सच्चा मानवोचित पुरुषार्थ

अधिक उपभोग की लालसा में मत बंधो इतना मत चाहो तो सर्वसाधारण को उपलब्ध नहीं हैं। इस प्रयास में घाटा ही घाटा हैं प्रकृति किसी को भी नियत मर्यादा से अधिक न तो संग्रह करने देती है और न उपयोग।

वैभव अर्जित करने और उनका असीम उपयोग करने की लिप्सा किसी को कितना हैरान करती है उसका दृश्य उन लोगों के आरम्भ और अन्त को देखने भर से किया जा सकता है। क्या आवश्यकता है कि उसका प्रयोग अनुभव अपने ही ऊपर किया जाय? कटीले मार्ग पर चलने वालों के पैर किस प्रकार लहू-लुहान होते हैं, यह दूसरों को वैसा करते देखकर या उनसे पूछकर भी जाना जा सकता है। फिर क्या अटकाव कि हर विपन्नता को अपनाया जाय और उनका त्रास सहा जाय।

मनुष्य जनम का बहुमूल्य अवसर उपहासास्पद पृष्ठ-पोषण में गँवाया जाय, इसमें कोई बुद्धिमानी नहीं। जिनने बहुत कमाया और बहुत उड़ाया उनकी अन्तरात्मा क्या कहती है और लोक भर्त्सना कितनी सहनी पड़ती है? यह अपने इर्द-गिर्द बिखरे हुए अनेकानेक उदाहरणों से भी जाना जा सकता हैं

हम सुयोग के सदुपयोग के लिए अनेक प्रयोजना सामने विद्यमान है। क्यों न उन्हीं की ओर ध्यान दिया जाय? और क्यों न ऐसा मार्ग अपनाया जाय जिसका अनुगमन करके अन्यों को भी श्रेय और प्रकाश मिल सके?


चल! तू अगले पड़ाव की तैयारी कर

“ऐ राहगीर! ललचाई आँखों से मत देख यह दुनिया तो सराय है। तेरा घर तो बहुत दूर हैं लम्बी मंजिल चल कर ही वहाँ तक पहुँचेगा। रुक मत। आगे बढ़ तू चाहे याद नहीं रखता है कि यह सराय एक रात विश्राम के लिए हैं सो यहाँ भले मानस की तरह प्रवेश कर- शालीनता के साथ रह ओर सज्जनता के साथ अपना रास्ता पकड़

“भूल गया- भुलक्कड़ ऐसी कितनी सरायों में ठहर चुका और आगे लम्बी मंजिल पार करने में अभी और कितनी ऐसी ही सरायों में ठहरना पड़ेगा ललचाने की आदत छोड़ मुसाफिर यदि ठहरने की सुविधा को ही पर्याप्त न मान कर सराय पर अधिकार जताने लगे तो उस मूर्खता की भर्त्सना ही होगी। कुछ हाथ थोड़े ही लगेगा”

“सराय वाले को धन्यवाद दे कि जिसने एक रात ठहरने के लिए तेरे लिये व्यवस्था बनाई। सुविधा-पूर्वक रहा-चैन की नींद सोया, सुविधाओं को भोगा, सेवकों से सहायता प्राप्त कीं इतना मिल गया, बहुत है। सन्तोष कर, प्रसन्न हो, कृतज्ञ वन ओर शान्ति के साथ अगले पड़ाव की तैयारी कर।”

“गड़बड़ मत फैल, पलंग मेरा, कमरा मेरा, रसोई घर मेरा, बर्तन मेरे, कर्मचारी मेरे, सराय मेरी, मालिकी मेरी। मैं ही सबका मालिक, यह सारी मेरी सम्पत्ति। इस पागलपन को छोड़। कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? रात भर ठहरने वाला मुसाफिर सराय पर अपनी मालिकी बताता है समझाने पर मानता नहीं मेरी-मेरी ही कहे चला जाता है सराय तेरी कैसे हो सकती है? यह बनाने वाले की हैं यहाँ के कर्मचारी तेरी सम्पत्ति कैसे हो सकते हैं। इनका अपना अस्तित्व है। इन्हें खिलाने, संभालने वाला दूसरा हैं मूर्ख, बेकार की बकवास मत कर, सुनने वाले सुन लेंगे तो तेरी दुर्गति बनायेंगे।”

“बगीचा देख लिया सो ठीक, फूल सूँघ लिये तो ठीक, पर यह तेरे नहीं है, तेरे लिए नहीं है। दूसरों की तरह तू भी देखले, सूंघले और इतनी देर तक मोद मनाने के सौभाग्य को सराहता हुआ आगे बढ़।”

“तेरा घर दूर है। उसकी मंजिल लम्बी है। अपनी मंजिल के मील गिन - चलने का कमर कसर, रास्ते का जल-पान का प्रबन्ध कर और हलका-फुलका होकर चल। सराय की चीजें उठाकर चलेगा तो उसके बोझ से तेरी गरदन-टूट जायेगी,फिर कोई ले जाने भी क्यों देगा?

“नेक मुसाफिर की तरह यहाँ रह। जब तक ठहरना है भलमनसाहत बरत - हँस और हंसा प्यार दे और लें छोड़ सके तो एक ऐसी याद छोड़ जा जो सराहना के साथ पीछे वालों के मन में उठती रहे। ले जा सके तो यहाँ वालों की श्रद्धा और सद्भावना लेता जा लेने और छोड़ने को इतना ही काफी है। परदेशी मोह का जाल मत बुन। यहाँ न कोई तेरा है - न तो किसी काँ रेन-बसेरे में कितने आते हैं - रात ठहरते हैं - दूसरे दिन चले जाते हैं रात भर हँस बोल लिए - मिलजुल कर रह लिये, यहाँ क्या कम है। मैं उसका - वह मेरा - इसी में तेरी गरिमा हैं”

“मोह नहीं - प्यार कर। मोह में बंधन है - प्यार में मुक्तिं मोह अधिकार माँगता है - प्यार कर्तव्य तक सन्तुष्ट रहता है असंतोष छोड़ सन्तोष कर।”

“मनचले, मचलना छोड़ जिस दुकान पर खिलौने देखे, वहीं मचल गये। जिस दुकान पर मिठाई देखी, अड़ गये इस बचपन से क्या बनेगा? यह मेला हैं यहाँ सब कुछ अनोखा ही अनोखा है। देख और मोद मनाता हुआ घर की राह ले। यह जलपरी का बगीचा है - एक से एक बढ़कर फूल खिले हैं देखने और खुश होने के लिए है। दूना और तोड़ना सख्त मना हैं गलत करने वालों को सख्त सजा भुगतनी पड़ती हैं मुसाफिर अपनी मंजिल को याद रख सफर के उद्देश्य को मत भूल। सरायों में ठहरता हुआ आगे बढ़ता चला लालच किया और अधिकार जमाया तो बुरी तरह मारा जायेगा चरैवेति का सिद्धान्त याद रख और आगे बढ़ता चला!”


आत्मिकी का अवलम्बन एवं उसके प्रतिफल

यह विशाल ब्रह्मांड, असीम और अनन्त शक्तियाँ का महान भाण्डागार है। इस विशालता के महासागर में कितने प्रचुर परिमाण में दिव्यता, विचित्रता एवं क्षमता भरी पड़ी है, इसकी मनुष्य को सीमित बुद्धि परिकल्पना तक नहीं कर सकती।

ब्रह्मांड की विशालता को देखते हुए अपनी आकाश गंगा, अपना सौरमण्डल और उसके अत्यंत छोटे भाग को घेरे हुए भू-मंडल का अस्तित्व नगण्य है। धरती पर बसने वाले कोटानुकोटि प्राणियों में मनुष्य जाति मुट्ठी भर है। इसमें भी एक मनुष्य की क्षमता तो इतनी नगण्य है जिसे बाल की नोंक से भी कम माना जा सकता है मनुष्य की सत्ता में उसका शरीर, मस्तिष्क एवं साधन सम्पदा ही गिने जाने योग्य है। इस परिधि में भी इतनी अधिक आश्चर्यजनक रहस्यमयी सामर्थ्य सन्निहित है, उनका एक अत्यंत ही छोटा कार्यान्वित होता है शेष अधिकाँश भाग तो प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ा रहता है। यदि मनुष्य की दृश्यमान कलेवर की शक्तियाँ ही जगाई, काम में लाई जा सकें तो उतने भर से मनुष्य अगणित विभूतियों का स्वामी बनकर अत्यन्त विशिष्ट विकसित सामर्थ्यों का भण्डार बनकर प्रकट हो सकता है। उसकी निजी क्षमता ऋद्धि सिद्धियों से भरी-पूरी दृष्टिगोचर हो सकती है। इसके आगे अनेकों सूत्र ब्रह्मांड के अनेक घटकों के साथ जुड़ते हैं जो अपनी सशक्त मानवी सत्ता पर उड़ेल कर उसे देवोपम बना सकते हैं। उसे कुबेर जैसा सम्पन्न, इंद्र जैसा सशक्त देखा जा सकता है यह असंभव उपलब्धियाँ कैसे हस्तगत हो? उस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है कि अध्यात्मिक विज्ञान के आधार पर जैव चुम्बकत्व को प्रखर, प्रचण्ड बना लिया जाय।

भौतिक विज्ञान के आधार पर कोई कितना ही उपार्जन संग्रह क्यों न कर ले, पर उसके उपयोग उपभोग की एक छोटी परिधि है जिसमें अधिक के लिए हाथ पैर मारना अपने आपको संकट में फंसाना हैं पेट से अधिक खाना शरीर सीमा से बढ़कर पहनना संभव नहीं उपार्जन वैभव कितना ही अधिक क्यों न हो, पर वह अपने स्थल पर ही रखा रहता है। बचत का दूसरे उपयोग करते हैं। किंतु चेतना क्षेत्र इससे सर्वथा भिन्न है उसकी परिधि विवाद है। सूक्ष्म शक्तियों के रूप में सम्पदा का अवस्त्र परिवार उसमें बीज रूप में भरा जा सकता है। उपलब्ध शक्तियों का जागरण और प्रभाव क्षेत्र का परिवार दोनों मिलकर इतने अधिक हो जाते हैं, जिसका मूल्यांकन करने में देव दानवों को ही मापदण्ड बनाया जा सकता है।

देवता मनुष्य शोक में आने के लिए ललचाते रहते हैं। उनकी उत्सुकता उससे कहीं अधिक है जैसा कि मनुष्य स्वर्ग लोक के सम्बन्ध में सोचता और वहाँ के आनन्द का रसास्वादन करने के लिए उत्सुक रहता है। इतिहास साक्षी है कि देवताओं ने मनुष्य से सहायता प्राप्त करने के लिए अनेक बार याचना की है। दशरथ अपना रथ लेकर देवताओं की सहायता करने गये थे। साथ में कैकेयी भी थीं जिनने पति की सहायता करके तीन वरदान प्राप्त किये थे। अर्जुन का इसी प्रयोजन के लिए देवलोक जाना प्रसिद्ध है वहाँ उनके सम्मुख अनिंद्य सुन्दरी उर्वशी प्रस्तुत की गई थी और गांडीव धनुष उपहार में दिया गया था देवताओं में मानुषी नारी के साथ संपर्क साधने में, अप्सराओं की सेवा से अधिक रसास्वादन माना है। इन्द्र और चन्द्र का अहिल्या पर मन डिगाना। कुन्ती से अनुरक्त होकर उसके गर्भ से सन्तानोत्पादन का उपक्रम करना यही बताता है कि धरती का वैभव स्वर्ग से अधिक है, यदि ऐसा न होता तो देव सुन्दरी मेनका विश्वामित्र की सहचरी बनने के लिए क्यों आतुर होती और क्यों इतनी लम्बी छोड़ लगाती?

भगवान को ब्रह्मांड के असंख्य लोगों की व्यवस्था का दायित्व संभलना पड़ता है, पर वे धरित्री का विशेष ध्यान रखते हैं। जब भी यहाँ असंतुलन पैदा होता है तभी प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए अधर्म के उन्मूलन और धर्म के अभिवर्धन के लिए इसी धरातल पर विशेषतया भारत क्षेत्र में अवतार धारण करते हैं दस या चौबीस अवतार इसी मनुष्य लोक में विशेषतया भारत देश में हुए हैं। इस भूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ कहा गया है। पुरातन काल के सतयुगी मनुष्य देव मानव कहे जाते थे। मनुष्य जनम को सुरदुर्लभ कहा गया हैं पुरातन काल के सतयुगी मनुष्य देव मानव कहे जाते थे। मनुष्य जन्म को सुरदुर्लभ कहा गया है। देवता यज्ञादि उपासनात्मक कर्मकाण्डों द्वारा अपना पोषण प्राप्त करने के लिए आशा, अपेक्षा करते रहते हैं। जब वैसा कुछ मिल जाता है तो प्रसन्न होकर मनोवाँछित वरदान प्रदान करते हैं। मनुष्यों की संकल्प शक्ति देवताओं के स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए विवश करती रही है। भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से उतार कर पृथ्वी पर बहने के लिए विवश किया था वृत्रासुर से संत्रस्त होकर देवगण महर्षि दधीचि से अस्थियाँ लेकर वज्र बनाने और संकट से त्राण पाने में सफल हुए थे। हरिश्चंद्र की आदर्शवादिता पर पुलकित होकर देवता स्वर्ग से पुष्प वर्षा करने के लिए छोड़ पड़े थे। सूर्य पुत्र कर्ण का पराक्रम और आदर्शवाद प्रख्यात हैं।

मानवी सत्ता देव वर्ग से कहीं अधिक है। पर यह आम तौर से प्रसुप्त स्थिति में मूर्छित पड़ी रहती हैं जग पड़े तो कुण्डलिनी बनकर अपनी ज्वाल-माल से क्षेत्र विशेष को प्रचण्डता से ओत-प्रोत करती देखी गई है यदि वैसा न बन पड़े तो मात्र हाड़ माँस के पिटारे जैसा दोष दुर्गुण से लिपटा हुआ मनुष्य दीन, दुर्बल, दरिद्र, अनगढ़, उपेक्षित, तिरस्कृत बनकर रहता है। आत्म प्रताड़नाएँ और लोक भर्त्सनाएँ उसे शूलती हुलाती रहती ही हैं। भव बंध में जकड़ा हुआ, कोल्हू के बैल की तरह घिसता, पीसता हुआ किसी प्रकार मौत के दिन पूरे भर कर पाता है।

काया स्वस्थ, समर्थ हो तो मात्र युवावस्था की थोड़ी-सी अवधि में बलिष्ठ, सुन्दर, प्रबुद्ध, सम्पन्न, स्वतंत्र, स्वच्छन्द रहा जा सकता है। बचपन और बुढ़ापे का अधिकाँश समय तो अपंग, असमर्थ, परावलम्बी जैसी स्थिति में किसी प्रकार गुजर करता है। जरा-जीर्ण स्थिति और रोग शोक में कलपते कराहते दिन बीतते हैं। उस स्थिति में मौत के दिन गिनने पड़ते हैं उसी के अंचल में मुँह छिपा लेने के लिए विवशता भरी उत्सुकता चढ़ी रहती है किन्तु आत्मिक प्रगतिशीलता इससे सर्वथा भिन्न है। यदि उस दिशा में प्रगति कर सकना बन पड़े तो लोक परलोक में समान रूप से सन्तोष छाया, ओजस उभरा और उल्लास आनन्द का रसास्वादन करते रहने की परिस्थिति निरन्तर बनी रहती है। आत्मिक प्रगति अकेली ही ऐसी है जिस पर अनेकानेक भौतिक सफलताओं को निछावर किया जा सकता है। बुद्ध, गाँधी सरीखे आत्मवान् अस्सी वर्ष से अधिक समय तक सन्तोष सम्मान भरा जीवन जीते रहे और सदा-सर्वदा के लिए अजर अमर हो गये। अपनी अनुकरणीय अभिनन्दनीय स्तर की उपस्थिति इतिहास के पृष्ठों पर युग युगान्तरों के लिए छोड़ गये। आत्मिक प्रगति की महिमा जितनी बखानी जा सके उतनी ही कम है। आत्मवान् स्वयं तो विभूतिवान होकर जीता ही है अपने अनुदानों से अपने समय और परिकर को हर दृष्टि से कृतकृत्य करता है। भौतिक क्षेत्र में केवल स्वल्प कालीन उन्नति ही की जा सकती है। चिरस्थायी प्रगति का अर्थ तो आध्यात्मिक उपलब्धियाँ उपार्जित करने के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। उसी के साथ प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष श्रेय जुड़ा हुआ हैं अस्तु दूरदर्शिता इसी में है कि आत्मोत्कर्ष का ताना-बाना बुना जाय। भले ही वह कष्ट साध्य ही क्यों न हो? भले ही उसके लिए सामयिक सुख-सुविधाओं में, तृष्णा महत्वाकाँक्षाओं में कटौती ही क्यों? करनी पड़े? आत्मा को ऊँचा उठाना आरम्भ कर दिया जाय तो वह विकसित होते-होते देवात्मा, परमात्मा का स्तर प्राप्त कर लेती है।

शरीर सर्वाधिक उपलब्धियों की एक सीमा हैं तृष्णा बढ़ी-चढ़ी कितनी ही क्यों न हो, पर प्रकृति अंकुश के कारण उसका संग्रह एवं उपभोग एक सीमा तक ही हो सकता है सीमित समय तक ही वह वैभव पास में रह सकता है। मृत्यु का ग्रास बनना हर किसी के लिए अन्तिम ही है। ऐसी दशा में यदि असीम और अनन्त की स्थिरता सम्बन्ध में सोचा जाय तो फिर आत्मिक प्रगति और आध्यात्मिक सिद्धि सम्पदा पर ही विचार करना पड़े उसी दिशा में कदम बढ़ाना पड़ेगा।

साँसारिक क्षेत्र के सुसम्पन्नों के साथ संपर्क साधना और उनकी अनुकम्पा अर्जित करना सरल नहीं है। पर अदृश्य क्षेत्र में जिन सूक्ष्म सत्ताओं का स्वच्छन्द निवास है अनेक साथ आत्मिक मार्ग पर चलते हुए सरलता के साथ जुड़ सकते हैं। उनका परामर्श, सहयोग विपुल परिमाण में प्राप्त किया जा सकता है, जिस प्रकार याचक को सम्पन्न दानशीलों की तलाश रहती है उसी प्रकार हर क्षेत्र के सुसम्पन्न अपने मित्र साथी तलाशते रहते हैं। उत्तराधिकारी की खोज सभी को रहती हैं पाने की तरह देने का भी आनन्द होता है। इसे माता संतान के पति-पत्नी के सम्बन्धों का विश्लेषण करते हुए सहज ही जाना जा सकता है। सूक्ष्म जगत की महान शक्तियाँ अपनी अनुकम्पा बरसाने के लिए बादलों की तरह आतुर रहती हैं वे उपयुक्त भूमि पर बरसती भी है। रेगिस्तानों पर से तो मेघ मालाएं बिना सके पलायन कर जाती हैं।

साधना से सिद्धि शत प्रतिशत सही है। श्रम-शीलता के सहारे मात्र सम्पदा अर्जित की जा सकती है सो भी येन केन प्रकारेण आगे चलाने के लिए अपना रास्ता बना लेती है। किंतु अध्यात्मिक सम्पदा के सम्बन्ध में यह बात नहीं हैं वह स्थिर ही नहीं रहती है, बैंक ब्याज की तरह बढ़ती भी रहती हैं। पल्लवित वृक्षों की टहनियों की तरह फलती फूलती भी रहती है। बाँटने पर विद्या की तरह उसकी अभिवृद्धि होती, परिपक्वता बढ़ती देखी जाती है।

भौतिक क्षेत्र में सफलता, असफलता के सम्पन्नता, विपन्नता के ज्वार भाटे आते रहते हैं। दिन-रात की तरह अनुकूलता-प्रतिकूलता का उलट के परिवर्तन होता रहता है किन्तु अध्यात्मिक क्षेत्र में ऐसा कुछ है नहीं। उस दिशा में बढ़ता हुआ हर कदम आगे की मंजिल ही पार करता है उसमें पीछे लौटने जैसी आशंका है नहीं। जब कभी इस राजमार्ग के पथिक को असफलता मिले तो समझना चाहिए कि दिशा भूल के भटकाव में उसे कहीं उलझना पड़ गया हैं सही मार्ग पर सही गति से सही तैयारी के साथ जो भी इस क्षेत्र में बढ़ता है उसे क्रमिक प्रगति का समुचित लाभ मिलता रहा है। उसे निराश का, पछताने का कुयोग कभी भी मिला नहीं है। उसे भाग्य को कभी कोसना नहीं पड़ा है।

स्मरण रखने योग्य बात यह है कि आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता का त्रिविधि संयोग हर साधक को अपने साथ संजोये रखना चाहिए। परमात्मा सत्ता के साथ अपने आपको समर्पित, विसर्जित कर देना ही ईश्वरावलम्बन है। ईश्वर जिसकी उपासना की जाती है वह है सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय। उत्कृष्टता एवं भाग्यवादिता का समन्वय। मात्र पूजा करने से नहीं आत्मा को परमात्मा के साँचे में डाल लेना ही योगाभ्यास हैं

चिन्तन और चरित्र के शालीनता से समन्वित करना, आत्मा परिशोधन में निरत रहना आध्यात्मिकता और कर्तव्यों के परिपालन में कटिबद्ध रहना, धार्मिकता इन तीनों को अपनाये रहने वाला ही सच्चा आध्यात्मवादी और सफल साधक होता है।


सभी की भलाई करो (kahani)

बादशाह को एक कर्मचारी नौकर की आवश्यकता थीं तीन व्यक्ति उसके पास उम्मीदवार के रूप में आए। बादशाह ने उनकी व्यवहार्य बुद्धि की परीक्षा ली, उन्होंने पूछा “यदि तुम्हारी व मेरी दाढ़ी में एक साथ आग लग जाय तो तुम क्या करोगे?

“ पहिले व्यक्ति ने कहा, “हुजूर मैं पहिले आपकी दाढ़ी बुझाऊँगा” दूसरे ने उत्तर दिया “मैं तो पहली अपनी दाढ़ी बुझाऊँगा’ फिर आपकी” तीसरे ने तपाक से कहा “मैं एक हाथ से आपकी व दूसरे से अपनी बुझाऊँगा।

” बादशाह ने तीसरे व्यक्ति को रख लिया व वह अपने दरबारियों से बोला, “अपनी उपेक्षा कर दूसरों की रक्षा करना अव्यावहारिक है जब मनुष्य स्वयं की रक्षा नहीं कर सका तो दूसरों की कैसे कर सकता है ।

दूसरों की भलाई करते रहने के लिये आवश्यक है कि हम स्वयं भी सुरक्षित, समर्थ व क्षमतावान बने रहें, परन्तु मात्र अपने आप तक ही सीमित रहना भी उचित नहीं अपने ही सूखों के लिये, अपने ही क्षेत्र के लिये सोचते रहना स्वार्थपरता है ।

खुदा स्वार्थी को भी पसन्द नहीं करता। खुदा को वही व्यक्ति पसन्द है जो स्वयं का भी भला करता रहे-स्वयं को भी विकसित करता रहे व दूसरों को भी आगे बढ़ाने का प्रयत्न करता रहे।


चेतना के तीन चरण

मनुष्य शरीर अनेक प्रकार के क्रिया-कलाप करता दीखता है। पर शरीर भी जड़ पदार्थों का बना है। उसमें जी क्षमता नगण्य है। वह भी तभी तक बनी रहती है जब तक कि उसमें प्राण विद्यमान है। प्राण के विलग होते ही शरीर न केवल निःचेष्ट हो जाता है वरन् सड़ने भी लगता है। इससे स्पष्ट है कि शरीर का आधार प्राण पर अवलम्बित है। प्राण की शक्ति शरीर के स्वसंचालित क्रिया-कलापों को गतिशील रखती है। रक्ताभिषरण, श्वास प्रश्वास, चयापचय, निमेष-उन्मेष आदि का क्रम प्राण ही चलाता है। प्राण जीव चेतना का वह भाग है जिसे सचेतन विद्युत की संज्ञा दी जा सकती है।

इसके अतिरिक्त चेतना के दो और भाग है, एक विचार और दूसरा भाव। जब तक शरीर प्राण शक्ति से संचित रहता है तब तक वे दोनों अपना काम करते रहते हैं। एक स्थिति ऐसी भी आती है जब शरीर को मूर्छना घेर लेती है। रात को सोते समय शरीर तो जीवित रहता है, पर मस्तिष्क निद्राग्रस्त होने से स्थिति अर्धमृत वैसी हो जाती है। शल्य चिकित्सक औषधियों द्वारा भी ऐसी स्थित उत्पन्न कर देते हैं। इन मूर्छित परिस्थितियों को छोड़कर सजग स्थिति में चेतना के महत्वपूर्ण पक्ष काम करते रहते हैं, जिन्हें विचार और भाव के नाम से जाना जाता है। चेतना का प्रमुख पक्ष यही है।

भावनाएँ असाधारण स्थिति की परिस्थितियों के आधार पर उत्पन्न हुए उभार है। प्रेम, मिलन, विछोह, क्रोध, भय जैसी असाधारण स्थिति सामने आने पर भी मनुष्य भाव विभोर होता है और दूसरों को संकटग्रस्त देखकर भी दया, करुणा जैसी भावनाएँ उठती और सेवा सहायता के लिए प्रेरित करती है। प्रत्यक्ष दृश्य देखने वाली घटना स्थिति में तो संवेदनाएँ उठती ही हैं। ऐसा भी होता है कि उनकी भाव स्मृति तीव्रतापूर्वक उभरने पर भी विह्वलता की स्थिति आ जाती है। ऐसा संवेदनशील भावुक जनों में ही प्रायः बहुलता से होता है। कुछ निष्ठुर प्रकृति के परमहंस प्रकृति के ऐसे भी होते हैं जो भावशून्य मनःस्थिति के होते हैं, उन्हें केवल अपनी निजी कठिनाई ही दुःखी करती है। दूसरों के ऊपर क्या बीतती है? इससे उनका कोई लगाव नहीं होता। भावुकता एक शक्ति है जिसमें सहृदय व्यक्ति असाधारण वेदना अनुभव करता है। उसके आवेश में कभी-कभी स्वयं उद्विग्न हो उठता है। कभी दूसरों की सहायता लिए अपना बहुत कुछ निछावर कर देता है। इसी को अध्यात्मिक संवेदनाओं में भक्ति नाम से जाना जाता है। भक्ति की महत्ता बताने वालों ने यहाँ तक कहा है कि उससे भगवान मिलते हैं। वस्तुतः भावुकता की शक्ति असाधारण है। आदर्शवादियों को महान त्याग बलिदान कर गुजरने की प्रेरणा इसी से मिलती हैं निष्ठुर प्रकृति के स्वार्थी एवं संकीर्ण स्तर के होते हैं उन्हें अपने सिवाय और किसी से लगाव नहीं होता।

भावनाओं का उभार शरीर और मन को भाव विभोर कर देता है। संवेदनशीलता चरित्रनिष्ठा की रीढ़ है। जिसे दूसरों का कष्ट अपने कष्ट के समान लगता है। वह परपीड़न वाला कोई काम नहीं कर सकता। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की मनःस्थिति जिनकी भी होती है उन्हें सेवा सहायता, करुणा, दया की संवेदनाएँ सहज उमंग जाती है उन्हें परपीड़ा अपनी जितनी पीड़ा के समतुल्य लगने लगती है। इस स्तर के लोगों को सन्त कहा गया हैं सन्त की व्याख्या करते हुए उन्हें नवनीत से भी बढ़कर बताया गया। मक्खन अपने ऊपर ताप का प्रभाव पड़ने से पिघलता है, पर सन्त हृदय व्यक्ति दूसरों का दुःख भी सहन नहीं कर सकते वे ऐसे अवसरों पर रुदन करते चुप नहीं बैठ जाते वरन् बढ़-चढ़कर सहायता भी करते हैं। सेवा उनका धर्म बन जाता है। वे अपनी चिंता कम और दूसरों की अधिक करते हैं। दूसरों की सहायता करते हुए उन्हें अपने निजी लाभ से बढ़कर प्रसन्नता होती है।

प्राण सजीवता का ही नहीं, वह साहसिकता का भी चिन्ह है वह सचेतन विद्युत शक्ति है। इसे जीवट शौर्य पराक्रम, स्फूर्ति आदि के रूप में भी देखा जाता है। इससे समूचा व्यक्तित्व होता है। प्रतिभा इसी की बहुलता से निखरती है। यह शरीर और मन को कार्य करने योग्य क्षमता प्रदान करती है। सूक्ष्म साधनों से इन्हें शरीर के इर्द-गिर्द विशेषतया चेहरे और हाथों के आस-पास तेजोवलय के रूप में देखा जा सकता है। प्राणवान व्यक्ति दूसरों को अपने प्रभाव से आच्छादित कर लेते हैं। दुर्बल प्राण दूसरे सामर्थ्यवानों के प्रभाव में आसानी से आ जाते हैं। यह शरीर की जड़ता और आत्मा की चेतना का संयुक्त सम्मिश्रण है। इसी के आधार पर जीवन की गाड़ी गतिशील रहती है। उसके दुर्बल पड़ जाने से मनुष्य, दुर्बल, रुग्ण, निस्तेज, कातर स्तर का हो जाता है। आत्म-विश्वास गवाँ बैठता है। धरावलम्बी स्वभाव अपना लेता है। इसका दुर्बल शरीर से पलायन होने लगता है। जीर्णता छा जाती है और उसका अभाव हो जाने पर मृत्यु आ धमकती है। प्राण के कारण उमंगें उठती रहती है। प्रतिस्पर्धा में उतरने को मन करता है। ऊंचा उठने आगे बढ़ने की इच्छा शक्ति सजीव हो उठती है। यह प्राण आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, व्रत, संकल्प आदि उपायों से बढ़ाया भी जा सकता है। शरीर की तरह इसकी अभिवृद्धि भी संभव है।

भावना, प्राण प्रतिभा के अतिरिक्त चेतना की तीसरी धारा है - विचारणा। वह आरम्भ में अभिरुचि के क्षेत्र में कल्पना रूप में उभरती है। मन की चंचलता प्रसिद्ध है। मस्तिष्क तंत्र की संरचना ही ऐसी है कि उसमें से निरन्तर तरंगें उठती रहती हैं इन तरंगों के साथ कोई भूतकालीन स्मृति अथवा भविष्य की सम्भावना का मानसिक चित्र जुड़ जाता है। यदि यह अनायास ही अनिच्छापूर्वक उभरा है तो देर तक न टिकेगा। जल्दी ही समाप्त हो जायेगा। परि यदि आकाँक्षा, अभिलाषा के आधार पर कल्पना उठी है तो उसके साथ कड़ियाँ जुड़ती रहती है और एक कथा कहानी जैसी शृंखला बन जाती हैं। मन इसी कल्पना लोक में रमण करता रहता है। यह बच्चों की खिलवाड़ जैसा दृश्य है।

मन के ऊपर अंकुश है- बुद्धि का। बुद्धि यह निरीक्षण परीक्षण करती रहती है कि कल्पनाओं में से कौन-सी कार्य में आने योग्य है और कौन अव्यावहारिक? मन की चेतनाओं में से उन्हें कार्य रूप में परिणत किया जा सकता है? कौन साधनों के, परिस्थितियों के, योग्यताओं के विपरीत है? असंबद्ध, कल्पनाओं की बुद्धि रोकती टोकती रहती है जिन्हें बुद्धि का समर्थन नहीं मिलता वे कल्पनाएं धुंधली पड़ती जाती है और समाप्त हो जाती हैं। जिन्हें बुद्धि की मान्यता मिलती है जो उत्साहवर्धक प्रतीत होती हैं उनका ताना-बाना बुना जाना आरम्भ हो जाता है। योजनाएँ बनती हैं और सोचा जाता है कि इच्छा पूर्ति के लिए किन-किन विकल्पों को प्रयुक्त किया जा सकता है बात आगे बढ़ती जाती है और वह समय समीप आ जाता है जब मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए बुद्धि संगत प्रयास चल पड़ते हैं और वह व्यवधानों से टकराता हुआ अभीष्ट निर्धारण तक जा पहुँचता है। क्रिया-कलापों को सफलता तक पहुँचने के लिए पग-पग पर कल्पना और बुद्धिमता का मिला जुला योगदान लेना पड़ता है।

विचारों का एक भाग वह है जो अपनी इच्छा पूर्ति के लिए निरत रहता है, पर वह एक मात्र मन है। इससे आगे भी मन तंत्र के कई विभाग है। एक ऐसा है जो संपर्क क्षेत्र की दूरी तक विचार करता रहता है। देश की, समाज की समुदाय की, परिस्थितियों के संबंध में जानकारियाँ प्राप्त करता है। यह कार्य पत्र, पत्रिकाओं रेडियो, दूरदर्शन, गोष्ठी-कथन आदि द्वारा विदित होता है। साथ ही उसके कारण-निराकरण, औचित्य-समाधान आदि का स्वरूप भी जानने को मिलता है। विश्वकोष जैसी पुस्तकें भी वैसी जानकारियाँ उपलब्ध कराती हैं। स्कूली कक्षाओं में भी विभिन्न विषय के ज्ञान कराये जाते हैं। पुस्तकालयों से भी वह लाभ मिलता है, विचारशील विद्वान, बहुश्रुत बनने का लाभ इन्हीं आधारों के सहारे मिलता है। हर विषय पर निजी कल्पनाएँ करने से भी उसकी गहराई में पहुँचने का अवसर निजी मेधा बुद्धि के सहारे भी मिलता है। जिसके पास विचार सम्पदा जितनी अधिक है उसे उसी स्तर का मनीषी माना जाता है।

विचारों में एक शक्ति सामर्थ्य भी है। वह दूसरों को कथन श्रवण, पठन के माध्यम से जानकारियों का विस्तार तो करती ही है। साथ ही संपर्क में आने वालों को अपने व्यक्तित्व से प्रभावित भी करती हैं। हर स्तर के व्यक्ति की अपनी-अपनी विशेषताओं से भरी हुई विद्युत चुम्बक शक्ति होती है जो समीपवर्ती लोगों पर अपना प्रभाव डालती है। सत्संग से किसी को विचारों द्वारा अवगत और प्रभावित किया जाता है। किन्तु ऐसा भी होता है कि प्रतिभावानों की प्रभाव शक्ति अनायास ही दूसरों पर अपनी छाप छोड़ती है जिन्हें जिस प्रकार के लोगों के साथ रहना पड़ता है वे वैसे ही साँचे में ढलने लगते हैं। बुरे लोगों का जहाँ बहुमत या प्रभाव होता है वहाँ भी यही प्रतिक्रिया होती देखी गई है। यह विचारों का ही चमत्कार है, जिनमें जितनी प्रतिभा होती है वे उतने ही अधिक प्रभावशाली होते हैं। यह प्रभाव उत्तम स्तर का भी हो सकता है और निकृष्ट स्तर का भी। सामान्य लोग उस प्रवाह में बहने लगते हैं। किंतु साथ ही यह भी देखा गया है कि जिनका व्यक्तित्व सामर्थ्यवान है वे दूसरों के प्रभाव को अस्वीकार कर देते हैं। उन्हें कोई समझ नहीं सकता है। उन्हें बदला भी नहीं जा सकता है। आग्रही, हठभावी इसी प्रकार के होते हैं वे अपने को सबसे बड़ा मानते हैं। अहंकार से उनका स्वभाव भरा होता है। ऐसे लोग अपनी मान्यता को सर्वोपरि ठहराते हैं और दूसरों के अभिमत पर विचार करने तक को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को मूढ मति की संज्ञा दी जाती हैं ऐसे जिद्दी पढ़े लिखे लोगों में भी हो सकते हैं और बिना पढ़े में भी। जिनके स्वभाव में लोच होता है वे दूसरों के द्वारा दी गई जानकारियों पर विचार करते हैं और उसमें जितना अंश औचित्यपूर्ण लगता है उतना ग्रहण कर लेते हैं। कुछ अधिक भावुक या कोमल अथवा सहज विश्वासी प्रकृति के होते हैं उन्हें कोई भी बहका सकता है। तर्क और संदेह का अभाव होने से वे किसी के भी फुसलाने से उसी ओर लुढ़क जाते हैं। ठग ओर प्रपंचों ऐसे ही लोगों को अपना शिकार बनाते और उल्टे उस्तरे से हजामत बनाते हैं।

विचारों में परिपक्वता काफी चिंतन मनन के बाद आती है। इसके लिए पक्ष-विपक्ष के तर्क तथा प्रमाण उदाहरण ढूंढ़े जाते हैं और उनका तुलनात्मक विवेचन करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि कौन-सा पक्ष अधिक वचनदार है। न्यायाधीशों को यही करना पड़ता है। वे वादी और प्रतिवादी के कथनों और प्रस्तुत किये गये प्रमाणों की वास्तविकता, अवास्तविकता का विचार करते हैं और जिस ओर से प्रतिपादन अधिक वचनदार प्रतीत होता है उसी पक्ष में फैसला देते हैं। सामान्य जीवन में भी ऐसी स्थिति बार-बार आती है। जब एक ही प्रसंग पर दो प्रकार के या कई प्रकार के मतभेद होते हैं। विचारक को किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व उन सभी तथ्यों की गहराई में उतरना पड़ता है जो सामने प्रस्तुत है। उनमें जिसमें जितना विश्वस्त और जितना अविश्वस्त होता है उसी के आधार पर अपना मत बनाया है और निर्णय किया जाता है। तर्क का आश्रय लिए बिना प्रमाणों की अपेक्षा किये बिना किसी के भी कथन पर जो भरोसा कर लेते हैं वे अवसर धोखा खाते हैं।

कभी-कभी कुछ अपवाद ऐसे भी देखे जाते हैं जिनमें मानस तंत्र अविकसित रहने पर मूढ़ता छाई रहती है। इसके विपरीत कुछ लोग आरम्भ से ही तीक्ष्ण बुद्धि होते हैं। इन अपवादों को छोड़कर सामान्य जनों में माध्यम स्तर की विचारशीलता होती है। पर उसका विकास किस सीमा तक हो सका यह इस बात पर निर्भर है कि बुद्धि का उपयोग किस सीमा तक किया गया। यदि कल्पना ही अपनी उड़ाने उड़ती रहती है तो उसे बचकानापन कहा जायेगा। ऐसे लोग वास्तविकता तक नहीं पहुँच पाते हैं और बेघर की उड़ाने उड़ते रहते हैं। यही बात अतिवादियों के सम्बन्ध में भी है। अति भावुक या अति आदर्शवादी भी व्यावहारिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते और पग-पग पर चूक करते रहते हैं। व्यावहारिकता ही विचारशीलता की कसौटी है। किसी कथन या उल्लेख को ही सब कुछ नहीं मान बैठना चाहिए वरन् देखना चाहिए कि न्याय औचित्य कहाँ है। परिस्थितियों के साथ किस प्रतिपादन का ताल मेल खाता है। इस प्रकार विचार करते रहने पर समयानुसार हर व्यक्ति बुद्धिमान विचारवान बन सकता है।


Quotation

कितनों ने प्रशंसा की, कितनों ने निन्दा की इसे मत देखो। कितना कमाया, कितना गंवाया, यह भी मत सोचो। उस राह को अपनाओ जिसे न्याय निष्ठ अपनाया करते हैं।


साकार उपासना द्वारा प्रतीक पूजा

उपकरणों के माध्यम से शिक्षा देने का अपना विशिष्ट विज्ञान है, उसके बिना बाल बोध की प्रक्रिया बनती ही नहीं। देश भक्ति का स्मरण करने, उसमें तत्परता बनाए रहने के लिए राष्ट्रीय झण्डे का अभिनन्दन किया और कराया जाता है। यों कपड़े की दृष्टि से झंडा भी अपने ढंग से सिया, रंगा कपड़ा भर है। उसे उलट-पुलट कर देखने पर ऐसी कुछ विशिष्टता नहीं दिखती जो अन्य कपड़ों से भिन्न हो। इतने पर भी उसके साथ देश भक्ति की भावना का सम्पुट लग जाने से समस्त देशवासियों के लिए वह प्राणप्रिय श्रद्धास्पद बन जाता है।उसकी रक्षा के निमित्त बड़े बलिदान भी किये जा सकते हैं। यह उपकरण के साथ विचारणा के समन्वय का प्रमाण है। उसे आस्तिक नास्तिक सभी अपने-अपने ढंग से स्वीकार करते हैं। रूस, चीन जैसे अनीश्वरवादी देशों में भी राष्ट्रीय झण्डे के प्रति उच्च भावना का समावेश है। वहाँ भी ध्वजारोहण होता है। ताकि देश-भक्ति की भावना ज्वलन्त बनी रहे, शिथिल न होने पावे। इस स्थापना का मानव मनोविज्ञान का गहरा सम्बन्ध है, उसे झुठलाया नहीं जा सकता।

इस्लाम धर्म में उगता चाँद। ईसाई धर्म में क्रूस। हिन्दु धर्म में स्वस्तिक को प्रतीक चिन्ह माना जाता है उनके प्रति समुचित श्रद्धा व्यक्त की जाती है और इन प्रतीकों को यथास्थान प्रतिष्ठित भी किया जाता है। यह निर्धारित धर्म एवं संस्कृति के प्रति उच्चस्तरीय भाव संवेदना बनाये रखने के लिए है। यों इनका भौतिक विश्लेषण किया जाय तो उनकी उत्कृष्टता के सम्बन्ध में कुछ ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किये जा सकते। उगता चाँद आसमान का एक दूरवर्ती पिण्ड है। क्रूस लकड़ी या धातु से विनिर्मित एक पदार्थ है। स्वस्तिक आड़ी टेड़ी लकीरों का एक आकार विशेष है। इन सभी में क्या विशेषता है? इसकी बौद्धिक व्याख्या कर सकना कठिन है। फिर भी कोटि- कोटि मानवों के हृदयों में इनके प्रति जो मात्र संवेदना है, उसे जीवन्त एवं जागृत रखने की दृष्टि से इन प्रतीकों का बहुत बड़ा मूल्य है। इन मूल्यों को उपेक्षा अवमानना द्वारा अमान्य ठहरा दिया जाय तो मानवी समाज का एक बहुत बड़ा अहित हो जायेगा। श्रद्धा डगमगा जाने से वे अपने-अपने मूलभूत आधारों को अपनाये न रह सकेंगे। गड़बड़ा जायेंगे और जिन सीढ़ियों पर चढ़कर ऊँचा उठने का प्रयत्न कर रहे हैं, उनके हट जाने पर एक झटका लगने घाटा पड़ने जैसा अनुभव करेंगे।

तर्क मात्र का प्रयोग किया जाय तो इस पद्धति की कोई प्रत्यक्ष संगति नहीं बैठती। कबूतर एक पक्षी है। उसका नामकरण भी हर देश में अपने-अपने ढंग से है। ऐसी दशा में वर्णमाला के अक्षरों के साथ पशु-पक्षियों की संगति बिठाने में क्या तुक हो सकती है? इतने पर भी विज्ञजनों ने आवश्यक समझा है कि अविकसित मस्तिष्क की स्मरण शक्ति का स्तर देखते हुए यही उचित है कि विनिर्मित परिपाटी को यथावत् जारी रखा जाय।

