धर्म किन्हीं विशेष अभिरुचि के या फालतू समय वालों के मन बहलाव का माध्यम है अथवा उसका कोई सार्वजनिक उपयोग भी है? इस प्रश्न के उत्तर में हमें धर्म का स्वरूप और उद्देश्य समझने का प्रयत्न करना होगा और यह जानना होगा कि क्या तथाकथित धर्माध्यक्षों द्वारा अपने-अपने ढंग से किया गया बहुमुखी प्रतिपादन ही धर्म है? अथवा उसके पीछे व्यक्ति और समाज की उपयोगी मार्गदर्शन की तथ्यपूर्ण क्षमता भी है।
सर जूलियन हक्सले ने अपने ग्रन्थ 'रिलीजन विदाउट रेवेलेशन' में धर्म संप्रदायों के सम्मिलित सत्य और असत्य की समीक्षा करते हुए लिखा है कि सत्य, ज्ञान और सौंदर्य की अभिव्यक्तियों से जो धर्म जितना पिछडा हुआ है,उसे उतना ही झूठा और नीचा समझा जाना चाहिए। सालोमन रीनाइक की यह उक्ति एक खीज भर है, जिसमें उन्होंने धर्म पर 'मानवी क्षमताओं पर रोक लगाने' का आक्षेप किया है। वस्तुतः वैसा है नहीं। धर्म की मूल आत्मा न्याय, कर्त्तव्य एवं औचित्य का समर्थन करती है। प्रथा-परंपराएँ तो धर्म के आवरण मात्र हैं। जिन्हें समय-समय पर बदले जाने की आवश्यकता पड़ती हैं।
देशभक्ति ही सब कुछ नहीं है। विश्व भक्ति उससे भी ऊपर है। समाज का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, बहुमत की मान्यताओं के समर्थन में कुछ भी क्यों न कहा जाता रहे; अंततः विवेक ही सबसे ऊपर है, उसे देशभक्ति से भी ऊँचा स्थान मिलना चाहिए। 'बहु-जन हिताय, बहु-जन सुखाय' के आधार पर विधान कुछ भी क्यों न बनते रहें, उच्च आदर्शों का स्थान सबसे ऊँचा है; भले ही उनके समर्थन में नीतिनिष्ठ व्यक्तियों की थोड़ी-सी-ही संख्या क्यों न हो?
धर्म दुधारी तलवार है। यदि वह अपरिपक्व दर्शन और संकीर्ण सांप्रदायिकता का समर्थन भर करता है तो वह हानिकारक है। किंतु यदि उसमें नीतिनिष्ठा का समुचित समावेश है तो उसके द्वारा मनुष्य और समाज का हित साधन ही होगा।
विज्ञान और धर्म के शोध विषय पृथक है। एक पदार्थ की गहराई को खोजता है, दूसरा चेतना के मर्मस्थल को। इतने पर भी दोनों का मूल प्रयोजन एक है—सत्य की शोध। इसके लिए आवश्यक है कि मस्तिष्क को किन्हीं पूर्वाग्रहों से जकड़ कर न रखा जाए। पिछले लोग क्या सोचते क्या कहते और क्या करते रहे हैं? इसकी जानकारी उत्तम है। उसके सहारे तथ्यों तक पहुँचना सरल पड़ता है, पर यह मानकर नहीं चला जा सकता कि जो जाना या माना गया है, उसमें संशोधन या सुधार की गुंजाइश नहीं है। तथ्यों को स्वीकार करने की शोध दृष्टि में यह साहस रहता है कि यदि स्वीकृतियों से भिन्न प्रकार के तथ्य सामने आते हैं तो उनके स्वीकार करने में इसलिए असमंजस न करना पड़े कि अब तक के चिंतन को झुठलाना पड़ेगा।
तर्कहीन मनःस्थिति का नाम धार्मिकता नहीं है। आँखें बंद करके किसी के भी वचन को गले नहीं उतारना चाहिए। अपने लोग कहते हैं या पराये-बात संस्कृत या अरबी भाषा में कही गई है अथवा बोल चाल की भाषा में इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। स्वीकार करने योग्य वही है जिसमें तथ्य जुड़े हुए हों और जिसे विवेक की कसौटी पर खरा सिद्ध किया जा सके। बिना खोज परख के जो धर्म के नाम पर किसी भी मान्यता या प्रथा को स्वीकार कर ले, वह स्वस्थ दृष्टि नहीं है। धार्मिक मन सत्य का उपासक होता है। उसे औचित्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए। भले ही इसके लिए उन्हें पूर्वजों की अथवा उपदेशकों, ग्रंथों अथवा साथियों की ही अवहेलना क्यों न करनी पड़े।
भगवान ने मनुष्य जीवन के रूप में असाधारण उपहार प्रदान किया है, तो साथ में यह उत्तरदायित्व भी सौंपा है कि इस विभूति का समुचित सदुपयोग किया जाए।
दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बन जाता है। धन-वैभव तक अनेकों ऐसी दुष्प्रवृतियाँ सिखा देता है जो न केवल स्वयं के विदा होने का, अपितु साथ में स्वास्थ्य, संतुलन, यश और सहयोग भी छिन जाने का निमित्त कारण बनती हैं।
जीवनधारी के लिए सबसे बड़ा सुयोग यह है कि वह मनुष्य जन्म प्राप्त कर सके। इनमें भी भाग्यवान वे हैं, जो उसका सदुपयोग जानते और कर पाते हैं। पेट भर लेने और इंद्रिय भोगों की सुविधा हर योनि में हैं। जिसका जैसा आकार और स्वरूप है, उसे उस स्तर की सुविधाएँ, सुख-संवेदनाएँ प्राप्त करने का अवसर भी है। यदि इतना ही बन पड़ा तो समझना चाहिए कि मनुष्य जीवन की गरिमा को समझने में भूल हुई है और दिन उसी प्रकार कट गए जैसे कि अन्य प्राणी काट लेते हैं।
मानव जीवन की विशेषता यह है कि वह अपने अंतःकरण को—व्यक्तित्व को समुन्नत करे और ऐसे पद चिन्ह छोड़े, जिन पर चलते हुए पीछे वालों को प्रगति के परम लक्ष्य तक पहुँचने की सुविधाएँ मिलें। संक्षेप में यही मानवी आदर्शवादिता हैं। जिसे अपनाने पर इस सुयोग की सार्थकता बन पड़ती हैं।
“गलत ढंग से विचार करने वाला उसी प्रकार भटकाव में मारा-मारा फिरता है जैसा कि राजमार्ग को छोड़कर उतावली में अनदेखी पगडंडियाँ पकड़ने वाला।”
"असफलता का अर्थ है—अभीष्ट कार्य के लिए जितना श्रम और मनोयोग लगाना चाहिए था, उसमें कटौती होना। यदि गिनना भूल जाएँ तो दुबारा गिनने लगें। गलती प्रतीत होने पर भूल-सुधार का दण्ड सहना पड़े तो कुछ हर्ज नहीं।”
"किसी का मूल्यांकन करते समय अपनी सीमित जानकारी को ही आधार मत मानों। ठहरो और वास्तविकता का पता लगाओ, ताकि गलत निर्णय के कारण दूसरे के साथ अन्याय न हो और अपने को भूल के लिए पछताना न पड़े।”
“विरोधियों से झगड़ो मत। उन्हें तथ्य समझाओ और वस्तुस्थिति से अवगत कराओ। दूसरे की कठिनाई को कठिनाई समझो और नीति का रास्ता अपनाओ। अधिकाश झंझट गलतफहमी के कारण होते हैं, जिसे समझा और समझाया जा सकता है।”
“घमंड मत करो। वह बहुत बोझिल होता है। उसका रख-रखाव करने के लिए बहुत समय लगता और खर्च पड़ता है। प्रसन्न रहना उससे कहीं अच्छा हैं। घमंडी की तुलना में लोग हँसमुख से अधिक प्रभावित होते हैं। नम्रतायुक्त प्रसन्नता बड़प्पन की निशानी है और शेखीखोरी ओछेपन की।”
“सदा मतलब निकालने की ही फिराक में मत रहो। यह भी देखो कि स्वार्थ के लिए किसी के साथ अनर्थकारी बर्ताव तो नहीं हो रहा है।”
"सहायता तो खुशामदी भी प्राप्त कर लेते हैं। पर वे किसी को संतुष्ट एवं प्रभावित नहीं कर सकते। मात्र सच्चाई में ही वह शक्ति है जो विरोधी को भी शांत कर सकती है।”
"तुच्छजन मात्र अपनी इच्छा की पूर्ति चाहते हैं। भले ही वह अनुचित हो और उसके लिए अनुचित उपाय अपनाए गए हों। नीच न बनो। अपनी इच्छाओं को इतना महत्त्व न दो कि स्वार्थ पूर्ति के लिए अपना ईमान बेचना पड़े।”
“विचारशील अपने दोष देखते और उन्हें सुधारते हैं। मात्र दुराग्रही ही दूसरों के दोष ढूँढ़ने और आरोप लगाने में निरत रहते हैं। अच्छा यह है कि भलों के साथ रहा जाए। उनके तौर-तरीके देखकर भलाई करना सीखा जाए।”
“सज्जनता बरतो। सभी से भला व्यवहार करो। मैत्री का स्वभाव बनाओ। किसी से द्वेष न करो। बुराई मिटाने का सही तरीका यह है कि बुराई मिटाने का सही तरीका यह है कि बुरे के प्रति घृणा न करते हुए भी बुराई के साथ असहयोग किया जाए। बुरे से भयभीत होकर डर जाना, उन्हें कुकर्म करने के लिए प्रकारान्तर से प्रोत्साहित करना ही है।"
“धन कमाया जाए, पर कमाई का रास्ता सही हो। बुरे उपायों से कमाया गया धन ठहरता नहीं। दुर्व्यसनों में बह जाता है और उसके लिए पतन का मार्ग प्रशस्त करता है, जिसने धन का सदुपयोग नहीं सीखा और अपव्यय में अविवेकपूर्वक खर्च कर डाला। ऐसों के हाथ पश्चाताप ही शेष रहता है।"
“चिंतित मत रहो और न खिन्नता अथवा निराशा में डूबो। चिंता का कारण समझो और वह उपाय सोचो जिससे उसकी जड़ कटे और समाधान मिले।”
"अंधविश्वाशी मत बनो। किसी कि बात इसलिए अंगीकार न करो कि वह धनी,ज्ञानी अथवा अधिकारी है। गहराई से निष्पक्षतापूर्वक सत्य की खोज करो और वही मानो जो उचित और न्याय संगत है।"
सत्साहित्य सामने रखा हुआ महकता उद्यान है।
आत्मा ने परमात्मा से याचना की—“असतो मा सद्गमय”। “तमसो मा ज्योतिर्गमय”। मृत्योर्माऽमृतंगमय”। ये तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान को पुकारा था। गज जब ग्राह के मुख में फँसता ही चला गया, पराक्रम काम न आया, जब जौ भर सूँड़ जल से बाहर रह गई तो उसने भी गुहार मचाई। दोनों को ही समय रहते सहारा मिला। एक की लाज बच गई—दूसरे के प्राण बच गए। जीवात्मा की तात्विक स्थिति भी ऐसी ही है। उसका संकट इनसे किसी भी प्रकार कम नहीं है।
मोटे तौर पर मनुष्य खाता, सोता, रौब गाँठता और शान दिखाता है। विलास-वैभव का यथास्थिति लाभ उठाता है। किन्तु यह सारा सरंजाम शरीर तक ही सीमित है और अस्थिर भी है। समय गतिशील हैं। साथ ही उपलब्धियों की अनुभूतियाँ भी भूतकालीन बनती जाती हैं। इसी बीच इच्छाएँ प्रबल होती हैं, पिछली उपलब्धियाँ स्मरण आती रहती हैं और उससे भी अधिक अच्छी स्थिति पाने की ललक उभरती है; लिप्सा जगती है। पिछले दिन जो मिला था, अगले दिन उससे भी अधिक पाने का मनोरथ इस आतुरता से उभरता है कि वर्तमान की स्थिति असंतोष से ही भरी रहती है। जो मिल चुका वह चला गया। जो इच्छित हैं, उसके मिलने का कोई निश्चय या समय नहीं। इसलिए मृगतृष्णा स्तर की प्यास से हर घड़ी गला सूखता रहता है। संतोष और चैन का अनुभव हो नहीं पाता। न विगत को वापस बुलाया जा सकता है और न आगत कोई निश्चित आश्वासन ही देता है। इस स्थिति में अशांति, उद्वेग के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ता।
प्रश्न सहज ही उठता है कि इस स्थिति का कारण क्या है? जब इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तब पता चलता है कि जो असत् था, अस्थिर था, नाशवान था, जाने वाला था, उसे चाहा गया, उसे पकड़ा गया। जो स्थिर था, शाश्वत था, सनातन था, सत्-चित् और आनन्द से ओत-प्रोत था, उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया गया; उपेक्षा की गई और नगण्य समझा गया। इसी भूल का परिणाम है कि भीतर और बाहर से सब प्रकार संपन्न होते हुए भी अभावग्रस्तों की तरह, दीन-हीन की तरह, अभागी जिन्दगी जियी गई। सांत्वना न मिल सकी और न किसी को दी जा सकी।
सत् स्थिर आत्मा है। गुण-कर्म-स्वभाव में सन्निहित मानवी गरिमा भी सत् है। जो सत् को पकड़ता है, अपनाता है और धारण करता है। यह पता चलने पर हिरन की भगदड़ बंद हो जाती है और अपनी ही सुवास सूँघते हुए वह हर घड़ी आनंदविभोर रहता है। भीतर से उभरी गरिमा बाह्य जीवन को भी उल्लसित, विकसित, विभूतिवान बना देती है। चिंतन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृततुल्य अनुदान बरसाता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है कि उसे 'सत्' की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें मूँदकर दौड़ने की प्रवृत्ति रुके। शांति का सरोवर सामने रहते हुए भी सड़न भरे दलदल में घुस पड़ने और चीखने-चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। इतना बन पड़े तो किसी से कुछ माँगना-चाहना न पड़े। अपने अंतराल से ही आनंद का ऐसा निर्झर बहे जो अपने को भी गौरव प्रदान करें और दूसरों की हित साधना करते हुए धन्य बने। आत्मा की दूसरी पुकार है— '“तमसो माँ ज्योतिर्गमय'। हे सर्वशक्तिमान ! हमें अंधकार से प्रकाश की और ले चल। जो क्रम अपनाया गया है, वह अंधकार में भटकने के समान है। रात्रि की तमिस्रा में कुछ पता नहीं चलता कि किस दिशा में चल रहे हैं। यथार्थता का बोध न होने से ठोकर खाते और कंटकों की चुभन से मर्माहत होते हैं। कुछ का कुछ समझ में आता है। कुछ का कुछ दीख पड़ता है। शरीरगत सुविधा ही लक्ष्य होती हैं। जड़ का जड़ता के साथ पाला पड़ता है। चेतना का अमृतकुंभ कहाँ रखा है? इसकी प्रतीति ही नहीं होती। वर्तमान और भविष्य अंधकारमय दिखता है। वैभव बटोर लेता है पर वह अंगार बनकर जलता भर हैं। सदुपयोग न बन पड़ने से उत्तम वस्तु भी घातक और निकृष्ट बन जाती है। मनुष्य जीवन में भरी हुई विभूतियाँ यदि सही रूप से पहचानी और प्रयुक्त कि गई होतीं तो उसका लाभ मिला होता, पर अंधकार में तो सर्वत्र भय ही भय है। मृत्यु का भय, हानि का भय, अपहरण का भय, अपनों से भय, वीरानो से भय। अंधकार का, अज्ञान का ही दूसरा नाम भय है। भयानकता कितनी डरावनी होती है, इसे हम रोज ही अनुभव करते हैं। प्राप्त करना चाहते हैं, पर कुछ के बदले कुछ हाथ लगता हैं। अपने बिराने दीखते हैं और बिराने अपने। सुंदर आकृतियाँ भी अंधेरे में भूत-प्रेत जैसी कुरूप और भयंकर लगती हैं। डर से जीवन भर सा गया है। यह अज्ञान- अंधकार की ही करतूत है। प्रकाश भीतर दबा पड़ा है। ऊपर से बरसता नहीं। इस विपन्नता से घिरी हुई आत्मा अपने सृजेता को पुकारता है—“अंधकार से प्रकाश की ओर -अज्ञान से ज्ञान की और ले चल।" भटकाव से निकाल और उस राह पर खड़ा कर जिसे अपनाकर सरलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।
तीसरी पुकार जीवात्मा की है कि मृत्यु की ओर नहीं अमृत की ओर ले चल। कुसंस्कारिता के कषाय-कल्मष संपर्क-क्षेत्र के प्रचलन, उस ओर घसीटे लिए जा रहे हैं, जिस पर मरण ही मरण हैं। आत्महनन के उपरांत जो कुछ हस्तगत होता है, उसे मरणधर्मा ही कहा जा सकता है। आकाँक्षाओं की बाढ़ के बहाव में न धैर्य टिक पाता है, न विवेक। जीवन कूड़े-करकट की तरह एक गंदे नाले में बहा जा रहा है। न ही किनारा दीखता है, न ठहराव, न आश्रय।
मनुष्य को जीवनरूपी अनुपम संपदा विभूतियों से भरी-पूरी मिली है। पर उनमें से किसी को भी जागृत-जीवन्त करने का अवसर नहीं मिला। जिस संचित पुण्य के आधार पर यह अनुदान मिला था, उसे कौड़ीमोल बेचा, लुटाया और बहाया जा रहा है। यदि बन पड़ा होता तो पंचतत्त्वॉ की काया चले जाने के उपरांत भी यश शरीर जीवित रहता; अनुकरणीय, अभिनंदनीय बनता। प्रकाश स्तंभ की तरह भटकते, टकराते जलयानों को सचेत करता और उनकी विपत्ति टालता। पर ऐसा भी तो कुछ नहीं बन पा रहा है। वासना और तृष्णा के दो पाटों के बीच अपना अस्तित्व पिसता चला जा रहा है। अपहरण और शोषण ही रुचिकर लग रहा हैं। शरीर को, इंद्रियों को, विचारणा को, भविष्य को, सभी को, बर्बाद करने वाली विडंबना ने चेतना पर आधिपत्य जमाया हुआ है। पत्नी से लेकर संतान तक को ऊँचा उठाने की अपेक्षा नीचे गिराने में ही मोह की पूर्ति होती दिखाई पड़ती है। ऐसी है अपनी अनगढ़ समझ, जो अमृत बरबाद करती और विष चाटती है।
हे परमात्मा! अपनी सत्ता का मरण हो रहा है। मौत एक-एक कदम आगे बढ़ती आ रही है, और अब-तब में दबोचने ही वाली हैं। इससे पूर्व हम अपने अंतःकरण को आनंद को, भविष्य को निरंतर मारते-कुचलते रहते हैं। हे परमप्रभु! इस महामरण से हमें बचा ले और हमें अपनी गोद में बिठाकर अमृत का रसास्वादन करा दें।
इन्द्रिय लोलुपता के वशीभूत होकर सामान्य प्राणी भी विपत्ति में फँसते हैं। फिर बढ़ी हुई लिप्सा के कारण मनुष्य का सर्वनाश हो तो आश्चर्य ही क्या?
बहेलिए की वीणा पर मुग्ध होकर कान का लोलुप हिरन मारा जाता है। गंध पर सुधि–बुधि खो बैठने वाला भौंरा कमल में बन्द होकर प्राण गंवाता है। जीभ की लोलुप मछली आटे की गोली आटे की गोली में गला फँसाती है। कामुक हाथी छद्म हथिनी के पीछे लगकर पकड़ने वालों के खड्ड में जा गिरता है और दुर्गतिग्रस्त होता हैं। आँख का असंयम बरतने वाला पतंगा दीपक पर गिर कर प्राण गंवाता हैं। आँख मूँद कर चासनी पर कूदने वाली मक्खी पर फँसाती और जान गंवाती है। जब कि किनारे बैठ कर धीरे-धीरे पेट भरने वाली चींटी पेट भी मरती है और विपत्ति में भी नहीं पड़ती।
भगवान की कृपा मनुष्य पर बरसी या नहीं, इसकी पहचान क्या है? इस संबंध में ईश्वर विश्वासियों की इच्छा निरन्तर बनी रहती है। कई सोचते हैं की ईश्वर जिस पर प्रसन्न होते है, उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि के रूप में उनके सामने आ खड़े होते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि 'वरदान माँग' अर्थात् “इच्छित मनोकामना को पूरी कराने के लिए जो सहायता चाहता हो उसे कह और ले।” मोटी धारणा यही है।
कई हृदयाकाश में प्रकाश ज्योति का दर्शन करते हैं। समाधिस्थ एकाग्र हो जाते हैं। वैराग्य धारण करके ऐसा सोचते हैं कि संसार को, कुटुंब-परिवार को, भवबंधन समझकर उन्हें त्याग दिया तो जीवनमुक्त हो गए। जन्म-मरण के बंधन से छूट गए। कई ‘सोऽहम्’ साधना में श्वास के साथ चलनेवाली आवागमन की ध्वनियों को सुनते हैं। कइयों को कान बंद कर लेने पर घंटा, शंख, मृदंग, मंजीर, गर्जन आदि के शब्द सुनाई पड़ते हैं और लगता है कि ईश्वर के सांकेतिक वचन सुन रहे हैं। उसका अर्थ समझने लगेंगे तो त्रिकालदर्शी बन जाएँगे।
कुछ को षट्चक्रभेदन की कल्पना उभरती रहती है। चिरसेवित कल्पना भावना बन जाती है। इस भावना की मस्ती में वे चक्र आदि प्रगाढ़ ध्यानावस्था का पुट लगाकर यथार्थवत् दीखने लगते हैं। वस्तुतः वे सूक्ष्मभेद शरीर में अवस्थित हैं। स्थूलशरीर में जहाँ-तहाँ नाड़ी गुच्छक ही हैं। उन्हें सूक्ष्मशरीर में चक्रों की उपस्थिति बतानेवाले संकेत भर कहा जा सकता है। प्लेक्सस को ही चक्र मान लेना उचित नहीं।
ध्यान के लिए शरीर के भीतर ही कई महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिनमें सघन एकाग्रता की साधना करके कई प्रसुप्त पड़े केंद्रों के सूक्ष्म प्राण को जगाया जा सकता है। मस्तिष्क के मध्य में सहस्रदल कमल है। उसे विष्णु भगवान की शेष शैया की अलंकारिक महत्ता दी गई हैं। उसी को कैलाश मान सरोवर की भी उपमा दी गयी है। उसी को कैलाश मान सरोवर की भी उपमा दी गई है। मस्तिष्क के ग्रे मैटर रूपी समुद्र में जहाँ-तहाँ पड़े नाभिक केंद्र रूपी द्वीप भी होते हैं जिनकी जागृति परामानसिक शक्तियों को जन्म देती है। मस्तिष्क में भरे द्रव्य सी.एस.एफ. को ही विष्णु भक्त क्षीरसागर की उक्ति देते हैं।
ध्यान की परिपक्वावस्था में यह सहस्रार कमल और ब्रह्मरंध्र शिव या विष्णु का निवास स्थान प्रतीत होता है। इस प्रतीति को श्रद्धा के समन्वय से और भी अध्याय प्रगाढ़ बनाया जा सकता है। मस्तिष्क मध्य, हृदय भाग और नाभि मध्य में ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि, एवं शिव ग्रन्थि भी हैं, जिनके संबंध में कहा जाता है कि इन गाँठों के बंधनों में जीवन बँधा हैं। यदि उन्हें खोला जा सके तो मुक्ति मिल सकती है।
नादयोग और सोऽहम् साधना के विषय में भी उनके बढ़े-चढ़े माहात्म्यों की चर्चा की जाती हैं। कुंडलिनी जागरण भी ऐसा ही प्रसंग है, जिसकी उपमा ज्वालामुखी फटने से दी जाती है। इतना सब होते हुए भी साधारणतया साधना क्षेत्र के जिज्ञासुओं में यही भ्रम बना रहता हैं कि यह शक्ति केंद्र स्थूलशरीर में विद्यमान है और ध्यान, मर्दन, योगासन आदि करने से यही स्थान, अपना चमत्कारी प्रतिफल दिखाने लगते हैं।
इस भ्रम से जितनी जल्दी उबरा जाए उतना ही उत्तम है। शरीर के अंग अवयवों की संरचना और कार्य पद्धति काय विज्ञानी भली प्रकार जानते हैं। इस जानकारी के संबंध में कोई भ्रम हो तो उसे किसी मृत शरीर की शल्य क्रिया करके जाना जा सकता है। विशेषज्ञों के मतानुसार यह भी समझा जा सकता है कि किस अवयव की कार्य पद्धति क्या है? और उनमें क्या-क्या गुण दोष उत्पन्न होते रहते हैं या हो सकते हैं। इस कथन और आध्यात्मिक विवेचन का परस्पर कोई तालमेल नहीं बैठता। अध्यात्म का आरंभ सूक्ष्मशरीर से होता हैं। स्थूलशरीर तो रक्त माँस, अस्थि, मज्जा आदि का समुच्चय है। वह तनिक-सी बीमारी के चोट के आघात से कुंहलाते, तिलमिलाते देखा गया है। वृद्धावस्था की जीर्णता भी ऐसी होती है जिसमें कई साधनाएँ संभव नहीं रहतीं। आँख में दृष्टि दोष आने पर त्राटक नहीं हो सकता। कान में बहरापन छा जाने के उपरांत नादयोग की साधना संभव नहीं। इसी प्रकार मनोबल घट जाने पर ध्यान की स्थिति अस्त−व्यस्त जैसी रहने लगती है। घुटने जकड़ जाने पर वे पूरी तरह खुलते नहीं। ऐसी दशा में विभिन्न प्रकार के आसन लगाना असंभव हो जाता है। कमर झुक जाने पर वे प्राणायाम नहीं हो सकते, जिनके लिए कमर सीधी रखने की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि युवावस्था के निरोग शरीर में ही शरीरगत साधनाएँ बन पड़ती हैं। इन कठिनाइयों के रहते यह नहीं कहा जा सकता कि साधना का उपयुक्त काल तो आयुष्य की चौथी अवस्था में हैं। इसीलिए चतुर्थ आश्रम बनाया गया है, यह कहाँ तक ठीक है। यदि स्थूलशरीर ही साधना केंद्र रहा होता तो बालकपन ढलती आयु-वृद्धावस्था से घिरा हुआ जीवन निरर्थक चला जाता। मात्र तरुणाई ही इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त काल माना जाता। किंतु बात ऐसी नहीं है। ध्रुव ने बालकपन में, च्यवन ने वृद्धावस्था में, आद्य शंकराचार्य ने फोड़े से ग्रसित रहते हुए रुग्णावस्था में भी कठोर साधनाएँ की थीं। समाधि अवस्था में तो शरीरगत स्पंदन अधिकतम रुक जाते हैं। ऐसी दशा में शरीर के किन्हीं अंग विशेषों को प्रभावित करने की प्रक्रिया कैसे चल सकती है? वह तो मृत मूर्च्छित जैसी स्थिति होती है।
इन समस्त तथ्यों पर ध्यान देने से प्रतीत होता है कि स्थूलशरीर द्वारा उच्चस्तरीय साधनाएँ बन पड़ना असंगत है। वह तो सूक्ष्मशरीर में समाहित दिव्य केंद्रों द्वारा ही बन पड़ती हैं। इसीलिए उसे शरीर के साथ गुँथा नहीं रहने देना चाहिए। उसका शरीराध्यास घटाना या मिटाना चाहिए। इसी उपाय से शरीराध्यास घटाना या मिटाना चाहिए। इसी उपाय से शरीर इस लायक बन पाता है कि वह समयानुसार सुक्ष्मशरीर को आवश्यक छूट देकर उसे साधनारत रह सकने की सुविधा प्रदान कर सके। लोभ, मोह और अहंकार के बंधनों को हथकड़ी बेड़ी तक की उपमा दी जाती है। इन बंधनों के पूरी तरह कसे रहने पर सूक्ष्मशरीर के लिए इतना संकट भय नहीं रहता कि वह शरीर बोध से विरत होकर अपनी स्वतंत्र सत्ता में विकसित हो सके और उन उच्चस्तरीय साधनाओं का अभ्यास कर सके, जिन से दिव्य क्षमताओं, दिव्य विभूतियों की प्राणी को उपलब्धि होती है।
शरीर के स्वस्थ रहने से मन स्वस्थ रहता है और सौंपे गए दायित्वों को पूरा कर सकता है। इसलिए उचित है कि साधना के प्रथम सोपान में प्रवेश करते हुए काया को बलिष्ठ और निरोग रखा जाए। इस प्रकार के नियमों का पालन, उपायों को अपनाना, साधना का प्रथम चरण कहा गया हैं। संयम, ब्रह्मचर्य, आहार-विहार की संतुलित सात्विकता का अपनाया जाना आवश्यक है, ताकि शरीर की निरोगता और मन की सौम्यता अक्षुण्ण रहे। राजयोग के आठ सोपानों में से प्रथम यम और नियम इसी निमित्त हैं कि शारीरिक सात्विकता अपनाकर चौथाई योगाभ्यास किया जा सके। इसके बिना मन के कल्मष-कषाय न घटते हैं न मिटते हैं। साथ ही चंचलता भी उद्वेगों से भरी होती है। वह ध्यान धारणा की प्रधान बाधा है। आसन-प्राणायाम में शारीरिक कियाओं को जितना करना पडता है उनसे अधिक मनोयोग का नियोजन करना पडता है। मन यदि सांसारिक ताना-बाना बुनने में व्यस्त और मस्त रहे तो किसी समय विशेष पर एकाग्रताजन्य ध्यान धारणा में लगाना कठिन होता है। आकाश में उड़ते पंछी को हाथ पसार कर कैसे पकड़ा जाए? जाल में तो उसे तभी फँसाया जा सकता है जब जमीन पर बैठा हो। शरीर को सौम्य सात्विक और मन को सुसंस्कारी बना लेने के उपरांत ही यह संभव है कि मन शांति का आश्रय लेने लगे और निर्धारित ध्यान धारणा में किसी प्रकार जमे। इसलिए जहाँ तक शरीर साधना का संबंध है वहाँ तक समग्र संयम की साधना का ही पूर्वार्द्ध समझा जा सकता है। उत्तरार्द्ध इसके उपरांत ही सध पाता है। सूक्ष्मशरीर में जिन ऋद्धि सिद्धियों के रत्न भण्डार भरे हुए बताये गए हैं, उन तक साधक की पहुँच तभी हो पाती है। जब वह अपने शरीर को साधने की प्राथमिक आवश्यकता पूरी करले। संयम साध ले। आहार-विहार में सात्विकता का समावेश कर ले। मन को सुसंस्कारी बना ले। उसमें घुसी हुई कीचड़ को-तृष्णा, लिप्सा, वासना, अहंता को निरस्त करके सच्चे अर्थों में सज्जन सुसंस्कृत सभ्य बना ले।
त्रुटि सबसे बड़ी यही होती रहती है कि वर्णमाला सीखे बिना लोग-बाग कॉलेज में पढ़ाया जाने वाला गणित पढ़ना आरंभ कर देते हैं। ऐसी दशा में कोई कहने लायक सफलता कैसे मिले? किए गए अनेकों योगाभ्यास निष्फल चले जाते हैं। भव बंधनों से जकड़ा मन आत्मिक उत्कर्ष के लिए कुछ करना चाहता है। मजबूरियों के निविड़ बंधन ऐसे बँधे रहते हैं कि उनके कारण कुछ करते धरते ठोस एवं स्थिर रूप से बन नहीं पाते, अतएव सफलता की दिशा में कुछ कहने लायक सफर नहीं बन पड़ता। यात्रा रास्ते में ही रुकी पड़ी रहती है।
सूक्ष्मशरीर की ही अधिकांश साधनाएँ हैं। कुंडलिनी जागरण से लेकर ब्रह्मरंध्र, सहस्रदलकमल के प्रस्फुरण तक के सभी महान प्रयोजन सूक्ष्मशरीर में ही अवस्थित हैं। षट्चक्रों से लेकर ग्रन्थिभेदन तक की प्रक्रिया सूक्ष्मशरीर से ही संपन्न होती है। खेचरी मुद्राओं में अमृत का पान किया जाता है। यह सूक्ष्मशरीर का ही अनुदान है। जिनने भी महत्त्वपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त की हैं, उनने चतुर्विधि मुक्ति पाने के लिए यही प्रयास किया है कि शरीर और आत्मा के बीच बँधे हुए निविड़ बंधनों को शिथिल किया, खोला है। इस प्राथमिक मुक्ति के मिलने पर दूसरी परोक्ष मुक्ति सरल हो सकती है। परमात्मा के साथ आत्मा को जोड़ने के लिए आवश्यक है कि भवबंधन से छुटकारा पाया जाए। इसकी उपेक्षा करके ऊँची छलांगें लगाना ऐसा ही है,जैसा पंखों के जकड़े रहने पर भी उन्मुक्त आकाश में विचरण करने के लिए मनोरथ करना।
भगवान की कृपा का प्रत्यक्ष दर्शन एक ही कसौटी पर कसा जा सकता है कि शरीर और आत्मा के बंधन ढीले हुए या नहीं? मनुष्य अन्तर्मुखी हुआ या नहीं। अपने स्वरूप, महत्त्व एवं लक्ष्य को समझ पाया या नहीं? ये अनुभूतियाँ यदि होने लगें तो समझना चाहिए कि भगवान की प्रत्यक्ष कृपा का- दिव्य सत्ता का- दर्शन होने लगा और उसका चमत्कार प्रतिफल बंधनमुक्ति के रूप में-ऊर्ध्वगमन के रूप में दीख पड़ने लगा।
देवताओं और असुरों के बीच घमासान युद्ध छिड़ा। दोनों पक्षों ने अपनी संपूर्ण शक्ति दाँव पर लगा दी। आरंभ के दिनों में देवताओं का पक्ष लड़खड़ाने लगा। सेनापति बदलने की आवश्यकता अनुभव हुई; निर्णय प्रजापति को करना था। ब्रह्मा जी कारण खोजने और उपाय खोजने के लिए समाधिस्थ हो गए।
उनने देखा देवता आलसी और प्रमादी हो गए हैं। सो अन्य गुणों का बाहुल्य होते हुए भी इन दो कमियों के कारण वे जीत न सकेंगे। संयमी और पराक्रमी सेनापति की नियुक्ति होनी चाहिए।
उन दिनों भू लोक में राजा मुचकुंद की समता संयम और पराक्रम में कर सकने वाला और कोई नहीं था। सो उन्हें ही प्रजापति के आदेश से देव वाहनी का सेनापति बना दिया गया। उनने आते ही माहौल बदल दिया। हारते हुए देवता जीतने लगे।
युद्ध लंबे दिन चला। साथ ही पासा भी पलटने लगा। असुर फिर तगड़े पड़ते गए और देवता जीती बाजी हारने लगे। चिंताजनक स्थिति से प्रजापति को अवगत कराया गया। उनने देखा कि विजय मिलते देखकर मुचकुंद अहंकारी होने लगा है। विजय के लिए अपेक्षित गुणों में संयम और पराक्रम की ही तरह निरहंकारिता भी एक महत्त्वपूर्ण गुण है। वह घटने लगी हो तो समझना चाहिए, पराभव के दुर्दिन आ गए।
मुचकुन्द को भूल सुधार वाले साधन करने के लिए कहा गया। नम्रता का अभ्यास करने में देर लगते देखकर नए सेनापति की नियुक्ति आवश्यक हो गई।
इसके लिए कार्तिकेय उपयुक्त पाए गए। उनमें तीनों विशेषताएँ थीं। अतएव नए सेनापति वे ही बने और नई रणनीति अपनाकर दैत्य समुदाय पर विजय प्राप्त कर सकने में सफल हुए।
राजतंत्र और धर्मतंत्र का परस्पर अविच्छिन्न संबंध माना गया है। दोनों में कौन श्रेष्ठ या वरिष्ठ है, कौन छोटा या कनिष्ठ। इस विवाद में न उलझकर एक संस्कृति -सत्य हर व्यक्ति स्वीकार करता है कि जिस युग में धर्मतंत्र परिपक्व एवं सशक्त होता है तथा अपना अंकुश राजतंत्र पर बनाए रखता है, उसे सतत् मार्गदर्शन देता रहता है, उसमे सर्वत्र सुव्यवस्था बनी रहती है। राजतंत्र का जहाँ दायित्व है कि वह सतत् सामने आने वाली समस्याओं प्रतिकूलताओं हेतु धर्मतंत्र का मार्गदर्शन ले, वहीं धर्मतंत्र को संभालने वाले अग्रदूतों का यह कर्तव्य है कि वे अपना आत्मसम्मान बनाए रखकर व्यक्तित्व का स्तर इतना ऊँचा बनाए रखें कि सहज ही जनसम्मान उन्हें मिलता रहे। सतयुगी व्यवस्था में यही होता रहा है एवं पुरोहित, ऋषिगण, मनीषी सदैव शासन तंत्र के पुरोधा, मार्गदर्शक रहे हैं।
आज स्थिति उलटी है। राजा-रजवाड़े तो नहीं रहे, पर 'साहब संस्कृति' अवश्य विद्यमान है। शासन तंत्र को संभालने वालों को जहाँ सुगठित, सुव्यवस्थित एवं लोक कल्याणकारी प्रवृत्तियों में संलग्न होना चाहिए था, वहाँ वे अपना स्वार्थ भर पूरा करते दिखाई पड़ते हैं। चाटुकारिता ही चारों ओर संव्याप्त है। भ्रष्ट आचरण दैनन्दिन जीवन का एक अंग बन गया है। जहाँ उन्हें धर्मतंत्र से दिशा लेना अभीष्ट था,वहाँ इसके विपरीत वे 'तंत्र' की शरण में इधर-उधर भटकने, चमत्कारों की खोज में डोलने, गद्दी बचाने हेतु विभिन्न बाबाओं की शरण में जाने लगे हैं। लोक नेतृत्व करनेवालों को, स्वयं को अंधविश्वास में लिप्त देख जनता उनसे क्या दिशा लेगी? दूसरी ओर एक कटु सत्य यह भी हैं कि चारों ओर दृष्टि घुमाने पर भी कहीं कोई ऐसा तंत्र अध्यात्म क्षेत्र में भी नहीं दिखाई पड़ता, जो शासन को सही दिशा दे। उलटे शासनतंत्र के सूत्रधारों-विभिन्न नेतागणों का सम्मान करते हमारे अपने ही पूज्य कहे जाने वाले महात्मागण दिखाई पड़ते हैं। यह सब देखकर लगता है, गंगा उलटी कैसे बहने लगी? यह तो कभी आर्षकालीन महामानवों ने विचारा भी न होगा कि उनके उत्तराधिकारी अपने अनुयायीगणों को शिक्षा व मार्गदर्शन देने के बजाय स्वयं उनके आसपास मंडराने लगेंगे।
वस्तुतः यह इस देश की सनातन परंपरा व स्वयं में एक विशेषता रही है कि मनीषी, विद्वान, महात्मागणों ने कभी राजाश्रय की आवश्यकता नहीं समझी। इसी भारतवर्ष में एक मनीषी हुए थे। जब उनका अंतिम समय समीप आया तो राजन् उनसे उनकी अंतिम इच्छा पूछने आए। उन्होंने अंतिम शब्द मात्र यही कहे कि “आप मेरे बच्चे को इतनी शिक्षा भर दिला दीजिएगा। कि वह किसी धनपति अथवा शासनतंत्र की कृपा का भिखारी न रहे।” राजा ने यही किया। उस बच्चे को ज्ञानार्जन के लिए काशी भेज दिया। जिन पुरोहित के संरक्षण में वह बच्चा पल रहा था, उन्होंने उसके युवा होने तथा समुचित ज्ञान अर्जित करने पर कहा कि अब तुम कुछ भेंट लेकर राजा के पास जाओ व उन्हें नमनकर अपने अर्जित ज्ञान का प्रमाण दो। मात्र बौद्धिक ज्ञान प्राप्त किए हुए उस ऋषिपुत्र ने जैसा बताया गया था, वही किया। राजा का बुलावा आने पर खुशामदी रुख अपनाते हुए राजा को भेंट दी एवं चरणों में सिर नवाया। राजा उसकी चापलूसी चेष्टा देखकर निराश हुए। उन्होंने उस युवक से पुनः शिक्षा प्राप्त करने हेतु काशी जाने को कहा। पुनः कुछ वर्षों तक उस युवक ने वेदांत, दर्शन तत्त्वज्ञान में महारथ हो राजदरबार में अपनी उपस्थिति दी एवं इस बार पहली बार से भी अधिक भाँति-भाँति के उपहार भेंट किए। भाव भंगिमा में विनम्रता इतनी कि कोई खुशामद पसंद करनेवाला राजा प्रसन्न हो ऊँचा पद दे देता। राजा को मनीषी के वचन याद थे। उन्होंने निराश होकर सोचा कि इसका ब्राह्मणत्व अभी भी नहीं जागा है। आत्मसम्मान इसमें विकसित हुआ नहीं, फिर पुरोहित पद देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
इस बार भी राजा ने उपेक्षा दिखाते हुए कहा कि और ज्ञान अर्जित करो, अभी कमी है। युवक की समझ में कुछ नहीं आया। उसे लगा या तो यह राजा विद्वत्ता का सम्मान करना नहीं जानता या फिर यह मेरी परीक्षा ले रहा है। ऐसा सोचते हुए वह पुनः बंगाल देश चल पड़ा ताकि योग, शास्त्र, व्याकरण आदि का और भी उच्चस्तरीय अध्ययन कर वह राजा को प्रसन्न कर सके। एक वर्ष के परिश्रम के बाद वह लौटा तो अगणित उपहार साथ थे जो प्रसन्न होकर वहाँ के धनपतियों ने दिए थे। सब राजा के समक्ष रखकर उसने साष्टांग प्रणाम किया। जब तक राजा ने उठने को नहीं कहा, वह विद्वान उठा नहीं। किंतु उठने पर उसने नरेश की वही रूखी तटस्थ मुद्रा देखी। न स्वागत, न सत्कार। न कोई पद या उपाधि। निराश हो वह नदी किनारे चिंतन करता हुआ भ्रमण करने निकला। जीवन उसे व्यर्थ लगने लगा था। देर रात तक बैठा सोचता रहा, क्या करें? एक साधु वहाँ से गुजरे। उनकी दिव्य दृष्टि ने हीरे की परख कर ली व छिपे हुए दोष की भी। पहले उससे उसकी गाथा सुनी, फिर उससे बोले—"जिस शास्त्र ज्ञान को तुमने अर्जित किया, उस पर मनन क्यों नहीं किया? क्या तुम्हें पातंजलि का योग सूत्र एवं गीता का “समत्वं योग उच्यते” वाला तत्त्वदर्शन यह नहीं सिखाता कि आत्मिक संपदा से संपन्न विभूतिवान को किसी प्रकार की राजकृपारूपी भिक्षा नहीं चाहिए। तुम्हारा आत्मसम्मान, अन्दर का ब्राह्मणत्व तो इस ज्ञान से और भी प्रखर होना था। किंतु तुम तो उसे भी गिरा बैठे।”
युवक द्वारा भावी मार्गदर्शन माँगे जाने पर साधु ने कहा—“अब इस तत्त्वदर्शन को जीवन में उतारो। योग-चित्तवृत्ति निरोध का नाम है। इसके उच्चतर सोपानों को प्राप्त करो। पूरी लगन से तप करो, इतना प्रचंड तप कि स्वयं इन्द्र भी सारा वैभव तुम्हारे चरणों पर रख दें, तो तुम्हें आत्म सत्ता के समक्ष वह भी तुच्छ लगे।”
युवक ने जो कुछ सीखा-पढ़ा था, उस पर अमल करते हुए स्वयं को साधना पुरुषार्थ में नियोजित कर दिया। उसे सांसारिक वैभव से कोई मतलब नहीं रह गया। निराहार रहता व सतत् साधनारत रहता। धीरे-धीरे कीर्ति फैली। लोग आते, चरणों में धन-संपदा-फल पुष्प रखते, पर योगीराज ने कभी उन पर दृष्टि नहीं डाली। समाचार राजा के कानों तक पहुँचा। पता चला वही युवक है जो पहले उनके आदेश पर ज्ञानार्जन हेतु गया था। राजा ने एक परीक्षा और लेनी चाही। अपने प्रधान मंत्री को योगीराज की सेवा में भेजा, कहा—”उन्हें यहाँ लेकर आओ।” मंत्री जी ने भी जाकर देखा कि यह तो वही युवक है। उन्होंने भी लगभग आदेशात्मक भाषा में कहा—"राजाज्ञा है कि आप हमारे साथ चलें।” योगीराज ने शांत संतुलित स्वर में कहा—” हम तो एक परब्रह्म का अनुशासन मानते हैं। किसी राजा की आज्ञा का यहाँ कोई महत्त्व नहीं। अपने राजा से कह दो कि यदि वे स्वयं आकर मिलना चाहें तो हम कुछ क्षण उन्हें यहाँ आश्रम में दे देंगे। राजा अपनी शासन-व्यवस्था संबंधी कोई परामर्श चाहें तो हम कुछ क्षण उन्हें यहाँ आश्रम में दे देंगे। राजा अपनी शासन-व्यवस्था संबंधी कोई परामर्श चाहें तो हमें देने में कोई संकोच नहीं। वह हमारा कर्त्तव्य है।” हतप्रभ मंत्री ने जाकर जब राजा को सारी बात बताई तो वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने समझ लिया कि जो उस युवक से चाहते थे, वह उसने अर्जित कर लिया।
राजा ने जाकर पूरे सम्मान के साथ याचना की कि “अब आप चलिए एवं राज पुरोहित बन शासन का सूत्र संचालन करिए।“ योगीराज ने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा कि “अब मेरा स्थान जहाँ है, वहीं ठीक है। आप वहीं रहें व राज्य को हमारी अमानत मानकर चलाते रहें। जब भी आप चाहें, मार्गदर्शन लेने आ सकते हैं।” राजा ने उनके चरणों में मस्तक नवाया व कहा—” आप धन्य हैं। आपने धर्मतंत्र की न केवल लाज रखी बल्कि उसे पुनः अपने उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित कर दिया है। आप यहीं आश्रम में साधना करते रहें। हम पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। कभी मार्ग से विचलित होता देखें तो मार्गदर्शन देते रहें।”
इस कथा के समापन पर आज की परिस्थितियों में पुनः प्रश्न उठता है कि क्या मनीषी वर्ग को, अध्यात्म तंत्र के अधिष्ठाताओं को, शासन तंत्र का आश्रय लेना शोभा देता है? क्या महामण्डलेश्वरों, संस्कृति के अग्रदूतों का आत्मसम्मान उसी स्थिति को नहीं पहुँच गया है जैसा कि कथा में वर्णित युवक के माध्यम से बतलाया गया। यदि ऐसा है तो पुनः पुरोहित वर्ग को आमूलचूल मंथन, आत्म विश्लेषण करना व उस सम्मानास्पद स्थिति तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए, जिसके वे पूर्व में अधिकारी रहे हैं।
हाय! सब कुछ चला गया, संचित निधि हाथ से निकल गई। भारी घाटा सहना पड़ा। उस अभाव के नीचे किस तरह दिन कटेंगे? ऐसा ही कुछ प्रलाप करता है मनुष्य, जब उसके किसी संबंधी का निधन हो जाता है। परिस्थितियाँ प्रतिकूल पड़ जाती हैं। घाटा लग जाता है, चोरी हो जाती है। यह अपना शरीर मृत्यु की ओर तेजी से दौड़ने लगता है। समझता है कि भारी क्षति उठानी पड़ी। अब इस स्थिति में किस प्रकार निर्वाह हो सकेगा? कैसे शेष दिन कटेंगे? विपत्ति की स्थिति को कैसे सहा जाएगा?
