ईश्वर का दर्शन-पवित्र अन्तःकरण में

समग्र स्वस्थता शरीर के सभी अवयवों के निरोग एवं परिपुष्ट होने से विनिर्मित होती है। किसी अवयव विशेष के बढ़ जाने से तो विद्रूप विपन्नता ही उत्पन्न होती है। पैर फूलने पर फीलप व और पेट फूलने पर अपच की चिन्ताजनक स्थिति बनती है। किसी अंग विशेष में गाँठ उभर आने से प्रसन्नता नहीं, चिन्ता ही बढ़ती है।

पूजा पाठ भी समग्र जीवन के विकास का एक छोटा भाग है। उसके लिए समय निकालना और अभ्यास क्रम चलना चाहिए। किन्तु इतने भर में ही सन्तोष कर बैठना और आत्म-कल्याण की समग्र आवश्यकता पूरी होने जैसी आशा नहीं करनी चाहिए।

साथ में जीवन की पवित्रता और प्रखरता का समावेश भी उतना ही आवश्यक है। ईश्वर की झाँकी अन्तरात्मा में ही हो सकती है। अन्यत्र उसे खोजना हो तो समस्त ब्रह्माण्ड में उसकी व्यापकता पर ही दृष्टि डालनी पड़ेगी। आत्म-दर्शन ही ईश्वर दर्शन का सरलतम और निकटतम साधन है।

आत्म-दर्शन का अर्थ है अन्तःकरण में पवित्रता और प्रखरता का समुचित सम्वर्धन। दर्पण पर धूलि जमी हो या उसके भीतर का रंग उतर गया हो तो फिर उसमें मुख दीख पड़ने का सुयोग न बनेगा। जिसने अपने अन्तःक्षेत्र को टटोला नहीं है, उसे धोया सँजोया नहीं है, उसके लिए यह कठिन हैं कि उस गंदले क्षेत्र में ईश्वर का आगमन अवतरण या दिव्य-दर्शन की आशा करें। वस्तुतः आत्मशोधन ही प्रभुदर्शन का एक मात्र उपाय है।


यहाँ न्याय है, अन्याय नहीं

क्षतिपूर्ति का नियम सृष्टि में सर्वत्र लागू होता है। प्रारम्भ में देखने में ऐसा लगता है कि कहीं न्याय नहीं है क्योंकि दुष्ट सफल होता देख जाता है, अच्छे लोग सताये देखे जाते हैं। परन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। क्रिया और प्रतिक्रिया का सिद्धान्त प्रत्येक पदार्थ अथवा प्रकृति के प्रत्येक कण पर लागू होता है। अँधेरा और प्रकाश, गर्मी और सर्दी, पुरुष और स्त्री सबमें अधूरापन होता है। ये सभी एक दूसरे के पूरक होते हैं। इसी तरह द्वैत्व सभी स्थिति में होता है, जैसे प्रत्येक मीठी वस्तु में कड़ुवापन होता है, दुष्ट में अच्छाई होती है एवं प्रत्येक बार खो देने के बदले प्राप्ति तथा प्रत्येक प्राप्ति के लिये गँवाना आवश्यक होता है।

प्रकृति एकछत्रता और अपवाद नहीं सहन करती। कुछ न कुछ ऐसा वातावरण विनिर्मित होता है, जो दोनों को बराबर कर दे। न्याय लुप्त नहीं हो सकता, सभी वस्तुयें सिद्धान्त से जुड़ी हैं। गणितीय ढंग से दोनों पक्ष बराबर रखे जाते हैं। जैसे प्रकाश-अंधकार, मीठा-कड़ुवा आदि। सभी वस्तुओं में एक दूसरे के पूरक का अथवा प्रतिरोध का गुण होता है। जैसे-ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाता है, अन्दर जाये बिना बाहर नहीं आ सकते। यदि आप किसी को दास बनाकर गले में जंजीर बाँधेंगे तो दूसरा सिरा आपके हाथ में बंधा होगा। स्वयं बुरे बने बिना बुराई की नहीं जा सकती।

प्रकृति में प्रत्येक अच्छे कार्य के बदले अच्छाई मिलने का भी नियम है। जैसे-प्रेम के बदले प्रेम। सराहना किये गये कार्य के साथ हानि होती है और इसके विपरीत हानिप्रद या बेकार समझी गई वस्तु भी लाभदायक सिद्ध होती है। जैसे-बारहसिंगा अपनी सींगों की बड़ाई और पैरों की बुराई करता है, परन्तु शिकारी के आने पर पैर ही भाग कर प्राण रक्षा करते हैं। सींग किसी झाड़ी में उलझ कर प्राण संकट ला देते हैं।

कमजोरी की स्थिति में स्वास्थ्य संवर्धन के ज्यादा अवसर होते हैं। जीवनी शक्ति को लगा धक्का प्रतिक्रिया स्वरूप प्रतिरोधी क्षमता ही बढ़ाता है। हमें यह जानना व समझना चाहिए कि प्रत्येक वस्तु के दो पहलू होते हैं। एक अच्छा और एक बुरा। हम हमेशा बुरा ही बुरा देखें, वही करें, उसकी अपेक्षा उचित होगा कि अच्छा देखने व करने की ही प्रक्रिया अपनायी जाय। उसकी प्रतिक्रिया भी हमेशा भली ही होगी।

घड़ी का पेण्डुलम फनर के दबाव से हिलता रहता है। साथ ही एक दिशा में चलने की प्रतिक्रिया उसे लौटाने हुए वापस भी करती रहती है। हमारी मस्तिष्कीय चेतना और प्रकृति संगठन का निर्माण इस आधार पर हुआ है कि क्रिया की प्रतिक्रिया होती रहे। अच्छों के लिए अच्छे और बुरों के लिए बुरे परिणाम उत्पन्न हो रहे। चोर को भर्त्सना भी मिलती है और राजदण्ड भी। अप्रामाणिक व्यक्ति का कोई सहयोग नहीं करता। अपनी दृष्टि में गिर जाने पर उसके द्वारा कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं बन पड़ते। दूसरी ओर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने वाला व्यक्ति आत्म संतोष तो अनुभव करता ही है, अपार जनश्रद्धा एवं दैवी अनुग्रह भी बदले में पाता है।

इसी प्रकार न्याय, नीति अपनाने के संबंध में भी यही तथ्य लागू होता है। भले ही इसके बदले उसे तत्काल नगद पुरस्कार न मिले, पर अपनी और दूसरों की दृष्टि में उसका स्तर ऊँचा उठ जाने से भविष्य में आश्चर्यजनक प्रगति की संभावना बनती है। महापुरुषों के जीवन में यही क्रम घटित होता रहा है। उन्होंने पहले अपनी प्रामाणिकता और सद्भावना का परिचय दिया। पीछे ऐसे अवसर हाथ आते रहे, जिनसे उन्हें भरपूर श्रेय सम्मान मिला। सबसे बड़ी बात है अपनी आत्म सत्ता को संतोष, जो मात्र सज्जनों को ही उपलब्ध होता रहा है।

जीवन देवता की आराधना करने वाले ईश्वर की इस सृष्टि में दृश्यमान इस शाश्वत सिद्धान्त पर आस्था रखते है एवं तद्नुसार अपना जीवन-क्रम बनाते, बदले में अगणित ऋद्धि-सिद्धियों को हस्तगत करते हैं। आत्म संतोष एवं जन सहयोग की प्रकारान्तर से ऋद्धि-सिद्धि हैं।


व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी, सत्चेतन धन आनन्द राशि

जिस प्रकार कोई कलाकृति अपने निर्माता के अस्तित्व तथा व्यक्तित्व को प्रकट करती है, उसी प्रकार यह सृष्टि भी अपने रचियता, अपने शिल्पी परमात्मा को व्यक्त करती है। जिसका निर्माण हुआ है, उसका निर्माता अवश्य है, इसमें किसी प्रकार की शंका अथवा तर्क का कोई अवसर नहीं है।

यह समस्त सृष्टि एक सुनिश्चित एवं निर्धारित रचना है। इस रचना का अणु-अणु एक निश्चित नियमावली से अनुशासित है, नियंत्रित है। हजारों प्रकार की वनस्पतियाँ और लाखों प्रकार के प्राणी अपने-अपने नियमानुसार बनते और बिगड़ते रहते है, पर क्या मजाल कि उसकी रचना में तनिक-सी गड़बड़ी हो जाये।

सूर्य समय पर निकलता, समय पर अस्त होता है। गुलाब के पौधे में गुलाब और गेंदे के पौधे में गुलाब और गेंदे के पौधे में गेंदे के ही फूल खिलते हैं। आम के वृक्ष में आम और अमरूद के वृक्ष में अमरूद के ही फल लगते हैं। उसमें भी जिन वृक्षों से जिस प्रकार के फल अपेक्षित हैं, उसी प्रकार के ही फल पैदा होंगे। एक रंग, एक आकार और एक स्वाद। खट्टे वृक्षों में खट्टे और मीठे में मीठे फल ही उत्पन्न होंगे। निश्चित भूमि, निश्चित जलवायु और निश्चित ऋतु में ही वे उत्पन्न होंगे और निश्चित समय पर ही समाप्त होंगे।

एक जंगल में लाखों प्रकार की वनस्पतियाँ होती हैं। हजारों प्रकार के पेड़ एक के पास एक उत्पन्न होते हैं, किन्तु उनकी एक भी पत्ती की बनावट में भूल नहीं होती। इमली से लेकर केले तक की पत्तियों का एक निश्चित आकार प्रकार होता है। एक पेड़ की पत्ती संसार के किसी दूसरे पेड़ की पत्ती से नहीं मिलती। उनमें कोई न कोई किसी प्रकार का थोड़ा बहुत अन्तर अवश्य होगा। इतनी विविधता और इतने प्रकार जानने वाला वह कलाकार, वह शिल्पी, वह निर्माता कितना ज्ञानवान, कितना चैतन्य और कितना समर्थ होगा, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। विश्व की इतनी बड़ी रचना को देखकर और उसके संचालन की आविष्कार विधि देखकर ऐसा कौन अभागा होगा जो रचयिता के अस्तित्व में संदेह करेगा।

किसी भी वृक्ष का बीज देखिये। उसके स्तर-स्तर अलग कर डालिये। उसका रेशा-रेशा चीर डालिये। कहीं भी आपको वृक्ष का कोई आकार, उसकी कोई भी तस्वीर, उसके अन्दर भावी संभावना का कोई भी अस्तित्व दृष्टिगोचर न होगा। कितना विलक्षण है, कितना अद्भुत है कि जब वह धरती में बो दिया जाता है तब वह विविध प्रकार के वृक्ष को जन्म देता है। जब वृक्ष अस्तित्व में आता है, तब बीज मिट चुका होता है। किन्तु पुनः कई गुना होकर वह वृक्षों द्वारा उत्पन्न फलों में अपना अस्तित्व अपना स्वरूप प्राप्त कर लेता है। प्रकृति की यह प्रक्रिया कितनी विलक्षण, अद्भुत और विस्मयकारक है? ध्यानपूर्वक इसको देखने, विचार करने और मनन करने की इसकी नियामक सत्ता, निर्माता और पालनकर्ता का ध्यान आये बिना नहीं रहता। कैसा अखण्ड अनुशासन है कि एक ही मिट्टी से ईख मिठास, मिर्च कड़ुवाहट और करौंदा खटास प्राप्त करता है? मिट्टी को चखिए। उसमें इस प्रकार का कोई रस कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा। उसमें इस प्रकार का कोई रस कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा। इतने रस, इतने स्वाद और इतने गुण एक ही मिट्टी में कहाँ से आ जाते हैं? यह सारे रस, आकार-प्रकार, गुण आदि और कुछ नहीं, एक उसी परमात्मा शिल्पी का अपना व्यक्तित्व एवं अपना अस्तित्व है। वह स्वयं धरती है, स्वयं मिट्टी है, स्वयं बीज वृक्ष और फल है। वह ही स्वयं रस, स्वाद और गुण भी है। वह सब कुछ है।

संसार में लाखों पशु-पक्षी और जीव जन्तु मौजूद हैं। सब एक दूसरे से भिन्न। आकार-प्रकार बनावट, स्वभाव विचित्र। जितने प्रकार के पक्षी, उतने प्रकार के रंग, उतनी प्रकार की बोलियाँ और उतने ही प्रकार के गुण व स्वभाव। इन सब बातों में इतनी अनन्तता, इतनी असीमता और अपरिमितता एक उसी विराट की याद दिलाती है।

रात-दिन, प्रकाश-अंधकार, गर्मी-सर्दी, जल-थल आदि सब उसी की साक्षी देते हैं, उसी के व्यक्तित्व को प्रकट करते हैं। अग्नि जलाती है, पानी बुझाता है, वायु कंपित करती है, जीवन जिलाता है और मृत्यु मारती है। किसके आदेश से किसके संकेत से? एक उसी बिन्दु के इंगित मात्र से यह सारे कार्यकलाप होते हैं, सारी प्रक्रियाएँ चलती हैं। बिना उसके संकेत के एक पत्ती भी नहीं हिल सकती, एक श्वास का भी आवागमन नहीं हो सकता।

इतनी बड़ी रचना, इतनी महान कृति को उसने किस उद्देश्य, किस हेतु से, किसके लिये विनिर्मित किया है? यह एक गहन प्रश्न है। एक गूढ़ रहस्य है। मनीषियों का मत है कि यह सब एक उस ही परमात्मा ने अपने से-अपने में-अपने लिये ही उत्पन्न किया है।

सृष्टि में हर ओर से ओत-प्रोत परमात्मा और परमात्मा में हर प्रकार से समाहित यह सम्पूर्ण रचना, मनुष्य के समझने के लिये है। समझ कर उस रचयिता का ज्ञान प्राप्त कर आनन्द पाने के लिये है। अपने अन्दर परमात्म सत्ता के प्रति विश्वास बिठाकर उसे आस्तिक बनाने के लिये है।

सृष्टि के प्रत्येक प्रत्यक्ष पदार्थ में जो अप्रत्यक्ष, निराकार, विचित्र है, विलक्षणता है, कौतूहल है, वही परमात्मा की एक झलक है, जिसके सहारे मनुष्य उस चिदानन्द परमात्मा तक पहुँचता है। अपना हृदय विशाल कीजिये। अपनी दृष्टि निर्मल कीजिये और देखिये आपकी सृष्टि के प्रत्येक अणु में उस विराट् की झाँकी देखने को मिलेगी।

परमात्मा सत्-चित्-आनन्द अर्थात् सच्चिदानन्द रूप है। उसका उद्देश्य प्राणी मात्र को आनन्द प्रदान करना है। मनुष्य को छोड़कर संसार का हर प्राणी एक नैसर्गिक आनन्द को प्राप्त करता है। एक मनुष्य ही ऐसा है जो स्वतः आनन्दित नहीं दिखलाई देता। इसका स्पष्ट कारण यह है कि परमात्मा की इच्छा है कि वह उसे सम्पूर्ण स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करे। अर्थात् केवल आनन्द नहीं सच्चिदानन्द परमात्मा की पूर्ण अनुभूति करे। सत् चित् अर्थात् उसके अस्तित्व का चेतन सत्ता का ज्ञान प्राप्त करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करे। अन्य पशु-पक्षियों की भाँति मनुष्य परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किये बिना आनन्द को प्राप्त नहीं कर सकता। उस सच्ची उच्चस्तरीय आनन्द तब ही प्राप्त हो सकता है, जब वह परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर ले।

अपनी इच्छा के अनुरूप ही उसने मनुष्य को उपादान भी दिये हैं। ये हैं अद्भुत शरीर और विलक्षण विवेक बुद्धि। इनका उपयोग कर मनुष्य सहज ही परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। अपनी विवेक शक्ति को विकृतियों से मुक्त कर मनुष्य यदि प्रत्यक्ष संसार को एक गहरी अनुभूति से देखे, उस पर चिन्तन करे, तो सहज ही वह परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

मनुष्य को आनन्द की खोज करने हेतु अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं। वह तो सच्चिदानन्द परमात्मा से उत्पन्न इस आनन्दमय सृष्टि से स्वयं ही ओत-प्रोत है। मनुष्य को केवल अपनी अनुभव शक्ति को प्रबुद्ध भर करना है। अनुभव शक्ति के प्रबोध के लिये उसे कोई विशेष तपस्या अथवा साधन नहीं करनी है। वह एक विस्मय मूलक दृष्टिकोण से उसकी रचना इस संसार को देखे और उसे परम शिल्पी की परम रचना समझकर उसका सम्मान करे। इतना भर कर लेने से इसकी अनुभव शक्ति स्वतः प्रबुद्ध हो उठेगी, और एक बार प्रबुद्ध हो जाने पर वह शक्ति विलुप्त नहीं होगी।

स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फल-फूल जिसको भी देखें, एक विस्मय और कौतूहल से देखता हुआ निर्माता की सराहना में गद्-गद् हृदय हुआ मनुष्य एक दिन बिना किसी विशेष साधन के परमानन्द को अवश्य पा लेता है। यही आत्मबोध है, और यही परमात्मा के अस्तित्व की अनुभूति है।


भक्त भाव विभोर होकर (Kahani)

एक भक्त भाव विभोर होकर प्रार्थना कर रहा था-मेरे प्रभु द्वारा खोलो ताकि मैं तुम तक पहुँच सकूँ।

उधर से निकलने वाले दूसरे सन्त ने कहा-जरा गहरे उतर कर देखो तो ईश्वर का द्वार क्या कभी किसी के लिए बन्द रहा है।


जीवन- ईश्वर का एक अनुपम अनुदान

आत्मबोध का वास्तविक अर्थ है, स्थूल शरीर और आत्मा की भिन्नता अनुभव करना। आमतौर से चेतना शरीर के साथ इतनी गहराई तक गुँथ जाती है कि अपना अस्तित्व और सर्वस्व उसी को समझने लगती है। उसी की सुख-सुविधाओं का ताना-बना बुनती है और अहिर्निश उसी को अधिकाधिक प्रसन्न एवं सम्पन्न बनाने के लिए श्रम करती रहती है। अपना आपा काया के साथ इतना अधिक घुल जाता है कि उससे पृथक् अपनी सत्ता का कोई भान ही नहीं होता।

आत्मा शब्द कहने-सुनने में तो नित्य ही आता है। पर यह अनुभव नहीं होता कि वह शरीर से भिन्न है और दोनों के स्वार्थों में जमीन-आसमान जितना अन्तर है। दोनों की आवश्यकता और इच्छा ऐसी है जिनमें परस्पर तालमेल बहुत ही कम खाता है। शरीर की इच्छा सर्वविदित है। वासना, तृष्णा और अहंता में काया को रस आता है। इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को नित नया और असीम मात्रा में चाहती हैं। यों उनकी उपभोग शक्ति सीमित हैं उसकी पूर्ति भी थोड़े में ही हो जाती है; पर चिन्तन निरन्तर उन्हीं का चलता रहता है। धन आदमी को इतना चाहिए, जितने में औसत भारतीय स्तर का गुजारा होता चले। उसे न तो अधिक मात्रा में एक जगह जमा होना चाहिए और न उसका अपव्यय होना चाहिए। संग्रह और अपव्यय से अनेकानेक समस्यायें उत्पन्न होती हैं। श्रम-उपार्जन से न्याय और ईमानदारी की कसौटी पर खरा उतरने वाला धन सीमित ही कमाया जा सकता है।

सामान्यतया शरीर की इच्छाएँ सीमित ही हैं। किन्हीं-किन्हीं में ये अधिक चित्र-विचित्र रूप में प्रकट होने लगती हैं एवं उनकी पूर्ति के लिए निरन्तर चिन्तित एवं व्यस्त रहना पड़ता है। इन बंधनों के ढीले हुए बिना ऐसा कुछ नहीं बन पड़ता कि आत्मा की तुष्टि एवं प्रगति के लिए कुछ किया जा सके। चिन्तन यंत्र काया-कलेवर में ही इतना उलझा रहता है कि आत्मा के लिए कुछ करना तो, दूर, सोचते भी नहीं बन पड़ता।

कोई यह नहीं चाहेगा कि शरीर की उपेक्षा की जाय। उसकी स्वस्थता, बलिष्ठता एवं क्षमता में कमी आये; क्योंकि वह आत्मा का वाहन है। आत्मा उसी पर सवार होकर अपनी विभिन्न योजनाओं को पूरा करने की आशा करती है। सामान्य बुद्धि के व्यक्ति भी अपने वाहनों को सही और साफ-सुथरा रखते हैं; पर ऐसा अन्धेर कहीं नहीं होता कि सवार अपना खाना, पीना, सोना, जागना, कमाना, पढ़ना आदि भूलकर निरन्तर मात्र उस सवारी के श्रृंगार में ही लगा रहे। अपने वर्तमान या भविष्य की चिन्ता न करे। यह भी ध्यान न रखे कि सवारी आखिर किस काम के लिए प्राप्त की गई थी और उन कामों को सम्पन्न करने की योजना भी सामने है क्या?

आत्मा की अपनी आवश्यकताएँ और जिम्मेदारियाँ हैं। 84 लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त एक बार यह अवसर मिला है कि भव बंधनों से छुटकारा पाया जा सके, पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। भगवान ने इस मानवी काया की अजस्र सम्पदा सौंपते हुए उससे जो आशा रखी है, उसकी पूर्ति के लिए जो आवश्यक है, उसे किया जाय। मनुष्य जन्म का अनुदान प्राप्त करने के उपरान्त कई और कक्षाएँ हैं, जिन्हें उत्तीर्ण किया जाना है और उसके फलस्वरूप अगली सीढ़ियों पर चढ़ते हुए महामानव, सिद्ध पुरुष, ऋषि एवं देवात्मा बनना है। उन समस्त दायित्वों की उपेक्षा कर भविष्य अंधकारमय बना लेना तो अदूरदर्शिता ही कही जाएगी।

सवार भूखा, चिथड़ा पहने बीमार रहे और घोड़े पर इत्र मलने का अशर्फियाँ निछावर करने का उपक्रम चले, तो समझना चाहिए कि नासमझी की चरम सीमा है। ऐसा जो कर रहा हो, उसे अर्धविक्षिप्त या पूर्णपागल कहना चाहिए। हममें से अधिकाँश व्यक्ति इसी स्थिति में रह रहे हैं।

दृश्य आकर्षण देखकर न दीख पड़ने वाली हानि को भुला देना ऐसा ही है, जैसा नशेबाज क्षणिक उत्तेजना के वशीभूत होकर अपनी सम्पदा, प्रतिष्ठा, सन्तान, सेहत आदि सब कुछ गँवा बैठते हैं। शरीर को गुदगुदाने भर के लिए मन की ललक को सींचने के लिए जो सब कुछ गँवा बैठते हैं, उनमें हममें से अधिकाँश की गिनती होती है।

जितना उपयोग में आ सके, उसे उपलब्ध करना एक बात है, किन्तु सदुपयोग की सीमा से अधिक संचय करना और उस भार से लद मरना दूसरी। शरीर की आवश्यकता अति सीमित है। उसे आधा सेर अन्न, छह गज कपड़ा, चारपाई और बिस्तर भर चाहिए। इसके अतिरिक्त जितनी मात्रा समेटी गई है वह अनर्थ ही पैदा करती है। दूसरे उसे लूटते हैं। इन्द्रिय भोगों की अति की जायगी तो रुग्णता और दुर्बलता के चाँटे दोनों गालों पर तड़ातड़ पड़ने लगेंगे। ऐसी फजीहत में फँसने के लिए बहुमूल्य जीवन सम्पदा को बर्बाद कर देना मानवोचित बुद्धिमानी नहीं है।

जिस पेड़ की जड़ें जितनी गहरी जमीन में जाती हैं, वह उतना ही बड़ा और टिकाऊ होता है। जड़ें छोटी और उथली हों तो उसका जीवन काल तो थोड़ा रहेगा ही, फैलाव भी अधिक न हो सकेगा। मनुष्य की जड़ें उसकी अन्तः चेतना के स्तर में सन्निहित हैं। वे यदि उथली होंगी तो व्यक्तित्व उथला रहेगा, घटिया सोचते और घटिया करते ही बन पड़ेगा। किन्तु यदि अन्तर की क्षमता आदर्शों पर टिकी हुई है, मानवोचित गरिमा के उपयुक्त गुण, कर्म, स्वभाव संचय हो सके हैं तो फिर बाहर की कठिनाइयों और अभावों के रहते उसकी प्रगति रुकने वाली नहीं है। वह अपना स्वरूप हर परिस्थिति को चीरती हुई निखार लेती है। इसके प्रमाण ढूँढ़ने हों तो महामानवों की जीवन गाथाएँ पढ़नी चाहिए। वे स्पष्ट करेंगी कि कोई आदर्श व्यक्ति परिस्थितियों ने नहीं गढ़ा है, वरन् अपने निज के पराक्रम ने ही उसे महान बनाया है।

अपनी महानता एवं क्षमता को उच्च प्रयोजनों के लिए सुरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक है कि शरीरगत वासनाओं और मनोगत तृष्णाओं को घटाया जाय। उन्हें औसत भारतीय स्तर से आगे न बढ़ने दिया जाय।

लोग मोह-ममता बढ़ाने को ही प्यार समझते हैं वह हर दृष्टि से दुःखदायी है। राजा चन्द्रकेतु का पुत्र मर गया। वे इतना दुःखी हुए कि शोक से सूख-सूख कर स्वयं काँटा हो गये और मरणासन्न स्थिति तक पहुँच गये। महर्षि भृगु एक दिन वहाँ पधारे। राजा की व्यथा सुनी। उनने कहा “स्वर्गस्थ आत्मा से यहाँ बैठे-बैठे आपकी बातें कराये देता हूँ। वह चाहेगा तो आपके परिवार में उसे नया जन्म दिलाने का प्रयत्न करेंगे।”

वार्त्तालाप हुआ। मृत बालक की आत्मा ने कहा- “यहाँ आने पर सौ जन्मों की स्मृतियाँ मुझे हो गई हैं। सौ पिता मेरी आँखों के सामने हैं। आप उनमें से कौन से हैं, बतायें? मेरी इनमें से किसी के साथ भी कोई आसक्ति नहीं है। अपने कर्म बन्धनों से निपटने मात्र में ही मेरी रुचि है। मेरी किसी पिता में कोई दिलचस्पी नहीं। वे शोक करते हैं तो मात्र अपने मोह का दंड भर पाते हैं। उससे मेरी कोई लाभ-हानि नहीं।”

वह कथा प्रसिद्ध है कि राजा को मरकर कीड़े में जन्म मिला और वह महल के बगीचे में ही पेड़ पर छिपा बैठा था। शोकाकुल रानियों को एक दिव्यदर्शी महर्षि ने भेंट कराई और पूछा रानियों के संबंध में आपका मन कैसा है। उनने कहा-”उन सब को मैं भुला चुका। अब तो यह कीड़े का शरीर ही अब मुझे परमप्रिय है।”

“रघुवंश” में दशरथ की रानियों का शोक घटाने के लिए महर्षि वशिष्ठ ने तत्वज्ञान की चर्चा की है और उदाहरण देते हुए कहा है कि “जैसे बहती नदी में लकड़ी के लट्ठे भी चले आते हैं और कभी वे एक साथ हो जाते हैं और कभी लहरों के दबाव से अलग-अलग बहने लगते हैं। यह प्रकृति का नियम है। इसमें शो करने जैसी अनोखी बात नहीं हैं। तुम ममतावश अपने को व्यर्थ शोकाकुल न करो। कोई प्राणी किसी के साथ-संबंधों के रिश्ते में तभी तक बँधा है, जब तक वह जीवित है। अन्यथा सभी प्राणियों की स्वतंत्र सत्ता है। मरने के बाद भी वह उसी रूप में नहीं बनी रहती। इसीलिए अज्ञानमूलक शोक से विवेक आश्रय लेकर पार होना ही श्रेयस्कर है।”

गर्भोपनिषद् में बताया गया है कि गर्भावस्था में जीव के अन्तःकरण में पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ जागृत होती हैं। और वह कहता है-”हजारों बार मेरा जन्म हो चुका है, विविध प्रकार के आहार मैं खा चुका हूँ, हजारों माताओं का दूध मैं पी चुका हूँ, बार-बार पैदा हुआ हूँ बार-बार मरा हूँ। पर वे तो आज साथ हैं ही नहीं। साथ हैं मेरे कर्म ही। उनका ही फल मुझे मिल रहा है।”

इस अलंकारिक वर्णन से आशय यही है कि मनुष्य सदैव मृत्यु को याद रखे, कायसत्ता को नहीं, आत्म सत्ता को महत्त्व दे, तो कभी लोभ-मोह के बंधन उसे आबद्ध नहीं कर पायेंगे।

जीवन की महानता को जीवन्त बनाये रहने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपनी काया का क्षणभंगुर होना याद रखे। मौत-बच्चे, जवान, बूढ़े किसी को भी किसी समय निगल सकती है। जो जीवन काल मिला हुआ है उसके बारे में क्या पता कि अगले ही क्षणों में समाप्त हो जाय। ऐसी दशा में मिला हुआ सुयोग लाखों वर्ष तक चौरासी के परिभ्रमण में चला गया ही समझना चाहिए।

अजर-अमर की तरह-विलासी, संग्रही और अहंकारी बने रहना और इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के लिए अपना सर्वस्व निछावर करते रहना किसी-भी प्रकार उचित नहीं। लिप्साओं को पूरा करने का अवसर तो न्यूनाधिक मात्रा में हर योनि में-हर जन्म में मिल जाता है, पर सद्गति सम्पादन के लिए तो मात्र यह मानव जन्म ही है। इसकी भी कोई अवधि निश्चित नहीं। श्मशान साक्षी है कि बूढ़ा होकर मरना भी निश्चित नहीं। उनसे अधिक संख्या में जवानों की चिताएँ आये दिन जलती रहती है।

जीवन काल की अनिश्चितता और करने योग्य कामों की सूची सामने रखते हुए संगति मिलाई जाय, तो विवेक का एक ही निर्णय होगा-बाल क्रीड़ाओं में समय सम्पदा का एक क्षण भी बर्बाद न किया जाय। उस विधि व्यवस्था को अविलम्ब अपनाया जाय, जिससे आत्मा की प्रगति होती हो और परमात्मा को संतोष मिलता हो। इसके लिए उचित समय की प्रतीक्षा किये बिना तुरंत ही स्वयं को नियोजित कर देना चाहिए।

पूर्व संचित संस्कारों का दबाव अन्य जन्मों में तो ज्यों का त्यों बना रहता है। मात्र मनुष्य जन्म ही ऐसा है जिसमें आन्तरिक कायाकल्प किया जा सकता है और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण हो सकता है। यह अवसर चूकने का नहीं है। जो चूकते हैं, वे पछताते हैं। अंतिम समय में इस छटपटाहट को प्रत्यक्षतः देखा जा सकता है। वह समय कभी भी आ सकता है, यह भाव मन में रखते हुए क्यों न जीवन-सम्पदा का भरपूर सदुपयोग किया जाय, देवमानव-सा जीवन जीकर धरित्री पर आना सार्थक किया जाय।


सम्राट अशोक का साहस (Kahani)

सम्राट अशोक का साहस और पराक्रम सर्व विदित है। उनके जीवन में उनका चरित्र और पुरुषार्थ अनुपयुक्त दिशा में भी बटा पर बौद्ध धम्र के संपर्क में आने से उसकी दिशा पूरी तरह बदल गई। वे सन्त-सम्राट की संयुक्त भूमिका निभाते रहे। बौद्ध धर्म का प्रचार देश देशान्तरों में पहुँचाने में उनकी सूझ-बुझ और सम्पदा ने चमत्कारी सफलताएँ प्रस्तुत कर दिखाई। मिश्र, सीरिया, मेसीडीनिया, एपिरस, गान्धार किरीन, तिब्बत, बर्मा, मलाया, जावा, सुमात्रा वाली, इन्डोनेशिया, जापान, चीन, रूस, ईरान आदि देशों में प्रशिक्षित प्रचारक भेजने से लेकर अपने निजी प्रभाव का उपयोग करने तक के अनेक प्रमाण, शिलालेख उन क्षेत्रों में मिले हैं। एशिया के अधिकाँश भागों का मात्र 28 वर्ष की अवधि में इतने शानदार ढंग से धार्मिक, और सामाजिक परिवर्तन कर सकना अशोक के लगन का ही प्रतिफल था।

उन्होंने अनेक स्थानों पर बौद्ध मठ, विहार, संघाराम बनाये जिनमें धर्म प्रचारकों को प्रशिक्षित करने और दूर देशों तक भेजने के लिए आवश्यक साधनों की व्यवस्था थी। धर्मचक्र प्रवर्तन दृश्य प्रेरणा देने वाले अनेकों स्तूप भी उन्होंने स्थान-स्थान पर बनवाये।

अन्य राजाओं की तरह यदि अशोक ने भी अपने प्रभाव और वैभव का उपयोग निजी विलास और अहंकार की पूर्ति में किया होता तो उन्हें कौन जानता और क्यों संसार का मस्तक उनके चरणों पर झुकता, उनके प्रयास से समय परिवर्तन जैसा सुयोग कैसे बनता?


सच्चा श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष चल रहा था। सन्त एक नाथ ने भी प्रचलित लोकरीति के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध करने का निश्चय किया और कुछ ब्राह्मणों को नियत समय पर अपने यहाँ भोजन के लिये आमंत्रित किया।

सुबह से ही घर में श्राद्ध की रसोई बनने लगी। संत एकनाथ तथा उनकी धर्मपत्नी गिरिजा दोनों पवित्रता, स्वच्छता और सात्विकता का ध्यान रखते हुए षट्रस व्यंजन बना रहे थे। घी, दूध और मिष्ठानों की सुगन्ध घर से बाहर सड़क तक व्याप रही थी। उसी समय सड़क से कुछ महार परिवार गुजरे। शायद उन्हें कई दिनों से ठीक तरह खाना नहीं मिला था। पकवानों की सौंधी सुगन्ध उनकी नाक में से घुस कर क्षुधा को और भी भड़काने वाली सिद्ध हुई। लेकिन अपने नसीब में न जानकर वयस्क महारों ने तो भूख को दबाया, परन्तु बच्चों से रहा न जा सका। एक बच्चा बोल ही उठा-माँ कैसी मीठी महक आ रही है। अहा! कितने बढ़िया-बढ़िया पकवान बन रहे होंगे। काश ये हमें मिल सकें।”

“चुप रह मूर्ख! कोई सुन लेगा तो गालियाँ खानी पड़ेंगी कि निगूढ़ों ने हमारे पकवानों को नजर लगा दी।” बाप ने कहा।

माँ एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुए बोली-बेटा! हम लोगों की किस्मत में तो इन चीजों की गंध भी नहीं है। व्यर्थ में मन के लड्डू बाँधने से क्या लाभ।”

माता, पिता और बच्चों में चल रही ये चर्चायें संत एकनाथ जी के कानों में पहुँची। उनका हृदय द्रवित हो उठा। संत की साध्वी पत्नी गिरिजा भी इन बातों को सुनकर महार परिवार को घर में न्यौत लायी और उचित आदर सत्कार सहित उन्हें आसन पर बिठा कर तैयार हो रही रसोई परोसने लगी। महार स्त्री, पुरुष और बच्चे कई दिनों के भूखे थे, इधर पकवानों ने उनकी भूख और भी बढ़ा दी, सो सब तैयार रसोई उनके ही उदर में चली गयी। लेकिन खा-पीकर तृप्त हुए महार-परिजनों ने जिस हृदय से संत एकनाथ तथा गिरिजा को दुआयें दी उससे दम्पत्ति का अन्तस् प्रफुल्लित हो उठा। गिरिजा ने भोजन के बाद यथोचित दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।

नियत समय पर न्यौते गये ब्राह्मण आये। बनायी गयी रसोई तो महारों के काम आ चुकी थी सो अब दुबारा भोजन तैयार करना पड़ रहा था। खाने में विलम्ब होते देखकर ब्राह्मणों से न रहा गया, वे कुड़कुड़ाने लगे।

संत ने कहा-”नाराज न होइये ब्राह्मण देव। रसोई तो समय से काफी पहले तैयार हो चुकी थी। परन्तु देखा भगवान सड़क पर भूखे ही जा रहे हैं। इसलिये उन्हें भोजन कराने में सारी रसोई चुक गयी।” विस्मित ब्राह्मण संत एकनाथ से पूरी घटना सुनकर आगबबूला हो उठे-”तो जिनके छूने से भी कुम्भीपाक लगता है उन्हें तुम भगवान कर रहे हो।”

“वे भगवान ही तो हैं पूज्यवर! कण-कण में उनका वास है, प्राणिमात्र में वे रहते हैं। यदि वे ही भूखे जा रहे हों तो उन्हें तृप्त कर भगवान की सेवा का अवसर हाथ से जाने देने में क्या बुद्धिमानी है?”

इन वचनों ने पंडितों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया और वे बोले-”अरे! एकनाथ तुम्हारी बुद्धि तो भ्रष्ट नहीं हो गयी है। एक तो हमारे लिये बनाया भोजन अन्त्यज जनों को खिला दिया और दूसरे उन्हें भगवान सिद्ध का उनसे अपवित्र हुए घर में चौके-चूल्हे पर बना भोजन खिलाकर हमें भी भ्रष्ट करने पर तुले हो।”

संत एकनाथ उसी विनम्रता से अपनी बात कहते रहे परन्तु रूढ़िग्रस्त और दुराग्रही मन मस्तिष्क वाले ब्राह्मणों पर क्या प्रभाव होना था, उठ कर चल दिये। संत एकनाथ ने उन्हें रोका नहीं। माथे पर तिलक लगाये रेशमी वस्त्रधारी उन बहुरूपियों को उन्होंने विनयपूर्वक रवाना किया व सच्चे ब्राह्मण, हृदय से आशीर्वाद देकर गए। उस महार परिवार द्वारा छोड़ा भोजन दोनों पति-पत्नी ने भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया। यही सच्चा श्राद्ध था।


वैष्णव की करुणाभरी आत्मीयता

नरुसी मेहता का प्रसिद्ध भजन है-”वैष्णव जन तो तेने कहिए, जै पीर पराई जाने रे”। इस छोटे से पद में भगवद् भक्ति और ईश्वर परायणता का सार तथ्य कूट-कूट कर भर दिया है।

जिसे सर्वव्यापी ईश्वर पर विश्वास है, और उसे सब में समाया हुआ देखता है। प्रियतम की साकार प्रतिमा सभी प्राणियों में विचरण करती दिखाई पड़ती है। प्रिय पात्र को सुखी बनाने की-उसके दुःख निवारण की स्वाभाविक इच्छा होती है। अपने प्रिय के प्रति कोई निष्ठुर कैसे हो सकता है? सताने की बात कैसे सोच सकता है?

सच्चे ईश्वर भक्त की दो मान्यताएँ अविचल, अटूट रहती हैं। एक “वसुधैव कुटुम्बकम्” दूसरी “आत्मवत् सर्वभूतेषु”। यह समस्त विश्व अपना ही परिवार है, और अपनी जैसी आत्मा ही हर किसी में ओत-प्रोत है। इन दो भावनाओं को जो जितनी गहराई में उतार सके, समझना चाहिए कि वह उतना ही सच्चा ईश्वर भक्त है। जब हम ईश्वर के प्रिय परिवार में सम्मिलित होना चाहत हैं तो स्वभावतः इसके लिए इतना तो करना पड़ेगा कि ईश्वर के परिवार को अपना परिवार मानें। यदि उसकी उपेक्षा करते हैं, रस नहीं लेते। सुख में सुखी और दुःख में दुःखी नहीं होते तो यह कहने का अधिकार कहाँ मिलता है कि हम ईश्वर के भक्त उसके परिवार के सदस्य है। पारिवारिकता के साथ आत्मीयता जुड़ी रहती है। घर के सदस्यों को हम अपना मानते हैं। उनके सुख दुःख में सदा साथी सहायक रहते हैं। उठाने, बढ़ाने और समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। अपनी कमाई को मिल बाँट कर खाते हैं। ऐसा नहीं करते कि जो अपना है सो तो है ही-इसके अतिरिक्त दूसरों के खीसे में जो कुछ है, उसे भी किसी प्रकार बहका-फुसला कर हड़प लिया जाय। ऐसा तो विरानों के साथ ही बन पड़ता है। पर जब ईश्वर भक्ति अन्तःकरण में आती है तो एक ही ज्योति सामने जगमगाती दीखती है। प्रतीत होता है कि एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब लहरों में से प्रत्येक के ऊपर अलग-अलग दीखता रहता है। वस्तुतः लहरों की झिलमिलाहट का केन्द्र एक ही है। जो है सो अपना प्रिय पात्र है। ऐसी दशा में उसके प्रतिबिम्बों के प्रति भी विरानापन कैसे माना जा सकता है?