देवालयों में प्रतिष्ठित प्रतिमाओं में ईश्वर को प्रतिनिधि मानकर उस पर श्रद्धा का केन्द्रीकरण- आरोपण किया जाता है। यह लौट कर प्रयोक्ता के पास वापस आ जाता है। रबड़ की गेंद को जिस निशाने पर मारा जाता है, टकराने के उपरान्त वह वहीं लौट आती है जहाँ से कि चली थी। श्रद्धा को प्रतिमा पर आरोपित करने के उपरान्त वह लौटकर वहीं वापस आ जाती है। भावनाशील की श्रद्धा अपेक्षाकृत और भी अधिक बढ़ जाती है। गुम्बज में जोर की आवाज करने पर वह गूँज जाती है और उच्चारण करने वाले को अधिक गुनी होकर सुनाई पड़ती है। दर्पण में अपनी ही प्रतिच्छवि दीख पड़ती है। श्रद्धालु को आत्मिक क्षेत्र का साधना सम्पन्न समर्थ कहा जाता है।

झाड़ी का भूत और रस्सी का सर्प बन जाता है और अपनी डरावनी प्रतिक्रिया भी दिखाकर रहता है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मृतिका मूर्ति बनाई थी और श्रद्धा के आधार पर इतना सशक्त बना लिया था कि वह कौरव पाण्डवों से भी अधिक अभ्यास उसे करा सकी। मीरा के गिरधर गोपाल और परमहंस की महाकाली जिस प्रकार के चमत्कार दिखा सके उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि श्रद्धा की शक्ति प्रत्यक्ष है। वह जहाँ भी आरोपित की जाती है, वहीं अपना फलितार्थ दिखाने लगती है। देव मान्यताओं के पीछे जो चमत्कारों की शृंखला जुड़ी है उसे साधक की श्रद्धा ही कहा जा सकता है।

प्रतिमा वस्तुतः रहती तो वही है जो मूलतः थी। मूर्तिकार की दुकान में जब तक रहती है तब तक वह एक बड़ा खिलौना ही रहती है। उसे जब देव वेदी पर प्रतिष्ठित करके प्राण भरने की प्रक्रिया अपनाई जाती है तो संपर्क में आने वाले उसे प्राणवान मानने लगते हैं। जिनकी जैसी भावना होती है, उन्हें तद्नुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई परिलक्षित होने लगती है, किन्तु जो इस मान्यता को अस्वीकार करते हैं उनके लिए वह फिर अपने असली रूप में आ जाती है। कितने प्रतिमा विरोधियों ने कितनी ही प्रतिमाओं को खण्डित किया है, पर इससे उनको किसी देवता का क्रोध प्रतिशोध नहीं सहना पड़ा। क्योंकि उनने उसे देव मान्यता से ही इन्कार किया था। क्योंकि उनने उसे देव मान्यता से ही इन्कार किया था। मात्र पत्थर माना था। अतएव उतना ही कुछ हुआ जो पत्थर को तोड़ने से हो सकता है। किन्तु जिनकी श्रद्धा गहरी है उन्हें उसके स्तर का प्रतिफल भी मिलता है।

क्या प्रेम का एक पक्षीय निर्वाह हो सकता है? यह एक मनोवैज्ञानिक प्रश्न है। पत्थर को इष्ट देव मानकर उसके प्रति गहरी भक्ति भावना जमाने का प्रयत्न किया जाता है। उसे सजीव मानकर जीवितों की तरह उसके भोजन, वस्त्र, शृंगार, सज्जा आदि का भी प्रबंध किया जाता है। समय-समय पर नमन, वंदन, पूजन, अर्चन आदि भी होता रहता है। नैवेद्य, मिष्ठान, पकवान आदि भी चढ़ाये जाते हैं किन्तु बदले में देवता की ओर से उस स्नेह समर्पण को स्वीकार करने तक का शिष्टाचार नहीं निभाया जाता है। प्रतिफल देना या कृतज्ञता प्रकट करना तक नहीं बन पड़ता। यह एकाँगी प्रेम हुआ। भक्त अपनी ओर से बहुत कुछ करता है, पर दूसरा पक्ष सर्वथा उपेक्षा ही बरतता रहता है। फिर भी रिश्ता टूटता नहीं। वह यथावत् बना ही रहता है। यही रीति-नीति लोक व्यवहार में भी चरितार्थ हो सकती है। अपनी ओर से मैत्री का परिचय दिया जाय, अपने कर्तव्य का निर्वाह करते रहा जाय। यह न देखा जाय कि बदले में वैसा ही कुछ किया गया या नहीं। अनुदान का प्रतिदान मिला या नहीं? यह एक पक्षीय श्रद्धा संवेदन प्रतिमा पूजन से निभ सकता है तो जीवित मनुष्य पड़ोसी परिचितों में क्यों कर नहीं हो सकता? इस संभावना को भाव क्षेत्र में जमाने के लिए प्रतिमा पूजन का सहारा लिया जाता है। इसमें प्रतिमा को तो कोई लाभ नहीं होता किन्तु जिनने यह भक्ति भाव प्रकट किया है उसका आत्मोत्कर्ष निश्चित रूप से होता है।

जिन देवी देवताओं की पूजा, प्रतिष्ठा की जाती है उनसे संबंधित कथा गाथाओं से ऐसे तत्व जुड़े होते हैं जिनके अवगाहन से उच्चस्तरीय आदर्शवादिता एवं उदारता का परिचय प्राप्त होता है। इन्हें भावनापूर्वक पढ़ा, सुना, समझा जाय तो उसका प्रभाव पड़ता है और श्रेष्ठता की दिशा में अग्रगमन करने के लिए साहस उमंगता है। देव पूजा का यह प्रतिफल साधक को मिलता है, देव सत्ता तो उससे अप्रभावित ही बनी रहती है। इस प्रकार साकार पूजा प्रकारान्तर से अपने लिए ही सत्य परिणाम उत्पन्न करती है। जिन्हें पूज्य माना गया है, इष्ट देव मानकर भक्ति प्रकरण आरम्भ किया गया है, उन तक यह पूजा पहुँचती है। उन्हें कुछ प्रसन्नता या सुविधा देती है, यह कहा नहीं जा सकता। वरदान अपने ही विकसित अन्तराल में प्रस्फुटित होते हैं।


बुरी आदते सुधारों (Kahani)

अमेरिका के राष्ट्रपति उडरो विल्सन जब छोटे थे तो उन्हें गप्पे लड़ाने की बड़ी आदत थी। लोग उनकी बातों पर सहसा विश्वास न करते। पर बड़े होने पर वे बदल गये और अपने गुणों के कारण अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिये गये।

राष्ट्रपति होने के बाद वे अपनी ननसार गये और अपनी वृद्धा नानी से कहा - “ इस बार में अध्यक्ष चुन लिया गया।” नानी ने कहा- ‘किसका? विल्सन ने कहा- “अमेरिका का”।

इस पर बुढ़िया ने हंसते हुए कहा- तू बूढ़ा होने को आया, पर अभी तक तेरी गप्पे हाँकने की आदत नहीं छूटी।

इसीलिए कहा जाता है कि - अगर अभी अपनी बुरी आदते नही सुधरी , तो ये आदते अंत तक हमारे अन्दर बनी रहती है ।


दमन अपने आपे का

धर्म लक्षणों की गणना में तीसरा सोपान “दम” का आता है। दम का अर्थ है, दमन। दमन किसका? अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्र में संव्याप्त अवाँछनीयताओं का।

विषय अध्यात्मिक का होने से यहाँ सर्वप्रथम अपने अन्तरंग क्षेत्र को प्रधानता देनी होगी और देखना होगा कि अपने भीतर कितना किस प्रकार का कूड़ा करकट किस-किस दुष्प्रवृत्ति के रूप में वहाँ जम गया है। अनुपयुक्तता अपने गुण, कर्म, स्वभाव में जिस रूप में भी जम गई हो वहाँ से उसे बुहार बाहर किया जाय। कुछ घटक ऐसे होते हैं जिन्हें बुहारने भर से काम नहीं चलता, वरन् उसे किसी गड्ढे में दबा दिया जाता है, जिससे वहाँ गढ़ा रह कर खाद बनने लगे। यह दबा देना भी दम है। इसके अतिरिक्त दबोच देना भी दम है। घर में रहने वाले, बिच्छू, साँप, कनखजूरे, बर्र, ततैये आदि को निरस्त ही करना पड़ता है। सिर में रहने वाले जुएँ और पलंग के छिद्रों में बैठे खटमलों को दबोचे बिना काम नहीं चलता। न दबोचा जाय तो वे अपने ऊपर हावी होते हैं, और जीना दूभर करते हैं। मक्खी, मच्छरों को पालते तो नहीं रहा जा सकता, गली में शौचालय में उत्पन्न होने वाले कृमि कीटकों को फिनायल, चूना आदि छिड़क कर निरस्त ही करना पड़ता है। अवाँछनीयता को निरस्त करना दबाना भी धर्म का ही एक अंग है। अनुचित बढ़ेगा तो चुप नहीं बैठा रहेगा, जो उचित है उसे प्रसेगा। फसल के कीड़ों से न निपटा जाय तो उगाये अन्न को पक कर घर तक पहुँचने से पहले ही समाप्त कर देंगे। इसलिए अवाँछनीयता के विरुद्ध संघर्ष को उचित माना गया है और उसे कई बार तो सराहा भी गया है।

मनुष्य स्वभाव में विलासिता, चटोरपन, असंयम, आलस्य आदि अनेकों दुर्गुणों की घुस-पैठ हो जाती है। आवेश में आने और कटुवचन बोलते रहने की भी आदत पड़ जाती है। फिजूल खर्च और कुकल्पनाएँ भी कम हानिकारक नहीं है। नशेबाजी स्वभाव का अंग बन जाने से छूटने का नाम नहीं लेती और छुड़ाने पर विद्रोह खड़ा करती है। क्या इन्हें इसी रूप में सहन करते रहा जाय? क्या उनके विरुद्ध कोई कदम न उठाया जाय? कोई संघर्ष न छेड़ा जाय?

कहा गया है मनुष्य जन्म चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते हुए पाता है। उसके साथ अनेक निष्कृष्ट योनियों के स्वभाव जुड़े आते हैं और वह जन्म-जात रूप में कुसंस्कारों के भण्डार के रूप में होता है। उस अनगढ़ स्थिति को नर पशु या शूद्र कहा गया है। मानवी गरिमा के अपने उत्तरदायित्व और अनुशासन हैं। वे सीखने और सिखाने पड़ते हैं। बोलना किसी को जन्म से नहीं आता, जो उच्चारण सुनता है, उसका अर्थ और क्रम समझते-समझते स्वयं भी बोलने लगता है। लिखना, पढ़ना माँ के पेट से सीखकर नहीं आता। अक्षर ज्ञान और शब्दकोष स्कूल की रगड़ाई जैसी पढ़ाई से ही सीखी जाती है। कला कौशल भी सीखे सिखाये जाते हैं। यह आशा करना व्यर्थ है कि सत्प्रवृत्तियों की विभूतियाँ अनायास ही उग पड़ेंगी। हेय वातावरण में पले बालक तो प्रायः कुसंस्कारी ही पाये जाते हैं।

अपने नाक, कान, आँख, पीठ, कंठ, तालु, दाँत तक को हम स्वयं नहीं देख सकते तो दुर्गुणों को किस प्रकार देख पायेंगे। इन कमियों को विचारशील गुरुजन बताते हैं और मनुष्य तथा पशु के स्तर का अन्तर समझाते हुए यह बताते हैं कि यह करने योग्य है, यह नहीं। यह छोड़ने योग्य है और यह बढ़ाने योग्य। इस सुधार परिष्कार प्रक्रिया के आधार पर ही व्यक्तित्व निखरता है और व्यक्ति पशु से मनुष्य बनता है। इस प्रक्रिया को न अपनाया जाय तो मनुष्य भी वनमानुष की तरह पुत्री, भगिनी या माता से सन्तानोत्पादन करने लगेंगे। निर्वस्त्र घूमेंगे और मल-मूत्र त्यागने के उपरान्त सफाई करने की आवश्यकता न समझेंगे।

जन्मजात रूप से हर मनुष्य इसी कुसंस्कारी स्थिति में उत्पन्न होता है। उसे शालीनता, शिष्टता अभिभावकों और गुरुजनों से सीखनी पड़ती है। लोक व्यवहार के प्रभावों से भी बहुत कुछ सीखा समझा जाता है। क्या उचित है क्या अनुचित इसे दूसरे बता सकते हैं। स्वाध्याय और सत्परामर्श से भी यह जाना जा सकता है। पर वह सुधार परिवर्तन करना स्वयं ही पड़ेगा। हम आहार निद्रा, शिक्षा, मल-मूत्र त्याग आदि कार्य स्वयं अपने बलबूते ही करते हैं। ठीक इसी प्रकार सुसंस्कारिता संवर्धन भी स्वयं ही करना पड़ता है। दूसरे रास्ता बता सकते हैं, पर अपने के बदले वे चल नहीं सकते। चलना तो अपने पैरों द्वारा बन पड़ेगा। साथ ही आत्म-परिष्कार भी होगा।

मन और इन्द्रियाँ इतने प्रकार की ललकें इतनी भीतर संजोये हुए हैं, जिनका कोई अन्त नहीं। महत्वाकाँक्षाओं की कोई सीमा नहीं। आवश्यकताएँ तो पूरी की जाती हैं, पर तृष्णायें तो ऐसी आग हैं, जिनमें ईंधन डालते चलने पर वह अधिकाधिक प्रज्वलित ही होती जायेगी। मन न जाने कितना बड़प्पन और वैभव चाहता है। इन्द्रियों की ललक है कि जितने विलासी उपभोग इस दुनिया में हैं वे सभी अपने को उपलब्ध हो जाय। अहंकार इतना उद्धत है कि वह रावण की तरह देवताओं तक को नीचा दिखाना और पाटी से बाँध कर रखना चाहता है। यही तीनों वासना, तृष्णा और अहंता की दुष्प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं जो उन्मादी पर चढ़े भूत की तरह हर घड़ी छाई रहती है और अनुशासन ढीला पड़ते ही वह कर-गुजरती है जो नहीं ही किया जाना चाहिए था।

अन्तरंग में विचारणाएँ जमती हैं और शरीर को आदतें अपना वशवर्ती बनाकर कठपुतली की तरह नचाती है। बेचारा विवेक, न्याय और औचित्य तो किसी कोने में ही पड़ा सड़ता रहता है। उनकी कोई खैर खबर तक नहीं लेता। इस दयनीय दुर्दशा में अपने-अपने को उबारने के लिए जो आक्रोश एवं साहस भरे प्रयत्न किये जाते हैं, उन्हें ही दम कहते हैं। जिस प्रकार हिंस्र जन्तुओं का, आततायी तस्करों का दमन किया जाता है, उसी प्रकार अपनी भीतरी और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों से लड़ा जाना चाहिए और उन्हें उल्टी से उलट कर सीधा किया जाना चाहिए।

आत्म परिशोधन सबसे अधिक सरल भी है और सबसे अधिक कठिन भी। सरल इस बात में कि हम जब पशुओं, परिजनों, नौकरों से मनमर्जी का काम करा सकते हैं तो अपने आप को गलत दिशा में मोड़ मरोड़ कर सीधे रास्ते चल पड़ना क्यों दुस्तर होना चाहिए। कठिन इसलिए है कि आदतें विषाणुओं की तरह नस-नस में कण-कण में, चिन्तन-चरित्र और व्यवहार में इस प्रकार जड़ें जमा लेती हैं जिन्हें सहज ही छुड़ा सकना कठिन पड़ता है। चिपकी हुई जोंक पेट भर कर खून पी लेने पर ही छूटती है। भले ही खींचने पर वह टूट क्यों न जाय। दुष्प्रवृत्तियों का बुरी आदतों का स्वरूप भी प्रायः ऐसा ही है। समझाने बुझाने से तो वे मानती भी नहीं उनके लिए तब तितीक्षा स्तर का कदम उठाने की आवश्यकता पड़ती है और अपने अन्दर वाले भगवान और शैतान के बीच खड़े किये गये इस महाभारत में स्वयं दर्शक मात्र न रहकर अर्जुन की तरह गाण्डीव सधाने की और हस्त की प्रकृष्टता अपनानी पड़ती है जिसे सारा मैदान तीरों से तापे दिया जाय।

सपेरा हर समय साँप को पालते, खिलाते हुए भी उसकी हरकतों पर पूरा ध्यान रखता है अन्यथा उसे जान से हाथ धोना पड़ सकता है। शेरों से सरकस में मनमाने काम कराने वाले रिंग-मास्टर कितने कौशल और साहस का परिचय देते हैं। ठीक ऐसा ही पराक्रम अपने को पशु-स्तर से परिवर्तित करके सुसंस्कारी मनुष्य स्तर का देवोपम बनाना पड़ता है। इस तीखी मीठी सुधार और दुलार की उभय-पक्षीय प्रक्रिया का नाम ‘दम’ है। अन्य किसी को दबाना भले ही विचारणीय हो पर अपना दमन प्रशिक्षण परिवर्तन तो करना ही चाहिए।


नशेबाज मसखरा (Kahani)

एक साधू ने नशेबाज को तालाब के किनारे चलते देखा  तो साधु ने कहा- पैर डगमगाते ही गहरे गड्ढे में गिर पड़ोगे।

नशेबाज मसखरा भी था उसने कहा- स्वामीजी आप भी जो व्यवसाय कर रहे हैं उसमें चूके तो अनेकों अनुयायियों का बेड़ा गरम करेंगे।


आत्म पटल पर अंकित हो, परमतत्व! तेरी ही झाँकी

कुरूपता इस विश्व में किसी को भी प्रिय नहीं है। सुन्दर व्यक्ति की ओर ही नहीं वस्तुओं की ओर भी लोग खिंचे चले जाते हैं। प्रातःकाल बगीचे में जब फूल खिले हुए होते हैं तो वे कितने सुन्दर लगते हैं कि आंखें फेरने का जी भी नहीं करता, प्रकृति जहाँ सुरभित, पुष्पित और पल्लवित होती है, झरने झरते हैं, पक्षी कूकते हैं, वहाँ का दृश्य देखकर आत्म विभोर हो उठते हैं। सौंदर्य आत्मा की चिर-पिपासा है। सौंदर्य में ही जीव को आनन्द मिलता है। सुन्दर बनने की अभिलाषा भी आध्यात्मिक है। इसलिए इसे प्राप्त करना मनुष्य का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव ही है।

सौंदर्य की परिभाषा करते हुए प्रसिद्ध कवि कीट्स ने लिखा है- “सौंदर्य ही सत्य है और सत्य ही सौंदर्य है।” इससे यह स्पष्ट है कि सत्य स्वरूप परमात्मा का प्रकाश ही सौंदर्य के रूप में परिलक्षित होता है। अतः सौंदर्य की कामना मनुष्य की आत्मिक आवश्यकता है। परम सत्ता का अंतः पटल पर अंकित होना ही वास्तविक सौंदर्यवान बनना है। इस सौंदर्य के बिना जीवन का महत्व कुछ नहीं है। सत्य, शिव और सुन्दर ये सब परमात्मा के ही स्वरूप हैं इसलिए इन्हें प्राप्त करने का प्रयास करना परमात्मा को प्राप्त करने का ही तो प्रयास हुआ।

भूल यह है कि मनुष्य ने पदार्थ की संरचना को सौंदर्य मानकर उसका एक काल्पनिक ढाँचा बना कर रक्खा है। परमात्मा अनित्य और सर्वकालिक है इसलिए बदलते रहने वाले स्वरूप को सौंदर्य नहीं मानेंगे। स्वरूप में प्राण की आकर्षक स्थिति का नाम ही सौंदर्य है। सौंदर्य सत्य है इसलिए वह भौतिक नहीं हो सकता, अपवित्र नहीं हो सकता। विचारणीय है कि आज जो सौंदर्य की परिभाषा की जा रही है क्या इसमें भी कुछ सत्यता है?

“आत्मकथा” में महात्मा गाँधी जी ने लिखा है- “वास्तविक सौंदर्य हृदय की पवित्रता में है। बाह्य बनावट और प्रदर्शन से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह जो रूप की सजावट, वेष विन्यास में विचित्रता का प्रसार बढ़ रहा है यह आँतरिक सौंदर्य को छलता है, इससे बचना चाहिए। मनीषी डॉ. वाल्श का भी मत ऐसा ही है। वे लिखते हैं- “सुन्दरता का सद्गुणों के साथ संयोग होना, हृदय का स्वर्ग है। यदि उसके साथ दुर्गुण हैं तो वह नरक के समान है। मूर्ख लोग सौंदर्य के बाह्य स्वरूप की पूजा करते हैं इसलिए वे निन्दा के पात्र बनते हैं।”

मनीषियों का निर्देश है कि आप खुलकर काम कीजिए। बंधे-बंधे से न रहिए, अपने हाथ-पाँवों को थोड़ा इधर-उधर हिलाइये-डुलाइये। आपका रक्त संचालन ठीक रहेगा, नाड़ियाँ ठीक काम करेंगी, शरीर साफ रहेगा तो आपके शरीर में प्राण और ओज रहेगा। प्राणवान व्यक्ति काले-कलूटे होने पर भी बड़े मोहक लगते हैं। बाहरी बनावट से थोड़ी देर के लिए भले ही प्रसन्न हो सकें, अन्ततः कोई लाभ न निकलेगा। उद्विग्नतायें ही परेशान करती रहेंगी। फारसी कहावत है- “ह्जयते मश्शाता नेस्त रुम दिलाराम रा।” अर्थात् सौंदर्य को सजावट की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे ही सौंदर्य को प्राप्त करने का प्रयास करें तो हम सच्चे सौंदर्य पारखी माने जायेंगे।

स्वस्थ स्वभाव से सौंदर्य मिलता है। मानसिक कमजोरियाँ ही कुरूपता का कारण हैं। भली आदतों का सम्बन्ध मनुष्य की मानसिक शुद्धता से है, मानसिक चेष्टायें सत्कर्मों में आनन्द लेती रहती हैं तो शरीर और मन की शक्तियाँ प्रखर बनी रहती हैं। इससे अपनी सुन्दरता भी अक्षुण्ण रहती है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि शक्तियों का संचय ही सौंदर्यवान होने का लक्षण है। दीन-दुर्बल और मानसिक उत्तेजनाओं में घिरे रहने वाले व्यक्तियों की न तो बाहरी सुन्दरता स्थिर रहेगी और न आँतरिक ही।

सुन्दरता, आपकी प्रसन्नता, मुस्कराहट, उत्तम स्वास्थ्य, आशा युक्त निश्चित जीवन, हर्ष और उल्लास में छिपी हुई है। अपने जीवन को मनहूस बनाना, साधनों वस्तुओं के लिए बुरी तरह रोते-झोंकते रहना बड़ा बुरा लगता है, ऐसे लोगों के पास किसी भी मनुष्य का बैठने का जी नहीं करता। हंस-मुख व्यक्तियों को लोग हर वक्त घेरे रहते हैं क्योंकि उनके जीवन में उल्लास होता है। ऐसे भावों की स्थिरता सुन्दर बनने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। तनावपूर्ण मानसिक स्थिति एक प्रकार का विकार है जिससे सौंदर्य-युक्त चेहरों पर भी उदासी छाई रहती है। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, घृणा, चिंता, उत्तेजना आदि से मनुष्य का व्यक्तित्व अनाकर्षक बनता है, इससे मनुष्य का आँतरिक सौंदर्य नष्ट हो जाता है। इनसे दूर ही रहना चाहिए।

सौंदर्य महानता का चिन्ह है। हिन्दुओं के देवी-देवताओं के मुख पर एक प्रकार का प्रकाश दर्शाया जाता है, इसे “तेजोवलय” कहते हैं। दूसरी संस्कृतियों में भी इसी तरह के मुख मंडल चित्रित किये जाते हैं और वह तेज तथा शक्ति के रूप में महापुरुषों में विद्यमान होता है। उसकी ओजस्विता, मृदुता और दया भाव से इस सौंदर्य का आभास होता है। वैसी ही विचारणायें अपना कर हम भी अपनी तेजस्विता जागृत करें तो सौंदर्य का संतोष हम भी प्राप्त कर सकते हैं। मनुष्य की गति सुन्दर वस्तुओं से सुन्दर भावनाओं की ओर, सुन्दर मनोभावों से सुन्दर जीवन की ओर होती है। जीवन की सुन्दरता ही पूर्ण सौंदर्य के दर्शन कराने में समर्थ होती है।

सुन्दर गतिविधियों का तात्पर्य मनुष्य की सरलता से है। उसकी निश्छलता, सरसता, गुण- ग्राहकता और मधुरता पर लोगों का अंतःकरण बरबस ही आकर्षित हो जाता है। खूबसूरत डाकू के मुख पर जो आतंक का भाव छाया रहता है उससे लोग भयभीत हो जाते हैं, इस सौंदर्य की कुटिलता मानकर लोग पास भी नहीं जाते। कामुकता भी इसी तरह सौंदर्य का महान दुर्गुण है। आकर्षक व्यक्तित्व तो शील और सद्गुणों के प्रकाश से बनता है। प्रेम में, दया और ईमानदारी में जो सुन्दरता भरी है लोग उसी से प्रभावित होते हैं। नकली चेहरे सजाकर बच्चों का मनोरंजन करने से अधिक लाभ नहीं हो सकता। शील स्वभाव में वह चुम्बकत्व होता है जो सभी के दिलों को मोह लेता है। भलमनसाहत लोगों को प्रिय लगती है। इन्हें ही सौंदर्य के उपकरण मान सकते हैं।

प्रेम-भावनाओं का सौंदर्य बड़ा आकर्षक है। ऋषियों के आश्रमों में प्रेम और आत्मीयता के प्रबल संकल्प गूँजा करते थे। इसी कारण वन्य पशु भी निर्भय होकर वहाँ विचरण करते थे। ऋषियों के बालक स्वच्छन्दता-पूर्वक हिंसक पशुओं से खेला करते थे और उनसे मैत्री स्थापित कर लेते थे। आँतरिक सौंदर्य की आभा बोलती थी, वहाँ, इसी से आकर्षित होकर जीव-जंतु भी वहाँ रहना अधिक पसन्द किया करते थे।

डॉ. ड्रिसडेन का यह कथन नितान्त सत्य है- “जब सौंदर्य रक्त में उबाल पैदा करता है तब प्रेम मस्तिष्क को बहुत ऊँचा उठा देता है।” सौंदर्य भेदभाव की कटुता का बहिष्कार करता है। इसी एक सार्वभौमिक सत्य पर इस संसार की व्यवस्था अनेक युगों से चलती चली आ रही है और जब तक सौंदर्य का एक भी कण इस धरती पर जीवित रहेगा, यह क्रम निरन्तर इसी तरह चलता रहेगा। सृजन की इस शक्ति को बनाये रखने के लिये प्रेम, दया, सेवा, उदारता, सहयोग, करुणा, स्वच्छता आदि दैवी गुणों का अभ्यास बनाये रखना होगा।

दुष्टता, मलिनता, अस्वच्छता और मानसिक दुर्भावनाओं के कारण जो अपनी शक्तियों का ह्रास करते हैं। वे अपनी कुरूपता बढ़ाते हैं। धन और सम्पत्ति के अभाव में भी यदि अपने सद्गुणों को विकसित रखा जाय तो अपनी मोहक शक्ति ज्यों की त्यों बनी रहेगी। धनवान होना सौंदर्य का लक्षण नहीं, शरीर की सजावट में भी आकर्षण नहीं है। जो वस्तुएं बलात् अपनी ओर खींच लेती है वह हैं व्यक्ति की सद्भावनायें। आँतरिक निर्मलता पल में दूसरों को मोह लेती है, लोग पीछे- पीछे दौड़े चले आते हैं।

सुन्दर बनने के लिए बाहरी साधन जरूरी नहीं है। यह भ्रान्त धारणा है कि अधिक बनाव, शृंगार करेंगे तो अधिक लोग आकर्षित होंगे। अपने मस्तिष्क से निकालकर अपने अंतःकरण के सौंदर्य को खोजने का प्रयत्न कीजिए। आपकी प्रसन्नता में आपके सुखद विचारों में सुन्दरता भरी हुई है उसे जागृत कीजिए। सच्चा सौंदर्य मनुष्य के सद्गुणों में है। हम गुणवान बनें, तेजस्वी बनें तो सौंदर्य हमारा साथ कभी न छोड़ेगा।


आस्तिकता विवेकवानों को ही फलती है!

आस्तिकता मानव जीव में समाहित उत्कृष्टताओं का मापदण्ड है। सर्वव्यापी परमेश्वर हमारे गुप्त प्रकट सभी कृत्यों को जानता है और तद्नुसार भला-बुरा कर्मफल प्रदान करता है। इस मान्यता के आधार पर ही हमारी नीतिमत्ता सुरक्षित रहती है। नास्तिक निरंकुश होता है। उसे उद्दंडता अपनाने में दैवी अनुशासन का भय नहीं रहता। तत्काल फल न मिलने पर वह इतनी दूरदर्शिता नहीं अपना पाता कि यहाँ देर है अन्धेर नहीं। जिसे कर्म-फल पर विश्वास होगा पाप से डरेगा और पुण्य परमार्थ के संचय में निरत रहेगा। यही है सर्वतोमुखी प्रगति और सुनिश्चित सुख शान्ति का मार्ग।

परब्रह्म को सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय भी कहा जा सकता है। दूसरों शब्दों में वह उत्कृष्ट, आदर्शवादी भी है। ईश्वर उपासना का तात्पर्य है- उसी के ढाँचे में अपने गुण, कर्म, स्वभाव को ढालना। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखना। सज्जनोचित सदाशयता से अपने आपे को ओत-प्रोत करना। आस्तिकता की यही अवधारणा वास्तविक है और श्रेयस्कर भी। जहाँ वह रहेगी वहाँ आध्यात्मिकता भी आत्मावलम्बन के रूप में रहेंगी और व्यवहार में धार्मिकता, कर्तव्य परायणता के रूप में दृष्टिगोचर होती रहेंगी।

सच्ची आस्तिकता में साधक परमेश्वर को आत्म समर्पण करता है। उसके अनुशासन में चेतना है, अपनी रीति-नीति ऐसी बनाता है जो ईश्वर भक्त को शोभा देती है। नाला अपने आपको जब नदी में मिलाता है तो उसी के प्रवाह में, उसी के अनुरूप बहता है। ईंधन जब अग्नि को समर्पित होता है तो अपने में आग के सारे गुण समाविष्ट कर लेता है। समर्पण ही ईश्वर भक्ति है। उसमें कामना के लिए याचना के लिए कोई गुँजाइश नहीं रहती। केवल उसी की इच्छा को समझाने, अपनाने के लिए तैयार करना पड़ता है। दृष्टिकोण में ऐसा बदलाव लाना पड़ता है कि कामनाएँ, तृष्णाएँ, महत्वाकाँक्षाएँ शेष न रहें, केवल प्रभु की इच्छा बना लेने कायाकल्प जैसा सर्वतोमुखी परिष्कृत प्रयास चल पड़े। इसकी सीधी परिणति होती है- चिन्तन में, चरित्र में, व्यवहार में आदर्शवादी उत्कृष्टता का समावेश। जीवन-क्रम में जितनी शालीनता भर चले तो समझना चाहिए कि उससे उतनी ही सार्थक भक्ति भावना सध नहीं है।

देखा जाता है कि तथाकथित भक्तजन तथ्यों के सर्वथा विपरीत मानस बनाये रहते हैं और प्रतिकूल आचरण से व्यक्तित्व को भरे रहते हैं। देवताओं को जिन-तिस कर्मकाण्ड के सहारे अपना गुलाम बनाने की चेष्टा करते हैं और उनसे उचित अनुचित मनोरथ पूरे कर लेने की मनौती मनाते रहते हैं। इसी प्रयोजन के लिए छुट-पुट भेंट-पूजाएँ चढ़ाते और स्तवन के रूप में वे प्रशंसा के पुल बाँधते हैं। यह समूचे आडम्बर एक ही प्रयोजन के लिए होते हैं कि मनोकामनाएँ पूरी होने लगें। संकट टलते रहें और प्रतिकूलताओं का अनुकूलता के रूप में परिवर्तन बन पड़े, वातावरण बदले। परिस्थितियाँ अनुरूप अनुकूल ढलें।

इसे कहते हैं थोड़ा देकर बहुत पाने का व्यवसाय। समझना चाहिए कि चिड़ियों और मछलियों को जरा से चारे का लोभ दिखाकर जाल में फंसाया और उनका मलीदा बनाया जाता है। देवताओं की पूजा पत्री करते समय भी यही रीति-नीति अपनायी जाती है। उनसे मनचाहा माँगने और हठपूर्वक पूरा कराने का आग्रह रहता है। जिसकी पात्रता नहीं है उसके लिए भी अनुग्रह माँगा जाता है जो न्यायोचित नहीं है, उसे भी देने के लिए कहा जाता है। यह विचार नहीं किया जाता कि देवता को भी उचित अनुचित का न्याय अन्याय का विचार करने के लिए अवसर मिलना चाहिए। वे तनिक-सी पूजा सामग्री के लोभ में औचित्य को तिलाँजलि देते रहें और जो माँगा गया है उसे देते रहें तो फिर पात्रता विकसित करने की किसी को क्या आवश्यकता रहेगी? फिर ‘सब धान बाईस पसेरी’ के भाव बिकेगा। जो भी पूजा का प्रलोभन दिखायेगा। जो भी प्रशंसा के पुल बाँधेगा-वह भक्त कहलायेगा। जो माँगे सो पावे की रीति चल पड़ी तो फिर पात्र कुपात्र का-खोटे खरे का-विचार करने की क्या आवश्यकता रह जायेगी? कर्मफल का सिद्धान्त कहाँ जीवित रहेगा? परिश्रम के प्रयास पात्रता के अनुरूप पाने का सिद्धान्त तो समाप्त हो जायेगा। रिश्वत का ही बोलबाला चल पड़ेगा। लोक व्यवहार में तो लाभाँश का एक बड़ा भाग रिश्वत में देना पड़ता है। पर देवताओं को तो थोड़े से में ही फुसलाया जा सकता है। उनके लिए तो अक्षत, पुष्प जैसी पाई पैसे की रिश्वत ही पर्याप्त समझी जाती है। चापलूस, झूँठी प्रशंसा के पुल बाँधते और भोले लोगों को मूर्ख बनाकर उनकी जेब काटते हैं। देवताओं को ऐसी ही बाल-बुद्धि का समझा जाय और उन्हें झुनझुना, गुब्बारा देकर फुसलाने का जुगाड़ बिठाया जाय तो इसे अनहोनी बनाकर दिखाने का बाजीगर ही समझा जायेगा। तथाकथित भक्त लोग ऐसी ही तिकड़म भिड़ाते हैं और देवताओं को रिश्वती, खुशामदखोर, अविवेकी रूप से बदनाम करते हैं।

विचारणीय है कि क्या ‘अंधेर नगरी बेबूझ राजा’ की लोकोक्ति भक्त और भगवान के प्रसंग में चरितार्थ होती रह सकती है क्या पात्रता का सिद्धान्त सर्वथा उपेक्षित हो सकता है? क्या प्रयास पुरुषार्थ का कर्मफल वाला अनुशासन निरस्त किया जा सकता है? क्या पूजा पाठ का अर्थ योग्यता और प्रयत्नशीलता की आवश्यकता को समाप्त करना है? क्या याचक और दाता दोनों को औचित्य की सीमा लाँघना है? क्या ऐसा करके वे दोनों ही अपनी गरिमा गिराते नहीं है?

ऐसी पूजा−पत्री फलदायक सिद्ध नहीं हो सकती, जिसमें मुफ्त ही मनोकामना पूर्ण करने कराने की रीति-नीति जुड़ी हुई है। चाहने पर भी ऐसा नहीं है। मुफ्तखोरों की झोली मणि-माणिकों से भरती नहीं है। असम्भव को सम्भव बनाने के प्रयासों में कहाँ, कब, कितनी सफलता मिलती है। यदि पूजा मात्र से मनोरथ सिद्ध हुए होते तो पुजारियों के पौ बारह रहते। उनके घर सोने, चाँदी से बने होते। कर्मकाण्डी पंडितों को कुबेर जैसा धनी और इन्द्र जैसा समर्थ देखा जाता। उन्हें तो सभी देवताओं के जंत्र-मंत्र आते हैं। भगवान को रिझाने के लिए विविध-विधि कीर्तन कौतुक करने कराने वालों की एक भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती।

भक्ति का उद्देश्य अपने आपको देवता के प्रति देवत्व के प्रति समर्पित करना है। मनुष्य में देवत्व का उत्पादन, अभिवर्धन प्रत्यक्षीकरण करता है। इसी प्रकार भजन पूजन बन पड़ता है और उसका प्रयोजन पूरा होता है। प्रामाणिकता, पवित्रता, प्रखरता और उदार सेवा भावना के आधार पर देवता प्रसन्न होते, अनुग्रह करते और वरदान देते देखे जाते हैं। यही यथार्थता है। पर जो लोग वास्तविकता में आंखें मूँद लेते हैं और चतुरता भरी तिकड़म भिड़ाकर सस्ते प्रलोभन के बले बहुमूल्य वरदान पाना चाहते हैं उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। पूजा के छद्म में जो समय श्रम लगता है वह बेकार चला जाता है। उपचारों में नियोजित किये गये साधन भी निरर्थक चले जाते हैं।

आस्तिकता कृषि कर्म जैसी, उद्यान आरोपण जैसी प्रत्यक्ष फलदायिनी पुण्य प्रक्रिया है। उस हेतु जो बोया जाता है वह सहस्र गुना होकर फलता है, किन्तु आवश्यकता इस बात की भी है कि उसमें खाद पानी की कमी न पड़ने दी जाय। आध्यात्मिकता, आत्म-परिष्कृति खाद है, धार्मिकता, कर्तव्य परायणता पानी। जो इन दोनों की व्यवस्था नहीं करते और देव अनुग्रह का प्रतिफल पाना चाहते हैं, उन्हें अविवेकी ही कहा जायेगा। बुद्धिहीन भी।


हारने से पहले पुनर्विचार करो (Kahani)

पर्वतारोहियों के दल का एक सदस्य लड़खड़ाया उसने सामने वाली ऊँची चोटियों को देखकर कहा, इतनी ऊँचाई तक चढ़ सकना मेरे लिए सम्भव नहीं।

साथियों ने उसे नीचे देखने को कहा। जमीन बहुत गहराई में थी। पुनर्विचार करने को जब वह तैयार हुआ तो सूझा कि, जब इतना चढ़ लिया गया तो आगे भी चढ़ते रहना क्यों कठिन होना चाहिए?


ज्ञानेन्द्रियों को विकसित-परिष्कृत किया जाय!