न्यूनाधिक मात्रा में ऐसी परिस्थितियों का सामना हम में से अधिकांश को किसी न किसी समय करना पड़ता है। यह सृष्टि का नियम भी है। चमकता और ऊष्मा बखेरता दिनमान सदा नहीं रहता। संध्या होते ही इतना सघन अंधकार छाने लगता है कि हाथ को हाथ नहीं सूझता। सृष्टि का सारा सौंदर्य एक काली चादर के नीचे ढँक जाता है। फुर्तीले शरीर को नींद आने लगती है और जीवित रहते हुए अर्ध-मृतक जैसी स्थिति में जा पड़ना पड़ता है। लम्बी रात किसी प्रकार बीतती है और फिर कुछ समय बाद ब्रह्म मुहूर्त आता है। ऊषाकाल प्रकट होता है और अरुणोदय के उपरांत वही सिलसिला चल पड़ता है जैसा कि पिछले कल था।
सागर में ज्वार-भाटे आते हैं। पानी ऊँचा उठता और नीचे गिरता रहता है। झूला-झूलते समय भी एक जैसी स्थिति नहीं रहती। कभी आगे बढ़ना पड़ता है, कभी पीछे हटना। समय भी सदा किसी का ऐसा नहीं रहता जिसे एकरस कहा जा सकता हैं। जब यहाँ आकाश के ग्रह तारक और धूलि कण के अणु परमाणु निरंतर गतिशील रहते हैं, तो यह आशा करना व्यर्थ है कि मनुष्य की एक जैसी स्थिति में ही समूची जिंदगी कट जाएगी, उसमें व्यवधान न आवेंगे। लोग इच्छानुकूल ही व्यवहार करेंगे और साधनों का जो समुच्चय अभी हाथ में है, वह सदा सर्वदा बना ही रहेगा। परिवर्तन इस सृष्टि का नियम भी है, परंपरा और व्यवस्था का अंग भी। इसे चाहते हुए भी बदला नहीं जा सकता, इसके लिए रुदन करना व्यर्थ है। उचित यही है कि परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना सीखें। मन को वस्तुस्थिति समझाएँ और अपना दृष्टिकोण ऐसा मजबूत बनाएँ जो बदलती परिस्थितियों में भी अपना संतुलन न डगमगाए। खिन्न और विपन्न न हों।
यह जीवन तो एक धर्मशाला है, होटल के समान है, जिसमें साज सज्जा के कीमती सुविधा साधन भी भरे पड़े हैं, पर उसमें ठहरना उतने ही समय होता है जितने का कि अनुबंध है। इसके उपरांत बिस्तर गोल करके सड़क पर जा खड़ा होना है। हसरत भरी निगाहों से मुड़-मुड़कर देखा तो जा सकता है, पर उसमें प्रवेश तब तक नहीं मिलता, जब तक नया शुल्क जमा न किया जाए। वह भी थोड़े ही समय के लिए होता है। होटल पर उसके कर्मचारियों अथवा सुविधा साधनों पर आधिपत्य जमाने का आधार नहीं बनता। यह संसार ठीक ऐसे ही होटल की तरह है जिसकी मालिकी किसी दूसरे की है। उसमें नियत समय तक सुविधाएँ प्राप्त करते रहने भर का ही अधिकार है। इस तथ्य को जो नहीं समझते वे ही संसार की वस्तुओं पर कब्जा जमाते हैं और छिनने पर रोते कलपते हैं।
बच्चे एक खिलौने से खेलते-खेलते ऊब जाते हैं। अस्तु अभिभावक उनके लिए विभिन्न आकृति प्रकृति के खिलौने लेकर देते और बच्चे का मन बहलाते हैं। सृष्टा भी ऐसा ही करता रहता है। वह मनुष्यों को विभिन्न प्रकार के साधन एवं अवसर देता रहता है, पर यह आवश्यक नहीं कि वे सदा सर्वदा यथावत् यथास्थान बने ही रहें। जब सरकारी नौकरों तक का स्थानांतरण होता रहता है तो मनुष्य ही सदा एक जैसी परिस्थितियों में किस प्रकार बना रह सकता हैं।
ऋतुएँ आती हैं चली जाती हैं। जो आगमन पर प्रसन्न होता है परिवर्तन का आनंद लेता है वही विचारशील है। जो मौसम को बदलता देखकर हैरान होता है, उसे प्रसन्नता कम और अप्रसन्नता अधिक होती है। पौधों पर फूल आते हैं, फल बनते हैं और फिर वे नीचे गिर जाते हैं। इस क्रम में परिवर्तन कैसे हो? फूल सदा खिला हुआ ही कैसे बना रहे, उसे परिवर्तन क्रम में होकर गुजरना और निरंतर बदलते रहना पड़ता है। इस बदलाव के साथ उसके प्रशंसक और मित्र भी बदल जाते हैं। फूल के कुम्हला जाने पर न तितलियाँ पास फटकती हैं और न मधुमक्खियाँ दिन भर साथ रहने का क्रम जारी रखती हैं। भौंरे गीत सुनाना बंद कर देते हैं। यह प्रकृति का स्वाभाविक क्रम है। मीठे का ही नहीं नमक-मिर्च का स्वाद भी उसे चखना पड़ता है। इसके बिना दावत कैसी? प्रीति भोजों में षट्–रस व्यंजन परोसे जाते हैं। उनके स्वाद एक दूसरे से पृथक होते हैं?इस भिन्नता के बिना रसोई का रसास्वादन कहाँ मिलता है? जीवन की सरसता अनेक परिवर्तनों के साथ ही जुड़ी है। यात्री पर्यटन के लिए निकलता है तो उसे मार्ग में अनेक सुहावने, डरावने दृश्य देखने को मिलते हैं। यदि एक ही दृश्य से संतुष्ट रहना है तो घर की किसी कोठरी में पड़े-पड़े समय गुजारा जा सकता है।
जन्म के समय हम कुछ भी साथ नहीं लेकर आते। दोनों ही स्थितियों में खाली हाथ होते हैं। नंगे बदन भी। जब आने के समय कुछ साथ लेकर नहीं आए तो जाते समय कोई क्या कुछ साथ ले जाने देगा? विदाई के समय चोरों जैसी तलाशी ली जाती है। खीसे में कुछ है तो नहीं, यह टटोल लिया जाता है। शरीर पर कोई आभूषण रहा हो तो उसे भी उतार लिया जाता है। इसमें दुःख मानने की बात ही क्या है? जो कुछ पास में था सब इसी विश्व-वसुधा का उपार्जन था, है और रहेगा। इसका दृश्य देखने, स्वाद चखने भर का अधिकार है। किसी वस्तु पर अधिकार जमाने का मतलब है कि स्रष्टा के बिखरे वैभव पर कब्जा जमाना। यह अनाधिकार चेष्टा चलती नहीं रह सकती। विश्व वैभव का स्वामित्व स्रष्टा का ही है। इस पर अपना हक सिद्ध करना किसी भी प्रकार न्यायानुकूल नहीं है। जो अनुचित है, असंभव है, उसके लिए हाथ पैर पीटना अपने आप को ही आहत करना और उपहासास्पद बनाना है। ऐसी अनधिकार चेष्टा अनाड़ी ही करते हैं। विज्ञजन न ऐसा सोचते हैं और न ऐसा करते ही हैं। वे परिवर्तनों को परिवर्तन ही मानते हैं, उनके कारण उन्हें भारी क्षति उठानी पड़ रही है, उनके कारण उन्हें भारी क्षति उठानी पड़ रही है ऐसा नहीं सोचते।
शरीर भी साथ आता तो है, पर साथ जाता नहीं। जिसे साथ लेकर आए थे वही जब इसी दुनिया में रहना चाहता है अन्यत्र नहीं जाना चाहता तो परलोक के लिए साधनों संबंधियों का साथ रहने की कल्पना करना व्यर्थ है। यह संसार सदा से एक सुहावने मेले की तरह सज-धज कर लगा हुआ है। यह अपने स्थान पर रहता है। मात्र दर्शक ही आवागमन की धूम मचाए रहते है। प्रदर्शनी इसलिए लगती है कि दर्शक उसे देखें और ज्ञान तथा आनंद उपलब्ध करें। इतने से ही उन्हें संतोष करना पड़ता है। जो उस सज्जा पर मोहित होकर बटोर ले चलने की कुचेष्टा करता है उसे सुरक्षा अधिकारी आड़े हाथों लेते हैं और जो न करना चाहिए उसे नहीं ही करने देते।
शरीर जब बचपन से किशोर बना था तब बुरा नहीं बनाया गया। जब युवक से प्रौढ़ और प्रौढ़ से वृद्ध होता है तो खीजने की क्या आवश्यकता? फटा पुराना कपड़ा उतारकर जब नया वस्त्र धारण करते हैं तो शोक कहाँ मनाया जाता है, मरने में दुःख किस बात का?
चट्टान को देखकर शिष्य ने गुरु से पूछा—"इससे भी कठोर कोई हो सकता है क्या?" गुरु ने उत्तर नहीं दिया और उस प्रश्न का उत्तर बारी-बारी शिष्य मंडली से पूछने लगे। एक ने कहा—"चट्टान से लोहा बड़ा है जो उसे काट सकता है।"
दूसरे ने कहा-—"लोहे से आग बड़ी है जो उसे गला सकती है।" तीसरे ने कहा—"आग से जल बड़ा है जो देखते-देखते उसकी हस्ती मिटा सकता है।" चौथे ने कहा—"जल से हवा बड़ी है जो उसे सुखाकर उड़ा देती है।"
हवा से बड़ा कौन? इसके उत्तर में पाँचवाँ शिष्य ‘प्राण’ कहने जा रहा था, और भी मेधावी छात्र उस समर्थ के वरदान की श्रेष्ठता आगे बढ़ाने को तैयार खड़े थे। गुरु ने अनावश्यक चर्चा बंद करते हुए कहा-"बच्चों! मनुष्य का संकल्प बड़ा है। उसके चलने से ही प्राण जीता है और चट्टान हट सकता है।"
जापान तथा उसके समीपवर्ती देशों में 'जेन' साधना का अभी भी अच्छा खासा प्रचलन है। यों अब उस क्षेत्र में भी वैज्ञानिकता के साथ नास्तिकता बढ़ी है और भौतिक सुविधा समृद्धि पर ध्यान केंद्रित हो गया है, तो भी आत्मवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उसका स्वरूप मात्र विचार दर्शन जैसा नहीं रह गया है, वरन् अभी भी सांस्कृतिक परंपराओं में सम्मिलित करके किसी न किसी रूप में जीवन व्यवहार में कार्यान्वित किया जाता हैं।
ताओधर्म, कन्फ्यूशियस परंपरा और बौद्ध धर्म का समन्वय उस देश में हुआ है। तीनों के प्रतिपादन एक दूसरे से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं। इसके लिए उनका समन्वय सरलतापूर्वक हो गया है। सब ओर से एक शैली का प्रतिपादन बन पड़ने से उस संदर्भ में श्रद्धा बढ़ती है और शंका कुशंकाओं का सिलसिला समाप्त होता है। जिस विचारधारा को तर्कों और विग्रहों के बीच नहीं गुजरना पड़ता, उनकी नींव गहरी और मजबूत होती चली जाती है। जापान से लेकर चीन, कोरिया जैसे मंगोल क्षेत्रों की भावनात्मक एकता का भी यही कारण है।
उपासना क्षेत्र में वहाँ अन्यान्य पूजा-प्रार्थनाएँ भी चलती हैं, पर असाधारण वरिष्ठता और प्रतिभा ‘जेन’ साधना की है। जापान के तोकुफु मंदिर में इसके उपदेष्टाओं एवं अभ्यासियों का अच्छा खासा जमघट रहता हैं। कभी-कभी तो अभ्यासियों की संख्या हजारों तक पहुँच जाती है। मौसम प्रतिकूल होने तथा व्यस्तता के दिन आने पर भी तोकुफु का प्रांगण साधकों से भरा ही रहता है।
जिनने प्रवीणता प्राप्त कर ली है। वे वापस लौटकर अपने-अपने क्षेत्र में इस उपासना पद्धति के लिए प्रचार करते हैं। इसके लिए उन्हें पुरातन बौद्ध मंदिरों की खाली पड़ी जगह उपयोग के लिए आसानी से मिल जाती है। जेन साधना में जीवन की पवित्रता प्रथम शर्त है। साधकों को अपना आहार सात्विक रखना पड़ता है। बीच बीच में उन्हें कुछ दिन उपवास करते हुए भी बिताने पड़ते हैं। ब्रह्मचर्य संबंधी मर्यादाओं का पालन भी सभी साधकों के लिए आवश्यक है। जो गृहस्थ जितने समय के लिए आश्रम में प्रवेश करते हैं उन्हें उतने समय ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना पड़ता है। वे पुरातन काल की संस्कृति से जुड़े हुए वस्त्र पहनते हैं। यों आधुनिक वस्त्र पहने रहने की भी छूट किन्हीं-किन्हीं प्रार्थियों को मिल जाती है, सभी को नम्र रहना पड़ता है, एक दूसरे के साथ मधुर भाषण और प्रेम प्रदर्शन में सभी आश्रमवासी उत्साह दिखाते हैं।
जेन-साधना का प्रत्यक्ष स्वरूप है—मौन रहकर आत्मचिंतन में निरत रहना। साधना की अधिकांश अवधि ध्यान में बीतती है। इस बीच वातावरण को इतना शांत रखा जाता है कि साधकों के ध्यान में किसी प्रकार का विघ्न न पड़े। ध्यान में ज्योति के ध्यान की प्रधानता रहती है। साधक द्वारा धारणा की जाती है कि यह सर्वव्यापी प्रकाश ऊर्जा सचेतन रूप से समस्त ब्रह्मांड में संव्याप्त है और वही साधक के ध्यान आकर्षण से विशेष मात्रा में आकर्षित होकर काय कलेवर के प्रत्येक कण में संव्याप्त हो रही है। इस मान्यता को अधिकाधिक परिपक्व करने के लिए साधक नेत्र बंद करके प्रत्येक अंग का क्रमशः ध्यान करता जाता है और अनुभव करता जाता है कि उसकी काया का कोई अंग ऐसा नहीं बचा जिसमें ज्योति ऊर्जा की स्थापना परिलक्षित न होती हो इस क्रम को कई घंटे लगातार जारी रखा जाता है। बीच में पानी पीने, पेशाब जाने, जैसी निवृत्तियों के लिए साधक सीमित समय के लिए उठ भी सकता है, पर वह विराम, विश्राम, अधिक देरी करने वाला नहीं होना चाहिए।
कुछ साधकों की पसंदगी बुद्ध की छवि के साथ तादात्म्य करने की होती है। वैसा कर सकते हैं। इसमें भी द्वैत को अद्वैत में विकसित करने का प्रयत्न रहता है। आरंभ में प्रकाश ज्योति की तरह प्रतिमा भी निकट से कल्पित करनी पड़ती है, पर प्रयत्न यह चलता है कि इसकी पृथकता घनिष्ठता में बदलती जाए और वह निकट से निकटतम होने लगे। दो शरीर मिलें और भक्त में भगवान और भगवान में भक्त पूरी तरह समा जाएँ। ज्योति धारण के बीच भी यही धारणा रहती है। आरंभ में प्रकाश पिंड कुछ दूरी पर रहता है। उसके उपरांत साधना में जैसे-जैसे अध्यात्म परिपक्व होता जाता है वैसे-वैसे प्रकाश निकटतम आता जाता है और उसे प्रचंड ज्वाल माल की तरह विकसित करते हुए साधक अपनी काया को उसमें होम देता है। आग में पड़ा ईंधन भी अग्निवत हो जाता है। ठीक उसी प्रकार संत अपनी सत्ता को प्रकाश पुंज में विसर्जित करके पूरी तरह एकात्म स्थापित कर लेता है। इस अभ्यास में अवयवों को ज्योतिर्मय तो देखा ही जाता है, साथ ही उस ज्योति को पवित्रता और प्रखरता का प्रतीक मानकर यह धारणा भी विकसित की जाती है, कि वे दोनों सत्प्रवृत्तियाँ अपने स्वभाव का अंग बनती जा रही हैं। इस ध्यान से उठते ही साधक को अपने भीतर और बाहर पवित्रता और प्रखरता की आभा फैली अनुभव होती है। मनोवांछित स्थिति का अनुभव करते हुए साधक उत्साह और आनंद से भर जाता है।
यही बात बुद्ध आकृति के साथ तादात्म्य करने का अभ्यास करने पर भी अनुभूति होती है। दूरी को निकटता में लाना और फिर उसमें तादात्म्य हो जाना यह तो प्रयास रहता है। फलतः इसकी प्रगति भी उसी प्रकार होती है। इष्ट देव अपनी सत्ता में समा जाते हैं और स्वयं की आत्मसत्ता का विलय इष्ट देव में हो जाता है। माता के गर्भ में जिस प्रकार भ्रूण रहता है, उस स्थिति की अनुभूति आरंभिक दिनों में होती है। पीछे पूर्ण सफलता की स्थिति में अनुभव यह होने लगता है कि इस प्रकार रक्त नलिकाओं में उक्त देवता रहता है, वैसे ही इष्ट देव को नाड़ी समूह मानकर उसके भीतर स्वयं के रंग रूप में भ्रमण करने की धारणा की जाती है। इस अनुभूति से बुद्ध की आध्यात्मिक गरिमा साधक को अपने में प्रवेश करती एवं कार्यरत होती दीख पड़ती है।
ज्योति के साथ एकात्मता में भी यही भाव मन में उठाया जाता है कि प्रकाश परब्रह्म का प्रतिनिधि है। भगवान् समस्त सद्गुणों के भंडार हैं— उसकी उपस्थिति में दृष्टिकोण में उत्कृष्टता एवं आदर्श का भरपूर समन्वय है। ज्योति धारण करने पर वे विशिष्टताएँ भी साधक को उपलब्ध होती हैं और वह अपने में देवोपम विभूतियाँ उगते और लहराते देखता है। साकार और निराकार मत से बुद्धताओं या प्रकाश का ध्यान अपनी रुचि के अनुरूप चुना जा सकता है। श्रद्धा के अनुरूप मन को एकाग्र एवं तन्मय होने में सुविधा रहती है और आनंद भी आने लगता है। विश्वास की सुनिश्चितता, श्रद्धा की परिपक्वता और प्रसन्नता की प्रफुल्लता की अनुभूति होने लगती है तो समझा जाता है कि साधक सिद्ध स्तर के समीप पहुँच पाया।
'जेन' साधनाओं में इर्द-गिर्द के वातावरण को कोलाहल रहित रखा जाता है। तोकुफु मंदिर में आरती तो होती है, पर घंटे नहीं बजते। किसी प्रयोजन के लिए आने-जाने वाले इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि उनका आवागमन इतना धीमा हो कि किसी साधक की ध्यान धारणा में विघ्न न पड़े। किसी को किसी से बात करनी होती है, तो संकेत से उसे अलग बुलाकर इस प्रयोजन के लिए बने हुए विशेष कक्ष में ले जाता है और जो कुछ पूछना, बताना होता है वह उसे इतने धीमे स्वर में व्यक्त करता है कि किसी का ध्यान न बटे, घुसफुस को सुनकर मन न उचटे। बाहर की इस सतर्कता और बाह्य क्षेत्र के प्रति उपेक्षा भाव रहने से साधारण हलचलें उसके अध्यात्म प्रयोजन में कोई विशेष विघ्न उत्पन्न नहीं कर पातीं और वे अपने मन पर काबू रखकर बिना विचलित हुए आराधना पथपर आरुढ़ रहते हैं।
सभी जेन-साधक कमर को सीधा रखकर बैठते हैं ताकि मेरुदंड चौड़ी, उच्च गुच्छक, चक्र भ्रासर जागृत हो और साधक की सत्ता में अभिनव शक्ति संचार का प्रयोजन पूरा करे।
धोबी का व्यवसाय है—दूसरों के मैले कपड़ों को बटोरना और उन्हें धुले हुए चमकदार बनाकर वापस करना। संत और सुधारक ऊँची किस्म के धोबी ही हैं।
योगाभ्यास को आमतौर से क्रियायोग समझा जाता है। विभिन्न क्षेत्रों के श्रमजीवी अपने-अपने कौशल दिखाते और उसका उचित पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। ऐसी ही कुछ मान्यता योग के संबंध में भी चल पड़ी है। लोग तत्संबंधित क्रिया कृत्यों को सीखने सीखाने का प्रयत्न करते हैं और उसका अभ्यास बन पड़ने पर योग सिद्धि के आधार मिलने वाली विभूतियों की आशा करते हैं। इस संदर्भ में घर छोड़कर विरक्त हो जाने, वन एकांत में रहने की भी आवश्यकता समझी जाती है। यह योग का बहिरंग स्वल्प है, उसे क्रिया कलेवर भी कह सकते हैं। इतने को ही सब कुछ मान लिया जाता है। यह चेष्टा नहीं की जाती कि इन निर्धारणों के पीछे रहस्य सार और तत्त्वज्ञान क्या है? वही है साधना का प्राण। उसकी उपेक्षा कर देने के उपरांत जो कुछ क्रिया-कृत्य रह जाता है, उसे प्राणरहित शरीर ही कहा जाना चाहिए। दृष्टिगोचर तो सारा शरीर यथावत् लगता है, पर प्राण न होने के कारण उससे कोई ऐसा पुरुषार्थ नहीं बन पड़ता जिसका कुछ उत्साहवर्धक प्रतिफल हस्तगत हो सके।
योग साधना में क्रिया-कृत्यों का समावेश तो है, पर वह मात्र उतने तक ही सीमित नहीं है। उसमें चेतना और भावना की बहुलता है। इसलिए उसे घर परिवार के बीच रहकर भी साधा जाता है और विरक्त होने पर उस प्रक्रिया का सध ही जाना निश्चित नहीं है। कितने ही संन्यासी एकांत स्थानों और वन प्रदेशों में रहते हैं, पर उनमें आलस्य के अतिरिक्त और कोई विशेषता नहीं दीखती। वेश के आधार पर सम्मान और दान दक्षिणा मिलने लगता है। इससे उनका प्रमाद, अहंकार और बढ़ जाता है, ऐसी दशा में उनका व्यक्तित्व उठता नहीं, वरन् निरंतर गिरता ही जाता है। चौबे जी छब्बे बनने चले थे, पर दुबे भी नहीं रहे, वाली उक्ति चरितार्थ होने लगती है। यदि इस तथ्य को समझा जा सके कि अध्यात्म साधनाओं में मानसिकता प्रधान है तो साधकों को यथार्थता का पता चले और उस आधार पर राजमार्ग अपनाकर लक्ष्य तक पहुंचने में सफलता प्राप्त करें। पर ऐसा सुयोग किन्हीं विरलों को ही हस्तगत हो पाता है।
योगों की अनेक दिशा धाराएँ हैं, उनमें से राजयोग को प्रमुखता मिली हुई है, कारण कि उसमें जोखिम कम और सफलता की संभावना, यथार्थवादी तत्त्वॉ का अधिकाधिक समावेश होने के कारण, अधिक हैं।
राजयोग को अष्टांगयोग भी कहते हैं। यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा, ध्यान, समाधि। इन आठ अंगों का अभ्यास कर लेने से यह प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो जाता है। उसे सुविधानुसार समय निकालकर घर या वन में, गृहस्थ या विरक्त रहते हुए, किसी भी स्थिति में पूरा किया जा सकता है।
यम वर्ग में पाँच अनुबंध आते हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यह पाँचों ही प्रधानतया मानसिक हैं। जो भीतर है उसी को बाहर प्रकट करना सत्य है। ऊँचे उद्देश्य के लिए काम करना सत्य है। छल, प्रपंच, पाखंड से बचे रहना सत्य है। ये मनोदशाएँ हैं। इनका प्रकटीकरण भले ही जिह्वा, हाथ आदि इंद्रियों से होता है।
अहिंसा का तात्पर्य है, प्रेम, करुणा, दया, उदारता, आत्मीयता और उनका प्रकटीकरण तो अन्य सभी भावनाओं की तरह शरीर से भी हो सकता है, पर वस्तुतः यह आंतरिक भाव संवेदनाएँ ही हैं। उसमें डॉक्टर के आपरेशन या न्यायाधीश के प्राणदंड जैसी कठोरता की भी गुंजाइश है। हिंसा, अहिंसा, का निर्णय क्रिया मात्र से नहीं, वरन् उसके साथ जुड़ी हुई भावनाओं के आधार पर होगा।
अस्तेय—चोरी न करना। चोरी, जेबकटी, उठाईगिरी, सेंध लगाना जैसे अपराधों के रूप में ही नहीं होते, वरन् शोषण अपहरण, मुनाफाखोरी, मिलावट, रिश्वत आदि के रूप में भी होते हैं। यह हेरा-फेरी बिना छीन झपट के भी हो सकती है। जिसमें ग्राहक की मर्जी या सहमति भी रह सकती है। बिना उठाईगिरी करनेवाले भी चोर हो सकते हैं। इसका निर्णय मनोदशा का विश्लेषण करते हुए ही किया जा सकता है।
ब्रह्मचर्य का तात्पर्य है— नर-नारी के मध्य पवित्रता का सद्भाव आत्मीयता का भाव होना। रामकृष्ण परमहंस शारदामणि की तरह गृहस्थ भी उसका पालन कर सकते हैं और विश्वामित्र मेनका संयोग की तरह विरक्त भी इस दुर्गुण के शिकार हो सकते हैं। कामुक चिंतन विशुद्ध व्यभिचार है और गाँधी जी की तरह धर्म पत्नी के प्रति उच्च भावनाएँ रखे रहना भी ब्रह्मचर्य है। यह भावनात्मक संयम है। इंद्रिय संयम के साथ-साथ इसमें भाव संयम भी जुड़ा रहना चाहिए।
अपरिग्रह का अर्थ— पैसा न छूना या सामान जमा करना नहीं है, वरन् यह है कि लोभ के वशीभूत न होना। जो हाथ में है उसे जनता जनार्दन की अमानत मानना और ईमानदार ट्रस्टी की भाँति हस्तगत संपदा को जन कल्याण के निमित्त ही काम में लाना। उसके माध्यम से सत्प्रवृत्ति संवर्धन का प्रयोजन पूरा करना।
यम निर्धारण के पाँचों पक्षों में शारीरिक क्रिया-कलाप भी जुड़ते हैं, पर मात्र इतने से ही उनकी पूर्ति नहीं हो जाती। उच्चस्तरीय भावनाओं का समन्वय इन पाँचों में अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसलिए इन्हें मानस प्रधान मनोयोग की प्रक्रिया कहा जाए तो उचित ही होगा।
दूसरा चरण पाँच नियमों का है— शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। यह पाँचों यदि क्रियामात्र के रूप में संपन्न किये जाएँ तो वे लोकाचार ही रह जाएँगे। शरीर और कपड़ों की सफाई सभी करते हैं, पर आध्यात्मिक शौच में वैचारिक एवं भावनात्मक स्वच्छता का भी समावेश होता है। संतोषी तो आलसी, प्रमादी, दरिद्र स्तर के लोग भी होते हैं। भाग्यवादियों का चिंतन इसी प्रकार का होता है, पर यहाँ संकेत इस बात का है कि अनिवार्य निर्वाह को सामान्य नागरिक स्तर पर अपनाया जाए। लोभ, मोह अहंकार से अपने को बचाया जाए। त्रिविध एषणाओं से विचारणा, आकांक्षा को मुक्त कराया जाए। तप का अर्थ— धूप या अग्नि के सामने गरम होना नहीं, वरन् अपने कषाय-कल्मषों का दमन करना है। इसे इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम भी कह सकते हैं। ऐसा मनोनिग्रही काम-काजी या परिवारी होते हुए भी अन्तःक्षेत्र का तपस्वी हो सकता है। इसी प्रकार स्वाध्याय का अर्थ पुस्तकें पढ़ते रहना नहीं, वरन् ‘स्व’ के संबंध में अध्यवसाय निरत होना है। ईश्वर प्राणिधान में जप-ध्यान-पूजा-अर्चा के क्रिया कृत्य ही नहीं आते। उसका वास्तविक स्वरूप है, सर्वव्यापी, कर्मफल में निष्पक्ष न्यायाधीश जैसी स्थिति के परमेश्वर के अनुशासन को ठीक तरह पालन करना। कोई भी दुष्कर्म छिपकर भी न किया जाय। कर्मफल में विलंब होते देखकर निष्ठा को डगमगाने न देना। सन्मार्ग पर एकाकी चलते हुए भी अपने साथ परमसत्ता की उपस्थिति अनुभव करना। यही है ईश्वर प्राणिधान, जिनमें कर्मकांड तो नाम मात्र का है। गहराई भावनाओं को ही अपनानी पड़ती है। यही है यम−नियम रूपी योगाभ्यास के प्रारंभिक दो चरण।
ईसा के परनाम में अपने शिष्यों समेत अल्फियरना के यहाँ भोजन करने गए। उसने अपने मित्रों को भी इस अवसर पर निमंत्रित किया। उसी की तरह ये आगन्तुक भी बदनाम थे।
इस भोज का समाचार जब भले लोगों को मिला, तो वे बिगड़े, कहने लगे—"बदनाम लोगों के यहाँ महाप्रभु को भोजन करने क्यों जाना चाहिए था?"
ईसा ने विरोधियों को बुलाया और पूछा—"चिकित्सक बीमारों के यहाँ जाता है, या स्वस्थ लोगों के यहाँ?"
सभी ने कहा—"बीमारों के यहाँ।" इस पर ईसा बोले—"फिर बुरे लोगों के बीच मुझे जाने पर आप लोग आपत्ति क्यों करते हैं?"