सन्तजन स्वयं कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी बनाते हैं। सेवा धर्म अपनाते हैं। पुण्य, परमार्थ में निरत रहते हैं। पर यदि इसके लिए उदारता, करुणा न उभरे तो भी इतना तो मानना ही चाहिए कि सब में अपनी ही जैसी आत्मा है। हम दूसरों से जिस प्रकार के व्यवहार की आशा करते हैं, निश्चय ही दूसरे भी हमसे वैसी ही अपेक्षा रखते होंगे। अपने शरीर में कहीं चोट लग जाने या पीड़ा उठाने से बेचैनी होती है, उसका उपचार करने दौड़ते हैं। यदि सब में अपना आत्मा ही व्यापक अनुभव किया गया है तो फिर अन्यान्यों की आवश्यकताएँ भी अपनी आवश्यकता प्रतीत होंगी और उनकी पूर्ति के लिए वैसा ही प्रयास चल पड़ेगा।

हो सकता है कि संसार में कितने ही दुष्ट दुरात्मा भी हों? यहाँ उनकी आत्मा को और दुष्टता को अलग-अलग करके मानना चाहिए। डॉक्टर रोग को मारने वाली दवा देते हैं, पर रोगी के प्रति उनकी सद्भावना ही रहती है। उसे बचाने के लिए वह सामर्थ्य भर प्रयत्न करता है। रोग और रोगी को एक मानकर दोनों का सफाया करने की बात नहीं सोचते। इसी प्रकार दुरात्माओं के दुर्गुण छुड़ाने की हित कामना ही मन में रहनी चाहिए। उस विद्वेष का उदय नहीं होना चाहिए जो आक्रामक रूप धारण करता है। सिर में जुएं पड़ जाने पर कोई सिर नहीं काटता। खाट में खटमल हो जाने पर चारपाई को जलाया नहीं जाता। इतना विवेक बनाये रखा जाता है जो अवाँछनीय है मात्र उसे ही हटाया जाय। जो उचित एवं आवश्यक है मात्र उसे ही हटाया जाय। जो उचित एवं आवश्यक है उसे बचा लिया जाय। उसे क्षति न पहुँचने दी जाय। अवाँछनीयता के साथ असहयोग, विरोध से लेकर संघर्ष तक किया जा सकता है। इतने पर भी यह अन्तर समझ ही लेना चाहिए कि व्यक्ति को क्षति न पहुँचे। उसके दुर्गुणों पर ही चोट पड़े।

अबोध बालक शिष्टाचार को नहीं समझते और पग पग पर बेतुकी हरकतें करते रहते हैं। उन्हें देखकर अभिभावक उग्र नहीं हो उठते। क्षमा करते और सिखाते हैं, कि उन्हें क्या करना चाहिए, क्या नहीं? न मानने पर फिर कभी के लिए अपनी सिखावन सुरक्षित रख लेते हैं। गलती करने वालों को बहिष्कृत, तिरस्कृत न करके उन्हें समझाना-सुधारना है यह भावना मन में रहे तो अनगढ़ लोगों के प्रति वैसा ही भाव उठेगा जैसा अनगढ़ बाल बुद्धि वालों के प्रति उठना चाहिए। कई व्यक्ति आयु की दृष्टि से बड़े हो जाते हैं, पर विचारों और आदतों की दृष्टि से उन पर पिछड़ापन ही छाया रहता है। तीव्र ज्वर की सन्निपात की स्थिति में अपने घर के रोगी भी अण्ड-बण्ड बकने लगते हैं। उनके शब्दों पर ध्यान नहीं दिया जाता, वरन् स्थिति को समझते हुए प्रत्युत्तर देने, प्रत्याक्रमण करने का प्रयत्न नहीं होता, वरन् आत्मीयता की करुणा ही काम करती है। क्षमा स्वयमेव उठ आती है, इसलिए रोगी को शर्मिन्दा करने या क्षमा माँगने के लिए बाधित करने के लिये कुछ सोचा नहीं जाता।

इस संसार में अनगढ़ ही भरे पड़े हैं। रोगी भी और अनाड़ी भी। उनके व्यवहार को देखकर वैसी ही प्रतिक्रिया अपनाई जाय तो समझदारी और सज्जनता कहाँ रही? चिकित्सक और रोगी की मनःस्थिति में तो अन्तर रहना ही चाहिए। बालकों और बड़ों की रीति-नीति में तो अन्तर रहेगा ही। दोनों ही एक जैसा व्यवहार करने लगें तो समझना चाहिए कि समझदारी हार गई और नासमझी जीत बोली। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने से बचाव ही करना चाहिए।

वैष्णवजन की पहिचान उसके तिलक छाप, वेश, परिवेश, पूजा, पाठ से नहीं हो सकती। उन्हें तो कोई पाखण्डी भी अपना सकता है। यह सस्ती अवधारणा ईश्वर का हृदय नहीं जीत सकती। न कोई उसका प्रिय पात्र कहला सकता है। नाटक के पात्र राजा, होने के परिधान भी पहनते हैं और वैसा ही अभिनय भी करते हैं। इतने पर भी वे किसी राज्य के अधिपति नहीं बन पाते। साधारण अभिनय कर्मचारी ही रहते हैं। इसी प्रकार पूजा पाठ की अपनी आवश्यकता एवं मर्यादा होते हुए भी उसी को ईश्वर भक्ति का आधार नहीं माना जा सकता।

वैष्णव-ईश्वर भक्त वह है जो पराई पीर जानता है। जानता ही नहीं अनुभव भी करता है। अनुभव ही नहीं करता, वरन् उसे दूर करने की चेष्टा भी करता है। चेष्टा ही नहीं करता, वरन् उसमें रस भी लेता तथा संतोष भी अनुभव करता है। उत्साहित, उल्लसित भी रहता है। इसी सहृदयता को भक्ति भावना कहते हैं।

उपरोक्त पद का अगला चरण है-”पर दुखे उपकार करे तोऊ मन अभिमान न आवे रे।” इसका तात्पर्य है कझा और सेवा को चरितार्थ करने वाले के मन में उपकारी होने जैसा अहंकार नहीं आना चाहिए। न बदले में आशा ही करना चाहिए। उपकार करके उसका बदला चाहना और प्रशंसा सुनना, कृतज्ञता की अभिव्यक्ति जैसी अपेक्षा करना भी बदला माँगने जैसा है। ईश्वर भक्ति निष्काम होती है। दूसरी उदार करुणा भी निर्मल और निष्काम सतत् ही होनी चाहिए। भक्ति व्यवहार और आचरण में परिलक्षित रहनी चाहिए।


सृष्टि रचना के उपरान्त (Kahani)

विधाता ने सृष्टि रचना के उपरान्त दो उपहार सुरक्षित रखे। उन्हें देवताओं और मनुष्यों में बीच बाँटा जाना था। प्रथम उपहार मंच पर रखा गया तो उसे लपक कर गणेश जी ने ले लिया, वह थी बुद्धिमत्ता अब की बारी मनुष्यों की थी। उन्हें उदास देखकर ब्रह्माजी ने कहा-अबकी बार जो मिलना है वह और भी अधिक मजेदार है, आप लोग उदास न हों। मंच पर रखी वस्तु पहले से अधिक चमकदार थी। उसे मनुष्यों ने ले लिया और आपस में बाँट कर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त करने लगे।

वह वस्तु थी-मूर्खता। मनुष्य तब से लेकर अब तक मूर्खता को बहुत सँभाल सँजोकर रख रहे हैं और इसे बुद्धिमत्ता से बढ़कर मानते हैं।


यह दलाली कोई घाटे का सौदा नहीं

किसी को माल, जीन्स, मकान इत्यादि खरीदना हो, पर उसे यह विदित न हो कि यह असबाब कहाँ से मिलेगा, तो वह कुछ कर नहीं पाता, दूसरी ओर ऐसा भी होता है कि विक्रय के लिये सामान के ढेर लगे होते हैं, पर उसका मालिक यह नहीं जानता कि इसके खरीददार कौन हैं? कहाँ हैं? महँगा या सस्ता किस में लेने में मूड़ में हैं? दोनों अपने-अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिए बेचैन होते हैं, पर खोज के लिए निकल पड़ना और अपने मतलब का आदमी ढूंढ़ निकालना बन नहीं पड़ता। किसी दशा में दोनों को हैरानी असाधारण रहती है। जिसके पास ढेरों जमा है, वह उसका ठीक उपयोग नहीं कर पाता, फलतः वह बर्बाद होता चला जाता है। दूसरी ओर जरूरतमंद मिलने के स्थान से अपरिचित होने के कारण अभावग्रस्त स्थिति में रहता और कष्ट उठाता है। दोनों के बीच अभीष्ट जानकारी का आदान-प्रदान न हो पाने के कारण संबंधित व्यक्तियों की निजी हानि तो होती ही है, ऐसे सुयोग न बन पाने के कारण वे मन मार कर बैठे रहते हैं। यह गतिरोध अनेकों के लिए अनेक प्रकार हानिकारक एवं कष्टदायक होता है।

इस महती असुविधा को दूर करने एवं आवश्यकता को पूरी करने के लिए एक वर्ग उभरता है जिसे बोलचाल की भाषा में दलाल या “ब्रोकर” कहते हैं। उनका कार्य आवश्यक जानकारियों का संचय करके जरूरत मंदों के साथ संपर्क बनाना और संचय करके जरूरत मंदों के साथ संपर्क बनाना और उनकी अभीष्ट आवश्यकता पूरी करना होता है। वे अपने क्षेत्र की खोज करते रहते हैं और विक्रेता खरीददारों के बीच तालमेल मिलाते हैं और सौदा करा देने तक उस प्रयास में लगे रहते हैं। इसमें उस मध्यवर्ती का अपना भी लाभ है। उसे दलाली का कमीशन मिलता है और उतने भर में अपना गुजारा वह मजे में कर लेता है। कई बार तो वह विक्रेता या ग्राहक से भी अधिक नफे में रहता है। उसे कृषि करने, व्यवसाय में पूँजी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। हेरा-फेरी का कमीशन ही इतना हो जाता है जितना कि घोर परिश्रम करने वाला उत्पादक या लम्बी पूँजी कमाने वाला ग्राहक कमा पाता है। वस्तुस्थिति को देखते हुए दलाली का धंधा बेजोखिम का और भाग दौड़ के अनुपात में कहीं अधिक मुनाफा प्रदान करने वाला समझा जाता है।

नदी के एक किनारे पर खड़ा हुआ व्यक्ति चौड़ी एवं तेजधार को पार करना चाहता है। दूसरे किनारे पर उसकी प्रतीक्षा भी है और आवश्यकता भी। पर पार कैसे हुआ जाय? उसे तैरना तो आता नहीं। इस समस्या का समाधान नाव वाला करता है। वह उसे अपनी डोंगी में बिठाकर पार करता है। इसके बदले उसे उचित पारिश्रमिक मिल जाता है। इस प्रयास को दलाली भी कहा जा सकता है।

प्रसिद्ध है कि कहीं उगे मेंहदी के पत्ते तोड़कर किसी हाथ रचाने वाले के लिए कोई उन पत्तों की पिसाई कर देता है। मेंहदी कहीं की और रचाने पर शोभा बनी किसी की, पर पीसने वाले के हाथ मुनाफे में ही लाल हो जाते हैं। इत्र का व्यवसाय करने वाले भी अपने कपड़ों को इतना महका लेते हैं जैसा कि वे बहुत खर्च करने पर ही कर सकते थे। इत्र की दलाली में उन्हें सुवासित होने का सहज अवसर मिलता है।

समुद्र में अथाह जल भरा पड़ा है वह दौड़कर प्यासे भूखण्डों तक नहीं पहुँच सकता। जिन्हें पानी की जरूरत है वे भी उसे प्राप्त करने के लिए समुद्र या सरोवर तक पहुँचने की लम्बी यात्रा नहीं कर सकते। यह कार्य बादल करते हैं। यद्यपि जल राशि उनकी निजी नहीं होती। वे परिवहन मात्र ही करते हैं। इधर से समेटने उधर बखेरने भर की क्रिया उन्हें करनी पड़ती है, किन्तु इतने भर से उन्हें असाधारण श्रेय मिलता है। उठती मेघमालाओं को देखकर लोग फूले नहीं समाते। मोर नाचते और पपीहे कूजते हैं। धरती हरा मखमली फर्श बिछाकर उन्हें निरन्तर बरसते रहने के लिये अपना प्रसन्नता भरा आमंत्रण भेजती रहती है। इस भाप के गट्ठर को कोई इन्द्र की सेना कहता है। कोई वरुण देवता का प्रतिनिधि। दलाली में उन्हें जो श्रेय और पुण्य मिलता है, उसे निश्चय ही असाधारण कहा और महत्वपूर्ण समझा जा सकता है। बीमा कम्पनियों के ऐजेन्ट यही काम करते हैं। कम्पनी और पॉलिसी होल्डरों का संबंध जोड़ने का काम वे करते हैं। विवाह शादी कराने में पिछले दिनों नाई-पुरोहित कारगर भूमिका निभाते थे। बदले में जो सम्मान और उपहार मिलता था, वह उससे कहीं अधिक होता था जितना कि यदि वे श्रमिक की तरह मजूरी करने पर कमा पाते। बीमा ऐजेन्ट भी घर से खाली हाथ ही निकलते हैं पर जरूरतमंदों की आवश्यकताएँ पूरी करने पर वे साधारण मजूरों की तुलना में कहीं अधिक-कई गुनी कमाई करते रहते हैं।

अध्यात्म क्षेत्र परमार्थ क्षेत्र में भी इस प्रक्रिया के लिए भारी माँग रहती है और जो उसे कर पाते हैं वे उपकारियों और उपकृतों की तुलना में कम नफे में नहीं रहते। दानी को प्रोत्साहित करने, उसे अभावग्रस्तों के लिए उदार अनुदान देने के लिए तैयार कर देने पर दोनों पक्षों को लाभ मिलता है। दाता को पुण्य, संतोष और यश मिलता है। पाने वाला अपनी व्यथा कठिनाई में राहत पाकर दुआएँ देता है। दोनों का लाभ स्पष्ट है। पर जिसने इन दोनों पक्षों को एक दूसरे से परिचित कराया और प्रोत्साहन भरी प्रेरणा देकर सुयोग बनाया, उस मध्यवर्ती को भी कम श्रेय नहीं जाता। कुछ प्रत्यक्ष देने की, लेने की बात नहीं बनी पर उस मध्यवर्ती की अप्रत्यक्ष भूमिका असाधारण समझी जायगी और उसे भी उसका पुण्य यश तथा श्रेय बड़ी मात्रा में मिलता हुआ समझा जाता है।

ज्ञान और तप के क्षेत्र में भी ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जिनके पास सामर्थ्य के भण्डार भरे पड़े हैं। पर वे अपने गहरे अन्वेषण में इतने अधिक व्यस्त रहते हैं कि लाभ उठाने वालों की उत्सुकता तथा चेष्टा बढ़ाने के लिए कुछ वैसा नहीं कर पाते जैसा कि विज्ञापनकर्त्ता कर लेते हैं। दूसरी और जिज्ञासुओं, श्रेयार्थियों की भी ऐसी बड़ी मंडली होती है जो उत्सुकता तो दबा नहीं पाती और आतुरतावश ऐसों के जाल जंजाल में जा फँसती है, जिनके पास आडम्बर और प्रपंच के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता जिनके पास ज्ञान है तप है, प्रतिभा है, सूझ है उन्हें निजी प्रयोजनों में से बचा कर जन-कल्याण के लिए लगाने के लिए सहमत करना भी एक बड़ा काम है। इसी प्रकार जिनमें जिज्ञासा नहीं है, परमार्थ के लिए आत्म प्रगति के लिए उत्कंठा नहीं है उन्हें भी तथाकथित व्यस्तता से उदासी उपेक्षा से निकाल कर महामानवों के पथ पर चलने के लिए उत्साहित करना भी विश्व कल्याण की दिशा में असाधारण पग बढ़ाना है। इसके लिए मध्यस्थों की भूमिका को दाता और ग्रहीता से कम नहीं वरन् अधिक ही बढ़ा चढ़ा माना जायगा। पुरोहित, धर्म प्रचारक, परमार्थ पारायण उदारमना लोग इसी श्रेणी में आते व अगणित व्यक्तियों को धर्म धारणा का पक्षधर बनाते हैं। इसके लिए स्वयं उन्हें पहले अपने को रंगना पड़ता है। कथनी-करनी एक करनी होती है। तब मध्यस्थ रूप में निभाई गई उनकी भूमिका सार्थक होती देखी जाती है।


साधु और डाकू (Kahani)

साधु और डाकू की एक ही दिन मृत्यु हुई। धर्मराज के दरबार में भी वे साथ-साथ ही पेश हुए।

डाकू ने अपने दुष्कर्म कह सुनाए और यथोचित दण्ड पाने के लिए सिर झुका कर खड़ा हो गया। साधु ने अपने पुण्य बखने और स्वर्ग सुख का दावा प्रस्तुत किया।

धर्मराज ने डाकू को दण्ड दिया कि तुम आज से इस साधु के सेवा में संलग्न रहो। ताकि जो सद्भाव तुम में जागा है वह संगति से और अधिक निखर सके। वह तैयार हो गया।

साधु ने आपत्ति की और कहा-इसकी संगति से मैं भ्रष्ट हो जाऊँगा। मुझे यह स्वीकार नहीं।

धर्मराज ने अपना फैसला बदल दिया। उलट कर साधु को दण्ड दिया कि तुम डाकू की सेवा में निरत रहो ताकि तुम्हारा अहंकार गल सके।


अपने भाग्य का विधाता स्वयं मनुष्य

आत्मा और परमात्मा के बीच स्नेह सघनता का अनुग्रह, अनुकम्पा का एक ही आधार है कि उसकी नियम व्यवस्था में चला जाय। अनुशासन, अनुबंध का पालन किया जाय। इससे कम में बात नहीं बनती। व्यवहार में उद्दंडता उच्छृंखलता बरती जाय, मर्यादाओं का उल्लंघन और वर्जनाओं का व्यतिरेक किया जाता रहे और यह आशा की जाती रहे कि परमात्मा की कृपा, अनुकम्पा को किसी दूसरे पगडंडी मार्ग से हथियाया जा सकता है, तो इस मान्यता को अनधिकार चेष्टा ही समझा जाना चाहिए। ऐसी चेष्टा जिसकी पूर्ति की आशा किसी को भी नहीं करनी चाहिए।

इस सृष्टि में सर्वत्र व्यवस्था का अनुशासन है। ग्रह, नक्षत्रों से लेकर, प्राणी, पदार्थ, वनस्पति, ऋतु चक्र, जन्म मरण जैसे उपक्रम अपने ढंग से चलते हैं, अपनी धुरी पर घूमते हैं। पराक्रमी, संयमी उपार्जन करते और आलसी व्यसनी जो हस्तगत है उसे भी गँवाते चले जाते हैं। समुन्नत स्तर के महापुरुषों ने इसी आधार पर भौतिक अभ्युदय और आध्यात्मिक उत्कर्ष का लाभ कमाया है। जिनकी अवगति, दुर्गति हुई है उसका कारण भी यही रहा है कि वे अपनी जागरूकता, श्रमशीलता को सक्रिय रखने में उपेक्षा बरतते रहे। फलतः अवगति के गर्त्त में गिरे। ईश्वर किसी के साथ पक्षपात या विद्वेष नहीं बरतता। उसके लिए सभी आत्माएँ समान हैं। पुत्रवत् हैं। यदि प्यार है तो सभी से फिर द्वेष हो तो सभी से होना चाहिए। एक न्यायशील पिता जब अपने सभी बच्चों को समान स्नेह, सहयोग प्रदान करता है तो भगवान जैसे परम न्यायकारी से यह कैसे बन पड़ेगा कि किसी को उन्नति के अवसर प्रदान करता जाय और दूसरे के लिए अवगति की परिस्थिति बनाकर रख दे।

भगवान की चर्चा करने वाले अक्सर विधाता द्वारा लिखी गई कर्म रेखाओं की चर्चा करते हैं। ज्योतिषी इस संदर्भ में ग्रह नक्षत्रों का श्रेय या दोष बताते रहते हैं, पर यह दोनों ही प्रतिपादन तर्क और तथ्य की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। ब्रह्मा को क्या पड़ी कि किसी को भाग्य खोटा लिखे और किसी का खरा। यदि वह अपनी मनमर्जी से ऐसी सनक अपनाये, जिससे किसी को असाधारण लाभ मिलता रहे और किसी को बिना किसी दोष के कष्ट मिले, असफलता हाथ लगे और दुःखी होना पड़े। यदि ब्रह्मा जी ऐसी बेतुकी खिलवाड़ करते हैं तो फिर मनुष्य का उन्नति अवगति का श्रेय या दोष उन्हीं को दिया जाना चाहिए। इस अव्यवस्था का इल्जाम उन्हीं पर लगना चाहिए।

ग्रह नक्षत्रों के अनुकूल प्रतिकूल होने की बात और भी बेतुकी है। पृथ्वी से लाखों करोड़ों मील दूर रहने वाले निर्जीव ग्रह पिण्ड भला पृथ्वी के निवासी मनुष्यों को कहाँ-कहाँ ढूँढ़ते फिरेंगे। कैसे पता लगावेंगे कि कौन कब पैदा हुआ था। फिर किसी समय विशेष पर पैदा होना कोई ऐसा जुर्म नहीं है जिससे किसी को आजीवन दुःख सहने पड़ें या कोई सदा मजा उड़ाता रहे। जब मनुष्य ने ग्रहों का कोई उपकार-अपकार नहीं किया है तो फिर उन्हें ही क्या पड़ी जो किसी को गिराने, किसी को उठाने का कौतुक अकारण ही करते रहें। एक ही समय में हजारों व्यक्ति हर दिन पैदा होते हैं। पर उनमें से भी एक जैसी स्थिति में नहीं रहते। कोई उन्नत, कोई मध्यम कोई गई-गुजरी स्थिति में रहते हैं। यदि ग्रह प्रभाव ही सब कुछ रहा होता तो एक समय में जन्मे सभी मनुष्यों की एक जैसी स्थिति में रहना चाहिए था। पर ऐसा होता कहाँ है? सभी अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ते या पीछे हटते हैं। यदि ग्रहों का ही अधिकार रहा होता तो वे विचारशील होने पर न्याय बरतते और यदि अविचारी, सनकी होते तो उन्हें ऐसा श्रेय नहीं मिलना चाहिए था कि उनका ग्रह गणित किया जाता, महत्व दिया जाता या पूजा उपचार के झंझट में पड़ा जाता। वस्तुतः ग्रह नक्षत्र निर्जीव पिण्ड हैं वे अपनी-अपनी परिधि में गतिशील रहते हैं। अपने लिए निर्धारित क्रिया चक्र को पूरा करते हैं। उनका प्रभाव यदि हो सकता है तो समूची पृथ्वी या उसके किसी क्षेत्र विशेष पर एक जैसा पड़ना चाहिए। यह कैसे हो सकता है कि मनुष्यों में से विभिन्न समयों में जन्मे लोगों के वे पीछे लगे रहे और उपहार बाँटे या हैरान करें?

जन्म कुण्डलियों में कोई अशुभ संकेत बताये जाने पर अनेकों अपने को भाग्यहीन समझते रहते और अपना मनोबल गिराते रहते हैं। मंगली बता दिये जाने पर कई लड़के या लड़कियाँ अपने को अभागा मान बैठते हैं और दाम्पत्ति सुख न पा सकने की आशंका से खिन्न रहते हैं। यही बात मूल नक्षत्रों में जन्मे बालकों के संबंध में भी है। उन पर अभिभावकों की घृणा और अकृपा बरसती रहती है। यह ग्रह गोचर किसी को कदाचित ही उत्साहवर्धक संकेत देते हों। हर किसी को किसी न किसी अनिष्ट की आशंका से चिन्तित करते रहते हैं। इसमें ज्योतिषियों की बन आती है। वे ग्रह शान्ति के बहाने, भोले भावुकों को बुरी तरह ठगते रहते हैं।

वस्तुतः मनुष्य का निजी प्रयत्न पुरुषार्थ ही उसके उत्थान, पतन का मूलभूत कारण है। जो समय और श्रम का मूल्य समझते हैं। कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक रहते हैं, अपनी सामर्थ्य को तोलते हुए कदम बढ़ाते हैं, व्यवहार में सज्जनता, मधुरता और सहयोग भावना का समुचित समावेश किये रहते हैं उन्हें प्रगति के अनेकानेक अवसर निरन्तर मिलते रहते हैं। किन्तु जो अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त और उद्धत जीवन जीते हैं, वे हारते और गिरते जाते हैं।

कभी-कभी इसके अपवाद भी देखे जाते हैं। कभी अंधे के हाथ बटेर लग जाती है तो कभी सुव्यवस्थित लोग भी मात खा जाते हैं। इसमें प्रधान कारण संयोग ही होता है। परिस्थितियों और क्रियाओं का तालमेल कुछ ऐसा बैठ जाता है जिसमें सहज स्वाभाविक प्रतिफल के स्थान पर उलटे परिणाम सामने आते हैं। अप्रत्याशित लाभ मिल गया तो उसे संयोग ही कहना चाहिए, और यदि घाटा हुआ तो उसे अपने क्रिया-कलापों में कही भूल रहना अथवा परिस्थितियों का उलटा-सीधा मोड़ ले लेना भी कारण समझा जा सकता है प्रकृति की प्रतिकूलता भी अकाल, बाढ़, सूखा, भूकम्प, महामारी आदि के रूप में टूट सकती है। इस प्रकृति प्रतिकूलता के पीछे भी मनुष्यों द्वारा अपनाई गई दुष्प्रवृत्तियाँ ही प्रधान कारण हो सकती है।

जिनका समाधान अपने कर्त्तव्य के साथ नहीं जुड़ता उन यदा-कदा आ धमकने वाले अपवादों के संबंध में यह समझा जा सकता है। कि यह अपने किसी पूर्व जन्मों के किये गये कृत्यों का परिणाम हो सकता है। आमतौर से दूध जिस दिन दुहा जाता है उसी दिन उसका उपयोग हो जाता है। पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बच जाने पर उसे जमा देते हैं। दूसरे दिन उसका नाम, रूप, स्वाद, गुण सभी बदल जाता है। पूर्व संचित कर्म इस जन्म में प्रारब्ध होकर प्रकट हो सकते हैं। वे अप्रत्याशित होते हैं और तात्कालिक क्रिया-कलाप के साथ उनकी संगति नहीं बैठती। ऐसी दशा में यह कहा जा सकता है कि किसी पूर्वकृत कर्म का उदय हुआ है। इसमें भी श्रेय या दोष अपना ही होता है, क्योंकि संचित कर्म भी तो अपने ही किये हुए थे।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इस उक्ति में कुछ अपवादों को छोड़कर 99 प्रतिशत सच्चाई है। यदि हम अपने आपको सुव्यवस्थित रखें और सही मार्ग अपनायें तो प्रगति का द्वारा खुला हुआ ही मिलेगा। अपने भाग्य और भविष्य का निर्माण हम अपने वर्तमान का सदुपयोग करके स्वयं ही करते हैं।


काट गिराने का निश्चय किया (Kahani)

लकड़हारे ने उस जंगल को काट गिराने का निश्चय किया पेड़ों तक यह खबर आँधी तूफान की तरह पहुँच गई।

पेड़ों ने हिम्मत रखी और कहा आदमी के हाथ पतले हैं और बहुत छोटे, वह हमें न काट सकता है न उखाड़ने की ताकत उसमें हैं।

कई दिन बाद लकड़हारे-लकड़ी के वेंट वाली कुल्हाड़ियों हाथ में लेकर आए।

पेड़ों ने कहा-अपनी ही बिरादरी यदि शत्रुओं का साथ दे तो फिर विपत्ति का टूटना निश्चित है।

आदमी की ताकत ने वेंट की जाति दोह से जंगल का सफाया कराया।


राजयोग के प्रारम्भिक अनुशासन

राजयोग के प्रथम दो चरणों में पाँच यम और पाँच नियम आते हैं। इनका तत्त्व प्रयोजन दसों इन्द्रियों को परिष्कृत मनोभावों के अंतर्गत अनुशासित करना है। काया को इस प्रकार संयमी बनाना है जिससे कषाय-कल्मषों के कार्यान्वित होने की कहीं गुंजाइश न रहे। यह बन पड़ने पर व्यक्ति आदर्शवादी, उत्कृष्टता सम्पन्न एवं पवित्रता सात्विकता से समन्वित बन जाता है। यह साधारण जीवन में प्रयुक्त होने वाला अनुशासन एवं श्रेष्ठता सम्पन्न क्रिया−कलाप है। जीवनचर्या बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्र में शालीनता से परिपूर्ण हो तो समझना चाहिए कि योग साधना के आरम्भिक दश अनुशासन बन पड़े और योगाभ्यास का महत्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया। यम और नियम यों संख्या की दृष्टि से दो गिने जाते हैं पर वे वर्गीकृत होने पर दस हो जाते हैं। इसमें जीवन गरिमा की दसों दिशाओं का समावेश हो जाता है। जिससे इतना करते बन पड़े, समझना चाहिए कि उसने योग मार्ग की आधी मंजिल पार कर ली। भूमि को खाद पानी देकर जुताई-गुड़ाई के सहारे उर्वर बना लिया।

इसके आगे तीसरे और चौथे चरण में आते हैं। आसन प्राणायाम। इनका क्रिया−कलाप तो सरल और सर्वविदित है। पर काम चलता है उनके साथ जुड़े हुए रहस्यों और तथ्यों को भली प्रकार समझने और अपनाने से इन दो चरणों को गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता समझा और समझाया जाना चाहिए।

आसन के रूप में पद्मासन मयूरासन पश्चिमोत्तासन, शीर्षासन, आदि के व्यायाम सीखे और सिखाये जाते हैं। यह व्यायाम वर्ग का प्रयोग है, जिसका तात्पर्य श्रम-शील जीवन, आहार-विहार के नियम में आरोग्य का संरक्षण, आसन प्रक्रिया में स्वास्थ्य रक्षा के लिए आवश्यक नियमों के पालने की बात कही गई है। इसमें आहार और विहार दोनों आते हैं। आसनों को मात्र व्यायाम तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए वरन् यह भी सोचना चाहिए कि इस विद्या से सात्विक आहार के सम्बन्ध में भी आसन के उपरान्त प्राणायाम की बारी आती है। प्राणायाम मोटे अर्थों में गहरी साँस छोड़ना और उसे पूरी तरह बाहर निकालना है। साँस लेने की दृष्टि से यही उपयुक्त तरीका है। हवा के साथ ऑक्सीजन-प्राण वायु भी घुली होती है। गहरी साँस लेने से फेफड़ों में पूरी हवा भरती है, इससे अधिक मात्रा में प्राण तत्व शरीर को उपलब्ध होता है। फेफड़ों में खाली जगह रहने से उस बंद जगह में क्षय जैसे रोगों के कीटाणु पलने लगते हैं। पूरी गहरी साँस लेने से न केवल फेफड़ों की वरन् समूचे शरीर के तंतु जाल को जीवन तत्व की बहुलता प्राप्त होती है। रक्त शोधन का क्रम ठीक प्रकार चलता है। यह निरोग शरीर और दीर्घ जीवन की दृष्टि से उपयुक्त प्रयोग है। यह शारीरिक प्रयोग-प्रयोजन हुआ। मानसिक दृष्टि से प्राणायाम साहसिकता का प्रतीक है। अमुक व्यक्ति प्राणवान है इस प्रकार का कथन उसके साहसी होने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। प्राणवान अर्थात् साहसी।

साहस मानसिक गुण है। शरीर बलिष्ठ हो सकता है, पर यह आवश्यक नहीं कि उसमें साहस भी हो। कितने ही स्थूलकाय व्यक्ति कायर भीरु भी हो सकते हैं। इसके विपरीत ऐसा भी देखा गया है कि गाँधीजी जैसे दुर्बलकाय व्यक्ति असीम साहस के भण्डार थे। मनस्वी ऐसे ही व्यक्तियों को कहते हैं। उन्हीं को ओजस्वी-तेजस्वी भी कहा जाता है। प्राणायाम से यह विशेषताएँ बढ़ती हैं। पर ऐसा भी होता है कि बिना विधिवत् प्राणायाम साधे भी कोई व्यक्ति मनस्वी हो। नैपोलियन सिकंदर जैसे कितने ही व्यक्ति ऐसे हुए हैं जो शौर्य साहस के धनी थे। यद्यपि योग विधि में वर्णित प्राणायाम नहीं करते थे।

योगाभ्यास के प्रकरण में जहाँ प्राणायाम का वर्णन आया हो वहाँ उसे मात्र श्वास प्रश्वास क्रिया की गहराई तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए वरन् यह भी समझना चाहिए कि उच्चस्तरीय महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए जिस शारीरिक पराक्रम और मानसिक शौर्य के लिए संकेत किया जा रहा है। उसे सम्पादित किया जाना चाहिए। योगाभ्यास में पग-पग पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्सर जैसे असुरों को निरस्त करने के लिए संघर्ष ठानना पड़ता है, और निश्चय करना पड़ता है कि कितना ही श्रम क्यों न पड़े, समय क्यों न लगे पर अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच कर ही रहा जायगा। ऐसी प्रचण्ड इच्छा शक्ति संकल्पजन्य दृढ़ता आध्यात्मिकता के साथ जुड़ी रहती है।

आन्तरिक दुर्बलताओं और बाह्य क्षेत्र की कठिनाइयों, आकर्षणों, दबावों से संघर्ष करने के लिए शरीर बल, शस्त्रबल आदि की अपेक्षा मनोबल की अधिक आवश्यकता पड़ती है। इसी को अर्जित करने के लिए श्वांस प्रश्वांस से ऊर्जा बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है जिस भी विधि से प्राण-चेतना साहसिकता बढ़े उसे प्रकारान्तर से प्राणायाम ही कहा जायगा।

राजयोग के आठ अंगों में प्राणायाम तक पाँच पूरे हो जाते है छठा है प्रत्याहार। इसका स्वरूप है-प्रतिरोधी प्रक्रिया। जन्म जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कार हर किसी को घेरे होते हैं। वे समय-समय पर उभर कर ऊपर आते रहते हैं। मनुष्य जीवन मिलने पर मानवी गरिमा के अनुरूप आचरण की जिम्मेदारी सिर पर आती है। उन्हें पूरा करने पर ही लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव होती है। किन्तु कठिनाइयाँ दो हैं। एक तो हेय योनियों में भ्रमण करते समय जो कुसंस्कार स्वभाव के अंग बन कर रहे हैं, वे अवसर मिलते ही उसी प्रकार उभर आते हैं, जैसे वर्षा होते ही घास की सूखी जड़ें हरी हो जाती हैं और देखते देखते सूखे धरातल पर हरीतिमा छा जाती है। कुसंस्कारों को जब तक दबाये रखा जाय तब तक वे दबे रहते हैं; किन्तु जैसे ही शिथिल हुआ। पशु प्रवृत्तियां अपना कौतुक दिखाने लगती है।

इसके अतिरिक्त दूसरी बात यह है कि समाज में सभी ओर दुष्प्रवृत्तियां का प्रचलन है। जन साधारण का स्वभाव बहुत की नकल करना है। अधिकाँश लोग जिस प्रकार बरतते हैं, उसी प्रकार सामान्य जनों का व्यवहार भी उसी मार्ग पर चल पड़ता है। योग साधना के लिए प्रयत्नशील व्यक्तियों को भी इस मोर्चे पर जूझना पड़ता है। वे अपने अन्तरंग और बहिरंग जीवन को आदर्श उत्कृष्ट बनाना चाहते हैं, किन्तु प्रचलन को देखकर साधक की ललक भी उसी दिशा में मचलने लगती हैं। यहाँ यदि अवरोध का मोर्चा कमजोर पड़ते तो हेय दुष्प्रवृत्तियां की चढ़ बनती है और साधना में अनेकानेक विघ्न खड़े हो जाते हैं। इसीलिए प्रतिवादी प्रतिपक्षी संघर्षशीलता का विभिन्न अभ्यासों द्वारा ऐसा स्वभाव बनाना पड़ता है; जो किसी भी अवसर पर चूकने न पाये। प्रत्याहार अर्थात् परास्त करने का कौशल। यह व्यक्तियों का, समूहों का, परिस्थितियों का ही उलटना नहीं वरन् अवाँछनीय मनोदशाओं को भी परास्त कर देना-उनसे बच निकलना भी है। प्रत्याहार की साधनाएँ कतिपय हैं, उनके नाम रूप अनेक हैं पर उद्देश्य एक ही हैं-अनौचित्य को परास्त करना।


स्वामी विवेकानन्द (kahani)

स्वामी विवेकानन्द बनारस की एक संकरी गली से जा रहे थे। रास्ता घेरे बन्दरों का एक झुण्ड बैठा था।

स्वामी जी डरे और भागकर लौटने लगे। बन्दरों ने पीछा किया। कपड़ा फाड़ दिया और कई जगह काट दिया।

चीख पुकार सुनकर गली का गृहस्थ बाहर निकला उसने कहा-भागो मत, सामना करो, कुछ नहीं तो घूँसा तान कर इनकी ओर बढ़ो।

स्वामी जी ने वैसा ही किया। बन्दर ठिठके और धीरे-धीरे इधर-उधर बिखर गए।

विवेकानन्द ने समझा कि कठिनाइयों से डरना, भागना व्यर्थ है। उससे जूझने के लिए हिम्मत के सहारे आगे बढ़ना चाहिए।


चेतना की उदात्तीकरण प्रक्रिया

आदिम काल में मनुष्य बन्दरों, वन–मानुषों की तरह रहता था और शारीरिक श्रम के आधार पर ही निर्वाह के साधन जुटाता था। तब उसके पास सम्पदा के नाम पर मिट्टी के बर्तन और पत्थरों के उपकरण भर थे। लम्बे पत्तों से काया को ढकता और ऋतु प्रभाव से अपने को बचाता था। निवास के लिए पेड़ों के झुरमुट और पहाड़ों की गुफा खंदक ही उसका आश्रय थे। यह स्थिति चिरकाल तक चली।

कालान्तर में इच्छा शक्ति उभरी, प्रगति की कामना जगी तो बुद्धि के कल पुर्जे अधिक सक्रिय हो गये। अग्नि जलाना, पहिए बनाना, कृषि करना, पशु पालन, आवास खड़े करना, बस्ती बनाना जैसी जीवनोपयोगी कलाएँ सीखीं। भाषा और लिपि का विकास हुआ। आयुध एवं औजार बने। इसी प्रकार क्रमशः भौतिक विज्ञान की प्रगति होती गई। सहकार बढ़ा। कुटुम्ब बने और एक का ज्ञान अनुभव दूसरे को हस्तान्तरित होने लगा। यही प्रक्रिया बढ़ते-बढ़ते आज उस स्थिति तक आ पहुँची है कि मनुष्य विद्युत शक्ति का दैनिक प्रयोजनों में, व्यावसायिक उद्देश्यों में, भरपूर प्रयोग कर रहा है एवं प्रकृति के अनेकों अविज्ञात रहस्य उसने खोज लिए हैं।

आद्यावधि हस्तगत हुई उपलब्धियों तथा भावी सम्भावनाओं की विभूतियाँ क्योंकर हाथ लगीं? इसका उत्तर देते हुए यही कहना होता है कि यह विज्ञान का चमत्कार है। यदि इस विश्व में प्रगति न हुई होती तो यह किसी भी प्रकार सम्भव न था कि वन-मानुषों की बिरादरी से आगे बढ़कर सृष्टि का मुकुट-मणि बनने की स्थिति तक पहुँच सकना बन पड़ता तथा सम्पदा, सुविधा और साधनों के अम्बार उसके सामने खड़े होते।

भौतिक विज्ञान की जितनी प्रशंसा की जाय जितनी महिमा बखानी जाय उतनी ही कम है। पदार्थ प्रकृतितः अनगढ़ और अस्त-व्यस्त था। उसे सुनियोजित मानवी बुद्धि, श्रमशीलता और कुशलता ने ही संभव किया है। विज्ञान पदार्थों के अनुकूलन की विधा सिखाता है। इसके लिए गतिशील रहा गया तो भविष्य में इस प्रत्यक्ष प्रगति के और भी अधिक आधार हाथ लगेंगे। इतने पर भी यह सब रहेगा एक पक्षीय ही। उससे सुविधा साधनों के अतिरिक्त और कुछ मिलने वाला नहीं है। शरीर पंच तत्त्वों का पदार्थों का बना है। उसे सुविधा प्रदान करने तक ही पदार्थ विज्ञान की सीमा नियत निर्धारित है।

इतने पर भी यह सब अपूर्ण, अधूरा है। क्योंकि मानवी सत्ता का एक पक्ष चेतना का भी है। चेतना जहाँ अपने प्रभाव से शरीर को जीवित सक्रिय रखती है। वहाँ वह नीति निष्ठा, भाव संवेदना, धर्मधारणा, आदर्शवादिता से भी भरी पूरी है। मानवी गरिमा उसकी सुसंस्कारिता पर निर्भर है। उसी के संकल्प से संयम बरतते बन पड़ता है। मर्यादा पालन एवं वर्जनाओं का अनुशासन भी उसी की प्रेरणा से निभता है। चरित्र-निष्ठा का निर्वाह उसी के संकेतों पर अवलम्बित है। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता जिस अन्तःकरण के संवेदनशील होने पर निर्भर है, उसे परिष्कृत चेतना के साथ सघन रूप से जुड़ा हुआ समझा जा सकता है। मानव जीवन का विचार पक्ष उसी पर अवलम्बित है। उच्चस्तरीय प्रगति उसी पर निर्भर है। महापुरुषों जैसी महानता उसी क्षेत्र से उद्भूत होती है। व्यक्तित्व का निखार, प्रतिभा का उभार, इसी उद्गम से होता है। दृश्य शरीर की तुलना में चेतना का अदृश्य पक्ष सहस्रों गुना अधिक श्रेष्ठ एवं वरिष्ठ है।

