सम्पत्ति मात्र एक सीमित मात्रा में अपने पास रखी जा सकती है। उससे अधिक रखने के लिए गोदाम अपने पास है ही नहीं। फिर तृष्णाजन्य उपार्जन से संकट यह खड़ा हो जाता है कि जो चाहा गया है, यदि उतना मिलता भी जाए तो वह संचित न रखा जा सकेगा। चीज चाही हुई हो, प्रिय भी हो और मूल्यवान भी, पर उसे रखने का प्रबन्ध किये बिना उसे जहाँ-तहाँ कैसे फेंक दिया जाए? स्थान बनाये बिना संग्रह कर लेना मुसीबत मोल लेने के समान है।
पेट में चार रोटी का स्थान है। मिष्ठान सामने अधिक मात्रा में उपस्थित हो उन्हें छोड़ देने का मन न हो, रखने की जगह नहीं, ऐसी दशा में खाये जाने पर पेट में दर्द उठेगा ही। बाहर कहीं रखेंगे तो चोरी होने या सड़ जाने का संकट खड़ा होगा। यह है सांसारिक मुसीबतों की जड़ उत्पन्न करती है।
संसार में असीम वैभव भरा पड़ा है। पर वह पात्रता के अनुरूप ही उपलब्ध है। भगवान सुख इतना देता है, जितना हजम हो सके। बिना पचे भी दर्द होता है। यही है तृष्णाजन्य दुःख अन्यथा इस वैभव से भरे संसार में हमें अकारण दुःख क्यों उठाना पड़े?
पूजा पाठ, जप, ध्यान अनुष्ठान आदि जो भी क्रियायें की जाती हैं, उनका मूल उद्देश्य परमात्मा के प्रति अपनी निष्ठा को गहरा करना होता है। ज्यों-ज्यों निष्ठा गहरी होती जाती है,त्यों-त्यों परमात्मा के प्रति प्रेमभाव बढ़ता जाता है। यही प्रेम-भाव धीरे-धीरे परिपक्व होकर भक्ति का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार उपासना का मूल तात्पर्य ईश्वर के प्रति प्रेम का विकास करना ही है।
परमात्मा के प्रति विकसित प्रेम जब अपनी चरम सीमा में पहुँचता है, तब वह केवल परमात्मा तक ही सीमित नहीं रहता। वह विश्वरूप परमात्मा तक फैल जाता है। सच्चे भक्त और परमात्मा के सच्चे प्रेमी की पहचान यही है कि उसका प्रेम-भाव संसार के सारे जीवों के प्रति प्रवाहित होता रहता है। कोई व्यक्ति कितनी ही पूजा और ध्यान,जप आदि क्यों न करता हो, पर उसका प्रेम-भाव संकुचित हो, उसका प्रसार प्राणिमात्र तक न हुआ हो तो उसे भक्त नहीं माना जा सकता।
भगवान का भक्त, परमात्मा को प्रेम करने वाला अपनी आत्म और समाज के नैतिक नियमों को भी प्यार करता है। कारण यह होता है कि नैतिक नियमों में आदर्शवाद का समन्वय होता है। अध्यात्म का सम्बन्ध आत्म से और आत्मा का परमात्मा से होता है। संसार से परमात्मा की ओर उन्मुख होने का यह एक क्रम है। भगवान का भक्त इस पावन क्रम से विमुख नहीं हो सकता। जो परमात्मा को प्रेम करेगा वह उससे सम्बन्धित इस क्रम में भी प्रेम-भाव रखेगा।
जिसने आदर्शवाद को प्रेम करना सीख लिया उसने मानो परमात्मा को पाने का सूत्र पकड़ लिया। परमात्मा के मिलन में अपार आनन्द होता है, लेकिन उसकी ओर ले जाने वाले इस क्रम में भी कम आनन्द नहीं होता, जो आत्म द्वारा स्वीकृत समाज के नैतिक नियमों का पालन करता रहता है। आदर्शवाद का व्यवहार करता है, वह समाज की दृष्टि से ऊँचा उठा जाता है। समाज उससे प्रेम करने लगता है। ऐसे भाग्यवान व्यक्ति जहाँ रहते हैं, उनके आस-पास का वातावरण स्वर्गोपम भावों से भरा रहता है। कटुता और कलुष का उसके समीप कोई स्थान नहीं होता। जिस प्रकार का निर्विघ्न और निर्विरोध आनन्द परमात्मा के मिलन से मिलता है, उसी प्रकार का आनन्द आदर्शवाद के निर्वाह से प्राप्त होता है।
स्वर्गलोक की उपलब्धि किसी लोक विशेष की उपलब्धि नहीं है। वह अनुकूल और पावन परिस्थितियों का एक धार्मिक नाम है। जहाँ सुन्दर, सुखदायक और कर्त्तव्यपूर्ण परिस्थितियाँ होंगी, वह स्वर्ग ही माना जायेगा। ईश्वर के सच्चे भक्त में प्रेम की जो पावन-धारा की परिस्थितियाँ भी प्रेमपूर्ण बनी रहती हैं। इसलिए भक्तजन हर समय स्वर्ग में ही निवास किया करते हैं।
साधना से मन्तव्य ईश्वरीय प्रेम की उपलब्धि से ही माना जाता है। यदि साधना सच्ची है तो उसका परिणाम प्रेम के रूप में ही मिलना चाहिए। सच्चे साधक का हृदय-प्रेम की धारा से अभिपूरित हो जाता है। वह प्राणिमात्र में अपनी आत्मा के दर्शन करने लगता है। आत्मीयता और उदारता प्रेम का ही तो रूप होता है। आत्मीयता का भाव मिलते ही संसार का सुख-दुःख साधक को अपना दुःख-सुख मालूम होने लगता है।
जिस प्रकार कुएँ में मुख डालकर आवाज करने से उसी प्रकार की प्रतिध्वनि कुएँ से निकलकर कानों में गूँजने लगती है, उसी प्रकार साधक के हृदय का प्रेम परमात्मा अथवा उसके व्यक्ति रूप प्राणियों को प्राप्त होकर पुनः प्रेमी के पास ही वापस आकर उसे आत्म विभोर कर देता है। इस प्रकार का प्रेम ही सच्चा प्रेम कहलाता है। इसी में वह सामर्थ्य है जो ईश्वर को साधक अपने समीप खींच बुलाता है।
ईश्वर दर्शन को भक्तिमार्ग की अर्ध सफलता माना जाता है। जिसकी सेवा, पूजा, नाम रट में इतने दिन से इतना प्रयास रहा। उसे भी तो कुछ पिघलना चाहिए। उसके ध्यान में भी कोई अपना स्थान होना चाहिए। है या नहीं, इसका प्रमाण दर्शन-झाँकी में होना समझा जाता है। इसलिए साधना की सफलता का सच्ची सफलता का अनुभव दर्शन के रूप में होने की अभिलाषा भक्तजनों के मन में रहती है।
उत्सुकता उत्कंठा होना एक बात है- उसका चरितार्थ होना दूसरी। तत्वज्ञानी परमात्मा की व्याख्या विवेचना सर्वव्यापी के रूप में होती है। जो सर्वव्यापी के रूप में होती है। जो सर्वव्यापी है, वह एक जगह अपना स्वरूप समझने लगे तो अन्यत्र काम करने वाली सत्ता का अन्त हो जायेगा और वह ही स्थान की होकर रह जाएगी।
फिर भगवान की झाँकी के लिए कोई रूप भी होना चाहिए। अपनी कल्पना के अनुसार उसे किसी भी आकृति-प्रकृति का गढ़ा जा सकता है। प्रतिमाएँ भी भगवान के सम्बन्ध में विविध कल्पनाओं के रूप में गढ़ी जा सकती हैं। किन्तु मतान्तर वाले उस कल्पना से सहमत नहीं होते। वे किसी दूसरी आकृति की कल्पना कर सकते हैं। यदि एक ही रूप होता तो वह सर्वमान्य रहा होता सूर्य-चन्द्र सर्वत्र एक ही आकृति के दिखते हैं। मतान्तरवादियों के लिए उससे कोई गुँजाइश ही नहीं रहती। वे एक दूसरे से सहमत नहीं हो पाते। इसलिए यह मान्यता वैयक्तिक ही ठहरती है कि ईश्वर का स्वरूप कैसा है? इसके लिए जब तक सब लोग समान रूप से सहमत न हों तब तक रूप विशेष का सर्वमान्य निर्धारण कैसे बन पड़े?
संसार में अनेक आस्तिक और नास्तिक धर्म है। नास्तिक धर्म में जैन और बौद्ध आते हैं। वेदान्त की प्रकृति वैसी ही है। उनने भगवान की मूर्ति तो नहीं बनाई पर उस स्थान पर उस धर्म के सन्तों, महामानवों संस्थापकों को लगभग वही दर्जा दे दिया। उनकी प्रतिमाएँ भी ईश्वर के समतुल्य सम्मान पाने लगीं। पर काम प्रतिमाओं से ही चल गया। आँख से प्रत्यक्ष भगवान के दर्शन का आग्रह न रहा।
साकारवादियों में ईश्वर के अनेक नाम रूप हैं। उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति भी भिन्न है। कोई उनमें शाकाहारी है कोई मांसाहारी। किसी को बलि चाहिए तो किसी को प्रसन्नता कीर्तन पर अवलम्बित है। ऐसी दशा में भिन्न रूप वाली आकृतियों में से किसे कौन पसन्द आए? फिर भक्तों के सन्तोष के लिए भगवान उनकी आकृति-प्रकृति का रंग रूप कैसे धारण करें? एक की पसन्दगी दूसरे की नापसन्दगी बनती है। फिर भगवान के लिए अलग-अलग लोगों को सन्तुष्ट करने के लिए अनेक प्रकार के आवरण धारण-करना तो बहरूपियों की तरह और भी उपहासास्पद बन जायेगा।
देवताओं का विभाग ईश्वर से सर्वथा पृथक मालूम पड़ता है। वे किसी नियंत्रण में न रहकर किसी नीति-व्यवस्था का परिपालन करते हुए नहीं दिखते। उनका स्वतंत्र अस्तित्व माना गया है। और भक्तजनों ने अपने-अपने देवताओं को दूसरे देवताओं की तुलना में अधिक श्रेष्ठ और शक्तिशाली माना है। महाराष्ट्र में गणेश जी की दत्तात्रेय की प्रमुखता है। दक्षिण भारत में विष्णु, हनुमान एवं शिव प्रमुख हैं। गुजरात में अम्बाजी की महिमा है, बंगाल में काली की। आसाम, उप्रार भारत में कृष्ण पुजते हैं। कहीं-कहीं राम की भी वैसी ही भक्ति प्रकट होती दीखती है। एक भक्त का जब एक से सन्तोष नहीं होता तो वह कई कई देवताओं को अपने पल्ले में बाँधकर उन सभी की पूजा-अर्चा करता है। इस आशा में कि इतने दरवाजों पर भिक्षा माँगने पर कहीं न कहीं से कुछ हाथ लगेगा ही। ऐसी लोगों को यह ध्यान नहीं रहता कि “सात मामाओं का भानजा” भूखा रहता है। हर मामा के यहाँ पहुँचने पर वे अनुमान लगा लेते हैं कि जब अन्य मामाओं के यहाँ होते हुए आया है, तो भानजे का पेट तो भरा हुआ ही होगा।
पिछड़े वर्गों के देवताओं की तो और भी विचित्र दशा है। उनमें हर कबीले का देवता होता है। वही चौथ वसूल करता है और वही सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाता है। यदि कभी स्वागत सत्कार में कमी पड़े तो रुष्ट होकर हानि भी पहुँचाता है और मानने के लिए खर्चीली शर्तें रखता है। एक कबीले दूसरे कबीले के देवता को पूजने लगें तो पहले वाला चिढ़ जाता है और रोष प्रकट करता एवम् हानि पहुँचाता है।
दर्शन देने की शर्त तो इस माने में होती है कि उनने अपनी ओर से आवागमन शुरू किया या नहीं? हमारी भक्ति को मान्यता मिली या नहीं? वास्तविक मनोरथ तो इसके बाद शुरू होते हैं। भौतिक कामनाएँ, लालसाएँ विपत्तियों का निवारण और सुविधाओं का सम्वर्धन ही होता है। वह मनोरथ, जिसके लिए परिस्थितियों के अनुरूप वरदान माँगे जाते हैं।
स्वप्न में या किसी अन्य वेश में भी दर्शन हो जाने की कल्पना कर ली जाती है। तथाकथित भक्तजनों की माया बड़ी विचित्र है। किसी व्यक्ति विशेष पर देवता का आवेश आ सकता है और वह उछलने-कूदने लगता है। देवता की ओर से परामर्श भी देने लगता है। भविष्यवाणियाँ भी करता है। पिछड़े वर्गों में देव दर्शन की लालसा इस आवेश से भी पूरी होती है।
देवताओं के एजेंट ओझा झोपा इस प्रयोजन की पूर्ति आसानी से कर देते हैं। कठिनाई उनको होती है, जो भावुकता के वशीभूत हैं और अमुक भगवान की अमुक आकृति से उनके सम्मुख प्रकट होने की माँग करते हैं। ऐसे लोग या तो निराश हो जाते हैं या अपने को दर्शन देने की बात विज्ञापित करके देवता के असली भक्त एवं सिद्ध पुरुष बन बैठते हैं। फिर वे भी मूर्खों के बीच एक नये सिद्ध पुरुष के रूप में पुजने लगते हैं।
इस प्रकार की मान्यताएँ बेतुकी है। तत्वतः भगवान निराकार है। उसकी विश्व व्यवस्था को सुसंतुलित सृष्टि व्यवस्था चलाती है। नियम रूप में उसे इन्द्रियों की सहायता में नहीं देखा जा सका। भावना और विवेक द्वारा ही उसका अनुभव होता है।
यदि आँखों से ही भगवान को देखना हो तो वह तरीका है जो भगवान ने अर्जुन को- कौशल्या को काकभुशुंडि को विराट ब्रह्म के रूप में दिखाया था। इसी को घट घटवासी सर्व नियन्ता समझ कर यह मानना चाहिए कि यही विराट रूप भगवान है। इसे श्रेष्ठ, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाना ही ईश्वर की पूजा है। मनुष्य को अनगढ़ से सुसंस्कारी बनाने के लिए जो प्रयत्न किया जाए, समझना चाहिए कि वह सब कुछ भगवान के निमित्त किया गया है। भगवान को प्रसन्न करना उनके दर्शन पाकर नहीं उनके विश्व उद्यान को सुरम्य बनाकर ही सम्भव है। इसी भावना को मन में बनाये रख आस्तिकता की अपनी भावना को सतत् बल दिया जा सकता है।
राजकुमार भद्रबाहु को सौंदर्य से बहुत प्रेम था। वह सुन्दर से सुन्दर वस्तुओं से अपना महल सजाता और जो सुन्दर होते उन्हें ही साथ रखता।
अचानक उसकी अति सुन्दरी पत्नी का देहावसान हो गया। शमशान में चिता पर उसका शव रखा गया। अन्तिम दर्शन करते हुए राजकुमार ने दुःखी मन से देखा, रानी का चेहरा ओर शरीर बुरी तरह कुरूप हो गया था।
सौंदर्य में अचानक इतना परिवर्तन देखकर भद्रबाहु का दुःख दूना हो गया। वे इस आकस्मिकता का भेद पूछने तथागत के पास पहुँचे।
उस दिन प्रवचन इसी विषय पर चल रहा था-आत्मा ही सुन्दर है। दिव्य दृष्टि में ही सुन्दरता है। इनके रहने तक एक वस्तु और व्यक्ति सुन्दर लगता है। प्रकाश बुझने पर अँधेरे के अतिरिक्त और रहता ही क्या है?
राजकुमार ने तथ्य और सत्य को समझा लौटे तो सभी सुन्दर वस्तुएँ विसर्जित कर दीं ऐसी दृष्टि विकसित की जो कुरूप में भी सौंदर्य देख सके।
परमात्मा सत्-चित-आनन्द-स्वरूप है। अनादि और अनंत है। न कभी उनका जन्म हुआ न कभी मरने वाला है। उसी ज्वालमाल की छोटी चिनगारी आत्मा है। जो गुण अंशधर में होते हैं, वही अंशी में भी पाये जाते हैं। समुद्र के जल में जो विशेषताएँ हैं वे उसकी एक बूँद में भी पाई जाती हैं।
ब्रह्माण्डीय चेतना परब्रह्म है। पिण्ड की परिधि में जो काम करती है वही सत्ता आत्मा है। फिर उसकी विशेषताएँ उसमें क्यों नहीं होनी चाहिए? परमात्मा अमर है तो उसके अंशधर का मरण कैसे हो सकता है?
मरण की विवेचना हम जिस रूप में करते हैं, वह सही नहीं है। शरीर के बदल जाने की प्रक्रिया को हम मौत मान लेते हैं। यह मौत हो भी सकती है, पर वह आत्मा की नहीं, शरीर मात्र की है। जीवन भर में मनुष्य सैकड़ों बार कपड़े बदलता है। वे वस्त्र अनेकों रंगों औरडिजायनों के भी होते हैं। पर उस बदलाव के कारण कोई यह नहीं कहता कि व्यक्ति बदल गया। यह परिवर्तन की दृष्टि क्षेत्र तक ही सीमित है। उसका प्रभाव आत्मा तक नहीं पहुँच सकता। शरीर के मरने पर आत्म नहीं मरती। वह तो यथावत् बनी रहती है। अन्तर केवल इतना ही आता है कि जो स्थूल था वह सूक्ष्म हो जाता है। शरीर सूक्ष्म हो जाने से उसकी आकृति स्थूल आँखों से दिख नहीं पड़ती। इस परिवर्तन को सूक्ष्मीकरण भी कह सकते हैं।
पदार्थों का सूक्ष्मीकरण होता रहता है। उनकी आकृति में अन्तर आता रहता है, पर मूल सत्ता यथावत् बनी रहती है। पानी ठोस होकर बर्फ बन जाता है। प्रवाही होता है तो जल कहलाता है। भाप बनकर वह वायु रूप होता और अदृश्य बन जाता है। यह प्रत्यक्ष परिवर्तन होते रहने पर भी उसकी मूल सत्ता में कोई अन्तर नहीं आता। जल का अस्तित्व पृथ्वी के जन्म काल से ही है और वह अन्य पंच तत्वों की तरह अपनी सत्ता बनाये रहेगा।
जीव न मरता है ओर न मर सकता है। मात्र उसका कलेवर ही अपने समय पर बदल जाता है। यह परिवर्तन एक चक्र है। शुक्र, भ्रूण, शिशु, बालक, किशोर तरुण, प्रौढ़, वृद्ध मरण और फिर उसी निर्धारित चक्र की पुनरावृत्ति। मरने के बाद वह शुक्र डिम्ब के रूप में जहाँ तहाँ होते हुए पहुँच जाता है और फिर पुरानी आवृत्ति को आरम्भ करता है।
कुछ मध्य काल ऐसा अवश्य है, जिसमें सूक्ष्म शरीरधारी को स्वच्छन्द विचरण करने का अवसर मिल जाता है। इस अवधि में वह विश्राम भी ले लेता है और पिछले दिनों की संग्रहित गंदगी की धुलाई करके इस योग्य बन लेता है कि नये जन्म में पुराने जन्म के संस्कार अधिक बाधा न पहुँचायें। कर्मफल तो साथ रहते हैं और उन्हीं दिनों यह भी अनुभव हो जाता है कि पाप कर्मों की परिणति क्या है? और पुण्य-कर्मो की क्या? इस प्रकार कुछ महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त करने का और थकान मिटाने का अवसर मिल जाता है। थका हुआ व्यक्ति रात को गहरी नींद सो लेता है तो दूसरे दिन सबेरे से ही उसे स्फूर्ति के साथ काम में जुटने का मन होता है।
प्रत्येक जीव स्वतंत्र है। उसकी अपनी एक स्वतंत्र इकाई है। वह अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। न कोई साथ आया, न कोई साथ जाता है।
सृष्टि की व्यवस्था ऐसी है कि मनुष्य मिल जुल कर रहे और एक दूसरे की सहायता करते हुए आदान प्रदान का लाभ ले। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत परिवार बन जाता है। स्वजन, संबंधी, मित्र, परिचितों का सिलसिला जुट जाता है और अनुभव होता है कि वे परस्पर सघनतापूर्वक बँधे हुए हैं। एक दूसरे के ऊपर निर्भर हैं। यह ममता जितनी घनिष्ठ होती है उसी अनुपात में मरण होने पर जाने वाले को बिछोह का दुःख होता है। कई बार एक दूसरे पर निर्भरता भी होती है। विशेषतया बच्चों की परवरिश अभिभावक करते हैं। उनके न रहने पर वे दूसरे की दया के सहारे भी पल तो जाते हैं। पर उतने निश्चिन्त और प्रमुदित नहीं रहते जैसे कि पहले रहा करते थे। माँ बेटे के बीच, पति-पत्नी के बीच भी कई बार ऐसी सघनता होती है। उसी अनुपात में उन्हें वियोग दुःख भी सताता है, किन्तु क्या वस्तुतः एक दूसरे के साथ वे इतनी ही घनिष्ठता के साथ बँधे हुए हैं। इसका उत्तर न में ही देना पड़ता है। प्रियजनों की मृत्यु का दुःख कुछ काल सताता है फिर वह झीना पड़ने लगता है। कुछ समय उपरान्त तो उस विलगाव की धुँधली स्मृति ही शेष रह जाती है।
पुरानी निर्भरता भी दूसरों पर बँट जाती है, कोई स्वजन संबंधी सहायता करने लगते हैं या फिर स्वावलंबन उभरता है और गाड़ी अपने ढर्रे पर लुढ़कने लगती है।
वशिष्ठ ने शोक विह्वल-दशरथ रानियों को समझाया था कि जिस प्रकार नदी में बहते हुए कुछ लट्ठे इकट्ठे हो जाते हैं और फिर लहरों का दबाव पड़ने पर बिछुड़ जाते हैं। बिछुड़ी हुई लकड़ियाँ जिस तिस के साथ अपनी संगति बिठा लेती हैं और फिर एक बजरे के रूप में बहने लगती हैं। जो लकड़ी पहले जिनके साथ थी उनसे अलग होकर वह दूसरों के साथ सट जाती है और फिर बहाव के साथ चलने लगती है। संसार की नियति ऐसी ही है। प्राण जन्मते, मरने और मिलने बिछुड़ते रहते हैं। जो कुछ आश्चर्य और असमंजस होता है शोक में विलाप करना पड़ता है, वह ममता के बंधन जुड़ने और टूटने से होता है अन्यथा ढेरों व्यक्ति हर दिन जन्मते और मरते रहते हैं जलती हुई चिताओं को देखकर कौतूहल मात्र प्रतीत होता है। वैसा व्यथित नहीं होना पड़ता जैसे कि उसके कुटुम्बी होते हैं। बात स्वाभाविक भी है। जन्म मरण के आधार पर चल रहे इस संसार में कौन, किसके लिए ख़ुशी मनाये और क्यों कोई किसी के लिए विलाप करे? जो हर किसी की भवितव्यता है उसके लिए उपेक्षा भाव रखने से ही काम चलता है।
मरण एक उच्चकोटि का अध्यापक, धर्म एवं दार्शनिक है, जो बताता है कि निर्धारित कर्त्तव्यों का परिपालन करते हुए सुखपूर्वक रहो और साथियों को रहने दो। जो जीवन के स्वरूप, उद्देश्य और उपयोग को समझता और पालता है, उसके लिए मृत्यु न तो कष्टकारक होती है और न भयप्रद।
एक राजा ने छोटी टंकी में मछलियाँ पाल रखी थीं। जगह सीमित रहने से वे उस दायरे में दुखी रहतीं पर किसी तरह जी रही थीं।
एक संत आये। राजा को कई परामर्श देने के साथ-साथ एक शिक्षा यह भी दे गये कि मछलियों को बंधन में बाँधना अन्याय है। इन्हें स्वच्छंद विचरण के लिए मुक्त कर दिया जाए। राजा ने टंकी से उठाकर मछलियाँ समुद्र में डलवा दीं। आरम्भ में बंधन की अभ्यस्त होने के कारण वे समुद्र में तैरना भूल गई और थपेड़ों की चपेट में आकर प्राण गँवा बैठीं।
मरने पर राजा की पेशी धर्मराज के दरबार में हुई। पुण्य-पाप का लेखा-जोखा लेने पर उन्हें स्वर्ग और नरक की मध्यवर्ती पट्टी पर बिठा दिया गया। इस विचित्र स्थिति का कारण राजा ने पूछा तो उसे बताया गया
मछलियों को बंधन मुक्त करना पुण्य तो था पर साथ ही उनकी स्थिति का ध्यान न रखने से पाप भी कम नहीं हुआ। सो इसका फल भी ऐसा ही असमंजस भरा मिलेगा जैसा मछलियों का उपलब्ध हुआ। राजा सोचता रहा। पुण्य के साथ-साथ उसकी परिणति समझना भी आवश्यक है।
मच्छर, हिरन, बन्दर, मोर, कबूतर, मछली, मेंढक जैसे प्राणी निरन्तर बेसिलसिले की दौड़-धूम करते रहते हैं। इनके पीछे भोजन तलाशने का उद्देश्य ही दिख पड़ता है। अन्यथा अनियोजित इस भाग-दौड़ से उन्हें थकान ही आती होगी। इस बिरादरी में एक और भी है जो सशक्त विचार सत्त के नाम से जानी जाती है, पर उसका कार्य रहता है अस्त−व्यस्त, अव्यवस्थित। उस सत्ता का नाम है- मन। रात्रि के समय बेसिर पैर के सपने देखता है। दिन में उसे दिवास्वप्न देखने की सूझती है।
मन की कल्पनाओं का उद्देश्य मोटे अर्थों में स्वार्थ सिद्धि या इच्छाओं में काल्पनिक रमण करना हो सकता है, पर इतने भर से बनता क्या है? संकल्पों की सिद्धि तो हो सकती है, क्योंकि उनके साथ प्रचण्ड पुरुषार्थ जो जुड़ा होता है। पर कोरी कल्पनाएँ तो मन की जल्पना मात्र हैं। सपने सार्थक नहीं होते। दिवास्वप्नों के सार्थक होने का भी कोई आधार नहीं। शेखचिल्ली की कथा प्रसिद्ध है, जो परिस्थिति, समय, सम्भावना आदि का अनुमान लगाये बिना ही मजूरी करते-करते मिनटों में भरे-पूरे परिवार का धनी मानी स्वामी बनना चाहता था। उस कल्पना से उसे पिटाई भर सहनी पड़ी कपड़े गन्दे हो गये और बदनाम हुआ। कल्पना की अनगढ़ उड़ाने उड़ते रहने वालों को भी शेख-चिल्ली की उपमा दी जा सकती है। इतने पर भी एक कमी रह जाती है, वह यह कि शेख-चिल्ली के सामने एक उद्देश्य एवं कार्यक्रम था। भले ही उसमें व्यावहारिकता का पुट न रहा हो, पर ढाँचा तो उसने किसी आधार को अपना कर खड़ा किया था। पर अपने मन के सामने ऐसा भी कुछ नहीं होता। भूतकाल की घटनाएँ, बचपन की स्मृतियाँ भविष्य में आकाँक्षित मनोकामनाओं का ऐसा जमघट मस्तिष्क पर छाया रहता है जिसका विश्लेषण करने पर हँसी आती है और यह कहने में संकोच होता है कि जिस मस्तिष्क में से यह फुलझड़ियाँ छूटती हैं वह वास्तविकता नाम की किसी वस्तु से परिचित भी है या नहीं।
पक्षी उड़ते हैं- हिरन दौड़ते हैं तो उस क्रिया में उन्हें शक्ति खर्च करनी पड़ती है। विचारों के सम्बन्ध में भी यही बात है, वे काम के हो या बेकाम के। उनके उठने और दौड़ने में मस्तिष्क की बहुमूल्य शक्ति खर्च होती है। उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध न हो तो आकाँक्षाओं के अपूर्ण रहने पर उलटे खीज ही आती है। मनः क्षेत्र का संचित भण्डार चुकता है और आदत पड़ जाने पर मनुष्य अचिन्त्य चिंतन के जाल में फँस जाता है। वैसी ही आदत बन जाती है। कल्पना लोक में उड़ते रहने की स्थिति नशेबाजी जैसी हो जाती है, जिन्हें वास्तविकता एवं हानि-लाभ का निष्कर्ष निकाल सकने तक की क्षमता से वंचित रह जाना पड़ता है।
विचार शक्ति का महत्व समझने वाले विज्ञजन अनुभव करते हैं कि कल्पना शक्ति को बेसिर पैर की उड़ानों में उड़ते रहने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। इससे उस शक्ति का अपव्यय होता है, जिसे एकाग्र करके किसी सुनियोजित काम में लगाया जाए तो उसका उत्साहवर्धक, आशाजनक सत्परिणाम निकल सकता है।
एकाग्रता की उपयोगिता और क्षमता से सभी परिचित हैं। साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, अभिनेता, शिल्पी, व्यापारी अपनी कल्पना शक्ति को एकाग्र करके उसे अभीष्ट प्रयोजनों में लगाते हैं। योजनाबद्ध रूप से सम्भावनाओं का विवेचन, विश्लेषण करते हैं और आवश्यक काट-छाँट के उपरान्त किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, किसी निर्धारण को अपनाते हैं। प्रायः सभी बुद्धिजीवियों को यही करना पड़ता है। आर्चीटेक्ट इमारतों के नक्शे बनाते हैं। वकील मुकदमें के चढ़ाव उतारों को समझते हैं। व्यापारी कारखाना लगाने से पूर्व उसके संचालन में पड़ने वाली सभी आवश्यकताओं का लेखा-जोखा लेते हैं। वैज्ञानिकों, आविष्कारकों को तो अपने विषय में खाने-सोने की सुध बुध तक छोड़कर तन्मय हो जाना पड़ता है। साहित्यकार अपनी रचनाओं का पूर्व ढाँचा खड़ा करते हैं। यहाँ तक कि नट और सरकस दिखाने वाले तक एकाग्रता के आधार पर ही सफल प्रदर्शन कर पाते हैं।
एकाग्रता की शक्ति असाधारण है। भाप चूल्हों से तेजी से बड़ी मात्रा में उड़ती रहती है, पर उसका थोड़ा अंश यदि किसी इंजन में सुनियोजित ढंग से भर दिया जाए तो उसके उपयोग से रेलगाड़ी दौड़ने लगती है। प्रेशर कुकर खाना पकाने लगते हैं। सूर्य की किरणें सर्वत्र बिखरी रहती हैं। उनमें गर्मी रोशनी भर मिलती है पर यदि थोड़े क्षेत्र की धूप को भी एकत्रित किया जा सके तो आतिशी शीशे के केन्द्र बिन्दु पर चिनगारियाँ उड़ने लगती हैं और उसके सहारे भयंकर अग्निकाण्ड तक हो सकते हैं। और चूल्हे सौर हीटरों आदि का प्रचलन बढ़ता जाता है। इन लाभदायक प्रयोगों में इतना भर ही होता है कि बिखराव को एकत्रीकरण के बंधन में बाँधा जाता है। तिनके मिलकर मजबूत रस्सा बनाते हैं। धागे मिलकर कपड़ा बुनते हैं। यह एकीकरण का ही चमत्कार है। विचारों का बिखराव रोका जा सके और उन्हें दिशा विशेष में लगाया जाए तो वही लाभ मिलता है, जो वर्षा के फसल गलाने वाले पानी को नालियों द्वारा निकाल कर एक बड़े तालाब में जमा कर उसे समय-समय पर काम में लिया जाता है।
द्रौपदी स्वयंवर की कथा प्रसिद्ध है। मत्स्य बेध करने वाले को विजेता घोषित किया जाना था। अनेकों युवक आये और असफल होते गये। अर्जुन था जिसे एकाग्रता सिद्ध थी। गुरु के पूछने पर उसने बताया कि उसे मछली की आँख देखने के अतिरिक्त उसके शरीर का और कोई अंश दृष्टिगोचर नहीं होता। इसी अभ्यास के आधार पर उसने लक्ष्य बेधा और द्रौपदी की विजय माला पहनने का सौभाग्य प्राप्त किया।
बैंकों के कैशियर, फर्मों के मुनीम लम्बा हिसाब जमाते हैं और काम तब बन्द करते हैं जब मिलान ठीक बैठ जाता है। यदि एकाग्रता न हो तो हिसाब में बार-बार भूल पड़े ढेरों समय खराब हो और अयोग्यता साबित हो। यही बात प्रत्येक काम की सफलता का आधार बनती है। बया पक्षी इतना सुन्दर घोंसला अपनी दत्त चित्त होकर काम करने की प्रकृति के कारण ही बना पाता है।
योग विद्या के महत्व और महात्म्य के बारे में बहुत लोग कुछ जानते हैं। उसके आश्चर्यजनक प्रभावों पर विश्वास करते हैं। प्रत्यक्ष देखते भी हैं। इस साधना का मूलभूत सिद्धान्त चित्त की एकाग्रता ही है। पातंजलि के योगदर्शन का प्रथम सूत्र है “योगश्चित्तवृति निरोध” अर्थात् चित्त की वृत्तियों को रोक लेना ही योग है। इस कथन का प्रथम अभिप्राय एकाग्रता साधने के लिए साधक को तत्पर करना है। दूसरा प्रयोजन यह है कि मन बहिर्मुखी आकर्षणों में लुभाता रहता है, उसे रोक कर अन्तर्मुखी किया जाए। गुण कर्म स्वभाव में समाविष्ट दुष्प्रवृत्तियों का कड़ाई के साथ अवरोध किया जाए। यही है मानसिक परिष्कार, जिसके आधार पर बिखराव केन्द्रीभूत होता है और अपनी तीक्ष्ण धार से कठोर दिखने वाली वस्तुओं में भी लेसर किरण की तरह छेद कर देता है। एकाग्रतापूर्वक छोड़ी गई गोली निशाने पर अचूक रूप से बैठती है। अन्यथा वह इधर-उधर लहराती हुई कहीं से कहीं जा पहुंचती है।
मन को रोकना एक बहुत बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। गीता में इसे वायु रोकने के समान कठिन माना गया है, तो भी वह प्रयत्न साध्य है, असम्भव नहीं। भौतिक जीवन की प्रगति और आत्मिक जीवन की सदगति दोनों ही इस बात पर निर्भर है कि व्यक्ति कितनी एकाग्रता साध सका। तत्परता ओर तन्मयता का अपने कामों में कितना नियोजन कर सका।
परिश्रम से शरीर बलिष्ठ होता है। इस सिद्धान्त पर विश्वास करके श्रमिक और पहलवान दोनों ही मेहनत करने लगे।
श्रमिक आठ घण्टे मेहनत करता, फिर भी दुबला होने लगा। पहलवान तीन घण्टे कसरत करता पर मोटा हो चला।
आश्चर्य का निराकरण करते हुए स्वास्थ्य विज्ञानी ने कहा भार समझकर किया गया काम भारी पड़ता और थकाता है जब कि आशा और विश्वास के साथ प्रसन्न मन से किया गया परिश्रम बल बढ़ाता और सुफल देता है।
गज और ग्राह की कथा है कि गज ग्राह के मुँह में फँस गया। एक पैर उसने निगल लिया और खींचकर जलाशय में लग गया। हाथी ने किनारे पर निकलने की बहुत कोशिश की पर वह निकल न सका। पानी में खिंचता ही चला गया। ग्राह की शक्ति गज से कम न थी। जब हाथी गहराई में चला गया और सूंड़ का सिरा मात्र बाहर रह गया तो उसने बचने की कोई सूरत न देखकर भगवान की पुकार लगाई। भक्त वत्सल आये और उनने ग्राह के मुख से गज को छुड़ाया। इस प्रकार गजेन्द्र मोक्ष का कथानक पूरा हुआ।
इस कथा का अध्यात्मिक रहस्य यह है कि जीव रूपी गज शरीर रूपी ग्राह के मुँह में फँस गया। निकलने का प्रयत्न करने के रूप में वह पूजा पाठ, जप-तप भी बहुत करता है। पर बाहर निकल नहीं पाता। पुरुषार्थ निरर्थक चला जाता है। अन्त में स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि नाम मात्र की सूंड़ का अग्र भाग बाहर रह जाता है और उसकी अपनी समूची ग्राह के क्षेत्र में सरोवर के कीचड़ में फँस जाती है। ग्राह खींचता है। माया रूपी कीचड़ हाथी के भारी भरकम शरीर को और भी अधिक जकड़ती जाती है। फिर निकलना कैसे जा पाए?
आत्म अपने स्वरूप, लक्ष्य, दायित्व को एक प्रकार से पूरी तरह भूल जाती है। उसकी सत्ता शरीराध्यास में पूरी तरह जकड़ जाती है। कहने को आत्मा और शरीर दो नामों से जाने जाते हैं। दोनों की भिन्नता भी सर्वविदित है। इस पृथकता पर आमतौर से चर्चा भी होती रहती है। इतना ही नहीं, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी आये दिन मिलते रहते हैं। लोग मरते हैं। शरीर को नष्ट कर दिया जाता है। यदि थोड़ी देर भी लाश रखी रहे तो वह स्वयं सड़ने लगती है। सड़न तभी तक रुकी रहती है जब तक प्राण हैं। अन्यथा काया कलेवर उन्हीं तत्वों में मिल जाने के लिए व्यग्र हो उठता है, जिससे मिलकर वह बना था। स्पष्ट है कि काया और आत्मा की सत्त पृथक-पृथक है। आत्मा प्रमुख है। काया उसका वाहन, आवरण, उपकरण। दोनों परस्पर मिल जुल कर काम तो करते हैं, पर उनकी पृथकता बनी ही रहती है।
आश्चर्य इस बात का है कि जीवात्मा अपनी मूलभूत सत्ता, महत्ता, गरिमा और दिशा धारा को पूरी तरह भूल जाता है। शरीरगत इच्छाएँ कामनाएँ, लिप्साएँ जिधर भी चाहती हैं उधर ही उसे घसीट ले जाती हैं। यात्री नाव पर बैठता तो अपनी इच्छा से है, पर बैठने के बाद पराधीन हो जाता है। नाविक असावधान हो तो नाव लहरों के साथ किसी भी दिशा में चल पड़ती है। लहरों की ठोकरें खाते-खाते किसी चट्टान से टकराकर उलट भी सकती है। किसी भँवर में फँसकर डूब भी सकती है। यात्री को तैरना न आया हो तो फिर बेचारे का ईश्वर ही मालिक है।
शरीर उन्हीं पंचतत्वों का बना है जिनसे कि यह चित्र विचित्र आकृति और प्रकृति वाला संसार। इसलिए सजातीय होने के कारण वे एक दूसरे को परस्पर खींचते ओर खिंचते हैं। शरीर को संसार में बहुरंगे स्वादों एवं आकर्षणों में बहुत रस आता है। उसका सोना जागना सब इसी क्षेत्र में होता है। इसलिए असाधारण तन्मयता की डोर में वे गुँथ जाते हैं। मछली और पानी यद्यपि अलग-अलग हैं, फिर भी मछली उसके साथ इतनी तादात्म्य होती है कि साथी के बिना जीवित नहीं रह सकती। शरीर इन्द्रिय लिप्सा और ममता जन्य तृष्णा में पूरी तरह लिपटा रहता है। इन्हें न छोड़ना चाहता है और न साधारणतया यह बंधन टूटता है। भवबंधन इसी को कहा गया है। उसका अर्थ है मनुष्य का लिप्सा लालसा के साथ पुरी तरह जकड़ जाना।
शरीर और संसार के प्रति यह बंधन अत्यधिक घनिष्ठ बन जाते हैं और दोनों की स्थिति अविच्छिन्न जैसी लगती है। इस स्थिति का दुर्विपाक यह है कि आत्मा अपने मूलभूत आधार परमात्मा की ओर से मुँह मोड़कर इस शरीर को ही अपना सर्वस्व मानने लगती है, जो स्वयं जड़ पदार्थों से बनता और उन्हीं में अहर्निश रमण करता रहता है।
मान्यता की दृष्टि से शरीर और आत्मा को पृथक मानने से सैद्धान्तिक रूप से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए पर व्यवहारतः सब कुछ उलटा ही होता है। ‘स्व’ परक सभी अनुभूतियाँ इसी प्रकार होती है मानो “अहम्” की समूची परिधि शरीर और इच्छा, इच्छाओं एवं मान्यताओं के साथ एकाकार कर चुकी है। अनुभूतियाँ ही अनायास बन जाती हैं। मनुष्य जो कुछ सोचता, चाहता, मानता और करता है, वह समग्र रूप से शरीर से ही संबंधित होता है। शरीरगत स्वार्थ ही इष्ट बन जाता है। आत्म-कल्याण का प्रयोजन साधने वाले परमार्थ की पूरी तरह उपेक्षा होने लगती है।
आत्म ईश्वर का अविनाशी अंश है। उसका सघन संपर्क ब्रह्म चेतना के साथ ही है। मनुष्य जन्म उसकी सर्वोपरि कलाकृति है जो इसलिए मिली है कि उसे धरोहर समझा जाए और परमार्थ प्रयोजन की सिद्धि की जाए। परमार्थ के दो भाग हैं सिक्के के दो पक्षों की तरह एक आत्म-कल्याण, दूसरा लोक मंगल। यही है जीवन लक्ष्य। इसी में इस जन्म की सार्थकता सन्निहित है। किन्तु इसके लिए प्रायः कुछ भी करते धरते नहीं बन पड़ता। शरीर की वासना, तृष्णा और अहंता की जकड़न इतनी मजबूत होती है कि उसे छोड़कर अन्य किसी कार्य के लिए अवकाश ही नहीं रहता। उत्साह ही नहीं जगता। जन्म से मरणपर्यन्त शरीर भाव ही छाया रहता है और उसी की कामना पूर्ति के लिए अर्हर्निशी प्रयास चलता रहता है। आत्म कल्याण के लिए जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए जो किया जाना चाहिए उसे करने में पग-पग व्यस्तता आड़े आती रहती है। अरुचि और उपेक्षा का भाव भी बना रहता है। आत्म प्रवंचना के लिए पूजा पाठ की औंधी सीधी लकीर भर पीटी जाती हैं। मानों ईश्वर मनुहार और उपहार पाने के लिए ही लालायित बैठा रहता हो। उसे उस प्रयोजन की चिन्ता एवं स्मृति ही नहीं जिसके लिए इस सुर दुर्लभ जन्म को बड़ी आशाओं के साथ धरोहर रूप में सुपुर्द किया गया था।
शरीर भाव और आत्म भाव का गुँथ जाना ही माया की ग्रन्थि है। यही हथकड़ी बड़ी और ताले की तरह भवबंधन में बाँधती एवं भ्रम जंजाल में भटकाती है। दोनों की पृथकता का भाव जागृत होने पर कर्तव्य भी बँट जाते हैं शरीर को कार्यरत रह सकने योग्य बनाये रखने के लिए रोटी कपड़ा और मकान जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं का प्रबंध करने पर काम चल जाता है और इसके उपरान्त इस कलेवर से उन कार्यों को करने के लिए योजनाबद्ध रूप से अग्रसर होना पड़ता है जो लक्ष्य एवं इष्ट हैं। स्वार्थ को सीमित करके परमार्थ को असीम बनाना ही वह निर्धारण है, जिस अपनाने पर उन विभूतियों की प्राप्ति होती है, जिन्हें स्वर्ग मुक्ति एवं ऋषि-सिद्धि के नाम से जाना जाता है।
परम पुरुषार्थ के नाम से एक ही सफलता को माना गया। है कि शरीर और आत्म की पृथकता एवं विधि-व्यवस्था को भली प्रकार आत्मसात कर लिया जाय। उसी दृष्टि से सोचा और उसी विधि से योजनाबद्ध क्रिया विधान बनाया जाए।
ऐसी सूझबूझ ही ईश्वर की वास्तविक अनुकम्पा है। गज की पुकार पर भगवान चक्र सुदर्शन लेकर दौड़े थे और अपने भक्त को ग्राह के पाश से-सरोवर के दलदल से-उबारा था। शरीराध्यास ही ग्राह है और सांसारिक प्रलोभनों का आकर्षण ही दलदल भरा सरोवर। इससे त्राण पाने में गज सफल हुआ था। देखना है की अपनी जीवात्म को यह सुयोग मिलता है या नहीं।
पति का सहारा चले जाने पर विधवा से सहानुभूति व्यक्त करने वाले कितने ही आए। सभी के मुख पर एक ही चर्चा थी इस अबला का भविष्य क्या होगा?
