आवश्यकता संपत्ति की उतनी नहीं; जितनी सदाशयता की। सदाशयता हमें हिल-मिलकर रहना और मिल-बाँटकर खाना सिखाती है। आपस में स्नेह और सहयोगपूर्वक कैसे रहा जाता है और जो सामने है, उसे मिल-बाँटकर कैसे खाया जाता है? यह ज्ञान का सार है। सोचने का तंत्र हमें मिला था, पर सोचने की कला से हम अपरिचित हैं। श्रम करने के लिए उपकरण हमें मिले हैं, पर क्या श्रम किया जाए और क्यों किया जाए? इसका भान कदाचित् ही किसी को है।
संपत्ति के साथ सदाशयता का समावेश आवश्यक है, अन्यथा बासी रखा हुआ उपयोगी भोजन भी सड़ेगा और उसे जो कोई काम में लाएगा, वही बीमार पड़ेगा। संपत्ति के अभाव में कितने ही लोग कष्ट पाते हैं, पर उससे अधिक वे लोग हैं, जो संपत्ति का उपयोग न जानने के कारण दुःखी हैं। संपत्तिवानों को दुर्व्यसनों में ग्रस्त देखा जाता है। उपयोग करने पर सुई भी अपने लिए घातक बन जाती है। कुकर्मों की भरमार संपन्नता के बाहुल्य से ही होती है। इसलिए संपत्ति से कहीं अधिक सदाशयता की आवश्यकता है। केवल सदाशयता की सहायता से जिंदगी हँसते-हँसाते कट सकती है; किंतु केवल संपत्ति अपने और दूसरों के लिए संकट खड़े करेगी।
बदले के लिए हर भला-बुरा आदमी अपना काम करता है, पर ऐसे लोग कम हैं, जो निष्काम भाव-से सेवाकार्य कर सकें।
श्रमिक शाम की मजूरी पाने के लिए दिनभर काम करता है। व्यवसायई, शिल्पी, कलाकार, नट आदि सभी अपने-अपने कार्य इसलिए करते हैं कि उन्हें उनके परिश्रम की उजरत मिले। जहाँ इसमें कभी कटौती दिखती है, वहाँ वे अपना काम करना बंद कर देते हैं।
आक्रामक लूट का माल बटोरने के लिए, क्रुद्ध प्रतिशोध लेने के लिए, चोर सेंध मारने के लिए अपना काम सतर्कतापूर्वक करते हैं। लालची अधिक संपन्न बनने के लिए योजनाएँ बनाते हैं और उन्हें क्रियांवित करने का जुगाड़ बिठाते रहते हैं। विलासियों को वासनाएँ तृप्त करने की धुन रहती है। वे भौंरे की तरह एक फूल से दूसरे पर मँडराते देखे गए हैं।
जिन्हें अपने बड़प्पन का बवंडर दिखाकर लोगों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करना है, वे गर्दभ होते हुए भी सिंह की खाल औढ़ते और चापलूसों को लालच देकर उससे झूठे बड़प्पन का यशगान कराते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि गधा, ऊँट के रूप की और अन्य, गधे के स्तर की प्रशंसा करें। प्रपंची अपना गिरोह खड़ा करते हैं और एकदूसरे का स्वार्थ साधने के लिए समझौते करते रहते हैं।
कर्म तो सभी को करना पड़ता है, चाहे वह अलाभप्रद ही क्यों न हो? बंदर इस डाली से उस डाली पर उचकते-मचकते रहते हैं। टहनियाँ और पत्ते तोड़कर जमीन पर गिराते रहते हैं। इस निरर्थक श्रम से भी उन्हें मजा आता है। झिंगुरों के बोलते और मेंढ़कों के टर्राते रहने में यों प्रत्यक्षतः कोई प्रयोजन सिद्ध होता नहीं दिखता, फिर भी वे आदत से मजबूर होकर कुछ करते ही रहते हैं। चुप न बैठ सकना उनकी मजबूरी है। ताश, चौपड़, शतरंज आदि के खेलों में मनोविनोद के अतिरिक्त उनमें निरत रहने पर प्रयास का प्रतिफल प्राप्त कर सकते हैं, यह भी नहीं दिखता।
पुण्य-परोपकार में निरत देखे जाने वालों में भी छिपी लालसाएँ काम करती देखी जाती हैं। लोगों की आँखों में धर्मांधपन दिखाने और बदले में उसी उपजी सद्भावना का प्रकारांतर से लाभ उठाने का मन रहता है। सस्ती वाहवाही भी इस प्रयास से सहज ही मिल जाती है। नाम और फोटो छपते हैं तो मन प्रसन्नता से भर जाता है। नेता बनकर कितने ही परोक्ष लाभ उठाने के लिए कितने ही लोग जनसेवा का आडंबर रचते हैं और उसी रूप में अपने को प्रख्यात करने का प्रयत्न करते हैं, ताकि बदले में कहीं अधिक मूल्य का जनसहयोग प्राप्त किया जा सके।
इन प्रपंचों में मनोविनोद भर होता है, वह आत्मसंतोष नहीं मिलता, जो निस्वार्थ सेवा धर्म अपनाने पर हस्तगत होता है। अपने स्वार्थसाधन का परित्याग करते हुए, जो मात्र दूसरों के दुखों को बँटाने और अपने सुखों को बाँटने का आत्मिक और वास्तविक आनंद प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए एक ही मार्ग है। निस्वार्थ सेवा-साधन, सत्प्रवृत्ति-संवर्ध्दन।
प्रदर्शन के लिए दरिद्रों की सहायता करना आत्मविज्ञापन है। सहायता ऐसी होनी चाहिए; जिसमें अपना अहंकार न बढ़े और प्राप्तकर्त्ता को स्वाभिमान दीन-हीन की पंक्ति में खड़ा न होना पड़े। इसमें आपत्तिग्रस्तों को सामयिक सहायता भी मिल जाती है। यह आवश्यकता तो है, पर पर्याप्त नहीं। होना यह चाहिए कि सामयिक सहायता प्राप्त करके व्यक्ति इतनी सामर्थ्य अर्जित कर ले, जिसके सहारे वह अपना काम अपने बलबूते चला सके।
जो सहायता प्राप्त करें उन्हें यही सोचते रहना चाहिए कि किसी की उदारता का लाभ उठाकर उनने एक प्रकार से ऋण लिया है, जिसे अन्य अभावग्रस्तों की सहायता करते हुए उसे ब्याज समेत चुकाना है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जीवन के चार प्रतिफल माने गए हैं। इन्हें आरोग्य का उत्तम फल भी कहा गया है; किंतु इस निर्धारण में विसंगतियाँ प्रतीत होती हैं और विचार करने वाले को इनका परस्पर तारतम्य मिलाने में भ्रम होता है। इस भ्रम का निराकरण आवश्यक है, अन्यथा उससे मूल सिद्धांतों एवं प्रतिफल के संबंध में भ्राँति भरा असमंजस हो सकता है। विभ्रांत मनःस्थिति में ही किसी दर्शन को, क्रियाकलाप को, प्रयोजन को ठीक तरह समझना बन नहीं पड़ता।
मोटे प्रचलित अर्थों में यह चारों प्रतिपादन एकदूसरे से असंबद्ध ही नहीं लगते; वरन विपरीत दिशा में भी जाते दिखते हैं। ‘धर्म’ शब्द को मोटे अर्थों में सांप्रदायिक मान्यताओं और पूजा-परक कर्मकांडों के साथ जुड़ा माना जाता है। धार्मिक परंपराओं के निर्वाह में भी इसका बोध होता है। यों धर्म का वास्तविक अर्थ कर्त्तव्यपालन है। पर इन दिनों वह सर्वसाधारण के मस्तिष्क में संप्रदाय विशेष बन कर रह गया है। इसी कारण एक विश्वधर्म या मानव धर्म के रूप में उसे तत्त्वज्ञानी तो समझते हैं। तथाकथित धार्मिक लोग उसे अपने कर्म में प्रचलित परंपराओं के साथ ही जोड़ते हैं और निर्धारित क्रिया-कृत्य कर लेने पर अपने को सच्चा धार्मिक समझने लगते हैं। तीर्थयात्रा अथवा अमुक कथा-कीर्तन करने वालो का धर्मात्मा कहा जाने लगता है। अथवा उसका संबंध वेश और केश के साथ भी जुड़ गया है। दान-पुण्य करने की प्रक्रिया भी धर्म के अंतर्गत आती है। इन विधाओं का निर्वाह अनेक लोग करते भी रहते हैं। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि जीवन को सफल-सार्थक बनाने वाले सूत्र उनके हाथ लग गए हैं। उथली धार्मिकता एक प्रचलन प्रणाली भर है। यदि कर्त्तव्यपालन का अर्थ किया जाए तो उसे अध्यात्म तत्त्वज्ञान या नीतिशास्त्र के आधार पर ही किया जा सकता है। धर्म-परिपाटी उसमें यत्किंचित् ही सहायक होती है। ऐसी दशा में उसे जीवन-फल कैसे माना जाए। आरोग्य का प्रतिफल कैसे कहा जाए? आवश्यक नहीं कि प्रत्येक हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति धर्मात्मा ही हो। उनमें से अनेकों उद्दंड, उच्छृंखल, अनाचारी भी होते हैं। इस प्रकार यह कथन संदेहग्रस्त ही रह जाता है।
धर्म के बाद ‘काम’ शब्द आता है और उसके बाद ‘अर्थ’। इन दोनों को ही हेय वर्ग में लिया गया है। उन्हें त्यागने या अंकुश में रखने का निर्धारण है। आमतौर से काम का अर्थ कामुकता— "यौनाचार से लिया जाता है, उसे अश्लील एवं गोपनीय कहा जाता है। ब्रह्मचर्य मर्यादा के अंतर्गत उसके परित्याग की, अधिकाधिक नियंत्रण की बात कही जाती है; जिन्हें परमार्थ-प्रयोजन के महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं, वे संत, महात्मा, ब्रह्मचारी, परिव्राजक, विरक्त जीवन व्यतीत करते हैं; विवाह नहीं करते। ऐसी दशा में जीवन-लाभ या आरोग्य का प्रतिफल काम को कैसे कहा जाए? लोक-व्यवहार में तो ‘काम’ शब्द यौनाचार या अश्लील कर्म, कल्पनाओं के रूप में प्रयुक्त होता है।" इसी दशा में यह असमंजस उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि एक हेय प्रवृत्ति को जिसके रोकथाम के लिए प्रत्येक धर्ममंच से कहा जाता है, उसे जीवन-लाभ या आरोग्य का प्रतिफल कैसे गिन लिया गया, कैसे मान्यता दे दी गई?
तीसरी उपलब्धि 'अर्थ' मानी गई है। यहाँ अनुमान लगता है, बड़ी संपदा एकत्रित करने, धनवान-अमीर, सुसंपन्न, समृद्ध बनने से। यह हविश तो मृगतृष्णा के रूप में हर किसी में होती है। अधर्मी लोग तो इसी के लिए निछावर रहते हैं। वे नीति-अनीति का ध्यान नहीं रखते। पाप अनाचार अपनाकर भी जैसे बने वैसे संपदा बटोरते हैं। धन की अधिकता के कई दुष्परिणाम बताए गए हैं। उससे अहंकार बढ़ता है। विलासिता फूट पड़ती है, दुर्व्यसन पीछे लग जाते हैं। उत्तराधिकारी निकम्मे बनते और परस्पर लड़ते-झगड़ते है। कुछ का अमीर बनना असंख्यों को निर्धन बनाता है। ऊँची दीवार उठाने के लिए कहीं-न-कहीं गड्ढे बनाने पड़ते हैं। एक अमीर की अमीरी रखने के लिए भी यह लागू होता है। फिर अर्थ को सुयोगों में कैसे गिना गया?
अपरिग्रह व्रत है। साधु-ब्राह्मण, वानप्रस्थ, संन्यासी जैसे सम्माननीय और अनुकरणीय व्यक्ति अपने पास संपदा जमा नहीं होने देते। कई तो निर्वाह साधन— "अन्न, वस्त्र जैसे उपकरण ही स्वीकार करते हैं। पैसे को छूते तक नहीं। सामान्यजनों को औसत नागरिक स्तर का जीवनयापन करने के लिए कहा गया है। कुछ अनेकों को पिछड़ेपन की स्थिति में धकेलने के लिए दोषी होते हैं। इन्हीं कारणों को देखते हुए धन को टिकने न देने का प्रावधान है। शास्त्रकार का कथन है कि जैसे नाव में बढ़ते पानी को उलीचने में ही खैर है, उसी प्रकार बढ़ें धन को दान-पुण्य में लगा देना ही श्रेयस्कर है। उसे रोका न जाए; वरन वितरण करते हुए भ्रमणरत रखा जाए। नदी-प्रवाह के उदाहरण की तरह उसे गतिशील रखें। कुछ लोग ठाट-बाट से रहे तो अन्यान्यों को या तो वैसा अनुकरण करने की ललक उठती है या ईर्ष्या का आक्रोश उभरता है। इस आधार पर अनेकों विग्रह उत्पन्न होते और एकता-समता का संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है। अधिनायकवाद से लेकर साम्यवाद तक सभी इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि अगर कुछ व्यक्ति संपन्न बनते हैं तो प्रकारांतर से असंख्यों को निर्धन रहने के लिए पिछड़ेपन का अभिशाप भुगतने के लिए बाधित करते हैं। वस्तुस्थिति को देखते हुए अर्थवान धनवान बनना भी ऐसा श्रेयस्कर नहीं है, जिसे सराहा जाए या सौभाग्यवान होने जैसा कहा जाए।
चौथा निर्धारण है— ‘मोक्ष’। काम और धन के रहते मोक्ष की स्थिति कैसे बन पड़े है? जब चारों ही अनुदान मिलेंगे तो काम और ‘अर्थ’ की भी बहुलता ही रहेंगी। धर्माडंबर भले ही निभता रहे, पर वास्तविक धार्मिकता का निभ सकना भी अशक्य है।
धर्मात्मा दयालु होते हैं। वे अपने समय, श्रम का उपयोग संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति में नहीं करते; वरन सेवा-प्रयोजनों के लिए उनका हाथों-हाथ उपयोग करते रहते हैं। ऐसी दशा में उन्हें काम-कौतुक के लिए, धन-संचय के लिए अवसर ही कैसे मिले? उत्साह भी कैसे उठे? जब एक दूसरे से प्रतिकूल पड़ते हो तो उनका एक साथ निर्वाह कैसे हो? उन्हें देने की कौन उतावली करे? फिर लेने वालो को भी परस्पर विरोधी झंझटों को सिर पर लादने में क्या उत्साह हो?
'मोक्ष' की परिभाषा और भी अधिक विचित्र की जाती है। समझा जाता है कि भगवान किसी कोठी-बँगले में रहते होंगे। वहीं उन्हीं के पास शौक-मौज केवातावरणमें उनके साथ रहने का अवसर मिलता रहेगा। काम-धाम कुछ करता नही पड़ेगा। भगवान जि को शौक-मौज के साधन मिलते हैं। वे हर घड़ी समीप रहने वाले को भी मिलते रहेंगे। मोक्ष की इन दिनों मोटी परिभाषा यही है। इसी का विवरण-निरूपण कथावाचक बताते सुनाते व ललचाते रहते हैं।
विचारपूर्वक सोचने वालों के लिए यह दिवा स्वप्न है। इस बेसिर पैर की कल्पना-जल्पना का वास्तविकता की कसौटी पर किसी भी प्रकार खरापन सिद्ध नहीं होता। भगवान सर्वव्यापी है। जो सर्वव्यापी है उसका न रूप हो सकता है न स्थान। जिसका शरीर ही नहीं उसके साथ सुविधा-साधन जुड़े होने का भी प्रश्न नहीं। फिर मोक्ष के लिए लालायित व्यक्ति को उसकी समीपता में मौज मजा उड़ाते रहने का अवसर कैसे मिलेगा? इस प्रकार जीवन के चार फलों को प्राप्त कर सकने की बात सर्वथा बेतुकी ही रहती है।
उस दिन बादशाह ने बहुत शराब पी रखी थी। मदहोशी में वे गृहस्थों के घरों में घुसने लगे।
साथ में वफादार नौकर था, उसने बादशाह को आगे बढ़ने से रोका और घसीटता हुआ राजमहल ले आया।
होश में आने पर दूसरे दिन दरबारियों ने नौकर की गुस्ताखी बताई और उसे सजा देने के लिए कहा।
बादशाह ने उसे राज्यमंत्री बना दिया और कहा— "बहादुरी इसमें है कि मालिक को भी गलत रास्ते पर चलते से रोके।"
विचारों की शक्ति पर अपने समय में काफी विचार हुआ है और यह माना गया है कि ध्वनि, प्रकाश और ताप की तरह चेतना-क्षेत्र में विचारों की एक जीवंत शक्ति है। इसकी महत्ता मानते हुए अध्ययन-अध्यापन का क्रम चला है। स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था भी हुई है। परामर्श और प्रवचन की शैली का विकास हुआ है। सही सोचने के सत्परिणाम और गलत ढंग से सोचने के दुष्परिणामों का विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है।
विचारों-ने-विचारों को काटा है और विचारों ने विचारों का समर्थन एवं पोषण भी किया है। एकता और विग्रह के मूल में सशक्त विचारों को ही काम करते पाया गया है। व्यक्तियों और समाजों को ऊँचा उठाने और नीचे गिराने में विचारों की असाधारण भूमिका रही है। पिछली शताब्दी में दो महान क्रांतियाँ हुई है। एक में राजतंत्र की अनुपयुक्तता सिद्ध करके उसके स्थान पर जनतंत्र की महत्ता प्रतिपादित की गई है। रूसो के इस प्रतिपादन को समस्त संसार में आँधी-तूफान जैसी मान्यता मिली है। इसके थोड़े समय उपरांत शासन का स्वरूप साम्यवादपरक हो इसकी वकालत कार्लमार्क्स ने की और वे विचार आज आधे से अधिक जनसमूह में मान्यता प्राप्त कर चुके हैं। शासन को छोड़कर समाज का स्वरूप निर्धारण करने में विचारों की प्रचंड लहरें अपना जादुई प्रभाव प्रस्तुत करती रही है। दासप्रथा का उन्मूलन, नारी को समानता के अधिकार, जनसाधारण के मौलिक अधिकारों की मान्यता जैसे परिवर्तन इन्हीं दिनों व्यवहार में आए हैं। नर−नारी की समानता, जमींदारी उन्मूलन जैसे कार्यों के लिए कोई बड़े संघर्ष नहीं खड़े हुए, विचारों के तीव्र प्रवाह ने ही इन्हें सहज संभव कर दिखाया। सहकारी आंदोलन की स्थापना और प्रगति ने जमींदारी, साहूकारी प्रथाओं को उखाड़ फेंका। छूत-अछूत का भेदभाव का समाप्त होना प्रगतिशील विचारों का ही प्रतिफल है।
कुछ समय पहले तक मान्यता थी कि धनबल बाहुबल और शस्त्रबल ही किसी की प्रगति का आधार है। अब वह सामंती विचारणा पीछे पड़ गई और माना जाने लगा है कि व्यक्तिगत जीवन का उत्थान-पतन विचारों की उत्कृष्टता-निकृष्टता पर निर्भर है। अब समाज सैन्यबल पर नहीं, विचार बल पर समर्थ और दुर्बल बनते हैं। विचार-विनिमय अब कूटनीति का भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू बन गया है। राष्ट्रों और जातियों की मजबूती और कमजोरी में विचारधारा के प्रखरता की प्रधान भूमिका रहती है। व्यक्ति निजी जीवन में किस कारण उठता गिरता है, इसे अब विचारों के आधार पर निर्भर मान लिया गया है। शासन सत्ताओं में इसी आधार पर आए दिन उलट-पुलट होती रहती है। जनमानस को दिशा दे सकने में समर्थ व्यक्तियों को अब सच्चे अर्थों में बलवान माना जाने लगा है। पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों को अब मनोरंजन का विषय नहीं सामर्थ्य का पुंज माना जाने लगा है।
विचार माध्यम से ही विज्ञान का भी आविर्भाव हुआ है। विज्ञान की अनेकानेक शाखा-प्रशाखाओं का आज प्रचलन है। उनके प्रयोग-परीक्षण के लिए यंत्र-उपकरणों का निर्माण हुआ है, किंतु उसके मौलिक आविष्कार की रूपरेखा चिंतन के माध्यम से ही संभव हुई है। विज्ञान का प्रयोग मशीनों के माध्यम से होता है, पर उन मशीनों का आविष्कार-आविर्भाव मनुष्य के बुद्धिबल से ही हुआ है। आकाश, गमन, उपग्रह, कम्प्यूटर, अणुशक्ति आदि अनेकों एक से एक विचित्र विज्ञान की शाखाएँ कार्यरत दिखाई पड़ती है, पर यह सब आकाश से नहीं टपका है। मनुष्य के चिंतन ने ही इनका सूत्रपात किया है और उन्हें क्रियारत होने की स्थिति तक पहुँचाया है।
विचार विज्ञान की ही एक शाखा श्रद्धा है। इसके वैज्ञानिक प्रयोग हिप्नोटिज्म माध्यम से होते हैं। व्यक्ति को सम्मोहित करके उसके बिना दर्द के आपरेशन होने लगे हैं। दाँत उखाड़ने में तो यह कला बहुत आगे बढ़ गई है। सुन्न करके दाँत उखाड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जादुई खेलों में इसका अच्छा-खासा उपयोग होता है। दर्शकों के समूह में मतिभ्रम उत्पन्न करके कुछ के बदले कुछ दृश्य दिखाए जाते हैं। रस्सी पर मनुष्य और ऊपर से शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके गिराना, बाद में असली शरीर का ज्यों, का त्यों दिखा देना हिप्नोटिज्म का खेल है। इस दिशा में अब भारी प्रगति हो चुकी है।
यह साधारण खेल-खिलवाड़ जैसी बात हुई। शारीरिक और मानसिक चिकित्सा में अब इस विद्या के महत्त्वपूर्ण प्रयोग होने लगे हैं। यह श्रद्धा विज्ञान का एक अंश है। भूत-प्रेत और देवी-देवताओं द्वारा विचित्रताएँ प्रदर्शित होते और लाभ-हानि के प्रतिफल सामने आने की घटनाएँ श्रद्धा पर अवलम्बित है। ‘शंका डाकिन मनसा भूत’ की उक्ति शतप्रतिशत चरितार्थ होती है। रात्रि के अँधेरे में डरपोक व्यक्तियों को झाड़ी भूत बनकर दिखाई देती है। पीपल के पत्तों की खड़खड़ाहट से ऐसा डर लगता है, जिससे भयभीत होकर कई व्यक्ति बीमार पड़ जाने और हृदय की धड़कन बंद हो जाने जैसी विपत्ति के ग्रास बन जाते हैं।
पारिवारिक संबंधों में छोटों का बड़ों के प्रति जो विश्वासयुक्त प्रेम होता है उसे भी श्रद्धा कहते हैं। बच्चों का अभिभावकों के प्रति, पत्नी का पति के प्रति छात्रों का गुरुजनों के प्रति जो गहरा सद्भाव होता है वह श्रद्धा कहा जाता है। यह अनुशासन के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह सद्गुण है। इसका परिणाम दोनों पक्षों के लिए श्रेयस्कर होता है। यदि छोटे-बड़ो के प्रति श्रद्धा रखेंगे तो उनके कार्यों के प्रति गहरी सद्भावना रहेगी। जो कहा गया है, पढ़ा गया है, उस पर गहरी आस्था रहेगी और कथन हृदयंगम होता चला जाएगा। बदले में बड़ों का सहज वात्सल्य भी मिलेगा। दोनों ओर का यह आदान-प्रदान शिक्षा की सफलता के लिए श्रेयस्कर है। इसका प्रतिफल अनुशासन के रूप में दृष्टिगोचर होगा। ऐसे परिवारों में सद्भावना का सहज आदान-प्रदान होता है, और दोनों पक्ष एकदूसरे के लिए असाधारण सहायक सिद्ध होंगे। इसमें दोनों पक्षों का हित है।
महापुरुषों के संबंध में श्रद्धा होने का अर्थ है, उनके जीवन से प्रभावित होना, उनकी शिक्षाओं का हृदयंगम करना निर्देशों और क्रियाकलापों में हाथ बँटाना। इससे परोक्षतः महापुरुषों को भी अपने मिशन का विस्तार करने में सहायता मिलती है। उनकी शिक्षाओं से लोग अधिक लाभ उठा पाते हैं। श्रद्धा दो व्यक्तियों को जोड़ने का सर्वोत्तम माध्यम है। मित्रों के बीच छोटे-बड़े का अंतर रहने पर भी गुणों के आधार पर गहरी श्रद्धा हो सकती है। यह सामान्य मित्रता से बहुत आगे की चीज है।
आदर्शों के प्रति श्रद्धा होने का अर्थ है कि इनका परिपालन भली प्रकार हो सकेगा और निभ सकेगा। आदर्शों की सामान्य जानकारी समझना और औचित्य मानना एक बात है और श्रद्धा होना दूसरी। जिन सिद्धांतों के प्रति श्रद्धा होगी, व्यक्ति उन्हें तोड़ने के लिए ललचाएगा नहीं; वरन दृढ़तापूर्वक उनका निर्वाह करता रहेगा। यदि मान्यता उथली है तो कहा नहीं जा सकेगा कि परीक्षा की घड़ी आने पर वह निभेगा या नहीं।
अध्यात्म क्षेत्र में तो श्रद्धा ही सफलता का मूलभूत आधार है। किसी देवता या मंत्र के प्रति श्रद्धा है, तो उसकी सामान्य साधना बन पड़ने पर भी, उसके चमत्कारी परिणाम होते हैं। इसकी विपरीत श्रद्धा के अभाव में उपासनात्मक कर्मकांड ढेरों समय लगाकर करते रहने पर भी कोई कहने लायक प्रतिफल नहीं प्राप्त होता है।
रामायण में श्रद्धा को भवानी और विश्वास को शिव की उपमा दी गई है और कहा है कि इन दोनों के बिना हृदय में विराजमान होते हुए भी इष्टदेव का दर्शन अनुग्रह नहीं होता। इससे प्रकट है कि जितनी किसी देवता या मंत्र में शक्ति है, उसकी तुलना में सघन श्रद्धा किसी प्रकार कम नहीं पड़ती।
किसी कार्य की गरिमा के प्रति श्रद्धा रखते हुए सच्चे मन और पूरे परिश्रम के साथ जुट जाना सफलता का सुनिश्चित पथप्रशस्त करना है।
नाम से कोई बड़ा नहीं होता। “कनक” धतूरे को भी कहते हैं, पर उससे गहने नहीं गढ़े जाते।
शरीर पर नियंत्रण मन का है। मन की प्रेरणा से ही शरीर के विभिन्न अंग अवयव काम करते हैं। प्रयत्न जिस भी दिशा में चल पड़ते हैं। प्रगति उसी दिशा में होती है; जिन्हें भौतिक समृद्धि चाहिए वे मन की दिशाधारा का सुनियोजन उस दिशा में करते हैं। उद्योग, व्यवसाय, कला-कौशल, शिल्प आदि के माध्यम से उपार्जन करते और सुसंपन्न बनते हैं।
जिन्हें आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ना है, वे अपने चिंतन, चरित्र और व्यवहार में घुसी हुई त्रुटियों का निराकरण करते हैं और उस स्थान पर शालीन-सुसंस्कारिता का समावेश करते हैं। इतना कर पाने के लिए ईश्वर से शक्ति-सामर्थ्य प्रदान करने की याचना करते हैं। पूजा-प्रक्रिया, उपासना, साधना का मूलभूत प्रयोजन यही है। कांटों में भटकने और सस्ते दाम में बहुमूल्य उपलब्धियां झटकने की फिराक में रहने वालों को ही असफलताजन्य निराशा का सामना करना पड़ता है।
दोनों क्षेत्रों में कोई एक अथवा दोनों के सम्मिश्रण का लक्ष्य लेकर चलने वालों को सर्वप्रथम मन की चंचलता पर अंकुश लगाना पड़ता है, अन्यथा मन अनगढ़ कल्पनाएँ करने और बंदर की तरह अस्थिर उछल-कूद में ही अपना समय गँवा देता है। अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि में उसका योगदान नहीं के बराबर ही लग जाता है। ऐसी दशा में लक्ष्य तक पहुँचना कैसे बन पड़े?
इसलिए प्रगति का ककहरा आरंभ करते हुए सर्वप्रथम मनोनिग्रह की वर्णमाला को अपनाना पड़ता है। तत्परता और तन्मयता इसके बिना नहीं सधती और इन आधारों को अपनाए बिना प्रगति की गाड़ी आगे नहीं बढ़ती। जिस गाड़ी के घोड़े मनमर्जी से दौड़ते हैं, उनका नियत स्थान पर, नियत समय में पहुँच जाना कठिन है।
मनोनिग्रह भी ठीक वैसा ही है, जैसा मदारियों द्वारा रीछ-वानरों को इच्छित खेल-तमाशा दिखने के लिए अभ्यस्त करना। इसके लिए उन्हें दुहरा काम करना पड़ता है। एक अभ्यस्त मनमानी को छुड़ाने का, दूसरा उन क्रियाओं का अभ्यास, जो इच्छित कौतूहल दिखाने के लिए आवश्यक है।
अनगढ़, बेतुकी, अस्त-व्यस्त कल्पनाएँ, शेखचिल्ली स्तर की होती है। जिनका अवसर नहीं, क्षमता नहीं, साधन नहीं, सहयोग नहीं, संभावना नहीं, उनकी कल्पनाएँ बेतुकी उड़ानें कहलाती है। बच्चों को परीलोक की कथाएँ बहुत सुहाती है। बड़ों में से भी कितने ही ऐसे होते हैं, जो आधाररहित कल्पनाएँ करने के आदी होते हैं। उनमें उलझे रहने से निरर्थक समय व्यतीत होता है और विचारों की बहुमूल्य संपदा को निरर्थक खर्च करने की आदत पड़ती है।
इस कुटेव को छुड़ाने के लिए रचनात्मक क्रियाकलापों में खाली मन को लगाने का अभ्यास डालना चाहिए। अपने या दूसरों के सामने उपस्थित समस्याओं का कारण, स्वरूप, समाधान सोचने में मस्तिष्क को रचनात्मक-व्यावहारिक मार्ग अपनाना पड़ता है, उसके लिए जिन साधनों की जरूरत पड़ने वाली है, उन्हें जुटाने का सोच-विचार करना होता है। आर्चीटेक्ट, इंजीनियर, वकील आदि योजनाएँ बनाने वाले पहले मस्तिष्कीय ढाँचा खड़ा करते हैं। वह कल्पना जितनी यथार्थवादी, अनुभवजन्य एवं सार्थक होती है, उसी अनुपात में उसका क्रियान्वयन सरल पड़ता है और सफलता की संभावना भी बढ़ती है। कल्पना की बेतुकी उड़ान उड़ने वाले मन को अपनी-अपने संपर्क-क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने, प्रगति का तारतम्य बिठाने में जुटना चाहिए। इस प्रकार निरर्थकता को सार्थकता की ओर मोड़ सकना संभव बन पड़ता है। यह अभ्यास मन की रचनात्मक क्षमता को जगाता है।
मन का दूसरा दोष है— "निषेधात्मक चिंतन। इस प्रवृत्ति से छोटी-छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर 'तिल का ताड़' बना लिया जाता है। संभावनाओं में आशंका, निराशा, अविश्वास, हानि, चिंता वाला पक्ष ही मस्तिष्क में घूमता रहता है। शत्रुओं के आक्रमण का, अशुभ अनिष्ट दैवी दुर्विपाक का भय बना रहता है। अपनों द्वारा विश्वासघात किए जाने की कुशंका रहती है। कभी-कभी यह प्रवृत्ति आक्रामक रूप धारण करते भी देखी जाती है। तब ईर्ष्या, द्वेष, आक्रमण, अपराध, व्यभिचार, बलात्कार, अपहरण, षडयंत्र जैसे विचार उठते हैं। उद्देश्य होता है— "प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दूसरों को हानि पहुँचाना। डरपोक और दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति ऐसे ही चिंतन से घिरे रहते हैं। कुछ कर तो नहीं पाते पर मन को उद्विग्न रखकर अपने शारीरिक, मानसिक क्षेत्र को असीम हानि पहुँचाते हैं। इसके अतिरिक्त मस्तिष्कीय वह कोमलता भी नष्ट कर देती है, जो प्रगति के पथ पर बढ़ चलने का मार्ग सुझाती है। ऐसे व्यक्ति एक प्रकार के मानसिक रोगी हो जाते हैं। उन्हें बौड़म या सनकी समझा जाने लगता है। लोग उनका उपहास उड़ाने और अविश्वास करने लगते हैं। कल्पनाएँ मस्तिष्क की तीक्ष्णता नष्ट करती हैं और संपर्क-क्षेत्र में व्यक्तित्व को गया-गुजरा समझे जाने का माहौल बनाती है।
इस प्रवृत्ति की काट यह है कि विधेयक विचारों का जखीरा मन में जमा किया जाए। असफलता को निश्चित मानने की अपेक्षा सफलता की संभावनाओं का ढाँचा खड़ा करना चाहिए। निराशा के स्थान पर आशा को प्रश्रय देना चाहिए। अविश्वास के स्थान पर विश्वास करने की आदत डालनी चाहिए। मनस्वी और तेजस्वी व्यक्तियों द्वारा किए गए पुरुषार्थों की कथा ज्यादा पढ़नी, सुननी या स्मरण करनी चाहिए। उत्साहवर्दक अभिवचन या कथानक स्मृति पटल पर खुली हवा की तरह आने देना चाहिए। अपना भविष्य सूर्य-किरणों या चंद्रमा की चाँदनी की तरह चमकता हुआ देखना चाहिए।
अपने निज के जीवन में घटित हुई उत्साहवर्दक घटनाओं, सफलताओं का समय-समय पर स्मरण करते रहा जाए। इसके अतिरिक्त परिचित अपरिचित क्षेत्र में भी ऐसा ही कुछ हुआ हो तो उसे नोट रखना चाहिए। इतिहास-पुराणों में कथा-गाथाओं में ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं; जिनमें शौर्य-पराक्रम की झाँकी होती है और साहस पुरुषार्थ के उदाहरण मिलते हैं। ऐसी घटनाओं को अपने स्मृति भंडार में भरना चाहिए और उनको संग्रह पूँजी की तरह जमा रखना चाहिए।
इन स्मृतियों को यदि बार-बार स्मरण करते रहा जाय तो उसके प्रभाव से अपना भी मनोबल बढ़ता है और कठिनाइयों से निपटने का शौर्य उभरता है। अनुपयुक्त विचारों को सद्विचारों से टक्कर कराते रहा जाए तो मस्तिष्क पर चढ़ा हुआ हेय चिंतन सहज ही निरस्त होता रह सकता है।
इन स्मृतियों को यदि बार-बार स्मरण करते रहा जाए तो उसके प्रभाव से अपना भी मनोबल बढ़ता है और कठिनाइयों से निपटने का शौर्य उभरता है। अनुपयुक्त विचारों को सद्विचारों से टक्कर कराते रहा जाए तो मस्तिष्क पर चढ़ा हुआ हेय चिंतन सहज ही निरस्त होता रह सकता है।
हमें उज्जवल भविष्य के सपने देखने चाहिए। भविष्य निश्चित नहीं है और बुरा-भला कैसे भी हो सकता है। इस अनिश्चितता का यदि निषेधात्म्क पक्ष लिया जाए तो प्रतीत होगा कि अगले दिनों संकट की घटाएँ टूटने वाली हैं; किंतु यदि विधेयात्मक पक्ष अपनाया जाए तो समझा जा सकता है की हर कठिनाई का हल निकल सकता है और हर प्रतिकूलता से जूझा या उसे सहा जा सकता है। आत्मगौरव और आत्मबल पर विश्वास रखने से मनुष्य अपनी हीनता से, दीनता से पिछा छुड़ा सकता है। सोचा यही जाना चाहिए कि जब उजाले से भरा दिन नहीं रहता तो अँधेरे भरी रात सदा-सर्वदा बनी रहेगी, ऐसा क्यों मानना चाहिए ? अपने बल और पराक्रम को घटाकर क्यों आँकना चाहिए ? कुकल्पनाओं के जंजाल में क्यों उलझकर अपने मनोबल को गिराना चाहिए?
