ग्रहण सरल है, प्रेषण कठिन

इच्छा शक्ति संकल्पबल एकाग्रता अनुशासन यह सामान्य जीवन की योग साधनाएँ हैं। जिन्हें किसी भी माध्यम से विकसित किया जा सकता है अपने आप को बिखराव से बचाकर एकाग्र तन्मय कर लेना मन क्षेत्र की साधना है। इन्हें दैनिक सामान्य क्रिया कलापों में समन्वित रखकर भी अपने मन संस्थान के बिखराव को बचाया जा सकता है। इतना भर कर लेने से अध्यात्म धाराओं के प्रभाव का ग्रहण करने की पात्रता विकसित की जा सकती है। पर इतने भर से काम नहीं चलता। प्रेरक शक्ति को किसी अन्य पर प्रयोग करने के लिए विशेष स्तर की सामर्थ्य अर्जित करनी पड़ती है। उसके लिए विशिष्ट साधनाएँ करना आवश्यक है।

रेडियो की आवाज पकड़ने के लिए साधारण टान्जीस्टर काम दे जाते हैं। पर प्रसारण करने के यंत्र जहाँ भी लगे होते हैं। वे बड़ी ताकत के भी होते हैं। और बड़ी कीमत के भी आंखों के सामने के दृश्य सहज ही दीख जाते है। पर दूर देशों तक किसी दृश्य को भेजना या देखना हो तो टेलीविजन प्रेरणा ओर ग्रहण के समग्र तंत्र पास में होना चाहिए कान समीपवर्ती वार्तालाप को सहज ही सुन लेते हैं। पर यदि बहुत दूरी तक आवाज पहुँचानी हो तो उसके लिए टेलीफोन तार ओर उसके लिए अभीष्ट ताकत वाली बैटरी चाहिए। सामान्य गति से तो अपने पैर भी चल लेते है। पर तेजगति से दौड़ना हो तो मोटर या मोटर साइकिल चाहिए और उसमें पर्याप्त तेल पेट्रोल भरा रहना चाहिए। यही बात अध्यात्म प्रसंगों के संबंध में भी है। ग्रहण सरल है। पर प्रेषण दुर्लभ। लाभ उठाना और खर्च करना सरल है। पर कमाना और सम्भालना कठिन। किसी के द्वारा प्रेषित शक्ति को ग्रहण कर लेने में उतनी कठिनाई नहीं है। उसमें मनोयोग से एकाग्रता से ही साधना से काम चल जाता है। यह प्रयोग साधनाओं द्वारा तो हो तो ही सकता है। पर यह भी सम्भव है कि तन्मयता के आधार पर किए जाने वाले दैनिक कार्यों में तनिक अधिक अभिरुचि और जिम्मेदारी का समावेश किया जाय तो मन का बिखराव सिमट कर एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत होने लगेगा। सरकस वाले कला का अभिनेता हिसाब रखने वाले मुनीम खिलाड़ी बाजीगर मदारी आदि का सारा क्रिया कलाप एकाग्रता के आधार पर ही चलता है। यदि वे ध्यान बटा दे। करे कुछ साँचे कुछ देखे कही सुने कही तो उनका मानसिक बिखराव सारा खेल बिगाड़ देता है। किसी के द्वारा प्रेषित भाव संवेदन या आध्यात्मिक क्षमता यदि एकाग्रतापूर्वक ग्रहण की जाय तो उसका समुचित लाभ मिलेगा।

हलके लाभ उठाने के लिए संकल्पशक्ति इच्छाशक्ति और एकाग्रता के समन्वय के काम चल जाता है। कहीं कोई घटना हुई और उसका संदेश किसी तक पहुँचना या पहुंचाना जाना है। तो इसमें इतनी ही बैटरी खर्च होगी जितनी कि ग्रहीता के उसे पकड़ने के लिए चाहिए।

समुद्र से भाप बनकर उठने और बादल बनने में अनेकों संकट खड़े होते है। किन्तु जब वे बरसते है। तो कुछ ही समय में जल जंगल एक कर देते है। कुण्डलिनी शक्ति का जागरण कठिन है। उसके लिए संयम बरतने की ओर साधना करने की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु यदि किसी ने वह शक्ति अर्जित एकत्रित कर ली हो तो उसके कुछ अंश का लाभ किसी को देने में अड़चन नहीं है। पैसा कमाने में बुद्धि भी लड़ानी पड़ती है। और मेहनत भी करनी होती है। पर यदि उस पैसे को उधार या दान देना हो तो बड़ी से बड़ी संपत्ति कुछ ही देर में खप जायगी। साधना उन्हें करनी पड़ती है। जो किसी को कुछ देना चाहते है। अध्यात्म क्षेत्र में यह सिद्धांत आदिकाल से चला आया है।

प्रत्यक्ष शरीर का कोई भी अं्रग काटकर किसी दूसरे के शरीर में प्रयुक्त होने के लिए दिया जा सकता है। हृदयदान गुर्दादान नेत्रदान रक्तदान आदि की शल्य क्रियाएँ प्रायः होती रहती हैं।

प्राण उपार्जन यों निजी सम्पदा है। पर कोई उदार चेता अपनी कमाई का कुछ अंश किसी दूसरे को भी हस्तांतरित कर सकते हैं। इसी को अध्यात्म भाषा में शक्तिपात कहा गया है। लोक व्यवहार में जिस प्रकार धनी लोग जरूरतमंदों को दान देते रहते है। उसी प्रकार दुर्बल प्राण व्यक्तियों को सशक्त प्राण वाले अपनी अध्यात्म सम्पदा का उपयुक्त भाग दान करते रहते है। इस उपलब्धि के सहारे वे अपने कष्टों से छूटते है। और अभीष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एक कारगर सहायता प्राप्त करते है।

शक्तिपात के सम्बन्ध में योगचूड़ामणि तेज बिंदूपनिषद् ज्ञान सकलानि तत्व हठयोग संहिता कुलाणवितंत्र धेरड संहिता रुद्र यामल तंत्र योग कुंडल्योपनिषद् शारदातिलक आदि ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन है। यह प्रबल प्राण वाले व्यक्ति द्वारा अपनी सामर्थ्य दूसरे के लिए हस्तान्तरित करने के सदृश है। उधार या दान में किसी को पैसा दिया जा सकता है। उसी प्रकार निकट सान्निध्य में यह शक्ति स्वयं भी अधिकारी लोगों की ओर चलने लगती है। अथवा प्रयत्नपूर्वक चलाई जा सकती है।

जलते चूल्हे के पास बैठने पर शरीर गरम होने लगता है। इसी प्रकार इस शक्ति की समीपता अपेक्षित होती है। नर और नारी के बीच यह आकर्षण विकर्षण अनायास ही काम करने लगता है। इसीलिए योगजिन अपनी सामर्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए स्त्रीसेवन या संपर्क से यथा सम्भव दूर रहते हैं। मित्रता की घनिष्ठता से भी यह प्रवाह बढ़ जाता है। इसलिए कुसंस्कारी के साथ रहना भी आध्यात्मिक दृष्टि से घाटे का सौदा है। किन्तु यदि स्वेच्छा पूर्वक किसी को ऊँचा उठाने या आगे बढ़ाने के लिए यह अनुदान दिया जाय तो दूसरी बात है। पर उसमें भी इतना विवेक तो रखना ही पड़ता है। कि उपलब्धकर्ता कही उसका उपयोग अनथ् प्रयोजनों में न करने लगे ऐसी दशा में जो दिया गया है। वह वापस भी लौटाया जा सकता है।

देखने में आत है। कि कितने ही व्यक्तियों को दूसरों के भेजे संदेश मिल जाते है। स्वप्न में तथा दूसरे प्रकार से भी निर्देशन प्राप्त हो जाते है। इसके लिए उपलब्धकर्ता को अपना चित एकाग्र करने का अभ्यास होना चाहिए। आकाश में बिखरी अनेकानेक तरंगों में से वह अपने काम की तरंगें पकड़ लेता है। और ऐसा अभ्यास प्राप्त कर लेता है। जिसे आश्चर्यजनक कहा जा सके।

कई लोगों में भविष्य कथन की दूसरों के विचार या क्रिया−कलाप जानने की भूतकाल में गुजरी घटनाओं की जानकारियों बता देने की क्षमता होती है। उन्हें अदृश्य आत्माओं के संदेश या संकेत आते है। किसी की बीमारियाँ या कठिनाइयों का समाधान बता सकते या कर सकते है। जमीन में या कोठे तिजोरियों में क्यों इसका विवरण बता सकते हैं

इनमें अनेक लोग ऐसी भी होते है। जिनने कोई विशेष साधना नहीं की है। इसका कारण तलाश करने पर पता चलता है। कि या तो उनने पहिले जन्मों में कोई कठिन साधना की है। और मिला उसका प्रभाव अभी तक बना हुआ है। इसके अतिरिक्त ऐसा भी हो सकता है। कि किसी सामर्थ्यवान का अनुग्रह अनुदान मिला है। इसके अतिरिक्त एक कारण यह भी हैं कि एकाग्रता इस स्तर की विकसित हो कि उसके सहारे अतीन्द्रिय क्षमताएं काम करने लगे अथवा ऐसे कल्पना चित्र उभरने लगे जो यथार्थता के समतुल्य है। जिनने कोई योग साधना नहीं की है। फिर भी उनमें चमत्कारी क्षमता मौजूद है। तो उपरोक्त प्रसंगों में से कुछ न कुछ विलक्षण उनके साथ अवश्य घटित हुआ होता है। बिना कारण किसी में चमत्कारी क्षमताओं का उद्भव होना सम्भव नहीं।

शक्तिपात अनुदान को अपनी पात्रता से अर्जित करके कोई व्यक्ति साधारण होते हुए भी सशक्त मनुष्यों के समतुल्य बन सकता है। और उपलब्धि का श्रेष्ठ उपयोग करके वैसा ही लाभ उठा सकता है जैसा कि योगीजन उठाते है।

यह सच है। कि शक्तिपात के आधार पर उच्चस्तरीय सफलताएँ अर्जित की जा सकती है। पर न्याय और नीति का तकाजा यह है। मुफ्त में किसी से कुछ न लिया जाय। शक्ति लेने के बदले में भक्ति तो देनी ही चाहिए


कुण्डलिनी साधना क्यों, किस प्रयोजन के लिए?

इन दिनों विश्वव्यापी विनाश संकट के घटाटोप इस तरह घिरते जा रहे हैं जिसमें मानवी सत्ता और सृष्टि के लिए अस्तित्व रक्षा का संकट उत्पन्न हो गया है। यह जितने विकट हैं, उतने ही समर्थ उनके प्रतिरोधक उपकरण चाहिए। हाथी छोटी पिस्तौल से नहीं मरता किला बिस्मार करने के लिए बाण वर्षा से नहीं, तोपें दागने से काम चलता है। वृत्तासुर का निधन वज्र बन जाने पर हुआ था। महिषासुर के लिए चण्डी का आवेश भरा आक्रोश कार्यान्वित हुआ था। पर्वत उखाड़ने के लिए हनुमान का पौरुष काम आया था। पर्वत उखाड़ने के लिए हनुमान का पौरुष काम आया था। पहाड़ उड़ाने के लिए डायनामाइट की छड़ें ही काम आती हैं। स्थिति को देखते हुए यह आवश्यक प्रतीत हुआ कि रचनात्मक सामर्थ्य की ही नहीं संघर्ष के लिए काम आने वाले ब्रह्मास्त्र जैसे साधनों की भी आवश्यकता पड़ेगी।

संकट का दानवी समुदाय एकत्रित होकर संचित सभ्यता का विनाश जिस प्रकार करने पर तुला है। उन्हें यदि मनमानी करने दी जाय तो प्रलय के दृश्य प्रस्तुत हो सकते है। इनकी रोकथाम आवश्यक है। उन्हें उलटा और निरस्त किया जाना चाहिए। इसके लिए दूसरी तरह के हथियार चाहिए। ग्रंथलेखन में कागज, कलम दवात काम दे जाती हैं। रसोई बनाने में आटा दाल और ईंधन का होना पर्याप्त है। पर जब दुर्दान्त दस्युओं का सामूहिक आक्रमण हो और लूट-रक्तपात की विभीषिका सामने आ खड़ी हो तो उन्हें रोकने के लिए बारूदी हथगोलों की आवश्यकता पड़ेगी।

हमारा जीवन गायत्रीमय ही बीता है। जो समय शेष रहा है वह भी उसी में लग खप जाय तो ठीक है। आज की विभीषिकाओं से जूझने के संघर्ष प्रयोजन के लिए कोई चन्द्रगुप्त, शिवाजी, विवेकानन्द मिल जाता तो हमें निर्धारित पथ से हटकर दायें-बायें न देखना पड़ता। पर बहुत प्रयत्न करने पर भी वैसा सुयोग न बन सका। फिर भी हम निराश नहीं है। अध्यात्म शक्तियां संसार में हैं तो सही पर वे सभी सूक्ष्म शरीर में रह रही है। भौतिक प्रयत्नों के लिए स्थूल शरीरधारी चाहिए। महाभारत में पाँच देवताओं ने पाँच पाण्डवों के रूप में शरीरधारण किए थे। कुछ रीछ वानरों के रूप में कुछ हनुमान अंगद आदि बनकर प्रकट हुए। प्रत्यक्ष कामों के लिये प्रत्यक्ष शरीर चाहिए। यह ढूंढ़ तलाश करने में लम्बा समय व्यतीत हो गया। शक्ति का समुच्चय न हो तो उसका थोड़ा अंश ही सही। वह किसी देवमानव में हो तो कामचलाऊ व्यवस्था बन सकती है। हमें बीजरूप में शक्ति सँजोए ऋषि सत्ताएँ प्रज्ञापरिवार के रूप में हाथ लगी हैं। पर वे एकाकी तो निस्सार ही थीं। यदि उन्हें दिशा ने दी गयी होती तो वही शक्ति कहीं और किन्हीं ध्वंसपरक गतिविधियों में लगी होती। ऐसे में मार्गदर्शक के निर्देशानुसार एक ही उपाय शेष रहा कि बड़ी मात्रा में शक्ति उपार्जन एवं तदुपरान्त वितरण हेतु स्वयं ही आगे आया जाय और मार्ग बदलना है तो स्थिति के अनुरूप वह भी बदल लिया जाय।

तीन वर्ष पूर्व वह परिवर्तन किया गया। एकान्त साधना सावित्री साधना का अवलंबन लिया गया। मुखर और मिलनसार जीवन छोड़कर एकान्तवास की रीति नीति अपनाना सरल कार्य नहीं था। सावित्री साधना पंच कोशों के जागरण की कुण्डलिनी जागरण की साधना है इसी को सूक्ष्मीकरण एवं वेदान्त की पंचीकरण साधना नाम दिया गया है। जिस मार्ग दर्शक ने गायत्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।

देखा गया कि संकट उतना हलका नहीं है जिसे सौम्य प्रयासों से निपटा जाय। यह बायें हाथ से खेलने वाला खेल ने प्रतीत हुआ इसलिए दाहिने हाथ को साधना और संभालना पड़ा है। सावित्री साधना से एक कदम आगे बढ़कर कुण्डलिनी को आड़े वक्त में जगाना पड़ा। इसी को दूसरे शब्दों में महाकाली, महाचण्डी या महादुर्गा कहा जाता है। यह आवश्यक जान पड़ा कि जिस शक्ति का सुनियोजन जिन व्यक्तियों द्वारा किया जाना है।, उन्हें इस विद्या की समुचित जानकारी दी जाय। पिछले दिनों कुण्डलिनी विज्ञान का काफी अन्वेषण पर्यवेक्षण प्रयोग परीक्षण अध्ययन अवगाहन चलता रहा है। इस संदर्भ में नई पुरानी पुस्तकों में चित्र विचित्र प्रकार के उल्लेख मिलते हैं इन्हीं को जोड़ गाँठ कर नये लेखकों और प्रकाशकों ने भी कुछ लिखने छापने का प्रयत्न किया है। इस लीपापोती के प्रयास में और भी अधिक गुड़ गोबर हो गया है।

अब तक कुण्डलिनी विषय पर लिखे गये प्रतिपादनों को पढ़कर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि यह विषय आकर्षक एवं गुह्य विज्ञान से संबंधित होने के कारण अनेकों ने इस कार्य किया है, पर निज का प्रयोग या अनुभव सम्पादन करने का कष्ट किसी ने भी नहीं किया जो भी कुछ उन्होंने लिखा है, वह हठयोग के प्रारंभिक प्रयोग एवं उनकी प्रतिक्रिया मात्र हैं वह हठयोग के प्रारंभिक प्रयोग एवं उनकी प्रतिक्रिया मात्र हैं जो कि इस विद्या का एक प्रतिशत भी नहीं है। प्रयोगकर्ता यह दावा करने से भी चतुरतापूर्वक बचते रहे है कि उन्होंने अपना प्रयोजन पूरा कर लिया। आज कहीं प्रामाणिक पुस्तक मार्गदर्शन तो दूर उसके सिद्धान्त विवेचन का सही रूप प्रस्तुत करने वाली पोथी भी कहीं दीख नहीं पड़ती। हमने स्वयं को भ्रम जंजालों से बचाकर उन्हीं प्रतिपादनों को आगे बढ़ाने का एक विनम्र प्रयास किया है।

हमारी सूक्ष्म मार्ग दर्शक सत्ता जो शताब्दियों से मौजूद है, गायत्री सावित्री और कुण्डलिनी क्षेत्र में समान ज्ञान व अनुभव रखती है। उसी ने हमें परखा हुआ सिक्का समझकर गत तीन वर्षों में सावित्री साधना तथा फिर देवात्म भारत की कुण्डलिनी जागरण के अभ्यास हेतु नियोजित किया है ताकि लुप्तप्राय किन्तु अत्यन्त सशक्त विद्या का सर्वथा लोप न होने पाए। उसकी टूटी हुई कड़ियाँ जुड़ कर अपने समग्र रूप में बनी रह सकें।

गायत्री ब्रह्म विद्या है उसे आत्मिकी भी कह सकते हैं। सावित्री आत्म भौतिकी है। आती तो वह आत्म विज्ञान के अंतर्गत ही है पर उससे भौतिक लाभों का उपार्जन और साँसारिक संकटों का निवारण ही हो सकता है। दोनों ही के माध्यम से अपना या अपनों का हित साधन हो सकता है। किन्तु कुण्डलिनी की क्षमता ब्रह्माण्डव्यापी है और उसे विशेषतया तोड़ने में कार्यान्वित किया जाता है। चण्डी का क्रुद्ध रुष्ट रूप उमड़ पड़े तो उसे अनाचार की मरम्मत करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। उसे इसी कारण असुर निकन्दिनी कहा गया है उसका जब भी प्रयोग हुआ है, दानवों आसुरीशक्तियों के विनाश हेतु ही हुआ है। इसे तलवार की तरह मारक होना चाहिए, जिसे तोड़ने मारने के लिए ही काम में लाया जा सकता है। जो बेकाबू हैं, उन्हें बलपूर्वक खींच बुलाने के लिए जिस दिशा में चाहें उसे घसीटकर ले चलने के लिए यह प्रयुक्त की जा सकती हैं यह वशीकरण विज्ञान हैं। इस मारण ओर उच्चाटन प्रधान कह सकते हैं। भस्मासुर को, सुन्द उपसुन्द को महिषासुर को इस महाकाली ने ही अपनी शक्ति से वशीभूत कर नष्ट किया था। शुम्भ निशुम्भ दुर्दान्त असुर मधुकैटभ का मर्दन उसी ने किया था। राम एवं सीता के माध्यम से रावण का एवं श्रीकृष्ण बलराम के माध्यम से पूना, कंस जरासंध जैसी आसुरी शक्तियों का नाश उसी ने किया था। यह तो शक्ति का पक्ष हुआ।

यही शक्ति जब सृजनात्मक प्रयोजनों हेतु प्रयुक्त होती है तो सृष्टि संचालिनी शक्ति बन जाती है। ज्ञानार्णव तंत्र में कहा गया है- शक्तिः कुण्डलिनी विश्वजननी व्यापार वद्धोद्यता। सारा विश्व व्यापार इसी शक्ति के माध्यम इसी शक्ति के माध्यम से एक घुमावदार उपक्रम की तरह चलता है। महाकाल की परिवर्तन प्रक्रिया इसी के माध्यम से सम्पन्न होती है। जीव को चक्र पर आरुढ़ मृतिका पिण्ड की तरह यह घुमाती है और कुम्हार की तरह आत्मसत्ता को भिन्न-भिन्न रूपों में गढ़ देती है। वस्तुतः कुण्डलिनी सृष्टि संदर्भ में समष्टि एवं जीव संदर्भ में व्यष्टि में शक्ति संचार करती है। कुण्डलिनी एक प्रकार से कास्मिक इलेक्ट्रिसिटी है जो योगाग्नि को जगाती व्यक्ति को प्राणवान समर्थ दृष्टा स्तर का बनाती है। कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में पंचाग्नि विद्या के रूप में इसी प्राणाग्नि की चर्चा हुई है जो व्यक्ति को रोग, जरा एवं मृत्यु से परे जीवन्मुक्ति की ओर ले जाती है। नाड़ी संस्थान की उत्तेजना से जो शक्ति उत्पन्न होती है, वह सामयिक क्षणिक प्रभाव का ही परिचय दे पाती है। किन्तु कुण्डलिनी चिरस्थायी है, चेतनात्मक शक्ति है जो व्यक्ति में ऊर्जा समाहित कर उसके व्यक्तित्व का कायाकल्प कर देती है।

जहाँ कास्मिक स्तर पर समष्टिगत धरातल पर कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया चल रही हो वहाँ यह मानना चाहिए कि यह अनिष्ट के निवारण एवं उज्ज्वल भविष्य के सृजन का प्रयोजन पूरा करेगी। पर ऐसे खतरनाक प्रयोग के लिए सत्पात्र तो हों। बन्दूक जब चलती है तो उसका झटका पीछे की ओर लगता है। इस महाशक्ति का प्रयोग करने वाले में इतना साहस बल और शौर्य पराक्रम होना चाहिए कि प्रहार के समय उलटकर पीछे लगने वाले झटके को सहन कर सके। अन्यथा लाभ उठाने के लिये किया गया प्रयोग हानिकारक भी हो सकता है। फिर रहस्यमयी साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने से वह सर्व साधारण के लिए चर्चा का विषय बनती है। यही कारण है कि इन्हें गुह्य विद्या मानकर इन पर बहुधा पर्दा ही डाला जाता रहा है। जब तक कुतर्कों का सिलसिला चलता है, अहंकारी लोग अपनी मीनमेख निकालते गलतियाँ और सुधार सुझाते हैं। ऐसी दशा में साधना का मूलभूत आधार श्रद्धा ही डगमगाने लगती है और शंकित मन स्थिति में उत्तम साधना भी निष्फल बनकर रह जाती है। संभवत ऐसे ही अनेक कारणों को ध्यान में रखते हुए शास्त्रकारों ने उच्चस्तरीय साधनाओं को विशेष कर तंत्र से जुड़ी साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने का निषेध किया है। इस संदर्भ में मार्गदर्शक द्वारा साधक की पात्रता को परखकर तद्नुसार साधना बताना आवश्यक समझा गया है। साधना क्षेत्र में पात्रता ही नहीं, साधक की आवश्यकता और परिस्थिति भी जाँचनी पड़ती है। इसके बाद ही निदान के आधार पर उपचार का तरीका रोगी व चिकित्सक दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।

सावित्री एवं कुण्डलिनी की साधना कराने का अनुभव एवं अभ्यास कष्ट साध्य एवं तलवार की धार पर चलने के समान दुरूह होने के कारण अब लोगों ने एक प्रकार से छोड़ ही रखा है। बिना अनुभवी शिक्षक के कोई इंजीनियर कलाकार नहीं बन सकता हैं इसी प्रकार जब कुण्डलिनी साधना के प्रवीण पारंगत ही नहीं रहे तो शिक्षार्थी कहाँ से मिलें?

कुण्डलिनी जागरण शरीरगत प्राणाग्नि का प्रज्ज्वलन है और उसका लाभ निजी प्रयोजनों के लिए उठाने की परम्परा अब तक रही है। जननेन्द्रिय मूल की काम ऊर्जा को ब्रह्म ऊर्जा में मेरुदण्ड मार्ग में अवस्थित छः चक्रों का वेधन करते हुए मिलाया जाता है। इससे शिव−शक्ति का संयोग सम्मिलन होने पर सिद्धियाँ भी मिलती हैं, पर उसमें सर्पों की खिलौने जैसी सतर्कता से काम लेना पड़ता है। साँप का तमाशा दिखाने वाला सँपेरा उससे अपना कुटुम्ब तो पालता है लोगों पर अपनी प्रवीणता की छाप भी डालता है, पर साथ ही वह जोखिम से भी खेलता है किसी विषधर से पाला पड़े तो उसकी फुंसकार भर से खेल रुक जाता है, लोगों के कलेजे थम जाते हैं व जान जाने का डर रहता है।

शिव और शक्ति दोनों के गले में सर्प लिपटे हुए हैं। अलंकारिक रूप से इसी को सर्पिणी कुण्डलिनी कहा गया है। यह हठयोग का ताँत्रिक प्रयोग तो है ही छः चक्रों के वेधन से जो शक्तियाँ प्राप्त होती हैं वे न केवल प्रतिकूलताओं के निवारण हेतु अपितु सावित्री साधना का उच्चस्तरीय प्रयोग साथ जुड़ा होने से नया वातावरण बनाने के निमित्त काम भी आती है। षट्चक्र वेधन के साथ जब पंच कोशों के जागरण की प्रक्रिया भी सम्पन्न होती है तो अनेक प्रकार के सृजन प्रयोजनों में उनका उपयोग होता है। मकान बनाने हेतु ईंट, चूना लोहा, लकड़ी व श्रमिक की जरूरत पड़ती है। भोजन बनाने में ईंधन, आग बर्तन खाद्यपदार्थ और पकाने वाले की जरूरत पड़ती है। पंचरत्न प्रसिद्ध हैं। शरीर का निर्माण पंचरत्नों से व चेतना का आविर्भाव पंच प्राणों से हुआ है। यह शक्ति स्रोत जीवनी शक्ति का ही दूसरा नाम है। प्राणाग्नि का उत्तेजन कुण्डलिनी जागरण जब पंचकोशी साधना सावित्री साधना के समन्वित रूप में होता है तो उसका प्रभाव क्षेत्र अति विस्तृत हो जाता है। समस्त विश्व के सम्मुख जितनी विकट समस्याएँ अभी सामने हैं वे पहले कभी देखने में नहीं आई। अणु आयुधों का विस्तार नक्षत्र युद्ध की आसन्न विभीषिका चारों ओर संव्याप्त वैचारिक एवं पर्यावरण प्रदूषण प्रकृति का असंतुलन एवं मारक रोगों की भरमार अपराध आतंक की काली साया देखते हुए लगता है कि यह प्रयोग अब विशाल व्यापक स्तर पर करना ही अभीष्ट है। इन पर विजय पाने वाले योद्धाओं सृजन शक्तियों के प्रजनन में साधनात्मक कष्ट तो है पर उसका प्रतिफल इतना शानदार है जिसकी तुलना अब तक के पराक्रमों से नहीं की जा सकती है। वे एक नया अध्याय ही जोड़ेंगे।

प्रस्तुत अंक में दैवी प्रेरणावश एक व्यापक जनसमूह के शक्ति जागरण की प्रक्रिया हेतु किए गये प्रयोगों में से मात्र उन्हीं का रहस्योद्घाटन हो रहा है जो सर्वोपयोगी हैं विधि विधान की जटिलता में जाने की पाठकों की आवश्यकता नहीं। उन्हें तो मात्र फलितार्थ देखने व अपनी भूमिका कहाँ हो यह बात समझनी है। इस अंक व आगे भी जारी रहने वाली लेख श्रृंखला द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जाना है कि व्यक्ति का आन्तरिक विकास उसे इस स्थिति तक पहुँचा सकता है कि वह अपना ही नहीं अन्य असंख्यों का भी भला कर सके। इतना ही नहीं व्यापक वातावरण को आमूलचूल बदलकर नये युग का सूत्रपात कर सके। संक्षेप में इसी प्रयोग का अनुसंधान हमारी अपनी देवात्मा भारत का अनुसंधान हमारी अपनी देवात्मा भारत की कुण्डलिनी जागरण साधना के माध्यम से सम्पन्न हुआ है।


गायत्री, सावित्री और कुण्डलिनी महाशक्ति

कुण्डलिनी की मीमांसा गायत्री महाप्रज्ञा के तत्वदर्शन की चर्चा से आरम्भ होती है। गायत्री उपासना मूलतः धर्मधारणा और भाव संवेदना का प्रयोग है। इसमें आत्मशोधन को प्रधानता दी है एवं ध्यान धारण द्वारा भक्ति संचार करते हुए ब्राह्मी चेतना को निकटवर्ती बुलाया जाता है या उसके साथ गुँथा जाता है। लकड़ी के ढेर पर आग उगल देना या जलती आग में ईंधन डालते जाना समांतर कृत्य हैं। अन्तर इतना ही है कि आत्म समर्पण की अद्वैत की स्थिति ले आने चमत्कारी परिणति अविलम्ब बन पड़ती है। समर्पण भाव न होकर अपने लिये कुछ चाहने का सकाम प्रयोजन भाव न होकर अपने लिये कुछ चाहने का सकमा प्रयोजन भी हो गाड़ी धीमी चाल से चलती हो तो भी उस में अपना हित साधन तो हो ही जाता है। पर सामर्थ्य इतनी हस्तगत नहीं होती कि दूसरों का भी भला कर सके। तैराक स्वयं तो तैर सकता है, पर नाविक की तरह दूसरों को पार लगाते रहने का व्यवसाय नहीं कर सकता। गायत्री की निष्काम और सकाम उपासना में यही अन्तर है। अपने-अपने स्तर की सफलता दोनों ही प्रयत्नों से साधकों को मिलती है।

यों हम गायत्री के तत्वदर्शन की गहराई में जाएँ तो पाते हैं कि मस्तिष्क के ज्ञान बीज से ही हमारी समस्त चेतना प्रभावित होती है। शरीर निर्वाह तथा लोक व्यवहार में उसी की भूमिका प्रधान है। उच्चस्तरीय भूमिका में यही केन्द्र अतीन्द्रिय क्षमताओं का उद्गम स्रोत सिद्ध होता है और अनंत ब्रह्म और जीवन को मिलाने वाली जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने वाली परमानन्द प्रक्रिया भी यहीं सम्पन्न होती है। ब्रह्मलोक को गायत्री की ब्राह्मी शक्ति कहा गया है। उसका प्रभाव क्षेत्र ज्ञान चेतना है। गायत्री को ब्रह्माणी ब्रह्म पत्नी अलंकारिक दृष्टिकोण से कहा गया है। उसकी सामर्थ्य को भौतिक जगत में दुख दारिद्रय का विनाश करने वाले एवं दुष्ट दुष्कृतों को परास्त करने वाले ब्रह्म दण्ड के रूप में देखा जाता है। अध्यात्म क्षेत्र में उसका स्वरूप ब्रह्मवर्चस के रूप में देखा जाता है।

गायत्री के उपरान्त सावित्री साधना का प्रसंग चलता है। सावित्री उपासना गायत्री का ही भौतिक पक्ष है। भौतिक प्रयोजनों के लिए शक्ति चाहिए। शक्ति ऊर्जा के सहारे विकसित होती है। कार्य कलेवर में अवस्थित पंचतत्व पंचप्राण ईंधन का काम दे जाते है। और उनके सहारे भीतरी अग्नि जगाई जा सकती है। यह अग्नि प्रज्ज्वलन ही सावित्री साधना है। सावित्री व कुण्डलिनी साधना में अंतर होते हुए भी उन्हें एक दूसरे के समतुल्य समझा जा सकता है।

पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्माजी की दो पत्नियाँ थी। प्रथम गायत्री दूसरी सावित्री। इसे अलंकारिक प्रतिपादन में ज्ञान चेतना और पदार्थ सम्पदा कहा जा सकता है। इनमें एक परा प्रकृति है, दूसरी अपरा। परा प्रकृति के अंतर्गत मन, बुद्धि चित, अहंकार अहंकार चतुष्टय, ऋतंभरा प्रज्ञा आदि का ज्ञान क्षेत्र आता है। दूसरी पत्नी सावित्री इसे अपरा प्रकृति पदार्थ चेतना जड़ प्रकृति कहा जाता है। पदार्थों की समस्त हलचलें गतिविधियाँ उसी पर निर्भर है। परमाणुओं की भ्रमणशीलता, रसायनों की प्रभावशीलता, विद्युत ताप प्रकाश चुम्बकत्व ईथर आदि उसी के भाग है। पदार्थ विज्ञान इन्हीं साधनों को काम में लाकर अगणित आविष्कार करने और सुविधा साधन उत्पन्न करने में लगा हुआ है, इसी अपरा प्रकृति को सावित्री कहते हैं। सावित्री की अपरा प्रकृति से ही प्राणियों का शरीर संचालन होता है और संसार का प्रगति चक्र चलता है। सत रज तम पंचतत्व तन्मात्राएँ आदि का सूत्र संचालन यही शक्ति करती है। सिद्धियों और वरदान इसी के अनुसार में मिलते है। मनुष्य शरीर में आरोग्य दीर्घजीवन बलिष्ठता, स्फूर्ति, साहसिकता सौंदर्य आदि अगणित विशेषताएँ इसी पर निर्भर हैं। यों इसका विस्तार तो सर्वत्र है, पर पृथ्वी के ध्रुव केन्द्र में और शरीर के मूलाधारचक्र में इसका विशेष केन्द्र है। साधना प्रयोजन में प्रकारान्तर में इसी को कुण्डलिनी शक्ति कहते है। इसी के जागरण से सारे प्रयोजन पूरे माने जाते हैं। जिनके लिए शक्ति उपार्जन की सामर्थ्य हस्तगत की जाती है। शास्त्रोक्त प्रतिपादनों पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि कहीं कहीं सावित्री व कुण्डलिनी को एक माना गया है। वह कहीं कहीं इन्हें अलग मानते हुए इनकी साधना पद्धति व उद्देश्य भिन्न भिन्न बताये गये हैं। फिर भी एक तथ्य अपनी जगह अटल है कि काया की सूक्ष्म संरचना व उस तंत्र को जगाने का विधि विधान सदैव शाश्वत चिरन्तन रहेगा। अन्तर वहाँ वहाँ होता है जब उनसे प्राप्त शक्ति सामर्थ्य को प्रयोजन विशेष हेतु नियोजित किया जाता है।

वैसे देखा जाय तो कुण्डलिनीयोग में क्रियायोग की प्रधानता है। नाड़ी शोधन त्रिनाड़ी परिमार्जन षट्कर्म चक्रवेधन आदि सभी प्रयोग ऐसे हैं जिनमें ध्यान धारणा के साथ-साथ शरीरगत क्रिया कलापों को प्रमुखता देनी पड़ती है। प्राणायाम के प्राण प्रयोगों का विचित्र क्रम अपनाना पड़ता है। बंधु मुद्राएँ आसन इत्यादि कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया में विशेष रूप से प्रयुक्त होते हैं विशुद्ध सावित्री साधना में स्वयं को मस्तिष्कीय क्षेत्र की परिधि तक सीमित रखना होता है। सहस्रार कमल ब्रह्मरंध्र और खोपड़ी में भरा द्रव्य अपने ढंग की उठक पटक से जागृत हो जाता है। भीतरी पक्ष की देखभाल ब्रह्मरंध्र करता है और बाहरी का तृतीयनेत्र आज्ञाचक्र। किन्तु जब सावित्री व कुण्डलिनी की सम्मिलित साधना का उपक्रम अपनाया जाता है तो दोनों विधि विधान का एक सम्मिश्रित स्वरूप हो जाता है। व फलितार्थ भी तद्नुसार बदल जाते हैं। प्रस्तुत साधना का स्वरूप कुछ ऐसा ही है। इसलिए क्रमिक सोपानों में गायत्री व कुण्डलिनी के सिद्धान्त व प्रयोग पक्ष की चर्चा की गई है।

जब शास्त्रों में ब्रह्मा की पत्नी के रूप में कहीं इन साधना प्रसंगों का विवरण आता है, तो यह मानना चाहिए कि यह शब्द अलंकारिक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। चेतनसत्ता कुटुम्ब परिवार मनुष्यों जैसा थोड़े ही होता है? अग्नि तत्व की दो विशेषताओं गर्मी ताप एवं प्रकाश रोशनी को कोई चाहे तो दो पत्नी का नाम दे सकता है। यह शब्द अरुचिकर लगे तो पुत्रियाँ कह सकते हैं। ऐसे शास्त्रों में हुआ भी है। सरस्वती को कहीं ब्रह्मा की पत्नी कहीं पुत्रियाँ कहा गया है। इसे स्थूल मानवी लोकाचार की भाषा में नहीं समझकर अलंकारिक वर्णन, उपमा भर मानना चाहिए। आत्मशक्ति गायत्री है, वस्तु शक्ति सावित्री है। आत्म चेतना का ऊर्ध्वगमन व्यक्तित्व का विकास श्रेष्ठ कार्यों में सुनियोजन, उच्चस्तरीय चिन्तन एवं जीवन्मुक्ति हेतु साधना पुरुषार्थ गायत्री साधना की फल श्रुतियाँ है। कुण्डलिनी जागरण से शरीरगत प्राण ऊर्जा की प्रसुप्ति उपक्रम सावित्री साधना के अंतर्गत आता है। बिजली के ऋण व धन दोनों ही धाराएँ होती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। गायत्री व सावित्री के समन्वय से ही साधना की समग्र आवश्यकता पूरी होती है। सावित्री साधना का मात्र भौतिक ही नहीं आत्मिक लाभ उठाने के लिए सदा गायत्री साधना का अवलम्बन लेकर शुरुआत की जाती है। यही है कुण्डलिनी साधना का प्रारम्भिक स्वरूप जो मानसपटल पर अस्पष्ट हो तो इस दिशा में किये गये प्रयास निरर्थक ही जाते हैं।

अध्यात्म क्षेत्र में ज्ञान भाग को दक्षिण मार्ग कहते हैं। उसे निगम राजयोग वेदमार्ग आदि भी कहा गया है। दूसरे क्रिया भाग को वाममार्ग, आगम, तन्त्र हठयोग आदि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दोनों की पृथकता प्रतिकूलता हानिकारक है। इससे कलह और विनाश उत्पन्न होता है। देवासुर संग्राम के उपाख्यानों को पढ़कर किसी को प्रसन्नता नहीं होती। उस वर्णन को पढ़कर खिन्नता ही उभरती है। दोनों जब मिलकर साथ चले समुद्र मंथन में सहयोग किया तो उस क्षेत्र में दबी हुई प्रचुर सम्पदा उपलब्ध हुई। समुद्र मंथन के फलस्वरूप बहुमूल्य चौदह रत्न निकलने की कथा सर्वविदित है। गायत्री और सावित्री के समन्वय को ठीक इसी प्रकार के देवासुर सहयोग स्तर का कहा जा सकता है।

शिव और पार्वती के विवाह से दोनों का एकाकीपन दूर हुआ था। दोनों के संयोग से दो पुत्र हुए एक सिद्धिदायक गणेश। दूसरे निकंदन कार्तिकेय। एक से धर्म की स्थापना होती है दूसरे से अधर्म के विनाश की। गणेश का वरदान प्रज्ञा और कार्तिकेय का अनुदान शक्ति है कार्तिकेय के छः मुख हैं। इन्हीं को षट्चक्र कहते हैं। इस स्कन्द अवतरण को कुण्डलिनी महाशक्ति से सम्बन्धित षट्चक्र समूह और उसने प्रभाव का वर्णन ही समझना चाहिए।

जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित आधार अग्नि का नाम ही कुण्डलिनी है शिव रूप सहस्रार के जागृत प्रफुल्लित होने पर उसका जो पराग मकरन्द निर्झरित हुआ उसे शिव रेतस कहना चाहिए। कुण्डलिनी आधार पर अग्नि ने उसे ग्रहण किया। छः कृतिकाओं ने उसे परिपक्व किया। यह छः कृतिकाओं छः चक्र ही है। छः कृतिकाओं द्वारा परिपोषित छः मुख वाले कार्तिकेय को अलंकार के रूप में षट्चक्रों का प्रभाव परिणाम ही माना जाना चाहिए।

षट्चक्र क्या है? कहाँ है? क्यों है? किस स्थिति में हैं? उनका क्या प्रयोजन है? इन प्रश्नों की यहाँ विस्तार से चर्चा नहीं की जा रही। इनके प्रयोग उपयोग का स्वरूप एवं विज्ञान सम्मत विवेचन बाद में किया जाना है। यहाँ उस कुण्डलिनी प्रसंग की चर्चा हो रही है जो मूलतः उनके लिए है जो भौतिकी के माध्यम से आत्मिकी से साध्य प्रयोजन उच्चस्तरीय उपलब्धियों हेतु पूरा करना चाहते हैं जो शक्ति के पुजारी है एवं सोचते हैं कि शक्ति की महत्ता अधिक है। देवासुर संग्राम में असुरों ने शक्ति जो उपार्जित की थी उसे निकृष्ट प्रयोजनों में गंवाया एवं फिर विष्णु भगवान की या उच्चस्तरीय आत्मशक्ति का प्रयोग कर उनका दमन किया जाता रहा। देवत्व के साथ जब शक्ति साधना जुड़ती है तभी फलीभूत होती है। ऐसी उपलब्धि शाश्वत होती है। एवं दूरगामी दृष्टि से सदैव जन साधारण के लिए हितकारी भी। दैत्यों की सफलता जो प्रारंभ में दिखाई देती है, हथेली पर सरसों जमा देने की बाजीगरों की तरह ही मायावी सिद्ध होती है। शुक्राचार्य कुण्डलिनी विद्या के निष्णात् रहे हैं। उन्हीं ने अपने शिष्यों असुरों को इसका मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण दिया था बृहस्पति देव गुरु रहे हैं। उन्होंने योगी, तपस्वी और ब्रह्मवेत्ता श्रेयार्थियों को गायत्री मंत्र से प्रारम्भिक सोपान पर चलाकर सुपात्र बनाया देवोपम बनाया। उन्होंने भी कुण्डलिनी साधना के प्रयोगों का शिक्षण दिया पर उसका नियोजन सदैव श्रेष्ठता के संवर्धन हेतु परहितार्थाय ही होता रहा। जिन आत्मवेत्ताओं के सामने भौतिक समस्याएँ थीं, उन्हें प्रारंभिक शिक्षण के उपरान्त सावित्री साधना का अवलम्बन लेने के लिए कहा गया। दधिचि भागीरथ लोमश श्रृंगी विश्वमित्र आदि ने सावित्री साधना से ही भौतिक पुरुषार्थ सम्पन्न किये थे। वे किये गये परमार्थ प्रयोजनों के लिए ही थे पर साधना का मार्ग उपक्रम विधि विधान तद्नुसार बदला गया। अर्जुन हनुमान जैसों को भी साँसारिक विग्रहों का शमन करना पड़ा उन्हें भी अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत भौतिकी शाखा सावित्री कुण्डलिनी साधना का पथ अपनाना पड़ा। हमारी अपनी साधना भी इन्हीं उद्देश्यों हेतु नियोजित हुई एवं सही मार्ग अपनाने पर प्रतिफल भी वैसे मिले।