मस्तिष्क में अनेकानेक क्षमताओं का निवास है। आँख, नाक, कान आदि की बनावट ऐसी है कि उनमें से स्राव भीतर से बाहर निकलते हैं। बाहर से भीतर को कोई वस्तु डाली जाए तो उसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। भीतर गहराई तक प्रवेश करने की उसमें गुंजाइश नहीं है। फिर मस्तिष्क को उत्तेजित, सक्रिय, संतुलित कैसे किया जाए? इसका एक उपाय योगविज्ञान के आचार्यों ने ढूँढ़ निकाला है। वह है—तालु मार्ग द्वारा सोमरस पान। तालु को मस्तिष्क की आधार भूमि या पृष्ठ भूमि कहा गया है।
तालु की बनावट शहद की मक्खी के छत्ते जैसी है। उसमें अलग-अलग कितने ही कोष्ठक बने हुए हैं। इन सब का उपयोग है। मुख के दो प्रयोजन हैं—एक खाना, दूसरा बोलना। इन दोनों ही कामों में तालु भाग की अपनी भूमिका रहती हैं। दाँतों से सटा हुआ भाग उच्चारण में योगदान करता है। जीभ तालु की सहायता से भोजन को उलटती पलटती है। तथा बोलने में भी उस भाग की सहायता लेती है। मुख में जीभ सीधी नहीं रहती, उसकी नोक तालु से सटी रहती है। मौनकाल में प्रायः ऐसा ही देखा जाता है। तालु का पिछला भाग जहाँ ऊपर चंचुक रूप में लटका रहता है, वहाँ से पहले का थोड़ा-सा भाग ऐसा है, जो कम ही काम में आता है। इसके उपरांत तो भोजन की नली आरंभ हो जाती है। श्वास नाड़ी भी उसके साथ ही चल पड़ती है। कभी-कभी ऐसा भी होता देखा गया है कि भोजन का कुछ अंश श्वास नली में चला जाता है तो उस फँसाव को निकालने के लिए गले को बहुत जोर लगाना पड़ता है।
गले का ओरो व नेजोफेरिंक्स नामक भाग ही आगे की ओर इस स्थिति में है कि वह मस्तिष्क से अधिक संबंधित है। मस्तिष्कीय आवेशों को वाणी द्वारा कटुभाषण की प्रेरणा मिलती है। इसी प्रकार जीभ के द्वारा गरम भाषा बोलने पर मस्तिष्क उत्तेजित एवं असंतुलित हो जाता है। शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान ने भी इस अध्यात्म मान्यता की पुष्टि की है कि यह क्षेत्र मस्तिष्क से अन्य अंगों की तुलना में अधिक संवेदनशील है।
सहलाने, थपकी देने से, राहत मिलती है और नींद आ जाती है। पैर दबाने से, वाइब्रेशन थेरेपी से एवं एक्युप्रेशर चिकित्सा से भी ऐसा ही होता है। तालु के उपरोक्त स्थान को मस्तिष्क के पैर कहा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने इस स्थान को राथकेज पाउच नाम दिया है व कहा है कि पिट्यूटरी यहीं से विकसित होता है। इस स्थान को सहलाने से तनाव दूर होते हैं और मानसिक संतुलन ठीक करने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त मनःक्षेत्र में जो महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ काम करती हैं उनकी विकृत स्थिति का संतुलन ठीक करने में सहायता मिलती है। स्वाभाविक है कि यह कार्य पिट्यूटरी के उत्तेजन से संभव हो पाता है।
इतना ही नहीं जिह्वा के उस क्षेत्र में ऐसा दिव्य रस मिलता है जो उसके वचनों में मिठास भरता है। स्वाद संबंधी विकृति को सुधारता है।
आध्यात्मिक विद्या के जानकर यह भी कहते है कि इस क्षेत्र से यदि स्रावों की तनिक-सी मात्रा भी उपलब्ध की जा सके तो मस्तिष्क का विवेक बढ़ता है और शरीर तथा मन के बीच पाई जाने वाली विकृतियों का भी समाधान होता है।
खेचरी मुद्रा उस साधना का नाम है, जिसमें जीभ को पीछे की ओर मोड़कर तालु के पिछले भाग से सटाया जाता है और फिर उसे धीरे-धीरे सहलाया जाता है। इसके लिए जिह्वा को अधिक लंबी, अधिक कोमल बनाने का पूर्ण अभ्यास करना पड़ता है।
पिछली पीढ़ी के साधकों को उनके मार्गदर्शक इस प्रयोजन के लिए पहले जिह्वा दोहन की क्रिया कराते थे। इस संदर्भ में काली मिर्चों को पीस कर जीभ के ऊपर और नीचे लेप किया जाता था। जब मुँह से पानी का स्राव होने लगता था, तब जीभ को थोड़ा-थोड़ा करके आगे खींचने, लंबा करने का प्रयास चलता था, दुधारू पशुओं के थन जिस प्रकार नीचे व नीचे और दबाए जाते हैं, वही व्यवहार जिह्वा के साथ किए जाने के कारण इसे दोहन क्रिया कहते हैं। इसका उद्देश्य यह था कि जीभ अपेक्षाकृत लंबी हो जाए और तलु के पिछले भाग को उसकी नोक छूने लगे। लंबाई पर्याप्त बढ़ गई या नहीं, इसकी परीक्षा इस प्रकार की जाती थी कि जीभ बाहर निकालने पर वह नासिका के अग्रभाग को छूने लगे।
इतनी सफलता मिलने पर तालु को सहलाने से जीभ को दिव्य रसास्वादन मिलता है। वह स्वाद—मिठाई, खटाई, जैसा नहीं, वरन् जीभ में आनंदप्रद उत्तेजना देने जैसा होता है। उसमें रस आता है और देर तक उस क्रिया को करते रहने का मन करता है। तांत्रिक प्रसंगों में आलंकारिक रूप में इसकी तुलना काम सेवन से भी दी गई है। जिह्वा को शिश्न और तालु गह्वर को योनि बताया गया है।
पुरातन मान्यताओं में अब की जन साधारण की शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों को देखते हुए जिह्वा दोहन जैसे कार्य नहीं करने चाहिए। अब हठयोग की अधिकांश क्रियाओं को प्रकृति विरोधी और हानिकारक ठहराया जा रहा है। नेति, धौति, वस्ति, वज्रोली जैसी क्रियाओं की उपयोगिता-अनुपयोगिता के संबंध में अब अच्छा खासा विवाद उठ खड़ा हुआ है और शरीर शास्त्री उस प्रकार का जोखिम न उठाने की सलाह दे रहे हैं। इस विवादास्पद स्थिति में जिह्वा-दोहन की बात को छोड़ भी दिया जाए तो भी संकल्प बल के सहारे जिह्वा को दिव्य रसास्वादन की अनुभूति हो सकती है। और मस्तिष्क के उपयोगी भाग को अधिक सक्रिय एवं संतुलित बनाया जा सकता है।
इन दिनों खेचरी मुद्रा के साधकों के लिए इतना ही पर्याप्त होगा कि वे इस क्रिया को करने से पूर्व अच्छी तरह मुँह साफ कर कुल्ला कर लें, इसके लिए प्रयुक्त किए जाने वाले पानी में एक चुटकी नमक एक लोटे के हिसाब से डालकर उस तनिक खारी पानी से दस बीस कुल्ले गरारे के साथ कर लेने चाहिए। इससे मुँह में कहीं लगी छिपी गंदगी साफ हो जाएगी और तालु के अधिक संवेदनशील भाग तक जिह्वा पहुँचाने में किसी गंदगीजन्य संकट की आशंका न रहेगी। इस स्थिति में जिह्वा के अग्रभाग से तालु के पिछले भाग का अत्यन्त धीमा स्पर्श किया जाए। सहलाने की क्रिया ऐसी न हो, जिसमें किसी प्रकार रगड़ पड़ने और वहाँ की त्वचा पर असाधारण दबाव पड़ने की आशंका हो।
इस क्रिया के साथ भाव संवेदना का सम्मिश्रण आवश्यक है। यह कल्पना करनी चाहिए कि जिस प्रकार मधुमक्खियों के छत्ते से शहद टपकता है वैसा ही दिव्य रस का आस्वादन करने का अवसर जिह्वा को मिल रहा है। यह शहद जैसा मीठा न होकर सोमरस जैसा आध्यात्मिक है। भावना प्रधान है। यह समूचे शरीर में उत्साह,उल्लास की लहर दौराता है। इसी के साथ-साथ यह चिंतन भी करना चाहिए कि सहस्रार के इस अधोभाग को उत्तेजना मिलने से समूचे मस्तिष्क क्षेत्र को राहत मिल रही है। समर्थता, सक्रियता का दौर बन रहा है।
रगड़ से ऊष्मा उत्पन्न होती है। विशेषतया जो भाग आमतौर से निष्क्रिय रखे जाते हैं, उनका स्पर्श गुदगुदी उत्पन्न करता है। गरदन, बगल, जननेंद्रिय जैसे स्थानों को हिलते जुलते रूप से स्पर्श करने पर गुदगुदी स्तर की उत्तेजना उत्पन्न होती है। इसी आधार पर खेचरी मुद्रा के भी वे लाभ मिलते हैं, जिनका योग ग्रंथों में विस्तारपूर्वक विवरण मिलता है।
आरंभ पाँच मिनट से करते हुए हर महीने एक-एक मिनट बढाते हुए अंतिम अवधि पंद्रह मिनट तक पहुँचा देनी चाहिए। इससे अधिक करना प्रारंभिक स्थिति में नुकसान पहुँचाने वाला होता है।
मैं परमात्मा का साक्षात्कार करने की फिकर और प्रतीक्षा में हूँ। पर वह होगा तब जब प्रत्येक मनुष्य के भीतर मुझे दीख पड़ेगा। एक दिन उसने कान में कहा था—"तू अपनी क्षुद्रता के बंधन काट, में भवसागर से तुझे पार कर दूँगा।"
'नाभि' पेट के मध्य अवस्थित एक भ्रमर चक्र जैसी गह्वर है। उसकी बड़ी आयु में कुछ विशेष उपयोगिता प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती, पर सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर उसकी जाँच पड़ताल की जाए तो यह अपने ढंग का ऐसा विलक्षण अंग है, जिसके साथ अनेकों भौतिक और आध्यात्मिक प्रयोजन जुड़े हुए हैं।
सौंदर्य कला के पारखी नारी की नाभि पर अश्लील कुदृष्टि डालते हैं और उसे गुह्यांगों का शीर्ष भाग मानते हैं। नाभि पर दृष्टि रखी जाए तो समीपवर्ती एवं संबंधित होने के कारण कामुक चिंतन उभरने लगता है। इसलिए शीलवान कुलों की वयस्क नारियों को सभ्यता के अन्यान्य प्रसंगों के साथ यह भी सिखाया जाता है कि वे पेट को ढक कर रखा करें। प्रदर्शन करने पर शिष्ट मर्यादा की उपेक्षा समझी जाती है और इस गलतफहमी से अनाचार परक कई प्रकार के झंझट खड़े होते हैं।
भ्रूण जब गर्भावस्था में होता है तो वह माता के शरीर के साथ जुड़ा रहता है। इसी नलिका के माध्यम से माता का रक्त, मांस, शिशु के शरीर में पहुँचता है। उसे पाकर वह बिंदु कलल अपने आप की अभिवृद्धि करता चलता है। प्रसव काल में भी यह नलिका शिशु के साथ बाहर आती है तब उसे काटकर माता और बच्चे के मध्यवर्ती संबंध सूत्र को अलग किया जाता है। इससे दोनों को पृथक इकाई के रूप में अपना-अपना कार्य अपने बलबूते करने का अवसर मिलता है। बच्चे के पेट में रहने तक माता को भी आहार विहार की अत्यधिक सावधानी रखनी पड़ती है ताकि उदरस्थ शिशु को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे। इस सतर्कता से जननी को प्रसव के उपरांत छुट्टी मिल जाती है। बच्चा भी हर बात के लिए माता पर निर्भर न रह क्रमशः अधिकाधिक स्वावलंबी बनता जाता है। इसलिए नाभि को माता से जोड़ने वाली नली का अंबलाइकल कार्ड का काटना एक प्रकार की हलकी-सी युक्ति है। इसमें दोनों के दायित्व बँटते हैं।
रक्त नलिकाएँ यों प्रत्यक्षतः हृदय के साथ जुड़ती हैं। वहीं से समस्त शरीर को रक्त भेजने और वापस लेकर साफ करने की प्रक्रिया चलती है।यह संचार मार्ग जन्म लेने के उपरांत विकसित होता है। इससे पूर्व नाभि नलिका से ही शिशु शरीर की रक्त नलिका माता के साथ जुड़ती और पोषण प्राप्त करती है। इसीलिए आयुर्वेद शास्त्र में सोलर प्लेक्सस की स्थली नाभि को ही नाड़ी केंद्र माना गया है।
बड़े होने पर भी नाभि निष्क्रिय नहीं होती है, वरन् महाप्राण में से प्राण खींच कर शरीरगत क्षमताओं का परिपोषण करती रहती है। नासिका के द्वारा वायु का आवागमन होता है, उसी प्रकार नाभि के द्वारा विश्वव्यापी प्राण प्रवाह के साथ संबंध जुड़ता है। कुंडलिनी का उद्गम मूलाधारचक्र है। उसे गुदा और जननेंद्रिय की सीध में जाना जाता है। पर उसका उद्गम छः अंगुल ऊँचाई पर नाभि की सीध में है। मूलाधार को जो अपने कार्य संचालन के लिए ऊर्जा उपलब्ध होती हैं। वह नाभि द्वारा ही बाहर से भीतर तक पहुँचती है। गर्भ का परिपोषण, शुक्र और डिंब के परिपाक में नाभि की अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
श्वास नासिका द्वारा शरीर में भीतर प्रवेश करती है। इससे आगे बढ़कर वह नाभिचक्र के अन्तःक्षेत्र से टकराती है और फिर समस्त शरीर की कोशाओं को प्राण चेतना देने के लिए बिखर जाती है। श्वास आघात से नाभि क्षेत्र में भी एक अत्यंत धीमी धड़कन चलती है। इसलिए उसे दूसरा हृदय भी कहा गया है। यह सारा वर्णन स्थूल एनाॅटामी की भाषा में नहीं, सटलर एनाॅटामी के माध्यम से समझा जाना चाहिए।
सूक्ष्मशरीर में तीन ग्रंथियाँ प्रमुख हैं। मस्तिष्क के मध्य भाग ब्रह्मरंध्र में ब्रह्म ग्रंथि, दोनों पसलियों के मिलन स्थान पर हृदयचक्र के स्थान पर विष्णु ग्रंथि, नाभि चक्र में मूलाधार से जुड़ी हुई रुद्र ग्रंथि। यहाँ ग्रंथियों का तात्पर्य रत्न-राशि को किसी पोटली में रख कर गाँठ बाँध लेने जैसा है। यह तीनों ही तीनों लोकों में कही भी उपलब्ध न होने वाली संपदाएँ हैं। साधारणतया यह गांठ मजबूती के साथ बँधी रहती हैं। किंतु इनमें से आवश्यकतानुसार वैभव और वर्चस्व खोजा एवं निकाला जा सकता है। ऋद्धि सिद्धियों की आवश्यकतानुसार इसी में से पूर्ति की जा सकती है। सर्वविदित है कि मस्तिष्क में अवस्थित ब्रह्मग्रंथि ज्ञान की, हृदयस्थित विष्णु ग्रंथि वैभव की और नाभि स्थित रुद्रग्रंथि पराक्रम की अधिष्ठात्री है। इन विभूतियों से संपन्न होने के लिए त्रिविध ग्रंथियों के बेधन का विशिष्ट विधान है।
चर्चा यहाँ नाभिग्रंथि की हो रही है। उसका प्रखरीकरण करने के लिए मूलबंध, उड्डियान बंध और जालंधर बन्ध जैसे उपक्रम अपनाने पड़ते हैं। उन विधियों को किसी अनुभवी के संरक्षण में ही सीखा जा सकता है। पुस्तकों में उन्हें कार्यान्वित करने की विधियाँ छपी हैं। पर उस आधार पर करने लगने की अपेक्षा यही उत्तम है कि जानकार के समीप या संरक्षण में उन्हें क्रियान्वित किया जाय। थोड़ी भी भूल होने से उलटे परिणाम की आशंका रहती है।
नाभि क्षेत्र को सजग समर्थ बनाए रहने के लिए कई उपयोगी अभ्यास हैं। उनमें सबसे सरल यह है कि चित लेटकर पेट की यथा संभव अधिक से अधिक फुलाया और कुछ रुक-रुककर सिकोड़ा जाए। इससे उस क्षेत्र का आकुंचन प्रकुंचन होने से निष्क्रियता दूर होती है और रक्त संचार में गतिशीलता आती है। साथ ही उस क्षेत्र से संबंधित छोटे बड़े अवयवों पर उपयोगी प्रभाव पड़ता है।
शक्ति ग्रंथों में मूलाधार के सदृश नाभि गह्वर में शक्ति का, दुर्गा का निवास माना गया है और कहा गया है कि इस गुहा में महाशक्ति अदृश्य रूप में निवास करती है। साथ ही उनकी सहचरी 64 योगिनियाँ भी सेवारत रहती हैं। इस स्थान पर ध्यान करने से भगवती की सिद्धि अपेक्षाकृत जल्दी होती है।
योग शास्त्र में 'नाभिचक्र काम व्यूह ज्ञानम्' अर्थात् नाभि चक्र में ध्यान करने से काम क्षेत्र के सभी रहस्यों की जानकारी मिलती है। विदित होता कि किसकी काम शक्ति में क्या गुण दोष हैं। साधक अपने संबंध में तथा किसी दूसरे के काम क्षेत्र के संबंध में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकता है। यह ज्ञान ऐसा है जिसके आधार पर सुसंतति का उत्पादन ही नहीं, देव मानवों का अवतरण भी संभव हो सकता है।
फ्रांस और इटली में युद्ध चल रहा था, इटली की छोटी नदी इर्द थी। गहरी बहुत चौड़ी कम। ग्रामीणों ने उसे पार करने के लिए दो खजूर के ट्ठे लगा रखे थे। फ्रांसीसी फौजें इसी पुल को पार कर इटली के भीतरी क्षेत्रों में प्रवेश करने की योजना बना रही थीं। ग्रामीणों को पता चला तो उनने लट्ठे काट कर नदी में गिरा देने का निश्चय किया। वे कुल्हाड़ी से काटने लगे।
खबर फ्रांसीसी फौजों को लगी तो वे काटना रोकने के लिए गोली चलाने लगे। ग्रामीण बहादुर थे। उनने हार नहीं मानी। काटना जारी रखा। गोलियों से छलनी होकर जब तक काटने वाला नदी में गिर नहीं जाता तब तक वह रुकता नहीं था।
इस प्रकार प्रायः तीन सौ किसान मौत के घाट उतर गए। जवान सभी समाप्त हो गए। एक बुड्ढा बचा। उसने वहाँ पहुँचकर स्थिति देखी तो पाया कि पुल के लट्ठे अधिकांश कट चुके थे। जुड़ा हुआ स्थान थोड़ा-सा ही था। बुड्ढा दौड़ता हुआ गया और उछलकर उस जुड़े हुए स्थान पर कूद पड़ा। झटके से लट्ठा टूट कर नदी में गिर गया। साथ ही वह बुड्ढा भी गिर गया।
गाँव के प्रायः सभी वयस्क इस प्रयास में खप गए। पर पुल टूटने से फ्रांसीसी सेना का हमला रुक गया और आजादी बच गई।
उन्माद का सहोदर है—आवेश। मस्तिष्क की स्थानीय गड़बड़ी से पागलपन उभरता है। अनिद्रा के लगातार रहने, कोई मानसिक आघात लगने, ज्वर के मस्तिष्कीय क्षेत्र में प्रवेश कर जाने आदि कारणों से लोग पगला जाते हैं। वे अपनी जिम्मेदारी को भूल जाते हैं और बदनामी, आर्थिक हानि आदि क्षतियों का अनुमान नहीं लगा पाते। आपे में नहीं रहते और चाहे जो करने लगते हैं। यह पागलपन के लक्षण हैं।
आवेश में थोड़ा अंतर है। इससे ग्रसित व्यक्ति होश में तो रहता है और अपने स्वरूप को भी याद रखे रहता है, किन्तु जब तैश आता है तो यह ज्ञान नहीं रहता कि इस स्थिति में जो कहा या किया जा रहा है उसका परिणाम क्या होगा? असंतुलित स्थिति में कुछ भी औंधा–सीधा सोचा जा सकता है। तिल का ताड़ और राई का पर्वत बनाया जा सकता है। यह असंतुलन कातरता निराशा में भी परिणत हो सकता है और आक्रामक दिशा अपना लेने पर किसी से भयंकर रूप से टकरा जाने से लेकर हत्या या आत्महत्या तक कर बैठने पर उतारू हो सकता है।
मस्तिष्क की अजीब दशा हो जाती है। जो विचार उग पड़ता है, वह ठंडा ही नहीं होता। नींद उड़ जाती है। जागृति या उनींदा अवस्था में वही विचार हावी रहता है। उतारे से उतरता नहीं। हटाने से हटता नहीं। बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह मनमानी दिशा में दौड़ता रहता है। स्थिति बहुत देर में मुश्किल से ही काबू में आती है। जो चिंतन चल रहा है, उसके विपरीत भी कोई तर्क या तथ्य हो सकता है,यह सूझता नहीं। विकल्प ढूँढ़ने और नई राह खोजने की भी गुंजाइश नहीं रहती। ऐसी दशा में बेलगाम घोड़े की तरह विपत्ति में जा फँसने की दिशा में भी सरपट दौड़ा जा सकता है। किसी भी खाई खड्ड में गिरा जा सकता है।
आवेशों में एक अजीब किस्म की सनक है—कामुकता। प्रकृति प्रवाह के जीवन में इसका स्थान अत्यंत स्वल्प है। नर-मादा जब पूर्ण परिपक्व स्थिति में होते हैं, तो फल के मध्य से पकने वाले बीज की तरह अगली पीढ़ी के सृजन की तैयारी करते हैं। उसी उत्साह की परिपक्वता, प्रौढ़ता का नाम है—कामुकता, जो यौनाचार के लिए आतुरता प्रकट करती है और साथी सहयोगी तलाश करती है।
इस उत्तेजना में एक जैव चुंबकत्व लहराता है, जिसका आरंभ मादा की ओर से होता है, वह परिपक्व स्थिति के नर को उत्तेजित आमंत्रित करता है। फलतः यौनाचार का संयोग बन जाता है और गर्भाधान से नई पीढ़ी का निर्माण का श्री गणेश होता है। अपरिपक्वावस्था में, अल्प वयस्कता में यह उभार नहीं उठता और वृद्धता आने पर शिथिलता की स्थिति में सही प्रजनन बहुधा संभव नहीं होता, इसलिए कि कामोन्माद की प्रवृत्ति समाप्त सी हो जाती है।अन्य प्राणियों की तरह यही प्रकृति नियम मनुष्य पर भी लागू होता है। उनकी कामुकता नारी की चरम विकसित जननोल्लास पर निर्भर रहनी चाहिए। नर बिना आमंत्रण के मादा को नहीं छेड़ता। इन नियमों का मनुष्य भी पालन करे, यह प्रकृति प्रेरणा है। मर्यादा में रहकर ही शांति और व्यवस्थापूर्वक जिया जा सकता है।
प्रकृति का अनुशासन जिनने अंगीकार किया है, उन वनवासी कबीलों अथवा सभ्य समुदायों में विभिन्न आयु के नर-नारी साथ-साथ रहते हैं। वे सभी अपने निर्धारित क्रियाकलापों में लगे रहते हैं। कामुक चिंतन की चपेट में वही मुड़ते हैं जिनकी स्थिति गर्भाधान के उपयुक्त हो गई है। इसके बिना स्वाभाविक रूप से कामुक आवेश उत्पन्न ही नहीं होता और न यौनाचार का अवसर खोजा जाता है।
मनुष्य ने जो अनेक दुष्प्रवृत्तियाँ स्वभाव में शामिल कर ली हैं, उनमें प्रमुख एक है—कामुकता। इसमें एक प्रतिशत यथार्थता और 99 प्रतिशत काल्पनिक उच्छृंखलता का समावेश रहता है। विपरीत लिंग के सजातीय की मांसलता तथा उत्कंठा के काल्पनिक चित्र गढ़े होते हैं और मिलन संयोग का सपना सँजोया जाता है। बस इतने भर से स्नायविक उत्तेजना आरंभ हो जाती है और ऐसा उपाय सोचने से मानसिकता दौड़ने लगती है। जिससे कल्पना को चरितार्थ करने का अवसर मिले।
सामाजिक मर्यादाओं में पाशविक स्वेच्छाचार की छूट नहीं है। मनुष्य को सामाजिकता के—- नैतिकता के बंधनों से जकड़ा गया है और आचार संहिता अपना कर चलने के लिए मर्यादाओं का अनुबंध सृजा गया है। पर जब मानसिकता आवेशग्रस्त होती है, तो वह वर्जनाओं को तोड़ डालने तक के लिए कटिबद्ध होती है। इससे दांपत्य दायित्वों की लक्ष्मण रेखा टूटती है और पहले मानसिक फिर शारीरिक व्यभिचार का सिलसिला चल पड़ता है।
इन दिनों यह अनर्थकारी दुष्प्रवृत्ति आँधी तूफान की तरह बढ़ चली है। गोपनीय विषय होते हुए भी सार्वजनिक रूप से झरोखों से जो उजागर होता है, उसे देखते हुए लगता है कि नर-नारी के बीच जो शालीनता का अंतरपट पड़ा हुआ था, उसे बेतरह झकझोरा और तोड़ा मरोड़ा जा रहा है। बहिन भाई, पिता पुत्री के रिश्ते प्रायः समाप्त होते जा रहे हैं। शिकार और शिकारी की दृष्टि उभर रही है। विपरीत लिंग के प्रति अश्लील चिंतन आम बात होती जा रही है। इसका प्रतिफल व्यभिचार, बलात्कार इत्यादि के रूप में इस कदर देखने सुनने में आ रहे हैं कि उनके भयावह परिणामों की संभावना से परिवार संस्था की पवित्रता का समापन होता दीख पड़ता है। इसका प्रतिफल वासनात्मक अतिवाद के कारण शरीरों को निःस्वत्व होते देखा जा सकता है और पाया जा सकता है कि अभिभावकों और वंशजों के बीच दुःखदायी उपेक्षा पल रही है। यौन रोग पनप रहे हैं और उसके साथ ही बौद्धिक एवं नैतिक स्तर बेतरह गिर रहे हैं।
कामुकता का आवेश उत्पन्न करने में अश्लीलता की पक्षधर साज सज्जा विशेष रूप से जिम्मेदार है। इस प्रकार की उत्तेजना देने वाली पुस्तकें, तस्वीरें, फिल्में, भावुक और कोमल मस्तिष्कों पर गहरी छाप छोड़ती हैं और किशोरों-किशोरियों से लेकर तरुण और प्रौढ़ों का ध्यान अन्य उपयोगी प्रसंगों से खींचकर अपने साथ जोड़ती है। फलतः दिवास्वप्नों में भूतपिशाच की तरह यौनाचार ही मनों पर छाया रहता है। इसे आवेश ही कह सकते हैं, एक प्रकार का उन्माद भी। उन्मादी अपना व्यक्तित्व और भविष्य गवाँ बैठता है। आतुर भी इसी प्रकार क्षतिग्रस्त होते हैं। अश्लील चिंतन स्वच्छंद यौनाचार के दुष्परिणाम अभी भी बुरी तरह मनुष्य को तोड़ निचोड़ रहे हैं और भी अधिक बढ़ोत्तरी होने पर जो बीतने वाला है उसकी चिंता मात्र से सीना दहलता है।
......मैं आपकी पत्नी हूँ ,आपकी प्रेयसी हूँ, आपकी माता हूँ, आपकी बहन हूँ, आप की मित्र हूँ।
मैं इसलिए बनाई गई थी कि मैं दुनिया को सौम्यता, आश्वासन, गंभीरता, सुंदरता और प्रेम दे सकूँ। लेकिन मैं देखती हूँ कि मेरे अस्तित्व के इस उद्देश्य की पूर्ति करना मेरे लिए उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है। सिनेमा तथा टेलीविजन वाले तथा विज्ञापनबाज मेरी जो अन्य विशेषताएँ और गुण हैं, उन सबको भुलाकर मेरा इस्तेमाल केवल एक ही काम के लिए कर रहे हैं-—कामोत्तेजन के लिए। इसके कारण मैं अपमानित हुई हूँ, इसने मेरी आबरू को नष्ट कर दिया है, इसके कारण मैं बच सकने में असमर्थ हूँ, जो आप चाहते हैं कि मैं बनूँ—सुंदरता, प्रेरणा और प्रेम का स्रोत। प्रेम की मूर्ति मेरे पति के लिए, मेरे परमेश्वर के लिए। मैं फिर से मेरा सही स्थान प्राप्त करने में आपकी मदद चाहती हूँ ताकि जिस उद्देश्य के लिए मेरा सृजन हुआ है, उसको मैं पूरा कर सकूँ।
अहंकार उन दिनों आसमान छू रहा था। नाम तो उसे स्वाभिमान का दिया जाता है, पर था वह औद्धत्य। नम्रता और शालीनता की सभी परिधियों को तोड़कर अपने को सर्वोपरि सिद्ध करने के लिए इस बात की होड़ लगी हुई थी कि किसने कितनों को पीछे धकेला और पछाड़ा। शासन के क्षेत्र में काम करनेवाले सैनिक भी बड़े अफसरों का रौब दिखाने के लिए बढ़-चढ़ कर क्रूरता का परिचय देते थे। मालिकों का स्वार्थ साधने के अतिरिक्त अपनी भी चौथ बटोरते थे। शासन का पर्याय-वाचक ही अत्याचार बन रहा था।
शासन के संपर्क में आनेवाले वरिष्ठ प्रजाजनों ने भी सत्ताधारियों का ही अनुसरण आरंभ कर दिया था। वे व्यापारी अपने ग्राहकों, श्रमिकों को शोषण करते—मनमाना मुनाफा कमाते और भारी ब्याज लेते। उनके यहाँ जेवर बर्तन ही गिरवी नहीं रखे जाते थे, वरन् युवा नर नारियों को भी इच्छानुसार बरतने के लिए पैसे के बदले गिरवी रख दिया जाता था।
सामान्यजनों में भी यही प्रवृत्ति पनप रही थी कि वे अपनी महत्त्वाकांक्षाएँ बढ़ाएँ और अधिक सफल संपन्न बनने के लिए जो चाहें सो रास्ता अपनाएँ, चाहे वह अनीति का ही क्यों न हो?
समय का दर्शन ही ऐसा कुछ बन गया था कि साथियों की तुलना में अपने को विशिष्ट सिद्ध करने के लिए ऐसा कुछ कर दिखाया जाए जिससे उनकी बलिष्ठता, प्रतिभा और महत्ता सिद्ध होती हो। यह विचार दर्शन प्रचलन बन गया था। इसमें दया, करुणा, सेवा, सहानुभूति के लिए स्थान न था। उपभोग और संचय ही प्रतिभा और सफलता के प्रमाण माने जाते थे। इस कुचक्र में दुर्बलों, पिछड़ों को बुरी तरह पिसना पड़ रहा था। विचारशील कहे जाने वाले दार्शनिकों, पुरोहितों ने भी हवा का रुख देखकर उसी के साथ चलने में अपनी भलाई और कमाई देखी। वे भी समर्थों का समर्थन करने लगे।
ऐसे समय में यूरोप के क्षेत्र में एक नया सितारा उदय हुआ—जर्मनी का शोपेनहाॅवर। वह अठारहवीं सदी के अंत में जन्मा। निर्धन वर्ग में जन्मने के कारण उसे बचपन से ही समर्थों के शोषण, उत्पीड़न का शिकार बनना पड़ा। किशोरावस्था पार करते-करते उसने अपनी पैनी दृष्टि दूर-दूर तक फेंकी और देखा कि संव्याप्त अनाचार के पीछे भ्रष्ट दर्शन की प्रेरणा किस प्रकार अपना प्रभाव छोड़ रही है। उसने विष वृक्ष की टहनियाँ तोड़ने पर श्रम नहीं किया, वरन् जड़ों पर कुल्हाड़ा चलाया।
उसने अधिक पढ़ने और अधिक कमाने का विचार मन में से पूरी तरह निकाल दिया। विश्व दर्शन के सभी पक्षों के अध्ययन को उसने अपना प्रिय विषय बनाया। इस समुद्र मंथन से उसने पाया कि भारतीय धर्म दर्शन ही मात्र ऐसा है जो मनुष्य को संयम बरतने, नम्रता अपनाने, सज्जनोचित निर्वाह करने और सेवा साधना में संलिप्त रहने की शिक्षा देता है। अधिक रुचि बढ़ी तो अधिक गहरा अध्ययन किया। उपनिषद् उसे अधिक प्रिय लगे। उनमें वह तत्त्व पाया जो मनुष्य की लिप्सा, अहंता, विलासिता एवं तृष्णा पर कुठाराघात करता है। उसकी सर्जना और शिक्षा में वे तत्त्व थे जो मानवी गरिमा के सूक्ष्म संकेतों को मुखर एवं कार्यान्वित करने में कारगर रूप से अपना पक्ष प्रतिपादित करते थे।
शोपेन हाॅवर ने भारतीय उपनिषदों का गहरा अध्ययन किया और उसके सार तत्त्व को, विभिन्न वर्गों के गले उतारने योग्य इस प्रकार निरूपित किया कि समाज का प्रत्येक वर्ग अपनी विचार सारिणी और कार्यपद्धति की यथार्थवादी समीक्षा कर सके। उसमें आवश्यक हेर-फेर सुधार कर सके। पुरातन के स्थान पर नवीन की स्थापना कर सके। उसने अपने प्रतिपादन को वाणी से प्रसारित करने में कोई कमी नहीं रहने दी और इतना लिखा, जिससे जनसमुदाय के व्यापक अविचारों को नए सिरे से समीक्षा करने का अवसर मिल सके। उसने अपने जीवन को पूरी तरह इसी मिशन के लिए समर्पित कर दिया।
शोपेन हाॅवर अपनी विधवा माता का इकलौता पुत्र था। वह संपन्न भी थी और विलासपूर्ण जीवन की पक्षपाती भी। उसकी कार्य पद्धति समय के साथ चलती थी। बेटे को भी अपने साथ चलने और वही रीति-नीति अपनाने के लिए समझाया। पर उस पर भारतीय निवृत्ति मार्ग का रंग चढ़ चुका था। निजी जीवन में आदर्शों का समावेश किए बिना कोई लोक मानस को आदर्शों की ओर मोड़ नहीं सकता। यह तथ्य उसकी स्वीकृत मान्यता का अंग बन चुका था। वह अपनी माता से अलग हो गया। एक सस्ते होटल में छोटी कोठरी किराए पर लेकर उसमें रहने और गुजारा करने लगा। जन संपर्क के लिए जितना समय आवश्यक था उतने समय बाहर रहता और लौटकर फिर कोठरी में बैठ जाता। रात्रि का आधा भाग उसने सोने के लिए और आधा पढ़ने-लिखने के लिए सुरक्षित कर लिया। जिस समय होटल में तरह-तरह की रंग रैलियाँ चलती रहतीं, उस समय वह विचारों में डूबा रहता और सोचता रहता कि प्रचलित अहम्मन्यता को किस प्रकार सज्जनता की राह पर मोड़ा जाए? जो उसे सूझता उसे निर्भीकतापूर्वक व्यक्त और अंकित करता।
शोपेन हाॅवर के विचार चौंकाने वाले थे, प्रचलन प्रवाह के विपरीत भी। उसने समर्थों की गतिविधियों की धज्जियाँ उड़ाईं। इस प्रतिपादन को सुनने और छपने में सहयोग देने के लिए कोई तैयार नहीं होता था। इसलिए उसकी आजीविका भी स्वल्प थी। इतने में ही उसे गुजारा चलाना पड़ता था। पर पीछे खरी सुनने वालों का भी एक वर्ग उभरा। उसने इन सुधारवादी संघर्षमूलक विचारधारा को प्रश्रय देने और दिलाने का प्रयत्न किया। फलतः उस प्रकार का भी एक वर्ग विकसित हुआ जो उस विचारधारा का समर्थन ही नहीं, सहयोग भी करता था। उसके ग्रंथ प्रकाशित ही नहीं हुए, बड़ी मात्रा में लोकप्रिय भी हुए। उत्साह बढ़ा तो उसने एक के बाद दूसरा ग्रंथ लिखा और समय का प्रवाह उलटने के लिए दार्शनिक पृष्ठभूमि पर भरसक प्रयत्न किया, जिसमें लगे हाथों सफलता भी मिलने लगी। शोपेन हाॅवर के जीवन में ही योरोप में एक वर्ग ऐसा उत्पन्न हो गया था जो शासन और समाज में संव्याप्त सामंतवाद का खुले आम विरोध करने लगा। इतना ही नहीं, इन अनुयाइयों ने अपने निज के जीवन में भी इस प्रकार के आदर्शवादी परिवर्तन किए, जिससे सिद्ध हो सके कि उनकी मान्यता मात्र बौद्धिक ही नहीं है, वरन् गहराई तक उतर कर जीवन विद्या में भी प्रवेश करने लगी है।
शोपेन हाॅवर का प्रख्यात ग्रंथ 'द वर्ल्ड एज विल एण्ड आइडिया' जब प्रकाशित हुआ तो सुधारवादी भावनाशील क्षेत्र में उसकी धूम मच गई। उसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और कोटि-कोटि लोगों ने उसे चावपूर्वक पढ़ा। जिनने उन विचारों पर गौर किया, उन्हें समय की प्रवंचना पर आक्रोश भी उपजा और सुधार परिवर्तन के लिए कुछ कर गुजरने का उत्साह उभरा। छुटपुट स्थानीय संघर्ष उन्हीं दिनों उभरने लगे थे। शासकों और शासितों के बीच विरोध उभरा और उसने संघर्ष का रूप धारण करना आरंभ किया। समीक्षक कहते हैं कि एक समर्थ प्रवाह को मोड़ने और उसके विरुद्ध जन मानस को संघर्ष के लिए अड़ा देने का कार्य, शोपेन हाॅवर के प्रयासों से ही, अपनी नींव मजबूत कर सका। जिनके कारण बाद में कई बड़ी राजनैतिक और सामाजिक क्रांतियाँ संभव हुईं।
शोपेन हाॅवर ने पूरी जिंदगी उसी छोटी कोठरी में सच्चे संत की तरह व्यतीत की। वह आजीवन अविवाहित रहा। समय और चिंतन का एक-एक कण वह अपने मिशन के लिए विसर्जित करता रहा। मरा तब उसके हाथ में लेखनी और सिरहाने पुस्तकों का बड़ा सा ढेर था। यही थी उसकी संपदा, जिसे मरते समय मित्रों के लिए सौगात रूप में छोड़ा।
विलास के स्थान पर संयम की, अधिकार के स्थान पर कर्तव्य की प्रवृत्ति के स्थान पर निवृत्ति की शिक्षा का प्रतीक शोपेन हाॅवर का चिंतन और जीवन। उसने अपने समय के समाज को पूरी तरह झकझोरा।
भाग्य के संबंध में एक बात निश्चित है कि कोई उसे बदलना चाहे तो बदल सकता है। भवितव्यता अटल नहीं है।
संसार में आश्चर्यजनक दृश्यों की गणना 7 में गिनी जाती है। यह मान्यता एवं किंवदंती रही तो बहुत समय से, पुरातन काल से है, पर साथ ही यह भी निश्चित है कि उनकी संख्या न्यूनाधिक होती रही। सात प्रख्यात अजूबों की गणना की जाती रही है। पर ऐसा नहीं हुआ कि एक बार जो कहा गया उसे पत्थर की लकीर मान लिया गया हो। उसमें समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं।
कभी (1) मिश्र के पिरामिड (2) बेबीलोन के बगीचे (3) ग्रीस में ज्यूइस की मूर्ति (4) एपीसस में आर्टिमस का मंदिर (5) यवन द्वीप की राडेस प्रतिमा (6) सम्राट मुसलिस की समाधि (7) फेरोहा का प्रकाश स्तंभ।
जिनके निर्माण में असाधारण बुद्धि-कौशल, कलाकारिता एवं विपुल संपदा का नियोजन हुआ है। इन्हें देखने के लिए उत्सुक साधन संपन्न व्यक्ति विश्व भ्रमण करते हुए जाया करते थे। उनमें से अधिकांश को देखने जाते समय समुद्र पार करने पड़ते थे। उस जमाने में नौकायन ही विदेश यात्रा का प्रमुख माध्यम था। मस्तूल वाले बड़े-बड़े जहाज हजारों यात्रियों को, टनों असबावों को, एक देश से समुद्र पार कर दूसरे देश में पहुँचाते थे। उन दिनों सड़कें कम थीं। जो थीं वे सुव्यवस्थित भी नहीं थीं और चोर डाकुओं से सुरक्षित भी नहीं। इसलिए स्थल की गुंजाइश होते हुए भी लोग लंबा चक्कर काटकर दूरवर्ती यात्राएँ संपन्न करते थे।
महत्वपूर्ण निर्माणों में से अनेक जराजीर्ण होकर ध्वस्त होते रहे और अन्य स्थानों पर नए निर्माण खड़े होते रहे। इसलिए पुरातन सप्त प्रसिद्धियों में परिवर्तन होता रहा। कुछ घटते और कुछ बढ़ते रहे।
ईसा की छठीं शताब्दी में सेंट ग्रेउटी ने विश्व भ्रमण करके सप्त आश्चर्यों की नई सूची बनाई थी। (1) सागर में उठते ज्वार भाटे (2) बीज से वनस्पति उगना (3) मनुष्य का पुनर्जन्म (4) ग्रीनोवल का जल स्रोत,जिसमें आग पानी एक साथ निकलते थे (5) माउण्ट एटना (6) सूर्य की ऊर्जा (7) चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाएँ। इन्हें प्रकृति के आश्चर्यों की संज्ञा दी गई थी।
18 वीं शताब्दी में जो आश्चर्य थे उन्हें (1) अमेरिका के ग्रोथकेयसे (2) ब्राजील का जनैरी बंदरगाह (3) अर्जेंटाइना का द्यामवास जलप्रपात (4) कैलीफोर्निया की योसेमाइट घाटी (5) हिमालय की एवरेस्ट चोटी (6) मिस्र की नील नदी (7) उत्तरी ध्रुव के प्रकाश पुंज के रूप में सूचीबद्ध किया गया।
इसके बाद की सूची में (1) पनामा नहर (2) ताजमहल (3) न्यूयार्क की एक पाया बिल्डिंग (4) मिस्र के पिरामिड (5) गीजा की महान मूर्ति (6) हेडिया सोपालिस्य (7) पीसा की मीनार आते हैं ।
उन्नीसवीं शताब्दी में विज्ञान के आविष्कारों की धूम रही और उस आधार पर जो नए निर्माण हुए उन्हें देखने के लिए लोग उत्सुकतापूर्वक पहुँचते थे। एक दो सहस्राब्दी पुराने तीर्थ स्थानों और स्मारकों की टूट फूट को दुरुस्त करके उन्हें दर्शनीय बनाए रखा गया। पैग्ंबरों और धर्माचार्यों के कार्यक्षेत्र भी दर्शनीय बने। जो देव प्रतिमाओं के लिए बनाये गये। वे भी क्षेत्रीय तथा श्रद्धा संदोह के आधार पर अपनी-अपनी जगह दर्शनीय बने हुए संदोह के आधार पर अपनी अपनी जगह दर्शनीय बने। जो देव प्रतिमाओं के लिए बनाए गए। वे भी क्षेत्रीय तथा श्रद्धा संदोह के आधार पर अपनी-अपनी जगह दर्शनीय बने हुए हैं। सबसे बड़ा अजूबा है स्वयं मनुष्य, जो इच्छानुसार गिरगिट की तरह रंग बदलता रहता है। कभी पशु, कभी प्रेत-पिशाच, कभी देव-दानव और कभी संत-सुधारक, उद्धारक बन जाता है।
चाकू कितने ही अच्छे लोहे का बना क्यों न हो, उसकी धार बनाने के लिए पत्थर पर रगड़ना आवश्यक है। स्वाध्याय ऐसा ही पत्थर है, जिसके संपर्क में निरंतर रहना ही चाहिए।
आधुनिक प्रगतिशीलता का प्रतिपादन है कि मनुष्य की उत्कंठा, अभिलाषा, इच्छा, जिस दिशा में जितनी प्रबल होगी, उसे उतना ही उस क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। बुद्धि काम करेगी। योजना बनेगी। साधन जुटेंगे और सहयोगी मिलेंगे। फलतः जो चाहा गया है उसके अनुरूप बानिक बनता चला जाएगा। प्रवाह चल पड़ने पर मंजिल तक पहुँचने में सुविधा होती है। सफलता प्राप्त होने की परिस्थितियाँ निकट आती जाती हैं।
ऐसी ढेरों पुस्तकें इन दिनों छपी हैं, जिनमें इच्छाशक्ति का महत्त्व और माहात्म्य उदाहरणों समेत विस्तारपूर्वक बताया गया है। भौतिक क्षेत्र में जिनने भी, जिस प्रकार की भी, उन्नति की है, उनके पास आरंभ से इच्छित प्रसंग की जानकारी तथा सुविधा भले ही न रही हो, पर उत्कंठा ने कदम उठाए तो प्रतिकूलताएँ अनुकूलता में बदलती चली गईं। अपने स्वभाव के अन्य सहचर भी मिल जाते हैं। उन्हें भी मिले और मिल−जुलकर खोजने तथा करने में मार्ग और भी अधिक सरल हो गया।
आवश्यक नहीं कि सभी महत्त्वाकांक्षी अपनी कामनाएँ पूरी कर ही लेते हों, पर इतना आवश्यक है कि अंतर की अकुलाहट रास्ता वहाँ भी बना लेती है जहाँ वह आरंभ में रुका हुआ प्रतीत होता था। इच्छा शक्ति को मानवी अंतराल की ऊर्जा माना गया है। उसके कारण शक्ति मिलती है। गरमी आती है और हलचल मचती है। यह उत्तेजना निरर्थक नहीं जाती। कुछ न कुछ कर ही गुजरती है। इस प्रतिपादन के पक्ष में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं। ढूँढ़ने पर वे अपने इर्द-गिर्द ही ढेरों मिल जाते हैं। अस्तु कथन, प्रतिपादन और प्रोत्साहन में अभिलाषी लोगों को इसकी स्वीकृति में आपत्ति भी नहीं होती।
यहाँ एक नया प्रश्न उत्पन्न होता है कि महत्वाकांक्षा की दिशाधारा क्या हो? आमतौर से लोग विलास, वैभव और बड़प्पन प्रदर्शन के आकांक्षी पाए जाते हैं। मन की जैसी बनावट है और बहुजनों को जैसा करते देखा जाता है, उसी का अनुकरण करने की अपनी भी इच्छा होती है। दूसरों को समृद्ध, संपन्न देखकर अपना भी मन करता है कि ऐसा ही सुयोग अपने को भी क्यों न मिले? परामर्श दाता मिल जाने पर भी अधिकांश ऐसे होते हैं जो सरल शुभेच्छा से प्रेरित होकर ऐसे ही परामर्श देते हैं, जिनसे सुखी-समृद्ध होने तथा बड़ा आदमी कहलाने का श्रेय मिले।
आवेश धीमी गति से चलता है, तब तक तो न्याय, विवेक और औचित्य का अंकुश बना रहता है और उसी सीमा तक उत्कर्ष की इच्छा की जाती है, जहाँ तक अन्याय अपनाने और अपराध करने का अवसर न आए। पर बाँध महत्त्वाकांक्षाओं के प्रबल होते ही दरारें देने, रिसने लगता है। एक स्थिति वैसी भी आती है कि मर्यादाओं और वर्जनाओं का बाँध पूरी तरह टूट जाता है और दुष्टता, भ्रष्टता अपनाने में कोई संकोच नहीं लगता। बड़प्पन मिलता रहे, किंतु साथ ही बदनामी होती रहे, घृणा-तिरस्कार की वर्षा होती रहे तो जो आनंद प्रतिभाशिलता में सोचा गया था, वह घटने और मिटने लगता है। बड़प्पन की अनुभूति बदनामी से हल्की नहीं होती, भारी ही पड़ती है।
आमतौर से कामना धन, वैभव, बड़प्पन और प्रदर्शन की होती है। इन्हें उपार्जित करके मनुष्य सोचता है कि वह असंख्यों से ऊँचा हो गया। लोग इसे प्रबल पुरुषार्थ और चातुर्य-कौशल का प्रतिफल मानेंगे और सौभाग्यशाली भी कहेंगे। पर देखा गया है कि वैसा होता नहीं। मित्र, पड़ोसियों और संबंधियों में से हर एक के सामने अपनी अपनी समस्याएँ हैं। उनका मन पूरी तरह उन्हीं को सुलझाने में रहता है। दूसरों की ओर रास्ता चलती नजर ही डाली जाती रहती है। किसी के बड़प्पन का इतिहास पढ़ने और धन कमाने की सफलता को सराहने के लिए किसके पास फालतू समय खाली होता है। दुनिया में एक से एक बढ़कर सुसंपन्न और प्रगतिशील पड़े हैं। इनकी विरूदावली गाने में कौन समय निकाले?
