोँ के गाँच में रहकर एक सज्जन अपनी सज्जनता सुरक्षित नहीं रख सकता। बाढ़, सूखा, भूकम्प, ज्वालामुखी आदि प्रकृति प्रकोपों के उभरने पर भले बुरे सभी को त्रास सहना पड़ता हैं सरकारी नियमों के अंतर्गत उपद्रवी क्षेत्र के सभी निवासियों को जुर्माना देना पड़ता है। अनीति करने की तरह ही अनीति को देखते रहना उसे रोकने का प्रयत्न न करना भी अपराध है। गाँव में डकैती पड़ने पर उन लोगों को पूछा और धमकाया जाता है, जिनके पास लाइसेन्स वाली बंदूक होती हैं। हथियार होते हुए भी वे पड़ौसी का बचाव करने क्यों आगे नहीं आये? अग्निकाण्ड होने पर उसे बुझाने के लिए दौड़ना फर्ज है पर उस दुर्घटना को यदि मूक दर्शक की तरह देखते रहा जाय। अपने मतलब से मतलब की नीति अपना कर यदि निष्ठुरता धारण किये रहा जाय, तो इस प्रकार कायरता को सुनने वाले तक कोसेंगे, धिक्कारेंगे।
प्रश्न इतना ही नहीं कि कुविचारों को किसने अपनाया और कार्यान्वित किया। प्रश्न यह भी है कि अनीति होती रही और उसे रोकने के लिए कोई आगे क्यों न बढ़ा? बलात्कारी ही नहीं, दंड के भागी वे भी होते हैं जिनने वह घटना देखी तो सही पर उसे रोका क्यों नहीं?
मनुष्य का दायित्व है कि बुराई से बचे और दूसरों को बचाये। नीति पर आरुढ़ रहे और दूसरों का भी उसी तरह का आचरण करने के लिए प्रोत्साहित-अनुप्राणित करें। हम सभी एक धागे में बंधे मनके हैं। समाज को माला कहा जाय तो व्यक्ति को उसका अविच्छिन्न घटक। कुछ मनके टूट जायँ या बिखर जायँ तो सारी माला कुरूप दीखती है। और खण्डित मानी जाती है। व्यक्ति और समाज का अन्योन्याश्रय संबंध है। बसंत, वर्षा, ग्रीष्म, शीत का वातावरण अपने-अपने समय में सभी छोटे बड़ों को प्रभावित करता है। कुविचारों और कुकर्मों का प्रचलन जिनने आरम्भ किया मात्र उन्हीं भी भागीदार कहा जाता है जो असहयोग, विरोध, संघर्ष के लिए आगे नहीं आये। गेहूँ पिसता है तो उनमें जुड़े घुन का भी सफाया हो जाता है। जंगल में सूखे बाँस हवा से परस्पर रगड़ते हैं तो चिनगारी निकलती है। वे ही उड़कर एक से दूसरे पर पहुँचती है और दावानल बनकर सारे जंगल को जला देती है कहावत है कि- “सूखे के साथ गीला भी जलता है।”
दुर्बुद्धि भी एक प्रकार की आग है। व जहाँ भी उपजती है, उसका तो सर्वनाश करती है, बचते पड़ौसी भी नहीं। पास में रखा हुआ पुआल या लकड़ी का ढेर उसी चिनगारी के प्रभाव से अपना अस्तित्व खो बैठता है। इतना ही पर्याप्त नहीं कि हम अपने को भला बनाये रहें, कुविचारों से रक्षा करें और नेकी का जीवन जियें। यह आधी भलमनसाहत है। इसमें इतना और उत्तरार्ध जुड़ना चाहिए कि दुर्भाव जहाँ भी पनप रहे हों वहाँ उन्हें जड़ न पकड़ने दें। सामर्थ्य भर रोकें और उसे न होने दें, जो नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ में जटायु का उदाहरण स्मरण रखने योग्य चाहिए। इस संदर्भ में जटायु का उदाहरण स्मरण रखने योग्य है। उस वृद्ध पक्षी से एक मानुषी का अपहरण न देखा गया और प्राण रहने तक अनीतिकर्ता के साथ लड़ता रहा।
दुर्बुद्धि भी एक प्रकार की आग है। व जहाँ भी उपजती है, उसका तो सर्वनाश करती है, बचते पड़ौसी भी नहीं। पास में रखा हुआ पुआल या लकड़ी का ढेर उसी चिनगारी के प्रभाव से अपना अस्तित्व खो बैठता है। इतना ही पर्याप्त नहीं कि हम अपने को भला बनाये रहें, कुविचारों से रक्षा करें और नेकी का जीवन जियें। यह आधी भलमनसाहत है। इसमें इतना और उत्तरार्ध जुड़ना चाहिए कि दुर्भाव जहाँ भी पनप रहे हों वहाँ उन्हें जड़ न पकड़ने दें। सामर्थ्य भर रोकें और उसे न होने दें, जो नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ में जटायु का उदाहरण स्मरण रखने योग्य चाहिए। इस संदर्भ में जटायु का उदाहरण स्मरण रखने योग्य है। उस वृद्ध पक्षी से एक मानुषी का अपहरण न देखा गया और प्राण रहने तक अनीतिकर्ता के साथ लड़ता रहा।
परिस्थितियों की विषमता देखकर उसका उथला या तात्कालिक उपचार करना ही पर्याप्त नहीं। चेचक की फुन्सियों पर दवा पोतते रहने से काम नहीं चलता उसके लिए रक्त शोधक औषधियां जुटानी पड़ती हैं। अन्यथा एक फुन्सी के कुम्हलाने पर दूसरी दसनई उठ पड़ती हैं। एक स्थान पर घटित हुई एक घटना या उपजी हुई समस्याओं को देखकर उसका सामयिक कारण या तात्कालिक उपचार करने से चिरस्थायी समाधान नहीं हो कसता। यह तभी संभव है, तब मूल कारण तलाश किया जाय और उसका चिरस्थायी समाधान नहीं हो सकता। यह तभी संभव है, जब मूल कारण तलाश किया जाय। स्पष्ट है कि दुर्बुद्धि अकेली ही उन समस्त समस्याओं का वास्तविक कारण है जो व्यक्ति एवं समाज को चित्र विचित्र स्तर का त्रास देती और अन्धकूप में गिराकर फिर कभी न उबरने के लिए बाधित करती हैं।
परमेश्वर को देखने के लिए वह चश्मा पहनना पड़ेगा जो वह तुम्हारी परख के लिये अपनी आँखों पर पहने रहता है।
काका कालेलकर उन दिनों जापान यात्रा पर थे। रास्ते में फुटपाथ पर पुरानी किताबें बेचने वाले लड़के को देखा। उन्हें एक किताब पसन्द आई। वह सस्ते मूल्य की थी सो खरीद ली।
इसके बाद लड़के ने पूछा - आप तो कोई विदेशी मालूम पड़ते हैं। शायद भारतीय हैं। किताब वापस कीजिए। मैं इतने ही पैसों में दुकानदार से नई किताब लेकर आपके होटल पर पहुँचा दूँगा।
काका ने आश्चर्य से पूछा- तुम लाभ क्यों छोड़ते हो और इतनी दौड़−धूप करने का क्या कारण है?
लड़के ने सहज उत्तर दिया- मैं नहीं चाहता कि जापानियों के अतिथि सम्मान पर कोई सन्देह करे। सद्व्यवहार के अभाव में तो जापान की विदेशों में बदनामी जो होगी।
काका सकते में आ गये और मन ही मन कहने लगे। काश! ऐसी ही भावनाएँ अपने देशवासियों में भी होती।
व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित अगणित कठिनाइयों, अभावों और संकटों के समाधान किस प्रकार किए जाँय? इस संदर्भ में दो प्रकार के चिन्तन हैं। एक ऊपर से थोपने के दूसरे भीतर से उगाने के। दोनों में से पहला बे जड़ का है और दूसरा चिर-स्थायी।
नाटक के पात्रों के ऊपर आवरण पहना कर इस प्रकार सजा दिया जाता है मानों वे जो कुछ दीखते हैं, वही हों। राजा, मंत्री, सेनापति, संत, सेठ आदि के अलग-अलग परिधान होते हैं। उनसे सजा देने पर वे वस्तुतः वैसे ही लगते हैं, जैसा कि सजाने वालों ने उन्हें दिखाने का प्रयत्न किया है। रामलीला में विभिन्न पात्रों के नकली मुखौटे उतार लिये जाँय, परिधान हटा दिए जाँय, तो सामान्य व्यक्ति जैसा असली रूप प्रकट हो जाता है तब उस कौतुक कौतूहल की भी समाप्ति हो जाती है।
समाधान भी वास्तविक हो सकता है और अवास्तविक भी। अवास्तविक वे हैं जो बाहर से थोपे जाते हैं। वास्तविक वे हैं जो बाहर से थोपे जाते हैं। वास्तविक वे हैं जो व्यक्तित्व में से उभर और जीवन के साथ जुड़े हैं। कोई देश उधार के शस्त्र और सैनिक लेकर समर्थ नहीं हो सकता। भीतर से यदि देश पोला है तो बाहर की छत्र-छाया कितने समय तक टिकेगी। कलई बहुत दिन नहीं चलती। बालू की दीवार अधिक देर नहीं खड़ी रहती। काठ की हाँड़ी बार-बार नहीं चढ़ती। दूसरे के कंधों पर लदकर न तो लम्बी यात्रा की जा सकती है और न जिन्दगी कट सकती है। बल तो वही काम देता है जो अपनी छाती और भुजाओं से उभरा हो। समाधान भी ऐसे ही ढूँढ़े जाने चाहिए। किसी को भिक्षा देकर न तो सम्पन्न बनाया जा सकता है न स्वावलम्बी। मनुष्य अपनी ही कमाई से सम्मानपूर्वक जिन्दगी काट सकता है।
दरिद्रता मिटाने के लिए मनुष्य का आलस्य, प्रमाद छूटना चाहिए और उसमें तत्परता तन्यता के साथ उपार्जन करने की ललक उत्पन्न की जानी चाहिए। इसके अभाव में दूसरों की दी हुई भिक्षा या सहायता से टिकाऊ हल नहीं निकल सकता। जो मेहनत से कमाता है, वह समझ से खर्च भी करता है। जिसे मुफ्त में सम्पदा हाथ लगी है, वह उसका न तो महत्व समझ सकेगा और न उसका सदुपयोग कर सकेगा। अपव्यय दुर्व्यसन उसकी पोटी जल्दी ही खाली कर देंगे इसलिए अच्छा हो कि मनुष्य, स्वावलंबी सुसंस्कारी बने और किसी की ओर सहायता पाने की दृष्टि से न तकें।
उपार्जन कला में प्रवीण मारवाड़ी, पंजाबी कहीं हाथ पसारते नहीं देखे गए। इसके विपरीत भिक्षुकों के समुदाय आए दिन जिस-तिस प्रकार जहाँ-तहाँ से भटकते रहने पर भी मन से हीन परिस्थिति से दीन बने रहते हैं। समाधान वहीं कारगर होते हैं, जिनकी निजी जड़ें होती हैं अमर बेल जिस पेड़ पर छाई होती है, उसे चूसने के उपरान्त स्वयं भी सूख जाती है।
कानूनों के द्वारा सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए प्रयत्न करना अच्छी बात है। पर वह ऊपर से थोपी होने के कारण सफल नहीं हो पा रही है। न तो बाल-विवाह बन्द होते दीख रहे हैं और न दहेज की माँग बन्द हो रही है। रिश्वत और व्यभिचार दोनों के विरुद्ध कड़े कानून हैं, पर दोनों पक्ष अपनी पटरी निकाल लेते हैं और सहयोगपूर्वक वे कुकर्म यथावत् रहते हैं। कानून अपना काम पूरा तब करे जब इन अनाचारों के विरुद्ध लोक मानस विनिर्मित हो और घृणा उभरे।
जाति पाँति के आधार पर ऊँच-नीच मानने का संविधान में विरोध है। पर ब्राह्मणों में कायस्थ कायस्थों में अछूत अछूतों में जो आपसी ऊँच नीच की मान्यता है- उसका क्या किया जाय? सवर्ण और अस्वर्णों के बीच पाये जाने वाले भेद भाव पर तो मुकदमा भी चल सकता है पर एक ही जाति की उपजातियों में जो भेद भाव है। एक जाति का अछूत दूसरे जाति के अछूत से रोटी बेटी व्यवहार नहीं करना चाहता। उसका क्या उपाय किया जाय? ऐसा ही भेद भाव गरीब अमीर और शिक्षित अशिक्षित के बीच भी देखा जाता है। अपने घरों की महिलाओं तक को लोग गई गुजरी ठहराते हैं, उनसे अपमानजनक व्यवहार करत हैं तो उसके लिए क्या किया जाय?
कानून का भय दिखाना आवश्यक है। राष्ट्रीय मान्यता के रूप में संविधान में भी सभ्यता सूचक निर्धारणों का उल्लेख होना चाहिए, सो है भी, पर इतने से भी हमारा उत्तरदायित्व पूरा नहीं हो जाता। करना कुछ और भी पड़ेगा और वह है आस्थाओं को झकझोरना विचारों की अवाँछनीयता में आमूल-चूल परिवर्तन करना। औचित्य का पक्ष समर्थन करने वाली विवेक-बुद्धि को उभारना। न्याय के प्रति आस्थावान् होना। यह मान्यता भीतर से जागेगी, तो वह जो जाति पाँति तक वेश वंश तक सीमित न रहेगी, वरन् विषमता के हर पक्ष की काट छाँट करेगी।
मनुष्य की अक्लमंदी में घुसी हुई धूर्तता का कोई अन्त नहीं। वह शासन की पकड़ से बच सकता है। कानून को अपने समर्थक के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। प्रलोभन और दबाव से गवाहियाँ जुटा सकता है। सबूत इकट्ठे कर सकता है और राजदण्ड की पकड़ से सहज ही बच सकता है। इसी प्रकार समाज को बहकाना भी कुछ कठिन हैं। इसी प्रकार समाज को बहकाना भी कुछ कठिन नहीं है। देशभक्त नेता और धर्मोपदेशक बनने में थोड़े से कला कौशल की आवश्यक है जिसे किसी भी सहकर्मी के रंग ढंग देखकर उसकी अनुकृति अपनाई जा सकती है। थोड़ा-सा दान पुण्य कर पूजा पाठ के कर्मकाण्डों को निबाहते रहने पर संपर्क क्षेत्र में अपने धर्मात्मा होने की ख्याति फैलाई जा सकती है और पर्दे के पीछे अनेक अनाचार इस प्रकार करते रहा जा सकता है, कि उनके सम्बन्ध में किसी को गंध भी न लगे। इसी चतुरता के बलबूते शोषितों के मुँह से जय-जयकार कराने के लिए मजबूरी उपस्थित की जा सकती है। इतने हथकण्डों को रोक पाना कठिन है। यही कारण है कि प्रत्येक अनाचार के सम्बन्ध में कानूनी प्रतिबन्ध होने, शास्त्रों द्वारा पाप घोषित किए जाने-उपदेशकों द्वारा दुष्कर्मों का हेय ठहराये जाने के धुंआधार प्रचार होते रहने पर भी लोग टस–मस नहीं होते, अपनी बेढंगी चाल में जरा भी परिवर्तन नहीं करते। चिकने घड़े की तरह अपने ऊपर उपदेशों के पानी की एक बूँद नहीं ठहरने देते।
स्थिति यही बनी रही तो समझना चाहिए कि दुर्भाग्य का काल राहु पीछे ही पड़ा रहेगा और उन स्वर्णिम स्वप्नों के साकार होने का कभी अवसर न मिलेगा, जिसमें मनुष्य सतयुगी सुख सुविधाओं से भरी पूरी जिन्दगी जी सकने की आशा अपेक्षा की जाती है। मात्र सम्पदा, शिक्षा, बलिष्ठता के बलबूते मनुष्य दूसरों को डरा-धमका कर, फुसलाकर अपना उल्लू सीधा तो कर सकता है, पर उसे औचित्य के प्रति आस्थावान होने के लिए प्रभावित, अनुप्राणित नहीं कर सकता।
इस दिशा में गंभीरता से सोचना और ठोस प्रयास करना होगा, अन्यथा जिस सर्वनाशी कुचक्र में हम फँस गए हैं, उसमें से निकला सहज ही संभव न होगा। जोल जाकर वहाँ रहने वाले वरिष्ठों से शिक्षा का पाकर जो निकलता है वह अपराधों के क्षेत्र में ट्रेन्ड, प्रवीण-पारंगत होता है। सामाजिक भर्त्सना सुनते रहने पर मनुष्य ढीठ हो जाता है और किसी की परवाह न करने की बात कहकर अपने आपको शूरवीर सिद्ध करता है। वैसा ही ढीठ मन बार-बार करने की चुनौती देता है। अनाचार इन्हीं कारणों से बढ़ रहा है। प्रतिरोध को प्रलोभन या धमकी के सहारे कुँठित कर देने पर उसे आधी सफलता मिल जाती है। जिस पर अनाचरण के लिए छूट मिली अनुभव करता है। ना समझ पशुओं के बलिष्ठ होने पर भी उन्हें लाठी या लगाम लगाकर इच्छित मार्ग पर चलाया जा सकता है। पर मनुष्य के लिए क्या किया जाय जो अपनी चतुरता और ढीठता के बल पर आदर्शों का उपहास करते हुए मनमानी बरतता है। उसे साथी भी आसानी से मिल जाते हैं। मिल जुलकर अनाचार करने और लाभाँश करने की विद्या अब अनेक लोगों द्वारा सीख ली गई हैं। वे उसे निधड़क कार्यान्वित भी करते हैं। सज्जनों के बीच ऐसी घनिष्ठ सहायता कदाचित ही हो पाती है कि वे अनीति से जूझे और सत्प्रयोजनों के लिए एकजुट होकर काम करें; किन्तु उलटी दिशा में चलने वाले कुमार्गगामी, कुकर्मी अपने अपने गिरोह और षडयन्त्र आसानी से बना लेते हैं ओर समर्थ विरोध के अभाव में अपनी मनमानी व्यापक क्षेत्र में बढ़-चढ़ कर करते रहते है।
पृथ्वी की आकर्षण शक्ति हर वस्तु को को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। पानी ढलान ओर खींचती है। पानी ढलान की और बहता है। मनुष्य के भीतर बैठी हुई जन्म जन्मांतरों की संचित दुष्प्रवृत्तियां भी उसे अनाचार की प्रेरणा देती रहती हैं। वह उसी प्रवाह में बहता और खाई खड्ड में गिरता भी रहता है। इस सरलता को तोड़कर, करना यह होगा कि मनुष्य आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाये, ऊँचा उठे और ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करे जिनसे स्नेह सद्भाव भरे -राजमार्ग पर चलते हुए तुष्टि, तृप्ति एवं शान्ति का वातावरण बने।
छोटे काम करना और उन्हें खूबसूरती से पूरे करते चलना प्रकारान्तर से बड़े काम कर सकने की योग्यता अर्जित करना हैं।
साधना के लिए अलग स्थान की तलाश न करो। अपने दायित्वों और संबंधियों के साथ ऐसा तालमेल बिठाओ जिसमें आदर्शों का गहरा पुट हो। इस प्रकार तुम्हारा व्यावहारिक जीवन ही समग्र साधना बन जायगा।
एक मनुष्य किसी महात्मा के पास पहुँचा और कहा- मैं बहुत गरीब हूँ। भगवान की मुझ पर अकृपा है, उसने औरों को बहुत धन दिया है पर मेरे पास कुछ भी नहीं है। आप ऐसी कृपा कर दीजिए जिससे मुझे भी धन मिल जाय।
महात्मा ने कहा-जो कुछ तेरे पास है उसे बेच दे तुझे बहुत धन मिल जायगा। उसने कहा मेरे पास कुछ भी नहीं, ईश्वर ने ऐसा भी मुझे कुछ नहीं दिया जिसे बेच कर मैं अपना काम चला लेता।
महात्मा ने कहा-अपनी एक आँख बेच दे मैं तुझे दस हजार दूँगा। इस पर वह तैयार न हुआ। फिर क्रमशः हाथ, टाँग, नाक, जीभ आदि बेचने के लिए कहा और प्रत्येक चीज के लिए दस-दस हजार रुपया कीमत बताई वह व्यक्ति इनमें से किसी भी चीज को बेचने की तैयार न हुआ। तब महात्मा ने कहा-दस-दस हजार मूल्य की दस चीजें तो मैंने ही तुझसे माँगी। एक लाख रुपये कीमत की तो यही सम्पत्ति तेरे पास मौजूद है फिर अपने को गरीब क्यों बताया है? जो ईश्वर ने जो प्रचुर सम्पत्ति का भण्डार शरीर तुझे दिया है इसे काम में ला। परिश्रम कर और जो पूँजी ईश्वर ने दी है उसके द्वारा उपार्जन करके अपना काम चला और प्रसन्न रह।
कुछ आपत्ति ग्रस्तों को छोड़ कर इस संसार में निर्धन कोई नहीं। शरीर से उचित पुरुषार्थ करके हर कोई अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने लायक कमा सकता है। भगवान ने शरीर रूपी बहुमूल्य रत्न भण्डार हर किसी को दिया है। इसका ठीक तरह उपयोग करने वाला कभी दरिद्र नहीं रह सकता।
यह भ्रम जितनी निरस्त हो सके उतना ही अच्छा है कि थोपी हुई सम्पन्नता के आधार पर किन्हीं को समृद्ध बनाया जा सकता है। दूसरों की ख्याति में बिना हाथ बटाये ही भागीदार बन सकता है। यह समझा और समझाया जाना चाहिए कि मनुष्य की विचारणा, भावना, मान्यता, अभिरुचिता, तत्परता और तन्मयता ऐसी है जो जिस भी दिशा में जुट पड़े उसी में चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत कर सकती है। इसलिए यदि वस्तुतः बहुमुखी संकटों एवं अनर्थों की जड़ें काटनी हो तो उसका एक उपाय है कि मनुष्य के अन्तःकरण को स्पर्श करने एवं औचित्य का पक्षधर बनाने के लिए प्रबल प्रयत्न किया जाय।
इस संबंध में लेखनी और वाणी का भी प्रभाव हो सकता है। कुछ न कुछ उनका भी प्रभाव पड़ता है, पर कठिनाई यह यह है कि वे भी पशुवृत्तियों को भड़काने में जितनी तेजी से सफलता होती हैं, उतनी गति उत्कृष्टता, अभिवर्धन के मित्त नहीं कर पाती हैं, उतनी गति उत्कृष्टता, अभिवर्धन के निमित्त नहीं कर पाती हैं। धर्म शास्त्रों का अस्तित्व मौजूद है। उनमें अधिकतर सद्विचार ही भरे पड़े हैं और नीति निष्ठा का ही समर्थन है। ऋषि पहले भी थे ओर अब भी। धर्मोपदेशकोँ की कमी नहीं। इतने प भी अवाँछनीयता, अनीति, असंबद्धता घटती नहीं दीखती, वह बढ़ ही रही है। प्रचार प्रयोजन अपने उच्चस्तरीय लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर पा रहा है। सन्मार्ग पर बढ़ाने का प्रयोजन पूरा हो नहीं रहा है। प्रयासों को देखते हुए प्रगति यत्किंचित् ही होती दिखाई दे रही है। मंदिर मस्जिद गिरजे, गुरुद्वारे जैसे धर्म संस्थानों की संख्या कम नहीं है उनकी भव्यता और बहुमूल्यता, ऐतिहासिकता भी उत्साहवर्धक भी है किन्तु जहाँ तक धर्म धारण के संबंध में उसे उभारने में वे यत्किंचित् ही समाि हो पा रहे हैं। प्रथा परम्परा के प्रति कट्टरता और कर्मकाण्डों के प्रति उत्साह जगाने में वे किसी सीमा तक सफल भी हुए हैं किन्तु मानवी अन्त चेतना में उत्कृष्ट आदर्शवादिता जगाने, उभारने और गतिशील करने में वे बहुत दोअी सीमा में ही सफल हुए हैं। जिस प्रकार अस्पतालों की वृद्धि के साथ-साथ रोगियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी दीख रही है, उसी प्रकार देवालयों और पुजारियों की संख्या में अभिवृद्धि होने के साथ लोगों की अनास्था भी बढ़ रही है। लोग कर्त्तव्यों की प्रेरणा पाने की अपेक्षा यह सोचने लगे हैं कि देव दर्शन का कर्मकाण्ड करने भर से ईश्वर को रिझाया जा सकेगा और उतने भर से दुष्कर्मों के पाप पर्वत का प्रतिफल प्राप्त करने से बचा जा सकेगा। इस आधार पर मनुष्य अधिक निर्भय होकर अनौचित्य की दिशा में अग्रसर होते हैं। यह मानने में अत्युक्ति न होगी कि धर्म का ढोल पीटने वालों के अपेक्षा वे लोग अधिक शालीन पाये जाते हैं, जो नागरिकता एवं सामाजिकता के प्रति अधिक निष्ठावान हैं। जो कर्म के साथ आदर्शों को जोड़ना आवश्यक मानते हैं। जिन्हें मानवी गरिमा का ज्ञान है वे अचिन्तय चिन्तन से बचते हैं और कुकर्म करने के लिए कदम नहीं बढ़ाते। हमें उस समस्त प्रचार तंत्र को एक दिशा अपनाने के लिए सहमत करना होगा, जिससे कि सभी एक स्वर वाद्य यंत्र एक लय-ताल में जबते है, जब सभी वाद्य यंत्र एक लय-ताल में रस तभी बरसता है, जब सभी वाद्य यंत्र एक लय-ताल में बजते हैं। जब सभी कंठ एक साथ उभरते है तो संगीत की सरसता बनती है। धर्म सम्प्रदाय अपने-अपने पुरातन दर्शन एवं कर्मकाण्ड अपनाये रहें पर उनमें पारस्परिक सम्मान और सद्भाव की कमी नहीं पड़नी चाहिए। उनमें से कोई न तो ईश्वर का ठेकेदार बने और न अपनी मान्यताओं को ही सच मानने का आग्रह करे। सर्व धर्म समभाव का तात्पर्य यह है कि प्रचलनों और मान्यताओं की दृष्टि से सबको छूट रहनी चाहिए वह अपनी मान्यताओं को जिस प्रकार सही मानता हैं उसी प्रकार दूसरे के इस अधिकार को आघात न पहुँचाये कि वह भी पूर्वजों के निर्धारणों के प्रतीक आस्थावान हो सकते है अपने मान्यताओं और भावनाओं को सच्च मान सकते हैं इसी प्रकार टकराव की आग्रह कि गुंजाइश न रहेगी अपने-अपने पसंद के वस्त्र आभूषण पहनने और इच्छित भोजन पकाने व खाने में स्वतंत्र हैं तो धर्म पराम्राओ को मानने अपनाने में वैसी ही स्वतंत्रता का उपयोग स्वयं करने और दूसरों को करने देने की नीति क्यों न अपनाए एक बगीचे में अनेक रूप रंग के फल लग सकते हैं, तो विश्व उद्यान में साम्प्रदायिक भिन्नता क्यों नहीं रह सकती? सभी को सम्मान क्यों नहीं मिल सकता सभी को संरक्षण देते हुए अनेकता में एकता का सिद्धान्त क्यों व्यवहृत नहीं हो सकता?