चीन के धर्मोपदेशक हुई वेंग दीवार की तरफ मुँह करके प्रवचन करते थें। श्रोताओं की तरफ उनकी पीठ रहती थीं।
पूँछने पर वे कहते थे— ”आप लोग दीवार की तरह ही सफाचट हैं। उसके भीतर प्रवेश करने के लिए खिड़की तक नहीं है। ऐसी दशा में यह आशा बंधती नहीं कि वे, जो सुनेंगे उसे समझने और अपनाने को भी तैयार होंगे।"
हुई का कथन था कि इतने पर भी, मैं निराश नहीं हूँ। दीवार को सुनाता हूँ। ताकि मेरा अभ्यास बढ़े और यदि दीवार के कहीं कान हो तो वे मेरी बात सुनें।
मनुष्य कितना दीन-हीन, स्वल्प शक्ति वाला, कमजोर प्राणी है, यह प्रतिदिन के उसके जीवन से पता चलता है। उसे पग-पग पर परिस्थितियों के आश्रित होना पड़ता है। कितने ही समय तो ऐसे आते हैं, जब औरों से सहयोग न मिले तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। इस तरह विचार करने से तो मनुष्य की लघुता का ही आभास होता है; किंतु मनुष्य के पास ऐसी भी शक्ति है, जिसके सहारे वह लोक-परलोक की अनंत सिद्धियों-सामर्थ्यों का स्वामी बनता है। यह है— "प्रार्थना की शक्ति परमात्मा के प्रति अविचल श्रद्धा और अटूट विश्वास की शक्ति। मनुष्य प्रार्थना से अपने को बदलता है, शक्ति प्राप्त करता है और अपने भाग्य में परिवर्तन कर लेता है। विश्वासपूर्वक की गई प्रार्थना पर परमात्मा दौड़े चले आते हैं। सचमुच उसकी प्रार्थना में बड़ा बल है, अलौकिक शक्ति और अनंत सामर्थ्य हैं।"
प्रार्थना विश्वास की प्रतिध्वनि है। रथ के पहियों में जितना अधिक भार होता है, उतना ही तेज निशान वे धरती में बना देते हैं। प्रार्थना की रेखाएँ लक्ष्य तक दौड़ी जाती हैं और मनोवांछित सफलता खींच लाती हैं। विश्वास जितना उत्कट होगा, परिणाम भी उतने ही श्रेष्ठ और प्रभावशाली होंगे।
प्रार्थना आत्मा की आध्यात्मिक भूख है। शरीर की भूख अन्न से मिटती है, इससे शरीर को शक्ति मिलती है। उसी तरह आत्मा की आकुलता को मिटाने और उसमें बल भरने की सत्त-साधना परमात्मा की ध्यान-आराधना ही है। इससे अपनी आत्मा में परमात्मा का सूक्ष्म दिव्य तत्त्व झलकने लगता है और अपूर्व शक्ति की अनुभूति होती है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रार्थना से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग आत्मबलसंपन्न व्यक्ति कर सकते हैं। निश्चयपूर्वक की गई प्रार्थना कभी असफल नहीं हो सकती।
आत्मशुद्धि का आह्वान भी प्रार्थना ही है। इससे मनुष्य के अन्तःकरण में देवत्व का विकास होता है, विनम्रता आती है और सद्गुणों के प्रकाश में व्याकुल आत्मा का भय दूर होकर साहस बढ़ने लगता है। ऐसा महसूस होता है, जैसे कोई असाधारण शक्ति सदैव हमारे साथ रहती है। हम जब उससे अपनी रक्षा की याचना, दुखों से परित्राण और अभावों की पूर्ति के लिए अपनी विनय प्रकट करते हैं, तो सद्यः प्रभाव दिखलाई देता है और आत्मसंतोष का भाव पैदा होता है।
असंतोष और दुःख का भाव जीव को तब तक परेशान करता है, जब तक वह क्षुद्र और संकीर्णता में ग्रस्त है। भेदभाव की नीति ही संपूर्ण अनर्थों की जड़ है। प्रार्थना इन परेशानियों से बचने की रामबाण औषधि है। भगवान की प्रार्थना में सारे भेदों को भूल जाने का अभ्यास हो जाता है। सृष्टि के सारे जीवों के प्रति ममता आती है, इससे पाप की भावना का लोप होता है।
जब अपनी असमर्थता समझ लेते हैं और अपने जीवन के अधिकार परमात्मा को सौंप देते हैं तो यही समर्पण का भाव प्रार्थना बन जाता है। दुर्गुणों का चिंतन और परमात्मा के उपकारों को स्मरण रखना ही मनुष्य की सच्ची प्रार्थना है। महात्मा गाँधी कहा करते थे ”मैं कोई काम बिना प्रार्थना के नहीं करता। मेरी आत्मा के लिए प्रार्थना उतनी ही अनिवार्य है, जितना शरीर के लिए भोजन।”
मनुष्य के जीवन में अच्छी-बुरी दोनों तरह की वृत्तियाँ रहती हैं, आत्मा के गहन अंतराल में तो, सत् तत्त्व पाया जाता है। इस शुभ शिव और परम तत्त्व से एकाकार प्रार्थना से होता है, जिससे आसुरी वृत्तियों का लोप और दैवी गुणों का प्रादुर्भाव होता है। प्रार्थना से ही अंतरंग में प्रवेश मिलता है और बुद्धि की सूक्ष्मग्रहणशीलता उपजती है। इस परिवर्तनशील जगत के सारे रहस्य खुलने लगते हैं। मोह की दुरभिसंधि मिटकर सत्य प्रकाशित होने लगता है।
प्रार्थना मानवी प्रयत्न और ईश्वरत्व का सुन्दर समन्वय है। मानवीय प्रयत्न अपने आप में अधूरे हैं। क्योंकि डडडड पुरुषार्थ के साथ संयोग भी अपेक्षित है। यदि संयोग-सिद्धि न हो तो कामनायें अपूर्ण ही रहती हैं। इसी तरह संयोग मिले और प्रयत्न न करें तो भी काम नहीं चलता। प्रार्थना से इन दोनों में मेल पैदा होता है। सुखी और समुन्नत जीवन का यही आधार है कि हम क्रियाशील भी रहें और दैवी विधान से सुसंबद्ध रहने का भी प्रयास करें। धन की आकांक्षा हो तो व्यवसाय और उद्यम करना होता है साथ ही उसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ भी चाहिए ही। जगह का मिलना, पूंजी लगाना, स्वामिभक्त और ईमानदार नौकर, कारोबार की सफलता के लिए भी चाहिए ही। यह सारी बातें संयोग पर अवलम्बित हैं। प्रयत्न और संयोग का जहाँ मिलाप हुआ, वहीं सुख होगा, वहीं सफलता भी होगी।
यह अनिवार्य नहीं कि प्रार्थना पूर्णतया निष्काम हो। सकाम प्रार्थनाओं का भी विधान है, किंतु साँसारिक कामनाओं के लिए की गई प्रार्थना में वह तल्लीनता नहीं आ पाती, जो परमात्मा तक अपना संदेश ले जा सके। ऐसी प्रार्थनाएँ भोग के निविड़ में भटक कर रह जाती है। परिणामतः समय का अपव्यय और शक्ति का दुरुपयोग ही होता है। परोपकार, आत्मकल्याण और जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही प्रार्थना का सदुपयोग होना चाहिए। ऐसी प्रार्थनाओं में सजीवता होती है। चुंबकत्व होता है और परमात्मा को प्राप्त करने की प्रबल आकुलता होती है, वे कभी निष्फल नहीं जातीं। सदुद्देश्यों के लिए की गई हृदय-आत्मा की पुकार अनसुनी नहीं जाती। परमात्मा उसे जरूर पूरा करते हैं।
अभी तक जो शक्तियँ मिलीं और जो मानव जीवन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, इसमें भी अपनी पूर्व भावनाओं की सौम्यता ही प्रतीत होती है। हमने उनका आश्रय छोड़ दिया होता तो अन्य जीवधारियों के समान हम भी कहीं भटक रहे होते, किंतु यह अभूतपूर्व संयोग मिलना निश्चय ही उनकी कृपा का फल है। प्राप्त परिस्थितियों का सदुपयोग तब है, जब इन साधनों का उपयोग आत्मविकास में कर सकें। इसके लिए हमारा संपूर्ण जीवन एक प्रार्थना हो। हम अनन्य भाव से अपने आपको उस परमात्मा के प्रति समर्पित किए रहें और उनकी दुनिया को सुंदर और सरस बनाने के लिए अपने कर्त्तव्यों का यथारीति पालन करते रहें। हृदयहीन मुखर प्रार्थना नहीं चाहिए। जिसमें केवल स्वर का महत्त्व प्रकट होता है, वह प्रार्थना नहीं, वह तो विडंबना हुई। प्रार्थना वह होती है, जो हृदय से निकल कर सारे आकाश को प्रभावित करती और परमात्मा के हृदय में भी उथल-पुथल मचाकर रख देती है। ऐसी प्रार्थना निष्काम, सच्ची और सजीव ही हो सकती है। वर्षा का जल गिरता है तो सारी धरती गीली हो जाती है। प्रार्थना के प्रभाव से परमात्मा का अंतःकरण द्रवित होता है और साधक की उपासना से अधिक परिणाम प्राप्त होता है। संत टेनीसन ने लिखा है। “जितना संसार समझता है, प्रार्थना से उससे अधिक कार्य होता है।” इसलिए अपनी प्रार्थना ऐसी हो “हे प्रभु! तेरी शरण हम आए हैं। तुझसे वह प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं, जिससे अंधकार में भटकते हुए मनुष्यों के दुःख और संताप दूर कर सकें।
असहाय अवस्था में जब मनुष्य को चारों तरफ से निराशा ही दिखाई देती है, शक्तियाँ काम नहीं देतीं, भाग्य की कुटिलता पग-पग पर सताने लगती है, अपने भी पराए बन जाते हैं तब प्रार्थना ही उसका मित्र बनती है। प्रार्थना दुर्दिनों की सहारा, अंधियारे का पाथेय और दुःख की साथी है। जब किसी तरह मनुष्य के प्रयत्न काम नहीं देते तब प्रार्थना से ही उसे बल मिलता है। सच्ची करुणा प्रार्थना का उत्तर तत्काल ही मिलता है।
दुष्ट दुर्भावनाओं को दूर करने में प्रार्थना एक अमोघ साधन है। कामुकता, क्रोध, मोह और अहंकार के मनोविकार प्रार्थना की आग में जल कर खाक हो जाते हैं। स्वार्थ की क्षुद्रता घटती है और आँतरिक विशालता बढ़ती है। जीवन-शोधन की यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रणाली है। प्रार्थना एक अभूतपूर्व शक्ति है, जिसे अपनी भावनाओं के द्वारा कोई भी उत्पन्न कर सकता है। आग का गुण है कि वह जहाँ रहती है, वहाँ उष्णता भी रहती है। प्रार्थना के ताप के पास पाप नहीं रह सकते।
पापों का प्रायश्चित करना प्रार्थना का ही करुण स्वरूप है। जब हम अपने पापों को सच्चे हृदय से स्वीकार कर लेते हैं तो उनके कठोर परिणाम भोग लेने की क्षमता आ जाती है। इससे अगले जीवन का प्रकाश आँखों के आगे झलकने लगता है, आशा जागती है। जिससे कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसंतोष और अलौकिक शांति बनी रहती है। इसलिए प्रत्येक धर्म में प्रार्थना को प्रमुखता दी गई है। आत्मविकास की प्रक्रियाओं में इसका सर्वप्रथम स्थान है। दूसरी योजनाओं के लिए इसी से बल मिलता है। इसलिए कोई भी शुभारंभ करने से पूर्व प्रार्थना अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है। इससे एक तरह का बल, विश्वास और आशा जागृत होती है, जो किसी भी काम की पूर्णता में सहायक होती है।
आसुरी शक्तियों से आत्मरक्षा और सद्गुणों के विकास के लिए इस युग में प्रार्थना का महत्व और भी अधिक है। झगड़ने की आवश्यकता नहीं है कि अमुक प्रार्थना अच्छी और अमुक खराब है। सद्बुद्धि की प्रार्थना ही परमेश्वर की सच्ची उपासना है। जिसकी वाणी में संपूर्ण प्राणियों के कल्याण की भावना सन्निहित है, वही परमात्मा की सच्ची प्रार्थना है। स्वार्थपूर्ण कामनाएँ इस विशालता में बाधा उत्पन्न करती हैं, इसलिए इनसे ऊपर उठकर हमारी भावनाएँ ऐसी हों जो आत्मकल्याण और संसार की भलाई से प्रेरित हों। वही प्रार्थना सार्थक हो सकती हैं, “हे भगवान! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।” जब इस तरह के उद्गार अंतःकरण से उठेंगे, तो जीवन में एक नया प्रकाश प्रस्फुटित होगा। उस परम पिता की प्रार्थना में वह शक्ति है, जो हमारे सारे कष्टों को दूर कर सकती है। हम उस परमात्मा को कभी न भूलें। हमारा जीवन सदैव प्रार्थनामय हो। हम उसके समक्ष याचक बनकर मनोकामना हेतु झोली न पसारें, सद्भावनाओं का अनुदान माँगे, इसी में हमारी गरिमा व उसका पुत्र,डडडडडड सृष्टि का सिरमौर कहे जाने की सार्थकता है।
“डाॅ. नारमन बिन्सेंट पीले” अमेरिका के गिरजों के परामर्शदाता मंत्री थे और मनोवैज्ञानिक चिकित्सक भी। न्यूजर्सी के गिरजाघर में एक दिन उनका प्रवचन था। भाषण समाप्तकर वह बाहर आए तो एक स्त्री उनके पास आई और याचक स्वर में बोली— “मैं जब भी किसी गिरजा में जाती हूँ, मेरी बाँहों में बड़े जोर की खुजली उठती है। आश्चर्य है कि गिरजाघर से वापस होते ही, खुजली कम हो जाती है।
डाँ. पीले ने पूछा— “आप किस कुर्सी पर बैठी थीं। संभव है उसमें किसी ने कोई ऐसी वस्तु लगा दी हो जिससे खुजली भड़कती हो।” इस पर उस महिला ने बताया कि “ऐसा इसी गिरजाघर में नहीं हुआ। जब भी किसी गिरजाघर में जाती हूँ तो खुजली के कारण बुरी तरह परेशान हो उठती हूँ।”
डाॅ. पीले ने बहुत विचार करने के बाद उन्हें एक दिन घर मिलने को कहा। घर पर पहुँचने पर डाॅक्टर ने उससे बहुत स्नेह के साथ पूछा— “आपके जीवन में कहीं कोई त्रुटि, कोई पाप जैसा कर्म हो रहा हो, जिसे आप भयवश किसी से प्रकट न कर रही हों, ऐसा कुछ हो, मुझे बताइए।”
वह बेचारी पहले तो कुछ झेंपी, पर बाद में बताया कि “वह जिस फर्म में काम करती है, वहाँ से कुछ पैसा चुरा लिया करती है।” चोरी उसका एक स्वभाव बन गई। वे जब भी किसी गिरजाघर जाती इस पाप का उद्वेग मस्तिष्क में छा जाता और धीरे-धीरे खुजली उठने लगती। डॉक्टर ने उन्हें समझाया—" बेटी! तुम अपने स्वामी के पास जाकर अपनी भूल स्वीकार कर लो। फिर भविष्य में ऐसा न करना तो तुम्हें यह कभी नहीं होगा।"
महिला उद्विग्न हो उठी। बोली— “ऐसा करने से मुझे नौकरी से निकाल दिया जाएगा और लोगों की दृष्टि में उसका सम्मान खो जाएगा।” पर डाॅक्टर के समझाने पर वे वैसा करने के लिए राजी हो गई। उन्होंने अपने फर्म मैनेजर से जाकर सारी घटना ज्यों-की-त्यों कह दी। स्वामी पहले तो बहुत गुस्सा हुआ पर महिला की निष्कलुषता से वह प्रभावित हुए बिना भी न रह सका। उसने महिला को फिर वैसा न करने की चेतावनी देकर क्षमा कर दिया और नौकरी से नहीं हटाया। पर आश्चर्यजनक बात यह हुई कि उस दिन के बाद वे जिस किसी भी गिरजा में गई, कहीं भी उन्हें खुजली नहीं हुई।
यह विश्व-व्यवस्था कर्त्तव्य और अधिकार के आधार पर चली है। यहाँ आदान-प्रदान के सिद्धांत को सर्वोपरि मान्यता प्राप्त है। भगवान ने प्राणियों में सर्वोत्तम शरीर मनुष्य को प्रदान किया है। यह उसकी सर्वोपरि कलाकृति है। इसे देने के उपरांत उसने हाथों-हाथ यह आशा भी रखी है कि वह वरिष्ठता की दृष्टि से उसका युवराज सिद्ध होगा साथ ही उसके इस विश्व-उद्यान को अधिक सुविकसित सुसंस्कृत बनाने में आगे बढ़कर हाथ बँटाएगा। जो इस उत्तरदायित्व को समझते हैं, वे अपने क्रियाकलापों को पेट-प्रजनन तक सीमित न रखकर वह करते हैं; जिससे भगवान के अनुदान का प्रतिदान उसे वापस मिल सके। जो इस दिशा में जितना आगे बढ़ते हैं, वे उसी के अनुसार नए उपहार भी प्राप्त करते हैं। प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ है। इससे आगे की मंजिल महामानव, देवात्मा, ऋषि, पार्षद, अवतार आदि आती है। वे भी समयानुसार मिलते-चलते हैं और नर से नारायण बनने का सुयोग हाथ लगता है। उन उठते स्तरों के साथ सिद्धियों और विभूतियों का अनुदान बरसता है। इसी स्थिति में मनुष्य स्वयं इस भवसागर से पार होता है और अपनी पीठ पर असंख्यों को पार कराता है।
व्यवहारिक सिद्धांत है, उचित मूल्य, उचित वस्तु प्राप्त करना। हर समझदार इसी को सही आधार मानता है और जैसी वस्तु खरीदनी होती है, वैसी पूंजी जुटाता है। बाजार में बेचना हो तो भी इसी आधार पर दाम मिलेंगे। भगवान की अनुकंपा भरी विभूतियों को प्राप्त करने में भी यही सिद्धांत काम करता है। कल्मषों से निवृत्ति पाने के लिए संयम की तप-साधना, दृष्टिकोण को परिष्कृत करने के लिए यौगिक तत्त्वज्ञान और जो पास में है, उसे अनेक गुना बनाने के लिए साधनों को परमार्थ के खेत में बो कर सौ गुनी फसल उगाना, यही है— "भक्तजनों की साधना, जिसके मिले हुयेए का ऋण चुकता है और आगे के लिए बहुमूल्य अनुदानों का द्वार खुलता है।"
बलबुद्धि नियम-मर्यादाओं में नहीं बाँधना चाहती। उसकी आतुर महत्त्वाकांक्षाएँ होती है। मूल्य चुकाने की सामर्थ्य नहीं होती। ऐसी दशा में बालविनोद से उसका मन बहलाया जाता है। मोटर, रेल, हवाई जहाज, पाने के लिए मन ललचाता है। यह वस्तुएँ बहुत दाम की है। फिर उनके रखने का स्थान और चलाने का अनुभव चाहिए। बच्चा इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता; मचलता है; तब उसे फुसलाने के लिए अभिभावक यह खिलौने दो-दो रुपए से खरीद कर ला देते हैं। चाबी लगी होने से वे चलते भी हैं। बच्चे का मन बहल जाता है और मचलने पर उत्पन्न होने वाली हैरानी से अभिभावकों का भी पीछा छूट जाता है।
विचारणीय बात है कि किसी को ध्रुव, प्रहलाद, बुद्ध जैसी तपस्याएँ क्यों करनी पड़ती? कोई कष्टसाध्य ऋषि जीवन क्यों अपनाता? एक ओर साँसारिक मौज-मजा उड़ाते रहना और दूसरी ओर भगवान की हजामत बनाने का बाजीगरी खेल देखने से क्यों चूकता? इस प्रश्न का उत्तर धूर्तों और मूर्खों की जोड़ी ही मिलकर दे सकती है और वे ही आपस में एकदूसरे का समाधान भी करते रह सकते हैं। समझदारी की कसौटी पर कसने से तो यह बातें मसखरी जैसी ही प्रतीत हो सकती है।
भगवान का अनुग्रह प्राप्त करने वालों को पूजा-उपचार तक सीमित नहीं रहना पड़ा है; वरन अपना जीवन आदर्शों की आग में तपाकर इस स्तर का ढालना पड़ा है, जो अपने आप में महान हो और उसमें असंख्यों को अनुकरण की प्रेरणा दे सकने की क्षमता विद्यमान हो। ऋषियों में से प्रत्येक का जीवनक्रम इसी ढाँचे में ढला था। वे अपरिग्रह, संयम और परमार्थ की जीती जागती प्रतिमा थे। महामानवों में से प्रत्येक का जीवन ऐसा रहा है, जिसमें निजी विलास और वैभव से उन्हें सर्वथा विमुख रहना पड़ा और जो कुछ सोचते तथा करते रहे उसमें स्वार्थ का रंचमात्र भी समावेश नहीं था। उनकी समूची योजनाएँ सत्प्रवृत्ति संवर्ध्दन और लोक-मंगल का लक्ष्य सामने रखकर ही बनी। संसार से उनने सस्ता निर्वाहमात्र लिया और अपनी बहुमूल्य क्षमताओं को सत्प्रयोजनों के लिए विसर्जित करते रहे। सच्चे भगवतभक्तों को इस एक ही कसौटी पर सब ओर से घिसकर देखा जा सकता है। उत्कृष्टता की आग में तपाने पर वे सब और से खरे सोने जैसे निकलते हैं। भगवान का प्रियवान बनने के लिए इससे कम में कभी किसी का काम चला नहीं है। तिलक-छापा लगाकर अजगर की तरह पड़ा रहने भावुकजनों के सिर पर अपना आर्थिक भार लादे रहने, सेवा धर्म से हजारों कोस दूर रहने वाले आज के तथा कथित सन्त भक्तों के बारे में क्या कहा जाए? कुछ कहते नहीं बन पड़ता।
सच्चे भक्तों की नामावली पर जब दृष्टि उठाकर देखते हैं तो उसमें वास्तविकता झलकती और छलकती देखी जा सकती है। स्मरण हनुमानजी का आता है। ‘राम काज कीन्हें बिना मोहि कहाँ विश्राम’ का प्रयास उनने जीवन भर किया। एक लंगोटी भर से जीवन गुजारा। राम की इच्छा के अनुरूप कठिन-से-कठिन और जोखिम भरे काम में जुट जाना, यही है उनकी भक्तजनों की उपयुक्त जीवन-साधना। मालूम नहीं इस कार्यक्रम के बीच में उन्हें जप-भजन का समय कभी मिलता भी था या नहीं, उनके साथी सहधर्मी अंगद, नल, नील, जामवन्त आदि इसी प्रकार निरंतर कार्यरत रहे हैं। लंका विजय के उपरांत यह सभी मंडली रामराज्य की स्थापना, सतयुग की वापसी में जुट गई और उसी में खप गई।
भगवान कृष्ण भारत को महाभारत— "विशाल भारत बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने प्राणप्रिय परम भक्त अर्जुन समेत पाँडवों को अगली पंक्ति में खड़ा किया।" उन्हें लौकिक दृष्टि से क्या मिला? पूरे पाँडव परिवार के एकोंएक सदस्य को आजीवन मरते खपते और पिसते हुए भगवान की इच्छा पूरी करने में खपना पड़ा। सबसे प्यारे मित्र और सखा को भगवान श्रेय देते हैं, साथ ही उसका प्रेय पूरी तरह छीन लेते हैं। मालूम नहीं, पाँडवों ने कभी कुछ जप-अनुष्ठान किया या नहीं?
भक्तों में नारद अग्रणी माने जाते हैं वे लोक-मानस के परिष्कार में विश्व की समस्याओं को निपटाने में लगे रहे। उनमें संकल्प था कि ढाई घड़ी से अधिक किसी एक स्थान पर न रुकेंगें, निरंतर परिव्रज्या करते रहेंगे। एक बार नारद का मन विवाह करने को हुआ। उनकी उस कामना पूर्ति को लज्जित करते हुए कुचल दिया। भगवदभक्तों में भागीरथ का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे धरती वालों का जल का अभाव दूर करने के लिए गंगा को ऊपर से नीचे लाने की कठोर तपश्चर्या में अहर्निश निरत रहे और आर्यवर्त्त, मगध, कौशल आदि राज्यों की भूमि से जलसंकट सदा के लिए समाप्त करके संतोष की साँस ले सके। मालूम नहीं, इस बीच में कथा-कीर्तन करते-कराते थे या नहीं।
बुद्ध की एकांत तपश्चर्या का समय बहुत थोड़ा रहा है। बाकी तो वे धर्मचक्र-प्रवर्त्तन की योजना को क्रियांवित करने और उसे विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाने में निरत रहे। जो भी उनके प्रभाव परिचय में आया उन्हें परिव्राजक बनाकर देश-देशांतरों में संव्याप्त अनाचार के उन्मूलन में लगा दिया। उनका-उनके अनन्य सहयोगियों का समूचा समय इसी उच्चस्तरीय प्रयोजन में लगा है। उन्होंने अपने पुत्र तक को इसी प्रयोग के लिए दीक्षित किया था। परिवार तो उनका एक तरह से उजड़ ही गया।
उनके प्रमुख शिष्यों में से प्रत्येक ने एक-से एक बढ़कर आदर्श उपस्थित किए। अंबपाली और अंगुलिमाल का जीवन बदला और उन्हें देश-देशांतरों में भेजा। हर्षववर्ध्दन और अशोक सम्राट होते हुए भी बुद्ध के रंग में ऐसे रंगे कि उनकी अपनी संपत्ति का एक-एक पैसा विहारों, संघारामों और विश्वविद्यालयों को चलाने में लगा दिया। अशोक की बेटी और हर्षवर्ध्दन की बहिन आजीवन कुमारी रहकर धर्म-प्रचार में निरत रही। इस बीच इन सब का पूजा-पाठ नित्यकर्म जैसा ही चल सका होगा?
कुछ समय पूर्व के महात्मा गाँधी और संत विनोबा सच्चे अर्थों में भगवतभक्त हुए है। उनकी पूजा-उपासना तो थोड़ी-सी ही होती थी, पर पीड़ित मानवता को सहारा देने के लिए उन्होंने वृद्धावस्था के अंतिम चरण तक काम किया। विदेशी महिलाओं में सिस्टर निवेदिता, सरला बेन, मीरबेन, मदर टेरेसा को किसी कथा-कीर्तन वाली महिला से कम नहीं माना जा सकता।
स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, रामतीर्थ, स्वामी केशवानंद, रामकृष्ण परमहंस, समर्थ गुरु रामदास, गुरु गोविंद सिंह आदि का कार्यक्रम लोक-मंगल प्रधान रहा। उनकी भक्ति किसी तिलक-छापा वाले से कम नहीं मानी जा सकती।
गृहस्थभक्तों में महर्षि कर्वे, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, शिवाजी, प्रताप आदि के जीवन में भगवान पूरी तरह घुले हुए है। राजाराममोहनराय जिनके प्रयास से असंख्य विधवाओं का आग में झोंका जाना रुका किसी संत से कम सराहनीय नहीं है। बापा जलाराम वीरपुर गुजरात के एक किसान थे। बापा दिन भर खेती करते उनकी स्त्री का चौका हर समय दीन-दुखियों के लिए चलता रहता। अंत में उनकी झोली सिद्ध पुरुष की झोली हो गई, जिसका अन्न कभी समाप्त ही नहीं होता। अब तक हजारों व्यक्ति उसी के अन्न से प्रसाद पाते रहे हैं।
चैतन्य महाप्रभु अपने संकीर्तन आंदोलन के सहारे उन आतंक के दिनों में जागृति पैदा करते रहे और अछूतों के साथ बरते जाने वाले भेदभाव को मिटाते रहे। कबीर ने अपने समय के भ्रम-जंजालों और कुप्रचलनों पर ऐसे तीखे प्रहार किए कि मठाधीशों के दिल दहलने लगे।
यह थोड़े से उदाहरण है। स्मरण करने पर ऐसे सच्चे संतों के नाम याद आ सकते हैं, जिनने अपना जीवन कथा-कीर्तन, पूजा-पत्री, भजन-सत्संग तक सीमित नहीं रखा; वरन आहत मानवी गरिमा के घाव भरने में अपने समय और श्रम को पूरी तरह लगा दिया। भजन नित्यकर्म है। स्नान भोजन की तरह नित्यकर्म में उसका भी स्थान होना चाहिए। पर इसका अर्थ यहाँ किसी भी प्रकार नहीं होता कि भजन का बहाना लेकर समूचा समय ऐसे ही निठल्ले रहकर बिता दिया जाए और अपने निर्वाह का व्ययभार भोलेभावुकजनों से वसूल किया जाए। देश में 7 लाख गवि है और 60 लाख संत बाबा। हर गाँव पीछे उनका औसत साढ़े आठ आता है, यह लोग भजन के अतिरिक्त शेष समय शिक्षा-प्रसार, नशा-निवारण, कुरीति उन्मूलन जैसे कामों में लगाने लगे तो समूचे देश का कायाकल्प हो सकता है। सेवा धर्म को साथ में जोड़ लेने से भक्ति भी सार्थक हो सकती है और भगवान की उपासना का स्वरूप भी जनमानस में श्रद्धा का संचार कर सकता है।
उपासना का अर्थ है— "पास बैठकर संगति करना। जो सच्चे मन से संगति करेगा, उसमें उसके गुण भी अवश्य प्रकट होंगे। चंदन के पेड़ के पास उगने वाले झाड़-झंखाड़ भी सुगंधित हो उठते हैं। पारस छूकर लोहा सोना हो जाता है। भगवान के पास बैठने का तात्पर्य है उसके गुणों को अपने में भर लेना। स्वाति की बूँद पड़ने से सीप में मोती, केले में कपूर, बाँस में वंशलोचन उत्पन्न होता है, फिर कोई कारण नहीं कि उपासना करने वाले ईश्वर के समान पवित्र, निस्पृह, न्यायपरायण, निरंतर व्यस्त परमार्थरत जैसे सद्गुणों से संपन्न न हो।"
आपत्तिकाल एक परीक्षा की कसौटी है। जिस पर कसे जाने के बाद ही, यह जाना जा सकता है कि वह ईमानदार है या नहीं?
आस्तिकता— "मानव जीवन में समाहित उत्कृष्टता का मापदंड।" सर्वव्यापी परमेश्वर हमारे गुप्त-प्रकट सभी कृत्यों को जानता है और तदनुसार भला-बुरा कर्मफल प्रदान करता है। इस मान्यता के आधार पर ही हमारी नीतिमत्ता सुरक्षित रहती है। नास्तिक निरंकुश होता है। उसे उद्दंडता अपनाने में दैवी-अनुशासन का भय नहीं रहता। तत्काल फल न मिलने पर वह इतनी दूरदर्शिता नहीं अपना पाता कि यहाँ देर है, अँधेर नहीं। जिसे कर्मफल पर विश्वास होगा, वह पाप की अपेक्षा और पुण्य-परमार्थ के संचय में निरत रहेगा। यही है सर्वतोमुखी प्रगति और सुनिश्चित सुख-शांति का मार्ग।
परब्रह्म को सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय भी कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में उत्कृष्ट आदर्शवादिता भी है। ईश्वर-।उपासना का तात्पर्य है उसी के ढाँचे में अपने गुण-कर्म-स्वभाव को ढालना— "मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखना"— "सज्जनोचित सदाशयता में अपने आपको ओत-प्रोत करना। आस्तिकता की यही अवधारणा वास्तविक है और श्रेयस्कर भी। जहाँ वह रहेगी वहाँ आध्यात्मिकता भी आत्मावलंबन के रूप में रहेगी और व्यवहार में धार्मिकता, कर्त्तव्यपरायणता के रूप में दृष्टिगोचर होती रहेगी।"
सच्ची आस्तिकता में साधक परमेश्वर को आत्मसमर्पण करता है। उसके अनुशासन में चलता है। अपनी रीति-नीति ऐसी बनाता है, जो ईश्वर भक्त को शोभा देती है। नाला अपने आपको जब नदी में मिलाता है तो उसी के प्रवाह में उसी के अनुरूप बहता है। ईंधन जब अग्नि को समर्पित होता है तो अपने में आग के सारे गुण समाहित कर लेता है। समर्पण ही ईश्वरभक्ति है। उसमें कामना के लिए कोई गुँजाइश नहीं रहती। केवल उसी की इच्छा को समझने, अपनाने के लिए मानस तैयार करना पड़ता है। दृष्टिकोण में ऐसा बदलाव लाना पड़ता है कि कामनाएँ, लिप्साएँ, तृष्णाएँ, महत्वकांक्षाएँ शेष ना रहे, केवल प्रभु की इच्छा को अपनी इच्छा बना लेने का कायाकल्प जैसा सर्वतोमुखी परिष्कृत प्रयास चल पड़े। इसकी सीधी परिणति होती है। चिंतन में, चरित्र में, व्यवहार में, आदर्शवादी-उत्कृष्टता का समावेश। जिसके जीवनक्रम में जितनी शालीनता भर चले, समझना चाहिए कि उससे उतनी ही सार्थक भक्तिभावना सध रही है।
देखा जाता है कि तथाकथित भक्तजन तथ्यों के सर्वथा विपरीत मानस बनाए रहते हैं और प्रतिकूल आचरण से व्यक्तित्व को भरे रहते हैं। देवताओं को जिस-तिस कर्मकांड के सहारे अपना गुलाम बनाने की चेष्टा करते हैं, और उनसे उचित-अनुचित मनौती मनाते रहते हैं। इसी प्रयोजन के लिए छुट-पुट भेंट-पूजा चढ़ाते और स्तवन के रूप में प्रशंसा के पुल बाँधते हैं। यह समूचा आडंबर एक ही प्रयोजन के लिए होता है कि मनोकामनाएँ पूरी होने लगे। संकट टलते रहें और प्रतिकूलताओं का अनुकूलता के रूप में परिवर्तन बन पड़े। वातावरण बदले। परिस्थितियाँ अनुरूप, अनुकूल ढले।
इसे कहते हैं— "थोड़ा देकर बहुत पाने का व्यवसाय। समझना चाहिए कि चिड़ियों और मछलियों को जरा से चारे का लोभ दिखाकर जाल में फंसाया और उनका मलीदा बनाया जा सकता है। देवताओं की पूजा-पत्री करते समय भी यही रीति-नीति अपनाई जाती है। उनसे मनचाहा माँगने और हठपूर्वक पूरा कराने का आग्रह रहता है। जिसकी पात्रता नहीं है, उसके लिए भी अनुग्रह माँगा जाता है।" जो न्यायोचित नहीं है, उसे भी देने के लिए कहा जाता है। यह विचार नहीं किया जाता कि देवता को भी उचित-अनुचित का न्याय-अन्याय का विचार करने के लिए अवसर मिलना चाहिए। वे तनिक सी पूजा-सामग्री के लोभ में औचित्य को तिलाँजलि देते रहे, और जो माँगा गया है, उसे देते रहे तो फिर पात्रता विकसित करने की किसी को भी क्या आवश्यकता रहेगी? फिर “सब धान बाइस पसेरी’ के भाव बिकेगा।” जो भी पूजा का प्रलोभन दिखाएगा, जो भी प्रशंसा के पुल बाँधेगा, वह भक्त कहलाएगा। जो माँगे सो पाए की रीति चल पड़ी तो फिर पात्र-कुपात्र का, खरे-खोटे का विचार करने की क्या आवश्यकता रह जाएगी? कर्म फल का सिद्धांत कहाँ जीवित रहेगा? परिश्रम के प्रयास पात्रता के अनुरूप पाने का सिद्धांत तो समाप्त ही हो जाएगा। रिश्वत का ही बोलबाला चल पड़ेगा। लोक-व्यवहार में तो लाभाँश का एक बड़ा भाग रिश्वत में देना पड़ता है, पर देवताओं को तो थोड़े में से ही फुसलाया जा सकता है। उनके लिए तो अक्षत-पुष्प जैसी पाई-पैसे की रिश्वत ही पर्याप्त समझी जाती है। चापलूस— "झूठी प्रशंसा के पुल बाँधते और भोले लोगों को मूर्ख बनाकर उनकी जेब काटते हैं। देवताओं को ऐसी ही बालबुद्धि का समझा जाए और उन्हें झुनझुना, गुब्बारा देकर फुसलाने का जुगाड़ बिठाया जाए तो इसे अनहोनी को होनी बनाकर दिखाने की बाजीगरी ही समझा जाएगा। तथाकथित भक्त लोग ऐसी ही तिकड़म-भिड़ाते हैं। और देवताओं को रिश्वती, खुशामदखोर, अविवेकी, के रूप में बदनाम करते हैं।"
विचारणीय है कि क्या “अंधेर नगरी बेबूझ राजा” की लोकोक्ति भक्त और भगवान के प्रसंग में चरितार्थ होती रह सकती है? क्या पात्रता का सिद्धांत सर्वथा उपेक्षित हो सकता है? क्या प्रयास-पुरुषार्थ का कर्मफल वाला - अनुशासन निरस्त किया जा सकता है? क्या पूजा-पाठ का अर्थ योग्यता और प्रयत्नशीलता की आवश्यकता को समाप्त करना है? क्या याचक और दाता की औचित्य की सीमा लाँघना है। क्या ऐसा करके वे दोनों ही अपनी गरिमा गिराते नहीं?