चेतना यों रहती तो सभी जीवधारियों में हैं। उसी की उपस्थिति तक जीवन रहता है। विलग होते ही मरण निश्चित है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि प्रखर परिष्कृत होने पर वह अन्तःकरण की भाव-संवेदना, मस्तिष्क की दूरदर्शी-विवेकशीलता और शरीर की तन्मय, तत्परता का विकास संभव कर दिखाती है। चेतना का उत्कर्ष ही नरपशु को महामानव बनाता है।

इस ब्रह्माण्ड की संरचना दो भागों में बँटी हुई है-एक जड़ तथा दूसरा चेतना। एक प्रकृति दूसरा पुरुष। सब जानते हैं कि बिना संचालक के आटोमेटिक मशीनें भी नहीं चल सकतीं और न कम्प्यूटर, रोबोट ही काम कर सकते हैं। प्रकृति को भी सचेतन पर ब्रह्म ने ही बनाया है। अस्तु यह तथ्य स्पष्ट है कि जड़ से चेतन का मूल्य-महत्व असंख्य गुना होना चाहिए। जड़ पदार्थों के सहारे जब अनेकानेक सुख साधन विनिर्मित हो सकते हैं तो चेतन की बुद्धिमत्ता एवं भाव संवेदना कितनी अधिक श्रेय साधना सम्पादित कर सकती है? इसे सहज ही समझा जा सकता है।

भौतिक विज्ञान पदार्थों के अनुकूलन पर आधारित है। उसमें वस्तुओं को इच्छानुरूप स्थिति में बनाने की क्रिया प्रक्रिया सीखी-सिखाई जाती है। दूसरा समानान्तर विज्ञान है चेतना का। उसके परिशोधन, उन्नयन का। इसे अध्यात्म कहते हैं। इसका प्रथम चरण है-चिन्तन। विचार पद्धति का सुसंतुलन। सर्वविदित है कि क्रिया-कलापों के मूल में विचारणा ही काम करती है। विचार प्रवाह यदि अनुपयुक्त दिशा में बह रहा है, तो उसके सूत्र संचालन पर निर्भर क्रिया-कलाप भी हेय स्तर के ही बन पड़ेंगे, हेय कृत्यों का प्रतिफल दुःखद, संकटापन्न एवं अपयश, विरोध विग्रह के रूप में ही सामने आना चाहिए। उस कुचक्र में फँसे मनुष्य खिन्न, विपन्न से बने रहते हैं और वर्जनाओं का उल्लंघन नहीं करते। चरित्र में गुण, कर्म, स्वभाव के सभी पक्ष आते हैं। निज की विनम्रता, संयमशीलता और दूसरों को सम्मान प्रदान करते रहने, मधुरता का पुट लगाते रहने, प्रसन्नता, सफलता व्यक्त करने वाली हल्की मुस्कुराहट चेहरे पर बनाये रहने पर व्यक्तित्व का स्तर प्रकट होता है। इस चुम्बकत्व से जन-साधारण का सहयोग, सद्भाव खिंचता चला आता है। वैसे चरित्र-निष्ठा के आवश्यक अंग समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के रूप में जाने जाते हैं।

तीसरा पक्ष व्यवहार का है। जैसा सोचा जाता है, वैसा ही व्यक्तित्व बनता है, चरित्र ढलता है। चरित्र अपनी गरिमा के अनुरूप लोकोपयोगी कामों में हाथ डालता है। उदार, परमार्थ, परायणता का परिचय देता है। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा के रूप में दूसरों से यथोचित व्यवहार बन पड़ता है। योजना ऐसा कुछ कर गुजरने की रहती है, जिसका प्रभाव ग्रहण करने वाले-हर किसी को ऊँचा उठने, आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल सके।

आत्मीयता की स्नेह संवेदनाओं से भरा-पूरा उदार सेवी सहयोग, सम्मिश्रित सद्व्यवहार हर किसी से नहीं बन पड़ता। ओछे व्यक्ति तो अहंकार भरी अशिष्ट उजड़ता ही बरतते देखे गये हैं। सज्जनता, चरित्र-निष्ठा का ही एक अंग है। नीतिवान मानवी गरिमा का-मनुष्य जन्म का-मूल्य महत्व समझते हैं। अस्तु अपना व्यक्तित्व ऐसा बनाये रहते हैं जिससे अन्तरात्मा प्रफुल्लता-प्रसन्नता अनुभव करे और संपर्क क्षेत्र में लोग सराहना करते रहें। किसी को किसी भी कारण उँगली उठाने का अवसर न मिले। शत्रु भी लोहा माने और उसका मूल्यांकन अजातशत्रु के रूप में करे। चरित्र चिन्तन का परिणाम है। चिन्तन बीज है, उसमें चरित्र और व्यवहार का खाद पानी लगाने से जीवन कल्पवृक्ष जैसा फलता है। चन्दन जैसा महकता है। चिन्तन आमतौर से अचिन्त्य चिन्तन की रँगीली उड़ानें उड़ता और आवारागर्दी में भटकता देखा गया है। पर जब उसे आदर्शवादिता का अवलम्बन मिलता है, तो सही मार्ग पर चलने लगता है। उच्छृंखलता अवरुद्ध होती है और निर्धारित उद्देश्यों के लिए वह एकनिष्ठ, तन्मयता अपनाता है। ऐसों की एक भी विचार तरंग अनगढ़ नहीं होती। न उनमें भटकाव देखा जाता है और न ही असंयमी स्वच्छंदता का दौर उभरता है। विचारों का मूल उद्गम अन्तःकरण है। आस्थाएँ, भावनाएँ, कामनाएँ जिस अन्तःकरण में उत्कृष्ट स्तर की होती हैं, वहाँ विचार तरंगों का उत्पादन भी आदर्शवादी अभिव्यंजनाओं से आपूरित रहता है। अन्तःकरण ही है जिसमें संस्कार जड़ जमाये रहते हैं। जहाँ कुसंस्कारों का उन्मूलन करके सुसंस्कारों को आरोपित कर लिया गया है, वहाँ चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के सभी स्तर आदर्शों से भरे पूरे रहते हैं।

चेतना का उदात्तीकरण जीवन के अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्रों का परिशोधन, परिष्कार करने की प्रक्रिया जारी रखने पर सहज संभव है। इसके लिए आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के चार कदम उठाने पड़ते हैं। एकान्त में बैठ कर एकाग्र मन से अपने गुण, कर्म, स्वभाव में घुसी हुई अवाँछनीयता को समझने, पहचानने का प्रयत्न करना पड़ता है। जो अनुपयुक्तता समझ में आवे, उसे कूड़े कचरे की तरह बुहार फेंकने का साहस भरा प्रयत्न करना चाहिए। प्रबल इच्छा शक्ति के सामने कोई दुष्प्रवृत्ति टिक ही नहीं सकती। यह परिशोधन हुआ। यह आवश्यक है किन्तु पर्याप्त नहीं। दुष्प्रवृत्तियों के हटाने पर जो स्थान खाली हुआ है, उसे रिक्त नहीं रहने देना चाहिए, वरन् उसमें सत्प्रवृत्तियों का आरोपण करना चाहिए। उन्हें स्वभाव का अंग बनाने के लिए अभ्यास में उतारने के लिए तद्नुरूप आचरण करने की क्रमबद्ध योजना बनानी चाहिए और उसे कार्यान्वित करते रहने के निश्चय पर आरुढ़ रहना चाहिए।

आत्म विकास का अर्थ है-अपने “स्व” का दायरा बढ़ाना। जिस शरीर, परिवार में अपनी ममता सँजो रखी है। उसे सुविस्तृत करते हुए “आत्मवत् सर्व भूतेषु” की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की मान्यता अपनानी चाहिए। दूसरा तात्पर्य है स्वार्थ को परमार्थ में विकसित करना। विराट् ब्रह्म का विशाल विश्व के रूप में दर्शन करना। लोक सेवा का व्रत लेना और सत्प्रवृत्ति संवर्धन में जुट जाना।

इस स्थिति तक पहुँचने के लिए अध्यात्मवादी तत्व दर्शन के अनुरूप अपने श्रद्धा विश्वास को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाला जाना चाहिए। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, सेवा और साधना के चारों आधार जीवन-चर्या के अविच्छिन्न अंग बनाये जाने चाहिए। चिन्तन और मनन की प्रक्रिया में अधिकाधिक समय लगाना चाहिए। चिन्तन का प्रयोजन होना चाहिए परिशोधन और मनन का उद्देश्य रहे-भावी गतिविधियों को सत्प्रवृत्तियों में सुनियोजित करने की उमंग भरी विचारणा रहनी चाहिए।


अमीर ने वसीयत लिखी (Kahani)

न्यूयार्क (अमेरिका) में एक अमीर ने वसीयत लिखी जो उसकी मृत्युपरान्त पढ़ी गई। वसीयत सुनकर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि वसीयत विचित्र व रोचक थी। इसमें परिवार के सयाने सदस्यों चालाक ड्राइवरों, चोर नौकरों के कारनामों का वास्तविक विवरण भी था।

उसने पत्नी को मात्र एक डॉलर की राशि देते हुए वसीयत में लिखा “पत्नी ने मुझे जीवन भर बुद्धू समझा उसकी लालची निगाहें मेरी सम्पत्ति पर ही लगी रही। मेरे सुख दुःख में कभी भी हाथ तक न बटाया। किन्तु न मैं बुद्धू था न मूर्ख।”

इकलौते आवारा, हरामखोर पुत्र के लिए वसीयत में मात्र इतना ही लिखा। “तुम्हें पसीने की गाढ़ी कमाई का एक भी धेला देने का अर्थ होगा कि मैं भी तुम्हारी हरामखोरी और आवारागर्दी से सहमत था।”

बेटी जिसने पिता की बुढ़ापे में देखभाल सेवा सुश्रूषा की, उसके नाम एक लाख डॉलर की राशि देते हुए लिखा “मेरे दामाद ने केवल एक ही समझदारी की कि मेरी पुत्री से विवाह किया। अपने दामाद के निकम्मेपन को देखते हुए उक्त राशि बेटी के नाम कर रहा हूँ जिससे उसका भविष्य सुरक्षित बना रहे।”

“वसीयत में खटारा कारें ड्राइवरों को जानबूझ कर दे रहा हूँ क्योंकि इनकी चालाकी से हमेशा नये पुर्जों की जगह पुराने पुर्जे ही डाले जाते रहे और रकम बीच में डकारी जाती रही। अब ये खटारा कारें जीवन पर्यन्त इनका भी सिरदर्द बनी रहेंगी। इनकी बेईमानी और हेरा फेरी फिर फिर कर इन्हें ही सालती रहेगी।”

“पुराने बर्तन, कपड़े आदि नौकरों, चाकरों को इसलिए सौंपे जा रहा हूँ जिससे इन्हें भविष्य में अपने मालिकों के यहाँ से न चुराने पड़ें।”


प्रत्यक्ष साधना और प्रत्यक्ष सिद्धि

प्राथमिक पाठशाला की पढ़ाई पूरी करने के उपरान्त ऊँची कक्षाओं में प्रवेश मिलता है। हाईस्कूल उत्तीर्ण कर लेने के उपरान्त ही कॉलेज की पढ़ाई पूरी होती है। स्नातक बन जाने के पश्चात् ही स्नातकोत्तर कक्षाओं में पढ़ना शुरू किया जाता है। क्रमिक गति से चलते रहने पर ही लम्बी यात्रा पूरी होती है। छलाँग लगाकर ऊँची छत पर नहीं

प्राथमिक पाठशाला की पढ़ाई पूरी करने के उपरान्त ऊँची कक्षाओं में प्रवेश मिलता है। हाईस्कूल उत्तीर्ण कर लेने के उपरान्त ही कॉलेज की पढ़ाई पूरी होती है। स्नातक बन जाने के पश्चात् ही स्नातकोत्तर कक्षाओं में पढ़ना शुरू किया जाता है। क्रमिक गति से चलते रहने पर ही लम्बी यात्रा पूरी होती है। छलाँग लगाकर ऊँची छत पर नहीं पहुँचा जाता। व्यावहारिक जीवन में शालीनता, सज्जनता, सुव्यवस्था संयम-शीलता आदि सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठापन और संवर्धन करने के उपरान्त ही पूजा विधानों के सफल होने की आशा करनी चाहिए। गन्दगी से सना बच्चा यदि माता की गोद में चढ़ने के लिए मचले तो वह उसकी इच्छा पूरी नहीं करती, प्यारा लगते हुए भी उसके रोने की परवाह नहीं करती। पहला काम वह उसे धोने का करती है। बच्चों की उतावली सफल नहीं होती, माता का व्यवस्था बुद्धि ही कार्यान्वित होती है।

अध्यात्म क्षेत्र में इन दिनों एक भारी भ्रान्ति फैली हुई है कि पूजा-परक कर्मकाण्डों के सहारे जादूगरों जैसे चमत्कारी प्रतिफल मिलने चाहिए। देवता को स्तवन, पूजन की मनुहार उपहार के आधार पर फुसलाया जाना चाहिए और उससे अपनी उचित अनुचित मनोकामनाओं को पूरा कराया जाना चाहिए। यह स्थापन अनैतिक है, असंगत भी। यदि इतने सस्ते में मनोकामनाएँ पूरी होने लगें तो सफलता के लिए क्यों तो कोई परिश्रम करेगा और क्यों पात्रता विकसित करेगा? फिर सभी उद्योगी, परिश्रमी व्यक्ति मूर्ख समझे जायेंगे और देवता की जेब काटकर उल्लू सीधा करने वाले चतुर। यह मान्यता यदि सही रही होती तो देव पूजा में अधिकाँश समय बिताने वाले पंडित-पुजारी, साधु बाबाजी अब तक उच्चकोटि की उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने की स्थिति में पहुँच गये होते। जबकि उनमें से अधिकाँश सामान्यजनों से भी गई-गुजारी स्थिति में देखे जाते हैं। इसी प्रकार जंत्र-मंत्र के फेरे में पड़े रहने वाले व आतुर और भावुक व्यक्ति बड़ी-बड़ी आशा-आच्छादित रहने वाली शालीनता को, चरित्र-निष्ठा को कहते हैं। आराधना का अर्थ है सेवा-साधना, पुण्य-परमार्थ। इसके लिए कड़ाई से आत्म-संयम बरतना पड़ता है। उस आधार पर की गई बचत को समय और साधनों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाना पड़ता है। गिरों को उठाने और उठतों को उठाने के लिए भी “सादा जीवन उच्च विचार” का सिद्धान्त यही है। जो सादगी से रह सकेगा, न्यूनतम में अपना निर्वाह सन्तोष कर सकेगा, उसी के लिए यह संभव है कि आदर्शवादिता को चरितार्थ कर सके। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाने पर ही कोई ईमानदार रह सकता है और परमार्थ के लिए आवश्यक भाव संवेदना उभार सकता है। उदार सेवा-साधना का परिचय दे सकता है।

उपासना, साधना, आराधना का जीवनचर्या में समावेश होना आवश्यक है। पेट प्रजनन की, लोभ-मोह और अहंकार की तृप्ति के लिए हर कोई व्यस्त, उद्विग्न देखा जा सकता है। पर यह भौतिक क्षेत्र की उछल-कूद हुई। उससे शरीर भर को तात्कालिक रसास्वादन करने का अवसर मिलता है। इन उपलब्धियों से तृष्णा और भी भड़कती रहती है और अधिकाधिक की माँग इस प्रकार बढ़ती जाती है कि उसकी पूर्ति संभव ही नहीं होती। व्यक्ति सदा अपने आपको असंतुष्ट अभावग्रस्त अनुभव करता है।

आत्मोत्कर्ष की साधना के लिए शांतचित्त रहना आवश्यक है। यदि अन्तराल में उद्वेग उभरते रहे, उपलब्धियों की आतुरता उफनती रहे तो वह आन्तरिक सन्तुलन समाधान बन ही न पड़ेगा जिसकी पृष्ठभूमि पर अन्तराल की प्रसुप्त शक्तियों को जगाया जा सके।

शरीर के द्वारा ही संसार से, उसकी पदार्थ सम्पदा से संबंध जुड़ता है। अनुभव भले ही न करें, पर चेतना की ऊर्जा भी शरीर को ही प्रभावित करती है। आत्मिक प्रगति जप, ध्यान, प्राणायाम आदि शरीर माध्यम से ही बन पड़ती हैं। आत्मसत्ता तक अपने आपको शरीर के नियंत्रण में चलती अनुभव करती है। इन सब तथ्यों पर ध्यान देने से काय कलेवर की प्रमुखता बनी दिखती है। अस्तु आवश्यक है कि आत्मोत्कर्ष की साधना को शरीर माध्यम से आरम्भ किया जाय। उसकी चिन्तन पद्धति, चरित्र-निष्ठा और पारस्परिक संबंधों में आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। प्रत्यक्ष जीवन में आदर्श ही अध्यात्म है। जीवनचर्या के प्रत्येक पक्ष में मानवी गरिमा से संबंधित सभी अनुबंधों का सतर्कतापूर्वक पालन किया जाय। इसके लिए परिशोधन और उत्कर्ष की उभय-पक्षीय क्रिया-प्रक्रिया अपनायी जाय। अपना स्तर ऐसा बनाया जाय जो आत्म संतोष प्रदान कर सके। कृतकृत्यता सम्पन्न हुई अनुभव कर सके। साथ ही दूसरों पर अनुकरणीय उदाहरण की प्रभावी छाप छोड़ी जा सके। यह निश्चय करने के उपरान्त उसे व्यवहार में उतारने के लिए जुट जाना चाहिए। गलाई और ढलाई की दुहरी क्रिया-प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए।

साधनात्मक उपचारों से पूर्व यही करणीय है। राजयोग के आठ उपचारों में यम-नियम को प्रथम स्थान दिया गया है। इसके उपरान्त आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के अगले चरण उठते हैं। हठयोग में भी नाड़ी शोधन प्रथा है। चिकित्सक उपवास विवेचन आदि के द्वारा प्रथम पेट की सफाई कराते हैं, इसके बाद उपचार का क्रम चलाते हैं।

स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर परस्पर गुँथे हुए हैं। क्रिया-विचारणा और भाव-संवेदना का उतार-चढ़ाव निरन्तर चलता रहता है। इसलिए अन्न, जल, हवा की तरह तीनों ही क्षेत्रों को सुसंतुलित बनाने वाली जीवनचर्या अपनानी पड़ती है। उसमें तीनों ही पक्षों का समाधान करना पड़ता है। कॉलेज से पहले वाली कक्षाओं में भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास आदि कई विषय साथ-साथ पढ़ने पड़ते हैं। स्नातकोत्तर कक्षाओं में एक विषय ही रह जाता है। जिनने सर्वतोभावेन अपना लक्ष्य आत्म-सत्ता का अभ्युदय निश्चित कर लिया है। जो साँसारिक, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुके हैं, उन्हें तपश्चर्या और योग साधना के लिए समूची शक्ति नियोजित कर सकना संभव है। अन्यथा सामान्यजनों के लिए यही मध्यमवर्गीय प्रयास उपयुक्त है।

शरीरगत संयम साधना का तात्पर्य है-क्षमताओं को बर्बादी से बचा लेना और संग्रहित जीवनी-शक्ति को किन्हीं महान् प्रयोजनों के लिए सुरक्षित रखना। संयम, साधना से दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु से भी बचा जा सकता है। इस आधार पर साहस और ओजस् विकसित होता है। कुरूप होते हुए भी शालीनता अपनाने वाला भारी-भरकम, विश्वस्त, प्रामाणिक एवं सुन्दर लगता है। इस प्रकार उसे नकद धर्म के रूप में व्यक्तित्व का विकास और प्रतिभा का निखार का लाभ हाथों हाथ मिलते देखा जा सकता है।

मनःक्षेत्र की कल्पना, विचारणा, मेधा, प्रजा आदि उत्कृष्टता अपनाये रहे तो उद्वेगों से तनावों से सहज बचा जा सकता है। साथ ही विचार तंत्र संरचनात्मक दिशा में संलग्न रहने पर साधक ऐसे रहस्य खोजते रह सकता है, जो अपने परिवार के लिए ही नहीं समस्त संसार के लिए श्रेयस्कर सिद्ध हो सके। वैज्ञानिकों के आविष्कार इसी आधार पर प्रकट हुए हैं। मनोविकारों से बचे रहना अपनी दूरदर्शी विवेकशीलता को समुन्नत बनाना है। मन को संतुलित करने के लिए सद्विचारों को अपनाने की सहज प्रक्रिया भी काम दे सकती है। व्रतशीलता के सहारे भी उभरने वाले अनौचित्य का दमन हो सकता है। इसी मनोभूमि पर ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग के कल्पवृक्ष उगते एवं परिपक्व होकर विभूतियों का भण्डार भरते हैं। उत्कृष्ट दृष्टिकोण अपनाये रहने वाले व्यक्ति ऐसी कार्य पद्धति अपनाते हैं, जिसके सहारे प्रगति प्रसन्नता और सफलता की बहुमुखी उपलब्धियाँ हस्तगत होती रहें।

भाव-संवेदना की गंगोत्री अन्तःकरण के गह्वर से प्रकट एवं प्रवाहित होती है। आत्म-भाव का जिस पर भी आरोपण होता है वह परम प्रिय एवं अतीव सुन्दर लगने लगता है। ऐसी दशा में दूसरों का दुःख बँटाने-अपना सुख बाँट देने की प्रवृत्ति सहज हो जाती है। इसी आधार पर आत्म-संतोष, जन-सम्मान एवं दैवी अनुग्रह की असीम वर्षा होती है। इस त्रिधा अमृत-निर्झर का जो रसास्वादन कर सका, उसे स्वर्ग और मुक्ति का, शान्ति और समाधि का आनन्द निरन्तर मिलता है। ऐसे ही व्यक्ति नर-नारायण और पुरुष-पुरुषोत्तम कहलाते हैं।


साधु के पास जाया करता (Kahani)

एक चोर किसी साधु के पास जाया करता था और उससे ईश्वर साक्षात्कार का उपाय पूछा करता था। ‘फिर कभी’ बताने की बात कहकर साधु अक्सर उसे टाल देता। पर एक दिन चोर का आग्रह बहुत बढ़ गया, उसने अतीव आग्रह ठाना और उपाय बताने के लिए हठ पकड़ ली।

साधु ने दूसरे दिन प्रातः आने को कहा। चोर ठीक समय जा पहुँचा। साधु ने कहा सिर पर कुछ पत्थर रखकर ऊपर पहाड़ी पर चढ़ना होगा। वहाँ पहुँचने पर ईश्वर के दर्शन की व्यवस्था हो जायगी।

चोर के सिर पर पाँच पत्थर लाद दिये गये और साधु ने उसे अपने पीछे-पीछे चले आने को कहा। इतना भार लेकर वह कुछ दूर चला तो उस बोझ से उसकी गर्दन खुलने लगी। उसने अपना कष्ट कहा तो साधु ने एक पत्थर फिंकवा दिया। थोड़ी देर चलने शेष भार भी असह्य प्रतीत हुआ तो चोर की प्रार्थना पर साधु ने दूसरा पत्थर फिंकवा दिया।

यह क्रम आगे भी चला। ज्यों-ज्यों ऊँचे चढ़ रहे थे त्यों-त्यों थोड़े पत्थरों को ले चलना भी कठिन हो रहा था। चोर अपनी थकान को व्यक्त करता गया। अन्त में सब पत्थर फेंक दिये गये और चोर सुगमता पूर्वक पर्वत पर चढ़ता हुआ, ऊँचे शिखर पर जा पहुँचा।

साधु ने कहा-जब तक तुम्हारे सिर पर पत्थरों का बोझ रहा तब तक पर्वत के ऊँचे शिखर पर चढ़ सकना संभव न हो सका। पर जैसे ही पत्थर फेंके वैसे ही चढ़ाई सरल हो गयी। पापों का बोझ सिर पर लादकर कोई मनुष्य ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता।

चोर ने साधु का वक्तव्य समझा और चोरी, बुराई का त्याग ईश्वर प्राप्ति के एक मात्र उपाय पवित्र आचरण और परमार्थ साधन में अपना समय लगाने लगा।


स्थूल से गुँथी सूक्ष्म शरीर की सत्ता

मोटी दृष्टि से देखने पर मनुष्य अन्य प्राणियों की तरह हलचल व हरकत करता हुआ काया मात्र दिखाई पड़ता है। परस्पर भेद उपभेद भी कम ही मालूम पड़ते हैं। मनुष्यों की कायिक संरचना और प्रकृति-प्रवृत्ति भी प्रायः एक जैसी ही प्रतीत होती है। पर तथ्यों को तर्क अथवा उपकरणों के माध्यम से देखने, वर्गीकरण विश्लेषण करने पर उनमें बहिरंग एवं अन्तरंग अन्तर भी बहुत दीख पड़ता है। इसी आधार पर उनके व्यक्तित्वों का मूल्यांकन भी किया जाता है। कोई समर्थ, बुद्धिमान साहसी, संतुलित, दूरदर्शी, प्रगतिशील दीख पड़ता है तो किन्हीं में इस विशेषताओं की न्यूनता एवं अनुपस्थिति भी पाई जाती है। यों यह गुण प्रत्यक्ष आँखों से नहीं देखे जा सकते। छुए या नापे तौले भी नहीं जा सकते। तो भी उनके भाव-अभाव से इन्कार नहीं किया जा सकता। इन्हीं के आधार पर प्रगतिशील एवं प्रतिगामिता के तथ्य उभरते हैं। यह विशेषताएँ सूक्ष्म रूप से अंतर्गत में रहती हैं। उन्हें समझने के लिए सूक्ष्मदर्शी विश्लेषण बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इसी आधार पर किसी की महिमा-गरिमा एवं गुणवत्ता को आँका जा सकता है।

स्थूल शरीर के साथ जुड़ी हुई ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ अपना-अपना काम करती रहती हैं और कायिक जीवन की गाड़ी को आगे धकेलती रहती हैं।

बाहर उभरे और प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाले अवयवों के अतिरिक्त चमड़े की भीतर भी अनेक छोटी-बड़ी इकाइयाँ हैं जो दीख नहीं पड़ती। उनमें हलचल तो रहती है। पर प्रत्यक्ष नहीं देखी जा सकती। प्रत्यक्ष साधनों से उनकी गतिविधियों का पता नहीं चलता, कभी उनमें खराबी आ जाती है तो पीड़ा, सूजन, अवरोध आदि का तो भान होता है, पर यह नहीं जाना जाता कि किस स्थान पर क्या गड़बड़ी चल रही है। इसके लिए अन्य सूक्ष्म माध्यमों का ही प्रयोग करना पड़ता है और उसी आधार पर उस कष्ट का उपचार संभव होता है।

यह स्थूल शरीर के क्रिया-कलापों का संक्षिप्त-सा विवेचन है, जिसे अवस्थिति एवं सक्रिय होते हुए भी उसका बहुत थोड़ा अंश ही देख समझ पाते हैं। यहाँ इस संदर्भ में यह जानना भी आवश्यक है कि प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाला एक शरीर ही सब कुछ नहीं है। इसके अतिरिक्त भी अन्य शरीर एक के भीतर एक घुसे हुए हैं। कुल मिलाकर यह तीन शरीर हैं। प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाले को स्थूल शरीर कहते हैं। इनके अतिरिक्त दो और हैं, एक सूक्ष्म दूसरा कारण। इनका शवच्छेद की तरह अलग-अलग पृथक्करण तो नहीं किया जा सकता, किन्तु यह नितान्त संभव है। उनके गुण धर्म को गतिशील रहते देखकर बुद्धिपूर्वक पहचाना जा सकता है कि इनकी स्वतन्त्र सत्ता मौजूद है और क्रमशः एक दूसरे से अधिक समर्थ है। स्थूल से सूक्ष्म की और सूक्ष्म से कारण की सत्ता एवं महत्ता अधिक बलवती है।

तीनों शरीर परस्पर गुँथे हुए हैं। उन्हें प्याज के छिलकों या केलों के तनों की तरह अलग-अलग तो नहीं किया जा सकता, किन्तु इस प्रकार यह जाना जा सकता है कि गुलाब के फूल के रंग, महक, स्वाद एवं रासायनिक संचालन में पृथक्-पृथक तत्वों का समीकरण होता है। यदि प्रयोगशाला में इनका पृथक्करण-वर्गीकरण किया जाय तो उन विभागों को अलग-अलग आकार-प्रकार में देखा समझा जा सकता है।

स्थूल और सूक्ष्म का अन्तर प्रत्यक्ष है। स्थूल शरीर पंचतत्वों के सूक्ष्म घटकों से बना है। उन्हें तत्वों, रक्त, माँस, अस्थि, मज्जा आदि के रूप में देखा जा सकता है। कर्मेन्द्रियों से शरीर-चर्या एवं लोक व्यवहार के विविध विधि क्रिया-कलाप चलते हैं। सूक्ष्म शरीर पंच प्राणों का बना है। उनके प्रतीक पाँच शक्ति केन्द्र हैं, जिन्हें पंचकोश भी कहते हैं। अन्नमय-कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय-कोश, आनन्दमय कोश के रूप में इनकी पहचान की जाती है। इन पंचप्राणों का समन्वय महाप्राण के रूप में समझा जाता है। जीवन चेतना यही है। इसके रूप में पृथक् हो जाने पर मृत्यु हो जाती है। मरे शरीर का तात्विक विश्लेषण करने पर उसमें वे सभी रसायन पाये जाते हैं जिनसे शरीर बना है। किन्तु उसमें से महाप्राण-चेतना का पलायन हो जाने पर वह निरर्थक हो जाता है। स्वयं सड़ने और नष्ट होने की क्रिया आरम्भ कर देता है। जिन्हें इस निरर्थक का अन्त सुव्यवस्थित रीति से करना हो वे उसका अग्नि-भूमि या जल के साथ जल्दी समापन कर देते हैं।

प्रश्न यह उठता है कि मरने के उपरान्त जो वस्तु शरीर छोड़कर चली गई, वह क्या थी? उसका स्वरूप क्या था? जीवन काल में कहाँ-कहाँ रही? क्या करती रही? और मरने के उपरान्त उसका क्या हो गया? उसकी भावी गतिविधि क्या बनी? इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के पहले हमें सूक्ष्म शरीर का स्वरूप समझना चाहिए। इसके उपरान्त ही प्रारम्भिक पृष्ठभूमि समझ लेने के उपरान्त यह समझ सकना होगा कि जीवन काल में वह क्या करता है? और मरने के उपरान्त उसकी गतिविधियों का क्षेत्र क्या हो जाता है?

जीवन काल में सूक्ष्म शरीर का स्वरूप ‘ज्ञान’ के रूप में होता है। इसका केन्द्रीय कार्यालय मस्तिष्क माना जा सकता है। यों वह चेतना स्थूल शरीर के कारण शरीर में समाहित है। ज्ञान-तन्तु सूक्ष्म शरीर में फैले हुए हैं। वे अपने-अपने क्षेत्र की आवश्यक सूचनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं। परिस्थिति से निपटने के लिए क्या उपाय अपनाया जाना चाहिए इसका निर्देश मस्तिष्क से तुर्त-फुर्त प्राप्त करते हैं और तदनुसार अंग काम करने लगते हैं।

ज्ञानेन्द्रियों में अतिरिक्त काम करने की शक्ति भी है और आनन्द प्राप्त करने की क्षमता भी। आँखें दृश्यों को देखती भी हैं साथ ही दृश्य की सुन्दरता का, विचित्रता का आनन्द भी लेती हैं। यही बात जिह्वा, कान, नाक, त्वचा, जननेन्द्रिय आदि के संबंध में भी है। वे शरीर यंत्र से संबंधित अपने-अपने व्यवहार कर्मों का निर्वाह भी करती हैं। यदि काया के साथ यह बहुविधि सरसता जुड़ी न होती तो समयक्षेप भारभूत हो जाता। इसके अतिरिक्त निर्वाह के लिए जो प्रयत्न करना पड़ता है, साधन जुटाने में, परिस्थितियों से निपटने के निमित्त जो ताना-बाना बुनना पड़ता है वह भी संभव न होता। यह सूक्ष्म शरीर का सामान्य क्रिया-कलाप है जो मृत्यु हो जाने पर अनायास ही बन्द हो जाता है। वस्तुस्थिति को समझने पर अनुभूत होता है कि स्थूल शरीर के साथ सूक्ष्म शरीर की सत्ता उसी प्रकार घुली हुई है जैसी कि दूध में घी, और फूल में इत्र घुला होता है। उन्हें चाकू के काटकर तो अलग नहीं किया जा सकता, पर अन्य अवसरों पर यह अनुभव किया जा सकता है कि कोई विशेष सत्ता अपना अस्तित्व रखे हुए अदृश्य थी। जिसके कारण उसकी शोभा, सक्रियता बनी हुई थी। घी निकाल लेने पर दूध मात्र छाछ रह जाता है। इत्र निकाल लेने पर फूल कचरा मात्र रह जाता है। इसी प्रकार स्थूल और सूक्ष्म शरीर की श्रृंखला जब टूट जाती है तो दोनों अपनी वास्तविक स्थिति का परिचय देने लगते हैं।


कुरुक्षेत्र में रणभेरियाँ (Kahani)

कुरुक्षेत्र में रणभेरियाँ बज रही थीं। कोलाहल से आसमान गूँजा।

उसी क्षेत्र में एक पाकर का पेड़ था उसमें घोंसला, घोंसले में टिटहरी के अण्डे बच्चे। भयभीत चिड़िया अपने बच्चों को असुरक्षित देखकर चीत्कार करने लगी।

कृष्ण रथ से उतरे और घोंसले के दरवाजे पर पत्थर का टुकड़ा रखकर उसकी सुरक्षा का प्रबन्ध किया और लौटते ही घोड़े सम्हालने लगे।

भीम ने पूछा-इस विषम बेला में आप कहाँ चले गए थे। कृष्ण ने कहा-युद्ध से बढ़कर संरक्षण है। उसका महत्व कम कैसे आँका जाय?


प्राणतत्व के उभार की चमत्कारी परिणति

प्रश्नोपनिषद् में एक सूत्र आता है-”प्राणाग्न्य एवास्मिन ब्राह्मपुरे जाग्रति” अर्थात्-”इस ब्रह्मपुरी माने शरीर में प्राण ही कई तरह की अग्नियों के रूप में जलता है।” यह अग्नि जठराग्नि हो सकती है, यज्ञ में वर्णित तीन दिव्य अग्नियाँ, आयुर्वेद वर्णित प्राकृत अग्नि विज्ञान की तेरह अग्नियाँ अथवा योगाग्नि के रूप में प्राण शक्ति का समुच्चय कुण्डलिनी हो सकती है। अपने भिन्न-भिन्न रूप में यह बहिरंग में प्रकट होती रहती है एवं कभी आँखों से, कभी भावभंगिमा द्वारा, कभी वाक्शक्ति के माध्यम से एवं कभी-कभी बल पराक्रम-साहसिकता के रूप में इसकी स्थूल अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।

वस्तुतः प्राण को एक प्रकार की सजीव विद्युत शक्ति कह सकते हैं, जो समस्त संसार में वायु एवं आकाश तत्व, ताप, चुम्बकत्व, क्वाण्टा तरंगों अथवा ईथर के रूप में समाई हुई है। यह समष्टि प्राण जिस प्राणी में जिस अनुपात में होता है, व्यक्ति उतना ही स्फूर्तिवान, तेजस्वी एवं साहस का धनी होता है। शरीर-रथ में संव्याप्त इसी तत्व को मनीषी जीवनी शक्ति, “ओजस्” रूप में जानते हैं। मन में अभिव्यक्त होने पर यही तत्व प्रतिभा मेधा अथवा “तेजस्” कहलाने लगता है। शास्त्रकारों का मत है कि संयम साधना द्वारा ब्रह्मचारी इसी विद्युत शक्ति का अधिकाधिक मात्रा में संचय कर वीर्यवान मनस्वी, तेजस्वी कहलाते हैं। जब भी कभी इसका अभाव हो जाता है, शरीर स्वस्थ-गोरा दीखते हुए भी, बहिरंग ढाँचा सुन्दर होते हुए भी मनुष्य निस्तेज, उदास, मुरझाये फूल-सा लुँजपुँज, वीर्यहीन नजर आता हैं तेजस् न होने से बाह्य सौंदर्य भी निर्जीव प्रतीत होता है। व्याधिग्रस्त होने अथवा मनोबल गिरने, मनोविकार ग्रस्त हो जाने पर व्यक्ति वस्तुतः निस्तेज हो जाता है।

मन को लुभाने वाले, समुदाय को आकर्षित करने वाले सौंदर्य में जो तेजस्विता एवं सौम्यता बिखरी होती है, वह और कुछ नहीं, प्राणों का उभार है। वृक्ष-वनस्पति, पुष्पों से लेकर, पहाड़, नदी-सरोवर, शिशु-शावक, किशोर-किशोरियों में जो कुछ भी आह्लादकारी सौंदर्य दिखाई पड़ता है, वह सब प्राण का ही प्रताप है। अभिव्यक्ति के रूप भिन्न-भिन्न घटकों में भिन्न हो सकते हैं, पर मूल प्राण तत्व एक ही होता है, एक ही स्रोत इस समष्टिगत प्राण का है।

मानवीकाया का जो स्थूल बहिरंग है, उसका सूक्ष्म शरीर जिन प्राण स्फुल्लिंगों के समुच्चय से बना है, वह अपने आप में अनन्त अपरिमित शक्तियों का पुँज है। यही कारण है कि इस शरीर को देव मन्दिर कहा गया है, जिसमें पाँच प्राण रूपी पंच देव प्रतिष्ठापित हैं। जब एक देवता की सहायता की मनुष्य को अजर-अमर बना देती है तो इन पंच देवों की सिद्धि कर लेने वाला कितना समर्थ, सशक्त हो सकता है, उसकी कल्पना भर से रोमाँच हो उठता है।

जर्मन विद्वान डॉ. हैकल की पुस्तक “रिडल ऑफ यूनीवर्स” में एक उद्धरण आता है कि “समष्टि में-मैटर पदार्थ एवं शक्ति का अभाव कभी नहीं होता। किसी न किसी रूप में वह बना ही रहता है।” इसे हैकल “फण्डामेण्टल ला ऑफ यूनीवर्स” बताते हुए लिखते हैं कि “इसी प्रकार प्राणतत्व, मनस्तत्व एवं चेतना भी समष्टि में संव्याप्त शक्तियाँ हैं। यद्यपि विज्ञान इनके अस्तित्व को प्रत्यक्ष न दीखने के कारण नकारता है किन्तु यह अनुभूति का विषय है कि प्राण अंतरिक्ष में संव्याप्त है, मन उसकी उच्चतर विकसित स्थिति में एवं चेतन अवस्था में बने रहकर ये तीनों पदार्थ जगत का पूर्ण रूपेण नियंत्रण करते हैं।”

जापान के डॉ. शेरवुड के प्राणयोग प्रक्रिया का अध्ययन कर महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले व अपने शोधग्रन्थ में प्रकाशित किये हैं। श्रीमती जे.सी. ट्रस्ट (“अणु और आत्मा” पुस्तक की लेखिका) की ही तरह उन्होंने भी प्राण सत्ता के अद्भुत प्रयोग किए व सम्मानित नागरिकों, पत्रकारों के समक्ष प्रस्तुत किए थे। एक ब्लैक बोर्ड पर खड़िया बाँधकर अपनी प्राण सत्ता सूक्ष्म शरीर के रूप में स्थूलकाया से बाहर निकालकर अनेकों प्रश्न ब्लैक बोर्ड पर हल किए। पत्रकार गुत्थियाँ देते रहे एवं खड़िया ब्लैक बोर्ड पर चलती रही। ओ.बी.ई. (आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियेन्स) की इस प्रक्रिया द्वारा उन्होंने यह प्रमाणित किया कि मानव शरीर मात्र वहीं तक सीमित नहीं है, जो दृश्यमान है। सूक्ष्म की सत्ता, प्राण शक्ति की क्षमता असीम अपरिमित है। इस प्रकार के कई उदाहरण ग्रन्थों में मिलते हैं।

शरीर के नियम बंधनों से मुक्त मानवी चेतना को प्रमाणित करने के लिए डॉ. थेल्मामाँस ने ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया है उनमें से एक घटना सन् 1908 की है। ब्रिटेन के ‘हाउस ऑफ लार्ड्स’ का अधिवेशन चल रहा था। इस अधिवेशन में विरोधी दल ने सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखा था और उस दिन प्रस्ताव पर मत संग्रह किया जाना था। विरोधी पक्ष तगड़ा था। अतः सरकार को बचाने के लिए सत्तारुढ़ दल के सभी सदस्यों का सदन में उपस्थित होना आवश्यक था। इधर सत्तारुढ़ दल के एक प्रतिष्ठित सदस्य सर काँर्नरोश गम्भीर रूप से बीमार पड़े हुए थे। उनकी स्थिति इस लायक भी नहीं थी कि वे शैया से उठकर चल फिर भी सके। जबकि उनकी हार्दिक आकाँक्षा यह थी कि वे भी मतदान में भाग लें। उन्होंने डॉक्टरों से बहुत कहा कि उन्हें किसी प्रकार मतदान के लिए सदन में ले जाया जाय परन्तु डॉक्टर अपने कर्त्तव्य से विवश थे। आखिर उनका जाना सम्भव न हो सका। परन्तु मतदान के समय सदन में कई सदस्यों ने देखा कि सर काँनरोश अपने स्थान पर बैठे मतदान में भाग ले रहे हैं जबकि डॉक्टरों का कहना था कि वे अपने बिस्तर से हिले तक नहीं। प्रबल प्रचण्ड शक्ति ही चेतन-सत्ता को वहाँ खींच लायी थी।

एक दूसरी घटना का उल्लेख करते हुए डॉ. माँस ने लिखा है-”ब्रिटिश कोलम्बिया विधान सभा का अधिवेशन विक्टोरिया सीनेट में चल रहा था। उस समय एक विधायक चार्ल्सवुड बहुत बीमार थे, डॉक्टरों को उनके बचने की उम्मीद नहीं थी, परन्तु उनकी उत्कट इच्छा थी कि वे अधिवेशन में भाग लें। डॉक्टरों ने उन्हें बिस्तर से उठने के लिए भी मना कर दिया था और वे अपनी स्थिति से विवश बिस्तर पर लेटे थे। परन्तु सदन में सदस्यों ने देखा कि श्री चार्ल्स विधान सभा में उपस्थिति हैं। अधिवेशन की समाप्ति पर सदस्यों का जो फोटो लिया गया, उसमें चार्ल्सवुड भी विधान सभा की कार्यवाही में भाग लेने वाले सदस्यों के साथ उपस्थित थे। “यह चित्र आज भी वहाँ के म्यूजियम में सुरक्षित हैं।

जिनके प्राण समर्थ हैं, वे एक ही शरीर से कई स्थानों पर कार्य करते रह सकते हैं। ऐसी अनेक घटनाएँ प्राणवान संकल्पवान व्यक्तियों के साथ घटती देखी गयी हैं। इस संबंध में शास्त्रकार का कथन है-

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एषपर्जन्यो मद्यवानष्। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं चयत्॥ प्रश्नोपनिषद् 2/5

यह प्राण ही शरीर में अग्नि रूप धारण करते तपता है यह सूर्य, मेघ, इन्द्र, वायु, पृथ्वी तथा भूत समुदाय है। सत असत तथा अमृत स्वरूप ब्रह्म भी यही है।

प्राणशक्ति की बहुलता ही मनुष्य की तेजस्विता है। उसे जितना बढ़ाया जा सके, बढ़ाना चाहिए।


आचार्य रामानुज (kahani)

आचार्य रामानुज मन्त्र पाठ करते हुये मन्दिर की प्रदक्षिणा कर रहे थे कि वहाँ एक चाण्डाल स्त्री उनकी परिक्रमा के बीच में आ गई, आचार्य रामानुज ठिठक कर रुक गये। उनका वेद पाठ खण्डित हो गया क्रोधपूर्वक बोले-अरी चाण्डालिन! मेरे रास्ते से हट जा मेरी प्रदक्षिणा अपवित्र न कर?

