समर्थ का आश्रय ले

जीवन स्थिर नहीं। उसके साथ जुड़ी हुई सुविधाओं का भी कोई ठिकाना नहीं। हँसना बचपन बोझिल जवानी की ओर बढ़ता है और कहार भरे बुढ़ापे में बदल जाता है। सम्पदा भी सदा किसका साथ देती है और मित्र, सहयोगी भी पानी के बबूले की तरह उछलते और समय के साथ आगे चले जाते हैं। अनुकूलताएँ सदा नहीं रहतीं। समय के बाद वे भी प्रतिकूलता में बदल जाती हैं। सूरज, चाँद तक जब स्थिर नहीं तो और किससे सदा साथ देने की आशा की जाय? जब शरीर तक साथ छोड़ जाता है, तो स्वजन सम्बन्धियों से ही कब तक साथ देने की आशा की जाय?

स्थिर इस संसार में एक ही है, जिसे धर्म कहते हैं। धर्म ही ईश्वर है। ईश्वर अर्थात् मानवी गरिमा के अनुरूप अपने को ढोलने के लिए विवश करने की व्यवस्था। यही है ईश्वर का आश्रय और धर्म का अवलम्बन। इन्हीं में सदा साथ देने और विश्वासपूर्वक मैत्री निबाहने की क्षमता है। वे इतने सुदृढ़ और अटल है कि संसार का कोई अंधड़ उन्हें डगमगाने में समर्थ नहीं।

जिस-तिस का आश्रय तकने और साथ निबाहने की आशा-अपेक्षा व्यर्थ है। जो स्वयं अस्थिर हैं, वे दूसरे किसका और कब तक साथ निभा सकेंगे। इस सृष्टि में मात्र धर्म और ईश्वर ही स्थिर व समर्थ हैं, जिन्हें अपनी परिष्कृत अन्तरात्मा में पाया जा सकता है। उन्हीं का आश्रय अपनाना बुद्धिमत्तापूर्ण है।


सम्पदा और उसका अनर्थकारी प्रलोभन

एक साधक ने तंत्र साधना की और अपने गुरु से यह विद्या सीख ली कि नियत नक्षत्र आने पर आकाश से रत्नवर्षा कराई जा सके और विपुल धन सहज ही प्राप्त किया जा सके। सफलता मिलने के बाद वह ठाट-बाट से रहने लगा।

एक दिन वह साधन वन मार्ग से किसी दूसरे प्रदेश को जा रहा था कि रास्ते में चोरों के समुदाय ने उसे पकड़ लिया और कहा- “तुम्हारे वस्त्राभूषण सम्पन्नों के से मालूम पड़ते हैं। जो कुछ पास है उसे तो निकाल कर यहाँ रखो ही, साथ ही अपनी दौलत का अता पता बताओ ताकि उसे भी हम लूट कर ला सकें। जब तक इतना काम नहीं हो जाता तब तक तुम्हें पेड़ से बाँध कर रखेंगे और कुछ अतिरिक्त हाथ न लगा तो तुम्हें मार देंगे।”

साधक बुरी तरह चंगुल में फंस गया। जो पास में था वह उतार कर रख ही दिया, पर चोरों को घर भेजकर परिवार की सारी सम्पदा लुटवा देने की बात गले न उतरी। अतएव उसे एक पेड़ से बाँध दिया गया। समय दिया कि एक सप्ताह के भीतर कुछ न मिला तो फिर उसका अन्त ही कर दिया जायगा।

प्राण जाने की चिन्ता में वह बहुत दुःखी रहने लगा। इतने में एक बात उसकी समझ में आई कि कल ही तो रत्न वर्षा ने वाला नक्षत्र है। क्यों न एक प्रयोग इन्हीं लोगों के लिए कर दिया जाए और विपुल धन लाभ करा कर अपना छुटकारा पा लिया जाय।

उसने डाकुओं को समीप बुलाया और सारी रहस्य वार्ता कह सुनाई। वह ताँत्रिक है। कल वह नक्षत्र है जिसमें मंत्र शक्ति से रत्न बरसाये जा सकते हैं। उसे छोड़ दिया जाय और आवश्यक पूजा करने की छूट दे दी जाय। कल आकाश में रात के समय रत्न बरसेंगे उन्हें वे लोग ले लें। बदले में उसे बंधन मुक्त कर दें, डाकू इस पर सहमत हो गये और उसके बंधन खोल दिये। आवश्यक पूजा-अर्चा करने के लिए जो साधन जरूरी थे, वे मँगा दिये। साधना सही थी। दूसरे दिन रात को रत्न बरसे। डाकुओं ने उन्हें बटोरा और निहाल हो गये। शर्त के अनुसार उसे छुटकारा भी दे दिया। लूटे गये वस्त्र, आभूषण भी लौटा दिये।

साधक ने इस विपत्ति से छुटकारा पाने पर ठण्डी साँस ली और आगे के रास्ते पर चल पड़ा। डस डाकू समुदाय का सरगना बहुत चतुर था। मार्ग में जो और डाकू मिले उन्हें साथ लेकर गया उपयुक्त निर्जन स्थान देखकर उन लोगों ने साधक को फिर पकड़ लिया और अगली रात फिर रत्न वर्षा करा देने का आदेश दिया। आनाकानी करने पर, जान जाने की बात भी स्पष्ट कर दी।

साधक पथिक ने रुआँसे होकर कहा- ऐसा नक्षत्र तो अब एक वर्ष बाद आयेगा। तब तक के लिए आप ठहरें। मैं लौटकर उस समय वह लाभ दिला दूँगा। अभी तो दया कर मुझे जाने दें। “

डाकुओं को उसकी बात पर विश्वास न हुआ, कैद कर लिया और रत्न वर्षा कल न करने पर जान जाने की बात बाद-बार याद दिलाते रहे। उन्हें एक वर्ष बाद नक्षत्र आने की बात पर विश्वास न हुआ। उस कथन को टालने का बहाना मात्र समझते रहे। निदान दूसरी रात प्रतीक्षा में देखी गई। रत्न वर्षा न करा सकने पर साधक की गरदन काट दी गई।


Quotation

ईश्वर को हृदय में बिठाया जा सकता है। मस्तिष्क की उस तक पहुँच नहीं है।


निष्काम कर्मयोग एक दार्शनिक विश्लेषण

कर्म ही वह केन्द्रीय धुरी है, जिस पर इस दृष्टि का गतिचक्र अविराम घूम रहा है। संसार में जो कुछ दृश्यमान है, उसका आधार यही प्रक्रिया है। जड़ कहे जाने वाले परमाणु में भी इलेक्ट्रान एक निश्चित परिकर में गति करते हुए अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखते हैं। चेतन-जीव जगत-भी भिन्न प्रकार की गतिविधियों-क्रिया-कलापों से अपने को नियोजित रखते हैं। कर्म में तत्पर हुए बिना यहाँ अपना अस्तित्व बनाए रह सकना असम्भव प्रायः है। जीवित रह सकें, इसके लिए कर्म आवश्यक ही नहीं-अनिवार्य भी है। मनुष्येत्तर निम्न श्रेणी के प्राणियों में यह प्रकृति प्रेरणा से परिचालित है। उदरपूर्ति, वंशवृद्धि एवं निज की रक्षा तक ही सीमित है। इन सीमित प्रयोजनों की परिधि में ही उनका सम्पूर्ण जीवन परिभ्रमण करता है और एक दिन-काल-अवलित हो जाता है। अतएव उनके लिए सुख, दुःख की उच्चस्तरीय वैचारिक चेतना के परिष्कार समष्टि से एकाकार होने की आत्मिक अनुभूतियाँ निरर्थक एवं परे है।

परम सत्ता के इस विश्व उद्यान में सर्वाधिक श्रेष्ठ एवं वरिष्ठ मानव मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से परिपूर्ण विकसित होने के कारण एन्द्रिक सुखों की लघु परिधि में सीमित नहीं रह सकता। उसे उच्चस्तरीय इन्द्रियातीत परम आनन्द की तलाश है, जिसके लिए अल्पज्ञतावश इस साँसारिक मृग मरीचिका में भटकता है। इस भटकाव से मुक्ति पाने, निज के स्वरूप को पहचानने के लिए ऋषि मनीषियों ने ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं कर्मयोग का मार्ग अपनाने हेतु निर्देशित किया है। इसमें कर्मयोग राजमार्ग की तरह सुप्रशस्त है। क्योंकि यह हर मनोभूमि के व्यक्तियों एवं वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल है। इसमें न तो भूलभुलैयों की दुरुहता है, न ही भटकाव की कोई गुँजाइश। यह इसलिए सभी के लिए उपयुक्त है क्योंकि मनुष्य आजीवन किसी न किसी रूप में कर्म करता ही रहता है। कर्मों से पूर्णतया विरत हो जाना कठिन ही नहीं असम्भव भी है। अतएव यदि कर्मयोग जीवन जी सकना सम्भव हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग एवं मोक्ष जैसी स्थिति का आनन्द पा सकना सबके लिए सम्भव है।

कर्म जीव और ब्रह्म को एकीकृत कर देने वाला योग तब बन जाता है, जब वह निष्काम हो। क्योंकि कामनाओं से जकड़े रहना ही भव-बंधन है और इनसे छूटना ही मुक्ति। कर्मों से विरति तो सम्भव नहीं है फिर इस संसार में कैसे रहा जाय? इसके लिए ईशावस्य उपनिषद् का ऋषि भी उपरोक्त उद्घोष करता हुआ कहता है- तेन त्यक्तेन भुज्जीथा- अर्थात् इस विश्व उद्यान में बिहा तो करें, इसका उपयोग करे, पर निर्लिप्त होकर निष्काम भाव से।

निष्काम कर्मयोग के सुविस्तीर्ण राजपथ पर चलने वाला पथिक, निज की इच्छाओं, वासनाओं को परमसत्ता के प्रति समर्पित कर देता है। उसका जीवन संकीर्ण स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं, अपितु भगवती चेतना के इस विश्व-उद्यान को अधिकाधिक पुष्पित, पल्लवित करने तथा इसे सुन्दर से सुन्दरतम बनाने में होता है। वह अपने कर्त्तव्यों के प्रति सतत् जागरुक एवं तत्पर रहता है। उनको भली प्रकार निर्वाह में उसे अनिर्वचनीय परमसुख की अनुभूमि होती है। इस प्रकार वह निरन्तर कर्म में निरत रहता हुआ दिखाई देने पर भी अंतर्मन से पूर्णतया अनासक्त होता है।

गीताकार ने इसी को समत्व भी कहा है और सभी प्रकार के योगों में इसे उत्कृष्ट बताया है। समत्व का तात्पर्य है समान भाव, चित्तवृत्तियों की चंचलता का सहज निरोध। जिसे योगदर्शन के प्रणेता पातंजलि ने योगश्चिन्तवृत्ति निरोध” कहकर समझाया है। गीता ने इसे ही समत्व कहा है। चित्त का चंचल होना कर्मों में बाधा, व्यतिरेक पैदा करता है। हानि लाभ, यश-अपयश, सुख-दुःख की उलझनों में जिसका मन सदा ही उलझता रहता है। जय होने पर जिसका अभिमान अस्सी गुना बढ़ जाता है, पराजय से जिसका मनोबल चूर-चूर हो जाता है। उससे सही ढंग से कर्म नहीं हो सकते हैं। जो हर परिस्थितियों, उद्विग्नताओं से रहित होकर दृढ़ मनोबल से परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पित भाव से कर्म करता है, वह ही इस समत्व भाव की निष्काम कर्मयोग की सच्ची आराधना करता है।

ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म, निष्काम कर्मयोग की प्रथम अनिवार्यता है। सामान्यतया मनुष्य जो कर्म करता है, उसका कारण शुद्र स्वार्थपरता ही है, उस समय वैश्व सत्ता की इस अनुपम कलाकृति को सजाने, सँवारने का विचार नहीं रहता है। स्वार्थ हेतु कर्म से संलग्न व्यक्ति अपने को प्रधान और परमात्मा को गौण मानता है। भला यदि किरण को प्रधान तथा सूर्य को नगण्य माना जाय तो यह अज्ञान के सिवा और है क्या? अतएव इस अज्ञानता के निवारण एवं ब्रह्मापर्ण बुद्धि से कार्य करने के सद्ज्ञान की प्राप्ति कराने वाले इस निष्काम कर्मयोग को ही “समत्वयोग” और बुद्धियोग भी कहा गया है, आस्था संकट एवं सारे अभावों की जड़ यह अज्ञान ही है, यदि इस भावना का समूलनाथ हो जाय तो संकीर्ण स्वार्थपरता के गहन, गम्भीर अंधकार में डूबा मानव निकले और विश्वात्मा के शाश्वत आलोक में आकर कुछ परमार्थ की भी सोचे। पर इसका प्रारम्भ संग त्यक्त्वा अर्थात् निष्कामता से ही होता है।

कर्म के परिणाम के प्रति अनासक्त होना इस दृष्टि से भी आवश्यक है कि मनुष्य का अधिकार क्षेत्र मात्र कर्म करने तक ही सीमित है। फल इस सीमा से बाहर है। यह तो सही है कि प्रत्येक कर्म का फल भी है और निश्चित समय पर उसकी प्राप्ति भी सुनिश्चित है, पर यह भी यथार्थ है कि इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया का संचालन सूत्र किन्हीं अदृश्य हाथों में ही है। कई बार इस कर्मफल प्रक्रिया में व्यतिरेक होने जैसा आभास भी लगता है। एक निश्चित प्रकार के कर्म करने पर भी उसका सम्भावित परिणाम न देखकर कर्मफल व्यवस्था पर मन आशंकित हो उठता है। पर ऐसा होने का कारण यही है कि कर्मफल के सिद्धान्त को सही ढंग से समझाया नहीं गया। वर्तमान जीवन एवं इससे सम्बद्ध भली-बुरी उपलब्धियाँ मात्र इसी जीवन की नहीं अपितु पूर्व संचित कर्मों का भी परिणाम है। कई बार ऐसा होता है, अच्छे कर्म करने पर भी परिणाम अनुकूल नहीं होते, बीच में ऐसे विघ्न, व्यतिरेक आ जाते हैं, जिसका निवारण मानवी सामर्थ्य से परे है। पर यह है वस्तुतः अदृश्य कर्मों के फल जो पूर्व जन्मों में सम्पादित किए गए है। जो कर्मफल की शाश्वत व्यवस्था के अनुसार कालान्तर में विविध रूपों में प्रकट होते हैं। अतएव कर्म फल की प्राप्ति पूर्णतया सत्य होते हुए भी उसे आसक्ति का सर्वथा त्याग ही श्रेयस्कर है। इसके प्रति आसक्ति होने एवं मनोनुकूल परिणाम न मिलने पर मनुष्य हताशा और निराशा के गहरे गर्त में समा जाता है।

कर्मयोग के सुप्रसिद्ध व्याख्याकार स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- निरन्तर कर्म करना पर उसमें पूर्ण अनासक्ति यही है जीवन का केन्द्रीय भाव। चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही दुरूह व कंटकाकीर्ण क्यों न हों, यहाँ तक कि मौत के मुँह में जाकर भी बिना तर्क वितर्क किए मानव एवं मानवता की सेवा और सहायता के लिए तत्पर रहो। क्षुद्र स्वार्थों की बेड़ियाँ तोड़ दो, भले ही वे सोने की ही क्यों न हों? सम्पूर्ण विश्व शिव का स्वरूप ही है। आसक्ति को त्याग कर आत्मबल का अवलम्बन लेकर इसकी सेवा करना, इसे उत्कृष्ट बनाना ही कर्मयोग का सही स्वरूप है। “शिव भावे जीव सेवा” इस महामंत्र को हृदयंगम करने पर ही कर्मयोग की व्याख्या समझ में आ सकती है।

निष्काम कर्मयोग के संदर्भ में कुछ लोग भ्रान्त धारणाएँ बना बैठे है। ये लोग विवेक को ताक पर रख कर रहते हैं कि जो भी कर्म हम करते हैं उनका कराने वाला तो परमात्मा है। यह काम अच्छा है या बुरा इससे हमें क्या चिन्ता? इस भ्रान्त धारणा के पोषण करने से मनुष्य कर्म और अकर्म के बीच विभेद नहीं कर पाता। होता यह है कि मन की निम्नगामी प्रवृत्तियाँ पूरी तरह स्वतंत्र हो जाती है। फलतः उत्थान की जगह पतन का पथ ही प्रशस्त होता है।

परमात्मा जो सृष्टि का नियामक और समूची सृष्टि का संचालक है, उसने मानव को विवेक बुद्धि प्रदान कर कर्मों का अधिष्ठाता बनाया है। उसे कर्म करने की पूरी स्वतंत्रता है। चाहे तो वह सत्कर्मों का सत्पथ अपना कर आत्मिक प्रगति के आलोकमय पथ पर चले अथवा दुष्कर्मों के कुमार्ग पर चलकर अवनति और पतन के गहरे अंधेरे गर्त में समा जाय। भले-बुरे कर्मों का उत्तरदायी मनुष्य ही है न कि परमात्मा। ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ से युक्त परमसत्ता भला दुष्कर्मों की प्रेरणाएँ दे भी कैसे सकती है? ऐसी प्रेरणाएँ तो मनुष्य के अपवित्र एवं कलुषित मन की उपज है। उस दिव्य सत्ता का प्रतीक प्रतिनिधि आत्मा तो हर एक के अन्दर विराजमान है जो नित्य-निरन्तर उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ सम्प्रेषित करता है। जो मन की उपेक्षा-अवहेलना के कारण व्यवहार जगत में नहीं आ पाती है। अतएव कर्माकर्म का दायित्व अपने ऊपर न मानना निष्काम कर्मयोग के अर्थ का अनर्थ करना ही है।

अनासक्त कर्मयोग- यह शब्द ही अपना वास्तविक अर्थ सुस्पष्ट करता है। अनासक्ति का तात्पर्य है-राग, द्वेष से विरति। कोई भी कर्म चाहे वह छोटा हो या बड़ा किया जाय तो उसमें कर्तव्य का शुद्र अभिमान न जोड़ा जाय। यह अभिमान ही पापों का मूल है और उसकी उत्पत्ति का एक मात्र कारण है-आसक्ति। दूसरा शब्द है कर्मयोग। गीताकार ने इसकी व्याख्या “योग कर्मसु कौशलम्” अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है- कहर कर की है और कार्य कुशल वहीं हो सकता है जिसे अनुचित और उचित कर्मों के अन्तर का परिपूर्ण ज्ञान हो। इस कुशल शब्द में वस्तुतः सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की त्रिवेणी प्रवाहित है। अतएव कार्य कुशलता में किसी भी तरह अशुभ-अशिव की गुंजाइश ही नहीं है। अनासक्त कर्मयोग का सही माने में तात्पर्य यही है कि काम को पूरी कुशलता के साथ शुद्र अहंकार का त्याग कर किया जाय और उसके फल में स्पृहा न हो। इस निष्काम कर्म योग के तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करके इस सुप्रशस्त, भागवती चेतना के दिव्य आलोक से अलोकित राजमार्ग पर चलकर कोई भी इस संसार में रहते हुए आत्मिक उत्कर्ष के चरम शिखर पर आरुढ़ हो सकता है और जीवन मुक्ति का, परमानंद का रसास्वादन कर सकता है।


सेवा का आवेदन (Kahani)

युद्ध के बाद ज्यूरिन में भयंकर अकाल पड़ा। साथ ही महामारियां भी फूट पड़ीं। इस आग से जूझने के लिए स्वयं सेवकों की जरूरत पड़ी।

ज्यूरिन के एक समाज सेवा पेवरिन ने पीड़ितों की सहायता के लिए एक सेवा समिति गठित की। स्वयं सेवकों के लिए मार्मिक अपील छपी।

इस पुकार को सुनकर एक नव विवाहित दम्पत्ति सामने आये थे। पति का नाम यूसो, पत्नी का सेर लाओ। वे सेवा का आवेदन लेकर आये थे।

पेवरिन ने कहा- यदि सच्चे अर्थों में सेवा करना है तो आप लोग बच्चे न जनने का व्रत लें। अन्यथा उस झंझट के कारण आप सच्चे मन और पूर समय तक लगन पूर्वक काम न करे सकेंगे। विचार करके दूसरे दिन आने के लिए उन्हें कहा गया।

पति पत्नी दूसरे दिन नियत समय पर सेवाधिकारी के पास पहुँचे। उनने बाइबिल हाथ में लेकर आजीवन बच्चे न जनने का और सदा सेवा धर्म में लगे रहने की प्रतिज्ञा की।

पेवरिन की आँखों में आँसू छलक आये। उन्होंने उस सच्चे व्रती दंपत्ति को हृदय खोलकर आशीर्वाद दिया और काम में जुटा दिया। उनके आदर्श ने अनेकों को प्रेरणा दी और वैसे ही व्रतधारी स्वयं सेवक एक हजार की संख्या में भर्ती हो गये।

विपत्ति से जूझने में इन सबने मोर्चा संभाला और लाखों के प्राण बचाये। यूसो दम्पत्ति का अग्रिम कदम उस क्षेत्र में अभी भी भावना पूर्वक स्मरण किया जाता है। उन दिनों भी उन्हें धर्म प्राणों से बढ़कर आदर मिला था।


सुसन्तति का वरदान

राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ के आश्रम में पत्नी समेत पहुँचे। उनका अभिप्राय सन्तान के लिए वरदान प्राप्त करने का था। बड़ी आयु को जाने पर भी उनकी कोई सन्तान न हुई थी।

गुरु समर्थ तो थे, पर मुफ्त में वरदान देकर किसी पर ऐसा कर्ज नहीं लादना चाहते थे, जिसका प्रतिदान उसे आगे चलकर ब्याज समेत चुकाना पड़े और उसे चुकाने में अब से भी अधिक त्रास सहना पड़े।

राजा दिलीप के सम्बन्ध में तो सन्तान का प्रश्न भी जुड़ा था। वरदान ऐसी सन्तान का होना चाहिए, जो बड़ा होने पर महामानवों में गिना जा सकें। आदर्शवादी ही महामानव हो सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि पिता-माता भी पुण्य परमार्थ की सम्पदा से सुसज्जित हों, अन्यथा ऐसी ही सन्तानों को जन्म दिया जा सकता है, जो अपयश बटोरे और कुकर्म में निरत रहकर अपने पूर्वजों की भी प्रतिष्ठा नष्ट करें।

इन सब बातों पर विचार करते हुए आवश्यक प्रतीत हुआ कि राजा द्वारा ऐसी सेवा भावना और आदर्शवादिता को बढ़ाने वाला कोई काम सीखा जाय।

वशिष्ठ जी ने एक वर्ष तक उनको अपने आश्रम में रहकर गौएँ चराने का काम सौंपा। आश्रम की अधिकाँश आवश्यकतायें गौ-पालन से ही पूरी होती थीं। इसलिए गौ-सेवा को प्रकारान्तर से आश्रम की सेवा, गुरु-सेवा के समतुल्य ही समझा जाता था।

दिलीप ने आदेश शिरोधार्य किया और आश्रम में निवास करने लगे। प्रातः रानी समेत आश्रम की गौएँ चराने जंगल में निकल जाते, शाम को वापस लौटते।

बहुत दिन यह क्रम साधारण रीति से चलता रहा। एक दिन एक विशेष घटना हुई। एक सिंह ने आश्रम की एक गाय को दबोच लिया। राजा ने सिंह को मारने के लिए धनुष-बाण संधान किया, पर आश्चर्य यह कि वह चल ही न सका। राजन दौड़ कर सिंह के पास गये और उसे अन्य उपायों से भगाने का प्रयत्न करने लगे।

सिंह ने मनुष्य की बोली में कहा मैं शिव दरबार का सिंह हूँ। मुझे भी तो भोजन चाहिए। वन पशु ही मेरा भोजन है। मैं इस गाय को नहीं छोड़ सकता। यदि इसे छुड़ाना है तो बदले में अपना माँस दो। दिलीप ने इसे स्वीकार कर लिया और सिंह के सामने जाकर बैठ गये। आश्रम की गाय को क्षति पहुँचाना उन्हें अपना शरीर देने से भी अधिक मारी पड़ रहा था।”

सिंह वशिष्ठ के संकेत पर शिवजी द्वारा राजा की परीक्षा लेने के लिए भेजा गया था, राजा उसमें उत्तीर्ण हो गये। सिंह वापस चला गया। राजा और गौएँ आश्रम सकुशल आ गये। एक वर्ष की अवधि भी पूरी होने जा रही थी।

वशिष्ठ जी ने दिलीप को सुसन्तति का आशीर्वाद देकर विदा किया। दिलीप ने अनेक पीढ़ियों तक एक से एक बढ़कर प्रतापी और आदर्शवादी बालक उत्पन्न होते रहे।


Quotation

ग्वाले की तरह देवता लाठी लेकर किसी की रक्षा नहीं करते। वे जिस पर प्रसन्न होते हैं, उसकी समझ में प्रज्ञा बना देते हैं।


आस्तिकता मानव जीवन की आधार शिला

अनीश्वरवादियों का कथन है कि विज्ञान द्वारा ईश्वर सिद्ध नहीं होता तो हम उसे क्यों माने? विचारणीय बात यह है कि क्या हम केवल उन्हें बातों को मानते हैं जो प्रत्यक्ष या विज्ञान सम्मत है? जीवन के कितने ही आदर्श और तथ्य ऐसे है, जिनका सीधा सम्बन्ध अन्तरात्मा से है। नीति शास्त्र का आधार यही है। धर्म सदाचार, नीति, कर्त्तव्य परमार्थ आदि को विज्ञान की कसौटी पर यदि कसा जाय तो यह सभी कुछ व्यर्थ प्रतीत होगा और मनुष्य को पशु की तरह आचरण करना ठीक प्रतीत होगा।

आधुनिक विज्ञान द्वारा ईश्वर को सिद्ध या असिद्ध करने का प्रयास हास्यास्पद है। जिस विज्ञान कहा जाता है- वह वस्तुतः पदार्थ विज्ञान है। पदार्थों के बारे में खोज करना, पदार्थों से जीवनोपयोगी प्रयोजन सिद्ध करना इस भौतिक विज्ञान की मर्यादा है। इसके अतिरिक्त वह अधिक सूक्ष्म तत्वों तक पहुँच सकने में असमर्थ है।

नीति, शास्त्र, सदाचार, त्याग, बलिदान, परोपकार, संयम जैसे आवश्यक विषयों में विज्ञान की कोई पहुँच नहीं, यदि विषयों को वान के आधार पर हल किया जाय तो उन उपयोगी मान्यताओं को त्यागना पड़ेगा जो मानवीय सामाजिक जीवन के लिए मेरुदण्ड के समान आवश्यक है।

विज्ञान की दृष्टि में नर और मादा का यौन सम्बन्ध स्वाभाविक है। उसमें बहिन, पुत्री या माता का कोई विचार नहीं होता। जब सृष्टि के अन्य सभी जीव-जन्तु अपनी बहिन, पुत्री या माता के साथ यौन संबंध करने में कोई संकोच नहीं करते तो मनुष्य ही क्यों करें। इस प्रतिबन्ध का, इन मर्यादाओं का विज्ञान समर्थन नहीं करता, वरन् उन्हें व्यर्थ बताता है। यदि विज्ञान की कसौटी पर यौन सदाचार व्यर्थ सिद्ध होता है तो क्या हम उसकी व्यर्थता स्वीकार कर लेंगे और पशुओं की तरह बहिन, पुत्री एवं माता की मर्यादा को छोड़ देने के लिए उद्यत होगे?

विज्ञान के अनुसार जीव, जीव का भोजन है। प्रत्येक प्राणी के लिये अपना स्वार्थ ही प्रधान है। फिर त्याग, बलिदान, उदारता, दान सेवा और परोपकार का महत्व कहाँ रहेगा? जीवधारियों के गुण-धर्म के बारे में विज्ञान की कसौटी प्राणी की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही है। सभी जीवों को अपनी क्षुधाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए जो भी अवसर मिलता है, उससे बिना उचित अनुचित का विचार किए लाभ उठाते हैं, फिर मनुष्य भी यदि वैसा ही करता है तो उसमें क्या अनुचित है? स्वार्थपरता एवं स्वच्छन्द भोगवाद का विरोध विज्ञान के द्वारा नहीं हो सकता, वरन् उसके आधार पर तो समर्थन ही करना पड़ेगा। ऐसी दशा में क्या हम विज्ञान को ही सब कुछ मानकर परमार्थ की प्रवृत्ति को मानकर जीवन से बहिष्कृत करने को तत्पर होगा? और यदि होगे तो क्या उसके फलस्वरूप किसी सत्परिणाम की आशा करेंगे?

विज्ञान बताता है कि मौत से हर प्राणी डरता है, बचता है, लड़ता है और भागता है। यह जीव का स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को भी इस स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को इस स्वाभाविक धर्म से बँधा हुआ मान लिया जाय तो फिर मृत्यु के लिए हँसते हुये तैयार रहने वाले सैनिकों एवं देश धर्म पर बलिदान होने वाले महामानवों को प्रकृति विरोधी एवं मूर्ख ही मानना पड़ेगा। फाँसी का हुक्म सुनने के बाद जिसके वजन जेल की कोठरियों में आठ आठ पौण्ड बढ़ गए, उन क्राँतिकारियों को मौत से डर न लगने का विज्ञान के पास क्या उत्तर है।

इस प्रकार ईश्वर आँखों से न दिखाई देना या वैज्ञानिक यंत्रों से उसका प्रमाणित न होना इतना बड़ा कारण नहीं कि जिसके आधार पर उस महान सत्ता के अस्तित्व से इनकार किया जा सके। इस संसार में सभी कुछ तो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। फोटोन्स, लक्सान्स आँखों से कब देखे जा सके है।

ईश्वर दिखाई नहीं देता इसलिये उसे न माना जाय यह कोई युक्ति नहीं है। अनेकों वस्तुएं ऐसी है जो आँख से नहीं दीखती फिर भी उन्हें अन्य आधारों से अनुभव करते हैं और मानते हैं। कोई वस्तु बहुत दूर होने से दिखाई नहीं पड़ती, पक्षी जब आकाश में बहुत ऊँचा उड़ जाता है तो दीखता नहीं। कोई वस्तु नेत्रों के बहुत समीप हो तो भी वह नहीं दीखती। अपने पलक या आँखों में लगा हुआ काजल अपने को कहाँ दीखता है? यदि नेत्र न हों, कोई व्यक्ति अन्धा हो तो भी उसे वस्तुएं नहीं दीखेगी, इसका अर्थ यह नहीं कि वे वस्तुएँ है ही नहीं। चित्त उद्विग्न हो, मन कही दूसरी जगह पड़ा हो, किसी समस्या के चिन्तन लगा हो तो आँख के आगे से कोई चीज गुजर जाने पर भी वह दिखाई नहीं देती। बहुत सूक्ष्म वस्तुएँ भी कहाँ दिखाई देती है? परमाणु या रोग के कीटाणु बिना सूक्ष्मदर्शी यंत्र के दीखते नहीं। किसी पर्दे की आड़ में रखी हुई, सन्दूक आदि में बंद की हुई, जमीन में गढ़ी हुई वस्तुओं को भी आंखें कहाँ देख पाती है? सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में तारे नहीं दिखते। पानी में नमक घुल जाता है तो फिर नमक दीखता नहीं, फिर भी पानी में उसका अस्तित्व तो रहता ही है।

जो वस्तु दिखाई न दे, वह है ही नहीं, यह मान्यता किसी प्रकार भी उचित नहीं ठहराई जा सकती। केवल आंखें ही किसी वस्तु के अस्तित्व को प्रमाणित करने का एकमात्र साधन नहीं है।

ईश्वर के अस्तित्व से केवल इस कारण इनकार करना कि वह आज के अल्प विकसित विज्ञान या बुद्धिवाद की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, कोई ठोस कारण नहीं है। प्रत्यक्ष के आधार पर तो यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि हमारा पिता वस्तुतः कौन है? माता की साक्षी को ही इसके लिये पर्याप्त प्रमाण मान लिया जाता है। मानव जीवन की अनेकों महत्वपूर्ण अवस्थायें उस विज्ञान के आधार पर निर्भर है, जिसे अध्यात्म विज्ञान करते हैं। पदार्थ विज्ञान से नहीं अध्यात्म-विज्ञान से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।

ईश्वर का अवलम्बन करके ही मानव जाति की अब तक प्रगति सम्भव हुई है। प्रेम करुणा, उदारता, दान संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ जैसे सद्गुणों का विकास आस्तिकता के आधार पर ही सम्भव हो सका है और इन्हीं गुणों के द्वारा सामाजिकता की प्रवृत्ति बढ़ी है। यदि इस महान आदर्श का परित्याग कर दिया जाय तो व्यक्ति का आँतरिक स्तर इस प्रकार का ही बनेगा जिससे द्वेष, घृणा संघर्ष और आतंक का मार्ग अपनाने के लिये मन मचलने लगे।

आदर्शवादिता का ही दूसरा नाम आस्तिकता है। जो आस्तिकता छोड़ चुका उसके लिये छल, असत्य आक्रमण, उत्पीड़न आदि नाम की भी कोई वस्तु नहीं रह जाती। आतंक की नीति ही उसके लिये सब कुछ है। नैतिक प्रवृत्तियों से रहित विचारधारा कितनी भयावह होती है, उसका अनुभव पग-पग पर होता रहता है। नास्तिकता का बाँध आस्तिकता की चट्टानों से ही बनता है। यदि यह बाँध तोड़ दिया गया तो फिर व्यक्ति या सरकारें अपनी-अपनी सनकें पूरे करने के लिए कुछ भी कर गुजरेगी और शाँतिप्रिय लोगों के लिये जीवन धारण कर सकना भी एक समस्या बन जायेगा।

आस्तिकता मानव जीवन की आधारशिला है। उसका परित्याग करना एक प्रकार से नैतिकता की व्यवस्था को ही चौपट कर डालने जैसी विपत्ति खड़ी करना होगा। मानव- जाति के भविष्य को खतरे में डालने वाली इस विभीषिका से हम जितनी जल्दी सावधान हो जावे, उतना ही उत्तम है। भोगवाद में लिप्त आज के वैभवशाली युग को इसकी संजीवनी की तरह आवश्यकता है, यह तथ्य इक्कीसवीं सदी में हर व्यक्ति को भली-भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए।


Quotation

कई बार पुराने खंडहर गिराने और पुराने कपड़े बदलने पड़ते हैं, यही बात प्रचलनों के सम्बन्ध में भी है, कई बार नए विवेकपूर्ण प्रतिपादन भी इतने सुन्दर होते हैं जैसे ओस बिन्दुओं से शोभायमान नवोदित कमल पुष्प।


मौन साधना की सिद्धि

दैनिक जीवन में जिस प्रकार शौच, स्नान, भोजन, शयन आदि की नित्य कर्म के रूप में आवश्यकता पड़ती है। उसी प्रकार मानस शरीर और भाव शरीर को नित्य स्वच्छ बनाते रहने, उसमें अभीष्ट ऊर्जा उपलब्ध कराते रहने के लिए उपासनापरक साधनाओं की आवश्यकता पड़ती है। इन्हें यदा-कदा कर लेने से काम नहीं चल सकता। वरन् उनका नित्य नियम बनाना पड़ता है। यदा-कदा किये जाने वाले कृत्य स्वभाव का अंग नहीं बन पाते। संस्कार स्तर तक पहुँच सकने में असमर्थ नहीं हो पाते। अस्पष्ट और अस्थिर प्रयास कौतुक, कौतूहल मात्र बन कर रह जाते हैं। किसी तथ्य की अन्तराल की गहराई तक उतरने के लिए यह आवश्यक है कि उस दिशा में सतत् प्रयत्न जारी रखे जायं। पहलवान, संगीतज्ञ, वैज्ञानिक, अभिनेता अपनी एकाग्रता को एक केन्द्र बिन्दु पर जमाये रहते हैं और सफलता की दिशा में अग्रसर होते हैं। यदि उनका मन विक्षोभग्रस्त रहे तो अस्थिरता उत्पन्न करने वाली लहरे उठती रहेगी। चंचलता कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध न होने देगी।

वार्तालाप में मात्र जिव्हा ही गतिशील नहीं रहती। मुख के भीतरी और बाहरी अवयव भी क्रियाशील रहते हैं। मस्तिष्क क्षेत्र के अनेक घटकों को उत्तेजित, सक्रिय बनाये रहना पड़ता है। यह अस्थिरता आवश्यक होती है। वक्तृता स्नायु संस्थान को झकझोर देती है। तनाव उत्पन्न करती है और पाचन तंत्र को अस्त व्यस्त करने से लेकर रक्ताभिषरण तक को प्रभावित करती है। वाचालों को अक्सर रक्तचाप की शिकायत रहने लगती है। उत्तेजनाजन्य तनाव से दाह और अनिद्रा जैसे विकार उठ खड़े होते हैं।

“कम खाना गम खाना” यह स्वास्थ्य संतुलन की दृष्टि से उपयोगी माना गया है। इससे अनेक उद्वेगों, विग्रहों से भी छुटकारा मिलता है। इसी के साथ एक कड़ी कम बोलने की भी जुड़नी चाहिए। अनावश्यक बक-झक भ्रांतियां उत्पन्न करती है और मन मुटाव के ऐसे आधार खड़े करती है जिनकी आवश्यकता न थी।

वाचालता पर अंकुश लगाने के लिए मौन साधना का अभ्यास थोड़ा लाभ दे सकेगा यह सच है। जितना गुड डाला जाय उतना ही मीठा होता है। जितना दाम खर्चा जाय उतना ही सामान मिलता है। जितना बीच बोया जाय उसी अनुपात से फसल काटने और उतना ही कोठा भरने का अवसर मिलता है। मौन मात्र दो घण्टे रोज साधा जाय या सप्ताह में मात्र दो घण्टे का क्रम रखा जाय तो उतना प्रयास भी निरर्थक नहीं जाता है। वाणी का असंयम रुकने से जीवनी शक्ति के अपव्यय से होने वाली क्षति में कमी आती है। बचत से सम्पन्नता बढ़ती है और आड़े समय में काम आती है। मौन साधना का यत्किंचित् प्रयास भी हर किस के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। उससे जीवनी शक्ति का भण्डार बढ़ता चला जाता है, भले ही वह सीमित प्रयास के कारण स्वल्प मात्रा में ही उपलब्ध क्यों न हो?