मानवी आदर्शवादिता का अधिक संबंध उत्कृष्टता का समर्थन करने वाले दर्शन से है वस्तुतः वही धर्म वास्तविक स्वरूप है। प्रकारान्तर से मानवी आचार संहिता को उच्चस्तरीय बनाये रहने का दायित्व धर्म का है और उसी को अपनी गरिमा के अनुरूप भूमिका निभाने में अग्रणी रहना चाहिए अन्य प्रसंग जो भी प्रस्तुत किये जावे पर इस केन्द्र बिन्दु को उसे अपनाये ही रहना चाहिए कि अपने साथ जुड़े हुए श्रद्धावानों को अनुयायियों को यह बतायें कि सद्भावना उदार-सेवा सहकारिता ही लोक परलोक में मनुष्य को ऊंचा उठा सकते हैं। गौरव गरिमा और प्रगति शान्ति का पथ प्रशस्त कर सकते है। यही ईश्वर को प्रिय हैं यी सद्गति का मार्ग है राह पर चलते हुए उस लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता हैं जिसे महानता के नाम से जाना माना जा सकता है।
धर्म अपनी गरिमा और महानता तभी स्थिर रख सकता है जब वह लोगों के बीच एकता समता, सद्भावना सहिष्णुता बनाये रहे। उन्हें दुर्गुणों ओर दुष्प्रवृत्तियों से बचाए। धर्म संप्रदाय को सज्जनता और शालीनता का पर्यायवाची बन कर रहना चाहिए। सभ्य शिष्टाचार की रीति-नीति सर्व साधारण को सिखाने समझाने और अभ्यास में उतारने के लिए उसे प्रबल प्रयत्न करना चाहिए। गुण कर्म स्वभाव में सुसंस्कारिता का समावेश करने के लिए धर्म को अपनी प्रभाव शक्ति का परिचय देना चाहिए।
मूल प्रयोजन से पीछे हट जाने ओर भटकावों में उलझने कारण धार्मिक आस्था का ह्रास हुआ है। यह दुर्भाग्य की बात है साबुन जब स्वयं स्वच्छ रहने और स्वच्छ बनाने की विशेषता गवाँ बैठेगा तो फिर उसका उचित मूल्याँकन न हो सकेगा कर्मकाण्डों और प्रथा प्रचलनों का प्रशिक्षण कैसा है? व ऐच्छिक भी है। उसमें भिन्नता भी हो सकती है। और समीक्षा की दृष्टि से अप्रामाणिकता एवं अनुपयोगिता भी। किंतु चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता का जहाँ तक संबंध है वहाँ तक वह एकता, एकरूपता, समता और सद्भावना का प्रतीक प्रतिनिधि ही होना चाहिए।
जन साधारण का चिन्तन बहुत करके धर्म सम्प्रदाय से प्रभावित पाया जाता है। इसलिए उस उद्गम को सही और स्वच्छ ही रखा जाना चाहिए। जिससे कि प्यास बुझाने वाले निर्झर निसृत होते हैं। उद्गम में कहीं से विषैलापन घुस पड़े तो समूची जल धारा दूषित पड़ने लगेगी उसका उपयोग करने वाले गंदगी एवं रुग्णता से घिरेंगे। धर्मों के बीच खाई नहीं पड़नी चाहिए उन्हें अपने पृथक् पहचान बनाये हरते हुए भी इस संदर्भ में एक ही रीति - नीति अपनानी चाहिए कि वे अपने प्रभाव क्षेत्र में उन सिद्धान्तों को सर्वोपरि स्थान देंगे जो मानवी मर्यादाओं के अनुरूप है उसे चरित्रवान एवं समाजनिष्ठ बनाने की दृष्टि से कारगर सिद्ध होते हैं।
अर्वाचीन दर्शन ने व्यापक तथ्यों और तत्वों पर विस्तृत प्रकाश डाला हैं खोजपूर्ण निष्कर्ष भी निकाला है पर ध्यान नहीं रखा कि उन प्रतिपादनों की प्रतिक्रिया क्या होगी फ्रायड का मनोविज्ञान और डार्विन का विकासवाद दोनों ही मिलते-जुलते प्रतिपादन प्रस्तुत करते हैं डार्विन ने मानवी सत्ता को अमीबा कृमि से विकसित हुआ बन्द की औलाद बताया है। फ्रायड का मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य भी एक प्रकार का पशु है उससे भी प्रकृति प्रेरणाएँ अन्य पशुओं की भाँति ही आचरण करने के लिए बाधित करती हैं। आधुनिक मनोविज्ञान दबी हुई पशु प्रवृत्तियों को खुला खेलने की छुट देता है और कहाता है सभ्यता के पक्षधर जिस संयम का अनुबंध लगाता है वह अनुचित है। यौनाचार जैसी उत्तेजनाओं का दमन न करके उनकी पूर्ति के प्रयास करने चाहिए। यौनाचार की तरह ही अन्य आत्म रक्षा स्वार्थपरता, छीन झपट की आपाधापी को भी उस दर्शन में प्रोत्साहन दिया है। इस वर्ग के दार्शनिक इच्छाओँ को भड़काते हैं और असंतोष को उभारते हैं। कहते हैं इस आधार पर अभ्युदय उत्कर्ष का सुयोग बन सकता है। प्रगति का द्वारा खुला सकता है। प्रगति का द्वारा खुल सकता है। वैभव को वे शक्ति मानते हैं और उसे संपादित करने में नीति अनीति के असमंजस को आड़े आने देने का विरोध करते हैं।
यही दर्शन हमें स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जाता है। विज्ञानवर्ग में उसका ऊहापोह और समर्थन होता है। आधुनिकता को अनैतिकता का रूप देने में अर्वाचीन दर्शन ने अपने समर्थन में अनेकों तर्क, तथ्य और प्रमाण उपस्थिति किये हैं। तर्कों से काटने की क्षमता जिनमें नहीं है, उनके लिए थाली में परोसी गई रसोई से ही पेट भरने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। आवश्यक है कि इस दिग्भ्रान्त दर्शन के कान में कहा जाय कि वे जो सिद्ध करना चाहते हैं वह सही हो या न हो, पर उसका प्रभाव लोक मानस पर इस स्तर का पड़ेगा जिससे मानवी गरिमा को अपनाने के लिए जन साधारण का विश्वास समाप्त हो जाय। कलहकारी सम्प्रदायों की तरह यह अर्वाचीन तत्व दर्शन भी गरिमा को उच्चस्तरीय बनाने में बाधक ही हैं।
यौवन रहते, वृद्धावस्था की संभावना का ध्यान रखो। सुविधा के रहते संकट से बचाव करो। जीवित रहते मृत्यु की पीड़ा से बच निकलो।
ईश्वर भक्त-अभक्त का बहीखाता नहीं रखता उसके लिए हर ईमानदार अपना और हर बेईमान शैतान की बिरादरी का है।
ईश्वर को किसी से मनुहार चाहिये न उपहार। चरित्रवान ओर लोक सेवी बन कर ही हम उसे प्रसन्न कर सकते हैं।
सन्त बलहीरी अपनी शिष्य मंडली के साथ सड़क पर जा रहे थे। ऊपर के मकान से किसी औरत ने टोकरा भरी गीली राख फेंक दी। हीरी के सारे कपड़े और शरीर लथपथ हो गये।
शिष्य उस औरत पर बिगड़े ओर मारने पर उतारू हो गये।
सन्त ने कहा-किसी पूर्व कर्म के फल स्वरूप आग बरसने वाली थी। खुदा का शुक्र है कि उसकी जगह कीचड़ का ही सामना करना पड़ा। विग्रहों को शान्ति से इस तरह बदला जाता है।
शाहजादा अलहीरी मकतब से पालकी में बैठकर लौट रहा था। रास्ते में घायल गधा पड़ा मिला। शहजादा उत्तर पड़ा उसने अपने कपड़े फाड़े और जहाँ-जहाँ जख्मों का कौए काट रहे थे, उन्हीं सभी जगहों पर पट्टी बाँध दी। गधे की आँखों में झाँका तो भगवान आशीर्वाद देते दिखे।
इस छोटे से पुण्य ने उनकी आत्मा को प्रेम रस में सराबोर कर दिया। वे घरेलू काम कन्धे से विरक्त होकर सूफी सन्त बन गये और जन-जन से मिल कर मुहब्बत और भलाई की नसीहतें देने लगे।
बगदाद का व्यापारी वहराम ऊँटों के काफिले लादकर विदेशों में व्यापार करने जाया करता था। एक बार उसका काफिला डाकुओं ने लूट लिया और सरी पूँजी चली गई।
उसकी दशा पर आँसू बहाने और सहानुभूति दिखाने अनेकों मित्र आये। आगन्तुकों का अहसान मानते हुए उसने कहा- “मेरा ईश्वर और भविष्य पर से विश्वास उठा नहीं है।” इतना बच रहने पर, मैं कंगालों की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता।
सम्पदा सम्पादित करना अपने हाथ के सर्वथा बस बूते की बात नहीं है। परिस्थितियों की प्रतिकूलता उसमें बाधक भी हो सकती हैं। प्रकृति प्रकोपों के कारण कई बार ऐसी विपन्नता उत्पन्न हो जाती है कि कराधरा पुरुषार्थ मटियामेट हो जाता है।
खेत में अच्छा बीज डालने और खाद पानी का समुचित प्रबन्ध करने से भी यह निश्चित नहीं है कि इच्छित उत्पादन होकर ही रहेगा। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, आले, कीड़े टिड्डी जैसे कई उत्पात खड़े हो सकते हैं। दांव लगे तो वन्य पशु और पक्षी भी उसके अधिकाँश भाग को हड़प सकते हैं। चोर उपज को ही नहीं खड़ी फसल को भी काट सकते हैं। आँधी तूफान से भारी क्षति हो सकती है। सहायता के लिए मजदूर न मिलें, बैल बीमारी से चल बसें,तो सम्पन्न बनने की योजना में प्रकृतिगत या मानवी कारणों से ऐसा कुछ हो सकता है, सिसे मनसूबे धरे के धरे ही रह जायँ। प्रयास के साथ परिस्थिति की अनुकूलता और साधन सहयोग की विपुलता ही भौतिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है, अन्यथा मनसूबे धरे के धरे रह जाते हैं।
उच्च शिक्षा की प्राप्ति, ऊँचे पद पर आरुढ़ होना, प्रतियोगिताओं में सफल होना, उन्नतिशील बनने के लिए आवश्यक है। इनके लिए पूरी तैयारी करने पर भी आकस्मिक रुग्णता, दुर्घटना, आवेश भरी योजना कुछ से कुछ कर सकती है। जो ऐसा सँजोया गया था वह उलट हो सकता है। यह भी संभव है कि उच्चशिक्षा प्राप्त कर लेने पर अनुरूप पद न मिले और किसी छोटी आजीविका से सन्तोश करना पड़े। पहलवान भी दंगल में मात खा जाते हैं। अफसर भी पदावनत और निलंबित होते देखे गए हैं। जीवन भर की कमाई को चोर चुरा सकते हैं। कपटी....... ठग. विश्वासघात की चोट मार सकते हैं। घर के कुपात्र सदस्य ही कुसंग में पड़कर दुर्व्यसनों के शिकार बनकर उस सम्पदा को स्वाहा कर सकते हैं। घर के कुपात्र सदस्य ही कुसंग में पड़कर दुर्व्यसनों के शिकार बनकर उस सम्पदा को स्वाहा कर सकते हैं, जिसके बारे में सोचा गया था कि जिन्दगी का सहारा बनेगी और सुख सुविधाओं में कोई कमी न पड़ेगी। सम्पन्नता अभीष्ट तो है, पर प्रयत्न रत व्यक्ति उसका समुचित लाभ उठा सकेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं।
इसकी तुलना में सुसंस्कारिता की फसल ऐसी है जो मात्र अपने संकल्प के बलबूते उगाई और पकाई जा सकती है। मन अपना है। शरीर भी अपना है। उन दानोँ पर पूरी तरह अपना स्वामित्व है। इच्छानुसार उन्हें सिखाया, समझाया, बदला सुधारा और मोड़ा मरोड़ा जा सकता है। इस क्षेत्र में किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं। यदि प्रण कर लिया जाय कि सुसंस्कारी बन कर रहेंगे तो यह प्रतिभा अपने बलबूते पूरी की जा सकती है। दूसरोँ की सहायता इसके लिए आवश्यक नहीं। प्रतिकूलताओं की स्थिति में थोड़ी कठिनाई तो हो सकती है पर इतनी शक्ति किसी में नहीं जो आदर्शों के प्रति निष्ठावान को पतित पराभूत कर सके। शरीर पर आघात हो सकते हैं। साधनों को नष्ट किया जा सकता है; किन्तु यह संभव नहीं कि व्रतशीलों को नष्ट किया जा सकता है; किन्तु यह संभव नहीं कि व्रतशीलों को उत्कृष्टता अपनाये रहन से विरत कर सकें। देव मानवों की कथ गाथायें इसकी साक्षी हैं कि उनने कठिन समय में भी महानता अपनाये रखी। व्यवधानों को सहते या विकट संघर्ष करके उन्हें निरस्त करते रहे। उत्कृष्टता ऐसा सम्बल है कि यदि उसे एक बार दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया जाय तो फिर उससे डिगा सकने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। दधिचि, भागीरथ, हरिश्चंद्र मोरध्वज कर्ण आदि ने महानता को अक्षुण्ण रखने का निश्चय किया था। कठिनाईयाँ आती रहीं और वे उन्हें दुलराते रहे। ध्रुव प्रह्लाद जैसे बालकों के साहस भी कठिन प्रसंगों में न टूटे। दमयन्ती, सीता, सावित्री, सुकन्या, शैव्या अरुन्धती, इला, अपाला एवं मीरा जैसी महिलायें जब अपनी उत्कृष्टता को अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए कटिबद्ध हो गई तो उनकी गरिमा पर उँगली उठाने की किसी में भी हिम्मत न हुई। विपत्तियों के तूफान उनसे टकराकर वापस लौट गए।
भौतिक सम्पदाओं को उन्नति का आधार तो माना जा सकता है, पर कोई दावे के साथ यह नहीं कह सकता है। कि वह उस आकाँक्षा को पूरा करके ही रहेगी। उस निमित्त पोषण ही पर्याप्त नहीं। परिस्थितियों की अनुकूलता भी चाहिए। प्रतिकूलता के अड़ जोन पर तो सारा गुड़ गोबर हो जाता है।
सुसंस्कारिता सम्पादन के संबंध में ऐसी बात नहीं है। उसे स्वावलम्बनपूर्वक कमाया और बढ़ाया जा सकता है। सद्गुणों का अभ्यास अपने बलबूते हो सकता हैं। दुर्बल मन वाले ही कुसंग से प्रभावित होते है। मनस्वी के लिए आत्मा का संकल्प और परमात्मा का विश्वास इन दोनों के सुदृढ़ बने रहने पर ही काम चल जाता है। बुरी आदतें डाली जा सकती हैं, पर यह नहीं समझना चाहिए कि अच्छी आदतें डालना उससे कठिन है। कुम्हार अपनी मर्जी के अनुरूप चाक पर चित्र विचित्र आकृतियों के बर्तन बनाता रहता है मनुष्य की अन्तरात्मा यदि समर्थ सतेज बनी रहे तो वह भी अपने आप को जैसा भी चाहे भला या बुरा गढ़ सकता है। यह कार्य कठिन नहीं सरल है। समृद्धि अर्जित करने की तुलना में प्रतिभा का उपार्जन सरल है।
एक गान्धी पर करोड़ करोड़पतियों को निछावर किया जा सकता है। एक महामानव लाख पहलवानों से बढ़कर है। इस तथ्य को यदि समझा जा सके तो व्यक्ति समृद्ध बनने के लिए कितना प्रयत्न करता है, उससे हजार गुना अधिक प्रबुद्ध बनने के लिए करें।
मूर्धन्य कर्णधारों को यदि यह सूझ पड़े कि प्रजाजनों की शारीरिक आवश्यकताओं की तरह अन्तरात्मा की भावनाओं को विकसित करना भी आवश्यक है, तो वे दूसरी तरह से सोचें और अपनी प्रयास योजनाओं का कम से कम आधा भाग सद्भाव सम्वर्धन के लिए निश्चय ही सुरक्षित रखें। विचारशील व्यक्ति आलस्य प्रमाद से छूट सकता है अवगति के गड्ढ से उछलकर प्रगति की मुंडेर पर आ सकता है। और उस राजमार्ग को पकड़ सकता है, जिस पर चलते हुए अपनी ही नहीं प्रभाव क्षेत्र की भी दरिद्रता को मार भगा सकता है सम्पत्ति पुरुषार्थ को उत्पन्न नहीं करती। पुरुषार्थ सम्पत्ति को उत्पन्न करता हैं संपदा से मनुष्य पैदा नहीं होता। मनुष्य के पसीने से दौलत पैदा होती है। यह समझ जा सके तो मनुष्य को समृद्ध, शिक्षित, बलिष्ठ, चतुर, बनाने की अपेक्षा ऐसा शिल्पी बनाया जाय जो अपने आपे को भी ढाल सके और समीपवर्ती मिट्टी खोद कर उसे देव प्रतिमा के रूप में सुसज्जित करदे। आवश्यकता इसी कौशल को सीखने और सिखाने की है। यदि ऐसा एक व्यक्ति ढल सके, तो उस पर स्नातक प्रमाण पत्रों के गाड़ी भरे कागज तोरणों की तरह स्वागत पथ पर लटकाये जा सकते हैं।
सद्गुणी स्वल्प साधनों में भी उसका सदुपयोग करते हुए अमीरों से अधिक प्रसन्न रह सकता है। और निबाह के अतिरिक्त उतनी पूँजी से प्रगति से साधन भी जुटा सकता है। किन्तु यदि दुर्गुणों की, दुर्व्यसनों की भरमार हुई महत्वाकाँक्षाओं की मदिरा जैसी खुमारी चढ़ी रही तो फिर समझना चाहिए, कि कुबेर का कोश या कारुँ का खजाना भी कम पड़ेगा। सम्पत्ति को दुर्व्यसन के समीप ले जाते ही वह इस प्रकार जल कर खाक हो जाती है मानो पुआल के ऐर में किसी ने जलती लकड़ी डाल दी हो।
परिश्रमी पसीने की बूँदों से खेती उगाते हैं। सज्जन अपने अनेकों सहयोगी और प्रशंसक बुला लेते हैं। जिज्ञासा उभरे तो समाधान बताने वाले किसी भी कोने से निकल आते हैं। पढ़ने में रुचि हो तो जेल के कैदी लोहे के तसले पर कंकड़ों की कलम बनाकर एक दूसरे से पूछते हुए विद्यावान् बने दीखते हैं। इसी प्रगतिशीलता को बोते, उगाते, सींचते, बढ़ाते ओर रखवाली करते हुए वैभव भरी उपज के स्तर तक पहुँचाया जाना चाहिए। यदि यह लगन लग पड़े तो अकबर जैसे निरक्षर तने प्रवीण हो सकते हैं कि बचपन से ही काम काज संभाल लें और सभा के नवरत्नों का मार्ग दर्शन करें।
शिक्षा का अपना महत्व है। साक्षरता संवर्धन के लिए सरकारी ओर गैर सरकारी प्रयत्न चलते ही रहने चाहिए। पैसे की अपनी आवश्यकता है। गरीबी भगाओ आन्दोलन के अंतर्गत हर व्यक्ति को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाया जाना चाहिए। इन प्रयत्नों को रोकने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें तो बढ़ावा ही मिलना चाहिए। कहा यह जा रहा है कि उस प्रज्ञा उन्नयन की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए जिसके आधार पर मनुष्य अपनी गरिमा को पहचानता है जिम्मेदारी को समझता है ओर साहस भरे पराक्रम के आधार पर जो हस्तगत हो सकता है, उसकी अनुभूति कर सके।
इसके लिए अलग से कोई विभाग खोलने की जरूरत नहीं है। जो भी वर्ग, क्षेत्र, उपक्रम है, उन्हीं के साथ यह सरसता घुलती रहनी चाहिए कि हर मनुष्य समझदारी ईमानदारी और बहादुरी का महत्व सीखे। हँसती हँसाती जिन्दगी जियें। अपनी खुशी बाँटे ओर दूसरों का दुःख बंटायें। सलाह लें और सम्मान दें। व्यस्त रहें मस्त रहें। कृतज्ञ रहें और सज्जन बनें। इस प्रक्रिया के लिए अलग से विद्यालय खुले तो भी हर्ज नहीं। हर समझदार व्यक्ति अपने आपके सज्जनोचित ढाँचे में ढाले। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता का समावेश होने दे। इतना करने भर से दूसरों पर उसका प्रभाव पड़ेगा और समीपवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक उस प्रक्रिया का अनुकरण करने लगेंगे। चोरी लोग इसलिए करते हैं कि उसका लाभ तत्काल और प्रत्यक्ष दीख पड़ता है शालीनता उससे बढ़कर है। उसे अपनाने पर आत्मसंतोष, लोकसम्मान और दैवी अनुग्रह का तिहरा लाभ मिलने जैसी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। उसका सत्परिणाम नकद धर्म की तरह सामने आते हैं। दुर्जन अपने ढंग का दर्प अहंकार दिखाते फिरते हैं पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सज्जनों के पास ऐसा कुछ नहीं होता जिसके कारण अपने को आनन्द और दूसरों को उल्लास दिया जा सके।
शुरुआत अपने से की जा सकती है। शुभारंभ के लिए आज का दिन ही परम श्रेष्ठ माना जा सकता है। प्रयोगशाला नई बनाने की जरूरत नहीं है। अपने मस्तिष्क एवं चिन्तन का उद्यान उगाया जा सकता है और शरीर द्वारा ऐसी जीवनचर्या का निर्धारण किया जा सकता है। जिसमें गुण कर्म, स्वभाव की आदर्शवादिता पग-पग पर दृष्टिगोचर होने लगे। गुलाब खिलता है तो उसकी महक चारों और फैलती है। चन्दन अपने समीपवर्ती झाड़-झंखाड़ को भी सुगंधित बना लेता है। इन तथ्यों को जो भी समझ सके वह अपने को सुधारे-समीपवर्ती तो अनायास ही सुधरता चला जाएगा।
पुरानी बात है चीन के दो व्यक्तियों ने आमने-सामने दुकानें खोली। दोनों ही धड़ल्ले से चलने लगीं। ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है और कमाई भी खूब होती।
इतने पर भी दोनों ही दुःखी रहते, उन्हें कितने ही बीमारियों ने घेर लिया और सूख-सूख कर काँटा हो चेल। ला कोई कारगर न हुआ तो मौत के दिन गिनने लगे।
समझदारों ने सलाह दी कि वे कन्फ्यूशियस के पास परामर्श के लिए जायँ। कई बार दार्शनिक चिकित्सकों से अच्छा इलाज कर देते थे।
दोनों की अन्तर्व्यथा कन्फ्यूशियस ने सूनी। दोनों ईर्ष्या के मरीज थे। सामने वाले की बढ़ोत्तरी सहन न कर पाते और मन ही मन कुढ़ते रहते। यही था उनकी बीमारियों का मूल कारण।
कन्फ्यूशियस ने इलाज बताया वे दुकानों के काउन्टर बदल लें। मालिकी ईश्वर की समझें ओर उनके गुमास्ते की तरह काम करते रहें।
इस उपाय से ईर्ष्या से पिण्ड छूटा और कुछ ही समय में दोनोँ पूरी तरह निरोग हो गए।
दो परस्पर विरोधी युगों का मिलनकाल बड़ा विचित्र होता है। उस अवधि में जो विसंगतियाँ दीख पड़ती है। वे बहुत ही विचित्र होती हैं। विसंगतियाँ दीख पड़ती हैं, वे बहुत ही विचित्र होती हैं। बह्ममूहूर्त में तारे बुझने लगते हैं। और तमिस्रा घनीभूत हो जाती है। विदा होने से पहले अन्धकार इतना गहन होता है जितना रात्रि के अन्य प्रहरों में नहीं होता। दूसरी ओर ऊषाकाल का अरुणोदय पूर्व प्राची दिशा में धीमा उजाला भी मुस्कान आरम्भ कर देती है। अन्धकार का घटना और प्रकाश का बढ़ना दोनों परस्पर विरोधी हैं। किन्तु फिर भी वे अपने समय पर अपना काम करते ही हैं। दीपक जब बुझने को होता है तो उसकी लौ बार-बार उदीप्त होती और अन्त में बन्द हो जाती है। मृतक भी अपनी सांसें अन्तिम क्षणों में बड़ी तेजी से चलाता है। बीज एक और गलता जाता है दूसरी ओर नवाँकुरों का उत्पादन भी करता है। शिशु जन्म के समय कितनी विकट प्रसव पीड़ा होती है इसे सभी जानते हैं पर साथ ही यह भी आशा करते हैं कि कुल का दीपक जन्मेगा और परिवार का सहारा बनेगा।
इन्हें परस्पर विरोधी बातें कह सकते हैं किन्तु परिवर्तन कालों में सदा ऐसा ही होता है। बसन्ती शोभा सुषमा बिखरने से पूर्व शीतल हेमंत का साम्राज्य होता है। पेड़ों से पत्ते गिरते और उन्हें कुरूप ठूँठ बना देते हैं पर उस समय के तनिक खिसकते ही नहीं कोपलों और फूलों का सिलसिला आरम्भ होता है। जिससे वातावरण उल्लासमय बनता और मधुर फल लगने का क्रम चल पड़ता है। ग्रीष्म सब कुछ सुखा देती है। अन्धड़ों और चक्रवातों की विभीषिका खड़ी कर देती है। पर उसका समापन होते होते ठीक प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनती है और बादलों के घटाटोप दौड़ पड़ते हैं, जल थल एक कर देने वाली वर्षा होती है। हरितिमा का मखमली फर्श सारी जीवन पर बिछ जाता है। तपते ग्रीष्म और बरसते श्रावण की तुलना की जाय तो उनके बीच जमीन आसमान जैसा अन्तर दीख पड़ता है। परिवर्तन काल ऐसे ही विचित्र होते हैं। जीवित को मरणकाल में प्राण त्यागने पड़ते हैं और मूत्रमार्ग में बेहोश पड़ा भ्रूण प्रसवकाल के क्षणों में नवजीवन का परिचय देता है। प्रकृति की यह विचित्रताएं लगती तो आश्चर्यजनक हैं पर हैं सुनिश्चित और आवश्यक। यदि ऐसा न होता तो सर्वत्र स्थिर जड़ता दृष्टिगोचर होती है। परिवर्तन का मोहक नृत्य समाप्त हो जाने पर यहाँ नीरवता निस्तब्धता छा जाती।
सृष्टा ने इस धरती की शोभा सुव्यवस्था बनाये रहने का दायित्व अपने ज्येष्ठ पुत्र मनुष्य के कंधों पर सौंपा है। साथ ही यह निर्देश किया है कि अपनी गरिमा को सुसंस्कृत स्तर तक पहुँचाने का प्रयत्न करे। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते समय जो हेय स्तर की आदतें मान्यताएँ गतिविधियां एकत्र कर ली हैं। उन्हें खरपतवार की तरह उखाड़ फेंके कूड़े कचरे की तरह बुहार डालें ताकि शक्तियों को अपव्यय बचे और ऐसे क्रिया कलाप चल सके। धरती की स्वर्गोपम उपमा गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे।
देखा जाता है कि मनुष्य जहाँ स्वाभाविक रूप से अति महान है वहाँ उसमें यह दोष भी है कि अपने गौरव और दायित्व को भुलाकर ईद गिर्द चल रही गतिविधियाँ से प्रभावित होकर उन्हीं का अनुकरण अनुगमन करने लगते हैं। सतयुगी वातावरण के दिनों में श्रेष्ठता का आवेश ही हर किसी पर छाया रहता है और आदर्शवादिता के क्षेत्र में हर कोई अपने पराक्रम एवं वर्चस्व का प्रमाण प्रस्तुत करते रहते हैं। प्रतिस्पर्धा की घुड़दौड़ लगी रहती है। सर्वत्र महामानवों का ही बाहुल्य दीख पड़ता है। किन्तु जब मनुष्य उलटी राह चलता है, कीचड़ और गंदगी में लोटता है तो शरीर परिधान सभी दुर्गन्ध से भर जाते हैं। उन्हें छूने तक की इच्छा नहीं होती ऐसे लोगों का बाहुल्य जहाँ भी जब भी होती है, तब वहाँ वीभत्स दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं। शराब खाने में गाली गलौज और जुल्म जोर की ही माहौल दीख पड़ता है। यह कलियुग है उसी को अवाँछनीय दीख पड़ता है। यह कलियुग है उसी को अवाँछनीय वातावरण कहते हैं जब नीतिमत्ता के निर्वाह की जिम्मेदारी का परित्याग कर दिया जाता है तो दृश्य नरक जैसा ही बन जाता है। उससे व्यक्ति का पतन और समाज का पराभव होता है। विग्रह और विनाश के शोक और संताप के दृश्य दिखाई देने लगते हैं। इन दिनों हमें ऐसे ही वातावरण में रहना पड़ रहा है। विषम परिस्थितियाँ चारों ओर से नोचती कचोटती दीख पड़ती हैं।
बिगड़े का सुधार आवश्यक है। टूट-फूट की मरम्मत की जाती है। जराजीर्ण भवनों को ठोक पीट कर काम चलाऊ बनाया जाता है। बर्तनों और कपड़ों की भी ऐसी ही साज सँभाल चलती है। इसके लिए मनुष्यों को ही आगे आना पड़ता है। यों मूलतः निर्माता के किये पर ही बिगाड़ को सुधारने की भी जिम्मेदारी है। मकान मालिक ही मरम्मत और रंग रोगन कराता है। प्रान्तीय क्षेत्रीय शासन जब अव्यवस्था और अराजकता से घिरे जाते हैं तब कार्यवाहकों को निलम्बित या परिवर्तित कर दिया जाता है। राष्ट्रपति शासन लागू होता है। मनुष्य जब तक बिगड़ी परिस्थितियों को सन्त, सुधारक और शहीदों के माध्यम से सामयिक अव्यवस्थाओं को सँभालता रहता है तब तक उसके पौरुष और वर्चस्व की प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा ही बनी रहने दी जाती है। कोई ऊपरी छेड़खानी नहीं होती। किन्तु जब पतन का प्रवाह द्रुतगामी हो जाता है तो उसकी रोकथाम करने और साज संभाल का जुगाड़ बिठाने के लिए अधिष्ठाता को अपना मार्शल कानून लगाना पड़ता है। स्थिति को संभालने वाले प्रशिक्षित अफसर भेजने पड़ते हैं। इसी का नाम अवतार है। अधर्म की बढ़ोतरी और धम के ह्रास जैसी विषम परिस्थितियों में स्वयं आकर साज संभाल करने का दिया हुआ वचन भूतकाल में भी चरितार्थ होता रहा है और अब भी होने जा रहा है। निराकार परमेश्वर स्वयं तो जन्म नहीं ले सकता और न किसी व्यक्ति विशेष के छोटे कलेवर में सीमाबद्ध होकर विशाल ब्रह्माण्ड के घट घट में समाया रह सकता है। जो असंभव है वह न पिछले दिनों हुआ है और न अब या अगले दिनों होगा अवतार एक अन्धड़ तूफान की तरह आता है जिसके सहायक होने की इच्छुकों की पात्रता उन्हें बढ़-चढ़कर काम करने का अवसर प्रदान करती है। युग सृजेता उत्पन्न होते हैं और उलटे उलटकर सीधा करने की प्रक्रिया में प्राणपण से जुटकर नियन्ता के संकेतों को समझते हुए उसकी इच्छापूर्ति में अपनी समग्र सत्ता को नियोजित करते हैं। कर्तृत्व मनुष्य का होता है और नेतृत्व भगवान का। ऐसी दशा में कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं और सामान्य स्तर के दीखने वाले मनुष्य भी ऐसे काम करते हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। युगपरिवर्तन के अवसरों में सृजन सैनिकों का पराक्रम ऐसा ही होता है, जिसे तुच्छ मनुष्य कदाचित ही कभी कर सके। तूफान जब आते हैं तो उसके साथ पड़कर रेत के कण और सूखे पते उड़ते चले जाते हैं और आसमान चूमते हैं। नगण्य सही टहनियाँ नदी के प्रचण्ड प्रवाह में पड़कर द्रुतगति से सनसनाती चली जाती है और लम्बी यात्रा पूरी करके समुद्र तक पहुँचती है। ग्रीष्म की बहुलता में साधारण हवा के झोंके चक्रवात बनते हैं और पेड़ों को उखाड़ते झोंपड़े के उछालते चले जाते हैं युग परिवर्तन के समय भी ऐसा ही होता है। साँसारिक दृष्टि में सामान्य योग्यता और परिस्थिति के व्यक्ति जब उच्चस्तरीय परमार्थिक काम करने खड़े होते हैं तो उन्हें भगवान की अतिरिक्त शक्ति सहायता करती है। उसी के बलबूते वे इतने बड़े काम कर दिखाते हैं जिन्हें मानुषी कहने में झिझक होती है जिन्हें दैवी कहने को ही मन करता है। ऐसे अनेकानेक उदाहरण इतिहास में मौजूद है और आगे भी प्रस्तुत होते रहेंगे।
हनुमान, अंगद, अर्जुन, भीम, परशुराम, अगस्त्य दधिचि, भागीरथ, राम कृष्ण, बुद्ध, गान्धी, ईसा दयानन्द, विवेकानन्द आदि कृत्यों को देखकर यह अनुमान लगाना पड़ता है कि यदि उनके साथ दैवी अनुग्रह न रहा होता तो इतने असाधारण कार्य कर सकने में उन्हें आश्चर्यजनक सफलताएँ क्यों कर मिलती हैं? रीछ वानरों की सहायता से समुद्र पर पुल कैसे बन जाता है। लाठी का टेका लगाकर ग्वालबाल गोवर्धन उठाने में कैसे सफल हो पाते हैं अनीति का उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति संवर्धन में दैवी सहायता सदा ही उपलब्ध होती रही और होती रहेगी।
अदृश्यदर्शी अपनी दिव्य दृष्टि से यही सब होते हुए देख रहे हैं। उन्हें हस्तामलकवत् यह दीख रहा है कि मनुष्य ने अपनी मर्यादा और गरिमा को तिलाँजलि दे दी फलस्वरूप अदृश्य वातावरण विषाक्त हो गया। प्रकृति प्रतिकूलताएँ उगलने लगीं। विपत्ति बरसाने लगी और ऐसे दलदल जैसी परिस्थिति बन गई जिसकी विभीषिका विश्व विनाश जैसा संकट खड़ा किये हुए है। आशंका और आतंक से हर किसी का दिल धड़क रहा है।
उबरने का उपाय एक ही है मानवी सुधार प्रयासों के असफल हो जाने पर उसका दूसरा उपचार आद्यशक्ति महाप्रज्ञा के अवतरण रूप में सामने आये और अपने वीरभद्रों को सुधार प्रयासों में जुटाये। विश्वास यही बन गया है कि यही होकर रहेगा। असुरता की लंका जलेगी और स्वयं फिर से नये रूप में प्रकट होगा। इस प्रकटीकरण का प्रत्यक्ष प्रभाव एक ही रूप में दीख पड़ेगा कि युगशिल्पियों को एक सृजन वाहिनी अनायास ही इन दिनों उग पड़ेगी। उसका पुरुषार्थ उन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा, जिनकी की इन्हीं घड़ियों अविलम्ब आवश्यकता है। बुरा समय इन दिनों घिरा हुआ दीख अवश्य रहा है पर ऐसा प्रचण्ड वायु वेग का माहौल भी बन रहा है, जो इन घटाटोप को उड़ाकर कहीं से कहीं पहुँचा देगा।
पूर्णिमा का चाँद अपनी समग्रता को बखानने और इतराने लगा। दूसरे दिन से ही उसका घटना शुरू हो गया। अमावस्या तक पहुँचते-पहुँचते उसका नामों निशान मिट गया।
शुक्ल पक्ष की द्वितीय का चाँद निकला तो उसने अपने तुच्छता को समझा और विकास के लिए प्रयत्नशील बढ़ने लगीं।
ईसा एक गाँव से होकर गुजर रहे थे। उनने एक आदमी को वेश्या के पीछे भागते हुए देखा, तो रुक गए और उसे अनुचित से रुकने की बात समझाने लगे।
गौर से चेहरा देखा तो वह पूर्ण परिचित-सा लगा। स्मरण करने पर पुरानी घटना याद आई। उनने फिर कहा अरे तू तो वह व्यक्ति है जिसने दो वर्ष पूर्व अंधेपन से छुटकारा पाने की याचना की थी और मैंने प्रभु से प्रार्थना करके ज्योति दिलाई थी।
उस व्यक्ति ने ईसा को पहचान लिया और बोला “आप जो कहते है। सो ही यथार्थ है। मैंने तुझे दृष्टि इसीलिए दिलाई थी कि उसका उपयोग ऐसे घिनौने काम के लिए करे।
व्यक्ति कुछ देर चुप बैठा रहा और अपनी भूल पर आँसू बहाता रहा, पर आगे पैर बढ़ाते हुए महाप्रभु के चरण चूम उसने दबी जबान से इतना और कहा आप में नेत्र दृष्टि दिलाने की सामर्थ्य थी यदि विवेक दृष्टि पहले दिलाई होती?