सुनते सुनते जब उससे न रहा गया तो एक सज्जन से उसने कह ही दिया आप लोग चिंता न करें। मेरा परिश्रम, मेरा ईमान और मेरा भगवान इन तीनों संस्कारों के रहते मुझे किसी प्रकार की कमी पड़ने वाली नहीं है।
धर्म धारणा का पंचम सोपान है शौच। शौच का सामान्य अर्थ है स्वच्छता यों शौच का मोटा अर्थ मल त्याग से भी लिया जाता है। पर अध्यात्मिक तत्वज्ञान की दृष्टि से इसका अभिप्राय है सर्वतोमुखी पवित्रता से। साँसारिक, शारीरिक ही नहीं, मन और आत्म की भी स्वच्छता। शारीरिक ही नहीं, मन और आत्मा की भी स्वच्छता।
मोटेतौर पर ग्राम, शहरों की स्वच्छता उस आधार पर होनी चाहिए जिसे अपनाकर नगरपालिकाएँ, टाउन एरिया यथा सम्भव नाली-नाले, सड़क, गली, मुहल्ले पाखाने, कुएँ, तालाब आदि की सफाई सम्बन्धी योजना बनाती है। घरों में रहने वालों को अपने वस्त्र, बरतन दीवारें, आँगन, छत, पुस्तक फर्नीचर, अनाज, पानी रसोई घर, शौचालय आदि की स्वच्छता रखनी पड़ती है। अन्यथा अस्वस्थता जन्य गन्दगी से जो विषाणु उत्पन्न होंगे वे नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करने के लिए बाधित करेंगे।
शरीरगत स्वच्छता में विसर्जन छिद्रों की त्वचा की दाँत, जीव आदि की सफाई अपना महत्व रखती है। कपड़े सादा धुले हुए रहने चाहिए। उनसे पसीना चूता है और न केवल दुर्गंध आती है वरन् जुओं खटमलों की फसल उग खड़ी होती है। उसके क्या परिणाम होते हैं? इसे भोगी ही जानते हैं।
पेट की भीतरी सफाई यह है कि अपच न होने दिया जाय। दस्त तो एनीमा या, जुलाब से भी हो सकता है, पर मुख्य बात यह है कि अखाद्य खाने से अधिक मात्रा में ठूँसने से पेट के पाचक रस कम पड़ने लगते हैं और आँतों में पड़ा हुआ मल सड़ने लगता है। यह सड़न रक्त के साथ जहाँ भी पहुँचती है, वहीं जमती और रुग्णता के रूप में फूटती है। इस कथन में रत्ती भर भी संदेह नहीं कि कब्ज हर बीमारी की जड़ है। पाचक औषधियाँ खाने भर से उससे पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता। सही तरीका यह है कि हल्के उबले शाकाहार से काम चलाया और आधा पेट खाया जाय। इतना भर नियम पालने से जब तब एनीमा लेते रहने से सप्ताह में एक दिन खाली पेट रहे जाने पर समझना चाहिए कि कब्ज से छुटकारा मिला और आधी बिमारियों के प्रकोप का संकट टला।
लेने देने की सफाई “नौ नकद न तेरह उधार” की नीति अपनाने पर निभती है। जिसका देना उसका जल्दी से जल्दी वापस करना। जिससे अपने को लेता समझना चाहिए वह बट्टे खाते चला गया। वापस लौटने वाला नहीं है। समय का कुछ ऐसा प्रभाव है कि कर्ज लेने की भूमिका बनाने वाला वर्ग यही सोचकर आता है कि किसी चतुरता से ले तो आया जाय पर वापस करने का नाम न लिया जाय। जिन्हें मित्र को शत्रु बनाना और उधार डूब जाने पर पश्चाताप होता हो, अभावग्रस्त की कोई सहायता करनी हो तो कर दी जाय, पर फिर उसके वापस लौटने का इन्तजार न किया जाय। कर्ज माँगने वालों में 10 प्रतिशत अपव्ययी लोग होते हैं। आकस्मिक संकटग्रस्त ईमानदारों की संख्या तो मुश्किल से पाँच प्रतिशत होती है। कर्ज देकर वापस लौटा लेना, असाधारण स्तर का कौशल है। जिनके लम्बे चौड़े व्यापार होते हैं, वे पहले से ही उधार डूबने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए मुनाफा बना लेते हैं। मध्यवर्ती जीवनचर्या का औचित्य इसी में है कि अपनी आय के अनुरूप खर्च का क्रम बनाकर गरीब वर्ग के लोगों की तरह रहा जाय और चैन से दिन काटा और रात को सुख की नींद सोया जाय।
लाग-लपेट की बात करने की अपेक्षा स्पष्टवादिता अपनाना अच्छा है। किसी को मतभेद बुरा लगे, तो कुछ समय रुष्ट हो लेगा। पर जब चित्त शान्त होगा तो यही अनुभव करेगा कि साफ दिल वाला और भला आदमी है। इसे लाग लपेट नहीं आती।
उपरोक्त सभी बातों से बढ़कर यह है कि विचारों को स्वच्छ, स्वच्छतम रखा जाय। ईर्ष्या द्वेष, घृणा, सन्देह आशंका के विचारों से दूर रहा जाय। न चिन्तित हुआ जाय और न आतुर आक्रोश ग्रस्त रहा जाय। शान्तचित्त, प्रसन वेदन और सन्तोष युक्त जीवनयापन करने का तरीका यह है कि मन में अनावश्यक चिन्ताओं के भार न लदने दिये जायें और अभावग्रस्त स्थिति में रहने का अवसर न आने दिया जाये।
महत्वाकाँक्षा ईर्ष्यालु स्वभाव, अपने विरुद्ध कुचक्र रचे जाने की आशंका, सन्देह, उद्वेग आदि की स्थिति में मनुष्य भयाक्राँत, शंकाशील या उद्विग्नता के आवेश से भरा रहता है। यह स्थिति मन को मलीन बनाती है और विचारों में हेय स्तर की गंदगी भर देती है। जिसके विचार अनुपयुक्त रहेंगे, उसके क्रिया कलाप कभी सज्जनोचित नहीं रह सकते। जो सोचेगा उससे अपने या दूसरों के संबंध में ऐसा ही मत बनेगा जैसा कि नहीं ही बनना चाहिए। उत्तेजित असहिष्णु दुराग्रही, अहंकारी व्यक्ति विचार क्षेत्र में गन्दे होते हैं। फलतः उनका समूचा जीवन गन्दगी से भर जाता है। वे न स्वयं सुख से रह पाते हैं और न साथ संपर्क के लोगों को चैन से बैठने देते हैं। ऐसे लोगों का कोई सच्चा मित्र नहीं रहता, जिसके प्रति श्रेष्ठता और सम्मान के भाव नहीं, उनसे लोग पीछा छुड़ाने का ही प्रयत्न करते हैं। किसी प्रकार लोक व्यवहार बना भी रहे तो आड़े समय में वे कदाचित ही साथ देते हैं। वस्तुस्थिति को दिवास्वप्न देखने वाले भी देर सबेर में समझ जाते हैं और अपने आपको को सर्वथा असहाय एकाकी, अभागा अनुभव करते हैं।
विचारों की छाया आचरण में प्रवेश किये बिना उभरे बिना रह नहीं सकती। घटिया व्यक्ति जहाँ जाता है वहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष तिरस्कार का भाजन बनता है। उसके आने से किसी को प्रसन्नता नहीं होती। न चले जाने से दुख होता है, न आघात लगता है। उसकी निज के जीवन की समस्यायें ही इतनी उलझ जाती हैं, जिन्हें सुलझाते नहीं बनता और ऐसे ही परेशानियों में डूबता-उतराता, जिनसे मन मिला, उनके सामने अपनी विपन्नता का रोना रोने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं बन पड़ता।
सड़न की दुर्गन्ध हवा के साथ मिलकर दूर-दूर तक वातावरण कुरुचिपूर्ण एवं विषाक्त करती है। सड़ी जिन्दगी अपेक्षतया और भी बुरी स्थिति उत्पन्न करती है। मुर्दा प्राण निकलने के बाद सड़ना आरम्भ करता है और गन्दगी उगलता है पर सड़े हुए विचारों एवं व्यक्तित्व वाला व्यक्ति जीवित रहते हुए भी मरो की तुलना में अधिक बुरे किस्म की गन्दगी फैलाता है।
धर्म का पाँचवाँ चरण शौच वस्तुतः सुरुचि और सौंदर्य के रूप में प्रयुक्त हुआ है। मात्र मलीनता हटा देना ही पर्याप्त नहीं, उसके स्थान पर सुरुचि, सुन्दरता और सुसंस्कारिता का भी दर्शन होना चाहिए।
यह प्रयोग धर्म के सच्चे साधकों को अपने निकटवर्ती वातावरण में परिवार में मित्र सम्बन्धियों में करना चाहिए और सर्वप्रथम अपने आपे को सुधार कर उसके साथ ही चन्दन वृक्ष की तरह अपने समीप उगे हुओं को भी आपने जैसा ही स्वच्छ एवं उत्कृष्ट बनाना चाहिए भले ही वे अनगढ़ झाड़ झंखाड़ जैसे ही क्यों न हों?
एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु दीक्षा लेने गये। महात्मा ने शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के मन्तव्य से पूछा बताओ कान और आँख में कितना अन्तर है?
एक ने उत्तर दिया-” केवल पाँच अंगुल का भगवान! दूसरे ने उत्तर दिया- महाराज आँख देखती है और केवल सुनते हैं इसलिये किसी बात की प्रामाणिकता के विषय में आँख का महत्व अधिक है।” तीसरे ने निवेदन किया -”भगवन्! कान का महत्व आँख से अधिक है।
आँख केवल लौकिक एवं दृश्यमान जगत को ही देख पाती है किन्तु कान को पारलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है।” महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया।
पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए विदा कर दिया। क्योंकि उनके सोचने की सीमा ब्रह्म तत्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य, सूक्ष्म बनी न थी।
कई बार मनुष्य अपने अनुचित कार्यों या आदतों के सम्बन्ध में दुःखी भी होता है और सोचता है कि उन्हें छोड़ दूँ। अवाँछनीय अभ्यासों की प्रतिक्रिया उसने देखी सुनी भी होती है। परामर्श उपदेश भी उसी प्रकार के मिलते रहते हैं। जिनमें सुधरने सँभलने के लिए कहा जाता है। सुनने में वे परामर्श सारगर्भित भी लगते हैं। किन्तु जब छोड़ने की बात आती है तो मनु मुकर जाता है। अभ्यस्त ढर्रे को छोड़ने के लिए सहमत नहीं होता। उपदेशों से प्रभावित हुए मन की वह सज्जनता, समय आते ही बालू की तरह खिसक जाती है। पत्ते की तरह उड़ जाती है। टिकने की पृष्ठभूमि ही नहीं होती। जिस साहस संकल्प के सहारे आत्म सुधार बन पड़ता है, उसकी रहने से बात बनती नहीं। स्थिति ज्यों की ज्यों बनी रहती है। नशेबाजों में यही प्रक्रिया आये दिन चरितार्थ होते देखी जाती है। आर्थिक तंगी, बदनामी, शरीर की बर्बादी, परिवार में मनोमालिन्य जैसी हानियाँ प्रत्यक्ष रहती है। उनका प्रत्यक्ष अनुभव भी होता है, छोड़ने को जी भी करता है। पर जब तलब लगती है, तब वह सब सोचा समझा बेकार हो जाता है। आदत उभर आती है और अपना काम करने लगती है। बार बार सुधरने की बात सोचने और समय आने पर उसे न कर पाने से मनोबल टूटता है। संकल्प बार-बार टूटने पर मन इतना दुर्बल हो जाता है कि यह विश्वास ही नहीं होता कि उनका सुधार हो सकता है कल्पना करने लगते हैं कि जिन्दगी ऐसे ही बीतेगी। आदतों से किसी भी प्रकार छुटकारा न मिल सकेगा।
ऐसा प्रायः दुष्प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में ही होता है। उद्योगमन में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति काम करती है। ऊपर से नीचे खिसका देना सरल पड़ता है। पानी बहने लगे तो वह ढलान की ओर चल पड़ता है। उसकी प्रकृति परम्परागत अद्योगमन की है। इसके लिए किसी को कुछ विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। आसमान पर छाए बादल बोझिल होते हैं, ऊपर से नीचे उतर आते हैं। पानी बरसाते हैं। यह बरसा हुआ पानी ढलान तलाशता है और अवरोधों को तोड़ते लांघते वह बरसाती नालों में जा मिलता है। वे नाले नदियों में पहुँचते हैं और अन्त में उस समुद्र में जा मिलते हैं, जो समतल धरती की तुलना में अधिक नीचा है बादलों के पानी का बहाव प्रयास तब रुकता है, जब वह ढलान के अन्तिम छोर पर जा पहुँचता है। जब आगे और गिरने की गुँजाइश नहीं रहती, तभी वह रुकता है। यह रुकना भी ऐच्छिक नहीं होता, वरन् विवशता ही वैसा कर लेती है। बुरी आदतों में फँसा हुआ व्यक्ति भी यही अनुभव करता है कि उसे किसी अदृश्य शक्ति ने अपने चंगुल में फँसा लिया है और उसे कोई बलात् कहीं घसीटे लिए जा रहा है। किसी ऐसे स्थान पर जहाँ जाने के लिए उसका विवेक अनुमति नहीं देता।
आश्चर्य की बात यह है कि मनुष्य अपने मन का स्वामी आप है। शरीर पर भी उसका अपना अधिकार है। सामान्य जीवन में वह अपनी अभिरुचि के अनुरूप सोचता है और आवश्यकतानुसार कार्य करता है। यही स्वाभाविक भी है और इसी विधा को चरितार्थ होते हुए भी देखा जाता है फिर दुष्प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में ही ऐसी क्या बात है। जिसके कारण वे चाहते हुए भी नहीं छूटतीं। प्रयत्न करने पर भी भूत की तरह सिर पर लदी रहती हैं।
इतना ही नहीं सत्प्रवृत्ति संवर्धन के सम्बन्ध में भी यही अड़चन है। पुरातन अभ्यास में यह सम्मिलित नहीं होता कि उत्कृष्टता के अनुरूप सोचे और आदर्शों के ढाँचे में अपनी गतिविधियों को ढाले। ऐसी दशा में अनभ्यस्त नये काम को करने में पुराना अभ्यास भी बाधक होता है। पशु खूँटे से छूटते ही हरी घास वाले क्षेत्र में दौड़ जाते हैं और पेट भरने के बाद संख्या होते ही निवास की ओर चल पड़ते हैं। यह उपक्रम अनायास ही चलता है और निरन्तर दुहराया जाता है। इससे किसी प्रकार का अवरोध न आने देने के लिए ही एक ग्वाला नियत रहता है वही एक झुण्ड को हाँकता चलाता रहता है। पर यदि उसे उन पशुओं को किसी अनभ्यस्त स्थान पर नये मार्ग से ले जाना हो तो घुमाने चलाने में असाधारण कठिनाई का सामना करना पड़ता है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू होती है। वे अभ्यस्त ढर्रे को एक परम्परा मान लेते हैं। उसी का समर्थन भी करने लगते हैं। भले ही वह अनुपयुक्त या हानिकारक ही क्यों न हो? लोक प्रवाह की चित्र-विचित्र गतिविधियाँ इसी दिशा धारा में बहती देखी जाती है। निजी और सामूहिक जीवन में यह ढर्रा ही स्वसंचालित मशीन जैसा काम करता दीखता है। अंधविश्वास मशीन जैसा काम करता दीखता है। अंधविश्वास, कुप्रचलन इसी आधार पर अपनी जड़ जमायें हुए हैं। अनेक कुरीतियाँ ऐसी हैं, जिन्हें बुद्धि विवेक और तर्क के आधार पर हर कोई अस्वीकार ही करता है। किन्तु जब करने का समय आता है तो पुराने ढर्रे पर चल पड़ते हैं खर्चीली शादियों के सम्बन्ध में यही बात आमतौर से देखी गई है। दहेज, प्रदर्शन और चुहल युक्त रीति रिवाजों का जंजाल सभी के लिए कष्टकारक असुविधाजनक खर्चीला, मूर्खतापूर्ण होने के कारण विचारशीलता उसके विरुद्ध ही रहती है। इतने पर भी समय आने पर पुराना ढर्रा ही हावी हो जाता है और वही करना पड़ता है जिसे न करने की बात अनेकों बार सोची थी।
ऊँची उठने के सम्बन्ध में तो और भी अधिक अड़चने हैं। महापुरुषों के कुछ अपने गुण, कर्म और स्वभाव ही ऐसे होते हैं, जो वे महत्वपूर्ण लोकोपयोगी कार्यों में लगते हैं। अवरोधों से जूझते हुए लक्ष्य तक पहुँचने का साहस औरों को प्रदान करते हैं। उन्हें अनुकरणीय और अभिनंदनीय माना जाता है। उनकी उपलब्धियों की प्रशंसा प्रतिष्ठा को देखकर अनेकों का मन चलता है कि हमें भी यह सुयोग मिला होता तो कितना अच्छा होता। इस दिशा में वे सोचते तो बहुत कुछ हैं, पर बन पड़े ऐसा कुछ कर नहीं पाते। इच्छा ही बनी रहती है न आदतें बदल पाना सम्भव होता है न महानता के राजमार्ग पर कदम बढ़ाते हुए चल सकना सम्भव होता है। सोचते मन भरते ही जिन्दगी बीत जाती है। लगता है कोई दुर्भाग्य पीछे पड़ा है और वह हमारी कल्पना, इच्छा योजना को कार्यान्वित नहीं होने देता।
मनुष्यों में से कम ही ऐसे हैं जो साहस करके अपनी पतनोन्मुखी प्रवृत्तियों को रोक सकें और असंतोषजनक बदनाम जीवन जीने से बच सकें। ऐसे भी क्रम ही होते हैं जो प्रभावों और अवरोधों को कुचलते हुए अपनी आकर्षण शक्ति से सुयोग की परिस्थितियों का निर्माण कर सके। ऐसे व्यक्ति ढूंढ़ने पर ही मिलेंगे जो प्रतिकूलताओं के परम्पराओं के घेरे को तोड़ कर उत्कृष्टता अपनाने और उसे मजबूती से पकड़े रहकर उच्चस्तरीय संकल्प को पूरा कर सकने में समर्थ हुए हों। विचारणा है कि ऐसा क्यों होता है? जब इच्छानुसार आहार, विहार, व्यवसाय मनोरंजन आदि की व्यवस्था जुटाई जा सकती है तब इस प्रकार के क्रिया-कलापों को सहज ही करते रहा जा सकता है। अड़चनों से निपटते रहने का क्रम भी चलता रहता है। इससे प्रतीत होता है कि इच्छानुसार काम करने के लिए मन और शरीर को कोई इनकारी नहीं है। इस स्थिति में भी मनुष्य जब पतन के गर्त में गिरने से अपने को रोक नहीं पाता, कुटेवों से पीछा छुड़ा नहीं सकता और अपने आपको महानता से सम्पन्न करने में कोई विशेष अड़चन न होते हुए भी सफल नहीं हो पाता तो फिर वह संभावित कारण क्या होना चाहिए कि सौभाग्य को छीनता और दुर्भाग्य को थोपता रहता है।
सामान्यतया यह उत्तर दिया जा सकता है कि यह संकल्पबल का साहस का अभाव है। संकल्प शक्ति की कमी है, जिसे दूर करके पर अभीष्ट उद्देश्यों में सफलता प्राप्त की जा सकती है। बात फिर धूमधाम कर वहीं आ गई। संकल्प और साहस का अभाव कहाँ। यदि वे विशेषताएँ न रही होती तो दैनिक जीवन में आये दिन असाधारण कदम उठाते रहना और उन्हें पूरे कर सकना किस प्रकार सम्भव रहा होता? तब तो व्यक्ति मात्र कोल्हू का बैल बनकर रहता। पिछले अभ्यासों से हटकर किसी लाभदायक काम में हाथ डालने की हिम्मत ही न करता। मनुष्य के सामान्य जीवन में भी असाधारण घटनाएँ घटित होती हैं। विवाह होने पर लड़की पितृगृह छोड़कर ससुराल चली जाती है और वहाँ के अनभ्यस्त ढाँचे में ढल जाती है। लड़के भी थल सेना, नैवी, एयर फोर्स जैसे क्षेत्रों में अनायास ही प्रवेश करते हैं। अभ्यस्त ढर्रे से सर्वथा भिन्न प्रकार की कार्य पद्धति अपना लेते हैं। जब ऐसा आये दिन होता रहता है, तो पतन से रुकना और उत्थान के निमित्त चल पड़ने में ही ऐसी क्या विशेष बात है जो बन नहीं पड़ती। ढर्रा अभ्यास इतना बड़ा अवरोध नहीं है जो मनुष्य पर इस कदर हावी हो जाय, जिसे बदलना उलटना बन ही न पड़े।
इस असमंजस का समाधान ढूंढ़ने के लिए उथले उत्तर ढूँढ़ने से काम न चलेगा। गहराई में उतरना पड़ेगा और उन विवशताओं को ढूंढ़ना पड़ेगा जो पतन के निरोध एवं उत्कर्ष के अवलम्बन में ऐसी बाधा बनकर अड़ी होती हैं जिन को पार कर पाने की चेष्टा में मनुष्य अपने को असमर्थ अनुभव करता, असफल रहता एवं निराश दीखता है।
समुद्र की गहराई में उतरने पर पनडुब्बों को मोती मिलते हैं। तट पर खेलने वाले लड़के तो छोटे-छोटे सीप घोंघे ही बटोर कर घर लौटते हैं। मनुष्य का चेतना क्षेत्र भी समुद्र की तरह गहरा और विशाल है। उसकी अनेकों परतें हैं। जिन्हें सचेतन की ऊपरी सतह में नीचे उतरने पर पाई जाने वाली अचेतन अवचेतन सुपर चेतन की परतें कहते हैं। सचेतन की ऊपरी सतह तो मन की कल्पनाओं, बुद्धि के परिमार्जन से ऐसी स्थिति उत्पन्न करती रहती है, जो व्यावहारिक हो। पुराने अभ्यास अनुभव से संगति खाती हो। जिसके उदाहरण मिलते हो और परामर्श देने वाले आगे बढ़ने का कठिनाइयों से निपटने का मार्ग बता सकते हों। यह सब सरल है। सरल को आसानी से अपनाया जा सकता है। सचेतन परत के निर्धारण थोड़े से प्रयास से कार्यान्वित होते रहते हैं, किन्तु गहरी परतों में जमी हुई जड़ता हठवादिता से निपटना सहज नहीं है जन्म-जन्मान्तरों के अनेक योनियों में परिभ्रमण करते समय के, वंश परम्परा के आधार पर अन्तःकरण के साथ जुड़े हुए भले बुरे संस्कारों को झुठलाना कठिन पड़ता है। वे ही हैं जो हमें उत्कृष्टता अपनाने में प्रधान बाधा बनकर अड़ते हैं। उनसे जूझना ही साधना पुरुषार्थ है।
एक बहरूपिया राजा को नित नये वेश बदलकर दिखाता, मनोरंजन करता और इनाम पाता। राजा ने एक दिन कहा ऐसा स्वाँग दिखाओ जिससे पकड़े न जा सके। हजार रुपये इनाम मिलेगा स्वाँगों में तो तुम्हारे असली रूप का पता चल ही जाता है।
बहरूपिया चला गया। अपने नगर से बाहर एक पेड़ के नीचे आसन जमाया, कपड़े उतारे भस्म रमाई। मौन धारण किया और धूनी तपने लगा। लोगों को किसी तपस्वी महात्मा के आने की खबर लगी तो हजारों व्यक्ति दर्शनों को पहुँचने लगे।
कोई भेंट, पूजा रखता तो उसे तत्काल दूसरों को बाँट देता। उससे ख्याति और भी बढ़ी। राजा स्वयं दर्शनों के लिए आये और बहुमूल्य भेट साथ लाए। तपस्वी ने उसे भी तत्काल बाँट दिया। राजा की श्रद्धा बढ़ी और उन्हें गुरु मान लिया।
दूसरे दिन बहरूपिया दरबार में पहुँचा, और हजार रुपया इनाम माँगा। राजा ने कारण पूछा बहरूपिये ने कहा मैंने ही महात्मा का स्वाँग बनाया था। आपने मुझे ही गुरु बनाया था। राजा चकित रह गये, साथ ही पूछा मेरे दिये इतने बहुमूल्य उपहार लौटाये और छोटा सा इनाम माँगने आये। इसका क्या कारण?
बहरूपिये ने कहा- वेश को कलंकित नहीं होने दिया। यदि में लेने लगता साधु की गरिमा गिरती और उस से लोक श्रद्धा उठ जाती। तब सच्चे साधुओं को भी लोग संदेह की दृष्टि से देखते। स्वाँग बनाने पर भी उस वेश की गरिमा अक्षुण्ण रखना अपना कर्त्तव्य माना, जिसके सहारे मेरी पूजा हुई और आपको भेंट सहित पहुँचना पड़ा। मुँह माँगा इनाम देते हुए राजा के बहरूपिये की सदाशयता को बहुत सराहा।
एक बार सभी देवता एक गोष्ठी में बैठे विचार विमर्श कर रहे थे कि सर्वप्रथम किस देवता की पूजा की जाये। अन्त में निश्चय हुआ कि जो देवता तीनों लोकों की परिक्रमा सबसे पहले कर लेगा, उसे ही यह सम्मानित पद दिया जायेगा। अतः सभी देवता अपने वाहनों पर चढ़ कर चल दिये परन्तु गणेश जी ने अपनी विवशता को विचार कि उनकी भारी शरीर एवं नन्हा सा मूषक वाहन है इतने से ही यह महत् कार्य कैसे सम्भव हो सकता है? तभी उनकी बुद्धि में स्फुरणा हुई। अपने माता पिता की परिक्रमा करके निर्णय स्थल पर जा पहुँचे और इस प्रकार प्रथम पूजे जाने का सम्मान प्राप्त किया। वस्तुतः इसमें उनकी प्रखर बुद्धि की ही मुख्य भूमिका थी। उनका गज मस्तक इसी का परिचायक है।
उनका एक ही दाँत है, क्योंकि दूसरे की लेखनी बनायी थी। महाभारत ग्रन्थ की रचना का समय आया तो प्रश्न उठा कि उसे लिखे कौन? व्यास जी ने इसके लिए गणेश जी को उपयुक्त समझा और उनसे लिखने का आग्रह किया। इसके हेतु एक सुदृढ़ लेखनी की आवश्यकता थी। गणेश जी ने अपना दाँत उत्तम समझा और उसका प्रयोग किया। विद्यार्जन के लिए धर्म और न्याय के लिए श्रेष्ठ कार्यों के लिए प्रिय-से-प्रिय वस्तु का भी त्याग करना पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए। यही इसके पीछे भाव है। उनके अपने सिर का जगह हाथी सिर का होना अहंकार नाश का द्योतक है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा की सी शोभा उनके शान्त, संतुलित, उज्ज्वल ज्ञान का प्रतीक है। गणेश जी के कान तथा पेट दोनों बड़े हैं, अर्थात् हमें उनके समान सब की बातें श्रवण करके अपने आप में, अपने बड़े पेट में सुरक्षित रख लेना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर समय आने पर ही उसका उद्घाटन करना चाहिए। छोटी आंखें हमें बुरी बातों को देखने से रोकती हैं। उनके आयुधों में पाश और अंकुश प्रमुख हैं। पाशा व्यामोह और बन्धन का प्रतीक है। यह हमें भवबन्धनों से उबरने का स्मरण दिलाता है, जबकि अंकुश दुष्प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने की चेतावनी देता है। विशाल शरीर में महानता का विशाल व्यक्तित्व का संदेश है।
उनके विशाल शरीर का वाहन छोटा मूषक है, इसमें अंतर्विरोध जैसी कोई बात नहीं है। वस्तुतः मूषक, प्रवृत्ति का द्योतक है, इसकी प्रवृत्ति है चोरी करना। मनुष्य में जो पाप की वृत्ति है, यह उसी का बोधक है। गणेश जी उस पर सवारी करते हैं, उस पर चरण प्रहार करके उसे दबाये रहते हैं, ताकि ऐसी वृति किसी में पनपे नहीं। चूहे का एक और गुण है। संचय वृत्ति। वह आगे की बात सोचता है। अनुकूल समय में ही प्रतिकूल स्थिति का भी भोजन इकट्ठा कर लेता है ताकि अगले समय में अन्न संकट की स्थिति न देखनी पड़े। यह इसकी दूरदर्शिता है। मनुष्य को हर कार्य में ऐसी ही दूरदर्शिता विवेकशीलता का परिचय देना चाहिए तभी वह सफल जीवन जी सकता है। मोदक उनका प्रिय भोजन है। यह संघ शक्ति संगठन शक्ति एकता की प्रेरणा देती है। अकेला व्यक्ति तो उस चने के समान है जो भाड़ नहीं फोड़ पता। व्यक्तियों का सुसंगठित समाज ही बड़ा कार्य कर सकता है- प्रगतिशील बन सकता है। अकेलेपन में तो प्रतिगामिता ही हाथ लगती है। लम्बोदर का एक नया नाम गणेश गणपति भी है, जिसका अर्थ है गणों का स्वामी। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन यह ग्यारह गण मनुष्य के भी हैं। उसे इन्हें वशवर्ती बनाकर उनका स्वामी होने का गौरव प्राप्त करना चाहिए।
यह सब गुण साथ ही मौन के रूप में वाणी संयम की शक्ति होने के कारण ही वे महाभारत जैसा महान ग्रन्थ लिख सके। असीम प्राण शक्ति किसी में नहीं होती। संयम द्वारा ही उसका संवर्धन कर सिद्धियों को करतलगत किया जा सकता है। विनायक श्रीगणेश के इन गुणों का अनुकरण करके हम भी सच्चे ईश्वर भक्त बन सकते हैं।
कृत्य यों हाथ पैर से होते हैं और उनकी उपलब्धियाँ प्रत्यक्ष देखने को मिलती है। किन्तु बात इतने से ही समाप्त नहीं हो जाती। उसका वास्तविक सूत्र संचालक हमारे अन्तर में बैठा रहता है और उसकी आज्ञा के अनुरूप हलचलों का कारवाँ आगे बढ़ता है। कठपुतलियों के नाच में खिलौने उछलते कूदते हरकतें करते दिखते हैं पर वस्तुतः यह बस पर्दे के पीछे बैठा बाजीगर करता है कराता रहता है। वह सम्बन्ध सूत्र टूट जाय तो वे पुतले नि चेष्टा होकर धूल में लोटने लगते हैं या पिटारी में बन्द हो जाते हैं।
कृत्य शरीर में होते भर है, पर उनके नियोजन करने वाली स्वप्रेरणा प्रदान करने वाली चेतना अदृश्य ही रहती है। वह अपने स्तर के अनुरूप सोचती और क्रियाओं के रूप में अपनी क्षमता का परिचय देती है। इसलिये कृत्यों की उत्कृष्टता निकृष्टता का श्रेय अन्त क्षेत्र को ही दिया जा सकता है। कृत्यों को अनायास ही सुधार या बिगाड़ा नहीं जा सकता। अपराध यकायक ही नहीं बन पड़ते। उनकी भूमिका बहुत पहले से ही मन में बनती रहती है। अवसर आने पर वह प्रकट और फलित होती है। यही बात सत्कर्मों के बारे में भी है। उनके लिये साहस अनायास ही नहीं उभरता वरन् बहुत पहले से ही उस प्रकार के विचार उठते और परिपक्व होते रहते हैं। अवसर आने पर वे कृत्य की तरह बन पड़ते हैं।
इसलिये जो करना हो जिस मार्ग पर चलना हो जिस लक्ष्य तक पहुँचने की अभिलाषा हो सर्वप्रथम उस स्तर के विचारों को मस्तिष्क में स्थान दे। उन्हें जड़ पकड़ने दे। जमने दे और लम्बी अवधि रहने दे। अधोगामी विचार तो प्रवाहमान पानी की तरह अनायास ही अपनी जड़ पकड़ लेते हैं। पर ऊर्ध्वगामी चिन्तन की प्रगति धीरे-धीरे होती है। वृक्ष धीरे-धीरे बढ़ते हैं। पर यदि उन्हें काटना हो तो कुछ घंटों के प्रयास से ही उन्हें धराशायी किया जा सकता है। कुविचार कुकुरमुत्तों की तरह कहीं भी कूड़े करकट के ढेर में उग आते हैं, किन्तु फलदार वृक्ष उगाने के लिये खाद पानी देने और निराई गुड़ाई से लेकर रखवाली तक का प्रबन्ध करना पड़ता है। सद्विचारों की स्थिति भी ऐसी ही है। वे अपना नियमित परिपोषण चाहते हैं।
तर्क, तथ्य, प्रमाण उदाहरण को मनोभूमि बनाने का दृष्टिकोण विकसित करने का आधार माना गया है। तर्कों में एक ही भूल होती है कि वे तात्कालिक लाभ को ध्यान में रखते हुए ही प्रायः उड़ते हैं। उनमें से कुछ ही ऐसे हैं जो दूरगामी परिणामों का अनुमान लगा सके। दूरगामी सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए आज कठिनाई सहने की प्रेरणा विवेक के आधार पर ही उठती है। यदि उच्चस्तरीय उत्कर्ष अभीष्ट हो तो तत्काल लाभ देने वाले अनैतिक स्तर के तर्कों से बचना चाहिए और सोचते समय स्थायी लाभ हानि की दूरदर्शितापूर्ण विवेचना करनी चाहिए।
मनुष्य स्वभाव अनुकरण प्रिय है। अपने चारों ओर जो होते देखता है उसी का अनुकरण करने लगता है इन दिनों समय की प्रबलता ऐसी है, जिसमें भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण का ही बाहुल्य दीखता है। प्रथम अतिक्रमण करने वाले नफे में रहता है। इस नीति के अनुसार अनाचारी जिन्हें प्रचुर मात्रा में और जल्दी सफलता मिलती है, अधिक आकर्षित करते हैं। उस प्रभाव से प्रभावित साधारण लोग भी वही नीति अपनाने लगते हैं। इस प्रकार अनाचारियों का समुदाय बढ़ता ही जाता है।
उत्कृष्टता बड़े प्रयत्न से ढूंढ़नी पड़ती है और जहाँ तहाँ ही मिलती है। मोती किसी किसी सीप में जब तब मिलते हैं असंख्यों साधारण पेड़ों के बीच कोई एक चन्दन होता है। इसी प्रकार धरती भर के मनुष्यों के बीच बिरले ही आदर्शवादी मिलते हैं। उन्हीं को आदर्श मानकर चलने से व्यक्ति अपने को श्रेष्ठ उत्कृष्ट बना सकता है। पर उनका प्रभाव ग्रहण करने के लिए संपर्क साधने के लिये कहाँ जाया जाय? कैसे उनसे मिला और कैसे साथ रहा जाय? फिर श्रेष्ठजन अपने समय को हीरे मोतियों से बढ़कर मानते है और उसे किसी उच्च प्रयोजन में नियोजन करते हुए व्यस्त बने रहते हैं। ऐसी दशा में उनका सत्संग भी सरल नहीं होता। आवारा लोग तो जहाँ भी स्वार्थ सधने की गुँजाइश दीखती है वहाँ पीछे लग जाते हैं। पर आदर्शवादी व्यवस्थित जीवनचर्या अपनाने वाले सदा संपर्क के लिये कहाँ उपलब्ध होते हैं? ऐसी दशा में उस लाभ से वंचित रहने की क्षति पूर्ति सत्साहित्य के माध्यम से ही की जा सकती है। स्वाध्याय का महत्व इसीलिये गाया गया है अस्तु विचार पद्धति एवं जीवनचर्या का उत्कृष्ट बनाने के लिये सत्साहित्य का महापुरुषों की जीवन गाथा का अवगाहन करना चाहिए। उससे भी किसी सीमा तक उस प्रयोजन की पूर्ति हो जाती है।
बुरे विचारों को काटने के लिये उनके प्रतिद्वंद्वी सद्विचारों की सेना संजोकर रखनी चाहिए। इसका उपाय चिन्तन और मनन भी है। विशुद्ध तक और तथ्य के आधार पर भी यह सिद्ध किया जा सकता है कि पवित्रता और प्रखरता यह दो अवलंबन ऐसे है, जिनसे प्रामाणिकता उभरती है।
प्रामाणिक व्यक्ति आत्म संतोष और लोक सम्मान प्रचुर परिमाण में अर्जित करता है। उसकी सभी विश्वास करते हैं विश्वास पात्र का समर्थन भी किया जाता है और उसे सहयोग भी दिया जाता है। इस भावनात्मक सम्पदा को अर्जित करके व्यक्ति ऊँचा भी उठता है और आगे भी बढ़ता है। यही प्रगति का सुनिश्चित राजमार्ग भी है। इस पर चलते हुए जो सफलताएँ अर्जित की जाती है वे चिरस्थायी बनती है और अनुकरणीय अभिनन्दनीय समझी जाती है।
बाजीगर और बच्चे ही तुर्त सुलता की आशा करते हैं। बाजीगर हथेली पर सरसों जमाते हैं। बच्चे बालू के किले गढ़ते है पर जिन्हें वट वृक्षों का उद्यान खड़ा करना है, उन्हें धैर्यपूर्वक अपने प्रयास को प्रखर ओर एकाग्र करना होता है। विचारों में यदि उच्चस्तरीय तत्वों का समावेश करना है तो उनका निरन्तर चिन्तन करते रहने की योजनाएँ बनाते रहने की और क्रियान्वित करने के लिये कोई अवसर हाथ से न जाने देने की चेष्टा करनी पड़ती है। यह तत्परता ही फलवती होती है।
अंकुरों को कोई व्यवधान आहत न करें तो उनके पौधा बनने और बढ़कर फूल फलों से लदा वृक्ष बनने की संभावना सुनिश्चित ही रहेगी। विचार ही अंकुर हैं। वे ही आस्था के रूप में परिपक्व होने पर पौधा बनते हैं जब उन्हें क्रिया रूप से उतारा जाता है और वे आदत के रूप में स्वभाव के अंग बन जाते हैं, तब वे चरित्र बन जाते हैं व्यक्तित्व के साथ घुल जाते हैं, सद्विचारों का क्रिया रूप में परिणत होना और उनका हर कसौटी पर खरा उतरना ही चरित्र है। चरित्रवान पर बलवान, धनवान, बुद्धिमान सभी निछावर किये जा सकते हैं। बुद्धि के साथ धूर्त्तता और प्रवंचना भी धुली हो सकती है। धन सम्पदा का अनीति अर्जित होना भी सम्भव है। फिर वह दुर्व्यसनों की अग्नि में घास फूस की तरह जल भी जाते हैं। बलिष्ठता ओर सुन्दरता एक सीमित समय तक ही अपना चकाचौंध दिखाती हैं। आयुष्य के ढलते ही उनका भी अन्त हो जाता है। किन्तु चरित्र अकेला ही ऐसा है, जो अपनी यश गाथा शरीर न रहने के उपरान्त भी यथावत बना रहता है। हरिश्चन्द्र, भागीरथ, हनुमान अशोक प्रताप, छत्रपति शिवाजी आदि की यशोगाथा युगों तक धूमिल नहीं पड़ सकती।