ऐसी पूजा-पत्री फलदायक सिद्ध नहीं हो सकती, जिसमें मुफ्त ही मनोकामना पूर्ण करने की रीति-नीति जुड़ी हुई है। पर चाहने पर भी ऐसा होता नहीं है। मुफ्तखोरों की झोली मणि-माणिकों से भरती नहीं है। असंभव को संभव बनाने के प्रयास में कहाँ किसे कब कितनी सफलता मिलती है? यदि पूजामात्र से मनोरथ सिद्ध हुए होते तो पुजारियों के पौ बारह रहते। उनके घर सोने-चाँदी से बने होते। कर्मकांडी पंडितों को कुबेर जैसा धनी और इंद्र जैसा समर्थ देखा जाता, उन्हें तो सभी देवताओं के जंत्र-मंत्र आते हैं। भगवान को रिझाने के लिए विविध विधि कीर्तन-कौतुक करने वालों की एक भी मनोकामना अधूरी न रहती।
भक्ति का उद्देश्य अपने आपको देवता के प्रति, देवत्त्व के प्रति समर्पित करना है। मनुष्य में देवत्त्व का उत्पादन-अभिवर्ध्दन प्रत्यक्षीकरण करना है। इसी प्रकार भजन-पूजन बन पड़ता है और उसका प्रयोजन पूरा होता है। प्रामाणिकता, पवित्रता, प्रखरता और उदार सेवा-भावना के आधार पर ही देवता प्रसन्न होते, अनुग्रह करते और वरदान देते देखे जाते हैं। यही यथार्थता है। पर जो लोग वास्तविकता से आंखें मूँद लेते हैं और चतुरता भरी तिकड़म-भिड़ाकर सस्ते प्रलोभन के बदले बहुमूल्य वरदान पाना चाहते हैं, उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। पूजा के छद्म में जो समय-श्रम लगता है, वह बेकार चला जाता है। उपचारों में नियोजित किए गए साधन भी निरर्थक चले जाते हैं।
आस्तिकता कृषि कर्म जैसी उद्यान आरोपण जैसी प्रत्यक्ष फलदायिनी पुण्य-प्रक्रिया है। उस हेतु जो बोया जाता है, वह सहस्र गुना फलता है। किंतु आवश्यकता इस बात की है कि उसमें खाद-पानी की कमी न रहने दी जाए। आध्यात्मिकता, आत्मपरिष्कृति खाद है और धार्मिकता-कर्त्तव्यपरायणता पानी। जो इन दोनों की व्यवस्था नहीं करते और देव अनुग्रह का प्रतिफल पाना चाहते हैं; उन्हें अविवेकी ही कहा जाऐगा, बुद्धिहीन भी।
माल्टा सरकार में सुरक्षा सैनिक चार्ल्स सलीवा, जिसकी आयु 53 वर्ष है, योरोप का सबसे शक्तिशाली पुरुष है। वह अपने दाँतों से 130 टन के हवाई जहाज को पच्चीस फीट दूर ले जा सकता है। दाँतों से लोहे की मोटी सरिया को मोड़ देता है। कान में हुक लगाकर कार को दस फीट तक खींच सकता है। बालों से रस्सी बाँधकर कार को खींच सकता है। वह अपने करतबों से होने वाली आय का एक पैसा भी स्वयं न लेकर उस पैसे को समाजसेवी कार्यों में लगा देता है।
धर्म शब्द का अत्यन्त संक्षिप्त सारगर्भित अर्थ तो “अभ्युदय और निःश्रेयस” के रूप में लिया जाता है। जिसका अर्थ होता है— "लौकिक और परलौकिक उन्नति अथवा ऊँचे उठना, नीचे न गिरना। इतने भर सूत्र संकेत की यदि विस्तृत विवेचना की जाए तो उसके अंतर्गत उन सभी श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभावों का समावेश हो जाता है, जिनका जीवन को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने से सीधा संबंध है। उन सभी दुर्गुणों का सुधार-निष्कासन भी इसी सूत्र में समाविष्ट है, जो पतन-पराभव का निमित्त कारण होते हैं।"
किंतु इस अभ्युदय, निःश्रेयस सूत्र से जिनका काम नहीं चलता और जो अधिक विस्तृत विवेचना के साथ वस्तुस्थिति को समझना चाहते हैं, उनके लिए धर्म के सुप्रसिद्ध दश लक्षणों की भावना, प्रेरणा और व्यवहार संहिता समझने की आवश्यकता पड़ेगी।
धर्मानुशासन के प्रथम प्रवक्ता भगवान मनु ने धर्म के जिन दस लक्षणों की व्याख्या विवेचना की है, उनके नाम है (1) धृति (2) क्षमा (3) दया (4) अस्तेय (5) शौच (6) इंद्रिय निग्रह (7) धी (8) विद्या (9) सत्य (10) अक्रोध। यही दस धर्म के प्रधान लक्षण है, इनकी सहयोगी सत्प्रवृत्तियाँ तो और भी हैं और उनका वर्णन गीता में दैवी संपत्ति के नाम से किया गया है और उनका संख्या विस्तार 26 की तक किया गया है। हमें इन व्याख्या-विवेचनों के विस्तार विवाद में न जाकर जितने से काम चल सकता है उतने से ही काम चला लेना चाहिए। इस दृष्टि से मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म के दश लक्षण प्रख्यात भी है और क्रम की दृष्टि से उनके बीच तारतम्य भी है।
धर्म लक्षणों में जिसे प्रमुख प्रश्रय मिला है वह है— ’धृति’, जिसका मोटा अर्थ ‘धैर्य’ समझा जाता है। धैर्य का अर्थ— है, जो कार्य जितने समय में होने वाला है उसके लिए उपयुक्त समय दिया जाए। अधीर न हुआ जाए, हथेली पर सरसों जमाने जैसी जल्दबाजी न की जाए। शेखचिल्ली घड़ा ढोने की मजदूरी मिलने से पूर्व ही मुर्गी, बकरी, भैंस, घर, बीबी, और संतान मिलने की उतावली में इतना व्यग्र हो गया था कि उसमें समय साध्य योजना पलक झपकते ही पूरी होती दिखाई पड़ने लगी थी। इसीलिए उस घटना या कथा की चर्चा, मुद्दतों बीत जाने पर भी मूर्खता का प्रतिनिधित्व करते हुए भी होती रहती है।
घास वर्षा होते ही उग आती है; किंतु बरगद अथवा ताड़ व खजूर को अपने यौवन के आगमन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। लंबे समय तक इनकी सेवा-सुरक्षा के साथ प्रतिफल की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जो उतावली करते हैं, वे हथेली पर सरसों जमाने की बाजीगरी न कर पाने पर निराश हो जाते हैं और भाग्य को दोष देकर जो काम हाथ में लिया था, उसे छोड़ बैठते हैं। इससे किया हुआ परिश्रम भी व्यर्थ चला जाता है और मनोबल भी इस प्रकार टूट जाता है; जिससे भविष्य में और कोई साहस भरे कदम उठाने से डर लगने लगे।
उपर्युक्त प्रतिपादन किसान-व्यापारी से लेकर लोकसेवी और योगी-तपस्वी तक पर समान रूप से लागू होता है। क्षमता दक्षता एवं अभीष्ट साधन-सहयोग उपलब्ध कर सकना इतना सरल नहीं है कि वे तत्काल ही तैयार किए हुए तैयार मिलें। इन्हें ठोक-पीटकर काट-छाँट के उपरांत ही इस योग्य बनाया जा सकता है, जिसमें से उनके सहारे निर्धारित योजना भली प्रकार चल सके। इस प्रयास में अड़ंगे भी लगते और अनुपयुक्त-साधन बरतते भी रहने पड़ते हैं। इसमें विलम्ब लगते देखकर अपनी आस्था डगमगाने नहीं देना चाहिए। धैर्यपूर्वक लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अटूट संकल्प और साहस अपनाए रहना चाहिए, यही है धृति का व्यावहारिक स्वरूप।
इसका अर्थ यह नहीं है कि जिस काम में जितना समय लगना चाहिए, उससे अधिक लगाया जाए। आलस्यवश कार्यों को आधे-अधूरे छोड़ते हुए उन्हें अस्त-व्यस्त रहने दिया जाए और अपने उस प्रमाद को धैर्य बताया जाए। कर्त्तव्यपालन के संबंध में तो समय का एक-एक क्षण को हीरे मोतियों से तोलना चाहिए और तत्परता के साथ तन्मयता को जोड़ते हुए बिना ध्यान बखेरे, मन को उदास किए, संयम-श्रमशीलता के साथ निर्धारण में संलग्न रहा जाए। तभी उसका कुछ कहने लायक प्रतिफल हस्तगत होता है।
धैर्य को शिथिलता का आलस्य-प्रमाद का प्रतीक नहीं माना जाना चाहिए और न इस उच्चआदर्श की आड़ में जो हो रहा है, समय पर होकर रहेगा। भाग्यवादियों जैसा बोल न बोलना चाहिए। धृति का तात्पर्य इतना ही है कि अभीष्ट प्रयोजनों के सधाने में समय से अधिक विलम्ब लग सकता है। इस बीच जो आतुरता-अकुलाहट होती है। उसे काबू में रखा जाए, ताकि विलम्ब लगने पर भी कठिनाइयों से लड़ने का हौसला तथा कर्मठता का प्रयास शिथिल होने न पाए।
ब्रूसो की कथा प्रसिद्ध है। वह लड़ाइयों में बार-बार हारता रहा। अंतिम हार के समय जान बचाकर किसी खाई में पड़ा छिपा हुआ था। पड़े-पड़े छत पर निगाह डाली तो एक मकड़ी जाला बुनते दिखाई पड़ी। तेरह बार असफल रहने के बाद भी वह निराश नहीं हुई और चौदहवीं बार सफल हुई। ब्रूसो की निराशा को इस घटना ने अभिनव उत्साह में बदल दिया। उसने नए सिरे से लड़ाई की योजना बनाई और दूने उत्साह से उसे पूरी करने में लग गया। इस बार सफलता उसी के हाथ रही।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन चुनावों में चौदह बार हारे। इसके बाद उन्हें विजय मिली। हारते रहने पर भी उत्साह ठंडा न हुआ तो लोगों ने जान लिया कि यह आस्थावान है और विश्वास योग्य है। इस दृढ़ता ने एक साहसी व्यक्तित्व का प्रमाण-परिचय दिया और जनसमुदाय उनके साथ हो गया। साधनहीन परिस्थितियों में भी वे राष्ट्रपति का चुनाव जीते।
शिव-पार्वती के विवाह का प्रसंग भी ऐसा ही है। पार्वती शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तप कर रही थी, सो तो ठीक था, पर शिवजी जानना चाहते थे कि अध्यात्म का प्रथम गुण— धैर्य, उनमें है या नहीं। अन्यथा मेरे साथ रहते हुए कठिनाइयों के बीच वे अधीर हो उठा करेगी और मुझे व्यर्थ का झंझट उठाना पड़ेगा। उन्होंने पार्वती की परीक्षा करने के लिए सप्तऋषियों को भेजा। वे पार्वती जी के पास पहुँचे और बोले— "शिव हजार वर्ष की समाधि लगाने जा रहे है। इतनी लंबी अवधि तक विवाह की प्रतीक्षा कैसे करती रहेंगी। स्वर्ग में कोई सुयोग्य देवकुमार विवाह के इच्छुक भी है। तुम्हारा विवाह उनके साथ हम तत्काल करा देंगे। इस प्रकार तुम्हें विवाह सुख भी अधिक अच्छी तरह एवं अधिक जल्दी मिलने लगेगा और तप का झंझट भी लंबे समय तक न उठाना पड़ेगा। यह विकल्प आकर्षक तो था, पर पार्वती के गले न उतरा।" उनने ऋषियों से दृढ़ता भरी वाणी में कहा—
कोटि जन्म लगि रगरि हमारी।
वरों शंभु न तु रहों कुमारी॥
करोड़ जन्म तक कुमारी रहना स्वीकार है, सदा-सर्वदा कुमारी रहना स्वीकार है; पर प्रयत्न शंभु के वरण का ही करूँगी। यह अभिमत शिवजी को सुनाया और उन्होंने व्यक्ति की निष्ठा को सर्वोपरि महत्त्व देते हुए विवाह स्वीकार कर लिया।
कोई व्यक्ति बुढ़ापे में पढ़ाने या और कोई महत्त्वपूर्ण कार्य आरंभ करते हैं तो उनसे यह भी सुना जाता है कि आत्मा अमर होने से शेष कार्य को अगले जन्म में भी पूरा कर लिया जाएगा। इस जन्म में उसका जितना भाग पूरा करना और अनुभव संपादित करना संभव है, उससे क्यों चुका जाए? ऐसे मनस्वी, धैर्यवान व्यक्ति निश्चित रूप से अपने संकल्पों को पूरा करके रहते हैं। भले ही इसमें कुछ देर कारणवश लग जाए। यही है— ‘धृति’, जिसे भौतिक और आत्मिक सफलता के लिए मूलभूत आधार माना गया है।
हसेंगे तो सफल समझे जाएँगे और लोगों का सम्मान पाएँगे। रोएँगे तो साथ देने वाले विरले होंगे। सामान्यतया रोने वालो से लोग बचते हैं कि कहीं अपने दुर्भाग्य की चपेट में हमें भी न लपेट लें।
सिद्धियों की उपलब्धि के आत्मविशेषज्ञों ने चार निमित्त कारण बताए हैं। (1) जन्म (2) मंत्र (3) तप (4) औषधि। आवश्यक नहीं कि इन चारों का ही संयोग बन पड़े। इनमें से एक भी यदि ठीक प्रकार सध जाए तो कुछ उतने भर से अभीष्ट फल प्राप्त हो सकता है।
जन्म से तात्पर्य है— "जन्मांतरों में किए गए पुण्य-परमार्थों के प्रतिफल। शरीर छूट जाने पर भी शुभ-अशुभ कर्म प्राणी के साथ जाते हैं और वे अगले जन्मों में फलित होते हैं। ताड़ के फल को अंकुरित होने में एक वर्ष लग जाता है। पुण्य कर्मों को फलित होने में यदि एक वर्ष लगता है तो आश्चर्य भी क्या है? कर्मफल तत्काल नहीं मिलते, दूध को दही बनने में कुछ समय लगता है।"
देखा गया है कि कुछ को बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा प्राप्त होती है। शुकदेव ने जन्मते ही वैराग्य ले लिया था। यह संस्कार उनके पूर्वसंचित, योगपरायणता के प्रतिफल थे। मीरा की भक्ति ऐसी थी जो बिना किसी के बताए-समझाए अनायास ही निर्झर की तरह फूट पड़ी थी। यह मानवी विवेक की कसौटी है कि तत्काल फल न मिलने पर अधीर न हो। बुरे का बुरा, अच्छे का अच्छा फल तो मिलता है, पर यह सब तत्काल ही नहीं होता है। वटवृक्ष को पल्लवित होने में मुद्दतों लगती हैं। कर्मफल भी समय साध्य है। देर लगती देखकर कई व्यक्ति अधीर हो जाते हैं और नास्तिकों जैसा मन बना लेते हैं। जिन्हें सृष्टी की सुनिश्चित विधि-व्यवस्था पर विश्वास है, वे जानते और मानते हैं कि जो बोया है उसे काटने का अवसर अवश्य मिलेगा। भले ही उसमें कुछ देर लगे। कई जन्म से ही अपंग होते हैं। कइयों में शिक्षा प्राप्त करने से पूर्व ही कई विलक्षणताएँ दीख पड़ती हैं। इन्हें उनके पूर्व जन्मों का उपार्जन-संचय ही समझना चाहिए। इसे संयोग समझा जा सकता है। चाहने मात्र से ऐसी सुखद परिस्थिति उपलब्ध नहीं की जा सकती।
दूसरा आधार है। मंत्र। मंत्र अर्थात् एकाग्रता, साधना, शब्दशक्ति का उन्नयन, साधना द्वारा प्रसुप्त शक्तियों का जागरण। मंत्र कुछ शब्दों को रटते रहने भर से नहीं सध जाता। उसके लिए वे सभी प्रयास करने पड़ते हैं, जो साधक की पात्रता को विकसित-परिष्कृत करें। उपजाऊ भूमि में ही अनाज की हरी-भरी फसल लहलहाती है। बीज का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, उसकी सर्वांगपूर्णता में कोई खोट भले ही न हो, पर अकेले उतने भर से काम नहीं चल जाता है। भूमि में उर्वरता आवश्यक है। साथ ही खाद पानी की व्यवस्था और रखवाली की सतर्कता भी नियोजित रहनी चाहिए। मंत्र की रटन भर से कोई सिद्ध पुरुष नहीं बन जाता है। निर्धारण में अटूटश्रद्धा भी रहती है। चरित्र तो साधकोचित रखना ही पड़ता है। ऐसी दशा में सफलता का एक ही मार्ग है कि साधकोचित चरित्र अपनाया जाए और भाव भरी श्रद्धा का अवलम्बन— "ग्रहण करते हुए सफलता के लक्ष्य तक पहुँचा जाए। इस मार्ग पर चलते हुए कितने ही सफलता के चरम शिखर तक पहुँच भी चुके हैं। मंत्र-विद्या की महत्ता के संबंध में बहुत कुछ कहा जाता रहा है, जो प्रयत्नरत होते हैं वे वैसी सफलताएं प्राप्त भी करते हैं।"
तीसरा सिद्धि मार्ग है— 'तप'। तप का अर्थ है— "तपाना। तपाना किसको? अपने आप को, शरीर को, मन को, अंतःकरण को। तपाने से बर्फ पिघलती है। ईंधन पाकर ज्वाला भभक उठती है। कच्चा लोहा पक्का बन जाता है। यहाँ तक कि मिट्टी के बरतन भी धातु की तुलना करने लगते हैं। सोने की चमक अग्नि पर पकने से ही उभरती है। कायसत्ता में भी वैश्वानर, प्राणाग्नि, महामेध आदि अनेकानेक शक्तियों का समावेश है।" वे आमतौर से प्रसुप्त स्थिति में रहती हैं। पर जब तपस्वी की ताप-ऊर्जा; उन्हें उत्तेजित करती है तो सभी अपना-अपना काम आश्चर्यजनक रीति से करने लगती हैं। इसका प्रतिफल सिद्धि-चमत्कारों के रूप में सामने आता है।
सिद्धिप्राप्ति का चौथा उपाय उपचार है— 'औषधि'। औषधि से तात्पर्य है— "यहाँ अभिमंत्रित वनौषधि। उनका प्रभाव अपने विशेष ढंग का है। कुछ तो जड़ी-बूटियाँ अपने निजी गुणों के कारण ही मानवी चेतना को असाधारण रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। कुछ को किसी महाप्राण द्वारा अपनी आत्मशक्ति का वाहन बनाकर उसे असाधारण स्तर का बनाया और सेवन कर्ता का हित साधा जाता है।"
गाँजा, भाँग, चरस, अफीम आदि वस्तुतः वनस्पतियाँ ही हैं, जो अपनी उत्तेजक क्षमता के कारण पीने वाले के होश-हवास गुम कर देती है। शराब भी वनस्पतियों को सड़ाकर निकाला गया अर्क ही है। तंबाकू, चाय आदि के अनेक वनस्पति वर्ग भी ऐसे ही हैं, जो मादक उत्तेजना उत्पन्न करते हैं। यह बुरा पक्ष हुआ, जिसके प्रयोग से मनुष्य उन्मादी जैसा हो जाता है और अनेक प्रकार की हानियाँ उठाता हैं।
इस संदर्भ में दूसरा उजला पक्ष भी है। अश्विनीकुमारों ने वयोवृद्ध च्यवन ऋषि को वनस्पतियों का एक ऐसा योग दिया था। जिसका सेवन करने से उनकी जराजीर्ण स्थिति देखते-देखते नवयौवन में बदल गई थी। लक्ष्मण को मेघनाद द्वारा मारी गई ब्रह्मशक्ति का आघात लगने पर वे मूर्छित मरणासन्न स्थिति में थे। सुषेण वैद्य की बताई संजीवनी बूटी हनुमानजी पर्वत-क्षेत्र से लाए और उसका सेवन करते ही वे पुनः पूर्ववत् सचेतन हो गए। ऐसी अन्यान्य विशेषताओं को देखते हुए चरक, सुश्रुत, वागभट्ट जैसे वनस्पतिविज्ञानियों ने गंभीर अनुसंधान किए थे और उसका सर्वसाधारण के लिए अतीव लोक-कल्याणकारी उपयोग किया था। ऐसे ही प्रयोगों के कारण आयुर्वेदशास्त्र का क्रमशः विकास होता आया और एक सांगोपांग शास्त्र विनिर्मित हुआ।
सोमपान वह विद्या है, जिसमें सोमवल्ली को सोम-सूत्रों में अनुप्रमाणित किया जाता है। देव स्तर के मानव उसका उपयोग करके अपनी श्रद्धायुक्त निष्ठा का विकास-विस्तार करते हैं। यज्ञों में वनस्पतियों को उत्पादन से लेकर समीकरण तक तपशक्ति के रूप में विनिर्मित किया जाता है। उसी का दिव्य मंत्रों के साथ यजन होता है। अग्निहोत्र द्वारा वनस्पतियाँ ऊर्जा रूप में बदल जाती है और संपर्क में आने वालों पर - संबद्ध वातावरण पर असाधारण प्रभाव छोड़ती है। उसका प्रतिफल शारीरिक-मानसिक रोगों के निवारण में वायुमंडल के संशोधन में, पर्जन्य के अभिवर्षण में महती भूमिका निभाना है।
पंचामृत में, चरणामृत में तुलसीपत्रों का समन्वय रहता है। जिन भावनाओं के साथ पूजा-अर्चना की जाती है, उसका उच्चस्तरीय भावतत्व इस द्रव्य में समाविष्ट हो जाता है। फलतः उसकी प्रकृति भी वैसी ही बन जाती है। जो सेवन करता है, वह भी अपने को श्रद्धासिक्त अनुभव करता है। इसे वनस्पति को माध्यम बनाकर आत्म-शक्ति की क्षमता का वितरण कहा जा सकता है।
उपर्युक्त चारों ही आधार अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप प्रभावोत्पादक परिणाम उत्पन्न करते हैं। इनका लाभ सिद्धि-उपलब्धि तक पहुँचे तो इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं समझा जाना चाहिए। मात्र एक ही अड़चन शेष रहती है— "प्रयोक्ताओं का स्तर। उनका चिंतन, चरित्र और व्यवहार; इसे उत्कृष्ट बनाने में ही समय, श्रम एवं मनोयोग का नियोजन करना पड़ता है। वह न बन पड़े तो समझना चाहिए कि पथ्य बिगाड़ते रहने पर उपचार कारगर नहीं होता। साधक का व्यक्तित्व गया गुजरा हो तो उसकी समुचित साधना का भी उपयुक्त लाभ न मिल सकेगा।"
रामकृष्ण की धर्मपत्नी शारदामणि महिलाओं का अलग सत्संग चलाती थीं। उसमें अधिकांश धार्मिक प्रकृति और संभ्रांत घरों की महिलाएं आती थीं।
एक महिला सत्संग में ऐसी भी आने लगी, जो वेश्या के रूप में कुख्यात थी। इस प्रकार अन्य महिलाएँ नाक-भौं सिकोड़ने लगीं और उसे न आने देने के लिए माताजी से आग्रह करने लगीं।
इस पर माताजी ने कहा— सत्संग गंगा है, वह मछली-मेढ़कों के रहने पर भी अशुद्ध नहीं होती। तनिक-सी मलिनता में ही जो अशुद्ध हो जाए, वह गंगा कैसी? तुम लोग सत्संग की शक्ति को पहचानो और उसे गंगा के समतुल्य मानो।
भगवान को शास्त्रकारों ने समदर्शी कहा है। अध्यात्मवाद के पथिकों को भी समदर्शी बनने का स्वभाव डालने के लिए कहा गया है; किंतु देखा गया है कि इस शब्द का सही अर्थ करने— -सही भावार्थ समझने में प्रायः भूल होती रहती है। इस कारण इस निर्धारण के संबंध में अनेक संदेह उठते रहते हैं। समाधान न होने की स्थिति में कोई प्रयोग ही सही रीति से नहीं बन पड़ता। शंकाशंकित मन रहने पर अभीष्ट सफलता मिल सकने जैसी स्थिति भी हस्तगत नहीं होती।
समझा जाता है कि समदर्शी का अर्थ समान रूप से देखने वाला है। टीकाकार यह नहीं सोच पाते कि इस अर्थ को व्यवहार में लाने पर सारा गुड़-गोबर हो जाएगा। गाय और व्याघ्र को संत और दुर्जन को, पापी और पुण्यात्मा को एक दृष्टि से कैसे देखा जा सकता है? विष और अमृत के प्रति समबुद्धि कैसे हो सकती है? ऐसा तो कोई विवेकशून्य अथवा परमहंसगति तक पहुँचा हुआ ब्रह्मज्ञानी ही सोच सकता है। अन्यथा स्थिति के अनुरूप दृष्टिकोण अपनाना और व्यवहार करना ही समीचीन होता है।
भगवान भी सबको समान दृष्टि से कहाँ देखते हैं। यदि ऐसा होता तो किसी को नरक में धकेलने और किसी को स्वर्ग पहुँचाने की उनकी व्यवस्था क्यों कर कार्यांवित होती? अवतार लेकर भक्तों की रक्षा और दुष्टों का सफाया करने का परस्पर विरोधी कृत्य वे क्यों करते? सभी को एक लाठी से क्यों न हाँकते। सब धान बाईस पसेरी बेचने, अँधेर नगरी बेबूझ राजा के राज्य में टका सेर भाजी और टका सेर खाजा बिकने का प्रचलन कदाचित रहा हो, पर जहाँ व्यवहार बुद्धि काम करती है, वहाँ तो वस्तु का मूल्याँकन उसकी गुणवत्ता के आधार पर ही होता है। यदि ऐसा न होता तो स्वर्ण मुद्राएँ लोहे या मिट्टी से भी बन सकतीं और उन्हें कोई भी निर्माता अपने भंडार में भर कर धन-कुबेर हो सकता था। फिर योग्यता की पात्रता की परीक्षा करने का कोई प्रसंग ही, सभी को एक समान पद एक समान वेतन, मिलने लगता। तब फिर कोई श्रम करने की योग्यता बढ़ाने की आवश्यकता भी न समझता। आलसी और उद्योगी के बीच जब कोई भेद-भाव नहीं होने वाला है तो कोई अधिक तत्परता दिखाने के झंझट में क्यों पड़ेगा? जब पापी और पुण्यात्मा को एक ही दृष्टि से देखा जाने वाला है, तो पाप से डरने और पुण्य करने की आवश्यकता भी क्यों समझी जाएगी?
समदर्शी का मोटा अर्थ समान रूप से देखा जाना जो लोग कहते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि माता, पुत्र, भागिनी और पत्नी को एक जैसा समझकर उनके साथ एक जैसा व्यवहार करने पर मनुष्य की सझदारी कहाँ रह जाएगी? उससे नीतिनिष्ठ बने रहना कैसे संभव होग? मूर्ख और विद्वान के बीच अंतर क्यों किया जाएगा? तब सर्प से बचने और हंस के दर्शन को दौड़ने की भी आवश्यकता न रहेगी। ऐसा विवेकशून्य समदर्शी न व्यवहारकुशल कहा जाएगा और न नीतिवान।
समदर्शी का शब्दार्थ कुछ भी हो पर उसका तात्त्विक अर्थ है— ‘सम्यक्-दर्शन’। सम्यक्-दर्शन अर्थात् भली प्रकार देखना, गहराई में उतरकर वस्तुस्थिति को समझना और तदनुरूप अपनी क्रियापद्धति, व्यवहार-व्यवस्था का निर्धारण करना।
चूँकि अनेक लोग अनेक स्तर के होते हैं। इसलिए उनके साथ व्यवहार करते हुए भी तदनुसार हेर-फेर करना अनिवार्य रूप से आवश्यक हो जाता है। इसी को सम्यक्-दर्शन अथवा ’कर्म-कौशल’ कहते है।
मनुष्य समुदाय को मोटे तौर पर चार भागों में विभक्त किया जाता है। (1) सज्जन (2) दुःखी (3) सुसंपन्न (4) दुर्जन। इनमें से किसके साथ क्या व्यवहार किया जाए। सज्जनों के साथ मैत्री। दुःखहारी के प्रति करुणा का सेवा-सहायता के लिए उदार तत्परता बरती जाए। जो सुखी संपन्न, सुसंस्कारी हैं, उन्हें देखकर प्रसन्नता अनुभव की जाए उनके सद्गुणों को सराहा जाए और जो विशेषताएँ दिख पड़े, उनका अनुकरण किया जाए। दुखियों के प्रति करुणा बरतना उचित है, पर जो संपत्तिवान हैं; उन्हें देखकर प्रसन्न होना, उनकी विशेषताओं से उत्साह भरी प्रेरणा प्राप्त करना भी आवश्यक है।
दुर्जनों के प्रति उपेक्षा बरतने का निर्धारण है। यहाँ उपेक्षा का तात्पर्य ही विचारणीय है। उसका तात्पर्य है— असहयोग। यदि इतने भर से काम न चलता हो तो उसे विरोध और संघर्ष के स्तर तक भी ले जाया जा सकता है। उपेक्षा का अर्थ चुप बैठे रहना नहीं है; वरन यह है कि उनके द्वारा उत्तेजना दिलाए जाने पर अपना संतुलन न गँवाया जाए, पर बात इतने भर से ही पूरी नहीं हो जाती। दुर्जनों के साथ जुड़ी हुई दुष्टता का उपचार भी करना होगा। रोगी को बचाया जाना चाहिए पर रोग को तो मारा ही जाना है। साँप को मारना न हो तो भी उसके विषदंत तो उखाड़ ही देने चाहिए। यदि उपेक्षा का अर्थ— चुप बैठे रहना— अनदेखा कर देना किया जाएगा तो इससे दुष्टता समाप्त नहीं होगी; वरन दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ेगी। चिनगारी के दावानल बन जाने पर उसकी रोकथाम भी कठिन हो जाती है। इसलिए फोड़े का ऑपरेशन, उसके नासूर बनने के पूर्व ही करा लेना चाहिए। यहाँ उपेक्षा का अभिप्राय ठीक तरह नहीं समझ पाने पर भी अर्थ का अनर्थ हो सकता है।
इसी प्रकार सज्जनों के साथ मैत्री करने का भावार्थ— उनके साथ दोस्ती गाँठना, गप बाजी करना, साथ-साथ लगे फिरना या चापलूसी करके अपनी ओर आकर्षित करना नहीं है। इससे तो उन्हें भारी परेशानी पड़ेगी, जिनके ऊपर दोस्ती लादी जा रही है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति अपने कंधे पर महत्त्वपूर्ण दायित्व लादता है। उन्हें पूरे करने के लिए तत्परता, तन्मयता अपनाते हुए व्यस्त रहता है, ऐसी दशा में मैत्री गाँठने के लिए उनके इर्द-गिर्द मंडराना न तो सभ्यता है और न व्यवहार। किसी के मूल्यवान समय को मैत्री के नाम पर बर्बाद करने का अधिकार किसी को कहाँ मिलता है? क्यों मिलना चाहिए?
इसी प्रकार मुदिता और करुणा का भी अपना-अपना विशेष अर्थ-अभिप्राय है। मुदिता का अर्थ— हर्ष-विभोर होकर नाचने लगना, भावावेश का ढोल बजाते फिरना नहीं है; वरन संतोष अनुभव करना एवं उत्साह ग्रहण करना है। कभी-कभी संसार में बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्तियों को देखकर निराशा आने लगती है, उसके कारण मन पर अवसाद चढ़ने न पाए, इसलिए सत्प्रवृत्तियों का बढ़ना और उनका सफल होना भी खोजने योग्य है। ऐसे अवसर जितने अधिक देख पड़ते हैं, जानकारी में आते हैं, उतना ही मनोबल देखने-सुनने वालों का बढ़ता है। मुदिता का भावार्थ यहाँ यही है। मैत्री का अर्थ सत्प्रवृत्ति संवर्ध्दन में लगे हुए लोगों का सहयोग करना, हाथ बँटाना और उनकी प्रशंसा करना, प्रतिष्ठा देना है।
करुणा का अर्थ विलाप करना आँसू बहाना या सहानुभूति दिखाना मात्र नहीं है। वरन् पीड़ितों, संत्रस्तों अभावग्रस्तों को सामयिक कठिनाई से निकालकर भविष्य में इस स्थिति तक पहुँचा देना, ताकि वे अपने पैरों खड़े है सकें। जितनी सहायता अभावग्रस्त स्थिति में स्वयं प्राप्त की थी, उसकी ब्याज समेत दूसरों की बढ़ी-चढ़ी सहायता कर सकें। अन्यथा उद्देश्यरहित करुणा, आत्मगौरव गँवा बैठने वाले भिक्षुक ही उत्पन्न करेगी।
संत तुकाराम को किसी किसान ने एक गट्ठा गन्ने दिए। उनकी पत्नी इसके लिए कहती भी रहती थी। रास्ते में बच्चे मिलते गए और माँगने वालों को वे एक-एक देते भी गए। घर पहुँचने तक केवल एक गन्ना ही शेष था।
पत्नी के हाथ में एक गन्ना दिया तो उनने पूछा— "एक, बस! और कहाँ गए। तुकाराम ने सारा हाल सुना दिया।" पत्नी को बड़ा क्रोध आया, उसने पति की पीठ पर गन्ना इतने जोर से मारा कि उसके दो टुकड़े हो गए।
संत ने क्रोध नहीं किया। हँसते रहे और दो टुकड़ों में से एक अच्छा भाग पत्नी को देते हुए सराहना करने लगे— "ठीक बीच में से तोड़ देने की कला में तुम कितनी प्रवीण हो।पत्नी का आवेश ठंडा हो गया।"
संत की गरिमा उसने समझी और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी। तुकाराम ने इतना ही कहा— क्रोध से प्रेम की शक्ति अपार है।
आत्मीयता जिनके साथ भी जुड़ जाती है, वही मधुर, प्रिय, सुखद एवं सुंदर लगने लगता है। विराने अपने हो जाते हैं। जिन वस्तुओं पर अपना अधिकार मान लिया जाता है, उन पर कोई दूसरा अपना दावा जताए तो सहन नहीं होता और लड़ने-मरने की नौबत आ जाती है। अपनी वस्तु खो जाने, छिन जाने या नष्ट हो जाने पर भी दुःख होता है। अपनी संपदा की क्षति किसी को भी भली नहीं लगती। आत्मीयता को सुखस्वरूप माना गया है। उसकी चमक जिस पर भी पड़ती है, उसी का सौंदर्य निखर आता है। घनिष्ठता के अनुपात से ही प्रिय लगने की स्थिति बन जाती है।
शरीर जन्म से लेकर मरण पर्यंत निरंतर साथ रहता है। उसी की सहायता से इच्छानुकूल कार्य बन पड़ते हैं। उसी की इंद्रियाँ हैं; जिनके माध्यम से विविध प्रकार के रसास्वादन करने का अवसर मिलता है। उसका एक अवयव मस्तिष्क, बुद्धिमता के भांडागार की भूमिका निभाता है। सौंदर्य, आकर्षण, स्वभाव आदि शरीर की ही विशेषताएँ है; जिनसे अनेक लोग प्रभावित होते और मित्र-सहयोगी बनते हैं। शरीर की सेवा-साधना, वफादारी और स्वामिभक्ति को देखते हुए उसके साथ अत्यधिक घनिष्ठतम भाव रखना स्वाभाविक है। इस शरीर को जो कोई मान-सहयोग देता है, वह भी प्रिय लगने लगता है।
ऐसी दशा में उसकी शोभा, सज्जा, सुविधा बढ़ाने के लिए भी हर व्यक्ति सामर्थ्य भर प्रयत्न करता है। शरीर को कभी क्षति पहुँचती है, व्यथा होती है, तो अंतस भी तिलमिला जाता है। जो संभव है वह उपचार करता है। शरीर के सुखों से समझौता करने के लिए मानस सदा ताना-बाना बुनता रहता है। यह घनिष्ठता— आत्मीयता बढ़कर एकात्मभाव तक इतनी विकसित हो जाती है कि “स्व” की कल्पना करने पर शरीर की ही कल्पना सामने आती है। आमतौर से मनुष्य अपनी मूल सत्ता शरीर को ही मानता है और उसी के सुख-दुःखों से प्रभावित खिन्न या प्रसन्न रहता है।
आत्मा का अस्तित्व शरीर से भिन्न मानने की चर्चा जब तक जानकारी क्षेत्र तक ही सीमित रहती है। उसकी सघन अनुभूति कदाचित् ही किसी को भी होती होगी। यदि हुई होती तो आत्मज्ञान, गौरव, स्वरूप और लक्ष्य भी उभरा होता और इस प्रयोजन के लिए कुछ न कुछ ऐसा किया होता, जिसे देखकर उसकी आंतरिक बोधगम्यता का पता चलता। आत्मानुभूति का अर्थ ही शरीर के लिए लगाव में कमी आना है। शरीर जब बिराना लगने लगता है तब यह सूझ भी सूझती है कि वह किसका है और क्यों है? इन प्रश्नों का उत्तर धर्मशास्त्र और तत्त्व दर्शन एक ही देते हैं कि काया माया भगवान की है। उसे जीवात्मा के पास इसलिए छोड़ा गया है कि वह लक्ष्य प्राप्ति की लंबी यात्रा को इस वाहन पर बैठकर सरलतापूर्वक पूरी कर सके। यह एक धरोहर है जिसे ब्याजसहित वापस किया जाना है। कोषाध्यक्ष की तिजोरी में धन भरा रहता है, पर वह उसके निजी प्रयोग के लिए नहीं होता। उसे तो गिने गाँठें वेतन से ही गुजारा करना पड़ता है। जमा राशि तो सरकारी प्रयोजन के लिए अथवा शासकीय कर्मचारियों के वेतन भत्ते आदि के लिए होती है। मनुष्य शरीर की क्षमता गुजारे की परिधि से बाहर है। पशु-पक्षी, कीट-पतंग अपने शरीर से निजी गुजारा भर कर ही कर पाते हैं। पर मनुष्य तो विशालकाय जलयान की तरह है, जिस पर ढेरों यात्री बिठाए जा सकते हैं और टनों माल असबाब ढोया जा सकता है। इसका तात्पर्य इतना ही है कि निजी चरित्रचर्या का समावेश हो। अपूर्णता के जितने छिद्र बाकी है, उन्हें भरा जाए। इसके अतिरिक्त विश्व-उद्यान को सुविकसित सुरम्य बनाने के लिए अपने समूचे कौशल का नियोजन किया जाए।
उद्देश्य का ध्यान आते ही आत्मा का स्वरूप और हित सूझ पड़ता है, तब व्यक्ति के लिए आत्मपरिष्कार और लोक-कल्याण का आधार हेतु सत्प्रवृत्ति संवर्ध्दन ध्यान में आन लगता है। तराजू के जिस पलड़े में वजन ज्यादा होता है, वह नीचा हो जाता है और हलके को ऊपर उठा रहना पड़ता है। जब आत्मा की सत्ता गरिमापूर्ण हो तो उसी के हित-साधन को प्राथमिकता देनी होगी। उच्चस्तरीय जीवनचर्या का ताना-बाना बुनना पड़ेगा। ऐसी दशा में शरीर की उतनी ही उपयोगिता समझ में आती है जितनी की वस्तुतः वह है। तब आत्मा को वरीयता देनी पड़ती है और यह प्रयत्न करना होता कि इस प्रतिद्वंद्विता में आत्मा के कलेवरों को अपना न जान पाएँ। साथ ही शरीर की निर्वाह-प्रक्रिया में भी कमी न पड़े। उचित आवश्यकता का पैमाना यही है कि औसत नागरिक जिन साधनों में गुजारा चलाता है उतने में ही अपना काम चलाया जाए। इसका तात्पर्य यह होता है कि पुण्य-परमार्थ के लिए पर्याप्त अवसर-अवकाश निकल आता है। तब मनुष्य देखने में सामान्य होते हुए भी असामान्य स्तर का देवोपम जीवन जीने लगता है। परमार्थ का पलड़ा भारी पड़ता है और स्वार्थ उसकी तुलना में अधर टँगा हुआ रहने लगता है।
जब जीवनचर्या में इस प्रकार का हेर-फेर हो तो समझना चाहिए कि तत्त्व दर्शन मात्र जानकारी का, कथा-प्रवचन का विषय न रहकर यथार्थ भरी अनुभूति बन गया। तब आत्मा के अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्त्व ही प्रधान दिखते हैं। उन्हीं में आसक्ति केंद्रीभूत हो जाती है। शरीर के लिए अनासक्ति होती है। उसे भगवान का उद्यान— देवालय समझकर उसी सीमा तक सद्व्यवहार किया जाता है, जितना कि माली बगीचे के प्रति और खजांची तिजोरी भरी राशि के प्रति जागरुक और कर्त्तव्यपरायण रहता है। उन्हें अपनी निज की संपत्ति नहीं मानता।
पुजारी का एक मंदिर से दूसरे मंदिर में, माली का एक बगीचे से दूसरे बगीचे में स्थानांतरण कर दिया जाए तो इससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। सैनिक को इस मोर्चे से हटाकर दूसरे मोर्चे पर बदल दिया जाए तो उसे इसमें क्या आपत्ति हो सकती है?
शरीर परिवर्तन को भी ऐसा ही एक प्रसंग जो लोग मानते हैं; उन्हें मरणकाल का न तो भय लगता है और न शरीर त्यागते समय कष्ट होता है। मृत्यु प्रायः यकायक नहीं आती। दुर्घटना से तो कभी-कभी ही कोई मरते हैं। आमतौर से बीमारियाँ बुढ़ापे के रूप में शक्तियों की कमी बनकर आती है। जब आत्मा का बोझ धारण किए रहना शरीर के लिए कठिन पड़ता है तो ही टूटा मकान बदलने जैसी स्थिति आती है और वह कार्य बिना झंझट या असुविधा के पूरा हो जाता है। शरीर और आत्मा दोनों ही एकदूसरे की समुचित सेवा करने योग्य नहीं रह जाने तो झंझट मिटाने के लिए दोनों का प्रथकता के लिए समझौता हो जाता है। यही मृत्यु है। साँसारिक दृष्टि में इसे पति पत्नी के बीच आए दिन झंझट होने का निपटारा-तलाक के रूप में संपन्न हुआ समझा जा सकता है। इससे दोनों पक्षों को स्वतंत्रता भी मिलती है और राहत भी।
कष्टकर मृत्यु उन्हीं की होती है, जो शरीर को परिवार को अपनी ममता से इस प्रकार जकड़ लेते हैं, जिसका पृथककारण कठिन बन पड़ता है। मरने के समय धड़कन बंद होना उतना कष्टकर नहीं होता। जितना कि मजबूत कसे हुए भवबंधन का तोड़ना। जो मेरा है, उसे मेरे साथ चलना चाहिए और नहीं तो मुझे उसके साथ सदा-सर्वदा के लिए जुड़ा रहना चाहिए। इस मान्यता को, अभिलाषा को सृष्टि क्रम का समर्थन नहीं मिलना। परंपरा यही है कि जंग लगे लोहे को भट्टी में तपाकर गलाया जाए। पीछे उसका नया उपकरण ढाला जाए। इस सतत् परंपरा को अमान्य करने वाले ही प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष छेड़ते हैं और उससे हारते हैं। यही है मरणकाल की व्यथा जिसमें कष्टकर कारण एक ही होता है— दृष्टिकोण का अवांछनीय ढाँचे में ढला होना। भगवान की धरोहर को अपनी संपदा मानना और कायर माने जाने पर झंझट खड़ा करना। यदि वस्तुस्थिति की जानकारीमात्र न रहने देकर यथार्थता की अनुभूति तक उतार लिया जाए तो मरण रंगमंच की पर्दा बदलने जैसा लगे और उस कौतूहल को देखते हुए किसी को भी त्रास न सहना पड़े।
मन को महत्व न दो। वह उछल-कूद करते रहने वाले उस बंदर की तरह है, जिसे एक जगह बैठने में चैन नहीं। उसका आश्रय लेने वाला सूखे पत्ते की तरह हवा के साथ उड़ता फिरता है।
व्यक्तित्व से स्वभाव बनता है या स्वभाव से व्यक्तित्व? पर इतना निश्चित है कि दोनों के बीच एकात्मता अवश्य रहती है। स्वभाव ही वह आधार है, जिसे देख कर किसी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जा सकता है। व्यक्तित्व की दृष्टि से यदि कोई वस्तुतः श्रेष्ठ है तो उसका स्वभाव अच्छा होना चाहिये। सदाचार मात्र आध्यात्मिक आख्यानों तक ही सीमित नहीं है। उसका परिचय व्यवहार-शिष्टाचार से भी मिलना चाहिए।
जो अपने आवेगों और आवेशों को संयम में रखता है, वही सच्चे अर्थों में सभ्य है। मानवी गरिमा के साथ कितनी ही मानने योग्य मर्यादाएँ और बचने योग्य वर्जनाएँ जुड़ी हुई हैं। इनसे बचा नहीं जा सकता, इनकी अवज्ञा नहीं हो सकती। पशुओं की बात दूसरी है, वे नंग-धड़ंग भी घूम-फिर सकते हैं। माता पुत्री का भेद किए बिना संतानोत्पादन कर सकते हैं। खाद्य जहाँ से भी मिले, लपक सकते हैं, पर मनुष्य को ऐसी छूट नहीं है।
मनुष्यता के साथ और भी कितनी ही विशेषताएँ जुड़ती है। गंगा, गौमुख पर उतनी चौड़ी नहीं है, जितनी कि सोनपुर या पटना में। कारण यह है कि आगे चलने पर गंगा में अनेक धाराएँ मिलती गई है। अंतिम छोर तक पहुँचते-पहुँचते गंगासागर बन गई है। अनगढ़ मनुष्य नर-पशु जैसा भी हो सकता है। वह आवेगों के प्रवाह से भी कुछ भी करने लगता है, उसके लिए मद्य, माँस भी भक्ष्य है; किंतु विचारशीलों को तो यह भी देखना पड़ता है कि जो अपनाया जा रहा है, यह न्यायोचित भी है या नहीं?
मनुष्य को अनेक लोगों के साथ बरतना पड़ता है। सामाजिक प्राणी होने के कारण यह अनिवार्य भी है। सभी लोग एक जैसे नहीं होते। समुदाय में सज्जनों की तरह दुर्जनों का भी बाहुल्य है, उनके परस्पर विरोधी व्यवहार तद्नुरूप प्रतिक्रिया सीधी भी हो सकती है और उलटी भी। जहाँ सदाशयता के कारण प्रसन्नता की अनुभूति होती है, वहाँ अपमानजनक अशिष्टता के प्रति आक्रोश भी आ सकता है। कटुवचन से लेकर आक्रमण कर बैठने तक की प्रतिक्रिया हो सकती है। बात करने पर असंतुलन हावी होने जैसी स्थिति भी बन सकती है; किंतु विवेक का अंकुश, ऐसी स्थिति उत्पन्न न होने देने की रोकथाम करता है। वह बताता है — मित्र के प्रति मैत्री और दुष्टता के प्रति संघर्ष। सुधार करने के लिए अपना मानसिक संतुलन बनाए रहना चाहिए; अन्यथा विपक्षी की तुलना में अपने को ही अधिक हानि उठानी पड़ सकती है।
हमें पराक्रमी होना चाहिए ताकि अभीष्ट सफलताएँ उपलब्ध कर सकना संभव बन पड़े। इतना ही नहीं, यह भी आवश्यक है कि अपनी प्रामाणिकता अक्षुण्ण रहे। यह चरित्रनिष्ठा के सहारे ही संभव इज्जत मात्र उसकी हो सकती है जिसका आचार असंदिग्ध है, उसी पर विश्वास किया जा सकता है और उसे ही सहयोग मिल सकता है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि अपने आचरण को पवित्र एवं सामयिक बनाए रखा जाए। इसे खो देने के बाद हम दुष्ट एवं भ्रष्ट हो जाते हैं। भले ही चापलूसों द्वारा प्रशंसा के ढेर लगाए जाते रहें। यहाँ समझने की यह बात भी है कि चापलूस वाहवाही के अंबार भले ही लगाते रहें ,पर विश्वास करने और सहयोग देने का समय आने पर वे भी कन्नी काट जाते हैं। व्यभिचारी मित्र को कोई अपनी गृहस्थी में घनिष्ठता बढ़ाने की छूट नहीं दे सकता और न अपने बच्चों को किसी नशेबाज के साथ घनिष्ठता स्थापित करने दे सकता है। अनाचारियों से स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कोई चापलूसी की बातें कर सकते हैं, पर उनके हाथों अपनी धनराशि नहीं सौंप सकते, क्योंकि उसके लौटने की आशा बँधती ही नहीं, अच्छा हो कि हम अपनी प्रामाणिकता को अक्षुण्ण बनाए रहें, भले ही इस कारण गरीबी ही क्यों न अंगीकार करनी पड़े। प्रामाणिक व्यक्ति अंत तक बरगद के पेड़ की तरह फूलता-फलता फैलता है; जबकि अविश्वस्त पाखंडी की दुर्गति पानी का बबूला फूट जाने जैसी होती है।
हमें अतिवादी नहीं होना चाहिए। मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए। बहुत ऊँची छलांग नहीं लगानी चाहिए। सूर्य को पकड़ना और चंद्रमा को छूने जैसी महत्वकांक्षाएँ नहीं सँजोए चाहिए। औसत नागरिक स्तर का जीवन शाँतिपूर्वक जिया जा सके इसी में संतोष करना चाहिए। सादा जीवन-उच्चविचार की नीति-निर्धारण को पर्याप्त मानना चाहिए। अतिवादी हारते, कुढ़ाते और खीजते देखे गए हैं। आवश्यक नहीं है कि सामान्य जनों से बहुत ऊँची परिस्थितियाँ और सफलताएँ हमें मिलकर ही रहे। सबको पीछे छोड़कर बड़प्पन को हमीं समेटें, ऐसा होता भी कभी-कभी एवं कदाचित ही है। जिन्हें तृष्णाएँ बहुत सताती हैं, वे आमतौर से अनीति का मार्ग अपनाते हैं। इतने पर भी यह आवश्यक नहीं कि हर महत्त्वाकांक्षी अपनी इच्छित ऐषणा को पूरा कर सके। बेतहाशा दौड़ने वाले प्रायः पैरों में ठोकर खाते और औंधे मुँह गिरते देखे गए हैं। इसलिए प्रसन्नचित्त रहने और रहने देने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि संतोषपूर्वक जिया जाए। अमीरी बटोरने और ठाट-वाट से जीने की अपेक्षा यह कहीं सरल और सुखद है कि अपने को आदर्शवादी बनाया जाए और भावना-क्षेत्र में उत्कृष्टता को सँजोया जाए; जिनने अपना दृष्टिकोण परिष्कृत कर लिया है, वे सज्जनों की तरह सोचते और परमार्थ-पथ पर चलते रहे।
हम अदूरदर्शी न बनें। तात्कालिक लाभ के लिए भविष्य को अंधकारमय बनाने वाले कदम न उठाएँ। आकुल-व्याकुल व्यक्ति कुछ ही समय में इंद्र जैसा सम्मान और कुबेर जैसा वैभव समेटना चाहते हैं। इसके लिए ऐसे सपने सँजोते हैं, जिनका पूरा होना कब तक किस तरह संभव है। यह तो नहीं कहा जा सकता, पर इतना निश्चित है कि उनका संतोष और संतुलन छिन जाता। सह गमन एक आदर्श है। जिसे अपनाने वाले दूसरों को पीछे छोड़ने और अपने प्रतिद्वंद्वी, ईर्ष्यालु बनाने की भूल नहीं करते। जिस समाज में जितने महत्त्वाकांक्षी बढ़ते हैं, उसमें उतनी ही विषमता उत्पन्न होती है और उसे अपनाने के धारा अपनाने के लिए परस्पर होड़ लगती है। यह अदूरदर्शितापूर्ण मार्ग है, जिसमें लाभ कम और हानि की संभावना सुनिश्चित रूप से अधिक है।
छिद्रांवेषण सरल है। बिना आधार के आरोप लगाना चिढ़ाना, बदनाम करना और भी सरल। वह कार्य तो कोई नासमझ भी कर सकता है। उपेक्षा, अवज्ञा, अशिष्टता का थोड़ा-सा अंश स्वभाव में सम्मिलित कर लेने से सद्भाव रखने वाले भी खिन्न हो जाते हैं और शत्रुता बरतने लगते हैं। मित्र बनाना जीवन में एक अत्यंत ही लाभदायक कार्य है, जिसे मात्र मृदुवचन कहने एवं शिष्टता बरतने भर से उपलब्ध किया जा सकता है। दुःखदाई परिस्थितियों में, रोग, शोक, हानि, अपमान आदि की गणना होती है; किंतु इन सबसे अधिक कष्टकर है, वह शत्रुता जो किसी के साथ दुर्व्यवहार करते हुए मोल ली गई है। शत्रु को मित्र बना लेना एक उच्च कोटि की कला है। मित्र को मित्र बनाए रहना बुद्धिमता है; किंतु रास्ता चलते शत्रुता मोल लेते चलना ऐसा फूहड़पन है, जो अशिष्ट और दुर्बुद्धि वाले ही अपनाते हैं।
प्रयासों में अनेकों क्रियाकलापों बुद्धिमतापूर्वक गिनाए जा सकते हैं; किंतु सब से अधिक विवेकवान उन्हें कहा जाएगा, जो अपने चरित्र एवं स्वभाव को आकर्षण बना लेते हैं। संजीवनी विद्या की यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
वह स्वर्ण रेखा नदी की रेत छान रहा था। ताकि उसमें से सोना मिल जाए। संयोग की बात उस दिन उसे एक अशर्फी मिल गई। दारिद्र दूर हो गया।
यह दृश्य देखता हुआ जागीरदार उधर से गुजरा था। बहुत दिन बाद वापस लौटा तो फिर व्यक्ति को रेत छानते देखा, पूछा— "पिछली बार तुम्हें अशर्फी मिली थी। काम चल गया होगा। अब फिर रेत छानने की आवश्यकता क्यों पड़ी?"
