आत्मै-वेदं सर्वम्

शरीर-अन्न, जल और हवा के आधार पर जीवित रहता है। सम्पन्नता-परिश्रम, चातुर्य और साधनों पर अवलम्बित है, किन्तु अन्तरात्मा को परिपोषण इनमें से किसी के सहारे भी नहीं मिल सकता। सम्पन्नता-सुविधा बढ़ाती है, उसके सहारे शरीरगत विलासिता, तृष्णा और अहंता का परिपोषण हो सकता है। चाटुकारों में मुँह प्रशंसा भी सुनी जा सकती है, किन्तु आत्मिक विभूतियों को अर्जित किये बिना कोई तृप्ति, तुष्टि और शान्ति का रसास्वादन नहीं कर सकता।

समृद्धि दूसरों को चमत्कृत कर सकती है, किन्तु श्रद्धा और सद्भावना उपलब्ध करने के लिए आन्तरिक उत्कृष्टता की आवश्यकता पड़ती है। इसी का दूसरा नाम सज्जनता है। इसे पवित्रता, महानता, उदारता और संयमशीलता के मूल्य पर ही उपलब्ध किया जा सकता है।

यदि शरीर को ही सब कुछ माना जाय तो उसके लिए सुविधा सम्पादन से विलास, वैभव से काम चल सकता है, किन्तु यदि ऐसा प्रतीत हो कि अपने भीतर अन्तरात्मा नाम की भी कोई वस्तु है और अन्तःकरण भी अपनी आवश्यकताएँ व्यक्त करता है, तो फिर यह अनिवार्य हो जाता है कि महानता और शालीनता को अपने चिन्तन एवं चरित्र का अविच्छिन्न अंग बनाया जाय। निर्वाह भर से संतोष किया जाय और अपनी प्रतिभा को आत्म-परिष्कार के लिए नियोजित किया जाय।


ससीम से असीम की ओर

लहर बड़ी निराश और दुखित बैठी थी। समुद्र उसे आगे बढ़ने और बिखरने के लिए कह रहा था। किन्तु वह डर रही थी। अपने आश्रयदाता के अंचल में छिपकर बैठे रहना ही प्रिय था। वह इतने में ही सन्तुष्ट रहना चाहती थी।

समुद्र ने उसे समझाया, भद्रे! आगे बढ़ो। मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं, गति के साथ जुड़ा है। विद्रोह के बिना प्रणय की सरसता की अनुभूति कैसे होगी? शीत के अभाव में आतप का स्वाद कैसे चखा जा सकेगा?

लहर चाहती नहीं थी कि उसे आगे बढ़ने के झंझट में पड़ना पड़े। भविष्य न जाने कैसा होगा? इस अनिश्चितता की कल्पना उसे भयभीत कर रही थी। उसने संतृष्ण नेत्रों से अपने प्रियतम को देखा चाहा कि उसे जहाँ का तहाँ रहने दिया जाय।

समुद्र गम्भीर हो गया, उसने कहा-देखती नहीं, मेरे अन्दर कितना दर्द है, जो मुझे क्षणभर भी चैन से नहीं बैठने देता। उस दर्द में हिस्सा बँटाये बिना तुम कैसे मेरी प्रियतमा बन सकोगी? अन्तर को छूना चाहोगी तो दर्द भी तुम्हारे हिस्से में आवेगा। ज्वार-भाटों के रूप में उछलती मेरी पीड़ा में से क्या तुम लहराती हलचल जितना हिस्सा भी नहीं बँटा सकोगी? प्रेम के साथ क्या मेरा दर्द भी अंगीकार न करोगी?

लहर सुबक रही थी। अतीत की सरसता और आगत की अनिश्चितता के बीच वह असमंजस में खड़ी थी-उस स्तब्धता को तोड़ती हुई आगे वाली लहरें हँस पड़ी और बोली-सहेली हमें देखो न, उद्गम से बिछुड़ कर ही तो हम भी अनन्त की ओर जा रही हैं। प्रियतम की महानता के अंतर्गत ही तो क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं-हम उससे बिछुड़ी कहाँ हैं? सीमित से असीम बनकर हमने प्रणय की सरसता को खोया कहाँ? बढ़ाया ही तो है। फिर तुम क्यों डरती हो?

चर्चा बड़ी मधुर थी। सो उसे सुनकर सूर्य की किरणों भी ठिठक गई। प्रौढ़ाओं के समर्थन में सिर हिलाते हुए उनने भी कहा-हमें अपने प्रियतम की विशालता में विचरण करते हुए तब की अपेक्षा अब अधिक उल्लास है, जब हम निकटता की निष्क्रियता को जकड़े बैठी थीं।

प्रसंग पूरा नहीं हो पाया था कि महकती गन्ध भी वहीं आ पहुँची और बोली-पुष्प की गरिमा के सुविस्तृत क्षेत्र को बढ़ाती हुई हम बिछुड़न का नहीं, पुलकन का अनुभव करती हैं, फिर छोटी सहेली! तुम्हीं क्यों कर रुक बैठने के लिए मचल रही हो?

समुद्र इस बोध चर्चा को मनोयोगपूर्वक शान्त चित्त से सुन रहा था। इतने में इन्द्र में द्वार खटखटाया और कहा-चलने में विलम्ब न करो। प्यारी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से बैठी है।

सागर सकपका कर उठ खड़ा हुआ। मेघ का वाहन तैयार था। भाप बनकर वरुण ने उस पर आसन जमाया और इन्द्र के इशारे पर सुदूर यात्रा पर चल पड़ा।

नवोढ़ा ने संतृष्ण नेत्रों से देखा और पूछा-मेरे आश्रयदाता, क्या तुम्हें भी वियोग सहना पड़ता है? क्या बिछुड़न तुम्हारा भी पीछा नहीं छोड़ती?

सागर की आँखें छलक पड़ी। उसने कहा-भद्रे! यह बिछुड़न नहीं-नवीनीकरण है। जीवन इसी का नाम है। मैं मेघ बनकर आकाश में गमन करता हूँ और सरिताओं की जल राशि बनकर फिर वापस लौट आता हूँ। इस गतिशीलता से किसी जीवित को छुटकारा नहीं। गमन का परित्याग करने पर तो मरण ही हाथ रह जायगा। सड़ना मुझे कब सुहाता है-कल्याणी!

लहर की आँखें खुल गई। उसने गतिशीलता की सजीव सरसता का मर्म समझा और अनन्त यात्रा पर चल पड़ी।


भक्ति भावना का सही पैमाना

शरीरगत इन्द्रियाँ हमेशा प्रत्यक्ष पर विश्वास करती हैं। जो उन्हें दीखता है, सुनाई देता और स्पर्श संपर्क में आता है, उसे वे प्रत्यक्ष एवं सही मानती हैं। इस कार्य में यंत्र उपकरण भी सहायक होते हैं। सूक्ष्म दर्शन में माइक्रोस्कोप, दूरदर्शन में टेलिस्कोप आदि यंत्र उपकरण इन इन्द्रियों की सहायता करते हैं और अपेक्षाकृत अधिक छोटी एवं दूरवर्ती वस्तुओं को दिखा देते हैं। यह इन्द्रिय ज्ञान की परिधि हुई।

इसके आगे मस्तिष्क है। उसमें कल्पना, तर्क, तथ्य, निर्णय, परिणाम आदि के संदर्भ में अधिक गहराई तक विचार करने की क्षमता है। चिन्तन में सहायता करने के लिए कम्प्यूटर स्तर के यंत्र बन गये हैं। पुस्तकों और परामर्शों के आधार पर भी इन प्रयोजनों में सहायता मिलती है।

प्रत्यक्ष काया को स्थूल शरीर और मस्तिष्क में अवस्थित चिन्तन तंत्र को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। यह दोनों एक दूसरे के साथ बहुत अंशों में घुले मिले हैं। काय कष्टों से पीड़ित होने पर मस्तिष्क मूर्छित हो जाता है। मस्तिष्क को नींद आ जाने या क्लोरोफार्म आदि सुँघा देने पर शरीर निश्चेष्ट हो जाता है। मस्तिष्क की दुर्भावनाएँ शरीर को प्रभावित करती हैं और उसे रुग्ण, अशक्त बनाती हैं। इसी प्रकार कोई असाधारण प्रसन्नता होने पर, सुविधा साधन प्रचुर मात्रा में हस्तगत होने पर मस्तिष्क में प्रसन्नता-प्रफुल्लता का ठिकाना नहीं होता। शरीर और मन के बीच तारतम्य बिठाने में ज्ञानेन्द्रियाँ बहुत सहायक होती हैं। वे दोनों के बीच सेतु का काम करती हैं।

अध्यात्म-संवेदनाओं, आस्थाओं, आकाँक्षाओं से संबंधित क्षेत्र है। ये सभी भावनाओं पर निर्भर हैं। भावनाओं की अस्तित्व न शरीर में है, न मन में। वे तो अन्तःकरण की गहन परतों में उत्पन्न होती हैं। प्रेम मन का गुण नहीं है। वह तो जिन्हें जब तक उपयोगी समझता है, तब तक उनसे उतना ही उथला गहरा लगाव बनाये रखता है। समय बीतने पर स्मृति झीनी पड़ जाती है और साथ ही वह प्रेम भी क्रमशः समाप्त हो जाता है।

इन्द्रियों की ललक और भी उथली है। उसका रसास्वादन नितान्त क्षणिक और सामयिक है। जब तक जीभ का स्वाद मिल रहा है, तब तक वह स्वादिष्ट पदार्थ प्रिय है। पेट भरते ही उससे तृप्ति या घृणा हो जाती है। बहुत आग्रह करने पर भी उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। कामेंद्रियों पर भी यही बात लागू होती है। जब तक रतिक्रिया चलती है, उतने ही क्षण उत्तेजना का अस्तित्व रहता है। क्षरण होने के उपरान्त उस ओर से मन हट जाता है और उपेक्षा, अरुचि उस स्थान को ले लेती है। अन्य इन्द्रियों की भी यही गति है।

मन को भी इसी परिधि में बँधा हुआ माना जाता है। धन जब तक नहीं मिला है, तब तक उत्कंठा रहती है। उसके अभीष्ट मात्रा में मिल जाने पर सुरक्षित रखने की चिन्ता पड़ती है। साथ ही अगले क्षण उस उपलब्धि का उल्लास तिरोहित हो जाता है। पत्नी-पुत्र आदि के संबंध में भी यही बात है। वे जब तक नहीं मिलते; तब तक विपुल वरदान की तरह कल्पना क्षेत्र पर चढ़े रहते हैं, किन्तु जैसे ही वे मिल जाते हैं, एक बोझिल उत्तरदायित्व की तरह लद जाते हैं और जैसे तैसे उनके प्रति कर्त्तव्य निबाहते हुए समय गुजारा जाता है। स्थायी प्रेम भावना या उत्कट अभिलाषा इन प्रसंगों के बीच बिजली की तरह कौंधती और क्षण भर में तिरोहित हो जाती है।

भावनाओं का अपना अलग स्तर और पृथक उद्गम है। वे उत्कृष्टता और आदर्शवादिता के साथ जुड़ती हैं और स्थिति के अनुरूप चिरकाल तक बनी रहती हैं। इतना ही नहीं, तारतम्य एक लहर द्वारा दूसरी उठाये जाने की तरह तट के अंतिम छोर तक पहुँचने की तरह बना रहता है किन्तु आहत को व्याकुल देखकर जो करुणा उत्पन्न होती है, वह मौखिक सहानुभूति का शिष्टाचार निभाकर विलुप्त नहीं हो जाती, वरन् उसकी शारीरिक सेवा आर्थिक सहायता के लिए कुछ किये बिना चैन नहीं पाती यह भावना है। भाव संवेदना उसी को कहते हैं और यह कारण शरीर से अन्तःकरण में उद्भूत होती है।

यह भावुकता की चर्चा नहीं हैं। भावुकता एक आवेश है, जो उभरकर कभी किसी को सर्वस्व दान भी कर सकता है। कभी क्रोध में ऐसा आक्रमण कर बैठता है जिसका दुष्परिणाम चिरकाल तक भुगतना पड़े। इसी प्रकार के आवेश में लोग आत्महत्या कर बैठते हैं। कोई कपड़े रंग कर साधु बाबा हो जाते हैं और नशा उतरते ही उस आतुरता को साँप छछूँदर की तरह गले की फँसी हुई अनुभव करते हैं। भावुकता के अनेक रूप हैं। पर हैं वे सभी अविवेकपूर्ण, आतुर और क्षणिक।

भावनाओं की गणना इस श्रेणी में नहीं की जा सकती। उसके पीछे श्रद्धा, त्याग, विवेक और साहस का सम्मिश्रण होता है। दधिचि, भागीरथ, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, हनुमान, गाँधी, बुद्ध जैसे महामानवों की स्थिति ऐसी ही थी। उनने उच्च आदर्शों का महत्व समझा। उसके लिए समय की पुकार को सुना। अपनी सामर्थ्य को तौला और धीर, वीर, गंभीरों की तरह निर्धारण की ओर चल पड़े। मार्ग में अवरोध, प्रलोभन और दबाव उन्हें विचलित न कर सके।

भक्ति भावना का यही स्वरूप है। वह ईश्वर के प्रति लगाव से आरम्भ होती है। अंकुरित होने का उसका एक छोटा केन्द्र बिन्दु है। पर उस स्थिति में सदा नहीं ठहरती। विकसित होने पर आम्र वृक्ष की तरह बनती है और अपने फलों से, पल्लवों से अनेकों की सहायता करती है। उसकी टहनियों पर पक्षी घोंसला बनाते हैं। छाया में पशु और पथिक विचरते हैं। लकड़ी तक शीत मिटाने और कपाट बनाने के काम आती है। भक्ति के रूप में प्रस्फुटित हुआ अंकुर ईश्वर की साक्षी से प्रकट होता है, पर वह उतने ही दायरे में सीमित नहीं रहती। किसी देवता विशेष तक उसकी लगन लगी नहीं रहती, पर व्यापक क्षेत्र में आत्मीयता के रूप में विकसित होती है। यह आत्म-भाव ही सच्चा प्रेम है। इसमें सेवा सहायता का गहरा पुट होता है। इस गहराई को इसी पैमाने में नापा जाता है कि उस भाव संवेदना के सहारे कितनों की कितनी सेवा सहायता बन पड़ी। इस विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर-समुन्नत बनाने के लिए कितना श्रम और त्याग किया जाय?

भक्ति शब्द प्रायः ईश्वर के लिए प्रयुक्त होता है। महानता सम्पन्न गुरुजनों के लिए भी। उनके प्रति अगाध प्रेम का होना ही वास्तविकता का प्रतीक है। गहरा प्रेम माँगता नहीं, वरन् देने के लिए आतुर रहता है। यह आतुरता इतनी उत्कृष्ट होती है कि उसकी प्रतिक्रिया प्रत्यक्ष सेवा सहायता के रूप में प्रकट हुए बिना रह ही नहीं सकती।

ईश्वर कोई अपंग, आहत एवं दीन-दुःखी नहीं है, जिसे अन्न-वस्त्र की सहायता करके संकट से उबारा जा सके। वह सामंत भी नहीं है, जिसका यशगान करके चरणों की तरह पुरस्कार पाया जा सके। उसकी मनुष्य से दो ही अपेक्षा हैं, एक तो वह अपनी गरिमा गिराकर सृजनकर्ता को बदनाम न करे और दूसरी यह कि उसके लगाये इस विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य बनाने में अपना पसीना बहाये, साधन खपाये और बुद्धिबल को जितना नियोजित कर सकता हो, उसमें कमी न रखे।


आत्म कल्याण (Kahani)

राहगीर को काशी जाना था। सो रास्ता चलते समय उसकी दृष्टि मील के पत्थर पर पड़ी। काशी उस पर खुदा था। राहगीर रुककर वहीं बैठ गया। आँख गलत नहीं हो सकती। प्रामाणिक लोगों ने लिखा है। काशी आ गई अब आगे जाने की जरूरत क्या रही?

कोई समझदार उधर से निकला और पत्थर के पास आसन जमाकर बैठने का कारण जाना तो कहा-पत्थर पर जिला भर अंकित है-काशी पहुँचना है तो पैरों से चल कर दूरी पार करनी होगी।

भोले व्यक्ति ने अपनी भूल मानी और बिस्तर समेट कर चल पड़ा। बात समझदारों को समझाया जाना कठिन है। वे शास्त्र पढ़ते और सुनते रहते हैं और सोचते रहते हैं इतने भर से धर्म धारणा का-आत्म कल्याण का उद्देश्य पूरा हो जायगा।


साँस साँस में, रोम रोम में बसते हैं भगवान

कठोपनिषद् की भृगु बल्ली में यम और नचिकेता का संवाद आता है। यम जानना चाहते हैं कि राजकुमार की जिज्ञासा कहीं कामनावश तो नहीं है। किन्तु जो आकाँक्षा नचिकेता ने व्यक्त की थी वह सचमुच उसे ब्रह्मविद्या का अधिकारी सिद्ध करने में समर्थ हुई। समर्थ गुरु यमाचार्य से प्राप्त करने योग्य एक ही वस्तु थी, उसके लिए नचिकेता ने कहा-

अन्यत्र धर्मान्दयत्राधर्मादन्यभास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद् वद्॥

अर्थात्-”हे भगवान! जो धर्म-अधर्म, कृत-अकृत और कार्य कारण के बंधन से रहित है’ भूत, भविष्य और वर्तमान की काल सीमायें जिसे बाँधने में समर्थ नहीं है, उस ब्रह्म-तत्व का उपदेश मुझे दीजिए।”

ईश्वर-दर्शन की आकाँक्षा मनुष्य की सम्पूर्ण कामनाओं से बढ़कर है। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है, किन्तु यह आकाँक्षा इतनी प्रबल हो कि उसके समक्ष साँसारिक प्रलोभनों का प्रभाव मिट जाय। सच्ची जिज्ञासा से ही भगवान मिलते हैं। इस आँतरिक भूख, आत्म तत्व की प्राप्ति की प्रबल आकाँक्षा की परीक्षा यमाचार्य ने इस तरह की-

एतत्तुल्यं यद नन्यसे वरं वृणीष्य वित्तं चिरजीविकाँ च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानाँ त्वा काममाजं करोमि॥

“हे नचिकेता! धन-वैभव और चिर-काल तक जीवन आदि जो कुछ चाहो, इस आत्म ज्ञान संबंध वर के बदले में माँग लो, तुम इस भूलोक में महान ऐश्वर्यशाली बनो, मैं तुम्हें सम्पूर्ण भोगों को भोगने में समर्थ बनाये देता हूँ।”

यह परीक्षा हर ईश्वरनिष्ठ के समक्ष आती है। पग-पग पर प्रलोभन और आकर्षण अपनी ओर खींचते हैं। मनुष्य काम-वासना की ओर, धन-वैभव और वस्तु साधनों के उपभोग के सुख प्राप्त करने के लोभ में अपने जीवन-लक्ष्य से गिर जाता है। ईश्वर प्राप्ति की आकाँक्षा प्रबल न हुई तो साँसारिक प्रलोभनों के आगे मनुष्य एक पल भी टिक नहीं सकेगा। हमारी ब्रह्म-दर्शन की आकाँक्षा इतनी प्रबल हो कि यमाचार्य के रूप में मौत की छाया हर क्षण आँखों के आगे घूमती रहे और जब भी कोई साँसारिक वासना जागृत हो तो उस मृत्यु से हमारे अन्तःकरण का नचिकेता यह कह सके-”यत्तत्पश्यसि तद्वद”-हे मृत्यु! “जिससे देखती हो, मुझे उसका ही उपदेश दो” अर्थात् मृत्यु को ध्यान में रखकर उस परम अविनाशी तत्व को ही प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहे।

क्षणिक सुख के लिये अपने जीवन लक्ष्य को भूल जाना बुद्धिमानी नहीं मान सकते। साँसारिक कामनायें अमृत तत्व की प्राप्ति नहीं करा सकतीं। उनको प्राप्त कर लेना किसी प्रकार श्रेयस्कर हो नहीं सकता। मनुष्य अपनी मूल सत्ता से बिछुड़ जाने के कारण दुःखी है। चिरन्तन शान्ति के लिए उसी परमात्मा की ही शरण लेनी चाहिए।

शरीर के भीतर ही प्रकाश स्वरूप परमात्मा अवस्थित है। सत्य-भाषण, तप, ब्रह्मचर्य और यथार्थ ज्ञान से उसकी प्राप्ति संभव है। सब तरह के दोषों से विमुक्त हो कर ही मनुष्य उसे प्राप्त कर सकता है। यह धारणा गहराई तक हमारे हृदय में प्रविष्ट हो। आकाँक्षा जिस क्षण शिथिल हो जाती है उसी समय वासनाओं के तीखे आघात मनुष्य को परेशान करने लगते हैं। शक्ति का मुकाबला शक्ति से किया जाता है। लोहे को काटने के लिए लोहे की ही छैनी बनानी पड़ती है। कुटिल विचारों और कुत्सित कर्मों को मार भगाने के लिए प्रबल-आकाँक्षा की गदा हर समय तैयार रहनी चाहिए।

भगवान कृष्ण का आदेश है-

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमष्यक्सं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमरसं धु्रवम्॥ संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र सममुद्रयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूतहिते रतः॥

अर्थात्-इन्द्रियों के विषयों को वश में रख कर, सर्वत्र समत्व का पालन करते हुए जो दृढ़, अचल और अचिन्त्य सर्वव्यापी अवर्णनीय और अविनाशी स्वरूप की उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए मुझे ही पाते हैं।” यहाँ ईश्वर के प्रति निष्ठा और परोपकार का समन्वय किया गया है। निष्काम-कर्म का यही स्वरूप है कि मनुष्य उस परमात्मा पर अटल विश्वास रखकर कामना रहित कर्म करे।

कर्म करते हुए मनुष्य से अज्ञान-वश त्रुटियाँ हो सकती हैं, किन्तु निष्काम भावना के कारण उसके सात्विक लक्ष्य पर किसी तरह का आक्षेप नहीं आता। लक्ष्य की स्थिरता ईश्वर के प्रति अनन्य भाव रखने से आती है। दोषों, त्रुटियों और भूलों से बचाव करना भी ईश्वरीय-ज्ञान के प्रकाश से ही सम्भव है।

साँसारिक आघातों से विकल होकर जब मनुष्य परमात्मा की शरणागति प्राप्त करता है, तब हृदय की भावनाओं में परमात्मा की प्रेरणायें और उसके निर्देश प्राप्त होने लगते हैं। समर्पण या शरणागति का भाव जितना सजीव होगा, परमात्मा की अनुभूति भी उतनी ही प्रखर होगी।

कोतवाल के साथ रहने पर जिस तरह चोरों का भय नहीं सताता, उसी प्रकार साँसारिक भव-बंधनों से वही निवृत्त रह सकता है जिसके हृदय में परमात्मा का प्रकाश ओत-प्रोत हो रहा है वह ब्रह्म ही सम्पूर्ण शक्तियों का स्वामी, सारी सृष्टि का नियामक और कारण स्वरूप है।

आत्मा चेतन पदार्थ तो है, किन्तु वह सत्ता मात्र होने के कारण स्वतः क्रियाशील नहीं है। किन्तु आत्म-ज्ञान से मनुष्य अपने आपको परमात्मा में मिला देना सीख जाता है। ईश्वर की सत्ता में अपने आपको विलीन कर देने से मनुष्य को ईश्वरीय शक्तियों का अनुभव होने लगता है। उस समय उसके सारे विकार मिट जाते हैं और अनिवर्चनीय आनन्द की सुखानुभूति होने लगती है। जो कुछ भी शक्ति, सामर्थ्य और सम्पन्नता है वह परमात्मा में हैं उसके पास बैठने के कारण ही यह श्रेष्ठतायें मनुष्य में भी आ जाती हैं इस नियम को भूल जाने के कारण ही क्षुद्र बन जाता है। परमात्मा को याद बार-बार न करते रहें, उसे अपने जीवन का अंग न बना लें तो जड़ता आ जाना संभव है। यही उपासना की पृष्ठभूमि भी है।

संसार में रहकर मनुष्य तरह-तरह की कामनायें किया करता है। जिधर उसे सौंदर्य, सुख और संतोष दिखाई देता है, उधर ही वह चल पड़ता है, किन्तु विवेक की कसौटी यह है कि जो कुछ सत्य है, वही ग्रहणीय है। जिससे अन्तःकरण की मलिनतायें मिट जाती हो वही अभीष्ट है। वह तत्व आत्म-तत्व ही हो सकता है। विचार के द्वारा इस आवश्यकता को समझ तो सकते हैं, एक क्षीण-सी जिज्ञासा भी उठती है इसके लिए, किन्तु सुखों की प्रतिद्वन्द्विता में आत्म-ज्ञान की आकाँक्षा मूर्छित रह जाती है। किसी एक लक्ष्य को प्रधान बनाये बिना काम चलता नहीं। इसलिए यह बात भली प्रकार विचार कर लेने की है कि हमारा लक्ष्य क्या है?

ईश्वर को प्राप्त करना और अन्तःकरण में ईश्वरीय प्रकाश जागृत करना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है। इस मार्ग में विघ्न-बाधायें आती हैं, किन्तु जिनके विचारों में निष्ठा होती है, जो प्रबल जिज्ञासा रखते हैं और जिनकी आकाँक्षायें इतनी बलवान होती हैं कि दुनिया की कठिनाइयों से सहज ही मुकाबला कर सकें, वे अपना जीवन ध्येय पूरा कर लेते हैं। परमात्मा बहुत दूर नहीं है, वह हमारे समीप, हमारी साँस में समाया हुआ है। उसे प्राप्त किया जा सकता है पर इसके लिए साधक की आकाँक्षा-अत्यन्त प्रबल होनी चाहिए।


इन्द्र की महानता (Kahani)

जन्मेजय ने नाग यज्ञ किया। आहुति दी जाने लगी सर्प खिंच-खिंच कर कुण्ड में पड़ने जलने लगे।

तक्षक भागा। इन्द्र से लिपट गया। तक्षक की आहुति पड़ी तो इन्द्र सहित वह खिंचने लगा। न इन्द्र ने तक्षक को छोड़ा न तक्षक ने इन्द्र को।

दोनों की आहुति पड़ने से यज्ञ नष्ट होता था। फलतः उस कृत्य को रोक दिया गया। दोनों बच गए। महान् के साथ जुड़ जाने पर क्षुद्र का भी बेड़ा पार होता है।


चर्म चक्षु, मनः चक्षु एवं ज्ञान चक्षु

किन्हीं देवी देवताओं की प्रतिमाओं में तीन नेत्र दिखाये जाते हैं। यह मनुष्यों में भी पाये जाते हैं। इनमें से दो दीख पड़ते हैं, तीसरा अदृश्य रहता है। बनावट की दृष्टि से दृश्यमान नेत्र एक जैसे लगते हैं और तीसरे की सत्ता के संबंध में संदेह ही बना रहता है। पर तात्विक दृष्टि से विवेचना करने की उनके अस्तित्व के चेतना के साथ जुड़े हुए होने की-बात सहज ही समझी जा सकती है। उनका अस्तित्व बोधगम्य हो जाता है।

एक को चर्म चक्षु दूसरे को मनः चक्षु तीसरे को विवेक चक्षु कहा जा सकता है। चर्म चक्षु को भौंहों के नीचे अवस्थित देखा जा सकता है। वे समीपवर्ती पदार्थों का स्वरूप देखते हैं। व्यक्तियों और पदार्थों की भिन्नता, विशेषतया इन्हीं प्रत्यक्ष नेत्रों द्वारा देखी समझी जाती है। यह सभी में होते हैं। दृष्टि इनकी विशेषता है। इसी के माध्यम से जो पहचान होती है। उसी के आधार पर रुचि, अरुचि उत्पन्न होती है। जो दीख पड़ता है उसके साथ संपर्क साधना या बचना सम्भव होता है। दूसरा मनः चक्षु कल्पना करता है। चिन्तन उसका प्रधान गुण है। मन की भाग दौड़ सर्वविदित है। वह अनेकों उचित अनुचित कल्पना जल्पना करता रहता है। बालू के महल बनाता है। इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ उभारता है और फिर उनके पीछे-पीछे भागता फिरता है। बच्चे जिस प्रकार तितली पकड़ने के लिए दौड़ लगाते हैं, पर उनसे ऊँची रहने और उड़ने में प्रवीण होने के कारण उन बालकों के हाथ नहीं आती। इसी प्रकार काल्पनिक पदार्थों, परिस्थितियों को हस्तगत करने के पीछे कोई सुनियोजित कार्य पद्धति न होने के कारण वे उपलब्ध नहीं होती। झाग या बबूले की तरह अगणित मनोरथ उठते और विलुप्त होते रहते हैं। अनगढ़ कल्पनाओं से मानसिक शक्तियों का अपव्यय ही होता है। किन्तु यदि कल्पनाओं को सुनियोजित ढंग से दिशा विशेष में उठाया दौड़ाया जाय, तो उसी कल्पना सागर में से बहुमूल्य मणि-मुक्तक भी हाथ लग जाते हैं। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार, योजनाकार, इंजीनियर आदि बुद्धिजीवी जो उपलब्धियाँ हस्तगत करते हैं वे सर्वप्रथम उनके कल्पना क्षेत्र में ही आती हैं। पीछे बुद्धि पूर्वक उनका ढाँचा खड़ा किया जाता है। काट-छाँट करके किसी सुनिश्चित आधार को ढूँढ़ निकाला जाता है।

तीसरा नेत्र विवेक चक्षु है। जिसे दूसरा नाम भाव चक्षु भी दिया जाता है। संवेदनाएँ उसी में उठती हैं। अन्य प्राणियों में स्वार्थ सिद्धि एवं आत्म रक्षा की दो प्रवृत्तियाँ भी प्रधान रूप से काम करती हैं, पर मनुष्य भावनाशील भी हैं। उसे दूसरों के दुःख में हिस्सा बँटाने और अपने सुखों में दूसरों को साझीदार बनाने की इच्छा भी होती है। वह अन्यान्यों की व्यथा वेदनाओं के प्रति संवेदनशील होता है। दया, करुणा, सेवा-सहायता, सहानुभूति, संवेदना आदि भावनाएँ उदार चेता ही में विशेष रूप से पाई जाती हैं। वे अपने साधनों को उपयोग परमार्थ में करते रहते हैं। जन कल्याण का-विश्व कल्याण का उन्हें ध्यान रहता है। भावनाओं की न्यूनाधिकता ही मनुष्य को निष्ठुर या प्रेमयोगी बनाती है।

विवेक चक्षु के रूप में इसी को समझा जाता है। उचित अनुचित का नीर-क्षीर-विवेक इसी की शक्ति से बन पड़ता है। आमतौर से लोक प्रचलन में भलाई बुराई का इतना सघन सम्मिश्रण है कि उन्हें पृथक कर पाना कठिन पड़ता है। इसके लिए कोई राजहंस परमहंस स्तर के लोग ही सफल होते हैं। किन्तु अभ्यास से सब कुछ सरल हो जाता है।

साथी सहयोगी जिस प्रकार सोचते हैं, उसी प्रवाह में अपना चिन्तन भी बहने लगता है। बारीकी में प्रवेश करने के झंझट से बचने की आदत होती है। उथली दृष्टि से देखकर काम चला लिया जाता है। घटना-क्रम जिस दृश्य के रूप में सामने प्रस्तुत है, उसी को पर्याप्त मान लिया जाता है। यथार्थता क्या है? इसे सोचने जानने की किसी को फुरसत तक नहीं। एक बार एक दार्शनिक कहीं तथा कथित विद्वानों की गोष्ठी में बैठा था। उसने उनकी तत्व-दृष्टि जानने के लिए एक उपक्रम किया। खड़ा हो गया। एक कपड़ा उसके पास था। उसे मोड़ मरोड़ कर सिर पर बाँध लिया और पूछा-इसका नाम बतायें। सभी ने कहा “पगड़ी” फिर उसने उसी कपड़े को तह करके कंधे पर रख लिया। पूछा तो उत्तर मिला “दुपट्टा”। फिर उसने उसे कमर में लपेट लिया। दर्शकों ने उसे “फेंटा” बताया। प्रश्नकर्ता ने फिर पूछा कि वस्तु तो एक ही थी, फिर उसके इतने नाम कैसे हो गये? यह तो कपड़ा मात्र है। जिस रूप में वह प्रयुक्त होता है, उसी नाम से उसे जाना जाता है। यह परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं। वे थोड़े से प्रयत्नभर से बदली जा सकती हैं। मनुष्य आत्मा भर है। वह जिन परिस्थितियों में रहना आरम्भ कर देता है, जिन गतिविधियों को अपना लेता है, उसी के अनुरूप उसकी पहचान बन जाती है। कलेवरों के इस भ्रम में न पड़कर यथार्थता को समझा जाना चाहिए।

बच्चे मुखौटे लगाकर दूसरों को डराते हैं। कई बार अनजाने होने पर स्वयं भी डर जाते हैं। उनके लिए वह दृश्यमान ही सत्य है। पर समझदार बच्चे जानते हैं कि जो आच्छादन चेहरे पर बाँधा हुआ है, वह नकली है। शेर का आवरण ओढ़कर कोई शेर नहीं बन सकता। वस्तुस्थिति प्रायः पर्दे की आड़ में रहती है। रंग मंच पर अनेकों नट-नर्तक विभिन्न वेश-भूषाएँ धारण करके अभिनय करते रहते हैं। प्रत्युत वे वैसे ही लगते भी हैं, पर विचारवान जानते हैं कि राजा या ऋषि बनकर मंच पर सजधज कर बैठा हुआ व्यक्ति वस्तुतः एक साधारण कला कर्मचारी है। यही विवेक दृष्टि है, जिसके उदय होने पर जीवन का स्वरूप समझ में आता है और कर्त्तव्यों का बोध होता है। अन्यथा मनुष्य आकर्षणों और दबावों के बीच कटी पतंग की तरह जिधर-तिधर छितराता हुआ अन्ततः कीचड़ में गिरकर अपनी सत्ता समाप्त कर देता है। दूरदर्शी विवेकशीलता के अभाव में ऐसी ही दुर्गति होती है।

लोक कथा प्रसिद्ध है, कुछ अनगढ़ नदी पार करे किसी बड़े नगर के लिए चले। नदी पार करते ही उनने सोचा कि गिन लेना चाहिए। घर से चले थे तब दस थे। कोई हममें से बह तो नहीं गया। हर एक ने गिना तो नौ निकले। बैठकर रोने लगे। एक समझदार उधर से गुजरा, उसने कारण पूछा, तो बात सामने आई। उसने झुण्ड को खड़ा किया और अलग खड़ा करते हुए सबके सिर पर धौल जमाते हुए गिनती गिनी तो पूरे दस थे। समाधान करते हुए उस विज्ञजन ने कहा-आप लोग अपने को गिनना भूल जाते थे फलतः एक की कमी पड़ती थी।

हम सब की स्थिति भी ऐसी ही है। औरों के गुण दोष देखते हैं। औरों की निन्दा प्रशंसा करते हैं। दूसरों को उत्तरदायी बताते हैं पर यह भूल जाते हैं कि अपनी मनःस्थिति और क्रिया प्रक्रिया ही उन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार है जिसका कि दोष या श्रेय दूसरों को देते हैं। यह विवेकशीलता ही है जो परावलम्बन छोड़कर आत्मनिर्भर होने के प्रभाव परिणाम से अवगत कराती है।

एक निपट देहाती ने कभी हाथी नहीं देखा था। संयोगवश कोई राजा हाथी पर बैठ कर उस गाँव से गुजरा। देहातियों को भौंचक्का देख कर उसने समझ लिया कि इन लोगों ने हाथी कभी देखा नहीं है। चलना रोक दिया गया। दर्शकों को पास बुलाया और प्रश्न पूछा गया कि ध्यान से देखो-इसमें अजनबीपन क्या है? सभी ने देखा और एक ही उत्तर दिया कि इसके आगे पीछे मोटी पतली पूँछें तो दो हैं, पर मुँह कहीं दीखता ही नहीं। यह खाता कहाँ से होगा? राजा ने हँसते हुए हाथी आगे बढ़ा दिया साथ ही सूँड़ उठवा कर हाथी का छिपा हुआ मुँह भी उन्हें दिखा दिया।

मनुष्य को दो पूँछें दिखाई पड़ता है। शरीर के साथ जुड़ी हुई ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के रूप में। किन्तु उसका वह पक्ष नहीं दीखता, जिसे चेतना या आत्मा कहते हैं। उसे विवेक दृष्टि से ही देखा जा सकता है।

चर्म चक्षुओं में दृष्टि दोष न होने पर भी वे सतही जानकारी ही प्राप्त कर सकते हैं। चेहरे पर लिपटी हुई चमड़ी की बनावट देखकर हम किसी के सौंदर्य पर मुग्ध होते और कुरूप के प्रति अरुचि प्रकट करते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि चमड़ी की झिल्ली से नीचे वाला मसाला देखने पर सभी में हाड़-माँस रक्त, मज्जा, मल-मूत्र आदि भरा ही दीखता है। सभी की काया उस चमकदार पन्नी चिपकाये हुए घड़े की तरह है जिसमें भीतर सड़ी कीचड़ भरी पड़ी है। आत्मा ही जीवन का आधार है पर वह यथार्थता चर्म चक्षुओं से किसी भी प्रकार दीख नहीं पड़ती। जमीन पर रेत पत्थर बिछे दीखते हैं। पर उसकी गहराई में पानी के स्रोत और बहुमूल्य खनिज पदार्थ भरे पड़े हैं। यह खुली आँखों से पलक उठा कर नहीं देखा जा सकता। चर्म चक्षु आमतौर से दैनिक जीवन के काम चलाऊ प्रयोगों में सहायता करने तक सीमित हैं। वे आकाश में टँगे विशाल काय ग्रह पिण्डों का झिलमिल चमकने वाली बिन्दियों के रूप में देखते हैं। इन्द्र धनुष जैसे अवास्तविक दृश्यों को प्रत्यक्ष एवं सही होने की धारणा बना लेते हैं। सिनेमा के पर्दे पर चलती बोलती छाया के उभार प्रत्यक्ष जैसे लगते हैं और असाधारण रूप से प्रभावित करते हैं। इन तथ्यों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि चर्म चक्षु समीपवर्ती पदार्थों की ऊपरी सतह ही देख पाते हैं। गूलर के फल में भरे हुए भुनगों तक को उनके सहारे नहीं देखा जा सकता। यह विश्व अणुओं और तरंगों का समुच्चय मात्र है। पर हमें तरह-तरह की आकृतियों के का समुच्चय मात्र है। पर हमें तरह-तरह की आकृतियों के रंगों के रूप में उनका समुच्चय दृष्टिगोचर होता है। स्थिति को देखते हुए चर्म चक्षुओं द्वारा दी गई जानकारी को अधूरी एवं भ्रमपूर्ण ही कहा जा सकता है।

मनःचक्षु अपने आप में विलक्षण हैं। वे कल्पना के घोड़े गढ़ते और उन पर चढ़कर आकाश पाताल की सैर करते रहते हैं। सुप्तावस्था में दीख पड़ने वाले सपनों की तरह उनके द्वारा जागृत स्थिति में भी दिवा स्वप्न देखे जाते रहते हैं। इसके लिए देशकाल की भी कोई सीमा मर्यादा नहीं। चिर अतीत के संबंध में जो सुना है, उनके यथार्थ जैसे चित्र गढ़े जा सकते हैं। भविष्य की सम्भावनाओं को इच्छित स्तर की बनाकर उन्हें डरावनी या लुभावनी छवि दी जा सकती है। अवास्तविक कल्पनाओं को वास्तविकता का बना पहनाना मनः चक्षुओं का ही काम है। उनके दिखायें दृश्यों को सही मान बैठने की बात बनती ही नहीं।

वास्तविकता युक्त तो ज्ञान चक्षु ही हैं। ये अदृश्य की गहराई में उतर कर पनडुब्बों की तरह बहुमूल्य मणि मुक्तक खोज सकते हैं इन्हीं के द्वारा आत्मा को-परमात्मा को-कर्त्तव्य को देखा समझा जा सकता है। इस जादू नगरी की भूल भुलैयों में से बाहर निकलने का वास्तविक रास्ता ढूँढ़ निकालने में यह ज्ञान-चक्षु ही काम देते हैं। उन्हीं की दृष्टि को तत्व दर्शन नाम दिया जा सकता है। यह नेत्र जब तक मुंदा रहता है, तब तक चर्म चक्षु और मनःचक्षु खुले रहने पर भी हम तत्व, तथ्य और सत्य को देखने समझने में असमर्थ ही रहते हैं।


आदर्श संन्यासी (Kahani)

सिन्ध प्रान्त में जन्मे सन्त टी.एल. वास्वानी एम.ए. पास करने के उपरान्त अपने ही कॉलेज में अँग्रेजी तथा दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर हो गये। अनेक कॉलेजों की उनने छुट-पुट सेवाएँ की और पटियाला के महेन्द्र कॉलेज के प्रिंसिपल बन गये। कूँच, बिहार और लाहौर कॉलेजों के भी वे प्रिंसिपल रहे।

जिन दिनों उनकी ख्याति चरम सीमा पर थी, उन्हीं दिनों उनकी आत्मा ने लौकिक कार्यों को विराम देकर युग धर्म की पुकार पर अधिक आवश्यक समस्याओं के समाधान में जुट गये। उन्होंने संन्यास ले लिया और स्वतंत्रता संग्राम के लिए निरन्तर वातावरण बनाने के कारण सरकार के कोपभाजन बने और जेल में बन्द कर दिये गये।

जेल जीवन में उन्हें युग चिन्तन का अधिक अवसर मिला। सोचते रहे जितनी स्वतंत्रता प्राप्ति की आवश्यकता है, उतनी ही जन जीवन को समुन्नत बनाने की भी। उन्होंने गाँधी जी की नीति अपनाई और मात्र स्वतंत्रता सैनिक न बने रहकर जन जागृति की विधा भी अपनाई।