विचार देखने में मस्तिष्क की बिना पर वाली रंगीन उड़ाने भर मालूम देते हैं वे मस्तिष्क को बिना पैसे का सिनेमा दिखाते रहते हैं। किन्तु यदि उन्हें उद्देश्यपूर्ण दिशा में ही प्रवाहित रहने की आदत डाली जाय तो वे ही दृष्टिकोण को परिष्कृत कर सकते हैं जीवन जीने की संजीवनी विद्या जैसी कला में प्रवीण कर सकते हैं। व्यक्तित्व को इस स्तर तक उभार सकते हैं जिसे देवोपम कहा जा सके और जिसके साथ चिरस्थायी सुख शांति जुड़ी रहे।
अवसर की प्रतीक्षा में न बैठो। आज का अवसर ही सर्वोत्तम है। उसका सही उपयोग कर सके तो बड़ा अवसर भी आपके सामने हाथ बाँधकर आ खड़ा होगा।
वैज्ञानिक अध्ययन सम्बन्धी विविध शाखा प्रशाखाएँ गम्भीर शोधात्मक अध्ययन के पश्चात् इन्हीं निष्कर्षों का प्रतिपादन करती है कि विधिता के मूल में एकता है। यही सृष्टि का परम नियम है। समष्टि चेतना ही अलग-अलग अंशों में सृष्टि के विभिन्न घटकों में वितरित हुई है।
विश्व ब्रह्माण्ड का सृजेता कोई ऐसा मानव या अतिमानव नहीं है जो कहीं दूर रहकर या साव में आसमान में सिंहासनारूढ़ होकर अपना दरबार लगाता हो और सलाहकारों, मुसाहिबों से पूछ कर निर्देश देता हो। वेदान्त दर्शन का कथन है कि जीवन का सिद्धान्त पुरुषार्थ है। मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का सृजेता है। अपने भविष्य को निर्मित करना उसी के हाथों में है। इस मत को स्वीकार करने मानने वाला व्यक्ति किसी अंध विश्वास के अंध कूप में न गिरकर विभिन्न मत मतान्तरों की भूलभुलैया में न उलझकर पुरुषार्थ को अपनाकर अपने विकार के राजमार्ग पर निरन्तर प्रगतिशील रहता है।
परमहंस रामकृष्ण ने परमात्मा के बारे में बताते हुए कहा था कि सह सगुण साकार भी है और निर्गुण निराकार भी फिर इन दोनों से परे भी है। समूचे भारतीय आस्तिक विचारधाराओं का सार यही है। यह परमात्मा कष्ट के लिए डिज एन सिच हो सकता है हर्बर्ट स्पेन्सर के लिए अननोएबल इमर्सन के लिए “ओवर सोल” तथा स्पिनोजा के लिए स्बस्टेशियाँ। ऐसा पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर सर्वव्यापक सर्व नियन्ता किसी नाम के बन्धन में नहीं बँध सकता। संसार की सबसे पहली पुस्तक ऋग्वेद ‘एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” अर्थात् सत्य एक ही है ज्ञानी उसे विविध नामों से पुकारते हैं कह कर मूल सता के एकत्व को सुस्पष्ट करता है। परिभाषाओं की विविधता उद्बोधन की भिन्नताएँ भले ही कितनी ही क्यों न हों परमपिता विश्व ब्रह्माण्ड का सूत्रधार वही रहेगा।
“यूनिटी इन डायवसिटी” अनेकता में एकता के वेदान्तिक प्रतिपादन का विज्ञान के साथ पूरा तालमेल बैठता है। सुविख्यात खगोल शास्त्री फ्रंडहायल के अनुसार ब्रह्माण्ड का विकास उसी मूल तत्व से हुआ है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में कास्मिक धूल और वेदान्त की भाषा में चिदाकाश कहा गया है।
वेदान्त भी सारी सृष्टि को ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति मानते हुए आत्मा की अमरता को प्रतिपादित कर ते हुए उसे स्वयं भू शक्ति का अपरिमित स्रोत बताता है। आत्मा का सम्बन्ध जिस मूल केन्द्र बिन्दु से है, उस परमशक्ति का प्रतिमान बुद्धि तथा पदार्थ दोनों ही रूपों में होता है। आग के ढेर से जिस तरह हजारों हजारों अग्नि स्फुल्लिंग निकलते हैं, उसी तरह परमसत्ता से भी आत्म रूपी अग्नि स्फुल्लिंग बाहर आए हैं। अद्वैत दर्शन के मतानुसार प्रत्येक आत्म ब्रह्म स्वरूप है। सहस्रों रूपों में प्रतिभासित होता है। उसी तरह प्रत्येक आत्मा ब्रह्म के प्रतिबिम्ब के रूप में विराजमान है।
दृश्य जगत की संरचना किसी क्षण विशेष में हो सकना सम्भव है। पर परमशक्ति का कोई आदि नहीं जिससे आत्म का भौतिक स्वरूप अनुप्रमाणित होता है। कर्मफल का सिद्धान्त आत्म पर लागू होता है। सही माने में यही परमसत्ता, वैश्व चेतना का अनुशासन वाला पक्ष है। वह दिव्य सत्ता ने तो रिश्वतखोर अफसर की तरह रिश्वत लेकर किसी को अतिरिक्त सुविधा सहूलियत प्रदान करती है न ही नाराज होकर कठोर दण्ड। वह तो चेतना का उद्गम स्रोत है कर्म सिद्धान्त अच्छे बुरे परिणामों की व्यापकता के रूप में भी उसकी एक छवि है।
जगत का मूल स्रोत एक ही है। यह एक ऐसा बिन्दू है जहाँ पदार्थ विज्ञानी और अध्यात्मवेत्ता एक मत हैं विज्ञान का आधुनिक स्वरूप इस बात को स्वीकार करता है कि जड़ और चेतन सभी में कोई दिव्य शक्ति विराजमान है जहाँ चेतन कहे जाने वाले प्राणियों में उसकी अभिव्यक्ति बुद्धि और इच्छा के रूप में होती है वहीं जड़ पदार्थों में वह शक्ति विभिन्न हलचलों में दिखाई देती है।
आइन्स्टीन जैसे मूर्धन्य विज्ञानी विशारद ने चेतना रूपी आत्म तत्व को अविनाशी और व्यापक माना है। उनके एक मित्र ने उनसे सम्बन्धित संस्मरण में लिखा है कि उनके रोगी होने पर मैंने उनसे पूछा कि क्या आपको अपनी मौत से भय नहीं लगता “जवाब में आइन्स्टीन ने कहा आजकल मुझे एक आश्चर्यजनक अनुभव हो रहा है। मैं अपने आपको समग्र चेतन सत्ता से एकाकार होता महसूस करता हूँ। यह तादात्म्य इतना गहरा है कि मुझे अपने अस्तित्व का पृथक रूप से भास ही नहीं होता। अब मुझे यह बात बिल्कुल महत्वहीन लगती है कि इस संसार में कौन कब आता है कब जाता है मेरे विचार से यह आना जाना चेतना की सूक्ष्म और स्थूल अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं। चेतना की सरिता तो नित्य निरन्तर अजस्र रूप से प्रवाहित होती रहती है।”
आइन्स्टीन का यह अनुभव स्पष्ट करता है कि उनके विचार से भौतिक जीवन चेतना का ही अंग है, तथा मृत्यु का तात्पर्य जीवन की समाप्ति नहीं, अपितु चेतना के नवीनीकरण की एक प्रक्रिया भर है। अनेकानेक महत्वपूर्ण शोध कार्यों के पश्चात् भी यह महान भौतिक विद् सन्तुष्ट न था। उनकी व्यस्तता अन्तिम समय में गहरी हो गई थी। उनकी व्यवस्था का प्रयोजन समस्त भौतिक शक्तियों के मूल केन्द्र का पता लगाना था। उनके विश्वास के अनुसार चुम्बकीय गुरुत्वीय नाभिकीय शक्ति का कुछ ठोस आधार अवश्य होना चाहिए।
भौतिकी के क्षेत्र में जो भी शोध कार्य हो रहे हैं- उनका विवेचन विश्लेषण करने पर यही तयि प्रकाश में आता है कि समस्त शक्तियों का इस सृष्टि का मूल क्या है? शोध कार्य स्थूल की संकीर्ण परिधि से अपने का मुक्त कर अब सूक्ष्म से सूक्ष्मतर क्षेत्र में उस जगह जा पहुँचा है, जहाँ चेतना के क्षेत्र की परिधि शुरू होती है। रहस्यों का उद्घाटन अभी इसलिए सम्भव नहीं हो पा रहा कि खोज की प्रक्रिया भौतिक ही बनी हुई है जबकि चेतना का सुविशाल दिव्य क्षेत्र सर्वथा अलग है। उसे ज्ञात करने समझने तथा अभिव्यक्त करने के लिए इस पदार्थ विज्ञान की हठवादिता की चार दीवारी लांघ कर चेतना विज्ञान के क्षेत्र में कूदना पड़ेगा। अपने इस भ्रम एवं हठवादिता को कुछ भौतिक विद समझने भी लगें हैं। उनके प्रयास भी पदार्थ विज्ञान संकीर्णता की बेड़ियों से मुक्त होने की ओर हैं।
मूलतत्व क्या है? विश्व ब्रह्माण्ड की उद्गम कहाँ से हुआ? आदि के परम रहस्य को जानने के लिए फ्रिटजाँफ काप्रा, डेविड फिन्सेल्टाइन, माइकेलमर्फी आदि भौतिक विदों के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में एक प्रयोगशाला की स्थापना की, जिसका नाम उन्होंने लारेन्स बर्कले प्रयोगशाला रखा। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु एक चालीस सदस्यीय संगठन बनाया गया, जिसमें प्रख्यात भौतिक शास्त्री तथा प्राच्य विद्या विशारद हैं। भौतिक विज्ञान के अब तक हुए शोध कार्यों के निष्कर्ष के अनुसार इन वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि हमने शोध कार्य की शुरुआत की विज्ञान से पर आ पहुँचे पूर्वार्त्त दर्शन में। इस संगठन के सदस्य एवं प्रख्यात भौतिकीविद् प्रो. माइकेल मर्फी ने बताया कि हमारी शोध प्रक्रिया से चिन्तन क्षेत्र में एक नए आयाम का विकास हो रहा है। अब यह अधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि पदार्थ और अंतरिक्षीय ऊर्जा वास्तव में एक ही तत्व हैं इनका उद्गम स्रोत एक ही है।
बर्कले में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के भौतिक शास्त्री प्रोफेसर फ्रिटआँफ काप्रा ने अपने एक शोध निबन्ध में कहा है कि प्रकृति के अन्वेषण एवं इसके उद्गम स्रोत का पता लगाना बुद्धि और तर्क पर आश्रित रहने वाले के लिए असम्भव है। यह कार्य “इंट्यूशन” जिसे प्राच्य लोग प्रज्ञा या अन्तर्ज्ञान कहते हैं, के द्वारा ही सम्भव है। यह प्रज्ञा तार्किक बुद्धि से परे है। इसका महत्व बहुत अधिक है। सूक्ष्मतर ज्ञान इसी से अर्जित होता है। उन्होंने वैज्ञानिक असफलताओं का कारण बताते हुए कहा है कि इसका एकमात्र कारण प्रज्ञा की उपेक्षा है।
प्रोफेसर काप्रा ने इस सम्बन्ध में एक पुस्तक की रचना की है जिसका नाम "ञ्जद्धद्ग ञ्जड्डश शद्ध क्कद्धब्ह्यद्बष्ह्य" ताओ ऑफ फिजिक्स” इस पुस्तक ने पूर्वी एवं पश्चिमी जगत में अत्याधिक लोकप्रियता अर्जित की है। पश्चिमी विचारक वेदान्त के तत्व को गम्भीरता से जानने को उन्मुख हुए हैं। उन्होंने इसी पुस्तक के दसवें अध्याय "ठ्ठद्बह्लब् शद्ध ड्डद्यद्य ह्लद्धद्बठ्ठद्दह्य" सभी चीजों की एकता में बताया है कि सृष्टि तक संरचना नहीं, अपितु एक अभिव्यक्ति है यहाँ सभी चीजें परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। सभी की अभिव्यक्ति का स्रोत एक परम सता है जिसे हिन्दुओं ने ब्रह्म बौदों ने धरमाक्य और ताओइज्म ने “ताओ” कहा है।
आगे बताते हुए वह कहते हैं कि एक परम सत्य से सभी की अभिव्यक्ति की बात सामान्य जीवन में भले ही हमें न समझ में आए पर यथार्थ यही है।
प्रो. काप्रा ने बताया है कि “विज्ञान का भटकाव अब अधिक नहीं रहेगा। सर्वत्र संव्याप्त चेतना में इस ब्रह्माण्डीय सत्ता को परमसत्ता के स्वरूप की तरह स्वीकारा जाने लगेगा। वेदान्त के सूत्र “सर्व खिल्विदं ब्रह्मम” की आर्ष मान्यता साकार हो सकेगी।”
यह विज्ञान की पूर्वाग्रहों से मुक्ति की शुरुआत भर है। जब यह प्रगति यात्रा द्रुतगति से अनेकानेक वैज्ञानिकों मनीषियों के प्रयास से चल पड़ेगी तो ब्राह्मी चेतना के स्वरूप को समझने एवं उसके अनुशासन के अनुरूप स्वयं को ढालने हेतु मनुष्य स्वयं बाध्य होगा। यही मनुष्य का सहज एवं यथार्थवादी विकास क्रम है, जो उसे मानव से महामानव के ऋषि पद को पहुँचाएगा। ऊर्जा के सभी बलों को एकीकरण सिद्धान्त की विवेचना के माध्यम से ये प्रयास आरम्भ हो गये हैं। विज्ञान व अध्यात्म का मिलन होकर ही रहेगा।
बोधिसत्व एक जन्म में काशी नरेश के घर में जन्में थे। छत पर बैठे हुए देख रहे थे कि सड़क पर झाडू लगाने वाले मेहतर को एक सोने का टुकड़ा मिला, उसे उठाकर दीवार के छेद में छिपा दिया और काम करता रहा।
दोपहर को घर पहुँचा तो पत्नी ने कहा, आज दिवाली का उत्सव है। कुछ तुम्हारे पास रहा होता तो घर में पकवान बनते ओर सजावट होती।
मेहतर को सोना मिलने की बात याद आई। उसने कहा थोड़ी प्रतीक्षा करो, सभी सोना लाता हूँ वह बेतहाशा भागा और कड़ी धूम धूप में खुशी से विह्वल होकर नाचता जा रहा था।
राजा को दोनों घटनाओं से आश्चर्य हुआ। सिपाही भेजकर उसे बुलाया और कहा कि क्या मिला है? जो इतने खुश हो? उसने बात बता दी।
राजा को उसकी मनः स्थिति देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और दस माशे सोना इनाम में देने का प्रस्ताव किया। मेहतर ने मना कर दिया और कहा जो भगवान ने दिया है, वही पर्याप्त है। वह एक माशे था।
मेहतर चला गया और उसी डेली को बेचकर दिवाली का उत्सव मनाया। राजा के मन से वह निस्पृहता उतरी नहीं। उसने दूतों को भेजकर उसके घर का समाचार मँगाया। पाया कि वे सब उन थोड़े साधनों से ही अतिशय प्रसन्न थे।
दूसरे दिन राजा ने मेहतर को बुलाया और अपना अंगरक्षक नियुक्त कर दिया।
कई दिन बीत गये थे। राजा के कोष में ढेरों सोना आता था। वह सोया हुआ था। अंगरक्षक पहरा दे रहा था। उसके मन में आया कि पास रखी तलवार से राजा का सिर उड़ा दूँ और सारा धन हथिया लूँ यह कैसा अवसर है?
इन्हीं विचारों में डूबा रहा कि राजा की आँख खुल गई। उसने नौकरी छोड़ दी। कारण पूछने पर मन का भेद बता दिया और कहा इस सम्पन्नता के वातावरण में थोड़े दिन रह कर ही मेरा मन इतना भ्रष्ट हो गया, अधिक दिन रहने पर तो न जाने कितना गिरुँगा और न जाने क्या-क्या करूंगा?
राजा ने बहुत रोका पर वह रुका नहीं। पड़ा सोना उठाने और राजा के प्रति कुविचार लाने के प्रायश्चित में उसने विरक्ति धारण कर ली मेहतर का काम करते हुए सन्त जीवन जीने लगा। राजा ने उससे दीक्षा ली और वे भी साधुता अपनाते हुए निस्पृह जीवन जीने लगे।
आहार विहार की उपयुक्तता का स्वास्थ्य पर प्रीव पड़ने की बात गलत नहीं है। पर विज्ञान के बढ़ते हुए कदम अब यह सिद्ध कर रहे हैं कि न केवल स्वास्थ्य संगठन का वरन् पीढ़ियों की आकृति प्रकृति का सम्बन्ध भी अधिक गहराई तक इस तथ्य से जुड़ा हुआ है। यह गहराई है जीव कोशिकाओं की जो परम्परागत “जीन्स” तथा अविज्ञात आधार पर खड़े हुए हारमोन स्रावों की जो शरीर की आकृति-प्रकृति से बहुत कुछ सम्बन्ध स्थापित करती है।
वंशानुक्रम विशेषताओं को चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धान्तों के अनुसार प्रजनन के लिए एक कच्ची सामग्री भर समझा जाता रहा है। ज्यों ज्यों विज्ञान ने प्रगति की वैसे ही सन्तति विकास में वंशानुक्रम की मान्यताएँ भी परिवर्तित होती रही हैं। डार्विन के पश्चात् ग्रेगर मेण्डल ने वंशानुक्रम को भलीभाँति समझा और उन नवीनतम सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया, जिन्हें वंशानुक्रम की कुँजी के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन दुर्भाग्यवश यह महत्वपूर्ण कान जन-साधारण की दृष्टि में नहीं आया। सन् 1900 में उनके प्रतिपादनों को पुनः खोजा गया। जिसे बाकायदा “हेरेडीटी” नाम दिया गया। शैनेः शैनेः खोजों का क्रम जारी रक्खा गया। मेण्डेल ने प्रजनन से सम्बन्धित उन सभी नियमों को खोज निकाला जिनमें मानवी विशेषताएँ वंशानुक्रम का निर्धारण करती हैं। लेकिन तात्कालिक विज्ञ समुदाय ने पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में इन्हें विज्ञान सम्मत होने की पुष्टि नहीं दी। किन्तु उनकी मृत्यु के पश्चात् जब इस दिशा में पुनः शोधकार्य आरम्भ हुआ तो वैज्ञानिकों को वही सारे परिणाम प्राप्त हुए जिसके बारे में वर्षों पूर्व मेण्ड ने बताया था इस प्रकार आनुवाँशिकी का जनक कहलाने का उन्हें श्रेय प्राप्त हुआ। मगर मेण्डल ने पौधों के बाह्य आकार-प्रकार को लेकर प्रयोग परीक्षण किये थे, अस्तु उनके परिणाम भी उन्हीं पर आधारित थे। वे इस बात को बताने में सर्वथा असमर्थ रहे, कि आखिर इन गुणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाने के लिए जिम्मेदार कौन है? इस कारण की खोज आगे के वैज्ञानिकों ने की। जर्मनी के “आगस्टम वेजर्मेन” का नाम इस क्षेत्र में विशेष उल्लेखनीय है। उन्हीं ने प्रथम बार यह बताया कि कोशिकाओं के नाभिक में पाया जाने वाला “न्यूक्लियर थ्रेड” अथवा गुणसूत्र ही वे मूलभूत कारक हैं, जो माता-पिता के गणों को पुत्र तक ले जाने की भूमिका संपन्न करते हैं। इतना ही नहीं उनने यह भी बताया कि संतति की कोई अपनी निजी विशेषता नहीं होती वरन् उसमें माँ बाप दोनों के गुणों का सम्मिश्रण होता है। इस प्रकार यदि चाल ढाल, बात व्यवहार पिता से मिलते हैं, तो सम्भव है नाक-नक्श, रूप रंग माँ के समान हो।
गुणसूत्रों के बारे में इतनी जानकारी मिलने के बाद वैज्ञानिक इसके और गहन अध्ययन में जुट पड़े जिसके उपरान्त यह जानना सम्भव हो सका कि पुरुषों और महिलाओं में यह दो भिन्न प्रकार के होते हैं। पुरुषों में एक्स वाई तथा महिलाओं में एक्स-एक्स प्रकार के पाये जाते हैं। शोधों से कई ऐसे नये तथ्य भी हाथ लगे, जिनकी पूर्व के वर्षों में जानकारी नहीं थी, यथा “क्यों किसी विशेष नस्ल के लोगों की आयु अन्यों की अपेक्षा अधिक होती है और क्यों कोई अल्पायु होता है? वर्णान्धता और अधिरक्तस्राव की व्याधियों से पुरुष वर्ग ही अधिक पीड़ित होते क्यों देखे जाते हैं आदि। “अनुसंधान के दौरान इन सभी के मूल में गुणसूत्रों सम्बन्धी संरचना ही मुख्य कारण ज्ञात हुआ। अध्ययनों से यह भी पता चला कि हर क्षेत्र की भाँति यहाँ भी अपवाद देखने को मिला। मनुष्यों में यह प्रायः 46 की संख्या में होते हैं, किन्तु कई लोगों और विशेष कर मंगोलियनों में इनकी संख्या 47 पायी गयी। इस अतिरिक्त गुण सूत्र का प्रभाव उनकी शारीरिक व मानसिक संरचना में स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है। ज्ञातव्य है कि मंगोलियनों के चेहरे की बनावट अन्य जातियों से नितान्त भिन्न प्रकार की होती है।
इस विशेष चेहरे के लिए आनुवाँशिक शास्त्री उसकी कोशिकाओं में विद्यमान एक अतिरिक्त ‘वाई’ गुणसूत्र को ही जिम्मेदार ठहराते हैं, जबकि उसकी आन्तरिक संरचना में इससे आक्रामकता और अवाँछनीयता की वृद्धि होती है। इस आधार की पुष्टि तब और सुदृढ़ हो गई, जब सन् 1960 में इंग्लैण्ड के एक ऐसे व्यक्ति का सूक्ष्म अध्ययन किया गया जो आक्रामक प्रकृति का था एवं जीवन में अनेक हत्याएँ कर चुका था। परीक्षणों से ज्ञात हुआ कि उसके व्यक्तित्व की 11 प्रकार की त्रुटियों के लिए मात्र उसका एक अतिरिक्त गुणसूत्र ही उत्तरदायी है, पर गुणसूत्रों की संख्या में वृद्धि सर्वदा अवाँछनीय ही नहीं होती। कभी-कभी उससे अच्छे गुण भी विकसित हो जाते हैं।
कोल्चीसिन औषधि को क्रौकस नामक पौधे से निकालते समय गुणसूत्रों की संख्या में मूल पौधे से कई गुनी अधिक वृद्धि हो जाती हे, किन्तु इस प्रक्रिया से इस पौधे में कोई अन्यथा परिवर्तन नहीं होता, वरन् उसकी नस्ल में और अधिक सुधार हो जाता है। परीक्षणों के दौरान इससे पौधे की प्रजनन क्षमता व उत्पादकता और अधिक सबल समर्थ होते देखी गयी, कारण कि इससे पौधे की प्रजनन क्षमता व उत्पादकता और अधिक सबल समर्थ होते देखी गयी, कारण कि इसमें एक से दूसरे पौधे में गुण सूत्रों के हस्तान्तरण की प्रक्रिया में उपयोगी जीन पहुँचाये जाते हैं, जो नस्ल उन्नत बनाने में महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। अब इसी प्रक्रिया द्वारा नस्लों में सुधार विकास सिर्फ वृक्ष वनस्पतियों एवं छोटे आकार के जन्तुओं तक में ही उचित होगा। मनुष्यों के साथ इस प्रकार के प्रयोग परीक्षण में खता सदा इस बात का बना रहेगा कि इस प्रक्रिया के दौरान कहीं कोई हिटलर मुसोलिनी, रुडाल्फ हेस अथवा क्लाउस बार्बी (लियोन का कसाई) स्तर का व्यक्तित्व न पैदा हो जाय, जो समय और समाज दोनों के लिए ही घातक सिद्ध हो। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि व्यक्तित्व में निकृष्टता और उच्छृंखलता पैदा करने वाले “जीन्स” की कटाई छँटाई कर मनुष्य के व्यक्तित्व को उत्कृष्ट और उदात्त बनाया जाय। इस दिशा में सफलता अमेरिका के डॉ. होपवुड को मिली है। उनने हाइब्रिड तकनीक” नामक एक ऐसी विधि ढूँढ़ निकाला है, जिसके अंतर्गत जीन्स की मरम्मत एवं प्रत्यारोपण दोनों सम्भव हो सकेंगे। इस प्रणाली द्वारा उत्पन्न तीन प्रकार की जीनों (1) एक्टीनोरहिडीन (2) मेडरमाइसिन (3) ग्रेण्टीसिन द्वारा शरीर में उन रसायनों व एन्जाइमों की कमी पूरी की जा सकेगी, जिसके कारण शरीर स्वास्थ्य लड़खड़ाने व रुग्ण बनने लगता है। इस प्रकार इस प्रक्रिया द्वारा जहाँ एक ओर दोष दुर्गुण व रोगात्मक जीन्स में सुधार परिवर्तन शक्य होगा, वहीं दूसरी ओर श्रेष्ठता वर्धक जीन्स का प्रत्यारोपण कर मनुष्य की गुणवत्ता बढ़ाना भी सम्भव हो सकेगा।
गुणवत्ता सम्बन्धी समस्या के अतिरिक्त मनुष्य के साथ इन दिनों जो एक और समस्या जुड़ गई है, वह है उसकी अल्पायुष्य की। आजकल व्यक्ति की औसत उम्र 50-55 के बीच रह गई है, अतः स्वस्थता, गुणवत्ता के साथ-साथ आयुष्य वृद्धि की बात भी आवश्यक समझी जा रही है। वैज्ञानिक अब इस क्षेत्र में भी जीन क्रान्ति लाने का विचार कर रहे हैं। इस संदर्भ में विश्व की अनेक प्रयोगशालाओं ने काम करना भी प्रारम्भ कर दिया है। न्यूयार्क के “नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ एजिंग” के प्रख्यात जैवरसायनज्ञ रिचर्ड कटलर व मूर्धन्य आनुवाँशिक शास्त्री मंक्रेस एक ऐसे रसायन की खोज में जुटे हैं, जो आयु के लिए जिम्मेदार जीन को उद्दीप्त कर सके। वस्तुतः प्रत्येक शरीर कोशिका में छः जीन्स का एक “सुपर जीन समूह” होता है। जब इस पर किसी स्वतन्त्र मूलक का आक्रमण होता है, तो प्रतिक्रिया स्वरूप ये एस.ओ.डी. नामक आयुवर्धक एन्जाइम साबित करने लगते हैं। रिचर्ड कटलर का कहना है कि किसी प्रकार यदि इन जीन समूह को धोखा देकर उनमें यह भ्रम पैदा किया जा सके कि उसकी कोशिकाओं के चारों ओर बहुत सारे स्वतन्त्र मूलक हैं, तो भ्रान्ति में पड़ कर जीन्स एस.ओ.डी. एन्जाइम साबित करने लगेंगे और इस प्रकार कोशिका और व्यक्ति की जीवन अवधि में महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी सम्भव हो सकेगी। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का मेडिकल सेन्टर, ओमाहा के डेनहाम हरमन ने भी इस परिकल्पना का समर्थन करते हुए मत व्यक्त किया है कि यह सम्भव है। यदि ऐसी कोई विधि निकट भविष्य में खोज ली गई, तो इससे जीवन अवधि 5-15 वर्ष तक बढ़ायी जा सकती है।
आनुवांशिकी के वैज्ञानिकों के यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है और यदि जीन अभियाँत्रिकी द्वारा आयु स्वास्थ्य व व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले यह उपाय उपचार सम्भव हुए भी तो वे इतने महंगे व मुश्किल भरे होंगे कि सबके लिए एवं सब जगह उपलब्ध न हो सकेंगे। ऐसी स्थिति में हमें किसी ऐसी विधि की तलाश करनी चाहिए जो सर्वसुलभ भी हो और जिसमें कोई खर्च भी न पड़े। ऐसे में ध्यान अनायास अध्यात्म विज्ञान की ओर जाता है। जिस कार्य को भौतिक विज्ञान कठिन व मुश्किल भरा मानता है वह इसमें अपेक्षाकृत अधिक सरल सम्भव बन जाता है। अप्रैल जीन विज्ञानी डॉ. क्रुक शैन्क भी इसकी उपदेयता स्वीकार करते हुए कहते हैं कि अध्यात्म साधना विज्ञान की रहस्यमयी सम्भावनाओं में यह तथ्य कुछ सुगमता से क्रियान्वित किया जा सकता है कि मनुष्य हर दृष्टि से उन्नत बन सके। सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व सम्पन्न संतति की निर्मिती ऐसे ही उपचारों से सम्भव है जो मानवी अन्तराल की गहराई में संस्कार चेतना से अन्त सत्ता को अनुप्राणित कर दें।
कौशल निवासी गाधि नामक ब्राह्मण ने लम्बे समय तक तप करके विष्णु भगवान को प्रसन्न किया। उनने वर माँगने को कहा। ब्राह्मण ने कहा आपकी माया का प्रत्यक्ष दर्शन करने का मन है। भगवान तथास्तु कहकर अदृश्य हो गये।
गाधि रात्रि को गहरी नींद सोया और लम्बा सपना देखने लगा। उसने देख वह एक चाण्डाल परिवार में जन्मा ओर बढ़कर प्रौढ़ हो गया। कीर देश का राजा मरा तो प्रथा के अनुसार किसी को भी अपनी पीरु पर बिठा लेने के लिए प्रशिक्षित हाथी छोड़ा गया।
नया राजा ऐसा ही व्यक्ति बनता था। हाथी ने उस चाण्डाल युवक को पीठ पर बिठा लिया। राज्याभिषेक हुआ तो उसे राजा बनाया गया। उसे जाति छिपानी पड़ी अन्यथा वह सुयोग न मिलता।
राज्य भोगते वर्षों बीत गये। सुन्दर रानी विवाही गई और उसके सात बच्चे हो गये। वैभव की कोई कमी न थी। एक दिन चाण्डालों की बारात निकली राजा भी कौतूहलवश देखने लगा। बारात वालों ने उसे पहचान लिया। खोये को पाने की खुशी में वे सभी उससे लिपट गये और वापस चलने को सभी को यहाँ बुलाने का आग्रह करने लगे। छोड़ कर जाने को वह सारा समुदाय तैयार न था।
राजा चाण्डाल वंश का है, यह सुनकर राजा दरबार में हाहाकार मच गया। जो ब्राह्मण उसके यहाँ भोजन करते रहते थे उनने अपने को धर्म भ्रष्ट माना और चिता बनाकर कूद पड़े। राजा ने प्रायश्चित स्वरूप उसी चिता में कूदकर प्राण दे लिये। रानियों और राजकुमारों ने यह दृश्य भान मन से देखा वे स्तब्ध थे। चिता की भस्म समेट कर वे गंगा में प्रवाहित करने ले गये। पानी बहुत ठंडा था सो राजा की मृतात्मा में कँपकँपी छूटी। थरथराने पर उसकी नींद खुल गई।
गाधि ब्राह्मण ने स्वप्न में प्रत्यक्ष दर्शन कर लिया। आशा और निराशा के झूले में झुलाती और हँसाती रुलाती रहने वाली उस मोहिनी को उसने बारम्बार नमस्कार किया और अपनी कुटिया पर आकर विरक्त मन से नियत ब्रह्म कर्म करने लगे।
परमात्मा की इस सृष्टि के विकास सौंदर्य का कारण पारस्परिक सहयोग और सहकार की सद्भावना ही है संघर्ष नहीं। संघर्ष की क्रियाशीलता से तो अव्यवस्था अराजकता ही फैलती है और भरी पूरी सम्पन्न प्रजातियाँ विकास के स्थान पर विनाश के गर्त में चली जाती हैं। इस तथ्य को प्राणि जगत के विगत इतिहास के विकास और विनाश की घटनाओं के अध्ययन से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। इन घटनाओं का विशद् विवरण प्रो. ई.ओ. डाँडसन एवं डा. रिचर्डसन लार्ड ने अपनी पुस्तकों में प्रस्तुत किया है।
मनुष्येत्तर जीवों की कितनी ही सूक्ष्म और बलिष्ठ प्रजातियाँ मात्र अपने आपसी संघर्ष और हिंसात्मक प्रवृत्ति के कारण पूरी तरह से लुप्त हो गई। उनके लुप्त होने का कारण आपसी टकराहट ही थी। मीजोजोइक एकरा (युग) को प्राणिशास्त्रियों में रेप्टाइल्स एरा या सरीसृप युग की कहा जाता है। इस काल में सरीसृप वर्ग के प्राणियों ने धरती पानी और आकाश में पूरी तरह से अपना वर्चस्व कायम कर रखा था। इक्थियोसाँरस 40 फीट लम्बा और भारी भरकम शरीर वाला समुद्री प्राणी था। इसी की एक प्रजाति में टेरोनोडाँन;च्मजतवदवकवदद्ध नामक 27 फीट लम्बा आकाश चारी प्राणी भी आता था। ट्राइसिरिक समय का ब्रान्टोसार नामक थलचर 80 फीट लम्बा 20 फीट ऊँचा और 50 टन (50,000किला) के भीमकाय शरीर का स्वामी था। डिप्लोडोक्स 90 फीट लम्बा 50 टन भारी था। इक्वानोडाँन नामक एक अन्य प्रजाति का जीव 30 फीट लम्बा ओर 15 फीट ऊँचाई का था। रेगिस्तान में सफलता पूर्वक रह सकने की क्षमता वाले डाईसेराटोल्स की लम्बाई 20 फीट थी। इसका शरीर अत्यन्त सबल था। इसी जाति के एक अन्य जीव टायनोसाँरस के शरीर की लम्बाई 20 फीट एवं इसके दाँतों की लम्बाई 6 फीट थी।
सरीसृप समूह के नाम से विख्यात ये सभी महासरीसृप समस्त भूमंडल पर छाए हुए थे। शक्ति की दृष्टि से इनमें किसी दाव से राई रत्ती कमी न थी। पर आपसी संघर्ष और टकराहट के कारण ये धरती पर विलीन हो गए। कुछ तत्कालीन परिस्थितियों से अपना सामंजस्य, सन्तुलन नहीं बिठा पाए। पर इसका प्रधान कारण परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं, अपितु आपसी सहयोग का अभाव ही था। वातावरण की प्रतिकूलता एवं आपसी टकराहट ने इनके अस्तित्व का समूल नाश कर दिया। विकासवादी भले ही परिस्थितियों को कारण मानते रहे हों, पर वस्तुतः प्रधान कारण आपसी टकराहट ही था।
वैज्ञानिकों द्वारा की गई शोध इस बात का प्रमाण है कि प्राणियों में विषम से विषम परिस्थितियों में भी सामंजस्य सन्तुलन बिठा सकने की अद्भुत क्षमता है। यदि इन दानवाकार प्राणियों में आपसी सहकार एवं सहयोग सद्भाव रहा होता तो इनका अस्तित्व सुरक्षित रह सकता था। पर ऐसा न हो सकता। जबकि शक्ति सामर्थ्य की दृष्टि से नितान्त अक्षम नगण्य से जीव अपने आपसी ताल मेल के कारण विषमताओं से जूझकर अपने को सुरक्षित बनाये रहे। इसका श्रेय निश्चित रूप से उनकी सद्भाव की प्रवृत्ति को ही दिया जा सकता है। यह विशिष्टता न केवल उनके समूह को सुरक्षित ही रखने में समर्थ हुई अपितु निरन्तर प्रगति और उत्कर्ष की ओर बढ़ती गई। तर्क का आश्रय लेने वाले बुद्धिवादी इसकी बौद्धिक व्याख्या मात्र कर सन्तोष कर लेते है॥ जो कि वस्तुतः आत्म प्रवंचना है। यथार्थ यही है कि सहकारिता के भाव ने उनका उत्कर्ष किया।
अन्य जीवों की तरह यदि मानव जाति ने भी संघर्ष को जीवन सूत्र माना होता तो सम्भवतः डायनोसौर इक्थियोसाँर की तरह उसका भी अस्तित्व समाप्त हो गया होता। पर मानव जाति संघर्ष और आपसी टकराहट न अपनाकर आपस में तालमेल और सद्भावना के कारण विकास के उत्कर्ष को पा सकी। अन्य जीवधारियों से कहीं ऊँचा सृष्टि का सिरमार कहलाने का सौभाग्य अर्जित कर सकी।
यह सहकारिता है क्या? व मनुष्य के जीवन में इसकी अहम् भूमिका किस प्रकार? इसे समझाते हुए प्रसिद्ध चिन्तक एल्डुअस हक्सले कहते है। कि “मनुष्य की बुद्धिमता, शारीरिक चेष्टा और पुरुषार्थ परायणता के मूल में जो अत्यन्त प्रेरणा दिव्य प्रवृत्त झाँकती है उसे ही सहकारिता कहते हैं। वस्तुतः यही मानव रूपी प्राणी की सबसे बड़ी विशेषता है। अन्य प्राणियों में यह वृति आँशिक ही है। मानसिक आदान प्रदान कर सकने योग्य उनकी स्थिति नहीं है। कुछ पशु पक्षी जोड़े बनाकर रहते हैं, समूह में रहने की अभ्यस्त हैं। इससे उन्हें सुरक्षा में सहायता मिलती है। छोटे-मोटे शारीरिक आदान-प्रदान भी बन पड़ते हैं, पर मानसिक भावनात्मक आदान-प्रदान भी बन पड़ते हैं, पर मानसिक भावनात्मक आदान-प्रदान उनसे नहीं बन पड़ता। सहकारिता वृति का सीमित प्रयोग कर सकने के कारण ही अन्य प्राणी सृष्टि के आदि से लेकर अब तह जहाँ के तहाँ पड़े हैं जबकि मनुष्य उस दिव्य प्रवृत्ति को अधिकाधिक विकसित करते हुए उन्नति के शिखर तक पहुँच सकने में सफल हो गया।
सहकारिता की इस दिव्य प्रवृत्ति के महत्व को कालान्तर में विकासवादी वैज्ञानिक डार्विन ने भी पहचानो और अपनी भूल सुधार करते हुए एक अन्य ग्रन्थ मानव का अवतरण में लिखा है “जीवन संघर्ष का तात्पर्य आपसी टकराव नहीं।” विकास के क्रम में असंख्य प्राणी समूह में पृथक पृथक प्राणियों का आपसी संघर्ष समाप्त हो जाता है। संघर्ष का स्थान सहयोग का गुण ले लेता है और इसके फलस्वरूप उनका बौद्धिक एवं नैतिक विकास होता है। इस विकास से ही उन प्राणियों का अस्तित्व बने रहने के लिए अत्यन्त अनुकूल आवश्यक व्यवस्था पैदा होती है। “सारवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट की व्याख्या के साथ अपनी पूर्व मान्यता का खण्डन करते हुए वे कहते हैं कि ऐसे समुदायों में योग्यतम उनको नहीं कहा जायेगा जो सर्वाधिक चालाक या बलवान है। वरन् सही माने में वे सक्षम आथ्र समर्थ है, जो अपने समाज के हित के लिए निर्बल और बलशाली सभी शक्तियों को इस तरह संगठित कर सकें कि वे एक दूसरे के पोषक बन सकें। जिन समुदायों में एक दूसरे के प्रति सहानुभूति रखने वाले प्राणी अधिक होंगे, वे ही सर्वाधिक उत्कर्ष पा सकेंगे पुष्पित पल्लवित होंगे। “आज के समाज के विकास और प्रगति के कारणों पर गम्भीरता पूर्वक चिन्तन करने पर पता चलता है कि पारस्परिक स्नेह सहयोग सहलाकर की अमृत वर्षों से सिंचित होने के कारण ही मानव जाति का यह उत्कर्ष सम्भव हो सका।
