साधक का आहार सात्विक हो

कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका के बाल्टीमोर शहर के एक स्कूल में पढ़ने वाले 52 छात्रों पर एक विशिष्ट औषधि का प्रयोग किया गया। यह गोलियाँ उन्हें करीब एक माह तक सेवन कराई गयी। इस प्रयोग का उद्देश्य यह जानना था कि इन औषधियों के सेवन से क्या वास्तव में मंद बुद्धि को प्रखर या तीव्र बनाया जा सकता है? औषधियों का निर्माण भी इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया था। नियत अवधि तक सेवन कराने के बाद जब विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ा है? यह जाँचा गया तो पता चला कि इस अवधि में इन स्मार्ट पिल्स के सेवन से उनकी मस्तिष्कीय क्षमता पहले की अपेक्षा काफी बढ़ गयी है।

मिशिगन यूनिवर्सिटी की जीव शास्त्री बर्नार्ड एब्रागोफ ने अपने प्रयोगों की परिधि में मछलियों और अन्य प्राणियों को भी रखा। इन प्रयोगों में भी आशाजनक सफलता मिली और न केवल इन प्राणियों को चतुर बनाया जा सका वन औषधियों के प्रयोग द्वारा उनकी स्मरण शक्ति को भी कम कर दिया गया। पिछले दिनों हुई वैज्ञानिक शोधों से सक निष्कर्ष सामने आया है कि “थोरामाइटिन नामक प्रोटीन की मात्रा को यदि आहार में घटाया-बढ़ाया जाये तो उससे मस्तिष्क की क्षमता भी घट-बढ़ सकती है। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के मनःशास्त्री रिचार्ड थाम्पसन ने दस वर्ष तक लगातार शोध करने के बाद यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया कि बुद्धि दैवी वरदान नहीं है, उसे मानवीय प्रयत्नों से घटाया-बढ़ाया जा सकता है। इन प्रयोगों में उन्होंने कुत्तों, बिल्लियों, बन्दरों और चूहों पर जा प्रयोग किये उनसे यह निष्कर्ष सामने आये कि जिस प्रकार किसी मशीन का कार्य क्षमता को थोड़ा बहुत सुधार कर इच्छानुसार कम ज्यादा किया जा सकता है, उसी प्रकार हर स्तर की मस्तिष्कीय क्षमता में भी परिवर्तन किया जा सकता है।

प्रो. जेम्स मैकाँनेल ने तो अपने प्रयोगों में यहाँ तक सफलता प्राप्त कर ली कि एक व्यक्ति की स्मृतियाँ और अनुभव जो केवल उसी तक सीमित हों और उसने किसी को भी इनके बारे में नहीं बताया हो। इन प्रयोगों द्वारा दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क में ठीक उसी प्रकार पहुँचाये या डाले जा सकेंगे जैसे कि ये स्मृतियाँ और अनुभव इस व्यक्ति के अपने स्वयं के अनुभूत हों। प्रो. मैकाँनेल का कहना है कि दशाब्दियों पूर्व यह समझा जाता था कि एक मनुष्य का रक्त उसके अलावा दूसरे किसी व्यक्ति के कुछ काम का नहीं है। किन्तु अब यह बात हास्यास्पद लगती है क्योंकि जब चिकित्सा विज्ञान बड़ी सफलता से एक प्राणी का रक्त दूसरे प्राणी के शरीर में पहुँचा देता है, यही नहीं टूटे-फूटे अवयवों के स्थान पर दूसरों के स्वस्थ अवयवों का भी आरोपण सरल हो गया है। उसी प्रकार यह भी संभव है कि मस्तिष्क की कोशिकाओं को अदल बदल कर दो भिन्न स्तर के प्राणियों में बौद्धिक क्षमता का आदान-प्रदान किया जा सके।

वे सारे प्रयोग मस्तिष्क पर पड़ने वाले खाद्य पदार्थों के प्रभाव पर आधारित हैं। अब तक शरीर पर खाद्य पदार्थों के पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर आहार शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया। किन्तु अब खाद्य पदार्थों के मस्तिष्क पर प्रभाव की बात को भी स्वीकार किया जा रहा है और ऐसे रासायनिक द्रव्यों की खोज की जा रही है जिससे बुद्धि की मन्दता, अकुशलता और मानसिक विकृतियों को भी चिकित्सा की जा सके। इस चिकित्सा पद्धति का ढाँचा शरीर चिकित्सा को वर्तमान विस्तार से बढ़ा-चढ़ा बना सकेगा और जन साधारण को मानसिक दुर्बलता तथा रुग्णता से भी बचाया जा सकेगा। इस सफलता के लिए पदार्थों की सूक्ष्म शक्ति को खोजा जा रहा है और उसके उपयोग का प्रयत्न किया जा रहा है। तनाव, अशान्ति, चिन्ता आदि भावनात्मक विक्षोभों के कारण नींद न आने की शिकायत होने पर नींद लाने वाली दवाएँ “ट्रेंक्कुलाइजर” औषधियों के प्रयोग की बात तो सर्व विज्ञात है। यह औषधियों को मस्तिष्क पर प्रभाव ही होता है, जो खाद्य पदार्थों की सूक्ष्म शक्ति से उद्भूत होता है। इस सूक्ष्म शक्ति को अन्याय मस्तिष्कीय प्रयोजनों और विकास के उद्देश्यों में प्रयोग की बात इन दिनों चल रही है। स्पष्ट ही यह सूक्ष्म शक्ति, शरीर पोषण करने वाली स्थूल शक्ति से भिन्न है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि कोई आवश्यक नहीं है कि जो खाद्य शरीर के लिये जितना उपयोगी है वह मस्तिष्क के लिये भी उतना ही उपयोगी हो।

भारतीय मनीषियों ने आहार की इस सूक्ष्म शक्ति के अतिरिक्त उसकी कारण शक्ति को भी पहचाना और माना है। यह कारण शक्ति आहार की स्थूल और सूक्ष्म शक्ति से ऊपर है। शरीर के तीन कलेवरों की भाँति प्रत्येक पदार्थ, प्रत्येक तत्व के भी तीन स्तर हैं जिन्हें स्थूल, सूक्ष्म और कारण कहा जाता है। यहाँ चर्चा मानवी सत्ता और आहार की कि जा रही है अतः इतना भर जानना पर्याप्त होगा कि शरीर के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप की अपेक्षा कारण स्वरूप अधिक महत्वपूर्ण है। इस स्तर को भावना क्षेत्र भी कह सकते हैं। इसी के आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव को दिशा मिलती है और समूचे व्यक्तित्व का निर्माण होता है। शरीर से बलवान और मस्तिष्क से बुद्धिमान होते हुये भी कोई व्यक्ति भावना स्तर पर गया-गुजरा हो सकता है तथा निकृष्ट कोटि का भ्रष्ट एवं दुष्ट जीवन जी रहा हो सकता है। ऐसे लोग अपने दोष दुर्गुणों के कारण पग-पग पर ठोकरें खाते है और प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी नितान्त असफल जीवन जी कर रोते कलपते संसार से विदा होते हैं। इसके विपरीत भावना स्तर परिष्कृत होने पर शारीरिक बौद्धिक और आर्थिक दुर्बलताएँ रहते हुए भी भावना के प्रखरता के कारण कई व्यक्ति ऐतिहासिक महामानवों की पंक्ति में जा बैठते है ओर संसार उनके चरणों पर मस्तक झुकाता है। यह कारण शक्ति का ही प्रताप है। जिससे शारीरिक और मानसिक क्षमताएँ मिलस देने पर व्यक्तित्व की क्षमता हजारों लाखों गुना महिमावान बन जाती है। भारतीय मनीषियों ने इस शक्ति के विकास में आहार को बहुत अधिक महत्व दिया था।

सर्वविदित है कि आहार की कारण शक्ति का उपयोग करने के लिए पिप्पलाद ऋषि केवल पीपल के फल खाकर ही निर्वाह करते थे। औदुम्बर ऋषि का यह नाम केवल इसी कारण पड़ा था कि गूलर खाकर शरीर का निर्वाह करते थे। मौहाल ऋषि का आहार केवल मूँग थी। यह खाद्य पदार्थ भी नियंत्रित क्रम द्वारा विशिष्ट शक्ति से सम्पन्न किए जाते थे।

प्राचीन मनीषियों ने आत्मोत्कर्ष की साधना में आहार की कारण शक्ति को आत्मसात करके अंतःकरण को विकसित करने का विशेष विधान विज्ञान सम्मत आधार पर विनिर्मित किया है। मनीषियों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि यदि इस ओर उपेक्षा बरती गई तो आत्मबल संवर्धन के लिए की जाने वाली साधनाओं में सफलता प्राप्त होना संदिग्ध है। यदि सफलता मिली भी तो वह यत्किंचित हो होगी। वस्तुतः आत्मबल का अभिवर्धन ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। यदि वह पूँजी वह अभीष्ट मात्रा में मनुष्य के पास हो तो वह शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और लौकिक दृष्टि से ही नहीं आत्मिक दृष्टि से भी सफल सिद्ध होता है। इस संदर्भ में आहार की कारण शक्ति, सतोगुणी विशेषता का उपयोग होना चाहिए।

विज्ञान अभी आहार की स्थूल और सूक्ष्म शक्ति को ही जान पहचान पाया है। पर अध्यात्म उसकी कारण शक्ति का हजारों वर्ष पहले पता लगा चुका है और वह इस बात पर बार-बार जोर देता है कि अंतःकरण को परिष्कृत करने के लिये

सात्विक आहार ही अपनाया जाना चाहिए ओर उसकी कारण शक्ति को भावनाओं का सम्पुट देकर आत्म चेतना को सुविकसित करने में अधिक उपयोगी बनाना चाहिए।*


Quotation

दैवी ज्ञान हुये बिना मनुष्य को अपनी कीमत नहीं मालूम होती और इसलिए अपने विषय में वह औरों से जानना चाहता है। जबकि अपने सम्बन्ध में वह अपनी आत्मा से विश्वस्त, किन्तु दृढ़तापूर्वक जानकारी कर सकता है। साँसारिक दृश्य पर देव मोहित नहीं होते क्योंकि निरन्तर अंतर दृष्टि रखने के कारण उन्हें अपने भीतर ही उससे अधिक महत्वपूर्ण चीजें मिल जाती हैं।

-महर्षि रमण


सद्बुद्धि की अवधारणा

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सद्बुद्धि का विकास किये बिना मानव जाति का उद्धार नहीं। मनुष्य की नियति यह है कि वह अपने को दूरदर्शी विवेकशीलता के साथ जोड़े शालीनता अपनाये और सज्जनों का तरह जिये।

दुराग्रह और पक्षपात मनुष्य को उद्दंड बनाते हैं। अहंकारी अपने ही चिन्तन और कर्तव्य को सबसे ऊंचा और बढ़कर मानता है। उसे यह स्वीकार नहीं कि अपनी मान्यताओं और आकाँक्षाओं का औचित्य की कसौटी पर कसे और यह देखे कि वे न्यायसंगत हैं या नहीं। जो चाहा सो कर गुजरना मनुष्य के अन्दर काम करती पशु प्रवृत्ति है। मनुष्य को यह सोचना होता है कि वह जो जानता, मानता हैं, चाहता और कहता है वह सार्वजनिक हित में हैं या नहीं? धर्म और कर्तव्य उसे करने की छूट देते हैं या नहीं?

बुद्धि की महिमा है और चतुरता की भी; किन्तु सबसे बड़ी बात है विवेकशील न्याय निष्ठा। हम अपने साथ न्याय करें और दूसरों के साथ भी। पर यह बन तभी पड़ेगा जब सद्बुद्धि की अवधारणा हो। हम आग्रह छोड़े और सत्य को अपनायें।

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लानत है ऐसी दौलत पर

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एक बार लक्ष्मी पृथ्वी पर आई। उन्होंने समीपवर्ती क्षेत्रों के लोगों को बुलाया और कहा,”मैं लक्ष्मी हूँ। तुम लोगों में से जिसे जैसा माँगना हो माँग लो” वरदान किस दिन मिलेगा, इसकी जानकारी भी दे दी गई। समय इसलिए दिया गया कि सूचना अधिक लोगों को मिल सके। वे समय रहते पहुँच सके’और अभीष्ट लाभ उठा सकें।

उस क्षेत्र में सब लोग कृषि का व्यवसाय करते थे। धरती को भी यह समाचार मिला। उसने अपने सभी कृषक पुत्रों को एकत्र कर समझाया कि तुम मुफ्त की दौलत पाने के फेर में न पड़ो। पूरा परिश्रम करते रहो। मैं तुम्हें कोई अभाव न रहने दूँगी।

पर इस परामर्श को किसी ने न माना। सभी विपुल धन बिना परिश्रम किये पाने के लिए आतुर थे। वे रुके नहीं। नियत समय पर लाखों की संख्या में लक्ष्मी जी के सामने उपस्थिति हुए आगंतुक मनमाना धन प्राप्त करते गये। लक्ष्मीजी ने हर माँगने वाले की मुराद पूरी की।

वे एक दिन के लिए आई थीं। उपस्थित लोगों में से जितनों की अभिलाषाएँ पूरी हो सकती थीं वे करके स्वर्ग वापस लौट गई।

विपुल धन पाकर लोग फूले न समाये। वे उस सम्पदा का स्वच्छंद उपभोग करने लगे, अनेक व्यसनों से ग्रस्त हो गये। बिना परिश्रम की सम्पदा का अनैतिक अपव्यय में ही तो उपयोग होता है।

किसानों के प्राप्त धन की कमी थी। वे उसका मन माना उपभोग करने लगे। खेती-बाड़ी करना बन्द कर दिया हल बैल बेच दिये। परिश्रम के झंझट में क्यों पड़ा जाय? सभी को अपने व्यवसाय से अरुचि हो गई। जब हाथ में विपुल दौलत हैं तो मेहनत करने की क्या जरूरत?

सभी ने खेती-बाड़ी बन्द कर दी। अन्न के संचित गोदाम समाप्त होने लग। महँगाई बढ़ने लगी और कुछ ही वर्षों में स्थिति यह आ गई कि महँगाई चरम सीमा पर पहुँच गई। पैसा खर्चने पर भी खाद्य पदार्थ न मिलते। दुर्भिक्ष जैसी स्थिति उत्पन्न हो गईं। दौलत के बक्से भरे पड़े थे पर अनाज नहीं मिल रहा था। भूख-बुझाने के साधन न रहने से लोग भूखे मरने लगे। दुर्बल होकर रोगों से ग्रसित होकर प्राण त्यागने लगे। कुछ ही समय में उस क्षेत्र के अधिकाँश लोग भूखे मर गये। जो बचे वे अच्छी स्थिति वाले क्षेत्र के लिए पलायन कर गये। इलाका खाली हो गया। पशु तो पहले ही मर चुके थे। मनुष्यों से भी क्षेत्र खाली हो गया। दौलत को चोर लूट ले गये।

जन शून्य पृथ्वी ने एक दिन अपने हरे-भरे और सुख चैन वाले क्षेत्र को घूम-घूम कर देखा वह श्मशान जैसा बन गया था सर्वत्र निस्तब्धता संव्याप्त थी।

धरती लक्ष्मी को कोसने लगी। उसी ने आकर मुफ्त की दौलत पाने की लालसा जगाई और मेरे भोले पुत्र परिश्रम भरे कृषि कार्य को छोड़ कर मुफ्त की दौलत के फेर में पड़ गया। उसी का यह प्रतिफल है कि समूचा समुदाय और क्षेत्र बरबाद हो गया।

क्या यह कथा आज की परिस्थितियों में यथारूप लागू नहीं होती? लक्ष्मी की लालसा ने व्यक्ति को उपभोगवादी बना दिया है। जमीन को मुँह माँगे दामों में भवन अट्टालिकाओं के निर्माण हेतु खरीदा जा रहा है। कृषि योग्य जमीन को जनसाधारण पृथ्वी माता की उपेक्षा करके क्रमशः खोता चला जा रहा है। हो सकता है, धरित्री की स्थिति अगले दिनों वही हो।


Quotation

पैसे का आदान प्रदान ही स्नेह सहयोग का निमित्त कारण बना रहा तो पतिव्रता के स्थान पर वेश्या को मान मिलता रहेगा।

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निष्ठा आत्मशक्ति की निर्झरिणी

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त्रिपदा कहीं जाने वाली गायत्री के तीन चरण हैं। उन्हें वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता कहा जाता है। इन्हीं के सहारे मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बन पड़ता हैं। अध्यात्म भाषा में इन्हीं को प्रज्ञा, श्रद्धा और निष्ठा के नाम से जाना जाता है।

प्रज्ञा अर्थात्-दूरदर्शी विवेकशीलता, श्रद्धा अर्थात् आदर्शों के प्रति सघन भाव-संवेदना, निष्ठा अर्थात् उत्कृष्टता की पक्षधर अविचल साहसिकता। इन तीनों का समन्वय ही अन्तरंग क्षेत्र का त्रिवेणी संगम बनता हैं। ऐसा तीर्थराज संगम जिसमें स्थान करके कौए को कोयल और बगुले को हंस बनना संभव है। इसी परिवर्तन को आत्मिक काया-कल्प भी माना गया है। आत्मिक काया-कल्प अर्थात्-नर बानर में देवत्व का उदय अवतरण

प्रज्ञा और श्रद्धा की विवेचना पिछले अंकों में हो चुकी है। निष्ठा पर प्रकाश डालना इन पंक्तियों में समीचीन है।

निष्ठा सामान्यतया निश्चयात्मक बुद्धि को कहते हैं। ऐसी निश्चर्यातक जिसमें संकल्प, साहस और पराक्रम का सुस्थिर समावेश हो, जो प्रलोभनों, आकर्षणों और दबावों से भी अपने स्थान से विचलित न हो। चट्टान की तरह सुदृढ़ और सुनिश्चित बनी रहे। जिसे निरन्तर अपनाये रहने पर भी ऊब या उदासीनता आने न पाये। सरसता,

तन्मयता और तत्परता में किसी प्रकार कमी न आने पाये। ऐसी सुदृढ़ और सुनिश्चित मनःस्थिति को निष्ठा के नाम से जाना जाता है।