उन्होंने सिन्धी भाषा में विपुल साहित्य सृजा। धर्मों का समन्वय सम्मेलन बुलाया। शान्ति आश्रम बना कर लोक सेवी प्रशिक्षित करने का क्रम चलाया। व्यापक प्रचार यात्राएँ की और एक आदर्श संन्यासी की तरह अपना जीवन अध्याय पूरा किया।


संतुलित रहें, प्रसन्न रहें

धनुष, बाण चलाने वाले यह नियम भी जानते हैं कि खाली समय में डोरी को खुला छोड़ा जाय। जो कमान हर समय कसी रहेगी उसकी दूर तक तीर फेंकने की शक्ति चली जायगी। ठीक यही बात शरीर और मन के संबंध में भी है। यदि हर घड़ी व्यस्त रहा जाय तो शरीर थक कर चूर हो जायगा और फिर ढर्रे का सीमित काम निपटाने के अतिरिक्त इतनी सामर्थ्य शेष न रहेगी कि नये उत्साह के साथ नया कार्य भली प्रकार आरम्भ कर सकें।

जीवन में भली और बुरी दोनों ही प्रकार की परिस्थितियों का आना जाना बना ही रहता है। रात और दिन की तरह परिवर्तन का क्रम भी बना रहता है। देखना यह है कि उनमें से किन पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यदि अनुकूलताओं की गणना की जाय तो प्रतीत होगा कि कुछ वस्तुओं का अभाव रहने पर भी जितना कुछ उपलब्ध है वह कम नहीं है। उसके लिए भी असंख्य व्यक्ति तरसते हैं।

यदि उपलब्धियों की गणना की जाय तो अपने भाग्य को सराहने का अवसर मिलेगा। इसके विपरीत यदि काला पक्ष देखने की आदत हो, प्रतिकूलताओं को ही गिना जाय और अनुकूलता का विस्मरण करते रहा जाय, तो प्रतीत होगा कि हम पूरी तरह कठिनाइयों के जाल जंजाल में फँसे हुए है। जिधर नजर उठाकर देखा जाय उधर ही निष्ठुर रूखे और उपेक्षा करने वाले ही दीख पड़ेंगे और चित्त खिन्न रहने लगेगा। इसके विपरीत यदि स्वभाव बदल जाय तो प्रतीत होगा कि उन्हीं की संख्या बढ़ी-चढ़ी है। प्रतिकूलताएँ तो केवल सतर्क रहने और प्रयासों में कमी न पड़ने देने की चेतावनी भर देने के लिए आती है। चेतावनी भर को विपत्ति मान बैठना भूल है।

काम की अधिकता से कोई थकता नहीं। थकान तो तब आती है, जब उसे बेगार भुगतने, बाधित रूप से लादा गया भार मानकर किया जाता है। बच्चे उठने से लेकर सोने तक कूदते फाँदते ही रहते हैं। खिलाड़ी मैदान में पूरी चुश्ती और मस्ती के साथ प्रवृत्ति होते हैं। उन्हें श्रम कम नहीं पड़ता, पर मनोरंजन की दृष्टि रहने से कुछ भी खलता नहीं, वरन् वैसे ही अवसर बार-बार मिलते रहने की इच्छा बनी रहती है। किसान अपने कामों में सुबह से लेकर गई रात तक लगे रहते हैं और काम निपटने पर गहरी नींद सोते हैं। इसी ढर्रे पर उनका जीवन क्रम हँसते-हँसाते हुए चलता रहता है। मजूर को-बेगारी को-काम को भार समझने की चिढ़ हो सकती है, किन्तु मालिक अपना काम समझकर करता हैं और मजूर से दूना काम कर लेता है। इतने पर भी उसे थकान नहीं सताती।

जीवन में शिकायतों जैसे अवसर नहीं आते। यह नहीं कहा जा रहा। संसार की बनावट के अनुरूप प्रतिकूलताओं का अस्तित्व भी रहेगा ही। यदि वह न रहे तो मनुष्य की सूझ-बूझ और साहसिकता को ही जंग लग जायगी। सफलताओं का अपना सुख है और असफलताओं के पीछे भूल सुधारने का उपयोगी प्रशिक्षण।

दोनों ही परिस्थितियों में अपने को संतुलित रखना चाहिए। सुख का सदुपयोग करना चाहिए और संकट को निरस्त करने के लिए उनसे जूझकर अपनी प्रतिभा निखारनी चाहिए। शरीर और मन को उत्तेजित करना, उद्विग्न रहना स्वभाव का ऐसा दोष है, जिससे मनुष्य दिनों-दिन दुर्बल और अक्षम बनता जाता है।


बलिदान (Kahani)

ईसा के शत्रु उसकी जान के ग्राहक बने हुए थे। शिष्यों ने सलाह दी, हमें येरुसलम छोड़कर कहीं अन्यत्र चल देना चाहिए।

ईसा सहमत नहीं हुए और कहा सत्य को न तो डरना चाहिए और न भागना। बलिदान साथ में जुड़ जाने से तो वह और अधिक निखरता है।


विज्ञान और ज्ञान क्षेत्र की अपनी अपनी उलझनें

शारीरिक श्रम पराक्रम के उपरान्त मनुष्य के लिए करने को जो सबसे बड़ा काम बच रहता है, वह है-मानसिक चिन्तन। शरीर और मन दोनों के मिलने से ही समग्रता बनती है। तत्परता और तन्मयता का संयोग ही ऐसी उपलब्धियाँ हस्तगत कराता है, जिसके आधार पर सुविधाएँ बढ़ती, प्रसन्नतायें फलती और प्रगति की संभावनाएँ मूर्तिमान होती हैं। मानवी प्रगति के इतिहास में मूल तत्व यही सन्निहित है। पशु और मनुष्य के बीच में यही अन्तर है। अन्य प्राणी मात्र शरीर से काम लेते हैं। प्रकृति प्रेरणाओं का अनुसरण कहते हैं और शरीर रक्षा से जुड़ी हुई समस्याओं का समाधान करते हैं। उन्हें चिन्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती। समस्याओं की पेचीदगी में नहीं उतरना पड़ता। गुत्थियों को सुलझाना नहीं पड़ता और न कोई महत्वाकाँक्षाएँ ही उनके सामने रहती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए असाधारण दौड़ धूप करनी पड़े। मनुष्य ही है जो आकाश, पाताल के कुलावे मिलाता, दलदलों में फँसता और उनसे उबरने के लिए अनेक स्तर के प्रयत्न करता देखा जाता है॥

सामान्य प्राणी हँसता हँसाता, कुदकता फुदकता, हलका फुलका जीवन जी लेता है। उसके लिए समय काटना और आवश्यकताओं को पूरा करना कोई समस्या नहीं है। प्रसन्नतापूर्वक उठता और संतोषपूर्वक सो जाता है। किन्तु मनुष्य को वैसा सुयोग उपलब्ध नहीं है। उसकी कल्पनाएँ इच्छाएँ, आदतें और योजनाएँ ऐसी विकृत, बेढंगी होती हैं जिन्हें सही रीति से हल करना तो दूर उनका स्वरूप समझना तक सम्भव नहीं होता। हैरानी सबसे बड़ी विपत्ति है। उनसे मानसिक और शारीरिक शक्तियों का, समय, श्रम एवं मनोयोग का इतना अधिक क्षरण होता है कि उनकी पूर्ति के लिए वह सब उपर्याप्त ही रहता है, जो कौशलपूर्वक बनाया या कमाया गया है। नाप तौल कर देखा जाय तो सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य कहीं अधिक समस्याग्रस्त और उलझनों में भटकता हुआ-खिन्न-विपन्न पाया जाता है।

सुविधाओं और क्षमताओं की इतनी अधिकता और उस पर भी इतनी विपन्नता? इस पहेली का कारण और निराकरण ढूँढ़ने के लिए हमें गहराई में उतरना होगा। देखना होगा कि गणित की लम्बी चौड़ी प्रश्नावली सामने रखकर उनका हल निकालते समय उन फार्मूलों को तो विस्मृत नहीं कर दिया गया है, जिनके आधार पर छोटे बालकों से लेकर निष्णात प्रोफेसरों तक अपनी-अपनी प्रश्नावलियों को सही समाधान तक पहुँचाते हैं।

अन्य प्राणियों में से कितनों की ही तुलना में मनुष्य पिछड़ा हुआ है। वह घोड़े, चीते, हिरन की तरह नहीं दौड़ सकता। हाथी और गेंडे जैसा बलिष्ठ भी नहीं है। दीमक, चींटी, मधुमक्खी जैसी क्रमबद्धता भी उसमें नहीं है। घ्राण शक्ति में वह कुत्ते, बिल्लियों तक से पिछड़ा हुआ है। फिर भी मनुष्य सृष्टि का शिरोमणि है। उसने ज्ञान विज्ञान के दोनों ही क्षेत्रों में इतनी दूरी तक प्रवेश पा लिया है कि उसे देवपुत्र या प्रकृति का राजकुमार कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

दो पैरों के सहारे चल कर दूरी तय की जाती है और मंजिल तक पहुँचा जाता है। मानवी प्रगति की विशिष्टता का श्रेय जिसे दिया जा सकता है, उसे ज्ञान और विज्ञान का नाम देना उपयुक्त ही है। मनुष्य ने इन्हीं दोनों की साधना की है, फलतः वे ऋद्धि सिद्धियाँ उसके सामने हाथ जोड़कर आ खड़ी हुई हैं, जिन्हें समृद्धि और प्रगति भी कहा जा सकता है। समृद्धि से तात्पर्य है पदार्थ पाकर सुविधा साधन। मनुष्य की क्षमता, सुविधा और प्रसन्नता इसी आधार पर बढ़ी है। प्रगति का अर्थ है चिन्तन की वह उत्कृष्टता, जिसके आधार पर उसने शास्त्र का, दर्शन का, व्यवहार का ढाँचा खड़ा किया है और अनेक दिशाओं में कल्पनाओं की उड़ानों ने उनके लिए रंगीले पंख प्राप्त किये हैं।

मनुष्य पदार्थ सम्पदाओं से अपने उपयोग की वस्तुएँ खोजता और बढ़ाता है, साथ ही उनके उपयोग की उपभोग की विद्या भी निर्धारित करता है। विज्ञान यही है। इसके आविष्कारों से पृथ्वी पर अनगढ़ स्थिति में पड़ा हुआ पदार्थ, परिष्कृत होकर उपयोगी स्थिति में सामने आया है। धरातल से नीचे के खनिज इसी आधार पर खोज निकाले गये हैं। धातुएँ, रसायनें, तेल, पत्थर, कोयला आदि न जाने क्या-क्या विज्ञान ने हमारे सामने प्रस्तुत किये हैं। पेय जल का अधिकाँश भाग धरती की परत खोद कर ही प्राप्त किया जाता है। अनगढ़ झरनों और नदी नालों को कृषि कार्य में प्रयुक्त हो सकने योग्य स्थिति में विज्ञान ने ही बनाया है। कृषिकार्य, बागवानी, पशुपालन की क्रिया प्रक्रिया विज्ञान ने ही दिखाई है। उसी ने वह जानकारी दी है, जिसके आधार पर वस्त्र, मकान एवं वाहन, यंत्र उपकरण औजार बन सके। आग जलना और उसके विविध उपयोग करना विज्ञान की सहायता से ही सम्भव हुआ है। यह समृद्धि की आरम्भिक दिनों की चर्चा है। बाद में तो वह कारखाने खड़े करने लगा, जलयान वायुयान बनाने लगा और अस्त्र-शस्त्रों के ऐसे जखीरे जमा करने लगा जिनके द्वारा पौराणिक प्रलय का नूतन संस्करण प्रस्तुत खड़ा किया जा सके। कम्प्यूटरों से लेकर रोबोटों तक के, रेडियो-टेलीविजन से लेकर एक्स और लेसर किरणों तक के वे साधन उपलब्ध कर लिए गये हैं जिनके आधार पर उसने प्रकृति पुत्र न रहकर उसका अधिष्ठाता होने पर दावा करना आरम्भ कर दिया है। सौर मण्डल को लाँघकर समूचे ब्रह्माण्ड तक अपनी पहुँच बनाने तक की उसकी अभिलाषा है। विज्ञान का यह विशालकाय क्षेत्र है, जिसके आधार पर चिकित्सा से लेकर प्लास्टिक सर्जरी तक के-कृत्रिम खाद्यों तक के-अनेक आधार हस्तगत कर लिए गये हैं।

दूसरा क्षेत्र है-ज्ञान। जिसे शिक्षा कहा जाता है। भाषा, लिपि, प्रेस, पुस्तक जैसे प्रत्यक्ष आधारों से लेकर चिन्तन की इतनी अधिक दिशाधाराएँ सामने आई हैं कि उनकी विचित्रता और भिन्नता आश्चर्यचकित कर देती हैं। धर्म सम्प्रदायों का कलेवर इतना बड़ा है, जिसने सभ्य असभ्य सभी को अपने अंचल में ढक लिया है। ईश्वर से लेकर देवताओं तक की सृष्टि इसी ज्ञान उद्यान की उपज है। धर्म, दर्शन, अध्यात्म, साधना, सिद्धि जैसे अनेकानेक प्रकरण इसी क्षेत्र में जन्मे हैं। राजनैतिक, सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक क्षेत्र की अनेकानेक पद्धतियाँ, प्रणालियाँ, दिशाधाराएँ यद्यपि एक दूसरे के विपरीत चलती हैं। और तालमेल न बिठा सकने वाला विलगाव रखती हैं, तो भी उन सबका अस्तित्व “ज्ञान” की खदान से ही निकल कर चित्र विचित्र रूप में सामने आया है।

तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण ढूँढ़कर अपने-अपने पक्ष का समर्थन करने और उसे सत्य ठहराने का कौतुक ज्ञान की पिटारी से ही निकल कर बाहर आया है। सत्य एक है। पर उसे इतने लोगों ने इतनी तरह से प्रस्तुत प्रतिपादित किया है कि उस समूचे जंजाल को देखते हुए हँसते-हँसते लोट पोट हो जाने का मन करता है। अपना-अपना सूर्य यदि हर कोई ऐसा गढ़ने लगे जिसकी दूसरे के साथ कोई संगति न बैठती हो तो उस वहम को मानसिक विक्षिप्तता ही कहा जायगा। इस अन्नकूट में से एक-एक दाना बीनकर अलग करना और फिर उसका कौन कितने अंश में उपयोगी किस अंश में अनुपयोगी है यह सिद्ध करना टेढ़ी खीर है। फिर भीम न को इसी जंजाल की उधेड़ बुन करने में लगाये रहना पड़ता है। अक्सर इन दुराग्रह भरी भिन्नताओं को लेकर विवाद मनोमालिन्य ही नहीं होते, विग्रह और रक्तपात तक के क्रम चल पड़ते हैं।

विज्ञान को इस अर्थ में एक सीमा तक निर्भ्रान्त माना जा सकता है कि उसके प्रतिपादन सिद्धान्त सतही तौर पर परस्पर मिलजुल कर एक सूत्र में बँधते हैं। एक सिद्धान्त का एक ही तरह का प्रतिपादन करते हैं। कारण, आधार, सिद्धान्त, तथ्य एक ही बताते हैं। इसलिए विज्ञान के प्रतिपादन पक्ष को समस्त विश्व में समान रूप से प्रामाणिकता एवं मान्यता मिली है। इसे संतोष और हर्ष का विषय माना जा सकता है। विग्रह तब खड़ा होता है जब विज्ञान की उपलब्धियों का किस प्रकार उपयोग या उपभोग किया जाय। इस प्रसंग पर निर्धारण करना पड़ता है। शक्ति एक यथार्थता है। उसे सहज ही मान्यता मिलती है। पर इस सामर्थ्य का किस प्रकार, किनके लिए, किस प्रयोजन के लिए प्रयोग किया जाय, मतभेद यहाँ से खड़ा होता है। यदि वैज्ञानिकों ने आविष्कारों के लिए श्रम करने के साथ यह निश्चय भी कर लिया होता कि इसे किस निमित्त किस प्रकार प्रयोग करना है? तो उस उभयपक्षीय निर्धारण से विज्ञान ऐसे अकाट्य तथ्य और सत्य के रूप में प्रकट होता कि भौतिक क्षेत्र में किसी को भी किसी प्रकार की असुविधा न रहती। जो भूल हो चुकी है, उसे सुधारना है। पिछली पीढ़ी आविष्कारों का प्रश्नपत्र सही हल कर गई। उससे भूल दूसरे प्रश्नपत्र का जवाब देने में हुई है। उनने विज्ञान को चतुरों और समर्थों की लिप्साएँ पूरी करने के लिए प्रयुक्त होने दिया और पिछड़े लोगों की जिन आवश्यकताओं को पूरा किया जाना था, उनकी ओर से आंखें फेर लीं। इस अनौचित्य का समाधान विज्ञान क्षेत्र की नई पीढ़ी को करना है। पदार्थ का उत्पादन, परिष्कृतीकरण ही नहीं, उपयोग और उपभोग की भी सीमा निर्धारित करनी है ताकि समूची मनुष्य जाति विज्ञान को सराह सके, उसका लाभ सर्व साधारण को मिल सके।

ज्ञान के क्षेत्र में भी भ्रान्तियों का समावेश संभवतः प्रगति के आरम्भ काल से ही हुआ होगा और अब वह बढ़ते बढ़ते इस स्तर तक पहुँचा है कि व्यापक क्षेत्र पर दृष्टिपात करते हुए इस असमंजस में पड़ना पड़ता है कि उस कुहासे को बेधते हुए सही दिशा में निर्धारण किस आधार पर किया जाय? वस्तु के वास्तविक स्वरूप को किस प्रकार पहिचाना जाय? सत्य और असत्य के बीच साक्षी रूप में किस कसौटी को खड़ा किया जाय? इस दृष्टि से विज्ञान की तुलना में ज्ञान अधिक अप्रामाणिक सिद्ध हो रहा है। विज्ञान की यथार्थता जाँचने के लिए कुछ कसौटियाँ हैं। उसे अपने प्रतिपादन को सही सत्य सिद्ध करने के लिए कुछ प्रमाण देने पड़ते हैं। परन्तु ज्ञान का तो समूचा ढाँचा ही ढकोसली कल्पनाओं पर आधारित माना जाता है। कल्पनाएँ स्वच्छन्द हैं। वे मनमानी उड़ानें उड़ सकती हैं और किसी भी सपने को सही कहने लग सकती हैं। ज्ञान को वैज्ञानिक धरातल पर प्रतिपादित किया जाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि यह सफलतापूर्वक प्रतिपादित किया जा सके, तो मनीषा द्वारा युग की यह सबसे बड़ी सेवा सिद्ध होगी।


निस्वार्थ कर्म (Kahani)

अकबर ने तानसेन के सम्मुख उनके गुरु श्री हरिदास का संगीत सुनने की इच्छा व्यक्त की तानसेन बड़े असमंजस में पड़ गये। श्री हरिदास के दिल्ली आकर बादशाह के सामने गाने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह भी आशा नहीं की जा सकती थी कि वृन्दावन में भी अकबर को सुनाने के लिये वे तैयार हो जावेंगे।

इस उलझन में तानसेन ने एक रास्ता निकाला, बादशाह अकबर वृन्दावन गए व साधारण वेश में चुपके से स्वामी जी की कुटिया से बाहर छिप कर बैठ गये। तानसेन अन्दर गये व अपने गुरु को प्रणाम कर गाना गाने लगे। तानसेन ने जान बूझकर गाने में गलती कर दी, अपने इतने पटु शिष्य की गलती सुधारने के लिए गुरु ने स्वयं गाना शुरू किया। इस तरह बादशाह अकबर की इच्छा पूर्ण हुईं

कुछ दिनों बाद की बात है। एक बार जब दिल्ली में तानसेन गा रहे थे, तो गाना पूरा हो जाने पर तानसेन से कहा-”तानसेन तुम गाते तो हो, परन्तु तुम्हारे गाने में वह निखार नहीं जो तुम्हारे गुरु के गाने में है। तुम्हारे गुरु का गायन तो बहुत ही उच्च कोटि का है “तुरन्त ही तानसेन ने नम्रता पूर्वक कहा-”जहाँपनाह! इसका कारण यह है कि मैं हिन्दुस्तान के बादशाह के लिये गाता हूँ और मेरे गुरु अखिल विश्व के नियन्ता के लिये गाते हैं।”

जो वस्तु परमात्मा को सौंप दी इससे अधिक पवित्र वस्तु क्या हो सकती है?


क्षमा वीरस्य भूषणम्

क्षमा को वीरों का आभूषण कहा गया है। यह सूत्र अपनी जगह सही है। इतिहास की घटनाओं पर दृष्टि डालने से वह आभूषण की तरह साहस के धनी महामानवों की शोभा बढ़ाती दिखती भी है। परन्तु कहीं-कहीं वही हाथों की बेड़ी या गले का फन्दा बनी भी दिखाई देती है।

झाँसी की रानी, शौर्य-साहस की प्रतिमूर्ति लक्ष्मी बाई ने राज्य के दुर्घर्ष डाकू सागर सिंह को पकड़ा। दण्ड व्यवस्था के अंतर्गत उसे मृत्युदण्ड दिया जाना चाहिए था। किन्तु रानी ने उसकी वीरता व जीवट का पूरा सम्मान करते हुए उसे क्षमा कर दिया। वह अपने अनुयायियों को भी ले आया। महारानी ने उन्हें सेना में भर्ती कर लिया। अँग्रेजों के साथ मुठभेड़ में पहली उल्लेखनीय शहादत सरदार सागरसिंह की थी। क्षमा का यह प्रसंग महारानी की उदारता, शौर्य-साहस को चार चाँद लगा देता है।

महमूद गजनबी ने भारत पर हमला किया। दिल्लीपति पृथ्वीराज ने उससे जमकर मोर्चा लिया व पराजित किया। क्षमा माँगने पर उसे छोड़ दिया गया। आक्रान्ता अपनी धूर्त्तता के बल पर फिर सेना लेकर आया, पराजित हुआ व फिर क्षमा माँगी। छूट गया। यही क्रम चलता रहा। यही क्षमा पृथ्वीराज के गले का फन्दा एवं बृहत्तर भारत के लिए आक्रान्ताओं का स्थायी मुकाम बन गयी। भारत को सैकड़ों वर्षों तक गुलाम बने रहना पड़ा।

अपराध दण्डनीय है, पर अपराधी यदि अंतर से सुधरने की इच्छा रखता है तो उसे मौका दिया जाय। क्षमा में खतरा भी है। यदि उसे दिशा न मिली व पुनः अपराध की ओर प्रवृत्त हो गया तो? इस बार तो काबू में आ चुका है, पुनः पकड़ा न गया तो? सुधार का अवसर दिए जाने को नाम पर धूर्त को स्वच्छन्द होकर समाज के लिए खतरा नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

इसीलिये क्षमा को वीरों के आभूषण के रूप में मान्यता दी गयी, जिसे वे विवेक के साथ धारण करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की उच्छृंखलता को उसके सौ बार गाली देने तक सहन किया। यही वचन वे अपनी बुआ को दे भी चुके थे। किन्तु उसकी दुर्मति जब सारी सीमाएँ लाँघ गई, राजसूय यज्ञ में उसने भगवान की लपेट में भीष्म पितामह आदि सब को ले लिया तो तुरन्त उसे मृत्यु की गोद में पहुँचा दिया। वीरता पर सबसे बड़ा दायित्व यह है कि वह निर्णय बुद्धि का समुचित प्रयोग करे। क्या वास्तव में परिवर्तन की संभावना है? यदि संभावना गलत निकली तो क्या वीरता स्वच्छन्द दुष्टता को पुनः पराजित करने की स्थिति में है? यदि इन दोनों प्रश्नों के उत्तर “विवेक” को हाँ में मिलते हैं, तो ही क्षमा का आभूषण वीरता को पहनाया जा सकता है। उद्धत अहंकार या अविवेक की स्थिति में क्षमा का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह नीति सूत्र है।

श्रीराम लंका पर चढ़ाई की तैयारी कर रहे थे। रावण का भाई मंत्रीपरिषद का वरिष्ठ सदस्य विभीषण उनकी शरण में आया। वानर योद्धाओं ने पकड़ कर शत्रु की तरह उसे अपने स्वामी के समक्ष प्रस्तुत किया। अब राम क्या करते हैं, सबकी दृष्टि इसी पर थी। क्षमा या दण्ड।

मर्यादा पुरुषोत्तम वीरोचित दूरदर्शिता का प्रयोग कर कहते हैं कि “विभीषण को शरणागत रूप में रहने दिया जाय। शत्रु पक्ष का या भेदिया समझकर दण्ड नहीं दिया जाय। यदि कोई चाल वह चलेगा ही तो उसे भाँपने योग्य दृष्टि हमारे पास है। घर में घुसकर आक्रमण करने का दुस्साहस करने वाली दुष्टता से जूझने योग्य सामर्थ्य भी हमारे पास है।”

श्रीराम की समीक्षा का कोई जवाब नहीं। यदि सुधरने का अवसर न दिया जाय तो इतिहास वीरता को लांछित करेगा, जिसमें खतरा उठाने का भी साहस नहीं था, यह जानने पर कि दुष्ट उदारता का दुरुपयोग करेगा, तब भी क्षमा का उपयोग दिमाग को दिवालियापन बताता है। वीर कहलाने की शेखी में क्षमा के ऐसे प्रयोग अंततः घातक फंदे साबित होते हैं। उचित-अनुचित समय पर क्षमा रूपी विभूति का क्या नियोजन किया गया यही विवेकशीलता की सच्ची परीक्षा है।


दर्पण के माध्यम से आत्म परिष्कार की साधना

पशु-पक्षियों और कीट, पतंगों की तुलना में अशिक्षित एवं अनगढ़ व्यक्ति भी कहीं अधिक साँसारिक जानकारियाँ संग्रह किये होता है। पर वे होतीं सब बाहरी क्षेत्र की ही हैं। अपने संबंध में प्रायः सभी महत्वपूर्ण जानकारियों से वह अनभिज्ञ ही रहता है। कुछ जानता भी है तो वह मात्र प्रयोगात्मक ही होता है। वस्तुस्थिति समझ सकने योग्य गहराई में प्रवेश पाना प्रायः उससे बन ही नहीं पड़ता। जो आँखें केवल सामने की हलचलों, स्थापनाओं को ही देख पाती हैं वे उलट कर भीतर कैसे देखें? गह्वर में कैसे प्रवेश करें? पर्दे के पीछे छिपी हुई यथार्थताओं को कैसे समझें?

त्वचा के भीतर किस अंग अवयव में क्या गड़बड़ है, उसे जानने के लिए टटोलना भर पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए कितने ही पैथालॉजीकल टेस्ट कराने पड़ते हैं। एक्सरेज तथा थर्मोग्राफी के माध्यम से अन्दर की स्थिति का मापन कर परिस्थितियों को समझा जाता है। यही बात मानव जीवन के अन्तराल पर भी लागू होती है। दूसरों की समीक्षा में प्रवीण अपनी निजी जाँच-पड़ताल में व्यक्ति उतनी ही असफल रहता है। समझा जाता है कि संसार भर में बुद्धि का परिमाण डेढ़ है। इसमें से एक अपने हिस्से में आई है और बाकी आधी से संसार के सब लोग मिल बाँट कर काम चलाते हैं। यही बात दोष, दुर्गुणों के संबंध में भी है। दो तिहाई दोष दूसरों में हैं और अपने में तो वे नगण्य सी मात्रा में हैं। इसी भ्रम में सारी दुनिया आकण्ठ मग्न है। अपने दोष और दूसरों के गुण तो किसी की समझ में आते ही नहीं।

किन्तु जब तक वस्तुस्थिति न समझी जाय, तब तक अवगति से उबरना और प्रगति पथ पर आगे बढ़ चलना सम्भव कैसे हो? सुधार परिष्कार यदि अभीष्ट हो तो उसके लिए आत्म-समीक्षा नितान्त आवश्यक है। यह बन पड़े तो ही परिमार्जन बन पड़े और उसी स्थिति में अभ्युदय के लिए आवश्यक सरंजाम जुटे।

इस प्रयोजन के लिए साधना क्षेत्र का एक सरल उपाय है-दर्पण का अवलम्बन। एक बड़ा-सा शीशा इसके लिए प्रयुक्त करना चाहिए। दर्पण ऐसा हो कि पालथी मार कर बैठने पर पूरा शरीर दीख सके। किन्तु दूरी अधिक न हो। ऐसे बड़े आकार का वह मिल सके तो सर्वोत्तम, अन्यथा छोटे साइज से भी काम चलाया जा सकता है। गरदन तक चेहरा साफ-साफ दीखे तो भी समझना चाहिए कि काम चल गया।

दर्पण में दीखने वाले अपने प्रतिबिम्ब को अपना नहीं अपने किसी निकटवर्ती घनिष्ठ संबंधी का मानना चाहिए और भाव यह रखना चाहिए कि इसकी त्रुटियों का परिमार्जन करना है। सत्प्रवृत्तियों के बीजाँकुर विकसित करना है। सही राह पर चलने से यदि भटकाव हो गया है, तो उसे यथार्थता समझा कर सही रास्ते लाया जाता है। जो सम्पदा पास में है, उसके सदुपयोग का अभिवर्धन का उपाय समझाया जाता है। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर अपना प्रतिबिम्ब गंभीरतापूर्वक देखा जाय और उसे समुन्नत सुसंस्कृत बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाय। आदर्शों की कसौटी पर जितनी खोट मिले, उसे सुधारने के लिए उपयुक्त प्रयास करने हेतु संकल्पित हुआ जाय।

सबसे बड़ी भूल आम आदमी से यह होती है कि वह अपने स्वरूप, जीवन के उद्देश्य और शरीर के साथ इसके प्रयोजन संबंध के बारे में जो समझना चाहिए, जिस प्रकार तालमेल बिठाने चाहिए उसे प्रायः पूरी तरह भूल जाता है। मनुष्य जीवन एक ऐसा सुयोग है, जो चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करने के उपरान्त एक बार अमानत के रूप में मिला है। यह सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। इसे सौंपा इसीलिए गया है कि निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति में उसका उपाय समग्र सतर्कता के साथ किया जाय। प्रसुप्त विभूतियों को जगाने के लिए तपश्चर्या का आश्रय लिया जाय। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को धोने के लिए आत्मशोधन का प्रबल प्रयास किया जाय। अपूर्णता को पूर्णता में बदला जाय। साथ ही सेवा, संवेदना को उभार कर अपने स्वभाव में अधिकाधिक पुण्य परमार्थ का समावेश किया जाय। मानव की गरिमा इसी में सन्निहित है कि वह संकीर्ण स्वार्थपरता के भव बंधनों से निकल कर लोक हित में जन कल्याण में-कितना निष्ठापूर्वक संलग्न होता है। सृष्टा के विश्व उद्यान को सींचने, सँजोने में कितनी तत्पर तन्मयता का परिचय देता है। जीवन के इस उच्च उद्देश्य को निबाहने में जो जिस सीमा तक सफल होता है, वह उसी सीमा तक मनुष्य जन्म को सार्थक बनाने में सफल होता है। इस सफलता का उपहार पुरस्कार उसे देव मानव बनने के रूप में और सब प्रकार भविष्य को उज्ज्वल बनाने के रूप में उपलब्ध करता है। शालीनता अपनाने के फलस्वरूप व्यक्ति अपने लोक और परलोक दोनों को सुधारता है। निजी क्षेत्र में उल्लास भरा संतोष, संपर्क क्षेत्र में सम्मान भरा सहयोग और दैवी क्षेत्र में अदृश्य अनुग्रह के रूप में उतना कुछ मिलता है जिससे कि तुष्टि, तृप्ति और शान्ति का-हर घड़ी उल्लास भरे आनन्द का-रसास्वादन किया जा सके।

दर्पण में दीख पड़ने वाले अपने परम आत्मीय छाया पुरुष से यही पूछना चाहिए। उसके उत्तर न देने पर भी अपनी तीव्र दृष्टि से यह परखना चाहिए कि इन प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर इसके पास है या नहीं? यदि नहीं तो उसे परम प्रिय होने के नाते इस हितैषिता की शिक्षा देनी चाहिए कि मृत्यु का कोई ठिकाना नहीं। बिस्तर किसी भी समय गोल करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में यही उचित है कि जो बीत गया, उसमें हुई भूलों के लिए पश्चाताप करते हुए शेष है, उसे श्रेष्ठतम बनाने के लिए इसी क्षण से मुड़ पड़ा जाय। समय को आलस प्रमाद में न बिताया जाय। यह वर्तमान ही है, जिसमें दिशा बदलने का काम अविलम्ब आरम्भ किया जा सकता है और तेजी से कदम बढ़ाते हुए निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।

माता बच्चे को गोद में उठाने से पहिले उसके शरीर से लिपटी हुई गंदगी को साफ कर लेती है। कीचड़ से, मल मूत्र से सने हुए व्यक्ति को कोई व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक पास नहीं बैठने देता। उससे वार्त्तालाप, व्यवहार करने से पूर्व यह चाहता है कि वह शुद्ध होकर आये। स्वच्छ घर, स्वच्छ पात्र, स्वच्छ परिधान, स्वच्छ शरीर सभी को सुहाता है, भगवान को भी। इसलिए प्रथम दृष्टि यही डाली जानी चाहिए कि गुण, कर्म, स्वभाव में कहाँ-कहाँ ऐसी दुष्प्रवृत्तियों का समावेश हो रहा है, जो मानवी गरिमा के अनुरूप नहीं हैं। इन्हें खोजने के लिए तनिक भी पक्षपात नहीं बरतना चाहिए। निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह स्वयं ही अपने छाया पुरुष की समीक्षा करनी चाहिए और उसका अतिशय शुभ चिन्तक परमप्रिय होने के नाते हित कामना से इतना दबाव देना चाहिए कि वह परामर्श मात्र सुनकर इस कान से सुने उस कान से न निकाल दे वरन् अभ्युदय की महत्ता समझने हुए अपने सुधार परिवर्तन के लिए सुनिश्चित संकल्प और सुदृढ़ संकल्प करे। यह प्रयास निरन्तर जारी रखा जाय, तो उसका प्रतिफल आश्चर्य जनक होता है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, बिल्व मंगल, जैसे कारण नहीं कि दर्पण में विराजमान अपना अभिन्न आत्म परिष्कार के द्वारा उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में निरत न हो सके।


हमेशा मुस्कराते रहो (Kahani)

आरम्भ में चन्द्रमा बहुत सुन्दर था। हर घड़ी हँसता रहता। चेहरा खिले कमल जैसा सुन्दर लगता। कुछ दिन बाद वह उदास रहने और खीजने लगा। अतएव कलाएँ घटने लगीं। चेहरा मुरझाने और सिकुड़ने तथा क्षीण होने लगा।

दिन बीतते गए। अमावस्या आते-आते वह काला कुरूप हो गया। कलाएँ समाप्त हो गई और अँधेरी कोठरी में दिन काटने लगा।

ब्रह्मा जी इस दुर्दशा को देखकर बोले मूर्ख! हँसना, मुस्कराना फिर आरम्भ कर। उसके बिना किसी की जिन्दगी पार नहीं होती। खीजने से तो बेमौत मरेगा।

चंद्रमा ने अपनी भूल सुधारी, उसने प्रसन्नता बिखेरना आरम्भ किया और बढ़ते-बढ़ते फिर पूर्णिमा को खिले कमल जैसा हो गया।


प्रेम पियाला जो पिये, सीस दच्छिना देय!

पौधों को जड़ों से खुराक न मिले और ऊपर से तेज धूप में झुलसना पड़े, तो उनका कुम्हला कर सूख जाना निश्चित है। भावनात्मक सरसता से अभिसिंचित होने का मनुष्य को अवसर न मिले तो वह नीरस होने लगता है, निराश और निष्ठुर भी। ऐसी मनःस्थिति में निर्वाह करना एक प्रकार का अभिशाप है। शरीर और निष्ठुर भी। ऐसी मनःस्थिति में निर्वाह करना एक प्रकार का अभिशाप है। शरीर से मनुष्य होने पर भी अन्तर से उसे श्मशानवासी भूतपलीत की स्थिति में रहना पड़ता है।

भावनाओं में प्रेम की उत्कृष्टता का समावेश करने के लिए लौकिक और आध्यात्मिक स्तर के अनेक प्रयोग जाने अनजाने किये जाते हैं, पर वे उत्कृष्टता की कसौटी पर खरे न उतरने के कारण आधे-अधूरे काने-कुबड़े होकर रह जाते हैं। सफलता के उस स्तर तक नहीं पहुँच पाते, जहाँ सहज सरसता का रसास्वादन उपलब्ध हो सके।

आत्म-कल्याण के लिए पूजा-अर्चा के अनेक विधि विधान अनेकों द्वारा अपनी-अपनी मान्यता, परम्परा के अनुरूप किये जाते हैं। किन्तु देखा गया है कि वे प्रगति पथ पर चल नहीं पाते। ऊब आने लगती है। चंचलता हैरान करती है। लकीर पीटने की तरह कुछ क्रिया कृत्य तो कर लिये जाते हैं पर न तो संतोष होता है और न आनन्द आता है। किसी प्रकार चिन्ह पूजा होती रहती है। इस अधूरेपन का एक ही कारण है कि उसमें भक्ति भावना का समावेश नहीं रहता। जिसकी पूजा की जा रही है, उसके साथ प्रेमाशक्ति नहीं जुड़ती।

यहाँ यह समझ लेने की आवश्यकता है कि प्रेम की प्रतीति यत्किंचित् उपहार देने या मनुहार करने मात्र से नहीं बन पड़ती। इसके साथ सेवा सहायता का पुट जुड़ा रहना आवश्यक है। भजन संस्कृत की भज्, धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है-सेवा। भजन पूजन उसी को कहना चाहिए, जिसके साथ सेवा साधना जुड़ी हुई है।

भगवान की सेवा सहायता क्या हो सकती है? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि उसके विश्व उद्यान को हरा-भरा फला-फूला बनाने के लिए सृष्टा का हाथ बँटाना सेवक का एक ही कृत्य होता है। स्वामी के कार्यों में हाथ बँटाना, उसकी मर्जी के अनुरूप मनोयोग पूर्वक श्रम करना। भजन पूजन अच्छी बात है, पर वह मात्र कर्मकाण्डों तक सीमित नहीं होना चाहिए। नियन्ता की दृष्टि बड़ी पैनी है। वह अन्तरंग की भक्ति भावना को प्रेम साधना को परखता है। वह यह नहीं देखता कि उसकी प्रतिमा को निखारने, पखारने में कितना श्रम किया गया। विधि विधान में कितना समय लगाया गया। प्रेम का अर्थ है प्रिय पात्र की आवश्यकता को पूरा करना। इसका दुहरा लाभ है, जहाँ प्रिय पात्र को अपने काम में हाथ बँटाने की प्रसन्नता होती है, वहाँ सेवाधर्मी-प्रेम पुजारी को भी कम आनन्द नहीं होता। प्रेम जहाँ भी प्रकट होता है, वहाँ हरीतिमा लहलहाती और उल्लासदायिनी सुगंध भर जाती है। निर्झर जहाँ से भी फूटता उमँगता है, वहाँ दूर-दूर तक शीतलता सरसता, हरीतिमा उभर उठती है। यही बात प्रेम के संबंध में है। जब वह ईश्वर के माध्यम से उगता उठता है तब उसे भक्ति कहते हैं। उच्चस्तरीय प्रेम का नाम ही भक्ति है। उसमें प्रिय पात्र के साथ इतनी घनिष्ठता होती है कि बिना सेवा सहायता किये मन का समाधान ही होती है कि बिना सेवा सहायता किये मन का समाधान ही नहीं होता। जिसने प्रेम को अपनाया वह न तो नीरस रह सकता है, न निष्ठुर, न निराश, अपनी मनःस्थिति ही उसे उल्लास में डुबोये रहती है।

लौकिक प्रेम का सर्वोत्तम स्वरूप तो सत्प्रवृत्ति संवर्धन, लोक मानस के परिष्कार जन-जागरण, तथा असमर्थ, विपत्तिग्रस्तों की सेवा सहायता करने में ही है। इसमें व्यक्ति विशेष से लगाव नहीं होता, वरन् परिस्थितियों को सुधारने में मन उल्लसित रहता है। ऐसे अवसर कहीं भी कभी भी मिल जाते हैं। सेवा के लिए सुविस्तृत क्षेत्र खुला पड़ा है। दृष्टि पसारते ही ऐसे अगणित व्यक्ति आस-पास ही दीख पड़ते हैं, जिन्हें उठाये जाने की, बढ़ाये जाने की आवश्यकता है। निस्वार्थ भाव से अपने से पिछड़े लोगों का ऐसा एक बड़ा समुदाय अपने इर्द-गिर्द ही मिल सकता है, जिन्हें साधन सहयोग की ही तरह दृष्टिकोण को परिष्कृत करने वाले परामर्श की आवश्यकता है। किसी के माँगने पर ही सहयोग उपलब्ध कराया जाय, इसकी प्रतीक्षा में बैठे रहने की जरूरत नहीं। जहाँ भी अपनी पहुँच है वहाँ पिछड़ेपन को सहज ही सुधारा जा सकता है और इस प्रकार का प्रयत्न किया जा सकता है कि बिना अपना अहंकार जताये, बिना अहसान दिखाये, अपनी सम्भव सेवा प्रस्तुत की जा सके, इस प्रकार की प्रक्रिया जब जिस मात्रा में जिस भाव संवेदना के साथ प्रस्तुत की जा सके। समझना चाहिए कि वहाँ उतनी ही भक्ति बन पड़ी और उस आधार पर दैवी अनुकम्पा की सम्भावना बढ़ी।

व्यक्ति विशेष से राग-द्वेष प्रायः स्वार्थ सिद्धि अथवा अड़चन के कारण उत्पन्न होता है। जिससे अपना मतलब सधता है, या साधने के आशा होती है, वही प्यारा लगता है। जो सहमत, सहायक नहीं होता उसकी अपेक्षा होने लगती है। कभी-कभी तो विरोध विग्रह भी खड़ा हो जाता है। यह प्रक्रिया लोक व्यवहार में आये दिन चलती रहती है। आज के मित्र कल शत्रु, आज के शत्रु कल मित्र बनते रहते हैं। यह स्वार्थ सिद्धि के उतार-चढ़ाव की विडम्बना मात्र है।

प्रेम के साथ आदर्शों का जुड़ा रहना आवश्यक है। उसमें प्रिय पात्र की इच्छा पूर्ति का नहीं हित-कामना का पुट रहता है। पत्नी से यदि सच्चा प्यार है, तो तत्काल यह विचार उठेगा कि उसका हित साधन किसमें है। जो दूरदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरता हो उसी निर्धारण को क्रियान्वित किया जाना चाहिए। भले ही इसमें अपनी ललक-लिप्सा पर अंकुश लगाना पड़ता हो। स्पष्ट है कि कामुकता का आवेग सच्चे प्रेम की किसी भी प्रकार पूर्ति नहीं करता। इस उत्साह के अतिवाद में पत्नी को अनेकों रोग लग जाते हैं। उसके शरीर को असाधारण क्षति पहुँचती है और यौवन की स्थिरता सुन्दरता, दीर्घायुष्य में भारी कमी पड़ती है। इच्छा की पूर्ति में नहीं हित साधना में प्रेम की गहराई और वास्तविकता सन्निहित है।

मित्रों से, सम्बन्धियों से, परिजनों से, अधिक सान्निध्य रहने के कारण घनिष्ठता बढ़ती है। साथ ही प्रेम भाव का भी रिश्ता बनता है। यह प्रकृति प्रेरणा है। पशु, पक्षी भी साथ-साथ रहने पर एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते और सान्निध्य में प्रसन्नता व्यक्त करते हैं मनुष्यों के बीच भी यह प्रवृत्ति पाई जाती है। किन्तु यह सामयिक मित्रता है।

जहाँ आदर्श साक्षी है, वहाँ छाँव भले ही ध्यान से उतर जाय, पर कर्त्तव्य सदा सुस्थिर बने रहते हैं। अग्निकाण्ड, दुर्भिक्ष, महामारी, बाढ़, भूकम्प जैसी दुर्घटनाओं का समाचार मिलते ही दयालू, कर्त्तव्यपरायण उनकी सेवा सहायता हेतु दौड़ पड़ते हैं। बदले में कुछ अपेक्षा नहीं रखते। इस कर्त्तव्य प्रेम को ही सच्चा प्रेम कहते हैं। उसमें दयालुता और आदर्शवादिता जो जुड़ी होती है।


भगवान की भक्ति (Kahani)

मैं तो इतने दिनों से भगवान की भक्ति कर रही हूँ-एक स्त्री ने सन्त को बताया, पर मुझे तो आज तक उन्होंने कभी स्वप्न में भी दर्शन नहीं दिये। आप कहते हैं कि वे आप से कभी अलग नहीं होते? बात यह थी कि वह स्त्री भक्ति तो करती थी, पर अपने परिवार, पड़ौसी और संबंधियों सबके साथ उसका व्यवहार बहुत रूखा और अहंकार पूर्ण था। घर वाले भी उसके आचरण से दुःखी थे।

सन्त बोले-”आज भगवान से पूछकर बतायेंगे, आपसे क्यों नहीं मिलते।” दूसरे दिन स्त्री मिली तो वह बोले-भाई भगवान तुम पर नाराज हैं, कह रहे थे वह हमारे बच्चों से लड़ती-मारती-पीटती और द्वेष रखती है, उससे मिलने का मन नहीं करता।

स्त्री समझ गयी। उस दिन से उसने अपना व्यवहार मीठा बना लिया। फलस्वरूप दूसरे लोग उसे इतना प्यार और आदर देने लगे कि वह उस शान्ति में ही भगवान की उपस्थिति अनुभव करने लगी।


साधनाएँ फलीभूत क्यों नहीं होतीं?