जिन्हें अवसर और अवकाश है, उन्हें मौन की अवधि भी बढ़ानी चाहिए और उसमें गम्भीरता भी लानी चाहिए। इस आधार पर मौन मात्र संयम ही नहीं रखता वरन् तपश्चर्या स्तर तक जा पहुँचता है और साधना से सिद्धि के सिद्धान्त को प्रत्यक्ष चरितार्थ कर दिखाता है।

सामान्यतया मौन व्रत लेने वाले कुछ घण्टे जीभ को विराम देते हैं पर उनकी कल्पनाएँ इच्छाएँ उछलती ही रहती है। इसे उनकी भावभंगिमा को देखकर सहज जाना जा सकता है। मन की चंचलता शरीरगत चेष्टाओं से परिलक्षित होती है। अपना अभिप्राय संकेतों के माध्यम से प्रकट करते हुए उन्हें देखा जा सकता है। आंखें चारों ओर घूमती है। जिस-तिस वस्तु को देखने में अभिरुचि का होना स्पष्ट प्रकट होता है। शंका समाधान चलता रहता है। पूछने बताने का काम जीभ से तो नहीं होता। पर कागज कलम स्लेट, पेन्सिल के माध्यम से वार्तालाप प्रायः वैसा ही चलता रहता है जैसा कि बिना मौन वाले अपना कथन श्रवण चालू रखते हैं। मात्र जिव्हा को विराम मिलना भी किसी हद तक अच्छा तो है, पर उतने भर से वह लाभ नहीं मिलता जो मौन से तपश्चर्या के रूप में साधने पर हस्तगत होता है। इस अनुबंध में कल्पनाओं, कामनाओं, इच्छाओं और चेष्टाओं पर भी अंकुश लगाना पड़ता है। यह न किया जा सके तो मात्र जिव्हा को विराम देकर उसे थकने से बचाने का उपाय किया जाय। मन की चंचलता, इच्छा कामना, चेष्टा यथावत् बनी रहे तो वह मौन नहीं सधता उसे तपश्चर्या कहते हैं और उसके सहारे दिव्य वाणियाँ उभरती और अपने-अपने चमत्कार दिखाती है।

जिव्हा से उच्चरित होने वाली वाणी को “वैखरी” कहते हैं। इसमें मुँह बोलता है और कान सुनते हैं। मस्तिष्क उसका निष्कर्ष निकालता है। इसके उपराँत तीन वाणियाँ और है। मध्यमा, परा और पश्यन्ती। मध्यमान में मन बोलता है उसका परिचय चेहरे की भावभंगिमा से अंग संचालन पर आधारित संकेतों से समझा जा सकता है पराअन्तःकरण से भव संवेदनाओं के रूप में प्रकट होती है। उसे प्रसन्नता, खिन्नता, उदासी के रूप में क्रियान्वित होते देखा जाता है। इसका प्रभाव एक व्यक्ति से उठ कर दूसरे में प्रवेश करता है। इसके सहारे एक के विचार दूसरे के मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं और उसका सम्प्रेषण की प्रतिक्रिया बटोर कर प्रेषक के पास वापस लौटते हैं। इसे मौन वार्तालाप भी कह सकते हैं इसमें चेहरे को देखकर अन्तराल को समझने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता।

पश्यन्ती विशुद्धतः आध्यात्मिक है। इसे देव वाणी भी कह सकते हैं। इसे आकाश वाणी, ब्रह्म वाणी भी कह सकते हैं। यह परा, चेतना के साथ टकराती है और वापस लौट कर उन समाचारों को देती है जो अदृश्य जगत के विभिन्न क्रिया-प्रतिक्रियाओं के रूप में सक्रिय रहते हैं। इसे अदृश्य दर्शन भी कह सकते हैं। इसी के माध्यम से देवतत्वों की पूरा चेतना के साथ सम्भाषण एवं आदान-प्रदान होता है।

ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती है। उनमें देखने, सूँघने, सुनने, चखने स्पर्श की सरसता अनुभव होती है। यह भौतिक रसास्वादन हैं पर यदि इन पंच देवों को साधना द्वारा सिद्ध कर लिया जाय तो वे अतीन्द्रिय क्षमताओं के रूप में विकसित होती और अलौकिक अनुभूतियाँ प्रस्तुत करती है। दूरश्रवण दूरदर्शन, भविष्य ज्ञान, जन्मांतर बोध आदि का धनी बना जा सकता है। जिव्हा है तो एक पर वह दुहरा काम करती है वह देखने के लिए रसना रूप में और बोलने के लिए वाणी रूप में प्रयुक्त होती है इसे यदि मौन एवं अस्वाद के आधार पर दोनों रूपों में सिद्ध कर लिया जाय तो अन्तरंग और बहिरंग स्तर की दुहरी विभूतियों का रसास्वादन किया जा सकता है।

खेंचरी मुद्रा में जिव्हा को तालु से सटाकर ब्रह्मरंध्र सहस्र-दल-कमल में से टपकता सोमरस अमृत पान जैसी अनुभूति के साथ उपलब्ध किया जा सकता है” यह ओजस, तेजस और वर्चस् की त्रिधा उपलब्धि है। इसे देव अनुकम्पा की वर्षा के समतुल्य माना जाता है।

जिव्हा की दूसरी सिद्धि है- शाप और वरदान देने की क्षमता। साधारण वाणी जानकारियाँ देने भर के लिये काम आती है, पर तपः भूत जिव्हा सत्पात्रों पर सत्परिणामोँ की वरदान रूप में वर्षा करती है। यदा-कदा ऐसा भी आवश्यक हो जाता है कि बढ़ते हुए अनाचार को रोकने थामने के लिए उनके मार्ग में अवरोध खड़ा किया जाय। अभिशाप इसी को कहते हैं। मौन साधना द्वारा साधित की हुई जिव्हा उपरोक्त सभी प्रयोजनों की पूर्ति करती है।


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रत्न राशि एक कौने में बैठा थी, पीसने की चक्की दूसरे कोने में। रत्न राशि ने कहा - मैं रानियों के कंठ और जौहरियों की तिजोरियों में सजधज के साथ रहती हूँ। चक्की ने कहा- अपना अपना भाग्य पर यह तो बताएँ आप कितनों की आजीविका का साधन बनती है? और कितनों का पेट भरती है। रत्नराशि से कुछ उत्तर न बन पड़ा।


अस्तेय अर्थात् अर्थ की पवित्रता

धर्म धारणा का चतुर्थ सोपान है-अस्तेय। अर्थात् चोरी न करना अर्थात् जो अपने हक एवं परिश्रम का है उसी में प्रसन्नता और संतोष के साथ निर्वाह करना।

यहाँ लक्षणों का क्रमानुसार उपयोग इस अर्थ में नहीं किया जा सकता है कि एक को पूरा करने के बाद दूसरे का आरम्भ किया जाय। वरन् यह है कि यह दसों लक्षण अपने अपने क्षेत्र में समान रूप से साथ साथ काम करते रहते हैं। जैसे दाँत में मंजन, आँख में अंजन, सिर में तेल आदि का कोई ऐसा निश्चय नहीं है कि दाँतों की सफाई के उपराँत ही सिर में तेल डाला जाय। यह सभी अपने अपने ढंग से यथावत् चलते रहते हैं। इसमें न कोई कम महत्व का है न अधिक। न किसी को प्रमुख कहा जा सकता न दूसरे को गौण। अपने अपने क्षेत्र में सुधार उपक्रम चलाते हुए यह दसों निर्धारण अपनी अपनी गति से आगे बढ़ते रहते हैं और सभी का संयुक्त प्रयत्न मिलाकर एक समग्र एवं संयुक्त इकाई बनता है, जिसे एक शब्द में कह सकते है-व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास।

चोरी करना प्रायः उसे समझा जाता है जिसमें दीवार तोड़कर, छलाँग लगाकर, ताला चटकाकर किसी का माल उठाया जाता है। गठरी, पोटली ले जाने जैसे उठाईगीरी, ठगी, जेबकटी आदि को भी चोरी परिकर की ही कहा जाता है। पर यह काम अभ्यासी और दुस्साहसी लोगों से ही बन पड़ते हैं। इन्हें हर कोई नहीं कर सकता। सर्वसाधारण में तो इतनी ताकत और हिम्मत भी नहीं होती। फिर कानून भी उन्हें पकड़ने में तत्काल सक्रिय हो जाता है। उनसे बचना और जेल पहुँच कर अपील दर अपील करते हुए किसी प्रकार छूट आना उस लाभ की तुलना में भारी पड़ता है जो चोरी करके कमाया गया है।

यहाँ गहराई में उतराना होगा और देखना होगा कि कानून की पकड़ बचते हुए निर्वाध रीति से चोरी किस वर्ग के लोग किस प्रकार करते हैं।

मनुष्य होता तो स्वतंत्र, स्वच्छंद ही है। पर वह कर्तव्यों, दायित्वों में इतना अधिक जकड़ा हुआ है कि मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियों की उपेक्षा करते ही वह अपने महान पथ से नीचे जा गिरता है और दुष्ट या भ्रष्ट कहे जाने की स्थिति तक नीचे आ टपकता है।

मनुष्य संयुक्त परिवार का एक घटक है। उस जन्म देने से लेकर लालन, पालन, शिक्षा दीक्षा चिकित्सा परिचर्या, विवाह, व्यवसाय आदि की दृष्टि से समूचे परिवार का न्यूनाधिक योगदान लगा है। इस ऋण से उऋण होने का सही तरीका यही है कि परिवार के अन्य सदस्यों की तरह निर्वाह किया जाय और जो अपना अधिक उपार्जन है उसे समूचे परिवार के विशेषतया अधिक आवश्यकता वालों का विशेष रूप से ध्यान रखते हुए प्रयोग किया जाय।

यह परम्परा आगे भी चलती रही तो नए सिरे से जो स्वावलम्बी या कमाऊ बना है, उसका भी हित है। उसके बेटे, पोते भी उसी परम्परा का निर्वाह करे जो उनके बाप दादों से चली, ताऊ द्वारा व्यवहृत होते देखी है। संयुक्त कुटुम्ब में रहने का यही औचित्य है। सम्बन्ध विच्छेद करके सर्वतन्त्र बना जाया जाय तो बात दूसरी है।

संयुक्त परिवार का अनुबंध यह छूट नहीं देता कि कमाऊ सदस्य अपने स्त्री बच्चों तक की परवाह न करते हुए मुँह छिपा कर बाजार में व्यंजन उड़ाये। कीमती कपड़े पहने और सिनेमा नाचरंग में यारबाजी में ढेरों पैसा खर्च कर दे। इस प्रकार बरता गया स्वेच्छाचार एक प्रकार से अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व का हनन करना है। नशा पीना तो अपना पैसा और स्वास्थ्य गँवाकर आश्रितों को असहाय स्थिति में छोड़ने की तैयारी है। इस प्रकार का व्यवहार न्याय दृष्टि से चोरी में ही गिना जायगा, भले ही कानून उसमें हस्तक्षेप न करता हो और परिवार द्वारा कोई प्रत्यक्ष कड़ा विरोध भी न होता हो।

व्यापार में लाभाँश की एक सीमा है। जो बेचा जाय उसके संदर्भ में वही कहा जाय, जो माल के अनुरूप है खराब चीज को अच्छी बताकर, नापतोल में चालाकी करते हुए अधिक मुनाफा लेकर बेचा गया है तो वह व्यापार कहलाते हुए भी चोरी के साथ मिला जुला है।

सरकारी टैक्स चुराना, दुहरे बही खाते रखना, मुंशी को पैसा देकर माल बिना टैक्स चुकाये निकाल लाना, बिना टिकट चलना जैसे कार्यों को भी बिना संकोच चोरी कहा जा सकता है। भले ही अभ्यस्त समाज में जब सभी किसी न किसी रूप में करते हो तो दूसरों की निन्दा न करें।

उत्तराधिकार का धन वस्तुतः उनका है जो अभी अपने पैरों पर खड़े होने योग्य समर्थ, स्वावलम्बी नहीं हुए है। जो अपना स्वयं कमाते खाते हैं, वह पूर्वजों की छोड़ी राशि पर गुलछर्रे उड़ाये तो यह हक की व मेहनत की कमाई नही है, तो उसे चोरी कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है। वस्तुतः परिवार के असमर्थ सदस्यों के पोषण से बचा श्राद्ध धन है। उसे पितरों की आत्मा की शाँति और सदगमत देने के लिए ही खर्च किया जाना चाहिए।

जुआ, सट्टा, लाटरी, दहेज, भेंट, उपहार जैसे माध्यमों से मिला धन वस्तुतः अनीति की उपलब्धि है। उसमें अपना श्रम नहीं लगा तो उसका उपयोग कैसा?बिना मेहन के धन को यदि नैतिक दृष्टि से हेय और चोरी के स्तर का कहा जाय तो उसमें कुछ भी अनुचित न होगा।

परिवार घर के सदस्यों को तो कहते ही है, पर वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता भी गलत नहीं है। समुन्नतों की कमाई पर खड़े होने योग्य सहारा प्राप्त करने के लिए पिछड़े वर्ग को हक है। अधिक उपार्जन की अधिक कौशल की प्रशंसा प्राप्त करते हुए एक महा प्रशंसा यह भी प्राप्त करनी चाहिए कि जो कमाया गया वह मिल बाँट कर खाया गया। उच्च स्तरीय आदर्श प्रस्तुत करना और बदले में अनेकों श्रद्धा उपार्जित करना किसी प्रकार भी कम लाभ की बात नहीं है।

आम तौर से लोग कँटीली झाड़ियों में भटकते हैं और अपने पैरों के ऐसे निशान छोड़ जाते हैं जिन पर चलकर पीछे वाले को भी भटकना और झाड़ झंखाड़ों में उलझने का त्रास पाना पड़े। यदि कोई अपने व्यक्तिगत चिन्तन चरित्र और व्यवहारों को आदर्शों से घुला, मिला रखता है तो आत्म निर्माण से संसार का उतना नव निर्माण अनायास ही हो जाता है। परिवार व्यक्तियों का समुदाय ही तो समाज है।, जितने व्यक्ति चरित्र व निष्ठा की कसौटी पर खरे उतरते हैं, समझना चाहिए उतने अंश में इस धरती पर स्वर्ग उतरने का ठेस सफल प्रयत्न किया गया।

मन में कुछ हो और प्रकट कुछ करे तो यह भी एक प्रकार की चोरी चालाकी। हमारी इच्छा और क्रिया का समन्वय ऐसा होना चाहिए, जिसमें छल छिद्रों की भरमार नहीं हो। अपनी वास्तविकता का छिपाए रहना विशेषतया बढ़ा-चढ़ा कर बताना भले ही आर्थिक चोरी न हो पर वह दुराव तो है ही और जिस भी प्रयास से दुराव की आवश्यकता पड़ती हो उसे चोर कर्म की श्रेणी में ही गिरा जाना चाहिए।

हमारी अर्थनीति ऐसी पवित्र और परिष्कृत होनी चाहिए जिसके कारण न हम किस से अनुचित लाभ उठाये और न किसी को वैसा लाभ उठाने दे। न चोरी करे और न अपने यहाँ किसी को चोरी करने दे। रिश्वत देना और लेना दोनों ही दण्डनीय बताये गये हैं। समझना चाहिए कि चोरी करना और करने देना, होते हुए मूकदर्शक की तरह देखते रहना, यह सभी देय है।

अस्तेय एक दर्शन है।। जिसका अर्थ होता है “आर्थिक पवित्रता” आर्थिक पवित्रता अर्थात् जो अपने श्रम की कमाई नहीं है, जो सम्य प्रवृत्तियों के सहवितरण से बची हुई नहीं है जो औसत भारतीय स्तर से अधिक मात्रा में प्रयुक्त की गई है, वह सभी धन राशि चोरी की है। स्मरण रहे अर्थ पवित्रता के साथ अन्य प्रकार की सभी पवित्रताएं जुड़ी हुई है। अचौर्य एक व्रत है जिसे हर पुण्यात्मा को, धर्म प्रेमी को निबाहना ही चाहिए।


Quotation

जिनकी तु प्रशंसा करते हो, उनके गुणों को अपनाओ और स्वयं भी प्रशंसा के योग्य बनो।


आहार शुद्धि साधना का प्रथम चरण

मनुष्य का शरीर तो सामान्य है और उसकी क्षमता भी सीमित है। वह ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के सहारे जो कुछ बन पड़ता है, वही करता है। कर्मेन्द्रियों हाथ, पैर आदि क्रियारत रहती है और ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जो समीपवर्ती है, वह देखा सुना सूँघ-चखा जाता है। उस आधार पर जानकारियाँ बढ़ती है और बुद्धिमत्ता का विकास होता है। शरीर के यह दो कर्म और ज्ञान पक्ष है। शेष संचालन तंत्र है, जो रेलगाड़ी में कोयला पानी जलाकर भाप बनाने की शक्ति चमड़े के आवरण में ढके हुए, अपना अपना काम करते रहते हैं। मोटी दृष्टि से शरीर यही है। इसको दुर्बलता और रुग्णता से बचाना पड़ता है। तभी वह अपना भीतरी और बाहरी काम ठीक प्रकार कर सकता है।

साधना विज्ञान का प्रथम पक्ष यही से आरम्भ होता है कि शरीर को निरोग और सक्षम रखा जाय। इस निमित्त शारीरिक और मानसिक संयम की आवश्यकता पड़ती है। यदि उस ओर उपेक्षा बरती जाय तो कष्ट पीड़ित शरीर अपने आप तक को स्थिर नहीं रख पाता फिर उससे योगाभ्यास जैसे उच्च प्रयोजनों की साधना कैसे सम्भव हो?

इसलिए साधक को यह पाठ पढ़ाया जाता है कि वह उस शरीर उपकरण को सही बना ले, जिससे कि साधन समर लड़ा जाने वाला है। तलवार जंग लगी और बिना धार की हो तो उससे युद्ध मोर्चे पर विजय पाना कठिन है। जो लोग छलाँग मार कर सबसे पहले कुण्डलिनी जगाना चाहते हैं, वे क्रमिक विकास के सिद्धान्त को भूल जाते हैं विद्यार्थी को एक एक कक्षा पास करते हुए स्नातक बनाना पड़ता है। छत पर चढ़ने के लिए एक एक सीढ़ी चढ़नी पड़ती होती है। बीज से अंकुर, अंकुर से पौधा, पौधे से वृक्ष बनाता है यह सब क्रमिक योजना है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए ही अष्टाँग योग में आसन, प्राणायाम का विधान बताया गया है। और यम नियम के परिपालन की आवश्यकता पर सर्वप्रथम जोर दिया है। वर्णमाला और गणित ही सर्व प्रथम पढ़ने पड़ते हैं आगे की पढ़ाई इसके बाद चलती है। इसलिए स्वास्थ्य संपादन को भी योगाभ्यास का प्रथम और प्रमुख अंग माना गया है। जिसकी नींव ही कमजोर रहेगी उस पर सुदृढ़ मकान कैसे बन सकेगा? जड़ें खोखली होने पर पेड़ कितने दिन खड़ा रहेगा। व्यक्तित्व की सक्षमता और प्रखरता के लिए स्वास्थ्य संपादन सर्वप्रथम आवश्यक है। उसकी उपेक्षा करके योगाभ्यास करने वालों को सफलता नहीं मिलती। न उनको मन योग में एकाग्र हो पाता है और न शरीर में तप साधना करने के लिए उपयुक्त साह और संकल्प बन ही संचित हो पाता है। ऐसी दशा में साधना परक सफलता कैसे मिल?

साधनाओं में इन्द्रिय साधना प्रमुख है। इन्द्रिय साधनाओं में भी दो की प्रधानता है- एक जिव्हा दूसरी ज्ञानेन्द्रिय। यही दो ऐसी है जो स्वास्थ्य पर दुहरी कुल्हाड़ी चलाती है। यदि इन दो पर अंकुश रखा तो समझना चाहिए कि आधी में से आधी मंजिल पूरी हो गई। नींव गहरी और मजबूत जम गई, अब इस पर भवन उठाने का कार्य धीरे-धीरे होता रहे तो भी हर्ज नहीं। नींव का कच्चा रहना ही वह जोखिम है, जिसके कारण भव्य और बहुमूल्य भवन भी गहरा कर नीचे गिर सकता है।

जिव्हा पर काबू करने के लिए सर्वप्रथम मनोबल उसी से जूझने की प्रक्रिया द्वारा परिपक्व करना पड़ता है जब से दूध छोड़, अन्नप्राशन आरम्भ किया जाता है तभी से जिव्हा को दुर्व्यसनी बनने की आदत डाली गई है। तरह तरह के जायकों का नशेबाजी जैसा चस्का लगाया गया है। नमक, शक्कर, मसाले और चिकनाई इन चोरों में से कइयों का सम्मिश्रण हमारे भोजन में होता है। आरम्भ में तो बच्चा मिर्च जैसी वस्तुएँ लेने में कष्ट अनुभव करता है। शक्कर खाने पर भी उसके मुँह से लार स्रवित होने लगती है। किन्तु वही चौके में बनता है, वही पूरे परिवार द्वारा खाया और खिलाया जाता है उपहार में भी इसी प्रकार की वस्तुएँ दी दी जाती है, तीज त्यौहारों पर और मेहमानों के लिए ही वही अगड़म बगड़म बनता है, तो बच्चों को भी वही खाना पड़ता है। इसके उपराँत ढर्रा चल पढ़ता है और नशे बाजी जैसी आदत पड़ जाती है जो छुड़ाए नहीं छूटती। फिर मनाही की बात की जाय तो यही एक उत्तर दिया जाता है कि यह वस्तुएं तो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इनका तो संतुलित भोजन के नाम पर डाक्टर भी समर्थन करते हैं, फिर इन्हें छोड़कर क्यों मन मारा जाय। और क्यों स्वजनों का आग्रह टाला जाय?

इतने पर भी तथ्य यथास्थान ही रहते हैं। स्वाद के नाम पर अभक्ष्य खाया जाता है और वह भी जायके जायके में पेट में अधिक मात्रा में पहुंच जाता है। पाचक रस उतने स्रवित नहीं होते। फलतः वह पेट में पड़ा सड़ने लगता है। अपच की व्यथा लग जाती है और सड़ा हुआ हार विष बन कर दूषित रक्त बनाता है। उसी को विजातीय द्रव्य कहते हैं, उसे जहाँ कही जगह मिलती है वही रुक जाता है और चित्र विचित्र लक्षणों वाले नामों से इसका निदान एवं उपचार चल पड़ता है। वस्तुतः रोग का कारण और स्वरूप एक ही है और उसका सबसे बड़ा कारण अपच है जो स्वाद के कारण अधिक मात्रा में अन्न को पेट में ठूँस लेने से उत्पन्न होता है। उपचार यही से होना चाहिए और भोजन को सात्विक बनाया जाना चाहिए।

आध्यात्मिक साधनाओं में सब से अधिक प्रचलित व्रत उपवास है। एकादशी, रविवार, पर्व त्यौहार, देवताओं का जन्म-जयन्ती आदि में उपवासों का विधान है। कितने ही उपवास महिलाएँ सुहाग के लिए रहती है कुछ किसी कामना से, कुछ किसी प्रतिबन्ध से। कन्यादान के दिन माता पिता के उपवास रखना पड़ता है। इसका तात्पर्य आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के अतिरिक्त यह भी है कि पेट को बीच बची में छुट्टी देते रहा जाय। उसे निरन्तर न जोते रखा जाय। इससे अपच को घटाने में सहायता मिलती है, उस दिन जो खाया जाता है उसे फलाहार कहते हैं। भले ही वह मावा, मिठाई, या चाट पकौड़ी के रूप में ही क्यों न हो? वस्तुतः उस दिन जल पर रहा जाय। काम न चले तो दूध, छाछ, रस, जैसी पतली वस्तुएँ ली जा कसती है। ऐसी उपवास साधना वस्तुतः योगाभ्यास का प्रथम चरण है। चान्द्रायण-कृच्छ चान्द्रायण आदि व्रत इसी निमित्त कराये जाते हैं। अनुष्ठानों में उपवास करने फलाहार पर रहने का ही विधान है।

गाँधी जी ने अपनी सत्य महाव्रत पुस्तक में “‘अस्वाद’ को प्रथम व्रत बताया है और कहा है कि यदि स्वादों पर विजय प्राप्त कर ली जाय तो अन्य इन्द्रियों का संयम सरल हो जाता है। अस्वाद का तात्पर्य नमक छोड़ना ही नहीं, शक्कर, चिकनाई और मसाले छोड़ना भी है, क्योंकि यह सभी मानवी संरचना की दृष्टि से अखाद्य है। इन सब में उस विकृत स्वाद का समावेश है जो प्रकारान्तर के जिम्मेदार है। इन्हें छोड़कर जो भी पेय स्तर पर भोजन लिया जाय वह उपवास में फलाहार के विधान की पूर्ति करता है। जल्दी हजम होने वाले फल या शाक भी सीमित मात्रा में उपवास जल पर न चल सकने की स्थित में लिये जा सकते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस संदर्भ में एनीमा की आवश्यकता को और सम्मिलित किया है। उनका कहना है कि आहार की छुट्टी करने की तरह से पेट में संचित मल का निष्कासन आवश्यक है। जिन्हें एनीमा में झंझट मालूम पड़े वे हरड, सनाय, ईसबगोल की भूसी आदि रचक वस्तुएं लेकर पेट साफ कर सकते हैं।

यह तो सामयिक बाते हुई। वस्तुतः हमारे दैनिक आहार में से हानिकारक स्वादों का एक प्रकार से विसर्जन ही कर दिया जाना चाहिए। सस्ते फलों और शाकों में आम, अमरूद, बेर शहतूत, जामुन, खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, टमाटर, गाजर, भिण्डी आदि ऐसी है जिन्हें बिना उबाले ही खाया जा सकता है। कन्दो को तथा तोरी, लौकी जैसे शाकों को उबाला जा सकता है। अन्न और दालें भी उबाल कर खाई जा सकती है। इन सब में शरीर में घुलने लायक नमक और शक्कर पर्याप्त मात्रा में है। दूध, दही, की चिकनाई,घी, तेल की तुलना में सुपाच्य है। चिकनाई की आवश्यकता का तिल, मूँगफली, खोपरा, आदि को पानी में पीसकर काम चल सकता है। इस प्रकार योगाभ्यासी को जब तब उपवास और सामान्य समय में हल्के सात्विक आहार को भूख से कुछ कम मात्रा में लेते रहने का नियम बनाना चाहिए। रस एवं रसा को प्रधानता देनी चाहिए। यह उपवास क्रम साधारण जीवन निर्वाह का अंग बना लेने पर स्वास्थ्य सुधरेगा अनावश्यक वजन घट सकता है। पर जीवनी शक्ति का अनुपात निश्चित रूप से बढ़ेगा। योगाभ्यास के प्रथम चरण में इन्द्रिय निग्रह को अनिवार्य रूप से अपनाना पड़ता है क्योंकि जैसा खाये अन्न वैसा बने मन वाली उक्ति अक्षरशः सत्य है। तामसिक और राजसिक भोजन करने से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य की जड़ खोली होती है वरन् उनका प्रभाव मानसिक स्तर पर भी पड़ता है। आहार के अनुरूप ही मानसिक स्तर पर भी पड़ता है। आहार के अनुरूप ही मानसिक स्थिति में तमोगुण छाया रहती है। चिन्ता, उद्विग्नता और आवेश का दौर चढ़ा रहता है। ऐसी स्थिति में न तो एकाग्रता सधती है और न ध्यान धारणा बन पड़ती है। इस विघ्न को जड़ से काटने के लिए आहार की सात्विकता पर सर्वप्रथम ध्यान देने की आवश्यकता है।

जो खाया गया, वह किस प्रकार कमाया गया। यह भी ध्यान देने योग्य है। बेईमान, बदमाशी, हरामखोरी, चोरी ठगी आदि के आधार पर जो कमाया गया है, वह भी कुधान्य है। आहार को हल्का सुपाच्य ही नहीं होना चाहिए। वरन् उसका उपार्जन भी नीतिपूर्वक किया हुआ होना चाहिए।

पकाने परोसने वाले के संस्कारों का भी आहार पर असत होता है। दुष्ट दुराचारी भी उसी प्रकार हेय है, जिस प्रकार खाज, दाद, कोढ़, क्षय आदि के रोगियों के हाथ का बना या परोसा हुआ भोजन अग्राह्य समझा जाता है।

सभी जानते हैं कि गंदगी की छूत लगती है। संक्रामक रोग एक से दूसरे पर धावा बोलते हैं इसी प्रकार कुसंस्कारी, कुकर्मी लोग संपर्क में आने वालों को अपनी छूत लगाते हैं। उसी प्रकार चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में जिन लोगों ने अनैतिकता भर रखी है, उनका प्रभाव भोजन पकाने और परोसने के माध्यम से भी ग्रहण करने वालों को प्रभावित कर सकता है। जिन होटलों में एक का प्रभाव दूसरे तक न पहुंचने देने के लिए उपयुक्त सावधानी नहीं बरती जाती, समुचित स्वच्छता नहीं रखी जाती, वहाँ का आहार भी साधना मार्ग पर चलने वालों के लिए विघ्न ही सिद्ध होता है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए आहार ही सिद्ध होता है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए आहार शुद्धि के सम्बन्ध में सर्वप्रथम ध्यान दिया जाना चाहिए।


कुकर्म चिंतन से छुड़ा देने की प्रार्थना (Kahani)

एक साधन सम्पन्न था। हर समय उस पर विलास सामग्री की धुन सवार रहती। सुरा सुन्दरी के मनोरथ ही मस्तिष्क पर छाये रहते। एक दिन किसी सन्त के पास पहुँचा और उक्त कुकर्म चिंतन से छुड़ा देने की प्रार्थना करने लगा।

दूसरे दिन उसे सन्त ने बुलाया और कान में कहा- ठीक आज ही की तिथि में ऐ महीने बाद तुम्हारी मृत्यु होनी है। जो तैयारी सम्भव हो सो कर लो। धनवान चिन्ता में डूब गया। दुःखी रहने लगा। घर और व्यवसाय की व्यवस्था बनाने में लगा गया। परलोक के लिए पुण्य अर्जित करने की योजनाएँ बनाने में जुट गया।

एक दिन शेष रहा तो सन्त ने उसे फिर बुलाया और पूछा कि इस अवधि में सुरा-सुन्दरी की योजना बनी या नहीं। उत्तर था- नहीं। जब मृत्यु का भय सामने हो तो विलास कैसा?

संत हँस पड़े। मृत्यु न होने का अभयदान दिया और कहा कुकर्म चिन्तन से दूर रहने का एक ही उपाय है कि मनुष्य हर समय मृत्यु सामने खड़ी होने का विचार करता रहे, और जीवन के एक एक क्षण का सदुपयोग करने की बात सोचे।


उपदेशक का स्तर

राजा परीक्षित को एक सप्ताह में सर्प दंश से मृत्यु होने का शाप लगा। मरण निश्चित समझकर उनने अपना शेष समय सत्कर्मों में लगा देने का निश्चय किया। इन दिनों में दैनिक सत्संग का भी आयोजन रखा गया।

प्रश्न उपस्थित था कि सत्संग का संचालन कौन करे? किसी ने नाम सुझाया व्यास का। किसी ने शुकदेव का। परीक्षित ने शुकदेव का समर्थन किया। इस पर सभासदों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि वयोवृद्ध पिता के रहते कम आयु के पुत्र का चयन क्या किया गया?

शंका का समाधान करते हुए परीक्षित ने एक आँखों देखी घटना सुनाई।

वे एक बार वन बिहार को गये थे। अकेले भटक गये। चलते चलते वे एक सरोवर के निकट जा पहुँचे। प्यास लगी थी। स्वयं भी पानी पीना था। घोड़े को भी पिलाना था। पर सरोवर का दृश्य देखकर वे ठिठक गये। जलाशय में देव कन्याएं निर्वस्त्र स्नान कर रही थी। राजा ने उचित समझा इनके काम में विघ्न डालने की अपेक्षा यह अच्छा है कि निकटवर्ती पेड़ की छाया में खड़े होकर स्नान समाप्त होने की प्रतीक्षा की जाय।

देखा कि बाल योगी शुकदेव उधर से निकले उन्हें पानी भी पीना था और स्नान भी करना था। सो उनने दोनों ही कार्य किये। शुकदेव भी निर्वस्त्र थे। युवा थे। पर देव कन्याओं ने उनकी मन स्थित परखकर किसी प्रकार का संकोच नहीं किया और निश्चिन्त भाव से वे सभी जल क्रीडा करती रही।

जब शुकदेव चले गये तो कुछ समय उपराँत वयोवृद्ध उधर से निकले। उन्हें भी पानी पीना था। देखते ही देव कन्याएँ चौकन्नी हो गई। भागकर झाड़ी में छिप गई और कपड़े पहन लिये।

प्रसंग समाप्त हुआ तो परीक्षित वृक्ष की छाया में से निकल, उनने पानी तो पिया पर कुछ ही दूर पर खड़ी देव कन्याओं से नम्रतापूर्वक एक प्रश्न किया कि निर्वस्त्र युवक के समीप आने पर आप लोग निःसंकोच स्नान करती रही और वयोवृद्ध को देखकर इतनी हैरान हुई और छिप गई, इसका क्या कारण था?

देव कन्याओं ने कहा हम व्यक्ति की मनोदशा और पिछली जीवनचर्या को देख लेते हैं। शुकदेव का मन बालक जैसा था। पर व्यास जी संन्यास में रहते हुए भी संतानोत्पादन करते रहे हैं। इस अन्तर के कारण ही हमें अपने व्यवहार में अन्तर करना पड़ा।

सत्संग के लिए वाचालता और बहुज्ञता ही सब कुछ नहीं होती। उसकी सार्थकता तभी है जब उपदेशकर्त्ता का जीवन क्रम भी उच्चस्तरीय हो। आज उपदेशक तो बहुत है पर कथनी-करनी एक हो ऐसे बिरले नहीं हैं। समाज को आवश्यकता धर्मोपदेशकों, प्रीचर्स की नहीं पवित्र उच्चस्तरीय आत्माओं की है।


उपदेश और पूजा,चरित्र और चिन्तन (Kahani)

ईसा शिष्य मंडली के बीच विराजमान थे। उस दिन उनने एक किसान के बीज बोने की कथा सुनाई जिसमें से थोड़े ही उगे और सब नष्ट हो गये। कुछ दानों को चिड़ियों ने चुग लिया। कुछ कड़ी धूप से झुलस गये।

कुछ कीचड़ में सड़े और कुछ झाड़ियों के बीच पड़ने से धूप रोशनी न मिलने से उगे ही नहीं। थोड़े से वे पौधे ही बढ़े और फले जो उपयुक्त भूमि पर बोये और सावधानी के साथ सीधे रखाये गये थे।

ईसा ने कहा उपदेश और पूजा भी फलित होती है जब साधक का चरित्र और चिन्तन भी उपयुक्त स्थिति में रहे और अनुकूलता उत्पन्न करने में योगदान करें।


त्वचा में निहित दिव्य शक्ति सामर्थ्य

त्वचा में सर्वत्र बहुत बारीक-बारीक छिद्र होते हैं। उनमें से धीमे धीमे पसीना निकलता रहता है। इस पसीने के साथ भाप भी उठती है जो पहने हुए कपड़ों द्वारा सोखी जाती रहती है। पहने कपड़ों में जो मैल जमता है गीलापन आता है।, गंध बसती है, यह इस भाप के कारण ही होता है। त्वचा का पसीना कुछ तो हवा में उड़ जाता है पर उसके साथ घुले रहने वाले पदार्थ भारी रहने के कारण उड़ नहीं पाते और परत जमा कर त्वचा के ऊपर सट जाते हैं। यदि उन्हें कड़े तौलिये से रगड़ कर अच्छी तरह साफ नहीं किया जाय तो वह हल्के किन्तु मजबूत परत बना लेते हैं। चमड़ी के ऊपर एक दूसरी परत की तरह लिपट जाती है। आमतौर से इसे स्नान द्वारा छुड़ाया जाता रहता है। पर कइयों का स्नान चिन्ह पूजा मात्र का होता है। नदी, तालाब में डुबकी लगा लेने या सिर पर चार छह लोटे पानी उड़ेल लेने पर भी मन को संतोष भी दिया जा सकता है, कि स्नान कर लिया पर इससे वह लाभ नहीं मिलता जो आवश्यक है। कड़े रगड़ाई के बिना मैल की चिपकन भरी परत हटती नहीं। चिपके रहने पर खाज, खुजली जुएँ, दाद, छाजन जैसे त्वचा रोग तो उठते ही है, साथ ही शरीर से अप्रिय गंध भी उठने लगती है। इसे दबाने के लिए शौकीन लोग प्रायः इत्र आदि सुगन्धियों का उपयोग करते रहते हैं। साबुन से भी यह प्रयोजन पूरा नहीं होता क्योंकि वह जहाँ मेल की परत हटाता है, वही अपनी एक परत त्वचा पर चढ़ा देता है। उसमें रहने वाले क्षार चमड़ी को खुरदरा करते हैं। छिद्रों में घुस बैठ करते हैं। इसी प्रकार इत्र भी एक प्रकार का तेजाब स्तर का होता है, उसे जहाँ भी लगाया जाता है वहां अपना हानिकारक प्रभाव छोड़ता है।

उपरोक्त सभी कारणों पर दृष्टिपात करने से यह नतीजा निकलता है कि पसीने की भाप की, साबुन की, तेल की, धूल की परत त्वचा पर जमती रहती है। उसके दबाव से चमड़ी से ऊपर निकलने वाला विद्युत प्रवाह रुक जाता है। जिससे दूसरों पर प्रभाव डालने की, उन से प्रभाव ग्रहण करने की क्षमता कुंठित हो जाती है। यह क्रम चिरकाल तक चलते रहने का परिणाम यह होता है कि त्वचा की अति महत्वपूर्ण शक्तियाँ मूर्छित हो जाती है। मात्र एक कपड़ा जैसा आवरण शरीर पर जमा रह जाता है। इस स्थिति को सुधारा जाना आवश्यक है। अन्यथा वह उस दायित्व को न निभा सकेगी जो उसे वशिष्ठ ज्ञानेन्द्रिय के रूप में प्रकृति ने प्रदान किया है। जिसके उपयोग से उसकी ज्ञान सम्पदा में अनेक गुनी अभिवृद्धि हो सकती है।

साधना विधान में स्नान को अति महत्व दिया गया है। साधना, उपासना से पूर्व स्नान कर लेने का विधि विधान आवश्यक माना गया है। उसका तात्पर्य जिस तिस प्रकार नहाने की चिह्न पूजा कर लेना नहीं है वरन् यह है कि त्वचा को रगड़ कर लाल कर लिया जाय, ताकि उसके ऊपर किसी कारण जमी हुई परत का भली प्रकार समापन हो जाय। इस व्यवधान के हट जाने पर प्रकृति की अनेक महत्वपूर्ण शक्तियों का शरीर के साथ आदान प्रदान सम्भव हो जाता है। बदलते मौसम अपना प्रभाव त्वचा पर डालते हैं। उनके दबाव ऐसे होते हैं कि तापमान के अनुरूप कपड़े पहने बिना काम नहीं चलता। इससे सर्दी गर्मी का प्रभाव तो बच जाता है, पर एक बड़ी कमी यह रह जाती है कि त्वचा की प्राकृतिक संवेदना घटने या नष्ट होने लगती है। मुँह खुला रहता है। नाक होंठ, गाल मस्तक आदि पर कोई कपड़ा नहीं पहना जाता। हाथ भी आमतौर से खुले ही रहते हैं। उनकी प्राकृतिक क्षमता बनी रहती है। चेहरा इसलिए सुन्दर लगता है कि वह खुला रखा जाता है यदि सीना पेट आदि की तरह उसे भी ढक कर रखा जाय तो सौंदर्य निश्चय ही घटता चला जायेगा। जो महिलाएं चेहरा ढके रहती है उनकी त्वचा न कोमल रहती है न चमकदार। इसी प्रकार सहारा के निकटवर्ती टम्बकटू क्षेत्र में पुरुष घूँघट मार कर रहते हैं उनके चेहरे भी कुरूप हो जाते हैं। ऋतु प्रभाव अपने अपने ढंग के दबाव तो डालते हैं, पर यदि उन्हें सहन करते रहा जाय तो त्वचा की संवेदन शीलता बना रहेगा और वह अपनी मौलिक विशेषता की रक्षा किये रहेगी। ऐसी दशा में वह अन्तरिक्ष में चलते रहने वाले प्राण प्रवाह को पकड़ने, समझने में समर्थ रह सकती है। ऋषि योगी इसीलिए नग्न रहते थे, वे आवश्यकतानुसार जन संपर्क में आने पर कटिवस्त्र मात्र धारण करके लोक लाज का निर्वाण करते थे। त्वचा को दोनों आधार प्रदान करते थे। एक तो घर्षण स्नान करके चमड़ी पर मैल की कोई परत जमा न होने देने थे। दूसरे शरीर को खुला रखकर वैसा ही संवेदनशील बनाये रहते थे, जैसे कि होंठ, गाल, आंखें आदि रहते हैं। शरीर की अस्वच्छता व आवरणों की अधिकता दोनों ही कारणों से त्वचा की प्राकृतिक क्षमता घटती है और क्रम निरन्तर चलते रहने से वह विद्युतीय क्षमता की दृष्टि से अक्षम बनती चली जाती है। वह मात्र लिफाफा बन कर रह जाती है। इस स्थिति में एक आवरण मात्र बनकर रहने वाली त्वचा एक प्रकार से विसर्जन भर का काम करती रहती है। भीतरी अवयवों को बिखरने से बचाये रहने वाले खोल जैसी स्थिती भी बनी रहती है।

त्वचा के इर्द गिर्द फैलने वाला आभा मण्डल भी धुँधला पड़ जाता है यह एक रक्षा कवच है। जो बाहरी वातावरण के अनुपयुक्त प्रभाव भी रोकता है और विषाणुओं के आक्रमण को भी निरस्त करता है किन्तु जब यह आभामण्डल दुर्बल, एवं संकुचित हो जाने के कारण वातावरण के दुष्प्रभावों से अपनी रक्षा करने में असफल रहने लगता है। इस स्थिति का दूसरा परिणाम यह होता है कि व्यक्ति की दूसरों पर प्रभाव डालने की क्षमता घट जाती है। वातावरण में कोई उपयोगी हलचल पैदा कर सकना तो और भी अधिक कठिन हो जाता है। तेजस्विता खो बैठने पर व्यक्ति मात्र अपनी जीवनचर्या को ही किसी प्रकार धकेलते रहने भर में समर्थ रह पाता है।

संव्याप्त तरंगों को पकड़ सकने और उनके साथ छिपे हुए रहस्यों को जानने में त्वचा तभी समर्थ होती है, जब उसकी प्राण परक तेजस्विता बढ़ी बढ़ी हो। ऐसा होने पर वह उन कीट, पतंगों से प्रतिस्पर्धा कर सकती है, उनसे आगे भी बढ़ सकती है, जिनके लिए क्षुद्र जीव अपनी आश्चर्यजनक विलक्षणता का परिचय देते रहते हैं।

अन्य सभी ज्ञानेन्द्रियाँ छोटे आकार की है। उनकी परिधि से टकराने वाले शब्द, रूप, रस आदि के प्रभाव ही अनुभव में आते हैं। मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। किन्तु त्वचा का विस्तार समूचे शरीर परिकर तक है। वह दसों दिशाओं में विद्यमान है। इसलिए उसके लिए यह सम्भव है कि जिस भी दिशा से चाहे सूक्ष्म तरंगों के प्रवाह को पकड़ सके अनुभव कर सके और उनके साथ छिपे हुए रहस्यों से अवगत हो सके। यह सामान्य उपलब्धि नहीं है। तपस्वियों, सिद्ध पुरुषों में इसी स्तर की विशेषताएँ होती है,उनकी काया से शक्ति प्रवाह निकलते रहते हैं। इन्हें एकत्रित करके किसी दिशा विशेष में नियोजित किया जा सकता है। किसी विशेष प्रयोजन की पूर्ति में उसे लगाया जा सकता है। संपर्क में आने वाले पदार्थ और प्राणियों को आज्ञानुवर्ती, इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है। कोई महान प्रयोजन सामने हो तो उसकी पूर्ति के लिए इस बढ़ी हुई क्षमता का ब्रह्म शक्ति के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

सर्वविदित है कि मनुष्य मुख के द्वारा आहार ग्रहण करता है। भोजन और पानी इसी मार्ग से शरीर के अन्दर जाते हैं। पर यह तथ्य उपेक्षित ही बना रहता है कि नासिका द्वारा जो साँस ली जाती है व कितनी अधिक पोषक है उसका एकाकी महत्व अन्न, जल प्राण भी खींच सकती है। उस संचय से अपने को प्राणवान बनाया जा सकता है गंध शक्ति का विकास किया जा सके तो नासिका भी अतीन्द्रिय क्षमताओं की संवाहक बन सकती है वह कृमि कीटकों से लेकर सिद्ध पुरुषों तक में पाई जाने वाली विशेषता की अपेक्षा अपना वर्चस्व और भी अधिक बढ़ा चढ़ा प्रकट कर सकती है। जिस प्रकार पुलिस के खोजी कुत्ते अपराधियों को पकड़ने में असमर्थ हो सकते हैं उसी प्रकार वरन् उससे भी बढ़ चढ़कर गंध सिद्ध व्यक्ति संपर्क में आने वाले का चरित्र, उद्देश्य, वर्तमान, भूत तथा भविष्य का सुविस्तृत इतिहास जान सकता है। इतना ही नहीं अवांछनीय को घेर धकेल देना और खींच कर समीप बुला लेना संभव हो जाता है। यह क्रिया शरीर के ऊपर भी प्रयुक्त हो सकती है और मन के ऊपर भी। इस आधार पर विचार और स्वभाव का परिवर्तन भी संभव है। आदतें छुड़ाई जा सकती है और नई सत्प्रवृत्तियों की स्थापना की जो सकती है। प्राणवान अपनी स्व वरिष्ठता की बीज की तरह दूसरों के व्यक्तित्व में खेत की तरह बो सकता है। उन्हें खाद, पानी देकर आगे, बढ़ा और फूलती फलती स्थिति तक पहुँचा सकता है। ऋषियों के आश्रम में पलने वाले मृग शावक पालतू कुत्ते की तरह निर्भय विचरते थे। सिंह, गाय एक घाट पानी पीते थे। इस क्षेत्र के अन्यान्य प्राणी भी अपनी मूल प्रकृति भूलकर सज्जनोचित शालीनता से भरा -पूरा व्यवहार करते थे। यह उसी मानवी विद्युत का चमत्कार है जो साधनारत व्यक्तियों के शरीर से निकलती है और अपनी एक प्रभाव परिधि का निर्माण करती है। ऐसी शक्ति का प्रकटीकरण त्वचा परिकर से होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते ही यह व्यवस्था बनी है कि किसके साथ घनिष्ठता स्थापित करनी चाहिए और किससे बचते रहना चाहिए?