चाण्डाल स्त्री हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गई और पूछने लगी भगवान मेरे चारों और पवित्रता ही पवित्रता व्याप्त है? कृपया बतला दीजिये कि मैं अपनी पवित्रता लेकर किस और कहाँ चली जाऊँ? स्वामी रामानुज आचार्य को उसके कथन से मानो ज्ञान मिल गया-हाथ जोड़कर बोले-माँ! मुझे क्षमा करो तुम निश्चय ही पवित्रात्मा हो।


चेतना के महासागर में दबी विलक्षण संभावनाएँ

ऐसा क्यों होता है कि किसी व्यक्ति को देखकर अपनापन महसूस होता है व लगता है, उससे ढेरों बात की जाय? उसके व्यक्तित्व का आकर्षण क्यों किसी को सम्मोहित कर देता है? उलटे कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जिन्हें देखकर न जाने क्यों मन करता है कि इस मनहूस सूरत से जितना दूर रहा जाय, उतना ही अच्छा। प्रश्न शक्ल की बदसूरती का नहीं, वरन् विचारों की भावनाओं की मनहूसियत का है जो सामने वाले को, बातचीत के माध्यम से संपर्क में आने वाले को सतत् विकर्षित करती रहती है।

इसका कारण बताते हुए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अन्यान्य शक्तियों की तरह मानवी चेतना के साथ जैवचुम्बकत्व भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वही किसी व्यक्ति के अन्दर ऐसी विशेषताएँ भर देता है कि परिकर पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। कभी-कभी, यदा-कदा यह चुम्बकत्व परोक्ष रूप में ही न रह कर सक्रिय शक्ति के रूप में भी उभरकर अपनी उपस्थिति का परिचय देने लगता है। वस्तुतः आत्म चेतना सम्पूर्ण शरीर में संव्याप्त है। यह आवश्यक नहीं कि वह अमुक इन्द्रियों के सहारे ही अभीष्ट ज्ञान प्राप्त करे। यह भी हो सकता है कि वह एक इन्द्रिय की अपेक्षा दूसरे अवयव को माध्यम बना ले और प्राण ऊर्जा के विभिन्न उपादानों के सहारे आवश्यक ज्ञान प्राप्त करे।

एक उल्लेखनीय घटना पश्चिम जर्मनी के लुई हैंबर्ग की है। यह लड़का जिन धातु पदार्थों को छूता, वे उससे चिपक जाते और किसी दूसरे द्वारा बलपूर्वक छुड़ाये जाने पर ही छूटते। उसके अन्दर एक शक्तिशाली चुम्बक सक्रिय स्थिति में विद्यमान पाया गया। मेरीलैण्ड विश्वविद्यालय ने इस विचित्रता पर बहुत खोज-बीन की पर वैज्ञानिक किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाये।

ओण्टोरियो (कनाडा) के वाँन्डन क्षेत्र में जन्मी एक लड़की मात्र 17 वर्ष तक जीवित रही। पर जब तक वह जीवित थी, चर्चा का विषय बनी रही। वह जहाँ भी जाती धातु का सामान उसके शरीर से आकर्षित हो, चिपक जाता था। उसके भोजन हेतु लकड़ी या काँच के पात्र एवं निवास भी लड़की का बनाया गया था। उसकी अल्पायु में मृत्यु के बारे में वैज्ञानिक मनीषी जेफ्री मिशलेख का मत है कि शक्ति धारा जब तक जीव कोशों के बंधन में रहती है, तब तक तो जीवन-चक्र सुव्यवस्थित चलता रहता है। परन्तु इसके निस्सृत होने का मार्ग बनने व किसी और शक्ति के रूप में प्रकट हो क्षीण होते चले जाने पर आयु उसी अनुपात के कम हो जाती है।

शारीरिक, मानसिक चुम्बकत्व पर वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान किया व इसे भी एक विभूति माना है। डॉ. फ्रैज एण्टन मैस्मर उस चिकित्सक का नाम है, जिसने मैस्मरेज्म-सम्मोहन विद्या की खोज की थी। अपने अनुसंधान कार्य में उन्होंने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया था कि अविज्ञात नक्षत्रों से एक चुम्बकीय पदार्थ सूक्ष्म रूप में इस धरती पर आता है और सारे धरतीवासियों को प्रभावित करता है। इस पदार्थ का जब भी शरीर में सन्तुलन गड़बड़ाता है तो विभिन्न प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होने लगते हैं। इस संतुलन को ठीक करने के लिये डॉ. फ्रैज एण्टन मेस्मर चुम्बकों का प्रयोग करते थे। बाद में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों के शरीर से सहजन रूप में चुम्बकीय धारा प्रवाहित होती रहती है, जिसे उन्होंने “एनिमल मैग्नेटिज्म” नाम दिया। ये व्यक्ति हीलर या डिवाइन थेरेपीस्ट कहलाये जाने लगे। स्वयं मेस्मर ने सन् 1778 में पेसि में इस चिकित्सा पद्धति द्वारा अगणित व्यक्तियों को ठीक कर अच्छा खासा नाम कमा लिया था। ऐसा कहा जाता है कि प्रसिद्ध संगीतज्ञ मोजार्ट, किंग लुई 16 व महारानी, मेरी एण्टोइने एवं आस्ट्रिया की महारानी मारिया थेरेसा उन रोगियों में से थे जिन्हें मेस्मर की चुम्बकीय चिकित्सा पद्धति से लाभ मिला। मेस्मर की हिप्नोटिज्म एवं परामनोवैज्ञानिक शक्ति द्वारा लायी गयी कृत्रिम निद्रा की स्थिति (सोम्नेम्बुलिज्म) बाद में अच्छा खासा विवाद का विषय बनी, परन्तु उसका मूलभूत सिद्धान्त मेस्मरवादियों ने एनिमल मैग्नेटिज्म को ही माना व आज भी सायकिक हीलिंग के मूल में परामनोविज्ञानी चुम्बकीयधाराओं का चिकित्सक से रोगी में प्रवेश ही प्रधान मानते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिकों ने मैग्नेरोमीटर्स का प्रयोग कर हृदय एवं मस्तिष्क में बहने वाली चुम्बकीयधाराओं का मापन करने में सफलता पायी है। सुपर कण्डक्टींग क्वान्टम इन्टरफरेन्स डिवाइस (स्क्वीड) ऐसे ही एक संयंत्र का नाम है जो बहुत ही क्षीण धारा पर काम कर डी.सी. एवं आल्टरनेटिंग मैग्नेटीक फील्ड, जिसकी ईकाई “टेस्ला” है, का पता लगा होता है। स्क्वीड इतना संवेदनशील यंत्र है कि एक नाल चुम्बक से 400 मीटर दूर खड़े व्यक्ति में उसके कारण शरीर की चुम्बकीय धाराओं में हो रहे परिवर्तनों को मापने की यह क्षमता रखता है। हो सकता है कि ऐसे अपवाद जो लुई हैंबर्ग व अन्य व्यक्तियों के रूप में जन्म लेते हैं, अब शोध प्रतिपादनों से शरीर के सूक्ष्म संस्थान की और भी विशद जानकारी अगले दिनों दे सकें। इसी संयंत्र द्वारा मैग्नेटोकार्डियोग्राम (एम.सी.जी.) एवं मैग्नेटोएनसेफेलोग्राम (एम.ई.जी.) की रिकॉर्डिंग भी अब संभव होने लगी है एवं ऐसी सूक्ष्म व्याधियों का पता लगाने में सफलता पाई है जो सामान्य उपकरणों-इलेक्ट्रोकार्डियो एवं एनसेफेलेग्राफी-इकोग्राफी इत्यादि के माध्यम से पकड़ में अक्सर नहीं आती।

अथर्ववेद में रेत द्वारा चुम्बकीय शक्ति से ओत-प्रोत लौह कणों के माध्यम से शरीर से रक्त स्राव रोकने एवं चुम्बक द्वारा स्त्री रोगों के उपचार का प्रसंग स्थान-स्थान पर आया है। ज्ञातव्य है कि चुम्बक में भी रेत, बेरियम एवं आयरन ऑक्साइड होता है। मिस्र की सुन्दरी क्लेयोपेट्रा के बारे में प्रसिद्ध था कि वह अपनी सुन्दरता बनाये रखने के लिये सदैव माथे पर एक छोटा-सा चुम्बक लगाये रखती थी।

मेस्मर से भी पहले स्विस चिकित्सक पैरासेल्सस ने जैवचुंबकत्व की विशेषता एवं बाह्य चुम्बक द्वारा मानवी काया के विभिन्न दोषों एवं मनोविकारों की चिकित्सा की संभावनाओं का वर्णन किया है। मेस्मर ने इसी सिद्धान्त को आगे चलकर प्रचारित कर मैस्मरेज्म-हिप्नोटिज्म को प्रचलित किया।

टाइम पत्रिका ने मानवी चुंबकत्व पर एक विचित्र केस वैज्ञानिकों के समक्ष कुछ वर्षों पूर्व रखा था। ओण्टोरियो (कनाडा) की कैरोलिन क्लेयर नामक एक महिला को स्नायु संस्थान संबंधी एक रोग ने आ घेरा। धीरे-धीरे आँशिक पक्षाघात की स्थिति से ठीक होते-होते वह जब स्वस्थ स्थिति में पहुँचने को ही थी कि उसमें एक नया परिवर्तन देखा गया कि वह धातु से बनी किसी भी चीज को छूती तो वह उससे चिपक जाती। बड़ी कठिनाई से उसे छुड़ाया जाता। जैव चुंबकत्व का यह प्रवाह स्नायु संस्थान की किस गड़बड़ी के ठीक होने अथवा नयी गड़बड़ी या “लीकेज” होने के कारण होने लगा, इसका वैज्ञानिक कोई समाधान खोज नहीं पाए।

टाइम पत्रिका ने मानवी चुंबकत्व पर एक विचित्र केस वैज्ञानिकों के समक्ष कुछ वर्षों पूर्व रखा था। ओण्टोरियो (कनाडा) की कैरोलिन क्लेयर नामक एक महिला को स्नायु संस्थान संबंधी एक रोग ने आ घेरा। धीरे-धीरे आँशिक पक्षाघात की स्थिति से ठीक होते-होते वह जब स्वस्थ स्थिति में पहुँचने को ही थी कि उसमें एक नया परिवर्तन देखा गया कि वह धातु से बनी किसी भी चीज को छूती तो वह उससे चिपक जाती। बड़ी कठिनाई से उसे छुड़ाया जाता। जैव चुंबकत्व का यह प्रवाह स्नायु संस्थान की किस गड़बड़ी के ठीक होने अथवा नयी गड़बड़ी या “लीकेज” होने के कारण होने लगा, इसका वैज्ञानिक कोई समाधान खोज नहीं पाए।


Quotation

स्वास्थ्य वैभव और चातुर्य यदि कम पड़ता है, तो चिन्ता न करो। चिन्ता की बात एक ही है-आत्मगौरव का भान न होना और आत्मबल का घट जाना।


व्यक्तित्व के विकास का उद्गम केन्द्र

व्यक्तित्व के विकास के मूल में जिन तथ्यों का समाहित माना जाता है, उनमें से एक है-शरीर में जीवनी शक्ति का प्रकटीकरण, प्राण ऊर्जा का उभार। व्यक्तित्व का मूल्यांकन सामान्यतया शरीर की सुडौलता, सुन्दर चेहरे से किया जाता है, पर यह मान्यता भ्राँति युक्त है। यदि मनुष्य काला व कुरूप भी है किन्तु आहार-विहार का संतुलन कर आरोग्य रक्षा में निरत रहता है तो ऐसा निरोग मनुष्य भी प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व का स्वामी होता देखा जाता है। जबकि चेहरे–मुहरे से सुन्दर व्यक्ति रोगग्रस्त, उदास, निस्तेज, आलसी होने पर मरा-गिरा-सा, टूटा हुआ प्रतीत होता है।

आशा और उमंग से मन भरा हो, उत्साह और साहस स्वभाव का अंग हो, हँसने-मुस्कुराने की आदत हो तो व्यक्ति की आकृति-प्रकृति आकर्षक हो जाती है। ऐसे व्यक्ति की बनावट भले ही कुरूप हो, वह सहज ही सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेता है एवं जहाँ जाता है, अपनी उपस्थिति से वातावरण प्रभावशाली बना देता है। अब्राहम लिंकन, सुकरात, महात्मा गाँधी आदि का बाह्य स्वरूप सुन्दर नहीं कहा जा सकता किन्तु उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व को, मनस्विता को, अंग-अंग से फूटने वाले तेजस् को कोई नकार नहीं सकता।

वस्तुतः हमारा चेहरा मनःस्थिति का प्रतिबिम्ब है। आँखों की खिड़की से भीतर की स्थिति झाँकती व उस क्षेत्र का भला-बुरा विवरण दर्शकों को बिना बोले ही बताती रहती है। प्रकृति ने कुछ ऐसी व्यवस्था की है जिससे व्यक्ति की भाव-भंगिमा, शिष्टता, कार्य पद्धति को देखते ही यह पता लग सके कि वह कितना पानी में है। शरीर बाह्य परिकर प्रभावोत्पादक हो इसके लिए शरीर और मन को इस प्रकार ढाला जाना चाहिए कि वह सौंदर्य, सज्जा, शिक्षा आदि के अभाव में भी अपनी विशिष्टता का परिचय दे सके।

शालीनता वह दूसरी शर्त है जो व्यक्तित्व को वजनदार बनाती है। इसी सत्प्रवृत्ति को सज्जनता, शिष्टता, सुसंस्कारिता आदि नामों से पुकारा जाता है। गुण,कर्म, स्वभाव में गहराई तक घुली यह विशिष्टता पास बैठने वाले को थोड़ी देर में बता देती है कि सामने वाले का बचकानापन किस मात्रा में घट गया और वजनदार व्यक्तित्वों में पायी जाने वाली विशेषताओं का कितना उद्भव समावेश हो गया।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुँग ने अन्तःकरण की ऊर्जा-”लिबिडो” को अपने शब्दों में प्रतिपादित करते हुए कहा है कि “न जाने क्यों यह तथ्य बुद्धिमानों के गले नहीं उतरता कि वे मस्तिष्कीय चमत्कारों की तुलना में कहीं अधिक विभूतियाँ अपनी अन्तः चेतना को विकसित करते हुए हस्तगत कर सकते हैं। “स्व” को यदि उच्चस्तरीय बनाया जा सके तो फिर “पर” के प्रति न कोई शिकायत रहेगी; न कोई आशा-अपेक्षा ही रखनी होगी।”

यह कथन व्यक्ति के व्यापक सर्वांगपूर्ण विकास की चर्चा करते समय काफी महत्व रखता है। यहाँ उनका संकेत है कि हमें एक विशेष बात का ध्यान रखना होगा कि आत्मिक क्षेत्र की सबसे बड़ी प्यास घनिष्ठ आत्मीयता की है, जिसे व्यवहार में सद्भाव सम्पन्न मैत्री कहते हैं। पुरातन भाषा में इसी को अमृत कहते थे। मैत्री परिकर भी बढ़ना चाहिए व वातावरण भी बनना चाहिए। किन्तु वैसी न हो जैसी कि आजकल मित्र बनकर शत्रुता का आचरण करने की विभीषिका बन कर उस पुनीत शब्द को बदनाम कर रही है।

इन दिनों वैभव को सर्वोपरि मान्यता मिली है। फलतः सम्पदा का संचय और प्रदर्शन जनसाधारण की आकाँक्षा व तत्परता का केन्द्र बन गया है। इसी को ललक-लिप्सा में आपाधापी और छीना-झपटी की दुष्प्रवृत्तियाँ पनपी हैं। फलतः विपन्नताएँ बदली चली गई। अगले दिनों यह प्रवाह उलटना होगा तथा लोकचेतना को यह सोचने पर सहमत करना होगा कि वह आदर्शों की ओर चले, उसके लिये अन्तःकरण टटोले और अंतःप्रेरणा से ही मार्गदर्शन प्राप्त करे।

आरम्भिक जीवन की ग्रहण संवेदनशीलता के अतिरिक्त व्यक्तित्व निर्माण का एक बड़ा कारण यह भी होता है कि बालक को माता के शरीर का रस मात्र ही नहीं मिलता, वरन् उसकी मानसिक संरचना भी उस नव निर्मित प्राणी को उपलब्ध होती और ढाँचे को अंग बनती है। यहाँ एक बात विशेष रूप से प्रभावित करने में भावनात्मक घनिष्ठता सर्वोपरि भूमिका निभाती है। माता की बच्चे के प्रति जो संवेदनात्मक घनिष्ठता होती है, वह आदान-प्रदान का समर्थ माध्यम बनती है। माता के द्वारा वह न केवल पोषक पदार्थ प्राप्त करता है न केवल सुविधा, सुरक्षा के अनुदान उपलब्ध करता है, वरन् इन सबसे बड़ी वस्तु स्नेह दुलार का वह रसायन भी प्राप्त करता है जिसके सहारे गहन स्तर के आदान-प्रदान बन पड़ते हैं। माता-पिता तथा अन्य अभिभावक जो बालक के साथ जितनी भावनात्मक घनिष्ठता एवं सहानुभूति जोड़े रहते हैं। उसे बिना माँगे ही बहुत कुछ गले उतारते रहते हैं।

बालकों का यह उदाहरण यहाँ इसलिए दिया जा रहा है कि घनिष्ठता, समीपता एवं भावनात्मक आत्मीयता के उस दुहरे प्रभाव को समझा जा सके, जिसमें न केवल सान्निध्य, सुख एवं सहयोग मिलता है वरन् अन्तरंग विशेषताओं के आदान-प्रदान का भी द्वार खुलता है। यहाँ मैत्री की ओर संकेत किया गया है। मैत्री किसी भी कारण बनी या बढ़ी क्यों न हो, यदि वह गहराई तक पहुँची एवं आत्मीयता तक विकसित हुई है तो फिर उसका ऐसा प्रभाव भी होना ही चाहिए कि एक पक्ष दूसरे को, विशेषतया सबल-दुर्बल को प्रभावित कर सके।

यह तथ्य इस निष्कर्ष पर पहुँचाते हैं कि व्यक्ति को यदि उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करना अभीष्ट हो तो उसके लिये शिक्षण के साथ-साथ आत्मीयता का गहरा सम्पुट लगाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। विकृत व्यक्तित्वों को संतुलित एवं समुन्नत बनाने में स्नेह-दुलार की उपलब्धि इतनी बड़ी औषधि है, जिसकी तुलना में अन्य कोई उपाय-उपचार कारगर नहीं होते देखा गया। प्यार की प्यास हर किसी को रहती है और वह समुचित परिमाण में किसी भाग्यवान को मिल सके तो समझना चाहिए कि व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास हेतु एक प्रभावशाली साधन जुट गया।

प्रतिभा की विलक्षणताएँ अनेकों सफलताओं का निमित्त साधन बनती हैं किन्तु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह मात्र वंशानुक्रम, सान्निध्य, साधन-शिक्षण आदि बाहरी प्रभाव अनुदानों से ही पूर्णरूपेण हस्तगत नहीं होती। ऐसी बात होती तो मनुष्य को सचेतन कहते हुए भी परिस्थितियों का दास कहना पड़ता। यह तो भाग्य-प्रारब्ध से भी बुरी बात होती। यदि परिस्थितियाँ ही किसी के भले बुरे बनने का आधार रही होती तो किसी को श्रेय या दोष न देकर उन साधनों को ही सराहा या कोसा जाता जिन्होंने उत्थान या पतन में भूमिका निभाई।

चरित्र मनुष्य की मौलिक विशेषता एवं उसका निजी उत्पादन है। इसमें इसके निजी दृष्टिकोण, निश्चय, संकल्प एवं साहस का पुट अधिक होता है। इसमें बाह्य परिस्थितियों का यत्किंचित् योगदान ही रहता है। असंख्यों ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जिनमें लंका जैसे विषाक्त वातावरण में विभीषण जैसे संत अपने बलबूते समूची प्रतिकूलताओं को चुनौती देते हुए अपने स्थान पर अटल बने रहे। ऐसे भी कम नहीं, जिनमें पुलस्त्य ऋषि के देवपरिकर में रावण जैसे अनाचारी का प्रादुर्भाव हुआ और उसने वातावरण को ताक पर उठाकर रख दिया।

यह व्यक्तिगत चरित्र ही है जो व्यक्ति अपने बलबूते विनिर्मित करता है। परिस्थितियाँ सामान्य स्तर के लोगों पर ही हावी होती है। जिनमें मौलिक विशेषता है, वे नदी के प्रवाह से ठीक उलटी दिशा में मछली की तरह अपनी पूँछ के बल पर छर–छराते चल सकते हैं। निजी पुरुषार्थ एवं अन्तःशक्ति को प्रसुप्त को उभारते हुए साहसी व्यक्ति अपने को प्रभावशाली बनाते व व्यक्तित्व के बल पर जन–सम्मान जीतते देख गए हैं। यह उनके चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की श्रेष्ठता एवं अन्तराल की विशालता के रूप में विकसित व्यक्तित्व की ही परिणति है। जिसे भी इस दिशा में आगे बढ़ना हो, इसके लिए यही एक मात्र राजमार्ग है। इसके लिये किसी शार्टकट का किसी रूप में प्रावधान नहीं है। यह एक शाश्वत निर्धारित सिद्धान्त है, जिसे हर स्थिति में स्वीकार किया जाना चाहिए।


मनःक्षेत्र के खरपतवार उखाड़ें

मस्तिष्क का उर्वरता अद्भुत है। झरने उद्गम का तरह उसका प्रवाह अनवरत जारी रहता है। उपजाऊ भूमि में वर्षात् के दिनों निरन्तर खरपतवार उगते रहते हैं। मच्छर मक्खियों का उत्पादन भी ऐसा ही है। उनका प्रजनन एक से अनेक रूप में हर दिन विकसित होता रहता है। मस्तिष्क में उठने वाली विचार तरंगों का भी यही हाल है। कल्पनाएँ हर समय उठती रहती हैं। टिड्डी दल की तरह अपनी गुफा से निकलकर सारे आसमान में छा जाती हैं। विचारों की प्रक्रियाएँ भी ऐसी ही हैं। वह घटाओं की तरह बरसती और फव्वारों की तरह उछलती देखी जाती हैं। दूध के झाग की तरह वे उठतीं और क्षण-क्षण में बैठती रहती हैं।

कब क्या विचार उपज पड़ें इसका कोई ठिकाना नहीं। उर्वरता कुछ न कुछ उगलती ही रहती है। मस्तिष्क बिना कल्पनाएँ किये रह नहीं सकता। बात की बात में विचारों की झड़ी लग जाती है। इनकी श्रृंखला अस्त-व्यस्त तो होती है पर टूटती नहीं। उनका सिलसिला चलता ही रहता है।

किसके मस्तिष्क में किस प्रकार के विचार बहुलता से उठेंगे, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पूर्व संचित संस्कार कैसे रहे हैं। कोयले की खदान में से कोयला निकलता है और गेरू की खदान में से गेरू। संग्रहित संस्कार एक प्रकार के मिट्टी में दबे हुए बीज हैं जो नमी का मौसम आते ही अंकुरित होने और बढ़ने फैलने लगते हैं।

पुरानी आदतें स्मृतियाँ-रुचियाँ, घटनाएँ, परिस्थितियाँ भूतकालीन हो जाने पर भी अपनी जड़ें हरी रखे रहती हैं। जब भी अनुकूलता होती है, तभी वे पतझड़ के उपरान्त फूटने वाली कोंपलों की तरह नये रूप में प्रकट होती हैं। उनका स्वेच्छाचार देखते ही बनता है। तात्कालिक उस प्रकार की कोई घटना या आवश्यकता न होने पर भी इस प्रकार के विचार उठने लगते हैं जिन्हें सामयिक समस्या के साथ सम्बन्ध रूप में जोड़ सकना कठिन पड़ता है।

खेतों में अपने अपने क्षेत्रों में प्रचलित खरपतवार अनायास ही उगते हैं। मस्तिष्कों में भी ऐसा ही होता है। संस्कार, संगति एवं अभिरुचि के अनुरूप ही विचार उठते हैं। जो रसीला अनुभव आस्वादन होता रहा है। उसकी पुनरावृत्ति करने के लिए मन चलता है, और कल्पनाओं का ज्वार उठता है। दूसरों को जो करते और लाभ उठाते देखा गया है, उसका अनुकरण करने के लिए भी मन करता है। उसी के अनुरूप ताना-बाना बुनता है। निराशा, भय, आशंका, असफलता, विपत्ति आदि की कुकल्पनाएँ ही बहुत उठती रहती है। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित कई उत्तेजनाएँ मन के सामने योजनाओं का रूप धारण करके आती हैं। आक्रमण प्रतिशोध के लिए कुछ किया जाना चाहिए, ऐसे प्रवंचकों का आधा अधूरा स्वरूप अविकसित रूप में पड़ा रहता है। कुछ को बड़ा आदमी बनने की धुन सवार रहती है। वे जल्दी ही अमीर बनने के लिए अनैतिक आचरणों की योजनाएँ बनाये रहते हैं। उन्हीं स्तरों के घुले मिले विचार आमतौर में मस्तिष्क की परिधि में घूमते रहते हैं।

खरपतवार भूमि की उर्वरता चूसती है और जितनी जगह में जड़ जमा लेती है उतनी में अन्य उपयोगी पौधों को नहीं पनपने देती। कुदरती पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और अपने अस्तित्व बनाये रहने के लिए आवश्यक दृढ़ता भी बनी रहती है। इसलिए बिना बोये भी उनकी सत्ता अधिकाँश धरती को घेरे रहती है। इसमें से कुछेक ही ऐसे होते हैं जो पशुओं के चारे में काम आ जाते हैं। शेष तो कटीले, विषैले होने के कारण जगह घेरने के अतिरिक्त और किसी काम के नहीं। विचारों के संबंध में भी यही बात है, वे सब उत्पादित होने पर हेय स्तर के ही होते हैं। उनकी उपस्थिति चिन्तन को विकृत ही करती रहती है, व्यक्तित्व को अनगढ़ और आचरण को ऐसा जिससे आत्म प्रवंचना एवं लोक भर्त्सना के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगे। यह स्थिति घाटे की है। यह बनी रहे तो मनुष्य को भीतर से खोखला और बाहर से ढकोसला बनाकर छोड़ता है।

चतुर किसान खेत के खरपतवार उखाड़ने के लिए हल जोतता है। जुताई के अन्य तरीके भी अपनाता है, उसकी इच्छा रहती है कि खेत साफ सुथरा रहे। ताकि भूमि में उर्वरता बनी रहे और लाभदायक फसल बोने उगाने के प्रयत्न में सफलता मिले। यही वास्तविकता भी है जो गुड़ाई, निराई नहीं करते उनका बीज भी मारा जाता है और फसल काटने का अवसर भी हाथ नहीं लगता है। कृषि कर्म में एक बीज से सौ दाने उत्पन्न होने का लाभ विवरण सभी को विदित है। किन्तु यह सार्थक तभी होता है जब खेत को खरपतवार से-पौधों में लगने वाले कीड़ों से बचाव की समुचित व्यवस्था बना ली जाय। अन्यथा उस खरपतवार को भी कीड़े-मकोड़े खाते रहते हैं, परिपुष्ट होकर अच्छी फसल पर आक्रमण करते हैं और उस किसान के लिए सब मिलकर सिरदर्द ही बनते हैं। खरपतवार से निबटना ही एक मात्र उपचार किसान के लिए है।

यही रीति-नीति उन सभी बुद्धिमानों को अपनानी पड़ती है, जो अपने बहुमूल्य मस्तिष्क के रूप में बहुमूल्य उपार्जन से लाभान्वित होना चाहते हैं। मनोनिग्रह इसी को कहते हैं। वश में किया हुआ मन मित्र और उच्छृंखल रहने पर उसी शत्रु कहते हैं। शत्रुता को मित्रता में बदलने के लिए सज्जनता और बुद्धिमत्ता को विशाल रूप में प्रयत्न करना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार मन को दुष्प्रवृत्तियों दुरभिसंधियों से विरत करने के लिए उसे बहुत तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करते हुए समझाना, बुझाना और भटकाव से विरत करके सही मार्ग पर लाना पड़ता है। यह कार्य कठिन तो है पर असम्भव नहीं। अन्तर्मुखी न होने और बाहरी प्रपंच में उलझे रहने के कारण मन अपनी मलीनता समेत किसी कोने में छिपा बैठा रहता है। उसकी करतूतें सहज ही पकड़ में नहीं आतीं, इसलिए उसे सुधारा कैसे जाय? यह सोचते भी नहीं बन पड़ता।

मन को वश में करना परम पुरुषार्थ माना गया है। उसे हाथी, शेर जैसे विकराल जीवों को वशवर्ती बनाकर उनके माध्यम से अपना गौरव-महिमा एवं उन्हें प्रशिक्षित करके लाभ उठाने का व्यवसाय करना है। वशवर्ती मन को किसी भी उपयोग, चिन्तन एवं प्रयास में लगाया जा सकता है, उससे मनचाहा लाभ उठाया जा सकता है। किन्तु यदि मनःक्षेत्र में अराजकता, अनुशासनहीनता चल रही हो, स्वेच्छाचार का बोल-बाला हो तो किसी उपयोगी योजनाबद्ध कार्य में उसे लगा सकने की संभावना ही नहीं बनती।

विचारों की शक्ति महान है। उसे चेतना की प्रचण्डता कहते हैं, वह जिस भी दिशा में चल पड़ती है, जिस कार्य में भी जुट पड़ती है उसे सफलतापूर्वक पूरा करके ही रहती है। कुविचारों को रोकने का सही तरीका एक ही है कि उनके सामने सद्विचारों की सुनियोजित श्रृंखला हर समय बनी रहे। कुविचार उठते ही उनका प्रबल विरोध किया जाय। उनसे होने वाली हानियों को समझा और समझाया जाय। राजमार्ग पर चलने से लम्बा लक्ष्य भी सरलतापूर्वक पूरा हो जाता है। यह तथ्य यदि हृदयंगम किया जा सकता है तो मन मनाने से भी मान जाता है। वह कुसंग की मलीनता त्यागकर सन्मार्ग के इर्द-गिर्द महकने वाले पुष्पों का रसास्वादन करते हुए आगे बढ़ता है।


अग्निवेश ने आचार्य चरक से पूछा (kahani)

जिज्ञासु अग्निवेश ने आचार्य चरक से पूछा-”संसार में जो अगणित रोग पाये जाते हैं, उनका कारण क्या है?”

चरक संहिता के अनुसार आचार्य ने उत्तर दिया-”व्यक्ति के पास जिस स्तर के पाप जमा हो जाते हैं, उसी के अनुरूप शारीरिक एवं मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं।”

व्यक्तिगत पापों का फल व्यक्ति को भुगतना पड़ता है, पर सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों का फल समूचे समाज को भोगने होता है। अतिवृष्टि, भूकम्प, महामारी, हिमपात, टिड्डी दल आदि प्रकृति प्रकोपों को व्यापक रूप से फैली हुई अवाँछनीयताओं, कुरीतियों एवं अनैतिकताओं का प्रतिफल समझा जाना चाहिये।


कुण्डलिनी का उर्ध्वगमन

कुण्डलिनी का अवस्थान शरीर के बीचों बीच है। जननेन्द्रिय को केन्द्र मानकर नापा जाय तो उसकी ऊपरी और निचले भाग की लम्बाई प्रायः समान ही बैठती है। इसे एक प्रकार का चौराहा कह सकते हैं, जहाँ से ऊपर भी उठा जा सकता है और नीचे भी गिरा जा सकता है। उथले तट पर भी विनोदरत रहा जा सकता है और कुशल पनडुब्बों की तरह गहरी डुबकी लगाकर बहुमूल्य मणि मुक्तकों को भी बटोरा जा सकता है।

कुण्डलिनी को प्राणाग्नि या योगाग्नि कहा गया है। उसकी स्वाभाविक प्रकृति ऊर्ध्वगामी है। पर यदि उपेक्षा बरती जाय तो वह निष्क्रिय भी पड़ी रह सकती है और यहाँ तक कि मार्ग अवरुद्ध रहने पर वह नीचे की ओर भी खिसक सकती है। कभी-कभी वह आवरण वेध कर अपने लिए बहिर्गमन का मार्ग बना सकती है।

वंश परम्परा का सृष्टि क्रम चलाते रहने के लिए प्रकृति ने जननेन्द्रिय में उत्तेजना उत्पन्न की है। सामान्य जीवधारी उससे प्रभावित रहते हैं, और वयस्क होने के उपरान्त काम कौतुक में रस लेने लगते हैं। इसके साथ ही प्रजनन का दायित्व भी जुड़ा हुआ है। उसमें जकड़ जाने के उपरान्त काम कौतुक की कठिनाई और जिम्मेदारी कंधे पर आती है। एक ऋण चुक नहीं पाता, तब तक दूसरा नया शिर पर लद जाता है, इस प्रकार वाणी वर्ग की उदरपूर्णा के अतिरिक्त यौनाचार और प्रजनन परक भार ढोते-ढोते हुए जिन्दगी बितानी पड़ती है।

जो प्राणी जितने हेय स्तर के हैं उनमें प्रजनन की क्षमता उतनी ही अधिक पाई जाती है। मक्खी, मच्छर, मछली, चूहे आदि की प्रजनन क्षमता को देखकर आश्चर्य होता है। यदि उनके प्रयास सफल होते रहे तो इनका एक ही जोड़ा कुछेक वर्ष में समूची धरती पर छा सकता है। सभी जानते हैं कि टिड्डी दल और फसल के कीड़े कितनी तेजी से बढ़ते हैं। यह वृद्धि न उन उत्पादकों के लिए हितकर होती हैं, न वातावरण के लिए और न उनके लिए जिनके कि संपर्क में वे आते हैं।

यह प्राणाग्नि का वैसा ही कौतुक कौतूहल है, जैसे कि बच्चे फुलझड़ी जलाकर करते रहते हैं। उस विनोद की परिणति सब प्रकार महँगी पड़ती है। पैसा जलता है, धुआँ स्वास्थ्य बिगाड़ता है और आग लगने का जोखिम रहता है। काम कौतुक में प्राणाग्नि जैसी बहुमूल्य सम्पदा का अपव्यय भी ऐसा है, जिसमें व्यक्तिगत रूप से आत्मिक दृष्टि से मनुष्य का कोई लाभ नहीं बनता। प्रकृति के कौतुक कौतूहल भर की पूर्ति होती है।

कुण्डलिनी जागरण उस प्रयत्न का नाम है, जिसमें प्राणाग्नि को ऊपर उठाया जाता है। शक्ति केन्द्रों के उन चक्रों को गतिशील किया जाता है, जिनका पैंदा आवश्यक गर्मी के अभाव में ठंडा ही पड़ा रहता है। हाँडी के नीचे आग न जलाई जाय तो उसमें पड़ी वस्तुएँ न गरम होती हैं, न पकती हैं।

प्राणाग्नि को गरम करने में बहुत कठिनाई नहीं है। ब्रह्मचर्य पालन से उसका अधोगामी व क्षरण रुक जाता है। इसके अतिरिक्त निर्धारित प्राणायामों के करने से शक्तिचालिनी मुद्रा जैसे प्रयोगों से उसे इतना तीव्र किया जाता है कि वह मेरुदण्ड मार्ग की नली में होती हुई मस्तिष्क के मध्य भाग में अवस्थित सहस्रार चक्र को स्पर्श सके। ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ अपना संबंध जोड़ सके। तालमेल बिठा सके।

ऊर्ध्वगामी प्राणाग्नि प्रायः प्रकृति प्रेरणा से नीचे गिरने या अन्य छिद्रों द्वारा बाहर फूटती है। इन्द्रियों के रस ऐसे ही हैं, जो सामान्य स्थिति में काम चलाऊ उपयोगों से शान्त हो जाते हैं। पर उनके पृष्ठ भाग में जब ऊर्जा उभरती है तो हाँड़ी में उफान आने जैसी स्थिति बन पड़ती है। सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय के भोगों को अतिवाद की सीमा तक ले जाना चाहती हैं। जिह्वा को रसास्वादन-आँखों को दृश्य कौतूहल, मस्तिष्क को लिप्सा लालसा का उभार आता है। यह संस्थान आतुर हो उठते हैं। असावधानी बरतने पर वे संग्रहित क्षमता से ही हाथ धो बैठते हैं और खोखले हो जाते हैं। इसलिए कुण्डलिनी साधक को न केवल ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है वरन् मन समेत सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण कड़ा करके संयम साधना पड़ता है।

कुण्डलिनी जागरण अभ्यास को निरन्तर जारी रखने पर असंयमजन्य उत्तेजनाएँ शान्त हो जाती हैं और प्राणाग्नि नीचे से ऊपर को उठना आरम्भ करती है।

मूलाधार गह्वर-मेरुदण्ड का अन्तिम सिरा कुण्डलिनी शक्ति का केन्द्र है। यों उसकी ऊर्जा समस्त शरीर में काम करती और गर्मी पहुँचाती है। ऊर्ध्वमुखी कुण्डलिनी क्रमशः एक-एक चक्र को वेधती हुई आगे बढ़ती ऊपर चलती है। मेरुदण्ड में मूलाधार के अतिरिक्त चार चक्र और हैं (1) स्वाधिष्ठान (2) मणिपूर (3) अनाहत (4) विशुद्धि चक्र। इसके बाद सहस्रार आ जाता है। आज्ञा चक्र का विषय विवादास्पद है। उसे मेरुदण्ड में सम्मिलित भी माना जाता है और पृथक भी कहा जाता है।

ऊर्जा कितनी ऊपर उठी, इसका आभास इससे होता है कि ऊपर उन चक्रों के स्थान पर बार-बार अनायास ही स्पन्दन, फड़कन, गर्मी, खुजली जैसी मचती है। कभी-कभी चींटी काटने- कीड़े रेंगने जैसे अनुभव होते हैं। यह हलचलें जिस क्षेत्र में होती हैं वहाँ तक प्राणाग्नि का उर्ध्वगमन हुआ माना जा सकता है।

स्वभाव में अन्तर आने वाली बात ही यह परिचय देती है कि कुण्डलिनी की पहुँच कितनी ऊँची हो गई। स्वाधिष्ठान में चंचलता, आतुरता, स्फूर्ति जैसे-उत्तेजनात्मक प्रयास चल पड़ते हैं। क्रोध एवं अहंकार की मात्रा भी बढ़ जाती है। यह उफान भर है। उफान स्थायी नहीं होते। वे कुछ ही समय उछल कूद करने के बाद स्थिर होते और तली में बैठते दीख पड़ते हैं। यह इसलिए होता है कि आत्म संयम की अगली सीढ़ी पर चढ़ने की परीक्षा साधक उत्तीर्ण कर सके।

इसी प्रकार ऊपर के चक्रों की दिशा में प्राणाग्नि का बढ़ना स्वभाव में तरह-तरह की उत्तेजनाएँ भरता है। इनमें से कुछ सात्विक भी हो सकती हैं कुछ राजसिक और तामसिक भी। लगता है कई प्रकार के आवेश आते हैं और उतावली अपनाने के लिए बेचैन करते हैं। इन सभी को अधिक दृढ़तापूर्वक संयमित करना पड़ता है। न कर पाने पर उत्तेजना कार्यान्वित होने लगती है और साधक के किये हुए प्रयासों को निष्फल बना देती है। अस्तु इस मार्ग को अपनाने पर पूर्णता तक पहुँचने तक क्रमशः अधिक कठोर संयम बरतने की आवश्यकता पड़ती है। धीर, वीर, गंभीर की तरह फूँक-फूँक कर कदम बढ़ाना पड़ता है और ध्यान रखना पड़ता है कि यह नशे जैसे आवेश कुछ ऐसा न कर बैठें, जिसे उद्धत कहा जा सके।

कुण्डलिनी की प्राण ऊर्जा जब मस्तिष्क के मध्य भाग सहस्रार तक पहुँचती है तब आत्म-ज्ञान उभरता है और शरीर और आत्मा की पृथकता अनुभव होने लगती है। इस स्थिति का प्रतिफल यह होता है कि दृष्टिकोण में उच्चस्तरीय परिवर्तन आता है जो आत्मा के पक्ष में अधिक सोचने और अधिक करने के लिए विवेक और साहस की मात्रा कहीं अधिक बढ़ा देता है। पूर्व जीवन में जिस ओर इच्छा ही उत्पन्न नहीं होती उस आत्म-कल्याण के लिए परामर्श मार्ग पर चल पड़ने का निश्चय दृढ़ से दृढ़तर होता जाता है। यही कुण्डलिनी का ऊर्ध्वगमन है।


समाज सेवी रविशंकर (Kahani)

गुजरात के प्रख्यात समाज सेवी रविशंकर महाराज ने जो रचनात्मक कार्य किया है वह लोक सेवियों के इतिहास में अमर रहेगा।

ऐसे समाज सेवियों को अपरिग्रही रहना चाहिए और औसत भारतीय स्तर का निर्वाह करना चाहिए। आदर्श को उनने जीवन भर अपनाया।

एक बार अन्य कार्यकर्त्ताओं के साथ वे पद यात्रा पर जा रहे थे। रास्ते में वर्षा होने लगी। साथियों ने झोले में से निकाल कर बरसाती ओढ़ ली, पर महाराज ने अपनी टोपी और कुर्ता उतार कर झोले में रख लिया। पूछने पर उनने कहा-वर्षा का स्नान और कपड़ों की सुरक्षा का मैंने दुहरा लाभ उठा लिया इसमें हर्ज क्या हुआ?