जीव विज्ञान के अनुसार मनुष्य को बन्दर जाति का एक प्राणी माना गया है। पर उसके अन्तराल में परमात्मा ने इतनी विशिष्ट शक्तियों का जखीरा भर रखा है, कि उसे सृष्टि का मुकुटमणि कहा जाना बहुत अंशों में सही है। शरीर संरचना में प्रयुक्त हुए असंख्यों जीवकोशों में से प्रत्येक घटक ऐसा है जो नन्हें-नन्हें गोलक जैसे प्रतीत होते हुए भी असाधारण क्षमता सम्पन्न हैं। पदार्थ के परमाणु का वैज्ञानिक विधि से नाभिकीय विस्फोट करने पर उससे निकलने वाली प्रचण्ड ऊर्जा समूचे क्षेत्र को प्रभावित करती है। ठीक इसी प्रकार जीवकोशों की सम्मिलित शक्ति भी एक आयन मण्डल बनाती है, जिसे अंग्रेजी में ‘आँरा’ कहते हैं और संस्कृत में स्थूलतः तो प्रायः एक जैसा ही दिखता है। उनमें रंगों भर का अन्तर पाया जाता है। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो उसमें रंगों का ही नहीं, शक्ति का भेद भी पाया जाता है। इसमें जैव चुंबकत्व के गुण भी होते हैं।

मोटे तौर से बिजली दो प्रकार की होती है। एक खींचने वाली, दूसरी धकेलने वाली। प्रकारान्तर से इसे उसका गुण कह सकते हैं। इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म के रूप में यह दूसरों के शरीर, मन आदि को अपनी ओर आकर्षित करती है। धक्का मारने वाली दूसरी शक्ति त्रास पहुँचती है। यह जैव विद्युत सामने वाले को तोड़ती व पतन के गर्त्त में गिरा देती है। माँत्रिकों और ताँत्रिकों में यही भेद होता हैं वेद मंत्रों की दिव्य ध्वनियों का गुँजन मनुष्य को मोहित, झंकृत, प्रसन्न और प्रफुल्लित करता है। इससे शक्ति, बलिष्ठता मिलती है, जिससे वह आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में ऊँचा उठता व आगे बढ़ता है।

शक्ति के आदान-प्रदान का यह क्रम मित्रों, बालकों अभिभावकों के बीच भी चलता है, पर सबसे अधिक सामर्थ्य गुरु के शक्तिपात में होती है। जिसने तप साधना द्वारा अपने में शक्ति का भण्डार एकत्रित किया है, वह उसका अनुदान भी किसी को दे सकता है। जिसकी कमाई का आधार रोटी भर है, अपना खर्च ही मुश्किल से चला पाता है, वह क्या किसी को दे सकता है? लिया तो किसी से, कहीं से भी जा सकता है किन्तु दे पाना उन्हीं के लिए संभव है, जिनके पास कुछ जमा पूँजी हो। यह जमा पूँजी अध्यात्म क्षेत्र में तप साधना, संयम, सेवा के आधार पर ही कमाई गई होती है। अपने को पवित्र बनाकर, अनगढ़ से सुगढ़ बनाकर मनुष्य निरोग बनता है और पुण्य की प्रखरता से बलिष्ठ बनता है। यों साधना में जप-तप भी करना पड़ता है। किन्तु सबसे बड़ी बात है आत्मशोधन, स्व का परिष्कार-परिमार्जन। यह सब जितना अधिक और गहरा बन पड़ता है, मनुष्य उतना ही गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से शक्तिशाली होता जाता है। जो विभूतिवान है, वही किसी को कुछ दे भी सकता है। अन्यथा बहकाने वाले बाजीगर और ठग तो गली कूचों में रंग-बिरंगे कपड़े पहने, बड़ी जटाएँ रखे या सिर घुटाये कहीं भी जाल बिछाये चिड़िया पकड़ते देखे जा सकते हैं।

साधना का पूरा अर्थ है-जीवन साधना। इस प्रयोजन के लिए जहाँ अपने गुण, कर्म, स्वभाव की देखभाल की जाती है, वहाँ साथ ही उस प्रसंग से जुड़े हुए कर्मकाण्डों का भी अभ्यास करना पड़ता है। इस प्रकार व्यक्तित्व एक विशेष ढाँचे में ढल जाता है। उसका जैसा भी चाहे भला-बुरा प्रयोग हो सकता है। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त जुड़ा हुआ है। पर साथ-साथ यह शर्त भी जुड़ी हुई है कि व्यक्ति ने अपना समग्र जीवन तद्नुकूल बना लिया हो।

ताँत्रिक प्रयोगों के कर्त्ता अभिचार स्तर के निकृष्ट कार्य करते हैं। उन्हें अपनी चर्या में “मद्यं मासं च मींन च मुद्रा, मैथुन एवं च” जैसे अनैतिक कृत्य करते हुए व्यक्तित्व को उसी ढंग से ढालना होता है। इसके अतिरिक्त श्मशान साधना शव साधना जैसे घिनौने कलापों में निरत रहना पड़ता है। कालिक, अघोरी भी प्रायः ऐसा ही करते हैं। इससे उनकी आत्माएँ उचित-अनुचित का भेद करने में असमर्थ हो जाती हैं। आत्म प्रताड़ना के कारण जो वैसा नहीं कर पाते, उनकी ताँत्रिक साधना भी सफल नहीं होती, ऐसा कहा जाता है। दूसरों को मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण आदि कृत्यों के द्वारा हानि पहुँचाने से पूर्व अपने आपको जघन्य कृत्यों को करते समय घृणा, जुगुप्सा न करने की स्थिति में ढालना होता है। यही बात दक्षिण मार्गी, सदाशयता पर, धर्मोपदेश देने वालों पर भी लागू होती है। सत्कर्म करने वालों को अपना जीवन भी साधना, संयम, स्वाध्याय, सेवा आदि का माध्यम अपना कर भीतर के देवत्व को जगाना पड़ता है। शाप-वरदान देने की सामर्थ्य के मूल में मात्र अभिचार कृत्य ही काम नहीं करते, कर्मकाण्ड ही काम नहीं दे जाते वरन् अपने जीवन का ढाँचा भी तद्नुकूल ही विनिर्मित करना पड़ता है।

कर्मकाण्ड अपना कथित प्रतिफल दिखा सकने में तभी समर्थ होते हैं, जब कर्त्ता का जीवन व्यवहार उस ढाँचे में ढला हुआ हो। इसलिए जहाँ विभिन्न प्रकार की साधनाओं के विधि विधानों और उनके माहात्म्यों का वर्णन है, वहाँ यह बात भी समझनी चाहिए कि साधक को अपनी जीवन चर्या का रूप भी वैसा ही ढाँचे में ढालना पड़ता है। यह उपचार विज्ञान का प्राण है और कर्मकाण्ड प्रयोग उसका कलेवर। प्राण रहने पर ही कलेवर का महत्व है।

व्यक्तित्व के अनुरूप ही सफलता प्रदान करने वाली अन्य विशेषताओं की भी अभिवृद्धि होती है। आध्यात्मिक क्षेत्र की भाँति ही भौतिक क्षेत्र में भी कितने ही प्रगति मार्ग हैं। उनका द्वार सभी के लिये खुला है। पर हर कोई उसे समझ या कर नहीं पाता। इसमें अभ्यास का अभाव ही प्रधान कारण रहता है। विद्वान, धनवान, प्रतिभावान बनने के लिए व्यक्ति को परिश्रमी, परिस्थितियों को समझने वाला मृदुभाषी तथा गुत्थियों को सुलझाने की सूझ-बूझ वाला होना चाहिए। यह सद्गुण किसी में अनायास ही प्रकट नहीं हो जाते, वरन् अभ्यास का सिलसिला जारी रखना पड़ता है। कुछ ही दिन प्रयास चला कर बन्द कर देने पर जो लोग थोड़ा अभ्यास करके छोड़ देते हैं, उनका स्वभाव उस ढाँचे में ढल नहीं पाता और उथले प्रयत्न परिस्थितियों के दबाव में ऐसे ही बिखर जाते हैं।

मनुष्य एक विशेष प्रकार का चुम्बक है, विधाता का बनाया हुआ। साधारण चुम्बक की अपेक्षा उसमें यह एक अतिरिक्त विशेषता है कि उसे जिस भी स्तर का बनाना हो, उस स्तर का बनाया जा सकता है और इस विश्व में विद्यमान किसी भी भली बुरी क्षमता को खींचकर अपनी ओर खींचा और धारण किया जा सकता है। व्यक्ति यों प्रत्यक्षतः अकेला ही होता है, पर उसके साथ इतनी विशेषताएँ, आकर्षक क्षमताएँ जुड़ी होती हैं कि वह जिस स्तर की वस्तुओं को साधनों को चाहे, अपने समीप एकत्रित कर सकता है। उसी स्वभाव वाले समधर्मी मनुष्यों एवं प्राणियों से भी घनिष्ठता स्थापित कर सकता है।

यह सही है कि कर्मकाण्डों में अपनी शक्ति है। यंत्र-तंत्र अपने प्रतिफल देते हैं। शास्त्रोक्त प्रतिफल जरूर मिलते हैं। किन्तु मात्र उन्हीं का विधि विधान सीख लेने से प्रयोक्ता कोई उपयुक्त फल उत्पन्न नहीं कर सकता। भक्ति मार्ग में भी यह बात लागू होती है। कर्म मार्ग में भी-व्यवसाय में भी-और व्यवहार में भी-सफलता का यही सारभूत तथ्य है कि जिस भी दिशा में अग्रसर होना हो, उस स्तर की विभूतियाँ और विशेषताएँ अपने में उत्पन्न एवं परिपक्व करनी चाहिए। इस क्षेत्र में कोई किसी प्रकार का शार्टकट सिद्धान्त लागू नहीं होता।


तपश्चर्या का आश्रय

तपाने से ही मिट्टी के बर्तन पकते और मजबूत होते हैं। धातुएँ भट्ठी में शोधी जाती हैं। पानी को भाप में उबालने से शक्तिशाली भाप बनती और रेल के इंजन तक चलाती है। बहुमूल्य रस भस्में अग्नि संस्कार से ही बनती हैं। अण्डा गर्मी में पकता है। सुपाच्य भोजन बनाने के लिए चूल्हा गरम करना पड़ता है। मनुष्य को संचित कुसंस्कारों को जलाना और प्रखरता उत्पन्न करने के लिए तपश्चर्या का आश्रय लेना पड़ता है। मनोबल बढ़ाने के लिए इस उपचार की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है।


ईसाई धर्म की जड़ें गहरी कैसे जमीं!

धर्म संस्थापकों एवं प्रचारकों में ईसा का अपना अनोखा स्थान है। उनकी जीवनी पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि उन्होंने पारलौकिक, काल्पनिक लाभों की विवेचना में अपना बहुत समय नहीं लगाया और न उस संबंध में विशेष रूप से प्रवचन परामर्श ही दिये वरन् सामयिक प्रचलनों में जो दुष्प्रवृत्तियाँ भरी पड़ी थी उनके विरुद्ध उन्होंने जनमानस को जगाया और संपर्क क्षेत्र में प्रभावित लोगों को उन बुराइयों से बचने और जूझने की प्रेरणायें दीं।

यही कारण था कि रूढ़िवादी प्रतिगामी, अनाचारी वर्ग के लोग उन्हें तरह-तरह की धमकियाँ देते रहे और भर्त्सना भरा विरोध भी करते रहे। यों उनने अपनी ओर से ऐसा कुछ नहीं किया था, जिससे दूसरों को चोट पहुँचती हो, पीड़ा पहुँचती हो। नम्रता और सज्जनता को भली प्रकार अपनाये रहने वाला व्यक्ति ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता, जिसमें आक्रमण, प्रतिशोध एवं द्वेष का समावेश हो, ईसा का व्यक्तित्व इन सभी दोष दुर्गुणों से बचा हुआ था। उनका आचार, व्यवहार ऐसा नहीं था जिसमें जादू चमत्कारों का समावेश करके लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की कला का समावेश हो। उन्होंने लोक सेवा का व्रत अपनाया और उसी में आजीवन लगे रहे।

ईसाई धर्म के आदि संस्थापक महाप्रभु ईसा अत्यन्त निर्धन और विपन्न स्थिति में जन्मे। कुमारी माता के पेट से जन्मने के कारण वे लोकापवाद का निमित्त कारण भी बने हुए थे। अतः बचपन में माता-पिता के साथ जहाँ-तहाँ घूमना पड़ा। इन विपन्न परिस्थितियों में उन्हें शिक्षा की सुविधा न मिली। सुख सुविधा के साधन तो ऐसी दशा में मिलते ही कहाँ से? समझा जाता है कि उन्हीं कारणों से व्यक्ति सरलतापूर्वक उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचते हैं। ईसा इसके अपवाद थे। उन्होंने अपनी सत्यनिष्ठा व्रतशीलता, सादगी, मिलनसारी और सेवा भावना के आधार पर संपर्क क्षेत्र की जनता के मन में असाधारण स्नेह और सद्भाव के अंकुर उगाये।

ईसा ने धर्म प्रचार के लिए लम्बी यात्राएँ नहीं की। वे अपने जन्म स्थान से प्रायः दो सौ मील की परिधि में ही क्रियारत रहे। सत्य-अहिंसा जैसे उच्च आदर्शों के प्रति उनके अन्तराल में इतनी गहरी निष्ठा थी कि उनके द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कार्य अनुकरणीय एवं अभिनन्दनीय ही होता था। उनका चरित्र बोलता था। वाणी के हर शब्द से शालीनता ही टपकती थी। उसे जो भी सुनता प्रतिपादनों को स्वीकार करने की तुलना में उनके व्यक्तित्व का अनन्य भक्त बन जाता।

ईसा पारिवारिक झंझटों में नहीं फँसे। उनने माता-पिता को भी स्वावलम्बी जीवन के लिए समुचित दबाव देकर तैयार किया। विवाह की बात उनने सोची ही नहीं। इतना अवकाश भी न था कि परिवार के निर्वाह के लिए अनेकानेक आवश्यकताओं को जुटाते रहें। और साथ ही वंश वृद्धि का कुम्हार जैसा चाक घुमाते रहें।

उन दिनों संसार के अन्य प्रदेशों की तरह ईसा के कार्यक्षेत्र में भी नशेबाजी का बोलबाला था। उस कुटेव से बाल-वृद्ध सभी ग्रसित थे। ईसा ने इस दुष्प्रवृत्ति के कारण होने वाली हानियों का इस भाव संवेदना के साथ प्रचार किया कि अभ्यस्त आदमियों में ऐसे भी असंख्यों थे जिन्होंने अपनी उस कुटेव को सदा सर्वदा के लिए छोड़ देने का साहस दिखाया। यह समझदारी एक से दूसरे को पकड़ती गई और नशेबाजी के विरुद्ध एक समर्थ मुहीम खड़ी हो गई।

सामन्ती अधिनायकवाद में आये दिन लड़ाइयाँ होती थी। उनका कारण कोई समस्यापरक न था। लुटेरों का गिरोह बना कर समीपवर्ती क्षेत्र पर वे अधिनायक चढ़ दौड़ते थे जो राजा-प्रजा की सम्पदा को मार काट का आतंक मचाते हुए लूट लेते थे। इसी में युवकों और युवतियों को पकड़ लाना भी एक काम था। यह पकड़े हुए युवक-युवती सारे बाजार जानवरों की तरह बेचे जाते थे। गुलाम प्रथा का बोलबाला था। पालतू पशुओं जैसा काम उनसे लिया जाता था। इस कुप्रचलन के विरुद्ध भी ईसा ने वातावरण तैयार किया। गुलामों को आजाद करने और दूसरों से कराने का कार्य ईसा ने जन साधारण का भाव संवेदन जगाकर ही बहुत हद तक पूरा कर लिया था, जबकि बिना विद्रोह किए आक्रमण का जवाब आक्रमण में देने के अतिरिक्त सामान्य जनों को कोई और उपाय सूझ नहीं पड़ रहा था। ईसा का भावनात्मक उभार उन कठोर तरीकों की अपेक्षा कहीं अधिक कारगर सिद्ध हुआ।

रोगियों की, पीड़ितों की, सताये हुए लोगों की, सेवा करने में, उनके घावों पर मरहम लगाने की उन्हें व्यावहारिक औपचारिक ही नहीं भावनात्मक क्रिया प्रक्रिया का भी उन्हें ज्ञान था। अपनी इस विभूति का उन्होंने भरपूर प्रयोग किया। रोगी उनके पास दौड़ते हुए चले आते वे जहाँ उनकी दयनीय दुर्दशा सुन पाते, दौड़े जाते। जो उपाय सूझता, उसे करते। श्रद्धा विश्वास की अपनी प्रतिक्रिया प्रकट होती। प्रयोक्ता की करुण भरी सेवा भी अपना चमत्कार दिखाती। इसका परिणाम यह होता कि उनके संपर्क में आने वालों में से अधिकाँश रोग मुक्त हो जाते। जो लाभान्वित होते, वे दूसरों से प्रशंसा करते। फल स्वरूप उस सेवा भरी चिकित्सा परिचर्या, की ख्याति फैलती गई और वे “मसीहा” (त्राता) समझे जाने लगे। अगणित व्यक्ति थोड़े ही समय में उनके अनुयायी बन गये। यों विधिवत् दीक्षा लेने वालों में से तो थोड़े से ही व्यक्ति थे। उनमें से भी एक ने लोभ वश धोखा दिया और झूठी चुगली करके जेल में बन्द करवा दिया।

उन्होंने अमीरों को गरीबों की तरह रहने के लिए सहमत किया और अपनी दौलत वहाँ लगाने के लिए उद्यत किया, जहाँ कि उसकी आवश्यकता थी। अमीर और गरीब के बीच के भेदभाव, की किस प्रकार अभिलाषा भड़कती है और ईर्ष्या का दौर पड़ता है। यह दोनों ही पक्षों के लिए हानिकारक है। वजन से लदा हुआ जानवर जिस प्रकार दबता खिंचता और कराहता हैं उसी प्रकार दौलत जिस पर लदती है, उसको चिन्ताओं-व्यसनों में डुबा देती है। इसलिए उसका विपरीत करते रहना ही उत्तम है। ईसा के इन प्रवचनों ने जादू जैसा काम किया और व्यस्त लोगों को स्वार्थ प्रयोजनों में जकड़े हुए लोगों को धर्म परायण और लोक सेवी बना दिया।

ईसाई पादरियों और महिला ननों की परम्परा ईसा की उसी शिक्षा का प्रतिफल है। इन दिनों इन दोनों प्रकार के धर्म प्रचारकों की संख्या लाखों में है। वे विश्व के कोने-कोने में फैले हुए हैं। उनने पिछड़े दरिद्र लोगों के बीच डेरे डाले हैं। उन्हें शिक्षित और सुयोग्य बनाने के लिए भरपूर काम किया है। जो जहाँ बैठा, वह वहाँ मन लगाकर जड़े जमाकर रहा है। ईसाई धर्म की वर्तमान प्रगति का यही कारण है। उसका उत्थान न राजाश्रय से हुआ न डरा धमका कर धर्म-परिवर्तन के लिए विवश किया गया। इतने पर भी विस्तार होने की तूफानी गति को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इन धर्म प्रचारकों के निजी जीवन की पवित्रता और उपदेशों के सेवा सहायता का समावेश वह तथ्य है जिसके कारण लोगों के मनों में उस क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं के प्रति गहरी सहानुभूति है। भले ही वे उनके धर्म में दीक्षित न हुए हों। विज्ञ समाज में ईसा का ईश्वर पत्र होना और समुदाय में प्रवेश करने वालों के पाप ओढ़ना उतना प्रामाणिक नहीं है जितना कि संयम और सेवा की परम्परा का क्रियान्वयन। किसी भी धर्म सम्प्रदाय संस्कृति के प्रतिपादकों का निजी जीवन कैसा होना चाहिए यह ईसा के उदाहरण से सीखा जा सकता है।


मिल बाँट कर खाने का आनंद (kahani)

उस दिन ईसा शिष्य मण्डली समेत किसी प्रचार यात्रा पर जा रहे थे। रात्रि हो गई। भोजन का सुयोग न बना। ईसा ने कहा-तुम सब के पास जो है इकट्ठा कर लो और उसी से मिल बाँट कर काम चलाओ।

पाँच रोटी इकट्ठी हुई। मिल बाँटकर खाई गई। हिस्से में आधी-आधी भी न आई। तो भी सब को पेट भर गया। सोलोमन ने पूछा-महाप्रभु यह कैसा आश्चर्य? इतने कम में इतनी तृप्ति कैसे?

ईसा ने कहा-यह मिल बाँट कर खाने का चमत्कार है।


वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं अब परब्रह्म की सत्ता को

नास्तिकवादियों का कथन यह है कि “इस संसार में ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं, क्योंकि उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष उपकरणों से सिद्ध नहीं होता। अनीश्वरवादियों की मान्यता है कि जो कुछ प्रत्यक्ष है, जो कुछ विज्ञान सम्मत है, केवल वही सत्य हैं। चूँकि वैज्ञानिक आधार पर ईश्वर की सत्ता का प्रमाण नहीं मिलता इसलिये उसे क्यों मानें, यह उनका तर्क है।

इस प्रतिपादन पर विचार करते हुए हमें यह सोचना होगा कि अब तक जितना वैज्ञानिक विकास हुआ है, क्या वह पूर्ण है? क्या उसने सृष्टि के समस्त रहस्यों का पता लगा लिया है? यदि विज्ञान को पूर्णता प्राप्त हो गई होती तो शोध कार्यों में दिन-रात माथा पच्ची करने की वैज्ञानिकों को क्या आवश्यकता रह गई होती?

सच बात यह है कि विज्ञान का अभी अत्यल्प विकास हुआ है। उसे काफी कुछ जानना बाकी है। कुछ समय पहले तक भाप, बिजली, पेट्रोल, एटम, ईथर आदि की शक्तियों को कौन जाता था? पर जैसे-जैसे विज्ञान में प्रौढ़ता आती गई यह शक्तियाँ खोज निकाली गई। यह जड़ जगत की खोज हैं। चेतन जगत सम्बन्धी खोज तो अभी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। बाह्य मन और अंतर्मन की गतिविधियों की शोध से ही अभी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं है। यदि हम अधीर न हों तो आगे चलकर जब चेतन जगत में मूल तत्वों पर विचार कर सकने की क्षमता मिलेगी तो आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व भी प्रमाणित होगा। ईश्वर अप्रमाणित नहीं है। हमारे साधन ही स्वल्प हैं जिनके आधार पर अभी उस तत्व का प्रत्यक्षीकरण सम्भव नहीं हो पा रहा है। परमसत्ता के अनुशासन को मानने से क्या प्रतिक्रिया जीवन में होती है, यह स्वयं में प्रत्यक्ष प्रमाण है।

पचास वर्ष पूर्व जब साम्यवादी विचारधारा का जन्म हुआ था, तब वैज्ञानिक विकास बहुत स्वल्प मात्रा में हो पाया था। उन दिनों सृष्टि के अन्तराल में काम करने वाली चेतन सत्ता का प्रमाण पा सकना अविकसित विज्ञान के लिए कठिन था। पर अब तो बादल बहुत कुछ साफ हो गये हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मनीषियों के लिए चेतन सत्ता का प्रतिपादन कुछ कठिन नहीं रहा है। आधुनिक विज्ञानवेत्ता ऐसी संभावना प्रकट करने लगे हैं कि निकट भविष्य में ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक आधार पर भी प्रमाणित हो सकेगा। जो आधार विज्ञान को अभी प्राप्त हो सके हैं, वे अपनी अपूर्णता के कारण आज ईश्वर का प्रतिपादन कर सकने में समर्थ भले ही न हों पर उसकी संभावना से इनकार कर सकना उनके लिए भी शक्य नहीं है।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जॉन रिचर्डसन ने लिखा है-”विश्व की अगणित समस्यायें तथा मानव की मानसिक प्रक्रियाएं वैज्ञानिक साधनों, गणित तथा यंत्रों के आधार पर हल नहीं होती। भौतिक विज्ञान से बाहर भी एक अत्यन्त विशाल दुरूह, अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के लिए कोई दूसरा साधन प्रयुक्त करना पड़ेगा। भले ही उसे अध्यात्म कहा जाय या कुछ और?”

विख्यात विज्ञानी डॉ. हाइज़ेनबर्ग का कथन है कि-”जो चेतना इस सृष्टि में काम कर रही है, उसका वास्तविक स्वरूप समझने में अभी हम असमर्थ हैं। इस संबंध में हमारी वर्तमान मान्यतायें अधूरी अप्रामाणिक और असंतोषजनक हैं। अचेतन अणुओं के अमुक प्रकार के मिश्रण के चेतन प्राणियों में काम करने वाली चेतना उत्पन्न हो जाती है, यह मान्यता संदेहास्पद ही रहेगी।”

विज्ञान अब धीरे-धीरे ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने की स्थिति में पहुँचता जा रहा है “जान स्टुअर्ट मिल” तथा काण्ट का कथन सच्चाई के बहुत निकट है कि-”विश्व की रचना में प्रयुक्त हुई नियमबद्धता और बुद्धिमत्ता को देखते हुए ईश्वर की सत्ता स्वीकार की जा सकती है। मिल, हेल्स, होल्टस, लाँग, हक्सले, काम्टे आदि वैज्ञानिकों ने ईश्वर की असिद्धि के बारे में जो कुछ लिखा है वह अब बहुत पुराना हो गया है, उनकी वे युक्तियाँ जिनके आधार पर ईश्वर का खण्डन किया जाया करता था, अब असामयिक होती जा रही हैं। डॉ. फिलन्ट ने अपनी पुस्तक “थीइज्म” में इन युक्तियों का वैज्ञानिक आधार पर ही खण्डन करके रख दिया है।

भौतिक विज्ञान का विकास आज आशाजनक मात्रा में हो चुका है। यदि विज्ञान की यह मान्यता सत्य होती कि “अमुक प्रकार के अणुओं के अमुक मात्रा में मिलने से चेतना उत्पन्न होती है” तो उसे प्रयोगशालाओं में प्रमाणित किया गया होता। कोई कृत्रिम चेतन प्राणी अवश्य पैदा कर लिया गया होता, अथवा मृत शरीरों को जीवित कर लिया गया होता। यदि वस्तुतः अणुओं के सम्मिश्रण पर ही चेतना का आधार रहा होता तो मृत्यु पर नियंत्रण करना मनुष्य के वश के बाहर की बात न होती।

विज्ञान का क्रमिक विकास हो रहा है। उसे अपनी मान्यताओं को समय-समय पर बदलना पड़ता है। कुछ दिन पहले वैज्ञानिक लोग पृथ्वी की आयु केवल सात लाख वर्ष मानते थे और भारतीय ज्योतिर्विदों की उस उक्ति का उपहास उड़ाते थे, जिसके अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 17 करोड़ वर्ष मानी गई है। अब रेडियम धातु तथा यूरेनियम नामक पदार्थ के आधार पर जो शोध हुई है उससे पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब सिद्ध हो रही है और वैज्ञानिकों को अपनी पूर्व मान्यताओं को बदलना पड़ रहा है। ऐसी अनेक मान्यताएँ हैं, जिन्हें चार वर्षा में “रिसर्च” के बाद बदला जा रहा है।

विज्ञान के सृष्टि के कुछ क्रिया-कलापों का पता लगाया है। क्या हो रहा है? इसकी कुछ जानकारी उन्हें मिली है। पर कैसे हो रहा है? क्यों हो रहा है? यह रहस्य अभी भी अज्ञात बना हुआ है। प्रकृति के कुछ परमाणुओं के मिलने से प्रोटोप्लाज्म-जीवन तत्व बनता ही है, पर इस बनने के पीछे कौन से नियम काम करते हैं, इसका पता नहीं चल पा रहा है। इस असमर्थता की खोज को यह कहकर आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता कि इस संसार में चेतन सत्ता कुछ नहीं है।

विकासवादी जार्ज डार्विन ने कहा-”जीवन की पहेली आज भी उतनी ही रहस्यमय है जितनी पहले कभी थी।” प्रोफेसर जे.ए. टामसन ने लिखा है-”हमें यह नहीं मालूम कि मनुष्य कहाँ से आया? कैसे आया? और क्यों आया? इसके प्रमाण हमें उपलब्ध नहीं होते और न यह आशा ही है कि विज्ञान इस संबंध में किसी निश्चयात्मक परिणाम पर कभी पहुँच सकेगा।”

“ऑन दि नेचर ऑफ दी फिजीकल वर्ल्ड” नामक ग्रन्थ में वैज्ञानिक एडिंगटन ने लिखा है-”हम इस भौतिक जगत से परे की किसी सत्ता के बारे में ठीक तरह कुछ जान नहीं पायें हैं, पर इतना अवश्य है कि इस जगत से बाहर भी कोई अज्ञात सत्ता कुछ रहस्यमय कार्य करती रहती है जिसे हम नहीं जानते।”

विज्ञानवादी इतना कह सकते हैं कि जो स्वल्प साधन अभी उन्हें प्राप्त हैं, उनके आधार पर ईश्वर की सत्ता का परिचय वे प्राप्त नहीं कर सके, पर इतना तो उन्हें भी स्वीकार करना पड़ता है कि जितना जाना जा सकता है, उससे असंख्य गुना रहस्य अभी छिपा पड़ा है। उसी रहस्य में एक ईश्वर की सत्ता भी है। नवीनतम वैज्ञानिक उसकी संभावना स्वीकार करते हैं। वह दिन भी दूर नहीं जब उन्हें उस रहस्य के उद्घाटन का अवसर भी मिलेगा। अध्यात्म एक प्रकार का विज्ञान ही है और उसके आधार पर आत्मा-परमात्मा तथा अनेकों अज्ञात शक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर सकना अगले दिनों सम्भव होगा।


समय और अधिकार (Kahani)

भीष्म शरशय्या पर उत्तरायण सूर्य आने पर मरने की प्रतीक्षा में पड़े थे। इन दिनों वे उपस्थित जनों को धर्मोपदेश दिया करते थे। एक दिन द्रौपदी ने पूछा-जिन दिनों कौरवों के साथ आप थे, तब उन्हें यह धर्मोपदेश क्यों नहीं दिए थे?

भीष्म ने कहा-तब में उनका दिया अनीति का धन खाता था। कुधान्य से भ्रष्ट बुद्धि क्या उचित अनुचित का निर्णय करे और क्या उसका किसी पर प्रभाव पड़े। अब वह रक्त घावों से होकर रिस गया। अतएव धर्मोपदेश का सही समय और अधिकार भी सामने आ गया।


साहस और पराक्रम प्रकृति से सीखें

कठिनाइयाँ और प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं, तो उनके साथ व्यक्ति में एक ऐसी व्यग्रता एवं साहसिकता का भी अनायास प्रादुर्भाव होता है, जो उसे सहज ही उन परिस्थितियों से उबार लेती हैं। प्रकृति से सुरक्षा प्रेरणा मनुष्य में ही नहीं, अन्य प्राणियों, पशु-पक्षियों और निर्बल कीड़े-मकोड़े तक में पायी जाती है। ऐसी कई घटनायें जानने में आयी हैं, जब इस प्रकृतिदत्त प्रेरणा प्रवाह से असहाय, अशक्त और कुछ न कर सकने की स्थिति में भी जानवरों ने चौंका देने वाला संघर्ष किया और उन्हें परास्त किया।

टेक्सास (अमेरिका) के प्राणी शास्त्र विशेषज्ञ एच.सी. डाँन ने एक ऐसी ही घटना का उल्लेख एक निबन्ध में किया था। किसी दिन वे जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रवृत्तियों का अध्ययन करने के लिए टेक्सास के निकटवर्ती जंगलों में गये हुए थे। एक झाड़ी के पास उन्होंने चूहों की चीख और सरसराहट सुनी। दौड़कर वे उस स्थान पर पहुँचे तो देखा कि पाँच फुट लम्बे एक साँप के मुँह में दबा हुआ चूहा मुक्त होने का प्रयत्न कर रहा है। वह छटपटाते हुए चीख भी रहा था। तभी एक दूसरा चूहा, पास के बिल से निकला और साँप पर हमला करने लगा। वह कभी उसकी दुम काटता, कभी पीठ। साँप की देह पर जगह-जगह काटते-काटते चूहे ने आखिर उसकी दुम पकड़ ली और मुँह में दबाने लगा। साँप ने कई पलटे खाये, फुफकार मारी मगर सब व्यर्थ। अन्त में साँप ने घबड़ा कर आक्रमणकारी चूहे का सामना करने के लिए मुँह में दबे हुये चूहे को छोड़ दिया। जैसे ही वह चूहा मुक्त हुआ और साँप पीछे मुड़ा दोनों बड़ी तेजी से भाग कर बिल में घुस गये। निर्बल कहे जाने वाले प्राणी भी अपने परिवार के संकटग्रस्त साथियों को देखकर उत्तेजित हो उठते हैं। ऐसे अवसरों पर वे बड़े साहस से काम लेते हैं। उनसे कई गुने शक्तिशाली पशु को भी उनके सामने घुटने टेक देते पड़ते है। फिर मनुष्य ही क्यों कर प्रतिकूलताओं में घबड़ा जाता है, समझ नहीं आता।

बम्बई की नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी की ओर से प्रकाशित एक पत्रिका में क्राम्पटन फ्राँजर ने एक और ऐसी ही घटना का वर्णन किया था। उन्होंने एक बार देखा कि एक बड़े पीपल के वृक्ष पर ऊँची शाखाओं से लिपटे हुए एक साँप पर पाँच छः तोतों ने आक्रमण किया। शायद उस साँप ने किसी तोते को अपना आहार बना लिया था। भिन्न-भिन्न दिशाओं से तोतों ने प्रहार करना आरम्भ किया। वे अपनी पैनी चोंचों से साँप पर हमला करते और उड़ जाते। बेचारा साँप तिलमिला कर रह जाता, कुछ समय बाद तोतों ने व्यूह रचना बदली और साँप पर तीव्र आक्रमण किया। एक तोते ने उसे बीच से दबोच कर खींच लिया। इतने से ही साँप की दुम डाल से छूट गयी और वह नीचे पथरीली जमीन पर बड़ी जोर से गिरा एवं उसके प्राण पखेरू उड़ गये। उत्पीड़न और प्रतिशोध के लिए भी कई बार निर्बल पशु-पक्षी आश्चर्यजनक रूप से साहसी बन जाते हैं।

खरगोश यों तो बड़ा डरपोक और भीरु पशु होता है। परन्तु मादा खरगोश अपने बच्चों पर किसी प्रकार का संकट आते देख बड़ी खूँखार होती देखी गयी है। एक बार एक शिकारी कुत्ते ने आसन्न प्रसूता मादा खरगोश के बच्चों को पकड़ने के लिए उन पर आक्रमण किया। उन बच्चों की माँ वहीं उपस्थित थी। नवजात शिशुओं पर संकट आया देख उसने शिकारी कुत्तों के मुँह पर अपनी पिछली टाँगों से इतना करारा प्रहार किया कि कुत्ते भागते ही बने।

इसी प्रकार एक बार मौका पाकर एक लोमड़ी ने बतख के बच्चों को धर दबोचा। बच्चे बुरी तरह चीखने लगे। उनकी चीख-कराह सुनकर पास से ही बच्चों की माँ दौड़ी आयी और अपनी चोंच से लोमड़ी को नोंचने लगी। उसके अंग प्रत्यंग आक्रमणकारी लोमड़ी का सामना कर रहे थे। पंखों की मार से उसने लोमड़ी को परेशान कर डाला। इस प्रत्याशित आक्रमण से घबराई लोमड़ी बच्चों को छोड़कर भाग निकली। अंदर साहस का माद्दा हो तो कितना ही खतरनाक दुश्मन हो, जूझा जा सकता है।

संकटग्रस्त अवस्था में खूँखार आक्रमणकारी पशुओं का सामना करने का बल निरीह और अल्प शक्ति वाले जानवरों में न जाने कहाँ से आता है? आगरा उ.प्र. के निवासी एक कृषक की आँखों देखी घटना का विवरण पिछले दिनों समाचारपत्रों में छपा था। उक्त कृषक की कुछ गायें जंगल में चर रही थीं, तभी पास की झाड़ी से एक चीता निकला और गाय पर हमला बोल दिया। चीते की गंध पहचान कर ही गाय ने जोर से हुँकार भरी और उसका आक्रमण होने से पूर्व ही चीते पर प्रत्याक्रमण कर दिया। हुँकार सुनकर पास में ही चर रही एक गाय चुपचाप चीते के पीछे पहुँची और उसकी पीठ पर इतनी जोर से सींग का प्रहार कर उछाला कि चीता चारों खाने चित्त गिरा। सम्भल कर उठने से पूर्व पहले वाली गाय ने पुनः हमला किया और अपने सींग उसके पेट में घुसेड़ दिये।

मात्र बाहरी आक्रमण या अन्य पशु पक्षियों द्वारा उत्पन्न की गयी घातक परिस्थिति ही नहीं, प्राकृतिक और अन्य आपदायें भी इनमें अद्भुत शौर्य साहस पैदा कर देती हैं। वे प्राणी जो आग और पानी के पास भी जाने से डरते हैं। तीव्र लपटों और भयंकर बाढ़ों को पार करते देखे गये हैं। मद्रास की एक सरकस की घटना है। असावधानी के कारण सरकस के तम्बू में आग लग गयी। तीव्र लपटों और भीषण शोलों से स्वयं को बचाने में सब भाग-दौड़ करने लगे। दर्शक और सरकस के कर्मचारी अपने स्वजन बान्धवों और सम्पत्ति साधनों की चिन्ता छोड़कर भागने लगे। ऐसी दशा में निरीह पशु-प्राणियों की किसे चिन्ता होती? बेचारे जानवर भी अपनी जान बचाने की कोशिश में भाग दौड़ करने लगे और सब तो जैसे तैसे निकल गये परन्तु पिंजड़े में बंद एक शेरनी छटपटाती रही। शेर आग से बड़ा डरता है। उसके साथ बच्चे भी थे। स्वयं अकेली का कोई बस न चलते देख शेरनी ने पिंजड़े से ही एक जोर का छलाँग लगायी और बाहर आ गयी। अपने एक बच्चे को मुँह में दबाकर वह बाहर भागी। इसी प्रकार दूसरे बच्चे को लेने पुनः अंदर आयी व उसे लेकर भी सुरक्षित बाहर आ गयी।

उपरोक्त घटनायें सिद्ध करती है कि साहस और शौर्य प्रत्येक प्राणी में प्रचुर और प्रचण्ड मात्रा में विद्यमान है। दूसरे संस्कारों की प्रबलता के कारण भले ही वह हर समय सामने न आये परन्तु है अवश्य। सृष्टि की सर्वोत्कृष्ट कृति और परमात्मा के सर्वाधिक सन्निकट होने के कारण मनुष्य में तो ये गुण और भी अधिक मात्रा में होना चाहिए। हैं भी। उनका सुनियोजित करने की कला आना चाहिए।

विशेष परिस्थितियों में आकस्मिक रूप से परिजनों, साथियों के प्रति प्रेम और वात्सल्य की प्रेरणा निर्बल, असहाय और दयनीय स्थिति वाले पशु पक्षियों को भी इतना साहसी बना देती हैं, तो क्या कारण हैं कि मनुष्य पग पग पर शौर्यहीन, कायर और भीरु बना रहता है। निःसन्देह इसका कारण आत्मसत्ता के प्रति अविश्वास और आत्यंतिक स्वार्थलिप्सा ही है। जब व्यक्ति को केवल अपनी ही चिन्ता, अपना ही हित, अपना ही भला दिखाई देता है तो वह दुनिया का सबसे निर्बल और असहाय प्राणी बन जाता है और उसका सम्पूर्ण जीवन अस्वाभाविकताओं से भरे संघर्षों के कारण अभिशाप बन जाता है। शौर्य और साहस का अभाव, स्वार्थ-लिप्सा और पद-पद पर पाये जाने वाले संघर्ष वस्तुतः मनुष्य के मूल स्वभाव के प्रतिकूल ही तो हैं। यदि इन अस्वाभाविकताओं को दूर किया जा सके तो साहसिकता और पराक्रम कोई प्राप्तव्य गुण नहीं रह जाएँगे। वे तो इस अँधेरे के दूर होते ही स्वयं ही जाएँगे।


देश का दर्द (Kahani)

एक किसान गान्धीजी के दर्शन करने पहुँचा। नंगे सिर देखकर उसे आश्चर्य हुआ। पूछा-गान्धी टोपी दुनिया भर में मशहूर है, फिर आप स्वयं गान्धी होते हुए भी वह टोपी क्यों नहीं लगाते?