जब सावित्री साधना व कुण्डलिनी जागरण का सम्मिलित प्रयोग होता है तो चमत्कारी परिणाम मिलते हैं बिजली कुछ ही सेकेंडों में अपना काम कर दिखाती है। विद्युत शवदाहा गुहों में यह कृत्य सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है जब कि अग्नि पर दाल चावल पकाने तक में देर लगती है। अध्यात्मिक दिव्यता को क्षति भी न पहुँचे एवं सुपात्र साधक अपने गन्तव्य को भी शीघ्र पा ले उसके लिए यही विधि श्रेयस्कर है। विशुद्ध कुण्डलिनी साधना तंत्र मार्ग वाममार्ग के अंतर्गत आती है। जब सावित्री गायत्री व कुण्डलिनी का समन्वय हो जाता है तो योगमार्ग दखिण मार्ग का प्राधान्य हो जाता है।

भगवान को बहुधा विकट प्रसंगों में वाराह नृसिंह परशुराम आदि का रूप धारण करना पड़ा है। शिवजी को भोलेबाबा, औघड़दानी कहा जाता है पर उनने भी दक्ष प्रजापति पर क्रुद्ध होकर वीरभद्र को उत्पन्न किया व दक्ष के अहंकार को मटियामेट किया था ये आपत्तिकालीन प्रसंग है जिनमें आवश्यकता को देखते हुए शमन मर्दन के प्रयोग किये जाते हैं।

अवतार शक्तियाँ एवं उच्चस्तरीय आत्माएँ परिस्थितियाँ देखते हुए यह कार्य दूसरों से कराती हैं ताकि अपनी शक्ति क्षीण न हो। विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा स्वयं कर सकते थे पर क्रोध के आवेश में वर्चस शक्ति नष्ट न कर उन्होंने ताड़का सुबाहु मारीचि से निपटने के लिए राम लक्ष्मण जैसे क्षत्रिय बालकों को ही अग्रिम पंक्ति में रखा बला अतिबला विद्या सिखाकर उनसे रक्षा का कार्य कराया। समर्थ रामदास ने छत्रपति शिवजी से और चाणक्य ने चन्द्रगुप्त से वे कार्य कराये थे जो यदि वे चाहते तो स्वयं भी कर सकते थे। यहाँ प्रश्न यही आता है कि ब्रह्मतेज अधिक मूल्यवान है। उस उपार्जित विभूति हेतु अपव्यय न किया जाय। इस प्रकार सावित्री व कुण्डलिनी की समन्वित साधना से अपने और पराये सामान्य स्तर के संकट निपटाये जा सकते हैं और औचित्य की सीमा के अंतर्गत वैभव सामर्थ्य को भी बढ़ाया जा सकता है।

एक व्यक्ति की साधना उपार्जित सामर्थ्य से अन्य अनेक एवं यहाँ तक कि वातावरण को भी बदला सारे परिकर में मंथन कर आमूल–चूल परिवर्तन किया जा सकता है। यह सत्य है। अन्य दानों की तरह शक्ति दान भी होता है। आत्मशक्ति वाले किसी समर्थ से अपने लिए शक्ति का अनुदान माँगकर उसे उचित कार्यों में खर्च कर सकते हैं, इसका सृष्टि के नियमों में वैसा ही प्रावधान है जैसा कि बैंकों से ब्याज लिया जाता है। जिस प्रकार धनी व्यक्ति अपना धन सम्पदा का एक अंश दान करते रहते हैं उसी प्रकार योगी समष्टिगत कठिनाई आने पर सारी वसुधा के हित हेतु अपना उपार्जन दूसरे सत्पात्रों को भी दान करते रहते हैं। कुटुम्ब में कमाने वाला एक होता है सभी अपने अपने हिस्से के छोटे बड़े काम स्थिति के अनुरूप करते रहते हैं पर यह आवश्यक नहीं कि उन्हें अपने लिए अलग-अलग कमाना पड़े अपनी आवश्यकता का सरंजाम जुटाना पड़े।

कुण्डलिनी जागरण अति कठिन विद्या है। इसे बिजली के साथ खेलना कह सकते हैं। बिजली के साथ जान जाने का जोखिम भी बना रहता है। कुण्डलिनी जागरण प्रयोगों में मार्गदर्शन के पात्रता के अभाव में कई व्यक्ति पागल होते देखे गये हैं कईयों का पक्षाघात हुए व कई जान से हाथ धो बैठे हैं। मोटर ड्राइविंग की किताब पढ़कर कोई गाड़ी चलाने चल पड़े तो इसका परिणाम अनर्थ में भी हो सकता है। कुशल सीखा हुआ चालक गाड़ी भी संभालता है और बैठे यात्रियों को अभीष्ट स्थान पर पहुँचा देता है। कुण्डलिनी जागरण का माहात्म्य ऋद्धि सिद्धियों के घटना प्रसंग प्रतिफल आदि जान लेने सुन समझ लेने के उपरान्त ऐसी उतावली नहीं करना चाहिए। कि इस कार्य को अति सरल समझ लिया जाय और बिना किसी मार्गदर्शक की सहायता के अपने आप ही कुछ उलटा सीधा करने लग जायें। ऐसे प्रसंगों में फुदक कर अगल पंक्ति में जा खड़े होने में रोमाँच तो है साहस का काम भी है पर उससे खतरा भी कम नहीं है।

गायत्री सावित्री व कुण्डलिनी के समन्वित प्रसंगों की चर्चा साधना प्रयोजनों हेतु इतनी सावधानी से की जानी इसीलिए आवश्यक है कि उसे दिशा में लोगों का आकर्षण कम नहीं। गुह्य विज्ञान होने के नाते एक आवरण उस पर पड़ा है। कुण्डलिनी विज्ञान का सिद्धांत स्वरूप व व्यवहार समझने की बात उचित भी है, आवश्यक भी क्योंकि जब ऐसी विधाओं का लोप होने लगता है तो सूत्र संकेतों की कड़ी मिल जाने पर बुद्धिमान व्यक्ति तो श्रृंखला को अपनी सूझ बूझ के आधार पर सुलझा लेते हैं। यदि कुछ भी अता पता न हो तो सिरे से अन्वेषण आविष्कार निश्चित ही कष्टसाध्य समयसाध्य है। अस्तु विज्ञान की महत्वपूर्ण धाराओं की जानकारी होने से हर्ज नहीं। हर्ज मात्र प्रयोग करने में हैं। शब्दबेधी बाण यदि उलट पड़े और अपनी ही आवाज को लक्ष्य मान ले तो वह प्रहार आत्मघाती ही होगा।

कुण्डलिनी विद्या को साधारण पूजा पत्री स्तर की खिलवाड़ न मानकर यही मान्यता बनाना चाहिए कि इसके लिए पात्रता अनिवार्य है प्रारम्भिक साधना की पृष्ठभूमि भी होना अभीष्ट है एवं जहाँ तक प्रयोग का सम्बन्ध है वह निष्णातों के हाथ में ही रहे।


प्राणाग्नि प्रज्ज्वलन कुण्डलिनी साधना से

कुण्डलिनी शक्ति का जागरण एवं उत्थापन कठिन है। उससे प्रवाह का अवरोध करना पड़ता है। असंयम में मौज मस्ती लगती है और प्रसन्नता भी होती है। स्वादेन्द्रियों को जितने प्रकार के व्यंजन चखाये जाँय वह मोद मानती हैं अभ्यास से आदत भी बन जाती है कि स्वादिष्टों की विविधता भी चाहिए और अति मात्रा भी। यही बात जननेंद्रियों के बारे में भी है। कामुकों का चिन्तन आकाश पाताल चूमता रहता है और क्रिया में भी अतिवाद अपनाने की ललक छाई रहती है। व्यभिचारी की मानसिक तृप्ति नहीं होती, शरीर थक जाता है, पर मन विभिन्नता और अतिवाद की रट लगाये ही रहता है। यह बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है। मन ग्यारहवीं इन्द्रिय है। उसके तीन स्वाद है। लोभ मोह अहंकार समूची काया पर आलस्य प्रमाद छाया रहता है। सामान्य जीवन के यही प्रवाह है। पशुवत् और प्रेत पिशाच जैसी दुष्प्रवृत्तियां इसी अधोगामी दिशा में गिरती रहती हैं इन्हें बाँधने की तरह रोकना असाधारण प्रयत्न है फिर समुद्री खारे जल का शुद्ध भाग भाप की तरह उड़ाकर बादल बनाना आकाश भ्रमण के लिए जाना और भी कठिन है। कुओं का पानी अथवा गहरे स्रोतों का तेल ऊपर जमीन तक लाने के लिए शक्तिशाली उपकरणों की जरूरत पड़ती है। खींचने उठाने के लिए क्रेन जैसे साधन चाहिए। फिर उन साधनों का यथावत नियोजन संचालन रख रखाव अपने आप में एक बड़ा काम है। उसे कर गुजरने के लिए सुशिक्षित इंजीनियर चाहिए। उनकी शिक्षा ही नहीं तत्परता और तन्मयता भी काम करती है।

कुण्डलिनी का संयम जागरण उत्थापन यह तीनों ही कार्य एक से एक कठिन है। इन्द्रियसंयम मनसंयम के साथ साथ विचार संयम अर्थसंयम समयसंयम आदि को अपनाना ही इस प्रकार निभाना पड़ता है जैसे घोड़े की लगाम हाथी को अंकुश ऊँट को नकेल लगाकर मनमानी करने से रोका और इच्छित प्रयोजन के लिए उनका इच्छित उपयोग बलपूर्वक किया जाता है। झरने के ऊपर से नीचे गिरने वाली प्रवृत्ति को यदि कोई बदलना चाहता है और उस पतनोन्मुख प्रवाह को नीचे से हजारों फुट ऊँचा ले जाना चाहता है तो उसके लिए शक्तिशाली बड़े आकार के पम्प की जरूरत पड़ेगी। यह कार्य साधारण प्रयास से नहीं हो सकता।

संयम निभाने व प्राणाग्नि को प्रज्वलित कर लेने वाले साधक की विकसित आत्म चेतना देव शक्तियों के रूप में साकार होकर कार्य कर सकती है। इस संबंध में कुछ उदाहरण सुविख्यात है। महात्मा जड़भरत राजर्षि भरत के ही अवतार थे सिंधु नरेश रहुगण को उन्होंने उनकी पालकी ढोते हुए ही आत्मज्ञान प्रदान कर दिया था। एक बार उन्हें एक दस्यु सरदार ने बलि के लिए पकड़ा लिया भद्रकाली की मूर्त के सामने उन्हें बंध के लिए खड़ा किया गया। वधकर्ता पुरोहित खड्ग लेकर आया। जड़ भरत निर्विकार खड़े रहे। उनके आत्मतेज से भद्रकाली मूर्ति जागृत हो गयी। उसने वधकर्ता का खड्ग छीनकर सभी दुष्टों का संहार कर दिया। आत्मसत्ता में प्रचण्ड शक्ति असीम सामर्थ्य है। काय विद्युत जब जागती है तो आग्नेयास्त्र की तरह कार्य करती एवं प्रतिकूलताओं से जूझने की सामर्थ्य रखती है।

शिव पत्नी सती ने पिता दक्ष के यह यज्ञ में अपमान अनुभव होने पर घोषणापूर्वक योगाग्नि से अपना शरीर भस्म कर दिया था ऋषि सुतीक्ष्ण ने भी भगवान राम के सामने ही उनके दर्शन से पूर्णकाम होकर शरीर योगाग्नि में होम दिया था। राज नल की पत्नी सती दमयन्ती ने वन में शील रक्षा के लिए नेत्र दृष्टि से ही व्याध को जला दिया था यह सब सोये भाण्डागार को जगाने की फल श्रुतियाँ हैं।

प्रसुप्त को जगाने में साधारणतया भी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। सोता बच्चा या मनुष्य झकझोर कर जगाया जाय तो वह उस आनन्द को छोड़कर हुए खीज अनुभव करता है और चिढ़ता खीजता है। सोते साँप को जगाना तो और भी बड़ा जोखिम मोल लेना है। परमाणु के भीतर उसकी नाभिक शक्ति सोई रहती है पर उसे छोड़ा जाय तो तोड़ा जाय तो इतना भयंकर विस्फोट होता है कि मीलों के दायरे में सर्वनाश उपस्थित हो जाता है। अणु विस्फोट की घटनाओं का जिन्हें स्मरण नहीं उन्हें नागाशाकी और हिरोशिमा की घटनाएँ स्मरण दिलाई जाती हैं, जिससे लाखों मनुष्यों का सर्वनाश हो गया था और पहाड़ पिघलकर शीशे की झील जैसा बन गये थे। स्वेच्छा पूर्वक हुई ज्वालामुखी फटने की घटनाएँ कितनी भयंकर होती हैं? इस संदर्भ में मैक्सिको कोलम्बिया आदि के विस्फोटों की चर्चा को कुछ दिन हुए हैं। हैलेना का ज्वालामुखी विस्फोट एक सप्ताह तक दिन को रात बनाये रहा था। उसकी काली धूलि आकाश के बड़े भाग पर छा गई थी। सुप्त कुण्डलिनी का जागरण ऐसा ही है। सोते कुम्भकरण के ऊपर जगाने के लिए हाथियों का झुण्ड घुमाया गया। था कुण्डलिनी प्रसंग ऐसा ही है। उसके प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहने पर ही दैनिक जीवन के सामान्य काम काज ढर्रे पर घूमते रहते हैं अभ्यस्त दिनचर्या किसी प्रकार लंगड़ी गाड़ी तक तरह लुढ़कती रहती है। जब रेल में नया शक्तिशाली इंजन जोड़ा और पूरे वेग से छोड़ा जाता है तो वह साथ में जुड़े हुए डिब्बे को घसीटता हुआ द्रुतगामी गति से दौड़ता है। कुण्डलिनी जागरण वाले साधक को भी साधना काल के आरम्भिक दिनों में ऐसे ही जोखिम का सामना करना पड़ता है। उसकी चमत्कृति साधारण मंद पवन की तरह नहीं चलती वरन् आँधी तूफान के वेग से दौड़ती है। हवा चक्रवातों और पानी के भँवरों जैसी उसकी गति होती है।

महायोग विज्ञान में ऋषि कहते हैं -

मूलाधारे आत्मशक्ति कुण्डलिनी परदेवता। शायिता भुजगाकारा सार्द्धत्रय बलयान्विता।

यावत्सा निद्रिता देहै तावज्जीवा पशुर्यथा। ज्ञानं जायते तावत् कोटियोगविधेरपि॥ तस्याँ शक्तिप्रबोधेन त्रैलोक्यं प्रति बुध्यते।

अर्थात् -आत्म शक्ति कुण्डलिनी मूलाधारचक्र में साढ़े तीन कुण्डली लगाये हुए सर्पिणी की तरह शयन करती है। जब तक वह सोती रहती है तब तक जीव पशुवत् बना रहता है। बहुत प्रयत्न करने पर भी तब तक उसे ज्ञान नहीं हो पाता। जिसकी आधार शक्ति सो रही है उसका सारा संसार ही सो रहा होता है। जब वह जागती है तो उसका भाग्य और संसार ही जाग पड़ता है।

प्राणाग्नि का प्रज्ज्वलन उद्दीपन अंत में अपरिमित उखाड़ पछाड़ करता है। जब आँधी अंधड़ के साथ चक्रवात आते हैं तो वे अपनी शक्ति सामर्थ्य से साधारण पेड़ों को उखाड़ते झोंपड़ों को उड़ाते चलते हैं। सूखे पत्ते और धूलिकण तक आसमान चूमने लगते हैं। नदी के भंवर नावों को डुबो देते है। और समुद्र के भँवर जहाजों तक की घसीट कर पाताल पहुँचा देते हैं। विशिष्ट गतिशीलता ऐसे ही अदृश्य उत्पन्न करती है। जेनरेटर फटते हैं तो समीपवर्ती इलाके की धज्जियाँ उड़ा देते हैं। आकाश से तड़ककर गिरने वाली बिजली भी जहाँ गिरती है। उसको जलाकर रख देती है।

कुण्डलिनी जागरण में भी ऐसी ही विपत्ति का सामना करना पड़ा है। अस्तु उसमें साहसिकता ही नहीं सतर्कता भी ऊँचे दर्ज की बरतनी पड़ती है। इसमें आलस्य प्रमाद काम नहीं देता। सरकस में पतली रस्सी पर चलकर दिखाने वाले नट जिस प्रकार अपना संतुलन सही रीति से सम्भाले रहते हैं उसी प्रकार कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया भी साधक से उच्चस्तरीय स्तर एवं सतर्कता की आशा करती है। असावधानी उपेक्षा बरतने पर अनिष्ट की आशंका बनी रहती है।

मक्खी मच्छर दिन भर में ढेरों अण्डे देते रहते हैं। मछलियाँ भी एक ही समय में सैकड़ों हजारों अण्डे दे गुजरती है, उन्हें उनके पालन पोषण की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। पर मनुष्य के भ्रूणाण्ड को जननी गर्भावस्था में भी सम्भालती और प्रसवकाल में भी मरणतुल्य कष्ट सहती है और फिर कई वर्ष तक उसके आहार की स्वच्छता की ऋतु फिर कई वर्ष तक उसके आहार की स्वच्छता की ऋतु प्रभाव से बचाने की व्यवस्था में लगी रहती है। अन्य क्रिया कलाप तो मक्खी मच्छर मछली द्वारा दिये जाने वाले अण्डों के समान हैं। पर कुण्डलिनी जागरण तो मनुष्य शिशु का प्रजनन और पोषण करने के समान है। उसमें सरलता नहीं कठिनता भी है और जिम्मेदार भी। यह सब भली भाँति सतर्कता चाहते हैं। भूल होने पर अनिष्ट का भय दिखाते हैं।

मादा बिच्छू के प्रजनन का तरीका विचित्र है। उसके पेट में कई अण्डे एक साथ पलते और बढ़ते हैं। जब वे कुछ बड़े हो जाते हैं, तो पेट से बाहर निकलना चाहते हैं। जननेन्द्रिय का छिद्र इतना छोटा होता है कि उसमें से उनका निकलना संभव नहीं होता। उधर बच्चों के पेट में बढ़ते जाने पर उन्हें भूख भी सताती है। वे माता का पेट खाना आरम्भ कर देते हैं और उसमें रहने वाले सारे माँस को खाकर बाहर निकलते हैं। इतने में मादा बिच्छू अपने पेट के खोखले हो जाते और फट जाने पर प्राण गवाँ बैठती है।

कुण्डलिनी के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों का प्रजनन ठीक इसी प्रकार का है जब वह जागती है तो शास्त्रकारों के अनुसार साधक का रक्त पी जाती है और माँस खा जाती है। वह अस्थिपंजरवत् रह जाता है। यह एक प्रकार का काया कल्प है, जिसमें पुराना कचरा छंटा जाता है और नये अंकुर उत्पन्न होते हैं। चतुर माली इसी रीति नीति को अपनाते हैं। वे फूल पौधों को ऊपर से अलग बगल में छाँट देते हैं इसके बाद अनेक जगहों से नई कोपलें फूटती हैं। और उन सभी पर फूलों के गुच्छे लटकते हैं। पौधे की गोलाई और साधक को स्वयं ही अपने संचित कुसंस्कारों, कषाय कल्मषों एवं अनगढ़ आदतों की छंटाई स्वयं ही करनी पड़ती है। कटते छँटते समय लगता है कि पौधा भी छोटा हो गया, उसका कलेवर घट गया। पर यह स्थिति देर तक नहीं रहती। नये कोंपल और नये फूल आना आरम्भ करते हैं। पतझड़ की श्रीहीनता चली जाती है और बसन्त में पुष्प पल्लवों से भरी हुई शोभा सम्पदा प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगती है।

कुण्डलिनी जागरण एक प्रकार की अग्नि परीक्षा है। तपाने पर सोने के साथ जो मिलावट होती है वह जलती है। खरे सोने वाले भाग को कोई आँच नहीं आती, वरन् उसकी क्रान्ति और भी अधिक निखर जाती है। अप्रामाणिकता का सन्देह टूट जाता है और खरे सोने का मूल्याँकन हर ग्राहक करता है। जागृत कुण्डलिनी वाला साधक शक्तिशाली बनता है। उसकी काया का ढाँचा तो पूर्ववत् रहता है किन्तु उस पिंजर के भीतर ऐसे विद्युत जागृत होती है जो अन्त जागरण और बाह्य वातावरण के परिवर्तन के उभयपक्षीय प्रयोजन साधती है।

अग्नि प्रज्वलित होने पर कई काम सधते हैं। उससे कीचड़, सीलन, सड़न सुखाई जा सकती है। भोजन पकाया जा सकता है। कूड़ा जलाया जा सकता है। आवे में लगाये गये मिट्टी के बर्तनों को तपाया जा सकता है। धातु शोध का काम हो सकता है। ऐसे ऐसे अनेक काम उससे हो सकते हैं कुण्डलिनी की अग्नि अन्तराल में जगाने से ठंडक लगने की कठिनाई तत्काल दूर होती है। अग्नि से भूख बुझाने वाली रसोई पकती है। गीले और बदबू वाले कपड़े सूखकर निर्मल बनते हैं। यह निजी लाभ हुए। बाहर के क्षेत्र में अनेकों व्यावसायिक प्रयोजन पूरे होते हैं। लुहार हलवाई सुनार कुम्हार अपनी-अपनी भट्टियाँ जलाते हैं और उपयोगी वस्तुएँ विनिर्मित करते हैं। कुण्डलिनी शक्ति से भौतिक क्षेत्र की अनेक कठिनाइयों का निराकरण और उपयोगी सुविधाओं का संवर्धन होता चला जाता है। अग्नि का देव पूजन में भी प्रयोग होता है। दैवी शक्तियों का सान्निध्य प्राप्त करके संपर्क बढ़ाने में भी उसका उपयोग है। इतना ही नहीं, कई बार तो गैस वैल्डिंग के सहारे दो धातु खण्डों को मजबूती के साथ जोड़ भी दिया जाता है। जहाँ यह जोड़ है वहाँ से टूटने का खतरा नहीं रहता, चाहे अन्यत्र से भले ही झुक या टूट जाय। दैवी उपासनाओं में साधारणतया भावनात्मक ज्वार भाटे आते रहते हैं। कभी भक्ति भावना का आवेश ऊँचे दर्जे तक की उष्णता ले आता है। कभी वह दूध के झाग या पानी के बुलबुले जैसा नीचे बैठ भी जाता है। किन्तु यदि उसमें कुण्डलिनी शक्ति का समावेश हुआ तो स्थिरता यथावत् बनी रहती है।

संचित कुसंस्कार भी उभरे रहते हैं। दूब गर्मी के दिनों में सूख जाती है और वर्षा में फिर हरी भरी हो जाती है। इसी प्रकार मनुष्य के कुसंस्कार भी परिस्थितिवश सूख जाने पर भी सजीव हो उठते हैं। विश्वामित्र कठोर तपस्वी व ऋषि थे पर मेनका का आग्रह वे न टाल सके। उन्होंने गृहस्थी बनायी और सन्तानोत्पादन किया। किन्तु जिनके संस्कार जड़ मूल से ही जल जाँय उनके सामने ऐसी विपत्ति आने की कोई संभावना नहीं रहती। शुकदेव की स्थिति अपने पिता वेद व्यास से सर्वथा भिन्न थी। वेदव्यास ने आग्रह मानकर अपनी भावजों से सन्तानोत्पादन की स्वीकृति दे दी पर शुकदेव जन्मते ही वन में तप करने को चले गये। पिता समेत सभी इसके विरुद्ध थे और उन्हें रोकने मनाने का प्रयत्न कर रहे थे। पर उनने किसी का भी कहना न माना और अपने व्रत पर दृढ़ रहे। उनकी परीक्षा के लिए इन्द्र ने रम्भा अप्सरा को भेजा, पर उनने तनिक से शब्दों में उसे निरुत्तर करके वापस भेज दिया। इसे कहते हैं कुसंस्कारों का जल जाना। पेड़ का तना काट दिया जाय और जड़ें हरी बनी रहे तो जड़ों में से अंकुर फूटने लगते हैं। किन्तु यदि जड़ को खोदकर फेंक दिया जाय या जला दिया जाय तो उसके फिर को खोदकर फेंक दिया जाय या जल दिया जाय तो उसके फिर से उगने की संभावना नहीं रहती। कुण्डलिनी शक्ति संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण मात्र तीनों ही प्रकार के कर्मों को जलाकर भस्मात कर देती है। इसमें तपा या पका हुआ साधक पक्की ईंट जैसा मजबूत हो जाता है।

आयुर्वेद के ज्ञाता रस भस्में बनाते हैं। उन्हें शतपुटी सहस्रपुटी, गजपुटी अग्नि संस्कारों से बताया जाता है। उन्हें संजीवनी की उपमा दी जाती है। यह अग्नि संस्कार ही हैं। कुण्डलिनी को योगाग्नि कहा गया है। यह एक प्रकार से प्राणाग्नि प्रज्ज्वलन की यजन प्रक्रिया है। उसमें पकाया हुआ साधक ऐसे ही बन जाता है जैसे सामान्य धातुओं से रस, भस्म बनकर संजीवन मूरि का काम देती है। कुण्डलिनी की अग्नि में तपा हुआ व्यक्ति भी इसी प्रकार असामान्य हो जाता है और उसकी क्षमताएँ असाधारण रूप से विकसित होती हुई देखी जा सकती है।

भाप बिखरी हुई रहे तो उसका कोई महत्व नहीं, ऐसे ही हवा में उड़ जाती है। किन्तु यदि उसे एक घेरे में बन्द करके किसी स्थान विशेष तक सीमित रखा जाय तो उसकी शक्ति रेलगाड़ी के इंजन दौड़ने लगते हैं। प्रेशर कुकर मिनटों में खाना पकाने लगते हैं। इसी प्रकार समस्त शरीर में सोई और बिखरी हुई ऊर्जा जब कुण्डलिनी जागरण प्रयोगों द्वारा एकत्रित कर ली जाती है तो आत्मिक ऋद्धियाँ और भौतिक सिद्धियाँ अनायास ही सशक्त हो उठती हैं और उनके द्वारा अनेकों उपयोगी प्रयोजन सिद्ध किये जा सकते हैं।

मनुष्य शरीर में सशक्त विद्युत भंडार भरा पड़ा है पर वह सब है बिखरी हुई स्थिति में। इसलिए उसका कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं होती। पर जब उसे कुण्डलिनी जागरण से सारे शरीर में से समेटकर मूलाधार चक्र में केंद्रित कर लिया जाता है तो उसका परिणाम भी सुविस्तृत ऊर्जा के एकीकरण के रूप में होता है और इस केन्द्रीभूत विद्युत का ऐसा उपयोग किया जा सकता है जिसका प्रतिफल आश्चर्यचकित करने वाला हो।


करुणा का अंकुर (Kahani)

एक तापसी वृद्धा जंगल में रहती थी। एक भिक्षु भी उधर आ निकला। वृद्धा ने उसके लिए समीप ही एक झोंपड़ी बनवा दी और खाने का प्रबंध अपने जिम्मे ले लिया। एक रात रास्ता भटकी लकड़हारी रास्ता भूल कर अंधेरे में भिक्षु की कुटिया पर जा पहुँची और और अनुग्रह की याचना करने लगी।

सन्त ने इसे प्रणय प्रस्ताव समझा ओर उसे आश्रय या भोजन देने से इनकार करते हुए भगा दिया।

प्रौढ़ा पेड़ के नीचे बैठी सुबक रही थी। वृद्धा के कानों तक आवाज पहुँची। वह निकलकर बाहर आई और उसे अपने साथ ले ली गई। आश्रय और भोजन दिया। भोर होते उसे रास्ता बता दिया।

भिक्षु की निष्ठुरता वह सुन चुकी थी। उसने अपनी बनवाई झोंपड़ी तोड़ डाली। भोजन की सहायता से इनकार कर दिया और कहा तुमने यहाँ 24 वर्ष रहकर केवल वासना जीती। करुणा का अंकुर तक न उगा सके। धिक्कार है तुम्हारे भिक्षु होने पर


आत्म विज्ञान की साधना का गुह्य तत्व ज्ञान

प्याज के छिलके के भीतर दूसरी छिलका निकला है। दूसरे के भीतर तीसरा। इसी प्रकार केले के तने को चीरा जाय तो उसमें एक के भीतर दूसरी परत निकलती जाती है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु है पर वह अकेला दीखते हुए भी अकेला नहीं है। उसके भीतर मध्यवर्ती नाभिक होता है उसके इर्द गिर्द इलेक्ट्रॉन प्रोटोन न्यूट्रोन आदि छोटी इकाइयाँ परिभ्रमण करती रहती है।

सौर मण्डल एक घेरा है। पर उनकी परिधि के अंतर्गत नवग्रह और 43 उपग्रह अपनी-अपनी धुरी एवं कक्षा में परिभ्रमण करते हैं। परमाणु भी एक सौर मण्डल है। उसके भीतर भी सौर मण्डल की प्रक्रिया काम करती है। मिट्टी का एक ढेला तोड़ा जाय तो उसमें से थोड़ा-सा रेत बिखर जायेगा पर यदि परमाणु के मध्यवर्ती नाभिक को तोड़ा जाय तो उसमें में एक बड़े पर्वत को गला देने वाली ऊर्जा निकलती है।

स्पष्ट है कि स्थूल को जितना सूक्ष्म दिया जाता है उतना ही वह अधिक शक्तिशाली होता है। शरीर में अरबों खरबों जीवन कोशिकाएँ है, पर उनके अन्तराल में जो जीन्स छिपे रहते है। उनमें से प्रत्येक में एक प्राणी की प्रोटोटाइप निहित हैं उनमें से प्रत्येक हर मनुष्य की काया में समष्टिगत ब्रह्माण्ड की तरह अरबों खरबों प्राणी निवास करते हैं। इनमें से एक को संभोग क्रिया के अवसर पर नारी डिम्ब में प्रवेश करने का अवसर मिल जाता है। बस इतने भर से एक भ्रूण बनता है और उसका पृथक सत्ता पृथक काया बननी आरम्भ हो जाता है। नौ महीने में भ्रूण परिपक्व हो जाता है और माता के योनिमार्ग में बाहर निकल कर संसार में विचरण करना आरम्भ कर देता है।

इस नवजात शिशु में अपने माता पिता नाना नानी, दादा दादी आदि कितनी ही पीढ़ियों की शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं की समावेश होता है। यह विशेषताएँ विभूतियों के रूप में इतनी सूक्ष्म होती हैं कि जीवन प्राण जीन्स का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विश्लेषण करने पर भी वस्तुस्थिति का पता नहीं चलता उनकी स्थिति तब प्रकट होती है, जब शिशु विकसित होते होते प्रौढ़ बन जाता है और अपनी विशेषताओं का स्पष्ट परिचय देना आरम्भ कर देता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि कच्ची स्थिति में उन विशेषताओं का भी पता नहीं चलता जो प्रौढ़ होने पर प्रकट होती हैं। शिशु का विश्लेषण करने पर उस परम्परागत प्रकृति का आभास नहीं मिलता। मात्र चेहरे पर त्वचा पर अभिभावकों का कुछ असर दृष्टिगोचर होता है। सूक्ष्मता चिरकाल तक अपरिपक्व स्थिति में ही बनी रहती है और समयानुसार परिपक्व होने पर अपनी स्थिति एवं सत्ता का परिचय देती है।

सूक्ष्म के भीतर सूक्ष्म का इतना बड़ा उपक्रम है कि प्याज के छिलके और केले के तने की उपमा उसके आगे वस्तुतः उपहासास्पद-सी ही प्रतीत होती है।

बीजों के ढेर का इकट्ठा कर लिया जाय तो उसके रंग रूप वजन आदि में थोड़ा बहुत ही अन्तर दिखाई पड़ता है पर जब उन्हें बोया जाता है तो अन्तर अंकुरों की आकृति से आरम्भ होकर पत्तों में, पत्तों के बाद तनों में, तनों के बाद टहनी में इसके उपरांत फूल फल की आकृति में प्रत्यक्ष होता चला जाता है। बड़े पेड़ों का अन्तर स्पष्ट दीखने लगता है। उनके फूलों की आकृति सुगंध तथा फलों के स्वाद गुण में इतना अधिक अन्तर हो जाता है कि उनका वर्गीकरण सहज ही पृथक पृथक किया जा सकता है। यह अन्तर असाधारण होता है। उनकी पृथकता बीज के अन्तराल में छिपी होती है। जिसे आरम्भिक स्थिति में देखा समझा नहीं जा सकता।

मानव शरीर की कोशाओं की सामान्य आकृति एक जैसी होती है किन्तु उसके भीतर इतने रहस्य भरे होते हैं जिनकी थोड़ी-सी जानकारी भर मिलने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। भौतिक विज्ञान इस पर्यवेक्षण का स्थूल भाग ही खोजने में लगे हैं। शरीर में कोशाएँ कितनी भिन्न भिन्न गतिविधियाँ अपनाती हैं और अपने-अपने पृथक पृथक कार्य करने में किस प्रकार संलग्न रहती है। इसका कुछ भाग शरीर शास्त्रीविज्ञानी वंशानुक्रम जान पाए हैं। उसी आधार पर वे चिकित्सा एवं शल्यक्रिया करते हैं, मनुष्य की जीवन शक्ति की क्षमता तथा संभावनाओं का मूल्याँकन करते हैं।

किन्तु विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि जीवन घटक मात्र पदार्थ से ही नहीं बने होते हैं। उनमें रसायनों भर का सम्मिश्रण नहीं है। उनमें एक महत्वपूर्ण पक्ष चेतना का भी है, जिसे जैव विद्युत कहते हैं। अध्यात्म की भाषा में उसे प्राण कहा जाता है। यह प्राण यों है तो एक पर विभिन्न अवयवों में पहुँचकर वह स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढल जाता है। मस्तिष्क क्षेत्र में वह आस्था, आकाँक्षा आदत विचारणा आदि के रूप में काम करता है। मन, बुद्धि चित आदि के रूप में उसकी व्यवस्था, विवेचना की जाती है। यही तत्व ज्ञानेन्द्रियों में अपना प्रभाव रूप, रस, गंध स्पर्श, शब्द के रूप में ग्रहण करता है। और प्रजनन का ढाँचा खड़ा करता है। हर माँसपेशी का स्नायु तन्तु का अपने अपने ढंग का क्रिया कलाप और स्वभाव है शक्ति और ज्ञान दोनों ही इसमें गुँथे हुए हैं।

काया के जड़ व चेतन को जानने, समझने के बाद निष्कर्ष यही निकलता है कि समूचे वृक्ष की सत्ता जिस प्रकार बीज में समायी रहती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की कायपिंड की हम वर्तमान कालीन स्थिति ही देख पाते हैं पर वस्तुतः उसके साथ भूत और भविष्य भी जुड़ा होता है। काया एक दर्पण है, यदि उसकी गहन सूक्ष्मता तक उतरा जा सकें तो यह जानकर व देखकर आश्चर्य हो सकता है कि यह विश्व व्यापी पदार्थ सत्ता और चेतन सत्ता के साथ हमारा काय पिण्ड कहाँ और किस रूप में किस सीमा तक जुड़ा हुआ है?

वस्तुतः मनुष्य के छोटे शरीर में इतना कुछ भरा पड़ा है जिसके सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि वह शक्तियों के संयुक्त परिकर की तुलना में अकेला ही अधिक शक्तिशाली है। किन्तु कठिनाई एक ही है कि यह शक्तिभंडार प्रसुप्त स्थिति में है। इन्हें जानने के लिए तप साधना स्तर के प्रयत्न करने पड़ते हैं, यदि उन्हें न किया जाय तो वे सदा सर्वदा प्रसुप्त ही पड़े रहते हैं और नर पशु से अधिक बड़े स्तर का और कुछ कर सकना उसके लिए सम्भव नहीं होता। इसलिए अध्यात्म क्षेत्र में प्रवीण पारंगत बनने के लिए हर किसी को साधनारत होने की आवश्यकता पड़ती है। कायविज्ञान का सूक्ष्म पर्यवेक्षण करने पर पाते हैं कि यह सभी विभूतियाँ मनुष्य के भीतर ही है। उनकी दिव्य क्षमताओं को कार्यान्वित कर सिद्धियों को हस्तगत भी किया जा सकता है। सूक्ष्मकाया में अवस्थित षट्चक्र प्रसिद्ध है। (1)मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपूर (4) अनाहत (5) विशुद्धि (6) आज्ञाचक्र। यह कार्य कलेवर के अंतर्गत ही हैं। इस गणना में मस्तिष्क को छोड़ दिया गया है। उसके मध्य में सहस्रार कमल है। इसे भी जोड़ देने से सात चक्र हो जाते हैं और सप्त लोकों में जो वैभव है सप्त तीर्थों में जो विभूतिवान पुण्य प्रयोजन हैं उन सबका परिचय मिलने लगता है। आवश्यक केवल विकास जागरण की है। शुक्राणु का नारी गर्भ में जब पोषण होता है, तब उसका शिशु रूप में विकास और जन्म होता है। बीज कोठे में बन्द पड़ा रहने पर विकसित नहीं होता, उसे खाद पानी की समुचित सुविधा उपलब्ध कराने पर ही यह सम्भव होता है कि पौधा पेड़ बने और फूलों से लदा हुआ विशालकाय शोभायमान दृष्टिगोचर हो।

मेरुदण्ड को राजमार्ग महामार्ग कहते हैं। इसे धरती से स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा जाता है। इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं। आत्म और परमात्मा के मध्य सप्तलोकों को विराम स्थल माना गया है। लम्बी मंजिलें पूरा करने के लिए लगातार ही नहीं चला जाता बीच बीच में विराम भी लेने होते हैं। रेलगाड़ी गन्तव्य स्थान तक बीच के स्टेशनों पर रुकती कोयला, पानी लेती चलती है। काय विद्युत के इन विराम स्थलों को ही चक्र कहा गया है। चक्रों की व्याख्या दो रूपों में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है। अभिमन्यु उसमें फँस गया था। वेधन कला की समुचित अनुदान के रूप में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है। अभिमन्यु उसमें फंस गया था वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था। चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं। इस अलंकारिक प्रसंग को आत्म का सात चक्रों में फँसा होना कह सकते हैं भौतिक आकर्षणों की भ्रान्तियों की विकृतियों की चहारदीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है। इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है। भागवत महात्म्य में धुन्धकाली प्रेत का बाँस की सात गांठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है। इसे चक्रवेधन का संकेत समझा जा सकता है।

साधना में अपनी निज की कोई विशेष शक्ति नहीं है। उसकी प्रमुखता एक ही है कि वह सोई हुई शक्ति को जागती है। जिसमें निज की क्षमता नहीं है या न्यून है उसके लिए साधारण साधना कुछ विशेष कारगर नहीं होती। सरकस के पशु शिक्षक उन्हीं को भरती करते हैं। जिनमें निजी चतुरता या सूझबूझ होती है। साधनाएँ सभी कलात्मक हैं। वे भावना की पृष्ठभूमि पर उगती और फलती फूलती है। इसलिए दृष्टिकोण का भाव संस्थान का संयम परिष्कार करना होता है। साथ ही चिन्तन और चरित्र को भी परिमार्जित करना होता है। यह प्रारम्भिक शर्त है जिसे पूरा किया जाना चाहिए।

किस साधना को कितने समय करना चाहिए? इसका सब के लिए एक जैसा निर्धारण नहीं हो सकता यह मनोभूमि के ऊपर निर्भर है। जिसके व्यक्तित्व में आत्मवादी गुणों का पहले से ही समावेश हो चुका है वह थोड़े ही समय में थोड़े ही श्रम में उत्साहवर्धक लाभ प्राप्त कर सकता है। किन्तु जिन सत्प्रवृत्तियों आधार पर यह उपार्जन किया जाता है उन्हीं में वह खर्च भी होता रहता है। गिरों को उठाने में दुखों को घटाने में डूबतों को उबारने में चढ़ते को चढ़ाने में इस शक्ति का समापन होता रहता है। तप के बदले पुण्य बढ़ता रहता है। इस प्रकार संतुलन बना रहता है और योगी यती साम्य सात्विक देवोपम जीवन जीते रहते हैं उनका दृष्टिकोण स्वर्गोपम और आचरण जीवन मुक्त जैसा रहता है। आत्म गौरव के रूप में आत्म साक्षात्कार होता है और विश्व वसुधा के कण-कण में समाये हुए परमेश्वर का दर्शन विवेक चक्षुओं से निरन्तर होता रहता है। वही वह स्थिति है जिसमें पुरुष पुरुषोत्तम नर नारायण कहलाता है।

किन्तु यदि चिन्तन और चरित्र पर आश्रित व्यक्तित्व उज्ज्वल न हो उसमें वीभत्स स्तर की निकृष्टता भरी हो तो रहस्यमयी शक्तियों के उपार्जन कर लेने पर मनुष्य मदोन्मत्त हो जाता है और ऐसे कुकृत्य करने लगता है जिससे उसकी गणना राक्षस, असुर दैत्य वर्ग होती है। धन, बल, वैभव पराक्रम आदि शक्तियों का यदि सदुपयोग न हो तो वे संचित नहीं रह सकती, कुमार्ग में चल पड़ती है। अंगूर सड़ने पर मदिरा बन सकता है। इसी प्रकार रहस्यमयी आन्तरिक शक्तियों का विकास हो तो किन्तु सत्प्रयोजनों में न लग सके तो फिर दूसरा विकल्प दुरुपयोग ही रह जाता है। अध्यात्म का योगपरक दक्षिणमार्गी। उपयोग न होगा तो फिर वह दुष्टता पर उतारू होगा। कुकर्मी ताँत्रिक अघोरी, कापालिक भी असुरता पर उतर आते हैं और मारण मोहन वशीकरण, उच्चाटन जैसे घोर कर्म करते हैं। असुरों को प्रायः आक्रमण अपहरण करते और आतंक मचाते ही देखा जाता है। वृत्तासुर हिरण्यकश्यप महिषासुर कंस रावण आदि यही करते रहे। उनके परिवार के खरदूषण कुम्भकरण मेघनाद हिरण्याक्ष, कंस, जरासंध, रक्तबीज आदि ने यही किया असुरों ने देवताओं को सताया। उनका वैभव लूटा ओर ऋषि रक्त को निचोड़ा था। वे प्रजा का मात्र त्रास ही देते रहते थे और तनिक से स्वार्थ के लिए बड़े से बड़ा अनर्थ कर गुजरते थे।

असुरों के दो वर्ग होते हैं, एक उद्धत आक्रमी आतंकवादी। दूसरे मायावी छली, प्रपंच रचने वाले और षडयंत्र गढ़ने वाले आक्रमणकारी अपने पराक्रम की डींग हाँकते हैं और मायावी अपने छल कौशल को मयाचार को बढ़ चढ़कर बखानते हैं। आक्रमणकारी बदनाम हो जाते हैं किन्तु मायावी पर्दे के पीछे बैठकर अपनी घात चलाते हैं। कई बार तो वे बाहर से सन्त और हितैषी जैसा आवरण ओढ़ते हैं। उदाहरण के लिए कालनेमि इस मायावी वर्ग का था। रावण का कुटुम्बी असुर होते हुए भी वह आक्रमण नहीं करता था, पर दूसरों की बुद्धि पर सवार होकर उन्हें ऐसे कुमार्ग पर घसीट ले जाता था जहाँ से वे उभर तो सकते नहीं थे, दलदल में फँसकर रोते कलपते प्राण त्यागते थे।