फिर यह समय ईर्ष्याप्रधान भी हो गया है। किसी की बढ़ोत्तरी देखकर लोग प्रसन्न नहीं होते, वरन् जलते हैं। ईर्ष्या करते हैं। चोर, बेईमान बतलाकर भर्त्सना करते हैं और अवसर मिलता है तो नीचा दिखाने में भी नहीं चूकते। एक दूसरे की प्रशंसा स्वार्थवश ही की जाती है; अन्यथा निंदा, उपहास, छिद्रान्वेषण करना ही इन दिनों का आम रिवाज है। धन के अनावश्यक संग्रह से उसे झपटने वाले, अपने को उत्तराधिकारी समझने वाले, चापलूसी की कीमत चाहने वाले इस फिकर में रहते हैं कि इस भंडार में से जितनी जल्दी जितना ले भागा जाए। उसके लिए कोई पक्ष या विपक्ष का कौतुक खड़ा किया जाए। जो प्रशंसा से काबू में न आएँ, उनके सामने भय, आतंक का कोई ऐसा खेल खड़ा किया जाए, जिससे डरकर वह कुछ उगले और संपदा का एक भाग उसे भी दे। ऐसे लोगों के षड़यंत्र कई बार बड़े दुरूह होते हैं और उनकी चोट कई बार बड़ी करारी बैठती है। संपन्नता, बड़प्पन, और वाहवाही लूटने की ललक में एक खराबी यह है कि वह जितना परिश्रम कराती, जितना कुचक्र रचाती हैं, उसका एक छोटा अंश भी अपने निज के काम नहीं आता। जमाखोरी का अधिकांश अपव्यय में उड़ जाता है। चमचे, चापलूस मूल्य से नहीं खरीदे जाते। वे हर घड़ी कुछ चाहते हैं। आड़े वक्त पर तो अपनी तथाकथित वफादारी की पूरी कीमत वसूल लेते हैं। इस प्रकार की समस्याओं में से कुछ तो उनकी बुनी हुई या खड़ी की हुई ही होती हैं।
जो पैसा पूरी ईमानदारी और मेहनत से कमाया जाता है, उसी का सदुपयोग भी बन पड़ता है, अन्यथा उसमें से अधिकांश अपव्यय में चला जाता है। ठाठ बाट खड़ा करना कम खर्चीला नहीं है। बातूनी मित्रों को साथ रखना हो और उनके मुँह प्रशंसाएँ सुननी हों तो इसकी कीमत चुकाने में भी निरंतर उनका मुँह मीठा करना पड़ता है। बड़प्पन लूटने के लिए अपव्यय आवश्यक है। यह अपव्यय दुर्व्यसनों और कुकर्मों में ही होता है। मुक्त हस्त से लूटने वालों को असंयमजन्य अनेकों आधि व्याधियाँ होती हैं। पेट खराब होने से लेकर अनिद्रा जैसे अनेकों रोग घेरते हैं और दवा दारू में, महंगी परिचर्या में, ढेरों खर्च हो जाता है। नशेबाजी, व्यभिचार, यारबाजी, आवारागर्दी जैसे दुर्व्यसन उस फालतू कमाई का अधिकांश अपव्यय करा देते हैं जो भड़काई गई महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए छल बलपूर्वक इकट्ठा किया गया था।
महत्त्वाकांक्षाओं का चालू अर्थ अधिकाधिक मात्रा में धन, वैभव समेटना और लोगों पर अमीरी की, चतुरता की छाप डालना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए समय, श्रम, बुद्धिबल और मनोबल को दाँव पर लगाना पड़ता है। इतना ही नहीं, नीति मर्यादा तक को तिलांजलि देनी पड़ती है। इतना कर गुजरने में जिंदगी खपा देने पर भी लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि पल्ले कुछ नहीं पड़ा। जो कमाया गया था, उसे मसखरे उड़ा ले गए।
महत्वाकांक्षाओं की सही दिशा वह है जिसमें आत्मगौरव बढ़ाने और लोक मंगल के लिए कुछ कर गुजरने की उमंग उठती है। संसार में अगणित ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनकी चरित्र- निष्ठा और सेवाभावना चिरकाल तक असंख्यों के लिए अभिनंदनीय और अनुकरणीय बनी रही है। सेवा और सुधार के लिए सदा ही माँग रहती है। पिछड़ों को उठाने और भटको को राह लगाने की आवश्यकता हर समय हर क्षेत्र में अनुभव की जाती है। इस संदर्भ में अवांछनीयताओं से जूझना और सदाशयता के लिए पथ प्रशस्त करना पड़ता है। यह सब तो करना ही होता है, दूसरों को भी उसी राह पर चलने के लिए एड़ी छोटी का पसीना एक करना पड़ता है। यह उसी से बन पड़ेगा जो अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाएँ एवं आवश्यकताएँ कम रखे। स्वल्प संतोषी बन कर ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की कार्य पद्धति अपनाए।
आदर्शवादी व्यक्ति भूखे नंगे नहीं रहते। वे हरामखोरी नहीं करते। इसलिए यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि अपनी आवश्यकता कम रखें। वस्तुतः इतनी कम हो कि यदि उन्हें काम चलाऊ कसौटी पर कसकर जमा संग्रहीत किया जाए तो उन्हें कुछ ही घण्टे के परिश्रम से कमाया जा सकता है। यदि उत्तराधिकारियों के लिए मुफ्त का ब्याज उपहार में देना नहीं है तो वह भी काम चलाऊ मात्रा में सरलतापूर्वक संग्रह किया जा सकता है। संतोषी वृत्ति धारण करने पर साधारण गुजारा भी निर्वाह तथा सम्मान के लिए पर्याप्त हो सकता है। इसके उपरांत जो समय, श्रम, चिंतन, एवं कौशल बच जाता है, उन्हें उन कार्यों में लगाया जा सकता है, जिनसे जीवन की सफलता का आधार बन सके।
शरीर को विलास चाहिए। मन को वैभव से प्रसन्नता होती है पर अपनी आत्म सत्ता तो शरीर से भिन्न है; साथ ही काया का यह ठिकाना भी नहीं कि वह कितने समय साथ देगी। शरीर छूट जाने के उपरांत तो बड़प्पन और गरीबी का गुणगान या उपेक्षा का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। जो व्यक्ति इस जन्म में राजा है, वही कर्मवश गधा या कुम्हार बन जाता है तो इस परिवर्तन के बाद पूर्व जन्म के राजा की ख्याति उसके लिए किस काम आई। आत्मा की अमरता का सिद्धांत यदि स्वीकारा जाए और शरीरों को वस्त्र बदलने की तरह आए दिन का झंझट माना जाए तो फिर ख्याति की महत्वाकांक्षा बहुत ही छोटी, घटिया और अस्थायी वस्तु रह जाती है। वह सामयिक भी है, अस्थिर और क्षणिक भी। जब पूर्व जन्मोँ के यश अपयश इन दिनों हमारे किसी काम नहीं आते, उस निन्दा प्रशंसा का आज कोई प्रभाव नहीं रहा तो इस जन्म में हो रही निंदा प्रशंसा का शरीर बदल जाने पर कोई प्रभाव न रहेगा। जब आज हमें पूर्वजन्मों की ख्याति कुख्याति का कोई असर अपने ऊपर नहीं है, तो भविष्य में उसके बने रहने की क्या आशा की जाए?
बदलते क्षणों की तरह शरीरों के धारण करने और उतारने का सिलसिला भी चलता ही रहता है। यश अपयश शरीरों तक सीमित है। यह सोचते हुए वाहवाही लूटने, शान बघारने, शेखी दिखाने, प्रशंसा सुनने के लिए ओछे हथकंडे अपनाना दूरदर्शिता नहीं है। मिथ्या प्रदर्शन तो रंगमंचों के नट, नटनियाँ भी कर लेते हैं। वे क्षण भर के लिए राजा, मंत्री, तपस्वी, भिखारी कुछ भी बन जाते हैं। पर प्रदर्शन समाप्त होते ही अपने सारे कपड़े पहन लेते हैं और सादे कर्मचारी की तरह रहते हैं।
इच्छा शक्ति का नियोजन और प्रगति का मूल्यांकन भौतिक वैभव के संपादन या लोगों के बीच बड़े कहलाने लिए नहीं करना चाहिए, वरन् यदि विवेक जागे तो विचारणा और साहसिकता और ऐसे उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए, जिन्हें तुच्छ, अस्थायी एवं बचकानी बुद्धि का चुनाव न कहा जाए।
अनिद्य सुन्दरी उव्वरो राज्य महिषी बनी। उसके रूप सौंदर्य और गुण स्वभाव की भी ख्याति थी। कुछ समय उपरान्त उव्वरो ने एक कन्या को जन्म दिया। अपनी ही जैसी चन्द्र मुखी। किलकारियोँ से उसने भी राज्य महल की शोभा सुषमा में चार चाँद लगा दिए।
भाग्य विधान पलटा। कन्या का देहावसान हो गया। माता पर वज्रपात हुआ। वह विक्षिप्त जैसी हो गई, जिस श्मशान में बालिका की अंत्येष्टि हुई थी, वह उसी में जा पहुँचती और विलाप से आकाश हिला देती। दर्शकों की आँखों में आँसू लुढ़कने लगते। उव्वरो इस शोक सन्ताप में सूख-सूख कर काँटा हो गई।
किसी के प्रबोधन का उस पर प्रभाव हो नहीं रहा था। एक दिन तथागत उस राह गुजरे। रुदन सुनकर ठिठक गए। विवरण जाना और क्रन्दन करती युवती के पास जा पहुँचे। उव्वरो ने सिर उठाकर उन्हें देखा और अनुग्रह की याचना करने लगी।
बुद्ध ने कहा-देखो इस श्मशान ने सहस्रों के मृत शरीर भस्मीभूत हुए हैं। उनके परिजन यदि ऐसा ही रुदन करते तो इस संसार में शोक के अतिरिक्त और कुछ बच रहता क्या? विवेक की आंखें खोलो और इस मरण–धर्मा शरीर की अन्तिम गति पर विचार करो।
जो चले गए उन्हें जाने दो। अपनी आत्मा का विचार करो जो पुत्री से भी अधिक प्रिय होनी चाहिए। ऐसा न हो कि तुम पुत्री की तरह आत्मा को भी गँवा बैठो। उव्वरो तथागत का एक-एक शब्द हृदयंगम करती गई।
उसने जीवित पुत्री अंतरात्मा को पहचाना और मृत का दामन छोड़कर जीवन्त का परिपालन आरम्भ कर दिया। कुछ दिन उपराँत उव्वरो बौद्ध महिला विहार की अधिष्ठात्री बन गई। सीमित मोह का व्यापक प्रेम के रूप में परिवर्तन जो हुआ था।
अध्यात्म की अनेक उज्ज्वल संभावनाओं का यश गान किया जाता है, पर उसका एक दोष ऐसा है जिसका दुष्परिणाम समूचे समाज को वहन करना पड़ता है। इस आरोप से इन्कार भी नहीं किया जा सकता।
प्रतिभा पलायन पर आमतौर से चिन्ता की जाती रहती है। देश के अन्न जल में पले और उच्चशिक्षा पर गरीब जनता के टैक्स से संग्रहित धन राशि द्वारा विशेष योग्यता प्राप्त जनता के टैक्स से संग्रहित धन राशि द्वारा विशेष योग्यता प्राप्त कर लेने के उपरान्त जब वे अधिक वेतन के लाभ में विदेशों को चले जाते हैं, तो उसी क्षेत्र की सेवा में अपना समय लगाते हैं। जो बढ़ा-चढ़ा वेतन पाते हैं उससे निजी विलास-वैभव बढ़ाते हैं। देश तो घाटे में रहता है। जिस जनता के द्वारा उन्हें खर्चीला पोषण और शिक्षण प्रदान किया था वह तो प्रतिफल से वंचित रहने के कारण घाटा ही सहती है। इसलिए प्रतिभा पलायन के संदर्भ में सदा कटु चर्चा ही होती रहती हैं।
मानव जीवन की संरचना इस प्रकार हुई है कि उसका अस्तित्व एवं विकास दूसरों के सहयोग अनुदान पर निर्भर रहता है। सहकारिता का ही दूसरा नाम प्रगति है। एकाकी रहने वाला तो आमतौर से वन्य प्राणी स्तर का ही जैसा है भेड़ियों की माँद में पाये गये मनुष्य बालक बिल्कुल पालकों का स्वभाव बना चुके थे। वे मनुष्यों के व्यवहार शिष्टाचार से सर्वथा अपरिचित थे बड़ी आयु का व्यक्ति भी यदि अपने आपको समेट लेता है तो उस संकीर्णता की परिधि में रहते हुए भी आहार, वस्त्र, ईंधन, आच्छादन आदि के लिए दूसरों पर किसी हद तक आश्रित रहता ही तुम्हीं आसन-माचिस, माला जैसे उपकरण तो तथा कथित वैरागी, गृहत्यागी लोगों को भी समाज से ही प्राप्त करने पड़ते हैं। भले ही उन्हें माँग कर लिया गया हो या बिना माँगे मिला हो। इसकी सीधी परिणति ही होनी चाहिए कि उपलब्ध किये गये कर्जे को निष्ठा पूर्वक चुकाया जाय। मानव जीवन का उद्देश्य विलास, वैभव एकत्रित करने, निजी लोभ लिप्सा की पूर्ति में निरत रहना नहीं है, वरन् यह है कि निर्वाह में जितना न्यूनतम समय लगाने से काम चल सके उसका शेष भाग जन कल्याण में पुण्य परमार्थ में लगाया जाय। इसी प्रयास में अपने दोष दुर्गुणों कषाय-कल्मषों एवं कुसंस्कारों का शमन, निराकरण भी होता रहता है और व्यक्ति निजी क्षेत्र में पुण्यात्मा-समाज क्षेत्र में परमार्थी बन जाता है। मानवी गरिमा का आधारभूत अवलम्बन यही है। उसी आधार पर उसे शान्ति सद्गति, प्रगति एवं प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। सर्वतोमुखी उत्कर्ष का आधार सुनिश्चित रूप से यही है।
सनातन आध्यात्म इसी की प्रेरणा एवं शिक्षा देता है। इसी दिशा धारा को अपनाने के लिए दबाव डालता है। प्रभाव छोड़ता है पुरातन काल के साधु ब्राह्मण इसी निमित्त अपना समय, श्रम, मन, पुरुषार्थ इसी हेतु समर्पित करने का लक्ष्य बनाकर चलते थे। इसी विशेषता के कारण उन्हें भूसुर, धरती के देवता माना जाता हैं। चार आश्रमों में वानप्रस्थ और संयम का उत्तरार्द्ध सुनिश्चित रूप से हर कोई परमार्थ के निमित्त ही अर्पित करता था। तभी यहाँ सतयुग विराजता था और इस देव भूमि को “स्वर्गादपि गरीयसी” होने का श्रेय मिलता था।”
आधुनिकता बुरी तरह स्वार्थपरता के रूप में हर क्षेत्र पर हावी होती जा रही हैं। व्यवसाय पर, पारस्परिक मिलन-मैत्री पर उसका पूरा-पूरा आधिपत्य है। मित्र बन कर शत्रु जैसी घात लगाना आज का चातुर्य प्रचलन है। यही रीति-नीति अध्यात्म जैसे पवित्र क्षेत्र में ही प्रवेश करती रही है अब उसने उस समूचे प्रसंग को अपने चंगुल में कसकर जकड़ लिया है। पंडावाद प्रसिद्ध है। ज्योतिषी कर्मकाण्डी से छिपा नहीं है। सामाजिक प्रपंचों और पाखण्डों के घटनाक्रम आयेदिन सामने आते रहते हैं।
इसी आधारशिला पर टिका है कि व्यक्ति अधिकतम पवित्र और परमार्थ परायण है। पुण्य शब्द में उन दोनों की ही समावेश है। माध्यम वहीं की सर्वतोभावेन पुण्यात्मा होना चाहिए। निजी महत्वाकाँक्षा का, लोभ-मोह का उसे विसर्जन करना चाहिए। अहंकारी यश लोलुप न होकर उसे शीलवान, संयमी और विनम्र होना चाहिए। यह वह पृष्ठभूमि है जिस पर साधना उगाई, बढ़ाई और फलित करने की प्रक्रिया अग्रगामी बनाई जाती है। साधनाएँ कितनी हैं? पर उसमें से कोई भी ऐसी नहीं है जा गर्हित, विकृत और प्रपंची मनोभूमि पर उग सकती हो। लालच और आदर्श की कोई संगति नहीं। लोगों पर रौब जमाने या चौंधियाने के लिए असली अध्यात्म का कोई अंश प्रयुक्त नहीं हो सकता। दूसरों को हानि पहुँचाने वाले वाममार्गी तंत्र प्रयोग, मानसिक प्रहार की आक्रामक संज्ञा में आते हैं। सम्मोहन और वशीकरण, कामनापूर्ति के लिए हो सकता है। मारण, उच्चाटन का प्रयोग कोई आततायी, अनाचारी ही कर सकता है।
आत्मा दर्शन में अहंता के पोषण का कहीं कोई स्थान नहीं है। प्रदर्शनात्मक ऋद्धि-सिद्धियाँ इसी दायरे में आती हैं। पानी पर बतख तैरती है। हवा में मक्खी उड़ती है। कछुआ अपने का फैलाता और सिकोड़ता रहता हैं। सर्दियों में सरीसृप और भालू महीनों की समाधि लगाये पड़े रहते हैं। कस्तूरी हिरन के शरीर में से सुगंध छूटती है, सारस हंस लम्बी दूरी कुछ ही समय पार कर लेते हैं। चीते लम्बी छलाँग लगाते हैं। इतने पर भी वे सम्माननीय सिद्ध योगी नहीं गिने जाते। लोगों को हतप्रभ कर देने और आश्चर्य में डुबो देने की कला, बाजीगरों और जादूगरों को आती हैं। उनके प्रदर्शनों में चकित करने वाले चमत्कार देखते ही बनते हैं। इतने पर भी उनकी श्रेणी नट, विदूषकों में ही रहती है। उन्हें न कोई महामानव है और न सिद्ध योगी। शरीर को मोड़ मरोड़ कर तो अजगर भी कुण्डली मार लेता है। फिर कई प्रकार के आसन लगाने वाले किस बिरते पर अपने करतबों की महिमा आकाश पाताल जितनी क्यों जताते हैं? साँप गहरी साँस खींचता और लम्बी फुंसकार मारता है। पर उसका यह कृत्य प्राणायाम परायणों की श्रेणी में नहीं गिना जाता हैं।
साधनाओं का उपासनात्मक कर्मकाण्डों का अपना महत्व है। उनके द्वारा प्रसुप्त शक्तियों के जागरण में सहायता मिलती है। किन्तु इतने पर भी यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि साधक का व्यक्तित्व संयमी, सदाचारी और करुणा से भरा पूरा हो। यदि यह पवित्रता अर्जित करने के लिए तपस्वियों जैसा साहस न जुटाया जा सका तो समझना चाहिए के बात बनी नहीं। चट्टान पर उपवन लगाने के प्रयत्न में कोई सफलता मिलने वाली नहीं है। व्यक्तित्व में निकृष्टता भरी पड़ी हो, छल प्रपंच के सहारे आडम्बरी यों सिद्ध बना जा रहा हो तो इस प्रकार सीमित आय ही कमाई जा सकती हैं फिर पोल खुलने का डर भी हर घड़ी बना रहता है और निरन्तर आत्म प्रताड़ना सहनी पड़ती है। इससे अच्छा है कि तस्करी के अनेकानेक धन्धों में से किसी को अपना कर लोगों की जेब काटते हुए अपना घर भरा जाय। इस से अध्यात्म के पवित्र नाम पर कलंक तो नहीं आता। जैसा कि इन दिनों पाखण्डी वर्ग उसे बुरी तरह बदनाम करता चला जाता है। स्मरण रहे आध्यात्म का उद्देश्य भावनाओं से पूरी करना था, बढ़ाना नहीं है।
अध्यात्म मार्ग का पथिक न्यूनतम निर्वाह का सादगी भरा जीवन जीता है और उच्चविचारों को - चरितार्थ करने के लिए समय, श्रम, चिन्तन, और साधन निकालता है। इससे वह अवकाश बच जाता है, जिसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाया जा सके। व्यक्ति और समाज को दुष्प्रवृत्तियों ने बर्बाद किया है। उसे यदि फिर से सुधारना संभालना है तो उसका एक ही उपाय हैं सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में जुटा जाय। अन्धकार में लाठी लेकर नहीं लड़ा जा सकता। व्यापक तमिस्रा को भागने के लिए प्रकाश उगना या उगाया जाना चाहिए। खाली बर्तन में हवा भर जाती है, किन्तु यदि उसमें कोई पदार्थ भर दिया जाय तो भरी हुई हवा अनायास ही वह स्थान चकली करके अन्यत्र चली जाती है। विश्व सेवा का उदार परमार्थ परायणता का सर्वश्रेष्ठ मार्ग एक ही है कि कुसंस्कारों का उन्मूलन करके उसके स्थान पर सुसंस्कारों की पौध लगाई जाय और खाद पानी की व्यवस्था जुटाई जाय। सच्चे अध्यात्मवादी यही करते रहते हैं और यही करते रहेंगे।
आध्यात्म का आडम्बर ओढ़ कर निजी स्वार्थ सिद्धि की तस्करी की जाय यह हर दृष्टि से घृणित है। अपनी सुविधा और प्रतिष्ठान का अभिवर्धन ही ऋद्धि सिद्धियों से हो सकता है। दस प्रयोजन के लिए किया गया जप-तप एक प्रकार से विशुद्ध व्यापार है। व्यापारी लाभ उपार्जन के लिए कष्ट उठाता, पूँजी लगाता और जोखिम सहता है। इसी प्रकार सिद्धि चमत्कारों के लिए मनोकामनापूर्ण करने या कराने के निमित्त किया गया साधन विधान उथले दर्जे का वैसा ही प्रयास समझा जा सकता है जैसे कि व्यवसायी या मुनीम स्तर के लोग करते और कमाई को अपने बच्चों तथा सम्बन्धियों में बाँटते रहते हैं। इसी प्रकरण में यह प्रयास भी जुड़ता है जिसमें स्वर्ग मुक्ति की कामना भरी रहती है। इस लोक में सुविधाएं अर्जित करने के लिए सभी स्वार्थीजन भरपूर प्रयास करते हैं। इसमें एक राई रत्ती का ही अन्तर है कि, स्वर्ग का विलास और मुक्ति का वैभव प्राप्त करने के लिए कार्य किया जाय या जोखिम उठायी जाय।
अध्यात्म का मूलभूत एवं तथ्यात्मक सत्य है कि स्वार्थ को परमार्थ में विसर्जित किया जाय। लोक मंगल के लिए इतनी तन्मयता के साथ तत्परता बरती जाय कि स्व की चीनी पर के दूध में पूरी तरह घुल जाय।
मनुष्य समा के श्रम बिन्दुओं से विनिर्मित पुतला है। उसका दायित्व है कि ऋण चुकाये। कम ले अधिक दे। स्वार्थ को परमार्थ में बदल दे। लोक सेवी बने और विश्व वाटिका को अधिक सुरम्य बनाने के लिए कर्तव्य परायण माली की तरह तन्मय होकर रहे।
समाज से लेते रहकर अपना वर्चस्व बढ़ाना और जब बदला चुकाने का समय आये तब स्वार्थ की पूर्ति में हम जाया जाय यी प्रतिभा पलायन है। यह विदेश को भागने तक ही सीमित नहीं है। इसमें भी प्रत्यक्ष देखा जाता है कि समाज सहयोग को पाकर निर्वाह किया जाय और सेवा करने की चुनौती सामने आने पर मुँह मोड़ लिया जाय। सिद्धि का मुक्ति को स्वार्थपरता को अपना इष्ट बनाया जाय।
ईश्वर ने सृष्टि संरचना के दिनों मनुष्य को अधिक उपयुक्त पाया और कृपापूर्वक अनुदान के रूप में प्रतिभा प्रदान कर दी। प्रतिभा के बल पर मनुष्य अनेक दिशाओं में उन्नति और सुख सुविधाओं से भरा पूरा जीवन बिताने लगा।
समय ने पलटा खाया। प्रतिभा के पीछे स्वार्थान्धता जुड़ गई। फलतः प्रतिभा का उपयोग एक दूसरे को चुराने और गिराने में किया जाने लगा। सृजन को जब ध्वंस में नियोजित किया गया तो विपत्तियों को उतरना स्वाभाविक था। सर्वत्र शोक संताप का वातावरण बन गया। लोग पतन पराभव के गर्त में गिरते चले गए।
समाचार सृष्टा तक पहुँचा। वे दुःखी हुए। स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने देव दूत भेजे। उनने विपत्तियों का कारण समझाया और परिस्थिति सुधारने के लिए मनः स्थिति बदलने का मार्गदर्शन करने में कुछ उठा न रखा।
लोग आदतों के इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि बदलना तो दूर उलटे देव दूतों का उपहास उड़ाते और त्रास देने पर उतारू हो गए। विवश होकर वे वापस चले गए। दुर्गतिग्रस्त मनुष्य की दुर्गति दिन-दिन अधिक बढ़ती गई। अब की बार मनुष्यों ने स्वयं विधाता से प्रार्थना की और स्थिति का नया उपाय बताने का अनुरोध किया।
विधाता ने इस बार और भी बलिष्ठ देवदूत भेजे, पर यह शर्त सुना दी कि जो उनका सहयोग करेंगे, अपने को बदलने की बात मानेंगे उन्हीं की सहायता की जायगी। उन्हीं के दुःख दारिद्र होंगे। वही क्रम अब तक चला आ रहा है- दैवी सहायता उन्हीं को उपलब्ध होती है जो अपनी सहायता आप करते हैं।
सो जाने के उपरान्त मनुष्य की स्थिति मृतक जैसी हो जाती है। करवट बदले में शरीर के कपड़े ढुलक सकते हैं और छिपाये जाने वाले अंग खुल सकते हैं। कान रहते हुए भी निन्दा प्रशंसा सुनने की स्थिति नहीं रहती। घर में चोरी होती रहे तो भी कुछ पता नहीं चलता। सोते समय सपने दिखाई देते हैं। अपने-पराये का- भले बुरे का - लाभ हानि का - निन्दा प्रशंसा का कुछ भी ज्ञान नहीं रहता ऐसी स्थिति में जीवित होते हुए भी प्रसुप्त की गणना अर्ध मृतकों में ही होती है।
बहुत लोग जागृत स्थिति में भी वस्तुस्थिति से अपरिचित और यथार्थता से दूर रहते हैं। उन्हें हित अनहित का विभेद करते नहीं बन पड़ता। सम्मोहित की तरह वे उसी दिशा में चल पड़ते हैं, जिस पर कदम बढ़ाने के लिए उन्हें कहा जाता है। भेड़ें झुण्ड के साथ चलती हैं चाहे उन्हें कहा जाता है। भेड़ें झुण्ड के साथ चलती हैं चाहें उन्हें एक के पीछे एक करके अन्धे कुएं में ही क्यों न गिरना पड़े? नशेबाज उन्मादी होश हवास खो बैठते हैं और न कहने योग्य कहते, न करने योग्य करते हैं। आँखें रहते हुए भी उन्हें अन्धा कहा जा सकता है। अज्ञान की पट्टी आँखों पर बँधी हो तो दीखता कुछ नहीं। यों दृष्टि मारी गयी यह भी नहीं कहा जा सकता। नेत्र और दृश्य का होना ही पर्याप्त नहीं। दीख पड़ने के लिए यह भी आवश्यक है कि मध्यम प्रकाश भी हो अन्यथा आँखें रहते हुए भी समीप ही रखी वस्तु को निरख परख सकना कठिन पड़ता है। जागरूकता वही मध्यवर्ती प्रकाश है जो चेतना को यथार्थता के साथ जोड़ता है।
जागरूकता का अर्थ है- संबंधित संदर्भों पर समुचित ध्यान रखना। इसमें हानि पक्ष से बचने और लाभ के लिए प्रयत्नरत रहने की सूझ-बूझ काम करती है। अन्यथा प्रमाद आ धमकता है और आधे श्रम से काम करने का आलस्य छाया रहता हैं। आधे मस्तिष्क से सोचने और उपेक्षापूर्वक आधा अधूरा निर्णय लेने में प्रमाद करते हैं। आलसी और प्रमादी अपनी स्फूर्ति एवं उमंग गँवा बैठते हैं। फलतः जो कुछ किया जाता है वह बेगार भुगतने जैसा होता है। ऐसी मनः स्थिति सफलता के लक्ष्य तक नहीं ले पहुँचती। रास्ते में ही भटका देती है। जंक्शन पर एक लाइन में खड़ी गाड़ियों में से किसी में भी बिना पूछताछ किये जा बैठने से गन्तव्य की अपेक्षा कहीं ऐसे स्थान पर जा पहुँचा जाता है जहाँ पछताना और वापस लौटना पड़े।
रात्रि के अन्धकार में ही निशाचरों की बन पड़ती है। उनींदे लोगों की गफलत का लाभ उठाकर उचक्के घात लगाते और घर द्वार खखोल ले जाते हैं। कुसंग में पड़कर उन्हीं के बच्चे बिगड़ते हैं, जो आरम्भ से ही उनकी देखभाल नहीं रखते। रोग उन्हीं के बढ़ते और असाध्य बनते हैं, जो समय रहते उपचार की उपेक्षा करते समय हैं। आदतें उन्हीं की बिगड़ती है जो शरीर वस्त्र की तरह अपने मन की सफाई करते रहना भी आवश्यक नहीं समझते।
रात्रि के अन्धकार में ही निशाचरों की बन पड़ती है। उनींदे लोगों की गफलत का लाभ उठाकर उचक्के घात लगाते और घर द्वार खखोल ले जाते हैं। कुसंग में पड़कर उन्हीं के बच्चे बिगड़ते हैं, जो आरम्भ से ही उनकी देखभाल नहीं रखते। रोग उन्हीं के बढ़ते और असाध्य बनते हैं, जो समय रहते उपचार की उपेक्षा करते समय हैं। आदतें उन्हीं की बिगड़ती है जो शरीर वस्त्र की तरह अपने मन की सफाई करते रहना भी आवश्यक नहीं समझते।
गरीब अपने आप में कोई अपमानजनक बात नहीं है। उसे दुत्कारा तब जाता है, जब वह मूर्खता, आलस, असावधानी या दुर्व्यसनी की वजह से आयी हो।
रेत के उड़ते कण हवा के साथ अस्त-व्यस्त उड़ते रहते हैं। उनका कहीं घर ठिकाना नहीं होता न वे कहीं आश्रय विश्राम पाते हैं। अनादि काल से अनन्त काल तक ऐसे ही भटकते रहते हैं। पानी पड़ने पर कीचड़ बने और ग्रीष्म में चक्रवातों के साथ उछलते कुदकते रहते हैं। शीत उनके ऊपर बनकर लद जाता है। इस प्रकार पराश्रित अनाश्रित स्थिति में निरुद्देश्य रेत कणों का जीवन बीतता है। वे न किसी के होते हैं और न कोई उनका होता हैं। जहाँ कुछ क्षण विरमने का अवसर मिला वहाँ मकड़ी जैसा मोह जाल बुनने लगते हैं।
जिनका इस क्षण साथ था अगले क्षण उनका साथ रहेगा, इसका कोई भरोसा नहीं। किसी को साथी सहयोगी बनाया जाय तो वह भी तो ठीक तरह नहीं बन पड़ता। नियति अपनी ही तरह दूसरों की भी हैं। वे भी अपनी राह चलते और कर्म भोग भोगते रहते हैं। कोई चाह कर भी किसी रेत कण के साथ देर तक जुड़ा नहीं रह सकता है। मिलन संयोग होता है। मिलन एक अवसर है और विछोह सतत् प्रवाह। पानी बूँद बादल से बरसते समय एक दूसरे की साथी सहचरी भी हो सकती है। पर जमीन पर गिरने के उपरान्त उनमें से किस की क्या नियति होगी इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता।
वर्षा की बूँदें जमीन पर पड़ने के उपरान्त किधर चल पड़े, इस सम्बन्ध में कौन क्या कहे? हो सकता है कि वह नाले नालियों का चक्कर काटती हुई समुद्र में जा पहुँचे। यह भी हो सकता है कि वह उसी खेत में उगते हुए पौधों के शरीर में प्रवेश करके हरीतिमा जैसी लहलहाती दिखाई पड़े और पकने सूखने पर भाप बनकर आकाश की और चल पड़े और ओस कणों के रूप में नया रूप धारण करे और दिन में भात रात में ओस बनते रहने की चक्र परिक्रमा करती रहे। बादलों से बरसते समय तो उस बिन्दु परिकर में निकटता घनिष्ठता थी वह कितने मय मिली जुली रही और फिर पीछे उनकी अपनी नियति किसी स्थिति में किस प्रकार कहाँ भ्रमाती रही इसका लेखा-जोखा लिया जा सकना असम्भव हैं। इस संसार में असंख्यों प्राणी अगणित संख्या में बसते हैं। उन पर दृष्टि दौड़ा सकना अपनी बौद्धिक सीमा से बाहर होगा, पर मनुष्य को तो गिना भी जा सकता है। वे इन दिनों इस धरती पर पाँच सौ करोड़ के करीब हैं। इन में से कई एक घर परिवार में जन्मते और छोटी बड़ी आयु के होते हुए भी मिल जुल कर रहते हैं। तब प्रतीत होता है कि यही हमारा परिवार है। इन्हीं को साथी सहयोगी समझा जाता हैं किन्तु नियति को संयोग कहाँ सुहाता है। वह वियोग का ही ताना बाना बुनती रहती है।
कुछ दिन भी सहचरत्व टिक नहीं पाता कि वियोग का क्रम चल पड़ता है। लड़कियाँ बड़ी होकर ब्याही जातीं और किसी दूसरे का घर बसाती हैं। लड़के कॉलेज पढ़ने चले जाते हैं और नौकरी के फेर में अदलते बदलते कहीं से कहीं पहुँचते हैं। बूढ़े मर जाते हैं। युवाओं को व्यवसाय के संदर्भ में डेरा उठा कर कहीं से कहीं डालना पड़ता है। कभी जिस परिवार के सदस्य स्थिर और एक जगह थे, वे समय के साथ अपना प्रवाह क्रम बदलते हैं और कहीं जा पहुँचते हैं।
हम भी मक्खी मच्छरों जैसी नियति साथ लेकर जन्मे हैं। वे हवा के साथ उड़ते और जहाँ भी भोजन विश्राम का अवसर पाते हैं वहीं विरम जाते हैं। फिर उस विश्राम में भी चैन कहाँ? स्थिरता कहाँ? परिस्थितियाँ आगे धकेलती हैं। कोई किसी राह जाता है कोई किसी रास्ते। यात्रा पथ के पथिकों में से कितने ही आगे निकल जाते हैं और कितने ही पीछे छूट जाते हैं।
जीवन अवधि स्वल्प हैं। ढर्रे की आदतें दिन रात की तरह अपनी चर्खी पर घूमती रहती हैं और जितने दिन जीना था वे एक-एक करके निपटते जाते हैं। छेद वाले घड़े की तलजी में से वह सारा पानी रिस जाता है जिसमें आरम्भ में घड़ा भरा हुआ था। एक-एक बूँद करके समूची सम्पदा समाप्त हो जाती है और खाली फूटे घड़े को उठाकर किसी कूड़े वाले के ढेर पर फेंक दिया जाता है। यही होती है हमारी भी दशा। जब अपना ही कहीं कोई ठिकाना नहीं तो दूसरों के बारे में क्या कहा जाय कि कौन कितने समय साथ रहेगा? किसका साथ देगा और बिछुड़ते ही कहाँ से कहाँ से जायेगा?
मोह किस से किया जाय? कब तक किया जाय? किसकी प्रतीक्षा में ठहरा जाय? किसे अपना, किसे विराना कहा जाय? किसके मिलने पर मोद मनाया जाय और किसके बिछुड़ने पर रुदन किया जाय। यह मुसाफिर खाना है। नये यात्री आते और पुराने जाते रहते हैं। आवागमन का मेला यहाँ लगा ही रहता है।
यह दुनिया एक नाट्यशाला है इसमें तरह-तरह की पोशाकें पहन कर तरह-तरह के मुखौटे लगाकर अनेक नट आते रहते हैं। अपना निर्धारित कार्य करते और फिर वापस चले जाते हैं। वापसी बहुत देर की नहीं होती। कुछ ही क्षण उपरान्त उन्हें नये पार्ट की तैयारी करनी पड़ती है। पिछला पर्दा बन्द होता है। नया आरम्भ होता है। पुराने नट नई पारी में नई शैली अपनाते और नये संवाद व्यक्त करते हैं। कुछ घंटे यह खेल चलता रहता है इसके बाद सारा सरंजाम समाप्त हो जाता हैं। जमीन खाली हो जाती है। सारा सिलून उखड़ जाता हैं। दूसरे दिन पता भी नहीं चलता कि यहाँ क्या हुआ था? इसी प्रकार मनुष्य जीवन भी एक रंगमंच है इसमें अनेक प्रकार के खेल होते रहते हैं। अनेक स्वाँग रचे जाते रहते हैं। बदलाव का क्रम चलता रहता है। परिवर्तन की गति धीमी और तीव्र होती रहती है। अन्त में एक दिन ऐसा आता है जिसमें तूफानी हेर-फेर होता है और जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा था वह सब कुछ उलट जाता हैं।
संसार की बनावट ही ऐसी है। इसमें ब्रह्माण्डव्यापी ग्रह नक्षत्रों का परिकर द्रुतगति से किसी अविज्ञात की ओर दौड़ा जा रहा है। सौर मण्डल के ग्रह और उपग्रह अपनी-अपनी धुरी और कक्षा में केन्द्र की परिक्रमा लगा रहे हैं। यहाँ सब से छोटा घटक परमाणु हैं। वह भी अपने से भी अधिक सूक्ष्म घटकों को साथ में लपेटे एक छोटे परिवार के रूप में निरन्तर गतिशील है। इस प्रकार विश्व संरचना में सर्वत्र भगदड़ ही मची दीखती है। दस में से किसी के भी साथ यदि हम जुड़ते हैं तो उसका परिणाम अपने आपके लड़खड़ा जाने, डगमगा जाने, उलट-पुलट हो जाने के अतिरिक्त और क्या हो सकता हैं?