त्वचा को समर्थ बनाने के लिए वायु, जल और सूर्य का बाहरी उपयोग किया जाता है। मैल की परत ने जमने दी जाय। घर्षण स्नान से त्वचा के छिद्रों को खुला रखने की व्यवस्था बनाये रखी जाय, ताकि नासिका की भाँति रोम कूपों से भी साँस लेने और स्वेद विसर्जन का समुचित आधार बनता रहे। इसके अतिरिक्त प्रातः काल के सूर्य सेवन का प्रबन्ध किया जाय। ठंडक के दिनों में शीत से बचने के लिए किसी ऐसे स्थान का चयन किया जा सकता है जहाँ हवा के झोंके तो न पहुँचते हो, पर धूप चमकती हो। शरीर का जितना भाग खुला रखा जा सके उतना ही उत्तम है। फल, शाक, अन्न आदि के ऊपरी भाग सूर्य किरणों के संपर्क में रहते हैं। उस भाग में पोषक तत्वों की मात्रा अपेक्षाकृत कही अधिक पाई जाती है। त्वचा को प्रातः काल धूप में आधा घंटे से लेकर एक घंटे तक सेंका जा सकता है। इससे ऊपरी परत की तेजस्विता तो बढ़ती है साथ ही उसका तेजोमंडल भी उत्तेजित एवं विस्तृत होता है। कड़ी धूम में बहुत देर बैठना उचित नहीं। अति की सर्वत्र वर्जना की गई है। मध्याह्न को कड़ी धूप का विशेषतः सिर भाग पर पड़ना अहितकर है।

इस संदर्भ में ध्यान-धारणा का उपयोग भी हो सकता है। आंखें बन्द और चित्त को एकाग्र करके ध्यान करना चाहिए कि त्वचा सामान्य चर्म वर्ण से बदलकर स्वर्णिम बन रही है। कलेवर प्रातः काल के सूर्य जैसा स्वर्णिम बन रहा है। इसके साथ ही उसमें से चन्दन जैसी दिव्य गंध भी उत्पन्न हो रही है। उत्पन्न होने के उपरान्त वातावरण में फैल रही है।

काया के आचरण को स्वर्णिम और सुगन्धित अनुभव करने को ध्यान-धारणा किसी भी समय की जा सकती है। पर रात्रि की अपेक्षा दिन का समय अधिक उत्तम और उत्साहवर्धक है। इसी के साथ तेजोवलय-आभामंडल का आवरण सभी दिशाओं में अधिक विस्तार और अधिक तेजस्विता से भरने की भावना भी करते रहनी चाहिए। त्वचा को समर्थ ज्ञानेन्द्रिय बनाने का यह सरल एवं प्रभावी अभ्यास है।


बड़प्पन सिद्ध करने के लिए नीचा दिखाने की आवश्यकता नहीं (Kahani)

अपना बड़प्पन सिद्ध करने के लिए लोग दूसरों को गिराने का प्रयत्न करते हैं, पर वे इसमें प्रायः सफल नहीं होते, उलटे अपने को ही बदनाम कर लेते हैं। उपाय दूसरा है, जिसकी सिखावन देते हुए एक अध्यापक ने छात्रों को समझाया।

श्याम पट पर अध्यापक ने एक लकीर खींच दी और छात्रों से पूछा इसे बिना मिटाये छोटी करके दिखाओ।

वैसा कोई भी न कर सका। सभी चुप बैठे थे। अध्यापक ने उस लकीर के समीप ही एक बड़ी लकीर खींच दी और कहा अब यह छोटी हो गई न? लड़कों ने स्वीकृति सूचक सिर हिलाया।

अध्यापक ने कहा- अपना बड़प्पन सिद्ध करने के लिए किसी को गिराने या नीचा दिखाने की आवश्यकता नहीं। अन्यों की तलना में अधिक ऊँचा पुरुषार्थ किया जाय तो सहज ही बड़प्पन हाथ लगेगा और किसी को छोटा सिद्ध करने की आवश्यकता न पड़ेगी।


धर्म धारणा-प्रगति का एक सनातन राजमार्ग

जीवन उतना जटिल नहीं जितना कि बन गया है या बना दिया गया है। हँसी-खुशी की सम्भावनाओं से वह भरा-पूरा है। शरीर और मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर से तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने पर सहज ही स्वस्थ और सुखी रह सकता है। अति स्वल्प साधनों से अन्य जीवधारी अपना संतोषपूर्ण व्यवस्था क्रम चलाते रहते हैं, न उन्हें रुग्णता सताती है और न खिन्नता। यदि उन्हें सताया न जाय तो शरीर यात्रा की प्रचुर परिणाम में उपलब्ध साधन सामग्री से ही अपना काम चला लेते हैं और हँसी खुशी के दिन काटते हैं।

मनुष्य को यह सुविधा और भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है। उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व इतना समर्थ है कि न केवल शारीरिक सुविधा की सामग्री वरन् मानसिक प्रसन्नता की परिस्थिति भी स्वल्प प्रयत्न से प्रचुर मात्रा में प्राप्त कर सकती है। इतने पर भी देखा यह जाता है कि मनुष्य खिन्नता और अतृप्ति से ही घिरा रहता है। आधियों और व्याधियों की घटाएँ उस पर छाई रहती है।

सौभाग्य जैसे समस्त साधन प्राप्त होने पर भी दुर्भाग्य की जलन में झुलसते रहने के पीछे एक ही कारण ढूँढ़ा जा सकता है कि सहज सरल रीति-नीति को छोड़कर हम जाल-जंजाल भरी विद्रूप विडम्बनाओं में उलझ गये और अपना मार्ग स्वयं कंटकाकीर्ण बना लिया। धर्माचरण का सहज राजमार्ग छोड़कर विपरीत आचरण अपना लिया। परिणाम स्वरूप असंतोष एवं रोग, शाक, युक्त जीवन जीने को बाध्य होना पड़ रहा है।

ऐलिस ने ठीक ही कहा है- “मनुष्य के मन और शरीर को आधि-व्याधियों ने इसलिए घेरा है कि उसे धर्म का समुचित संरक्षण नहीं मिला। यदि आहार निद्रा की तरह धर्म को भी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया होता तो हम शोक-सन्तापों की विविध-विधि व्यथायें सहने से सहज ही बच सकते थे।”

सन्त आगस्टाइन ने मानव की मानव के प्रति कर्त्तव्य घोषणा को धर्म माना है। सेन्टपाल का कथन है कि पतन के गर्त से उत्थान के शिखर पर चढ़ने की सीढ़ी को धर्म कहना उपयुक्त होगा।

हेम्रोज ने धर्म को दो धाराओं में विभक्त किया है- एक आस्था मूलक दूसरी व्यवहार परक। आस्था की स्थापना ‘अध्यात्म’ के आधार पर होती है और आचरण -व्यवहार का समीकरण धर्माचरण पक्ष द्वारा किया जाता है। दोनों के समन्वय को धर्म कह सकते हैं। ईश्वरवाद के सहारे ही धर्म सिद्धान्तों की व्याख्या और पुष्टि की जा सकती है।

विलियम ब्लैक ने-धर्म को आत्मा का कवित्व कहा है वे कहते हैं - “पुराणों के अलंकार में परियों की गाथाएँ और जादुई किंवदंतियों भी पड़ी है। इन सबका सार निष्कर्ष” यह है कि आत्मा की भाव सरिता यदि उत्कृष्टता की दिशा में बह निकले तो उसका प्रतिफल व्यक्ति और समाज के लिए उतना ही सरस और आकर्षक हो सकता है “जैसा कि देवताओं का सौंदर्य, वैभव और कर्त्तव्य।”

ल्यूबा ने धर्म को एक सनातन राजमार्ग बताया है। जिस पर धीरे-धीरे चलते हुए मनुष्य जाति विकास के वर्तमान स्तर तक पहुँचने में समर्थ हुई है और भविष्य में अधिक कुछ पाने की आशा कर सकती है।

वस्तुतः सहज स्वाभाविकता का नाम ही धर्म है और इसके विपरीत आचरण अधर्म कहलाता है। वैयक्तिक और सामाजिक कर्तव्यों को जो सही तरह समझता है और सही तरह पालन करता है। उसे स्वल्प साधनों में भी तुष्ट-पुष्ट और प्रगतिशील देखा जा सकेगा। धर्म की धारणा निश्चित रूप से सुख शान्ति के प्रतिफल प्रदान करती है।


Quotation

ईश्वर को कल्पवृक्ष कहा गया है, पर कुछ पाने के लिए उसके निकट जाना और छाया में बैठना पड़ता है।


सरलतम और समग्र शक्तिवान “ॐ कार”

मंत्र साधना करने वाले साधक को जिन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, उसमें प्रधान यह है कि मंत्रोच्चारण की ध्वनि शुद्ध हो। इसकी जाँच पड़ताल किसी अनुभवी से करा लेनी चाहिए। ईश्वर प्रार्थना के रूप में राम का नाम सीधा उल्टा, सही गलत किसी भी रूप में किया जा सकता है, पर मंत्रोच्चार में उसकी ध्वनि शुद्धता आवश्यक है। सितार के तारों का गठन और अंगुलि चालन यदि सही हो तो ही उसमें से अभीष्ट राग, रागनियाँ निकलते हैं। ओंधे किसी भी प्रकार कुछ भी बजाने लग जाय तो उसमें से बेसुरी कर्कशता ही निकलेगी। यह बात मंत्रोच्चार की शुद्धता के सम्बन्ध में भी है।

कौन व्यक्ति किस प्रयोजन के लिए किस मंत्र की साधना करें। इसका निर्धारण अपनी मन-मर्जी से नहीं कर लेना चाहिए और न पुस्तकीय उल्लेखों को आत्यंतिक प्रमाणभूत मानना चाहिए। चिकित्सा शास्त्र के अनेकों ग्रंथ औषधि निर्माण का विधान एवं सेवन का उपचार बताने वाले है। इस पर भी रोगी की विशेष स्थित को जाँचकर तद्नुरूप औषधि का निर्धारण करने में अनुभवी चिकित्सक की सलाह लेनी पड़ती है। यदि ऐसा न किया जाय तो कोई भी रोगी बाजार से पुस्तक या दवा खरीद कर अपना इलाज आप करने लगे। इच्छित मात्रा में इच्छित औषधि खाने लगे तो इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। इसलिए सार्वजनिक प्रार्थनाओं को छोड़कर यदि मंत्र विद्या में गहराई तक प्रवेश करना है और अभीष्ट लाभ प्राप्त करने का लक्ष्य रखना है, तो अपने मनोरथ के अनुरूप मंत्र के चयन एवं प्रयोग के विधान में किसी अनुभवी का परामर्श लेना चाहिए। अपनी स्थिति एवं कामना के अनुरूप मंत्र का चयन, विधान एवं उच्चारण सही करना चाहिए।

उच्चारण के अतिरिक्त जो बात ध्यान रखने की है, वह है व्यवहार शुद्धि। मंत्र साधक का आहार-विहार सात्विक ही नहीं सीमित भी होना चाहिए। इसी को व्रत उपवास की परिधि कहते हैं। यह प्रक्रिया संयम साधना के अंतर्गत आती है। जिसका प्रारम्भ आहार शुद्धि से होता है और आगे बढ़कर चरित्र शुद्धि तक पहुँचता है। दुराचारी, अनाचारी, कुकर्मी, व्यक्ति अपने उद्धत आचरणों से इतनी प्रतिकूल प्रतिक्रिया काय कलेवर में अर्जित कर लेते हैं कि उस पर मंत्र साधना का प्रभाव उतना ही पड़ता है, जितना जलते तवे पर पानी की कुछ बूँदों का।

आध्यात्मिक उपचारों का विधि विधान ही समुचित नहीं होना चाहिए, वरन् उसके प्रयोक्ता का व्यक्तिगत चरित्र-चिन्तन भी परिष्कृत स्तर पर होना चाहिए। अभक्ष्य खाने वाले, बहुभक्षी, नशे वाले, व्यभिचारी, दुराचारी स्तर के व्यक्ति प्रायः उपयुक्त साधना विधान अपनाने पर भी असफल रहते देखे गये हैं। उनकी विद्रूप मानसिकता एवं उच्छृंखलता क्रियाशीलता यदि रुके नहीं तो मलीनता की मात्रा एवं इतनी अधिक संचित होती जाती है, जो साधना के स्वल्प प्रयास को भी अपने तूफानी झोंके में उड़ा ले जाय। इसलिए मंत्र योगी को आहार विहार की सात्विकता संयमशीलता बनाये रहने के लिए विज्ञजन दबाव या निर्देश करते रहे हैं विशेषतया आहार की सात्विकता बढ़ाने और मात्रा घटाने के के पलिए। भूख से कुछ कम और नियत समय पर सात्विक आहार करने से भी उपवास का काम चलाऊ उद्देश्य पूरा हो जाता है। इस हेतु अस्वाद व्रत बिना नमक शक्कर मिला भोजन भी प्रशंसनीय है। अमृताशन उबला हुआ खिड़की जैसे प्रस्तुतीकरण को भी अन्न की तुलना में कुछ अधिक ही रखा जाय। खाने के समय तो नहीं पर बाद में पानी की मात्रा भी पर्याप्त रखी जाय। जिससे कचरे की धुलाई ठीक प्रकार होती रहे।

तीसरी बात है- मंत्र की सशक्तता एवं प्रमाणिकता पर अटूट विश्वास। विश्वास को साधना का प्राण कहा गया है। उसके अभाव में संदेह छाया रहता है और उपयुक्त परिणति की संभावना बड़ी मात्रा में नष्ट हो जाती है। विश्वास अपने आप में एक शक्ति है। उसके आधार पर सिद्ध पुरुषों द्वारा दी हुई “भस्म” भी जादू जैसा प्रभाव दिखती देखी गई है। जिजीविषा के प्रबल रहने पर मरणासन्न व्यक्ति भी मौत को परास्त करते देखे गये हैं। स्वयंकेतों का-स्वयंवेदनों का-एक स्वतंत्र शास्त्र ही विकसित हुआ है, जिसमें व्यक्ति की अपनी प्रकृति की, सुधार की, उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित अवधारणा करनी पड़ती है। विश्वास द्वारा उत्पन्न ऊर्जा अनेकानेक विपन्नताओं को परास्त करती देखी गई है। इस अवलम्बन को मजबूती से पकड़े रहने वाले आशावादी साधनों के अभाव में भी ऊँचे उठते, आगे बढ़ते देखे गये हैं। “एकला चलोरे” का संकल्प उस साहसिकता का द्योतक है। जिसमें उपयुक्त सहयोग एवं साधन न मिलने पर भी आत्म विश्वास के सहारे कदम उठाते हैं और अभीष्ट तक पहुँचाने वाला प्रयास निर्वाध गति से अनुगामी बनता है। सफल होकर रहता है।

रस्सी का साँप, झाड़ी का भूत, बतलाने जैसे उदाहरणों में अवास्तविकता विश्वास के आधार पर सत्य बनकर अपना दुष्प्रभाव दिखाती देख गई है। कथा प्रसिद्ध है कि यमराज ने मृत्यु को पाँच हजार व्यक्ति मार लाने के लिए भेजा। अब वह पन्द्रह लाख लेकर लौटी तो जवाब-तलब हुआ कि आदेश से अधिक बटोरने की आवश्यकता क्यों की गई? तो मौन ने कहा- मैंने तो नियत संख्या में ही मारे। पर अन्य लोग आशंका, कुकल्पना और भीरुता के कारण डर के मारे स्वयं मर गये और परलोक आने वालों की भीड़ में सम्मिलित हो गये। “होता ऐसा भी है कि संकल्पों की दृढ़ता एवं दुर्बलता अपने आप में एक तथ्य भरी शक्ति बन जाती है और ऐसे परिणाम दिखाती है जिसे आश्चर्यजनक कहा जा सके। शास्त्रकार ने श्रद्धा विश्वास को भवानी शंकर की उपमा दी है। इसे मनगढ़ंत नहीं, सचाई जैसी वास्तविकता समझा जाना चाहिए। इस आधार पर हित साधन भी होता है और अनर्थ में जकड़ा भी जाता है। मंत्र साधन में विशेष रूप से इस तथ्य को समझा और सम्मिलित किया जाना चाहिए कि विश्वासी को मंत्र साधन की सहज सफलता प्राप्त करते देखा गया है, जबकि अविश्वासी का सही मंत्र और सही प्रयोग भी अनेक बार असफल रहते देखा गया है।

कौन व्यक्ति किस प्रयोजन के लिए, किस मंत्र साधना किस प्रकार करें? यह एक विशेष निर्धारण है। इसके लिए परीक्षक एवं निर्धारक ऐसा होना चाहिए जो व्यक्तित्व का सही वर्गीकरण करने एवं साधना विधान में प्रयोग प्रतिक्रिया से भली भाँति परिचित हो। ऐसे निष्णात अनुभवियों का इन दिनों एक प्रकार से अभाव ही देखा जाता है। अनपढ़ आडम्बर ही अध्यात्म क्षेत्र पर विडम्बनाओं के सहारे हावी है। उन्हीं का छल प्रपंच भावुकजनों की भाव श्रद्धा का दहन करता रहता है बाहुल्य इसी समुदाय का है। उन्हीं का गुरु दम्भ जहाँ-तहाँ अधिकार जमाये बैठा है और चित्र-विचित्र विडम्बनाएँ रचना रहता है। जिनने गम्भीर अध्ययन, मनन चिन्तन किया हो, आचरणों में भावनाओं में उत्कृष्टताओं का भरपूर समावेश रखा हो साथ ही साधना विधान के हर पक्ष को भली भाँति समझा हो। ऐसे मार्गदर्शकों के अभाव में साधक के सामने यह कठिनाई आती है कि वह स्थूल शरीर के परिमार्जन हेतु मंत्र साधना का उपयोग किस प्रकार करे? द्विविधा से किस प्रकार मुक्ति पाये? सरल और सीधे मार्ग पर किस प्रकार चल सकें?

इस उलझन का समाधान करने के लिए हमें व्यक्ति विशेष के लिए विभिन्न विधि विधान बताने वाली प्रक्रिया से बच कर ऐसा राजमार्ग निश्चित करना होगा, जो हर किसी के काम आ सके और बिना किसी जोखिम का हो।

पन्द्रह वर्ष की आयु से आरम्भ करे अब 77 वर्ष तक के 62 वर्षों में हमने निरन्तर गायत्री महामंत्र की उपासना की है। इस अवधि में हमने अपने अवरोधों को हटाने और अनुकूलताओं के उगने में आशातीत सफलता पाई है। संपर्क परिकर के जिन लोगों को यह प्रयोग बताया है, उन सब ने भी अपनी प्रतिक्रिया ऐसी ही व्यक्ति की है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विश्वासी के लिए इस साधना का सुनिश्चित प्रतिफल हो सकता है और वह मंत्र शक्ति की सार्थकता के सम्बन्ध में स्वयं संतुष्ट रहकर दूसरों को भी अपने अनुभवों से आश्वस्त कर सकता है। किन्तु कहाँ कठिनाई यह आड़े आती है कि यह संस्कृत भाषा में विनिर्मित है, साथ ही हिन्दू परम्परा से भी जुड़ा हुआ है।

उसकी मातृ स्तर की छवि ही बनी हुई है। यह सब बातें हिन्दू धर्मानुयायियों के ही गलत उतरती है। प्रश्न सार्वभौम व्यवस्था है। लक्ष्य विश्व मानव की प्रगति का सामने है जो हिन्दू परम्परा के प्रति निष्ठावान नहीं है उन अन्य भाषा भाषियों और अन्य धर्मावलम्बियों का भी है। अब हमें विश्व विचारणा विश्व भावना को भी ध्यान में रखना है भविष्य में एकता और समता को ही मान्यता मिलनी है। विभेदों वाले प्रचलन हटने है। ऐसी दशा में उस मानसिकता का निर्धारण करना होगा जो सर्वग्राहय भी हो और सर्वसुलभ, सर्व ग्राहय एवं प्रयोग में सरलतम भी हो।

इस संदर्भ में “‘ॐ कार” की ध्वनि धारणा से उपरोक्त आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। “‘ॐ” किसी भाषा का कोई शब्द नहीं। भारत में उसे अ-उ-म के सम्मिश्रण से बना “ओम्” माना जाता है और उसका अर्थ भी संस्कृत शब्द कोष के आधार पर किया जाता है। पर “ॐ” तो ध्वनि मात्र है। “ओउम्” से भिन्न है। इसे ऐसी ध्वनि समझा जा सकता है जैसी घड़ियाल में हथौड़ी मारने के उपरान्त झनझनाहट के रूप में होती है। यह प्रकृति पुरुष का आदि समागम भी है और उसी उपक्रम के निरन्तर चलते रहने से सृष्टिक्रम चलता रहता है। इसे घड़ी का पेण्डुलम तुल्य कहा जा सकता है। गायत्री का बीज भी यही है ॐ से तीन व्याहृतियाँ उत्पन्न हुई। प्रत्येक व्याहृति से तीन-तीन शब्द प्रस्फुटित हुए। जैसे कि बीज में अंकुर, पौधा और पत्तों फूल फलों से विकसित हुआ वृक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री को वृक्ष और “ॐ” को उसका बीज कहा जा सकता है। गायी के 24 अक्षरों में काय कलेवर के अन्तराल में विद्यमान 24 शक्ति केन्द्रों का जागरण होता है और उस आधार पर अनेक ऋद्धि-सिद्धियों की विभूतियों को वैभव हस्तगत होता है यही समूचा लाभ प्रकारान्तर से अकेले “ॐ” कार के जप से भी हस्तगत हो सकता है।

शरीर को यथा संभव शुद्ध करके शुद्ध स्थान में बैठकर अन्तर्मुखी मुद्रा में “‘ऊँ कार” जप इस प्रकार किया जा सकता कि मनोचेतना और आया के बीज आघातों का क्रम चलने की झनझनाहट जैसी अनुभूति होने का क्रम चल रहा है। इस आधार के चक्रों उपत्यिकाओं, ग्रंथियों, गुच्छकों में अभिनव चेतना का संचार होता है। कुछ ही दिन के अभ्यास से इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी किया जा सकता है। साथ ही उन लाभों को हस्तगत होते देखा जा सकता है, जो गायत्री मंत्र की विधिवत् साधना करने से उपलब्ध होता है

अच्छा हो इस जप का कंठ से गुँजन होता रहे और उसका कम्पन प्रभाव समस्त काया को प्रभावित करता प्रतीत होता रहे। इसके अतिरिक्त ऐसा भी हो सकता है। जब भी अवसर अवकाश हो तभी “‘ॐ” का मानसिक जप चालू कर दिया जाय। यह प्रक्रिया भी लौकिक जीवन को सुखी समुन्नत बनाने में कारगर हो सकती है।


लोमड़ी (Kahani)

भोर हुआ तो लोमड़ी आंखें मलती हुई उठी। पूँछ उसकी उगते सूरज की ओर थी। छाया सामने पड़ रही थी। अपनी लम्बाई और ऊँचाई देखकर लोमड़ी को अपने असली स्वरूप का आभास आज पहली बार हुआ था।

सोचने लगी वह बहुत बड़ी है। इतनी बड़ी कि समूचे हाथी के बिना उसका पेड़ भरेगा नहीं। सो हाथी का शिकार करने वह घने जंगल में घुसती चली गई। भूख जोरों से लग रही थी। पर छोटी खुराक से काम क्या चलता। उसे हाथी पछाड़ने की सनक सवार थी।

भूखी लोमड़ी भाग दौड़ में थक-थक कर चूर चूर हो गई। तब तक दोपहर भी हो गई। सुस्ताने के लिए वह जमीन पर बैठी तो उसका सारा नजारा ही बदल चुका था। छाया सिमटकर पेड़ से नीचे जा छिपी थी।

इस नई असलियत को देखकर लोमड़ी की चिन्ता बदल गई, वह सोचने लगी इतने छोटे आकार के लिए तो एक छोटी मेंढकी भी बहुत है।


आनन्द कहाँ? अपनी ही मुट्ठी में

भगवान बुद्ध से एक बार श्रेष्ठी सुमन्तक ने पूछा- “मन्ते।” अक्षय आनन्द की प्राप्ति का क्या उपाय है? इस पर तथागत से उत्तर दिया- इच्छाओं को त्याग करना। प्रसंग को अधिक स्पष्ट कराने के लिए जिज्ञासु ने पूछा- बिना इच्छा के कोई कर्म तक नहीं हो सकता, फिर इच्छा न रहने से तो निष्क्रियता छा जायेगी और निर्वाह तक कठिन हो जायेगा।

भगवान ने विस्तार से बताया कि इच्छा त्याग से तात्पर्य बुद्धि एवं कर्म का परित्याग नहीं, वरन् व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं को छोड़कर आदर्शों के लिए काम करना है। शरीर रक्षा, परिवार पोषण एवं सामाजिक सुख-शाँति का ऊँचा उद्देश्य रखकर जो काम किये जायेंगे। उनमें स्वार्थान्धता नहीं रहेगी। न उनके लिए दुष्कर्म करने पड़ेंगे। सामर्थ्य भर प्रयत्न करने पर जितनी सफलता मिलेगी उसमें सन्तोष रखते हुए आगे का प्रयास जारी रखा जायगा। यही है इच्छाओं का त्याग। जिनमें किन्हीं आदर्शों का समावेश नहीं होता-लोभ और मोह की पूर्ति ही जिनका आधार होता है वे ही देय और त्याज्य मानी गई है।

ईमानदारी के साथ सदुद्देश्य लेकर मनोयोग पूर्वक श्रम किया जाय। वह कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य कर्म करने के उपराँत जो प्रतिफल सामने आये उससे प्रसन्न रहने का नाम सन्तोष है। सन्तोष का यह अर्थ नहीं है कि जो है उसी को पर्याप्त मान लिया, अधिक प्रगति एवं सफलता के लिए प्रयत्न ही न किया जाय। ऐसा सन्तोष तो अकर्मण्यता का पर्यायवाचक हो जायगा। इससे तो व्यक्ति दरिद्र रहेगा और समाज पर पिछड़ापन छाया रहेगा। पुरुषार्थ भरे उपार्जन में से व्यक्ति की प्रतिभा निखरती है और समाज की समृद्धि बढ़ती है।

दार्शनिक जैरोल्ड की परिभाषा के अनुसार सन्तोष निर्धनों का निजी बैंक है, जिसमें पर्याप्त धन भरा रहता है। जार्ज इलियट का मत भी इसी से मिलता जुलता है। वे कहते थे- “असंतोषी कभी अमीर नहीं हो सकता और संतोष के पास दरिद्रता फटक नहीं सकती।” उदार और दूरदर्शी मस्तिष्कों में संतोष का वैभव प्रचुर मात्रा में भरा रहता है। आनन्द की तलाश करने वालों को उसकी उपलब्धि सन्तोष के अतिरिक्त और किसी वस्तु या परिस्थिति में हो ही नहीं सकती। सुकरात ने एक बार अपने शिष्यों से कहा था- “संतोष ईश्वर प्रदत्त सम्पदा है और तृष्णा अज्ञान के अनुसार द्वारा थोपी गई निर्धनता”

परिणाम को आनंद का केन्द्र न मानकर यदि काम को उत्कृष्टता की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाय तो सदा उत्साह बना रहेगा और साथ ही आनन्द भी। कलाकार ब्राउनिंग करते थे- “हम किसी कार को छोटा न माने वरन् जो भी काम हाथ में है उसे इतने मनोयोग के साथ पूरा करें कि उसमें कर्त्ता के लिए श्रेय और सम्मान का कारण बनते हैं, भले ही वे अधिक महत्वपूर्ण न हो।” मनस्वी रस्किन की उक्ति है “काम के साथ अपने को तब तक रगड़ा जाय जब तक कि वह संतोष की सुगंध न बखेरने लगे।” वाल्टेयर ने लिखा है - “किसी काम का मूल्याँकन उसकी बाजारू कीमत के साथ नहीं, वरन् इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उसके पीछे कर्ता का क्या दृष्टिकोण और कितना मनोयोग जुड़ा रहा है। अब्राहम लिंकन का यह कथन कितना तथ्यपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा था - “हम जिस काम में जितना रस लेते हैं और मनोयोग लगाते हैं वह उतना ही अधिक आनन्ददायक बन जाता है।”

आनन्द के लिए किन्हीं वस्तुओं या परिस्थितियों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं और न उसके लिए किन्हीं व्यक्तियों के अनुग्रह की आवश्यकता है। वह अपनी भीतरी उपज है। परिणाम में संतोष और कार्य में उत्कृष्टता का समावेश करके उसे कभी भी, कहीं भी और कितने ही बड़े परिमाण में पाया जा सकता है।


तन्मेमनः शिवंसकल्पमस्तु

रेडियो प्रसारण में एक स्थान से बोले हुए शब्द आकाशीय तरंगों के माध्यम से सभी दिशाओं में दूर-दूर तक फैलते हैं। जहाँ भी उनको सुने जाने वाले यंत्र रखे होते हैं, वहाँ उन्हें आसानी से सुन लिया जाता है। दूरदर्शन में भी यही होता है। एक स्थान में दृश्यों को विद्युत शक्ति के सहारे आकाश में फेंका जाता है, वे दृश्य प्रकाश तरंगों के रूप में अन्तरिक्ष में बिखरते हैं। उन्हें जहाँ भी देखे जाने वाले उपकरण लगे होते हैं वही वे बटन दबाते ही दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। मस्तिष्क भी इसी प्रकार का एक शक्ति उत्पादक केन्द्र है। यहाँ से विचार उठते हैं और वे समस्त आकाश में फैल जाते हैं, किन्तु वे पकड़ में वही आते हैं।, जहाँ उन्हें ग्रहण किये जाने हेतु अनुकूल स्थिति होती है।

अनुकूल स्थिति से तात्पर्य है- पकड़ने वाले मस्तिष्क की स्थिति लगभग वैसी होने चाहिए जैसी कि भेजने वाले की थी। दोनों के बीच समस्वरता होने पर भी आदान प्रदान का सिलसिला ठीक से चल पड़ता है। हर मस्तिष्क में भेजने और ग्रहण करने की क्षमता है। अन्तर इतना ही होता है कि किन्हीं मस्तिष्कों में विचार संचालन के उपयुक्त विद्युत शक्ति कम होती है और किन्हीं में बढ़ी चढ़ी। जिनमें सशक्तता होती है वे विचार संचालन ठीक प्रकार कर पाते हैं। पर यदि वह धीमी हो तो भी उठने वाले विचार फैलते तो है, पर उनकी सामर्थ्य इतनी नहीं होती कि उन्हें सुनने के इच्छुक आसानी से सुन सकें। कभी कभी मनुष्य की स्थिति उत्तेजना भरी होती है तब वह विचार संप्रेषण भी तीव्र हो जाता है और उसे झटके के साथ अप्रत्याशित रूप से सुना जा सकता है। ऐसे झटके शोक, दुर्घटना, उत्पीड़न, आपत्ति जैसी स्थिति में होते हैं। देखा गया है कि मरण के समय या किसी दुर्घटना में फँस जाने पर व्यक्ति चीत्कार जैसी मनः स्थिति में अपने घनिष्ठ सम्बन्धियों तक अपने विचार पहुँचाना चाहता है। उस समय उसकी ऊर्जा बढ़ी-चढ़ी होती है, अस्तु वे विचार भी विशिष्ट स्थान तक पहुँचने में बिना किसी अड़चन के सफल हो जाते हैं। ऐसी कितनी ही घटनाएँ सुनी गई है कि मरने वाले या दुर्घटनाग्रस्त किसी व्यक्ति ने अपने प्रियजन को याद किया और सुदूर बैठे उस व्यक्ति को अचानक वैसी ही अनुभूति हुई।

प्रिय पात्रों के बीच में विचारों का आदान-प्रदान चला रहता है। दूर-दूर तक रहने वाले प्रेमीजन अपनी भावनाओं को एक दूसरे तक पहुँचाते रहते हैं और वे अधिकतर सही अनुभूतियाँ होती है। मित्रता की तरह शत्रुता में भी यह गुण होता है। कारण यह कि शत्रु का व्यक्तित्व भी मित्र की तरह ही मस्तिष्क पर छाया रहता है। पारस्परिक तादात्म्य किसी प्रकार बन जाए तो दो व्यक्तियों के बीच विचार- संचालन का क्रम चल पड़ेगा। इस परिकर में दोनों के स्थान पर और भी कई व्यक्ति सम्मिलित हो सकते हैं। संसार के अगणित स्थानों पर रेडियो, टेलीविजन प्रसारण यंत्र लगे है। वे अपनी कुछ न कुछ बात लगातार करते रहते हैं। इन्हें सुनने के लिए तनिक अधिक सशक्त ग्रहण यंत्र या ट्राँजिस्टर क्रिस्टल चाहिए। रेडियो-टेलीविजन में यह विशेषता है कि प्रसार के लिए बहुमूल्य यंत्र और अधिक बड़ी शक्ति की बिजली चाहिए। निकटवर्ती होने पर प्रसारण शक्ति न्यून होती है। विचारों के संप्रेषण में भी यह बात है। किसी के भेजे हुए विचार तो आकस्मिक स्मृति के रूप के अलावा स्वप्न में तन्द्रित स्थिति में भी अपनी झलक दिखा जाते हैं, किन्तु लम्बा संप्रेषण तभी सम्भव है जब प्रेरक का मनः क्षेत्र और अधिक सामर्थ्यवान हो जाए और जिसे कुछ बताना है, उसका ध्यान अन्यत्र लगा होने पर उसे रोक कर अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए सहयोगी बना लिया जाए।

आरम्भ में यह वैयक्तिक विचार संचरण समग्र एवं निर्दोष नहीं होता। उससे कुछ बाते प्रेषित तो होती है, पर कुछ ग्रहीता की निज की कल्पनाएँ भी मिल जाती है। इस प्रकार बात आधी-अधूरा रह जाती है, पर यह अभ्यास जारी रखा जाए। संप्रेषण का समय नियत रखा जाए। दोनों पक्ष उसकी तैयारी में संकल्पपूर्वक बैठे, तो उस प्रक्रिया में रहने वाली त्रुटियाँ घटती जायेगी और समग्रता बढ़ती आएगी।

यह व्यक्तिगत विचार संप्रेषण की बात हुई। इससे रेडियो, टेलीविजन का काम बिना किसी यंत्र की सहायता के हो सकता है। व्यक्तिगत विचार विनिमय में प्रायः निजी बाते रहती है, किन्तु पारमार्थिक विचारणाओं का घेरा विशेष रूप से बनाया जा सकता है। जिस एक प्रकार से एक विचारों का प्रभामण्डल या आयनोस्फियर कहा जा सकता है। जिस प्रकार सत्संग, गोष्ठी या सभी इत्यादि में एक वक्ता उस परिकर में उपस्थित अनेक लोगों को अपनी बात सुना सकता है, वैसा ही प्रयोग आदर्शवादी परामर्श के लिए नियमित व्यवस्था बनाकर उस प्रकार का प्रयोग किया जा सकता है। समर्थ आत्म विज्ञानी नियत समय पर नियमित रूप से अपने शिष्यों को परामर्श देते रहे है। अरुणाचल में महर्षि रमण जिन दिनों मौन रहते थे उन दिनों भी उनका मौन सत्संग चलता था। वे मौन स्थिति में ही अपनी परा-पश्यन्ति वाणी द्वारा प्रवचन करते थी। उपस्थित जन उस सूक्ष्म कथन की प्रतिध्वनि अपनी अपनी अन्तः चेतना में श्रवण किया करते थे। परस्पर पूछने पर बात एक ही मिलती थी। कि सबने क्या सुना, किस क्रम से किन किन प्रमाणों को उद्धरण सहित सुना। इस प्रकार का लाभ पहुंचाने में अन्य साधक भी निष्णात् हो सकते हैं।

कुविचारों का क्षेत्र बहुत बड़ा और अपेक्षाकृत अधिक सशक्त है। वह अनायास ही दुर्बल मन वालों को अपने चंगुल में फँसा लेते हैं। अपनी इच्छा के अनुरूप ढाल लेते हैं। गुरुत्वाकर्षण की शक्ति सहज ही अपना काम करती रहती है। ऊपर से गिरने वाले को लपक कर नीचे खींच लेती है। पानी ढलान की दिशा में अनायास ही बहने लगता है। इसी प्रकार कुविचार दुर्बल मस्तिष्क वालों पर अपना शासन सहज ही स्थापित कर लेते हैं।