ईसा ने आज नया पाठ पढ़ा वे लोगों की सुविधा दिलवाने की अपेक्षा उनकी समझ सुधारने की बात को प्राथमिकता देने लगे।
कहते हैं विष्णु शेष शैय्या पर क्षीर सागर में सोते रहते है। उनकी निद्रा में कोई विघ्न न डाले इसलिए शैय्या रूप में पड़ा हुआ सहस्रमुखी शेषनाग सदा फन फैलाये तैयार रहेगा। उनके विश्राम में किसी प्रकार की विघ्न बाधा न पड़े इसलिए लक्ष्मी जी पैताने बैठी चरण चापा करती रहती हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका एक ही उत्तर है कि वे अपने ज्येष्ठ पुत्र मनुष्य पर बहुत भरोसा करते हैं। उनका विश्वास है कि जो भी समस्यायें, अड़चनें कभी आती होंगी उनका निराकरण वह अपनी समर्थता और बुद्धिमत्ता के सहारे कर लेगा। इस निमित्त उसे बहुत कुछ दिया भी गया है। सृष्टा ने अपनी अन्नत क्षमताओं को मनुष्य के बीज रूप में भर दिया है, ताकि उसे आत्मबल का भरोसा बना रहे और साथ ही यह ध्यान भी बना रहे कि प्रसुप्ति को जागृति में बदलना है। बीज के भीतर वृक्ष सोया रहता है। उसे धरती में बोना और खाद पानी से सींचना पड़ता है तभी वह सुयोग बनता है जिसके सहारे कोठों भरे धन धान्य का भण्डारण वैभव की वृद्धि करे।
हनुमान में सामर्थ्य थी, पर बिना उद्बोधन के वह न प्रकट हो सकी न क्रियान्वित। प्रसुप्त अन्तःकरण की स्थिति में भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करके अपना गुजारा करते थे। राम लक्ष्मण के संपर्क से विद्युत करेन्ट उन्हें छू गया तो राम लक्ष्मण के संपर्क से विद्युत करेन्ट उन्हें छू गया तो स्थिति बदल गई और महावीर विक्रम बजरंगी हो गये। अगले प्रसंगों में वह अवसर भी आता है जब समुद्र लांघने की समस्या थी। गदाधारियों में से सभी चकरा रहे थे। हनुमान भी कार्य की विशालता और भयंकरता देखकर मौन धारण किये एक कोने में उदास बैठे थे। जामवन्त ने जब उद्बोधन दिया तो उनका आत्म विस्मरण छूटा। कटिबद्ध हुए और देखते-देखते समुद्र लांघ कर लंका को वीरान करने में लग गये।
शेषशायी विष्णु वह है जो मनुष्य की क्षमता और गरिमा के भरोसे यह विश्वास करता है कि सब कुछ ठीक चलता होगा ओर ठीक चलेगा। जब आभास होता है कि दायित्व निभ नहीं रहा है तो स्वयं आगे आते हैं। शयन शैय्या छोड़ते हैं और पराक्रम भरे चक्र सुदर्शन को गति देते हैं। उनने वाराह नृसिंह और परशुराम के रूप में धारण किये हैं और अवसाद आतंक को जड़ मूल से उखाड़ कर भगाया है। उनने लंका की बलिष्ठ असुरता का भी विनाश किया है और द्वापर में अनौचित्य के विरुद्ध महाभारत का भी सरंजाम जुटाते रहे हैं। उनने बुद्ध गान्धी के रूप में भी पराक्रम किये हैं। मनुष्य को कृपणता बरतने देखकर उनने गीता का तत्वावधान भी समझाया और सारथी बन कर अर्जुन का रथ सही मार्ग पर चलाया।
प्रथम आक्रमण सदा बाजी जीतता रहा है। पीछे उसका परिणाम कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े? देव दानव संग्राम में सदा प्रथम विजय दैत्यों की ही हुई है। देव वर्ग अपने जैसा सज्जन दूसरों को भी मानता रहा है और कल्पना करता रहा है कि दुष्टता चरम सीमा तक पहुँचने से से पहले ही रुक जायेगी। किन्तु यह अनुमान गलत ही साबित हो रहा है। आक्रमण के विरुद्ध प्रत्याक्रमण करना पड़ा है। यों देवत्व इस संदर्भ में अभ्यस्त और प्रवीण नहीं होता इसलिए उसे निराकरण में देर भी लगी है और कठिनाई भी झेलनी पड़ी है। किन्तु एक सुयोग देवपक्ष के साथ जुड़ा रहा है कि उसे अदृश्य शक्तियों का सहयोग उपलब्ध होता रहा है। दुर्दान्त वृत्तासुर का आतंक जब चरम सीमा पर पहुँचा तो देवता घबराये वे प्रजापति के पास पहुँचे उनने देवताओं की संयुक्त शक्ति एकत्रित की और उससे दुर्गा का सृजन किया। महाशक्ति ने महिषासुर शुँभ निशुँभ, मधुकैटभ, रक्तबीज आदि को धराशायी बना दिया। इस कथा में तथ्य इतना ही है कि देवमानवों की संयुक्त शक्ति यदि दानवों के विरुद्ध अड़ जाय तो सफलता में कोई सन्देह नहीं रह जाता। इन्द्र को हारा देखकर दधिचि ने अपनी अस्थियाँ ऐसा वज्र बनाने के लिए दे दी थी कि देव वर्ग की जीत निश्चित हो गई। वह कथा सभी को याद है जिसमें ऋषियों के रक्त संग्रह से घड़ा भरा गया था और उस घड़े से सीता जन्म जो असुरता को गढ़ को विस्मार करने में निमित्त कारण बनी। उन्हीं के कारण रीछ वानरों को बहती गंगा में हाथ धोकर अपने को कृतकृत्य करने का अवसर मिला था। यह दैवी सहायता का ही अनुदान है। जिससे देवत्व को शाश्वत सजीव बनी रही और अपनी वरिष्ठता अक्षुण्ण बनाये रह सकी।
संदर्भ आज की परिस्थितियों का है। मायावी बेताल का वितान चारों ओर तना हुआ है। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा जिसमें प्रवेश करने पर जहरीली घुटन अनुभव न होती हो जहाँ सत्यानाशी संभावनाएँ अजगर जैसा सिर उठाये फंसकर न रह हों।
इनके निराकरण के प्रयत्न न किये गये हों सो बात नहीं। पर सोचने का तरीका ईंट का जवाब पत्थर से देने जैसा ही रहा है। माया को माया से काटने के पास बिछाये गये हैं, पर मैल से मैल को कैसे धोये जाय। दानवी मायाचार का मुकाबला उस तरीके को अपना कर तो तभी दिया जा सकता है, उस आक्रान्ता से बढ़कर आक्रमण किया जाय और अनीति के सामने उससे भी बड़ी अनीति खड़ी की जाय। किन्तु यह देव प्रकृति के लिए संभव नहीं उनका स्वभाव ही ऐसा ढाँचे में ढला नहीं होता। ऐसी दशा में संकट की निवृत्ति तभी हो सकती है, जब देव पक्ष को ईश्वरीय सहायता उपलब्ध हो।
यह सब कुछ अनायास ही नहीं हो जाता, वरन् देव पक्ष को भी अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए ऐसी गुहार लगानी पड़ती है जिससे आवश्यकता और पात्रता भगवान के सामने सिद्ध हो सके। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवता आक्रान्त होने पर प्रजापति या विष्णु की शरण में गये हैं ओर समय रहते सहायता मिलने की याचना की है। ग्राह के मुँह में फँसे हुए गज ने भी पुकार की थी और द्रौपदी ने भी लाज जाने की गुहार में समूची भाव संवेदना भर दी थी। इसी मनः स्थिति को दूसरे शब्दों में तप कहते हैं। भागीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए प्रचण्ड तप किया था शिव का वरण करने के लिए पार्वती को भी तप करना पड़ा था। भगवान को गोदी में खिलाने के लिए स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी को कठिन तपस्या करनी पड़ी थी। सृष्टि की संरचना में हाथ डालने से पूर्व ब्रह्माजी को भी उग्र तपस्या पूरी करनी पड़ी थी। भारत भूमि एवं विश्व वसुधा को अनाचार मुक्त बनाने के लिए पिछले दिनों महर्षि रमण योगी अरविन्द आदि ने तपश्चर्या का मार्ग ही अपनाया था। देश की स्वतंत्रता में एक ही समय में अनेकानेक महामानवों के उत्पादन में उन तपस्याओं का असाधारण योगदान रहा है।
वर्तमान परिस्थितियों में विश्व समस्याओं के समाधान हेतु प्रज्ञा अभियान द्वारा सामूहिक तप साधना की एक श्रृंखला चलाई गई है। उसका प्रभाव एकाकी साधना की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। ईसाइयों के गिरजों में रविवार को मुसलमानों की मस्जिदों में शुक्रवार को नमाज की धूम रहती है। जो नित्य नियमित रूप से प्रार्थना नहीं कर सकते, वे भी उन सामूहिक आयोजनों में सरलतापूर्वक सम्मिलित होते हैं। एकाकी प्रयासों की अपेक्षा सम्मिलित कार्यक्रम की शक्ति सामर्थ्य कहीं अधिक होती है, इसे तो हर कोई जानता है।
प्रज्ञा अभियान के सूत्र संचालक ने 24-24 लक्ष्य के 24 गायत्री महापुरश्चरण किये थे। उनका संकल्प किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं वरन् जन कल्याण के निमित्त ही था। आमतौर से साधनाएँ व्यक्तिगत ही होती है। लोग अपने लिए स्वर्ग मुक्ति ऋद्धि सिद्धि देवदर्शन वरदान मनोकामना कष्ट निवारण आदि के निमित्त ही साधनाएँ करते हैं, किन्तु अपनी साधनाएँ आरम्भ से अन्त तक युग परिवर्तन एवं जन कल्याण के निमित्त ही हो रही हैं। महापुरश्चरणों के अन्त में सहस्रकुण्डी यज्ञ भी सामूहिक ही हुआ था और इसके उपरान्त गायत्री अनुष्ठानों एवं यज्ञ आयोजनों का क्रम सामूहिक इबादतों के रूप में ही चला है। अब भी हर नव रात्रि में सामूहिक साधनाएँ ही होती हैं।
युग संधि के संदर्भ में विगत 4 वर्ष से प्रतिदिन 240 करोड़ गायत्री जप आयोजन चल रहा है। प्रज्ञा परिवार के प्रायः सभी 24 लाख परिजन प्रतिदिन दो माला गायत्री जप न्यूनतम करते हैं। एक माला आत्म परिष्कार के लिए दूसरी विश्व कल्याण के लिए। इस प्रकार न्यूनतम 240 करोड़ जप नित्य हो जाता है। ऐसी योजना कहीं भी कभी भी अब तक नहीं बनी है।
इसी प्रयोजन के लिए अब से तीन वर्ष पूर्व सूक्ष्मीकरण साधना आरंभ की गई थी। उसे सावित्री साधना के नाम से जाना गया था और पंचकोशों का अनावरण भी कहा गया था। उसके साथ जुड़े हुए अनुशासन अतीव कठोर थे। इन दिनों जहाँ भी जिनसे भी जैसी भी तपश्चर्या बन पड़ रही है इनकी तुलना में इसे किसी भी प्रकार कम नहीं माना जा सकता है। तप साधना में ऐसे कठोर इतने व्रत नियमों को कोई विरले ही साध पाते हैं। अब वह साधना पूर्ण होती है। इसे भारत की देवात्मा का कुण्डलिनी जागरण कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। आमतौर से व्यक्ति विशेष अपनी निजी क्षमता उभारने के लिए कुछ कुण्डलिनी की प्रचंड साधना करते हैं। उसमें षट्चक्रों का वेधन तथा बन्ध मुद्राओं को ध्यान धारणाओं को विशेष समावेश होता है पर अपनी साधना तो भारत की देवात्मा में प्रचंड बल भरने की थी। ताकि इस स्वर्गादपि गरीयसी देवभूमि का देवत्व दावानल की तरह उबल पड़े।
ध्रुव भागीरथ जैसी तनी वर्षीय प्रस्तुत साधना का अभीष्ट परिणाम निश्चित रूप से होना है और वह अपने ढंग का अत्यन्त महिमामय प्रभाव उत्पन्न करेगा। भारत की देवात्मा जागेगी और वह न केवल अपने देश की समस्याओं का समाधान करेगी, वरन् समीपवर्ती दूरवर्ती अन्य क्षेत्रों पर भी उसका प्रभाव पड़े गरिमा को हस्तगत करेगा और अन्यान्य क्षेत्रों पर कल्याण के राजमार्ग पर चल सकने की क्षमता प्रदान करेगा। यह तीन वर्षीय हमारे जीवन की अन्तिम और अति कठोर साधना रही है। इसकी पूर्णाहुति सौ-सौ कुण्डों के सौ गायत्री यज्ञों में हो रही है। सन् 1958 का यज्ञ एक हजार कुण्डों का हुआ था। यह एक लाख कुण्डों का होगा। सौ-सौ कुण्डों के सौ यज्ञों में विकेंद्रीकरण इसलिए किया गया है कि उसका अधिक व्यापक क्षेत्र में प्रभाव विस्तृत हो सके और उससे अधिकाधिक क्षेत्रों का जन समुदाय लाभान्वित हो सके।
एक कसाई की वध-शाला से छूट कर गाय भाग गई। कसाई पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ा।
गाय एक सन्त आश्रम के पीछे धनी झाड़ियों में घास चर रही थी और कसाई की आँखों से ओझल थी।
कसाई ने सन्त से पूछा इधर से गाय निकली है क्या? आपने उसे देखा है क्या?
सन्त सोचने लगे सच बोलने से गाय का प्राण जायेगा। इसलिए परिणाम को देखते हुए शब्द छल करने में कोई हर्ज नहीं।
बार बार पूछने पर उनने उतर दिया जिसने देखा है वह बोलता नहीं जो बोलता है उसने देखा नहीं। कसाई इस ब्रह्मज्ञान की भाषा का अर्थ न समझ सका और आगे चला गया।
ऋषि पत्नी ने इस रहस्य वचन का कारण पूछा तो उनने कहा गाय का प्राण बचाने के लिए शब्द हल किया गया। सो जो कहा गया वह असल भी नहीं था। नेत्रों ने गाय देखी थी। वे बोलती नहीं। जीभ बोलती है देखती नहीं। इस प्रकार सत्य वचन की चिन्ह पूजा भी हो गई और नग्न सत्य के कारण होने वाला अनर्थ भी हल हो गया।
विश्वभर में उत्थान-पतन की विग्रह- सामंजस्य की परिस्थितियाँ अपने-अपने प्रकार की चल रही हैं। अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी समझबूझ के अनुसार कदम उठा रहना हैं। फलतः समझदारी नफे में रह रही है और ना-समझी का दंड उन समुदायों और व्यक्तियों को सहन करना पड़ रहा है। पर कहीं भी स्थिति ऐसी नहीं है जिसे निश्चिंतता और प्रसन्नता से भरी हुई कहा जा सके। उद्वेगों का ज्वर महामारी की तरह हर क्षेत्र में फैला हुआ है।
इनके समाधान में भारत परोक्ष भूमिकाएँ सम्पन्न करेगा। इसके लिए उसे इन्हीं दिनों अतिरिक्त दैवी बल उपलब्ध हुआ है। साधारणतया पड़ौसी ही एक दूसरे के साथ आदान-प्रदान करते हैं। और लाभ-हानि पहुँचाते उठते गिरते हैं, पर आत्मबल के सम्मुख मीलों की दूरी कोई दूरी नहीं। सूर्य का प्रकाश देखते-देखते अपने प्रभाव क्षेत्र में आलोक बखेर देता है। इसी प्रकार अपना देश विश्वव्यापी समझदारी को प्रभावित एवं परिवर्तित होने के लिए बाधित भी करेगा। जहाँ उद्दंडता चरम सीमा पर है वहाँ प्रतिबन्ध खड़े होंगे और जहाँ सन्मार्ग पर चला जा रहा है वहाँ सफलता भरे प्रोत्साहन मिलेंगे। अगले दिनों यही होने वाला है। यही होकर रहेगा।
इन दिनों सबसे बड़ी विश्व विभीषिका तृतीय युद्ध की है। कई देशों ने परमाणु बम बना लिये हैं और उनके जखीरे जमा कर लिये हैं। सभी इस तैयारी में हैं कि अन्य विरोधियों का सर्वनाश करके संसार भर पर एकाकी राज्य करेंगे। संसार भर की सम्पदा पर उनका स्वामित्व होगा। बचे खुचे लोग उन्हीं के पराश्रित रहेंगे। जिस प्रकार रहने और करने के लिए उनसे कहा जायगा उसी प्रकार वे करेंगे। करने के लिए बाधित होंगे। स्वप्न बहुत सुनहरे हैं, पर वे कभी भी सार्थक न हो सकेंगे। प्रतिद्वन्दी चुपचाप यह सब सहन करते न रहेंगे। जापान की बात दूसरी थी। तब एक देश के पास ही शक्ति थी, दूसरे सभी असहाय थे। पर अब ऐसी बात नहीं है। अब प्रायः एक दर्जर देश अणुशक्ति से सम्पन्न हैं। प्रतिशोध की पूरी-पूरी संभावना है। हर आक्रामक इस बात से डरता है कि बदले में जो प्रहार होंगे, उससे बच सकना अपने लिए भी किसी तरह संभव न होगा। लम्बी दूरी तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र अब अनेकों के पास हैं, वे प्रेरित भूमि से चलकर निर्बाध रूप से गन्तव्य स्थान पर पहुँच सकते हैं और कहर बरसा सकते हैं। आकाश युद्ध की, जल युद्ध की भी तैयारियाँ हो रही हैं। पर समझ लिया जाना चाहिए कि उनकी समानान्तर प्रतिकृतियाँ विरोधी देशों के साथ भी किसी न किसी तरह पहुँचती रहती हैं और उस आधार पर निष्कर्ष यही निकलता है कि वर्तमान परिस्थितियों में युद्ध आरंभ तो कोई भी कर सकता है पर प्रतिशोध की तैयारियों को देखते हुए वह जीत नहीं सकता। हारने के लिए लड़ना कौन चाहेगा?
युद्ध आयुधों को कुँठित करने और उनकी क्षमता को नष्ट करने के लिए दैवी शक्तियाँ पीछे लगी हुई हैं। स्काईलैब से लेकर चैलेन्जर की एक श्रृंखला मुँह उठाते ही धूल चाटते रह गई है। कितने ही उपग्रह भटक गये हैं। सतर्कता में कमी नहीं देखी जा रही है, पर जब पासे ही उलटे पड़ रहे हों तो कोई क्या करे? यह चेतावनी रूस को भी मिल चुकी है, उसे भी नये कारखाने खोलते समय हजार बार सोचना पड़ेगा कि अपनी बोई फसल अपने को ही न काटने लगे। जिन देशों में औद्योगिक दृष्टि से इस तकनीकी को अपने देश में लगाया है वे भी अणु भण्डार बढ़ाने से पूर्व यह अनुभव कर रहे हैं कि इस शेर को जाल में जकड़ कर पिंजड़े में ठूँस देना तो उतना कठिन नहीं है जितना कि उसका पालना और सरकस में उपयुक्त कौशल दिखाने के लिए प्रशिक्षित करना।
महायुद्ध में काम आने वाले अणु बम, रासायनिक गैसें, मृत्यु किरणें विनिर्मित तो तेजी से हो रही हैं, पर उदीयमान दैवी शक्ति के हस्तक्षेप पर फलों में से कोई भी अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर सकने की स्थिति तक न पहुँच पायेंगे।
अन्धड़ के भयंकर दबाव को न सह सकेंगे और पकने से पूर्व ही धरती पर आ गिरेंगे। चलाने वाले दिग्भ्रान्त होंगे और वह करने लगेंगे जिसे करने की इच्छा कभी नहीं की थी। योजना कभी नहीं बनाई थी। इस विपन्नता के साथ अग्रगामी के हाथों असफलता ही लगेगी।
जिनके मन में बड़े-बड़े हौंसले हैं। जिनके पास रणनीति की बड़ी-बड़ी योजनायें हैं, वे सभी धरी रह जायेंगी और धूलि चाटेंगी। युद्ध आरम्भ होने का अर्थ दो शक्तियों को आपस में निपटना नहीं है, वरन् यह है कि पक्ष-विपक्ष में से किसी को भी विजय न मिले। दोनों ही पराजय के गर्त में गिरें। यह स्थिति चाहते हुए भी लोग बरत न सकेंगे। कहावत है कि “बिगाड़ने वाले से बनाने वाला बड़ा हैं”-”मारने वाले से बचाने वाला बड़ा है।” इसका प्रमाण बिल्ली के बच्चों को जलते आवे में से जीवित निकलने के रूप में सामने आ चुका है। महाभारत में गज घंट के नीचे माईल पक्षी के अण्डे बेच जाने की कथा भी प्रसिद्ध है। प्रहलाद को मार डालने के कितने ही प्रयत्न किये गये थे, पर उनमें से एक भी सफल नहीं हुआ। मानवी सत्ता और सभ्यता को मटियामेट करके रख देने वाले मनसूबे चरितार्थ न हो सकेंगे, उन्हें अपने प्रयासों की व्यर्थता स्वीकार करनी पड़ेगी। इस प्रकार गर्व चूर करने में वही शक्ति काम करेगी जिसने वृत्तासुर, भस्मासुर, हिरण्यकश्यप, रक्तबीज जैसे दुराधर्षों को नीचा दिखाया था।
जिनके मन में बड़े-बड़े हौंसले हैं। जिनके पास रणनीति की बड़ी-बड़ी योजनायें हैं, वे सभी धरी रह जायेंगी और धूलि चाटेंगी। युद्ध आरम्भ होने का अर्थ दो शक्तियों को आपस में निपटना नहीं है, वरन् यह है कि पक्ष-विपक्ष में से किसी को भी विजय न मिले। दोनों ही पराजय के गर्त में गिरें। यह स्थिति चाहते हुए भी लोग बरत न सकेंगे। कहावत है कि “बिगाड़ने वाले से बनाने वाला बड़ा हैं”-”मारने वाले से बचाने वाला बड़ा है।” इसका प्रमाण बिल्ली के बच्चों को जलते आवें में से जीवित निकलने के रूप में सामने आ चुका है। महाभारत में गज घंट के नीचे माईल पक्षी के अण्डे बेच जाने की कथा भी प्रसिद्ध है। प्रहलाद को मार डालने के कितने ही प्रयत्न किये गये थे, पर उनमें से एक भी सफल नहीं हुआ। मानवी सत्ता और सभ्यता को मटियामेट करके रख देने वाले मनसूबे चरितार्थ न हो सकेंगे, उन्हें अपने प्रयासों की व्यर्थता स्वीकार करनी पड़ेगी। इस प्रकार गर्व चूर करने में वही शक्ति काम करेगी जिसने वृत्तासुर, भस्मासुर, हिरण्यकश्यप, रक्तबीज जैसे दुराधर्षों को नीचा दिखाया था।
महायुद्ध के स्थान पर उसका छुटपुट स्वरूप आतंकवादी लुक-छुप आक्रमणों के रूप में दृष्टिगोचर होता रहेगा। यह नई पद्धति इस युग की नई देन होगी। आमने सामने की लड़ाई शूरवीरों को शोभा देती थी, पर आज जब नीति मर्यादा का कोई प्रश्न नहीं रहा तो “मारो और भाग जाओ” की छापामार नीति ही काम देगी। गुप्त प्रयास शासकों के तख्ते उलटने के होते रहेंगे। महलों में क्रान्तियाँ होने की कई घटनाएँ सुनने के होते रहेंगे। महलों में क्रान्तियाँ होने की कई घटनाएँ सुनने को मिलेंगी। रक्तपात होता रहेगा और असुरक्षा का अराजकता का माहौल बना रहेगा। यही है इस सदी का अन्त। इन उपद्रवों का सामना करने के लिए तो हमें तैयार रहना ही चाहिए, किन्तु यह भय मन में से निकाल ही देना चाहिए कि सर्वनाशी तृतीय महायुद्ध मानवी अस्तित्व को मिटाकर रहेगा। यदि हुआ तो इक्कीसवीं सदी का फलता फूलता स्वरूप देखने के लिए कौन बच रहेगा? अगले 13 वर्षों के संबंध में हमें इतना ही समझ लेना चाहिए कि घटाएँ उठेंगी, घुमड़ेंगी और गरजेंगी तो बहुत पर इतनी वर्षा होने के कोई आसार नहीं हैं जिसमें सर्वत्र प्रलय के भयानक दृश्य दीखने लगें।
ईश्वर की अनुकम्पा सिर्फ उन पर बरसती है, जो उसकी दुनिया में शान्ति पैदा करते हैं, न कि उन पर जो बड़बड़ाते तो बहुत हैं, किन्तु काम कलह के बीज बोने का करते हैं।
विश्व संकट में महायुद्ध के समतुल्य दूसरा खतरा है, उन वस्तुओं का अकाल पड़ जाना, जिनके बलबूते तथाकथित प्रगति का पहिया धूम रहा है और जनसाधारण का निर्वाह हो रहा है।
इस संदर्भ में दो प्रमुख आधार है। एक बढ़ती हुई जन संख्या के अनुरूप खाद्य पदार्थों की समस्या दूसरी है खनिज पदार्थों की समस्या। इसमें धातुएँ आती हैं और खनिज तेल एवं कोयला। इन सभी चीजों की अगले दिनों कमी पड़ने वाली है। कृषि योग्य भूमि सीमित है। जमीन की उपज भी मर्यादित है। उसका रासायनिक खादों में बेहिसाब दोहन किया जाय तो जमीन ठंडी पड़ जाती है। भविष्य के लिए वह ऊपर बंजर स्तर की निर्जीव हो जाती है। इसलिए रोज एक अंडा सोने का देने वाली मुर्गी से एक-एक अंडा रोल लेते रहना ही ठीक है। उसका पेट चीर कर एक दिन में ही सारे अंडे निकाल लेने का प्रयत्न किया जाय तो उसमें घाटा भी है और मूर्खता भी। जनसंख्या वृद्धि रोके नहीं रुक रही। उत्पादन शक्ति में ऐसी बढ़ोतरी हुई है कि प्रायः हर साल एक नया बच्चा पैदा होने का सिलसिला चल पड़ा है। हर बीस वर्ष में आबादी दूनी हो जाती है। इस हिसाब से बीसवीं शताब्दी में ही 500 करोड़ के स्थान 1000 करोड़ तक की आबादी जा पहुँचेगी। स्पष्ट है कि दूने खाद्य की जरूरत पड़ेगी, जबकि उतनी अभिवृद्धि होने की कोई भी संभावना नहीं है।
मात्र खाद्य की ही नहीं वस्त्र, निवास रोजी, रोटी, शिक्षा, चिकित्सा यातायात उद्योग आदि की इतनी अभिवृद्धि होगी कि उन सब आवश्यकताओं को जुटाना कठिन पड़ जायेगा। अभावग्रस्त पिछड़ी जनता के लिए सरकार को भारी टैक्स चुकाना भी संभव न रहेगा, जिससे वह नये साधन खड़े कर सके। कमाई कम और अधिक होने का सीधा अर्थ होता है दिवालियान, कंगाली महंगाई, कठिनाई। समझा जाना चाहिए कि यह अभावग्रस्तता दिन-दिन बढ़ती ही जायेगी और अंत में स्थिति यहाँ पहुँचेगी कि भुखमरी के मुँह में चले जाने के अतिरिक्त और कोई रास्ता शेष न रहेगा।
धातुओं में लोहा प्रधान है। उसी से सारी मशीनें बनती है। उद्योग में काम आने वाले और यातायात में लगे रहने वाले सभी यंत्र लोहे से बनते हैं। रेल, मोटर जलयान, वायुयान, कल कारखाने आदि में लोहा ही लोहा भरा होता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जिस गति से धातुओं का खनन हो रहा है, यदि वही क्रम चलता रहा तो अगले सौ वर्षों से पहले ही जमीन धातुएँ देना बंद कर देगी। कोयले का भी यही हाल है और तेल पैट्रोल का भी। समूची धरती का सर्वेक्षण कर लेने पर उसका निष्कर्ष भी यह निकला है कि इस ईंधन स्तर की खनिज सम्पदा का दोहन भी एक सौ वर्षों से अधिक नहीं हो सकेगा। तब तक वह छूँछ हो लेगी।
चालू क्रम प्रवाह को रोका नहीं जा सकता। माँग और बढ़ोतरी में कमी होने का कोई आसार नहीं। फिर उत्पादन अभिवर्धन भी ऐसा नहीं जिसे मनमाने स्तर तक बढ़ाया जा सके। धरती मिट्टी से पत्थरों से बनी हुई है उसे रबड़ की तरह खींच कर बढ़ाया भी नहीं जा सकता, ताकि आवश्यक और अनावश्यक माँग को उसे डरा धमका कर देर तक पूरा करते रहने के लिए बाधित किया जा सके। इस असमंजस भरे व्यवधान का फलितार्थ यह हो सकता है कि मशीनी क्षेत्र को लोहा और ईंधन न मिलने से गतिरोध उत्पन्न हो जायेगा और जो अनिवार्य रूप से आवश्यक प्रतीत होता है उसकी पूर्ति का भी कोई मार्ग न होगा। इस व्यवधान का परिणाम यही हो सकता है कि अकाल पड़ जाय और शारीरिक श्रम का आश्रय लेकर पाँच सौ वर्ष पूर्व की मशीन रहित दुनिया में लौटा जाया जाय। मशीनें ईंधन की शक्ति माँगती हैं। तेल कोयला न मिलने पर भी उनका ढाँचा ढकोसला कबाड़खाना बन कूड़े कचरे की तरह पड़ा रहेगा।
आज तो लोग सुई से लेकर माचिस तक के लिए मशीनों पर आश्रित हैं। उसने बैलगाड़ी जैसे वाहनों और हथकरघे वस्त्रों से काम चलाने की आदत भुला दी है। उसे नये सिरे से आरम्भ करने में कितनी कठिनाई पड़ेगी, इसे समय आने पर ही जाना सकेगा।