प्राणविद्युत के संवर्धन से तेजोवलय का अभिवर्धन

जीवात्मा के साथ लिपटे हुए तीनों शरीरों का अपना-अपना महत्व और अपना-अपना उपयोग है। प्रत्यक्षतः उनके विकास की उत्साहवर्धक उपलब्धि का प्रत्यक्ष जीवन में अनुभव किया जा सकता है। स्थूल शरीर स्वस्थ, समर्थ और सुन्दर लगे, दीर्घायुषी बने तो उसे हरेक पसन्द करेगा और इस सफलता को अपना सौभाग्य मानेगा। अपने आपको भी अपनी सत्ता शरीर तक सीमित लगती रहती है। दूसरे तो पूरी तरह वैसा ही मानते हैं। व्यावसायिक, पारिवारिक, सामाजिक संबंध शरीरों के साथ ही जुड़ते हैं। जन्म पर हर्ष और मरण पर शोक उसी के लिए मनाया जाता है। यह परिचय संपर्क पंच तत्त्वों से बने काय कलेवर के हैं। प्रत्यक्ष की दृष्टि से इतना ही औचित्य भी है और संभाव्य भी। पर जब उसकी सूक्ष्मता में प्रवेश करते हैं तो विदित होता है कि चेतना क्षेत्र अभी और शेष रह गया। शरीर जड़ ही नहीं, उसके भीतर सचेतन भी चमकता-झाँकता दिखाई पड़ता है। इस शरीर चेतना की अपनी उपलब्धियाँ हैं। उसे कुण्डलिनी शक्ति की विशिष्ट क्षमता समझा जा सकता है। काया रक्त ही नहीं प्राण भी है, इसके आधार पर समर्थता उपलब्ध होती हैं; किन्तु कायिक प्राण की क्षमता चमत्कारी होती है। उसमें तेजस्विता एवं आकर्षण शक्ति भरी रहती है। विकर्षण की प्रहार क्षमता भी।

जिसकी कुण्डलिनी जागृत है, उसकी काया में ओजस् का प्राण प्रवाह फूलता रहता है। वह संपर्क में आने वालों को अपने अनुकूल-अनुरूप बना सकता है। अपने प्रभाव से निकटवर्ती वातावरण को विशेष स्तर का बना सकता है। ऋषियों के आश्रम में सिंह, गाय एक घाट में पानी पीते थे। हिलमिल कर रहते थे। पर जब वहाँ से चले जाते थे तो पूर्ववत् व्यवहार करने लगते थे। प्राण शक्ति का चमत्कार सीमित क्षेत्र में चमत्कार दिखाता है। कुण्डलिनी की क्षमता से साहस और प्रभाव असीम मात्रा में उभरता है। इससे साधक का न केवल आत्म-विश्वास उभरता है, वरन् उसकी क्रिया प्रभाव में भी अनेक गुना कौशल भर जाता है। जीवन सामान्य स्तर का न रहकर असामान्य बन जाता है। अनेकों को शक्ति प्रदान करना, उन्हें ऊँचा उठाना, आगे बढ़ाना ऐसे ही लोगों से बन पड़ता है, जिनके काय कलेवर प्राण ऊर्जा की अतिरिक्त मात्रा में भरे होते हैं। यह जीवनचर्या के संयम, अनुशासन, आत्म-विश्वास और महान दायित्वों के परिवहन से ही संभव हो सकता है। उसका साधनात्मक तरीका यह भी हो सकता है कि कुण्डलिनी जागरण की विधा अपनाई जाय। इसमें जननेन्द्रिय मूल में सन्निहित महासर्पिणी जैसी प्राण ऊर्जा को जगाया जाता है। वह ज्वाल-माल की तरह ऊँची उठकर मेरुदण्ड मार्ग से मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है। मेरुदण्ड मार्ग से गुजरते हुए उसे उस प्रवाह में विद्यमान छै चक्रों का-भँवरों का वेधन करना होता है। इन केन्द्रों की प्रसुप्त शक्ति जब जागृत होती है तो अपने निकटवर्ती पदार्थों और प्राणियों को प्रभावित करती है। एक सीमा तक वातावरण में भी अभीष्ट परिवर्तन करती है। ऐसी अनेक कसौटियों पर कसने से प्रतीत होता है कि स्वस्थ सामान्य जनों में पाई जाने वाली समर्थता की तुलना में उनकी क्षमता कहीं अधिक विकसित होती है, जिनने उस क्षेत्र की प्राण प्रक्रिया को जगा लिया है। पंचतत्वों में पंच प्राणों का समन्वय हो जाने पर अनेक स्तर के प्रभाव-चमत्कार दीख पड़ते हैं। आवश्यक नहीं कि उन्हें मैस्मरेज्म-हिप्नोटिज्म की तरह प्रदर्शन के लिए प्रयुक्त किया जाय। बढ़ी हुई क्षमता को उन महत्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है, जिन्हें महामानवों द्वारा सम्पन्न किये गये महान कार्यों के समतुल्य समझा जा सके। मानवी विद्युत का एक स्वरूप शरीर के इर्द-गिर्द विद्यमान तेजोवलय के रूप में जाना जाता है। यह एक समर्थ कवच है जो बाहरी आघात आक्रमणों से रक्षा करता है और अन्यान्यों को अपने अनुशासन में चलने के लिए बाधित कर सकता है। ओजस् सचमुच ही शरीर क्षेत्र का एक विद्युत भण्डार है जिसे समयानुसार अभीष्ट प्रयोजनों के लिए सफलतापूर्वक प्रयुक्त किया जा सकता है।

ओजस् का वैज्ञानिक पर्यवेक्षण और (तेजोवलय) के रूप में देखा गया है। वह शरीर के चारों ओर छै इंच की दूरी तक फैला हुआ विशेष यंत्रों द्वारा देखा जा सकता है। चेहरे पर उसकी मात्रा, सघनता की परिधि अधिक होती है। इसे एक प्रकार की भाप समझा जा सकता है। चूल्हे पर पानी चढ़ा देने से उसमें से भाप उठती है। यह भाप निकट क्षेत्र में तो खुली आँखों से भी देखी जा सकती है, पर कुछ ऊँची उठने के बाद वह विरल एवं अदृश्य हो जाती है। फिर भी उसका अस्तित्व बना रहता है। रात्रि को शीतलता का संपर्क होने पर वह घास–पात पर ओस बिन्दु बन कर जमा हो जाती है। इसी प्रकार स्थूल शरीर एवं उसमें समाई हुई प्राण चेतना का समन्वय जब क्रियाशील होता है तो उस ऊर्जा का भीतरी क्रिया-कलाप चलने के अतिरिक्त त्वचा के बाहर भी उसका फैलाव होता है। यही ओजस् या तेजोवलय है।

तेजोवलय अपना काम अनायास ही अपने ढंग से करता रहता है। शरीर के ऊपर वह रक्षा कवच की तरह चढ़ा रहता है। बाहरी आक्रमणों से रक्षा करता है। जो हानिकारक तत्व-विषाणुओं के रूप में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आक्रमण होते रहते हैं, उन प्रहारों से बचाव करता है। सामान्य जनों को वातावरण का संपर्क का प्रभाव अपनी ओर खींच ले जाता है, हावी हो जाता है। फलतः व्यक्ति अपने को असहाय अनुभव करता है और बिल्ली के मुँह में दबे हुए चूहे की तरह समीपवर्ती प्रभावों से प्रभावित होता चला जाता है। अपनी निरोधक शक्ति प्रायः सीमित, न्यून पड़ने लगती है। जीवट भी स्वल्प मात्रा में होती है। किन्हीं कारणों से मनुष्य देखने में भला चंगा होने पर भी भीतर से खोखला बना रहता है-यही वास्तविक दुर्बलता है। इस स्तर के दुर्बल व्यक्ति न पराक्रम कर पाते हैं और न साहस दिखा पाते हैं। सृजन प्रयोजनों में उनका व्यक्तित्व बहुत हलका पड़ता है। प्रकृतिगत वातावरणजन्य मानसिक प्रहार एवं पतनोन्मुख आकर्षण इन दुर्बलों को चाहे जिस दिशा में घसीटते और कठपुतली की तरह नचाते रहते हैं। उनकी अपनी सृजन क्षमता, संकल्प शक्ति कुछ ऐसा नहीं कर पाती कि अपनी आकर्षण शक्ति से अभीष्ट सहयोग सम्मान, विश्वास खींचकर बुला सके। आवश्यक साधन जुटा सके। इस अभाव को अध्यात्म की भाषा में ओजस् की कमी कह सकते हैं, जिसे उपकरणों से अथवा दिव्य चक्षुओं से प्रत्यक्ष भी देखा जा सकता है। तेजोवलय वस्तुतः अन्तरंग में समाहित प्राण शक्ति का बाहर झाँकता हुआ मँडराता हुआ स्वरूप है। इसे दृष्टि कौतुक या अविज्ञात का ज्ञान भर नहीं समझा जाना चाहिए, वरन् यह मानकर चलना चाहिए कि बलिष्ठता का यह जीवन्त प्रमाण परिधान है।

तेजोवलय की स्थिति में प्रयत्नपूर्वक परिवर्तन किया जा सकता है। वह उच्चस्तरीय भी होता है और निकृष्टतम भी। रूप सौंदर्य वाले व्यभिचारियों में, वेश्याओं में, ठगों में, क्रूर आक्रान्ताओं में यह भयावह स्तर का होता है। इसे असुरता का परिचायक कह सकते हैं। इसका सघन होना धारणकर्ता के पतन का द्वार खोलता है। जिस पर प्रभाव छोड़ता है उसे अशक्त, असहाय बनाकर निर्जीव पराधीन की स्थिति में ला पटकता है। इस आसुरी तेजोवलय का रंग कालिख लिए हुए होता है। दैत्य-दानवों की आकृतियाँ काले रंग की चित्रित की जाती है। पर यह त्वचा की निरख परख पर लागू नहीं होती। गोरे रंग के हिटलर एवं नीत्से जैसे महत्वाकाँक्षी व्यक्तित्वों का व्यक्तित्व दानवी पाया गया। रावण आदि लंकावासी हो सकता है कि गोरे रंग के रहें हो। उष्ण कटिबन्ध क्षेत्र में रहने वाले सभी निवासियों की चमड़ी काली होती है, पर उनमें भी सज्जनता का बाहुल्य पाया जाता है। इस प्रकार रंगों का निर्धारण त्वचा को देखकर नहीं, तेजोवलय में घुले काले रंगों को देखकर किया जाता है। सन्त, सज्जन एवं देव प्रकृति के लोगों का तेजोवलय पीली झलक लिए हुए प्रतीत होता है। वे समीपवर्ती लोगों का विविध-विधि अनुग्रह, अनुदान अनायास ही देते रहते हैं।

तेजोवलय की न्यूनाधिकता तथा रंगों की झलक देखते हुए व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक स्थिति का अन्तःस्वरूप जाँचा जा सकता है। भले-बुरे की, दुर्बल-सबल की, दुर्जन-सज्जन की परख की जा सकती है। उनसे बचा अथवा लिपटा जा सकता है। व्यक्तित्वों का विश्लेषण इस आधार पर हो सकता है। किसके शरीर में कहाँ किस प्रकार के विजातीय द्रव्य जमा हैं, इस प्रकार का रोग निदान जहाँ अंग-परीक्षण की अन्यान्य निदान पद्धतियों द्वारा होता है, वहाँ वह कार्य विभिन्न स्थानों से शरीर में उभरने वाले भिन्न-भिन्न स्तर के तेजोवलय को देखते हुए भी वस्तु स्थिति समझ कर सम्पन्न किया जा सकता है। इसी प्रकार मानसिक न्यूनताओं, विपन्नताओं को भी समझा जा सकता है। चरित्र का भी बहुत हद तक पता लगाया जा सकता है। तेजोवलय को देख पढ़ सकने की प्रक्रिया यदि किसी को हस्तगत हो सकें तो वह दूसरों के बारे में इतना अधिक जान सकता है जितना कि गहरी जाँच-पड़ताल से भी संभव नहीं। इस आधार पर अनुपयुक्त संपर्क से बचा जा सकता है और उपयुक्त सान्निध्य से शक्ति वर्षा जैसा लाभ उठाया जा सकता है।

तेजोवलय मात्र स्थिति का परिचायक नहीं है। उसे घटा-बढ़ाकर दूसरों की स्थिति में ऐसा परिवर्तन किया जा सकता है। जिससे समग्र सन्तुलन बन सके। विपन्नता सुधारी और सुसंस्कारिता बढ़ाई जा सके।

जिस प्रकार पैसे के लेन-देन से रुके व्यवसाय चल पड़ते हैं, उसी प्रकार तेजोवलय की आवश्यक मात्रा किसी को हस्तान्तरित करके उसके द्वारा शारीरिक रोगों से, मानसिक उद्वेगों से, प्रतिकूलता भरे संकटों से, अभावों से कषाय-कल्मषों से भी छुटकारा दिलाया जा सकता है। यह एक बड़ी उपलब्धि है। शरीर में माँस तो खा-पीकर भी बढ़ाया जा सकता है, पर उसमें प्राण तत्व की प्रचुरता भर लेना यह असाधारण कौशल एवं पुरुषार्थ है। इसे पाकर निजी व्यक्तित्व को समुन्नत स्तर का प्रभावशाली प्रतिभावान बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त बाँटा जा सके जिसकी तुलना कर्ण जैसे दानवीर से की जा सके।

इस हेतु प्राण अभिवर्धन के लिए साधनात्मक प्रयोग करने पड़ते हैं। इसके लिए प्राण योग से संबंधित ऐसी साधनाएँ करनी पड़ती हैं जो अपने स्तर के अनुरूप हों। सभी भेड़ों को तो एक लाठी से हाँका जा सकता है पर ऐसा नहीं हो सकता कि सभी साधकों को एक ही साधना बताई जा सके। रोग निदान व उनकी स्थिति में भिन्नता के आधार पर उन्हें भिन्न-भिन्न औषधियाँ दी जाती हैं। भले ही वे स्वस्थता के लिए लालायित एक जैसी मनःस्थिति के क्यों न हो? यह बात साधना के संबंध में भी है। प्राण-योग के अंतर्गत प्राणाकर्षण का, प्राणायाम प्रक्रिया का सर्वसुलभ आरंभिक प्रयोग हैं। पर उसे अन्त नहीं आरम्भ समझना चाहिए और उसका अभ्यास बन पड़ने पर अपने अनुकूल प्राणायाम चुनना चाहिए। लोम-विलोम प्राणायाम सूर्य वेधन प्राणायाम तथा नाड़ी शोधन प्राणायाम आदि के अपने-अपने विधान हैं, जिनका विस्तार प्रसंग आने पर उपयुक्त मार्ग-दर्शक से समझा जा सकता है।

संकल्प शक्ति को बढ़ाना भी इसी प्रक्रिया का व्यावहारिक पक्ष माना गया है। इसके लिए आत्म संयम एवं परमार्थ के छोटे-छोटे पुण्य प्रयासों के ऐसे संकल्प लेने चाहिए जो सरल भी हों और नियत अवधि में निश्चित रूप से पूरे हो सके। जो अपनी स्थिति एवं रुचि के अनुरूप हों उसके लिए व्रत लेने का साहस करना चाहिए, उसे हर हालत में करते रहने का प्रण करना चाहिए। इतनी तत्परता और तन्मयता उसमें नियोजित करनी चाहिए जिससे उसका पूरा कर सकना सुनिश्चित रूप से संभव हो सके। ऐसे छोटे-छोटे व्रत लेते रहने और पूरे करते चलने की श्रृंखला मनोबल बढ़ाने में अत्यन्त सहायक होती है। घरेलू एवं व्यावसायिक क्रिया–कलापों को नित्य ही करना पड़ता है। उनका अनुमान अभ्यास भी रहता है, किन्तु व्रत धारण एवं पुण्य-परमार्थ की दिशा में कहना-सुनना ही बन पड़ता है। उसे व्यवहार में उतारने का यदा-कदा ही अवसर मिलता है। इस उपेक्षित दिशा में प्रगति होनी चाहिए, तभी प्राण चेतना को बढ़ा सकना सम्भव है।

प्राण तत्व ही मनुष्य में उच्चस्तरीय समर्थता का आधार है। तेजोवलय के रूप में उसी की व्याख्या-विवेचना होती है। इस दिव्य क्षमता को उपलब्ध करने के लिए जहाँ योग साधनाओं का महत्व है वहाँ संकल्प शक्ति का भी स्थान है। जिन्हें इच्छा उत्कंठा है, उन्हें अपना संकल्प-बल विकसित करने के लिए पुण्य परमार्थ के साधना व्रत संयम निबाहते हुए सम्पन्न करते रहना चाहिए।


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धन की नहीं यश की रक्षा करो। लोगों की आँखों में गिर जाने के उपरान्त तुम गये गुजरे गरीब बन जाते हो।


सबै सहायक सबल के, कोई न निबल सहाय

साहस एक दैवी विभूति है। सामान्य मनुष्य सदैव साधन और अवसर की तलाश करते हैं। किन्तु जो साहस के धनी हैं, वे ऐसे कदम उठाते हैं जिससे विदित होता है कि इनके प्रयासों के पीछे न जाने कितनों का बाहुबल, बुद्धिबल और सहयोग काम कर रहा है। अनेकों ऐतिहासिक प्रसंग एवं आख्यान इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

हनुमान बाल ब्रह्मचारी थे। उनका पराक्रम सर्वविदित है। पर्वत उठाने, समुद्र लाँघने, लंका जलाने जैसे असम्भव कार्य जो उनने समाप्त कर दिखाये, मात्र मिथक नहीं हैं। लंका दहन के उपरान्त वे ताप मिटाने के लिये समुद्र में कूदे तो उनके पसीने को मछली निगल गई। कथा के अनुसार उस पसीने की शक्ति को वह मछली हजम नहीं कर पाई और उससे मकरध्वज की उत्पत्ति हुई। हनुमान से जुड़ी पौराणिक कथाएँ ग्रीक साहित्य में हरक्यूलिस से जुड़ी कथाएँ एवं कृष्ण के अग्रज बलराम में शौर्य पराक्रम की गाथाएँ उस अपरिमित पराक्रम का परिचय देती हैं जो मानवी काया में असीम संभावनाओं के रूप में रोम-रोम में कूट-कूट भरा है। महर्षि दयानन्द ने अपने शक्ति बल से संयम की महत्ता जानने को उत्सुक एक जमींदार की चार घोड़ों से जुती बग्घी को एक हाथ से रोककर बता दिया था कि विभूतियों का सही उपयोग किया जाय, असंयम के छिद्रों से बहाना न जाय तो मनुष्य की शक्ति कितनी प्रचण्ड हो सकती है।

स्विट्जरलैण्ड के कास्ट्राउड नमक लकड़हारे ने सीमा-विवाद हल करने का जिम्मा अपने ऊपर लिया। काफी हट्टा-कट्टा था वह। 1040 पौण्ड भारी पत्थर अपने सिर पर लादकर वह चला। एक मील 4500 फीट वजन समेत चल लेने पर वह गिर पड़ा। वहाँ स्थायी सीमा मान ली गयी। उसके साहस से हतप्रभ दोनों पक्ष इस निर्णय से सहमत हो गए।

फ्राँसीसी ड्यूक डिमाइट की हत्या के अपराध में जीन पाँप मित्तराँ नामक अपराधी को मृत्यु दण्ड सुनाया गया। उसके दोनों हाथ-दोनों पैर चार घोड़ों से बाँध कर चार दिशाओं में दौड़ाये गए ताकि उसके चार टुकड़े किये जायँ। घोड़ों की शक्ति से सभी परिचित हैं। अमेरिका के नेवाड़ा व टेक्सास प्रान्त में भी अपराधी को मृत्युदण्ड देने का यही तरीका अपनाया जाता रहा है। इस मामले में यह प्रयोग तीन बार दुहराये जाने पर भी असफल हुआ। अपराधी इतना मजबूत था कि चार घोड़ों की सम्मिलित शक्ति भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकी। नियमानुसार उसे मुक्त कर दिया गया।

चेक जनरल व्हेटमैन लड़ाई में बुरी तरह घायल हुआ। मरने से पूर्व उसने साथियों से कहा-’मरने के बाद मेरी चमड़ी उखाड़ ली जाय और उसकी खाल मढ़कर सारी चेक सेना में यह मुनादी कर दी जाय कि कोई हिम्मत न हारे। अन्ततः जीत चेक सेना की ही होगी। वैसा ही किया गया। उस ढोल की आवाज सुनकर जनरल के पराक्रम से रोमाँचित सैनिकों के मन में दूना उत्साह उपजा और वे इतनी बहादुरी से लड़े कि जर्मनी के पैर उखड़ गए। प्रकृति के सिद्धान्तों की अवहेलना कर असंभव कर दिखाने वाला संसार में एक ही जादू है साहस-पराक्रम।

यू.के. की काउण्टी चेशायर का एक शिकारी रॉबिन्सन भालुओं के एक झुण्ड में घिर गया। बन्दूक की गोलियों ने जब तक काम किया, चलता रहा। बाद में छुरे से मल्लयुद्ध हुआ। वह भी हाथ से छिन गया तो मल्ल युद्ध लड़ा। इस निहत्थी लड़ाई में डेढ़ सौ पौण्ड वजन के इस व्यक्ति ने 4 भालुओं को गला घोंट कर मारा और अपनी जान बचाई।

फ्राँस के प्रतिभावान अभिनेता चार्ल्सडेलिन के जीवन का वह प्रसंग स्मरणीय है जिसमें उसने शेरों से भरे पिंजड़े में प्रवेश करते ही कविता पाठ करना चालू कर दिया। काव्य की रस धारा में हिंसक जीव भी बह गए एवं कविता कहते-कहते ही बिना किसी क्षति के वे पिंजरे से बाहर निकल आए। वेचुआनालैण्ड (जैरे-अफ्रीका) का फ्रीज वीमाल्ट जंगल से गुजरते हुए अचानक एक खूँखार शेर के सामने आ गया। बंदूक की नली जाम हो गई। शरीर घावों से लहूलुहान हो गया। अन्ततः उसने शेर के मुँह में अपना हाथ ठूँसकर उसका साँस लेना दूभर कर दिया। शेर दम तोड़ बैठा एवं वीमाल्ट की जान बच गई। कुछ ही दिनों में जड़ी बूटियों ने उसे स्वस्थ कर दिया।

साहस-पराक्रम व्यक्ति को सहज ही मिली ऐसी विभूतियाँ हैं, जिन्हें जगाकर प्रचण्ड पुरुषार्थ, असंभव-सा दीख पड़ने वाला काम भी संभव कर दिखाया जा सकता है। कापुरुष उन्हीं को कहते हैं जो परिस्थितियाँ थोड़ी भी प्रतिकूल देख हताश हो जाते हैं एवं मनोबल खो बैठते हैं। शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ दीखते हुए भी, पोषण की दृष्टि से कहीं किसी प्रकार की न्यूनता न होते हुए भी जो मानवोचित पराक्रम कर दिखा पाने में असमर्थ होते हैं, ऐसे व्यक्ति न तो स्वयं प्रगति कर पाते हैं, न औरों को कोई प्रेरणा ही दे पाते हैं। उलटे वे भर्त्सना का पात्र बनते अपनी दुर्गति कराते हैं।

साहस कहीं आसमान से नहीं बरसता। यह तो सदैव अन्तः में विद्यमान है। उसे समय आने पर जगाने भर की आवश्यकता होती है। सूझ-बूझ दूरदर्शिता, प्रत्युत्पन्नमति साहसियों को उचित सम्बल देती व श्रेय सम्मान का अधिकारी बनाती है। फ्राँस के जनरल डुवेले की सेना एक बार किले में घिर गई। राशन भी समाप्त हो गया। शत्रु के चालीस हजार सैनिकों को चकमा दिया गया। रात के सघन कुहासे में घोड़ों पर आटे के बोरे इस तरह बाँधे गए कि वे दैत्याकार सैनिक लगने लगे। साथ ही जानवरों के सींगों पर मशाल बाँधकर रात भर उनसे किले के बुर्ज पर गश्त लगवाई गई। इतना अपार सेना बल देखकर उनसे लड़ने की शत्रु सैनिकों की हिम्मत पड़ी और वे भाग खड़े हुए। हार-जीत में बदल गई।

उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों पर आज तो यात्रा आसान हो गयी है। विज्ञान ने प्रतिकूल वातावरण में रहने के साधन जुटा लिये हैं, एवं भाँति-भाँति के वैज्ञानिक अन्वेषण वहाँ सम्पन्न किये जाने लगे हैं। किन्तु इस सदी के प्रारम्भ में जबकि इन दोनों ही ध्रुवों की टोपोग्राफी का जरा भी अंदाज न था कितने ही साहस के धनी व्यक्तियों ने यात्रा की जोखिम उठाते हुए यह जानने का प्रयास किया कि ये कहाँ हैं व वहाँ की परिस्थितियाँ कैसी हैं? उत्तरी ध्रुव की सर्व प्रथम यात्रा डॉ. फ्रेडरिक अर्ल्बट कुक ने की थी। इस अमेरिकन वैज्ञानिक ने अपने-अपने एस्किमो साथी व 26 कुत्ते साथ लिये। यह यात्रा उसने 23 मील प्रतिदिन के हिसाब से पूरी की। 21 मार्च 1908 को वह चला और 42 दिन में नार्थ सी के रास्ते चलकर वह एबरडीन (स्काटलैण्ड) लौट आया। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव विजय का प्रथम श्रेय ब्रिटिश रॉयल नेवी के कैप्टन जेम्स कुक्स को जाता है। वे कुछ दिन जलयानों की सहायता से चले। बाद में कुत्ते जुती गाड़ियों पर 53 दिनों में अपना सफर पूरा कर वापस केप ऑफ गुडहोप होते हुए यू.के. लौट आये।

एडवेन्चर-प्रकृति के रहस्यों की खोज एवं अविज्ञात को जानने की ललक मनुष्य में प्रारम्भ से हो रही है। यही कारण है कि पत्थर के औजारों, चकमक पत्थर से अग्नि जलाने एवं पत्तों के कपड़े पहनने वाले, गुफा में रहने वाला आदि मानव प्रतिकूलताओं से संघर्ष करता हुआ प्रगति करता चला आया है एवं आज वह चरम सीमा पर है। स्वयं को जोखिम में डालकर किसी को क्या मिलता है? पर यही तो सारे आविष्कारों, नवीन उपलब्धियों का मूलभूत आधार है।

जल मार्ग द्वारा भू-परिक्रमा करने वालों की संख्या अब दो दर्जन से भी अधिक हो चुकी है। सैकड़ों वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ यह सिलसिला बराबर चलता आ रहा है। सबने अपने अलग-अलग रास्ते चुने और नये-नये अनुभव एकत्रित किये। सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को खोजने 18 वर्षीय कोलम्बस नामक नाविक जब स्पेन से निकला था, उन दिनों समुद्र को छोरहीन समझा जाता था। इस अगाध जल राशि को पार करते हुए वह पश्चिम की ओर चलते-चलते धरती को गोल मानते हुए पूर्व में भारत पहुँचना चाहता था। पर वह जा पहुँचा वेस्टइंडीज द्वीपों में। वहाँ से आदिवासियों को उसने भारतीय मानकर “इंडियन्स” नाम दिया। अमेरिका का खोजने का श्रेय कोलम्बस को इसलिये दिया जाता रहा है कि उसने अग्रदूत की भूमिका निभाकर लोगों की राह दिखाई। अटलाँटिक सागर को पार कर वह धरती पा सका, यही उसकी उपलब्धि थी। बाद में उसके बताये मार्ग पर चलकर अन्य नाविकों ने अमेरिका (वर्तमान यू.एस.ए.) खोज निकाला। पुर्तगालियों ने भारतीय मसालों को खोज निकालने के लिये अनेक जोखिम भरी जल यात्राएँ की। अन्ततः वास्कोडिगामा को सफलता मिली एवं गोवा के तट पर पहुँचकर वह भारतीयों से जल मार्ग द्वारा संपर्क स्थापित करने में सफल हो ही गया। ये तो प्रारम्भिक यात्राओं का वर्णन है, जो जैसे जलयानों द्वारा की गयी, जिनमें आधुनिक सुविधाएँ थी ही नहीं। ऐसी ही असुविधा भरी परिस्थितियों में वृद्ध सर चिचेस्टर ने सरकण्डे की नाव से पूरी धरती की जल मार्ग से परिक्रमा लगाई थी। अभी पिछले दिनों ही भारतीय सेना के पुरुषार्थ सम्पन्न नौजवानों द्वारा “तृष्णा” नौका द्वारा जलमार्ग से पूरी धरती का चक्कर लगाया गया है। इससे उन्हें क्या मिला, यह उनके अनुभवों को जानकर जाना जा सकता है। जिजीविषा व संकल्प बल व्यक्ति को प्रकृति के आँचल में प्रतिकूलताओं में जोखिम भरी परिस्थितियों में जाने, कुछ कर दिखाने को प्रेरित करता रहता है एवं जब तक इस मानवी विभूति का अस्तित्व है, मनुष्य भाँति-भाँति के लोमहर्षक कारनामे करता रहेगा।

राइट बंधुओं द्वारा विमान के आविष्कार से लेकर स्पूतनिक के अंतरिक्ष में उड़ने यूरी गगारिन की अंतरिख यात्रा एवं नीलआर्मस्ट्रांग के चन्द्रमा पर पैर रखने से लेकर चैलेन्जर उपग्रह की यात्रा अपने आप में इतिहास के कीर्तिमान हैं। पर एक कीर्तिमान अभी पाँच माह पूर्व एक युवक व युवती ने बिना कहीं रुके, सतत् ईंधन अपने छोटे से यान को नभ में ही उपलब्ध कराते रह, धरती की परिक्रमा कर स्थापित किया है। वाँयेजर-नामक इस विमान के लिये हल्की से हल्की धातु एवं सिंथेटिक शीट्स का प्रयोग किया गया। मात्र डेढ़ मीटर के स्थान में बैठ बारी-बारी से विश्राम कर 9 दिन 216 घण्टे की यात्रा पूरी कर वे सफलतापूर्वक धरती पर उतर आये। व्यक्ति को नये से नये रोमांचक काम कर दिखाने हेतु सतत् प्रेरणा मिलती रहती है एवं यही महत्वपूर्ण उपलब्धियों का कारण बन जाती है। आगे चलकर हो सकता है, ऐसी अनेक यात्राएँ होने लगें। पर इस दो साहसी, जिजीविषा के धनी अन्वेषकों ने पहले सूझ-बूझ से अपना यान स्वयं ही बनाकर जो कुछ भी कर दिखाया, वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित हो गया है।

आज स्वेजनहर से प्रतिदिन 100 से अधिक बड़े जहाज गुजरते हैं एवं हजारों मील की यात्रा के झंझट से बचकर लाल सागर व भूमध्य सागर होते हुए यूरोप पहुँच जाते हैं। किन्तु जब आज से एक सौ वर्ष पूर्व फर्डीनेंड डी लैसेप्स नामक भू वैज्ञानिक ने इस मार्ग को खोज निकाला था तो कौन जानता था कि आगे चलकर यह ऐतिहासिक स्वेजनहर अनावश्यक लम्बी यात्रा को इतना छोटा कर देगा। पनामानहर, पिरामिड एवं चीन की दीवार-ये सभी उस विभूति की उपलब्धियाँ हैं, जिसे पराक्रम, संकल्पबल, साहस बल नाम से जाना जाता है।

मनोबल की प्रचण्ड सामर्थ्य मनुष्य के पास है। शरीर की दृष्टि से समर्थ होते हुए भी जीवन संग्राम में अनेकों व्यक्ति दब्बू मनःस्थिति में जीते-जूझते देखे जाते हैं। पुंसत्वहीन पुरुष शरीर की दृष्टि से मजबूत हो तो भी उसे सेना में नहीं चुना जाता। सब जानते हैं कि रणक्षेत्र में जाना तो दूर यह सामान्य से खतरे का सामना भी नहीं कर सकता। हर व्यक्ति उस विलक्षण सामर्थ्य से भरा-पूरा है जिसे पराक्रम जिजीविषा, साहस, बल-पुरुषार्थ जैसे विभूषणों से संबोधित किया जाता है। इसे यदि सुनियोजित कर दिशा दी जा सके तो और भी कुछ अधिक मूल्यवान उसे हस्तगत हो सकता है, जिसे ऋद्धि-सिद्धि नाम से जाना जाता रहा है।


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दीपक बोलता नहीं प्रकाश से अपना परिचय देता है। तुम अपने संबंध में बढ़-चढ़ कर बातें न करो, लोगों को कृतियाँ देखकर वस्तुस्थिति जानने का अवसर दो।

भौतिक महत्वाकाँक्षाओं के भार से मनुष्य इतना दब जाता है कि आत्म कल्याण के लिए कुछ कर सकना तो दूर-सोचना तक कठिन पड़ता है।


अन्तरिक्ष वासी पृथ्वी पर आते रहें

क्या पृथ्वी से इतर भी कोई विकसित सभ्यता है? इस संबंध में आजीवन शोध में निरत रहने वाले स्विस पुरातत्व विद् एरिखवान डैनिकन ने अनेकों विस्मयकारी प्रमाण खोज निकाले हैं। इन निष्कर्षों से यह ज्ञात होता है कि सदियों पूर्व से अंतरिक्षवासी, अन्यान्य ग्रहों के निवासी अपनी जिज्ञासा पूर्ति हेतु धरती पर आते रहे हैं। पुरातत्त्वविदों ने पेरु के दक्षिण-पश्चिम में एरीक्वीपा प्रान्त के नाजका क्षेत्र में सैंतीस मील लम्बी एक पट्टी ढूँढ़ निकाली है जहाँ ज्यामितीय क्रमानुसार गहरी खाइयां खुदी पाई गई हैं। इनमें से कुछ मीलों लम्बी समानान्तर क्रम में गई हैं तो कुछ परस्पर काटती हुई एक विशेष आकार में देखी गई हैं। यहाँ कुछ जानवरों के चित्र भी खुदे पाये गए हैं। पुरातत्त्वविद् मानते हैं कि ये निर्माण शताब्दियों पूर्व इंका सभ्यता के निवासियों द्वारा विनिर्मित सड़कों के ध्वंसावशेष हैं। भूचुम्बकीय आधार पर वैज्ञानिकों ने इनका खगोलीय महत्त्व भी बताया है।

एरिकवान डैनिकन अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि नाजका के ये चिह्नित स्थान अन्तरिक्षवासियों के हवाई अड्डे हैं, जिन्हें उन्होंने आज से कई सदी पूर्व स्वयं के आवागमन के लिए बनाया था। बाद में उस क्षेत्र के निवासियों ने अन्तरिक्षवासियों के आदर सम्मान में जानवरों के एवं भिन्न-भिन्न प्रकार के चित्र बनाये। धरतीवासियों ने उन्हें देवता रूप माना। श्री डैनिकेन की मान्यता है कि “आधुनिक मानव जिसे ‘होमोसैपिएन्स’ कहा जाता है। अंतरिक्षवासियों और बंदर की संकर संतान है। उस समय धरती पर केवल बंदर ही थे, मनुष्य नहीं। मनुष्य कृत्रिम प्रेरित उत्परिवर्तन से उत्पन्न हुआ है। “उन्हें नाजका मात्र ही नहीं, वरन् अन्य स्थानों पर भी लाखों वर्षों पूर्व अंतरिक्षवासियों के आते-जाते रहने के प्रमाण मिले हैं। अपने कथन की पुष्टि में श्री डैनिकेन ने ऐसे अनेकों सशक्त पुरातत्वीय प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिनसे यह साबित होता है कि इतरवासी अपने वायुयानों से धरती पर उतरते थे। विश्व के विभिन्न शिलालेखों, पेंटिंग, शैल चित्रों, विचित्र मूर्तिकलाओं से यह बात भली प्रकार प्रमाणित हो जाती है। अल्जीरियन सहारा की तास्सिली पर्वत श्रृंखला पर बने चित्र यह बताते हैं कि अंतरिक्षवासी गोल हेल्मेट पहनकर भार रहित हो अंतरिक्ष में तैरते थे। इनके उड़ती हुई स्थिति में चित्र यहाँ देखने को मिलते हैं। ऐसा लगता है कि अत्यंत उच्चस्तरीय तकनीकी क्षमता वाले अंतरिक्षवासियों के लिए पृथ्वी एक अस्थायी क्रीड़ा स्थली थी। एक एनलैड्रिलैडो केचिलियन पठार में फैली विशालकाय पत्थर की 233 चट्टानें इस तरह से खड़ी हैं जैसे पहले यहाँ प्राथमिक रंगशाला या अखाड़े रहे हों। इतने बड़े भीमकाय पत्थर बिना किसी साधन क्रेन जैसे यंत्र के उन पिछड़ी असभ्य समझी जाने वाली जन जातियों द्वारा उस पठार तक किसी भी हालत में नहीं पहुँचाये जा सकते। निश्चित रूप से ये पत्थर अंतरिक्षवासियों द्वारा अपनी तकनीक का प्रयोग कर लाये गये और वहाँ के निवासियों की सहायता से अपने कुशल इंजीनियरिंग देख-रेख में ज्यामितीय आकार देकर उन्होंने बनवाया ताकि उनकी मदद से पाइलटों को उस पठार पर यान आदि उतारने में सुविधा रहे।

चिली के समुद्र तट से 2000 मील की दूरी पर पेसिफिक समुद्र में खड़ी ईस्टर आइलैण्ड की मूर्तियाँ भी इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि समय-समय पर अंतरिक्षवासी धरती पर आते रहे हैं। इन मूर्तियों में से सैकड़ों ऐसी हैं जिनकी ऊँचाई 33 से 66 फीट तक है। इनके उद्भव और उपयोग महत्व के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। वहाँ के निवासियों द्वारा भी इस तरह के कोई निर्माण कार्य नहीं किये गये। निःसन्देह ये मूर्तियाँ अंतरिक्षवासियों की, अंतर्ग्रही सभ्यता की ही निर्मित लगती है।