सत्संग और कुसंग के बारे में उनका प्रभाव वर्णित करते हुए मनीषियों ने बहुत कुछ कहा है। उन्हें जिस प्रकार के वातावरण में रहना पड़ता है वे अनायास ही उस माहौल में ढले लगते हैं। ऋषियों के आश्रम में समीपवर्ती क्षेत्र में सिंह और गाय एक घाट पानी पीते थे। कारण इतना भर था कि प्राणवान तपस्वियों की आत्मप्रेरणा उस क्षेत्र के पशु पक्षियों तक को प्रभावित करती थी और वे अपना स्वाभाविक बैर भाव भूल जाते थे। स्वभाव के विपरीत स्नेह सौजन्य के साथ रहने लगते थे। यह प्रयोग मनुष्यों पर भी हो सकता है। कोई सामर्थ्यवान अध्यात्मवेत्ता विपरीत विचार वालों को अपने प्रभाव से प्रभावित करके अपने ढाँचे में ढाल सकते हैं। आसुरी प्रवृत्ति वालों का प्रभाव और भी अधिक बढ़ा चढ़ा रहता है। दुर्गुणी दुर्व्यसनी, अनाचारी अपने समीपवर्ती लोगों में से अनेक को अपनी कुटेव लगा देते हैं। इसके लिए उन्हें कुछ विशेष कहना समझाना नहीं पड़ता। बुरे लोग बुरे प्रयोजनों के लिए ढुलमुल मन वालों को सहज ही अपनी ओर खींच लेते हैं परन्तु कुटेवें छुटाने के लिए आदर्शों में प्रवृत्त करने के लिए अधिक बढ़ी चढ़ी सामर्थ्य चाहिए। वही उन्हीं में उत्पन्न होती है, जिनका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऊँचे दर्जे का होता है। जिनकी प्राण-विद्युत साधना प्रयोगों द्वारा बढ़ाकर ऊँची स्थिति में पहुँचायी गयी होती है।


Quotation

जब हम भावुक होते हैं, तो शहीद होने की सोचते हैं, ओर जब उत्तेजित होते हैं, तो किसी के कठोर शब्द तक नहीं सह पाते।


जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्या

जब तक मनुष्य जीवित रहता है, तब तक उसकी चार अवस्थाओं में से एक बनी रहती है। इन्हें जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्या कहा गया है। इनका स्तर क्रमशः एक से एक बढ़कर है।

जागृति वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सोचना बोलता करता, चलता, देखता सुनता रहता है संक्षेप में इसे क्रियाशील स्थिति कहना चाहिए। विद्वत्ता, बलिष्ठता, सम्पदा, ख्याति आदि कमाने का अवसर इसी स्थिति में मिलता है। मनुष्य चाहता है कि अधिक से अधिक इसी स्थिति में बना रहे। क्योंकि वैभव उपार्जन से लेकर वासना, तृष्णा, लोभ मोह को चरितार्थ करने का रसास्वादन इसी स्थिति में हो पाता है, जीवन का बड़ा भाग इसी स्थिति में साथ रह पाते हैं। सम्पदा का उपार्जन और संग्रह भी इसी स्थिति में हो पाता है। जीवन का बड़ा भाग इसी स्थिति में रहते हुए गुजरता है। इच्छा भी इसी स्थिति में रहने की होती है। रात्रि की संरचना भगवान ने सोने के लिए की है। पर उसका भी बड़ा भाग जागते हुए ही बिताया जाता है आधी रात तक विविध विधि मनोरंजन विनोद चलते रहते हैं। जब नींद का बहुत दबाव पड़ता है, विवशता जैसी स्थित आ जाती है, तभी सोया जाता है।

जागृति के अतिरिक्त दूसरी स्थिति है स्वप्न। स्वप्न नींद की स्थिति में ही देखे जाते हैं। जागृति के अनुभवों को सोता हुआ मनुष्य स्वप्न नींद की स्थिति में ही देखे जाते हैं। जागृति के अनुभवों को सोता हुआ मनुष्य स्वप्न रूप से देखता है। अपनी कामनाओं और आकाँक्षाओं की पूर्ति इसी स्थिति में होती है। कल्पनाएं साकार बन कर दृश्यमान दीखने लगती है। स्वप्नों में से अनेक तो मात्र हास परिहास जैसे ही होते हैं। जो शरीर से नहीं बन पड़ता, कल्पना पक्ष का वह भाग दृश्यमान प्रतीत होता है। यह गरीब, अमीर संपन्न-विपन्न सभी के लिए चित्र विचित्र स्वादों वाला मनोरंजन है। इस स्थिति को जागृति का पूरक ही कहना चाहिए। इसे भी मस्तिष्क परिधि की एक आवश्यकता पूर्ति कहा जा सकता है।

सामान्य लोगों के लिए स्वप्न एक प्रकार से नाटक सिनेमा अर्थात् रंगीनी चित्र विचित्र कल्पनाओं की झलक झाँकी कह सकते हैं। वैज्ञानिक इसे “रैम स्लीप” (रैपीड आई मूवमेन्ट स्लीप) की स्थिति में मानते हैं। किन्तु जिनका चेतना स्तर असामान्य है, उनके लिए इसे अतीन्द्रिय क्षमताओं की जागृति वाली स्थिति कह सकते हैं। मन, बुद्धि तो जागृति में काम करती है किन्तु चित्त और अहंता निद्रित अर्धनिद्रित स्थिति में ही क्रियाशील होती है। इस स्थिति में मन के संयम एवं चित्त वृत्तियों निरोध द्वारा योग साधना जैसी स्थिति उत्पन्न करके प्राप्त किया जाता है। ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ तो जागृति के साथ जुड़ी हुई है। किन्तु सूक्ष्म इन्द्रियाँ जो सूक्ष्म शरीर से संबंधित है, चित्त के साथ जुड़ती है। अचेतन मन उसी स्थित में काम करता है जब जागृति गहरी निद्रा में विलीन हो जाती है। इसे योग निद्रा भी कहा जा सकता है। योग निद्रा में दीखने वाले स्वप्न निरर्थक नहीं सार्थक होते हैं। उनमें दूरदर्शन, दूरश्रवण, भविष्य कथन, विचार संचालन, पूर्वाभास, पितर जैसी दिव्यात्माओं के साथ संपर्क आदि अनेक ऐसी बाते दीख या सूझ पड़ती है जिन्हें अतीन्द्रिय ज्ञान कहा जाता है।

सभी जानते हैं कि निद्रा थकान मिटाती है। तनाव और भारीपन दूर करती है। मस्तिष्क को विश्राम देकर उसके मेधा, प्रज्ञा क्षेत्रों को विकसित, परिष्कृत करती है। नींद के अभाव में उत्पन्न होने वाली बेचैनी का दूर करने के लिए नशीले पदार्थ सेवन किये जाते हैं। उनसे भी आधी अधूरी, खुमारी आती और आँशिक पूर्ति भर होती है। नींद न आने पर मनुष्य, पागल खूँखार हो सकता है। मर भी सकता है, इस तथ्य को सामान्य शरीर विज्ञानी भी जानते हैं।

सुषुप्ति- जागृति और निद्रा का सम्मिश्रण हैं। उसमें इतना और होता है कि दिव्य विशिष्टता का एक अंश और जुड़ जाय। इस स्थिति में जो भाव संवेदनाएँ उठती है। उनमें आदर्शों का गहरा समन्वय रहता है। लोक-मंगल, जन-कल्याण, पुण्य-परमार्थ, त्याग, वैराग्य जैसी धर्मधारणाओं की अंतः प्रेरणाएं उठती हैं मानवी गरिमा की जीवन्त करने वाले राजमार्ग को अपनाने की उमंगे उठती है। उसी उभार में मनुष्य ऐसा चिन्तन चरित्र और व्यवहार विकसित करता है जिसे महामानव स्तर का देवात्माओं जैसा कहा जा सकें।

सुषुप्ति स्थिति में ही ऐसे विचार उठते हैं जिन्हें दार्शनिक या वैज्ञानिक स्तर का कहा जा सकें। भौतिक विज्ञानियों या वैज्ञानिकों को इसी स्थिति में अभिनव आविष्कारों की सूझ सूझती है। कवि कल्पनाएँ एवं साहित्यिक निर्धारणाएँ उसी स्थिति में प्रकट होती है। प्रेरणाप्रद सत्संग इसी स्थिति में बन पड़ता है सामान्य मनोरंजक चर्चा तो कोई भी विद्वान या वाचाल घण्टों करता रह सकता है पर जिस कथन का सुनने वालों के अन्तराल पर गहरा असर पड़े, उसे सुषुप्ति से अभिप्रेत मनः स्थिति ही कहा जा सकता है। शास्त्रों का लेखन इसी आवेश में होता है।

तुर्या चतुर्थ एवं अन्तिम स्थिति है। उसमें जीवात्मा परमात्मा के आवेश से भर जाता है। ईंधन में अग्नि के प्रवेश करने पर साधारण लकड़ी में ज्वाला प्रकट एवं प्रदीप्त होती है। यों उसका आकार पूर्ववर्ती लकड़ी जैसा ही बना रहता है, पर उसके हर भाग से ज्वालमाल फूटती है। उसमें न तो लकड़ी जैसी पूर्ववर्ती कठोरता रहती है और न काला कलूटा स्वरूप ही दृष्टिगोचर होता है। इस स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, आत्मा से परमात्मा, भक्त से भगवान, क्षुद्र से महान स्तर में विकसित परिलक्षित होता है। वह अपने भीतर दिव्य चेतना का आविर्भाव हुआ देखता है। ज्ञान चक्षु खुलते हैं और इसी विश्व उद्यान में समाहित विराट् ब्रह्म के दर्शन होते हैं। ईश्वर साक्षात्कार की यही स्थिति है।

तुर्यावस्था में पहुँचे हुए व्यक्ति योगी, तपस्वी न रहकर देवात्मा, सिद्धपुरुष बनते हैं। उनकी वाणी में शाप वरदान की शक्ति होती है। अपने पुण्य प्रताप की अभीष्ट मात्रा किसी दूसरे सत्पात्र को हस्तान्तरित कर सकते हैं। शक्तिपात के नाम से इसी अनुदान को जाना जाता है। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को अपनी संचित दिव्य क्षमता का हस्तान्तरण किया था। विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को अपनी यही दिव्य चेतना बला और अतिबला विद्या की साधना कराते हुए उपलब्ध कराई थी।

तुर्यावस्था एक प्रकार की समाधि अवस्था है। जड़ समाधि में शरीर के अवयव निश्चेष्ट हो जाते हैं और गति विधियाँ रुक जाती है। किन्तु इस जागृति समाधि में क्रियाशीलता तो सामान्यजनों जैसी रहती है। किन्तु अन्तरात्मा में परमात्मा भाव का प्रकटीकरण उभर कर ऊपर आता है। व्यक्ति शारीरिक क्रियाएं तो सामान्य जनों जैसी करता रहता है, पर उसकी अन्त चेतना सर्वत्र दिव्य हो जाती है। अपना आपा साँसारिक जीव धारियों जैसा नहीं वरन् देवात्माओं जैसा परिलक्षित होता है। जीवन सृष्टा की धरोहर प्रतीत होता है और सतर्कता यह कहती है कि हर क्षण का ईश्वर की इच्छानुरूप श्रेष्ठतम सदुपयोग बन पड़े।

यह इच्छा कल्पना ही नहीं रहती वरन् क्रिया रूप में भी परिणति होती रहती है। अंग अवयवों की संरचना में कोई अन्तर नहीं आता। शरीर यात्रा भी सामान्य जनों जैसी चलती रहती है पर आदर्श और उद्देश्य असाधारण रूप में ऊँचे रहते हैं। आकाँक्षा, विचारणा, भावना और चेष्टा ऐसी होती है जैसी जीवनमुक्त दिव्य पुरुषों की होनी चाहिए।

तुर्यावस्था की खुमारी ऐसी होती है जो एक बार चढ़ जाने पर उतरती नहीं। प्रलोभनों, आकर्षणों ओर दबावों का कोई ऐसा प्रभाव नहीं पड़ता जो नीचे गिरा सकें और पथ भ्रष्ट कर सके। हर साधक का इसी स्थिति को प्राप्त करना मुख्य लक्ष्य रहता है। बशर्ते कि वह मार्ग में न भटके।


आँख और कान (Kahani)

आँख और कान की विशेषता और गरिमा बताने के लिए किसी जिज्ञासु ने विचारक से पूछा।

मनीषी ने उत्तर दिया। आँख केवल सामने का देखती है जबकि कान, विगत, आगत और वर्तमान के सुनने समझने में सहायता करते हैं।

सुन्दर दीखने वाली आँखों की तुलना में कुरूप कानों की महिमा अधिक है।


सिद्ध क्षेत्र हिमालय

पदार्थों और प्राणियों के जीवकोशों- परमाणुओं में मध्यवर्ती नाभिक “न्यूक्लियस” होते हैं उन्हीं को शक्ति स्त्रोत कहा गया है। चारों और घिरे हुए परिकर को उसी उद्गम से सामर्थ्य मिलती है और अवयवों की सक्रियता गतिशील रहती है। यह घिरा हुआ परिकर गोल भी हो सकता है और चपटा अण्डाकार भी। यह संरचना और परिस्थितियों पर निर्भर है।

पृथ्वी का नाभिक उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव की परिधि में मध्य स्थान पर है। उसके दोनों सिरे अनेकानेक विचित्रताओं का परिचय देते हैं। उत्तरी ध्रुव लोक लोकान्तरों से कास्मिक ब्रह्माण्डीय किरणों को खींचता है। जितनी पृथ्वी को आवश्यकता है, उतनी अवशोषित करता है और शेष को दक्षिणी ध्रुव मार्ग से अन्तरिक्ष में निस्सृत कर देता है। इन दोनों छिद्रों का आवरण मोटी हिम परत से घिरा रहता है। इन सिरों को सुदृढ़ रक्षा कवच एवं भंडारण में प्रयुक्त होने वाली तिजोरी की उपमा दी जा सकती है प्राणियों के शरीरों और पदार्थ परमाणुओं से भी यही व्यवस्था देखी जाती है अपने सौर मण्डल का नाभिक सूर्य है। अन्य ग्रह उसी की प्रेरणा से प्रेरित होकर अपनी अपनी धुरियों और कक्षाओं में भ्रमण करते हैं।

नाभिक की सत्ता, महत्ता और स्थिति के बारे में इतना समझ लेने के उपराँत प्रकृति से आगे बढ़कर चेतना क्षेत्र पर विचार करना चाहिए। उसका भी नाभिक होता है। ब्रह्माण्डीय चेतना का ध्रुव केन्द्र कहाँ हो सकता है? इसके सम्बन्ध में वैज्ञानिकों में से अधिकाँश का प्रतिपादन ध्रुव तारे से सम्बन्ध है। वह दूर तो है ही, स्थिर भी प्रतीत होता है। उसका स्थान ब्रह्माण्ड का मध्यवर्ती भाग माना जाता रहा है, अभी भी उसमें संदेह भर किया जाता रहा है। किसी ने प्रत्यक्ष खण्डन करने का साहस नहीं किया।

पृथ्वी की पदार्थ सम्पदा का नाभिक जिस प्रकार ध्रुव केन्द्र है, उसी प्रकार चेतना प्रवाह का मध्य बिन्दु नाभिक हिमालय के उस विशेष क्षेत्र को माना गया है, जिसे हिमालय का हृदय कहते हैं। भौगोलिक दृष्टि से उसे उत्तराखण्ड से लेकर कैलाश पर्वत तक बिखरा हुआ माना जा सकता है। इसका प्रमाण यह है कि देवताओं यज्ञ गंधर्वों, सिद्ध पुरुषों का निवास इसी क्षेत्र में पाया जाता रहा है। इतिहास पुराणों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र को देवभूमि कहा और स्वर्गवत् माना जाता रहा है। सामान्य वन पर्वतों भूखण्डों की तुलना में इस क्षेत्र की चेतनात्मक महत्ता विशेष रूप में आँकी गई है। उच्चस्तरीय सचेतन प्राण प्रवाह इस क्षेत्र में बहुलता पूर्वक पाया गया है। आध्यात्मिक शोधों के लिए, साधनाओं सूक्ष्म शरीरों को विशिष्ट स्थिति में बनाये रखने के लिए वह विशेष रूप से उपयुक्त है। उस क्षेत्र में सूक्ष्म शरीर इस स्थिति में बने रह सकते हैं, जो यथा अवसर आवश्यकतानुसार अपने को स्थूल शरीर में भी परिणत कर सकें और उस स्तर के लोगों के साथ विचार विनिमय कर सकें। एक दूसरे को सहयोग देकर किसी बड़ी योजना को कार्यान्वित कर सकें।

सिद्ध पुरुषों के कई स्तर है, जिनमें यज्ञ, गंधर्व प्रमुख है। खलनायकों की भूमिका निभाने वालों को दैत्य या भैरव कहते हैं। उनकी प्रवृत्ति तोड़−फोड़ में अधिक होती है जबकि यज्ञ राजष्ज्ञि स्तर के होते हैं। गंधर्व कलाकार स्तर के। सिद्ध पुरुषों का ही बढ़ा-चढ़ा योगदान रहता है। इसलिए उनकी समीपता, सहायता के लिए ऐसी अभ्यर्थनाएं की जाती है जो उन्हें प्रभावित या आकर्षित कर सके। जिनका जिन्हें विशेष अनुग्रह प्राप्त होने लगता है वे उन्हें “देव” भी कहने लगते हैं। यों ईश्वर की अनन्त शक्तियों को अपनी अपनी विशेषताओं के कारण देव नाम से जाना जाता है। वे अदृश्य होती है। फिर भी ध्यान साधने के लिए, संपर्क सम्बन्ध स्थापित करने के लिए उन्हें अलंकारिक रूप से किसी आकार की मान्यता दी जाती है।

आकार के बिना न तो ध्यान बन सकता है और न तादात्म्य स्थापित हो सकता है। इसलिए निराकार की अभ्यर्थना के लिए उनके साकार रूपों की प्रतिष्ठापना की गई है। पूजा प्रयोजनों में देवालय स्थापना में इन्हीं विकसित प्रतिमाओं का प्रयोग होता है। इनकी समर्थता में दैवी शक्ति के अतिरिक्त साधक की श्रद्धा सघनता का भारी महत्व है श्रद्धा के बिना देवी विभूतियों को आकर्षित स्थापित नहीं किया जा सकता। रामचरित मानस के प्रणेता ने तो श्रद्धा विश्वास को ‘भवानी शंकर” की उपमा दी है। वह बहुत हद तक सही भी है। झाड़ी का भूत और रस्सी का साँप बन जाता है। और मान्यता के अनुरूप भयानक प्रतिफल प्रस्तुत होते हैं इसी प्रकार उच्चस्तरीय श्रद्धा भी देव दर्शन कराती है। एकलव्य के मिट्टी से बनाये गये द्रोणाचार्य, मीरा के गिरधर गोपाल, रामकृष्ण परमहंस की काली के उदाहरण ऐसे ही हैं, उनमें जड़ प्रतिमाओं ने समर्थ चेतन जैसी भूमिकाएँ सम्पन्न की। फिर सचेतन को देवता या सिद्ध पुरुष स्तर तक पहुँचाने की संभावना सुनिश्चित होने में संदेह क्यों किया जाए?

यह चर्चा भावना के अनुरूप देव पुरुषों की सिद्ध पुरुषों की सत्ता विनिर्मित करने की हुई। मुख्य प्रश्न यह है कि श्रद्धा के अभाव में भी सत्ताएँ अपने क्रिया कलाप जारी रख सकती है या नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि वे अपनी इच्छानुरूप अभीष्ट गतिविधियां बिना किसी रोक-टोक के क्रियाशील रखे रख सकती है। आवश्यकतानुसार वे अपने सूक्ष्म शरीर की स्थूल शरीर में भी बदलती रहती है। मनुष्यों के साथ संपर्क साधने में उन्हें विशेषतया प्रकट स्वरूप बनाना पड़ता है। पर वह कुछ समय के लिए ही होता है। उनकी स्वाभाविक स्थिति सूक्ष्म शरीर में ही बने रहने की होती है। इसलिए निश्चित प्रयोजन पूरा करने के उपराँत वे पुनः अपनी स्वाभाविक स्थिति को अपना लेती है। सूक्ष्म स्थिति में चली जाती है। स्थूल शरीर का कलेवर बना कर रहना उन्हें सुविधाजनक प्रतीत होता है। कारण कि उसके लिए उन्हें ऋतु प्रभाव से बचने, आहार, जल आदि की व्यवस्था जुटाने के लिए विशेष स्तर का प्रबन्ध करना पड़ता है इस झंझट भरी व्यवस्था को वे थोड़े समय के लिए स्वीकारते हैं, और अभीष्ट की पूर्ति के उपराँत बिना झंझट वाली सूक्ष्म स्थिति चले जाते हैं।

मरने के उपराँत नया जन्म मिलने से पूर्व जीवधारी को कुछ समय सूक्ष्म शरीर में करना पड़ता है। उनमें से जो अशांत होते हैं उन्हें प्रेत और जो निर्मल होते हैं उन्हें पितर प्रकृति का निस्पृह उदारचेता सहज एवं सहायता में रुचि लेते हुए देखा गया है। मरणोपरान्त की थकान दूर करने के उपराँत संचित संस्कारों के अनुरूप उन्हें जन्म धारण करने के लिए उपयुक्त वातावरण तलाशना पड़ता है। इसके लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वह समय भी सूक्ष्म शरीर में रहते हुए भी व्यतीत करना पड़ता है। वह समय भी सूक्ष्म शरीर में रहते हुए भी व्यतीत करना पड़ता है। ऐसी आत्माएँ अपने मित्रों, शत्रुओं परिवारियों एवं परिचितों को सहज ही अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती है। प्रेतों की अशाँत मनः स्थिति सम्बद्ध लोगों को भी हैरान करती हैं पितर वे होते हैं, जिनका जीवन सज्जनता के सतोगुणी वातावरण में बीता है। वे स्वभावतः सेवा सहायता में रुचि लेते हैं। उनकी सीमित शक्ति अपने परायों को यथासंभव सहायता पहुँचाती रहती हैं। इसके लिए विशेष अनुरोध नहीं करना पड़ता। जरूरतमंदों की सहायता करना उनका सहज स्वभाव होता है। कितनी ही घटनाएँ ऐसी सामने आती रहती है, जिनमें दैवी शक्तियों ने कठिन संकट में भारी सहायता की और संकटग्रस्तों की चमत्कारी सहायता करके उन्हें उबारा।

सिद्ध पुरुष जीवन मुक्त स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं। इसका तात्पर्य हुआ कि उनकी इच्छा और ईश्वर की इच्छा एक हो जाती है। वे स्वेच्छा संकल्पपूर्वक कुछ काम नहीं करते। दैवी प्रेरणायें ही उनसे लोकहित के लिए विविध कार्य कराती रहती है। जिस प्रकार काया में संव्याप्त निराकार जीवात्मा अपनी इच्छा के अनुरूप कार्य हाथ पैर वाणी आदि विभिन्न अवयवों के माध्यम से सम्पन्न कराती रहती है, उसी प्रकार दैवी प्रेरणा सिद्ध पुरुष को कठपुतली की तरह नचाती और सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप उनसे विविध कार्य कराती है। इस प्रकार निराकार सत्ता के साकार प्रयोजन सिद्ध पुरुषों के माध्यम से पूरे होते रहे है। ऐसे सिद्ध पुरुष को देवात्मा भी कहते हैं। वे शरीर के बंधनों में बंधे हुए नहीं होते। शरीर त्यागने के बाद उनका सूक्ष्म शरीर प्रायः उसी आकृति-प्रकृति का बना रहता है। उसकी स्थिति उनके संकल्पों के ऊपर निर्भर करती है। अस्तु समयानुसार वे उसमें परिवर्तन भी कर लेते हैं। जब उनसे दिव्य चेतना कोई महत्वपूर्ण कार्य कराता चाहती है तो नियत समय पर, नियत स्थान पर, नियत साधनों के साथ उन्हें जन्म धारणा करने के लिए निर्देश करती है। ऐसे लोग महामानव स्तर के होते हैं। बचपन में दबाव उप नर अधिक समय नहीं रहता। लम्बी अवधि तक अबोध नहीं बने रहते। किशोरावस्था से ही उनकी विशिष्ठ गति विधियाँ आरम्भ हो जाती है। दिग्भ्रांत नहीं होना पड़ता है। वातावरण के प्रभाव से वे प्रभावित नहीं होते, वरन् अपनी आत्मिक प्रखरता के आधार पर वातावरण को प्रभावित करते हैं। परिस्थितियाँ उनके मार्ग में बाधक नहीं बनती वरन् वे परिस्थितियों के प्रतिकूल होते हुए भी उन्हें अनुकूलता के ढाँचे में ढालते हैं। हवा के साथ सूखे पत्तों की तरह उड़ते नहीं फिरते वरन् पानी की धार चीरते हुए उल्टी दिशा में चल सकने वाली मछली जैसा अपने पुरुषार्थ का परिचय देते हैं। वे आदर्शवादी जीवन जीते और पीछे वालों के लिए अनुकरणीय, अविस्मरणीय, अभिनंदनीय उदाहरण छोड़ते हैं।

सिद्ध पुरुष यों संसार के किसी भी भाग में पाये जा सकते हैं। पृथ्वी के हर खण्ड में स्थूल शरीर धारी महामानव और सूक्ष्म शरीर द्वारा अपनी गतिविधियाँ कार्यान्वित करने वाले सिद्ध पुरुष प्रकट होते रहे है। इस दृष्टि से कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसे ऊसर कहा जा सकें। फिर भी विशेषता की विपुलता किसी क्षेत्र विशेष के साथ जुड़ी रहती देखी जाती है। वृक्ष, वनस्पति, पशु-पक्षी, जीव जन्तु हर क्षेत्र में अपनी-अपनी विशेषता, भिन्नता लिए हुए जन्मते हैं। सर्वत्र एक जैसा उत्पादन नहीं होता इसी प्रकार सिद्ध पुरुषों की उत्कृष्टता एवं बहुलता हिमालय के ध्रुव केन्द्र के इर्द-गिर्द ही पाई जाती है अनेक विशिष्ट जड़ी बूटियाँ विशेष क्षेत्र में ही उपजती और उसी परिधि में जीवित रहती है। सोमवल्ली, संजीवनी बूटी, अरुन्धती, ब्रह्मकमल जैसी वनस्पतियाँ हिमालय के एक विशेष क्षेत्र में पाई जाती है। यदि उन्हें अन्यत्र कहीं लगाया जाय तो, उनका जीवित रहना संभव नहीं। इसी प्रकार पृथ्वी के ध्रुव केन्द्र हिमालय के एक विशेष भाग में ही उच्चस्तरीय दिव्य आत्मा का बाहुल्य पाया जाता है। उन्हें अन्य भू-खण्ड रास नहीं आते। जैसा पोषण, वातावरण मिलता चाहिए, वैसा अन्यत्र से नहीं मिलता। इसलिए अपनी सुविधा तथा अपने स्तर की अन्य आत्माओं की उपस्थिति देखते हुए उनका निवास इसी क्षेत्र में रहता है। वे धरातल के समस्त क्षेत्रों से लोक-लोकान्तरों से आकर यहाँ रह कर जिस सुविधा के साथ संपर्क बनाये रहते हैं, ऐसी सुविधा उन्हें अन्यत्र नहीं मिलती। यही कारण है कि हिमालय का देवात्मा भाग एक प्रकार से सिद्ध क्षेत्र बन गया है।


ज्ञान की अनन्तता (Kahani)

भगवान बुद्ध एक बार आनन्द के साथ सघन वन से होकर गुजर रहे थे। रास्ते में बातचीत भी चल रही थी। आनन्द ने पूछा- देव। आप तो ज्ञान के भण्डार है। आपने जो जाना, क्या उसे हमें बता दिया।

बुद्ध ने उल्टे पूछा- इस जंगल में भूमि पर कितने सूखे पत्ते पड़े होगे? फिर हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े है उस पर चिपके सूखे पत्तों की संख्या कितनी होगी? इसके बाद अपने पैरों तले जो अभी पड़े है। वे कितने हो सकती है?

आनन्द इन प्रश्नों का उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे। मौन तोड़ते हुए तथागत ने स्वयं ही कहा- ज्ञान का विस्तार इतना है, जितना इस वन प्रदेश में बिछे हुए सुखे पत्तों की संख्या मैंने उतना जाना अपने पैरों के नीचे कुछेक पत्तों का समूह पड़ा है।

ज्ञान की अनन्तता को समझते हुए उसे निरन्तर खोजते और जितना मिल सके उतना समेटते रहने में ही बुद्धिमत्ता है।


अद्भुत, विलक्षण-हिमालय की यह पद यात्रा

जितना विलक्षण विचित्र, लीलामय हिमालय का, हृदय उत्तराखण्ड क्षेत्र है, उतने ही विचित्र यहाँ के कुछ घटनाक्रम है। इनमें से एक है नन्दादेवी की अद्भुत पद यात्रा जो 200 किलोमीटर की होती है, दुर्गम मार्ग से होती हुई गुजरती है एवं जिनका नेतृत्व एक विचित्र मेढ़ा (नरभेड़ करता) करता है, जिसे स्थानीय भाषा में “चौसिंगिया खाडू” करते हैं। काले रंग का, चार सींग वाला यह मेढ़ा इसे विचित्र, “राजजात यात्रा” जो हर बाहर वर्षा के अन्तराल पर होती है, के समय की संगति के कुमायूँ-गढ़वाल क्षेत्र के किसी न किसी गाँव में जन्म ले लेता है। यात्रा का समापन जैसे होने लगता है, पूजन सामग्री अपनी पीठ पर लिए यह विचित्र जीव अदृश्य प्रेरणा से जन समूह को पीछे छोड़कर अकेला नंदा देवी शिखर की ओर बढ़ता हुआ अन्तर्ध्यान हो जाता है। वहां कहाँ चला जाता है? कोई नहीं जानता। यह यात्रा नौवीं शताब्दी से प्रारम्भ हुई, और अब तक सतत् चालू है। इसे भारतवर्ष की सबसे लम्बी धार्मिक पदयात्रा माना जाता है। यह यात्रा हिमालय के अति दुर्गम क्षेत्र में लगभग 200 किलोमीटर की दूरी तय करती है।

ताम्रपत्रों के आधार पर ज्ञात हुआ है कि ‘नन्दा’ गढ़वाल के राजा ‘कनक पाल’ की पुत्री थी। उन्हें अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त थी, जिनका वर्णन लोक कथाओं में आज भी घर घर होता है। नन्दा का मायका गढ़वाल के गाँव नौटी में था और ससुराल नन्दादेवी के नाम से विख्यात पर्वत पर। राजजात यात्रा नन्दा देवी के मैके से ससुराल तक यात्रा है। नन्दा देवी के डोले सहित यह यात्रा देवी को मैके से ससुराल पहुँचाने की परम्परा के रूप में की जाती है।

यात्रा के निर्धारित समय के पूर्व ‘चौसिंगिया खाडू’ जो कही न कहीं उसी क्षेत्र में पैदा हो चुका होता है, के जन्म की सूचना काँसुका गाँव में बसे राजघराने के व्यक्तियों को दी जाती है। यात्रा के पूर्व राजकुँवर और राजपुरोहित स्वयं उस गाँव तक जाते हैं जहाँ चौसिंगिया पैदा हुआ है उसे ‘छदोली’ (राज सी छतरी) के साथ सम्मानपूर्वक नौटी गाँव लाया जाता है। वहाँ निर्धारित मुहूर्त में उसका अभिषेक करके यात्रा प्रारम्भ की जाती है। हजारों की संख्या में नर नारी इसमें सम्मिलित होते हैं। मान्यता है कि राजजात यात्रा के बाद 12 वर्ष तक क्षेत्र में ऋद्धि-सिद्धियों की वृष्टि होती रहती है। वहाँ से निवासियों में सत्प्रवृत्तियाँ बनी रहती है।

ग्राम नौटी से नन्दा देवी तराई तक की यह यात्रा बड़ी दुर्गम है। वह भी भादो मास में होती है। भीषण वर्षा के बीच पहाड़ी दुर्गम पथ कितना खतरों से भरा है यह सब जानते हैं। अंतिम चरण में ‘बाण’ नामक गाँव से आगे 16200 फीट की ऊँचाई पर स्थित रूपकुण्ड तक की यात्रा तो नंगे पैर की जाती है।

यात्रा समाप्त होने पर देवी की पूजा करके पूजन की सामग्री चौसिंगिंया पर लाद दी जाती है। इसके बाद वह मूक पशु किसी अज्ञात प्रेरणा से स्वतः नंदादेवी शिखर की ओर बढ़ जाता है। चौसिंगिया की निर्धारित समय पर जन्म लेना, स्वतः पर्वत शिखर की ओर चल पड़ना तथा अनजान स्थान पर अंतर्ध्यान हो जाना आज भी एक रहस्य बना हुआ है।

हर बारहवें वर्ष यह निर्धारित यात्रा होती है। इस वर्ष अगस्त 87 से 17 तारीख को राजकुँवर एवं राजपुरोहित ग्वाड़ा ग्राम में पैदा हो चुके चौसिंगया को लेकर भव्य जुलूस के साथ नौटी गाँव पहुँचे होंगे। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इस यात्रा का शुभारम्भ हो गया होगा। यात्रा का समापन दिवस एक सितम्बर है जब विधिवत् पूजन के साथ नंदादेवी शिखर की तलहटी पर मेढे के अन्तर्ध्यान होने के साथ इसकी चरम परिणति हो चुकी होगी। इतना समय बीत गया, इस पर इस विचित्र प्रकरण का रहस्य कोई नहीं जान पाया।


मनुष्य जन्म सोद्देश्य है!

प्रकृति के अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य की संरचना बिलकुल अनोखे ढंग की है। सृष्टा ने उसे सभी प्रमुख विशेषताओं, विशिष्ट सामर्थ्यों से अलंकृत कर इस दुनिया में भेजा हैं। वह अपने विकास के लिए परिस्थितियों पर निर्भर है न बाह्य साधनों पर अवलम्बित। उसमें अस्तित्वपूर्ण जीवन, अनुभूति ज्ञान और स्वतंत्र इच्छा शक्ति का समन्वय है। उसके अंतराल में ऊंचा उठने और श्रेष्ठ सिद्ध होने के लिए सत्कर्म करने की ललक पाई जाती है। परोक्ष के लिए प्रत्यक्ष की हानि सहने की उमंगें उठना मानवी अंतरात्मा की अपनी विशेषता है। जबकि मनुष्येत्तर प्राणी प्रकृति प्रदत्त सहज प्रेरणा से प्रेरित होकर अपना पेट भरते, वंशवृद्धि करते एवं आत्मरक्षा करते हुए समाप्त हो जाते हैं।

मनुष्य चेतना के सुविकसित स्तर पर प्रतिष्ठित है, साथ ही उसकी कायिक संरचना में भी अनेक विलक्षणताएँ विद्यमान हैं। वैज्ञानिकों ने इसके अनेकों प्रमाण खोज निकाले हैं।

इटली के सुप्रसिद्ध एंब्रियोलॉजिस्ट फैब्रीसियस एवं एक्वेपेंडेन्ट ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि मनुष्य की कायिक संरचना अन्य जीवधारियों की तुलना में विशिष्ट है। उसमें दिव्य तत्त्वों की बहुलता है। शरीर विज्ञानी हैलर का तो यहाँ तक कहना है कि मनुष्य की उत्पत्ति सीधे ईश्वरीय इच्छा से हुई है। आज से 6000 वर्ष पूर्व ईश्वर ने दो खरब लोगों को जन्म दिया जिन्हें ‘ईव की सुसंतति’ के नाम से जाना जाने लगा। यह माँयता खीस्ट समुदाय में अभी भी प्रचलित है। शरीर विज्ञानियों का कहना है कि प्लेसेण्टा की संरचना को देखकर मनुष्य की जन्म-जात विलक्षण विशेषताओं का पता लगाया जा सकता है। एक दशक पूर्व भ्रूण विज्ञानियों के एक समुदाय ने अपने गहन अनुसंधान के फलस्वरूप प्लेसेण्टा की एक और गहरी परत - “डेसीडुआ रिफ्लैक्सा” का पता लगाया है। प्रयोग परीक्षण करने पर जिन तथ्यों का रहस्योद्घाटन हुआ है, उन्हें देखते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि मनुष्य एक ऐसा विशिष्ट प्राणी है जिसका बनावट किसी अन्यान्य प्राणी से कदाचित मेल नहीं खाती।

विगत बीत वर्षों से शरीर विज्ञान की एक और नवीन धारा ‘साइकोफिजिक्स’ प्रकाश में आई हैं प्रख्यात शरीर विज्ञानी थियोडर फेचनर और अर्नस्ट हैनरिक वैवर को इस विधा का जन्मदाता माना जाता है। मानव की इस अप्रत्याशित क्षमताओं का अवलोकन करते हुए ही उन्होंने चिकित्सा जगत में कई नये आयामों को जन्म दिया है। उनका कहना है कि मनुष्य एक चेतन प्राणी है, अतः उसके शरीर की सभी निर्धारणाएं पदार्थपरक नहीं हो सकती है। चेतना की क्षमता भौतिक शक्तियों से कई गुना बढ़-चढ़ कर है। साथ ही वह उन सभी वाह्य शक्तियों पर नियंत्रण कर सकने में समर्थ है।

जीवन विज्ञानियों के अनुसार शरीर में जीवन की सम्भावना को व्यक्त करने वाले पदार्थ को ‘प्रोटोप्लाज्मा के ना से जाना समझा जाता रहा है। इसी प्रकार का तत्त्व परामनोविज्ञान वेत्ताओं ने अब मनः स्थिति स्तर पर सक्रिय पाया है और उसे ‘साइकोप्लाज्मा’ के नाम से सम्बोधित किया है। तंत्रिका तंत्र में काम करने वाला तत्त्व ‘न्यूरोप्लाज्मा’ कहलाता है। इन सब संरचनाओं को देखते हुए मनुष्य को चैतन्य आत्मगत विशेषताओं वाला कहा जाय तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी।

मानव की सबसे बड़ी विशेषता हैं- उसकी आदर्शवादिता, साथ ही आत्म-गरिमा का बोध। वह बड़े से बड़े स्वार्थों को ठुकरा सकता है जबकि अन्य प्राणी मात्र पेट-प्रजनन तक ही, सुविधाओं तक ही सीमित रहते हैं। मादा की बच्चों के प्रति प्रकृति प्रदत्त प्रेरणा के अतिरिक्त उनमें कुछ ऐसा नहीं होता जिसे आत्मीयता-स्वावलम्बन या उत्तरदायित्व जैसे गुणों के आधार पर मनुष्य जैसा आँका जा सके। क्या यह सब विशेषताएं मानव के अंदर एक विशिष्ट गौरव का भाव नहीं जगाती कि उसका धरती पर अवतरण विशेष प्रयोजन हेतु है, सोद्देश्य है।


स्वर्ग की प्राप्ति और बंधन मुक्ति

कहा जाता है कि देवता स्वर्ग में रहते हैं और यज्ञकर्त्ताओं को सीधे स्वर्ग ले जाते हैं। शास्त्रों में ऐसी अनेक कथाएं आती हैं, जिनमें यज्ञ का माहात्म्य बताया गया है। यज्ञ करने वाले नहुष आदि सशरीर स्वर्ग को गये थे। स्वर्ग किसी लोक विशेष को समझा जाता है, किन्तु खोज कर्त्तागण सौर मंडल के अंतर्गत कोई ग्रह-उपग्रह ऐसा नहीं खोज पाए हैं, जिसमें स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ हों। सौर मण्डल के बाहर ऐसे किसी ग्रह नक्षत्र की आशा नहीं हैं जिसमें स्वर्ग या जन्नत जैसा कुछ हो। तो क्या स्वर्ग जाना, यज्ञ का प्रतिफल इस रूप में मिलना कपोल कल्पित है? वस्तुतः स्वर्ग उच्चस्तरीय दृष्टिकोण का नाम है, जिसके उपलब्ध होने से यह समस्त विश्व का, भगवान का, विराट स्वरूप दिखाई देता है और उसके बीच रहते हुए प्रसन्नता का अनुभव सदा बना रहता है। परब्रह्म के लोक में रहना-इस स्वर्गदचि गरीयसी धरती माता पर जन्म लेना किसी श्रेष्ठ सुख सौभाग्य से कम नहीं है। फिर देव संस्कृति में आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है। इन परमात्मा के अंश को आकाशस्थ नक्षत्र मंडल की तरह या दिवाली के दीपकों की तरह जाज्वल्यमान, शोभायमान समझा जा सकता है।