मनुष्य शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। वे सभी मस्तिष्क के साथ जुड़ी हैं। अपनी-अपनी अनुभूति, संवेदनाएँ वे ग्रहण करती हैं। उनकी जानकारी मस्तिष्क तक पहुँचाती है। मस्तिष्क वस्तुस्थिति का परिचय प्राप्त करने के अतिरिक्त उनका निरीक्षण, परीक्षण भी करता है और अगले क्षणों क्या किया जाना चाहिए, इसका निर्धारण करता है। तद्नुसार अन्य अवयव अपना काम करना आरम्भ कर देते हैं। मस्तिष्क की कल्पनाएँ भी अपना काम करती है। उनमें से जो भी उपयोगी समझी जाती हैं वे महत्व पाती हैं। जो निरर्थक मानी जाती है उन्हें उपेक्षित कर दिया जाता है। इसी प्रकार हमारी शारीरिक, मानसिक गतिविधियों का सूत्र संचालन होता रहता है। मस्तिष्क के प्रशासन तंत्र में वरिष्ठ अधिकारी का काम ज्ञानेन्द्रियाँ ही करती हैं उन्हीं से सम्बद्ध तंत्र-जाल समूचे शरीर में फैला है। संचार की सुविस्तृत क्रिया-प्रक्रिया वही सम्भलता है।

पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों में से उन्हीं की सक्रियता बढ़ी-चढ़ी रहती है। जिनका निरन्तर उपयोग होता रहता है। क्रियाशीलता ही विकास का आधार है। निष्क्रिय पड़े रहने वाले पदार्थ अथवा अवयव जितने अधिक गतिशील रहते हैं उनकी दैवी क्षमता उसी अनुपात से उभरती है। यदि वे चिरकाल तक निष्क्रिय पड़े रहें तो उनकी क्षमता क्षीण होती चली जाती है। आकाशस्थ ग्रह-पिण्ड इसीलिए अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं कि उनकी गतिशीलता द्रुतगामी बनी हुई है। यदि वे अपना परिभ्रमण क्रम खो बैठें तो वे परस्पर टकरा जायेंगे। अनन्त अंतरिक्ष के गहन गर्त में गिरकर सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो बैठेंगे।

प्राणियों की काया, शक्तियाँ इसी आधार पर घटती-बढ़ती रही हैं। मुर्ग जाति के प्राणी उड़ने से कतराने लगे। अब उनकी सभी प्रजातियाँ थलचर मात्र बन कर रह गई हैं। शुतुरमुर्ग तो मात्र धावक बनकर ही रह गया है। पालतू मुर्गे भी कहाँ उड़ पाते हैं कि मछलियों की छलाँग लगाने की इच्छा से उनके पर उगा दिये। उड़ने वाले सर्प भी देखे गये हैं। फुदकने वाले टिड्डों के शरीरों में नये पर उगे हैं। यह इच्छा आवश्यकता और चेष्टा का संयोग है।

मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों में से नेत्र और कान उनकी आवश्यकताएँ पूरा करने में विशेष रूप से सहायक सक्रिय रहे हैं। इसी कारण उनकी क्षमता स्थिर ही नहीं रही, वरन् बढ़ती भी चली गई है। चील, गिद्ध, गरुड़ जाति के पक्षी और भी अधिक दूरी तक स्पष्ट देख सकते हैं, आकाश में ऊँचे उड़ते हुए भी भूमि पर शिकार को अपनी-अपनी दृष्टि विशेषता के कारण पकड़ पाते हैं। इसी आधार पर कितनी ही नई प्रजातियाँ समय की सुविधा के अनुरूप उत्पन्न होती रहती है, जब कि आदिम काल के महागज, महासरीसृप, इतने विशालकाय होते हुए भी अपना अस्तित्व गँवा बैठे।

इस परिवर्तन क्रम में मानवी काया में भी बहुत कुछ उलट पुलट हुई है। नर को वानरों का वंशधर माना जाता है। उसके वंशजों की पूँछ का उपयोग न हो सका अस्तु वह धीरे-धीरे समाप्त हो गई। अब मेरुदण्ड के अन्त में उसकी जड़ का एक भाग ही किसी रूप में सुरक्षित रह गया है।

ज्ञानेन्द्रियों में मनुष्य प्रधानतया आँख और कान का ही प्रयोग करता है। नाक और त्वचा का उपयोग तो नगण्य जितना ही हो पाता है। जबकि पशु-पक्षी समुदाय में से कितने ही इन्हीं दो के आधार पर अपनी जीवनचर्या चलाते हैं और उलझनों को सुलझाते हैं।

मात्र एक जिव्हा ही ऐसी है जो विचित्र रीति-नीति से काम में आती है। स्वाद चखना जीभ का काम था ताकि वह भक्ष्य और अभक्ष्य का उपयुक्त अनुपयुक्त का निर्णय मुख रूपी अस्पताल में बैठे हुए जाँच पड़ताल वाले डाक्टर की भूमिका निभाती रहे। पर कुप्रचलन ने उसे भी चटोरपन की नशेबाजी जैसी बुरी आदतों का अभ्यस्त बना लिया है। वह अखाद्यों को खाद्य और खाद्यों को अखाद्य ठहराने की अनीति पर उतर आई है। जो शाक फल जीवन तत्व प्रदान करते थे उन्हें या तो लिया ही नहीं जाता, लिया भी जाता है तो नाक, भौं, सिकोड़ कर मसाले, चीनी, चिकनाई आदि से सराबोर करने के उपरान्त। इस प्रकार आहार मनुष्य नहीं खाता वरन् वह उल्टा उसी को खा रहा है। रुग्णता और अकाल मृत्यु का कारण बन रहा है।

जीभ द्विधा इन्द्रिय है। वह चखती ही नहीं बोलती भी है। बोलना प्रभावशाली होना चाहिए, उसमें प्रामाणिकता और प्रतिभा का ऐसा समावेश होना चाहिए, जिससे जिसमें भी वार्तालाप चले वह आदर्श अपनाने का मन बनाये, अपने चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करे। वाणी को सरस्वती का प्रतीक माना गया है, उसकी गरिमा इसी में है कि भटकाव को रोके और उत्कर्ष मार्ग पर चलने की प्रेरणा भरे। पर देखा जाता है कि यह कर्तव्य भी उससे निभ नहीं पा रहा है। वाचालता अब मिथ्याचार की प्रतिनिधि बन गई है। छल, प्रपंच में फँसाने, दुर्व्यसनों की ओर धकेलने और भ्रान्तियाँ फैलाने का मिथ्याचार ही उससे बन पड़ता है, देखा जाता है जो जितना मुखर है वह उतना ही अधिक लोगों को बरगलाता, फुसलाता है। ऐसी दशा में स्वाद और कथन के दोनों ही क्षेत्रों में असफल रहने के कारण उसकी चपलता भी अनर्थकारी ही सिद्ध हो रही है। इस प्रकार जिव्हा का होना उसके न होने से भी अधिक महँगा पड़ रहा है। जिराफ के जीभ नहीं होती, कई पक्षी कीटक तथा जल जीव भी बिना जीभ के पाये जाते हैं, वे उसके बिना भी काम चला लेते हैं, मनुष्य का मुख उसके व्यक्तित्व का प्रवक्ता है फिर भी उसके द्वारा होने वाले सभी क्रिया-कलाप ऐसे होते हैं, जिन्हें कौतुक कौतूहल तो कहा जा सकता है पर सराहा नहीं जा सकता। न वैसा लाभ मिल पाता है जैसा कि मिलना चाहिए था।

इन्द्रियों में महत्वपूर्ण समझी जाने वाली जिव्हा की रसना एवं अभिव्यक्ति क्षमता को यदि परिष्कृत किया जा सके तो मनुष्य का स्तर इतना समुन्नत हो सकता है कि वह सतयुगी देव मानवों में अपनी गणना करा सके। स्वयं सुखी समुन्नत रहे और दूसरों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने, सुखी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। आवश्यकता है जिव्हा का परिष्कार करने के लिए नये सिरे से उसी प्रकार के प्रयास किये जाय जैसे कि आँख, कान की व्यथाओं को दूर करने के लिए अस्पताल खोले जाते हैं। जिव्हा को परिष्कृत करने के लिए यदि विचारणा और भावना से भरी पूरी शिक्षण पद्धति चलाई जा सके तो निश्चय ही इसका असाधारण लाभ समूची मनुष्य जाति को मिल सकता है।

कुछ इन्द्रियों से काम न लिए जाने के कारण वह निरर्थक हो गई है। उन्हें फिर से इस योग्य बनाया जा सकता है कि मनुष्य की वर्तमान ज्ञान, क्षमता कई गुनी अधिक बढ़ सके और वह अपने तथा संपर्क क्षेत्र के बारे में कुछ जान सके जिससे कि वह इन दिनों कोसों दूर है।

पशु पक्षियों कीट, पतंगों में इन्द्रिय क्षमता नगण्य होती है। इन्हें नेत्रों और कानों के सहारे इतना ज्ञान नहीं मिल पाता, जिसके सहारे वे अपना जीवन-क्रम सरलता से चला सके। आत्म रक्षा कर सके। खुराक जुटा सके तथा प्रजनन के समय उत्पन्न होने वाले शिशु पालन, अंडा संरक्षण जैसे कार्यों से भली प्रकार निपट सके। एक तो उनकी शरीर संरचना ही मनुष्य की तुलना में अधिक पिछड़ी होने से पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस पर भी यदि ज्ञानेन्द्रियाँ भी गई-गुजरी हों तो निर्वाह की आवश्यकता पूरी कर सकना भी उसके लिए सम्भव न हो सके।

मनुष्य के दो पैर और दो हाथ है। हाथ काम करते और पैर चलते हैं। अन्य प्राणियों के या तो दो पैर होते हैं या चार हुए तो वे चलने भर के काम आते हैं। हाथों की आवश्यकता उन्हें मुँह, चोंच, सूँड़, सींग आदि के सहारे ज्यों-त्यों करके पूरी करनी होती है। फिर उनका पाचन तंत्र भी इतना समर्थ होता है कि शरीर के अनुपात से उन्हें कहीं अधिक खुराक चाहिए वह एक जगह एकत्रित नहीं मिलती। थोड़ा-थोड़ा करके जहाँ-तहाँ से जुटानी पड़ती है। इसके लिए अधिक सक्रियता चाहिए। निवास के लिए बने बनाये घर नहीं मिलते। वे उन्हें ही बनाने पड़ते हैं। जो बार-बार बिगड़ते रहते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें, उनके अण्डे बच्चों को आहार बनाने के लिए कितने ही माँसाहारी प्रकृति के प्राणी घात लगाये रहते हैं। इनसे बचाव करना भी एक समस्या है। यह आत्म रक्षा का उपयुक्त आधार उन्हें न सूझता रहे तो समझना चाहिए कि उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।

इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए प्रकृति ने उन्हें ऐसी अतिरिक्त क्षमता प्रदान की है जो या तो मनुष्य को मिली ही नहीं या वह उनका प्रयोग न करके गवाँ बैठा। अन्य प्राणियों में गंध इन्द्रिय और त्वचा इन्द्रिय इतनी सूक्ष्मग्राही होती है कि उनके सहारे मस्तिष्क को इतनी जानकारी मिल जाती है जितनी कि मनुष्य को आँख, कान के सहारे मिलती है।

पशु पक्षी अपने-अपने स्वरों में बोलते हैं। उनके साथ उनकी भाव संवेदनाएँ, इच्छाएँ, अभिव्यक्तियाँ भी जुड़ी रहती हैं। जिनसे अन्य सजातीय अवगत हो सकें। इस आधार पर आवश्यक आगाही प्राप्त कर सकें। सहयोग या आत्म रक्षा के लिए कदम बढ़ा सकें। यह सब स्वरों के साथ जुड़ी हुई ऐसी विचित्र तरंगों के माध्यम से होता है जो मनुष्य के लिए तो एक प्रकार से सर्वथा अरिति ही है, पर दूसरे प्राणियों में शब्द कोष का काम देते हैं। वे जीभ और कान से असमर्थ होते हुए भी मात्र त्वचा संपर्क से आने वाली ध्वनि किरणों के माध्यम से आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।

आकाश में अनेक ध्वनि तरंगें मान रहती हैं। परिस्थितियाँ बदलने के साथ-साथ उन में भी उतार चढ़ाव आते रहे हैं, उन्हें समझ सकना यदि सम्भव हो तो मौसम के परिवर्तनों से लेकर वातावरण में होने वाले हेर फेर तक एक को जाना जा सकता है और आवश्यकतानुरूप अपनी गतिविधियों में हेर-फेर किया जा सकता है। यह ज्ञान अधिकाँश उन प्राणियों में बढ़-चढ़ कर पाया जाता है जिन्हें हम पिछड़ा या अज्ञानी मानते हैं। वे भूकम्प बाढ़ बिजली गिरना, वर्षा होना आदि भवितव्यताओं के सम्बन्ध में समय से पहले ही आवश्यक जानकारियाँ प्राप्त करके अपना बचाव कर लेते हैं।

गंध के आधार पर वे परिचित अपरिति का भेद करते हैं। शिकार तलाशते और आक्रमणकर्ता की उपस्थिति को समझते हुए अपनी प्राण रक्षा का उपाय समय रहते करने लगते हैं। प्रणय सम्बन्ध मिलाने के साथ उत्साही साथी ढूँढ़ने में उन्हें गंध शक्ति ही काम देती है। इसी आधार पर अपने मालिकों से बिछुड़े कुत्ता, बिल्ली, लम्बी मंजिलें पार करते हुए नदी नाले लाँघते हुए लम्बी दूरी पार कर लेते हैं। प्रशिक्षित कुत्ते तो अब पुलिस के लिए जासूसी का काम भी करने लगे हैं। वे गंध के आधार पर ही अपराधियों का पल्ला जा पकड़ते हैं और चुराये हुए माल का अता−पता बता देते हैं, इस गंध शक्ति के आधार पर ही मधु-मक्खियाँ, खिलते हुए फूलों का पता मीलों दूर से लगा लेती हैं। उनकी छोटी आँखें इतना कर सकने में किसी भी प्रकार समर्थ नहीं हो सकतीं। दिशा ज्ञान लम्बी दूरी पार करके अपने निवास स्थान तक जा पहुँचना उनके लिए इस गंध चेतना के सहारे ही सम्भव होता है।

प्रकृति के विशाल महासागर में तो हलचलें चलती हैं वे सभी के लिए खुली हुई हैं। अन्तर इतना ही है कि जिनकी ग्रहण शक्ति बढ़ी-चढ़ी है वे अपने काम की जानकारियाँ मात्र गंध और त्वचा के सहारे उपलब्ध कर लेते हैं, जबकि मनुष्य इन दोनों को उपेक्षित करता रहा है और आवश्यक ज्ञान संचय के लिए बहुमूल्य यंत्रों का सहारा लेता है। यदि वह नये सिरे से त्वचा और घ्राण इन्द्रिय को जागृत करने का प्रयत्न करे तो आँख और कान से भी अधिक सक्षम इन दोनों अतिरिक्त इन्द्रियों का भी भरपूर लाभ उठा सकता है।


विधवा विवाह कानून (Kahani)

बचपन में राजा राम मोहन राय की भावज को परिवार वालों द्वारा उकसाकर जबरदस्ती सती कराया गया था। उस घटना को वे जीवन भर न भूले और सती प्रथा का अन्त कराने के लिए कानूनी तथा सामाजिक वातावरण, बनाने के लिए आजीवन प्रयत्न करते रहे।

ठीक ऐसी ही घटना ईश्वरचन्द्रिसागर के जीवन में घटित हुई। उनके एक सम्बन्धी ने वृद्धावस्था में कम आयु की लड़की से वाह कर लिया। कुछ ही दिन में उसे विधवा बनाकर मर गये।

उन सम्बन्धी से उनने विवाह के बाद ही रिश्ता तोड़ लिया था पर बाद में वे विधवा की दुर्दशा देखकर अत्यन्त दुःखी रहने लगे। ऐसी ही अनेकों दुर्दशाग्रस्त विधवाएँ उनके सामने आती रहीं।

वे चुप न बैठे। विधवा विवाह का कानून बनवाने और उस पर लगे सामाजिक प्रतिबंध को दूर कराने में उनने जीवन भर प्रचण्ड एवं सफल आन्दोलन चलाया।


आसक्ति से मुक्ति

एक दिन की घटना है। सिन्धु सौवीर प्रदेश के राजा रहूगणा महर्षि कपिल का सत्संग करने के लिए शिविका में बैठकर जा रहे थे। रास्ते में एक कहार बीमार पड़ गया, संयोग से उसी स्थान पर जड़ भरत विचरण करते दिखाई दिये। वेश विन्यास देखकर उन्हें महर्षि तो क्या कोई ब्राह्मण भी नहीं समझ सकता था। शरीर से हृष्ट-पुष्ट और मुद्रा से प्रसन्न सरल भारत को भारवाहकों ने कोई चरवाहा समझा और उन्हें पकड़ कर सौवीर नरेश की पालकी उठाने में बीमार साथी के स्थान पर लगा दिया। स्वभाव से ही “न” करना नहीं जानने वाले महर्षि भरत ने सहर्ष इस कार्य को स्वीकार किया और रुग्ण व्यक्ति के स्थान पर स्वयं आ गये।

उन्हें इस कार्य का अभ्यास तो था नहीं, इसलिये वे अय भारवाहकों की तरह उनके साथ कदम से कदम मिला कर नहीं चल पा रहे थे। इसके अलावा उन्हें इस बात का ध्यान रहता था कि धरती पर रंगने या चलने वाला कोई जीव पैरों से कुचल कर न मर जाये। इस सतर्कता और अभ्यस्त होने के कारण उनके पैर बार-बार लड़खड़ा जाते।

जब तीन चार बार ऐसा हुआ तो राजा रहूगणा ने बाहर देखा एवं क्रोध से बिफर कर बोल उठे, “क्या बात है मूर्ख? तुम्हें ठीक से चलना नहीं आता या तुम्हें वार्धक्य ने आ घेरा है?”

मौन तोड़कर भरत ने कहा, “राजन! आपकी पिछली बात मैंने सुखी थी और उसका आशय भी समझा था। मुझे ज्ञात है कि बोझा ठीक से ढोने के लिये होता है और उसे ठीक से ढोना चाहिये। पर मुझे यह समझ में नहीं आता कि आदमी आदमी के ऊपर ही बोझ क्यों बने?”

राजा को इस उत्तर की आशा नहीं थी। पालकी से उतरकर वे बोले “दुष्ट! तेरी यह धृष्टता। किस से किस तरह व्यवहार करना चाहिए वह भी तुझे नहीं आता। ठहर मैं अभी तुझे मार कर किये का मजा चखाता हूँ।”

इस पर भी जड़ भरत अविचलित भव से चुपचाप खड़े राजा की मुद्रा को सदय भाव से देख रहे थे। राजा ने फिर पूछा- “तुझे अपनी भूल का कोई पछतावा नहीं?”

“भूल”! भरत ने कहा- “भूल तो राजन मैंने भी की है और आपने भी। इस भूल के कारण ही हमें इस संसार में पुनः आना पड़ा। पर मेरी भूल बड़ी थी कि मैं जानबूझ कर मोह में पड़ा।”?

राजा ने समझा शायद यह पागल है और ऐसे प्रलाप कर रहा है। अब दण्ड उन्हें मिलेगा यही सोचकर शेष भारवाहक भय से काँपने लगे।

क्रोध के कारण लाल अंगारे हुई आँखों को देखकर भरत और भी सदय हो उठे, “राजन! इन लोगों का कोई दोष नहीं है। आप दंड तो मुझे देने वाले थे। मुझे ही दीजिये न।”

यह कहते-कहते भरत के मुख मण्डल पर सौवीर नरेश को एक तेजस्विता दिखाई देने लगी। जड़ भरत कहे जा रहे थे, “शरीर से आत्मा का क्या वास्ता? भूख, प्यास, क्रोध, अभिमान, क्षीणता, हीनता, उसके लिये है जो इन्द्रियों के स्वाद में लीन है, देहासक्ति में डूबा हुआ था और आसक्ति का देश मुझे एक बार हो चुका है, इसलिये आप निःशंक निःसंकोच दंड दीजिये।”

महर्षि भरत के तत्वज्ञान के पश्चाताप से दग्ध राजन को पूरी तरह पराभूत कर दिया और वे पैरों में गिर कर क्षमा माँगने लगे। पूर्णतः अविचल भवन से भरत सौवीर नरेश के क्षण-क्षण बदलते रूप को देख रहे थे।

विनम्र भाव से ऋषि बोले- ‘अपराध तो तब होता राजन! जब आप के किये से मुझे वेदना या पीड़ा होती। मुझे तो ऐसा कुछ भी आभास नहीं हुआ, फिर आपको कैसे दोषी मानूँ और प्रायश्चित या क्षमा का विधान करने वाला मैं कौन होता हूँ।”

सौवीर नरेश ने अपनी यात्रा वहीं स्थगित कर दी और महर्षि जड़ भरत के चरणों में बैठ कर ही ब्रह्म विधा का ज्ञान प्राप्त किया। महर्षि भारत ने कहा- “राजन! आसक्ति ही सब दुःखों की जननी है यहाँ तक कि वही पुनः जन्म लेने के लिये बाध्य करती है। आसक्ति वश ही मेरे जैसे योगी को मृगयोनि में जम लेना पड़ा था।

“मनुष्य को चाहिए कि कुल वंश और पद तो क्या इस शरीर से आसक्ति न करे। अनासक्त रहकर कर्तव्य कर्म का आचरण करने से ही मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।”

राजा तत्व ज्ञान का उपदेश सुनकर धन्य हुए और पश्चाताप स्वरूप अपना शेष जीवन लोक मंगल के लिये समर्पित करते हेतु ब्रह्मर्षि भरत के निर्देश पर नियोजित कर दिया।


विचार ही हमें उठाते हैं और ले डूबते हैं!

निग्रहित मन की शक्ति असाधारण है। सूर्य किरणें बिखरती रहती हैं, उनकी गर्म रोशनी का ही महत्व है, पर आतिशी शीशे के माध्यम से उस किरण को एक केंद्र पर केन्द्रीभूत कर लिया जा सके तो तुरन्त आग उत्पन्न हो सकती है। सौर किरणों की एक मील की ऊर्जा एक सरोवर को भाप बनाकर उड़ा सकती है। यही बात निग्रहित मन के सम्बन्ध में भी है। उसकी अधिकाँश क्षमता अस्त-व्यस्त प्रयोजनों में नष्ट होती रहती है। उसके बिखराव को बचाया और एक केन्द्र पर केन्द्रित किया जा सके तो उतने भर से अनेकों चमत्कार देखे जा सकते हैं। शक्तियों का एकीकरण ही योगाभ्यास का मूल सिद्धांत है। वहाँ उसके लिए अनेक काम करने पड़ते हैं, पर विचारों के निग्रहित करने की प्रक्रिया ऐसी है जो किसी भी आधार पर आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में उतरने वाले उन लोगों को करनी ही पड़ती है, जो अपनी सामान्य सी दीखने वाली चेतना से असामान्य कार्य लेना चाहते हैं। जो भौतिक दृष्टि से भी असामान्य पुरुषार्थ कर सकते हैं और आध्यात्मिक दृष्टि से भी।

मनोविज्ञानी सिगमंड फ्रायड कहते थे कि विचारों में समझने-समझाने भर की शक्ति है। कार्लजुँग का प्रतिपादन था कि उनके द्वारा वस्तुओं को भी प्रभावित किया जा सकता है। विवाद के समाधान के लिए एक कमरा चुना गया और संकल्प शक्ति का प्रयोग किया। फलतः कमरे में सभी वस्तुएं हिलने लगीं और पुस्तकें उड़कर दीवारों से जा चिपकी।

फिनलैंड की एक सुन्दर युवती की कथा है। उसे कैन्सर हो गया था। आपरेशन की टेबल पर जाने से पूर्व उसने डाक्टरों से कहा- वह जीवित रह सकेगी न? अपने प्रेमी के साथ विवाह कर सकने की स्थिति में हो सकेगी न? डाक्टरों ने आश्वासन में ‘हाँ’ कह दिया। यद्यपि वे संदिग्ध थे। प्रेमी भी उस घड़ी दौड़ा आया और कहा- “बीमारी मामूली है। उसके ठीक होते ही हम लोग विवाह बंधन में बंध जायेंगे और सुखपूर्वक जियेंगे।” ऐसा ही हुआ लड़की की आशा प्रबल हुई और उत्साह का असामान्य प्रतिफल यह हुआ कि छोटे से आपरेशन से वह सदा के लिए अच्छी हुई, जब कि उसी के वार्ड की अन्य रोगी महिलाओं में से एक को भी न बचाया जा सका। आरोग्य रक्षा, रोग निवारण के क्षेत्र में मनस्विता संवर्धन के माध्यम से लोग प्रगति पथ पर उतनी दूरी तक चल सके हैं जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रहा जा सके।

निग्रहित मन की शक्ति अपार हो जाती है। संकल्प बल में असीमित वृद्धि हो जाती है। जिसके बल पर कितनी ही बार एक स्थान पर बैठकर दूरवर्ती लोगों को प्रभावित किया जा सकता है। ट्रेड सीरियस द्वारा “थाँटफोटोग्राफी” एवं रूस द्वारा “मेण्टल वार” संभव कर पाना इसी आधार पर सम्भव हुआ है।

सामान्य जीवन में भी संकल्प शक्ति का कम महत्व नहीं है। विचार ही देर तक मस्तिष्क में जड़ जमाये रहने पर सुदृढ़ होते और कर्म स्वरूप में परिणत हो जाते हैं। थोड़े दिन उन कार्यों को करते रहा जाय तो वे ही स्वभाव बन जाते हैं और ऐसी आदत के रूप में परिपक्व होते हैं कि सहज ही छुड़ाए नहीं छूटते। वे अभ्यास कार्य अनायास ही होने लगते हैं, उनके लिए साथ सहयोगी मार्गदर्शक ही जहाँ-तहाँ से साधन भी अनायास ही जुटते रहते हैं। संकल्प बल एक अच्छी खासी सशक्त चुम्बक के समान है जो अपने अनुकूल व्यक्तियों तथा पदार्थों को खींच बुलाता है।

बड़ी-बड़ी खदानें इसी आधार पर बनती हैं, बढ़ती हैं कि जहाँ भी किसी पदार्थ की अधिक मात्रा जमा हुई कि उसका प्रभाव चुम्बकत्व उसी बिरादरी के अन्यान्य कणों को अपनी ओर खींचना आरम्भ कर देता है और खदान का परिमाण अनायास ही बढ़ता चला जाता है।

चेतना की प्रचंड शक्ति की चर्चा सब जगह होती है। शरीर जड़ पदार्थों का बना है। उसमें अपने निज की कोई क्षमता नहीं। यदि रही होती तो मरण के उपरान्त भी उसका अस्तित्व बना रहता। वस्तुतः प्रेरक सत्ता वह चेतना ही है जिसकी गतिविधियाँ विचारों एवं संकल्पों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं।

यही हमारा निर्देशक एवं मार्गदर्शक है। जिस स्तर की आकाँक्षाएँ भीतर उठतीं और लगातार चलते रहने पर परिपक्व होती हैं, वही मनुष्य का अंतराल बन जाता है। कार्यों और आदतों के साथ सम्मिश्रित होकर वही स्वभाव या संस्कार बनता है। इसी आधार पर भले-बुरे या अनगढ़ काम बन पड़ते हैं व परिस्थितियाँ सब ओर से सिमट कर उसी स्तर की जमा होने लगती है। परिस्थितियों के उत्थान पतन का निमित्त कारण माना जाता है, पर वास्तविकता यह है कि परिस्थितियाँ स्वतंत्र रूप से नहीं आ धमकती। उन्हें हमारी मनःस्थिति चुनती और जहाँ तहाँ से बटोरती है।

कहा जाता है कि जो होता है, विधि के विधान या भाग्य रेखा के अनुरूप होता है। यह देखना हो कि भाग्य कहाँ है और भवितव्यता का उल्लेख कहाँ मिलता है, तो उसे जन्म कुण्डलियों में नहीं वरन् मानवी अन्तराल में उठने वाले विचारों को देखकर किसी को अनुमान लगाना चाहिए। विचारों के बीज ही वृक्ष बनकर बढ़ते और फलते-फूलते हैं। यही मनुष्य का भाग्य निर्माण है, जिसे वह स्वयं ही करता है। विचार किस स्तर के अपनाए जाएँ, यह निर्णय मनुष्य अपनी इच्छानुसार ही करता है। किस तरह के अपनाये और किस स्तर के छोड़े जायें, यह भी मनुष्य की अपनी अभिरुचि के ऊपर ही निर्भर है। वह चाहे तो किन्हीं विचारों को अपनाये भी रह सकता है और जीवन भर अपनाये रह सकता है, पर यह भी पूरी तरह अपने हाथ की बात है कि अपनाये हुए कुविचारों को एक ही झटके में साहसपूर्वक परित्याग कर दिया जाय और नये उपयोगी विचारों का महत्व समझे एवं व्यवहार में उतारने का अभ्यास डालकर उन्हें जीवन का अंग बना लिया जाय। आदतों की टहनियों पर ही भलाई और बुराई के फूल या काँटे लगते हैं।

विचार न जाने कहाँ से हमारे मस्तिष्क में घुस पड़ते हैं, यह कथन किसी हद तक ठीक है। उपेक्षा बरतने और निरीक्षण परिशोधन न करने पर बुरी आदतें भी ‘बर्र’ के छत्ते की तरह घर बना लेती हैं और जब भी दाँव लगता है, डंक चुभाती रहती हैं। पर यह बात उन पर लागू नहीं होती जो फैशन-शृंगार को दर्पण में निहारते रहने की तरह अपने अंतराल की भी देखभाल करते रहते हैं और जहाँ कहीं भी जितना कुछ भी कूड़ा-करकट दीख पड़ता है उसे बिना आलस्य बरते तत्काल निकाल फेंकते हैं।

स्मरण रहे आत्मा ही हमारी शत्रु या मित्र है। यहाँ आत्मा से तात्पर्य उस विचार शृंखला से समझा जाना चाहिए जो धीरे-धीरे परिपक्व होती और व्यक्तित्व का स्तर ढालती रहती है। यदि मित्र का सघन साहचर्य हमें मिलता रहा, सतत् सत्संग होता रहा तो कभी कुविचार पनपने नहीं पायेंगे। सद्विचारों की बगिया अन्दर लहलहायेगी एवं इसका सत्परिणाम आकर्षक, प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में उभर कर सामने आएगा।


तथागत का परमप्रिय शिष्य (Kahani)

तथागत का परमप्रिय शिष्य था आनन्द। उस दिन सभी शिष्यों को उनकी इच्छानुसार क्षेत्रों में बसने और धर्मप्रचार करने के लिए भेजा जा रहा था। सभी ने अपने परिचित एवं सुविधापूर्ण स्थान चुन लिए।

आनन्द ने सूनापान्त नामक गाँव चुना। वह दुष्ट दुर्जनों के लिए प्रख्यात था। वहाँ कोई साधु पैर जमा ही नहीं सका था। सभी ने आश्चर्य से पूछा- ऐसी विपरीत परिस्थितियों वाले स्थान को अपना कार्य क्षेत्र आप क्यों चुनते हैं?

आनन्द ने कहा- चिकित्सक को वहाँ जाना चाहिए जहाँ भयंकर महामारी फैली हो। अपनी सुविधा और सुरक्षा की बात सोचने पर चिकित्सक और साधु दोनों ही हेय बनते हैं। दोनों के स्तर की परीक्षा तो कठिन परिस्थितियों में ही होती है।


समझदारी का आयु से कोई सम्बन्ध नहीं

बचपन एक आयु भी है और प्रकृति भी। तीन वर्ष तक के बालकों को शिशु कहा जाता है। वे अबोध होते हैं। दैनिक सामान्य व्यवहार भी उन्हें सिखाना पड़ता है। सहज अनुकरण प्रियता के अनुरूप वे उस बहुमुखी शिक्षण को यथा समय प्राप्त भी कर लेते हैं। पूर्वाग्रह और कुतर्क को आड़े न आने देने के कारण उनकी प्रगति अपने क्रमानुसार ठीक प्रकार चलती रहती है। तीन वर्ष के बच्चे अपनी शारीरिक विधि व्यवस्था का अधिकाँश भाग स्वयं सम्भालने लगते हैं, स्नान, कपड़ों का धोना, पहनना जैसे कुछ ही काम ऐसे बचते हैं जिनके लिए दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। मातृभाषा के इतने शब्द उन्हें याद हो जाते हैं जिसे काम चलाऊ अभिप्राय समझ और प्रकट कर सकें।

इससे बड़े दस वर्ष के बच्चे बालक कहलाते हैं। वे बाल कक्षाओं में पढ़ने भी लगते हैं और माता से स्वजनों से चिपके रहने की अपेक्षा समन्वय वाले सहचरों के साथ खेलने कूदने का नया अध्याय खोल लेते हैं। बुद्धि की दृष्टि से उनमें भी परिपक्वता नहीं होती। अभ्यस्त नित्य कर्मों को ही वे सही रीति से कर पाते हैं। अन्य विषयों की जानकारी उन्हें अभिभावक और अध्यापक देते रहते हैं। निजी पर्यवेक्षण बुद्धि द्वारा भी समीपवर्ती वातावरण में से स्व चेतना के अनुरूप बहुत कुछ सीखते अपनाते रहते हैं।

इसके उपरान्त किशोरावस्था का समय आ जाता है। फिर यौवन। पच्चीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य परिपक्वता प्राप्त कर लेता है। यह शरीर बुद्धि का क्रम हुआ। इसी के साथ व्यवहार बुद्धि भी विकसित होती है। स्कूल पाठ्यक्रम और वातावरण इस प्रयोजन में बहुत हद तक सहायक होते हैं। अनपढ़ भी देख सुनकर तथा जानकारी में आने वाले घटनाक्रम अनुभव के आधार पर भी बहुत कुछ जान लेते हैं। यद्यपि पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर जो व्यापक क्षेत्र का ज्ञान अनुभव मिल सकता था उससे वे वंचित ही रहते हैं।

यह सामान्य निर्वाह क्रम है। इसी चक्र में परिभ्रमण करते हुए लोग जन्मते, बढ़ते और मरते रहते हैं। उदरपूर्णा और वंश वृद्धि के साथ जुड़े हुए परिवार निर्वाह का उपाय उपचार भी उन्हें विदित हो जाता है। यों अपनी बुद्धि और दूसरों की सम्पत्ति चतुर को चौगुनी और मूर्ख को सौगुनी प्रतीत होती रहती है। फिर भी यह कहने में कोई संकोच नहीं होता कि वह बुद्धि मात्र निर्वाह की परिधि में ही सीमित रहती है। उसके आधार पर उपार्जन, उपयोग एवं सीमित क्षेत्र के दायित्वों का समझना, सम्भालना ही बन पड़ता है।

समझदारी आयु के साथ नहीं दूरदर्शिता के साथ प्रारम्भ होती है। अदूरदर्शी तात्कालिक लाभ को देखते हैं। इसके लिए उतावली बरतने का मन बना लिया जाय तो कुमार्ग पर चल पड़ने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहता। सदाशयता अपनाने पर तो सीमित लाभ ही मिलता है। उसमें से वृक्ष रोपने से लेकर फल लगाने वाली लम्बी अवधि की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। हथेली पर सरसों जमाने जैसा प्रपंच तो कोई बाजीगर ही रच सकता है। अनाचारी, आक्रामक गतिविधियाँ अपना कर तो लूट खसोट जैसा लाभ लुच्चे-लफंगे भी उठा लेते हैं, पर जिन्हें सन्मार्ग का परित्याग करने वाली बात गले नहीं उतरती, वे धैर्य रखते और सीमित उपलब्धि पर भी संतोष करते हैं। जिन्हें ठाट-बाट नहीं रोपना है, जिन्हें वाहवाही लूटने के लिए आकुल व्याकुल नहीं होना है उन्हें स्वल्प संतोष रहने में कोई हर्ज होता नहीं दीखता। थोड़ा कमाने थोड़ा खर्च की नीति अपना कर संतुलन बिठा लेते हैं। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह जिन्हें स्वीकार है, उन्हें विपुल साधन जमा करने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। ऐसी दशा में उद्दण्डता अपनाने, अनीति रत होने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती। फिर अनर्थ अपनाने की बात क्यों तो सोची जाय? और क्यों उस प्रकार की चेष्टा की जाय?

समझदारी का केन्द्र बिन्दु यही है कि जीवन का स्वरूप और महत्व समझा जाय। गरिमा के उपयुक्त रीति-नीति अपनाई जाय। इर्द-गिर्द के लोग क्या करते हैं? किन हथकंडों से वैभव बढ़ाते और बड़प्पन लूटते हैं। इस सब को देखते हुए भी अनदेखा करना समझदारी का काम है। सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का इस प्रकार श्रेष्ठतम सदुपयोग करता है कि वह चिरकाल तक स्मरणीय और अभिनन्दनीय बना रहे। इसी निर्धारण में समझदारी है। ऐसा समय जब भी उभरे समझना चाहिए की उसी समय से बुद्धिमता आरम्भ हुई।

दूरदर्शिता का भी आयु से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। वह बचपन से भी उदित हो सकती है। जवानी में भी बुढ़ापे में भी। ध्रुव, प्रहलाद, शुकदेव जैसों ने बचपन से ही महान निश्चय किये थे। शंकराचार्य, कबीर, रैदास आदि ने यौवन का आरम्भ होते ही महानता की दिशा में कदम उठाये थे। वानप्रस्थ और संन्यास में प्रवेश करने वाले ढलती आयु में पुण्य परमार्थ में प्रवृत्त होते हैं। इसके लिए आयु का कोई बंधन नहीं। दयानन्द, विवेकानन्द जैसों ने उठती आयु में ही ऐसा मार्ग अपनाया था जिसे विरक्त वैरागी भी नहीं अपना पाते।

पूर्व संचित सुसंस्कारों की शृंखला कभी-कभी अनायास ही निर्झर की तरह फूट पड़ती है। स्वाध्याय सत्संग का सुयोग न मिलने पर भी अन्तःप्रेरणा के रूप में ऐसा ज्वार आता है कि अनेक अवरोधों और संकटों के अभावों के रहते हुए भी उस मार्ग पर चल पड़ना सम्भव हो जाता है जिस पर कि साहसी, शूरवीर और आदर्शवादी कर्मवीर ही साहस संजो पाते हैं।

पतनोन्मुखी प्रयास तो कोई भी कर सकता है। कुकर्म यों किसी भी आयु में बन पड़ सकते हैं। उसे शिक्षित अशिक्षित का भी भेद नहीं रहता। यहाँ तक कि ज्ञानी धर्मात्मा बनने वाले तक दुष्कर्मों में निरत पाये जाते हैं। यह संगति का फल भी हो सकता है और अनौचित्य से भरे वातावरण का प्रभाव भी या प्रलोभनों का आकर्षण और दबावों को सहन न कर पाने वाले भीरु मानस भी। कारण कुछ भी क्यों न हो यह समझा जा सकता है कि नीचे गिरना सरल है, ऊँचे उठना कठिन। इतने पर भी उत्कृष्टता अपनाने की साहसिकता को असम्भव नहीं कहा जा सकता है। साहस के धनी ऐसे कदम उठाते और लक्ष्य की सफलता प्राप्त करके रहते हैं।

मनुष्य की आवश्यकता सीमित है। उसका स्वल्प साधनों में निर्वाह हो सकता है। परिवार को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाने भर से संतोष किया जा सकता है। आवश्यक नहीं कि बहुत बटोरा जाय, उसे दुर्व्यसनों में उड़ाया जाय और उत्तराधिकार के लिए बड़ी सम्पदा छोड़कर मरा जाय। इन प्रयासों में जितनी शक्ति व्यय होती है, उससे कहीं कम में सन्मार्ग पर चलते हुए महामानव बन सकने की स्थिति तक पहुँचा जा सकता है।?

मनुष्य की आवश्यकता सीमित है। उसका स्वल्प साधनों में निर्वाह हो सकता है। परिवार को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाने भर से संतोष किया जा सकता है। आवश्यक नहीं कि बहुत बटोरा जाय, उसे दुर्व्यसनों में उड़ाया जाय और उत्तराधिकार के लिए बड़ी सम्पदा छोड़कर मरा जाय। इन प्रयासों में जितनी शक्ति व्यय होती है, उससे कहीं कम में सन्मार्ग पर चलते हुए महामानव बन सकने की स्थिति तक पहुँचा जा सकता है।?

झरने का पानी बहता रहता है और आगे बढ़ते हुए नदियों के रास्ते समुद्र में जा पहुँचता है। उपार्जन न्यायपूर्वक और कठोर परिश्रम द्वारा अर्जित किया हुआ होना चाहिए। धन, ज्ञान, प्रभाव आदि किसी स्तर का वैभव क्यों न हो उसे हाथों हाथ सदुपयोग में नियोजित होते रहना चाहिए। जमा हुआ पानी जोहड़ों में सड़ता है। जमा किया जाने वाला वैभव भी अनर्थ ही उत्पन्न करता है, ऐसा न होने देना समझदारी का चिन्ह है। भले ही वह किसी भी स्थिति में उत्पन्न हो।


Quotation

हिंसा अहिंसा दोनों का अपना-अपना उपयोग है। हिंसा दुष्टता की और अहिंसा सहायता सदाशयता की। भले बुरे से समता का व्यवहार नहीं किया जा सकता।


तीन शरीर और उनका कार्यक्षेत्र

जिस प्रकार स्थूल शरीर के साथ सूक्ष्म शरीर गुँथा हुआ है उसी प्रकार उससे आगे की गहराई में उतर कर देखने से प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर में सर्व समर्थ या स्वावलम्बी वही हैं उसके पीछे भी एक अधिक समर्थ सत्ता नियन्ता की जुड़ी हुई है। उसका नाम है- कारण शरीर। सामान्य बुद्धि तो काया को ही अपना समग्र स्वरूप मानती है और उतने तक ही प्रसन्नता, विपन्नता को सीमाबद्ध रखती है। शारीरिक स्वार्थ ही मनुष्य के लक्ष्य बनकर रहते हैं। उसी को अपना समग्र स्वरूप मानते हुए सोचने और करने की परिधि सीमाबद्ध कर लेते हैं। शोभा सज्जा, समर्थता सम्पन्नता, सरलता ही शरीर को रुचते हैं इसलिए उन्हीं के निमित्त समूचा प्रयास नियोजित रहता है।

सूक्ष्म शरीर को मोटे रूप से समझने के लिए चेतना के उस पक्ष को आधार मानना पड़ेगा, जिसे कल्पना या विचारणा करते हैं। कुशलता चतुरता भी। स्वभाव और रुझान इस स्तर के साथ जुड़ा हुआ है। शिक्षा, अनुभव अभ्यास के आधार पर विचार तंत्र का उत्कर्ष का जाता है। इस दिशा में प्रगतिशील व्यक्तियों को पैनी सूझबूझ वाला, चतुर, विद्वान आदि के नाम से जाना जाता है। यह शरीर के साथ समृद्धि बंधनों से बँधा रहता है इसलिए उसकी दौड़ धूप कल्पना, इच्छा प्रायः बहिरंग जीवन के निमित्त ही क्रियाशील रहती है। मस्तिष्कीय गतिविधियों को कायिक निर्वाह के लिए सोचने और साधन जुटाने में संलग्न पाया जाता है।

कारण शरीर का तत्व ज्ञान बढ़ा-चढ़ा है पर उसे सामान्य परिचय में भाव संवेदना कह सकते हैं। भावना आस्था, प्रेरणा, साहस, विश्वास, आदर्श जैसे तत्व इसी क्षेत्र में उभरते हैं। किसी को महामानव स्तर तक विकसित करने की अलौकिकता इसी क्षेत्र में उभरती है। उसकी विकसित स्थिति इतनी समर्थ है कि एकाकी निर्धारण कर सके। अकेला चल सके। आदर्शों के लिए कठिनाइयों को सहन कर सके। बिना डगमगाये उच्च लक्ष्य तक पहुँच सके। योगी, तपस्वी, मनीषी, सुधारक, सृजेता इसी स्तर के होते हैं। जो मात्र उत्कृष्टता की दिशा में ही कदम बढ़ाते हैं। विचार तंत्र और क्रिया तंत्र के साथ घसीटते चलने की क्षमता परिष्कृत कारण शरीर से ही होती है। साथ ही यह बात भी है कि इस क्षेत्र पर यदि अनैतिक अवाँछनीयता अधिकार जमा ले तो व्यक्ति को घिनौने स्तर का अपराधी और असुर बना देती है। इसलिए व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारित करने एवं उसे भला-बुरा समुन्नत अधः पतित बनाने वाली उमंगें भी कहीं से उठती हैं। मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जी सकना और महामानवों का स्तर अपना सकना जिस आधार पर सम्भव होता है, उसे कारण शरीर ही कहना चाहिए।

कर्म स्थूल शरीर से बन पड़ते हैं। विचार सूक्ष्म शरीर में उठते हैं और भाव संवेदनाओं का उद्गम कारण शरीर को समझा जा सकता है। उदारचेता, संवेदनशील आदर्शवादी परमार्थी स्तर उन्हीं का होता है, जिनका कारण शरीर परिष्कृत हो।

सूक्ष्म शरीर के विकृत विपन्न होने पर कुकल्पनाएँ उठती हैं। चंचलता छाई रहती है। असम्बद्ध भटकाव का दौर चढ़ा रहता है। आदतें बिगड़ती हैं और स्वभाव घटिया हो जाता है। फलस्वरूप मानसिक उद्वेग बने रहते हैं। क्रोध, आतुरता, निराशा, चिन्ता, ईर्ष्या, प्रतिशोध एवं महत्वाकाँक्षाओं का ऐसा उफान उठता रहता है, जिसे समुद्र में उठने वाले ज्वार भाटे या उष्ण वायु में बनने वाले चक्रवात के समतुल्य समझा जा सके। मानसिक तनाव रहने पर शरीर भी स्वस्थ नहीं रह सकता, क्योंकि मात्र आहार विहार पर ही स्वस्थता निर्भर नहीं है। वरन् उस तंत्र के संचालन के उपयुक्त ऊर्जा मनःक्षेत्र में ही मिलती है। उद्वेग उभरने पर भूख, प्यास, नींद तक गायब हो जाती है और असंतुलित मनःस्थिति में व्यक्ति सकी, विक्षिप्त, उन्मादी जैसा आचरण करने लगता है। दूरदर्शिता कुँठित हो जाने पर सामान्य गतिविधियाँ एवं निर्धारणाएँ भी ठीक तरह नहीं बन पड़ती। इतना ही नहीं भीतरी अंग अवयवों पर इतना दबाव पड़ता है कि जहाँ-तहाँ से जिस-तिस प्रकार की रुग्णता उभरने लगती है। बाह्य प्रभावों की प्रतिकूलता से जितना अनिष्ट होता है उससे कहीं अधिक अनर्थ मानसिक असंतुलन से होता है। स्वास्थ्य बिगड़ता है और निर्णय, निर्धारण, क्रिया- कलाप उल्टे होने लगते हैं।

यदि शारीरिक स्वास्थ की तरह मानसिक सुसंतुलन का ध्यान रखा जाय तो उस स्थिति में बाह्य परिस्थितियों की प्रतिकूलता भी हँसते-हँसाते सहन करली जाती है। सही चिन्तन चलता रहे तो स्वभाव में ऐसी आदतें सम्मिलित नहीं हो पातीं जो स्वास्थ्य बिगाड़े, मस्तिष्क को तनावग्रस्त रखें। बेतुके आचरण अपनाने और व्यवहार कुशलता के अभाव में जिसे असह्य विग्रह का सामना करना पड़ता है, उस प्रकार का त्रास सहना पड़े।

मनःस्थिति की विपन्नता ही अकर्म करने के लिए प्रेरित करती है और उसी कारण परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं जिन्हें दुःखद आया दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सके। एक जैसी परिस्थितियों में जन्में और पले व्यक्तियों में से कुछ लोग प्रिय होते हैं, सम्मान और सहयोग अर्जित करते हैं साथ ही तेजी से प्रगति पथ पर दौड़ लगाते हैं। चुम्बक अपने प्रभाव से लौह खण्डों को घसीट कर अपने साथ चिपका लेती है उसी प्रकार विचारशील व्यक्ति अपने सही चिन्तन को सद्गुणों में बदलते हैं और सद्गुणों के लिए चिरस्थायी सम्मान एवं सहयोग सुरक्षित रहता है। सही निर्णय सही स्वभाव, सही आचरण यही शृंखला अनेकानेक सफलताओं का आधारभूत कारण बनती है। जो इस तथ्य को नहीं समझते वे विचार तंत्र को उच्छृंखलता के खाई खन्दकों में भटकने देते हैं। फलस्वरूप उनका व्यक्तित्व अवाँछनीय हेय स्तर का बन जाता है। पग-पग पर ठोकरें लगती हैं। हर दिशा में तिरस्कार, उपहास, विरोध बरसता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं तो दुःखी रहता ही है। साथ ही सम्बद्ध लोगों को, मित्र परिजनों को भी विषम विपन्नता में धकेलता है। कुसंस्कारिता अपने आप में यह विपत्ति है। वह जहाँ भी रहती है, वहीं अपने स्तर के अनेक सहयोगियों को न्यौत बुलाती है। ऐसी विसंगतियों से घिरा हुआ कोई व्यक्ति न तो स्वयं चैन से रहता है और न जिसके साथ जुड़ता है उसे चैन से बैठने देता है। ऐसों की दुर्गति ही होती है। वे कभी कहने योग्य सफलता और सज्जनों के द्वारा की गई प्रशंसा के पात्र बन नहीं पाते।

स्वास्थ्य सुधारने और सुन्दर सम्पन्न दीखने के लिए जितना प्रयत्न किया जाय उतना ही यदि मन को कुसंस्कारी बनाने के लिए भी किया जाय तो अपेक्षाकृत कहीं अधिक लाभ में रहा जा सकता है। उपलब्धियाँ, साधन सम्पदाएँ कितनी ही अधिक क्यों न हो उनका सदुपयोग करने की दूरदर्शिता, विवेकशीलता का अभाव रहे तो दुरुपयोग से अमृत भी विष बन सकता है। कुबेर को भी अभाव रह सकता है, और इन्द्र जैसा सर्व सम्पन्न भी पतित,निंदित एवं अभिशप्त स्थिति में पहुँच सकता है। जिन्हें इस वस्तुस्थिति का ज्ञान है वे सूक्ष्म शरीर को विचार तंत्र की परिष्कृत, परिमार्जित बनाने पर पूरा-पूरा ध्यान देते हैं और हर परिस्थिति में हँसता-हँसाता हुआ खिलता- खिलाता हुआ जीवन जीते हैं। यही है सूक्ष्म शरीर का सामान्य जीवन में सदुपयोग।

कारण शरीर में भाव संवेदनाओं का भण्डार है। असीम शक्ति का स्रोत यहीं से उभरता है। स्थूल शरीर को विकसित करने के लिए कर्मयोग का, सूक्ष्म शरीर को प्रगति के लिए ज्ञानयोग का और कारण शरीर को समृद्ध बनाने के लिए भक्तियोग का आश्रय लेना पड़ता है।


दूसरों से पहले अपने आप को देखों (Kahani)

फकीर जुन्नेद आँखों में आँसू भरकर परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे- “मैंने सब कुछ छोड़ दिया अब तक तेरे ऊपर नजर टिकी है। पर प्यारे यह तो बता कि तेरी नजर भी मेरी तरफ है या नहीं?”