गान्धीजी ने उसके सिर पर बँधे हुए लम्बे चौड़े साफे की ओर इशारा करते हुए कहा-जब एक-एक व्यक्ति इतना कपड़ा, सिर पर लपेटेगा तो बहुतों को नंगे सिर रहना पड़ेगा। ऐसे ही लोगों में से एक, आप मुझे भी समझ सकते हैं।


मनुष्य की बहुज्ञता को क्षुद्र जीवों की चुनौती

प्रवृत्ति के अन्तराल में अनेकानेक घटनाएँ घटित होती रहती हैं, जिन्हें हम आकस्मिक रूप में कार्यान्वित होते देखते रहते हैं। वे भी अपने अस्तित्व का सृजन बहुत पहले से ही आरम्भ कर देती हैं। किन्तु उनका परिचय हमें तभी मिलता हैं, जब घटनाक्रम अपने समीपवर्ती क्षेत्र में घटित होता है।

मौसम संबंधी सम्भावनाओं का पता लगाने वाले गुब्बारे आकाश में छोड़े जाते हैं। उनके द्वारा दूर-दूर क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों एवं प्रवाहों की जानकारी मिलती है। वायु की नमी-दबाव की गति, गति दिशा-धारा आदि के सहारे यह जाना जाता है कि अगले दिनों कितने समय बाद, किस प्रकार का, परिवर्तन संभावित है और उसका प्रभाव मौसम पर क्या पड़ेगा?

इसी प्रकार धरातल पर या समुद्र क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों की ऐसी जानकारियाँ जो आँखों देखी, कानों से सुनी नहीं जा सकती। सूक्ष्म ग्राही यंत्रों की सहायता से यह पता लगाया लिया जाता है कि कितने समय में, किस क्षेत्र में, किस प्रकार की उथल-पुथल होने की सम्भावना है। इस प्रकार के खोजी यंत्र उपकरणों को वैज्ञानिकों द्वारा सूक्ष्म ग्राही सिद्धान्तों एवं पदार्थों की सहायता से विशेष विधि द्वारा बनाया जाय। राकेट प्रणाली में काम आने वाले घटक प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। उपग्रहों की अन्तरिक्ष यात्रा में संरचना में भी इसी उच्चस्तरीय प्रणाली का प्रयोग होता है। समुद्र की गहराई में रहने वाली पनडुब्बियों में भी ऐसी ही विधा का समन्वय किया जाता है।

सृष्टा ने मनुष्य को अनेकानेक विभूतियों से विभूषित किया है। शारीरिक संरचना में जितना लचीलापन और सूक्ष्मता है उसका एक भोंड़ा स्वरूप ही अन्यान्य जीव जन्तुओं में देखा जाता है। मानवी मस्तिष्क भी असाधारण है। उसकी तुलना अब तक के बने कम्प्यूटरों में से कोई नहीं कर सका। भविष्य में भी इस प्रकार की कोई आशा नहीं है कि प्रकृति के उन रहस्यों का पता लगाया जा सकेगा जो मनुष्य की बुद्धि एवं पदार्थ सम्पदा की पकड़ में नहीं आते। ज्ञानेंद्रियां जितनी गहराई में पहुँच नहीं पाती इनके बारे में मनुष्य अपने को असहाय ही अनुभव करता रहा है। उसके बनाये यंत्र उपकरण भी उस सीमा तक पहुँच नहीं पाते, जिस सीमा तक की प्रकृति के अन्तराल की गहराई है।

किन्तु देखा गया है कि सृष्टि के अन्यान्य प्राणियों में कितनी ही ऐसी क्षमताएँ हैं, जिन्हें देखते हुए मनुष्य को उस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ ही समझा जा सकता है। ऋतु-परिवर्तन की पूर्व हलचलों को अन्यान्य जीव जन्तु पूर्वाभास के रूप में जान लेते हैं, जबकि मनुष्य उस संबंध में कुछ जानकारी परम्पराओं के आधार पर ही अनुमान लगाकर संतोष कर लेता है। उस संबंध में वह कुछ निश्चित रूप से नहीं जान सकता। व्यतिरेक उत्पन्न होने पर तो वह चकित भर होकर रह जाता है। कारणों के संबंध में परम्परागत ज्ञान पर ही अवलम्बित रहता है, जो अनेक बार अपने को झुठलाता भी रहता है। किन्तु अन्य जीव जन्तुओं में से कितने ही ऐसे हैं, जिनका पूर्वाभास बहुत गहरा ही नहीं होता वरन् सुनिश्चित भी देखा गया है।

वर्षा की सम्भावना निकट आते ही मकड़ी अपना जाला खुले क्षेत्र में से समेट कर किसी सुरक्षित कौने में जा छिपती है। बिल्ली अपने छोटे बच्चों को उठाकर ऐसे आच्छादन की आड़ लेती है जहाँ वे भीगने न पायें। बरसने वाले बादलों की सीलन अपने शरीर को स्पर्श करती देख कर मोर नाचने लगता है। पपीहा सफेद उघड़े और खाली बादलों को देखकर रट नहीं लगाता वरन् उसका गूँजना तब आरम्भ होता है, जब बादल बरसने वाले होते हैं और ऊपर से नीचे उतरने लगते हैं। कोयल की कूक आमों के कुँज में उस समय से ही आरम्भ हो जाती है जबसे कि टहनियों में बौर उभरने की शुरुआत होने को होती है। यह पता उसे आँख से देखने पर नहीं वरन् गंध का प्रारूप उभरते ही विदित हो जाती है। बसन्त में उन पक्षियों कृमि, कीटकों की भरमार रहती है, जो फूल न खिलने पर कभी दृष्टिगोचर नहीं होते फूल खिलने की संभावना है इसका पता उन्हें समय से पूर्व ही लग जाता है। मधु मक्खियों के झुण्ड, तितलियाँ, भौंरों आदि को बसन्त के दिनों ही नहीं उसकी सम्भावना निकट आते देखकर थिरकना आरम्भ हो जाता है। वे अपने-अपने कोतरों से निकल कर बिना निमंत्रित अभ्यागत की तरह अपने यजमानों के इर्द गिर्द मंडराने, कुहराम मचाने लगते है।

भूकम्प, तूफान, अन्धड़, बाढ़ आदि आने की बात मनुष्य को तो तब विदित होती है, जब दृश्य सामने आ खड़ा होता है, या उसकी जानकारी किन्हीं संचार साधनों से मिलती है। पर उस प्रकार की विपत्ति वाले क्षेत्रों में वहाँ के निवासी कुत्ते, सियार, बिल्ली पहले से ही भगदड़ मचाते और पलायन करते देखे जाते हैं। वे कुहराम भी मचाते और पागलों जैसी हरकतें भी करते हैं। यह मात्र अपनी घबराहट प्रकट करने के लिए नहीं होता, वरन् इसीलिए भी होता है कि दूसरे प्राणी उनकी दी हुई जानकारी का लाभ उठाकर समय रहते अपनी आत्म रक्षा का प्रबन्ध कर सकें।

चीन में इस प्रकार की शकुन विद्या कई सहस्राब्दियों पहले खोजी गई थी। वहाँ जिस क्षेत्र में भूकम्प अधिक आते थे, वहाँ के पालतू पशुओं की हरकतों पर सतर्कतापूर्ण नजर रखी जाती है। जैसे ही वे घबराने, पगलाने लगते हैं वैसे ही भूकम्प की सम्भावना को ताड़ लिया जाता है और उस विपत्ति से होने वाली हानि का बचाव करने के लिए जो सूझ पड़ता है किया जाता है। जापान में भूकम्पों का प्रकोप प्रायः संसार के अन्य भागों की अपेक्षा अधिक होता है। पर वे किसी बहुत बड़े क्षेत्र को चपेट में लेने वाले भयंकर विस्फोट से ही हानि उठाते हैं। छोटे भूकम्पों को वे कुत्ते, बिल्ली जैसे घरेलू जानवरों की हरकतों के आधार पर ही समझ जाते हैं और अपने लकड़ी के बने मकानों को तारों से रस्सों जकड़ कर गिरने से बचा लेते हैं। इस संदर्भ में इन प्राणियों की अतीन्द्रिय क्षमता सामान्य मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी मानी जाती है।

शिकारी पशु पक्षियों में से अधिकाँश की आँखें इतनी तीक्ष्ण नहीं होती कि अपने शिकार को आसानी से ढूँढ़ और पकड़ सके। यह कार्य उन्हें गंध की न्यूनाधिकता के आधार पर करना होता है। ये सेंटर्स उनके मस्तिष्क में कूट-कूट कर भरे हुए हैं।

छोटे कृमि कीटकों में नर मादा साथ-साथ रहते हैं। अपने अपने काम से वास्ता रखते हैं, किन्तु जब मादा ऋतुमती होती है तो उसकी गंध भर से नर का समूह उसके ईद गिर्द मँडराने लगता है। इसके लिए उसे लम्बी यात्रा भी करनी पड़ती है और प्रतिद्वन्द्वियों से संघर्ष भी इस प्रणय मिलन में मात्र गंध ही संदेशवाहक का काम करती है।

ऐसी-ऐसी अनेक विशेषतायें हैं, जो पशु-पक्षियों तथा अन्य क्षुद्र समझे जाने वाले प्राणियों में पाई जाती हैं जो मनुष्य की वरिष्ठता, बहुज्ञता को कड़ी चुनौती देती हैं।


”मन ऐसा ही बहुमूल्य घोड़ा है (Kahani)

एक रईस ने एक घोड़े की बहुत प्रशंसा सुनी, सो उसने उसे खरीदने का निश्चय किया और मुँह माँगा मोल देकर खरीद लिया। घोड़ा बहुत चतुर था। उदाहरण उसने प्रत्यक्ष देखा मालिक पीठ पर से गिरा तो उसने उसे सहारा देकर उठाया, पीठ पर बिठाया और डॉक्टर के यहाँ पहुँचाया।

बहुत दिन बाद संयोगवश वैसी ही दुर्घटना उस रईस के साथ घटी। वह घोड़ा दौड़ाते हुए गिर पड़ा। घोड़े ने उसे उठाया पीठ पर बैठाया और डॉक्टर के यहाँ पहुँचा।

पर अन्तर उसमें यह रहा कि उसे जानवरों के अस्पताल में पहुँचाया गया। घोड़ा उसी को जानता था मनुष्यों के डॉक्टरों से उसका वास्ता न पड़ा था। वहाँ पहुँचाता तो कैसे?

रईस इस प्रसंग की चर्चा कर रहा था कि एक सन्त ने कहा- ”मन ऐसा ही बहुमूल्य घोड़ा है, पर उसने वो सीखा होता है। वह करता है। खरीदने वाले को चाहिए कि उसे वह सिखाए जो कराना है।”


बड़े करामाती हैं हमारे हाथ!

पाश्चात्य सभ्यता में मिलन और बिदाई के अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए हाथ से हाथ मिलाने का रिवाज है। पूर्वार्त देशों में हाथ जोड़कर अभिवादन किया जाता है। यह मात्र प्रथा प्रचलन ही नहीं है, इसके लिए मानवीय विद्युत के आदान-प्रदान के साथ-साथ भाव-संवेदनाओं का किसी कदर विनियम करना भी है।

स्नेह प्रदर्शन के लिए छोटों के सिर पर हाथ फिराया जाता है। बालकों के कपोल सहलाये जाते हैं। भावों की अभिव्यक्ति करते समय वक्ता की उँगलियाँ भी चलने लगती हैं। हस्त मुद्राएँ अनायास ही बनती हैं। यह एक प्रकार का भाव नृत्य हैं। जिसके लिए नर नारियों के नर्तन जैसा अंग संचालन नहीं होता। थिरकन की भी आवश्यकता नहीं पड़ती, पर हाथों की अदलती–बदलती मुद्राएँ ही यह प्रकट कर देती हैं कि प्रवक्ता के अन्तराल में किस प्रकार का भाव संचार गतिशील हो रहा है।

आन्तरिक उभारों का परिचय प्रधानतया मुख मुद्रा में प्रकट होता है। आँखों को मनुष्य के हृदय का दर्पण माना जाता है, उनके उतार चढ़ाव देखकर पारखी यह समझ लेते हैं कि अन्तराल में क्या कुछ उभर रहा है। होंठ, कपोल भी अभिव्यक्तियों के प्रकटीकरण में सहायक होते हैं। भवें तथा माथे की रेखा भी अपने ढंग से व्यक्ति की मनःस्थिति का भाव संवेदना का परिचय देती है। सौंदर्य की छठा चेहरे पर छाई रहती है। कुरूपता भी वहाँ बसती है। शरीर के अन्य अंग तो प्रायः कपड़े से ढके रहते हैं पर चेहरा तो खुला ही रहता है। उसे ध्यानपूर्वक देखा जा सके तो मनुष्य के व्यक्तित्व और कर्तव्य का स्तर का परिचय बहुत अंशों में जाना जा सकता है।

चेहरे के उपरान्त दूसरा उतना ही संवेदनशील अंग हैं-हाथ-यद्यपि उनमें वाणी नहीं होती। देखने सुनने के आधार भी नहीं हैं इतने पर भी बोलते, सुनते, समझते, देने तथा लेते रहते हैं। उनकी भाव संवेदना अपने आप में असाधारण है।

मोटे तौर पर उन्हें विविध-विधि कामों में निरत रहते देखा जा सकता है। पैर तो चलने फिरने की आवश्यकता पड़ने पर ही काम आते हैं, पर हाथ हैं जो अनेक प्रकार के ताने बाने बुनते रहते हैं। वाद्य-वादन, लेखन, शिल्प, व्यवसाय आदि में जितना उनका उपयोग होता है उतना और किसी अंग अवयव का नहीं।

यह सब तो हाथों के बारे में प्रत्यक्ष ही है और सर्वविदित भी। पर गहराई में उतर कर उनकी विचित्रताओं का अध्ययन किया जाय तो प्रकट होता है कि उनकी एक दिशा धारा गिराने उठाने की भी है। वे अपने संकेतों के द्वारा भी वाणी की आधी आवश्यकता पूरी कर देते हैं। मूक या मौन व्यथाओं की भावाभिव्यक्ति हाथ के संकेतों पर भी निर्भर होती है। उनके आकार बनाकर इच्छा को आसानी से दूसरों पर प्रकट किया जा सकता है।

चरण स्पर्श में, मस्तक पर तिलक लगाने में, कलाइयों में सूत्र बाँधने में रहस्यमय अर्थ छिपे हुए हैं। शरीर की मालिश में, हाथ पैर मसलने में, हाथ जो चमत्कारी परिचय दिखाते हैं, वह किन्हीं अन्य यंत्र उपकरणों से सम्भव नहीं हो सकता। क्षमा याचना से लेकर धमकी देने तक में हाथों की अनुकृतियाँ अपना उद्देश्य भली प्रकार पूरा कर देती है। सांत्वना एवं आश्वासन देने में, स्वीकृति तथा अस्वीकृति प्रकट करने में हाथ अपनी भूमिका भली प्रकार निभाते देखे गये हैं।

यहाँ हाथों का विवेचन कलाई से लेकर हथेली समेत उँगलियों वाले भाग का किया जा रहा है। यह शरीर का एक छोटा पतला छिरछिरा भाग है, पर उसकी कार्यक्षमता असाधारण है। मस्तिष्क के कॉर्टेक्स में इस भाग को 30 प्रतिशत से अधिक प्रतिनिधित्व मिला है। भाव क्षमता भी, हस्तस्पर्श से रोग निवारण की विधा प्राण चिकित्सा सायकिक हीलिंग के नाम से प्रख्यात है। ईसा से लेकर अनेकानेक सिद्ध पुरुषों में यह क्षमता पाई जाती है। इंग्लैण्ड के राजा के बारे में बहुत समय पूर्व यह मान्यता थी कि वे राजयक्ष्मा के रोगी को स्पर्श कर दें तो बीमारी से छुटकारा मिला जाता था।

प्रणय प्रसंग में हाथों की भूमिका सर्वाधिक होती है। प्रेम का प्रकटीकरण और घनिष्ठता भरी उमंगे उत्पन्न करना उन्हीं का काम है। यौनाचार क्षणिक होता है। वे आवेश भरे उन्मादग्रस्तता के क्षण होते हैं। उनमें आवेश आतुरता और अस्त व्यस्तता का समावेश रहता है। नशा उतरने पर सब कुछ ठंडा हो जाता है। किन्तु हाथ ही हैं जो अपनी हलचलों से आनन्द को घंटों बनाये रखते हैं।

ज्योतिषी हस्त रेखाएँ देखकर भूत, भविष्य, वर्तमान, की अनेक बातें बताते हैं। गुण, दोषों की विवेचना करते हैं। आयुष्य, धन, सौभाग्य, दुर्घटना, दुर्भाग्य आदि के कितने ही रहस्यमय पृष्ठ खोलते हैं। विद्वान कीरो ने सामुद्रिक विधा पर एक विज्ञान-सम्मत ग्रन्थ लिखा है। यों भारत के मनीषियों की इस संदर्भ में प्राचीन काल से जानकारी रही है, और उनने उसका वर्णन सामुद्रिक शास्त्र के अनेक ग्रन्थों में किया है।

विज्ञान की नवीनतम खोजों में हथेलियों, पोरुवों के उभार गठान तथा गड्ढे देखकर आन्तरिक अवयवों की स्थिति समझने के विषय में गहरी जानकारी प्राप्त करने का आधार ढूंढ़ निकाला है। जो कार्य काय-परीक्षा के विभिन्न निरीक्षण, परीक्षणों द्वारा जाने जा सकते हैं, उन्हें हाथ को बारीकी से टटोलने पर भी जाना जा सकता है। इसे समग्र पैथालॉजी की स्थानापन्न विधा समझा जा सकता है। अब डर्मेटोग्लायफिक्स के रूप में चिकित्सा विज्ञान भी इसे मान्यता दे चुका है।

जानकारी प्राप्त कर लेना एक बड़ी बात है, पर महत्वपूर्ण तो उपचार है। शारीरिक, मानसिक, रोगों के रूप में उभरती रहने वाली आधि व्याधियाँ बिना उपचार के जाती नहीं। चिकित्सा आवश्यक है, रोग भले ही किसी प्रकार का क्यों न हों? प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में नवीनतम यह है कि हाथ के किसी भाग विशेष को गुदगुदा कर उसमें उभरे असंतुलन को दूर किया जाय।

इतना तो सभी जानते हैं कि शरीर में फैले हुए पतले ज्ञान तन्तु मस्तिष्क से संबंधित हैं। वे मेरुदण्ड मार्ग से मस्तिष्क को सूचनाएँ पहुँचाते हैं और वहाँ से जो निर्देश मिलते हैं उसके अनुसार विभिन्न अवयवों को काम करने के लिए सहमत करते हैं। पर यह अब कुछ ही समय पहले खोजे गये हैं कि शरीर की ही नहीं मन की भी अस्त-व्यस्तता होने पर उसके प्रतिबिम्ब हाथ पर भी उभरने लगते हैं। अंगों एवं घटकों की सूक्ष्म संबद्धता हाथों के साथ भी रहती है। हाथों में दाहिना हाथ अधिक संवेदनशील होता है। उसी की प्रमुख रूप से जाँच पड़ताल का अथवा चिकित्सा प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जाता है। बांया हाथ काम में भी कम आता है और संवेदनशील भी कम होता है। इसलिए प्रायः सभी महत्वपूर्ण कार्यों में जिनके कार्य का केन्द्र बायें मस्तिष्क में होता है, दायें हाथ का ही प्रयोग होता है।

हाथों में दबाने, गुदगुदाने, चिकोटी काटने, मसलने, दबाने की एक विशेष विधा है। जिसे प्रमोद की कला नहीं एक महत्वपूर्ण उपचार पद्धति समझना चाहिए। प्रयोगों से सिद्ध होता जा रहा है कि मात्र हाथ के साथ छेड़खानी की एक्युप्रेशर की विधियों की समुचित जानकारी प्राप्त करके मनुष्य को रोग मुक्त ही नहीं सुविकसित भी बनाया जा सकता है।


संकीर्णता का फल (Kahani)

चीन में एक बौद्ध भिक्षुणी थी। उसने भगवान की एक छोटी स्वर्ण प्रतिमा बनाई। उसी की पूजा अर्चना में निरत रहती। एक दिन महाबुद्ध उत्सव हुआ। दूर-दूर की बुद्ध प्रतिमाएँ सजा–धजा कर लाई गई। उनकी सामूहिक पूजा अर्चना करने का कार्यक्रम बना।

भिक्षुणी पूजा की सामग्री तो लाई थी, पर वह अपनी ही प्रतिमा की उससे अर्चना करना चाहती थी। धूप, दीप, नैवेद्य समारोह में जलाने पर उसे भय था कि दूसरी प्रतिमा उसकी सुगन्ध लूट ले जायगी।

इस हानि से बचने के लिए उसने अपनी धूप का धुँआ एक बाँस की पोंगली द्वारा अपनी प्रतिमा की नाक से सटा दिया। थोड़ी ही देर में प्रतिमा का मुँह धुएँ से काला हो गया।

दर्शकों को वह कुरूप लगी और पूजने तथा लाने वाले तक की भर्त्सना हुई। खिन्न भिक्षुणी से समारोह के अधिष्ठाता ने कहा “संकीर्णता के रहते पूजना, पुजारी और पूजा दोनों का मुँह काला ही करता है।”


अन्तराल की प्रचण्ड ऊर्जा

पृथ्वी की गहराई में प्रवेश करते जाने पर पता चलता है कि वहाँ अनादि काल जैसी गर्मी अभी भी मौजूद है। आरम्भ काल में पृथ्वी भी अन्य ग्रहों के जन्म काल में पाई जाने वाली स्थिति में थी। उन दिनों वह आग का गोला थी। ठंडी होने का क्रम चला तो छोटी बड़ी दरारें बन गई। वर्षा ने उन्हें भरा और जलाशय बना दिया। यह हलचलें ऊपर परतों को ही प्रभावित करती रहीं। वनस्पति और प्राणियों का उद्भव तथा विकास इसी ऊपर परत पर हुआ।

पृथ्वी, वायु और पानी के कारण क्रमशः ठंडी हुई है। उसके मध्यवर्ती अन्तराल में प्रचण्ड गर्मी मौजूद है। वह बहते हुए गर्म लाल लोहे की तरह है। ऊपर से ठंडा घेरा उस गर्मी को कैद किये हुए है। उसकी मोटाई और मजबूती भी बहुत है। इतने पर भी प्रकृति के नियम उस आतप को भी प्रभावित किये बिना नहीं रहते। गर्मी से हर वस्तु फैलती है। पृथ्वी का गहरा भीतरी भाग की स्वभावतः फैलाना आगे बढ़ना चाहता है। ऊपरी परत उसे कसे रहती है। फिर भी भीतर का लावा चैन से नहीं बैठता और वह अपने विस्तार के लिए रस्सा-कसी करता रहता है। बाहर निकलने के लिए कोई खिड़की चाहता है। यह प्रयास निरन्तर चलता है। तनाव की यह खोज रहती है कि उसे फूट पड़ने के लिए अवसर मिले। जहाँ वह कमजोरी देखता है वहीं चढ़ दौड़ता है और छेद बनाकर बाहर निकलता है। ज्वालामुखी इसी स्थिति का नाम है। वे जब फटते हैं तो लावा उगलते हैं। भीतर की आग ऊपर की ठंडी परतों को ऊपर उछालती है तो जमीन पर लावा बहने लगता है। वह सुरंग फटने की तरह आकाश में भी उछलता है और बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेता है, वहाँ विनाशलीला खड़ी हो जाती है। वृक्ष, वनस्पति, मकान आश्रय, जलाशय सभी उस मलबे से भर जाते हैं।

इस विस्फोट के समय प्रभावित होने वाले क्षेत्र थरथराते भी है। उस हड़कम्प को भूकम्प कहते हैं। धरती कीमती जैसी प्रतीत होती है। जमी हुई वस्तुएँ उलट-पलट जाती है। इस उलट-पलट में जो गिरता है, वह नीचे वालों को दाब दबोच देता है। साथ ही यह भी होता है कि जो कुछ भला बुरा नीचे दबा था, वह उलट कर ऊपर आ जाय और धरातल की स्थिति इतनी बदल जाय कि पूर्व स्वरूप का अता पता भी न चले।

आँका गया है कि हर वर्ष प्रायः 24 हजार सशक्त भूकम्प आते हैं। एक हजार के करीब ज्वालामुखी फटते हैं। चूँकि समुद्र पृथ्वी का दो तिहाई हिस्सा घेरे हुए है, इसलिए ज्वालामुखियों से भूकम्पों की संख्या में अनुपात क्रम की अपेक्षा वहाँ कुछ अधिक ही रहता है। कारण कि समुद्र की गहराई वाला जल मध्य भूतल की आग्नेय परत के समीप पड़ता है, वहाँ से सीलन नमी रिसन क्रमशः नीचे उतरती रहती है। आग में पानी का स्पर्श होने से भाप बनती है। भाप में अपेक्षाकृत दबाव अधिक होता है। यही कारण है कि भाप से बादल रेल गाड़ियों के इंजन एवं घरेलू प्रेशर कुकर तक छोटे उपकरण काम करते हैं। भाप स्नान से मैल फूलने और छूटने का अधिक उपयुक्त लाभ मिलता है। उससे रोम कूप खुलते और स्वेद बिन्दु निकलते हैं। इसी को जमीन द्वारा साँस लिया जाना कहते हैं। मात्र ऊपर से ही हवा के झोंके, अन्धड़, चक्रवात नहीं आते अविज्ञात रूप से धरती भीतर से भी उफनती रहती है। झरने फूटते हैं। नदियों के स्रोत खुलते हैं। बहुत जगह गर्म जल के स्रोत भी पाये जाते हैं। खोदने पर चलने वाली गैसें निकल पड़ती हैं। खनिजों की जो परतें कभी बहुत गहरी थीं, वे नीचे के दबाव से ऊपर उठती हैं और धरातल के इतनी समीप आ जाती हैं कि उनका आसानी से पता लगाया जा सके। खोदकर खनिजों को ऊपर निकाला जा सके।

उपरोक्त वस्तुस्थिति को भूगर्भ विधा के उच्च कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं। भूकम्पों ज्वालामुखियों एवं अन्य प्रकार से नीचे की सम्पदा ऊपर आने के विषय में बहुत कुछ जान सकते हैं। पर यह रहस्य किन्हीं विरलों को ही प्रतीत हैं कि विराट् ब्रह्म की तरह मनुष्य की एकाकी सत्ता भी पृथ्वी की तरह ही विशाल रहस्यमय और समानान्तर है।

पृथ्वी की भीतरी आग्नेय परत ही बाहर आकर समीपवर्ती स्थिति को प्रभावित करती है और उसी से गुरुत्वाकर्षण उत्पन्न होता है। गुरुत्वाकर्षण न केवल धरातल पर चलने वाली गतिविधियों को प्रभावित करता है, वरन् स्वयं पृथ्वी को भी अपनी धुरी पर घूमने तथा सूर्य परिक्रमा के लिए चल पड़ने के लिए आगे धकेलता है। उस परिभ्रमण की एक कक्षा भी बनती हैं, ताकि सौर मण्डल के अन्याय ग्रहों के मार्ग में व्यवधान न पड़े, टकराव न हो। यह गतिशीलता ही पदार्थों में प्रवेश करके उनके अणु परमाणुओं को गति देती है और संसार का उत्पादन अभिवर्धन, परिवर्तन क्रम चलाती है। संसार में जो कुछ सम्पदा, प्रगति, सुन्दरता दीख पड़ती है, उसका निमित्त कारण पृथ्वी के अन्तराल की ऊर्जा और उसके कारण उत्पन्न होने वाले दबाव को ही माना जाना चाहिए।

मनुष्य के अन्तराल में भी ऊर्जा केन्द्र है। उन्हें शरीर क्षेत्र में हृदय एवं मनःक्षेत्र में ब्रह्मरंध्र कहा जा सकता है। यह ऊर्जा जब प्रबल प्रखर होती है, तो शरीरगत समर्थता बलिष्ठता, सुन्दरता के रूप में उगती है। मस्तिष्क क्षेत्र में जब वह सक्रिय होती है तो बुद्धिमत्ता, गुणवत्ता और विवेकशीलता के रूप में काम करते देखा जा सकता है। मानवी अन्तराल में दबी ऊर्जा को ही आत्मा, चेतना, प्रेरणा के रूप में समझा जा सकता है। वही उमंग, आकाँक्षा, भावना के रूप में उभरती है। जब उसका स्तर उत्कृष्ट एवं ऊर्ध्वगामी होता है तो से श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा के रूप में भाव संवेदन स्तर की देखा जाता है। शरीर क्षेत्र में वही पराक्रम, कौशल, संयम बन कर काम करती है, उसकी समग्रता ओजस्, तेजस् और वर्चस् के रूप में जानी जाती है। यह उसका सौम्य पक्ष है-सृजनात्मक। यही जब विद्रूप होने लगता है तो शरीर में आधि व्याधि बनकर फूटता है। स्वभाव एवं चरित्र में दुष्टता, भ्रष्टता, अनाचार, आतंक दुर्व्यसन, जैसे आसुरी कहे जाने वाले लक्षणों के रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार का प्रकटीकरण ज्वालामुखी या भूगर्भ के भयावह उपद्रवों के समतुल्य समझा जाता है।

भीतरी अग्नि अन्तःचेतना है। यही प्राण है, जिसके रहने तक शरीर जीवित रहता है। उसमें सौम्य पक्ष, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता बनकर छलकता है। उसी के परिपोषण हेतु व्रत नियमों का निर्धारण, परिपालन आध्यात्मिक अग्नि क्षेत्र कहा जाता है।

पृथ्वी के अन्तराल की अग्नि का किस दिशा में निष्क्रमण हो, यह प्रकृति परमेश्वर के हाथ में हैं। वह उसके सौम्य, भयावह निष्क्रमण की उपयोगिता समझता और व्यवस्था बनाता है। किन्तु मनुष्य अपनी ऊर्जा और उसकी दिशाधारा का इच्छित उपयोग करने में स्वतंत्र है। वह अनुशासन में रहकर अपने जीवन काल और बुद्धिबल का उत्साहवर्धक उपयोग भी कर सकता है और उसके लिए भी सम्भव है कि घुटन, असंयम, विद्रोह का मार्ग अपना कर न केवल अपने लिए संकट उत्पन्न करे, वरन् संबंधित लोगों को भी उस विनाश लीला की चपेट में ले ले। आत्मिक अग्नि ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति और सम्पदा है। उसे सही दिशा देना विवेकशील मनुष्य का अपना काम है।


समझदारी का परिचय (Kahani)

एक उदारमना व्यक्ति ने अपनी सम्पदा परमार्थ प्रयोजनों के लिए दान कर दी और लोक सेवा के कार्यों में निरत रहने लगा। उसकी सर्वत्र प्रशंसा होने लगी। इस परिवर्तन के लिए लोग उसकी भूरि-भूरि सराहना करते और बधाई देने आते।

उत्तर में उदार व्यक्ति एक प्रश्न करते-आपके झोले में कंकड़ पत्थर हों और अनायास कोई बहुमूल्य वस्तु मिल तो उन पत्थरों को फेंक कर मूल्यवान वस्तु उसमें भरेंगे या नहीं? लोग उत्तर में शिर हिला देते। उदारमना समझाते मैंने कोई त्याग नहीं किया, मात्र समझदारी का परिचय दिया है जो व्यर्थ बटोर रखा था वह बोझ बढ़ाता। अनर्थ सिखाता।

अब उस जंजाल के फेंक देने पर मनःस्थिति परमार्थ करने जैसी बन गई और वे कार्य हो सके जिनकी प्रशंसा आप सब करते हैं और मुझे सन्तोष पाने तथा भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिलता है।


मनस् तत्व का दर्शन और विज्ञान

योग वशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ ने श्री राम को मानव जीवन की महत्ता व गरिमा समझाते हुए कहा है-”हे राम! मैं तुम्हें एक रहस्य की बात बताता हूँ कि सम्पूर्ण सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठ कोई जीवधारी नहीं हैं” आखिर वह कौन सी विशिष्टता है जो मनुष्य को विलक्षण क्षमता सम्पन्न, असीम संभावनाओं का स्वामी बनाती है, जिससे वह पशुओं से भी श्रेष्ठ बन जाता है। इस विषय में ऋषि-मनीषियों का मत है कि संरचना ही नहीं, कार्य पद्धति के क्षेत्र में भी जब हम मानवी काया, विशेषतः मानव मस्तिष्क पर दृष्टि डालते हैं, तो वह अन्य जीवों से सर्वोपरि एवं विभूति सम्पन्न नजर आता है।

आज विज्ञान विकास की सभी सीमाएँ पार कर चुका है। आधुनिकतम यंत्रों की खोज हो चुकी है, जो सूक्ष्म से सूक्ष्म की जानकारी कराते हैं। फिर भी मानव मस्तिष्क के बारे में हमें मात्र सात से तेरह प्रतिशत की जानकारी है। शेष सारा जखीरा अविज्ञात के गर्त में पड़ा है। वह अपनी चमत्कृतियाँ दिखाता रहता है, पर कारक घटकों की खोज अभी तक नहीं हो पायी है। न्यूरोलॉजी, न्यूरोहिस्ट्री केमिस्ट्री, न्यूरोएण्डोक्राइनाँलाजी, न्यूरोफिजियोलॉजी नाम से अनेक विधाऐं इन दिनों सक्रिय हैं। पर वे भी अविज्ञात की साइलेंट एरिया की कोई विशेष जानकारी नहीं करा पाती हैं। मस्तिष्कीय विकार या मानसिक विकृति से शारीरिक व्याधि का कारण क्या हो सकता है, यह तो वे बताते हैं, पर क्यों? यह नहीं बता पाते।

जहाँ तक संरचना का प्रश्न है, मानव एवं पशु दोनों के मस्तिष्क की बनावट कुछेक अपवादों को छोड़कर मिलती है। वे एक समान आकृति, संरचना और संघटन वाले होते हैं। चिंपांजी का मस्तिष्क सर्वाधिक विकसित बताया जाता है, एवं विकास क्रम की दृष्टि से मानव के सर्वाधिक निकट भी। सीखने की दृष्टि से अन्य जानवरों से यह अधिक कौशल सम्पन्न है। चिंपांजी का मस्तिष्क मनुष्य के मस्तिष्क से थोड़ा छोटा होता है, किन्तु हाथी और डाल्फिन के मस्तिष्क उससे बड़े होते हैं। घ्राण की उच्च विकसित इन्द्रियों के होने के बावजूद भी पशु बुद्धिमत्ता, तर्कक्षमता, लॉजिक आदि के क्षेत्र में मनुष्य से पीछे हैं। वे अक्षर, शब्द, वाक्य, व्याकरण का उपयोग करना नहीं जानते, नहीं उन्हें सिखाया जा सकना संभव है। पशुओं का मस्तिष्क ज्यामिति, त्रिकोणमिति जैसी जटिलताओं को समझने में अक्षम होंगे, पर उसका प्रकटीकरण काव्य या लेखन के रूप में मनुष्य ही कर पाता है। यहीं मनुष्य व पशुओं में अन्तर का पता लगाता है। अमीबा से बन्दर व बन्दर से मनुष्य के विकास का सिद्धान्त प्रतिपादित करने वाले यहाँ यह समझाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं कि चेतना के विकास के दो सोपानों में इतना अन्तर क्यों?

वस्तुतः अन्तर उस मनस्तत्व के कारण है, जिसे समष्टि का एक अंग ‘माइण्ड स्टॉफ’ बताया गया है। जानवरों का मस्तिष्क मूल प्रवृत्तियों (इंस्टीक्ट्स) के आधार पर कार्य करता है, जबकि मानवी मस्तिष्क इनसे भी इतर विकसित विभूतियों के आधार पर काम करता है जो कि मानव-मानव में विकास क्रम के व प्रसुप्त के उभार के कारण भिन्न-भिन्न परिणाम में सक्रिय पायी जाती है।

इसके विपरीत मनुष्य के विकास में उसे मिली एक दिव्य विभूति एक विशेष भूमिका निभाती है। वह है-मानव की स्वतंत्र चयन बुद्धि। इसकी परिधि अत्यन्त विशाल-अपरिमित है। मनुष्य सीखता है और विकसित होता जाता है। अनुभूतियों के आधार पर सृजन में निरत देखा जाता है। उसकी जिज्ञासु बुद्धि भाँति-भाँति के आविष्कार उससे करा लेती है। ज्ञान-विज्ञान, कला, लालित्य, संगीत, काव्य आदि अनेक क्षेत्रों में मानवी मस्तिष्क सक्रिय देखा जाता है। यह मस्तिष्क भाव संवेदनाओं से प्रभावित भी होता है व स्वयं तथा औरों को भी भावना मिश्रित विचारणा से प्रभावित करता देखा जाता है। पूर्वार्त्त दार्शनिकों ने ‘मन’ होने के कारण ही उसे मनुष्य कहा है। प्रकारान्तर से मनुष्य और पशु के बीच यह मन ही एक विशिष्ट एवं काफी महत्वपूर्ण अंतर स्थापित करता है।

मनुष्य पेट-प्रजनन के ढर्रे वाले पाशविक स्तर से ऊपर उठना चाहता है। यह ‘इच्छा-शक्ति’ उसके अन्तराल में हमेशा न्यूनाधिक रूप में क्रियाशील रहती है। अपने आपको नर, मानव, महामानव और देव मानव बनाने के लिए उसे ‘फ्री-च्वाँयस’ का परमात्मा द्वारा अधिकार मिला हुआ है। इस अधिकार का सदुपयोग भले ही वह न करे। आलस्य और प्रमाद में पड़कर आदमी अपने नर मानव के सामान्य स्तर से पतित भी हो सकता है। और नर पामर, नर पशु और नर-पिशाच की पदवी भी हासिल कर सकता है। मनुष्य अपने स्वरूप को अपनी गौरव-गरिमा को भली प्रकार जानता है, पर पशु नहीं। मनुष्य अपने आध्यात्मिक और भौतिक-वैभव को अपने उपासना साधना के प्रबल पुरुषार्थ से सहस्रों गुना बढ़ा सकता है। और चाहे तो पतन पराभव के गर्त्त में भी जा सकता है।

यह इच्छा शक्ति या मनस्तत्व वैज्ञानिकों की दृष्टि में अस्तित्वहीन है। पाश्चात्य मनोविज्ञान एवं पदार्थ विज्ञान मन एवं मनुष्य को भौतिक पदार्थ-कणों का समुच्चय भर मानता है। उनके अनुसार विचारणा तथा भावनाएँ यथा प्रेम, क्रोध, प्रसन्नता, निराशा स्नायुओं में रासायनिक परिवर्तन की प्रतिक्रिया मात्र हैं। इन्हें इलेक्ट्रोड द्वारा विद्युत प्रवाह से अथवा ड्रग्स द्वारा बदला जा सकता है। चार्ल्स डार्विन का विकासवादी सिद्धान्त एवं फ्रायड का मनोविज्ञान का सिद्धान्त इसी धुरी पर घूमता है। इस प्रकार पशु व मनुष्य उनके अनुसार मात्र ‘मैटर’ हैं। जॉन हाँपकिन्स यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के शोधकर्ता अध्यक्ष डॉक्टर सोलेमन स्नाइडर से एक पाश्चात्य पत्रकार ने इंटरव्यू के दौरान पूछा-’क्या स्वतंत्र इच्छा शक्ति को मस्तिष्क के विद्युत प्रवाह अथवा स्नायु रासायनिक क्रिया में परिवर्तित किया जा सकता है? ‘तब डॉक्टर स्नाइडर का उत्तर था कि ‘हम नहीं जानते कि मन मस्तिष्क से किस प्रकार जुड़ा है। आधुनिकतम यंत्रों के बावजूद हम यह बता पाने में असमर्थ हैं कि मन की प्रक्रियाओं का संचालनकर्ता कौन है व मस्तिष्क का स्थूल ग्रेमैटर उसमें कितनी भूमिका निभाता है?”