रूस के लाइफ साइंसेज के प्रो. केसलर ने प्रकृतिवादियों के सम्मुख अपने एक भाषण में कहा था कि सहयोग प्रकृति का नियम और विकास का मूल अंग है।” अपने भाषण के अन्त में उन्होंने बताया कि प्राणि जागृत और मानव जाति का विकास पारस्परिक संघर्ष द्वारा नहीं अपितु सहयोग द्वारा ही हो सका है।
प्रो. केसलर के इन विचारों का उल्लेख रूस के प्रसिद्ध विचारक प्रिस क्रोपटकिन ने अपनी पुस्तक “संघर्ष नहीं सहयोग” में किया है जीवन संघर्ष की व्याख्या पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं कि मैं अपने मित्र प्राणिशास्त्र विशारद डा. पोलियाकोफ के साथ साइबेरिया के घने जंगलों में गया। डार्विन के सिद्धान्त का भूत हम लोगों पर नया नया चढ़ा था। हम दोनों यह आशा लगाए बैठे थे कि एक जाति के प्राणियों में परस्पर प्रतिस्पर्धा की झलक देखने को मिलेगी किन्तु वहाँ इसका कोई नामोनिशान भी न मिला।
जीवन में संघर्ष के क्षण भी आते हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता। चोर, डाकुओं से सामना करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। पर आपात परिस्थितियों में ही यह स्थिति आती है। संघर्ष को जीवन दर्शन के सूत्र सिद्धान्त का रूप नहीं दिया जा सकता। परिस्थितियों की अनुकूलता के लिए हम सभी प्रयत्न करते हैं किन्तु जब यही बाह्य जीवन में अपने सजातियों के प्रति प्रकट होने लगेगा तो संकट उत्पन्न होने के साथ बर्बरता असभ्यता जैसी स्थिति ही पैदा होगी। मात्र कल्पना करें कि हर व्यक्ति संघर्ष को जीवन का सिद्धान्त मानने लगे “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की रीति-नीति अपना ले तो “मत्स्य न्याय” की यह परम्परा मनुष्य को क्रूर बर्बर हिंसक बना देगी और मानव जाति का समूल अस्तित्व कुछ ही दिन में धरती से समाप्त हो जायेगा।
वस्तुतः व्यक्ति, समाज राष्ट्र के उत्थान की आधार शिला पारस्परिक स्नेह सहयोग का सद्भाव ही है। संघर्ष यदि सफलता का आधार बन जाये तो हर व्यक्ति छल प्रपंच शारीरिक बलिष्ठता से अपना वर्चस्व स्थापित करने का उपाय करेगा। नैतिक पुरुषार्थ महत्वहीन हो जाएगा। परिणामस्वरूप प्रगतिशील मानव समाज और मानवता की वही दशा होगी जो सरीसृप समूह के जन्तुओं की हुई। स्पष्ट है अस्तित्व की नींव संघर्ष नहीं सहयोग है अपनी सभ्यता संस्कृति को अक्ष बनाए रखने के लिए सहयोग की उदात्त भावना को ही जीवन दर्शन के सूत्र सिद्धान्त के रूप में अपनाना होगा। जीव विज्ञान की एक शाखा एथ्रापाँलाजी के विशद अध्ययन से यही तथ्य प्रकाश में आता है कि जिन जीवों में जिन प्रजातियों में उत्कर्ष सहकार की दिव्य प्रवृत्ति जितनी अधिक रही, उतना ही अधिक उत्कर्ष को वे प्राप्त हुए। आज की विचारशील मानव जाति जो शीत युद्ध पर उतारू है, सहयोग सहकार के जीवन दर्शन के आधार भूत सिद्धान्त को अपना कर ही अपना अस्तित्व अक्षुण्ण बनाए रख निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होती रह सकती है।
एक नाई जंगल में होकर जा रहा था अचानक उसे आवाज सुनाई दी “सात घड़ा धन लोगे? उसने चारों तरफ देखा किन्तु कुछ भी दिखाई नहीं दिया। उसे लालच हो गया और कहा लूँगा तुरन्त आवाज आई “सातों घड़ा धन तुम्हारे घर पहुँचा दिया जायेगा जाकर सम्हाल लो।
नाई ने घर आकर देखा तो सात घड़े धन रखा था उसमें छह घड़े तो भरे थे किन्तु सातवाँ घड़ा खाली था। लोभी का लालच और बढ़ा गया । नाई ने सोचा सातवाँ घड़ा भरने पर मैं सात घड़ा धन का मलिक बन जाऊँगा। यह सोचकर उसने घर का सारा धन जेवर उसमें डाल दिया किन्तु वह भरा नहीं।
वह दिन रात मेहनत मजदूरी करने लगा, घर का खर्चा कम करके धन बचाता और उसमें भरता किन्तु घड़ा नहीं भरा। वह राजा की नौकरी करता था तो राजा से कहा महाराज मेरी तनख्वाह बढ़ाओं खर्च नहीं चलता। तनख्वाह दूनी कर दी गई फिर भी नाई कंगाल की तरह रहता।
भीख माँगकर घर का काम चलाने लगा और धन कमाकर उस घड़े में भरने लगा। एक दिन राजा ने उसे देखकर पूछा “क्यों भाई तू जब कम तनख्वाह पाता था तो मजे में रहता था अब तो तेरी तनख्वाह भी दूनी हो गई और भी आमदनी होती है फिर भी इस तरह दरिद्री क्यों? क्या तुझे सात घड़ा धन तो नहीं मिला।”
नाई ने आश्चर्य से राजा की बात सुनकर उनको सारा हाल कहा। तब राजा ने कहा “वह यज्ञ का धन है। उसने एक रात मुझसे भी कहा था किन्तु मैंने इन्कार कर दिया। अब तू उसे लौटा दे। नाई उसी स्थान पर गया और कहा अपना सात घड़ा धन ले जाओ तो घर से सातों घड़ा धन गायब। नाई का जो कुछ कमाया हुआ था वह भी चला गया।
पराये धन के प्रति लोभ तृष्णा पैदा करना अपनी हानि करना है। पराया धन मिल तो जाता है किन्तु उसके साथ जो लोभ तृष्णा रूपी सातवाँ घड़ा और आ जाता है तो वह जीवन के लक्ष्य जीवन के आनन्द शान्ति प्रसन्नता सबको काफूर कर देता है।
मनुष्य दरिद्री की तरह जीवन बिताने लगता है और अन्त में वह मुफ्त में आया धन घर के कमाये कजाये धन के साथ यज्ञ के सातों घड़ों की तरह कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाता है चला जाता है। भूलकर भी पराये धन में तृष्णा लोभ, पैदा नहीं करना चाहिए। अपने रम से जो रूखा सुखा मिले उसे खाकर प्रसन्न रहते हुए भगवान का स्मरण करते रहना चाहिये।
प्रकृति द्वारा दिये गये अनुदानों में से एक सुन्दरता भी है, जिसे जड़ एवं चेतन दोनों जगत में देखा जा सकता है। सामान्यतया सौंदर्य का अर्थ शारीरिक सुघड़ता तथा मुखाकृति तक ही सीमित माना जाता है, जिसका प्रभाव प्रचलन आज के तथाकथित सभ्य समाज में स्पष्ट देखा जा सकता है। यथार्थ में उत्कृष्ट व्यक्तित्व एवं सुव्यवस्थित वेश विन्यास ही वास्तविक सौंदर्य है। जब वह मानव चरित्र में सन्निहित होता है, तब निराशाओं और चिन्ताओं के झँझावातों में भी उसे खुशियों और आशाओं का संबल मिलता रहता है। यही कारण है कि स्वभाव से उत्तम व्यक्ति को अपने चारों ओर सुन्दरता बिखरी दिखाई पड़ती है। अप्रिय परिस्थितियों में भी वह बिना विचलित हुए कुछ न कुछ आकर्षण देखता है।
सौंदर्य वस्तुतः सुस्वास्थ्य की अनुकृति है। स्त्री हो या पुरुष, जिसका शरीर निरोग होगा, रक्त की न्यूनता न होगी, व्यायाम में माँसपेशियाँ सुगठित होंगी वह चेहरे की बनावट साधारण होने पर भी सुन्दर लगेगा। फूल कितने ही किस्म के होते हैं जब वे खिली हुई स्थिति में होते हैं तो सभी सुन्दर लगते हैं। किसी एक की तुलना दूसरे से नहीं हो सकती है। बनावट में भिन्नता रहने पर भी हर किसी में ताजगी और सुगन्ध सौंदर्य निखार देती है। मुरझाया हुआ कुम्हलाया हुआ फूल प्रकृतितः सुन्दर लगने पर भी निस्तेज और कुरूप लगने लगता है। समय पर सभी वृद्ध होते और बीज रूप में परिणत होते हैं। सुन्दरता घटती है तो उपयोगिता बढ़ जाती है। अल्हड़ आयु में प्रेम, उपेक्षा और घृणा के आँधी तूफान आते रहते हैं। किन्तु कोमलता घट जाने के स्थान पर प्रौढ़ता और परिपक्वता आ जाती है। जो निश्चय होते हैं वे अटल रहते हैं। यह परिपक्वता अधकचरे सौंदर्य की अपेक्षा मनोरमा भले ही न लगे, पर अल्हड़ता युक्त सौंदर्य में परिपक्वता नहीं होती।
फूलों में कोमलता ओर सुगन्ध तो अधिक होती है, पर इस वय में उन फलों का उद्भव नहीं होता, जो मीठे भी होते हैं और मूल्यवान भी। सौंदर्य की अपनी परख भी है, वह कसौटी सहज ही विकसित नहीं होती। किसी को नर्तकी मनभावन लगती है, तो किसी को बच्चों का भोलापन। रूप रंग के परखी स्थिरमति नहीं होते, क्योंकि उसमें भी अधिक आकर्षण जहाँ कहीं दीखती है वे भौरों ओर तितली जिसे सर्वोत्तम की उपाधि देते थे, वही तुलनात्मक दृष्टि से अधिक आकर्षक के सामने फीका, नीरस और उपेक्षणीय लगने लगता है। पर जिनके साथ मैत्री, वफादारी एवं जिम्मेदारी के आधार पर चुनी गई है, उनसे ऐसे परिवर्तनों की आशंका नहीं रहती है।
आँखों रंग रूप की ओर आकर्षित होती हैं और साज-सज्जा के प्रति अपनी पसन्दगी को मान्यता देती है। पर जिस आधार पर यह आकर्षण उभरा था उसके तीनों स्तम्भ अस्थिर हैं स्वास्थ्य में गड़बड़ी आने या आयु बढ़ने पर चेहरे की चमक चली जाती है। तुलनात्मक दृष्टि से कोई अन्य सुहावना लगने लगे या अपनी ही स्थिति भौंड़ी बन जाय तो दूसरे पक्ष की अपेक्षा होने लगती है। आँखों के सौंदर्य में यह शर्त है कि वह दोनों ओर से सुहावना लगे यह पसन्दगी अनेक कारणों से बदल सकती है, व्यवहार में अन्तर आने पर भी। इसलिए सुन्दरता की परख करते समय नख शिख को ही नहीं व्यक्तित्व की परिपक्वता और वरिष्ठता को भी देखा जाना चाहिए। ऐसे ही निर्णय चिरस्थायी और फलप्रद होते हैं।
जो सुन्दरता को बहिरंग मात्र आँकते व भौंरों की भाँति उस पर मँडराते हैं, उनका भावावेश समय के प्रवाह में बह जाता है। वस्तुतः सौंदर्य अन्तरात्मा के शाश्वत सच्चिदानन्द स्वरूप की अभिव्यक्ति ही है। जो आत्म के सौंदर्य विचारों की उत्कृष्टता को समझता व उनका मूल्याँकन करना जानता है, वही सच्चा सौंदर्य पारखी है।
सौर मण्डल का पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ता है? इस जानकारी से किस प्रकार लाभान्वित हुआ जा सकता है? अनिष्टों की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में किस प्रकार सुरक्षात्मक कदम बढ़ाये जा सकते हैं? इसके लिये साधन सम्पन्न वेधशालायें पृथ्वी के अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्रों में बनाई गई हैं। उनसे जो जानकारियाँ मिली हैं वे अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। यदि उन्हें सामान्य क्षेत्रों में सुविधाजनक स्थानों में बनाया गया होता तो वह लाभ न मिलता जो प्रस्तुत संवेदनशील क्षेत्रों के निर्माण से मिल रहा है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव क्षेत्रों में भी अनेक प्रकार के शोधों के प्रयास चल रहे हैं। वे अत्यन्त खर्चीले भी हैं और जोखिम भरे भी। फिर भी क्षेत्रीय संवेदनशीलता का लोभ संवारण नहीं किया जा सका और जहाँ तहाँ वैसी प्रयोगशालायें बनाने का विचार किया गया। क्योंकि वैज्ञानिक जानते थे कि स्थान विशेष की संवेदनशीलता का लाभ अन्यत्र नहीं उठाया जा सकता।
खग्रास सूर्य ग्रहणों के समय भी उसके फोटो लेने और प्रभाव जाँचने के लिए भी वैज्ञानिक किन्हीं ऐसे स्थानों पर जाते हैं जहाँ से दृश्य की छवि देखी जा सकती हो ऐसे स्थान ही उस शोध प्रयोजन की पूर्ति भली प्रकार कर पाते हैं।
मिश्र के पिरामिड मात्र कब्रें नहीं हैं, उन्हें धरती के एक विशेष क्षेत्र में बनाया गया है, जहाँ से सौर मण्डल के ग्रहों की गतिशीलता की नाम तौल भली प्रकार हो सके। उनकी बदलती परिस्थितियों का लेखा जोखा ठीक प्रकार लिया जा सके। वे सूक्ष्म गणित पर आधारित विशेष प्रकार की वेधशालाएँ हैं। उपयुक्त स्थान तलाश करके उन्हें विशेष कठिनाइयों के साथ बनाया गया है। यदि भूमि का महत्व उतना न रहा होता तो सम्भवतः वे पिरामिड कहीं ऐसे स्थान पर बनाये गये होते जहाँ आवश्यक वस्तुएं सुविधा-पूर्वक मिल सकी होती हैं और कारीगरों का निवास निर्वाह अपेक्षाकृत सरल होता। पिरामिडों के स्थान चयन में सौर मण्डल के विभिन्न प्रभावों का पृथ्वी पर अवतरण ही प्रमुख कारण रहा है।
एशिया के सोवियत क्षेत्र के दक्षिणी भाग में कई स्थान ऐसे हैं, जहाँ अधिकाँश लोग शतायु या उससे भी अधिक समय तक जीवित रहने वाले पाये जाते हैं। इन लोगों का आहार-विहार अन्यत्र रहने वालों की तरह सामान्य ही होता है, किन्तु फिर भी आश्चर्य की बात हय है कि उन्हीं क्षेत्रों में दीर्घजीवी क्यों पाये जाते हैं? इसका सम्बन्ध भी उन प्रदेशों पर अन्तरिक्षीय विशेष किरणों का बरसना एवं वातावरण का विशिष्ट होना माना जाता है। इसे जलवायु की आहार विहार की, विशेषता नहीं माना जाता, वरन् उस क्षेत्र में पृथ्वी और आकाश के मिलन का ब्राह्मी चेतना के स्थान विशेष पर अवतरण का एक अद्भुत संयोग कहा जाता है।
धरातल का सामान्य वातावरण ऋतुओं के प्रभाव से प्रभावित होता रहता है, पर विशेष क्षेत्र ऐसे भी हैं, जिनकी परिस्थितियाँ धरती और आकाश के बीच विशेष प्रकार के सम्बन्ध बाँधने पर निर्भर रहती हैं। उन क्षेत्रों की उर्वरता खनिज सम्पदा, प्राणियों का स्वभाव एवं पौरुष असामान्य रूप से घट बढ़ा पाया जाता है। इसे भूगोल एवं खगोल का विशिष्ट प्रत्यावर्तन कहा जा सकता है। हिमालय का वह भाग जिसे देवात्मा कहते हैं, ऐसे ही विशेषताओं से सम्पन्न है। उस पर भू-चुम्बक एवं अन्तरिक्षीय तरंग वर्षण का प्रभाव देखा गया है। हिमालय बहुत विस्तृत भी है और ऊँचा नीचा भी। उसमें कई पठार भी हैं, किन्तु जो विशेषता देवात्मा क्षेत्र में पाई गई हैं, वे एक नहीं अनेकों हैं। वे विशेषताएँ अन्यत्र नहीं है। इसी कारण उस परिधि के सिद्ध पुरुषों ने अपने लिये उसे क्रिया क्षेत्र चुना है।
रेडियो, टेलीविजन प्रसारण के लिए ऊँचे खम्भे खड़े किये जाते हैं। यह कार्य धरातल पर कारखाना बना कर पूरा नहीं किया जा सकता। कारण कि धरातल पर से जो तरंगें निस्सृत होती हैं, व प्रायः समानान्तर ऊँचाई पर ही चलती हैं। उन्हें ऊँचा फेंकना हो तो विशेष शक्ति का नियोजन करना पड़ता है। किन्तु ऊँचे खम्भों के सिरे पर से जो तरंगें फेंकी जाती हैं वे निर्वाध रूप से लम्बी दूरी पार करती हुई विस्तृत क्षेत्र में बिखर जाती हैं। हिमालय की ऐसी संतुलित ऊँचाई देवात्मा क्षेत्र में ही पड़ती हैं, जहाँ से विश्व के क्षेत्र विशेष को प्रभावित किया जा सके, वहाँ तक विशेष संदेश पहुँचाये जा सकें। सिद्ध पुरुष मात्र अपनी ही निजी साधनाओं तक सीमित नहीं रहते, उन्हें धरातल के विभिन्न क्षेत्रों को वहाँ के विशेष व्यक्तियों को संदेश पहुँचाने पड़ते हैं। इसके लिये उनका आसन ऐसे स्थान पर होना चाहिए जो इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सही ओर संतुलित हो। समुद्रों में खड़े किये गये प्रकाश स्तम्भ भी ऐसी ही ऊँचाई तक उठाये जाते हैं, जहाँ से उनमें जलने वाला प्रकाश जलयानों तक पहुँचने में भली प्रकार समर्थ हो। यदि यह स्तम्भ अनुपात से नीचे या ऊँचे हों तो निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति न हो सकेगी। सिद्ध पुरुषों को प्रसारण भी करना पड़ता है और प्रकाश स्तम्भों की भूमिका भी निभानी पड़ती है। इसी से इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उनने देवात्मा क्षेत्र का अपने लिए चयन किया है। यों सुविस्तृत हिमालय क्षेत्र में अनेक स्थान उससे ऊँचे भी हैं और नीचे भी। सुविधा साधनों की दृष्टि से हिमालय के कई क्षेत्र अधिक पसन्द किये जाने योग्य हैं, पर उनकी उपयोगिता इसलिए नहीं समझी गई कि वहाँ से प्रसारण और संग्रहण का तारतम्य सही रूप से नहीं बनता था।
प्रसारण का तात्पर्य है फेंकना। सिद्ध पुरुष अपनी आत्म शक्ति का एक महत्वपूर्ण भाग समय पर आवश्यकतानुसार फेंकने तो रहते ही हैं। साथ ही उन्हें भी करना पड़ता है कि अन्तरिक्षीय दिव्य प्रभावों को आकर्षित करने अपने में उनका अवतरण अवधारण कर सकें। दिव्य शक्ति प्राप्त करने के लिए शरीरगत और मनोगत साधना ही पर्याप्त नहीं होती। अपने प्रसुप्त केन्द्र का जागरण भी साधना का महत्वपूर्ण भाग है। उतने भर से ही वह महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता। अन्तरिक्ष से भी बहुत कुछ प्राप्त करना पड़ता है। धरातल पर जलाशय क्षेत्र में अनेक उपयोगी पदार्थ और तत्व पाये जाते हैं। पर इससे कहीं अधिक मात्रा उसकी है जो वायु भूत अंतरिक्ष में परिभ्रमण करता रहता है। यह पदार्थ रूप में है ओर चेतना रूप में भी। उसे जल, थल पर पाये जाने वाले पदार्थों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान समझा जा सकता है। उदाहरण के लिये पवन, प्राण, ताप, ध्वनि, प्रकाश, लेसर, रेडियो, तरंगें, ऋतु प्रभाव, वातावरण आदि अनेकों बहुमूल्य तत्व आकाश में ही भरे पड़े हैं। यदि इन्हें आकर्षित एवं संचित किया जा सके तो धरती पर पाई जाने वाली सम्पदा की तुलना में उसे असंख्य गुना अधिक मूल्यवान पाया जा सकता है। फिर मात्र पदार्थ ही नहीं अन्तरिक्ष में चेतना प्रवाह भी असीम मात्रा में भरा पड़ा है। इस सचेतन का अदृश्य लोक में विद्यमान रहने और इसमें परिकर के इर्द-गिर्द भ्रमण करते पाया जाता है। इसमें प्रेत, पितरों से लेकर देव दानव स्तर की अनेकानेक सत्ताएँ परिभ्रमण करती रहती हैं। यों वे अपने रास्ते आतीं और चली जाती हैं। किन्तु प्रयत्नपूर्वक उन्हें पकड़ा और उपयोग में लाया जा सकता है। लोग प्रयत्नपूर्वक जलचरों और नभचरों को भी जाल बिछाकर पकड़ लेते हैं। यह प्रयोग अन्तरिक्ष की सचेतन सत्ताओं के सम्बन्ध में भी हो सकता है। देखना यह होता है कि अन्तरिक्ष के सघन क्षेत्रों के साथ अधिक सरलतापूर्वक संपर्क कहाँ रहते हुए बन सकता है? तत्वदर्शियों ने पाया है कि हिमालय का देवात्मा भाग इसके लिए अधिक उपयुक्त और सुविधाजनक है। अनेक क्षेत्रों की परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करते हुए तत्वदर्शियों ने ‘देवात्मा” भाग को ही अधिक उपयुक्त एवं महत्वपूर्ण पाया है और उसी को अपने समुदाय हेतु साधन प्रयोजनों के लिए सुनिश्चित स्थान नियत किया है।
ताँत्रिक साधनाएँ करने वाले कापालिक अपने प्रयोगों के लिए प्रायः श्मशान भूमि में डेरा डालते हैं, क्योंकि वहाँ का वातावरण और प्रेतात्माओं का जमघट उन्हें अपने लिए अधिक कारगर दीखता है। वहाँ रहकर वे सफलताएँ भी अधिक मात्रा में तथा जल्दी प्राप्त करते हैं। ठीक यही बात उच्चस्तरीय आत्मबल सम्पादन के सम्बन्ध में भी है। जिन क्षेत्रों में देव शक्तियाँ दिव्य आत्माएं सूक्ष्म रूप में बहुलता पूर्वक विचरण करती हैं, वहाँ रहकर निर्धारित साधनाओं में याचित सहायता भी मिलती है और अहैतुकी अनुग्रह भी। मार्गदर्शन, परामर्श भी उन्हें उच्चस्तरीय मिलता रहता है। जिस प्रकार चन्दन के निकट उगने वाले अन्य पौधे भी सुगन्धित हो जाते हैं, उसी प्रकार देवात्मा क्षेत्र में रहने वाले स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरधारी साधना द्वारा अपनी-अपनी रुचि के मनोरथ प्राप्त करते हैं।
थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापकों ने यह प्रतिपादन विस्तारपूर्वक किया है कि हिमालय के देवात्मा भाग में सिद्धपुरुषों की संगठित समिति कार्य करती हैं। उसके फैसले अदृश्य सहायकों द्वारा कार्यान्वित किये जाते हैं। इससे जन साधारण को अनेकों ऐसी सहायताएँ अविज्ञात रूप से प्राप्त होती रहती हैं, जिन्हें वे अपने प्रबल पुरुषार्थ से भी प्राप्त नहीं कर सकते थे। सोसायटी के उपरोक्त प्रतिपादन में बहुत कुछ सचाई है। इस क्षेत्र के साथ सूक्ष्म सम्बन्ध जोड़ सकने वाले अदृश्यदर्शियों ने वैसा ही पाया भी है। साधारण स्थानों में रहने वाले सामान्य जन भी इस क्षेत्र में जाकर थोड़े समय रहने पर भी अपने लिए उपयोगी जीवनतत्व संतोषजनक मात्रा में उपलब्ध करते हैं।
शीत प्रधान वातावरण में वस्तुएँ स्थित एवं अक्षय रहती हैं। गर्मी की अधिकता से जहाँ पदार्थों का क्षरण अधिक मात्रा में होता है, वहाँ यह भी देखा गया है, कि शीत में पदार्थों को देर तक सुरक्षित रखने की क्षमता है। शीत ऋतु में पदार्थ जल्दी खराब नहीं होते। फ्रीज में खाद्य पदार्थ कई कई दिन सुरक्षित रहते हैं। बर्फ में दबाकर रखे गये मृत शरीर लम्बे समय तक यथावत बने रहते हैं। शुक्राणुओं को शीतल करके उन्हें काफल समय तक गर्भाधान के लिए उपयुक्त स्थिति में बनाये रखा जाता है। हिमालय का देवात्मा भाग भी ऐसा है जहाँ स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर को अनेक विकृतियों से बचाकर उपयुक्त स्थिति में सुरक्षित रखा जा सकता है। अब तो मृत शरीरों को गहरी शीतलता में दबाकर इस निमित्त भी सुरक्षित रखा जा सकता है। अब तो मृत शरीरों को गहरी शीतलता में दबाकर इस निमित्त भी सुरक्षित रखा जाने लगा है कि कालांतर में उन्हें पुनर्जीवित किया जा सकेगा। इतना निश्चित है कि शीतलता में सुरक्षा अधिक है। सिद्ध पुरुषों को अपनी स्थूल एवं सूक्ष्म कायाओं को सुरक्षित एवं चिरस्थायी बनाये रहने की आवश्यकता अनुभव होती हैं। इसलिये उनने प्रकृति विनिर्मित कोल्ड स्टोरेज वाला ऐसा क्षेत्र चुना है, जहाँ की सहज स्थिति है। अधिक गर्मी की तरह अधिक शीत भी सामान्य क्रिया कलाप में बाधक होती है। इसलिये मध्यवर्ती चयन ही उपयुक्त पड़ता है। सिद्धपुरुषों ने ऐसे ही संतुलित क्षेत्र को अपनी क्रीड़ा भूमि बनाया हुआ है। यह सुरक्षित क्षेत्र है - “देवात्मा हिमालय”
सभी चतुष्पद ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और उनमें से कौन वरिष्ठ है? पूँछने लगे। ब्रह्मा जी ने इसके लिए दौड़ की प्रतिस्पर्धा लगाई और कहाँ जो एक मील की दौड़ में सबसे आगे निर्धारित शिला पर पहुँचेगा, उसी को वरिष्ठ माना जायेगा।
जानवरों में छोटे बड़े सभी थे। उनमें एक धूर्त था गिरगिट। प्रतिस्पर्धा में तो वह भी शामिल था। पर दौड़कर आगे निकल जाने की हिम्मत न थी। सो उसने धूर्तता से काम लिया और बाजी जीतने की ठानी। मोटे बन्दर के आगे निकल जाने की सम्भावना देख कर गिरगिट उसकी पूँछ में इस तरह चिपक गया कि इस नये साथी का उसे पता तक न चला।
दौड़ पुरी हुई चट्टान पर पहुँचकर गिरगिट पूँछ छोड़कर उछला और बन्दर से पहले ही जा बैठा बन्दर ने बैठने की कोशिश की तो आँख लाल पीली करता हुआ वह बोला देखता नहीं मैं पहले से ही यहाँ बैठा हूँ।
गिरगिट की जीत घोषित कर दी गई। पर जब ब्रह्मा जी को वस्तुस्थिति का पता चला तो वे बहुत क्रुद्ध हुए और कहा तुझे पीढ़ी दर पीढ़ी अप्रामाणिक ठहराया ओर तिरस्कृत किया जाता रहेगा। यहाँ तक कि धूर्तों को तरी संज्ञा देकर अपमानित किया जाय करेगा। रंग बदलते रहने वाले गिरगिट को अभी भी अविश्वसनीय माना जाता है
मात्र ऊँचाई और विशालता से ही कोई बड़ा नहीं होता संसार के अधिकाँश महामानव साढ़े पाँच फुट से कम ऊँचे ही हुए हैं। पर इसी सामान्य आकार-प्रकार वाले शरीर से वे ऐसे कार्य कर गये, जिससे कितनों को ही नई दिशा व प्रेरणा मिली, कितनों के जीवन धन्य बन गये। किन्तु विश्व में ऐसे भी लोग हुए हैं, जिनका आकार असाधारण हो पर उनमें ऐसे विशेषता नहीं दीखती, जिससे समाज और समुदाय की किन्हीं समस्याओं का हल होता हो अथवा स्वयं के व्यक्तिगत जीवन में कोई कहने लायक सफलता अर्जित की हो। इसलिए उनका बड़प्पन मात्र कौतूहल बन कर रहा जाता है।
ईरान के बशरा शहर का सिपाद खाँ ऐसा ही व्यक्ति था। शरीर तो उसे भीमकाय मिला था, मगर वह उसका उपयोग मात्र प्रदर्शन के रूप में करता रहा। उसकी लम्बाई 8 फुट 10 इंच और सीना साढ़े तीन फुट था। चाहता तो वह इस विशाल शरीर का उपयोग किसी ऐसे काम में कर सकता था जो साधारण डील-डौल वाले शरीर से किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। इससे जहाँ एक ओर उसकी बलिष्ठता का लाभ समाज को मिलता, वहीं दूसरी ओर उसकी वरिष्ठता भी सिद्ध होती, किन्तु उससे अपना सारा जीवन बल प्रदर्शन में लगा दिया। कभी भारी भरकम लोह खण्ड उठा कर लोगों को अचरज में डालता तो कभी जंगली जानवरों से कुश्ती का नुमाइश आयोजित करवाता। इससे अधिक वह कुछ नहीं कर सका। ऐसे करतबों से कौतुक कौतूहल तो पैदा किया जा सकता है, पर समय और समाज को आगे बढ़ाने वाली प्रेरणा नहीं दी जा सकती और न ही श्रेष्ठता उपार्जित की जा सकती है।
वर्ल्ड रिकार्डस की किताबों में विश्व काशों में ऐसे अनेक हैं, जो अजूबों के कारण विख्यात है। अक्टूबर 71 की “अवकाश” पत्रिका के “सबसे ऊँचे वृक्ष” स्तम्भ में बताया गया हैं कि उतरी अमेरिका के कैलीफोर्निया प्रदेश में दुनिया के सबसे ऊँचे वृक्ष “पैसिकोइया” पाये जाते हैं। ऊँचाई के मामले में ये सबसे आगे तो हैं ही, उम्र भी इनकी सबसे अधिक होती हैं। वैज्ञानिकों ने पैसिकोइया वृक्षों की आयु 2000 से 3000 वर्ष के करीब आँकी है। इन वृक्षों में 70 वर्ष की उम्र में बीज बनना प्रारम्भ होता है और 3000 वर्ष बाज बीज पकते।
कुतुबमीनार की ऊँचाई 238 फुट है, लेकिन पैसिकोइया नामक वृक्ष कुतुबमीनार से भी ऊँचे होते हैं। पैसिकोइया वृक्षों में सबसे ऊँचे वृक्ष का “फाउडर्स ट्र” कहते हैं। जो 364 फुट ऊँचा है। साथ के अन्य वृक्ष भी 340 फुट से अधिक ऊँचे हैं।
बहुत से पैसिकोइया वृक्षों की मौत हो चुकी है। एक गिरा हुआ वृक्ष काफी दूरी घेर लेता है। इन वृक्षों का व्यास व आयतन भी काफी अधिक होती है। सन् 1881 में एक वृक्ष के तने को जड़ के पास खोखला करके रास्ता बनाया गया था, जिसमें से होकर मोटर कार और घोड़ा गाड़ी अजा भी आसानी से निकल जाती हैं।
इसी प्रकार एक अजूबा सैन जाँस कैलीफोर्निया में विचेस्टर हाउस के रूप में बना खड़ा है। इसकी मालकिन सारा विचेस्टर अपने जीवन काल के अंतिम अड़तीस वर्ष तक अपने मकान के निर्माण कार्य में लगी रहीं, जिसमें दो हजार दरवाजे एवं दस हजार खिड़कियाँ थीं। आठ मंजिल की इस इमारत में जो छह एकड़ भूमि मैं फैली हुई है, एक सौ साठ कमरे थे। सन् 1922 में जब इकलौती श्रीमती विचेस्टर की लाश उस मकान से निकली, तब से अब तक वह भवन खण्डहर जैसी स्थिति में निरुद्देश्य खड़ा हो पूछता रहता है कि मुझे बनाने का इतनी धनराशि के अपव्यय का उद्देश्य क्या था?
ऐसे कितने ही मनुष्य दुनिया के इतिहास में देखे जा सकते हैं, जिनके महल किले जमीन जायदाद व वैभव काफी विस्तृत होते हैं। उनका बड़प्पन संसार के लिए कोई ऐसा आदर्श नहीं छोड़ता जिससे कि सर्वसाधारण को उनसे राहत मिले या अनुकरण करने की प्रेरणा हस्तगत हो।
वेदांत दर्शन कहता है जो कुछ भी प्रत्यक्ष है दृश्यमान है, वह नित्य नहीं है, यथार्थ नहीं है, अपितु सतत् परिवर्तनशील है, अवास्तविक है। फिर सत्य क्या है? उसे प्राप्त कैसे किया जाय? इस दृश्य जगत के कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है।
प्रकाश को ही ले व उसका विश्लेषण करें तो ज्ञात होता है कि उसमें विद्युत चुम्बकीय लहरें मात्र हैं। एक सेकेंड में एक लाख छियासी हजार मील की तीव्र गति से चलने वाले प्रकाश अणुओं को सात रंग की किरणों में विभक्त किया जा सकता है। इन कारणों को न्यूनाधिकता ही रंग-भेद का कारण है।
सामान्यतया कहा यह जाता है कि संसार में एक वस्तु एक रंग की है, दूसरी अन्य रंग की। परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। किसी भी वस्तु का अपना निज का कोई रंग नहीं है। जिस विशेष रंग की किरणों को वह पदार्थ अवशोषित न कर उसे वापस कर देता है, वे जब आँखों के ज्ञान तन्तु से टकराती हैं, तो वह पदार्थ उसी रंग का मालूम पड़ता है।
इसी तरह दिखाई देने वाले सभी पेड़ पौधे बिना किसी रंग के हैं। पर वे प्रकाश की हरी किरणें अवशोषित न कर पाने के कारण हरे रंग के प्रतीत होते हैं। हम इसी प्रतीति को सनातन सत्य मानते रहते हैं। यदि कोई इस मान्यता के अलावा और कुछ कहे तो उसकी बात पर हँसते हैं, और उस भ्रान्त, दुराग्रही जैसी संज्ञा देते हैं। जबकि सच्चाई यही है कि प्रकृति की जादूगरी, कलाबाजी हमें छलावा दे रही है। पेड़ पौधे तो एक उदाहरण हैं। अन्य सभी रंगों के बारे में भी हम भ्रम जाल में ही पड़े हैं।
काला रंग हमको सबसे गहरा लगता है और सफेद रंग को रंग ही नहीं मानते, जबकि बात इससे सर्वथा उलटी है किसी भी रंग का न दिखना काला रंग है और सातों रंग का मिश्रण सफेद रंग। घनघोर छाया अँधेरा कुछ भी नहीं है। इसीलिए वैशेषिक दर्शन अँधेरे को कोई पदार्थ नहीं मानता जबकि अन्य चिन्तक उसे एक तत्व विशेष की मान्यता देने में खूब जोर लगाते हैं। होता यह है कि कालिमा अपने में सभी प्रकाश किरणों को शोषित कर लेती हैं और हम अँधेरे में ठोकर खाते रहते हैं।
जबकि सफेद रंग किसी भी किरण को नहीं सोखता है। उससे टकराकर सभी प्रकाश तरंगें वापस आती हैं और आँखों से टकराने पर सातों रंगों का समूह हमें सफेद लगता है। कैसी विचित्रता है? एक प्रकार का इन्द्रजाल है, जिसे स्वीकार करने का मन नहीं होता अस्वीकार भी नहीं कर सकते। इन वैज्ञानिक सिद्धियों को अमान्य कैसे ठहराया जाय।
एक सवाल और है कि प्रकाश किरणों में रंग कहाँ से आता है।? इसका उत्तर और भी विचित्र है। इन प्रकाश तरंगों की लम्बाई में पाया जाने वाला अन्तर (वेव लेंग्थ) ही रंगों के रूप में दिखता है। सही माने तो रंग नाम की चीज इस दुनिया में है ही नहीं।
विद्युत चुम्बकीय तरंगें ही प्रकाश है। इनकी तरंग दैर्ध्य की भिन्नता का अनुभव मस्तिष्क भिन्न-भिन्न तरह से करता है। अनुभूति की यह भिन्नता ही भिन्न रंगों के रूप में प्रकट होती है। सातों रंग एवं इनके परस्पर मिलने से बनने वाले विविध रंगों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रकाश तरंगों की तरंग दैर्ध्य का विवेचन मस्तिष्कीय अनुभूति से ही कर सकना सम्भव है। रंगों की अपनी यथार्थ सत्ता कुछ भी नहीं।
आँखों का यह धोखा मस्तिष्क का बहकना, रंगों के संसार में प्रथम पग रखते ही स्पष्ट हो जाता है। अन्य विषयों में भी हम किस तरह से भ्रमित हैं, कोई ठिकाना नहीं। हमारे जीवन का लक्ष्य, प्रयोजन और स्वरूप क्या है? यह तो पूरी तरह से भूल चूके हैं, और जानने की चिन्ता भी नहीं। अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण जड़ जगत में अपनी मान्यता को भिन्न-भिन्न तरह से फैला कर प्रिय-अप्रिय के रूप में मान बैठे हैं। आत्मज्ञान की दिव्य दृष्टि यदि हम पा सके तो जान सकेंगे की किस अज्ञान के दल दल में जा फँसे हैं। इससे उबरने बिना सत्य का साक्षात्कार कर सकना असम्भवप्राय है।
वेदान्त दर्शन संसार को मिथ्या कहता है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि दृश्यमान जगत का सर्वथा अस्तित्व नहीं। वर्तमान स्वरूप और स्थिति में यह सभी भी है। यदि ऐसा न होता तो पुण्य पाप कर्तव्य अकर्तव्य का बोध कैसे होता?