देखा गया है कि मानवी मन चंचल स्वभाव का हे। उसकी उपमा बानर वृत्ति से दी जाती रही है। बानर एक जगह नहीं बैठता, इस डाली से उस डाली पर अकारण उचकता, मचकता रहता है। चित्र-विचित्र आकृतियां बनाता रहता है। अकारण निर्रािक हरकतें करता रहता है। न तो एक मुद्रा में रहता है और न एक जगह बैठता है। चंचल प्रकृति की यह सहज प्रतिक्रिया है। मन की स्थिति भी लगभग ऐसी ही मानी गई है। अनगढ़ स्थिति में वह अस्त-व्यस्त कल्पनाएँ करता रहता है। वे कल्पनाएं भी किसी दिशा विशेष की ओर चलती नहीं। हिरन की तरह चौकड़ी भरती रहती है। ऐसी दशा में लम्बे समय तक की जाती रही कल्पनाएँ भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। किसी काम नहीं आती। समय गुजर जाता है। चिन्तन चेतना का एक बड़ा भाग ऐसे ही बरबाद हो जाता है। उस बहुमूल्य शक्ति का प्रतिफल कुछ भी हाथ नहीं लगता। इस प्रकार होती रहने वाली बरबादी को निष्ठा का अभाव ही कहा जा सकता है।

किसी निश्चय पर हर परिस्थिति में जमे रहने की संकल्प शक्ति को निष्ठा कहते हैं। उसके बिना महत्वपूर्ण कार्य तो क्या छोटे और सामान्य कार्य भी पूरे नहीं हो सकते। देर तक एक दिशा अपनाये रहने में ऊब आने लगती है। नवीनता की खोज और चाह रहती है। प्रदर्शनियों में दर्शक एक स्थान पर खड़े नहीं रहते। वे जल्दी-जल्दी इधर से उधर चलते रहते हैं। एक के बाद दूसरी वस्तु देखने को कौतुक पूरा करते है। नवीनता के अवलोकन का मनोरंजन करते है। इसी प्रकार अपने हाथ में लिए कार्यों के बारे में, लिए हुए संकल्पों के बारे में भी अस्थिरता बनी रहती है। चित्त चंचल होता रहता है। नवीनता खोजता रहता है। नये के आकर्षण में पुराने पर से मन उचट जाता है। लम्बे समय तक एक कार्य को करते हुए ऊब आने लगती है और मन कुछ नया जैसा खोजने लगता है। नया न भी मिले तो भी पुराना नीरस लगने लगता है और उसे छोड़ बैठने जैसी उदासी छा जाती है।

उपासना के क्षेत्र में आमतौर से ऐसा होता है। कुछ दिन उत्साह चलता है। नवीनता जैसे-जैसे घटती जाती है, वैसे-वैसे उत्साह में भी कमी आने लगती है। प्रयास घटता है और कुछ समय में वह समाप्त प्रायः हो जाता हैं। एक पकड़ा दूसरा छोड़ा। दूसरा छोड़ा तीसरा पकड़ा, यह सिलसिला चलता रहता है और हाथ में लिये सभी कार्य प्रायः अधूरे रहते और छूटते जाते हैं। मन की चंचल वृत्ति अधिकाँश लोगों से यही कराती रहती है। उनमें स्थिरता और दृढ़ता का अभाव रहता है। फलतः किसी प्रयास को पूरा कर नहीं पाते। पानी में बबूले क्षण-क्षण में उठते और फूटते रहते हैं। ऐसा ही कुछ अस्थिर मति वाले भी करते रहते हैं। समय बीतता चला जाता है। जीवन के दीप का तेल चुक जाता हैं। कोई कहने योग्य सफलता नहीं मिल पाती। बार-बार रास्ता बदलते रहने वाले किसी लक्ष्य तक कहाँ पहुँच पाते है?

इस चंचल वृत्ति और ऊब से छुटकारा पाना आवश्यक है ताकि जिस कार्य पर भी जुटा जाये, जिस भी मान्यता को अपनाया जाये, उस पर स्थित एवं दृढ़ रहा जा सके। इसी आधार पर कार्य प्रणाली चलती और सफलता मिलती है। आदर्शवादी प्रयोजनों पर तो यह बात और भी अधिक लागू होती हैं। क्योंकि उनका लोक-प्रचलन नहीं के बराबर है। कोई विरले ही व्रतशील आदर्शों के जीवन में अपनी निष्ठा लम्बे समय तक बनाये रह पाते है। कारण कि उनके कारण आत्म-संयम बरतना पड़ता है। स्वेच्छाचारी चिन्तन पर लगाम लगानी पड़ती है। लोभ-मोह और अहंकार अपने आकर्षक रूप बना कर प्रलोभनों के सब्ज बाग दिखाते रहते है। अधिकाँश लोग भी उसी प्रकार का आचरण करते दिखाई देते हैं। अनुकरण की सहज वृत्ति भी बहुमत का अनुसरण करने के लिये फुसलाती और धकेलती रहती है। ऐसी दशा में कोई रिले ही अपनी आदर्शवादी रीति-नीति पर स्थिर रह पाते है।

पानी का स्वभाव नीचे ढलान की ओर बहने का है। मनुष्य के लिये भी संचरित्र स्थिर में यही कठिनाई सामने आती है। संचित कुसंस्कार और प्रचलन में कार्यान्वित होते प्रयास अधोगामी बनने के लिये धकेलते हैं और उनसे लोहा ले सकना कठिन पड़ जाता है कई व्यक्ति आदर्शों की दुहाई लेते देखे जाते है। उनके पक्ष में रहते और लिखते भी रहते हैं, पर जब निजी व्यवहार में आदर्शों को अपनाये रहने का सवाल आता है तो लड़खड़ाने लगते है वैसा ही कुछ करने लगते है, जिनसे तात्कालिक स्वार्थों की पूर्ति होती है। ऐसे डाँवाडोल मन में उत्कृष्टता की पक्षधर आदर्शवादिता कहाँ टिक पाती है?

कई बार कठिनाइयाँ भी ऐसी आ जाती है, जिनसे निपटने के लिये अनीति का आश्रय लेने का दबाव पड़ता है। उनका सामना करने के लिये जिस धैर्य, साहस और संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है, वह न जुट पाने पर भी कई बार ऐसा होता है कि डर और घबराहट की स्थिति में अनीति के आगे सिर झुकाना पड़ता है और वह करना होता है, जिसे करने के लिए सामान्यतया सोचा भी नहीं गया था। इस प्रकार पतन के गति में गिरने से बचाने वाली एक ही शक्ति है-निष्ठा आदर्शों पर दृढ़ रहने के लिये निष्ठावान व्यक्ति ही अपने संकल्प के बल पर एकाकी खड़े रह पाते है। व्यवहारकुशल तो अपना लाभ कमाने और झंझटों से बचे रहने में ही अपना लाभ सोचते हैं और बेपेंदी के लोटे की तरह इधर से उधर लुढ़क जाते है।

निष्ठा को ही उच्चस्तरीय आत्मबल मनोबल कहते है। उसमें आदर्शों के प्रति समर्पित रहने का ऐसा संकल्प जुड़ा होता है जो कठिन समय में भी सीना ताने खड़ा रह सके। प्रलोभनों, आकर्षणों और दबावों के आगे न झुकने का व्रत ग्रहण कर चुका हों। जो हर कीमत पर अपनी राह चलने और उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य तक पहुँचने की सुनिश्चित ठान ठान चुका हो। ऐसे ही लोग निष्ठावान कहलाते है।

निष्ठा को जगाने और परिपक्व करने के लिए आदर्शवादी महामानवों के जीवन चरित्र पढ़ना सुनना और उन्हें मस्तिष्क में दृश्य रूप कल्पना चित्र बनाते रहना आवश्यक है। आज वैसे देव-मानव इर्द-गिर्द दीख नहीं पड़ते तो भी उनका सर्वथा अभाव कभी भी नहीं हुआ है। आज भी ऐसे उत्कृष्ट चरित्र और आदर्श क्रिया-कृत्य वाले अनेकों व्यक्ति संसार में हो सकते हैं, पर कठिनाई एक ही है कि उन सबसे अपना परिचय नहीं होता। दूर एवं अविज्ञात होने के कारण संपर्क भी नहीं सध पाता। जिनके साथ संपर्क रहता है उनमें से अधिकाँश लोग चरित्र की दृष्टि से गये-गुजरे होते है। उन्हीं के क्रिया वाले पक्ष सामने रहते और प्रभावित करते रहते है। इन परिस्थितियों में एक ही अवलम्बन हाथ में रह जाता है कि महामानवों के सती-शूरमाओं के आदर्शवादी चरित्र को सुने, समझें, मनन, चिन्तन करे और अपने को उसी ढाँचे में ढालने की योजना बनायें। जीवन की भावी योजना भी उसी स्तर पर बननी चाहिये, जैसे कि सरकारी पंचवर्षीय योजनायें बनती है। रेल एक लाइन पर चलती है तो निश्चित स्टेशनों पर ही ठहरती है और अन्तः में वही रुकती है जहाँ उसका अन्तिम पड़ाव हैं यह नीति सुदृढ़ व्यक्तित्वों वाले मनुष्यों की रहती है। वे संकीर्ण स्वार्थ साधने के लिये कुछ भी करने के लिए आतुर नहीं होते, है, जिसका अनुगमन करते हुए अनेकों श्रेष्ठता के पथ का अनुगमन कर सकें।

समझा यह जाता है कि संकीर्ण स्वार्थपरता अपनाने में लाभ है। उससे तात्कालिक दृष्टि से कुछ हाथ भले ही लग जाये पर अन्त में खाली हाथ रहने और जीवन की बहुमूल्य सम्पदा व्यर्थ कामों में गवाँ देने के कारण पश्चाताप ही हाथ लगता है जबकि देव मानव यशस्वी होते, आत्म सन्तोष पाते असंख्यों की श्रद्धा सहायता अर्जित करते है। पीछे के लिये अपना यश-शरीर छोड़ मरते हैं, जो चिरकाल तक असंख्यों को कल्याणकारी प्रकाश देता रहता है।

आँधी तूफान आते जाते हैं पर सुदृढ़ पर्वत शिखर जहाँ के तहाँ खड़े रहते है। विशालकाय वट वृक्ष भी सर्दी, गर्मी सहते और अपने स्थान पर अडिग खड़े रहते है। निष्ठा में ऐसी ही सामर्थ्य है। वह बहुत सोच−विचार कर किसी महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचती है। जब कोई निश्चय कर लेती है तो उस पर दृढ़तापूर्वक सुस्थिर रहती है। डगमगाने वाले तत्वों के साथ जमकर संघर्ष करती हैं। अनीति के सामने झुकने का नाम नहीं लेती, भले ही उसे दबाव से टूटना ही क्यों न पड़े? उसका हर कदम इस प्रकार रखा जाता है, जिसमें फिसलने की आवश्यकता ही न पड़े।

निष्ठा आत्मा की गहराई से उभरने वाली शक्ति है। वह न तो लड़खड़ाना जानती है न डगमगाना। उसे आदर्श प्राण प्रिय होते है। जिस प्रकार मछली पानी के बिना जीवित नहीं रह सकती, उसी प्रकार नैष्ठिकों को उत्कृष्टता भरे चिन्तन,चरित्र, व्यवहार एवं वातावरण में ही जीवित रहने का अवसर मिलता है। कहते है कि राजहंस मोती चुगते हैं, कीड़े नहीं खाते। उसी प्रकार यह भी निश्चित है कि अध्यात्म मार्ग के पथिक अपनी उपासना, साधना और आराधना के प्रति निष्ठावान ही होकर जीवन-यापन करते है।


आत्म नियन्त्रण भी एकान्त में नहीं (Kahani)

कौत्स उन दिनों महर्षि कण्व के आश्रम में तप कर रहे थे। एक दिन गुरु और शिष्य दोनों जंगल में देर तक काम करते रहें सायंकाल महर्षि ने कौत्स को थोड़ा पहले आश्रम भेज दिया आप कुछ पीछे चले।

कौत्स आश्रम आ रहे थे, तब उन्होंने मार्ग में पड़ी एक सुन्दर स्त्री देखी। स्त्री को चोट लगी थी, वह पीड़ा से कराह रही थी। कौत्स एक क्षण रुके और फिर अपनी राह चलते बने।

पीछे महर्षि कण्व भी उधर से आये और युवती को यों कराहते देखा तो अपने शिष्य पर उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ। युवती को उठाकर वे आश्रम लाये और उसकी चिकित्सा की व्यवस्था कर दी।

कौत्स को बुलाकर उन्होंने पूछा- जब यह स्त्री मार्ग में तुम्हें कष्ट पीड़ित अवस्था में मिली तब तुमने उसे उठाया क्यों नहीं, उसे आश्रम में लाकर सेवा का उचित प्रबन्ध क्यों नहीं किया?

कौत्स ने सिर झुका कर कहा-भगवन्! मुझे सन्देह था कि उस स्त्री के सौंदर्य से कहीं विचलित न हो जाऊँ इसीलिये चुपचाप चला आया।

महर्षि ने गंभीर स्वर में कहा-वत्स! इससे क्या सौंदर्य से विरक्ति हो जायेगी। छिपा हुआ भाव तो कभी भी प्रकट हो सकता है, इसलिये वासनाओं के आकर्षण से बचने के लिये तो यह आवश्यक है कि वैसे वातावरण में रहकर ही आत्म-नियन्त्रण का अभ्यास किया जाये। तैरना सूखे में नहीं सीखा जा सकता, उसी प्रकार आत्म नियन्त्रण भी एकान्त में नहीं हो सकता।

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ऐसी बची द्रौपदी की लाज

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उस दिन प्रातः काल द्रौपदी स्थान के लिए गई नहाते समय उसकी निगाह कुछ दूर पर स्नान करते एक साधु पर पड़ी। उसके शरीर पर लँगोटी मात्र थी। दूसरी लँगोटी बदलने के लिए किनारे पर रखी थी। पर हवा का झोंका आया और वह दूसरी लँगोटी उड़ कर पानी में बह गई।

दुर्भाग्य से भीगी लँगोटी भी पुरानी होने के कारण उसी समय फट गई। लज्जा ढकने में भी अड़चन खड़ी हो गई। प्रकार उगने लगा था। स्थान करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। साधु का असमंजस बढ़ा। वह निर्लज्ज बन कर कैसे खड़ा रहे? उसने कुछ दूर पर उगी एक बड़ी-सी झाड़ी के नीचे अपने को छिपा लिया। जब रात हो जाय तब अंधेरे में अपने स्थान पर जाने का उसका इरादा था।

द्रौपदी ने यह सारा दृश्य देखा। साधु की कठिनाई को समझा। उसने सहायता करने की बात सोची। उसके पास दूसरी धोती न थी साड़ी आधी फाड़ कर अपना शरीर किसी प्रकार ढक लिया और शेष आधी को लेकर उस झाड़ी के समीप पहुँची, जहाँ निर्वस्त्र साधु छिपा हुआ था।

द्रौपदी बोली, “पिताजी आपकी कठिनाई को मैंने समझा है। अपनी आधी साड़ी फाड़ कर लाई हूँ। इससे अपना तन ढकलें और घर चले जाँय। आधी से मेरा भी काम चल गया है।”

साधु की आंखों में आँसू आ गये उसने कपड़े के टुकड़े को ले लिया। लज्जा ढकी और घर चला गया। मन ही मन यह आशीर्वाद भी देता गया। भगवान सदा तुम्हारी लज्जा को ढके रहे।

बात बहुत पुरानी हो गई। द्रौपदी को पाण्डव जुए में हार गये। दुशासन उसे भरी सभा में नंगी करने के लिए उतारू हो गया। द्रौपदी के अपशब्दों का बदला लेने के लिए वही सूझ सूझी थी।

द्रौपदी ने इस विकट संकट में भगवान का पुकारा। भगवान शेष शैया पर सोये थे। नारद ने उन्हें जगाया। कहा “भक्त की पुकार सुनिये। उसकी सहायता का प्रबन्ध कीजिए।”

उनींदी आंखों से भगवान ने कहा,”न मैं किसी की सहायता करता हूँ न हैरानी में डालता हूँ। सभी अपने-अपने कर्मों का फल भोगते है। द्रौपदी का कोई पिछला पुण्य हो तो पता लगाओ। उसके पुण्य होंगे तो बदला मिल जायेगा।”

नारद ने हिसाब बही जाँची, विदित हुआ कि द्रौपदी ने किसी साधु को अपनी आधी साड़ी फाड़ कर दान दी थी। वह टुकड़ा अब ब्याज समेत बढ़ते-बढ़ते एक पूरे गट्ठे जितना हो गया है।

भगवान ने कहा, “हम किसी के पुण्य का प्रतिफल समय पर क्यों नहीं देंगे?” वे गरुड़ पर चढ़ कर वस्त्रों का गट्ठा लिए कौरवों की सभा के समीप पहुँचे। दुशासन वस्त्र खींचता गया। भगवान ऊपर से उसकी पूर्ति करते गये।

खींचने वाला थक गया। वस्त्र बढ़ता रहा। द्रौपदी की लाज बच गई, उसे आधी साड़ी बदले हजारों गज कपड़ा मिल गया।

कर्म के फल ही भगवान की अनुकम्पा अथवा कोप के रूप में सामने आते है।


हिरन का पीछा (Kahani)

एक शिकारी हिरन का पीछा करता आ रहा था। जान बचाने के लिये हिरन अंगूर की लताओं में छिप गया। शिकारी को गया जानकर उसने अंगूर की सारी बेल चर ली, इस पर शिकारी ने उसे देख लिया और मार दिया।

जो आश्रय देने वाले के साथ कृतघ्नता करता है उसकी हिरन जैसी दशा होती है।


उपासना का स्वरूप और प्रतिफल

उपासना अर्थात् “पास बैठना”। भक्त और भगवान के बीच जितने रिश्ते हैं, उनमें यही सब से श्रेष्ठ है। पिता, माता, सहायक, स्वामी आदि में दाता की महिमा का भाव तो है, पर साथ ही भक्त स्वयं को दीन, दरिद्र, याचक, क्षुद्र असहाय जैसा मानता प्रतीत होता है। भगवान की महत्ता तो स्वयमेव है। उसका वर्णन आवश्यक नहीं। ऐसी सम्भावना भी नहीं है कि चारणों द्वारा अपनी महिमा सुनने की उनकी प्रवृत्ति हो। इससे प्रसन्न होते हों और निहाल करते हों। उन्हें अपनी सृष्टि व्यवस्था से ही फुरसत नहीं, फिर समय और रुचि भी तो नहीं। दूसरे उन पर सीधी आक्षेप लगता है कि प्रशंसा सुनने की रिश्वत में किसी को अनुग्रह प्रदान करते है। ऐसी प्रवृत्ति क्षुद्र हृदय धनवानों में तो पाई जाती हैं पर उसी श्रेणी में भगवान को चित्रित करना किसी भी प्रकार उचित नहीं। इससे उनके समदर्शी होने की महानता पर आक्षेप आता है।