यह उत्तर विज्ञान को एक छोटी परिधि में सीमाबद्ध कर देता है। इससे यही भाव निकलता है कि मात्र प्रत्यक्ष की खोज तक वैज्ञानिक सफल हो पाये हैं। प्राणशक्ति, चेतन शक्ति, इच्छाशक्ति, संकल्प बल, जिजीविषा जैसी विधाएँ ग्रेमैटर रूपी लिबलिबे पदार्थ में विद्यमान हैं। वे प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देतीं पर उनके मानवी चिंतन, व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। योगवशिष्ठ में मन को संकल्पात्मक शक्ति बताया गया है। कहा गया है कि मन बुद्धि के निश्चयों से प्रेरित होता है और बुद्धि अहंकार से नियंत्रित की जाती है। यही नहीं संकल्प व मन को अभिन्न बताया गया है-

रामास्य मनसो रुपं न किचिंदपि दृश्यते। संकल्पनं मनो विद्धि कल्पान्तन्नमिद्यते॥

इस प्रकार मन ही संकल्पों द्वारा संसार की रचना करता बताया गया है। इस सूत्र में हमें सारी जिज्ञासाओं का समाधान मिल जाता है। मन अनुभूति का विषय है। पुराणों में इस मनस्तत्व को ‘मनोमय’ कहा गया है। शिव संकल्प मंत्रों में उसे ‘ज्योतिषाँ ज्योतिः’-विद्युत शक्ति के समान माना गया है।

भारतीय मनोविज्ञान एवं आर्ष वांग्मय द्वारा प्रदत्त मनस् संबंधी विशिष्ट ज्ञान को यदि आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों से जोड़कर प्रस्तुत किया जा सकना संभव हो तो उन सभी सिद्धियों, विभूतियों का रहस्योद्घाटन होने लगता है जिनसे महामानव सम्पन्न देखे जाते हैं। विलक्षण प्रतिभा, स्मरण शक्ति, अजेय संकल्प बल एवं प्रखरता के मूल में विकसित मनस्तत्व को कारण माना जा सकता है। सभी में प्रसुप्त रूप में बीज के समान ये छिपी पड़ी रहती हैं। जो इन्हें जगा लेते हैं, वे अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न, प्रतिभा-मेधा सम्पन्न महापुरुषों के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।

मनुष्य पशु रूप में जीवन जीने के लिए नहीं ऊर्ध्वगामी यात्रा करते हुए कुछ विशिष्ट कर दिखाने के लिए जन्म लेता है। हर नवजात बच्चे में यह प्रकाश पुँज देखा जा सकता है। जीवन यात्रा में कषाय-कल्मषों के कारण यह प्रक्रिया मंद होती जाती है। यदि आत्मबोध द्वारा अपने वैभव को जाना व समुन्नत बनाया जा सके तो योगवाशिष्ठ के रहस्योद्घाटन को सत्यापित किया जाना असम्भव नहीं।


आश्चर्यजनक किन्तु सत्य!

प्रकृति का ढर्रा एक सामान्य क्रम से लुढ़कता दीखता है, किन्तु कितनी बार ऐसे दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं जिनके रहस्यों का पता लगाना कठिन पड़ता है। यों वैज्ञानिकों का कहना है कि ये अचरज भी किन्हीं ऐसे प्राकृतिक नियमों के अंतर्गत होते हैं, जिनके वास्तविक कारणों को जानने में हम अभी समर्थ नहीं हो सके हैं।

सन् 1857 हमारे लिए गदर की लड़ाई के नाम से महत्वपूर्ण है, किन्तु अमेरिकावासियों के लिये कुछ और कारणों से यह यादगार वर्ष है। इस वर्ष कैलीफोर्निया की नापा काउण्टी में कई दिनों तक ऐसा पानी बरसा जो शरबत से भी अधिक मीठा था। कुछ लोगों ने तो इसे भावी उपयोग के लिये बड़े-बड़े पात्रों में जमा कर लिया और कई दिनों तक शरबत के रूप में उसका सेवन करते रहे। वैज्ञानिकों का मत था कि पानी में घुली हुई मिश्री इसका कारण थी। प्रकृति की इस अबूझ पहेली को वैज्ञानिक अब तक सुलझा नहीं पाये है।

19 वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड के लन्दन शहर में हुई कुत्तों व बिल्लियों की वर्षा बहुचर्चित रही है। तब से ही उस कहावत ने जन्म लिया-’इट इज रेनिंग कैट्स एण्ड डाँग्स’। 28 मई 1881 के दिन इंग्लैण्ड के वर्सेस्टर शायर के परिसर में गरजते तूफान के साथ टनों कैंकड़े और घोंघे गिरते देखे गए। वहाँ के निवासी उन्हें समेट कर विक्रय हेतु मण्डी में ले गये।

‘ला साइंस पोरटाँस’ में सिंगापुर में घटी एक ऐसी ही घटना का विवरण छपा है। 16 फरवरी 1861 को इतनी मूसलाधार वर्षा हुई कि समुद्र अपनी मर्यादाओं को लाँघकर शहर की गलियों तक जा पहुँचा। थोड़ी देर बाद पानी उतर गया, पर ढेरों मृत मछलियाँ सड़क पर पड़ी मिलीं।

जीवित मछलियों के वर्षा के पानी के साथ गिरने के प्रमाण भी वेल्स इंग्लैण्ड में मिलते हैं।

11 फरवरी 1859 को वेल्स की एक पहाड़ी पर कार्यरत जॉन लेविस ने अपने निकटवर्ती शहर अबेरडार के पादरी को बताया कि दोपहर को खेत पर काम करते समय अचानक उसकी पीठ पर छोटी-छोटी मछलियाँ बरसने लगीं। उसकी भीगी टोपी सुखाने के लिए खेत में उल्टी रखी थी। वह भी मछलियों से खचाखच भर गयी। वे उसमें उछलकूद मचा रही थी। परीक्षण हेतु कुछ मछलियों को समुद्र के नमकीन पानी में डाला गया तो वे मर गई जबकि सादे पानी वाले जल में वे यथावत बनी रही। आश्चर्य यह है कि वे समुद्र से उड़कर नहीं आयी तो फिर कहाँ से आई?

जीवित प्राणियों के अलावा अन्य पदार्थों की अप्राकृतिक वर्षा के भी अनेकों उदाहरण सामने आये हैं। फरवरी 1903 में पश्चिम योरोप का विस्तृत भूभाग सहारा रेगिस्तान के काले रेत से भर गया था। पदार्थों के रंग कई तरह के थे। ठीक ऐसी ही वर्षा इंग्लैण्ड के लीड्स शहर एवं वेल्स में 30 जून 1968 को हुई थी।

सन् 1819 में 13 अगस्त की रात को अमरीका के मेसाच्युसेट्स शहर में घनघोर वर्षा हुयी। आकाश मार्ग से गिरते हुए आठ इंच व्यास तथा एक इंच मोटाई के चिकने गोल पदार्थ देखे गये। कुछ दिन पश्चात् शोध-अनुसंधानों से पता चला कि वे फफूँद हैं।

13 नवम्बर 1833 को उत्तरी-अमेरिका में आग बरसते सभी ने देखी थी। उस इतिहास प्रसिद्ध घटना का कारण था अन्तरिक्ष से छोटी-छोटी अगणित उल्काओं का एक साथ बरस पड़ना। अनुमानतः 2 लाख छोटे बड़े जलते अंगारे आकाश से जमीन की ओर तेजी के साथ दौड़ते हुए देखे गये। गनीमत इतनी ही रही कि वे सभी जमीन तक पहुँचने से पहले ही बुझ गये। एक भी उल्का धरती को छू नहीं सकी और आकाश में धूल बनकर बिखर गई।

छोटी बड़ी ढेरों मीनारें सारे विश्व में हैं किन्तु इनमें सबसे निराली, विचित्र एक भारत में भी हैं। ये अहमदाबाद में है, एवं झूलती हुई मीनारों के नाम से प्रसिद्ध है। ये मीनारें अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के समीप कालूपुर क्षेत्र में वशिर मस्जिद के अहाते में है। इतिहास प्रसिद्ध मौलवी हाफिज सिद्दी वशिर साहेब के नाम से यह मस्जिद स्थापित हैं। ये मीनारें अद्भुत हैं। नीचे से करीब 20 वर्ग फुट मोटे दो स्तम्भों से जुड़ी दीवार के ऊपर ये मीनारें बनी हैं। इनकी लम्बाई 75 फुट है। इन मीनारों की असली खूबी यह है कि अगर किसी एक मीनार के ऊपर चढ़कर खड़े हो जायें और कुछ लोग अगर दूसरी मीनार को पकड़कर हिलाएँ तो दोनों मीनारें झूले की तरह झूलने लगती है। पत्थर की मोटी-मोटी मीनारें जो जमीन में पता नहीं कहाँ तक गड़ी हैं, झूले की तरह झूलती हैं। पिछले करीब छह सौ साल से ये मीनारें इसी तरह झूलती चली आ रही हैं। विश्व में ऐसी कोई दूसरी मीनार नहीं हैं जो झूलती हो।

इन झूलती मीनारों को ईस्वी सन् 1458 में मल्लिक साहरंग साहब ने बनवाया था। यह वह समय था जब यहाँ सुलतान मुहम्मद का शासन था। सुलतान मुहम्मद यों तो कठोर शासक था, परन्तु वह कला प्रेमी भी था। कहते हैं कि जब पहली बार इन मीनारों के विषय में सुलतान को बताया गया तो उसे विश्वास नहीं हुआ। भला पत्थर की मीनारें झूल कैसे सकती हैं? इस बात की सत्यता को जानने के लिए वह खुद एक बार अहमदाबाद गया और एक मीनार पर चढ़कर देखा।

इन झूलती मीनारों का रहस्य क्या है, यह आज तक अज्ञात है। अंग्रेज जब भारत पर शासन करने लगे, तब उन लोगों ने भी बहुत कोशिश की कि इन झूलती मीनारों के रहस्य का पता लगाया जाय, परन्तु अब तक सारे प्रयत्न बेकार ही रहे हैं। सदियों का रहस्य आज भी रहस्य ही बना हुआ है।

प्रकृतिगत विशेषताएँ ही नहीं, मानवी जीवन में भी बहुधा ऐसा कुछ घटित होते देखा गया है कि जिसके संबंध में मात्र अचरज ही व्यक्त किया जाता है, पर यह प्रतीत नहीं होता कि यह असंभव समझी जाने वाली बातें किस कारण घटित हो सकीं?

प. जर्मनी के म्युनिख शहर के चारों तरफ से बन्द दरवाजे और खिड़कियों वाले कमरे में एक मनुष्य जलता हुआ पाया गया, जबकि दूसरी किसी वस्तु ने आग नहीं पकड़ी थी और खून काफी निकला हुआ था।

आश्चर्य है कि आग कैसे पकड़ी? संभवतः आत्म हत्या की गई हो। वहाँ पर माचिस बीड़ी-सिगरेट या कोई अन्य चीज नहीं थी जिससे आग पकड़ने की पुष्टि हो। अधिक खून निकलने के कारण वह इतना दुर्बल था कि स्वयं भी आग नहीं लगा सकता था। किसी तेल, पेट्रोल आदि की गंध भी नहीं थी।

एक दूसरा केस इसी प्रकार इंग्लैण्ड में हुआ था, जिसमें उसकी समस्त माँस पेशियाँ जल गई थी परन्तु उसके बाल, भौंहें और अंडरवियर व अन्य कपड़े बिल्कुल नहीं जले थे। क्या वह आत्महत्या का केस हो सकता था? जब जवाब किसी के पास नहीं था। ऐसी ही एक घटना में पार्टी चालू थी, लोगों का नाच गाना चल रहा था कि अचानक कमरे के मध्य में एक नर्तकी के शरीर से नीली रोशनी निकलने लगी और कुछ ही मिनटों में जलकर राख हो गई। इंग्लैण्ड की इस घटना का कोई हल निकल नहीं पाया।

ऐसी ही एक घटना 2 जुलाई 1951 की है। जिसमें मिसेज रोजर का शरीर अचानक जल कर राख हो गया, फिर भी उस कमरे में कोई भी अन्य वस्तु नहीं जली और न आग की लपटें ही दिखीं, मात्र गर्मी मालूम पड़ रही थी उनकी हड्डियाँ मात्र शेष थीं। इसका रहस्य नहीं समझा जा सका।

अनेक स्तरों की जाँच पड़तालों, विशेषज्ञों द्वारा परीक्षणों एवं उन्नत देशों की जाँचों से भी इन अग्निकाण्डों का रहस्य समझ के बार रहा। इन रहस्यों को “स्पान्टेनियस कम्बशन” नाम दिया गया है व एक परिकल्पना यह की गयी है कि संभवतः पृथ्वी की जियोमैग्नेटिक वेन्स की पकड़ में आने से ये घटनाक्रम घटे हों। पर यह भी एक तुक्का भर है। क्योंकि ये घटनाएँ वहाँ घटी हैं जहाँ इन वेव्स या विद्युत तरंगों की सघनता नहीं के बराबर होती है।

ये प्रसंग चाहे मानवी काया के हों अथवा विराट प्रकृति जगत के अविज्ञात अनोखे करतबों के एक प्रश्न चिन्ह विज्ञान जगत के समक्ष खड़ा करते हैं। जब हर बातों का जवाब देने का दावा वैज्ञानिक करते हैं, तो फिर ऐसे विचित्र घटनाक्रमों को संयोग मात्र अथवा अपवाद कहकर क्यों टाल देते हैं?


हमसे भी विकसित सभ्यता की सुनिश्चित सम्भावनाएँ

मनुष्य ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में इतनी प्रगति कर ली है कि सौर मंडल के समीपवर्ती ग्रहों तक मानव रहित यान पहुँच चुके हैं। अगले दिनों मंगल, बुध, ग्रहों तक मनुष्य समेत यान भेजने की योजना है। हो सकता है किसी दिन आगे बढ़ते-बढ़ते लोक-लोकान्तरों तक यात्रा कर सकने वाले वाहनों का विकास करके वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड की, अभीष्ट ग्रह तारकों की, खोज-खबर लेने के लिए चल पड़ें।

मनुष्यों का किन्हीं अदृश्य लोकों तक पहुँचना और लोक-लोकान्तरों के बुद्धिमान प्राणियों का मनुष्य लोक के साथ संपर्क बनाने के लिए दौड़ लगाना आश्चर्यजनक तो लगता है, पर सर्वथा अविश्वस्त भी नहीं है। अंतर्ग्रही सभ्यता की खोज के लिए दशाब्दियों से चले आ रहे वैज्ञानिकों के अथक प्रयत्न अब सफल सिद्ध होते जा रहे वैज्ञानिकों के अथक प्रयत्न अब सफल सिद्ध होते जा रहे हैं। रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, पश्चिम जर्मनी, आस्ट्रेलिया और कनाडा के अन्तरिक्ष विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार आगामी 10 वर्षा में संभवतः इक्कीसवीं सदी आरंभ होने के पूर्व ही अपने सौर मंडल के अतिरिक्त अन्य सौर मंडल के ग्रह तारकों की सभ्यता का सरलतापूर्वक पता लगाया जा सकेगा। 4 जुलाई 1986 को फ्राँस के टोलोज शहर में अन्तरिक्ष अनुसंधानों की 26 वीं संगोष्ठी आयोजित की गई जिसमें “सर्च फार इक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल इन्टेलीजेंट लाइफ” (एस.ई.टी.आई.) की योजना को क्रियान्वित करने के लिए कदम उठाने की चर्चा हुई। विश्व के लगभग 1340 वैज्ञानिकों ने इसमें भाग लिया। वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयत्नों के आधार पर ‘रेडियो स्पैक्ट्रम सर्वीलेंस सिस्टम’ नामक एक नयी तकनीकी का विकास किया गया है जो 1 से 10 जी.एच.जैड. (गेगाहर्ट) की दूरी की आवृत्तियों का मापन कर सकेगी। ग्रहों के अनुसंधान की यह एक स्वसंचालित प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति अथवा यंत्र उपकरण की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती। एस.ई.टी.आई. के मार्ग में आने वाले संभावित अवरोधों के तथ्य एवं प्रमाण इसी के द्वारा रिकार्ड किये जायेंगे। अन्तरिक्ष विज्ञानियों का कहना है कि सौर मण्डल से परे यदि कोई अन्य विकसित सभ्यता है, तो उसके साथ संचार-व्यवस्था का उपक्रम बिठाने में रेडियो तरंगों की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी। अन्तर्ग्रही सभ्यता संभवतः भूलोक से कहीं अधिक बुद्धिमान है। संचार व्यवस्था में वे रेडियो तरंगों का प्रयोग नहीं करते उनकी संचार प्रणाली बिलकुल भिन्न स्तर की है, जो आधुनिक विज्ञान की पकड़ में नहीं आ रही है। कुछ सभ्यताएँ ऐसी भी हैं, जिनकी वैज्ञानिक एवं तकनीकी जानकारी धरती के निवासियों से भी काफी पीछे है।

कार्नेल यूनिवर्सिटी (यू.एस.ए.) के डॉ. डे्रक के अनुसार यदि अन्य लोकों के बुद्धिमान प्राणी धरातल पर आते हैं तो हमें इससे भयभीत होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। वस्तुतः वे समर्थ एवं समुन्नत किस्म के प्राणी हैं। ऐसे लोगों की विशिष्टता ही यह है कि वे आवश्यकताएँ स्वल्प और उत्पादन अधिक रखते हैं, ताकि अपने लिए माँगने या चाहने की आवश्यकता ही न पड़े। वे दूसरों की सहायता करने, अनुदान, बरसाने हेतु ही यदा-कदा धरती पर आते रहते हैं।

जीव विकास के नवीनतम सिद्धान्तों के प्रतिपादन कर्त्ताओं के मतानुसार मानवी सत्ता किसी अन्य लोक से आई है। जिस लोक से आई हैं, वहाँ उसका विकास और भी ऊँचे स्तर का हो चुका होगा। अन्य लोकवासी अपनी उत्सुकता को भी मनुष्यों की तरह रोक नहीं पा रहे हैं और यहाँ की अधिक खोज-खबर लेकर तद्नुरूप अधिक सघन संपर्क बनाने की कोई योजना बना रहे हैं। उड़न तश्तरियों का दृश्य दर्शन संभवतः इसी श्रृंखला की कोई कड़ी हो। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् ही उड़नतश्तरियों का अस्तित्व प्रकाश में आया है। सर्वप्रथम वर्ष 1948 में अमेरिका की वायुसेना ने इसकी खोज की। खोजी दलों ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया कि 90 प्रतिशत दृश्यों का संबंध अंतर्ग्रही सभ्यता के अस्तित्व की ओर इंगित करना है। सन् 1966 में एक और वैज्ञानिक मिशन की स्थापना हुई जिसने 59 उड़न तश्तरियों के प्रत्यक्षदर्शी प्रमाण प्रस्तुत किये। अधिक संख्या में प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा प्रत्यक्षतः देखी जाने के कारण उनका अस्तित्व झुठलाया जाना संभव नहीं। वैज्ञानिक इस संबंध में भले ही कुछ ठीक से न बता पाये हों, पर इतना तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि जिस प्रकार पृथ्वी के वैज्ञानिक अन्य ग्रह नक्षत्रों की खोज के लिए समय-समय पर अपने उपग्रह भेजते रहे हैं, उसी तरह अन्य ग्रहों के निवासी भी पृथ्वी पर खोज के लिए अपने यान भेजते हैं।

सैकड़ों वर्षा से संसार के अनेकों देशों में उड़न तश्तरियों के विषय में समय-समय पर प्रमाण मिलते रहे हैं; किन्तु आश्चर्य यह है कि उनका रहस्य अभी रहस्य ही बना हुआ है। फ्राँस में पेरिस के सन्निकट चैटीलाँन नामक स्थान पर एक अन्तर्राष्ट्रीय बैंक है जिसमें उड़न तश्तरियों और विद्युत गेदों (फायर बाँल्स) की प्रामाणिकता से संबंधित आँकड़े एकत्रित किये जाते हैं। लगभग 1000 प्रत्यक्षदर्शी प्रमाण यहाँ पर एकत्रित तो किये जा चुके हैं, पर यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि ये अद्भुत आकृतियाँ, वायुयान, उपग्रह, गुब्बारे हैं अथवा खगोलीय पिण्ड। 23 फरवरी 1986 को पश्चिमी यूरोप के हजारों लोगों ने कुछ दृश्य ऐसे भी देखे, जिनमें मात्र प्रकाश पुँज या वायुयान स्तर की कोई वस्तु आकाश में उड़ती, दिशा बदलती, डुबकी या छलाँग लगा रही थी। विशाल तश्तरीनुमा हरे रंग के प्रकाश से घिरे एक उड़ते वाहन के रूप में पश्चिमी जर्मनी, फ्राँस, बेल्जियम के लोगों ने इस अलौकिक दृश्य को नंगी आँखों से देखा।

उड़नतश्तरियों की भाँति फायरबाँल्स भी उन मनुष्यों को कोई हानि नहीं पहुँचाती जिनके समीप से वे निकलती या सटकर अपनी ऊर्जा अस्तित्व का छोटा मोटा प्रमाण देती जाती हैं। 2 दिसम्बर 1983 को सायंकाल रूप के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित काला सागर के समीप यूक्रेन में एक अद्भुत लम्बी पूँछ वाली चमकीली वस्तु को हजारों लोगों ने देखा। जनवरी 1984 में एक प्रकाश युक्त विद्युत गेंद अचानक दृष्टिगोचर होने लगी। रूसी प्रेस एजेन्सी तास ने इस घटना का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि ‘सोवियत इल्यूशिन-18’ यान में बैठे यात्रियों ने नजदीक से देखा कि इस विद्युत गेंद से टकराने पर भी उनके विमान को किसी भी तरह की कोई क्षति नहीं उठानी पड़ी। इस भयानक दुर्घटना से स्वयं का बच जाना उनने दैवी अनुग्रह ही समझा। उड़नतश्तरियों को अन्तरिक्ष यान माना जाय तो विद्युत गेदें किसी अन्य लोक के सुविकसित एवं समुन्नत जीवधारियों का समूह या प्रभा मण्डल हो सकती है। 26 फरवरी 1984 को एक और विद्युत गेंद साइबेरिया के टोमस्क शहर पर चमकी देखी गयी। उससे नगर की सभी सड़कें और गलियाँ तुरन्त प्रकाशित हो उठीं। शोधकर्ताओं का एक दल मलबे के परीक्षण हेतु तुँगुस्का जंगल की ओर भेज गया। लेकिन वहाँ पर उन्हें कोई भी चीज देखने को न मिली। उनने अपनी रिपोर्ट में बताया कि यह एक ज्वलनशील गैसों का सघन सम्मिश्रण ही था।

अब कुछ ऐसे भी उदाहरण सामने आये हैं जिसमें इन उड़न तश्तरियों तथा विद्युत गेंदों ने विपत्तियाँ भी खड़ी की है। 30 जून 1908 को सेंट्रल साइबेरिया के सैकड़ों स्त्री-पुरुषों ने एक बेलनाकार वस्तु को आकाश में चमकाते हुए देखा और देखते-देखते वह प्रकाश अचानक विलुप्त हो गया। पृथ्वी उसी क्षण थर−थर काँपने लगी। काली वर्षा से सैकड़ों मील लम्बा क्षेत्र प्रदूषित हो गया। लन्दन का दिन रात्रि में बदल गया एवं भूकम्प के झटके मास्को से ब्लाडीवाँस्टक एवं पेरिस, न्यूयार्क तक महसूस किए गये। “द ग्रेट शिकागो फायर” नाम से एक भयावह विभीषिका अमेरिकावासियों को अभी भी याद है।

सामान्यतया ये सारे घटनाक्रम प्रकृति के विधि विधान के रूप में, परमसत्ता की व्यवस्था के हस्तक्षेप से मिले दण्ड के रूप में ही घटित हुए बताये जाते हैं। फिर भी इनके आकस्मिक प्रकटीकरण और विलुप्त होने के पीछे छिपी शक्तियों का पता लगाना अनुसंधान का विषय है। इससे हम लोकोत्तरवासियों की योजनाओं और क्रिया–कलापों को भी समझ सकेंगे व उनसे संपर्क स्थापित कर संभवतः अपने ज्ञान की अपूर्णता को पूर्णता में बदल सकने में समर्थ होंगे।


पृथ्वीवासी विलुप्त क्यों होते हैं

किंवदंतियां आकाश-पाताल को एक कर सकती हैं और तिल का ताड़ बना सकती हैं। ये भैंस को मक्खी जैसे छोटे रूप में बता सकती हैं, पर यथार्थता की जाँच पड़ताल करने पर वस्तुस्थिति स्पष्ट होने में भी देर नहीं लगती। इसके विपरीत वास्तविकता पर आधारित तथ्य ऐसे भी होते हैं, जो आश्चर्यचकित करने वाले, समझ में न आने वाले होते हुए भी जाँच पड़ताल की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनका स्वरूप और कारण समझ में न आने पर भी जो घटित हुआ है, उनसे इन्कार नहीं किया जा सकता।

इतिहास के पृष्ठों पर कुछ ऐसी ही घटनाएँ हैं, जिनमें बताया गया है कि कुछ व्यक्ति या उनके समूह देखते-देखते अदृश्य हो गये। उनके साथ का सामान उसी स्थान पर मौजूद था, पर शरीरों का पता न चला कि वे कहाँ गए? किधर उड़ गए, कहाँ समा गए? जहाँ तक खोज का संबंध है, वहाँ तक कोई संभावित उपाय ऐसा न रहा, जो सोचा या खोजा न गया हो।

स्पेन सरकार को एक युद्ध लड़ना था। जॉन राँस के नेतृत्व में एक बड़ी सेना मोर्चे पर भेजी गई। सेना की छोटी-छोटी टुकड़ियों बना दी गयीं और उन्हें अलग-अलग दिशाओं में भेजा जा रहा था, ताकि दुश्मन के चारों ओर घेरा डाला जा सके। जिस टुकड़ी में पन्द्रह सौ जवान थे, वह अचानक गायब हो गई। न कैम्प, में वापस पहुँची, न उसके मरने-पकड़े जाने-घायल होने आदि की कोई खबर ही मिली। भाग खड़े होने, शत्रु से मिल जाने जैसी आशंकाएँ भी खोज करने पर निर्मल साबित हुई। उनके पदचिह्न भी किसी ओर नहीं जाते थे, जिनके आधार पर पीछा किया जा सके। असमंजस मुद्दतों चलता रहा और शताब्दियाँ बीत जाने पर भी वह रहस्य ज्यों का त्यों बना रहा। यह विवरण “हिस्ट्री ऑफ वण्डरफुल इवैण्ट्स” में विस्तारपूर्वक छपा है। “एनसाइक्लोपीडिया विजय ऑफ स्प्रिचुअल वर्ल्डस्” में जिसे इमेनुअल स्वीडन बोर्ग ने अपने अनुभवों के आधार पर लिखा था, इस व ऐसी ही अनेक घटनाओं का वर्णन हैं।

ऐसी ही एक घटना फ्राँस की एक टुकड़ी के साथ घटित हुई, जो जर्मन चौकी पर हमला करने गई थी। वाकया सन् 1856 का है। एक हल्की-सी आँधी आई और उसी अन्धड़ में 645 सैनिक लुप्त हो गये। अन्धड़ छोटा-सा ही था। थोड़ी देर ही रहा। इसने हल्की वस्तुओं की उलट-पुलट भर की। कोई बड़ा पेड़ तक उसके दबाव से न गिरा, पर आश्चर्य यह कि उसी बीच यह इतनी बड़ी सैनिकों की टुकड़ी गायब हो गई। इस आश्चर्यजनक घटना के संबंध में जो कारण हो सकते थे, वे सभी सोचे गये। जो कुछ खोज बीन के लिये किया जा सकता था, वह सब कुछ किया गया। पर कहीं किसी प्रकार का सुराग हाथ न लगा। अब तक उस घटना को फ्राँस के जाँच पड़ताल विभाग की फाइल में सुरक्षित रखा गया है।

लन्दन के एक साँसद विक्टर प्रेशर का भी ऐसा ही प्रसंग है। घटना सन् 1920 की है। वे अपने घर से भले-चंगे निकले ही थे कि कुछ ही मिनटों में लुप्त हो गये। तुरन्त तहलका मच गया। दुर्घटना आदि की पुलिस दफ्तरों से जानकारी पूछी गयी। आत्म हत्या, विदेश यात्रा, रूठ बैठने जैसा कोई प्रसंग न था। फिर वे लुप्त हुए तो कहाँ गए, कैसे गए? कुछ जाना नहीं जा सका। अपहरण जैसा भी कुछ न था। रंजिश का बदला लेने जैसी भी कोई कड़ी नहीं जुड़ती थी। जिसने इस प्रकरण को सुना, हैरत के अतिरिक्त और कुछ अनुमान न लगा सका। यह मामला भी फाइल में बन्द होकर रह गया।

सन् 1950 की बात है। पोलैण्ड के एक पादरी कैनरी बातिस्को घर से मित्र के यहाँ जाने के लिए निकले। मित्र का घर पास में ही था। वहाँ तक पहुँचने के लिये कुछ ही मिनट लगने चाहिए थे। पर जब देर हुई तो पता लगाया गया। सारे तरीके खोज बीन के पूरे कर लिये गए, किन्तु कोई हल न निकला। अप्रसन्न होकर घर से चले जाने या दूसरी किसी प्रकार की कोई सम्भावना नजर न आई। वह खोज तब से लेकर अब तक अनसुलझी पहेली ही बनकर रह गई है। उसका कहीं कोई ऐसा सूत्र न मिला, जिससे किसी संभावना का तालमेल बिठाया जा सके।

एक ऐसी ही घटना चीन में सन् 1939 में घटित हुई। उन दिनों चीन और जापान में युद्ध चल रहा था। चीनी सेनाएँ आगे बढ़ रही थी। तीन हजार सैनिकों का एक पड़ाव नानकिंग के समीप पड़ा। केन्द्र से उसका जो संचार संबंध था, वह अचानक टूट गया। खोज करने पर सैनिकों के हथियार आदि तो मिले पर सैनिक एक भी नहीं मिला। उन्हें धरती निगल गई या अंतरिक्ष से कोई दैत्य उन्हें उठा ले गया, ऐसा लगने लगा। इसका कारण क्या हो सकता है? सैन्य अधिकारी इस संबंध में अवाक् थे। ढूँढ़ने के सभी तरीके अपनाये गये, पर कोई सूत्र ऐसा न मिला जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकला जा सके कि सेना के इतने बड़े समुदाय का आखिर हुआ क्या?

शार्ट रेडियो वेब्स के समष्टि में विस्तार की प्रक्रिया पर शोध करने वाले डॉ. हर्बर्ट गोल्डस्टाइन ने अपने विचार विलुप्त हुए व्यक्तियों के संबंध में व्यक्त करते हुए लिखा है कि अंतरिक्ष में यदा-कदा उठने वाले विद्युत चुम्बकीय तूफान इसका कारण हो सकते हैं। एच.जी. वेल्स जो साइंस यूटोपिया पर अपने उपन्यासों के लिये प्रख्यात हैं, ने “द इनविजिवल मैन” पुस्तक में ऐसे आधारों को सूत्र रूप में प्रस्तुत किया है, जिनमें प्राणियों, मनुष्यों, वस्तुओं के अदृश्य होकर विशाल अन्तरिक्ष में कहीं चले जाने की यथार्थता का प्रतिपादन है। वारमूडा त्रिकोण के संबंध में यह तथ्य सर्वविदित है कि इस क्षेत्र में कितने ही जलयान, वायुयान अन्तरिक्ष के गर्भ में समा चुके हैं। ढूँढ़ने पर भी उनका कुछ अता-पता न लगा कि कौन उन्हें किस लोक में खींच ले गया?

अन्तरिक्ष के संबंध में अब यह तथ्य प्रकट होते जाते हैं कि वह मात्र पोली नीलिमा भर नहीं है। उसमें ग्रह-गोलक तो विद्यमान हैं ही। इसके अतिरिक्त अणुओं-तरंगों की भी उसमें भरमार है। उन्हीं के कारण दृश्य जगत में ही विभिन्न प्राणी और पदार्थ बनते हैं। उनमें से कुछ मनुष्य को चर्मचक्षुओं से दीख पड़ते हैं, कुछ अदृश्य ही रहते हैं। वायरस बैक्टीरिया इसी में आते हैं। रंगों की संख्या 400 से भी अधिक हैं, पर मनुष्य की आँखें उनमें से मात्र 40 के अलगभी ही देख पहचान पाती है।

वायु से जीवधारी प्राण खींचते हैं। पौहारी बाबा अन्य सिद्ध पुरुषों के वे आख्यान प्रख्यात हैं, जिनमें निराहार रह कर उन्हें ब्रह्माण्डीय प्लाज्मा पर ही जीवित एवं विभूति सम्पन्न बताया गया है। इसी ईथर भरे पोले घटाकाश में से सर्प विष और शार्क बिजली की बहुलता खींच लेती है। इसी विराट् अंतरिक्ष में ऐसे विवर (ब्लैक होल) पाये गये हैं, जिनमें विद्युत चुम्बकीय प्रवाह बड़े सघन अनुपात में हो है। इनमें प्रवेश पाने या बलात खींच लिये जाने पर कोई भी पदार्थ या जीवधारी प्रकाश-गति से उन क्षेत्रों में पहुँच सकता है, जहाँ अपने ढंग की अनोखी दुनिया है। उनमें सचेतन प्राणी भी रहते हैं और हमारी ही तरह अन्य लोकवासियों के बारे में बहुत कुछ जानना चाहते हैं। वे मानवी विशेषताओं को देखते हुए उनसे मिलता-जुलता वंशानुक्रम चलाने के लिए प्रयत्नशील हो सकते हैं। ऐसे ही किन्हीं प्रयोगों के लिए अंतरिक्ष वासी सत्ताएँ यदि इस लोक के प्राणियों को उठा ले जाती हों तो उसे सर्वथा असम्भव नहीं कहा जा सकता। दृश्य और अदृश्य जगत के बीच आदान-प्रदान चलते रहने की संभावना को यदि सही माना जाय तो मनुष्यों-पदार्थों के विलुप्त होने का रहस्य समझा जा सकता है।


सन्त की सूझ (kahani)

एक राजा था। उसके राजमहल में एक सन्त पधारे। राजा ने अपना महल, शस्त्रागार, खजाना, आदि वैभव दिखाए सबके पीछे वे उस तिजोरी के पास ले गए जिसमें बहुमूल्य रत्न भरे पड़े थे।

सन्त ने अनजान की तरह पूछा-”भला इन रत्नों से आपका क्या प्रयोग सधता है? क्या लाभ मिलता हैं?” राजा ने कहा-लाभ तो कुछ नहीं उलटे रखवाली पर खर्च उठाना पड़ता है।

सन्त ने कहा-इन्हें बेच कर आटा पीसने की चक्कियाँ खरीदकर प्रजाजनों को बँटवा देवें। बन्द पत्थरों की तुलना में चलने और कुछ कमाने वाले पत्थर अधिक उपयोगी रहेंगे।


संगीत की मधुरिमा

संगीत तरंगों का प्रभाव जड़, चेतन पर समान रूप से पड़ता है। लय और ताल में बँधे हुए स्वर प्रवाह को संगीत कहते हैं। यह गायन के रूप में स्वर प्रवाह के साथ भी जुड़ा हुआ हो सकता है और वाद्य यंत्रों की तद्नुरूप ध्वनि भी संगीत में गिनी जा सकती है। गायन और वादन दोनों का सम्मिश्रण उसकी पूर्णता निर्मित करता है। गायन के साथ गुँथी हुई भावनाएँ चेतना को प्रभावित करती हैं। अन्तरंग में उल्लास उत्पन्न करती हैं। गायक के मनोभाव श्रवण कर्त्ता के कानों में प्रवेश करके गहराई तक पहुँचते हैं और तद्नुरूप स्रोता के अन्तराल को प्रभावित करते हैं। चेतना क्षेत्र में इस प्रकार की हलचलें गायक के साथ उन तरंग प्रवाह को अपनाने वाले को अपने साथ चलने, उड़ने के लिए बाधित करती हैं। भक्ति भावना से लेकर जोश आवेश या कामुक आतुरता को इसी आधार पर उभारा जा सकता है। भक्ति भाव की समर्पित आत्म-विभोरता भी उस आधार पर उत्पन्न की जा सकती है। उत्थान को पतन में और पतन को उत्थान में बदलना भी इस माध्यम के आधार पर सम्भव हो सकता है। अपराधी को संत और संत को अपराधी बनाने की क्षमता उसमें है। नदी प्रवाह में तिनके पत्ते बहते लगते हैं। संगीत प्रवाह में तरंगित होने वालों की मनःस्थिति भी इसी प्रकार तैरने डूबने लगता है।

इन्हीं विशेषताओं के कारण संगीत को शास्त्रकारों ने नादब्रह्म कहा है। शिव का ताण्डव नृत्य और महाप्रलय का दुर्धर्ष प्रकरण साथ-साथ चलते हैं। नारद वीणा वादन के साथ-साथ भक्ति विभोर होते हैं। संगीत कभी चेतना के उच्च पद पर था, तब ईश्वर प्राणिधान में स्वरयोग का, नादयोग का समावेश होता था। पर अब तो बात ही दूसरी है। उसे कामुकता का प्रतीक प्रतिनिधि बना दिया गया है। वीरभाव उभरने और आदर्शों के प्रति समर्पित होने की चेतना उत्पन्न करने वाले न कहीं गायक रखते हैं और न उसके लिए तरसने वाले गुणी भावनाशीलों का समुदाय ही कहीं दीख पड़ता है। ऐसे ही कारणों से क्षुब्ध होकर औरंगजेब ने अपने राज्य से संगीतकारों को, गायक, वादकों को उनके उपकरणों सहित देश निकाला दे दिया था। यदि वह अपनी उच्चस्तरीय गरिमा से च्युत न होता तो उसे क्यों जनसमुदाय के लिए अहितकर माना गया होता और क्यों ऐसी अवमानना की जाती? आज भी इस वर्ग के लोगों को सम्मानितों की गणना में नहीं गिना जाता। गवैये, बजैये, नचकैये, मनोरंजनकर्त्ता विदूषकों की श्रेणी में ही गिने जाते हैं। यह अवमानना इसलिए हो चली है कि उसमें से उत्कृष्टता का प्राण धीरे-धीरे धीमा और तिरोहित होता चला गया। जहाँ पुरातन गरिमा को अक्षुण्ण रखा गया है वहाँ उसका अभी भी समुचित सम्मान है।

मात्र एकाकी वादन की भी अपनी महत्ता है। इस आधार पर भी सशक्त ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता और अपना प्रभाव प्रदर्शित करता है। युद्ध काल में आगे-आगे ‘वीररस’ से भरे-पूरे गीत वादक गाते चलते थे। उससे न केवल सैनिक वरन् उस प्रयोजन में काम आने वाले घोड़े हाथी तक मस्ती में भरकर नाचने लगते थे और अपना जौहर दिखाने का प्रयत्न करते थे। दीपक राग और मेघ मल्हार की जनश्रुति सर्वविदित है। संगीत मुर्दों में प्राण फूँकता है, यह सत्य है। यह भी मिथ्या नहीं कि वह बुझों को जलाता है और समर्थों को बरस पड़ने के लिए विवश करता है। विगत चार दशाब्दियों में प्रयोगकर्ताओं ने रोग निवारण के लिए संगीत ध्वनि प्रवाहों की चमत्कारी विशेषता सिद्ध की है। शारीरिक एवं मानसिक रोगों में किन ध्वनि प्रवाहों को प्रभावी उपचार की तरह काम में लाया जा सकता है, इसकी विधा निर्धारित की गई और अपने प्रयोजन में आश्चर्यजनक परिणाम में उपयुक्त सिद्ध हुई। आगे इस संदर्भ में और भी कड़ी सम्भावनाएँ सोची जा रही हैं। समझा जा रहा है कि अन्य चिकित्सा पद्धतियों से कहीं अधिक समर्थ संगीत चिकित्सा रोगियों की असाधारण सहायता कर सकेगी।

पशु पक्षियों और जीव जन्तुओं पर भी संगीत का उत्साह-वर्धक प्रभाव देखा गया है। मछलियाँ और मुर्गियाँ अधिक संख्या में अधिक बड़े अण्डे देने लगीं और उनसे परिपुष्ट बच्चे प्रकट होने लगे। गायों ने अधिक दूध दिया। वे अवधि से पूर्व गर्भिणी हुई और बच्चे देने में, दूध देने में, अन्यों की अपेक्षा अग्रणी ही रहीं। यही बात अन्य पशुओं के बारे में भी देखी गई। उनने संगीत की मस्ती में अधिक पराक्रम किया। धावकों ने दौड़ में बाजी जीती। जिन्हें संगीत के संपर्क में रखा गया, उनकी बुद्धिमत्ता अपेक्षाकृत अधिक विकसित हुई देखी गई।

संगीत के प्रयोगों में वनस्पतियों पर अच्छा प्रभाव पड़ने देखा गया है। घास तेजी से बढ़ी। सब्जियों में बड़े और अधिक स्वादिष्ट फल लगे। उत्पादकों को इस प्रयोग से अतिरिक्त लाभ मिला। फलदार वृक्ष भी अधिक फले। जिनसे लकड़ी ली जाती थी उनकी अभिवृद्धि से मोटाई तथा मजबूती में वादन सुनने वाले कहीं अधिक सफल रहे।

धातुएँ संगीत का प्रभाव सोखती हैं। ऐसे प्रभाव में बने आभूषण अधिक चमकते और उपकरण अधिक सुदृढ़ होते हैं। जिन इमारतों में गायन वादन होता रहता है, उनमें वह मस्ती वाला प्रभाव चिरकाल तक बना रहता है। कालान्तर में भी जो वहाँ पहुँचे और टिके उन्हें यह अनुभूति होने लगी कि यहाँ उल्लास और उत्साह का मस्ती का दौर अधिक है। उदास, निराश प्रकृति के लोगों ने भी वहाँ अपने में उमंगें उठती अनुभव की। ऐसे वातावरण में निराश मनों में भी आशा का संचार हुआ। आदतों में आशाजनक परिवर्तन आया।

संगीत कोलाहल को नहीं कहते। उसमें मधुरता मृदुलता होनी चाहिए। कोलाहल तो कारखानों में भी होता रहता है। रेल के पहिये और जहाजों के डैने भी क्रमबद्ध ध्वनि करते हैं। पर उनकी कर्कशता सीमा से अधिक इस स्तर पर पहुँचती है कि कान उन्हें सहन नहीं कर पाते। इसी प्रकार विवाह बरातों में बजने वाले बाजे कई बार इतनी अधिक ध्वनि करते हैं कि रास्ता चलते लोगों को उसे सुनना भारी पड़े। शंख, घड़ियाल, ढोल, नगाड़े भी यदि विसंगत स्वर में बजे तो उनमें कर्कशता ही प्रधान होती है। ऐसा वादन लाभ के स्थान पर हानिकारक ही सिद्ध हो सकता है। अत्यधिक शोर वाले क्षेत्रों में रहने वाले जल्दी बहरे होते हैं। कई बार तो उनके मस्तिष्क को विक्षिप्तता से प्रभावित होते देखा गया है। तोप के गोलों की भयंकर आवाजों से जलाशयों में रहने वाली मछलियों का हृदय फट जाता है और वे मरकर पानी पर तैरने लगती हैं। युद्धकाल में भयंकर ध्वनि करने वाले अस्त्रों के ध्वनि कम्पन गर्भवती स्त्रियों का गर्भपात कर देते हैं। उस क्षेत्र के लोगों की धड़कन बढ़ जाती है और रक्त चाप से लेकर नींद उड़ जाने बेचैनी अनुभव होने जैसी व्यथा त्रास देने लगती है। अनेकों मनोविकार इसी कारण जन्म लेते हैं।

लाभकारी संगीत वही होता है जो मृदुल एवं मधुर हो। कर्ण प्रिय लगे एवं आकर्षण उत्पन्न करे। निद्रा को भगाये नहीं वरन् बुलाने में सहायता करे। वादकों का कौशल इसी में है कि वे उत्साह-वर्धक, आनन्ददायक स्वर लहरियाँ उत्पन्न करें। गायकों की गरिमा इसी में है कि वे अपने गीतों को पशुता से छुटकारा दिलाने वाले और देवत्व उभारने वाले तत्वों से सराबोर रखें। जो संगीत मधुरिमा उत्पन्न करें, उसे ही सराहा जाना चाहिए।


पर्यवेक्षण और सुधार (kahani)

बाप मूर्तिकार था। बेटे को भी उसने कला सिखाई। सोचता था बेटा बढ़-चढ़ कर निकले। सो उसे हर दिन नए सुझाव देता। नए सुधार करता।

कला निखरी। मूर्तियाँ महँगी बिकने लगीं। पहले एक रुपए की बिकती थी। फिर दो की, तीन की, चार की पाँच तक की कीमत मिलने लगी। बाप, तो भी उसमें कुछ कमी बताता और सुधार कराता।

बेटा एक दिन झल्लाने लगा। आपकी मूर्ति एक रुपए की बिकती थी। मेरी पाँच रुपए में बिकने लगी। तो भी दोष ही बताते चले जाते हैं। बाप सन्न रह गया। अब आगे की प्रगति रुक गई न। दस रुपए तक पहुँचने का रास्ता बन्द हो गया न। निरन्तर के पर्यवेक्षण और सुधार के क्रम को जारी रखे बिना, प्रगति क्रम आगे बढ़ता कहाँ है?