भीतर का परमात्मा बोला- “जब तक दूसरे की नजर अपनी ओर होने में संदेह है तब तक दूरी बनी ही रहती है। अपनी नजर जमाये रहने में ही संतोष कर। फिर देख!”


सविता साधना से-अन्तःशक्ति का अभिवर्धन

इस दृश्य जगत में जो कुछ दीख पड़ता है उसे सूर्य का ही चमत्कार कहना चाहिए। ताप, प्रकाश और ध्वनि की त्रिविधि तरंगें ही प्रकृति के अन्तराल में संव्याप्त हैं। उन्हीं के कारण तत्वों का प्रादुर्भाव हुआ है। अणु परमाणुओं की संरचना बन पड़ी है। त्रिविधि शक्ति धाराओं में से दो का ताप और प्रकाश का सूर्य से सीधा सम्बन्ध है। उनका उसे उद्गम भी कहा जा सकता है। प्राणियों, वनस्पतियों का अस्तित्व सूर्य के रासायनिक सम्प्रेषण से ही सम्भव हुआ। ऋतुएँ सूर्य के स्थान परिवर्तन से ही आती जाती हैं। इसी महा पुष्प से पराग प्राप्त करने के लिए पृथ्वी मधुमक्खी की तरह उसके इर्द-गिर्द भ्रमण करती रही है। श्रुति ने सूर्य को जगत का आत्मा सच ही बताया है। यदि सूर्य बुझ जाय तो पृथ्वी समेत समस्त सौर-मण्डल में सघन अंधकार के अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर न हो। सर्वत्र निस्तब्धता छा जाय। हलचलों का कहीं कोई आधार या कारण शेष न रहे।

सूर्य उभयपक्षीय शक्ति धाराओं का उद्गम है। उसमें जीवनी शक्ति का अजस्र भण्डार है। जीवित प्राणियों, अन्न फलों को जहाँ किरणें स्पर्श करती हैं, वहाँ जीवनदायक विशिष्ट तत्वों का अवतरण हुआ देखा जाता है। इसी प्रकार उसमें दूसरी विनाशक शक्ति भी है। विषाक्तता संलग्न, मलीनता को यही किरणें रौंद डालती है। साधारण विज्ञान अर्थी इस बात को जानते हैं और अन्न, वस्त्र, पुस्तक आदि को धूप लगाते रहने की आवश्यकता बताती है, अन्यथा जीवाणु उनके अस्तित्व को खतरे में डाल दें। सूर्य किरण चिकित्सा के आधार पर अनेक रोगों का निवारण उसी प्रकार सम्भव होने लगा है जिस प्रकार कि एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा आदि द्वारा सम्भव होता है। भौतिक जगत में जो कुछ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष वैभव दृष्टिगोचर होता है, उसे सूर्य का अनुदान ही समझा जाना चाहिए। भविष्य की महती आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अन्य आधारों से निराश होकर सूर्य का आश्रय लेने की बात ही सोची जा रही है। ईंधन जितना उपलब्ध हो सकता है। वह एक शताब्दी में ही समाप्त हो जायेगा। फिर उसकी आवश्यकता सूर्य के महान ऊर्जा भण्डार से ही पूरी कर सकना सम्भव होगा। पानी की बढ़ती समस्या बादलों से पूरी होती दीखती नहीं। बर्फ का पिघलना भी नदियों के माध्यम से क्षेत्रीय आवश्यकता ही पूरी करता है। भूगर्भ का जल नीचे खिसकता जाता है। उसके स्रोत सूखते जा रहे हैं। ऐसी दशा में निरन्तर बढ़ती हुई जल की आवश्यकता सूर्य किरणों द्वारा समुद्र के खारापन को दूर करके कृत्रिम बादल बना कर ही पूरी की जा सकेगी। अब तक के प्रगति इतिहास में भी सूर्य की ही प्रमुख भूमिका रही है। भविष्य में भी आशा सम्भावनाओं का केन्द्र वही हो सकेगा। यदि उसकी अमृत वर्षा का लाभ उपलब्ध नहीं हुआ तो दिन-दिन चुकते जाने वाला पदार्थ भण्डार और जीवन धारा चुक जाने में बहुत देरी नहीं समझी जानी चाहिए। सृष्टि का उद्भव उसी से होने की बात विज्ञानवेत्ता खुले रूप में स्वीकारते हैं, साथ ही यह भी कहते हैं, बढ़ती जनसंख्या के साथ बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस अजस्र भण्डागार से संतुलन बिठा पाना सम्भव हो सकेगा। इस अनुदान में कमी पड़ी तो जलहीन मछलियों की तरह अपनी दुर्दशा ही होकर रहेगी। जहाँ चाह वहाँ राह के अनुसार अगले दिनों यह प्रयत्न सफल होकर रहेंगे कि दृश्यमान सूर्य का धरती निवासियों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिल सकना कैसे सम्भव हो।

प्रसंग आत्मोत्कर्ष का चल रहा है। वैभव का अभिवर्धन भी पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता उस आत्म-बल के बढ़ाने की भी है जिसे श्रद्धा प्रज्ञा, निष्ठा, जैसी विभूतियों का आधार माना जाता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास इसी पर निर्भर है। ऋद्धि-सिद्धियाँ इसी क्षेत्र से उभरती हैं। प्रतिभा, कुशलता, विशिष्टता वरिष्ठता बाहर से नहीं उतरती भीतर से ही उभरती हैं। अन्तरंग ही आत्मा का क्षेत्र है। इसे दिव्यलोक भी कहा जाता है। प्रसुप्त रूप से उन समस्त सम्भावनाओं के बीज इसी क्षेत्र में प्रसुप्त स्तर पर पड़े हुए हैं कि उन्हें जो जितनी मात्रा में जगा लेते हैं वे उसी अनुपात से देवात्मा होने का गौरव प्राप्त करते हैं।

आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में अध्याय के, परिशोधन के अनेक उपाय उपचार हैं। उपासना, साधना की सम्प्रदाय मेद से अनेकों विधि परंपरायें प्रचलित हैं। इनमें ध्यान-धारणा की सार्वभौम एवं सर्वानुमोदित स्थान मिला हुआ है। इसे आत्मवादी विशेष आकाँक्षा सँजोकर श्रद्धा विश्वास के साथ अपनाते और उसका भावना के अनुरूप प्रतिफल भी प्राप्त करते हैं। इतना ही नहीं अनीश्वरवादी भी मानसिक संतुलन बिठाने और एकाग्रताजन्य विशिष्टता प्राप्त करने के लिए ध्यान उपचार को प्रयोग में लाते हैं।

ध्यान के अनेक माध्यम हैं। लक्ष्य एवं इष्ट को निर्धारण करते हुए उसे ध्यान का केन्द्र बिन्दु बनाया जाता है। फिर भी इन स्थापनाओं में मतभेद तो बनते ही रहते हैं। इस बिखराव को दूर करने में सूर्योपासना अधिक कारगर सिद्ध हो सकती है। प्रकाश की चमक में आकर्षण भी होता है। पतंगे दीपक की ओर अनायास ही लपकते देखे जाते हैं।

गायत्री महामंत्र का देवता सविता है। सविता उगते हुए स्वर्णिम सूर्य को कहते हैं। ध्यान प्रयोजन के लिए सूर्योपासक इसी का प्रयोग करते हैं। सूर्योपस्थान सूर्य नमस्कार, सूर्यार्घ, सूर्य सेवन, आदि के अनेकों उपक्रम साधना क्षेत्र में अपनाये जाते हैं। अग्निहोत्र में भी सूर्य शक्ति की प्रमुखता है। इसके अतिरिक्त ध्यान-धारणा को तो उस आधारभूत अवलम्बन के रूप में अपनाया ही जाता है।

ध्यान-धारणा में सविता उपासना का सामान्य क्रम यह है कि प्रातःकालीन उगते सूर्य को अर्द्ध खुली आँखों से देखकर पलक बंद कर लिया जाय। भावना की जाय कि वह दिव्य सत्ता अपने किरण जाल समेत सम्पूर्ण शरीर में संव्याप्त हो गई। इस शुभारम्भ में जलाशय की समीपता शक्ति आकर्षण की दृष्टि से अधिक फलप्रद होती है। कई व्यक्ति जलाशय में खड़े होकर सूर्याभिमुख स्थिति में जप तथा ध्यान करते हैं। कई उतने समय तक गीले वस्त्र धारण किये रहते हैं। कुछ सूर्य को अर्घ्यदान करते हुए मासिक जप के साथ अपनी संरक्षित आराधना पूरी कर लेते हैं। यदि ब्रह्म मुहूर्त में यह आराधन करना हो, तथा बादल छाये रहने पर प्रत्यक्ष दर्शन न हो रहा हो तो जिस दिशा में उस समय सूर्य की उपस्थिति सम्भव लगती हो उस ओर मुख करके भी ध्यान किया जा सकता है, यह अनेकानेक प्रचलनों में से कुछ एक की चर्चा है।

सार्वभौम, सर्वजनीन और सर्व सुलभ ध्यान का उपाय यह है कि खुले स्थान में बैठा जाय। प्रातःकाल का समय हो जल पात्र दाईं और रक्खा हो। प्रतीक स्थापना के रूप में अगरबत्ती या दीपक जला लिया जाय। स्वच्छ स्थान में स्वच्छ शरीर, वस्त्र से पालथी मार कर बैठा जाय। मेरुदण्ड सीधा रहे। नेत्र बन्द। हाथ गोदी में एक के ऊपर एक, स्थिर शरीर, शान्त चित्त। यह है ध्यान मुद्रा, जिसे प्रत्येक प्रकार के ध्यान में आवश्यक एवं उपयोगी माना गया है।

इस स्थिति को बनाने में आरम्भ में पाँच मिनट लग सकते हैं। इसके बाद स्वर्णिम सूर्य का ध्यान मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरंध्र से आरम्भ किया जाय। ध्यान ठीक प्रकार बन पड़ने में कुछ दिन लगते हैं। अभ्यास से ही साधना परिपक्व होती है। इसका चिन्ह यह है कि बिना आँख खोले ही इष्ट देव के भाव दर्शन होने लगें। प्रतीति हो चले कि अन्तःक्षेत्र में ध्येय का दिव्य अवतरण आरम्भ हो गया। मस्तिष्क मध्य में एक हल्का छोटा सौम्य सूर्य उदय हुआ। उसकी किरणें नीचे की दिशा में समस्त काय कलेवर में फैली और ऊपर के आकाश क्षेत्र में उनने उभर कर गगन मण्डल के साथ संपर्क जोड़ा। ब्रह्मरंध्र को मध्य बिन्दु माना जाय। अधोभाग में शरीर के समस्त अवयव और ऊर्ध्व भाग में अंतरिक्ष का वह भाग जो ध्यान के काय कलेवर से उतना ही ऊँचा है जितना नीचे का अधोभाग।

मस्तिष्क मध्य में मनुष्य की दिव्य शक्तियों का अदृश्य भाण्डागार है। उसी को जागृत करने की प्रथम चेष्टा होनी चाहिए। ब्रह्मरंध्र खिले कमल की तरह दृष्टिगोचर होने लगता है। पुष्प प्रजाति में कमल का सूर्य के साथ रहस्य भरा संबंध है। प्रभात कालीन किरण पड़ते ही वह खिलना आरम्भ करता है और अस्त होने पर वह भी सिकुड़ जाता है। मस्तिष्क मध्य में सूर्य का ध्यान इस प्रकार किया जाय, मानो वह पर्वत शृंखला के हिमाच्छादित शिखर से उदय हो रहा है और उसमें यथावत् प्रतिबिम्ब मस्तिष्क मध्य में उसी तरह प्रतिबिम्बित होता है जैसे दर्पण में सामने वाला दृश्य यथावत् परिलक्षित होता है।

हिमालय के उदयाचल क्षेत्र में मानसरोवर अवस्थित है। मस्तिष्कीय स्निग्ध पदार्थ को मानसरोवर या क्षीर सागर की उपमा दी जाती रही है। शतदल कमल यही है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश की-दिव्य गुरु सत्ता की-भावना कमलासन पर अवस्थित होने के रूप में देखी जाती है। इस स्थिति का भाव क्षेत्र मानस लोक में उभरते ही उसकी किरणें समूचे क्षेत्र में बिखरती हुई अनुभव की जानी चाहिए। साथ ही उसकी सौम्य ऊर्जा का विस्तार भी। सूर्य प्रायः उष्ण होता है। पर उसके प्रतिबिम्ब यदि शीतल झील पर पड़ें तो उसका प्रभाव एवं प्रकाश भी शीतल रहेगा। मस्तिष्क मध्य का सूर्य भी सदा शीतल ही रहता है, ताकि उसकी आभा समूचे संपर्क क्षेत्र को शान्ति प्रदान करती रहे। इस प्रकाश से मनःक्षेत्र के वे सभी पक्ष अभिनव चेतना प्राप्त करते हैं और सभी ज्ञात, अविज्ञात, प्रसुप्त-जागृत क्षेत्र नये सिरे से उभरना, शक्ति सम्पन्न बनना आरम्भ कर देते हैं। यह दृश्य ध्याता को इस रूप में दृष्टिगोचर होता है, मानों उद्यान के पुष्प पल्लवों पर लगी कलियाँ खिलने और सुगंध बिखेरने लगीं। इस दृश्य को अतीन्द्रिय दिव्य क्षमताओं का प्रकट-प्रखर बनना, विकसित होना समझा जा सकता है। वैसा वस्तुतः होता भी है। साधक अनुभव करता है कि उसका मस्तिष्क क्षेत्र देवलोक की तरह सत्प्रवृत्तियों का देव शक्तियों का केन्द्र बन कर सुदूर क्षेत्र तक अपने आलोक का विस्तार वितरण कर रहा है।

प्रत्यक्षतः काय कलेवर में यों सोने जगने की, पेट प्रजनन की सामान्य जीवों जैसी क्रियाएँ ही बन पड़ती हैं। पर यदि उसके अन्तरंग क्षेत्र में अवस्थित विभिन्न घटकों को टार्च जैसा प्रकाश उगते हुए दीख जाय तो दिव्य चेतना के आलोक में ऐसा बहुत कुछ विद्यमान अनुभव होता है जो असाधारण है। दिव्य क्षमताओं से भरपूर है। अभिनव आलोक मिलने पर उस सब का अभ्युदय उत्कर्ष निश्चित है।

स्थूल शरीर में अनेक गुच्छक अन्तर्ग्रन्थिस्राव, ग्रन्थि समुदाय शरीर विज्ञानी देखते हैं। सूक्ष्म शरीर को निरखने की जिसमें क्षमता है वे षट्चक्र, पंचकोश, नाड़ी प्रवाह, उपत्यिकाएं स्तर के सूक्ष्म अवयवों की उपस्थिति भी देखते हैं। मस्तिष्क चलन के अतिरिक्त सूक्ष्म शरीर में अति महत्वपूर्ण केन्द्र और भी हैं। इन्हें हृदय चक्र और नाभि चक्र भी कहते हैं। नाभि चक्र स्थूल शरीर का अधिष्ठाता है। इस परिधि को भूलोक कहते हैं। हृदय चक्र सूक्ष्म शरीर मानस लोक को स्वर्ग लोक का प्रतीक माना गया है। मस्तिष्क का ब्रह्मचक्र स्वर्ग लोक है। उसे कारण शरीर का अधिष्ठाता कहा जा सकता है।

सामान्य स्थिति में यह तीन चक्र उपेक्षित, अविज्ञात, अविकसित स्थिति में पड़े रहते हैं। पर जब उनमें सविता के दिव्य आलोक का संचार होता है तो क्रमशः विकसित होते चले जाते हैं। इस विकास की प्रमाणभूत अनुभूति साधक को स्वयं होने लगती है। उसे प्रतीत होता है कि सविता का अन्तःक्षेत्र में अवतरण अपना प्रभाव, चमत्कार दिखा रहा है। तीनों शरीरों में और उनमें सन्निहित अनेकानेक घटकों में अभिनव शक्ति संचार कर रहा है सर्वतोमुखी अभ्युदय का इस आधार पर पथ प्रशस्त भी हो रहा है।


जहाँ धर्म होगा, वहीं जीत होगी (Kahani)

दुर्योधन को अपनी माता गान्धारी की वचन सिद्धि का विश्वास था। सो वह अंतिम युद्ध में जाते समय माता के पास गया और विजय का आशीर्वाद माँगने लगा। गान्धारी ने इतना ही कहा- “जहाँ धर्म होगा, वहीं जीत होगी।”

इतना कहने से दुर्योधन का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता था। वह स्पष्ट शब्दों में अपनी विजय का आशीर्वाद चाहता था। माता से उसने वैसा ही आग्रह किया।

गान्धारी ने बताया- आशीर्वाद तभी तक सफल होते हैं जब तक नीति-न्याय के साथ जुड़े रहते हैं। पक्षपात प्रेरित होने पर वे निष्फल ही नहीं चले जाते, दाता के पास से सदा के लिए उस सामर्थ्य को भी ले जाते हैं। अस्तु मैं तुम्हारी मर्जी से नहीं, अपने विवेक से ही आशीर्वचन बोलूँगी।


इच्छा शक्ति के चमत्कार

व्यक्ति किसी कार्य विशेष में सफलता पाने के लिए कृत संकल्प हो जाय और अभ्यास प्रयास उस दिशा में निरन्तर जारी रखे तो कोई कारण नहीं कि वह सफल न हो सके। शरीर क्रिया क्षेत्र में आये दिन योगाभ्यासियों द्वारा ऐसे ही क्रिया-कौतुक प्रदर्शित किये जाते रहे हैं, जिन्हें देखने से सहज विश्वास तो नहीं होता; पर वैज्ञानिक निरीक्षण परीक्षणों के दौरान वे बिल्कुल सही पाये गये और उनकी इस क्रिया-कुशलता को सर्वसम्मति से स्वीकारा गया।

ऐसा ही एक प्रयोग-परीक्षण “हारवर्ड इंस्टीट्यूट फॉर साइकिक एंड कल्चरल रिसर्च” की ओर से डॉ. थेरेस ब्रोसे नामक एक फ्राँसीसी शरीर विज्ञानी के संरक्षण में आयोजित किया गया। इसके लिए वे अपने मित्र डॉ. माइलोवेनोविच के साथ योग की विलक्षणताओं की शोध करने के लिए भारत आए। अपने प्रयोगों के दौरान उनने अपने सन्देहों के निवारणार्थ कई प्रकार की जाँच-पड़ताल के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले उसमें दिल की धड़कन बिल्कुल बन्द कर लेने का दावा भी उनने सही पाया। ऐसे योगी तो काफी संख्या में मिले जो सामान्यतया 72 बार प्रति मिनट की धड़कन को 30 तक घटा लेते हैं। 3 दिन से 28 दिन तक बिना साँस लिए, बिना अन्न−जल ग्रहण किए, बिना मल-मूत्र विसर्जन किए, समाधिस्थ रहने वाले योगियों में से अधिकाँश के दावे सही पाए गए। उनके संज्ञाशून्य होने की बात उनका हाथ बर्फ में दबाए रहे और आग का स्पर्श कराने पर भी परीक्षायें खरी उतरीं। एक योगी संकल्प-बल से जिस भी अंग से कहा जाता उसी से पसीना निकाल सकते थे। इससे उनने पूर्वार्त्त अध्यात्मिक के मर्म को समझा व पाश्चात्य जगत में भारत के वास्तविक स्वरूप को प्रकट किया। यही नहीं एक बार लन्दन में एक भारतीय योगी ने सन् 1928 में ऐसा ही एक सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। उसने नाड़ी की गति को न्यूनतम 20 और अधिकतम 120 करके डॉक्टरों को आश्चर्यचकित कर दिया। वह अपनी माँस-पेशियों और त्वचा को इतनी कड़ी कर लेता था कि सामान्य हथियारों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।

साम्राज्ञी मेरीलुईस के बारे में कहा जाता है कि वे अपनी इच्छानुसार अपने कानों को बिना हाथ से छुए किसी भी दिशा में मोड़ सकती थीं और आगे-पीछे हिला सकती थी। इसी प्रकार एक फ्राँसीसी अभिनेता इस बात के लिए प्रसिद्ध था कि वह अपनी इच्छानुसार अपने बालों को नचा सकता था। बालों को गिराने-उठाने, इधर-उधर घुमाने व घुँघराले बनाने की क्रिया में उसे महारत हासिल थी। अक्सर वह अपनी इस अद्भुत क्षमता का प्रदर्शन करके धन कमाया करता था। एक बाल को घुँघराला और ठीक उसके बगल के दूसरे बाल को चपटा कर देना, उसके लिए सामान्य बात थी। विभिन्न प्रकार के परीक्षण कर डॉ. आगस्त कैवेनीज ने बताया कि उसने सिर की त्वचा को माँसपेशियों तथा वस्तुओं को अपनी इच्छाशक्ति के आधार पर असाधारण रूप से विकसित और संवेदनशील कर लिया है।

इस प्रकार अगणित प्रयोग आये दिन देखने को मिलते ही रहते हैं। यह तो स्थूल अंगों के नियमन, नियंत्रण संबंधी, सामान्य प्रयोग मात्र हैं। आम मान्यता मनुष्य को यहीं तक सीमित स्वीकारती है, वह इसे हाड़-माँस का बना काय-कलेवर भर मानती हैं; पर वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। जो दृश्यमान है, उसके अतिरिक्त भी उसमें बहुत कुछ छिपा बड़ा है। वह चेतना का विशाल भाण्डागार है। यदि उस चेतना को सुनियोजित-नियंत्रित कर किसी दिशा विशेष में लगाया जा सके, तो व्यक्ति पहले से भी असामान्य और विलक्षण करतब दिखा सकता है। भगवान ने यह ऊर्जा भण्डार इसी हेतु हमें प्रदान किया है, कि हम उसका सदुपयोग कर लाभान्वित हो सकें।


खेचरी संवेदनाओं की निर्झरिणी

मस्तिष्क को स्वर्ग लोक की संज्ञा दी गई है। स्वर्ग में देवता निवास करते हैं। देवता अर्थात् दिव्य आदर्श। वे अमृत पीते हैं। अपने यश शरीर में अमर रहते हैं और जिन पर अनुग्रह करते हैं, उन्हें सोमरस पिलाते हैं।

सोमरस के बारे में यह मान्यता सही नहीं है कि वह भाँग जैसी मादक जड़ी बूटी है। यह भ्रम पूर्वकाल में भी था और इसी बहाने कई भ्रम-ग्रस्त मादक द्रव्यों का सेवन करने लगे थे और अपने पक्ष में शिवजी को भी नशेबाजों की श्रेणी में गिनने लगे थे।

इस भ्रम का निराकरण करते हुए अथर्ववेद 14/13 में कहा गया है- सोम रस जड़ी बूटी नहीं है। उसका आस्वादन तो ब्रह्मवेत्ता ही करते हैं और वे ही उस तत्व के रहस्य को जानते हैं। इसी वेद के 2/7/2 में कहा गया है कि “सोम मस्तिष्क का अधिष्ठाता है।” 1/4/6 में कहा गया है, ‘सोम से भरा-पूरा दिव्य कलश इस मस्तिष्क में ही अवस्थित है।”

ऋग्वेद के 1/51/2 में कहा गया है- ‘सोम’ इस भूलोक का अमृत है। 1/16/15 में कहा गया है-सोम में प्रज्ञा पवित्र होती है। 9/96/29 में कहा गया है सोम पायी दिव्य भावनाओं से भर जाता है। शतपथ ब्राह्मण में 3/6/3/9 की उक्ति है कि यह सोम ही विष्णु है। उसी के 3/5/3/17 में कहा गया है कि मस्तिष्क ही देवलोक है वही यज्ञ भूमि है।

इस रहस्यमय दिव्य लोक मनः क्षेत्र में अवस्थित अमृत रूपी सोम को व्यावहारिक जीवन में कैसे उतारा जाय? व्यक्तित्व में सम्मिलित कैसे किया जाय? इसका उत्तर दिव्य दर्शियों ने खेचरी साधना के रूप में दिया है।

इस साधना के आधार पर शरीर में उत्साह और मन में उल्लास भरता है। उसकी दिशा धारा उत्कृष्ट आदर्शवादिता की ओर होती है। इसी को उर्ध्व गमन कहते हैं। ब्रह्मलोक की महायात्रा भी यही है।

इस तथ्य का और भी अधिक स्पष्टीकरण करते हुए ऋग्वेद 9/17/7 में कहा गया है। हेम सोम! आत्मरक्षा के इच्छुक, देवत्व की अभिवृद्धि के उत्सुक, नेतृत्व की क्षमता अर्जित करने वाले ब्रह्म परायण लोग तुझे प्रज्ञा द्वारा प्राप्त करते हैं।

ऋतम्भरा प्रज्ञा ही महासरस्वती है उसका निवास परब्रह्म के साथ सहस्रार कमल पुष्प पर ही है। ऋग्वेद 9/7/7 में कहा गया है प्रज्ञा का रस सोम, अज्ञान, अन्धकार को नष्ट कर महाप्रज्ञा को प्रदान करता है। यह कुण्डलिनी साधना का अध्यात्मिक प्रसंग है।

सोम के संबंध में शतपथ, ताण्डव, ऐतरेय ब्राह्मणों में उसे वर्चस तेजस, ओजस का ही यज्ञ बताया है और परम प्रतापी कहा है। प्रज्ञा का आधार बताया है। आत्मदर्शी ऋषि कहा है और इन्द्र की उपमा दी है।

इसे प्राप्त कैसे किया गया, इसका एक उपाय ब्रह्मचर्य कहा गया है और दूसरा अपनी क्षमताओं को सोम में होम देना बताया है। यहाँ सोम का तात्पर्य तालु की उच्च भूमिका में अवस्थित प्राणाग्नि की ओर संकेत है। प्रकारान्तर में यह खेचरी मुद्रा की प्रक्रिया बनती है। यह केवल क्रिया ही नहीं है उसमें आत्म समर्पण की भावना भी है। जिव्हा हवि है और तालु अग्नि। दोनों के संयोग से ब्रह्म यज्ञ बनता है। यह बिना घृत शाकल्य का देव यज्ञ है। इसे तत्ववेत्ता करते और ब्रह्मलीन स्थिति को प्राप्त करते हैं।

ब्रह्मरंध्र सशक्त होते हुए भी ईंधन न मिले के कारण अपनी दिव्य ऊर्जा गँवा बैठता है। उसकी स्थिति गरम भस्म जैसी रह जाती है। यह गर्मी मात्र शरीर यात्रा एवं दैनिक समस्याओं के समाधान में ही खप जाती है। जिस आधार पर ब्रह्मवेत्ता, दिव्य शक्तियों का भाण्डागार बन जाता है। ऋषि या सिद्ध पुरुष बना जाता है, वह स्थिति बन नहीं पाती। इसके लिए योग साधनाओं का आश्रय लेना पड़ता है। ब्रह्म स्थिति प्राप्त करने के लिए मौन, एकाग्र, एकान्त में बन पड़ने वाली ‘खेचरी साधना’ अपने प्रयोजन के लिए अद्वितीय है।

मनःसंस्थान का केवल 7 प्रतिशत भाग ही जाना जा सका है। 93 प्रतिशत अभी भी अविज्ञात है। इसे डार्क एरिया कहते हैं। अतीन्द्रिय क्षमताओं का इसी में निवास है। सूक्ष्म दर्शन, दिव्य दर्शन, भविष्य, प्राण-परिवर्तन जैसी अद्भुत क्षमताएँ इसी क्षेत्र में रहती हैं। उसका स्पर्श करने उभारने का और कोई मार्ग किसी ओर से नहीं है। केवल तालुका पिछला भाग ही ऐसा है जो अतीन्द्रिय क्षमताओं के क्षेत्र को नीचे से सहारा देकर ऊपर उठा सके। मुख में जीभ ही एकमात्र ऐसा उपकरण है, जो तालु तल को स्पर्श करके मस्तिष्क के प्रसुप्त अविज्ञात क्षेत्र को जागृत करने और प्रदीप्त करने में समर्थ है। उसी क्षेत्र से संबंधित, पिट्यूटरी ग्रन्थि है। पीनियल का उसके साथ तारतम्य है, दोनों मिलकर शरीर के अन्यान्य अवयवों को संतुलित समृद्ध रखने वाले “हारमोनों” को नियंत्रित करती हैं। उन्हीं का अनुशासन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों पर चलता है, यह समूचा सर्किल छोटा होते हुए भी सुविस्तृत शरीर की गतिविधियों, हलचलों और समय-समय पर उभरने वाले ज्वार-भाटों को नियंत्रित करती है।

मस्तिष्क विद्या के विज्ञानी जिव्हाग्र को एक विशेष प्रकार का जीवन्त इलेक्ट्रोड मानते हैं। उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए भोंथरापन हटा कर तीक्ष्णता उत्पन्न की जाती है। इस नुकीलेपन को निखारने के लिए तालुका पिछला भाग ही चुम्बक का काम करता है और इस योग्य बना देता है कि उसकी फेंकी हुई ऊर्जा मस्तिष्क गह्वर के किसी भी क्षेत्र तक पहुँच कर अपना काम कर सके। अन्य माध्यमों से यह कार्य बन पड़ना, अत्यधिक कठिन है।

प्रख्यात शरीर शास्त्री डॉ. मैग्राथ ने अपनी ‘ग्रेज एनाटोमी’ पुस्तक में एडिनो हाइपोफिसस सम्बन्धी अध्याय में तालु मूर्धा के ठीक ऊपर एक ऐसी थैली का वर्णन किया है जिसमें सेरिवोर-पायनल नामक द्रव भरा रहता है। यह द्रव न केवल शारीरिक बलिष्ठता, मानसिक- बुद्धिमता को पोषण प्रदान करता है, वरन् भावना क्षेत्र में भी उत्तेजना प्रदान करता है। निष्ठुरता, सहृदयता जैसी प्रवृत्तियाँ इस क्षेत्र के संतुलन एवं अनगढ़पन से संबंधित रहते हैं। द्रव को सही और सुरुचि संवर्द्धक बनाने में तालु के निचले भाग की विशेष भूमिका रहती है। इस निर्धारण में भी खेचरी मुद्रा से संबंधित क्रिया-कलापों द्वारा समूचे व्यक्तित्व प्रभावित करने की बात सिद्ध होती है।

मालिश का अपना महत्व है। शरीर के विभिन्न अवयव मालिश किये जाने पर ऐसी स्थिति पैदा करते है, जिससे स्नायु संस्थान एवं रक्त संचार में अपने ढंग की हलचल चल पड़े। जिव्हा की नोंक से तालु के निम्न भाग की मालिश किये जाने का प्रभाव सामान्य मालिशों की अपेक्षा अनेक गुना व्यापक होता है। उसका शरीर के अंगों पर तो प्रभाव पड़ता ही है। मानसिक विशेषताओं को उभारने में उसका और भी अधिक योगदान है।

फ्राँसिस ल्यूकेल की “इन्ट्रोडक्शन साइकोलॉजिकल फिजियोलॉजी” में बताया है कि तालु को जिव्हा की नोंक से चूसते रहने पर मनुष्य अनेकों उपयोगी तत्व शरीर को जीवित रखने की आवश्यकताएँ पूर्ण करने के लिए प्राप्त कर सकता है।

मस्तिष्क से भरे हुए भूरे लिबलिबे पदार्थों को तत्व दर्शियों ने मानसरोवर की उपमा दी है और कहा है उसमें अनेकों नदियों का उद्गम है। यह नदियाँ सूक्ष्म विद्युत व्यवस्था के रूप में समूचे शरीर में अपना-अपना काम करती पाई जाती हैं। जिस नदी का उद्गम सूख जाता है या आवश्यकता से अधिक खुल जाता है। अस्तु उस क्षेत्र में संबंधित अवयवों में ज्वार-भाटे आने लगते हैं और स्वास्थ्य संतुलन बिगड़ जाता है। स्थिति को सुधारने के लिए मानसिक उद्गम को ठीक करना पड़ता है। यह कार्य किसी और प्रकार नहीं, खेचरी, मुद्रा में प्रवीणता प्राप्त करके उन क्षेत्रों तक पहुँचा जा सकता है, जो स्वास्थ्य के शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र को गड़बड़ाने के लिए उत्तरदायी हैं। इस प्रकार खेचरी मुद्रा के सम्बन्ध में यदि समुचित ध्यान दिया जा सके तो उसे एक सफल चिकित्सा प्रणाली के रूप में विकसित किया जा सकता है।

भावनाओं को उभारने या दबाने के संबंध में ‘ब्रेन वाशिंग’ की एक बड़ी ऊबड़-खाबड़ परिपाटी प्रचलित है। उससे भी विचार बदलने भर की सफलता मिल पाती है। भावनाएँ तो अंतराल के किसी अविज्ञात क्षेत्र में उमड़ती हैं। उस उद्गम तक भी खेचरी मुद्रा द्वारा पहुँचा जा सकता है और हेय भावनाओं से भरे मानस को उत्कृष्ट संवेदनशील बनाया जा सकता है।


चले विज्ञान अब अध्यात्मिक का कर थाम कर जग में

जड़ पदार्थ और मनुष्य की प्राण चेतना मिल जुलकर ही वह स्थिति उत्पन्न करते हैं, जिससे मानवी ज्ञान और प्रकृतिगत साधनों का सदुपयोग हो सके। दोनों एक दूसरे से अलग रहने पर वे प्रयोग में नहीं आ सकते और एक प्रकार से निरर्थक ही पड़े रहते हैं। दोनों का समन्वय ही है, जिसने दुनिया को इतनी सुन्दरता और सुव्यवस्था प्रदान की है। एक को दूसरे के सहारे ही अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का अवसर मिला है। इसलिए ज्ञान और विज्ञान के बीच घनिष्ठ सहयोग करना उपयुक्त है।

देखा जाय तो विज्ञान का व्यावहारिक उत्कर्ष अभी कुछ ही शताब्दियों के अंतर्गत हुआ है। उसकी यह बात एक सीमा तक ही सही बैठती है कि जिसे प्रत्यक्ष देख लिया जाय उतने को ही मान्यता दी जाय। पर यह बात धर्म के संबंध में पूरी तरह लागू नहीं होती। उसमें श्रद्धा और विश्वास को प्रधान मान्यता दी जाती है।

नवोदित विज्ञान की मान्यता थी कि जिन पंच तत्वों के मिले से चेतना की उत्पत्ति होती है, उसका अन्त भी तत्वों के विखण्डन होने के साथ-साथ ही हो जाता है, अर्थात् आत्मा का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं। वह भी शरीर के साथ जन्मती और मृत्यु के साथ मर जाती है। मनुष्य चलता- फिरता पेड़ पौधा है।

इसी प्रकार विज्ञान की ईश्वर के संबंध में भी यह मान्यता थी कि ‘ईश्वर’ नाम की कोई अलग वस्तु है। प्रकृति के नियमों को ही कोई चाहे तो ईश्वर कह सकता है, पर इस मान्यता के रहते तो व्यक्ति को आदर्शों के साथ बाँधना भी किस प्रकार सम्भव हो सकता था? फलतः अनैतिकता का माहौल बनता चला गया और उससे सामाजिक संगठन को अपार क्षति पहुँची।

वस्तुतः मनुष्य की गरिमा वैयक्तिक आदर्शवादिता और सामाजिक मर्यादा के पालन में है। अन्ध विश्वासी प्रचलनों को छोड़कर उपयोगी अनुबंध स्वीकारने पर ही वैयक्तिक और सामाजिक जीवन का ढर्रा ठीक प्रकार चल सकता है। “अंधेर नगरी-बेबूझ राजा” की उक्ति चरितार्थ करने पर तो पारस्परिक स्नेह-सहयोग और उदार व्यवहार के सारे आदर्श ही नष्ट हो जाते हैं। क्योंकि तथाकथित विज्ञान-वाद के फेर में मनुष्य को नियंत्रण में रखने के लिए मात्र राजकीय कानून ही शेष रह जाते हैं, जिनसे बच निकलना मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी के लिए तनिक भी कठिन नहीं है।

अस्तु, चेतना और सम्पदा के बीच तालमेल बिठाये रखने के लिए उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र की महती आवश्यकता रहती है। अधकचरे विज्ञान की मान्यताएँ उस उत्कृष्टता की जड़ें काटती है, जिनके सहारे मनुष्य श्रेष्ठ बनता और दूसरों को श्रेष्ठ बनाता है, स्वयं उठता और दूसरों को उठाता है।

विज्ञान ने धर्म के संबंध में जो विकृत मान्यताएँ बनायी थीं, उसका परिणाम जब वैयक्तिक जीवन और समाज-व्यवस्था के क्षेत्र में अराजकता जैसा दीखने लगा तो प्रतीत हुआ कि यह मान्यताएँ उसी उपयोगितावाद का समर्थन करेंगी, जिसमें बड़ी मछली छोटी को खा जाती और बड़ा पेड़ नीचे के पौधों की खुराक का अपहरण कर लेता है। यह “जिसकी लाठी, तिसकी भैंस” वाला जंगली कानून यदि मनुष्य में भी अपनाया जाने लगा, तो समर्थों की बन पड़ेगी और असमर्थ धरती पर से मिट जायेंगे।

विज्ञान ने पिछली शताब्दी की मान्यताओं में उसके गुण-दोष को देखते हुए नये सिरे से विचार किया है और जो पिछले दिनों कहा जाता था, उसमें आमूल-चूल परिवर्तन भी किया है।

सृष्टि की कार्यविधि कितनी व्यवस्थापूर्ण है, यह “इकॉलाजी” सिद्धान्त का पर्यवेक्षण करने पर सहज ही समझा जा सकता है। सृष्टि के किसी भी पक्ष की जाँच-पड़ताल की जाय, तो उसमें एक घटक दूसरे घटक के साथ अनवरत सहयोग करता दिखाई पड़ता है। इतनी बुद्धिमता पूर्ण साँसारिक व्यवस्था और मानवी प्रकृति के भीतर पग-पग पर लागू होने वाले ‘इकॉलाजी” सिद्धान्त को देखते हुए हर किसी की सहज मान्यता बनती है कि संसार का कोई बुद्धिमान सृष्टा होना चाहिए, जो राह बताने और भूल सुधारने की योग्यता से सुसम्पन्न है। आकाश में इतने सारे ग्रह-नक्षत्रों की भगदड़ और उनका स्वभाव यदि क्रमबद्ध न हो, तो संसार में सुख-शान्ति नाम की कोई वस्तु ही शेष न रहे।