पिछले दिनों चल रहे ढर्रे पर अगले दिनों देर तक नहीं चला जा सकता। कम आबादी वाले दिनों में जंगली वृक्षों के कंद मूल फल भी ऋषियों से लेकर सामान्यजनों तक का गुजारा कर देते थे। कृषि होने लगी और पशु धन का सहयोग हाथ लगा, तब तो साधनों की बहुलता हो गई गुजारे का कोई प्रश्न ही न रहा। धातुओं का उपयोग भी घरेलू उपकरणों के ही काम आता था। लड़ाई में तीर तलवारों के निमित्त ही थोड़ी-सी आवश्यकता पड़ती थी। पर अब तो धातुएँ भी वस्त्रों की तरह ही आवश्यकता हो गई है। बढ़ती हुई आवश्यकताओं ने प्रकृति के भंडार में जो चिरकाल का संचय जमा था सो उसे खोद निकाला गया अब जब अगले दिनों नयी आवश्यकता पड़ेगी तो न धातुएँ मिल सकेंगी और न खाद्य पदार्थों का बाहुल्य रहेगा। मनुष्य इस संदर्भ में क्या कर सकता है? बुद्धि की अपनी सीमा मर्यादा है, वह पदार्थों को उतनी ही मात्रा में उपलब्ध कर सकती है, जितनी की वे प्रकृति के भण्डार में पहले से ही मौजूद है। पृथ्वी की उर्वरता भी सीमित है। रासायनिक उत्तेजनाएँ देकर तो उतना ही हो सकता है कि उस रस को धीरे धीरे सब्रपूर्वक न निकाल कर एकाकी दोहन कर लिया जाय। इससे तात्कालिक लाभ तो बढ़ा चढ़ा दीख सकता है, पर अगली पीढ़ी के लिए बाबा की थैली में सिक्के नहीं जुएँ खटमल ही भरे दीखेंगे।
मनुष्य बहुत दिनों से इन तीनों परस्पर संबंधित समस्याओं के समाधान का हल सोच रहा है, पर सामयिक उत्तेजना से नशा पीकर बल प्राप्त करने की तरह सामयिक हल ही सूझ पड़ रहे हैं। जनसंख्या कैसे घटे? उत्पादन कैसे बढ़े? धातुओं को तेल कोयले का भंडार खाली हो जाने पर उसका स्थानापन्न विकल्प क्या हो? अण बिजली का उत्पादन आरम्भ से संदेहास्पद बना हुआ हो। विकिरण कैसे रोका उनकी जली हुई राख को कहाँ डाला जाय? यह प्रश्न पर विचार तो बहुत हुआ है पर समाधान एक भी सूझ नहीं पड़ा है मानव बुद्धि यहाँ तक कर बैठ गई है।
दैवी समाधान ही अगले दिनों काम देंगे। जनसंख्या बढ़ने का उद्गम नारियाँ है। यह भार उन्हें ही सहना पड़ता है। रिपोर्ट है कि हर साल वे प्रसव पीड़ा में ही पाँच लाख की संख्या में वेदना से प्राण गवाँ बैठती है। यह प्रकृतिगत विडम्बना अदृश्य जगत के भाव प्रवाह से रुकेगा। कन्याओं की अपेक्षा पुत्रों का उत्पादन बढ़ जायेगा। हो सकता है कि देहरादून जिले के जौनसार क्षेत्र की तरह बहुपति प्रथा प्रचलित हो वहाँ के लोग अपने को पाण्डवों की संतान कहते हैं और बड़े एक भाई का विवाह करते हैं। शेष भाइयों की वह एक नारी ही उपपत्नी होती है। इस प्रकार पिछली पीढ़ी की तुलना में अगली पीढ़ी की संख्या नहीं बढ़ने पाती है और घर का खेतों का बटवारा न होकर पीढ़ियों तक शाँतिपूर्वक निर्वाह एक आजीविका का सिलसिला चलता रहता है।
यह भी हो सकता है कि नारी समुदाय की प्रजनन इच्छा एवं शक्ति घट जाय। विवाह नर नारी की मित्रता स्तर तक तो रहे पर उनके मध्य यौनाचार अत्यधिक घट जाय। दोनों ही पक्ष के उत्पादक तत्वों में भारी कमी हो जाय और वैसी स्थिति अनायास ही बन जाय जैसी कि परिवार नियोजन वाले कृत्रिम उपायों से करना चाहते हैं। यह भी हो सकता है कि कामुकता भड़काने वाले साहित्य और चित्रों को फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया जाय और नर नारी कुत्साओं से छूट कर भाई-भाई की तरह सदाचरण पूर्वक रहने लगे और मिल जुल कर काम करें। ऐसे ही उपायों का मिला जुला रूप अगले दिनों सामने आवेगा। विकिरण की वृद्धि से जब अपंग संतानें होने लगेंगी तो मनुष्य उस आफत से अपना बचाव करने में सतर्कता बरतने लगेगा और रोकथाम के उपाय अपनायेगा। मनुष्य जाति की महामारी भुखमरी का शिकार नहीं होना है तो सन्तानोत्पादन पर विराम लगाने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रह जाता। प्रकृति की इच्छा और प्रेरणा बदलने जा रही है और अगली शताब्दी में अब की अपेक्षा जनगणना घटती ही जायेगी। वह तीन चौथाई से भी अधिक घट सकती है। ऐसी दशा में एक बड़ा समाधान निकल आवेगा।
खाद्यान्नों के उत्पादन में इन दिनों नई वृद्धि माँसाहार के प्रोत्साहन की ओर बढ़ रही है, यह उत्साह भी पानी के प्रोत्साहन की ओर बढ़ रही है, पर यह उत्साह भी पानी के बुलबुले की तरह ठंडा हो जायेगा। माँस महंगा पड़ता है पचने में गरिष्ठ होता है। उस माध्यम से प्राणियों के रोग मनुष्यों के शरीर में पहुँचते हैं, फिर उस कारण मनुष्य को निर्दय निष्ठुर बनना पड़ता है वह स्वभाव में सम्मिलित हो जाता है और पशु हत्या के बाद मनुष्य हत्या में जो झिझक होनी चाहिए वह भी नहीं रहती। फिर मनुष्य को अधिक जमीन और वनस्पति की आवश्यकता पड़ेगी। उन्हें पशु ही खा लेंगे तो मनुष्यों को उससे वंचित रहना पड़ेगा। ऐसी दशा में पशुओं का परिवार नियोजन चल पड़ेगा और वे इतनी ही सीमित संख्या में रह जायेंगे जिनके बचे रहने पर मनुष्यों को कोई असुविधा न हो। किसी प्रतिद्वंदिता का सामना न करना पड़े।
इक्कीसवीं शताब्दी में बड़े शहरों का विकेन्द्रीकरण होगा। गाँवों का स्थान कस्बे लेंगे। कल कारखाने छोटे छोटे स्तर के लगेंगे जो प्रदूषण उत्पन्न न करें जिसके लिए बड़ी मात्रा में कोयला न जलाना पड़ेगा। इतनी बिजली तो हवा पानी से ही निकल आया करेगी। जिस कुटीर उद्योगों के लिए छुट पुट शक्ति मिलती रहे। मनुष्य जिस शारीरिक श्रम से अनभ्यस्त हो रहा है, उसे फिर से अपनाने लगेगा। साथ ही लघु उद्योगों के लिए छोटे संयंत्रों द्वारा उत्पन्न की गई बिजली भी मिलती रहेगी। देहाती जीवन स्वास्थ्यकर भी होता है, सुविधाजनक भी और सस्ता भी।
लोग शान्तिपूर्वक सुविधा के साथ हिल मिल कर रहेंगे। सहकारिता के आधार पर सुविधाओं का कोई गुना संवर्धन होने लगेगा। मिल जुल कर काम करने की पद्धति से सभी मजूर कृषक होंगे और सभी कृषक मजूर इस प्रकार कृषि समस्या सुलझावेंगे और जीवनयापन में काम आने वाले धंधे लुहार, बढ़ई, दर्जी, मोची, कुम्हार, धोबी आदि भी अपना गुजारा इसी स्तर का करने लगेंगे जैसा कि अन्य लोग करते हैं। सादगी और मितव्ययिता से सुनियोजित ग्राम्य जीवन की पद्धति नये सिरे से विकसित होगी और उसका प्रतिफल ऐसा होगा जिसे जिसे आज की समस्या का कारगर समाधान कहा जा सके। लोग अन्न के स्थान पर शाक अधिक उगायेंगे जो सस्ता भी पड़ेगा और पौष्टिक भी उत्पादकों को अन्न की तुलना में अधिक लाभ मिलेगा। खाद्य समस्या का यह ही ऐसा समाधान है जिसमें कम भूमि में अधिक लोगों के लिए अधिक मात्रा में अधिक उपयोगी संसाधन उपलब्ध हो सकें।
फूल को किसी भी नाम से पुकारते पर उसकी सुगन्धित में अन्तर नहीं पड़ता उसकी सुगन्धि में अन्तर नहीं पड़ता भगवान को किसी भी नाम से पुकारों इसमें फर्क क्या पड़ता है?
न्यूयार्क के जार्ज इस्टमैन बड़े धनवान और अध्यवसायी थे। उनकी सूझबूझ वैज्ञानिक स्तर की थी। यों उनने साइंस का क्रमबद्ध अध्ययन नहीं किया था जो भी उनने फोटोग्राफी के क्षेत्र में इतने अधिक आविष्कार किये जिनका लाभ आज तक सारा संसार उठाता चला आ रहा है। उनमें विश्व विख्यात कोडक फोटो कम्पनी का निर्माण किया और अरबों डॉलर कमाये। उनके परामर्श का लाभ उठाकर अन्य समझदारों ने भी आशातीत प्रगति की।
इस्टमैन ने अपना कोई फोटो नहीं खिंचवाया था एक बार एक पत्रकार ने उनसे अपनी पत्रिका में छापने के लिए फोटो माँग। उत्तर था मैंने अपना चित्र कभी खींचा या खिंचवाया ही नहीं। जब मैं जीवित मौजूद हूँ तो किसी को चित्र देखने की आवश्यकता क्यों पड़े। मेरा चित्र नहीं चरित्र ही देखने और सीखने योग्य है।
इक्कीसवीं सदी में नई भी कई समस्याएँ उत्पन्न होंगी, जो अभी तो सिर्फ सिर चमका रही हैं, पर आगे चलकर उनकी प्रौढ़ता दृष्टिगोचर होने लगेगी। इन दिनों जो अंकुर मात्र है, वे अगले दिनों विशाल वृक्षों के रूप में बढ़े चढ़े आकार में दृष्टिगोचर होंगे।
उदाहरण के लिए ईंधन की समस्या को ही लिया जाय। जब आबादी थोड़ी थी तब गोबर के उपले और अरहर की लकड़ियों से सीधे साधे ढंग की रसोई पक जाती थी। जंगली टेढ़े मेढ़े मात्र जलावन के स्तर वाले पेड़ पौधे ही इस काम आ जाते थे। जब ईंधन की कोई समस्या नहीं थी पर अब बड़ी बड़ी मशीनें बनने लगी। हैं वे चलती तो ईंधन से ही हैं यह ईंधन बहुत करके तेल और कोयले से उपलब्ध होता रहा है। अब बिजली का भी उत्पादन होने लगा है और वह भी बहुत हर तक घरेलू तथा कारखाने के ईंधन की आवश्यकता पूरी करने लगी है। पर इनके उद्गम स्रोत जब अगले दिनों सूख जायेंगे तब ऐसा गतिरोध उत्पन्न होगा कि इस ईंधन के अकाल का दबाव अन्य सभी प्रकार के दुर्भिक्षों से बढ़ चढ़कर भयावह सिद्ध होगा। न खाना पकेगा। और न कारखाना चलेगा। गोबर अब तो खाद के काम आता है और बेकार पेड़ों से कागज बनाने का काम लिया जाता है।
इक्कीसवीं सदी में ऐसे यंत्र बन जायेंगे जो सूर्य किरणों के बिखराव को केन्द्रीभूत करके उसे बिजली की तरह वितरित किया जा सका। समुद्र की लहरे और ज्वार भाटे भी इस उत्पादन में योगदान दे सकते हैं। इस प्रकार प्रकृति की शक्ति वर्षा को ही केंद्रीभूत किया जायेगा और उसी को मिल बाँट कर ईंधन के काम में लाया जायेगा। फिर इन दिनों अत्यधिक ऊर्जा खर्च करने का अपव्यय जो अभ्यास में आया है उसमें भी कटौती होगी। हर व्यक्ति को समझना पड़ेगा कि ईंधन सम्पदा की मानवी क्षमता सीमित रह गई है, उसे किफायत के साथ ही उपयोग में लाना चाहिए।
पशुओं का मलमूत्र तो गोबर गैस प्लान्ट में प्रयुक्त होने ही लगेगा। अगले दिनों लगभग इतनी मात्रा में उत्पन्न होने वाला मनुष्य का मलमूत्र भी दुर्गन्ध और कुरुचि बीमारी फैलाने की अपेक्षा गोबर गैस की तरह ही प्रयुक्त होने लगेगा। उससे खाद की प्रचुर मात्रा में मिलेगी, गंदगी भी कटेगी और प्राकृतिक खाद की उपयोगी मात्रा भी खेतों को अधिक परिमाण में प्राप्त होगी। ईंधन इस प्रकार समय की आवश्यकता को किसी प्रकार पूरा कर सकेगा।
वनस्पति पशुओं से बचेगी। उनसे मनुष्य को इमारती लकड़ी और कागज जैसी वस्तुओं को बनाया जा सकेगा। मनुष्य को दूध पीने की आदत घटानी पड़ेगी और तिल मूँगफली, सोयाबीन आदि के घोल से उस प्रयोजन की पूर्ति करनी पड़ेगी। पशु चर्म के लिए जिन वस्तुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। वे प्लास्टिक जैसी वस्तुएँ होंगी। जिस प्रकार कपास का स्थानापन्न नाइलान का धागा निकल आया है, उसी प्रकार धातुओं की कमी पड़ने पर उनके स्थान पर ऐसे रासायनिक पदार्थ उपज पड़ेंगे कि उनसे धातुओं की आवश्यकता पूरी हो सके। इन दिनों बड़े कारखाने और विशाल युद्धों के लिए विनिर्मित होने वाले हथियार ही लोहे की तिहाई की ही आवश्यकता पड़ती है। अगले दिन महायुद्ध को निरस्त कर देंगे। इसी प्रकार बड़े कारखाने बढ़ चढ़कर छोटे कुटीर उद्योगों में दबल जायेंगे। ऐसी दशा में लोहे की उपयोगिता सीमित ही रह जायेगी। उसकी पूर्ति पुरानों को नये में ढालकर अथवा जहाँ तहाँ से कुरेदबीन कर की जाती रहेगी।
वस्त्रों के लिए जितना अम्बार अब खड़ा करना पड़ रहा है, उतना भविष्य में न रहेगा। सभी एक जैसी सीधी सादी पोशाकें पहनेंगे। तरह-तरह के डिजाइन और फैशन उस बदले हुए जमाने में हेय समझे जाने लगेंगे। फिर बक्सों भरे कपड़े कोई न रखेगा। धोने सुखाने और पहनने के लिए जितना फेर आवश्यक होगा, उतने ही कपड़े बनेंगे और सीये जाया करेंगे। फैशन के नाम पर जितना पैसा तरह-तरह की डिजाइनें बनाने में बेशकीमती स्तर का जखीरा जमा करने में खर्च करना पड़ता है, उतने की जरूरत ही न पड़ेगी। कपड़ा उद्योग हैण्डलूम के हिस्से में एलाट कर दिया जायगा इससे बेकारी भी दूर होगी, अपव्यय भी बचेगा और बेकार की शान-शौकत में लोगों में जो अनुकरण की ललक पैदा होती है, उसकी भी जड़ कट जायगा।
युटोपिया के नाम पर भविष्य कथन का विवरण जिन लेखकों ने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उसमें उन्होंने प्रायः एक बात लिखी है कि भौतिक विज्ञान के अनेकानेक आविष्कार होंगे, उनसे मनुष्य की सुविधाएँ और सामर्थ्य अतिशय बढ़ जायेंगी। थल की भाँति जल और नभ पर भी आधिपत्य हो जायगा। इस कथन में अधूरापन यह है कि वर्तमान परिस्थितियों के बदलने पर नई परिस्थितियों के साथ संगति कैसे बैठेगी? सारे काम मशीनें करने लगीं तो मनुष्य का शरीर ही नहीं दिमाग भी निकम्मा हो जायगा। सुविधाओं के सहारे एक सीमा तक ही उन्नति संभव होती है, इसके उपरान्त अधःपतन का सिलसिला चल पड़ता है और मनुष्य लुँज पुँज हो जाता है। ऐसी दशा में स्वाभाविक है, कि दुर्बलता, रुग्णता, विलासिता और आकाँक्षा अभिलाषा इस सीमा तक बढ़ती चली जायँ, तो उसे उत्थान न कहकर पतन मानना पड़े। लोग प्रसन्न रहने के स्थान प उद्विग्न रहने लगें। तब फिर जिस उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा गया है वह ठीक उल्टी स्थिति में पहुँचकर विपत्तियों का कारण बने।
मानव सत्ता शरीर नहीं आत्मा है। शारीरिक सुविधा साधनों का उपयोग तभी तक है जब तक कि वह चेतना को समुन्नत बनाने की सहायता करता है। यदि उसके विपरीत हुआ, चेतना आलसी, प्रमादी, अनाचारी और पतनोन्मुखी होती चली गई तो उसका प्रभाव परिणाम न केवल अन्तरात्मा के लिए वरन् बाह्य परिस्थितियों की दृष्टि से भी अनुपयुक्त एवं कष्टकारक ही होगा कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश होगा और जीवनचर्या के साथ सादगी सहकारिता का अंश बढ़ता चला जायगा। यही वास्तविकता है। भविष्य कथन वे ही सार्थक माने जायेंगे जो आविष्कारों और सुविधा साधनों की बात करें और मानवी सज्जनता और सुव्यवस्था की संभावना पर अधिक चिन्तन एकाग्र करें। अगली शताब्दी में मनुष्य भावनाओं का धनी होगा, भले ही उसकी सम्पन्नता कम ही क्यों न हो? मिल−बांट कर खाने वाले थोड़े साधनों में भी प्रसन्नता और प्रगतिशीलता का आधार खड़ा कर लेते हैं। जबकि विपुल विभूतियाँ रहने पर भी कृपणता से घिरे हुए लोग बेचैन रहते और बेचैन करते रहते हैं। अगले दिनों सद्गुण सत्कर्म और सत्स्वभाव में अभिवृद्धि होगी। उन आविष्कारों और सुविधा साधनों को हेय ठहराया जायगा जो मनुष्य को जादूगर स्तर की कुछ भी बुला लेने और कुछ भी भगा देने की कला सिखाता है।
मानवी गौरव गरिमा को अक्षुण्ण रखना आवश्यक समझा जायगा तो मर्यादा में बँधना और वर्जनाओं से बचना पड़ेगा। संयमशीलों की जीवनी शक्ति बढ़ती है। वे सुपाच्य सात्विक खाते और सीना बहाने वाला श्रम करते हैं। ऐसी दशा में उन्हें न दुर्बलता घेरती है न रुग्णता सताती है और न असमय की अकाल मृत्यु ही आती है।
अगले दिनों मनुष्य बलिष्ठ होगा। पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह हाथी की तरह विशालकाय चीते की तरह धावक और हिरन की तरह छलाँगें लगाने लगेगा। वरन् अर्थ यह है कि आदर्शों के परिपालन की उसकी साहसिकता असाधारण होगी। वह लोभ और मोह का भय और दबाव का सामना कर सकेगा। उनके आकर्षक दबाव से विचलित न होगा, वरन् अपनी प्रत्येक कृति में उस विशिष्टता का परिचय देगा जिसका धीर, वीर, गंभीर लोग प्रमाण प्रस्तुत किया करते हैं।
शरीरगत सुविधाएँ अभी भी कम नहीं हैं। आलसियों की तरह उन्हें अपनाया ही न जाय और अनाड़ियों की तरह दुरुपयोग किया जाय तब तो बात दूसरी है, अन्यथा साधनों की दृष्टि से पूर्वजों की तुलना में हम कहीं अधिक सुविधा भरी स्थिति में हैं। यदि पूर्वज रहे होते तो आज की दुनिया उन्हें स्वर्ग जैसी मोहक और बुद्धिमान लगती। हम भी इक्कीसवीं सदी के लोगों को आविष्कार के धनी होने या अपेक्षाकृत अधिक साधन सम्पन्न देख सकते हैं, पर इससे बनेगा कुछ नहीं। अन्तरंग यदि प्रसन्न और सम्पन्न न हो तो ऊपरी चमक दमक केवल भ्रम ही उत्पन्न कर सकती है।
साक्षर बनने की शिक्षा चिरकाल से उपलब्ध है। स्कूलों और कालेजों में हमारे बच्चे बहुत-सी जानकारियाँ प्राप्त करते हैं और बहुज्ञ प्रतीत होते हैं। अवसर मिलता है तो अफसर भी बन जाते हैं और कई प्रकार के कौशल दिखाकर सम्पन्नता भी बटोरते हैं। येन, केन प्रकारेण प्रख्यात भी हो जाते है, पर इतने भर से कोई ठोस उपलब्धि हाथ नहीं लगती। बहुरूपिये, नट बाजीगरों जैसे, कौतूहल उत्पन्न करते रहे हैं, पर वह सूत्र हाथ नहीं आते जिनके सहारे कि महान बना जाता है।
अगले दिनों ऐसी शिक्षा का प्रबंध करना पड़ेगा जिससे मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप एवं कर्त्तव्य-दायित्व का गंभीरता पूर्वक भान करे। साथ में ऐसा आचरण भी करे जो आत्मा की पुकार, परमात्मा के संकेत एवं युगधर्म की चुनौती स्वीकार ने के लिए विवश कर सके। ऐसी शिक्षा स्कूली पाठ्यक्रम में छात्रों के लिए सम्मिलित रहेगी। अध्यापकों को अपना चरित्र उसी ढाँचे में ढला हुआ सिद्ध करना पड़ेगा यह नियमित पढ़ाई की बात हुई जिसे स्कूली शिक्षा कहते हैं। यह आवश्यक तो है पर पर्याप्त नहीं धर्मोपदेशकों, कर्णधारों, नेतृत्व कर सकने की स्थिति में पहुँचानी पड़ेगी। जिसके सहारे अपने व्यक्तित्व को विभूतिवान् प्रतिभावान् चरित्रवान् और कर्त्तव्य परायण सिद्ध कर सकें। ऐसी शिक्षा के लिए हमें अभी से तैयारी करनी होगी, जिससे कि अगली शताब्दी का जो समुदाय आदर्शवादी कर्मनिष्ठ और सिद्धान्तों के प्रति आस्थावान, दृढ़व्रती दृष्टिगोचर हो सके।
ईश्वर का कोई रूप नहीं, फिर भी हर रूप में उसे देखा जाता है। देवता की न केवल आरती उतारो, वरन् उसके मन्दिर में झाडू भी लगाओ।
दो आलसी थे। एक बगीचे में रहते थे। एक दूसरों से सहायता माँगने की ताक में रहते।
एक दिन एक घुड़सवार उधर से निकला। पुकारा-आई जरा ठहरना मेरा एक जरूरी काम कर जाओ।
सवारयका। पास आया और पूछा-क्या काम है? पेड़ पर से गिरा हुआ आम छाती पर पड़ा है इसे मेरे मुँह में निचोड़ दो। इस पर सवार बहुत बिगड़ा और इतने आलसीपन पर नाराज होकर दो लात जमाई।
पास में ही एक और बड़ा आलसी पड़ा था। उसने कहा-भाई साहब दो लातें मेरे बदलें भी लगा दें। कुत्ता मेरा मुँह चाट रहा था। मैं इसे पुकारता रहा कि कुत्ते को भाग जाओ। पर यह आया ही नहीं और कुत्ता तब गया जब चाटने के बाद मेरा मुँह पर मूत भी गया।
अपना काम आप कर सकने वाला भी, छोटे मोटे कार्यों के लिए ईश्वर से याचना करते हैं उनकी सहायता तो दूर उलटे गाली खानी और पिटाई सहनी पड़ती हैं।
इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ होने में अब 13 वर्ष शेष हैं। इस अवधि में पिछले पापों का प्रायश्चित हमें करना होगा। इस संदर्भ में होना तो वह चाहिए था, जिसकी कि भविष्यवाणी इन दिनों सर्वनाश के रूप में प्रमाणिक क्षेत्रों से की जाती रही हैं। उनमें प्रकृति प्रकोपों का विशेषतया वर्ण है। वातावरण में तापमान की वृद्धि, ध्रुवों का पिघलना, समुद्री उफान आना, हिमयुग, भूकंप, ज्वालामुखी, बाढ़, सूखा दुर्घटनाएँ, महामारी आदि को प्रकृति प्रकोपों में गिना जा सकता है। युद्ध विग्रह आतंकवाद, हत्याएँ, अपराध, अनाचार, बलात्कार, अपहरण, छल नशा, विनाश आदि को मनुष्यकृत अनाचार कह सकते हैं। यह दोनों ही मिलकर व्यक्ति और समाज के लिए अनेकानेक संकट उत्पन्न करें, तो समझना चाहिए कि यह पिछले दिनों किये गये मानवी अनाचार का दण्ड प्रायश्चित है। प्रदूषण, विकिरण को भी इसी वर्ग में गिना जा सकता है। ज्योतिषी इसे ग्रहाचर का कारण बताते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध में अणु आयुधों का प्रयोग होना औ रउसे सर्वनाश की स्थिति बनना जन जन के मुख पर चढ़ी रहने वाली चर्चा का विषय है।
यह संभावनाएं जिन लोगों ने बताई हैं उनने किसी बहकाया नहीं है और न अपनी मान्यताओं के प्रति दुराव किया है। पिछले दिनों समर्थ वर्गों द्वारा दुर्बलों के साथ जो बर्ताव किये जाते रहे हैं,उनका सामूहिक परिणाम समूची मानव जाति को भुगतना पड़े तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।
किन्तु प्रज्ञा अभियान के मंच से उन अनिष्टकर सींवनाओ को चुनौती देने के लिए जो प्रचण्ड तप सामूहिक एवं वैयक्तिक रूप से किया जाता है, उसकी शक्ति भी कम नहीं आँकी जानी चाहिए। घनघोर घटाओं की जल प्लावन संभावना को तेज आँधी उड़ा ले जाती है और छुट पुट बूँद बरस कर आसमान साफ हो जाता है।अगले 13 वर्षों में ऐसे ही उत्पात होते रहेंगे। जिन्हें एक शब्द में चैन सेन बैठ पाना, न बैठने देना कह सकते हैं। ऐसे घटनाक्रम इन वर्षों में जहाँ-तहाँ देश विदेश में होते रहेंगे; किन्तु वे इस सीमा तक न बढ़ पावेंगे कि महाविनाश कीप रिधि छूने लगें और काबू से बारह निकल जायँ।
बीज के गलने के साथ अंकुर भी फूटते हैं और वे खाद पानी पाने पर क्रमशः बढ़ते हुए पौधे से वृक्ष बनते हैं। यह विकास उन प्रतिभाओं का होगा जिन्हें सर्माि मूर्धन्य एवं भावनाशी कहा जा सकता है। उपदेशक नोता कलाकार मनीषी, लेखक, धनवान वैज्ञानिक इसी श्रेणी में आते हैं। अब तक यह वर्ग निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए तरह-तरह के शितून खेड़े करता रहा है। जिस तरह अधिक लाभ मिले, बड़ा ठाट बने और अधिक ख्याति चमके। यह उद्देश्य लेकर उपरोक्त वर्गों ने चित्र विचित्र कार्य किये हैं। उससे जनता का मनोबल और भावना स्तर गिरा है बड़ों को कहते और करते देखकर समान्यजनों की समझ और चेष्टा भी उसी दिशा में बहने लगती है। नदी के प्रवाह में तत् अनायास ही बते चले जाते हैं। मूर्धन्यों का अनुगमन सामान्यजन सहज ही करते देखे जाते हैं। ऊँचे चढ़ना तो कठिन है, पर नीचे गिरने में कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता और न किसी की सहायता लेनी पड़ती है मूर्धन्यजन जो स्तर अपनाते हैं,सर्वसाधारण की इच्छा उसी के अनुकरण की होती है। धनवानों, प्रबुद्धजनों, साहित्यकारों, कलाकारों ने प्रायः पशु प्रवृत्तियों का भड़काने का व्यवसाय अपनाया है।उनका चुम्बक मध्यवृत्ति के लोगों तथा नवयुवकों को अपनी और खींचता सचला गया है। सभी जानते हैं कि सिनेमा ने कामुकता को फैशनपरस्ती को कितना प्रोत्साहन दिया है ओर उस उत्तेजना से प्रभावित होकर कितनों ने अपना कदम अधः पतन की ओर बढ़ाया है। यही बात अन्य मूर्धन्य वर्गों के संबंध में भी कही जा सकती है। नशा व्यवसाय को अत्यधिक आगे बढ़ाने में धनवानों का ही प्रमुख हाथ रहा है। गरीब तो उसे खरीद कर पीते और मरते भर हैं।
अब नयी उलट-पलट में यह होने जा रहा है कि मूर्धन्य वर्ग का बहुत बड़ा भाग युग चेतना से प्रभावित होगा और अपनी दिशा धारा को उलट कर उस दिशा को अपनायेगा, जिसके लिए युग धर्म ने समझाया पुचकारा और ललकारा है। शक्ति की महिमा महत्ता सभी जानते हैं, व हजिस भी दिशा में कटिबद्ध होती है उसी में सफलताओं के अम्बार लगा देती है। अब तक बिगाड़ की दिशा अपनाई तो उसमें भी चमत्कार कर दिया। अब यदि उनका मानस बदलता है ततो समझना चाहिए कि उस बदलाव का प्रभाव भी कम न पड़ेगा। वे ऐसी गतिविधियां भी अपना सकते हैं,जो उनके स्वयं के लिए तो श्रेयस्कर होती है अगणित लोगों को भी अपने प्रभाव से प्रकाशित करेंगी।
साहित्यकार, प्रकाशक, मुद्रक, बुकसेलर एक संयुक्त वर्ग है। यह मिल-जुल कर ऐसे साहित्य का सृजन प्रकाशन और वितरण करे जो युग धर्म के अनुरूप हो तो उसका प्रभाव भी शिक्षित वर्ग पर कम न पड़ेगा। अब तक इस वर्ग में से अधिकाँश ने ऐसा मसाला प्रस्तुत किया है,जो पाठकों को अंधविश्वासों और दुश्चिंतनों की ओर धकेलता रहा है। उस प्रभाव से अगणित प्रभावित हुये हैं और बड़ा सा लोक मानस उसी ढाँचे में ढला है। अब जब सांचा बदलेगा तो उसमें ढलने वाले पुर्जे दूसरे रंग ढंग के होंगे। सत्साहित्य कितना प्रेरक होता है। इसके साक्षी ईसाइयों, कम्युनिस्टोँ और क्राँतियाँ प्रस्तुत करते रहने वालों से पूछकर कारगर निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है।
गायकों, वादकों, अभिनेताओं, फिल्म निर्माताओं ने मिल−जुलकर जो माहौल रचा है उस पर अगणित लोग झूमने लगे हैं। फिल्म दर्शकों की संख्या अखबार पाठकों से भी अधिक है। रिकार्डों को सुनने वाली संख्या भी कम नहीं है, उन्हें तो जहाँ-तहाँ मुफ्त में ही सुना जाता हैं। साँप बीन पर लहराते हैं और सुनने वाले गीतों का रसास्वादन करते हैं। सभा सम्मेलनों समारोहों में गीतवाद्य सुनने को मिलते हैं। फिल्म देखने तो लोग पैसा देकर जाते हैं और लौटते समय उसी रंग में रंगे हुये होते हैं जो दिखाया गया है। मस्तिष्क को बदलने में गायन वदन अभिनय का बड़ा हाथ है। वहां अपना लक्ष्य बदले तो सुनने वालों का मनःक्षेत्र बदले बिना रह नहीं सकेगा।