हर मनुष्य में कुछ न कुछ सद्गुण पाये जाते हैं। उतने अंश पर ध्यान केन्द्रित किया जाये तो अपना लोक ही देवलोक जैसा आनन्ददायक प्रतीत हो सकता है। उद्यान में पुष्प भी रहते हैं और खाद कूड़े की गंदगी भी। भौंरे, तितली, मधुमक्खियाँ केवल पुष्प ही देख पाती हैं। किन्तु गुबरीले कीड़े को वहाँ भी खाद गोबर ही दिखाई पड़ता है। वह कथा प्रसिद्ध है कि जिसमें गुरु ने दुर्योधन और युधिष्ठिर को एक ही गाँव के लोगों का गुण दोष ढूँढ़कर लाने को भेजा था। युधिष्ठिर को सब सज्जन ही मिले और दुर्योधन को सभी में बुराइयाँ दिखाई पड़ी। यह अपने दृष्टि कोण का अंतर है। भूले भटके पापी दुरात्माओं को अपनी सेवा का माध्यम माना जा सकता है और उनके सराहे अपनी सेवा तथा सुधारवृत्ति को विकसित किया जा सकता है है। बुरों की तुलना में ही अच्छों की कद्र होती है। यदि सभी अच्छे होते तो सुधारने और संघर्ष करने का अवसर ही न मिलता। दुनिया नीरस और हलचल विहीन हो जाती, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। दुनिया विविधता से भरी-पूरी है। यहाँ अच्छे बुरे सभी हैं, किन्तु बुरों का उसी प्रकार उपचार करना चाहिए, जिस प्रकार एक डॉक्टर रोग को मारता है और रोगी को बचा लेता है।

स्वर्ग की भाँति मुक्ति की भी चर्चा होती है। मुक्ति अर्थात् भवबंधनों से छूटना। भवबंधन क्या हैं? किसने मनुष्य को हथकड़ी बेड़ी से जकड़ा हैं? किसमें ईश्वर के अंश को बाँधने या विवश करने की सामर्थ्य है? वस्तुतः काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, जैसे दुर्गुण ही वे भवबंधन हैं जिनमें मनुष्य स्वयं बँधता है। नशे की तरह इनकी आदत डालता है, पर यदि वह चाहे तो उन्हें छोड़ भी सकता है। मकड़ी अपने लिए जाला स्वयं ही बुनती है और उसमें अज्ञान स्वयं बँध जाती है। जब उसे इस बात का ज्ञान होता है कि यह सारा प्रपंच मेरा ही बुना हुआ है और मुझ में वह सामर्थ्य है कि पहले की तरह फिर समेट कर पेट में निगललूँ। तो वह फिर से नया कदम उठाती है और जाले को समेटकर कर उदरस्थ कर लेती है। स्वच्छंद विचरती है। यही मुक्ति है। यदि हम अपने दोष-दुर्गुणों भ्रम-जंजालों को समेट लें और अपने का विश्व उद्यान का माली समझकर उसकी हरीतिमा तथा फल फूल सम्पदा को देखते चखते हुए आनन्द उठायें तो प्रतीत होगा कि यह धरती ऐसी गौरवमयी है कि उस पर जन्म लेने के लिए देवता तरसते हैं और भाग-भाग कर यहाँ जन्म लेने के लिए आते हैं। यज्ञीय जीवन की यह शिक्षा है यज्ञकर्ता उसके साथ जुड़े हुए उपरोक्त तत्त्व ज्ञान को अपनाएँ तो उन्हें हर घड़ी हर परिस्थिति में संतोष और उल्लास उपलब्ध हो सकता है, यह है स्वर्ग और मुक्ति जो मुक्ति जो मनुष्य के पूरी तरह अपने हाथ में है।


अविज्ञात रहस्यों से भरी मानवी चेताना

मानवी काया का बहिरंग अस्थि चर्म से विनिर्मित दिखता है, जिसके साथ जुड़ी हुई ज्ञानेन्द्रियाँ अपना-अपना कार्य करती रहती है और जिस-तिस प्रकार जीवन की गाड़ी आगे धकेलती रहती हैं। सामान्यजनों की जानकारी में यही है- स्थूल काया का स्वरूप और उसका उपयोग।

किन्तु सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि स्थूल की तुलना में सूक्ष्म की सत्ता, प्राण चेतना की क्षमा असीम, अपरिमित है। जितना कुछ मनुष्य को अपने शरीर एवं ज्ञानेन्द्रियों के बारे में ज्ञात है, उसकी तुलना में अविज्ञात बहुत अधिक है। यह समय-समय पर भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होकर अपनी सामर्थ्य-क्षमता का परिचय देता रहता है।

मूर्धन्य परामनोविज्ञानवेत्ता डॉ. पाल गेल्डीन का कहना है कि ज्ञानेन्द्रियों के सुनने, बोलने, देखने, सूँघने तथा स्पर्शानुभूति की क्षमता से हम सभी परिचित हैं, पर इससे भी महत्वपूर्ण एवं अत्यंत सामर्थ्यवान एक और शक्ति है जिसके बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। इसे छठी इंद्रिय या पराचेतना शक्ति कहते हैं। प्रयत्नपूर्वक इसे जागृत एवं अभिवर्धित किया जा सकता है। किन्हीं-किन्हीं में यह संयोगवश भी प्रकट हो जाती है।

नवम्बर 1965 में जर्मनी के बवेरिया क्षेत्र के राषेनहेम स्थिति एक पदाधिकारी के मकान की ट्यूब लाइटों का प्रकाश एकाएक मंद पड़ गया। बिजली के सभी स्विच अपने आप आफ हो गये। कार्यालय के चारों टेलीफोन एक साथ घनघना उठे और उनके रिकार्ड में हजारों लोगों के बातचीत करने का लेखा बिल पर अंकित होने लगा। कारणों की छानबीन बहुत की गई, पर सुराग कुछ भी हाथ नहीं लगा। अंततः प्रो. हंस वेन्डर जैसे मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक की सहायता ली गई। उन्होंने पता लगाया कि यह सब परिवर्तन 12 वर्षीय नौकर एनीमैरी की उपस्थिति में घटित होती हैं। उसकी प्राण विद्युतीय ऊर्जा असाधारण रूप से बढ़ी हुई हैं जो काया से निस्सृत होकर आस-पास के वातावरण को प्रभावित करती है। एनीमैरी की यह क्षमता अनायास ही फूट पड़ी थी जिसने उसे असाधारण सामर्थ्य वाला व्यक्ति बना दिया। वैज्ञानिकों ने परखने पर पाया कि उसकी उपस्थिति के कारण दीवाल पर टँगी तस्वीरें उलटी हो जाती हैं। बल्ब फ्यूज होने लगते हैं। मेजों की दराजें स्वयमेव खुल जाती है। फाइलों से खचाखच भरी लौह अलमारियाँ अपने स्थान से एक फुट दूर तक खिसक जाती हैं। घड़ी की सुइयाँ अपनी गति को तीव्र करके 20 मीटर में ही एक घण्टा पूरा कर लेती हैं। विद्युत सप्लाई काट देने पर भी विद्युतीय उपकरण 50 एंपीयर की करेंट को रिकार्ड करते देखा गया। टेलीविजन से जुड़े एक वीडियो रिकार्डर ने तत्कालीन वातावरण का जा चित्राँकन किया, उससे स्पष्ट भुतहा दृश्य दिखाई देने लगा। राशेनहेम में फोटो कैमरे में प्रयुक्त होने वाली बैटरी बिना पावर हाउस कनेक्शन के चला करती थी। इतना ही नहीं मैरी के चलने पर बिजली के बल्ब हिलने से लगते थे।

चैकोस्लोवाकिया के परामनोविज्ञान संस्थान के प्राध्यापक मेलिन रिज्ल एवं लेनिनग्राड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक वासिलियेव ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि मनुष्य में इस तरह की अनेकानेक क्षमताओं का अस्तित्व होता है। किन्हीं-किन्हीं में यह अचानक विकसित हो जाती हैं और मनुष्य आँखों या कारे का काम शरीर के अन्य अंगों से लेने जैसे चमत्कृत करने वाले अनेकों करतब करने लगा है। विश्व में ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान हैं।

सोवियत संघ में कुलेशोवा नामक एक महिला आँखें रहते हुए भी देखने का काम उँगलियों के पोरुओं से कर लेती थी। परखने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि आँख पर पट्टी बाँधने के पश्चात् भी वह न केवल अक्षरों को सही रूप में पढ़ लेती वरन् उनके रंग, डाक टिकटों के अक्षर, मूल्य आदि ज्यों का त्यों बता देती थी। बाद में जाँच करने पर यह और ज्ञात हुआ कि इस प्रकार की विलक्षण शक्ति उसके बायें पैर की उंगलियों, जीभ और टखनों में बहुलता से विद्यमान थी।

इसी प्रकार सेन्ट्रल चीन के वुहन क्षेत्र में रहने वाली 23 वर्षीय लू विंग नामक एक किशोरी किसी भी लिखावट को कान से पढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने ‘इंग’, ‘इलेक्ट्रीसिटी’ जैसे कठिन शब्द कागज पर लिखकर उसे आठ बार मोड़ा और उनका पुलिन्दा बनाकर लू विंग के कान के पास छोड़ दिया। उसने इन शब्दों कर्ण नेत्रों से पढ़ कर स्पष्ट बता दिया। किसी भी कठिन शब्द को समझने में उसे सात से दस मिनट का समय लग जाता है।

चीनी पत्रकारों के एक दल ने अपने देश के कई प्रान्तों में ऐसे अद्भुत क्षमता सम्पन्न बीस बच्चों का अध्ययन किया हैं जो कान, नाक, हाथ, पैर, पेट या आँख द्वारा पढ़ लेते हैं।

दिव्य दृष्टि के अस्तित्व के सम्बंध में अनुसंधानरत मूर्धन्य वैज्ञानिक गेविन मैक्सवेल ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया हैं कि यह क्षमता सभी मनुष्यों में होती हैं। लगातार प्रयत्न और अभ्यास करने पर उसे जागृत एवं विकसित किया जा सकता है। अपवाद स्वरूप ऐसे व्यक्ति भी देखे जाते हैं जिनमें दूरदर्शन की सामर्थ्य सहज ही विकसित होती हैं। उदाहरण के लिए वेलरुयोयाँग नामक 12 वर्षीय चीनी बालक को लिया जा सकता है। इसमें विलक्षण दूरदर्शन क्षमता है। 1971 से वह वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है। उसकी आंखें इतनी तीक्ष्ण हैं कि पत्थर की मोटी दीवार के दूसरी और देखने में भी सक्षम है। वैज्ञानिकों के एक दल ने जब इस तथ्य का परीक्षण करना चाहा तो उसने सात मंजिले एक मकान की छत पर चढ़कर सबसे नीचे वाली मंजिल में रखे हुए सभी वस्तुओं का यथावत् वर्णन कर दिया। वेल कानों से भी भली-भाँति देख लेता है। जब उसके कान में एक कागज पर कुछ लिखकर बाँध दिया गया तो उसने अपनी कर्ण दृष्टि से पढ़कर लिखे गए अंश को अक्षरशः सुना दिया। मनुष्य तो क्या अन्य प्राणियों के शरीर से निकलने वाले प्रभामंडल को भी वह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देख लेता है और उनके रंगों को बता देता है। भूगर्भ में बहने वाले जल स्रोतों का पता लगा लेना और उनके नक्शे बनाना उसके लिए सामान्य-सी बात हैं। किसी भी व्यक्ति के अंतर्मन के विचारों-भावनाओं को वह आसानी से पढ़ लेता है।

लेनिनग्राड के सुविख्यात परामनोविज्ञानी डॉ. वासिलियोव का कहना है कि यदि हम अपनी मूलशक्ति प्राण चेतना की खोज कर सके तो भौतिक शक्तियों की तुलना में अनन्तगुना सामर्थ्यवान बन सकते हैं। पिछले दिनों विश्व की विभिन्न संस्थाओं द्वारा किये जा रहे अनुसंधानों से जो तथ्य सामने आये हैं उनसे यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य यदि अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना की सूक्ष्म धारा प्रवाह के साथ जोड़ सके तो वह ऐसे उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त कर सकता है जो अभी तक काल्पनिक और अविश्वसनीय समझे जाते रहे हैं।

मनः शास्त्री विक्टर ई. क्रोमर मानवी प्राण ऊर्जा की चर्चा करते हुए कहते हैं कि यह ब्रह्मांडीय चेतना के साथ सम्बंध जोड़ने वाली ऐसी चाबी हैं जिसका सही उपयोग करने पर भौतिक जगत में भारी उथल-पुथल उत्पन्न की जा सकती है और अपनी निजी क्षमता में विशिष्ट स्तर की भारी मात्रा में अभिवृद्धि की जा सकती हैं।

मनुष्य अपनी प्राण चेतना को परिष्कृत एवं अभिवर्धित करके उसे स्थूल काया से अलग कर सकता है। परामनोविज्ञानी कर्नल टाइन सेंड ने प्राणायाम के अभ्यास से प्राणमय शरीर के नियंत्रण में सफलता प्राप्त की थी। एक बार उन्होंने सैकड़ों वैज्ञानिकों एवं साहित्यकारों से खचाखच भरे हाल में इस प्रकार का प्रदर्शन किया। वह ब्लैक बोर्ड के साथ एक चाक का टुकड़ा बाँध दिया गया। संड अपने स्थान पर बैठे-बैठे ही अपनी प्राण चेतना को स्थूल काया से बाहर निकाल कर अदृश्य सूक्ष्म शरीर से बोले गये अक्षरों को बोर्ड पर लिखने लगे। बीच-बीच में वे अपने स्थूल शरीर में भी आ जाते और वस्तुस्थिति भी लोगों को समझाते जाते।

यदि हम उपरोक्त घटनाक्रमों को पूर्वार्त्त मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में देखे तो पाते हैं कि योगविज्ञान में प्राण साधना द्वारा मिलने वाली अणिमा-शरीर को भार रहित कर लेना। गरिमा-भारी भरकम वजन बढ़ा लेना। लघिमा-छोटा हो जाना। प्राप्तव्य-कठिन वस्तुओं की सरलता से प्राप्ति। प्राकाम्य-इच्छापूर्ति। ईषत्व-सर्वज्ञता। वषित्व-सभी को वशवर्ती कर लेना इन आठ सिद्धियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने जो अतींद्रिय क्षमताएं खोजी हैं, वे उन्हें चार वर्णों में विभक्त करते हैं- (1) क्लेअर वायेन्स - परोक्ष दर्शन, अर्थात् वस्तुओं या घटनाओं की वह जानकारी जो ज्ञान प्राप्ति के सामान्य आधारों के बिना ही उपलब्ध हो जाये। (2) प्रीकागनीशन-भविष्य ज्ञान-बिना किसी मान्य आधार के भविष्य की घटनाओं के ज्ञान। (3) रेट्रोकाग्नीशन-भूतकालिक ज्ञान-बिना किन्हीं मान्य साधनों के अविज्ञात भूतकालीन घटनाओं की प्रामाणिक जानकारी। (4) टेलीपैथी-विचार-सम्प्रेषण बिना किसी आधार या यंत्र के अपने विचार दूसरों के पास पहुँचाना तथा दूसरों के विचार ग्रहण करना। इस वर्गीकरण को और भी अधिक विस्तृत किया जाये तो उन्हें 11 प्रकार की गतिविधियों में बाँटा जा सकता है। चमत्कारी अनुभवों का यह वर्गीकरण इस प्रकार हैं- (1) बिना किन्हीं ज्ञातव्य साधनों के सुदूर स्थानों में घटित घटनाओं की जानकारी मिलना। (2) एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की मनःस्थिति तथा परिस्थिति का ज्ञान होना। (3) भविष्य में घटित घटनाओं का बहुत समय पहले पूर्वाभास। (4) मृतात्माओं के क्रिया-कलाप जिससे उनके अस्तित्व का प्रत्यक्ष परिचय मिलता हो। (5) पुनर्जन्म की वह घटनाएँ जो किन्हीं बच्चों, किशोरों या व्यक्तियों द्वारा बिना सिखाये-समझाये बताई जाती हों और उनका उपलब्ध तथ्यों से मेल खाता हो। (6) किसी व्यक्ति द्वारा अनायास ही अपना ज्ञान तथा अनुभव इस प्रकार व्यक्त करना जो उसके अपने व्यक्तित्व और क्षमता से भिन्न व उच्च श्रेणी का हो। (7) शरीरों में अनायास ही उभरने वाली ऐसी शक्ति जो संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती हो। (8) ऐसा प्रचण्ड मनोबल जो असाधारण दुस्साहस के कार्य विनोद की साधारण स्थिति में कर गुजरे और अपनी तत्परता से अद्भुत पराक्रम कर दिखाए। (9) अदृश्य आत्माओं के संपर्क से असाधारण सहयोग सहायता प्राप्त करना। (10) शाप और वरदान जिससे दीर्घकाल तक व्यक्तियों व वस्तुओं पर प्रभाव बना रहता है। (11) परकाया प्रवेश या एक आत्मा में अन्य आत्मा का सामयिक प्रवेश सिद्ध होता है।

इन समस्त सिद्धियों का आधार प्राण साधना हैं, जिसके आधार पर प्राणमय कोश या प्राणमय शरीर का विकास, नियंत्रण और उपयोग किया जाता है। यह तथ्य अब तक भले ही श्रद्धाभूत रहे हों किन्तु अब विज्ञान उन तथ्यों को स्वीकारने लगा हैं। प्राण चेतना एक ऐसी ऊर्जा है, जिसके पूरी तरह उद्घाटन किया जा सके तो मनुष्य उन दिव्य शक्तियों का चमत्कार जैसी लगती हैं। चूँकि सामान्य व्यक्ति भी इन क्षमताओं से युक्त पाये गये हैं। यह सम्भावना कपोल कल्पित नहीं लगती कि पुरुषार्थ द्वारा इन्हें अर्जित किया जा सके। विज्ञान के विकास की चरमावस्था में भी ऐसे घटनाक्रमों का कोई विज्ञान सम्मत प्रतिपादन न प्रस्तुत किया जाना क्या उसे बौना नहीं ठहराता?


ईमानदारी श्रम और उसका सही सदुपयोग (Kahani)

एक लगनशील मजूर था। कड़ी मेहनत करता और चार आने रोज कमा लेता घूमते हुए एक विद्वान ने पूछा-इस कमाई को खर्च किस प्रकार करते हों? यह बता सको तो तुम्हारी समझदारी का अनुमान लगाऊँ।

मजूर ने कहा - एक आने में अपना पेट भरता हूँ। एक आना उधार देता हूँ। उससे बच्चे पालता हूँ जो बड़े होने पर काम आवे। एक आने से कर्ज चुकाता हूँ ताकि ऋणी होकर न मरुँ। यह मेरे वृद्ध माता पिता की सेवा में लगते हैं। एक आना बचाता हूँ जो भविष्य में काम आवे अर्थात् धर्म कार्यों में लगा पैसा परलोक को सुखी बनाये।

ईमानदारी का श्रम और उसका सही सदुपयोग सुनकर प्रश्नकर्ता तत्त्वज्ञानी को बहुत प्रसन्नता हुई।


वृक्षों में संव्याप्त विद्युत चुम्बकत्व

बेंगलोर की शोध संस्था “इसरो” (इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन) ने टेलीविजन एण्टीना का काम लम्बे छायादार पेड़ों से लेना आरम्भ किया है। बिजली के तार लगाकर आमतौर से टेलीविजन एण्टीना लगाये जाते हैं। पर उक्त संस्थान की खोज के अनुसार वही काम ऊँचे पेड़ों की पत्तियों से लिया जा सकता है। जड़ों के पास टेलीविजन रखकर उसका सम्बन्ध पेड़ से जोड़ दिया जाये, तो टेलीविजन पर वैसे ही चित्र आने लगते हैं, जैसे कि विधिवत् बनाये रखे एण्टीना से आते हैं।

इस आधार पर यह संभावना बनती है कि बड़े पेड़ों की छाया में बैठकर अन्तरिक्ष में दौड़ने वाले अनेक उपयोगी मस्तिष्क के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। सिद्धियों में दूरदर्शन, दूरश्रवण की सिद्धियाँ भी हैं इन्हें प्राप्त करने के लिए लम्बे आकार के पेड़ों में खजूर, देवदार जैसे वृक्षों के नीचे बैठकर योगाभ्यास करने से उन सिद्धियों को सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है, जो खुले स्थानों में या झाड़ियों में बैठकर मुश्किल से हस्तगत होती है संभवतः इसी कारण ऋषिगण सघन वृक्षों के मध्य तप साधना करते थे।

वृक्षों की समीपता का एक सर्वविदित लाभ ऑक्सीजन की उपलब्धि है। पेड़ों का प्रत्यक्ष लाभ यह भी है कि उनकी समीपता से प्रदूषण की निवृत्ति होती है। दूषित वायु को ग्रहण करने और उसके स्थान पर स्वच्छ वायु प्रदान करने का गुण पेड़ों में है। इसलिए पेड़ों के नीचे झोंपड़े बनाकर उनकी छाया में रहने का एक बड़ा लाभ प्राचीनकाल में प्राप्त किया जाता था।

मानसिक विशेषताएँ बढ़ाने एवं मनोविकार दूर की भी कई वृक्षों से अपनी विशेषताएँ है। यज्ञ प्रयोजन में कुछ पेड़ों को समिधाएँ काम आती है। यज्ञ के काष्ठ पात्र भी इसी दृष्टि से चुने जाते हैं कि इनका काष्ठ उपयोग में लाने से मानसिक शुद्धि का विशेष लाभ होता है।

योगाभ्यास के आत्म-कल्याण के लिए कुछ विशेष वृक्षों की छाया का उपयोग उपयुक्त माना गया है। कई सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए उस प्रकार का साधना अमुक वृक्ष के नीचे की जाती है। इसके पीछे उन विशेषताओं का समावेश होना चाहिए, जिनका आज के वैज्ञानिक एण्टीना में उपयोग करने लगे है। यह एक प्रकार की बिजली की अधिक मात्रा का उन पेड़ों में होना है। हर पेड़ में यह विशेषता नहीं होती। कुछ विशेष वृक्षों में भी यही विशेषता पायी जाती है।

जन संकुल क्षेत्र में रहकर साधनाएँ उतनी सफल नहीं हो पाती। कारण इसमें तरह तरह के लोगों से मिलते रहने से चित्तवृत्तियाँ अस्थिर होती है।, उनमें भटकाव आता है और एकाग्रता भंग होती है। यद्यपि ऐसी परिस्थितियां नदी सरोवर के एकान्त, शाँत तट पर भी रह कर उपलब्ध की जा सकती है, किन्तु वहाँ रहकर साधक वन्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण लाभ-वृक्षों में रहकर लम्बे काल में भी उतनी सफल नहीं हो पाती, वैसी साधनाएँ पेड़ों के संपर्क में अपेक्षाकृत कम काल में फलीभूत होती देखी जाती है। इसका कारण वृक्षों में संव्याप्त विद्युत ही है।

सर्वविदित है- पक्षीगण पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के कारण ही दिशा-ज्ञान करने में सफल हो पाते हैं। प्रयोगों के दौरान जब उन्हें इस तत्व (चुम्बकीय तत्त्व) से रहित क्षेत्र में रखा गया, तो वे दिशा बोध करने के विफल रहे, किन्तु जैसे ही भू-चुम्बकीय क्षेत्र में लाया गया,उनके संवेदी अंग पुनः सक्रिय हो उठे और दिशा-ज्ञान प्राप्त करने में सफल हुए। ऐसा ही लाभ पेड़ों के विद्युतीय क्षेत्र से साधक को मिलता है। इस विज्ञान को यदि भली प्रकार समझा जा सके तो आध्यात्मिक महत्व के कितने ही लाभ वृक्षों की सहायता से प्राप्त किये जा सकते हैं।


दिव्य प्राण ऊर्जा के भाण्डागार षट्चक्र

मानव शरीर शक्तियों का भण्डार है। उसमें जहाँ-तहाँ ऐसे विद्युत उत्पादन केन्द्र है जो चेतन ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। मनुष्य इन्हीं के सहारे महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ होता है। बहुचर्चित षट्चक्र ऐसे ही उत्पादक भाण्डागार है।

भारतीय योगियों ने स्पाइनल कालम -सुषुम्ना स्थित जिन षट्-चक्रों की खोज की है उनमें मूलाधार के ऊपर मेरुदण्ड के सहारे क्रमशः ऊपर उठते हुए छः चक्र है।यह ब्रह्मरंध्र से जुड़े हुए शक्ति-सामर्थ्यों के विशिष्ट पावर हाउस या माइक्रोवेव स्टेशन कहे जा सकते हैं। जननेन्द्रिय के मूल में मेरुदण्ड का जहाँ अन्त होता है, उस बीच जितना पोला स्थान है उसे साधनात्मक भाषा में ‘योनि कन्द’ कहते हैं। स्थूल शरीर शास्त्र-एनाटॉमी के अनुसार वहाँ सुषुम्ना नाडी गुच्छक भर है, पर सूक्ष्म शरीर रचना विज्ञान के अनुसार यहाँ एक विशेषज्ञ अवयव है जिसे मूलाधार चक्र करते हैं। इसके नीचे की पीठ कछुए जैसे है इसे कूर्म कहते हैं। इसके ऊपर एक छोटा मेरुदण्ड है उसे सुमेरु कहते हैं। इसके चारों ओर साढ़े तीन फेरे लगाये हुए एक शक्ति सूत्र विद्यमान है, जिसे ‘कुण्डलिनी’ कहते हैं। यही प्रथम मूलाधार चक्र है। कुण्डलिनी का मूल स्थान यही है प्राण ऊर्जा का यह भण्डार प्रसुप्त स्थिति में ठीक उसी तरह पड़ रहता है जिसे प्रकार अग्निकुण्ड में बुझी हुई आग ईंधन के अभाव में पड़ी तो रहती है पर वहाँ गरमी बनी रहती है। प्रयत्न करने पर इसकी लौ ऊपर उठती है तथा अन्य चक्रों को जागृत करने में सहायक होती है। इसकी प्राण ऊर्जा शरीर के समस्त अंगों को शक्ति प्रदान करती है।

मूलाधार से ऊपर पेडू की सीध में स्वाधिष्ठान चक्र स्थित होता है। नाभि की सीध में मणि पर, हृदय स्थित अनाहत, कण्ठ में विशुद्धि तथा भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र है। ब्रह्म रंध्र में अवस्थित सहस्रार को गिना जाय तो इनकी संख्या सात हो जाती है। पर उसे सबका अधिपति मानकर गणना से बाहर रखा गया है। सुप्रसिद्ध परामनोवैज्ञानिक आर्थर ई॰ पावेल ने अपनी कृति ‘द एस्ट्रल बॉडी एण्ड एस्ट्रल फिनामेना ‘ में कहा है कि ये चक्र मानव शरीर में सूक्ष्म रूप से स्थित है और विपुल शक्तियों के भाण्डागार है। इन्हें ‘फोर्स सेंटर्स’ भी कहते हैं। स्नायु मण्डलों से घिरे हुए ये चक्र चार आयामी होते हैं। इनसे सतत् प्रस्फुटित होते रहने वाली ऊर्जा शारीरिक -मानसिक गतिविधियों का संचालन करती है।

योग विद्या के ज्ञाताओं ने सहस्रार कमल को सर्वप्रभुता सम्पन्न माना है। यह स्थान कनपटियों से दो-दो इंच अन्दर भृकुटि से लगभग ढाई तीन इंच अंदर छोटे से पोले में प्रकाश पुँज के रूप में है। तत्वदर्शियों के अनुसार यह उलटे छाते या कटोरे के समान सत्रह प्रधान प्रकाश तत्वों से बना होता है, देखने में मर्करी लाइट के समान दिखाई देता है। छान्दोग्य उपनिषद् में सहस्रार दर्शन की सिद्धि का वर्णित करते हुए कहा गया है। “तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारों भवति” अर्थात् सहस्रार प्राप्त कर लेने वाला सम्पूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धि हस्तगत कर लेते हैं। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है और विश्व में जो कुछ भी मानवकृत विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है। उनका सम्पादन करता है।

सहस्रार क्या है? इसका उत्तर शरीर शास्त्र के अनुसार अब इतना मात्र जाना जा सका है कि मस्तिष्क के माध्यम से समस्त शरीर के संचालन के लिए जो विद्युत उन्मेष पैदा होते हैं, वे आहार से नहीं वरन् मस्तिष्क के एक विशेष संस्थान से उद्भूत होते हैं। वह मनुष्य का अपना उत्पादन नहीं वरन् दैवी अनुदान है। आमाशय, हृदय आदि तो उसी ऊर्जा से अपने काम कर सकने की क्षमता प्राप्त करते हैं। रक्त से शरीर के अवयवों को पोषण मिलता है, यह सत्य है। फेफड़े-साँस का और पाचन तन्त्र आहार का साधन जुटाते हैं, यह भी सही है, पर यह देखना फिर भी शेष रह जाता है कि यह सारी मशीन जो निर्वाह की आवश्यकता पूरी करने में जुटी हुई है वह अपने लिए मूल ऊर्जा कहाँ से पाती है? यह समाधान सही नहीं है कि आहार एवं साँस आदि से ही जीवन ऊर्जा मिलती है। यदि ऐसा रहा होता तो भूख या दम घुटने के बिना किसी मृत्यु न होती।

मस्तिष्क के मध्य भाग से यह विद्युत उन्मेष रह रह कर सतत् प्रस्फुटित होते रहते हैं। इससे एक विलक्षण विद्युतीय फव्वारा कहा जा सकता है। वहाँ से तनिक तनिक रुक-रुक कर एक फुलझड़ी-सी जलती रहती है। हृदय की धड़कन में भी ऐसे ही मध्यवर्ती विराम रहते हैं। ताप, ध्वनि आदि की प्रवाहमान तरंगों में भी उतार चढ़ाव होते हैं। मस्तिष्कीय मध्य बिंदु में अवस्थित ऊर्जा उद्गम की गतिविधि भी ठीक उसी प्रकार की है। वैज्ञानिक इन उन्मेषों को मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों की सक्रियता स्फुरणा का मुख्य आधार मानते हैं। संत कबीर ने कहा है “ दिरदय बीच अनहत बाजे, मस्तक बीच फवारा।” यह फवारा ही “रेटिकुलर एक्टीवेंटिंग सिस्टम” या सहस्रार है।

सहस्रार कमल का पौराणिक वर्णन बहुत ही मनोरम एवं सारगर्भित है। कहा गया है कि क्षीरसागर में विष्णु भगवान सहस्र फन वाले शेषनाग पर शयन कर रहे हैं। उनके हाथ में शंख, चक्र, गदा, पद्म है। लक्ष्मी उनके पैर दबाती है। कुछ पार्षद उनके पास खड़े है। क्षीर सागर मस्तिष्क में भरा हुआ भूरा चिकना पदार्थ- ग्रे मैटर है। हजार फन वाला सर्प यह चपटा खुरदरा ब्रह्म रंध्र सेन्ट्रल कैनाल स्थित विशेष क्षेत्र है। मनुष्य शरीर में अवस्थित ब्रह्म- सत्ता का केन्द्र यही है। इसी से यहाँ विष्णु भगवान का निवास बताया गया है। यहाँ विष्णु सोते रहते हैं। अर्थात् सर्वसाधारण में होता तो ईश्वर का अंश समान रूप से है पर वह जागृत स्थिति में नहीं देखा जाता। आमतौर पर लोग हेय, पशु पक्षियों-प्रवृत्तियों जैसा निम्न स्तर का जीवन यापन करते हैं। उसे देखते हुए लगता है कि इनके भीतर या तो ईश्वर है ही नहीं अथवा यदि है तो वह प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है। जिसका ईश्वर जागृत होगा, उसकी विचारणा, क्रिया-शीलता, आकाँक्षा एवं स्थिति उत्कृष्ट स्तर की दिखाई देगी। वह प्रबुद्ध और प्रकाशवान जीवन जी रहा होगा, अपने प्रकाश से स्वयं ही प्रकाशवान न हो रहा होगा, वरन् दूसरों को भी मार्गदर्शन कर सकने में समर्थ ही रहा होगा।

शरीर रचना की दृष्टि से इस स्थल पर केवल हड्डियों का जोड़ ही नहीं होता, उसी सीध में नीचे अन्य संगतियाँ भी बैठती है। कपाल की हड्डियों के नीचे मस्तिष्क को आच्छादित किये हुए एक सेरिब्रल कार्टेक्स होता है। इसमें खेत में हल चलाने से बने हुए चिह्न जैसे होते हैं, जो उसे विभिन्न भागों में विभक्त करते हैं, जिसे सल्कस कहते हैं। कार्टेक्स अर्थात् ब्राह्मक को लम्बाई में फिशर तथा चौड़ाई में बीच से विभाजित करने वाली को सेन्ट्रल सल्कस-केन्द्रीय सीता कहते हैं। इन दोनों जोड़ों को केन्द्र ठीक उसी स्थल पर होता है, जहाँ ब्रह्मरंध्र कहा गया है। इसी रंध्र की सीध में मस्तिष्क की सबसे रहस्यमय कही जाने वाली संरचना पीनियल ग्लैण्ड होती है।

यह ब्रह्मरंध्र काय स्थित सत्ता को महत चेतना से संबंधित करने का विशिष्ट मार्ग द्वार है। योगी अंत समय में इसी मार्ग से प्राण का निष्कासन करके ब्रह्मरंध्र मस्तिष्क के अनुभूतियों के आदान-प्रदान का कार्य करता है। सहस्रार चक्र और ब्रह्मरंध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई के रूप में कार्य करते हैं। अतः योग साधना में भी इन्हें संयुक्त रूप से प्रभावित करने का विधान है।

चक्र संस्थानों को भँवर, चक्रवात की ही तरह एक उपमा झरना फटने की भी दी जा सकती है। ज्वालामुखी के छेद अक्सर अग्नि, धुआँ या दूसरी चीजें उगलते रहते हैं। चक्रों से भी उसी प्रकार का प्रकटीकरण होता रहता है। समुद्री लहरों से आज असीम विद्युत शक्ति उपलब्ध करने की तैयारियाँ हो रही हैं। चक्र संस्थानों से उफनती शक्ति का उपयोग कर सकना जिनके लिए संभव होता है वे उसका ऐसा लाभ उठा सकते हैं जिसे दैवी क्षमता अथवा सिद्धों की सामर्थ्य कह कर सम्बोधित किया जाता है।


आग पर चलने का जादुई कौशल

दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलने की परम्परा इस प्रगतिशील युग में भी विश्व के अनेक भागों में जहाँ-तहाँ देखी जाती है। विशेष पर्वों, अवसरों पर इसका आयोजन किया जाता है। भारत, स्पेन, बल्गारिया एवं फिजी के अनेक सम्प्रदायों में यह धार्मिक क्रिया कलापों का एक अंग है। आत्म-शुद्धि तथा व्याधियों के उपचार के रूप में नंगे पैर आग पर चलना, अग्नि नृत्य करना यूनान और फ्राँस में लोगों के पूजा-उपचार का एक अभिन्न भाग है। इस वे देवताओं की कृपा तथा मंत्र शक्ति का चमत्कार मानते हैं। अन्य अफ्रीकी देशों में भी इसका प्रचलन है।

एक बार भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद बिहार के दौरे पर गये हुए थे। राँची में उराँव तथा मुण्डा जाति के लोगों के उन्हें अपना एक करतब देखने को आमंत्रित किया। वे उस समय आश्चर्य में पड़ गये जब अनेकों युवक पंक्ति बद्ध होकर धधकते हुए अंगारों पर चलने लगे। उनमें से एक भी व्यक्ति के पैर में जलने का कोई चिन्ह तक नहीं था। आग पर चलने की इस विद्या को जन-जातियों ने देवी देवताओं से जोड़ रखा है।

यूनान में वीणा की स्वर लहरी पर अग्नि नृत्य आज भी देखने को मिलता है। वहाँ आइयाएलोनी नामक गाँव में प्रति वर्ष सन्त कास्टेंटाइन और सन्त हेनोन के सम्मान में कई दिन तक चलने वाले उत्सव का आयोजन होता है। इसका समापन अन्तिम दिन अँगारों पर चलने के साथ होता है। आग पर नाचने वालों को “अनास्ते नैराईडस” कहा जाता है। सूर्यास्त के पश्चात् आरम्भ हुआ यह नृत्य तब तक चलता रहता है जब तक कि अंगारे राख के ढेर में परिवर्तित नहीं हो जाते। उनका विश्वास है कि सन्त कास्टेंन्टाईन की दैवी शक्ति उनकी रक्षा करती है तथा रोगों से मुक्ति दिलाती है।

दक्षिण अफ्रीका ने नेटाल प्रान्त में भी आग पर चलने का रिवाज है यहाँ इसे एक प्रकार की धार्मिक पवित्रता के रूप में किया जाता है। इस उत्सव में जो लोग सम्मिलित होते हैं उन्हें दस दिन पूर्व से स्त्री संपर्क, माँस-मदिरा आदि का परहेज करना पड़ता है। इसका वर्णन करते हुए हाले विलियम्स नामक एक अंग्रेज विद्वान ने लिखा है कि ऐसे अवसर पर वे लोग 20 फुट लम्बे, 10 फुट चौड़े तथा दो तीन फीट गहरे गड्ढे में लकड़ियाँ जलाकर धधकते हुए कोयले की आग तैयार कर लेते हैं। सबसे आगे पुरुषों का समूह चलता है और पीछे गाती बजाती महिलाओं की टोली चलती है। आग पर सबसे पहले पुजारी के पैर पड़ते हैं जिसके नेतृत्व में यह उत्सव मनाया जाता है। और उसके पीछे उसके भक्त पंक्तिबद्ध रूप से चलते हैं। इनमें से किसी के भी पैरों के जलने के कोई चिन्ह नहीं मिले। पूछने पर पुजारी ने बताया कि-ईश्वर विश्वास एवं शारीरिक तथा मानसिक पवित्रता की शक्ति ही हम लोगों को जलने से बचाती है।

सेनफ्रांसिस्को के सुप्रसिद्ध लेखक रिचर्ड मार्टिन ने दक्षिण प्रशान्त महासागर के टाहिटी नामक टापू में स्वयं देखी हुई एक घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि 18 फीट लम्ब 12 फीट चौड़े और 3 फीट गहरे गड्ढे में 12 से 14 इंच व्यास के झाँवे भर दिये गए। इसके बाद उनके ऊपर कोयला और लकड़ी को जलाया गया। निर्धूम होने पर डण्डों से अंगारों को नीचे और झाँवों को ऊपर कर दिया गया जिससे झाँवे भी कोयले से समान लाल सप्त हो गये। इस पर चलने वालों ने सर्वप्रथम पत्तियों के एक गुच्छक से तप्त झाँवों को तीन बार स्पर्श किया फिर एक एक करके उप पर से आगे निकले और पुनः उसी रास्ते में वापस भी आ गये।

इस प्रकार अमेरिका के प्रोफेसर लाँग्ले ने प्रत्यक्ष देखे गये एक विवरण को प्रकाशित कराया है उन्होंने लिखा है कि ‘सोसायटी टापू’ के रेटिया नामक स्थान में भारतीय मूल के एक व्यक्ति ने पत्थर के बड़े बड़े टुकड़ों को एक गड्ढे में लकड़ी और कोयले को जलाकर खूब गरम कराया। तत्पश्चात् उन धधकते पर वह इस प्रकार चलता गया मानो सामान्य पत्थर पर चल रहा हो। तप्त पत्थरों का जब तापमान नापा गया तो वे 1200 डिग्री फारेनहाइट तक गरम थे। जापान में भी इसी प्रकार के एक प्रदर्शन का वर्णन लेखक परसीवल लावेल की पुस्तक में किया है।