इक्वेडोर में जमीन के अन्दर बने विशालतम जटिल गलियारे और बड़े-बड़े हाल भी उपरोक्त तथ्य को प्रमाणित करते हैं। हाल की दीवारें और भीतरी छत की बनावट को देखकर यही मालूम होता है कि यह किसी अनुभवी कुशल इंजीनियर द्वारा विनिर्मित हैं। इन हालों के अन्दर बड़े से बड़े जुम्बोजेट को लटकाया जा सकता है। एक बड़े हाल से जुड़े अनेकों गलियारे और उनकी शाखा प्रशाखायें हैं जो बड़े-बड़े समानुपातिक कक्षों में खुलती हैं। बड़े हाल के मध्य में एक बड़ी टेबल और कुछ कुर्सियाँ रखी पाई गई हैं जो प्लास्टिक जैसे किसी पदार्थ की बनी हैं। ये स्टील से भी अधिक मजबूत और वजनी हैं। इस फर्नीचर के चारों ओर स्वर्ग के ठोस प्लेटों पर हाथी, मगर, शेर, भालू, भेड़िये, केकड़े, घोंघे जैसे अनेकों जीवधारियों के चित्र खुदे हैं इन प्लेटों की लम्बाई 3 फीट दो इंच और चौड़ाई एक फुट सात इंच है। सभी प्लेटों पर विचित्र भाषा में कुछ लिखा है और इन पर किसी मशीन विशेष से एम्बोस्ड मुहर लगी पायी गयी है। वैज्ञानिकों का मत है कि ये स्वर्ण प्लेटें पुस्तकालय की पुस्तकों के पृष्ठ हैं, जो अंतरिक्षवासियों द्वारा सदियों पूर्व अपनी पृथ्वी यात्रा के दौरान छोड़े गये इस हाल के साथ जुड़े रास्तों, गलियारों की खोज की जाय तो संभव है कि बहुत से ऐसे अन्य स्थान और वस्तुएँ मिलें, जिनसे इस तथ्य की पुष्टि हो सकती है कि अंतरिक्षवासी पृथ्वी पर आते जाते रहे हैं। ब्रिटेन, फ्राँस के कार्नेक नामक स्थान से भी एक लम्बी पट्टी विशाल महापाषाणों की पाई गई है, मानों वह एक राजमार्ग हो। इनसे अनुपात होता है कि अन्तरिक्षवासी इसी मार्ग से धरती पर आते थे। डेनमार्क राष्ट्री उत्पत्ति के विषय में भी पुरातत्त्वविद् बड़ी आश्चर्यजनक खोज कर लाए हैं। वे बताते हैं कि इसका मूल नाम धेनुमार्ग था जो बाद में अपभ्रंश होकर डेनमार्क हो गया। इसी राष्ट्र में अंतरिक्ष से गाय (धेनु) नामक प्राणी धरती पर अवतरित हुआ एवं सारी पृथ्वी पर फैल गया। डेनमार्क में गायों की प्रचुरता देखकर इस मान्यता की पुष्टि होती है। वहाँ की भाषा, लिपि की भी संस्कृत से अधिक निकटता पाई गई है।

डॉ. टेरेन्स डिकिन्सन “एस्ट्रानाँमी” जरनल में प्रकाशित (वाँल्यूम 2, क्र. 12 दिसम्बर 1974) “द जेटा रेटीक्युली इन्सीडेन्ट” में लिखते हैं कि हमारे नजदीकी 16 तारामण्डलों में से एक जेटा रेटीकुली सिस्टम भी है। वहाँ की परिस्थितियाँ हमारे सौर-मण्डल से बिल्कुल मिलती जुलती हैं व ऐसा सुनिश्चित लगता है कि वहाँ अभी भी जीवन हो। यदि निकट भविष्य में हमारे दक्षिणी गोलार्द्ध के ऊपर स्थित इस तारामण्डल तक, जो हमसे 37 प्रकाश वर्ष (एक प्रकाश वर्ष-नब्बे खरब किलोमीटर) दूरी पर है, जाना संभव हो सका तो हो सकता है कि हमें वहाँ विकसित सभ्यता के दर्शन हों। उड़न तश्तरियों द्वारा धरतीवासियों को पकड़ कर ले जाने व उनसे जानकारियाँ उगल कर वापस धरती पर छोड़ने के कई घटनाक्रम गत तीन दशकों से चर्चित होते रहे हैं। पहले यह मजाक लगता था, किन्तु मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये एक अध्ययन (डॉ. लियो स्प्रीकंल-वायोनिंग विश्वविद्यालय) बताते हैं कि यह सर्वथा मिथ्या नहीं है। “आउट ऑफ बॉडी जर्नी” (शरीर से बाहर सूक्ष्म शरीर की यात्रा) पर बहुत कुछ पाश्चात्य जगत में शोधकार्य हो चुका है व प्राप्त निष्कर्ष इस मान्यता का समाधान करते हैं कि अंतरिक्षवासी इस धरती पर आते हैं व सूक्ष्म रूप से चेतन सत्ता से संपर्क स्थापित करने का प्रयास करते हैं। सन् 1899 में जेनेवा विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक डॉ. थियोडोर फ्लाँर्नी ने एक पुस्तक लिखी थी-”फ्राम इण्डिया टू प्लेनेट मार्स” (भारत से मंगल ग्रह तक) इस पुस्तक में उन्होंने बताया था कि श्रीमती कैथेरीन मूलर नामक एक महिला में मंगल ग्रह निवासियों से संपर्क स्थापित कर चर्चा करने की अद्भुत क्षमता पायी गयी। “मंगल ग्रह की लिपि” जो संस्कृत से मिलती-जुलती थी, में उन्होंने कई निर्देश सम्मोहन की स्थिति में लिखकर भी दिये। डॉ. कार्लजुँग ने इसे कलेक्टिव काँशसनेस प्रक्रिया के अंतर्गत घटने वाली एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नाम दिया था। इसे उन्होंने मनुष्य द्वारा अचेतन में “कॉस्मिक यूनिटी” (ब्राह्मी तादात्म्य) स्थापित करने के प्रयास का नाम दिया था।

सभी उपलब्ध प्रमाण व वैज्ञानिक शोधों के रहते यह कहना उपयुक्त होगा कि विकासवाद की मूल थ्योरी पर पुनः दृष्टि डालना चाहिए एवं यह मानना चाहिए कि आज से भी विकसित सभ्यता पहले धरती पर रह चुकी है अथवा आज का मनुष्य कहीं और से इस धरती पर अवतरित हुआ व उस समय वह और भी श्रेष्ठ स्थिति में रहा होगा। यदि यह सच है तो निष्कर्ष यही निकलता है कि पूर्वजों की तुलना में हम हर क्षेत्र में नीचे ही गिरते आये हैं, प्रगति कम की है।


संगीत को शालीनता की दिशा मिले

भाव संवेदनाओं को तरंगित करने की जितनी क्षमता संगीत में है, उतनी और किसी में नहीं। जिन्हें भाव क्षेत्र की उत्कृष्टता एवं क्षमता का ज्ञान है उन्हें किसी न किसी रूप से संगीत के संपर्क में रहना चाहिए। उसका उत्पादन कर सकना स्वयं ही न बन पड़े तो दूसरों के माध्यम से इस सरसता का रसास्वादन करना चाहिए। यदि रुझान और तलाश हो तो इस उपलब्धि के साथ संपर्क साधना कुछ कठिन नहीं है।

शरीर को भोजन चाहिए। मन को उत्साहवर्धक उपलब्धियाँ। अन्तःकरण जिसे कारण शरीर भी कहते हैं, सरसता के भाव तरंगों में लहराना चाहता है। भक्ति का तत्व ज्ञान इसी आधार पर विनिर्मित विकसित हुआ है। प्रेम का उत्कृष्ट स्तर पर चरितार्थ करने, उसे स्वभाव में सम्मिलित करने से जो उमंगें उठती हैं, उनमें तृप्ति, तुष्टि और शान्ति का समावेश होता है। आत्मीयता को जिस पर भी बखेरा जाता है वही सुन्दर, सरस, परम प्रिय लगने लगता है। सामान्यजन स्त्री, बच्चों में जिस स्तर का स्नेह बखेर पाते हैं उसी अनुपात से उन्हें उलट कर प्रसन्नता भरी संवेदनाओं का अनुभव होता है।

यह तो हुई अन्तराल के गहन उद्गम से उत्पन्न होने वाली भाव संवेदना। इसे हर कोई उत्पन्न नहीं कर सकते। इसे भावुकता सहज संवेदना करुणा और आत्मीयता के सहारे ही उगाया जा सकता है। यह विशेषता किन्हीं-किन्हीं में होती है। जिनमें होती है वे ही भगवद् भक्ति भी कर सकते हैं। अन्यथा नाम स्मरण की तोता रटंत करने और जप की माला घुमाने भर का कर्मकाण्ड चलता रहता है। वह बेगार किसी प्रकार भुगत तो ली जाती है, पर न उससे एकाग्रता होती है और न भाव संवेदना ऐसी दशा में आनन्द की अनुभूति तो होगी ही कैसे? गहन अन्तराल को जिस सरसता की तड़प होती है वह मिले कैसे?

अपनी ओर से प्रेम उगाकर दूसरों को अनुदान रूप में देना अपने हाथ की बात है। पर दूसरों से वह प्रक्रिया आरम्भ हो और वे उक्त आत्मीयता को वास्तविक रूप से पर्याप्त मात्रा में हमें दे सकें, इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसा सुयोग तो किसी-किसी को कभी-कभी ही मिलता है। फिर उसके संबंध में यह भी नहीं कहा जा सकता कि स्थिति देर तक वैसी ही बनी रहेगी। भावनाओं का क्षेत्र ऐसा है जिसमें जल्दी-जल्दी उथल पुथल भी होती है। जो बच्चा माता की गोद को क्षण भर के लिए नहीं छोड़ना चाहता था, वही तनिक बड़ा होने पर साथियों के साथ लिपटा रहता है। तनिक और बड़ा होने पर पत्नी पर वह प्यार केन्द्रित हो जाता है। नयापन उतरते ही वह संबंध भी काम चलाऊ भर रह जाते हैं। इसके बाद मन न जाने कहाँ-कहाँ भटकता है और अन्त में मृत्यु की शरण में जाकर जीवन अध्याय की इतिश्री होती है। दूसरे व्यक्ति या पदार्थ अन्तर की प्यास को कुछ क्षण के लिए ही सांत्वना दे पाते हैं। किन्तु संगीत की यह विशेषता है कि उसके साथ जितने समय तक तन्मयता सध सके उतनी देर अन्तःकरण की सरसता की अनुभूति होती रहती है। यों यह बाहर से संजोई हुई होने पर प्रवाह रुकने पर समाप्त भी हो जाती है। पर यदि भीतर से गुन–गुनाने की कला हाथ लग जाय तो अपना अद्भुत संगीत इच्छित समय तक साथ देता रह सकता है, और उल्लास की अनुभूति करता रह सकता है। संगीत चाहे बाहर से उपलब्ध हो रहा हो या भीतर से निकल रहा हो, दोनों ही स्थितियों में अन्तरंग को लहराता है और उसे तरंगित ही नहीं वरन् दिशा विशेष में प्रेरित, प्रोत्साहित भी करता है। इन विशेषताओं को देखते हुए जिन्हें भाव संस्थान में उमंगें उठाने का आनन्द लेना है उन्हें संगीत के साथ संबंध जोड़ना पड़ता है।

देव प्रतिमाओं में वाहन और आयुध ही निर्धारित नहीं होते उनके साथ कोई वाद्य यंत्र और जुड़ा होता है। इससे प्रकट है कि देव सत्ताओं की विशेषताओं की एक महत्वपूर्ण इकाई संगीत है। शिव का डमरू, कृष्ण की बंशी, सरस्वती की वीणा की अवधारणा सर्वविदित है। अन्यान्य देवी देवता भी इस सरसता का सान्निध्य बनाये रहते हैं। उनकी पूजा अर्चा से शंख, घड़ियाल जैसे पुरातन काल के वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता ही है। धर्मोत्सवों में ढोल–दमाव, मृदंग, दुँदुभि आदि का सरंजाम जुटाया जाता है। ऋषियों की शास्त्र संरचना में अधिकतर पद्यों का ही प्रयोग हुआ है। यहाँ तक की आयुर्वेद, ज्योतिष जैसे विषयों को भी छन्दबद्ध किया गया है। कथानकों, नाटकों की संरचना भी पद्य शैली में हुई। गद्य का उपयोग तो यत्र-तत्र ही हुआ है। गीत, संगीत, चिर प्राचीनकाल से जीवन की महती आवश्यकताओं में से एक माना जाता रहा है। स्त्रोत्र पाठ में ललित छन्दों की ही भरमार है।

आज के संदर्भ में मनुष्य का शरीर वासनाओं से और मन तृष्णाओं से इतना अधिक भर गया है कि भावना क्षेत्र की उपयोगिता, आवश्यकता और गरिमा समझने तक का अवसर नहीं मिलता। इस क्षेत्र को खोजने, शोधने और विकसित करने की आवश्यकता समझी जाय तो इसका प्रारम्भिक उपचार संगीत संपर्क के रूप में हस्तगत करना होगा। जो गायन, वादन में रुचि ले सके उसका अभ्यास कर सके, उन्हें उसके लिए समय निकालना और प्रयत्न करना चाहिए। जो वैसा न कर सकें उन्हें भाव भरे गीतों को गुनगुनाते रहने की आदत डालनी चाहिए। यह प्रयोजन किसी हद तक दूसरों के उत्पादन से लाभ उठाते हुए भी किसी सीमा तक पूरा किया जा सकता है। इसके लिए गीत-गोष्ठियाँ कारगर हो सकती है। आवश्यक नहीं है स्वयं ही गीत रचे ही जायँ। दूसरों की रचनाएँ गाई सुनी और गुनगुनाई जा सकती हैं। इन दिनों तो यह कार्य टेपरिकार्डर, और रिकार्ड प्लेयर भी किसी हर तक पूरा कर देते हैं। संगीत सम्मेलन भी जहाँ-तहाँ जब तक होते रहते हैं। उनमें सम्मिलित हुआ भी जा सकता है। आरम्भ से ही यह आवश्यक विषय हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में संव्याप्त रहे और तरंगित होकर भाव क्षेत्र में प्रवेश पाने का द्वार खुले।

सन्त काल में इस संदर्भ में गहरे तत्व चिन्तन के उपरान्त संकीर्तन की शैली अपनाई गई। अधिकाँश सन्तों ने अपनी भजन मण्डलियाँ गठित की। भक्ति संकीर्तन की पद्धति निर्धारित की। उनका विषय मात्र भक्ति ही नहीं वरन् ज्ञान और कर्म की उत्कृष्टता का समावेश रखना भी था। मीरा, सूर, कबीर, रैदास, नामदेव, तुकाराम, चैतन्य आदि की धर्म प्रचार शैली में संकीर्तन प्रक्रिया को प्रमुखता दी गई थी। उनकी प्रव्रज्या तीर्थ यात्रा कार्य पद्धति में संगीत मण्डली का माहौल भी साथ चलता था। जहाँ भी वह पहुँचते थे अपने उस कार्यक्रम में जनसाधारण को भी सम्मिलित करते थे। इस पद्धति का प्रभाव सामान्य का, उपदेशों की अपेक्षा अनेक गुना हो जाता था। जिन तथ्यों का साधारण भाषण प्रवचनों से हृदयंगम नहीं हो पाता उतना संकीर्तन के साथ भक्ति भावना के साथ-साथ आत्मिक गरिमा को निखारने, उभारने का असाधारण अवसर मिलता है। गरम लोह धातु को पिघलाकर उसे इच्छित दिशा में मोड़ा मरोड़ा और ढाला जा सकता है। संकीर्तन

सन्त काल में इस संदर्भ में गहरे तत्व चिन्तन के उपरान्त संकीर्तन की शैली अपनाई गई। अधिकाँश सन्तों ने अपनी भजन मण्डलियाँ गठित की। भक्ति संकीर्तन की पद्धति निर्धारित की। उनका विषय मात्र भक्ति ही नहीं वरन् ज्ञान और कर्म की उत्कृष्टता का समावेश रखना भी था। मीरा, सूर, कबीर, रैदास, नामदेव, तुकाराम, चैतन्य आदि की धर्म प्रचार शैली में संकीर्तन प्रक्रिया को प्रमुखता दी गई थी। उनकी प्रव्रज्या तीर्थ यात्रा कार्य पद्धति में संगीत मण्डली का माहौल भी साथ चलता था। जहाँ भी वह पहुँचते थे अपने उस कार्यक्रम में जनसाधारण को भी सम्मिलित करते थे। इस पद्धति का प्रभाव सामान्य का, उपदेशों की अपेक्षा अनेक गुना हो जाता था। जिन तथ्यों का साधारण भाषण प्रवचनों से हृदयंगम नहीं हो पाता उतना संकीर्तन के साथ भक्ति भावना के साथ-साथ आत्मिक गरिमा को निखारने, उभारने का असाधारण अवसर मिलता है। गरम लोह धातु को पिघलाकर उसे इच्छित दिशा में मोड़ा मरोड़ा और ढाला जा सकता है। संकीर्तन


Quotation

तीसरे विश्वयुद्ध के बारे में पूछे जाने पर दार्शनिक-वैज्ञानिक आइंस्टीन का कथन था कि आणविक शक्ति संबंधी युद्धोन्माद को देखते हुए यह तो नहीं कहा जा सकता कि यह कैसे लड़ा जाएगा पर इसके बाद यदि कोई युद्ध हुआ तो वह आदिम मानवों के बीच ईंटों और पत्थरों से लड़ा जाने वाला युद्ध होगा।


वनौषधियाँ चमत्कार क्यों नहीं दिखातीं?

अन्य जीवधारियों की तरह वनस्पतियाँ भी सजीव होती हैं। अन्तर इतना ही है कि वे चलने फिरने वाले प्राणियों की तरह विचार व्यवहार करने में इन्द्रियों का विकास न होने से समर्थ नहीं हो पाती। फिर भी उनके कलेवर में उच्च स्तरीय संरचना का प्रमाण परिचय मिलता है, यदि ऐसा न होता तो उन्हें खाकर प्रायः सभी जीवधारी अपने लिए पोषण किस प्रकार प्राप्त करते? शरीरधारी अपनी जीवनी शक्ति वनस्पतियों से ही प्राप्त करते हैं। यहाँ तक कि माँसाहारी प्राणी भी उन्हीं का माँस खाते हैं जो शाकाहार पर निर्भर रहते हैं। वनस्पतियों से पेट भरते हैं।

सामान्य आहार में घास स्तर की वनस्पतियाँ काम आती हैं। पेड़ों के पत्ते भी काम दे जाते हैं। किन्तु विशिष्ट गुण दोषों से सम्पन्न वनस्पतियों की संरचना इस प्रकार हुई है कि उनकी गंध तथा स्वाद प्राणियों के खाने के काम न आ सकें। वे बची रहें और उस प्रयोजन की पूर्ति करें जिसके लिए प्रकृति ने उन्हें विनिर्मित किया है। हानिकारक विषाक्त पौधे भी प्राणियों के काम नहीं आते। वे सड़-गल कर खाद बन जाते हैं। किन्तु मनुष्य अपनी बुद्धिमत्ता एवं शोध प्रक्रिया के सहारे उनका सदुपयोग कर लेता है। आधि-व्याधि निवारण एवं शक्ति संवर्धन के लिए विभिन्न उपाय उपचारों के सहारे प्रयोग कर लेता है। इसी समुदाय को वनस्पति वर्ग, वनौषधि के नाम से जाना जाता है और विभिन्न प्रयोजनों के लिए उनका उपयोग किया जाता है।

व्याधि निवारण की बात सामान्य चिकित्सकों को भी विदित है। वे जड़ी बूटियों के सहारे विभिन्न रोगों का इलाज भी करते हैं। उनमें से जो पौष्टिक हैं उनका प्रयोग बलवर्धन के लिए किया जाता है। इस प्रकार उनके शामक और संवर्धक गुणों का उपयोग विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रकार से होता रहता है। यदि सही वस्तु का सही रीति से उपयोग किया जाय तो उसका उत्साहवर्धक प्रतिफल उपलब्ध होना भी सुनिश्चित है।

किन्तु इस संबंध में भारी घपला यह चल पड़ा है कि न तो सही वनस्पतियाँ मिलती हैं और न उसका उपयोग सही प्रकार बन पड़ता है। सही वस्तु होने से तात्पर्य यह है कि जिन औषधियों का उपयोग किया जाता है उनमें वे गुण होने चाहिए जो देखे समझे और माने गये हैं। भूमि और जलवायु का, क्षेत्र का, वीर्य कालावधि का अपना प्रभाव होता हैं। वहाँ की अन्य वस्तुओं की तरह वनस्पतियाँ भी प्रभावित होती हैं। नागपुरी संतरे, भुसावली केले, लखनवी आम प्रसिद्ध हैं। उन्हें अन्यत्र उगाया जाय तो वह स्वाद एवं गुण न मिलेगा। वनस्पतियों के भी अपने क्षेत्र हैं। चंदन अपने सीमित क्षेत्र में ही अभीष्ट सुगंध देता है। उसे अन्यत्र बोया उगाया तो जा सकता है, पर मलयागिरी जैसी सुगंध होने की आशा नहीं की जा सकती। गंगा के उद्गम से एक सीमित दूरी तक ब्राह्मी अपने असली रूप में मिलती है। उसमें वर्णित सारे गुण भी पाये जाते हैं। पर जैसे-जैसे दूरी बढ़ती है। वैसे-वैसे उसकी आकृति और प्रकृति में अन्तर होता जाता है। नहरों के किनारे पहुँचते-पहुँचते वह मण्डूकपर्णी बन जाती है। इस अन्तर को न समझने वाले प्रायः सुगमता पूर्वक मिलने वाली मण्डूकपर्णी का ही ब्राह्मी के स्थान पर प्रयोग करते हैं। संरचना में घटियापन रहने से उसका वह प्रभाव नहीं होता जो होना चाहिए।

एक-सी मिलती जुलती सकल सूरत की अनेक वनस्पतियाँ होती हैं। जंगलों से खोद कर लाने वाले मजूर भी उस अन्तर को नहीं समझते, फिर खरीदने वाले पंसारी तो सूखने मुरझाने पर उनकी वास्तविकता, अवास्तविकता को पहचान ही क्या पायेंगे? फिर सब को कम परिश्रम में अधिक लाभ कमाने की धुन चढ़ी रहती है। असली वस्तुएँ कम मिलती हैं। कूड़ा कचरा मिली नकली अधिक। असली रत्न कम मिलते हैं। काँच के नगीने अधिक। इसी प्रकार उपयुक्त वनस्पतियाँ यत्र–तत्र ही पाई जाती हैं। संजीवनी बूटी लाने के लिए हनुमान को हिमालय जाना पड़ा था। वह लंका के इर्द-गिर्द नहीं उगती थी। यदि कोई जहाँ-तहाँ से हर बूटी को खोजने का प्रयत्न करेगा, क्षेत्र की विशेषता न समझेगा और असली नकली के बीच रहने वाले सूक्ष्म भेद की जानकारी न रखेगा तो बात बढ़ते-बढ़ते वहाँ पहुँचेगी कि असली से मिलती जुलती शक्ल की दूसरी वनस्पति बटोर ली जायगी। उसी को असली के स्थान पर दिया जाने लगेगा। इससे खोदने वालों और बेचने वालों को तो लाभ मिलेगा पर उन प्रयोक्ताओं का हित साधन न हो सकेगा जो अभीष्ट काम की आशा लगाये बैठे हैं।

पंसारियों की दुकानों पर ऐसी ही नकली, मिलावटी वस्तुओं की भरमार रहती है। उनसे लेकर चूर्ण गोली अवलेह, अर्क आदि बनाने वाले औषधि निर्माता भी बारीकी से जाँच पड़ताल करने के झंझट में नहीं पड़ते। पर्चा लिखकर पंसारी की दुकान से वस्तुएँ मँगा लेते हैं, उन्हीं का कूट छानकर इच्छित औषधि बना लेते हैं। इसी को रोगी को सेवन कराते हैं। गुणविहीन होने के कारण वे वैसा लाभ नहीं दे सकतीं जैसा कि देना चाहिए।

इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि वनौषधियाँ परिपक्व स्थिति में ही समग्र गुणों से अभिपूरित होती हैं। उन्हें यदि कच्ची स्थिति में उखाड़ लिया जाय या सूख जाने के उपरान्त बहुत समय बाद लिया जाय तो या तो उनमें अभीष्ट रसायन भरे ही न होंगे या सूख जाने पर धूप या हवा से निःस्वत्व हो गये होंगे। परिपक्व स्थिति में भी उन्हें सुरक्षित रखने की एक सीमित अवधि है। यह आमतौर से छः महीने तक की मानी गई है। एक वर्षा ऋतु उतर जाने के बाद तो वे अपनी स्वतः सारी विशेषताएँ खो बैठती हैं। किन्तु देखा गया है कि पंसारियों के गोदामों में वे दसियों वर्ष पुरानी भरी रहती हैं और जब तक बिक नहीं जाती, रखी ही रहती है।

इस संबंध में ऐलोपैथी वाले अधिक जागरूक और ईमानदार हैं कि संश्लेषित एवं प्राकृतिक सभी औषधियों पर उनके गुण समाप्त हो जाने की तिथि छाप देते हैं। समय बीतने के बाद उन्हें फेंक दिया जाता है। उपयोग में नहीं लाया जाता है। पर अपने यहाँ तो काष्ठ औषधियाँ चिरकाल तक काम देती रहती हैं। इस संदर्भ में बटोरने वाले, खरीदने वाले, फार्मेसी वाले, विक्रेता, चिकित्सक सभी प्रमाद बरतते हैं। अन्त में स्थिति यहाँ तक पहुँच जाती है कि गुणों की दृष्टि से वे लकड़ी का बुरादा मात्र रह जाती हैं। उनसे आशाजनक परिणाम मिलने की अपेक्षा कैसे की जाय? दोष होता है मध्यवर्ती लोगों का, बदनाम होती है समूची पद्धति। ऐसी दशा में यदि न पर से विश्वास उठता है-अप्रामाणिक समझा जाता है तो उसमें आश्चर्य की बात भी क्या है?

वनौषधियों के सेवन का सही तरीका यह है कि उन्हें हर स्थिति में ही कल्क रूप में चटनी या ठंडाई के रूप में सेवन किया जाय। सुखाये जाने पर क्वाथ बड़ा कर लिया जाय। पर यदि हर मौसम में उनके न मिलने की कठिनाई को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित रखना हो तो यह सावधानी रखनी चाहिए कि उन्हें छाया में सुखाया जाय। कड़ी धूप और तेज हवा के कारण उनके गुणों को घटा देने का खतरा न उठाया जाय। जहाँ तक पीसने की आवश्यकता का संबंध है वहाँ यह ध्यान रखा जाय कि अधिक से अधिक बारीक पीस कर उनके कणों को सूक्ष्म किया जाय, जिनमें स्वरस की अथवा अन्य वनस्पतियों की भावना देने का उल्लेख है उन्हें उस प्रक्रिया को पूरी करते हुए निर्धारित समय तक लगातार घुटाई की जाय इससे उनकी सूक्ष्म शक्ति उभरती है। होम्योपैथी दवाओं के निर्माता, डीशेन पद्धति वाले इस तथ्य पर पूरा ध्यान देते हैं। इसलिए उनकी दवायें द्रव्य की दृष्टि से स्वल्प मात्रा में होते हुए भी गुणों की दृष्टि से बढ़ी चढ़ी होती है।

यदि वनौषधियों की क्षमता को जीवित रखना है, आयुर्वेद की प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण बनाये रहना है तो आवश्यक है कि उसमें प्रयुक्त होने वाली जड़ी बूटियों की प्रामाणिकता पर आँच न आने दी जाय। भले ही इसमें अधिक समय श्रम लगाना पड़े या अधिक खर्च करना पड़े। शुद्ध और गुणकारी वस्तुएँ कुछ महंगी लेने में भी लोगों को आपत्ति नहीं हो सकती, पर गुणहीन वस्तु तो सस्ती होने पर भी भ्रामक एवं महँगी पड़ती है। इतना ही नहीं गुणहीन निर्माण के प्रति सेवनकर्ताओं के मन में अश्रद्धा, असंतोष उत्पन्न करती हैं और विधा विज्ञापित होकर दूसरों के लिए ही उपेक्षा की पृष्ठभूमि बनाती हैं। जब तक इस प्रचलित अन्धेर में जड़ मूल से सुधार न किया जाय तब तक आयुर्वेद को वह श्रेय न मिल सकेगा, जिसका वह अधिकारी है।

इस हेतु आयुर्वेद प्रेमियों को विशेषतया औषधियों के निर्माता, विक्रेताओं को यह प्रबंध करना चाहिए कि नकली या सड़ी गली वस्तुओं का प्रयोग न किया जाय। इसके लिए अपना दोष दूसरों पर टालते रहने की अपेक्षा यही उचित है कि दावेदारों को समूची प्रक्रिया अपने संरक्षण में चलाने का दायित्व उठाया जाय।

इस निमित्त अन्न, शाक आदि के उत्पादन की तरह वनौषधि फार्म बनाये जायँ और उनमें प्रामाणिक वस्तुएँ उगाई जायँ। उन्हें सुरक्षित रहने के लिये कोल्ड स्टोरेज का उपयोग किया जाय। यदि किसी स्थिति में रखा जाना है तो फिर उनकी निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने पर फेंक देने में भी लोभ को आड़े न आने दिया जाय। कितनी ही औषधियाँ ऐसी हैं जो विशेष भूमि या जलवायु में ही उत्पन्न होती हैं। उनका उत्पादन उसी क्षेत्र में किया या कराया जाय। बटोरने वाले यह ध्यान रखें की उनकी जड़ें नष्ट न करें। पकने पर उनके बीज धरती पर बिखरने दें ताकि उनकी उत्पत्ति का सिलसिला आगे भी चलता रहे। अन्यथा एक बार में ही उनका पूरी तरह सफाया कर देने से अगले वर्ष उगने की सम्भावना न रहेगी। सच तो यह है कि उत्पादन चाहे खेतों में हो या जंगलों में, उनके लिए खाद पानी की, रखवाली की समुचित व्यवस्था की जाय उनके लिए वैसी ही तत्परता बरती जाय जैसी कि किसान अपने खेत के लिए या माली अपने बगीचे के लिए बरतते हैं।

यह कार्य बड़े पैमाने पर किये जाने की आवश्यकता है। ताकि देश भर की समस्त विश्व की वनौषधियों की आवश्यकता पूरी हो सके। इस संदर्भ में यह निश्चित है कि इस प्रयोजन के लिए भारत भूमि की अपनी विशेषता है। जैसी दिव्य गुणों वाली वनौषधियाँ यहाँ उगती हैं, वैसी धरातल पर अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं होती।

यह प्रक्रिया ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान शान्ति कुँज हरिद्वार से शुभारम्भ के रूप में आरम्भ हुई। प्रमुख और महत्वपूर्ण वनौषधियाँ यहाँ उगाई जाती हैं या संग्रहित की जाती हैं। उनके प्रयोग का परिणाम भी ऐसा उत्साहवर्धक हो रहा है कि वनौषधियों के प्रति लोक श्रद्धा को पुनर्जीवन मिल सके।


वन विहार में रास्ता (Kahani)

वन विहार में रास्ता भटक कर राजा एक वनवासी की झोपड़ी में जा पहुँचा। अनजान के साथ ऐसे सद्व्यवहार की आशा न थी, सो उसे बहुत प्रसन्नता हुई।

सवेरे जब चलने लगा तो राजा ने अपना परिचय दिया और समीपवर्ती चन्दन उद्यान उसे उपहार में दिया।

वनवासी, उद्यान में पहुँचा। चन्दन का महत्व समझता न था। सोचने लगा शहर तक इतनी लकड़ी ढोना पहुँचना कठिन है। सो कोयला बनाकर बेचने में अच्छा रहेगा।

एक-एक पेड़ काटना, जलाना और कोयला बाजार में ले जाकर बेचना। यही उसका दैनिक क्रम बन गया। गुजर पहले से अच्छा होने लगा।

वर्षा हुई। कोयला बन नहीं सका। निदान लकड़ी चीर कर शहर ले गया।

सुगंधि से सारी मण्डी महकने लगी। दुकानदारों में खरीदने की प्रतिस्पर्धा लग गई। कोयले की तुलना में दस गुने दाम मिले।

वनवासी ने खरीददारों से पूछा-इस लकड़ी में क्या खास बात है? दूसरे इतने दाम कैसे? बताया गया-यह चन्दन है। यह बहुत महंगा बिकता है।

वनवासी सिर पीटने लगा। इतनी सम्पदा उसने कोयला बनाकर क्यों बेची?

उस अनजान के दुर्भाग्य पर तरस खाने वाले एक विचारवान ने साथियों से कहा-”हम लोग भी तो जीवन सम्पदा को पशु प्रवृत्तियों में कोयला बनाकर ही तो बेचने हैं।”


हँसे तो दिल खोलकर

पेरिस के एक सभा भवन में प्रति रविवार को 10 बजे एक गोष्ठी आयोजित होती हैं। जिसमें वहाँ के वैज्ञानिक हँसी पर भाषण देते हैं। अन्त में सभी कक्षों में अंधकार हो जाता है और लोगों के कह-कहे गूँजने लगते हैं। मन के सुखद भावों को बाहर लाने के लिए हँसी सर्वोत्तम उपाय हैं। जो स्वयं को ही प्रसन्न नहीं करती, वरन् आस−पास के लोगों और मित्रों को भी प्रफुल्लित कर देती है। हास्य शरीर की स्वाभाविक तथा आवश्यक क्रिया है जो दैनन्दिन जीवन में आने वाले व्याघातों का कुप्रभाव नष्ट करती है।

जब किसी के व्यवहार से दुःख पहुँचता है कोई नैराश्य पूर्ण स्थिति आ जाती है और संयोग वश उसी समय हँसी आ जाय तो सारा क्रोध और चिन्ता दूर होकर मन झूम उठता है। यह प्रत्यक्ष अनुभूत किया जा सकता है। मुस्कान और हँसी के द्वारा अंतर्जगत में एक ऐसा स्निग्ध वातावरण बनता है जो अंदर ही अंदर से हृदय को शीतलता प्रदान करता है।

इस शुभ प्रभाव का कारण हँसी की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है। व्यथा, क्रोध, चिड़चिड़ापन थके हुए मन में ही ज्यादा उत्पन्न होते हैं, जबकि हास्य मन के सारे तनावों और ग्रंथियों को दूर कर देता है, खोल देता है। एक फ्रांसीसी मनोविज्ञ रोग चिकित्सक डॉ. पौस्किड ने लम्बे समय तक इस विषय में अन्वेषण किया है। लगभग 150 प्रयोगों के द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हँसने से मनुष्य के मन और मज्जातंतुओं को स्फूर्ति और सजीवता प्राप्त होती है तथा थकान और चिन्ता का भार कम हो जाता है। हँसी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक व्यायाम है जो मन को ही नहीं, शरीर के अवयवों तथा माँसपेशियों को भी अनावश्यक दबाव से मुक्त कर देता है।

हँसी के बारे में सर्व सम्मत सिद्धान्त है कि इससे खून बढ़ता है। यह केवल कल्पना मात्र ही नहीं है। अमेरिका के डॉक्टरों ने इस सिद्धान्त की सच्चाई को परखने के लिये बालकों के दो समूह लिए और दोनों को अलग-अलग रखा। एक समूह को देख करके भोजन के बाद एक मसखरा तरह-तरह से हँसाता रहता दूसरे समूह के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी। एक मास बाद दोनों समूह के बच्चों का परीक्षण किया गया तो पता चला कि हँसने वाले बच्चों का स्वास्थ्य पहले की अपेक्षा और अच्छा हो गया है। वे पढ़ने लिखने में भी तेज हो गये हैं।

परन्तु यह सब होता तब है जब दिल खोलकर हँसा जाय। बहुत से अवसरों पर हम औपचारिक रूप से ही हँस पाते हैं। अपने साथी मित्रों का मन रखने के लिए अथवा आसपास के लोगों का साथ देने के लिए। ऐसी डेढ़ इंच मुस्कान या हँसी का कोई परिणाम नहीं होता।

मुस्कान भी हँसी का ही एक स्वरूप है। यह सदा बनी रहने वाली स्थिति है। चौबीसों घंटे खिलखिलाते रहना असंभव हो सकता है परन्तु सदा मुस्कराते रहना ज्यादा कठिन नहीं है। दर्पण में खिला हुआ मुख कमल देखकर मन आह्लादित हो उठता है। मुस्कराते हुए व्यक्तियों के समीप क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिहिंसा फटकती तक नहीं। प्रतिहिंसा की अग्नि को शान्त करने वाली यह अचूक औषधि है। कभी-कभी घर में पति-पत्नी के बीच कलह होता है, या कोई मित्र रूठ जाता है तो मुस्कराने का नुस्खा आजमाकर इस स्थिति को आसानी से सम्हाला जा सकता है। मन पर जमा हुआ सारा मैल, मुस्कान के जल-प्रवाह में बह जाता है।

मनोवैज्ञानिकों का मत है कि मुस्कान के द्वारा आँतरिक मन को एक स्वस्थ संकेत मिलता है, विद्युत प्रवाह बढ़ता है। इसका दूसरा लाभ यह है कि हमारा मन मधुर कल्पनाओं, सद्भावनाओं तथा पवित्र विचारों से ओत-प्रोत है। मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव शरीर, आयु और आरोग्य पर निसंदेह पड़ता है। इसी तथ्य की ओर इंगित करते हुए श्रीमती एलिजाबेथ सैंफोर्ड ने लिखा है कि “सौ वर्ष जीने के लिए चारों ओर से जवान और हँसमुख मित्रों से घिरे रहो।”


पर्व त्यौहारों की उद्देश्यपूर्ण परम्परा

पर्व और त्यौहारों की जितनी भरमार हिन्दू धर्म में है उतनी और कहीं किसी में नहीं। कारण यह है कि यह अनेकान्त समुच्चय है। अनेक संस्कृतियों और परम्पराओं का इसमें समन्वय हुआ है। कभी भारतीय संस्कृति विश्वव्यापी थी। यहाँ के देव मानव संसार भर को अपना परिवार मानते थे और सुदूर क्षेत्रों में जाकर भी सर्वतोमुखी अभ्युदय के निमित्त अनवरत प्रयत्न करते थे। इसके लिए उन्हें परिव्राजकों की तरह भ्रमणशील रहना पड़ता था।

बिखराव को एकात्मता में बाँधने के लिए उन्होंने एक क्षेत्र की महान घटनाओं, महान परम्पराओं को दूसरे क्षेत्रों में अवगत-प्रचलित कराने के लिए प्रयत्न किये, जिससे सीमित संकीर्णता की परिधि टूटे और व्यापकता का भाव बढ़े। यही कारण है कि चित्र-विचित्र देवी-देवताओं और प्रथा प्रचलनों का संग्रहालय भारतीय धर्म बन गया। पर्व त्यौहारों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। उनमें विभिन्न क्षेत्रों और जातियों की मान्यताओं का समावेश देखा जा सकता है।

वर्ष में 360 या 365 दिन होते हैं, पर अपने हिन्दू समाज में पर्व त्यौहारों की संख्या 450 के करीब है। इन सभी को मनाना उन्हीं के लिए सम्भव है जिन्हें रोटी कमाने की चिन्ता या और किसी प्रकार की जिम्मेदारी न हो। जो हर रोज एक दो पर्व मनाया करें ऐसा व्यक्ति कोई अतिशय भावुक एवं कुबेर भण्डारी जैसा धनाध्यक्ष ही हो सकता है। साधारण व्यक्ति के लिए इन सबको अपनाना मनाना सम्भव नहीं हो सकता।

अन्य प्रमुख धर्मों में थोड़े-थोड़े ही पर्व होते हैं। जो होते हैं उनके पीछे कोई प्रेरणा, परम्परा, शिक्षा या उमंग होती है। इसीलिए उन्हें मनाया भी भावनापूर्वक जाता है। उनका स्मरण भी रखा जाता है कि उनके साथ जुड़े हुए संदेशों को भी हृदयंगम किया कराया जाता है। यह सब तभी बन पड़ता है जब उनकी संख्या सीमित हो और मनाये जाने के पीछे कोई भाव भरा उद्देश्य हो।

अपने त्यौहारों में देवताओं की छुट-पुट पूजा-पत्री एवं खान-पान में पकवान मिष्ठानों का समावेश इतना भर ही प्रचलन है। जब तब जहाँ-तहाँ मेले ठेले भी होते हैं और नदी सरोवरों के स्थान देवालयों के दर्शन भी सम्मिलित रहते हैं। आशा की जाती है कि इससे अमुक देवता प्रसन्न होंगे। रक्षा करेंगे, संकट टालेंगे और मनोकामना पूर्ति में सहायता देंगे। एक कारण पूर्व परम्पराओं का निर्वाह भी है चूँकि पूर्वज वैसा करते आये हैं इसलिए वंशजों को भी वह लकीरें पीटनी चाहिए। ऐसे ही कुछ कारण मस्तिष्क में रहते हैं। विभिन्न जाति-वंश भी कुछ पर्वों के लिए अपने लिए विशेष रूप से निर्धारण मानते हैं। अन्य लोगों के न करने पर भी अपनी कुल परम्परा निबाहते हैं।