वक्ताओं ने बड़ी-बड़ी क्रान्तियाँ की हैं। उन्होंने लोक शिक्षण दिया और जन मानस को उठाकर खड़ा किया है। प्रभावित लोगों ने वह किया है, जिसे करने में आम आदमी चकराता है। कृष्ण की गति ने अर्जुन में नव जीवन भरा था। शुकदेव की कथा से परीक्षित का उद्धार हुआ हैं। सूत सौन के कथानकों ने सामयिक समस्याओं का उपयोगी समाधान किया थ। लेनिन की वाणी ने रूस को हिलाकर रख दिया था। बुद्ध, गाँधी आदि की वाणी समय को उलटने में समर्थ हुई। मनीषियों के उद्बोधन व्यक्ति को नये सिरे से सोचने और नयी दिशा अपनाने के लिए बाधित कर सकते हैं।
जो वैज्ञानिक अणुबम जैसे मारक अस्त्र बना सकते हैं, वे चाहें तो सुविधा संवर्धन से लेकर ब्रेन वाशिंग तक की अनेकों क्रिया प्रक्रिया सम्पन्न कर सकते हैं। मारको को निरस्त करने वाला विष विरोधी अमृत भी खोज सकते हैं।
यों धन की नश्वरता को उसे कमाने में बरती जाने वाली निष्ठुरता को देखते हुए उसका नम्बर पिछली पंक्ति में आता है; पर आज तो वही प्रथम पंक्ति में हैं; पर आज तो वही प्रथम पंक्ति में है। पैसे की कीमत पर सब कुछ खरीदा जा सकता है। सम्मान भी और धर्म समुदाय भी। उसी पूँजी के बल पर अनेकों भले बुरे व्यवसाय चलते हैं। धन मनुष्य को बुद्धिमान और चतुर भी बना देता है। मूर्ख के पास तो पैसा ठहरता ही नहीं।
धनवान चाहे तो कुटीर उद्योगों का ताना-बाना बुन कर लाखों करोड़ों को काम दे सकता। वे शिक्षा संस्थान चला सकते हैं। प्रकाशन हाथ में लेकर वातावरण को बदल सकते हैं। लोक सेवियों को प्रश्रय दे सकते हैं। धनवानों से कहा जाय कि जिस चतुरता से उन्होंने उपार्जन किया है, उसी प्रकार दूरदर्शिता आश्रय लेकर ऐसी सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनायें जिन से नई हवा चल सके, नया वातावरण बन सके और नया युग बन सके।
विश्वास किया जाना चाहिए कि यह मूर्धन्य वर्ग इन्हीं दिनों अपने भीतर समुद्र मंथन जैसी हलचलें अनुभव करेंगे, और उस दिशा में कदम बढ़ायेंगे जिन पर चलने से सबका कल्याण ही कल्याण है। इन दिनों विपत्तियों को बरसने की बेला है। उनसे पीड़ितों को सहायता की आवश्यकता पड़ेगी। धनवानों की थैलियाँ उस प्रयोजन के लिए भी काम आ सकती हैं।
इन दिनों विपत्तियों के बरसने की बेला है। उनसे पीड़ितों को सहायता की आवश्यकता पड़ेगी। धनवानों की थैलियाँ उस प्रयोजन के लिए भी काम आ सकती है।
विश्वमित्र नवयुग का सृजन करना चाहते थे। नई दुनिया बनाने का उनका मन था। राजा हरिश्चंद्र ने उस महान प्रयोजन के लिए न केवल अपना सारा राज पाट दे दिया, वरन् अपने पूरे परिवार को बेचकर उस आवश्यकता में कमी न पड़ने दी। सम्राट अशोक ने बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन में अपने विशाल साम्राज्य को खपा दिया था। तक्षशिला विश्वविद्यालय के लिए हर्षवर्धन ने और नालंदा के पुनर्निर्माण में चन्द्रगुप्त विपुल धन लगाया था। राणा प्रताप को स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने के लिए भामाशाह ने अपना समस्त कोष उड़ेल दिया था। अन्य अनेकों लाभ मोह त्याग कर पुण्य प्रयोजनों के लिए अपने समय और श्रम का सार धन के रूप में लगाते रहे हैं
प्रज्ञा मिशन को सुविस्तृत व्यापक बनाने के लिए अनेकों उपाय हो सकते हैं। कितने ही विद्यालय चल सकते हैं। फिल्में बन सकती हैं। शतकुण्डी यज्ञों की एक बड़ी श्रृंखला चल सकती है। जिस छोटी-सी इमारत में शाँति कुँज चल रहा है उसे दूना भी कर दिया जाय तो युग सृजन के लिए जीवन-दान, समय-दान करने वालों की कमी न पड़ेगी। युग शिल्पी सत्रों में सम्मिलित होने के इच्छुकोँ में से प्रायः आधों को ही स्वीकृति मिल पाती है। शिक्षण और भोजन निवास की सुविधा सर्वसाधारण के लिए घोषित कर देने पर यह स्वाभाविक ही था, कि जो आर्थिक कठिनाई के कारण इन नवजीवन प्रदान करने वाले एक मासीय सत्रों में सम्मिलित होने के इच्छुक रहे हैं, वे अब सुविधाओं का अधिक प्रबंध होने की स्थिति में बड़ी संख्या में सम्मिलित होने के इच्छुक रहे हैं, वे अब सुविधाओं का अधिक प्रबंध होने की स्थिति में बड़ी संख्या में सम्मिलित होना चाहें, पर आर्थिक कठिनाईयाँ आगे बढ़ने के प्रयासों के हाथ पकड़ लेती हैं और पैर भी जकड़ती हैं। सार्वजनिक अपील करने में संकोच करते रहने की अपनी नीति ने काय ्राके उसी सीमा तक फैलने फूलने दिया है जितना कि वह इन दिनोँ है।
आशा की जानी चाहिए कि नव सृजन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनीषी, समयदानी, गायक, वादक, सक्ता धनी आदि प्रतिभावान अपनी अपनी श्रद्धाँजलि लेकर नवयुग के अभिनव सृजन में आगे बढ़ेंगे और कहने लायक योगदान देंगे। इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य विनिर्मित करने के लिए इस प्रकार का सहयोग आवश्यक है और अनिवार्य भी।
जो वस्तु खोई नहीं उसे ढूँढ़ते कहाँ हैं? ईश्वर तो तुम्हारे भीतर भी बसता है और बाहर भी। फिर उसे नजदीक ही क्यों नहीं पकड़ लेते?
कराची में एक सार्वजनिक अस्पताल बन रहा था। निर्माता उसके लिए दान माँग रहे थे। दस हजार देने वाले के नाम का पत्थर अस्पताल की दीवार पर लगाने की घोषणा थी।
एक उदार दानी मानकदास ने दस हजार में से एक रुपया कम दिया ताकि उनके दान का विज्ञापन न हो और पुण्य क्षीण न हो।
लुहार और सुनार की दुकानें आमने-सामने थी। उनमें लोहे और सोने की दिन भर कुटाई होती।
एक दिन लोहे की चिनगारी उचटकर सुनार की दुकान में जा घुसी। रात के सुनसान में सोने की खपच्ची ने लोहे के टुकड़े से कहा-भाई हम तुम दोनों ही अभागे हैं जो दिन भर पिटते हैं।
इस पर लोहे के टुकड़े ने उदास होकर कहा-बहिन मैं तुम से अधिक अभागा हूँ क्योंकि मुझे अपनी बिरादरी वालों द्वारा ही पीटा जाता है, जब कि तुम अनय जाति के औजारों द्वारा पिटती हो।
जब रूस में राज-क्रान्ति हुई उन दिनों लेनिन जेल में थे। फाटक खुले तो उनने आश्चर्य से पूछा कि क्या सचमुच क्रान्ति सफल हो गई? भारतीय काँग्रेस के मूर्धन्य नेता व्यक्तिगत वार्ता में यही कहते थे कि हैं अपनी जिन्दगी कारागारों ही बितानी पड़ेगी। स्वराज्य देखने का दिन शायद नई पीढ़ी को मिले, पर उनका अनुमान गलत निकला। वे आशा से बहुत पहले ही छूट गये और शासन सत्ता का सूत्र संचालन करने लगे।
आज की स्थिति को देखते हुए इक्कीसवीं सदी में होने वाले महान परिवर्तनों पर सहसा विश्वास नहीं होता, तो भी यह निश्चित है कि भवितव्यता होकर रहेगी। तपते ग्रीष्म में कौन सोचता है कि अगले ही सप्ताह मानसून उठेंगे ओर तपती धरती को हरितिमा से ढक देंगे। कड़कड़ाती सर्दी में पतझड़ होता है और पेड़ ठूँठ रह जाते हैं। उस स्थिति को देखते हुए यह अनुमान कैसे लगे कि कुछ ही सप्ताह में खिलखिलाते बसंत की शोभा पूरे माहौल को बदल देगी।
अर्जुन अपनी छोटी सेना को देखकर हारने की बात सोचता था। सामने वाले दिग्गज सेनापतियों को कौशल और साधन सम्पन्न सेना का जौहर भी विदित था। उसे लगता था कि दुर्योधन को लड़ाई के मैदान में हराना कठिन है। इसलिए वह लड़ने के कतराता था। कृष्ण ने आश्वासन दिया कि शत्रु पक्ष को मैंने पहले से ही मार दिया है। वे तो जीवित लाश भर हैं। उन्हें जीत कर श्रेय प्राप्त करो। वस्तुस्थिति का भान होने पर वह लड़ाई में उतरा और विजयी बन कर लौटा।
दिन दिनों की स्थिति और अगली शताब्दी की संभावना में इतना अधिक अन्तर रहेगा कि सामान्य बुद्धि के लिए उस संभावना को सही मानने में अविश्वास हो सकता है, पर जो अदृश्य को देखते हैं वे देखते है कि ढाँचा खड़ा हो गया है, उसे सुसज्जित करने भर की देर है। माता के उदर में परिपक्व हुआ भ्रूण यों प्रत्यक्ष नहीं दीखता, पर यह निश्चित है कि कुछ ही दिनों में प्रसव होगा और नवजात शिशु गोदियों में खेलेगा। भावी समय का परिवर्तन इक्कीसवीं सदी का माहौल अब की अपेक्षा होगा तो अत्यधिक भिन्नता लिए हुए पर अन्दर ही अन्दर जो एक रहा है, उसे देखते हुए उन्हें कल्पना नहीं सुनिश्चित संभावना ही मानना चाहिए।
इक्कीसवीं सदी के साथ अवतरित होने वाला नवयुग अपनी विशेषताओं के आधार पर यदि प्रज्ञायुग कहा जाय तो उसमें किसी प्रकार की अत्युक्ति नहीं मानी जानी चाहिए। आज की अगणित विभीषिकाओं और समस्याओं का एक मात्र कारण ‘आस्था संकट है। लोगों ने आदर्शवादी आस्था, मान्यताओं का परित्याग कर दिया हैं पशु प्रवृत्तियों को अपना लिया है। इसका निराकरण किसी लोभ या भय से नहीं हो सकता। अन्तराल में प्रज्ञा उभरेगी, तभी दूरदर्शी विवेकशीलता के अनुरूप चिन्तन प्रवाह बनेगा। इसी के साथ चरित्र की उत्कृष्टता और व्यवहार की सज्जनता का प्रमाण परिचय मिलता है। व्यक्ति बदलेगा और समाज का स्वरूप भी ऐसा गंदला न रहेगा जैसा कि इन दिनों हैं जो परिस्थितियाँ इन दिनों कठोर बनी हुई हैं और विपन्न दीखती हैं वे तात्विक आधार बदलने पर अपना चोला साँप की केंचुली की भाँति बदल देंगी।
इक्कीसवीं सदी में पदार्थजन्य सुविधा साधनों में भारी उलट-पुलट न होगी। इन परिवर्तनों को दो प्रत्यक्ष रूपों में देखा जा सकेगा कि लोगों ने सादगी अपना ली। औसत नागरिक का जीवन जीने के लिए सुसम्पन्न भी स्वेच्छा या विवशता से बाधित होकर उस पद्धति को अपनाने लगें। दूसरा परिवर्तन यह दीख पड़ेगा कि देहातों से शहरों की ओर आने वाली भीड़ रुक जायगी। बड़े नगरों का विकेन्द्रीकरण होगा और वे कस्बों में बिखर जायेंगे। बड़े गाँव ही साधन सम्पन्न कस्बे बनेंगे और समीपवर्ती छोटे गाँवों को अपना ही मुहल्ला मानकर उनका परिपोषण अभिवर्धन करने लगेंगे। तब कृषि, व्यवसाय, गृह उद्योग, परिवहन वितरण के बीच ऐसा सुन्दर तालमेल होगा कि किसी को असुविधा हो किसी को खाली न रहना पड़े कोई बेरोजगारी का कष्ट न सहे।
इक्कीसवीं सदी के मौलिक आधार चार होंगे (1) एकता (2) समता (3) न्याय व्यवस्था (4) स्वाभाविक सुसंस्कारिता। एकता में राष्ट्रों का एकीकरण आता है। विभाजन की रेखाओं में बँटे रहते हैं। शोषण के कुचक्र चलते हैं और दुर्बलों को शोषित होना पड़ता है। सीमाओं को घटाने बढ़ाने के कारण ही युद्ध छिड़ते है जिनमें धन-जन की अपार क्षति होती है। जब एकीकृत विश्व राष्ट्र की स्थापना होगी तो उस के जिले डिवीजन बन कर देशों को रहेगी और आवश्यकतानुसार उनका उपयोग होता रहेगा। प्रांतों का विभाजन भौगोलिक स्थिति के अनुरूप नये सिरे से होगा। युद्ध सेनापति नहीं लड़ेंगे, अपितु न्यायालयों के फैसले मान्यता प्राप्त करेंगे। विश्व संविधान में मानवी एकता एकरूपता का न्याय और विवेक का प्रमुख प्रावधान रहेगा। जहाँ घिच-पिच है वहाँ की आबादी छितर-छितरे क्षेत्रों में बसा दी जायेगी। पारिवारिक सिद्धान्तों के अनुरूप प्रचलन बनेंगे। विश्व एक परिवार होकर रहेगा।
दूसरा तथ्य मान्यता प्राप्त करेगा वह होगा-समस्ता। जाति वंश के आधार पर कोई ऊँचा नीचा नहीं माना जायगा। नर और नारी के बीच कोई ऐसी विभाजन रेखा न रहेगी जिसके आधार प किसी के वरिष्ठ और किसी को कनिष्ठ ठहराया जा सके। जाति और लिंग के आधार पर प्रतिष्ठित और प्रचलित भिन्नता की मान्यता का एक प्रकार समापन हो जायगा। गाड़ी के दो पहियों की तरह दोनोँ वर्ग समान निष्ठा और योग्यता से परिवार से परिवार एवं समाज का सुसंचालन करेंगे।
भाषायी एकता की सर्वत्र आवश्यकता अनुभव की जायगी। अनेक भाषाएँ रहने से लोगों के बीच निरर्थक ही भेदभाव पैदा होता है और ज्ञान के विस्तार का अनुवाद मुद्रण की भिन्नता से भारी अवरोध पड़ता है। भाषायी एकता होने पर संसार भर के लोग एक दूसरे के अति निकट होंगे और विचारों का भावनाओं का उन्मुक्त आदान-प्रदान करेंगे। अनेकों सुविधाओं को देखते हुए विचारशील जनमानस भाषाई एकता को सहज स्वीकार करेगा और ज्ञान विस्तार क्षेत्र में इसका असाधारण लाभ अनुभव करेगा।
जाति लिंग और भाषा की भिन्नता की हानियों की तरह ही आर्थिक विषमता भी है। धन का स्वामित्व राष्ट्र का रहे। हर किसी को योग्यतानुसार और आवश्यकतानुरूप लेने की प्रथा हो तो न कोई गरीब रहे और न अमीर। गरीबी और अमीरी दानोँ समाज में अनेकानेक विकृतियाँ उत्पन्न करती हैं। जब उनका आधार कट जायगा तो उसका स्वरूप साम्यवाद से मिलता-जुलता होगा।
तीसरा पक्ष है व्यवस्था का प्रचलन एवं न्याय कानून का। इसका नवीन निर्धारण उपयोगिता एवं यथार्थता की कसौटी पर कसा जायगा। कानून और प्रचलन की भिन्नता भी मनुष्य जाति के पिछड़ेपन का अहंकारी अधिपत्य का एक बहुत बड़ा कारण है। सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत जब व्यवस्था चल पड़ेगी तो नौकर मालिक के समर्थ दुर्बल के बीच जो आये दिन टकराव होते हैं उनका काई कारण शेष न रहेगा।
इक्कीसवीं सदी का चौथा आधार होगा-सुसंस्कारिता। सुसंस्कारिता अर्थात् कर्तव्यपालन, मर्यादाओं का अनुशासन सभी धर्म सम्प्रदायों का अनुशासन सभी धर्म सम्प्रदायों में से उस नवनीत को अपनाया जाना जो न्याय विवेक एवं औचित्य पर आधारित है। पूजा परक कर्मकाण्ड कोई किसी रूप में अपनाये। यह रसोई या लिवास की तरह अपनी रुचि का विषय होगा पर अपने को सत्य का ठेकेदार और दूसरों को झूठा बेईमान कहने की छूट किसी को न होगी। एक ही बगीचे में कई रंग के फूल फलों की तरह सभी धर्म सम्प्रदाय एक दूसरे के पूरक बन कर रहेंगे और परस्पर सम्मान करने में भी कमी न रहने देंगे।
यही हैं वे चार सूत्र जिनके चार पाठों पर नवयुग का राज्य सिंहासन खड़ा हुआ है। इन्हीं चार दीवारों को मिलाकर नवयुग का विशाल भवन खड़ा होगा।
मानवी क्षमता सीमित है। यह उत्पन्न तो साहस एवं संकल्प के सहारे होती है, किन्तु उसका सफल एवं विकसित होना साधनों तथा परिस्थितियों पर निर्भर रहता है। वे न जुट पाये तो बुद्धिमत्तापूर्ण किया गये नियोजन और तत्परता के साथ नियोजित हुए प्रयास भी असफल होते देखे गये हैं, किन्तु दैवी सहकार, संकेत साथ रहने पर ऐसी कठिनाइयों की आशंका नहीं रहती। जिस सृष्टा के संकेतों पर यह समूचा ब्रह्माण्ड निश्चित गति एवं व्यवस्था के साथ चल रहा है उसकी इच्छाएँ योजनाएँ प्रेरणाएँ असफल होकर रहे ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए भौतिक की समर्थता को मान देते हुए भी दैवेच्छा को प्रबल मानना पड़ता है। कर्मफल, भाग्य विधान ईश्वरीय कर्त्व्य आदि नामों से इसी को बखाना जाता है।
इक्कीसवीं सदी का रूप ऐसा सजाया जा रहा है। जैसा पुरातन काल के सतयुग में कभी था। अब तो सघन अंधकार की तरह अविवेक और अनाचार बहुलता का कलियुग चल रहा है, पर देखा गया है कि प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं। ऊषाकाल अरुणोदय में बदलता और उसके बाद स्वर्णिम सविता के दर्शन होने लगते हैं। देर नहीं लगती कि दिनकर का प्रकाश समूचे धरातल पर अपनी प्रकाश किरणों को बखेर देता है। यही देवी कर्तव्य है। मनुष्य इनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
विश्वास किया जाना चाहिए कि नवयुग का अवतरण दैवी अनुग्रह के रूप में इस धरित्री पर अवतीर्ण हुई थी, उसी प्रकार प्रज्ञा युग का आलोक भी दिनमान के प्रकटीकरण की तरह अनायास ही होगा। समुद्र पर किसी जमाने में पुल भी इसी प्रकार बना था और गोवर्धन पर्वत को लड़कों ने लाठियों का सहारा देकर उठा लिया था इस बार भी वैसा ही चमत्कार परिवर्तन प्रस्तुत हो तो उसमें कुछ आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए।
भगवान सर्वव्यापी और शक्ति स्वरूप होने के कारण स्वयं तो एक स्थान पर सिमटने और प्रकट होने की प्रक्रिया पूरी नहीं करते, पर अपने प्राणवान पार्षदों को बिगड़े को बनाने के लिए बने को सजाने के लिए भेजते हैं। इस बार भी ऐसी ही प्रतिभाओं को विश्व के कोने-कोने में अवतरण होगा, जो ईश्वरी की इच्छा के अनुरूपता का अवातावरण बना सकें।
अभीष्ट प्रयोजनों के लिए प्रचंड ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता पड़ेगी। बिना उसके वाहनों और कारखानों तक को चलाना कठिन हो जाता है। इसलिए विशालकाय निर्माण करने के साथ ही ऊर्जा भण्डार की व्यवस्था बनानी पड़ती है। गंगा स्वर्ग से आई थी तब पृथ्वी पर उसका दबाव सहन करने के लिए शंकर आगे आये थे और उनने अपनी जटाएँ बखेरी थी। राम दल में पर्वत उठाने संजीवनी लाने लंका का मरोड़ देने वाले हनुमान कार्य क्षेत्र में उतरे थे। महाभारत तो असंख्यों द्वारा लड़ा गया था पर उसका ध्रुव केन्द्र अर्जुन की धुरी पर भ्रमण करता रहा। समय समय पर अवतारी आत्माएँ ऐसी प्रतिभाओं के रूप में प्रकट होती रही है। जो लाभ मोह अहंकार से मुक्त होकर जनमानस के परिष्कार में सत्प्रवृत्ति संवर्धन में जुट पड़ीं। ऐसे विषम समय में देवात्माएँ मनुष्य का काय कलेवर धारण करती और भगवान द्वारा निर्देशित सामयिक समस्याओं को आवश्यक मोड़ देने में प्रवृत्ति होती है। इसके लिए उन्हें धर्मानुष्ठानों से लेकर सुविस्तृत जन संपर्क में प्रवृत्त होना पड़ता है। अनादि काल से समय केेेी विकृतियों के निराकरण में वही प्रक्रिया कार्यान्वित होती रही है।
प्रतिभावान आदर्शवादियों को सुधार संवर्धन में जुट जाना सार्थक होना जा रहा है या नहीं, इसकी पहचान एक ही है कि उनने निजी लोभ मोह में अहंता प्रदर्शन में कटौती की या नहीं। यदि वे अपने चिन्तन चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत कर सके होंगे तो उनका दूसरों पर प्रभाव भी पड़ेगा और अपनी बढ़ी हुई आत्म शक्ति के सहारे ऐसा कुछ भी कर सकेंगे जिनसे विकृतियों का निराकरण और सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन संभव हो सके। यदि वे निजी स्वार्थ साधन के दलदल में पैरों से लेकर सिर तक डूबे होंगे तो फिर यह कठिन होगा कि वे उच्चस्तरीय कार्यों को कर सकने में उनके लिए आवश्यक समर्थन सहयोग जुटाने में सफल हो सके। पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर प्रतिमाएं ही सामान्य कार्यों में सफल होती हैं और उन्हीं के लिए यह भी संभव है कि सार्वजनिक पारमार्थिक कार्यों को पूरा कर दिखायें। ओछे और घटिया व्यक्ति तो पग-पग पर असफल ही होते हैं।
यह प्रयास द्रुतगति से चल रहा है और सफल भी हो रहा है। इसके अतिरिक्त अदृश्य वातावरण के अनुकूलन के लिए दिव्य चेतना का सहयोग आकर्षित करने के विशेष धर्मानुष्ठानों का क्रम चलाया गया है।
इस हेतु इसी दिवाली से लेकर चैत्र नवरात्रि तक की अवधि में शत कुण्डी एक सौ गायत्री यज्ञ सम्पन्न किये जा रहे हैं, साथ ही नव सृजन की चेतना उभारने वाले सम्मेलन समारोह भी होंगे।
इन आयोजनों में व्यवस्थापकों को आवश्यक वस्तुऐं एकत्रित करने में दौड़−धूप न करनी पड़े और पैसे की भी सीमित आवश्यकता पड़े। इस सुविधा को ध्यान में रखते हुए हरिद्वार से एक पूरा ट्रक लदा हुआ सामान भेजा जाता है। इसमें शतकुण्डी यज्ञशाला,विशाल प्रवचन पंडाल, स्टेज, चित्र प्रदर्शनी, भोजनालय के उपकरण लाउडस्पीकर, रात्रि समय काम आने वाला जनरेटर आदि सामान होंगे। साथ ही गायक, वक्ता, संगीत उपकरणों तथा लाउडस्पीकरों समेत पहुँचेंगे।तीन तीन दिन के सम्मेलन होंगे। ट्रक आगे पीछे इतने समय तक और भीरुंगा जिससे सामान उतारने लाइनें तथा निर्धारित स्थान पर जमाने और उतारने का अवसर मिल सके। सौ कुण्ड बाने के लिए लकड़ी के फर्मे होंगे ताकि वह निर्माण कार्य एक दिन में ही पूरा हो जाये। हवन सामग्री का, यज्ञ विधि पुस्तिका का पूरा प्रबन्ध किया गया है,कि सभी वस्तुऐं सुविधापूर्वक उपलब्ध हो सकें।
108 कुण्डों के 1000 यज्ञ होने पर यह एक लाख कुण्डों का सुविस्तृत किन्तु विकेन्द्रित यज्ञ हो जायेगा। एक स्थान पर बड़ा यज्ञ आयोजन करने की उपेक्षा यह उचित समझा गया है, कि उसे प्रत्येक प्रान्त में दर्जनों की संख्या में सम्पन्न किया जाये। इसका प्रभाव यह होगा कि सभी स्थानों में गायत्री परिवारों तथा समीपवर्ती लोगों का बड़ी संख्या में सम्मिलित होना संभव हो सकेगा और वे उस आयोजन में भागीदार रहकर धर्म लाभ उठा सकेंगे। यज्ञ प्रातःकाल चलेगा। तीसरे पहर संकीर्तन होगा। रात्रि को सभा सम्मेलन चलेगा, जिससे उच्चकोटि के गायन वादन तथा प्रवचन चलेंगे।
इससे पूर्व 240 करोड़ का गायत्री जप प्रज्ञा परिवार के 24 लाख सदस्यों द्वारा पहले से ही चल रहा है। उस जप को इसे पूर्णाहुति समझा जा सकता है। 24 लाख कुण्डों की यज्ञ व्यवस्था योजनाबद्ध रूप से कहीं कभी भी नहीं बनी इसलिए इसे अपने ढंग का अनोखा,अद्भुत और अभूतपूर्व आयोजन भी कहा जा सकता है।
मंत्र शक्ति की प्रचण्डता प्रख्यात है। यदि उसे सही ढंग से साधा जा सके तो कारखाने वाले यंत्रों की अपेक्षा मंत्रों की क्षमता अद्भुत एवं असाधारण होती है। गायत्री मंत्री की महत्ता सर्वोपरि कही गई है।इस क्षेत्र का तना जप और इतना यजन होने का परिणाम अदृश्य जगत के परिशोधन की दृष्टि से असाधारण होना चाहिए। होगा भी।
लंका दमन के उपरान्त वातावरण में अदृश्य असुरता विपुल मात्रा में भरी रह गई थी। उसका निराकरण करने के लिए भगवान राम ने काशी में दशाश्वमेधघाट पर दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। इसी प्रकार कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, आदि ने अनाचारों को निरस्त करने के उपरान्त भी पाया गया कि अदृश्य अन्तरिक्ष में आसुरी तत्व विपुल मात्रा में विद्यमान है। वे यथावत बने रहते तो बरसात के उद्भिजों की तरह नये आकार प्रकार में नये दैत्य उपज पड़ते और पिछली दृष्टा से भी बढ़े चढ़े अनाचार करते। इस कठिनाई से निपटने के लिए भगवान कृष्ण ने पाण्डवों से विशालकाय राजसूय यज्ञ कराया था। प्रत्यक्ष की भांति परोक्ष का संशोधन भी आवश्यक है। शरीर के स्नान कराने की तरह ही मन में पवित्रता की स्थापना आवश्यक होती है। समस्याओं का प्रत्यक्ष स्वरूप प्रत्यक्ष उपायों द्वारा संतुलित किया जाता है। ठीक इसी प्रकार परोक्ष जगत में दुर्बुद्धि के कारण अनौचित्य छा जाता है,उसका निराकरण करने के लिए गायत्री यज्ञ जैसे धर्मानुष्ठानों की आवश्यकता पड़ती है। वही किया भी जा रहा है। प्रथम चरण में 1 लाख कुण्डों के गायत्री महायज्ञ की व्यवस्था की गई। इसे इतने पर ही समाप्त नहीं किया जाना है। वह आगे भी ऐसे ही उत्साह पूर्वक चलता रहेगा ओर संभव है यह युग संधि की इसी अवधि में 24 लाख कुण्डों का आयोजन होकर रहे। इसी अवसर पर मिशन के सूत्र संचालक की 75 वीं हीरक जयंती भी है। अखण्ड ज्योति पत्रिका के पचासवें वर्ष की स्वर्ण जयंती भी। तीसरा सुयोग इसी में और आ मिलता है। तीन वर्ष की सावित्री साधना का समापन भी इसे राष्ट्रेव की कुण्डलिनी जागरण तप भी कहा गया है। इस प्रकार यह त्रिपदा त्रिवेणी बनती है ओर उसकी पूर्णता में एक लाख कुण्डों में यज्ञाग्नि प्रज्वलित होनी है। युग संधि की अवधि में तो यह 24 लक्ष्य कुण्डों की प्रक्रिया बन कर सम्पन्न होगी।
यज्ञ के दो पक्ष है। एक राजसूय -राजनैतिक समस्याओं के निराकरण के लिए। दूसरा धर्मधारणा क्षेत्र में उलझनों को सुलझाया जाता है। विशाल भारत के शुभारंभ की योजना कार्यान्वित करने के लिए कृष्ण के नेतृत्व में राजसूय यज्ञ हुआ था। त्रेता में सतयुग की वापसी वाला धर्म युग लाने के लिए देश जो दश अश्वमेध यज्ञ हुए वे वाजपेय यज्ञ थे। उसमें मनीषियों ने एकत्रित होकर भविष्य की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।
प्रस्तुत लक्ष्य कुण्डी गायत्री यज्ञ को राजसूय और वाजपेय यज्ञ का मिला जुला स्वरूप समझना चाहिए। इसमें राजतंत्र और धर्मतंत्र की शक्ति का एकीकरण करके समग्र परिवर्तन की इक्कीसवीं सदी की प्रक्रिया गतिशील की जा रही है।
धुनिया रुई के गोदाम में गया तो सन्त रह गया। इतनी मुझे धुननी पड़ी तो किस प्रकार पार पड़ेगी?