अध्यात्म शक्तियों का उपार्जन तो किया जाय पर उसको सत्प्रयोजन में न लगाकर विलास वैभव चातुर्य छल पाखण्ड में लगाया जाय तो स्थिति कालनेमि जैसी बन जाती है। उसमें आक्रमण के साथ जुड़ा हुआ प्रत्युत्तर का भय भी नहीं रहता है। छद्म की आड़ ले लेने पर प्रत्यक्ष बदनामी से भी कुछ समय तक बचाव हो जाता है। इसलिए आधुनिक असुरता कुण्डलिनी क्षेत्र में भी कालनेमि मार्को लगाकर बाजार में सस्ते भावों मिलती और टोकरे भर भर कर मिनटों में बिकती है।

असली आत्मशक्ति सम्पादन तो श्रेय मार्ग अपनाते पर ही बन पड़ता है। उसी में अपना तथा अन्य सबका भला भी है। आत्म विज्ञान का मूलभूत दर्शन यही है कि साधना का अवलम्बन लिया जाय पर प्राप्त सिद्धियों विभूतियों को परहित हेतु ही नियोजित किया जाय।

मोटेतौर पर समझा यह जाता है कि परिस्थितियाँ भावना स्थिति को प्रभावित करती है। संसार में जो घटित हो रहा है, उसी से हम प्रभावित होते हैं। अपर आत्म विज्ञान की मान्यता इससे बहुत गहराई तक चली गई है और यहाँ तक पहुँची है कि वैयक्तिक चेतना के तन्तु समीपवर्ती और दूरवर्ती परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं। मनुष्य को अपना भाग्य विधाता कहा जाता है, पर तथ्य यह है कि वह विकसित स्थिति में ब्रह्माण्ड का सूत्र संचालक भी है इतना तो इस संदर्भ में निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि अपने भीतरी और बाहरी क्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाले परिकर को मन स्थिति के अनुरूप निश्चित रूप से ढाल सकते हैं विकसित स्थिति के अनुरूप निश्चित रूप में ढाल सकते हैं विकसित स्थिति में वह विश्व व्यापी गतिविधियों को भी मोड़ मरोड़ सकता है। इसी को अतीन्द्रिय क्षमता कहा गया है। यही अतिमानव या अति मानस की स्थिति है जो कि साधारणतया अविज्ञात एवं प्रसुप्त स्थिति में ही बनी रहती है। इसे जागृत कैसे किया जाय? बलिष्ठ कैसे बनाया जाय? और विभिन्न प्रयोजनों के लिए उसे काम में कैसे लाया जाय? इसी का नाम आत्मविज्ञान है। इसी को ब्रह्म विद्या कहते हैं। कुण्डलिनी साधना इसी को जीवन्त जागृत स्तर तक पहुँचाने के लिए की जाती है।


पाखंड अधिक दिनों नहीं चलता (Kahani)

लक्षद्वीप के समीप वट उद्यान में चार तपस्वी रहते थे। वे भिक्षा के लिए जल पार करके जाया करते थे साथ ही गृहस्थों को उपदेश भी करते थे। इन साधुओं में एक बहुत चतुर था। उसने पैरों पर रसायन लेप करके पानी पर चलने की कला सीख ली थी। तीन साधु तो तैर कर पार होते पर वह खड़ा होकर जल पर चलता। दर्शक उसे सिद्ध पुरुष मानने लगे, उसी के प्रवचन सुनते और उसी को अधिक सम्मानपूर्वक बहुमूल्य भिक्षा देते।

धीरे धीरे भेद खुला चतुर दर्शकों ने एक दिन चारों साधुओं के गरम जल से पैर धोने का आग्रह किया। सिद्ध पुरुष बनने वाले के पैरों का लेप छूट गया। तैरना वह जानता नहीं था। लज्जा से उसे अपनी मंडली और वह समुदाय छोड़कर अन्यत्र भागना पड़ा।

पाखंड अधिक दिनों नहीं चलता।


योग का रहस्य ओर सिद्धि परिकर

आत्म को परमात्मा के साथ जोड़ने का नाम योग है। संख्याओं को आपस में जोड़ देने से उनका बल कई गुना कहीं अधिक हो जाता है। मनुष्य एक वानर जाति का पशु है। आदिम काल में वह वैसा ही था। न्यूगिनी में अभी भी कुछ आदिवासी ऐसे पाये गये हैं जो आदिमकालीन सभ्यता अपनाये हुए हैं। वे नर नारी नंगे रहते हैं। आहार के नाम पर जो जीव जन्तु और वनस्पति मिल जाती है, उसी से गुजारा करते हैं। सभ्य कहे जाने वाले संपर्क से दूर भागते हैं फलतः उनकी भाषा तक का भी विकास नहीं हो सका है। कुछ ही शब्द बोल पाते हैं कि संकेतों के सहारे पारस्परिक व्यवहार चलाते हैं। वैसे शारीरिक दृष्टि से वे अधिक बलवान और सर्दी गर्मी को अधिक मात्रा में सहन कर लेते हैं। मनुष्य भी एक प्रकार से ऐसे ही आदिम सभ्यता के बीच निर्वाह करता है। उसे पटे प्रजनन की लोभ मोह की गई गुजरी प्रवृत्तियों का ही अभ्यास होता है। आदर्शों को अपनाने मानवी गरिमा के अनुरूप आचरण करने में उसे अनख लगता है।

उत्कृष्ट और आदर्शवादिता की विभूतियाँ परमात्म सत्ता के साथ ही जुड़ी हुई है। मनुष्य अपने आप को उस श्रद्धा समुच्चय के साथ जोड़ लेता है तो आदिम स्थिति से ऊँचा उठकर सीय सुसंस्कारी बनने की स्थिति तक जा पहुँचता है। पति पत्नी की सघनता और सरसता मिलने से जिस प्रकार घर आँगन में ही स्वर्ग उग पड़ता है उसी प्रकार आत्म और परमात्मा का योग भी मनुष्य का स्तर ऊँचा उठकर देवोपम बना देता है। इसलिए योग साधना की महिमा गाई जाती है और आन्तरिक उत्कर्ष का महत्व समझने वाले की गति उस दिशा में बढ़ती है।

योग को दो भागों में विभक्त किया जाता है। एक बहिरंग योग दूसरा अन्तरंग योग। बहिरंग वह जिसमें शरीर संचालन के अनेक उपचार अपनाने पड़ते हैं। आसन प्राणायाम बंध मुद्रा जप हवन तीर्थ पूजन कीर्तन आदि की गणना बहिरंग योग में होती है। इसका एक नाम क्रियायोग भी है। इसी विद्या की एक शाखा हठयोग कहलाती है। इसमें क्रिया कृत्यों पर जोर दिया जाता है उनका विधान और अनुशासन ठीक प्रकार से अपनाये रहने पर जोर दिया जाता है। उसके परिणाम सुनियोजन के अनुरूप होते हैं विशेषतया स्वास्थ्य संवर्धन प्रतिभा का निखार बुद्धि कौशल आदि शरीर से सम्बन्धित अवयवों पर क्रियायोग का प्रभाव पड़ता है। मन पर भी यत्किंचित् अंकुश लगता है।

दूसरा पक्ष है अंतरंगयोग का। इसमें मन और प्राण के बिखराव को संयमशील एकनिष्ठ बनाना पड़ता है। कुसंस्कारों का परिमार्जन करना पड़ता है। और चिन्तन को उत्कृष्टता के साथ जोड़ना पड़ता है। ध्यान के अनेक पक्ष है। वे सभी अन्तरंगयोग के अंतर्गत आते हैं।

ध्यान में आमतौर से किसी कल्पित छवि के प्रति भक्ति भाव प्रकट किया जाता है और उसे निकटतम होने का अनुभव किया जाता है। इसके अतिरिक्त नादयोग सोऽहम् साधना में ध्वनि का खेचरी मुद्रा में सोमरस पान के रसास्वादन का अनुभव किया जाता है। चक्रवेधन कुण्डलिनी उतान, ग्रन्थि वेध जैसे ध्यान प्रधान अभ्यास भी अन्तरंग योग में ही गिने जाते हैं क्योंकि उन में चिन्तन को ही दिशा देनी पड़ती है। प्रत्यक्ष में क्रियायोग जैसी शारीरिक हलचलों की आवश्यकता नहीं पड़ती।

क्रियायोग का दायरा शरीर सीमा में काम करने वाली ऊर्जा अथवा सामान्य अतीन्द्रिय क्षमताओं तक ही सीमित है। इन्द्रियाँ स्थूल है। उनकी गणना शारीरिक अवयवों में होती है। उनकी शक्ति सामर्थ्य भी स्थूल ही रहती है। इन्द्रिय क्षमताओं का सूक्ष्मीकरण मात्र इतना ही करता है कि बिना उपकरणों के माध्यम से मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु अन्य किसी इन्द्रिय के सहारे अपना काम चलाऊ रास्ता निकाल लेते हैं। जैसे आँख के न हरने पर उँगलियों से छूकर अक्षरों का एवं वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है। परामनोविज्ञान के अंतर्गत दूर श्रवण, दूर दर्शन, विचार सम्प्रेषण, आदि को ही अतीन्द्रिय क्षमता मान लिया जाता हैं यह सब मस्तिष्क का ही खेल है। अन्तर मात्र इतना ही पड़ता है कि इसमें प्रत्यक्ष माध्यमों की अपेक्षा ताप शब्द प्रकाश की ध्वनि तरंगों को पहचाने और पकड़ने की क्षमता हस्तगत हो जाती है। इसे भी भौतिक लाभ या साफल्य कहा जा सकता है। इन विशेषताओं को आध्यात्मिक मान लिया जाता है पर यह वस्तुतः वैसी है नहीं। परमात्म सत्ता के क्रिया−कलाप बड़े अलौकिक एवं रहस्यमय है। उन्हें आज की भौतिक आइन्स्टीन का विचार है कि “पार्टिकल फिजिक्स” वास्तव में लंगड़ी लूली है। वह विराट तत्व के रहस्यों का बोध नहीं कर सकती। समस्त विश्व ब्रह्माण्ड के ऊपर एक सुलझी हुई विराट चेतना है इस चेतना को परब्रह्म ईश्वर सृष्टिकर्ता या विश्व संचालक कह सकते हैं। ऋद्धि सिद्धियों का सारा परिकर इसी समष्टिगत व्यवस्था के अद्भुत क्रिया–कलापों की एक झाँकी मात्र है।

भौतिकीविद् एवं दार्शनिक सर जेम्स जीन्स का भी यही कथन है कि भौतिक जगत की समस्त घटनाएँ सामंजस्य पूर्ण है। जिन्हें हम संयोग कहते हैं उनमें मूल यही है। इनके रचने वाली अवश्य एक महान् गणितज्ञ अति सामर्थ्यवान एवं अदृश्य सत्ता है। उसे परमेश्वर कहना चाहिए एवं जगत् याँत्रिक जड़ नहीं हो कसता क्योंकि इसकी हर वस्तु हर प्राणी हर जीव जंतु में चेतना कायम है और निरंतर क्रियाशील है। इसी समष्टिगत सत्ता के साथ व्यष्टिसत्ता का जब सुनियोजित ताल में बैठ जाता है तो वह योग कहलाने लगता है।

महाभारत के अश्वमेध पर्व में वर्णन आता है कि दिव्य दृष्टि सम्पन्न सिद्ध पुरुष अपने दिव्य चक्षुओं से जीवों शरीर त्यागना उनका पुनः धारण करना तथा दूसरी योनि में प्रवेश करना आदि भली भाँति देख व जान सकते हैं। आत्मबल संपन्न लोग सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं का मनुष्य के साथ सद्भाव एवं सहयोग स्थापित कर सकते हैं। परोक्ष जगत से सीधा संपर्क बिठा लेना त्रिकाल दर्शिता की सिद्धि का ही परिचायक है।

यह समय को बाँध लेने को सिद्धि ही है जो जागृत कुण्डलिनी की फलश्रुति के रूप में दिखाई देती है। ऐसे व्यक्ति सामान्यजनों की तरह जीवन मृत्यु के बंधन से भी मुक्त रहते हैं। संत ज्ञानेश्वर के समकालीन योगी चाँगदेव की आयु योग साधना के बल से 400 वर्ष से अधिक हो चुकी थी। बाद में उन्होंने ज्ञानेश्वर जी के परामर्श पर समाधि ली। हमारे सूक्ष्म शरीर धारी गुरुदेव जो दुर्गम हिमालय में रहते हैं आयु के बंधनों से परे हैं।

महात्मा तैलंग स्वामी ने 280 वर्ष की आयु में वाराणसी में पौष शुक्ल एकादशी संवत् 1944 को शरीर छोड़ा था। उनका जन्म संवत् 1664 वि. में एक ब्राह्मण जमींदार के यहाँ हुआ था। उन्होंने पुष्कर क्षेत्र में भगीरथ स्वामी से संन्यास दीक्षा ली थी। गुरु का दिया नाम गणपति स्वामी था। किन्तु प्रख्यात नाम तैलंग स्वामी ही है। वे महान साधक योगी लोकसेवी थे। उनके जीवन की अनेक चमत्कारिक घटनाएँ प्रसिद्ध हैं। विवेकानन्द जी ने भी उनका उल्लेख किया है और ऋषि दयानन्द के समय में भी वे थे। वे योग साधना की चरम अवस्था को प्राप्त कर अगणित विभूतियों के स्वामी बने एक बार की बात है। महात्मा तैलंग स्वामी नेपाल के जंगलों में तप कर रहे थे। नेपाल नरेश सेनापति सहित शिकार को निकले। उनके प्रहार से बचकर एक व्याघ्र भागा। सेनापति ने पीछा किया। व्याघ्र तैलंग स्वामी के आश्रम में घुस गया, स्वामी जी के चरणों पर सर रखकर बैठ गया। स्वामी जी उसे सहलाने लगे। सेनापति व नरेश पीछा करते पहुँचे तो दृश्य देखकर हतप्रभ हो गये।

ये प्रसंग मात्र कौतूहल जानकारी भर तक ही सीमित नहीं है, वरन् तपश्चर्या द्वारा अर्जित सामर्थ्य द्वारा इतना कुछ हस्तगत हो सकता है। कि अदृश्य में चल रहे प्रवाहों की दिशा को मोड़ सकते भवितव्य को टाल सके और जो होने वाला नहीं है उसके बन पड़ने का माध्यम वे बन सकें। शाप वरदान देने की शक्तियाँ देवताओं के हाथ में मानी जाती है। पर ऊँचे स्तर तक पहुँचा हुआ योगी तपस्वी या सिद्ध पुरुष भी वैसा कर सकता है। जिस बिजली के तार में करेन्ट बर रहा है। उसके साथ अन्य तार जोड़ देने पर प्रवाह उसमें भी दौड़ने लगता है। परब्रह्म की देव सत्ताओं में से जो जिसके साथ जुड़ जाता है उसे उसकी समतुल्यता प्राप्त हो जाती है और वह उस क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है जिसमें परब्रह्म की देव शक्तियों का निवास है। यह प्रदेश मात्र सैलानियों जैसा नहीं वरन् भागीदारी जैसा होता है दुकान पर बैठने वाले कई भागीदारों में से हर कोई खरीद फरोख्त करता रहता है। भागीदारी में इतना अधिकार तो मिल ही जाता है, किन्तु जिनकी स्थिति घनिष्ठतापूर्वक जुड़ जाने तक नहीं पहुँची है जो मात्र भक्त उपासक या सेवक बने हुए हैं, उन्हें अपना मनोरथ प्रकट कर देने तक का ही अधिकार होता है। उसकी पूर्ति हो सके या नहीं यह मालिक की मर्जी पर निर्भर है।

बहिरंगयोग, क्रियायोग का सम्बन्ध मात्र दृश्य जगत से है। वस्तुओं को वह उगा हटा या बढ़ा घटा सकता है। गुप्त या प्रकट कर देने तक भी उसकी गति हो सकती है। किन्तु किसी के अंतःकरण में गहराई तक प्रवेश कर सकने की क्षमता उसमें नहीं होता। निकृष्टता की राह पर धकेल देना तो किसी के लिए भी संभव है। ऐसा तो चोर व्यभिचारी जुआरी व्यसनी भी कर देते हैं, किन्तु ऊँचा उठा देना बन्धनों से मुक्ति दिला देना सर्वथा दूसरी बात है। शब्दवेधी बाण ही लक्ष्य को वेधते हैं। ढेला फेंकने पर तो वह किसी भी दिशा में और कितनी ही दूरी तक जा सकता है। उस पर नियंत्रण नहीं होता। नियन्त्रित माप तोल का नहीं अनुमान लगाना एवं प्रयोग करना सधे हुए हाथों का ही काम है। किसी को किस दिशा में कितना ऊँचा उठाया जा सकता है यह निर्णय करना या उसे कार्यान्वित कर दिखाना उन्हीं का काम है, जिनकी तेल कूपों की गहराई तक उतरने की समुद्र की गहराई नापने जितनी क्षमता है ऊँचाई पर छोटी छलाँग तो कोई भी लगा सकता है पर पृथ्वी पर ऊँचाई में चढ़े हुए कवचों को वेधन करते हुए आगे के अन्तरिक्ष में प्रवेश करना गतिशील होना बहुमूल्य राकेटों के लिए ही सम्भव है। अन्तरंग योग द्वारा आत्म का परमात्मसत्ता के साथ जुड़ा हुआ संबंध ऐसी अलौकिक ऋद्धि सिद्धियों का परिचय दे सकता है। सिद्ध पुरुषों का देव मानव ही कहते हैं। उनकी विवेक भरी अनुकम्पा किसी को भी ऊँचा उठाने सुखी बनाने में सहायक सिद्ध हो सकती है। उच्चस्तरीय सिद्धियों तक इसी स्तर के लोगों की पहुँच होती है।

दृश्य जगत की तरह दूसरा सटा हुआ या घुला हुआ अदृश्य जगत भी है, जिसका आभास हम साधारणतया स्वप्नावस्था में तथा विशेष अनुभूति निर्विकल्प समाधि तक पहुँचने पर करते हैं। शास्त्रकारों ने उन्हें लोक लोकान्तर कहा है। वे सूक्ष्म स्तर के हैं। अदृश्य स्तर के हैं आकाशीय ग्रह नक्षत्र में की कोई वैसा लोक नहीं है, जैसा कि स्वर्ग, नरक, ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि के रूप में वर्णन किया जाता है। सप्त लोकों की ब्रह्माण्डीय स्थिति अदृश्य है। उन्हें नेत्रों या उपकरणों से नहीं पकड़ सकते। इन अदृश्य लोकों में अदृश्य स्तर के देव पितर सिद्ध मुक्त स्तर के जीव निवास करते हैं वहाँ की परिस्थिति पदार्थपरक नहीं संवेदनपरक है। उस वातावरण में रहने वाले आनन्द उल्लास उमंग तृप्ति, तुष्टि शान्ति का हर घड़ी अनुभव करते हैं। इन अदृश्य लोकों में ही वे पार्षद रहते हैं जिन्हें जीवन मुक्त कहा जाता है। जो ब्रह्म प्रेरणा से प्रेरित होकर संसार के असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए नियम समय तक महापुरुष उद्धारक सुधारक, अवतार आदि बन कर रहते हैं। उनका दृश्यमान शरीर अभीष्ट आयोजन पूरा होने तक ही कार्यरत रहता है। इसके बाद वह पूर्ववत् अदृश्य हो जाता है। यह परिकर भी छोटा नहीं है। पृथ्वी पर जितने मनुष्य रहते हैं उसकी तुलना में अदृश्य लोकों के निवासी अदृश्य जीवन मुक्तों की संख्या कम नहीं है। जिस प्रकार संसारी लोगों में अपने अपने ढंग की अनेक प्रतिभाएँ और सम्पदायें होती हैं, उसी प्रकार अदृश्य लोकों की अदृश्य आत्माओं में अपने-अपने स्तर की अगणित विभूतियाँ प्रमुख सिद्धियां, विशेषताएँ दिव्य सम्पदाएँ होती हैं यह वैभव उनके पास संचित ही नहीं बना रहता वरन् वे सत्पात्रों को सत्प्रयोजनों के लिए उदारतापूर्वक वितरित भी करती रहती है।

नरसी मेहता को परमार्थ के लिए धन की जरूरत पड़ी। उनके पास कुछ साधु पहुँचे, कहा हमें गाँव वालों ने आपके पास भेजा है। हम द्वारिका जी जा रहे हैं। आप सात सौ रुपये द्वारिका जी में हमें धन प्राप्त हो जाय। नरसी ने प्रभु की भेजी सहायता समझकर वह रुपये ले लिए। अपने इष्ट साँवलिया जी के नाम हुण्डी लिख दी। द्वारिका जी में साँवलिया शाह के रूप में प्रभु ने वह हुण्डी लेकर साधुओं को 700 रुपये दे दिए। वस्तुतः भगवान ही सूक्ष्म शरीर धारी आत्माओं द्वारा दिशा निर्देशन दिग्दर्शन द्वारा उच्चस्तरीय साधकों में प्रेरणा का संचार करते एवं दुःखी पीड़ितों का दुःख मिटाते हैं।

योगीराज महर्षि अरविन्द का कथन था कि विवेकानन्द की भूतात्मा उन्हें अनेक प्रेरणाएँ देती थीं। 1901 में रामकृष्ण परमहंस की आत्मा ने ही उन्हें समष्टि की साधना के लिए प्रेरित किया था। श्री “मा” किसी अदृश्य सत्ता की प्रेरणा से ही उनके पास पांडिचेरी आई थी। सुकरात हमेशा कहते थे कि उनमें एक डेमन रहता है जो उनसे सब काम मनचाहा कराता है। अपने सब कार्यों का श्रेय वे उस डेमन को हो देते थे।

थियोसोफीस्ट अन्वेषणकर्ता सी.डब्लू. लेडबीटर आजीवन परोक्ष जगत पर शोधरत रहे। उनका कथन था कि पितर आत्माएँ निर्दोष बच्चों और सज्जन लोगों की मुसीबतों में रक्षा करती हैं, तथा कई तरह से लाभ पहुँचाती हैं। एक बार भयंकर आग एक कमरे में लगी। वह पूरा जल गया। पर उसमें एक बालक पूर्णतः सोता रहा और बच गया। एक दिव्य तेज उसकी रक्षा करता रहा व आग उसे प्रभावित नहीं कर पाई। 1958 में प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक बर्नार्ड हटन ने हीलिंग हैन्ड0¬स नामक पुस्तक में एक घटना का विवरण दिया है। वे स्वयं नेत्र ज्योति खो चुके थे और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। उन्हें मालूम हुआ कि स्वर्गीय डॉ. लैंग की प्रेतात्मा मि. चैपमेन को माध्यम बनाकर असाध्य नेत्र रोगों को ऑपरेशन द्वारा ठीक करती है। वे वहाँ गए। चैपमेन में प्रविष्ट डॉ. लैंग ने अपने हाथों के सहारे बन्द नेत्रों से बर्नार्ड हटन की आँख का ऑपरेशन किया और जख्म भर दिया। हटन की आँख ठीक हो गई।

यह विवेचन बताता है कि अन्तरंगयोग के साधक अपनी अन्तरात्मा को इतनी हल्की, इतनी स्वच्छ इतनी तीखी बना लेते हैं अदृश्य जगत में उनका प्रवेश भली प्रकार से हो सके। शरीर धारण किये रहते हुए भी अपने सूक्ष्म और कारण शरीरों को दिव्य लोकों तक पहुँचा सकें। अपने प्रयोजन के अनुरूप अदृश्य सिद्ध प्रभावों को ढूंढ़ सके। उनके साथ घनिष्ठता बढ़ा सकें और अभीष्ट अनुदानों को सरलतापूर्वक हस्तगत कर सकें। योग साधना का प्रथम चरण आत्मशोधन का है। उसके उपरान्त तो सिद्ध पुरुषों के अनुदान उन्हें सहज ही उपलब्ध होने लगते है।, जिनके सहारे आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों ही साधन सध सकते हैं। पानी जब भाप बन जाता है तो उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की ओस या बादल बनकर कहीं भी बरस पड़ने की क्षमता उन योगीजनों को हस्तगत हो जाती है जो भटकावों में नहीं भटकते किन्हीं अनुभवी मार्ग दर्शकों के संरक्षण में निष्कंटक पथ पर चलते हैं और स्वयं धन्य बनते हुए अन्य अनेकों को धन्य बनाते हैं। कुण्डलिनी साधना में फलश्रुतियाँ इसी तथ्य पर आधारित हैं। सिद्धियों रहस्यमयी विभूतियों का विवेचन कौतूहल भर जगाने के स्थान पर उस दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सके तो ही उस प्रचण्ड पुरुषार्थ की सार्थकता है।


कुण्डलिनी के पाँच मुख पाँच शक्ति प्रवाह

बोलचाल की भाषा में सभी जीवित प्राणियों को जीवधारी कहते हैं। वे प्राणवान है, इसलिए प्राणी भी कहते हैं। पर बात इतनी साधारण नहीं है। पदार्थ विज्ञानी तो जीव की कोई सत्ता ही नहीं मानते। पंचतत्वों एवं रासायनिक द्रव्यों का मिलन मात्र ही जीवन है ऐसा उनका मत है। वे कहते हैं कि इस संयोग का वियोग हो जाना जीव की सत्ता का आत्यंतिक समापन है। उनकी दृष्टि में आत्मा नाम की कोई चीज नहीं। मनुष्य एक चलता, फिरता बोलता पौधा भर है।

ये परिभाषाएँ तत्वज्ञान की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं वे आत्म का अस्तित्व परमात्मा के छोटे घटक रूप में मानते हैं प्राण इससे भिन्न है। प्राण जीवट को कहा गया है। जिसमें आन्तरिक साहस और बहिरंग पराक्रम है वही प्राणवान है। प्राणवान होने में ही जीवधारी का गौरव और और जीवन का महत्व है। यहाँ चर्चा जिस प्राण की की गई है, जीवन का महत्व है। यहाँ चर्चा जिस प्राण की की गई, उसे सामान्य भाषा में जीवट कहते हैं। जीवट से तात्पर्य है प्रतिभा प्रतिभा कहते हैं समझदारी ईमानदारी जिम्मेदारी और बहादुरी के समन्वय को। अध्यात्म की भाषा में इसी विभूति विशेषण को प्राणाग्नि कहा गया है। हिम्मत वाले और बलवान तो दुष्ट डाकू और कुचक्री भी होते हैं। पर उन्हें शौर्यवान पुरुषार्थी कहलाने का श्रेय नहीं मिलता। अधिक से अधिक उन्हें दैत्य दुष्ट कहा जा सकता है।

प्राणवान होना मनुष्य जीवन की महानता उपलब्धि है। जिनके पास यह वर्चस्व होता है। वे ही अनुकरणीय अभिनन्दनीय कार्य कर पाते हैं। महापुरुष कहलाते हैं और अपने सुसंस्कृत व्यक्तित्व के कारण स्वयं उठते और दूसरों को उठाते हैं। स्वयं पार होते और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पार उतारते हैं।

प्राण एक चेतना शक्ति है। जिसे जीवन्त विद्युत कहा जा सकता है। बिजली की शक्ति से बड़े बड़े कल कारखाने चलते हैं। नगर रोशनी से जगमगाते और उस ऊर्जा के सहारे अनेकों सुख साधन जुटते हैं। प्राण विद्युत भी साधारण से शरीरों के सहारे ऐसे असम्भव जैसे कार्य सम्पन्न कर दिखाती है जिनका स्वरूप देखते हुए आश्चर्य चकित रह जाना पड़े।

संसार में जीवित प्राणियों की संख्या गिन पानी कठिन है। जल थल में रहने वाले और आकाश में परिभ्रमण करते रहने वाले जन्तुओं की कोई गणना नहीं कर सकता। उपजाऊ भूमि में सूक्ष्म जीवी होते हैं। पानी की एक बूँद में सहस्रों अदृश्य जन्तु देखें जा सकते हैं। इनकी गणना कौन करें? उनकी संख्या कल्पनातीत है। यों कहने को तो इन सभी को प्राणी कहा जा सकता है। पर इन पंक्तियों में जिस प्राण की चर्चा की जा रही है, उसका तात्पर्य ऐसी प्रतिभा एवं क्षमता से हैं जो साधारण मनुष्यों में नहीं पाई जाती। ऊँची छलाँग लगाने की हिम्मत उन्हीं में होती है जिनकी नाड़ियों में माँस पेशियों में कल्पना और विचारणा में उच्चस्तरीय विद्युतशक्ति पाई जाती है। जो असाधारण सोचते और अपने एकाकी पराक्रम के बलबूते अनोखी योजना बनाते और असाधारण सफलता पाते हैं ऐसे लोगों ही अपने को कृतकृत्य हुआ मानते हैं देखने और सुनने वाले उन्हें धन्य कहते हैं।

जीव धारियों के समुदाय में प्राणवानों की ही विशिष्टता और वरिष्ठता है। वे जहाँ तहाँ कदाचित कभी कभी ही दीख पड़ते हैं, पर जो होते हैं वे ज्योतिर्मान होकर असंख्यों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करते हैं। अनेकों को श्रद्धालु एवं अनुयायी बनाते हैं। जिस राह पर वे चलते हैं उस पर पीछे चलने वालों की कमी नहीं रहती। सड़क न सही वे एक अच्छी खासी पगडंडी तो बनाकर छोड़ ही जाते हैं जिस पर चलकर भूले भटके भी गन्तव्य लक्ष्य तक पहुँच सकें। ऐसे लोग आत्म गौरव अनुभव करते हैं और दूसरों की दृष्टि में दिव्य विभूतियों से भरे पूरे माने जाते हैं। इतिहास में ऐसे ही जीवट सम्पन्नों द्वारा किये गये महान कार्यों का उल्लेख है। उन्हीं को महामानव के नाम से मूर्धन्यों की गणना में गिना गया है।

जीवन के साथ जुड़े हुए शरीर, मस्तिष्क परिवार वैभव को एक तराजू पर रखा जाय और प्राण प्रतिभा को दूसरे पलड़े पर तो भारी भरकम प्रतिभा ही बैठेगी। उन्हें ही नररत्न कहते हैं। आदर्शों का अवलम्बन लेने और उसके लिए बढ़ चढ़कर त्याग बलिदान कर गुजरने पर तो उन्हें नर नारायण कहा जाता है। उनकी कृतियाँ अनेकों का मार्ग दर्शन करती है। राजा हरिश्चन्द्र का नाटक देखने पर बालक गान्धी ने निश्चय किया कि वे भी हरिश्चन्द्र जैसे महान बनकर रहेंगे। वह संकल्प अंततः पूरा ही हुआ सत्य अहिंसा की अवधारण करने वाले गान्धी सचमुच ही दूसरे हरिश्चन्द्र बन गये।

ऐसी जीवट प्राप्त करने के लिए स्वाध्याय सत्संग मनन चिन्तन के आत्म निर्माण करने वाले तरीके भी हो सकते हैं मनःस्थिति भी परिस्थिति बनाती हैं पर आध्यात्मिक उपचारों में ऐसी प्रतिभा प्राप्त करने के लिए प्राणायाम प्राणाकर्षण जैसे उपचार भी है। उन उपचारों में सबसे ऊँची प्रक्रिया कुण्डलिनी जागरण की है। इस सूर्योपासना के माध्यम से भी संपन्न किया जा सकता है। सूर्य को भौतिक ऊर्जा का स्रोत मानना अपर्याप्त होगा आत्मिकी के सिद्धान्त उसे परब्रह्म का दृश्यमान स्वरूप भी मानते हैं और उसे गर्मी रोशनी का ग्रह गोलक भर न मानकर अन्तरात्मा में अंतःकरण में और उसके प्रत्येक स्फुल्लिंग में जीवट का अभिनव संचारकर्ता भी मानते हैं। वस्तुतः वह है भी ऐसा ही सविता की तेजस्विता यदि साधना तपश्चर्या सघन श्रद्धा एवं प्रबल इच्छा शक्ति के सहारे धारण की जाय तो साधक को निराश न होना पड़ेगा।

प्राण की चैतन्य विद्युत इस निखिल ब्रह्माण्ड में सर्वत्र भरी पड़ी है। उसमें से मनुष्य अपने संकल्प बल पर चाहे जितनी मात्रा में उसे ग्रहण कर सकता है। पर उसको धारण करना उतना ही सम्भव है जितनी अपनी पात्रता हो जलाशय में अथाह पानी भरा रहता है। उसमें से कितना ही लेने पर कोई रोक टोक भी नहीं है। पर लिया उतना ही जा सकता है जितना बड़ा कि अपने पास पात्र हो इसके अभाव में अधिक ले चलने की आकाँक्षा अधूरी ही रह जाती है।

सूर्य ग्रह नक्षत्रों के बीच सबसे अधिक प्रकाशवान है। यह प्रकाश रोशनी के बल्ब जैसा नहीं है। वरन् अपनी ऊर्जा के प्रकाश से इतना चमकता है। सौर मण्डल के अन्य सदस्य भी उसी के प्रकाश में प्रकाशवान होकर दृष्टिगोचर होते हैं। वृक्षों वनस्पतियों में जीवन वहीं बाँटता है। उसी के कारण कलियाँ फूल बनकर विकसित होती हैं प्रश्नोपनिषद् में नचिकेता को विस्तार से इसी प्राण की महिमा बताई और उससे संबंधित पाँच प्रकार की प्राणाग्नि विद्या सिखाई है।

इसी प्रकार गायत्री महाशक्ति का प्राण पक्ष शक्ति पक्ष कुण्डलिनी है। दोनों मूलतः एक ही हैं विद्युत तत्व एक है। ऋण और धन उसके दो विभाग मात्र हैं। जीव सत्ता एक है शरीर और प्राण उसके दो विभाग मात्र हैं। जीव सत्ता एक है, शरीर और प्राण उसके दो घटक भर हैं गायत्री और कुण्डलिनी को पृथक नहीं वरन् दो धाराओं का परस्पर पूरक स्वरूप समझा जाना चाहिए। कहा भी है -

कुण्डलिन्याँ समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी। प्राणविद्या महाविद्या यस्ताँ वेति स वेदवित्। -योगचूड़ामणि उपनिषद्

कुण्डलिनी ही प्राणशक्तिमयी गायत्री का उत्पत्ति स्थान है। यह गायत्री ही प्राणविद्या रूपा महाविद्या है। जो व्यक्ति इस विद्या को जानने हैं, वे ही वेदवित् हैं।

जीव सत्ता के साथ पाँच सशक्त देवता उसके लक्ष्य प्रयोजनों को पूर्ण करने के लिए मिले हुए हैं। व निद्राग्रस्त हो जाने के कारण मृततुल्य पड़े रहते हैं और किसी काम नहीं आते। फलतः जीव दीन दुर्बल बना रहता है। यदि इन सशक्त सहायकों को जगाया जा सके उसकी सामर्थ्य का उपयोग किया जा सके तो मनुष्य सामान्य न रह कर असामान्य बनेगा। दुर्दशाग्रस्त स्थिति से उबरने और अपने महान गौरव के अनुरूप जीवन यापन का अवसर मिलेगा। शरीरगत पाँच तत्वों का उल्लेख कपिलतंत्र में पाँच देवताओं के रूप में इस प्रकार किया है -

“आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महैश्वरी। वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधितः॥”

अर्थात् आकाश के अधिपति हैं विष्णु। अग्नि की अधिपति महेश्वरी शक्ति हैं। वायु अधिपति सूर्य हैं पृथ्वी के स्वामी शिव हैं और जल के अधिपति गणपति गणेश जी हैं। इस प्रकार पंच देश शरीर के पंचतत्वों की ही अधिपति सत्ताएँ हैं।

पाँच प्राणों को पाँच देव बताया गया है। तंत्रार्णव में कहा गया है -

पंच देवमयं जीव पंच प्राणमयं शिव। कुण्डली शक्ति संयुक्तं शुभ्र विद्युल्लतोपम्॥

अर्थात् यह जीव पाँच देव सहित है। प्राणवान होने पर यह शिव है। यह परिकर कुंडलिनी शक्तियुक्त है। इनका आकार चमकती हुई बिजली के समान है।

मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में यह पाँच प्राण (1) प्राण (2) उदान (3) अपान (4) व्यान (5) समान के रूप में विकसित हुए हैं। इनके पाँच सहायक भी हैं जिन्हें (1) देवदत्त (2) वृकल (3) कूर्म (4) नाग (5) धनंजय के नाम से वर्णित किया गया है। यह चेतना की पाँच परतें हैं। इनके सम्मिश्रण से व्यक्तित्व बनता है। उनका स्तर एवं अनुपात जितना ऊँचा नीचा होता है, उसी आधार पर व्यक्ति की वरिष्ठता एवं विशिष्टता एवं विशिष्टता प्रदीप्त होती है।

आधुनिकतम गेस्टॉल्ट साइकोलॉजी के अनुसार भी व्यक्तित्व को पाँच भागों में विभाजित किया गया है। मन चिकित्सक डॉ. फ्रेडरिक ए. पर्ल्स ने यह प्रतिपादन व्यक्त करते हुए बताया कि पाँच परतें जो व्यक्तित्व का निर्माण करते हुए बताया कि पाँच परतें जो व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं यदि सही विश्लेषण विधि द्वारा खोली टटोली जा सकें तो स्वभाव की अनगढ़ता को मिटाकर व्यक्तित्व को परिष्कृत कर सकना संभव है। ये पाँच परतें इस प्रकार हैं (1) क्लीश लेयर (2) सिंथेटिक लेयर (3) इम्पल्स लेयर (4) इम्पलोसिव अथवा डेथ लेयर एवं 5 इम्पल्स लेयर (4) इम्पलोसिव अथवा डेथ लेयर एवं 5) एक्सप्लोजिव अथवा लाइफ लेयर। निरर्थक अनगढ़ जीवन से आरम्भ होने वाली कलीश लेयर अपने विकास की चरमावस्था में एक विस्फोटित ऊर्जा का रूप ले लेती हैं जिसमें व्यक्ति स्वतंत्र विश्वसनीय सक्रिय और यथार्थ जीवन जीने लगता है। गेस्टॉल्ट ने ऊपर जिन ऊर्जा परतों की ओर संकेत किया है वे व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर में अवस्थित पंचकोश ही है।

जिस प्रकार ब्रह्माण्ड का दृश्यमान पदार्थ पंचतत्वों से बना है उसी प्रकार संव्याप्त चेतना प्राण रूप में भरी पड़ी है। यह ब्रह्माण्ड पंच चेतन सत्ताओं से भरा पड़ा है मानवी पिण्ड भी उसी का छोटा संस्करण है। जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड भी उसी का छोटा संस्करण है जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में है। ब्रह्माण्डव्यापी पंच प्राणों का समावेश इस काया में भी है। वह सुषुप्त एवं बीज रूप में विद्यमान है। बीज में समूचा वृक्ष विद्यमान रहता है। पर उसकी स्थिति को स्पष्ट देख सकना संभव नहीं। पुरुष और स्त्रियों के शुक्राणु डिम्बाणु मिल कर बालक की संरचना करते हैं किन्तु उन कणों को उलट पुलट कर सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से भी देखा जाय तो भी उनमें शिशु शरीर का कोई ढाँचा दृष्टिगोचर नहीं होगा। ठीक इसी प्रकार सावित्री शक्ति की पंचधा प्रवृत्तियों के संबंध में यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्यक्ष उनका स्वरूप और परिणाम क्या है? तो भी इस दिव्य शक्ति के शरीर में अवतरित होने पर जो परिणाम सामने आते हैं उनके आधार पर उनकी शक्ति और सत्ता को समझा जा सकता है।

पाँच वैभवों की गणना होता है। (1) बल (2) धन (3) ज्ञान (4) विज्ञान (5) कौशल। इस प्रकार अन्यान्य भी कई प्रकार के पंच प्रकरण हैं। महाभारत के प्रमुख योद्धा पाँच पाण्डव थे। राम दल में भी हनुमान अंगद नल नील जामवन्त यह पाँच ही प्रमुख सेनापति थे। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। पाँच ही कर्मेन्द्रियाँ पंचरत्न पंचामृत पंचगव्य पंचाँग जैसे कितने ही पंचक गिनाये जा सकते हैं। वेदान्त की पंचीकरण साधना प्रसिद्ध है।

कुण्डलिनी जागरण की साधना में प्रयुक्त पँचकोशों में अन्नमय प्राणमय की साधना में प्रयुक्त पँचकोशों में अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोशों की गणना की जाती है।

महायोग विज्ञान में कुण्डलिनी जागरण का परिचय पंच कोशों की जागृति के रूप में मिलता है।

कुण्डलिनी शक्तिराविर्भवति साधके तदा स पंच कोशे मत्तेजोऽनुभवति ध्रुवम॥

अर्थात् जब कुण्डलिनी जागृत होती है तो साधक के पांचों कोश ज्योतिर्मय हो उठते हैं।

पाँच तत्वों से शरीर बना है। उसके सत्व गुण चेतना के पाँच उभारों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। (1) मन माइण्ड (2) बुद्धि इन्टलैक्ट (3) इच्छा विल?) चित माइन्ड स्टफ (5) अहंकार ईगी।

पाँच तत्वों के राजस तत्व से पाँच प्राण उत्पन्न होते हैं इन्हें वायटल फोर्स भी कहा जा सकता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उन्हीं के आधार पर अपने विषयों का उत्तरदायित्व निबाहती है। तत्वों के तमस् भाग से काय कलेवर का निर्माण हुआ है। (1) रस (2) रक्त (3) माँस (4) अस्थि (5) मज्जा के रूप में उन्हें क्रिया निरत काया में देखा जा सकता है। मस्तिष्क हृदय आमाशय फुफ्फुस और गुर्दे यह पाँचों विशिष्ट अवयव तथा पाँच कर्मेन्द्रियों को उसी क्षेत्र का उत्पादन कह सकते हैं।

जब हम विज्ञान की परिभाषा में इन पंचप्राणों पंचकोशों की विवेचना करते हैं तो पाते हैं कि इनके प्रतिनिधिगण व्यष्टि एवं समष्टि सभी में संव्याप्त है।

भौतिक विज्ञान भी पाँच शक्तियों को प्रमुख मानता है। (1) महासत्व (2) अल्पसत्व (3) गुरुत्वाकर्षण (4) विद्युत्चुम्बकीय बल (5) एण्टीमैटर। ब्रह्माण्डीय कण भी पाँच ही प्रख्यात है। न्यूटीनों क्वार्कस पल्सार्ज फोटाँन्स एवं लेप्टान्स। क्वान्टस क्वार्कस पल्सार्ज फोटाँन्स एवं लेप्टान्स। क्वान्टम बेव थ्योरी के अनुसार सारी शक्ति का कार्य व्यापार तरंगों से ही चल रहा है। ब्रह्माण्डीय किरणें पाँच ही हैं। अल्ट्रावायलेट इन्फ्रारेड कास्मिक रेडियो वेव्स या माइक्रोवेव्स इन्टरस्टेलर वेव्स। ध्वनि तरंगें भी पांच हैं सोनिक अल्ट्रासोनिक इन्फ्रासोनिक हाइपरसोनिक सुपरसोनिक पृथ्वी पर चढ़े पाँच ही कवच लीथोस्फियर हाइट्रोस्फियर बायोस्फियर एवं एटमोस्फियर इनके ऊपर डायनोस्फियर है जो 1600 किलोमीटर ऊँचाई तक चला गया है। इसकी भी पांच परतें हैं एण्डोस्फियर ट्रोपोस्फीयर स्ट्रेटोस्फीयर ओजोनोस्फियर एवं एक्जोस्फियर।