व्यक्ति ने हँसते हुए कहा— "भविष्य में अधिक सोना मिलने की आशा छोड़कर निठाल क्यों बैठें?"
मनःक्षेत्र के विकास-परिष्कार के लिए ध्यान-धारणा का उपचार अमोध माना गया है। उसे अध्यात्म क्षेत्र में प्रमुख मान्यता मिली हुई है और उपासना प्रयोगों में सर्वत्र स्थान दिया जाता है। उन अभ्यासों को अनीश्वरवादी भी मानसिक तनाव दूर करने एवं स्फूर्ति प्राप्ति के उद्देश्य से किया करते हैं। ध्यान को यों धर्मधारणा की परिधि में भी गिना जाता है, पर यह यहाँ तक सीमाबद्ध नहीं है। जिन्हें धर्म-प्रसंगों में आस्था नहीं है, वे भी इसे अनुभव के लिए अपनाते हैं और उसके लाभदायक परिणाम देखते हैं।
ध्यान क्या है? इसका स्वरूप क्या है? यह बताते हुए मनीषी करते हैं कि कल्पनाशील मन की निरंतर निरर्थक भगदड़ करते रहने की आदत छुड़ाई जाने, बहुमूल्य मानसिक शक्ति का अपव्यय रोकने के लिए ध्यान अनिवार्य है। अंतः की सामर्थ्य को केंद्रीभूत करके किसी उपयोगी प्रसंग में लगाया जाकर उससे असाधारण लाभ उठाया जा सकता है। इस लाभ में अस्थिर मन वाले वंचित ही बने रहते हैं। उनकी प्रगति में यह एक बड़ी बाधा बन जाती है। एकाग्रताजन्य लाभों का प्रत्यक्ष अनुभव करने का उन्हें अवसर ही नहीं मिलता।
कानवेक्स लैन्स (आतिशी शीशे) की एक छोटी से परिधि पर फैली हुई सूर्य-किरणों, यदि एक केंद्र पर एकत्रित कर दी जाएँ तो देखते-देखते आग जलने लगती है। वाष्प-ऊर्जा बिखरीस्थिति में हवा में उड़ती रहती है, पर जब उसे सीमाबद्ध करके पिस्टन के साथ जोड़ दिया जाता है तो भारी वजन वाले डिब्बों को घसीटना हुआ रेल इंजिन द्रुतगति से दौड़ने लगता है। बंदूक चलने में भी यही होता है। बारूद को बिखरीस्थिति में जला दिया जाए तो उससे साधारण सी ज्वाला भर उठेगी पर कारतूस कलेवर में सीमाबद्ध करके नली की मर्यादा में रहने के लिए उसे अनुबंधित कर दिया जाए तो निशाने पर करारी चोट करती है और लक्ष्य बेधकर रख देती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार, नट, सरकस के पात्र यही प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। कि एकाग्रता के अभ्यास द्वारा साधारण से असाधारण बना जा सकता है। द्रौपदी-स्वयंवर जीतने में अर्जुन इसलिए सफल हुआ था कि उसने अभ्यास द्वारा एकाग्रता संपादित कर ली थी।
ध्यान एकाग्रता-संपादन की अनुभूत प्रक्रिया है। उसकी गुणवत्ता सर्वत्र स्वीकार की जाती है और अभ्यास द्वारा उसमें प्रवीणता प्राप्त करने चेष्टा की जाती है। ध्यान का उद्देश्य आत्मविकास तो है ही, मनःक्षेत्र को शक्ति संपन्न करना भी है।
ध्यान की दो धाराएँ है। एक बहिर्मुखी, दूसरी अंतर्मुख। आमतौर से प्रारंभिक स्तर पर बहिर्मुखी ध्यान किए जाते हैं; क्योंकि वे अपेक्षाकृत सरल पड़ते हैं। मन को बाहरी क्षेत्र में दौड़ लगाते रहने की चित्र-विचित्र दृश्य देखने की आदत होती है, वह रमता भी ऐसे ही प्रसंगों में, इसलिए ध्यान प्रयोग में भी वह उसी अवलंबन को आसानी से ग्रहण करता है, जबकि अंतर्मुखी ध्यान में मन को दबावपूर्वक लगाना होता है, प्रगति भी धीरे-धीरे होती है इतने पर भी अधिक लाभ अंतर्मुखी प्रयोगों का ही होता देखा गया है।
बहिर्मुखी ध्यान में केंद्रबिंदू के रूप में किसी सांसारिक वस्तु को माध्यम बनाया जाता है। सामान्यतया सूर्य, चंद्र, दीपक आदि को माध्यम बनाते हैं। किसी देवी-देवता की छवि भी इसी निमित्त अपनाई जाती है। किसी भी सुरम्य प्राकृतिक दृश्य या निखिल ब्रह्मांड को परब्रह्म के रूप में किसी भी धर्म-मत को मानने वाले प्रतीक मानकर ध्यान संपादन कर संकेत है। प्रत्यक्ष दीखने वाले आकार को प्रथम खुले नेत्रों से निहारकर पीछे आँखें बंद कर ली जाती है और आधार बिंदु का मानसिक चित्र बनाकर उसके साथ तन्मय होने का प्रयास किया जाता है, उसके साथ निकटवर्ती रिश्ता जोड़ा जाता है। मात्र कल्पना करते रहने भर से ध्यान-धारणा पूरी नहीं हो जाती; वरन सघन श्रद्धा-विश्वास अपनाते हुए ध्येय के साथ तन्मय होने का प्रयत्न किया जाता है। अग्नि-ईंधन का, दीपक-पतंगे का उदाहरण ध्येय और ध्याता के बीच पनपना चाहिए। ध्येय के उच्चस्तरीय गुणा के क्षमताओं का पुंज होने की मान्यता का परिपाक करना चाहिए। छवि के साथ अपमिति विशेषताओं से युक्त होने वाली बात को गहरी मान्यता देनी चाहिए। छवि और विशिष्टता के बीच सुदृढ़ एवं सुनिश्चित संबंध बनाना चाहिए। इसके बिना कोई ध्येय मात्र “स्वरूप” बन कर रह जाता है, और यदि वह खुली आँखों से या बंद आँखों से दिवास्वप्नवत् दीखने भी लगे तो इससे कुछ बनेगा नहीं। मात्र दृश्य-दर्शन ही चलता रहेगा। चाहे वह खुले नेत्रों से देखा जाय या बन्द नेत्रों से।
ध्येय को उच्चस्तरीय गुणवत्ता से संपन्न होना चाहिए। ऐसी स्थापना हृदयस्थ हो चले तो इष्ट के साथ तादात्म्य होने की भावना करनी चाहिए। ऐसे समर्पण भाव कहते है; द्वैत को हटाकर अद्वैत क्षेत्र में प्रवेश करना भी। आग और ईंधन के बीच यही संबंध बन पड़ता है। फलतः एक के घटिया और दूसरे के बढ़िया होने पर भी दोनों में एकदूसरे की विशेषता समाहित हो जाती है। ईंधन जलने लगता है।, पर आग भी धुँआ उगलते लगती है, जो ईंधन का ही वायुभूत स्वरूप है। नदी-नाले के मिलन का उदाहरण भी समर्पण की स्थिति का प्रत्यक्ष उदाहरण है। नाला अपनी सत्ता का समापन करके नदी में मिल जाता है। नदी और नाले का मिलना दुर्बल पक्ष के लिए वरदान सिद्ध होता है। सबल पक्ष भी इससे कुछ घाटे में नी रहता। उसका आकार और बहाव अभिवृद्धि करता चला जाता है। महिमा और गरिमा तो बढ़ती ही है। उसे वरिष्ठ की उदारता अनुकंपा भी माना जाता है। पर यह उपलब्धि तब तक संभव नहीं होती, जब तक कि ध्याता-ध्येय के साथ एकीभूत होने के लिए उसकी विशिष्टताओं को अपने अंदर अवधारण करने के लिए तैयार नहीं होता।
बहिर्मुखी ध्यान-धारणा के लिए कोई दृश्य बाह्यावलंबन चाहिए। यह प्रतीक किसी देवी-देवता के आकार वाली प्रतिमा के रूप में भी हो सकता है और किसी दिवंगत महामानव के रूप में भी। यह ध्येय सजीव भी हो सकता है और निर्जीव भी। वस्तुतः साधन की श्रद्धा ही उसमें प्राण भरती है और शब्दबेधी बाण की तरह छवि से टकरा कर रबर की गेंद की तरह वापस लौटती है। गुंबद में अपनी ही प्रतिध्वनि गूँजती है, दर्पण में अपनी ही छाया दीखती है। ध्येय निर्जीव है या सजीव, वास्तविक है या काल्पनिक इसका कोई महत्त्व नहीं; क्योंकि आधार तत्त्व तो साधक की श्रद्धा होती है, जब आस्थामात्र से झाड़ी का भूत और रस्सी का साँप बन सकता है, तब कोई कारण नहीं कि उच्चस्तरीय आध्यात्मिक आस्थाएँ विश्वासपूर्वक आरोपित किए जाने पर फलित न हो। चमत्कारी प्रतिफल न प्रस्तुत करे। एकलव्य का उदाहरण इसका साक्षी है। मिट्टी के बने द्रोणाचार्य उसे बाण-विद्या में कुशल-पारंगत बनाने में असमर्थ हुए थे। यह प्रतिमा का नहीं, आरोपणकर्ता की सघन भाव-श्रद्धा का चमत्कारी परिणाम है। बिना आदर्शवादी स्थापना और ध्याता की एकात्मता स्थापित हुए कोई कल्पित या दृश्यमान छवि उस दृश्य की पूर्ति नहीं कर सकती, जो देवदर्शन या ध्यान-धारणा के माहात्म्य के रूप में बताया गया है।
ध्यान के लिए देवताओं की छवि अपनाए जाने अनिवार्यता नहीं है। उस स्थान पर कोई आकर्षक फूल भी चूना जा सकता है। गुलाब कमल के पुष्पों में अन्यों से अधिक आकर्षण, सौंदर्य एवं सुगंध का बाहुल्य होता है। पक्षियों में हंस, मयूर जैसे को देव-वाहन माना गया है। शंकर का वाहन नंदी, लक्ष्मी का वाहन हाथी है ये सभी अपनी सौम्यता के कारण प्रसिद्ध है। कठिनाई तब आती है, जब आक्रामक, हिंस्र पशु−पक्षियों को ध्यान का माध्यम बनाया जाता है। उनकी प्रकृति ध्याता पर भी अपना प्रभाव छोड़ सकती है।
ध्यान के संदर्भ में एक और भी प्रचलन है। गोल या अंडाकार प्रतिमा के शिवलिंग-शालिग्राम इसी आकार के होते हैं। उन्हें विश्व वसुधा का प्रतीक माना जाता है। पृथ्वी गोल है, ब्रह्मांड भी गोल है। इस प्रतीक को विराट-विश्व का भाव दर्शन कहा जा सकता है। अर्जुन, यशोदा, कौशल्या, काकभुशुंडि आदि को इसी विराट रूप में झाँकी हुई थी। इसे आरंभ करना हो तो गोलाकार, प्रतिमाओं को माध्यम बनाया जा सकता है ‘ग्लोब’ भी प्रतीक का काम दे सकता है।
समझा सिद्धांतों का जाना चाहिए। मात्र परंपरा निर्वाह भर से काम नहीं चलता। चिह्नपूजा आरंभिक अवलंबन है, कलेवर मात्र है। उनमें प्राण भरने के लिए सघन श्रद्धा का समावेश होना चाहिए। ध्येय में उच्चस्तरीय गुणवत्ता का, उत्कृष्ट आदर्शवादिता का आरोपण और साथ ही उसके साथ तादात्म्य होने की उत्कृष्ट भाव-संवेदना होनी चाहिए।
ध्यान के लिए कोलाहल रहित एकांत स्थान की आवश्यकता पड़ती है। उसके अभाव में शब्द कानों से टकराते हैं और अपनी और ध्यान खीचते हैं। इससे अनभ्यासी मन चंचल हो उठता है और अभीष्ट लक्ष्य पर टिक नहीं पाता, इसलिए स्थान को ऐसा चयन किया जाए जहाँ बाहरी कोहराम प्रभावित न कर पाए। शरीर, मन और स्थान की शुद्धि भी आवश्यक है; अन्यथा यह साथ में जुड़ी हुई अशुद्धता अपने प्रभाव से विक्षेप उत्पन्न किए बिना न रहेगी।
बाहरी निस्तब्धता की तरह अंतरंग की शांति भी इस प्रयोजन के लिए आवश्यक है। चिंता भय, ईर्ष्या, उत्कण्ठा जैसे उद्वेग चित्त को किसी केंद्रबिंदु पर स्थित नहीं होने देते। मन में अनेकानेक संकल्प उठते रहें तो उन जाल-जंजालों में मन भटके बिना न रहेगा। इसीलिए अनुभवियों का परामर्श है कि ध्यान के साथ मनःक्षेत्र की निश्चिंतता, निर्द्वंदता बनी रहनी चाहिए। देवता से मनोकामना पूरी कराने की ललक भी मनःक्षेत्र में न हो। संकटों का निवारण, इच्छित वरदान का अनुरोध भी ऐसा है, जो मन को भयभीत भिक्षुक का स्तर प्रदान करता है। दीन-दरिद्री, कायर-कातर कभी शांतचित्त नहीं रह सकते। उनके मनोरथ ही उन्हें हवा में उड़ाते, तिनके की तरह जहाँ-तहाँ भटकाते रहते हैं। स्पष्ट है कि अस्थिर मन कभी निश्चिंत नहीं रह सकता और न उसे एकाग्रता का लाभ ही मिल सकता है।
इन व्यवधानों की संभावना से प्रत्येक ध्यान-साधना के साधक को कदम बढ़ाने से पूर्व ही अवगत रहना चाहिए और उनसे बचने का, उन्हें निरस्त करते रहने का प्रयास शुभारंभ करने से पूर्व ही कर लेना चाहिए। ध्याता को प्रसन्नचित, पुलकित मन और श्रद्धा-विश्वास की भावना से सराबोर होना चाहिए। मन को उच्छृंखल उड़ाने उड़ने से पूरी तरह रोकना चाहिए। मनोनिग्रह ध्यान-धारणा की सफलता का एक अविच्छिन्न अंग है, यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। इसे हर साधन को भली-भाँति हृदयंगम कर ही साधना-क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।
दक्षिण कर्नाटक के बेलगाँव जिले की एक महिला संतान न होने के कारण बहुत दुखी थी। भजन, पूजन, व्रत, उपासना, जिसने जो बताया, उसने बड़ी श्रद्धा से पूर्ण किए। फिर भी उसकी गोद सूनी-की-सूनी ही रही। अंत में उदास मन लेकर संतान पाने की लालसा से वह चिदम्बर दीक्षित के पास पहुँची। दीक्षित जी उद्भट विद्वान समाजसेवी और लोकोपकारी व्यक्ति थे। वह दूसरों के दुःख-दर्दों को अपना दुःख-दर्द समझकर दूर करने का भरसक प्रयत्न करते।
दीक्षित जी के पास बर्तन में कुछ भुने हुए चने रखे थे। उन्होंने उस महिला को अपने पास बुलाकर दो मुट्ठी चने दे दिए और कहा— "उस आसन पर बैठकर चबा लो। उस ओर कई बच्चे खेल रहे थे।" छोटे-छोटे बच्चे, उन्हें अपने-पराए का ज्ञान कहाँ होता है, वे भी खेल बंद करके उस महिला के पास आकर इस आशा में खड़े हो गए कि यह महिला शायद हमें भी खाने को देगी, पर वह तो मुँह फेरे अकेली ही चने खाती रही और बच्चे लालच की दृष्टि से टुकुर-टुकुर खड़े देखते रहे।
चने खत्म हो गए तो वह दीक्षित जी के पास पहुँची और बोली— "अब आप हमारा दुःख दूर करने के लिए भी कुछ उपाय बताइए।"
देखो देवी फोकट में मिले चने में से तुम उन बच्चों को चार दाने भी नहीं दे सकी, जबकि एक बच्चा तो तुम्हारी ओर हाथ तक पसार रहा था। फिर भगवान तुम्हें हाड़-माँस का बच्चा क्यों देने लगेंगे। उदार भगवान से और भी अधिक उदारता पाने की आशा करने वालों को अपना स्वभाव और चरित्र अधिक उदार बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
अध्यात्म प्रतिपादनों में स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरों के परिशोधन की चर्चा आत्मिक-प्रगति के संदर्भ में की जाती है। प्रत्यक्ष रूप से यह कार्य तो क्रियाशुद्धि से ही होता है; किंतु इतना भर पर्याप्त नहीं है। अतः की बीजशक्ति उभारने के लिए विशेष साधनात्मक प्रयोग किए जाने की आवश्यकता है। शरीर-रक्षा के लिए आहार-विहार की व्यवस्था अनिवार्य है, पर इतने भर से कोई विद्वान वैज्ञानिक या इंजीनियर-डॉक्टर नहीं बन जाता। इसके लिए विशेष अध्ययन-अभ्यास करना होता है। आहार-विहार की विधि-व्यवस्था एवं विशिष्ट शिक्षा दोनों का सुयोग-संयोग आध्यात्मिक प्रगति हेतु अभीष्ट है। अकेली ईटों से दीवार नहीं खड़ी हो जाती; उन्हें परस्पर जोड़ने के लिए चूना, सीमेन्ट, लोहा आदि भी चाहिए। इसी प्रकार गाड़ी के दो पहियों की तरह व्यवहारशुद्धि और साधनात्मक उपचार दोनों की ही अपनी जगह अनिवार्यता एवं महत्ता है।
त्रिवेणी की तीन धाराओं की तरह ब्रह्मा-विष्णु-महेशरूपी त्रिदेवों की तरह, लोक त्रिधा की तरह मानवी सत्ता भी तीन भागों में विभक्त है— स्थूल, सूक्ष्म और कारण। तीनों पृथक भी हैं और समन्वित भी। तीनों का समावेश होने पर एक पूर्णता विकसित होती है; किंतु सही स्थिति में तीनों को ही होना चाहिए, अन्यथा असंतुलनजन्य विकृति उत्पन्न हो सकती है। चर्म, मांस और अस्थि का ढाँचा तभी तक सही है, जब तक तीनों अपने-अपने स्थान पर सही रूप से अवस्थित है। इनमें से एक का भी गड़बड़ाना उस क्षेत्र की स्वास्थ्य-सुडौलता को आघात पहुँचाता है।
स्थूलशरीर रासायनिक पदार्थों से बना हुआ है। उसमें किसी प्रकार की हलचल उत्पन्न करने के लिए प्रहार की आवश्यकता पड़ती है। प्रत्यक्ष आघात तो हथौड़े जैसे उपकरणों से पहुँचाएँ जाते हैं; किंतु अदृश्य जगत में यह कार्य शब्द के द्वारा संभव होता है। सभी जानते हैं कि आघात लगने पर शब्द होता है, पर तथ्य यह भी है कि शब्द से आघात लगता है। किसी वस्तु के गिरने-टूटने-टकराने से शब्द होता है। तोप-बंदूक चलने से धमाका होता है; पर यह भी मान्यता है कि शब्द की भयंकरता भी अनर्थ कर सकती है। तोपों के गर्जन, बमों के विस्फोट गर्भधारियों के गर्भ गिरा देते हैं। धड़कते हृदय को बंद कर देते हैं। कान बहरे हो जाते हैं। कोलाहल की अधिकता से अन्य प्रकार के शारीरिक-मानसिक उपद्रव खड़े होते हैं। और अदृश्य वातावरण में भी एक तरह का असंतुलन आ जाता है। प्रदूषण बढ़ जाता है। जेटयानों की कंपन लहरें जिधर होकर गुजरती है, उधर अस्थिरता-अस्वाभाविकता उत्पन्न करती हैं। रात में भयानक पक्षी ध्वनि करते हैं तो डर लगता है और नींद उड़ जाती है। फौजी सिपाही तालबद्ध कदम मिलाकर चले तो उस आवाज से वह लोहे का पुल टूट सकता है; जिस पर से लोग गुजरते थे। देखा तो यहाँ तक गया है कि किसी मजबूत हाॅल में लोहे का मजबूत गार्डर लटका दिया जाए और उस पर क्रमबद्ध रूप से हलका प्रहार एक छोटे से पेंडुलम से करते रहा जाए तो वह गार्डर टूट सकता है एवं छत फट सकती है।
यह ध्वनि की प्रहार-प्रक्रिया हुई। उसका रचनात्मक उपयोग भी है। अमुक स्तर का संगीत बजाकर रोगियों की मानसिकता, जीवन-क्षमता, भाव-संवेदना लहराई जाती है। इस उभार के आधार पर रोग-विषाणुओं का समापन एवं आरोग्य को वापस लाने वाले तत्त्वों का उन्नयन होता है। संगीत अब अपने आप में एक स्वतंत्र चिकित्सापद्धति बनती जा रही है। पुरातनकाल में उसका उपयोग मेघ-मल्हार गाकर वर्षा कराने में, दीपक राग गाकर दीपक जलाने के रूप में होता था। बहेलिए मृगों को, सपेरे साँप को संगीत के आधार पर वशीभूत करते और उन्हें पकड़ते थे। आधुनिक वैज्ञानिक पशु-पक्षियों और जलचरों की क्षमता विकसित करने में लयबद्ध ध्वनि-प्रवाह का उपयोग करते हैं। पाया गया है कि इस प्रकार से गाएँ अधिक दूध देने लगीं। मुर्गियों से अधिक अंडे बच्चे मिले और मछलियाँ जल्दी परिपुष्ट हुई और अपेक्षाकृत कहीं अधिक प्रजनन करने लगीं। यह प्रयोग पेड़-पौधों पर भी हुआ है। वे इस आधार पर अधिक तेजी से बढ़े और असामान्य रूप से फूले-फले। कृषकों और उद्यानमालिकों ने अपनी फसलों को संगीत सुनाकर अधिक परिपुष्ट करने में सफलता पाई। मानवी मनोरंजन में गायन-वादन-अभिनय का असाधारण स्थान है। उससे उत्साह बढ़ता है। घोड़े नाचने लगते हैं। मेघ-गर्जन की ध्वनि पर भाव-विभोर होकर मोर नाचते देखे गए हैं।
प्रकृति के अंतराल में तीन प्रमुख शक्तियाँ काम करती हैं— (1) ध्वनि (2) ताप (3) प्रकाश। इन्हीं की सूक्ष्म-तरंगें रेडियो, टेलीविजन आदि उपकरण चलते हैं। एक्स-किरणें, रेडियो-किरणें, लेसर-किरणें, गामा-किरणें आदि के रूप में इन तरंगों का महत्त्वपूर्ण एवं आश्चर्यजनक उपयोग भी किया जाने लगा है। तरंगें ही सघन होकर अणु-परमाणुओं के रूप में परिवर्तित होती है।और अनेक नाम-रूपों वाले पदार्थों की संरचना करती हैं। इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि समस्त विश्व की अनेकानेक हलचलों को यह ध्वनि-प्रवाह ही हिलाता-डुलाता, मोड़ता-मरोड़ता रहता है। इसी आधार पर उत्पादन-अभिवर्ध्दन परिवर्तन की रीति-नीति सर्वत्र चलती रहती है। उत्साह, उमंग और उल्लास के रूप में तीनों शरीरों को भी सूक्ष्मध्वनियाँ अपने ढंग से यथा अवसर प्रभावित करती रहती हैं। जीवन और मरण, उत्थान और पतन, बहुत कुछ उन्हीं के ऊपर अवलंबित है।
त्रिविधि-तरंगों में से स्थूलशरीर को ध्वनि-तरंगें प्रभावित करती हैं। सूक्ष्मशरीर को ताप-तरंगें और कारणशरीर को प्रकाश-तरंगें। यों अनायास भी यह संयोग बनता-बिगड़ता रहता तथा अनेकानेक प्रभाव उत्पन्न करता रहा है; किंतु यदि उनका योजनाबद्ध रूप से वैज्ञानिक प्रयोगों की तरह उपयोग किया जा सके तो इसके इच्छित परिणाम भी होते हैं। बारूद जला देने पर धमाका तो होता है, पर उसमें अस्त-व्यस्तता रहती है; किंतु उसी को बंदूक या तोप की नली में डालकर किसी लक्ष्य पर केंद्रित करके दागा जाए तो निशाने को धराशाई करने की प्रत्यक्ष परिणति दृष्टिगोचर होती है। ध्वनि-तरंगों का उपयोग स्थूलशरीर को प्रभावितकर उसमें अभीष्ट सुधारकर इस समूचे ब्रलाक में बिखरी पड़ी है। उन्ही के द्वारा परिवर्तन करने के निमित्त किया जा सकता है।
स्थूलशरीर को प्रभावित करने के लिए मंत्रयोग का सूक्ष्मशरीर के लिए प्राणयोग का और कारणशरीर में उपयोगी उभार लाने के लिए ध्यानयोग का उपयोग किया जाता है। यों साधनाएँ अनेकों प्रकार की हैं। परंपरा भेद से उनका उपयोग-उपचार अनेक विधि-विधानों के रूप में किया जाता हैं। इस प्रकार साधना विज्ञान के अनेकानेक भेद और उपभेद बन जाते हैं। इनमें से जिन्हें अपनी अभिरुचि के अनुरूप अपनाना होता है, वे उसका प्रयोग करते रहते हैं। देश, भाषा, परंपरा आदि भेदों के कारण तत्त्व दर्शन अनेक भागों में विभक्त हो गया है, पर इसे एकदूसरे के प्रतिकूल मानना भूल होगी। एक ही नगर में पहुँचने के लिए विभिन्न दिशाओं के सभी अलग-अलग मार्ग अपनाते हैं। इतने पर भी वे सभी उस एक ही लक्ष्य तक पहुँच ही जाते हैं।
संसार भर में प्रचलित अनेकानेक योगाभ्यासों को तीन भागों में ही विभक्त किया जा सकता है। बहुलता को सीमा बद्धता में बाँधा जा सकता है। मंत्रयोग, प्राणयोग और ध्यानयोग की सीमा में प्रायः सभी साधन-विधानों को बाँधा जा सकता है। मनोविकार और अनैतिक आचरण भी लोभ, मोह, अहंता की पृष्ठभूमि पर उगते हैं। साधनाएँ भी साहस, संकल्प और संवेदना का अवलंबन लेकर आगे बढ़ती और तीनों शरीरों को प्रभावित करती हैं।
पदार्थ परिवार को ध्वनि-तरंगों से प्रभावित परिवर्तित, परिष्कृत, करने के लिए 'मंत्रयोग' का उपयोग करना होता है। मंत्र में तीन तत्त्व जुड़ते हैं— (1) शब्दों का गठन (2) साधक का व्यक्तित्व (3) तथ्य को अंतःकरण की गहराई तक पहुँचा देने वाला अविचल विश्वास। इन तीनों का जब भी, जहाँ भी जितना भी, समावेश हो, वहाँ उसकी उपयोगी प्रतिक्रिया मिश्रित रूप से परिलक्षित होगी; किंतु यदि इनमें से एक भी कम पड़ा या त्रुटिपूर्ण रहा तो उसका अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न होना; संदिग्ध हो जाएगा।
मंत्रों का गठन दूरदर्शी अनुभवी योगाभ्यासियों द्वारा किया जाता है। वे शब्दों को समझने में अर्थ को प्रधानता नहीं देते; वरन यह देखते हैं कि किस क्रम से अक्षरों का गुणन हुआ और उनके उच्चारण में किस प्रकार का ध्वनि प्रवाह उत्पन्न हुआ। इस मंत्र निर्धारण में प्रायः उनके सृजेताओं को अंतःस्फुरण-मार्गदर्शन मिलता है। इसलिए वे उसे आकाशवाणी द्वारा, ईश्वरीय-चेतना द्वारा उद्भूत भी कहते हैं। गायत्री मंत्र, कलमा शरीफ, बपतिस्मा, णामोंकार मंत्र, मणि पद में हुँ, ऐसे ही सनातन कहे जाने वाले मंत्र हैं।
तंत्रयोग के अंतर्गत एकाक्षर मंत्रों का भी निर्धारण किया गया है। देवनागरी लिपि के कुछ प्रभावशाली अक्षरों के ऊपर अनुस्वार (.) लगाकर उन्हें विशेष प्रयोजनों में काम आने वाला विशेषज्ञ मंत्र बना दिया गया है (कं, खं, गं, घं, चं, छं, जं, झं,पं, फं, बं, भं) आदि की रचना इसी दृष्टि से हुई है। श्रीं, क्लीं, ह़ीं, हुं फट् आदि की भी गणना एकाक्षरी मंत्रों से ही होती है। अर्थसहित मंत्रों की व्याख्या-विवेचना हो सकती है। उनसे शिक्षा ले सकते हैं, पर एकाक्षरी मंत्र बीजरूप हैं। उनमें शक्ति की प्रधानता है। अभिव्यक्ति नहीं खोजी जा सकती। इन सबके अपने अपने प्रभाव है। उनका उच्चारण यों, कंठ, होठ, जीभ, दाँत, तालु आदि के माध्यम से ही होता है; पर जो ध्वनि-प्रवाह समंवित रूप से बनता है वह स्थूल शरीर के अन्तराल में रहने वाली विशाल ग्रंथियों से टकराता है, उस प्रतिक्रिया को समूचे व्यक्तित्व में वितरित करता है। शरीर के अंतराल में अनेक गुच्छक, उपत्यिकाएँ, चक्र-भ्रमर अंतः स्रावी ग्रंथियों का समुदाय है। इनमें से कुछ के क्रियाकलापों की जानकारी हो गई है, पर कुछ अभी तक शरीरशास्त्रियों द्वारा समझे नहीं जा सके हैं। माइक्रोलीटर की मात्रा में स्रवित होने वाले हारमोन द्रव्यों की विलक्षणता प्रत्यक्ष है। उनका प्रभाव काया तक ही सीमित नहीं रहता; वरन स्वभाव और व्यक्तित्व को भी प्रभावित करता है। इस प्रकार अनेकानेक ग्रंथियों को संतुलन में लाने, विकसित करने के लिए मंत्र-प्रयोगों को आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न होते देखा गया है। आहार आदि की तरह संसार के अन्यान्य पदार्थ भी मनुष्य को प्रभावित करते हैं। वे पास आते, दूर भागते हैं। अनुकूल एवं प्रतिकूल बनते हैं। इस असंतुलन को इच्छानुरूप बनाने में भी मंत्रशक्ति कार्य करती है। यह शक्ति वरदान एवं अभिशाप के रूप में भी अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करती देखी जाती है।
मंत्री ने राजा से कहा—" यदि अवसर मिले, कोई चालाकी से चूकता नहीं। अवसर मिले तो ही धूर्तता की रोक-थाम हो सकती है।"
राजा ने कहा— इसका अर्थ यह हुआ कि संसार में भलमनसाहत है ही नहीं; मंत्री ने कहा— "है तो, पर उसे जीवित या सुरक्षित तभी रखा जा सकता है, जब रोक-थान का समुचित प्रबंध हो। छूट मिले तो कदाचित ही कोई बेईमानी से चूके।"
बात राजा के गले न उतरी, मंत्री ने ताड़ लिया और अपनी बात का प्रमाण देने के लिए उपाय किया।
प्रजा में घोषणा कराई गई कि अभी राज-काज के लिए हजार मन दूध की आवश्यकता पड़ेगी। सभी प्रजाजन रात्रि के समय खुले पार्क में रखे हुए कड़ाहों में, अपने-अपने हिस्से का एक एक लोटा दूध डाल जाय।
रात्रि के समय पार्क में बड़े-बड़े कड़ाहे रखा दिए गए। चौकीदार का कोई प्रबंध नहीं किया गया। स्थिति का पता कानो-कान सभी को लग गया। रात्रि का समय और चौकीदार का न होना, इन दो कारणों का लाभ उठाकर प्रजाजनों ने दूध के स्थान पर पानी डालना आरंभ कर दिया। इतने लोटा दूध होगा तो हमारे एक लोटे पानी का किसी को पता भी न चलेगा। सभी ने एक ही तरह सोचा और सभी ने पानी डाला।
दूसरे दिन मंत्री राजा को लेकर दूध के कड़ाह दिखाने ले गया। सभी पानी से भरे थे। दूध का नाम तक न था। राजा ने समझा कि ईमानदारी के जीवित रखने के लिए चौकीदारी की कितनी आवश्यकता है?