दुकान मालिक उसकी भीरुता को ताड़ गया और बोला-जब तुम धुनने का इरादा करोगे तो अनेकों साझेदार मिल जायेंगे। हिम्मत छोड़ दोगे तो थोड़ा काम भी भारी पड़ेगा।
माधवाचार्य ने वृन्दावन रहकर गायत्री के 14 महापुरश्चरण किये, इतने पर भी उन्हें कोई सफलता न मिली। निराश होकर वे काशी चले गये। वहाँ एक तांत्रिक से मरघट में रहकर भैरव सिद्ध करने में लग गये।
एक वर्ष में भैरव आये पर पीछे खड़े होकर वरदान माँगने की बात करने लगे। माधवाचार्य ने सामने दर्शन देने का अनुरोध किया तो जवाब मिला हम तांत्रिक देवता हैं। गायत्री जप से तुम्हें जो ब्रह्म तेज प्राप्त है उसके कारण सामने आते नहीं बनता।
माधवाचार्य ने कहा-यदि गायत्री साधना में ऐसा ही ब्रह्म तेज प्राप्त होता है तो 14 पुरश्चरण पर भी कोई सिद्ध क्यों नहीं मिली। भैरव ने उन्हें 14 जन्मों के दृश्य दिखाये। उनमें बन पड़े पापों के करने में ही अब तक के अनुष्ठान खप जाने की बात बताई ओर पाप कुसंस्कार कट जाने पर अब जो साधना करेंगे उससे सिद्धि मिलेगी। माधवाचार्य को नया प्रकाश मिला वे वापस वृन्दावन लौट आये। पन्द्रहवें पुरश्चरण पर उन्हें सिद्धि मिली। उस उपलब्धि के सहारे उन्होंने “माधव निदान” नामक आयुर्वेद का अद्भुत ग्रन्थ बनाया और कृतकृत्य हो गये।
लम्बी गुलामी के उपरान्त भारत में स्वाधीनता के वातावरण में साँस ली। इसे पिछली पीढ़ी के राजनेताओं का प्रत्यक्ष पुरुषार्थ माना जा सकता है। भले ही उनके साथ आध्यात्मिक पुरुषार्थों का भी अदृश्य पुरुषार्थ जुड़ा रहा हो। स्वतंत्रता प्राप्ति के कारणों, योजनाओं कर्तृत्वों परिस्थितियों की चर्चा करना इन पंक्तियों में अप्रासंगिक होगा। उस विवेचना का कार्य इतिहासकारों पर छोड़ देना चाहिए। हमें तो इतना भर समझना है कि स्वतंत्रता के उपरान्त जो दायित्व देश के कंधों पर आया है, उसका निर्वाह किस प्रकार किया जाए? कौन करे? रहने वाली त्रुटियों का संशोधन परिमार्जन किस प्रकार किया जाए? जन जन में वह भावना कैसे भरी जाय जिससे पिछले दिनों खोदी गई खाई को पाट सकना संभव हो सके।
सत्ता हाथ में आने पर शासकों ने प्रमुख उत्तरदायित्व दो संभाले हैं। एक देश की सुरक्षा को बनाये रखने के लिए अपने को समर्थ स्थिति में गिने जाने योग्य बनाना। दूसरा कार्य भार यह भी कंधे पर था कि बिगड़ी हुई आर्थिक स्थिति को संभाला जाय। फैली ही अव्यवस्थाओं को नियोजित करना भी शासन तंत्र का ही काम है।
पूर्व पीढ़ी ने स्वतंत्रता प्राप्त की। वर्तमान पीढ़ी उसकी सुरक्षा और प्रगति के लिए उपाय कर रही है। इससे इस दिशा में प्रयत्नों के अनुरूप सफलता भी मिल रही है। आशा की जानी चाहिए कि कुशलता, तत्परता ओर दूरदर्शिता के साथ प्रयोग करने पर शासन के पास जो साधन हैं,उनका सदुपयोग और बढ़ती आबादी के नियंत्रण न हो पाने पर भी देश को ऊंचा उठाने का क्रमिक अवसर मिलता जायेगा।
जो नहीं हो सका है वह पूरा करना धर्म तंत्र का काम है। शासन की तरह ही धर्मतंत्र का भी महत्व है। शासन भौतिक जगत को प्रत्यक्ष कठिनाइयों को संभालता है ओर उत्पादन, नियमन की व्यवस्था करता है। इसके अतिरिक्त भी अन्य पक्ष हैं, जो इससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। वह है व्यक्तित्व का निखार और समाज का भावनात्मक अभ्युदय।इस दिशा में आवश्यक प्रगति होने की त्रिविधि क्रान्तियों के रूप में भी विवेचना की जा सकती है।
बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति वे दिशाधाराएं हैं जिनमें व्यक्ति की प्रतिभा, प्रामाणिकता निखरती है ओर समाज का सर्वतोमुखी उत्कर्ष होता है। व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती इकाई है- परिवार। यह भी अपना सुनियोजन चाहता है। व्यक्ति परिवार और समाज तीनों ही पक्ष अपना अपना कर्तव्य, दायित्व कैसे पालें? हिल मिल कर कैसे रहें? एक दूसरे को आगे बढ़ाने, ऊंचा उठाने में किस प्रकार सहायक सिद्ध हों? इसकी भावना उत्पन्न करना और विधि प्रयोग बताना धर्म तंत्र का काम है। श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा उसी के सहारे उत्पन्न होती है और सुदृढ़ बनती है।
मनुष्य तीन हिस्सों में बंटा हुआ है, चिंतन, चरित्र और व्यवहार। शरीर और मन को मिला कर यही प्रयोजन पूरे करने पड़ते हैं। इन क्षेत्रों को साफ सुथरा रहना चाहिए। इनमें से एक में भी विकृतियों का समावेश नहीं होने देना चाहिए। जहाँ भी गड़बड़ी दीख पड़े वहाँ बुहारी लगानी चाहिए और जो कचरा दीख पड़े उसे कूड़े के ढेरों में पटकना चाहिए।
बौद्धिक क्रांति के अंतर्गत चिन्तन की अवाँछनीयताओं का उन्मूलन आता है। मनोविकारों की सुविस्तृत श्रृंखला इसी स्तर की होती है। जिसमें से प्रत्येक को खोजा जाना चाहिए और एक एक करके निकाल फैंकने में जुट जाना चाहिए। भय, चिन्ता, कृपणता, भीरुता, अनगढ़ महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या, निराशा आदि ऐसी ही मानसिक विकृतियाँ हैं, जिनके रहते कोई चैन से नहीं बैठ सकता। श्मशान में प्रेम पिशाच की तरह स्वयं डरता और दूसरों को भी डराता रहता है। स्वयं जलता ओर दूसरों को जलाता है। मानसिक उद्वेग शारीरिक रोगों में परिणित होते हैं। मेधा बुद्धि पर बुरा असर डालती है। सनकें बन कर अर्धविक्षिप्त जैसी मनःस्थिति बना देती है। ऐसे व्यक्ति सदा दिग्भ्रांत रहता है उन बातों को सोचता है जिन्हें नहीं सोचा जाना चाहिए।
चिन्तन का प्रभाव चरित्र पर पड़ता है। चरित्रनिष्ठा ही नैतिकता है। नीतिवान और चरित्रवान एक ही स्थिति के दो नाम है। कर्तव्य उत्तरदायित्व का निर्वाह, सज्जनता का अवधारण, शिष्टाचार अनुशासन का परिपालन है। उसके निर्मल निष्कलंक होने पर व्यक्तित्व प्रामाणिक परिष्कृत होता है। उस पर विश्वास किया और सहयोग दिया जाता है। इन्हें प्राप्त करने पर किसी का भी प्रगति की दिशा में चलना स्वाभाविक है। नीति विरुद्ध आचरण करने वाले, मर्यादाएं तोड़ने ओर वर्जनाओं का व्यतिरेक करने वाले छल कपट रचते और दुष्ट कर्मों में लिप्त रहते हैं। ऐसे को प्रथम आक्रमण में थोड़ा लाभ मिल भी सकता है, पर अन्ततः विश्वास खो बैठने पर इतने घाटे में रहते हैं जिसकी पूर्ति किसी भी प्रकार नहीं हो सकती। जिसने चरित्र खोया समझना चाहिए कि उसने सब कुछ खो दिया।
नीति क्षेत्र में मर्यादाओं का, वर्जनाओं का व्यतिरेक न करने देने की व्रतशीलता के निर्वाह को नैतिक क्रान्ति कहते हैं और चिन्तन क्षेत्र को अनगढ़ता को- अवाँछनीयता को उखाड़ फेंकना बौद्धिक क्रान्ति के नाम से जाना जाता है। इन्हें सम्पन्न करना धर्मतंत्र का काम है। शासन इसके लिए कानून की छोटी मर्यादाओं में ही आँशिक रूप से किसी को प्रतिबंधित कर सकता है। अन्यथा मौलिक नागरिक अधिकारों की दुहाई देकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कुछ भी करते रह सकता है। इनका निराकरण आस्थाओं में आदर्शवादिता का समावेश करने से मान्यताओं की उच्चस्तरीय दार्शनिकता का समन्वय करने से ही संभव हो सकता है। धर्मधारणा का मूलभूत प्रयोजन यही है।
धर्म यों आज अनेकानेक सम्प्रदायों में बंट गया है और प्रथा प्रचलनों, पूजापरक कर्मकाण्डों को ही समग्र धर्मतत्व समझा जाने लगा है, पर यह भी अर्थ का अनर्थ करना है। धर्म उस तत्व दर्शन का नाम है जो व्यक्ति को आदर्शवादी, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार से अवगत अभ्यस्त होने के लिए बाधित करता है।
व्यक्तित्व का कार्यक्षेत्र एक कदम बढ़ाने पर परिवार को अपनी परिधि में लपेटता है और दूसरा कदम बढ़ने पर वह समूचे समाज पर छा जाता है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसका जन्म और परिपोषण परिवार में ही होता है। इसलिए इस समुदाय में रहने वाले सभी सदस्यों के बीच सराहनीय अनुकरणीय स्नेह सहयोग रहना चाहिए। सभी एक दूसरे के लिए अपना बहुत कुछ निछावर करें और बदले में न्यूनतम प्रतिदान की इच्छा रखें। तभी घनिष्ठता और आत्मीयता अक्षुण्ण रह सकती है। सुसंस्कृत परिवार ही नर-रत्नों की खदान होते हैं। उन्हीं के आँगन में स्वर्गीय स्नेह सौजन्य, उभरता उछलता रहता है। यह स्थिति उत्पन्न करना धर्म तंत्र के प्रवचनों शास्त्रों, पुराणों एवं कर्मकाण्डों को आधार मान कर प्रशिक्षण कार्य से ही संभव हो सकता है।
व्यक्तित्व का विकसित रूप समाज है। समाज व्यक्ति को प्रभावित करता है और व्यक्ति समाज को। दोनों के बीच जितना अधिक सामंजस्य सौमनस्य होगा उतना ही उपयुक्त वातावरण बनेगा। आदान-प्रदान का नीति युक्त सिलसिला चलेगा। समाज में अनेकों कुरीतियाँ, मूढ मान्यताएं अनीतियाँ प्रचलित पाई जाती हैं। इसका कारण भी विवेक बुद्धि की दूरदर्शिता की, न्याय निष्ठा की कमी है। समाज में इस स्तर के दुष्कृत्यों को हटाया जाना ही उचित है। यह कार्य भी शासन क्षेत्र की परिधि में एक सीमा तक ही आता है। परमार्थ परायणता, न्याय निष्ठा, सेवा सहायता की सत्य प्रवृत्तियां जब पनपती हैं तब सामाजिक सुव्यवस्था के अक्षुण्ण रहने की स्थिति बनती है। इस आस्था को जगाने में धर्म की ही प्रधान भूमिका होती है, हो सकती है परस्पर किसी प्रकार हंसते, हंसाते, मिल बाँट कर खाते हुए जीवन जिया जाना चाहिए। यही सामाजिक धर्म शिक्षा है। उसमें समझदारी, ईमानदारी ओर बहादुरी का ऐसा पाठ पढ़ाया जाता है, जिससे मनुष्य में देवत्व उभर सके और इसी धरती पर स्वर्ग का वातावरण बन सके।
कभी धर्म, पूजा-उपासना और परलोक की चर्चा में ही निरत रहता था, पर अब उसकी परिधि में वे सभी आधार सम्मिलित किये जा रहे हैं जो मनुष्य के चिन्तन, चरित्र ओर व्यवहार को परिष्कृत, सुव्यवस्थित करते हैं। इस दृष्टि से धर्मोपदेशक ही नहीं वरन् वे साहित्यकार, कलाकार, लोकसेवी भी पुरोहित कहे जा सकते हैं जो आदर्शवादी आस्थाओं को उभारने में अपने अपने ढंग से योगदान देते हैं।
बहुत समय से धर्म, निहित स्वार्थों के चंगुल में फँसा रहा है पुरोहित देवताओं के एजेन्ट बन भावुकजनों को किन्हीं प्रपंचों के सहारे लूटते खाते रहे हैं, पर अब विज्ञ वर्ग ने समझा है कि धर्मधारणा एक उच्चस्तरीय प्रेरणा है जिससे मनुष्य स्वयं महान बनता और अपने समीपवर्ती वातावरण में महानता का बीजारोपण करता है।
पेड़ जड़ों की गहराई, मजबूती और खाद पानी सोखने की शक्ति के सहारे सुदृढ़ होता और फलता फूलता है। मनुष्य की जड़े उसकी आस्था भूमि-अन्तरात्मा में है। क्षुद्रता और महानता-अवगति और प्रगति वहीं सन्निहित रहती है। इसे सींचना संजोना धर्म का दायित्व है। भौतिक क्षेत्र की सम्पदाओं का कितना ही महत्व क्यों न हो, वह अन्तःकरण की विभूतिवान उत्कृष्टता से बढ़ कर नहीं हो सकता। जो इस स्तर पर सुसम्पन्न है वही वस्तुतः प्रगतिशील है।
राजनैतिक और आर्थिक क्रांतियों का वर्तमान में क्रिया−कलाप शासन द्वारा सुसंचालन बना रहेगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए, साथ ही यह विश्वास भी संजोया जाना चाहिए कि राजतंत्र का पूरक धर्मतंत्र भी अपनी जिम्मेदारियाँ निबाहने से पीछे न रहेगा। बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक क्रान्ति की त्रिविध धाराओं को प्रवाहित करने में हिमालय जैसी भूमिका सम्पन्न करेगा। त्रिवेणी की तीनों धाराएं मिलकर तीर्थराज संगम बनता है। धर्मतंत्र की त्रिविध क्रांतियों द्वारा नवयुग का आधार खड़ा होगा,इस तथ्य को हम अगले ही दिनों प्रत्यक्ष देख सकेंगे।
राजा ने अपने महल में अंधेरा न घुसने देने के लिए बड़ी सेना लगा दी, पर रात होते ही अंधेरा सब ओर छा गया। रुका ही नहीं प्रतिरोध बेकार चला गया।
पुरोहित ने सलाह दी कि सेना पर जितना खर्च किया जाता है, उतना प्रकाश फैलाने के साधन बनाने में लगाया जाय। वैसा ही किया गया। उजाला होते ही अंधेरा चला गया। उसे रोकने वाली सेना वापस चली गई।
उन दिनों शिक्षार्थी विद्या शुल्क जमा नहीं करते थे। पर साथ ही इतने कृतघ्न भी नहीं थे कि जिस आश्रम में लम्बी अवधि तक रहकर ज्ञान और निर्वाह प्राप्त किया हो, उसका ऋण न चुकाएं। लौटने पर नाम गुरुकुल का स्मरण रखते और अपनी कमाई का एक अंश नियमित रूप से भेजते।
शिक्षा सम्पूर्ण होने पर शिष्य गुरु से उनकी आवश्यकताएं पूछते और उनकी पूर्ति का संकल्प लेकर वापस लौटते।
उस दिन विरजानन्द के गुरुकुल से विद्याध्ययन के उपरान्त दयानन्द चलने लगे तो चर्चा उस सम्बन्ध में हुई कि गुरु आकाँक्षा एवं आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्हें क्या करना है?
ब्रह्मचारी दयानन्द की प्रतिभा से विरजानन्द प्रभावित थे। उनने कहा- सामान्य लोगों की तरह न जीकर तुम समय के कुप्रभाव को उलटने में लग सको तो कितना अच्छा हो।
शिष्य ने गुरु इच्छा पर अपनी इच्छा निछावर कर दी और उसी दिन संन्यास लेकर समाज सुधार के कार्यों में निरत हो गए।
इन दिनों भारत अनेक भीतरी विग्रहों ओर बाहरी दबावों के बीच रह रहा है। उनका प्रभाव प्रगति पथ में रोड़ा बन रहा है और चित्र विचित्र प्रकार की कठिनाइयों उत्पन्न कर रहा है। इन असमंजसों को दिखते हुए औसत दर्जे के मनुष्य का चिन्तन होना और भविष्य के लिए कठिनाइयों के बढ़ने की आशंका करना स्वाभाविक है। जो छोटी मोटी असफलताएं भी व्यवधान उत्पन्न करती हैं, वे अदूरदर्शियों को बढ़ी बढ़ चढ़ कर प्रतीत होती हैं और उतने भर से उनकी स्थिति घबरा जाने जैसी बन जाया करती है।
देश के सामने प्रस्तुत इन दिनों की समस्याओं को गिनाया जाय तो उनमें से राष्ट्रीय महत्व की दर्जनों विभीषिकाएं सामने खड़ी दीखती हैं। स्थानीय महत्व की दुरभिसंधियों को गिना जाय तो उनकी संख्या सैकड़ों तक जा पहुँचती है। जो निराश भरा, असफलताओं से जुड़ा पक्ष देखने के आदी हैं, जिनके लिए प्रस्तुत संकटों का बढ़ना ही कल्पना क्षेत्र में आता है। फलतः वे स्वयं हैरान होते हैं और अपनी मान्यताएं दूसरों को बढ़ा चढ़ा कर बताने पर उन्हें भी हैरानी में डालते हैं।
यह एक पक्ष की चर्चा है। विचारशील दूरदर्शी लोगों के लिए उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पना करना न केवल स्वाभाविक ही है, वरन् उनका चिन्तन रचनात्मक होता है। जो अपने पुरुषार्थ और प्रयत्न पर दृष्टि डालते हैं और सत्य की जीत होने के सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं, उनके लिए यह स्वाभाविक है कि सुधरे हुए दृष्टिकोण से सोचें और सत्प्रयत्नों का सुखद परिणाम होने की बात का अनुमान लगाएं।
हमारा स्वयं का विश्वास इतने दिनों की आराधना और देवी सन्निकटता के आधार पर यह बन गया है कि भारत अगले दिनों सभी क्षेत्रों में असाधारण प्रगति करेगा। इतना ही नहीं वह दूसरे पिछड़े और पददलित देशों को ऊंचा उठाने में कारगर भूमिका भी सम्पन्न करेगा। उसकी सनातन परम्परा भी ऐसी ही है। उसने उन दिनों में विश्व व्यवस्था को सुधारने में भारी काम किया थ जब संसार में सर्वत्र अनगढ़ता और पिछड़ापन छाया हुआ था। तब यहाँ के मनीषी परिव्राजक विश्व के कौने-कौने में गये थे और ज्ञान विज्ञान से अवगत कराके पिछले जन समुदाय को ऊंचा उठाया था। अब की बार उसी पुरातन प्रक्रिया की नई परिस्थितियों के अनुरूप पुनरावृत्ति करनी होगी। सफलता पूर्वकाल में भी मिलती थी और सत्परिणाम इन दिनों के प्रयत्नशीलता के भी निकलेंगे।
प्राचीन काल में पिछड़े पन में अभाव, दारिद्रय, अज्ञान और अनाचारों का बाहुल्य था। तब का प्रशिक्षण भारतीय देवात्माओं ने उसी के अनुरूप किया था। समस्त विश्व को भारत का अजस्र अनुदान किस प्रकार का उपलब्ध करा गये थे, इसका संक्षिप्त विवरण हम अपनी इस नाम की पुस्तक में दे चुके है। तब की परिस्थितियों से अब भारी अन्तर हुआ है। विज्ञान ओर बुद्धिवाद की उन्नति से सुविधा साधन बढ़े हैं। लोगों का तर्क करना और चमत्कारी निर्माण खड़े करना भी आ गया है, किन्तु भारी कमी यह हुई है कि मनुष्य विलासी, स्वार्थी और पाखण्डी असाधारण रूप से बन गया है। उसकी निष्ठुर, आक्रामकता और विश्वासघाती प्रपंचपरायणता ने अगणित तरीकों से ढूंढ़ निकाले हैं ओर मुट्ठी भर चतुर लोगों ने बहुसंख्यक असमर्थों को अपने चंगुल में कसकर उन्हें निचोड़ डालने का उपक्रम अपनाया है प्रत्यक्ष लड़ाई का सामना किसी प्रकार किया भी जा सकता है, पर परोक्ष छद्म से जूझना किसी प्रकार भी सरल संभव नहीं होता। विश्व इन दिनों दो हिस्सों में बंट गया है एक शोषक दूसरे शोषित। एक समर्थ दूसरे असमर्थ। दोनों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष तो जहाँ तहाँ ही चल रहा है पर परोक्ष में ईर्ष्या, द्वेष ओर रोष प्रतिशोध की ऐसी आग जल रही है जो ईंधन जैसे उपेक्षित दीखने पर भी भयानक दावानल भड़का देने के लिए अभी भी अपने अस्तित्व को दाँव पर लगा सकती है।
स्पष्ट है कि वर्तमान परिस्थितियाँ इसी प्रकार चलती रहीं तो उसका परिणाम अणु युद्ध न होने पर भी सर्वत्र विष बीज बो देने की प्रक्रिया अपना लिये जाने पर उतने ही भयंकर होंगे। जिसे विश्व विनाश के समतुल्य समझा जा सके। सामान्य बुद्धि हतप्रभ है कि इस व्यापक विडम्बना से कैसे निपटा जाये? किन्तु भारत को जो देवात्मा अभी अभी जाग्रत हुई है अब विश्वास पूर्वक घोषणा कर सकती है कि प्रस्तुत परिस्थितियां देर तक नहीं रहेंगी, और देर तक नहीं रहने दी जायेंगी।
यों भारत की जनसंख्या भी इन दिनों 75 करोड़ तक जा पहुँची है। संसार के समस्त मानवों में सात के पीछे एक भारतीय सुधरता हुआ हो तो छः पिछड़ों का भी ऊंचा उठाने में सहायता कर सकता है। एक नाविक जब अपनी नाव में दिन भर सैकड़ों को इस पार से उस पार पहुँचाता रह सकता है, तो कोई कारण नहीं कि जिसकी नसों में ऋषियों और देवताओं का रक्त बहता है वे उपयोगी परिवर्तन की बेला में महती भूमिका न निभा सकें। देश गरीब है फिर भी उसकी श्रद्धा बलवती है जिसके बलबूते वे धन जुटाये जा सकें हैं जो विश्व के काया कल्प में महती भूमिका निभा सकें। संसार के प्रमुख तीर्थों में से अब भी तीन चौथाई भारत में ही हैं। संसार के महापुरुषों के इतिहास की आदि से लेकर अब तक की गणना की जावे तो प्रतीत होगा कि उठे हुए, दूसरों को कंधे पर बिठा कर उठाने वाले लोग इसी दिशा में हुए हैं। यह यहाँ की मिट्टी की विशेषता है। पूर्व दिशा से ही सदा सूर्य निकलता है और उसका प्रकाश सारे संसार में फैलता है। ऊषाकाल ब्रह्ममुहूर्त ओर अरुणोदय का वह देश भारत ही है, जहाँ से दिनकर उदय होता और संसार में अपना प्रकाश फैलाता है। यह नित्य का क्रम है। अब की बार उसे विशेष क्रम अपनाना होगा। अंधेरे को दूर कर उजाला लाने भर से काम नहीं चलेगा। इस बार बौद्धिक भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता को निरस्त करना चाहिए। यह कार्य अपने घर से आरम्भ होगा ओर विश्व के दूसरे छोर तक निर्वाधगति से बढ़ता जाएगा। आज जिन कारणों से संसार भर का जन समुदाय खिन्न-विपन्न है, कल उनकी परिस्थितियां बदलने लगेंगी और जब तक बदलने की यह प्रक्रिया चलती ही रहेंगी जब तक कि स्वाभाविक और संतोषजनक स्थिति में जा पहुँचने का समय नहीं आता।
अगले दिनों लोग आश्चर्य करेंगे कि किसी समय का पिछड़ा पराधीन देश किस प्रकार ऐसा कायाकल्प कर सका कि अपनी समस्या तो सुलझाई ही, विश्वभर की समस्याओं को सुलझाने में, विपत्तियों के निराकरण में असाधारण सहायता की। इन दिनों भारत की राजनैतिक स्थिति और शक्ति सामान्य है। पर वह दिन प्रतिदिन आत्मबल का धनी होता जाता है। उसे ऐसी देवी प्रेरणा और अनुकम्पा हस्तगत होने जा रही है, जिसकी क्षमता शस्त्रबल, बुद्धिबल और धनबल तीनों से ही अधिक पड़ती है। इस प्रकार भारत का पलड़ा अनायास भी भारी होकर इस स्थिति में पहुँच जाता है, कि वह अपने साथ साथ दूसरों को भी उबार सके।
इस संदर्भ में फ्राँसीसी अदृश्य दृष्टा- नोस्ट्राडेमस का भविष्य कथन बहुत ही विश्वस्त और प्रामाणिक माना जाता है। उसने एक सहस्राब्दी आदि में केवल राजनैतिक भविष्यवाणियाँ लिखी हैं। अन्य ज्योतिषी तो व्यक्ति विशेष की ग्रह दश बताते हैं और उसी छोटे दायरे तक सीमित रहते हैं। पर उपरोक्त अदृष्टा दृष्टा ने समस्त विश्व का राजनैतिक भविष्य देखा और लिखा है। जिन देशों का उदय तक उसके जमाने में नहीं हुआ था, उनके आरंभ होने से लेकर मिट जाने तक के विवरण प्रस्तुत किये हैं। आश्चर्य यह है कि उन कथनों की सच्चाई पिछले पाँच सौ वर्षों से सही होती गई। उसकी राजनैतिक भविष्यवादिता में कहीं अन्तर नहीं आया।
नोस्ट्राडेमस ने इन दिनों की परिस्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए लिखा है कि भारत विश्व का नेतृत्व करेगा। उसी की दैवी शक्ति उन प्रयोजनों को पूरा करेगी जिनके सहारे संसार की अनेकानेक समस्याएं सुलझे और विपत्ति की भयंकर विभीषिकाओं से त्राण मिले। इन भविष्यवाणियों पर फ्राँस के शासनाध्यक्ष मितराँ की तरह हमारा भी अटूट विश्वास होता है कि ऐसा ही होकर रहेगा।
यह एक सुनिश्चित और विश्वस्त तथ्य है कि युग संधि के बीस वर्षों में से लगातार देश की कुण्डलिनी जागरण के लिए प्रबल प्रयत्न हुए हैं और अब वे इस स्थिति तक पहुँच गये कि अपने प्रचंड पौरुष के चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकें, करेंगे भी।
इन दिनों दुनिया का विस्तार सिमट कर राजनीति के इर्द गिर्द जमा हो गया है। जिसके पास जितनी प्रचण्ड मारक शक्ति है वह अपने को उतना ही बलिष्ठ समझता है। जो जितना सम्पन्न और धूर्त है, वह अपनी शेखी उसी अनुपात से धारता है और अपने को सर्वसमर्थ घोषित करता है। इसी बलबूते वह छोटे देशों को डराता और फुसलाता भी है। यही क्रम इन दिनों चलता रहा है, किन्तु अगले दिनों यह सिलसिला न चल सकेगा। परिस्थितियां इस प्रकार करवटें लेंगी कि जो पिछले दिनों होता रहा है अगले दिनों उसके ठीक विपरीत घटित होगा। भविष्य में नैतिक शक्ति ही सबसे भारी पड़ेगी। आत्मबल और दैब बल जनसमुदाय को आकर्षित, प्रभावित एवं परिवर्तित करेगा। इस नयी शक्ति का उदय होते लोग पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। यों प्राचीन काल में भी इसी क्षमता का मूर्धन्य प्रभाव रहा है।
बुद्ध, गान्धी ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भू भाग को नव चेतना से प्रभावित किया था। विवेकानन्द विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बना कर गये थे। कौडिन्य ओर कुमारजीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधिचि, परशुराम, अगस्त्य, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे। चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणि बनाया था। देश को संभालने में तो अनेक प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजर हैं।
समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा। अभी कितनी ही ऐसी समस्याऐं दीखती हैं जिनसे आशंका होती है कि कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे। चिनगारियाँ दावानल बन कर तो न फूट पड़ेंगी। बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जायगा। ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि विनाश को विकास पर हावी न होने दिया जायगा। मार्ग में रोड़े भल ही अड़चनें उत्पन्न करती रहें, पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुँचेगा। जिससे विश्व को शान्ति से रहने और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।
भगवान का एक ही लक्ष्य है- दूरदर्शिता से काम लेना।