दक्षिण भारत के चिंगलपेट जिले में एक उत्सव के समय अनेक अँग्रेजों ने सैकड़ों भारतीयों को कोपीन पहनकर मंत्रोच्चार करते हुए पंक्तिबद्ध होकर धधकते अंगारों पर चलते देखा था। पैरों में कोई रसाईयन लेप कर चलने जैसी शंकाओं का निराकरण भी परीक्षण करके कर लिया गया था फिर भी किसी के पैर में जलने के कोई निशान तक नहीं देखे गये। इससे प्रभावित होकर लन्दन विश्वविद्यालय के कुछ मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने आग पर चलने की घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करने की दृष्टि से एक समिति का गठन किया। परीक्षण के लिए उन्होंने खुदा बक्श नामक एक भारतीय जादूगर को तैयार किया। 25 फुट लम्बे, 3 फुट चौड़े और एक फुट गहरे गड्ढे को तप्त अंगारों से भर दिया गया। खुदाबक्श कुरान की कुछ आयतें पढ़ने के बाद उस पर चलकर पर निकल गया। उसका कहना था कि अंगारों की तह कम से कम 9 इंच अवश्य होनी चाहिए। अन्यथा पतली तह में जलने का भय रहता है। एक सप्ताह बाद भी उसने इस प्रक्रिया को दोबारा करके दिखाया, किन्तु तीसरी बार उसने यह कह कर आग पर चलने से इन्कार कर दिया कि अब मेरा विश्वास डिग गया है यदि अब चला तो जल जाऊँगा। दोनों प्रयोगों के पूर्व और पश्चात् खुदा बक्श के पैरों की पूरी जाँच कर ली गई थी जिसमें न तो किसी प्रकार रसायन और न ही पैरा में कड़ापन पाया गया।

कुछ वर्ष पश्चात् इसी प्रकार का प्रदर्शन एक दूसरे भारतीय अहमद हुसैन ने वैज्ञानिकों के समक्ष किया था। हुसैन न केवल अकेले अंगारों पर चला था वरन् अनेक अंग्रेजों को भी अपने साथ 1292 डिग्री ताप वाले अग्नि पिण्डों पर चलाने में समर्थ हुआ था।

इंडोनेशिया (सुमात्रा) में जिन लोगों पर देवता आते हैं वे अपने मुँह में दहकते कोयले भर लेते हैं। मिस्र और अल्जीरिया के कई दरवेश लाल सुर्ख अंगारों को अंगूर जैसे निगल जाते हैं अल्जीरिया के फकीर तो अपना शरीर लोहे की तपती शलाखों से दगवाते हैं।

इन चमत्कारिक घटनाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए मूर्धन्य वैज्ञानिक एवं अनुसंधानकर्ता स्टीवन ने नृवंश मनोविज्ञान की प्रमुख पत्रिका ‘इथोज’ में बताया है कि यह पदार्थ पर दिमाग के हावी हो होने की प्रक्रिया है। इस कृत्य के समय ‘फायर वाकर - अर्थात् आग पर चलने वाले लोग तन्द्रा जैसी स्थिति में रहते हैं। इस सम्बन्ध में अनुसंधानरत वैज्ञानिक कैने ने अपने शोध निष्कर्ष में कहा है कि सम्मोहन की स्थिति में व्यक्ति को आग के संसर्ग से जलन महसूस नहीं होती।

अमरीका के सुप्रसिद्ध शल्य चिकित्सक डा0जी0 एम॰ फेठन ने सातवें दशक में आविष्कारक एवं दार्शनिक आर॰ बाकमिस्टर के साथ दक्षिण समुद्र के बोरा बोरा द्वीत में आग पर चलने का एक आयोजन देखा तथा उसमें स्वयं सम्मिलित हुए। वहाँ अग्निकुण्ड देखा तथा उसमें स्वयं सम्मिलित हुए। वहाँ अग्निकुण्ड में प्रवेश करने पर उन्होंने जो अनुभव किया उसे “सैटरडे रिव्यू” नामक पत्रिका में प्रकाशित कराया। उसमें उन्होंने कहा है “अग्नि में पैर डालने पर अंगारे सैण्डपेपर जैसे लग रहे थे। पैरों पर तीव्र किन्तु सहन करने योग्य गरमी महसूस हुई। तत्पश्चात् पैरों में झुनझुनी-सी होने लगी और मस्तिष्क शून्य सा पड़ गया था। अग्नि कुण्ड के बाहर निकलने पर लगा सोते से जगा हूँ।”

वैज्ञानिकों का कथन है कि आग पर चलना एक शारीरिक एवं मानसिक कौशल है। इस पर देवी-देवताओं से कोई संबंध नहीं है क्योंकि घोर नास्तिक एवं जादूगर तक यह कौशल दिखा देते हैं। भारत में बीसियों जगह जलती होली में से निकलने का रिवाज है। यह कृत्य पण्डे पुरोहित के यहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी होता चला आता है। उनके आचरण भी सामान्य लोगों जैसे औसत दर्जे के होते हैं। उनमें से कोई सत्यवादी या योगी, तपस्वी नहीं होता। इसके विपरीत ऐसा भी हो सकता है कि उस कौशल को न जानने वाला व्यक्ति सच्च, ईमानदार या भला होते हुए भी आग से जल जाय।

आग पर चलने का केवल जादुई कौशल कहा जा सकता है। इसके साथ अध्यात्म या साधना की कोई सिद्धि के जुड़े होने का कोई आधार नहीं है।


परोक्ष जगत से उतरते “दैवी संदेश”

यदा-कदा सूक्ष्म लोकों से देवी चेतना उठते और लोगों को महत्वपूर्ण सूचनाएँ दे जाती है पर देखा गया है कि यह सूक्ष्म संदेश हर कोई ग्रहण नहीं कर पाता। वही व्यक्ति इन तरंगों को पकड़ पाता है, जिसका अन्तःकरण निर्मल हो, विचारणाएँ, भावनाएं पवित्र हो, जो लोकमंगल के लिए जीता और परमार्थ के लिए मरता हो। ऐसे व्यक्ति इन सूक्ष्म सूचनाओं के माध्यम से अपना और समाज दोनों का कल्याण करते देखे जाते हैं। पिछले दिनों ऐसी अनेक घटनाएँ घटी है। एक घटना इजराइल की हैं

वहाँ के निवासियों को 45 वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहने और स्वाधीनता प्राप्ति के लिए अथक प्रयास करने के बावजूद भी जब मुक्ति के कोई आसार नजर नहीं आये, तो उन्होंने धार्मिक कृत्यों का सहारा लिया और धर्मानुष्ठानों की एक लम्बी शृंखला चलायी। इसी मध्य उन्हें “माउन्ट सिनाई” से एक दिन एक दिव्य संदेश मिला, जिसमें कहा गया कि, तुम्हारी खुशियाँ वापस लौटेगी और तुम जल्द ही स्वतंत्र होगे। इस ईश्वरीय सूचना के मिलते ही लोगों की उद्विग्नता समाप्त हो गयी और सभी ने चैन की साँस ली। इसी के फलस्वरूप न्यायनिष्ठ सम्राट सोलोमन का अवतरण हुआ था, जिनने इजराइल की स्थिति सुधारने और स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

ग्रीक पौराणिक उपाख्यानों के अनुसार रोम की स्थापना का श्रेय रोमुलस और रैसम नामक जुड़वा भाइयों को है। वे मार्स की सन्तान थे। रैमस उम्र प्रकृति का था, जबकि रोमुलस शान्त सात्विक स्वभाव का। शासन काल के दौरान एक दिन रोमुलस ने अपने सिर के ऊपर एक अलौकिक प्रकाश देखा और एक दिव्य ध्वनि सुनी, जिसमें उसकी सत्ता के अवसान का संकेत था। बाद में ऐसा ही हुआ। सुप्रसिद्ध ग्रीक इतिहासकारों, जिन्होंने ग्रीक-परशियन युद्ध के कारणों का बड़ी गहनता से अध्ययन किया है का कहना है कि एथेना प्रोनोइया के मंदिर में एकबार ऐसी दिव्य आवाज गूँजी, जिसमें अनाचार के विरुद्ध मुहिम शुरू करने का स्पष्ट आदेश था। एसक्यलेपस को रोम में चिकित्सा का देव कहा जाता है। एक दिन उनने अनुभव किया, मानो कोई अदृश्य व्यक्ति उससे कह रहा हो कि “रुग्ण और बीमार व्यक्तियों की सहायता करो।” तभी से रोगियों की सेवा-परिचर्या में वे जुट पड़े और आजीवन इसी काम में निरत रहे। इसी कारण रोमवासी उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं।

कभी कभी सूक्ष्म प्रेरणाएँ इतनी सशक्त होती है कि बड़े समुदाय भी उसके प्रभाव में आये बिना नहीं रहते। 13 मई से अक्टूबर 1917 के अन्त तक कुछ व्यक्तियों ने पुर्तगाल के गए गाँव में लेडी फातिमा को “तिडवाइन मदर ऑफ रोजरी” के रूप में महीने की हर 13 तारीख को दिव्य संदेश के साथ अवतरित होते देखा। इस घटना की जब स्थानीय लोगों की जानकारी मिली, तो 13 अक्टूबर 1917 को बड़ी संख्या में लोग इस अभूतपूर्व दृश्य को देखने के लिए एकत्रित हो गये। उपस्थित लोगों का कहना था कि इस बीच वहाँ का सूक्ष्म वातावरण कुछ ऐसा बना, जो लोगों की धर्म- भावना को झकझोर रहा था। लोगों ने अपने भीतर उत्कृष्ट विचारणाएँ और विलक्षण परिवर्तन अनुभव किये। इस घटना को अविस्मरणीय बनाने के लिए उस स्थान का “फातिमा उद्यान” नाम दे दिया गया, जो अब एक तीर्थ स्थल है।

जब तब ऐसे संदेश मूर्त माध्यमों से भी मिल जाते हैं। इन अवसरों पर अचानक कुछ ऐसे दृश्य आँखों के सामने उपस्थित होते हैं, जिन पर सहसा विश्वास नहीं होता और मतिभ्रम-सा प्रतीत होता है, पर वस्तुतः होते ये वास्तविक ही है। बवेरिया के हैरोल्ड बैंक गाँव में ऐसी ही एक घटना 1959 को घटी। ग्राम में एक धार्मिक आयोजन हो रहा था, जिसमें बड़ी तादाद में ग्रामवासी उपस्थित थे। कार्यक्रम के मध्य अकस्मात् एक श्वेत वस्त्रधारी प्रतिमा लोगों के समक्ष प्रकट हुई और कुछ क्षण रुक कर अन्तर्ध्यान हो गई। वहाँ एक चित्र अधिकाँश लोगों ने इसे आँखों का विभ्रम माना, पर कुछ धर्मप्राण सतोगुणा सन्तों का कहना था कि उनने एक विशेष प्रकार की प्रेरणा अनुभव की, मानों मूर्ति कर रही हो कि शासन तंत्र पर धर्मतंत्र का अंकुश होना चाहिए तभी राज्य में सुव्यवस्था और शाँति बनी रह सकती है। ज्ञातव्य है, तब वहाँ चारों ओर अराजकता और अव्यवस्था फैली हुई थी। अशान्ति के दम घोंटू वातावरण से लोग परेशान थे। अमन-चैन का कही नामों निशान नहीं था। लोग शांति की तलाश में मृत-तृष्णा की तरह भटक रहे थे।

इसी प्रकार की एक घटना विवेकानन्द के बचपन की है। एक दिन वे अपने कमरे में ध्यानस्थ थे, तभी अचानक उनका ध्यान उचट गया। आंखें खोली तो देखा कि एक चीवरधारी विग्रह हाथ में कमण्डलु लिए कक्ष की दीवार को तोड़ते हुए प्रकट हो रहा है। मूर्ति उनके सम्मुख आकर खड़ी हो गयी। यह सब देख वे भयभीत हो उठे किन्तु थोड़ी देर पश्चात् जब भय कुछ घट, तो उन्होंने प्रतिमा गायब हो गयी। उन्होंने दीवारों का निरीक्षण किया, तो सभी सुरक्षित थी, किसी प्रकार का कोई सुराख नहीं था। बाद में जब उनसे लोगों ने इस अद्भुत घटना की जानकारी चाही, तो उनने कहा कि वे साक्षात् भगवान बुद्ध थे, जो ज्ञान क्राँति का एक विशेष संदेश देने के लिए प्रकट हुए थे।

चौदहवीं शताब्दी में इटली में राजनैतिक कमजोरियों के कारण अराजकता का विष पुरे देश में चलता चला गया। पड़ोसी राष्ट्र भी इटली वासियों की इस कमजोरी का लाभ उठाने की कोशिश करने लगे। इन्हीं परिस्थितियों में सन् 1947 में इटली में “साइना” ग्राम में कैथरीन नामक एक कन्या का जन्म हुआ। जब वह 17 वर्ष की हुई, तभी उसके जीवन में एक आकस्मिक मोड़ आया। एक दिन रात में वह सोने का उपक्रम कर रही थी कि उसके कर्ण-कुहरों से कुछ सट शब्द टकराये। कोई कह रहा था कि “तुम लोगों में धार्मिक चेतना जगाओ तभी देश इस दलदल से निकल सकता है।” उसने अविलम्ब उठकर कमरे में तथा कमरे के बाहर चारों ओर काफी खोजबीन की, पर कोई व्यक्ति नहीं दीखा। तब उसने इसे कानों का भ्रम मान लिया और सो गयी, किन्तु उस दिन के बाद से यह दैनंदिन घटना बन गयी। उसे बराबर इस प्रकार के सूक्ष्म संदेश प्राप्त होने लगे। अन्ततः कैथरीन ने उन्हीं संदेशों को अपना आदर्श और आधार मानकर कार्यक्रम शुरू किया और लोगों का चिन्तन-तंत्र और जीवन क्रम बदलने का अभियान आरम्भ किया, जिसमें उसे काफी सफलता मिली तथा देश की स्थिति में भी उत्तरोत्तर सुधार होता चला गया।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों महर्षि अरविंद जब अलीपुर जेल में थे, तो उन्हें भी ऐसे ही दिव्य व सूक्ष्म संदेश नियमित रूप से मिलते रहते थे, जिसमें भावी कार्यक्रमों की रूप रेखा और इनसे सम्बन्धित निर्देश होते थे। इन्हीं संदेशों के आधार पर महर्षि अपनी योजना बनाते और क्रियान्वित करते थे। ब्राह्मी चेतना के संकेत पर ही वे स्वाधीनता-संग्राम के सक्रिय जीवन से संन्यास लेकर पाण्डिचेरी चले गये और समष्टि साधना में निरत हुए।

इन घटनाओं के सम्बन्ध में श्री अरविंद कहते थे कि इस दृश्य जगत की तरह ही एक परोक्ष जगत् भी है, जो विशुद्धतः चेतनात्मक है। सूक्ष्म स्तर के संदेश उसी चेतनात्मक संसार से उतरते हैं। कई बार ऐसा होता है कि चिन्तन के दौरान कई ऐसे नये विचार और तथ्य अपने आप सूझ पड़ते हैं, जिनकी आशा भी नहीं की थी, पर अनायास मस्तिष्क में कौंध जाते हैं। वस्तुतः यह विचार तरंगें सूक्ष्म जगत से ही अवतरित होती है, स्थूल विश्व से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता, ऐसी सूक्ष्म तरंगें अदृश्य लोक में निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। आवश्यकता उन्हें प्रकरण करने की है। पर यह उन्हीं की पकड़ में आती है जो अपने जीवनक्रम को शुद्ध, सात्विक बनाकर अपने चरित्र चिन्तन व्यवहार को परिष्कृत कर लेते हैं। ऐसे ही लोग इनका स्वयं लाभ उठाते और दूसरों को भी लाभान्वित करते देखे जाते हैं।


Quotation

भगवान जिस पर अनुग्रह करते हैं उसकी सम्पदायें छीन लेते और विभूतियां थमा देते हैं।


मानवी काया में छिपा दानव

मनुष्य के भीतर भगवान का भी निवास है और शैतान का भी। उसके भीतर देवता भी रहते हैं और दैत्य भी। यह उसकी इच्छा पर निर्भर है कि वह चाहे उभारे और चाहे जिस दबोच दे।

दया, करुणा, प्रेम सेवा के लिए अपने आपको उत्सर्ग करने वाले महामानवों, संतों, सुधारकों की भी कमी नहीं रही, पर ऐसे कुकर्मी और निष्ठुर भी इस संसार में कम नहीं हुए, जिनने मानवता को उठा कर ताक में रख दिया और वे कृत्य किये, जिनकी चर्चा सुनकर भी किसी सहृदय का सिर नीचा हो जाता है और संदेह होता है कि क्या ऐसी नृशंसता भी मनुष्य के कलेवर में छिपी हो सकती है?

सिंह, व्याघ्र, सर्प, बिच्छू, बाज, गिद्ध आदि में आक्रमण की प्रवृत्ति होती है। वे दूसरे जानवरों पर प्राणघातक हमला कर उन्हें मार डालते अथवा गम्भीर रूप से घायल कर देते हैं। उनमें नर-मादा के बीच बिना माता, पुत्री बहिन आदि का अन्तर किये यौन स्वेच्छाचार चलता है। यह उनकी स्वाभाविक वृत्ति है पर मनुष्य भी नर-पशु और नर-पिशाच के रूप में प्रकट हो सकता है, इसके उदाहरण भी कम नहीं है।

ट्राँसिलवानिया के शासक ड्रैक्युला के बारे में कहा जाता है कि वह निरीह लोगों का कत्ल करवा कर शहर के चारों ओर खूँटो से लटका देता था। यह दृश्य देख कर उसे काफी आनन्द आता था।

क्रूरता में रोम का शासक नीरो भी कोई कम खूँखार नहीं था। 14वीं शताब्दी में वह नौ वर्ष तक सिंहासनारूढ़ रहा। इस दौरान उसने हजारों लोगों की नृशंस हत्याएँ करवाये जिनमें उसके सगे- सम्बन्धी भी सम्मिलित थे। उसने अपनी पत्नी का सिर कटवा डाला, जिन अफसरों से मनमुटाव था, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। यहाँ तक कि अपनी माँ को भी नहीं बख्शा। उसे भी मरवा डाला। एक बार सनसनी चढ़ी तो पूरा शहर ही जलवा कर राख कर दिया और स्वयं एक ऊँची पहाड़ी पर तड़पते-मरते लोगों को देखकर प्रसन्न होता रहा। उस विनाशलीला का आनन्द वह बाँसुरी बजा कर लेता रहा।

वर्तमान रूस से काला सागर तटवर्ती क्षेत्र में यूराल, दोन तथा रुमानिया, हंगरी, बल्गेरिया, साईबेरिया, जैसे देशों में ऐसी अनेक कब्र मिली है, जिनकी खुदाई में न केवल स्वर्ण जड़ित रत्न, आभूषण मिल है, वरन् मनुष्यों एवं पशुओं के असंख्य कंकाल भी पाये गये हैं। समझा जाता है कि सत्ताधिपतियों, शासकों को परलोक में ऐश-आराम पहुँचाने की दृष्टि से ही इतने बड़े परिमाण में विलास वैभव व नौकर -चाकर दफनाये गये थे। ऐसी ही कब्रें मिश्र के पिरामिडों में भी पायी गई है। दोनों में अन्तर सिर्फ इतना है कि मिश्र के दिवंगत सत्ताधीश सुख-सुविधा, धन दौलत, दास-दासी की दृष्टि से अधिक सम्पन्न होते थे। उनकी कब्रें वैभव का विशाल भाण्डागार होती थी।

प्रसिद्ध यूनानी कवि होमर ने अपने महाकाव्य “इलियड” में रत्न राशियों युक्त ऐसी अनेक समाधियों का उल्लेख किया है। इस रचना को आधार मानते हुए जर्मनी के एक व्यक्ति हेनरी स्कलाईमेन ने इन कब्रों की खोज आरम्भ की। लम्बे प्रयास के बाद अन्ततः वह दक्षिण यूनान में मायसीनिया में एगामेन्नाने एवं उनके साथियों की समाधि ढूंढ़ने सफल हो गया, इनसे इतनी सम्पदा मिली कि हेनरी धनकुबेर बन गया। समाधियों में सेनापतियों के साथ उनके कई कई सेवक भी दफनाये गये थे।

एशिया में ऐसे सामूहिक नर संहार का जीता-जागता नमूना ‘चीन की दीवार’ है। कहा जाता है कि वहाँ के शासक ने इसके निर्माण काल के दौरान हजारों निरीह लोगों की चिनाई करके इसकी नींव खड़ी की थी, जिससे यत्र-तत्र झाँकते इनके कंकाल आज भी अपने निर्दयी मौत का पैगाम संसार को दे रहे है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के मध्य हिटलर और उसके सहयोगी मार्शल गोरिंग ने जो कत्लेआम मचाया था, वह भुलाये नहीं भूलता। इन दोनों ने मिल कर शत्रु सेना का जितना संहार किया, उससे कई गुना अधिक अपने ही देशवासियों को मौत के घाट उतार डाला। कारण सिर्फ इतना था कि हिटलर स्वयं को एवं जर्मन को शुद्ध आर्य मानता था। यहूदियों को अनार्य कहता था। वह चाहता था कि जर्मनी में सिर्फ शुद्ध आर्य जति ही रहे। इसी कारण उसने अपने देश में यहूदियों का सफाया आरम्भ किया था।

मध्यकाल में नादिरशाह ने भी ऐसी ही नृशंसता अपनायी थी, इसी “नादिरशाही’ उसके क्रूर-कृत्य का पर्याय बन गया। सर्वविदित है कि वह एक जर्मन गड़रिया था। भेड़ चराते-चराते डाकेजनी करने लगा और फिर वह एक गिरोह का सरदार बन बैठा। अपने प्रभाव और प्रभुत्व का विस्तार करते करते वह ईरान तक जा पहुँचा और वहाँ का शासक बन गया। शासनसत्ता को हाथ में लेने के बाद यदि वह चाहता, तो इतिहास पुरुष बन सकता था और अपनी प्रतिभा का उपयोग जनहित में कर देश-वन्द्य हो सकता था, पर उसके अन्दर के दैत्य ने उसे ऐसा नहीं करने दिया और जीवन पर्यन्त वह लूट पाट, मार-काट ही मचाता रहा। उसकी इस हविश की संतुष्टि एक ही देश से नहीं हुई उसने कई-कई देशों में इस प्रकार की विनाश लीलाएँ रचीं दिल्ली को भी उसके कहर झेलने पड़े। यहाँ एक ही दिन में डेढ़ लाख व्यक्तियों का कत्ल करवा दिया और बड़ी संख्या में लोगों को कैद कर अपने साथ ले गया।

रोडेशिया में जब सीथियस सभ्यता थी, तब राजा की अन्त्येष्टि विलक्षण प्रकार से सम्पन्न की जाती थी। उसकी लाश गाँव-गाँव, नगर नगर प्रजाजनों के दर्शन के लिए घुमाई जाती। शोक प्रकट करने के लिए लोगों को अपने कान का एक भाग भेंट करना तथा सिर मुड़ाना पड़ता था। इतना ही नहीं, अन्तिम संस्कार का समय जब आता, तो मृत राजा के साथ हरम की कम से कम एक रानी अवश्य दफनायी जाती। साथ में अनेकानेक घोड़े तथा नौकर होते। इसका विशद विवरण तत्कालीन इतिहासकार हेकोडोटस ने बड़े ही रोमाँचकारी ढंग से किया है।

तुक्र और तातार सरदारों की अन्तिम क्रिया भी कोई कम लोभ हर्षक नहीं होती थी। शव-यात्रा के दौरान रास्ते में जो कोई मिल जाता, उसका सिर यह कह कर कलम कर दिया जाता कि “जाओ, स्वर्ग में अपने स्वामी के साथ रहकर उसकी सेवा-सुश्रूषा करना।”

लिपजिंग (जर्मनी) के सैशन कोर्ट को मुख्य न्यायाधीश वेनेडिक्ट कार्पजे इतना क्रूर और हत्यारा प्रकृति का था कि जो कोई उसका नाम सुन लेता, उसे पसीना छूट जाता और रात में कई-कई दिन तक नींद हराम हो जाती। वह छोटे-से-छोटे अपराध के लिए भी मृत्यु दण्ड से कम की सजा नहीं देता। औसतन पाँच व्यक्तियों को प्रतिदिन फाँसी के फन्दे पर लटकाया जाता। इस प्रकार 46 वर्ष के लम्बे कार्य काल में उसने 50 हजार व्यक्तियों को मौत के मुँह में धकेला था।

वस्तुतः यह मनुष्य का दानव पक्ष है। जब उसके भीतर का दैत्य जागता है, तो उसे नर पिशाच बना देता है। और उसी स्तर के कृत्य करवाता है, पर मनुष्य की विशिष्टता इसमें नहीं है। ऐसे आचरण तो जंगली जानवर भी नहीं करते पाये जाते। मनुष्य अपने ऐसे नृशंस कृत्यों से भले ही प्रसिद्धि पा ले, मगर वह इनसे महान नहीं बन सकता। उसकी महानता तो उसकी देववृत्ति में छिपी है। अन्तः के देव पक्ष को जगाकर ही वह सही अर्थों में मानव देवमानव महामानव बन सकता है। अतः हमारा प्रयास-पुरुषार्थ इस दिशा में होना चाहिए। हमें इनके इतिहास से प्रेरणा नहीं सबक लेना चाहिए।


पहलवान (Kahani)

समाचार मिला एक पहलवान बहुत मोटा है और खाता भी अनाप सनाप है। एक विचार शील ने पूछा-इतना-होने पर वह आखिर करता क्या है? बराबर वालों को पछाड़ता है। और गिराता है। कभी हारता है स्वयं ही गिरता और पिटता है। विचार शील ने कहा-फिर गिरने और गिराने के लिए उसे इतना समय और धन खर्च करने में कोई रोकता क्यों नहीं?


सफलता किनके कदम चूमती है?

बुद्धिमत्ता की वर्णमाला संसार रूपी पाठशाला में आकर सीखी जाती हैं जितने भी व्यक्ति आगे चलकर बड़े विद्वान, वैज्ञानिक, मनीषी, बने है, जरूरी नहीं कि जन्म से ही ऐसे रहे हों। अनुवाँशिकता एवं माता द्वारा गर्भकाल में दिए गए रहे हों। आनुवाँशिकता एवं माता द्वारा गर्भकाल में दिए गए संस्कारों की अपनी महत्ता है। वह अपनी जगह अक्षुण्ण रहेगी। जब तक भरत व लव−कुश के साथ शकुन्तला व जानकी का नाम लिया जाता रहेगा, यह तथ्य अपनी जगह अटल रहेगा। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए की वरदराज, गोपमाल, कालिदास जैसे उद्घट विद्वान भी इस देश में हुए है जिन्हें प्रारम्भ में मूर्ख, ढपोलशंख, बेवकूफ क्या क्या नहीं कहा गया। किन्तु अध्यवसाय एवं साधना पुरुषार्थ के बलबूते उन्होंने “इडियट” से “जीनियस” बनकर दिखा दिया। यह विशेषता मनुष्य के साथ ही है कि वह जो चाहे, वह बन सकता है। न केवल यह स्वतंत्रता विधाता ने उसे दी है, वरन् ऐसे साधन, अवसर, परिस्थितियाँ भी दी है जिनका समुचित सदुपयोग-सुनियोजन कर वह क्या से क्या बन सकता है।

कोई जरूरी नहीं कि हर महामानव या प्रतिभावान का मूल्याँकन स्वतः हो जाये व जनता उसकी जय-जयकार करने लगे। यह एक समयसाध्य प्रक्रिया है। यदि व्यक्ति प्रारम्भिक उपहास-निंदा व प्रताड़ना से क्षुब्ध हो, निराश हो प्रगति पथ की यात्रा बीच में छोड़ दे तो वह उस सौभाग्य से वंचित हो सकता है, जो कदाचित उसे प्रयास-पुरुषार्थ जारी रखने पर मिलता। धीरज एवं सतत् अध्यवसाय एक ऐसा गुण है, जो बिरलों में पाया जाता है, किन्तु इसी के बलबूते व परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना पाने, वाँछित सफलताएँ हस्तगत करने में सफल हो जाते हैं। सफलता का यह मूलमंत्र है एवं इसकी साक्षी उन व्यक्तियों के जीवन-क्रय से मिली है, जो प्रारम्भ में साधारण से व्यक्ति थे, किन्तु बाद में इतिहास में अपना स्थान बना गए।

टेनीसन पाश्चात्य जगत के प्रसिद्ध कवि हुए है। जब उन्होंने अपनी कविताओं को एक प्रसिद्ध पत्रिकाओं के सम्पादक को दिखाया तो उनकी खूब हँसी उड़ायी गयी। उनके पितामह ने उनका मन रखने के लिए उन्हें 10 शिलिंग दिए किन्तु साथ ही यह भी कह दिया था “यह पहली व अंतिम कमाई है, जो तम अपनी तथाकथित रचनाओं के बदले पा रहे हो और मेरी बात ध्यान से सुन लो- पढ़ाई में मन लगाओ व कुछ बनने का प्रयास करो। किंतु बाद में यही प्रारम्भिक कविताएँ विद्वानों के लिए शोध का विषय बन गयी। कि कैसे इतनी सुन्दर रचना एक किशोर ने अपनी कल्पना शक्ति से रची?

“फ्रेजर्स मेगजीन” के सम्पादक को एडवर्ड फिट् जगराल्ड ने अपनी कविताओं की पाण्डुलिपि लाकर दी, जिसका नाम “उमरखैयाम की रुबाईयाँ” था उन्होंने न केवल उनकी हँसी उड़ाई, बल्कि चौकीदारों से बाहर खदेड़वा दिया। एडवर्ड निराश नहीं हुए। उन्होंने कुछ पैसे उधार लेकर उसे छपवाया। जब वह किताब आधे क्राउन में भी नहीं बिकी, उन्होंने उसकी कीमत घटाकर एक शिलिंग कर दी। फिर भी न बिकने पर उन्होंने एक कबाड़ी के यहाँ कुछ प्रतियाँ प्रसिद्धि प्राप्त साहित्यकार राँसेटी, स्वाइन बर्न एवं सर रिचार्ड बर्टन के पास पहुँची तो उन्होंने इस छिपी प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा।

कार्लमार्क्स शायद फुटपाथ पर सोते- श्रमिक की तरह जीवन काटकर इस दुनिया से चले जाते, यदि उन्हें अपनी बचपन की मित्र एवं बाद में जीवन संगिनी जेनीवाँन वेस्टफाँलेन का सान न मिला होता। उसने न केवल उनकी हर विपत्ति में साथ दिया, उनकी प्रतिभा को पहचाना व सतत् प्रेरणा देते रहने का काम किया, जिससे वे “डास कैपीटेल” जैसी रचना विनिर्मित कर सकें। स्वयं अमीर घर की होते हुए भी उसने गरीब किन्तु प्रतिभावान, पुरुषार्थ अपने पति के साथ प्रतिकूल परिस्थितियों में जीना पसंद किया और यही से जन्मा अर्थशास्त्र का दर्श, जिसने बाद में विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या को प्रभावित किया।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एडीसन (जो तब तक अच्छी खासी ख्याति प्राप्त कर चुके थे) एक नया प्रोजेक्ट आरम्भ करने के लिए बैंक से कर्ज लेना चाहते थे। किन्तु जब उन्होंने बैंकर को बताया कि इस प्रयोग से कुछ निष्कर्ष निकलेगा या नहीं, यह दो वर्ष बाद ही कहा जा सकता है, तो उन्हें बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया गया। फिर भी सीमित साधनों से उन्होंने वह काम आरम्भ कर दिया एवं सफल हुए।

बेजामिन डिजराईली को महानता की चरम स्थिति पर पहुँचने के लिए अच्छा-खासा संघर्ष करना पड़ा। वे पार्लियामेण्ट का चुनाव लगातार तीन बार हारे। जब चौथी बार सफल हुए व अपना पहला भाषण आरम्भ किया, उनकी खूब खिंचाई हुई व हँसी उड़ाई गई। अन्य सदस्यों ने उन पर जमकर व्यंग्य किया। वे जोर से चीखे- “एक समय ऐसा आएगा, जब आप सब को मुझे सुनना पड़ेगा” और ऐसा ही हुआ भी। इसे कहते हैं जीवट एवं आत्म विश्वास।

सफलता संघर्षशीलों की चेरी है। जो जीवन-संग्राम में लड़ नहीं सकता, वह आगे नहीं बढ़ सकता। हर महामानव का जीवनक्रम यही बताता है कि स्थायी यश एवं कीर्ति उन्हें ही हस्तगत हुई जो निरन्तर लक्ष्य प्राप्ति हेतु लगे रहे। डेनियल बेब्सटर जिनके शब्दकोश आज सारे विश्व में प्रचलित है, अपना पहला शब्दकोश 36 वर्ष में पुरा कर सके। बीच में अनेक व्यवधान आए, कइयों ने उन्हें मूर्ख भी कहा, पर वे पीछे न हटे। अनन्तः सफलता हाथ लगी। माईकेल एंजेलों के वेटीकन स्थित चर्च में बने चित्र विश्व विख्यात है। सिस्टीन चैपेल की छत व ऊँची दीवारों पर उल्टा लेटे पेटिंग करते करत उन्हें पूरा करने में उन्हें पूरे सात वर्ष लगे। पर जो काम एंजेलो कर गए वह एक कीर्तिमान बन गया। इसे देखने विश्व भर से लोग आते हैं व कलाकृतियों की सजीवता देखकर भूरि-भूरि सराहना करते है। “डिक्लाईन एण्ड फाँल ऑफ रोमन एम्पायर” नामक विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ गिब्बन द्वारा पूरे बीस वर्ष में लिखा गया था। वस्तुतः बिना कड़े परिश्रम-अध्यवसाय के महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ मिलती भी नहीं। बीथोवन दोनों कानों से बहरे थे, पर संगीतज्ञ उच्चकोटि के थे। अपनी सर्वप्रसिद्ध संगीत -धुन को उन्होंने कम से कम एक दर्जन बार बारम्बार लिखा व बनाया। अन्ततः जो नवनीत निकल कर आया, वह सर्वोच्च कोटि का था।

जार्ज लुई बोर्जेज जिन्हें अर्जेन्टीना का राष्ट्रकवि कहा जाता है, जन्मजात अंधे थे, पर कविता रचने से उन्हें इस अपंगता ने नहीं रोका। लुई ब्रेल जिन्होंने अंधों के लिए लिपि बनायी स्वयं तीन वर्ष की उम्र में नेत्र दृष्टि खो चुके थे। हेलनकीलर दो वर्ष की आयु में ही गूँगी व बहरी हो गयी थी पर क्या प्रगति पथ पर यह विकलाँगता उनकी बाधक बनी। जोसेफ पुलित्जर जिनके नाम पर पत्रकारिता का पुरस्कार दिया जाता है, 40 वर्ष की उम्र में अंधे हो गये थे। पर जिस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए उन्हें पत्रकारिता का प्रणेता माना जाता रहा है, वह उन्होंने 40 वर्ष बाद ही प्राप्त की।

बहुत से ऐसे व्यक्ति हुए है जिन्हें सम्मान, राशि आयुष्य के उत्तरार्ध में मिली, पर इससे उनकी साधना में कोई व्यवधान नहीं आया। जार्ज बर्नार्डशा को सबसे बड़ा सम्मान नोबुल पुरस्कार सत्तर वर्ष की आयु में जाकर मिला। इकहत्तर वर्ष की आयु में माक्रट्वेन ने अपनी दो सबसे ख्याति प्राप्त रचनाएँ “इव्सडायर” एवं डालर तीस हजार बिक्वेस्ट” रची थी। इस शृंखला में पण्डित दामोदर सातवलेकर जी का नाम भी लिया जा सकता है। जो शताधिक जिए व पिचहत्तर वर्ष की आयु के बाद जिनने आर्ष ग्रन्थों का भाष्य आरम्भ किया।

असफलता का रोना रोने वाले इन महामानवों का जीवनक्रम क्यों नहीं देखते? हर व्यक्ति यदि पुरुषार्थ पारायण हो तो जिस क्षेत्र में चाहे सफलता प्राप्त कर सकता है। भाग्य लिखा हुआ नहीं आता, बनाया जाता है। बनाने हेतु पुरुषार्थ, लगन, अध्यवसाय चाहिए।


अशरीरी आत्माएँ एवं उनके क्रिया कलाप

भूत-प्रेत का मतलब है कि किसी श्मशान, खण्डहर, एकाकी पीपल पर रहने वली डरावनी सूरत जो औरतों पर विशेषतया बच्चों पर आक्रमण करती है ओर पीछा छोड़ने के बदलें में अपहरण कर्ताओं की तरह फिरौती माँगती है ओझा, सियाने, दिवाने भोपे उनके मिशन एजेंट होते हैं। कोई सौदा पटाने के लिए उनके कमीशन एजेंट होते हैं। कोई सौदा पटाने के लिए उनके पास लाना जरूरी है। नई उम्र की लड़कियों को चुड़ैल, जिन्द, मसान सताते हैं और तब छोड़ते हैं जब मनमाना पुजापा वसूल कर लेते हैं, नहीं तो बुखार, हैफनी, ऐंठने, सिर दर्द, उल्टी जैसी बीमारियों खाड़ी कर देते हैं।

हिंदुस्तान में यही है भूत-पलीतों का रूप जो पिछड़े देहाती समुदाय पर आये दिन सवार रहता है। भोपा, ओझा आदि उनको अक्सर शिकार बनाते रहते हैं।

यह पिछड़ेपन की निशानी है जो जनसाधारण को हैरान करती रहती है। पर वस्तुतः ऐसी स्थिति है नहीं। यदि शरीर छोड़ने के उपरांत आत्मा की स्थिति की वास्तविक जानकारी प्राप्त करनी हो तो उसे ऐसा सूक्ष्म शरीरधारी माना जा सकता है। जिसका पूर्व जन्म से सम्बन्धित व्यक्तियों से प्रेम न सही लगवा तो बना ही रहता है। अपना समय उन्हें कर्मानुसार जैसे भी भुगतान पड़ता है जैसे तो भुगतते ही है, इसके अतिरिक्त परिचितों और सम्बन्धियों को अपनी स्थिति के अनुसार लाभ पहुँचाते हैं। सूक्ष्म शरीर-धारी होने के कारण एक स्थान की घटनाओं या सम्भावनाओं की जानकारी उन्हें रहती है। उसे भी उपयुक्त व्यक्तियों तक पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। इससे घटनाक्रम रुकता तो नहीं, पर उस सम्भावना की पूर्व तैयारी रहने पर वह भटका नहीं लगता जो आकस्मिक विपत्ति सामने आ खड़ी होने पर लगता है। पूर्व सूचना यदि उससे पहले मिल जाय जब तक कि दुर्घटना घटित नहीं हुई है, तो प्रत्युत्पन्नमति वाले उससे पूरी तरह बच न सके तो बचाव का उपाय तो कर ही सकते हैं।

कोई सूक्ष्म शरीरधारी किसी स्वजन सम्बन्धी को हानि पहुँचायेगा, ऐसी आशंका किसी को भी नहीं करनी चाहिएं ऐसा तो पिछड़े लोग अपनी मानसिक आशंकाओं का वमन मनगढ़ंत रूप में करते रहते हैं और अपना विज्ञापन कराने के उपरान्त चुप हो जाते हैं।

प्रेतात्माओं के अस्तित्व और उनकी पूर्ववर्ती जानकारियों के सम्बन्ध में कुछ प्रमाणिक जानकारियाँ इस प्रकार है:-

अमेरिका के एक ट्रेन ड्राइवर होरेस एल सीवर प्रेतात्माओं से संपर्क साधने एवं उनसे निकट भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए विख्यात थे लोग उन्हें किंग ऑफ दी रोड कहते थे। 1810 में वे जब एक सैनय दल लेकर जा रहे थे तो मध्य मार्ग में सूक्ष्म प्रेरणा से उन्हें संदेश मिला कि आगे खतरा है गाड़ी रोक दो अन्यथा दुर्घटना के शिकार हो जाओगे। होरेस ने गाड़ी रोक दी। दल के कमाण्डर ने खोजबीन के उपरान्त पाया कि होरेस को दी गई पूर्व सूचना सही थी। आगे रेल की पटरियाँ उखड़ी हुई थी। ऐसे ही एक अन्य अवसर पर सामने से आ रही गाड़ी की जिसकी कि टकरा जाने की सुनिश्चित सम्भावना थी मीलों पूर्व इसी प्रकार उन्हें सूचना मिल गई थीं इस अवसर पर होरेस ने अपनी गाड़ी को रोका और फिर पीछे की ओर चलाना आरम्भ कर दिया। सामने से आ रही ट्रेन उनके रेल इंजन से टकराई तो सही पर दोनों की एक ही दिशा होने से कोई विशेष क्षति नहीं हुई। इसे वे सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा द्वारा दिया गया संदेश मानते थे। हालीवुड के सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक केनी किंग किंग्स्टन ने अनेक मृतात्माओं से संपर्क बनाया है, उनका कहना है कि मृतात्माएँ जीवितों की सहायता ही करती देखी जाती है किंग्स्टन का कहना है कि फ्लिपतन वेव नामक एक व्यक्ति की आत्मा उन्हें समय समय पर सहायता देती रहती है। एक बार विश्वविख्यात धनकुबेर हयूजेस परिवार वालों को कोई सूचना दिये बिना ही घर से कही चले गये ढूंढ़ खोज करने पर जब उनका कही कोई पता नहीं चला तो धर वालो ने किंग्स्टन महाशय की सहायता ली। तब वेव की आत्मा ने उन्हें बताया था कि - “हयूजेस एक गोपनीय व्यापारिक दौर पर है और लाँस वेगास होटल की नीव मंजिल के एक फ्लेट में ठहरे हुए है।