यही सिद्धान्त यदि हम मानव की प्रतिभा के अनायास ही संभावित समय से पूर्व विकसित होने, विलक्षण क्षमताओं से सुसम्पन्न होने वाले उदाहरणों पर लागू करें तो पाते हैं कि कोई न कोई ऐसी व्यवस्था जरूर है जो पूर्व जन्म के संचित संस्कारों को, ज्ञान सम्पदा आदि को पीढ़ी दर पीढ़ी अथवा एक जन्म से दूसरे में पहुँचाने में महती भूमिका निभाती है। अब तो मरणोत्तर जीवन के इतने अधिक प्रमाण ढूँढ़ निकाले गये हैं, जिनसे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि आत्मा की अपनी स्वतंत्र सत्ता है और वह काया के न रहने पर भी किसी न किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाये रखती है। यह अधकचरे विज्ञान की भूतकालीन मान्यताओं का खण्डन है।

मानवी अन्तःकरण में आदर्शों के निर्वाह की आकाँक्षा है। उसके प्रतिकूल आचरण करने पर अन्तर्द्वन्द्व खड़ा हो जाता है और उस आधार पर शारीरिक और मानसिक रोगों की झड़ी लग जाती है। शरीर मात्र रक्त माँस के आधार पर ही निरोग नहीं रहता, वरन् उसके प्रत्येक घटक को मानसिक विद्युत शक्ति का भी असाधारण प्रभाव सहना पड़ता है। असंतोष, उद्वेग, रोष, आक्रोश जैसे विकारों के कारण मनुष्य का व्यक्तित्व हर किसी की दृष्टि में हेय ठहरता है। साथ ही शरीर और मन में अनेकों प्रकार की अव्यवस्थाएँ उभरने लगती हैं जो असाध्य रोगों का रूप ले लेती हैं। यह अनैतिकता का प्रत्यक्ष दुष्परिणाम है।

देखा गया है कि आदर्शवादी चिन्तन, चरित्र और व्यवहार रखने वाले सर्वत्र सम्मान और स्नेह-सहयोग अर्जित करते तथा अन्तरंग-बहिरंग दोनों ही दृष्टि से समुन्नत स्थिति प्राप्त करते हैं। यह व्यवस्था पूरे समाज में गतिशील होते हुए यह स्पष्ट मानना पड़ता है कि चेतना के स्तर के साथ ही जीवन के उत्थान-पतन के अनेकों सूत्र जुड़े हुए हैं।

विचारों की शक्ति को अब एक प्रकार की जीवनी शक्ति माना जाने लगा है, जिसके सहारे कर्म बन पड़ते हैं, परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं और वे ही सुख-शाँति अथवा प्रतिरोध-विक्षेप का निमित्त कारण बनती हैं। व्यक्ति से समाज और समाज से व्यक्ति बनता है, इसलिए दोनों को सही-संतुलित रखने के लिए हमें वही सोचते रहना चाहिए जो व्यक्तित्व की गरिमा बढ़ाने की दृष्टि से समग्र एवं उच्चस्तरीय हो।

देश भक्ति, समाज सेवा, संयम, पुण्य परमार्थ जैसे आदर्श अपनाना आत्मिक प्रेरणा पर ही सम्भव है, क्योंकि इस प्रकार के आचरणों से तात्कालिक घाटा सहना पड़ता है। सत्परिणाम तो समय साध्य है। किन्तु महानता उन्हीं विशेषताओं तथा विभूतियों पर निर्भर है। यह उत्कृष्टता तथाकथित मनोविज्ञान के आधार पर नहीं बन पड़ती। क्योंकि प्रत्यक्षवाद में तत्काल लाभ को ही मान्यता मिलती है, जबकि कालान्तर में परिणामों के मिलने की बात को आत्मा की अमरता और सृष्टि में चल रही व्यवस्था के आधार पर ही सही सिद्ध किया जा सकता है पाश्चात्य मनोविज्ञान की दृष्टि से तो मनुष्य और पशु एक ही बिरादरी के बनते हैं। इसलिए उनमें भी दया, करुणा, परोपकार जैसी धर्म-धारणाओं की अपेक्षा की जानी चाहिए, किन्तु पशु तो निरन्तर स्वार्थ-वृत्तियों से ही ग्रसित रहते हैं। फिर दान, सेवा, पुण्य, परमार्थ, आत्मीयता, देश भक्ति, त्याग, बलिदान जैसे किसी आदर्श को अपनाने की बात तभी सम्भव हो सकती है, जब उनके द्वारा मानवी उत्कृष्टता को अपनाया जा सके। वैज्ञानिकों से लेकर हर उच्चस्तर के व्यक्ति को अपना स्वार्थ गौण करना पड़ता और लक्ष्य को प्रधानता देनी होती है। यहाँ तक कि उस मार्ग पर चलने वालो को कष्ट में रहते हुए भी संतोष एवं प्रसन्नता की आदत डालनी पड़ती है। इसके लिए प्रयत्न कर सकना पशु की स्थिति में नहीं बन पड़ता, जबकि तथाकथित वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार मनुष्य बन्दर से ही विकसित होकर बना है और बन्दर एवं पशु का समूचा आन्तरिक ढाँचा संकीर्ण स्वार्थपरता के ढाँचे में ही ढला है। उत्कृष्टता की प्रेरणा व उल्लास की मानवी प्रवृत्ति विकासवाद के तथाकथित सिद्धान्तों को झुठलाती है।

अब विज्ञान की प्रगति के साथ वे सूत्र भी मिले हैं, जिनके आधार पर ईश्वर, आत्मा, कर्मफल, आदर्शवादिता जैसे तथ्यों को न केवल व्यक्ति एवं समाज की भलाई को ध्यान में रखते हुए, वरन् इन उच्चस्तरीय दैवी विभूतियों को विशुद्ध पदार्थ विज्ञान के आधार पर भी सिद्ध प्रतिपादित किया जा सकता है।

पर यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य को पशु या पौधा कहने वाले विज्ञान की हर बात सही ही मानी जाय। मनुष्य की अपनी विशेषता और मर्यादा है और उनका समुच्चय ‘धर्म’ कहा जाता है। यहाँ धर्म शब्द का उपयोग सम्प्रदायवाद के अन्ध विश्वासों के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जा रहा। सम्प्रदाय रीति-रिवाजों के आधार पर बनते और चलते हैं। यह मान्यताएँ मनुष्यकृत हैं और एक समुदाय के लोग मिलजुल कर जो ढर्रा अपना लेते हैं, वही ढर्रा सम्प्रदाय के लोग मिल जुल कर जो ढर्रा अपना लेते हैं, वही ढर्रा सम्प्रदाय बन जाता है। उनमें मतभेद के साथ-साथ पूर्वाग्रह होना भी स्वाभाविक है। उस भावोन्माद में औचित्य पर विचार करने की गुंजाइश नहीं रहती। इन सम्प्रदायों ने ही कलह के बीज बोये और समाज की अखण्डता को चुनौती दी है। यदि यह मोटी बात समझाई जा सके कि धर्म और सम्प्रदाय दो अलग-अलग घटक हैं एवं धर्म का विकृत स्वरूप अनुपयुक्त प्रतीत होने पर उसका विरोध विज्ञान के द्वारा किया जाना चाहिए तो निश्चित ही विज्ञान की उपादेयता सर्वमान्य होगी।

समष्टिगत हित की बात सोचें तो धर्म और विज्ञान के बीच असहयोग या विरोध का होना हर दृष्टि से मानव समाज के लिए अहितकर है। धर्म को मानवी आदर्शों का सार्वभौम आदर्श माना जाय और उसका विज्ञान के आविष्कारों, तथा प्रयोगों पर अंकुश रहे, ताकि अणु बम, रासायनिक गैसें जैसे अवाँछनीय निर्माण और प्रयोगों पर रोक लगे। विज्ञान का उपयोग मात्र लोकहित में ही किया जाय।

इसी प्रकार आवश्यकता इस बात की भी है कि धर्म को विज्ञान की कसौटी पर कसा जाय और उसके विवेक, न्याय, सहयोग, स्नेह वाले पक्षों को भी मान्यता मिले। धर्म के नाम पर जितनी कुरीतियाँ, रूढ़ियां, मूढ़-मान्यताएँ प्रचलित हैं, उन्हें धर्म के उच्च सिंहासन से पदच्युत करके सम्प्रदायों के खण्डहरों में जमा कर दिया जाय। नये या पुराने होने के नाम पर किन्हीं मान्यताओं को श्रेष्ठ या निकृष्ट न ठहराया जाय।

विज्ञान ने धर्म को प्रतिगामी बता कर खूब कोसा है और धर्म ने विज्ञान को छिछोरा कहकर गालियाँ दी हैं। इसलिए वे दोनों एक-दूसरे से दूर ही हटते गये हैं। फलस्वरूप दोनों ही क्षेत्रों में अराजकता फैली है। विज्ञान ने हर क्षेत्र में हिंसा का खुला समर्थन किया है और तत्वदर्शन की प्रत्येक हिंसा का खुला समर्थन किया है और तत्वदर्शन की प्रत्येक मान्यता का उपहास उड़ाया है। ठीक इसी प्रकार धार्मिकों की दृष्टि में वैज्ञानिकों को आसुरी साधनों का सहायक संवर्धक कहा है। इससे चिढ़ बढ़ी है और परस्पर विग्रह का वातावरण बना है, जबकि होना यह चाहिये था कि धर्म अपने आपको विज्ञान की कसौटी पर खरा सिद्ध करने के लिए साहस जुटाता और प्रचलित मूढ़-मान्यताओं का निःसंकोच खण्डन करता। दूसरी और विज्ञान का भी यह कर्तव्य था कि धर्म की छत्रछाया में अपनी दिशा धारा का निर्माण करता, अपना उच्छृंखल उपयोग न होने देता, भविष्य में इसी समन्वय को अपनाना पड़ेगा। तभी विज्ञान के सहारे भौतिक और धर्म के सहारे आध्यात्मिकता का पथ प्रशस्त होगा। दोनों के समन्वय से समग्र सुख शान्ति का आधार खड़ा होगा।

सही, सुखद और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकने योग्य अध्यात्मिक को प्रतिष्ठित करने के लिए यह आवश्यक है कि सुधारक वर्ग सामने आये। निहित स्वार्थों वाले सन्त-महन्त वंश और वेश के नाम पर धन और सम्मान की लूटमार करते रहने वाले, लोगों को भ्रम जंजालों में फंसाने से बाज न आयें, तो विचारशील लोगों का कर्तव्य है कि लोक मानस में वैसी प्रखर चेतना जगायें, जो धर्म का स्वरूप पहचानने योग्य बुद्धिमता का परिचय दे सके। साम्प्रदायिक दुराग्रहों में जो अनुपयुक्त अंश घुस पड़ा है, उसे छाँटकर कूड़े-करकट की तरह बुहार कर किसी कूड़ेदान में डाल दें। इस प्रकार का परिशोधित और परिष्कृत धर्म अध्यात्मिक ही विज्ञ समुदाय तथा वैज्ञानिक क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करने योग्य और लोक मानस के दबाव से वैज्ञानिक शोधों और प्रचलनों को नीतियुक्त-धर्म सम्मत बना सकता है। यही समय की महती आवश्यकता है।


सिरजनहार का जगती को अनुपम उपहार

मानवी काया सृष्टा का एक अनुपम उपहार है। प्रत्यक्ष काया के अन्दर ही सूक्ष्म तथा कारण शरीर, पंचकोश, षट्चक्रों के रूप में अनेकानेक दिव्य विभूतियों के भाण्डागार भरे पड़े हैं। योग साधना के विभिन्न उपक्रमों को अपनाकर उन्हें जागृत करके मनुष्य अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न बन सकता है। भूत, भविष्य की बातें जान लेने की सामर्थ्य हस्तगत कर सकता है। उसके लिए तब देश, काल एवं समय की दूरी का सीमा बन्धन समाप्त हो जाता है। प्राचीन काल के भारतीय, ऋषि-मनीषी इसी स्तर को प्राप्त करने के पुरुषार्थ में संलग्न रहते थे।

योगशास्त्र के ज्ञाता आचार्यों ने अलौकिक क्षमताओं को जागृत करने के जिन विधि-विधानों, नियमों का आविष्कार किया था आज के भौतिक विज्ञानी भी उसकी पुष्टि अपने ढंग से कर रहे हैं। ऐसा ही एक प्रयोग पिछले दिनों ‘रायल यूनिवर्सिटी ऑफ रोम’ में किया गया था। विषय था- मनुष्य की दूर-दर्शन शक्ति का विकास और प्रदर्शन। सुप्रसिद्ध स्नायु मनोवैज्ञानिक डॉ. गिसेप कालिगाँरिस ने इसके लिए एक व्यक्ति के शरीर के कुछ मर्मस्थलों को 15 मिनट तक दबाया जिससे उसकी इन्द्रियातीत क्षमता विकसित हो गई। उसे एक दीवार की दूसरी ओर अवस्थिति व्यक्तियों और वस्तुओं का सूक्ष्मातिसूक्ष्म सारा विवरण बता दिया। डॉ. कालिगाँरिस ने उपस्थित अन्यान्य वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों को बताया कि “यदि शरीर के कुछ विशिष्ट स्थानों को जागृत किया जा सके तो व्यक्ति को अतीन्द्रिय अनुभूति प्राप्त हो जाती है और वह उन सब वस्तुओं को देखने में सक्षम हो जाता है जो चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देती। इस सामर्थ्य के विकसित होने पर मनुष्य कितनी भी दूर स्थित किसी भी वस्तु को एवं किसी भी घटित अथवा संभावित घटनाक्रम को देख सुन सकता है।”

मनोवैज्ञानिक जगत में आज ई.एस.पी. अर्थात् एक्स्ट्रा सेन्सरी परसेप्सन’ का नाम बहुप्रचलित है। यह मानव के अंतर्ज्ञान को प्रकाशित करने की वह विद्या है, जिसके माध्यम से व्यक्ति की अतीन्द्रिय क्षमताओं को कुरेदा एवं विकसित किया जाता है। मनुष्य शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से श्रेष्ठ एवं समुन्नत कैसे बन सकता है? दूसरे व्यक्ति के मन की बातों का आभास और अतीन्द्रिय शक्तियों में वृद्धि कैसे की जा सकती है?, इस खोज में अमेरिका के मिशिगन और कैलीफोर्निया विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक निरन्तर प्रयत्नशील हैं। उनका कहना है कि अतीन्द्रिय क्षमताओं को व्यक्तिगत स्तर पर अनुभव किया जा सकता है। इस प्रकार वे प्रमाणों से परे नहीं है।

मनीषियों के अनुसार मन-मस्तिष्क की सहज गति ऐसी है जो किसी एक विषय अथवा वस्तु पर केन्द्रित न रहकर कहीं दूसरी तरफ चली जाती है। यदि उसे किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जा सके तो उसकी बेधक क्षमता उसी प्रकार चमत्कार दिखा सकती है, जिस प्रकार आतिशी शीशे पर सूर्य रश्मियाँ एकत्रित होकर अग्नि उत्पन्न करती है। केन्द्रीभूत मस्तिष्कीय तरंगें उन स्थानों पर भी जा पहुँचती हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं पड़ते। इससे मनुष्य के पूर्व निर्णय की क्षमता बढ़ती है। दूसरे के मन की बातों को जाने, दिव्य दर्शन तथा भविष्यवाणी जैसे प्रयोजन इसी के माध्यम से पूरे होते हैं। येल विश्वविद्यालय में अनुसंधानरत वैज्ञानिक द्वय - डॉ. ए. एआँशँफ तथा राबर्ट एवेल्सन का कहना है कि आस्था एवं तन्मयता के अभाव में व्यक्ति की क्षमताएँ बिखरी हुई होती हैं। एकाग्रतापूर्वक उनका नियोजन अंतःशक्तियों के जागरण में यदि किया जा सके तो प्रसुप्त, गुप्त शक्तियों के उद्घाटन से वह सबको चमत्कृत कर सकता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के सत्यापन के लिए उन्होंने विद्यार्थियों का चुनाव किया, जिनमें से 70 प्रतिशत से अधिक ई.एस.पी. के प्रयोग सही निकले। इन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता।

मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक मार्टिन इवाँन ने अपनी पुस्तक “टू एक्सपीरिएन्सेस इन प्रोफेसी” में ऐसी अनेक प्रामाणिक घटनाओं का उल्लेख करते हुए यह सिद्ध किया है कि मनुष्य के भीतर अद्भुत अलौकिक क्षमताएँ विद्यमान हैं। इन्हें जागृत करके भूत, भविष्य एवं वर्तमान को देश काल की सीमाओं से परे होकर देखा जा सकता है। इसी तह न्यूरो साइकिएट्रिक इन्स्टीट्यूट, कैलीफोर्निया के निर्देशक डॉ. क्रेग ने भी अपने शोध निबन्धों में अनेक अतीन्द्रिय शक्ति की घटनाओं का वर्णन किया है। उनका कहना है कि यह सामर्थ्य किसी-किसी को तो गहन अभ्यास से प्राप्त होती है, परन्तु बहुत से व्यक्ति संसार में ऐसे भी हैं जिन्हें यह शक्ति जन्मजात अतिरिक्त वरदान के रूप में पूर्व जन्म संचित सम्पदा के रूप में मिली होती है।

पश्चिम जर्मनी में पुलिस विभाग में सेवारत मेजर हेल्मुज जींक को प्रकृति प्रदत्त ऐसी दिव्य क्षमता प्राप्त है जिससे उन्हें पश्चिम जर्मनी में हिटलर के समय के छिपाए गए बमों और अस्त्र- शस्त्रों की जानकारी मात्र उस जमीन पर खड़े होते ही मिल जाती है। उनके इस अतीन्द्रिय ज्ञान का लाभ जर्मन सरकार ने विगत 40 वर्षों में भरपूर उठाया है और अब तक लगभग साढ़े तीन लाख युद्ध आयुधों के जखीरे खोजे जा चुके हैं। भवन निर्माण के स्थान का चयन, भूगर्भस्थ जल स्रोतों के सही स्थान का चुनाव हेल्मुज की सलाह पर ही किया जाता है।

कैलीफोर्निया की एक महिला- क्लेरीसा बर्नहेड भूकम्पों की पूर्व जानकारी देने में प्रख्यात है। इसी कारण लोग उसे “अर्थक्वेक लेडी” के नाम से सम्बोधित करते हैं। भूकम्प सम्बन्धी दी गई उनकी सूचना रेडियो एवं टेलीविजन से सीधे प्रसारित भी होती रहती है। 28 नवम्बर 1974 को दोपहर तीन बजे कैलीफोर्निया के मध्य तटवर्ती क्षेत्र में आये भूकम्प की जानकारी उसने बहुत पहले लोगों को दे दी थी। साथ ही यह भी कहा था कि उसमें जान माल की कोई विशेष क्षति नहीं होगी। वास्तव में सुनिश्चित अवधि में ठीक ऐसा ही हुआ। एक दूसरे पूर्व कथन में वर्नहेड ने नवम्बर 1975 में हवाई द्वीप में आये विनाशकारी भूकम्प की ग्यारह माह पूर्व ही चेतावनी दे दी थी। इसमें बहुत अधिक जन-धन की हानि हुई थी। इसी तरह अमेरिका के ही और्गन प्राँत की लेडी शाँरलेट किंग भूकम्पों के आने से पहले ही उनकी सूचना देने के लिए प्रख्यात है। होलिस्टर, न्यू जूनिया, लिवरमूर, यूरेका जैसे प्राँतों में आने वाले भूकम्पों की पूर्व घोषणा करके वह लाखों लोगों की जानें एवं करोड़ों की सम्पत्ति बचा कर ख्याति प्राप्त कर चुकी हैं।

इंग्लैण्ड में जन्मा सामबेंजो नामक बालक बचपन से ही अतीन्द्रिय सामर्थ्य सम्पन्न था। बंद डिब्बों के अंदर रखी गई अज्ञात वस्तुओं के बारे में दूर से देखकर ही वह पूरी जानकारी दे देता था। अपने पिता की मृत्यु का संदेश अपनी माँ को उसने पहले ही बताया दिया था। अपने एक पेण्टर मित्र की मृत्यु का पूर्वाभास उसे तीन दिन पहले ही हो गया था। जैसा कि उसने बताया था कि दीवाल की पुताई करते समय सीढ़ी से गिरने पर उसका प्राणान्त हो जायेगा। तीन दिन बाद ठीक वैसा ही घटित हुआ।

1909 में जन्मा हालैण्ड का क्रोसेट भी बचपन से ही परादृष्टि से सम्पन्न था। उसने नाजी आक्रमण तथा जापानियों द्वारा डचाँ के ईस्ट इंडीज द्वीपों के अधिग्रहण के बारे में वर्षों पूर्व ही बता दिया था। किसी भी वस्तु को स्पर्श करके उसके मालिक, नौकर, परिवार एवं मित्र-संबंधियों के बारे में पूरा विवरण बता देना क्रोसेट के लिए बहुत आसान था। इतना ही नहीं वरन् वह संबंधित व्यक्तियों की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के बारे में भी सब कुछ बता देता था। वहाँ की पुलिस ने उसकी इस क्षमता का भरपूर लाभ उठाया और अनेक अपराधियों तथा हत्यारों को पकड़ कर जेल के सीकचों में बन्द किया।

कभी-कभी जीवन में अनायास होने वाले घटनाक्रमों से भी मनुष्य की दिव्य क्षमताएँ जागृत हो जाती हैं। अमेरिका में कैन्टुकी नगर के पास एक छोटे से गाँव में रहने वाले एडगर केसी नामक युवक के साथ ऐसा ही हुआ। एक दिन अचानक वह बीमार पड़ गया। उसकी माँसपेशियों में जकड़न और दर्द इतने जोरों से होने लगा जिसका निदान वहाँ के प्रख्यात चिकित्सक भी न कर सके। डाक्टर परामर्श कर ही रहे थे कि केसी ने आँखें खोलीं। उसकी छठी इन्द्रिय जागृत हो चुकी थी। उसके प्रकाश में अपनी बीमारी का नाम, उसका निदान उपचार वह स्वयं उपस्थित चिकित्सकों के बताने लगा। दवाइयाँ मँगाई गई और उसके सेवन से वह पूर्ण स्वस्थ हो गया। प्रकृति प्रदत्त इस शक्ति का उपयोग उसने अनेक रोगियों पर किया।

अमेरिका के मूर्धन्य मनोविज्ञानी डॉ. नेल्सन वाल्टर के मतानुसार प्रत्येक व्यक्ति में बलवती चेतना काम करती है। यही परोक्ष जगत की हलचलें एवं दूरस्थ वस्तुओं की जानकारी देती है। समस्त प्राणि जगत के एक ही चेतना के सागर से जुड़े होने के कारण कोई भी अपनी चेतना को विकसित एवं परिष्कृत करके अतीन्द्रिय सामर्थ्य को प्राप्त कर सकता है। उसके माध्यम से दूसरों के उत्थान पतन सहित अन्यान्य घटित होने वाले समस्त घटनाक्रमों की पूर्व जानकारी दे सकता है। प्रख्यात विज्ञान वेत्ता जे.बी. राइन ऐसे ही व्यक्ति हैं, जिन्हें विश्व में कहीं भी कोई घटित होने वाले घटनाक्रम का पूर्व परिचय मिल जाता है। उन्होंने अपनी एक पुस्तक में चार हजार पूर्वाभास की घटनाओं का चित्रण किया है, जो समय आने पर सच निकलीं। इस सम्बन्ध में उनके अनेकों व्याख्यान ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन ने प्रसारित किए तथा उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं। राइन ने तीन बातों का जिक्र किया है। उनका मत है कि प्रत्येक मनुष्य में अतीन्द्रिय शक्ति होती है जो दूरस्थ घटनाओं का बोध कराती हैं। दूसरे परस्पर घनिष्ठ व्यक्तियों में चेतनात्मक आदान-प्रदान बहुत सरलता से सम्पन्न हो जाता है। तीसरे पुरुषों की अपेक्षा यह अनुभूति महिलाओं एवं आध्यात्मिक, धर्मनिष्ठ व्यक्तियों में अधिक होती है।

वर्तमान में किये जा रहे विभिन्न मनोवैज्ञानिक-परामनोवैज्ञानिक अनुसंधानों की खोज विस्मयकारी मानवी मस्तिष्क के तंत्रिका आवेगों तक ही सीमित है। इससे चमत्कारों का ज्ञान मात्र होता है, पर चेतना का परिष्कार नहीं होता। जीवन पद्धति यथावत् बनी रहती है। वस्तुतः वास्तविक रहस्य तो अन्तःचेतना को विकसित एवं परिशोधित करके ही जाना जा सकता है। इस दिशा में प्रयास जारी रखे जा सकें एवं विज्ञान द्वारा प्रदत्त भौतिक उपादानों का आश्रय लेकर अध्यात्म अवलम्बन से अर्जित इन विभूतियों पर अनुसंधान किया जा सके तो सृष्टा के भाण्डागार में छिपे बहुमूल्य मणि-माणिक्य मानव जाति को हस्तगत हो सकते हैं।


ईश्वर की इच्छा (Kahani)

मौलवी साहब के दो बच्चे थे। उन्हें वे बहुत प्यार करते। भोजन उन्हें साथ ही कराते। नित्य कर्म के बाद मौलवी साहब किताब पढ़ाने गये। अकस्मात् दोनों बच्चे बीमार पड़े और तीसरे पहर तक स्वर्ग सिधार गये।

बच्चों की माँ सोचने लगी पिता लौटेंगे, तो वे ऐसा सदमा बर्दाश्त न कर सकेंगे। बाद में उन्हें समझाने की अपेक्षा ऐसा करना चाहिए कि आरम्भ में ही उनका विवेक जग जाय और सदमा हल्का पड़े।

मौलवी साहब के घर लौटने से पहले ही बच्चों की लाश घर में लिटाकर ऊपर से कपड़ा ढक दिया, जब वे लौटे और बच्चे न होने की बाबत पूछा- तो जवाब मिला वे अभी अभी खा पी कर खेलने चले गये हैं देर से लौटेंगे। आप भोजन कर लीजिए।

जब वे खाना खाने लगे तो उनकी पत्नी ने अपनी एक गुत्थी का हल पूछा- बोलीं कुछ दिन हुए पड़ोसिन से दो जेवर माँग लाई थी। बहुत दिन पहने सो अच्छे लग गये। आज वह आई थी और जेवर वापस माँग रही थी। मेरा मन तो देने का नहीं है क्या करूं?

मौलवी साहब ने बदलकर कहा- माँगी वस्तु वापस करनी चाहिए। इतने दिन तक जेवर पहन लिये, इसी पर संतोष करो और दूसरे की अमानत खुशी-खुशी वापस कर दो।

भोजन कर चुके तो मौलवी जी को उनकी पत्नी घर में भीतर ले गई जहाँ बच्चे मरे हुए पड़े थे। वे सन्न रह गये। बच्चों की माता ने कहा- यही थे वे माँगे हुए जेवर जिनके संबंध में आपने कहा था- खुशी-खुशी वापस करो।

मौलवी साहब ने सदमे को विवेक पूर्वक सहा और ईश्वर की इच्छा समझकर मन समझा लिया।


काय बिन्दु में समाया सिन्धु

स्थूल दृष्टि से हमारा शरीर रक्त मास का बना काय-कलेवर भर प्रतीत होता है। इसीलिए जन-सामान्य इसका उपयोग खाने-कमाने के तुच्छ प्रयोजनों तक ही सीमित रखता है, पर वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। इसका दृश्यमान स्वरूप जितना कुछ दीखता है, वही सब कुछ नहीं। इसमें इतनी असीम क्षमताएँ और ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में ऐसी निधियाँ छिपी पड़ी हैं, जो काय-बिन्दु में सिन्धु के समाये होने का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। आये दिन विलक्षण इन्द्रियातीत सामर्थ्य के रूप में इस बात के उदाहरण मिलते ही रहते हैं। इटली में इस सदी के प्रारम्भ में एक ऐसी आधी लड़की पायी गयी थी जो अपने नासाग्र और कर्ण के पिन्ना (बाह्य कर्ण) से देख सकती थी। जब कोई अचानक तेज रोशनी उसकी नाक अथवा कान पर डाली जाती तो वह चौंक उठती थी। सन् 1956 में स्काटलैण्ड में एक अंधा छात्र शोध कर्त्ताओं ने ढूंढ़ निकाला जो विभिन्न प्रकार के रंगीन-प्रकाशों में विभेद कर सकने में सक्षम था। कुछ दूरी पर रखे हुए अनेक वस्तुओं में से सबसे चमकीली वस्तु के बारे में बताने की क्षमता उसमें थी।

ये जो क्षमताएँ चक्षु विहीन व्यक्तियों में अनायास ही विकसित हो जाती हैं, उन्हें अन्यान्य इन्द्रियों के माध्यम से वे लाभ देते हैं जो उन्हें दुर्भाग्यवश सामान्य क्रमानुसार नहीं मिला।

सन् 1960 में वर्जीनिया की एक लड़की जो अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न समझी जाती थी, उस पर वहाँ के एक मेडिकल बोर्ड के विशेषज्ञों ने सच्चाई जानने के लिए अनेक प्रयोग किये। उसकी आँखों पर मोटी पट्टी बाँध दी गई, किन्तु फिर भी वह देखने में सक्षम थी और किताबों को पढ़ सकती थी। इसी प्रकार का एक प्रयोग न्यूयार्क के बर्नार्ड कालेज के मनोविज्ञानी डॉ. रिचार्ड ने सम्पन्न किया। उनने अमेरिका की एक महिला की आँखों पर पट्टी बाँधकर विभिन्न रंगों की जाँच करने को कहा। उक्त महिला ने उँगलियों के सहारे सभी रंगों की यथावत् जाँच कर सही बताया। डॉ. रिचार्ड का कहना है कि प्रत्येक रंग से अलग-अलग ताप तरंगें निकलती हैं। किसी-किसी की त्वचा इन्द्रियों में उन तरंगों के अन्तर को समझने की क्षमता भी विकसित हो सकती है। उसी आधार पर रंगों की विविधता पहचानना उनके द्वारा सम्भव होता है। ब्रेल लिपि का आविष्कार तो बाद में हुआ किन्तु यह विभूति मानव की चिर पुरातन अमूल्य थाती है।

फ्राँस में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद डॉ. जूल्स रोमैन ने सैंकड़ों अंधे व्यक्तियों पर दृष्टि सम्बन्धी प्रयोग परीक्षण किये और पाया कि उनमें से कुछ प्रकाश और अंधकार की उपस्थिति को अत्यन्त दक्षतापूर्वक बता करने में समर्थ थे।

आखिर मनुष्य इस क्षमता को कैसे अर्जित कर लेता है? इस संदर्भ में अनेकानेक प्रयोग- परीक्षणों के उपरान्त व इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य की त्वचा में असंख्य “कीट नेत्र” होते हैं, जो अति संवेदनशील होते हैं और नेत्रों से अधिक जानकारी देते हैं। जब प्रयास पूर्वक व्यक्ति इन्हें विकसित कर लेता है, तो वह अन्य अंग-अवयवों से भी देखने में सक्षम हो जाता है।

‘जर्नल ऑफ मेडिकल हिप्नोटिज्म, ने पचासवें दशक में एक ऐसा ही समाचार छापकर बताया था कि बैंकाक में तो एक संस्था ही काम करती है, जो अंधों को गालों से देखने का प्रशिक्षण देती है। उसके संचालकों का दावा है कि मनुष्य के गाल शरीर भर के समस्त अंगों की अपेक्षा अति संवेदनशील हैं और उनमें सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्तियों का प्रचुर प्रवाह विद्यमान रहता है।

शरीर के अन्यान्य अवयवों से देखने और पुस्तकें पढ़ने की घटनाएँ तो सामने आती रहती हैं, पर कई बार देखा यह जाता है कि व्यक्ति अपने दूसरे अंगों से सुनने में भी समर्थ होता है। इसी प्रकार का एक प्रसंग सन् 1884 में प्रकाश में आया। न्यूयार्क में ऐजेशेल नामक एक व्यापारी था उसके कानों में सूराख पूर्णतया बन्द थे, फिर भी वह कान वाले व्यक्तियों से सुनने में किसी भी प्रकार कमजोर नहीं था। इतना अवश्य था कि सुनने के प्रयास में उसे अपना मुँह खोलना पड़ता था। मुँह ही उसके कान थे।

मनुष्य की इस क्षमता की सच्चाई जानने के लिए वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों ने भी अनेक प्रकार के प्रयोग-परीक्षण किये।

ऐसा ही एक प्रयोग लन्दन यूनिवर्सिटी में सन् 1937 में किया गया। प्रयोगकर्ता थे, विश्वविद्यालय के मूर्धन्य गणितज्ञ एस.जी. सोल तथा जिस पर परीक्षण किया गया, वह थे जाने माने अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न फ्रेडरिक मैरियन।

प्रयोग के आरम्भ में मैरियन को एक रूमाल दिया गया। कुछ क्षण तक वह इसे निहारते रहे। फिर रूमाल को एक प्रयोगकर्ता को देकर वह सोल के साथ कमरे से बाहर आ गये। तत्पश्चात् कमरे को अन्दर से बन्द कर लिया गया और कमरे में स्थित टीन के छः बक्सों में से एक में रूमाल को रखा गया। अब मैरियन को पुनः कमरे के अन्दर बुलाया गया और रूमाल ढूंढ़ने को कहा गया। कुछ क्षण तक मैरियन उन बक्सों के इर्द गिर्द चक्कर लगाते रहे, फिर एक बक्से के नजदीक आकर रुक गये। बक्से को खोलने पर रूमाल उसी के अन्दर पाया गया।

प्रयोग प्रामाणिक लोगों के मध्य किया गया था और किसी प्रकार की धोखाधड़ी से बचने के लिए पूरी सावधानी बरती गयी थी। प्रयोग के अन्त में उपस्थित लोगों को उनकी अतीन्द्रिय सामर्थ्य को स्वीकारना पड़ा। एक अन्य प्रकार के प्रयोग में डॉ. जे.जी. प्राट प्रयोगकर्ता थे और हर्बर्ट पियर्स सब्जेक्ट। दोनों सौ गज के फासले पर स्थित दो पृथक इमारतों में चले गये। प्रयोग का समय पूर्व निर्धारित था। जब निश्चित हुआ, तो प्राट ने विभिन्न प्रकार की आकृतियों के कार्डों का एक गट्ठर उठाया और कार्डों को एक-एक कर बिना उसके चित्रों को देखे, पृथक देखने लगा। जब यह प्रक्रिया समाप्त हो गई तो उनने कार्डों के नम्बरों को उसी क्रम में नोट कर लिया। उधर दूसरे मकान में बैठा पियर्स भी अनुमानित चित्रों की आकृतियाँ उसी क्रम में एक कागज पर बनाता गया। प्रयोग के अन्त में दोनों ने अपने-अपने रिकार्ड को सील बन्द कर तत्कालीन ई.एस.पी. शोधकर्ता डॉ. जे.बी. राइन जो स्वयं भी इस प्रयोग में भाग ले रहे थे, को सुपुर्द कर दिया। राइन ने उनकी लिस्टों का परस्पर मिलान किया, तो चकित रह गये। दोनों की सूची असाधारण रूप से मिल रही थी।

सन् 1933 की इस शृंखला में डॉ. जे.जी. प्राट और हर्बर्ट पियर्स ने अनेकानेक प्रयोग किये। हर प्रयोग से मनुष्य में मान इस असाधारण क्षमता की पुष्टि ही हुई। पेरिस में फेकल्टी आफ मेडीसिन में फिजियोलॉजी विभाग के प्रवक्ता डॉ. चार्ल्स रिचैट तथा ट्यरिन यूनीवर्सिटी में कार्यरत पैथालॉजीकल एनटामी के प्रवक्ता डॉ. एण्डरसन ने भी वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर मनुष्य में पाये जाने वाली विलक्षण क्षमताओं के अस्तित्व को स्वीकार किया है।

चेकोस्लोकिया के परामनोवैज्ञानिक मेलिनरिज्ल और लेनिनग्राड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक बेसिलियेव इस विलक्षणता के कायल हैं और वे इसे मनुष्य के भीतर रहने वाली विशिष्टता ही मानते हैं, जो एक प्रकृति प्रदत्त गुण है। उनका कहना है कि हमारी काया देखने में भले ही सामान्य प्रतीत होती हो, पर वस्तुतः यह असामान्य शक्तियों से भरी पड़ी है। इस दिशा में यदि थोड़ा प्रयास भर किया जाय, तो हर व्यक्ति इस प्रसुप्त सामर्थ्य को अपने अन्दर विकसित कर उससे लाभान्वित हो सकता है।

संभवतः इसी तथ्य को दृष्टिगत रख उपनिषद्कार ने इन्द्रियजन्य ज्ञान व उससे परे के इन्द्रियातीत ज्ञान का रहस्योद्घाटन करते हुए लिखा है-

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो हवाचं सऽड प्राणस्य प्राणः। चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेन्या स्माल्लोकादमृता भवन्ति॥ (केनोपनिषद्)

अर्थात् “यह श्रोत्र का श्रोत्र है, मन का मन है, वाणी की वाणी है, प्राण का प्राण है तथा चक्षु का चक्षु है। धीर पुरुष (मनीषी) इनमें से (इन्द्रिय कार्यों में से) आत्म तत्व को पृथक करके इन्द्रियबद्ध जीवन से ऊपर उठकर अमृतत्व को प्राप्त करते हैं।”


जैव चुम्बकत्व की चमत्कारी शक्ति

मानव को मिली अनेकानेक विभूतियों में एक हैं- चुम्बकत्व। चुम्बक का गुण है- “आकर्षण”। इसकी यह अदृश्य शक्ति वस्तुओं को अनायास अपनी ओर खींचती रहती है। यदि चुम्बक से उसकी इस क्षमता को पृथक् कर दिया जाय, तो वह मात्र धातु खण्ड बन कर रह जायेगा। तात्पर्य यह है कि उसमें जो कुछ भी विलक्षणता नजर आती है, यह उसी दृश्य शक्ति के कारण है। यह चुम्बकत्व सिर्फ लौह-खण्डों में ही नहीं पाया जाता, वरन् सम्पूर्ण जीव-जन्तुओं के शरीरगत क्रिया-कलाप सुचारु रूप से चलते रहते हैं। मनुष्यों में भी इसका एक अंश पाया जाता है। असीम सम्भावनाओं के रूप में जो क्षमता उसमें निहित है, वह इसी शरीर चुम्बकत्व के कारण है। व्यक्तित्व सम्पन्न लोग अपने अन्दर ओजस, तेजस, वर्चस इसी के द्वारा पैदा कर पाते हैं।

मनुष्य में इसके दो प्रवाह हैं- एक ऊर्ध्वगामी - दूसरा अधोगामी। ऊर्ध्वगामी मस्तिष्क में केंद्रित है। उस मर्मस्थल के प्रभाव से व्यक्तित्व निखरता और प्रतिभाशाली बनता है। बुद्धि कौशल, मनोबल के रूप में - शौर्य, साहस, आदर्शवादी उत्कृष्टता के रूप में यह चुम्बकत्व मिश्रितित ही काम करती है। मनुष्य के चेहरे के इर्द-गिर्द छाये तेजोवलय - ओजस - आँरा को इस ऊर्ध्वगामी विद्युत का ही प्रतीक मानना चाहिए। अधोगामी विद्युत जननेन्द्रियों में केन्द्रित रहती - रति-सुख का आनन्द देती और संतानोत्पादन की उपलब्धि प्रस्तुत करती है। यौन आकर्षण के पीछे यही चुम्बकीय विद्युत काम करती देखी जाती है।

ऊर्ध्वगामी और अधोगामी चुम्बकीय प्रवाह उत्तरी, दक्षिणी ध्रुव की तरह भिन्न प्रकृति के होते हुए भी परस्पर सम्बद्ध हैं। कामोत्तेजना और काम विकार के शमन की प्रक्रिया का क्रमशः इस अधोगामी-ऊर्ध्वगामी प्रवाह की परिस्थिति ही मान सकती है। जहाँ शरीर को कई प्रकार के खाद्य पदार्थ एवं पोषण चाहिए, वहाँ उसे वातावरण में संव्याप्त चुम्बकीय ऊर्जा की मात्रा भी उसी प्रकार चाहिए, जैसे कि साँस के लिए हवा की जरूरत पड़ती है। इसी प्रकार मस्तिष्क को भी अपनी बैटरी चार्ज करने वाला ‘चार्जर’ चाहिए, अन्यथा वह डिस्चार्ज होती चली जायेगी और मनुष्य अपने ओजस् को, व्यक्तित्व में झलकते आकर्षण को, अपनी प्रखरता को गँवा बैठेगा। इतना ही नहीं, प्रयोग-परीक्षणों से अब यह भी ज्ञात हो चुका है कि यह काय-चुम्बकत्व दिशा-ज्ञान में भी सहायक होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अंधे लोग इसी चुम्बकत्व के कारण मार्ग निर्धारण में सफलता पाते और कुशलतापूर्वक गंतव्य तक पहुँचते हैं।

वैज्ञानिकों ने इस क्षमता को ‘चुम्बकीय इन्द्रिय’ बताते हुए कहा है कि पृथ्वी का चुम्बकत्व मानवी चुम्बकत्व पर प्रभाव डाले, इसमें दूसरे प्रयोग में रखी छड़ ने व्यवधान डाला। मानवी चुम्बकत्व अपनी क्षमता के सहारे अपनी दिशा स्वयं ढूंढ़ने में मनुष्य को सहायता करता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपनी इस चुम्बकीय क्षमता का सुनियोजन करता है। इस प्रकार छठी इन्द्रिय (अर्थात् चुम्बकीय इन्द्रिय) कोरी कल्पना नहीं है।

यह चुम्बकत्व यदा-कदा जब अधिक परिमाण में उत्पन्न हो जाता है और शरीर द्वारा उसका सदुपयोग नहीं हो पाता, तो बाहर लीक करने लगता है और विभिन्न प्रकार के क्रिया-कौतुक पैदा करता है। इसी प्रकार का एक प्रसंग मैरीलैण्ड (अमेरिका) के कॉलेज आफ फार्मेसी की एक छात्रा ‘लुई है बर्गर’ के साथ देखा गया। उसकी उँगलियों के अग्रभाग में चुम्बकीय गुण था। आधी इंच मोटी, एक फुट लम्बी लोहे की छड़ वह उँगलियों के पोरों से छूकर अधर में उठा लेती थी। धातुओं से विनिर्मित वस्तुएँ उसके हाथ में चिपक कर रह जाती थीं। अन्य विद्युत् महिलाओं की तरह किसी मनुष्य द्वारा उसे छूने पर बिजली का झटका तो नहीं लगता था, पर एक विचित्र-सा आकर्षण उसके समीप आने पर लोग महसूस करते थे।

अभी तक जीव विज्ञानी और मनोवैज्ञानिक यह नहीं समझ पा रहे थे कि किसी को देखकर अनायास अपनापन महसूस होना, उसकी ओर आकर्षित हो जाना एवं किसी की सूरत देखते ही डर या घृणा का अनुभव होना- ऐसा क्यों होता है? पर अब इसी गुत्थी का हल उन रूसी वैज्ञानिकों ने ढूँढ़ निकाल है, जो सतत् परामनोविज्ञान की शोध में निरत रहते हैं। उनने जैव चुम्बकत्व से संबंधित कुछ दिलचस्प निष्कर्ष अभी पिछले दिनों विभिन्न वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किये हैं। जिनसे इस विषय पर प्रकाश पड़ता है। प्रोफेसर बी.वी. येफिमोव का कहना है कि इस सारी क्रिया का कारण जीव जगत में, जिसमें वनस्पतियाँ भी शामिल हैं, एक प्रकार के चुम्बकत्व का होना है। उनके अनुसार पक्षियों का पंक्तिबद्ध होना या अलग-अलग उड़ना, उत्तर की ओर बोये जाने वाले बीजों में अन्य दिशाओं की अपेक्षा कम समय में अंकुर फूटना आदि विलक्षणताएं पृथ्वी तथा जीव-वनस्पतियों के चुम्बकीय तत्वों के कारण ही देखने को मिलती है।

शोधों द्वारा ज्ञात हुआ है कि चुम्बक का उत्तरी ध्रुव जीवाणु क्रिया को नियंत्रित करता है और दक्षिणी ध्रुव शक्ति पोषण की आवश्यकता पूरी करता है। अस्वस्थता को इन दो वर्गों में वर्गीकृत करके यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि चुम्बक की दोनों धाराओं में से किसका, कहाँ और कितना उपयोग किया जाए? यह इस सिद्धान्त का प्रयोग अब चिकित्सा जगत में भी सफलतापूर्वक किया जा रहा है। स्विट्जरलैण्ड के डॉक्टर फिलिप्स आरोलस पेरासेल्सस ने कितनी ही बीमारियों का कारण शरीरगत चुम्बकत्व की विकृति एवं विश्रृंखलता को सिद्ध किया है। ऐसे रोग जिनका कारण ठीक से वे समझ नहीं पा रहे थे और चिकित्सा के अनेक प्रयोग असफल रहे थे, डॉ. फिलिप्स ने रुग्ण केन्द्र मूलों में चुम्बक की आवश्यक मात्रा पहुँचा कर उन्हें उन रोगों से मुक्ति दिलाई। जर्मनी के बान-हेलमाण्ट इसी शक्ति का उपयोग करके शारीरिक और मानसिक रोगियों को कष्ट मुक्त करने में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। भारत में भी चुम्बकोपचार के विभिन्न केन्द्र सफलतापूर्वक चल रहे हैं।

महामानव महापुरुषों में भी यही चुम्बकत्व काम करता है। वे इसे इस स्तर तक विकसित कर लेते हैं कि जहाँ भी, जिस भी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, वहीं अपने प्रभाव क्षेत्र से अनेकों को लाभ देते देखे जाते हैं।

ईसा मसीह, मुहम्मद जरथुस्त्र आदि धार्मिक क्षेत्र के मनस्वी ही थे, जिन्होंने लोगों को अभीष्ट पथ पर चलने के लिए विवश किया। उपदेशक लोग आकर्षक प्रवचन देते रहते हैं, पर उनकी कला की प्रशंसा करने वाले भी उस उपदेश पर चलने के लिए तैयार नहीं होते। इसमें उनके प्रतिपाद्य षिय का दोष नहीं, उस मनोबल की कमी ही कारण है, जिसके बिना सुनने वाले के मस्तिष्क में हल-चल उत्पन्न हो सकना सम्भव न हो सका। नारद जी जैसे मनस्वी ही अपने स्वल्प पुरुषार्थ से लोगों की जीवनधारा बदल सकते थे। वाल्मीकि, ध्रुव, प्रहलाद, सुकन्या आदि कितने ही आदर्शवादी उन्हीं की प्रेरणा भरी प्रकाश किरण पाकर आगे बढ़े थे।?