पाँच शक्तियाँ ऐसी हैं जो जैव भौतिकी के क्षेत्र में क्रियाशील हैं। ये बायोइलेक्ट्रिसिटी जैवविद्युत बायोमैग्नेटिज्म जैवचुंबकत्व रेडिएशन विकिरण क्रिएशन रिप्रोडक्शन (प्रजनन) इम्यूनिटी प्रतिरोधी सामर्थ्य जैवविद्युत के भी वैज्ञानिक दृष्टि से पाँच भेद हैं प्लेक्स इलेक्ट्रिसिटी न्यूरोनल इलेक्ट्रिसिटी सेल्युलर इलेक्ट्रिसिटी कनडक्शन इलेक्ट्रिसिटी एवं फेशियोंआँक्युलर इलेक्ट्रिसिटी प्रकारान्तर से इन्हीं को अध्यात्म भाषा में वर्चस ओजस तेजस ब्रह्मवर्चस एवं मनस के अंतर्गत समेट लिया गया है।

मस्तिष्क स्नायु संस्थान का संचालन करने वाले पाँच प्रमुख घटक कॉर्टिकल न्यूकलाई थेलेमस हाइपोथेलेमस में डुयुला एवं स्पाइनल कार्ड मस्तिष्क को सक्रिय रखने वाले रसस्राव भी प्रमुखतः पांच ही हैं जिन् न्येहयूमरल सिक्रीशन कहते हैं डोपामिन एण्डार्फिन सिरोटोनिन एन्केफेलीन एवं गाबा। इनमें न्यूनाधिक अस्तव्यव्थ्ता से मानसिक क्रिया−कलाप गड़बड़ा जाते हैं पाँच हारमोन ग्रन्थियाँ जिनकी संगति बहुधा पँचकोशों से बिठाई जाती है। इस प्रकार है पीनियल पिट्यूटरी थाइराइड एडीनल एवं गोनेडस। षटचक्रों की चर्चा आने पर छठी थाइमस ग्रन्थि का प्रसंग और जोड़ दिया जाता है।

इस प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी और शरीरगत कई विभाजन है जिनका योगदान सूक्ष्म क्रिया–कलापों में होता है। इन सभी पाँच प्रमुख शक्त समूहों को सावित्री के पाँच मुखी का कुण्डलिनी शक्ति के पंचकोशों का ही अंग प्रत्यंग माना जा सकता है। इनमें से कुछ को भी नियंत्रित कर सुनियोजित किया जा सके तो उसकी उपलब्धियाँ ऐसी हो सकती है मानों पाँच लोकों से पाँच देवताओं द्वारा साधक पर दिव्यशक्ति भरे पुष्पों की वर्षा की जा रही हो कुण्डलिनी जागरण की फलश्रुतियाँ ऐसी ही विशिष्टताओं से भरी पूरी है।


प्राण सत्ता का कलेवर यह कायपिंजर

जिस कायकलेवर में प्राणाग्नि के समुच्चय के रूप में कुण्डलिनी शक्ति साढ़े तीन कुंडलिनी का घेरा बनाये विराजमान है वह स्वयं में कम विलक्षण नहीं। हाड़मांस के इस पिण्ड को सिरजनहार की अनुपम कलाकृति कहा जा सकता है। जिसमें अनन्त अलौकिक शक्तियों का भंडार प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है। स्थूल सूक्ष्म एवं कारण शरीरों के रूप में इसमें सक्रियता विचारणा एवं भावना निष्ठा प्रज्ञा एवं श्रद्धा जैसी विभूतियाँ विद्यमान है। इन्हें जागृत विकसित कर मनुष्य क्षुद्र से महान और नर से नारायण बन सकता है।

पंचतत्वों से बनी यह काया विश्व ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ी विलक्षण शक्तिशाली पॉवर हाउस है। वैज्ञानिक मनीषी आइंस्टीन ने अपने शक्ति सिद्धान्त ई.एम.सी. स्क्वेयर के प्रतिवादन में बनाया है कि पदार्थ के एक परमाणु से कुल तीन लाख पचास हजार कैलोरी ऊर्जा उत्पन्न होती है। फिर मनुष्य का शरीर तो विश्व ब्रह्माण्ड में पाये जाने वाले समस्त स्थूल सूक्ष्म एवं अदृश्य कणों के समुच्चय से विनिर्मित हुआ है। औसत साठ किलोग्राम की स्थूलकाया में प्रत्यक्ष रूप में ऐ दिव्य तत्वों से बने सूक्ष्म व कारण शरीर में कितना अधिक शक्ति भंडार छिपा पड़ा है। इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। शक्ति पुँज होने के कारण ही उसे ज्योतीषांज्योति कहा गया है। शरीर माधं खलु धर्म साधनम् कहते हुए ऋषियों ने इसी काया को साधने जगाने एवं सुनियोजन लोक मंगल हेतु करने का निर्देश दिया है।

मानवी काया के जिस भी अंग अवयव पर दृष्टि डाली जाय उसी का क्रिया कलाप देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। हृदय को ही ले उसका रक्त प्रवाह नदी नाले की तरह नहीं वरन् किसी शक्तिशाली पम्प की तरह झटका देखकर बहने वाले पानी की तरह प्रवाहित होता है। एक धड़कन एक मिनट में औसत 72 आर अर्थात् एक सेकेंड के पाँच बटे छह भाग में सम्पन्न होती है। उस धड़कन में असंख्यों विद्युततरंगें निकलती हैं जिन्हें इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम हिज बण्डलकार्डियोग्राम द्वारा मापा जाता है। यही 0.83 सेकेंड की अवधि वाला अत्यन्त अल्प समय हृदय को विश्राम के लिए भी मिल जाता है।

हृदय के समान ही फेफड़े भी आजीवन कभी विश्राम नहीं लेते। वे 20 से 30 धन इंच हवा बराबर भरते निकालते रहते हैं श्वास की गति एक मिनट में प्रायः 18 से 20 बार होती है। वे शरीर को आक्सीजन प्रदान करते और दूषित वायु निकालते रहते हैं वायु कोष्ठकों की संख्या हजारों में गिनी जाती है। इन्हें सीधी रेखा में रखा जाय तो शरीर से 55 गुनी बैठती है।

गुर्दे भूरे कत्थई रंग के सेम के बीज जैसी आकृति के लगभग 150 ग्राम भारी है। प्रत्येक गुर्दा प्रायः 4 इंच लम्बा ढाई इंच चौड़ा एवं 2 इंच मोटा होता है जिस प्रकार फेफड़े वायु साफ करते हैं उसी प्रकार जल अंश की सफाई गुर्दों के जिम्मे हैं। वे अनावश्यक तत्वों को मूत्र द्वारा निकाल कर बाहर करते रहते हैं उनमें 10 लाख से भी अधिक नलिकाएँ हैं इन सब की लम्बाई कतार में रखी जाय तो यह विषुवत् रेखा के चारों ओर एक चक्कर लगा सकती है। एक घण्टे में गुर्दे इतना रक्त छानते हैं जिसका भार समूचे शरीर की तुलना में दूना होता है।

आमाशय को मोटा काम भोजन हजम करना है पर यह क्रिया अत्यन्त जटिल और विलक्षण है। इस छोटी-सी थैली को एक अनोखी रसायनशाला कहा जा सकता है। कहाँ रक्त? इस परिवर्तन में इतने प्रकार के रासायनिक पदार्थों और क्रिया कलापों का समन्वय होता है कि उसे बाजीगर जैसा कौतुक कलापों का समन्वय होता है कि उसे बाजीगर जैसा कौतुक ही कह सकते हैं इसी प्रकार आँख जैसा कैमरा एवं कान की तर शक्तिशाली ट्राँसड्यूसर साउंड फिण्टर अपने में आश्चर्यजनक है। त्वचा शरीर के सुरक्षात्मक कवच का निर्माण करती है। और ढाल की तरह उसकी रक्षा करती है। मनुष्य के शरीर की त्वचा को यदि फैलाया जाय तो वह लगभग 250 वर्गफुट जगह घेरती है। इसका कुल वजन पौने तीन किलोग्राम के लगभग है। एक वर्ग इंच त्वचा में 72 फुट लम्बा तंत्रिका जाल और 12 फुट लम्बी रक्त नलिकाएँ बिछी बिखरी रहती हैं। रोमकूप प्रायः एक पौण्ड पसीना रोज बाहर निकालते हैं साथ ही यही श्वसन की जिम्मेदारी भी संभालते हैं साँस व्यक्ति न केवल फेफड़ों से बल्कि त्वचा के माध्यम से भी लेता है। त्वचा के भीतर बिखरे ज्ञान तन्तुओं को एक लाइन में रखा जाय तो उनकी लम्बाई 450 मील होगी। त्वचा का मेलेनीन रसायन चमड़ी को गोरे, काले, पीले आदि रंगों से रंगता रहता है।

सामान्यतया त्वचा की मोटाई 0.3 से 3 मिली मीटर होती है, परन्तु कार्य व्यवहार एवं उपयोगिता के आधार पर इसकी मोटाई विभिन्न अंग अवयवों से अलग अलग होती है। सबसे पतली तह लगभग 0.5 मिलीमीटर आँखों पर होती है और सर्वाधिक मोटी परत पैर के तलवों में लगभग 6 मिलीमीटर होती है। त्वचा में अगणित छोटे छोटे रोमकूप होते हैं, जिनकी संख्या रोमों के आधार पर साढ़े तीन करोड़ बताई गई है। एनोटॉमी के आधार पर मनुष्य शरीर की त्वचा में 6 परतें हैं जिनके कार्यों में भिन्नता होती है।

सुविख्यात वैज्ञानिक डॉ. लोगन क्लेनडेनिंग ने इसे एक रोचक और रहस्यमय संरचना बताया है। उन्होंने कहा है कि त्वचा शरीर के चारों और कोई निष्क्रिय आच्छादन मात्र नहीं है वरन् यह एक सक्रिय अवयव है। त्वचा को प्रमुख कार्य स्पर्श है। इसके अतिरिक्त इस पतले से आवरण में इतनी विलक्षण क्षमताएँ भरी पड़ी हैं कि यदि उन्हें कुरेदा और विकसित किया जा सके तो वह अन्य इन्द्रियों का काम बखूबी कर सकती है। विकसित और प्रशिक्षित त्वचा स्वादेन्द्रिय घ्राणेन्द्रिय श्रवण और दर्शन आदि का कार्य कर सकती है और अपनी अतीन्द्रिय क्षमता का परिचय दे सकती है। समय समय पर आये दिन त्वचा की विलक्षण सामर्थ्य के उदाहरण सामने आते रहते हैं जिनमें त्वचा से सूँघने देखने सुनने और स्वाद लेने का काम लिया जाता है चक्षुहीन व्यक्तियों की त्वचा इस सीमा तक संवेदनशील विकसित होती जाती है कि उन्हें आँखों का अभाव अनुभव तक नहीं होता।

मानव मस्तिष्क की संरचना और भी विलक्षण है। 26 वर्ग इंच वाली छोटी पिटारी बंद तीन वजनी मस्तिष्क भूत भविष्य और वर्तमान का समस्त ज्ञान अपने अन्दर समेट प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है। इसमें सम्पूर्ण ईश्वरीय क्षमता बीज रूप में विद्यमान है। मनुष्य के मस्तिष्क में 14 करोड़ कोशिका तंत्र तथा 14 अरब 5 लाख तंतु होते हैं जो ग्रे मैटर और व्हाइट मैटर नामक पीले एवं सफेद रंग के द्रव में तैरते रहते हैं। यह मस्तिष्क ही सभी शारीरिक क्रिया प्रक्रियाओं का संचालक माँसपेशियों तथा श्वास प्रश्वास भोजन पचाने जैसे नियंत्रक हैं इसके अतिरिक्त रूप, रस, गंध, स्पर्श और ध्वनियों का महासागर सदैव मनुष्य के चारों और हलराता रहता है। तथा उसमें उठने वाले तूफान मस्तिष्क से टकराते रहते हैं। मस्तिष्क इन सबको जानता पहिचानता विश्लेषण करता और अपना निर्णय सुनाता है। इसके अलावा भी नवीनतम और पुरातन स्मृतियाँ अर्जित ज्ञान सम्पदा वर्तमान जन्म और पूर्व जन्मों के संस्कार सुखद दुखद अनुभूतियाँ आदि सभी मस्तिष्कीय पिटारी में संचित रहते हैं। इसके प्रमाण भी वैज्ञानिकों ने जुटा लिए हैं।

अन्त स्रावी ग्रन्थियों और बहिस्रावी ग्रन्थियों की संरचना और कार्य प्रणाली को देखते हुए शोधकर्ताओं ने इन्हें जादुई पिटारियाँ माना है। यह ग्रन्थियाँ न केवल मनुष्य की शारीरिक बनावट में योगदान देती है, वरन् उनके चेतन और अचेतन मस्तिष्कों को रहस्यमय ढंग से प्रभावित करती हैं।

शरीरगत जीव कोशों को काया की सबसे छोटी इकाई के रूप में देखा जाता है। देखा जाय तो मनुष्य के शरीर में इन जीवकोशिकाओं का महासमुद्र ही भरा पड़ा है, जिनका 65 प्रतिशत भाग जलीय होता है ओर उसमें साइटोप्लाज्म प्रोटोप्लाज्म नाभिक जैसे जैविक तत्व तैरते रहते हैं। इन तत्वों के निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, नाइट्रोजन, फास्फोरस आदि तत्व भाग लेते हैं। शरीर शास्त्रियों के अनुसार मानवी काया में 6 नील (6,00,00,00,00,00,000) कोशिकाएँ होती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इनके निर्माण में भाग लेने वाले तत्वों की तथा निर्मित कोशिकाओं की सम्मिलित संयुक्त ऊर्जा का मापन भौतिक उपकरणों के माध्यम से किया जाना संभव नहीं है।

जीवकोशों के साइटोप्लाज्मा के मध्य में उसका भी एक मध्यवर्ती नाभिक होता है। एक नाभिक में 23 या 24 जोड़े गुण सूत्रों (क्रमोजोम्स) के होते हैं जिनकी इकाई को जीन्स कहते हैं। वैसे प्रत्येक जीवकोश में कुछ जीन्स की संख्या पाँच हजार से एक लाख बीस हजार जोड़े गिनी गई है। उनकी संरचना भी डी.एन.ए. और आर.एन.ए. जैसे रसायनों से हुई है। यह सूक्ष्मता की चरम सीमा है। वंशानुक्रम का सारा ढाँचा इन्हीं पर खड़ा हुआ है। पूर्वजों की अनेक पीढ़ियों का सारा ढाँचा इन्हीं पर खड़ा हुआ है। पूर्वजों की अनेक पीढ़ियों की विशेषताएँ इन्हीं जीन्स में भरी रहती हैं और वे समयानुसार विभिन्न रूपों में प्रकट होती है।

दृश्य रूप में यही प्रतीत होता है कि माता, पिता ही बालक को जन्म देते हैं तो सन्तान को उन्हीं के अनुरूप होना चाहिए। पर इस मान्यता को जीन्स में संग्रहित अनेकों माता पिता की पीढ़ियों का उत्तराधिकार जब पीछे पीछे चलता है तो उस मोटी मान्यता में कई बार असाधारण व्यवधान भी उत्पन्न होते हैं, और संतति की विलक्षणताएँ अजीब ढंग की दृष्टिगोचर होती हैं। इन्हें अध्यात्म की भाषा में पूर्वजन्मों के संग्रहित संस्कार भी कह सकते हैं।

मनुष्य जिस जीव सत्ता से बना है। उसकी सामर्थ्य देखते हुए दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। बीज से अंकुर अंकुर से पौधा और पेड़ बन जाना जिस प्रकार आश्चर्यजनक है, उससे भी अनन्त गुण पुरुषार्थ जीव को अपने आरम्भिक मुहूर्त में ही करना पड़ता है।

शुक्राणु इतना छोटा होता है कि सुई की नोक पर उसके हजारों भाई बैठ सकते हैं रतिकर्म के समय योनि में विद्युत स्पंदन उठने लगते हैं, उन्हीं की उत्तेजना से शुक्राणु अपने सहयोगी डिम्ब की तलाश में चल पड़ते हैं। इस प्रयास में उन्हें इतनी तेज दौड़ लगानी पड़ती हैं कि चीते की दौड़ भी उससे कम पड़ती है। शुक्राणु को डिम्बाणु तक पहुँचने में अपने आकार के अनुपात से इतनी लम्बी दौड़ लगानी पड़ती है जिसे एक मनुष्य द्वारा समूची पृथ्वी की परिक्रमा के समतुल्य माना जा सके।

शरीरगत अनेकों रहस्य ऐसे हैं जिनके ऊपर से पर्दा अभी तक उठ ही नहीं सका है। हारमोन वंशानुक्रम जीव कोशों की अद्भुत क्षमता अचेतन मन, भाव सम्वेदना अतीन्द्रिय क्षमता, स्वसंचालित जीवन-पद्धति, प्रभावी तेजोवलय, रासायनिक पदार्थ एवं प्राणाग्नि रूपी दैवी शक्ति पुँज क्या काम करते हैं? इसका अभी थोड़ा-सा पता चला है। पर वे विनिर्मित किस आधार पर होते हैं? इसकी मनुष्य को कोई जानकारी नहीं है। इन रहस्यों का सूत्र संचालक सूक्ष्म शरीर द्वारा होने की बात कह कर हमें मौन होना पड़ता है।

मानवी काया के संदर्भ में वैज्ञानिक लॉर्ड हर्बर्ट ने कहा है हू सो एवर कन्सीडर्स द स्टडी ऑफ एनोटॉमी केन नेवर बी एन एथिस्ट अर्थात् जो काय संरचना को जानता समझता है उसे कभी नास्तिक नहीं होना चाहिए उसे परब्रह्म की सत्ता को एक कुशल चित्रकार सृजनात्मक सत्त के रूप में स्वीकार कर मानवीकाया के स्थूल व सूक्ष्म दोनों ही घटकों का समुचित सदुपयोग कर जीवन सफल बनाना चाहिए।


षट्चक्रों की पिटारी में कैद चेतना का महासागर

मानवी कायसत्ता के जिस पक्ष की चर्चा पहले की गयी वह सामान्य ज्ञान की परिधि में आता है उसे यंत्र उपकरणों के माध्यम से जाना समझा जाने लगा है। यह काया का स्थूल पक्ष है। इसी का पैथोलोजिस्ट विश्लेषण करते कायचिकित्सक एवं शल्यविशेषज्ञ इसी आधार पर टूट फूट की मरम्मत करते रहते हैं।

इससे आगे जो चेतना सत्ता का प्रसंग आता है, वह स्थूल भी है और सूक्ष्म भी। स्थूल इतना कि प्राण निकलते ही सारा खेल समाप्त हो जाता है ओर क्षण भर पहले जो शरीर नाना प्रकार की हलचलें कर रहा था वही शरीर निश्चेष्ट होकर सड़ने गलने लगता है। सूक्ष्म इतना कि इसके छोटे बड़े अनेक घटक विश्व चेतना से जुड़े रहते हैं। इस ब्रह्माण्ड में भी कुछ विद्यमान है उसे अपनी क्षमता के अनुरूप ग्रहण करते एवं सतत् फेंकते रहते है। व्यष्टि चेतना ब्राह्मी चेतना का ही एक अंग होने के नाते उसी से सतत् अनुदान पाती व आदान−प्रदान का क्रम बनाए रखती है। कुण्डलिनी शक्ति के प्रसंग में जब भी चर्चा चलती है इसी सूक्ष्म चेतनसत्ता का विवेचन इस संदर्भ में किया जाता है।

मनुष्य शरीर में ऐसे अनेक केन्द्र हैं जिनमें जीवनी शक्ति प्राण ऊर्जा की बहुलता होती है। इन्हें मर्म स्थान कहते हैं तथा इनकी संख्या सात सौ बताई गयी है। इन स्थानों में प्राणशक्ति में कमीवेशी होने पर स्वास्थ्य संतुलन बिगड़ जाता है और व्यक्ति को अनेकों बीमारियाँ धर दबोचती है। चिकित्सा विज्ञान में मर्म स्थानों का विशेष महत्व बतलाया गया है। जापान और चीन में एक्यूपंचर एवं एक्यूप्रेशन चिकित्सा प्रणाली का मूल आधार यही मर्म स्थान है।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक के. कार्लफ्रीड ने द वाइटल सेर्ण्टस ऑफ मैन ग्रन्थ में कहा है कि मर्म स्थान पर तंत्रिका तंतु अधिक एकत्रित और सघन होते हैं तथा वे केन्द्र से एवं एक दूसरे से सम्बन्धित भी होते हैं मर्म स्थानों के अतिरिक्त शरीर में सात ऐसे प्रमुख केन्द्र हैं जिनमें प्राणशक्ति और अतीन्द्रिय क्षमताओं का अपार वैभव प्रसुप्त स्थिति में दबा पड़ा है। इन स्थानों को चक्र या प्लेक्सस कहते हैं। इन केन्द्रों में ज्ञान तन्तु अधिक मात्रा में उलझे होते हैं। स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर के मिलन स्थान पर चक्रों की उपस्थिति बताई गई है।

योरोप के प्रख्यात मनोवैज्ञानिक पैरासेल्सस ने शरीरस्थ सूक्ष्म केन्द्रों को एस्ट्रम (तारा) नाम से उन पर प्रकाश डालते हुए उन्हें शक्ति पुँज बताया है। उनके मतानुसार इन सूक्ष्म केन्द्रों के माध्यम से ग्रह नक्षत्रीय एवं ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ मनुष्य के शरीर में अवतरित होती है।

योगाचार्यों ने चक्रों को कमल नाम से भी सम्बोधित किया है जैसे हृदय कमल नाभिकमल सहस्रार कमल आदि। अंग्रेज में इन्हें प्लेक्सस और जापानी जेन धर्म की व्याख्यानुसार क्यूसोस कहा गया है। चीन की ताओ प्रणाली में चक्रों को विश्व ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए नर और नारी याँग ओर यिन शक्तियों के एकत्रीकरण सम्मिलन का केन्द्र बताया गया है।

सर जॉनवुडरफ ने पॉवर एज रियलिटी एवं शक्ति एवं शक्ति में वी.जी. रेले दमिस्टीरिय कुण्डलिनी में श्री दास गुप्ता ने हिस्ट्री ऑफ इण्डियन फिलॉसफी वाँल्यूम रे में इवान्स वेण्ट्ज ने टिबेटन बुक ऑफ ग्रेट लिबरेशन में एवं एच.जी. बेन्स ने माईथोलॉजी ऑफ सोल में जिस सूक्ष्म में जिस सूक्ष्म शरीर की संरचना का वर्णन किया है वह मूलतः वही है जो योग व तंत्र पर भारतीय दर्शनकारों ऋषिगणों ने निरूपित किया है। योग कुंडल्योपनिषद् महानिर्वाण तंत्र षट्चक्र निरूपणम् ध्यान बिन्दु उपनिषद् योगर्वव तंत्र कुलाण्व तंत्र शारदातिलक इत्यादि ग्रंथों में कुण्डलिनी इड़ा पिंगला, सुषुम्ना मेरुदण्ड एवं मूलाधार सहस्रार रूपी दो केन्द्रों संबंधी जो विवेचन किया गया है उसे विज्ञान सम्मत भाषा में एक सीमा तक ही प्रस्तुत किया जा सकता है।

सुषुम्न को वैज्ञानिक स्थायी विद्युतीय द्विध्रुव केन्द्र (इलेक्ट्रीक डायपोल) मानते हैं, जिसका अधोभाग जो काडा इक्वाइना कहलाता है। ऋण आवेश युक्त है, तथा अर्ध्व वाला सेरिब्रम नामक भाग धन आवेश युक्त। काडा इक्वाइन व मूलाधार चक्र की स्थिति एक है। इसी प्रकार सेरिब्रम में विद्यमान विद्युत्स्फुल्लिंगों का फव्वारा एसेण्डिंग रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम सहस्रार के समकक्ष माना जाता है। असामान्य स्थिति में जब प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर बहता है तो इसे कामबीज से ब्रह्म बीज की महायात्रा कहते हैं, जो मेरुदंड रूप देवयान मार्ग पर पूरी की जाती है। अलंकारिक रूप से इन्हीं अंगों को विभिन्न नाम दे दिये गये हैं पर होते से सूक्ष्म विद्युत्चुंबकीय प्रवाह के रूप में ही है। वैज्ञानिक बताते हैं कि शरीर में कुल मिलाकर मोटे तौर पर एक लाख वोल्ट प्रति सेण्टीमीटर का विद्युत दबाव होता है। अन्य जीव धारियों की भाँति यह भी जननेन्द्रियों से त्वचा से श्वास मार्ग से क्रमश नित्य प्रतिदिन क्षरित होकर नष्ट होता रहता है। मात्र मनुष्य को यह सामर्थ्य विधाता से मिली है कि वह स्खलन के पतन गर्त में पड़ी आत्मसत्ता को ऊर्ध्वगामी बना सके, क्षरण को रोक सके एवं योगाभ्यास द्वारा चक्र बंधन करते हुए सहस्रार को जगाकर अपना तेजोवलय बढ़ा सके।

चक्र जैसा कि बताया जा चुका है कुल छः हैं। सातवें सहस्रार की गिनती इसमें नहीं होती। उसे सहस्र दल कमल कहा गया है। नीचे से ऊपर ये चक्र जिस क्रम में हैं व उनका एनोटॉमी से किस सीमा तक संबंध है उसका संक्षिप्त विवेचन यहाँ किया जा रहा है।

मूलाधार चक्र सुषुम्ना (स्पाइनल कार्ड की मध्य केनाल) के निचले सिरे पर मेरुदण्ड के काक्सीजियल क्षेत्र पेरीनियम में गुदा व जननेन्द्रिय के मध्य स्थित होता है। यहाँ पर काडा इक्वाइन से निकली सेक्रल नर्वरुट्ष कई गुच्छक में प्रवाहित विद्युतधारा चक्रवात के समान ऊर्जा उत्पन्न करने वाली भँवर बनाती हैं। इसी सूक्ष्म विद्युत प्रवाह को मूलाधार शक्ति कहते हैं जिसका मूल कार्य है उत्पादन प्रजनन कुण्डलिनी महाशक्ति साढ़े तीन कुण्डलियों में लिपटी यहीं सोयी पड़ी रहती है। यहाँ स्थिति प्रवाह को 4 पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में योगीजन देखते व इन्हें 4 वृत्तियों परमानन्द सहजानन्द योगानन्द वीरानन्द का प्रतीक बताते हैं। यहाँ जो शब्द ब्रह्म के कम्पन होते हैं उससे जो शब्द की व्युत्पत्ति होती है, उसे “ल” नाम दिया गया है। इस चक्र की तन्मात्रा गंध व तत्व पृथ्वी है।

ऊपर की ओर यात्रा करते हुए अगला चक्र स्वाधिष्ठान आता है, जो मूलाधार से चार अंगुल ऊपर हाइपोगेस्ट्रियम के स्थान पर अवस्थित है। यहीं पर स्थिति प्लेक्सस सुषुम्ना के दोनों ओर स्थित सिम्पेथेटिक गैंगलियान व सुषुम्ना का नाड़ी गुच्छकों से मिलकर बनता है। इससे जुड़ा आँतरिक अंग एड्रीनल ग्रंथि है जो एड्रेनेलीन हारमोन से संबंधित है। तनाव से जूझने व प्रतिकूलताओं से मोर्चा लेने की क्षमता इसी की सक्रियता से आती है। उत्सर्जन विसर्जन इसका मूल कार्य है। किन्तु इसके जागृत होने पर बलिष्ठता व स्फूर्ति बढ़ती है। आलस्य प्रमाद अवज्ञा अविश्वास आदि दुर्गुण मिटते हैं यहाँ स्थित कमल की छः पंखुरियाँ मानी गयी हैं। बीच मंत्री ‘व’ है। इस चक्र की तन्मात्रा रस एवं तत्व जी है मूलाधार स्वाधिष्ठान दोनों ही एक समूह में आते हैं एवं इनका मिलन बिन्दु रुद्रग्रंथि कहलाता है।

तीसरा चक्र मणिपूर है। शरीर संरचना की दृष्टि से यह नाभिस्थान में मेरुदण्ड लम्बर रीजन में होता है। यहीं पर सोलर प्लेक्सस होता है। जो सिम्पेथेटिक गैग्लियान एवं वगस नर्व के नाड़ी गुच्छकों से मिलकर बनता है।

इससे जुड़ी ग्रंथि पैक्रिजयाज है, जो हारमोन्स के अतिरिक्त एन्जाइम्स बनाती है। इस चक्र के जागरण से संकल्प बल व पराक्रम बढ़ता है। पाचन क्रिया में सहायता इसका मूल कार्य है। मनोविकार घटते हैं एवं परमार्थ कार्यों में रुचित बढ़ती है। नाभि स्थित यह कमल दस दल वाला माना गया है। इसका बीज मंत्र “र” तन्मात्रा रूप (दृश्य एवं तत्व अग्नि है। इसके जागरण से शरीर की तीनों अग्नियाँ जागृत होतीं व ऊर्ध्वगमन में सहायक बनती हैं। इस चक्र से अद्भुत ऊर्जा को अपनी चक्रा। मशीन से जापान के डॉ. हिरोशिमा मोटोयामा ने मापा व ग्राफ पर अंकित भी किया है। तिब्बती इस मणपद्म कहते हैं। चौथा चक्र अनाहत है। जो हृदय के पीछे कार्डियक प्लेक्सस के स्थान पर अवस्थित माना जाता है। यहाँ सिम्पेथेटिक गैंगलियान चेन व सुषुम्ना तथा वेगस के नर्व तन्तु मिलकर एक जाल बनाते व पूरे हृदय क्षेत्र को ऊर्जा देने की भूमिका निभाते हैं। यह बार पंखुड़ियों वाला कमल माना गया है। पेसमेकर का ऊर्जा स्रोत यही है। इसे भाव संस्थान भी माना गया है। कलात्मक उमंगे रसानुभूति व कोमल संवेदनाओं का उत्पादक स्रोत यही चक्र है। इसके जागरण से उदार सहकारिता परमार्थ परायणता “वसुधैव कुटुम्बकम्” के भाव उभरते हैं। थाइमस इससे जुड़ी ग्रंथि है। प्राण धारण एवं उसका सुनियोजन इसका मूल कार्य है। इस चक्र का बीज मंत्र ‘य” है। अनाहत नाद अथवा शब्द ब्रह्म की केन्द्र स्थली इसे माना गया है। शब्द ही इसकी तन्मात्रा एवं वायु इसका तत्व है। अनाहत व मणिपूर दोनों मिलकर सूर्य खण्ड बनाते व विष्णु ग्रंथि कहलाते हैं।

कण्ठ में विशुद्धि चक्र होता है। थाइराइड ग्रंथि तथा उसी के पीछे स्थित फेरेन्जियल व लेरेन्जियल प्लेक्सस इस से संबंधित है। इस चक्र के जागरण से अतीन्द्रिय क्षमता के प्रसुप्त बीजाँकुर फूट पड़ते हैं। यह चक्र सीधे अचेतन मन व चित संस्थान को प्रभावित कर दायें मस्तिष्क के साइलेण्ट एरिया को जगाता है। यहाँ स्थित कमल 16 पंखुड़ियों वाला है एवं इसका बीज मंत्र “हं” है।

स्पर्श इसकी तन्मात्रा एवं आकाश तत्व है। आज्ञा चक्र छठा एवं अन्तिम चक्र है जो विशुद्धि के साथ मिलकर चन्द्र समूह तथा ब्रह्म ग्रंथि बनाता है। इसका बीज मंत्र ॐ एवं तत्व मनस् है। इसे द्विदलीय कहा गया है जो पीनियल व पिट्यूटरी ग्रंथि से मिलकर बनते हैं। भ्र मध्य की सीध में ये दोनों ग्रंथियाँ हैं जो पूरे शरीर की गतिविधियों का संचालन करती हैं। इसके जागरण से दिव्य चक्षु खुल जाते हैं। लिम्बिक सिस्टम व हाइपोथेलेमस में जागृति आने से मस्तिष्क की सभी परतें खुल जाती है। व्यष्टि सत्ता समष्टि चेतना से संबंध जोड़ने में सक्षम हो जाती है।

सहस्रार कुण्डलिनी जागरण की महायात्रा का अंतिम पड़ाव है जो मस्तिष्क मध्य में इन्टरनल कैप्सूल व रेटीकूलर एक्टीवेटिंग सिस्टम में अवस्थित माना जाता है। यहाँ से स्फुल्लिंग सहस्रों की संख्या में उठते हैं। इसीलिए इसे सहस्रार कहा गया है। इसे ब्रह्म लोक एवं ब्रह्मरंध्र भी कहते है। सहस्रार उत्तरी ध्रुव है जो ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़कर ब्रह्मानन्द की प्राप्ति कराता है। सहस्रार के जागरण का अर्थ है सारे ग्रे मैटर के केन्द्रों का जागरण सुषुम्ना नाड़ी जो मूलाधार चक्र से चलकर ऊपर बढ़ती है, अपने दोनों ओर बायें से दायें व फिर दायें से बायें इड़ा (गंगा) एवं पिंगला (यमुना) नाड़ियों को लेकर चलती है। इड़ा बायीं ओर होती है। पिंगला दायीं ओर होती है व सूर्य नाड़ी कहलाती है। एवं पॉजेटिव आवेशयुक्त होती है। दो इन के संगम स्िल है, जो सुषुम्ना रूपी सरस्वती से मिलकर मूलाधार व आज्ञा चक्र पर त्रिवेणी संगम बनाते हैं। इड़ा व पिंगला नाड़ियों पैरासिम्पेथेटिक व सिम्पेथेटिक सिस्टम का प्रतिनिधित्व करती है।

वस्तुतः कुण्डलिनी शक्ति का स्थूल एनोटॉमी की शब्दावली में वर्णन करना असंभव है। जो भी परिकल्पना विभिन्न मनीषियों ने की है उसका सार उपरोक्त वर्णन माना जा सकता है। कुण्डलिनी सर्पेण्ट पॉवर जीवनीशक्ति फायर ऑफ लाइफ न जाने कितने नामों से जानी जाती है। षट्चक्र वे धन व कुण्डलिनी जागरण से उद्भूत ऊर्जा व्यक्ति को ब्रह्मवर्चस सम्पन्न बनाती है।


सात रत्न भंडारों की तिजोरी यह देव शरीर

यों कुण्डलिनी प्रसंग में बार -बार षटचक्रों का ही प्रसंग आता है पर वे वस्तुतः सात है। सहस्रार चक्र सहस्रदल कमल इन सब में मूर्धन्य है शीर्षस्थ है इसलिए बड़ा सूत्र संचालक एवं असामान्य मानकर सामान्यों की गणना से ऊपर उसे रखा गया है यों तो मेरुदंड में वे पाँच भृकुटि की सीध त्रिकुटी में आज्ञाचक्र एवं फिर सहस्रार के रूप में मस्तिष्क में स्थित है इसलिए उन्हें एकत्रित नहीं बिखरा हुआ ही मानना चाहिए।

सप्तलोकों का वर्णन किया जाता है उन्हें भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् कहा गया है इस्लाम धर्म में भी खुदा को सातवें आसमान पर अवस्थित माना गया है। ईसाई धर्म में भी इससे मिलती–जुलती ही मान्यता चिरकाल से चली आई हैं। पृथ्वी एक है पर उस पर भी रेत पत्थर वृक्ष वनस्पति खनिज पाणी वर्ग के सात समुदाय ही निवास करते हैं।

सात लोकों को ऊपर आसमान में नजर दौड़ाकर किन्हीं ग्रह नक्षत्रों में विद्यमान नहीं मानना चाहिए है न नीचे भयंकर उनकी तलाश ही करना चाहिए वे मानवी सत्ता में ही समाये हुए यदि ऊपर नीचे माना जाय तो भी ब्रह्मांड की सारी सत्ता पिण्ड में समाहित है इसलिए दूर जाने की अपेक्षा उन्हें भीतर ही ढूंढ़ा जा सकता है एवं उनसे संपर्क मिलाया जा सकता है।

आयुर्वेद के हिसाब से शरीर में सात धातुएँ है। रस रक्त त्वचा मांस अस्थि मेद शुक्र। यह सब अलग-अलग दीखते हुए भी परस्पर सघनतापूर्वक गुथी हई है इन सातों से मिलकर ही समग्र शरीर बनता है जब व्यष्टि सत्ता के संदर्भ में सात आयामों की चर्चा होती है तो लम्बाई चौड़ाई ऊंचाई से जुड़े होलोग्राफी के त्रिआयामीय प्रसंग के अलावा चौथा टाइम स्पेस का एवं पांचवां एंटीमैटर प्रति पदार्थ परोक्ष श् जगत का माना जा सकता है इसी पांचवे आयाम का व्यष्टिगत रूप छाया शरीर - अतीन्द्रिय सामर्थ्य इत्यादि के रूप में विद्यमान होता है। छठा आयाम विचारणा एवं सातवाँ भाव-संवेदना रसौ वै सः एवं बधन्मुक्ति का माना गया है जहाँ प्रथम चार जड़ सत्ता से संबंधित है वहां अंतिम तीन विशुद्ध चेतना परक आयाम है।

भगवान राम ने बाली को मारने से पूर्व एक बाण से सात ताड़ वृक्षों का वेधकर सुग्रीव को अपने पराक्रम का प्रमाण दिया था। यह सात ताड़ वृक्ष वस्तुतः सूक्ष्म शरीर के सात चक्र ही है। इनका वेधन ठीक तरह से न हो पाने के कारण ही अभिमन्यु गर्भकाल से प्राप्त अपूर्ण ज्ञान के फल स्वरूप कौरवों द्वारा रचित चक्रव्यूह में फस गया और बाहर न निकल सका। कुण्डलिनी इतनी बहुमूल्य सम्पदा है कि उसे चक्र रूपी वालों वाली तिजोरी में बन्द करके रखा गया है।

सात चक्र गणना करने पर इस क्रम से मिलते है। (1) मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपूर (4) अनाहत (5) विशुद्ध (6) आज्ञा (7) सहस्रार। यों आज्ञा चक्र के साथ ही एक बिन्दु चक्र की भी गणना होती है। इस तरह सहस्रार ब्रह्मरंध्र को उर्ध्वगमन की अंतिम परिणति सहस्रदल कमल सहस्र फन सर्प माना जाता है। वस्तुतः इसे मिलाकर मुख्य चक्र सात ही है। जिनमें नीचे के छहों का संचालक अधिपति सहस्रार ही माना गया है। जैसे कि सभी एण्डोक्राइन ग्रंथियों का मास्टर ग्लैण्ड पिट्यूटरी माना जाता है छह चक्रों को छह ऋतुओं की तरह एक श्रृंखला में पिरोया हुआ किन्तु एक दूसरे से अलग भी माना जा सकता है। इन्हें 6 मील के पत्थर भी कहा गया है। और सातवें मील पर पत्थर न लगाकर देवालय ही बना हुआ बताया गया है।

इन सात चक्रों को एक वर्ग योगी सात शरीर मानते है। (1) स्थूल शरीर फिजीकल बॉडी (2) सूक्ष्म शरीर ईथरीक बॉडी (3) कारण शरीर एस्टल बॉडी (4) मानस शरीर मेण्टल बॉडी (5) आत्मिक शरीर स्प्रिचुअल बॉडी (6) देव शरीर कास्मिक बॉडी (7) ब्रह्म शरीर डिवाइन बॉडी। प्रत्यक्ष शरीर आंखों से स्थूल रूप में देखा जाता है। इसके भीतर के अवयव छूकर या दूसरी प्रकार से जाने जाते है।

दूसरा शरीर वह है जिसमें विचारणाएं जन्म लेती है। राग देष मानापमान अपना पराया संतोष असंतोष मिलन- विछोह की कड़वी मीठी अनुभूतियाँ होती है। यह ईथरीक बॉडी जिसे थियोसोफीस्ट इथरीक डबल श् कहते है। व प्राणमय कोश के समतुल्य मानते है। जब कि वह इससे भी विस्तृत परिधि वाला क्षेत्र है। इसे ही बायोफलास के रूप में देखा व मापा जाता है। मेन विजिवल इनविजिवल के माध्यम से इसी की चर्चा लेडबीटर ने की है। इस आइडियोस्फियर भी कह सकते है।

तीसरा शरीर तर्क बुद्धि प्रज्ञा से संबंधित है। इसका विकास व्यवहार सभ्यता मान्यता अभिरुचि संस्कृति आदि से संबंधित है। मनस शरीर में कलात्मक रसानुभूतियाँ होती है। कोमल भाव संवेदनाएं जागती है। या भाव लोक है। करुणा दया उदारता आदर्शवादिता इसी शरीर में निवास करती है। चौथा शरीर मनस शरीर है। जिसमें महत्वाकांक्षाएं उभरती है और साहस- पराक्रम परिपक्व होता है। इसी आधार पर व्यक्ति अपने भविष्य का निर्माण करता है। इसके सुनियोजन से व्यक्ति महानता को एवं विकृत हो जाने से पतन को प्राप्त होता है।

पांचवां शरीर आत्मिक शरीर है। जो अतीन्द्रिय क्षमताओं का भांडागार है। अचेतन मन भी इसी सीमा में अपने पैर जमाये हुए है। छठे देव शरीर में ऋषि तपस्वी योगी संयमी बना जाता है भूसर के नाम से जाने ने वाले महामानवों का यही कार्यक्षेत्र सातवें शरीर में स्व पर का भेद मिट जाता है। आत्मवत् सर्वभूतेषु और वसुधैव कुटुम्बकम की भावना जागृत होती है। आत्म स्वरूप और ब्रह्म शरीर की अनुभूति होती है। स्वर्ग मुक्ति का क्षेत्र भी यही है।

शिवपुराण में महापराक्रमी शिव पुत्र स्कन्द या कार्तिकेय जन्म की विचित्र कथा आती है। असुरता के दमन व देव सत्ता की स्थिरता हेतु शिवजी को पुत्र जन्म की आवश्यकता अनुभव हुई। देवताओं की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया गया। शिवजी का रेतस अग्नि रूप में बाहर आया। पार्वती जी उसे धारणा करने में असमर्थ थी तो वैश्वानर ने नारी रूप धारण किया और अपने गर्भ में उस अग्नि रूप रेतस को स्थान दिया। स्कन्द जन्मे तो जन्मते ही उनका प्रचण्ड तेजस देखकर असमंजस हुआ कि पोषण कौन करे पार्वतीजी का अनुभव नहीं था। जब इस कार्य को छः कृतिकाओं ने संभाला। उन्होंने ही पालपोष कर इस पुत्र को बड़ा किया। छह कृतिकाओं का दूध पीने के लिए उनके छह मुँह उत्पन्न हो गये। इसलिए कार्तिकेय को षडानन भी कहते है। समर्थ होते ही दुर्दांत दैत्यों से उनने युद्ध किया व उन्हें परास्त कर देव शासन की स्थापना की।

इस स्कन्द अवतरण को कुण्डलिनी महाशक्ति से संबंधित षट्चक्र समूह व उसके भाव वर्णन ही संभावना चाहिए। रेतस शिव की कुण्डलिनी है। और उसे धारण करने के लिए अन्तराल की वैश्वानर सत्ता का आहवार करता है। षटचक्रों छः कृतिकाओं के रूप में दूध पिलाते और आत्मिक क्षेत्र का महापराक्रमी बनकर जागृत कुण्डलिनी वाला सिद्ध साधक देव प्रयोजनों की पूर्ति करता है।

मेरुदण्ड के सूक्ष्म भाग में अवस्थित इन चक्रों को बिजली के धारक ओर वितरक ट्रांसफार्मर्स की उपमा दी जा सकती है। जिनका काम रहस्यमय ऊर्जा को सूक्ष्म जगत से आकर्षित करके स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीरों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहना है। इन दिव्य शक्तियों का समन्वय पूज लोगस नाम से अंग्रेजी में जाना जाता है।