सूक्ष्मशरीर अर्थात चेतना-क्षेत्र का विचारतंत्र। इसे क्रियाशील शरीर से कहीं अधिक बढ़-चढ़कर माना गया है। काया सुडौल और सुगढ़ हो तो उससे परिश्रम परककार्य भी लिए जा सकते हैं। उसका उपार्जन भी श्रमिक स्तर का ही हो सकता है, पर यदि व्यक्तित्व प्रतिभावान है, मानसिक स्तर की शिक्षा, समझदारी, सुव्यवस्था और शालीनता की है तो उस आधार पर हर किसी की दृष्टि में बढ़-चढ़कर मूल्यांकन होता है। बहुमूल्य वस्तुएँ हर जगह सम्मान पाती हैं, संपर्क में आने वाले को अलंकृत करती हैं और अपने मूल्य के अनुरूप ऊँचे स्तर की उपलब्धि भी हस्तगत करती हैं। शरीरगत सुडौलता न होने पर भी मनस्वी व्यक्ति अपनी विशिष्टता के बल पर समुदाय की वरिष्ठता उपलब्ध करते हैं, सम्मान भी पाते हैं और सहयोग भी। संपन्नता के बल पर लोग अहंकार क प्रदर्शन करते देखे गए हैं; किंतु परिष्कृत मानसिकता के बलबूते अपने को संतुष्ट भी रखा जा सकता है और प्रसन्न भी। तृप्ति-तुष्टि और शांति प्राप्त करने के लिए एक ही उपाय-उपचार है कि अपनी मानसिकता को, आदर्शों को शालीनता से भरा-पूरा रखा जाए। चिंतन तंत्र को इतना सुसंस्कृत बनाया जाए कि प्रस्तुत समस्याओं का हल और आवश्यकताओं का सरंजाम जुटाने में उन्मुक्त दृष्टिकोण अपनाया जा सकना संभव हो सके। सूक्ष्मशरीर के मनन संस्थान को समुन्नत इसी प्रकार रखा जा सकता है।
व्यावहारिक जीवन भी एक साधना-क्षेत्र है। इतना ही मन बना लेना उपयुक्त नहीं कि किन्हीं विशेष साधना, उपचारों से ही स्थूलसूक्ष्म एवं कारणशरीरों को समर्थ सुव्यवस्थित बनाया जा सकता है। इनकी भी उपयोगिता है, पर यह संभव नहीं कि व्यावहारिक जीवन गया-गुजरा बना रहे और पूजा-उपचारों की सहायता भर से संपन्न उत्कर्ष के लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।
अखाड़े में पहलवानी सीखी और सिखाई जाती है। सर्वसाधारण को मोटी दृष्टि से यही प्रतीत होता है कि अखाड़े के साथ संबंध जोड़ना वहाँ बताए जाने वाला क्रियाकलाप अपनाना, किसी को भी पहलवान बना सकता है। ऐसा ही कुछ साधनाओं के संबंध में सोचा जाता है और माना जाता है कि अमुक साधनाएँ करने से अमुक प्रतिफल प्राप्त हो जाता है, पर इस प्रकार का गणित फैलाने वालों से एक भूल रह जाती है कि वे यह नहीं सोचते कि साधना के अतिरिक्त और कुछ करना आवश्यक होता है क्या? समझा जाना चाहिए कि पहलवानी के शौकीनों को पौष्टिक खुराक बढ़ानी पड़ती है, ब्रह्मचर्य से ररना पड़ता है, थके अंगों को चैतन्य करने के लिए मालिश कराने जैसे उपचारों का आश्रय लेना पड़ता है। यदि यह सब न किया जाए तो मात्र दंड पेलने-बैठक करने भर से दंगल पछाड़ने की स्थिति प्राप्त कर लेना संभव नहीं। कई बार तो दुर्बलकाय व्यक्ति उस दबाव को असाधारण रूप से बढ़ा लेने पर व्यायाम का अतिरिक्त दबाव सहन नहीं कर पाते। उलटे शरीर में जोड़ों में दर्द उत्पन्न कर लेने जैसे संकटों में फँस जाते हैं।
स्थूल एवं सूक्ष्मशरीरों को असाधारण रूप से सशक्त बमाने वाली साधनाएँ तो है, पर उन्हें बताने-अपनाने से पूर्व अपनी स्थिति क पर्यवेक्षण करना चाहिए और विकास-परिष्कार के लिए जो मध्यवर्ती अनुबंध पालना होता है, उसकी तैयारी करनी चाहिए।
सूक्ष्मशरीर को मानसतंत्र को प्रगतिशील बनाने के लिए उस क्षेत्र की स्थिरता, एकाग्रता, समस्वरता सही बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। देखना चाहिए कि किस प्रकार मानसिक उद्वेगों से बचा जा सकता है। समुद्र में जोरदार ज्वार-भाटे उठ रहे हो तो नाव खेने वाले को डांड चलाते हुए असाधारण परिश्रम करना पड़ता है। कई बार तो किसी चट्टान से टकरा जाने पर उसके डूबने तक का खतरा सामने आ खड़ा होता है। हिलोरे लेते जलाशय में सूर्य, चंद्रमा की परछाई यथावत नहीं दीख सकती है। दौड़ते घोड़े पर सवारी बैठे रहना कोई साधारण काम नहीं है। उनमें सचार के गिर जाने और घोड़े के ठोकर खा जाने की आशंका बनी रहती है। दृश्य स्थिर रहे तो ही उसकी छवि ठीक से देख पड़ना आँखों के लिए संभव हो पाता है। धावक की दौड़ती छवि ठीक तरह देखते नहीं बन पड़ती है। अस्थिर-उद्विग्न मन सामयिक समस्याओं का समाधान तक ठीक तरह ढूँढ़ नहीं पाता। दूसरों के साथ उसका व्यवहार असंगत हो जाता है। वस्तुस्थिति को समझने एवं भविष्य की संभावनाओं का उतार-चढ़ावों का अनुमान लगाते नहीं बन पड़ता। ऐसी दशा में उसके निर्णय-निर्धारण भी सही स्तर के होंगे, इसकी आशा नहीं की जा सकती। जब लोक-व्यवहार में मन की अस्थिरता इतनी अधिक होती है तो आध्यात्मिक साधनाएँ ठीक प्रकार बन पड़ेंगी इसकी आशा कैसे की जाए? चित्तवृत्ति निरोध किए बिना मनोनिग्रह किए बिना साधना कर पाना शक्य नहीं है।
मन में उद्वेग अनायास ही नहीं उठते, उनका कुछ कारण होता है। जलाशयों में लहरें तब उठती हैं, जब कोई भारी वस्तु गिरे अथवा तेज हवा चले। गर्मियों में चक्रवात स्वेच्छापूर्वक उनका निमित्त कारण होता है। इसी प्रकार मानसिक उद्विग्नता भी किन्हीं अन्य कारणों के साथ जुड़ी हुई होती है।
सृष्टि-व्यवस्था के साथ जीवनक्रम की संगति सरलतापूर्वक बिठाई जा सकती है। सर्वथा संभव है कि बिना उत्तेजित हुए या दूसरों को उत्तेजित किए, पहिया अपने लकीर पर लुढ़कता रहे। न हम किसी से टकराएँ और न कोई हमसे टकराए, ऐसा सुयोग आसानी से बन सकता है। रोग को मारने और रोगी को बचा लेने की नीति चिकित्सक अपनाते हैं। यह विद्या न तो असाध्य है न असंभव। बच्चे कीचड़ में सन जाने पर कीचड़ धोई जाती है और बच्चे को किसी प्रकार कोई क्षति नहीं पहुँचने दी जाती है। यह कौशल ऐसा है कि जिसे तनिक-से अभ्यास द्वारा स्वभाव का अंग बनाया जा सकता है।
उत्तेजनाएँ परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं या व्यक्ति ही उस हेतु आड़े आते हैं, ऐसी बात नहीं है। कई बार अपना मानस ही ऐसा दुर्बल होता है कि स्थिति का आँकलन करने में असाधारण रूप से चुक कर जाता है। आँखों पर रंगीन चश्मा पहन लेने पर वस्तुएँ उसी रंग में रंगी हुई दिखती हैं। यह भ्रांति है। वस्तुएँ अपने-अपने रंग की होती है; किंतु चश्मा रंगीन पहन लेने पर जो प्रतीत होता है, वह अवास्तविक होते हुए भी वास्तविक जैसा लगता है। जिसके बारे में हम जो सोचते हैं, जैसा उन्हें मान बैठते हैं वस्तुतः वे वैसे नहीं होते। आँकलन सही कर सकने की क्षमता रहने पर यहाँ सब कुछ सरल एवं स्वाभाविक प्रतीत होता है। इतना बन पड़ने पर वे उत्तेजनाएँ नहीं उभरती हैं, जो चढ़ दौड़ने पर मानसिकता को तनाव से भर देती है। आवेशग्रस्त करके ऐसा कुछ कर गुजरने के लिए बाधित करती है, जिसके लिए पीछे शर्म करने या पछताने की आवश्यकता अनुभव होती है।
मनोविकारों को शारीरिक रोगों से भी अधिक अनर्थकारी कहा गया है। शरीर में ताप बढ़ने, रक्तचाप ऊँचा होने पर जो स्थिति बनती है, उससे रोगी किसी काम-धाम के योग्य नहीं रह जाता है। ठीक यही बात मानसिक आवेशों के संबंध में भी है। इस उत्तेजना में विचारतंत्र बुरी तरह लड़खड़ा जाता है दूसरों पर दोषारोपण करता है। भविष्य को भयंकर देखता है और अपने दुर्भाग्य को कोसता है।
चूल्हें पर जब दूध उबलता है तो उसके उठते हुए झाग पहले की अपेक्षा बढ़े-चढ़े मालूम होते हैं, पर वस्तुतः वह जलने लगता है, चूल्हें में गिरता है, आग बुझाता है और उसमें दरार डालता है। ठंडा होते-होते उसकी परत पतीली की दीवारों से चिपक जाती है। इसी प्रकार उफान के बाद वह पहले की अपेक्षा कहीं कम मात्रा में रह जाता है। इस प्रकार मन में उफान आने से शरीर को हर दृष्टि से घाटा-ही घाटा रहता है। शरीर को चढ़ा हुआ बुखार जलाता है, मन संस्थान को सूक्ष्मशरीर की उत्तेजनाएँ जलाती रहती हैं। उसकी विशेषताएँ इसी उष्णता में जल जाती है। ऐसी दशा में सूक्ष्मशरीर के सशक्त होने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ जो मिल सकते थे, उन सबका द्वार बंद हो जाता है। इसलिए अपनी दिव्य विशिष्टताओं को समुन्नत करने के लिए प्रथम चरण यह उठाना चाहिए कि मानसिक संतुलन किसी भी कारण गड़बड़ाने न पाए।
चर्मचक्षुओं से देखने पर शरीर की सुडौलता, सुंदरता, समर्थता आकर्षक लग सकती है, पर जहाँ तक व्यक्तित्व की वरिष्ठता और प्रतिभा की विशिष्टता का संबंध है, वहाँ मानसिकता का क्षेत्र ही मणि-माणिकों से भरा-पूरा सिद्ध होता है। जिसमें दूरदर्शिता-विवेकशीलता होती है, गुण-कर्म-स्वभाव की दृष्टि से जो गुणवत्ता, विभूतिमत्ता विकसित होती है, वह इसी आधार पर निर्भर है कि मनुष्य का मानसिक धरातल सुसंतुलित रहे।
मानसिक विक्षेपों से एक सीमा तक सांसारिक परिस्थितियाँ, प्रतिकूलताएँ भी कारण हो सकती है; किंतु उनका समाधान सरल और संभव है। अड़चनों से बचकर निकला जा सकता है। काँटे नहीं बीने जा सकते तो पैर में जूता पहना जा सकता है। अपना कार्यक्षेत्र-व्यवसाय भी टकराव से बचाते हुए नया निर्धारित किया जा सकता है। संभावित सशक्तता अर्जित करके विग्रहियों से संघर्ष भी किया जा सकता है। यह सामान्य व्यवहार कुशलता है, जिसके सहारे परिस्थितियों की प्रतिकूलता की अनुकूलता में बदलता जा सकता है; किंतु बड़ी कठिनाई तब उपस्थित होती है, जब अपना ही स्वभाव, अभ्यास, दृष्टिकोण, विसंगतियों से भर जाता है।
अहंता पग-पग पर बाधक होती है। वह आत्मविज्ञापन चाहती है। वाह-वाही लूटने मैं रस लेती है। दूसरों को पिछड़ी स्थिति में रखकर ही अपना बड़प्पन उभरता है। इसके लिए वे सभी उपाय अपनाने होते हैं जिसमें छल-छद्म अपनाने होते हैं, आक्रमण करने होते हैं, खर्चीले ठाट-बाट के सरंजाम जुटाने पड़ते हैं। अहंकार की तुष्टि तब होती है, जब दूसरों को अपने से हेय सिद्ध किया जाए। यह आक्रामक मार्ग है, जिसमें प्रतिस्पर्धा एवं प्रतिशोध का जोखिम भी सामने आता रहता है। अपने को विनम्र, सज्जन, उदार बनाने वाले के लिए यह पुरुषार्थ कतई असंभव नहीं। वस्तुतः लिप्सा, तृष्णा और विलासिता की ललक ऐसी है, जो सदा अपूर्ण ही रहती है और महत्त्वाकांक्षी को उद्विग्न, असंतुष्ट और आवेशग्रस्त बनाए रहती है। इन दुरितों को निरस्त एवं परास्त करने के उपरांत ही सूक्ष्मशरीर का उत्कर्ष संभव हो सकता है।
धर्मदीक्षा का शिविर समाप्त हुए। सारे भिक्षु अपनी-अपनी रुचि की दिशा में परिव्रज्या के लिए निकल गए। देववर्ध्दन नामक भिक्षु भी गौतम बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और प्रार्थना की— "भगवन ! मेरी इच्छा है कि मैं कलिंग जाकर संघ का प्रचार करूँ।" कलिंग का नाम सुनकर बुद्ध ने आँखें उठाई, देववर्ध्दन को पास बिठाया। स्नेह से शीश पर आशीर्वाद का हाथ फेरते हुए बोले— "वत्स! वहाँ के लोग बड़े अधर्मी और ईर्ष्यालु हैं, वे मिथ्या दोष लगाकर तुम्हें सताएगें, गालियाँ देंगे, इसलिए वहाँ जाने का इरादा बदल डालो।”
भिक्षु ने उसी विनय के साथ कहा— "भगवन गालियाँ देंगे तो क्या हुआ, मारेंगे तो नहीं"। तथागत कहने लगे— "तात! इसमें भी संदेह नहीं। वे आतताई भी हैं। तुम्हें मार भी सकते हैं।” देववर्ध्दन फिर भी दृढ़ रहा। उसने कहा— "देव थोड़ा दंड से इस शरीर का बिगड़ता क्या है, मारेंगे तो भी बुरा नहीं, वे मेरे प्राण तो नहीं लेंगे।"
“पर वे तुम्हें जान से मार देंगे, देववर्ध्दन! मैंने उनकी निर्दयता देखी है", बुद्ध ने कहा— “तो क्या हुआ भगवन आपने ही तो कहा— "यह शरीर 'धर्मकार्य में लग जाए तो पुण्य ही होता है', इस तरह वे लोग मेरे साथ उपकार ही करेंगे।” तथागत भगवान बुद्ध शिष्य के उत्तर से संतुष्ट हुए। उन्होंने आशीर्वाद दिया और विदा करते हुए बोले— “वत्स! समाजसेवी की सच्ची योग्यता है तुम में, तुम निश्चय ही वहाँ धर्म-प्रचार कर सकोगे।"
समाजसेवी की योग्यता है— "सहिष्णुता, क्षमा और निष्ठा।"
सूक्ष्मतत्त्व प्राणतत्त्व से विनिर्मितहै। जड़ और चेतन का सम्मिश्रण प्राण है। जिस प्रकार नीला और पीला रंग मिलने से हरा रंग बनता है, पानी और मिट्टी का सम्मिश्रित स्वरूप कीचड़ के रूप में परिलक्षित होता है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष का जड़-चेतन का सम्मिलन प्राण है। इसी के आधार पर जीवन स्थिर रहता है। जब वह शरीर से पृथक हो जाता है तो मरण की स्थिति बन जाती है।
प्राणतत्त्व शरीर में भी विद्यमान है और उसका विराट स्वरूप विश्व-ब्रह्मांड में संव्याप्त है। जड़-चेतन की एक मात्रा जब आपस से गुँथ जाती है तो उसे जीव संज्ञा दी जाती है, वह शरीरगत अवयवों को गति प्रदान करता है, साथ ही अहम् की ग्रंथी बनकर चिंतन-तंत्र के माध्यम से अपनी चेतना का परिचय देता है। चेतना का गुण है— चिंतर। चिंतर को ही सजीवता का चिह्न माना जाता है। आस्था, आकांक्षा, भावना कल्पना, विवेचना आदि उसी के भेद उपभेद है। प्राणवान को साहसी समझा जाता है। पराक्रमी, पुरुषार्थी और जीवट का धनी। महाप्राण प्रतिभावान होते हैं और अल्पप्राण कहकर दीन, दुर्बलों, कायरों, डरपोकों का तिरस्कार किया जाता हैं। वैभववान होने की तरह प्राणवान होना भी किसी के समर्थ सौभाग्यवान होने का चिह्न है। उसका वर्तमान सुव्यवस्थित होता है और भविष्य उज्ज्वल।
जिस प्रकार जमीन पर बिखरी हुई रेत बिना किसी अड़चन के अभीष्ट में बटोरी जा सकती है, जिस प्रकार विशाल जलाशय से अपनी आवश्यकता का पानी उपलब्ध पात्र में भरा जा सकता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी महाप्राण में से अपनी सूक्ष्मसत्ता में प्राणतत्त्व को इच्छित मात्रा में धारण करके अपना चेतना-पक्ष बलिष्ठ बनाया जा सकता है। यह शरीर की शोभा-समर्थता बढ़ाने की भी निमित्त कारण बनता है।
सूक्ष्मशरीर किस स्थिति में रहरहा है, किस स्तर का है? इसका अनुमान इसी आधार पर लगाया जा सकता है कि उसमें प्राणतत्त्व कितना है? स्थूलशरीर में उसकी विद्यमानता को 'ओजस्' कहते है। सूक्ष्मशरीर में उसकी बहुलता “तेजस कहलाती है और उसका कारणशरीर को जब वह ऊर्जा प्रदान करने लगता है तब उसे 'वर्चस्' नाम मिलता है।
सूक्ष्मशरीर को लोक-व्यवहार के लिए कुशल बनाने के लिए चिंतन-क्षेत्र की परिधि बढ़ानी पड़ती है। शिक्षा का आश्रय लिया जाता है, अनुभव एकत्रित करते हैं, साथ ही मनन-चिंतन का उपक्रम अपनाने मंथन करते हुए दूरदर्शी विवेकशीलता की परिधि तक पहुँचा जाता है। प्रज्ञा का, मेधा का भूमा का उदय कारणशरीर में होता है, पर उसके पूर्व मानसिक संतुलन की, परिष्कृत दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि बनती है।
विचारों की तीक्ष्णता किसी तथ्य की गहराई तक पहुँचती है, जबकि मंदता बनी रहने पर उथली प्रथा-परंपराओं को अपनाकर ही काम लिया जाता है। समीपवर्ती लोगों को जैसा सोचते-करते देखा जाता है, उसी का अनुकरण-अनुगमन साधारणजनों का भी चल पड़ता है। वे कोयले के ढेर में से हीरे नहीं बीन पाते। दोनों के बीच रहने वाला अंतर भी उनकी समझ में नहीं आता। ऐसी दशा में वे स्वतंत्र बुद्धि उत्कर्ष के लिए आवश्यकता-निर्धारण के लिए समर्थ नहीं होते। बस नर-पशुओं की तरह जिंदगी पूरी करते हैं। पेट-प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ उन्हें सूझता ही नहीं। तृष्णा और अहंता उन्हें कठपुतली की तरह नचाती रहती है।
प्रचलन का सम्मोहन जिन्हें वशवर्त्ती बनाए रहता है, जो समुदाय से प्रभावित-परिचालित होते हैं, वे सामान्यजनों में ही गिने जाते हैं। उनसे न कुछ महत्त्वपूर्ण सोचते बनता है और न करते। आहार-निद्रा कही लहरों में डूबते गिरते किसी प्रकार जिंदगी पार करते हैं; जिन्हें आत्मबोध को प्रकाश में मिलता है, वे इतने भर से संतुष्ट नहीं रहते, उन्हें महानता की आकांक्षा कचोटती है, फलतः ऐसी दिशाधारा खोजते हैं, जो व्यक्तित्व में दैवी तत्त्वों का समावेश कर सके।
इस मार्ग पर चलने, इस प्रयास में लगने के लिए लौकिक प्रयत्न तो करने ही पड़ते हैं। स्वाध्याय-सत्संग का, चिंतन-मनन का आश्रय तो लेना पड़ता है, साथ ही एक कदम बढ़कर प्राणतत्त्व की अतिरिक्त मात्रा का भी संचय करना पड़ता है। सामान्यतया हर किसी को प्राणतत्त्व की एक समिति मात्रा ही उपलब्ध होती है। उस विभूति को अधिक मात्रा में हस्तगत करने के लिए प्राणाकर्षण की विशेष साधना करनी पड़ती है। प्राणाकर्षण का अर्थ है— ब्रह्मांडव्यापी महाप्राण में से खींचकर अपनी पात्रता को फुला-फैलाकर उसमें अभीष्ट वैभव को संचित-संकलित करना। इसी क्रिया विज्ञान को प्राणायाम भी कहते हैं।
जन्म से मरण पर्यंत हमें साँस लेने-छोड़ने का क्रम चलाना पड़ता है। वायु को नथुनों द्वारा लिया, फेफड़ों में भरा व अंग-प्रत्यंगों में फैलाया जाता है। अपनी पहुँच की परिधि में वह बुहारी लगाती है और कचरे को बाहर निकाल फेंकती हैं। इसी प्रकार सामान्य परिशोधन होता रहता है। वायु के साथ शरीर को पोषण देने वाला आक्सीजन तत्त्व भरा रहता है। यही ईंधन बनकर जलता और शरीर-संचालन के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न करता है। इतनी जानकारी हर किसी को होती है; किंतु इसी रहस्य को अध्यात्म विज्ञानी ही जानते हैं कि आक्सीजन के अतिरिक्त आवश्यकता प्राणतत्त्व की भी रहती है। इसे आक्सीजन नहीं, उससे उच्चस्तरीय चेतना-मिश्रित धारा कह सकते हैं। यह अनायास ही नासिका मार्ग से भीतर घुसती-निकलती नहीं रहती; वरन उसे संकल्पशक्ति को उभरकर विशेष प्रयास द्वारा खींचने और धारण करने का अभ्यास करना पड़ता है। इस अभ्यास में जितनी अधिक पकड़ होती है, उतनी ही शक्ति लगाकर वह प्राणतत्त्व को उतनी ही मात्रा में आकर्षित करने पकड़ने धारण करने में समर्थ होती है। प्रयोक्ता इसे इच्छित मात्रा में प्रयत्नपूर्वक उपलब्ध कर सकते हैं और उसे जिस भी प्रयोजन में खर्च करना चाहें, खर्च कर सकते हैं। इसे प्राण विज्ञान कहा जाता है। अध्यात्म-क्षेत्र की इसे एक बडी उपलब्धि माना जाता है। इस अतिरिक्त प्राण का अनेक प्रयोजनों में उपयोग होता है। आक्सीजन तो श्वास प्रश्वास का प्रयोजन ही पूरा करती है, किंतु प्राण के द्वारा साधक अपने मानस तंत्र का स्तर भी बढ़ा सकता है और प्रभाव एवं कार्यक्षेत्र भी।
प्राण के अधिकार पर सामान्य बुद्धि में वैसी तीक्ष्णता आती है जैसी कि दार्शनिकों, वैज्ञानिकों विशेषज्ञों में देखी जाती है। प्राण के द्वारा मनोविकारों को जलाया जा सकता है। चिंतन-क्षेत्र में आदर्शवादिता एवं विवेकशीलता को उछाला-उभारा जा सकता है। प्राण का मन पर नियंत्रण है। चित्तवृत्तियों के निरोध की, मनोनिग्रह की, एकाग्रता संपादन की, अध्यात्म उत्कर्ष के निमित्त पग-पग पर पल-पल में आवश्यकता पड़ती है। मनस्वी बनने के लिए प्राणतत्त्व की अधिक मात्रा संकलित करनी पड़ती है। इसके बिना ओछी चतुरता ही हाथ रह जाती है और वह कुशलता भरे छद्म-प्रपंच ही रचती रहती है। महामानवों जैसी विशेषताएँ उत्पन्न करने के लिए मनःक्षेत्र को प्राण-प्रेरणा के माध्यम से उभारना पड़ता है।
प्राण की शक्ति बिजली की तरह धावमान भी है और विद्युत उत्पादक यंत्र की तरह स्थिर भी। उससे आत्मविकास के हर पक्ष में अभिनव चेतना का संचार किया जा सकता है। साधक व्यक्तित्ववान, प्रतिभावान, विवेकवान और सामर्थ्यवान बन सकता है। इनकी कमी से जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उससे उबरा जा सकता है। साथ ही यह भी संभव है कि इस उपार्जित चेतन संपदा का एक भाग किसी जरूरत मंद के लिए हस्तांतरित किया जा सके। इसे शक्तिपात भी कहते हैं और प्राण अनुदान-लाभदायक वरदान भी। जिस प्रकार आग की तपती भट्टी के निकट बैठने वाले शीत से मुक्ति पाते हैं। उस ऊर्जा का अनेकानेक कार्यों में उपयोग कर सकते हैं उसी प्रकार यह भी संभव है कि प्राण संपदा के धनी अपनी उस ऊर्जा को हस्तांतरित करते रह सकें। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद को चाणक्य ने चंद्रगुप्त को समर्थ ने शिवाजी को मात्र आशीष ही नहीं दिया था, इसके साथ ही इन शिष्यों को प्राण अनुदान भी प्रदान किया था। इसी आधार पर वे व्यक्तिगतसंपन्न बने और महान कार्यों का सूत्र-संचालन कर सके। ईसा अपनी प्राण-चेतना का रोगियों और पतितों में वितरित किया करते थे।
इस शक्ति का दुष्प्रयोजन के लिए भी प्रयोग हो सकता है। तांत्रिक, कापालिक, अघोरी इसी शक्ति के बलबूते प्रतिपक्षियों को त्रास देते हैं। मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन आदि के प्रयोगों में दूसरों को हानि पहुँचाकर अपनी अहंता का पोषण किया जाता है। चाकू से फल काटने का काम भी लिया जा सकता है और किसी पर प्राणघातक आक्रमण करने का भी। यह प्रयोक्ता की मनःस्थिति पर निर्भर है कि शक्ति-साधनों को किसके लिए, किस प्रकार प्रयोग करे ?
प्राणाकर्षण की विधा सार्वभौम है। इसमें संप्रदायभेद, भाषाभेद, लिंगभेद आदि के कोई व्यवधान आड़े नहीं आते। यों इस विज्ञान के अनेकानेक भेद–उपभेद हैं और उन्हें विभिन्न कार्यो के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयुक्त किया जाता है, पर इन पंक्तियों में प्रांरभिक स्तर की वह प्रक्रिया ही वर्णित की गई है, जिसे सर्वसुलभ और सर्वजनीन कहा जा सके।
उस अभ्यास के लिए प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है, क्योंकि रात्रि के शांत समय में कोलाहल, प्रदुषण, अंधड़ की सभी अनुपयुक्तताएँ नीचे बैठे जाती हैं एवं जलाशयों-वृक्ष-वनस्पतियों द्वारा सोख ली जाती हैं। प्रभात के ब्रह्ममुहूर्त में प्रकृति अपेक्षाकृत अधिक सौम्य एवं शीतल रहती है। आध्यात्मिक साधनाओं के लिए वह समय इसी कारण सर्वोतम माना जाता है। यों अध्ययन, व्यायाम, आदि के लिए भी उस समय की अधिक अपयुक्तता है।
प्राणाकर्षण साधना खुली जगह में करनी चाहिए। शुध्दता जितनी अधिक रह सके, उतना उत्तम । आसन बिछाकर पुर्वाभिमुख बैठना चाहिए। समय सूर्योदय से एक घंटा पहले से लेकर एक घंटा बाद तक का रखा जा सकता है। मेरुदंड सीधा रहे। आँखे बंद। हाथ गोदी में। चित शांत। यह ध्यान मुद्रा है। प्राणायाम में भी इसी का प्रयोग किया जाता है।
भावना यह करनी चाहिए की सृष्टि में संव्याप्त वायु के साथ-साथ, जो प्राण-संपदा भरी हुई है, उसी को उभारना और खींचना अपना उद्देश्य है। तालाब में जिस प्रकार मछली रहती है, अपनी स्थति भी वैसी ही अनुभव करनी चाहिए कि प्राण-समुद्र चारों ओर लहलहा रहा है और अपनी स्थिति उसके मध्य मछली जैसी है। प्राण सब ओर से अपने भीतर प्रवेश कर रहा है। अपना चुंबकत्व उसे परिपूर्ण मात्रा में खींचकर अवशोषण कर रहा है। इसी मनःस्थिति में, भाव–धारणा में प्रायः दस मिनट रहा जाए।
इसके उपरांत प्राणायाम का क्रम चलता है। दोनों नथुनों से धीरे-धीरे साँस खींची जाए और उसे जितनी अधिक मात्रा में भरा जा सकता हो, भरा जाए। साथ ही यह संकल्प भी उभारना चाहिए कि साँस के साथ प्रचुर परिमाण में प्राणतत्त्व भी अंतराल में प्रवेश कर रहा है। इसी ऊर्जा अवतरण की अनुभूति किसी रूप में होती रहे, इसके लिए भावना-क्षेत्र को उद्यत एवं तत्पर करना चाहिए।
साँस खींच चुकने पर उसे भीतर रोका जाए। रोकने का समय खींचने से आधा रहे। इस समय भावना की जाए कि जो प्राण भीतर पहुँचा है, उसे जिवकोषों द्वारा खिंचा-चूसा जा रहा है और काया का प्रत्येक घटक उस ऊर्जा से अनुप्राणित हो रहा है।
अब साँस को छोड़ना आरंभ किया जाए। मान्यता अपनाई जाए की भीतर भरे अवांछनीय तत्त्वों का साँस के साथ बहिर्गमन हो रहा है और उस भार से पूरी तरह मुक्ति मिल रही है। हलकापन अनुभव हो रहा है।
पूरी साँस निकल जाने पर जितनी देर साँस भीतर रोकी गई थी, उतनी ही बाहर भी रोका जाए। अर्थात बिना साँस के रहा जाए और भावना की जाए कि संसार के बाहरी प्रभाव अपने स्थान पर रुक गए और अंतर्मुखी स्थिति सुरक्षति हो गई।
यह एक प्रयोग हुआ। इसे आरंभिक दिनों में न्यूनतम दस बार किया जाए। हर सप्ताह एक-एक प्राणायाम बढाया जाए। अंततः उसकी संख्या 25 तक पहुँचाई जाए। संख्या भले ही सिमित हो, पर उसके साथ भावना का गहरा पूट लगा रहे। प्राणयोग की सफलता का यही रहस्य भरा तत्त्वज्ञान है।
यह संसार पंचतत्त्वों द्वारा विनिर्मित है। आधुनिक विज्ञान इन तत्त्वों की संख्या, बारीकियों में उतरते-उतरते 100 के लगभग गिनाता हैं। यह पदार्थअन्य भौतिक सृष्टि हुई। अध्यात्मिकता चेतना को इस विश्व-ब्रह्मांड का मूल कारण मानती हैं। प्रकृति और पुरुष के संयोग से बने पंचप्राणों का विवेचन करती है। इन्हें ही आलंकारिक रूप से पंचदेवता कहा गया हैं।
प्राण विज्ञान एक स्वतंत्र विषय है। उसकी चर्चा करना अप्रासंगिक भी होगा और अनावश्यक भी। तत्त्व-चर्चा की विवेचना भी नहीं की जा रही है; वरन एक विषय पर प्रकाश डाला जा रहा है। जिसके संबंध में सर्वजनीन जानकारी उतनी विस्तृत नहीं हुई है, जितनी की होनी चाहिए थीं।
सूर्य भगवान के रथ में जुते हुए सात अश्वों की प्रतिमाएँ एवं छवियाँ उपलब्ध है। इन सात अश्वों को सूर्य की सात किरणें समझा जाना चाहिए। भगवान भास्कर से निःसृत वाली किरण-तरंगों की संख्या अपरिमित है। फिर भी उनमें से सात प्रमुख हैं। सप्तरंगों के मिल जाने से श्वेतवर्ण बनता है, इसीलिए भूतल पर बिखरने वाली धूप श्वेतवर्ण पतीत होती है। सूर्य का गोलक भी श्वेतवर्ण का है। सप्तरंगों के मिल जाने से श्वेतवर्ण का है। यह धवलता वस्तुतः सप्तवर्णों का वर्णन ही है।
संगीत के सप्तस्वर, सप्तधातु, सप्तपर्वत, सप्तसमुद्र, सप्तलोक आदि प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार सौरमंडल में संव्याप्त सूर्य की सात-किरणें भी। इतने पर भी श्वेतवर्ण के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इस समन्वय को आवश्यकतानुसार वर्गीकृत भी किया जा सकता है। वर्षा और धूप के समन्वय से इन्द्रधनुष दिखता है। जिसमें सातों रंग अलग-अलग और मिश्रित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं, तिकोने काँच में भी सात रंगों को झलकता देखा जा सकता है।
किसी रंग के काँच में होकर यदि धूप पार की जाय तो उसका वही रंग दिख पड़ेगा,जो तो काँच का था। शेष रंग बाहर ही रह जाएँगे। इसी प्रकार यह संभव हो सकता है कि सूर्य की उस रंग वाली किरणें नहीं ग्रहण की जाती हो जो अभीहट हो। पारदर्शी वस्तुएँ जिस भी रंग की होती हैं, उन्ही को नीचे उतरने देती है, शेष को ऊपर रोक लेती है। इस प्रकार जिस रंग को ग्रहण करना आवश्यक होता है, उसी को उपलब्ध करने की बात बन सकती है। पेड़ों के पत्ते हरे होते हैं, इसलिए वे उसी रंग को अपने भीतर प्रवेश करने देते हैं। इसी आधार पर उनमें आक्सीजन छोड़ने और कार्बनडाइ-आक्साइड सोखने की विशेषता उभरती है। जलाशय भी प्रायः हरा या नीला रग ही खींचते हैं। आकाश की नीलिमा भी विशाल ब्रह्मांड तथा नेत्रगोलकों का ऐसा ताल-मेल बिठाती है, जिससे नीला रंग संव्याप्त दिख पड़े।
सूर्य-किरण चिकित्सा इसी प्रकार पर विकसित हई है। रंगीन बोतलों में पानी भरकर धूप में रखा जाता हैं, बोतल वाले रंग के गुण पानी में आ जाते हैं। उसका अनुरूप सेवन करने से रोगों का निवारण संभव होता हैं। यह प्रभाव रंगे हुए कपड़े पहनने पर त्वचा माध्यम से शरीर के भीतर प्रवेश करता है। दीवारें, फर्नीचर आदि यदि किसी रंग विशेष से पूते हुए हो तो उनकाप्रतिविंब समीपवर्त्ती वातावरण पर पड़ता है। जँहा पारदर्शिता का अभाव है, वँहा रंगों से टकराकर किरणें छितराती और समीपवर्त्ती क्षेत्र को प्रभावित करती है। आँखों का आपरेशन होने पर हरे काँच का चश्मा पहनाया जाता है या उसी रंग के कपड़े का नकाब आँखों पर लगा दिया जाता है। तेज धूप में रंगीन चश्मा भी इसलिए पहना जाता है कि आँखों तक मात्र हलके रंग ही पहुँच पाए और प्रकाश का चकाचौंध न लगे।
मौलिक रंग तीन है— लाल, नीला, पीला। इनके न्यूनाधिक सम्मिश्रण से उनकी संख्या सात हो जाती है। इन तीन में बेंगनी, आसमानी, हरा, नारंगी और जुड़ जाते हैं। इन सबका अपना-प्रभाव है। नीला शीतल— शांतिदायक। लाल गरम। पीला सौल्य— पाचक। सम्मिश्रण में जिसकी न्यूनाधिकता है, उसी अनुपात से उनके परिणाम भी बदलते और घटते-बढ़ते रहते हैं।
यदि पारदर्शी उपकरण न हो, उनमें होकर धूप पार करने का प्रबंध भी न हो, किसी ठोस चीज को उस रंग से पोतकर उसका प्रभाव-ग्रहण करने की व्यवस्था भी न हो तो एक सरल उपाय यह अपनाया जा सकता है कि आँखें बंद करके उस रंग का ध्यान किया जाए। अपने सामने या चारों ओर उस रंग का आकाश-आवरण छाया हुआ अनुभव करने का अभ्यास किया जाए। आरंभ में इस प्रकार का ध्यान इसी रीति से जमना कठिन पड़ता है, बार-बार चित उचटता है, इच्छित रंग हटता और अनिच्छित उसके स्थान पर आ धमकते दिखाई पड़ते हैं। पर यह उथल-पुथल अधिक दिनों नहीं रहती। इच्छित रंग पर ध्यान जमने और उसका आवरण सामने ही नहीं चारों ओर भी छाया दिखने लगता है। यह दृश्य मात्र मनोरंजन नहीं हैं, वरन इसका चमत्कारी प्रभाव भी उत्पन्न होते देखा गया है। मस्तिष्क पर उसकी छाप पडती और प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है।
जिस समय गर्मी की अधिकता अनुभव होती हो, क्रोध चढ़ा हो, उत्तेजना छाई हों, तब नीले रंग का ध्यान करना उपयुक्त पड़ता है। यदि नीले पर्दे उपलब्ध हो तो दरवाजों और खिड़कियों पर उन्हें लटका देना चाहिए। ऐसी कल्पना भी की जा सकती है कि किसी सुविस्तृत जलाशय में नीला जल भरा है। हलकी-हलकी लहरें उठ रही हैं। उस पर तैरती नाव। नाव में लेटे, झपकी लेते, तैरते चले जा रहे हैं। यह ध्यान शीतलता और शांति प्रदान करता है। जिनकी प्रकृति उष्ण है, नकसीर फूटती है। रक्तचाप बढ़ा रहता हो, फोड़े-फुंसी निकलते हों, उनके लिए यह बिना दाम का उपचार सामान्य दवा-दारु की तुलना में कहीं अच्छा बैठता है। लाल रंग उष्णताप्रधान है। जिन्हें जुकाम, खाँसी, पसली का दर्द, गठिया जैसे अकड़न वाले रोग रहते हों, वे लाल रंग के ध्यान से उत्तेजना बढ़ती है और साहस उमंग देता है, आलसी प्रवृत्ति सक्रियता में बलती है। रक्ताल्पता में भी सुधार होता है।
अपचजन्य शिकायतों में पीला रंग उपयुक्त है। मन की चंचलता, उद्विग्नता, तनाव, वासनात्मक आवेश इस ध्यान से घटते हैं। यह प्रभातकाल के उदीयमान सूर्य का रंग है, उससे उत्साह उभरता है। संयम सधता है और मनःक्षेत्र में सात्विकता का अनुपात बढ़ता है।
यह तीन प्रमुख रंगों का विवेचन है। इनको हल्का गहरा कर देने पर तदनुसार उनका प्रभाव घट जाता है। जब इनमें से किन्हीं दो के मिलाने की आवश्यकता प्रतीत हो तो उनका सम्मिश्रित स्वरूप भी काम में लाया जा सकता है।
सामान्यतया श्वेत रंग के संपर्क में आना ही उचित है। यह सब आवश्यकताओं का संतुलन बनाए रहता है। सौर-ऊर्जा का परिपूर्ण लाभ तभी मिलता है, जब वह अपने साधारण स्वरूप में हो। पर जब शारीरिक-मानसिक स्थिति में विभिन्नता हो तो किसी विशेष रंग का उपयोग किया जा सकता है। आवश्यक नहीं कि इसके लिए पारदर्शी धूप में से रंग छानने वाली व्यवस्था जुटाना ही अनिवार्य है। आँखें बंद करके उस रंग के विस्तार का ध्यान करने से भी बहुत हद तक काम चल जाता है।
काँच के दर्पण में अपना मुख दिखा तो काया की दिव्य शोभा देखकर मनुष्य फूला न समाया, पर जब अपने आचरण को देखा तो घृणा और लज्जा से सिर नीचे झुक गया। शरीर इतना सुंदर और मन इतना कुरूप। विश्व के दर्पण में अपना मुख देखा तो अहंकार गल गया। कहाँ इस जगत की चिंतन से परे विशालता और कहाँ मैं नगण्य-सा तुच्छ राजकण।
और भी गहराई में प्रवेशकर जब अपने अंतरात्मा, जीवन सौभाग्य और उमंगें हाथ बाँधे खड़े हुए उज्ज्वल भविष्य को देखा तो हृदय के कपाट खुल गए। लगा, ईश्वर की पवित्रता का प्रतीक-प्रतिनिधि मैॆ ही हूँ। अपने को जाना तो धन्य हो गया। तब न काया का अहंकार शेष था, न मन की जिज्ञासा।
— अन्नातोले
जहाँ तक दृश्य इंद्रियों का प्रश्न है, देखने को प्रतियोगिता में मनुष्य से कहीं अधिक आगे गिद्ध वर्ग के प्राणी है। उनकी आँखें ऐसी होती हैं कि वे सुदूर आकाश में उड़ते हुए भी अपने शिकार को देख लेती है व एक झपट्टे में वे अपने शिकार को उदरस्थ कर लेती हैं। कान भी मनुष्य को एक सीमित डेसीबल तक की सुनिश्चित फ्रीक्वेंसी व एम्प्लीट्यूड तक ही ध्वनि-तरंगों को सुन सकने भर की सुविधा देते हैं। इसके अतिरिक्त भी इस विशाल आकाश में असंख्य प्रकार की ध्वनियाँ गतिशील रहती है; जिनके आधार पर पर न केवल सुदूर क्षेत्रों का घटनाक्रम समझा जा सकता है; वरन भूत और भविष्य के संबंध में भी जो हो चुका है, जो होने वाला है, उसे जाना जा सके। परंतु प्रकृति ने उसे सीमित स्तर की इतनी ही क्षमता प्रदान की है, जिसके सहारे वह अपने निर्वाह के लिए आवश्यक साधनों भर की जानकारी प्राप्त कर सके।
मनुष्य की आँखें सतेज मानी जाती हैं। वे रंगों को पहचान सकती हैं और बारीक अक्षरों वाली पुस्तक भी तेजी से पढ़ सकती हैं। इतने पर भी वे मछली की तरह गहरे पानी में खुली रहकर दूर-दूर के दृश्य नहीं देख सकती हैं। दूरबीन जैसी क्षमता भी उनमें नहीं हैं कि मीलों दूरी के दृश्यों को स्पष्टतया देख सकें। इस कारण जो दो इंद्रियाँ अधिक तीव्र है, उन्हें भी अकिंचन क्षमतासंपन्न ही कहा जा सकता है, इस सामर्थ्य को बढ़ाने के लिए इंद्रियाँशक्ति तो नहीं बढ़ सकी, पर रेडियो, टेलीविजन, दूरबीन जैसे उपकरण विनिर्मित कर लिए गए हैं, जिनकी सहायता से अपेक्षाकृत अधिक जानकारियाँ यह दोनों इंद्रियाँ दे सकती है। उनकी क्षमता अभी तो इतनी ही है, जिसे कि ज्ञान के महासागर में एक बूँद के समतुल्य समझा जा सके। आवश्यकता इनकी शक्ति-सामर्थ्य बढ़ाए जाने की भी है, यह वृद्धि मात्र इतनी ही नहीं चाहिए कि कुछ अधिक दूरी तक देखना या सुनना संभव हो सके; वरन यह विस्तार इतना आगे तक बढ़ना चाहिए कि प्रकृति के अंतराल में होने वाली हलचलों को भी देख एवं सुन सके। यह स्थिति तो अतींद्रिय क्षमताओं से उपलब्ध होती है। अतींद्रिय का अर्थ यह नहीं कि कोई अतिरिक्त शक्ति किसी अन्य माध्यम से उपलब्ध की या कराई जाती है; वरन यह है कि वर्तमान इंद्रियों का इतना अधिक उदात्तीकरण— निखार किया जाता है कि सामान्य ग्रहणशक्ति की तुलना में अधिक सूक्ष्मक्षेत्र में, अपनी पैठ पहुँचा सके।
आँखों का सूक्ष्मदर्शन-दूरदर्शन के रूप में प्रकट होता है। दूरबीनें तो कुछ ही दूर के क्षेत्र को देख पाती है, पर दिव्य चक्षु न केवल सारे भूलोक की स्थिति जान सकते हैं; वरन लोकांतरों की परिस्थितियों को भी जान सकते हैं। अपने भीतर भी जो महत्त्वपूर्ण शारीरिक, मानसिक क्रियाकलाप होते रहते हैं, उनका भी पता लगाया जा सकता है। यह चर्म-चक्षुओं की शक्ति का विस्तार नहीं है; वरन मस्तिष्क-रंध्र में विद्यमान आज्ञाचक्र का क्षमतासंपन्न होना है। इससे दूसरों के शरीर-मन को भी पढ़ा जा सकता है। इस आधार पर उन्हें भविष्य की तैयारी करने अथवा सावधान रहने, बचाव करने का परामर्श भी दिया जा सकता है। प्रकृतिगत हलचलों की पूर्ण संभावनाओं का ज्ञान रहने से तदनुरूप अपनी तैयारी कर सकना भी संभव हो सकता है।
कर्णेंद्रियों के अतींद्रिय पक्ष को जगाने के लिए नादयोग से भी अधिक स्वरयोग सरल पड़ता है। कानों में बाहरी शब्दों को पूरी तरह रोक सकना कठिन पड़ता है। रुई, कार्क या मोम की पोटली कान के छिद्रों में लगाकर अक्सर नादयोग के अभ्यासी बाहरी शब्दों का भीतर प्रवेश करना रोकते हैं; पर उससे आंशिक सफलता ही मिलती है। शब्द-ध्वनियाँ पूरी तरह रुक नहीं पातीं। कर्ण इंद्रिय नेत्रों से भी अधिक स्थूल है, इस लिए उनमें विकृतियाँ भी अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में और अधिक जल्दी उत्पन्न हो जाती हैं। अक्सर शोर-गुल वाले स्थानों में रहने से धीमा बहरापन शुरू होता देखा जाता है। वृद्धावस्था में नेत्रों की ज्योति जाने से पूर्व कानों की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक जल्दी और अधिक मात्रा में घटने लगती हैं। इन सब कारणों से सूक्ष्मकर्णेंद्रिय द्वारा की जाने वाली नाद-साधना कठिन पड़ती है। बाहर के शब्द रुक जाने पर भी भीतर शरीरगत हलचलों भी शब्द बनकर कानों के पर्दे से टकराने लगती हैं। रक्त-संचार, श्वास-प्रश्वास की क्रियाएँ रेलगाड़ी की धड़धड़ाहट या झरना-झरने, बादल गरजने जैसे आवाजें बन जाती हैं। वे होतीं तो समीपवर्ती क्षेत्र की ही हैं।, पर साधक अनुमान लगाने लगता है कि वह सूक्ष्मजगत के संकेत हैं। इस भ्रम में फँसे रहने पर शब्दमात्र सुनाई पड़ते रहते हैं। मस्तिष्क भी कर्ण माध्यम से प्रवेश हुए शब्दों को उतनी गंभीरता से नहीं पकड़ता। यही कारण है कि लोग बहुत सुनते रहने पर भी उसे देर तक स्मरण नहीं रख पाते। इस कान से सुना, उस कान से निकाला वाली उक्ति भी इसी कारण चरितार्थ होती रहती है। कर्णेंद्रिय माध्यम से नादयोग की साधना करते हुए दूर श्रवण की अतींद्रिय क्षमता भी कठिनाई से थोड़ी मात्रा में जगती है। फिर ब्रह्मम चेतना से संबंध जुड़ना, अनाहत नाद से संपर्क स्थापित करना कठिन हो जाता है। उसमें किन्हीं विरलों को ही अभीष्ट सफलता मिलती है। एकाग्रता का लाभ ही एक सीमा तक मिल पाता है।
नादयोग के लिए कर्णेंद्रियों संवेदनशीलता का सहारा लेने की अपेक्षा नासिका अधिक संवेदनशील भी मस्तिष्क के निकट भी और उस पर भीतरी या बाहरी शब्दों के आघात का कोई प्रभाव भी नहीं पड़ता। साथ ही 'सोऽहम्' साधना के माध्यम से नादयोग भी सध जाता है और इससे भी आगे शब्दब्रह्म के साथ संबंध जोड़ने का प्रयोजन भी पूरा हो सकता है।
'सोऽहम्' अजपा जप-साधना अपेक्षाकृत सरल भी है। कानों में बाहर के शब्दों का प्रवेश रोकने के लिए जिस प्रकार अवरोध लगाने पड़ते हैं, उस प्रकार की आवश्यकता नासिका मार्ग में नहीं पड़ती। शब्द के आवागमन से उसका कोई सीधा संबंध नहीं हैं। श्वास को गहरी खींचना और पूरी तरह उसे बाहर निकालने का उपक्रम श्वास विज्ञान की दृष्टि से भी शरीर के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। फेफड़ों को पूरी हवा मिलने से वे सुदृढ़ होते हैं। रक्त या आक्सीजन की अधिक मात्रा मिलने लगाने पर रक्त-संचार एवं रक्तशोधन की प्रक्रिया तेज होती है। जीवनी शक्ति बढ़ती है। यह प्रत्यक्ष लाभ हुए। परोक्ष लाभों में श्वसन-क्रिया के साथ जो सूक्ष्म 'सोऽहम्' ध्वनि प्रवाह चलता है, उसकी पकड़ करने पर श्वास की सीढ़ी पर चढ़कर मस्तिष्क के विभिन्न शक्तिकेंद्रों में से जिस पर भी पहुँचना हो, उस तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। इसके अतिरिक्त यह भी हो सकता है कि समस्त शरीर में दौड़ने वाली श्वास के साथ चेतना को जोड़कर जिस भी अवयव तक पहुँचना हो, उसमें सुधार-परिवर्तन करना हो, उसे किया जा सकता है। मेरुदंड षट्चक्र हैं। चौबीस नाड़ी गुच्छाओं के रूप में उपत्यिकाएँ शरीर के विभिन्न भागों में पाई जाती हैं। उनमें अपनी-अपनी दिव्य क्षमताएँ सन्निहित हैं। उन्हें कुरेदने, झकझोरने तथा गह्वर बनाने जैसे कितने ही वे कार्य किए जा सकते हैं, जो चमत्कारी सिध्दियों का उद्भव करते हैं। इस प्रकार 'सोऽहम्' साधना में नादयोग वाले सभी उद्देश्य पूरे हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राणवायु पर सवारी गाँठ कर शरीर में अवस्थित सभी दिव्य केंद्रों तक पहुँचना और वहाँ से गोताखोरों की तरह बहुमूल्य मोती निकालना भी सरल होता है। 'सोऽहम्' साधना अति सरल है। श्वास खींचते समय ‘सो’ की ओर निकालते समय हेम् की धारणा करनी पड़ती है। कुछ दिन के अभ्यास से यह भावना अपेक्षाकृत अधिक सरल होती चली जाती है और अभीष्टशब्द स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ने लगते हैं। इसके अतिरिक्त ब्रह्मांड के प्रतीक प्रतिनिधि इस कायपिंड में जो शक्ति-संस्थान विद्यमान है, उनकी प्रसुप्ति दूर करके जागृति का उद्देश्य भी पूरा होता है। नादबरह्म और शब्दब्रह्म दोनों की ही साधना सध जाती है।
ज्ञानेंद्रिय वर्गीकरण में जिह्वा को द्विधा इंद्रिय माना गया है। रसना और वाणी। वह दूहरे प्रयोजन पूरे करती है। स्वाद भी चखती है। और बोलती भी है। ठीक उसी प्रकार नासिका को भी सूक्ष्म आध्यात्मिक विज्ञान में द्विधा माना गया है। उसका प्रत्यक्ष कार्य श्वास-प्रश्वास है। उससे जहाँ आक्सीजन की ऊर्जा शरीर को मिलती है, वहाँ थोड़ा अधिक प्रयत्न करने पर प्राणशक्ति से भंडार भरने वाले प्राणायामों को भी साधा जा सकता है। प्राणवान अर्थात जीवट वाला। ओजस्वी, तेजस्वी, साहसी पुरुषार्थी। यह इन प्रत्यक्ष विशेषताओं को अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में संचित करने के लिए प्राणायामों की अनेकानेक विधियाँ है। उनके माध्यम से शारीरिक और मानसिक रोगों का भी निराकरण किया जा सकता है।
नासिका का दूसरा कार्य कषेत्र है— गंध। सामान्य जीवन में उसका बहुत थोड़ा उपयोग रह गया है। दुर्गंध से बचने और सुगंधजन्य प्रसन्नता प्राप्त करने भर की सुविधा नासिका द्वारा प्राप्त की जाती है। नाक की बनावट चेहरे की सुंदरता और कुरूपता में भी अपना योगदान करती है। बस यही है— नासिका का सामान्य उपयोग, जो इन दिनों सर्वसाधारण द्वारा किया जाता है; किंतु यह तो उपेक्षित एवं अविज्ञात वह विशेषता है, जो एक प्रकार से तिरोहित ही हो गई और मनुष्य एक भारी लाभ से वंचित रह गया।
अन्याय जीव-जंतुओं की शारीरिक-मानसिक आवश्यकताएँ प्रायः गंध द्वारा ही पूरी होती हैं। शरीर संरचना की दृष्टि से वे मनुष्य की तुलना में पिछड़े होते हैं। मानसिक क्षमता भी दुर्बल होती है। इतने पर भी उनकी घ्राणेद्रियाँ इतनी तीव्र होती हैं कि आवश्यक वस्तुओं को तलाशने और संकटों से बचने के लिए सभी प्रयोजन वे गंध के सहारे पूरे कर लेते हैं। प्रणय निवेदन और प्रजनन से संबंधित सारी व्यवस्थाएँ गंध के आधार पर ही चलाते हैं, वे न केवल अपना शरीरगत सूत्र-संचालन ही नहीं करते; वरन प्रकृति के उन अदृश्य रहस्यों को भी जान लेते हैं, जो मनुष्य के लिए अभी अविज्ञात एवं आश्चर्यजनक बने हुए हैं। शहद की मक्खी चींटी, दीमक, आदि कीड़ों के जीवनक्रम पर नजर डालने से ऐसा बहुत कुछ प्रतीत होता है; जिसमें वे मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में, कितने ही अतिरिक्त क्षेत्रों में आगे बढ़े-चढ़े हैं। छोटे कीड़े, जो छेद बना कर धरती में रहते हैं या पेड़-पौधों पर चिपके रहते हैं, उन्हें भी अपनी जीवनचर्या मात्र गंध के आधार पर निर्भर रखनी होती है। पारस्परिक पहचान अपने स्थान तक पहुँचने का बिना भटकाव वाला मार्ग, उन्हें गंध के ही आधार पर निर्धारित करना होता है।
मनुष्य की गंधशक्ति एक प्रकार से जीव-जंतुओं की तुलना में बहुत ही पिछड़ी हुई नगण्य स्तर की है। इसे यदि किसी प्रकार बढ़ाया जा सके और उसे महत्त्वपूर्ण प्रयोजनों में लगाया जा सके तो निश्चय ही मानवी क्षमता उसकी अपेक्षा कहीं अधिक विकसित स्तर की हो सकती है, जैसी कि आज है।
एक दरिद्र पंडित राज-दरबार में कुछ प्राप्त करने की इच्छा से पहुँचा। बोला— "मैं आपका अतिथि हूँ। मेरे उचित आतिथ्य की व्यवस्था कीजिए"
राजा चकित रह गया। "ऐसे फटेहाल को निमंत्रित किसने किया? यह अपरिचित किस प्रकार सत्कार के योग्य अतिथि बना?"