संसार को माया या मिथ्या कहने का अर्थ यह है कि जो भासित हो रहा है तात्विक दृष्टि में वह यथार्थ नहीं संसार में जैसा कुछ प्रतीत हो रहा है, क्या सही माने में यह ऐसा ही है? इस प्रश्न पर यदि गम्भीरतापूर्वक चिन्तन किया जाय तो यह तथ्य सामने आता है कि इन्द्रियों के द्वारा संसार की जो प्रतीति हो रही है, यथार्थता उससे अलग है। इन्द्रियों के द्वारा मस्तिष्क को होने वाली अनुभूतियाँ तभी सही हो सकती हैं, जबकि इन्द्रियों में यथार्थ स्वरूप के बोध कराने क्षमता हो।
वैज्ञानिकों द्वारा दिए गये प्रमाणों पर विचार करने से स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में हुए एक प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों ने परीक्षण हेतु एक व्यक्ति को सम्मोहित करके उसे सुला दिया, फिर उसके गले पर एक छुरी स्पर्श स्तर तक चुभाई जिससे खून की एक बूँद निकल पड़ी। इसके बाद सकी सम्मोहन निद्रा तोड़ दी गई। इस सारे प्रयोग में कुछ ही मिनट लगे। व्यक्ति के द्वारा सोने में लगा समय तो मात्र कुछ सेकेंड ही था। इन कुछ सेकेंडों में उस व्यक्ति ने एक लम्बा सपना देखा था।
डा. रोशे ने उस स्वप्न के बारे में बताते हुए लिखा है कि इस थोड़े से समय में उस व्यक्ति ने एक आदमी की हत्या कर दी, महीनों लुकता छिपता रहा। बाद में पुलिस द्वारा पकड़ा गया। जज ने मृत्यु दण्ड भी दिया। फाँसी के तख्ते पर चढ़ ही रहा था कि अचानक नींद खुल गई।
यह प्रयोग आइन्स्टीन के समय के सिद्धान्त की सचाई परखने हेतु किया जा रहा था। जिसके अनुसार समय का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। समय दो घटनाओं की दूरी मात्र है, जिससे कुछ भी होना सम्भव है। पर मनुष्य को अपनी अनुभूति और ज्ञान के आधार पर वह बड़ा सा छोटा लगता है।
तो क्या समय भी कुछ नहीं है? सुबह से शाम तक 24 घण्टों में हम कितने ही काम करते हैं। घड़ी भी चलती है कुछ स्पष्ट प्रतीत भी होता है। पर आइन्स्टीन की भाषा में यह भ्रम ही है।
वेदान्त दर्शन भी आइन्स्टीन की इस व्याख्या से सहमत है। माया वही है जो नहीं होने पर भी भासित हो। आचार्य शंकर माया यथा जगर्त्सवमिदं प्रसूतों अर्थात् माया से ही सारा जगत उत्पन्न हुआ है कहते हैं।
आइन्स्टीन से पूर्व की वैज्ञानिक मान्यता थी कि इन्द्रिय बुद्धि मन द्वारा अनुभव होने वाला यह संसार सत्य है। हम दौड़ रहे हैं, बैठे हैं, जाग रहे हैं समय अपनी बँधी बँधाई रफ्तार से भागता जा रहा है। पर आइन्स्टीन के सापेक्षिकता सिद्धान्त ने इस मान्यता को ध्वस्त कर दिया है और अब पूरी तरह से सिद्ध हो गया है कि समय कुछ घटनाओं का समुच्चय भर है। घटनाओं के न होने पर समय का अस्तित्व नहीं और घटनाएँ भी द्रष्टा की अनुपस्थिति हैं।
अपनी घड़ी में समय का आँकलन अर्थात् 60 सेकेंड का मिनट 60 मिनट का एक घण्टा और 24 घण्टे का एक दिन। यह सूर्य की परिक्रमा लगा रही पृथ्वी के अपने कक्ष में एक बार घूमने लगा यह है। लेकिन मंगल शुक्र अथवा चन्द्रमा के लिए यह समान नहीं होता। वहाँ दिन रात चौबीस घण्टे के नहीं होते अर्थात् वहाँ के मापदण्डों का निर्धारण भिन्न होता है।
आइन्स्टीन के अनुसार समय इसी तरह की घटनाओं पर निर्भर है। सोते हुए व्यक्ति के लिए बाह्य जगत में भले 10 मिनट का समय लगा हो। पर वह जो स्वप्न देख रहा था, उसके इन 10 मिनटों में ही 10 वर्षों की घटनाएँ घटित हो जाती हैं तो उस समय उसके लिए यह कहना सही होगा कि 10 मिनट बीत गए अथवा यह कि 10 वर्ष बीत गए।
वस्तुतः व्यक्ति विशेष के अपने परसेप्शन (बोध) पर निर्भर है कि समय तेजी से बीत जा रहा है धीमी गति से। घटनाओं के अलावा समय का अस्तित्व दृष्टा के बोध पर भी निर्भर है। कई बार लगता है कि समय बिताए नहीं बीतता। किसी जगह अति आवश्यक कार्य से जल्दी पहुँचना हो तो रेल आने में पाँच मिनट की दे भी घण्टों सी लगती है। कारण यह है कि उद्विग्न, तनावपूर्ण मानसिकता में व्यक्ति उस समय होता है। जबकि विवाह आदि सुखद समारोह में कई दिन का समय भी कब बीत जाता है? पता नहीं चलता। उस समय यह बोध शक्ति पूरी तरह तन्मय हो जाती है और समय भागता प्रतीत होता है।
इसी तरह मच्छर, मक्खी का जीवन भले ही हमें कुछ घण्टों का लगे पर उनके लिए मनुश्रु की पूरी आयु 80 -90 साल के बराबर ही होती है। इसी काल में ही वह बच्चा जवान बूढ़ा सब कुछ हो जाता है। हमारे अनुसार कुछ घण्टे और अपने अनुसार वह 80-90 साल की उम्र पूरी कर मर जाता है इसका कारण प्रत्येक जीव जन्तु की बोध शक्ति भिन्न-भिन्न है और उसी के अनुसार समय भी सिमटता फैलता है।
सापेक्षता के सिद्धान्त के अनुसार समय की चाल घटनाओं, बोध शक्ति के अतिरिक्त गति पर भी निर्भर है। इस नियम के अनुसार गति का समय पर ही नहीं, जगह पर भी प्रभाव पड़ता है। उसके अनुसार गति जितनी बढ़ेगी समय की चाल उतनी ही घटती जायेगी। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति प्रकाश की गति वाले अंतरिक्षयान पर बैठकर नौ प्रकाश वर्ष दूर किसी अन्य ग्रह पर जाय तो इसी बीच उसमें बैठे व्यक्ति के लिए समय की चाल 1/90,000 हो जायेगी। वह व्यक्ति उतनी दूर तोरे पर जाकर तुरन्त लौट पड़े तो इस यात्रा में 18 वर्ष लगेंगे। लेकिन उस यान में बैठे व्यक्ति के लिए यह समय अट्ठारह वर्ष का 90,000 वाँ भाग अर्थात् सवा दो घण्टे ही होगा।
यह नहीं कि पृथ्वी पर सवा दो घण्टे बीते। यहाँ तो 18 वर्ष का ही समय बीतेगा यहाँ पर वह निज बच्चों को 1, 2 वर्ष को छोड़ कर गया था, वह 19, 20 वर्ष के हो गये होंगे। जबकि उसकी वय सवा दो घण्टे ही बीती होगी। भले ही यह बात अनहोनी जैसी लगे पर आइन्स्टीन ने प्रमाणों और प्रयोग द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है। इसको क्लाक पैराडाँक्स (समय का विरोधाभास) का सिद्धान्त नाम दिया गया।
इसके जो समीकरण आइन्स्टीन ने प्रस्तुत किये उसके आधार बनाकर अमेरिका के भौतिकविद् जोजेफ हक्सले और खगोल विज्ञानी रिचर्ड कीटिंग ने सन 1971 में दो बार प्रयोग किये। उन्होंने साथ परमाणु घड़ियाँ लीं जिनमें एक सेकेंड के अरबवें भाग का आँकलन हो सकता है। इसे लेकर सर्वाधिक तेज चलने वाले यान से पृथ्वी की दो परिक्रमा लगाई गई। प्रयोग के अनन्तर तीव्र गति के कारण परमाणु घड़ियों ने अन्तर बता दिया। वैज्ञानिकों ने घोषित किया कि आइन्स्टीन का क्लार्क पैराडँक्स का सिद्धान्त सत्य है।
सापेक्षता के यह सभी सिद्धान्त वेदान्त की मूल बातों का समर्थन करते हैं। प्रथम सिद्धान्त बताता है कि यह संसार और कुछ नहीं घटनाओं का जोड़ मात्र है। घटनाएँ भी व्यक्ति की बोध शक्ति, संकल्प चेतना का परिणाम ही हैं। पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर के संकल्प से ही उसकी उपस्थिति मात्र से इस मायामय जगत का आविर्भाव हुआ है। जो भी चाहे वह इन भ्रम जंजालों से ऊपर उठकर सत्य का साक्षात्कार कर सकता है। मनीषियों ने इसी को साक्षी भाव कहा है।
प्रतीत होने वाली बातें अज्ञान मात्र हैं। इसमें जकड़े रहकर विविध प्रकार के त्रास हम सहते हैं। यही है माया यह कोई बाहर से आई विपत्ति नहीं, हमारे अंत की भ्रान्ति पूर्ण मन स्थिति है। जैसे ही यह बदली, माया के बंधन शिथिल हो जाते हैं।
संसार एक रंगमंच है, जहाँ प्रत्येक को अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए भेजा गया है। यदि यह भाव मन में हो तो हम अधिक प्रखरता एवं कुशलता से यथार्थ को जानते हुए भी अपनी भूमिका को सही ढंग से निभा सकेंगे। पूर्वकाल में ऋषि गणों ने साधना से जागृत अंतर्दृष्टि से इस सापेक्षिकता के भ्रमजाल को जाना एवं स्वयं को निरपेक्ष ब्रह्म में प्रतिष्ठित किया था। विज्ञान की गति भी उसी ओर है।
शास्त्रकारों और आप्तजनों के अनेक उपदेशों का इतना ही सार है कि जो व्यवहार तुम अपने लिए पसन्द नहीं करते, उसे दूसरों के लिए न करो।
एक सेठ ने कथा में तीर्थयात्रा का बड़ा पुण्य माहात्म्य सुना। उनका सस्ते मोल में स्वर्ग पाने के लिए मन ललचाने लगा। सो चलने के लिए सारी तैयारी करने लगे। पत्नी से चलने का कहा तो उसने मना कर दिया और कहा “इतना पैसा किसी उपयोगी काम में लगाऊँगी। घर की देखभाल करूंगी। अतिथि सत्कार में भी कमी न होने दूँगी। आप प्रसन्नतापूर्वक जायं।
जब सेठ जी चलने लगे तो सेठानी ने अपने लिए एक सौगात देते हुए का अनुरोध किया। उसने एक छोटी लौकी उन्हें सौंपी और कहा जहाँ भी आप स्नान करें, जहाँ भी दर्शन करें, वहाँ इस लौकी को भी वही अवसर दिया करें। यह मेरी प्रतिनिधि रहेगी। सेठजी ने बात प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर ली।
उन दिनों तेज सवारियों का प्रबन्धन न था। सफर लम्बा था सो एक वर्ष का समय लग गया। लोटते ही सेठानी ने अपनी लौकी वापस माँगी और पूछा इसे वह सब अवसर दिये या नहीं जो आपको मिले? सेठजी ने लौकी सँभाल कर रखी थी और उसे स्नान दर्शन आदि के सभी अवसर प्रदान किये थे। उन्होंने सारा विवरण बताया और लगभग सड़ चुकी उस लौकी को प्रसन्नतापूर्वक लौटाया।
वापस लौटने की प्रसन्नता में प्रतिभोज किया गया अनेक व्यंजन बने पर साथ ही एक-एक छोटी कटोरी सभी आगंतुकों को बड़ी प्रशंसा के साथ एक अमृतोपम पदार्थ के रूप में परोसने की भी घोषणा की। वह उस लौकी का शाक था जो सभी तीर्थों में स्नान दर्शन करके लौटी थी।
एक वर्ष में वह सूख ठिठुर कर सड़ भी गई थी। साग बना तो दुर्गन्ध भरा और कड़ुवा था। सेठ जी समेत सभी ने प्रशंसा सुनकर उसे पहले ही ग्रास में खाया पर घोर अरुचिकर कड़ुई वमनोपग होने के कारण सभी ने उसे थाली से हटा कर दूर रख दिया और इस परोसने को अपना अपमान समझकर रोष भी व्यक्त किया।
जब सब अतिथि निवृत्त हो गये तो सेठानी ने कहा “यह सभी तीर्थों का पुण्य लाभ लेकर लौटी हुई लौकी थी। यदि यह स्वादिष्ट नहीं बन सकी तो आप लोग यह आशा कैसे कर सकेंगे कि कोई व्यक्ति इन कर्मकाण्डों के करके भर से पुण्यात्मा बन जायेगा। और स्वर्ग सद्गति जैसा लाभ प्राप्त कर सकेगा।
आगन्तुकों में से प्रत्येक ने यह निष्कर्ष निकाला कि मात्र कर्मकाण्डों से ही कोई पुण्यफल प्राप्त नहीं कर सकता। जैसा कि लौकी न कर सकी। उसके लिए तो जीवन क्रम को संयमी और सेवाभावी बनाने की आवश्यकता पड़ती है। यही सिखाना धर्म कृत्यों का उद्देश्य भी है। तीर्थ स्नान, कर्मकाण्ड इत्यादि को महत्व देने वाले इस तथ्य को भुला देते हैं कि अन्त की पवित्रता व विश्व उद्यान को सुरम्य बनाना ही ईश्वर की सच्ची आराधना एवं पुण्य प्राप्ति का राजमार्ग है। लाखों व्यक्ति सोमवती अमावस्या से लेकर गंगा दशहरा तक पवित्र पुण्यतोया सरिताओं में स्नान कर अपनी गन्दगी से उन्हें प्रदूषित कर देते हैं। पुण्य तो मिलता नहीं, विधाता का रोष अवश्य मिलता होगा। सच्ची तीर्थ यात्रा वही है जिससे कर्मकाण्ड को नहीं, भावना को महत्व दिया गया हो।
मरने के बाद तो कुत्ते भी समाधिस्थ हो जाते हैं। समझदारी इसमें है कि कठिनाइयों के बीच शांत संतुलित ठहरा जा सके। जब बछड़ा गले की रस्सी तुड़ा सकता है तो तुम भव बन्धनों को क्यों काट नहीं सकते?
मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म के प्रयोक्ता अपनी इच्छा शक्ति को एकाग्र करने का अभ्यास करते हैं। दृष्टि को एक केन्द्र बिन्दु पर जमाते और बेधकता उत्पन्न करते हैं। जिनका यह अभ्यास परिपक्व हो जाता है। वे दूसरों को योगनिद्रा ग्रस्त कर सकते हैं। उनके मस्तिष्क पर हावी हो जाते हैं और जैसा चाहें सोचने या अनुभव करने के लिए विवश करते हैं। सक्रिय मस्तिष्क को निद्रित कर देना और अचेतन को क्रियाशील बना देना सम्मोहन विद्या का रहस्य है। इस आधार पर तन्द्रित व्यक्ति को कई प्रकार के लाभ पहुँचाये जाते हैं और कई प्रकार के कौतूहल प्रस्तुत कराये जाते हैं।
यही आधार स्वसंकेत या स्वसंवेदन के लिए काम आता है। जिस प्रकार हिप्नोटिज्म के आधार पर किसी दूसरे को योगनिद्रा में ग्रसित किया जाता है उसी प्रकार अपने आप को भी उस स्थिति में पहुँचाया जा सकता है। और पूर्व निश्चित संकल्प अपने अन्तराल की गहराई तक पहुँचा कर व्यक्तित्व को दुष्प्रवृत्तियों से छुड़ा कर सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए सहमत किया जाता है। आत्म सुधार का यह अच्छा तरीका है कि योगनिद्रा की स्थिति में अचेतन मन से सीधा संपर्क जोड़ा जाय और उस क्षेत्र में जमी हुई अभिरुचियों आदतों में आवश्यक सुधार परिवर्तन सम्पन्न किया जाय। ऑटोसजैशन स्वसंकेतन का एक समग्र शास्त्र है, जिसके सहारे अपने आपको अभीष्ट दिशा में चल पड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। दूसरों पर इस विद्या का प्रयोग करके उन्हें शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से सुधारना तो और भी सरल है।
सामान्य भौतिक स्तर की एकाग्रता सम्पन्न करने के लिये पंच तन्मात्राओं का आश्रय लिया जा सकता है। शब्द रूप, रस, गन्ध, स्पर्श यह पाँच तन्मात्राएँ है इनका कान, जीभ, नेत्र, नाक एवं त्वचा से सम्बन्ध है। इनके द्वारा जो प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ होती हैं उन्हें परोक्ष रूप से रूप मात्र कल्पना के सहारे अनुभूति में उतारना होता है। यह तन्मात्रा परक ध्यानयोग का भौतिक अभ्यास है।
जैसे घण्टी बजाकर ध्यानपूर्वक उनकी ध्वनि श्रवण करना और फिर बिना घण्टी बजाये ही उस शब्द की प्रतिध्वनि सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय के क्षेत्र में दर तक सुनाई पड़ते रहने का अनुभव करना।
रूप के लिए चमकीला प्रकाश उपयोगी माना जाता है। प्रातःकाल का लाल सूर्य अथवा जलता दीपक क्षण भर देखकर आंखें बन्द कर लेना और फिर उसी रूप की कल्पना के सहारे दृश्यमान अनुभव करना है। इसे त्राटक कहते हैं। मैस्मरेजम अभ्यास में एक काले गोले के मध्य में सफेद छिद्र छोड़कर इस छिद्र पर खुली आँख से घूरने का ध्यान किया जाता है। दोनों का एक ही उद्देश्य है। दृश्य के अतिरिक्त उसके साथ इच्छा शक्ति या आत्मभाव के समन्वय का भी अभ्यास किया जाता है। इस प्रयोग के लिये गुलाब के फूल जैसी कोई और आकर्षक वस्तु काम में लाई जा सकती है।
रसों की अनुभूति में जिव्हा से मिश्री, नमक, मिर्च, नीबू जैसी किसी स्वाद विशेष की वस्तु का स्पर्श कराया जाता है। प्रत्यक्ष स्वाद अनुभव करने के उपरान्त वस्तु को हटा लेते हैं और कल्पना के आधार पर उस स्वाद की अनुभूति देर तक जारी रखे रहते हैं।
गंध साधना में किसी इत्र, चन्दन, कपूर हींग आदि तीव्र गंध वाली वस्तु को नाक के समीप ले जाकर सूंघा जाता है और फिर उसे हटा कर कल्पना के सहारे उस गंध की उपस्थिति का अनुभव किया जाता है।
स्पर्श त्वचा का गुण है। कोई चीज शरीर के किसी भाग से छूकर हटा लेना और फिर उसका वैसा ही अनुभव करना इस प्रयोग का स्वरूप है। शारीरिक तापमान में अधिक ठंडी या अधिक गरम वस्तु को छूकर हटा लेना और फिर उसी प्रकार का स्पर्श संवेदन अनुभव करना स्पर्शानुभूति है।
इस प्रकार अधिक दिनों तक इनमें से कोई एक या एकाधिक अनुभूतियाँ का अभ्यास करते रहने में कल्पना शक्ति इतनी प्रखर परिपक्व हो जाती है, जिससे बिना वस्तु की उपस्थिति के ही किसी का अनुभव अनायास ही होने लगे। इन अभ्यासों के सहारे एकाग्रता सधती है और उसके सहारे कार्य किये जा सकते हैं, जिनके लिए आमतौर से साधन उपकरणों की आवश्यकता होती है।
यह एकाग्रता स्मरण शक्ति विकास में विशेष रूप से काम देती है। पढ़ी हुई या नोट की हुई बातें सहज ही स्मरण हो आती हैं। लोगों के नाम पते याद रखना, घटनाओं का विवरण यथावत् सुना देना, किसी के कहे हुए शब्द यथावत् दुहरा देना इसी अभ्यास के आधार पर सम्भव है। भले ही अल्प ज्ञान होने के कारण उन शब्दों का अर्थ विदित न हो मस्तिष्कीय विकास के लिए हिप्नोटिज्म जैसे प्रयोजनों के लिये दूसरों को प्रभावित करने के लिए इस आधार पर बढ़ा हुआ मनोबल एक बड़ी सीमा तक काम दे जाता है। स्वसंकेत के आधार पर अपने शारीरिक, मानसिक रोगों से छुटकारा पा लेना भी इस आधार पर सम्भव है।
आध्यात्मिक ध्यानयोग का स्तर ऊँचा। है, उसके सहारे सिद्धियों के क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। किन्तु उसमें एकाग्रता, सघनता के अतिरिक्त श्रद्धा, विश्वास का भी समावेश करना पड़ता है। कल्पना मस्तिष्क का एक साधारण गुण है। किन्तु श्रद्धा अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होती है और उसकी जड़ें अचेतन में ऊँची कक्षा सुपर चेतन में होती हैं। इसलिये उसके लिए अपने से भी बड़ी किसी अलौकिक अद्भुत माध्यम का सहारा लेना पड़ता है।
रात के अन्धेरे में झाड़ी भूत के रूप में प्रतीत होती है। सुनसान श्मशान में पीपल के पेड़ पर पंख फड़फड़ाते गिद्ध, अपने को भूतों का कोलाहल जैसा प्रतीत होता है और उससे भयभीत होकर भयंकर बीमार हो जाना या प्राण घातक दिल का दौरा पड़ना सम्भव है। इसका कारण यह है कि भूत सम्बन्धी मान्यता जो हमारे हृदय के अन्तराल में छिपी होती है और वही तनिक सा अवसर पाने पर प्रकट होकर अपना प्रभाव दिखाने लगती हैं।
भक्तजनों को जागृत या स्वप्नावस्था में भगवान का किसी देवता विशेष का दर्शन होना भी ऐसा ही है। उसमें अपना विश्वास ही यदा कदा अपना प्रतिबिंब मस्तिष्क के सामने ला कर खड़ा कर देता है। यह स्वसम्मोहित स्थिति है। जिस प्रकार मैस्मरेजम में कुशल व्यक्ति किसी प्रभाव ग्रसित को हाथी, शेर आदि की झाँकी करा सकते हैं, उसी प्रकार भक्ति भावना के आवेश में स्वसम्मोहित व्यक्ति भी किसी अलौकिक देवता की झाँकी कर सकता है। इसमें मात्र दृश्य देखने के कौतूहल भर की बात नहीं है। उस समय सुपरचेतन मन का आवेग तीव्र होता है, इसलिए ऐसी बातें भी उनके मुँह से सुनी जा सकती हैं जो भूत भविष्य से सम्बन्ध रखती हों। वे कथित अनुभूतियाँ कई बार सच्ची भी निकलती हैं। पर स्मरण रहे ऐसे प्रसंगों में सुपरचेतन को प्रभावित करने के लिए किसी देव दानव, पितर स्तर की आत्माओं को माध्यम बनाना पड़ता है। मात्र कल्पना को ही सब कुछ मान लेने पर छोटे स्तर की सफलताएँ ही काम देती हैं। देवताओं के प्रति आस्था का स्तर गहरा जम जाने पर वे लाभदायक भी उसी प्रकार हो सकती हैं, जैसे कि भूतों का भय अनिष्टकारी सिद्ध होता है।
योगाभ्यास में ध्यान का प्रयोजन आत्म निरीक्षण है इसके लिए अन्तर्मुखी होने का अभ्यास करना पड़ता है। प्रत्यक्ष शरीर को पूर्णतया शिथिल करने के लिए शिथिलीकरण मुद्रा या शवासन का अभ्यास आवश्यक है। इसी प्रकार मन को तंद्रित करने के लिए योगनिद्रा में जाने की कुछ दिन साधना करनी पड़ती है। धारणा करनी पड़ती है कि शरीर ही नहीं मन भी प्रसुप्त स्थिति में चला गया और केवल साक्षी दृष्टा आत्मा ही सजग है। इस स्थिति में आत्म चेतना को ही काम करना पड़ता है। शरीर और मन दोनों ही गहरे विश्राम की स्थिति में होते हैं।
इस स्थिति में सूक्ष्म शरीर की झाँकी की जाती है। षट्चक्रों के दर्शन किये जाते हैं। वे मेरुदण्ड में स्थान-स्थान पर अवस्थित हैं। इसका दूसरा प्रकार है पंचकोशों का दर्शन। षट्चक्र मेरुदंड में ग्रन्थियाँ भँवरों की तरह होते हैं और पंचकोश प्याज के या केले के तनों में पाई जाने वाली परतों की तरह। ग्रन्थों और कोशों को जागृत आत्मचेतना के साथ अधिक प्रत्यक्ष करने के लिए उन्हें टटोला, सहलाया जा सकता है। प्राणायाम की लम्बी श्वासों द्वारा उन्हें हिलाया झकझोरा जा सकता है। इसी रीति-नीति का लम्बे समय तक परिपालन करने से छह प्रकार की सचेतन विद्युत शक्तियाँ जागृत होती हैं और कुण्डलिनी जागरण का आधार बनाता है।
पंचकोशों के जागरण में पाँच शरीरों की स्फुरणा होती है और वे मस्तिष्क के ब्रह्मरंध्र क्षेत्र को प्रभावित करते हैं सहस्रार कमल मस्तिष्क के मध्य है। उसी का उर्ध्व भाग ब्रह्मरंध्र कहलाता है। योग शास्त्रों में इसी को विष्णु और क्षीर सागर कहा गया है। इसी को कैलाश और मानसरोवर स्थिति शिव की उपमा दी गई है। इस क्षेत्र के जागरण से विश्व चेतना के साथ सम्बन्ध हुड़ता है और अर्जुन यशोदा की तरह विराट ब्रह्म की झाँकी होती है। पाँच कोश ही मनः संस्थान में विद्यमान पाँच देवता है।
षट्चक्रों से सम्बन्धित कुण्डलिनी शक्ति है, जो जननेन्द्रिय मूल है। इस शरीरगत विद्युत भण्डार कहना चाहिये। व्यष्टि में संव्याप्त इस अद्भुत विद्युत को किसी वस्तु या व्यक्ति को प्रभावित करने के लिये काम में लाया जा सकता।
मस्तिष्क अतीन्द्रिय क्षमताओं का भण्डार है। यह देवी है, सुपर चेतन से सम्बन्धित। इसे परब्रह्म की चेतना एवं ब्रह्माण्डीय सामर्थ्य के साथ जुड़ा रहना समझा जाता है। इसलिए इस संस्थान के माध्यम से सूक्ष्म जगत का परिशोधन या अनुकूलन किया जाता है। उसके भूत भविष्य से सम्बन्धित सम्भावनाओं को समझा जा सकता है। इसीलिए पंचकोश साधनाओं की सामर्थ्य का प्रतिफल दिव्य माना है, जब कि कुण्डलिनी जागरण से अपने या दूसरों के लिए भौतिक स्तर के लाभ-हानि ही उठाये जा सकते हैं। इसके सभी प्रयोगों में ध्यानयोग नितान्त आवश्यक है। साधनाओं में अधिकाँश भूमिका उसी की होती है।
एक आवारा सा आदमी कहीं जा रहा था। रास्ते में आम के बगीचे में होकर गुजरा तो बगीचे के मालिक ने उससे कहा यदि तू चाहे तो बाग की रखवाली की नौकरी यहाँ कर सकता है। वह आदमी तैयार हो गया और बाग की रखवाली की नौकरी करने लगा। जैसी ईमानदारी सावधानी और मेहनत से वह रखवाली करता उससे मालिक भी बहुत संतुष्ट था।
मुद्दतों बीत गयीं रखवाली करने वाले ने उसी काम में वर्षों गुजार दिये। अपनी झोंपड़ी में रहना बताई हुई मजदूरी करना और भगवान का भजन बस यही उसकी नियत दिनचर्या बन गयी।
एक दिन मालिक ने उस नौकर से कहा कुछ मीठे आम तोड़कर लाओ। नौकर गया और कुछ बड़े बड़े पके आम इकट्ठे करके ले आया। आम खट्टे निकले। मालिक झल्लाया उसने कहा तुम्हें वर्षों यहाँ रहते हो गये पर इतना भी नहीं जानते कि किस पेड़ के आम खट्टे और किसके मीठे हैं?
नौकर ने विनीत भाव से कहा मालिक मैं रखवाली वाला नौकर हूँ। किसी दूसरे को इसका एक फल भी चोरी नहीं होने देता तो मैं स्वयं ही चोरी करके फल चाखने लगूँ यह कैसे हो सकता है। इतने वर्षों से बगीचे का एक भी फल मैंने नहीं चखा मालिक की बिना आज्ञा के यदि मैं वैसा करता तो वह चोरी ही तो होती।
ऐसा अद्भुत ईमानदार नौकर उस मालिक ने न देखा था न सुना था। धरती पर ऐसे देवता भी रहते हैं। ऐसा अनुमान तक उसने न किया था। मालिक ने नौकर को काम करने से छुट्टी दे दी और उसी बगीचे में संत के रूप में निवास करने का आग्रह किया।
दूसरे दिन बड़े तड़के ही नौकर वहाँ से विदा हो गया जहाँ संत बनाकर पूजा की जाने लगेगी वहाँ कोई व्यक्ति सचमुच संत न रह सकेगा, यह सोचकर वह आवारा आदमी नौकरी छोड़कर फिर पहले की तरह विचरण करने लगा। यह आवारा आदमी अंत में महात्मा इब्राहिम के नाम से विख्यात हुआ।
श्री ए.पी. सीनेट विश्व के एक प्रख्यात परामनोवैज्ञानिक हुए हैं। परामनोविज्ञान के क्षेत्र में उनका वर्चस्व रहा है। उनने काफी शोधें की हैं और इससे संबंधित अनेक पुस्तकें भी लिखी हैं। अपनी एक पुस्तक में उनने एक विलक्षण घटना का उल्लेख किया है।
एकबार वे एक झील के किनारे टहल रहे थे। इतने में देखा कि एक युवती झील की ओर बढ़ी चली आ रही है। उनने सोचा कि शायद वह भी चहलकदमी के उद्देश्य से आ रही हो। अतः उस पर कोई विशेष ध्यान दिये बिना अपनी मस्ती में टहलते रहे। तभी झील में छपाक की आवाज हुई। सीनेट ने नजरें उठायीं तो पता चला कि युवती आत्म हत्या के लिए कूद चुकी है और बचाने का अवसर उनके हाथ से निकल चुका है। चीख पुकार मचायी तो ढेर सारे लोग इकट्ठे हो गये। कइयों ने बचाने के उद्देश्य से छलाँग लगा दी। देर तक पानी के अन्दर युवती की ढूंढ़ खोज चलती रही, पर कुछ पता न चला। अन्ततः पुलिस में रिपोर्ट की गई। रिपोर्ट दर्ज तो कर ली गई, मगर इसके साथ ही एक रहस्योद्घाटन हुआ। पुलिस ने बताया कि कुछ वर्षों से लगातार हर वर्ष इसी दिन इसी वक्त इसी प्रकार की आत्महत्या की रिपोर्ट दर्ज करायी जाती रही है। पिछले कुछ वर्षों की फाइलें खोली गयीं तो यह जानकर अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि प्रत्येक वर्ष रिपोर्ट में एक ही उम्र की युवती दर्ज थी। इतना ही नहीं उसकी हुलिया और वस्त्र भी समान थे।
सीनेट की जिज्ञासा बढ़ी तो उन्होंने इसका इतिहास जानना चाहा। पुरानी फाइलों को देखते हुए पुलिस ने बताया कि यह घटना पिछले सोलह वर्षों से घटती चली आ रही है। सोलह साल पूर्व इन्हीं दिनों इसी हुलिया की एक लड़की ने उक्त झील में आत्महत्या कर ली थी। परिवार वालों ने इसके शव को खोज निकाला और दफना दिया। तभी से इस घटना की पुनरावृत्ति होती आ रही है। इसके पीछे महात्मा का उद्देश्य क्या है? अब तक नहीं जाना जा सका।
ऐसी घटनाओं की पुनःपुनः आवृत्ति क्यों होती है? इसकी व्याख्या करने का प्रयास सुप्रीम एडवेंचर “टेकनीक्स ऑफ एस्ट्रल प्रोजेक्शन” एवं “मोरल एस्ट्रल प्रोजेक्शन” के विश्व विख्यात लेखक राबर्ट कूकल ने अपनी उपरोक्त पुस्तकों में किया है। उनका कहना है “जब अकाल मृत्यु होती है, तो मरने वाले का सूक्ष्म शरीर तुरन्त यह अनुभव करने में असमर्थ होता है कि वह मर रहा है। सरोवर में पत्थर फैंकने से जिस प्रकार तरंगें देर तक आती रहती हैं, उसी प्रकार मृतक व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर भी मध्यवर्ती काल में उन घटनाओं की पुनरावृत्ति करता है। ऐसे उदाहरणों में एक ही घटना की बार-बार आवृत्ति का यही कारण है।”
इसके अतिरिक्त राबर्ट कूकल ने अपनी उक्त पुस्तकों में बहुत सारे ऐसे तथ्य भी संकलित किये हैं, जो उनने मृतात्माओं से प्रत्यक्ष संपर्क, वार्तालाप एवं प्रयोगों के आधार पर खोजे हैं। आपने खोज निष्कर्ष के आधार पर वे भारतीय तत्वज्ञान की ही पुष्टि करते हैं कि मरणधर्मा सिर्फ स्थूल शरीर है आत्मा अविनाशी है। व्यक्ति की इच्छाएं, आकांक्षाएं, वासनाएँ सभी स्थूल शरीर के साथ जुड़ी रह कर जीवात्मा का दूसरे जन्म में भी पीछा करती हैं और अगले जीवन में भी दिखाई पड़ती है। जो जितना इनके वशीभूत होता है उनके एस्ट्रल शरीर उतनी ही देर से ईथर से मुक्त होता है, फलतः जीवात्मा को सम्पूर्ण वातावरण अन्धकारमय और भयावह लगता है और तथा अनेक प्रकार की यातनाएँ इस मध्यवर्ती काल में उसे झेलनी पड़ती है, इसे ही भारतीय आर्ष ग्रन्थों ने नरक की संज्ञा दी है।
अपने संग्रह पर दृष्टि डालें तो हमें उसमें अधिकाँश कबाड़ ही भरा दीखता है। काम की वस्तुएँ खोजने और पीने के लिए हमारे प्रयास की कब होते हैं? इसीलिये ऐसा कुछ हस्तगत नहीं होता जो काम आए अपना व दूसरों का भला करे।
जो कुछ समेटा बटोरा है वह सब ऐसा है जो फुलझड़ी की तरह जलकर अपने को भ्रमित और दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करे। क्षण भर उपरान्त अनन्त में विलुप्त हो जाय।
उल्कापात अक्सर होते रहते हैं। लगता है, कोई बड़ी महत्वपूर्ण वस्तु इधर से उधर हुई है, किन्तु वस्तुतः वह ब्रह्माण्डव्यापी कबाड़ का एक छोटा सा टुकड़ा मात्र होता है, जो तनिक से भटकाव में पड़कर अपनी हस्ती देखते देखते गँवा बैठता है।
हमारे ब्रह्मांड में कुछ ऐसा मलबा भी घूमता रहता है जो या तो सृष्टि निर्माण के समय ग्रह पिण्डकों से कतरन के रूप में बच गया अथवा किसी टूटे ग्रह का बिखरा हुआ चूरा है। जो हो पाले अनन्त अन्तरिक्ष में उनका भी अपना स्थान है। पर इनमें न तो निजी गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही है और न किसी मजबूत पिण्ड के साथ अच्छी तरह बँधे जुड़े हुए हैं। वे हल्के फुल्के और अनुशासन से बद्ध न होने के कारण मनमर्जी से जहाँ-तहाँ छितराते रहते हैं। इस भ्रमण काल में वे जब किसी सशक्त ग्रह के साथ जा टकराते हैं तो उसे उल्कापात कहते हैं। इन्हीं उल्कापातों ने हमारे खूबसूरत चन्द्रमा की छवि बिगाड़कर रख दी है। उस पर बहुत ऊँचे नीचे खाई खड्डे और टीले हैं। वे उल्कापातों के कारण लगे हुए आघातों से बने हैं।
कभी कोई उल्का पृथ्वी के वायु मण्डल में प्रवेश कर जाता है तो प्रचण्ड घर्षण के कारण जलने लगती है। वह आयन मण्डल की बाहरी सतह से टकराकर ही लौट जाती है। औसतन छोटी बड़ी दो करोड़ उल्का प्रति मिनट पृथ्वी के आयन मण्डल पर टकराती रहती हैं, किन्तु पृथ्वी पर एक भी नहीं आ पाती। टकराते समय वे जलते है तो उसका प्रकाश और वेग इतना होता है कि हम उसे “तारा टूटा” ऐसा कहते हैं वैसा वह तारा नहीं होता वरन् उसकी संरचना में पत्थर, धातुएँ एवं रसायनें मिली होती हैं। वे दिन में भी टूटती और जलती रहती है, पर दीखती रात के अँधेरे में ही हैं।
इनमें से अधिकाँश उल्काएं जलकर हवा में ही विलीन हो जाती हैं, किन्तु कुछ बहुत बड़ी होने के कारण अधजली भी रह जाती है और धरती पर आ गिरती हैं। उनके गिरने कोण बहुत एक्यूट व वेग काफी तेज होता है, इसलिए जहाँ भी वे गिरती हैं, वहाँ एक गहरा खड्डा बना देती हैं। इनमें से एक सबसे बड़ा खड्डा महाराष्ट्र में चन्द्रपुर के समीप है। दूसरा सोवियत रूस के साइबेरिया प्राप्त के तुँगुस्का नामक स्थान पर तथा तीसरा अमेरिका के एरीजोना प्राप्त के रेगिस्तान में इनके अतिरिक्त भी छोटे मोटे और ऐसे गड्ढे हो सकते हैं। पर वैज्ञानिक इन तीन का कारण बड़ी उल्काओं का धरती पर गिरना बताते हैं। गिरते समय ये उल्काएँ (मेटीआँर्स) हलते अंगारे जैसी होती हैं। इस कारण समीपवर्ती वृक्ष वनस्पति व जीवधारियों को भारी क्षति पहुँचती है। कुछ तो समुद्र में रेगिस्तानों में पर्वतों के ऐसे स्थानों पर गिरती हैं जहाँ सामान्यतया आबादी नहीं या न्यूनतम होती है, किन्तु जब वे आबादी वाले क्षेत्र के समीप अपना प्रहार करती है तो उनके अवशेषों का पता चल जाता है। ऐसी गिरी उल्काओं की खोज करने व उनका भौतिकीय विश्लेषण करने पर यह पाया गया है कि सौर मण्डलीय या ब्रह्माण्डीय ग्रहों की संरचना जिस मसाले से हुई है, उसी का तलहट इन उल्काओं में भी पाया जात है। वे इतनी बड़ी संख्या में अपनी पृथ्वी पर आ गिरती हैं कि हर बार पृथ्वी का वजन टनों में बढ़ जाता है। इस भार से पृथ्वी दिनों दिन और भारी होती जाती है।
अब तक मनुष्य के संग्रह अधिकारी में छोटे टुकड़ों के रूप में प्रायः 1700 उल्काएँ सुरक्षित हैं। जहाँगीर शासन काल में जालंधर (पंजाब) में दो किलों ग्राम की उल्का गिरी थी बादशाह ने उसे अशुभ माना और टुकड़े टुकड़े करने फिंकवा दिया। सन 1978 में वाराणसी में एक उल्का गिरी थी जो जमीन से टकराकर चूरे के रूप में बिखर गई। सन् 1948 में कसास अमेरिका में उड़ता जलता चूरा कोई दो घण्टे तक आकाश में बरसता रहा पर जमीन वालों को मात्र कौतुक ही दिखाया। कोई बड़ी क्षति नहीं पहुँचाई।
दक्षिणी पश्चिम अफ्रीका में हाँवा नामक स्थान पर 1961 में एक साठ टन भारी उल्का गिरी थी। साइबेरिया में 1907 में गिरी एक भारी उल्का के गिरने से भूकम्पन मीलों दूर तक फैले थे, सम्भवतः वहाँ का वातावरण उल्काओं को भा गया एवं पुनः सन् 1947 में एक उल्का पृथ्वी से कुछ ऊँचाई पर क्षत विक्षत हुई। उसके 196 खण्ड टुकड़ों-टुकड़ों में समेटे गये। इसका प्रकाश पूरे उत्तरी यू.एस.एस.आर. एवं यूरोप भर में छाया रहा।
हमारी आँखें मात्र 50 हजार वर्ग किलो मीटर दूरी तक फैला क्षितिज व निखिल आकाश का सही निरीक्षण कर सकती हैं। इतने ही दायरे में जो ज्वालाएँ जलती बुझती गुजरती हैं, वे ही हमारी पहचान में आती है। किन्तु समूचे ब्रह्माण्ड में जितना पथराव होता रहता है। उसकी जानकारी पा सकना हमारे लिये असम्भव है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऊँचे स्थानों पर बनी झीलें व चन्द्रपुर महाराष्ट्र में पाई गई गड्ढे में झील की तरह ऐसी कई झीलें हो सकती हैं जिनका कारण उल्का रही हों पर हमें ज्ञात नहीं है। “नेशनल ज्योग्राफी” सोसायटी व पत्रिका ने ऐसे कई अविज्ञात स्थानों को खोज-खोज कर सामान्य के समक्ष लाने का अभूतपूर्व प्रयास किया है। इनका कहना है कि कहीं कहीं गहरी खाइयां तराइयाँ भी इसी प्रकार बनी हैं और कई दलदलों का भी आविर्भाव उल्काओं के कारण हुआ है।
इन दिनों पृथ्वी के ईद-गिर्द उपग्रहों राकेटों और खोजी उपकरणों का इतना कबाड़ आकाश में भर गया है कि नये प्रेषणकर्ता के लिये खाली जगह मिलने का सवाल दिनों दिन पेचीदा होता जा रहा है। अब तक जिन जिन राष्ट्रों ने अंतरिक्ष में उपग्रह भेजे हैं उनने 50 किलोमीटर से लेकर 3500 किलोमीटर तक की ऊँचाई को अपने कब्जे में कर लिया है। चूँकि यह सामग्री एक स्थान पर स्थिर नहीं रहती वरन् पृथ्वी की परिक्रमा लगाती रहती है अतः आकाश में किसका कितना अधिकार क्षेत्र है, यह निर्णय करना कानून की दृष्टि से सम्भव न रहेगा। समुद्र की सीमा किसी जमाने में 3 मील तक मानी जाती थी क्योंकि तब तोप के गोले इतनी ही दूरी तक मार करते थे। अब बदली परिस्थितियों में वह सीमा 12 मील कर दी गई है। पर आकाश का बँटवारा भला कैसे हो? उस पर सीमा बंधन कैसे लगे? जो पहल कर रहे हैं अधिकाँश आकाश पर उसमें चलायमान तरंगों-फ्रिक्वेन्सीज पर कब्जा कर लेंगे। ऐसी दशा में जो अपने प्रयास बाद में करेंगे उनके लिये जगह खाली ही न रहेगी। समुद्रों की सीमाएँ हैं पर उनका खुला क्षेत्र भी है जिसमें होकर खुला आवागमन चलता है। पर जब अन्तरिक्ष को इन बढ़ते चरणों में आरमी से ही घेर लिया जा रहा है स्टारवार की योजनाएँ बन रही हैं तब पीछे रहने वाले अपने अधिकार को कैसे पाएँगे?