फिर स्थिर क्या है? किसके साथ जुड़ें? किसको अपना समझें? किसकी सहायता माँगें? किसके बनें? किस को अपना बनायें। इस असमंजस का समाधान एक ही हो सकता है, कि अपनी आत्मा ही वह अवलम्बन है जिसे दृढ़तापूर्वक पकड़ा और सदा सर्वदा के लिए अपनाया जा सकता है।
आत्मा परमात्मा के साथ जुड़ता है। दोनों के बीच जब घनिष्ठता स्थापित होती है तो एकात्मता विकसित होती है। उसके कारण छोटा घटक भी बड़े के समान ही शक्तिशाली हो जाता है। अग्नि में पड़कर ईंधन भी बड़े के समान ही शक्तिशाली हो जाता है। विद्युत प्रवाह एक तार से निकल कर दूसरे स्पर्श करने वाले तार में दौड़ता है। ठीक इसी प्रकार परमात्म सत्ता के साथ जुड़ जाने पर आत्मा भी इतनी सशक्त बन जाती है कि फिर उसे कोई कठपुतली की तरह न नचा सके। पहिया घूमता है धुरी नहीं। धुरी के साथ जुड़ जाने पर हम भी ध्रुव बन जाते हैं। ध्रुव स्थिर रहता है। ब्रह्माण्ड उसी के इर्द-गिर्द चक्कर काटता है।
अकबर के दरबार में एक पेशकार थे- बलीराम। बादशाह से अपमानित होने पर उन्होंने वैराग्य की ठानी और घर का सारा माल असबाब गरीबों को दे दिया। स्वयं जमुना की रेती में लम्बे पैर पसार कर सोने लगे।
बादशाह ने बुलाया तो वे आए नहीं। अकबर स्वयं ही उन्हें मनाने पहुँचे। कुशल पूछने के बाद अकबर ने पूछा- पैर पसारना कब से शुरू हुआ?
बलीराम ने कहा - जिस दिन से हाथ समेटे उसी दिन से पैरों का फैलना आरम्भ हो गया।
देवताओं की विविधता, बहुलता, विभिन्नता, साधक की श्रद्धा के साथ जुड़ी हुई हैं। श्रद्धा ही विकसित रूप में देवता का रूप धारण करती हैं। मनुष्यों की मान्यताओं एवं भावनाओं में अन्तर होता हैं। इसी आधार पर श्रद्धा के बीजाँकुर फलित होते हैं। विश्वास के दुर्बल होने पर देवता भी दुर्बल हो जाते हैं। समर्थ और फलदायक वे होते हैं जिन्हें भावनापूर्वक श्रद्धा विश्वास से सींचा गया है। इसके अभाव में छबि या प्रतिमा कौतूहल मात्र बनकर रह जाती है। आस्थावान के लिए इष्ट देव की अनुकम्पा चमत्कारी बनकर प्रकट होती हैं किन्तु अनास्थावान के लिए उसका कोई महत्व नहीं। उसे उसमें कोई विशेषता दिखाई नहीं पड़ती।
पिता के चित्र को देखकर भावनाशील संतति का मस्तक झुक जाता है। उनकी स्मृति एवं उपस्थिति का अनुभव होता है, किन्तु जिनका उससे कोई सम्बन्ध नहीं उनके लिए वह व्यक्ति विशेष की तस्वीर मात्र है। वह उसकी रेखाओं को देखता और सुन्दर असुन्दर का निर्णय करता है। राष्ट्रीय ध्वज, देश भक्तों के लिए अतिशय सम्मान के योग्य है, पर जिसमें इस प्रकार की भावनाएँ नहीं, उनके लिए वह कपड़े का टुकड़ा मात्र हैं।
श्रद्धा अपने आप में एक शक्ति है। मान्यताएँ अपना प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाती हैं। झाड़ी का भूत और रस्सी का साँप अँधेरे में दीख पड़ता है। भले ही वस्तुस्थिति वैसी न हो पर मान्यता अपना प्रभाव दिखाती है। भयंकर होने पर वह डरा सकती है और सुखद संवेदना से भरी-पूरी होने पर वह हृदय की कली खिला सकती है। प्रिय-अप्रिय की सुन्दर-कुरूप की परिभाषा यही है कि जो अपने को सुहाया उसकी श्रेष्ठता मानी गई, जो अप्रिय लगा वह उपयोगी होते हुए भी निरुपयोगी माना जाता है। व्यक्ति, पदार्थ या देवता अपनी ही मान्यता के अनुरूप दीख पड़ते हैं। उनकी प्रतिक्रिया भी प्रतिध्वनि या प्रतिछबि जैसी होती है।
यदि तथ्यों के अनुरूप देवताओं के प्रति आस्था उत्पन्न करनी हो तो धरती माता, पवन प्रवाह, मेघमाला, सूर्य चन्द्र जैसी दिव्य सत्ताओं को कृतज्ञता भरा नमन किया जा सकता है। दूरवर्ती के प्रति अधिक आकर्षण होता है। समीपवर्ती के प्रति अरुचि या अवज्ञा की मनःस्थिति बनने लगती है। इस दृष्टि से धरती, वनस्पति, पवन जल आदि को सामान्य समझा जा सकता है और सबके अधिक दूर होने के कारण अपने सौर मण्डल का अधिष्ठाता सूर्य अधिक श्रेयाधिकारी प्राचीन प्रतीत होता है। उसके प्रति देव मान्यता की परम्परा भी अधिक है।
सूर्य प्रत्यक्ष देवता है। वह आँखों से उदीयमान देखा जा सकता है। उसकी ज्योति एवं ऊष्मा का लाभ निरन्तर उठाते हैं। रात्रि के समय चन्द्र बनकर सूर्य ही अपनी परावर्तित आभा का परिचय देता हैं सूर्य प्राणियों की वनस्पतियों की आत्मा है। उसी के कारण जल थल और नभ की ऐसी स्थिति बनी हुई है, जिसमें जीवन विकसित हो सके। सूर्य ही समुद्र का जल भाप बनाकर मेघ वर्षा का प्रबंध करता है। जल के आधार पर ही जीवधारी और पदार्थ विनिर्मित, विकसित और विघटित होते रहते हैं। दृश्यमान परब्रह्म नाम से भी उसकी मनीषियों ने अभ्यर्थना की हैं।
उपासना संदर्भ में सूर्य को सविता कहा गया है और सविता की शक्ति को सावित्री नाम दिया गया है। सावित्री अर्थात् गायत्री। आद्यशक्ति-महाप्रज्ञा। शक्ति शक्ति वाक्देवी-मंत्र विद्या की अधिष्ठात्री, मंत्र विचार है, विवेक प्रेषक। ओजस् तेजस् वर्चस् का प्रतीक प्रतिनिधि। शब्द ही ज्ञान है। लेखनी और वाणी के द्वारा उसी का आराधन अध्यवसाय किया जाता है। शब्द के उसके नर बानर बने रहने में कोई संदेह नहीं। सविता का प्रकाश विवेक कहा जाता है। उसकी दिव्य शक्ति को वाणी कहते हैं। सामान्य प्रयोग में वह वार्तालाप के रूप में प्रयुक्त होती है किन्तु उच्च भूमिका में वह मंत्र शक्ति बन जाती है। मंत्र विद्या का प्राण गायत्री महामंत्र में सन्निहित है। सावित्री में आत्म की और भौतिकी का उभयपक्षीय समावेश हैं इसीलिए उन्हें बला और अतिबला नाम दिया गया है। पौराणिक कथानकों में उस एक ही शक्ति को द्विधा कहा गया है। परब्रह्म की परा और अपरा शक्तियाँ पत्नियाँ वे ही हैं। भारतीय अध्यात्म में ज्ञान तथा विज्ञान का जो पुट है उसे सृष्टि सत्ता में विकसित किया गया है। सत्ता क्षेत्र में उसे सर्वोपरि माना गया है। वही महादेव है।
देव मान्यता के आरम्भ काल में सर्वप्रथम प्रतिष्ठापना सूर्य की ही हुई। वह प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान भी है। जल का अर्घ्य चढ़ाकर उसकी सर्व सुलभ पूजा अर्चा भी बन पड़ती है। उसके उदय, अस्त का काल संध्या कहा गया है और उस अवसर पर वन्दन-नमन का प्रावधान रखा गया है। यही है सनातन वैदिक सम्पदा। भारतीय तत्व दर्शन सविता की ही अभ्यर्थना करता है। अन्यान्य देवताओं के मुख मण्डल पर जो तेजोवलय है वह प्रकट करता है कि देवताओं का देवत्व सविता की छत्रछाया में ही विकसित हुआ है।
जिन दिनों आत्मिकी की आराधना का-उदय हुआ उस समय प्राथमिकता सूर्य की ही थी। जिन क्षेत्रों में सभ्यता का विकास हुआ वहाँ पूजा प्रयोग में सविता को ही अपनाया गया। पुरातत्व विज्ञान ने धरातल से जो आदि सभ्यता के चिन्ह ढूँढ़े हैं, उनसे सूर्य प्रतिमाएँ प्रमुख हैं। वे तेजस् युक्त गोलाकार है। पीछे उनमें मनुष्य के चेहरे का भी आरोपण हुआ।
सम्प्रदायों का विभेद जब तक नहीं हुआ था तब तक शाश्वत सनातन धर्म को ही मानवी मान्यता ने अंगीकार किया था और सूर्य ही समूची मानव जाति का आराध्य था। उसकी गति, आभा एवं ऊर्जा की त्रिविधि क्षमताओं को लेकर त्रिदेवी की कल्पना जगी। तीन देवियाँ यही हैं। त्रिवेणी-त्रिपदा के रूप में इन्हीं का तीर्थ संगम हैं।
पुरातत्व के देवालय पक्ष में सूर्य प्रतीकों की ही स्थापना वाले प्रमाण उपलब्ध हुए हैं। पुरातन सभ्यताओं के प्रतीकों में सूर्य का अविच्छिन्न समावेश है। देवालयों में सूर्य प्रतीक ही अतिशय पुरातन हैं। विकासमान सभ्यताओं के साथ वह उच्चस्तरीय सम्मान का अधिष्ठाता रहा। भारत में कोणार्क जैसे कतिपय मंदिर उन दिनों बने थे, जिन दिनों भारत का वर्चस्व समस्त भूमण्डल पर छाया था।
गायत्री महामंत्र में भारतीय वाङ्मय का क्रमिक विकास हुआ है। गायत्री का केन्द्र बिन्दु सविता ही है। मंत्र शक्ति का अवतरण उसी से होता है। सूर्योपस्थान वस्तुतः सविता के तेजस् का स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में अवतरण की अवधारण की प्रक्रिया है।
भौतिक विज्ञान ने प्रकृति के अंचल में समाहित अनेकानेक रहस्यमयी शक्तियों की खोज की है। वे कहाँ से आईं? इसका पता लगाने पर पाया गया है कि यह सूर्य का ही अनुदान है। रेडियो तरंगें, लैसर किरणें, ब्रह्माण्डीय किरणें, पराबैगनी किरणें आदि का क्रमिक रहस्योद्घाटन होता चला जा रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता जाता है कि इन सबका एक ही उद्गम केन्द्र है- सूर्य।
व्यावहारिक, कारोबारी संसार में सब से अधिक आवश्यकता ऊर्जा की है। उसी सहारे अनेकानेक यंत्र बनते और की है। ताप की आवश्यकता शक्ति के लिए, प्रकाश के लिए, उत्पादन के लिए, वर्षा के लिए आवश्यक होती हैं। सूर्य ऊर्जा का पुँज है। जब ईंधन के अन्य सारे स्रोत समाप्त हो जायेंगे तब मात्र सूर्य पर रही मनुष्य को हर दृष्टि से निर्भर रहना पड़ेगा। यही देवता जीवन मरण का साथी था, है और रहेगा।
सन्त विठोवा भगवान कृष्ण के बड़े भक्त थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान दर्शन देने उनके घर आए। सन्त अपने वृद्ध माता पिता की सेवा में संलग्न थे। भगवान को घर आया देखकर वे पुलकित हो गए। पर विवेक नहीं गिरा था।
भगवान के लिए उनने पास में पड़ी ईंट उठाकर बैठने के लिए रख दी और कहा अपने कर्त्तव्य धर्म को पूरा कर लूँ तब आपकी पूजा अर्चा करूंगा।
भगवान ईंट पर प्रतीक्षा में बैठे रहे। नियत उत्तरदायित्व से निवृत्त होने पर उनकी पूजा हुई। ईंट वाला विठोवा मंदिर अभी भी प्रख्यात है।
अधूरी नींद आने पर उनींदी स्थिति में प्रायः सपने आते हैं। पेट में कब्ज रहने या किसी अंग विशेष के दुखने पर भी निद्रा में विक्षेप पड़ता है और सचेतन और अचेतन मस्तिष्क के गड्ड-मड्ड हो जाने से सपनों की श्रृंखला चल पड़ती है। उनमें से कई ऐसे भी होते हैं। जिनका घटित घटनाओं से संबंध होता है। कुछ में चिन्ताएँ एवं इच्छाएँ मूर्तिमान होकर दृश्यमान होती हैं।
किन्तु सभी सपनों के बारे में ऐसी बात नहीं है। कुछ गहरी नींद में आते हैं। श्रृंखलाबद्ध चलते हैं और सार्थक भी होते हैं। ऐसे सपने प्रायः रात्रि के अंतिम चरण में आते हैं। उनकी मन पर गहरी छाप भी पड़ती है, जबकि निरर्थक भी होते हैं। ऐसे सपने प्रायः रात्रि के अंतिम चरण में आते हैं। उनकी मन पर गहरी छाप भी पड़ती है, जबकि निरर्थक होने पर वे बिखरे हुए और धूमिल-विरल होते हैं। उनकी स्मृति दिन चढ़ते-चढ़ते चली जाती है। किन्तु जिनमें कुछ दम होता है वह जगने के उपरान्त भी स्मृति पर छाये रहते हैं और रह-रह कर याद आते रहते हैं।
कइयों के लिए सार्थक सपने पूर्व सूचना के रूप में आते हैं। जो देखा था वह हो चुका होता है या होने वाला होता है। कईयों में सारगर्भित मार्गदर्शन होता है, उसके सहारे अपनी गतिविधियों को जोड़कर खतरे से बचा जा सकता है, अथवा लाभ मिल सकता है। ऐसे सपने प्रायः किन्हीं अदृश्य सहायकों के प्रेरित होते हैं।
मृतात्माओं में कुछ दुष्ट प्रकृति की होती हैं, जो अवसर मिलने पर दिवास्वप्नों के रूप में, उनींदी स्मृति में चिन्ता, भय, निराशा जैसी उत्पन्न करती हैं और आभास कराती रहती हैं, किन्तु जिनका स्तर ऊँचा है उन्हें पितर कहते हैं वे अपनी उदार सद्भावना को चरितार्थ करने के लिये दूसरों की सहायता करने की मनःस्थिति में रहते हैं और साधारण मनुष्यों से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी अपनी जानकारी के आधार पर ऐसा परामर्श देती रहती हैं, जिसे अपनाकर मनुष्य अधिक अच्छी स्थिति का लाभ उठा सके। किन्तु ऐसे स्वप्न संकेत ग्रहण करने वाले की मनःस्थिति में रहते हैं और साधारण मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छी स्थिति का लाभ उठा सके। किन्तु ऐसे स्वप्न संकेत ग्रहण करने वाले की मनःस्थिति संवेदनशील होनी चाहिए। उनमें अदृश्य शक्तियों के साथ ताल-मेल बिठा सकने योग्य मानसिक स्वच्छता होनी चाहिए। कपटी, मायावी, पाखंडी, क्रोधी, आतुर, आवेश ग्रसित व्यक्ति इस संदर्भ में सफल नहीं हो पाते। नशेबाजों का मस्तिष्क भी अस्त-व्यस्त रहता है और वे इस स्थिति में नहीं होते कि अदृश्य संकेतों को आकर्षण कर अवधारण कर सकें।
ऐसी कितनी ही घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं जिनमें स्वप्न माध्यम से किन्हीं को ऐसी सूचना मिली जिनके सहारे वे आश्वासन और मार्गदर्शन प्राप्त कर सके और उनके सहारे अतिशय लाभान्वित हुए। यदि वह सहायता उन्हें न मिली होती तो वह सुयोग प्राप्त न कर पाते जो उन्हें उपलब्ध हुआ।
17 वीं शताब्दी में फ्राँसीसी रेने देकार्ते गणित संबंधी गूढ़ विषयों पर शोधरत थे। प्रश्न ऐसे पेचीदा थे जिनका हल ढूँढ़ते हुए उन्हें सप्ताहों बीत गये, पर कोई समाधान न मिला। इसी बीच उन्होंने एक सपना देखा जिसमें संकेत रूप में उनके समाधान बताये गये, जिनकी खोज में वे लगे हुए थे। इस आधार पर वे द्विभागीय वैश्लेषिक ज्यामिति का निर्धारण कर सके और गणित क्षेत्र में मूर्धन्य माने गये।
फ्राँस के एक दार्शनिक कोडोरेक्ट ने भी कितनी ही उलझी गुत्थियों के समाधान स्वप्नावस्था में ही पाये थे। वे बहुधा दिन में जिन तथ्यों को ढूंढ़ न पाते उनके संबंध में रात्रि के लिये निर्णय छोड़ देते और सो जाते। सबेरे आते ही प्रतीत होता कि कोई निष्णात उनसे मिला और उलझनों को सुलझा कर रख गया।
16 वीं शताब्दी में इटली के जेरम कार्टिने एक बड़ा ग्रन्थ लिखना आरम्भ किया पर उसमें स्थान-स्थान पर तथ्यों को जोड़ने की आवश्यकता पड़ती थी। वह सामग्री उपलब्ध करना कठिन था। ऐसी दशा में पुस्तक किस प्रकार प्रमाणिक और सर्वमान्य बनती। इस कठिनाई में उनके स्वप्न सहायक होते रहे। समय-समय पर तथ्य सामने आये। वे काल्पनिक और यथार्थवादी होते थे। उनके जुड़ते रहने से पुस्तक सब प्रकार प्रमाणिक बन गई।
अठारहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध संगीतज्ञ जिडमेधी वायलिन बजाने में असाधारण प्रतिभा सम्पन्न हुए हैं। उसे किसी ने भी वह कला नहीं सिखाई। वादक का कहना था कि रात्रि के समय कोई अदृश्य सहायक उसे जगाकर संगीत सिखाता रहा। इस आधार पर उसकी प्रगति साधारण रीति में नहीं वरन् चमत्कारी गति से अग्रगामी होती रही। इसका परिणाम उसे अपने समय का सर्वोत्तम संगीतकार बनने के रूप में उपलब्ध हुआ। उसने संगीत शिक्षण पर कुछ पुस्तकें भी लिखीं, जिसमें से ‘दि डेविल्स टूले’ का बहुत प्रसार विस्तार हुआ।
रॉबर्ट लुईस स्टीवेन्सन ने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं, जिनमें से कुछ बहुत ही प्रख्यात हुए हैं। इन प्रख्यात ग्रन्थों में लिटिल प्यूपील, वडबीज, मि.हाइड अदि विशेष रूप से प्रख्यात हैं। लेखक का कथन है उसे इन पुस्तकों के प्रकरण, आधार, कथानक एवं उतार-चढ़ाव स्वप्नों के प्रकरण, आधार, कथानक एवं उतार-चढ़ाव स्वप्नों के आधार पर ही हस्तगत होते रहे हैं। उसकी निज की पूर्व तैयारी इनके संबंध में नहीं के बराबर थी और उसने तथ्यों को ढूँढ़ने में भी कोई विशेष प्रयास नहीं किया। फिर भी कृतियाँ असाधारण बन पड़ीं। इनका श्रेय उन स्वप्नों को है जो उन्हें क्रमबद्ध रूप से आते रहे।
अँग्रेज कवि काँलरिज अपने समय में संभ्रान्त सम्मानित कवियों में रहे हैं। उनकी रचनाओं का संकलन ‘कुबला खान’ नाम प्रख्यात है। यह कविताएँ उन्हें कोई आकर स्वप्न में सुनाता था। वे उसी समय उठकर नोट कर लेते थे। जितना अंश भूल जाते उसे दूसरे दिन अपनी समझ से पूरा करते। इसी प्रकार वह रचना पूरी हुई और प्रकाश में आई। जनसाधारण द्वारा सराही और अपनाई गई।
यूनान के दार्शनिक अरस्तू ने अपने ग्रन्थों में कई स्वप्नों की सार्थकता पर प्रकाश डाला है। प्लेटो कहते थे- कि सदा तो नहीं पर कई बार स्वप्नों के माध्यम से मनुष्य को दिव्य संदेश आते हैं और वे जाँच पड़ताल करने पर, तथ्यपूर्ण सिद्ध होते हैं।
स्वप्न विवेचन के संबंध में प्लेटो का ग्रन्थ ‘रिपब्लिक’ ऐसे अनेक सिद्धान्तों पर प्रकाश डालता है जो बहुत ही तथ्य हैं। इसी में उसने लिखा है कि स्वप्न विद्या में भी प्रवीणता प्राप्त की जा सकती है और अविज्ञात को प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है। फ्रायड की पुस्तक ‘इन्टर प्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स’ में यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि अचेतन मन की सामयिक, भूतकाल तथा भावी घटनाओं की साँकेतिक जानकारियाँ सम्मिश्रित रहती हैं। स्वप्न प्रायः घटनापरक होते हैं, पर उनमें वस्तुतः कुछ संकेत दिए होते हैं। घटनापरक होते हैं, पर उनमें वस्तुतः कुछ संकेत दिए होते हैं। घटनाओं को संकेत रूप में परिणत कर सकने की सूझबूझ ही स्वप्न विद्या है। इसको कई प्रकार से उलट-पुलट कर के अर्थ करते रहने और तथ्यों के साथ संगति बिठाते रहने की खोज-बीन में किसी भी लगनशील में इतनी प्रवीणता उत्पन्न कर सकती हैं कि वह अपने तथा दूसरों के स्वप्नों का तात्पर्य बता सकें।
एक पंडित जी नाव में यात्रा कर रहे थे। कि केवट से वार्तालाप करते हुए यह पूछ रहे थे, वह क्या-क्या पढ़ा है? धर्मशास्त्र, गणित, इतिहास, आयुर्वेद, दर्शन, व्याकरण आदि। केवट सभी के संबंध में अपनी अनभिज्ञता प्रकट करता। पंडित जीने झुँझला कर कहा-तब आपका जीवन व्यर्थ चला गया। केवट ने विवशता और लज्जापूर्वक सिर झुका लिया।
थोड़ी देर में आँधी आई। नाव डगमगाने लगी। मझधार का प्रवाह तेज था। डूबने के आसार बन गये। तैरना जानने वाले सभी पानी में कूद पड़े और जान बचाने के लिए तैरने का प्रयत्न करने लगे। माँझी भी लंगोट कस कर वैसा ही करने को उद्यत हुआ।
पंडित जी सकपकाये हुए एक कोने में बैठे थे। केवट ने पूछा - आपको तैरना नहीं आता है क्या? उनने अनभिज्ञतापूर्वक सिर हिला दिया। नाविक बोला - तब आपका जीवन भी व्यर्थ चला गया। प्रत्यक्ष आवश्यकताओं को छोड़कर और परोक्ष जंजाल में उलझे रहे।
पंडित जी नाव के साथ ही अथाह जल राशि में समा गये।
पृथ्वी पर जो हलचलों होती रहती हैं उन्हें हम आँखों से दूरबीन से देख लेते हैं। ताप, शब्द और रेडियो तरंगों से भी पृथ्वी की ऊपरी परत एवं कुछ दूर तक ऊपरी परत एवं कुछ दूर तक ऊँचाई की भी हलचल विदित होती रहती है। पर यह नहीं सोचना चाहिए कि अपनी धरती नितान्त ठोस है और उसके भीतर कोई हलचल नहीं होती। भीतर भी गरम हाँड़ी पकती रहती हैं।
पृथ्वी पर 71 प्रतिशत पानी है। शेष को थल कह सकते हैं। अन्तरिक्ष में गैसों का भण्डार है। उनकी कई चित्र विचित्र परतें भी हैं। उनकी सघनता भी कम नहीं। ब्रह्माण्ड से बरसने वाली उल्काएँ उन्हीं सघन परतों से टकराती और जलकर खाक होती होती रहती हैं। उनकी खाक पृथ्वी की परत तक आ पहुँचती है। कुछ अधजले उल्का खण्ड भी। इस प्रकार प्रतिदिन पृथ्वी में बोझ प्रायः 300 टन अधिक बढ़ता जाता है। यह बोझ तथा प्राणियों की बढ़ोत्तरी मिलकर इस बोझ को और भी अधिक बढ़ा देती है। परिणाम यह होता है कि धरती का भीतरी दबाव दिन-दिन बढ़ता जाता हैं।
पृथ्वी की ऊपरी परत ठंडी है। वह धूप के तापमान से गरम ठंडी भी होती रहती है। पर उसके गर्भ में पिघले हुए लोहे जैसी स्थिति है। जितने हम भीतर उतरते हैं उतना ही उसे गरम पाते हैं। इस गरमी को नियंत्रण में रखने के लिए समुद्री पानी पहुँच कर कुछ सहायता करता रहता है तो भी अस्थिरता बनी ही रहती है और उसके गर्भ में आश्चर्यजनक हलचलें चलती रहती हैं। वे कभी-कभी अनियंत्रित भी हो जाती हैं और अपने सीमा बंधनों को तोड़कर फव्वारे की तरह उछल पड़ती हैं। इसी स्थिति में ज्वालामुखी फटते हैं, भूकम्प आते हैं और चक्रवात तूफान मचलने लगते हैं।
पृथ्वी की ऊपरी सतह मिट्टी, रेत, चट्टान, पहाड़ आदि की बनी है पर उसके साथ ही खनिज भी मिले हुए हैं। लोहा, ताँबा धातुएँ मनुष्य द्वारा निरन्तर खोदी जाती हैं, तेल भी निकाला जाता है। इस कारण ठोसपन घटता और पोल बढ़ती है। मिट्टी में मिले हुए क्षार भी नदियों तथा वर्षा के जल के साथ समुद्र में पहुँचते रहते हैं। इसलिए भी पृथ्वी की मजबूती घटती और पोलापन बढ़ता है। भीतर आग और समुद्र का भारीपन बढ़ने से दबाव का अनुपात बढ़ता ही जाता है। पिलपिले आम पर यदि दबाव पड़े तो उसका रस छिलका फाड़ कर ऊपर उछल जाता है और जिस ओर भी जगह मिलती है उसी ओर छितराता है। यही हाल पृथ्वी का भी है। चारों और से बढ़ता दबाव और भीतर का खोखलापन मिलकर ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं, जिससे ज्वालामुखी, भूकम्प, तूफान जैसे कितने ही उपद्रव उठ खड़े होते हैं। फलतः न केवल धरती का सामान्य स्वरूप ही ऊबड़-खाबड़ होता है वरन् प्राणियों के लिए असाधारण असुविधाएँ भी सामने आ खड़ी होती हैं।
इण्डोनेशिया के काका डोडग क्षेत्र में एक भयानक ज्वालामुखी सन् 1883 में फटा उसका धमाका 30000 मील तक सुना गया। द्वीप समूल नष्ट हो गया। इस विस्फोट ने जावा, सुमात्रा के समुद्र में 135 फुट ऊँची लहरें उठाईं और उनकी चपेट में जो भी तटवर्ती नगर एवं समुद्री टापू आये वे सभी उदरस्थ होते चले गये। इन लहरों ने जापान से लेकर आस्ट्रेलिया तक को बुरी तरह प्रभावित किया। तूफानों ने समस्त संसार को प्रभावित किया। सन् 1960 के तूफान ने बंगाल की खाड़ी को कोई आठ बार झकझोरा। जिसमें चार लक्ष मनुष्य मारे गये। चटगाँव में नवम्बर 1974 में जो तूफान आया उसमें तीन लाख आदमी मरे।
1967 में महाराष्ट्र का अंधड़ तूफान भी ऐसा भयंकर था। असम में 1890 औ 1950 में दो ऐसे भूकम्प आये जिनमें लाखों की जान गई और अरबों की सम्पदा नष्ट हुई।
ज्वालामुखियों, भूकम्पों, तूफानी चक्रवातों का इतिहास बड़ा विलक्षण है। वे कब, कहाँ फट पड़े इसका कुछ पूर्व अनुमान नहीं होता है? पर मोटा कारण यह समझा जाता है कि ऊपरी परत पर दबाव बढ़ता और भीतरी खोखलेपन की स्थिति बनते जाना ही इसका प्रधान कारण है। पृथ्वी पर जनसंख्या न बढ़े और उसके कारण भूमिगत संपदाओं का इतना दोहन न करना पड़े तो संभवतः जल्दी-जल्दी इतने भारी और इतने भयंकर विस्फोटों का सिलसिला न चले और कमाने की तुलना में कहीं अधिक गँवाने का संकट सामने खड़ा न हो।
मनुष्य शरीर और जीवन में भी ऐसे छोटे बड़े संकट आते रहते हैं। इसका कारण साँसारिक बोझों से लद जाना और भीतरी विशेषताओं को खोते चले जाना है। क्षय रोग प्रायः इसी कारण से उपजता और बढ़ता है। शरीर को अतिशय श्रम करना पड़े। मस्तिष्क पर चिन्ताओं तक उद्वेगों का भार लदा रहे तो दुहरे दबाव से फेफड़ों या आँतों में जख्म हो जाते हैं और उनमें होकर जीवन तत्व बाहर निकलने लगता हैं। समझना चाहिए कि भूकम्प से पड़ने वाली दरारें भीतर से फूटती और बाहर उनका उपद्रव कई प्रकार के कहर ढाता दीखता है।
भीतरी ऊर्जा को संतुलित बने रहने की स्थिति जब तक सही बनी रहती है, तब तक व्यक्तित्व सामान्य रहता है। पर जब संतुलन में अवाँछनीय क्षति पहुँचती या चोट लगती है तो उसी घुटन को बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ़ना पड़ता है। यह कभी-कभी उद्दण्डता का रूप धारण कर लेती हैं और भयंकर उत्पात मचाती है। इसे ज्वालामुखी के समतुल्य समझा जा सकता है।
व्यक्ति गड़बड़ाता है तो अपने आपको क्षति पहुँचाने तक सीमित नहीं रहता, वरन् दूर-दूर तक के वातावरण को बिगाड़ता है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और ज्वार-भाटे एक दूसरे को धकेलते हुए उस श्रृंखला को लम्बी घसीट ले जाते हैं। यही तूफान है जो पृथ्वी के अन्तराल से उफनते हैं। वातावरण पर छा जाते हैं और चक्रवात बनकर अन्तरिक्ष में ऊँचाई तक उफनते चले जाते हैं।
ज्वाला मुखी विस्फोटों से गरम और जहरीला लावा निकलता है। वह समीपवर्ती भूमि को जलाता है और आकाश धुएँ से भर देता है। धुँआ जब नीचे उतरता है तो उसकी परत जमीन पर जम जाती है और उगी हुयी वनस्पतियों को भारी हानि पहुँचाती है। क्रोध जब भीतर से उबलता है तो उसका प्रत्यक्ष स्वरूप विस्फोट से कम नहीं होता। मुँह से असंस्कृत शब्द निकलते हैं और ऐसा व्यवहार बन पड़ता है, जिसे आक्रमण भी कहा जाता है और आत्मघात भी। मुँह ज्वाला उगलता है और उससे समूचे वातावरण में विक्षोभ भर जाता है।
सामान्य सन्तुलित स्थिति ही श्रेयस्कर हैं। उसे सही बनाये रहने के लिए संयम बरतने की आवश्यकता है। संयम की शीतलता, शान्ति और स्थिरता में बनी रहती हैं। उद्धत आचरणों की प्रतिक्रिया न चैन से बैठती है और न बैठने देती है। दबा हुआ आक्रोश और असंयम देर सवेर में विस्फोट बनकर फूटता है और ज्वालामुखी, भूकम्प और तूफान जैसे उपद्रव खड़े करता हैं।
परिहास सुखद होता है, पर उसमें शालीनता का पुट भी रहना चाहिए। अन्यथा द्रौपदी और यादव कुल की तरह वह अनर्थकारी भी होता है।
द्रौपदी के महल में एक बार कौरव गये। वह इतना विलक्षण था कि थल में जल और जल में थल दीखे कौरव ऐसे ही भ्रम में पड़ गये और टकराने भटकने लगे। द्रौपदी ने व्यंग में कहा- “अंधों के अंधे ही होते हैं।” इसे कौरवों ने अपना अपमान माना और आगे चल कर द्रौपदी को नीचा दिखाने में कोई कमी न रहने दी।
इसी प्रकार एक कथा यादव किशोरों की है। वे शमीक ऋषि के पास गये। एक लड़के को युवती बनाया उसके पेट में लोहे का मूसला बाँधा और यह पूछने लगे कि इसका गर्भ में लड़का जन्मेगा या लड़की?