राजा ने परिचय पूछा और आगमन हेतु तथा आतिथ्य का दबाव देने का कारण बताने के लिए कहा पंडित मुस्करा दिया, बोला— "भूलते क्यों हैं। मैं आपका मौसेरा भाई हूँ।"
राजा का आश्चर्य और भी बढ़ा। कौन-सी मौसी का पुत्र है, यह व्यक्ति सो उनने उसकी माता का नाम और स्थान बताने के लिए कहा।
पंडित ने एक संस्कृत श्लोक सुनाया — आपद मम माता च, तव माता च सम्पदा। अपापद सम्पदे भ्गिन्यौ, तेनाहं तत्र बान्धवा ।
मेरी माता का नाम आपदा और आपकी माता का नाम सपदा। यह दोनों सगी बहने है। इसलिए हम दोनों मौसेरे भाई हो गए न?
धूप-छाव की तरह आपदा-संपदा के नियतिचक्र का राजा को स्मरण हो आया और आगंतुक की मौसेरा भाई जैसे सत्कार की व्यवस्था कर दी।
बालक नरेंद्र को अपने बचपन में एक खेल बड़ा ही प्रिय था। वह अपने साथियों को लेकर पास के बगीचे में चला जाया करता और घने पत्तों वाले आम के वृक्ष की एक मोटी डाली पर औंधा लटक जाता। साथी नीचे खड़े और ढंग के खेल खेला करते। बगीचे का माली डरा कि कहीं नरेंद्र उस पेड़ पर से गिर न जाए और हाथ-पाँव तोड़ न बैठे। सो उसने सब बच्चों को इकट्ठाकर कह— “देखो तुम उस पेड़ के नीचे मत खेला करो। वहाँ एक ब्रह्मराक्षस रहता है। कभी यह नाराज हो गया तो तुम लोगों को खा जाएगा।” ब्रह्मराक्षस क्या चीज होती है; बाबा !— "नरेंद्र ने जिज्ञासावश पूछा।"
“जो लोग किसी दुर्घटना में मारे जाते हैं। असमय में मरने के कारण भूत बन जाते हैं। असमय में मृत्यु होने से उनकी आत्मा इधर-उधर भटकती रहती है और लोगों को परेशान किया करती है"।— माली ने कहा।
“ तो उस पेड़ के नीचे कौन मारा गया था और कब? किसने उसकी हत्या की थी।”
“यह तो मुझे नहीं पता, बेटा!”
“तो फिर तुम्हें कैसे पता है कि वहाँ ब्रह्मराक्षस रहता है”? “लोग कहते हैं।”
“लोग तो कहते हैं, परंतु तुमने कभी उसे देखा है? “नरेंद्र एक के बाद एक प्रश्न किए जा रहा था। इन प्रश्नों को सुनकर माली घबरा उठा; क्योंकि वह एक प्रश्न का जवाब नहीं दे पता था की दूसरा प्रश्न तैयार मिलता है। सो घबड़ा कर वह बोला— “बेटा नरेंद्र! तुमसे बातों में तो भगवान ही जीते। मैं तो केवल इतना ही कहे देता हूँ कि तुम उस पेड़ के नीचे मत खेला करो। कल से कुछ हो गया, ब्रह्मराक्षस ने तुम्हें कुछ कर दिया तो मैं नहीं जानता।”
“अच्छा बाबा! अच्छा! नहीं खेलेंगे।" इतना नाराज क्यों होते हो— नरेंद्र ने कहा और अपने साथियों के साथ वहाँ से भाग चला।
उसी दिन शाम को नरेंद्र घर से गायब हो गया। पहले तो परिवार वालों ने सोचा कि वहीं-कहीं खेल रहा होगा; परंतु जब बहुत देर हो गई तो चिंता हुई। बच्चा बड़ा शरारती है, कहीं कोई दुर्घटना न हो गई हो; यह भय सबको सताने लगा। खोज-बीन हुई। नरेंद्र को मित्रों के घर तलाश किया। बालसखा तो सब चुपचाप सो गये थे। उन्हें उठा-उठाकर पूछा गया कि नरेंद्र को कहीं देखा था। सभी ने एक ही उत्तर दिया कहीं नहीं। उन बालसखाओं के अभिभावक भी चिंतित हो उठे क्योंकि चंचल और शरारती होने के कारण नरेंद्र उन्हें भी अपने बच्चों के समान प्रिय था। इसलिए उनकी भी नींद जाती रही और वे भी खोजबीन में लग गए। नरेंद्र के स्वभाव से परिचित किसी वृद्ध व्यक्ति ने पूछा— “आज नरेंद्र को किसी ने कोई काम करने से रोका था?” नहीं तो। और रोकने से मानता भी कहाँ है?” नरेंद्र के किसी निकट संबंधी ने कहा।
लड़कों से पूछा गया तो उक्त घटना का पता चल गया और सभी उसी आम पेड़ तले जाकर रुके, जिसमें कि माली ब्रह्मराक्षस का निवास बताया और आवाज लगाई— नरेंद्र! ओ नरेंद्र!
“मैं यहाँ हूँ बापू— ऊपर से नरेंद्र की आवाज आई।
“नीचे उतरो बेटा। सब लोग कैसे परेशान हो रहे हैं।" और नरेंद्र नीचे उतरा तो पूछा कि, "वहाँ क्या कर रहे थे?" नरेंद्र ने बताया— “ब्रह्मराक्षस की प्रतीक्षा। मैं उससे मिलना चाहता हूँ।”
चलो भाई घर चलकर सोओ। यहाँ कोई राक्षस-वाक्षस नहीं रहता। माली ने तुमसे झूट बोला था और नरेंद्र को घर ले जाया गया। सत्य को जानने के लिए निर्भीक जिज्ञासु, यही नरेंद्र आगे चलकर स्वामी विवकानंद के नाम से विश्वविख्यात हुआ, जिसने सब धर्मो का तत्त्व निचोड़ एक वाक्य के रूप में कहा— 'निर्भीकता और साहसिकता'।
विश्वविख्यात “रीडर्स डाइजेस्ट” पत्र-समूह की ओर से एक पुस्तक प्रकाशित हुई है “फेक मिथ्स एण्ड लिजेण्ड्स ऑफ ब्रिटेन” उसमें इस प्रकार की प्रेतात्माओं का वर्णन है; जिन्हें किंवदंती, भ्रम या अफवाह कहकर हँसी में नहीं उड़ाया जा सकता। घटनाओं में उन प्रेतों का जिक्र है, जो अपने अस्तित्व का प्रत्यक्ष परिचय सतत देते और अपनी उपस्थिति का भान कराते रहे हैं। पुस्तक में इंग्लैण्ड के डाॅरसेट स्थित सेनफोर्ड ऑर कास नामक बंगले का जिक्र है, जिसमें कितने ही प्रेतों का आवागमन बना रहता है। वे वहाँ उपस्थित लोगों से वार्त्तालाप भी करते हैं और जरूरत की चीजों का आदान-प्रदान भी।
“बुक ऑफ फैक्ट्स एण्ड रिकार्ड्स” में ओल्डविक थियेटर की उस घटना का उल्लेख है, जिसमें शेक्सपियर की आत्मा कुछ समय तक डेरा डाले बैठी रही।
'ईस्टर्न इस्क्वेयर लाइन' नामक वायुयान कंपनी में एक बार दुर्घटना हुई थी, उसमें प्रायः 100 यात्री मारे गए थे। वह घटना अपने समय की चर्चा बनकर समाप्त हो गई। कंपनी चलती रही और उसके दूसरे वायुयान उड़ते रहे। आश्चर्य यह देखा गया कि अधजले शरीर बोलती-चालती स्थिति में उसी कंपनी के जहाजों में बिना टिकट सफर करते पाए गए। वे अपने लिए कोई सीट सुरक्षित नहीं कराते और न कहीं एक जगह बैठते हैं। कभी-कभी किसी परिचारिका की ट्रे में से कोई खाने-पीने की वस्तु उठा लेते हैं। घटना की प्रामाणिकता जाँचने और उसे रोकने के कई प्रयत्न किए गए, पर उनसे कोई काम न चला। सिलसिला समय बीतने पर रुक गया।
एक मृतात्मा ने अपने कत्ल करने वालों का तब तक पीछा न छोड़ा, जब तक उन्हें फाँसी का दंड नहीं मिल गया। घटना डरहम की है। एक आटाचक्की चलाने वाले व्यक्ति जेम्स ग्राहम के सम्मुख एक घायल युवती प्रकट हुई। उसने अपना नाम 'ऐना वेरीना' बताया और कहा— ‘मुझ पर अवैध संबंध के लिए दबाव डालने में असफल रहने पर हत्यारों ने, जिनके नाम थे— वाकर और शार्क, कुल्हाड़ी से फाड़कर लाश को कोयले की खदान के खड्ड में फेंक दिया है। मैं चाहती हूँ कि हत्यारों को दंड मिले।”
चक्कीवाला ग्राहम उस घटना की सूचना न्यायाधीश को देने के लिए प्रेतात्मा के बार-बार जोर देने पर मुश्किल से तैयार हुआ। पुलिस ने जाँच की। हत्या के प्रमाण और उपकरण सभी मिल गए। इस पर वाकर और शार्क दोनों को मृत्यु दंड की सजा हुई। घटना का विवरण मृतात्मा ने ही बताया था और वही पुलिस को सबूत जुटाने में सहायता करती रही।
उत्तरी आस्ट्रेलिया के बिरडम नगर में ‘थ्री लेन ओमेन’ होटल में कुछ डाकुओं ने उर्सुला नामक युवती को लूटा और उसका गला दबोच कर मार डाला। खानापूरी के बाद लाश दफना दी गई, पर उर्सुला की विक्षुब्ध प्रेतात्मा होटल पर बहुत समय तक कब्जा जमाए रही। जो भी कमरा खाली देखती, उसमें वह पैर फैलाकर आराम करने लगती। होटल के नौकर किसी खाली कमरे का ताला खोलते हुए डरते थे और घंटी बजाने के बाद उसमें प्रवेश करते। उन्हें ऐसे चिह्न मिलते, मानो उसमें से कोई अभी-अभी उठकर गया है। उसने भी अपने को लूटने वाले डाकुओं से उसी होटल में बदला लिया। मारे दहशत के एक की मृत्यु हो गई, दो ने आत्महत्या कर ली।
इंग्लैण्ड के सफाॅक नगर में एक बँगला है— वीलिंग हाउस। उसमें अदृश्य आने-जाने वालों की हरकतें तो अक्सर होती रहती थीं, पर एक बार तो वहाँ विचित्र घटना घटी। रात को बारह बजे अचानक घंटी बजने लगी। दरवाजा खोलकर देखा गया तो बाहर कहीं कोई नहीं था। घंटी तब भी बजती रही। बिजली की कोई खराबी समझकर उस लाइन का कनेक्शन काट दिया गया। पूरी लाइन से बिजली हट गई तो भी घंटी बजती ही रही। पूरे दो दिन तक मिस्त्री, इंजीनियर इसका कारण जानने और ठीक करने में लगे रहे, पर वे न तो कोई कारण समझ सके और न आवाज ही बंद कर सके। कई दिन बाद वह शोर अपने आप ही बंद हुआ।
प्रेतों का आवागमन कब्रिस्तानों, फाँसीघरों, श्मशानों व घटना स्थलों के अतिरिक्त जहाँ अधिक मात्रा में देखा जाता है, वे हैं— अस्पताल। मरने वालों में से बहुत से ऐसे होते हैं, जिन्हें अस्पतालों में ही प्राण त्यागने पड़ते हैं। वहीं देर तक उनकी लाश रखी भी रहती है। पोस्टमार्टम भी होते हैं। इन कारणों से मृतात्माओं का लगाव प्रायः उस क्षेत्र से हो जाता है। बीमारी के दिनों में भी तो वे बहुत समय जहाँ रहते हैं। असली घर की तुलना में, यह अस्पताल ही मरने के दिनों उनका घर बन जाता है। ऐसी दशा में उनका वहाँ लगाव होना आश्चर्य की बात नहीं है। संवेदनशील कर्मचारियों में से कइयों को कुछ दिन पूर्व अकाल मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति उस क्षेत्र में टहलते या कराहते दीखते हैं। यह उनकी मानसिक दुर्बलता अथवा स्थान से जुड़ी लोकमान्यता भी हो सकती है। एण्डरवुल अस्पताल में एक नर्स थी, उसके जिम्मे बेहोशी की दवा सुँघाने का काम था। एक बार उसकी गलती से दवा का डोज अधिक दे दिया गया और वह उसी कारण मर गया। नर्स को अपनी भूल पर बड़ी ग्लानि हुई। उसने अस्पताल के ही एक कमरे में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इसके उपरांत उस अस्पताल में कोई भी डॉक्टर बेहोशी की दवा देने आता, जो मृत नर्स की आत्मा डाक्टर या नर्स के कंधे पर हाथ रखकर कानों में कहती— “प्रिय! असावधानी न हो।”
लंदन के सेन्ट थॉमस अस्पताल में एक बूढ़ी नर्स उन रोगियों की असाधारण सेवा करती, जो मृत्यु के मुख में जाने वाले होते। उनके प्रति वह सहानुभूति भी करती और सिरहाने बैठ कर मदद करने वाली परिचर्या भी करती। पानी माँगने पर पानी लाकर देती। मल, मूत्र त्यागने की इच्छा होती तो उसकी व्यवस्था स्वयं करती। वह मात्र रोगी को ही दीख पड़ती थी। अन्य कोई पास से गुजरने पर भी उसे देख न पाता। जब कभी उसकी उपस्थिति की चर्चा होती तो अनुमान लगा लिया जाता कि दूसरे ही दिन रोगी की मृत्यु होने वाली है।
वस्तुतः मरने के बाद कितने ही लोग तो शांतिपूर्वक अगली यात्रा पर चल देते हैं। पर कई ऐसे होते हैं, जिन्हें पूर्वजीवन से असाधारण लगाव होता है— अथवा मरण के समय उनकी मनःस्थिति विक्षुब्ध होती है, वे उससे मुक्त नहीं हो पाते और प्रेतात्मा के रूप में शरीरांत वाले स्थान के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं।
एक यात्री संयोगवश कल्पवृक्ष के नीचे जा पहुँचा। उसके नीचे बैठते ही हर मनोकामनाएँ पूरी होती थीं।
यात्री प्यासा था। पानी चाहा तो सुराही भरकर ठंडा जल आ गया। भूख लगी और भोजन चाहा तो व्यंजनों का थाल सामने था। झपकी आई और सोने का साधन चाहा तो ऊपर से सजी हुई शैया उतर पड़ी। कामना और जगी और सेविका चाही तो पेड़ पर से एक रमणी टपक पड़ी।
एक के बाद एक कामना पूरी होते देखकर भय लगा, कहीं इस पेड़ पर भूतों का डेरा न हो। सोचने भर की देर थी कि भूतों का समुदाय समाने आ गया और डरावने नृत्य करने लगा।
भय बढ़ा। यात्री ने अनुभव किया, अब मौत सामने है। यह लोग मिल-जुलकर खा ही जाएँगे। वैसा ही हुआ। देखते-देखते प्रेतों की मंडली टूट पड़ी और उसे काट-काट कर खा गई। यह संसार कल्पवृक्ष है। अपने संकल्प ही अंकुरित होते और वृक्ष बनकर सामने आते हैं।
बाजीगरी का व्यवसाय करते और अपने चमत्कारी करतबों से असंख्यों का मनमोहने वाले फ्रांसीसी ऐमिल ग्रेविए का, एक बार मन आया कि उदरपूर्णा का साधन जुटाने वाले साधनों को ही आजीवन नहीं पकड़ना चाहिए; वरन कुछ ऐसा भी करना चाहिए, जिससे जनसाधारण पर अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व की छाप छोड़ी जा सके।
बहुत दिनों विचार करने के बाद उसने सोचा कि अमेरिका के नियाग्रा जल-प्रपात के ऊपर रस्सी बाँधकर उसके ऊपर चलकर दिखा दिया जाए और लोगों की दृष्टि से असंभव समझे जाने वाले इस कार्य को संभव कर दिखाया जाय। इसके लिए उसने अपने घर के समीप ही वैसे अभ्यास आरंभ कर दिए। प्रायः एक वर्ष उसमें लग गया, पर इतने भर से उसे विश्वास हो गया कि वह संसार के सबसे बड़े नियाग्रा जल-प्रपात के ऊपर बिना किसी सहारे के चलकर दिखा सकता है। उसने इस अनोखेपन का विज्ञापन शुरू किया तो पढ़ने वालों ने किसी उन्मादी का मखौल या आत्महत्या का प्रयास ही समझा। तो भी यह सोचकर कि ऐसा अचरज आँखों देखने का फिर कभी अवसर न मिले, देखने वाले लाखों की संख्या में जमा हो गए।
प्रपात के दोनों छोरों पर मजबूत खंभे गाड़े गए और उनके बीच एक साधारण मोटाई का रस्सा कस दिया गया। प्रपात के किनारे पर पहुँचकर उसने धीरे-धीरे रस्से पर चलना आरंभ कर दिया। संतुलन ऐसा सही बना रहा कि न तो रस्सा लहराया और न यात्री लड़खड़ाया। मध्यम चाल से चलते हुए उसने, वह रास्ता पार कर लिया। दर्शक इसे असंभव का संभव होना देखकर हर्षोंमत्त हो गए।
ऐमिल ग्रेविए ने उसी समय दूसरे दिन इससे भी बड़े जोखिम भरे खेल दिखाने की घोषणा कर दी। आज कल की अपेक्षा भी दूनी संख्या में लोग थे। तमाशा आरंभ हुआ। वह दो पायों की एक कुर्सी भी साथ लेता आया, जहाँ चाहता वहीं रस्से पर उसे टिका देता और सरकस के कलाकार की तरह कुर्सी पर चलता। उलटा चलकर दिखाता और नाचता-फुदकता भी पर नियंत्रण कभी नहीं खोया। यह प्रदर्शन कल के साधारण से कई गुना खतरनाक था। जब वह रस्से से नीचे उतरा तो लोगों ने उसे नोटों की मालाओं से लाद दिया। प्रचुर धन उपहार में मिला। यहाँ उसने तीसरे प्रदर्शन की घोषणा की। एक आदमी पीठ पर बिठाकर ले चलेगा। जो उसकी पीठ पर बैठेगा, मिलने वाली उपहार-राशि में से आधी वह उसे देगा। उस विराट भीड़ में से एक ही आदमी निकला— ब्लाँदा। उसने पीठ पर बैठना स्वीकार कर लिया। दोनों चल पड़े, पीठ पर चढ़े व्यक्ति ने अभी आधी भी दूरी पार न की थी कि उसको प्रपात की भयंकरता और रस्सी के अविश्वास का भय लगा। वह घिघियाने लगा। पीठ पर से उतरने की जिदकर जान बचाने की प्रार्थना करने लगा। इस नई मुसीबत से बाजीगर का भी धैर्य टूटने लगा। ऐसी असंतुलन की जोखिमभरी हरकत से दोनों के ही नीचे गिरने का डर था। शारीरिक व मानसिक संतुलन बनाए रखकर उसने सवार की आँखों पर पट्टी बाँधी। उसे अपनी छाती के साथ कसकर बाँध किसी प्रकार ढाढ़स दिलाते हुए, दूसरे किनारे तक वे दोनों पहुँच गए।
इस प्रदर्शन से उसकी ख्याति भी बढ़ी, धन भी मिला। वायदे के अनुसार सवार ब्लाँदा को उसका हिस्सा दे दिया गया, किंतु इस अवधि में जो भय उसके मन-मस्तिष्क पर छाया रहा, उसने ऐसी दहशत ब्लाँदा के मन में बिठा दी कि वह 'डिप्रेशन' व भय की स्थिति से ग्रस्त हो अस्पताल में भरती हो गया। सारा जीवन उसका अस्पताल में ही बीता।
लोग इन दोनों घटनाओं के संबंध में तरह-तरह की चर्चा करतें रहें। ऐमिल ग्रेविए ने उनका समाधान करते हुए कहा कि “यह मनोबल और संतुलन की सफलता थी”, जो पागल हुआ, उसकी मनःस्थिति एवं ऐमिल की जीवट व साहसिकता की समीक्षा करने वाले मनःशक्ति की दो भिन्न प्रकार की परिणतियाँ देखकर आश्चर्यचकित थे।
संसार के जल-थल में, कितने साँप रहते हैं? यह कहना तो कठिन है। निश्चय ही वे मनुष्यों से कहीं अधिक होंगे। खोजकर्त्ताओं ने उसकी हजार प्रजातियों का विवरण तैयार किया है। इनमें से मात्र 400 प्रजातियाँ जहरीली पाई गईं। अर्थात छः पीछे पाँच निर्दोष और एक को विषैला कहा जा सकता है। विषैले सर्पों का काम मनुष्यों को काटना और मार डालना ही नहीं है। वे भी अन्य कीड़े-मकोड़े की तरह डरपोक होते हैं और आदमी की आहट पाकर बचने-भागने और छिपने का प्रयत्न करते हैं।
साँप का क्रोधी स्वभाव तो है, पर वह उसे उतारता तभी है, जब कोई उसे छेड़ता-टोकता है अथवा उसे यह अनुभव हो कि मुझ पर आक्रमण होने वाला है, तब वह अपने बचाव के लिए आक्रमण कर बैठता है। उसके दाँत पोले होते हैं उनकी जड़ में एक थैली होती हैं, जिसमें जहर धीरे-धीरे जमा होता रहता है। जब वह अपने पोले दाँत किसी में चुभोता है तो विष कोथरी पर दबाव पड़ता है और दाँतों के रास्ते जहर उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है, जिसे काटा गया है। यदि जहर ऊँचे दर्जे का है तो मौत जल्दी हो जाती है। कम शक्ति का विष हो तो अफीम का नशा चढ़ने जैसी खुमारी प्रतीत होती है। ऐसे रोगी पर विष का प्रभाव उपचार से अथवा शरीर की जीवनीशक्ति द्वारा निरस्त हो जाता है। अति जहरीले साँप अफ्रीका के जंगलों में पाए जाते हैं। वह फनधर कहलाता है। जब सिर ऊँचा करके लहराता है, तो उसके फन पर गाय के खुर जैसा सफेद गोलाकार निशान उभर आता है। इसके नीचे सर्पमणि पाई जाने की किंवदंती है। वस्तुतः जंतु विज्ञान के अनुसार साँप के सिर, फन, मुँह या किसी हिस्से में कोई मणि नहीं होती।
सर्प की शक्ल देखते ही लोग बौखला जाते हैं और उसे मारने दौड़ते हैं, उसे शत्रु समझा जाता है, पर साथ ही मित्र भी है। सर्प पालने के संसार में अनेकों बड़े-बड़े फार्म हैं। उनमें उनका विष दुहा जाता है। जो सोने से भी अधिक मोल का बिकता है। उससे दमा, हैजा आदि की औषधियाँ बनाई जाती हैं। बुद्धिमत्तापूर्वक पाला जाए तो शत्रु प्रतीत होने वाले से भीं, मित्र जैसा लाभ उठाया जा सकता है। साँप के संबंध में अनेक किंवदंतियाँ हैं। वह छेड़ने वाले से बदला लेकर छोड़ता है। खजाने की रखवाली करता है। बीन की धुन मस्त होकर सुनता है। उसे सपने में देखा जाए तो मृत्यु का संदेश समझा जाता है। इन सभी बातों में कोई सचाई नहीं है। सर्प बहरा होता है। बीन हिलाने पर, वह भी उसे दुसरे सर्प की तरह समझता है और उसके आक्रमण से बचने के लिए हिलने की हरकत पर दाँव-पेंच लड़ाता है। खजाना पहचानने की बुद्धि उसमें कहाँ है? सीलन भरे अँधेरे स्थानों में कीड़े-मकोड़े अधिक होते हैं। उनसे अपना पेट भरने के लिए ऐसे स्थानों में जा पहुँचता है। कभी संयोगवश वहाँ किसी को खजाना मिल गया होगा और तभी से, यह किंवदंती चल पड़ी होगी कि सर्प खजाने की रखवाली करता है।
छोटे कीड़ों को खाना और पचाना उसने लिए सरल है। इसलिए वह जिन खेतों, घरों, झोपड़ियों में जा विराजता है, वहाँ उसकी गंध पाते ही हानिकारक कीड़े भाग खड़े होते हैं या उसकी खुराक बन जाते हैं। चूहे आदि बड़े जंतुओं को भी वह खाकर हमारी हानि बचाता रहता है। इतना लाभ तो प्रत्यक्ष ही है कि उसे देखने या गंध पाने पर कीड़े उसके इर्द-गिर्द से पलायन कर जाते हैं।
साँप के मुँह में, कदाचित पूँछ में भी जहर पाया जाता है। इसे काट-पीककर कहीं-कहीं लोग मध्य भाग की तरकारी बनाते व उसे खाते हैं। जहर मनुष्य की जीभ में होता है। कटुभाषण, अपमान, निंदा, चुगली आदि की आदत पड़ने पर मित्रों की संख्या घटती और शत्रुओं की बढ़ती जाती है। तब उससे वे साँप की तरह बचते हैं या उसका सिर कुचलते हैं।
योगशास्त्र में सिद्धियाँ प्राप्त करने के अनेक उपाय-उपचारों का वर्णन है। उनमें से एक औषधि का भी उल्लेख है। औषधि से तात्पर्य वनौषधि से है; क्योंकि वे अविकसित प्राणधारी वर्ग में सम्मिलित की जा सकती हैं। वे संवेदनशील भी होती हैं और संवेदनाओं की संग्राहक भी। उन्हें भाव-चेतना से अभिमंत्रित किया जा सकता है, इस योग्य बनाया जा सकता है कि किसी महाप्राण के प्राण-चेतना को अपने में संधारण कर सके। किसी दूसरे सत्पात्र तक पहुँचा सके, जिन्हें अध्यात्मबल की विशिष्ट उपलब्धि कहे जा सकें।
यज्ञ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। अग्निहोत्र में मात्र औषधियों को जलाकर, उसकी ऊर्जा मात्र से ही चमत्कारी परिणाम नहीं होते; वरन भविष्य को दिव्य मंत्रों से अभिमंत्रित करके, उसे एक ऐसा पदार्थ बनाया जाता है, जिसमें प्राण-चेतना का गहरा संपुट लगा हुआ पाया जा सके।
मंत्रशक्ति मात्र कुछ शब्दों का उच्चारण ही नहीं होता; वरन उसके साथ प्रयोक्ता की विशेष साधना द्वारा विशेष प्रकार की शक्ति उत्पन्न करके शब्दों के साथ संपुटित करना होता है। अभिमंत्रित किया गया पदार्थ ही हविष्य कहलाता है। उसे यज्ञाग्नि में यजन करके सशक्त ऊर्जा के रूप में परिणत किया जाता है। इस ऊर्जा का व्यक्ति पर, वातावरण पर, लक्ष्य पर प्रहार किया जाता है। यज्ञाग्नि भी चूल्हे में जलने वाली अग्नि से भिन्न होती है। उसे भी नियम कर्मकांडों के साथ अभिमंत्रित किया जाता है। इस प्रयोजन में जो काष्ठ होमा जाता है, उसे समिधा कहते हैं। यह रूप तब बनता है जब निर्धारित वृक्षों से, नियत विधि से, उसे उपलब्ध किया जाए और मंत्रों द्वारा विशिष्ट प्रकार के प्राण से विशेष प्रकार की क्षमता से, उसे संपंन किया जाए। वातावरण शुद्धि के लिए अथवा लोक-चेतना जगाने वाले वृहत यज्ञों में भी और व्यक्तिगत प्रयोजनों के लिए किए गए यज्ञों में भी इस विधा का अपने-अपने ढंग से अपने-अपने स्तर पर प्रयोग किया जाता है। अग्निहोत्र में प्रयुक्त होने वाला समस्त सरंजाम मंत्रशक्ति की अवधारणा से अपने को सचेतन स्तर पर विकसित करता है, तभी उसके समुचित लाभ मिलते हैं। यदि भट्टी में आग जलाकर औषधिमात्र को सामान्य रीति से जला दिया जाए तो उसका धूम्र यत्किंचित ही प्रभाव उत्पन्न करेगा। वह लाभ न मिल सकेगा, जो यज्ञ-प्रक्रिया का होना चाहिए।
विचारणा और भावना के परिशोधन के लिए, आत्मबल बढ़ाने के लिए, चमत्कारी सिद्धियाँ उत्पन्न करने के लिए यज्ञों की विशेष महिमा बखानी गई है। पर उसे यथार्थ रूप में तभी देखा-पाया जा सकता है, जब उसमें किसी प्राणवान, प्रवीण, पारंगत द्वारा शाकल्य को अभिमंत्रित किया गया है, उसमें विशेष प्राण भरा गया हो। इस आवश्यकता की उपेक्षा करके अभीष्ट लाभ प्राप्त करना संभव नहीं होता।
कायाकल्प जैसे प्रयोगों में अन्य उपचारों का यत्किंचित ही योगदान होता है। वस्तुतः उस समूची प्रक्रिया का हर पक्ष मंत्रशक्ति से अनुप्राणित किया जाता है। तभी उसकी वह परिणति होती है, जो शास्त्रों में महात्म्य रूप से विस्तार के साथ बताई गई है। सामान्य भोजन और भगवान के प्रसाद में मौलिक अंतर यही है कि खाद्य को प्रसाद बनाते समय उस में भावनाओं का, प्राणशक्ति का, मंत्रविद्या का समुचित विधिवत प्रयोग किया जाता है।
शारीरिक रोगों में आयुर्वेद के अनुसार वनौषधियों का प्रयोग होता है। इसका उपचार विधान प्रस्तुतिकरण में अपनाया जाता है। यदि सही वस्तुओं का सही रीति से प्रयोग किया गया तो उसका लाभ भी वैसा ही मिलता है, जैसा कि शास्त्रकारों ने बताया हैं। इस प्रयोजन में भी यदि उपचार सामग्री अभिमंत्रित की गई हो तो उसका लाभ और भी अधिक मिलता है।
शारीरिक क्षेत्र से आगे चलने पर मानसिक क्षेत्र आता है। उसमें भी अनेकों विकृतियों का परिकर घुसा बैठा होता है। अविकसित मस्तिष्क के कितने ही मंदबुद्धि भी होते हैं। कइयों में कई प्रकार की सनकें पाई जाती हैं। वे अस्त-व्यस्त ढंग से बहकते रहते हैं और अनगढ़ आचरण करते हैं। मनोविकारग्रसितों में आवेशों, आवेगों की बहुलता देखी गई है। उद्धत, उद्दंड, क्रोध, चिड़चिड़े, शंकालु, ईर्ष्यालु, चिंतित, निराश, भयभीत रहने वालों की भी कमी नहीं। उन्हें तिल का ताड़ बनाने की आदत होती है। राई को पर्वत समझ बैठते हैं और स्वयं हैरान रहने के साथ-साथ दूसरों को हैरान करते हैं। विक्षिप्तों, अर्धविक्षिप्तों की बात अलग है। ऐसे लोगों का मानसिक स्तर कभी-कभी यहाँ तक जा पहुँचता है कि उन्हें खुला छोड़ते नही बनता । पागलखानों में पहुँचना पड़ता है। असामान्य, अस्वाभाविक ढंग से सोचने वाले, शिष्टाचार का उल्लंघन करने वाले और अव्यावहारिक समझे जाने वाले लोग प्रायः मानसिक रोगी ही होते हैं। उन्हें समझा बुझाकर भी सही रीति-नीति अपनाने के लिए सहमत नहीं किया जा सकता। डराना-धमकाना भी काम नहीं देता। दवा-दारु से नींद भर लाई जा सकती है या और कुछ सामयिक समाधान किया जा सकता है। इस स्थिति में पड़े हुए लोग एक प्रकार से निरर्थक भारभूत जीवन जीते हैं। संबंधियों की चिंता का ठिकाना नहीं रहता। काम का हर्ज होने के कारण, जो क्षति उठानी पड़ती है, वह भी ऐसी होती है कि उसे कष्टसाध्य रुग्णता की तुलना की जा सके, समता दी जा सके।
इस स्थिति के निराकरण में अभी तक काम में लाए गए उपचारों में से कोई इतना कारगर नहीं हुआ कि उस पर संतोष किया जा सके और सुधार की आशा लगाई जा सके। बात यह है कि इस स्थिति की जड़ें अंतर्मन में बहुत गहरी जमी होती हैं। दवा-दारु से लेकर शल्यक्रिया तक उस मर्मस्थल तक नहीं पहुँच सकतीं। पुरातनकाल में ऐसे आध्यात्मिक उपचार थे, जो मनोविकारों को ही नहीं, कुसंस्कारों तक को बदल सकते थे। स्वभाव एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते थे।
यह दिव्यौषधि के साथ सम्मिलित की गई प्राण-चेतना ही है, जो मानसिक विकृतियों का शमन-समाधान करती है। आंतरिक सुधार-परिष्कार की व्यवस्था बनाती है। मनोरोगों का उनसे निराकरण होता है। भस्म, भभूत के माध्यम से कई सिद्ध पुरुष आपत्तिग्रस्तों की सहायता करते देखे गए हैं। यह कार्य अभिमंत्रित दिव्यौषधियों के माध्यम से और भी अधिक सरलता के साथ हो सकता है। जहाँ अन्य उपचार असफल रहते हैं, वहाँ प्राणवानों का प्राण व्याधिग्रस्त के अंतराल तक पहुँचकर उसे संकट से उबारता है। इस मंत्रमार्जन में दिव्य औषधियाँ सशक्त माध्यम का कार्य संपन्न करती हैं।
मनःक्षेत्र से आगे का कार्यस्थल अंतःकरण है। उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तो अपना-अपना काम करते देखे ही जाते हैं। साथ ही भाव-संवेदनाएँ और आस्थाएँ गहराई तक जड़ें जमाए रहती हैं। कामना आकांक्षा, अभिरुचि एवं संचित संस्कारों की शृंखला का भी गहराई तक जमे होने का यही क्षेत्र है। व्यक्तित्व का स्तर एवं स्वरूप इसी मर्मस्थल में अपनी विशिष्टता का परिचय देता है। मनुष्य में जो भले-बुरे गुण, कर्म स्वभाव पाए जाते हैं। उन्हें अतःकरण की स्थिति का प्रतिबिम्ब ही समझा जा सकता है। आस्था के, अनास्था के बीजांकुर यहीं उगते और समयानुसार पल्लवित, फलित होते हैं। इन्हें सुधारना, सामान्य धर्मोपदेशों-सत्परामर्शों से भी संभव नहीं। यहाँ तक कि सज्जनों का सत्संग-संपर्क भी कारगर परिवर्तन कर सकने में समर्थ नहीं होता। दुष्टों की दुष्टता दुराग्रह बनकर अड़ी रहती हैं। ऐसे व्यक्ति सज्जन किस प्रकार बन पाएँ, यह एक टेढ़ा सवाल है। लंका के असुर अंत तक दुष्ट ही बने रहे। कौरवों की चौकड़ी, दैत्य-दानवों की मंडली अपनी निकृष्टता को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर प्राण जाने तक अपनाए रही।
इस पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि संचित एवं परिपक्व स्तर की हो जाने पर भी पतनोन्मुखी प्रवृत्ति को नहीं ही बदला जा सकता। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे अनाचारियों का भी कायाकल्प जैसा परिवर्तन हुआ है। बिल्व मंगल, अंगुलिमाल, अजामिल, चंड, अशोक आदि के रूप में ऐसे कितने ही उदाहरण हैं, जिनके अपने स्वभाव में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। वे भ्रष्ट से श्रेष्ठ बन गये।
यह प्राण-प्रहार की प्रतिक्रिया है। यह एक महाप्राण के व्यक्तित्व से उछालकर विकृत प्राण में प्रवेश कर सकती है और ऐसा चमत्कारी प्रभाव दिखाती है, जिसे महापरिवर्तन कहा जा सके। इस प्रकार के प्रयोगों को अध्यात्मबल की महान मानवी सेवा या समाजसेवा भी कहा जा सकता है।
सर्प-नेवले की लड़ाई में नेवला बीच-बीच में दौड़कर समीपवर्ती विषनिवारण वनस्पति खाता रहता है। उसी आधार पर वह आक्रांता सर्प का विष उतारता है और अपने में इतनी शक्ति उद्भव करता है कि क्लांत होते हुए भी दुर्दांत शत्रु को पछाड़ सके। ठीक यही प्रक्रिया वे महाप्राण भी संपन्न करते हैं; जिन्हें असुरता, अवांछनीयता को निरस्त करना है।
इसके लिए अन्य साधनाओं के अतिरिक्त आहार, मेवे, ऐसे वनस्पतियों को भी सम्मिलित करते हैं, जो शारीरिक-मानसिक ही नहीं आध्यात्मिक-क्षेत्र को भी संभालने-सुधारने में समर्थ होती है। उच्चस्तरीय महाप्राण का संग्रह-संकलन करने में दिव्यौषधियों के सेवन की असाधारण भूमिका होती है। इस प्रयोग का लाभ सहज-सुलभ रीति से ही उठाया जा सकता है। महर्षि पिप्पलाद पीपलवृक्ष के फल ही खाकर निर्वाह करते थे। अन्यान्य ऋषि-तपस्वियों ने अपना आहार आँवला, बिल्व आदि को ही बनाया था।
पूर्ण निर्भरता न सही, वनौषधियों में से जो, जिसके लिए सूक्ष्मदर्शियों द्वारा निर्देशित है, सीमित मात्रा में सेवन करते रहने पर भी वे अलौकिक लाभ से लाभांवित हो सकते हैं। यह व्यवस्था मात्र प्राण-चेतना के अभिवर्ध्दन में ही कारगर नहीं होती, वरन उससे सामान्यजन भी कष्ट-निवारण और शक्तिसंवर्ध्दन का समुचित लाभ उठा सकते हैं।
उड़ीसा के दीवान कृष्णचंद्र सिंह बड़े विलासी थे। उनके जीवन का लक्ष्यमात्र इंद्रिय सुख में लिप्त रहना था। जब उनकी भौतिकता की अति हो गई तो पत्नी ने कहा भी “अभी अपना सारा पुण्य इस जन्म में ही समाप्त कर देंगे या अगले जन्म के लिए भी कुछ एकत्रित करेंगे। अगले जन्म में आप कुछ पा सकें इसके लिए अभी से परमार्थ-परायण बनिए, आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखिए।”