तंत्र विधान के अनुसार विश्व की प्रमुख शाक्त्यो को सात भागो में विभाजित किया गया है। पराशक्ति ज्ञानशक्ति इच्छाशक्ति क्रियाशक्ति कुण्डलिनी शक्ति मातृका शक्ति एवं रहस्य शक्ति। इन सबका एकीकरण ही गा्रण्ड यूनीफिकशन ऑफ फोसस नाम से जाना जाता है। जिस पर भौतिकी का अनुसंधान चल रहा है।

अध्यात्म शास्त्र में वर्णित सप्त लोक समुद्र द्वीप पर्वत आदि का वर्णन है भूगोल से इनकी संगति नहीं बैठती वस्तुतः यह अध्यात्म क्षेत्र का संरचना और क्षमता स्रोत का उल्लेख है। यह सात रत्न भंडारों की तिजोरी है। जिसमें वह सब कुछ भरा हुआ है। जिनकी प्रत्यक्ष और परोक्ष वह सब कुछ भरा हुआ है। जिनकी प्रत्यक्ष और परोक्ष जीवन में मनुष्य को आवश्यकता अनुभव होती है।


कुण्डलिनी के वशीभूत ब्राह्मी चेतना के क्रिया कलाप

मानवी काया में दिव्य सचेतन बिजली के भंडार भरे पड़े है। इनमें से जीवन यापन विद्या में थोड़ा ही प्रयुक्त होता है। खाने कमाने सोने नित्यकर्म विनोद आदि में इसका थोड़ा-सा ही अंश काम में आता है। अभ्यास के अनुरूप उतना ही भाग काम में लाने का अनुभव होता है। शेष सामर्थ्य है। तो सही पर प्रसुप्त स्थिति में यदि उसे जागृत करके सक्रिय सुनियोजित किया जा सके तो उससे इतने अधिक और इतनी विविधता भरे महान कार्य सम्पन्न होते रह सकते है। कि उन्हें आश्चर्यजनक स्तर तक विकसित हुआ देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों की गतिविधियां और विभूतियां इतनी विलक्षण होती है जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। साधारणतया समग्र शरीर और मस्तिष्क में संव्याप्त विद्यात् शक्ति का मात्र सात प्रतिशत भाग ही व्यस्त लोगों के दैनंदिन जीवन में प्रयुक्त होता है। इसके अतिरिक्त जो भाग शेष रह जाता है उस अविज्ञात को कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया के माध्यम से सक्षम बनाया जाता है इस भंडार में से जो जितना कुरेद लेता है। बटोर लेता है। वह उतना ही सुसम्पन्न बन जाता है।

वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है। कि मानवी मस्तिष्क की संरचना अत्यन्त जटिल है। उसमें प्रत्येक न्यूरान करीब 60000 सिनेप्सो से जुड़ा रहता है। एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरान को सब संकेत 360 मील प्रति घंटे की गति से मिलते है। फिर वे अपने स्थान पर आ जाते है। ये संकेत मस्तिष्कीय विद्युत शक्ति से मिलते है। स्वीडन के जीव विज्ञानी होलडर के अनुसार इस विद्युत से ही चिन्तन कोशिकाएं ज्ञान तन्तुओं के लिए संवेदनशील बनती है। प्रतिभा पराक्रम एवं विवेक का जागरण इन्हीं कोशिकाएँ की स्फुरणा का परिणाम है।

सुविख्यात मनीषी वैज्ञानिक आइन्स्टीन के अनुसार मानव स्मृति कोश में 200 अरब सूचनाएं संग्रहित करने की शक्ति होती है। जो एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के तीस वाल्यूम में अंकित कुल सूचनाओं का पांच गुना है। दस अरब न्यूरान्स एवं दस खरब सिनेप्स समूहों से बिना मस्तिष्क अद्भुत विलक्षणताओं का भण्डार और एक जादूई पिटारा है। डॉ. डी सी रीफ एल एच स्नीडर डॉ. विलियम होरविज डॉ. मार्टिन डबलू बार आदि अनेक वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ मस्तिष्क की विलक्षणता से चकित होकर कहते है। ऐसा सुपर कंप्यूटर बना पानाप मानव के बस की बात नहीं।

किन्हीं किन्हीं में अद्भुत विलक्षण प्रतिभा की झलक बाल्यकाल में ही दीखने लगती है। यह जागृत कुण्डलिनी की ही चमत्कृति है। आचार्य शंकर ने तीन वर्ष की आयु में मातृभाषा मलयालम सीख ली थी। माता पिता से सुन सुन कर पुराणादि के विशिष्ट प्रसंग याद कर लिए थे। पांच वर्ष की आयु में उनका यज्ञोपवीत संस्कार करा के विद्यमान के लिए भेजा गया। सात वर्ष के होते होते उन्होंने वेद वेदान्त वेदांगों का पूर्ण अध्ययन कर लिया था आठ वर्ष की अवस्था में संन्यास दीक्षा ले ली। कुछ ही दिनों में वे सिद्ध योगी हो गये। 24 वर्ष की आयु तक वे वे प्रमुख भाष्य आदि का लेखन पूरा कर चुके थे।

भारतीय संस्कृति का पुरातन इतिहास इस तथ्य का साक्षी है। कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में ऋषिगण जीवन के प्रारम्भ से ही अग्रगामी रहे है। ऐसे अनेक आख्यान पढ़ने को मिलते है। जो जागृत अविज्ञात सम्पदा की फलश्रुतियों की एक झलक दिखाते है।

हो सकता हैं किन्हीं को इन आख्यानों में अतिश्योक्ति जान पड़े। पर ऐसे आधुनिक उदाहरण भी हमारे सामने है। गाहमबेल ने 20 वर्ष की आयु में टेलीफोन का और बिल्वरराइट ने वायुयान का 32 वर्ष में आविष्कार किया। एली हिवटली ने 24 वर्ष में कपास ओटने की मशीन और ब्लेस पास्कल ने 32 वर्ष में परिकलन यंत्र प्रथम बार बनाया जेम्सक्रिस्टन ने 22 वर्ष की आयु में अरबी ग्रीक यहदी तथा फलैमिश सहित विश्व की अनेक भाषाएं सीख ली थी। गिनीज बुक ऑफ वर्ड रिकार्ड्स में इन सभी का एक कीर्तिमान के नाते उल्लेख है।

प्रसिद्ध कवि गेटे ने 24 वर्ष प्रसिद्ध काव्य थॉट्स इन द डिस्टेटो आव जीसस काइस्ट इन टू हैल लिखा। विक्टरह्यूगो ने 24 वर्ष की आयु तक तीन हजार कविताएं लिखी। संत ज्ञानेश्वर ने 25 वर्ष में प्रसिद्ध ज्ञानेश्वरी गीता पर लिखा। सिकन्दर 20 वर्ष में विश्व विजय के लिए निकला था। मुगल सम्राट अकबर ने 26 वर्ष में गद्दी को भली भांति संभाला और काफी ख्याति पाई। सम्राट अशोक 20 वर्ष में और शिवाजी 22 वर्ष में गद्दी पर बैठे थे।

कुण्डलिनी विज्ञान का अनुसंधान विवेचन वस्तुतः प्रसुप्त की जागति का विज्ञान ही है। यदि ऐसा योग साधना उपचारों द्वारा सम्भव हो सके तो शारीरिक बलिष्ठता और मानसिक प्रतिभा असाधारण रूप से बढ़ाई जा सकती है। शौर्य पराक्रम साहस जैसे गुण और स्फूर्ति तत्परता तन्मयता सुभबुभक्त का स्तर इतना असामान्य हो सकता है। कि उसके माध्यम से किये गए क्रिया कलाप बहुमुखी सफलताएं अपनी ओर खीचते घसीटते चले जाते है।

मनुष्य की आकृतियों तो लगभग एक जैसी होती है। पर उनकी प्रकृति में इतना पाया जाता है। कि उसे देखकर हतप्रभ रह जाना पड़ता है। कितने ही लोग हाथ पैर सिर सही होने पर भी गई गुजरी अनगढ़ स्थिति में पड़े रहते है। ओर ज्यों त्यों करके जीवन की गाड़ी धकेलते है। किन्तु वैसे ही परिस्थितियों में जन्में तथा पले व्यक्ति अपने विकसित मनोबल के कारण ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर लेते है। जिनमें सफलताओं को श्रेय पर्वत जितना जमा हो जाता है। वे प्रतिकूलताओं के बीच रहते है। पर उन्हें अनुकूल बनाने में देर नहीं लगती। उनका बढ़ा हुआ मनोबल ऐसी रहा सकता है। जिस पर चलते हुए लम्बे लक्ष्य को सरलतापूर्वक पार किया जा सके और मार्ग के व्यवधानों को कुचलते हुए अभीष्ट केन्द्र तक सरलतापूर्वक पहुंचा जा सके। यह जागृत मन शक्ति का ही चमत्कार है।

शरीर पर मन असाधारण प्रभाव होता है। प्राण विद्युत की पर्याप्त सप्लाई न हो पानं है स्थिति में हमारे शरीर के सभी क्रिया−कलाप ढीले और धीमे पड़ जाते है। इसका परिणाम रुग्णता और दुर्बलता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इस कठिनाई को हल करने के लिए आमतौर से औषधि उपचार का प्रचलन है किन्तु देखा गया है। कि भूल कारण का निवारण न होने पर औषधियों के दबाव से रोग अपना स्वरूप भर बदलते रहते है। एक से दूसरी शकल बना लेते पर पीछा नहीं छोड़ते इस व्यथा से पूरी तरह मुक्त होने के लिए शरीरगत विद्युत भंडार को बढ़ाया और रुग्ण अवयवों पर उसका प्रयोग किया जाय तो उसका आशातीत प्रभाव हो सकता है।

मन लोभ मोह के विचारो वासना तृष्णा की धमाचौकड़ी से खाली रहे तो मनुष्य प्रतिभावान तेजस्वी एवं अग्रगामी महामानवों में गिना जा सकने योग्य ताना बाना बुन सकता है। ऐसे व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में भी साधनों और सहयोगियों का अभाव होते हुए अपने व्यक्तिगत चुम्बकत्व द्वारा जो आवश्यक है। उसे निखिल ब्रह्मांड में से अपने लिए खींच बुलाते है। ऐसे तेजस्वी व्यक्ति अपने बलबूते आगे बढ़ते है। और बास की तरह झुरमुट बनाते हुए असाधारण ऊंचाई तक जा पहुंचते है। यह उनकी आन्तरिक जीवट का प्रतिफल है। इसी को कुण्डलिनी कहते है इसके जागृत होने पर मनुष्य निर्भय और निश्चिन्त बन जाता और कठिनाई समस्याओं और आक्रमणों के विरुद्ध इस प्रकार लोहा लेता है। मानो उसे खेल के मैदान में कला कौशल भर दिखाना है।

इन्द्रिय शक्ति सर्वविदित है। हाथ पाव आंख कान जिह्वा आदि से सभी काम लेते है पर इनमें एक अदृश्य परत भी है। जैसे कि शरीर के अंतर्गत अदृश्य प्राण प्राण को हम प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करते तो भी उसके अस्तित्व से इन्कार नहीं कर सकते इसी प्रकार इंद्रियों के सामान्य किया कलाप के अतिरिक्त बहुत कुछ उच्चस्तरीय कर गुजरने की जानने समझने की क्षमता कहते है। यह सर्व साधारण में दृष्टिगोचर नहीं होती पर जिनकी अन्त क्षमता प्रस्फुटित हो उठती है उनकी अतीन्द्रिय क्षमता भी काम करती है।

पूर्व जन्मों की स्मृति अपना ओर दूसरों का भविष्य ज्ञान दूरवर्ती घटनाओं की बना माध्यम के जानकारी अपने विचार दूसरों तक पहुंचाना दूसरों के विचार एवं उद्देश्य संभव लेना आदि बातें अतीन्द्रिय क्षमता के अंतर्गत ही आती है। उन्हें परामनोविज्ञान क्षेत्र में मान्यता मिली है। और संसार भर में इस स्तर के अनेकों प्रमाण उपलब्ध हुए है। योग विज्ञान के अनुसार कुंडलिनी साधना की सहस्रार चक्र पर असाधारण प्रतिक्रिया होती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के दिव्य संस्थान अपनी मूर्छना छोड़ कर सक्रिय बनते है। और वह देखने सुनने जानने लगते है। जो साधारण स्थिति में असम्भव ही लगता है। अन्तरिक्ष की असंख्यों हलचलों को ध्वनियों एवं प्रकाश किरणों को हमारी भौंड़ी इन्द्रिय क्षमता देख समझा नहीं पाती। काम चलाऊ मोटी जानकारियाँ दे सकने के स्तर पर ही उनका निर्माण हुआ। यदि अतीन्द्रिय क्षमता विकसित की जा सके तो सृष्टि के रहस्यों को अविज्ञात को समझ सकना योगाभ्यासी सिद्ध पुरुषों की भांति ही सम्भव हो सकता है। ये कभी कभी किन्हीं किन्हीं में पूर्वजन्मों के संचित संस्कारों के कारण जागी हुई पाई जाती है। कुछ इसे साधना पुरुषार्थ से पा लेते है।

कुण्डलिनी साधना से प्राप्त अतीन्द्रिय सामर्थ्य के प्रामाणिक उदाहरण भारतीय धर्म इतिहास में अच्छी खासी संख्या में देखने का मिलते है।

संजय राजमहल में बैठे - बैठे ही महाभारत के प्रत्येक मोर्चे की छोटी से छोटी घटना भी धृतराष्ट्र का सुनाते थें

चैतन्य महाप्रभु न भगवान कृष्ण की लीलाभूमि को दिव्य दृष्टि से देख लिया था। वे बंगाल से चलकर वृन्दावन पहुंचे और वहां तीर्थ की स्थापना की।

जिन दिनों स्वामी विवेकानन्द इंग्लैंड में थे उन्हीं दिनों जमशेद जी टाटा लोहे का कारखाना लगाने की स्वीकृति लेने वहां गये थे। स्वामी जी से मिल तथा कहा कोई ऐसा स्थान बतलाये जहां लोहे खनिज कोयला और पानी यह तीनों चीजें पर्याप्त मात्रा में मिल सके। स्वामी जी ने दिव्य दृष्टि से देखकर बतलाया कि बिहार के सिह भूमि जिले में साकनी नदी के किनारे फैक्ट्री डालना ठीक रहेगा। वहां आस पास सभी आवश्यक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में मिल।

शरीर क्षेत्र और मन क्षेत्र में अनेक प्रकार के चक ग्रंथि समुच्चय प्लेक्सस नाड़ियां के दिव्य प्रवाह मौजूद है। इनमें से कुछ स्थूल शरीर में होते है। कुछ सूक्ष्म और कारण शरीर में इन्हीं को जागृत करने के लिए अनेक स्तर की तपश्चर्याएं तथा योग साधनाएं की जाती है। यह कार्य स्व उपार्जन की विधि अपनाने पर समय साध्य और कष्ट साध्य है। किन्तु यदि स्थूल शरीर की भांति सूक्ष्म शरीर एवं कारण शरीर के अंग प्रत्यांगों को जागृत करने में किसी की सहायता मिल सके तो लम्बी साधना करने की अपेक्षा स्वल्प साधना से ही वे लाभ मिल सकते है। जिन्हें सामान्य नहीं समझा जा सकता।

ऊपर की पंक्तियों में केवल उन तथ्यों की चर्चा की गई है। जो शरीर और मन की परिधि में है। जिन्हें समुन्नत करने से कुण्डलिनी साधना में सफलता का असाधारण सुयोग मिलता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मांडीय चेतन और बहम चेतना के दो क्षेत्र और भी रह जाते है। उन्हें सशक्त करने में आत्म विद्युत की तरंगें बड़े काम आ सकती है।

ब्रह्मांडीय चेतना प्रकृति को कहते हैं। शास्त्रकारों ने इसे माया नाम दिया है। इसी की हलचलें इस सृष्टि के सारे क्रिया कलापों को संचालित करती एवं व्यवस्थित रखती है। वैज्ञानिकों ने इस प्रकृति चेतना की उथली परतों को खोलकर अनेक प्रकार के आविष्कार किये है। पर जो क्षेत्र अभी तक पाया जा सकता है। उसे पर्वत की तुलना में राई भर हाथ लगने के समतुल्य समझा जा सकता है। अभी जानने को बहुत कुछ शेष है। उसे सम्भवत यंत्र उपकरणों की सहायता से बुद्धि की घुड़दौड़ से उपलब्ध न किया जा सकेगा। इसलिए मनुष्य की जागृतचेतना का स्तर इतना सूक्ष्म होना चाहिए जो प्रकृति के अन्तराल को पारदर्शी काच की तरह देख समझ सकें यह स्तर कुण्डलिनी क्षेत्र में प्रचण्डता उत्पन्न करके हस्तगत किया जा सकता है।

संतानोत्पादन की एक शाखा ऐसी है जो यौनाचार तक सीमित न रहकर गुण सूत्रों एवं जीन्स घटकों तक चली जाती है। जेनेटिक्स के नाम से यह विज्ञान की शाखा जानी जाती है। साधारणतया पशु प्राणियों की तरह मनुष्य भी बच्चे जनता रहता है। पर उनके अन्दर उच्चस्तरीय विशेषताएं उत्पन्न कर सकना मनुष्य के वश की बात नहीं त्वचा का रंग एवं चेहरे की आकृति से ही अभिभावकों की स्थिति झलकती है। किन्तु शिशु का अन्तराल कैसा होना चाहिए उसके व्यक्ति में स्किन विशेषताओं का समावेश होना चाहिए इसका निर्धारण कर सकना सामान्य मनुष्य के बलबूते की बात नहीं है। किन्तु जागृत कुण्डलिनी इस मनोकामना को पूर्ण कर सकती है। इस कथन के प्रमाण स्वरूप साधना बल से सूक्ष्म अदृश्य देव शक्तियों के आकर्षण द्वारा बिना किसी प्रकार के शरीर संपर्क के गर्भाधान और प्रतिभाशाली पुत्र जन्म की अनेक घटनाएं भारतीय पुराणों में देखी जा सकती है।

कुन्ती ने सूर्य की शक्ति से कर्ण धर्मराज से युधिष्ठिर वायु से भीम एवं इन्द्र से अर्जुन दिया था। सह पत्नी मादी को भी वह विद्या सिखाई थी उसने अश्विनी कुमारों की शक्ति से नकुल सहदेव को जन्म दिया था। इसी प्रकार माता अंजनी ने भी वायु देव की शक्ति से पवन पुत्र हनुमान जी को उत्पन्न किया था। जैनेटिक इंजीनियरिंग के वे प्रयोग जो आज इक्कीसवीं सदी का विज्ञान करता देखा जाता है। इन घटना प्रसंगों के समक्ष बोने नजर आते है। यही नहीं विशिष्ट आध्यात्मिक प्रयोगों से असाधारण क्षमता सम्पन्न संतति पैदा करने के प्रयोग पुराण काल में खूब हुए है। राम आदि चारों भाई तो पुत्रेष्टि प्रयोग से हुए ही थे। द्रुपद ने भी यज्ञ प्रयोग से द्रौपदी और धृष्टद्युम्न पैदा किए थे। द्रौपदी सौंदर्य विवेक शौर्य सभी क्षेत्रों में असाधारण थी। धृष्टद्युम्न महाभारत में पाण्डव सेना के प्रधान सेनापति थे।

वृत्तासुर का जन्म भी यज्ञ के तंत्र प्रयोग से हुआ था उसके शरीर पर किसी अस्त्र−शस्त्र का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता था आध्यात्मिक साधना से अनुप्राणित ऋषि दधिचि की हड्डियों से बने वज्र से ही उसे मारा जा सका था। प्राणवान वातावरण में साधना द्वारा जागता प्रचण्ड जैव विद्युत गर्भस्थ शिशुओं में विलक्षण प्रतिभाएँ जागृत कर देती है। इसी आधार पर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव कुश महर्षि कण्व के आश्रम में भरत महर्षि जमदग्नि के आश्रम में वत्सराज उदयन आदि अद्भुत प्रतिभा लेकर जन्मे विकसित हुए।

ब्रह्मांडीय चेतना का प्रकृति का एक परम्परागत ढंग लुढ़क रहा है। उसमें सीमित या व्यापक परिवर्तन कर सकने की क्षमता ब्रह्मांडीय चेतना के स्पर्श एवं उलट-पुलट से सम्भव है। इस प्रकार मनुष्य चाहे तो अपनी अध्यात्म ऊर्जा के सहारे ब्रह्मांड की भूगोल की परिस्थितियों में आवश्यक एवं उपयोगी परिवर्तन कर सकता है। ब्रह्मांडीय चेतना उससे बहुत बड़ी सीमा तक प्रभावित हो सकती है।

दक्षिणेश्वर में प्रकृति पर चेतना के प्रभाव की चर्चा चल रही थी एक भक्त बोले के प्रकृति के स्वभाव से एक पौधे में एक ही प्रकार के फूल लगते है। पर क्या चेतना के प्रभाव से दो तरह के भी उग सकते है। परमहंस जी ने कहा है।

दूसरे दिन जब भक्त आये तो उन्हें बगीचे में एक ही डाली पर गुलाब के दो फूल एक लाल एक सफेद खिले दिखे। आश्चर्य में भरे हुए वे परमहंस जी के पास पहुँचे तो वे मुस्कुरा भर दिए। शक्ति सम्पन्न महापुरुषों के लिए यह एक सामान्य उपक्रम है। पर जन सामान्य को चेतन सत्ता की सामर्थ्य का विश्वास दिलाने के लिए ही वे कभी कभी ऐसे प्रयोग करते है। यह प्रदर्शन के लिए नहीं होता न ही होना चाहिए।

भागीरथ जी द्वारा तपशक्ति से स्वर्ग में प्रवाहित गंगा को पृथ्वी पर प्रवाहित करने का सर्वविदित आख्यान प्रकृति गत चेतना से तादात्म्य व उस पर मानवी चेतना के अधिकार का सूचक है। अत्रि पत्नी अनुसूया जी ने चित्रकूट क्षेत्र में सुरसरि की एक मंदाकिनी रूप में अपने तपोबल से प्रवाहित की थी। ये प्रसंग यहां उस विज्ञान की महत्ता समझाने के लिए दिये गये है। जिसे साधारणतया प्रत्यक्षवादी नकारते देखे जाते हैं। ये सारे प्रकृतिगत परिवर्तन आज भी संभव हैं।

ब्राह्मीचेतना परमात्म सत्ता को कहते हैं। वह सृष्टि का अधिपति है। इतना ही नहीं उसने प्रकृति का और अपना निज का समूचा ढांचा मानवी काय कलेवर में समाहित कर रखा है। जो ब्रह्मांड में है। सो पिंड में मौजूद है। जो परमात्मा में है। उसे आत्मा में देखा और पाया जा सकता है।

परब्रह्म अकेला एक व्यक्ति जैसा नहीं है। उसके साथ स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर की अगणित आत्माएं जुड़ी हुई है। इनमें से कुछ का स्तर अति साधारण है। कुछ का प्रमुख देव शक्तियों जैसा पर सभी स्वच्छन्द नहीं है। ब्रह्म के साथ वे उसी प्रकार जुड़ी हई है। जस प्रकार की धागे में माला के मनके गुंथे होते हैं। बिजली अपने तारों के टेड़े–मेड़े मोड़ों को पार करती हई संबद्ध समूचे तन्तु जाल में बिखर जाती है। इस बनावट के किसी भी कोने में विद्युत की उपस्थिति देखी जा सकती है। और अभीष्ट प्रयोजनों में काम लाई जा सकती है। इस प्रकार कुण्डलिनी न केवल ब्रह्मांडीय चेतना के हर क्षेत्र के साथ सम्बन्ध जोड़ सकती है। वरन् परमात्मा के साथ जुड़े हुए हर स्तर की आत्मा के साथ आवश्यकतानुसार अपने सम्बन्ध बना सकती है। यह सम्बन्ध स्थापन निरुद्देश्य नहीं होते उसके पीछे महत्वपूर्ण कारण रहते है। ओर वे इस सम्बन्ध सूत्र के सहारे पूरे भी होते है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। यदि साधक प्रकृति और परमेश्वर के प्रत्येक घटक के साथ अपना संबंध जोड़ लेता है। ओर उस अनुबन्ध के सहारे उपयोगी कृत्य करता है। तो उसे ऐसा ही समझा जा सकता है। जैसा कि ईंधन आग के साथ जुड़कर अग्नि रूप हो जाता है।

एक्सचेंज की मारफत टेलीफोन का कनेक्शन किसी नगर किसी व्यक्ति से मिलाया जा सकता है। इसी प्रकार ब्रह्म चेतना के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेने पर विश्व के किसी भी व्यक्ति या प्राणी तक अपना संदेश संकेत विदान वह है जिसने आत्मज्ञान पाया और अपने को उत्कृष्ट बनाया अहंकारी से मनुष्य राक्षस बनते है। सज्जनता और नम्रता के बलबूते ही मनुष्य देवत्व से अलंकृत है।

अनुरोध आग्रह पहुँचाया जा सकता है। और साथ ही उसकी क्षमता या इच्छा के अनुरूप उतर भी पाया जा सकता है ब्रह्म संस्थान ब्रह्ममय है। यहीं पर सहस्रार कमल अवस्थित है। इसे उतरी ध्रुव भी कहा जाता है। ब्रह्मांडीय चेतना प्रकृति शक्ति का शरीर में अवस्थित क्षेत्र मूलाधार चक्र है। विद्युत प्रसारण का मूल केन्द्र इसी को माना गया है मूलाधार और सहस्रार को परस्पर देवयान मार्ग से मेरुदण्ड जोड़ता है। यह ब्रह्मदंड भी है। षटचक्रों एवं इड़ा पिंगला सुषुम्ना का त्रिवेणी संगम भी यही है। कुण्डलिनी महाविज्ञान का यह सारा ऊहापोह इस चिर पुरातन विद्या की महत्ता एवं साधना पराक्रम से अप्रत्याशित को भी कर दिखाने चेतना पर नियंत्रण स्थापित कर सकने की मानवी सामर्थ्य का रहस्योद्घाटन करता है।


कुल कुण्डलिनी देवि कन्दमूल निवासिनी

कुण्डलिनी शक्ति की तुलना विद्युत शक्ति ऊर्जा एवं आभा से की गई है। तडिल्लता समरुचिवि द्यूल्लेखे़त्र भास्वरा सूत्र में उसे बिजली की लता रेखा जैसा ज्योतिर्मय बताया गया है। इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर उसका उल्लेख तडिल्लेखा तन्वी तपनशशि वैश्वानरमयी के रूप में किया गया है। अर्थात्- वह प्रचण्ड अग्निशिखा एवं दिव्य वैश्वानर अग्नि के समतुल्य है। योग कुंडल्योपनिषद् में कहा गया है:-

मूलाधारस्य ब्रहमायात्म तेजो मध्ये व्यवस्थिता। जीवशक्ति कुण्डलाख्या प्राणाकाराय तैजसी॥

मूलाधार के मध्य वह आत्मतेज ब्रह्मतेज रूपी कुण्डलिनी निवास करती है। वही जीवनी शक्ति है। तेजरूप है। एवं प्राण शक्ति है।

इसी प्रकार महायोग विज्ञान में उल्लेख आता है मूलाधार चक्र में आत्म-ज्योति अग्नि रूप दीखती है। स्वाधिष्ठान चक्र में वह प्रवाल अंकुर-सी प्रतीत होती है मणिपूर में विद्युत जैसी चमकती है। नाभिचक्र में वह तड़ित सम प्रकाशवान् है। हृदय कमल के अनाहत चक्र में वह लिंग आकृति की कंठ चक्र में श्वेत वर्ण की तालू चक्र में शुनरुाकार एकरस अनुभूत होती है। भू चक्र में अंगूठे के प्रमाण जलती दीप शिखा-सी भासती है। आज्ञा चक्र में धमशिखा जैसी और सहस्रार चक्र में चमकते परशु-सी दीखती है।

प्रस्तुत अलंकारिक व्याख्या कुण्डलिनी महाशक्ति की विद्युतमयी सत्ता की एक झांकी देती है। वैसे वैज्ञानिक प्रतिपादनों व प्रमाणों के आधार पर हम कुंडलिनी को मानवी विद्युत का प्रचंड अंश कह सकते है। बारूद फुलझड़ी जलाने के काम भी आती है। और डाइनामाइट की तरह पहाड़ों के परखच्चे भी उड़ा देती है। मानवी विद्युत का हलका अंश चेहरे या शरीर के इर्द गिर्द फैले हुए तेजोवलय जैसे रूप में भी देखा जा सकता है। और उसका प्रचण्ड रूप तृतीय नेत्र आज्ञा चक्र खोलकर शिव द्वारा काम देव जला देने जैसा विस्फोट भी कर सकती है। दमयंती के शाप से व्याध भस्म हो सकता है। सगर राजा के हजारों उदत पुत्र जलकर भस्म हो सकते है। गौतम के कोप से इन्द्र ओर चन्द्रमा जैसों की दुर्गति हो सकती है। यादव कुल दुर्वासा के शाप से पारस्परिक कलह में नष्ट हो सकता है।यही प्रचण्ड रूप धारण करने वाली मानवी विद्युत कुण्डलिनी है। प्रकारान्तर से उसे आध्यात्मिक डाइनामाइट कह सकते है। साधारण ऊर्जा मनुष्य के कण कण में विद्यमान है। वह मस्तिष्क हृदय और जननेन्द्रिय मूल में विशिष्ट मात्रा में पाई जाती है। इन तीन अग्नियों को ही वैदिक भाषा में अहितग्नि दक्षिणग्नि गाहपत्याग्नि तीन अग्नियों के नाम से जाना जाता है। यही महाकाली महाचंडी ओर महादुर्गाएं है। सामान्य ऊर्जा दो व्यक्तियों के सान्निध्य से दीर्घप्राण वाले का प्रभाव स्वल्प प्राण वाले पर डालती है। सत्संग ओर कुसरा के रूप में इसका भला बुरा प्रभाव होता है। नर नारी का संयोग इसी ऊर्जा का क्रीड़ा कल्लोल पक्ष है। तपसी इसी योगाग्नि पर तपश्चर्या करते थे जठराग्नि भोजन पचाती और उसे वीर्य स्तर तक ले पहुँचती है। कामाग्नि से पीड़ित नर नारी दीपक की चमक पर पतंगे की तरह जल मरते है। वाणी की अग्नि शत्रु मित्र बनाती शाप वरदान देती रहती है। ओजस तेजस एवं वर्चस का आलोक व्यक्ति की प्रतिभा में फूटता हुआ परिलक्षित होता है। ब्रह्माग्नि सहस्रदल कमल में रहती है और आत्मा को परमात्मा का दर्शन कराती है। हृदय की भावाग्नि दया करुणा मैत्री सेवा आदि के रूप में प्रस्फुटित होती है। कालाग्नि मरण का निमित्त कारण बनती है। मदाग्नि से मनुष्य आलसी ओर रोगी बन जाता है।? ऐसी अनेकों अग्नियों शरीर में है। प्राकृत अग्नि विज्ञान ऐसी 13 अग्नियों का वर्णन करता है। उनके अपने प्रभाव है। इनमें से प्राणाग्नि कुण्डलिनी है। जिसके कारण जीवनी शक्ति जीवट और हिम्मत मनुष्य में फुट फूट कर भरी रहती हैं यह माना गया है। कि यह प्रसुप्त ऊर्जा स्रोत मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में 6 तालों की तिजोरी में बन्द है। ये 6 ताले ही षट्चक्र है। जो भंवर नाड़ी गुच्छक अथवा विद्युत प्रवाह के रूप में काया में अवस्थित है। शास्त्रकारों ने चक्रों एवं कुण्डलिनी की अपनी अपनी तरह से अलंकारिक व्याख्याएं की है।

शाम्भवी तंत्र का कथन है। जिस प्रकार ताली से ताला खोलकर घर में प्रवेश किया जाता है। उसी प्रकार कुण्डलिनी जागरण के उपरान्त मनुष्य सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्मलोक पहुंचता है। तैत्तरीय आरण्यक में चक्रों को देवलोक कहा गया है। सौंदर्य लहरी में इस महाशक्ति की व्याख्या करते हुए आद्य शंकराचार्य ने आज्ञाचक्र तथा सहस्रार को ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधि माना है। तथा षट्चक्र वेधन करने पर कैसे कुण्डलिनी शक्ति ब्रह्मलोक तक पहुंचती व परब्रह्म से विहार करती है। इसका वर्णन इस प्रकार किया है।

मही मूलाधार कमपि मणिपूरे हतवहं स्थित स्वाधिष्ठाने हदि मरुतमाकाशमुपरि। मनोअपि भू्रमघ्ये सकलमपिभित्वा कुल पर्थ सहस्रार पदम सहरहसि पत्या विहरसि॥

अर्थात् है। कुण्डलिनी तुम मूलाधार में पृथ्वी को स्वाधिष्ठान में अग्नि को मणिपूर में जल को अनाहत में वायु को विशुद में आकाश को वेधन करती हई आज्ञाचक्र में मन को प्रकाश देती हो योगदर्शान के समाधि पाद सूत्र 36 में कहा गया है। विशोका ज्योतिष्मती उनका यह संकेत कुण्डलिनी की और है। कि इस ज्योतिष्ती के प्रकाशवान होने पर मनुष्य दुख शाको से छूट जाता है।

तैंतीस या तैंतीसकोटि देवताओं की हिंदू धर्म में मान्यता है। यह मेरुदंड में पाये जाने वाले 33 धटकों या गृटकों की और संकेत है। इन खंडों को कशेरु या र्वाटबी कहते हैं। मेरुदण्ड आकृति में सर्पाकार है। प्रत्येक दो कशेरु के मध्य में एक मास निमित्त गद्दी-सी रहती है। जिस पर प्रत्येक कशेरु टिका और सूत्रों से कसा हुआ है। इसी कारण यह अपनी धुरी पर हर दिशा में धुम सकता है। उसे पांच भागो में बाटा जा सकता है। 1 ग्रीवा सरवाइकल कशेरु 2 पीठ थोरक्स कशेरु 3 कटिप्रदेश लम्ब्र कशेरु 4 वस्तिगहवर त्रिक प्रदेश सेक्रल कशेरु 5 पुच्छिकास्थ्चिंचु काक्सीक्स कशेरु। इन तैंतीस खंडों में सन्निहित क्षमता को देवोपम माना गया है।

मेरु दण्ड पोला तो है पर ढोल की तरह खोखला नहीं उसमें मस्तिष्कीय मज्जा भरी हुई प्रत्येक कशेरु के पिछली और दायें बायें अर्धवृत्ताकार छिद्र होता है। जिसमें से छोटे नाड़ी सूत्रों से निमित्त बड़ी नाड़ियां बाहर निकलती है। मेरुदण्ड का निचला भाग शंकु के आकार का है। जिसे फाइलमत टमानेल कहते हैं।

चंचु प्रदेश के कशेरु जितने छोटे है उतने ही चौड़े है। वे अन्दर से पोले भी नहीं है। और एक दूसरे से जुड़े हुए है। ये चार कशेरु मिलकर अण्डे की आकृति वाला अथवा फूल की कली के सदृश आकार बनता है। इसे काक्सीक्स कहते है। इस गोलक को कुण्डलिनी योग में कन्द एवं स्वयं भू लिंग के नाम से पुकारा गया है।

क्षेत्रों के हिसाब से चक्रों का क्रम इस प्रकार है। 1 चंचु प्रदेश मूलाधार 2 त्रिक प्रदेश स्वाधिष्ठान 3 कटि प्रदेश मणिपूर 4 वक्षस्थल अनाहत 5 गीवा विशद चक्र। मेरुदण्ड यही समाप्त हो जाता है। आज्ञाचक्र मस्तिष्क के अग्रभाग में है। और सहस्रार मस्तिष्क के बीचों बीच।

चक्र वेधन चक्र शोधन चक्र परिष्कार चक्र जागरण आदि नामों से इन्हीं गुह्य केंद्रों की क्षमता को प्रकट करने का प्रयत्न किया जाता है।

यहाँ एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि अध्यात्म शास्त्र में शरीर विज्ञान को विशुद्ध रूप से सूक्ष्म विद्या के रूप में माना जाता है। स्थूल शरीर में तो उसकी प्रतीक छाया ही देखी जा सकती है। कभी किसी शारीरिक अंग को सूक्ष्म शरीर से नहीं जोड़ना चाहिए। मात्र उसे प्रतीक प्रतिनिधि भर मानना चाहिए। शरीर के किसी भी अवयव विशेष में वह दिव्य शक्तियाँ नहीं है। जो आध्यात्मिक शरीर विज्ञान में वर्णन की गई है। स्थूल अंगों से उन सूक्ष्म शक्तियों का आभास मात्र पाया जा सकता है।

मूलाधार शब्द के दो खंडों है। मूल आधार मूल अर्थात् जड़ बेस आधार अर्थात् सहायक सपोर्ट जीवन सत्ता का मूल भूत आधार होने के कारण उस शक्ति संस्थान को मूलाधार कहा जाता है। वह सूक्ष्म जगत में होने के कारण अदृश्य है। अदृश्यों को प्रतीक चिन्ह प्रत्यक्ष शरीर में भी रहता है। जैसे दिव्य दृष्टि के आज्ञाचक्र को पिट्यूटरी और पीनियल रूपी दो आंखों में काम करते हुए देख सकते है। ब्रह्मचक्र के स्थान पर हृदय को गतिशील देखा जा सकता है। मूलाधार सत्ता को मेरुदण्ड के सकेकल प्लेक्सस में देखा जा सकता है। अपनी चेतनात्मक विशेषताओं के कारण उसे वह पद एवं गौरव प्राप्त होना हर दृष्टि से उपयुक्त है। प्राण का उद्गम मूलाधार है। पर उसका विस्तार व्यवहार और वितरण तो मेरुदण्ड माध्यम से ही सम्भव होता है।

मूलाधार के कुछ ऊपर और स्वाधिष्ठान से कुछ नीचे वाले भाग में शरीर शास्त्र के अनुसार प्रोस्टैटे ग्लेण्ड है शुक्र संस्थान यही होता है। इसमें उत्पन्न होने वाली तरंगें काम प्रवृत्ति बन कर उभरती है। इससे जो हारमोन उत्पन्न होते है। वे वीर्योत्पादन के लिए उत्तरदायी होते हैं। स्त्रियों का गर्भाशय भी यही होता है। सुषुम्ना के निचले भाग में लम्बर और सेक्रल प्लैक्सस नाड़ी गुच्छक है। जननेंद्रियों की मूत्र त्याग तथा कामोत्तेजन दोनों क्रियाओं पर इन्हीं गुच्छाओं का नियन्त्रण रहता है। यहां तनिक भी गड़बड़ी उत्पन्न होने पर इनमें से कोई एक अथवा दोनों ही क्रियाएँ अस्त व्यस्त हो जाती है। बहुमूत्र नपुंसकता अति कामुकता आदि के कारण प्रायः यही से उत्पन्न होते है। सारी जीवनोपयोगी प्रेरणाओं को केन्द्र यही स्थान है। जिसे कन्द कुण्ड या कामबीज कह सकते हैं। कन्द का एक नाम कूर्म भी है। इसे कच्छपावतार का प्रतिनिधि माना गया है। उसे पैरों को सिकुड़ने फैलाने के कारण वहाँ से निस्सृत शक्तिधाराओं का प्रतीक माना गया है। कन्द की आकृति एक अण्डे के समान मानी गयी है। उसे हाथ पाव सिकोड़े कछुए है उपमा भी दी गई है। समुद्र मथन की कथा में रइ्र मदिरांचल पर्वत के नीचे ही भगवान कूमावतार के रूप में कच्छप बनकर बैठे थे ओर उस भार को अपनी पीठ पर उठाया था यह कूर्म यह कन्द की अंतर्जगत के मथन एवं शक्ति के ऊर्ध्वगमन के रूप में अलंकारिक व्याख्या है।

षट्चक्रों से ही संगति बिठाने वाले मनीषियों ने अन्त प्रभावी ग्रन्थियों के समूह को उनका स्थूल प्रतीक रूप माना है। उनके अनुसार नर व नारी में इन चक्रों में प्रवाहित विद्युत की ही एक मोटी स्थूल प्रतिक्रिया पुरुषोचित दढता एवं स्त्रियोचित कोमलता के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है। तथापि यह सामान्य जैविक क्रिया कलापों की एक झलक मात्र है। वैसे इन एण्डोका्रन ग्लैण्ड्स व उनसे निकलने वाले हारमोन्स के क्षेत्र को जादू का पिटारा कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। ये 6 हारमोन ग्रंथियां इस प्रकार है।

1 पीनियल सिरोटोनिन व मेलेटोनिन 2 पिट्यूटरी गा्रेथ हारमोन 3 थायराइड थायरक्सीन 4 थाइमस रिप्रोडक्टीव हारमोन 5 एडीनेलीन ए सी टी एच 6 गोनेडस टैस्टोस्टेरान नर एवं इस्टोजन मादा।

साधारणतया सर्पिणी कुण्डलिनी एवं सहस्रार आज्ञाचक्र आदि कुण्डलिनी से संबंधित अवयव प्रसुप्त स्थिति में निष्क्रिय पड़े होते है। निद्रा या मूर्छा की स्थिति में मनुष्य भी मतकवत स्थिति में हो जाता है। उसे कुछ भी होशो–हवास नहीं रहता। उसकी वस्तुओं को कोई उठा ले जा सकता है। पर कुछ ज्ञान नहीं रहता है। लज्जा ढकने के कपड़े उतर जाय तो भी बोध नहीं होता किन्तु जब जागृति की अवस्था होती है। तो उसे अपनी सामर्थ्य और हानि होने की जानकारी वापस लोट आती है।

शरीरगत विद्युत शक्ति का सामान्य प्रवाह निष्क्रिय पड़ा रहता है। पर उसे झकझोरकर साधना द्वारा जागृत और द्रुतगामी बना दिया जाता है। तो स्थिति में भारी अन्तर पड़ जाता है।

तेज हवा जब बांस के झुरमुटों में टकराती है। जो बंशी बजने जैसी आवाजें भी होती है ओर सूखे बांसों में रगड़ पड़ने से उनमें अग्नि भी प्रकट हो जाती है। रेल मोटर जैसे द्रुतगामी वाहनों के पीछे पत्ते तिनके धूलिकण भी उड़ते दौड़ते देखे गये है। नदी के बीच पड़ी चट्टानों से पानी टकराता है। तो उछालने लगता है। पनचक्की के पंखे घूमते हैं। तो उनसे आटा पीसने जैसे काम लिए जाते है। भरने ऊपर से नीचे गिरते है। तो उन प्रपातों पर बिजली बनाने के यंत्र लगा दिये जाते है। अंधड़ तूफान चक्रवात भंवर अपनी अपनी असाधारण शक्तियों का परिचय देते है। चक भी जब जागृत और उत्तेजित होते है। तो उनके द्वारा स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों ही शरीर उफनने लगते है। अपनी असाधारण शक्ति का परिचय देते है।

विभिन्न अध्यात्म ग्रंथों में कुण्डलिनी के संदर्भ में अनेक अभिमत व्यक्त किये गए है। यथा त्रिपूरा तंत्र में कहा गया है। जो देवता भोग देते है। वे मोक्ष नहीं देते जो मोक्ष देते है। वे भाग नहीं देते। किन्तु कुण्डलिनी दोनों को ही प्रदान करती है।

महायोग विज्ञान में लिखा है। जिसकी मूलाधार शक्ति सो रही है। उसका सारा संसार सो रहा है। जिसकी कुण्डलिनी जगी समझना चाहिए कि उसका भाग्य जग गया।