औचित्य पात्रता की परीक्षा करके तदनुसार उपहार या उत्तरदायित्व सौंपने का है। भगवान की इसी विशेषता को हृदयंगम करना चाहिए क्योंकि इसमें अपने को सत्पात्र बनाने, उत्तरदायित्वों को पूरा करने और श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा में उपयुक्त स्थान प्राप्त करने में औचित्य भी है और न्याय भी। इसी विधा को अपनाने में भगवान की महिमा की रक्षा होती है और अपनी भी गरिमा स्थिर रहती है।

धन-दौलत हो या स्वर्ग-मुक्ति इसमें अपना ही प्रत्यक्ष स्वार्थ-साधना है। इन्हें अनुग्रहपूर्वक माँगने-अपनी दीनता दिखाने में न उनके न अपने गौरव की रक्षा होती है। इसलिए मनुहार करने की अपेक्षा भगवान के सान्निध्य के लिए अपना स्तर तदनुरूप बनाने की बात ही हर दृष्टि से उचित मालूम पड़ती है।

किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के पास बैठने के लिए उसी के स्तर का होना चाहिए। प्रधान मंत्री की विचार गोष्ठी में एम॰पी॰ स्तर के चुने हुए लोग होते हैं। मुख्यमंत्रियों की गोष्ठी में एम॰एल॰ए॰ लोगों को स्थान मिलता हैं जौहरी, व्यापारी अपने स्तर के लोगों को ही समीप बिठाते हैं। ग्राहक दलाल या भिक्षुक दूर खड़े रहते हैं। गाय का बछड़ा अपनी माँ का दूध पीता है। माँ उसे चाटती हैं क्योंकि दोनों के बीच आत्मीयता का सघन रिश्ता है। ग्वाले या दूसरे पशु उतने समीप नहीं आते।

उपासना शब्द में प्रकारांतर से अपने लिए प्रेरणा एवं जिम्मेदारी है कि उस महान सम्मान को उपलब्ध करने का गौरव प्राप्त करने के लिए जिन विशेषताओं की आवश्यकता है उसका निर्वाह करें और परीक्षा में उत्तीर्ण हो।

चन्दन के समीप उगे हुए वृक्ष भी उसी के समान सुगंधित हो जाते है। स्वाति बूँद सीप, बाँस, केला आदि में पहुँचने पर मोती, वंशलोचन, कपूर बनते है। यह सत्संगति का चमत्कार है। इसी स्तर तक अपनी पहुँच पहुँचाने के लिए उपासना शब्द में संकेत किया गया है। मनुहार करने की उतनी अधिक आवश्यकता इस शब्द में नहीं है। मेंहदी पीसने वाले के हाथ अनायास ही लाल होते है। पुष्प-उद्यान में भ्रमण करने पर नाक को सुगंध और आँखों को सुन्दरता अनायास ही उपलब्ध होती है। समीपता का यही लाभ हैं कुसंग का प्रतिफल सभी जानते है। कोयला ढोने, बेचने में कपड़े काले होते हैं। बदबू की अन्य वस्तुएँ उठाने, धरने पर ही हाथों और कपड़ों में दुर्गन्ध आने लगती है।

शास्त्रकारों ने भक्त और भगवान की एकता, घनिष्ठता आत्मीयता के लिए उपासना को सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया बताया है। इसकी तुलना में और सब गौण है।

योगवाशिष्ठ 49/8 में उपासक का स्वरूप बताते हुए कहा है-

भूमौ जले लभसि देव नरा सरेषु- भूतेषु देव सकलेषु चरा चरेषु। पश्यन्ति शुद्ध मनसा खलु राम रुपं, रामस्यते भुवितले समुत्यासकाश्च।

अर्थात्- भूमि, जल, आकाश, देव, मनुष्य,चर अचर सब्र में जो भगवान को देखता है और सच्चे मन से उनकी सेवा करता है-वही उपासक है।

अब यहाँ प्रश्न उठता है कि भगवान कैसा है और उसी समीपता के लिए क्या किया जाय?

छान्दोग्य 3/14/1 में कहा है।

“सर्व खल्विंद ब्रह्म, तजवला मिति शान्त उपसीत” अर्थात्-”यह समूचा संसार ब्रह्नाम हैं।

मनुष्य को शान्त चित्त से उसी की उपासना करनी चाहिए इस श्रुति में इस विराट् ब्रह्मनाम को -समस्त संसार को-अपनी सेवा साधना से उपासना करने का संकेत है।”

बृहदारण्यक 7/3/22 में तथा बाल्मीकि रामायण 6/117/25 में भी यही भाव है-” जगत सर्व शरीरं ते” अर्थात्’-परमात्मा का दृश्य शरीर यह निखिल विश्व ही है।

जितनी भी श्रेष्ठताएँ, विभूतियाँ इस संसार में है वे सभी ब्रह्म रूप हैं।

“संगीता यस्य सर्वे वपषि स भगवान पातु वो विश्व रूप”

जिसकी समस्त देवगण, श्रेष्ठजन और मुनि ब्रह्मज्ञानी स्तुति करते हैं वह भगवान विश्वरूप है।

वाश्वेरस्य तु सुभ््राषा परिचर्याप्युपासना। अमरकोशा 2/7/34

अर्थात्- संसार की सेवा, सुश्रूषा परिचर्या करना उपासना है।

कर्मणाः मनसा वाचा सर्वावस्यास्तु सर्वदा। समपिषैषा विधिना उपस्यरिति कथ्यत। कुलार्णव तंत्र 17/67

अर्थात्- सर्व समुदाय के निकट रह कर मन से वचन से कर्म से सेवा करनी उपासना है।

भागवत में एक स्थान पर कहा गया है ‘सेव्य’ उपासित-व्यम्’-अर्थात्-सेवा ही उपासना है।

सत्कर्मों को भी उपासना कहा गया है। सथा-’शील’ सरस्वभावः दुर्जन सहवास परित्याग इति उपासा’। अर्थात् शील, सदाचार, स्वाध्याय का परिपालन और दुर्जनों कुकर्मों का परित्याग उपासना है।

योगवाशिष्ठ 49/8 में आता हैं देव-गणों का अभिनन्दन प्राणि मात्र की सेवा सहायता है। सर्वत्र श्रेष्ठता को ही खोजना, मुनि वृत्तियों को धारण करना यही सच्ची उपासना है।

पैंगलोपनिषद 4/21 में आता है कि जहाँ कहीं तक कल्पना जाती है, उस सब को ब्रह्म मानना चाहिए और उसको श्रेष्ठ समुचित बनाने की सेवा साधना करनी चाहिए।

केवल पूजा-पाठ करते रहा जाय और जीवन को पवित्र सेवा साधना युक्त न बनाया जाय, तो उस दशा में कोई मंत्र तंत्र सफल नहीं होते। कहा गया है कि -

जिह्वा दग्धा परान्नेन, करौ दग्धौ प्रतिग्रहातु। मनो दग्धं परस्त्रीभिः कथं सिद्विर्वरानने।

शंकर पार्वती जी से कहते हैं कि जिनकी जिह्वा पराया अन्न खाने से-हाथ दान दक्षिणा बटोरने से-मन परस्त्री चिंतन से-दुग्ध हो गया है उनका अध्यात्म क्षेत्र की सिद्धियाँ कैसे मिल सकती है?

यहाँ पूजा उपासना का निषेध नहीं है। वह भी करने योग्य है किन्तु व्यक्तिगत जीवन को पवित्र, प्रखर बनाना साथ ही लोकमंगल की सेवा साधना में संलग्न रहना भी आवश्यक है और उपासना का वास्तविक प्रयोजन तभी पूरा होता है। हेय जीवन जीने और आत्म परिष्कार तथा लोकमंगल के कार्यों की उपेक्षा करने से उन लोगों का श्रम निरर्थक ही चला जाता है जो पूजा-पाठ को ही उपासना समझते है और उतने भर से भगवत् प्रसन्नता की आशा करते है। बदले में ऐसों को कुछ नहीं मिलता।


जीवितों में मृतक और मृतकों में जीवित!

महत्वाकाँक्षा प्राणी की एक विशेषता है। जीव विकास विज्ञान के अनुसार एक कोशीय जीव से बढ़ते-बढ़ते इसी कारण प्राणियों ने अपनी-अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित शरीर संरचना, चिन्तन में प्रगति की है और परिस्थितियों के साथ ताल मेल बिठाया है। विभिन्न प्राणियों, क्षेत्रों, साधनों और परिस्थितियों में अधिक समुन्नत स्थिति की संरचना का श्रेय इसी प्रवृत्ति को है। जिनमें यह उत्साह जितना कम विकसित हुआ है वे अभी भी उसी पुरातन स्थिति में रह रहे हैं। फूल के संपर्क में आकर तितली ने अपनी काया बदल ली। हिंस्र जन्तुओं ने रात्रि के समय अपनी घात अच्छी तरह लगने के कारण प्रकृति को निशाचर स्तर का बना लिया। नेत्रों की ज्योति भी उनकी उसी के उपयुक्त बन गई। आत्मरक्षा से लेकर सुविधा सामग्री जुटाने में जीवों का क्रमिक विकास अग्रगामी ही होता चला गया है।

मनुष्य के शारीरिक परिवर्तन के विकास का इतिहास तो संदिग्ध है, पर इतना स्पष्ट है कि उसकी महत्वाकाँक्षा आरीं से ही बढ़ी-चढ़ी है। इस कारण अन्य अवयवों की तुलना में उसका चिन्तन तंत्र अपेक्षाकृत अधिक विकसित हुआ है। प्रकृति की सम्पदा का अधिक भाग उसने अपने अनुकूल बनाने में कुछ उठा नहीं रखा है। इसलिए भोजन, वस्त्र, निवास, परिवार,, आजीविका आदि के क्षेत्र में वह सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में कहीं, अधिक अच्छी स्थिति में हैं। दूसरे प्राणी जब कि प्रकृति प्रकोपों के सामने अपनी सत्ता गँवा बैठते हैं तब मनुष्य ही एक ऐसा दिखाई पड़ता है जो प्रतिकूलताओं के बीच भी अनुकूलता तलाश लेता है। कृषि, पशुपालन, वाहन, पाक-शास्त्र, आच्छादन की बातें तो पुरानी हो गई। नई उपलब्धियों में उसने विद्युतशक्ति को अपना दास बना लिया है और प्रकृति की इस महती शक्ति से वह नौकरानी जैसा काम ले रहा है। अपनी स्वाभाविक चाल की तुलना में वह जल, थल और नभ में द्रुतगामी चाल से चलने लगा। अनेकानेक यंत्रों और साधनों का निर्माण करने के लिए उसे महत्वाकाँक्षाओं ने ही आगे बढ़ाया और एक-से-एक बढ़कर विभूतियाँ उपलब्ध कर सकने में सफल बनाया।

यह उसके भौतिक पक्ष का उत्कर्ष है। सुविधा साधनों के सहारे जो प्रसन्नता होती है, उपलब्धियों में जो उत्साह मिलता है, उस प्रत्यक्ष लाभ ने उसे अधिकाधिक सम्पन्न और समर्थ बनाने में सहायता की है। किन्तु इसके उपरान्त एक दूसरा पक्ष भी रह जाता है जिसे आत्मा कह सकते हैं। इसका प्रमाण यह है कि जब तक चेतना रहती है तभी तक शरीर काम करता है, अन्यथा वह किशोर, युवा या प्रौढ़ होते हुए भी निर्जीव हो जाता है और किसी न किसी उपाय से अपने कलेवर का अन्त कर लेता है।

आत्मा के संबंध में अब तक बहुत कुछ कहा सुना, सोचा और खोजा जाता रहा है, पर इस क्षेत्र की गहराई में प्रवेश करने पर आत्मा के स्वरूप और लक्ष्य के संबंध में जो निष्कर्ष निकाले जा सके हैं, उसे एक शब्द में ‘मानवी गरिमा’ कहा जा सकता है। अब तक उसकी अनेकों व्याख्याएँ हो चुकी है और अनेक रूप समझाये गये हैं। पर उनमें अधिक उपयुक्त और गौरवशाली अर्थ यही है। जब मानवी गरिमा मर गई और वह दुष्ट, भ्रष्ट और निकृष्ट बन गयी तो समझा जाना चाहिए कि आत्म हनन हो गया, चाहे व्यक्ति की साँस भले ही चलती हो। साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती छोड़ती रहती है और जीवित तो सड़े तालाब में पाये जाने वाले कीड़े भी होते है। पर उनके जीवित रहने या मृतक कहलाने में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

सड़कों पर वाहनों के नीचे कुचल कर असंख्यों मरते रहते है। बीमारियों के मुँह में आये दिन अगणित लोग चले जाते है, पर इनकी कोई महत्वपूर्ण चर्चा नहीं होती। शरीर में हलचल रहने और अन्न को टट्टी बनाने वाले लोगों को जीवित मृतक कहा जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी। क्रूर और नृशंस लोगों में आत्मा का अस्तित्व माना जाय या नहीं यह विवाद का विषय है।

आत्मा-जिसे सच्चे अर्थों में ‘आत्मा’ कहा जाय, आदर्शों के साथ जुड़ती है। उसमें संयम का भाव होता है और साथ ही उदारता एवं सेवा का भी। जिन्हें यह ध्यान रहता है कि मानवी गरिमा को गिरने न दिया जाय, दुष्ट या भ्रष्ट समझे जाने का अवसर न आये वही मानवी काया को सार्थक करते हैं, अन्यथा प्रेत-पिशाच भी ऐसे ही मिलते जुलते काय कलेवर में छिपे स्वयं जलते और दूसरों को जलाते रहते है। स्वयं डरते और दूसरों को डराते रहते है।

पवित्रता और प्रखरता मनुष्य के गुण हैं। जो निजी जीवन में सज्जनोचित सदाशयता भरे रहते है। और जो आदर्शों की रक्षा के लिए साहस दिखाते एवं बलिदान स्तर तक का शौर्य-प्रकट करने को तैयार रहते हैं उनके संबंध में कहा जा सकता है कि वे प्राणवान और जीवन्त मनुष्य हैं। अन्यथा ऐसी ही आकृति वाले खिलौने कुम्हारों के अवों में आये दिन पकते और काले पीले रंगों में रंगे जाते रहते है। आत्मा हलचल का नाम है, पर वह तो मशीनों के पहिये भी करते रहते है। हांडी में भी खिचड़ी की उछल कूद देखने को मिलती रहती है। हवा के साथ पत्ते भी उड़ते रहते है। इन्हें न तो जीवित कहा जा सकता है, न मनुष्य, न आत्मा।

आत्मा में उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और सज्जनोचित व्यवहार का समावेश होता है। यह जिनके साथ रहा हो वे शरीर न रहने पर भी अविनाशी आत्मा हैं। अन्य सड़ाँध में दिन काटने वाले और दूसरों को कष्ट देने वाले प्राणी भी ऐसे होते हैं, जिन्हें कोई चाहे तो जीवन धारियों में गिन सकता है।

आततायी सोचता है कि किसी प्रकार अपना स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए अपनी वासना और तृष्णा की जिस सीमा तक संभव हो, हविस पूरी होनी चाहिए। इसके लिए उसे दूसरों को किसी भी सीमा तक उत्पीड़न देने में संकोच नहीं होता। अपने अतिरिक्त और सब माटी या मोम के बने प्रतीत होते है, जिन्हें पीड़ा पहुँचाते हुए अपने ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता न दया आती है न उचित-अनुचित का भाव जगता है। अनर्थ और कुकर्म करते हुए अपने अहंकार का अनुभव करते हैं और नृशंसता का पराक्रम के रूप में सिर ऊँचा करके बखान करते है। उन्हें अपने को कोल्हू के सदृश मानते हुए गर्व होता है, जिसका एक ही काम है-तल निचोड़ लेना और खली को पशुओं के सामने बखेर देना। जो ध्वंस और विनाश की ही योजनाएँ बनाते और इसी स्तर के कुकर्म करते हुए अपने शौर्य को बखानते हैं, उन्हें इसी स्तर का गतिशील, किन्तु जघन्य कहना चाहिये। नर पशु और नर पिशाच अलग आकृति के नहीं होते हैं। उनकी चमड़ी भी इसी स्तर की होती है। किन्तु प्रकृति ऐसी मिली होती है, जिसे नर पशु या नर पिशाच से भी गया-बीता कहा जा सके।

इसी समुदाय में एक कायर वर्ग भी होता है, जो विनाश का दुस्साहस तो इसलिये नहीं कर पाता कि बदले में उलट कर अपनी भी हानि हो सकती है, कायरता दूसरों का शोषण भी कर सकती है, पर उनमें इतना साहस नहीं होता कि प्रतिकार को सहन करने के लिये दूसरे की चुनौती स्वीकार कर सकें। उचक्के और लफंगे इसी प्रकार की ठगी और विडम्बनायें रचते रहते हैं। सामना पड़ने पर शेर का चमड़ा उतार कर उन्हें बकरी के असली रूप में भी प्रकट होते देर नहीं लगती। ऐसे ही लोगों को नर पामर कहा गया है। उन्हें कृमि कीटकों से भी गयी गुजरी स्थिति में गिना जाता है। हमें देखना है कि हम क्या है, क्या बनना चाहते हैं व औरों से भिन्न जीवन की रीति-नीति किस प्रकार बनायें?


दो अंक लिख दिये (Kahani)

एक अध्यापक ने ब्लैक बोर्ड पर दो अंक लिख दिये 5 और 3। छात्रों से इसका हल पूछा।

छात्रों में से किसी ने 8, किसी 2,किसी ने 15 बताया वे जोड़, बाकी,गुणा कुछ भी करते और उतावली में उत्तर देते।

अध्यापक ने सभी उत्तरों को गलत ठहराया और कहा-उतावले बच्चों, हल करने से पूर्व तुम्हें यह पूछना था कि आखिर पूछा क्या जा रहा है?