कैसी विडम्बना है कि ब्रह्माण्ड की अनन्त परिधि पर कब्जा करने के प्रयास विभिन्न वर्गों द्वारा वैसे ही हो रहे हैं जैसे कि जमीन पर कब्जे के लिए किये जाते हैं। जिसे नेति नेति” कहा गया है, वह मनुष्य की स्थूल पकड़ में कभी नहीं आ सकता। उसके लिए तो मनुष्य को समष्टि की लघु इकाई व्यष्टि में अपने अंत में ही अनुसंधान करना होगा। क्योंकि ब्रह्म ही सत्य स्वरूप ज्ञान स्वरूप एवं अनन्त है।
सेवाधर्म अपनाने में जितना दूसरे का भला होता है, उससे अधिक लाभ अपने का मिलता है। व्यक्तित्व की गरिमा भावना की कोमलता सहानुभूति तो प्रत्यक्ष लाभ है, जो मनुष्य को ऊँचा उठाते आगे बढ़ाते हैं। इससे भी बड़ा लाभ है आन्तरिक संतोष और उल्लास जिसकी तुलना किसी भी उपलब्धि से नहीं की जा सकती
आये दिन प्रकृति जगत में एवं दैनिक जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ घटती रहती है, जिनका कारण जानना अत्यन्त कठिन होता है। इतना सुनिश्चित है कि ये निरुद्देश्य नहीं होतीं। उनमें कोई न कोई रहस्य छिपा होता है। हम उन्हें नहीं समझ पाते, यह बात दूसरी है। यदि इन्हें जाना जा सके, तो इन अबूझ जैसी लगने वाली कितनी ही पहेलियों को सरलतापूर्वक समझ कर अपनी जिज्ञासा को शान्त किया व पिण्ड ब्रह्माण्ड संबंधों को जाना जा सकता है।
केण्ट इंग्लैण्ड की कु. मोयट ने जून 1953 में एक स्वप्न देखा, जिसमें एक अजनबी उससे अपना चित्र बनाने पर जोर दे रहा था। मोयट को सपना कुछ अटपटा सा लगा उसे यह समझ में नहीं आया कि वह व्यक्ति ऐसा क्यों कह रहा है, फिर भी अनमने मन से दूसरे दिन स्मृति के आधार पर उसने तस्वीर बनायी। देखने वालों ने बताया कि यह स्थानीय गिरजाघर के पादरी हयृज का चित्र है जो अब से 25 वर्ष पूर्व दिवंगत हो चुके हैं। दोनों की कभी मुलाकात नहीं हुई, फिर क्यों पादरी ने मोयट को अपनी तस्वीर बनाने के लिए प्रेरित किया। यह आज भी उसके लिए एक पहले बनी हुई है।
इसी प्रकार एक घटना 28 जून 1918 को इंग्लैण्ड में घटी। हेम्पशायर ने एक पादरी जोसेफ डील्यानी को एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था “फादर हमारी पत्नी और हम एक गहरी दुरभिसन्धि में फंस चुके हैं। बचने की कोई उम्मीद नहीं हैं। आपकी सहायता की आवश्यकता है।” पादरी अभी इस विषय में सोच ही रहा था, कि उन्हें सहायता कैसे पहुँचायी जाय कि देखते ही देखते चिट्ठी के सारे अक्षर गायब हो गये और कोरा पत्र उसके हाथ में रह गया। पादरी को बहुत आश्चर्य हुआ। लगा कि कोई जादुई पत्र है। बहुत सोचने के बाद भी जब उनकी समझ में कुछ नहीं आया तो कोरी चिट्ठी को उसने मेज पर रख दी। तब उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब इसके ठीक 10 घण्टे बाद उस पत्र में पुनः कुछ शब्द उभरे जिससे कहा गया था कि “आर्कड्यूक फर्डीनाण्ड एवं उनकी पत्नी की गोली मार कर हत्या कर दी गयी। है। बाद में अखबारों द्वारा इसकी पुष्टि भी हो गई। यह चिट्ठी आज भी उस परिवार के पास सुरक्षित है। अचम्भा तो इस बात का है कि आरम्भिक सूचना के माध्यम से संकेत देकर उसमें नई खबर कैसे अंकित हो गई।
मेसाचुसेट्स का जान जेकप सन् 1956 में अपने मधुमक्खी पालन केन्द्र पर ही मर गया। जब वह मरा तो हजारों लाखों की संख्या में मधुमक्खियाँ उसके पार्थिव शरीर के चारों और एक घण्टे तक मँडराती रहीं। इस दौरान मक्खियों ने किसी को भी लाश कि निकट नहीं आने दिया। इसके बाद वे किसी अन्य स्थान की ओर चल पड़ी और फिर कभी लौट कर नहीं आयी।
ऐसी ही एक घटना आस्ट्रेलिया की है। सेव रोजर्स सिडनी में मधुमक्खी पालने का धन्धा करता था। 61 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। जब उसका ताबूत कब्रगाह के लिए उठा तो उसके ऊपर हजारों मधुमक्खियाँ उड़ती रहीं और कब्रिस्तान तक साथ साथ चलीं। मधुमक्खियाँ वहाँ तब तक बनी रहीं जब तक मृतक को दफना नहीं दिया गया। इसके बाद वे वहाँ से चली गयी।
न्यू हेम्पशायर में श्रीमती मार्बल मेटकाफ नामक एक महिला रहती थी। 23 जुलाई 1961 के दिन उसके यहाँ एक विचित्र घटना घटी। वह जिस कमरे में रहती थी, उसकी एक दीवार गर्म होकर खूब लाल हो गई, मानो किसी ने उसे भट्ठी में रख कर तपाया हो। बाद में अग्नि शमन दस्ते ने उसकी आग बुझायी। यद्यपि बिजली संबंधी उसके कमरे में कोई गड़बड़ी नहीं थी। फिर ऐसा क्यों हुआ? यह विशेषज्ञों की समझ में नहीं आया।
न्यूजर्सी, अमेरिका की एक महिला को दाँतों द्वारा अचानक रेडियो समाचार सुनाई पड़ने लगा। जब लोगों से उसने इस अजीबोगरीब घटना का उल्लेख किया तो सबने इसे उसकी सनक समझी और उसकी उपेक्षा कर दी, किन्तु जब उसने रेडियो में प्रसारित हो रहे समाचार का सार सुनाया तो सभी दंग रह गये। सचमुच उस समय व ही समाचार प्रसारित हुए थे।
ब्रिजपोर्ट कनेक्टीकर के एक कर्मचारी को संगीत की स्वर लहरियाँ अचानक तब सुनाई पड़ने लगीं जब एक दिन उसने अपने एक दाँत से चाँदी भरवायी। तब से दिन रात रेडियो की संगीत धुनें उसके कानों में गूँजने लगी जिसका कारण अंत तक नहीं जाना जा सका। सम्भवतः धातु ध्वनि तरंगों को ग्रहण करने का माध्यम बन गई थी।
श्रीमती वर्जीनिया किम्मी टेक्सास की रहने वाली थी नवम्बर 1960 में उसके साथ यह व्यथा जुड़ गयी कि जब भी वह गर्म पानी के संपर्क में आती उसे चित्र विचित्र ध्वनियाँ सुनाई पड़ने लगती थीं। मैसाचुसेण्ट्स की एण्ड्रीया वेलन ने एक खरगोश पाल रक्खा था। जब भी वह खरगोश को पकड़ती तो उसकी आवाज मात्र से टेलीविजन का चैनल बदल जाता था। इस रहस्यमय प्रसंग का कोई भी विज्ञान सम्मत हल नहीं दे पाया।
कई बार लोग देखते-देखते अचानक गायब हो जाते हैं। फिर उनका कोई सूत्र संकेत हाथ नहीं लगता कि वे कैसे-कहाँ गये? टेनेसी का डेविड लैग्ग एक दिन अपने खेत में काम कर रहा था साथ में अन्य कृषक भी थे। कुछ घण्टे बाद वह न जाने कहाँ गायब हो गया। किसी को पता न चला। कई महीनों तक उसकी दूर-दूर तक खोज की गई। पर परिणाम निराशाजनक ही रहा। ऐसी ही एक घटना का उल्लेख “स्ट्रैन्जर दैन साइंस” नामक पुस्तक में मिलता है। घटना “एन्जीकुनी” नामक एक एस्किनों बस्ती की है। उस बस्ती के सभी स्त्री पुरुष और बच्चे अकस्मात कहाँ गायब हो गये, आज तक किसी को पता न चल सका। आश्चर्य की बात तो यह थी कि उनकी झोपड़ियाँ कुत्ते और शिकार करने के हथियार सभी सुरक्षित थे। सिर्फ उन्हीं का कहीं पता नहीं था।
जुलाई 1877 में नेवादा, अमेरिका के सिप्रंग पहाड़ी में एक ऐसे भीमकाय मनुष्य के टखने (एंकल) की हड्डी पायी गई जिसकी लम्बाई 31 इंच थी। लगातार कई दिनों तक विशेषज्ञों के माथा पच्ची के बाद भी पिछले किसी काल में इतने विशालकाय मनुष्य जाति के अस्तित्व को कोई जानकारी नहीं मिल सकी। फिर यह हड्डी किसकी हो सकती है। आज भी अविज्ञात है।
6 सितम्बर 1821 को माँटगोमरी में चोरी के अपराध में जान डेविस को फाँसी की सजा दी गई। मरने से पूर्व उसने चीख-चीख कर मजिस्ट्रेट से कहा-”मैं निर्दोष हूँ मुझ पर झूँठा आरोप लगाया है। इसका सबूत बड़ा प्रमाण यही होगा कि मेरे कब्र पर कभी भी घास नहीं उगेगी। “इतना कह कर वह कुछ क्षण के लिए मौन हो गये और भगवान से प्रार्थना करने लगा। प्रार्थना समाप्त होने पर उसे फन्दे से लटका दिया गया। इसके बाद लाश परिवार वालों ने दफना दी। डेविक की घोषणा के अनुसार सचमुच ही उसके कब्र पर एक भी घास अब तक नहीं उगी, जबकि आस-पास के अन्य कब्रों पर ढेर सारे खर पतवार उग आये। सरकार ने आस-पास की दो फुट गहरी मिट्टी कई कई बार बदली और घास लगायी, पर एक भी बार उसमें तृण नहीं उगा। इस प्रकार उसके निर्दोष होने की बात साबित हो गई, किन्तु उसके कब्र में वनस्पति नहीं उगने की घटना किसी की समझ में नहीं आयी।
अनेक अवसरों पर पक्षियों की सामूहिक आत्महत्या की घटनाएँ प्रकाश में आयी है। भारत में आसाम के जटिण्डा क्षेत्र में प्रति वर्ष यह घटना घटती है। हर बार हजारों हजार की संख्या में ये साल की एक निश्चित अवधि में अपने प्राणोत्सर्ग करते हैं ऐसे क्यों होता है? कौन व क्यों कोई उन्हें आत्मघात के लिए प्रेरित करता है, शोधार्थी इसका रहस्य अब तक नहीं जान सके। इसी से मिलता जुलता एक प्रकरण फ्राँस का है। अक्टूबर 1846 की रात्रि को अचानक अगणित पक्षी आकाश से धरती पर गिरने लगे। गिरने से पूर्व कुछ समय तक वे ऊपर मँडराते और फिर एकाएक जमीन की ओर गोता लगा देते। धरती से टकराने पर उनकी मौत हो जाती। उस रात पेट्रे गाँव की पूरी धरती चिड़ियों से ढक गयी थी। जुलाई 1816 में लुईशियाना में भी सामूहिक रूप से पक्षियों ने आत्मोत्सर्ग किया।
प्रकृति भी कोई कम रहस्यमय नहीं है। इसमें असंख्य ऐसी विलक्षणताएँ भरी पड़ी हैं, जिनका रहस्य वैज्ञानिक अभी तक नहीं जान पाये।
कहा जाता है कि रूस में सेन्ट्रल आराकुम मरुस्थल में जब जोर की हवाएँ चलती हैं तब वहाँ से चीखने, चिल्लाने रोने, गाने की भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ निकलती हैं। जार्जिया, रूस के त्स्वालतुवों नामक स्थल पर एक प्रकृति निर्मित गुफा है, जिसमें विभिन्न आकार के प्रकृति ने इन सुन्दर कमरों को किस प्रकार बनाया? इसे देखने आज भी पर्यटक दूर-दूर से आते हैं। चाँगचुन (चीन) में हुनान विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे पेड़ की खोज की है, जिसके प्रत्येक अवयव से प्रकाश निकलता है। इसकी छाल को उतार कर अन्यत्र लगा देने पर भी इसके प्रकाश में कमी नहीं आती। लगातार एक हल्की नीली रोशनी इससे निकलती रहती है। वृक्ष की ऊँचाई करीब दस मीटर है। वैज्ञानिक प्रकाश का रहस्य जानने केक लिए प्रयत्नशील हैं।
बहुत समय पूर्व कोरिया में जब राजतंत्र था, तो एक बार चीनियों ने उस पर आक्रमण कर दिया। यद्यपि कोरियाई सैनिकों ने उनका बहादुरी पूर्वक समाना किया, मगर चीनियों के सामने वे टिक न सके। युद्ध में कोरियाई राजा मारा गया, तो सिपाहियों को भी हिम्मत टूट गई। चीनी सेना धीरे-धीरे राजमहल की ओर बढ़ने लगी। सूचना जब अन्तपुर में रानियों तक पहुँची तो उनने शत्रु पक्ष को आत्म समर्पण करने की तुलना में ससम्मान मर जाना उचित समझा और बगल में बह रही नहीं में कूद कर आत्महत्या कर ली। तब से उन 70 रानियों की स्मृति में नदी तट पर हर वर्ष 70 पौधे उगते, बढ़ते और समय पर फूलते भी हैं और ठीक आत्महत्या वाले दिन, निश्चित समय पर वे सभी फूल एक साथ नदी जल में गिर पड़ते हैं। इस दिन नदी तट पर दूर दूर से लोग इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए उपस्थिति होते हैं। प्रकृति क्यों इस घटना को अविस्मरणीय बनाना चाहती है, यह समझ में नहीं आता।
ऐसी अनेकानेक घटनाएँ आयेदिन घटती रहती हैं। यदि इनका रहस्य जाना जा सके, तो जीवन और प्रकृति के उस पहलू को हम समझने में सफल हो सकते हैं, जो अब तक अविज्ञात हैं। इन्हें मात्र अपवाद कर कर नहीं टाला जा सकता। यह तो मात्र वैज्ञानिकों द्वारा की गयी बहाने बाजी ही कही जायेगी। अविज्ञात की ढूँढ़-खोज ही तो नये आविष्कारों का माध्यम बनती है। हो सकता है, ऐसे कई रहस्य हों, जिनकी पृष्ठभूमि पूर्णतः विज्ञान सम्मत हो।
समुद्र खोलने लगा तो डरी सहमी जल की बूँदें विधाता के पास जाकर कहने लगीं पितामह! हमें कष्ट क्यों देते हो हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। विधाता ने बहुतेरा समझाया बूँदों तुम आकाश में उड़ोगी जहाँ बरसोगी वहीं हरियाली फूटेगी और संसार को प्रसन्नता मिलेगी, पर वह उपदेश बूँदों को अच्छा न लगा। वे लौटीं तो पर विधाता को गालियाँ ही देती रहीं।
समुद्र जल की बूँदों को आकाश में फेंक दिया, फिर वे धरती पर गिरीं और बहते-बहते समुद्र में फिर जा पहुँची तब उन्हें पता चला कि अरे हम तो व्यर्थ ही डरते रहे हमारा तो कुछ भी नहीं बिगड़ा। उधर स्वाति नक्षत्र आ गया तो बूँदें एक बार फिर उमड़ीं इस बार उनमें न भय था न उद्वेग। हँसती खिलखिलाती बूंदें आकाश से झरने लगीं कोई बाँस में गिरी तो वंशलोचन बन गई, कोई कदली में गिरी तो कपूर और सीपी के मुख में गिरी तो मोती हो गई।
विधाता विचार कर रहे थे कि मनुष्य भी संकट और साधनाओं से विचलित न होता तो आज वह भी बूँदों के समान, वंशालोचन, कपूर और मोती बन गया होता।
अमेरिका के उत्तर पूर्व में ध्रुव प्रदेश से सटा हुआ ग्रीनलैण्ड का विशाल द्वीप है, जो पश्चिम में अलास्का और बेयरिंग जलडमरुमध्य के उस पर साइबेरिया के उत्तर पूर्व तक बर्फ की विशाल चार ऐ ढका है। पृथ्वी का यह क्षेत्र संसार के अन्य भागों से करीब-करीब कटा हुआ है, जिसमें सदियों से प्रकृति से लोहा ले रहे एस्किमो जाति के लोग रहते हैं। सुविधा साधन की दृष्टि से भी यह इलाका पिछड़ा है। परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं, फिर भी यहाँ के निवासी अपने जीवन से पूर्णतः संतुष्ट हैं- यह उनके चेहरे से झलकती निश्चिंतता एवं आत्म संतोष से विदित होता है।
उनकी हँसोड़ प्रकृति कठिन जीवन को और भी सरल बना देती है। हँसी उनके जीवन का कितना अभिन्न अंग है, यह इस बात से पता चलता है कि साल भर में हम लोग जितना नहीं हँसते उससे कई गुना ज्यादा एस्किमो महीने भर में हँस लेते हैं। यह उनकी प्रवृत्ति है। कुछ लोग इसे जन्मजात विशेषता मानते हैं, तो कुछ इसका कारण विशेष प्रकार का आहर एवं वातावरण का प्रभाव बताते हैं। कुछ भी हो उनका विनोदी स्वभाव उनके आन्तरिक सुख और मानसिक संतुष्टि को ही अभिव्यक्त करता है, जो ऐसी विषम परिस्थिति में शायद ही कही देखने को मिले।
वे बाह्य सुन्दरता के बजाय आन्तरिक को महत्वपूर्ण मानते हैं। रूप लावण्य की दृष्टि से तो वे कई विशेष आकर्षक नहीं होते, पर उनकी व्यवहार कुशलता देखते ही बनती है। सज्जनता, शालीनता, सहिष्णुता, विनम्रता उनमें कूट-कूट कर भरी होती है। परोपकारिता की वृत्ति इतनी बढ़ी चढ़ी होती है कि यदि कोई भूला भटका पथिक एस्किमो बस्ती में पहुँच जाय तो परिवार के सदस्य की भाँति उनका मान सम्मान करते हैं। वे बहादुर भी कम नहीं होते हैं, मगर इसकी कसौटी अपने समुदाय के लोगों पर शासन व शोषण करना वे नहीं मानते। उनकी लड़ाई तो मात्र प्रकृति से है। उस लड़ाई में उन्हें कितनी सफलता मिलती है, महत्व इस बात को देते और सही अर्थों में पराक्रम इसे ही मानते हैं।
दूसरों के मुँह का ग्रास छीनना तो उनने सीखा ही नहीं। यह जानकर आश्चर्य होता है, कि जहाँ समस्त संसार के तथाकथित “सभ्य’ समाज में आज ऐसे कृत्यों का बोलबाला है, वहीं दूसरी ओर असभ्य कहलाने वाले इन एस्किमो को ऐसी प्रवृत्ति छू भी नहीं है। एकता और समता के जिन थोथे आदर्शों की बात सभ्य समाज लम्बे समय से करता आ रहा है, वह आदर्श इन अविकसित समझी जाने वाली जातियों में न जाने कब से विद्यमान है। जिस आध्यात्मिक साम्यवाद की आज दुनिया को महती आवश्यकता है, उसका जीता जागता स्वरूप इस समुदाय में स्पष्ट देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि कोई शिकारी शिकार मार कर लाता है, तो उसका थोड़ा थोड़ा अंश अन्य साथियों को भी देना पड़ता है, भले ही उनसे शिकार में कोई मदद मिली हो या नहीं। इतना ही नहीं पूरी बस्ती के हर परिवार को इसका कुछ हिस्सा दिया जाता है। इस प्रकार मार्क्सवाद का प्रसिद्ध सूत्र ‘वन फॉर आल एण्ड आल फॉर वन” को चरितार्थ होते हुए यहाँ प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, और इसके माध्यम से वे एक वृहत परिवार का उत्कृष्ट नमूना संसार के सामने प्रस्तुत करते हैं। वे न तो झूठ बोलते हैं, न चोरी की प्रवृत्ति उनमें होती है।
इस तरह यदि हम उनके आन्तरिक गुणों को देखें तो उन्हें असभ्य और अविकसित कहना किसी भी प्रकार समीचीन न होगा। कोई समुदाय अभावग्रस्त हो, सुविधा-साधनों की कमी में जी रहा हो, तो भौतिक दृष्टि से वह प्रतिगामी हो सकता है, किन्तु असभ्य नहीं। एस्किमो इसी वर्ग में आते हैं। उनकी अन्तःकरण की उत्कृष्टता उन्हें शेष विश्व से कहीं अधिक सभ्य और सुसंस्कृत बनाती है। इसी विभूति की ही तो आज मानव को जरूरत है।
मानवी मस्तिष्क असीम शक्तियों का भण्डागार है। उसमें अन्तर्निहित ऐसे विलक्षण शक्ति केन्द्र हैं जिन्हें यदि जागृत किया या कुरेदा जा सके तो मनुष्य अनेकानेक प्रतिभाओं विभूतियों का स्वामी बन सकता है। मस्तिष्कीय चेतना की गर्जन परतों में ही नवीनतम एवं पुरातन विचारों तथा संस्कारों की अमिट छाप भी अंकित होती है, जिन्हें प्रयत्नपूर्वक मोड़ा मरोड़ा या निष्कासित किया जा सकता है और उनके स्थान पर उच्चस्तरीय विचारों, संस्कारों की स्थापना की जा सकती है। सम्मोहन एवं ब्रेन वाशिंग जैसे अनेक वैज्ञानिक प्रयोगों से इस दिशा में बहुत कुछ सफलता भी मिली है।
कैंडर्स अस्पताल (यू.के) में चार वर्षीय बालिका के कान का ऑपरेशन होना था। उसमें शल्य चिकित्सकों को कम से कम पाँच घण्टे लगने थे। इतने लम्बे समय तक दवाओं की बेहोशी छोटी बालिका के लिए पीछे घातक सिद्ध हो सकती थी। अतः सम्मोहन के आधार पर ऑपरेशन करने का निश्चय किया गया। सम्मोहन द्वारा गहरी निद्रा में जाने के पश्चात् उसके कान का ऑपरेशन किया और वह पूर्णतया सफल रहा। इस सफलता से प्रभावित होकर अनेक चिकित्सकों ने इस विज्ञान का आश्रय लेना आरम्भ कर दिया। सुप्रसिद्ध चिकित्सक डा. हाँर्थमैन ने इस उपचार प्रक्रिया से न केवल रोगी अच्छे किये हैं वरन् व्यसनों और बुरी आदतों की कुटेवों से भी लोगों को मुक्ति दिलाई है। नशेबाज, जो अपने को बुरी लत को छोड़ने में असमर्थ लाचार बताते थे, सम्मोहन द्वारा व्यसन से छुटकारा पा सके। बिस्तर में पेशाब कर देने वाले किशोरों को भी इस उपचार से लाभ मिला है।
सम्मोहन के प्रभाव से विचार परिवर्तन के कारण रोगी अर्धमूर्छित भर रहता है, पर उसे कष्ट का अनुभव बिल्कुल नहीं होता। डा. हार्थमैन ने एनेस्थेशिया की आवश्यक मात्रा का आधा भाग देकर ओर आधा सम्मोहन का उपयोग करके भी रोगी का उपचार करने में सफलता पाई है। अमेरिका में इन दिनों अनेकों मूर्धन्य शल्य चिकित्सक इस प्रणाली का प्रयोग कर रहे हैं और सम्मोहन विज्ञान के आधार पर रोगियों की चिकित्सा कर रहे हैं। महिलाओं की प्रसव पीड़ा कम करने में तो इन प्रयोगों में शत प्रतिशत सफलता मिली है। दर्द नाशक इंजेक्शन लगाने की अपेक्षा सम्मोहन द्वारा कष्ट मुक्त स्थिति का लाभ देना उचित और हितकर समझा जाने लगा है। प्रसूताओं को भी यह उपचार अधिक उपयुक्त लगा है।
फ्राँस के प्रख्यात चिकित्सक एवं परामनोविज्ञानी डा. यूजेन औस्टे का कहना है कि इस प्रक्रिया में कमजोर मनः स्थिति वाले व्यक्ति सशक्त मस्तिष्कीय क्षमता सम्पन्न लोगों के प्रभाव में आकर दब्बू प्रकृति के बन जाते हैं तथा उनके विचारों के अनुरूप कार्य करने लगते हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें प्रभावित व्यक्ति या समूह को आदर्शवादिता एवं प्रगतिशीलता की ओर भी ले जाया जा सकता है और निम्नगामिता या विनाश की ओर भी धकेला जा सकता है। कम्युनिस्ट और उसके प्रभाव क्षेत्र वाले देशों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा है कि इन देशों में सामान्य नागरिकों की मानसिक स्थिति ऐसी है है, जिसे सम्मोहनग्रस्त कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। इससे पूर्व द्वितीय महायुद्ध के पूर्व ऐसी ही स्थिति जर्मनी, इटली आदि में तत्कालीन अधिनायकवादी शासन तन्त्र ने उत्पन्न की थी। नाजीवाद का पक्षधर लोकमानस बनाने में हिटलर, मुसोलिनी आदि ने अपने देश के समूचे बौद्धिक तन्त्र को जुटा दिया था।
इलेक्ट्रानिक ब्रेन के निर्माण की प्रक्रिया में ज्ञात तथ्यों द्वारा वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मनुष्य का अचेतन मन एक सशक्त कम्प्यूटर की तरह कार्य करता है और जिस तरह एक कम्प्यूटर की गई फीडिंग के अनुसार ही क्रियाशील होता है, उसी तरह अवचेतन भी अपना आहार विचारों तथा संकल्पों से प्राप्त करता है। इस तरह अवचेतन की दिशा मनुष्य की इच्छाओं से ही प्रभावित होती है। प्रयास द्वारा उस पूर्ण नियन्त्रण पाया जा सकता है। और इच्छित दिशा में प्रगति की सकती है।
मस्तिष्कीय क्षमता को ही व्यक्तित्व का विकास समझने वाले वैज्ञानिकों ने इन दिनों इस संदर्भ में कई दृष्टियों में विचार किया और अनेकों उपाय ढूँढ़ निकाले हैं। इस दिशा में उनने कई अनुसंधान प्रयोग भी किये हैं। उनका कहना है कि परिवार एवं समाज के वातावरण का मनुष्य के चिन्तन एवं स्वभाव पर असर पड़ता है। इसलिए शिक्षा तथा परम्परा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक बुद्धि, साहसी और सद्गुणी हो सके।
इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों का विशेष ध्यान इस बात पर भी गया है कि ब्रेन वाशिंग के कोई कारगर उपाय ढूँढ़ निकाले जायँ, जिससे दूसरों को अपनी मान्यता के अनुरूप मोड़ा मरोड़ा जा सके। इस दिशा में कम्युनिस्ट देश सबसे आगे हैं। उन्होंने अपने विरोधियों का सफाया करके सिरदर्द से छुटकारा पाने के उपायों में अत्यधिक उत्साह दिखाया है। वहाँ ऐसे प्रयोग भी हुए हैं कि प्रतिपक्षी मान्यता वालों पर ऐसे मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जायँ कि वे अपनी पूर्व मान्यता को छोड़कर नये निर्देशों को हृदयंगम करने के लिए स्वेच्छापूर्वक सहमत हो जायँ। इस प्रयास में समझाने बुझाने अभीष्ट वातावरण में रहने, भय प्रताड़ना से आतंकित करने लालच दिखाने जैसे उपायों के सहारे असहमत को सहमत बनाने का प्रयत्न किया जाता है। यही ब्रेन वाशिंग की प्रक्रिया जाता है। यही ब्रेन वाशिंग की प्रक्रिया है जो उन देशों में बड़े उत्साह से चली और एक सीमा तक सफल भी हुई है।
इस संदर्भ में मस्तिष्क के उस केन्द्र की खोज बीन का जा रही है। जहाँ स्मृतियाँ दबी हुई प्रसुप्त पड़ी रहती हैं। कनाडा के प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डा. डब्ल्यू . जी. पेनफील्ड ने भी ऐसे इलेक्ट्रोड खोज निकाले, जिनका सम्बन्ध विशिष्ट मस्तिष्कीय कोशिकाओं से करने पर अतीत की घटित घटनाएँ, विवाद, संवाद, चर्चा परिचर्चा ऐसे उभर आती थीं, जिनसे प्रतीत होता था कि वे अभी तत्काल ही सम्पन्न हो रही हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार रसायनों में प्रभाव से भी मस्तिष्क को उत्तेजित, दब्बू भयभीत या अति सामर्थ्यवान बनाया जा सकता है। इन रसायनों में सिरोटोनिन ना एडीनेलिन, एण्डाँर्फिन एवं डोपामिन प्रमुख है। जैव रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा ये मस्तिष्कीय क्षमता को प्रभावित करते हैं। पिछले दिनों कैलीफोर्निया के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. स्नाइडर ने एनकेफेलिन नामक रस स्रावों की मस्तिष्क में उपस्थिति बताई है। इन्हें कृत्रिम विधियों औषधि, सम्मोहन, बायो फीडबैक, इलेक्ट्रोड उत्तेजन से प्रभावित करने व्यक्ति को मानसिक दृष्टि से सामर्थ्यवान प्रतिभावान बनाया जा सकता है।
भावनाएँ मानवी मस्तिष्क को अनेक प्रकार से प्रभावित करती हैं। स्नायु विज्ञान सम्बन्धी खोजों के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इनके कारण मस्तिष्क में ऐसे रसायन उत्पन्न होते हैं, जो विष जैसा प्रभाव छोड़ते हैं और जीवन रस भी प्रदान करते हैं। मस्तिष्क विज्ञानियों का कहना है कि स्नायु तंत्र का संचालन केवल मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली विद्युत धारा से ही नहीं होता है वरन् उनके संचालन में रासायनिक तत्व भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस आधार पर अब यह प्रयास किये जा रहे हैं कि भावनाओं और रसायनों को मस्तिष्क के अमुक भाग में पहुँचा कर व्यक्ति को दर्द से छुटकारा दिलाया जा सके, मनोरोगों की चिकित्सा की जा सके और उसकी बौद्धिक क्षमताओं को प्रखर बनाया जा सके। ऐसी सम्भावनाओं भी व्यक्त की जा रही है। कि इन रसायनों के प्रयोग द्वारा मनुष्य की आदतें बदलने, नशे की लत छुड़ाने तथा उसका व्यवहार तक बदल डालने के प्रयोग किये जा सकते हैं।
यह प्रयत्न उसी दिशा में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं जो मनुष्य को प्रगतिशील और आदर्शवादी बनाने के लिए किये जायँ। अन्यथा निकृष्ट प्रवृत्तियों के ढाँचे में ढले हुए व्यक्ति हिटलर की तरह संसार का अहित ही करेंगे और स्वतंत्र चेतना गंवाकर अपने सूत्र संचालकों के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचने पर शेष समुदाय को मजबूर करने लगेंगे। यदि ऐसा समय आया तो वह मानवी स्वतंत्र चेतना की दृष्टि से सबसे बुरा समय होगा।
मानवी प्रगति के लिए इन दिनों पहले की अपेक्षा कहीं अधिक गुँजाइश है। साधनों में कमी नहीं वृद्धि हुई है। पूर्वजों के पास भोजन के घटिया साधन थे, उनसे अधिक प्रकार के शाक, भाजी, फल मेवे हम प्राप्त कर लेते हैं चिकनाई की मात्रा भी अपेक्षाकृत अधिक हिस्से में आती है। जरा भी बीमारी होने पर पड़ौस में ही हकीम-डाक्टर मिल जाते हैं। नित नई औषधियों के आविष्कार होते चलते मिल जाते हैं। नित नई औषधियों के आविष्कार होते चलते हैं। अस्पताल से लेकर प्रयोगशालाओं और शोध शालाओं की धूम है, जिससे किसी को बीमारी कष्ट न सहना पड़े। औसत आदमी के भोजन में पौष्टिक तत्वों की मात्रा पूर्वजों की अपेक्षा हलकी नहीं, भारी ही पड़ती है। ऐसी दशा में हम सब का स्वास्थ्य अच्छा ही होना चाहिए, किन्तु देखने में स्थिति इसके विपरीत ही आती है।
लम्बाई, ऊँचाई, वजन की दृष्टि से हम अपेक्षाकृत बढ़ नहीं वरन् घट रहे हैं। घटोत्तरी का सबसे चिन्ताजनक पक्ष है- जीवनी शक्ति की न्यूनता, रोग निरोधक शक्ति, बिना थके परिश्रम करने की क्षमता, मनोबल, साहस, हिम्मत यह जीवन शक्ति की न्यूनता, रोग निरोधक शक्ति, बिना थके परिश्रम करने की क्षमता, मनोबल, साहस, हिम्मत यह जीवनी शक्ति की न्यूनता, रोग निरोधक शक्ति, बिना थके परिश्रम करने की क्षमता, मनोबल, साहस, हिम्मत यह जीवनी शक्ति के चिन्ह हैं। जब इन क्षमताओं की कमी पड़ जाती है। तो शरीर माँस - चर्म से ढँका होने पर भी ढीला पोला पिलपिला रह जाता है। देखने-दिखाने भर के काम आता है। जीवन तत्व की जब कमी पड़ जाती है, तब चेहरों पर तेजस्विता दिखाई नहीं पड़ती, आकर्ष नहीं रह जाता उदासी छाई रहती है, कोई काम हाथ में लेते ही उसके पूरा होने की आशा नहीं बँधती, निराशा छाने लगती है। जरासा काम में हाथ डाला नहीं कि अंग - अवयव थकान अनुभव होती है। जो काम हँसते-खेलते, उछलते - कूदते हो सकते थे, उन्हें करने के लिए सहायक की नौकर वहन की आवश्यकता पड़ती है। जिम्मे लिए हुए कामों का ढेर लगा रहता है। आज का कल पर कल का परसों पर टलता रहता है। स्फूर्ति के अभाव में टालम-टोल ही एक मात्र उपाय रह जाता है। जब काम ज्यादा जमा हो जाता है तो कोई बहाना बनाकर जिस-तिस पर दोष मढ़ना पड़ता है; पर इससे भी कुछ बनता तो नहीं। दूसरों की आँखों में अपनी आँखें में अपनी इज्जत घटती है। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निकम्मापन सिर पर लदा रहता है।
सुविधाएँ जहाँ पहले की अपेक्षा बढ़ी हैं, वहाँ क्षमता क्योँ घटी हैं? इसका उत्तर एक ही है- “जीवनी शक्ति की घटोत्तरी”। इसी के बलबूते मनुष्य कुछ पुरुषार्थ कर पाता है, रोगों से लड़ पाता है, दीर्घ जीवन का आनन्द ले पाता है। जीवन शक्ति गिरने पर शरीरबल और मनोबल दोनों में ही न्यूनता पड़ती है। ऐसी दशा में सुयोग और सुअवसर भी आँखों के सामने देखते-देखते निकल जाते हैं तथा उदासी और असफलता ही गाँठ बँधती है।
देखना यह है कि पूर्वजों की तुलना में यह घटोत्तरी क्यों हो रही है? किस कदर हो रही है? पिछली शताब्दी पर दृष्टि डालते हैं तो शरीरों के आकार-प्रकार में भी कमी प्रतीत होती। इन दिनों औसत लम्बाई 5 फुट 8 इंच और वजन 60 किलो ग्राम है; पर कुछ दशकों पूर्व ऐसी स्थिति नहीं थी। कद भी ऊँचा था और वजन भी अधिक था। उसमें ज्यादा कमी न हुई हो, तो भी पराक्रम वाली जीवनी शक्ति तो निश्चित रूप से कम हो गई है। स्फूर्ति और हिम्मत दोनों ही घट रही हैं। जरा-सा परिश्रम करते ही थकान और उदासी छाने लगती है।
इसका कद और वजन से सम्बन्ध है। जिसकी हड्डियाँ भारी, मजबूत और चौड़ी हैं - वह पराक्रम भी अधिक कर सकेगा, भोजन भी अधिक करेगा, उसके पचने पर रक्तमाँस अधिक बनेगा और पुरुषार्थ भी अधिक बन पड़ेगा; पर यदि शरीर हल्का, फुल्का, ठिगना, कमजोर है, तो उससे खाया भी कम जायेगा, पचेगा भी कम और रक्त माँस की न्यूनता से कमजोरी के चिन्ह सर्वत्र दृष्टिगोचर होंगे।
स्त्रियाँ इन दिनों औसतन 5 फुट इंच और वजन में 55 से 58 किलो ग्राम की होती हैं। इसकी तुलना में इन्हीं दिनों जीवित व्यक्तियों में इस औसत की तुलना में कहीं अधिक कद और भार देखा जा सकता है। जो चले गये, वे तो दोनों ही दृष्टियों में अधिक भारी-भरकम थे। इसी अनुपात से उसकी क्षमता भी काफी बढ़ी-चढ़ी थी “विलीव इट ओर नाट’ पुस्तक के कुछ उदाहरण इस सम्बन्ध में यहाँ दिये जा रहे हैं।
सन् 1962 की बात है कि फिलिस्तीन का एक पहलवान डेविड नाम से मशहूर था। उसकी ऊँचाई 210 सेन्टीमीटर अर्थात् दै हाथ से भी अधिक थी। उतनी ही मजबूत उसकी जीनी शक्ति थी।
ईरान के बसरा शहर का सिपाह खाँ 312 सेन्टीमीटर ऊँचा था। प्रामाणिक लम्बाई के हिसाब से अमेरिका का राबर्ट वाशिंग वाडलों 242 सेन्टीमीटर तक पहुँच गया था। टैनेसी का जार्ज विलियम रीगन 254 सेन्टीमीटर का था। पाकिस्तान का मुहम्मद आलम चन्ना 259 सेन्टीमीटर नापा गया। इस प्रकार पिछले दिनों दर्जनों 250 सेन्टीमीटर लम्बाई के लगभग के व्यक्ति हुए हैं।
संसार के जीवित व्यक्तियों में शिकागो (अमेरिका) का जान काइलर सबसे लम्बा आदमी है। उसकी लम्बाई 8 फुट 4 इंच है। इससे भी बढ़कर सिंध (पाकिस्तान) का मकसूद आलम है। उसकी लम्बाई 8 फुट 6 इंच है। ऐसे मामलों में थाइराइड की बीमारी के कारण लम्बाई बढ़ना कहा जाता है; किन्तु इन दोनों का स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है। एक दूसरा व्यक्ति जिसकी मृत्यु 22 वर्ष की उम्र में हो गई थी, रार्बड कनिंघम 11 फुट 1 इंच तक पहुँच गये थे। सम्भवतः वह एक्रोमिगैली रोग से ग्रस्त रहा हो।
महिलाओं में चीन के हुनान प्रान्त की साँग चुन लिंग की लम्बाई 217 सेन्टीमीटर तक आँकी गई थी। कनाडा की सेडी एलन 231 सेन्टीमीटर लम्बाई की थी। दुनिया के सबसे लम्बे दम्पत्ति कनाडा के डाहन ओर उनकी पत्नी मार्टिन दोनों लगभग 250 सेन्टीमीटर के थे। तुतनी की आदिम जातियों में लोग 231 से 244 सेन्टीमीटर तक पाये जाते रहे हैं उनमें दमखम भी खूब होता है।
लम्बे दम्पत्तियों में केन्प्रट मार्ट वेडूस की लम्बाई 7 फुट 5 इंच थी। उनकी पति एन्ना स्वान 7 फुट 7 इंच लम्बे थे दोनों ने मिलकर सरकस में नौकरी कर ली थी, जहाँ उन्हें अच्छा वेतन मिलता था। अमेरिका का क्विफर्ड टायसन एक माना हुआ वकील था। उसकी लम्बाई 8 फुट 7 इंच थी। आयरलैण्ड के कार्टर का कद 8 फुट 3 इंच था। तब वह 19 वर्ष का था। वह कहता था मेरा बाप ब्राडन 9 फुट का था। उसके बराबर होने में भी उससे कम न रहूँगा।
लम्बे आदमी अपने कद के हिसाब से खाते भी हैं और मेहनत भी करते हैं। पहनने के कपड़े, जूते स्पेशल बनवाने पड़ते हैं बिस्तर भी बड़े बनते हैं। इतने पर भी उनके कारण किसी को घाटा नहीं पड़ता।
अब से कोई 300 वर्ष पहले अब की अपेक्षा बहुत लम्बे और वजनदार आदमियों की पीढ़ी संसार भर में भी। तब उनका ऐसा होना कोई आश्चर्यजनक नहीं माना जाता था। आदमियों की घटोत्तरी तो धीरे-धीरे हुई है। इतिहास वेत्ता मेगेनिल ने दक्षिणी अमेरिका के रैड इन्डियनों को साढ़े 7 फुट ऊँचा पाया था। मिस्र का शासक सिसरो 8 फुट का था। रोम का शासक मैक्समन भी 8 फुट का था। शाही दरबारों में ऐसे ही लम्बे आदमी ढूँढ़-ढूँढ़ कर तब रखे जाते थे।
परशिया के शासक फ्रेडरिक विलियम ने लम्बे मनुष्यों की एक सेना बनाई थी, जिसमें 2900 सैनिक थे। इनका औसत कद 8 फुट था। चाँग नामक एक चीनी लड़का 19 वर्ष की आयु में ही 9 फुट लम्बा और 204 कि.ग्रा. को हो गया था। वह आजीवन स्वस्थ रहा। मिसूँरी, अमेरिका की एक लड़की इलाहीविग 25 वर्ष की होते-होते साढ़े सात फुट और 113 कि.ग्रा. वजन की हो गई थी।
रिकार्डस में सबसे भारी मनुष्य वाशिंगटन का मिचेल सिस्टल था। उसका वजन 635 पौंड था। उसे करवट लिवाने के लिए 6 आदमियों की जरूरत पड़ती थी। लंदन की मिल्स नामक महिला का वजन 405 कि.ग्रा. था। 380 कि.ग्रा. से अधिक भारी पिछले दिनों संसार भर में 8 आदमी थे।
दीर्घायु लोगों में से जिनने पिछले 50 वर्षों में कीर्तिमान स्थापित किए हैं, उनकी आयु 100 से लेकर 118 वर्ष तक की हो सकी है। इनमें अधिकाँश यूरोप व एशिया के ठंडे इलाकों के रहे हैं। भारत में भी अभी भी पहाड़ों पर दीर्घायु व्यक्ति पाये जाते हैं। एडवर्ड होल्योग प्राप्त की। 80 वर्ष तक वह सलेम अमेरिका में प्रेक्टिस करता रहा। जिसमें उसने 25 लाख रोगियों का इलाज किया। 90 वर्ष की उम्र तक ऑपरेशन करता रहा। उसी साल सलेम बैंक का प्रधान भी चुना गया।
अनबक्तदीन जब आर्कोट की लड़ाई में लड़ने गया, तब वह 107 वर्ष का था। दो गोलियाँ लगने से वह मारा गया। आस्ट्रिया के मारक्रिशन चर्च की 700 वीं वर्ष गांठ पर 12 मील राज चल कर सम्मिलित होने वाली महिला का नाम बारबरा वाइ. आइ. टेलर। तब वह 119 वर्ष की थी। न्यूजीलैण्ड के माटामारा इलाके में जन जाति का एक सदस्य “होहुआ” बहिष्कृत कर जंगल में अकेला छोड़ दिया गया। वह कन्दमूल खाकर रहा और 124 वर्ष तक जिया। फ्राँस का एडमण्ड मौथ्यूस सन् 1870 से 1985 तक 115 वर्ष जिया। इसमें वह 75 वर्ष तक मेयर रहा। हार्लर काउण्टी की एक महिला सैली ईगर 90 वर्ष की उम्र में अपनी ऐनक खे बैठी। इस पर उसकी आँख की रोशनी घटी नहीं बढ़ गई और खुली आँख से सुई में धागा पिरोती रही। 95 वर्ष की आयु तक उसे चश्मे की फिर जरूरत ही न पड़ी।
शरीर की बलिष्ठता और बहादुरी लगभग एक ही चीज है। जिसका शरीर सुदृढ़ होगा, वही कुछ बड़े काम कर सकता है। अधिक दिन तक जी भी सकता है।
दीर्घ जीवन भी इसी जीवनी शक्ति से सम्बन्धित है। जिसका शरीर मजबूत गठन का है, वही लम्बे समय तक जीवित भी रह सकता है और आपत्तियों को सहन भी कर सकता है।
युद्ध में लड़ने वाले सेनापति किसी जमाने लोहे के तारों से बने कवच पहनते थे, ताकि शत्रु की तलवार उनका कुछ बिगाड़ न सके। वोर्सस्टर विलियम साँमरसेट का कवच 37 किलो ग्राम भारी था, वह पाँच हिस्सों में जोड़कर बना था। उसके बुलेट प्रुफ हिस्से समेत वजन 60 कि.ग्रा. था। प्रिन्स ऑफ अर्ल के अत्यन्त भारी कवच की कीमत 428 लाख पौण्ड आँकी गई थी, वह रत्न जड़ित था मिस्र का सेनापति लुँग पाशा 15 वर्ष से लेकर 40 वर्ष तक एक मन भारी कवच पहनकर नील नदी को तैरने और वापस आने का नियम बनाये रहा। वाइजेन्टियम का शासक रोमैजस अपने भारा लोहे के कवच पहने हुए उछलकर घोड़े की पीठ पर बैठकर जाता था।
इतना ही नहीं, उन लोगों की ताकत और हिम्मत भी असामान्य स्तर की होती थी। स्काटलैंड का बादशाह अलेक्जेन्डर अंगरक्षक नहीं रखता था। एक रात वह सोया हुआ था कि छह शत्रुओं ने मिलकर हमला किया। आँख खुलते ही वह भिड़ पड़ा और देखते-देखते छहों का सफाया कर दिया। उसकी ताकत और हिम्मत दोनों एक से एक बढ़कर थी। जर्मनी के एक होस्ट का एक रीछ से पाला पड़ जाने पर उसने उसे घूँसों से मार डाला।
फ्राँस के वारेन क्रीस्टोफ का घोड़ा सफर में घायल हो गया। उसे वह कंधे पर लाद कर डेढ़ मील दूर पशु चिकित्सालय तक ले गया। घोड़े का वजन 424 पौण्ड था।
एक असाधारण पहलवान कीवेस्ट का निवासी पीटर जेकक्स था, जिसने दो आदमियों को हाथों पर बिठाकर लम्बी दूरी तय की।
संसार में तीर से गेंडे का शिकार करने वाला एकमात्र व्यक्ति अफ्रीका का इमेस था। उसकी भुजाओं में इतनी शक्ति थी कि उसका तीर एक इंच मोटी खाल पार करता हुआ दो फुट भीतर घुस गया था। पहले के लोगों का साहस भी देखते ही बनता था। स्पेन के सेनाधिकारी रोडिगो पान्स को शेरों के एक झुण्ड के कटघरे में से हाथ के दस्ताने निकालने के लिए छलाँग लगानी पड़ी। शेर सकपका गये और सेनापति दस्ताना लेकर सकुशल वापस लौट आया।
ननवग्र जर्मनी के एक कैदी माँलीजन को फाँसी की सजा मिली। उसने मरने से पूर्व अंतिम इच्छा प्रकट की कि उसे अपने घोड़े पर एक बार चढ़ लेने दिया जाए। स्वीकृति मिल गई। कैदी ने घोड़े पर चढ़ते ही 12 फुट ऊँची दीवार छलाँगी, 30 फुट की खाई पार की और ऐसा भागा कि फिर कभी पकड़ में न आया।
ये घटनाएँ एवं प्रसंग बताते हैं कि अब से कुछ ही समय पूर्व लोग कद में लम्बे, वजन में भारी, अधिक खाने वाले और अधिक पराक्रम करने वाले तथा दीर्घजीवी होते थे। उनकी हिम्मत और बहादुरी भी बढ़ी-चढ़ी थी। यह उनकी जीवनी शक्ति की बहुलता थी, जो प्राकृतिक रहन-सहन तथा अस्तित्व के समग्र विकास का प्रयत्न करने पर ही उपलब्ध होती है। इस ओर उपेक्षा बरतने पर ही उपलब्ध होती है। इस आरे उपेक्षा बरतने से ही आज हम स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत कुछ खोते व खोखले होते चले जा रहे हैं।
भाषा भगवान ने सबको नहीं दी है; पर भाव सब को ही दिये है। सुख, दुःख, भय, आशंका, प्रसन्नता, आशा जैसे भले-बुरे अवसर परिस्थिति वश सभी के सामने आते रहते हैं। इसमें मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी शामिल हैं।
जिन्हें जीभ मिली ही नहीं, उनकी बात दूसरी है। वे अपना मन मसोस कर रह जाते हैं अथवा समूचे शरीर की छटपटाहट से अपनी पीड़ा का परिचय देते हैं।
मछलियाँ प्रसन्न होने पर क्रीड़ा-कल्लोल करने लगती हैं और जब उन्हें पानी से निकाल कर प्राण हरण किया जाता है, तो उनकी छटपटाहट प्रत्येक भावनाशील का हृदय हिला देती हैं।
पशु पक्षियों को जीभ-मिली है। वे उसके माध्यम से अपने भाव प्रकट करते रहते हैं। उनके साथी सहयोगी उस शब्दावली के माध्यम से यह अनुमान लगा लेते हैं किस उस पर क्या बीत रही है, और अपनी अनुभूतियों को साथियों पर कैसे प्रकट करना चाहता है। यद्यपि अभी तक ऐसा कोई शब्दकोश नहीं बना, जिससे जाना सके कि किस प्राणी को अपने मनोभाव दूसरों पर प्रकट करने के लिए किस शब्दावली का प्रयोग करना पड़ता है?