उपेक्षापूर्वक उदास मन से किसी प्रकार चिन्ह पूजा कर लेने से समय का अपव्यय ही होता है। साथ ही श्रम तथा पैसे की हानि भी। इस प्रकार कुछ टंट-घंट कर लेने को न अपना मन करता है, न किसी अन्य के मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है। अन्धविश्वास की मनःस्थिति में किसी प्रकार कुछ कर लेने से किस प्रकार किसी का कुछ भला हो सकता है। इस स्थिति के कारण, पर्व उपहास का कारण ही बनते हैं।

प्राचीन काल में प्रत्येक पर्व त्यौहार के पीछे कुछ प्रेरणाओं का समावेश था। जुड़े हुए आदर्शों के प्रति आन्तरिक उत्साह उभारा जाता था इसके लिए सामूहिक आयोजन होते थे। मिल-जुलकर एक स्थान पर एक उद्देश्य के लिए एकत्रित हुआ जाय और एक पद्धति का क्रिया-कृत्य सम्पन्न किया जाय तो उससे परम्परा मैत्री भी बढ़ती है और सहकृत्य से उत्साह भी बढ़ता है। पर वह होना इतने अन्तर से चाहिए कि बीच के दिनों में नवीनता के लिए उमंग उठने लगे। आये दिन का ढकोसला तो द्वंद्व उत्पन्न करता है।

प्रचलित पर्वों में कुछेक ही महत्वपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण हैं। उनको अलग से छाँट लिया जाय। व्यस्तता और महँगाई के दिनों में उतना ही अपनाया जाना चाहिए जो आवश्यक हो। इस कटौती किफायतशारी के समय में संतानोत्पादन तक में रोकथाम की जा रही है और खर्चीले उत्पादन में कटौती करने की सलाह दी जा रही है। ऐसी दशा में यदि पर्वों में से आवश्यक अनावश्यक की काट-छाँट की जाय तो वह उचित ही होगा। जिन्हें मनाया जाय उनके संबंध में यह विचारा जाय कि इन्हें किस पद्धति के साथ मनाया जाय और सन्निहित प्रेरणा को किस प्रकार उभारा जाय।

राष्ट्रीय पर्वों में 15 अगस्त, 26 जनवरी, तिलक जयन्ती, गाँधी जयन्ती आदि का महत्व माना जाता है। सम्प्रदायों के जन्मदाताओं की जयंती भी कुछ अर्थ रखती है। सामाजिक पर्वों में होली दिवाली, दशहरा, श्रावणी आदि का महत्व है। अध्यात्म पर्वों में बसन्त पंचमी, गीता जयन्ती, गुरु पूर्णिमा श्रावणी की महिमा है। पारिवारिक त्यौहारों में भाई दौज दाम्पत्य चतुर्थी, श्राद्ध अमावस्या, शरद पूर्णिमा आदि के अपने-अपने इतिहास और संदेश है। जिनकी रुचि प्रकृति परम्परा जिनके लिए उत्साह उत्पन्न करती है वे उन्हें मना सकते हैं। पर इतना आवश्यक है कि जो भी किया जाय, मिलजुल कर किया जाय। मात्र पकवानें बनाने का, पूजा पत्री की चिन्ह पूजा करके बात को समाप्त न किया जाय। सामूहिक आयोजन हर्षोत्सवों के रूप में सामूहिक रूप से मनाये जा सकते हैं। इतना न बन पड़े तो परिवार पड़ौसी के सदस्यों को एकत्रित करके छोटे सहभोज और उस दिन के साथ जुड़े संदेश का स्मरण किया जाय। इससे सद्भाव बढ़ता है और मनोमालिन्य के जमा हुए कचरे को बुहारने का अवसर मिलता है।

जन्मदिन, विवाहदिन, दीक्षादिन आदि मानवी गरिमा का स्मरण दिलाने वाले दिनों को छोटे बड़े जैसे भी तौर तरीके से उन्हें मनाया जाय इतना अवश्य स्मरण किया जाय कि इनके साथ ही क्या दायित्व कंधे पर लदे हैं, उनकी पूर्ति के लिए जो आवश्यक था वह किया गया है क्या? यदि बन पड़ा है तो कितना? कमी रही है तो कितनी? इस समीक्षा के साथ यह भी होना चाहिए कि भविष्य में उन दायित्वों को अधिक तत्परतापूर्वक निभाया जाय।

भारतीय धर्म में जयन्तियों की भरमार है। महामानवों-देवजनों के जन्मोत्सव ही मनाये जाते हैं। समझा जाता है कि आत्मा अमर है। साथ ही उन दिव्यात्मा का यश शरीर भी विद्यमान है। उनकी गौरव गरिमा का अनुकरण तथा अभिनन्दन सदा होता रहेगा। आदर्शवादी व्यक्तित्वों का शरीर न रहने पर भी उनकी मृत्यु नहीं होती। अतएव उनका मरण दिन नहीं स्मरण रखा जाता है और न उस दिन किसी प्रकार का आयोजन होता है।

पारिवारिक संबंधियों के श्राद्ध होते हैं, इसका तात्पर्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है। इसमें एक उद्देश्य उनके ऋणों से उऋण होना भी है। जो चले गये उन्हें अब न तो ढूँढ़ा जा सकता है और न कृतज्ञता अथवा श्रद्धांजलि स्वीकार करने के लिए वापस बुलाया जा सकता है। संभव श्राद्ध यही हो सकता है कि जिन सत्प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर वे हमारी सेवा सहायता करते रहे उनको शाश्वत मानकर अधिकाधिक बढ़ाने के लिए जो सम्भव हो प्रयत्न करते रहा जाय। बड़ों का वात्सल्य, समवर्ग की मैत्री छोटों की आत्मीयता भरी भाव श्रद्धा यह सभी उस सदाशयता के प्रतीक हैं, जिनसे प्रेरित, प्रभावित होकर व्यक्ति कौटुम्बिकता के स्नेह सौजन्य में बँधता है। यदि सत्प्रवृत्तियां कुछ जीवित कर्म दिवंगत व्यक्तियों के साथ पारस्परिक संबंध बनाकर ही समाप्त न हो जाँय वरन् उनका व्यापक विस्तार जन-जन में हो इसी को चेष्टा होती रहनी चाहिए। श्राद्ध यही हो सकता है कि सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में अपना योगदान सम्मिलित किया जाय। जो अपनी उपयोगिता गँवा बैठे उन पर्वों में कटौती की जानी चाहिए। और जिनकी उपयोगिता प्रेरणा अभी भी यथावत् बनी हुई है उन्हें अपेक्षाकृत और अच्छी तरह मनाया जाय। कुछ लोग कुछ पर्व किसी प्रकार मना लें इसकी अपेक्षा अच्छा है कि उन्हें सार्वजनिक उत्कर्ष का प्रेरणाप्रद माध्यम बनाया जाय। पर्वों की मानवी गरिमा का संदेहवाहक बनकर नये सिरे से निखारना चाहिए।


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सफलता का रहस्य है-लक्ष्य को सोच विचार कर निर्धारित करना फिर उस पर संकल्प और साहस के साथ चल पड़ना।


ज्ञान और विज्ञान के शक्ति स्रोत- गायत्री और यज्ञ

भारत भूमि की प्रसुप्त अन्तरात्मा को जगाने के लिये ज्ञान और विज्ञान की प्रतिष्ठापना करना सर्वप्रथम कार्य है। ज्ञान और विज्ञान इन दोनों के बल पर ही काई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। जब इन दोनों में से एक की भी कमी हो जाती है तो अधःपतन आरम्भ हो जाता है। ज्ञान का अर्थ है-विद्या, बुद्धिमत्ता, विवेक, दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता, न्यायप्रियता। विज्ञान का अर्थ है-बल, योग्यता, साधन, शक्ति, सम्पन्नता, शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य। आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है तभी उसे वास्तविक विकास माना जाता है। प्राचीन काल में भारत भूमि इन दोनों से ही परिपूर्ण थी। साधारण जनता से लेकर राजपरिवारों तथा ऋषि आश्रमों में ज्ञान और विज्ञान की समुचित प्रतिष्ठा थी। राजकुमार भी ऋषियों के आश्रम में जाकर ज्ञान प्राप्त करते थे और विज्ञान की रहस्यमय नाना कलाओं से विज्ञ बनते थे। दिव्य शस्त्रास्त्रों, दिव्य वाहनों, दिव्य सामर्थ्यों के आश्चर्यजनक वर्णन प्राचीन इतिहास पुराणों में भरे पड़े है। ऋषि लोग आत्म-चिन्तन में, परमार्थ साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि, नवनिद्धि सरीखी लोकोत्तर शक्तियाँ उपलब्ध रहती थी। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है। यह निर्विवाद है।

आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों, अनुभवों तथा विज्ञान मशीनों पर अवलम्बित है। भौतिक जानकारी तथा शक्तियाँ प्राप्त करने के लिये भौतिक उपकरण ही आज के वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं। यह तरीका बहुत खर्चीला, श्रमसाध्य, स्वल्प-फलदायक एवं अचिर अस्थायी है। जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, रिसर्च स्कालरों है। पृथ्वी पर यदि सौ टन पानी भरा माना जाय तो आकाश में करोड़ों टन पानी हर समय अदृश्य रूप से घूमता हुआ माना जायगा। हमारा विचार और संकल्प भी एक पदार्थ है। इस पदार्थ में एक प्रकार की चुम्बक शक्ति उत्पन्न की जा सकती है और उसकी सहायता से अदृश्य जगत में भ्रमण करते रहने वाले किन्हीं विशेष पदार्थों के परमाणुओं को खींचकर अपनी ओर लाया जा सकता है। विज्ञान के इस आधार को पकड़कर ऋषियों ने यह देखा कि जब सृष्टि के सभी पदार्थों के अणु अपने शरीर क्षेत्र तथा मनः क्षेत्र में विद्यमान हैं, तो उनमें से उपयोगी अणुओं को विकसित करके उसी जाति के असंख्य अणुओं को विकसित करके उसी जाति के असंख्य अणुओं को जगत में से खींचकर अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेने का प्रयोजन सिद्ध क्यों न किया जाय? उन्होंने इसी आधार पर विज्ञान की खोज की और अपने शरीर तथा मन में छिपी हुई नाना प्रकार की शक्तियों को विविध साधनाओं द्वारा जागृत किया। फलस्वरूप उनकी पकड़ने की शक्ति इतनी बलवान हो गई कि जिस प्रकार सारस अपनी लम्बी गर्दन पानी में डुबोकर चाहे जहाँ से मछली पकड़ लेता है, उसी प्रकार वे आकाश क्षेत्र में से नाना प्रकार की वस्तुएँ सामर्थ्य तथा शक्तियाँ पकड़ लेते थे।

ज्ञान और विज्ञान की हमारी प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होती थी, क्योंकि यही दोनों अध्यात्म विद्या के माता-पिता हैं। गायत्री ज्ञान रूपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है। गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार पथ प्रदर्शन करने वाली शिक्षायें भरी हुई हैं। इसके अतिरिक्त उन अक्षरों का गुन्थन रहस्यमयी विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है। इन 24 अक्षरों को यदि शास्त्रोक्त उपासना विज्ञान के अनुसार उपयोग किया जाय तो शरीर और मन में भरी हुई अलौकिक शक्तियाँ अपने-अपने ढंग से अपने-अपने समय पर स्वयमेव उद्भूत होती जाती हैं। आध्यात्मिक गुणों में तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है जिसके आधार पर जीवनी समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सके।

यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। वेदमंत्रों की शब्द शक्ति को विशिष्ट कुण्डों, समिधाओं, हवियों, चरुओं के साथ उत्पन्न की हुई विशेष सामर्थ्यवान अग्नि में सम्मिश्रित कर देने से रेडियो सक्रिय शक्तितरंगों का आविर्भाव होता है। यह शक्ति तरंगें रेडार यंत्र की तरह संसार के किसी भी भाग में भेजी जा सकती हैं, किसी व्यक्ति विशेष के शरीर में भरी जा सकती हैं, प्रकृति के गुह्य गह्वर में किसी विशेष प्रयोजन के लिये प्रविष्टि कराई जा सकती है। वर्षा, धान्य, दधि, ओज, आरोग्य, प्राण, जीवन आदि की पृथ्वी पर अभिवृद्धि कराने के लिये उनका उपयोग किया जा सकता है। भावनाओं, विचारधाराओं तथा परिस्थितियों के परिवर्तन के लिये यज्ञ से उत्पन्न शक्तियों का उपयोग हो सकता है। भावनाओं, विचारधाराओं तथा परिस्थितियों के परिवर्तन के लिये यज्ञ से उत्पन्न शक्तियों का उपयोग हो सकता है। इस प्रकार के अगणित कारण और लाभ हैं, जिनके कारण यज्ञ को एक अत्यन्त आवश्यक प्रक्रिया माना गया है। हिन्दू धर्म में प्रत्येक पर्व, उत्सव, पूजन, कर्मकाण्ड, व्रत, संस्कार, त्यौहार, उपासना, साधना यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह से अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि संस्कार के साथ शरीर सौंप

दिया जाता है। यज्ञ को इतना महत्व ऋषियों ने इसलिये दिया था कि वह न केवल अनेकों भौतिक शक्तियों को देने वाला है वरन् आत्मा का कल्याण करने वाला शरीर और मन को निर्मल, निर्विकार बनाकर शांतिदायक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाला भी है।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिये हमें ज्ञान और विज्ञान की आवश्यकता होगी। इसके बिना वह महान कार्य सम्पन्न न हो सकेगा। भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र गायत्री है। उसी की शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। अग्नि के समान तेजस्वी रहना यही तो हिन्दू जीवन का आदर्श है। भौतिक माता-पिता हमें शरीर सम्पत्ति, शिक्षा-सुविधा, आश्रय, सहयोग, स्नेह आदि बहुत कुछ देते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता की यदि हम प्रतिष्ठा और उपासना करें तो इसके द्वारा हम और भी उत्तम एवं महत्वपूर्ण वस्तुयें प्राप्त कर सकते हैं।


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इन्द्रियों किसी को नहीं सतातीं, वे तो उपयोगी प्रयोजनों के लिए बने हुए साधन मात्र हैं। उच्छृंखल तो मन है। उसी को समेटो ताकि इन्द्रियों द्वारा अपनी उच्छृंखलता के लिए बाधित न करे।


महायज्ञों द्वारा वायुमण्डल और वातावरण का परिशोधन

यज्ञ से आत्मोत्कर्ष का प्रयोजन तब पूरा होता है, जब उस क्रियाकृत्य के साथ जीवन को यज्ञ मय बनाने की भावना एवं योजना भी सम्मिलित रहे। यज्ञ से वातावरण का संशोधन होता है, पर यह क्रिया बहिरंग ही न रहे, उसे अन्तरंग में भी गहराई तक प्रवेश होने दिया जाय। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में जो भूलें होती रही हैं, उन्हें यज्ञाग्नि में होम देना चाहिए। अपने आप को अग्नि में तपे सोने की तरह खरा बनाना चाहिए। यज्ञ में ऋषित्व और देवत्व प्राप्त करने की प्रक्रिया इसी आधार पर सम्पन्न होती है। स्वर्ग और मुक्ति मिलने का देवताओं का अनुग्रह बरसने का जो माहात्म्य शास्त्रों में बताया गया है, उसमें ज्ञान और कर्म के समन्वय का तत्वज्ञान छिपा हुआ है। यज्ञ एक कृत्य है। जिसका एक अविच्छिन्न अंग अग्निहोत्र हैं, पर वह उतने तक ही सीमित नहीं है। याज्ञिक को अपनी क्षुद्रताओं का-दुष्प्रवृत्तियों का-समापन करना पड़ता है और उस स्थान को खाली न रहने देकर सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन एवं अभिवर्धन करने के लिए प्रयत्नरत होना पड़ता है। यह न किया जाय और कर्मकाण्ड भर को सब कुछ मान लिया जाय तो उससे आत्मिक प्रगति का सुयोग न बनेगा। कृत्य के आधार पर रोग, चिकित्सा, वायुमण्डल का परिशोधन, पर्जन्य वर्षा, संकट-निवारण जैसे बहिरंग प्रयोजन ही पूरे होकर रह जायेंगे।

यज्ञ का एक स्वरूप समारोह सत्संग, सम्मेलन भी है। उच्च उद्देश्यों के लिए जो कार्य किये जाते हैं और उनके साथ देवाराधना के रूप में अग्निहोत्र भी जुड़ा रहता है तो वह प्रयास भी ज्ञान यज्ञ के रूप में अभिनंदित किये जाते हैं।

इस प्रकार के आयोजन पूर्वकाल के दो प्रकार के थे। एक बाजपेय, दूसरे राजसूय। बाजपेय धर्म प्रयोजनों में सुधार अभिवर्धन करने के लिए और राजसूय राजनैतिक, आर्थिक, समर्थता, संवर्धन जैसे प्रयोजनों को ध्यान में रख कर किये जाते थे।

पुराने समय में संचार साधन सरल नहीं थे। आवागमन भी कष्ट साध्य था। इसलिए तीर्थ स्थानों में नियत निर्धारित तिथि पर बाजपेय यज्ञ होते थे। देश के हर विभाग की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रयाग, उज्जैन, नासिक एवं हरिद्वार में कुँभ आयोजनों की व्यवस्था की गई थी। छोटे कुँभ तीन-तीन वर्ष बाद और बड़े कुँभ बारह वर्षों बाद उपर्युक्त स्थानों पर सम्पन्न होते थे। उनमें देश के मूर्धन्य धर्माचार्य भी आते थे और जनता के वरिष्ठ लोग भी काम छोड़कर उनमें सम्मिलित होते थे। जलाशय का स्नान और मंदिरों का प्रतिमादर्शन तो साधारण उपचार था। मूल उद्देश्य सामयिक समस्याओं के लिए विचार मंथन और उनके संदर्भ में जनता का मार्ग दर्शन होता था। आगन्तुक जन समुदाय इसी प्रयोजन में लगा रहता था। पर्यटन तो ऐसी प्रक्रिया है, जिससे इतिहास ज्ञान होता है और पुरातन-काल में घटित हुई घटनाओं से प्रेरणा लेने का लाभ भी साथ-साथ पूरा होता रहता है। वह कभी भी किया जा सकता है। पर तीर्थों में होने वाले आयोजन विशेष रूप से जन मानस को परिष्कृत करने, प्रचलित कुप्रथाओं में सुधार करने के लिए ही होते थे। आगन्तुक उद्देश्य को समझते भी थे और उसी में दत्तचित्त भी रहते थे।

राजसूय यज्ञों को इस प्रकार का समझा जाना चाहिए जैसा कि आजकल विभिन्न राजनैतिक दलों के अपने अपने वार्षिकोत्सव होते हैं। प्राचीन काल में बिखराव के स्थान पर एकीकरण की उपयोगिता समझी जाती थी, इसलिए राजनैतिक क्षेत्र की बिखराव की एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत करने के लिए अश्वमेध सरीखे यज्ञ होने थे। अश्व इसलिए छोड़ा जाता था कि प्रदेशों के शासक एक केन्द्र का चक्रवर्ती अनुशासन स्वीकार करें। जो विरोध करते थे उनके साथ केन्द्र की लड़ाई ठनती थी। संगठन पूर्ण हो जाने पर एक केन्द्रीय यज्ञ होता था।

यह धर्मतंत्र और राजतंत्र को समर्थ एवं रमुज्वल बनाने की योजना थी। जो समय-समय पर बाजपेय और राजसूय यज्ञों के नाम से सम्पन्न होती रहती थी।

एक विशेष प्रकार के यज्ञ वैज्ञानिक विधा के अनुरूप होते हैं। इन भेषज यज्ञों का विशेष उद्देश्य वायुमण्डल में प्रदूषण भर जाने से प्रकृति संतुलन डगमगाता था। दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारियों का उद्रेक भूकम्प जैसी दुर्घटनाओं से प्रकृति का बिगड़ा हुआ संतुलन जन साधारण को अनेकानेक त्रास देता था। हानिकारक कृमि कीटक उपज पड़ते थे। अकाल मृत्युएँ होने लगती थीं। इन त्रासों को मिटाने के लिए वायुमण्डल के परिशोधन आवश्यक होते थे और उन्हें बड़े रूप में सम्पन्न किया जाता था।

वायुमण्डल प्रत्यक्ष होता है। वातावरण परोक्ष। परोक्ष अर्थात् सचेतन, बौद्धिक भावनात्मक। दुष्प्रवृत्तियाँ बढ़ चलने से उसका प्रभाव भी छूत की तरह फैलता है और एक का अनुकरण दूसरा करता है। दुष्प्रवृत्तियां के संबंध में यह बात विशेष रूप से लागू होती है। पानी ढलान की ओर बहता है और मन भी दूसरों की दुष्प्रवृत्तियां को अपनाने अनुकरण करने के लिए सहमत, उत्साहित हो जाता है, जबकि ऊँचा उठाने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। वातावरण के प्रदूषण में मनुष्यों का चिन्तन निकृष्टताएँ अपनाता है, चरित्र दुष्ट-दुर्जनों जैसा हो जाता है और व्यवहार में हिंस्र पशुओं जैसी आक्रामकता भर जाती है। इसका संशोधन हुए बिना मनुष्य छोटी-छोटी बातों का लेकर विग्रह पर उतारू हो जाते हैं और अपना, पराया सभी का सर्वनाश करते हैं।

वायुमण्डल की तरह वातावरण की विषाक्तता को भी यज्ञ कृत्यों द्वारा परिशोधन करना पड़ता है।

लंका दमन के उपरान्त असुर दमन तो हो गया था। पर उस युद्ध की तथा इससे पहिले असुरता की दुष्प्रवृत्तियां वातावरण में भरी थी। यदि उनका संशोधन न होता तो नये असुर पैदा होते और जड़ें हरी रहने पर नये अंकुर फूट पड़ते। इस तथ्य पर ऋषियों से विचार करके भगवान राम ने काशी दशाश्वमेध घाट पर दस अश्वमेधों का आयोजन किया था।

ऐसा ही भगवान कृष्ण को भी करना पड़ा था। महाभारत में हुए हत्याकाण्ड और इससे पूर्व कंस, जरासंध शिशुपाल आदि द्वारा फैलाये गये अनाचारों से वातावरण में इतनी दुष्प्रवृत्तियां भर गई थीं कि युद्ध विजय के उपरान्त भी वे दुष्प्रवृत्तियां पनप सकती थी। इस तथ्य पर विचार किया गया और उसका समाधान पाण्डवों द्वारा विशालकाय यज्ञ आयोजन के रूप में हुआ। अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में यह सहायक भी हुआ।

इससे पूर्व विश्वामित्र, वातावरण में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए एक विशेष यज्ञ आयोजन कर रहे थे। विश्वामित्र को वैदिक वाङ्मय में गायत्री का दृष्टा माना गया है। उनका यज्ञ भी गायत्री यज्ञ था। ऐसे आयोजनों को निर्विघ्न न होने देने के लिए आसुरी शक्तियाँ विघ्न फैलाती हैं। कृष्ण के ऊपर बचपन से ही आक्रमण आरम्भ हो गये थे, फिर विश्वामित्र का यज्ञ भी असुरता की जड़ें खोदने वाला होने के कारण निर्विघ्न पूर्ण कैसे होने दिया जाता? ताड़का, मारीच सुबाहु अपनी सेना समेत उसे ध्वंस करने के लिए दौड़ पड़े। विश्वामित्र को दशरथ राजकुमारों को यज्ञ रक्षा के लिए ले जाना पड़ा। उनने वह संरक्षण कार्य तो किया ही। साथ ही विश्वामित्र से बला और अतिबला विद्याएँ भी सीखीं। बला कहते हैं सावित्री को, अतिबला कहते हैं गायत्री को। दोनों विद्याएँ सीखने के उपरान्त ही वे शिवधनुष तोड़ने, सिया स्वयंवर करने, लंका को ध्वंस करने एवं राम राज्य की स्थापना में समर्थ हुए। ऐसा ही प्रशिक्षण भगवान कृष्ण को भी उज्जयिनी के संदीपन आश्रम में प्राप्त हुआ था।

पिछले दिनों दो महायुद्ध होकर चुके हैं। वे द्वापर, त्रेता के युद्धों से भी भयंकर थे। उसमें पार्वती जितनी बारूद जली है और करोड़ों की संख्या में लोग हताहत हुए हैं। तब से लेकर अब तक छुट-पुट क्षेत्रीय युद्ध चलते ही रहे हैं और वायुमण्डल तथा वातावरण में विष भरते रहे हैं और वायुमण्डल तथा वातावरण में विष भरते रहे हैं। मद्य, माँस, अनाचार व्यभिचार आदि दुष्कृतों की भी गगनचुम्बी, अभिवृद्धि हुई है। नास्तिकता के कुचक्र में आधी दुनिया आ गई है। विश्व में मूर्धन्य राजनेता, जल, भूगर्भ तथा वायुमण्डल में आणविक विस्फोट कर अणु-युद्ध, अन्तरिक्ष-युद्ध आदि की ऐसी तैयारियाँ कर रहे हैं जिससे धरती पर से मनुष्य का अस्तित्व ही उठ जाय।

ऐसी विषम वेला में आवश्यक था कि किन्हीं बड़े हाथों बड़े संगठनों बड़े साधनों से सहयोगपूर्वक बड़ा द्रव्य यज्ञ तथा ज्ञान यज्ञ किया जाता। पर बिखराव की, अहंता की, क्षुद्रता की, दुष्प्रवृत्ति समूचे वातावरण पर छा जाने से वैसा न बन सका। इतने पर भी गायत्री परिवार ने हिम्मत नहीं हारी है और अपने स्वल्प साधनों को समग्र रूप में झोंककर वह कदम उठाया है, जो भूतकाल में बड़े लोगों ने बड़े आयोजनों के रूप में उठाये थे। अन्तर इतना ही है कि वे एक स्थान पर एक संयोजन के रूप में हुए थे और इन्हें विकेन्द्रित रूप में किया गया है।

मथुरा में हुआ सन् 58 का सहस्रकुंडी गायत्री महायज्ञ जिसमें चार लाख लोग सम्मिलित हुए थे, हजारों वर्षों तक याद किया जाता रहेगा, क्योंकि वह हर दृष्टि से अपने ढंग का अनोखा था। इसके उपरान्त 2400 गायत्री शक्ति पीठों और 10 हजार प्रज्ञा संस्थानों द्वारा उस कार्य को अपनी सामर्थ्यानुसार बराबर जारी रखा गया है। हरिद्वार और मथुरा में तो नित्य गायत्री जप और हवन होता है।

इन दिनाँक 24 लाख गायत्री परिजनों द्वारा एक माला नित्य के हिसाब से 24 करोड़ नित्य गायत्री जप का अनुष्ठान चल रहा है। जो युग संधि के अगले 14 वर्षों तक लगातार चलेगा।

शान्तिकुँज की नौ कुण्डी यज्ञशाला में नित्य गायत्री यज्ञ होता है उसी प्रकार गायत्री तपोभूमि मथुरा में भी। शक्तिपीठों में से अधिकाँश ऐसी है, जो दैनिक या साप्ताहिक यज्ञ क्रम चलाती है।

प्रचारक मण्डलियाँ देशव्यापी दौरे पर जाती हैं और हर आयोजन में सामूहिक यज्ञ होता है। शतकुण्डी यज्ञायोजन इन दिनों देश भर में स्थान-स्थान पर हुए हैं। यह विकेन्द्रीकृत योजना है। इसी को यदि केन्द्रीकृत और दस पाँच दिन के आयोजन के रूप में किया जाता तो त्रेता और द्वापर के यज्ञों की ही समता में जा बैठता, किन्तु परिस्थितियों के साथ आवश्यकता का तालमेल बिठाते हुए वातावरण एवं वायुमण्डल संशोधन की प्रक्रिया अपनाई गई है।


धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए (Kahani)

उन दिनों धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए दान करने की प्रतिस्पर्धा समर्थों के बीच चल रही थी। तथागत ने लेखाध्यक्ष से पूछा इस वर्ष सबसे बड़ी राशि किसने प्रदान की।

कोष पुस्तिका देखकर उनने बताया कि इस वर्ष के अनाथ पिण्डर सबसे बड़े दानी हैं उन्होंने सौ करोड़ मुद्राएँ संघाराम के लिए भेजी हैं।

सम्राट अशोक उस सभा में मौजूद था। सोचने लगे जब सामान्य श्रेष्ठि इतना कर सकता है तो वे ही क्यों पीछे रहें? उनने घोषणा की कि जो राज्यकोष में है सो अभी और शेष क्रमशः भेजते हुए वे भी सौ करोड़ मुद्राएँ दान करेंगे।

क्रम चल पड़ा राज्य कोष में जितना जुड़ता उतना संघाराम में पहुँच जाता।

लम्बा समय बीता अशोक का आयुष्य पूरा हो चला रुग्ण शरीर मृत्यु के दिन गिन रहा था उनने कोषाध्यक्ष को बुलाया और पूछा-”संघाराम राशि”-संघाराम पहुँची या नहीं लेखा देखकर उनने बताया अभी 16 करोड़ ही पहुँची है चार करोड़ देने बाकी हैं।

समय निकट आया देखकर अशोक ने अपने निजी प्रयोग के सभी पात्र उपकरण भेज दिए और स्वयम् मृत्तिका पात्रों में खाने और भूमि पर सोने लगे। इतने पर भी राशि पूरी न हुई और मृत्यु का निमंत्रण आ पहुँचा।

अशोक ने चारों ओर दृष्टि पसारी। जो शेष हो उसे भी भेजा जाय। देखा तो सिरहाने आज के आहार को एक सूखा आँवला सामने था। उन्होंने उसे उठाया और बुद्ध बिहार भेजते हुए कहा जो शेष था भेज रहा हूँ। इसी से ............. पूर्ण कर लिया जाय।

सूखा आँवला पीसकर उस दिन के महाप्रसाद में मिला दिया गया। घोषित किया गया कि सर्वमेध की यह पूर्णाहुति दान सम्पदा में सर्वश्रेष्ठ मानी जाय।


गायत्री-माहात्म्य

आर्य समाज के प्रमुख नेता स्वर्गीय महात्मा आनन्द स्वामी ने अपने अनुभवों को बताते हुए लिखा है कि बचपन में वे मन्दबुद्धि थे। हर वर्ष फेल होते थे। घर के काम काजों को भी ठीक तरह न कर पाने पर उनकी प्रताड़ना होती थी। दुःखी होकर उनने एक नदी में छलाँग लगा दी। बहते हुए बहुत दूर निकल गए तो किसी अपरिचित व्यक्ति ने उन्हें निकाला और घर पहुँचा दिया।

इसी बीच किसी सन्त से उनकी भेंट हुई। उसने उन्हें गायत्री मंत्र सिखाया। वे लिखते हैं कि “मैं नियमित रूप से उस साधना को करने लगा बुद्धि तीव्र हुई। अच्छे नम्बरों से पास होने लगा। ‘आर्य गजट’ का सम्पादक बना। “अपना निज का ‘मिलाप’ पत्र निकाला। आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो गई।”

एक क्रान्तिकारी केस में उनके पुत्र को फाँसी हुई थी। आनन्द स्वामी जेल में मिलने गये तो उसे ‘गायत्री’ का आश्रय लेने के लिए कहा। अपील में वह छूट गया।

हिन्दुस्तान पाकिस्तान बँटवारे में हुए दंगों में गुण्डों ने उनका घर घेर लिया और आग लगाने की तैयारी कर ली। नीचे उतरने की गुंजाइश न थी। छत पर बैठकर वे सब गायत्री जप करने लगे। इतने में एक परिचित पुलिस अफसर उधर से निकले। उनने उन्हें बचाया और दिल्ली पहुँचने का प्रबन्ध किया।

स्वामी जी ने जीवन भर गायत्री का बहुत प्रचार किया और कई पुस्तकें इस विषय पर लिखीं। गायत्री परिवार के प्रयासों एवं इसके संस्थापक के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा थी।

राजा अश्वपति की गायत्री उपासना प्रसिद्ध है। उनके शासनकाल में सतयुगी वातावरण था। राजा के धर्मात्मा होने से प्रजा भी वैसी ही हो गई थी। उनके राज्य में अपराधों का सिलसिला एक दम ही समाप्त हो गया था। और सभी प्रजाजन धन-धान्य और सुख शान्ति से पूर्ण थे। सतयुग का जो वर्णन पढ़ने को मिलता है, उसका साकार रूप राजा अश्वपति के राज्य के वर्णन-वातावरण की जानकारी द्वारा देखने को मिलता है।

देवी भागवत में और भी ऐसी ही कितनी ही कथाओं का वर्णन है जिसमें गायत्री उपासना से अनेकों ने असाधारण सिद्धियाँ पाई।

विश्वमित्र राजर्षि से ब्रह्मर्षि इसी अवलम्बन के आधार पर बने।

ध्रुव को भी नारदजी ने इसी महामंत्र की उपासना करके त्रैलोक्य का अधिपति बनाया था।

वृन्दावन में काठिया बाबा नाम एक परम सिद्ध हो गये थे। विद्याध्ययन के उपरान्त वे गायत्री उपासना में लगे और संन्यासी हो गये। वे काठ की लंगोटी पहनते थे। इसीलिए उनका नाम काठिया बाबा प्रसिद्ध हो गया। कोई दीन दुःखी याचना, करता तो उसे धन देते रहते। लोगों ने समझा इनने काठ की लंगोटी में पैसा छिपा रखा है, सो उनके सेवक बने धूर्तों ने दो बार जहर दिया कि लंगोटी में छिपा धन मिल जाय। वे जहर से तो नहीं, समय आने पर मरे। काठ की लँगोटी खोली गई तो उसमें कुछ भी नहीं मिला। उनके आशीर्वाद से कितनों का ही भला हुआ। जो वे कह देते थे, सही होकर रहता था।


Quotation

दूसरा दिन आया। माली ने गुलाब छाँटे और काँटे काटकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया और पुष्प देवता का मुकुट सुशोभित कर रहा था।


सूर्य की सविता शक्ति का विवेचन-2

प्रत्यक्ष दृश्यमान सूर्य ऊर्जा का भण्डार है। यह ऊर्जा जहाँ जीवनोपयोगी अन्यान्य प्रयोजनों में प्रयुक्त होती है, वहाँ वह आरोग्य लाभ के अनेकानेक उद्देश्य भी पूरा करती है। वह प्रत्यक्ष जीवनी शक्ति है। शरीर में प्रवेश करके समर्थता का संवर्धन करती है। अवयवों को रस, रक्त, माँस, मेद, स्नायु संस्थान आदि का बलिष्ठ बनाती है, जिसके आधार पर शरीर बलवान रहता है और दीर्घ जीवी बनता है। इस गर्मी से स्वेद, मल, मूत्र, श्वास आदि के माध्यम से मल विसर्जन में सुविधा होती है। भीतरी और बाहरी सफाई का आधार मजबूत रहता है। विजातीय द्रव्य ठहरने नहीं पाते। वे जिस-तिस मार्ग में बाहर निकलते रहते हैं। रोग कीटक विषाणु जहाँ कहीं भी शरीर में जड़ जमा लेते हैं, उन्हें नष्ट करने की राम बाण दवा सूर्य किरणें हैं। प्रभात काल की धूप में जितनी देर रहा जा सके उतना उत्तम है। ग्रीष्म ऋतु में मध्याह्न काल की कड़कती धूप ही खुले बदन पर लेने से कुछ हानि पहुँचाती है। मनुष्यों और पशुओं के खाद्य में काम आने वाली वनस्पतियों पर जब सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं, तब उनमें विटामिन ‘डी’ जैसे कई पोषक तत्व अनायास ही बढ़ जाते हैं और वे सेवनकर्ताओं को विशेष लाभ पहुँचाते हैं। शास्त्रकारों का कथन भी है कि “आरोग्य भास्करात् इच्छेत्” अर्थात् आरोग्य की कामना सूर्य संपर्क से करें।

सूर्य किरण चिकित्सा का प्रचलन धीरे-धीरे संसार भर के विज्ञजनों में होता जा रहा है। सातों रंगों के पृथक् पृथक् गुण हैं। नीला शीतल, लाल उष्ण और पीला पाचक होता है। इन तीन के सम्मिश्रण से ही सात रंग बनते हैं। शरीरगत रुग्णता को देखते हुए रंगीन काँचों के माध्यम से आवश्यक किरणों को ही पीड़ित अंग पर डाला जाता है। अभीष्ट रंग की बोतलों में पानी भरकर उसके सेवन से क्रोमोपैथी के माध्यम से लाभ उठाया जाता है। अब तक इस प्रयोग का जो लाभ देखा गया है उसके आधार पर सोचा यही जा रहा है कि चिकित्सा विज्ञान में सूर्य किरण चिकित्सा का एक बड़ा आधार जुड़ेगा और बिना कुछ खर्च किये लोग आरोग्य लाभ का एक महत्वपूर्ण माध्यम हस्तगत कर सकेंगे।

सूक्ष्म शरीर का परिशोधन एवं शक्तिवर्धन स्वर्णिम सूर्य का ध्यान करने से पूरा होता है। प्रभात काल सूर्याभिमुख होकर, नेत्र बंद रखते हुए भूमध्य, हृदय स्थान एवं नाभिचक्र में प्रकाश पुँज का ध्यान किया जाता है। मस्तिष्क में बुद्धि चेतना का निवास है। हृदय में भाव संवेदना और नाभि में सर्वतोमुखी बलिष्ठता का। इन स्थानों में किया गया ध्यान अपने-अपने केन्द्रों को अधिक समर्थ बनाता है। उनकी चेतना को अधिक विकसित करता है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों ही शरीर अपने-अपने क्षेत्र में बीज रूप से विद्यमान क्षमताओं के जागरण में, उत्कर्ष में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होते हैं।

हठयोग में कुण्डलिनी जागरण के प्रयोग को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। मेरुदण्ड में षट्चक्र हैं। जननेन्द्रिय मूल में प्रसुप्त सर्पिणी जैसी कुण्डलिनी का मूल आधार है। इसका अंतिम सिरा मस्तिष्क मध्य वाले ब्रह्मरंध्र में सहस्रार कमल है। इन तीनों पक्षों को मिला कर कुण्डलिनी का पूरा कलेवर बनता है। जागरण के लिए जहाँ अन्यान्य क्रिया-कृत्यों का समावेश करना पड़ता है वहाँ सूर्य का ध्यान भी अनिवार्य है। जिस जिस केन्द्र में सूर्य का ध्यान किया जाता है वह जागृत, सक्रिय और गतिवान होने लगता है। इस साधना का यह सरलतम मार्ग है कि सहस्रार से लेकर मेरुदण्ड अवस्थित छहों चक्रों में होते हुए जननेन्द्रिय मूल तक के समूचे क्षेत्र में सूर्य प्रकाश के प्रवेश करने, ऊर्जा भरने का ध्यान किया जाय।

सोऽहम् साधना द्वारा प्राण आकर्षित किया जाता है। साँस लेते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की ध्वनि का ध्यान किया जाता है। पर इसके साथ ही श्वास-प्रश्वास की सूर्य शक्ति से ओत-प्रोत होने की भावना भी की जाती है। नाद-योग में नाद श्रवण के साथ यह मान्यता भी परिपक्व की जाती है कि वे दिव्य शब्द सूर्य लोक से उतर कर साधक तक आ रहे हैं।

संभवतः इसी कारण सूर्य के कुछ उपासना पर्व भी निर्धारित हैं। रविवार को सूर्य दिन का दिन माना जाता है। उस दिन उपवास रखकर सूर्य को प्रसन्न करने की प्रथा है। वट सावित्री का संबंध सावित्री सत्यवान की कथा से जोड़ा जाता है। सावित्री से सूर्योपासना, करके अपने पति सत्यवान को यमराज के हाथ से पुनः वापस लौटाया था। सौभाग्य रक्षा के लिए अन्य स्त्रियाँ भी इस व्रत को करती है। मध्यप्रदेश और बिहार में कार्तिक शुक्ल 6 को सूर्य षष्ठी कहा जाता है उस दिन उस पूरे क्षेत्र में अत्यन्त समारोहपूर्वक इस व्रत उत्सव को मनाया जाता है।

गायत्री सावित्री का ध्यान चित्रण एवं प्रतिमा निर्माण तो सूर्य मण्डल के मध्य में करना आवश्यक ही है। अन्य देवताओं को भी सूर्य आभा के अंतर्गत ही किया गया है। सभी के चेहरों पर तेजोवलय का समावेश आवश्यक माना गया है। जितने भी देवता हैं उनकी प्रतिमाएँ बनाते समय उनके चेहरे के इर्द-गिर्द तेज मण्डल का अंकन या चित्रण अनिवार्यतः रहेगा यह सूर्य की ही आभा है। इससे स्पष्ट है कि कोई नर देवता या नारी देवता जो शक्ति प्राप्त करते हैं, वह सूर्य द्वारा अधिग्रहीत की गई ही होती हैं। सर्वविदित है कि चन्द्रमा पृथ्वी की तरह ही साधारण मिट्टी का बना हुआ है। पर सूर्य का प्रकाश उसके जितने भाग पर पड़ता है, उतना ही वह रात्रि के समय चमकता है। सौर मण्डल के अन्य ग्रहों और उपग्रहों के संबंध में भी यही बात है, उनमें अपना निज का कोई प्रकाश नहीं है। सूर्य की किरणों का प्रकाश पड़ने से ही वे उदय होते रहते हैं।