ऋषि इस परिहास पर बहुत क्रुद्ध हुए और शाप दिया। यह गर्भ होगा जो तुम सबके विनाश का कारण बनेगा। अन्त में वे सभी पारिवारिक संघर्ष के ग्रास बने और परस्पर लड़कर समाप्त हो गये।
अध्यात्म विज्ञानियों की भाषा अब भौतिक विज्ञानी भी बोलने लगे हैं। वे अब यह मानते हैं कि नगण्य-सी दीखने वाली मानवी काया विपुलशक्ति का भांडागार हैं। उसमें विद्यमान अविज्ञात का जखीरा असीम संभावनाओं से भरापूरा है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ-पराशक्ति की विविधता व अपरिमित सामर्थ्य हमें हतप्रभ कर देती है व यह सोचने पर विवश करती है कि यदि इस शक्ति का सदुपयोग हुआ होता तो मनुष्य क्या से क्या बन गया होता? आत्म सत्ता की पिटारी में अगणित रत्न भण्डारा दबे हुए प्रसुप्त स्थिति में पड़े हैं। यदि उन्हें कुरेदा जा सके, जागृत-विकसित और क्रिया रूप में लाया जा सके तो मनुष्य शक्ति पुँज बन सकता है, शुद्र से महान, नर से नारायण बन सकता है।
कार्डिनल गिसेप मेजोफेण्टी जो वेटीकन लाइब्रेरी के प्रमुख व्यवस्थापक रहे (1833), अपनी 50 भाषाओं, जो विश्वभर में बोली जाती हैं, में ऊँचे दर्जे की महारत प्राप्त कर वैज्ञानिकों के लिए एक प्रश्न चिन्ह बन गए। कैसे कोई व्यक्ति बिना उस प्रदेश में गए, उन लोगों से मिले भाषा-लिपि-शब्द विज्ञान की सारी जटिलताओं की जानकारी अनायास ही अर्जित कर लेता है, यह एक अनुत्तरित प्रश्न है। स्वामी विवेकानन्द पुस्तक पर हाथ रखकर कुछ पन्ने पलट कर ही उसे शब्दशः दुहरा देते थे। संत ज्ञानेश्वर 16 वर्ष की आयु में ही गीता का भाष्य लिख चुके थे। वैज्ञानिकों का कथन है कि सामान्यतः मानवी मस्तिष्क पूरे जीवन भर में ही गीता का भाष्य लिख चुके थे। वैज्ञानिकों का कथन है कि सामान्यतः मानवी मस्तिष्क पूरे जीवन भर में प्राप्त जानकारी का सौवाँ हिस्सा ही स्मरण शक्ति की माइक्रोफिल्म के रूप में जमा कर पाता है। अर्थात् हमें प्राप्त 100 जानकारियों में से 99 हम सहज ही भुला देते हैं। फिर ऐसे घटनाक्रम क्यों कर देखने में आते हैं, जिसमें व्यक्ति अनायास ही, अथवा साधना-योगाभ्यास द्वारा अथवा अध्ययन क्षमता के माध्यम से अपने मस्तिष्क में अगणित सूचनाएँ भर एक साथ उन्हें प्रकट भी करने की सामर्थ्य भी अर्जित कर लेता हैं। वैज्ञानिक ऐसे केसेज को अपवाद करार देते हैं, जबकि परामनोवैज्ञानिक इसे अतीन्द्रिय सामर्थ्य का चमत्कार कहते हैं।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर विलियम बैटिट ने अपने ग्रन्थों में लिखा है कि अनेक व्यक्तियों में पराशक्ति का उपयोग कर पृथ्वी के गर्भ में छिपी प्राकृतिक सम्पदा-संसाधनों का पता बताने की विलक्षण क्षमता अनायास ही जाग जाती है। टाटानगर की स्थापना की कहानी इस संदर्भ में दुहराने की कोई आवश्यकता नहीं है। सीधी सादी भाषा में पृथ्वी के धरातल से ही पाताल लोक की गहराई में छिपे भूगर्भीय भाण्डागार का सही स्थान बताने वालों को “सगुनिया” कहा जाता रहा है। प्राचीनकाल में सगुनिये इस कार्य के लिए अपने यंत्र के रूप में पहाड़ी बादाम या नीम की धनुषाकार पतली हरी टहनी का प्रयोग करते थे। पाश्चात्य विज्ञानी इसे डिवाइनिंग रॉड कहते हैं। कैसे किसी स्थान विशेष पर पहुँचते ही सगुनिये की हाथ में रखी टहनी का अगला सिरा नीचे की ओर झुक कर छिपी सम्पदा का संकेत दे देता है, यह शोध का विषय है। आजकल इन टहनियों के स्थान पर कहीं-कहीं ताँबे का तार प्रयुक्त होता है। मनुष्य की त्रिकाल दर्शिता का परिचय देने वाली यह क्षमता स्वयं में विलक्षण है और कैसे यह किसी सामान्य से व्यक्ति में जग जाती हैं, यह और भी रहस्यमय है।
अब तो वैज्ञानिकों ने भी इसी से संकेत लेकर पृथ्वी के नीचे एवं समुद्र की अतल गहराई में छिपे जल भण्डार एवं विपुल खनिज सम्पदा को पराशक्ति के माध्यम से खोज निकालने की डाउजिंग विधि का विकास कर लिया है। अब इसे अन्धविश्वास न मानकर मन की शक्ति का सुनियोजन माना जाने लगा है। अपराधियों को खोज निकालने से लेकर जमीन की गहराई में छिपे ऐसे स्थानों पर विद्यमान सीवर पाइपों केबल्स आदि के हालात पता का उपयोग हो रहा है।
मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने अपने विभिन्न अनुसंधानों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के चारों ओर ऊर्जा का एक अदृश्य घेरा विद्यमान है। भिन्न-भिन्न प्रकार की भिन्न वस्तुओं की ऊर्जा का घेरा भी भिन्न-भिन्न होता है। इसे उस वस्तु का आभामण्डल (आँरा) भी कह सकते हैं। ग्रह-नक्षत्र, सूर्य चन्द्र-तारे, मानव, प्राणी, वृक्ष-वनस्पति, चट्टानें, जल, धातु, अधातु आदि प्रत्येक के घटक लगातार कंपन करते रहते हैं व अपने चारों और एक विशेष प्रकार की ऊर्जा किरणें विकिरित करते हैं। इस तरह सृष्टि की हर वस्तु से निरन्तर विशिष्ट ऊर्जा प्रवाह समष्टिगत ब्रह्माण्ड में फैल रहा है। व्यष्टि व समष्टि में संव्याप्त संबंध ही डाउजिंग प्रक्रिया की वैज्ञानिकता को सत्यापित करता है एवं असीम संभावनाओं का पथ प्रशस्त करता हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि भूगर्भ स्थित प्राकृतिक सम्पदा के दोहन हेतु जानकारी लेते समय मानवी तेजोवलय का ऊर्जा घेरे से टकराता है तो सगुनिये या प्रयोक्ता वैज्ञानिक के मन मस्तिष्क में एक विद्युत, तरंग दौड़ जाती है। माँस पेशियों में खिंचाव आता है व हाथ का यंत्र स्वतः नीचे झुक जाता है व खुदाई करने पर विपुल प्राकृतिक सम्पदा हाथ लगती है। यह सारा चमत्कार उस विकसित ऊर्जा घेरे का है, जिसे तेजोवलय-आभामंडल या आँरा कहते हैं जो किसी-किसी में विकसित होता हैं।
यह वस्तुतः मनुष्य की प्राण विद्युत या प्रसुप्त ऊर्जा का विकसित रूप ही है, जिस किसी ने ईथरीक डबल नाम दिया है, किसी ने प्राणमय कोश एवं किसी ने आइडियोस्फियर। जैसे पृथ्वी के चारों ओर आयनमण्डल विद्यमान है, उसी प्रकार कायसत्ता के चारों ओर भी एक ऊर्जा पुँज बिखरा पड़ा हैं। यह मात्र मस्तिष्क ही नहीं शरीर के अंग-प्रत्यंग में फैले नाड़ी संस्थान में प्रवाहित विद्युत प्रवाह का बाहर परिलक्षित होने वाला घेरा है, जिसे साधना उपचारों के द्वारा इस सीमा तक विकसित किया जा सकता है कि व्यक्ति न केवल स्वयं अगणित विभूतियों का स्वामी बन सकता है, अपितु अन्य अनेकों को इस आध्यात्मिक ऊर्जा से निरोग भी कर सकता है व प्राण शक्ति सम्पन्न भी। साइकिकहीलिंग एवं शक्तिपात इसी विकसित ऊर्जा मण्डल के माध्यम से सम्पन्न होने वाली प्रक्रियाएँ हैं।
प्रश्न यह उठता है कि यह प्रभा मण्डल है क्या चीज? किस प्रकार यह बनता व विकसित होता है व कैसे इसे भांपा या चर्म चक्षुओं से देखा जा सकता है? इस संबंध में हमें यह ध्यान रखना होगा कि प्रभा मण्डल भी दो प्रकार का होता है- फिजीकल आँरा जो बायोप्लाज्मा या बायोफ्लक्स से विनिर्मित से विनिर्मित होता हैं, दूसरा साइकिक आँरा जो सूक्ष्म ईथरीक तरंगों का एक प्रवाही घेरा है। मानवी काया का यह प्रभामण्डल संबंधी अनुसंधान सन् 1987 की इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रगति के काफी सोपान पार कर अपनी प्रौढ़ावस्था में है, तब भी कहा नहीं जा सकता कि समूचे अविज्ञात को खोज लिया गया। यह तो असीम अपरिमित भाण्डागार है जिसे समूचा छान पाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य हैं।
1972 में मास्को विश्वविद्यालय के बायोफिजीक्स विभाग के डॉ. बेरिस टारुसोव ने बहुत ही मन्दी पर संवेदन शील प्रकाश किरणें मानवी जीव कोशों एवं पौधों की पत्तियों से निकलती नोट की। इसी बीच कजाकिस्तान (आल्मा अता) की स्टेट यूनिवर्सिटी के डॉ. विक्टर इन्युशिन ने बताया कि मानवी नेत्रों व जीव जन्तुओं से विशेष प्रकार की अल्ट्रा वायलेट किरणें निकलती हैं एवं इन्हें एक विशेष सेंसीटिव फिल्म पर स्पेशल फिल्टर्स का प्रयोग कर रिकार्ड किया जा सकता है। लाइफ फील्ड एल-फील्ड के माध्यम से “इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मैट्रिक्स” के रूप में हैराँल्डबर एवं लियोनार्ड रैवीट्ज ने इस सिद्धान्त को आगे बढ़ाया। हाईवोल्टेज फोटोग्राफी (किलियन, इलेक्ट्रोग्राफी, कोरोना डिस्चार्ज फोटोग्राफी) भी आभामण्डल का मापन करने की ऐसी तकनीक थी जो क्रमशः विकसित हुई। यहाँ तक कि विभिन्न प्रकार के मनोविकार, भय, अंग विशेषों की भावी व्याधि तक विभिन्न रंगों में अंकित करने में सफलता वैज्ञानिकों को मिली। चिंतन प्रवाह में परिवर्तन से आभामण्डल भी परिवर्तित होता पाया गया। यू.सी.एल. की थेल्मा माँस. ने योगों, अतीन्द्रिय क्षमता संपन्न व्यक्तियों की उँगलियों से विशिष्ट “कोरोना” निकलते देखा व अंकित किया है। अपनी पुस्तक “सायकिक डिस्कवरीज बिहाइण्ड आयरन करटेन’ (1970) में लिनथ्रोडर एवं शीला आँस्ट्रेण्डर ने सोवियत परामनोचिकित्सक व तथाकथित सायकिक हीलर कर्नल एलेक्सी क्रिवोरोटोव के बारे में लिखा है कि “जब वे अपना हाथ रोगी व्यक्ति के पेट पर घुमा रहे थे एवं उन्होंने अपना ध्यान एकाग्र किया, तब उनके हाथ से तीव्र चमक वाली प्रकाश किरणें, जैसे कि “लेसर बीम” निकलती हैं, उत्सर्जित हुईं व अंग विशेष पर फोकस हो गयीं”। इस प्रक्रिया को लेखक द्वय ने चित्राँकित भी किया है। इसी प्रकार चैकोस्लोवाकिया में डिजाइन किये गए अपने इत्वीपमेण्ट द्वारा नेवार्क कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग न्यूजर्सी के डॉ. इ. डगलस. डीन ने ईथेल. ई. डी. लोच नामक एक सायकिक हीलर के हाथों से भी किरणों का मापन किया। डॉ. डीन ने कहा - कि अपनी इच्छानुसार लोच ने अपने हाथों से निकलने वाली किरणों का रंग बार-बार बदल कर दिखाया।
विलियम टीलर एवं डेविड बाँयर्स (स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी) ने हाथ से उत्सर्जित आभामण्डल को अल्ट्रावायलेट रेंज का माना व उसका फोटोग्राफ लेने में उन्हें सफलता मिली हैं। वस्तुतः अब बायोलॉजिकल प्लाज्माबॉडी एवं हाइवोल्टेज किर्लियन फील्ड में सामजस्य बिठाने में वैज्ञानिकों को काफी सीमा तक सफलता मिली है। फैण्टम लीव एवं लिम्ब इफेक्ट भी इसी से जाना जा सका हैं।
इतना सब होते हुए भी परामनोवैज्ञानिक मानते हैं कि अभी ऐसा समुचित मॉडल नहीं बन सका जो आँरा, आर्गेन एनर्जी, चक्रों का विद्युत प्रवाह, इथरीकबॉडी, एस्ट्रलबॉडी को चित्राँकित कर सके। बायोप्लाज्मा के कणों के कम्पन जो जैवविद्युत चुम्बकीय होते हैं बहुधा उच्चवोल्टेज की मशीन द्वारा मापे जा सकते हैं, पर वे मूल आभामण्डल का एक छोटा-सा अंश भर होते हैं। उन्हें आँरा का पर्याय नहीं माना जा सकता। आर्गोन एनर्जी की अवधारणा सबसे पहले फ्रायडकालीन मनःचिकित्सक विल्हेम राइख ने की थी। उनका कहना था कि चेतना के स्पन्दन को जिस ऊर्जा के रूप में जाना चाहिए, वह आँर्गोन एनर्जी है। “बायाँन्स” इनकी मूल ईकाई है। जो एक मिलीमीटर के दस लाख वाँ भाग के बराबर होते हैं। राइख द्वारा बनाये गए आर्गोन एक्युमुलेटर को 13 जनवरी 1941 को प्रिंसटन में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. अलबर्ट आइंस्टीन को दिखाया गया, जिसका उन्होंने सत्यापन किया। यद्यपि बद में डॉ. राइख की यह अवधारणा विवाद का विषय बनी फिर भी वैज्ञानिक, पराविज्ञानी एक स्वर से आर्गोन एनर्जी के सिद्धान्त को मानवी प्रभामण्डल के परिप्रेक्ष्य में स्वीकार करते हैं व भावी व्याधि के निदान व उपचार में महत्व प्रतिपादित करते हैं।
हमारी यह दुनिया बहुआयामी व विविधताओं से भरीपूरी है। मानवी काया उस विराट् का एक घटक है व उसमें ब्रह्माण्डीय सत्ता की ईश्वर की समस्त शक्तियाँ सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं। आवश्यकता मात्र उन्हें उभारने-विकसित करने भर की है, चाहे वैज्ञानिक प्रमाण न मिलें, पर उपरोक्त प्रतिपादनों को झुठलाया नहीं जा सकता।
टिप्पणी- उपरोक्त लेख में उद्धृत संदर्भ एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (1985) एवं डॉ. जेफ्री मिशलोव की “द रुटस ऑफ काँशसनेस” से लिये गए हैं।
शेख शादी मस्जिद में रोज नमाज पढ़ने जाते थे। उनके पास फटे जूते थे। एक दिन एक धनी नमाज पढ़ने आया, उसके पास सोने की करचोटी वाले जूते थे। शेख शादी ने पूछा - आप कब-कब नमाज पढ़ते हैं। तो उसने दिया- साल में एक बार।
इस पर शेख शादी दुःखी हुए और बोले हे ईश्वर! रोज नमाज पढ़ने वाले के फटे जूते और साल में जो एक बार पढ़ता है उसे सोना लगे? यह कैसा इंसाफ? वे यह सब सोच ही रहे थे कि एक बिना पैर वाला अपंग घिसटता हुआ आया और नमाज पढ़ने लगा।
शेख शादी का विचार बदल गया। उनने शिकायत के स्थान पर भगवान पर भगवान को धन्यवाद दिया और कहा-मुझे पैर मिले हुए हैं यही क्या कम है? सम्पन्न से अपनी तुलना करने पर मनुष्य दुःखी होता है किन्तु जब दुखियों से तोलता है तो प्रतीत होता है कि जो मिलता है, वह भी कम नहीं हैं।
एक बार स्वर्ग के देवता धरती पर विचरण करने आये। उन्हें आशा थी कि धरती के निवासी उनका विपुल स्वगत करेंगे।
उन दीनों खेतों में अनाज के पौधे लहलहा रहे थे। कलियाँ और बालें निकल रही थीं। लोग उन्हें देखकर फूले नहीं समा रहे थे। चारों ओर मस्ती छाई हुई थी, जहाँ देखो वहाँ बसन्तोत्सव मनाया जा रहा था। देवताओं के तरफ किसी ने आँख उठा कर भी नहीं देखा। उन्हें जिस स्वागत की आशा थी वह उन्हें कहीं भी नहीं मिला। वरदान देने की क्षमता पर उन्हें जो वर्ग था वह गल चला।
वे सोचते थे कि अभावग्रस्त मनुष्य उनकी अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए बहुत गिड़गिड़ायेंगे और न जाने क्या-क्या माँगेंगे। याचकों की मनोकामनापूर्ण करने वाला सदा यशस्वी होता है और मान पाता है। देवता इसी आनन्द लेने को पृथ्वी पर आये थे। जिसके पास वरदान देने की क्षमता हो उसके लिए वैसी चाहना उचित भी थी। जब देवता निराश लौटने लगे तो उनने धरती से पूछा - “तुम्हारे पुत्र किस उपलब्धि में हर्ष-विभोर हो रहे हैं? ये हमसे क्यों कोई याचना करने नहीं आते?”
धरती ने इतनी दूर से पधारे हुए अपने मान्य अतिथियों का झुक-झुककर स्वागत किया और नम्रतापूर्वक बोली- “इस लोक में यहाँ का भी एक देवता है, वह भी आपकी ही तरह सामर्थ्यवान है। मेरे पुत्र उसी की पूजा करते हैं और फलस्वरूप जो चाहते हैं सो प्राप्त कर लेते हैं। आजकल उसी की अनुकम्पा यहाँ बरस रही है, सो सबका मन उसी के स्वागत में लगा हुआ हैं। आप कुसमय आये। यदि दूसरे दिनों में आते तो सम्भव है आपकी भी अर्चना होती।”
“देवताओं के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उनने पूछा-भला इस मनुष्य-लोक में भी कोई देवता बसता है? और वह हम लोगों की तरह ही सामर्थ्यवान है? ऐसा हमें अब तक विदित न था, यदि ऐसा है तो उसका नाम बताओ, स्थान दिखाओ।”
धरती मुस्कराई। उसने एक मनुष्य को पास बुलाया और उसकी हथेली दिखाते हुए कहा, वह देवता यहाँ रहता है, खेत-खेत में उसी विभूति बिखरी पड़ी हैं। मेरे सब पुत्रों का भरण-पोषण उसी के द्वारा होता है। श्री और समृद्धि, सफलता और प्रगति सभी कुछ तो उससे मिलता रहता हैं।
हथेली में रहने वाला, न दीखने वाला और इतनी विभूतियों का अधिपति भला कौन देवता होगा? स्वर्ग से पधारने वाले अतिथियों के लिए यह एक पहेली थी। वे उसे न सुलझा सके तो पूछने लगे- “देवी! जरा और स्पष्ट करो। उसका नाम रूप तो बताओ?”
धरती की छाती गर्व से तन गई, उसने कहा-” वह देवता है, “श्रम”। मेरे पुत्रों ने उसी की आराधना करने की ठान-ठानी है और वे आज नहीं तो कल इस लोक में स्वर्ग की रचना करेंगे? खेत-खेत पर हरियाली के रूप में यह श्रम ही लहलहा रहा है। जहाँ भी इस देवता की अर्चना होती है, वहीं विभूतियाँ हाथ बाँध कर आ खड़ी होती हैं।
जहाँ श्रम की पूजा होती है वहाँ कोई ऐसी कमी नहीं रह सकती जिसके लिए देवताओं को कष्ट करना पड़े। इस तथ्य और सत्य के साथ-साथ स्वर्ग निवासियों ने वस्तु स्थिति को समझा और वे अपनी निरुपयोगिता एवं मनुष्य की उपेक्षा का रहस्य समझते हुए अपने लोक को वापस चले गये।
देवता होते हैं या नहीं, स्वर्ग कहीं है भी कि नहीं, इस विवाद में न उलझकर एक तथ्य इस आख्यान से स्पष्ट होता है कि सुरपुर के जिस भगवान को हम युग-युग से खोज रहे हैं, उस पर व्यर्थ बहस समयक्षेप करते ही नहीं, आपस में लड़ते भी हैं, उसके एक गुण को भी धरतीवासी अपने अंदर उतार लें तो मानव में देवत्व के अवतरण की उक्ति सार्थक हो सकती है। कर्मयोगी को अपनाने की प्रेरणा देने वाला वह धरती का देवता श्रम है, जिसके माध्यम से सर्वांगपूर्ण प्रगति का पथ प्रशस्त किया जा सकता है।
मनुष्य की यह एक स्वाभाविक इच्छा रहती है कि उसकी संतति सुयोग्य और समुन्नत हो। पर इसका उपाय-उपचार प्रायः अच्छी शिक्षा एवं अच्छे वातावरण पर आश्रित समझा जाता रहा है। एक मान्यता यह भी रही है कि माता और पिता का स्वास्थ्य सौंदर्य ही नहीं कौशल भी वंश-परम्परा पर आधारित है। इसलिए सुयोग्य जोड़ों से उत्पन्न की गई संतति ही समुन्नत हो सकती हैं।
पर यह मान्यताएँ उथली ही ठहराई गई हैं, क्योंकि उपरोक्त प्रयोग उपचार करने पर भी संतति वैसी न बन पड़ी जैसी कि अभीष्ट थी। विज्ञान ने गहराई में उतरकर उसका आधार आनुवाँशिकी में खोजा है और परम्परागत गुण-सूत्रों को, जीन समुच्चय को इसका कारण माना है। वे कहते हैं कि बाहर से यौवन और सौंदर्य से भरपूर होते हुए भी किन्हीं दंपत्तियों का जीन्स सम्मिश्रण ऐसा हो सकता है, जिससे संतान पिता-माता की तुलना में बदले हुए स्वभाव की हो।
जीन्स की परम्परागत परिणति असंदिग्ध है, पर वह शरीर संरचना तक ही सीमित है। अफ्रीका के नीग्रो अमेरिका के ठण्डे देशों में रहते हुए भी रंग-रचना की दृष्टि से काले व वैसे ही हैं जैसे कि उनके पूर्वज थे। जो गोरे लोग अफ्रीका में बसे हैं अपनी परम्परागत गोरी चमड़ी बनाए हुए हैं। अरबों का लम्बा और काँगो निवासियों का बौना होना भी देश बदल देने पर भी यथावत बना रहता है। यही बात मंगोलियन जातियों के संबंध में भी है।
आकृतियों से भी अधिक महत्व प्रगति एवं बुद्धिमत्ता का है। यह परम्परा कैसे आगे बढ़े? इसके लिए पौधों में कलम लगाने के सिद्धान्त में सफलता मिलने की बात आगे सोची जाने लगी हैं। गधे और घोड़ी के संयोग से खच्चर जाति का एक नया प्रजनन संभव हुआ है। वैज्ञानिकों का दिमाग इन दिनों इसी दिशा में चल रहा है और वे जीन्स की समर्थता को अद्भुत मानते हुए मनुष्यों में भी “कलम प्रणाली” (क्रास ब्रीडिंग) का प्रचलन करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं।
जीन्स में परम्परा गत दोष-दुर्गुणों का संशोधन करना भी संभव हुआ है और उनके स्थान पर नई विशिष्टताओं का समावेश करने में भी सफलता मिली है। पेड़ पौधे में यह प्रयोग बहुत पहले ही सफल हो चुका है। विजातियों के साथ यौन संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया को दृष्टिगत रख किसी भी नर को शुक्राणु किसी नारी के शरीर में पहुँचाये जाने के कृत्रिम गर्भाधान के प्रयास में भी सफलता मिल रही है। पूर्वकाल में यह मात्र यौन संपर्क से ही संभव था। तब निर्धारित पति-पत्नियों में गुण सूत्र विपन्न हों तो कोई अन्य चारा नहीं था। यद्यपि वैदिक-पौराणिक काल में “नियोग-प्रक्रिया” के अनेक उदाहरण मिलते हैं। अब तो (1) जीन्स का परिमार्जन तथा (2) किसी शरीर में उनका बिना सहवास के भी प्रवेश बन पड़ना संभव हो गया है।
सुप्रसिद्ध पुस्तक “इन हिज इमेज, क्लोनिंग ऑफ मैन” पुस्तक के लेखक डेविड रोरविक को यदि विकसित किया जा सके तो बिना संभोग के भी समर्थ एवं सुयोग्य व्यक्तियों की प्रतिलिपि संतानें पैदा की जा सकेंगी।” अपनी इस पुस्तक में उसने अमरीका के एक करोड़पति की कार्बन-काँपी तैयार करने में सफलता प्राप्त करने का भी दावा किया है और लिखा है कि वह बिल्कुल सामान्य शिशु का सामना कृत्य भी सम्मिलित हैं।
कृत्रिम गर्भाधान द्वारा गर्भाशय के बाहर संतान निर्माण में ब्रिटेन के दो वैज्ञानिकों का नाम आता है। ये हैं-कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के आर.जी. एडवर्ड्स वेब्सटर एवं आँलम जनरल अस्पताल (यू.के.के) डॉ. पी. सी. स्टेपार्ट। उनने बंध्या नारियों को छोटे आपरेशनों के बाद संतानोत्पादन में समर्थ ही नहीं बनाया वरन् कृत्रिम गर्भाधान के सहारे समुन्नत स्तर की संतानें भी उत्पन्न करायीं। अमरीका के प्रजनन विज्ञानी डॉ. हैरिस ने भी इस स्तर के प्रयोग किये और परिणामों को देखते हुए भावी संभावनाओं के संबंध में उत्साहपूर्ण को देखते हुए भावी संभावनाओं के संबंध में उत्साहपूर्ण सफलताओं का संकेत दिया। उनका कथन है कि इक्कीसवीं सदी की पीढ़ी सशक्त, समुन्नत, बुद्धिमान हो, इसके लिए कृत्रिम प्रयोग किए जाने अत्यन्त अनिवार्य हैं।
जैक्सन प्रयोगशाला बारबाहट्र मैने (यू.एस.ए) के जीवन प्रजनन विभाग के विशेषज्ञ वैज्ञानिक पीटरहोप के अनुसार स्तनपायी जीवों का कार्बन-काँपी तैयार करना मुश्किल अवश्य है, पर असंभव नहीं।
फ्राँसीसी जीव वैज्ञानिक जीन रोंसे की मान्यता है कि “मानव कलम का उपयोग समर्थ व गुण सम्पन्न व्यक्तित्वों के निर्माण में किया जा सकता है, साथ ही इस विधि द्वारा व्यक्ति को अमर भी बनाया जा सकता हैं।
मिनिसोटा विश्वविद्यालय के जीवन कोशिका विशेषज्ञ रॉबर्ट मैकिवेल ने निम्न जाति के जीवधारियों पर मानवी कलम लगाकर उन्हें नर पशु नर स्तर के नये जीवधारियों की संरचना की बात सिद्धान्ततः स्वीकारी है। उनका कहना कि यह आवश्यक नहीं कि समान जाति के बीच ही प्रजनन प्रक्रिया सीमित रहे। यह कदम मैथुन क्रिया द्वारा तो नहीं पर जीन्स आरोपण के प्रयोगों द्वारा आज न सही कल संभव हो सकता है। फिलाडेल्फिया के राँबर्टे ब्रिग्स ने भी इस संभावना को अक्षरशः स्वीकार करते हुए इस दिशा में शोध करने पर बल दिया है।
जर्मनी के तीन मूर्धन्य वंशानुक्रम विज्ञानी डॉ. आखेन बेवर, डॉ. आयोजिन फिशर एवं डॉ. फ्रिट्ज लेंज लेंज ने ह्यूमन हैरेडिटी’ नामक एक पुस्तक लिखी है। इसमें उन्होंने वासना के उभार में चल रहे अंधाधुन्ध विवाह संबंधों के कारण संतान पर होने वाले दुष्प्रभाव को मानवी भविष्य के लिए चिन्ताजनक बताते हुए कहा है कि “अनियंत्रित विवाह के कारण पीढ़ियों के वर्तमान स्तर में बहुत गिरावट आ रही हैं।”
म्यूटेशन विशेषज्ञ व ख्याति प्राप्त विज्ञानी टर्नियर का कथन है- “मानसिक अशक्तता का भी पीढ़ियों पर प्रभाव पड़ता है और इससे पीढ़ियाँ उत्तरोत्तर निम्नतर स्तर की बनती जाती हैं, जबकि मनोबल सम्पन्न एवं साहसी व्यक्ति तेजस्वी एवं गुणवान संतति पैदा करते हैं। इसलिए मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों का सशक्त पीढ़ी के निर्माण हेतु बन्ध्याकरण कर देना चाहिए। उनका समर्थन कितने व्यक्ति करेंगे, मालूम नहीं, पर हो सकता है कोई सनकी तानाशाह यही कर गुजरे।
लेटर बर्ग, कैलीफोर्निया के नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. जोशुला का विचार है कि संसार के मूर्धन्य व्यक्तित्वों के शुक्राणु संचय करने के लिए एक ऐसे बैंक की स्थापना की जानी चाहिए जो उपयुक्त स्तर की महिलाओं के माध्यम से समर्थ व गुण सम्पन्न संतानें प्राप्त करने के काम आ सकें।
कैलीफोर्निया के वयोवृद्ध वैज्ञानिक रॉबर्ट के ग्राहम ने भी पिछले दिनों एक अत्यंत विलक्षण अभियान चलाया था। उनने पाँच नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के शुक्राणुओं को इकट्ठा कर “शुक्राणु बैंक” की स्थापना की थी। इस अद्भुत बैंक के निर्माण का अपना उद्देश्य बताते हुए उन्होंने कहा कि इन शुक्राणुओं द्वारा तीक्ष्ण मस्तिष्क की महिलाओं की अणु कोशा को निषेचित कर असामान्य आई. क्यू. वाले बच्चे पैदा किये जा सकेंगे। अपने इस प्रयास में वे तीन महिलाओं का अभी तक कृत्रिम गर्भाधान भी करा चुके हैं। उन्हें कितनी सफलता मिली, यह समय बताएगा।
आज-कल वैज्ञानिक ‘जीन’ के घटक डी. एन. ए. में आमूल-चूल परिवर्तन कर वाँछित गुण सम्पन्न व्यक्तित्वों के निर्माण की बात सोच रह हैं। इसके लिए अनेकानेक विधियाँ सुझायी गई हैं। प्रथम विधि में एक जजीन के डी. एन. ए. को दूसरे जीन में प्रत्यारोपित करने की बात सोची गयी है। दूसरी विधि मेंक वायरस या बैक्टरीयोफाँज की सहायता से डी. एन. ए के न्यूकलिओटाइडों में फेर बदल का प्रस्ताव रखा गया है। चौथी विधि पार्थेनोजेनेसिस की है। वस्तुतः आज अमेरिका के प्रायः एक सौ से भी अधिक विश्व विद्यालयों एवं निजी शोध संस्थानों में जीन्स परिवर्तन एवं प्रत्यारोपण पर विशद अनुसंधान कार्य चल रहा है। इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी एवं यू. एस. एस. आर. में भी इस दिशा में प्रयोग चल रहे हैं।
विस्काँसिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ई. एम. राँस अपनी जातीय विशेषताओं पर आधारित पुस्तक “प्रिंसिपल्स ऑफ सेशियाँलाँजी” में लिखते हैं- “परम्परा से प्राप्त नैतिक संस्कारों में उत्तरी यूरोप के निवासी दखिझाी यूरोप के निवासियों से बहुत आगे हैं।” एक उदाहरण के द्वारा उन्होंने अपनी इस बात को और भी अधिक दृढ़ता प्रदान की है। और इसे प्रामाणिक बताते हुए कहते हैं कि जहाजी दुर्घटनाओं के अवसर पर उत्तरी यूरोप के निवासियों में दक्षिणी यूरोप के निवासियों की तुलना में अनुशासन कर्तव्यनिष्ठा दुर्बलों के प्रति करुणा एवं सेवा भक्ति अधिक पायी जाती है। दक्षिणी यूरोप के निवासी ऐसे अवसरों पर घबड़ा कर अपना संतुलन खो देते हैं दूसरों के बचाव की तुलना में ऐसे वक्त में वे मात्र आत्म रक्षा की बात सोचते हैं जबकि उत्तरी यूरोपवासियों की प्रवृत्ति इसके ठीक विपरीत पायी जाती है।”
मिनीसोटा विश्वविद्यालय में गत आठ वर्षों से चल रहे अनुसंधान कार्य के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं 350 जुड़वा बच्चों पर किए गए अध्ययन से ऐसा लगता है कि कार्ल मार्क्स एवं सिगमण्ड फ्रायड अपने नेचर विरुद्ध नर्चर सिद्धान्त के प्रतिपादन में गलत थे। मार्क्स कहते थे कि आदमी को पुनः बनाया जा सकता है जबकि ये वैज्ञानिक कहते हैं कि परम्परागत मूल्यों का परिपालन एवं आँतरिक अनुबंध विशुद्धतः जीन्स द्वारा निर्धारित होता है। डॉ. डेविड लाइकेन कहते हैं कि यह अध्ययन प्रमासात करता है कि मासलेवल पर विचारणा व मान्यता परिवर्तन के प्रयास आनुवांशिकी स्तर पर हो चाहिए। अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक क्षेत्र में यह ऊहापोह चल रहा है कि वह से पूर्व रंग रूप का अधिक स्थिति का नहीं गुण सूत्रों का भी परीक्षण किया जाना चाहिए और किस प्रकृति की संतान उत्पन्न करनी हो, उसी के अनुरूप विवाह निश्चित होना चाहिए।
यदि यह न बन पड़े तो गुण सूत्रों के परिवर्तन एवं उन्हें कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से उपयुक्त खेत में उपयुक्त बीज डालने का प्रयास कार्यान्वित किया जाना चाहिए। यह कार्य बिना दाम्पत्य जीवन की मर्यादा नष्ट किए होता रह सकता है।
अभी वैज्ञानिक किसी निष्कर्ष पर पहुँचे नहीं हैं। फिर भी यदि उनका यह प्रतिपादन सही सिद्ध हुआ तो नर नारियों को पुरातन कायाकल्प सिद्धांतों के अनुरूप दाम्पत्य-जीवन में ही जीन्स परम्परा का परिवर्तन सरल हो जाएगा।
एक ऐसे भविष्य वक्ता थे जो सब का सही भविष्य बताते थे। दो मित्र उनसे अपना भविष्य पूछने गए। एक से उन्हें कहा एक महीने बाद मृत्यु हो जायगी और दूसरे से कहा एक महीने बाद राजा बनोगे। दोनों बड़ा विश्वास लेकर घर लौट गए।
जिसे मरना था उसने अपने आप को सत्कर्मों में लगा दिया। पुण्य परमार्थ में निरत रहने लगा ताकि अगले जन्में काम आए। दूसरे ने सोचा जब कुछ ही दिन रात बनना है तो जो हाथ में है उसे मौज से क्यों न उड़ाएँ? व अहंभाव मदिरा पीने लगा।
महीना बीत गया। एक के पैर में चोट लगी और वह मरहम पट्टी से अच्छी हो गई। दूसरे का स्वर्ण मुद्राओं की थैली रास्ते पर पड़ी मिली। पर वह भी मदिरापान में खर्च हो गई। महीना बीतने पर भी वे ज्यों के त्यों थे। कारण पूछने के लिए भविष्यवक्ता के पास फिर दोनों गए।
उनने कहा- कर्म से प्रारब्ध बदल सकता है। पुण्यात्मा ने सत्कर्मरत होकर मृत्यु की विषमता को चोट के हलके रूप में बदल डाली और राज्य पाने वाले के मदिरापान ने उसे स्वर्ण मुद्राओं में घटाकर समाप्त कर लिया। भाग्य विधान है तो पर उसे कर्म द्वारा बदला भी जा सकता है।
स्वामी विवेकानन्द आरम्भ में साधारण परिवार में जन्मने और आर्थिक स्थिति गई-गुजरी होने के कारण सहचरों में साधारण ही समझे जाते हैं। पर जब उनने परमहंस की कृपा से दृष्टिकोण में असाधारण परिवर्तन किया, जीवन क्रम में उच्चस्तरीय गतिविधियों का समावेश किया तो वे सब की आंखों में ऊँचे उठने लगे। सम्मान और सहयोग उन पर बरसने लगे। उत्कृष्टता अपनाने के सत्परिणाम प्रत्यक्ष देखे तो वे उन सत्प्रवृत्तियों की ओर भी तेजी, मुस्तैदी से आगे बढ़ने लगे। द्रुतगति से बढ़े और आसमान पर छा गये। विश्व भर में उन्हें देव संस्कृति का राजदूत माना जाने लगा। देश की नई पीढ़ी में बढ़ती अनास्था को उनने न दृढ़ता पूर्वक रोका और भटकते पैरों को सही रह पर चलने के लिए बाधित किया। वे विदेशों से लौटे तो मद्रास व कलकत्ता की सड़कों पर घोड़े जुती बग्घी में बैठे हुए अपने मसीहा के वाहन से घोड़े खेल दिया और स्वयं जुत गये। अन खींचने वाले में मूर्धन्य गण्यमान लोगों की भी बड़ी संख्या थी। एक और उनके प्रयासों और त्याग बलिदानों अनुरूप जहाँ जन मानस से श्रद्धा उमड़ रही थी, वहीं दूसरी ओर न? अपनी और उनकी तुलना करते हुए हीनता अनुभव करने वाले ईर्ष्यालुओं की भी बाढ़ आई और वे उन्हें टाँग पकड़ कर नीचे गिराने के लिए अपनी समता तक उतार लाने के लिए असाधारण प्रयत्न करने लगे।
आक्रमण के लिए अन्य हथियार उठाना तो जोखिम भरा लगा। सस्ता एक ही उपाय सूझा। मनगढ़ंत आरोपों और लाँछनों को गढ़ कर बदनामी फैलाना। वास्तविकता तो कुछ थी नहीं। पर मनगढ़ंत पर तो कोई रोक है नहीं जो मन आया सो गढ़ लिया और जो जीभ पर उतरा सो कहने लगे। बात यहीं तक सीमित नहीं रही। पर्चेबाजी भी चली। लंगड़े लूले अखबारों में पैसा देकर आरोप पत्र भी छपाये गये। ईर्ष्यालू समझते थे कि प्रचार ही सब कुछ है। प्रोपेगैंडा किसी को तिल से ताड़ बना सकता है और हाथी को मच्छर जैसा छोटा कर सकता है। पर उनकी धारण मिथ्या सिद्ध हुई जब संगठित गिरोह के योजनाबद्ध आक्रमणों का कोई प्रतिफल नहीं निकला।
स्वामी जी के मित्रों और हितैषियों ने कहा- “ईर्ष्यालुओं के आक्षेपों का प्रतिवाद किया जाय और मुँह तोड़ उत्तर दिया जाय।” इस प्रस्ताव को स्वामी जी ने सर्वथा अस्वीकार कर दिया और कहा हमें धैर्य रखना चाहिए और जनता के विवेक पर विश्वास रखना चाहिए। यथार्थता को समझते देर भले ही लगे पर वह अपनी स्थिति स्वयं स्पष्ट कर देती है। सूर्य पर धूल फैंकने वाले के मुँह पर ही वह उलट कर पड़ती है।
हुआ भी ऐसा ही आरोपों का कोई प्रतिवाद नहीं छपा। वाणी प्रत्युत्तर में मौन रही। न स्वामी जी ने सफाई दी और न उनके सहयोगियों ने ऐसा कोई कदम उठाया नया ईंधन न मिलने पर जलाई गई आग अपने आप समयानुसार बुझ गई। दुष्टता अपनाने के कारण ईर्ष्यालुओं पर ही धिक्कार पड़ी। स्वामी जी खरे सोने की तरह अधिक चमके और प्रमाणिकता लिए हुए उभरे क्योंकि उन्हें अन्ध विश्वास के आधार पर नहीं वरन् अनेकों उपायों से जाँच पड़ताल करने का उपरांत हृदय पर बिठाया गया था और यथार्थता का समर्थन उपलब्ध हुआ था।
ऐसे विद्वेषी, ईर्ष्यालु एवं कालनेमि स्तर के ओछे व्यक्ति समय-समय पर जन्मते व पनपते रहे हैं, पर कालान्तर में कुकुरमुत्तों की इस सेना का नाश होकर ही रहता है, यह सर्वथा सत्य है।
किसी प्रचलन का इसलिए अनुकरण न करो कि उसे बहुत जनों की मान्यता प्राप्त है। इस संसार में बहुमत समझदारी का नहीं है।
देव मान्यता और देव पूजा की भावना से भारतीय जन मानस पूरी तरह से भरा हुआ है। उनकी कृपा की सभी आकाँक्षा करते और कोप से डरते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर उनकी पूजा उपासना छोटे या बड़े रूप में, साकार या निराकार रूप में होती रहती है। माना जाता है कि वे स्वर्ग नामक ऊर्ध्ववर्ती लोक में रहते हैं और आमंत्रित करने पर मनुष्यों की सहायता के लिए दौड़ आते हैं।
इस संदर्भ में अनेक देशों, दर्शनों में विभिन्न मन्तव्य हैं। उनमें से एक यह है कि मनुष्य की अन्तरात्मा में देव और दैत्य दोनों पक्षों का निवास है। दोनों ही मनुष्य को अपनी-अपनी और खींचते रहते हैं। वह जिसे प्रिय समझता है, उसी की गोद में जा बैठता है। इस तरह वह अपने भविष्य को बुरा या भला स्वयं ही बनाता है। आधे मन से एक का, आधे मन से दूसरे का समर्थन करने से अन्तर्द्वन्द्व खड़ा होता है। फलतः शारीरिक और मानसिक स्वस्थता गड़बड़ाती है। दैत्य नरक में घसीट ले जाता है और देव उसे स्वर्ग गमन में सहायता करता है।
समाज शास्त्रियों का मत है कि मनुष्य में ही तीन वर्ग के लोग हैं। देव, पशु और पिशाच तीनों की आकृति तो एक जैसी होती है पर प्रकृति में अन्तर रहता है। देव सत्प्रयोजनों में निरत रहते हैं। पशुओं को स्वार्थ साधने में ही रस आता है और पिशाच ध्वंस करते एवं त्रास देते रहते हैं।
पुराणों की कथाओं के अनुसार देवता और मनुष्य इसी लोक में घुल मिलकर रहते थे, एक दूसरे का सहयोग भी करते थे और विग्रह भी खड़े करते थे। अर्जुन एवं दशरथ देवताओं के पक्ष में लड़ने के लिए गये थे और रावण, मेघनाद ने कुबेर का वैभव छीन लिया था काल को खाट की पाटी से बाँध लिया था। नारद जब चाहते थे तब विष्णु जी से वार्ता समाधान करने के लिए देव लोक जा पहुँचते थे।
एक प्रकरण ऐसा भी आता है कि गुरु बृहस्पति ने देवताओं की विलास प्रियता से रुष्ट होकर उन्हें शाप दिया था कि तुम लोक अमर तो रहोगे, पर देवलोक में संतानोत्पादन न कर सकोगे। फलतः किसी देवता की उसके बाद कोई संतान नहीं हुई। मेनका को विश्वमित्र से संपर्क सधने आना पड़ता और उनसे उसे शकुन्तला पुत्री प्राप्त हुई जो कण्व ऋषि के आश्रम में पली। उर्वशी अर्जुन से विवाह करना चाहती थी, पर अर्जुन की संयमशीलता के कारण बात बनी नहीं।
कुन्ती को इस विषय में सफलता मिल गई। उसने पाँचों पाँडव देवाराधन के आधार पर तीन अपने और दो माद्री के गर्भ से प्राप्त किये। वे देवताओं की संतान माने गये हैं। उपाख्यान ऐसा भी आता है कि दिति और अदिति नामक महिलाओं से देव और दैत्य उत्पन्न हुए। ईसा का जन्म तो कुमारी मरियम के पेट से हुआ था, पर उनके पिता स्वर्गस्थ परमात्मा थे।
देवताओं को जब सन्तानोत्पादन की आवश्यकता हुई तब उन्हें मनुष्य लोकवासियों के साथ ही संपर्क साधना पड़ा है। शिवाजी पृथ्वी पर आये, कैलाश पर्वत पर रहे। राजा हिमांचल की कन्या पर्वती के साथ उनका विवाह हुआ और उन्हीं से दो पुत्र प्राप्त हुए।
अवतारों को जन्म धारण करने के लिए पृथ्वी पर ही आना पड़ा है। उनमें से अधिकाँश मनुष्य माता पिता के संयोग से ही जन्मे हैं। राम के अनन्य सहायक हनुमान को पवन पुत्र माना जाता है।
डार्विन ने मनुष्य के विकासवाद की कड़ी मनुष्य के पूर्वज बन्दर के साथ जोड़ी है। पर वे भी यहाँ मौन है कि इतना अद्भुत मस्तिष्क उसे किस परम्परा के आधार पर मिला। मानवी मस्तिष्क उसे किस परम्परा के आधार पर मिला। मानवी मस्तिष्क गुह्य विधाओं का भण्डार है। उसमें जीवन निर्वाह की कल्पना और चतुरता का विकास भौतिक अनुभवों से उपलब्ध हुआ है, पर आदर्शों के प्रति त्याग-बलिदान करने की प्रवृत्ति प्राणि परम्परा में नहीं आती। वह दैवी विभूति है इसी प्रकार अतीन्द्रिय क्षमताओं के संबंध में अभी जितनी जानकारी प्राप्त हो सकी है, वह भी कम चमत्कारी नहीं है फिर भविष्य में जिन विशेषताओं के हस्तगत होने की आशा की जाती है, वे उसी स्तर की हैं जैसी कि ऋषियों को देवताओं के अनुग्रह से उपलब्ध होती थीं। मानवी मस्तिष्क ने संसार में हलचल मचा दी है। ज्ञान और विज्ञान के अनेकानेक प्रसंगों में चमत्कार उपलब्ध किये हैं पर विशेषज्ञों के अनुसार यह सब मस्तिष्क के साथ प्रतिशत भाग का चमत्कार है। 93 प्रतिशत तो गुह्य भाग ऐसा है जिसे जगा लिए जाने पर मनुष्य देवताओं के समतुल्य इसी शरीर में रहते हुए बन सकता है।
लुप्त प्रायः संस्कृतियों के ध्वंसावशेष ऐसे मिले हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि मनुष्य अब की अपेक्षा भूतकाल में कहीं अधिक सुविकसित और सुसंस्कृत रहा है। दक्षिण अमेरिका में ऐसी अनेक अंतर्ग्रही वेधशालाएँ पाई गई हैं जो उच्च लोकों के साथ धरती के संबंध जुड़े रहने की बात को भी पुष्टि करती हैं। ईस्टर द्वीप की विशालकाय प्रतिमाओं के संबंध में भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे मनुष्य के साधनों से कब किस प्रकार बन सकी होंगी? बात तो पिरामिडों तक के संबंध में ऐसी ही कही जाती है।
जर्मनी के वैज्ञानिक “ऐरिकवान डैनिकेन” ने अपनी शोध पुस्तकों में विश्व भ्रमण के वर्णनों और देवताओं के बीच 11 अगस्त 134 ईसा से पूर्व तक घनिष्ठ संबंध रहे हैं और वे इस धरती सुसम्पन्न बनाने के लिए ऐसे काम करते रहे हैं, जो केवल मनुष्यों के तत्कालीन ज्ञान और साधनों के अनुसार किसी प्रकार संभव नहीं थे। इस बात को अब प्रायः 5000 वर्ष होने को आये हैं जिसमें देवता और मनुष्यों के संबंध शिथिल हो गये। इसका कारण धरती निवासी मनुष्यों के आचार, व्यवहार एवं विश्वास में निकृष्टता की मात्रा बढ़ जाना हैं।
पृथ्वी पर जिस प्रकार अंतर्ग्रही शक्तियाँ उत्तरी ध्रुव पर उतरती हैं, उसी प्रकार मानवी मस्तिष्क के ब्रह्मरंध्र केन्द्र की संरचना है। उसमें ब्रह्माण्डीय चेतना के अभीष्ट अंशों को आकर्षित और प्रतिष्ठित किया जा सकता है। उसी भाव को सक्षम बनाने के लिए ध्यानयोग की साधना की जाती है।
श्री कृष्ण ने अपनी ही आकृति प्रकृति का पुत्र प्रद्युम्न पैदा किया था। अर्जुन ने महापराक्रमी अभिमन्यु को जन्म दिया था। अनेक ऋषियों ने भी अपने ही योग्यता के समतुल्य बालक जने थे, इसमें मात्र मानवी रज-वीर्य ही नहीं वरन् आह्वान किया हुआ दैवी अंश भी सम्मिलित था। अब लोग कामुकता प्रधान हो गये हैं और उच्चस्तरीय दैवी विशेषताओं वाली नई पीढ़ी विनिर्मित करने का विशेष प्रयास नहीं करते। अन्यथा इस भारत भूमि पर जन्मे 33 कोटि देवताओं जैसी हर नई पीढ़ी का निर्माण हो सकता है। इसके लिए आवश्यक यह है कि मानवी काय कलेवर में देवत्व की मात्रा का निरन्तर अभिवर्धन किया जाय।
एक दुरात्मा था। नित्य महात्मा के पास जाता और पूछता-दुष्टता का स्वभाव कैसे छूटे?