जीवन की समस्याओं का स्वरूप और कारण न जानने पर भी उनके समाधान के लिए चलने वाली दौड़−धूप प्रायः इसी कारण निरर्थक चली जाती है।


॥ सत्यमेव जयते॥

धर्म का नवाँ लक्षण है- सत्य। आमतौर से सत्य का बोलने से सम्बन्धित माना जाता है। जैसा कुछ देखा, सुना या समझा है उसे उसी रूप में कह देना सत्य हैं। मोटी परिभाषा इतने भर से पूरी हो जाती है, पर सत्य का तत्त्वज्ञान यदि समझना हो तो उसकी परिभाषा यह करनी होगी-श्रेष्ठता का संरक्षण। उद्देश्य यदि ऊँचा है तो कथन में स्थिति को देखते हुए यत्किंचित अन्तर भी किया जा सकता है। रोगी निराश होकर मरण को निश्चित मानने लगे तो आशा और उत्साह देकर मनोबल जगाना और इस आधार पर उसके ठीक होने की सम्भावना को नये सिरे से उभारना सत्य से कम प्रतिफल उत्पन्न करने वाला नहीं है। यदि चिकित्सक के अनमनेपन को ताड़ कर मरण की सम्भावना को रोगी के सम्मुख प्रकट कर बैठा जाय तो उससे अनर्थ की ही सम्भावना है। ऐसी सत्य असत्य से बुरा है।

दो स्वजनों के बीच पल रहे मनोमालिन्य को यदि चुगली करके बढ़ाया न जाय और विश्वसनीयता को साफ सफाई की बातों में अपनी ओर से कुछ नमक, मिर्च न मिला कर सहयोग समाधान की स्थिति उत्पन्न कर दी जाय तो इसे असत्य नहीं कहा जायगा, वरन् सत्परिणाम को देखते हुए उस चापलूसी को सत्य से कम सराहा न जायगा।

कोई जमाना था जब अपनी खोट- सर्वसाधारण के सम्मुख प्रकट कर देने से उस व्यक्ति को सच्चाई निष्कपटता, भोलेपन और सुधार पश्चाताप की छाया में श्रेय ही दिया जाता था, पर अब वैसी स्थिति बिलकुल भी नहीं रही। भेद की बातें पूछ कर लोग मसखरी उड़ाते और उस गन्दगी को चारों ओर बखेर कर सच बताने वाले की इज्जत को धूलि में मिला देते है।

हमें ऐसी अनेकों घटनाओं का स्मरण है, जिसमें नव विवाहिताओं से प्यार, सचाई और क्षमा की दुहाई देकर पिछली गलतियों को पूछ लिया गया। इसके उपरान्त क्षमा करना तो दूर ऐसा रौद्र रूप धारण किया गया कि बेचारी का जीना हराम हो गया। ऐसी दशा में बुद्धिमता की दृष्टि से यही उचित था कि जिन रहस्यों के प्रकट होने पर किसी आपत्ति के आने की आशंका है तो उसे सदा सर्वदा के लिए कूड़े के ढेर में दाब दिया जाय और उसकी चर्चा का प्रसंग ही न आने दिया जाय।

सचाई-भलमनसाहत का चिह्न मानी जाती है और मन और कािनी की एकता रखना अच्छा गुण है, पर यह सब दैनिक सामान्य व्यवहार तक ही सीमित रहना उचित है। रहस्य की उन बातों को जिनके प्रकट होने पर विग्रह खड़े होने की आशंका हो, उन्हें न कहना किसी भी प्रकार झूठ नहीं है। कई बार मौन भी सत्य के ही समतुल्य हो जाता है।

घटना है कि किसी कसाई के हाथ से छूट कर गाय भाग आई। वह ऋषि आश्रम के पीछे नदी किनारे चर रही थी। ढूँढ़ते हुए कसाई आ पहुँचा। ऋषि से उनकी गाय के बारे में कुछ जानकारी हो तो बताने के लिए कहा। ऋषि ने ब्रह्मज्ञान की भाषा में कहा-”जिसने देखा है वह बोलता नहीं और जो बोलता है उसने देखा नहीं”। उनका संकेत जिह्वा और नेत्रों की बीच का अन्तर भर बताना था कसाई उस साँकेतिक भाषा को न समझ सका और निराश होकर घर वापस लौट गया। गाया के प्राण बच गये और इस प्रच्छन्न सत्य के सहारे एक अनर्थ होते-होते बच गया।

सरकार के सेना विभाग तथा गुप्तचर विभाग के लोगों को कड़ी हिदायत रहती है कि वे सामने वाले का भेद जानने की कोशिश करें। किन्तु अपने सम्बन्ध में जो वस्तुस्थिति हो उसे छिपाये’। यह झूठ को प्रत्यक्ष प्रोत्साहन है। किन्तु इसके पीछे राष्ट्र रक्षा तथा अपराधों का पता लगाने की उच्च भावना काम करती है इसलिए इन प्रसंगों में झूठ का आश्रय लेना किसी भी प्रकार हेय नहीं कहा जा सकता।

धर्मराज ने अश्वत्थामा मरण की पुष्टि करते हुए धीमे से इतना और कह दिया कि ‘नरोवा कुंजरोवा’ या तो इस नाम का मनुष्य मरा होगा या हाथी। हाथी तो महाभारत में ढेरों मरे थे। इस प्रकार युधिष्ठिर ने बात का समग्र स्पष्टीकरण करने की अपेक्षा आधा सत्य और आधा झूठ बोला। यहाँ तक कि कृष्ण भगवान ने जयद्रथ के स्थान पर अर्जुन के अपघात की आशंका देखकर अपना चक्र सुदर्शन सूर्य के उगे होने के रूप में दिखा दिया। अर्जुन बच गया। जयद्रथ मर गया। अनर्थ टला और औचित्य की रक्षा के लिए जिसका जीवन आवश्यक था वह बच गया।

यहाँ न तो झूठ को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और न सत्य को अव्यावहारिक बताया जा रहा हे किन्तु यह कहा जा रहा है जीवन-यापन के सामान्य प्रसंगों में सत्य का व्यवहार ही उचित है। व्यापारी यदि मिलावट न करे, कुछ के स्थान पर कुछ न दे। नाप तौल में चालाकी न करे। उचित मुनाफा ले और हिसाब किताब ठीक रखे तो उनकी यह रीति-नीति सत्य समर्थक ही मानी जायगी। किन्तु चोर या ठग अपनी संचित राशि की संख्या और रखे होने का स्थान पूछे तो तनिक भी आवश्यकता नहीं कि सत्यवादी हरिश्चंद्र बना जाय और सारे रहस्य बता कर चोरी डकैती का पथ-प्रशस्त किया जाय।

सचाई के व्यवहार की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही उत्तम। लाग-लपेट का जितना कम व्यवहार किया जाय उतना ही अच्छा। मन और वाणी की एकता रहने में अन्तराल स्वच्छ रहता है। इससे शारीरिक और मानसिक रोगों की उत्पत्ति के प्रधान कारण अन्तर्द्वन्द्व की जड़ कटती है। अपनी गणना भले मनुष्यों में होती है। कथन पर विश्वास भी किया जाता है और एक सज्जन के रूप में सम्मान बना रहता है। उसकी प्रामाणिकता पर उँगली नहीं उठती।

इतना जान लेने के साथ ही यह भी जान लेना चाहिए कि श्रेयस्कर क्रिया-कलाप में विघ्न उत्पन्न करने वाली सचाई का अकारण ढोल न बजाते फिरा जाय तो उसमें भी कुछ हर्ज नहीं। अगणित प्रसंग ऐसे अपवाद होते हैं जिनके मौन रहने पर वाणी का बिगड़ने जैसा विक्षेप उत्पन्न नहीं होता।

इन दिनों ऐसे दुरात्माओं का बाहुल्य है जो पेट में घुस कर भेद की बात जान लेते है और उस आधार पर ऐसे हथकण्डे चलाते हैं कि बेचारे सत्यवादी के लिए आत्म रक्षा करना कठिन पड़ जाय। ऐसे प्रसंगों का बाहुल्य होते देखकर विज्ञजनों ने ठीक ही कहा है कि थोड़ा बोला जाय। हितकर बोला जाय और मधुर बोला जाय। इन तथ्यों का निर्वाह करना भी लगभग सत्य की परिधि को छूना ही है। अकारण सत्य उगलते फिरने में जिनके स्वार्थ को चोट पहुँचती होगी वे अपने दुश्मन बनेंगे इसलिए जहाँ सत्य की रक्षा करनी है वहाँ नीति और औचित्य की भी रक्षा करनी चाहिए और साथ ही अपनी आत्म रक्षा भी।

सत्य की ही विजय होती है। इस उद्घोष को शोषितों के पक्ष में उभारा जा सकता हैं और कहा है कि अन्याय कागजी रावण के समान है। मनुष्य के मौलिक अधिकार सत्य और तथ्य पर आधारित हैं इसलिए शोषक कितने ही समर्थ क्यों न हों, कल नहीं तो परसों औंधे मुँह गिरेंगे। कुरीतियों, मूढ़ताओं और अन्ध विश्वासों के विरुद्ध भी यही कहा जा सकता है कि उनकी जड़े नहीं हैं। इन बालू की दीवारों में एक धक्का मारने में यह महल ढह जायगा, जो परम्परावाद के नाम पर किसी तरह अपनी चमड़ी बचाये हुए है।

आत्म सुधार की- लोक मानस निर्माण की अन्तरंग और बहिरंग गतिविधियाँ सत्य की साधना के समतुल्य है। नशेबाजी जैसी दुष्प्रवृत्ति भी मनुष्य के ऊपर हावी होकर अमरबेल की तरह उसका रस रक्त चूस रही है। असत्य का अन्धकार हटते ही इस प्रकार के कुप्रचलनों को भी निशाचरों की भाँति मैदान छोड़ कर भागना होगा।

आत्मा सत्य है। आत्मा की गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखने का प्रयत्न भी सत्य है। सत्य ही यह है कि सामाजिक न्याय और भाईचारे की प्रतिष्ठापना फिर से हो। इस मार्ग में जो भी अड़ंगे अड़ गये हैं उन्हें निरस्त करने के लिए मोर्चा सम्भालना भी सत्य के पक्ष तथा असत्य का दमन करने के समान है।


आत्मशोधन की संयम साधना

योग विद्या का वर्गीकरण विश्लेषण अनेक दृष्टिकोणों से अनेक खण्डों में किया जा सकता है, पर सरलता की दृष्टि से उनके दो विभाजन ही अधिक उपयुक्त पड़ते हैं। एक अध्यात्म-योग दूसरा हृदयोग या तंत्रयोग। अध्यात्मयोग को राजयोग भी कहा जा सकता हैं। दोनों का लक्ष्य एक होते हुए भी उनकी विधि व्यवस्था पृथक-पृथक है।

जीवन सत्ता दो भागों में बाँटा जा सकती है। शरीर और प्राण। इनके सम्मिलन से जीवन-धारा प्रवाहित होती है। इसे प्रकृति पुरुष का संयोग भी कह सकते है। शरीर पंच तत्वों से बना है। पंच तत्व प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते है। उन्हें पड़ भी कहा जाना है। जड़ का तात्पर्य है- विचार विहीन, भावना शून्य। यो जादू में भी हलचल तो रहती है।प्रकृति के सब से छोटा घटक परमाणु द्रुतगति से अपनी कक्षाओं में परिभ्रमण करते रहते है। स्थिति के अनुरूप उनके गतिचक्र में परिवर्तन भी होता रहता है। यह हलचलें अस्तित्व बने रहने तक चलती ही रहती हैं। प्राण निकल जाने पर काया बिना किसी की प्रतीक्षा किये अपनी अंत्येष्टि करने में स्वयं लग जाती है। उसमें सड़न पैदा हो जाती है। कृमि उपज पड़ते हैं। मृत कलेवर को खा पीकर समाप्त कर देते हैं। साथ ही स्वयं भी मर जाते है। चील, कौए, स्यार, कुत्ते उनके कार्य में सहायता करते हैं इससे पूर्व सम्बन्धियों कुटुंबियों ने वह कृत्य स्वयं पूरा कर दिया हो तो बात दूसरी है। जीवन में एक सत्ता शरीर की है, तो प्रत्यक्ष दीख पड़ती है वह नाम रूप से जानी जाती है। इसे स्थूल शरीर भी कहते है।”

इसके उपरान्त दूसरी सत्ता है-प्राण। जिसे मोटे रूप में चेतना या आत्मा भी कहा है। प्राण का प्रत्यक्षीकरण मन मस्तिष्क के क्रिया-कलापों से जाना जाता है। प्राण जीवन को ही स्थिर नहीं रखता, वरन् विचारणा एवं भावना को भी गति देता है। इसकी मूलभूत सत्ता आत्मा है। जो जीवन में समाविष्ट होते हुए भी अपनी सत्ता साक्षी दृष्टा के रूप में बनाये रहता है। विचारणा और बुद्धिमत्ता प्राण की अनुकृति है। आत्मा इससे अधिक गहराई में है वह कर्मफल व्यवस्था बनाती है। संस्कारों को यथा समय फलित होने के लिए संजोये रखती हे। योनियों में भ्रमण उसी को करना पड़ता है। परलोक में ही उसी का प्रवेश है। अजर-अमर वही है। शरीर तो जन्मते, मरते रहते है।

यदि विभिन्न भेद, उपभेदों में न जाया जाय तो जीवसत्ता के दो वर्ग विभाजन करने से काम चल जायगा। मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय के रूप में माना जाता है। अधिक से अधिक वह कह सकते है कि चेतना ओर काया का सम्मिश्रण मन है। पीला और नीला रंग मिलने से हरा बन जाता है। पर यदि दोनों को पृथक्-पृथक् कर दिया जाय तो उस मिश्रण से बने हरे रंग का अस्तित्व समाप्त हो जायगा। प्राण तत्व जड़ चेतन से मिली एक स्वतंत्र इकाई मानी जाती है, पर वस्तुतः वह इन दानों का सम्मिश्रण है जो ब्रह्माण्ड से शरीर में प्रवेश करता है और समयानुसार वह अपने विशाल क्षेत्र में मिल कर घुल भी जाता है। समुद्र का जल बादल बनता है। बादल बरसते और अपनी जल धारा का समुद्र में जा पहुँचने के लिए धकेल देते हैं। इसी प्रकार विराट में संव्याप्त महाप्राण काय कलेवरों में प्रवेश करके व्यक्ति प्राणवान बनता और सचेतन विद्युत धारा के रूप में अवयवों के विभिन्न क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन करता रहता है। यह शरीरों में उनकी स्थिति के अनुरूप न्यूनाधिक मात्रा में भी देखा जाता है। अधिकता से ओजस, तेजस, वर्चस की अभिवृद्धि देखी जाती है और न्यूनता से दुर्बलता, दीनता, हीनता आ घेरती है। प्राण को संकल्प-बल के सहारे प्राणायाम द्वारा अधिक मात्रा में खींचा और धारण किया जा सकता है। उपेक्षा बरतने पर वह गई-गुजरी स्थिति में भी पड़ा रहता है।

शरीर, प्राण और चेतना के तीन भागों में व्यक्तित्व को विभाजित किया जा सकता है। यही तीन प्रकृति, जीवन और ब्रह्म है। इन्हीं को स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहते है। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के नाम से इस त्रिवर्ग की विवेचना होती रहती है। क्रमशः तीनों के केन्द्र बिन्दु नाभिक, हृदय और ब्रह्मरन्ध्र में माने गये है। इन्हें देव विज्ञान में शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी कहा गया है। काली, लक्ष्मी और सरस्वती भी इन्हीं की प्रतीक प्रतिनिधि है।

साधना विज्ञान का प्रयोजन इन तीनों को परिष्कृत प्रखर बनाना है। शरीर की स्वस्थता, सुन्दरता, मन की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, अन्तःकरण की भाव-संवेदना उदार सेवा परायणता इन्हीं तीन क्षेत्रों का समुन्नत बनाती हैं। अनेकानेक साधनाएँ इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती हैं।

काया में सुदृढ़ता एवं तेजस्विता का अभिवर्धन संयम साधना से होता है। इसी का बढ़ा-चढ़ा स्वरूप तप है। प्रथम को सहज सामान्य और द्वितीय को कठिन असाधारण कहा जा सकता है। संयम का तात्पर्य है- अभ्यस्त कुटैवों को ढूंढ़ना और कठोरतापूर्वक उखाड़ फेंकना। तपस्वी को एक कदम और आगे बढ़ाना पड़ता है, उसे साधना विधानों को अपना कर ऐसी प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न करना है, जो संग्रहित कुसंस्कारों को न केवल उखाड़े, वरन् अपने प्रचण्ड तप से उन्हें भस्मीभूत भी कर दे।

आदतें सहज पीछा नहीं छोड़ती। वे भगाने पर भी लौट लौटकर फिर वापस आ जाती है। गन्दगी पर मक्खी बैठती है। उड़ा देने पर चक्कर काटकर फिर उसी स्थान पर आ धमकती है। दोष, दुर्गुणों की हानि और उनके छोड़ देने पर मिलने वाली सुविधा के सम्बन्ध में मोटी जानकारी प्रायः सभी को होती है। कुकृत्य करने वालों को भर्त्सना, प्रताड़ना मिलती प्रायः देखी जाती है। कुकर्मी का कोई सच्चा मित्र नहीं होता है। मतलब निकालने के लिए कोई सच्चा मित्र नहीं होता है। मतलब निकालने के लिए कोई चापलूसी भले ही करता रहे, पर समय पड़ने पर उसका साथ सभी छोड़ जाते है। इन सब बातों की चर्चा सत्साहित्य में, सत्संगों में, प्रवचन समारोहों में भी होती रहती है। इतने पर भी समझदार कहे जाने वाले लोग तक कुटेवों से ग्रसित पाये जाते हैं। पोल खुलने जैसी घटना सामने आने पर लज्जित भी होते है। पछताते भी है। किन्तु कठिनाई ज्यों की त्यों बनी रहती है। आदत छूटती नहीं। नशेबाजों की दुर्दशा उस दुर्व्यसन के कारण होती आये दिन देखी जाती है। फिर भी सुधार के कारगर लक्षण दीख नहीं पड़ते। नशेबाजी दिन-दिन बढ़ती जाती है।

शरीर को क्षति पहुँचाने वाले यों अनेक कारण है। मौसम का परिवर्तन, अस्वच्छता, उद्वेग, आलस्य, अतिवाद जैसे कारण भी स्वास्थ्य को बिगाड़ते हैं, पर प्रधान कारण असंयम को ही मानना पड़ेगा। उसके कारण उत्पादन की तुलना में अपव्यय कहीं अधिक होता है। जीवनी शक्ति की पूँजी घटती जाती है। चटोरपन के कारण तामसिक प्रकृति का आधार आवश्यकता से अधिक मात्रा में उदरस्थ होता चला जाता है। अपच की सड़न अनेकानेक रोग उत्पन्न करती है। कामुकता को अमर्यादित रूप से अपनाने वाले भी भारी मस्तिष्कीय क्षति उठाते हैं। साथ ही जीवन तत्व का महत्वपूर्ण भाग गँवा बैठने से खोखले हो जाते है।