विश्वास एवं आशंका पर आधारित चिकित्सा मनोविज्ञान

बीमारियाँ भी आती ही हैं और उनका उपचार भी करना होता है। यह एक ढर्रा है, जिसे इच्छा अनिच्छा से सभी को घुमाना पड़ता है। पर कई व्यक्ति इस संबंध में अतिशय चिन्ता करते हैं, या सतर्कता बरतते हैं। सतर्कता बरतना बुरी बात नहीं है, पर उसे चिन्ता या परेशानी की स्थिति तक पहुँचा देना गलत है।

बीमारी बढ़ने पर उसके साथ-साथ क्या-क्या उलझनें खड़ी हो सकती है? उस बढ़ोत्तरी के क्या-क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं। मामूली इलाज काम न आया तो बढ़िया इलाज के लिये कहाँ जाना पड़ सकता है कि कितना खर्च लग सकता है। उतने साधन जुटाने पर कर्ज लेना या सामान बेचना पड़ सकता है। इतने पर भी रोग काबू में न आया तो मरने का अवसर भी आ सकता है। मरने के बाद हम कहाँ होंगे? और अशाँत कहाँ भटकेंगे? इस प्रकार की चिन्ताएँ छोटी बीमारी होने पर और उसे बढ़ा सकती हैं और मानसिक परेशानी के कारण हल्का-फुल्का रोग भी खतरनाक हो सकता है। उसकी चिकित्सा में जो लाभ हो सकता था उस पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है। चिन्ता उतना बिगाड़ कर देती है, जितना कि चिकित्सा लाभ नहीं पहुँचा पाती।

लेकिन रचनात्मक चिन्तन वाला सोचता है कि कौन सर्वथा निरोग है? हर किसी को कुछ न कुछ खटपट लगी रहती है। इतने बड़े शरीर में राई रत्ती बीमारी भी किसी कोने पर पड़ी रहे तो उनसे क्या बनता बिगड़ता है? मौत का तो समय निश्चित है। उससे पहले कोई नहीं मर सकता। मौत भी नहीं उठा सकती। क्या चिकित्सकों का इतना अध्ययन हमारी कुछ सहायता नहीं कर सकता? क्या जड़ी-बूटियों से लेकर रसायनों और प्रतिरोधकों में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वह अपने इस रोग की जड़ें काट सकें? निश्चय ही दुनिया में अन्धकार से अधिक प्रकाश है। रुग्णता की तुलना में स्वस्थता का समर्थन करने वाले तत्व अधिक है।

जाँच-पड़ताल की बड़ी-बड़ी मशीनें देखकर कई रोगियों को बड़ा भय लगता है। आप्रेशन की छुरी-कैंची देखकर उन्हें पसीना छूटता है। समझते हैं यह सारा सरंजाम उन्हें मारने काटने के लिए है। यह मृत्यु के संदेशवाहक हैं एवं डॉक्टर साक्षात् यमराज है। यह तो जान लेकर ही हटेंगे। ऐसे डरपोक और अविश्वासी रोग अच्छे होने में बहुत समय लेते हैं। उनकी भयभीत और शंका शंकित मनोदशा, उनकी जीवनी शक्ति पर प्रहार करती तथा दुर्बल बनाती है। इस कारण उपचार भी आँशिक प्रभाव ही दिखा पाता है।

जिन्हें डॉक्टर परोपकार की प्रतिमा प्रतीत होते हैं, एवं नर्सें स्नेह सौजन्य की प्रतिमाएँ, उन्हें औषधियाँ संजीवनी बूटी जैसी लगती हैं और अस्पताल का उद्देश्य ही रोगियों की व्यथा हरना-अनुभव होता है। वे उस वातावरण में अपने लिए हर प्रकार की सुरक्षा देखते हैं। सोचते हैं यहाँ की विशिष्टता अपना कष्ट पूरा करके ही छुट्टी प्रदान करेगी। चिकित्सक की हर क्रिया में उन्हें आशा की झलक दीखती है। फिर आत्म विश्वास का भी तो कुछ मूल्य है। इसकी तुलना में अपने आप को धैर्य बंधाना, प्रोत्साहित करना और उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन देना अधिक सरल है।

यह नहीं कहा जा रहा कि रोग का इलाज ही न किया जाय और उसे उपेक्षा में पड़े रहने दिया जाय। इस सीमा तक निश्चिंत रहना भी अहित कर है। जिस प्रकार मैले कपड़े साफ करने के लिए साबुन की, आँगन को बुहारने के लिए बुहारी की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार शरीर में कहीं कोई क्षति दीखने पर उसकी भी पूर्ति की जानी चाहिए।

इतने पर भी बात को बढ़ा-चढ़ा कर सोचने की आवश्यकता नहीं है। बीमारी को हल्के मन से लेना, उसकी चिन्ता करने की अपेक्षा हल्का-फुल्का उपाय ढूँढ़ निकालना पर्याप्त है, कारण कि प्रकृति हमारा सबसे बड़ा डॉक्टर है। शारीरिक संरचना में ऐसे तत्व प्रचुर परिणाम में विद्यमान हैं, जो अनवरत रूप से क्षतियों की पूर्ति करते और आवश्यकताओं के अनुरूप सरंजाम जुटाते रहते हैं। मौत की भयावहता में सन्देह नहीं। बीमारी के साथ जुड़े हुए कष्टों से भी इनकार नहीं किया जा सकता, किन्तु सर्वोपरि तथ्य यह है कि जीवन बहुत बलवान है। वह भरपूर आयुष्य तक जीने के लिए संकल्पपूर्वक कटिबद्ध है। उसे प्रोत्साहन और सहयोग भर देते रहा जाय तो इतने भर से बहुत बड़ा काम सध सकता है। बीमारियाँ सावधान करने आती हैं कि असंयम का रास्ता छोड़ा जाय और प्रकृति अनुशासन में बँधा रहा जाय। जो इसे अस्वीकार कर लेते हैं, बीमारियाँ उन्हें छोड़कर चली जाती है।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. रिचर्ड. एस. लैजेरस ने अनेक रोगियों की मनोदशा और चिकित्सा के परिणामों का पर्यवेक्षण किया। उनने पाया कि एक जैसी बीमारी और एक जैसे इलाज के चलते रहने से भी वही रोगी अधिक तेजी से रोगमुक्त हुए जो निश्चिन्त रहते थे और विश्वास करते थे कि उन्हें अच्छे होकर ही लौटना है। जिन्हें रोग की भयंकरता और चिकित्सकों की उपेक्षा दीखती थी वे दूने समय में वे धीरे-धीरे अच्छे हुए। कुछ तो उनमें से भी मर गये।

पचास वर्ष से अधिक आयु वालों में रक्तचाप या हृदय रोग के लक्षण दृष्टिगोचर होने पर यह कहा जा सकता है कि उनकी शारीरिक मशीन घिस जाने पर भी काम का दबाव यथावत बना रहने से ऐसा होता है। किन्तु उनके लिए क्या कहा जाय जो अभी किशोर या तरुण हैं, किन्तु हृदय संबंधी रोगों के शिकार हो गये। धड़कन बढ़ना, थकान, मधुमेह, अनिद्रा, दमा एवं अपच जैसे रोगों ने उनके अन्दर घर बना लिया और उन सबका संयुक्त प्रभाव उनके शरीर रूपी यंत्र को अव्यवस्थित होने के रूप में सामने आया। ऐसे लोगों के आहार एवं दिनचर्या में सर्वसाधारण की अपेक्षा इतना अन्तर नहीं होता, जिससे उनमें उस प्रकोप का कारण ढूँढ़ा जाय।

देखा यह गया है कि मनोविकार, मस्तिष्क से उपज कर अपना प्रभाव सारे शरीर पर डालते हैं और धीरे-धीरे खोखले बनते जाने वाले शरीर में क्रमशः हृदय रोग एवं अन्य जीर्ण रोग विकसित होने लगते हैं। इनमें किन्हीं को यह पैतृक विरासत में मिले हुए भी हो सकते हैं। किन्तु अधिकाँश में दुर्व्यसन और अचिन्त्य चिन्तन इसका निमित्त कारण होते हैं। नशेबाजी की लत भी इसका बड़ा कारण है। इसके अतिरिक्त कामुक उत्तेजना का सिर पर सवार रहना ऐसा निमित्त कारण है, जिसके आधार पर समस्त स्नायु संस्थान आवेशग्रस्त होता है और उससे नाड़ियों का माँस पेशियों का आकुँचन-प्रकुँचन अस्त-व्यस्त होता है। स्थिति मानसिक तनाव बढ़ने से लेकर हृदय की धड़कन अव्यवस्थित हो जाने के रूप में सामने आती है। यह व्याधि ऐसी है कि सीमा से अधिक बढ़ जाने पर पक्षाघात, हृदयाघात जैसे संकट खड़े हो सकते हैं। जीवन से हाथ धोना पड़ सकता है।

औषधियाँ रोकथाम करती हैं। उससे उफान को ठण्डा किया जा सकता है, पर जब चूल्हे में आग भड़क रही हो तब ऊपर रखे दूध में दुबारा उफान न आवेगा, यह नहीं कहा जा सकता। मानसिक आवेश बढ़े-चढ़े रहने पर किसी भी संकट की स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं। उनके लगातार बने रहने पर स्थिति ऐसी बन जाती है, जिसे अपंगता कहा जा सके।

इन दिनों अच्छे आहार का सुयोग क्रमशः बढ़ता जाता है। चिकित्सा की सुविधायें भी बढ़ रही हैं, पर साथ ही हृदयाघात जैसे आकस्मिक दौरों से होने वाली मृत्यु संख्या भी बढ़ रही है। जो मरते नहीं, वे इस स्थिति में पहुँच जाते हैं कि कोई महत्वपूर्ण पराक्रम कर सकने में असमर्थ बन कर रहें। यह सब आशंकाग्रस्त मनःस्थिति का दुष्परिणाम है। आधुनिकता के सभी अनुदान मुबारक, पर कीमत इतनी महँगी न हो कि जर्जर काया एवं टूटी मनःस्थिति ही हाथ लगे।


Quotation

चमकीली आँखों, सुन्दर सूरतों और चतुर प्रतिभाओं की मण्डली से मिलना तो सहज होता रहता है। पर ऐसी विभूतियाँ कदाचित ही उपलब्ध होती हैं जो आत्मा से कुछ कह सकें। या उसकी बात सुने के।


वनौषधियों में निहित असामान्य शक्ति

वनौषधि अपने भीतर असाधारण गुण समाहित किये रहती है। उनके रसायन उन्हीं तत्त्वों से बने हैं, जिनसे कि मनुष्य की काया। मनुष्य का शारीरिक व मानसिक ढाँचा कुछ इस प्रकार का बना है कि उसकी तुलना जड़ी-बूटियों के रसायनों एवं सूक्ष्म प्रभावों से भली प्रकार की जा सकती है। उनके द्वारा विकृति निवारण तथा बलवर्धन के दोनों ही प्रयोजन भली प्रकार पूरे किये जा सकते हैं। नव जीवन का संचार तक किया जा सकता है।

लक्ष्मण जी लंका युद्ध में मेघनाद का ब्रह्मास्त्र लगा था। वे मरणासन्न स्थिति में मूर्च्छित पड़े थे। इसका उपचार उस समय के पारंगत सुषैण वैद्य से पूछा गया तो उनने बताया कि हिमाच्छादित ऊँचे पर्वतों पर उगने वाली एक विशिष्ट बूटी ही इस संकट से उबार सकती है। हनुमान जी उस संजीवनी बूटी को लाये। सेवन कराने पर अभीष्ट परिणाम हुआ। अच्छे हो गये। इसे कहते हैं-बूटी का चमत्कार।

च्यवन ऋषि वयोवृद्ध थे। काया जीर्ण-शीर्ण हो गयी थी। राजकुमार सुकन्या की गलती से उनकी आँखें चली गयी। राजकुमारी ने वृद्ध ऋषि की अन्ध स्थिति में सहायता देने के लिये उनसे विवाह कर लिया। पति की दयनीय स्थिति पर उसे दुःख रहता था। उसने तपश्चर्या की एवं देव वैद्य अश्विनी कुमारों को प्रसन्न किया। उनके द्वारा प्रदत्त औषधि समुच्चय से ऋषि में नव-जीवन का संचार हुआ एवं वे युवा हो गए।

ये पौराणिक मिथक कितने सत्य हैं, नहीं मालूम। किन्तु ऐसे अनेकों प्रसंग न केवल इतिहास में अपितु दैनन्दिन जीवन में देखने को मिलते हैं, जिनमें शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के संबंध में जड़ी बूटियों के योगदान की महती भूमिका का वर्णन है। प्राचीन काल में कायाकल्प की विधा निष्णात् चिकित्सकों को विदित थी उसके प्रभाव से पुरानी जरा-जीर्ण काया सर्प की केंचुल की तरह उतर जाती थी और वैसी ही स्थिति बन जाती थी जैसी कि केंचुल उतार देने के उपरान्त सर्प में नई स्फूर्ति दृष्टिगोचर होती है।

अध्यात्म विज्ञान में यजन प्रक्रिया में वनौषधियों के प्रयोग का असाधारण महत्त्व बताया गया है। उसके द्वारा वातावरण शुद्धि से लेकर पर्जन्य वर्षण जैसे अद्भुत लाभ तो होते ही हैं, याज्ञिकों की शारीरिक-मानसिक स्थिति भी सुधरती है। महाराज दशरथ का उदाहरण सर्वविदित है। पुत्रेष्टि यज्ञ द्वारा ही उन्हें देवोपम चार संतानें प्राप्त हुई थीं। विश्वामित्र का यज्ञ वातावरण को बदलने-सतयुग की वापसी के लिए था। उसमें असुर विघ्न डालते थे। रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण को जाना पड़ा था। यज्ञ सफल हुआ असुर समुदाय का समापन हुआ। राम-राज्य के रूप में धर्मराज्य की स्थापना हुई। इस असाधारण सफलता में उस यज्ञ की असाधारण सहायता थी। वातावरण के संशोधन के लिए भगवान राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे, जिसकी स्मृति अभी भी काशी का दशाश्वमेध घाट अपने में संजोए हुए है। इसी प्रयोजन के लिये महाभारत काल में भी राजसूय यज्ञ कराया गया था। दुर्भिक्ष जैसी विपत्तियों के निवारण के लिए अनेक बार यज्ञ-महायज्ञ होते रहे हैं।

भावनात्मक कायाकल्प में भी यज्ञ की महती भूमिका है। ब्राह्मणत्व की उपलब्धि का निमित्त कारण मनु ने यज्ञ को बताया है। मात्र जप, तप से ही नहीं, आचार-विचार से ही काम नहीं चलता। इसके लिए प्रयोगात्मक उपचार यज्ञ सान्निध्य में रहने का भी करना पड़ता है। शास्त्रकारों का अभिमत है कि यज्ञों और महायज्ञों के सान्निध्य में ही ब्राह्मणत्व पकता है। इसे भावनात्मक कायाकल्प ही कहना चाहिए।

यज्ञ-यजन प्रक्रिया का प्रत्यक्ष स्वरूप वनौषधियों की गुणवत्ता का अग्नि संस्कार द्वारा विस्तृतीकरण करना है। सुगंध का विस्तार यज्ञ धूम्रों के माध्यम से तुरन्त होता है। यह स्थूल का सूक्ष्मीकरण है। होम्योपैथी, बायोकेमिक का

सारा ढाँचा इसी सिद्धान्त पर टिका है। उसमें मूल द्रव्य को अपने ढंग से सूक्ष्म बनाकर पोटेन्सी बढ़ायी जाती है। वनौषधियों की शतपुटी व सहस्रपुटी भस्म में भी सूक्ष्मीकरण सिद्धान्त रहता है। कणों की सूक्ष्मता जितनी बढ़ती है, औषधि की गुणवत्ता उतनी बढ़ती है। यज्ञ में यह प्रक्रिया अग्नि संस्कार द्वारा सम्पन्न होती है। पानी की सतह पर थोड़ा-सा तेल डाल देने पर वह दूर-दूर तक फैल जाता है। उसी प्रकार अग्नि द्वारा वायुभूत की गई औषधियाँ भी सुविस्तृत वातावरण को प्रभावित करती है।

मस्तिष्क सबसे संवेदनशील और सक्रिय तंत्र है। उसे अन्य अंगों की अपेक्षा तीन गुनी ऊर्जा की खपत अभीष्ट होती है। इसकी पूर्ति यज्ञीय वाष्प द्वारा जितनी अच्छी तरह हो सकती है, उतनी अन्य किसी प्रकार नहीं। सामान्यतः मस्तिष्क के अनेकानेक केन्द्र व घटक प्रसुप्त ही पड़े होते हैं। इस बहुमूल्य खदान के भाण्डागार में से एक बहुत ही छोटा भाग है जो सामान्य जीवन के संचालन में प्रयुक्त होता है। यदि इन विभूतियों को जागृत करके अन्यान्य उपचार समूह की तुलना में अकेले वनौषधियों से सम्पन्न यज्ञ का पलड़ा ही भारी बैठता है। शारीरिक, मानसिक आधि-व्याधियों के निवारण में अनुकूल शास्त्रोक्त औषधियों का यजन चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न करता है।

सभी जानते हैं कि आयुर्वेद मतानुसार रोगों की चिकित्सा का प्रमुख माध्यम वनौषधि स्तर की वनस्पतियाँ ही हैं। विषों का शोधन और रस-भस्मों का जारण-मारण तो मध्यकाल में आविष्कृत और प्रचलित हुआ। पुरातन पद्धति का अथर्ववेद में सुविस्तृत विवेचन हुआ। आयुर्वेद इसी का एक उपाँग है। इस प्रकरण में व्याधियों से निबटने और पौष्टिकता बढ़ाने के लिये वनौषधियों का ही वर्णन विवेचन किया जाता रहा है। इस संदर्भ में ऋषि कल्प महामानवों, वैज्ञानिकों ने चिरकाल तक गहरी खोजें की हैं। वनौषधियों की संरचना एवं प्रतिक्रिया की आयुर्वेद शास्त्रों द्वारा सर्वसाधारण को जानकारी है। इन प्रतिपादनों का जिनने समझा और अपनाया है, उनने अपने-अपने निकटवर्तियों के लिये कल्याणकारी लाभ उठाने का द्वार खोला हैं।

जिस प्रकार अन्न, जल, वायु के सहारे रस-रक्त बनता और जीवनक्रम चलता है, उसी प्रकार विकृतियों के निवारणार्थ और समर्थताओं के अभिवर्धन में वनौषधियों से लाभ लिया जा सकता है। दैनिक आहार की तरह आवश्यकतानुसार संतुलन बिठाए और बनाए रखने के लिये वनौषधियों को भी आहार का एक उच्चस्तरीय स्वरूप माना जा सकता है। उनके लाभ भी असंदिग्ध एवं चमत्कारी हैं। वे हमारी व्यथाओं को टालने और समर्थता को विकसित करने में अनेक प्रकार से सहायता करती हैं।

वनौषधियों की रासायनिक संरचना का तो अपना महत्व है ही, वे चेतना की संवाहक भी हैं। प्रयोक्ता की प्राणशक्ति को भी वे अपने में भर सकती हैं और उसे सेवनकर्त्ता के काय कलेवर तक पहुँचा सकती हैं। आशीर्वाद वरदान की तरह उन्हें अभिमंत्रित भी किया जा सकता है। यज्ञ धूम्र में वनौषधियों की रासायनिक संरचना के साथ मंत्र शक्ति का भी उपयोग होने से प्राण चेतना का समन्वय होता है। इसी कारण वे अधिक उत्कृष्ट व समर्थ बन जाती हैं।

भगवान के प्रसाद में तुलसी दल मिश्रित जल को अभिमंत्रित करके दिया जाता है। उसका लाभ भी सात्विकता की अभिवृद्धि के रूप में सेवनकर्त्ताओं को मिलता है। यह साधारण प्रक्रिया है। यदि इसे अधिक गंभीरता से समझा और प्रयोग किया जाय तो उसकी परिणति वरदान स्तर की बनाई जा सकती है।

मथुरा में एक पुरातन सिद्ध गायत्री टीला है। उसमें एक संत के निवास एवं तप करने हेतु प्रयुक्त होने वाली एक गुफा भी बनी हुई है। वे रात्रि में निकलते थे और दूर-दूर तक घूमकर अनेक प्रकार की वनौषधियाँ ले जाते थे। उन्हें अभिमंत्रित करते थे। दिन में थोड़ा समय सर्वसाधारण को दर्शन देने के लिए नियत रखा था। लोग अपनी कठिनाईयाँ बताते व निवारण हेतु उपाय पूछते रहते थे। वे मौन रह मात्र किसी औषधि के अभिमंत्रित पत्ते दुःखी व्यक्ति को दे देते थे। एक पत्ता नित्य सेवन करने का संकेत करते। इतने भर से आने वालों का मनोरथ पूरा हो जाता था। उसमें से अधिकाँश अपने संकटों से त्राण पा जाते। इस तपस्वी का नाम तो अज्ञात था, पर लोग उन्हें बूटी सिद्ध कहते थे। इसी नाम से उनकी चर्चा उस क्षेत्र में अभी भी होती रहती है।

यह वैयक्तिक विशेषता तक सीमित रहने वाला प्रसंग नहीं है, वरन् एक सम्मत सिद्धान्त भी है। वनौषधियों की रासायनिक विशेषता का पर्यवेक्षण प्रयोगशालाओं में किया जाता रहा है और उस आधार पर उनकी रोग निवारक शक्ति को, जीवनी शक्ति संवर्धन सामर्थ्य को जाना गया है, प्रयोग करके लाभ उठाया गया है। पर इस प्रसंग में अभी उतनी गहराई तक नहीं उतरा गया है कि प्राणवान आत्मशक्ति से सम्पन्न व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक विभूतियों को किस प्रकार वनौषधियों में कूट-कूट कर भर देता है।

अभी इस तथ्य पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है कि प्राचीन काल में वनौषधियों की रासायनिक संरचना चिकित्सा प्रयोजनों में क्यों भरपूर लाभ देती थी और अब वह विशेषता क्यों संदिग्ध होती जा रही है? लोग आयुर्वेदिक औषधियाँ लेने की अपेक्षा एलोपैथी का तीव्र एवं शीघ्र परिणाम दिखाने वाली दवाओं पर अधिक विश्वास रखते हैं। वैद्य से इलाज कराने की अपेक्षा डॉक्टर की शरण में जाना पसंद करते हैं। पूछने पर सेवनकर्त्ताओं में से प्रायः सभी एक ही उत्तर देते हैं कि उनमें तुरन्त लाभ देने वाला गुण नहीं हैं। काष्ठ औषधियों का लाभ भी देर से होता है और संदिग्ध भी रहता है। स्थिति का इस प्रकार बिगड़ते जाना उस ऋषि अनुसंधान को झुठलाता है, जिसने चिरकाल तक समूची मानव जाति को आधि-व्याधि से मुक्त रखने में असंदिग्ध सहायता की। अब वह क्यों कर पिछड़ गई? क्यों कर अपना चमत्कारी प्रभाव प्रदर्शित करने में असमर्थ हो गई? इस संदर्भ में शान्तिकुँज में ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने पिछले दस वर्षा में अनवरत प्रयोग परीक्षण किये हैं और सारगर्भित निष्कर्ष निकाले हैं।

दूसरा प्रयोग पर्यवेक्षण अभी और आगे तक चलाना है कि वनौषधियों में प्राणवान व्यक्ति किस सीमा तक दिव्य शक्ति की-प्राण शक्ति की अवधारणा कर सकते हैं। उस समन्वय से न केवल शरीरगत व्यथा निवारण की वरन् मानसिक संतुलन एवं आत्मिक वर्चस् के अभिवर्धन में भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। वनौषधि यजन एवं बूटी कल्क सेवन की महत्ता इसी तथ्य पर अवलम्बित है कि मात्र वनौषधियों को सूक्ष्मीकृत किया जाना ही पर्याप्त नहीं होता, वरन् मंत्र शक्ति के आधार पर उन्हें सचेतन प्राणवान भी बनाया और संबद्ध लोगों को आशाजनक लाभ दिया जा सकता है।


कर्ण की नीति-निष्ठा (Kahani)

कर्ण के बाण चले। अश्वसेन वाला बाण भी। कृष्ण ने वस्तुस्थिति को समझा और रथ को धीरे से जमीन पर बैठा दिया। बाण मुकुट काटता हुआ ऊपर से निकल गया। असफलता से क्षुब्ध अश्वसेन प्रकट हुआ और कर्ण से बोला। अब की बार अधिक सावधानी बरतना, साधारण तीरों की तरह मुझे न चलाना। इस बार अर्जुन का वध होना ही चाहिए। मेरा विष उसे जीवित न रहने देगा। इस पर कर्ण को भारी आश्चर्य हुआ। उसने उस काल सर्प से पूछा-”आप कौन हैं? और क्यों अर्जुन को मारने में इतनी रुचि रखते हैं?”

सर्प ने कहा-”अर्जुन ने एक बार खाण्डव वन को आग लगाकर मेरे परिवार को मार दिया था। मैं उसका प्रतिशोध लेने के लिए व्याकुल रहता हूँ। उस तक पहुँचने का अवसर न मिलने पर आपके तरकस के बाण रूप में आ गया हूँ। आपके माध्यम से अपना आक्रोश पूरा करूंगा?”

कर्ण ने उसकी सहायता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वापस लौट जाने के लिए कहा ‘भद्र, मुझे अपने ही पुरुषार्थ से नीति युद्ध लड़ने दीजिए आपकी अनीति युक्त सहायता लेकर जीतने से तो हारना ही अच्छा।काल सर्प कर्ण की नीति-निष्ठा को सराहता हुआ वापस लौट गया।


गायत्री सर्व कामधुक्

गायत्री माहात्म्य के अंतर्गत एक कथा आती है कि नारायण तीर्थ नामक स्थान में महर्षि शाकल्य का आश्रम था। उसमें एक हजार विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते थे। एक दिन आवर्त देश के राजा सुप्रिय उस आश्रम में पहुँचे और बोले-”जिस साधना के आधार पर आप सिद्ध पुरुष बने हैं, उसे मैं भी सिद्ध करना चाहता हूँ। आप मुझे भी उसकी शिक्षा दीजिये।”

महर्षि ने कहा-”यह साधना चमत्कारी तो है, पर हर कोई उसे कर नहीं सकता। विशेषतया जिनका जीवन राजसी आदतों में ढला है, जो संयम रहित है, वे इसे करने पर भी सफल नहीं हो सकते, तुम तपश्चर्या में प्रवृत्त कैसे हो सकोगे?”

राजा को निराश देखकर उसकी आशा जागृत रखने के लिए ऋषि ने अपने कमण्डलु में से गायत्री में अभिमंत्रित जल एक सूखे ठूँठ पर छिड़का। देखते-देखते वह हरा हो गया। इस चमत्कार को देखकर राजा सोचने लगे कि मैं भी आत्मिक दृष्टि से सूखे ठूँठ की तरह हूँ। क्यों न ऋषि का शिष्यत्व प्राप्त करके इसी तपोवन में रहकर साधना करूं।

राजा शासन का प्रबन्ध परिवार के लोगों को सौंपकर जल्दी ही आये। उनने वहीं उसकी साधना की और उसका सत्परिणाम प्राप्त किया।

स्वामी विद्यारण्य जी दक्षिण भारत के एक माने हुए विद्वान थे। स्वामी जी ने विद्याध्ययन के अतिरिक्त 24 गायत्री महापुरश्चरण भी किये थे। उनके आशीर्वाद से अनेकों का कल्याण हुआ। विजय नगर के राजकुमारों ने अपना खोया राज्य फिर से प्राप्त किया।

उनने चारों वेदों का भाष्य ब्राह्मणों, उपनिषदों-दर्शनों, गीताओं, तंत्रों के भाष्य किये जो बड़े प्रामाणिक माने जाते हैं।

उनके भक्तजनों ने अनेक प्रकार के चमत्कार देखे और लाभ उठाये। अन्त में वे श्रृंगेरी पीठ के अधिपति के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

गायत्री साधना को समस्त कामनाओं की पूर्ति हेतु समय-समय पर मनीषियों द्वारा किया जाता रहा है। इससे उनके मनोरथ भी पूरे हुए हैं, साथ ही विश्व की तात्कालीन परिस्थितियों में परिवर्तन भी आया है।

एक कथा है कि स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी ने गायत्री का महान तप किया। माता ने प्रसन्न होकर पूछा-तुम लोग क्या चाहते हो?

दोनों ने प्रणाम करके उनकी स्तुति की और कहा-”देवि! हम लोग भगवान को बार-बार अपनी गोदी में खिलाना चाहते हैं।”

देवी ने कहा-”यह लाभ तुम्हें अगले जन्मों में मिलेगा।”

पौराणिक कथा है कि दूसरे जन्म में वे दशरथ और कौशल्या बने और राम उनकी गोद में खेले। पश्चात् वे नन्द और यशोदा बने और भगवान कृष्ण को गोद में खिलाकर धन्य हुए। साथ ही युगपरिवर्तन जैसा महान प्रयोजन पूरा करने के भी वे श्रेयाधिकारी बने।

एक बार सुदूर क्षेत्रों में महान् दुर्भिक्ष पड़ा। सर्वत्र त्राहि त्राहि मच गई। मनुष्य और पशु पक्षी आहार और जल के अभाव में बेमौत मरने लगे।

किन्तु उस बीच भी महान् गायत्री उपासक महर्षि गौतम के आश्रम का समीपवर्ती क्षेत्र हरा भरा था और उस छोटे क्षेत्र में किसी बात की कमी नहीं थी।

गौतम को इतने भर से संतोष न हुआ। वे समूची जनता का कल्याण चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कठोर गायत्री साधना का तप संपन्न किया। माता ने प्रसन्न होकर उन्हें एक पूर्ण पात्र दिया। जिसमें से अजस्र मात्रा में खाद्य सामग्री निकलने लगी। समयानुसार वर्षा हुई और दुर्भिक्ष दूर हो गया।


सूर्य की सविता शक्ति का विवेचन

दृश्यमान सूर्य को कविता कहते हैं और उसकी शक्ति को सावित्री। सविता और सावित्री का युग्म है। रथ के दो पहियों की तरह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। सावित्री को गायत्री भी कहते हैं। सविता को आदित्य या भर्ग भी। दोनों की संयुक्त शक्ति का आविर्भाव जब होता है, तो उस समन्वय को उपलब्ध करके साधक धन्य बन जाता है। सविता की सर्वोपरि यहाँ तक की ब्रह्म कहा गया है।

आदित्या-ज्योतिर्जायते। आदित्याद्देवा जायन्ते। आदित्या द्वेदा जायन्ते। असवा दित्यो ब्रह्म। -सूर्यापनिषद

अर्थात् “आदित्य से प्रकाश उत्पन्न होता है। आदित्य से देवता उत्पन्न हुए हैं। आदित्य से वेद उत्पन्न हुए, यह सूर्य ही प्रत्यक्ष ब्रह्म है।

आगे शास्त्र इसी कथन की पुष्टि करते है।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कंद प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः काले यमः सोमो ह्यषाँ पतिः -बाल्मिकी. रामा.

अर्थात्- ‘‘यह सूर्य ही ब्रह्मा है। विष्णु है। शिव है। स्कंद है। प्रजापति है। इन्द्र है। कुबेर है। काल है। यम है। सोम है और इन सबका स्वामी भी है।

संद्यानो देवः सविता साविशद् अमृतानि -अथर्ववेद

अर्थात्-”वह सविता देव अमृत तत्वों से भरा पूरा है।

तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो।

अर्थात्-”यह परम पुरुष सविता तेज का भण्डार है और अमृतमय है।”

वस्तुतः अमृत घट के रूप में सविता का ही अलंकारिक वर्णन पुराण शास्त्रों में निरूपित किया गया है।

मुंडकोपनिषद् में कहा गया है-

आदित्या-ज्योति जायते।

अर्थात्-”आदित्य से ही ज्योति उत्पन्न होती है। संसार में जिस किसी रूप में प्रकाश दृष्टिगोचर होता है, वह सूर्य का ही अनुदान है।”

प्रातःकाल का सूर्य सुनहरी आभा वाला होता है, इसलिए उसे स्वर्णिम, स्वर्णाभ आदि नामों से जाना जाता है। ऊषाकाल पूर्व दिशा में सुनहरी रंग के साथ उदय होता है। इसे ब्रह्म मुहूर्त भी कहते हैं। इस समय को सूर्य उपासना के लिए अधिक उपयुक्त माना गया है। इसी समय सविता देव की प्रेरणा का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। तालाबों में कमल खिलते हैं। उद्यान में पुष्पों की खिलखिली दृष्टिगोचर होती है। चिड़ियाँ घोंसलों से निकल कर चहचहाती, कुदकती–फुदकती दृष्टिगोचर होती है। वन्य पशु आहार की तलाश में एक दिशा से दूसरी में चलते-भागते दीख पड़ते हैं। रात्रि की स्तब्धता के उपरान्त सवेरे का पवन शीतल, मंद, सुगंध से भरा-पूरा होता है। उसमें प्राण-तत्व अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह सूर्य का प्रत्यक्ष अनुदान है। सविता को प्राण या प्राण प्रदाता भी कहा गया है। उस समय का खुले क्षेत्र में विचरण करते हुए जो लोग उपयोग करते है। उनके उस समय किये हुए सभी काम अधिक अच्छी तरह सम्पन्न होते हैं। इस समय का टहलना सामान्य व्यायामों की तुलना में कहीं अधिक शक्ति वर्धक पाया गया है। व्यायामशालाओं में स्वास्थ्य संभालने वाले पहलवानी के शौकीन इसी समय जा पहुँचते हैं। विद्यार्थी इस समय जितनी अच्छी तरह अपना पाठ याद कर लेते हैं, वैसा सुयोग उन्हें दिन के किसी अन्य समय में नहीं मिलता। लेखन की साधना का भी यही सर्वोत्तम समय है। उपासना साधना के लिए तो यह समय सर्वोपरि है। कारण कि वातावरण में नवोदित सूर्य द्वारा प्रेरित प्राण तत्व की मात्रा का परिणाम अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है।

सूर्य के सप्त अश्व वस्तुतः सात प्रकार की सात रंगों वाली किरणों के समुच्चय का प्रतीक है। सात द्वीप, सात सागर, सात पर्वत, सात सरिता इसके धरातल पर होने का उल्लेख है, यह भूगोल पुरातन काल का है। कालान्तर में वे प्रकृतिगत दबावों के कारण घटते बढ़ते रहे हैं। फिर भी उन्हें सप्तधा ही कहा गया है। सौर मण्डल में सात ग्रह ही प्रधान हैं। उन्हीं के आधार पर सप्ताह के सात दिनों का नामकरण किया गया है। सप्त ऋषि प्रख्यात हैं। यों ऋषि मुनियों की संख्या समयानुसार घटती-बढ़ती रहती हैं। पर जिन्हें ऋषि तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है, उनकी संख्या सात ही है। वे आकाश में अवस्थित हैं। रात्रि को तारागणों के मध्य चमकते हैं। लोक सात हैं। इन्हें आध्यात्मिक आयाम भी कह सकते हैं और ब्रह्माण्ड का सप्तधा वर्गीकरण भी। इन्हें सात लोकों के नाम से निरूपित किया गया है (1) भूः (2) भुवः (3) स्वः (4) महः (5) जनः (6) तपः (7) सत्यम्। इन्हें एक से एक ऊँची मनःस्थिति एवं परिस्थिति समझना चाहिए।

सूर्य को महाकाल भी कहा गया है। काल गणना उसी के आधार पर होती है। दिनमान प्रथम इकाई है। सात दिनों का सप्ताह होता है इसके उपरान्त पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, युग कल्प आदि का सिलसिला चलता है। ज्योतिषशास्त्र का आविर्भाव इसी आधार पर हुआ है। सूर्य को प्रधानता देते हुए उसके परिवार के अन्यान्य ग्रह उपग्रहों की भी गति गणना की गई है। साथ ही यह देखा गया है कि आकाशस्थ किस राशि पर किस ग्रह की क्या स्थिति होने पर प्राणियों, पदार्थों पर उस स्थिति का क्या प्रभाव पड़ता है? वातावरण में क्या हेरफेर हो रहा है।

आदिम काल से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति काल तक मनुष्य समय-समय पर अपने-अपने ढंग से सूर्य का आश्रय लेता रहा है और वह श्रृंखला अभी भी अपने क्रम में चल ही रही है। आरम्भिक काल में उसे देवता माना गया था। प्रातःकाल और सायंकाल के उदय-अस्त काल में उसकी अभ्यर्थना होती थी। पूजा सामग्री का चयन न होने के कारण जल को ही उपचार माध्यम निर्धारित किया गया था। नाम, जप, रूप-ध्यान के अतिरिक्त श्रद्धाभिव्यक्ति के लिए सूर्य को ही जलाँजलि दी जाती थी।