पत्नी की बात से कृष्णचंद्र सिंह ऐसे ही हँसकर टाल दिया करते थे, परंतु एक घटना ने उनका जीवन ही बदल दिया। एक बार कृष्णचंद्र जंगल के रास्ते से आ रहे थे। रास्ते में किसी गरीब की कुटिया थी। लड़की अपने चारपाई में पड़े हुए रोगी पिता से कह रही थी— “बाबूजी, रात घिर आई, आपने अभी तक दीपक नहीं जलाया।”
वृद्ध ने उत्तर दिया— ’बेटी! जीवन की रात्रि भी निकट है। यदि मैंने सत्कर्मों का दीपक जलाया होता, समय रहते अपने जीवन का सदुपयोग किया होता तो आज मेरी यह स्थिति न होती। मैंने अपने जीवन को भोग-विलास में व्यर्थ गँवाया। उसी के परिणामस्वरूप मैं आज व्याधियों से घिरा हुआ मरणासन्न दयनीय स्थिति में पड़ा हूँ। लगता है कि मेरा अगले जन्म का खाता भी शून्य ही होगा।
यह कहकर, वह वृद्ध विलाप करने लगा। कृष्णचंद्र ने वृद्ध में अपना भविष्य प्रतिबिम्बित पाया। वे सोचने लगे कि यदि में भी समय रहते नहीं, चेता तो मेरी स्थिति भी इस वृद्ध जैसी ही दयनीय होगी।
इस विचारधारा ने कृष्णचन्द्र का जीवन ही बदल दिया। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दीन-दुःखियों और असहायों को दान दे दी और स्वयं तपोवन में जाकर साधना करने लगे।
इक्कीसवीं सदी कि लिए लोग बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाए बैठे हैं, सोचते हैं— वैज्ञानिक सुख-सुविधाएँ अब की तुलना में बहुत अधिक बढ़ जाएगी। कम्प्यूटर मनुष्य के दिमाग का काम कर दिया करेंगे और शरीर को टानिकों के आधार पर स्वस्थ रखा जाएगा। उत्पादन इतना अधिक होगा, वेतन इतना अधिक बँटेगा कि किसी को किसी बात की कठिनाई नहीं रहेगी। सब लोग खुशहाली भोगेंगे।
पर यह सोचने वाले भूल जाते हैं कि बीसवीं सदी के शेष महीनों का जंगल इतना बड़ा पड़ा है कि उसे पार करने में नानी याद आएगी। यदि तृतीय विश्वयुद्ध हुआ तो यह बीसवीं सदी के अंत तक ही निपट लेगा। उसके लिए इक्कीसवीं सदी तक की प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी।
वर्तमान और भावी परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए समय के मूर्धन्य पर्यवेक्षकों ने अपने-अपने ढंग से अनुमान लगाए हैं। इनमें से अधिकांश निराशावादी हैं और वे निकट भविष्य में आने वाले संकटों को ही बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। उनकी आशंकाएँ तर्कों और तथ्यों पर अवलंबित हैं। पर कुछ ऐसे भी हैं, जो विश्वास करते हैं कि समझदार मनुष्य ऐसी नासमझी न करेगा; जिसे अपने पैरों कुल्हाड़ी मारना कहा जा सके। विपत्ति की बेला आने से पूर्व ही वह अपने कदम वापस लेंगे और उस राह पर चलेंगे, जो उसे किसी लक्ष्य तक पहुँचाती है।
सुखद भविष्य की मान्यता रखने वाले कितने ही व्यक्ति हैं। उनमें से एक हैं— हडसन इन्स्टीट्यूट के निर्देशक, श्री हरमन कान। उनने अपनी पुस्तक “दि नैक्स्ट 200 ईयर्स- 'ए सोनेटरी फॉर अमेरिका एण्ड वर्ल्ड' में यह बताने का प्रयत्न किया है कि बढ़ता हुआ विज्ञान, युद्ध को असम्भव बना देगा। उसे आत्महत्या की सामूहिक नीति अपनाकर ही लड़ा जा सकता है। लेखक विश्वास करते हैं कि ऐसा समय किसी की कल्पना या योजना में भले ही हो, पर वह कठिनाइयों को देखते हुए कभी कार्यांवित, चरितार्थ न हो सकेगा।
इसी मत की पुष्टि विश्व-परिस्थितियों के विश्लेषणकर्त्ता विद्वान विलियम ब्राउन-लियन्मार्टेल आदि ने की है। वे वर्तमान समस्याओं और संकटों की यथार्थता तो स्वीकार करते हैं, पर साथ ही यह भी मानते हैं कि पिछले दो युद्धों का अंत जिस प्रकार संधि के रूप में हुआ, इस बार भी विनाश के निकट पहुँचते-पहुँचते विश्वनेता कोई कामचलाऊ संधि कर लेंगे। जिससे समय भय भी बना रहे और प्रगति के लिए किया जाने वाला कार्य भी न रुके।
अभी तक पृथ्वी का दोहन हुआ है। उसी पर पड़े या गढ़े खनिजों का, दृश्यमान प्रकृतिसंपदा का, दोहन हुआ है। समुद्र 70 प्रतिशत है और समुद्र का आयतन 70 प्रतिशत यह दो तिहाई भाग न तो निरर्थक है और न इस योग्य कि उसे उपेक्षा के गर्त्त में डाले रखा जाए। अब मनुष्य का ध्यान इस ओर मुड़ेगा तो जहाँ-तहाँ उभरे टापुओं की अनगढ़ भूमियों को भी विकसित किया जा सकेगा। जैसा कि जापान का एक छोटा जखीरा प्रगति और परिस्थितियों को तालमेल मिलाकर देखने से अनुपम दीख पड़ता है। धरती पर अभी इतनी जमीन बाकी है, जिन पर सैकड़ों नए जापान बसाए जा सकें और उन्हें हर दृष्टि से समृद्ध किया जा सके। समुद्र में प्राणीसंपदा, रसायन और वनस्पतियाँ इतनी अधिक हैं कि वे हजारोंवर्षों तक मनुष्य की निर्वाह समस्या का समाधान कर सकती हैं। समुद्रतल पर तैरती हुई बस्तियाँ बनने और स्थिर एवं गतिशील बनाए जा सकने की पूरी-पूरी संभावना है। ऐसी दशा में जिस भूमि या व्यवसाय को लेकर इन दिनों जो आपा-धापी चल रही है, उसकी उत्पादन, अभिवर्ध्दन बढ़ जाने की दिशा में कुछ भी आवश्यकता न रहेगी। लोग छीन-झपट की अपेक्षा वैज्ञानिक आधार पर अपने सुविधा साधन बढ़ावेंगे। नएपदार्थ विनिर्मित करेंगे। जैसे कि प्लास्टिक के इतने अधिक विकास की गुंजाइश है कि उसकी मजबूती को देखते हुए मकान, रेल, वायुयान ही नहीं विशालकाय कारखाने भी खड़े किए जा सकें। धातुएँ कम पड़ जाने की स्थिति में उसका स्थान कृत्रिम प्लास्टिक ग्रहण कर लेगा। यही बात अन्य क्षेत्रों में भी होगी। ऊर्जा का दोहन सूर्य से होगा और समुद्र का खारी पानी मीठा बनाकर पेय आवश्यकता की पूर्ति तथा भूमि सिंचाई के निमित्त सहज ही काम में लाया जा सकेगा।
तब मकान ही नहीं खेत भी कई मंजिले बनने लगेंगे। इससे कृषि उत्पादन की भूमि की समस्या का समाधान निकल आवेगा। पर्वत भी निरुपयोगी नहीं रहेंगे। नदियों का पानी समुद्र तक पहुँचने से पूर्व ही रोककर मानवी प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त कर लिया जाया करेगा। कचरे की समस्या, उसे भूमि में दबाकर सड़ाने या खाद बनाने के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहेगा।
इस प्रकार अभी जहाँ गतिरोध दीख पड़ता है, वहाँ ऐसे नये स्रोत हाथ लगेंगे, जिनके सहारे पृथ्वी पर सैकड़ों हजारों वर्षों तक बिना किसी नई खोज से सुखपूर्वक रहा जा सके।
फ्राँसीसी लेखक सेवास्तिया मर्सिये ने अपनी पुस्तक “ला 2800” में अगले 800 वर्षों का खाका खींचा है और कहा है कि जनसंख्या वृद्धि का पूर्ण नियंत्रण न होने पर भी इस पृथ्वी में इतनी गुंजाइश है कि आगत 800 वर्षों तक बिना किसी कठिनाई के अब की अपेक्षा अधिक सुविधा भरा जीवन जीने का अवसर मनुष्य को मिल सके।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जब जीवित थे तब उन्होंने भी अपनी कल्पना थोड़ी आगे तक दौड़ाई थी और अगले दिनों को अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर बताया था।
अमेरिका की ‘फोवर्स’ पत्रिका में विश्व पर्यवेक्षण संबंधी मसला ही प्रधान रूप में रहता है। उसने बदलते हुए राजनैतिक परिवेश को देखते हुए भविष्यवाणी की है कि अब के मूर्धन्य देश जिस प्रकार अपनी शक्तियों का अपव्यय कर रहे हैं, उसे देखते हुए वे अगले दिनों खोखले हो जाएंगे और नवोदित राष्ट्रों में से कई ऐसे उभरेंगे जो अपनी सुदृढ़ता का लाभ न केवल स्वयं उठायें वरन् उन्हें देशवासियों को देते हुए सार्वभौम प्रगति में अपना कहने लायक योगदान दे सकें। ‘फोवर्स’ के अनुसार 21 वीं सदी में भारत विश्व की मूर्धन्य शक्ति होगा और वह अस्त्रों के बल से नहीं, अपनी नैतिकता और साहसिकता के सहारे उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच चुकेगा। उसके पास प्राकृतिक सम्पदा के इतने स्रोत अगले दिनों भी बने रहेंगे कि वह अपना तथा दूसरों का भला कर सके।
शान्तिवादी ‘एफेयर्स’ का कथन है कि आज की समस्याओं की ओर से हम सतर्क भर रहें। तैयारी पूरी समय की करें। वे तैयारियाँ इतनी मूल्यवान होंगी जिनकी
अपने समय की प्रख्यात लेखिका मेरी स्टोव किशोरावस्था में बहुत सुन्दर लगती थी। इसकी चर्चा और प्रशंसा भी बहुत होती थी। इस पर लड़की को गर्व रहने लगा और वह इतरा कर चलने लगी।
बात पिता को मालूम हुई। तो उन्होंने बेटी को बुलाकर प्यार से कहा- बच्ची किशोरावस्था का सौंदर्य प्रकृति की देन है। इस अनुदान पर उसी की प्रशंसा होनी चाहिए।
तुम्हें गर्व करना हो तो साठ वर्ष की उम्र में शीशा देखकर करना कि तुम उस प्रकृति की देन को लम्बे समय तक अक्षुण्य रख कर अपनी समझदारी का परिचय दे सकीं या नहीं।
तुलना में आज की समस्याओं से जूझना खिलवाड़ प्रतीत होगा। मनुष्य की बुद्धि, प्रतिभा और दक्षता की परीक्षा अगले दिनों होगी, जब वह उलझनों की सुलझाने और प्रगति का नया पथ-प्रशस्त करने के लिए अपने कौशल का श्रेष्ठतम उपयोग करने की परीक्षा में उतरेगा। विश्वास किया जाना चाहिए कि हम पीछे नहीं हट रहे, आगे बढ़ रहे हैं। हम खड्ड में गिरने की अपेक्षा पर्वत शिखर पर चढ़ने की बात सोचेंगे और लगन तथा तत्परता बनाये रख कर हम अभ्युदय के लक्ष्य तक पहुँच कर भी रहेंगे।
द्रुतगति से चले। तेजी से आगे बढ़ो। अंधड़ की तरह आसमान पर छा जाएँ, ऐसी महत्वाकांक्षा अनेकों के सिर पर भूत की तरह सवार रहती है। उन्मादी की तरह स्वार्थ-साधन के लिए कुछ भी कर गुजरने की आतुरता भरती है। शराबी की तरह व्यक्ति की विचारशीलता का अपहरण कर लेती है। खुमारी में अधिक और अधिक की रट लगी रहती है। फिर परिणाम उसका कितना ही खेदजनक क्यों न हो।
साथी वाहनों को पीछे छोड़कर आगे निकल जाने और सब को पीछे रहने का उपालंभ देते हुए अपनी महत्ता की छाप छोड़ने के लिए आतुर बना देना, यही महत्वाकांक्षा का सर्वविदित स्वरूप है। इसे अपनाकर व्यक्ति इतनी हड़कंप मचाता है कि रात में नींद नहीं आती और दिन में तारे दीखते हैं।
मनुष्य की सामान्य गति सीमित है। फिर परिस्थितियाँ भी एक पर ही अनुग्रह नहीं करतीं। उन्हें सभी का ध्यान रखना होता है। वर्षा हो तो माली को मजा आए। धूप पड़े तो कुम्हार का लावा पके। इस संसार में स्वार्थों के बीच टकराव रहता ही है। जो अपना पारा की प्रतीक्षा करते हैं अपनी लाइन में चलते हैं और तनिक अग्रगमन के लिए धैर्य रखते हैं, वो ही शांति का रसास्वादन करते और दूसरों को शांति से रहने देते हैं। जिन पर आतुरता सवार है, जो चुटकी बजाते कुछ से, कुछ बनना चाहते हैं। कहीं से, कहीं पहुँच जाने के लिए व्याकुल हैं, वे पाते कम और गँवाते बहुत हैं। सबको छकाना और स्वयं सितारे छूना इतना सरल नहीं है जितना कि अतिवादी, बचकाने लोग सोचते हैं। परी की कहानियाँ बालविनोद का काम दे सकती हैं, पर दृश्य जगत में परियाँ नहीं देखी जातीं। सामान्य महिलाएँ ही पीहर और ससुराल के घरों में अपनी कर्मठता के आधार पर गृहलक्ष्मी बनकर रहती हैं।
कड़कती बिजली के साथ गाज गिर सकती है। कइयों की जान ले सकती है और ओले गिराकर फसल को मरोड़ सकती है, पर वह नहीं कर सकती कि फुहारों वाली वर्षा, खेत की जमीन में गहराई तक प्रवेश करके फसल लहलहाने का निमित्त कारण बनती है।
स्वाति की बूँदें सदा नहीं बरसतीं। वे अपने नियत क्षेत्र की प्रतीक्षा में रहती हैं और समय पर धीमी गति से बरसती हैं, अंधड़ की दौड़ में नहीं पड़तीं। शरद ऋतु का निर्मल आकाश मिलने के लिए प्रतीक्षा करती हैं। धीमे बरसती हैं और सीधी धार में इस प्रकार उतरती हैं कि सीप के पेट में गिरें। बाँस के देह से तालमेल बिठाएँ और वंशलोचन के रूप में मूल्यवान रसायन उपभोक्ताओं को लाभांवित करें।
कम बरसना, उपयुक्त अवसर के लिए प्रतीक्षा करना, सीधी चाल चलना स्वाति बूँदों का स्वभाव है। वे अंधड़ के साथ पैज नहीं लड़ातीं, न किसी कि भूलें ही स्वीकार करती हैं और न अपनी किसी के सामने प्रस्तुत करती हैं वे उतावी होंती ; क्योंकि मह्त्त्वकांछओं से, अपने को बचा लिया होता है।
महत्वाकांक्षाएँ दुर्घटनाएँ प्रस्तुत करती हैं। अपने आप को क्षति पहुँचाने वाले टकराव में उलझकर कोई नफे में नहीं रहा। जल्दी उभरने की आतुरता कभी-कभी दावानल की तरह प्रचंड होती तो देखी जाती है, पर उसके पल्ले सिर्फ राख का ढेर ही पड़ता है।
भगवान कृष्ण ने किसी बात पर प्रसन्न होकर कुंती से वरदान माँगने को कहा।
कुंती बोली— "मुझे कठिनाइयों से जूझने और समस्याएँ सुलझाने का अवसर सदा मिलता रहे।" कृष्ण ने आश्चर्य से पूछा— "ऐसा तो कोई नहीं माँगता।"
कुंती का उत्तर था— "तभी तो लोग साहसी, दूरदर्शी और प्रतिभावान नहीं बन पाते। कष्टों का अपना स्वाद और प्रतिफल है।"
जिस वस्तु, व्यक्ति या समुदाय की उपेक्षा, अवज्ञा, अवहेलना होती है, वह सहज की घटता-मिटता चला जाता है। भारत का पशुधन और वनक्षेत्र इसीलिए सिकुड़ता जा रहा है कि उनकी उपस्थिति की तुलना में समाप्त होने की बात अत्यधिक लाभदायक समझी जाती है। वन कट गए तो क्या? उनसे खाली हुई जमीन, खेती के, मकान, कारखाने बनाने के काम आएगी। पशु समाप्त हो चले तो क्या? उनके लिए घिरने वाला स्थान और खपने वाला चारा दूसरे काम आएगा। यह तर्क तात्कालिक लाभ के प्रति अत्यधिक आतुरता प्रदर्शित करता है। यह भुला दिया जाता है कि बाद के परिणाम क्या होंगे? वन न रहने पर लकड़ी की जो कमी पड़ेगी, वायु-प्रदूषण अवशेषित न हो सकेगा, भूक्षरण होगा, बाढ़ आएगी, रेगिस्तान बढ़ेगा, बादल बरसने में हलकेंगे आदि हानियों को नजर अंदाज करके, लोग चोरी या सीनाजोरी से पेड़ काट डालने, नफा कमा लेने जैसा कुछ खोजते हैं। पशुओं को कसाई के हाथ सौंपकर रुपए गिनते हैं, पर यह नहीं देखते कि उनके घटने पर दूध, श्रम, गोबर आदि की जो कमी पड़ेगी, उसकी क्षतिपूर्ति कैसे संभव होगी। अदूरदर्शिता मानवी समझ पर छाया हुआ एक कलंक है। जिसके कारण उसे हर क्षेत्र में न पूरी हो सकने वाली हानि उठानी पड़ती है। खेत में बोए जाने वाले बीज को भूनकर चबैने की तरह स्वाद लेते हुए चबाया जा सकता है, पर इसके बाद खेत खाली पड़ा रहने पर फसल के दिनों खाली हाथ रहना पड़ेगा, इसको भुला दिया जाता है। पाठ्य-पुस्तकें बेचकर सिनेमा देखने वाले विद्यार्थी, शिक्षालाभ से वंचित रहते हैं और जीवन भर गई−गुजरी स्थिति में दिन काटते हैं।
ऐसी ही एक अदूरदर्शिता जनसमुदाय पर यह छाई हुई है कि लड़की पराया घर बसाती है, अपने घर नहीं रहती। कमाई तो लड़का खिलाता है और इसलिए दूसरे के घर जाने वाले कचरे को पालने-पोसने में क्यों खर्च किया जाए? उसकी साज-संभाल में ध्यान देने का क्यों कष्ट किया जाए? जब विवाह में खर्चना ही पड़ेगा तो उसे पढ़ाने-लिखाने में क्यों खर्च किया जाए? उसको स्वास्थ्य पर भी उतना ध्यान नहीं दिए जाता; क्योंकि मर जाने में नफा जो प्रतीत होता है। पालन-पोषण का, शिक्षा का, शादी का सारा खर्च जो बचता है, उसके लिए ध्यान देने का झंझट भी नहीं रहता। यही है, वह अदूरदर्शिता, जिसके कारण नारी की उपेक्षा-अवमानना होती रहती है। कन्याएँ तो आमतौर से इस अवहेलना की शिकार होती हैं।
अपने देश में लड़का जन्मने की खुशी मनाई जाती है। प्रीतिभोज होते और ढोल-दमागे बजते हैं; किंतु लड़की जन्मने पर लुट जाने जैसा सन्नाटा छा जाता है। उसकी जन्मदात्री तक को ताने-उलाहने सहने पड़ते हैं। उपेक्षा न केवल बालिका पर; वरन उसकी माता पर भी बरसती है। बड़े होने पर लड़की-लड़के के बीच हर बात में भेद-भाव किया जाता है। भोजन, वस्त्र, शिक्षा, विनोद, आदि सभी में अंतर प्रत्यक्ष-परिलक्षित होता है। विशेषतया उपेक्षित पक्ष को अपनी स्थिति पर मन-हीं-मन अंतर्व्यथा सताने लगती है। उसके मन में आत्महीनता की ग्रंथि बन जाती है। जिसके कारण सदा अपने आप को दुर्भाग्यग्रस्त, पददलित पक्ष का एक घटक अनुभव करती है। यह मान्यता आजीवन बनी रहती है और प्रतिभा निखरने की, कोई महत्त्वपूर्ण पुरुषार्थ करने का, साहस उससे बन ही नहीं पड़ता। वह अपने लिए, न परिवार के लिए न समाज के लिए उतनी उपयोगी नहीं हो पाती, जितनी कि समता और दुलार के वातावरण में पलकर हो सकती थी।
बात बढ़ते-बढ़ते बहुत आगे तक चली गई है। सामंतवादी युग में कन्या अपहरण का, उसी कारण लुटेरे के आक्रमण होने का अंदेशा निरंतर बना रहता था। यदि वैसा न हुआ तो विवाह में सामर्थ्य से बाहर खर्च करना पड़ता था। इन सब झंझटों से बचने के लिए यह उपाय अपनाया जाने लगा कि कन्या को जन्म लेते ही मार दिया जाए। यह कार्य सरल था। प्रसव कराने वाली दाइयाँ इस कला में प्रवीण होती थी। परिवार के दबाव पर उन्हें गला घोट देने जैसा कृत्य करने में हिचक नहीं होती थीं। इस निमित्त कुछ अतिरिक्त उपहार जो मिल जाता था। इस प्रयोजन के लिए अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रकार के तरीके अपनाए जाते थे। दूध के साथ अफीम घोलकर पिलाने में भी यही काम बन जाता था। जन्मते ही मरने पर किसी को पता भी नहीं चलता था और चर्चा का विषय भी नहीं बनता था।
यह प्रचलन देखा-देखी सभी बिरादरियों में चल पड़ा। आरंभ में वह लड़ाकू उच्च वर्णों से चला था, पर पीछे सभी सोचने लगे कि कमाऊ लड़कों को ही बचाकर रखा जाए और लड़कियों का झंझट हटा दिया जाए। अंग्रेजी सरकार के जमाने में कन्या शिशुओं का वध एक आम बात हो गई थी। इसे रोकने के लिए समाज-सुधारकों ने प्रयत्न किया, शासकों ने सहयोग दिया। 'फलस्वरूप दुख्तरकुशी, निरोधक कानून' बना। तो भी छुपे-छुपे वह प्रसंग चलता ही रहा और जहाँ-तहाँ अब भी उसे निष्ठुर वर्गों में अपनाया जाता है।
सोचने योग्य बात यह है कि इस प्रचलन से किसने, क्या पाया? अपने घर-परिवार में वधुएँ आती हैं और गृह-व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाती हैं। पति के लिए वे अर्धांगिनी बनती हैं, गृह-लक्ष्मी की भूमिका निभाती हैं, नई पीढ़ी को जन्म देतीं और उन्हें समुन्नत बनाती हैं। यदि दूसरे परिवार अपनी लड़कियों को नष्ट करके या उपेक्षित रखें तो अपने घर में सुयोग्य गृह-लक्ष्मियाँ कहाँ से आएँ? जो पक्ष घटता जाएगा, उसका अकाल पड़ेगा और उस उपलब्धि के लाभ में लाभांवित हो सकना संभव न होगा।
नर की तुलना में नारी का संख्या अनुपात तेजी से घटता जा रहा है। इस तथ्य की जानकारी कुछ दिनों की गणना पर दृष्टिपात करने भर से सहज प्रकट हो जाती है। सन् 1901 में एक हजार लड़कों पीछे 972 लड़कियाँ थीं। 1911 की जनगणना में अनुपात और गिरा । वे हजार पीछे 964 रह गई। 1921 में वे हजार पीछे 955 ही रह गई। 1931 में 950, 1941 में 946, 1951 में 946, 1961 में 941, 1971 में 930 व 1981 में 931। उत्तर भारत में यह असंतुलन और भी अधिक बढ़ा-चढ़ा है। पंजाब 1170 लड़कों के पीछे 1000 लड़कियाँ हैं। तमिलनाडु में लड़कों की तुलना में 70, 80 लड़कियाँ कम हैं।
आवश्यकता अधिक और उत्पादन कम होने पर महँगाई और प्राप्त करने वालों की आपा-धापी बढ़ती है। वह दिन दूर नहीं, जब इसी प्रकार उपेक्षित पक्ष की कमी होते जाने पर लड़के वालों को घर बसाने के लिए लड़की वालों के सामने पल्ला पसारने और नाक रगड़ने की आवश्यकता पड़ेगी। हो सकता है कि उन्हें खाड़ी देशों की तरह लड़कियाँ प्राप्त करने के लिए उतनी ही बड़ी लंबी रकम देनी पड़े जैसी कि इन दिनों भारत में लड़के वाले कन्या पक्ष से बड़े नाज-नखरे और रौब-दौब के साथ वसूल करते हैं। जो उतनी भरपाई नहीं कर सकेंगे, जो रूप रंग कमाई की दृष्टि से हल्के पड़ते होंगे; उन्हें तो कुंवारे रहने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न रहेगा।
प्रकृतिक्रम के अनुसार हर प्राणिवर्ग में नर की तुलना में मादा की उत्पत्ति अधिक होती है, क्योंकि उसे प्रजनन का दबाव सहने के कारण नर की तुलना में अधिक शक्ति खर्चनी पड़ती है। इस कारण उसकी मृत्यु भी अधिक होती है। आयु भी कम रहती है। इस संकट का सामना करने के लिए यह प्रबंध अनिवार्य हो गया कि क्या मादा की उत्पत्ति नर की संख्या से अधिक हो और समानता का संतुलन बना रहे।
पर यह उपक्रम अब मनुष्य जाति में क्रमशः उलटा होता चला जा रहा है। नर बढ़ रहे हैं और नारियाँ घट रही हैं। इसका कुप्रभाव परिवार-व्यवस्था, दांपत्य-जीवन, वंश-परंपरा आदि सभी क्षेत्रों में प्रतिकूल पड़ेगा। यह संकट नर ने जानबूझ कर खड़ा किया है। नारी के साथ उपेक्षा-अवज्ञा बरतकर उनको मनोदशा की इस स्थिति में पहुँचाया है कि वे निराश रहें, जीवन का महत्त्व न देखें। यह मनोदशा विकास पथ में अवरोध उत्पन्न करती है। दुःखी प्राणियों को त्रास से उबारने के लिए प्रकृति उनका अस्तित्व घटाना आरंभ कर देती है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव आँखों के सामने प्रस्तुत देखा जा सकता है। नारी की संख्या क्रमशः घटती चली जा रही है। विक्षुब्ध रहने की स्थिति बनी रहने पर वह और भी अधिक तेजी से घटने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं है।
कोढ़ में खाज की तरह नारी के अस्तित्व को इन्हीं वर्षों में एक नया संकट पैदा हुआ है। गर्भकाल में भ्रूण के लिंग का निर्धारण बना देने वाले उपकरणों का चिकित्सा-क्षेत्र में आविर्भाव हुआ है। इस “एम्नियोसेण्टेसिस” द्वारा गर्भकाल में ही यह पता लगाया जा सकता है कि भ्रूण लड़की है या लड़का। मध्यकालीन मान्यता अभी भी सर्वसाधारण के मन पर जमी हुई है कि लड़के का जन्म सौभाग्य है और लड़की का होना दुर्भाग्य। दुर्भाग्य से छुटकारा हर कोई चाहता है। कोई विरले ही अभिभावक चाहते हैं कि उनके घर लड़की जन्मे लाभरहित बोझा सिर पर लदे। दूसरा बचाव भी अब कानूनी गर्भपात के रूप में निकल आया है। अनिच्छित भ्रूण को गर्भपात द्वारा हटाया जा सकता है। इसके लिए कितने ही चिकित्सा संस्थान काम करते हैं। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार अभिभावकों में से बहुसंख्यक कन्याभ्रूण का गर्भपात करा देते हैं। परीक्षण और गर्भपात में जो थोड़ा-सा धन लगता है, उसकी तुलना में कन्या जन्मने और उसके भरण-पोषण, शिक्षा-शादी आदि के झंझट से छुटकारा पाने जैसी बात सोची जाती है। इस प्रकार इन दिनों इस नए आधार पर कन्या से भ्रूणकाल में ही छुटकारा पा लेना अधिक सरल हो गया है।
बंबई में एक सर्वेक्षण के अनुसार 7000 भ्रूण, जो नष्ट किए गए उनमें मात्र एक लड़का था। एक अन्य आकलन के अनुसार सन् 1978 से 1985 तक अपने देश में 78000 कन्या भ्रूण नष्ट किये गये। यह एक नया अभिशाप है, जिसके दुष्परिणामों को देखते हुए इस संदर्भ में सरकारी रोकथाम का प्रावधान होने की बात सोची जा रही है। परिवार नियोजन एक अलग बात है। और चुन-चुनकर लड़कियों का ही सफाया किए जाने की बात सर्वथा दूसरी।
तात्कालिक लाभ सोचने और भविष्य की परिस्थितियों को आँख से अलग कर देने की अदूरदर्शिता का ही यह परिणाम है, जो नर-मादा के मध्यवत्ती संतुलन को बिगाड़ता चल रहा है। यदि दृष्टिकोण बदला न गया तो प्रत्यक्ष कन्यावध के स्थान पर दूसरे बुरे तरीके पनपते रहेंगे। उपेक्षित कन्याएँ समुचित आहार और चिकित्सा की उपयुक्त सुविधा प्राप्त न कर सकेंगी; फलतः उन्हें कुपोषण का शिकार होकर, बीमारियों से ग्रसित होकर अकाल में ही मृत्यु का ग्रास बनना पड़ेगा। जल्दी बला टालने की धुन में होने वाले बालविवाह भी नारी जीवन के लिए कम घातक नहीं है। वे किशोरावस्था में ही खोखली हो जाती हैं। बच्चे जनने के कारण बेमौत मरती हैं। जहाँ पिता अपनी बला छुड़ाता है, वहाँ ससुराल वाले भी मनौती मनाने और उस हेतु प्रोत्साहन देते देखे गए हैं। यह सभी प्रचलन, दृष्टिकोण ऐसे हैं, जो नारी वर्ग पर कुठाराघात करते हैं। कहना न होगा कि नारी का संख्यावत् घटना उसका अशक्त, रुग्ण स्थिति में रहना, नर के लिए भी कम त्रासदायक नहीं है। अच्छा हो, समय रहते स्थिति पर विचार किया जाए और अनौचित्य को अविलम्ब हटाया जाए।
तब देवताओं का युग था। मनुष्य नया-नया ही गढ़ा गया था। उन दिनों प्राणी और पदार्थ देव-व्यवस्था के अनुरूप अपने-अपने काम चलाते थे।
आदमी ने लकड़ी काटी और उनका गट्ठा बाँधा। शाम हो चली थी, आदमी ने गट्ठे से कहा— "चलो घर चलें, सो वह पीछे-पीछे चलने लगा। कुछ दूर चलने के बाद वह आदमी सोचने लगा। क्यों न मैं इस बोझ पर सवारी गाँठ लूँ और बिना परिश्रम क्यों न घर पर जा पहुँचू? आदमी ने वैसा ही किया, वह गट्ठे को सवारी बनाकर उस पर लद बैठा।"
गट्ठे ने चलने से इंकार कर दिया। फिर उसने ऐसी हठ पकड़ी कि पीठ पर बिठाकर चलना तो दूर, वह पीछे-पीछे जाने के लिए भी रजामन्द न हुआ और अड़कर बीच रास्ते में बैठ गया।
आदमी को क्रोध आ गया। उसने कहा— 'ठहर, मूर्ख! अभी तेरी अकल दुरुस्त करता हूँ। तो उसने एक डंडे से बोझ को पीटना शुरू कर दिया। बाँधने वाली रस्सी टूट गई और सारी लकड़ियाँ इधर-उधर छितर कर बिखर गई।"
झंझट बढ़ा तो हंगामा सुनकर देवता लोग जमा हो गए। पूरी बात समझने में उन्हें देर न लगी। फैसला यह हुआ कि आलसी आदमी इस योग्य नहीं कि गट्ठा उसका कहना माने और सहायता करे। भविष्य में आदमी को ही गट्ठा सिर पर रखकर चलना पड़ा करेगा।
अपने-अपने समय पर सभी वस्तुएँ सुंदर लगी हैं। बच्चों का भोलापन, किशोरों का उठना, तरुणों का उत्साह, प्रौढ़ों की परिपक्वता सुंदर लगती हैं। इसी प्रकार बुढ़ापा भी अपने समय में अपनी विशिष्टता का परिचय देता है। इन आयुखंडों की अपनी-अपनी विशेषता तो है, पर तुलना नहीं की जा सकती और न किसी को श्रेष्ठ निकृष्ट ठहराया जा सकता है। बचपन अपनी जगह सुहाता है और तरुणाई की अपनी छटा है। दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। कोपलें उगती हैं, पत्ते बढ़ते हैं, फूल खिलते और फल आते हैं। सभी अपनी-अपनी जगह शोभायमान होते हैं; किंतु परस्पर तुलना करने का कोई अर्थ नही, नमक अच्छा है या मीठा? इस प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं दिया जा सकता। दाल में डालने के लिए नमक की जरूरत पड़ती है और दूध में शक्कर मिलाई जाती है। दोनों की अपनी-अपनी जगह उपयोगिता है और आवश्यकता।
पौधों के टहनियों की लकड़ी गीली होती हैं। उन्हें मोड़ा, मरोड़ा और टोकरी जैसे ढाँचे में ढाला जा सकता है, पर तने की विशेषता अपनी अनोखी ही है। मजबूत शहतीर उसी से बनते हैं। टहनियाँ कितनी ही लचीली एवं सुंदर तो हैं, पर लट्ठे का काम नहीं दे सकतीं।
बुढ़ापा कुरूप या सुंदर? इसे समझने का अपना-अपना दृष्टिकोण है। तरुणाई जैसी अठखेलियाँ, उमंगे और मुस्काने बुढ़ापे में नहीं होतीं और न चेहरे पर ही वैसी गुलाकी लालिमा और चमक रहती हैं, पर उसके स्थान पर जो नया उभरता है, उसे अपनी जगह महिमा और गरिमा से भरा-पूरा समझा जा सकता है। चेहरे की झुर्रियाँ, सफेदी, बेदांती मुख यह बताता है कि इस व्यक्तित्व पर परिपक्वता आ गई। ज्ञान-अनुभव अब ऊँचाई तक पहुँच गया है। यह वरिष्टता की निशानी है। समाज में उनकी प्रतिष्ठा और गरिमा समझी जाती है, इसलिए लोग महत्त्वपूर्ण प्रसंगों में उनके परामर्श लेने पहुँचते हैं। उनके निर्णय-निर्धारणों को महत्त्व देते हैं। उनका नमन-वंदन किया जाता है। देखते ही श्रद्धा के अंकुर उठते हैं और उन्हें सम्मानपूर्वक ऊँचे स्थान पर बिठाया जाता है। यह गरिमा अनायास ही मिली हुई नहीं होती। उसके पीछे बहुमूल्य अनुभूतियाँ और विचारणाएँ होती हैं।
कच्चे आम भारी होते हैं; गोल और खट्टे, महकदार भी। पकने पर वह स्थिति नहीं रहती, पिलपिलापन आ जाता है। मिठास बढ़ जातीं, वजन भी हलका होता है। इतने पर भी पके आम अधिक दाम के बिकते हैं। काले बालों को भौंरे से उपमा दी जाती है; पर सफेद बाल तो हंस जैसे होते हैं, मानों चाँदी के तारों से उन्हें बनाया गया हो। बच्चे का बिना दाँत का मुँह हँसते समय कितना सुंदर लगता है। बूढ़े के पोपले मुँह की भी वही स्थिति होती है। ये कामुकता, विलासिता की दृष्टि से वे फिसड्डी हो जाते हैं, फिर भी युवकों की अपेक्षा, उनकी बातों में वजन होता है। समझदारी की दृष्टि से अनुभवगम्य ज्ञान ऐसे निर्णायक निष्कर्षों तक पहुँचता है कि उस वृद्धावस्था पर जवानी निछावर करने को मन करता है।
जार्ज बर्नार्डशा कहते थे— "बुढ़ापा एक सिद्धि है, पूर्णता की मंजिल है। और समय की धरोहर। व्यक्ति और समाज की स्थिति का अन्वय करने वाली उसे दूरबीन या खुर्दबीन कह सकते हैं। बुढ़ापा श्रद्धा-सम्मान से लदा हुआ वटवृक्ष है, जिसकी छाया में बैठकर नई पीढ़ी बहुत सीख सकती है और सान्त्वना पा सकती है"
बुढ़ापे में खीजते वे हैं, जिनने बुढ़ापे का पूर्वाभास नहीं किया और उसके स्वागत की समुचित तैयारी नहीं कीं। जवानी की उच्छृंखलता बुढ़ापे में लौट नहीं सकती और न उतनी स्फूर्ति रहती है, फिर भी जो कुछ रहता है या बढ़ता है, वह ऐसा होता है, जिस पर संतोष किया जा सके और गर्व भी। जिसने अपने बुढ़ापे को स्वयं सम्माननीय बनाया, उसका अन्यत्र भी अभिनंदन होता है। बुढ़ापा शरमाने की नहीं; वरन प्रफुल्लता बखेरने तथा बटोरने की वय है।