ब्रह्माण्ड में सूर्य सहोदरों की बहुत बड़ी संख्या है। अपने सूर्य को आदित्य कहते हैं। ठीक इसी प्रकार के सूर्य वे तारक भी हैं, जो रात्रि के समय आकाश में चमकते हैं। चमकते ही नहीं, वे अपनी-अपनी विभिन्नताओं और विचित्रताओं से भरी पूरी विशिष्ट किरणें भी निःसृत करते हैं। पृथ्वी पर उन समस्त सूर्यों का प्रकाश आता है, पर वह अपने आदित्य की छलनी में छनकर ही धरती पर आता है। तारकों की सीधी किरणें यदि पृथ्वी पर आने लगें तो समूचा वातावरण ही गड़बड़ा जाय।

सूर्य और पृथ्वी की दूरी का इतना संतुलित क्रम है जिसे सहज एवं सुयोग सम्मत कह सकते हैं। यदि किरणें अपेक्षाकृत निकट या तीव्र होतीं तो पृथ्वी की स्थिति भी बुध के समान लाल अंगारे जैसी होती। यदि दूरी अधिक होती तो प्लूटो आदि के समान ही यहाँ असहनीय शीत होता और किन्हीं प्राणियों या वनस्पतियों का जलाशयों का कोई चिन्ह कहीं दृष्टिगोचर न होता। यह सूर्य का अनुग्रह ही है कि पृथ्वी उससे संतुलित दूरी पर है। फलतः यहाँ विविध प्रकार के प्राणी, वनस्पति, पदार्थ उत्पन्न होते हैं। जल बरसता है और वायु चलती है। वायु में जीवन तत्व ‘प्राण’ ऑक्सीजन घुला रहता है। यदि उसका अनुपात नहीं रहा होता तो वायु के रहते हुए भी उसमें प्राण प्रदायिनी शक्ति का अभाव रहता और कोई जीव जन्तु उत्पन्न न होता। इसीलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है-सूर्य आत्मा जगतुस्थश्च। अर्थात्-इस जगत की आत्मा सूर्य ही है। समस्त जीवधारियों का उत्पादन, अभिवर्धन, और परिवर्तन सूर्य के कारण ही सम्भव होता है।

ऋषिगणों के अनुसार-

सूर्याज्योतिज्ज्योतिः सूर्या वर्चा ज्योतिर्वचः। - श्रुति

सूर्य ही ज्योति है। सूर्य ही वर्चस् है।

सूर्य प्रकाश रूप है। पर यह प्रकाश इतने तक ही सीमित नहीं है कि अन्धकार को दूर करें। जो वस्तु जैसी है उसे उसी रूप में दिखाये। यह अन्तः प्रकाश भी है, जिसे ब्रह्म तेज या वर्चस् कहते हैं। इससे अपनी तथा विश्व की महिमामयी विभूतियों के दर्शन भी होते हैं।

सवित्र्यास्तु परं नास्ति। अग्नि पुराण

सवित्र्यास्तु परं नास्ति। मनुस्मृति

सवित्र्यास्तु परं नास्ति। याज्ञवल्क्य

सावित्री से ऊँचा और कोई नहीं है।

शास्त्रकारों के अनुसार सूर्य उपासना का एक मात्र मंत्र सावित्री है। सप्त व्याहृतियाँ लगने पर वह सावित्री कहलाती है और तीन व्याहृतियाँ रहने पर उसे गायत्री कहते हैं। सावित्री का प्रयोग भौतिक प्रयोजनों के लिए होता है तथा गायत्री को अध्यात्म तत्त्व-ज्ञान के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

यों देखा जाय तो पृथ्वी का सुसंचालन सूर्य की सुसंतुलित स्थिति के कारण ही हो रहा है। प्राणियों के लिए जिन पदार्थों की आवश्यकता है वह सब भी प्रकारान्तर से आदित्य अनुग्रह ही प्रदान करता है। जीवन धारण के लिए ऊर्जा नितान्त आवश्यक है। प्रत्येक प्राणी के शरीर में ऊर्जा काम करती है। खाद्य पदार्थों में भी कैलोरी के रूप में ऊर्जा तत्त्व ही काम करता है। शीत से बचने एवं गति देने के लिए बिजली, तेल, कोयला, ईंधन आदि के रूप में ऊर्जा ही काम आती है।

पृथ्वी का आकार चपटापन लिए हुए है। साथ ही उसकी भ्रमण कक्षा भी अण्डाकार है। इसी कारण शीत और ग्रीष्म ऋतुएँ आती हैं। साथ ही कुछ क्षेत्र सदा शीतल और सदा उष्ण बने रहते हैं। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों में शीतलता अधिक रहती है। उनमें भारी बर्फ जमी रहती है। यदि सूर्य ताप में घट-बढ़ रहने लगे तो उससे समुद्र में भरी जल राशि पर भारी प्रभाव पड़ सकता है। सूखे क्षेत्र पानी में डूब सकते हैं और जल घट जाने से कितने ही द्वीप उभर सकते हैं। इसलिए सर्वसाधारण को विज्ञजन सदा सचेत करते रहते हैं कि ऊर्जा का उपयोग अनुचित मात्रा में न किया जाय। कल, कारखाने, मोटर, वायुयान जैसे वाहनों की भरमार न की जाय। पृथ्वी की उर्वरा शक्ति बनाये रखने के लिए उस पर वृक्ष, वनस्पतियों की बहुलता घटने न दी जाय। पेड़-पौधे सूर्य का प्रकाश सोखते हैं। उसकी प्रतिक्रिया प्राणवायु युक्त वायु निःसृत करने के रूप में होती है। प्राणियों के लिए यही जीवन तत्व है। इसीलिए धरती पर वन सम्पदा को अक्षुण्ण बनाये रहना भी प्रकारान्तर से सूर्य उपासना का ही एक पक्ष है। जहाँ वनस्पति से धरती ढकी नहीं होती उसे शास्त्रों में निर्वसना कहा गया है। अनुपयोगी रहने की ओर संकेत किया गया है। रेगिस्तान इसी कारण बढ़ते हैं। बंजर ऊसर भी इसी कारण पनपते हैं। सूर्य उपासना का सर्व साधारण द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया का यह महत्वपूर्ण अंश है कि धरती को हरीतिमा से ढका रखा जाय, उस पर मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों के लिए उपयुक्त आहार उगाया जाय। वृक्ष वनस्पतियों से प्रत्येक भूभाग को भरा-पूरा रखा जाय। आदित्य पुराण में वृक्षों को सूर्य के केश और वनस्पतियों को रोम बताया गया है, पृथ्वी को आदित्य भगवान का दिया हुआ यह सीधा अनुदान है।

सूर्य पृथ्वी से बहुत ऊपर है। उसका आकार भी प्रायः 110 गुना बड़ा है। फिर भी उसकी ऊर्जा को हम कहीं भी अग्नि रूप में प्रज्वलित कर सकते हैं। अग्नि भी सूर्यांश ही है। इसलिए उसकी ज्योतिर्मय प्रतिमा अग्नि रूप से ही प्रज्वलित की जाती है। उपासना प्रयोजनों में अगरबत्ती धूप-दीप का विधान इसीलिए है कि देव प्रयोजनों में सूर्यांश को साक्षी रखे रहा जाय।

अग्निहोत्र सूर्य आराधना का सर्वोत्तम प्रयोग है। सामान्य कार्यों में प्रयुक्त होने वाली अग्नि तो ईंधन के सहारे जल जाती है। पर यज्ञाग्नि को प्रज्वलित करने के लिए विशेष वृक्षों की ही समिधाएँ काम में आती है। समिधा के लिए जिन वृक्षों का काष्ठ प्रयुक्त होता है, उनमें सूर्य तत्त्व की बहुलता पाई जाती है। फिर इसके अतिरिक्त शक्तिशाली शब्द शक्ति का मंत्र रूप में भी समावेश किया जाता है। यज्ञाग्नि सूर्य का भूतलीय प्रतिनिधित्व करती है, इसके लिए उसके माध्यम से भी वे लाभ उठाये जा सकते हैं जो सूर्य किरणों के द्वारा उपलब्ध होते हैं। शारीरिक रोगों का निवारण, मानसिक चेतना का अभिवर्धन, व्यक्तित्व में ओजस्, तेजस्, वर्चस का समावेश, प्रतिभा का संवर्धन सद्गुणों का विकास, सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन अग्नि होत्र के प्रधान लाभ हैं। इसके अतिरिक्त यह ऊर्जा आत्मा को परमात्मा से मिलने का दोनों के बीच तादात्म्य उत्पन्न करने का प्रयोजन भी पूरा करती है। इसलिए चेतना में ब्रह्मत्व की-ब्रह्मभाव की अभिवृद्धि के लिए यज्ञाग्नि का सान्निध्य आवश्यक माना गया है। कहा गया है कि यज्ञाग्नि के सान्निध्य से मनुष्य शरीरधारी ब्राह्मणत्व की उच्च भूमिका तक पहुँचते हैं।

सीलन, सड़न, कृमि, कीटक दुर्गन्ध आदि के निवारण में जितने भी प्रयोग उपचार प्रयुक्त होते हैं, उन सबकी तुलना में अकेले सूर्य ऊर्जा कहीं अधिक बढ़कर प्रयोजन पूरा करती है। गंदगी का अनुपात जब बढ़ता है तब ग्रीष्म ऋतु में तूफान, अन्धड़, चक्रवात उठते हैं। उनका उद्देश्य वातावरण की-वायु मण्डल की सुविस्तृत सफाई करना ही है। समुद्र स्थिर रहता है पर उसे भी ज्वार-भाटों के माध्यम से ऊँची लहरें एवं तूफान के माध्यम से गतिशील बनाये रहती है। चल नदियों का पानी की स्वच्छ रहता है। स्थिर जोहड़ों का पानी सड़ने लगता है। उसकी प्रकार समुद्र का जल तभी तक शुद्ध रहता है जब तक उसमें हलचल उठती रहती है। यह कार्य सूर्य और चन्द्रमा का आकर्षण शक्ति ही सम्पन्न करती है। सूर्य किरणें ही समुद्र जल को भाप बनाती हैं। बादल बनाकर उन्हें जहाँ-तहाँ बरसाती हैं। इसीलिए सविता को अग्नि का ही नहीं जल का देवता भी माना गया है। धूप, दीप, जैसे अग्नि प्रतीकों के साथ-साथ देव पूजा में जल कलश का भी प्रयोग होता है। जिस प्रकार यज्ञाग्नि में अनेकानेक देवताओं का आह्वान किया जाता है उसी प्रकार पूजा वेदी पर स्थापित किये जाने वाले जल कलश में विभिन्न प्रकृति के विभिन्न प्रयोजनों वाले देवताओं को भी आमंत्रित किया जाता है। सूर्य को इन्द्र और वरुण दोनों की संज्ञा दी गई है। इन्द्र अग्नि है और वरुण जल। दोनों के समन्वय से यह पृथ्वी अपनी विभिन्न क्रिया-प्रक्रियाओं का सूत्र संचालन करती रहती है। मनुष्य शरीर भी एक प्रकार का भूमण्डल, सौर मण्डल अथवा ब्रह्माण्ड ही है। इसके प्रकट और अप्रकट क्रिया-कलापों में सूर्य का असाधारण एवं अद्भुत योगदान रहता है। इसीलिये सूर्योपासना का इतना अधिक माहात्म्य बताया गया है।


उसी घाट पर एक घड़ियाल (Kahani)

एक पंडित थे। गंगा तट पर बैठ कर गीता पाठ करते और घर लौट जाते।

उसी घाट पर एक घड़ियाल रहता था। कथा उसे बहुत सुहाती। पंडित से बोला मुझे आद्योंपन्न गीता सुनायें आपको हर दिन सौ मोतियों की दक्षिणा दूँगा। पंडित ने वैसा ही किया। घड़ियाल रोज कथा सुनता और वचनानुसार सौ मोती दक्षिणा में देता।

कथा पूर्ण होने पर एक हार और भेंट दिया। साथ ही यह निवेदन किया कि किसी प्रकार मुझे त्रिवेणी संगम तक पहुँचा दे तो आपको एक घड़ा भर कर मोती दूँगा। पंडित ने बैल गाड़ी का प्रबन्ध किया और लादकर उसे त्रिवेणी पहुँचा दिया। घड़ियाल ने भी वचन पूरा किया और मोती भर घड़ा उन्हें थमा दिया।

विदा करते समय, घड़ियाल ने नमन नहीं किया उलटा व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसने लगा। कारण पूछने पर उसने पंडित से इतना ही कहा-अपने पड़ौस के सजन धोबी के गधे से कारण पूछना।

पंडित जी सीधे उस गधे के पास पहुँचे और घड़ियाल के व्यंग्य हँसी का कारण पूछने लगे।

गधे ने लम्बी साँस खींचते हुए कहा-पूर्व जन्म में मैं कौशल नरेश का अंग रक्षक था। वे त्रिवेणी तट पर आये तो अत्यधिक प्रभावित हुए और राजपाट दूसरों को देकर वहीं बस गये। मुझे से उनने पूछा-अब वेतन तो नहीं मिलेगा पर चाहो तो साथ रहकर तुम भी धन अर्जित करो। लौटना चाहो तो एक सहस्र मुद्रा लेकर वापिस चले-जाओ।

गधे ने कहा-मैं मुद्रा लेकर वापिस चला गया। राजा तो स्वर्ग चले गये पर मैं रुपयों के प्रपंच में पड़कर अनेक अनर्थ करता रहा और अब गधे की योनि में पड़ा कष्ट सह रहा हूँ।

पंडित समझदार थे। गधे से शिक्षा ग्रहण की और त्रिवेणी तट पर घड़ियाल के समीप रहकर आत्म कल्याण की साधना करने लगे।


उपवास रोग निवारक भी! शक्तिवर्धक भी!

व्यवस्थित रूप से चलने वाले दफ्तरों, कारखानों में सप्ताह में एक दिन अवकाश का रहता है। कहीं-कहीं तो पाँच दिन का भी सप्ताह माना जाने लगा है और दो दिन छुट्टी में हल्के फुल्के रहने के लिए मिलते हैं। यह छुट्टी में प्रत्यक्ष काम की हानि होती हुई दीखती है, किन्तु परोक्ष में उससे लाभ ही रहता है। दो दिनों में हल्का फुल्का रहकर व्यक्ति अधिक उत्साहपूर्वक अधिक मात्रा में काम कर सकता है।

यही बात पाचन तंत्र के बारे में भी है। पेट, आमाशय, आँतें मिलकर एक तंत्र बनता है। इसमें फूलने सिकुड़ने की क्रिया होती रहती है और उलट पुलट के लिए जगह की गुंजाइश रखे जाने की आवश्यकता पड़ती है। इस सारे विभाग में ठूँसा-भरा जाय और कसी हुई स्थिति में रखा जाय तो स्वभावतः पाचन में बाधा पड़ेगी। अवयवों पर अनावश्यक दबाव-खिंचाव रहने से उनकी कार्य क्षमता में घटोत्तरी होती जायेगी। इन अंगों से पाचन की निमित्त जो रासायनिक स्राव होते हैं, उनकी मात्रा न्यून रहेगी और सदा हल्की-भारी कब्ज बनी रहेगी। खुलकर दस्त होने और पेट हल्का रहने की वह स्थिति न बन पड़ेगी जो शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए आवश्यक है।

पाचन तंत्र ही आहार को रक्त के रूप में परिणत करने की आश्चर्य भरी प्रयोगशाला चलाता है। इसके कलपुर्जों से अनावश्यक छेड़खानी नहीं करनी चाहिए। इससे कई प्रकार की परेशानियाँ व्यर्थ ही उत्पन्न होती हैं। अधिक मात्रा में खाना में खाना इसी तोड़-फोड़ का प्रत्यक्ष स्वरूप है। स्वल्पाहारी को अध्यात्म शास्त्र में उपवासकर्ता, व्रतशील कहा जाता है। आयुर्विज्ञान ने इसी तथ्य का यह कहकर समर्थन किया है कि कम मात्रा में खाया हुआ अच्छी तरह पच जाता है। फलतः वह अधिक ठूँसने की तुलना में आर्थिक बचत भी करता है। अंगों को सुव्यवस्थित भी रखता है और पोषण भी अधिक मात्रा में प्रदान करता है।

वृद्धावस्था के लिए तो यह अनिवार्य अनुशासन है कि वे अपने पाचन तंत्र की क्षमता को देखते हुए आहार की मात्रा घटायें। यह न सोचें कि ऐसा करने से शक्ति सामर्थ्य घटेगी। किन्तु देखा इससे ठीक उल्टा गया है कि मात्रा घटा देने पर आहार सही रूप से पचता है। वह उपयुक्त पोषण बढ़ाता है और पाचन तंत्र में विकृति नहीं खड़ी होने देता।

बच्चों के आहार के संबंध में भी यही सावधानी बरती जानी चाहिए। हर वयस्क उन्हें प्रेम प्रदर्शन के रूप में अपने साथ खिलौने लगे तो उसका परिणाम यह होता है कि उन्हें बार-बार खाने की, बड़ों वाले गरिष्ठ पदार्थों को लेने की आदत पड़ जाती है। इस कारण उत्पन्न होने वाले संकटों से बचने के लिए यही उचित है कि बच्चों को खाते समय पास भले ही बिठा लिया जाय, पर उनके आहार का स्तर, अनुपात एवं समय सर्वथा भिन्न रखा जाय। कोमल पेट पर अनावश्यक मात्रा थोपना एक प्रकार से उनके मरण की पूर्व भूमिका विनिर्मित करना है।

उपवास को धर्म प्रयोजनों में बढ़-चढ़ कर महत्व दिया गया है। धार्मिक प्रकृति के लोग वैसा करते भी रहते हैं। महिलाओं में इसके लिए अधिक उत्साह एवं साहस दिखाया जाता है, पर इस संदर्भ में जो अनियमितता बरती जाती है, वह सब प्रकार से खेदजनक है। उपवास के दिन फलाहार के नाम पर मावा के बने मिष्ठान्न तथा फलाहारी समझे जाने वाले कुट्टू, आलू, सिंघाड़ा आदि गरिष्ठ पकवानों की स्वादिष्टता के कारण और भी अधिक मात्रा में खाया जाता है। फलतः परिणाम ठीक उल्टा होता है। मात्रा घटाने और सात्विकता बढ़ाने के रूप में ही फलाहार हो सकता है। जब नाम फलाहार है तो उसे शब्दों के अनुरूप ही होना चाहिए। ताजे सुपाच्य पेड़ के पके फल आवश्यकतानुसार फलाहार में एक बार लिये जा सकते हैं। उनके अधिक महंगे और कोल्डस्टोरों में रखे होने के कारण शाकाहार से काम चलाना चाहिए। ताजे ऋतु फल मिल सकें तो वे भी ठीक रहते हैं। अच्छा तो यह है कि शाकों को उबालकर बनाया हुआ रस या फलों का रस काम में लिया जाय। दूध, दही, छाछ जैसी प्रवाही वस्तुएँ भी काम दे सकती हैं। यह सब जंजाल भी जितना कम लिया जाय, उतना ही अच्छा।

वास्तविक उपवास वह है जिसमें पानी तो बार-बार और अधिक मात्रा में पिया जाय। पर पेट पर वजन डालने वाला कोई भी आहार न लिया जाय। छुट्टी सो छुट्टी। उस दिन पेट को एक प्रकार से पूर्ण विश्राम लेने दिया जाय। सफाई करने के लिए गुनगुने पानी में नीबू का रस, तनिक-सा खाने का सोड़ा और शहद अथवा गुड़ मिलाकर दिन में कई बार चाय की तरह पीया जा सकता है। अच्छा लगे तो इस पेय में तुलसी की थोड़ी-सी पत्तियाँ भी डाली जा सकती है। इस पेय से पेट की सफाई भी होती है और भूख के कारण पेट में जो ऐंठन पड़ती है, उसकी संभावना भी नहीं रहती।

पशु-पक्षियों में से कोई कभी बीमार पड़ता है वे अपना उपचार स्वयं करते है। भोजन बन्द कर देते हैं। निराहार रहने से शरीर में अन्यत्र काम करने वाली जीवनीशक्ति एकत्रित होकर रोग निवारण में लग जाती है और वे इतने भर उपचार से रोगमुक्त हो जाते हैं। मनुष्यों के लिए भी इस आधार को अपनाना रोग मुक्ति का सर्वसुलभ उपचार सिद्ध हो सकता है।

सप्ताह में एक दिन का तो पूर्ण उपवास करना ही चाहिए। इतनी छूट सुविधा तो पाचन तंत्र को देनी ही चाहिए। शरीर जुकाम, खाँसी, ज्वर आदि की चपेट में आ गया हो तो एक दिन से अधिक का उपवास भी किया जा सकता है। निराहार उपवास आरम्भ करने से पहले कम से कम एक जून तो खिचड़ी जैसा हल्का भोजन करना ही चाहिए। उपवास तोड़ने पर भी आरम्भ में एक जून, फिर क्रमशः थोड़ा हल्का भोजन लेने के उपरान्त ही सामान्य ढर्रे पर आना चाहिए।


महाराज प्रद्युम्न का शरीर (Kahani)

महाराज प्रद्युम्न का शरीर छूट गया। गुणी लोगों ने कहा-राजा की आत्मा मरते ही दूसरा जन्म लेगी। यदि उस नये शरीर को जन्मते ही मार दिया जाय तो राजा प्राण वापिस लौट आयेगा और वे फिर से जीवित हो उठेंगे।

नया जन्म कहाँ, किस योनि में लिया इसे बताने के लिए उन दिनों में प्रख्यात दिव्यदर्शी पुरंध्र बुलाये गये। उनने समाधिस्थ होकर देखा तो उन्होंने पाया कि पास के बगीचे में आम्रकीट के रूप में जन्मे हैं। स्थान तथा रूप सबको बता दिया गया।

पकड़े कौन? मारे कौन? यह कार्य महामंत्री को सौंपा गया। वे वृक्ष पर चढ़े। कीटक को नमन किया और राजा रूप में लौट चलने के लिए वध कराने को उद्यत होने के लिए निवेदन किया।

आम्रकीट ने मुँह मोड़ लिया। वध के लिए वह किसी भी प्रकार उद्यत न था। अब उसे वही काया प्रिय लगने लगी थी। महामंत्री का आग्रह उसे तनिक भी न रुचा। प्राण बचाने के लिए वह एक डाली से दूसरी डाली पर भागने लगा।

यह आँख मिचौनी घंटी चलती रही। कीड़ा महामंत्री की पकड़ में न आया। बार-बार राजकाज और प्रिय परिवार का स्मरण दिलाने पर भी वह उस ओर ध्यान देने को सहमत न हुआ। अब उसे नई काया ही प्राण प्रिय लगने लगी थी।

थक हारे महामंत्री निराश लौटे और उन्होंने समूचा विवरण सभासदों एवं परिवारीजनों को सुना दिया।

विचारकों ने निर्णय दिया। आत्मा की इच्छा को ही प्रधानता दी जाय और मृत शरीर की अंत्येष्टि कर दिया जाय।


शान्तिकुँज का एकेडमी में परिवर्तन नूतन गतिविधियों का शुभारम्भ एवं विस्तार

शान्तिकुँज के क्रिया-कलापों का असाधारण गति से विस्तार हो रहा है। उसकी गतिविधियाँ दूर-दूर तक अपना प्रकाश फैला रही हैं। और विज्ञजनों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। मिशन के प्रयासों की जानकारी प्राप्त करने तथा जो किया जा रहा है उससे लाभान्वित होने के लिए, अनेकानेक ऐसे लोगों का मन बन रहा है, जिनका इससे पूर्व कोई परिचय या संबंध नहीं था। इस प्रकार के अगणित लोग आये दिन आते और अपनी जरूरतों का समाधान प्राप्त करते रहते हैं।

आश्रम के नाम में परिवर्तन

शान्तिकुँज तथा ब्रह्मवर्चस् दोनों के नाम ऐसे हैं जिनसे इनमें चल रही गतिविधियों का स्पष्ट परिचय नहीं मिलता। विशेषतया अहिन्दी भाषी लोगों को अधिक कठिनाई होती है। वे दोनों आश्रमों का नाम तक ठीक प्रकार उच्चारण नहीं कर पाते और न उनका अर्थ, कार्यों का स्वरूप ही समझ पाते हैं।

इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए आश्रम का नाम भी उनकी प्रवृत्तियों के अनुरूप सरल अँग्रेजी में अनूदित कर दिया गया है। इनके बोड़ो में भी आवश्यक सुधार परिवर्तन किया जा रहा है। इससे विदेशों से आने वालों तथा भारत के अहिन्दी भाषियों को सुविधा रहेगी। शान्तिकुँज को अब “शान्तिकुँज अकादमी (्नष्ड्डस्रद्गद्वब्)” नाम से जाना जायेगा ताकि उसका स्वरूप विद्यापीठ-प्राचीनकाल के विश्वविद्यालयों जैसा भासित होने लगे। ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया भी अब इस शिक्षण का एक अंग होगी। शिक्षण शान्तिकुँज में भी चलता है एवं ब्रह्मवर्चस् में भी। शोध कार्य भी दोनों जगह सम्पन्न होता है। इस प्रकार “शान्तिकुँज एकेडमी” शब्द के अंतर्गत ब्रह्मवर्चस् का नूतन शोध अनुसंधान भी समाहित हो गया है।

शानदार युग शिल्पी सत्र

पिछले वर्ष से शान्तिकुँज हरिद्वार की प्रशिक्षण प्रक्रिया, व्यक्तित्व निर्माण की, ज्ञानपीठ जैसे स्तर की रही है। उसमें एक साथ कई-कई सत्र चलते रहे हैं। नैतिक बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति के विभिन्न पक्षों से अवगत होने और उनके लिए आन्दोलन स्तर का प्रयास चलाने के लिए प्रचारक तैयार किये जाते रहे हैं। इस निमित्त प्रारम्भ में एक-एक महीने के युग शिल्पी सत्र चले। इन सत्रों में औसतन 100 शिक्षार्थी सम्मिलित होते रहे। स्थापित 2400 प्रज्ञापीठों के समीपवर्ती क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति-संवर्धन के लिए प्रशिक्षित कार्यकर्त्ताओं की महती आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। उसकी पूर्ति इन युग शिल्पियों से पूरी होने लगी है। उन्हें भाषण, सुगम-संगीत, कर्म-काण्डों के माध्यम से लोक शिक्षा, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन जैसे अनेक प्रयोजनों को कार्यान्वित करने की शिक्षा दी जाती है। प्रायः सभी शिक्षार्थी लोक सेवा के लिए प्राणपण से काम करने की प्रतिज्ञाएँ लेकर गये। उनने अपने-अपने क्षेत्र में प्रौढ़ शिक्षा प्रसार, वृक्षारोपण, व्यायामशालाओं का संस्थापन, झोला पुस्तकालय, दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन, जन्मदिवसोत्सवों के माध्यम से परिवार निर्माण की गोष्ठियाँ आदि अनेकों रचनात्मक कार्य जाते रहे आरंभ कर दिये। तीन-तीन की टोलियाँ बनाई। जो शान्तिकुँज में सीखा था उसे अपने क्षेत्र में कार्यकर्त्ताओं को सिखाने के लिए पाठशालाएँ चलाई। यह प्रशिक्षण व्यवस्था आगे भी यथावत् जारी रहेगी।

व्यक्तित्व एवं प्रतिभा विकास सत्र

यह नौ-नौ दिन के सत्र हर महीने पहली से नौ तक-ग्यारह से बीस तक-बाईस से उनतीस तक चलते हैं। इनका उद्देश्य चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का अधिकाधिक समावेश करने की विधि-व्यवस्था सिखाना है। आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज निर्माण के लिए भिन्न परिस्थितियों में किन्हें क्या करना चाहिए? इसके सभी पहलुओं को ऐसी शैली में समझाया जाता है कि मात्र सिद्धान्तवाद की दार्शनिक व्याख्या विवेचना ही न होती रहे, वरन् उसे वर्तमान विषम परिस्थितियों में भी कार्यान्वित किया जा सके।

लोग समर्थ, सम्पन्न, विद्वान, कलाकार तो बनते जा रहे हैं, पर जीवन को प्राणवान, प्रभावशाली, सुसंस्कृत, समुन्नत बनाने की दिशा में वैसा कुछ कर नहीं पा रहे जो आसानी से किया जा सकता था। प्रखर और प्रामाणिक व्यक्ति ही किसी देश की वास्तविक पूँजी हैं। जिनका दृष्टिकोण, चरित्र, व्यवहार सज्जनता सम्पन्न है, वे ही सच्चे अर्थों में भौतिक एवं आत्मिक प्रगति कर पाते हैं। प्रगतिशीलता का अर्थ साधन सम्पन्न होना ही नहीं, व्यक्तित्व की दृष्टि से ओजस्, तेजस्, वर्चस् जैसी विभूतियों से सम्पन्न होना भी है। इन नौ दिवसीय सत्रों में इस उपलब्धि के लिए सरलतापूर्वक अपनाई जा सकने की प्रक्रिया हृदयग्राही ढंग से सिखाई जाती है।

इस सत्र में नौ दिवसीय गायत्री अनुष्ठान, साधना का भी समावेश है, ताकि आत्मिक क्षेत्र की प्रसुप्त सूक्ष्म शक्तियों का जागरण भी सम्भव हो सके। यह सत्र बड़ी सफलतापूर्वक चल रहे हैं। हर सत्र में औसतन 250 शिक्षार्थी सम्मिलित होते हैं।

राजतंत्र वर्ग के शिक्षार्थी

राज-काज के लिए भी प्रामाणिक, उत्तरदायी, ईमानदार और लगनशील कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है। इसके बिना श्रेष्ठतम योजना भी कार्यान्वित नहीं हो पाती। इस कमी को पूरा करने के लिए कितने ही सरकारी विभाग अपने प्रमुख कार्यकर्त्ताओं को समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी का सत्प्रवृत्तियों का अभ्यस्त बनाना चाहते हैं। इसके लिए शान्तिकुँज ने विशेष व्यवस्था की है। शिक्षा विभाग ने इस संबंध में अधिक उत्साह दिखाया है ताकि उस प्रशिक्षण का प्रकाश छात्रों एवं उनके अभिभावकों को भी मिल सके। प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारी अपने सम्बद्ध दूसरे अन्यों को प्रशिक्षित करते हैं।

गतवर्ष नवम्बर 1985 से अब तक लगभग चार हजार प्रधानाचार्य एवं निरीक्षक स्तर के शिक्षा विभाग के कार्यकर्ता प्रशिक्षित हुए। इसके अतिरिक्त, मद्य निषेध, परिवहन, खादी ग्रामोद्योग, युवक मंगल दल, महिला स्काउट विभागों, के प्रमुख कार्यकर्ता अपने-अपने ढंग की आवश्यक शिक्षा योजनाबद्ध रूप से प्राप्त कर चुके हैं।

प्रशिक्षण प्राप्त लोगों ने वापस लौटने पर अपने-अपने क्षेत्र में जो सुधार परिवर्तन, विकास, सम्पन्न किये हैं, उसकी चर्चा दूर-दूर तक फैली है। प्रगति और परिवर्तन के लक्ष्य प्रत्यक्ष प्रकट हुए हैं। इससे प्रभावित होकर अन्यान्य कितने ही प्रान्तों ने यह इच्छा प्रकट की है कि उनके कार्यकर्ताओं को भी यह प्रशिक्षण प्राप्त हो ताकि वे भी उनके द्वारा अपने पूरे प्रयत्न से इस पद्धति को विकसित कर सकें। प्रायः इस प्रशिक्षण में 100 अधिकारी 5 दिन के लिए आते हैं।

ब्रह्मवर्चस् शोध में नय समावेश

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की उपलब्धियों ने बुद्धिजीवी वर्ग का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया है। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का कार्य इतना आवश्यक और महत्वपूर्ण है कि उसकी आवश्यकता उपयोगिता को सर्वत्र माना जाने लगा है। इस संबंध में चर्चाएँ तो बहुत हुई हैं पर व्यावहारिक एवं बड़े साधन सम्पन्न कदम कदाचित कहीं से भी नहीं उठाये गये। यह कार्य सुचारु रूप से चलते हुए शान्तिकुँज के ही एक विभाग ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में आशाजनक रीति से होते हुए देखे जा सकते हैं।

जड़ी बूटी शोध के परिणाम इतने आश्चर्यजनक निकाले हैं कि यह आशा बल पकड़ती जा रही है कि चिकित्सा क्षेत्र में जड़ी बूटियों की उपयोगिता ऐलोपैथी के महंगे उपचारों की तुलना में कहीं अधिक सस्ती और लाभदायक होगी। आयुर्वेद में नव-जीवन संचार हो सकेगा। शान्तिकुँज ब्रह्मवर्चस् में जितनी जगह इस कार्य के उपयुक्त शेष थी उस सभी में नये सिरे से नई जड़ी बूटियों का आरोपण किया गया है और उनकी वर्गीकरण-विश्लेषण के लिए नये यंत्र फिट किये गये हैं।

प्रदूषण का निराकरण यज्ञ विद्या द्वारा सम्भव है। इसे प्रभावित करने के लिए इन्हीं दिनों एक नयी प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है और उसमें बहुमूल्य नये यंत्र फिट किये जा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक चिकित्सा में अग्निहोत्र किस प्रकार, किस सीमा तक सहायक सिद्ध हो सकता है, यह भी शोध का प्रमुख विषय है। विभिन्न साधनाओं का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका निष्कर्ष निकालने के लिए उपवास, संयम, नियम, मंत्र-शक्ति, प्राणायाम, ध्यान, आदि विषयों को भी शोध प्रक्रिया में नये सिरे से सम्मिलित किया गया है।

राष्ट्रीय एकता सम्मेलन और गायत्री यज्ञ

गतवर्ष प्रायः 500 राष्ट्रीय एकता आयोजन शत-कुण्डी-गायत्री महायज्ञों के साथ देश के हर भाग में सम्पन्न हुए। इनमें समय की सभी माँगों एवं आवश्यकताओं से जन-जन को अवगत कराया गया। उपस्थिति सभी में आश्चर्यजनक थी। औसतन 50 हजार जनता हर आयोजन में एकत्रित हुई। कहीं-कहीं उपस्थिति एक लाख से भी अधिक थी। ऐसा उत्साह उमड़ते अन्य संस्थाओं द्वारा आयोजित समारोहों में प्रायः कहीं भी नहीं देखा जाता। कारण एक ही था। अध्यात्म अवलम्बन से निज की समस्त समस्याओं का हल कैसे किया जा सकता है?

राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की उपयोगिता अनेक दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण समझी गई। अलगाववाद की अनेक दुष्प्रवृत्तियां इन दिनों उभर रही हैं। सम्प्रदायवाद, भाषावाद, प्रान्तवाद, जातिवाद, वर्गवाद, आदि के नाम पर जो अलगाव की, बिखराव की, हवा चल रही है उसे रोकने के लिए प्रचण्ड आन्दोलन की आवश्यकता समझी गई। इसी निमित्त सर्वत्र ऐसे आयोजनों का प्रबन्ध किया गया, जिससे हर स्तर के अलगाव के खतरों को समझने उनसे बचने के लिए जनमत को प्रशिक्षित किया जा सके।

वीडियो प्रदर्शन का विस्तार

प्रचार माध्यमों में एक नई व्यवस्था वीडियो कैसेटों के माध्यम से करने के लिए नई योजना बनी है। अब तक शान्तिकुँज में इस प्रक्रिया द्वारा महत्वपूर्ण प्रवचन ही इस माध्यम से सुनाये जाते थे। अब उस योजना का अनेक गुना विस्तार किया गया है।

व्यक्ति निर्माण, प्रतिभा विकास, परिवारों में सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन, समाज सुधार, अर्थ-संतुलन उदात्त दृष्टिकोण, आदर्श चरित्र, सुसंस्कृत व्यवहार, सामाजिक उत्कर्ष, सामयिक समस्याओं का समाधान जैसे मानव जीवन से संबंधित सभी विषयों पर “यूमेटिक” सिस्टम से नयी टी.वी. फिल्में तैयार करने की योजना बनी है। प्रेरणाप्रद गीतों के एक्शन से अन्यान्य विषयों पर प्रश्नोत्तर शैली से प्रस्तुतीकरण की रीति-नीति अपनाई जायगी। आरम्भ में इनका प्रदर्शन शान्तिकुँज में नई व्यवस्था बनाकर किया जायगा। पर बाद में यह कैसेट अन्य उत्सुक जनों को भी उपलब्ध कराये जा सकेंगे।

छोटे देहातों में बिखरी हुई अशिक्षित देहाती जनता को प्रगति की सर्वतोमुखी सम्भावनाओं की रीति-नीति से अवगत कराने के लिए आधुनिकतम और बिजली वाले क्षेत्रों में सुलभ पद्धति वीडियो की है। दृश्य और श्रव्य का उसमें समुचित समावेश है। यह साहित्य से, पत्र पत्रिकाओं से भी अधिक प्रभावी माध्यम है। इसके सहारे जन साधारण को वह सब कुछ सिखाया समझाया जा सकता है जो उसके लिए समय के अनुरूप नितान्त आवश्यक है। जो कमी सरकारी तंत्र में है, उसकी पूर्ति का प्रयास शान्तिकुँज एकेडमी द्वारा किया जायगा।

वर्षा के दिनों में प्रज्ञा-संस्थानों के सत्र सम्मेलन

शान्तिकुँज के तत्त्वावधान में प्रायः 2400 प्रज्ञा पीठें देश के कोने-कोने में बनी हैं। इनके पीछे योजना है कि प्रत्येक प्रज्ञापीठ अपने समीपवर्ती दस गांवों का मण्डल बनायें और उनमें सत्प्रवृत्तियों का सूत्र संचालन करें। इस प्रकार 2400 शक्तिपीठ 24000 गांवों के मुहल्लों के नवनिर्माण का कार्य करेंगी। उनमें सृजनात्मक, सुधारात्मक स्तर की प्रवृत्तियों को फलने-फूलने का अवसर मिलेगा। यह निर्धारण बहुत हद तक कार्यान्वित भी हुआ है और सफल भी रहा है।

अब आगे उनमें और भी अधिक सुव्यवस्थित गतिशीलता लानी है। अगले वर्ष सभी को अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नये सिरे से नया कार्यक्रम निर्धारण करना है-निर्धारण को पूरा कर दिखाना है।

इस प्रयोजन के लिए इसी वर्षा ऋतु में श्रावण, भाद्रपद में सभी शक्तिपीठ प्रज्ञापीठों, के शान्तिकुँज में सम्मेलन बुलाये गये हैं। यह सम्मेलन छोटे-छोटे, बारी-बारी से होंगे। एक क्षेत्र में कार्यकर्ता एक बार में जमा होंगे। हर प्रज्ञापीठ के दो प्रतिनिधि आवेंगे। सम्मेलन तीन दिन तक चलेगा। चौथे दिन विदाई हो जायगी। प्रातः विदाई, शाम तक नयों का आगमन, यही क्रम पूरे दो महीने चलेगा। इसी बीच अगले वर्ष के सभी निर्धारण नियोजित कर लिए जायेंगे। जहाँ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन होने हैं, गायत्री यज्ञ छोटे या बड़े होने है, उनकी तिथियाँ भी इसी अवसर पर निश्चित हो जायगी, ताकि उन आयोजनों में संगीत की तथा वक्ताओं की टोलियाँ भेजने का निश्चय ही इन्हीं सम्मेलनों में हो जायेगा। उनमें काट-छाँट, फेर-बदल करने का अवसर न रहेगा। सभी प्रज्ञापीठों को उनकी तारीखें भेजी जा रही हैं।


आत्मा से

(लाखन सिंह भदौरिया)


आत्मा से (Kavita)

खो रही हो कहो, किस खनक में यहाँ? बह रही किस हवा की सनक में यहाँ,

देह के साज-श्रृंगार में होड़ ले- सो गयी हो, रजत में कनक में यहाँ

शील परिधान, भूषण गुणों के भुला- सौम्य रूपे, कहीं छवि सँवरती नहीं।

आसुरी चाह में आह भरते हुये। जी रही जिन्दगी, आज मरते हुये।

रेत की राह पर पाँव चलते चले- डूबती साँस है, सिन्धु तरते हुये।

हाथ पतवार की दूरियाँ बढ़ रहीं- डूबती इस तरह, नाव तरती नहीं।

शक्ति को कौन दे? शक्ति! बोलो तुम्हीं। तृप्ति को कौन दे? तृप्ति! बोलो तुम्हीं।

चेतना, प्रेरणा, भावना हो तुम्हीं। प्रीति को कौन दे मुक्ति बोलो तुम्हीं।

तुम संवारो सुधारो नहीं सृष्टि को- तो किसी और से ये सुधरती नहीं।

*समाप्त*