महात्मा टालते रहे। एक दिन उनने उसकी हस्त रेखा देखी और विश्वास दिलाया, अब तुम्हारा अन्त आ गया। एक महीने से अधिक जीना न हो सकेगा। दुरात्मा चिन्ता में डूब गया। एक महीना दुःख, भय, पश्चाताप और भजन में लगा रहा। भविष्य में होने वाली दुर्गति ही मस्तिष्क पर छाई रही।
एक महीने में एक दिन शेष रहा तो महात्मा ने उसे फिर बुलाया और पूछा - इस महीने कितनी बार दुष्टता हुई? कितने पाप बने? उत्तर मिला- एक बार भी नहीं - एक भी नहीं। चित्त पर तो हर समय मृत्यु भय ही छाया रहा।
पाप की इच्छा ही कैसे उठती? महात्मा हँस पड़े। पाप से बचने का एक ही उपाय है कि हर घड़ी मृत्यु को याद रखो और वह करने की सोचो जिससे भविष्य उज्ज्वल बने। मृत्यु के टल जाने का अभयदान पाकर दुरात्मा चला गया और मृत्यु का स्मरण प्रगाढ़ होते ही महात्मा बन गया।
यज्ञ के लिए संस्कृत साहित्य म कृतु, मख, अग्निहोत्र और कितने ही नाम प्रयुक्त हुए हैं; पर यहाँ सर्वसाधारण को इतना ही जानना पर्याप्त हैं कि आत्म कल्याण के लिए आत्मोत्कर्ष के लिए यज्ञ शब्द का उपयोग होता है और शारीरिक - मानसिक चिकित्सा, पर्जन्य वर्षा एवं पर्यावरण परिशोधन, वनस्पति संवर्धन एवं अन्यान्य प्राणियों के कल्याणार्थ जो विद्या प्रयुक्त होती है, उसे अग्निहोत्र कहते हैं।
संक्षेप में इस बात को यों भी समझा जा सकता है कि भौतिक प्रयोजनों के लिए जिस प्रक्रिया को काम में लाया जाता है, उसे अग्निहोत्र कहते हैं और आत्म परिशोधन के लिए प्रयुक्त होने वाला भाव पक्ष “यज्ञ” कहलाता है।
यज्ञ के अंतर्गत यज्ञ तो आता है; पर ‘यज्ञ’ अग्निहोत्र तक सीमित नहीं है। गीता में इस संदर्भ में विस्तृत विवेचना की गई हैं और उसे परमार्थ भावनाओं के साथ जोड़ा गया है। आप्टे की ‘संस्कृत टू इंग्लिश डिक्शनरी में यज्ञ “टू सैक्रीफाइस”, बलिदान, त्याग के अर्थ में परिभाषित किया गया है। इसे व्यक्तित्व - निर्माण के अर्थ में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। उत्कृष्ट भावनाओं के लिए भी। नेत्रदान यज्ञ, भूदान यज्ञ, ज्ञानदान यज्ञ आदि शब्दों में इस शब्द को परमार्थ प्रयोजनों के लिए ही प्रयुक्त किया गया है, जिसका लक्ष्य लोक सेवा के माध्यम से आत्म - कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करना भी समझा जा सकता है।
यज्ञ संस्कृत की ‘यज’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है संगतिकरण, पवित्रता और दान। अर्थ का और भी अधिक स्पष्टीकरण करने की लिए उन्हें उपासना, साधना और आराधना भी कह सकते है। उपासना ही संगतिकरण है। संगतिकरण का एक अर्थ है संघबद्धता। एक है निकटतम बैठना। पूजा का अर्थ है- अपने आप को भीतर और बाहर से पवित्र करना। यही साधना का प्रयोजन है। दान और आराधना एक ही बात है। संकटग्रस्तों की सहायता एवं सत्प्रयोजनों में सहयोग दान है। ऐसे तो दान के नाम पर वंश और वेश की आड़ में कितने ही लोग ठगते खते रहते हैं और संकट ग्रस्त न होते हुए भी ऐसी मुद्रा बना लेते हैं जिससे गहराई में न जाने वालों को बहानेबाजी और वास्तविकता का अन्तर ही प्रतीत नहीं होता। इसलिए दान के नाम पर अपव्यय ही चलता रहता है, साथ ही निठल्लों को छद्म बनाने का अवसर मिलता है। दान में गिरों को उठाने और उबारने की भावना है।
पूजा-पवित्रता का अर्थ सामान्य जीवन में शिष्टाचार और कर्तव्य धर्म का पालन है। अपने भीतर पवित्रता, प्रखरता उत्पन्न करने के प्रयासों को ही साधना या संयम कहा गया है। इसमें अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को ऊँचा उभारना पड़ता है। इसी प्रक्रिया को आत्मनिरीक्षण, आत्मशोधन, आत्म निर्माण एवं आत्म-विकास के रूप में पूरा करना पड़ता है। अपनी अनगढ़ता को साध लेना ही साधना है। यही आत्मा और परमात्मा की पूजा तथा अभ्यर्थना है।
संगतिकरण में ईश्वर की संगति करनी पड़ती है। उसके निकट बैठना पड़ता है। उसके जैसा बनना पड़ता है। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ना पड़ता है। नाले का नदी के साथ और ईंधन का आग के साथ जैसा मिलन होता है और दोनों एक रूप बन जाते हैं, उसी स्थिति को अन्तराल में पैदा करना पड़ता है। चंदन के समीप उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी सुगंधित हो जाते है। स्वाति की बूँद पड़ने से सीप में मोती बन जाता है। उसी प्रकार परमात्मा के अनुरूप आत्मा के बनाना पड़ता है। यह समर्पण भाव है। इसी को ‘स्वर्ग’ या ‘मुक्ति’ कहते है। उपासना का संगतिकरण का यही उद्देश्य हैं।
अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं को ईश्वर के अनुरूप बना लेना ही बलिदान है, जैसे कि पत्नी अपनी इच्छाओं को पति के लिए समर्पित कर देती हैं। ऐसे व्यक्ति को समाज के लिए अपने आप को उत्सर्ग करना होता हैं। विराट ब्रह्म विशाल विश्व को ही कहते हैं। उसी के निमित्त स्वार्थ को परमार्थ में परिणत करना होता है। सर्वव्यापी, समदर्शी न्यायकारी भगवान को प्रसन्न करने के लिए यह आत्मा समर्पण बलिदान ही करना पड़ता है। अपनी क्षुद्र कामनाओं को पूरा करने के लिए ईश्वर को बाधित करने का प्रयत्न करना तो एक प्रकार की धृष्टता ही है।
यज्ञ कृत्य में भी यही करना पड़ता है। इसमें वास्तविक सुगंधित गुणकारी वस्तुओं को अग्नि में होम कर उन्हें सूक्ष्म बनाया जाता है और उन्हें वायुभूत बनाकर समस्त संसार के उपयोग हेतु वितरण कर दिया जाता है। सूर्यार्घ्य दान की छोटी प्रक्रिया के पीछे भी यही भाव है। अपने लोटे का जल अर्थात् जीवन में भरा हुआ सत् द्रव्य सूर्य भगवान के निमित्त अर्पित करते हैं और कामना करते हैं कि इस जल को वाष्प बनाकर वे संसार में शीतलता बढ़ाने के लिए वितरित कर दें। अग्निहोत्र और सूर्यार्घ्य दान का तत्वज्ञान एक ही हैं।
इन सब का तात्पर्य जीवन को यज्ञमय बनाना है, अपने को पवित्र करना और समूचे वातावरण को पवित्र बनाना यज्ञीय कर्मकाण्ड का सारभूत तत्व ज्ञान है। यह प्रक्रिया अपनाने पर व्यक्ति और समाज को सुखी समुन्नत बनाने का अवसर मिलता है।
इसलिए भारतीय देवसंस्कृति में यज्ञ को सर्वोपरि महत्व दिया गया है और ज्वलन्त अग्नि के रूप में भगवान की प्रतिमा को मान्यता दी गई है।
ऋग्वेद प्रथम वेद है। उसका प्रथम मंत्र “अग्नि मीड़े पुरोहित यज्ञस्य देव ऋत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्” है। इस मंत्र में अग्नि को पुरोहित कहा गया है और साथ ही यह भी कहा गया है कि वह यजन करने वाले को देवोपम बना देता है सद्गुणों के रत्न भण्डार से परिपूर्ण कर देता है।
पुरोहित का अर्थ उपदेश देना है और यजमान का कर्त्तव्य उन्हें श्रद्धापूर्वक अंतरंग में अवधारण करना। यों पुरोहित व्यक्ति भी होते हैं, पर उनमें दोष दुर्गुण होने की आशंका सदा बनी रहती है। इसलिए दिव्य तत्व अग्नि को ही पुरोहित कहा गया है। वह वाणी से तो उपदेश नहीं देता; किन्तु अपनी क्रिया पद्धति का अनुकरण करने की प्रेरणा देता है। उन्हें कार्यान्वित करने पर ही गुरु का उद्देश्य और शिष्य का कर्त्तव्य पूरा होता है। यज्ञाग्नि जो उपदेश देती है। उन्हें सूत्र रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है।
(1) अग्नि जब तक जलती हैं, तब तक वह गरम और प्रकाशवान रहती हैं। हमें भी आजीवन गरम अर्थात् क्रियाशील रहना चाहिए और प्रकाश वितरित करने में ज्ञान चेतना को व्यापक बनाने में प्रयत्नशील रहना चाहिए। ऐसे कृत्य करना चाहिए जिनका अनुगमन करने वाले भी प्रकाशपूर्ण जीवन जी सकें और क्रियाशीलता को गतिवान बनाये रह सकें।
(2) अग्नि का दूसरा गुण है कि उसका सिर सदा ऊँचा रहता है। कितना ही दबाव पड़ने पर भी वह सिर नीचा नहीं होने देता। अपना मस्तक-चिन्तन भी सदा ऊँचा रहे परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी निकृष्ट चिन्तन न करें। अनीति के सामने सिर न झुकायें। न्याय के समर्थन में तन कर खड़े रहें, उत्कृष्ट रहें और उसी रीति-नीति को अपनाने की जनसाधारण को प्रेरणा दें।
(3) अग्नि में जो भी वस्तु डाली जाती है, वह अशुद्ध होते हुए भी उसी के समतुल्य बन जाती है। लकड़ी धातु या गंदगी तक अग्नि के सान्निध्य में पहुँचे, तो वह उसी के समतुल्य बन कर रहती है। अपने संपर्क में भले ही खोटे लोग आयें; पर वे शुद्ध होकर जायँ। विरानों को अपना बनाने की कला हमें आनी चाहिए। दूसरों के दुर्गुण ग्रहण न करें। शिवजी के गले में सर्प पड़े रहते हैं; पर वे उनके विषैले प्रभाव को ग्रहण नहीं करते, उल्टे शिव सान्निध्य में रहने के कारण विषधर होने पर भी वे देवता बन जाते हैं। नागपंचमी पर नाग देवता की पूजा होती है। इस प्रकार शिव हमारी रीति-नीति भी विरानों को अपनाने आत्मसात् कर लेने की होनी चाहिए।
(4) अग्नि में जो भी डाला जाय, उन सब को वह अपने लिए बचा कर नहीं रखती, दूसरों के निमित्त ही खर्च कर देती है। संग्रह की उसकी वृत्ति होती ही नहीं। हमें भी अपने दिव्य पुरोहित का अनुकरण करना चाहिए। कृपण एवम् संग्रही नहीं बनना चाहिए। क्षमताओं एवं साधनों को गतिशील रखना चाहिए।
(5) अग्नि का अन्त भस्म रूप में होता है। हममें से प्रत्येक को यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे अस्तित्व का अन्त भी दो मुट्ठी भस्म के रूप में ही होने वाली है। इसलिए न तो अहंकार करें, न विग्रह उत्पन्न करें, न पाप कमाएँ। मृत्यु को सदा ध्यान में रखें। अपने अस्तित्व का अन्त स्मरण रखें और ऐसे काम करें जिसके लिए पीछे पश्चाताप न करना पड़े।
यह पाँच शिक्षाएँ पाँच रत्नों से भी बढ़कर हैं। रत्न तो पत्थर के होते हैं और उनके चोरी जाने, गुम होने का भी डर रहता है। पर यह पाँच गुण ऐसे हैं जो अपनाने वाले ऋत्विज् को देवोपम बना देते हैं साथ ही सद्गुणों के साथ जुड़ी रहने वाली प्रशंसा तथा सहयोग भावना को संजोते हुए निहाल भी कर देते हैं।
निराकार भगवान की साकार प्रतिमा यज्ञ को इसलिए माना गया है, कि अन्य देवताओं की तरह उसके पीछे कोई ऐसा इतिहास नहीं है। जिसमें गुणों के साथ एक दोष भी सम्मिलित है। अन्य देवताओं के सम्बन्ध में उनकी कथा गाथाएँ ऐसी हैं, जिनमें यह असमंजस उत्पन्न होता है कि उन्हें उपास्य माना जाता है तो सहज ही गुणों के साथ उनके दुर्गुण भी मान्यताओं में प्रवेश करें। यह संकट अग्नि पूजा में यज्ञ में नहीं हैं।
यज्ञाग्नि के संबंध में देव मान्यता स्थापित करनी पड़ती है। उसे ईश्वर का मूर्तिमान स्वरूप मानना पड़ता है। कहा भी है-
यज्ञों वै विष्णुः - (शतपथ) पुरुषों वै यज्ञः - (शतपथ) प्रजापतिर्वै यज्ञः - (तैत्तरीय) यज्ञः एवं सविता - (गोपाथ) इन्द्रो वै यज्ञः - (मै. शा.) प्रथमो हि यज्ञाः - (कपि. शा.)
यज्ञ को श्रुतियों में “श्रेष्ठतम कर्म” भी कहा जाता है। उसे अनर्थों के लिए परशु के समान छेदनकर्ता भी कहा जा गया है। साथ ही उसे सब प्रकार के कल्याणों का उत्पादन कर्ता भी कहा गया है।
यज्ञः कल्याण हेतवः (विष्णु पुराण)
यज्ञ का माहात्म्य वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने और भी बहुत कुछ कहा है :-
यज्ञेन देवा विमला विभान्ति। यज्ञेन देवा अमृत्त्वमाप्नुयः॥ यज्ञेन पापैर्वहुभिर्विमुक्तः।
प्राप्नोति लोकान परमस्य विष्णो। “हारीत संहिता॥ “अर्थात् - यज्ञ में से ही देवगण पवित्र होते हैं। यज्ञ से ही वे अमृतत्व प्राप्त करते हैं। यज्ञ से पापों से छुटकारा मिलता है। यज्ञ से परमात्मा का दिव्य लोक मिलता है।
यजुः 2।23 में कहा गया है कि “भला कौन सुख चाहने वाला यज्ञ को छोड़ता है”? जो उसे छोड़ता है उसे परमात्मा भी छोड़ देते हैं।
यज्ञ की व्याख्या करते हुए शास्त्रकारों ने कहा है-
“येन सद्नुष्ठानेन सम्पूर्ण विश्व कल्याण भजेत् तत् पदाभिधेयम्।”
अर्थात् - जिस कृत्य को करने से सम्पूर्ण विश्व का कल्याण होता है - वह यज्ञ है।
उपरोक्त प्रतिपादनों से यज्ञ की गरिमा और व्यापकता समझी जानी चाहिए। उसे सांप्रदायिक क्रिया भर नहीं मान लेना चाहिए।
ऋग्वेद में भगवान ने सच ही कहा है कि यज्ञाग्नि ही मनुष्य का पुरोहित - सद्गुरु और सच्चा मार्ग दर्शक है। यजन करने वाला द्विज देवता बन जाता है और हवन कर्ता उसे रत्न भण्डार के रूप में पाता है। यह दैवी सम्पदा के दिव्य रत्न हैं, जो जन्म जन्मान्तरों तक साथ बने रहते कुबेर से भी बढ़कर अपने को सुसम्पन्न अनुभव करने लगता है।
वस्तुतः साँसारिक वैभव भी सद्गुणी के साथ रहते और उसे सुखी बनने और सुखी बनाने का अवसर प्रदान करते हैं। आध्यात्मिक विभूतियाँ भी उन्हीं को हस्तगत होती हैं जो सद्गुणी हैं। धूर्तता से उपार्जित धन न तो चिरस्थाई होता है और न उसे पाकर कोई फूलता-फलता है। यही बात सिद्धियों, विभूतियों के सम्बन्ध में हैं वाममार्गी चमत्कार दिखा भी सके तो कर्त्ता और उपभोक्ता दोनों ही उससे हानि उठाते हैं।
यज्ञीय जीवन अपनाने की प्रक्रिया ही ऐसी है कि उसके साथ भौतिक सम्पदाएँ एवम् आत्मिक विभूतियों का सुयोग सहज ही जुड़ा हुआ है।
मानव शरीर की आधारभूत इकाई है जीवकोष (बायोलॉजिकल सेल)। शरीर में प्रायः साठ अरब के लगभग कोशिकाएँ हैं। प्रत्येक कोश हजारों पॉवर स्टेशन, परिवहन संस्थान एवं संचार संस्थान की मिली-जुली व्यवस्था के रूप में एक - सुसंचालित बड़ा शहर हैं। यहाँ कच्चा माल आयातित होता है, नया माल तैयार किया जाता है। तथा अवशिष्ट मल पदार्थों को निकाल फेंकने की गतिविधियाँ भी सम्पादित होती हैं। एक समर्थ अनुशासन पूर्ण प्रशासन की झाँकी इस इकाई के प्रतिपल के जीवन व्यापार में देखने को मिलती हैं।
जीव कोश इतने सूक्ष्म होते हैं कि एक करोड़ सेल्स आसानी से पिन के सिरे पर बैठ सकते हैं। य सूक्ष्म दर्शक यंत्र की सहायता से ही देखे जा सकते हैं। विस्तार से देखना हो तो इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप का आश्रय लेना होगा। कोश (सेल) की तुलना में सारे शरीर पर दृष्टिपात करें तो वह किसी सौर मण्डल या ब्रह्माण्ड से कम विलक्षण और विराट् नहीं लगेगा। इस तरह पिण्ड व ब्रह्माण्ड की एकात्मता की बात प्रमाणित होती है।
हर जीव कोश में साइटोप्लाज्म जैसी एक बड़ी झील होती है। जिसमें विभिन्न शक्ति केन्द्र तैरते रहते हैं। सतत् इसमें हलचल होती रहती है। माइट्रोकांड्रिया, वैक्योल्स, एण्डोप्लाज्मिक, रेटीकूलम, गाँल्गी बाँडीज जैसी महाशक्तियाँ इस झील में ही अवस्थित होती है। नाभिक (न्यूक्लियस) एवं उसके अन्दर की दुनिया अपने आप एक पूरी सृष्टि है। माता पिता से बच्चों में स्थानान्तरित गुणों की शक्ति को डिऑक्सी, टाइबो न्यूकलिक एसिड (डी.एन.ए.) कहते हैं जो नाभिक में पाए जाने वाले गुण सूत्रों के घटक हैं। इसे वास्तु - शिल्पज्ञ डिजाइनर या अर्टिटेक्ट कह सकते हैं, जो कोशीय अवयवों को यह बताता है कि कैसा व्यवहार करना, क्या बनना, क्या स्वीकार करना व किसे नकार देना। पर बिल्डिंग कांट्रेक्टर की भूमिका आर.एन.ए निभाता है। सैकड़ों विभिन्न प्रकार के प्रोटीन घटकों के निर्माण का डिजाइन डी.एन.ए. की केंचुली में छिपा होता है।
जीवकोषों का पाव स्टेशन है- माइट्रोकांड्रिया। अति सूक्ष्म आकार की ये इकाइयां ईंधन (शक्कर) को जलाकर ऊर्जा उत्पन्न करती हैं। एवं अवशिष्ट (राख) को छोड़ देती हैं जो कार्बनडाइ आक्साइड एवं पानी के रूप में होता है। इस जटिल रासायनिक प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप एडिनोसिन ट्राइ फास्फेट (ए.टी.पी.) उत्पन्न होता है, जो कि सर्वभौम ऊर्जा श्रोत है। हर गतिविधि चाहे पलक झपकाने-छाती फूलने, हृदय धड़कने की हो, ऊर्जा की माँग करती है। निद्रा के लिए मस्तिष्क को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। स्वप्न बिना ए.टी.पी. के सम्भव नहीं हैं। शरीर में सतत् घुमंतू 5 लाख सेल (रक्त कण) परिव्राजक धर्म की जिम्मेदारी निभाते हैं। सम्भवतः इसी कारण प्रकृति ने स्वयं के उत्पादन के झंझटों से इन्हें मुक्त कर दिया है। ये अपना काम कर बंधन्मुक्त होते चले जाते हैं, नये बनते चले जाते हैं।
हृदय एक शक्तिशाली पम्प के रूप में अविरल गति से रक्त को प्रवाहित किये रहता है। शरीर का यह शक्ति स्रोत आजीवन एक पल को विश्राम किये बिना काम करता रहता है। आराम इसके लिए मौत है। 24 घन्टे कार्य रत बना रहने पर न गरम होता है, न घिसावट आती है, न कल पुर्जे बदलने की आवश्यकता अनुभव होती है। यदि इसी प्रकार का धातु का कोई पम्प लगा दिया जाता तो कितनी बार उसके कल पुर्जे बदलने पड़ जाते और कार्य में गतिरोध होता। किन्तु 250 ग्राम वजन का माँस पिण्ड प्रतिदिन छियानवे हजार किलोमीटर लम्बी रक्तवाहनियों में रक्त संचार बनाये रखता हैं।
कितना विचित्र, विलक्षण है यह मानवी काया का तंत्र? यदि तनिक भी हमने इस जटिलता व इसे बनाने वाले कार्य-कौशल सम्पन्न सृष्टा की सामर्थ्य का अनुमान लगाया होता तो कभी उसकी सत्ता को न नकारा होता। आस्तिकता का प्रथम पाठ यहीं से आरम्भ होता है।
मनुष्य के अन्दर शैतान का निवास भी है और भगवान का भी। दोनों में से जिसे परिपोषित किया जाता है, वही प्रबल हो जाता है। आत्म-सुधार, परिष्कार करते-करते उसे “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सिद्धि हो जाती है और किसी को दुःख पहुँचाना तो दूर उलटे सेवा सहायता करने और पुण्य - परमार्थ संचित करने की ही इच्छा बनी रहती है। उसी प्रकार की उदात्त क्रियायें भी उससे बन पड़ती हैं
किन्तु जो अपने शैतान पक्ष को जगाते हैं। वैसे ही चिन्तन, अभ्यास को ढालते हैं। उन्हें दुष्ट दुरात्मा बनने में भी देर नहीं लगती है। दूसरों को कष्ट-पीड़ित देखकर उन्हें मजा आता है और तड़पते हुओं का हृदय विदारक दृश्य उन्हें अपने मनोरंजन या पुरुषार्थ का कारण प्रतीत होता है। कसाइयों की प्रकृति उसी ढाँचे में ढल जाती है। आत्मा के मर जाने से वे ऐसे कृत्य निरन्तर करते रहते हैं। दया, धर्म की अन्तःप्रेरणा उनके मन में जगती ही नहीं। डाकू, हत्यारे, अपहरण कर्त्ता, बलात्कारी, विश्वासघाती भी प्रायः ऐसी ही प्रकृति में ढल जाते हैं।
संसार विचित्र है। इसमें जहाँ भागवत-परायणों की कमी नहीं वहाँ शैतान के पक्षधर भी अनेकों हैं। भारत पर चंगेजखाँ, नादिरशाह आदि ऐसे कितने ही नृशंस आक्रमणकारी आते रहे हैं, जिनने धन-लूटने और निर्दोष मनुष्यों की हत्या करने के कीर्तिमान स्थापित किए। पिरामिड बनाने और चीन की दीवार खड़ी करने में कितने ही पकड़े हुए गुलामों को अपने प्राण झोंकने पड़े हैं।
पिछली शताब्दियों में ऐसे ही क्रूरकर्माओं के अनेक उदाहरण सामने हैं।
बगदाद को शासक वलबिर-बिल्लाह को उसके विरोधियों ने अन्धा करके जेल में डाल दिया। जब मर्तजी गद्दी पर बैठी तो उसे जेल से तो रिहा कर दिया, पर गुजारे को कोई इन्तजाम न किया। इस पर एक दिन का बादशाह सड़क पर भीख माँगकर पेट पालने के लिए गुजारा करता रहा। जिन्दगी के अंतिम 16 वर्ष उसने इसी प्रकार गुजारे।
सन् 1466 में क्रिसमस के दिन विलियम प्रथम का राज्याभिषेक हुआ। पादरी ने प्रवक्ता से कहा “पूछो कि सभी उपस्थित जनो ने राजा का आधिपत्य स्वीकार कर लिया है न”? प्रवक्ता ठीक से मतलब नहीं समझ सका और उसने सारे शहर में आग लगा देने और कत्लेआम मचा देने की आज्ञा दे दी। अगणित निर्दोषी नर-नारी मारे गये और अग्नि काण्ड में अपार-संपदा की हानि हुई। वेस्ट मिस्टर एबी का एक बड़ा भाग बर्बाद हो गया।
पौस्थुमस ने अपने साथ डाकुओं का गिरोह इकट्ठा किया और वह उनका नेता बनकर लूट-पाट कराता रहा। उसने अपने को राम का शासक भी घोषित कर दिया। जब साथियों ने एक धनी कस्बे को लूटने की इजाजत चाही तो उसने इन्कार कर दिया। इस पर साथियों ने उसी का कत्ल कर दिया और मनमानी करते रहे। अंततः जनता ने उनका भी कत्ल कर दिया।
मोरक्को का सुलतान मुले इस्माइल जब सिंहासनारूढ़ हुआ तो उसने हर बार एक सईस का कत्ल किया। निजी नौकरों में से उसने 10 हजार को बिना कसूर मार डाला था। वह कहता था जो हाथों मरेगा वह सम्मानित होगा।
मिस्र पर ईसा से 246 वर्ष पूर्व टोलेमी नामक राजा राज्य करता था। उसने अपने भाईयों को सबसे अधिक प्यार करने वाला कहकर प्रख्यात कराया जबकि वस्तुतः राज में बाधक समझकर उसने सभी भाई मरवा डाले थे।
इसी प्रकार उस देश पर राज्य करने वाले किंग चतुर्थ ने अपने बाप को मार कर गद्दी हथियायी थी और “बाप का सच्चा सेवक” के रूप में अपने को प्रख्यात कराया था।
बिदिन के शासक हाफिजअली को जिस पर भी अपना विरोधी होने का शक होता उसी को बिना कुछ पूछताछ किये, मरवा देता था। इस प्रकार उसने अपने शासनकाल के 20 वर्षों में 7 हजार व्यक्तियों का कत्ल कराया था।
चीन में क्रान्तिकारियों को 1947 से 1965 के बीच 2 करोड़ 63 लाख नागरिकों को मृत्यु दण्ड मिला। इस संदर्भ में जो अनुमान छपा है, उसके अनुसार इस प्रकार मरे व्यक्ति 6 करोड़ 37 लाख थे। रूस में भी ऐसा ही अभियान छिड़ा था जिसमें 1 करोड़ के करीब को शुद्धिकरण के नाम पर मौत के घाट उतारा गया। नाजी जर्मनी में हिटलर ने अपने ही 9 लाख देशवासियों की हत्या की थी। अन्यान्य देश के लोगों के मरने वालों की तो गिनती ही नहीं है। कोटुला टैक्सास की जान हर्ष एक निर्दय शिकारी थी। उसने खाने के लिए नहीं, मरने वालों की तो गिनती ही नहीं है। कोटुला टैक्सास की जान हर्श एक निर्दय शिकारी थी। उसने खाने के लिए नहीं, मरने ले की तड़पन देखने के लिए 25000 कुत्ते 25000 छोटी बिल्लियाँ 11,000 भेड़ियों और 2000 सियारों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया।
पोलैंड का राजकुमार फर्डिनेन्ड निरीह पशुओं की हत्या के लिए ही जंगलों में घूमा करता था। उसने 2 लाख 76 हजार वन्य पशु पक्षी मौत के घाट उतारे थे। इसी की हत्या प्रथम विश्व युद्ध का कारण बनी।
काहिरा में एक मस्जिद वास्तुकार यूसेफ से बनवाई गई। 25 वर्ष में जब बनकर तैयार हो गई तो शासक पासा ने कारीगर को अन्धा कर देने का हुक्म दिया। ताकि वह कोई ऐसी सुन्दर मस्जिद और नहीं न बना सके। यही बात ताजमहल के संबंध में भी कही जाती है।
रूस के कैथेडल नगर में दि टैरिवल ने अपनी विजय के उपलक्ष में एक गिरजा घर बनवाया। वह बहुत सुन्दर बन गया। शासक ने बनाने वाले मिस्त्री योस्तानिक के हाथ पैर कटा लिए, ताकि वह कोई दूसरा वैसा ही गिरजा न बना सके।
लूटपाट के लिए प्रतिष्ठा एवम् दर्प के लिए कितनी ही छोटी बड़ी लड़ाइयाँ पहले भी होती रहती थीं। पर पिछले द्वितीय महायुद्ध ने तो उसकी अति ही कर दी। कहते हैं पृथ्वी के इतिहास में जितने भी युद्ध हुए उनकी तुलना में यह अकेला द्वितीय महायुद्ध ही सब के योग से भी भारी पड़ा। इससे अपार जन-धन की हानि हुई।
द्वितीय विश्वयुद्ध में 1939 से 1945 तक यस के ढाई करोड़ सैनिक और 78 लाख सेनाधिकारी मारे गए। दोनों पक्षों के प्रायः 5 करोड़ 48 लाख व्यक्ति मारे गये।
युद्ध में पोलैंड सबसे अधिक घाटे में रहा, उसकी ढाई करोड़ आबादी में से प्रायः आधी आबादी बर्बाद हो गई। इस युद्ध में रूस के 25000 करोड़ रुबला, अमेरिका के 5100 करोड़ डॉलर और ब्रिटेन के 300 करोड़ पौण्ड खर्च हुए। अन्य देशों को जो हानि उठानी पड़ी, इसके अतिरिक्त है।
सन् 1982 में सरकारी रक्षा बजट 171023 करोड़ डॉलर का था। इन तीन वर्षों में यह प्रायः दून हो गया है। सबसे बड़ी सशस्त्र सेना चीन की है 48 लाख। रूस की सैनिक संख्या 37 लाख और अमेरिका की 29 लाख है।
इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति ने 7 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए सैनिक शिक्षा बाधित कर दी है। लाओस पर विभिन्न युद्धों में प्रायः 25 लाख टन के वजन के बम गत बीस वर्षों में गिराए गए हैं।
मनुष्य वस्तुतः पशु भी है, मानव भी एवम् देवता भी। जब तक अन्दर का दानव, पशुत्व मनुष्य से अलग नहीं होता, मनुष्य उससे अपना पल्ला नहीं छुड़ाता, वह नर चोले में दैत्य बना नृशंस क्रिया-कलापों में भावनाहीन बने रहकर संलग्न रहता है। यह मनुष्य की अस्मिता ही है जो उसे मानवोचित जीव जीने के लिए पशुत्व को छोड़कर देवत्व ग्रहण करने के लिए प्रेरित करती है। किसी शायर ने कहा है कि अन्दर की पशुता यदि न होती तो मानव वस्तुतः देवता होता। उन्हीं के शब्दों में “गर कुफ्र न होता तो मैं कहता कि तुम खुदा हो”। यह बात अक्षरशः सही है।
इतिहास साक्षी है कि क्रूर कर्मों के दुष्परिणाम कालान्तर में सभी को भुगतने पड़े हैं, पर आश्चर्य है कि इतने उदाहरणों के बावजूद मनुष्य की आंखें खुली नहीं है, और वह सर्वनाश प्रस्तुत करने वाले तृतीय महायुद्ध परमाणु - हथियारों से लड़ने की तैयारी कर रहा है, जबकि बड़े से बड़े उलझे हुए मामले ईमानदारी अपनाकर पंच फैसले से सुलझाए जा सकते हैं। आवश्यकता इसी की है कि मनुष्य अपनी गरिमा समझे और पशुत्व से मुक्ति पाए।
सूक्ष्मीकरण द्वारा सूत्र संचालक के लघु से विराट् में परिणत हुए रूप का दर्शन सभी परिजन अपने-अपने क्षेत्रों में, महायज्ञों के आयोजन में कर रहे हैं। “धियो योनः प्रचोदयात्” एवं “अग्नि नये सुपथा रायै” के गगन भेदी उद्घोष बताते हैं कि दुर्मतिजन्य विपन्नताएँ मिट कर रहेंगी एवं चारों ओर सत्प्रवृत्तियों का साम्राज्य छाकर रहेगा।
कटिहार (बिहार) में दो मील लम्बी भव्य जल कलश यात्रा की शुरुआत के साथ शुरू हुये 108 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ ने समूचे क्षेत्र को युग चेतना से अनुप्रमाणित कर दिया। जल कलश यात्रा के आकर्षण ने लोगों को मंत्र मुग्ध कर दिया।
राष्ट्रीय एकता सम्मेलन को लोक सभा सदस्य श्री तारिक अनवर ने संबोधित करते हुए कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजनों के माध्यम से ही जन-समुदाय को सही मार्ग पर ले जाया जा सकता है। इस सम्मेलन में सभी धर्म के अनुयायी सम्मिलित हुए।
पूर्णाहुति के अवसर पर लगभग 30 हजार लोगों ने राष्ट्रीय एकता की शपथ ली, व मिशन को अग्रगामी बनाने के लिए समयदान व अंशदान के संकल्प लिए।
सुल्तान पुर (उ. प्र.) “ गिरजा गिरे न मस्जिद टूटे” के उद्घोष के साथ सम्पन्न 208 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ ने सभी अनुयायियों को मानवता की रक्षा के लिए एक जुट होने के लिए संकल्पित किया।
खुर्शीद क्लब मैदान पर लगातार चार दिनों तक उमंग और उल्लास का अद्भुत दृश्य उपस्थित रहा। सर्वधर्म सम्मेलन में संत जगदीश सिंह ईसार अहमद तथा फादर अल्फ्रेड ने अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रज्ञा अभियान को दैवी अभियान बताया जिसने ध्वंस की वर्तमान परिस्थितियों से मानव जाति को बचाने के लिए विश्व व्यापी अभियान योजनाबद्ध रूप से चलाया है।
इन पुनीत आयोजन में जन सामान्य की तो भीड़ लगी ही रही साथ ही जिला न्यायालय डी.आर.सिंह तथा राजा साहब सिंगरामऊ कुँवर श्रीपाल सिंह जी ने भी यथा सम्भव अधिकाधिक समय तक उपस्थित रहकर जन समुदाय को इस पुनीत कार्य में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया।
समापन समारोह के अवसर पर अग्नि को साक्षी मानकर ईर्ष्या, द्वेष तथा भेदभाव जैसी मानवीय कमजोरियों को दूर रखने की सभी ने शपथ ली।
भोपाल (म.प्र.) प्रदेश की राजधानी का कार्यक्रम अपने गौरव के अनुरूप वृहद में सम्पन्न हुआ। इस आयोजन ने समूचे क्षेत्र में युग चेतना का संचार किया। इस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए समीपवर्ती उज्जैन इन्दौर, खण्डवा, विदिशा, रायसेन तथा सीहोर जिलों से हजारों की संख्या में कार्यकर्ता सम्मिलित हुए।
सम्मेलन का उद्घाटन स्वास्थ्य मंत्री सरदार तनवंत सिंह कीर ने किया। उद्घाटन के अवसर पर अन्य कोई साँसद व विधायक उपस्थित रहे। मंच के सामने लगे वैनर “गिरजा गिरे न मस्जिद टूटे, वह मन्दिर निर्माण करें” ने हर धर्म सम्प्रदाय के लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
पूर्णाहुति के अवसर पर रक्तदान व नेत्रदान का आयोजन भी किया गया, जिससे सैकड़ों लोगों ने उत्साहपूर्वक रक्तदान व नेत्रदान किया।
इस त्रिदिवसीय सम्मेलन में शिक्षा मंत्री, वित्तमंत्री, विधान सभा अध्यक्ष के अतिरिक्त स्वयं मुख्य मंत्री भी समय-समय पर उपस्थित रहे। सभी ने अपने उद्बोधन में राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए इस मिशन को मानवता की रक्षा करने वला एक सफल अभियान बताया।
महायज्ञ आरम्भ हो गया, आज नवल निर्माण का
जोधपुर (राज.) महावीर क्रीड़ा स्थल में सम्पन्न हुए विशाल 108 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ ने समूचे क्षेत्र को राष्ट्रीय एकता की भावना से आविर्भूत कर दिया।
राष्ट्रीय एकता सम्मेलन व सर्व धर्म प्रार्थना की अध्यक्षता पूर्व न्यायमूर्ति कान सिंह परिहार ने की। इसमें प्रो. जी. एस. ग्रोवर एवं शहर खनीब पेश इमाम मोहम्मद अय्यूब ने प्रज्ञा अभियान के कार्यक्रमों की सराहना करते हुए सभी धर्म के अनुयायियों को कंधे से कंधा मिलाकर इस पुनीत कार्यक्रम में सम्मिलित होने की प्रेरणा दी।
समारोह में पंचायत राज एवं काल राहत राज्यमंत्री दामोदर दास आचार्य एवं खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री श्री छोगाराम बाकोलिया ने विश्व शान्ति के लिए संलग्न इस अभियान के जन्मदाता पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के संदेश को फैलाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उपस्थित जन-समुदाय ने अग्नि की साक्षी में इस संकल्प को दोहराया।
गुरसराय (झाँसी म. प्र.) बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सम्पन्न यह आयोजन अपनी ऐतिहासिक दाप छोड़ गया। समीपवर्ती क्षेत्र के लगभग 200 कार्यकर्ता आयोजन की पूर्व व्यवस्था में संलग्न रहे। शोभायात्रा में ट्रैक्टरों, घोड़ों तथा कीर्तन मण्डलियों के साथ जन-समुदाय की अपार भीड़ साथ चलने देख दर्शक मंत्रमुग्ध रह गये।
आयोजन में राष्ट्रीय एकता सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए राज्य वित्त मंत्री श्री ओम् प्रकाश रिछारिया ने मिशन की भूरि- भूरि प्रशंसा की व शान्ति - कुँज दर्शन की भी इच्छा व्यक्त की।
आयोजन स्थल पर मेला जैसा दृश्य उपस्थित था। कार्यक्रम से प्रभावित होकर कार्यकर्ता पूर्णाहुति के अवसर पर अपने संपर्क क्षेत्र में नियमित संपर्क बनाने का संकल्प लेकर गए।
कुम्हरौआ, भिण्ड (म.प्र.) चौबीस कुण्डीय गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन श्रद्धापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस आयोजन में विभिन्न धर्मों के विद्वानों ने अपने-अपने विचार व्यक्त करते हुए अलगाववाद की भर्त्सना की साथ ही राष्ट्रीय एकता के लिए संलग्न इस अभियान में सहयोग करने का आह्वान किया।
समारोह में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्री वालेन्दु शुक्ल ने सच्चे धर्म की व्याख्या करते हुए विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय में संलग्न ब्रह्मवर्चस् का परिचय दिया।
पूर्णाहुति के अवसर पर हजारों नर-नारियों ने महायज्ञ की अग्नि की साक्षी में इस अभियान के कार्यक्रम की अभूतपूर्व सफलता में सभी को पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म उपस्थिति एवं विराट् रूप की अनुभूति हुई।