भावना अन्तःकरण की भाषा है। वह प्रकट हुए बिना नहीं रहना चाहती। कोई प्राणी घुटन में आबद्ध नहीं रहना चाहता। अपने व्यक्तित्व का परिचय देने और मनोभावों को प्रकट करने की इच्छा उन सभी प्राणियों में होती है, जिन्हें जिव्हा मिली हुई है, भले ही वह मनुष्य की तरह क्रमबद्ध रूप से वार्तालाप न कर सके; किन्तु अपने भावों को तो किसी-न-किसी रूप में प्रकट कर ही देते हैं।
बाज, बिल्ली, साँप, गोह आदि किसी भी आक्रामक जानवर की निकटता अनुभव करते ही छोटे पक्षी इकट्ठे होकर चहचहाने लगते हैं। इसके कई उद्देश्य होते हैं - एक तो सब साथियों का एकत्रित - संगठित होना, दूसरे साथ-साथ मिल कर शोर मचाना, ताकि शत्रु यह न समझे कि यह एकाकी है, इसलिए हमला किया जा सकता है, तीसरा यह कि समीपवर्ती क्षेत्र में उस समुदाय की कोई और बिरादरी वाला हो तो वह भी साथ हो जाय, बचाव का उपाय करे।
प्रसन्नता के अवसर पर भौंरे, कोकिल, मोर आदि विशेष वाणी बोलते हैं। उन शब्दों को मानवी भाषा में अर्थ तो नहीं किया जा सकता; पर इतना अवश्य जाना जा सकता है, कि यह पक्षी वर्तमान परिस्थितियों में प्रसन्न है।
सिंह अपनी दहाड़ से वन्य पशुओं को भयभीत करके उनके मनोबल को गिराता है, साथ ही सूचना देता है कि इस क्षेत्र में उसका कोई प्रतिद्वन्द्वी हो, तो चला जाय अन्यथा परस्पर भिड़ने का खतरा है। प्राणियों में वाणी की अपेक्षा गंध कारगर है। वे अपने घर, देश, दिशा को गंध के आधार पर पहचान लेते हैं। हिरणों का तो यह स्वभाव ही होता है कि वन के जिस भाग में वे निवास करते हैं, उसके वृक्ष वनस्पतियों में एक विशेष प्रकार की गंध छोड़ देते हैं ताकि दूसरे हिरण उस क्षेत्र में घुसपैठ न कर सकें और यदि अनधिकार प्रवेश जरूरी ही हुआ तो, वे नये सिरे से उस वन्य प्रदेश की वनस्पतियों को काट-छाँट कर उसकी गंध मिटा देते और अपनी नई गंध डाल कर उस क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम कर लेते हैं। प्रणय-निवेदन भी वे गंध के आधार पर ही करते हैं। जिनकी आँखें कमजोर हैं, वे भी गंध के आधार पर अपने शिकार को, प्रेमी को, आक्रान्ता को आसानी से पहचान लेते हैं।
भाव-भंगिमा हर प्राणि की मनुष्य से मिलती-जुलती हैं। शब्द न समझे जा सकें, तो आकृति, भाव भंगिमा देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन प्राणी अपनी क्या भाव-भंगिमा व्यक्त करना चाहता है। क्या मात्र बोल लेने व वाक्चातुर्य मात्र से किसी की मूर्ख बना लेने से ही मनुष्य इन शुद्र जीवों से बड़ा मान लिया जाना चाहिए?
मिस्र के पिरामिडों के बारे में अनेक जन मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक आम धारणा यह भी है कि प्राचीन मिस्र वासियों ने मृतकों के शवों को चिरकाल तक सुरक्षित रखने के लिए तत्कालीन ज्ञान और विज्ञान के अपने अनुसंधान के आधार पर इन संरचनाओं को खड़ा किया था। परन्तु इससे आगे सैकड़ों मील क्षेत्र में फैले इन विशाल पिरामिडों की वास्तविक उपयोगिता क्या थी, आज तक अबूझ पहेली बनी हुई है। इतिहासकार भी इस सम्बन्ध में मौन हैं। आरम्भ काल में इसकी उपयोगिता चाहे कुछ भी रही हो, अब तो यह भुतही जगह मात्र है। प्रेत - पिशाच स्वच्छन्दता पूर्वक विचरण करते देखे जा सकते हैं। जो भी व्यक्ति इनमें ठहरने और जानकारी हासिल करने का प्रयत्न करता है, वे उसका विनाश छोड़ते हैं।
विश्वविख्यात पत्रकार फिलिप बैडन वर्ग ने “द कर्स ऑफ फराओज” नामक अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ऐसी अनेकानेक घटनाओं का उल्लेख किया है जो भौतिक विज्ञान की सीमाओं से परे है। उन्होंने अपने जीवन का अधिकाँश भाग फराओ के मकबरे और ममियों के मध्य व्यतीत किया है। उनके अनुसार पिरामिडों में कुछ स्थान इतने अभिशप्त हैं, जिनमें पहुँचते-पहुँचते लोग काल का ग्रास बन जाते हैं। तूतनखामन का मकबरा उनमें से एक हैं। तूतनखामन का मकबरा उनमें से एक है। इसमें जड़ी हुई शाप सूचक तख्ती की इबारत आज के वैज्ञानिकों के अनुसंधान का विषय बनी हुई है। इसमें प्रवेश करने वाले कितने ही व्यक्तियों के अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा है। 17 फरवरी 1923 को लार्ड कैनरिवान और हावर्ड कार्टर ने राजा तूतन के मकबरे में प्रवेश किया था परन्तु वे सकुशल वापस नहीं आ सके। तभी से 30 की संख्या में उच्चस्तरीय मूर्धन्य वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं तथा क्षेत्रों के विशेषज्ञों की इसमें दर्दनाक मौत हो चुकी है।
सन् 1962 में काहिरा विश्वविद्यालय के मूर्धन्य वैज्ञानिक डा. इज्जेहीन ताहा, जो वरदान-अभिशाप जैसी बातों पर तनिक भी विश्वास नहीं करते थे, के साथ एक विचित्र घटना घटित हुई। उनकी मान्यता थी कि पिरामिडों में पाई जाने वाली काई के कारण ही उसमें प्रवेश करने वालों को श्वास और त्वचा की बीमारी हो जाती है जो अंततः जानलेवा सिद्ध होता है। उन्होंने काई को समाप्त करने की योजना बनाई ही थी कि अचानक कारों की भिड़न्त में ही मृत्यु हो गई।
बैंडनवर्ग के अनुसार सन् 1929 तक तूतनखामन के मकबरे को खोलने और उसकी जानकारी प्राप्त करने वाले 22 लोग काल कवलित हो चुके हैं। कई लोग तरह-तरह की आधि-व्याधियों से पीड़ित हैं और अनेकों को अर्धविक्षिप्तों जैसी स्थिति में जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है। वैज्ञानिक कहते है कि यह मात्र काई से होने वाली व्याधियाँ नहीं हैं।
विश्व प्रसिद्ध गीजा के ‘महान पिरामिड’ के संबंध में भी यही कहा जाता है कि वह अभिशप्त है। रात्रि में जो कोई भी व्यक्ति इसमें रुकने का प्रयत्न करता है, फराओं की प्रेतात्मा उसे मार डालती हैं।
प्राचीन मिस्र पर खोज करने वाले अंग्रेज पर्यटक पॉल ब्रण्टन ने एक बार इस पिरामिड में प्रवेश करने का दुस्साहस किया और संपूर्ण रात उसी में बिताई। उस समय जो भी दृश्य दिखे और अनुभूत हुए, उसका विशद् उल्लेख उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ए सर्च इन सीक्रेट इजिप्ट” में किया हैं। उसके अनुसार जब वे पिरामिड के अन्दर प्रविष्ट हुए तो परम्परागत ढंग से उस रात भी उसका दरवाजा बन्द कर दिया गया। अकेले ब्रण्टन महोदय उस काल कोठरी के गहन अन्धकार में इधर-उधर घूमते रहे। प्रकाश के लिए उनके पास एक टार्च थी जिसके माध्यम से वे अन्दर की चीजों का निरीक्षण परीक्षण कर रहे थे रह-रह-कर चमगादड़ों के डैनों की फड़फड़ाहट उनके कर्ण-कुहरों से टकराती और वे कुछ भयभीत हो उठते, पर तत्क्षण ही स्वयं को आश्वस्त करते और आगे बढ़ जाते। अन्ततः एक कोठरी में जाकर एक ताबूत के निकट बैठे गये। थोड़ी देर पश्चात् वहाँ क्रूर और भयानक चेहरे प्रकट होने लगे। वे ब्रण्टन को तरह-तरह की धमकियाँ देते दिखाई पड़े, किन्तु वे निर्भय बैठे रहे। अपना रास दिखाने के बाद प्रेतात्माएँ जैसे आयी थीं वैसे ही विलुप्त हो गयीं।
अब वहाँ के वातावरण में प्रशाँति घुली हुई थी। दुष्ट दुरात्माओं के तिरोहित होते ही वहाँ परोपकारी देवात्माएँ प्रकट होने लगी। उनने ब्रण्टन को सावधान किया और महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी दीं। वहीं कई दिव्य आत्माओं से उनका साक्षात्कार भी हुआ।
इस प्रकार गीजा के पिरामिड में किसी व्यक्ति के रात्रि बिताने की अभी तक प्रकाश में आई यह एकमात्र घटना है। इसके अतिरिक्त इस भुतही काल कोठरी में कदम रखने का साहस कोई भी नहीं कर सका। हाँ, उसका एक भाग-राज प्रकाष्ठ में समय-समय पर कई लोगों ने प्रवेश किया है, परन्तु वहाँ के हृदय विदारक दृश्य देखकर एवं डरावनी अनुभूतियों से त्रस्त होकर वे दुबारा उसमें जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाये। पीटर टाम्पकिन्स नामक सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ने पिरामिड से बाहर निकलने के पश्चात् वहाँ के बारे में पूछे जाने पर उसे अवर्णनीय बताया था। वे स्वयं बहुत अशक्त एवं पीले पड़ गये थे।
सन् 1789 में फ्राँस के महान विजेता नैपोलियन बोनापार्ट ने 38 हजार सैनिकों को लेकर मिस्र विजय एवं ऐतिहासिक अन्वेषण के लिए प्रस्थान किया था। इन सैनिकों के साथ सैकड़ों पुरातत्व वेत्ता, रसायनशास्त्री तथा गणितज्ञ थे। बड़ी कठिनाई सं सिकंदरिया और काहिरा होते हुए मरुभूमि को पार कर वह गीजा के सबसे ऊँचे पिरामिड पर पहुँचा। वहाँ उसने पिरामिड के अन्दर अकेले ही प्रवेश किया, पर कुछ देर बाद ही उसे बाहर निकलना पड़ा। उसके प्राण अन्दर के दृश्य देखकर सूख गये थे। उस एकांतवास की भयानकता का इसके बाद उसने कभी वर्णन नहीं किया। उस अभिशप्त पिरामिड की छाया उसके ऊपर ऐसी पड़ी कि उसको विजयमाल धारण करने का सुअवसर भी प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि ब्रिटिश एडमिरल नेलसन से बुरी तरह पराजित होकर उसे मिस्र से हटना पड़ा था।
इसी प्रकार “फराओ” के पिरामिड के बारे में भी कहा जाता है कि उसमें अन्दर प्रविष्ट होने वालों का अनिष्ट हुए बिना नहीं रहता। कहा जाता है कि आज से कोई पाँच हजार वर्ष पूर्व मिस्र में सूर्य के उपासक - सविता आराधक “फराओं” नामक राजा का साम्राज्य सारे विश्व में फैला था। उनने स्मृति चिन्हों के यथावत् बनाये रखने के लिए न जाने उन्होंने कौन से विषैले पदार्थों या विषैली गैस का प्रयोग किया था जिससे वहाँ की प्रत्येक वस्तु विषाक्त बनी हुई है। मकबरे के किसी भी वस्तु से छेड़खानी करने पर व्यक्ति को मौत का शिकार होना ही पड़ता है। इस अलौकिक रहस्य को समझने के लिए ही विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिक समय-समय पर वहाँ आने का खतरा उठाते रहे हैं।
पिरामिडों पर अनुसंधान कर रहे मूर्धन्य वैज्ञानिकों के अनुसार मिस्र के प्राचीन निवासियों ने अपने मकबरे की सुरक्षा हेतु विषैले ‘प्रुसिक अम्ल’ का प्रयोग किया था। वे इसे नाशपाती के बीजों से बनाते थे और ममियों को उसी अम्ल में भिगोकर रखते थे जिससे वे सुरक्षित भी रहें व उन्हें कोई चुरा न सके। इस अम्ल को एक प्रकार की तीव्र स्नायु विष कहा जा सकता है। उनने मानसिक तनव फैलाने वाले एक और विष की खोज की थी, जिसे क्विक सिल्वर के विषैले गंधहीन वाष्पकणों से बनाया जाता था। मकबरे की खुदाई के समय डा. एवचिन व्हाइट इसी विषाक्त प्रभाव के कारण मृत्यु की गोद में चले गये थे।
कुछ वैज्ञानिकों ने “फराओ के शाप” को रेडियो एक्टिव जैसी कोई करामात माना है, जिससे शारीरिक और मानसिक कमजोरी तथा अंग-प्रत्यंग में शिथिलता का अनुभव वहाँ पहुँचने पर लोगों को परमाणु विज्ञान की भी पूर्ण जानकारी थी। सम्भवतः वे सौर किरणों के साथ आने वाली कास्मिक किरणों को संग्रह कर सड़ सकने वाले शवों को पूर्णतः विज्ञान सम्मत ढंग से बने पिरामिडों में सुरक्षित रखते थे। कृत्रिम ढंग से बने पिरामिडों में सुरक्षित रखते थे। कृत्रिम ढंग से बनाये गये पिरामिडों की उत्तर-दक्षिण धुरी पर विभिन्न सामग्री रखकर देखा गया है कि यह सही है। पिरामिड बने भी भूचुम्बकीय धाराओं के समुच्चय के बीच हैं। “पिरामिडॉलाजी” आज एक भली भाँति विकसित विधा है। केवल अभिशप्त स्थान न कह कर इस संबंध में विशद् अनुसंधान की आवश्यकता है।
स्वप्न यों तो सभी को आते है पर जन सामान्य को दिखाई पड़ने वाले सपनों में से अधिकाँश में अवचेतन मन का भटकाव ही रहता है। ऐसे सपनों के दृश्य बेसिर पैर के औंधे -सीधे होते है। जिनमें किसी प्रकार की क्रमबद्धता का सर्वथा अभाव होता है किन्तु भावनाओं को थोड़ा भी परिष्कृत परिमार्जित कर लिया जाये तो सार्थक और उच्च स्तरीय स्वप्नों को देखा व स्मरण रखा जाना सम्भव है, जिनमें अनागत भविष्य की महत्वपूर्ण सूचनायें निहित हों।
अण्डरस्टेण्डिग ह्यूमन बिहेवियर के ग्यारहवें खण्ड के ‘टुमारो टुडे’ शीर्षक के अंतर्गत देश -विदेश के अनेकों मूर्धन्य मनीषियों के ऐसे कितने ही विवरण छपे है, जिनने अनागत भविष्य की संभाव्य घटनाओं को प्रत्यक्ष देखा था। जो यथार्थता की कसौटी पर भी पर भी बाद में सही उतरी। ऐसे व्यक्तियों के निष्णात् इंजीनियर व कुशल ब्रिटिश यान चालक जे0 डब्ल्यू0 डुने प्रख्यात है, जिन्होंने अपनी पुस्तक “एन एक्सपेरीमेन्ट विद टाईम” में ऐसे अगणित घटनाक्रमों का उल्लेख किया है। एक स्थान पर अपनी पुस्तक में उनने लिखा है कि एक बार जब वे बोअर युद्ध के दौरान दक्षिण अफ्रीका में नियुक्त थे, तो एक रात को एक नाटकीय स्वप्न देखा। ऐसा लगा कि वे कि वे एक पहाड़ी ढलान पर खड़े-खड़े ऐसे ज्वालामुखी को देख रहे है जो फटने ही वाला है। इस भीषण नरसंहार का अनुमान कर वे चिल्ला-चिल्ला कर लोगों को सचेत करने लगे और तुरन्त ही फ्रांसीसी अधिकारियों से उनकी सहायता की अपील की। उन्हें अन्यत्र ले जाने के लिये वायुयान भेजे जाने का आग्रह किया इस बीच उनने देखा कि इस भयंकर प्राकृतिक आपदा से लगभग चार हजार लोगों की जानें चली गई। अनेक लोग अपंग अपाहिज बन गये। बच्चों के करुण क्रन्दन और बड़ों की आर्तनायुक्त चीत्कार से इस मध्य उनकी आँखें खुल गई।
इस प्रकार की अनेक घटनाओं को “डुने ड्रीम्स” नामक अपनी प्रसिद्ध उनने संकलित किया है, जिसका प्रथम प्रकाशन सन 1930 में हुआ। जब यह पुस्तक समकालीन ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक डा. जे.सी. बार्कर के हाथों लगी तो वे मानों सोते से जगे। उसे आधोपान्त पढ़ने के बाद उनके तार्किक मन में इस प्रकार के विचार कुलबुलाने लगे कि जब भावी घटनाओं का पूर्वाभास समय रहते ही मिल जाता है तो क्या मानवीय प्रयासों के द्वारा जन-धन की हानि टाली जा सकना संभव नहीं? और यदि शक्य है तो ऐसे प्रयास क्यों ना किये जायें। इस प्रकरण पर उनने गंभीरता पूर्वक विचार किया। चूँकि डा0 बार्कर को भी डॉक्टर डुने जैसे ही सपने आते थे और उनमें से अधिकाँश सही सिद्ध होते थे, इसलिये भी डा. बार्कर को ने इस दिशा में विशेष रुचि दिखाई।
घटना सन 1966 की है। रात्रि में डा0 बार्कर ने एक लोमहर्षक विभीषिका दृश्य देखा। वेल्स क्षेत्र की गगनचुम्बी पर्वतमालाओं में की उपत्यिका में बसा एक गाँव काई लगे वृहद शैल खण्डों के यकायक स्खलन होकर गिरने लुढ़क पड़ने की चपेट में आ गया है। खण्डहर हुए मकानों के छतों छप्परों के नीचे दबकर अगणित लोगों की जानें चली गयी। तराई क्षेत्र में चल रहे विद्यालय के लगभग सभी छोटे बड़े बच्चे इस प्राकृतिक आपदा में धराशायी हो गये। बच्चों की असहाय हृदयस्पर्शी करुण चीत्कार से यकायक जग पड़े। सोचने लगे “ आज इस स्वर्ण अवसर को हाथ से नहीं जाने दूँगा। बचाव का जितना प्रयत्न हो सकेगा, करूंगा। इससे एक आर जहाँ जान माल की क्षति को रोका जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर ऐसी महत्वपूर्ण सूचनाओं का लाभ व्यक्ति और समाज को मिलते रहने से वे स्वप्न की सार्थकता को समझ सकेंगे, और भविष्य में इन्हें झुठलाने, इनकी उपेक्षा करने की बजाय समय रहते चेत कर इनका फायदा हस्तगत कर सकेंगे। “इसी उधेड़बुन में प्रातः हो चला। सूर्य निकलते ही लन्दन के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक पत्र “ईवनिंग स्टैर्ण्डड” के प्रातः संस्करण के मुख पृष्ठ पर सुर्खियों में “वार्निंग इम्मीडियेट क्लीयरिंग हाउसएवर्टिंग कैमेलिटी” शीर्षक के अंतर्गत सनसनीखेज सूचना प्रकाशित करायी पर होनी को टाला नहीं जा सका। दुर्भाग्य से समाचार पत्र उस दिन उक्त क्षेत्र में समय पर नहीं पहुँच सका। जब पहुँचा तब काफी देर हो चुकी थी। फिर भी सूचना मिलते ही काफी लोग माल - असबाब को लेकर सुरक्षित क्षेत्र की ओर भागने लगे। घटना ठीक अपने निश्चित समय में घटी, जिसमें काफी प्रयासों के बाद भी बहुत सी जानें गयी। ‘स्वप्न संकेत द्वारा बचाव’- इस विद्या के प्रणेता डा0 बार्कर स्वयं भी इस घटना के दौरान ग्रामीणों की सुरक्षा व्यवस्था करने में अपनी जान गंवा बैठे। इस प्रकार अनागत भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के नियन्त्रण और फेरबदल करने जैसे अतिमहत्वपूर्ण शोध-कार्य को और आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इसी विपदा ने इस शोध कार्य का पटाक्षेप कर दिया।
इसी प्रकार क्लीवलैण्ड के जुलियस डिटमैन ने एक बार स्वप्न देखा कि निकटवर्ती बाँध अचानक टूट गया है और बड़ी संख्या में उस क्षेत्र में जान माल की क्षति हुई है। वह स्वयं भी उसकी चपेट में आ गया है एवं डूबता उतराता पानी में बहा जा रहा है। हाथ-पैर थक कर चूर हो गये है और अब वह डूबने ही वाला है। इस घबराहट की स्थिति में उसकी नींद खुल जाती है। तब प्रातः काल होने ही वाला था। थोड़ी देर और रुक कर बाँध अधिकारियों को डिटमैन ने अपने सपने की बात बतायी। चार अधिकारी अविलम्ब बाँध के निरीक्षण के लिये निकल पड़े। निरीक्षण के दौरान बाँध में एक जगह उन्हें एक बड़ा सूराख नजर आया, जिससे पानी बड़ी तेजी से बाहर निकल रहा था। तुरन्त स्थानीय लोगों को इसकी सूचना दे दी गई और किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाने को कहा गया। इधर सूराख को बन्द करने का प्रयास किया जाने लगा, पर सारे प्रयत्न निरर्थक साबित हुए। सूराख का आकार निरन्तर बढ़ता ही चला जा रहा था। जब जल प्रवाह को रोकना और सूराख को बन्द करना हर प्रकार से बेकाबू सिद्ध हुआ, तो काम करने वाले मजदूर व अधिकारी भी जल्दी ही वहाँ से अन्यत्र चले गये। एक घण्टे बाद बाँध टूट गया, पर तब तक उस क्षेत्र की आबादी करीब-करीब खाली हो चुकी थी। हाँ फसल और मकान अवश्य बर्बाद हो गये। एक स्वप्न ने व्यापक जन हानि को बचा लिया।
यही नहीं, सपनों द्वारा यदा कदा गढ़े धनों की सूचना मिल भी जाती है। वेट्टी फाक्स श्रापशायर, इंग्लैंड के एक गरीब किसान की पत्नी थी। दोनों परिश्रमपूर्वक खेत में काम करते और उससे जो कुछ भी प्राप्त होता, उसी से अपना जीवन चला रहे थे। किसान की पत्नी सात्विक विचारधारा की थी। एक दिन उसने स्वप्न में देखा योद्धा की वेशभूषा में कुछ लोग मिट्टी के नीचे कुछ दबा कर भाग रहे है। वेट्टी फैक्स ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, पर एक सप्ताह बाद फाँक्स को पुनः वही स्वप्न दिखाई पड़ा तो उसकी उत्सुकता बढ़ी। फावड़ा लेकर स्वप्न में निर्दिष्ट स्थान को उसने खोदा तो, नीचे सोने-चाँदी के सिक्कों से भरा एक घड़ा मिला। उसकी दरिद्रता मिटी और दंपत्ति धनवान बन गये। धन का उन्होंने दूसरों को लाभ पहुँचाने वाले कार्यों में ही सार्थक सुनियोजन किया।
एक बार श्री अरविन्द ने अपने एक ऐसे शिष्य को सपने में देखा, जिसका चेहरा काफी विभत्स था। वास्तविक जीवन में उसके शिष्य का चेहरा ऐसा बिल्कुल नहीं था। छः वर्ष बाद उसका वह सपना सच निकला। उस शिष्य का चेहरा स्वप्न में देखे चेहरे जैसा ही कुरूप हो गया था।
उपरोक्त घटनाओं में स्वप्न दृष्टा के जीवनक्रम शुद्ध सात्विक थे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ को वे अपना आदर्श मानते और व्यवहारिक जीवन में उनका अधिकाधिक पालन करते थे। विचारधारायें एवं भावनाएँ उच्च स्तर की थी। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन को इस आदर्शवादी साँचे में ढाल सके, भाव संवेदनाओं को सात्विक बना सके, तो उच्च स्तरीय व सार्थक स्वप्न उनका एवं समष्टि का भली भाँति हित साधन कर सकते है। स्वप्न मात्र मृगमरीचिका नहीं है, उनमें से कई सोद्देश्य होते है। मानवीय मस्तिष्क रूपी कल्पवृक्ष से जुड़ी इस विद्या के महत्व को स्वीकारा व इस दिशा में प्रगति के प्रयास किये जाने चाहिये।
भारतीय संस्कृति अति पुरातन है। उससे कहीं पुरातन जितनी कि काल गणना इस पृथ्वी की या मनुष्य जीवन की आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा की जाती है।
विश्व के अधिकाँश मानव विज्ञानी इस बात से सहमत है कि मनुष्य की सबसे प्राचीन वंशावली भारत की ही है। भारत पहले एक तैरता हुआ द्वीप था। जहाँ उन्नत सभ्यता वाले सुसंस्कृत लोगों का निवास था। आज जहाँ अमेरिका यू.एस.एस. है, वहीं पर प्राचीन काल में “होपी” नामक परम्परा प्रचलित थी, जो भारतीय परम्पराओं से मेल खाती है। सुप्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री डा. जूलियाओ टैलों ने पिसाकों पेरु के निकट ऐसे चित्र-विचित्र रंग के वर्तनों की खोज की है, जिन्हें देखकर हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता का भान होता है। सूर्य देव की उपासना का विधान इसमें स्पष्ट रूप से अंकित है। लोग इसे अमेरिकन इण्डियन सिविलाइजेशन के नाम से भी पुकारते हैं। अमेरिकन इण्डियन की खोज का श्रेय क्रिस्टोफर कोलम्बस को दिया जाता है। उसने इस खोज के उपरान्त एकत्रित किये गये तथ्यों को प्रकाशित करते हुए कहा था कि भारतीय संस्कृति ही सबसे प्राचीन है। एस्किमो जाति को भी उनने इसी की उत्पत्ति माना है। कोलम्बस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “आल डिसकवर्ड अमेरिका” में यह सिद्ध किया है कि उससे पुरातन संस्कृति उत्तरी अटलाँटिस की है, जहाँ पर भारतीयता के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं।
यू.एस.एस.आर. एकेडेमी ऑफ साइंस की मूर्धन्य वैज्ञानिक डा. मारिया क्लीनोवा ने अटलाँटिक महासागर में 6620 फुट तक की गहराई के पत्थरों का बड़ी गहनता के साथ अध्ययन किया है। उनके अनुसार इस क्षेत्र में सबसे अधिक लगभग एब लाख भूकम्प प्रतिवर्ष आते रहे हैं, जिसके कारण उसके आस पास की सभ्यता का विनाश हुआ है। इसी तरह “द रिडल आँ दी पैसीफिक” अर्थात् प्रशान्त महासागर की पहेली नामक पुस्तक से सुप्रसिद्ध लेखक जे मैकलिन ब्राउन ने लिखा है कि भारतीय संस्कृति के ध्वंसावशेष प्रशान्त महासागर में भी देखने को मिले हैं।
चीन में हुई शिन नाम के एक बौद्ध भिक्षु ने पाँचवीं सर्दी में विश्व की अनेक संस्कृतियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं उनके तुलनात्मक अध्ययन में गहन अभिरुचि दिखाई। गहन अध्ययन के पश्चात् तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए उनने बताया कि मैक्सिको की कलाकृतियों को देखकर यही कहा जा सकता है कि यह बुद्ध का हृदय है। हिटलर से 2000 वर्ष पूर्व की कलाकृतियों में कमल और स्वस्तिक स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। न्यू इंग्लैण्ड ऐन्टीक्विटीज रिसर्च ऐसोसिएशन’ के अध्यक्ष राबर्ट स्टोन के अनुसार सबसे पुरानी सभ्यता एवं संस्कृति भारत की ही है। उनका कहना है कि मिश्र के विलक्षण पिरामिडों का निर्माण सम्भवतः कालूसा नामक भारतीय जाति ने ही किया। दक्षिण अफ्रीका के कलाहारी रेगिस्तान में प्रागैतिहासिक काल की एक मानवाकृति प्रतिमा मिली है जिसके एक हाथ में प्रज्वलित लाल मशाल और दूसरे में धनुष बाण हैं। ये भारतीय संस्कृति के ही प्रतीक चिन्ह हैं।
पुरातत्व वेत्ताओं का कहना है कि आज से 4500 वर्ष पूर्व की सिन्धुघाटी की सभ्यता में मोहन जोदड़ो और हड़प्पा के निवासियों को देखने से यह स्पष्ट पता चलता है कि भारत तथा सुमेरिया की प्राचीन संस्कृतियों में काफी समरूपता है।
विश्व के अनेकों वैज्ञानिक नृतत्व विज्ञानी एवं पुरातत्ववेत्ता मानव जाति के इतिहास एवं प्राचीन संस्कृति का पता लगाने में अनुसंधानरत हैं। अफ्रीका के प्रख्यात वैज्ञानिक डा. लुईस लीकी ने तंजानियों में मिले ध्वंसावशेषों के परीक्षण के आधार पर बताया है कि मानव जाति का अस्तित्व आज से 20 लाख वर्ष पूर्व भी रहा होगा। अन्य वैज्ञानिकों ने भी इसकी जानकारी कार्बन अनुसंधान पद्धति के द्वारा प्राप्त की है और डा. लुईस के कथन को सही बताया है। इन भग्नावशेषों में भारतीय वास्तुकला की अमिट छाप देखने को मिलती है। पैकिंग के समीप चोऊ-कोऊ टेन नामक स्थान पर लगभग 7 लाख वर्ष पुराना जला हुआ मानव कंकाल मिला है जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि चीन में भी कभी दाह संस्कार की परम्पराएँ प्रचलित रही होंगी जो मूलतः भारतीय संस्कृति की देन है।
मिश्र के गुम्बजों में भारतीय संस्कृति के परिचायक शिल्प कला के उत्कृष्ट नमूने अभी भी जीर्ण शीर्ण स्थिति में देखे जो सकते हैं। देखने पर ये चित्र भूल भुलैया जैसे प्रतीत होते हैं। पर यदि उनका गहराई से अवलोकन किया जाय तो मरणोत्तर जीवन की वास्तविकता को प्रकट करते हुए नजर आते हैं। डैन्डेरा मिश्र से प्राप्त कलाकृतियाँ भी ऐसी हैं, जो हजारों वर्ष प्राचीन हैं, उनमें अन्य चित्राँकनों के अतिरिक्त राशि चक्र एवं ग्रह नक्षत्रों की पूरी जानकारी भी अंकित है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार इस प्रकार की कलाकृतियों को देखकर यही कहा जा सकता है कि इनके निर्माणकर्ता भारतीय ही रहे होंगे। नृवंश विज्ञानियों के अनुसार इजराइल की 10 विलुप्त मानव प्रजातियों में भारत की भी एक जाति सम्मिलित है जिसका सम्बन्ध मुख्यतया वास्तु एवं शिल्प कला से था। इससे पता चलता है कि भारतीय संस्कृत का विस्तार सारे विश्व में भा।
जापानी भाषा में सूर्य देवता के लिए “तैओवा” शब्द का प्रयोग किया गया है। उत्तरी कैलीफोर्निया में रहने वाले होपी जाति के भारतीय सूर्य को “शैपास” कहकर पुकारते हैं। सूर्य पूजा का क्रम कभी विश्व के लगभग सभी देशों में चलता था। जिस प्रकार भारत में कोर्णाक का सूर्य मन्दिर अपनी गरिमा बनाये हुए हैं, ठीक उसी तरह संसार के अन्य देशों में भी इन्हें पृथक पृथक नाम से सम्बोधित किया जाता है। टर्की में कनक यू.एस.एस.आर में काणरव्य, आयरलैंड में कार्ना, पुर्तगाल में कार्नाक्साइड के नाम से इन सूर्य मन्दिरों को लोग जानते हैं। ग्रीक संस्कृति में सूर्य और चन्द्रमा को पुरुष वाचक देवता न मानकर देवी मानते हैं और इस प्रकार सूर्य देवी को ऐलीओस तथा चन्द्र देवी को “सैलीन” के नाम से जाना जाता है। प्राचीन काल में इसी की पूजा का विधि विधान चला आ रहा है। एन्ड्रौस में भगवान के कच्छप अवतार का मन्दिर लोगों की श्रद्धा का केन्द्र बना है। इसकी खोज वैज्ञानिकों ने 1968 में की है। यह बहुत ही प्राचीन बताया जाता है। यहाँ पर जी के भीतर बना माया मन्दिर भी इसी तरह का है।
पिछले दिनों सोवियत रूप में एक प्राचीन ‘श्री’ यंत्र मिला है, जिस पर अंकित साँकेतिक ताँत्रिक विद्या को वैज्ञानिकों ने सुलभ लिया है। मास्को विश्वविद्यालय के मूर्धन्य वैज्ञानिक प्रो. कुलाशेव ने एक गणितीय फार्मला इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर में डाला तो उसकी जो प्रतिलिपि तैयार हुई वह भारतीय तंत्र विद्या के ‘श्री यंत्रम’ की थी। प्रो. कुलाशेव का कहना है कि भारतीय गणित विद्या तीन हजार वर्ष पूर्व भी आज से कहीं अधिक समुन्नत थी ओर इसका प्रचार प्रसार विश्व के सभी भागों में था।
“धेनुमार्ग” में अपभ्रंश बने डेनमार्क से लेकर “अर्जुन टीला” के अर्जेन्टीना बनने एवं भारत की चिर पुरातन परम्पराओं के विश्व के कोने कोने में भिन्न-भिन्न रूपों में पाये जाने से स्पष्ट है कि कभी भारतीय संस्कृति का प्रसार सारे विश्व में था। अब तो वह सिकुड़कर बृहत्तर भारत भी नहीं, और भी छोटी परिधि में आबद्ध हो गया। हमारा गौरवमय अतीत हमें ही पुनः लौटाना होगा। पश्चिमोन्तुख होने से तो उस अस्मिता को ओर हानि पहुँचती है। प्रसिद्ध भविष्य विज्ञानी नाँस्ट्राडेमस ने आज से चार शताब्दियों पूर्व भारत से ही सतयुग की वापसी का संकेत दे दिया था। जागना हमें है।
जो संसार को भव-बन्धन कहते हैं और उसे माया जाल बताकर खिंचे खिंचे रहते हैं। वे भगवान की सर्वोपरि कृति की अवमानना करते हैं। त्याज्य तो अपने में समाई दुर्भावना है, छोड़ने और कोसने लायक वही है।
छोटा सा चौदह सौ ग्राम का मस्तिष्क जो एक लिबलिबा द्रव्य मात्र है, अन्दर प्रवाहित विद्युत के “स्पार्क” के इधर-उधर होते ही कुछ ही कुछ चमत्कारी विभूतियाँ दिखाने लगता है। इंग्लैण्ड के ब्रिस्टल के पागलखाने में तीन बच्चे भरती हैं। सायकिएट्रिस्टों के अनुसार वे ऐसे तो पूरी तरह पागल हैं और अपना दैनन्दिन रुटीन कार्य भी सलीके से नहीं कर पाते, किन्तु तीनों एक-एक विषय के पारंगत हैं। उम्र इनकी छोटी है किन्तु वे अपने विषय विशेष में पूर्णतः पारंगत हैं, एवं कोई भी उस विद्या का विद्वान उनसे पूरी गम्भीरता से चर्चा मात्र ही नहीं अपितु मार्गदर्शन भी ले सकता हैं।
एक बच्चा है - पीटरसन। उम्र उसकी है 14 वर्ष। वह वैसे तो पूरी तरह पागल है, किन्तु उसके सामने दुनिया का बड़े से बड़ा वायलिन वादक भी कोई नवीनतम - क्लिष्टतम धुन बजाये तो वह मात्र सुनकर उसे पुनः बजा सकता है। उससे कभी चूक नहीं होती। यही नहीं, वह उसमें संशोधन भी सुझाता है वह उसे और भी मधुर बना देता है। वायलिन की कोई लगातार दस ध्वनियां भी बजाये तो वह उन सबको उसी क्रम में दुहरा देता है। बड़े बड़े संगीतज्ञ उसके समझ आकर हतप्रभ होकर रह जाते हैं।
दूसरा पागल है- डेविट कीट। किन्तु अतीव प्रतिभा सम्पन्न चित्रकार है। कोई भी सुन्दर दृश्य या क्लिष्ट संरचना का भवन हो तो वह तुरन्त उसकी अनुकृति बना देता है। एक बार दृश्य या चित्र देखने के बाद उसे पुनः देखने की जरूरत नहीं पड़ती। स्वतः भी वह कभी आड़ी टेढ़ी रेखाएँ खींचकर चित्र बनाता रहता है। “वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर” (यू.एस.ए.) के भवन के फोटो को देख कर ही उसने तीनों ही आयाम दर्शाता हुआ चित्र बना दिया।
तीसरे बालक का नाम है- स्टीवेन्स जो अति प्रतिभावान गणितज्ञ है कम्प्यूटर की तरह वह जटिल से जटिल गिनतियाँ तुरन्त कर दिखता है। विगत 700 वर्षों के किसी भी दिनाँक का वार, उस समय घटी घटनाएँ वह ऐसे बता देता है, जैसे उसके मस्तिष्क में वे चलचित्र की तरह घूम रही हों।
किन्तु एक बात है। वहाँ तक तो ठीक है, जो तीनों की अपनी-अपनी प्रतिभा का क्षेत्र है इससे इधर-उधर होते ही तीनों उच्छृंखल हो जाते हैं व तीव्र आवेश में आकर सामने वाले को भागने पर मजबूर कर देते हैं। वैज्ञानिक यह जवाब देने में असमर्थ हैं कि ऐसा क्यों होता है?