पीछे प्रतीक प्रतिमाओं का निर्माण आरम्भ हुआ। सभ्यता के उदय काल से लेकर उसके विकास काल तक सूर्य की प्रतिमाएँ विनिर्मित होती रहीं। पुरातत्व खोजियों ने संसार के उन सभी क्षेत्रों का बारीकी से पर्यवेक्षण किया है, जहाँ वन्य सभ्यता से आगे बढ़कर, शहरीकरण शुरू हो गया था और जहाँ प्रतिमाएँ बनने लगी थीं। अति प्राचीन काल की समझी जाने वाली प्रतिमाओं में से अधिकाँश सूर्याकृति की ही हैं। मिट्टी की बनी प्रतिमाओं और गुफाओं के भित्ति चित्रों में सूर्य आकृति का ही प्रधानतया चित्रण है। इसके बाद पाषाण प्रतिमाओं और धातु प्रतिमाओं का समय आया। उन दिनों की स्थिति के अनुसार निर्माण पदार्थों में तो अन्तर होता गया, पर प्रतिमाएँ सूर्य की ही रहीं। अतिपुरातन काल में प्रत्यक्ष गोलक की तरह प्रतिमाएँ भी गोलाकार ही बनती थी। उसे मुख माना जाता था और उस पर मुख, नेत्र नाक, कान आदि का अंकन किया जाता था। चारों और किरणें बिखेरने का भी उपक्रम किया जाता था। इसके बाद जब देवता मनुष्याकृति में बनने लगे, उनके साथ वाहन, आयुध जुड़ने लगे तब मनुष्याकृति में देवता बने। वाहन रूप में सप्त अश्व निरूपित किये गये। किन्हीं-किन्हीं प्रतिमाओं में अरुण सारथी भी बिठाया गया है। उस काल में देवताओं की अधिक भुजाएँ, अधिक शक्तियों के प्रतीक रूप में मानी जाती थीं। दो भुजा वाली मूर्तियाँ कम ही मिली हैं। अधिकाँश में चार भुजाएँ हैं। आयुधों में अन्तर है। लगता हैं, जिस क्षेत्र में जिन आयुधों की वरिष्ठता और बहुलता थी, वहाँ उन्हीं वाहनों का अंकन किया जाता रहा है।

सूर्य को ज्योतिर्लिंग कहा गया है। ज्योतिर्लिंगों के नाम पर अनेक तीर्थ और देवालय रहे हैं। इन दिनों उन सभी में शिवलिंग स्थापित हैं। धार्मिक भावना के उदयकाल में शिव और सूर्य को एक ही माना जाता था। शिव का इतिहासकार अनार्य देवता मानते हैं। उनकी वेषभूषा, परिधान आच्छादन, वाहन, आयुध सभी आदिवासियों जैसे हैं। प्रतिमा निर्माण की कला उस वर्ग के अभ्यास में नहीं आई थी। इसलिए नदियों में बहने वाले गोल पत्थर ही शिव के प्रतीक माने गये। अविकसित लोगों ने इस परम्परा को आत्मसात कर लिया और शिवलिंग को सूर्य गोलक की कल्पना दे दी। समन्वय की आवश्यकता समझी गई और शिव सूर्य के बीच का जो अन्तर था, वह हट गया।

मिस्र की विशालकाय सूर्य प्रतिमा सबसे पुरातन है। फराऊ बादशाह रैसेमस द्वितीय ने इस पहाड़ी को कटवाकर उसे सूर्य रूप दिया था। यह प्रतिमा 225 फुट ऊँची है। इसे ईस्वी सन् से 4 हजार वर्ष पूर्व की माना जाता है। इसी प्रकार उन दिनों की विकसित सभ्यताओं के चिन्ह जहाँ भी मिले हैं, वहाँ सूर्य के प्रतीक अनिवार्य रूप से उपलब्ध हुए हैं। यों धीरे-धीरे अन्य देवी देवताओं का भी प्रचलन विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में होने लगा था। किन्तु सूर्य का स्तर और सम्मान गिरा नहीं। उनके प्रतीक हर जगह विद्यमान मिले।

विश्व के पुरातत्व विज्ञानी अपने-अपने क्षेत्रों की खोजों के निकले निष्कर्षों के आधार पर इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि प्रतिमाओं की स्थापना और पूजा का प्रचलन जब से आरम्भ हुआ, तब उसमें प्राथमिकता सूर्य प्रतीकों की ही रहीं। कहीं उन्हें स्मारक रूप में सम्मान दिया गया, कहीं उन्हें देवालयों के रूप में विनिर्मित करके पूजा अर्चा का सिलसिला चलाया गया। जिन गुफाओं में मनुष्य परिवारों के निवास करने का पता चला है। सूर्य, चित्र एवं विविध विधि प्रतीकों का स्थापन चित्रण या उत्खनन के रूप में होता रहा है।

अग्रगामिता ने देवताओं में बहुलता का समावेश किया और उनके सम्प्रदाय भी चल पड़े। पौराणिक काल से कुछ पहले शिव, दुर्गा, गणेश, विष्णु के भी सम्प्रदाय बनने लगे थे, पर पाँचवे सूर्य को इनमें प्राथमिकता रही। देव सम्प्रदायों और उनके भक्तों की संख्या और विभिन्नता तो बढ़ती रहीं, पर सूर्य की प्रमुखता पर कहीं से भी उँगली नहीं उठी। वरन् कहा तो यह भी जाता रहा कि सूर्य की प्रथम पूजा किये बिना अन्य सब देवताओं की अर्चना अधूरी ही रहती है। सूर्य का दृश्यमान होना और मात्र जलाँजलि से उनकी अभ्यर्थना बन पड़ना इस वरिष्ठता का प्रधान कारण रहा।

विभिन्न समयों पर विदेशी यात्री भारत की समृद्धि आध्यात्मिक प्रगति और विचित्रता का पता लगाने आते रहे हैं। इनमें इब्नबतूता और हेनंसाग का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उनने अपनी यात्रा विवरणों में भारत में विद्यमान, अनेक विशालकाय सूर्य मंदिरों का उल्लेख किया है। मध्यम श्रेणी के देवालय तो असंख्यों थे। मुलतान के मन्दिर के बारे में लिखा गया है कि उसकी प्रतिमा 200 मन सोने की ढली थी। मोंढे़रा मंदिर का भी आश्चर्यजनक विस्तार लिखा गया है। उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत में भी उसका बाहुल्य था।

समय की लम्बी अवधि बीत जाने पर उन विशालकाय देवालयों के तो अब ध्वंसावशेष ही शेष रह गये हैं। मध्यकालीन मन्दिर आकार में छोटे थे और उनका निर्माण भी उतनी मजबूत सामग्री तथा कुशलता के साथ नहीं हुआ था तो भी उनके ऐसे ध्वंसावशेष जहाँ-तहाँ विद्यमान हैं, जिनमें सूर्य की प्रतिमा और उनके वाहन अश्वों का सजीव परिचय मिलता है विद्यमान मंदिरों में कोणार्क (उड़ीसा) का सूर्य मन्दिर अब भी अपेक्षाकृत अच्छी हालत में है। उसकी ऊँचाई 225 फुट है। सूर्यग्रहण के समय इस स्थान से उस स्थिति को अधिक अच्छी तरह से जानने के लिए देश-विदेशों के अनेक वैज्ञानिक अपने बहुमूल्य यंत्रों समेत वहाँ एकत्रित होते हैं।

सम्पूर्ण भारत में ऐसे ध्वंसावशेषों की 4000 से ऊपर संख्या हैं, जिनमें सूर्य की निमित्त उन्हें बनाये जाने का पता लगता है। पर यह सभी टूटी फूटी स्थिति में हैं। इससे पता चलता है कि चिर पुरातन काल के उपरान्त ऐसा मध्यकाल भी आया है जिसमें अन्य देवताओं की मान्यता बढ़ गई और सूर्य की उपेक्षा होने लगी। साथ ही आक्रमणकारियों का भी वर्चस्व रहा, जो मूर्तिपूजा के विरोधी थे। इस स्थिति में बने सूर्य मंदिरों का निर्माण एक प्रकार से रुक ही गया। लोग ज्योतिर्लिंगों के रूप में शिवलिंग को ही मान्यता देने लगे।

जिनकी अच्छी स्थिति है, जो नये बने हैं। जिनकी आयु पाँच छः सौ वर्ष से अधिक नहीं है, ऐसे सूर्य मन्दिर भारतवर्ष में एक हजार के लगभग आँके गये हैं। विदेशों में जो ध्वंसावशेष मिले हैं, उनकी संख्या भी हजारों में है। इन सब प्रमाणों द्वारा ऐतिहासिक दृष्टि से भी नहीं विदित होता है कि भारतीय संस्कृति में सूर्य की मान्यता को अतीव ऊँचा स्थान चिरपुरातन काल से दिया जाता है।

प्राचीन धर्म ग्रन्थों में से एक भी ऐसा नहीं है, जिसमें सूर्य का विवेचन, माहात्म्य एवं पूजा विधान का वर्णन न हो। पुराणों और उप पुराणों में से सभी में किसी न किसी रूप से सूर्य संबंध उपाख्यान विद्यमान हैं। मंत्र विज्ञान और तंत्र विधान के दोनों पक्षों में ही अपने-अपने ढंग से सूर्य की अभ्यर्थना का विवरण है। प्रतीत होता है कि चिर काल तक योग, तप, अनुष्ठान के रूप में विविध प्रकार की सिद्धियों के लिए सूर्य तप किये जाते रहे हैं।

कुन्ती ने सूर्य की आराधना करके उन्हीं के समान तेजस्वी पुत्र कर्ण प्राप्त किया था। सूर्य उपासना से ही द्रौपदी को ऐसा अक्षय पात्र मिला था जिसकी भोजन सामग्री कभी समाप्त ही नहीं होती थी। हनुमान को सूर्य का तेजाँश प्राप्त हुआ था और उन्हीं की कृपा से वे अनेक विभूतियों के अधिनायक बने थे। सीता के वाल्मीकि के आश्रम में सूर्य साधना करके ही लव-कुश को जन्म दिया था। राजा इक्ष्वाकु ने सूर्य साधना की थी। वहीं से उनके वंशधर सूर्यवंशी कहलाते चले गये। शकुन्तला ने अपनी परित्यक्ता स्थिति में सूर्य साधना करके ही चक्रवर्ती भरत को जन्म दिया था। ऐसे अनेक कथानक हैं, जिनमें सूर्योपासना से तेजस्वी संतानों का वरदान मिलने का उल्लेख है। यही नहीं सूर्योपासना से अभीष्ट मनोरथों के पूरा होने का उल्लेख शास्त्रों में विस्तार से आता है।

स्कन्द पुराण में कहा गया है-

किं किं न सविता दयात् सम्यगुपासितः। आयुरारोग्यमैर्श्वयं र्स्वगं चाप वर्गकम्।

अर्थात्-”भली प्रकार उपासना करने पर सूर्य क्या-क्या प्रदान नहीं करते। आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, स्वर्ग, अपवर्ग सभी कुछ उनसे मिलते हैं।

“शरीरारोग्य कृच्चैव धन वृद्धि यशस्करः जायते नात्र संदेहों यस्य तुष्ये दिवाकर” -पद्म पुराण

अर्थात्-”शरीर के आरोग्य, धन वृद्धि, यश यह सब उसे प्राप्त होते हैं जिस पर सूर्य प्रसन्न है।

महाभारत में वर्णन आता है कि जब वनवास काल में पाण्डव बुरी तरह परिस्थितियों में घिर गये, तब उन्होंने महर्षि धौम्य से पूछा कि इस विपत्ति से कैसे निकलें? तब उत्तर में धौम्य ने कहा-तुम लोग सूर्य की उपासना करे। उन्हीं की कृपा से कष्टों का निवारण और सुयोग का आगमन हो सकता है।

गायत्री महामंत्र वस्तुतः सविता देव का शक्ति स्रोत है। भौतिक प्रयोजनों में जब गायत्री का उपयोग होता है तो उसे सावित्री कहते हैं। अध्यात्म प्रयोजनों में वह दिव्य रूप धारा गायत्री ही रहती है। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि प्रदान करती हैं किन्तु सावित्री रूप में वह महारानी, महाचण्डी, महाकुण्डलिनी का रूप धारण करती हैं शक्ति सम्प्रदाय सावित्री उपासकों का है। वैष्णव, सम्प्रदाय गायत्री उपासकों का। फिर भी यह कोई विभाजन रेखा नहीं है। आवश्यकतानुसार कोई भी साधक इनमें से किसी का भी आश्रय ले सकता है।

गायत्री को सूर्य मण्डल मध्यस्थ कहा गया है। वह सूर्य मण्डल के बीच में अवस्थित है। गायत्री ध्यान में सविता देव का ही ध्यान किया जाता है। सविता स्वर्णिम आभा वाले हैं। प्रातः और सायं दोनों समय उनका वही रूप रहता है। दिन और रात्रि के मिलन काल यह दोनों ही हैं। इसलिए इन बेलाओं को संध्या काल कहा जाता है। यों कहीं-कहीं मध्याह्न समेत त्रिकाल संध्याओं का वर्णन है। पर मुख्यतः संध्याएँ प्रातः सायं की दो ही है। इन समयों पर किसी न किसी रूप में संध्या वंदन करना आवश्यक माना गया है। भले ही वह स्वल्प काल का ही क्यों न हो?

सविता की निष्काम उपासना से अन्तराल में सन्निहित दिव्य विशेषताओं का विभूतियों का अभिवर्धन होता है। सकाम उपासना से प्रतिकूलताएँ टलती हैं और अनुकूलताएँ बढ़ती है। शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग, शत्रुता का आक्रमण, दुर्बुद्धिजन्य अनाचरण, व्यसन, प्रायः प्रतिकूल परिस्थितियों के रूप में सामने आते रहते हैं। इनसे किस प्रकार पीछा छुड़ाया जाय, इसकी अंतःप्रेरणा सूर्योपासना से जन्म लेती है। उपाय सूझ पड़ते हैं और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए जिस विवेक और साहस की आवश्यकता पड़ती है उनका उद्भव भी अन्तःक्षेत्र में से अनायास ही उदय होने लगता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन, के उपायों को अन्तःचेतना के अभिवर्धन में सहायक माना गया है। पर यह बाह्य प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है। उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने वाले जिस आन्तरिक उल्लास की आवश्यकता है उसमें सूर्याराधना विशेष रूप से सहायक होती है।


सेवा से अरुचि क्यों?

“मैंने इतना तो कर लिया, क्या अब सदा मैं ही करता रहूँगा। दूसरों को सेवा कार्य करना चाहिए।” ऐसा सोचना उचित नहीं। सेवा कार्य आत्मा की आवश्यकता का पोषण है। उसको निरन्तर और निर्बाध गति से करते रहना इसलिए आवश्यक है कि हम जीवित रहें-हमारी आत्मा और उसकी सुरुचि जीवित रहे। किसी पर एहसान करने के लिए-दूसरों के सहायक और उपकारी बनने के लिए अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए भी नहीं, यश के लिए भी नहीं-सेवा का प्रयोजन आत्मा की गरिमा को अक्षुण्ण रखने और उसका जीवन साधन जुटायें रखने के लिए है।

जो सेवा की आवश्यकता और महत्ता को समझता है, उसे उससे कभी भी ऊब नहीं आती। जो ऊबता हो समझना चाहिए कि अभी उसे सेवा का रस नहीं आया। जब एक बार उस परम-धर्म का रसास्वादन कर लिया जाता है, तो उसे छोड़ सकना सम्भव ही नहीं होता। फूलों में कैसा रस है? इसे मधुमक्खी जानती है और वह जन्म से लेकर मरण पर्यन्त अनवरत रूप से उसी मधुरिमा में निमग्न रहती है। न थकती है न ऊबती हैं और कभी यह नहीं सोचती कि इतना लम्बा समय मधु संचय के प्रयोजन में लग गया अब कोई और धन्धा ढूँढ़ेंगे। विश्राम करेंगे। वह ऐसा सोच इसलिए नहीं सकती कि उसकी अन्तरात्मा उस क्रिया-कलाप की गरिमा को समझ ही नहीं, स्वीकार भी कर चुकी है।

भ्रमर का आश्रय और कहाँ है? पराग से विमुख होकर वह और क्या खोजे? तितली को अपने सौंदर्य के समतुल्य पुष्प के अतिरिक्त और कुछ दीखता भी तो नहीं। आखिर वह जाय भी कहाँ? बैठे भी कहाँ? करे भी तो क्या? जिनका दृष्टिकोण उत्कृष्टता का अभ्यस्त हो गया, उन्हें निकृष्टता की दुर्गन्ध में साँस ले सकना सम्भव भी नहीं है। सेवा धर्म छोड़कर अन्यत्र आत्मा की गरिमा के अतिरिक्त और कोई कार्य है भी तो नहीं।

हम साँस आजीवन लेते रहते हैं। इतने दिन साँस लेते रहे, अब हम विश्राम करेंगे, दूसरों की यह भार उठाना चाहिए कोई हमीं ने ठेका लिया है। बात ठीक है। मन न करे तो साँस लेना कभी भी बन्द किया जा सकता है, पर यह स्मरण रखना चाहिए कि यह विचार जिस क्षण कार्य रूप में परिणत होगा उसी क्षण दम घुट जायगा।

अन्न बहुत दिन खाया अब नहीं खायेंगे। पानी इतने दिन से पीते चले आ रहे हैं अब नहीं पियेंगे। स्वतन्त्र कर्तव्य के धनी मनुष्य के ऊपर फल पाने का ही बन्धन है कर्म करने का नहीं। सो अन्न, जल ग्रहण करना छोड़ा भी जा सकता है, पर यह भूलना न चाहिए कि यह ऊब जीवन के प्रति ऊब ही सिद्ध होगी। यह अनशन हमें विश्राम का आनन्द नहीं लेने देगा, मृत्यु के मुख में धकेल देगा।

हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े, गुर्दे, जिगर आदि भी विश्राम की माँग कर सकते हैं। जब तक कहते सुनते भर रहे, तब तक तो काम चल सकता है। पर जब अड़ कर विश्राम करने ही बैठ जायँ तो फिर सारा सरंजाम ही विश्राम करेगा। इनका विश्राम, चिरनिद्रा ही अखण्ड शान्ति-श्मशान जैसी नीरवता में परिणत होगा।

सूर्य ने कब छुट्टी मानी, चन्द्रमा ने कब विश्राम लिया, पृथ्वी का चलना कब बन्द हुआ, हवा कब रुकी, समुद्र कब शान्त हुआ? जीवन इसीलिए जीवित है कि वह अनवरत रूप से चल रहा है। सौर मण्डल की तरह परमाणु मण्डली भी अथक रूप से कार्य में संलग्न है। क्षुद्रता सो सकती है, पर महानता के लिए जागरण के अतिरिक्त दूसरा विकल्प नहीं। सूर्य का अन्धकार के साथ तालमेल बैठ ही नहीं सकता। सेवा आत्मा का स्वभाव है। गुण है, इसलिए वह कर्म में स्वभावतः परिणत होता रहेगा, फूल और गंध पृथक नहीं हो सके। मछली पानी के बिना रह ही नहीं सकती है। आत्मा का स्वभाव है-प्रेम। और प्रेम की परिणति है-सेवा। उससे छुट्टी कैसी? उससे ऊब क्यों? उसे छोड़ा कैसे जा सकता है?


देख खुला है द्वार पुजारी

अम्बपाली का कायाकल्प हुआ एवं वह वेश्या से साध्वी बन गयी। अपना वैभव बुद्ध को समर्पित कर वह बुद्ध की हो गयी। बुद्ध ने जो पाया था, उसे पाने के लिये-आस्तिक प्रगति के सोपानों को पार करने के लिए-वह छोड़ना आवश्यक था, जिसे वे स्वयं छोड़कर आये थे।

वैभव से अम्बपाली को कोई मोह न रहा, पर वैभव के नाते लोग जिस आदर भरी दृष्टि से उसे देखते थे, वह दृष्टि न रही। अंदर ही अंदर यह कामना बनी रहती थी कि सम्मान मिलना चाहिए। कहीं कोई कमी है, एवं यही उसे दुःखी करती रहती थी।

एक दिन यह अभाव गहरी धुँध के रूप में अंतराल पर छाया रहा। उदास मन से वह एकान्त में लम्बे समय तक बैठी रही। तथागत ने अन्तःदृष्टि से सब कुछ देखा व समझ गये। स्नेह से पूछा तो वह धुँध पानी की बूँदों के रूप में आँसू बन कर टपक पड़ी।

स्नेह भरे स्वर में भगवान बोले-”भद्रे! तुम संसार को जो दे रही थीं वह देना तुमने बन्द कर दिया है। उसके बदले में-संसार तुम्हें जो दे रहा था वह भी देना बन्द करेगा ही? भौतिक सुख के चले जाने का क्या दुःख मनाना?”

अम्बपाली कुछ आश्वस्त हुई, पर प्रश्न भरी दृष्टि तथागत के चेहरे पर डालकर पुनः नीचे देखने लगी। तथागत पुनः बोले “देवि! दैवी चेतना जब किसी को दिशा विशेष में बढ़ाना चाहती है तो वह एक द्वार बन्द करती है, दूसरा खोलती है। बन्द होते द्वारा पर ध्यान देकर दुःख मत बढ़ाओं। उसे किसी खुलते नये द्वारा का संकेत मानकर अपनी चेतना को उधर ही ले जाने का प्रयास करो। खुलते द्वारा की कल्पना मात्र में उल्लास बढ़ता है और उधर ध्यान देने से दिव्य अनुदान प्राप्त होते हैं।”

निर्धारित क्रम से साधना चलती रही। एक दिन साध्वी निर्धारित प्रव्रज्या करके लौट रही थी। मार्ग में अँधेरा हो गया। निकट के गाँव में पहुँची और रात बिताने के लिए किसी भवन में आश्रय चाहा। वहाँ कोई उसे जानता नहीं था। साध्वी वेश में ही सही एक अनजान युवती को कौन आश्रय दे?

साध्वी सहज भाव से गाँव से लगे सरोवर के किनारे वृक्ष के नीचे सो गयी। आधी रात के बाद शीत बढ़ी, ठण्ड लगी तो नींद खुल गयी। अम्बपाली ने कसम खायी “यदि कोई भवन---” पर तभी तथागत का कथन याद आया-”बन्द होते द्वारा को नहीं,-खुलते द्वारा को देख।”

दृष्टि खोज में चारों और घूमी। अचानक उसका ध्यान सरोवर पर गया। पूर्णचन्द्र मध्य आकाश में आ चुका था। सरोवर की कुमुदनी खिल गयी थी। दृश्य रोचक लगा। कुमुदनी से भरा सरोवर मन्द वायु के साथ झूमी खिली कुमुदनी, हल्की-हल्की लहरें, प्रत्येक लहर पर नृत्य करती चाँदनी तभी स्मृति में बिजली-सी कौंधी। दृश्य बदल गया। साध्वी को दिखा कि एक दिव्य आदान-प्रदान चल रहा है-स्थूल तथा सूक्ष्म प्रकृति के बीच। हर कुमुदनी निर्मल चाँदनी को गोद में भरे उल्लसित हो रही है। वायु के साथ सरोवर की हर लहर थिरक रही है। चन्द्रमा अनन्त रूपों में प्रत्येक कुमुदनी, प्रत्येक लहर के साथ अठखेलियाँ कर रहा है।

उसे लगा मेरी हृदय कुमुदनी भी खिल रही है। प्राण सरोवर की लहरों की तरह तरंगित हो रहे हैं। मेरा इष्ट दिव्य प्रकाश बनकर प्राण की रह तरंग पर, श्वास की हर गति पर, हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ चंद्रिका की तरह एक हो रहा है। कण-कण झिलमिला रहा है--! साध्वी को पता नहीं लगा, इस दिव्य आदान-प्रदान में वह कब समाधिस्थ हो गयी?

प्रातः पक्षियों के कलरव ने सूर्य रश्मियों के ऊष्मा भरे स्पर्श ने उसे ध्यान समाधि से जगाया। साध्वी उठी एक नये बोध के साथ। उस बोध में अंबपाली पूरी तरह घुल चुकी थी। अब साध्वी ही शेष थी-बोध की आभा से दीप्त मुखमंडल और शान्त अन्तःकरण युक्त।

वह पुनः उन स्थानों पर गयी जहाँ रात्रि में स्थान नहीं मिला था। धन्यवाद देने----उन्हें जिनने द्वार बंद रख था। यदि वह द्वार बन्द न होते तो बुद्ध द्वारा बताये गये दिव्य बोध कराने वाले द्वार तक कैसे पहुँचती?


सत्प्रवृत्ति संवर्धन की दिशा में बढ़ते चरण

राष्ट्र के सर्वांगीण विकास हेतु अध्यात्म एवं भौतिकी के समन्वय हेतु संकल्पित प्रज्ञा अभियान ने इन दिनों चारों और वनौषधि यजन के सामूहिक आयोजन एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की जो फिजा बनायी हैं, उससे जन मानस जागा है। समाज निर्माण के प्रगतिशील कार्यक्रम अध्यात्म मंच से न केवल उद्घोषित होते हैं अपितु उनका सक्रिय क्रियान्वयन भी जब आरम्भ हो जाता है, तो आशा बँधने लगती है कि समय अवश्य बदलो। विचार क्राँति का स्वप्न अवश्य पूरा होगा। हर अंचल से आने वाला समाचार इस तथ्य की साक्षी देता है।

बोकारो (बिहार) सेक्टर 9 में गायत्री शक्ति पीठ प्राँगण में आयोजित राष्ट्रीय एकता सम्मेलन आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम में राँची, धनबाद, हजारीबार, गिरीडीह एवं गोड्डा जिले के हजारों प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

समारोह का उद्घाटन महिला समिति की अध्यक्ष श्रीमती हेमा रामकृष्णन ने किया। सम्मेलन में बोकारो स्टील प्लान्ट के प्रबन्ध निदेशक श्री एस.आर. रामकृष्णन, जामा मस्जिद बोकारो के इमाम श्री करी मुहम्मद अली तथा मुहम्मद कैशर जामा, जी.ई.एल. चर्च के फादर रेव.जो. टोपनो सहित अन्यान्य प्रवक्ताओं ने मानवीय एकता पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जन-जन सत्साहित्य पहुँचाने की व्यवस्था स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने की।

नागपुर (महाराष्ट्र) जगनाडे़ चौक पर आयोजित राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में भाग लेने हेतु दूर-दराज के अंचलों से असंख्य लोगों के पहुँचने का क्रम लगातार बना रहा। विभिन्न स्थानों से आयोजन स्थल तक पहुँचने के लिए विशेष बसों की व्यवस्था की गई।

सम्मेलन में मुस्लिम समुदाय के हाजीशेख, शौकत कुरेशी (विधायक), श्री इच्छापुरी जी (पारसी) विश्व हिन्दू परिषद के श्री सी.सी.जे. ठक्कर एवं जैन, बौद्ध सिख, ईसाई आदि समुदाय के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। सभी ने राष्ट्रीय-एकता के लिए प्रज्ञा मिशन द्वारा किए जा रहे कार्यक्रमों की सराहना करते हुए अपने स्तर का सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कुक्षी (धार, म.प्र.) आयोजन से चार दिन पूर्व ही समूचे क्षेत्र में पीले चावल के साथ घर-घर जाकर आमंत्रण दिया गया। फलस्वरूप शोभायात्रा के समय से ही कार्यकर्त्ताओं का परिश्रम सार्थक दिखने लगा जब ऊँट, घोड़े, हाथी, बैण्डबाजे, शहनाई, ढोल, नगाड़े, बिगुल एवं शंख ध्वनि के साथ चल रहे जुलूस का स्वागत हर धर्म सम्प्रदाय के अनुयायियों ने स्वागत द्वार बनाकर पुष्पवृष्टि के साथ किया।

सम्मेलन में जैन समाज के श्री मणिलाल, ईसाई धर्म के पादरी अर्थर सेमसन, सिक्ख धर्म के श्री प्रीतमसिंह छाबड़ा, मुस्लिम समाज के सदर मुहम्मद हुसैन के अतिरिक्त कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुक्षी परियोजना के प्रशासक श्री आर. आर. गंगारेकर ने एकता और सद्भावना की आवश्यकता बताते हुए इस आयोजन को अभूतपूर्व कदम बताया।

कायावरोहण (बड़ोदरा, गुज.) राष्ट्रीय-एकता सम्मेलन ऐतिहासिक छाप छोड़ते हुए सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में सभी धर्म सम्प्रदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। पारसी प्रतिनिधि श्री टेमुरस फकीरशाह अंकलेश्वरिया इस कार्यक्रम से अत्याधिक प्रभावित हुए। इस अवसर पर सभी कर्मठ कार्यकर्त्ताओं ने युग चेतना से समूचे क्षेत्र को अनुप्राणित करने के लिए टोली बद्ध रूप से अशिक्षा निवारण के लिए प्रौढ़ पाठशालायें चलाने तथा भावी पीढ़ी के अन्दर मानवीय गुणों के विकास के लिए बाल संस्कारशालायें चलाने का संकल्प लिया।

बोरसद (खेड़ा, गुज.) स्थान नया होते हुए भी समीपवर्ती क्षेत्रीय कार्यकर्त्ताओं के सहयोग से राष्ट्रीय एकता सम्मेलन शानदार ढंग से सम्पन्न हुआ। इस क्षेत्र में इस तरह का यह पहला कार्यक्रम था। जिसकी आम जनता ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।

सम्मेलन में रचनात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत सद्वाक्य लेखन के द्वारा अनायास ही मिलने वाले मार्गदर्शन पर विशेष जोर दिया गया। रास्ते चलते राहगीर भी प्रेरणा एवं प्रकाश प्राप्त कर सकें, इसके लिए कार्यकर्ताओं ने इस कार्यक्रम को नियमित रूप से चलाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम की सफलता में श्री पी.जे. रावल का सराहनीय योगदान रहा।

गाडरवारा (नरसिंहपुर, म.प्र.) राष्ट्रीय एकता सम्मेलन जन जागरण के महान उद्देश्य को पूरा करता हुआ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में सम्मिलित जन समुदाय में से अधिकाँश प्रबुद्ध वर्ग था।

कार्यक्रम से उभरे उत्साह को स्थायी बनाये रखने के लिए स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने आयोजन में ही रचनात्मक कार्यक्रमों के संचालन की सुव्यवस्थित योजना बनाई। जिसके अंतर्गत जन्म दिन, सद्वाक्य लेखन, झोला पुस्तकालय, वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रमों को तुरन्त ही टोली-बद्ध रूप से क्रियान्वित करने का संकल्प लिया।

जशपुर नगर (म.प्र.) राष्ट्रीय एकता सम्मेलन की शोभायात्रा में ईसा, मोहम्मद, नानक, बुद्ध तथा अन्य महापुरुषों, सन्तों की शिक्षाओं के पोस्टरों से सुसज्जित झाँकियाँ अपार जनसमूह के साथ शानदार शुरुआत का परिचय दे रही थी।

कार्यक्रम के दूसरे दिन से वर्षा के कारण व्यवधान तो हुआ, पर सामूहिक सभा का कार्यक्रम न होने पर इस समय का उपयोग कार्यकर्त्तागोष्ठी के रूप में हुआ, जिसमें रचनात्मक कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने के लिए योजनाबद्ध रूप से काम करने का संकल्प लिया गया। आयोजन में ईसाई परिवार के सदस्यों ने भी यज्ञोपवीत व नामकरण संस्कार कराये।

ओबेदुल्लागंज (भोपाल) कार्यक्रम में उमड़ते जन समूह को देखकर स्थानीय कार्यकर्ता आश्चर्यचकित रह गए। मानों किसी अदृश्य सत्ता ने घर-घर जाकर आयोजन में सम्मिलित होने के लिए विवश किया हो।

चारों दिनों तक नगर के गणमान्य व्यक्तियों के अलावा विधायक, साँसद तथा केबिनेट स्तर के मंत्री सहज ही सम्मिलित होते रहे। शालेय शिक्षा मंत्री श्री बंशीलाल धृतलहरे तथा खाद्य आपूर्ति मंत्री श्री कन्हैयालाल शर्मा विशेष रूप से जन समुदाय को मिशन के प्रति स्वयं की अनुभूतियाँ सुनाकर लाभान्वित करते रहे। उत्तर प्रदेश सरकार की तरह मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग के सदस्यों को नैतिक शिक्षा प्रशिक्षण देने के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी जानकारी श्री धृतलहरे ने दी।

पालनपुर (गुज.) यहाँ राष्ट्रीय-एकता सम्मेलन शानदार सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। दो किलोमीटर लम्बी शोभायात्रा ऐतिहासिक रही।

राष्ट्रीय-एकता सम्मेलन में इस्लाम, ईसाई, जैन, सिक्ख, पारसी प्रतिनिधियों ने अपूर्व उत्साह के साथ भाग लिया, सभी ने राष्ट्रीय-एकता के लिए मिशन द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की व राष्ट्रीय-एकता की शपथ ली।

समूचे क्षेत्र में ज्ञान का प्रकाश फैलाने के उद्देश्य से झोला पुस्तकालय एवं ज्ञान रथ नियमित रूप से चलाने का संकल्प कर्मठ कार्यकर्त्ताओं ने लिया। पच्चीस हजार तक की कीमत का साहित्य तो आयोजन के समय ही श्रद्धालुओं द्वारा खरीदा गया।

धापी (गुज.) मुस्लिम बाहुल्य बस्ती में राष्ट्रीय एकता का प्रत्यक्ष नमूना यहाँ देखा गया। जब 20 हजार लोगों से सुसज्जित शोभायात्रा का स्वागत स्थान-स्थान पर मुस्लिम भाइयों द्वारा स्वागत द्वार बनाकर किया गया।

राष्ट्रीय-एकता सम्मेलन का उद्घाटन पंडित लीलापत शर्मा द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए युग निर्माण योजना द्वारा राष्ट्रीय-एकता के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। अन्य धर्मावलम्बियों ने भी इन प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। कार्यक्रम में 1500 से भी अधिक विभिन्न संस्कार सम्पन्न कराये गये।

शिरपुर (महाराष्ट्र) राष्ट्रीय-एकता सम्मेलन को स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने अपने श्रम एवं आपसी तालमेल के कारण ऐतिहासिक बना दिया। कार्यकर्त्ताओं ने कार्यक्रम की तिथियाँ मिलते ही घर-घर जाकर संपर्क करने एवं आयोजन में सम्मिलित होने के लिए टोलीबद्ध रूप से आमंत्रण देने का काम प्रारम्भ कर दिया था। स्थानीय समाचार पत्रों के माध्यम से भी समूचे क्षेत्र में परमपूज्य गुरुदेव का संदेश आमंत्रण के साथ निरंतर पहुँचाया जाता रहा। इसी का परिणाम था कि कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए अपार जन समूह उमड़ पड़ा।

कार्यक्रम से उभरे उत्साह को दिशा देने के लिए नियमित जन संपर्क की व्यवस्था झोला पुस्तकालय के माध्यम से कार्यकर्त्ताओं ने टोलीबद्ध रूप से करने का संकल्प लिया।


अपनों से अपनी बात - संजीवनी विद्या का शिक्षण प्रयोजन एवं स्वरूप!

यह संसार जड़ और चैतन्य दो तत्वों से मिलकर बना है। जड़ सृष्टि अर्थात्-पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के न्यूनाधिक सम्मिश्रण से बने पहाड़ नदियाँ, जंगल, समुद्र, ग्रह-नक्षत्र आदि। जड़ प्रकृति अपने आप में कितनी उपयोगी और कितनी समर्थ है? आज स्कूलों में पढ़ाये जाने वाले विज्ञान से उसे भली प्रकार समझा जा सकता है। यान्त्रिकी, शल्य-शिल्प, रसायन, औषधि विज्ञान आदि के क्षेत्र में हुई प्रगति इतनी आश्चर्यजनक है कि उसके सहारे आज का मनुष्य दूरवर्ती ग्रह नक्षत्रों तक जा पहुँचा। परमाणु विद्या पकड़ में आ जाने से एक ही झटके में सारे संसार का विनाश कर डालने वाली शक्ति मनुष्य के हाथ में आ गई है।

चेतना-सृष्टि का दूसरा पक्ष है। इसके अंतर्गत वे सभी जीव आते हैं जिनमें इच्छा, अनुभूति, अहंभावना पाई जाती है। जीव जगत को प्राणधारी भी कहते हैं। संकल्प, विचारणायें और भावनायें प्राण तत्व में भरी हुई हैं। जीवनी शक्ति के रूप में यह प्राण ही सक्रिय है। इसी की कमी से व्यक्ति निस्तेज मुर्दा-सा दिखने लगता है। और इसी के संचार से तेजस्वी बनता है। इसी को समझने, बढ़ाने के, नियंत्रण और मनोवाँछित उपयोग करने का अध्यात्म विज्ञान कहा जाता है। आज इस विज्ञान की सर्वथा उपेक्षा हो रही है। आज इस विज्ञान की सर्वथा उपेक्षा हो रही है, पर यह बात बहुत आसानी से समझ में आने वाली है कि जड़ का उपयोग करने वाली शक्ति चेतना ही है। अतएव इस विधा को भौतिक विज्ञान की अपेक्षा बहुत अधिक शक्तिशाली और समर्थ कहा गया है। इसी विज्ञान की प्रगति के आधार पर प्राचीन काल के लोगों ने ऋद्धियों-सिद्धियों के भंडार प्राप्त किये थे।

इन दिनों भौतिक विज्ञान को तो बहुत महत्व दिया गया, पर चेतना के गुण, कर्म, स्वभाव के परिष्कार की ओर से आंखें मूँद ली गई। परिणाम यह हुआ कि भौतिक विज्ञान ने जितनी प्रगति की, अन्तःचेतना उतनी ही अधःपतित हुई। औषधियाँ बढ़ी, उससे हजार गुने अधिक बीमारियाँ बढ़ गई। जितने भौतिक साधन बढ़े, मनुष्य उतना ही विपन्न हो गया। जबकि प्राचीन काल में अध्यात्म साधनाओं पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था। आश्रम, आरण्यक, तीर्थ इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुए थे। जहाँ पर अन्तश्चेतना के विकास की साधनाओं का शिक्षण और अभ्यास किया जाता था। आश्रम परम्परा जीवित तो अभी भी है। पर वे केवल मूर्तिदर्शन, कथा कीर्तन, रामधुन या अधिक से अधिक योगाभ्यास कहे जाने वाले आसनों प्राणायामों तक सीमित हैं। यह योग व्यायाम निरर्थक नहीं उनकी उपयोगिता अपने स्थान पर यथावत है परन्तु योग का असली भाव तो उच्चतम से जुड़ना है। इसके लिए तप भी करने पड़ते हैं। तपश्चर्या अर्थात् अन्तश्चेतना में गहराई तक प्रवेश कर गये कुसंस्कारों का दमन और निष्कासन।

अध्यात्म तत्वज्ञान का प्रारम्भिक चरण है-”व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश। इसे चेतना का सुसंस्कारीकरण कह सकते हैं। लौकिक प्रगति इसी पर निर्भर है। इसे जीवन जीने की कला, संजीवनी विद्या भी कहा गया है। इतना कर गुजरने पर ही गहराई में प्रवेश करना बन पड़ता है।

चेतना के समुद्र में काफी गहराई तक अनेक समृद्धियाँ भरी पड़ी हैं। इन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी कहा जाता है। जिस प्रकार वैभव का धनी अपना ठाट-बाट बना सकता है और दूसरों को भी सहायता देकर निहार कर सकता है, उसी प्रकार चेतना को योगाभ्यास और तप साधना द्वारा इतना परिष्कृत किया जा सकता है कि साधक हर किसी को चमत्कृत कर सके, अनेकों को विशेष लाभ दे सकने का द्वारा खोल सकें, स्वयं सिद्ध पुरुषों जैसा देवोपम जीवन जी सके। यह सफलता उपासना विज्ञान के अवलम्बन से उसे श्रेष्ठ मार्गदर्शन एवं दैवी संरक्षण में किए जाने पर ही मिलती है। चेतना के उदात्तीकरण की इस प्रक्रिया हेतु, प्रारम्भ से ही उच्च स्तर की साधनाओं के लिए किसी को नहीं कहा जाना चाहिए, न किसी को वैसा दुस्साहस ही करना चाहिए। यही व्यावहारिक है। संजीवनी विद्या वाले पक्ष को जीवन में उतार कर यदि अपने को सुविकसित कर लिया जाता है तो अन्तराल की गहराई में छिपे पंचकोशों, षट्चक्रों, उपत्यिकाओं, गुच्छकों को उभारने वाली और अनेक ऋद्धि-सिद्धियों को सामने उपस्थित करने वाली विभूतियों का अर्जन संभव भी हो जाता है और सरल भी।

प्रत्यक्ष शरीर की व्यावहारिक साधना का प्रसंग चलने पर मानवी सत्ता के तीन पक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। जैसे केले के तने में एक के भीतर दूसरी परत होती है, ऐसे ही शरीर में क्रियातंत्र रूपी काय-कलेवर, विचारतंत्र रूपी मनःक्षेत्र एवं भावतंत्र रूपी अन्तःकरण इन तीन की सत्ता समाई हुई है। इन्हें आध्यात्मिक शब्दावली में क्रमशः स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर कहा गया है। तीनों के मिलने से ही समग्र मनुष्य बनता है। इन्हें सुविकसित बनाने के लिए जो अनुशासन अपनाना पड़ता है, उसे अध्यात्मशास्त्र, तत्वदर्शन या उपासना विज्ञान कहते हैं।

हम प्रायः स्थूल काया से परिचित हैं, उसी को सब कुछ समझते हैं। उसी के लिए सोचते और करते रहते हैं। अपनी समग्रता उसी में समाहित देखते हैं। इसलिए जो कुछ सोचा करते हैं, वह उसी परिधि की स्वार्थ साधन के निमित्त होता है। वासनाएँ इसी क्षेत्र में धुँध की तरह छायी रहती हैं। शरीर का ही एक भाग मन है। उसे ग्यारहवीं इन्द्रिय अपने भोग तलाशती रहती हैं। मन का विचार तंत्र लिप्साग्रस्त होकर लोभ, मोह और अहंता की पूर्ति हेतु ताने-बाने बुनता रहता है। समूची क्रिया शक्ति इसी परिधि में समाप्त हो जाती है। वह एक भी काम बन नहीं पड़ता जिसके लिए सृष्टा ने अपनी इस सर्वोपरि कला-कृति को धरोहर के रूप में सुपुर्द किया है। आत्म-परिष्कार के बिना न पुण्य परमार्थ सधता है, न लौकिक सिद्धियों एवं आत्मिक ऋद्धियों का द्वार खुलता है।