महातंत्र में उल्लेख है। जिसकी कुण्डलिनी जगती है। उसकी बैखरी मध्यमा परा और पश्यंति वाणी जागृत हो जाती है। उसका कथन सत्य होकर रहता है।

योगिनी तंत्र में लिखा है। कुण्डलिनी के जगते ही अन्तराल में छिपा वैभव अनायास ही दृष्टिगोचर होने लगता है।

महाभारत का सुप्रसिद्ध आख्यान है। कि भीष्म पितामह दक्षिणायन सूर्य रहने पर मरना नहीं चाहते थे उनकी इच्छा उत्तरायण समय आने पर मरने की थी इसके लिए उन्होंने देवयान को पर लोक प्रयाण का पथ चुना। इस प्रसंग में भी कुण्डलिनी प्रसंग है दक्षिणायन कुण्डलिनी अग्नि है। और उत्तरायण ब्रह्मरंध्र ऊर्जा देवयान मेरुदण्ड मार्ग है। भीष्म की कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया अधूरी थी वे उसी को पूर्ण करने में शरशैय्या पर पड़े–पड़े प्रयत्न करते रहे उद्देश्यपूर्ण होने पर उन्होंने शरीर का त्याग किया।

अथर्व 12 38 1 में कहा गया है। है आत्माग्नि तेरे द्वारा मुझे प्रकाश तेज बल प्रतिभा पराक्रम ओजस सभी मेरे भीतर से उभर रहे है। है। अग्नि तेरे तैंतीस विभाग तेरे ऊपर अनुग्रह करें।

यजु 2 8 में कहा गया है। है दिव्य अग्नि तू आयु वर्चस सुसंतति धन मेधा रति पौरुष बनकर हमें अपना अनुग्रह प्रदान कर।

आधुनिक मनोविज्ञानियों ने कुण्डलिनी को अचेतन मन की प्रसुप्त शक्ति कहा है। चीन और जापान के योगाभ्यासी उसे ची की शक्ति का नाम देते रहे।

अमेरिका के डॉ. ली सेनेल्या नपे अपनी कुण्डलिनी साइकोसिस एण्ड टान्सेन्डेस पुस्तक में कुण्डलिनी की महत्ता बताते हुए लिखा है। कि उसके जागरण से मनुष्य की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। व्यक्तित्व निखरता है। और गृहस्थ मस्तिष्क की उन क्षमताओं का विस्तार होता है। जो आमतौर से सोई हुई ही पड़ी रहती है।

वृहज्जाबालोपनिषद का कथन है। यह कालाग्नि कुण्डलिनी जब अधोगामी होती है। मनुष्य को अशक्त बना देती है। पर जब वह ऊपर उठती है। जो उच्च सिद्धियों को प्रदान करती हुई ब्रह्मलोक तक पहुंचती है।

स्कंद पुराण में एक रोचक कथा आती है। सृष्टि.आरम्भ में ब्रह्माजी ने कठोर दीर्घकालीन तप किया उससे प्रचण्ड अगिन उत्पन्न हई वह भूमि पर गिरी तो भूमि जलने लगी ऊपर उठी तो आकाश जलने लगा उसमें से तेजस की चिनगारियां उठ उठकर देशों दिशाओं को जलाने लगी।

अग्नि ने ब्रह्माजी से कहा में भूख से जली जा रही है मुझे भोजन दीजिए ब्रह्माजी ने एक एक करके अपने शरीर के सारे अंग उसे खिला दिये तो भी उसकी तृप्ति नहीं हुई ओर वह भूखा भूख कह कर चिल्ला कर रुदन करने लगी।

ब्रह्माजी को कोई उपाय न सूझा तो उनने कहा तू कामुक व्यक्तियों के शरीर में घुस जा और उनकी समस्त धातुओं का भक्षण करना। अग्नि ने ऐसा ही किया। उसने असंख्य कामुक नर नारियों को खा लिया किन्तु तृप्ति तब भी न हुई जब प्रजापति ने उसे देवता और ऋषियों के अन्त करण में प्रवेश करने के लिए कहा वहाँ अमृत भरा हुआ पाया अग्नि उसका पान करके तृप्त हो गयी और प्रसन्नतापूर्वक वही रहने लगी

इस कथन का तात्पर्य है। कि कुण्डलिनी का काम क्षेत्र में प्रवेश होता है। तो वह जर्जर कर देती है। किन्तु जब उसका प्रयोग दिव्य प्रयोजनों के लिए होता है। तो वह स्वयं भी प्रसन्न रहती है। ओर आश्रयदाता को भी प्रसन्नतादायक वरदानों से भर देती है।

कुण्डलिनी को दावानल कहा गया है। जो जंगलों को जलाकर खाक कर देती है। वह बड़वानल भी है। जो समुद्र में से ज्वालमाल बनकर उठती और पानी से रहित कर देती है। धरती की मध्यवर्ती अग्नि जब फूटती है। तो भूकम्प आते ओर ज्वालामुखी फूट शक्ति तत्व कुण्डलिनी है। जो ब्रह्मांडीय चेतन सत्ता के साथ जुड़ा है। और विश्व भंडार में से अपनी इच्छा एवं आवश्यकतानुसार शक्ति का खींचता ओर धारण करता रहता है। मूलाधार में बसी हुई सुप्त सर्पिणी अग्नि कुण्ड में पड़ी पड़ी विष उगलती रहती है। इस विष को अमृत बनाया जा सकता है। उसे अमृत रस पान सोम संपर्क हेतु ऊर्ध्वगामी बनाया जाय यही कुण्डलिनी साधना है।


कुण्डलिनी एक प्रचण्ड प्राण ऊर्जा

गिरना हमेशा बुरे अर्थों में लिया जाता है एवं उठना अच्छे अर्थ में। यह सिद्धान्त कायसत्ता के क्षेत्र में विशेषकर जननेन्द्रियों में सन्निहित प्राणशक्ति के ऊपर विशेष रूप से लागू होता है। मूलाधार को योनि एवं सहस्रार को लिंग बताते हुए अध्यात्मशास्त्र में अलंकारिक विवेचन तो किया गया है पर क्रिया प्रसंग में वैसा कुछ नहीं है। मूलाधार स्थित शक्ति को कामाचार में नष्ट न कर मस्तिष्क में ले जाना चाहिए ताकि उसका सुनियोजन सद्ज्ञान संवर्धन ध्यान द्वारा प्रसुप्ति के जागरण में हो सके। सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति शिवलिंग के साथ लिपटी प्रसुप्त सर्पिणी की तरह पड़ी रहती है। समुन्नत स्थिति में विकास होते होते यह शक्ति ऊँचे उठकर मस्तिष्क के सर्वोच्च स्थान क्षीरसागर मस्तिष्क के ग्रे मैटर में अवस्थित सूक्ष्म स्नायु तन्तुजाल सहस्रार पर जा बिराजती है। एक छोटा-सा शिवलिंग ऊर्ध्वगमन के बाद कैलाश पर्वत का रूप ले लेता है। खिले हुए सहस्रदल कमल के रूप में उसका विकास होता है एवं क्रमश मस्तिष्क के सारे सोय केन्द्र जाग पड़ते हैं। यह लघु का विराट में विस्तार है।

इस नियंत्रण में मेरुदण्ड का आश्रय लिया जाना अत्यावश्यक है। उसे मोड़कर सुषुम्ना की चेतना धारा को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में नियोजित किया जा सके तो विषयानन्द की तुलना में हजार गुना आनन्द ब्रह्मानन्द में पाया जा सकता है। बंध मुद्राओं प्राणायाम आसनादिक के विभिन्न उपचार इसी उद्देश्य को लेकर किये जाते हैं। सिद्धान्त या वज्रासन में शक्तिचालिनी मुद्रा व विशिष्ट बंधों व प्राणयोग का आश्रय लेकर मूलाधार की शक्ति के उद्दीपन जागरण उर्ध्वगमन एवं उसे पूर्णता के केन्द्र से जोड़ने का प्रयत्न किया जाता है। इन सभी प्रयोगों को जो कि हठयोग या क्रियायोग से संबंधित है कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया का प्रारम्भिक माध्यम भर मानना चाहिए। भ्रान्तिवश इन्हीं उपचारों को सब कुछ मान लिया जाता है जबकि ये मात्र चौक के प्रयोग द्वारा ठण्डी मोटर गाड़ी में गर्मी पैदा करने के समतुल्य हैं।

यह प्रसंग यहाँ करना अनिवार्य है क्योंकि कुण्डलिनी को कामबीज भी कहा गया है। इसके प्रतीक रूप में शिवलिंग की स्थापना की जाती है। शिवलिंग का रुद्राभिषेक करते हैं तो तीन टाँग की तिपाही पर जलघट रखा जाता है और उसमें से एक एक बूँद पानी गिराने का प्रबन्ध किया जाता है। यों नारी योनि में भी मदनाँकुर होता है। पुरुषशिशन के अधोभाग में भी नारी योनि है। इन्हीं विपरीतताओं के जागृत होने पर लिंग परिवर्तन के प्रसंब घटते रहते हैं। नर नारी बन जाती है और नारी नर। इसका कारण प्रसुप्त क्षेत्रों में ऊर्जा आवेश का पहुँच जाना है। कामुकता भी इन्हीं कारणों से उभरती रहती है। यह अनुपयुक्त क्रम बनने न पाए, इसलिए मस्तिष्क का ज्ञान रूप अमृत टपका कर उसे शान्त करते रहा जाता है। इसी अमृत को सोमरस कहते हैं। खेचरी मुद्रा की सोऽहम् साधना में सोमरस पान की प्रक्रिया पूरी की जाती है। जिस तिपाही पर रुद्राभिषेक का जल घट रखा जाता है, वह इड़ा पिंगला सुषुम्ना इन तीन नाड़ियों का प्रतीक है। रुद्राभिषेक को कुण्डलिनी साधना का एक दृश्य प्रतीक माना गया है। इस वर्णन में अलंकारिक माध्यम से इस तथ्य का प्रतिपादन है कि कुण्डलिनी के अधिपति शिव प्रत्यक्ष और समर्थ परमेश्वर है। उनके निवास स्थान कैलाश पर्वत और मान सरोवर की तरह पवित्र समझे जाँय, उन्हें नर नारी की घृणित जननेन्द्रिय मात्र न मान लिया जाय। वरन् उनकी पवित्रता और महत्ता के प्रति उच्च भाव रखते हुए उनके सदुपयोग शक्ति के सुनियोजन की आराधना में तत्पर रहा जाय। साहस और कलाकारिता के पुरुषार्थ और लालित्य के कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन् नर नारी की जननेन्द्रियों के निकटस्थ मूलाधार चप्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय।

हठयोग के साधनाकाल के इस प्रचलन की अश्लील कल्पना करने वाले पुरुष शिशन और नारी योनि के साथ संगति बिठाते हुए “संभाग से समाधि” की चर्चा करते है। यह कथन सही नहीं, बड़ा बेतुका भद्दा एवं दिशाहीन करने वाला है। वस्तुतः हृदय मस्तक जैसे पवित्र इन स्थानों तक अनाचार की अतिवाद की गन्दगी नहीं पहुँचनी चाहिए। कि इन्हें अधिकाधिक पवित्र रखते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। और ऊर्ध्वरेता बनना चाहिए। यह मर्यादा स्त्री और पुरुष दोनों को ही निबाहनी चाहिए। शास्त्रकारों ने कुण्डलिनी की प्रकृति का निरूपण करते हुए कामकला से उसकी संगति बिठाई है। पर उसका अर्थ कामुकता नहीं वरन् कायसत्ता में उत्साह व उल्लास करने वाली शक्ति से लिया जाता है। मूलाधार को कामबीज भी कहते हैं एवं सहस्रार को ज्ञानबीज। दोनों के समन्वय परिष्कार से विवेकयुक्त क्रिया बनती है। जीवन का सर्वांगपूर्ण विकास व्यक्तित्व का परिष्कार चिन्तन के स्तर में निखार इसी शक्ति पर निर्भर है। कुण्डलिनी योग इसी सुयोग संयोग की व्यवस्था के निमित्त की जाने वाली साधना है।

श्वेताश्वेतर उपनिषद् में कुण्डलिनी को “योगान्नि” अथवा नचिकेत अग्नि कहा गया है और उसकी तुलना पवित्र यज्ञाग्नि से की गई है। कहा गया है कि जिसके शरीर में यह दिव्य अग्नि प्रज्वलित रहती है उसके न शरीर में रोग होता है न मन में विक्षोभ। चैनिक योग प्रदीपिका में आई लोहैन ने इसे स्प्रिट फायर कहा है और आत्मा की ज्वलन्त अग्नि के रूप में उसकी विवेचना की है।

पाश्चात्य योग विद्या विशारद सर जॉन वुडरफ ने इसे सर्पन्ट फायर के नाम से सम्बोधित किया है। थियोसोफिकल सोसायटी की जन्मदाता मैडम ब्लेवटस्की ने इसे विश्वव्यापी वैद्युतीय शक्ति कास्मिक इलेक्ट्रिसिटी कहा है और इसकी गति को 345000 मील प्रति सेकेंड बताया है। जबकि प्रकाश की गति 1, 85000 मील प्रति सेकेंड एवं विद्युत तरंगों की गति 288000 मील प्रति सेकेंड है। वैज्ञानिकों के अनुसार विचार तरंगों की गति विद्युत तरंगों से सात गुनी अधिक अर्थात् 22,65120 मील प्रति सेकेंड है। वैज्ञानिकों के अनुसार विचार तरंगों की गति विद्युत तरंगों से सात गुनी अधिक अर्थात् 2265120 मील प्रति सेकेंड है। विचार क्षण मात्र में ही पृथ्वी लगभग चालीस बार परिक्रमा लगा सकते हैं।

अध्यात्मिक शक्ति होते हुए भी कुण्डलिनी की संगति पूर्णरूपेण शारीरिक विद्युत के साथ जुड़ जाती है। डॉ. वसन्त जी रेले ने अपनी पुस्तक “द मिस्टीरियस कुण्डलिनी” में इसे नर्वस फोर्स कहा है। इस पुस्तक की भूमिका सर वुडरफ ने लिखी है। उनके अनुसार रेले जहाँ कुण्डलिनी की संगति दायीं वेगस नर्व से बिठाते हैं वहाँ वे स्वयं उसे एक “गण्डपोटेन्शियल” और भी बड़ी शक्ति मानते हैं। कुण्डलिनी उनके अनुसार “डायनेमिक रियल” वह प्रसुप्त ऊर्जा है जिसे पदार्थ सत्ता की इन्वाँल्यूशन प्रक्रिया के विपरीत इवाँल्यूशन के माध्यम से ऊँचा उठाकर व्यक्तित्व को प्रखर समुन्नत बनाया जा सकता है। कुण्डलिनी शक्ति वसन्त रेले के अनुसार स्थिर रूप में अपने सामान्य स्वरूप में रहती है किन्तु गत्यात्मक रूप में यही प्राणशक्ति बन जाती है। वे कहते हैं कि हठयोग प्रदीपिका शिव संहिता एवं षट्चक्र निरूपण जैसे ग्रन्थों का विवेचन यह बताता है कि यह ब्रह्मांडव्यापी समष्टिगत महत चेतन शक्ति का व्यष्टि रूप है।

हठयोग के ज्ञाता पाश्चात्य वैज्ञानिक श्री हडसन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक साइन्स ऑफ सीअरशिप में कहा है कि चमत्कारी शक्ति कुण्डलिनी को पवित्र मन और कामना रहित होकर किसी सुयोग्य योगज्ञाता गुरु के मार्गदर्शन में ही जागृत करना चाहिए। अन्यथा कुण्डलिनी शक्ति नीचे की ओर प्रवाहित होकर विषय वासनाओं और कामुक विचारों के आवेग को बढ़ा सकती है। फिर इस शक्ति का क्षरण वासना तृप्ति स्वार्थ साधन के रूप में होने लगता है।

जैन योगाचार्यों ने कुण्डलिनी शक्ति को तेजोलेश्या के रूप में वर्णित किया है। उसकी उपलब्धि के दो साधन बताये हैं। प्रथम है। अनन् और जल की अति सीमित मात्रा ग्रहण करते हुए तपस्या करना तथा दूसरा है। सूर्य की आतापना लेना अर्थात् सूर्योपासना द्वारा शक्ति संग्रह करना तेजोलेश्या का उद्गम स्रोत सूक्ष्म द्वारा शरीर माना गया है। वही स्थान कुण्डलिनी शक्ति का भी है। तेजोलेश्या को सावित्री साधना का स्वरूप माना जा सकता है।

कुण्डलिनी शक्ति की व्याख्या करते हुए योग विज्ञानियों ने कहा है। कि यह वाइस ऑफ साइलेन्स मौन की भाषा है। लोग लौकिक अग्नि या विद्युत का प्रभाव जानते तथा उपयोग करते है। यदि वे इस स्प्रिचुअल या मेटाफिजीकल अग्नि का प्रयोग भी जान ले तो आत्मिक क्षेत्र की असंख्यों सिद्धियां हस्तगत कर सकते है।

डॉ. स्कॉट ने कहा है। कि यह क्रिस्टल है जिसके सहारे जीवनश् रूपी टाजिस्टर अपनी ध्वनि बजाता है। शरीर शास्त्री अपने ढंग से उसकी व्याख्या करते है। और उसे स्पाइनल कार्ड तथा मूलाधार को गैग्लियान इम्पार के रूप में निरूपित करते है। उसकी उपमा जेनरेटर डायनेमो बैटरी चुम्बक आदि से की माना सभी ने यह है। कि यह काम क्षेत्र में दहकता हुआ कुण्ड है और उससे ऊपर उठता हुआ प्रज्वल सचमुच असाधारण शक्ति का केन्द्र है।

डॉ. हैनरी लिण्डाल ने ब्रह्मांडव्यापी चेतन विद्युत भौतिक जगत में काम करने वाली बिजली के उद्गम स्रोतों की व्याख्या करने के साथ ही मानव शरीर में काम करने वाली बिजली की भी विवेचना की है। ब्रह्मांड में पृथ्वी के चारों ओर विद्युत्चुम्बकीय धाराओं का एक जाल-सा फैला हुआ है। एवं यह धन विद्युत विभव तीन लाख वोल्ट की सामर्थ्य का है। हर जीवधारी पर 5 वोल्ट प्रतिमीटर की औसत से यह दबाव बना हुआ है। इसी ब्रह्मांडीय विद्युत का व्यष्टिगत अंश कुण्डलिनी शक्ति के रूप में मेरुदण्ड में विराजमान होता है। डॉ. लिण्डाल ने कहा है। कि जीवकोशी नाड़ी तंतुओं तथा विभिन्न अवयवों के काम करने में बड़ी मात्रा में विद्युत शक्ति का निरन्तर व्यय होता रहता है। इसका उद्गम हृदय नहीं मस्तिष्क है। वही जीवन के उद्भव तथा अन्त का आधार है। किन्तु यह उद्गम एकाकी नहीं हैं मेरुदण्ड के ऊपरी सिरे पर स्थिति मस्तिष्क ग्रेमैटर एवं सुषुम्ना का निचला हिस्सा दोनों ही इस प्राण विद्युत के उत्पादन में अपने अपने पक्ष का निर्वाह के करते है। मस्तिष्कीय ग्रेमैटर में रेटीकूलर एक्टीवेटिंग सिस्टम के रूप में विद्युत्स्फुल्लिंग निरन्तर उभरते रहते है। इस विद्युत का एक बहुत बड़ा भाग उस क्षेत्र का भी होता है। जिसे दक्षिणी ध्रुव या कामकेन्द्र की संज्ञा दी जाती है। डॉ. हिरोशी मोटोयामा ने अपनी ए एम आई मशीन द्वारा विद्युत का सघन अनुपात इसी केन्द्र बिन्दु पर पाया है। वैज्ञानिकों ने काम केन्द्र पर जो विस्तृत अन्वेषण किया है। उसका कारण यह है। कि कुण्डलिनी क्षेत्र जीवन संचार का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। नया प्राणी उत्पन्न करने के साधनों से भरपूर होने के कारण उसकी सत्ता और महत्ता शरीर के अन्य सब अवयवों की तुलना में विशेष रूप से संवेदनशील और क्षमता सम्पन्न है। सेक्रल प्लेक्ससव व काडइक्वाईना की संरचना मस्तिष्क के समान ही अत्यन्त पेचीदा व फिजियोलॉजी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस तथ्य को भी ली सनेला ने अपनी पुस्तक कुण्डलिनी साइकोसिस आर टान्सेन्डेन्स में डॉ. डी ई वुलरीज ने द मशीनरी ऑफ ब्रेन में एवं डॉ. सी नारन्जो आर आर्नस्टीर ने साइकोलॉजी ऑफ मेडीटेश में भिन्न भिन्न रूपों में अभिव्यक्त किया है।

डॉ. केरिगटन ने अपनी आधुनिक मनोविज्ञान और भारतीय दर्शन पुस्तक में लिखा है। कि ऐसे अनेक उदाहरण देखे गए है। जिनमें प्राण परमाणुओं वाला शरीर रहने या न रहने पर भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है। उसके शरीर से जुड़ा रहने पर भी प्राण घटकों की सत्ता उसी क्षेत्र में बनी रहती है। इसी शोध से संबंधित एक विलक्षण खोज योगियों के शरीर से ध्यान साधना की

चरमावस्था समाधि प्रक्रिया के दौरान बाहर निकलने वाले आयडियोप्लाज्म अथवा साइकोप्लाज्म के रूप में की गया है। वैज्ञानिकों कहते है। कि यह वाष्प अवस्था में शरीर से बाहर निकलता रहता है। एवं सिर के शीर्षभाग स्तन उंगलियों के पोर होठ तथा चेहरा नाड़ी चक्र एवं जननेंद्रियों के आसपास इसका सघन अनुपात देखा गया है। रूसी वैज्ञानिकों सेमियन किलियन द्वारा बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी के अध्ययन व चित्रांकन के बाद सूक्ष्मशरीर कुण्डलिनी की प्राण शक्ति के संबंध में इस अनुसंधान कार्य बड़ी ख्याति प्राप्त की है। मेनुअल स्वीडनबोर्ग ने इसे ईथर के दश्य बादल की संज्ञा दी है। जिसे विशेष फिल्टस का प्रयोग कर हाईवोल्टेज प्रोजेक्शन द्वारा चित्रांकित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने इसकी बनावट मकड़ीदार जाले व गंध ओजोन होने पर इसकी सघनता घटती बढ़ती है भावनाएं भी इसके प्रभाव को कम अधिक करती है। इसकी उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण लायल वाटसन ने अपनी पुस्तक सुपरनेचर में दिया है जिसमें किसी व्यक्ति का कोई अंग कट जाने पर भी उसे उस अंग की प्रत्यक्ष अनुभूति दर्द जलन खुजली इस रूप में होती रहती है। फेन्टम लिम्ब इफेक्ट नाम से जाने जाते इस प्रसंग में यह प्रमाणित किया गया है। कि सूक्ष्मशरीर की सत्ता एक्टोप्लाज्म के रूप में बनी रहती है। एवं वही सारी संवेदनाएं प्रत्यक्ष ज्ञान के न होने पर भी मनुष्य को अनुभव होती रहती है।

टिवेटन बुक ऑफ डेड चाइनीज बुक ऑफ सोल में प्रत्यक्ष शरीर ओर प्राण शरीर की सत्ता पृथक पृथक मानी गई है। यद्यपि वे दोनों साथ साथ रहते है। पर कभी कभी प्राण शरीर पृथक होकर अन्यत्र रहने लगता व आवश्यकतानुसार नया प्राण शरीर बना लेता है। इसी प्रकार मनुष्य की कई बार दुहरी उपस्थिति भी देखी गई है।

डॉ. सील एवं जे टैजर ने अपनी पुस्तक द पॉजेटिव साइन्सेज ऑफ एन्सीएण्ट हिन्दूज में लिखा है कि हिन्दू धर्म के साधना विधान और कर्मकाण्ड प्राण शरीर का अधिकतम उपयोग करते हुए सम्पन्न होते है। इस प्राण शरीर को दिव्य चक्षुओं से देखा जा सकता है। कुछ वर्ष पूर्व थियोसोफीस्ट पत्रिका में एक लेख एनोटॉमी ऑफ तत्राज नाम से विषय छपा था।

थियोसोफीस्ट वैज्ञानिक सी डब्यू लेडबीटर ने मेरुदण्ड में अवस्थित छह चक्रों का विवेचन अपनी द चका्रज पुस्तक में किया है। व कहा है। कि प्राण शरीर एक विशेष प्रकार की विद्युत से विनिर्मित होता है। और ऐसा ही कायसत्ता में विराजमान है। जैसे कि घोंसले में पक्षी बैठा होता है। कितने ही अन्य वैज्ञानिकों ने प्राण को फायर ऑफ लाइफ कहा है। इस अग्नि की जितनी मात्रा शरीर में होती है। वह उतना ही चैतन्य उत्साही साहसी और प्रतिभावान होता है। इसमें शिथिलता आने पर मोटा ताजा शरीर भी डरपोक आलसी और निराश प्रकृति का पाया जाता है। इस विद्युतशक्ति को प्रयत्नपूर्वक बढ़ाया भी जा सकता है। योगाभ्यासों की रचना इसी दृष्टि से हुई है। कुण्डलिनी योग तो वस्तुतः प्राण विद्या के ऊपर ही आधारित है।

कुण्डलिनी जागरण का सार संक्षेप यह है। कि निखिल ब्रह्मांड में से प्राण चेतना को आकर्षित करके अपने निज के प्राण में उस महत चेतना की बड़ी मात्रा मिलाकर उच्च स्तरीय शक्ति प्राप्त की जाय और इस सामर्थ्य को अभीष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करने योग्य अभ्यास कर लिया जाय। यह क्षमता संयम से बढ़ती है एवं शक्ति क्षरण करने पर क्रमश घटती व नष्ट होती जाती है।

यूरोपिन तांत्रिकों में जेकब बाहम की बहुत ख्याति रही है। उनके जर्मन शिष्य जॉर्ज मिशेल की पुस्तक थियोसोफिकल प्रक्टिका में कुण्डलिनी जागरण व षट्चक्रों के प्रसंग में उसे गोपनीय रखने की भी हिदायत दी है। क्यों कि पता चलने पर अनधिकारी उसे लूट ले जाने का षड्यंत्र रचने है। ऐसी दशा में बहकावे में आने वाले बहुमूल्य रत्नराशि का मधपो को सौंपकर अपनी और उनकी उभयपक्षीय हानि करते है।


दिव्य शक्ति का निर्भर कुण्डलिनी का चक्र परिवार

जीवन एक यज्ञ है। इसके भी पुरोहित देवता और उपकरण होते है। इन सबकी संगति शास्त्रकारों ने बिठाई है। कुण्डलिनी यज्ञ का विशेष वर्णन करते हुए मुंडकोपनिषद् के 217 संदर्भ में कहा गया है। सप्तप्राणी उसी से उत्पन्न हुए। अग्नि की सात ज्वालाएँ उसी से प्रकट हुई। यही सप्तसमिधाएँ है। यही सात हवि है। इनकी ऊर्जा उन सात लोकों तक जाती है। जिनका सृजन परमेश्वर ने उच्च प्रयोजनों के लिए किया है।

सप्त लोकों का देवी भागवत में अन्य प्रकार से उल्लेख हुआ है। उसमें भू में धरित्री भुव में वायु स्व में तेजस मह में महानता जन में जनसमुदाय तप सत्य में सिद्ध वाणीवाक् सिद्धि रूपी सात शक्तियाँ समाहित बतायी गयी है। इस प्रकार कुण्डलिनी योग के अंतर्गत चक्र समुदाय में वह सभी कुछ आ जाता है। जिसकी कि भौतिक और आत्मिक प्रयोजनों के लिए आवश्यकता पड़ती है।

मानवीकाया को एक प्रकार से भूलोक के समान माना गया है। इसमें अवस्थित मूलाधार चक्र को पृथ्वी की और सहस्रार को सूर्य की उपमा दी गई है। दोनों के बीच चलने वाले आदान प्रदान माध्यम को मेरुदंड कहा गया है। सूर्य की गर्मी से पृथ्वी का सारा काम चलता है। ब्रह्म रंध्र ब्रह्मांड का प्रतीक है। सूर्य का तेजस धारण करने से ही पृथ्वी को बहुमूल्य जड़ चेतन संपदा प्रवाह को उत्पन्न और निर्वाह करते रहने की क्षमता मिलती है। ठीक इसी प्रकार सहस्रार लोक ब्रह्मांडीय चेतना का अवतरण केन्द्र है। और इस महान भांडागार में से मूलाधार को जिस प्रयोजन के लिए जितनी मात्रा में जिस स्तर की सामर्थ्य अपेक्षित होती है। उसकी पूर्ति सतत् होती रहती है।

यह अनुदान किस प्रकार बरसता है। इसकी एक झांकी ध्रुव प्रदेशों में जाकर देखी जा सकती है। क्यों कि ब्रह्मरंध्र को मस्तिष्क को उतरी ध्रुव भी माना गया है। जहाँ सूर्य की तथा अन्यान्य ग्रहों की महत्वपूर्ण शक्तियाँ निरन्तर बरसती रहती है। इसमें कौन क्या कितनी मात्रा में बटोरता है। यह साधक के कोशल पर निर्भर है।

पृथ्वी का उतरी ध्रुव क्षेत्र प्रायः 50 हजार वर्ग मील का दक्षिणी ध्रुव लगभग 30 हजार वर्ग मील क्षेत्र में फैला हुआ है। उतरी ध्रुव पर ध्रुव प्रभा मेरु प्रकाश के रूप में आती है। और वह चित्र विचित्र रूपों में वहाँ दीखती है। यह प्रकाश दोनों ध्रुवों पर अपने अपने निराले रूपों में जिस प्रकार दृष्टि गोचर होता है। उसे देखकर चकित रह जाना पड़ता है।

ध्रुव प्रकाश सूर्य किरणों की वक्रता के कारण विचित्र रूप में सर्च लाइट की तरह दीखता गायब होता रहता है। उतरी ध्रुव पर चमक कुछ अधिक होती है। उतरी ध्रुव पर एस्किमो जाति के मनुष्य भालू रेन्डियर मछली आदि प्राणियों का अस्तित्व पाया जाता है। दक्षिणी ध्रुव पर पेन्गुइन पक्षी पाया जाता है। जिसकी प्रकृति में असीम प्यार भरा है। उतरी ध्रुववासी एस्किमो स्वभावतः असीम साहसी होते है।

ध्रुव क्षेत्रों पर सूर्य किरणों की अनेक विचित्रताएँ दृष्टि गोचर होती है। उतरी ध्रुव यात्री जॉन बायर्ड ने एक बारे वहाँ सूर्य को बिलकुल हरे रंग का देखा था। वहां दूर की वस्तुएँ हवा में लहराती दिखाई पड़ती है। टीलों की ऊंचाई जितनी होती ही। उससे कई गुनी ऊँची दिखाई पड़ती है। कई बार अनेक सूर्य एक साथ उगते हुए दीखते है। इसी प्रकार चन्द्रमा भी बर्फ पर हवा में तथा आकाश में अलग अलग दीखते है। उतरी ध्रुव पर रात्रि छः महीने की होती है। सूर्य वर्ष में मात्र 16 दिन पूरी तरह चमक से निकलता है। चन्द्रमा की चमक कई बार इतनी होती है। जिसकी तुलना सूर्य से की जा सके। रोशनी रंग बदलती और झिलमिलाती रहती है। कई बार वह टार्च के प्रकाश की तरह लम्बाई में दौड़ती चली जाती है। चुम्बकीय तूफान निरन्तर आते रहते है। यह शक्ति प्रवाह उछल कर उस स्थान पर गिरा पाया जाता है। जहाँ दक्षिणी ध्रुव है। उतरी ध्रुव का प्रदूषण आणविक धूलि दक्षिणी ध्रुव से उत्सर्जित पायी जाती है। एक ध्रुव गहरा है। दूसरा उठा हुआ आवाजें कभी बहुत दूर की पास सुनाई देती है। कभी बहुत पास की भी सुनवाई नहीं पड़ती। यह विवरण काया के दोनों लोक मूलाधार व सहस्रार दक्षिणी व उतरी ध्रुव से भली भांति संगति खाता है।,

मस्तिष्क उतरी ध्रुव है। और जननेन्द्रिय मूल मूलाधार दक्षिणी ध्रुव। दोनों की परिस्थितियों ओर विशेषताओं तथा प्रभाव को देखते हुए जननेन्द्रिय और मस्तिष्क में पाई जाने वाली विशेषताओं की पूरी पूरी संगति बैठ जाती है। कामवासना का प्रवाह भी मस्तिष्क से चलता है। और जननेंद्रियों पर अपनी उत्तेजना पटकता है। इस आदान प्रदान में रोक थाम ओर मर्यादा बनी रहे इस प्रयोजन के लिए मेरुदंड का एक लम्बा मार्ग है। और उसमें भी छः चक्र छः व्यवधान खड़े हुए है।

कितने ही पौराणिक उपाख्यानों की संगति कुण्डलिनी योग से बैठती है। यह संसार शेष नाग के फन पर टिका है। एवं शरीर मूलाधार स्थित सर्प पर। इस क्षेत्र में गड़बड़ी पड़ जाने पर मनुष्य अशक्त अपाहिज नपुंसक हो जाता है। विष्णु भगवान शेष नाग पर सोते हैं। शंकर जी के गले में साँप है। यह ब्रह्म रंध्र का वर्णन है। यह सभी सर्प एक दूसरे का सहयोग करते है। और धारणकर्ता को उस ऊर्जा से लाभान्वित करते रहते है। जो विष्णु व शिव से जुड़े होने के कारण अलंकारिक रूप से उनमें पाई बतायी जाती है।

जहाँ मूलाधार की प्रसुप्त महासर्पिणी नारी तत्व की बोधक है। वहाँ सहस्रार में विद्यमान महासर्प नर है। दोनों की अपनी अपनी विशेषताएँ है। दोनों के मिलन की असीम उत्कंठा की पूर्ति मेरुदंड कुण्डलिनी योग के माध्यम से करता है।

रतिक्रिया में मिलने वाले विषयानंद को मस्तिष्कीय ऊर्जा झकझोरने पर ब्रह्मानंद का एक छोटा रूप बताया गया है। दोनों ही क्षेत्र आमतौर से सोये रहते है। एवं उमंग उठाने पर ही वे उत्तेजित होते है।

कुण्डलिनी की मूलाधार स्थित ऊर्जा को प्राण प्रवाह जीवनी शक्तिसृजन प्रेरणा जिजीविषा उमंग उत्साह विनोद क्रीड़ा पौरुष आदि के रूप में प्रकट होता देखा जाता है। वह क्षेत्र प्रसुप्त हो तो मनुष्य निराश अशक्त स्थित में रहने लगता है।

कुण्डलिनी के ऊर्ध्व लोक सहस्रार चक्र में बुद्धि विचारणा विवेकशीलता भक्ति भावना आदर्शवादिता संयमशीलता स्नेह श्रद्धा सद्भाव कर्मनिष्ठा आदि का निवास है।

काम क्रीड़ा में अतिवाद बरता जाय तो नीचे और ऊपर के दोनों ही केन्द्र लड़खड़ाने लगते है। शारीरिक और मानसिक दोनों ही क्षेत्रों में अशक्तता आ जाती है। यदि इन केंद्रों का सीमित एवं मात्र सत्प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जाय तो उससे असाधारण फल श्रुतियाँ भी मिलती है।

कहा जा चुका है। कि कुण्डलिनी शक्ति स्थूल शरीर में प्रजनन का क्रीड़ा विनोद भर का काम करती है। उसका गंभीर स्वरूप सूक्ष्म शरीर में सन्निहित है। शरीर की चीर फाड़ की जाय तो चक्र तो नहीं पर निर्धारित स्थानों के आस पास छोटे छोटे नाड़ी गुच्छक दृष्टि गोचर होते है। जिनकी एनोटॉमीकल संगति का वर्णन पूर्व में किया जा चुका है। चक्र वस्तुतः विद्युत प्रवाह के प्रतीक केन्द्र है।

प्रस्तुत दिव्य प्रवाहों को रक्त प्रवाह नाड़ी चक्र ज्ञान तन्तु प्रवाह कोश स्फुल्लिंग आदि के रूप में नहीं जाना जा सकता है। इन मान्यताओं को अपनाकर चलने वाले वस्तुस्थिति को नहीं समझ पाते और न तथ्यों की सही विवेचना ही कर पाते है। यह चेतनात्मक प्राण प्रवाह का विषय है। जिसे भौतिक विद्युत के समकक्ष नहीं माना जा सकता क्यों कि उसका प्रवाह लकड़ी रबड़ जैसी वस्तुओं पर प्रभाव नहीं डालता जब कि प्राण की चेतना में ही नहीं जड़ में भी गति है।

कुण्डलिनी प्रसंग योग वाशिष्ठ योग चूड़ामणि देवी भागवत शारदा तिलक शांडिल्योपनिषद् मुक्तिकोपनिषद् हठयोग संहिता कुलाव्रत तंत्र योगिनी तंत्र बिंदूपनिषद् रुद्र यामल तंत्र सौंदर्य लहरी आदि ग्रंथों में विस्तार पूर्वक दिया गया है। तो भी वह वैसा नहीं है। जिससे साधना के उतार चढावों को सरलता पूर्वक समझा जा सके और साधना का विधि विधान समझ कर निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने की सफलता को प्राप्त किया जा सके। यही कारण है। कि ऋग्वेद में ऋषि कहते है। प्राणाग्नि मेरे जीवन में ऊषा बनकर प्रगटो, अज्ञान का अन्धकार दूर करो ऐसा बल प्रदान करो जिससे देव शक्तियाँ खिंची चली आएँ।

त्रिशिखिब्रह्मोपनिषद् में शास्त्रकार ने कहा है। योग साधना द्वारा जगाई हई कुण्डलिनी बिजली के समान तड़पती और चमकती है। उससे जो सोया है। सो जागता है। जो जगता है। वह दौड़ने लगता है।

अर्जित मुकर्जी की द तांत्रिक वे स्वामी अगेहानन्द की ताँत्रिक परम्परा एवं यौन ऊर्जा हैसा जैक्सन की पाश्चात्य मनोविज्ञान एवं भारतीय साधना ओमर गैरीसन की तंत्र योन योग उखिल हाँस की कमेण्टी आँन हठयोग प्रदीपिका फिलीप राखेन की तांत्रिक कला जान ब्राइट की चेतना की सीमान्त हैस रिग्जीमर की भारतीय धर्म के उपाख्यान और प्रतीक एवं सर जॉन वुडरफ की सपेण्टाइन पॉवर में कुण्डलिनी योग के संदर्भ में आधुनिक मनोविज्ञान परामनोविज्ञान एवं साधना शास्त्र के ऊपर विस्तृत प्रकाश डाला है। एवं बताया है। कि यह विद्या ऐसे सुनिश्चित तथ्यों पर आधारित है। कि उसको प्रयोग में लाने वाले लाभान्वित हुए बिना रह ही नहीं सकते

महातंत्र में वर्णन आता है। जाग्रत हुई कुण्डलिनी असीम शक्ति का प्रसव करती है। उससे नाद बिन्दु कला के तीनों अभ्यास स्वयमेव सध जाते है। परा पश्यन्ति मध्यमा और वैखरी चारों वाणियों मुखर हो उठती है। इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति में उभार आता है। शरीर वीणा के सभी तार क्रमबद्ध हो जाते है। और मधुर ध्वनि में बजते हुए अंतराल को झंकृत करते है। शब्दब्रह्म की यह सिद्धि मनुष्य को जीवन्मुक्त कर देवात्मा बना देती है।

चक्रों के भाव पक्ष को आधार मानकर चलने वाले उनमें कई कई रंगों कई शब्दों कई कणों कई वाहनों का आरोपण करते है। ध्यान की गहनता में तो वैसा स्वरूप भी दीख सकता है। और वैसी विशेषताएँ भी प्रतीत हो सकती है। किन्तु यदि तथ्यों को आधार रखकर चला जाय तो उनकी वायु में पड़ने वाले चक्रवातों ज्वालामुखी से प्रकट होने वाले लावा अग्नि ऊर्जा के शोलों एवं नदी में पड़ने वाली भंवरों से तुलना की जा सकती है। जिनमें असाधारण सामर्थ्य काम करती रहती है इस सामर्थ्य के द्वारा परोक्ष जगत में व्यापक हलचल उत्पन्न की जा सकती है। साथ ही आत्मिक प्रगति के सर्वोच्च सोपानों तक पहुँचा जा सकता है।


सर्पिणी का जागरण शक्ति का ऊर्ध्वगमन

षटचक्रों को षट्संपत्ति भी कहा गया हैं अध्यात्म तत्व ज्ञान की भाषा में उन्हें श्रम दमन उपरति तितिक्षा श्रद्धा और समाधान नाम दिए गए है। शम का अर्थ है। शांति। उद्वेगों तनावों संतापों आवेशों का शमन। दम का अर्थ है। इन्द्रिय आवेशों का दमन एवं निरोध करने की सामर्थ्य का विकास। उपरति अर्थात् दुष्टता से दुर्बुद्धि से दुर्गुणों से जूझने का सत्साहस।

तितिक्षा अर्थात् सोद्देश्य के मार्ग में आने वाले कष्टों को धैयपूर्वक सहने की सामर्थ्य। श्रद्धा अर्थात् सन्मार्ग में सत्प्रयोजनों में प्रगाढ़ निष्ठा और विश्वास का समन्वय। समाधान अर्थात् लोभ लिप्साओं व्यामोहों और दर्पविभ्रमों से छुटकारा। वस्तुतः षटचक्रों की जागृति साधक के गुण कर्म स्वभाव को परिष्कृत करती है।

षट्चक्र वेधन एवं कुण्डलिनी शक्ति के जागरण का विज्ञान विराट ब्रह्मांड और व्यष्टिगत लघु पिण्ड के वियोग अलगाव के दूर कर परस्पर संबद्ध करने एवं मूर्च्छना को निरस्तकर प्रखर पराक्रम जगाने की एक सर्वांगपूर्ण विद्या है। आद्य शंकराचार्य ने अपने ग्रन्थ सौंदर्य लहरी में जो आठ सिद्धियां गिनाई है। वे छः चक्रों सहस्रार एवं अन्तरात्मा के जागरण से प्राप्त होती है ये सिद्धियां है। 1 जन्म सिद्धि पूर्वजन्मों कमी स्थिति का सहज आभास 2 शब्द ज्ञान सिद्धि कानों से सुने गये शब्दों के पीछे हुए उद्देश्यों का ज्ञान 3 शास्त्र सिद्धि शास्त्र वचनों का वास्तविक ज्ञान 4 सहनशक्ति कठिनाइयों एवं आपत्तियों का सामना करने की सिद्धि सामर्थ्य 5 ताप शक्ति आक्रोशों प्रकोपों को सहन करने की सामर्थ्य 6 शाप शक्ति वाक् सिद्धि शाप या वरदान देने की शक्ति 7 विद्याशक्ति जिन विधाओं को दूसरों से पढ़कर जाना जाता है। उनका भीतर से स्मरण 8 विज्ञान शक्ति विश्वब्रह्मांड के गुह्य रहस्यों को जानने की क्षमता। वस्तुतः भगवान शंकर ने अपने कुण्डलिनी स्तवन में तो भाव भरे शब्दों में यह कहा है। कि मैं अबोध बालक जो कुछ भी बन सका हूँ तुम्हारे अनुग्रह और पयपान से ही बना हूँ।

कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन अन्यान्य धर्मावलंबियों ने भी किया है। इनमें मुख्यतः सूफी भारतीय दर्शन के अधिक समीप रहे दाराशिकोह जो कि सूफी मत को मानने वाला था उपनिषदों का अच्छा−खासा विद्वान था। उसने तंत्र व योग ग्रन्थ भी पढ़े तथा उनका फारसी में भाष्य किया। उसने कुण्डलिनी शक्ति की चर्चा अपनी पुस्तक साला ए हुक्मनामा में की है। जहाँ तीन केंद्रों का दिल ए मुदव्वर दिल ए सनोबरी एवं दिल ए निलोफरी नाम से वर्णन आता है। से मूलतः ब्रह्मग्रंथि विष्णुग्रंथि रुद्रग्रंथि है। इन्हें सहस्रार अनाहत एवं मूलाधार के समकक्ष माना जा सकता है। शेख मुहम्मद इकबाल ने अपनी पुस्तक द डेवलपमेण्ट ऑफ मेटाफिजिक्स इन पशिया में एक से अनेक संदर्भों का वर्णन किया है। जो बताते है। कि हिन्दू अध्यात्म दर्शन किस सीमा तक अन्यान्य मतावलंबियों के लिए गहन रुचि का विषय रहा है। अल बिरुनी नामक विद्वान ने तो पातंजलि योगसूत्र एवं साँख्य सूत्रों का ग्यारहवीं शताब्दी में अरबी भाषा में अनुवाद तक किया था।

तिब्बती ग्रंथों में मानवी काया में प्रमुख ऊर्जा केंद्रों की स्थिति मस्तिष्क गला हृदय सोलर प्लेक्सस और जननांगों के मध्य में मानी गई है। ग्रीक साहित्य में भी मनुष्य शरीर में 6 ऊर्जा केंद्रों को चक्र या कमल कहा गया है। मूर्धन्य शरीर शास्त्रियों चिकित्साविदों ने उनकी संगति विद्युतप्रवाह एण्डोका्रइन ग्लैंड्स एवं अन्यान्य आटोनॉमिक गैगलिया से बिठाई है। जापानी पद्धति में जो स्थान एवं आकार व्यूसोस नाम से बताये गये है। वह धारणा भी ग्रंथियों व चक्रों से समानता खाती है। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बेजामिन वाकर ने अपनी पुस्तक एनसाइक्लोपीडिया ऑफ एसोटरिक मैन में कहा है कि अंतःस्रावी ग्रन्थियों से नि सत रस धारा एवं चक्रों से उत्सर्जित ऊर्जा मनुष्य उत्थान पतन के निर्धारण एवं गुण कर्म स्वभाव तथा व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करती है।

कुण्डलिनी प्राणाग्नि है। जिसे पा्रणकुण्ड जननेन्द्रिय मूल में प्रसुप्त चिनगारी की तरह जब प्रज्ज्वलित किया जाता है। तो छहों लोकों को वेधती हुई वह सातवें ब्रह्म लोक में पहुंच जाती है। वहां उसका स्वरूप ब्रह्माग्नि का हो जाता है। प्राणाग्नि शरीरगत ओर मनोगत विशेषताओं को उभारती है। ओर सोम वर्षा करती है। देवता और ऋषि अवी सोम का पान करते हैं। ब्रह्मर्षि गण परमात्मा में आत्मा को हवन करके जीव और ब्रह्म के महत्व अदेय स्थिति एकत्व स्थापित कर देते हैं। इस अध्यात्म यज्ञ का वर्णन विस्तारपूर्वक किन्तु संयत रूप में किया गया है। और इसे आत्म यज्ञ कहा गया है।

प्राणाग्नि शरीर सत्ता की भौतिक क्षमताओं को अन्तरात्मा में दिव्य विभूतियों के रूप में खींच बुलाती है। अमृत रूपी सोम का रसास्वादन कराती है। क्षुद्रता को महानता में परिवर्तित कर देती है।

कुण्डलिनी शक्ति है। ओर सहस्रार शिव। शिव और शक्ति के समन्वय से दो वरदान उत्पन्न होते है। सद्बुद्धि के अधिष्ठाता गणेश और शक्ति के पुंज कार्तिकेय साधक शरीर को वैश्वानर महामाया से भरा पूरा देखता है। और ब्रह्मरंध्र में दिव्य चेतना का अजस्र अनुदान गंगावतरण की तरह प्रत्यक्ष दृश्यमान होने लगता है। इन्हीं का समन्वय पृथ्वी निवासियों के लिए सोम बन जाता है। और स्वर्ग में निवास करने वालों के लिए अमृत। अध्यात्म तत्वज्ञान में सोम और अमृत को एक ही स्तर की दो वस्तुएं माना गया है।

मानवी मस्तिष्क जहाँ सहस्रार स्थित माना जाता है। प्रत्यक्ष देखने में खोपड़ी के अस्थि सम्पुट में भरा हुआ थोड़ा-सा लिबलिबा पदार्थ मात्र है। किन्तु उसकी वास्तविक महिमा ओर गरिमा अतीव विस्तृत है। उसका एक बड़ा भाग साइलेझट या डार्क एरिया कहलाता है। जो मस्तिष्क का 78 से 93 प्रतिशत भाग होता है। चेतन और अचेतन मस्तिष्क दोनों मिलकर जितना क्षेत्र घेरते हैं। साइलेण्ट ऐरिया अर्थात् दाया पेराइटल काटेक्स कार्पस कैलोजम एवं लिम्ब्कि सिस्टम इत्यादि का उससे कही अधिक व्यापक क्षेत्र है। दिव्य शक्तियों के केन्द्र इसी में है। मनोविज्ञान शास्त्र चेतन अचेतन की ही खोजकर सकता है। यह सुपर चेतन अभी उनकी समझ और पकड़ से बाहर है।

कुण्डलिनी योग मूलतः हठयोग के अंतर्गत आता है। हठ योग तंत्र विद्या के अधिक समीप बैठता है। इसका कारण मोहन उच्चाटन वशीकरण आदि ऐसी विद्याएँ है जिनके सहारे किसी पर आक्रमण भी किया जा सकता है। और उसे हानि भी पहुंचाई जा सकती है।

इंग्लैंड की स्काटलैण्ड यार्ड गुप्त पुलिस के अफसर रॉबर्ट फेबियन जब अफ्रीका में थे तो वहाँ उन्होंने तांत्रिकों के भयंकर प्रयोग देखे जिनमें कई प्राण घातक प्रयोग थे। अपनी पुस्तक में उन्होंने इन प्रसंगों को विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया है।

इसलिए इन साधनाओं का थोड़ा-सा सौम्य भाग ही प्रत्यक्ष उपचारों में देखने में आता है। शेष को गोपनीय रखा गया है। ताकि किसी कुपात्र के हाथों यह प्रयोग लग जाने पर वह उनके माध्यम से अनर्थ न करने पाए। जिस बारूदी सुरंग से पहाड़ की चटाने तोड़कर सुविधाजनक रास्ता बनाया जा सकता है। उसी से किसी विद्यालय या अस्पताल मल्टी स्टोरिड बिल्डिंग को गिराया भी जा सकता है। गुह्य विद्याओं को गोपनीय रखने का प्रचलन इसलिए है कि उनके द्वारा अनर्थ न होने पाए। समुद्र मथन का एक उपाख्यान पुराणों में आता है। जिसमें देवता और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था ओर फलस्वरूप चौदह बहुमूल्य रत्न निकले थे। इस कथानक की संगति कुण्डलिनी योग के साथ पूरी तरह बैठती है।

कुण्डलिनी के यौन गह्वर में एक तलछट कुण्ड बताया गया है। यह कूर्म है। जिस मदिरांचल की रई मथने के लिए बनाई गई थी सर्प की रज्जु बनाकर मथा गया था। वह इड़ा पिंगला के साढ़े तीन सपिल घेरे है। मंथन से घर्षण से ऊर्जा उत्पन्न होती है। काम कौतुक में भी मंथन होते हैं। और कुण्डलिनी योग में भी प्राण मंथन। इसमें से विष भी निकल सकता है। और अमृत भी। इस गहस्य विद्या का यदि ताँत्रिक वामाचार में प्रयोग करके किसी को हानि पहुंचायी जाय तो वह विष हुआ और यदि आत्म कल्याण विश्व कल्याण के लिए प्रयोग किया जाय तो वह अमृत है। सज्जन सदुपयोग करते है। और दुर्जन दुरुपयोग। इसलिए उसे जननेंद्रिय आच्छादित रखने और आवरण से ढके रहने का भी विधान है।

सोती सर्पिणी जगाने वाले की ओर ही सर्वप्रथम लपकती है। और उसी को उटक्र हैरान करती है। दुरुपयोग हैरान करने सर्प को छेड़ने के समान ही है। चमत्कार दिखाने के लिए किसी का अनिष्ट करने के लिए अनगढ़ लोग उसे प्रयुक्त कर बैठते है। साधक की कामोत्तेजना भी बढ़ जाती है। और वह उस आवेश में व्यभिचाररत भी हो सकता है।

हैनीर आँस्ले की पुस्तक नोट्स ऑन स्प्रिचुअल फिजियोलॉजी में लिखा है। कि नर नारियों में कामोत्तेजना मेरुदण्ड के निचले भाग सेक्रो काक्सीजियल रीजन से उत्पन्न होती है। उस क्षेत्र की शिथिलता और उत्तेजना पर कामुकता बहुत हद तक निर्भर है इस क्षेत्र में गड़बड़ी पड़ जाने पर कोई भी अति कामुक या नपुंसक हो सकता है। इसीलिए मूलाधार बंध शक्तिचालिनी मुद्रा वज्रासन व पद्मासन इत्यादि द्वारा इस क्षेत्र को सशक्त बनाने का योग साधनाओं में प्रावधान रखा गया है। इन उपचारों द्वारा कुण्डलिनी साधना में प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाना पड़ता है। अनयथ वह अधोगामी होकर धातुओं का अनावश्यक क्षरण कर साधक को अल्पायु में ही वृद्ध सदृश अशक्त बना सकता है।

कुण्डलिनी का शब्दार्थ है घेरा मारकर बैठना सर्पिणी मारकर बैठती है। तो भी उसका फन ऊँचा रहता है। यही उसका अग्रभाग है दौड़ना वह यहीं से आरम्भ करती है। और जगने के पश्चात वह ब्रह्मरंध्र के सहस्रार से मस्तिष्क के गे्रमेटरन से जागृति केन्द्र स्फुल्लिंग के फव्वारे रेटीकूलर एक्टीवेटिंग सिस्टम से जाकर चिपटती है। इसी विज्ञान ओर विधान को शिव मंदिरों में स्थापित प्रतिमाओं में दिखाया जाता है। कुण्डलिनी वह है। जिसमें जल भरा रहता है। शिव का स्वरूप कैलाश पर्वत जैसा स्फटिक लिंग जैसा गोलाकार है। वह जलहली के बीच स्थापित रहता है।

जीवात्मा भी कुण्डली मार कर बैठता है। न जाने कितनी कितनी वस्तुओं पर अधिकार जमाता है। पर वास्तविकता यह है। कि शरीर भी साध नहीं पाता। मात्र अकर्म कुकर्मों का पश्चाताप ही पीठ पर लदा रहता है।

कुण्डलिनी जागरण का एक तात्पर्य यह भी है। कि मनुष्य अहंता का दायरा छोटा करके न बैठे। निद्रा की खुमारी में ही न ऊंघता रहे। जगे और वह काम करे जिसे दूसरे संकीर्ण स्वार्थपरता में आबद्ध लोग भी जग पड़े और उस मार्ग पर चले जिस पर जागृत कुण्डलिनी सहस्रार कमल में अवस्थित सदाशिव से मिलने के लिए जाती है और साधक की साधना को सार्थक बनाती है।


नव सृजन के निमित्त साधना पराक्रम

पुराणों में वर्णन आता है। कि संसार की तत्कालीन परिस्थितियों से क्षुब्ध होकर विश्वमित्र ने एक समानान्तर संसार बनाने का निश्चय किया और विधाता के समान इस कार्य के लिए सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए सूर्य का प्रचण्ड तप करने लगे। उनकी साधना सफल हुई। उन्होंने अपना कार्य आरम्भ किया ही था कि देवगण समानान्तर संसार बनाने से उत्पन्न कठिनाई को समझते हुए उस निश्चय का त्याग करने की प्रार्थना करने लगे उस अनुरोध में सफल हुए भी।

समानान्तर विश्व की संरचना कोई नई बात नहीं है। उसकी स्थिति पहले से ही विद्यमान है। वह अदृश्य और अनुभूति से परे है। पर है। अवश्य। उसकी सत्ता को समझा तो गया है। पर किसी का साहस उसे प्रयोग में लाने का नहीं हुआ क्यों कि उस छेड़ छाड़ से वर्तमान दुनिया का नक्शा ही बदल जाने का भय है।

परमाणु का प्रतिद्वन्द्वी ऐन्टी ऐटम पदार्थ का प्रतिद्वन्द्वी ऐन्टीमेटर विश्व का प्रतिद्वन्द्वी ऐंन्टटी यूनीवर्स। इनकी सत्ता पदार्थ विज्ञानियों ने स्वीकार कर ली है। वह काया की छाया की तरह साथ साथ ही चलती है। इससे तराजू के दो पलड़ों की तरह साइकिल के चलते पहियों की तरह बैलेन्स बना रहता है। और दृश्य मान विश्व का स्वरूप चिरकाल से यथावत बना चला आता है। उसी कारण पदार्थ में अपनी धुरी पर घूमने और अपनी कक्षा पकड़ने की क्षमता बनी हुई है। छोटे घटक अपने से बड़े शक्ति केंद्रों की परिक्रमा करते हुए विश्व व्यवस्था का एक निर्धारित क्रम चला रहे है।

पानी में भँवर हवा में चक्रवात ब्रह्मांड की पोल में ब्लैक–होल जैसी स्थितियाँ जब कभी दीख पड़ती है। तो पता चलता है। कि कोई प्रतिपक्षी शक्ति सामान्य प्रवाह में रोकथाम करके इस प्रकार के आश्चर्यजनक दृश्य उपस्थित करती है अन्यथा सीधे प्रवाह के चलते ऐसी उथल पुथल की आवश्यकता न थी। जल प्रपातों में जब ऊपर से नीचे की आर पानी गिरता ओर नीचे टकराता है। तब वहाँ भी पानी भँवर की तरह घूमता दीख पड़ता है।

इस प्रकार की सीधी को उल्टी करने वाली अगणित घटनाएं घटित होती रहती है। तूफानों में कितनी शक्ति होती है। इसका अनुमान इससे लगता है। कि वे कितने भारी भरकम मकानों को द्वीपों को चट्टानों को उठाकर कही से कहीं फेंक देते हैं। नदियों की भँवरों में नावें डूब जाती है। और समुद्री भंवरों में विशालकाय जलयानों की समाधि बन जाती है। वारमूडा जैसे ब्लैकहोल अन्तरिक्ष वायुयानों को जलयानों को ऊपर उड़ाकर अदृश्य कर देते है।

पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति और चुम्बकीय शक्ति उसके घूमने या पराक्रम करने से नहीं बनती जैसा कि समझा जाता है। वरन् नवीनतम मान्यता यह है कि पृथ्वी के समतुल्य कोई पदार्थ पिण्ड एण्टी वर्ल्ड प्रति विश्व जब घूमता है तो उसके कारण यह दोनों शक्तियाँ विनिर्मित होती है जो न केवल उसे घुमाती चलती है। वरन् उसके ऊपर एक सुरक्षा छत्र भी विनिर्मित करती है। ताकि अन्तरिक्षीय विकिरण एवं सतत् गिरती उल्काएँ धरातल तक न पहुँचने पाएँ।

अभी यह प्रतिद्वन्द्वी शक्ति छाया की तरह है। किन्तु कदाचित वह प्रति विश्व एन्टी यूनीवर्स आगे आ जाय और दृश्य जगत पीछे पड़ जाय तो ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें सब कुछ नया हो। पदार्थ भी नया प्राणी भी नये मनुष्य भी नये और स्वभाव तथा प्रचलन भी नये होंगे।

क्या यह संभव है। विश्वसनीय यह तथ्य है कि मनुष्य से बढ़कर और कोई नहीं यह कथन भी सही है कि भगवान ने मनुष्य को बनाया पर यह कथन भी गलत नहीं कि भगवान को मनुष्य ने बनाया। अन्य प्राणियों में से कोई भी भगवान की सत्ता नहीं समझता। मनुष्य ने ही उसे समझा है और जैसा जिसकी समझ में आया उसने उसी आकृति प्रकृति का भगवान गढ़ा है। इतना तो मानना ही पड़ेगा कि मनुष्य भगवान का युवराज है। और व्यास जी के शब्दों में एक रहस्य बताता हूँ कि इस संसार में मनुष्य से बढ़कर और कुछ नहीं अक्षरशः सत्य है।

पृथ्वी अक्सर अपनी धुरी का स्थान बदलती रहती है। पर यदि उसका सही पता लग जाय और कोई मनुष्य वहाँ पहुंच कर एक घूसा कस कर मार दे तो पृथ्वी अपनी कक्षा बदल देगी और जिस प्रकार अब 365 दिन का वर्ष होता है 24 घंटे का दिन होता है वैसा न रहेगा और न्यूनाधिक हो जायगा इतना ही नहीं तापमान में भी घट बढ़ होगी और स्थिति अबकी अपेक्षा भारी उलट पुलट के फेर में फँस जायगी।

जब एक मनुष्य की स्थूल शारीरिक शक्ति इतना कर सकती है। तो उसकी चेतना जो शरीर की तुलना में असंख्यगुनी प्रचण्ड है यदि अपनी समग्र क्षमता समेट कर कोई विलक्षण प्रहार करे तो स्थिति में कितना भयंकर परिवर्तन हो जायगा कुछ कहा नहीं जा सकता।

आज की विपन्नता भूमण्डल की संरचना में परिवर्तन चाहती हो तो ऐसी बात नहीं है। वरन् परिस्थितियों का परिवर्तन चाहती है। यह परिस्थितियां कैसी बनी कैसे बदलेगी इस प्रश्न गम्भीर विचार करते हुए घटनाक्रमों का विश्लेषण करना व्यर्थ है। गहराई में उतरने पर प्रतीत होता है। कि परिस्थितियों की निर्मात्री बन स्थिति होती है। मन आकांक्षाओं से प्रभावित होता है। आकांक्षाएं क्रिया करने के लिए विवश करती है और वे क्रियाएं ही एकत्रित होकर परिस्थितियाँ बन जाती है मन ही परिस्थितियों का निर्माता विधाता है।

इसलिए सोचना यही समीचीन होगा कि यदि आज की परिस्थितियाँ विपन्न है। तो उन्हें बदलने के लिए लोक मानस को बदला जाय। इसका भौतिक उपाय मात्र प्रचार या प्रशिक्षण रह जाता है क्यों कि यह खोखला उपाय है। नीति धर्म देशभक्ति कर्तव्य संस्कृति आदि की दुहाई देने वाले लोग ही जब अपने निजी जीवन में विपरीत प्रकार के आचरण करते है। तो विचार करने पर प्रतीत होता है कि मानसिक शिक्षण अधूरा है इसमें भी और कोई परत है जो व्यक्तित्व के वास्तविक स्तर का निर्माण करती है। चोरों को पकड़ने का दावा करने वाले ही जब चोरी करते है तो लगता है कि जानकारी मात्र से व्यक्ति ढलता नहीं। वरन् उसे ढालने वाला केन्द्र कोई ओर है वह है अन्त करण जिसे अन्तरात्मा भी कहते है। महापुरुषों के शरीर या साधन महान नहीं होते वरन् उनके अन्त करण की महानता ही उन्हें दूसरों की तुलना में कही ऊँचा उछाल देती है। यह जिस भी उपाय से उछाला बदला सुधारा जा सके उसे ही युग परिवर्तन का आधारभूत उपाय कहा जायगा।

एक दो व्यक्तियों का प्रश्न हो तो उसे प्रलोभन दबाव परामर्श अथवा कूटनीति के सहारे बदला और अभीष्ट दिशा में चलाया जा सकता है पर जहाँ 500 करोड़ व्यक्तियों के भाग्य का निर्धारण होना हो अनेक भाषा भाषी अनेक वातावरणों में पले अनेक परिस्थितियों के अभ्यस्त लोगों का सवाल है वहाँ उनकी मान्यताओं में उच्चस्तरीय संस्कारों का आरोपण आदर्शों का अवलम्बन करने हेतु तत्पर करना कितना कठिन हो सकता है। इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

ऐसे महान प्रयोजन के लिए मानवी नहीं देवी शक्ति चाहिए। मानवी शक्ति के दबाव से मनुष्य ही में हाँ भर मिला सकता है पर अन्तरात्मा के बदल जाने की बात असाधारण हैं इसे सच्चे अर्थों में युग परिवर्तन की आधारभूत शिला कह सकते है परिस्थितियाँ जब बाहरी उपाय उपचार तानाशाहों की कठोरता के काबू में नहीं आई उन्हें भी माननी पड़ी और उनसे समझौता करना पड़ा, तो फिर अन्तरात्मा के भीतर से मंथन और परिवर्तन कितना कठिन और जटिल हो सकता है इसकी कल्पना करना तक असंभव है। किन्तु यह भी स्मरण रखने योग्य है कि भगवान के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। वह कलियुग का सतयुग में बदलता है, त्रेता में धर्म राज्य की स्थापना करता है। रावण, वृत्तासुर, जैसों के मद को चूर्ण विचूर्ण करता हैं सुदामा, विभीषण, सुग्रीव, जैसे विपन्नों को सुसम्पन्न बनाता है। हारे हुए देवताओं को महाप्रलय के गर्त में डुबो देता है और सर्वव्यापी जल में से नई सृष्टि रचकर खड़ी कर देता है। वह मानवोचित विचारों को मानवी वर्चस्व की गरिमा को पुनर्जीवित करने के लिए अन्तःकरणों में भारी उथल पुथल उत्पन्न कर दे तो क्या असम्भव है? जिसके कौशल से निखिल ब्रह्माण्ड में ग्रह तारक अधर में टँगे और घुड़दौड़ लगाते हुए ऐसा क्रम चला रहे हैं, जिसे देखते हुए आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है, उसके लिए किसी भी आस्तिक का उपयोगी परिवर्तन उसके अनुग्रह से सम्पन्न हो सकना असम्भव नहीं मानना चाहिए।

इन दिनों अनजानों के लिए कोई समस्या नहीं है। वे रातभर सोते, दिन भर काम करते, अनुकूलता में हँसते और प्रतिकूलता में रोते हुए समय व्यतीत करते हैं। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त उसी घर में रहते और उन्हीं सम्बन्धियों से रूठते–मिलते रहते हैं। किन्तु जो दूरदर्शी हैं, जिन्हें कूपमंडूक से-गूलर के भुनगों से अच्छी स्थिति मिली है, उनके लिए आँखों पर दूरबीन चढ़ाने के बाद यह देख सकना कठिन नहीं है कि विभीषिकाओं की काली घटाएँ किस तरह उमड़ती घुमड़ती चली आती है।

परिस्थितियों को ही लें तो उनमें से प्रत्येक ऐसी हैं जिनकी चिन्ह पूजा के लिए कुछ उपचार तो करते हैं, पर समाधान का आदि अन्त कहीं नहीं दिखता। कारखानों में वाहनों में ताले कैसे डाले जायँ? और दिन-दिन बढ़ता हुआ वायु प्रदूषण कैसे घटे? अणुआयुधों का विस्फोटों का अणुभट्ठियों का सिलसिला कौन रोके और बढ़ते हुए विकिरण पर अंकुश कैसे लगे? बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने के लिए पुरुषों की एक द्वीप में और स्त्रियों को दूसरे द्वीप में बसाने का प्रबन्ध कैसे हो? नर-नारियों के साथ रहते उन्हें इतनी समझ कौन दे कि अब बच्चे उत्पन्न करना विश्व विनाश का आयोजन है। पृथ्वी रबड़ की तरह खींच कर दूनी चौगुनी कैसे की जाय कि उस पर बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप अन्न और खनिज पैदा होने लगें? इतने बादल किस प्रकार नौकर रखे जाँय जो तीन महीने की समस्या का हल करें? ऐसे शिक्षक कहाँ से आयें जो अन्य विषय छोड़कर जीवन जीने की कला और समाज के प्रति कर्तव्य निष्ठा के अनेकानेक प्रकरणों को ही आदि से अन्त तक पढ़ाते रहे? ऐसे चिकित्सालय किस प्रकार खुले जिनमें प्रकृति के अनुसरण और संयम बरतने शिक्षा देकर रोगी की चिकित्सा के साथ-साथ उनसे बचे रहने का उपाय सुझाया जाय और उसके परिपालन के लिए सर्वसाधारण को विवश किया जाय? ऐसी समाज व्यवस्था कैसे बने? जिससे शोषण, उत्पीड़न, अपहरण और प्रपंच से मुक्ति मिले और सब लोग हिल-मिल कर रहे एवं मिल बाँट कर खाँय।

इस उल्टे को उलटकर सीधा करने के लिए बड़ी बहुत पड़ी शक्ति चाहिए सो भी मानवी नहीं देवी? इसे किस प्रकार जागृत और एकत्रित किया जाय? उसे धरती निवासियों के पीछे किस तरह लगाया जाय? यह एक बहुत बड़ा काम है। सबसे बड़ी समस्या समर्थों की दिशा मोड़ने की है। चाहे धनवान हों चाहे शासक, चाहे साहित्यकार हों चाहे धर्माध्यक्ष, सभी उलटे मार्ग पर चल रहे हैं। लोक मंगल की बात तो करते हैं, पर सभी को अपने स्वार्थ साधन की पड़ी है। इस समुदाय की अपनी क्षमता ध्वंस से मोड़कर सृजन में-स्वार्थ से विरत होकर परमार्थरत हो सके तो शालीनता का वातावरण बनने में कुछ देर न लगे।

अध्यात्म विज्ञान के अनुसार उपचार मात्र एक ही रह जाता है-कठोरतम तपश्चर्या। उसी के बल पर ब्रह्मा ने नूतन सृष्टि रची थी। भागीरथ गंगा को स्वर्ग से घसीट कर धरती पर लाने में समर्थ हुए थे। वृत्तासुर के आतंक से जब देवता त्राहि-त्राहि कर उठे तो उनकी प्राण रक्षा के लिए दधिचि का अनुदान ही काम आया था। तपस्वी परशुराम ने अनाचारियों का अनेक बार धरती से उन्मूलन किया था, महर्षि दयानन्द एवं अन्यान्य समकालीन महामानवों ने पाखण्ड विराट से संपर्क जोड़ने वाला साधना पराक्रम से मोर्चा लिया था।

अब यदि परिवर्तन होना है तो वह तप से अर्जित शक्ति बल पर ही होगा। समष्टिगत संकल्प शक्ति, इच्छाशक्ति से क्रियाशक्ति के समन्वय से बलिष्ठ हुई व्यक्तित्व की सामर्थ्य, अभीष्ट सफलताएँ सहज ही खींचकर निकट से निकटतम ले आती हैं। मानवी शक्ति के अनेक रूपों में कुण्डलिनी की गरिमा सर्वोपरि है। जननेन्द्रिय मूल-मूलाधार क्षेत्र में यह निवास करती है और धारण शक्ति के अनुरूप वंश-वृद्धि करती चली जाती है। इसे एक आश्चर्य ही कहना चाहिए कि बिन्दुमात्र से एक नये प्राणी की जीवन सत्ता विनिर्मित होकर खड़ी हो जाती है। यह शरीर परिकर में सीमित रहने तक की ही स्थिति की परिणति है।

जब इस शक्ति को साधना द्वारा ब्रह्माण्ड व्यापी बनाया जाता है। तो वह असंख्यों की मनःस्थिति को उलट-पुलटकर कुछ का कुछ बना देती है। वह युग बदल सकती है, विश्वामित्र की तरह एक नई सृष्टि रच सकती है। इतिहास बताता है कि मनुष्यों के जीन्स-गुण सूत्र तक इस प्राण विद्युत के प्रहार से बदले जा सकते हैं। पुलस्त्य ऋषि के समस्त पोते रावण परिवार के दैत्य हो गए थे। बालखिल्य ऋषि दैत्य माता-पिता की सन्तान थे पर वे जन्मते ही उस वातावरण से विलग होकर बरगद का दूध पीकर उसी से पलते-बढ़ते रहे व ऋषि प्रकृति के हो गए। त्रेता में ऋष्यमूक निवासी समस्त वानर अपनी पशु प्रवृत्ति त्याग कर श्रेष्ठ मनुष्यों जैसी नीतिमत्ता और कुशलता उपलब्ध कर सके थे। ऐसी घटनाओं में प्राण शक्ति का कोई समर्थ प्रहार ही काम कर चुका होता है। युग परिवर्तन की आशा ऐसे ही उदाहरणों को देखकर की जा सकती है। ईश्वर ने प्राणियों की संरचना की है पर साथ ही युवराज मनुष्य में कुण्डलिनी शक्ति रूपी ऐसा विलक्षण शक्ति भंडार भरा है कि वह व्यक्ति विशेष ही नहीं, समष्टिगत समूह की प्रकृति में आशातीत परिवर्तन कर सके। देवात्मा भारत की कुण्डलिनी जागरण की साधना हेतु निमित्त प्रारम्भ में किसी एक को ही बनना पड़ा हो, पर है सबकी बराबर की भागीदारी। यह शक्ति जागरण युग परिवर्तन भी संभव कर सकता है।


राष्ट्र कुण्डलिनी की परिवर्तन प्रक्रिया

कुण्डलिनी सविता की सूक्ष्म शक्ति है, जो सर्वव्यापक होते हुए भी प्रकट वहीं होती है, जहाँ उसका अनुष्ठान आह्वान किया जाता है। सविता रूपी महाशक्ति का एक स्थूल एवं सामान्य उपयोग हम गर्मी और रोशनी के रूप में करते हैं, असामान्य उपयोग जीवन निर्माण के रूप में है। ब्रह्माण्डव्यापी इस सविता शक्ति का बीज तत्व मानवी काय-कलेवर में भी विद्यमान है। सप्तचक्र, सप्तधातु, सप्तजिव्ह, सप्तगंग, सप्तभुवन, सप्ताश्व, सप्तशक्ति प्रवाह की तरह इन्हें सूर्य के सात वर्ण सात अश्व समझा जा सकता है। इन्हीं की सहायता से सृष्टि का उत्पादन, अभिवर्धन परिवर्तन का क्रम चलता रहा है।

प्रचलित जानकारी के अनुसार साधना उपादानों के माध्यम से व्यक्ति विशेष की ही कुण्डलिनी जागृत होती है और वह अपने मनोबल, प्राणबल के सहारे कुछ ऐसे काम कर पाता है जो शरीरबल या शास्त्र उपकरणों के सहारे सरलतापूर्वक कर नहीं पाता। मानवी गाया में सन्निहित ऐसे अगणित बीज सूत्र है जो विकसित हो सकने की स्थिति में मनुष्य को असाधारण बना देते हैं। उसकी गणना सिद्धपुरुष, महामानव, तेजपुँज एवं शाप-वरदान के अधिष्ठाता के रूप में की जाने लगती है। वह ऐसे पराक्रम करने लगता है, जिनकी आशा किन्हीं देव दानवों से ही की जाती है। सृजन और विघटन के दोनों ही क्षेत्रों में वह ऐसा कुछ करने लगता है, जिसे अद्भुत, आश्चर्यजनक अलौकिक कहा जान लगे।

यह व्यक्तिगत सफलता की बात हुई। आमतौर से व्यक्ति की स्वार्थपरता ही प्रधान होती है। वह अपने ही वैभव, विलास, पराक्रम एवं यश-सम्मान की बात सोचना है। स्वर्ग-मुक्ति भी इसी क्षेत्र में आते हैं। शाप-वरदान देकर भी आत्म तुष्टि ही की जाती है। जिन्हें डराया या सम्पन्न किया जाता है वे भी बदले में प्रयोक्ता को प्रतिफल उपलब्ध कराते हैं। इस प्रकार प्रचलित प्रयोग में कुण्डलिनी जागरण भी व्यक्ति का निजी उत्कर्ष-अभ्युदय ही कहा जा सकता है।

समन्वित कुण्डलिनी जागरण आत्मिकी का एक उच्चस्तरीय प्रयोग है। इसमें साधक का “स्व” सीमित न होकर असीम बन जाता है। वह जो सोचता है, जो करता है, उसमें विश्व व्यवस्था को समुन्नत श्रेष्ठ बनाना ही लक्ष्य होता है। जिसने “आत्मवत्-सर्व भूतेषु” की-”वसुधैव कुटुम्बकम्” की धारणा परिपक्व कर ली वह अपनी कामनाओं व चेष्टाओं को विश्व कल्याण के निमित्त ही केन्द्रित कर देता है। उसका अपना कुछ रहता ही नहीं। जिसने द्वैत को अद्वैत में विसर्जित कर दिया-तुच्छ को महान में विलीन कर दिया, कामना को भावना बना लिया; उसका चिन्तन और कर्तृत्व विराट के लिए ही हो सकता है। उसकी अभिरुचि विश्व वाटिका को फला-फूला देखने की ही ओर केन्द्रित हो जाती हैं

देवर्षि नारद जब भी विष्णु भगवान के पास जाते थे तब एक ही प्रश्न करते थे कि विश्व की अस्त-व्यस्त व्यवस्था में सुधार कैसे हो? ऋषियों की आकाँक्षा “काम ये दुःख तप्तानाँ प्राणिनाँ आर्त्तनाशनम्” में केन्द्रीभूत रहती रही है। उदारचेताओं का योग-तप इसी प्रयोजन के निमित्त होता रहा है। क्षुद्रता तो नितान्त अर्वाचीन है। पिछले अन्धकार युग में ही मनुष्य स्वार्थपरता में आबद्ध हुआ है। आत्मिकी साधनाएँ और उपलब्धियाँ इन्हीं दुर्दिनों में व्यक्ति विशेष की निजी कामनाओं की पूर्ति में नियोजित होकर रहने लगी। आज सिद्ध पुरुषों के क्षेत्र में मनोकामनाओं की पूर्ति ही संकीर्ण स्वार्थपरता के रूप में कार्यान्वित होती हुई देखी जाती हैं। पर यह नहीं सोचना चाहिए कि यही सब कुछ है। परमार्थ और लोक मंगल भी अपवाद रूप में अभी भी जीवित हैं और वे अपने सनातन अस्तित्व का परिचय अभी भी देते रहते हैं।

विगत तीन वर्षों में शान्तिकुँज में सामयिक परिस्थितियों को देखते हुए जो विशिष्ट साधना चली है, उसे विश्व का अथवा राष्ट्र का कुण्डलिनी जागरण कह सकते हैं। अग्नि को तेजस् उसके निकट क्षेत्र में अधिक होता है। उसके उपरान्त जैसे-जैसे दूरी बढ़ती है वैसे ही उसकी ऊष्मा कम होती जाती है। इसी प्रकार हिमालय की पुरातन ऋषि-ऊर्जा का पुनर्जागरण हरिद्वार के सप्तधारा क्षेत्र में नियोजित हुआ है। उसका प्रभाव राष्ट्र में समीपता की दृष्टि से अधिक और जल्दी दृष्टिगोचर होगा। दूरी बढ़ते जाने से विश्व के अन्य क्षेत्रों में उसका प्रभाव क्रमश परिलक्षित होता जाएगा। अरुणोदय का प्रकाश सर्वप्रथम पानी में दृष्टिगोचर होता है। उसकी झलक आरम्भ में पर्वतों की चोटियों और वृक्षों की ऊपर टहनी-फुनगियों पर दिखाई पड़ने लगती है। उसके बाद वह प्रकाश क्रमशः अधिक व्यापक होता जाता है। समूचे आकाश में फैलता है और पर्वत-शिखरों से नीचे उतर कर सारी जमीन पर फैल जाता है। ठीक उसी प्रकार महाप्रज्ञा की जो इन तीन वर्षों में कुण्डलिनी जागृत हुई है, उसकी ऊर्जा का उदयन प्रथम इस देश से होगा। पीछे क्रमशः वह समस्त विश्व में फैलता जाएगा। उसके प्रभाव से होता हुआ परिवर्तन हुआ था। इस बार भी वैसा ही होने जा रहा है। गंगा के तलहट की सफाई सरकार द्वारा इन दिनों बड़ी राशि खर्च करके कराई जा रही है। गोवर्धन की मानसी गंगा की तली में जमी हुई कीचड़ को भी इन्हीं दिनों पूरी तरह निकालकर उसमें नया पानी भरने का प्रावधान बना है। ठीक इसी प्रकार विश्व वातावरण में जो विविध प्रकार की अवाँछनीयताएँ घुस पड़ी हैं, अनेक परिमार्जन-परिशोधन किये जाने का ठीक यही समय है। प्रस्तुत कुण्डलिनी जागरण का यही प्रयोजन हैं कि व्यक्ति को नहीं, विश्व को आदर्शवादिता की पृष्ठभूमि पर सशक्त बनाया जाय। अनैतिकताओं, मूढ़मान्यताओं, अन्ध परम्पराओं, अवाँछनीयताओं से उसे मुक्त किया जाय।

परिवर्तन किस क्रम से होगा? परिवर्तन किस क्रम से होगा इस संदर्भ में यह समझ कर चलना चाहिए कि सर्व प्रथम जो जमा हुआ है, जड़ समाये हुए है, उसे उखाड़ना पड़ेगा। भले ही इसमें राहत के स्थान पर असुविधाएँ ही क्यों न सामने आयें?