न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं कि हमने विज्ञान के नवीनतम अनुसंधानों से मानव मस्तिष्क की थाह पाली है। किन्तु कोई पागल किसी विधा विशेष में कैसे पारंगत है, यह प्रश्न अनुत्तरित है। ऐसा लगता है, मानों विधाता ने मनुष्य के साथ मसखरी है। उसने न्यूरोसर्किट में सारे तारों के जंजाल को तो अस्त व्यस्त कर दिया, किन्तु एक विभूति विशेष वाले सेण्टर को जरूरत से अधिक विकसित कर दिया। एक सम्भावना की भी झलक उस परमसत्ता ने माटी का पुतला बनाने वाले कुम्हार ने मनुष्य को दिखा दी कि वह मया के जंजाल में उलझा एक पागल है व छिपी क्षमताओं के प्रति अनजान है। यदि उसने अपने अन्दर छिपी सामर्थ्य को जाना व विकसित किया होता तो संभवतः वह भी विलक्षण सामर्थ्य सम्पन्न होता।
आइंस्टीन एक अति प्रतिभावान वैज्ञानिक थे, किन्तु अपने चिन्तन में इतना खोए रहते थे कि आस पास की उन्हें खबर ही नहीं रहती थी। एक बार घूम कर आए तो छड़ी को कमरे के कोने में रखकर स्वयं लेटने के स्थान पर छड़ी को बिस्तर पर लिटा दिया व विचारों में खोये स्वयं छड़ी के स्थान पर कोने में खड़े हो गए। उन्हें यहाँ पागल नहीं कहा जा रहा। विचार शृंखला की जटिलता का परिचय दिया जा रहा है। हो सकता है, इंग्लैण्ड क इन तीनों पागलों में मैनुहिन जैसा वयलिन वादक, पिकासो जैसा चित्रकार या रामानुजन् जैसा गणितज्ञ छिपा पड़ा हो। कुछ भी हो, वह नियन्ता है, बड़ा अद्भुत व अपने घटक मनुष्य को सतत् संकेत देता ही रहता है।
कानपुर जिले में खाँडेराव नामक एक सिद्ध संत हुए हैं। विठूर में पटकापुर गाँव में उनका आश्रम था। आश्रम के निकट ही एक विशाल वट वृक्ष था, जिसमें वर्षा और गरमी से बचने के लिए हजारों लोग आश्रय ले सकते थे।
श्री खाँडेराव ने वहाँ रह कर लम्बे समय तक गायत्री साधना की थी। एक बार गुरु पर्व के अवसर पर विशाल स्तर पर ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया। तैयारियाँ एक सप्ताह से चल रही थीं। सभी आवश्यक सामग्री इकट्ठी की जा रही थीं। समीपवर्ती क्षेत्र में महात्मा खंडेराव जी ने एक भोज का आयोजन किया है। प्रचार को देखते हुए प्रबन्ध भी बड़े स्तर पर किया गया। निश्चित दिन आया, तो सबेरे से ही लोगों का ताँता लगना आरम्भ हो गया। देखते-ही-देखते चारों ओर से भारी भीड़ आश्रम की ओर उमड़ पड़ी। भीड़ की विशालता और स्थान की कमी को देखते हुए सुबह से ही भोज की पंगतें भी आरम्भ कर दी गई। बड़ी धूमधाम से दिन भर भोज चलता रहा; किन्तु लोग अभी भी आते ही चले जा रहे थे। व्यवस्था मंडली उन्हें खिला-खिला कर उसी क्रम में विदा भी करती जा रही थी।
शाम से रात को चली; पर लोगों का आना अभी भी जारी रहा। अतः भोजन भी चलता रहा। यद्यपि व्यवस्था बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति के अनुमान के आधार पर की गई थी; मगर अनुमानित संख्या से भी बड़ी तादाद में लोग उपस्थित हुए। ऐसी स्थिति में सामानों की कमी पड़ जाना स्वाभाविक ही था। उस रात भी यही हुआ। अनेक आवश्यक सामग्री घट गई। औरों की तो जहाँ-तहाँ से पूर्ति कर ली गई; किन्तु घी कहीं उपलब्ध नहीं हो सका। आस-पास की दुकानों में भी तलाश की गई; पर कहीं भी व्यवस्था नहीं बन सकी। सभी चिन्तातुर हो उठे; मगर करते क्या? जितना कुछ हो सका, सामर्थ्य भर प्रयत्न किया। इससे अधिक वे कुछ कर भी नहीं सकते थे। उधर भीड़ बाहर इस आशा में बैठी थी कि भोजन अभी बन रहा है, तैयार होते ही परोसा जायेगा। बड़ी असमंजस की स्थिति थी। व्यवस्थापक परेशान हो रहे थे। इन्तजार कर रहे लोगों को न तो वस्तुस्थिति से अवगत कराया जा सकता था, न व्यवस्थापकगण उन्हें भोजन कराने की स्थिति में थे। स्थिति बोध कराने में अपमानित होने का भय था; पर ऐसे और कब तक लोगों को टाला जा सकता था? कुछ न कुछ तो प्रबन्ध करना ही था। अन्ततः बड़ा सोच-विचार कर व्यवस्था-मंडली ने समस्या को खाँडेराव जी के समक्ष रखने का विचार किया, यह समझ कर कि शायद वे कोई उपाय निकाल सकें। महात्मा जी ने जब यह सुना कि चार डिब्बे घी की कमी पड़ गई है और इसके बिना अभीष्ट परिणाम में भोजन नहीं पकाया जा सकता कि सभी उपस्थित जन संतुष्ट हो सकें, तो फिर, शान्त चित्त से ध्यान में बैठते हुए व्यवस्थापकों से वे बोले - “जाओ, गंगा जी से गंगा-जल भर लाओ और घी की जगह उसका ही प्रयोग करो।” लोगों ने इसे परिहास माना; पर जब बार-बार उनका आग्रह हुआ, तो वे उसे टाल न सके। चार व्यक्ति गये और चार डिब्बों में गंगा-जल भर लाये। उसी में पूड़ियाँ तली गयीं और अन्य व्यंजन बनाये गये तथा सभी को परोस गया। उस रात जिन-जिन लोगों ने भोजन किया, उनका कहना था कि ऐसा स्वादिष्ट भोजन उनने इससे पहले कभी नहीं किया था।
दूसरा दिन चार डिब्बा घी उनके निर्देश पर गंगा जी में डाल दिया गया। लोगों ने जब इसका कारण पूछा तो उनने बताया कि कल हमने चार डिब्बा घी गंगा जी से उधार माँगे थे, जो लौटाने जरूरी हैं। गायत्री साधना की शक्ति अपरम्पार है। सुपात्रों को वह मिलती है एवं वे प्रकृति की व्यवस्था से सामयिक तालमेल बिठाकर उसका चमत्कारी स्वरूप यदा कदा दिखला देते हैं किन्तु परब्रह्म की व्यवस्था में कभी व्यतिक्रम नहीं आने देते।
ब्रह्मवर्चस् की नूतन गतिविधियाँ
तर्क, तथ्य, प्रमाणों के इस युग में ब्रह्मवर्चस के वर्तमान स्वरूप एवं प्रतिपादनों ने जनमानस को, विशेषकर बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी ओर खींचने में अभूतपूर्व सफलता हस्तगत की है। 1979 में इसकी स्थापना के बाद यह उत्तरोत्तर प्रगति की दिशा में ही अग्रसर है। शुभारंभ यज्ञ विज्ञान एवं साधना से मानसोपचार प्रक्रिया से हुआ था, किन्तु अब वनौषधियों का रासायनिक विश्लेषण, उनके प्रभावों का विवेचन, संगीत की शक्ति एवं मंत्र शक्ति का शरीर, मन, वनस्पति व जीव जन्तु वर्ग पर प्रभाव, विभिन्न साधना उपचारों व जीव जंतु वर्ग पर प्रभाव, विभिन्न साधना उपचारों की शारीरिक क्रिया कलापों पर प्रभाव डालने की क्षमता जैसे विषय प्रयोग परक शृंखला में सम्मिलित होते चले जा रहे हैं। दार्शनिक अनुसंधान संबंधी प्रतिपादन तो इस पत्रिका में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। किन्तु प्रयोग निष्कर्षों हेतु वाँछित अवधि तक साधक वर्गों पर शोध प्रविधि के आधार पर अनुसंधान अनिवार्य था। अब क्रमशः ऐसी स्थिति बन रही है कि अपने अनुभव निष्कर्षों को बुलेटिन नुमा एक छोटे से प्रपत्र में अथवा इस पत्रिका के निर्धारित पृष्ठों पर समय-समय पर दी जाती रहे ताकि जनसाधारण को ब्रह्मवर्चस् के सक्रिय क्रिया-कलापों की जानकारी मिल सके।
यज्ञ अनुसंधान हेतु जो प्रायोगिक यज्ञशाला बनायी गयी थी, वह उपकरणों के बढ़ते चले जाने के कारण छोटी पड़ने लगी। अतः यही उचित समझा गया कि जो उपलब्ध है उसी में विस्तार कर लिया जाय। यज्ञशाला के पीछे इतना ही बड़ा एक परामर्श कक्ष था। अब उसे प्रदर्शनी कक्ष में स्थानांतरित कर दिया गया है। उस कक्ष को चारों ओर से काँच से बन्द कर उसमें वातानुकूलित यंत्र लगाया जा रहा है, ताकि संवेदनशील उपकरणों को धूप की तपन से बचाकर सक्रिय रखा जा सके। एक कम्प्यूटर इन्हीं दिनों इंग्लैण्ड से मंगाया गया है, जो विभिन्न आँकड़ों के विश्लेषण एवं जनसाधारण को चारों ओर लगे कलर माँनीटर्स द्वारा अन्दर चल रही गतिविधियों को दर्शाने में मदद देगा। संगीत शक्ति का महत्व, स्वरूप व प्रभाव बताने वाले “ड्युअल बीम प्रिसीजन आँसीलोस्कोप” यंत्र, यज्ञ धूम्र व रसायनों का विश्लेषण करने वाले “गैस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी यंत्र” को भी इसी कक्ष में लगाया जा रहा है। एक पिरामिड भी केन्द्र में बनाया जा रहा है। जो यज्ञ ऊर्जा व ब्रह्माण्डीय चेतना, व्यष्टिगत कुण्डलिनी शक्त व ब्राह्मी चेतन ऊर्जा के मध्य संबंधों का रहस्योद्घाटन करेगा। आगामी बसन्त पंचमी तक इस प्रयोगशाला का सारा रूप निखर कर आने की सम्भावना है।
अभूतपूर्व साहित्य सृजन गीता का विश्व कोश
गीता का विश्वकोश बनाने की आकांक्षा गुरुदेव की बहुत पुरानी है। कईबार इस योजना को प्रारम्भ भी किया गया, पर सामयिक कार्य सामने आते रहने के कारण यह लम्बी अवधि में पूरी होने वाली योजना सुनिश्चित क्रम से गतिशील न हो सकी।
अब उन्होंने संकल्प कर लिया है कि जीवन के इस अंतिम अध्याय में उस महती योजना को पूरा करके रहेंगे। इसके लिये उनने इसी आश्विन नवरात्रि से योजनाबद्ध प्रक्रिया अपनाकर कार्य आरम्भ कर दिया है। आशा की जानी चाहिए कि उनके निजी विशाल ज्ञान-भण्डार और संदर्भ-ग्रन्थों के सहारे यह महान कार्य सम्भवतः एक वर्ष में ही पूरा हो जायेगा। गीता के अठारह अध्यायों पर हर अध्याय एक हजार पृष्ठ इस ग्रन्थ विशेष में होंगे। इसे हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित करने की योजना है।
संसार भर की विभिन्न भाषाओं में प्रायः आठ हजार ग्रन्थों में गीता विषयक समीक्षा और टिप्पणियाँ उपलब्ध हैं। इनके महत्वपूर्ण अंशों का सार संक्षेप इसमें रहेगा। इसके अतिरिक्त संसार के सभी प्रमुख धर्मों और दर्शनों के गीता प्रतिपादनों से मेल खाते हुए उदाहरणों का भी समावेश रहेगा। आर्ष धर्म के अतिरिक्त ईसाई, मुस्लिम, पारसी, बुद्धतओं जैसे प्रमुख धर्मों में भी गीता के प्रतिपादनों में समर्थन संदर्भ हैं, यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जायेगा।
गीता विश्वकोश इस दृष्टि से लिखा जा रहा है कि वह विश्व धर्म का, विश्व तत्व दर्शन का एक साँगोपाँग ग्रन्थ बन सके। संसार में कहीं भी बसने वाले किसी भी संस्कृति और विचार विज्ञान के अनुयायी इस नव-निर्मित ग्रन्थ से ऐसा प्रकाश प्राप्त कर सकें, जिससे सभी को परस्पर अपनापन घुला हुआ दृष्टिगोचर हो और उसमें समन्वय के सारे भरपूर मात्रा में विद्यमान परिलक्षित हों।
यह अपने ढँग का अभूतपूर्व ग्रन्थ होगा। इस एक को ही पढ़ने के बाद अनेकानेक तत्व दर्शनों को पढ़ने की आवश्यकता पूरी हो जायेगी। ग्रंथ के पूरा होने व छपने की परिजनों को एक दो वर्ष से अधिक की प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी।
कल्पिक ऊर्जा के संयंत्र गायत्री नगर में
ऊर्जा के संसाधनों तेजी से हो रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में एक आँदोलन का रूप देने के लिए शाँतिकुँज ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। गैर परम्परागत ऊर्जा संबंधी सभी उपकरणों को “नेडा” उ. प्र. के सहयोग से लगाने का कार्य आरम्भ हो चुका हे। इसमें पवन चक्की से विद्युत, सोलर फोटोवोल्टिक सेल्स से कुएँ से जल खींचना, कूड़े व लकड़ी की खाद में 20 के. डब्ल्यू., की गैसी फायर यूनिट का संचालन, धान की भूसी से 5 हार्स पावन के स्टलिंग इंजन को चलाना व सोलर सेल्स की पैनेल्स द्वारा बीस वाँट की ट्यूबलाइटों को जलाना, डिस्टिल्ड वाटर बनाना कुछ ऐसे प्रयोजन हैं जो इन उपकरणों से पूरा होते हैं। इस दर्शनीय स्थली को जिसमें बहुमूल्य वनौषधि वाटिका है, देखने दूर-दूर से यात्री आते हैं।
पारिवारिक दीप यज्ञ
हर घर में एक कुण्डी दीपयज्ञ आयोजित करने की योजना आशातीत रूप से सफल हो रही है। जिनने इनका स्वरूप, उद्देश्य और प्रभाव कहीं देख-सुन लिया है, वे उसके लिए प्रसन्नता पूर्वक स्वीकृत दे देते हैं और जल्दी व्यवस्था करने का आग्रह करते हैं।
प्रयुक्त होने वाली उपचार सामग्री की लागत प्रायः एक रुपया आती है। उपस्थित जनों का स्वागत मात्र सौंफ, धनिए, शीतल जल से किया जाय, यह प्रावधान पहले ही है। इसलिये भी यह आयोजन बहुत सस्ते रहते हैं। देखने में आकर्षक लगते हैं। मण्डप मात्र झंडियों, बंदनवारों से बन जाता है। जो लोग गायत्री मंत्र का शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते, उनके लिये “हरि ॐ तत्सत्” का मानसिक जप करते रहने के लिये कह दिया जाता है।
इन परिवार दीप यज्ञों में महिलाओं, बालकों, गृह संचालकों को विशेष रूप से संबंधित किया जाता है। उन्हें कुरीतियों, अंध परम्पराओं को छोड़ने का उनसे विशेष रूप से आग्रह किया जाता है और प्रगति शील बनने की प्रेरणा देने वाले प्रवचन दिये जाते हैं। जिस परिवार के सम्मुख जो समस्याएँ प्रमुख हैं, उन्हीं का समाधान उन सबको बताया जाता है।
पारिवारिक पंचशीलों का प्रसार इन घरेलू आयोजनों का प्रधान लक्ष्य है। श्रमशीलता, मितव्ययिता, शिष्टता, सुव्यवस्था, सहकारिता के सद्गुणों से प्रत्येक परिवार को सुसम्पन्न बनाने की यह योजना लोकप्रिय हो रही है।
एक दिवसीय दीपयज्ञ एवं सूखे का सामना
अब क्षेत्र में गाँव-गाँव में सौ कुण्डी स्तर के दीप यज्ञों की शृंखला चल पड़ी है। याजकों से प्रौढ़ शिक्षा, दहेज विरोध तथा नशा निषेध, घरेलू शाक वाटिकाओं को लगाने की प्रतिज्ञा कराई जा रही है। सूखे से निपटने के लिये जगह-जगह श्रमदान मंडल बनाये जा रहे हैं। असमर्थों की सहायता के लिये मुट्ठी फण्ड निकालने को कहा गया है। बिहार, गुजरात, उड़ीसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सभी अंचलों के परिजनों से इसी प्रकार के समाचार प्राप्त हुए हैं।
अखण्ड ज्योति मनोरंजन के लिए चित्र विचित्र लेखों का लदस्ता बनाकर पाठकों का मन बहलाने वाली पत्रिका नहीं है। उसके पीछे एक उच्चस्तरीय लक्ष्य है, वह है लोक चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश एवं चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश। यह कार्य अति कठिन है। अन्तराल का कायाकल्प करने एवं सर्जरी के समान है। इसमें भावनाओं मान्यताओं, संवेदनाओं, आकांक्षाओं के अनेकानेक पक्षों स्तरों में नव चेतना का संचार एवं इसी हेतु उसमें कितने ही तर्कों, प्रमाणों और उदाहरणों का समावेश करना होता है। इस संग्रह के लिए मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतर कर हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं। हंस तो अपना-अपना ही पेटी भरते हैं, पर यहाँ उससे बढ़ बढ़ कर काम करना पड़ता है। यह मणि मुक्तक वितरण करने जैसे प्रक्रिया है, जिससे अनेकों को सुसज्जित समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। यही है वह प्रयत्न जिसमें राजहंस की तरह अखण्ड ज्योति के प्रयास पिछले 51 साल से अनवरत तत्परता के साथ चले आ रहे हैं। इसका परिणाम भी आशातीत हुआ है। प्रायः ढाई लाख ग्राहक और हर पत्रिका को कम से कम दस को पढ़ाये जाने का अनुबन्ध पच्चीस लाख को और पढ़ाने है। इस प्रकार सत्ताईस लाख के करीब पाठक उसे नियमित रूप से आद्योपान्त स्वाध्याय संदर्भ की तरह पढ़ते हैं जो पढ़ा है, उसका मनन चिन्तन करते है। और जो पढ़ा समझा है, उसे जीवनचर्या में उतारने का सामर्थ्य भर प्रयत्न करते हैं।
इसी की परिणति है कि व्यक्तित्व परिष्कार की दिशा में सहचरों के कदम तेजी से बढ़े हैं। उनने पेट प्रजनन तक सीमित न रहकर पुण्य परमार्थ की दिशा में प्रगतिशीलता से भरे पूरे कदम उठाये हैं। अपना आदर्श भले ही इतिहास के पृष्ठो में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने जैसा न बन पड़ा हो पर इतना निश्चित कि वे अपने परिवार को संपर्क क्षेत्र को सर्वसाधारण की अपेक्षा कहीं अधिक विचारशील चरित्रवान, एवं प्रगतिशील बनाने में समर्थ हुए हैं वे भी अपने परिकर को उत्कृष्टता की दिशाधारा के साथ जोड़ सकने में बहुत अंशों तक सफल हुए हैं। यह प्रक्रिया ऐसी है, जिससे व्यक्तियों को प्रामाणिक प्रतिभावान बनने में असाधारण योगदान मिलता है। अनेकानेक युगशिल्पियों का सृजन हुआ है। इनकी गतिविधियाँ देश धर्म ओर समाज संस्कृति की असाधारण सेवा कर सकने में सुफल हुई हैं।
वर्तमान पीढ़ी में भी बुद्धिवादियों का एक सबल पक्ष है। अगली पीढ़ी तो इस प्रयोजन में ओर भी अधिक बढ़ी चढ़ी होगी। तब हर बात तर्क तथ्य और प्रमाण की कसौटी पर कसी जायेगी और जो इस अग्नि परीक्षा में खरा सिद्ध होगा, वह अपनाया जायेगा, वही मान्यता प्राप्त करेगा। ऐसी दशा में यह आवश्यक था कि लोक चिन्तन के लिए प्रामाणिक समाधान प्रस्तुत किये जायँ, अन्यथा नास्तिकता, अनैतिकता के क्षेत्र में अराजकता उत्पन्न होने का भय है। यदि इतना न बन पड़ा तो नैतिक मूल्यों का तेजी से ह्रास होगा। मानवी मर्यादाओं का निर्बाध उल्लंघन होगा। वह अनुशासन बुरी तरह टूट रहा है। उच्छृंखलता, पतन पराभव के शिखर पर चढ़ दौड़ने के लिए आतुर हो रही है फिर जब उसे कोई तत्वदर्शन अनुशासन में बाँधने के लिए सुधारने के लिए विद्यमान न रहेगा, तो जो स्थिति उत्पन्न होगी उससे ईश्वर ही रक्षा कर सकता है।
समय की महती आवश्यकता थी, जिसे पूरी करने में अपना मिशन मूर्धन्य भूमिका निभाता रहा है। उसका प्रतिफल इतना महान बन पड़ा है कि अगले दिनों उससे भी अधिक उसका प्रभाव होने वाला है। यह चक्रवृद्धि क्रम है। एक से दस दस से सौ सौ से हजार होने जैसा। यह दिवास्वप्न नहीं है। उसे ऐसी सफलता के रूप में देखा जा सकता है, जिसकी यथार्थता को जाँचने परखने के लिए हर किसी को आमंत्रित किया जाता है।
उत्साहवर्धक भूत और उत्साहवर्धक भविष्य परिलक्षित होने का एक बड़ा कारण अखण्ड ज्योति का प्रतिपादन, प्रकाशन और प्रयत्न भी रहा है। यह असंदिग्ध है। उसके द्वारा संचालित यह प्रयास आगे और भी द्रुतगति से चलता रहेगा। अखण्ड ज्योति की लौ कभी भी धूमिल होने या बुझ जाने जैसी स्थिति में पहुँचने वाली नहीं है। उसके लिए ऐसा सुनिश्चित प्रबन्ध कर दिया गया है कि कम-से-कम बीसवीं सदी के अन्त तक तो अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर अपने स्तर का प्रतिपादन अक्षुण्ण बना रहे। भले ही उसे अपने स्तर का प्रतिपादन अक्षुण्ण बना रहे। भले ही उसे इन दिनों लिखने वाले जीवित रहें या न रहें। अदृश्य चेतना ही अब तक काम करती रही है और भविष्य में भी वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में सतत् संलग्न रहेगी। इस प्रकार यह प्राण संचार की प्रवृत्ति अपना लक्ष्य पूरा होने तक बिना थके मोर्चे की अग्रिम पंक्ति सम्भालती और अपने जौहर दिखाती रहेगी।
जो कुछ बन पड़ा है उसके श्रेयाधिकारी संचालक प्रस्तोता कम और उसके परिजन अधिक हैं। अखण्ड ज्योति अब से 51 वर्ष पूर्व जब आरम्भ हुई थी, जब उसका पहला अंक मात्र 500 छपा था। उसकी सदस्य संख्या बढ़ाने में संचालक स्वयं कोई बड़ी योजना न बना सके। चिन्तन मनन और अध्ययन अवगाहन में संलग्न व्यक्ति बहिरंग व्यवस्था बना सकने में अवकाश उपलब्ध करते हैं और उससे प्रचार तंत्र संभाल सकना संभव ही होता है। फिर पाँच सौ से आरम्भ होने वाला तंत्र अढ़ाई लाख ग्राहकों और पच्चीस लाख पाठकों समेत लगभग सत्ताईस लाख जितना कैसे बन गया? उसकी प्रेरणाओं ने वंशवृद्धि की तरह किस प्रकार लाखों करोड़ों की विचारणा और दिशाधारा में किस प्रकार कायाकल्प जैसा चमत्कार उत्पन्न किया? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है- इस सोमपान की रसास्वादन जिनने किया, उनने उस महाप्रसाद से अन्यान्यों को भी उपलब्ध कराने का प्राणपण से प्रयत्न किया। यही है मिशन के विकास में महती भूमिका संपन्न करने वाली प्रक्रिया। जो सफलता मिल सकी, जो प्रयास बन पड़ा। भविष्य की जो आशा बँधी उसमें अग्रणी रहे, वे परिजन जिनने स्वयं चलते रहना ही पर्याप्त न समझा वरन् अन्य अनेकानेकों को भी बिखरी कड़ियों की तरह एक सूत्र में पिरोया और लम्बी शृंखला मणिमुक्तकों की बहुमूल्य माला बना कर दिखाई। वस्तुतः लेखक मुद्रक के प्रयत्न सीमित और प्रचारकों का पुरुषार्थ अधिक सराहनीय रहा है।
यह तो हुआ अब तक की प्रगति का निरीक्षण परीक्षण। उस पर संतोष किया जा सकता है और गर्व भी। परिवार में परस्पर धन्यवाद देने और कृतज्ञता प्रकट करने की औपचारिक परिपाटी नहीं चलती। फिर संचालक और सदस्य ही क्यों उस शिष्टाचार को निबाहने के लिए बाधित हों? आन्तरिक श्रद्धा सद्भावों बनाये रहना और उसे अन्तराल में बहुमूल्य उपलब्धि की तरह छिपाये रहना भी पर्याप्त हो सकता है। वही दोनों पक्षों से बन भी पड़ा है मस्तिष्क ओर भुजाएँ दोनों ही एक दूसरे के बिना प्रकटीकरण के भी एक दूसरे के कृतज्ञ रहते हैं। रह भी रहे हैं।
प्रश्न अगले दिनों का है। जो काम करने को सामने पड़ा है, उसे पूरा करने का है। अभी हम लोग लाखों की सीमा का र्स्वश कर रहे हैं। अगले दिनों तो उसे करोड़ों की सीमा पार करके अरबों की अभिनव उत्कर्ष की बात सोचनी है केवल हिन्दी, गुजराती, मराठी उड़िया भाषाओं के क्षेत्र में काम करने रहना अपर्याप्त होगा। देश की संसार की अनेकानेक भाषाओं के माध्यम से गतिशीलता को सुविस्तृत करना है। अपने देश में भी 80 करोड़ की आबादी हो चुकी है। उसमें से हम लोग कुछ लाख लोगों को ही स्पर्श कर सके हैं। जो कार्य करना शेष है, वह उससे कहीं अधिक है। कई गुना है, जो कार्य करना शेष है, वह उससे कहीं अधिक है कई गुना है जो किया जा चुका। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्राँति का क्षेत्र इतना बड़ा है कि उसे संसार की समस्त राजक्रांतियों के सम्मिलित योग से भी अधिक भारी भरकम महत्वपूर्ण एवं आवश्यक माना जा सकता है। जन साधारण की विचारणा, मान्यता आकाँक्षा एवं दिशा धारा में उत्कृष्टता का समावेश न रहेगा, तो उलझनों को सुलझाने की समस्याओं के समाधान की कोई आशा बँधेगी नहीं। भविष्य निर्माण के लिए युग निर्माण के लिए जो प्रधान उपाय उपचार किया जाना है, वह एक ही है जन साधारण के व्यक्तित्व और कर्तृत्त्व आदर्शवादिता का अनुशासन कूट कूट कर भरा जाय उसे अभ्यास व्यवहार में उतारा जाय। यह बन पड़े तो समझना चाहिए कि संसार के सामने मुँह बाये खड़े संकटों में से तीन चौथाई का समाधान हो गया। इतना कर गुजरने पर तो मात्र उद्दण्डों को प्रताड़ना के माध्यम से सही राह पर चलने के लिए बाधित करना शेष रह जायेगा।
युग परिवर्तन के लक्ष्य की मंजिल एक छोटी सीमा तक ही पूरी हुई है। उसका बड़ा अंश तो अभी पूरा करना शेष रहा है। उसे पूरा किये बिना हममें से काई भी अपने कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व की इतिश्री न समझे, वरन् दूने चौगुने, सौगुने उत्साह से अपनी लगन गतिशीलता को तीव्र करे।
इस हेतु क्या-क्या करना पड़ेगा, उसकी योजनाएँ बनाना है। परिजनों का स्तर जैसे-जैसे उभरता आता है, वैसे-वैसे वे प्रस्तुत भी की जाती रहती हैं। वह सुधार संवर्धन का क्रम बदलती परिस्थितियों के अनुरूप आगे भी चलता रहेगा। यह प्रक्रिया अनवरत चलने वाली है और शाश्वत भी। मूल तथ्य यह है कि जिस गौमुख गंगोत्री से गंगा निकलती है, उस उद्गम को अधिक अनुदान दे सकने में समर्थ किस प्रकार बनाये रखा जाय। गंगा का प्रवाह ठीक रहा तो नहरें निकलेंगी। रजवाहे बनेंगे। कलावे लगेंगे और खेत-खेत में पानी पहुँचेगा। यदि उद्गम में प्रखरता न रह सकी, तो धीमे धारा प्रवाह को लेकर चलने वाली गंगा स्वयं का अस्तित्व तक अक्षुण्ण बनाये न रह सकेगी। फिर खेतों तक पानी कैसे पहुँचेगा और सर्वत्र धन धान्य की हरीतिमा दीख पड़ने का सुयोग कैसे बनेगा?
संकेत अखण्ड ज्योति की वर्तमान स्थिति को ओर है। उसके साथ मूलतः जुड़े हुए लोग मात्र अढ़ाई लाख हैं। यह संख्या संसार के प्रमुख पत्रों की तुलना में कहीं पीछे है। वे तो विज्ञापनों के सहारे सहायता स्रोतों के सहारे जीते और फलते-फूलते हैं। पर अखण्ड ज्योति के पास तो इन दोनों में से एक भी आधार नहीं है। उसकी स्थिरता और प्रगति तो पूरी तरह स्वजनों के प्रचार प्रयत्नों पर निर्भर है। अब तक तो बन पड़ा है, उसका श्रेय इसी एक स्रोत को है और उज्ज्वल भविष्य की आशा का अवलम्बन भी।
यदि वर्तमान ग्राहकों में से प्रत्येक को दो नये सदस्य बनाने, बढ़ाने का व्रत लेते बन पड़े तो यह बसन्त पर्व के जन्म जयन्ती पर प्रस्तुत की जाने वाली सर्वोत्तम श्रद्धाँजलि तो रहेगी ही, साथ ही उससे यह सुयोग भी बन पड़ेगा कि मिशन का प्रभाव और क्रिया कलाप भी अगले ही दिन तीन गुना हो जाय। छोटे सहयोग का इतना महान परिणाम निकलना आश्चर्यजनक तो है, किन्तु उसे देखकर प्रत्यक्ष चमत्कार की तरह ही समझा जा सकेगा। सन् 88 में वर्तमान सदस्य संख्या बढ़कर तीन गुनी हो जाय, यह बात बड़ी तो है, पर अब तक परिजनों द्वारा किये जाते रहे सहयोग को देखते हुए यह सरल भी है और सम्भव भी इसके सत्परिणामों के श्रेय उन्हीं को मिलेगा जो ऐसा कुछ कर गुजरने का बड़ा मन बना लेंगे।
महर्षि धौम्य के गुरुकुल में पाठ्यक्रम और सदाशयता का अनुशासन समान रूप से छात्रों को सिखाया जाता था। बीच-बीच में परीक्षा का क्रम भी चलता रहता।
एक दिन मूसलाधार वर्षा हुई। आश्रम के खेत में मेंड़ टूट गई थी। पानी बहा जा रहा था। नमी न रहने पर खेता में उपज ही क्या होती?
गुरु ने खेत का पानी रोकने के लिए एक शिष्य आरुणी को भेजा। उसने अपनी बुद्धि और मेहनत से सब कुछ किया पर पानी रुका नहीं।
आश्रम का हित और गुरु आदेश का महत्व आरुणी समझते थे और उपाय समझ में न आया तो वे उस स्थान पर स्वयं लेट गये जहाँ से पानी बह रहा था।
बहुत देर हो गई तो महर्षि विद्यार्थी की तलाश करने स्वयं निकले। देखा तो आरुणी मेंड़ का पानी रोकने के लिए स्वयं लेटा हुआ था।
महर्षि ने स्वयं पानी बन्द किया आरुणी को उठा कर छाती से लगा लिया बोले कर्तव्य परायणों की विद्या ही सार्थक होती है। सच्चा लाभ उन्हीं को मिलता है।
(हरिशंकर जोशी)
मैं अविनाशी हूँ, आदि अजन्मा, शाश्वत, सृष्टि पिता भगवान्। प्राण रूप हूँ, व्याप्त गगन में, सोऽहम्, सोऽहम् दिव्य महान॥
मैं जन्म मरण से मुक्त, सच्चिदानंद, अमर-अज अविनाशी। मैं व्यापक हूँ, सर्वत्र बँधा कब रहता हूँ, काबा काशी॥
मेरे ही कहने से चलते, सूर्य-चन्द्र ग्रह निशि, वासर। वर्षा, शीत, ग्रीष्म, ऋतु आती मेरा ही इंगित पाकर॥
पुष्पों में हूँ गन्थ रूप, जड़ चेतन में हूँ व्याप्त निखिल। अणु-अणु पर्यन्त सृष्टि, में मम सत्त बहती अविरल॥
मैं विश्व चेतना, ज्योतिर्मय-जग को, सृजेता बनकर माया। जड़ चेतन में प्रतिभासित होती, मेरी ही व्यापक छाया।
जब बढ़ता है पाप धरा पर, मैं दौड़ा-दौड़ा आता है। ज्ञानी मुझ में, मैं ज्ञानी में, अज्ञानी ने देख पीता॥
प्रकृति नटी के पर्दे पर, जगती को खेल बना करके। एक! एक से हो अनेक, सृष्टि का खेल रचा करके॥
उत्थान-पतन, संहार-सृजन के दृश्य अनेकों रचता हूँ। प्रलयान्तर में सबाके समेट, फिर स्वयं एक रह जाता हूँ।
*समाप्त*