अभागे की एक ही पहचान है- तुरन्त का लाभ देखकर कुकर्म करना और भविष्य के परिणाम पर विचार न करना।
तीन सिद्ध पुरुष एक साथ लम्बे प्रवास कार्यक्रम पर निकले। रास्ते में एक सिंह का अस्थि पिंजर पड़ा मिला। उन में दो ने अपनी सिद्धि का प्रदर्शन करने के लिए सिंह को जीवित कर दिखाने की ढानी। तीसरा इसके दुष्परिणामों को बताता रहा और जीवित रहा। पर वे इतने आवेश में थे कि उस चेतावनी पर ध्यान ही न दे सके।
एक सिद्ध ने अस्थि पिंजर पर माँस, चर्म, रक्त का कलेवर चढ़ा दिया। काया बन कर तैयार हो गई। दूसरे ने मंत्र पढ़ा ओर उसमें प्राण फूँक दिया।
अनर्थ सामने आया देखकर तीसरा पेड़ पर चढ़ गया और परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा।
सिंह जीवित हुआ और दहाड़ मारकर दोनों सिद्ध पुरुषों पर टूट पड़ा देखते देखते वे उदरस्थ हो गये।
पेड़ पर बैठा तीसरा सिद्ध सिंह के चले जाने पर नीचे उतरा और रास्ते भर यही सोचता गया, सामर्थ्य प्राप्त करना ही नहीं, दूरदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है।
मुर्गे की बाँग लगते ही सवेरा होने का आभास मिल जाता है। उसके बाद पौ फटती है, ब्रह्ममुहूर्त, ऊषाकाल का आगमन होता है। प्राची का रक्तवर्ण देखते ही बनता है। इसके उपरान्त ऊर्जा और आभा भरा सूर्य अपनी तीव्र किरणें बखेरना आरम्भ करता है और दिनकर के प्रचंड प्राण भरे दर्शन होते हैं। सायंकाल भी ऐसा ही होता है। सूर्य डूबने से घंटों पहले धूप मध्यम पड़ जाती है। डूबता सूर्य बहुत पहले से ही फैलना फूलना शुरू कर देता है। पश्चिम के दूरवर्ती बादल चित्र विचित्र रंगों से भर जाते हैं। सूर्य थोड़ा थोड़ा करके डूबना शुरू करता है। अन्तिम अंश अदृश्य हो जाने के उपरान्त भी पश्चिम में दूर दूर तक लालिमा छाई रहती है। रात्रि में अंधेरा घिरने और सूर्य अस्त होने के बीच काफी काफी मध्यान्तर रहता है। प्रभात में भी सूर्योदय से पूर्व घोर निशा रहती है और रात्रि और दिन का मध्यवर्ती बहुत-सा समय आधी अधूरी असमंजस से भरी स्थिति में ही निकल जाता है।
बीसवीं सदी का अन्त और इक्कीसवीं सदी का आगमन जब अपनी परिपूर्ण स्थिति में होंगे तब उनके बदलने में काफी देर लगेगी। यह समय क्रमिक गति से बदलेगा। परिवर्तन की धीमी गति से चलती हुई प्रक्रिया दिखाई देगी। इन्हें देखकर तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि समय की गति किस दिशा में चल रही है। पर जो होने जा रहा है वह एक क्षण में उलट जाए ऐसा नहीं हो सकता। नाटकों में पर्दा उलटते ही दूसरी तरह के दृश्य सामने आ खड़े होते है, पर युग परिवर्तन तो बड़ी बात है। उसकी प्रक्रिया द्रुत गति से चलती हुई भी मानवी बुद्धि को धीमी से प्रतीत होगी। पृथ्वी और सूर्य अपनी अपनी धुरी तथा कक्षा में अत्यन्त तेजी से अग्रसर रहते हैं पर घर बरामदे में बैठकर देखने पर उनकी चाल बहुत धीमी प्रतीत होती है। सूर्य के चलने जैसा तो कुछ अनुमान भी लगता है पर पृथ्वी घूमती है इस बात पर तो विज्ञजन ही विश्वास करते हैं। सामान्य जन तो अपना खेत, घर जहाँ का तहाँ देखकर यह समझ भी नहीं पाते कि पृथ्वी के घूमने वाला कथन सही है भी या नहीं। आकाश की चादर झिलमिल तारे चादर में टँगी पन्नियों की तरह सुहावने तो लगते हैं पर प्रतीत यही होता है कि वे जहाँ के तहाँ हैं। यद्यपि वे अकल्पनीय तेजी से आगे भी बढ़ते हैं, घूमते भी हैं ओर दूर भी हटते हैं। उनका प्रकाश धरती तक पहुँचने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं, पर यह सब मोटी बुद्धि से नहीं समझा जा सकता। मस्तिष्क और आँखों की बनावट इस हो रहे परिवर्तन को सहज स्वीकार नहीं करती।
युग परिवर्तन की प्रक्रिया भी विश्व व्यवस्था को देखते हुए आश्चर्यजनक गति से बदलेगी पर उस परिवर्तन की प्रक्रिया को यथावत यथा समय समझ सकना हर किसी के लिए कठिन पड़ेगा। इस सच्चाई को हृदयंगम करने में बहुत जोर लगाना पड़ेगा।
30 दिसम्बर सन् 2000 की रात्रि को सोते समय जो नजारे देखकर सोयेंगे वे 01 जनवरी सन् 2001 में सर्वथा बदले हुए दीखें यह नहीं हो सकेगा। गति की तीव्रता को पहचानना सरल नहीं होता। धीमापन तो और भी अधिक समझने में जटिल होता है। छोटा बालक निरन्तर बढ़ता रहता है। पर वह दिखाई नहीं पड़ता कि हर रोज, हर घंटे किस क्रम से कितना बढ़ रहा है। घड़ी में सेकेंड की सुई जब बहुत ध्यान देने पर ही चलती मालूम पड़ती है। फिर मिनी सेकेंड की चालों को यथावत समझना तो ओर भी कठिन है। रस्से में ढेला बाँध कर घुमाया जाये तो तेजी के कारण वह छतरी जैसा बन जाता है और स्थिर दिखाई पड़ता है। तेजी से जमीन पर घुमाया गया लट्टू भी अपनी धूरी पर खड़ा दिखता है। इतने पर भी उसकी द्रुतगामी भ्रमण प्रक्रिया को झुठलाया नहीं जा सकता।
युग बदलेगा तो उसकी गति ऐसी ही होगी होगी, जैसी कि पिछली शताब्दी में परिवर्तनों का क्रम रहा है। पूर्व काल में बिजली की किसी को कल्पना तक नहीं थी। पर अब तो जीवन पूरी तरह उसी पर निर्भर हो गया है। बत्ती, पंखे, हीटर, कूलर, टेलीफोन आदि घरेलू उपकरण बिजली पर ही निर्भर हैं। जिन देहातों में बिजली नहीं पहुँची है वहाँ भी कपड़े, कुदाल, हाशिया जिन कारखानों में तैयार होते हैं वे बिजली के ऊपर ही अवलम्बित हैं। रेल मोटर, जलयान, वायुयान आदि में बिजली ही दौड़ती है। माचिस और सुई तक वही बनाती है। एक शताब्दी पूर्व यह कल्पना न थी कि बिजली मनुष्य जीवन के साथ इस कदर गुंथ जायगी कि उसकी सहायता के बिना काम ही न चल सके। प्रिटिंग प्रेसों से लेकर रेडियो, दूरदर्शन, लाउडस्पीकर, सिनेमा आदि में बिजली के चमत्कार दीख पड़ता है।
पर यह परिवर्तन कितनी धूम धड़ाके के साथ किस दिन सम्पन्न हुए यह नहीं कहा जा सकता। संस्कृति में आधुनिकता का समावेश हुआ है। पुरानी पीढ़ी की तुलना में आज का आहार विहार ही नहीं व्यवहार, दृष्टिकोण एवं स्वभाव भी आश्चर्यजनक रीति से- असाधारण रूप से परिवर्तित हो गया है। पर यह नहीं कहा जा सकता कि इतना बड़ा परिवर्तन किस घड़ी मुहूर्त में सम्पन्न हुआ। बदलाव तो आया, पर उसकी गति एवं प्रक्रिया इतनी धीमी इतनी बिखरी रही कि बदल बहुत कुछ गया पर उस उलट फेर का निश्चित समय, स्थान एवं क्रम विवेचना पूर्वक नहीं बताया जा सकता।
शरीर की जीवकोशिकाएं एक वर्ष के भीतर प्रायः पूरी तरह बदल जाती हैं। उनके जन्मने मरने का क्रम हर घड़ी जारी रहता है, किन्तु प्रत्यक्षतः वही शरीर, यथावत बना हुआ प्रतीत होता है। साँप केंचुली बदलता रहता है। पर उसकी सत्ता वैसी ही बनी रहती है जैसे कि पहले थी। सूर्य अपने सौर मण्डल को समेटे हुए महासूर्य की परिक्रमा पथ पर द्रुतगति से दौड़ता रहता है। आकाश के जिस क्षेत्र में आज हम हैं उसमें वापस लौटने में हजारों वर्ष लगेंगे। तब तक अपने दसियों जन्म हो चुके होंगे। इतने पर भी यही प्रतीत होता रहता है कि हम जहाँ के तहाँ है। धरती, आकाश, सूर्य सितारे आदि अपना स्थान बदलते और अग्रगामी होते रहते हैं पर हमें स्थिरता ही दृष्टिगोचर होती रहती है।
युग संधि की इस बेला में सब कुछ तेजी से बदल रहा है भले ही उसे हम प्रत्यक्ष अनुभव न करते हों। माता के गर्भ में भ्रूण आरम्भ में एक बबूला मात्र होता है कि प्रसव का झटका सह सके और उन्मुक्त वायुमंडल की सर्वथा बदली हुई परिस्थितियों में साँस ले सके। यह परिवर्तन क्रम देख समझ नहीं पाते। गर्भाधान के उपरान्त प्रसव की ही प्रत्यक्ष घटना होती है इस बीच जो विकास क्रम चलता है वह पर्दे के पीछे ही बनता रहता है उसे हम प्रत्यक्ष न तो देख पाते है और न अनुभव करते हैं। युग परिवर्तन की प्रक्रिया भी इसी अदृश्य वास्तविकता के साथ द्रुतगति से अग्रगामी हो रही है।
जापान पर अणु बम गिरे थे, तब प्रतीत होता था कि विश्व के भाग्य का निबटारा इन्हीं अस्त्रों से कुछ ही दिनों में हो जाएगा, किन्तु अदृश्य की परिस्थितियाँ बदली और अब जिनने विशालकाय अणु बमों के भण्डार जमा कर लिये हैं, वे उनके संबंध में एक ही बात सोच रहे हैं कि इस कचरे को कहाँ दफनाया जाये। प्रकृति ने संतुलन ऐसा बनाया कि अणु युद्ध जीता नहीं जा सकता इसलिये दूरदर्शिता प्रत्यक्ष घोषणा के पीछे ठोस तथ्य हैं और यह निश्चित है कि जिस अणु अस्त्र भण्डारण में कुबेर भण्डार जितना धन खर्च हो चुका उसे अपव्यय रूप में बट्टे खाते ही गिना जायेगा। नक्षत्र युद्ध की दिनों दिन बड़ी डींगें हाँकी जा रही है पर उसका पूर्णतया असफल रहना भी निश्चित है। आकाश पर आधिपत्य जमाने के कितने प्रयास हो चुके, कितने ही होने जा रहे हैं पर इसे भी ध्रुव सत्य मानना चाहिए कि इस संदर्भ में जो जितना उत्साह दिखा रहे हैं उन्हें अधिक निराशा पल्ले बाँधनी पड़ेगी। इस प्रकार विकिरण बखेरने के उपरान्त दिग्गज इतना ही कर पायेंगे कि अपनी दुर्बुद्धि का परिचय देते हुए निर्माणकर्ता गाली खाये और पीढ़ियां तक कोसे जाये। विकिरण, प्रदूषण में इसी आशा से अपने आपको फिर कर लेगा। प्राणी इतने जहरीले हो जायेंगे कि उस प्रदूषण को पचा सके। मच्छर मारने के लिए डी.डी.टी. आरम्भ में रामबाण समझी गई थी पर अब मच्छर डी.डी.टी. प्रूफ हो गये है और उसी के खुले ड्रमों पर बैठे भोजन का आनंद लेते रहते हैं। प्रदूषण से उतना विनाश न होगा जितना कि समझा जाता है।
बढ़ती आबादी एक विकट समस्या मालूम पड़ती है। पर विचारशीलता बढ़ने के साथ-साथ ही उसका घटना आरम्भ हो जायेगा। यूरोप के कई देशों में जन्म दर स्थिर हो गई है। कहीं-कहीं घटने भी लगेगी। वहाँ का अर्थशास्त्र कहता है कि परिश्रमी जातियों को बाहर से ला-ला कर अपने देश में बसाया जाय। यह समझ पिछड़ेपन का अन्त होते होते संसार भर में हो जायेगी। इन दिनों प्रसव पीड़ा में प्रायः ‘ 15 लाख महिलाएँ प्राण खो बैठती है। समझ बढ़ते ही महिलाएँ उपयोगी कार्यों में लगेंगी। विवाह भले ही करें पर अण्डे बच्चे उगलने के व्यवसाय से पूरी तरह हाथ खींच लेंगी। महिलाओं में असहयोग उभरे तो पुरुषों के लिए एकाकी प्रजनन करते रहना कहाँ बन पड़ेगा? इक्कीसवीं सदी में जनसंख्या वृद्धि नाम की कोई समस्या न रहेगी। उसका समापन बीसवीं सदी का अन्त होते होते समाप्त हो जायेगा।
एकता और समता का दर्शन हर किसी के गले उतरेगा। इन दिनों में सहकारिता आन्दोलन पनप रहा है। आगे चलकर वह शासन, अर्थशास्त्र, भाषा सम्प्रदाय सभी को अपनी गाँठ में बाँध लेगा। मियाँ बीवी वाले अकेले चूल्हें न पकेंगे। लॉर्ज फैमली स्तर की केन्टीने गाँव मुहल्ले के रूप में विकसित हो जायेगी। खाना एक जगह पकेगा। कपड़े एक जगह धुलेंगे। सोने की कोठरियाँ एक ही बड़े हाल में हलके पार्टीशनों से अलग कर दिये जाया करेंगे। अलग घर बसाने, अलग खेती करने, मौत बुढ़ापे के लिए साधन, अलग बचा कर रखने की आवश्यकता न पड़ेगी। यह सहकारिता विश्व साम्यवाद के रूप में बदलेगी और सशक्त राष्ट्र संघ विश्वव्यवस्था का सूत्र संचालन करेगा। सामर्थ्य भर काम करने और आवश्यकता भर लेने की नीति हर किसी को न्यायोचित भी लगेगी और सुविधाजनक भी। आज के पूँजीवाद बिलगाववाद, उपनिवेशवाद, आधिपत्य शोषण के सूत्र ही समाप्त हो जायेंगे।
बढ़ते हुए अपराधों की जड़ आज का चिन्तन और वातावरण है। इन दिनों में ही मानवी गरिमा का प्रवेश होगा और लोभ लिप्सा का, अमीरी ठाट बाट का वर्तमान रवैया उपहासास्पद बन जायेगा और निन्दनीय भी। तब कोई इस जोखिम भरे झंझट में हाथ डालकर आग में झुलस मरने जैसी हरकत क्यों करेगा? जब वसुधैव कुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु का दर्शन अन्तःकरणों में गहराई तक प्रवेश करेगा तो कोई कारण नहीं कि स्वार्थों का टकराव समाप्त न हो और मिलजुल कर सुख से रहने और चैन से रहने की नीति हर किसी के द्वारा न अपनाई जाय।
न बड़े कारखाने वाले रहेंगे और न उनके द्वारा खड़े किये गये प्रेत पिशाच जैसे स्वसंचालित उद्योग। तब देहाती कस्बों में गृह उद्योग पनपेंगे और शहरों की घिचपिच समाप्त हो जायेगी। विशालकाय नगर, वाहन, उद्योग, अपने खंडहरों में यह साक्षी देते होंगे कि कोई ऐसा युग भी रहा, जिसमें पूँजीवाद ने सर्वत्र बेकारी फैलाई थी और लोग सिमट सिमट कर इन शहरों में अपनी सर्वांगीण सुविधा खोने के लिए आ बसते थे और यहीं नरक जैसी सड़ांध में सड़ कर मरते थे। तब कोई बड़े नगरों की सैर पर न जाया करेगा। प्राकृतिक सुषमा वाले क्षेत्र ही दर्शकों को आकर्षित करेंगे और उन्हीं के इर्द गिर्द उस शिक्षा के केन्द्र बनेंगे जो मनुष्य बहुज्ञ ही नहीं, विवेकवान भी बनाती है।
व्यसन और व्यभिचार दुर्बुद्धि की देन है। अपव्यय और धन संग्रह भी उसी दुर्नीति की देह है वह न रहेगी तो कोई नशेबाजी जैसे दुर्व्यसन जो मनुष्य की बढ़ी चढ़ी मूर्खता का ही परिचय देते हैं। आज तथाकथित बुद्धिमान ही इस प्रकार की मूर्खता अपनाते और अपने पैर कुल्हाड़ी मारते हैं। बर्तनों और उपकरणों के लायक धातु धरती के गर्भ से पीछे भी मिलती रहेगी। कभी तो शस्त्र और विशालकाय यंत्रों में धातुओं का अन्धाधुन्ध उपयोग होता था, उसकी जब आवश्यकता ही न रहेगी तो उत्खनन के लिए हाथ पैर पीटने की भी आवश्यकता न रहेगी।
मनुष्य के दो हाथ और मस्तिष्क का कोश इस योग्य है कि सभी उचित आवश्यकताओं की पूर्ति हलके फुलके प्रयासों से ही पूरा करते रहे। फिर किसी कौन तो दरिद्र रहना पड़ेगा न अशिक्षित तब किसी पर भी पिछड़ेपन का लाँछन न लगेगा न कोई शोषक रहेगा न शोषित समता और एकता को केन्द्र बिन्दु मानकर अपनी इस दुनिया का नवनिर्माण होगा।
मनुष्यकृत ध्वंस निर्माण की प्रत्यक्ष घटनाएं दृष्टिगोचर होती है किन्तु प्रकृति द्वारा उत्पन्न किये गये परिवर्तनों में परिस्थितियों ही बदलती है जिनका स्वरूप कभी कभी कुछ हलचलों के रूप में देखा जा सकता है युग परिवर्तनों का स्वरूप वो प्रत्यक्ष देखना चाहते है उन्हें बसन्त की उपमा से तथ्य को समझाने का प्रयत्न करना चाहिए। बसन्त के दिनों सर्वत्र खिले फूलों को बाहर दृष्टिगोचर होती है स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में एक साथ उच्च कोटि के अनेकों महामानव जनम थे और उनने त्याग बलिदान के आदर्शवादी पुरुषार्थ प्रस्तुत किये थे। पूरा परिवर्तन की बेला में सृजन शिल्पियों द्वारा किये गये जनमानस परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन जैसे कृत्यों का अतिशय अभिवर्धन देखा जा सकता है। भावना क्षेत्र में सुधारकों की एक बड़ी सेना योजनाबद्ध रूप से कार्य करती हुई दिखाई देगी। दे भी रही है।
जो दुनिया के बारे में बहुत जानता है, उसे अध्ययनशील अनुभवी और जानकार भी कहा जा सकता है। ज्ञानवान वह है, जिसने अपनी आत्मा को समझा और दायित्वों को निबाहा।
अमेरिका में स्वामी रामतीर्थ के प्रवचनों से प्रभावित होकर एक विश्वविद्यालय ने उन्हें पी0एच0डी0 की उपाधि से विभूषित करने का प्रस्ताव किया।
स्वामीजी ने उसे अस्वीकार करते हुए कहा स्वामी और एम0ए॰ यह दो उपाधियाँ तो पहले से ही मेरे ऊपर लदी है एक और अधिक बोझ लादने का मेरा तनिक भी मन नहीं है।
भगवान बुद्ध ने आनन्द को झरने से एक लोटा पानी लेने भेजा। पर उसी समय उस धारा में जंगली जानवर लोट लौट रहे थे। गंदे पानी को लिए बिना ही शिष्य वापस लौट आया।
तथागत ने उसे दुबारा भेजा और कहा- जानवरों को चले जाने देना और गंदगी तली में बैठ जाने की प्रतीक्षा में उसी किनारे पर खड़े रहो।
उतावली में ही असफलता दीखती है। पर प्रतीक्षावान समय पर अपने उद्देश्य की पूर्ति कर लेते हैं।
विग्रहराज ओर उनकी रानी हाथ से जो कमा पाते, उतने से ही गुजारा करने। राज्यकोष का प्रजा धन को छूते तक न थे। उनकी इस सत्यनिष्ठा से वरुण देव प्रसन्न थे। रानी कच्चे धागे की डोरी बनाकर उसी से कुएं से खींचा करती थी।
लोभ आते ही आत्मबल समाप्त हो जाता है।
चीन धर्मगुरु नान -- के आश्रम में एक विद्वान दार्शनिक आये उन्हें अपने अध्ययन पर बड़ा अभिमान भी था पर धर्म तत्व के रहस्यों के संबंध में कुछ सीखना चाहते थे।
नान ने आगन्तुक को चाय भरा प्याला पेश किया। जैसे ही पीना शुरू किया। नान एक केतली भरकर चाय और ले आये भरे प्याले में डालने लगे।
आगन्तुक ने उनका हाथ पकड़ा और कहा प्याला तो भरा हुआ है इसमें अब कुछ और नहीं आ सकता नान हंस पड़े और बोले तुम्हारे पास पूर्वाग्रह बहुत है। जब तक वह खाली नहीं हो जाने तब तक उसमें कुछ और नहीं डाला जा सकता।
इस अंक के प्रतिपादनों को परामर्श की भाषा में लिखा गया है। लोगों को ऐसा करना चाहिए इस मार्गदर्शन के पीछे जन-जन का कर्त्तव्य बोध उजागर किया है, पर वस्तुतः यह समूचा प्रतिपादन सुनिश्चित भविष्यवाणियों की तरह है। उन्हें अकाट्य एवं विश्वस्त संभावनाएँ मानकर चला जा सकता है।
इस कथन प्रतिपादन के पीछे उच्च स्तरीय अध्यात्म की वे अनुभूतियाँ हैं, जिनमें घटित होने वाले घटनाक्रम का पूर्वाभास संजोया गया है। इसमें किसी व्यक्ति विशेष, अतिरिक्त घटनाक्रम का उल्लेख नहीं है, वरन् विश्व की भवितव्यता का निरूपण है और बताया गया है कि प्रचण्ड प्रवाह किस दिशा में चल पड़ा है और भविष्य में जाकर कब, किस लक्ष्य तक पहुँच कर रुकेगा।
नवयुग के फलितार्थ होने की सही अवधि इक्कीसवीं सही है। महाकाल की असीम अवधि में युग की इतिहास की दृष्टि से सैकड़ों क्या हजारों वर्षों का भी कोई महत्व नहीं होता। राजतंत्र को प्रजातंत्र तक पहुँचने में हजारों वर्ष लगे हैं। मनुष्य को सभ्यता, शिष्टाचार, अनुशासन व्यवस्था गढ़ने में भी बहुत समय लगा है। बोलना और लिखना सीखने में न जाने कितनी पीढ़ियाँ गुजरी होंगी। पर तब काल की गति धीमी थी। अब उसमें तीव्रता आ गई है। विकास कहें या परिवर्तन, तेजी से हो रहा है। इसका प्रभाव किसी व्यक्ति समुदाय या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा सकता। उससे समूचा विश्व प्रभावित होगा। इच्छा या अनिच्छा से उसके सभी निवासियों को प्रवाह के साथ बहने के लिए समय के साथ चलने के लिए विवश होना पड़ेगा।
आमतौर से व्यक्तियों के प्रयास ही परिस्थितियों को प्रभावित करते और उनमें उथल-पुथल पैदा करते हैं राजक्रांतियां सामाजिक क्रान्तियाँ, औद्योगिक क्रान्तियाँ कुछ प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों अथवा समुदायों के प्रभाव से ही उत्पन्न हुई हैं। उनका श्रेय भी अमुक व्यक्तियों या योजनाओं को ही मिला हैं किन्तु कई बार ऐसा भी होता रहा है, कि उमंगे उठीं और उनने चमत्कारी कार्य कर दिखाये और समूचे संसार में असाधारण परिवर्तन करके दिखा दिये। वैज्ञानिक आविष्कारों के सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है। बिजली, रेडियो, टेलीफोन, रेल, जहाज, अणु विस्फोट जैसे कार्य तो कुछ व्यक्तियों ने ही सम्पन्न किये, पर उनका प्रभाव समूचे संसार पर पड़ा। परिस्थितियों में आकाश-पाताल जैसा अन्तर हो गया। इस वैज्ञानिक क्रान्ति के लिए कोई बड़ी योजनाएँ नहीं बनी थीं। कुछ छोटी प्रयोगशालाओं में ही वे आविष्कार उपजे थे, पर उपयोगिता को देखते हुए उनका प्रचलन संसार भर में होने लगा। इक्कीसवीं सदी की युग क्रान्ति को भी इसी स्तर की माना जा सकता है। इस क्रान्ति को दार्शनिक क्रान्ति कहा जायेगा और उससे विश्व का समूचा वातावरण, समूचा उपक्रम, प्रचलन प्रभावित होगा। जिस प्रकार पाँच सौ वर्ष पुरानी दुनिया की आज के समय के साथ संगति बिठाने पर आश्चर्यजनक परिवर्तन प्रतीत होता है। इसी प्रकार बीसवीं सदी में चल रही, चलती आ रही परिस्थितियों में अब जमीन आसमान जैसा अन्तर इक्कीसवीं सदी में होने जा रहा है, उसी की रूपरेखा इस अंक में प्रस्तुत की गई है। यह सब कैसे होगा? कौन करेगा? परिवर्तन लाने वाली घटनाएँ कहाँ घटित होंगी? क्या मोड़ लेंगी? सफलता, असफलता का उन्हें कब-कब कहाँ-कहाँ किस प्रकार सामना करना पड़ेगा? यह भी इस भविष्य कथन के साथ यदि उल्लेख रहता तो शायद पाठकों को अधिक रोचक और कौतूहलवर्धक लगता, पर उसकी चर्चा जानबूझ कर नहीं की गई है। लिखा वही गया है जो अवश्यम्भावी है।
पूछा जा सकता है कि इन भविष्यवाणियों के आधार क्या है? आमतौर से ग्रह गणित, ज्योतिष को ऐसे कथनों का आधार माना जाता है, पर वास्तविकता यह है कि जो भविष्य कथन की विद्या जानते हैं, वे उन संभावनाओं को प्रकटन नहीं करते। जो करते हैं, वे जानते नहीं। यदि मृत्यु काल सही बताया जा सके तो लोगों की स्वतंत्र बुद्धि और स्वतंत्र क्रिया ही समाप्त हो जाये। लोग मृत्यु से पूर्व किये जाने वाले कार्यों को निपटाने में लग जाये। इसी प्रकार यदि वस्तुओं की तेजी मंदी का सही कथन कोई कर सके तो वह उसी व्यापार में लगाकर दस पाँच दिन में ही करोड़पति बन सकता है। पर ऐसा होता कहाँ हैं? मनीषियों ने व्यक्तिगत भविष्य बनाने का निषेध भी किया है। इससे व्यर्थ चिन्ता बढ़ती है और पुरुषार्थ में व्यवधान पड़ता है।
इस अंक में प्रस्तुत भविष्यवाणियों का पहला आधार है - अदृश्य जगत का वह सूक्ष्म प्रवाह जो कुछ नई उथल पुथल करने के लिए अपने उद्गम से चल पड़ा है और अपना उद्देश्य पूरा करके ही रहेगा। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेकानेक प्रतिभाओं को हनुमान, अर्जुन की तरह अपने प्रभाव में लेकर निश्चित प्रयोजन के निमित्त उन्हें बलपूर्वक लगा देगा।
दूसरा आधार है - हमारा निज का संकल्प, जो किसी उच्च सत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया। नवनिर्माण के लिए अपनी निजी क्षमता को इन्हीं तीन वर्षों में विशेष रूप से पैनाया और तीक्ष्ण किया गया है। इसका प्रयोग भी सूक्ष्म जगत की दिव्य चेतनाओं को झकझोर कर खड़ा कर देने में किया जायेगा। साथ ही अनर्थों को निरस्त करने के लिए उनके साथ कटकटा कर जूझा जायगा। यह उभयपक्षीय प्रयोजन हमारी सूक्ष्म सत्ता ही सम्पन्न कर सकेगी। इसलिए हमने अपने स्थूल शरीर से काम लेना प्रायः बन्द कर दिया है। उसके साथ एक हल्का तंतु ही जुड़ा रखा है। जब उसकी भी आवश्यकता न रहेगी तो एक झटके से इसे भी तोड़कर अलग कर देगा।
महान् और व्यापक क्षेत्र की महती उथल-पुथल में सूक्ष्म शक्ति ही काम करती है। स्थूल शरीर उसे सीमित रखता ओर एक छोटे क्षेत्र तक ही काम करते रहने के लिए बाधित करता है। इसलिए शरीर के साथ सहयोगी जैसा साधारण मोह तो है हुए भी उसे गले में पत्थर की तरह नहीं बाँधे रखा जा सकता। स्थिति अभी भी वह बन चली है कि स्थूल शरीर एक स्मृति सौगात की तरह एक कोने में रखा रहे और सूक्ष्म शरीर से वह कार्य होता रहे जिसे अदृश्य जगत के व्यापक क्षेत्र में सूक्ष्म शरीर से ही किया जा सकता है। अपना निज का पुरुषार्थ और आत्म विश्वास भी इन भविष्यवाणियों का दूसरा आधार है। इस कथन के बारे में निश्चिन्त हम इसलिए हैं, कि उस प्रयोजन में हमसे भी कहीं अधिक बड़ी और समर्थ सत्ता इस कार्य को आगे बढ़कर कर रही है। हमें तो उन्हीं के प्रचण्ड तूफानी प्रवाह में तिनके पत्ते की तरह उड़ना पड़ रहा है, फिर भी उसका कुछ मूल्य तो होगा ही? इस निजी मूल्य और उच्चस्तरीय सहयोग के आधार पर इस अंक में प्रस्तुत वे भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं जिनका उल्लेख इस अंक में हुआ है। यों आज की निराशाजनक परिस्थितियों में उतना बड़ा परिवर्तन निकट भविष्य में ही खड़ा हो जाना असंभव जैसा लगता है। तो विश्वासी विश्वास कर सकते हैं कि संसार के इतिहास में अनेक बार असंभव लगने वाले प्रसंग की प्रत्यक्ष होते रहे हैं। महापुरुषों की उपलब्धियाँ एवं महान घटनाओं की संभावनाएँ ऐसे ही असमंजस भरे वातावरण में फलित होती रही है।