सम्राट एडवर्ड सप्तम की पत्नि महारानी एलेक्जेन्डा पितरों से संपर्क में आस्था रखती थी। एक दिन एक पितर आत्मा ने उन्हें सूचित किया कि उनके पति अब कुछ ही दिनों में मेहमान है, अब वे अपने जन्म स्थान कोवे में प्राण त्याग देंगे। महारानी कोवे पहुँची तो पाया कि उनके पतिदेव पलंग पर मूर्च्छित पड़े थे हिलाने डुलाने पर उनने क्षण भर के लिए आंखें खोली और फिर सदा के लिए सो गए। इसी तरह की एक घटना इंग्लैंड में घटित हुई जिसमें पितरों द्वारा मृत्युशय्या पर पड़ी एक महिला की जानकारी उसकी लड़की को दी गई।”फैन्टास्म ऑफ लिविंग” पुस्तक में इस घटना का वर्णन करते हुए लेखक ने बताया है कि एक दस वर्षीय बालिका अपने पिता के साथ सड़क पर टहल रही थी कि अचानक उसके सम्मुख एक छाया प्रकट हुई उसकी माँ के अस्वस्थ होने का समाचार सुनाया। इस अप्रत्याशित घटना से वह लड़की भयभीत हो गई और उसने अपने पिता को घर वापस लौट चलने के लिए बाध्य किया। जैसे ही वे घर पहुँचे तो देखा कि उनकी पत्नि दिल का दौरा पड़ने से मूर्च्छावस्था में पड़ी जीवन की अन्तिम सांसें गिन रही है। शीघ्र ही चिकित्सक को बुलाया गया जिससे महिला की प्राण रक्षा हुई।कैलीफोर्निया में एक पुलिस अधिकारी को एक छाया पुरुष दिखा, जिसने बताया कि वहाँ स्ट्रीम लाइनर से एक ट्रक टकरा गया है जिससे ट्रक ड्राइवर की मृत्यु हो गई है। पुलिस अधिकारी ने एवेन्यू पहुँचने पर ऐसा कोई भी दृश्य नहीं दिखाई दिया। अतः वह वापस होने लगा। कुछ ही कदम पीछे मुड़े होगे कि एक ट्रक सामने से तीव्रगति से आया और स्ट्रीम लाइनर से टकराकर चकनाचूर हो गया उसने समीप जाकर देखा कि मरने वाला ड्राइवर उसका घनिष्ठ मित्र है, जिसकी पूर्व सूचना उसे पहले ही अदृश्य आत्मा द्वारा मिल चुकी थी।

प्रेतात्माओं से संपर्क साधने एवं उनके द्वारा मृत्यु की पूर्व घोषणा करने का विवरण रखने वालों में 17 वीं शताब्दी के जॉन ओब्रे नामक एक अंग्रेज को बहुत प्रामाणिक माना जाता है। उनके अनुसार एक अंग्रेज को बहुत प्रामाणिक माना जाता है। उनके अनुसार मृत मार्टिन लूथर की आत्मा द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ अक्षरशः सत्य घटित हुई है। मृत्यु के पश्चात भी लूथर की सदाशयी आत्मा समय समय पर लोगों की सत्परामर्श दिया करती थी। महान कवि विलियम ब्लैक भी मृतात्माओं से अपने संपर्क के लिए विख्यात थे। रात्रि के एकान्त में माईकेल एंजिलों मोजेज, क्लियोपेट्रा जैसी कितनी ही स्वर्गीय आत्माओं से वे घण्टों वार्तालाप एवं विचार विमर्श किया करते थे।

प्रेत-पितर न केवल उपयोगी जानकारियाँ प्रदान करते हैं, वरन् माध्यम की सहायता से रोगियों को स्वस्थ करते हुए भी देखे जाते हैं। मेरी काडिंगटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “इन सर्च आफ दि हीलिंग पावर” में इस तरह के

कई उदाहरण प्रस्तुत किये हैं अफ्रीका के कई व्यक्ति इन्हीं अशरीरी आत्माओं की सहायता से लोगों की टूटी हुई हड्डियों जोड़ देते हैं। इसी तरह “द वर्ल्ड ऑफ पैराडाइज” पुस्तक में लेखक ने हवाई दीप में रहने वाली जन जातियों के बारे में लिखा है कि ये लोग कुछ सदाशयी मृत आत्माओं का प्रसन्न कर लेते हैं और उनसे रोगियों को स्वस्थ करने का काम लेते हैं। सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं में कुछ ही ऐसी होती है जो अपनी दुष्प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर लोगों को डराती और हैरान करती है। किन्तु अधिकांश मृतात्माएँ ऐसी होती है जो अपनी जानकारी से लोगों को खतरों से सावधान करती एवं अपनी क्षमता के अनुरूप सहायता प्रदान करती रहती है। उनसे भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं। अपितु उनसे सम्बन्ध स्थापित कर लाभान्वित होना चाहिए।


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प्रसन्नता अन्तःकरण की परिपक्वता का चिन्ह है, खिन्नता बिगड़े बच्चों की मचलने जैसे बुरी आदत।


सिंहासन बतीसी

भारतीय कथा साहित्य बहूमूल्य मणिमुक्तकों से भरा पड़ा है। मात्र मनोरंजन के लिए ही उनका सृजन नहीं किया गया। कथाओं के मूल में जीवन कला के महत्वपूर्ण सूत्र छिपे रहते थे, ताकि जन साधारण बोधगम्य भाषा से इन्हें सुन-समझकर तदनुसार अपनी जीवनचर्या बना सके। फैटेसी या कल्पना लोक की दुनिया में जाने वाला चित्रण करने वाले बहुधा इस तथ्य को भूल जाते हैं। स्वयं भी उस मृगमरीचिका में उलझ जाते हैं कथा वांग्मय में से एक कथा शृंखला सिंहासन बतीसी की भी है।

कुछ किशोर गड़रियों जंगल में भेड़ें चरा रहे थे। वहाँ घास तो बहुत थी, पर कही-कही पुराने टीले खण्डहर भी थे कौतूहल में लड़के उन टीलों पर चढ़ जाते और खेतले मस्ती करते।

इन टीलों में से एक बड़ा विचित्र था। उस पर जो कोई बैठ जाता वह विद्वानों जैसी बाते कहने लगता। साथी आश्चर्य करते कि अशिक्षित होते हुए भी ऐसी वार्ता किस प्रकार सम्भव होती है। सभी लड़के बारी बारी बैठते। जो बैठता वही विद्वान की भूमिका निभाने लगता।

टीले में कोई विशेषता होनी चाहिए। यह प्रसंग राजा भोज तक पहुँचा। उन्हें स्वयं आश्चर्य हुआ। दरबारियों को साथ लेकर वे वहाँ पहुंचे। उन लोगों ने भी बैठकर देखा तो जो सुना था वह बहुत सही निकला। जो भी दरबारी वहाँ बैठता वही असाधारण विद्वता से सम्पन्न हो जाता।

टीले की खुदाई कराई गई। उसमें एक भव्य स्वर्ण सिंहासन निकला। पायों की आकृति अप्सराओं जैसी थी। सभी ने विचार किया इस बहुमूल्य सिंहासन की मरम्मत कराई जाय और उसे राजा भोज के लिए बैठने का सिंहासन बनाया जाए। ऐसा ही किया भी गया। अभिषेक की तिथि निश्चित की गई। उस दिन सम्भ्रान्त नागरिकों को बुलाया गया और उत्सव कराया गया। जैसे ही राजा ने एक पैर सिंहासन पर रखा वैसे ही पायों में लगी अप्सरा की आकृति वाली एक पुतली मनुष्य की तरह बोलने लगी। उसने कहा यह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का है। उनके जैसे गुण हो तो ही इस पर बैठना। उतनी पात्रता ने होने पर बैठने का प्रयास करने में अनर्थ होगा।

राजा ने पूछा विक्रमादित्य में क्या क्या गुण थे। पुतली ने घटनाक्रम समेत एक विशेषता का वर्णन किया। राजा ने अपने को उस योग्य नहीं देखा और अभिषेक स्थगित कर दिया गया। दूसरे दिन भोज ने वही साहस फिर किया आज दूसरी पुतली बोलने लगी और विक्रमादित्य का दूसरा गुण बताया और वह विशेषता होने पर ही मंच बैठने की बात कही। इसी प्रकार बत्तीस दिन तक वही क्रम चलता रहा। नित्य एक पुतली विक्रमादित्य की एक विशेषता बताती। भोज आत्म निरीक्षण करते तो उस प्रकार के गुण अपने में न पाते।


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उपासना का अर्थ है, देवत्व के समीप बैठना अथवा अपनी जगह पर देवता को घसीट लाना। दोनों का साराँश है सद्गुणों से अपने को ओत प्रोत कर लेना।

बत्तीस घटनाक्रम सुनाये। जब देखा कि भोज अपने का सब उदाहरणों से पिछड़ा हुआ पा रहे है, तो सिंहासन बत्तीसी की कथा के अनुसार पुतलियां सिंहासन को लेकर आकाश में उड़ गई।

कथा अभिप्राय यह है कि पात्रता होने पर ही महत्वपूर्ण पद ग्रहण करने का साहस करना चाहिए, अन्यथा उससे अनर्थ होने की आशंका है। हर किसी को बहूमूल्य उपलब्धियां इसी कारण नहीं मिलती। उपार्जित योग्यता ही इसकी कसौटी है।


गायत्री के शक्तिशाली बीजाक्षर

गायत्री महाशक्ति को महाराज कहा गया है इससे बढ़कर समूचे मंत्र विज्ञान में कोई ऐसा मंत्र नहीं है जिसे मुकुटमणि की उपमा दी जा सके। उसका प्रादुर्भाव परब्रह्म द्वारा निसृत आकाशवाणी से हुआ है। ब्रह्माजी जो उसके तप से वह सामर्थ्य पाई जिससे वे जड़ चेतना सृष्टि का सृजन कर सके। भौतिक प्रयोजनों से उसे सावित्री और अध्यात्म प्रगति के संदर्भ में गायत्री कहा जाता है। एक ही तत्व के यह दोनों पक्ष है। उपयोग भेद में ही उसके दो नाम पड़े है। सावित्री के कल्पना चित्रों में उसके पाँच मुख बनाये जाते हैं। यह प्रकृति के पाँच तत्व और चेतना की पाँच प्राण धाराओं का साँकेतिक उल्लेख है।

गायत्री के 24 अक्षर है। पर उसके साथ ही प्रणव और तीन व्याहृतियाँ लगी हुई है। प्रणव-ओंकार-प्रत्येक वेदमंत्र से पूर्व लगाये जाने की सनातन परम्परा है। तीन चरण वाली गायत्री का एक एक बीज तीन व्याहृतियों के रूप में संजोया गया है। ईश्वर - जीव, प्रकृति, सत्-चित-आनन्द ब्रह्मा-विष्णु-महेश, स्वर्ग भूलोक एवं पाताल लोक सत रज तम आदि का तत्वदर्शन इन व्याहृतियों से समाविष्ट है। यदि इनकी व्याख्या की जाय तो समूचा अध्यात्म दर्शन इन तीन व्याहृतियों की व्याख्या में ही निरूपित हो जाता है जिन तीन चरण से दानी बलि का समूचा साम्राज्य नाप लिया था, उन तीन को त्रिविध गायत्री के साथ जोड़ा जा सकता है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का स्वरूप भी इस व्याहृति विवेचना के आधार पर समझा जा सकता है।

समस्त देवता गायत्री की उपासना करते थे। ऋषियों का भी वही अवलम्बन रहा। मनुष्यों में शिखा और यज्ञोपवीत के रूप में गायत्री को अपनी काया तथा बुद्धि में समाविष्ट होने की भावना रखना और उसकी यथासम्भव नित्य नियमित उपासना करने का विधान है। इसमें सद्बुद्धि के लिए मात्र प्रार्थना ही नहीं है वरन् यह तथ्य है कि इस उपासना में बुद्धि में तीव्रता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिये किया जाये। देवता श्रेष्ठ के लिए और दैत्य निष्कृष्ट के लिए भी बुद्धि की प्रतिभा का प्रयोग करते रहे है।

जिस प्रकार पुष्प में रूप भी होता है गंध भी रस भी पराग भी। उसी प्रकार गायत्री के प्रत्येक अक्षर में अनेकानेक प्रकार की विशेषताएँ भरी हुई है। मस्तिष्क देखने में एक है। पर उसके भीतर अगणित क्षमताओं के स्थान और कोश है। उनमें से कुछ ही अभ्यास में आने पर जागृत रहते हैं। शेष निरर्थक पड़े रहने के कारण मूर्छित या प्रसुप्त स्थिति में चले जाते हैं। ठीक इसी प्रकार गायत्री का प्रत्येक अक्षर अपने अपने परिकर में परिपूर्ण है। परमाणु प्रत्यक्ष एक होता है, पर उसके तनिक से अन्तराल में इलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्यूट्रोन, पाजिट्रान आदि अनेक घटक अपनी अपनी कक्षाओँ में बिना टकराये परिभ्रमण करते रहते हैं। सौर मण्डल के समस्त नियम, उपनियमों का उस छोटी सी परिधि में अपनी तन्दूप सता के रूप में विवरण वह देखा जा सकता है। इस संदर्भ में यथासम्भव जानकारी ब्रह्माजी ने अपने चार मुखों से चार वेदों का सृजन करते हुए भी है। उस जानकारी से मनीषियों के अवगत कराया है। उस कथन को और भी अधिक सुबोध बनाने के लिए ऋषियों ने उपनिषद् ब्राह्मण, आरण्यक, सूत्र आदि में अधिक खुलासा करने का प्रयत्न किया है। पुराणकारों ने उन्हीं तथ्यों को अलंकार से जोड़ते हुए कथा उपाख्यानों के रूप में गढ़ दिया है। इस प्रकार समूचे अध्यात्म, वाङ्मय पर गायत्री का ही आलोक छाया हुआ देखा जा सकता है।

गायत्री के 24 अक्षर है। उनमें से प्रत्येक में अनेकानेक रहस्य भरी विभूतियों के भाण्डागार भरे पड़े है। अवतार 24 हुए हैं देवताओं में प्रमुख 24 है। देवियाँ भी महाशक्ति के रूप में 24 ही गिनाई जाती है। ऋषियों में 24 की प्रमुखता है। यह आध्यात्मिक प्रकरण हुआ। इसे देव पक्ष भी कह सकते हैं। संख्या में 24 होने के कारण इन सब को गायत्री की चूड़ामणि का ही एक एक मणि मुक्तक कह सकते हैं। तंत्र पक्ष बीजाक्षरों से आरम्भ होता है उससे शक्ति विशेष का उद्भव होता है और उसके प्रतिफल आध्यात्मिक ऋद्धि और भौतिक सिद्धियों के रूप में परिलक्षित होते है। इस पक्ष का भी प्रत्येक घटक 24 की संख्या में ही है। इससे प्रकट है कि तंत्र परिकर का विज्ञान ओर विधान भी गायत्री का ही स्वरूप विस्तार है। तंत्र में यों शाबर मंत्रों का भी हल्का फुलका प्रयोग होता है, परन्तु मूलतः वह है गायत्री विज्ञान का विस्तार ही। जब उस क्षेत्र की गहराई में प्रवेश करना पड़ता है तो सुदृढ़ और सुनिश्चित अवलम्बन के रूप में गायत्री ही दृष्टिगोचर होती है। देवी देवता आदि के सम्बन्ध में किसी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है वे ईश्वर से पृथक या प्रतिद्वंद्वी नहीं उनकी अलग सता भी नहीं है। परब्रह्म इस विश्व ब्रह्माण्ड की अनेकानेक गतिविधियों का सूत्र संचालन करता है। वे कार्य जिस रूप में क्रियान्वित होते हैं, तब उनको देखत हुए पृथक नाम दे दिया जाता है। जिस प्रकार एक ही व्यक्ति वकील, चिकित्सक, गायक, लेखक व्यवसायी हो सकता है, उसी प्रकार भगवान को अनेक कार्य करते हुए देखकर समयानुसार अनेक अलग अलग सम्बोधन प्रयुक्त किये जा सकते हैं। वकालत करते समय वकील साहब और कुश्ती लड़ते समय पहलवान जी कहा जा सकता है। वही बात ईश्वर की देव संज्ञाओं के सम्बन्ध में भी है।

परिस्थितियों मनुष्य बिगाड़ तो आसानी से लेता है, पर उन्हें सम्भालना नहीं बन पड़ता। ऐसे आड़े समय में भगवान अवतार लेते हैं। कोई तूफानी आन्दोलन खड़ा करते हैं। उसके प्रवाह में कितने ही पुराने पेड़ उखड़ जाते हैं। कितने ही तिनके और पते आसमान चूमने लगते हैं। चक्रवात बनते और कौतूहल भरी घटनाएं, परिस्थितियाँ प्रस्तुत करते हैं। यह अवतार सता का स्वरूप हुआ। ब्रह्म एक जगह एकत्रित नहीं हो सकता। यदि उसकी समग्रता एक स्थान पर एकत्रित हो जावे ता फिर अन्यत्र जो कुछ हो रहा है, वह किस प्रकार हो सकेगा, योगी, तपस्वियों और प्रतिभावान मनीषियों में उसका आवेश ही अधिक मात्रा में भर जाता है। उनके माध्यम से विचित्र क्रिया कलापों की शृंखला चल पड़ती है। दृश्यमान अवतार उसकी को समझा जाता है। भारतीय मान्यता के अनुसार अब तक 24 अवतार हुए है। इनमें से प्रत्येक गायत्री के एक एक अक्षर के फलित होने के रूप में समझा जा सकता है।

देवताओं और देवियों के युग्म को इसी प्रकार समझा जाता है जैसे समुद्री ज्वार भाटा एवं नदी की लहरे। जल का एक भाग ऊँचा उठने पर दूसरा नीचा रह जाता है। इन दोनों के आधार पर ही प्रवाह में गतिशीलता दृष्टिगोचर होती है। बिजली में ऋण और धन दो वर्ग साथ साथ चलते हैं। देवी और देवता परस्पर अति निकट है। एक दूसरे के साथ शक्ति का आदान प्रदान चलते रहे है। प्रकृति की इसी विविध विलक्षणता को देवी देवताओं के नाम से पुकारा जा सकता है। इन दोनों वर्गों में 24-24 की प्रधानता है। उतने ही गायत्री के अक्षर भी है।

योगी तपस्वी तो साधारण शरीरधारी होते हैं और समयानुसार जन्मते मरते रहते हैं, किन्तु ऋषि जरा-मरण के बन्धनों से मुक्त होकर अपनी सूक्ष्म सता यथावत् बनाये रहते हैं। प्रत्यक्ष दीखते नहीं तो भी इतना कर्त्तृत्व सम्पन्न करते हैं, जितने अनेकों स्थूल शरीर मिलकर भी नहीं कर सकते वे अदृश्य जगत पर छाये रहते हैं और ऐसी सम्भावनाएँ परिस्थितियों विनिर्मित करते हैं और ऐसी सम्भावनाएँ, परिस्थितियाँ विनिर्मित करते रहते हैं, जिन्हें समर्थ देह धारियों के अनेक शरीर मिलकर भी नहीं कर सकते। सप्त ऋषियों के शरीरों को मरे युगों बीत गये पर उनके शक्ति केन्द्र अभी भी रात्रि के समय आकाश में चमकते हैं। इतना ही नहीं वे व्यक्ति को उठाने और समाज के वातावरण के बदलने का भी परोक्ष माहौल बनाते रहते हैं। इन ऋषिगणों की सता भी सूक्ष्म शरीरधारी देव मानवों में गिनी जाती है। ऋषियों में से कितने ही किन्हीं सामान्य लोगों की व्यवस्था सम्भालने भेजे गये होगे पर पृथ्वी पर इन दिनों जिनका प्रभाव और दायित्व है उनकी संख्या 24 में गिनी गई है। गायत्री के ऋषि गुच्छक 24 - 24 के ही है। उन्हें अदृश्य आदि मानव भी कह सकते हैं। जीवन मुक्त भी और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर्ता भी। यह भी गायत्री के 24 अक्षर ही है। ब्राह्मी क्षेत्र के चार ही घटक है। अवतार, देवता देवियाँ और ऋषि। भौतिक पक्ष प्रत्यक्ष भी है और पुरुषार्थ परायण भी। इन्हें दूसरे शब्दों में सामर्थ्य के धनी शक्तिपुंज या दैत्य कह सकते हैं। दैत्य का अर्थ है “जाइण्ट “। विशाल सशक्त। दैत्यों में से सभी बुरे नहीं होते। बलि, विभीषण, प्रहलाद आदि दैत्य कुल में ही उत्पन्न हुए थे। दैत्य वर्ग की साधना के भी चार चरण है बीजाक्षर, शक्ति संचय की तप साधना, भौतिक क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियां तथा अंतिम है ऋद्धियां।

बीजाक्षरों में स्वरों के साथ अनुस्वार जोड़ देने से वह मकारान्त हो जाता है जैस क ख ग, घ, को बीज मंत्र के रूप में प्रयुक्त करना हो तो उन्हें क, ख, ग, घ इस रूप में कहा जायेगा। एक बार में एक ही अक्षर प्रयुक्त होगा। उन्हें, नकारान्त मकारान्त बोला जायेगा। अक्षरों का समन्वय न करने, समुच्चय गुच्छक न बनने से एकाकी रहने पर वह बीज मंत्र बन जाता है उसका उच्चारण इस प्रकार होता है कि मुख जिव्हा आदि में हलचल तो होती रहे पर उच्चारण दूसरों को सुनाई न पड़े इस प्रकार के उच्चारण की प्रतिक्रिया समस्त जीवकोशों में एक विशेष प्रकार का कम्पन प्रवाह उत्पन्न करती है। यह कम्पन एक विशेष प्रकार का कम्पन प्रवाह उत्पन्न करती है। यह कम्पन एक विशेष प्रकार की ऊर्जा का सृजन करता है। जिसके आधार पर अपने तथा दूसरों के अनेकानेक कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं।

“शक्ति” शब्द का संक्षिप्त उल्लेख करने का समग्र तात्पर्य है-शक्ति संचय और आत्मशक्ति संचय के दो ही संयम साधना की भट्टी में तपा कर खरे सोने की तरह बनाया जाता है। योग में ब्रह्मांडीय चेतना की अजस्रता के साथ अपने आप कार्य करने लगते हैं, सामर्थ्य से भर जाते हैं। टंकी के साथ जुड़े जाने पर नल में तब तक पानी बहता रहता है जब तक टंकी खाली नहीं हो जाती। ब्रह्मचेतना, शिव चेतना आत्मिक और भौतिक शक्तियों का भंडारण निवास है। योग द्वारा उसी के साथ जुड़ा जाता है। तप के द्वारा धातु को गलाया जाता है और योग के द्वारा उसे उपयुक्त ढाँचे में ढाला जाता है। दक्षिणमार्गी और वाममार्गी साधक अपने अपने ढंग से अपना अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए यह योग तप की समन्वित शक्ति साधनाएँ करते हैं। दोनों पक्षों के लिए 24-24 साधना निर्धारित है। उन्हें गायत्री हिमगिरि में से निःसृत गंगा यमुना के रूप में समझा जा सकता है।


कठोर नही उदार बनो (Kahani)

एक चीनी सन्त बहुत बूढ़े हो गए। मरने का समय निकट आया तो उनके सभी शिष्य उपदेश सुनने और अन्तिम प्रणाम करने एकत्रित हुए।

उपदेश न देकर उनने अपना मुँह खोला और शिष्यों से पूछ-देखो इसमें दाँत है क्या? शिष्यों ने उत्तर दिया- एक भी नहीं।

दूसरी बार उनने फिर मुँह खोला और पूछा - देखो इसमें जीभ है क्या? सभी शिष्यों ने एक स्वर में उत्तर दिया हाँ- है - है।

सन्त ने फिर पूछा - अच्छा एक बात बताओ। जीभ जन्म से थी और मृत्यु तक रहेगी और दाँत पीछे उपजे और पहले चले गए। इसका क्या कारण है?

इस प्रश्न का उत्तर किसी से भी न बन पड़ा।

सन्त ने कहा जीभ कोमल होती है इसलिए टिकी रही। दाँत कठोर थे इसलिए उखड़ गए।

मेरा एक ही उपदेश है- दांतों की तरह कठोर मत होना - जीभ की तरह मुलायम रहना। यह कह कर उनने अपनी आंखें मूँद ली।


वयं राष्ट्रे जागृयामः पुरोहिताः

साँचा हाथ में हो तो उसके आधार पर धातुओं के पुर्जे या मिट्टी, मोम आदि के खिलौने ढाले जा सकते हैं। इस साँचे को ही लक्ष्य कहते हैं। लक्ष्य निश्चित होने पर दिशा निर्धारण होता है और उसे दृढ़तापूर्वक अपनाये रहने पर मनुष्य अभीष्ट स्थिति तक पहुँचता है, हमारा लक्ष्य महानता होना चाहिए। महामानवों की मनःस्थिति कार्य पद्धति और उदार साहसिकता का किस प्रकार प्रयोग हुआ यह गंभीरतापूर्वक परखना चाहिए।

परिस्थितियाँ बदलती रहती है और उनके अनुरूप वष्ठों को अपनी गतिविधियों का निर्धारण करना पड़ता है। इस प्रकार क्रिया कलाप तो बदल जाते हैं, किन्तु आदर्श यथावत रहते हैं, उद्देश्यों में अन्तर नहीं आता। क्रिया-पद्धति समय के अनुरूप बदलती रहती है।

प्रज्ञा पुराण के खण्डों में यह विवरण प्रस्तुत किया गया है कि अपने व्यक्तित्व को महान और समय की समस्याओं का समाधान करने के लिए क्या किया? दूसरे लोगों ने दूसरी परिस्थिति में अपनी रीति-नीति को किस प्रकार बदला। महामानवों को अपने चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की आदर्शवादिता और व्यवहार की परमार्थ परायणता का समावेश करना पड़ता है। अन्न, जल और वायु बिना जिस प्रकार जीवन संभव नहीं उसी प्रकार इन तीनों के बिना महानता सधती नहीं और जिसे महानता का अवलम्बन न मिले उसे आत्म संतोष, लोक सम्मान और देवी अनुग्रह की प्राप्ति नहीं होती। इसलिए उपरोक्त त्रिविध समन्वय को आधार मान कर चलना चाहिए। उत्कर्ष की आकांशा सभी को होती है। साँसारिक वैभव कमाने वालों को जिस प्रकार कृषि व्यापार आदि उद्योग अपनाने होते हैं, उसी प्रकार आत्मोत्कर्ष के लिए उस प्रक्रिया को जीवन में धारण करना पड़ता है जिसे हर दृष्टि से सही पाया जा सके। जो एकाकी न हो। एकाँगी प्रचलन भी इन दिनों विस्तारपूर्वक चल पड़े है। मात्र उपासना अपनाकर लोग परम लक्ष्य की प्राप्ति होना सोचते हैं, पर यह नितांत भ्रम हैं। ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है और न मनुष्यों जैसी दुर्बलताओं से वह सना है कि जो उसकी दुहाई दे, दण्ड प्रणाम करे, भेंट उपहार प्रस्तुत करे, उसके लिए अपना मन पक्षपातपूर्ण बनाने और याचना के अनुरूप देने के लिए चल पड़े।

ईश्वर सर्वव्यापी सता है कर्म का फल उसका सुनिश्चित विधान है। यदि उसमें राग द्वेष का आरोपण किया जाय तो भी उसका कर्म के आधार पर निर्धारण होता है। प्रार्थना याचना नहीं है और न भक्त भिखारी और न ईश्वर दानी सेठ होता है। यह विडम्बनाएँ यदि ईश्वर के दरबार में भी चल पड़े तो उसमें और साधारण मनुष्य में क्या अन्तर रह जायेगा। फिर उसे भी लोकचारग्रस्त विवेक हीन कहा जायेगा? ईश्वर सामन्तों की तरह अपनी प्रशंसा सुनने के लिए चारणों को प्रोत्साहित नहीं करता और न निंदकों पर उसका कोप बरसाता है। यदि ऐसा होता तो इन ना अपने को स्पष्ट नास्तिक घोषित करने वाले आधे जन समुदाय पर उसका क्रोध नहीं बरसता? उसकी प्रगति क्रम में कोई बाधक नहीं होता। ता यह कैसे माना जाय कि वह प्रशंसा पूजा करने वालों का निहाल कर देगा।

पिछले दो महायुद्ध ईसाई राष्ट्रों के बीच ही हुए है। दोनों पक्ष गिरजों में अपने पक्ष की विजय के लिए प्रार्थना करते थे। ऐसी दशा में उसने इन प्रार्थनाओं का ही मापदण्ड माना होता तो जिस पर अनुग्रह दिखाना होता उसे निहाल कर दिया होता। जापानी भी अधिकांश ईसाई ही थे और अमेरिका वाले भी। पर भक्तों ने भक्तों पर आक्रमण किया और ईश्वर मूक दर्शक बना रहा। भारत के देवालय और मठों, महन्तों की, मध्य एशिया के आक्रमणकारियों ने कितने लम्बे समय तक कितनी दुर्गति की, यह किसी से छिपा नहीं है। अभी मुस्लिम देशों में जमकर लड़ाइयां चल रही है और दोनों पक्ष जीतने के लिए इबादत करते हैं। विचारणीय है कि हम में से यदि कोई ईश्वर रहा होता तो उसे इन जंजालों से पीछा कैसे छुड़ाना पड़ता।

ईश्वर भक्ति का उद्देश्य इतना ही है कि हम सर्वव्यापी सता का अस्तित्व मान, उसके नियम, विधान को समझे और इस तरह जिएँ जैसे कि ईश्वर के ज्येष्ठ पुत्र को शानदार जीवन जीना चाहिए। उसके विश्व उद्यान को ईमानदारी माली की तरह सुरम्य बनाने के परमार्थ, प्रयत्नों में लगे रहना चाहिए। मात्र माला जपने या नाम रटने, ध्यान लगाने से जीवन लक्ष्य की पूर्ति हो सकेगी यह सोचना व्यर्थ है। जो लोग उस तप मात्र में स्वर्ग मुक्ति के सपने दिखाते हैं वै यथार्थता से दूर है। नाम जपने में दर्ज, नहीं पर उसे खुशामद या याचना स्तर पर नहीं, अपने कर्त्तव्यों का स्मरण रखने के लिए नियामक सत्ता बोध रखने के रूप में ही करना चाहिए।

गीता में भगवान ने आदि से अन्त तक कर्म का उपदेश दिया है ओर भक्ति का प्रतीक भी सत्कर्म को ही बताया है। अपनी निज की नाम रटन का जो दबाव डाले या अपेक्षा करे उसे हेय स्तर का ही कहा जायेगा। भले ही वह भगवान ही क्यों न हो?

उपासना का मर्म अधिक अच्छी तरह समझना हो तो वेदान्त दर्शन की विचारणा का मनन, चिन्तन करना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि मनुष्य को परमात्मा में आत्म सता को समर्पित करके अपनी स्थिति अद्वैतवत् बनानी चाहिए। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में से दोष दुर्गुणों का पूरी तरह निष्कासन करना चाहिएं परमेश्वर श्रेष्ठताओं का समुच्चय है। हमें वैसा ही बनना चाहिए। भीतर से भी और बाहर से भी।

उपासना तभी बन पड़ती है जब उसके साथ जीवन साधना जुड़ी हुई हो। सुखा ईंधन ही प्रज्वलित होता है, अन्यथा गीलापन रहने से धुँआ ही आता रहता है। जीवन साधना के लिए उपासना का आश्रय लिया जाय या उपासना को सही तरीके से कर सकने के लिए जीवन क्रम में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समन्वय किया जाये। ईश्वर भजन से पाप नाश होते हैं। इसका तात्पर्य इतना ही है कि ईश्वर की सता को दृष्टि से रखने वाला दुष्कर्म नहीं कर सकता। यह नहीं है कि जीभ से नाम रटंत चलती रहे और क्रिया पद्धति में छल, पाखण्ड अहंकार एवं अनाचार भरा रहे। पवित्रता और प्रखरता का अभ्यास, अनुशासन अपने में भरे लेने का अर्थ ही ईश्वर भक्ति है। भक्त न स्वार्थी हो सकता है न अनाचारी। जिस पर अधिकार और प्रकार साथ साथ नहीं रह सकते उसी प्रकार ईश्वर भक्ति और संकीर्ण स्वार्थपरता को दुर्बुद्धि और दुष्कर्मों का यह अस्तित्व सम्भव नहीं।

ईश्वर का दृश्य रूप विराट विश्व है। अदृश्य रूप अनुशासन। आत्मानुशासन का तात्पर्य है। अदृश्य रूप अनुशासन। आत्मानुशासन का तात्पर्य है - चिन्तन और कार्य के घिनौनेपन का समावेश होने दो। आत्माओं के समूह का ही परमात्मा-कहते हैं। भजन का अर्थ-सेवा है। पूजा अर्चा भी सेवा को ही कहते हैं और आराधना भी वही है समष्टि की सेवा में संलग्न रहना ही ईश्वर भक्ति का परमात्मा की आराधन का वास्तविक स्वरूप है। यहाँ यह और भी समझ लेना चाहिए कि सुख साधन की वृद्धि ही वैभव, को अनाचार से भी कमाया जा सकता है और उससे कुटुम्बियों मित्रों के सुख साधन भी बढ़ाये जा सकते हैं। यह सेवा कहां हुई? जो 60 लाख के करीब हट्टे-कट्टे निठल्लों का निर्वाह भार वहन करते हैं वे उनकी सेवा कहाँ करते हैं, वरन् उन्हें ऋण भार से दबाने और भक्ति का पाखण्ड रचने में सहायता भर करते हैं। मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना संसार में अनाचार को बढ़ाना है। वेश्या को धन देना, कसाई के व्यापार में साझीदार होना, प्रत्यक्ष उनकी सुख सम्पदा बढ़ाने के रूप में देखा जा सकता है। पर यह सेवा कहाँ हुई। इसके विपरीत भले ही कष्ट सहने पड़े पर लोकमंगल में, सत्प्रवृत्ति संवर्धन में, लगना या लगाना पुण्य परमार्थ है। गाँधी जी ने सत्याग्रहियों को, बुद्ध ने परिव्राजकों को जिस सेवा साधना में लगाया उससे उन्हें प्रत्यक्षतः कष्ट ही सहना पड़ा पर सत्प्रवृत्तियां विकसित मिलीं असंख्यों को प्रकाश एवं सन्मार्ग मिला। अतएव उन प्रयासों को परमार्थ ही माना गया। जो उसे परमार्थ मान कर सेवा, धर्म अपनाने में प्रवृत्त हुए उनका भी आत्मकल्याण ही हुआ। अत एवं सुविधा बढ़ाने के नहीं, सद्भावना एवं सद्मार्ग का अवलम्बन करने का जिसे अवसर मिला, वह हर दृष्टि से लाभ में ही रहा, यह माना जायेगा, क्योंकि उनका उद्देश्य लोकहित एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन था।

यह बात वहाँ नहीं बनती जहाँ अपने निजी स्वार्थ, मुक्ति सिद्धि आदि लाभों के लिए पारिवारिक एवं सामाजिक कर्तव्यों के लिए पारिवारिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का परित्याग किया जाता है। अपने देश में ऐसे लाखों व्यक्ति है जो सोचते हैं कि साँसारिक पारिवारिक कर्तव्यों का परित्याग करने में वैराग्य है वैराग्य रागद्वेष को छोड़ने में है। जहाँ कर्त्तव्यों से आँख चुराई जाय और भजन के बहाने आलस्य प्रमाद में समय लगाया जाय, वहाँ न भक्ति बन पड़ती है न पूजा आराधना। उसके लिए तो शबरी की तरह दिन भर लोक सेवा के कामों में निरत रहकर अवकाश के समय थोड़ा भगवन्नाम इस निमित्त लेना कही अच्छा, जिसमें भगवान से कर्म पक्ष से विचलित न होने वाले साहस की याचना की गई हो।

कभी अपने इस देश के साधु ब्राह्मणों का बाहुल्य था। ब्राह्मण, गृहस्थ रहकर विद्यालय चिकित्सालय, आदि स्थानीय क्षेत्रीय सेवा करते थे और साधु गृहस्थ का दायित्व अपने सिर पर न बाँध कर ब्रह्मचारी या वानप्रस्थों की तरह गिरों को उठाने और पिछड़ों को बढ़ाने के लिए प्रवृत्त रहते थे। बिना कठोर श्रम के उनका एक क्षण भी नहीं बीतता था। बिना कठोर श्रम के उनका एक क्षण भी नहीं बीतता था। जो करते थे उसमें संकीर्ण स्वार्थ जुड़ा हुआ नहीं बीतता था। जो करते थे उसमें संकीर्ण स्वार्थ जुड़ा हुआ नहीं होता था। समाजहित एवं सत्प्रयोजनों का परिपोषण ही उनके श्रम का लक्ष्य रहता था निज के लिए तो न शारीरिक श्रम का लक्ष्य रहता था। निज के लिए तो न शारीरिक सुविधाओं को तलाश करते थे न परलोक का स्वर्ग मुक्ति आदि का मनोरथ रहता था।

नत्वहं कामये राज्यं. न सौख्यं न पुनर्भवाम् कामये दुःख तप्तानाँ प्राणि नामार्त्ततनाशनम्।

गृहत्यागी तो कैदी भी होते हैं और उचक्के निठल्ले एवं आवेशग्रस्त भी। पारिवारिक उत्तर दायित्व हल्के रखे जायं यह दूसरी बात है ताकि परमार्थ प्रयोजन अधिक मात्रा में बन पड़े। किन्तु जो है उन्हें बिलखते छोड़कर जहाँ तहाँ जैसे तैसे समय गुजारना सर्वथा दूसरी बात।

जनता का सत्प्रयोजनों के लिए मनोबल बढ़ाये रहना उत्थान कार्यों में स्वयं लगना, और दूसरों को लगाये रहना, यह सन्तजनों का पुनीत कर्त्तव्य था। वह कार्य निष्ठा आज एक प्रकार से तिरोहित हो हो गई है। यही कारण है कि पतन पराभव की दुष्प्रवृत्तियां दिन-दिन बढ़ती जा रही हैं जिम्मेदारी जिनके कंधों पर थी वे प्रहरी जिस तिस बहाने जितना दोष पथ भ्रष्टों का है उतना ही उन मील के पत्थरों का भी है जिनने गलत दिशा और गलत फासला अपने ऊपर लिखकर पथिकों का भ्रमित किया है चोर की तरह वह प्रहरी भी दण्डनीय होते हैं, जिनने रखवाली का जिम्मा उठाकर, चैन से सोया और मौज में रात बिताई। पुरोहितों का उद्घोष है कि ‘वयं राष्ट्रे जागृयामः पुरोहिता अर्थात् हम पुरोहित राष्ट्र को जागृत और जीवन्त रखेंगे। यह आश्वासन देने के उपरान्त जो कर्तव्य से अपना मुख मोड़ लेते हैं ओर स्वर्ग सिद्धि के निजी लालच में चित्र विचित्र विडम्बना रचते हैं उन्हें क्षम्य नहीं कहा जा सकता। आज कर्तव्यनिष्ठा जन मानस के संरक्षकों की सब ओर से माँग है।


अन्धविश्वास और अहंकार (Kahani)