अध्यात्म-विज्ञान का अनुशासन है कि स्थूल शरीर पर अंकुश नियंत्रण रखा जाय। उसे संयम बरतने के लिए संकल्पपूर्वक विवश किया जाय। इसके लिए तपश्चर्या अपनानी होती है। बड़े उद्देश्यों के लिए योगी यती पंचाग्नि विद्या जैसी प्रत्यक्ष और परोक्ष तपश्चर्या करते हैं। किन्तु सर्वसाधारण के लिए तो उसे सुलभ स्तर पर सीमित मात्रा में ही लागू किया जा सकता है। हलकी तपश्चर्या को संयम साधना कहते हैं।

संयम के चार भाग बताये गये हैं :- (1) इन्द्रिय संयम (2) समय संयम (3) अर्थ संयम (4) विचार संयम। इन्द्रिय संयम में चटोरेपन और कामुकता से पीछा छुड़ाया जाता है और वाणी को साधा जाता है। समय संयम में जागने से सोने तक का सुव्यवस्थित कार्यक्रम बनाना और उस पर दृढ़तापूर्वक चलना होता है। अर्थ संयम में अपव्यय के हर पक्ष पर रोकथाम करनी पड़ती है। अहंकारी प्रदर्शन से बचकर ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का आदर्श हृदयंगम करना पड़ता है। विचार संयम का तात्पर्य है कि कल्पनाओं को स्वच्छन्द उड़ानें ने भरने दें। मात्र सामने प्रस्तुत उपयोगी प्रयोजनों का ताना-बाना बुनने तक ही विचारणाओं को सीमाबद्ध रखा जाय।

छलनी में दूध दुहकर सारा दूध जमीन पर गिरा देने जैसी मूर्खता हमें नहीं करनी चाहिए। असंयमों को छिद्र कहा जाता है। अभ्यास में आ जाने पर ईश्वर प्रदत्त अनुदान और स्व उपार्जित वैभव इन्हीं असंयम रूपी छिद्रों में से बहकर बर्बाद हो जाता है। असंयमी पर आलस्य छाया रहता है, कुकल्पनाओं और दुर्व्यसनों का आवेश चढ़ा रहता है। परिणाम स्वरूप व्यक्ति-सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन की गरिमा गिराता है और उसके सहारे मिल सकने वाली उपलब्धियों से वंचित रह जाता है। संजीवनी विद्या के शिक्षण का मुख्य उद्देश्य है कि इन विडम्बनाओं से बच कर चारों प्रकार के संयमों को अपनाकर विभूतियाँ जगाये और उन्हें सत्प्रयोजनों के लिए ही लगाया जाय।

व्यावहारिक अध्यात्म की निष्ठापरक चार धारणाएँ और भी हैं :- (1) समझदारी (2) ईमानदारी (3) जिम्मेदारी (4) बहादुरी। इन्हीं हो अपनाते हुए साधक सामान्य स्तर का जीवन-यापन करते हुए भी असंख्यों के लिए अनुकरणीय-अभिनन्दनीय बनता है। यह ऐसी सम्पदाएँ हैं जिनका प्रतिफल तृप्ति, तुष्टि, शान्ति के रूप में मिलता है। जीवन में अध्यात्म अनुशासनों का समावेश कितने चमत्कारी प्रतिफल देता है इसे तीनों शरीरों की साधना के माध्यम से प्रत्यक्षतः जीवन में कायाकल्प के रूप में देखा जा सकता है।

मनुष्य के तीनों ही शरीर एक से एक अधिक शक्तिशाली है, किन्तु प्रत्यक्ष शरीर की तुलना में सूक्ष्म की महत्ता कहीं अधिक होती है। वैज्ञानिक, चिकित्सक, एडवोकेट, आर्टिस्ट, साहित्यकार, इंजीनियर आदि बुद्धि कौशल के आधार पर प्रख्यात भी होते हैं, सम्मान पाते और सम्पन्न बनते हैं।

विचार शक्ति का जितना गुणगान किया जाय, उतना ही कम है। मनःक्षेत्र एक बाजीगर है। यही काया के अंग−प्रत्यंगों को कठपुतली की तरह नचाता और उनसे भले-बुरे काम कराता रहता है। उसे साधना के माध्यम से परिष्कृत एवं सशक्त बनाया जा सकता है। मनोबल के आधार पर ही व्यक्तित्व निखरता है। प्राणवान आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति ही प्रतिभावान बनते हैं, और अपनी प्रखरता, प्रामाणिकता के आधार पर असंख्यों का कल्याणकारी नेतृत्व करते हैं।

सूक्ष्म शरीर मनुष्य की काया में प्राण शक्ति के रूप में नापा व आँका जा सकता है। वह प्राण विद्युत से भरा है। शरीर के चारों और विशेषतया चेहरे पर तेजोवलय के रूप में इसे देखा जा सकता है। प्रतिभा-प्रखरता, साहसिकता के रूप में उसी विशिष्टता को न्यूनाधिक मात्रा में देखा जाता है। यह जैव चुम्बकत्व भी है, जो अपने प्रभाव से आस-पास वालों को आकर्षित प्रभावित करता है। सत्संग-कुसंग की प्रतिक्रिया के रूप में इसके प्रभाव को प्रकट होते हुए देखा जा सकता है। मन और प्राण का समन्वय ही सूक्ष्म शरीर है। उसमें व्यावहारिक जीवन में असाधारण काम कर दिखाने की सामर्थ्य तो है ही, इसके अतिरिक्त अतीन्द्रिय क्षमताओं का भी वहीं भण्डार है। यह दिव्य शक्तियाँ प्रायः प्रसुप्त स्थिति में रहती हैं। इन्हें जागृत किया जा सके तो वे हर क्षेत्र में चमत्कार दिखाती हैं।

सूक्ष्म शरीर की व्यावहारिक साधना तो मनोविकारों से छुटकारा पाने के प्रयत्नों से ही पूरी हो जाती है। हल्की-फुल्की हँसती-हँसाती जिन्दगी उतने भर से ही बन जाती है। उद्वेगों महत्वाकाँक्षाओं, आक्रोशों, अवसादों की अनेक मानसिक व्याधियों से छुटकारा मिल जाता है। इसके अतिरिक्त प्रसन्न मुख रहने की आदत चेहरे का सौंदर्य अनेक गुना बढ़ा देती है, भले ही नख, शिखा की दृष्टि से बनावट कुरूप ही क्यों न हो। शरीरगत सशक्तता को ओजस् और मानसिक शक्ति को तेजस् कहते हैं। ओजस् की अपेक्षा तेजस् की सूक्ष्मता की सामर्थ्य अनेक गुनी मानी गयी है। जिसने सूक्ष्म शरीर विकसित कर लिया, समझना चाहिए कि कोई सामर्थ्यवान देव सिद्ध कर लिया और उसकी असाधारण सहायता निरन्तर प्राप्त करने रहने का सुयोग प्राप्त कर लिया। प्रसुप्त एवं अनगढ़ स्थिति में तो वह शरीर यात्रा एवं अनगढ़ कल्पनाओं में ही अपनी क्षमता का समापन करता रहता है। इस हीरक हार को आम आदमी तो काँच के टुकड़ों वाला कूड़ा-करकट ही समझता है।

कारण शरीर समग्र काय-सत्ता का अंतिम तीसरा शरीर है। इसे यों प्रथम भी कहा जा सकता है, क्योंकि वह आत्मा और परमात्मा के मध्यवर्ती झीनी चादर का काम करता है। इसकी पृष्ठभूमि पर ही परब्रह्म का, ब्रह्माण्डीय चेतन धारा का अवतरण होता है। व्यावहारिक भाषा में यह भाव शरीर है, इसमें सबल संवेदनायें निवास करती हैं। आत्मीयता, करुणा, मैत्री, सेवा, सहायता, संवेदना का इसे केन्द्र कहा जा सकता है। उत्कृष्ट आदर्शवादिता भी उसी में जड़ जमाये रहती है। जब यह क्षेत्र विकसित होता है। तो नन्दनवन की कल्पवृक्ष, उपवन की तरह सुन्दर लाभदायक सिद्ध होता है।

आत्मीयता जिस भी वस्तु या व्यक्तित्व के साथ जुड़ती है उसी को परम प्रिय आनन्ददायक बना देती है। भगवान के साथ भक्ति के रूप में जब वह जुड़ती है, तो प्रभु सान्निध्य जैसी दिव्य अनुभूति होती है। स्वजन संबंधों में वह प्रेस भावना बनती है। प्रियपात्र की समीपता सदा आनन्ददायक लगती है। उस आत्मभाव का विस्तार विराट ब्रह्म के साथ जुड़ने से ही संभव होता है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की आस्था जब प्रगाढ़ होती है, तब संसार का कण-कण देवता जैसा अनुभव होने लगता है। भाव संवेदनाओं को आदर्शवादिता के साथ जोड़ते हुए उन्हें उभारना ऐसा ही है, मानों हर घड़ी सोमपान का, अमृत तत्व के रसास्वादन का अवसर मिल रहा हो।

साधारण रूप से यह समझा जाता है कि ऐसा आनन्द तो मरने के बाद स्वर्ग-मुक्ति प्राप्त होने पर ही मिल सकता है। पर यदि परायेपन की नीरसता को जीता जा सके, तो सर्वत्र आत्म तत्व ही बिखरा दिखता है और प्रभु मिलन जैसा सरस अनुभव बराबर होता रहता है। भाव संवेदनायें जिस उद्गम से उभरती हैं उसे गंगोत्री, गोमुख जैसा पावन बनाती है। वह धारा जब अग्रगामी होती है तो सारे संपर्क क्षेत्र का सरसता से, शीतलता से ओत-प्रोत करती हैं। इसका प्रत्यक्ष स्वरूप सेवा-साधना के रूप में प्रकट होता है। इस दैवी उभार ही कहा जा सकता है। देवताओं के मानस एवं क्रिया-कलाप सदा सर्वदा वरदान, अनुदान, बरसाने वाले ही होते हैं। जिनका भाव क्षेत्र संवेदनशील हो चला है, वे देव मानव भी इसी आत्मीयता भरी सेवा साधना को अपनी जीवन धारा बनाते हैं। इसी आधार पर दिव्य आनन्द का लाभ प्राप्त करते हैं।

कारण शरीर कहा जाने वाला भावक्षेत्र यदि विकसित हो उठे तो शरीर के साथ सच्चा प्यार करने उसे स्वस्थ सक्रिय बनाने का विवेक जगाता है। परिवार के प्रति उच्चस्तरीय भाव जगे, तो उसके सदस्यों को सद्गुणी बना कर उज्ज्वल भविष्य को गढ़ने का प्रयास चल पड़ता है। मित्र पड़ौसी संबंधियों को विचार परिष्कार की प्रेरणा मिलती है, तथा उनका वास्तविक हित साधन करने के लिए जी उमगता है। पाप, अनाचार, छल, प्रपंच के लिए तो पैर उठते ही नहीं। इस स्थिति में न केवल अपना अन्तःकरण आनन्द से ओत-प्रोत होता है वरन् संपर्क क्षेत्र में भी वह अमृत वर्षा होती देखी जा सकती है। प्रकृति, पदार्थ एवं दृश्य भी चित्र जैसे सुन्दर और खिलौने जैसे मनमोहक लगने लगते हैं। इन उपलब्धियों का सहयोग ऐसा मंगलमय है कि अपने को स्वर्ग में पहुँचाने या स्वर्ग को अपने अन्दर प्रकट कर लेने जैसी अनुभूति होने लगती है।

प्रस्तुत पंक्तियों में प्रत्यक्ष शरीर सूक्ष्मशरीर और कारण शरीर के व्यावहारिक उत्कर्ष का अनुभव अभ्यास तीन शरीरों की विशिष्ट साधना प्रक्रिया के प्रशिक्षण के अंतर्गत सुझाया गया है। यह आवश्यक तो है और प्रथम चरण के रूप में अनिवार्य भी। पर बात इतने से समाप्त नहीं हो जाती। इसके लिए सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों के जागरण हेतु विशिष्ट साधनाएँ भी करनी पड़ती है। श्रद्धा संवर्धन के विविध कर्मकाण्ड किए जाते हैं। अन्तःकरण की चिकित्सा हेतु संस्कारित औषधिकारक से लेकर प्रायश्चित इच्छापूर्ति के विभिन्न उपचार करने होते हैं।

तीन शरीरों की एक उथली स्वल्प मात्रा दैनिक जीवन में कार्यरत रहती है पर उस समर्थता को तीनों क्षेत्रों में प्रचण्ड करना हो तो यह भी अनिवार्य हो जाता है कि इस प्रयोजन के निमित्त जपयोग प्राणयोग भावयोग रूपी उन अध्यात्म विज्ञान सम्मत उपचारों को अपनाया जाय, जिन्हें विशिष्ट साधनाएँ कहते हैं। तीनों शरीरों की अन्तरंग क्षमता को प्रचण्ड बनाने के लिए भिन्न प्रकार की साधना-विधियाँ हैं जिन्हें हर साधक स्तर के परिजनों के लिए इन साधना सत्रों में सुगम बनाया गया है।


सादगी का फल (Kahani)

मधुमक्खी उड़ती-उड़ती एक फूल पर जा बैठी और मकरन्द चूसने लगी। एक तितली भी वहीं मँडरा रही थी उसने पूछा-”बहन, यह क्या कर रही हो, हमें भी तो बताओ?”मधुमक्खी ने कहा-”मधु इकट्ठा कर रही हूँ और फिर अपने काम में जुट गई” ।

तितली हँस कर बोली-”बहन तुम भी कितनी नादान हो। छोटे से फूल में कहीं मधु रखा है, बेकार समय और शक्ति खराब कर रही हो? आओ हम दोनों चलकर कहीं मधु के तालाब की खोज करें।”

मधुमक्खी कुछ न बोली, चुपचाप अपने काम में लगी रही। तितली सारा वन छानती रही। शाम को दोनों घर लौटी तो मधुमक्खी के पास मधु का ढेर जमा था और तितली खाली हाथ लौट रही थी।


ओजस्, तेजस् एवं वर्चस् के जागरण हेतु उच्चस्तरीय साधनाएँ

स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों का अस्तित्व भिन्न होने पर भी तीनों परस्पर जुड़े हुए हैं। एक शरीर जिस स्थान पर दूसरे से जुड़ता है उसे ग्रन्थि या चक्र भी कहते हैं। पहला दरवाजा मकान में प्रवेश पर होता है उसे खोलकर ही मकान के अन्दर की यथार्थ स्थिति को समझा जा सकता है। मकान के अन्दर भी दूसरा ताला, आलमारी पर लगा होता है। सामान्य वस्तुएँ तो घर के बाहर फैली रहती है; पर विशिष्ट वस्तुओं को आलमारी या तिजोरी के अन्दर रखने का विधान है। कीमती आभूषण तिजोरी के अन्दर भी किसी तीसरे आवरण में-लॉकर में रखे जाते हैं इतने दरवाजे खोल लेने पर ही वहाँ तक पहुँचा जा सकता है।

ब्रह्म की वैभव विभूतियों को इसी तरह कारण शरीर के अन्तराल में छिपा कर रखा गया है। जो इन तालों को खोल सकता है, वही उन्हें प्राप्त कर सकता है। आध्यात्मिक भाषा में इसी को ग्रंथिभेद चक्रवेधन कहते हैं। इसके लिए कुछ विशिष्ट क्रियाएँ और अभ्यास करने पड़ते हैं। यह क्रियाएँ ही साधना उपचार या योगाभ्यास कहलाती हैं। हठयोग में इन साधनाओं को समर अर्थात् युद्ध कहा गया है। इन साधनाओं में कोई त्रुटि रह जाए तो वह हानिकारक हो सकती है। इसलिए कठिन साधनाओं का आग्रह हर किसी को नहीं करना चाहिए। सिद्ध महापुरुष ऐसे शिष्यों को स्वयं तलाशते हैं। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द स्वामी विरजानन्द ने, स्वामी दयानन्द, मछिन्द्रनाथ गोरखनाथ को स्वयं तलाश कर उच्चस्तरीय साधनाएँ कराई थीं। यह उत्तरदायित्व तो प्रवर्तक पर छोड़ना चाहिए। वह जिसे चाहेंगे उसे स्वयं ही यह कठोर साधनाएँ करायेंगे।

विभूतियाँ प्राप्त करने का एक सौम्य उपाय भी है। अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई की अपेक्षा अनुग्रह प्राप्त करके, अपने माता-पिता से उत्तराधिकार प्राप्त कर लेना, हर किसी के लिए सरल और सुगम होता है। तीनों शरीरों की वैभव विभूतियाँ प्राप्त करने की ऐसी ही रीति-नीति शान्ति कुँज द्वारा विकसित की गई हैं। इसमें साधकों का अपना प्रयत्न पुरुषार्थ तो नाम मात्र का होगा, पर यहाँ के वातावरण का, समर्थ गुरुदेव के अनुग्रह का योगदान इतना होगा जिसके सहारे सामान्य स्तर के साधक भी मात्र अपनी जीवनचर्या में परिवर्तन करके अधिकतम अभीष्ट लाभ प्राप्त कर सकेंगे। सरल सौम्य साधनाओं का प्रारम्भिक अभ्यास नौ दिन तक शान्ति कुँज में कराया जाता है, जिसे अपने घरों पर रहकर भी किया जा सकता है और धीरे-धीरे लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।

उच्चस्तरीय साधनाओं का उद्देश्य तीनों शरीरों में छिपी हुई दिव्य क्षमताओं को उभारना और उनका प्रभाव पूर्ण उपयोग करना होता है। व्यक्तिगत प्रचण्ड साधना अथवा दिव्य अनुदान दोनों ही क्रमों से उन्हें प्रभावित जागृत किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के लिए उनसे सम्बद्ध केन्द्रों, कमल चक्रों का प्रयोग करना लाभप्रद होता है। स्थूल शरीर का केन्द्र नाभि कमल, सूक्ष्म का हृदय कमल तथा कारण शरीर का केन्द्र सहस्रार कमल है। इन्हीं के जागरण में क्रमशः प्राण प्रवाह, ज्ञान प्रवाह भाव प्रवाह पैदा होते हैं, सशक्त बनते हैं।

स्थूल शरीर की सुन्दरता, सक्रियता सामर्थ्य आदि सभी विशेषताएँ प्राण से जुड़ी हैं। उसके बिना तो चमड़ी, माँस, रक्त, सब सड़ांध फैलाते हैं। उन्हें देखने से अरुचि पैदा होती है। शरीरगत प्राण तत्व और अन्तःकरण गत आत्मतत्व के संयोग से मनस्तत्व बनता है। साधना के प्रभाव से प्राण तत्व ‘ओजस्’ मनस्तत्व ‘तेजस्’ और आत्म-तत्व वर्चस् के रूप में प्रकट होता है। नाभि कमल का क्षेत्र मूलाधार चक्र तक है। इस क्षेत्र में स्थित महाशक्ति को कुण्डलिनी भी कहा जाता है। इस शक्ति की उपलब्धि वृद्धि है। सामान्य स्थिति में यह केवल पाचन और प्रजनन का ही काम करती है। इस स्थिति में वृद्धि शरीर पोषण तथा वंश वृद्धि तक ही सीमित रहती है। पर जब यह जागती है तो छः ऊर्जा स्रोतों षट्चक्रों को वेधती हुई सहस्रार तक जा पहुँचती है। इसे शिव से शक्ति का मिलन कहते हैं। तब ओजस् के रूप में चमत्कारी वृद्धि होती है।

जिस प्रकार स्थूल शरीर के केन्द्र नाभि कमल का क्षेत्र मूलाधार तक है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर के केन्द्र हृदय कमल का क्षेत्र आज्ञाचक्र तक है। इस क्षेत्र की उपलब्धि है ‘सिद्धि’। सामान्य स्थिति में इस क्षेत्र से केवल प्राण संचार, जीवन रक्षा के जैसे प्रयोजन सिद्ध होते हैं। जागृत होने पर अतीन्द्रिय शक्तियों का विकास, यश, गौरव का अनुपम विस्तार होता है।

कारण शरीर सहस्रार कमल ब्रह्मरंध्र से सम्बद्ध है। इस चक्र का क्षेत्र ब्रह्माण्डव्यापी ब्राह्मी चेतना तक है। इसकी उपलब्धि ऋद्धि है। सामान्य स्थिति में इसके प्रभाव से सर्व समर्थ सत्ता की हल्की स्मृति भर बनी रहती है। अपनी महानता का हल्का-सा बोध बना रहता है। इस क्षेत्र के जागरण से, सत् चित् आनन्द से एकत्व की अनुभूति होने लगती है। वृद्धि, सिद्धि और ऋद्धि के भंडार साधना से ही खुलते हैं, और मनुष्य नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है।

तीनों शरीरों के जागरण की परम्परागत साधनाएँ बड़ी कठिन दुरूह हैं। समय की आवश्यकता देखते हुए पूज्य गुरुदेव ने सर्वसुलभ साधना क्रम विकसित किया है। शान्ति कुँज के साधना सत्रों में उन्हीं का प्रशिक्षण दिया जाता है, अभ्यास कराया जाता है। स्थूल शरीर के लिए जपयोग, सूक्ष्म के लिए प्राणयोग और कारण के लिए ध्यान योग का निर्धारण है। इसे अखण्ड-ज्योति के जनवरी अंक के कुण्डलिनी योग-ग्रन्थि भेदन एवं अप्रैल अंक की ‘कुण्डलिनी केन्द्र की साझेदारी’ का सुगम संस्करण समझा जा सकता है। मार्च की अपनों से अपनी बात में जिन नौ दिवसीय सत्रों की घोषणा की गयी है उनमें यही साधनाएँ सिखायी करायी जायेंगी।

गायत्री जप को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। प्राण को चिनगारी से ज्वाला बना देने की इसमें चमत्कारी क्षमता है। शरीर के ऊर्जा केन्द्रों पर इसके अक्षरों के भाव भरे उच्चारण का सीधा प्रभाव पड़ता है। जैसे टाइप राइटर की चाबी दबाने से संबंधित अक्षर टाइप होता है, वैसे ही इसके अक्षरों के उच्चारण का, संबंधित केन्द्रों पर सीधा दबाव पड़ता है। शरीरगत प्राण शुद्ध और प्रखर बनकर, सौंदर्य, शक्ति सामर्थ्य, आरोग्य सभी को बढ़ाता है। इन सत्रों में गायत्री मंत्र के 24000 जप का अनुष्ठान कराने की व्यवस्था है।

सूक्ष्म शरीरों की तेजस्विता के लिए प्राणाकर्षक प्राणायाम का निर्धारण है। तीर्थ में युग ऋषि के प्राण अनुदानों को इस माध्यम से साधक बड़ी मात्रा में धारण कर सकता है। पहले प्राण के सरोवर में स्थित होने का भाव किया जाता है। फिर श्वास खींचते हुए दिव्य प्राण के प्रवेश का बोध किया जाता है। इसे 10 मिनट से प्रारम्भ करके क्रमशः आधे घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। इससे मेधा, प्रज्ञा, विवेकशीलता, प्रखरता जैसी तेजस्विताएं बढ़ती हैं।

कारण शरीर सहस्रार कमल के विकास के लिए सूर्य की स्वर्णिम आभा का ध्यान किया जाता है। वह दिव्य प्रवाह, रोम-रोम में कण-कण में समाता हुआ देखा जाता है। स्वर्णिम प्रकाश और आत्मज्योति एक रूप होते अनुभव होते हैं। श्रद्धा संवेदनाओं, सदिच्छाओं, सद्भावनाओं के जागरण स्थापन के लिए यह उद्भूत प्रयोग है। इन तीनों साधनाओं को शरीर के लिए अन्न जल, वायु की तरह, अध्यात्म क्षेत्र के त्रिवेणी संगम की तरह लाभकारी कहा जा सकता है।

भावयोग के अंतर्गत ही एक साधना उपचार और आता है, जिसे देवाधि देव-आत्मदेव की साधना कहा गया है। इसमें दर्पण के माध्यम से आत्मपरिष्कार की साधना की जाती है। दर्पण में दिख रहे अपने प्रतिबिम्ब को अपनी छाया नहीं, अपना कोई निकटवर्ती घनिष्ठ संबंधी-परिजन मानते हुए यह भाव करना चाहिए, कि इसमें विद्यमान त्रुटियों का परिमार्जन करना है। सत्प्रवृत्तियों के बीज विकसित करना है। अपना प्रतिबिम्ब गंभीरता से देखा जाय व ‘स्व’ के परिष्कार का, उसे समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाय। दर्पण में विद्यमान व्यक्ति का भूत, वर्तमान सभी विदित है। यह भावना करते हुए उसका सही पर्यवेक्षण कर आदर्शों की कसौटी पर जितनी खोट पर मिले, उसे हटाने सुधारने का प्रयास अपनाने का संकल्प किया जाय। संजीवनी विद्या के अंतर्गत यह एक महत्त्वपूर्ण साधना है, जिसका अवलम्बन प्रस्तुत शिक्षण में लिया जाना है।

साधना काल में उपवास का व्रत भी अपनाना पड़ता है। अपने परिश्रम की, स्व-उपार्जित कमाई ही ग्रहण करने का तपश्चर्याओं में सर्वोपरि विधान है, जिससे अन्त से जुड़े कुसंस्कार तंग न करें। आहार में जौ, तिल, चावल का विशिष्ट धान्य तथा औषधि कल्क भी इसी निमित्त शामिल किए जाते हैं। व्रत और उपवास के सभी आवश्यक सिद्धान्तों का समावेश होने के कारण अमृताशन का बहुत अधिक महत्व है। यह सुपाच्य भी होता है। सात्विक भी। नौ दिन की तपश्चर्या में आहार साधना को स्थूल शरीर शोधन का महत्वपूर्ण अंग मानकर उसे अपनाना पड़ता है।

अन्तःकरण में छुपे हुए पापों की खोज करने के लिए साधक के भूतकाल का इतिहास जानना आवश्यक होता है। पिछले जीवन में क्या भूलें हुई हैं, उन्हें जानने के बाद ही प्रायश्चित्त साधनाओं का निर्धारण हो सकता है। आभूषण की सामान्य टूट-फूट को थोड़े में ठीक किया जा सकता है, पर टूट-फूट अधिक हो तो भट्ठी में गलाये बिना काम नहीं चलता। प्रायश्चित्त साधनाएँ प्राचीन काल में बहुत कठोर होती थी। इन सत्रों में उसे सुलभ तो बनाया गया है, पर पाप कर्मों का खुलासा तो करना ही पड़ता है। पिछली गाँठें खुले नहीं, बन्धन टूटें नहीं, तो साधक मुक्तावस्था का आनन्द कैसे ले सकता है? इसके लिए साधकों को अपने जीवन में हुई भूलों को विस्तार से लिखना पड़ता है। उन्हें वंदनीय माताजी या गुरुदेव ही देखते हैं। किन परिस्थितियों में कब कौन से पाप बन पड़े यह जानना ठीक उसी तरह आवश्यक होता है, जिस तरह डॉक्टर चिकित्सा से पूर्व रोग के कारणों को बार-बार पूछकर ज्ञात करता है। सारी स्थिति जान लेने पर साधक के पक्ष में कठोर प्रायश्चित तो पू. गुरुदेव अपने पर लेकर स्वयं जलाते हैं, प्रतीक प्रायश्चित भर, साधकों से कराते हैं। स्वयं कुछ किये बिना साधक उऋण भी नहीं हो सकते।

महाभारत का सूत्र है “पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधि रूपेण निस्त्रितः” अर्थात्-पूर्व जीवन में किए पाप रोगों, कष्टों के रूप में प्रकट होते हैं। उन पापों का शमन, प्रायश्चित एवं साधना विधान से किया जाय तो अनेक रोगों, शोकों, कष्टों से मुक्ति मिलती है। पाप निष्कासन, परिष्कार की व्यवस्था, नौ दिवसीय सत्रों की अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

कारण शरीर की उच्चस्तरीय तपश्चर्या का नाम समर्पण योग है। इसके अंतर्गत अपनी इच्छाएँ परमात्मा को सौंपनी पड़ती है। यह अभ्यास गुरु के प्रति श्रद्धा समर्पण से पूर्ण होता है। उसके लिए प्रत्येक साधक को शान्ति कुँज को माँ का पेट, आवा समझ कर निर्धारित नौ दिन तक यहाँ का साधना, क्रिया कलाप और अनुशासन का पालन करना पड़ता है; ताकि यहाँ प्राण ऊर्जा पूरी तरह साधक के रोम-रोम में पच जाए। यह ऊष्मा ही अगले दिनों खाद पानी की तरह अन्तरंग की शक्तियों को पुष्पित पल्लवित और फलीभूत करती है। परम पू. गुरुदेव की संकल्प शक्ति और ऊर्जा ऐसी ही स्थिति के साधक की साधना पकाने में समर्थ होती है।


सब कुछ सार्थक(Kahani)

शुकदेव जी राजा जनक के यहाँ राजगृह में विद्या सीखने गये। विद्याध्ययन पूरा हुआ तो उन्होंने गुरुदक्षिणा देने की इच्छा प्रकट की। राजा जनक ने कहा-”मुझे कोई दक्षिणा नहीं चाहिये। फिर भी तुम्हारा आग्रह है तो कोई निरुपयोगी लगने वाली वस्तु दे दो।”

निरुपयोगी वस्तु की तलाश में शुकदेव निकले, मिट्टी, पत्ते, इत्यादि सभी अपनी-अपनी जगह उपयोगी लगे। पदार्थों में कोई निरुपयोगी नहीं दिखता। भावों का लेखा जोखा लेने लगे। उन्हें लगा यह देहाभिमान ही निरुपयोगी है। जनक जी से बोले “मैं आपको देहाभिमान अर्पित करना चाहता हूँ।”

राजा ने कहा “अब तुम कृतार्थ हो गये। संसारी देहाभिमान को ही सर्वप्रिय मानकर उससे चिपटा रहता है। तुम्हें यह सर्वथा निरर्थक लगा, यह दृष्टि प्रभु कृपा से जिसे मिल जाय, वही कृतार्थ।”


नौ दिवसीय साधना सत्रों की रूपरेखा

ढर्रे के जीवन में, कोल्हू के बैल की तरह लगे रहना जिन्हें नहीं रुचता, उन्हें दृष्टिकोण बदलना होगा। वे भौतिकता को ही सब कुछ न मान लें, अध्यात्म विज्ञान पर भी उचित ध्यान दें। यही वह मार्ग है जिससे अभावों से ऊपर उठकर उल्लास की, बन्धन मुक्ति और स्वर्गीय सुख की अनुभूति हो सकती है।

अक्सर शिकायत मिलती है कि उपासनाएँ सफल नहीं होतीं, मनोकामनाएँ पूरी नहीं हो पाती। अध्यात्म पर यह कलंक उनने लगाया हैं जो खेत तैयार किए बिना ही बीज बोने और फसल काटने की जल्दबाजी करते हैं। आत्मशोधन की उपेक्षा और पूजा-पत्री को ही सब कुछ मान लेने से ऐसी स्थिति पैदा होती है। सही ढंग से चला जाय, तो अध्यात्म से वे सब लाभ आज भी उठाये जा सकते हैं, जो कभी पढ़े या सुने गये हैं। पूज्य गुरुदेव का निजी अनुभव भी हम सबके सामने हैं।

सोचा गया है कि प्रज्ञा परिजनों में से किसी के मन में अध्यात्म विज्ञान के प्रति शिकायत न रहने पाये। अब तक अपनाये गये क्रम और उसकी असफलता की दुहाई देने की अपेक्षा समग्र साधना का क्रम नये उत्साह के साथ, श्रद्धा विश्वासपूर्वक अपनायें। इन साधना सत्रों में निर्धारित साधनाओं का पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करें।

नवीन साधना क्रम नौदिन में 24000 गायत्री जप के अनुष्ठान के साथ जोड़कर रखा गया है। यह प्रति माह 1 से 9, 11 से 19 तथा 21 से 29 तक चलेंगे। गायत्री जप अनुष्ठान के साथ तीनों शरीरों से सम्बद्ध कमल चक्रों का ध्यान-योगत्रयी के रूप में जुड़ा रहेगा। प्राणाकर्षण प्राणायाम तथा आत्मदेव की साधना भी अनिवार्य साधनाओं में रहेगी। प्रातःकाल विश्व कुण्डलिनी योग का विशेष ध्यान भी कराया जायेगा। तप साधना में आश्रम अनुशासन, हविष्यान्न तथा अमृताशन का एक बार आहार, गंगाजल पान, प्रातः मौन जैसे सुगम परन्तु प्रभावशाली क्रम अपनाने होंगे। लोक मंगल के लिए किया जाने वाला सुनिश्चित पुरुषार्थ भी तप और प्रायश्चित इच्छापूर्ति का माध्यम बनेगा।

साधनाएँ घर पर भी की जा सकती है, परन्तु वातावरण की अनुकूलता का लाभ मिलने पर साधक का संकल्प अपनी पिछली आदतों को काबू करने में ढर्रे को बदलने में अधिक सफल हो पाता है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की तपस्थली, दिव्य वातावरण, समर्थ संरक्षण, उपयुक्त परामर्श आदि की सुविधाएँ गायत्री तीर्थ में विशेष रूप से हैं। इसलिए जो परिजन समय निकाल सकें उन्हें किसी साधना सत्र की स्वीकृति मँगा लेनी चाहिए। अपने परिचित, संबंधियों सत्पात्रों को भी इसकी जानकारी देनी चाहिए तथा जिनमें उमंग जगे, उनके भी आवेदन भिजवाकर स्वीकृति मँगा लेनी चाहिए।

प्रज्ञा परिवार बहुत बड़ा है। शान्ति-कुँज में स्थान सीमित है। एक बार में उतने ही व्यक्तियों को स्वीकृति दी जायेगी जितनों की व्यवस्था ठीक से की जा सके। इसलिए परिजनों को क्रमशः अपनी पारी की प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी।

आवेदन पत्र हाथ में लिखकर भेजे जायेंगे। उसमें पूरा नाम, पूरा पता, आयु, जन्म-जाति, शिक्षा, व्यवसाय आदि लिखे जायेंगे। किस माह के किन सत्रों को प्राथमिकता देना चाहते हैं? यदि उन सत्रों में स्थान होगा तो उन्हीं सत्रों में अन्यथा निकटवर्ती किसी सत्र में स्वीकृति दी जायेगी। आवेदन के साथ सत्रों के अनुशासन पालने का आश्वासन होना चाहिए। कोई ऐसा रोग नहीं होना चाहिए, जिसके कारण सत्र साधना अथवा किन्हीं के साथ ठहरने में स्वयं को कठिनाई या दूसरों को ऐतराज हो। प्रत्येक आवेदन अलग हो। एक आवेदन पर बहुतों के नाम लिखना पर्याप्त नहीं। प्रत्येक व्यक्ति के विवरण की समीक्षा करके, उन्हें उपयुक्त पाये जाने पर ही स्वीकृति भेजी जायेगी। घुमक्कड़ मनोभूमि के व्यक्ति जो साधना अनुशासन के प्रति गंभीर नहीं हों; वे साधना का माहौल बिगाड़ते हैं। इसलिए सुपात्रों के लिए ही स्वीकृति माँगी जाय। स्वीकृति देने में भी सावधानी बरती जायेगी।

परम पू. गुरुदेव ने देवात्मा भारत की समष्टि कुण्डलिनी के जागरण का संकल्प लिया है। उसके लिए विशिष्ट रूप से इस युग में जन्मी आत्माओं को झकझोर कर जगा रहे हैं। जिन्होंने इस वर्ष के शतकुण्डीय यज्ञ देखे होंगे उन्हें यह विश्वास हो गया होगा कि किस तरह बिना बुलाये इन आयोजनों में भीड़ उमड़ रही है। लोगों का कहना है कि ऐसा लगता है जनसमूह को कोई अदृश्य शक्ति हाथ पकड़ कर ला रही है।

तीन वर्ष के कठोर साधना से उनका स्थूल शरीर तो क्रमश हुआ है; पर तीनों शरीर-सुदर्शन चक्र की तरह अत्यधिक सक्रिय हो उठे हैं। उनके सूक्ष्म शरीर की प्रौढ़ता चमत्कार अगले 15 वर्षों तक लोग अपने चक्षुओं से ................ देखेंगे। कारण शरीर के प्रभाव से वे भारत ही नहीं समूचे विश्व की विचारणा आस्था को बदल कर रख देंगे।

जिस अभिनव सृष्टि की संरचना की जा रही है उसका सूत्रधार तो अपना गायत्री परिवार ही है। इसमें उन आत्माओं का अवतरण हुआ है, जो अगले दिनों अपनी आत्म शक्ति से युग को नेतृत्व प्रदान करेंगी और लोगों का आध्यात्मिक, धार्मिक मार्गदर्शन करेंगी। यह कार्य वे अपने वर्तमान स्तर और एकाकी बल-बूते पर नहीं कर सकते। उन्हें जिस तप साधना की अनिवार्य आवश्यकता है, उसी के लिए यह नौ-नौ दिनों की अभिनव सत्र श्रृंखला प्रारम्भ की गयी है। सेनापति संगठन करता है और योजनाएँ बनाता है; पर लड़ने वाले तो सैनिक ही होते हैं। वे सेनापति की योग्यता वाले न हों तो न सही; पर उसके संरक्षण में युद्ध प्रशिक्षण तो उन्हें भी लेना पड़ता है। इन पंक्तियों में ऐसे सभी मनस्वी साधकों को युग नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। वे अपने अन्तरंग में विद्यमान देवाधिदेव आत्म देव को पहचानें और उसे परिपुष्ट करने के लिये इन शिविरों में शान्ति-कुँज आयें।

सूक्ष्मीकरण साधना से पूज्य गुरुदेव ने इतनी अगाध शक्ति प्राप्त की है जिससे यहाँ न आ सकने वाले प्रज्ञा परिजन भी अपने घरों पर 15 मिनट की शक्ति संचार साधना (जिसका उल्लेख अप्रैल के अखण्ड-ज्योति में किया गया है) से लाभान्वित हो सकते हैं। सूर्योदय से आधा घंटे पूर्व से आधा घंटे बाद तक के समय में 15 मिनट शक्ति संचार के लिए नियत रखें। साधकों को प्राणाकर्षण प्राणायाम के साथ हिमालय के ध्रुवकेंद्र का ध्यान करना चाहिए। प्राण प्रवाह तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा है। रोम-रोम में समा रहा है। तीनों कमल (स्थूल शरीर का नाभि कमल, सूक्ष्म का हृदय कमल तथा कारण का सहस्रार कमल) खिलते जा रहे हैं। 5-5 मिनट तीनों कमल जागृत करने का ध्यान करना चाहिए। इससे उन्हें न्यूनाधिक मात्रा में शान्ति-कुँज के साधना सत्रों में आने जैसा लाभ मिलेगा।

दैनिक जीवन में ज्ञानयोग की साधना गायत्री उपासना के रूप में, सप्ताह में एक दिन यज्ञ कर्मयोग की साधना और प्रज्ञा संकीर्तन भक्तियोग की साधना के अंतर्गत जहाँ भी प्रजा परिजन हों मिलकर चलाएँ। इससे देवात्मा भारत की महाशक्ति कुण्डलिनी का जागरण सुनिश्चित होकर रहेगा।


प्रतिभावान शंकर (Kahani)

शंकर मित्र तब पाँच वर्ष के थे। बड़े प्रतिभावान। उस देश के राजा अचानक उनके गाँव में आ निकला। एक हँसोड़ लड़के को बुलाकर पूछा-तुमने क्या सीखा है? उसने अपनी बनाई एक कविता मधुर स्वर में गाई। फिर दूसरे की बनाई कविता सुनाने के लिए कहा गया। बालक ने पुरुष सूक्त के 16 मंत्र सस्वर सुना दिये और उनका अर्थ भी बताया।

राजा बहुत प्रसन्न हुए और बालक को उपहार में अपने गले का हार दे दिया। बच्चे की हार को माता को दिया। माता ने दाई को बुलाकर कहा-”मैंने वचन दिया था कि इस बालक की पहली कमाई तुझे दूँगी। सो यह हार लेले।” दाई ने इतना कीमती हार लेने से इनकार किया पर समझाने बुझाने पर उसने ले लिया, और उसे बेचकर एक तालाब सार्वजनिक उपयोग के लिए बनवा दिया। दरभंगा में वह दाई का तालाब अभी भी मौजूद है।


द्वैत का अद्वैत में विलय

(सुन्दर लाल “अरुणेश”)


द्वैत का अद्वैत में विलय (Kavita)

इतना चिन्तन किया तुम्हारा, तुमसे इतना प्यार हो गया। तजकर अपना रूप, तुम्हारा मैं पावन आकार हो गया॥

एक एक मिल दो होते हैं, यह तो है सिद्धान्त पुराना। एक एक मिल एक हो गया, गणित भला यह किसने जाना?

हम तुम मिलकर एक हो गये, यह अद्भुत व्यापार हो गया॥ तजकर अपना रूप, तुम्हारा मैं पावन आकार हो गया॥

तब तक दूर रहे तुम जब तक द्वैत भाव ने मन को घेरा। ज्योति तुम्हारी पड़ी दिखाई, जब अद्वैत ने किया बसेरा।

अब तक था जो निराकार, वह नयनों में साकार हो गया॥ तजकर अपना रूप, तुम्हारा मैं पावन आकार हो गया॥

भव बन्धन ने मुझ को बाँधा, माया ने प्रतिफल भर पाया। इस संसृति को जानूँ कैसे, जबकि स्वयं को जान न पाया।

अपने को पहचान सका तब, जब मन पर अधिकार हो गया॥ तजकर अपना रूप, तुम्हारा मैं पावन आकार हो गया॥

*समाप्त*