समर्थगुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, गुरुगोविन्द सिंह, दयानन्द, कबीर आदि मनस्वी महामानवों ने अपने समय के लोगों को उपयोगी प्रेरणाएँ दी थीं और अभीष्ट पथ पर चलने के लिए साहस उत्पन्न किया था। गाँधी जी की प्रेरणा से स्वतंत्रता संग्राम में अगणित व्यक्ति त्याग-बलिदान करने के लिए किस उत्साह के साथ आगे आए, यह अभी पिछले ही दिनों की घटना है। वस्तुतः ऐसे चमत्कार महामानवों के व्यक्तित्व में घनीभूत काय-चुम्बकत्व के कारण ही सम्भव हो पाते हैं।

हम में से प्रत्येक में इस तत्व का समावेश सृष्टा ने किया है, जिससे कि हम उसका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की सफलताएँ अर्जित करने में कर सकें। पर इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हममें से अधिकाँश उस शक्ति का दुरुपयोग कर छूँछ जैसी स्थिति में आ जाते और जीवन को दीन-दयनीय बना लेते हैं। यदि इस स्थिति से बचा जा सके, उस अमूल्य निधि का सदुपयोग किया जा सके तो हम भी अपना व्यक्तित्व वैसा ही उत्कृष्ट और आकर्षक बना सकते हैं, जैसे कि हमारे पूर्वज ऋषि व देव मानव थे।


घटनाएँ जिनका रहस्य न जाना जा सका!

विज्ञान की अधुनात प्रगति और चन्द्रमा तथा मंगल ग्रहों पर विजय जैसे अभियान यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान प्राणी है। परन्तु इसी कारण यह सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता, सामर्थ्यवान इकाई कहाने का अधिकारी नहीं हो जाता। प्रकृति के थोड़े से रहस्यों का अनावरण कर लेने भर से उस पर दिनोंदिन यह दम्भ छाता जा रहा है कि उसकी बराबरी कोई दूसरा प्राणी तो क्या प्रकृति भी नहीं कर सकती, लेकिन जब प्रकृति उसके सामने ऐसे सवाल कर देती है, जिन्हें वह सुलझा न सके तब मनुष्य को क्षुद्रता और अल्प सामर्थ्य का आभास होता है।

प्रकृति के कुछ रहस्य तो ऐसे हैं, जिन्हें देखकर बड़े-बड़े मूर्धन्य वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं। संसार के विभिन्न भागों में पाई जाने वाली हस्यात्मक ध्वनियाँ अभी भी मानवी बुद्धि को चुनौती दे रही हैं।

सन् 1961 से हडस्टन लाइब्रेरी में वायलिन का मधुर संगीत सुनाई पड़ता रहता है। वहाँ न तो कोई वाद्ययंत्र है और न ही कोई टेपरिकार्डर या ट्राँजिस्टर, जिसे कोई बजाता हो। वायलिन क्यों बजता है? कौन बजाता है? उसका पता लगाने की हर सम्भव कोशिश की गई, लेकिन अभी तक कुछ ज्ञात नहीं हो पाया। कुछ लोगों का कहना है कि बहुत पहले वहाँ एक अफसर रहता था, जो घण्टों वायलिन बजाया करता था। वह अब मर चुका है किन्तु संगीत अभी भी सुनाई देता है।

कभी-कभी ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं जिनका समाधान ढूँढ़े नहीं मिलता। एक घटना अक्टूबर 1962 की है। नैसविले, टिनेसी में जान हाकिन्स नामक व्यक्ति के मकान में सामने के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। आवाज सुनकर हाकिन्स ने जब दरवाजा खोला तो वहाँ कोई नहीं था। अन्दर से दरवाजा बद करके जैसे ही वह बैठा कि फिर से खट- खट की आवाज आई। इस प्रकार यह आवाज बार-बार आती रही। कुछ दिन बाद वह मकान के अन्य दरवाजों और खिड़कियों पर भी सुनाई देने लगी। पुलिस की चौकसी बिठाई गई, वैज्ञानिकों ने भी जाँच पड़ताल की, परन्तु कोई व्यक्ति नजर नहीं आया जो इस तरह की शरारत-पूर्ण हरकतें करता हो। दो माह तक दिन-रात इस तरह की आवाज बराबर आते रहने के पश्चात् स्वयमेव बन्द हो गई। आश्चर्य तो इस बात का है कि बिना किसी की उपस्थिति के भी दस्तक की आवाज लगातार कैसे आती रही? यह रहस्य अब तक अनसुलझा ही बना हुआ है।

प्रकृति के विभिन्न अंचलों एवं घटकों से निकलने वाली अद्भुत ध्वनियों को लैटिन में ‘ब्रोनटाइड’ कहा जाता है। इस तरह की आवाजों को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में समय-समय पर वैज्ञानिकों, यात्रियों ने खोजा भी है। गाने वाली बालू संसार के विभिन्न रेगिस्तानों में पाई जाती है। होनेलूलू के निर्जन हवाई टापू से रोते हुए कुत्तों की आवाज आती है। रात्रि के अंधेरे में यह आवाज और अधिक तीव्र हो उठती है। गाँबी मरुस्थल के ‘टकला माकान’ क्षेत्र में फैले रेत से एवं सहारा रेगिस्तान के टीलों से संगीत-मय ध्वनि प्रवाह निकलता रहता है। जैसलमेर में बालू के कुछ टीलों से कराहने की आवाज आती है। ऐसे अनेकानेक प्राकृतिक रेडियो स्टेशन हैं जो चित्र-विचित्र स्तर की ध्वनियाँ प्रसारित करते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इन रहस्यों का पता लगाने के प्रयास, प्रयत्न भी किये हैं, पर अभी तक वे इतना ही ज्ञात कर पाये हैं कि प्रकृति में बालू की तरह के कुछ ऐसे कण हैं जो परस्पर संघात से प्राकृतिक ध्वनियों का सृजन करते हैं।

प्रकृति के अद्भुत रहस्यों का पता लगाने में अपने जीवन का अधिकाँश भाग खर्च करने वाले अन्वेषी विलियम आर. कार्लिस ने सौ वर्षों से अधिक समय से प्रकाशित विशिष्ट पत्र-पत्रिकाओं जैसे- ‘साइकोलॉजिकल बुलेटिन”, “लैन्सेट”, “अमेरिकन जर्नल आफ साइकिएट्री” आदि के माध्यम से प्राकृतिक आश्चर्यों को एकत्र किया है। उन्होंने इन रहस्यमयी घटनाओं से संबंधित 25 हजार से अधिक लेख लिखे हैं। साथ ही ‘सोर्स बुक प्रोजेक्ट’, ‘इनक्रेडिबुल लाइफ’, ‘दन अन फैदम्ड माइन्ड’ तथा ‘ऐनसियन्ट मैन’ जैसी अपनी प्रसिद्ध कृतियों में लगभग दो हजार घटनाओं का वर्णन किया है। उनका कथन है कि अभी तक प्राकृतिक रहस्यों के मात्रा कुछ ही अंशों को उद्घाटित करने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। उसका पच्चासी प्रतिशत भाग अभी भी अविज्ञात है। विश्व में जितनी भी जानकारी प्राप्त कर ली गई है, विभिन्न विषयों के एनसाइक्लोपीडिया में जितना ज्ञान संग्रह कर लिया गया है, उसकी तुला में विपुल अज्ञात बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। उसे जान लेने पर ज्ञान-विज्ञान का भण्डार मनुष्य के हाथ लग सकता है।

विकासवाद के सिद्धान्त के प्रणेता प्रख्यात वैज्ञानिक डार्विन के पुत्र चार्ल्स फील्ड ने 1894 की ‘नेचर’ पत्रिका में रहस्यमय ध्वनियों - ब्रोनटाइडों का प्रकाशन कराया था। उनके अनुसार गंगा के डेल्टा स्थित वेरीसाल परगने से तोप दागने जैसी धाँय-धाँय की आवाज आती थी। कार्लिस ने इस लेख को पढ़ने के बाद अनी खोज में पाया कि ऐसी रहस्यात्मक ध्वनियाँ अनेकों स्थान पर भिन्न-भिन्न नामों से सुनी जाती हैं। उदाहरण के लिए बेल्जियम में मिस्टोफर की, स्काटलैण्ड में मूडस की, प्रशान्त महासागर में हैटी द्वीप समूह में गोफरी ध्वनियाँ सुनी जाती हैं। इनकी पुष्टि समय-समय पर अन्यान्य मूर्धन्य वैज्ञानिकों द्वारा की गई है। रेडियो फिजिक्स तथा अनुसंधान केन्द्र कार्नेल विश्वािलय के निदेशक रामस गोल्ड ने कार्लिस के कार्यों को न केवल स्वीकृति प्रदान की वरन् ब्रोनटाइड को भी स्वीकारा है। अमेरिका के अत्यन्त धनीमानी मूर्धन्य पत्रकार कचार्ल्स फोर्ट ने भी अपना सारा जीवन प्राकृतिक आश्चर्यों को संग्रहित करने में ही व्यतीत कर दिया और अजूबों से भरी एक एनसाइक्लोपीडिया का निर्माण किया। कार्लिस ने लगभग चौबीस “फील्ड गाइड” द्वारा इन अज्ञात रहस्यों को समझने, समझाने का प्रयास किया है।

सुमात्रा - इण्डोनेशिया में एक ऐसा कुआँ है जिसके अन्दर झाँकने से दर्शक को एक के स्थान पर दो प्रतिबिम्ब दिखाई देते हैं। प्रकाश किरणों में ऐसी अद्भुत क्षमताएँ तो हैं कि वे किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब कहीं भी कैसा भी उल्टा-सीधा चित्र-विचित्र बना दें। किन्तु उसके लिए तरह-तरह के प्रिज़्म एवं लेन्सों का उपयोग आवश्यक होता है। इस कुएँ में कहीं कोई शीशा भी नहीं जड़ा है। आश्चर्य तो यह है कि जो दो प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ते हैं उनमें से एक तो स्वयं दर्शक का ही होता है, पर दूसरा किसी अपरिचित का। वैज्ञानिकों के पास इसका कोई उत्तर नहीं है कि “ऑप्टिक्स” के सारे सिद्धान्तों से परे ऐसा क्यों कर होता है?

जाने वह कौन सी अभिशप्त घड़ी थी जब लैटले-फ्रांस में एक बार भयंकर तूफान आया। तेज बिजली कड़की और एक किसान के फार्म पर टूट पड़ी। इसमें हजारों की संख्या में काली और सफेद रंग की भेड़ें थी। बिजली से केवल निर्जीव वस्तुएँ बच सकती हैं, पर गोरे-काले के भेदभाव से उसे क्या लेना देना? किन्तु यहाँ उसने भेदभाव का बर्ताव किया। फार्म में जितनी काली भेड़ें थीं, बिजली गिरने से सबकी सब मारी गई, पर सफेद भेड़ों में से एक का भी बाल बाँका न हुआ। प्रकृति के भेदभाव युक्त इस व्यवहार को आज तक कोई भी वैज्ञानिक या बुद्धिजीवी मेधावी हल नहीं कर सका।

अद्भुत सृष्टा के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। इसका परिचय कभी-कभी इस प्रकार मिलता है। फ्राँस के मोमिन्स नगर में एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया, जिसने आनुवाँशिकी के समस्त वैज्ञानिक नियमों को उठा कर एक ओर फेंक दिया। व्रासर्ड नामक यह बालक वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य एवं अनुसंधान का केन्द्र बना हुआ है। उसकी एक आँख भूरी तथा एक आँख नीली है। जीव-विज्ञानी इस विचित्रता का कोई कारण नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं।

इसी तरह 1829 में लन्दन में चार्ल्सवर्थ नामक एक बच्चे ने जन्म लिया था और अनुवाँशिकी की नियमों को चुनौती दी थी। चार वर्ष की आयु प्रायः ऐसी होती है जब बालक अच्छी तरह बोल भी नहीं पाता, किन्तु चार्ल्सवर्थ चार वर्ष में ही पूर्ण वयस्क हो गया। उसके मूँछ दाढ़ी भी निकल आई। उसके व्यवहार, बातचीत में भी पूरी तरह बुजुर्गपन टपकने लगा। सात वर्ष की आयु में उसके सम्पूर्ण बाल सफेद हो गये और इसी वर्ष उसकी मृत्यु हो गई। ऐसे मामले में अब ‘प्रोजेरिया’ व्याधि समूह के अंतर्गत माने जाने लगे हैं। इसी प्रकार इटली में एक ऐसा व्यक्ति हुआ है जिसका शरीर तो सामान्य था पर आँखें उल्लू जैसी थी। वह दिन में नहीं देख पाता था, किन्तु रात्रि के घोर अन्धेरे में भी किसी वस्तु को स्पष्ट रूप से देख सकता था। 41 वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई और वह रहस्य अब तक अनसुलझा ही बना रहा।

लन्दन में ‘एडवर्ड मार्डो’ नामक एक अँग्रेज अपनी शारीरिक विशेषताओं के कारण लोगों को आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसके दो चेहरे अन्य व्यक्तियों से अलग सहज ही उसका परिचय दे देते थे। सिर तो एक ही था, पर मुँह, आँख, नाक दोनों ओर थे। पीछे स्थित आँख से भी वह अच्छी तरह देख सकता था। पिछले मुँह से अस्पष्ट भाषा में बोलता था जबकि सामने का मुख सामान्य था।

इसी तरह शरीर विज्ञान के नियमों का उल्लंघन करने वाली फ्राँस के टुरकुइंग नगर में एक बच्ची ने जन्म लिया। उसके अन्य अंग-अवयव तो सामान्य थे, किन्तु आँख एक ही थी और वह भी दोनों भौहों के मध्य, जहाँ आज्ञाचक्र की उपस्थित बतायी जाती है।

मनुष्य अपनी संकल्प शक्ति को जुटाकर अतिमानव बन सकता है, इसमें सन्देह नहीं। इतना होने पर भी उसे सर्वशक्तिमान नहीं कह सकते। इसलिए कि उसकी इच्छा और माँग के विरुद्ध भौतिकी और पराभौतिकी क्षेत्र में ऐसी सैंकड़ों घटनाएं घटती रहती हैं, जिनका नियंत्रण तो दूर वह उस रहस्य तक को नहीं जान पाता कि उनका कारण क्या है? जब कि निसर्ग में उस तरह का स्वयं कोई सुनिश्चित सिद्धान्त नहीं होता, उदाहरण के लिए पेरिस के एक प्रख्यात वकील जैक्विसल हरवेट 4 वर्ष की आयु के बाद से ही 72 वर्ष की उम्र तक एक क्षण भी नहीं सोये। इससे न तो उनके स्वास्थ्य पर कुछ बुरा प्रभाव पड़ा और न काम-काज पर ही। मृत्यु-पर्यन्त वे पूर्णतः स्वस्थ रहे।

1957 में केन्टुकी बालगृह लिंडन में एक ऐसी घटना प्रकाश में आई जिसे देख सुनकर मूर्धन्य चिकित्सा-शास्त्री आश्चर्यचकित रह गये। इस बालगृह में एक छः वर्षीय बाँबी नामक निर्धन बालक को भर्ती कराया गया। वह कुपोषणजन्य बीमारियों का शिकार था। उसकी चिकित्सा कर रहे डाक्टरों को यह देखकर बहुत अचम्भा हुआ कि अविकसित और अशिक्षित बाँबी लैटिन, स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, टर्किश भाषा सहित पाँच कठिन भाषाओं का पूर्ण ज्ञाता है। 12 वर्ष की आयु तक वह बीस भाषाएँ पढ़ने की क्षमता रखता था।

अभी-अभी पिछले दिनों महाराष्ट्र से एक ऐसा मामला प्रकाश में आया है, जिसका रहस्य वैज्ञानिक जेनेटीक्स से लेकर आधुनिकतम चिकित्सा विभाग की किसी विधा में न पा सके। एक ट्रक ड्राइवर ने नासिक के समीप सड़क पर पड़े अजगर के ऊपर से अपना ट्रक चढ़ा कर यात्रा तो कर ली, पर खौफ मन में छाया रहा। कुछ ही दिन बाद उसकी पत्नी ने डेढ़ वर्ष के अन्तराल में दो बच्चों को जन्म दिया, जिनकी सारी त्वचा अजगर की तरह थी। सारे उपचार निरर्थक सिद्ध हुए। न इसे भय की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है, न ही सहज संयोग, क्योंकि उसकी पत्नी पहले से ही गर्भवती थीं कोई इसे अभिशाप भी कह सकता है, पर आज के विज्ञान प्रधान युग में कोई तक सम्मत जवाब किसी के पास नहीं है।

माउल्ंिटग-केंचुल छोड़ने अर्थात् त्वक्मोचन के लिए साँप प्रसिद्ध है। किन्तु यदि यही प्रक्रिया मनुष्य की त्वचा के साथ घटित होने लगे तो उसे असामान्य ही कहा जायेगा। 1981 में शिकागो मेडिकल सोसाइटी ने एक ऐसे व्यक्ति का उपचार किया, जिसे 12 घण्टे के लिए तीव्र बुखार आता था। देह की सारी त्वचा लाल सुर्ख पड़ जाती और इसके बाद बड़े-बड़े टुकड़ों में केंचुल की तरह छूटती जाती। जिस तरह दस्ताने या मोजे उतारे जाते हैं उसी तरह चमड़ी की परतें उतरने लगतीं। तब तक इसका स्थान नई त्वचा ले चुकी होती।

प्रकृति के रहस्य अगम हैं और उससे भी रहस्यपूर्ण और विचित्र है-सूक्ष्म चेतन संसार। प्रकृति जब-तब मनुष्यों के सामने इस प्रकार की चुनौती भरे प्रश्न खड़े करती रहती है, जिन्हें लाख प्रयत्न करने पर भी सुलझाया नहीं जा सकता। अभी तक तो यही ठीक से जान पाना सम्भव नहीं हुआ है कि प्रकृति में क्या-क्या है? उसके सम्पूर्ण रहस्यों को समझ पाना तो दूर की बात रही। फिर चेतन तत्व कितना गूढ़ होगा? क्या उसके रहस्यों का अनुमान लगाया जा सकता है?


गायत्री गंगा की अनेकानेक धाराएँ

गायत्री यों चारों वेदों में पाया जाने वाला एक महामंत्र है। जिसमें शिक्षात्मक प्रेरणा इतनी ही है कि बुद्धि को शुद्ध रखा जाय। यही वह केंद्र है जहाँ उत्थान-पतन के अंकुर उगते हैं। यदि बुद्धि भ्रमित हो जाय, निकृष्टता की दिशा में चल पड़े तो फिर समझना चाहिए की आधि-व्याधियों का घटाटोप सिर पर घुमड़ने ही वाला है। इसलिए समस्त शास्त्रों और धर्म दर्शनों का सार तत्व गायत्री मंत्र में सन्निहित समझा जा सकता है। मान्यता, भावना, विचारणा, आकाँक्षा, कल्पना और क्रिया तत्परता की पृष्ठभूमि बुद्धि के आधार पर ही बनती और विकसित होती है। इसी आधार पर मनुष्य उत्कृष्टता, निकृष्टता अपनाता ओर ऊँचा उठता, नीचे गिरता है। अस्तु मानवी सम्पदाओं में बल, वैभव, पद, अधिकार, शिक्षा, कौशल आदि सभी की तुलना में सद्बुद्धि को सर्वोपरि माना गया है और कहा गया है कि अपनी ही नहीं अपने समाज संसार की विचारणा को उच्चस्तरीय बनाने में प्रयत्नरत रहना चाहिए।

यह गायत्री का ज्ञान पक्ष है। दूसरा है- विज्ञान पक्ष। जिसके अनुसार गायत्री सविता देवता की प्राण चेतना जड़ चेतना सृष्टि की नियंत्रण कर्ता आद्यशक्ति है। यह उत्पादन कर्म में ब्राह्मी, अभिवर्धन में वैष्णवी और परिवर्तन-क्रम में शाम्भवी मानी जाती है। उसे वेदमाता, देवमाता और विश्वमाता भी कहा गया है। महाप्रज्ञा के रूप में वेदमाता है। जिसका कार्य क्षेत्र, प्रभाव क्षेत्र समूचा संसार हैं इसलिए उसे विश्वमाता कहा गया है। गायत्री की योग धारा भी है और तंत्र धारा भी। योग धारा के अवगाहन से सप्त ऋषियों का परिकर विभूतिवान बना था और रावण, कालनेमि जैसों ने उसे अघोर-क्रम में अपनाकर दैत्य स्तर की सशक्तता प्राप्त की थी। विश्वामित्र ने इस दोनों ही धाराओं को गायत्री, सावित्री नाम से असुर दमन और सद्भाव संवर्धन के निमित्त भगवान राम को प्रशिक्षित किया था।

सामान्य-जन उसकी उपासना मनोकामना पूर्ति और बाधाओं की निवृत्ति के लिए करते हैं। यह सर्वविदित परिचय है। गायत्री का सूक्ष्म परिचय प्राप्त करने के लिए अधिक गहराई में उतरने की आवश्यकता है। जिस प्रकार शुक्राणु में, एक व्यक्ति का स्वस्थ बुद्धि कौशल प्रतिभा आदि सभी कुछ सन्निहित रहता है। बीज में वृक्ष का कलेवर पुष्पों की बनावट, फलों का स्वाद एवं आयु विस्तार आदि की सारी विशेषताएँ सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती हैं, उसी प्रकार गायत्री महामंत्र के 24 अक्षरों में से विभिन्न स्तर की विभूतियाँ, अशिष्टताएँ, ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ समाविष्ट हैं। उन सबके समन्वय से ही एक पूरा गायत्री मंत्र बनता है।

दत्तात्रेय की गुरु खोज जब पूरी नहीं हुई तो वे प्रजापति के पास गये और प्रामाणिक गुरु उपलब्ध करने के लिए उनसे निर्देश चाहा। उन्होंने उन्हें 24 गुरु के लिए कहा। अलंकारिक रूप से उन्हें चित्र-विचित्र जीव-जन्तु भी कहा गया है, पर वस्तुतः वे गायत्री के 24 अक्षर ही हैं, जिनका अवगाहन करके वे महर्षि से अवतार स्तर तक पहुँचने में समर्थ हुए।

गायत्री में 24 अक्षर हैं। इनमें से प्रत्येक अक्षर एक-एक देवता एक-एक देवी, एक-एक अवतार, एक-एक ऋषि अपने कलेवर के साथ जोड़े हुए हैं। इन सबके समुच्चय को ही समग्र गायत्री मंत्र माना जाना चाहिए। यों देवताओं, देवियों, अवतारों, ऋषियों की संख्या गिनते हुए मत विशेष से वे न्यूनाधिक भी हो जाते हैं। किन्तु मनीषियों के तथा शास्त्रकारों के बहुमत को लिया जाय तो वह संख्या चौबीस ही होती है। इस प्रकार अध्यात्मिक जगत में जो कुछ सारतत्व है, उसे इन माध्यमों से गायत्री में केन्द्रीभूत समझा जा सकता है।

मनुष्य के काय कलेवर में 24 विशेष केन्द्र हैं। षट्चक्र यंत्र कोष का विस्तार उन्हीं 24 केन्द्रों के अंतर्गत आ जाता है।

स्थूल शरीर में ही सूक्ष्म शरीर भी गुँथा हुआ है। जिस प्रकार प्रत्यक्ष शरीर में अप्रत्यक्ष अंग-अवयव होते हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर में भी विशिष्ट शक्ति केन्द्र होते हैं। नदी में भँवर एवं तेज गरम हवा में चक्रवात बनते देखे जाते हैं। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर में भी ऐसे भ्रमर पड़ते हैं, जिन्हें शक्ति केंद्र की उपमा दी जा सकती है। इन्हें निर्झर भी कहा गया है। झरनों से जिस प्रकार धाराएँ स्रवित होती हैं उसी प्रकार मनुष्य की प्रतिभा में योगदान देने वाली इन निर्झरणियों को उपत्यिकाएँ कहा जाता है। इन्हें गजमणि, सर्पमणि के समतुल्य मनुष्य में ओजस् तेजस् एवं वर्चस् भरने वाली अग्नि जिह्वाएं भी कहा गया है।

हारमोन ग्रंथियों के संबंध में शरीर शास्त्री गहराई तक खोज करने में संलग्न है। अभी तक उन्हें जो विदित हुआ है, उसके अनुसार जीवन में अनेक प्रकार की विलक्षणताओं को चलाने, बढ़ाने, घटाने में इन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की महती भूमिकाएँ होती हैं। आपका सौंदर्य, जीवट, कामोत्तेजना, पराक्रम, आवेशी आदि उतार चढ़ाव हारमोनों की न्यूनाधिकता एवं व्यवस्था व्यतिरेकता के ऊपर निर्भर है। इनकी संख्या अभी प्रायः एक दर्जन खोजी गई हैं, लेकिन सम्भावनाएँ बताती हैं कि वे 24 वर्ष से कम नहीं हो सकती। कारण कि शरीर और मस्तिष्क में ऐसी विलक्षणताएँ पाई गई हैं जो विज्ञात हारमोनों की परिधि में नहीं आती। दूसरी ओर शरीर में ऐसी ग्रन्थियाँ भी देखी गई है, जिनके उद्देश्य और कार्य ठीक तरह समझे नहीं जा सके। इसी प्रकार यह भी अचम्भे का ही विषय है कि कतिपय प्रकार की विलक्षणताओं के सम्बन्ध में यह विदित नहीं हो सका है कि उनका उद्गम कहाँ है? जब इन रहस्यों का पता चलेगा तब जाना जायेगा कि अविज्ञात और ज्ञात हारमोनों की संख्या मिलकर 24 हो जाती है। यह मान्यता सुनिश्चित है कि हाड़-माँस के शरीर में अनेक प्रतिभाओं और विशेषताओं के साथ इन हारमोन ग्रन्थियों का गहरा सम्बन्ध है।

अध्यात्म भाषा में उपत्यिकाएँ उन्हीं को कहते हैं, जिसे रिसने वाले स्राव रक्त में मिलते हैं और विभिन्न शक्ति संस्थानों को सींच कर उन्हें पल्लवित, पुष्पित एवं फलित करते हैं।

इन शक्ति बीजों को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। हारमोनों की बनावट तथा उनके स्राव ही देखे समझे गये हैं। पर उनकी क्रिया-पद्धति के रहस्यों का विवेचन विश्लेषण नहीं हो सका है, किन्तु अध्यात्मिक क्षेत्र में इनको बहुत पहले से ही जान लिया गया है। उन्हें बीज की संज्ञा दी गई है और आकृति को कोणात्मक यंत्र बताया गया है।

तंत्र विज्ञान में अभीष्ट सिद्धियाँ उपार्जित करने के लिए बीज मंत्रों और कोण यंत्रों की रहस्यमयी सामर्थ्य समझी गई है। साथ ही उन्हें जागृत एवं प्रयुक्त करने का विधान भी बताया गया है। बीज और यंत्र उपत्यिकाओं का ही सूक्ष्म रूप है। उपत्यिकाओं का स्थान एवं अता पता शरीर विच्छेद से एक सीमा तक जाना जा सकता है किन्तु उनके बीज एवं यंत्र दृश्य नहीं है। उन्हें दिव्य नेत्रों एवं सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर ही जाना जा सकता है।

मंत्र विज्ञान, तंत्र विज्ञान एवं यंत्र विज्ञान को साधना जगत की त्रिविध विशिष्टताएँ समझा जा सकता है। मंत्र विज्ञान में शब्द शक्ति का प्रयोग है। मंत्र के अक्षरों का अनवरत जप करते रहने से उनका एक चक्र बन जाता है और उनकी सुदर्शन चक्र जैसी गति विद्युतीय चमत्कारों में परिणत होती है। मंत्र शब्द बैश्वी भी बाण की तरह काम करते हैं। अभीष्ट लक्ष्य को बेधते हैं।

तंत्र प्रकारान्तर से कुण्डलिनी विज्ञान है। उसमें प्राण ऊर्जा को प्रचण्ड किया जाता है और किन्हीं व्यवधानों की तोड़ मरोड़ में उनका प्रयोग किया जाता है। मारण, मोहन, उच्चाटन, बेधन, वशीकरण आदि में उनके प्रयोगों को कार्यान्वित किया जाता है। सम्मोहन और विनष्टीकरण तंत्र के यही दो मूल प्रयोजन हैं। ताँत्रिक अघोर साधना करके अपने मन, शरीर के विद्युतीय क्षेत्र को इस स्तर का बना लेते हैं कि चाहें तो किसी का प्राण हरण भी कर सकें। असुर समुदाय में तंत्र विधि को ही अपनाया जाता रहा है। दैत्यों के क्रिया-कलाप प्रायः आक्रामक रहे हैं। इसके लिए वे अपने साधारण शरीर में बेधक और मारक क्षमता का उत्पादन तंत्र साधना से ही करते रहे हैं। उन्हें कुण्डलिनी शक्ति भण्डार से अभीष्ट प्रयोजनों के लिए उतना आधार मिलता है, जितना कि समय-समय पर प्रयोजन विशेष के लिए आवश्यकता पड़ती रहती है।

तंत्र में आसन, बंध, मुद्राएँ अभ्यास में उतारनी पड़ती है। इन तीनों की ही संख्याएं अनेक और अगणित हैं किन्तु गायत्री का तंत्र-पक्ष सावित्री यदि सिद्ध करना हो तो 24 आसन 24 बंध और 24 मुद्राएँ प्रयोग में लानी पड़ती हैं। 24 मुद्राएँ प्रसिद्ध हैं। बंधों की मोटी जानकारी तीन तक सीमित है। किन्तु विशेषज्ञों को विदित है कि उनके भी भेद उपभेद 24 की संख्या तक पहुँचते हैं। हठयोग में आसन तो 84 तक पहुँचते हैं, पर तंत्र प्रयोजन में उनमें से 24 की एक अतिरिक्त शृंखला है। ताँत्रिकों का काम 24 से ही चल जाता है।

गायत्री के 24 अक्षर तंत्र प्रयोग में 24 बीज, 24 मंत्र 24 आसन, 24 बंध, 24 मुद्राओं के रूप में जाने जाते हैं। इन्हें करने से पूर्ण नेति, धौति, वस्ति, वज्रोली, कपाल, भीति आदि षट् कर्मों के द्वारा नाड़ी शोधन की आवश्यकता पड़ती है।

योग मार्ग में प्राणायाम और ध्यान दो की प्रमुखता है। मंत्र योग स्वतंत्र है। उसे वाक् विद्या के नाम से जाना जाता है। मंत्र की शक्ति सहस्र चक्र ब्रह्मरंध्र विचारों आदि के सम्मिश्रण से उद्भूत होती है। किन्तु योग साधना के लिए प्राणायाम और ध्यान का आश्रय लेना पड़ता है। प्राणायामों का अपना संसार और अपना विस्तार हैं पर उनमें से गायत्री मार्ग अपनाने वाले के लिए 24 ही छाँटे हुए अलग हैं। महामंत्र के 24 अक्षर भी हैं। इसी अनुपात में 24 प्राणायामों का भी निर्धारण हुआ है।

ध्यान के राजमार्ग के साथ अनेक पगडंडियां जुड़ती हैं। नादयोग भी प्रकारान्तर से ध्यान ही है। सोऽहम् साधना की श्वास-प्रश्वास क्रिया तो होती है, पर ध्यान सोऽहम् की सूक्ष्म ध्वनि पर ही केन्द्रित रहता है। भक्तियोग में इष्ट देव दर्शन का पूरा प्रकरण ध्यान पर ही आश्रित है। ध्यान की परिपक्वता जी सब समग्र हो जाती है तो निर्धारित इष्टदेव के प्रत्यक्षवत् दर्शन होने लगते हैं। हृदय गुफा में अंगुष्ठ मात्र ज्योति का आभास भी इस प्रकार दीखने लगता है मानो उसका साक्षात्कार ही हो रहा हो। इष्ट देव भी अपनी धारणा या भावना के अनुरूप आकार प्रकार धारण करके प्रकट होते हैं। यह ध्यान की समग्रता का ही चमत्कार है।

ध्यान में एकाग्रता की प्रमुख भूमिका रहती है। त्राटक आदि के सहारे दिव्य नेत्र खोले जाते हैं और उससे अपनी ही सत्ता अनेक गुनी हो जाती है। छाया पुरुष साधना में आत्मसत्ता को द्विगुणित हुई देखा जाता है। पंच मुखी गायत्री की पंचकोशीय साधना में अपने में ही पाँच-पाँच स्वतंत्र इकाइयां विकसित हो जाती हैं। यह उच्चस्तरीय गायत्री साधना की चमत्कारी परिणतियाँ हैं। ये पाँचों एक ही समय में अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप काम करती देखी जा सकती हैं।

ध्यान में सर्वप्रथम छवि मात्र का आभास होता है। किन्तु मनोयोग की गहनता में उनमें प्राण प्रतिष्ठा भी हो जाती है और वह छवि एक सजीव देव-दानव की तरह निर्देश का पालन करने लगती है। यह योगमार्ग है। योग आद्यशक्ति गायत्री का प्रथम पक्ष है एवं तंत्र सावित्री शक्ति का द्वितीय पक्ष। शारदेय नवरात्रि के 9 दिवसीय अनुष्ठानों में गायत्री महाशक्ति के इस विवेचन को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए।


दृष्टिकोण की भिन्नता (Kahani)

कबीर सिद्ध पुरुष की तरह प्रख्यात हो गए दूर-दूर से लोग आते। तब भी वे पहले की ही तरह कपड़ा बुनते रहते। और साथ-साथ सत्संग चलाते।

शिष्यों में से एक ने पूछा- आप जब साधारण थे तब कपड़ा बुनना ठीक था। पर अब-जब कि सिद्ध पुरुष हो गए हैं और निर्वाह में कमी नहीं रहती तो आप कपड़ा क्यों बुनते हैं?