अन्धविश्वास और अहंकार ने मिलजुल कर ठान ठानी कि कुछ ही समय में सारे संसार की विचारशीलता को अपने कब्जे में कर लेंगे और एक छत्र राज्य करेंगे।

इच्छित गति से प्रगति न हो सकी ता वे पर्वत शिखर पर सोये एक शक्ति शाली देवता की साधना करने लगे। मनोरथ, जगाकर भर पूरा सहायता पाने और जल्दी सिद्धि पाने का था।

कठिन साधना से प्रभावित होकर देवता जागा। दोनों साधकों का मनोरथ पूछा। जानने पर वह खिलखिला कर हँस पड़ा। बोला- तुमसे पहचानने में भूल हुई। मेरा ना विवेक है। मेरे जग पड़ने पर तुम दोनों का अस्तित्व ही शेष न रहेगा।

सकपकाये साधकों ने कहा - पहला निवेदन यदि आपको रुचा नहीं तो कृपया फिर गहरी नींद में सो जाइये, ताकि हम देर सबेर से चक्रवर्ती बनने का मनोरथ अपने बलबूते पूरा कर सके।


धर्मतंत्र-अपनी क्षमता प्रत्यक्ष कर दिखाये

(गताँक से जारी)

राज तंत्र के उपरान्त जनजीवन में दूसरा स्थान धर्मतन्त्र का है राजतंत्र, सुरक्षा अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, संचार आदि के सुविधा साधन जुटाता है। भौतिक क्षेत्र की सुव्यवस्था प्रजाजनों के लिए उपलब्ध कराता है। धर्मतंत्र अनगढ़ चेतना को परिष्कृत करता और सुसंस्कारित बनाता है। नीति, न्याय, संयम, सदाचार, आस्था, भावना जैसे अन्तः चेतना से सम्बन्धित क्षेत्रों में शालीनता, सज्जनता की स्थापना धर्म तंत्र ही करता है। मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने की जिम्मेदारी उसकी की है। संयम बरतने और बचत को परमार्थ प्रयोजन में लगाने की शिक्षा, प्रेरणा उसी के तत्व दर्शन से उपलब्ध होती है। अन्तराल को परिष्कृत करना धर्म का काम है और भौतिक क्षेत्र की सुविधाएँ जुटाना, वैभव परक प्रगति का सरंजाम जुटाना राजतंत्र का। दोनों मिलकर ही एक दूसरे के पूरक बनते हैं। इस संयोग सुयोग से ही समग्रता बनती है। राजतंत्र को गतिशील, सुनियोजित रखने के लिए अनेकानेक प्रतिभाएँ विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत रहती है। टैक्सों के आधार पर जनता उसके लिए आवश्यक साधनों की व्यवस्था जुटाती है। धर्म तंत्र लोकश्रद्धा पर आधारित है। उसे धर्म सेवी, साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, दानशील मिल-जुल कर पोषण प्रदान करते हैं। दोनों का सुव्यवस्थित और सुसंचालित रहना आवश्यक है। गड़बड़ी इनमें से किसी भी क्षेत्र की सहन नहीं हो सकती।शासन अनीति अपनाये तो प्रजा को त्रास सहने पड़ेंगे, और अराजकता फैलेगी। धर्म धारणा में यदि गिरेगा। वे भ्रष्टाचार पर समावेश होगा तो व्यक्तित्वों का स्तर गिरेगा। वे भ्रष्टाचार पर उतरेंगे और मर्यादाओं, वर्जनाओं का उल्लंघन करते हुए मानवी गरिमा को पतन पराभव के गर्त में धकेलेंगे।

राजतंत्र को सम्भालने और उसमें प्रवेश पाने वाली अनुपयुक्तताओं को इंगित करने वाले राजनैतिक क्षेत्र में अनेक व्यक्ति रोकथाम करने और सुधारात्मक परामर्श देने के लिए तत्पर रहते हैं। इसलिये गड़बड़ियां एक सीमा तक ही चल पाती है संतुलन बनाये रहने के प्रयत्न चलते रहते हैं। फलतः बिगाड़ उस सीमा तक नहीं पहुँच पाता, जिसे गतिरोध कहा जा सके। किन्तु धर्मतंत्र को ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं है। धर्मध्वजी अपनी मनमर्जी चलाते रहते हैं। वे न सतयुगी मर्यादाओं का अवलोकन करते हैं न धर्म धुरीयों स्वार्थों के कुचक्र में फंसते हैं और जिस तिस प्रकार भावुक भक्तजनों को दिग्भ्रान्त करके अपना उल्लू सीधा करते हैं इस आधार को अपनाने पर धर्म क्षेत्र के मूर्धन्यों का उतना प्रभाव सर्वसाधारण के मन पर नहीं पड़ पाता कि उनके प्रतिपादनों प्रवचनों पर ध्यान दिया जा सके, उन्हें हृदयंगम किया जा कसे। दूसरी ओर साधारण धर्म प्रेमियों की भाव श्रद्धा धूमिल हो जाती है जिसके आधार पर उचित अनुचित का अन्तर कर सकना सम्भव हो सके। धूर्त्तता और मूर्खता का तालमेल सध जाने पर ऐसा कुछ चल पड़ता है जिसे धार्मिक क्षेत्र की विडम्बना ही कहा जा सकता है धर्म धारण नहीं। यही है वह दुर्भाग्य जो राजतंत्र की विकृतियों से भी अधिक मात्रा में धर्मतंत्र में घुस पड़ा है। उसी ने बिखराव उत्पन्न किया है। उसी कारण छोटे छोटे वर्ग समुदायों, मतान्तरों सम्प्रदायों से इस सशक्त क्षेत्र का विकेन्द्रीकरण हुआ है। इसका दुष्परिणाम सर्वसाधारण को भुगतना पड़ा है। सच्ची धर्मधारणा का अमृत दुर्लभ हो जाने से उसे अपनी प्यास ऐसे गंदे पानी से बुझानी पड़ रही है। जो समग्र आन्तरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से हितकर नहीं है।

लोगों को चित्र-विचित्र मान्यताओं और परम्पराओं के प्रति आग्रही देखा जाता है, पर यह सोचते नहीं बन पड़ता कि धर्म के मूलभूत प्रयोजनों को समझा और अपनाया जाय निजी जीवन में पवित्रता, प्रामाणिकता और प्रखरता के रूप में धर्म का परिचय मिलना चाहिए। सामूहिक जीवन में उसकी प्रतिक्रिया, सहकारिता, सामाजिकता, उदार, परमार्थ परायणता के रूप में सामने आनी चाहिए। इसी दिशाधारा में लोकचिंतन बह रहा है। आदर्शवादी क्रियाकलापों में उसकी प्रतिक्रिया जनजीवन में परिलक्षित हो रही हो तो समझना चाहिए कि धर्मतंत्र की विधा और प्रक्रिया अपने सही रूप में बनी हुई है। इस कसौटी पर धर्म क्षेत्र का काया कल्प किये जाने जैसी है।

सुधार उपक्रम विलगाव का केन्द्रीकरण होने की दिशा में होना चाहिए। निहित स्वार्थ के छोटे समुदाय को चंगुल में कसने की सुविधा में व्यवधान पड़ता दीख सकता है। वे विरोध पर उतारू होते और आड़े आते दीख पड़ सकते हैं। पर समग्र धर्म क्षेत्र की प्रतिष्ठा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए संगठित होने के प्रयत्न जारी रहने चाहिए। बिखराव में नष्ट होती रहने वाली शक्ति एक लक्ष्य और एक केन्द्र पर समवेत हो सके तो इसमें सब का सब प्रकार से कल्याण ही है। धर्मतंत्र अपनी उपयोगिता बनाये रह सकेगा और कन्धों पर ली हुई जिम्मेदारी पूरी हो सकेगी। धर्म प्रेमी लोगों का सर्व साधारण की इस नीति को अपनाने से कल्याण ही होगा। उन्हें भ्रान्तियों में भटकते तथा स्वार्थों का शिकार बनते रहने से छुटकारा मिलेगा।

सार्वभौम धर्म न बन सके, मानव धर्म की एक रस व्यवस्था न बन पड़े तो कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि एक प्रकृति के समुदाय एक केन्द्र पर एकत्रित हो। इस दृष्टि से हिन्दू धर्म का एक संगठित तंत्र तो बन ही सकता है। उसके ऐसे नियम प्रचलन तो बन ही सकते हैं जिन्हें उस समुदाय के लोग बिना मतभेद के सरलता पूर्वक स्वीकार कर सके। सभी धर्मों के सूत्र संचालक यदि इस प्रकार का प्रयत्न सच्चे मन से करे, विलगाव वादी मतभेदों को उठाकर एक कोने में रखे तो एक निष्ठा को विकसित होने में फिर कोई अड़चन शेष नहीं रह जाती।

रुचि के अनुकूल पूजा उपासना में, तत्व दर्शन में विभिन्नताओं को अपनाये रहने की भी छूट मिल सकती है। पर चरित्रनिष्ठा और समाज निष्ठा के परमार्थ वादी सिद्धांतों में तो एकरूपता रह सकती हैं प्रथा प्रचलनों को भी यथासम्भव एकता और समता के ढांचे में ढाला जा सकता है। भिन्नताएँ जितनी कम हो, उतना ही अच्छा।

धार्मिक तत्व ज्ञान के उच्चस्तरीय स्वरूप का अध्ययन करने के लिए ऐसे शोध संस्थानों को सुविधा होनी चाहिए जो भिन्नताओं के बीच पाई जाने वाली एकता को खोजकर उसे उजागर कर सके। सर्वसाधारण के लिए प्रस्तुत कर सके।

धर्म प्रचार के लिए प्रामाणिक प्रवक्ता तैयार किये जायं, जो इस विषय पर अधिकारपूर्ण लिख सके और प्रचार प्रवचन के क्षेत्र में उतर सके। स्थान स्थान पर ऐसे केन्द्र स्थापित कर सके तो अपने क्षेत्र में धर्म धारणा को जीवन्त एवं गतिशील बनाये रहने की जिम्मेदारी सँभाले। हर गाँव में एक प्रामाणिक धर्म केन्द्र होना चाहिए जो विचार देने के साथ साथ ऐसे सेवा कार्यों की भी व्यवस्था बनाये रहे जो जन साधारण की सहानुभूति आकर्षित करती हो। सभी ईसाई चर्चों में शिक्षा, चिकित्सा, पीड़ितों की सामयिक सहायता की व्यवस्था रहती है। अपने धर्म केन्द्रों में भी ऐसा कुछ रहना चाहिए। मात्र कथा प्रवचनों, सत्संगों कर्मकाण्डों तक ही सीमित न रहा जाये।

लोक मंगल के लिए धर्म धारणा को किन-किन क्षेत्रों में किस किस प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है। इसके लिए प्रान्तीय भाषाओं के क्षेत्रों में अलग अलग विश्व विद्यालयों की स्थापना हो सकती है। भाषायी कठिनाइयों के करण एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र के लोगों तक अपनी बात नहीं पहुँचा पाते। इस कठिनाई को दूर करने के लिए भाषायी क्षेत्रों के धर्म प्रशिक्षण विद्यापीठ अपनी कार्य विधि अपनी भाषाओं में भी सिखा सकती है। पर सभी की नीति एक हो। केन्द्रीय तंत्र से ही सभी को मार्ग दर्शन मिले। सभी एक शैली को अपनाएं।

दूसरा विकल्प यह भी हो सकता है कि एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय में विभिन्न भाषाओं के माध्यम से एक ही स्थान पर एक ही शैली में भाषायी माध्यम अपनाते हुए शिक्षा व्यवस्था चलती रहे। इस प्रकार एक ही स्थान से विभिन्न भाषायी क्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकर्ता उपलब्ध होते रहेंगे। धर्म तंत्र की प्रभाव क्षमता, व्यापकता, सम्पन्नता को देखते हुए उसे अनेकानेक लोकोपयोगी कार्यों का दायित्व सौंपा जा सकता है। उसे छोटी परिधि में सीमित नहीं रखा जा सकता। अभ्यर्थना, कथावार्ता एवं कर्मकाण्डों परम्पराओं का निर्वाह भर होता रहे, यह उचित न होगा। सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप जनकल्याण के कार्यों में उसकी क्षमता को नियोजित किया जा सकता है, किया जाना चाहिएं। शिक्षा सम्वर्धन स्वावलम्बन सत्प्रवृत्ति संवर्धन दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन जैसे क्रियाकलापों के अनेक स्वरूप हो सकते हैं और वे धर्मतंत्र के माध्यम से सुविस्तृत क्षेत्र में क्रियान्वित हो सकेंगे।

अपने देश में सात लाख गाँव है। साठ लाख सन्त। हर गाँव पीछे उनका औसत साठे आठ आता है जब जनता उनके निर्वाह का भार उठाती है तो उसे यह अधिकार है कि उनसे कुछ सेवा सहायता की आशा भी करे।

धर्म सेवी समुदाय यदि चाहे ते अशिक्षा की समस्या का सहज समाधान निकल सकता है। इतने सन्त अध्यापक यदि चाहे तो अपने अपने कार्य क्षेत्र बनाकर उसमें निरक्षरता उन्मूलन के लिए इतना अधिक काम कर सकते हैं। कि कुछ ही समय में देश के माथे से निरक्षरता का कलंक मिट जाए। शेखावटी के स्वामी केशवानन्द ने यही कार्य अपने हाथ में लिया था और गाँव गाँव प्राथमिक शालाएं स्थापित करके उन्हें हाईस्कूल कालेज तक पहुँचा दिया था। यह कार्य कोई भी धर्म क्षेत्र का व्यक्ति बड़ी सरलता से पूर्वक हाथ में ले सकता है और से सरलतापूर्वक पूरा भी कर सकता है।

गली कूंचों में सड़ती रहने वाली गंदगी न केवल कुरुचि दुर्गन्ध बखेरती है वरन् बीमारियाँ उत्पन्न करके अनेकों के लिए प्राण संकट भी खड़ा करती है। सरकारी श्रमदान के बलबूते कोई भी सेवा भावी संगठन अग्रगमन का मार्गदर्शक बनते हुए बिना सफाई कर्मचारियों के ढूंढ़े अपने बलबूते उस प्रयोजन को पूरा कर सकता है। श्रमदान संगठन के माध्यम से अनेकों उपयोगी कार्य स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप सहज ही पूरे किये जा सकते हैं।

चरित्र निष्ठा, समाज निष्ठा, जीवन कला, पारिवारिक सुसंगठन जैसे विषयों की जानकारी लोगों को नगण्य जितनी है उसे सुविस्तृत करने पर व्यक्तित्व के विकास का मार्ग खुलता है। यह बड़ी उपलब्धि है, जिसे राष्ट्रीय विकास की आधारशिला समझा जा सकता है कुरीतियों का उन्मूलन भी इतना ही महत्वपूर्ण कार्य है नशा, दहेज छूतछात पर्दा आदि कितने ही प्रचलन ऐसे है जो विकास के मार्ग से सबसे बड़े अवरोध है इसके विरुद्ध उन्मूलन अभियान चलाने में धर्मतंत्र के अधिष्ठाता, पुरोहितों धर्मोपदेशकों को जितनी सफलता मिल सकती है उतनी और किसी को नहीं। राजतंत्र अपनी उपयोगिता और समर्थता का परिचय दे। किन्तु धर्मतंत्र को भी उपेक्षित एवं निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए। बिखराव को समेट कर एक केन्द्रीय अनुशासन में योजनाबद्ध रूप में इस प्रकार जुटना चाहिए, जिससे धर्म तंत्र की गरिमा प्राचीन काल की तरह प्रतिष्ठा के उच्च शिखर तक जा पहुँचे।


भूल-भुलैयों वाले बड़े महल (Kahani)

दैत्य भूल-भुलैयों वाले बड़े महल में रहता था उसके चार रत्नों का भण्डार था किसी सत्पात्र को उसे देना चाहता था। पर पहले उसकी कुशलता जाँच लेने का मन उसने बना लिया। इसकी घोषणा भी कर दी गई थी।

अनेकों इच्छुक आए, उस मल में घुसे पर भूल भुलैयों में भटक जाने के कारण न खजाने तक पहुँच सके न वापस लौट सकें। उसी गोरख धन्धे में फँसकर जान गँवाते रहे।

एक चतुर व्यक्ति ने बहुत लम्बा धागा लिया। उसका एक सिरा दरवाजे के बाहर बाँध दिया। धागे की पिण्डी खोलता हुआ आगे बढ़ता गया। सम्बल हाथ में रहने से वह भटका नहीं- उस धागे के सहारे ही बाहर निकल आया।

दैत्य को उसकी बुद्धिमानी बहुत भाई। सो धन के साथ ही अपने रूपवती बेटी ब्याह दी।

जीवन की डोर भगवान के द्वार से बाँधकर चलने वाला सिद्धि भी प्राप्त करता है और ऋद्धि भी, वह भटकता भी नहीं।


यह नन्हे माटी के दीपक ही जगती की आशाओं मनु संतानोंइन संकल्प स्वरों की गरिमा को पहचानो

महाराज जनक को समझाते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा था समय कठिन हो, तो भी यज्ञ परम्परा नहीं रुकनी चाहिये चाहे वह भावनाओं की अग्नि में संकल्पों की समिधाओं से ही क्यों न सम्पन्न हो।

दीपयज्ञों की अभिनव शृंखला उस पुरातन मान्यता का अभिनव संस्करण है। वह कितना महत्वपूर्ण है? इसका प्रमाण इस अभियान का श्रीगणेश करने वाले इन समाचारों से मिलता है। छोटे होने पर भी इन आयोजनों की परिणति कितनी उल्लेखनीय होगी इसका इनसे सहज ही अनुमान किया जा सकता है।

चौबीस महायज्ञ

इन्दौर (म.प्र.) नगर पार्षद एवं कर्मठ प्रज्ञापुत्र श्री भवानी कश्यप ने अपने सहयोगियों सर्वश्री वंकटलाल, शि. कु. शर्मा तथा हरिनारायण शर्मा सहित 24 स्थानों में 108 थालों वाले दीप यज्ञ करने का संकल्प लिया है। श्री कश्यप घर- घर तुलती अभियान के अंतर्गत 2400 तुलसी पौधों की जीवंत प्राण प्रतिष्ठा का चुके है।

घर-घर ज्योति जले

पार्टी (खरगोन) श्रीमती सुमन गुप्ता शरद पूर्णिमा के शतकुँडी दीप यज्ञ को व्यापक बनाने के लिये घर-घर संपर्क साध रही है। वे परिवार निर्माण के लिये महिलाओं से कोई न कोई व्रत और संकल्प भी कराती है ऐसे 1000 संकल्प कराने का उनका लक्ष्य है।

बोलता क्षेत्र बोलती दीवारें

बालोद (दुर्ग) दीप यक्ष की शृंखला के साथ- साथ सारे क्षेत्र की दीवारों में आदर्श वाक्य लिखने का सघन कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया है। अधिवक्ता श्री धन्नू लाल साव अपने सहयोगियों सहित अपना सारा खाली समय इसी प्रयोजन में लगा रहे है।

शिथिलता, गति में बदली

शेरगढ (राजनादगाँव) 1000 दीप यज्ञों के संकल्प ने समूचे क्षेत्र में मिशन की नई हलचल पैदा कर दी है। बुद्धिजीवी वर्ग इस अभिनव कार्यक्रम को आज की सामयिक आवश्यकता और व्यक्ति निर्माण का सुनिश्चित आधार बता रहे है।

बुलाने से पहले

देवगढ़। सजी सजाई 51 थालियों का अभिनव किन्तु अभूतपूर्व दीपयज्ञ भाद्रपद पूर्णिमा पर स्थानीय जवाहर इंटर कालेज के प्राँगण में सम्पन्न हुआ। घर - घर एक थालें के दीप यज्ञ की घोषणा करते ही अपने घर आयोजन रखने वालो की भीड़ उमड़ पड़ी। इस स्थिति में यह निश्चित किया गया है कि जिस घर से नशेबाजी तथा माँसाहार की बुराई त्यागने तथा न्यूनतम 5 वृक्ष लगाने का अनुबंध पालन किया जायेगा वही आयोजन होगे। इस शर्त पर भी प्रायः एक सौ घरों के आयोजन उसी समय निश्चित हो गये।

6 मास की जागरण ज्योत

कनाडिया (इन्दौर) शाखा के कर्मठ कार्यकर्ता सर्वश्री गंगाराम चौधरी, महादेश शर्मा, वासुदेव, सतीश वर्मा तथा शिव नारायाण मंडलोई ने अश्विन नवरात्रि से चैत्र नवरात्रि तक निरंतर घर-घर दीप यज्ञ सम्पन्न करने का निश्चय कर जनसंपर्क प्रारम्भ कर दिया। वे समीपवर्ती गाँवों में भी यह आयोजन सम्पन्न करेंगे। हर व्यक्ति से एक बुराई छुड़वाने का भी लक्ष्य रखा गया है।

शक्तिपीठ में पुनर्जीवन

रंगई खुर्द (जयसमुन्द) दीप यज्ञों की घोषणा ने प्रज्ञा पीठ में नया जीवन डाल दिया। 15 अगस्त से नियमित प्रौढ़ पाठशाला तथा बाल संस्कार शाला प्रारम्भ कर दिये गये। इससे पहले ट्रस्टी श्री राम सजीवन दुबे की ओर से 24 व्यक्तियों का दीपयज्ञ सम्पन्न हुआ जो बहुत ही भव्य और आकर्षक था। इस अवसर पर 52 लोगों की बीड़ी, सिगरेट न पीने की प्रतिज्ञा की। घर-घर दीप यज्ञ का क्रम उत्साह पूर्वक प्रारम्भ हो गया।

दीप ज्योति अर्थात् अशिक्षा निवारण

भनसुली (दुर्ग) नशा निवारण तथा हरीतिमा संवर्धन के अतिरिक्त साक्षरता विस्तार की व्यापक रूपरेखा बनाई गई है। यह कार्यक्रम विस्तार की व्यापक रूपरेखा बनाई गई है। तथा कार्यक्रम दीपयज्ञ के साथ साथ चलाने का संकल्प स्थानीय कार्यवाहक श्री मनोहर लाल साहू ने लिया है।

व्यापक समर्थन

उतई (दुर्ग) 10 स्थानों में 108 दीप यज्ञ सम्पन्न करने का अभियान उत्साहपूर्ण वातावरण में चल रहा है इन यज्ञों में सम्मिलित होने वालो में से प्रत्येक को कोई न कोई बुराई छोड़ने और अच्छाई ग्रहण करने का आग्रह किया जाता है। श्री लोकनाथ साहू तथा उनके सहयोगियों के इस कार्य को व्यापक समर्थन मिल रहा है।

काम गायत्री धाम के

बेलादुला (रायगढ) शक्तिपीठ के तत्वावधान में चैत्र की नवरात्रि तक एक हजार दीप यज्ञ सम्पन्न करने का श्री गणेश किया गया। सर्वश्री कालीदीन चौबे, हरीराम साहू तथा श्याम लाल रवानी ने मिलकर यह संकल्प पूरा करने का निश्चय किया। दीप यज्ञ के साथ-साथ बुराइयाँ छुड़ाने तथा सत्संकल्प धारण करने का क्रम भी चलेगा।

शानदार प्रथम प्रदर्शन

गहाई (फतेहपुर) दीप यज्ञ का प्रथम 24 कुण्डों का आयोजन बहुत प्रभावोत्पादक रहा। 24 थालियों में 5-5 दीपों अगरबत्तियों से पूरा वातावरण प्रकाशमय हो उठा। सारा कर्मकांड शान्ति कुंज से प्रदर्शन देखकर लौटे सर्वश्री राम निहोरे शुक्ल, बसन्त लाल पाणिग्रही, राम सिंह यादव तथा श्री कान्त द्विवेदी ने समवेत स्वर से कराया। उपस्थित तीन सौ बहत्तर व्यक्तियों में से 89 व्यक्तियों ने नशेबाजी, गाली-गलौच, क्रोध, माँसाहार आदि बुराइयों का परित्याग किया। उसी दिन से प्रौढ़ पाठशाला भी प्रारम्भ की गई, जिसमें अभी 27 प्रौढ़ सम्मिलित हुये।

बृहत् व्यापक, विशाल विराट

दुर्ग (म.प्र.) शरद पूर्णिमा को बृहत् घर-घर दीप यज्ञों की व्यापक शृंखला एवं 108 दीपकों का यज्ञ, तत्पश्चात दीवारों में 1008 सद्वाक्य लेखन जिससे जड़ भी नव निर्माण का संकल्प दुहराये, 108 व्यक्तियों से अपने या अपने बालकों के दहेज और धूम-धाम सहित सादगी सम्पन्न आदर्श विवाह सम्पन्न कराने की प्रतिज्ञायें कराना, 501 व्यक्तियों से नशे की आदतें छुड़ाकर उन्हें धीमी आत्महत्या से बचाना और 108 लोगों के जन्म दिन संस्कार सम्पन्न कराकर चैत्र नवरात्रि पर विशाल पूर्णाहुति कार्यक्रम सम्पन्न कराकर चैत्र नवरात्रि पर विशाल पूर्णाहुति कार्यक्रम सम्पन्न करना, यह विराट योजना कर्मठ कार्यकर्ता सर्वश्री हरीशंकर उजाला, भीमवली तिवारी तथा कान्ता सक्सेना ने बनाई और उसका तत्काल क्रियान्वयन प्रारम्भ कर दिया है।

इसी जन्म में

पुर मंडावली (बिजनौर) दीप यज्ञों का संकल्प लेकर लौटे श्री जयपाल सिंह के अनुसार इन आयोजनों का जन-मानस पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा है। जिस घर आयोजन हुआ, हर किसी ने कोई न कोई बुराई छोड़ी। एक सज्जन शराब के बहुत आदी थे, जब उनसे देव दक्षिणा में शराब छोड़ने का आग्रह किया गया तो उनकी माँ ने कहा-यह सौ जन्म में शराब नहीं छोड़ सकता। वह भाई मुस्कराये-बोले इसी जन्म में क्यों नहीं? और उस दिन से उन्होंने उसे हाथ भी नहीं लगाया।

संकल्पपूर्ति के प्रयास

खरगोन (म.प्र.) कर्मठ परिजनों ने हरिद्वार कार्यकर्ता सम्मेलन से वापस आते ही नय संदर्भ में सक्रिय प्रयास प्रारम्भ कर दिए। शरद पूर्णिमा से दीपयज्ञ अभियान प्रारम्भ होगा ही, परन्तु अभी से संपर्क क्षेत्र में, विभिन्न ग्रामों, शाखाओं में दीपयज्ञ का स्वरूप समझाने का क्रम प्रारम्भ किया है। संकल्प एक हजार का है, परन्तु सम्भावना इससे कई गुनी बनी गयी है। दीपयज्ञ के साथ संकल्प अभियान जुड़ा हुआ है। इसके लिए भी परिजनों में भारी उत्साह उभरा है। जन संपर्क पूर्वक याजक बनाने का क्रम आशातीत गति से चल पड़ा है।

हरीतिमा संवर्धन भी

खिलीचीपुरा (शाजापुर म.प्र.) दीप यज्ञ के लिए याजक बनाने प्रारम्भ कर दिये गये हैं। साथ ही हरीतिमा संवर्धन कार्यक्रम को गति देने का निर्णय हुआ है। कई परिजनों ने उसके निमित्त अपने यहाँ पौध तैयार करके निःशुल्क देने की व्यवस्था भी बना ली है।

प्रौढ़ शिक्षा का उत्साह जगा

बड़वानी (खरगोन म.प्र.) सम्मेलन से लौटते ही परिजन सक्रिय हो उठे है। स्थानीय कार्यकर्ता - जो शान्ति-कुंज नहीं गये थे, उन्हें एकत्रित करके सारे निर्धारण बतलाये समझाये गये सभी में नय उमंग जागी है। प्रौढ़ शिक्षा के लिए पढ़े-लिखे भावनाशीलों से संपर्क प्रारम्भ कर दिया गया है। विद्या ऋण चुकाने के लिए दिया गया प्रोत्साहन 80 प्रतिशत सफल हो रहा है। लगता है उल्लेखनीय उपलब्धि इसी वर्ष में हस्तगत हो जायेगी।


अपनों से अपनी बात - इस वर्ष की आध्यात्मिक साधना

प्रत्यक्ष कठिनाइयों का समाधान तथा प्रगतिशीलता का अभिवर्धन प्रत्यक्ष उपाय उपचार से किसी कदर सम्भव है। असाधारण परिस्थितियाँ सामने आने पर मनुष्य यथा सम्भव उनके निराकरण का प्रयत्न करता भी है। करना भी चाहिए, क्योंकि वह कर्तव्य है किन्तु इतने भर से ही गुत्थियों का सुलझाव समुचित बन पड़ते देखा नहीं जाता, क्योंकि कारणों में कई बार वे परोक्ष स्तर के भी होते हैं। कठिनाइयाँ मात्र प्रत्यक्ष अव्यवस्थाओं से ही नहीं आती। कई बार उनका कारण वातावरण की अस्त-व्यस्तता और प्रकृति की विपन्नता भी होती है। यह सूक्ष्म जगत में उत्पन्न होने वाले कारण है जिनका आधार मनुष्य समुदाय का दूषित दृष्टिकोण एवं गर्हित क्रिया कलाप होता है। सूक्ष्म जगत में असंतुलन बनने का यही कारण है और इसी आधार पर ऐसी विपत्तियां सामने आती हैं, जो उसी स्तर का उपचार किये बिना सुलझती नहीं।

प्रत्यक्ष पुरुषार्थ का अपना महत्व है। कठिनाइयों से निपटाने और समृद्धि को बढ़ाने के लिए सभी अपने अपने ढंग से काम करते हैं, पर साथ ही यह भी भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि सूक्ष्म जगत के परिशोधन के लिए ऐसे उपाय भी अपनाये जाने चाहिए जिससे अनास्था संकट टले, श्रद्धा संवर्धन को बल मिले और पुण्य-परमार्थ का सत्प्रवृत्तियां को परिपोषण मिले। इन्हीं के समन्वय को अध्यात्म प्रयोग करते हैं। उन्हें यदि सामूहिक, सुव्यवस्थित और भाव-संवेदनाओं से भरे-पूरे स्तर पर अपनाया जा सके, तो निश्चय यह समाधान और अभ्युदय का उभयपक्षीय पथ प्रशस्त करता है।

अध्यात्म तत्वज्ञान और साधना परिकर का अवलम्बन जितना साधक के लिए हितकर है उतना ही सामूहिक सन्तुलन के लिए प्रभावशाली सिद्ध होता है।

इन दिनों ऐसी ही परिस्थितियाँ है, जिनकी विकटता को देखते हुए प्रत्यक्ष उपायों के अतिरिक्त परोक्ष अध्यात्म स्तर के आधारों को भी अपनाया जाना चाहिए, कारण कि आपत्तियों के घटाटोप और प्रगति पथ के अवरोध में जितना व्यवधान प्रत्यक्ष भूल-चूकों से होता है, उससे कही अधिक समष्टि क्षेत्र का सूक्ष्म जगत, उसमें भरी हुई अनैतिकता बाधक बनती है।

इन दिनों व्यापक रूप से जन-जीवन को सन्त्रस्त करने वाली कुछ प्रमुख कठिनाईयाँ यह है कि 1. प्रकृति की विपन्नता, वर्षा का असन्तुलन, 2 चरम स्तर की महंगाई, 3. अनाचारी दुरात्माओं की अनैतिक आक्रामकता, 4. साम्प्रदायिक तनाव 5. राजनैतिक उथल-पुथल। इन सभी का समन्वय मिल जुल कर इतना त्रासदायक हो जाता है कि व्यक्ति का निजी जीवन और समाज का सुसंतुलन उससे बुरी तरह प्रभावित होता है, हो भी रहा है। ऐसी दशा में पुरुषार्थ परक प्रयास तो होना ही चाहिए, साथ ही आध्यात्मिक उपाय-उपचारों का भी निर्धारित होना चाहिए, ताकि सूक्ष्म जगत की विकृतियों का समुचित समाधान हो सके।

अध्यात्म उपचारों में गायत्री की मन्त्रशक्ति और यज्ञ की दिव्य ऊर्जा का आना विशिष्ट स्थान है। शास्त्रकारों ने गायत्री को भारतीय संस्कृति की माता और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता कहा है। इन दोनों का आश्रय ग्रहण करने पर सामयिक समस्याओं को सुलझाने में अतिरिक्त सहायता मिल सकती है। साथ ही आश्रय ग्रहण करने वाले का व्यक्तिगत उत्कर्ष हितसाधन भी हो सकता है।

सभी लोगों तक अनुरोध पहुँचाना और उन्हें सहमत करना तो कठिन है, पर प्रज्ञा परिवार के परिजनों से तो ऐसा अनुरोध किया ही जा सकता है और उनसे सार्वजनीन श्रेय साधना के निमित्त अपनी भाव श्रद्धा का परिचय देने के लिए कहा ही जा सकता है।

व्यक्तिगत साधना के लिए कहा जा रहा है कि प्रातः काल सूर्योदय के समय न्यूनतम दस मिनट गायत्री महामंत्र का स्नान करने पर विधिवत और वैसा न बन पड़ने पर मानसिक जप किया जाय, साथ ही प्रभातकालीन सूर्य का नेत्र बन्द करके ध्यान करते रहा जाय। भावना की जाय कि इससे बल बुद्धि और सद्भाव की त्रिविध देव अनुकम्पा का लाभ उसे मिल रहा है।

या उपासना कभी भी की जा सकती है किन्तु एक निर्धारित समय में असंख्यों की संयुक्त शक्ति का समन्वय हो जाने पर उसका चमत्कारी प्रतिफल होता है। जिन्हें संयुक्त शक्ति की चमत्कारी प्रक्रिया का ज्ञान है, उन्हें यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि सूर्योदय के समय की उपासना को क्यों महत्व दिया गया है? एक समय में असंख्यों की एक क्रिया का सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है इस सिद्धांत के अनुसार पुल पर सेना को कदम मिला कर नहीं चलने दिया जा सकता, क्योंकि पैरों की संयुक्त शब्द शक्ति पुल को गिरा देने का खतरा उत्पन्न कर सकती है, वातावरण का संशोधन करने वाली दिव्य शक्ति भी उत्पन्न रूप से लाभ मिलने की अतिरिक्त सम्भावना है।

दूसरा आधार है - यज्ञ पिछले वर्ष यज्ञ। पिछले वर्ष यज्ञ आयोजन और राष्ट्रीय-एकता सम्मेलनों की धूम रही भी है ओर उससे विपत्ति के बादल किसी हद तक छँटे भी है।

इस वर्ष पिछले साल की अपेक्षा उन आयोजनों के लिए और भी अधिक उत्साह था। तैयारी भी चल रही थी। इस हेतु प्रान्तों के सम्मेलन जुलाई, अगस्त में बुलाये गये थे पर परिस्थितियों ओर सम्भावनाओं ने जिस प्रकार पलटा खाया है उसे देखते हुए हिमालय से नया संदेश आया कि आयोजनों को समाप्त तो न किया जाय, पर छोटा अवश्य कर दिया जाय। आपत्तिकाल में ऐसे परिवर्तनों की पूर्व परम्परा भी है।

जनक ने याज्ञवल्क्य से पूछा यदि विषम बेला हो तो अनिवार्य कहे जाने वाले यज्ञों की व्यवस्था कैसे बने? याज्ञवल्क्य ने कहा-”घृत न मिले, तो मात्र वनस्पतियों से काम चलाया जाय। वे भी उपलब्ध न हो, तो मात्र समिधाओं से ही हवन कर लिया जाये। वह भी न हो, तो श्रद्धा रूपी समिधा प्रयुक्त कर मात्र दीप जला कर यज्ञ की भावना कर लेनी चाहिए। “ इसी नीति के अनुसार इस वर्ष पिछले साल की अपेक्षा सौ गुने अधिक स्थानों पर यज्ञ तो होगे, पर वे सभी दीप यज्ञ होगे जिनकी लागत एक वेदी पीछे एक रुपये के लगभग आती है। आमतौर से 100 दीप वाले यह यज्ञ सामूहिक होगे। उनमें 100 की अगरबत्ती और घी पर्याप्त होगा। इसके अतिरिक्त अन्य व्यवस्थाओं में भी 100 और खर्च हो जाये तो 200 मात्र का बजट बनाना होगा, जिसकी पूर्ति कही भी हो सकती है और किसी भी गाँव मुहल्ले में उसे सरलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। इस प्रकार उनकी संख्या गत वर्ष की तुलना में सौ गुनी हो सकती है।

इन यज्ञों का संक्षिप्त स्वरूप यह है कि एक थाली में स्वस्तिक बना कर उसमें पाँच पाँच अगरबत्तियों के पांच स्टेण्ड लगाये जायं। पाँच दीपक जलाये जाये। हवन पद्धति के स्विष्टकृत वसोधरा, पूर्णाहुति जैसे मंत्रों को छोड़ कर सारा विधान उसी आधार पर चलेगा। यह कृत्य प्रायः एक घण्टे में पूरा हो जायेगा। इसके बाद देव दक्षिण सम्बन्धी एक घण्टे का प्रवचन हो, जिसमें याजक अपनी दुष्प्रवृत्तियां छोड़ने और सत्प्रवृत्तियां बढ़ाने का संकल्प ले। यह प्रातः काल का कार्यक्रम हुआ, जो सूर्योदय से लेकर दो घण्टे दिन चढ़े तक पूरा हो जायेगा। रात्रि को कीर्तन कार्यक्रम रहेगा यह स्थानीय कार्यक्रम होगे, जो कि कम्पाउण्ड में हाल में या कनात लगाकर पूरे किये जा सकते हैं।

आश्विन की शरद पूर्णिमा इन शतकुण्डी यज्ञों का शुभारम्भ दिन है। इसकी पूर्णाहुति के रूप में चैत्र सुदी पूर्णिमा को समाप्ति होगी। इन मध्यवर्ती छह महीनों में हर घर में एक थाली को एक कुण्ड मान कर यही प्रक्रिया चलती रहेगी। प्रातः हवन, साँय कीर्तन। इसे पारिवारिक धर्मानुष्ठान भी सकते हैं। इसमें भी जो सम्मिलित होगे, वे अपनी कोई न कोई बुराई छोड़ने और एक नई सत्प्रवृत्ति आरम्भ करेंगे, संक्षिप्त में यही है-यज्ञानुष्ठान आयोजन जो पूरे छः महीने चलेगा, घर-घर तक पहुँचेगा और सुधार-परिष्कार का कार्यक्रम व्यापक रूप से सम्पन्न करेगा।

जिस सुधार प्रक्रिया को इन आयोजनों के साथ जोड़ा गया है, उनमें से चार प्रमुख है - 1. प्रौढ़ शिक्षा, 2. दहेज उन्मूलन, 3. नशा निवारण, 4. हरीतिमा संवर्धन-इस वर्ष इन चार को चुना गया है। अगले वर्षों में इसी प्रकार चार-चार कार्यक्रम हाथ में लिए और कार्यान्वित किये।


प्रभु-प्राप्ति

(मंगल विजया)


प्रभु-प्राप्ति (Kavita)

मुझे कोई नाच कर गाकर रिझाता है। और कोई शंख, झालर भी बजाता है।

कई ऊँचे चढ़ मुझे आवाज हैं देते। बन्द आंखें कर, मुझे कोई बुलाता है॥1॥

सोचता हूँ मैं, किधर जाऊँ, सुनू किसकी। कौन है वह बात मानी जा सके जिसकी।

देखता है जा हृदय के द्वार पर जब मैं तो वहाँ पर और ही कुछ नजर आता है॥2॥

कहीं पर भी मनुजता दिखती नहीं मुझको। प्यार अपना दे सकूँ दिल खोलकर जिसको।

दिख न पाती है मुझे ऐसी जगह कोई। जहाँ मेरा मन सहज आनन्द पाता है॥3॥

मानवी भाषा नहीं अब बोलता कोई। स्नेह, समता रस नहीं घोलता कोई।

पास जिसके भी तनिक सा ठहर जाता है। बस मुझे वह राग अपना ही सुनाता है॥4॥

बहुत हिन्दू, मुसलमान ईसाई मिल जाते। भीड़ में लेकिन नहीं इंसान मिल पाते।

जहाँ भी इंसानियत का जिक्र करता हूँ। हर बशर इंसानियत से मुकर जाता है॥5॥

धड़कता हूँ प्राणियों की धड़कनों में मैं। दीन दुखियों के दिलों की सिसकनों में मैं।

राम और रहीम उनको हो मिला करते।, प्राणियों से प्यार करता आता है॥6॥

*समाप्त*