प्रश्न यह है कि शरीर को दुर्बल, रुग्ण बनाने वाले दुर्व्यसनों से छुटकारा कैसे पाया जाय? इसका एक ही उत्तर है। दृढ़ प्रतिज्ञा स्तर की साहस भरी व्रतशीलता को अवधारण करना और संकल्प करना कि किसी भी हालत में निश्चय से पीछे न हटा जायगा। सुधरी हुई दिनचर्या बननी चाहिए। व्यस्तता का इतना दबाव रहना चाहिए कि खाली दिमाग को शैतान की दुकान बनने का अवसर मिल न पाये। किसी क्षण असावधानी पाकर यदि आदत का भूत कोई आक्रमण कर ही बैठे तो उसका अविलम्ब प्रायश्चित्त करना चाहिए। अपने आप को प्रताड़ना देनी चाहिए। भले ही वह हलके ही किस्म की क्यों न हो? साथ ही उस गलती को न दुहराये जाने के लिए अधिक कड़ा निश्चय करना चाहिए। इस पर भी गलती दुहराई गई हो तो पहले की अपेक्षा अधिक कठोर दण्ड सहन करना चाहिए। यह तितीक्षा के रूप में भी हो सकता है, सदाशयता को क्षति पहुँचाने पर की जाने वाली भरपाई को श्रमदान, धनदान आदि के रूप में भी चरितार्थ किया जाना चाहिए। दण्ड का उद्देश्य ही यह है कि अपराधी भविष्य में वैसा करने से रुके हिचके।

असंयम का मोटा अर्थ-चटोरपन और कामुकता के दो रूपों में ही जाना जाता है, पर उसका क्षेत्र इतना सीमित नहीं है। समय की बरबादी, पैसे की बरबादी, कुकल्पनाओं में निरत होकर की जाने वाली विचारशक्ति की बरबादी भी असंयम के अंतर्गत आती है। इन्द्रिय असंयम तो उपवास, अस्वादव्रत, ब्रह्मचर्य, मौन आदि तितीक्षाओं के आधार पर किया जा सकता है। वे समय पर सावधानी बरतने से टल सकते हैं। किन्तु समय संयम, अर्थसंयम, विचार संयम के लिए निरंतर जागरूकता अपनानी पड़ती है। अपने घर परिवार की साहसी पहरेदार की तरह चौकीदारी करनी पड़ती है। जिस प्रकार साँप से, बिच्छू से, अँगारे से, खुले बिजली के तारों से दूर रहा जाता है, बचा और भागा जाता है, उसी प्रकार उपरोक्त सभी असंयमों से प्राण बचाना चाहिए। आक्रमण होने से पहले बचाव की पूरी-पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए।

यह सावधानी वाला व्यवहार पक्ष का प्रयोग हुआ। शरीर क्षेत्र में घुसी हुई बुरी आदतों से लड़ने के लिए और भी कई व्रत तितीक्षाओं का विधान है। अस्वाद व्रत की साधना भी उपवास वर्ग में आती है। पेट खाल रखना, पाचन तंत्र को विश्राम देना, नमक, शकर, मसाले, चिकनाई का एक निर्धारण अवधि के लिए परित्याग कर देना मनोबल को बढ़ाता है। इसमें दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और उन्हें परास्त करते रहने का साहस उभरता है। यह संकल्प-बल आगे चल कर सत्प्रवृत्ति संवर्धन के अनेक प्रयोजनों में काम आता है।

ब्रह्मचर्य को काम-क्रीड़ा से विरत होना भर नहीं मान लेना चाहिए। वह तो उसका प्रत्यक्ष स्वरूप एवं व्यावहारिक पक्ष है। इसे दबाव या अभाव से भी विवशता में निभाया जाता रहता है। कैदियों के लिए ब्रह्मचर्य एक विवशता है। साधु बन जाने पर भी मन में उठने वाली कुत्सा को कार्यान्वित कर सकने का अवसर नहीं मिलता। विधुर, विधवा, कुंआरे, कुमारियाँ भी समाज व्यवस्था से अनुबंधित होने के कारण प्रत्यक्षतः कुछ कुकृत्य कर सकने में असमर्थ हैं। कुछ गुप्त करने लग जाँय तो बात दूसरी है।

उपरोक्त स्तर के काम-क्रीड़ा से विरत लोगों का ब्रह्मचारी नहीं कहा जा सकता। असली क्षरण तो मानसिक होता है। काम को मन्सज कहा गया है। उसकी उत्पत्ति मन से होती है। मन को धोया जाय, कुदृष्टि को त्यागा जाय। नर नारी को और नारी नर को पवित्र दृष्टि से देख सके तो समझा जाना चाहिए कि समग्र इन्द्रिय संयम बन पड़ा। चटोरपन हो या कामुकता का व्यवहार रोकना ही पर्याप्त नहीं, त्यागी उनकी ललक एवं अभिलाषा भी जानी चाहिए।

इन्द्रिय निग्रह का प्रथम चरण जो पूरा कर लेता है उनके लिए इस संयम साधना के अन्य तीन पक्ष साध सकना भी सरल हो जाता है। इन्द्रिय- जयी, समय संयमी, अर्थ संयमी, विचार संयमी बनने में उतनी अधिक कठिनाई अनुभव नहीं करता जितनी की प्रथम चरण की साधना में साहस अपनाना होता है।


नमक और दाल छोड़ने की प्रतिज्ञा (Kahani)

कस्तूरबा उन दिनों अस्वस्थ थीं। स्वास्थ्य सुधारने के कितने ही प्रयत्न हो चुके थे पर सभी निष्फल गये। एक दिन गाँधी जी ने दाल और नमक छोड़ने की सलाह दी। अपनी बात के समर्थन में स्वास्थ्य सम्बन्धी साहित्य के कुछ अंश भी पढ़कर सुनाये पर “बा” उनकी बात मानने को तैयार नहीं हुई। उन्होंने झुँझलाते हुए कहा- ‘‘आप मेरे इतने पीछे पड़े हैं दाल और नमक तो आप भी नहीं छोड़ सकते।”

गाँधीजी को यह बात चुभ गयी, अच्छी बात है तुम नहीं छोड़ना चाहती तो मत छोड़ो। मैंने आज से एक वर्ष के लिये दोनों ही वस्तुएँ छोड़ दीं। गाँधी जी को “बा” के प्रति व्यक्त करने का यह अपूर्व अवसर मिला था, इसे वह सहज छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा यदि मैं अस्वस्थ होता और मेरा चिकित्सक इस प्रकार का परहेज करने के लिये कहते तो मैं खुशी-खुशी तैयार हो जाता।

गाँधीजी की एक साल तक नमक और दाल छोड़ने की प्रतिज्ञा ने कस्तूरबा को यह समझाने में सफलता प्राप्त की संयम कुछ भी कठिन नहीं, वरन् सरल है और लाभदायक भी।


छः घड़े सोना!

श्मशान घाट के पीपल पर एक यक्ष रहता था। उसकी आदत थी कि धन का प्रलोभन देकर लोगों को अपने चुँगल में फँसाना। लालच के वशीभूत होकर लोग अपने सभी कर्त्तव्य भूल जाते। दिन-रात धन बढ़ाने के लोभ में लगे रहते। चिन्ता इतनी सवार रहती कि सभी व्यवस्थाएँ,जिम्मेदारियाँ त्याग कर शरीर तक को घुला डालते। अकाल मृत्यु मरते और जल्दी ही श्मशान पहुँच कर यक्ष की चाकरी करते हुए नरक जैसा त्रास सहते।

एक दिन उस देश के राजा का मंत्री किसी काम से उस रास्ते निकला। पेड़ के ऊपर से कोई अदृश्य आत्मा बोली-”छै घड़ों में भरी स्वर्ण मुद्राएँ लोगे।”

मंत्री को लालच आ गया। मुफ्त का धन पाने के लिए बहुतों के मन में ललक उठती है। मंत्री भी ललचाया। पीपल के नीचे बैठ गया और उस अदृश्य बोलने वाले से प्रार्थना करना शुरू किया। देव! वह धन कहाँ है मुझे दे दीजिए।

अदृश्य यक्ष ने कहा, “इसी पीपल की जड़ में दाहिनी ओर वे घड़े गढ़े हैं तुम प्रसन्नतापूर्वक खोद ले जाओ। पर रात को ले जाना ठीक पड़ेगा। अन्यथा किसी को पता चल जाने पर वह उसे छीनने के लिए घात लगायेगा। मंत्री को यह सलाह रुची। घर लौट गया। रात को फावड़ा लेकर आया। सब घड़े खोद लिये। सभी भारी थे। वे इन्हें ले जाने के लिए एक-एक करके घर पहुँचाता रहा। रात भर इसी प्रकार चक्कर लगाता रहा।

घर जाकर घड़े खोले तो उनमें स्वर्ण मुद्राएँ भरी देख कर भारी प्रसन्नता हुई। आधा घड़ा खाली था। पत्नी को जगाया। वह सम्पत्ति उसे दिखाई और पूछा क्या करना चाहिए? पत्नी ने भी सलाह दी कि जो आधा घड़ा कम है उसे जल्दी भरने का उपाय करना चाहिए। इसी की पूर्ति में जो बन पड़े सो करना चाहिए।

पत्नी ने घर खर्चे में कटौती आरम्भ कर दी। भोजन का स्तर घटिया कर लिया, पुराने कपड़े सीकर परिवार के तन ढके। बच्चों को पढ़ाई करने से बिठा लिया। उधर मंत्री ने अपने खर्च में तो कमी की ही साथ ही राज-काज में से पैसे चुराने लगा। इतने पर भी चिन्ता और उदासी से उसका चहरा मुरझाने लगा। समझ भी कम हो गई। प्रतिभा पलायन करने लगी।

मंत्री का यह हाल देखकर राजा को चिन्ता हुई। उसकी चोरी बेईमानियाँ भी प्रकट होने लगीं। शरीर सुख कर काँटा होने लगा। समझ में फर्क पड़ जाने से उसके मित्र भी शत्रु बनने लगे। राजा को सलाह भी उल्टी सीधी मिलने लगी। राज-काज में भारी हर्ज होने लगा।

इस मुसीबत का क्या कारण हो सकता है, राजा उसकी तलाश में लगा रहता पर कुछ पता न चलता। एक दिन एक ताँत्रिक से राजा की भेंट हुई। उसने पीपल वाले यक्ष की करतूत का ब्यौरा बताया और कहा, “हो सकता है मंत्री उसी के फेर में पड़ गया हो।”

एक दिन राजा ने मंत्री को एकान्त में बुलाया और पूछा कि कहीं आप यक्ष वाले छैः घड़े के फेर में तो नहीं पड़ गये। मंत्री पहले तो सकपकाया। पीछे उसने वास्तविकता स्वीकार करली।

राजा ने उसे परामर्श दिया कि धन को जहाँ से लाये हो वहाँ गाड़ आओ, अन्यथा तुम्हारा शरीर और परिवार बुरी तरह-बरबाद हो जायगा। मंत्री ने उस नेक सलाह को मान लिया और छहों घड़े उसी पीपल के नीचे गाढ़ दिये।

लालच का कुचक्र सिर से हटा वैसे ही मंत्री की सारी चिन्ताएँ चली गई घर का-राजपाट का-सारा काम यथावत चलने लगा। राजा ने वेतन बढ़ा दिया। सुविधाओं में वृद्धि हुई और निश्चिंतता सहित हँसी खुशी के दिन कटने लगे। अनीति के- बिना मूल्य धन पाने के-लालच में जो विपत्ति सिर पर सवार हुई थी वह चली गई और चैन के दिन कटने लगे।


तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा

तार्किकों द्वारा प्रायः प्रश्न उठाया जाता रहा हैं कि ईश्वर यदि है, तो हमें दीखता क्यों नहीं? यह सवाल वैसा ही है, जैसा कोई कमजोर दृष्टि वाला अपना चश्मा उतार कर सामने का दृश्य देखने का प्रयास करे और कुछ भी नहीं दिखे, पर सामने के व्यक्ति को ही झूठा ठहराये। वस्तुतः इस अल्पविकसित बाल बुद्धि ही कहा जाना चाहिए। विकसित मस्तिष्क वाले यदि इस संबंध में शंका-शंकित हुए भी तो उनका संदेह इतना उथला नहीं होता कि पर्याप्त अनुसंधान किये बिना निष्कर्ष निकाल लिए जायँ। विज्ञान की आधुनिकतम शोधों ने विकसित बुद्धि वाले लोगों को परमसत्ता के प्रति नये सिरे से आस्थावान बना डाला है। यह स्वाभाविक भी है।

वस्तुतः नास्तिकता एक ऐसी मानसिक अक्षमता है, जो अपनी कमजोरी ढकने के लिए मानसिक प्रखरता का नाटक रचती रहती है। जानने-सुनने में तो नास्तिकों के तर्क बड़े युक्तियुक्त और सही जान पड़ते हैं। ऐसा लगता है कि सचमुच ही ये अपने तीक्ष्ण विचारों द्वारा सत्य को जानने-पहचानने की क्षमता रखते हैं, पर तनिक सूक्ष्मता से विचारने पर ज्ञात होगा कि जिसे वे अपना बौद्धिक पैनापन मान बैठे हैं, वस्तुतः उसके पीछे उनका दुर्बलताजन्य पूर्वाग्रह छिपा रहता है।

तनिक तीक्ष्ण बुद्धि का सहारा लें, तो ईश्वर के न दिखाई पड़ने मात्र से ही उसके अस्तित्व को नकारने का कोई कारण नहीं प्रमाणित होता। उस चेतन सत्ता की स्थूल दृष्टि से अनुभूति न हो पाना, हमारी दृष्टि सामर्थ्य के निर्धारित सीमाबन्धन को ही प्रकट करता है, न कि भगवद् सत्ता का अनस्तित्व।

दूर की कितनी ही वस्तुओं के अस्तित्व से हम अनभिज्ञ होते हैं। वे हमें सिर्फ इसलिए नहीं दिखाई पड़ती, क्योंकि हम दोनों के बीच का फासला अधिक होता है और दृश्य सामर्थ्य कम। उनके अस्तित्व का भान हमें तभी हो पाता है जब हम उसके करीब पहुँच पाते है। अब यदि सिर्फ इस आधार पर कोई किसी के अस्तित्व स्वीकार कर दे तो इससे उसकी मान्यता सिद्ध नहीं हो जाती मात्र इतना पता चलता है कि वे है तो, पर हम उनसे बहुत दूर हैं। हमारी विभिन्न प्रकार की जानकारियों व संवेदनाओं का मुख्य स्त्रोत मस्तिष्क है। उसी से हमें तरह-तरह के ज्ञान प्राप्त होते हैं। यदि यह केन्द्र उस परमसत्ता से सदा अलग-थलग पड़ा रहे, विषय-वासनाओं, इच्छा-आकाँक्षाओं में उलझा रह कर साँसारिक वस्तुओं की कामना करता रहे, तो यह कैसे संभव है कि व्यक्ति एक ही साथ दो-दो लक्ष्यों की प्राप्ति करे? जागतिक विषयों का भी उपभोग करे और ईश्वर का सान्निध्य लाभ भी प्राप्त करे?

इस स्थिति में अपने को पहुँचाने के लिए मनुष्य स्वयं ही जिम्मेदार है। अपने प्रतिकूल कर्तृत्वों से ही वह सर्वेश्वर से अपनी दूर बढ़ा लेता है। यद्यपि वह परमसत्ता हमसे अत्यन्त करीब है, फिर भी हम उसे जानने-समझने में सफल नहीं हो पाते है। इसमें दोष उस महान सत्ता का नहीं अपितु उसकी समीपता का है। अति निकटता भी ईश्वरानुभूति में सहायक की जगह बाधक बन बैठती है। आंखें किसी वस्तु को तभी देख पाती हैं, जब वह एक निश्चित दूरी पर हों। जैसे-जैसे वह निकट आती जाती है, अस्पष्ट से अगोचर बन जाती है। आंखों में देखने की शक्ति तो है; पर वह अपने ही पलकों में लगे काजल को कैसे देखें? इसे देखने के लिए तो दर्पण में उसका प्रतिबिम्ब निहारने की आवश्यकता पड़ती है। जन सामान्य को ईश्वरीय सत्ता की प्रतीति भी तभी हो पाती है, जब उन्हें उसका प्रतिबिम्ब कहीं दिखाई पड़ता है। अत्यधिक समीपता और कषाय-कल्मषों की प्रचुरता के कारण ही बहिर्मुखी मन को अन्तःसत्ता का अनुभव नहीं हो पाता यद्यपि वह है।

समीपता के साथ-साथ तद्रूपता भी अनुभूति के मार्ग में विघ्न डालती है। सागर में अनेक स्रोतों से जल आकर मिलता है। अनेक नदी नालों का प्रवाह उसमें आकर समाता है और वर्षा की बूंदें भी सम्मिलित होती है; पर इन सबका पृथक अस्तित्व वहाँ कहाँ रह जाता। वे तो जिसमें मिलते है, उसी के तद्रूप हो जाते हैं। वहाँ उन्हें अलग-अलग पहचाना नहीं जा सकता। हम चेतना के समुद्र में जी रहे हैं। यहाँ हमारी स्थिति विशाल चेतना के सागर में एक चेतन बूँद के समान है। यह बूँद इस महत चेतना अनुभूति अलग से कैसे कर पाये? यह अति कठिन कार्य है। मानवी अनुभूतियाँ इसी परम चेतना के प्रकाश की उपस्थिति में संभव हो पाती है।

इसी चैतन्य अंश के कारण हम प्रकृति के रहस्यों और हलचलों को समझने में सफल हो पाते हैं। फिर भी चेतना के उस विशाल सागर को जान-समझ पाना मानवी मन के लिए मुश्किल हो जाता है। चेतन मन की परम चैतन्य सत्ता को इसी कारण हम नहीं ज्ञात कर पाते। मन-मस्तिष्क सदा अपने ढंग से काम करते रहते है; पर इसके पीछे की शक्ति उन्हें उसी चेतन तत्व द्वारा मिलती है। सजातीय सादृश्य के कारण उसे जानना कठिन है।