कबीर ने सरल भाव से कहा- पहले मैं पेट पालने के लिए बुनता था। पर अब मैं जन समाज में समाए हुए भगवान का तन ढँकने और अपनी कमियों को सुधारने के लिए बुनता हूँ।

कार्य वही रहने पर भी दृष्टिकोण की भिन्नता से उत्पन्न होने वाले अन्तर के समझने से शिष्यों का समाधान हो गया।


शब्द शक्ति के भले बुरे प्रभाव

स्थूल ध्वनियाँ प्राप्त होती है। श्रव्य ध्वनियों का अपना एक प्रभाव क्षेत्र होता है। हम उन्हीं ध्वनियों को सुन सकते हैं। जो इस सीमा क्षेत्र के अंतर्गत आती हो, प्रायः यह प्रसार क्षेत्र 20-20,000 कम्पन प्रति सेकेंड होता है अर्थात् हमारी कर्णेंद्रिय उन्हीं तरंगों को ग्रहण कर सकती है, जो उक्त दायरे में हों। इससे कम अथवा अधिक आवृत्ति वाली ध्वनियों को सुनने की सामर्थ्य हमारे कानों में नहीं होती। ऐसी ध्वनियाँ जिनकी बारम्बारता 20 हर्ट्ज से कम है इन्फ्रासोनिक तथा 20,000 हर्ट्ज से अधिक खाली ध्वनियाँ अल्ट्रासोनिक कहलाती है।

ध्वनियाँ प्रायः व्यक्ति और वस्तु को असाधारण रूप से प्रभावित करती है स्थूल का श्रव्य प्रभाव तो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है पर अश्रव्य और सामान्य समझी जाने वाली ध्वनि तरंगें भी कोई कम प्रभावित नहीं करती।

वियेना के.प्रो. गावराँड “भारमिल्स” नामक इंस्टीट्यूट में इंजीनियर थे; वे जब भी अपने कक्ष में जा कर बैठते तो उन्हें बड़ी बेचैनी अनुभव होती। प्रायः उस कक्षा में उन्हें मिचली भी आती रहती है यद्यपि कमरा पूर्णतः साफ था और वायु आवागमन की अच्छी व्यवस्था थी। फिर ऐसा क्यों होता है? उनकी समझ में नहीं आ रहा था। उनमें विभिन्न यंत्र उपकरणों से कारण का पता लगाने की कोशिश की, पर निष्फल रहे। एक दिन वह दीवार के सहारे बैठे हुए थे कि उन्हें अत्यन्त सूक्ष्म कम्पन का आभास हुआ। खोजबीन से पता चला कि यह कम्पन नजदीक के ही एक एयरकडिशनिंग संयंत्र का है इसी से पूरा कमरा इन्फ्रासोनिक ध्वनि तरंग से कम्पायमान था। कम्पन को जब रिकार्ड किया गया, तो यह 7 हर्ट्ज पाया गया। ज्ञातव्य है कि जब वह अपने कक्ष से बाहर होते तो उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ महसूस नहीं होती किन्तु कमरे में तरंग का असर द्विगुणित हो जाता।

इस घटना के बाद पो0 गावराँड ने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया और फिर सूक्ष्म ध्वनि तरंगों पर अनुसंधान कार्य में जुट पड़े। कुछ आरम्भिक सफलताओं के बाद वे यह जानने को उत्सुक हुए कि अश्रव्य तरंगों का मानवी शरीर-मन पर कैसा असर पड़ता है। इसके लिए उनने एक विशालकाय इन्फ्रासोनिक मशीन बनायी। उसका प्रथम परीक्षण एक प्रायोगिक पशु पर किया। मशीन चालू होते ही वह गिरा ओर तड़प कर मर गया। जब उसका पोस्टमार्टम किया गया तो पता चला कि उसके सारे आँतरिक अवयव तरंग की मार से अर्धतरल में परिवर्तित हो गये हैं।

इस हादसे के बाद प्रो0 गावराँड़ परीक्षण में अधिक सावधानी बरतने लगे। इस बार उनने खुले मैदान में प्रयोग करने को सोचा, अतः कुछ पर्यवेक्षकों को कंक्रीट बंकर में रख कर मशीन धीरे-धीरे चालू करना शुरू किया। कुछ ही देर में परीक्षण स्थल से आधे मील की परिधि में जो भी इमारतें थीं, उनकी सारी खिड़कियाँ चकनाचूर हो गई और मकानों की नींव हिल गई। पर्यवेक्षकों से जब इस दौरान का अनुभव पूछा गया, तो उनने बेचैनी, उद्विग्नता और सिर दर्द की शिकायत की।

अब तो लो-फ्रीक्वेंसी के ऐसे यंत्र भी विकसित हो गये हैं, जिनके सहारे विशालकाय गगनचुंबी इमारतों को भी क्षण में ही ध्वस्त किया जा सकता है। ये सारे उदाहरण सूक्ष्म ध्वनियों की शक्ति दर्शाते हैं।

भूकम्प से पूर्व भी पृथ्वी के गर्भ में चल रही हल-चल की जानकारी ऐसी ध्वनियाँ दे जाती हैं। सर्वविदित हैं कि ऐसी आपदाओं से कुछ घण्टे पूर्व मानवेत्तर प्राणियों, यथा- कुत्ते, बिल्ली, खरगोश, तिलचट्टे आदि में विचित्र भाग-दौड़ दिखाई पड़ती हैं। वस्तुतः उनमें सूक्ष्म तरंगें ग्रहण करने की अद्भुत सामर्थ्य होती हैं। इसके माध्यम से उन्हें आगत घटनाओं का पूर्वाभास मिल जाता है और समय रहते वे सुरक्षित स्थानों में चले जाते हैं। जापानी लोग इस विपदा से बचने के लिए गोल्डफिश का सहारा लेते हैं। जब भूकम्प आने की होता है, तो इस मछली में एक अजीब बेचैनी दिखाई पड़ती हैं। इसे देखकर लोग बाग अपने-अपने घरों से बाहर निकल आते हैं और प्राण रक्षा करते हैं। कुछ हद तक ऐसी सूक्ष्म तरंगों के प्रति महिलाएँ और बच्चे भी संवेदनशील होते हैं। पुरुषों की तुलना में वे ऐसी ध्वनियाँ अधिक सक्षमता से पकड़ते हैं।

कुछ वर्ष पूर्व रूस ने ऐसी ही सूक्ष्म तरंगों के माध्यम से अमरीकी सुरक्षा योजना बनाने वाले वैज्ञानिकों को परेशानी में डाला था। बाद में जब उन्हें रूसियों के इस कारनामे की जानकारी मिली, तो उनने इसके दुष्प्रभावकारी असर को मिटाने के लिए प्रति तरंग को रूस की ओर प्रेषित करना शुरू किया।

अभी थोड़े दिन पूर्व बम्बई के एक ऐसे व्यक्ति की खबर अखबारों में छपी थी, जिसने दावा किया था, कि कुछ अज्ञात व्यक्ति उसे परेशान करने के उद्देश्य से सूक्ष्म रेडियो सिगनल्स भेजते हैं। उसका कहना था कि जब उसे सिगनल्स प्रेषित किये जाते हैं, तो वह अशाँत व बेचैन हो उठता है और बार-बार आत्महत्या करने का विचार आता है।

कहा जाता है कि दक्षिणी इजियन के सैण्टोरिनी द्वीप में कोई भी पर्यटक एक दिन से अधिक नहीं रुक पाता। वहाँ पहुँचते ही उन्हें एक अज्ञात भय, नैराश्य, उदासीनता, व विचित्र निष्क्रियता घेर लेती हैं। कुछ लोगों का विश्वास हैं कि वर्तमान सैण्टोरिनी वहीं स्थल हैं, जहाँ कभी एटलाण्टिस था। इ0यू0 1450 में उसका अधिकाँश भाग जलप्लावित हो गया। तभी से वहाँ पर भूगर्भीय उथल-पुथल के कारण बराबर एक सूक्ष्म ध्वनि क्रियाशील रहती हैं, जिसकी उपस्थिति का पता भूकम्पमापी यंत्र बताते हैं।

कुछ भी हों, इन्फ्रा-साउंड स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं, यह अब एक सत्यापित तथ्य हैं, किन्तु हर प्रकार की पराध्वनियाँ दुष्प्रभावजन्य होती हैं, ऐसी बात नहीं हैं। अनेक पशु पक्षियों में ऐसी अश्रव्य ध्वनियाँ पायी गयी हैं। इसी के माध्यम से वे अपनी दूरवर्ती साथी को आवश्यक संदेश सम्प्रेषित करते हैं। चमगादड़ अपने मार्ग के अवरोधों का पता अल्ट्रासोनिक तरंग द्वारा ही लगाता है। फिन ह्वेल मीलों दूर ऐसी तरंगों द्वारा सूचना भेज सकती हैं। अब हाथियों में भी ऐसी ही सूक्ष्म तरंगों का पता चला हैं। इस खोज से ही वह रहस्योद्घाटन हो सका, कि क्यों अचानक उनका झुंड किसी निर्दिष्ट दिशा की ओर चला पड़ता है। गायत्री मंत्र के मानसिक जप में भी एक प्रकार का सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न होता है, जो चक्रों, उपत्यिकाओं और ग्रन्थियों को प्रभावित करता है।

वस्तुतः हम पराध्वनियों के विशाल सागर में रह रहे हैं, जो जाने-अनजाने हमारे शरीर-मन को प्रभावित करती रहती हैं। सृष्टि का आरम्भ शब्द-शक्ति से ही हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि सुदूर हिमालय में अब भी वैदिक ऋचायें सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों के माध्यम से उसी प्रकार सुनी जा सकती हैं, जैसे हजारों वर्ष पूर्व ऋषियों ने सुनी थीं। रहस्यवादियों के अनुसार किसी भी घटनाक्रम का ब्लूप्रिन्ट, घटित होने से काफी समय पूर्व तावरेण में सूक्ष्म कम्पन के रूप में आ जाता है। विज्ञान कहता है कि हम जो कुछ भी बोलते हैं, उसका विनाश नहीं होता, वह सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के रूप में विद्यमान रहता है। उसका दावा हैं कि महाभारत के दौरान कृष्ण ने अर्जुन को जो गीता सुनायी थी, तथा भीष्म-पितामह ने शरशैय्या पर पड़े द्रौपदी को जो उपदेश दिये थे, उन्हें आज भी सुना जा सकता है, यदि उन सूक्ष्म तरंगों को खोज कर हम पकड़ सकें।

सृष्टि का आविर्भाव शब्द से हुआ बताया जाता है। शब्द शक्ति के द्वारा ही विश्व-ब्रह्मांड का काय सत्ता का सारा क्रिया व्यापार चलता है। विज्ञान ने मैगनेटिक रेजोनेन्स इमेजिंग (एम0आर0आई0) एन॰ एम॰ आर॰ तथा सोनोग्राफी आदि के द्वारा निदान-चिकित्सा आदि में महत्वपूर्ण उपलब्ध कराई हैं। यदि इसी प्रकार शब्द शक्ति रूपी ईंधन का प्रयोग सूक्ष्म काय संयंत्र के विभिन्न घटकों को विकसित करने हेतु किया जा सकें तो इस नगण्य-सी दृश्यमान काया से असम्भव दीख पड़ने वाले कार्य भी सम्भव हो सकते हैं। पुरातन काल में इसी शक्ति का प्रयोग कर ऋषि, मुनि उच्चस्तरीय योग की सिद्धियाँ हस्तगत करते थे। आज तो विज्ञान रूपी माध्यम भी उसके पास हैं। यदि सही दिशा में इस शक्ति का सुनियोजन किया जा सके तो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों से मानव समाज को लाभान्वित किया जा सकता है।


मृत्यु के मुख से वापसी

मरने के उपरान्त या जन्म लेने तक की परिस्थितियों में किस प्रकार गुजरना पड़ता है, इसके प्रत्यक्षवादी परिणाम तो अभी तक नहीं मिल सके हैं, पर यह पता लगा पाने में सफलता अवश्य मिली हैं कि मृत्यु के समय कैसा अनुभव होता हैं?

कई बार ऐसा होता है कि सामान्य लक्षणों से मृत्यु घोषित कर दी जाती हैं। फिर भी लगनशील डॉक्टर यह प्रयत्न करते रहते हैं कि किसी प्रकार प्राण लौटाये जा सकें। इसके लिए हृदय की धड़कन को फिर से गतिवान बनाने के लिए “डिफिब्रिलेटर” द्वारा बिजली के झटके सीधे हृदय में दिए जाते हैं। मुँह से कृत्रिम श्वास दी जाती हैं। जो भी नवीनतम अनुसंधान इस सम्बन्ध में हुए हैं उनका प्रयोग चिकित्सक आखिरी साँस तक करते हैं। इन उपायों में से कई बार कुछ प्रयोग सफल भी हो जाते हैं और बन्द हुई साँस पुनः चलने लगती हैं। गया हुआ जीवन फिर लौट आता है। कई बार बिना किसी प्रयत्नों के भी मृत्यु के तुरन्त बाद अन्त्येष्टि संस्कार न करने की प्रथा हैं। कुछ समय प्रतीक्षा की जाती हैं कि कहीं साँस लौट आने का संयोग तो नहीं हैं। जब शरीर अकड़ने लगता है और बुरी तरह शारीरिक-मानसिक मृत्यु का विश्वास हो जाता है, तभी उसे श्मशान ले जाया जाता है।

इस संदर्भ में कितने ही वैज्ञानिकों ने खोज-बीन की हैं कि मृत्यु से लौटे हुए व्यक्तियों से पूछ-ताछ करके यह पता लगाया जाय कि जितनी देर उन्हें शरीर से पृथक स्थिति में रहना पड़ा, उतने समय किस प्रकार के अनुभव होते रहें?

इस शोध कार्य में डॉ0 रेमण्ड0 ए॰ मूडी का नाम शीर्ष स्थान पर लिया जाता है। ऐसे ही प्रयोगों के पश्चात् उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी - “लाइफ आफ्टर लाइफ”। कैथोलिक चर्च की मान्यता के पक्षधर इस चिकित्सक द्वारा लिखी पुस्तक को प्रामाणिकता में इसलिए सन्देह की गुँजाइश नहीं हैं कि एक तो लेखक का व्यक्तित्व ज्ञान के क्षेत्र में अत्यन्त प्रामाणिक माना जाता है। साथ ही उनने कई विश्व-विद्यालयों से चिकित्सा विज्ञान की उच्चस्तरीय डिग्रियां प्राप्त की हैं और लम्बे समय तक उनमें प्राध्यापक रहे हैं। विज्ञान की कितनी ही उच्च संस्थाओं के सम्माननीय सक्रिय सदस्य रहे हैं। इसके अतिरिक्त इस शोध को उन्होंने किंवदंतियों और जन-श्रुतियों के आधार पर नहीं चलने दिया हैं, वरन् जो भी घटना इस प्रकार की उनकी जानकारी में आई हैं, उसका प्रत्यक्ष पता लगाने वे स्वयं पहुँचे हैं। साथ ही यह भी प्रयत्न करते रहे हैं कि चयनकर्त्ता कहीं किसी भ्रान्ति का शिकार तो नहीं हुआ हैं। कहीं अपने को चर्चा का विषय बनाने के लिए वह अत्युक्तियों का आश्रय तो नहीं ले रहा हैं।

एकत्रित अनुभवों से ज्ञात होता है कि लगभग सभी की यह अनुभूति रही हैं कि उनका शरीर मृत शरीर से अलग हुआ था, वह अत्यन्त ही हल्का और अदृश्य स्थिति में था। वह दूसरों को देखता है पर दूसरे उसे देख नहीं पाते। वह कुछ कहना भी चाहता है, पर वाणी इतनी अस्पष्ट होती हैं कि किसी के कान में उसकी भनक तक नहीं हो पाती। आँखों के आगे से पूरी तरह अदृश्य रहने पर भी उसे स्वयं यह अनुभव होता है कि मृत शरीर सामने पड़ा हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि मृत शरीर रोगी, विकृत, कुरूप आकृति का हैं वस्त्र पहने या ओढ़े हुए हैं। जबकि मृतात्मा को रोग काल जैसी कोई पीड़ा होती नहीं, न ही काया से दूर रहने पर किसी प्रकार की बिस्तर पर पड़ा शरीर उसका अपना हैं। इसे मित्र सम्बन्धियों ने घेर रखा हैं और उसका अंतिम संस्कार करने की तैयारी में लगे हैं। मृतक के सम्बन्ध में कई प्रकार की चर्चाएँ होती हैं। उन्हें वह सुनता तो हैं, पर किसी बात का उत्तर देने की स्थिति में नहीं होता। पुराने शरीर के साथ जो अपनापन था, पुराने सम्बन्धियों के साथ जो ममत्व था, वह घटने लगता है। क्योंकि नये सूक्ष्म शरीर में कोई ऐसी असुविधा नहीं होती, जिससे किसी बड़ी हानि का अनुभव करना पड़े। ठीक उसी तरह के विचार, स्वभाव एवं आकृति प्रकृति का नया शरीर मिल जाने पर सुविधाएँ अधिक प्रतीत होती हैं। उसे किसी वाहन, उपकरण या आच्छादन की आवश्यकता नहीं होती। नया शरीर इतना हल्का और ऋतु प्रभावों से सुरक्षित होता कि नये शरीर के मिल जाने पर पुराने शरीर की असुविधा ही स्मरण आती है ओर उसमें वापस लौटने की एक हल्की इच्छा तो जरूर बनी रहती है परन्तु तीव्र उत्कण्ठा नहीं। यदि वह पुराना शरीर वापस मिलना संभव न हो तो भी नये सूक्ष्म शरीर की स्थिति ऐसी होती है कि उसमें रहते हुए काम मजे में चलता रहता है।

प्राणों के निकलते समय रोगी को घुटन आदि का कष्ट होता है। पर जब प्राण शरीर छोड़ देता है तो इस विच्छेद के समय एक विचित्र अनुभव होता है। लगता है किसी गुफा के इस पार से उस पार जाया जा रहा है। गुफा के प्रारंभिक कोने पर अंधेरा होता है जिसमें प्रवेश करते समय यह अनुभव होता है कि न जाने आगे क्या होगा पर वह स्थिति ज्यादा देर तक नहीं रहती। दूसरा सिरा आता है और प्रकाश भर जाता है। आसपास की सभी वस्तुएं देखने लगती है।

जब तक शरीर की अंत्येष्टि क्रिया नहीं हो जाती या धरती में सुला नहीं दिया जाता, तब तक आत्मा उसके इर्द-गिर्द ही मंडराती रहती है। सम्बन्धियों, कुटुम्बियों को देखती रहती है। उसकी व्यथा वेदना का भी अनुभव होता रहता है, पर वापस शरीर में प्रवेश करने की ताकत नहीं रहती। उसे यह भी स्मरण नहीं रहता कि शरीर के इतने बड़े कलेवर में कहाँ से निकला गया था और कहाँ होते हुए प्रवेश किया जाता है।

परलोक सर्वथा एकाँकी या शून्य नहीं होता उसमें पूर्व परिचित भरे हुए संबंधी मिल जाते हैं वे कुशल समाचार भी पूछते हैं और उस नई स्थिति में उनकी सहायता का आश्वासन भी देते हैं।

यह सब घटनाएं अधिक से अधिक दस मिनट के भीतर हो जाती है। यदि पुनर्जीवन मिलता है तो इतने या इससे कम समय में ही मिल जाता है इस अवधि में किसी लंबी गहरी नींद में सोने के उपरान्त अचानक जाग पड़ने का अनुभव होता है तब सूक्ष्म शरीर की स्थिति धुंधली पड़ जाती है जो जिस क्रम में घटना-क्रम घटित हुआ उसमें से अधिकाँश का तारतम्य टूट जाता है स्मृति तृप्त हो जाने से इस आशंका में मन रहता है कि कभी शरीर से पृथक्करण हुआ भी था या नहीं।

मृत्यु के उपरान्त वापस लौटने की छोटी सी अवधि के संबंध में और भी कितने ही शोधकर्ताओं ने अनुभव लिखे है। पर उनकी खोजे भी इसी से मिलती जुलती है किसी ने भी यह निष्कर्ष नहीं निकाला है कि मृत्यु के उपरान्त अशरीरी स्थिति में जो लंबे समय तक रहना होता है उसकी दिनचर्या जैसे बनती और आत्मसत्ता पर उसमें क्या बीतती हैं?


Quotation

हाथ का कल्याण इसी में है कि वह अपना हित समस्त शरीर के हित में जुड़ा हुआ रखे। किसी भी अंग को अभाव या कष्ट हो तो उसके निराकरण का उपाय करें। यदि हाथ अपना कर्तव्य धर्म छोड़ दें और कलाई तक ही अपने को सीमित कर ले तो वह स्वयं भी नष्ट होगा और सारे शरीर को कष्ट करेगा।?

सम्पूर्ण जगत एक शरीर है। व्यक्ति उसका एक छोटा अवयव। अवयव यदि शरीर के साथ जुड़ा रहे। समाज की सुख शान्ति और प्रगति का प्रयास करें इसी में उसका हित साधन है दूसरों की उपेक्षा करके संकीर्ण, स्वार्थपरता में निरन्तर व्यक्ति, स्वयं मरने और समूचे समुदाय को मारते हैं।

-”स्वामी रामतीर्थ”


अविज्ञात का चमत्कार या महज एक संयोग

कई बार संयोगवश ऐसी घटनाएं घटित हो जाती है जिनकी आशा-उपेक्षा नहीं की गई होती है। ऐसी घटनाएं व्यावहारिक जीवन में तो होती ही रहती है, पर अनेक बार यह विचित्र.ता विज्ञान जगत में भी परिलक्षित हो जाती है देखा जाता है कि वैज्ञानिक किसी विषय पर प्रयोग-परीक्षण कर रहे है, बनाना कोई पदार्थ चाहते हैं पर अकस्मात अथवा दुर्घटनावश बन कोई और पदार्थ जाता है आविष्कार किसी अन्य वस्तु का हो जाता है पिछले दिनों ऐसे अवसरों पर अनेक ऐसे नये पदार्थों-सिद्धान्तों का आविष्कार हुआ, जिन्हें आज के परिप्रेक्ष्य में मानवोपयोगी और अत्यन्त महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।

कृत्रिम रेशम का अनुसंधान एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक डॉ0 शेरडोन्ने फोटोग्राफी के दौरान किया था। एक दिन शेरडोने एक फोटोग्राफी प्लेट पर कोलोडियन नामक तत्व की पुताई कर रहे थे कि अचानक मेज हिल जाने से ‘कोलोडियन’ से भरी बोतल फर्श पर गिर गयी। दुःख एवं क्रोध के आवेश में शेरडोन्ने उसे ज्यों का त्यों छोड़ कर घर चले आये। दूसरे दिन जब वह अपनी प्रयोगशाला की सफाई करने लगे तो जमीन पर पड़ा हुआ कोलोडियन रेशम जैसे पतले धागों में परिणत हो गया था। इन धागों से ही सर्वप्रथम 1811 में कृत्रिम रेशम का कपड़ा बनाया तथा उसे प्रदर्शित किया गया था।

यदि डॉ0 शेरडोन्ने के साथ यह आकस्मिक घटना नहीं घटी होती, तो संभवतः आज हम कृत्रिम रेशम का उपयोग नहीं कर रहे होते।

इसी प्रकार एक बार दो अमेरिकी वैज्ञानिक इरारेमसिन एवं बालवर्क अपनी प्रयोगशाला में कोलतार पर गंधक का प्रभाव देख रहे थे कि अचानक बालवर्क का हाथ होठों से टकराया जिससे उसे मिठास का अनुभव हुआ। घर जाकर हाथ धोकर खाना खाया तो बालवर्क का हाथ इतना मीठा था कि पूरा भोजन ही मीठा हो गया था दूसरे दिन बालवर्क ने पुनः प्रयोगशाला में जाकर जब अवशिष्ट पदार्थ का स्वाद लिया तो उसे बेहद मीठा पाया यही तत्व सैकरिन था, जो आज मधुमेह रोगी के लिए अनुदान एवं शक्कर का विकल्प बन गया है।

एलोपैथिक दवाओं में एण्टीबायोटिक पेन्सिलीन का आविष्कार महत्वपूर्ण माना जाता है इसकी भी खोज संयोगवश ही हुई।

एक बार वैज्ञानिक सर अलेक्जेन्डर फ्लेमिंग अपनी प्रयोगशाला में हानिकारक कीटाणुओं की उत्पत्ति के कारणों पर प्रयोग कर रहे थे। प्रयोग के मध्य उन्होंने देखा कि वाच ग्लास की तली में हरे रंग का पदार्थ जमा हुआ है। सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देखने पर डॉ0 फ्लेमिंग ने पाया कि उस पदार्थ के चारों और हजारों की संख्या में जीवाणु मरे हुए चिपके हैं। अनुसंधान के बाद यही पदार्थ पेन्सिलीन साबित हुआ वो आगे की चिकित्सा की आधारशिला बना।

तब पेन्सिलीन इतनी दुर्लभ थी, कि रोगी को दिये जाने के बाद यह औषधि उसके मूत्र से पास निकाल ली जाती थी, ताकि उसका दुबारा प्रयोग किया जा सके। पर अब जब कि इसके उद्गम-स्रोत फफूँद का भली-भाँति अध्ययन किया जा चुका है फफूँद का व्यापारिक उत्पादन कर बड़े पैमाने पर पेन्सिलीन तैयार की जाती है। इसी कारण आज यह इतनी कम कीमत पर सरलतापूर्वक सभी को उपलब्ध हो जाते हैं गुप्त रोगों के लिए तो यह रामबाण सिद्ध हुई है।

विल्होल्म रोएण्टजन जर्मनी के जाने माने वैज्ञानिक था। सन् 1895 के एक सर्द दिन वे निर्वात नलिका वैक्यूम ट्यूब के साथ कुछ प्रयोग कर रहे थे नलिका चारों और से एक काले मोटे गत्ते से इस प्रकार ढकी थी कि कोई किरण उसके बाहर न आ सके। अब वह निकला से उच्च वोल्टेज की विद्युत धारा गुजरती थी सामने रखा कागज जिस पर प्रतिदीप्ति कारक रसायन का एक लेप चढ़ा हुआ था अन्धेरे में चमकने लगता था। विद्युत धारा बंद होते ही कागज का चमकना भी बंद हो जाता था। उनसे यह भी देखा कि जब दोनों के बीच हथेली रखी जाती तो उसकी हड्डियों की छाया कागज पर स्पष्ट उभर आती थी। घटना विलक्षण थी अस्तु उनकी अभिरुचि इसके प्रति चढ़ी उनसे गहराई से इसका अध्ययन किया और अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि नलिका से एक अदृश्य किरण निकलती है जो कागज से टकराने पर प्रदीप्ति का कारण बनती है इसका नाम उन्होंने एक्स किरण रखा अपनी वेधक प्रकृति के कारण ही चिकित्सा जगत में इसे इतना महत्वपूर्ण स्थान मिल सका और टूटे-फूटे अंगों की जाँच परख में इसका इस्तेमाल किया जाने लगा।

सामान्य सी लगने वाली यह घटना अपने प्रयोग परीक्षणों के दौरान अनेक वैज्ञानिकों ने देखी थी जिनमें प्रख्यात भौतिक विद् जे.जे. थामसन भी थे मगर उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया सौभाग्यवश रोएण्टजन ने इसमें रुचि दिखायी जिससे चिकित्सा जगत को एक अत्यन्त उपयोगी और महत्वपूर्ण किरण की जानकार मिली। अन्यों की तरह यदि उनने भी इसकी उपेक्षा कर दी होती तो उपचार जगत इसकी बहुमूल्य सेवाओं से वंचित ही बना रहता।

कई बार ऐसे अवसरों पर भौतिक शास्त्र के अनेक महत्वपूर्ण सिद्धान्त वैज्ञानिकों के हाथ लगे। आर्किमिडीज का सिद्धान्त वैज्ञानिकों के हाथ लगे। आर्किमिडीज का सिद्धान्त ऐसा ही एक सिद्धान्त है।

सिराक्यूज के राजा ने एक बार यह घोषणा करवायी कि उसके सोने के मुकुट के असली-कली होने की पहिचान जो बता देगा उसे भारी इनाम दिया जायेगा। आर्किमिडीज ने भी इस घोषणा को सुन रखा था। एक बार जब यह तालाब में स्नान कर रहा था। एक बार जब वह तालाब में स्नान कर रहा था, तो उसने देखा कि डुबकी लगाने के बाद उसके भार में एक आँशिक कमी आ जाती है और हल्कापन महसूस होने लगता है एक क्षण तक उसने इस विलक्षणता पर विचार किया सोचा कि असली नकली सोने के विशिष्ट घनत्व में कमी वेशी के आधार पर इस विद्या द्वारा उसका खरापन सिद्ध किया जाता है। बस फिर पागलों की तरह ‘यूरेका-यूरेका” (पा लिया-पा लिया) चिल्लाते हुए वह राजा के पास पहुँचा, अपनी बात बतायी और दोनों मुकटों में विभेद कर देने का अपना दावा प्रस्तुत किया। राजा ने कुछ दिनों का समय देते हुए निश्चित अवधि में काम पूरा कर लाने का आदेश दिया। आर्किमिडीज ने उसी सिद्धान्त का प्रयोग करते हुए खरे-खोटे सोने की पहचान कर ली। बाद में यही घटना “आर्किमिडीज सिद्धान्त“ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

देखा जाय तो यह एक सामान्य सी घटना थी, वो प्रायः प्रत्येक व्यक्ति नहाते अथवा कुँआ से पानी खीचते वक्त अनुभव करता है पर इससे पहले किसी ने इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया संयोगवश आर्किमिडीज ने इस पर विचार किया तो विज्ञान को एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त ही लगा।

आइन्स्टीन न्यूटन एक दिन अपनी बगिया में सेब के पेड़ के नीचे बैठे हुए थे कि अचानक उनके सिर पर सेब का एक फल गिरा। वह सोचने लगे कि आखिर यह फल नीचे ही क्यों गिरा? ऊपर क्यों नहीं गया? गहन चिन्तन के उपरान्त उनने निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी में निश्चित रूप से किसी न किसी प्रकार की आकर्षण शक्ति है जो वस्तुओं को अपनी और खींचती है। कालान्तर में यही शक्ति पृथ्वी की “गुरुत्वाकर्षण शक्ति” कहलायी और यह प्रसिद्ध सिद्धान्त “गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त” के नाम से जाना गया अब इसी सिद्धान्त का प्रयोग कर बड़ी-बड़ी भौतिक एक खगोलीय गणनाएं की जाती है।

ऐसी अनेक घटनाएं हमारे दैनिक जीवन में घटती रहती है, जिसमें बड़े महत्वपूर्ण सूत्र-सिद्धान्त छिपे रहते हैं पर उन्हें हम तुच्छ समझकर दर गुजर कर देते हैं किन्तु वैज्ञानिक स्तर के व्यक्ति उन्हीं छोटी घटनाओं में से बड़ी-बड़ी खोजे कर लेते हैं इससे उन्हें जहाँ एक और स्वतंत्र चिन्तन का अवसर मिलता है वही दूसरी और वे नये आविष्कारों के श्रेयाधिकारी बनते हैं। वस्तुतः अविज्ञात का भण्डार अत्यन्त विराट एवं अपरिमित है। इसमें डुबकी लगा कर अन्तर्मुखी होकर बहुमूल्य मणिमुक्तक खोज निकाले जा सकते हैं महत्वपूर्ण आविष्कारों का इतिहास इन्हीं संभावनाओं को उजागर करता है।


उपवास से अनेक विकृतियों का समाधान

किसी वाहन पर उसकी शक्ति में अधिक वजन लादा जाय तो उसे अभीष्ट स्थान तक ले पहुँचना न तो संभव है और न अपनी सुदृढ़ता सुरक्षित बनाये रहना, यदि वजन उसकी सामर्थ्य से कम रखा जाय तो जल्दी चलेगा स्वस्थ रहेगा और मालिक को भी किसी प्रकार की परेशानी उत्पन्न न होने देगा।

यह बात पेट के ऊपर शत प्रतिशत लागू होती है। आमाशय की थैली छोटी सी है। उसमें अधिक से अधिक आधा किलों खाद्य सामग्री रखी जा सकती है। फिर जो पाचक स्राव होते हैं वे भी सीमित मात्रा में ही रिसते हैं। आमाशय से चलकर उनकी 32 फीट लम्बे आँतों में भी यह प्रक्रिया चलती रहती है इस सब में एक बार के खाये भोजन को पचाने में छः सात घटे लग जाते हैं इस बीच उसके कार्यों में विक्षेप उत्पन्न नहीं होने देना चाहिए अन्यथा बीच में उत्पन्न हुआ वह व्यक्तिक्रम आगे भी अड़चने खड़ी कर सकता है।

जिस प्रकार आजकल लोगों को खाने की आदत है उस हिसाब से दिन में दो बार ही भोजन किया जा सकता है। बार-बार खाते रहने से हाँडी पकने से पहले ही उसमें नया माल डाल देने जैसी स्थिति होती है पुराना जल जाता है नया तब तक कच्चा ही बना रहता है दोनों ही स्थितियाँ ऐसी है जिसमें आहार का लाभ नहीं मिलता वरन् उससे विक्षेप ही उत्पन्न होता चला जाता है।

पशु पक्षियों की बात दूसरी है उन्हें एक-एक ग्रास तलाश करना चबाना पड़ता है इसके लिए भाग दौड़ भी बहुत करनी पड़ती है पशु तो बैठ कर जुगाली भी करते हैं पर मनुष्य की स्थिति ऐसी नहीं होती उसे दिन भर एक-एक ग्रास ढूंढ़ने खाने पचाने की फुरसत कहाँ है इसलिए उसे नियत समय पर ही उस कार्य से निश्चित होकर अन्य कामों में लगना पड़ता है। अस्तु यही तरीका अच्छा है कि नियत मात्रा में नियत समय पर भोजन किया जाय। बीच-बीच में वो मन में आया सो खाने न रहा जाय।

प्रातःकाल का भोजन तो और भी अनुपयुक्त है, क्योंकि देर रात को खाया हुआ भोजन पेट में पड़ा रहता है और वह ठीक तरह हजम नहीं हो पाता। इसलिए प्रायः पानी, नीबू, शहद, दूध, छाछ जैसी पतली कुछ वस्तु लेकर काम चला लेना चाहिए। भोजन दोपहर को ही करना चाहिए। उसमें भी यह ध्यान रखा जाय कि आधा पेट आहार से भरना चाहिए और आधे को हवा के आवागमन तथा पानी के लिए छोड़ देना चाहिए। ठूँस-ठूँस कर भोजन करना, गर्भवती स्त्री जैसी बेचैनी अपने लिए उत्पन्न करना है। शाम को भोजन सदा हल्का और अपेक्षाकृत कम मात्रा में होना चाहिए।

यह क्रम अनवरत नहीं चलने देना चाहिए। बीच-बीच में विश्राम की सुविधा भी देनी चाहिए। स्कूलों में दफ्तरों में बाजारों में कारखानों में साप्ताहिक अवकाश का दिन रहता है। देखने से प्रतीत होता है कि इससे काम हर्ज होगा पर सही बात यह नहीं है अवकाश में मिलने वाले विश्राम में पाचन तंत्र के विश्राम मिल जाता है और नई शक्ति नई स्फूर्ति मिलने से अधिक उत्साह से अधिक मात्रा में काम करने बन पड़ता है इससे न काम हर्ज होता है न मालिक को नुकसान पड़ता है। वरन् काम का ढर्रा उदासी, उपेक्षा से रहित होकर अधिक मात्रा में वे अधिक अच्छा काम कर पाते हैं।

यह अवकाश हमारे पेट को भी मिलना चाहिए क्योंकि वही सबसे अधिक श्रमशील और कार्यरत है। इसलिए उसके साथ औचित्य एवं सेवा साधना का ही व्यवहार होना चाहिए जो वह आसानी से पचा सकता है वैसा शाकाहार ही उसे देना चाहिए। यह न सोचना चाहिए कि अधिक पैसा खर्च करके बनाये जाने वाले मिष्ठान्न या पकवान ही अनिष्टता प्रदान कर सकते हैं जब हाथी तक शाकाहार के सहारे अपनी बलिष्ठता बनाये रह सकता है तो यह सोचना व्यर्थ है कि मनुष्य की आवश्यकता उससे पूरी नहीं होती उसे स्वादिष्ट उस स्वादिष्ट मिष्ठान्न, पकवान और मिर्च मसाले वाले पकवान ही खाने चाहिए। इस प्रयोग में उसे घाटा ही उठाना पड़ता है। गरिष्ठ पदार्थ देर से पचते हैं। सड़न उत्पन्न करते हैं। अपच का कारण बनते हैं। इतना ही नहीं वे रक्त में विषाक्तता भी भर देते हैं जिससे शरीर के क्षीण एवं रुग्ण होने का क्रम चल पड़ता है।

मूल से मिलने वाले दण्ड का प्रायश्चित यही है कि उसे आगे न दुहराया जाय और जो भूल हो चुकी है उसका प्रायश्चित किया जाय। पेट पर अनावश्यक भार लाद-लाद कर हम जो अनर्थ करते रहे है उसका सबका प्रायश्चित उपवास के रूप में ही हो सकता है। यही एक उपाय है जिससे थका हुआ आहत हुआ पेट समुचित विश्राम पाकर फिर से अपना काम नये सिरे से नई तत्परता के साथ आरंभ कर सकता है।

शास्त्रों में उपवास की असाधारण महत्ता बताई गई है। इसे तपश्चर्या में गिना गया है कारण यह है कि उससे मात्र पेट का ही परिमार्जन नहीं होता मात्र सड़न के कारण उत्पन्न होने वाले अनेकानेक रोगों का ही नियमन नहीं होता वरन् उसके साथ जुड़े हुए मस्तिष्कीय विकारों पर भी नियंत्रण होता है। विकृत मस्तिष्क जाती है। मिष्ठान्न या पकवान ही अनिष्टता प्रदान कर सकते हैं जब हाथी तक शाकाहार के सहारे अपनी बलिष्ठता बनाये रह सकता है तो यह सोचना व्यर्थ है कि मनुष्य की आवश्यकता उससे पूरी नहीं होती उसे स्वादिष्ट उस स्वादिष्ट मिष्ठान्न, पकवान और मिर्च मसाले वाले पकवान ही खाने चाहिए। इस प्रयोग में उसे घाटा ही उठाना पड़ता है। गरिष्ठ पदार्थ देर से पचते हैं। सड़न उत्पन्न करते हैं। अपच का कारण बनते हैं। इतना ही नहीं वे रक्त में विषाक्तता भी भर देते हैं जिससे शरीर के क्षीण एवं रुग्ण होने का क्रम चल पड़ता है।

मूल से मिलने वाले दण्ड का प्रायश्चित यही है कि उसे आगे न दुहराया जाय और जो भूल हो चुकी है उसका प्रायश्चित किया जाय। पेट पर अनावश्यक भार लाद-लाद कर हम जो अनर्थ करते रहे है उसका सबका प्रायश्चित उपवास के रूप में ही हो सकता है। यही एक उपाय है जिससे थका हुआ आहत हुआ पेट समुचित विश्राम पाकर फिर से अपना काम नये सिरे से नई तत्परता के साथ आरंभ कर सकता है।

शास्त्रों में उपवास की असाधारण महत्ता बताई गई है। इसे तपश्चर्या में गिना गया है कारण यह है कि उससे मात्र पेट का ही परिमार्जन नहीं होता मात्र सड़न के कारण उत्पन्न होने वाले अनेकानेक रोगों का ही नियमन नहीं होता वरन् उसके साथ जुड़े हुए मस्तिष्कीय विकारों पर भी नियंत्रण होता है। विकृत मस्तिष्क में सदा कुविचार उठते रहते हैं और उनके कारण अनेक प्रकार के दोष, दुर्गुण उठते और व्यक्तित्व के गरिमा भरे धर्म स्थल को अस्त व्यस्त करते हैं। इससे समूचा जीवन क्रम ही निकृष्टता के गर्त में गिरने लगता है। इस महती क्षति से बचाव करने के लिए एक ही उपाय है कि भोजन पर नियंत्रण किया जाय और उस क्षेत्र की जमी हुई गंदगी को सफाई का अवसर दिया जाय।

साधना क्षेत्र में सबसे बड़ी आवश्यकता मनोबल बढ़ाने की होती है। मनोबल ही संकल्प, साहस, शौर्य, पराक्रम के रूप में जाना जाता है उसी की बहुलता से आत्म संयम और मनोनिग्रह की व्यवस्था बन पाती है। यदि मनोबल क्षीण हो तो उच्चस्तरीय पुरुषार्थों का बन पड़ना या निभ सकना संभव नहीं। तप साधना और योगाभ्यास से संचित दुर्बुद्धि और अवाँछनीयता का परिमार्जन करना पड़ता है इसके लिए आन्तरिक क्षेत्र में महाभारत स्तर का साधना समर जीतना पड़ता है अन्यथा उठने वाले शुभ संकल्प भी टिक नहीं पाते और हवा के प्रवाह में उड़ जाने वाले बादलों की तरह तिरोहित हो जाते हैं।

आध्यात्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाएं अनेकानेक है पर उनमें से एक भी ऐसी नहीं जो पुरातन अनर्गल अभ्यासों का उन्मूलन किये बिना सध सकती हो इस उन्मूलन में जितनी शक्ति लगने की आवश्यकता पड़ती है उसका संचय करने के लिए उपवास करने और मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है इस हेतु आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुकों को सबसे प्रथम आहार नियमन करना पड़ता है।


एक उदेश्य निश्चित करो(Kahani)

एक लड़के ने एक बहुत धनी आदमी को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया कई दिन वह कमाई में लगा रहा और कुछ पैसे भी कमा लिये इसी बीच उसकी भेंट एक विद्वान से हुई अब उसने विद्वान बनने का निश्चय किया और दूसरे दिन से कमाई धमाई छोड़कर पढ़ने में लग गया।

अभी अक्षर अभ्यास ही सीख पाया था कि उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हुई। उसे संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया, अतः उस दिन से पढ़ाई बंद कर दी और संगीत सीखने लगा।

काफी उम्र बीत गई, न वह धनी हो सका न विद्वान और न संगीत सीख पाया तब उसे बड़ा दुःख हुआ एक दिन उसकी एक महात्माजी से भेंट हुई उसने अपने दुःख का कारण बताया।

महात्मा जी मुस्कुरा कर बोले बेटा दुनिया बड़ी चिकनी है जहाँ जाओगे कोई न कोई आकर्षण दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीत जी उस पर अमल करते रहो तो तुम्हारी उन्नति अवश्य हो जायेगी और युवक एक उद्देश्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा।


धर्मतन्त्र की क्षमता प्रगति प्रयासों में लगे

ईसाई धर्म का एक केन्द्रीय संगठन है दान की धन राशि उस केन्द्र में ही जमा होती है। मिशन की गतिविधियों को व्यापक एवं अग्रगामी बनाने के लिए कार्यकर्ता प्रशिक्षित किये जाते हैं और उन्हें योजनाबद्ध ढंग से उन उपयुक्त स्थानों में नियुक्त किया जाता है वहाँ उन्हें अधिक सफलता मिलने की आशा है प्रतिफल भी आश्चर्यजनक रूप से हो रहा है संसार भर में ईसाई धर्म के अनुयायियों की संख्या धर्म अब प्रथम पंक्ति में है। भविष्य में उसकी प्रगति और भी तेजी से होने की संभावना है।

बौद्धकाल में ऐसे ही प्रयासों के लिए दो बड़े केन्द्र बनाये गये थे। एक नालन्दा विश्वविद्यालय दूसरा तक्षशिला विश्वविद्यालय कहा जाता है उनमें तीस-तीस हजार छात्रों के अध्यापन निवास निर्वाह की व्यवस्था थी। वे छात्र धर्म प्रचारक बनकर निकलते थे और बौद्ध धर्म को विश्वव्यापी बनाने के लिए निरन्तर कर्तव्यरत रहते थे।

अति प्राचीन समय में यह कार्य तीर्थ स्थानों में बने गुरुकुलों तथा आरण्यकों द्वारा सम्पन्न होता था लोग उनके साथ जुड़ते थे। सद्ज्ञान संवर्धन और सत्प्रवृत्ति संचालन के निमित्त मुक्तहस्त से धन दान करते थे। उन साधनों के सहारे धर्म प्रचारकों, पुरोहितों का प्रशिक्षण होता था और उनके प्रवास में आवश्यक पड़ने वाली सुविधाओं को वही से जुटाया जाता था।

यह कुछ थोड़े से उदाहरण है, जिनके माध्यम से कतिपय धर्म संस्थानों द्वारा अपने-अपने ढंग से अपने-अपने क्षेत्र में सफलतापूर्वक काम करने का परिचय मिलता है यह सब तभी बन पड़. जब वे किसी केन्द्र बिन्दु को बनाने और उस पर एकत्रित होने में सफल हुए।

यदि केन्द्रीय शक्ति एकत्रित न हुई होती। एक व्यापक और सुनिश्चित योजना न बनी होती संगठन स्थानीय ढंग के रहे होते, उनके कार्यकर्ता सर्वत्र स्वतं. रहकर बिखरे भटके रहे होते, आपस में अधिक प्रतिष्ठा पाने और अधिक लाभ उठाने के प्रलोभन में परस्पर टकराते रहे होते तो निश्चित है कि उनके क्रिया कलाप में तनिक भी प्रगति न हुई होती। कोई यशस्वी सफलता हस्तगत न हुई होती। अपनी ढपली अपना राग वाली उक्ति चरितार्थ होती। डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाने “ ढाई ईंट की मस्जिद बनाने वाले व्यंग उपहार इस धर्म केंद्रों तथा धर्म प्रचारकों पर भी चरितार्थ हुए होते। प्रतीति तो होती ही क्या? कोई कारगर सफलता तो मिला ही कैसे सकती थी?