नवजात शिशु को गोदी में खिलाने से पूर्व प्रसव पीड़ा सहनी पड़ती है और खून खच्चर हाता है। नाली में जमा गन्दगी साफ करते समय उस सारे क्षेत्र में दुर्गन्ध फैलती है, फोड़े को अच्छा करने से पूर्व उसका ऑपरेशन होता है और जमा हुआ विषैला द्रव्य बाहर निकालना पड़ता है। होम्योपैथी की औषधियों के बारे में कहा जाता है कि वे पहले उभार लाती है अर्थात् जो विकृतियाँ जमी हुई थीं, उन्हें भीतर से बाहर लाती हैं इसके बाद रोग का अच्छा होने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। इमारत खड़ी करने से पूर्व नींद खोदनी पड़ती है। कपड़े को रंगने से पूर्व उसे पीट-पीट कर धोना पड़ता है। यही प्रक्रिया कुण्डलिनी ऊर्जा के देशव्यापी-विश्वव्यापी बनने से पूर्व आरम्भिक दिनों में दृष्टिगोचर होगी। जो विकार, विद्वेष, प्रपंच, पाखण्ड, अनाचार, कुविचार मुद्दतों से जड़ जमाए बैठे हैं, उन्हें उखाड़े बिना नवीन स्थापनाओं को सिलसिला चल नहीं सकेगा, उपक्रम बन नहीं सकेगा। इसलिए इन आरम्भिक दिनों में यदि तोड़-फोड़ हो तो ऐसा ही समझना चाहिए जैसे कुम्हार मिट्टी को पानी से भिगोता, डंडे से कूटता और पैरों से रौंदता है। इसके बाद चाक पर बर्तन बनाने के उपरान्त उन्हें आवे में पकाता है। नवयुग के निर्माण में भी इसी प्रकार की प्रक्रिया को परिवर्तन की विधि व्यवस्था द्वारा अपनाया जा रहा है। इन दिनों जहाँ-तहाँ उपद्रव हो रहे हैं, तोड़-फोड़ चल रही हैं, तो भी किसी को निराश होने की आवश्यकता नहीं है।

वैद्य बहुमूल्य रसायन बनाते हैं तो औषधियों की पिसाई, घुटाई करने के उपरान्त रसभस्मों के अग्नि संस्कार भी करते हैं। अच्छी खासी औषधियों की दुर्गति बनाने जैसा ही यह क्रिया-कलाप दीखता है, पर इनका परिणाम अन्ततः अच्छा ही होता है। उज्ज्वल भविष्य की संभावना का यह प्रथम चरण है। वृक्ष बनने से पूर्व बीज को गलना-सड़ना पड़ता है, उसके बाद वह पौधा बनता और वृक्ष के रूप में फलता-फूलता हैं। वर्तमान विश्व व्यवस्था को भी पुरातन अनुपयुक्त ढाँचे में से निकालकर इस प्रकार ढालना पड़ेगा जिसमें नया कायाकल्प देखकर मानवी गरिमा का-विश्व की सुसंस्कृत समृद्धि का प्रत्यक्ष दर्शन हो सके।

वर्षा के दिनों में आरम्भ में सर्वत्र कीचड़ होती है। हवा-पानी से झोंपड़े उड़ने और मकान चूने लगते हैं। किन्तु कुछ ही दिनों में सूखे तालाब भर जाते हैं। हरे-भरे घास–पात से ऊसर-बंजर और फसल से खेत लहलहाने लगते हैं। वह समय इक्कीसवीं सदी का होगा, जिसमें सृजन का, अभ्युदय का, सभ्यता का विकास तेजी से होता दृष्टि गोचर होगा। अभी बीसवीं सदी के शेष तेरह वर्ष ऐसी ही उखाड़ पछाड़ से भरे होंगे। वर्षा के दिनों में भी खेतों की मेंड़ें टूटती हैं और नाले-नदियोँ में भयंकर बाढ़ आती है। समझना चाहिए कि वर्तमान तेरह वर्ष ऐसे हैं, जिनमें घटाएँ घुमड़ती, बिजली कड़कती और अनिष्ट की संभावना उतरती दीख पड़ेगी। पर अन्ततः यह तथ्य सभी के सामने आता है कि वर्षा की घटाटोप विभीषिका सभी प्राणियों के लिए सुखद परिणाम साथ लाई थी। इन दिनों की उथल-पुथल के पीछे निकट भविष्य में सुखद संभावनाओं का आगमन आँकना चाहिए।

सांसारिक प्रचलन में मनुष्य कर्म करता है। उसकी प्रतिक्रिया एवं परिणति सामने आती है। किन्तु दैवी विधान इससे भिन्न है। उसमें प्रथम वातावरण बनता है। उससे व्यक्ति, प्राणी एवं पदार्थ प्रभावित होते हैं। ऋतु चक्र ऐसा ही है। सर्दी, गर्मी, वर्षा अपने-अपने समय पर वातावरण विनिर्मित करती हैं। पतझड़ और बसन्त का प्रभाव सहज ही देखा जा सकता हैं। युग परिवर्तन को भी ऋतु परिवर्तन के समतुल्य दैवी कर्त्तव्य समझा जा सकता है। उसमें अदृश्य वातावरण की प्रधान भूमिका रहती है। उससे जड़ चेतन सभी प्रभावित होते हैं।

विश्व की-राष्ट्र की कुण्डलिनी जागृत होने का प्रभाव इस रूप में देखा जा सकेगा कि उससे जड़ पदार्थ, जीवधारी, मनुष्य एवं परिस्थितियों के प्रवाह प्रभावित होंगे। मृतिका की उर्वरता बढ़ेगी, खनिजों के भंडार तथा उत्खनन का अनुपात बढ़ जाएगा। धातुएँ मनुष्य की आवश्यकताओं से अधिक ही उत्पन्न होंगी। खनिज तेलों की कमी न पड़ेगी। रसायनें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होंगी। वृक्ष-वनस्पति उगाने के लिए मनुष्य को अधिक प्रयास नहीं करना पड़ेगा। वे प्रकृति की हलचलों से ही उपजते और बढ़ते रहेंगे। जलाशयों में कमी न पड़ेगी। वनौषधियाँ फिर प्राचीन काल की तरह इतनी गुणकारक होंगी कि चिकित्सा के लिए बहुमूल्य उपचार न ढूँढ़ने पड़ेंगे। उपयोगी प्राणी बढ़ेंगे और दीर्घ काल तक जीवित रहेंगे। हानिकारकों की वंश वृद्धि रुक जायगी और वे जहाँ-तहाँ ही अपना अस्तित्व बचाते हुए दीख पड़ेंगे। जलवायु में पोषक तत्व बढ़ेंगे और वे प्रदूषण को परास्त कर देंगे। मलीनता घटेगी और शुद्धता अनायास ही बढ़ेगी। प्रकृति प्रकोपों के समाचार यदा-कदा ही सुनने को मिलेंगे। बाढ़, सूखा, अकाल, महामारी, भूकम्प, ज्वालामुखी-विस्फोट, ओलावृष्टि, टिट्टी इत्यादि हानिकारक उपद्रव प्रकृति के अनुकूलन से सहज ही समाप्त होते चले जायेंगे।

मनुष्य की आकृति तो वैसी ही रहेगी जैसी अब है। पर अगली शताब्दी में उसकी प्रकृति असाधारण रूप से बदल जायगी। दुर्व्यसन हर किसी को अरुचिकर लगेंगे और न उनमें जनसाधारण की प्रीति रहेगी, न प्रतीति। चोरी, ठगी, निष्ठुरता, क्रूरता, पाखण्ड, प्रपंच अपने लिए न अनुकूलता देख पायेंगे, न अवसर प्राप्त करेंगे। अधिकाँश के जब गुण, कर्म, स्वभाव में सज्जनता भरी होगी तो दुष्ट-दुर्जनों की करतूतें न तो बन पड़ेंगी और न सफल होंगी। मक्खी-मच्छर सड़न कीचड़ में पनपते हैं। अनाचार भी तभी फूलते फलते हैं, जब उन्हें रोका-टोका नहीं जाता। जब पग-पग पर उन्हें विरोध, प्रतिरोध, दमन, निन्दा, भर्त्सना और असहयोग का सामना करना पड़ेगा तो उनकी दाल गलने ही कैसे पाएगी? जब प्रचलन सज्जनता का होगा तो दुष्टता को अपनी घात लगाने के लिए न तो अवसर मिलेगा, न साहस बन पड़ेगा।

लोग आत्म विश्वासी, स्वावलम्बी, और पुरुषार्थ पारायण होंगे तो दरिद्रता, अभावग्रस्तता के लिए कोई कारण ही शेष न रहेगा। मनुष्य की श्रमशीलता और बुद्धिमत्ता यदि काम करे तो उचित आवश्यकताओं की पूर्ति में कमी क्यों पड़ेगी? उदारता जीवन हो तो दुखों को बाँट लेने और सुखों को बाँट देने की परम्परा ही चल पड़ेगी। तब न किसी को क्रोध का आवेश ही जकड़ेगा, न प्रतिशोध के लिए हाथ उठेगा।

व्यक्तिगत स्वार्थपरता और निष्ठुरता ही सामूहिक रूप से विकसित होकर साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, शोषण उत्पीड़न, अपहरण आदि के घृणित कृत्यों में विकसित होती है। युद्ध उसी के कारण छिड़ते और असंख्यों के प्राण हरते हैं। वस्तुतः अहमन्यता ही विग्रह खड़े करती है। लड़ाई में दोनों ही पक्ष हारते हैं और जर्जर होकर इस स्थिति में पहुँच जाते हैं कि कठिनाई से ही अपना अस्तित्व बनायेर रखने में समर्थ हो सकें। युद्ध का उन्माद जब तक चढ़ा रहता है तब तक प्रतीत होता है कि अपनी स्थिति ही सर्वजयी है। किन्तु जब उन्माद उतरता है तो प्रतीत होने लगता है कि यह आत्मघात का ही एक तरीका है। विवेक का उदय होते ही यह समझ भी आ जाती है कि मतभेदों को विचार विनिमय से अथवा किसी न्यायनिष्ठ को पंच बनाकर उपयुक्त फैसले पर पहुँचा जा सकता है। ऐसे फैसलों में भले ही किसी को घाटा दिखाई पड़े, पर वह लड़ाई की तुलना में लाभदायक ही रहता है। यह समझ जब जनसाधारण में उपजेगी तो न छोटी लड़ाइयाँ होगी और न महायुद्ध रचे जायेंगे।

मानवी श्रमशीलता और बुद्धिमत्ता में इतनी सामर्थ्य है कि यदि उसे सृजन प्रयोजनों में लगाया जा सके तो उसके आधार पर इतने सुविधा साधन विनिर्मित किए जा सकते हैं, जिनका सदुपयोग करके मनुष्य देवताओं जैसी प्रसन्नता, सुसंस्कारिता करके मनुष्य देवताओं जैसी प्रसन्नता, सुसंस्कारिता एवं सर्वांग सुन्दरता प्राप्त कर सके। सन्मार्गगामी व्यक्तियों से भरी-पूरी इस धरित्री को ही स्वर्ग से बढ़कर समृद्ध एवं सुसम्पन्न देखा जा सकता है।

अगले दिनों ऐसा ही वातावरण बनेगा। इसे बनाने की अदृश्य भूमिका उस साधना द्वारा सम्पन्न होने जा रही है जिसे विश्व कुण्डलिनी जागरण नाम दिया गया है और जिसे विगत तीन वर्षों में कठिन तपश्चर्या के माध्यम से पूरा किया गया है।

परिवर्तित समय सुख संतोष से भरी-पूरी परिस्थितियों में विगत रामराज्य की तरह चिरकाल तक बना रहेगा। उसे “सतयुग की वापसी” नाम दिया जाय तो यह उचित ही होगा।


विवेकशीलता का स्वर्ग (Kahani)

एक सेनापति चीन के दार्शनिक नानुशिंगें के पास जिज्ञासा लेकर गया। उसने जाते ही पूछा-स्वर्ग और नरक के बारे में बताइए। नानुशिंगे ने उसका परिचय पूछा तो अतिथि ने अपने को सेनापति बताया। सुनकर सन्त हँसे और बोले-शक्ल तो आपकी भिखारी जैसी है। सेनापति तो आप लगते नहीं।

सुनते ही वह लाल पीला हो गया और अपने अपमानों से उत्तेजित होकर तलवार खींच ली और सिर काटने पर उतारू हो गया। नानुशिंगे ने फिर हँसते हुए कहा-तो तुम्हारे पास तलवार भी है? क्या सचमुच लोहे की है? क्या इस पर धार भी चढ़ी है और अगर है तो तुम्हारी कलाइयों में इतना दम-खम भी है कि मेरी गर्दन काट सको?

सेनापति आपे से बाहर हो गया। हाथ काँपने लगे। प्रतीत हुआ कि उसका वार होकर ही रहेगा। नानुशिंगे गम्भीर हो गये। उनने कहा-योद्धा, यही है नरक, जिसकी बात तुम पूछ रहे थे।

योद्धा ठंडा पड़ गया। उसने तलवार म्यान में कर ली। इस पर नानुशिंगें ने ठंडी साँस खींचते हुए कहा-देखा, यही है विवेकशीलता का स्वर्ग। जिज्ञासु का समाधान हो गया। वह घर वास लौट गया।


कुण्डलिनी साधना का मर्म एवं आवश्यक मार्ग दर्शन

पदार्थों में से प्रत्येक का अपना-अपना प्रत्यक्ष प्रकट एवं अप्रत्यक्ष अप्रकट रूप है। सोना एक मूल्यवान धातु है। यह जमीन से मिट्टी मिली कच्चे अयस्क के रूप में निकलती है, परन्तु उसे परिशोधन के उपरान्त बाजार में महँगे मोल में खरीदा जाता है, सुन्दर आभूषण बनते हैं। पर जब उसे रासायनिक क्रियाओं द्वारा स्वर्ण भस्म के रूप में विकसित किया जाता है तो उसके गुणों में अद्भुत विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती है। वह दुर्बल शरीर को बलिष्ठ एवं दीर्घायु बनाने के काम आती है। यही विशेषताएँ अन्य धातुओं में भी हैं। सामान्यतया उनके उपकरण बनते हैं पर शोधन-सूक्ष्मीकरण के उपरान्त वे रस-भस्मों के रूप में अपनी रहस्यमयी विशेषताएँ प्रकट करती हैं। रेत के परमाणुओं का सूक्ष्म अंश अणुशक्ति उत्पादन करने के काम आता है, जिससे बिजली, विकिरण, किरणें तथा आयुध बनते हैं। यह स्थूल का सूक्ष्मीकरण है।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि स्थूल की तुलना में सूक्ष्म में अगणित शक्ति होती है। मिट्टी के ढेले की तुलना में अणु-विस्फोट गजब का काम करता है। शरीर की तुलना में मनोबल की महत्ता अत्यधिक है। पानी से भाप की समर्थता कई गुनी है। आत्मा अदृश्य है तो भी वह विकसित हो महापुरुष, ऋषि, देवात्मा एवं अवतारों के रूप में प्रकट होती है।

मानवी सत्ता का सूक्ष्मीकरण भी इसी प्रकार योग और तप के माध्यम से हो सकता है। तपस्वी अपनी शरीरगत दिव्य क्षमताओं को जगाता है। भाप से रेल चलती है और बांसों के घर्षण से दावानल प्रकट होती है। तपस्या की साधनात्मक विधि-व्यवस्था से यही प्रभाव उत्पन्न होता है। आतिशी शीशे पर बिखरी हुई सूर्य किरणें जब एक बिन्दु पर एकत्रित की जाती हैं तो उतने भर से अग्नि की ऊर्जा दृश्यमान होने लगती है। तपश्चर्या का-साधना का प्रतिफल ऐसा ही होता है।

योग से मनुष्य की तुच्छता, दिव्य लोक की महानता के साथ जुड़ती है और उस गठबंधन का परिणाम होता है-लघु और महान् का एकीकरण। बिजली से जुड़ जाने पर सभी तार शक्तिशाली हो जाते हैं और अपने लिए नियोजित कार्य उस उपलब्ध शक्ति के सहारे सम्पन्न करने लगते हैं। बड़ी टंकी के साथ जुड़े हुए सभी नल तब तक पानी देते रहते हैं, जब तक टंकी भरी रहती है। स्पष्ट है कि दिव्य चेतना की टंकी कभी खाली नहीं होती है और उसके साथ जुड़ा हुआ नल तब तक पानी फेंकता है, जब तक कि कोई भारी व्यवधान बीच में आकार खड़ा न हो जाय। परब्रह्म की दिव्य चेतना को मानवी अंश चेतना जब धारण करती है तो उसे नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, तुच्छ से महान् बनने में देर नहीं लगती। कलेवर का विस्तार अपने साथ क्षमता को भी बढ़ाता चलता है। शेर की तुलना में हाथी का आकार ही नहीं, बल भी अधिक होता हैं। बच्चे की तुलना में तरुण का आकार ही बड़ा नहीं होता वरन् उसकी कार्य क्षमता भी उसी अनुपात से बढ़ जाती है। साधक की साधना उसे सिद्ध बना देती है।

साधनाएँ इसीलिए सफल नहीं होतीं क्योंकि उनमें आत्मसंयम, चरित्र का प्रखरीकरण और व्यवहार में उदार, सेवा-साधना का समन्वय नहीं होता। खाद पानी और रखवाली के बिना बोया हुआ बीज विशालकाय वृक्ष कैसे बने? यह तथ्य कुण्डलिनी साधना प्रकरण पर पूरी तरह लागू होता है।

कुण्डलिनी जागरण से तात्पर्य है-चेतना के अन्तराल में छिपी हुई दिव्य शक्तियों का जागरण प्रचंडीकरण। यह तीनों शरीरों में विभिन्न प्रयोजनों के लिये विभिन्न प्रकार से सम्पन्न हो सकता है।

उपाय-उपचारों की विदित और अनुभूत संख्या 14 पाई गई है। इन 14 विभूतियों की समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों के साथ तुलना की जाती है। इनका वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है। स्थूल शरीर में मूलाधार से लेकर मेरुदंड प्रदेश से आगे बढ़ते हुए सहस्रार कमल, ब्रह्मरन्ध्र तक जा पहुँचने वाला षट्चक्र समूह इन्हें भौतिक क्षेत्र की समृद्धियों के उत्पादन और अवरोधों के निवारण में काम आने वाले सशक्त माध्यम कहा जा सकता है। इनकी सिद्धियाँ मनुष्य को सशक्त, समृद्ध और प्रचण्ड-पराक्रमी बनाती है। इस आधार पर साधक सामान्यजनों की तुलना में कहीं अधिक सशक्त हो जाता है। हमारी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी ही नहीं रहतीं, अंतर्मुखी होकर व्यापक क्षेत्र में भी काम करने लगती हैं। जो दृश्य आँखों से नहीं देखे जा सकते, वे दिव्य दृष्टि के जगाने पर दीख पड़ते हैं। यही बात अन्य इन्द्रियों के संबंध में भी है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, विचार संप्रेषण, पदार्थ संचालन, प्राण प्रवाह, शक्तिपात, भविष्य ज्ञान जैसी स्थूल जगत से संबंधित सिद्धियाँ स्थूल शरीर के क्षेत्र की कुण्डलिनी जगाने पर उपलब्ध होती हैं। ओजस्, तेजस् और वर्चस् की बड़ी मात्रा का भी उपार्जन इस माध्यम से हो जाता है।

सूक्ष्म शरीर का कुण्डलिनी जागरण पंच कोशों के आधार पर होता है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय विज्ञानमय और आनन्दमय कोश चेतना पर चढ़ी हुई पाँच परतें हैं। उनमें पंच तत्वों का पंच प्राणों का समीकरण है। इन्हें पाँच लोक या पाँच आयाम भी कह सकते हैं। इन क्षमताओं के विकसित होने पर साधक अदृश्य जगत से जुड़ जाता है। सर्व-साधारण की जानकारी तो दृश्यमान पदार्थ जगत तक ही सीमित होती है, किन्तु सूक्ष्म शरीर की कुण्डलिनी जागने पर मनुष्य का संबंध अदृश्य जगत से बन जाता है। उसके निवासी पितरों, देवों के साथ उसका स्नेह संबंध जुड़ता और आदान-प्रदान का क्रम चल पड़ता है। वह प्रकृति के रहस्यों से अवगत होता है। भविष्य की संभावनाएँ जिस प्रकार पक रही है, उनका पूर्वाभास भी उसे मिल जाता है। इस जानकारी के आधार पर तद्नुरूप प्रबन्ध करके, अनुकूलताओं से लाभ उठाया जा सकता है और प्रतिकूलताओं को निरस्त किया जा सकता है। जनमानस में अभीष्ट आवेश भरे जा सकते हैं और लोक प्रवाह को मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है।

कारण शरीर के तीन प्रयोग हैं, उन्हें “ग्रन्थि भेद” कहते हैं। मस्तक मध्य में ब्रह्म ग्रन्थि है, जिसे कैलाश पर्वत अथवा क्षीर सागर कहा जाता है। उसे ब्रह्माण्डीय शक्तियों के साथ आदान-प्रदान में निरत ध्रुवकेंद्र कहा जा सकता है। दूसरा हृदय देश में विष्णु चक्र है। उसे चेतना का अन्तराल कह सकते हैं। भाव संवेदनाओं का केन्द्र यही है। तुष्टि, तृप्ति और शान्ति यहीं मिलती है। अपने मानस को उच्चस्तरीय बनाने के अतिरिक्त दूसरों की समझ को भी समुचित मोड़ देना, इस विष्णु ग्रन्थि की शक्ति के सहारे ही बन पड़ता है। तीसरी ग्रन्थि है रुद्र ग्रन्थि। यह नाभि चक्र में है। शारीरिक स्वास्थ्य, प्रतिभा, प्रखरता, सशक्तता, साहसिकता, उत्पादन, अभिवर्धन जैसे अनेकों शक्ति स्रोत इस क्षेत्र में पाये जाते हैं। मूलाधार चक्र इसी गह्वर में है। कुण्डलिनी के चिर विश्राम का क्षेत्र यही है। उसे प्राण-प्रहार से ही जगाया, ऊँचा उठाया और ब्रह्मलोक तक पहुँचाया जाता है।

स्थूल शरीर के छः चक्र सूक्ष्म शरीर के पाँच कोश-कारण शरीर की तीन ग्रन्थियाँ मिलकर चौदह बनते हैं। यही चौदह भुवन हैं। इनमें से सात ऊर्ध्वलोक हैं और सात अधःलोक। सात का उन्नयन अभ्युदय के लिए प्रयोग होता है; और सत्ता का दुष्टता के दमन के लिए-संकट निवारण हेतु। मानवी सत्ता को ही समुद्र माना जा सकता है और उसे त्रिविधि कुण्डलिनी साधना द्वारा मथा जा सकता है। सही अर्थों में इसमें शरीर ही दैत्य है, और मन ही देव है। दोनों मिलकर जब तप योग की शाखा-प्रशाखाओं का अवलम्बन लेते हुए साधनारत होते हैं तो उपरोक्त 14 रत्नों को

हस्तगत करते है पौराणिक समुद्र मन्थन में इन्हीं की वर्णन विवेचन अलंकारिक रूप में किया गया है मानवी सत्ता के पंच तत्वों और प्राणों से बने हुए कलेवर को समुद्र जितना गहरा और विशाल रत्नाकर माना गया है। अभीष्ट की प्राप्ति के लाए हम कही अन्यत्र बाहरी जाने की आवश्यकता नहीं है। जो चाहिए सो भीतर ही विद्यमान है उसे बाहर क्योँ ढूंढ़ा जाय कस्तूरी हिरन की तरह अपनी नाभि में ही क्यों न तलाश लिया जाय?

संक्षेप में यही है कुण्डलिनी विज्ञान की रूप रेखा जिसका अंक के विगत पृष्ठों में परिचय विवरण विधान का संकेत दिया गया है पर इन चौदह विधानों में से किसी की भी समग्र रूपरेखा जानबूझ कर प्रस्तुत नहीं की गयी है। क्यों कि यह अणु विस्फोट जैसा प्रयोग से पूर्व यह जानना पड़ता है कि किसी स्थिति का कौन व्यक्ति किस प्रयोजन के लिए इसे प्रयुक्त करना चाह रहा है यह विदित हुए बिना साधना आरम्भ कर देना बारूद के ढेर के साथ खिलवाड़ करने के समान है गलत उपयोग से कर्ता की ऐसी हानि भी हो सकती है जिसकी क्षतिपूर्ति न हो सके। नौसिखियों और असावधानों के लिए तो ज्ञानयोग भक्तियोग कर्मयोग प्रज्ञायोग आदि सरल जीवन साधनाओं से भी काम चल सकता है। वे इतना ही कर ले तो बहुत है।

कुण्डलिनी विधान सीखने के लिए किसी को भी आतुरता नहीं अपनानी चाहिए और न उसका कोई सिरा पकड़कर पूर्णता तक पहुंचने की साध संजोनी चाहिए। इस महान प्रयोग में से जितना जिसके लिए उचित और आवश्यक है उतना उसे सिखाते रहने की हमारी जिम्मेदारी कम से कम एक शताब्दी तक बनी रहेगी उसे बताया और सिखाया जाता रहेगा। स्थूल शरीर न रहने पर भी हमारी सूक्ष्म सत्ता अपने सामयिक दायित्वों का निर्वाह भली प्रकार करती रहेगी।

किसी सत्पात्र को यह अनुभव न होने दिया जायगा कि सिखाने वाले के अभाव में हमारी आत्मिक प्रगति की उचित आवश्यकता कुण्डलिनी जागरण का विधान न मालूम होने के कारण इच्छा पूर्ति न हो सकी। जिस प्रकार दिव्य शक्तियों ने हम से 24 वर्ष महापुरश्चरण पूरा कराया और तीन वर्ष में कठोर तप के माध्यम से देश की कुण्डलिनी जगाने का विधान ही नहीं बताया वरन् साथ देकर जो आवश्यक था उसे पूरा करने का सरंजाम भी जुटाया। उसी प्रकार हम भी यह प्रयत्न करेंगे कि प्रज्ञा परिवार के परिजनों में से जो विशेष प्रयोजन के लिए विशेष आत्मबल संग्रह करने के लिए कुण्डलिनी विज्ञान का आश्रय लेना चाहे उनकी आवश्यकता को पूरी करने के लिए आवश्यक प्रयोग बिठाते एवं सरंजाम जुटाते रहे।


अपनों से अपनी बात - तीनों चरण सम्पन्न होने चाहिये

अखण्ड ज्योति के प्रत्येक परिजन को इन दिनों अपने निजी काम धंधे में कटौती करके भी युग देवता के आमंत्रण को चुनौती रूप में स्वीकार करना चाहिए और नव सृजन की ऐतिहासिक बेला में हाथ बटाने कंधा लगाने और कदम से कदम मिलाकर चलने की तैयारी करनी चाहिए। साथ ही यह विश्वास भी रखना चाहिए कि लोक मंगल के लिए बरती गई उदार साहसिकता उससे अधिक मूल्यवान फसल लेकर वापस लौटेगी जितना कि बीज बोया गया है।

यह युग संधि बेला है। इसमें भी वर्तमान वर्ष का अपना विशेष महत्व है दो वर्ष से चल रही हीरक जयन्ती अखण्ड ज्योति देश की कुण्डलिनी जगाने की त्रिवर्षीय योजना का यह त्रिविधि संगम समागम है। इसे त्रिवेणी संगम भी कह सकती है और पूर्णाहुति वर्ष भी। किन्तु कार्य पद्धति इतनी सरल है जिसे वयस्क व्यक्ति भी अपने निजी प्रयास से अथवा संपर्क परिकर के सहारे सरलता पूर्वक सम्पन्न कर सके।

जहाँ बड़े सामूहिक यज्ञ सम्पन्न हुए है। वहाँ समीपवर्ती क्षेत्रों में अन्य छोटे बड़े महायज्ञ सम्पन्न करने का प्रयत्न करना चाहिए। देश को देवभूमि यज्ञभूमि बनाना है। वातावरण वायुमण्डल का संशोधन करना है साथ ही यज्ञ की साक्षी में सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के संकल्प भी लेने है। व्यक्ति एवं समाज कायाकल्प का यह एक प्रभावशाली तरीका है। जहाँ सामूहिक यज्ञ बड़े रूप में सम्पन्न न हो सके वहाँ इतना तो करना ही चाहिए कि अपना जन्मदिवसोत्सव मनाया जाय। एक कुण्डी यज्ञ सम्पन्न किया जाय और संपर्क क्षेत्र के अन्य साधक लोगों को एकत्रित करके इस अवसर पर सम्पन्न हुई विचार इसका महत्व समझा जाना चाहिए अनुमान करना चाहिए कि महाकाल के ऐसे चुनौती भरे आमंत्रण बार बार नहीं आते पेट प्रजनन का लोभ मोह से भरा पूरा जंजाल तो जन्म जन्मांतरों तक यथावत चलता रहता है।

इस वर्ष के महासंकल्प को तीन चरणों में विभाजित किया गया है तीनों एक से एक अधिक महत्वपूर्ण है 1 राष्ट्रीय एकता सम्मेलन सहित एक सहस्र से भी अधिक गायत्री महायज्ञों की शतकुण्डी और चौबीस कुण्डी श्रृंखला इस योजना के अंतर्गत एक लाख कुंडों के यज्ञ सम्मेलन संपन्न होने है 2 प्रज्ञा परिवार की एक लाख अभिनव शाखाओं का संगठन 3 शान्ति कुंज में चल रहे नालन्दा विश्व विद्यालय स्तर के एक एक मास वाले युग शिल्पी सत्रों में एक लाख देव मानवो का प्रशिक्षण।

यह तीनों ही कार्य एक से एक महत्वपूर्ण है। साथ ही यह कार्यक्रम ऐसे भी है जिनका माहात्म्य असाधारण है गोष्ठी का उन सब को लाभ लेने दिया जाय।

सामूहिक यज्ञों के लिए हरिद्वार से सभी आवश्यक समान लेकर अक् पहुंच रहे हैं इससे स्थानीय लोगों को भोजन व्यवस्था के अतिरिक्त अनरु कार्यों में कम ही भागदौड़ करनी पड़ती है। फिर भी रोशनी सफाई स्थान का चयन निमंत्रण सुरक्षा जैसी अनेकों जिम्मेदारी तो उठानी ही पड़ती है जहाँ नियमित संगठन नहीं हैं। वहाँ के लोग एकाकी साहस के बल पर भी यह व्यवस्था कर सकते है प्रबंध के लिए समीपवर्ती शाखाओं के जानकार लोगों को बुला सकते है। संकल्पित एक लाख कुंडों के यज्ञ आयोजनों की पूर्ति होने की सुनिश्चित संभावना है।

अभिनव प्रज्ञा परिवारों की स्थापना के लिए न्यूनतम तीन सदस्यों की शाखा से काम चल जाता है। यह तीनों नियमित समय दान और अंश दान की प्रतिज्ञा लें उसी उदार अनुदान के सहारे अपने छोटे बड़े संपर्क क्षेत्र में जन जागरण की गाड़ी चल पड़ेगी।

अत्यन्त छोटे रूप में यह अपने घर पड़ोसी परिवार रिश्तेदार, दफ्तर, परिचित क्षेत्र में से भी चलता रह सकता है। बड़े रूप में तीनों की टोली जन संपर्क के लिए अपने गाँव मुहल्ले से निकले और जन मानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के दोनों कार्य अधिकाधिक व्यापक बनाने का प्रयत्न करें। नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक सुधार परिवर्तन के कार्य इसी परिधि में आते हैं। जिनसे भी संपर्क बने, बढ़े उन्हें प्रभावित परिचित करवाने का प्रयत्न किया जाय।

तीन सदस्यों वाले शाखा संगठन इसलिए बनाने पड़े कि बड़े संगठनों को चलाने के लिए जितनी आत्मीयता और दूरदर्शिता की आवश्यकता है। उसका विकास अभी नहीं हुआ है। फलतः वे कुछ कार्य करने की अपेक्षा आपसी झंझटों में फँस जाते हैं। संगठन का कार्य ठप्प हो जाता है। इसलिए एक मन के तीन व्यक्तियों के एक जुट होकर काम करने पर अपेक्षाकृत अधिक एवं ठोस कार्य होने की आशा की गई है। ऐसे संगठन कहीं भी आसानी से वन भी सकते हैं। उनकी उद्देश्य पूर्ण मित्रता लोक सेवा के क्षेत्र में निभ भी सकती है।

अभिनव शाखा संगठनों को पाँच सूत्री कार्यक्रम दिये गये हैं। (1) झोला पुस्तकालय। संपर्क क्षेत्र के शिथिलों को अपना युग साहित्य पढ़ने देना वापस लेना और अशिक्षितों को सुनाना (2) विज्ञजनों के जन्मोत्सव मनाना (3) स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से हर मुहल्ले में प्रकाश चित्र दिखाना और उनकी व्याख्या में प्रचलन करना। (4) दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखना (5) सुगम संगीत के माध्यम से विचार गोष्ठियों एवं बड़े आयोजनों में युग चेतना का प्रचार विस्तार करना।

इन प्रचार माध्यमों के सहारे उन सभी विषयों पर प्रकाश डाला जा सकता है। जो आज के समय में नितान्त आवश्यक है। शिक्षा संवर्धन स्वच्छता अभियान व्यायाम शाला बाल संस्कार शाला प्रौढ़ शिक्षा महिला उत्कर्ष वृक्षारोपण आँगनबाड़ी जड़ी–बूटी चिकित्सा जैसे उपयोगी कार्यों के जहाँ जितना सम्भव हो शुभारंभ कराये जा सकते हैं। कुरीति निवारण क्षेत्र में नशानिषेध जातिपाँतिगत ऊँच नीच पर्दा प्रथा भिक्षा व्यवसाय मृतक भोज, धूमधाम वाले दहेज विवाह जैसे बुरे प्रचलन समाज के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में फैले हुए हैं। इनका निराकरण करने के लिए लेखनी और वाणी से सुधार किया जाना है और आवश्यकतानुसार असहयोग विरोध संघर्ष भी खड़ा किया जाना है। इस सबके लिए योजना बद्ध रूप में अपनी शक्ति और सीमा के अंतर्गत प्रत्येक छोटी बड़ी शाखाओं को पूरी लगन और निष्ठा के साथ कार्य करना चाहिए।

नवशाखा स्थापित करने वालों को सभी आवश्यकता उपकरणों का प्रबन्ध करना चाहिए। जिनके पास पहले से ही हैं उनके अतिरिक्त जो कभी पड़े उसे स्थानीय कारीगरों से बना सकते हैं या हरिद्वार से खरीद सकते हैं। इसके लिए आरम्भिक पूँजी के रूप में प्रायः एक हजार की राशि मिल जुलकर एकत्रित करनी चाहिए। यह भी हो सकता है। कि जितने पैसे का प्रबन्ध होता चले उतने उपकरण खरीदते भी रहे और उन्हें क्रमश बढ़ाते चलें। शाखा का कार्यक्रम किसी संचालक के घर में रखा जा सकता है। आवश्यक उपकरण भी वहीं सुरक्षित रहे। अखण्ड ज्योति के सदस्य स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा पीठ समर्थ शाखा संगठन कार्य क्षेत्र में उतरेंगे तो विश्वास है कि नये शाखा संगठन जिनमें तीन तीन सदस्य हों एक लाख की संख्या में एक वर्ष के भीतर ही बन जायेंगे।

तीसरा चरण है एक लाख प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को तैयार करना। शान्ति कुँज में नालन्दा विश्वविद्यालय स्तर की एक एक महीने वाली युग शिल्पी शिक्षा गत वर्ष से सफलता पूर्वक चल रही है। अब इसे और भी द्रुतगामी बनाने के प्रयत्न चल पड़ने चाहिए। नव स्थापित शाखाओं के तीन सदस्य शिक्षा प्राप्त करने आयें। यज्ञ आयोजनों के माध्यम से जिन क्षेत्रों से संपर्क बना और बढ़ा हो उसके प्रतिभावान भावनाशीलों को आग्रह पूर्वक सत्रों से भिजवाया जाय। अब यह भय निकाल देना चाहिए कि हरिद्वार में अधिक ठंड पड़ती है। यहाँ भी मौसम अब सामान्य स्थानों जैसा ही रहने लगा है। गत दो माहों में 300 से भी अधिक नैष्ठिक कार्यकर्ताओं का प्रति मास शिविर में शिक्षण प्राप्त करके जाना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

प्रज्ञा परिवार के प्रत्येक परिजन को उपरोक्त तीनों ही संकल्प पूरा कराने में अपना भाव भरा योगदान देना चाहिए और उनकी पूर्ति के लिए प्राणपण से जुटना चाहिए।


प्रगति पथ पर अग्रसर प्रज्ञा परिवार - आई अब जागृति की बेला, सोने वाले जागो रे

भगवान राम ने जब समुद्र बाँधा तो नल, नील रीछ बानरों से भी बढ़कर उस गिलहरी के पुरुषार्थ को सराहा गया जो अपनी पूँछ में गली धूलि से समुद्र पाटने चली थी। अवतार सत्ता ने उसे अकिंचन समर्पित प्राणी को स्नेह से दुलारते हुए कहा था गिलहरी मेरी वास्तविक सामर्थ्य तो ही है। तेरे पास लगन है, साहस है संकल्प है एवं सत्य के पथ पर चलने की अडिगनिष्ठा है। प्रस्तुत कथानक की झाँकी प्रज्ञा अभियान के बढ़ते चरणों में गिलहरी की भूमिका निभा रहे देवमानवों के प्रयासों के रूप में अपने चारों ओर देखी जा सकती है।

शांति कुँज में प्राचार्य की मॉरल एजुकेशन ट्रेनिंग शान्ति कुँज (हरिद्वार)। एक वर्ष से चल रहे नैतिक शिक्षा प्रशिक्षण के अगले चरण में उ.प्र. शासन के राजकीय विद्यालयों के प्रधानाचार्यों का नैतिक शिक्षा प्रशिक्षण सत्र भाव भरे वातावरण में शान्ति कुँज के लक्ष्मी हाल में प्रारंभ हो गया। उद्घाटन उत्तर प्रदेश शासन के शिक्षा सचिव माननीय श्री जे.सी. पंत ने किया।

विभिन्न जनपदों से पधारे प्रधानाचार्यों को सम्बोधित करते हुए सचिव महोदय ने शान्ति कुँज के वातावरण और शिक्षण की सराहना करते हुए पिछले एक वर्ष के प्रशिक्षण की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला और बताया कि उतर प्रदेश में अनेक समस्याओं के रहते हुए भी इस प्रशिक्षण से शिक्षा के स्तर पर अभूतपूर्व सुधार हुआ है।

इसे एक क्रान्तिकारी मोड़ समझा जा रहा है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश, उड़ीसा बिहार हिमाचल प्रदेश गुजरात एवं राजस्थान प्रशासन भी अपने शिविर आयोजित करने के लिए प्रयत्नशील है। उत्तर प्रदेश के मध निषेध विभाग की तिथियाँ प्रायः निर्धारित हो चुकीं है। राज्य ग्राम्य विकास विभाग भी चाहता है कि उनके अधिकारियों के लघु प्रशिक्षण सत्र चले। यहाँ से प्रशिक्षण प्राप्त कर लौटे अधिकारियों में ईमानदारी जिम्मेदारी और कर्मनिष्ठा का अभूतपूर्व विकास हुआ है। प्रशासन तंत्र के सुचारु संचालन के यही मूलभूत तत्व है। यहाँ से शिक्षण प्राप्त करने गये शिक्षक एवं अधिकारीगण सही अर्थों में सृजन साधक बनकर गये हैं।

कन्या विद्यालय को इन्टरमीडिएट की मान्यता

आँवलखेड़ा (आगरा) परम पू. गुरुदेव की जन्मभूमि में बनी गायत्री शक्तिपीठ से प्रारम्भ राजकीय कन्या विद्यालय को इन्टरमीडिएट की मान्यता इसी वर्ष से मिल गई है, उससे इस क्षेत्र में कन्या शिक्षण के लिये अभूतपूर्व उत्साह जागृत हुआ है, यहाँ तक कि बहुयें भी पर्दा छोड़कर उच्च शिक्षा के लिए आगे आ रही हैं।

उल्लेखनीय है कि कन्या शिक्षा की दृष्टि से यह क्षेत्र अब तक बहुत पीछे था। दूर दूर तक कोई कन्या विद्यालय नहीं था। गायत्री शक्तिपीठ ने अपना भवन देने का वचन दिया तो शासन ने कन्या विद्यालय खोल दिया। अब उसमें ग्यारहवीं कक्षा में भी कन्यायें प्रवेश ले रहीं हैं।

राष्ट्रीय एकता सम्मेलन श्री गणेश

वाराणसी (उ.प्र.) तैयारी के लिये न्यूनतम समय मिलने पर भी गायत्री परिवार वाराणसी के परिजनों ने जितना शानदार राष्ट्रीय एकता सम्मेलन सम्पन्न किया उसे देखकर लोगों ने इसे दैवी चमत्कार की संज्ञा दी।

आयोजन में प्रतिदिन बड़ी संख्या में प्रबुद्ध वर्ग सम्मिलित हुआ इसके अतिरिक्त पूर्वांचल के जौनपुर गाजीपुर मिर्जापुर, आजमगढ़ बलिया एवं बिहार के रोहतास और पलामू जिले के प्रायः 15000 प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। लखनऊ कानपुर सुल्तानपुर इलाहाबाद बरेली तक से प्रतिनिधि आयें।

अन्य धर्मावलंबियों, गुरुद्वारों के ग्रन्थी सेन्टपाल चर्च के पादरी मुसलिम धर्म के मौलवियों ने राष्ट्रीय एकता मंच से संदेश दिये और इस आयोजन को भूरि भूरिक सराहा। आवास व्यवस्था के लिये भारतीय शिक्षा मन्दिर के प्राचार्य श्री प्रेम नारायण के लाल ने उल्लेखनीय सहायता की।

बड़ी संख्या में संस्कार और मिशन को घर-घर पहुँचने के संकल्प हुये।

बहराइच आयोजन-मिनी कुँभ

बहराइच (उ.प्र.) राष्ट्रीय एकता सम्मेलन और शतकुण्डी यज्ञ आयोजन की पूर्णाहुति में 50 हजार व्यक्ति सम्मिलित हुये। कुँभ जैसा वातावरण देखकर प्रशासन आश्चर्यचकित रह गया।

आयोजन का उद्घाटन करते हुये माननीय जिलाधीश महोदय बहराइच ने इस राष्ट्रीय एकता सम्मेलन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। सिख, ईसाई, मुसलिम, सभी समुदाय सम्मिलित हुए। खीरी-लखीमपुर, सीतापुर, हरदोई लखनऊ, फैजाबाद, गोण्डा तथा बस्ती जनपद के प्रायः 500 वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने सहयोग दिया। जल कलश यात्रा में 5 हजार महिलाओं ने सम्मिलित होकर नारी जागरण का उद्घोष किया।

धार्मिक सौहार्द का अद्भुत संगम

चुरु (राज.) शतकुंडी यज्ञ और राष्ट्रीय एकता सम्मेलन इस क्षेत्र के लिये एक ऐतिहासिक यादगार बन गया है जिसमें एक ओर मुसलमान भाइयों ने भी यज्ञ में आहुतियाँ दी दूसरी ओर दुर्व्यसन, माँसाहार जैसी घृणित दुष्प्रवृत्तियों का परित्याग करने वालों का मेला-सा लग गया।

इस आयोजन में राजस्थान के अतिरिक्त, गुजरात तक से बसों में लोग आये। प्रबुद्ध व्यक्तियों ने भी इस अध्यात्म की गरिमा अनुभव की और बड़ी संख्या में दीक्षा लेकर उन्होंने अपने जीवन सतोगुणी दिशा में मोड़े। कट्टर पंथ के लिये विख्यात इस क्षेत्र में प्रतिगामिता की चूलें पूरी तरह हिल गई। सब तरफ धार्मिक सहिष्णुता के सतयुगी दर्शन हुये।

अनुपम! अवर्णनीय! अविस्मरणीय!

बाड़मेर (राज.) के इतिहास में आज तक ऐसा विशाल आयोजन कोई नहीं हुआ था जैसा इस बार शतकुंडी गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन हुआ। अनेक विघ्न बाधाओं और अकाल के बावजूद भी बड़ी भारी संख्या में नर नारी उपस्थित हुए। सम्मिलित होने वालों में सभी धर्म और वर्ग के लोग थे।

संगीत ओर प्रवचनों में राष्ट्र की एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण बनाने के सूत्रों पर प्रकाश डाला गया जिसकी प्रशासनिक अधिकारियों ने भूरि-भूरि सराहना की।

प्रवासी परिजनों का समागम हिमालय की गोद में

मंसूरी (उ.प्र.) केन्या के श्री हंसमुख रावत द्वारा संचालित “मंसूरी इन्टरनेशनल स्कूल” के सत्र समापन के शुभ अवसर पर केन्द्र के प्रतिनिधियों द्वारा हिमाच्छादित चोटियों के मध्य स्थित श्रीनगर एस्टेट में, 23 नवम्बर को शतकुण्डी यज्ञ सम्पन्न किया गया। अमेरिका, इंग्लैण्ड, केन्या, तंज़ानिया, जापान, इंडोनेशिया, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जाम्बिया, बाँग्लादेश, साउथ अफ्रीका, कैमेरान, आबूधाबी, दुबई एवं नाइजीरिया से आए डेढ़ सौ से अधिक अभिभावकों ने पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा पर स्थापित इस कन्या विद्यालय के प्राँगण में सपरिवार भारतीय संस्कृति के उस शाश्वत रूप का दर्शन किया जिसके प्रशिक्षण हेतु दिव्य संरक्षण में वे अपनी कन्याओं को 10 माह पूर्व, छोड़कर गए थे। केन्द्र से आए श्री शिवप्रसाद मिश्र, श्री दिव्यानन्द, डॉ. प्रणव पाण्ड्या एवं डॉ. अमलकुमार दत्ता ने अपने सहयोगियों के साथ विभिन्न पक्षों की महत्ता एवं देव संस्कृति के स्वरूप का प्रस्तुतीकरण लगभग 5000 की संख्या में उपस्थित मंसूरीवासियों के समक्ष किया। उत्तराखण्ड में हुए इस आयोजन ने पाश्चात्य संस्कृति में पले लोगों में एक नयी हलचल पैदा की है।

सामूहिक विवाह

मंदसौर (म.प्र.) केन्द्रीय प्रतिनिधि श्री बालकृष्ण उपाध्याय के संरक्षण में 62 विवाहों का सामूहिक आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। सामूहिक विवाह स्वर्णकार समाज द्वारा सम्पन्न कराये गये।

श्री उपाध्याय ने भारतीय समाज द्वारा विवाह जैसे धार्मिक समारोहों को विकृत रूप देने, दहेज, अलन-चलन तिथि, मुहूर्त, फिजूलखर्ची जैसी बुराइयों की ओर उपस्थित जनसमूह का ध्यान आकर्षित किया और बताया कि समाज को खोखला करने में इन्हीं का सबसे बड़ा हाथ है। उपस्थित जनसमूह में सैकड़ों लोगों ने अपने बच्चों के दहेज रहित आदर्श विवाह करने की प्रतिज्ञा की।

प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव

मेहसाणा (गुज) गायत्री शक्तिपीठ का प्राण प्रतिष्ठा समारोह केन्द्रीय प्रतिनिधि श्री केशरी कपिल के संचालन में बड़े त्यौहार जैसे वातावरण में सम्पन्न हुआ। गुजरात की प्रायः सभी शाखाओं के परिजन पधारे।

स्थानीय प्रशासन ने हर संभव सहयोग प्रदान कर आयोजन को सफल बनाने में पूरी सहायता प्रदान की। उन्होंने स्थानीय कार्यकर्त्ताओं की निष्ठा, लग्न और परिश्रम को हृदय से सराहा।


महाशक्ति कुण्डलिनी

(माया वर्मा)


महाशक्ति कुण्डलिनी (Kavita)

कुण्डलिनी है महाशक्ति, इस जीवन की। इसमें ऊर्जा केन्द्रित रहती तन-मन की॥

योगी, ऋषि, मुनियों ने, की थी खोज यही। कुण्डलिनी है परम शक्ति यह बात कहीं।

अंतिम पगडण्डी है, यही प्रभु मिलन की। कुण्डलिनी है महाशक्ति इस जीवन की।

इसे जगाने से, मानव होता ज्ञानी। बन सकता कवि, कलाकार या विज्ञान॥

जननी यह अध्यात्मिक, बौद्धिक चिंतन की। कुण्डलिनी है महाशक्ति, इस जीवन की॥

इस सागर मंथन में चौदह रत्न भरे। कामधेनु यह बस इच्छाएँ पूर्ण करें॥

सुख की वर्षा हेतु, घटा यह सावन की। कुण्डलिनी है महाशक्ति, इस जीवन की॥

सहस्रार दल-कमल, इसी से खिलाता है। आत्मा को प्रभु धाम, परम पद मिलता है।

गंध यही है सूक्ष्म जगत के कानन की। कुण्डलिनी है महाशक्ति इस जीवन की॥

इसमें झरते प्रज्ञा, मेधा के झरने। ऋद्धि सिद्धियाँ आतीं जीवन नद भरने।

स्वस्थ गात मन सुखी पूर्ति होती धन की। कुण्डलिनी है महाशक्ति इस जीवन की॥

इसका स्वामी, दिव्य गुणों का सागर है। यह जीवन के, प्राणामृत की गागर है।

ब्राह्मी शक्ति यही तो है, पंचानन की। कुण्डलिनी है महाशक्ति, इस जीवन की॥

*समाप्त*