हमारे इर्द-गिर्द कितने ही बैक्टीरिया वाइरस मँडराते रहते हैं। कितनी ही प्रकार की तरंगें-ध्वनि, प्रकाश इसके अतिरिक्त अन्यान्य प्रकार के ब्रह्माण्डीय-किरण-विकिरणें बरसते रहते है; पर इन सब की जानकारी हमें कहाँ होती है? रेडियो सेट पर निश्चित फ्रीक्वेंसी मिलाने पर ही हम ध्वनि को सुनते और टी॰वी॰ में प्रकाश चित्रों को देख पाते हैं। इसी प्रकार सूक्ष्म जीवाणुओं को देखने के लिए महाइक्रोस्कोपा जैसे यंत्र बने हैं। इनकी भिज्ञता नहीं हो पाने से यह कदापि नहीं सिद्ध होता कि इन सब का अस्तित्व है ही नहीं, वरन् यह रिसेप्टर की अक्षमता प्रदर्शित करता है। चूँकि यह सब हमारी स्थूल इन्द्रियों की सामर्थ्य से परे की चीज है, अतः इनका भान हमें नहीं हो पाता। ज्ञातव्य है कि जब यह स्थूल चीजें ही हमारी पकड़ से परे की हैं, तो वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चेतन तत्व ही अनायास अनुभूति में कैसे आ जाये? इसके लिए हमें इन्द्रियों को ईश्वराभिमुख बना कर प्रज्ञा चक्षु विकसित करने पड़ेंगे तभी हम उस समष्टि चेतना को जान सकेंगे।

व्यक्ति की संगति जैसी होती है, वह उसी क्षेत्र में निपुण बनता जाता है। यदि उससे किसी अन्य क्षेत्र का सवाल पूछ लिया जाय, तो वह बगलें झाँकने लगता है। गणित का विद्यार्थी जिस सहजता से गणित के प्रश्नों को हल कर लेता है वैसा कला या वाणिज्य का विद्यार्थी नहीं कर सकता। ठीक इसके विपरीत गणित के अध्येता से कोई साहित्य संबंधी प्रश्न पूछ लिया जाय, तो उसका दिमाग तनिक भी साथ नहीं देता। तात्पर्य यह कि मन-मस्तिष्क आरंभ से जिस दिशा में तत्पर और अभ्यस्त बन जाते हैं, फिर उनकी गति, रुचि और प्रवृत्ति उसी ओर बन पड़ती है।भगवद् अनुभूति के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। जब स्वयं को सत्प्रवृत्तियों में लगाया नहीं, इन्द्रियों को साधा ही नहीं इस ओर रुचि प्रवृत्ति जगाई नहीं, तो परम तत्व की अनुभूति निश्चय ही कठिन होगी।

कई बार ऐसा होता है कि जब मन किसी कार्य में निमग्न हो जाता है, तो सामने क्या कुछ हो रहा है, इसका ध्यान ही नहीं रहता। प्रयोगशाला में कार्यरत वैज्ञानिकों चिन्तन में तल्लीन साहित्यकारों सवाल हल करने में निरत गणितज्ञों के साथ अनेक बार ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जब उन्हें अपनी समीपवर्ती हलचलों की ही जानकारी नहीं मिल पाती। साँसारिक विषय-वासनाओं राग-रंगों में डूबे मन-मस्तक को अन्य अनुभूतियाँ ग्राह्य ही नहीं होतीं, अतः ऐसे व्यक्ति यदि सृष्टा की अनुभूति न कर सकें, तो इससे उसकी निस्सारता नहीं सिद्ध होती।

तारों और नक्षत्रों का दिन के सुमेरु आकाश में न दिखाई पड़ना यह नहीं प्रमाणित करता कि सूर्य की तरह इस वक्त वे अस्त हो जाते हैं। इनकी उपस्थिति उस समय भी यथावत बनी रहती है; पर दिन की चकाचौंध में हमारी आंखें उन्हें देखने में सर्वथा विफल रहती हैं। साँसारिक चकाचौंध इससे कम नहीं कई गुना अधिक ही प्रखर होती है। इसमें पड़कर व्यक्ति की आंखें चौंधिया जाना और ईश्वरीय आलोक का एहसास न हो पाना, स्वाभाविक ही है। जब तक स्वयं को उनसे विमुख एवं मन को परिष्कृत न किया जाय, जब तक हममें वह क्षमता नहीं विकसित हो सकती, कि हम संसार में रहते हुए भी उसके दिव्य प्रकाश को ग्रहण-अवधारण कर सकें।

अंगारे पर जब तक राख की पर्त चढ़ी रहती है, तब तक उसकी प्रखरता दबी-छिपी अवस्था में पड़ी रहती है, किंतु उसके हटते ही वह अपने वास्तविक आत्म स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। हमारी मलीनता का कारण हमारे अपने ही अपरिष्कृत मनोभावों की आत्म-चेतना पर चढ़ी परतें हैं। जब तक यह हम पर सवार रहती हैं हम स्वयं को सामान्य समझते रहते है पर इनके तिरोहित होते ही सही आत्म भव को प्राप्त करते है। आंखों पर चढ़े वासना तृष्णा इच्छा आकाँक्षा लोभ-मोह के इन पर्दों के कारण ही हम अपने को पहचान नहीं पाते आत्मा के प्रकाश को देख नहीं पाते। यदि सरोवर का जल ही गंदला हो, कीचड़युक्त हो तो उसके तल पर पड़ी वस्तु कैसे देखी जाय? सन्दूक में बन्द आभूषणों और जमीन के नीचे दबी प्रकाशयुक्त मणि को नहीं देखा जा सकता है। इसके लिए प्रयत्न-पुरुषार्थ करना होता है। बक्से का ताला खोलना और परिश्रम पूर्वक जमीन की खुदाई करनी पड़ती हैं तभी उनकी उपलब्धि संभव हो पाती है। भगवत् सत्ता का अवलोकन करने के लिए इसी स्तर की प्रक्रिया आरंभ करनी पड़ती है अपनी मलीनताओं को हटा कर परिष्कृति लानी पड़ती है, तब कहीं जाकर उसकी दर्शन-झाँकी शक्य हो पाती है। हम ईश्वर के अंशधर हैं, उसकी अनुकम्पा प्रत्येक पर समान रूप से बरस रही है। उसका प्रकाश हर जगह हर एक में अन्दर-बाहर सर्वत्र विद्यमान है, पर ग्रहण तंत्र की विकृति के कारण हमें इसकी प्रतीति नहीं हो पाती। आवश्यकता इसी विकृति को प्रतिकूलता को समाप्त कर अनुकूलता विकसित करने की है।

भौतिक विज्ञान भी आज उस मोड़ पर पहुँच गया है, जहाँ पदार्थ के मूल स्वरूप के बारे में वह काई स्पष्ट निर्णय नहीं ले पा रहा है। पदार्थ का चेतना में रूपांतरण तो उसने स्वीकार लिया है, पर चेतना का पदार्थ में परिवर्तन को मान्यता मिलना अभी शेष है। अगले दिनों इसे भी विज्ञान क्षेत्र में मान्य ठहराया जायेगा। अभी विज्ञानियों ने इतना अवश्य स्वीकार कर लिया है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चेतन तरंगों का ही क्रीड़ा-कल्लोल है। इस बिन्दु पर आज समस्त विज्ञान परिकर एकमत हैं कि इस चेतना को जड़ उपकरणों द्वारा किसी भी प्रकार देखा, समझा और खोजा जा सकना संभव ही नहीं है। ऐसी स्थिति में नास्तिकों के थोथे तर्क उनकी अज्ञता एवं नासमझी के ही परिचायक हैं। ईश्वर के न दीखने, फलतः न होने की मान्यता अब पूर्णतः अमान्य ठहरा दी गई है। विकसित बुद्धि ऐसे तर्कों को गलत और अपर्याप्त मानती है। वस्तुतः उस निराकार और अतिसूक्ष्म सत्ता का ज्ञान-विवेक, साधना और सद्ज्ञान द्वारा ही संभव है।


कुशसन और दुरावस्था (Kahani)

त्रावनकोर राज्य में कुशसन और दुरावस्था का बोलबाला था। दीवान से लेकर साधारण अहलकार तक आलसी, कर्तव्यभ्रष्ट और भ्रष्टाचारी हो गये थे। गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने यह सब देखा तो वह खुद उटकमण्ड आया। उसने त्रावनकोर राज्य को ब्रिटिश भारत में मिला लेने का निश्चय कहला भेजा।

डलहौजी की आज्ञा वज्रपात थी। राजा सन्न रह गये फिर दुःखी स्वर में बोले, “अब कुछ नहीं हो सकता। अब किसी तरह राज्य नहीं बचाया जा सकता।”

तभी एक तीस वर्षीय युवा अधिकारी सामने आया और बोला, “आप गवर्नर जनरल से कुछ समय माँग लीजिये।” अधिकारी योग्य और कर्मठ था। पर राजा को विश्वास न हुआ। वह बोला,”थोड़े समय में तुम क्या कर सकोगे?”

अधिकारी ने आत्म विश्वास से कहा, “एक क्षण की कर्मठता मनुष्य को बदल देती है तो राज्य बदलने के लिए कुछ वर्ष बहुत हैं।”

राजा ने डलहौजी से सात वर्ष का समय माँगा और युवक को दीवान बना दिया। युवक ने अपनी प्रतिभा, दक्षता और कर्मठता से कुछ ही समय में त्रावनकोर राज्य को नयी जिन्दगी दी। युवक थे राजा सर टी रामाराव, जिन्होंने योग्य प्रशासक के रूप में अंग्रेजों से राज और सर की उपाधि अर्जित की।


मानव जीवन इस जगती का सर्वोत्तम उपहार

मनुष्य क्या है? इसका उत्तर दिया जा सकना अत्यंत कठिन है, क्योंकि वह समूची विचित्रता है। उसे भानुमती का पिटारा कह सकते हैं। अनादि काल से ही विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ, मनीषी, वैज्ञानिक, दार्शनिक, अध्यात्मवेत्ता उसकी व्याख्या विवेचना अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत करते रहे हैं। जिस दृष्टिकोण से देखा जाय, वह पूर्ण प्रतीत होता है। रासायनिक संरचना, ज्ञान तंतुओं का जाल-जंजाल, अंतःस्रावी ग्रंथियाँ मनःसंस्थान, भाव समुच्चय आदि को प्रधानता देने से भी बात बन जाती है और उसके अंतर्गत जुड़ी हुई विशेषताओं को गौण या सहायक सिद्ध किया जा सकता है।

मनुष्य ईश्वर का अंश अजर, अमर, अविनाशी आत्मा भी है और तथाकथित मनोविज्ञानियों की मान्यता वाला मूल प्रवृत्तियों-पशु प्रवृत्तियों युक्त मरणशील प्राणी भी। वह किसी का शत्रु अथवा मित्र किसी का ग्राहक किसी का स्वामी किसी का दास हो सकता है। विभिन्न सम्बन्धी नातेदार उसे अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप विभिन्न रिश्तों में बाँधते हैं। किन्हीं की दृष्टि में वह विद्वान पहलवान, कलाकार, संगीतज्ञ, वैज्ञानिक, अध्यापक, चिकित्सक, अर्थशास्त्री, कृषक, संत, दार्शनिक-समाज सुधारक आदि हो सकता है और कोई उसके दोष-दुर्गुणों को देखते हुए आलसी, व्यसनी, अपव्ययी, दुष्ट-भ्रष्ट आदि ठहरा सकते हैं। यह सभी निर्धारण आँशिक रूप से ही सही हैं- समग्र रूप से नहीं। जिसने जैसा सोचा या देखा है वह उसे उसी रूप में प्रतीत होगा। कोई भी एक व्यक्ति किसी दूसरे को समग्र रूप से जानने में समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि हर किसी की दृष्टि एक ढाँचे में ढली और एक सीमा में ही पर्यवेक्षण कर सकने में समर्थ हो सकती है।

प्रायः मनुष्य के दो स्वरूपों का वर्णन देखने को मिलता है। प्रथम-वास्तविक और दूसरा-आभासी। आत्मज्ञानी अपने को आत्मा मानते हैं और कहते है- .... पराजिग्ये।” अर्थात् मैं अपराजित आत्मा हूँ। उनका उद्घोष है कि मैं अकर्ता उपभोक्ता हूँ अविकारी हूँ। शुद्ध बोध स्वरूप हूँ एक हूँ और नित्य कल्याण स्वरूप हूँ। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार यही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप हैं पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक मनुष्य के आभासी स्वरूप की व्याख्या विवेचना में निरत देखे जाते है। उनकी दृष्टि में मनुष्य एक साइकोलॉजिकल बीइंग-मनोकायिक प्राणी है। वे शरीर और मन को महत्वपूर्ण मानते और उसी को उधेड़ बुन करने-विश्लेषण करने को प्रमुखता देते है। यही कारण है कि पाश्चात्य मनःशास्त्र को मानने वाले मनुष्य को मात्र एक अद्भुत तथा विलक्षण सचेतन जीव मानते है। जिसके पास मन और मस्तिष्क जैसे बहुमूल्य घटक प्राप्त है। वह मूल प्रवृत्तियों का गुलाम है। यौन आकर्षण ही वह प्रेरक तत्त्व है जिससे उसकी प्रत्येक भली-बुरी गतिविधियाँ संचालित होती हैं। जिसकी सन्तुष्टि अथवा अतृप्ति पर मानवी विकास अथवा पतन आधारित है।

समाज शास्त्रियों के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज का एक अभिन्न घटक तथा उसका निर्माता है। अन्यान्य क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भी अपने विषय ज्ञान के आधार पर मनुष्य को विभिन्न रूपों में परिभाषित किया है। जीवविज्ञानी उसे एक बहुकोशीय पिण्ड मानते हैं। तो ज्योतिर्विदों ने उसे तारों के बीजकोष के रूप में माना है। मनःशास्त्री कहते हैं कि मनुष्य कुशाग्र दृष्टि सुविकसित मस्तिष्क, कल्पनाशील मन तथा समर्थ शरीर से युक्त सृष्टि का एक सुविकसित प्राणी है। पुरातत्त्ववेत्ताओं की मान्यता है कि मनुष्य संस्कृति का संचायक नगर का निर्माता मिट्टी पात्र से लेकर अन्यान्य कला कृतियों का आविष्कारक संगी कृषि साहित्य जैसे विषयों का निर्माता है। जैव रसायनविदों ने मनुष्य को न्यूक्लिक एसिड एन्जाइमों के बीच पारस्परिक क्रियाशील रहने वाला प्राणी कहा है तो रसायनशास्त्रियों ने उसकी व्याख्या “कार्बन अणु की जटिल जैविक संरचना” के रूप में की है।

अर्थशास्त्रियों ने पार्थिव शरीर के रूप में मनुष्य का मूल्याँकन किया है तथा शरीर का विश्लेषण अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि मानवी काया के निर्माण में भाग लेने वाले महत्वपूर्ण संघटक कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस आदि को अलग-अलग करके उनकी कीमत आँकी जाये तो महँगाई के इस जमाने में वह लगभग सौ रुपये तक बैठती है। इस प्रकार मूल्य की दृष्टि से मनुष्य शरीर अन्यान्य पशुओं की तुलना में सस्ता और कम वजन का होता है।

पुरातन तथा आधुनिक पाश्चात्य मनीषियों एवं दार्शनिकों ने मनुष्य की व्याख्या विभिन्न ढंग से की है। दार्शनिक प्लेटो ने मानव को एक पंख विहीन द्विपाद के रूप में वर्णन किया है। दार्शनिक सेनेका उसे एक सामाजिक प्राणी मानते हैं, जबकि एल्डुअस हक्सले का कहना है कि-”मनुष्य इन्द्रियों की दासता में जकड़ा एक बुद्धिमान जीव है।” डार्विन ने जीव विकास की एक उच्च स्थिति के रूप में मनुष्य का वर्णन किया है। फ्रायड मनुष्य को पशु प्रकृतियों में जकड़ा एक जीव मानते हैं जन स्टुअर्ट मि ने उसे चलता फिरता नश्वर प्राणी माना है और कहा है कि वह अन्य जीवों की तुलना में अधिक समझदार तथा सृष्टि के लिए उपयोगी है। बर्ट्रैन्ड रसेल उसे बुद्धिमान किन्तु विध्वंसक जीव मानते हैं। भारतीय ऋषियों तथा मनीषियों ने भी मनुष्य तथा मनुष्य जीवन की विवेचना अनेक रूपों में की है। नास्तिकवादी दार्शनिक चावकि ने मनुष्य को नश्वर माना है जबकि आस्तिकवादियों की मान्यता है कि जितना असीम शाश्वत यह परमात्मा है उतना ही महान उसका पुत्र है। नश्वर शरीर है आत्मा नहीं। महर्षि व्यास महाभारत में कहते है-

“गुह्यं ब्रह्म तदिंद ब्रवीमि न मानुषाच्छेष्ठतरं हिं किंचित।” ( महाभारत शा॰प॰ 80/12)

अर्थात्- में एक रहस्य की बात बताता हूँ कि इस संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं। वस्तुतः मनुष्य ही समस्त जीवधारियों में ऐसा प्राणी है जो विवेक बुद्धि से समन्वित है। शारीरिक मानसिक और बौद्धिक क्षमता के अतिरिक्त उसको ईश्वरकृत विशिष्ट उपलब्धि भावना क्षेत्र की मिली हुई है। अन्तःकरण में उत्कृष्टता के सार तत्व बीज रूप में विद्यमान हैं जिन्हें जागृत कर वह अपने आत्मगौरव को प्राप्त कर सकता है। क्षुद्र से महान मानव से अतिमानव, नर से नारायण बन सकता है। मनुष्य ही सृष्टा के उन अरमानों को पूरा कर सकता हैं जिसके लिए उसने इतनी तीव्र आकाँक्षा की और इस दुर्लभ सृजन का कष्ट उठाया।