हिन्दू धर्म की दार्शनिक पृष्ठभूमि असाधारण रूप से मजबूत है। उसकी जड़ें पाताल तक पहुँचती है। उसकी मान्यताओं, आस्थाओं, प्रथाओं एवं प्रतिपादनों की यदि सही सुधरे हुए रूप में सर्वसाधारण के सामने रखा जा कसे तो सामान्य विवेक बुद्धि वाला भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। किन्तु इस संभावना के मार्ग में कई कठिनाईयाँ भी है। मध्यकालीन अंधकार युग के प्रभाव से उसके प्रचलनों में कितने ही अवांछनीय तत्व सम्मिलित हो गये हैं। समय आ गया है कि उन पर फिर से दृष्टिपात किया जाय और जो अनुपयुक्त लगता है उसे स्वेच्छापूर्वक सुधार लिया जाय। उदाहरण के लिए जाति पाँति पर आधारित ऊंच-नीच को मान्यता, विवाह शादियों के अवसर पर होने वाला सामर्थ्य से बाहर इतना खर्च जो परिवारों को दरिद्र एवं बेईमान बनाये बिना न रहे, आधे जन समुदाय की स्त्रियों को घूँघट पर्दे में कैद रखकर उन्हें अपंग जैसी स्थिति में डाले रखना मृतक भोज के नाम पर लंबी चौड़े प्रीतिभोजों का होना। भिक्षा व्यवसाय आदि -आदि। इन प्रचलनों को असामान्य ठहरा कर समाज को प्रतिगामिता के लाँछन से बचाया जा सकता है। इन्हीं कारणों से पनपने वाली दरिद्रता से पीछा छुड़ाया जा सकता है मान्यताओं में भी भाग्यवाद अंध विश्वास जैसे प्रति गाड़ी तत्वों की घुसपैठ कम नहीं हुई है इन्हीं के चंगुल में फंसकर अगणित भावुक वन दिग्भ्रांत होते और भ्रम जंजालों में भट कर जेब कटाते तथा समय रावति है। यदि उन अवाँछनीयताओं पर गंभीरतापूर्वक विचार कर लिया जाय और उनके परिशोधन के लिए साहस कर लिया जाय तो न केवल भारत का तत्व दर्शन वरन् व्यवहार प्रचलन भी ऐसा हो सकता है जिसे अपनाने के लिए हर किसी की उमंग उभरे विचारशील वर्ग उसका अनुगमन करने के पीछे न हरे। अभी तो जो उस परम्परा में पूर्वजों की सीख मान कर किसी प्रकार लकीर पीटने की तरह अपनाये हुए है वे भी उत्साहित मन से उसके प्रति आस्थावान बने और अन्यान्यों की उसकी महत्ता बताते हुए आभ्यावान बनाने के लिए प्रोत्साहित करें इस प्रकार अपना समुदाय देखते-देखते कई गुना हो सकता है वर्गों की संख्या बल अपना महत्व रखता है लोकतंत्र तो उसी पर आधारित है पाकिस्तान का बंटवारा इसी आधार पर हुआ है कि अपने की भिन्न संस्कृति का अनुयायी होने के नाते उसने प्रथम भूमि की माँग की और बंटवारा करा लेने में सफलता पाई भारतीय धर्मानुयायी यदि घटते चले गये और भिन्न मान्यता रखने वालों की संख्या बढ़ती गई तो भविष्य में उसी स्तर के संकट खड़े हो सकते हैं बंटवारे पर बंटवारे होने के आधार खड़े हो सकते हैं। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका उत्पन्न होना भी कष्टकर है पर उस और से आंखें बंद करके भी नहीं बैठे रहा जा सकता समय रहते भविष्य की समुच्चयता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए इस संदर्भ में प्रथम प्रयास यही हो सकता है कि हिन्दू धर्म की मान्यताओं में जहाँ-कहीं प्रतिगामिता दृष्टिगोचर होती है उसका सुधार, परिमार्जन कर डाला जाय।

भारत में जितने लोगों ने हिन्दू धर्म छोड़ा है उनमें से अधिकाँश असंतुष्ट वर्ग के लोग है अन्य धर्मों के तत्व दर्शन की तुलनात्मक समीक्षा करके वे धर्म परिवर्तन के लिए सन्नद्ध हुए हो ऐसी बात नहीं है वास्तविकता यह है कि कुप्रचलनों से खिन्न उद्विग्न हुए लोगों ने यह अच्छा समझा कि इस धर्म से संबंध ही तोड़ लिया जाय जिसमें उन्हें अनुचित दबाव त्रास सहने पड़ते हैं। शोषण का शिकार बनना पड़ता है उससे सदा सर्वदा के लिए पीछा क्यों न छुड़ा लिया जाय विक्षोभों ने ही उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए विवश किया है। परिवर्तनों के लिए विवश किया है। इन परिस्थितियों को सुधारे बिना कोई गति नहीं यदि हाट में अपना माल अपेक्षाकृत अधिक उत्तम सिद्ध न किया जा सका तो उसे खरीदेगा कौन उसे मान किससे मिलेगा सवर्ण और असवर्ण सभी इन कुरीतियों की चपेट में आते हैं जो धर्म परिवर्तन नहीं करते वे भी इन अनौचित्य भरे प्रचलनों को कोसते तो ही ऐसी दशा में अनुयायियों की आम्या भी डगमगाती है। मनोबल भी कमजोर होता है समाज सुधार के अतिरिक्त एक दूसरा कदम उठाने योग्य है कि धर्म को संगठित सुव्यवस्थित किया जाय उसकी गतिविधियों को ऐसी दिशा धारा के साथ जोड़ा जाय जो रचनात्मक उपलब्धियाँ प्रस्तुत करें।

हिंदु धर्म अनेकानेक मत-मतान्तरों में विभाजित है। उनके सबके अपने-अपने पथ, आश्रम है। अपने-अपने प्रथा प्रचलन एक दूसरे से तालमेल न रखने वाले प्रतिपादन गुयमहन्त वर्ग अच्छा होता यह विभाजन सिकुड़ता एकीकरण की ओर चलता संगठित होता पारस्परिक सहयोग एक केन्द्र पर केंद्रित हो जाता यदि ऐसा बन पड़ता तो बिखरी हुई शक्त एक केन्द्र पर केन्द्रित होती धन शक्ति, जन शक्त बुद्धि शक्ति किसी रचनात्मक दिशा में लगती सुधार परिष्कार और उत्कर्ष अभ्युदय की उन आवश्यकताओं को पूरा करती जिनकी आज महती आवश्यकता है ईसाई मिशन ने अपनी संगठित शक्ति को अपने मत की व्यापक बनाने में लगाया हम उसे उन कल्याण के लिए ऐसे कामों में लगा सकते हैं कि सभी धर्मों के अनुयायी उससे प्रभावित होते और लाभ उठाते।

भारतीय वन समुदाय में धर्म श्रद्धा की किसी प्रकार कमी नहीं वरन् अन्य धर्मों से कुछ अधिक ही है यह स्थापना वश परम्परा के आधार पर युग-युगान्तरों से चलती आ रही है अत्यधिक गरीबी रहते हुए दान दक्षिणा के तीर्थ यात्रा के विभिन्न कर्मकाण्डों के निमित्त इतना पैसा खर्च किया जाता है जिसे सरकारी राजस्व कर के समतुल्य समझा जाता है साठ लाख साधु बाबाओं धर्म जीवियों का खर्च भी जनता खुशी-खुशी उठाती है उनके द्वारा आये दिन किये जाने वाले धर्म कृत्यों भी विपुल धनराशि खपती ही है इस राशि को इस जन शक्ति को ईसाई मिशनों के वैभव से कम नहीं अधिक ही आँका जा सकता है।

अन्तर इतना ही है कि उनने संगठन का आश्रय लिया है। और योजनाबद्ध कार्यक्रम बनाकर निर्धारण के अनुरूप प्रयासों को संलग्न करने की बुद्धिमता का परिचय दिया है जबकि हमारे स्वभाव में विघटन ही घर कर गया है।

आत्म निरीक्षण का ठीक यही समय है भूले सुधारने का भी इस दिशा में धर्म-तंत्र को आगे आना चाहिए क्योंकि उसका अपना महत्व सम्मान प्रभाव है उसके पास साधन की कमी नहीं सभी धर्म स्थानों की सम्पदा और उस दिशा में नियोजित जन शक्ति का अनुमान लगाया जाय तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि इससे पूर्व कभी भी भारतीय धर्म तं. की छत्र छाया में तनी शक्ति एकत्रित नहीं हुई बुद्ध जैसे महामानवों ने अपनी शक्ति एकत्रित नहीं हुई बुद्ध जैसे महामानवों ने अपनी शक्ति से देश भर में विदेशों में धर्म चक्र प्रवाह की गगनचुंबी लहर उठाने में सफलता पाई थी यह उसकी सीमित शक्ति का प्रभाव था उसके स्थान पर धर्म संस्थानों की धर्माचार्यों की संयुक्त शक्ति तो आज अनेक गुनी अधिक आँकी जा सकती है प्रश्न केवल उसको सम्पादित कराके एक केन्द्र पर केंद्रीभूत करने की है साथ ही एक निश्चित लक्ष्य बनाकर उस प्रयास में उस क्षमता को नियोजित करने की यदि ऐसा बन पड़े तो प्रचलित अवाँछनीयताओं से भली प्रकार लोहा लिया जा सकता है और उनके स्थान पर सद्वृत्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है वो लोग धर्म की दुहाई देते और उसी के लिए अपने सहचर अनुयायियों का समय श्रम धन लगते रहते हैं, यदि वे समय की माँग पर ध्यान दे तो उन्हें धर्म पाठ पढ़ाने के स्थान पर स्वयं ही उसे पढ़ने की आवश्यकता प्रतीत होगी अपने मुट्ठी भर अनुयायियों की अलग पहचान बनाए रखने की चेष्टा रखने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर यही कि सभी धर्म प्रेमियों को एक छात्रावास में एकत्रित किया जाय और उनकी क्षमताओं को सर्वतोमुखी प्रगति के लिए है नियोजित किया जाय।


काम, क्रोध और मोह से परे (Kahani)

सन्त पुरन्दर गृहस्थ थे तब भी क्या लोभ, क्या काम और क्रोध उन्हें छू भी नहीं पाये थे । दो तीन घरों में क्षाटन करने के बाद उससे जो दो मुट्ठी चावल और आटा मिल जाता उससे वे अपना और धर्मपत्नी सरस्वती देवी का उदर पोषण कर लेते और दिन भर लोकसेवा के कार्यों में जुटे रहते।

एक दिन विजय नगर के राजपुरोहित व्यासराय से महाराजा कृष्ण देवराय ने सन्त की प्रशंसा सुनी महाराज कृष्ण देवराय हंसे और बोले गृहस्थ में रहकर कौन तो निर्लोभ रहा कौन काम वासना से बचा? यदि गृहस्थ में ऐसा संभव हो जाये तो ये सभी अपना मनुष्य शरीर सार्थक न कर ले?

“कर सकते है” व्यासराय बोले- यदि लोग सन्त पुरन्दर और देवी सरस्वती की भाँति निर्लोम सेवा परायण व सरल जीवन जीना सीख ले महाराज कुछ खिन्न हो गये बोले ऐसा ही है तो आप उनसे कुछ दिन यही हमारे यहाँ भिक्षाटन के लिए कह दें। व्यासराय ने सन्त पुरन्दर से जाकर आग्रह किया “आप आगे से राजभवन से भिक्षा ले आया करें”।

सन्त पुरन्दर राजभवन जाने लगे वहाँ से मिले चावल ही उनके उदर पोषण के लिए पर्याप्त होते ,सन्त अपनी सहज प्रसन्नता के लिये हुए जाते, उसका अर्थ महाराज कुछ और ही लगाते। एक दिन तो उन्होंने व्यासराय से कह भी दिया देख लो आपके सन्त श्री निष्पृहता। आज कल देखते नहीं कितने प्रसन्न रहते हैं।

व्यासराय बोले आपका तात्पर्य समझा नहीं इस पर महाराज राजपुरोहित के साथ सन्त पुरन्दर के घर पहुँचे देखा उनकी धर्मपत्नी चावल साफ कर रही है महाराज ने पूछा बहन। यह क्या कर रही हो? इस पर वे बोली आज कल न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं इन चावलों में कंकड़ पत्थर भरे होते हैं। यह कह- उन्होंने अब तक बीने रत्न उठाये और बाहर की तरफ उन्हें फेंकने चल पड़ी महाराज यह देख कर अवाक् रह गये।


आन्तरिक और आत्मिक प्रेम

श्रामवस्ती की असाधारण सुन्दरी थी- वासवदत्ता। इसे नगर वधू का पद मिला मध्यकाल में नगर की असाधारण रूप यौवन सम्पन्न महिलाओं को यह पद मिलता था वे आजीवन कुमारी रहती थी नृत्य गायन से वे सर्वसाधारण का विनोद करती थी। उन पर कोई एकाधिपत्य न जमा सके। उसे प्राप्त करने के लिए परस्पर सामन्तों में विग्रह न हो इस हेतु यह नियम निर्धारित किया गया था।

वासवदन्त के सौंदर्य पर अनेकों धनीमानी अपने को निछावर करते थे। उसकी एक मुस्कान के बले कुछ भी प्रस्तुत करने को तैयार रहते थे यह लोकाचार भी निभाती पर किसी के निकट संपर्क में न आती वह जानी थी यह सब त्रसना के कृमि कीटक है। सच्चा प्यार कर सकते हैं जैसी विकसित आत्मा तो इनमें है नहीं इसलिए उसने उन मधु लोभी भ्रमरों की सदा उपेक्षा की।

उन्हीं दिनों कुछ संघ के एक सौम्य तेजस्वी उपगुप्त थे वे भिक्षाटन के लिए उस मार्ग से प्रायः जाया करते जिसमें वासवदत्ता का महत्व पड़ता था उपगुप्त की उठती आयु थी उनका शील देखने योग्य था कभी सिर उठाकर ऊपर न देखते। लक्ष्म में उनकी असीम निष्ठा थी। इसलिए वे जिनके भी संपर्क में आते उन्हें गहरा प्यार करते साथ ही यथासंभव सेवा सहायता भी।

वासवदत्ता ऐसे ही किसी आदर्शवान् से प्यार करना चाहती थी। युवक साधु जब भी उस मार्ग से निकलता वह टकटकी लगाकर देखती रहती दरवाजे पर खड़ी रहती, प्रतीक्षा करती रहती और उनके निकल जाने के बाद उठकर भीतर जाती कुछ स्वाभाविक और गहरा प्रेम हो गया था।

एक दिन वासवदत्ता ने भिक्षु को अपने घर भिक्षा के लिए आमंत्रित किया। उसने भिक्षा ग्रहण की। जब चलने लगे तो उसने आँखों में आँसू भर कर कहा- “देव, क्या मेरा स्वर और शरीर भी स्वीकार कर सकेंगे”?

भिक्षु ने जमीन में गड़े नेत्रों को ऊपर उठाया। वात्सल्य भरी दृष्टि से देखा और कहा- “वासनात्मक स्नेह कर सकना तो मेरे लिए संभव नहीं पर तुम्हें कभी मेरी सेवा की जरूरत होगी तो मैं उपस्थित मिलूँगा।”

वासवदन्त मंत्र मुग्ध सी देखती रही साधु अपने मार्ग पर चले गये। भिक्षु ने उस मार्ग से जाना भी बंद कर दिया। नगरवधु भी निराश हो गई। मन मसोस लिया पर उसका समर्पण भाव क्षेत्र में ज्यों का त्यों बना रहा।

वर्षों बीत गये। वासवदन्त अधेड़ हो गई रूप यौवन भी ढहा गया। निछावर होने वाले समुदाय ने भी मुख मोड़ लिया इसी बीच दुर्भाग्य आ टपका। वासवदन्त को कोढ़ जैसी कोई बीमारी हो गई जिसके कारण कोई उसके पास तक न झांकता। सर्वथा एकाकी और छूत रोग से पीड़ित वासवदन्त के दिन काटने कठिन हो गये। मृत्यु के लिए प्रार्थना करती रहती।

उपगुप्त के मन में भी वासवदन्त की भावनाएं स्मृति पटल पर बनी रही समाचार मिला कि नगरवधू को असाभ्य छूत रोग ने घेर लिया है कोई उसके पास तक नहीं फटकता। असहाय दुखी जीवन जी रही है।?

उपगुप्त सीधे वासवदन्त के निवास पर पहुँचे। उसके अंग गल रहे थे। शरीर सूख कर काँटा हो गया था। उपगुप्त ने जाते ही उनका सेवा कार्य संभाल लिया और इस प्रकार जुट गये मानो उसके सगे संबंधी हों।

वासवदत्ता ने आँखों में आँसू भर कर कहा- देव। आप बहुत विलम्ब से आये। मेरे पास तो आपकी सेवा के लिए कुछ भी बचा नहीं। शरीर भी नहीं।”

उपगुप्त ने बस यही कहा- ‘देवि! आत्मा, आत्मा को प्यार करती और केवल सेवा को छूट देती है। शरीर का उसमें कोई न हस्तक्षेप होता है न योगदान।


छोटे-छोटे काम, बहुत बड़े सत्परिणाम - पंचसूत्री कार्यक्रमों पर प्रज्ञापुत्रों के गतिशील चरण

दहेज विरोधी अभियान, निरक्षरता उन्मूलन दीप यज्ञ (जन्म दिवसोत्सव) सद्वाक्य लेखन और झोला पुस्तकालय इन पंचसूत्री कार्यक्रमों का इन दिनों तेजी से विस्तार हो रहा है। छोटे प्रतीत होने वाले यह कार्यक्रम नमक सत्याग्रह की तरह ही कितने प्रभावी है उसकी कुछ झलक झाँकियाँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही है।?

बाबाजी विद्यार्थी बनें

मंगलासंर (राज0) गायत्री परिवार शाखा द्वारा प्रारंभ प्रौढ़ पाठशाला में क्रमशः 57 व 60 वर्ष के दो वयोवृद्ध श्री रमजान खाँ और श्री कामताप्रसाद भी विद्यार्थी बने है 15 विद्यार्थियों को लेकर प्रारंभ की गई यह प्रौढ़ पाठशाला इन दिनों समूचे नगर की प्रेरणा और चर्चा का विषय है।

युग निर्माण योजना के साक्षरता अभियान के अंतर्गत प्रौढ़ शिक्षा का यह संकल्प जुलाई मास में सर्व श्री देवराज सिंह चन्द्रिका प्रसाद तथा कृष्ण चन्द्र रवानी ने लिया था उन्होंने पूरे उत्साह से यह योजना क्रियान्वित की। उनकी निष्ठा का ही परिणाम था जो घर-घर प्रौढ़ निरक्षरों को पढ़ने के लिए सहमत किया जा सका और अब यह प्रौढ़ पाठशाला उत्साहपूर्ण वातावरण में चल रही है

विराट महायज्ञ के लिए

किशनगढी (विहार) आगामी माह आयोजित शतकुण्डी गायत्री महायज्ञ को विराट बनाने के लिए पंचसूत्री कार्यक्रम निर्धारित किये गये हैं 1- एक हजार जनसंपर्क और चालीसा वितरण 2- समीपवर्ती गाँवों की तीर्थ यात्रा 3- घर-घर दीप यज्ञ और आमंत्रण 4- एक हजार मंगल कलश के लिए महिलाओं की तैयारी स्लाइड प्रोजेक्टर द्वारा मिशन का प्रसार और भागीदार के लिए आमंत्रण।

इन कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग समितियाँ बना दी गई है यह सभी यज्ञ समिति के मार्गदर्शन में कार्य करेंगी अनुमान है इस आयोजन से एक लाख व्यक्तियों तक प्रज्ञा आलोक फैलेगा। आयोजन की सफलता के लिए स्थानीय सभी शाखायें स्वाध्याय मंडल और समीपवर्ती शाखाएं एक जुट होकर कार्य।

अविस्मरणीय!आराध्य! तीर्थ यात्रा

पटना (बिहार) गायत्री शक्तिपीठ से साइकिल यात्रा प्रारंभ हुई। साथ में ज्ञानरथ-साहित्य वितरण के लिए मेरु कलम-सद्वाक्य लिखने के लिए चित्र और चालीसा प्रज्ञा अभियान का प्रारम्भिक परिचय देने के लिए सर्व श्री कृष्णदेव नारायण सिन्हा, हरदेवच मिश्र, रणधीर सिंह, महावीर सिंह, विनोद कुमार रघुनाथ प्रसाद, नागेन्द्र प्रसाद, परमानन्द प्रसाद प्रधान वीरेन्द्र कुमार वाल्मीकि प्रसाद, नागेश्वर प्रसाद तथा गोविन्द शेखर शंकर ने कंकड़ बाग कालोनी से चलकर कच्ची दरगाह तक दूसरे दिन फतुहा तक की यात्रा सम्पन्न की।

मार्ग में स्थान स्थान पर लघु सभायें आयोजित कर युग निर्माण का परिचय दिया और प्रचार सामग्री वितरित की गई। इस प्रचार यात्रा का ही प्रतिफल था विराट शतकुँडी आयोजन जिसे आज भी लोग भूल नहीं पा रहे। ऐसी तीर्थ यात्रायें और भी चलाने की योजना है।

आय से मिलकर स्वर्ग मिल गया

अर्जुन पोखरी (उ0प्र0) श्री भरतलाल केशरवानी का जन्म दिन संस्कार युग-निर्माण योजना पद्धति से श्री ग्यासीराम पुनियाने सम्पन्न कराया। प्रायः डेढ़ घंटे चले इस संस्कार को देखने के लिए श्री केशरवानी के मित्रों संबंधियों सहित प्रायः एक सौ पचास लोग उपस्थित थे श्री पुनिया को विदा करते समय श्री केशरवानी जी भव विभोर हो उठे “ आप क्या मिल स्वर्ग मिल गया’ उनके इन उद्गारों में उपस्थित जनों की सहमति झाँक रही थी।

श्री पुनियाँ नियमित झोला पुस्तकालय चलाते हैं। एक दिन श्री शरवनी ने मिशन का परिचय पूछा तो श्री पुनियाने उनकी जन्म तिथि पूछी और स्वयं कराने की सहमति ले ली। नियत तिथि पर संपन्न हुआ जन्म दिन संस्कार बड़ा भाव विभोर था उसी में उन्हें मिशन का परिचय मिल गया। अब श्री पुनिया की डायरी में 54 लोगों के जन्म दिन संस्कार कराने के आमंत्रण नोट है।

दीप जले- शंख बजे

बहादुर गंज (उ0प्र0) एक माह में 17 लोगों ने शराब छोड़ी तीन ने अफीम, बीस ने बीड़ी सिगरेट, 5 महिलाओं ने गृह कलह या बच्चों पर क्रोध न करने की भी शपथ ली साथ में एक अच्छाई ग्रहण करने की प्रतिज्ञा के अंतर्गत ईमानदारी सरकारी काम काज में निष्ठा बच्चों के दहेज रहित आदर्श विवाह तथा प्रौढ़ साक्षरता के संकल्प भी लिये गये। हृदय परिवर्तन का यह शंखनाद दीपयज्ञ आन्दोलन ने फूँका है। जुलाई उत्तर प्रदेश सम्मेलन में संकल्प होने के बाद वापस आते ही स्थानीय शाखा के कर्मठ कार्यकर्ता श्री हरीलाल शास्त्री तथा श्री पंचवटी नन्दन मिश्र ने दीप यज्ञ प्रारंभ किया। यह शृंखला अभूतपूर्व उत्साह के साथ चल पड़ी है।

अब मैं बम्बई जा रहा हूँ

मथुरा (उ0प्र0) श्री टीकाराम शर्मा निष्ठावान युग शिल्पी 1975 से सद्वाक्य लेखन प्रारंभ किया मान्टेसरी स्कूलों तक में सद्वाक्य (स्टीकर्स) लगवाये इससे भी मन न भरा तो अपने दरवाजे पर एक बोर्ड लगवाया उसमें प्रतिदिन स्टीकर्स मान्यता प्राप्त सद्वाक्य और अखण्ड ज्योति के सू. एवं आप्त वचन लिखना प्रारंभ किया।

एक दिन श्री मधुसूदन चतुर्वेदी नाम के एक वयोवृद्ध श्री शर्मा से मिले कहने लगे में आपका वाक्य पढ़ने प्रतिदिन घर से चलकर आता था अब मैं बम्बई जा रहा हूँ एक थैली में पैसे देकर कहा “मुझे प्रतिदिन का सद्वाक्य कार्ड में लिखकर जब तक में जीऊँ भेजते रहना” हाल में ही उनका निधन हुआ उसके पूर्व उन्होंने अपने बच्चे से रजिस्टर भिजवा कर 500 सद्वाक्य लिखा कर मंगवाये वे इसे देव यज्ञ कहा करते थे।

प्राण जायें वरु वचन न जाई

कानपुर (उ0प्र0) गायत्री यज्ञापीठ किदवह नगर के तत्वावधान में कोपेन होगेन डेनमार्क में जन्मे और नार्वे के इंजीनियर श्री माइकेल तथा कोपेन हेगेन की समाज कल्याण अधिकारी जीनेट का पाणिग्रहण संस्कार गायत्री परिवार पद्धति से सम्पन्न हुआ। विवाह कार्य श्री हरी प्रसाद शुक्ल संवाददाता और हजारों लोगों की भीड़ इसे देखने को उमड़ पड़ी।

श्री माइकेल ने बताया वे डेनमार्क से ही पूज्य गुरुदेव का साहित्य पढ़ रहे है। भारतीय विवाह पद्धति से प्रभावित होकर उन्होंने यही आकर विवाह कराने का निश्चय किया था, उन्होंने कहा हमने इस अवसर पर जो प्रतिज्ञायें की है उन्हें आजीवन निबाहेंगे। नवविवाहित जीनेट विवाह के आदर्शों और शिक्षण से भाव विभोर हो उठी। विवाह से पूर्व माइकल का यज्ञोपवीत संस्कार भी सम्पन्न हुआ।

साइकिलों द्वारा सार्थक तीर्थयात्रा

जहाँगीराबाद (बुलन्दशहर) अशोक गर्ग और उनके सहयोगियों ने जन -जागरण हेतु अपने पूरे क्षेत्र की साइकिल यात्री सम्मान की उसकी यहाँ भारी सराहना की जा रही है। टोली जहाँ रुकती है वहाँ रात्रि प्रवचन करती है और जाति-पाँति ऊंच-नीच वर्गभेद आदि बुराइयों के उन्मूलन स्वच्छता, वृक्षारोपण, शिक्षा संवर्धन आदि समाज को ऊपर उठाने वाले कार्यक्रमों के विस्तार की प्रेरणा भरती है अगले दिन यज्ञ साक्षी में बुराइयां छोड़ने और अच्छाइयाँ ग्रहण करने के संकल्प कराये जाते हैं जिससे जनजीवन में आश्चर्यजनक सुधार के दृश्य दिखाई देने लगे है।

हम तो धन्य हो गये

बड़ौदा गुजरात शतकुंडी यज्ञ और राष्ट्रीय एकता सम्मेलन जिले की सभी शाखाओं के सहयोग से सम्पन्न हुआ। अनेक गणमान्य व्यक्ति भी सम्मिलित हुये।

डॉ0 के0 सौ0 परमार के नेतृत्व में अपने परम्परागत वेषभूषा में नृत्य गान करते हुये आने वाला प्रायः 550 आदिवासी भाइयों का समुदाय इस आयोजन का विशिष्ट आकर्षण था 3 जोड़ों के आदर्श विवाह भी हुये थे और सैन सब ने कभी नशा न करने का संकल्प लिया था आदिवासियों की अभिव्यक्ति थी हम तो धन्य हो गये। हम लोगों की प्रेरणा से अब उनका सजातीय समुदाय भी बड़ी संख्या में नशे छोड़ रहा है व साक्षरता की और बढ़ रहा है।

दहेज विरोध अभियान

मझवारा। गायत्री शक्तिपीठ के संचालक श्री रामावतार दुबे तथा उनके सहयोगियों द्वारा दहेज रहित आदर्श विवाहों का संकल्प अभियान बहुत सफलता प्राप्त कर रहा है। अब तर्क विभिन्न परिवारों के 10 मुखिया या विवाह योग्य नवयुवक प्रतिज्ञा पत्र भर चुके है।

श्री दुबे और उनके साथियों ने विवाह संबंधी ट्रैक्ट और पुस्तकें घर-घर पढ़ाने और दहेज की बुराई मिटाने की चर्चा का कम प्रारंभ किया अनेक लोग इस बुराई से पीड़ित तो पहले से ही थे अब पहल करने वाले मिल गये तो सब को आशा का सम्बल मिला। संकल्प कर्ताओं को अपने बाल-बालिकाओं के विवाह शान्ति कुँज में कराने का आग्रह किया जा रहा है।


अपनों से अपनी बात

गत वर्ष राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों सहित शतकुँडी गायत्री महायज्ञों का देशव्यापी आयोजन था उसका अधिकाँश भाग पूरा हो गया जो शेष है वह इस वर्ष पूरा होना जाना निश्चित है इन आयोजनों में सम्मिलित होने वालों ने साम्प्रदायिक क्षेत्रीय भाषापाल, जातिगत, लिंगागत विलगाव को निरस्त करने की अग्निदेव की साक्षी में प्रतिज्ञा की और उसे आजीवन निर्वाह के लिए भावनापूर्वक प्रतिज्ञा ली। यह यज्ञ आयोजन जहाँ वातावरण वायुमण्डल में परिशोधन का प्रयोजन पूरा करते रहे वही उन्होंने अनेकता में एकता उत्पन्न करने की भी महती भूमिका निबाही। न्यूनतम खर्च में इतने विशालकाय धर्मानुष्ठान और किसी प्रकार संभव नहीं थे। जितनी मितव्ययिता पूर्वक इन्हें सम्पन्न किया गया और महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए कारगर कदम उठाया गया। इतनी बड़ी उपस्थिति इतनी विचार प्रेरणायें इतनी प्रतिज्ञायें देखते हुये इन आयोजनों को अपने ढंग का अनोखा एवं अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।

नये वर्ष का दीप यज्ञ कार्यक्रम

आषाढ़ी पूर्णिमा गुरु-पूर्णिमा से अपना साधना वर्ष प्रारंभ होता है इसके लिए जो कार्यक्रम निर्धारित किया गया है, उसे व्यक्ति निर्माण एवं परिवार निर्माण की सम्मिलित योजना कहा जा सकता है। गत वर्ष के आयोजन सामूहिक थे इसलिये उनमें बड़ी संख्या को उपस्थिति के प्रयत्न किये गये। चालू वर्ष के छोटे आयोजनों को परिवार गोष्ठियाँ कहना चाहिए। इनकी प्रत्यक्ष रूप रेखा नितान्त सरल है, उनमें समय, साधन, व्यवस्था आदि की दृष्टि से नितान्त सरलता रखी गयी है, ताकि इस माध्यम से व्यापक जनसंपर्क जन जागरण लोक शिक्षण पूरा हो सके। परिवार निर्माण की महती आवश्यकता को पूरा किया जा सकें। इन्हें हर प्रज्ञा परिजन को अपने यहाँ करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है इस परम्परा को भविष्य के लिए स्थित परम्परा का रूप जो दिया जाना है।

अब तक जन्म दिन मनाये जाने की परम्परा चलती रही है। उसके लिए जन्म दिन आने की प्रतिज्ञा की जाती थी अब यह झंझट न रहेगा। हर परिवार में एक-एक दिन का यह आयोजन चलता रहे, इस दृष्टि से अपने-अपने संपर्क क्षेत्र में सभी लोग तारीखों के निर्धारित क्रम के हिसाब से योजना बनायेंगे। इस प्रकार अपने यहाँ जितने परिवार होगे उन सभी को बारी बारी से अपने यहाँ घरों में यह उपक्रम सम्पन्न करने का अवसर मिल जायेगा।

परिवार गोष्ठी पारीक्रम के अनुरूप जिस दिन उपयुक्त बैठती हो उसी दिन का पूर्व निश्चय कर लिया जाय। समय प्रातः काल का अधिक उपयुक्त बैठता है।

क्योंकि उस समय प्रायः सभी लोग घरों पर रहते हैं। अपने परिवार के अतिरिक्त पड़ोसियों, मित्रों परिचितों को भी आमंत्रित करना चाहिए ताकि इस प्रेरणा पर्व का लाभ वे सब भी उठा सके और उसका अनुकरण अपने यहाँ भी कर सकें।

क्रम

कलश एवं थाली स्थापित करें। सिंचन पवित्रीकरण करें। कलश में सर्वदेव नमस्कार करके पंचोपचार पूजन करें। स्वस्तिवाचन सबको पुष्प देकर कराये। पुष्पादि एकत्रित करके चढ़ाये सबको चन्दन रोली तिलक लगावे। दीप अगरबत्ती प्रज्वलित करते हुए मंत्रोच्चार करें। 24 मंत्र पूरे होने पर थाली घुमाये आरती ले अगरबत्ती की भस्म धारण करें सब शीत प्रवचन, संकल्प का क्रम चलाये। अन्त में सूर्यार्घ दान करें, तत्पश्चात सौंफ, धनिया आदि देकर एकत्रित परिजनों को विदा करें।

क्रिया कृत्य सीधा सादा सा है। उसे दीपयज्ञ का नाम दिया गया है एक थाली चौक पूरा जाय। उसमें पाँच-पाँच अगरबत्तियों की पाँच जुगली सजायी जाये। पाँच दीप जलाये जाये। साधन सामग्री इतनी भर जुटाने से प्रयोजन पूरा हो जाता है। उपस्थित लोग मिलकर 24 बार गायत्री मंत्र का उच्चारण करें। जल कलश देव पूजन तथा सूर्यार्घ दान के लिए अलग से सुसज्जित रख लिया जाय। सभी उपस्थित लोगों के मस्तक पर चंदन रोली का तिलक लगाया जाय।

उपरोक्त कृत्य से यज्ञ कार्य सम्पन्न समझा जा सकता है। अभी दो पक्ष और शेष रहे। एक संगीत प्रवचन दूसरा देव दक्षिणा। संगीत प्रवचन के रूप में आधा घंटे का माताजी तथा देवकन्याओं का संगीत टेप कर दिया गया है आधे घंटे का पु0 गुरुदेव का इस योजना का महत्व समझाने तथा स्वरूप बताने वाला प्रवचन है। एक-एक घंटे के प्रवचन टेप कर दिये गये हैं। इसके रहते गायकों, वक्ताओं की आवश्यकता नहीं रह जाती। आनन्द उतना ही आता है वरन् उससे भी अधिक क्योंकि साधारण गायन प्रवचन में वक्ता की जीभ भर काम करती है। इस टेप में वैखरी, मध्यमा, परा, पश्यन्ती चारों वाणियों का प्रयोग हुआ है इसलिए उनका प्रभाव भी उसी अनुपात में अत्यधिक होना चाहिए।

टेप शान्ति कुंज में उपलब्ध है टेप रिकार्डर किसी उकरमना से माँगकर भी काम चलाया जा सकता है जिनकी सामर्थ्य हो वे लोग लगभग 400 रु0 खर्च करके अपना निजी टेप रिकार्डर भी काम में लाते रह सकते हैं इससे भी अधिक बन पड़े तो उसी परिवार में रात्रि के समय एक घंटे का स्लाइड प्रोजेक्टर भी दिखाया सुनाया जा सकता है इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि आयोजन हर दृष्टि से अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया सम्पन्न करने में समर्थ हो गया।

तीसरा पक्ष है देव दक्षिणा का दीप यज्ञ में भी देवशक्तियाँ आमंत्रित एवं उपस्थित रहती है। क्योंकि स्वस्ति वाचन, कलश पूजन के मंत्रों से उन्हें भी आहूत किया जाता है अब यह आवश्यकता रह जाती है कि जिन्हें आमंत्रित किया गया है उन्हें कुछ उपहार भी देकर भेजा जाय इसी को देव दक्षिणा कहते हैं।

इस प्रथम वर्ष के लिए चार देव दक्षिणायें निर्धारित की गई है। अगले वर्षों में आवश्यकतानुसार उनमें परिवर्तन भी होता रहेगा। चार देव दक्षिणाओं में प्रथम है 1- नशे बाजी का त्याग 2- बिना दहेज जेवर की नितान्त सादी शादियां 3- प्रौढ़ शिक्षा का विस्तार 4- हरीतिमा अभियान। इन चारों में से कम से कम एक प्रतिज्ञा तो करनी ही चाहिए और उसे कापी साइज के सादे कागज पर अपने पूरे पते सहित लिखकर शाँतिकुँज हरिद्वार के पते पर स्थायी सम्पदा की तरह सुरक्षित रखे जाने की तरह भेजना चाहिए।

नशेबाजी शरीर की जीवनी शक्ति, मस्तिष्क की दूरदर्शिता नष्ट करती है। परिवार में बुरी परम्परा डालती है आर्थिक दृष्टि से यह बहुत व्यय साम्य है। कृत की बीमारी की तरह एक से दूसरे में फैलती है नशे बाज का व्यक्तित्व घटिया बनता है और समाज में से उसकी प्रतिष्ठा एवं प्रमाणिकता दिन-दिन घटती चली जाती है हानियाँ अनेक है लाभ कुछ नहीं इन बातों पर विचार करते हुए जो कोई नशा पीते हैं उन्हें छोड़ देना चाहिए। जो नहीं पीते हैं उन्हें आगे न पीने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए।

दूसरी प्रतिज्ञा है कि बिना दहेज की, बिना प्रदर्शन की बिना जेवर की सौम्य शादियाँ करना। यह कुरीति निवारण की दिशा में समाज निर्माण की दिशा में क्राँतिकारी कदम है। आमदनी बढ़ा लेने पर भी एक व्यक्ति को अपने गृहस्थ जीवन में चार पाँच शादियाँ करनी पड़ती है। इनमें इतना धन व्यय हो जाता है कि उसकी पूर्ति गरीब,ऋणी रहकर या बेईमान बनकर ही पूरी करनी पड़ती है यदि यह राशि सुरक्षित रहे तो उसके सहारे कोई भी परिवार अपने को सम्पन्न, सुसंस्कृत, समुन्नत बना सकता है खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती है इस तथ्य को समझते हुये हमें साहसपूर्वक यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि खर्चीली शादियाँ नहीं करेंगे कहीं होती होगी तो उसमें सम्मिलित नहीं होंगे। विवाह योग्य लड़की लड़कों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वे दहेज व जेवर वाली धूमधाम की शादियाँ स्वीकार नहीं करेंगे भले ही उन्हें अविवाहित रहना पड़े।

यह एक साहस भरा कदम है रूढ़िवादी प्रतिगामी लोग अवश्य ही इसमें अड़ंगे अटकायेगें। उपहास करेंगे सम्मिलित तो होगे ही नहीं। इन सबसे जूझना हर किसी का काम नहीं है इसलिये सरलता इसमें है कि पाँच व्यक्ति कन्या पक्ष के और पाँच व्यक्ति वर पक्ष के लड़की लड़के को लेकर शाँतिकुँज हरिद्वार चले आये। यहाँ सब प्रकार की सुविधायें उपलब्ध है बिना किसी खर्च के शादियाँ हो जाती है इस सुविधा से लाभ उठाया जाय। घर लोकर संबंधियों को प्रीतिभोज करा दिया जाय। जो राशि दहेज में देनी है जेवर में लगानी है वह एकत्रित करके स्त्री धन के रूप में कन्या के नाम “फिक्स डिपोजिट” में जमा करा दिया जाय जो हर पाँच वर्ष बाद दूना होता रहे और आड़े वक्त में काम आये। इस संबंध में उपजातियों का बंधन तोड़ने की भी आवश्यकता है जाति की सीमा ही पर्याप्त मान ली जाय। उपजातियों को अनुबन्ध स्वीकार न किया जाय। यदि लड़की बड़ी हो गयी हो और वयस्क हुआ वर एक दो वर्ष छोटा है तो उसका भी विचार न किया जाय। तीर्थ स्थान में हुये विवाह हर दृष्टि से शुभ होते हैं शाँति कुँज में हुये विवाहों का अब तक का इतिहास यह रहा है कि वे हर दृष्टि से शुभ हुये हैं फले फूले है।

देव दक्षिणा का तीसरा पक्ष है प्रौढ़ शिक्षा अपने देश में वे निवाई अनपढ़ है। वे वयस्क हो गये है और काम धंधे में लग गये हैं समाज का संचालन इसी वर्ग के हाथ है इसे अनपढ़ नहीं छोड़ जा सकता। सरकार बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था भर कर पाती है वह प्रौढ़ों को भी शिक्षित बना देगी यह आशा नहीं करनी चाहिए। शिक्षितों को शिक्षा ऋण चुकाने की प्रेरणा देनी चाहिए। उनमें समयदान लेकर अध्यापन कार्य में लगाना चाहिए। निजी प से एक व्यक्ति कम से कम पाँच अशिक्षितों को तो साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा में हो सकता है उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है इसके अतिरिक्त मुहल्ले-मुहल्ले गाँव-गाँव प्रौढ़ पाठशालायें चल सकें तो उन्हें चलाने का भी पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए।

स्कूली बच्चों के लिए इनके बचे हुये समय में “बाल संस्कार शालाएं” चलायी जाय जिसमें वे कक्षा का दिया हुआ पाठ भी करें और स्काउटिंग जैसे सुसंस्कारी कार्यक्रमों में भी भाग ले।

चौथा संकल्प हरीतिमा वर्धन का है कुछ न बने तो घर में पुष्पवाटिका, शाक वाटिका तुलसी आरोपण जैसे सुगम संकल्प तो किये ही जा सकते हैं।

एक उत्साही व्यक्ति यदि सच्चे मन से उपरोक्त समाज निर्माण के कार्यक्रम में जुट पड़े तो अपने बलबूते परिवार गोष्ठियों की शृंखला चलाता रह सकता है। घर-घर नवयुग का अलग जगा सकता है देव दक्षिणा के चारों पक्ष पूरे करता रह सकता है नशेबाजी खर्चीली शादियाँ छोड़ने और प्रौढ़ शिक्षा तथा वृक्षारोपण का प्रचलन करने में इसे आशातीत सफलता मिलती रह सकती है। अकेला सूर्य अकेला चन्द्रमा आकाश को प्रकाशवान बनाये रहते हैं। एक युग शिल्पी अपने निजी कामों को करते हुए अपने संपर्क क्षेत्र में यह सभी रचनात्मक कार्यक्रम गति शील कर सकता है। इस वर्ष शुभ प्रचलन को व्यवहार से उतारने के लिए प्रत्येक प्राणवान को इस हेतु आगे कदम बढ़ाना चाहिए। नियमित समय दान देना चाहिए।

समाज निर्माण के निर्गमन चल रहे राष्ट्रीय एकता सम्मेलन एवं शतकुण्डीय गायत्री यज्ञों की शृंखला भी गत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी चलाती रहेगी इसके साथ ही “दीप यज्ञ” आन्दोलन के अंतर्गत परिवार गोष्ठियों का भी क्रम चलाना चाहिए। वे एक घंटे में ही संभव हो जाते हैं प्रातः काल उन्हें दो घरों में सम्पन्न किया जा सकता है। उन्हीं दो घरों में स्लाइड प्रोजेक्टर भी दिखाये जा सकते हैं। इसमें देखने सुनने वालों को युग चेतना का प्रकाश मिलता है और दिखने सुनाने वाले को वृकत्तव करना का अभ्यास करने का अवसर मिलता है। इस दुहरे लाभ को छोड़ा नहीं जाना चाहिए।

पिछले दिनों झोला पुस्तकालय और दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन का क्रम चलाता रहा है उसे भी और भी अधिक उत्साहपूर्वक इस वर्ष चलाना चाहिए। दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने के लिए स्टेशिल बना दिये गये हैं जिसके सहारे मिनटों में सुन्दर अक्षरों में वाक्य लिखे जा सकते हैं।

उपरोक्त सभी आन्दोलनों की सामग्री प्रायः एक हजार रुपये में नये सिरे से बन जाती है जिनके पास उपरोक्त वस्तुओं में से कुछ साधन जुटे है उन्हें उतना ही पैसा कम खर्च करना पड़ेगा प्रज्ञा पुत्रों में से प्रत्येक को इस वर्ष उपरोक्त योजना को हाथ में लेना ही चाहिए और अपने क्षेत्र को नव जागृत से आलोकित करने का व्रत लेकर इसे पूरा करना ही चाहिए।


मातृ वन्दना


नये साज-स्वर (Kavita)

नये साज-स्वर, सजा रही माँ। विवेक वीणा, बजा रही माँ।

प्रणव-नादिनी, जगी ऋचायें वरद भुजायें, उठा रही माँ।

अगाध रस के अनादि निर्झर अबाध गति से बहा रही माँ

दुलार देकर सँवारने को उठो! प्यार से बुला रही माँ।

अनन्त जन्मों की चिर प्रतीक्षा भरे नयन में जगा रही माँ

अमृत सुतों को सुधा के प्याले बुला बुला के पिला रही माँ।

अशेष, पुण्यों का पर्व आया। मरे हुओं को जिला रही माँ

प्रणव नादिनी सुना ऋचायें वरद भुजायें उठा रही माँ

नये साज स्वर सजा रही माँ विवेक वीणा बजा रही माँ।

लाखन सिंह भदौरिया

*समाप्त*