जो घटित होने वाला है उस सफलता के लिए श्रेयाधिकारी-भागीदारी बनने से दूरदर्शी विज्ञजनों में से किसी को भी चूकना नहीं चाहिए। यह लोभ मोह के लिए खपने और अहंकार प्रदर्शन के लिए ठाटबाट बनाने की बात सोचने और उसी स्तर की धारणा, रीति-नीति अपनाये रहने का समय नहीं है। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह और परिवार को बढ़ाने की अपेक्षा स्वावलम्बी बनाने का निर्धारण किया जाय तो वह बुद्धिमता भरा लाभदायक निर्धारण होगा। जिनसे इतना बन पड़ेगा वे देखेंगे कि उनके पास युग सृजन के निमित्त कितना अधिक तन, मन, धन का वैभव समर्पित करने योग्य बच जाता है, जब कि लिप्साओं में ग्रस्त रहने पर सदा व्यस्तता और अभाव ग्रस्तता की ही शिकायत बनी रहती है। श्रेय संभावना की भागीदारी में सम्मिलित होने का सुयोग्य, सौभाग्य जिन्हें अर्जित करना हमारी ही तरह भौतिक जगत में संयमी सेवाधर्मी बनना पड़ेगा। सादाजीवन उच्चविचार का मंत्र अपने रोम-रोम में जमाना पड़ेगा। इतना कर सकने वाले ही अगले दिनों की दिव्य भूमिका में हमारे छोड़े उत्तराधिकार को बहन कर सकेंगे। पीछे रहकर भी हमें बल देते रह सकेंगे।
कानपुर। 10 से 13 नवम्बर तक चार दिवसीय राष्ट्रीय एकता सम्मेलन अभूतपूर्व वातावरण में सम्पन्न हुआ। हिन्दू मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई-सभी वर्ग के लोगों ने उपस्थित होकर सर्वधर्म समभाव का ऐसा दृश्य उपस्थित किया जैसा इससे पहले कभी नहीं देखा गया।
स्थानीय फूलबाग ने चार दिन के लिये राष्ट्रीय मेले का रूप ले लिया। वक्ताओं ने आज की समस्याओं और उनके समाधान के उपाय बताये जिन्हें उपस्थित जन समुदाय ने आज की स्थिति में सही निदान बताया है। इनमें भाषावाद, क्षेत्रवाद, सम्प्रदायवाद के उन्मूलन ही नहीं, सामाजिक समस्याओं यथा दहेज उन्मूलन ही नहीं, सामाजिक समस्याओं एवं संस्कार संवर्धन जैसी समस्याओं का उल्लेख भी हुआ।
उपस्थितों में नगर के जिलाधिकारी डी.आई.जी. चेयरमैन, वी.आई.पी., उपप्रशासक, विधायक एवं साँसद प्रमुख थे। मंगल कलश जुलूस में प्रायः 5000 महिलाओं, यज्ञ में दस हजार एवं श्रोताओं की संख्या प्रतिदिन 15 से 50 हजार तक रही। सभी धर्मों के प्रतिनिधियों ने अपने गीत, सबद ओर कव्वालियाँ प्रस्तुत की। गायत्री की 14 शक्ति धाराओं की 14 प्रतिमाओं की भव्य प्रतिमायें प्रतिष्ठित की गई थी, जिन्हें देखने वालों का ताँता लगा रहा।
यज्ञ भगवान की साक्षी में लाखों लोगों ने संकल्प दोहराए
हम बदलेंगे-युग बदलेगा
लखनऊ 17 से 30 नवम्बर तक सम्पन्न राष्ट्रीय एकता सम्मेलन देखकर स्थानीय जन समुदाय झूम उठा। जिन्दाबाद मुर्दाबाद के राजनैतिक नारों की अभ्यस्त जनता ने हम बदलेंगे, युग बदलेगा, लड़के लड़की नहीं बिकेंगे, देश की रक्षा कौन करेगा? हम करेंगे, हम करेंगे, जैसे भावना और राष्ट्रीयता प्रधान नारे सुनकर जन समुदाय सड़कों के दोनों ओर सागर की तरह उमड़ पड़ा।
प्रायः एक हजार पीतवस्त्रधारी महिलाओं की मंगल-कलश यात्रा में आगे आगे प्रो. बासुदेव सिंह भू0 पू0 खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री चल रहे थे, उनके पीछे मुसलमान प्रतिनिधि श्री जावेद लखनवी, कैलवरी इवेंजिकल चर्च के पादरी श्री सी.एम. डैनियल, लाजपथ्त नगर चौक गुरुद्वारा के प्रमुख सरदार जोगिन्दर सिंह, गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. एस.सी. राय, डॉ. ओम प्रकाश, मेजर वी.के. खरे, श्री एस.के. त्रिवेदी तथा केन्द्रीय प्रतिनिधि श्री राय चन्द्रवीर सिंह बिजौलिया ने जुलूस का नेतृत्व कर राष्ट्रीय एकता का अद्भुत दृश्य उपस्थित किया।
चार दिन तक सम्पन्न यज्ञ आयोजन में सभी समुदायों के लोग सम्मिलित हुए। यज्ञ साक्षी में बुराइयाँ छोड़ने और सभ्य एवं समुन्नत समाज में योगदान देते रहने का संकल्प लिया।
शिक्षा सचिव श्री जगदीश चन्द्र पंत ने समारोह की अध्यक्षता की। अपने संदेश में उन्होंने इस आयोजन का श्री कबीर, प्राणनाथ, समर्थ रामदास, गुरु नानक तथा मीराबाई जैसी उच्च आत्माओं की तरह समाज को जोड़ने वाला बताया।
ग्राम्य जीवन में नवयुग चेतना
मोहनपुर अडूकी (मथूरा) 14 से 17 नवम्बर। एक छोटे से गाँव में शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन की शानदार सफलता ने यह निर्विवाद सिद्ध कर दिया - हमारी ग्राम्य चेतना शहरी जीवन से कम मुखर नहीं - भावनात्मक दृष्टि से उनसे बहुत आगे है।
दिल्ली आगरा रोड पर बसे इस छोटे से गांव में 100 गाँवों के 15 हजार भोले भाले किसानों ने भाग लिया। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण बनाने की प्रमा के साथ-साथ गाँव की दुर्दशा ठीक करने, खर्चीली शादियाँ न करने, दहेज न लेने सन्तान की संख्या न बढ़ाने जैसे राष्ट्रीय दायित्वों के निर्वाह के संकल्प लिये। हजारों व्यक्तियों ने एक-एक बुराई छोड़ी और एक-एक नया रचनात्मक कदम उठाने का व्रत लिया।
शोभा यात्रा में प्रायः दो हजार महिलायें सम्मिलित हुई। 551 मंगल-कलश उठाये गये। साँसद श्री मानवेन्द्र सिंह ने आयोजन को असाधारण उपयोगी बताते हुए उसके सूत्र संचालक तथा केन्द्रीय प्रतिनिधियों की हार्दिक सराहना की। इस आयोजन की सफलता के लिए युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि के संचालक, कार्यकर्त्ताओं तथा विद्यार्थियों का परिश्रम, पूर्ण योगदान सभी के द्वारा सराहा गया।
स्वयं सेवकों की सराहनीय सेवा
मेरठ। 14 से 26 नवम्बर को सम्पन्न राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा शतकुँडी यज्ञायोजन की न केवल व्यवस्था अपितु सुरक्षा जैसे गम्भीर उत्तरदायित्व को भी प्रज्ञा मिशन के स्वयं सेवकों ने सफलता पूर्वक सम्भालकर यह सिद्ध कर दिखाया कि पारस्परिक सौहार्द्र से किस तरह साम्प्रदायिकता को भी जीता जा सकता है। इस आयोजन में भी सभी वर्ग तथा सम्प्रदाय के लोग बड़ी संख्या में सम्मिलित हुये। पुलिस जैसी किसी भी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं पड़ी।
इस आयोजन में नगर क्षेत्र के परिजनों के समान ही चार दिन तक ट्रेक्टर ट्रोलियों में बैठकर बड़ी संख्या में समीपवर्ती गाँवों के लोग भी आये और राष्ट्र के पुनर्निर्माण में रचनात्मक कदम उठाने का संकल्प लिया।
सहभोज में सभी वर्ग के लोगों ने सम्मिलित होकर राष्ट्रीय एकता का भावभरा वातावरण उपस्थित किया।
समुद्र तट पर भव्य शक्ति पीठ
द्वारिका। समुद्र तट पर विनिर्मित गायत्री शक्ति पीठ का प्राण प्रतिष्ठा समारोह नौ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर टाटा कैमिकल्स के चेयरमैन श्री उदबारी सेठ विशेष रूप से उपस्थित हुये। उन्होंने इस मिशन को विश्व कल्याण का आधार स्तम्भ बताया।
गायत्री, सावित्री तथा कुँडलिनी इन तीन प्रतिमाओं की भव्य प्राण प्रतिष्ठा हुई। पूर्णाहुति के समय पर प्रायः पाँच हजार व्यक्ति उपस्थित थे। यह स्थल बहुत ही शान्त और रमणीक है। देव दर्शनार्थियों के आवास आदि का भी प्रबंध है। शक्ति पीठ का बोध काम गायत्री परिवार ट्रस्ट बम्बई के प्रबंधक ट्रस्ट श्री मुकन्द एम॰ शाह की देखरेख में सम्पन्न हुआ है।
साईकिल यात्रा, सद्ज्ञान प्रसार
बेलाई (फतेहपुर) गायत्री परिवार के उत्साही नवयुवक कार्यकर्त्ताओं ने अपनी समीपवर्ती 10 किलोमीटर क्षेत्र की साईकिल यात्रा सम्पन्न की। युगनिर्माण मिशन के कार्यक्रमों के विस्तार की दृष्टि से यह आयोजन अत्यधिक सफल रहा। श्री रामानंद सिंह मुख्य संयोजक थे।
स्थान-स्थान पर आदर्श वाक्य-लेखन, यज्ञायोजनों के माध्यम से नशा, दुर्व्यसन, दहेज, आदि कुरीतियों के उन्मूलन में आशातीत सफलता मिली है। दूरदर्शी विवेकशीलता ही सर्वोपरि धर्म है। इसे प्रबुद्ध व्यक्तियों ने बहुत सराहा है। यदि इस तहर के धर्म की सर्वत्र प्रतिष्ठा हो तो साम्प्रदायिकता के विष को निकाल बाहर फेंका जा सकता है। ऐसी हर किसी की मान्यता है।
ऐतिहासिक आयोजन
भीनमाल (राज0) नगर में पहली बार इतना भव्य और ऐतिहासिक आयोजन 109 कुँडी गायत्री महायज्ञ और राष्ट्रीय एकता सम्मेलन सम्पन्न हुआ। सीमावर्ती जिले के सैकड़ों गाँवों की जनता इस आयोजन को देखने के लिए उमड़ पड़ी।
परम्परागत वेषभूषा में आगन्तुक स्त्री पुरुषों ने इस समूचे क्षेत्र को एक सचल प्रदर्शनी जैसा स्वरूप प्रदान किया। गीत गाते हुये महिलायें और पुरुष अहिर्निश यज्ञशाला की परिक्रमा करते थे, उससे सारा वातावरण भावनाओं में डूबा प्रतीत होता था।
बड़ी संख्या में लोगों ने बुराइयाँ, पर्दा प्रथा, अशिक्षा, बाल विवाह आदि कुरीतियों के निवारण के संकल्प लिये।
108 कुँड - 108 शाखाय
डीसा (गुजरात) शतकुँडी गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में यहाँ के कर्मठ प्रज्ञा पुत्रों ने समीपवर्ती क्षेत्रों में 209 अभिनव शाखायें गठित करने और वहाँ भी गायत्री महायज्ञ एवं सम्मेलन करने का निश्चय किया गया।
1 किलोमीटर से भी अधिक लम्बे मंगल कलश जुलूस में महिलायें और पुरुष सामाजिक जीवन में नव चेतना उत्पन्न करने वाले नारे लगा रहे थे जिसे देखने के लिये सारा नगर उमड़ पड़ा। ऐसा लगता था स्वयं स्वर्ग धरती पर उतर आया हो।
गायत्री शक्ति पीठ डीसा के कार्यकर्त्ताओं की संगठनात्मक क्षमता न केवल गुजरात अपितु सारे देश के लिये एक अनुकरणीय उदाहरण है। उसी के फलस्वरूप धर्म चेतना का इतना व्यापक प्रचार हुआ है। और प्रायः एक लाख लोगों को संदेश पाने का सौभाग्य मिला।
पूर्णाहुति वर्ष की कालावधि में महान लक्ष्यों की पूर्ति के अवसर पर महाकाल की तीन चुनौतियाँ स्वीकार की गयी। उनकी पूर्ति के लिए समूचा गायत्री परिवार समुद्र मन्थन की तरह जुट पड़ा। विश्वास किया जा सकता है कि इसके फलस्वरूप पौराणिक समुद्र मन्थन से मिले चौदह रत्नों की अपेक्षा कम नहीं कुछ अधिक ही विभूति भण्डार हस्तगत होगा।
1269 के बसंत की बेला में मिशन के सूत्र संचालन की हीरक जयन्ती अखण्ड ज्योति की स्वर्ण जयन्ती, राष्ट्रीय कुंडलिनी जागरण की त्रिवर्षीय त्रिवेणी इन सबका एक साथ मिलन ऐसा है, जिसे त्रिवर्गों का, तीन लोकों का, तीन देवताओं का एक साथ मिलन कह सकते है। उसके सत्परिणाम जिस रूप में सामने आने वाले हैं उसे मनुष्य देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण रूप में देखा जा सकेगा। वह समय अब दूर नहीं है। इक्कीसवीं सदी इसी नियति की भवितव्यता की सुनिश्चित बेला है।
हममें से कितने ही लोग उस असंभव दीखने वाले निर्धारण को अपनी आँखों से ही मूर्तिमान होते देखेंगे। इन दिनों व्यवधान और विग्रहों के पहाड़ सामने हैं। संकटों के घटाटोप सामने हैं, पर वे त्रिविधि अवतरणों की संयुक्त शक्ति के आगे टिकेंगे नहीं। यह सघन तमिस्रा देर तक नहीं टिकेगी। नवयुग का उदीयमान अरुणोदय इस ऊषाकाल का ब्रह्ममुहूर्त बीतते ही प्रकट होगा। हम अंधकार का निविड़ निशा का साम्राज्य समाप्त होते हुए देखेंगे। साथ ही उगते दिनमान का ज्योतिर्मय आलोक वितरण भी।
प्रज्ञा परिवार एक सम्मिलित समुच्चय है। केन्द्र से गतिविधियाँ चलती है, उसी को अग्रगामी बनाने के लिए परिवार का प्रत्येक घटक अपने-अपने ढंग से अग्रगामी होता है। तीन लाख व्यक्तियों को तीन-तीन में विभाजन कर देने से एक लाख संख्या बनती है। इतने सदस्य तो अपनी पत्रिकाओं के ही हैं। वे सभी यदि इस निश्चय को अपना लें कि हम सबको तीन-तीन की टोली में गठित होना है तो इतने भर में वह उद्देश्य पूरा हो जाता है, जिसे प्रस्तुत त्रिविधि संकल्पों का मेरुदण्ड कहा जा सकता है।
सभी जानते है कि संगठन में कितनी शक्ति होती है। तिनकों के मिलने से हाथी बाँधने वाला मोटा रस्सा बनता है। धागे मिलने से मजबूत फर्श कालीन बनते है। सीकों का सम्मिलित स्वरूप बंधी बुहारी बनता है और सारे घर आँगन को झाड़ बुहार कर साफ करता है। मेले ठेलों में बिखरी भीड़ धक्के खाती और जेब कटाती है। पर वही जन समुदाय जब सैनिकों के रूप में संगठित, प्रशिक्षित और कटिबद्ध हो जाता है, तो सुरक्षा और व्यवस्था की महती आवश्यकता पूरा करता हैं नवनिर्माण अपने युग का अतिमहत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य है। इसे सम्पन्न करने के लिए भावनाशीलों का उद्देश्य गठन एक छत्र के नीचे होना चाहिए। प्रज्ञा परिवार इस बार ऐसी ही छोटी-छोटी इकाइयों के रूप में अपनी समवेत स्थिति प्रकट करने जा रहा है। इसे बड़ा कदम माना जाना चाहिए और आशा की जानी चाहिए कि इस आधार पर व्यक्तित्वों की प्रखरता प्रकट होगी और समाज के नव निर्माण की प्रक्रिया द्रुतगति से आगे बढ़ चलेगी।
व्यक्तिगत चिन्तन चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समन्वय होना चाहिए। जन-जन की प्रमाणिकता प्रखरता, प्रतिभा निखरनी चाहिए। समाज में सहकारिता, उदारता और एकता समता की रीति-नीति चलनी चाहिए। सर्वत्र समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी का माहौल बनना चाहिए। सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन समग्र तत्परता और तन्मयता के साथ होना चाहिए। व्यक्ति को उत्कृष्ट और समाज को समर्थ बनाना चाहिए।
इस संकल्प को कार्यान्वित होने के लिए तीन-तीन सदस्यों वाले प्रज्ञा परिवारों का आकार में छोटा किन्तु व्यवहार में तेजस्वी गठन अविलम्ब अग्रसर होना चाहिए। उन संगठनों को एक छोटा पंचसूत्री कार्यक्रम क्रियान्वित करने के लिए अविलम्ब जुट जाना चाहिए। (1) झोला पुस्तकालय के माध्यम से जन-जन तक युग चेतना को हृदयंगम कराया जाना। (2) जन्मदिवसोत्सव के माध्यम से भाव भरे वातावरण में परिवार निर्माण को नये सिरे से नया प्रयत्न किया जाना। (3) स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से मिनीसिनेमा की आवश्यकता पूरी किया जाना (4) सुगम संगीत के उपकरण एकत्रित करके प्रशिक्षित भजन मंडलियों द्वारा लोक शिक्षण का आकर्षक आधार खड़ा किया जाना (5) दीवारों पर आदर्श वाक्य लिख कर राहगीरों को युग चेतना का आभास कराया जाना। यह पाँचों आधार ऐसे हैं जिनकी साज सज्जा कुछ सौ रुपयों में एकत्रित की जा सकती हैं इस राशि का प्रबंध शाखा सदस्य आपस में मिल-जुल-कर या मित्र मंडली की सहायता से कर सकते हैं। भावना और लगन जीवित हो तो नित्य का नियमित समयदान और अंशदान भी बिना किसी अड़चन के चल सकता है। आलस्य, प्रमाद ओर अनुदार कृपणता घेरे हुए हो तो बात दूसरी है, अन्यथा पेट प्रजनन की व्यस्तता इतनी सघन नहीं हो सकती कि उसमें ही हर घड़ी व्यस्त और मस्त रहा जाये।
प्रसन्नता की बात है कि पिछले दिनों जिस उत्साह से एक लाख कुण्डों के यज्ञ की योजना द्रुतगति से चली है, जिस गति से शान्ति-कुंज का नालन्दा विश्वविद्यालय शिक्षार्थियों से ठूंसा रहा है और एक लाख प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार करने का लक्ष्य पूरा होने जा रहा है, उसी उत्साह से यह तीसरा संकल्प एक लाख प्रज्ञा परिवार शाखाएँ संगठित करने के निर्धारण में बीजारोपण से आगे बढ़ कर हरी-भरी फसल के रूप में लहलहाने लग गया है। उस उद्यान का अभी शुभारम्भ श्री गणेश ही हुआ है, पर वह समय दूर नहीं जब इसके हर पौधे पर फूल लदेंगे और बसंत की शोभा सुषमा से हर क्षेत्र खिलखिलाने लगेगा।
इस तृतीय निर्धारण की घोषणा हुए बहुत दिन नहीं हुए। शंखनाद अभी ही बजा है। निमंत्रण भेजे बहुत समय नहीं हुआ पर बिगुल बजते ही समर्पित सैनिक कटिबद्ध होकर अपनी-अपनी पंक्तियों में आ खड़े हुए हैं और प्रयाण पथ पर बढ़ चलने के लिए मचल रहे हैं। प्राणवान प्रज्ञापुत्रों को टोलियाँ यह योजना बना रही हैं कि उनका प्रभाव क्षेत्र कितना बड़ा है। और उसमें कौन-कौन व्यक्ति मिशन से अवगत है उसके साथ अधिक घनिष्ठता के साथ जुड़ सकने की मनःस्थिति में है। इस सूची की भूल चूक का पर्यवेक्षण किया जा रहा है। जो नाम छूट गये हैं वे जोड़े जा रहे है। जिनसे कुछ आशा नहीं है जो बातूनी तो हैं, पर कार्य करने का समय आते ही छुई मुई की तरह मुरझा जाते है। उनके नाम भारी मन से हटाये जा रहे हैं। फिर भी यह आशा तो की ही जा रही है। कि उनसे मिला और कहा जायेगा। शाखा में संगठित सम्मिलित न हों तो कम से कम इतना तो करें ही कि समर्थन देते रहे, परामर्श सहयोग भर देते रहे, परामर्श सहयोग भर रहें। ऐसी सूचियाँ सभी स्वाध्याय मंडलों ने प्रज्ञा पीठों ने समर्थ शाखाओं ने बना ली हैं और उन नामों वाले व्यक्तियों के साथ संपर्क साधने की तिथि निर्धारण कर ली है। किस समय कहाँ होते चलना और किस मार्ग से कब तक घर वापस लौटना यह सुनिश्चित योजना बन गई है। समर्थों ने संकल्प किया है कि जब तक वे 14 शाखाएँ न बना लेंगे तब तक हजामत न बनायेंगे या शक्कर न खायेंगे। ऐसे अनुबंधों से संकल्प में प्राण भर जाते है और निश्चय पूरे होकर रहते है।
अभी-अभी जहाँ यज्ञ आयोजन होकर चुके हैं उनका प्रचार के सिलसिले में कई गाँवों के साथ-कितने ही व्यक्तियों के साथ नया संबंध जुड़ा हैं जहाँ आयोजन होने जा रहे है वहाँ अधिक लोगों को आमंत्रित करने की भाग दौड़ चल रही है। इसके साथ ही यह निश्चय भी लिया गया है कि पुराने परिचितों और नये संपर्कों में जो भी इस योग्य दिखे, उन्हें तीन की टोली में प्रज्ञा परिवार की श्रृंखला में जोड़ दिया जाये। साथ ही उन्हें प्रचार के लिए प्रशिक्षित करने और आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था बनाने का भी क्रम चल पड़ा है। ऐसे व्यक्तियों को शान्ति-कुंज के प्रशिक्षण में भी भेजा जा रहा है। ताकि वे नये उत्तरदायित्व को भली प्रकार निबाह सकें।
गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थरत्न-
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं चालीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से एकचित्त लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय का सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
1.गायत्री महाविज्ञान सजिल्द (तीनों भाग) 27)00 रुपये गायत्री यज्ञ विधान (प्रथम भाग) 3) 3- सामूहिक गायत्री यज्ञ विधान (द्वितीय भाग) 3) 4. गायत्री चित्रावली 5) 5. गायत्री मन्त्रार्थ 5)
गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य
(अ) छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सेट-आकर्षक कवरों वाले 31-31 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू0 1) मात्र, 15) पुस्तकों के सैट का मू0 15)/- ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार है।
1.गायत्री का स्वरूप और रहस्य। 2. गायत्री की गुप्त शक्ति। 3. सर्वसुलभ गायत्री साधना। 4. गायत्री का शक्ति स्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एक मुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोपवीत। 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
(ब)संक्षिप्त गायत्री हवन विधि मू01/- (से) दैनिक गायत्री साधना मू0 1)- (द) गायत्री चालीसा मू0 20
अध्यात्म का वैज्ञानिक प्रतिपादन साहित्य -
प्रस्तुत बुद्धिवादी युग में तर्क, तथ्य, प्रत्यक्ष, प्रमाण एवं विज्ञान को प्रामाणिकता मिली है और शास्त्र, श्रद्धा एवं आप्त वचनों को अमान्य किया गया है। इस मन स्थिति में पनपने वाले नास्तिकवाद एवं स्वेच्छाचार को निरस्त करने के लिए युगदृष्टा गुरुदेव की लेखन से अभिनव युग साहित्य सृजा गया है। प्रत्येक विचारशील वर्ग के लिए अत्यन्त प्रेरणाप्रद हैं प्रत्येक की छपाई-सफाई सुन्दर। कवर आकर्षक। पृष्ठ संख्या 112/- मूल्य तीन रुपया।
1.विवाद से परे ईश्वर अस्तित्व, 2. ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है? 3. दृश्य जगत के अदृश्य संचालन सूत्र, 4. चेतना की प्रचण्ड क्षमता का दर्शन, 5. असीम पर निर्भर ससीम जीवन, 6. पाँच प्राण पाँव देव, 7. दिव्य शक्तियों का उद्भव प्राण शक्ति से 8. मानवीय क्षमता - असीम अप्रत्याशित 9. अणु से विभु गागर में सागर, 10. आत्मा न नर है ना नारी, 11. मानवीय मस्तिष्क विलक्षण कम्प्यूटर 12. अतीन्द्रिय क्षमताओं की पृष्ठभूमि 13. जड़ के भीतर विवेकवान चेतना, 14. शरीर की अद्भुत क्षमताएँ और विलक्षणताएँ 15. मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष, 16. क्या धर्म अफीम की गोली है? 17. धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं पूरक 18. विज्ञान को शैतान बनने से रोकें 19. पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य 20. स्वर्ग नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया 21. तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति 22. मरें तो सही पर बुद्धिमता के साथ 23. भूत कैसे होते है? क्या करते है? 24. पितरों को श्रद्धा दें- वे शक्ति देंगे। 25. सपने झूठे भी सच्चे भी, 26. शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म 27. आध्यात्मिक काम विज्ञान 28. संसार चक्र की गति-प्रगति 29. दृश्य जगत की अदृश्य पहेलियां, 30. हम सब एक-दूसरे पर निर्भर, 31. बच्चे बढ़ाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी न मारें, 32. युग शक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण 33. ब्रह्मवर्चस् की ध्यान धारणा, 34. कुण्डलिनी महाशक्ति और उसकी संसिद्धि 35. सर्वोपयोगी गायत्री साधना, 36. गायत्री के पाँच मुख पाँच दिव्य कोश।
100/- से अधिक की पुस्तकें मँगाने र 25 प्रतिशत छूट एवं डाक खर्च अतिरिक्त।
200/- रुपये से अधिक साहित्य माँगने पर पैकिंग फारवर्डिग रेल भाड़ा फ्री।
वी0पी0पी0 से पुस्तकें भेजने का नियम नहीं है। अतः सम्पूर्ण राशि अग्रिम भेजी जाय।
(मंगल विजय)
सूर्योदय होने से पहिले, अंधकार गहराता है। ज्यों-ज्यों अन्त निकट आता है, त्यों-त्यों जोर लगाता है॥1॥
चोर, लुटेरों की गतिविधियाँ, अंतिम दाँव लगाती हैं। अंधकार की दुष्प्रवृत्तियाँ, और अधिक इठलाती है॥
पर सूर्योदय की तैयारी, नभ में चलती रहती है। नव-प्रकाश की अथक-साध, प्राची में पलती रहती है।
चीर निराशा-निशा, आशा का मुर्गा बाँग लगाता है। सूर्योदय होने से पहिले, अंधकार गहराता है॥2॥
निसंदेह युग की विभीषिकाओं ने जाल बिछाया है। दुश्चिंतन ने, दुराचरण ने, अंतिम दाँव लगाया है।
स्वार्थ सिद्धि की दुरभि संधियाँ दुष्षड़यंत्र रचाती है। टूट रहा विश्वास, आस्थाएँ उठती जाती है।
शोषण, उत्पीड़न, कुँठा से मनुज जकड़ता जाता है। सूर्योदय होने से पहिले, अंधकार गहराता है॥3॥
लेकिन भारत के पौरुष में नवयुग लेता अँगड़ाई। इक्कीसवीं सदी की करने, सृजन शक्ति से अगुआई।
तप संकल्पित हुआ देश का, नूतन सृष्टि रचाता है। तरुणाई हुलसी, सद्चिंतन-सदाचरण की ही वरन्।
युग का विश्वामित्र कहीं पर नूतन सृष्टि रचाता है। सूर्योदय होने से पहिले अंधकार गहराता है॥4॥
नवयुग में सम्मान न शोषण का होगा, होगा श्रम का। धर्म और विज्ञान विलग हैं, पता न होगा, होगा श्रम का।
वैज्ञानिक-विकास ‘समता का स्वर्ग’ धरा पर लायेगा। आध्यात्मिक विकास मानव का सुप्त-देवत्व जगायेगा।
शिव संकल्पों, सृजन शक्ति के बल पर नवयुग आता है। सूर्योदय होने से पहिले, अंधकार गहराता है॥5॥
जाति-पाँति का, ऊँच-नीच का भेद न होगा नव युग में। वैज्ञानिक-संहार न होगा, वैज्ञानिक-विकास होगा। नैतिकता, आध्यात्मिकता का कहीं नहीं हास होगा॥
“प्रज्ञा युग’ आने वाला है। यह स्वर धीर बंधाता है। सूर्योदय होने से पहिले, अंधकार गहराता है॥6॥
*समाप्त*