पाश्चात्य मनीषी कोर्लिस लैमोण्ट ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति “ह्यूमैनिज्म ऐज ए फिलाँसफी “ में लिखा है कि इस सृष्टि में अनेकों’ आश्चर्य हैं किन्तु मनुष्य से अद्भुत और श्रेष्ठ अन्य कुछ नहीं है। पास्कल के मतानुसार वह इस संसार का सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक जीव है। ज्ञान प्राप्त करके वह सृष्टि की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति करने में समर्थ है। रूसो के मतानुसार स्वतंत्र होकर भी मनुष्य प्रत्येक स्थान पर बंधनों से बंधा हुआ है। सुकरात का भी यही कथन है कि मानव जीवन श्रेष्ठ तो है पर ज्ञान के अभाव में वह व्यर्थ ही चला जाता है। मारकस एन्टोनियसस ने अपनी पुस्तक “टू हिमसेल्फ” में लिखा है कि मनुष्य ही सृष्टि एवं उसकी समस्त क्रियाओं का मूल केन्द्र है फिर भी वह स्वयं अपने लिए एक समस्या है। संसार के रहस्य को समझने में वह भले ही समर्थ हो जाय, पर अपने बारे में वह अनभिज्ञ ही बना रहता है। आदिकाल से वह अपने अस्तित्व के संबंध में उत्सुक होकर अपना और अपने परिवेश का परीक्षण करता रहा है। “आइडियाज ऑफ ग्रेट फिलासफर” नामक अपनी सुप्रसिद्ध कृति में एस॰एस॰फ्रास्ट ने कहा है कि सर्वोच्च सत्ता से सम्बन्धित होने के कारण मानव उससे तनिक ही नीचे है। स्वामी विवेकानन्द ने मानव जीवन को सर्वश्रेष्ठ माना है और कहा है कि यह पशुता, मानवता और देवत्व का संयोग है। अशुभ को शुभ में बदल देने, स्वार्थ को परमार्थ में पुरोहित कर देने के कारण ही उसका श्रेष्ठता है। प्रख्यात यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस का कहना है कि मनुष्य ही समस्त वस्तुओं का मापदण्ड है जबकि चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस का मानना है कि मानव का मापदण्ड मानव ही है। उनके मतानुसार हर दृष्टि से मनुष्य इस सृष्टि का सूत्र है। वही समाज और मूल्यों का माध्यम तथा समस्त संस्कृतियों की शक्ति का स्त्रोत है। इस प्रकार उपरोक्त कथन ऐतरेय उपनिषद् के उस वचन की पुष्टि करते हैं जिसमें कहा गया है-”ताम्य पुरुषमानयत्ता अबु्रवन सुकृत बतेति। पुरुषो वाव सुकृतम। “( ऐत॰उप॰ 1/2/3) अर्थात् मनुष्य विश्व शक्ति की सुकृति है।

मनुष्य प्रायः साढ़े पाँच फुट ऊँचा, डेढ़ सो पौण्ड भारी, सोता, खाता-पीता, बोलता, लिखता, सजता, अकड़ता दीखता भर है। पर उसकी मूल सत्ता यह काय कलेवर नहीं वरन् आत्म-चेतना है जिसमें व्यष्टि और समष्टि दोनों समाये हुए हैं। मनुष्य के इसी वास्तविक स्वरूप की महता को अध्यात्मविदों ने स्वीकारा और परिष्कृत आत्मा को परमात्मा के समतुल्य माना है। विभिन्न धर्मग्रंथों में मानव के स्वरूप का वर्णन उत्कृष्टता के रूप में किया गया है। शतपथ ब्राह्मण 2/5/11 में कहा गया है- “पुरुषो वे प्रजापतेर्नेदिष्ठम्” अर्थात् ब्रह्म का सारा रहस्य मानव में सन्निहित है, क्योंकि नर ही नारायण के अतिनिकट है। बाइबिल में भी अनेक स्थलों पर इस तथ्य का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि में मनुष्य ही परमात्मा का साकार रूप है। वही ईश्वर का जीवन्त मन्दिर है (बाइबिल-जैनेसिस 1/26,27, 5/1, 9/6 ) कुरान में कहा गया हैं कि “मनुष्य धरती पर अल्लाह का प्रतिनिधि है” ( कुरान-सुरा 2 एवं 35,36 )। तथा “अल्लाह ने मानव को सर्वश्रेष्ठ आकार प्रदान किया है” ( कुरान-सुरा 95/4, 64/3. 40/96 )। जैन एवं बौद्धधर्म में भी मनुष्य की श्रेष्ठता का ही प्रतिपादन किया गया है और उसे परमात्म सत्ता का एक लघु संस्करण बताया गया है। मानवी काया के उपलब्ध होने पर ही निर्वाण, सत्य ज्ञान, मोक्ष आदि प्राप्त किये जा सकते हैं।

इजिप्ट के प्रख्यात संत दार्शनिक हरमेस ट्रिस्मेजिस्टस ने मनुष्य को ईश्वर का एक दिव्य चमत्कार माना है। उनके अनुसार मनुष्य के समान गौरवशाली, मर्यादित एवं श्रद्धास्पद कोई भी प्राणी इस धरती पर नहीं है। ईश्वर ने ही मानवी काया में प्रवेश किया है। परमात्म सत्ता का प्रतीक प्रतिनिधि होने से वह स्वयं में समस्त ईश्वरीय गुणों से अभिपूरित है। यही कारण है कि उसकी दृष्टि निम्नगामिता को छोड़कर सदैव श्रेष्ठता की ओर परमपिता परमेश्वर की ओर ऊपर उठी रहती है।

प्रख्यात ग्रीक दार्शनिक पिको डेला मिरान डोला तथा अर्नस्ट कैसिरर ने मानव को “सार्वभौमिक मनुष्य” कहा है और तदनुरूप उसका व्यापक स्वरूप प्रस्तुत किया है। इनके मतानुसार अपने विकास अथवा पतन के लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है क्योंकि भले-बुरे का निर्णय और वरण करने की स्वतंत्रता जो उसे मिली है। वह चाहे तो अपने कर्मों के माध्यम से निम्न योनियों में भ्रमण करता रह सकता है और चाहे तो दिव्य योनियों में जन्म ले सकता है, मोक्ष प्राप्त कर सकता है। महर्षि अरविंद के अनुसार पृथ्वी पर मनुष्य ही परमात्म-सत्ता की दिव्य चेतना का सर्वोच्च प्रमाण है। यही वह साधन है जिसके माध्यम से ईश्वर इस संसार में अभिव्यक्त होता है। दिव्यता, पूर्णता एवं मुक्ति का आधार मानव जीवन ही है।

मनुष्य क्या है? इसका उत्तर इस प्रतिप्रश्न में सन्निहित है कि मनुष्य क्या नहीं है? अर्थात् वह सब कुछ है। बीज रूप में उसके भीतर विकास की असीम संभावनाएँ विद्यमान है। अपने विषय में जो जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। वह एक ऐसा अनगढ़ प्राणी है, जो सुगढ़ बन सकता है, नर से नारायण बन सकता है और अधोगामी मार्ग अपना कर नर-पशु-नर पामर भी बन सकता है। अभीष्ट दिशा में चल पड़ने की उसे खुली छूट है। शरीर, मन, अन्तःकरण तथा उससे जुड़ी असामान्य क्षमताएँ सदुद्देश्यों से जुड़कर उसके विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है और निकृष्ट दिशा में नियोजित होकर पतन पराभव की ओर ढकेल भी सकती है।

अपने को वह रसायनों का सम्मिश्रण, मूल प्रवृत्तियों का गुलाम, अणुओं का संगठन अथवा चलता फिरता नश्वर प्राणी भर मानता रहे, यह मनुष्य के लिए शोभा नहीं देता। वह ईश्वर की अंशधर आत्मा है, पंचमृतों से विनिर्मित यह काय कलेवर नहीं जो प्रत्यक्ष दीखता है। अतः उसके लिए उचित यही है कि वह मानव जीवन की इस गरिमा को समझे तथा यह माने कि सुरदुर्लभ प्रस्तुत अवसर उसे विशिष्ट प्रयोजन के लिए प्राप्त हुआ है, जिसका सदुपयोग होना चाहिए। श्रेष्ठ मान्यता के अनुरूप ही विचारणा का क्रम चलता और अन्ततः वही आचरण में उतरता है। भौतिक मान्यताओं से ऊपर उठकर ही मनुष्य का सही एवं शाश्वत मूल्यांकन करना विवेक सम्मत है।


अन्तर्मुखी आत्म निरीक्षण

मनुष्य की स्थूल संरचना बहिर्मुखी है। उसके अंग-अवयव बाहर की ओर निकले हुए हैं। हाथ, पैर धड़ से बाहर लटकते हैं कान, नाक, होंठ आदि की बनावट भी ऐसी ही है। समूचा शरीर का बाहरी भाग ही दीख पड़ता है। आंखें बाहर के दृश्य देखती हैं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं नाक बाहर से आने वाली सुगंध को सूँघती है। मस्तिष्क बाह्य जगत की हलचलों सुविधाओं और कल्पनाओं की उड़ाने उड़ता रहता है। हम बाहर के लोगों से निपटने और उनके साथ सम्बन्ध बनाने, बिगाड़ने की, उससे इच्छित लाभ उठाने की बात सोचते रहते हैं। यह बहिर्मुखी प्रवृत्ति इतनी प्रगाढ़ हो जाती है कि उसके अतिरिक्त और कुछ करना तो दूर सोचता तक नहीं बन पड़ता।

मनुष्य की वास्तविक सत्ता बाहर नहीं भीतर है। पेड़ की जड़े जमीन में भीतर धँसी होती हैं। वे दीखती नहीं तो भी पेड़ का समग्र पोषण उन्हीं पर निर्भर रहता है। वे सुदृढ़ होती हैं। गहरी घुसी होती है। पर्याप्त खाद, पानी जमीन से खींच सकने में समर्थ होती है तो पेड़ का बाह्य कलेवर सुविकसित होता है। फलता फूलता है। दीर्घजीवी बनता हैं। आँधी तूफानों का सामना करते हुए अपनी सत्ता बनाये रहता है। किन्तु यदि जड़ों की स्थिति दुर्बल हो, वे गहराई तक प्रवेश न करें और समुचित खुराक खींचने में असमर्थ रहे तो यह भी निश्चित है कि वृक्ष का विकास सम्भव न हो सकेगा। वह गई-गुजरी स्थिति में रह कर अपना असमय में ही दम तोड़ देगा। मनुष्य के सम्बन्ध में भी यही बात शत प्रतिशत लागू होती है।

हृदय, मस्तिष्क, आमाशय, यकृत, गुर्दे आदि धड़ के भीतर खोखले में है। उसी गह्वर में भू्रव बनते और परिपक्व होते हैं। यह भीतर की स्थिति जब तक यही बनी रहती है। कायिक स्वास्थ्य और सौंदर्य भी ठीक बना रहता है। किन्तु यदि भीतर गड़बड़ी रहे तो हाथ, पैर जैसे बाह्य अवयवों के सहारे जीवन रथ की गाड़ी धकेलना कठिन पड़ेगा। गहरे का सौंदर्य भी पिलपिला जायेगा।

व्यक्तित्व की विशिष्टता का वरिष्ठता का उत्कृष्टता का सुसंस्कारिता का जहाँ तक सम्बन्ध है वे अंगों अवयवों की सुदृढ़ता पर निर्भर नहीं हैं। प्रतिभावानों का शरीर मोटा तगड़ा हो यह आवश्यक नहीं। स्कूल शिक्षा के सहारे क्लर्की मिल सकती है किन्तु महामानव स्तर की गरिमा का व्यक्तित्व के साथ जुड़ा होना ही अनेकानेक सफलताओं का आधारित कारण होता है। अन्तराल की गहराई में रहने वाली यह गरिमा यदि गये- गुजरे स्तर की हो तो व्यक्ति समर्थ और कुशल होने पर भी चोरी, ठगी, बेईमानी, बदमाशी के अतिरिक्त और कुछ कर न सकेगा। इस निकृष्टता के कारण उसे आये दिन आपने स्थान और मुखौटे बदलने पड़ेंगे। एक दिशा में- एक क्षेत्र में प्रामाणिकता, पारंगतता प्राप्त करने का जो सुयोग मिलना चाहिए उससे उसे वंचित ही रहना पड़ेगा। गुण, कर्म स्वभाव ही मनुष्य के मूल्यांकन का एक मात्र सुनिश्चित आधार है।

बाहरी जाल-जंजाल में तो सभी उलझे रहते हैं, पर ऐसे कोई विरले ही होते हैं जो अन्तर्मुखी होने की आवश्यकता अनुभव करते हैं। आत्म-समीक्षा में निष्पक्ष न्यायाधीश जैसी तीक्ष्णता बरतते हैं। जो त्रुटियाँ देख पाते हैं उनके सुधार में समग्र संकल्प शक्ति के साथ संलग्न होते है। जिन सत्प्रवृत्तियों की कमी है उन्हें महा-मानवों की जीवन-चर्या के साथ तुलना करते हुए समझने का प्रयत्न करते हैं कि किन अवरोधों के कारण व्यक्तित्व का ऐसा विकास न हो सका जो प्रामाणिक समझा जाना और अभीष्ट सफलताओं का वरण करता। जिन सद्गुणों की अपने में कमी दीखती है उनका अभिवर्धन करते रहना ही आवश्यक है। मात्र दुर्गुणों को उखाड़ते रहना ही काफी नहीं है। खेत को जोतते तो रहा जाय पर उसमें उपयोगी बीज बोने सींचने का प्रबंध न किया जाय तो बहुमूल्य धन-धान्य से कोठे किस प्रकार भर सकेंगे;।

क्षुद्र व्यक्ति मात्र संकीर्ण स्वार्थपरता की बात ही सोचते हैं। उन्हें आपाधापी 4 अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। पेट-प्रजनन की मृग-तृष्णा में भटकते रहने के अतिरिक्त उनके श्रम, समय का उपयोग किन्हीं उच्च प्रयोजनों के लिए लग ही नहीं पाता आत्म-विकास के सम्बन्ध में कहा सुना तो बहुत कुछ जाता है, पर वास्तविकता यह है कि जिसका दृष्टिकोण उदात्त है, जिसे दूसरों का हित भी अपने हित के समान ही महत्वपूर्ण लगता है। वो छोटे परिवार की चिंता में ही निरत न रह कर विशाल मानव परिवार की विश्व परिवार की बात सोचता है, उसी के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि वह दिव्य दृष्टि का अधिकारी बना। विश्व परिवार की अवधारणा वाला व्यक्ति ही संकीर्णता की परिधि से ऊँचा उठ कर परमार्थी बन सकता है। जिसने परमार्थ को ही सर्वोत्तम स्वार्थ बना लिया वस्तुतः वही आत्मवादी है। उसी का आत्म-विकास हुआ समझा जाना चाहिए।

बहिर्मुखी दृष्टिकोण से हम प्रकृति के पदार्थ के अनेकानेक पक्षों को जान सकते हैं। स्कूलों में यह सब पढ़ाया और पुस्तकों में यह सब बताया भी जाता है। पर्यटन एवं संपर्क परामर्श से इस दिशा में अतिरिक्त जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इन दिनों तो अखबार, रेडियो, टेलीविजन आदि के सहारे भी साँसारिक गति-विधियों रीति-नीतियों के सम्बन्ध में भी बहुत कुछ जाना जा सकता हैं। किन्तु मौलिक प्रश्न निजी व्यक्तित्व के विकास परिष्कार का है। इसके बिना किसी के लिए यह सम्भव नहीं कि प्रगति के पथ पर द्रुतगति से अग्रसर हो सके और किसी ऊँचे लक्ष्य तक पहुँच सके। चिन्तन चरित्र और व्यवहार ही मनुष्य की चेतन सम्पदाएँ हैं। इन्हीं के सहारे किसी के लिए सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में अग्रसर बनना सम्भव हो सकता है।

इस प्रयोजन के लिए अंतर्मुखी होने की प्रवृत्ति का पनपना आवश्यक है। बाहर के किसी व्यक्ति, पदार्थ या घटनाक्रम की समीक्षा हो सकती है। उसके गुण दोषों का निर्णय निर्धारण किया जा सकता है। इस संदर्भ में दूसरों की सलाह भी काम दे सकती है। पर आपने आप के सम्बन्ध में यह सम्भव नहीं है। कारण कि दूसरा किसी दूसरे की अन्तरण वस्तुस्थिति को समझ नहीं सकता। बाह्य गति-विधियों का एक अंश ही सामने आता है। सदा किसी के साथ रहना और व्यक्तित्व की समग्र समीक्षा कर सकना सम्भव नहीं होता, क्योंकि अक्सर लोग अपना बाहरी स्वरूप कुछ दूसरा रखते हैं। भीतर से वैसे नहीं होते जैसे कि अपने को प्रकट करते हैं। ऐसी दशा में समीक्षकों को गहराई तक प्रवेश न कर पाने के कारण बहुधा धोखा ही रहता है। जब वास्तविकता का पूरा पता ही नहीं लग पाता तो यही समीक्षा कैसे बन पड़े और सुधार परिष्कार का परामर्श दे सकना कैसे बन पड़े? फिर कोई किसी के परामर्श को किस हद तक स्वीकार, कार्यान्वित कर सकता है? इसका निश्चय करना सहज नहीं बन पड़ता। इसके लिए अपनी ही परख और सलाह कारगर हो सकती है। अपने सम्बन्ध में अपना निर्णय ही सटीक बैठ सकता है।

आत्मिक प्रगति के लिए एक ही अवलंबन सर्वश्रेष्ठ है कि अन्तर्मुखी होकर आत्म-निरीक्षण की पद्धति को अपनाया और विकसित किया जाय। यह कार्य सरल नहीं कठिन है, पर अभ्यास से सब कुछ संभव हो सकता है। अपने रोग के लक्षण तो अनुभूतियों के आधार पर समझा में आते है, पर उसका कारण, निदान, उपचार करने के लिए ऐसा परीक्षक चाहिए जो स्थिति को गहराई से समझा सके और उपचार कर सके आत्मिक प्रगति के सम्बन्ध में रोगी को ही निदान उपचार करना होता है इसके लिए अन्तर्मुखी आत्म-निरीक्षण ही काम आता है।


आम्रवृक्ष से अनुरोध किया (Kahani)

थोड़े से विषैले कीड़ों ने आम्रवृक्ष से अनुरोध किया कि उसे अपने आश्रय में जीवन यापन करने की आज्ञा दी जाये। उदार वृक्ष ने अपनी सहजशीलता से प्रेरित होकर वैसा करने की छूट दे दी।

कीड़ों ने वंश वृद्धि आरम्भ कर दी। देखते-देखते वे असीम संख्या में बढ़ गये। उनने फल-फूल और पत्तों पर अड्डा जमाया और वृक्ष की समूची उपयोगिता-हरीतिमा और शोभा को समाप्त कर दिया।

साथ वाले दूसरे वृक्षों ने उपालम्भ देते हुए कहा-कि आप सज्जन  रहते पर उसका अतिवाद अपना कर दुर्जनों को आश्रय तो न देते।


ध्यान धारणा का लक्ष्य और प्रयोजन

ध्यानयोग का प्रधान उद्देश्य मन की उड़ानों को केन्द्रीभूत कर एकाग्रता के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना है। यह एकाग्रता भौतिक क्षेत्र में प्रगति के और आत्मिक क्षेत्र में सिद्धि के साधन जुटाती है। अपने प्रभाव से साधक को विभूतिवान बनाती है।