सारसा (गुजरात) प्रारम्भ से ही यहाँ के 208 कुण्डी महायज्ञ में जन सहयोग उमड़ पड़ा। युवा वर्ग ने यज्ञ क्षेत्र की सफाई कुण्ड निर्माण सज्जा आदि अधिकाँश कार्य उत्साहपूर्वक श्रमदान से पूरे किए। शोभा यात्रा आदि अधिकाँश कार्य उत्साहपूर्वक श्रमदान से पूरे किए। शोभा यात्रा में भारत के नक्शे तिरंगे झंडे सहित सभी धर्मों के प्रतिनिधि अपनी परम्परागत पोशाक में शामिल हुए। ग्रामीण क्षेत्र से 70-80 ट्रैक्टर कीर्तन मण्डलियाँ, विभिन्न धर्मों के सद्भाव परक चित्रों-झाँकियों से युक्त जुलूस यहाँ के इतिहास में अद्वितीय था।
राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री श्री योगेन्द्र मकवाना भी सम्मिलित हुए। युग निर्माण मिशन के क्रिया-कलापों पर उनके उद्गार जनता ने बहुत सराहे। पारसी धर्म के चीफ प्रीस्ट होमी अरदेसार जी गुजरात अकाली दल के प्रमुख श्री करतार सिंह, जमायते इस्लामी के प्रधान मौलाना नकवअली, फादर फ्राँसिस मेन्डोन्सा सभी ने इस धारा में अनेक उद्गार जोड़े। हजारों की संख्या में जनता प्रवचनों के श्रवण के लिए समय पर जुटती रही।
यज्ञ के लिए आम जनता उत्साह नियंत्रण के बाहर हो रहा था। पूरे दिन शाम 5 बजे तक यज्ञ चलता ही रहा। परिक्रमा लगाते रहे।
समापन समारोह में सहकारिता एवं आबकारी मंत्री श्री अमर सिंह बाघेला पधारे। यज्ञ देव दक्षिणा में नशा आदि दुर्व्यसन छोड़ने के संकल्पों की परम्परा को उन्होंने बहुत सूक्ष्मीकरण साधना का विराट् स्वरूप प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है।
कोटा (राज.) विज्ञान नगर स्थित गायत्री शक्तिपीठ के प्राँगण में 108 कुण्डीय यज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन सम्पन्न हुआ। सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए आयुर्वेद राज्य मंत्री श्रीराम किशन वर्मा ने मातृ भावना के विस्तार के इस प्रयास को युग की एक बड़ी आवश्यकता बतलाया।
जनता ने विद्वेष निवारण करके आत्मीयता स्थापना के लिए युग पुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के संदेश बड़े ध्यान से सुने और हृदयंगम किए। समारोह की अध्यक्षता करते हुए अकाल राहत राज्य मंत्री श्री दामोदर दास आचार्य ने कहा कि जब अन्य देश विनाशक हथियारों की होड़ में शामिल हो रहे है, तो भार को विश्व शान्ति के लिए अग्रणी बनना ही होगा।
साँसद श्री शान्ति लाल धरीवाल ने कहा कि युगपुरुष आचार्य जी के संकल्प कभी अधूरे नहीं रहे हैं। उनके द्वारा राष्ट्रीय एकता का अभियान हाथ में लिया जाना बड़ा ही उत्साहवर्धक शुभ प्रकरण है। आस-पास के क्षेत्रों के कार्यकर्त्ताओं और उत्साही जनता ने सारे क्षेत्र को युग संदेश से लाभान्वित करने के लिए जनसंपर्क करने के संकल्प लिए।
इन यज्ञायोजनों के विराट् स्वरूप, जन साधारण का उत्साह, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए की गयी प्रतिज्ञाएँ एवं सभी धर्म-सम्प्रदायों का सहयोगी सहकार यह दर्शाता है कि जन जागरण से व्यापक विचार क्राँति का बीड़ा जो मिशन के सूत्रधार ने अपने हाथ में लिया था, वह अपने पूर्ण यौवन पर है, अब युग परिवर्तन दूर नहीं है।
इस वर्ष भारत भूमि को देव भूमि, यज्ञ भूमि बनाने के लिए राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों सहित गायत्री महायज्ञों की धूम है। वातावरण परिवर्तन समग्र प्रदूषण का परिशोधन शारीरिक मानसिक स्वरूप का सम्वर्धन, सत्प्रवृत्तियों का उन्नयन, दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन जैसे अनेकों शास्त्रोक्त प्रयोजन इस पुण्य प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं। जहाँ भी समर्थ प्रज्ञा परिवार हैं, उन सभी ने अपने-अपने यहाँ इन आयोजनों को रखा है। सभी आमंत्रणकर्ताओं को तो स्वीकृति नहीं दी जा सकी। प्रस्तुत माँगों को सम्भवतः अगले एक पर्ष में पूरा किया जा सकेगा। यह श्रृंखला आगे भी चलती रहेगी। इन कार्यक्रमों के लिए सभी आवश्यक वस्तुएँ शान्तिकुँज के ट्रक यथा समय पहुँचा देते हैं। फलतः संयोजकों के ऊपर भाग दौड़ और अर्थ व्यवस्था का भार बहुत हल्का हो जाता है। समय की विषमता को देखते हुए संगठन सुरक्षा, सहकारिता एवं सुधार परिवर्तन की आवश्यकता सर्वत्र समझी गई है, और उसकी पूर्ति इन आयोजनों से जिस प्रकार होती देखी जा रही है। उससे जन साधारण की इन समारोहों की आवश्यकता अनुभव हुई है। फलतः उनमें सम्मिलित होने-प्रेरणा ग्रहण करने के लिए इतनी बड़ी संख्या में जन समुदाय एकत्रित होता देखा गया है, जिसकी जिसकी किसी को आशा नहीं थी। गुरुदेव जब प्रवास में जाते थे, तब भी उन्हें देखने सुनने के लिए हजारों की संख्या में लोग आते थे, पर अब जब कि वे शरीर समेत कहीं नहीं जाते मात्र सूक्ष्म शरीर से ही पहुँचते हैं तब लोगों की श्रद्धा, भावना, उमंग एवं उत्सुकता पहले की अपेक्षा कई गुनी बढ़ी है। इसका प्रमाण प्रस्तुत आयोजनों की उपस्थिति एवं सफलता को देखकर सहज ही देखी, समझी जा सकता हैं।
हजारों लाखों की भावुक उपस्थिति में से प्रत्येक की राष्ट्रीय एकता अखण्डता की-सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की शपथ यज्ञाग्नि की साक्षी में संकल्प संस्कार कराते हुए करने पर यह सम्भावना अनेक गुनी बढ़ जाती है। कि जो व्रत जिन-जिन ने लिए हैं वे उसका निर्वाह प्रतिज्ञापूर्वक करेंगे। यही करने के लिए संगीत एवं प्रवचनों द्वारा उपस्थित समुदाय में कहा जाता है। अनेक दृष्टियों से समीझा, परीक्षा करने पर उन समारोहों को असाधारण रूप से उपयोगी पाया गया है। इस आयोजन प्रक्रिया की-मिशन की सामयिक सूझ-बूझ एवं समाज को मिलने वाली महती उपलब्धि समझा जा रहा है।
इन आयोजनों के साथ एक और सुधार परिवर्तन कार्यक्रम चल रहा हैं जैसे मानव भविष्य को असाधारण रूप से उज्ज्वल बनाने वाला कहा जा सकता है।
सभी आयोजनों के साथ अमृताशन के विशालकाय प्रीतिभोज होते हैं। इसमें सभी जाति वर्ण सम्प्रदायों के लोग प्रसन्नता पूर्वक प्रीतिभोज का आनन्द लेते हैं। इन प्रीतिभोजों में उपस्थिति भी आश्चर्यजनक होती है। जिन्हें भूख नहीं है या परोसे गये पदार्थ में रुचि नहीं है वे भी शिष्टाचार अनुशासन, समर्थन एवं दूरगामी परिणाम का ध्यान रखते हुए सहभागी अवश्य बनते हैं।
अमृताशन से तात्पर्य है उबला हुआ अन्न। उदाहरणार्थ चावल; दाल, खिचड़ी, दलिया, आदि। इस प्रकार की भोजन को पुरानी प्रथा के अनुसार ‘कच्चा’ या सखरा कहा जाता है। उसे जति कुटुम्ब की सीमा में ही खाया जाता है। दूसरी बिरादरी के यहाँ खाने में छूत लगती है और मर्यादा भंग होती है। यह मनुष्य-मनुष्य के बीच में एक बड़ी दीवार है। इसे गिराने से मिशन का वह उद्घोष पूरा होता है। जिसमें बार-बार “नर और नारी एक समान” जाति वंश सब एक समान। की मान्यता व्यापक बनाने का प्रयत्न किया जाता है। कच्चा भोजन (दाल, चावल) एक साथ सभी वर्ण वालों को बैठकर खाना, एकता की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण चरण है। रोटी और बेटी यही दो जाति पाँति के प्रमुख आधार हैं। इसमें से प्रथम चरण में यदि रोटी वाली अड़चन दूर हो जाती है तो दूसरी विवाहों में जाति उपजाति वाले प्रतिबंधों को भी शिथिल होते देखा जा सकेगा।
यह प्रचलन उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से साहसपूर्वक चला है वहाँ हर दर्शनार्थी को भगवान का प्रसाद दाल चावल के रूप में ही मिलता है। बिना भेद भाव के उसे सभी जाति वंश के लोग ग्रहण करते हैं। सुखाकर घर भी ले जाते हैं। ताकि उसे प्रसाद रूप में सभी वर्णों के लोगों को दिया जा सके और “सखरे–निखरे” के प्रचलित भेद-भाव पर भक्ति भावना के सहारे करारी चोट की जा सके। आमतौर से अन्य देवालयों में लड्डू पकवान शकर की गोली, बताशे पंचामृत जैसी वे ही वस्तुएँ प्रसाद रूप में प्रयुक्त होती हैं, जिन्हें पक्का माना जाता और जिनमें छूत नहीं समझी जाती।
गायत्री यज्ञों के साथ सहभोज की प्रसाद परम्परा भी चलाई जाती है और उपस्थित सभी लोगों को उस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए कहा जाता है। भले ही भूख न होने पर वे उसे थोड़ी मात्रा में ही क्यों न ग्रहण करें। मूल प्रयोजन एकता और समानता की भावना को व्यवहार में उतारना है। प्रसन्नता की बात है कि उपस्थित समुदाय में से अधिकांश लोग उसे स्वीकार करते हैं। अत्यधिक पुरातन पंथी ही अपवाद रूप आना-कानी करते और बच निकलने के बहाने बनाते देखे गये हैं।
अमृताशन के दूरगामी लाभ हैं। नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान प्रयोजन के लिए छोटी परिवार गोष्ठियों से लेकर विशाल काय प्रज्ञा समारोहों तक असंख्य सम्मेलन आयोजन होते रहते हैं। इनमें एक विशेष आनन्द प्रीतिभोज का होता है। उसके बिना बात अधूरी रह जाती है। पूड़ी पकवान-श्रमसाध्य, झंझट भरे और महंगे भी पड़ते हैं, साथ ही उनके रहते जाति पाँति का भेद भाव भी परिपुष्ट होता रहता है। जबकि दाल चावल शक का सम्मिश्रण एक वर्तन में उबाला जा सकता है। इस कार्य में एक दो व्यक्ति लग कर भी हजारों का भोजन पका सकते हैं। खाने के लिए पर्याप्त जगह हो तो पंक्ति बद्ध भी बिठाया जा सकता है। अन्यथा पत्ते के दोनों में वह प्रसाद चलते फिरते भी दिया और खड़े-खड़े खाया जा सकता हैं। उद्देश्य यज्ञ का प्रसाद लेकर अपनी भक्ति भावना का परिचय देना और जातिगत भेद-भाव पर करारा प्रहार करना है। लोक मानस के परिष्कार प्रयोजन के लिए गोष्ठियों आयोजनों सम्मेलनों की अनिवार्य आवश्यकता रहेगी। दूर-दूर से चलकर लोग उनमें उत्साहपूर्वक एकत्रित भी होते रहेंगे। समय पर उन्हें भोजन भी चाहिए। इसके लिए अमृताशन व्यवस्था से बढ़कर सस्ता और बनाने में अति सरल माध्यम दूसरा नहीं हो सकता।
चावल भारत के प्रायः आधे क्षेत्र में प्रधान भोजन बना हुआ है। पर जहाँ वह महंगा है या रुचि कर नहीं है वहाँ गेहूँ ज्वार, बाजरा, मक्का आदि अन्य अनाजों का दलिया बना कर चावल की जगह काम में लाया जा सकता है। दाल साग दोनों ही मिलाए जा सके तो ठीक अन्यथा इनमें से किसी एक का भी सम्मिश्रण हो सकता है। पौष्टिक स्वादिष्ट बनाने का मन हो तो तिल, नारियल, मूँगफली जैसे तिलहन का भी समावेश किया जा सकता है। इस प्रकार चावल, दाल का भी आग्रह नहीं रह जाता। स्थानीय अन्नों, शाकों में से जो सरलतापूर्वक मिल सके उसे भी अपने ढंग से पकाकर प्रतिभोज का सरंजाम जुटाया जा सकता है। यज्ञ-भोज के लिए घर-घर अन्न घट रखे जा सकते हैं। एक मुट्ठी अन्न नित्य डालने पर प्रीतिभोज की आर्थिक समस्या का भी समाधान हो सकता है। कई अनाजों कई तेलों कई शाकों का सम्मिश्रण भी अन्नकूट जैसा अनोखा आनन्द दे सकता है। कहाँ क्या व्यवस्था बनाई जाय यह स्थानीय सुविधा और सूझबूझ पर निर्भर है। पर प्रयत्न यह अवश्य किया जाना चाहिए कि प्रज्ञा आयोजनों में प्रसाद रूप ‘अमृताशन’ ही का प्रीतिभोज छोटे या बड़े रूप में सम्पन्न अवश्य होता रहे।
प्रश्न केवल आयोजनों के समय आगन्तुकों के सत्कार का पृथकतावादी कुरीति के उन्मूलन का समर्थक ही नहीं है वरन् मानवी आहार प्रचलन में समग्र परिवर्तन करने का भी। यह एक नितान्त उपयोगी प्रथा है। यह सात्विक आहार पकाने की सरलतम विधि है। कोई नितान्त एकाकी व्यक्ति भी एक स्टोव, एक भगौनी या प्रेशर कर लेकर अपने बल बूते भोजन पकाते खाते रहने की समस्या का स्थायी समाधान कर सकता है। प्रवास में जाना हो तो भी इतना सामान लेकर कहीं भी जाया जा सकता है और उपयुक्त स्थान पर बैठकर आधा घंटे के भीतर खा पकाकर आगे बढ़ा जा सकता हैं।
अगले दिनों ईंधन की समस्या विकट होगी। चित्र विचित्र पकवानों को बनाते रहने की लिए किसी के पास फालतू समय न होना। खाद्य पदार्थ भी कम पड़ेंगे तब इन सभी समस्याओं का समाधान अमृताशन के सहारे निकलेगा। इन दिनों हर क्षेत्र में अपनी-अपनी रुचि का अपने-अपने ढंग का भोजन पकता है। उसमें अनावश्यक रूप से ईंधन और समय का अपव्यय होता है। जब सर्वत्र दैनिक प्रयोग में अमृताशन काम आने लगेगा तो समझना चाहिए कि कठिनाई का आधा समाधान हो गया। सार्वभौम भोजन प्रक्रिया का आधार पर मिल गया।
संसार में कम खाने से जितने लोग मरते हैं उससे दूने अधिक खाने से मरते हैं। अधिक मात्रा में आमतौर से तरह-तरह के स्वादिष्ट पदार्थ बनते रहने के कारण अधिक खाया जाता है। वह मात्रा में अधिक होने के कारण पचने के स्थान पर सड़ता है और असंख्य प्रकार की बीमारियों का निमित्त कारण बनता है। दीर्घ जीवन में बुरी तरह कटौती करता है। यदि अमृताशन अपने स्वभाव का अंग और रसोई घर का सुनिश्चित विधान बन जाय तो इसके एक नहीं अनेक फायदे होंगे। स्त्रियाँ जो सारे दिन चौके में बैठी-बैठी छुन मुन बनाती रहती हैं उन्हें अवकाश मिलेगा और अन्य उपयोगी कार्यों में लग सकेंगी। ठोस भोजन की अपेक्षा उबले हुए खाद्य की आधी मात्र ही पेट भर देती है। इस प्रकार आर्थिक दृष्टि से भी वह कहीं अधिक सस्ता पड़ता है और सुपाच्य होने के कारण शरीर में स्फूर्ति और मन में संतुलन की समस्वरता बनाये रहता हैं। “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली उक्ति शत प्रतिशत सही है। तामसी, राजसी, भोजनों की प्रीतिभोज परिपाटी और गृह परम्परा यदि हट जाती है और उसका स्थान अमृताशन की परम सात्विक क्रिया प्रक्रिया कार्य रूप में आने लगती है तो उसका प्रभाव न केवल ईंधन पर, समय के अपव्यय पर, अधिक खर्चीली रीति–नीति सुधर जाने पर पड़ेगा, वरन् अन्न की सात्विकता-चिन्तन, चरित्र व्यवहार के क्षेत्र में भी सन्तोषजनक सुधार परिवर्तन प्रस्तुत करेगी। इससे प्रचलित अवाँछनीयताओं, अनैतिकताओं में भी अनायास ही सुधार होगा। जो कार्य कष्टसाध्य आध्यात्मिक साधनाओं से भी नहीं बन पड़ता वह इस सतोगुण अन्न ब्रह्म को अपनाने भर से सहज सम्भव हो सकेगा।
एक ही कल्प वृक्ष के अवलम्बन से अनेक कामनाओं की पूर्ति होने की बात कही जाती है। वह कहाँ तक सही है यह तो नहीं कहा जा सकता, पर यह सुनिश्चित है कि अमृताशन के उपयोग का प्रचलन अकेला ही ऐसा है जो व्यक्ति की निजी और सामूहिक समस्याओं का कारगर समाधान प्रस्तुत करता है। इन दिनों चल रहे गायत्री महायज्ञों समेत राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों के साथ जोड़ी गई अमृताशन प्रीतिभोज की परिपाटी उन अनेक सम्भावनाओं का शुभारम्भ करती है जो अनेक दृष्टियों से परम श्रेयस्कर और दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है।
एक सिद्ध पुरुष के पास पारस पत्थर था वरिष्ठ शिष्य उसे हथियाने की फिराक में था। सो जिस-तिस प्रकार उसने गुरु को प्रसन्न करके उसे प्राप्त करने का रास्ता बना लिया।
पत्थर छिपाकर रखा गया था जब देने का समय आया तो गुरु ने एक सील बन्द लोहे की पेटी उठा लाने का निर्देश किया। शिष्य उसे उठाकर लाया। पारस उसी में था। सो चाभी न मिलने पर ताला तोड़ने का प्रयास होने लगा।
शिष्य ने सन्देह व्यक्त करते हुए कहा- यदि इसमें असली पारस रहा होता तो यह लोहे की पेटी कब की सोने की हो गई होती? गुरु कुछ बोले नहीं। ताला तोड़ने पर पारस निकाला गया, वह कपड़े में लिपटा हुआ था। लोके के साथ उसका कोई संपर्क नहीं था।
दोनों के बीच का व्यवधान ही अभीष्ट परिणाम होने नहीं दे रहा था। अध्यात्म प्रसंग की चर्चा में एक दिन गुरु ने उस बात को उल्लेख किया और कहा-भक्त और भगवान के बीच, गुरु और शिष्य के बीच दुराव और स्वार्थ का व्यवधान ही आदान-प्रदान में प्रमुख बाधा बना रहता है।
शान्ति कुँज हरिद्वार में एक-एक महीने के युगशिल्पी सत्र यथावत् चल रहे हैं, नालन्दा विश्वविद्यालय स्तर की इस पढ़ाई में युग परिवर्तन में सफल नेतृत्व की भूमिका निभा सकने योग्य प्रखर प्रतिभाएँ विनिर्मित करना इस प्रशिक्षण का मूलभूत उद्देश्य है। आस्था संकट ने ही इन दिनों अनेकानेक प्रकार की समस्याएँ, उलझन, कठिनाइयाँ खड़ी की हैं। इन सबका एक मात्र समाधान यही है कि लोकमानस का आद्योपान्त परिष्कार किया जाय। दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने और जो उचित है उसी को स्वीकार ने की व्यापक मनोभूमि विनिर्मित के जाय। इसके लिए भावनाशीलों को निजी जीवन में लोभ, मोह की कटौती करके लोक मंगल के लिए समयदान और अंशदान की बढ़-चढ़ कर उदारता साहसिकता दिखाई जाय। जो इतना कर सके उनके लिए यह प्रशिक्षण अमृतोपम है। अब तक हजारों की संख्या में प्राणवान सृजनशिल्पी प्रशिक्षित हुए और कार्य क्षेत्र में उतरे हैं। यह पुनीत प्रक्रिया आगे भी जारी रखेगी। उसे दिव्य चेतना ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विनिर्मित जो किया है।
जिन्हें इन युग संधि के प्रभात पर्व पर अपने जीवन को कृत-कृत्य करना है, उन्हें औसत नागरिक का निर्वाह अपनाना चाहिए। लोभ, मोह और अहंकारी प्रदर्शन की महत्वाकाँक्षाओं को तिलाँजलि देनी चाहिए और अपनी योग्यता के अनुरूप कार्यक्रम बनाने के लिए हरिद्वार से संपर्क साधना चाहिए। अपने क्षेत्र में अपने घर रहकर भी कार्य किया जा सकता है। पर जिन्हें समुचित अवकाश हो वे देशव्यापी कार्यक्रमों पर भी निकल सकते हैं। जिनकी उपयोगिता समझी जायगी उन्हें शान्ति कुँज या किसी सम्बन्धित संस्था में भी स्थायी रूप से नियुक्त किया जा सकता है। पर इन कदमों को उठाने से पूर्व हर हालत में एक महीने का युग शिल्पी शिक्षण प्राप्त कर लेना आवश्यक है। मात्र भावावेश से उत्तेजित व्यक्ति व्यवस्थित रूप से कोई कार्य उतनी खूबसूरती से नहीं कर सकते, जितना कि उन्हें करना चाहिए।
नौ दिन के नये आध्यात्मिक जीवन-सत्र
इस वर्ष प्रायः सभी समर्थ शाखाओं ने अपने-अपने यहाँ शत कुण्डी, चौबीस कुण्डी, गायत्री यज्ञ समेत राष्ट्रीय एकता सम्मेलन सम्पन्न किये हैं। प्रत्येक में हजारों की संख्या में उपस्थिति हुई हैं। जिनसे भी उन कार्यक्रमों का संपर्क सधा है, उन सभी में युग धर्म के निमित्त कुछ सक्रिय योगदान करने के लिए भावांछित, उत्तेजित हो चले हैं। बिगड़ती परिस्थितियों के कारण सम्भावित विभीषिकाएँ उनके मस्तिष्क में घूमी हैं। साथ ही महाकाल के युग निमन्त्रण ने उनका अन्तराल झकझोरा है। इन दबावों से विवश होकर उन्हें सोचना पड़ा है कि मात्र पेट प्रजनन के लिए पशु जीवन नहीं जीना चाहिए, वरन् पूरा समय न निकल सके तो घरेलू काम काज करते हुए भी कुछ ऐसा करना चाहिए जिस संतोषजनक एवं महत्वपूर्ण कहा जा सके।
ऐसे उत्कंठित व्यक्तियों के पुरातन सुसंस्कार एकाकी जागे हैं और वे जिस स्तर पर दिन गुजारते रहे हैं, उसकी तुलना में अपनी प्रखरता, प्रतिभा, भावना को भी बढ़ाना चाहते हैं और युग धर्म के निर्वाह में कुछ सेवा साधना में भी हाथ बटाना चाहते हैं। जिनका रुझान कुछ समय शांतिकुंज के वातावरण में रहने-निजी व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने और साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाने और अगले दिनों सेवा साधना की दृष्टि से भी यथा सम्भव कुछ करने का मन है। ऐसे लोगों के अनुरोध बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं। इतना ही नहीं समर्थ शाखाओं ने भी यह अनुभव किया है कि जितने सहयोगी कार्यकर्ता अभी तक हैं, उतने भर से समय की बढ़ती माँग को पूरा नहीं किया जा सकेगा। उनकी संख्या बढ़नी चाहिए, ताकि नितान्त आवश्यक कार्यों को आरम्भ किया जा सके, आगे बढ़ाया जा सके। सुयोग्य साथियों की सहायता से ही महान् कार्य सम्पन्न होते रहे हैं, हो सकेंगे। इसलिए जहाँ भी इस वर्ष प्रज्ञा समारोह सम्पन्न हुए हैं। उन सभी स्थानों के कार्य संचालकों के मन में यह सूझ उभरी है कि जिन भावनाशीलों के मन में यह सूझ उभरी है कि जिन भावनाशीलों के साथ इन दिनों संपर्क सधा और उत्साह उभरा है न सभी को शान्ति कुँज प्रशिक्षण के लिए भेजा जाय।
मिशन की पत्रिकाओं के इन दिनों पाँच लाख के करीब स्थायी सदस्य हैं। इनमें सभी सेवा धर्म अपनाने के लिए आतुर तो नहीं हैं पर इतना सभी चाहते हैं कि उनका निज का व्यक्तित्व गुण, कर्म स्वभाव की दृष्टि से, शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से समुन्नत ऊँचा रहे। सभी ओर से स्नेह सहयोग मिले। इसके अतिरिक्त यदि रास्ता चलते कुछ सेवा साधना बन पड़े तो उसे भी किसी कदर करते रहा जाय। यह आकाँक्षा कुछ अपवादों को छोड़कर सभी प्रज्ञा परिजनों के मन में हो सकती है, या थोड़े प्रयत्न से उभारी जा सकती है। सेवा कार्यों में किसी को रुचि भले ही कम हो पर निजी व्यक्तित्व का स्तर हर कोई ऊँचा उठाना चाहता है। यह कामना इन दिनों के लेखों ने यज्ञ आयोजनों एकता सम्मेलनों ने विशेष रूप से उभारी है। मिशन के वरिष्ठ कार्यकर्ता भी इस बात के लिए आतुर हैं कि उनकी सहयोगी अधिक संख्या में बढ़े। यदि कोई मिशन के कार्यों में प्रत्यक्ष सहयोग नहीं भी करता है, मात्र अपने आपको ही आदर्श बना लेता है, तो भी वह मिशन का गौरव बढ़ाता है। प्रकारांतर से सहयोगी की भूमिका ही निभाता है, भले ही वह प्रत्यक्षतः कोई कहने लायक जिम्मेदारी अपने कंधों पर न उठाये। जिन शाखाओं को निष्क्रियता ने घेर रखा है जिन प्रज्ञापीठों में सन्नाटा छाया हुआ है, जो मात्र मंदिर बनकर रह गई हैं, वेषेश रूप से यह चाहती हैं कि उनके संपर्क क्षेत्र में कुछ आदर्श व्यक्ति आगे आयें और अपने परिष्कृत व्यक्तित्व से अनायास ही अनेकों का मन उस दिशा में उभरने लगे। इस प्रकार सहज ही छाई हुई उदासीनता की निष्क्रियता का अन्त हुए बिना न रहेगा।
कठिनाई एक ही थी कि शांति कुँज में इन दिनों केवल एक महीने वाले युग शिल्पी सत्र ही चलते हैं। इतना समय निकाल सकना उसके संभव नहीं, जो अत्यधिक व्यस्त हैं। जो रोज कुआं खोदते रोज पानी पीते हैं अथवा किसी ऐसे कार्य में लगे हैं जिसे थोड़े दिन के लिए भी छोड़ा नहीं जा सकता। इतने पर भी उनकी उत्कंठा शान्तिकुँज के वातावरण में कुछ समय रहने की है, वहाँ रहकर एक गायत्री अनुष्ठान करके आत्मबल बढ़ाने की है। अपने चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, स्वभाव एवं व्यक्तित्व में निखार लाने की है, जो अपने को अधिक प्रतिभाशाली लोकप्रिय एवं सम्मानित देखना चाहते हैं।
अब तक शान्ति कुँज के संपर्क में आकर जो भी लौटे हैं, उनमें से अधिकाँश ने यही कहा है कि उन पर पारस स्पर्श से सोना बनाने उदाहरण लागू हुआ है। सीप में स्वाति बूँद पड़ने पर मोती उत्पन्न होने जैसा कुछ चमत्कारी घटित हुआ है। एक महीने के शिक्षण वालों की गणना उनके क्षेत्र में प्रतिभाशाली प्रामाणिक, प्रभावी नेता के रूप में होने लगी है। यहाँ तक कि जो बच्चों का मुण्डन, यज्ञोपवीत कराने, विद्यारम्भ आदि कराने के बहाने एक दो दिन के लिए ही इस आश्रम में ठहरे वे वहाँ की प्रभाव प्रतिक्रिया को आये दिन स्मरण करते रहे। जिनके विवाह शान्ति कुँज में आदर्श परम्परा के साथ सम्पन्न हुए उनके दाम्पत्य जीवन, पारिवारिक जीवन आनन्द उल्लास से भरे रहे, यह उनकी चर्चा है जो आवश्यकतानुसार कारण वश एक दो दिन के लिए ही वहाँ पहुँचे और ठहरे। इन चर्चाओं ने असंख्यों के मन में यह आतुरता उत्पन्न की है कि वे किसी प्रकार कुछ दिन के लिए शान्तिकुँज रहे। वहाँ के दिव्य वातावरण में साधना करें। प्रेरणाओं की भी-पूरी प्राण ऊर्जा का एक अंश उपलब्ध करके अपने को लाभान्वित करें। उस सरसता के रसास्वादन से अपने को कृतकृत्य बनायें।
बहुत दिन अत्यन्त गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपरान्त शान्तिकुँज के सूत्र संचालकों ने निश्चय किया है कि दस-दस दिन के जीवन साधना सत्रों की एक श्रृंखला शान्तिकुँज में नये सिरे चलाई जाय। एक महीने के युग शिल्पी सत्र अपने ढंग से अपना क्रम से चलते रहें। साथ ही इन नितान्त अभिनव जीवन साधना सत्रों की दस-दस दिन ले सत्रों की श्रृंखला इसी अप्रैल मास से अलग से चल पड़े।
अपना सुविस्तृत परिचय लिखते हुए आवेदन पत्र भेजा जाय। स्वीकृति प्राप्त की जाय और सत्र प्रारम्भ होने से एक दिन पहले आ जायँ और सत्र समाप्ति होने वाले दिन या दूसरे दिन चले जायँ। ताकि पिछले या अगले शिक्षार्थियों को स्थान खाली मिले। हर महीने तारीख 1 से 9 तक पहला सत्र। दूसरा 11 से 19 तक। तीसरा 21 से 29 तक चला करेगा। ता. 10.20.30 के तीन दिन इसलिए खाली रखे गये हैं किस उनमें आगन्तुकों, विदाई वालों को आवागमन की सुविधा रहे और स्थान आदि की सफाई भी ठीक प्रकार हो सके।
आवेदन पत्र हर शिक्षार्थी को हाथ से ही लिखना पड़ेगा। उसमें किस महीने के किस शिविर में आना चाहते हैं (1) नाम (2) पूरा पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) जन्म जाति (6) व्यवसाय (7) मिशन की किन पत्रिकाओं को नियमित रूप से पढ़ते रहें हैं। (8) कोई शारीरिक मानसिक रोग तो नहीं है। विशेषतया छूत का (9) आश्रम के अनुशासनों को ठीक प्रकार पालन करते रहने का आश्वासन। इतना विवरण सादे कागज पर विस्तारपूर्वक लिख भेजने से आवेदन पत्र मान लिया जायगा और जिन्हें उपयुक्त समझा जायगा, उन्हें पत्र मान लिया जायगा और जिन्हें उपयुक्त समझा जायगा, उन्हें पत्र द्वारा स्वीकृति भेज दी जायेगी।
यहाँ एक बात विशेष रूप से स्मरण रखने की है कि तीर्थ पर्यटकों की अनगढ़ भीड़ साथ में लेकर कोई भी न चले, कारण की अनगढ़ भीड़ साथ में लेकर कोई भी न चले, कारण कि घुमक्कड़ों का मात्र दृष्टिकोण होता है, सैलानियों की तरह जहाँ-तहाँ घूमते फिरना और चित्र विचित्र इमारतें देखते फिरते फिरना उन्हें सत्र के उद्देश्यों से कोई सहानुभूति नहीं होती। इसलिए वे शिक्षार्थियों को चैन से नहीं बैठने देने। साधना और शिक्षण में निरन्तर विघ्न उत्पन्न करते हैं और घुमाने ले चलने के लिए हर घड़ी दबाव देते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि इन शिविरों में जो लोग सम्मिलित होने आये हैं, उनका कोई प्रयोजन निष्फल हो जाते हैं। इसलिए उचित यही है कि साथ में झुण्ड ले चलने की बात मन में से बिल्कुल निकाल दी जाय। जिन्हें साथ लाया जाय- जिनके लिए आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति माँगी जाय, वे सभी ऐसे होने चाहिए जिनके लिए शिविर प्रधान हो जो निर्धारित विषयों की समता भी समझते हों। बुड्ढे बीमार, सड़े गले, एवं अशिक्षित स्त्री बच्चों को तीर्थ यात्रा के बहाने लेकर चलना सत्र के मूलभूत उद्देश्य को ही समाप्त करना है। वाक्छल अपनाकर ऐसे लोगों के लिए स्वीकृति प्राप्त करने की चतुरता किसी को भी नहीं दिखानी चाहिए।
भोजन निवास आदि का प्रबंध आश्रम में है। वस्त्र अपने लेकर चलना चाहिए। कुर्ता धोती सभी के लिए आवश्यक परिधान है। पेन्ट, तहमद, अण्डरवियर पहनकर अनगढ़ पोशाक में फिरते रहना वर्जित है। नौ दिनों में एक गायत्री अनुष्ठान करना होता है। अन्य साधनाएँ भी जो आवश्यक समझी जाती हैं, बताई या कराई जाती हैं। दिनचर्या, प्रातः से सायंकाल तक की व्यस्त हैं उसमें जहाँ-तहाँ भटकने की न तो गुंजाइश है और न आज्ञा। नौ दिनों के बीच में ही दो दिन आधे-आधे दिन के लिए पर्यटन की छुट्टी दी जाती हैं जिसमें एक दिन हरिद्वार से सम्बन्धित और एक दिन में ऋषिकेश के समीपवर्ती स्थान देख लिए जाते हैं। शिविरों सत्संग प्रवचन के विषय व्यक्तित्व परिष्कार, परिवार निर्माण एवं समाजगत सद्व्यवहार का प्रचलन मुख्य विषय हैं। आध्यात्मिकता का पुट तो इन सभी प्रसंगों में आदि से अन्त तक रहता है। व्यक्ति गत समस्याओं से समाधान सम्बन्धी परामर्श का भी उचित अवसर मिलता है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा आत्मोत्कर्ष के यह चार प्रमुख सोपान हैं। इन्हें निबाहा जाय, इसका हर व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप ऐसा निर्धारण किया जाता है। जो बिना किसी कठिनाई के भविष्य में भी कार्यान्वित हो सके।
एक मास के युग शिल्पी सत्र और नौ दिन के जीवन साधना सत्रों का अन्तर भली भाँति समझा जाना चाहिए। किसमें आना है? कब आना है? इसका स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए, युग शिल्पी सत्रों के प्रमुख विषय हैं। (1) सुगम संगीत (2) भाषण सम्भाषण (3) पौरोहित्य के माध्यम से लोक शिक्षण (4) जड़ी बूटी उपचार (5) सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कार्यान्वित किये जाने एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कार्यान्वित किया जाने वाले आवश्यक विधि विधान और उनके बीच आने वाले मोड़-तोड़ो का समाधान।
प्रज्ञा मिशन में परिजनों में से जो कोई हरिद्वार आये हिमालय यात्रा के लिए उधर से गुजरे वे शान्ति कुँज ब्रह्मवर्चस् का दर्शन, अवलोकन किये बिना न जायें। यह युग तीर्थ है। उसमें (1) ऋषि परम्परा (2) साधना परम्परा (3) तीर्थ परम्परा (4) पौरोहित्य परम्परा (5) आरण्यक परम्परा (6) आयुर्वेद परम्परा (7) ज्योतिर्विज्ञान परम्परा आदि अनेक परम्पराओं का ऐसा समन्वय मिलेगा जैसा कदाचित ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले। इस दर्शन से प्राचीन काल का समयुग अवधि का साधु ब्राह्मण वानप्रस्थ परिपाटी का प्रत्यक्ष दर्शन मिलता है और देखने वाला कृत कृत्य होकर लौटता है। अपनी यात्रा को सार्थक मान कर लौटता है।
प्रज्ञा मिशन में परिजनों में से जो कोई हरिद्वार आये हिमालय यात्रा के लिए उधर से गुजरे वे शान्ति कुँज ब्रह्मवर्चस् का दर्शन, अवलोकन किये बिना न जायें। यह युग तीर्थ है। उसमें (1) ऋषि परम्परा (2) साधना परम्परा (3) तीर्थ परम्परा (4) पौरोहित्य परम्परा (5) आरण्यक परम्परा (6) आयुर्वेद परम्परा (7) ज्योतिर्विज्ञान परम्परा आदि अनेक परम्पराओं का ऐसा समन्वय मिलेगा जैसा कदाचित ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले। इस दर्शन से प्राचीन काल का समयुग अवधि का साधु ब्राह्मण वानप्रस्थ परिपाटी का प्रत्यक्ष दर्शन मिलता है और देखने वाला कृत कृत्य होकर लौटता है। अपनी यात्रा को सार्थक मान कर लौटता है।
चैत्र नव रात्रि से आरम्भ
नौ दिवसीय अनुष्ठान सहित जीवन साधना सत्रों का आरम्भ चैत्र नव रात्रि से हो रहा है। वह पर्व 30 मार्च से आरम्भ होकर 7 अप्रैल को समाप्त होगा। प्रथम आरम्भ यहीं से हैं। इसमें जो सम्मिलित होना चाहें, 29 मार्च की शाम तक शान्ति कुँज पहुँच जायँ। इसके उपरान्त 11 व 21 अप्रैल से तथा अगले सत्र 1, 11, व 21 तारीख को हर महीने चलते रहेंगे।
(लाखनसिंह भदौरिया सौमित्र)
जब अभीप्सा जगे, तो अभीप्सित मिले। जब प्रतीक्षा जागे, तो प्रतीक्षित मिले॥
जब तृषा से धरा ओंइ, पपरा उठे, ताप हरने तभी, मेघ घहरा उठे।
जब पिपासा जगी, तृप्ति इप्सित मिले। जब अभीप्सा जगे, तो अभिप्सित मिले॥
जब तृषातुर विकलता, जगी प्राण में, नहे निर्झर बहे फूट, पाषाण में।
हो द्रवित चित से देव इच्छित मिले। जब अभीप्सा जगे, तो अभीप्सित मिले॥
रस-उपेक्षा लिये, विष-बसाये रहे, स्वाति-घन से सदा मुँह छुपाये हरे।
आप ही, आप से हम, उपेक्षित मिले। जब अभीप्सा जगे, तो अभीप्सित मिले॥
व्यर्थ ही भक्ति, भगवान बदनाम हैं, भाव की शून्यता में, कहाँ राम हैं?
भाव को भेंटते, इष्ट हर्षित मिले। जब अभीप्सा जगे, तो अभीप्सित मिले॥
पात्रता ने किया, पूर्णता का वरण, रिक्तता को मिली, मुक्त सरिता उफन।
घट उड़िल ही पड़े, पात्र विकसित मिले। जब अभीप्सा जगे, जो अभीप्सित मिले॥
*समाप्त*