ध्वनि अपने आप में एक बहुत महत्त्वपूर्ण शक्ति है। जहाँ प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर यह एक ओर नादब्रह्म-शब्दब्रह्म संगीत का रूप लेकर मनुष्य की आत्मिक प्रगति का पथ-प्रशस्त करती है, वहाँ दूसरी ओर प्रकृति के विरुद्ध होने पर यह मनुष्य को पागल बना सकती है, प्रलय ला सकती है, ध्वनि-प्रदूषण द्वारा समष्टिगत हानि पहुँचा सकती है। शब्दशक्ति को, ध्वनि को चेतना की ऊर्जा— ईंधन माना गया है। कभी इससे मात्र जानकारी प्राप्त करने व आदान-प्रदान का प्रयोजन भर पूरा होता था; किंतु अब विज्ञान के विकास ने उसे एक उच्चस्तरीय शक्ति के रूप में ला खड़ा कर दिया है। शब्दशक्ति को लेसर से भी अधिक सामर्थ्य भरा शक्तिपुंज कहा गया है एवं इसी के आधार पर विज्ञान ने खगोल जगत में ब्रह्मांडीय आदान-प्रदान की तथा काय जगत में सूक्ष्मतत्त्वों की जानकारी एवं चिकित्सा की शोध उपलब्धि अर्जित की है।
वर्त्तालाप-परामर्श में प्रयुक्त बैखरीवाणी का प्रसंग छोड़ हम ऊँचे सोपान पर चढ़ मध्यमा, परा, पश्यंती का साधना-क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में विवेचन करें, तो पाते हैं कि इंद्रियातीत अनाहत बिंदु रूप में— शब्दब्रह्म-नादब्रह्म के रूप में शास्त्रकारों ने इसकी महिमा को बड़ी गंभीरता से प्रस्तुत किया है। उनका यह विवेचन, पूर्णतः विज्ञानसम्मत भी है। शब्दब्रह्म अर्थात गद्य उच्चारण, नादब्रह्म अर्थात संगीत के रूप में तालबध्द वादन-गायन। मंत्र विज्ञान इसी क्षेत्र से उद्भूत विधा है, जिसका अवलम्बन लेकर आत्मिक प्रगति का पथ-प्रशस्त किया जाता है। यही शक्ति, शाप व वरदान के रूप में परिलक्षित होती देखी जा सकती है। प्राचीनकाल में जिन दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होता था, उनमें शब्दशक्ति की ऊर्जा से चालित उपचारों के प्रयोगों का उल्लेख होता है कि यह कितनी सूक्ष्म; किंतु सामर्थ्यवान शक्ति है।
'ओम' शब्द आर्ष वाँग्मय में महत्त्वपूर्ण स्थान है। 'ओम्' शब्द के उच्चारण से सूक्ष्म; किंतु शक्तिशाली तरंगों की उत्पत्ति होती है, जिसे मौलिक ध्वनि माना गया है। अ, उ एवं म, से मिलकर बना ओम् शब्द इस घटाकाश, निखिल ब्रह्मांड का बोध कराता है। यह अविनाशी परब्रह्म सत, रज, तम रूपी तीन गुणों, तीन गुणों, तीनों कालों एवं ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेवों का परिचायक भी है। प्रत्येक मंत्रोच्चार ॐकार के बिना अपूर्ण है। इसके बिना शब्दशक्ति की चर्चा ही अपूर्ण है।
मंत्रशक्ति एवं संगीतशक्ति इन दोनों का ही विशिष्ट माहात्म्य के साथ विज्ञानसम्मत विवेचन हमारे आर्ष ग्रंथों में हुआ है। वस्तुतः शब्द विज्ञान की इन दो महत्वपूर्ण विधाओं को इस मंत्र युग में जाना एवं महत्त्व नहीं दिया गया है। यदि चेतना के इस अनुसंधान की गहराई में जाना संभव हुआ तो मनुष्य को इतने महत्त्वपूर्ण रत्न हस्तगत हुए होते, जिनकी तुलना भौतिक वैभव से कभी भी नहीं की जा सकती। ऋग्वेद और सामवेद के साथ-साथ आयुर्वेद एवं गांर्धर्ववेद का उल्लेख इस प्रसंग में किया जाता है। आयुर्वेद, ऋग्वेद का उपवेद है, एवं गांर्धर्ववेद, सामवेद का। आयुर्वेद के पितामह माने जाने वाले अश्विनी कुमार विरचित भैषजतंत्र में इस संबंध में महत्त्वपूर्ण संकेत दिए गए हैं।
भैषजतंत्र में चार प्रकार के भैषज बताए गए हैं— पवनौकष, जलौकष, वनौकष और शाब्दिक। इसमें अंतिम शाब्दिक भैषज से द्विदेवों का आशय है— मंत्रोच्चारण एवं लयबद्ध गायन। जहाँ आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता आदि में सन्निपात, ज्वर, दमा, मधुमेह, हृदयरोग, ट्यूबरकुलोसिस, पीलिया, अल्पमंदता आदि रोगों में मंत्रों से उपचार का उल्लेख हुआ है, वहाँ सामवेद में ऋचाओं के गायन द्वारा रोगमुक्ति का माहात्म्य बताया गया है। मंत्रोच्चार से उत्पन्न ध्वनि-प्रवाह व्यक्ति की समग्र चेतना को प्रभावित करता है और उसके कंपन अंतरिक्ष में बिखर कर समष्टि चेतन-सत्ता को प्रभावितकर परिस्थितियों में अनुकूलन लाते हैं। कंठ, जिव्हा, तालू आदि मुख्य अवयवों को सोद्देश्य विरचित, सुगठित शब्द-समुच्चय के उच्चारण में भिन्न-भिन्न प्रकार की हलचलें करनी पड़ती हैं, जिनका प्रभाव स्थूलशरीर के अंग-प्रत्यंग पर तो पड़ता ही है, सूक्ष्मशरीर स्थित उपत्यिकाओं, नाडी़-गुच्छकों, विद्युत-प्रवाहों पर भी इनका प्रभाव पड़ता है। कोई भी शक्ति सबसे पहले अपनी उत्पादन स्थली को प्रभावित करती है, आग जहाँ जंमती है, गरमी पहले वहीं जंमती है। उसका विस्तार पूरे क्षेत्र में बाद में होता है। इसी प्रकार मंत्रोच्चारण से उद्भूत ऊर्जा से साधक का व्यक्तित्व सबसे पहले एवं सर्वाधिक प्रभावित होता है। मंत्रशक्ति को शब्दबेधी बाण की तरह माना जा सकता है, जो कायसत्ता के सूक्ष्म अवयवों से टकराते व उन्हें प्रभावित करते हैं। किस अवयव को किस सीमा तक प्रभावित किया जाए, यही ध्यान रखते हुए मंत्रों का गठन एवं उच्चारण द्वारा सुनियोजन किया जाता है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि समवेत स्वर में उच्चरित मंत्र पृथ्वी के आयनमंडल को घेरे विशाल भूचुंबकीय प्रवाह शूमेन्स-रेजोनेन्स से टकराते व लौटकर समग्र पृथ्वी के वायुमंडल को प्रभावित करते हैं। यह एक विचित्र साम्य है कि शूमेन्स-रेजोनेन्स के अंतर्गत जो गति तरंगों की रहती है, वही गति मंत्रोच्चारण करने वाले साधकों की एकाग्रता-तन्मयता की स्थिति में मस्तिष्क से रिकार्ड की जाने वाली अल्फा तरंगों की (7 से 13 सायकल प्रति सेकेंड) होती है। व्यक्ति चेतना व समष्टि चेतना में कितना सघन तादात्म्य है, इसकी साक्षी यह वैज्ञानिक उपलब्धि देती है। यही नहीं, अध्यात्म विज्ञान के प्रवक्ता मंत्र द्वारा शाप, वरदान, रोगमुक्ति, मारण, मोहन, उच्चाटन, अभिचार, कृत्याघात आदि प्रयोगों का दावा करते हैं एवं कर भी दिखाते हैं।
लय-तालबद्ध गायन, संगीत के रूप में दूसरी शब्दशक्ति की महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसका यदि सुनियोजन किया जा सके तो प्रकृति में वाँछित परिवर्तन एवं कायसत्ता को रोगमुक्त करना संभव है। संगीत न केवल तनाव शैथिल्य लाता है, अनेकानेक मनोविकारों के उपचार की एक विज्ञानसम्मत विधा भी है। ताल और लय के समुच्चय को ही स्वर विज्ञान कहते हैं। थपकी ताल कहलाती है और आलाप को स्वर कहते हैं। दोनों के मिलन के समग्र संगीत बनता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की घराना परंपरा के अंतर्गत विभिन्न राग-रागनियों का आलाप एवं वीणा, सितार, तबला, तानपूरा, मृदंग आदि यंत्रों के माध्यम से गायन-वादन का क्रम काफी समय से चलती आया है। इसका मध्यकाल में प्रायः मनोरंजन हेतु प्रयोग होता था, नहीं तो इसमें अपरिमित सामर्थ्य विद्यमान हैं। संगीत के सुनियोजन से रोग-निवारण, भावनात्मक अभ्युदय, स्फूर्तिवर्ध्दन, वनस्पति उन्नयन एवं प्राणियों की कार्यक्षमता में विकास जैसे महत्त्वपूर्ण लाभ संभव हैं। इस माध्यम से आनंद भरी परिस्थितियाँ उत्पन्नकर संवेदनाओं को भाव-तरंगों से जोड़कर मनःस्थिति में वांछित परिवर्तन भी लाया जा सकता है। जड़-चेतन सभी पर संगीतशक्ति का प्रभाव पड़ता है, यह अब प्रमाणित किया जा चुका है।
गायन-वादन के अंतर्गत संगीत के छः प्रमुख राग हैं, जिनका गांर्धर्ववेद में उल्लेख आता है। ये हैं— श्री राग, भैरवराग, हिंडोल राग, मालकौंस राग, विहार राग एवं मेघ राग। इन्हीं की पाँच से छः तक भिन्न विद्वानों ने समय-समय पर भिन्न रागों के सम्मिश्रण से नए राग तैयार किये हैं। इन्हें कब, किस समय, किस ऋतु में बजाया जाए, इसका शास्त्रोक्त विधान है। वाँछित प्रतिफल तभी मिलता है, जब इन नियम-उपनियमों का पालन किया जाए। यही नहीं, गायक की पात्रता एवं पवित्रता भी उतनी की अनिवार्य है। गांर्धर्ववेद में कहा गया है—
जपादि अष्टगुणम् ध्यानः, ध्यानादि अष्टगुणं तपः।
तपसा अष्टगुणम् गानम् गानात् परत्परम्॥
वक्ता और श्रोता दोनों के ही चेतना के स्तर का विकसित होना गायन की सफलता के लिए अनिवार्य माना गया है। यही सब शर्तें पूरी होने पर प्राचीनकाल में संगीतशास्त्र के ध्वनि-प्रवाहों के प्रभाव भी देखे जाते थे। दीपक राग से बुझे दीपक जल जाते थे, मेघमल्हार राग बादलों को बरसने के लिए विवश कर देता था, मोहन राग साँपों को लहराता व हिरनों को स्तब्ध कर देता था, राग शंकर मदोंमत्त हाथियों को वशवर्त्ती करने में समर्थ था, श्री राग सूखे वृक्षों को हरा बनाने की सामर्थ्य रखता था। यह सब लोकोक्ति नहीं, वास्तविकता है। अब तो रोगोपचार में गांर्धर्ववेद के विभिन्न प्रयोगों का अनुसंधान भी किया जाने लगा है। इससे लगता है आने वाले वर्षों में संभवतः डिस्क आडियो कैसेट बनाने वाली कंपनियाँ भिन्न-भिन्न रोगों के लिए वैदिक सूक्तों को रागों में लयबद्धकर प्रस्तुत करने लगें एवं सैनिटेरियमों में उनका उपयोग होने लगे। यह प्रयोग ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान द्वारा तो किए ही जा रहे हैं, भारत में महर्षि गांर्धर्ववेद विश्वविद्यापीठ तथा विदेश में भी विभिन्न विश्वविद्यालयों में संपन्न हो रहे हैं।
रोग-निवारण में संगीतशक्ति किस प्रकार अपनी भूमिका निभाती है, इसका स्पष्टीकरण करते हुए विद्वान बताते हैं कि जिस प्रकार आयुर्वेद में बात, पित्त, कफ की मान्यता द्वारा निदान किया जाता है, उसी प्रकार गांर्धर्ववेद में वात की 'सम्यक् माधुर्य', पित्त की 'सम्यक् तीव्रता' एवं कफ के 'सम्यक् तारता' का प्रावधान है। जिस प्रकार कायगत वायु, अग्नि एवं जल में असंतुलन से भिन्न रोग उत्पन्न होते बताए जाते हैं, उसी प्रकार विभिन्न रागों का सुनियोजनकर मानव की प्रकृति का सही निदान एवं उपचार किया जाना संभव है। यही नहीं वैद्यक एवं संगीत की जानकारी रखने वाला विशेषज्ञ आयुर्वेद एवं गांर्धर्ववेद का पर्याप्त संतुलन बनाए रख, मात्र वनौषधिसेवन एवं संगीतशक्ति से असाध्य-से-असाध्य रोगों की चिकित्सा कर सकता है। संभवतः इसीलिए शास्त्रों में वैद्यों के लिए संगीत का ज्ञान अनिवार्य बताया गया है।
विद्वान बताते हैं कि कफ के कुपित होने से संभावित रोगों में, राग भैरवी, मानसिक चंचलता एवं क्रोध की स्थिति में राग मल्हार, सौरत एवं जैजैवंती तथा रक्त की अशुद्धि की स्थिति में राग आस्सावरी का प्रयोग होना चाहिए। श्वाससंबंधी असह्यकष्ट, तपेदिक, खाँसी, दमा आदि में राग भैरवी के प्रयोग का तथा मेदावृद्धि, यकृत-प्लीहावृद्धि में राग हिंडोल का प्रावधान है। जठराशयसंबंधी रोगों से मुक्ति हेतु पंचम राग गाए जाने का उल्लेख है। कहा जाता है कि तानसेन के गुरुभाई बैजू बावरा ने राग पूरिया सुनाकर राजा राजसिंह को अनिंद्रा रोग से मुक्ति दिलाई थी। भारत के प्रसिद्ध संगीतज्ञ ओंकार नाथ ठाकुर ने इटली के तानाशाह मुसोलिनी, जिसे अनिंद्रा रोग था; को अपने गायन से ही सुला दिया था। यही बात पंडित पलुस्कर एवं डागरबंधु के बारे में भी कही जाती है।
एलोपैथी ने अल्ट्रासाउण्ड को मान्यता देकर शब्दशक्ति की महत्ता तो मान ली है; किंतु वे उसकी उतनी गहराई तक नहीं पहुँच पाए हैं, जहाँ तक हमारे ऋषिगण मंत्रविद्या एवं संगीतशक्ति के माध्यम से पहुँचने में सफल हुए थे। अमेरिका के पिट्सवर्ग शहर के समीप डॉ0 राल्फ लाॅरेन्स ने भी संगीत से रोग-निवारण की आर्षपद्धति के आधार पर एक आश्रम की स्थापनाकर अनेक रोगियों को कष्टों से मुक्ति दिलाई है। डॉ0 पोडोलेस्की एवं डॉ0 बर्नर मैकफेडेन भीं इस विधा में सक्रिय हैं एवं वे सारा उपचार सोनोथेरेपी के माध्यम से ही करते हैं। वस्तुतः शब्दतत्त्व में असाधारण जीवनदात्री क्षमता है। मंत्रोच्चारण एवं संगीत द्वारा इनका सही उपयोग यदि किया जा सके, तो विज्ञान की प्रगति की दिशा में अग्रसर मानव को चेतना को मथ देने वाली एक महत्त्वपूर्ण शक्ति का स्रोत हाथ लग सकता है। हम इस चिरपुरातन; किंतु विज्ञानसम्मत पद्धति को अपनाकर निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य की नई संभावनाएँ विनिर्मित कर सकते हैं।
महाप्राज्ञ शरीर छोड़ने लगे तो अपने पुत्र सौमनस को बुलाया और एक मणि देते हुए कहातात्! यह लो ‘सूर्यकांत मणि’; इसमें जीवन के संपूर्ण अभाव दूर करने की क्षमता है। यह कहकर उन्होंने पंचभौतिक शरीर का परित्याग कर दिया।
सौमनस ने कुछ दिन तो उस मणि का प्रयोग दीपक के रूप में किया, फिर अपनी प्रेमिका एक वेश्या को दे दिया। वेश्या को शृंगार-प्रसाधनों की आवश्यकता पड़ी तो उसे एक जौहरी को बेच दिया। जौहरी ने मणि की महत्ता को परखा और उससे बहुत-सा सोना बनाकर धनपति बन गया।
संगीत भी सूर्यकांत मणि के समान है, जो अपात्रों के हाथ महत्त्वहीन और पारखियों के हाथ अमूल्य निधि के रूप में सुरक्षित रहता है।
अब रचनात्मक संकल्पों को पूरा करने की बारी है।
इस वर्ष संपन्न हुए कार्यक्रमों की संख्या, स्वरूप एवं विस्तार इतना अधिक है कि सभी के विस्तृत समाचार यदि पत्रिकाओं में दिए जाते रहें, तो यह क्रम लगातार वर्षों चलता रहता। तब तक नए आयोजनों की शृंखला भी आरंभ हो जाती, अतः उस अवधि में पुराने समाचार दिया जाना युक्तिसंगत न मानकर कार्यक्रमों की उपलब्धियाँ तथा स्वरूप एक ही जगह सभी स्थानों के नाम के साथ देने की युक्ति अपनाई गई है।
परमपूज्य गुरुदेव की कुंडलिनी-महासाधना का प्रतिफल परिजनों ने हर जगह अनुभवी किया। प्रारंभ में तो विश्वास नहीं होता था कि कार्यक्रम ऐतिहासिक भी बन सकते हैं; पर जब शुरुआत हुई तो जनसमूह का ताँता; जैसे लगता देखा गया, मानो किसी अदृश्य सत्ता ने घर-घर जाकर आमंत्रण दिया हो। सभी स्थानों के कार्यक्रम आशातीत सफलताओं के साथ संपन्न हुए।
कार्यक्रमों में हर धर्म-संप्रदाय के अनुयाई उत्साहपूर्वक सम्मिलित होते रहें। राजनेताओं के साथ विभिन्न सम्प्रदाय के प्रतिनिधियों का दृश्य अधिकांश स्थानों पर राष्ट्रीय एकता को सार्थक करता रहा। ऐसे सम्मेलन ऐतिहासिक बन गए। उपस्थित जनसमूह के साथ कभी प्रतिनिधियों को यज्ञाग्नि की साक्षी में राष्ट्रीय एकता की शपथ ली। यज्ञायोजन के अवसर पर विभिन्न संस्कारों के माध्यम से लोकशिक्षण का उद्देश्य तो पूरा हुआ ही, साथ ही सम्मिलित परिजनों ने देव दक्षिणास्वरूप अपने दोष-दुर्गुणों का त्यागकर सत्प्रवृत्तियों के संवर्ध्दन का संकल्प भी लिया।
कार्यकर्त्ताओं ने आपसी मतभेदों को भुलाकर टोलीबद्ध रूप से एकजुट होकर मिशन द्वारा निर्धारित रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की व्यापक व्यवस्था बनाई। जन्मदिन, झोला-पुस्तकालय, स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन तथा सद्वाक्य लेखन जैसे सरल-सस्ते; किंतु महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम व्यापक स्तर पर चल पड़े। शान्तिकुञ्ज में चल रहे साधना-सत्रों में सम्मिलित होने के लिए परिजनों में होड़ जैसी लग गई है। मिशन की गतिविधियों के व्यापक विस्तार के लिए अपूर्व उत्साह स्थान-स्थान पर दिखलाई पड़ रहा है। कार्यक्रमों की ऐसी सफलताओं को देखते हुए लगता है, वह दिन दूर नहीं, जब महाकाल का ‘मनुष्य में देवतत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण’ का उद्घोष पूरा होकर रहेगा।
जिन स्थानों में आयोजन संपन्न हुए विस्तृत समाचार देना संभव नहीं वे हैं—
उत्तर प्रदेश :- निधासन, डुमरियागंज, बालावास, बढ़नी, सेवरही, जरकला, मल्लांवा, लैरोदोनवार, हरदोई, झाँसी, इलाहाबाद, बसखारी, नैनी, सुखनपुर, कासगंज, किच्छा, पंतनगर, पीलीभीत, अल्मोड़ा, सरसांवा, चक्के, लालगंज, पडरौना, आगरा, फतेहपुर, बाराबंकी, फर्रुखाबाद, कौआ, सादाबाद, देवीपुरा, दौलतपुर, बम्हनपुर, पूरनपुर, तम्बौर, नानपारा, भिनगा, कैशरगंज, खुरहरी, नौगढ़, तमकूही रोड, भाटपार रानी, शिकरपुर, बसखारी, मुबारिकपुर, नेवादा, सीसरी बाजार, ऊँचाहार, अर्जुनपुर, मुगराबाद, शाहपुर ,सैफाबाद, चकसुण्डा, चैनपुर, कलवारी, पयागपुर, कूमांचल, विस्वां, सिथौली, हरगाँव, मिश्रित, अतरी, औरैया, खिरियामुकुंद, किशुनपुर, दूधी, धाता, उन्नाव, अजीतमल, हसनपुर, ककराला, मोंठ, अवागढ़, कुरसंडा, अनूपशहर।
गुजरात:- भूतिया, थामला, देवली, ओड, हारिज, बाँधनी, मानसा, महुधा, बाला सिनोर, उदेल संतरामपुर, सरदार कृषिनगर, गोमतीपुर, चलाला, छबासर, बहुचराजी, राणीप, कोसम्बा, भादरवा, बगसरा, विसावदर, गरियाधार, खाँभा, नानीझेर, कणभईपुरा, सिंधाज, सावरकुंडला, मातर, तलाला, खीमत, विद्यानगर, रंगपुर, पलीयड़, किसनगर, माला झिंझवा, पोरबंदर मोटा मांडावडा, राजकोट, भुज, दयापर, मलिया, गढ़शीशा, आदीपुर, रापर, दियोदर, ठुनादरा, बहेराखाड़ी, डभासी, सिंहुज, पेटलाद, कुंजराव, अजरपुरा, मोमारोड़, उम्बेर, भरुच, बडोली, मोटामिया माँगरोल, वारडोली, बोडेली, भादरवा, कोसंबा।
मध्य प्रदेश :- अमरवाड़ा, नगरी, गरियाबंद, पेंड्रा, दत्तेवाड़ा, बालोद, रतलाम, सोरम सिंधी, डिण्डोरी, दमोह, राजसमुंद, मन्दसौर, राजिम, बरमकेला, बिसौद, मूंदी, पलारी, सलिहा, विदिशा, तखतपुर, भाटापारा, आमालोरी, निकुम, दिवारी, सारनी, पनगाँव, स्नेहनगर, लोरमी, टीकमगढ़, बूढ़ा, ग्वालियर, नेवरा, नन्दिनीनगर, शिवपुरी कालोनी, रामगढ़, रायगढ़, लंजोड़, रायपुर, जौरा अलापुर, भिंड, नागदा, कसारीडीह, चाँंपा, बिलासपुर, सीधी, सतना, छापीहेड़ा, बिरकौना, सेंदरी, सेमरताल, नखराम, वसीवहार, खौली, पेंडरी बसना, टेमरी, करगीरोड़, चार भाटा, साँकरा, बेलपान, सकरी, कवर्धा, देवगाँव, व्यौहारी, देवलोंद, कुली पोटा, बाराद्वार, पोरथा, सोहागपुर, बम्हनीडीह, सारागाँव, उदयबंद, सिरमौर, बासौद, तरीचरकलाँ, सुनवानी महाकाल, खिड़किया, शिकारा, नेपानगर, बलवाड़ी, छोटी खरगोन, बरुर, बिचौली, साँवेर, सिहोर, मुँगावली, सबलगढ़, बखतगढ़, खोर, नीमच, डीकेन, राजनगर, फरंजी, भटगंवा, चर्चाकालरी, बसदेई, भैयाथान, धनागर, लैलूँगा, देवकोनी, दारंग, धनसीर, चारौदाबाँध, सराय-पाली, मुनगासेर, रिसामा, सिरसाकला, सपिया, खोडरी, जैतहरी, पाली बिरसिंहपुर, करसरा, निवाडी।
उड़ीसा :- रम्भा, राउरकेला, काटाभाँजी, भुवनेश्वर, रानिबुड़ा, बरंगा, सम्बलपुर, जेपुर, काल्ला, फूलवाणी।
बिहार :- मोतीहारी, बेतिया, मुजफ्फरपुर, टायो, झुमरी तलैया, सासाराम। ये बड़े शतकुण्डी आयोजन रहे। इसके अतिरिक्त छुट-पुट 50 से भी अधिक चौबीस कुण्डीयज्ञ बिहार में हुए हैं।
राजस्थान :- डग, चित्तौड़गढ, सांगोद, बकानी, सीसवाली, बूँदी, जयपुर, पिलानी, बिजौलिया, राजसमंद, माहीडैम, बड़गाँव, फलोदी, बीकानेर, सरदार-शहर, झुँझुनू, ब्यावर, श्री माधोपुर, किशन गढ़वाल, सवाई माधोपुर।
अन्य प्रांत :- उमरी अकोला, शहादा, धुले, भुसाबल, कुरुक्षेत्र, भिलदर्रा, पालधी, अनंतपुर, नेल्लोर तथा गुण्टूर।
श्रोताओं की प्रतिक्रिया
बोधघाट (म॰प्र॰) शतकुंडी महायज्ञ के अवसर पर आयोजित जनसभा में शान्तिकुञ्ज में चल रही प्रवृत्तियों की विस्तृत जानकारी दी गई। श्रोताओं से आग्रह किया गया कि वे यहाँ विभिन्न शिविरों में भाग लेने आएँ। सभा के अंत में 547 परिजनों ने इस आशयक के संकल्पपत्र समर्पित किए। आयोजकों ने विचार गोष्ठी में इन सब का अलग से विस्तृत मार्गदर्शन किया। उनको भेजने का समुचितक्रम बिठाया जा रहा है।
घर-घर अमृत वर्षा
तलाई (म॰प्र॰) की औद्योगिक बस्ती में संपन्न राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के अवसर पर सर्वश्री रामस्वरूप निगोती, वृजराज सिंह, धीरज सिंह सर्वेपर, पुनाऊ-रायमवैश्य, शीतला सहाय, राधेश्याम मिश्र, राम शंकर मिश्र, सरला मिश्र, शिवचंद्र, पारीख, गिरीशचंद्र पाटीदार, सूरजभान पुवैया कटोरीलाल, जीतराम ताँती, बैकुण्ठ अवस्थी, चंदन लाल टिकारीहा, दिनेश पटेल, श्रीमती वंदना पटेल, रामकृपाल चौधरी, अर्जुनलाल पाटीदार, विश्वनाथ प्रसाद, सुरेश सेन, चन्द्र दत्त सांकला, उमेशचंद्र तथा सत्यप्रकाश पाटीदार ने नियमित रूप से झोला पुस्तकालय चलाने के संकल्प लिए। इस अवसर पर उनका अभिषेक-अभिनन्दन किया गया। जिस समय इनका अभिनंदन किया जा रहा था, सघन बादलों से हल्की फुहार पड़ी। मानो घर-घर अमृत बाँटने का संकल्प लेने वालों पर प्रकृति स्वयं अभिसिंचन कर रही हो।
अभी से तैयारी
गोसाईगंज (उ॰ प्र॰) समीपवर्त्ती राष्ट्रीय एकता सम्मेलन से प्रभावित होकर स्थानीय गायत्री परिवार परिजनों ने नवंबर दिसंबर में अभूतपूर्व सम्मेलन करने की रूप−रेखा बनाई है। सर्व श्रीचंद्र वर्मा, आर वी राठौर तथा दिनेश चंद्र अग्रवाल को मिलाकर बनी यज्ञ समिति ने आवश्यक तैयारियाँ और प्रचार कार्य अभी से प्रारम्भ कर दिया है, मिशन और कार्यक्रम के स्वरूप की जानकारी देने वाले 5 हजार परिपत्र प्रकाशित कर जन-जन संपर्क की व्यापक रूप-रेखा तय की गई है। समस्त गायत्री परिवार एकजुट होकर कार्य कर रहा है।
माॅरल एजुकेशन प्रशिक्षण का व्यक्तित्व परिष्कार प्रशिक्षण के रूप में विस्तार
शान्तिकुञ्ज (हरिद्वार) उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन के उच्च अधिकारियों, राज्य ग्राम विकास अधिकारियों, महिला स्काउट्स एण्ड गाइड्स (युवक मंगल) के व्यक्तित्व परिष्कार शिविर संपन्न होने के बाद अब उत्तर प्रदेश के प्राइवेट इंटर कालेजों के प्रधानाचार्यों के नैतिक शिक्षा शिविर प्रारंभ हो गए हैं। यह शिविर फरवरी 1988 के अंत तक लगातार चलते रहेंगे। सैनिक स्कूल के आचार्यों के प्रशिक्षण का निर्धारण भी हो चुका है। उड़ीसा सरकार बिहार सरकार तथा गुजरात की सरकारें भी अपने शिक्षकों तथा शिक्षा अधिकारियों के मॉरल एजुकेशन शिविर संपन्न करने के लिए शान्तिकुञ्ज से परामर्श कर रही हैं; इन शिविरों के भाव भरे परिणाम भी मिल रहे हैं। ऐसा प्रतिभागियों के वापस लौटने के बाद आएँ पत्रों से ज्ञात होता है। इस अनौपचारिक पत्र-व्यवहार द्वारा जिससे प्रतिभागियों से प्रगति समीक्षा पूछी गई थी, अस्सी प्रतिशत से अधिक से संपर्क स्थापित हुआ है एवं सक्रियता बढ़ी है।
अगस्त मास में भी सम्मेलन
शक्तिपीठों, प्रज्ञा-संस्थानों एवं प्रज्ञा आयोजनों के वर्ष 1987-88 के कार्यक्रमों के निर्धारण हेतु पूर्व घोषित जुलाई माह के सम्मेलनों को, अब एक माह तक सीमित न रख अगस्त तक और बढ़ा दिया गया है। अब सम्मेलनों की शृंखला इस प्रकार होगी :-
3 से 6 जुलाई बिहार, 7 से 10 जुलाई गुजरात का सौराष्ट्र क्षेत्र, 12 से 15 जुलाई गुजरात द्वितीय (बड़ौदा खेड़ा अहमदाबाद एवं बम्बई) 16 से 19 जुलाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश, 20 से 23 जुलाई पूर्वी उत्तर प्रदेश व उससे लगे बिहार के जिले, 24 से 27 जुलाई गुजरात तृतीय सूतर, भरुच, बलसाड़ एवं हि॰प्र॰ हरियाणा, दिल्ली 28 से 31 जुलाई गुजरात चतुर्थ गांधीनगर, मेहेसाणा बनासकांठा, साबरकांठा, कच्छ, पंचमह, 2 से 5 अगस्त म॰ प्र॰ के चंबल जिले बुंदेलखंड बघेलखंड विदिशा, रायसेन एवं सीहोर, 7 से 10 अगस्त बैतूल छिंदबाड़ा, बालाघाट, सिवनी, मंडला, भोपाल, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, जबलपुर एवं महाराष्ट्र, 12 से 15 अगस्त छत्तीसगढ़ क्षेत्र, 17 से 20 अगस्त रायपुर, रायगढ़ एवं उड़ीसा, 22 से 25 अगस्त मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र, 27 से 30 अगस्त राजस्थान।
उपरोक्त अवधि में 9 दिवसीय साधना-शिविर एवं युगशिल्पी शिविर स्थगित रहेंगे।
यस्तपस्वी जटी मुण्डो नग्नो वा चीवरावृतः।
सोऽप्यसत्यं यदि ब्रूते निन्द्वयः निन्द्यः स्यादन्त्यजादपि॥
जो तपस्वी जटाधारी, सिर मुँडाए हुए, वस्त्रहीन अथवा वस्त्रधारी होते हुए भी असत्य बोलता है, वह चांडाल से भी बुरा है।
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकाया विषं शिरः।
वृश्चिकस्य विषं पुच्छे वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुर्जनो विषम्।
साँप के दाँत में विष होता है और मक्खी के सिर में विष होता है। बिच्छू की पूँछ में विष होता है; किंंतु दुर्जन के तो संपूर्ण अंगों में विष रहता है।
आत्मार्थं जीव लोकेऽस्मिन्को न जीवति मानवः।
परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीविति॥
अपने आपके लिए इस जीवलोक में कौन मनुष्य नहीं जीवित रहता है। पर सच्चा जीवन उसी का है, जो परोपकारार्थ जीता है।
देव संस्कृति में ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तरह धरित्री जी के भी तीन देवता माने गये हैं— माता, पिता एवं गुरु। इनकी तुलना त्रिवेदों से की गई है। माता— ब्रह्मा है; क्योंकि वह पेट में सबका पालन-पोषण करती है। पिता— विष्णु माने जाते हैं; क्योंकि जन्मोपरांत बालक के शिक्षण, निर्वाह, चिकित्सा, विवाह, आजीविका जैसी व्यवस्था द्वारा वे ही उसे समर्थ बनाते हैं। गुरु की गरिमा इन दोनों से भी ऊँची है। उनको महेश के समतुल्य माना गया है, जिनकी स्तुति विष्णु, प्रजापति सहित सभी देव करते हैं।
माता-पिता शरीर का सृजन-पोषण करते हैं, जबकि गुरु आत्मा में, व्यक्तित्व में सुसंस्कारिता का आरोपण करके उसे इसी जन्म में दूसरा जन्म देते हैं, जिसे द्विजत्व कहा गया है। यज्ञोपवीत दीक्षा के साथ यह प्रतीक-पूजा आरंभ होती है; किंतु यहीं तक सीमित नहीं रहती। इस कृत्य के पीछे गुरुवरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका संपन्न होती है। गुरु की गरिमा से जुड़कर नर-पशु के नगर-नारायण बनने की संभावनाएँ साकार होती देखी जा सकती हैं। आत्मिक क्षेत्र का परिशोधन-परिष्कार कर सकने वाली गुरु-गरिमा की जितनी महिमा गई जाए, कम हैं।
प्राचीनकाल में यह प्रावधान प्रारंभ से ही था कि देव संस्कृति का एक भी अनुयाई ऐसा न हो, जो गुरुकुल रहकर सुसंस्कारिता उभार कर न आया हो। महत्त्व शिक्षा का नहीं, दीक्षा का, प्रतिभा प्रखरता का, अंतः की सामर्थ्य के विकास का, संजीवनी विद्या का रहा करता था। अब वह परंपरा तो नहीं रहीं। सच्चे मार्गदर्शक गुरु मिलते भी बड़ी कठिनाई से हैं। गुरु के बिना व्यक्ति को निगुरा कहकर गाली दी जाती है। इससे पता चलता है कि गुरुतत्त्व जीवन के सर्वांगीण विकास हेतु कितना जरूरी है। शास्त्रों में उपनिषदों में लिखा है यदि कोई गुरु न मिले तो आत्मतत्त्व को गुरु मानकर उसके माध्यम से अपनी समीक्षा करनी व मार्गदर्शन लेना चाहिए। गुरु पूर्णिमा का प्रस्तुत पर्व (11 जुलाई 1987) इसी दिशा में चिंतन करने का अवसर प्रदान करता है।
गुरुतत्त्व के सान्निध्य-अवलंबन से कितने ही सामान्य व्यक्तियों को असामान्य बनने का अवसर मिला है। बुद्ध के अनुग्रह से हर्षवर्ध्दन, अशोक, आनन्द, कुमारजीव जैसे कितने ही महानता के उच्च शिखर पर पहुँच गए। अंगुलिमाल-अम्बपाली, जैसे कितने ही दलित मानव कायाकल्पकर महामानव बन गए। समर्थ एवं शिवाजी की, परमहंस एवं नरेंद्र की, चाणक्य एवं चंद्रगुप्त की, विरजानंद एवं दयानंद की आत्मिक घनिष्ठता यदि न बन पड़ी होती तो यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि कौन-सा पक्ष घाटे में रहता। बेल, वृक्ष से लिपट कर कहाँ-से-कहाँ तक पहुँचा जाती है। नाला, गंगा में मिलकर, बूँद, समुद्र में मिलकर एवं पतंग, डोर से बँधकर क्या से क्या हो जाती हैं, यह आसानी से समझा जा सकता है। शिष्य की गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण भाव उसे आत्मिक प्रगति के पाथ पर तो प्रशस्त करता ही है, दैवी अनुदानों की अमृत वर्षा होने लगती है। जो गुरुतत्त्व के प्रति जितनी श्रद्धा, जिस मात्रा में जगा सका, समझना चाहिए कि उसके लिए अध्यात्म विभूतियाँ उपलब्ध करने का स्वनिर्मित राजमार्ग मिल गया। गुरुवरण का श्रद्धासिक्त अभ्यास ही अध्यात्म क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रथम सोपान है।
अपना विवेक यदि अनुमति दे, गुरु की गरिमा समझने का माद्दा अंदर हो एवं समर्पणभाव से अपना अहं गुरुचरणों में सौंपने को जो तैयार हों, उन साधकों के लिए व्यास पूर्णिमा का पर्व यही संदेश लेकर आता है कि गुरु बड़ी कठिनाई से मिलते हैं, मिले हैं तो उन्हें छोड़ना मत, प्रगति के पथ पर चल पड़ना। यही अपेक्षा प्रज्ञापरिकर से इस दैवी अभियान की सूत्रसत्ता करती भी है।
(मंगल विजय)
दर्शन बहुत किए गुरु-मुख के, गुरु-चरणों की ओर निहारो।
सुनते-सुनते कभी न हारे, तो गति से भी तो मत हारो॥1॥
गुरु-मुख थका सुनाकर अब तक, हमने सुनने का सुख पाया।
इससे सुन, उससे की बाहर दो कानों का लाभ उठाया॥
दर्शन श्रवण किए गुरु-दर्शन, कितना समझे तनिक विचारो।
दर्शन बहुत किए गुरु-मुख के, गुरु-चरणों की ओर निहारो॥2॥
बीती चलो बिसारें अब तो, गुरु चरणों को ध्यान करें हम।
जो मंजिल गुरु गति ने नापी, अपने डग उस डगर धरे हम॥
अपने को अपने पथ-दर्शक के, पथ पर अविलम्ब उतारो।
दर्शन बहुत किए गुरु-मुख के, गुरु-चरणों की ओर निहारो॥3॥
महापुरुष जिस पथ पर चलते, वह ही पथ उत्तम होता है।
जितने तर्क-कुतर्क उभरते, उतना ही पथ-भ्रम होता है।
चरण-पादुकाएँ कहती हैं, चलने का उत्साह उभारो।
दर्शन बहुत कि गुरु-मुख के, गुरु-चरणों की ओर निहारो॥4॥
सतपथ पर चलने वाले ही, चरण सदा पूजे जाते हैं।
सच्चे अनुयाई चरणों से, दिव्य प्रेरणाएँ पाते हैं।
गुरु चरणों की कृपा चाहिए, तो उनकी गति को न नकारो।
दर्शन बहुत किए गुरु-मुख के, गुरु-चरणों की ओर निहारो॥5॥
हिमगिरी सा ऊँचा, सागर सा, गहरा, गुरु पाया हो जिसने।
फिर भी ऊँचा चिंतन श्रेष्ठ, चरित्र न अपनाया हो जिसने।
मत ऐसा दुर्भाग्य बुलाओ, मत ऐसा सौभाग्य बिसारो।
दर्शन बहुत किए गुरु-मुख के, गुरु-चरणों की ओर निहारो॥6॥
*समाप्त*
जीवन स्पंज की तरह है, उसमें जो भी भला-भूरा भरोगे भर जाएगा।