इसलिए आत्म-विज्ञान के क्षेत्र में सभी साधनाओं को एकाग्रता का अभ्यास कराने के रूप में आरम्भिक कदम बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए अनेक उपाय, अनेक विधान प्रचलित हैं। उनकी संख्या और भी बढ़ाई जा सकती है। योगशास्त्र में राजयोग, हठयोग, लययोग बिन्दुयोग, मंत्रयोग आदि विशिष्ट हैं। दार्शनिक योगों में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का निर्धारण है। इनमें से किसी का भी अवलम्बन लिया जाय, आश्रय लिया जाय एकाग्रता की साधना अनिवार्य रूप से करनी होगी। ध्यान योग का आधार यही है। इसी कल्पवृक्ष पर कामनाएँ पूर्ण करने वाले अनेकानेक मधुर फल लगते हैं।

इष्टदेव की छवि ध्यान, त्राटक साधना, नाद श्रवण, खेचरी मुद्रा, बिन्दु केन्द्र, प्रेक्षा ध्यान, भावातीत ध्यान आदि अनेक विधि-विधानों का विभिन्न मंचों से प्रचलन है। दक्षिण मार्गी वैदिक और वाममार्गी ताँत्रिक मार्गों में से कोई भी मार्ग या विधान ऐसा नहीं है जिसमें एकाग्रता साधने के लिए अपने-अपने ढंग के विधि-विधान नहीं बनाये। ध्यानयोग का प्रारम्भ न कराया जाता हो आगे की साधनाएँ उसके उपरान्त ही आरम्भ होती हैं। मुख्य द्वारा खुल जाने के उपरान्त ही भवन में प्रवेश मिलता है और उसके भीतर बने हुए कमरों, कोठों, दालानों, तलघरों में जा सकना सम्भव होता है। जब तक ध्यान की एकाग्रता न सधे तब तक अंतर्जगत के प्रवेश के लिए प्रतीक्षा पूर्वक ठहरना पड़ता है। ताकि ध्यान धारणा को अपने स्वाभाविक क्रम में विकसित एवं परिपक्व होने का अवसर मिल जाय। इस प्रसंग में हथेली पर सरसों नहीं बैठती। मन सहज काबू में नहीं आता। रीछ बन्दर पालने वाले जानते है उन अनगढ़ प्राणियों को कलाकारों जैसी भूमिका निभाने के लिए प्रशिक्षित करना कितना कठिन होता है। फिर मन तो पूरा उस्ताद है। वह चकमा देना भली भाँति जानता है। बिठाया ध्यान के लिए जाय, पर वह सैर गली-कूचों की करता है और आकाश, पाताल की खबर लाता है। इस स्थिति में धैर्य और प्रयत्नपूर्वक स्थिर रहने का अभ्यास कराना पड़ता है। विचारों की शक्ति बड़ी है, संकल्प की क्षमता असीम है यदि उसे दृढ़तापूर्वक करते रहा जाय तो मनोनिग्रह जैसे कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं।

एकाग्रता साधने के अनेक उपाय उपचार हैं। उन्हें योगाभ्यास से भी किया जा सकता है और बिना योगाभ्यास के सामान्य कला-कौशलों में भी नट, बाजीगरों की समस्त कलाएँ एकाग्रता पर निर्भर है। मुनीम, वैज्ञानिक साहित्यकार, जेबकट सभी अपने कौशल में यथासम्भव इसी विशेषता का प्रयोग करते है। योगाभ्यास स्तर की ध्यान धारणाओं से भी मन सध जाता है। अनेकों क्षेत्रों में भाग दौड़ करने की अपेक्षा एक निश्चित प्रसंग पर लगने लगता है। यह तो प्रथम चरण है जैसा कि छोटे बालक का घुटने के बल चलने की अपेक्षा उसका पैरों पर खड़े होना और चलने के लिए ठुमकना। पौरुष तो तब आरम्भ होता है जब मनुष्य बड़ा होकर समझदार बनता और उपयोगी कार्यों में संलग्न होता है। घिसटने के स्थान पर ठुमकना सफलता तो है, उसे प्रगति भी कह सकते हैं, पर यह ऐसी प्रगति नहीं है जिस पर सन्तोष या गर्व किया जा सके।

ध्यान धारणा की क्रिया में कई लोग अभ्यस्त हो जाते हैं। मन को भागदौड़ करने के स्थान पर एक खूँटे से बँधा रहने पर बाधित कर देते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि साधन ने अभीष्ट दिशा में तत्परतापूर्वक प्रयत्न किया है। और मानसिक उछल कूद को प्रतिबंधित अनुशासित कर दिया है। पर देखना यह है कि बच्चे को खेल-खिलवाड़ करने से रोक कर घर में बैठे रहने के लिए ही बाधित किया गया या उससे पढ़ने लिखने जैसे किसी काम में भी लगाया गया। अनुबद्धता की उपयोगिता तभी है जब दौड़ धूप से बचाये गये समय का कोई श्रेष्ठ उपयोग होने लगे, अन्यथा आकाश में उड़ने वाले तोते को पिंजड़े में कैद कर देने जैसी बात हुई। अपना मनोरंजन भले ही हुआ हो, पर तोते की स्वाभाविक प्रवृत्ति रोक देने पर उसे तो व्यथा ही हुई। पिंजड़े की खिड़की जब खुली रह जाती है तो तोता अवसर पाते ही उड़ जाता है और फिर उस कैद खाने में बन्द होने के लिए स्वेच्छापूर्वक नहीं लौटता। चंचल मन का भी यही प्रयास रहता है कि दबाव देकर एकाग्र किये जाने की प्रक्रिया जब ढीली पड़े तो उड़ने के प्रयत्न में लगने और मन-मानी करने की पुरानी आदतें प्रबल होंगी।

एकाग्रता साधने के साध ही यह निश्चय भी करना चाहिए कि इस उपलब्धि का प्रयोग किस काम में किया जायगा। हाथी पर अंकुश, घोड़े पर लगाम, ऊँट पर नकेल बैल पर नाथ का दबाव इसलिए डाला जाता हैं कि उसे इच्छित दिशा में चलाया जाय। उससे उपयोगी काम लिया जाय। यदि ऐसा कुछ न करना हो तो फिर बँधनों में प्राणी को बाधित करना बेकार है।

धन का उद्देश्य संयम साधना होना चाहिए। एकाग्र मन से अपने गुण, कर्म स्वभाव में घुसे हुए दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ा जाना चाहिए और इसके बाद जहाँ भी गन्दगी दिखाई पड़े उसे बुहारना चाहिए। टूट,फूट की मरम्मत करनी चाहिए। बिगाड़ को सुधार में परिवर्तित करना ध्यान धारणा द्वारा उत्पादित सूक्ष्म बुद्धि का प्रधान कार्य है। मनुष्य देवत्व की प्रतिमा है। उसकी अन्तराल में समाहित विशिष्टता इसी कुसंस्कारी कूड़े करकट के नीचे दबी पड़ी रहती हैं। उसे स्वच्छ किया जा सके और सद्गुणों को अलंकार उपकरणों से सुसज्जित किया जा सके तो समझना चाहिए कि नया देव जन्म धारण किया। मनुष्य मुर्खताएँ करता है तो पशु कहलाता है और जब भ्रष्ट चिन्तन दुष्ट आचरण अपनाता है तो उसे पिशाच कहते हैं। यह दोनों ही लानतें अधिकाँश मनुष्यों पर लदी होती है। वे अपने दोष, दुर्गुणों को समझ तक नहीं पाते और न यह विदित होता है कि हेय को हटा कर उसके स्थान पर श्रेय की स्थापना कैसे की जाय? ध्यान का दूसरा चरण यह है कि आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार का प्रयत्न किया जाय। व्यक्तित्व को सद्गुणों के ऐसे अलंकारों से सजाया जाय कि उसकी शोभा सुषमा देखते ही बने। दुर्गुणी व्यक्ति कोयले के समान जलावन मात्र बन कर रहता है पर यदि उसकी परिणति हीरे के रूप में हो सके तो समझना चाहिए कि उसका मूल्य और सम्मान बढ़ गया।

यह कार्य अन्तर्मुखी होने से हो सकता है। ध्यानपूर्वक उसकी कड़ी समीक्षा की जाय। मानवी गरिमा की कसौटी पर कसकर अपने आपे के हर पक्ष को देखा जाय तो वे छिद्र सहज ही बन्द किये जा सकते हैं, जिनमें होकर बहुमूल्य जीवन तत्त्व टपकता बिखरता रहता है। सज्जनता अर्जित करने के लिए कुछ विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता। दुर्गुणों को पहचाना और हटाया जा सके तो फिर रिक्तता को भरने के लिए सद्गुणों की सेना दौड़ पड़ती है और व्यक्तित्व को प्रामाणिक और प्रखर बना कर रहती है।

ध्यान धारणा का तीसरा चरण वह है जिसमें हाथ में लिए हुए कामों को समूची तत्परता और तन्मयता के साथ किया जाता है। काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न माना जाय और उसे पूरे मनोयोग के साथ रुचिपूर्वक किया जाय। काम में रस लिया जाय तो उसकी मिठास अनुपम होती है। कर्त्तव्य पालन वह गुरुता है जिसे करते रहने पर हर घड़ी संतोष और आनन्द उपलब्ध होता रहता है। परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

मन की निग्रहित करना उत्तम तो है पर समग्र नहीं उसका समुचित लाभ तभी मिलता है। जब मानसिक चेतना को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में नियोजित करने के निश्चय कर लिया जाय।


Quotation

इस पर स्वामी जी ने उत्तर दिया बंदूक बहुत अच्छी होते हुए भी यदि कोई उसे चलाना न जाने तो उसे सैनिक का श्रेय नहीं मिल सकता। इसी प्रकार भारत का दर्शन तो ऊँचा है पर भारतीय उसे व्यवहार में लाना नहीं जानते।


धर्म्माविरोधी यो धर्म्मःस धर्म्मः सत्यविक्रमः

संसार में कितने ही सद्ग्रंथ हैं, कितने ही धर्म और दर्शनशास्त्र हैं, कितने ही मत, पँथ और सम्प्रदाय है। अधकचरे ज्ञानी अथवा सर्वथा अज्ञानी मनुष्यों के मन इन सबमें ऐसी अनन्य बुद्धि और आवेश से अपने आपको बाँधे हुए हैं कि जो कोई जिस ग्रन्थ या मत को मानता है उसी को सब कुछ जानता है। यह देख भी नहीं पाता कि उसके भी परे कुछ है। वह अपने चित्त में ऐसा हठ पकड़े रहता है कि बस यही या वही ग्रन्थ भगवान का सनातन वचन है और बाकी सब ग्रन्थ या तो केवल ढोंग हैं या यदि उनमें कही कोई भगवत्प्रेरणा या भाव है तो वह अधूरा है।

इसी निषेधात्मक चिन्तन के कारण अधिकाँशतया धार्मिक होने के नाम पर इधर-उधर भटकते और अँधेरे में ठोकरें खाते फिर रहे है। बड़े मजे की बात तो यह है कि बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग भी प्रायः इन पक्षपातपूर्ण आग्रहों और व्यर्थ के झगड़ों में पड़कर इन्हें पुष्टि देते रहे हैं कोई तमोभाव ही उनके बौद्धिक प्रकाश में मिलकर उसे अहंकार या आध्यात्मिक अभ्मान से ढक कर भटकता रहा है।

इस निषेधात्मक चिन्तन पूर्वाग्रही बौद्धिकता से कैसे उबरा जाय? क्या कोई ऐसा सूत्र है, जो विविध धर्म मतों सम्प्रदायों तथा दर्शनों के मूल तत्त्व को अपने में पिरोता है? ये प्रश्न ऐसे हैं जिनके समाधान से विश्व मनीषा को नूतन दृष्टि मिलेगी। चिन्तन के नए आयाम का विकास होगा। एक ऐसा सेतु विनिर्मित होगा जिसके सहारे सभी पार हो सकेंगे।

ऐसे आधार के लिए जिसमें “सर्वमिदें प्रोक्त” हो आर्यावर्त के चिन्तनागर में दृष्टि डालनी होगी। इस आगार का सर्वाधिक मूल्यवान मणि भगवद्गीता आज भी अपने स्निग्ध प्रकाश से मानवता का पथ प्रदर्शन कर सकने में सक्षम है। महर्षि कृष्ण द्वैपायन द्वारा सम्पादित यह ग्रन्थ काल की दृष्टि से भले ही लगभग .... वर्ष प्राचीन हो गया है किन्तु उसमें पूर्व की ही भाँति आज भी समन्वय सामंजस्य की अद्भुत क्षमता विद्यमान है।

इस समन्वय क्षमता के कारण ही विश्व चिन्तन के अनेकानेक उड़गनवृन्दों के मध्य शशि के सदृश वह सुशोभित है। इसमें साम्प्रदायिक जातिगत, देशगत कट्टरता की प्रखरता न होकर- सामंजस्य की स्निग्ध छटा है। इसका दिव्य सन्देश सार्वभौमिक रूप से उपादेय है। पूर्व में आचार्य शंकर के पूर्ववर्ती चिन्तक बोधायन उपषर्ष, टंक, सुन्दुरपाण्ड्य से लेकर परवर्ती अध्येता पद्मपाद वाचस्पति, मधुसूदन, अरविन्द आदि ने एकमत से उसकी उपादेयता को स्वीकारा है।

इसका समन्वयात्मक सूत्र न केवल अपने में भारतीय षड़दर्शनों के मूल तत्त्वों को पिरोता है अपितु मसीही-इस्लाम आदि धर्मो के मूल तत्व भी इसमें उत्कृष्टता के साथ गुथे हुए हैं। इसी कारण पश्चिमी जगत के डील्स, काण्ट, फिक्ते, शेलिंग, हेंगल, डायसन, तथा राल्फ वाल्डो इमर्सन आदि चिन्तक अपने धर्म के मूल तत्त्व तथा उसकी गवेषणात्मक पद्धति को पाकर कृतकृत्यता की अनुभूति कर सके।

इस्लाम धर्म के अनुयायी तथा मुगल युवराज दाराशिकोह ने अपने धर्म के मूलतत्वों के पाने के कारण ही फारसी में इसको अनूदित कराया था। इसमें प्रकारान्तर से मोतजला, करामी, अशआरी सम्प्रदायों के आधार समाए हुए हैं। इतिहास के अधिकारी विद्वानों ने इसी कारण इस्लामी दर्शन पर अरस्तु, फिला, पलोटिनस जोरोस्टर, भनी के विचारों का प्रभाव स्वीकारने के साथ वेदान्त के साथ सामंजस्य बिठाने में भी संकोच नहीं किया है।

कुरान में परमात्मा के सर्वतत्व की चर्चा करते हुए कहा गया है कि परमात्मा की दृष्टि से अपने को कोई बचा नहीं सकता ( कुरान सुरा 89, 26 सूरा 57, 6 10 ) परमात्मा के सर्वज्ञत्व का विचार गीता हृदि सर्वस्य विष्ठितम कहकर प्रतिपादित करती है। इसमें परमात्मा के सर्वज्ञत्व का प्रतिपादन विशेष रूप से मिलता है। ब्रह्म को एकमात्र परमार्थिक सत्ता स्वीकार करते हुए जगत को अनित्य बताया गया है। भाष्यकार शंकर ने जगत की उपमा इन्द्रजाल से की है। इसी प्रकार कुरान में भी एक स्थल पर कहा गया है कि जान लो कि यह साँसारिक जीवन खेल-तमाशा है। यहाँ का बाह्य आडम्बर अन्दर में मिथ्या अहं को जन्म देने वाला है।

परमात्म सत्ता की ही तरह जीव सत्ता का भाव भी गीता के अनुरूप ही है। इस्लामी दर्शन का प्रसिद्ध दार्शनिक गजाली ( 1059-11111ई॰) जीव का लक्षण बतलाते हुए कहता है- “व लेसल-वदनो मिन कदाये जातेका-फदन्ह दाम ले- वदने लय अद्योका” अर्थात् शरीर तेरे अपने लक्षणों में नहीं है, इसलिए शरीर का नष्ट होना तेरा नष्ट होना नहीं है। जीवन के अविनाशित्व का भाव गीता “अनोनित्यः शाश्वताऽयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे” कहकर प्रतिपादित करती है।

गजाली का परवर्ती दार्शनिक इष्नरोश्द परम विज्ञान की अवस्था का वर्णन करते हुए मावाद तबइयात में स्पष्ट करता है कि ईश्वर का ज्ञान ज्ञान के ज्ञान का नाम है, क्योंकि उस अवस्था में ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता में विभेद नहीं रहता। गीता इसी को ज्ञानज्ञेय ज्ञानगमयं कहकर स्पष्ट करती है। ईश्वर प्राप्ति के सम्बन्ध में गीता तर्क के स्थान पर श्रद्धा को महत्व प्रदान करती है। इसी तरह दार्शनिक अबुल हुसैन अलनूरी का कथन है कि ईश्वर को तर्क द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता उसे ईश्वर द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। अलनूरी की ही तरह खल्दून का भी यही चार है कि तर्क ज्ञान को उत्पन्न नहीं करता।

गीता में जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया इन चार अवस्थाओं को निरूपित किया गया है। इस्लामी दर्शन में यही चार अवस्थाएँ चार मंजिलों के नाम से प्रसिद्ध हैं। पहली जागृत अवस्था को इस्लामी दर्शन में नासूत स्वप्नावस्था को “मलकूत’ सुषुपित को ‘जबरुत’ और तुरीया को “लाहूत” कहा गया है। तुरीयावस्था की अभेद स्थिति का अनुभव इस्लामी दार्शनिक की चौथी मंजिल लाहूत का अवलहक का अनुभव है।

इस प्रकार गीता एवं इस्लामी दर्शन में विभेद मात्र नाम का ही है। तत्व एवं सिद्धान्त की दृष्टि से सर्वथा अभेद ही है। उदाहरणार्थ गीता का अद्वैत इस्लाम में तौहीद गीता का परम सत्य इस्लाम का मुतलक गीता का सन्यस्य सत्यम् इस्लाम में हकीकत उलहकाहक और गीता की ज्योतिषाँ ज्योतिः इस्लाम में नूर अल नूरिन के नाम से प्राप्त है। गीता जिसको मिथ्या और माया इस्लामी दर्शन में उसे मअलूय हम अदम और मौजूद-इमौहूय कहते हैं। जिस प्रकार इसमें ईश्वर को व्यक्त–व्यक्त सर्वव्यापी, एवं अन्तर्यामी कहा गया है उसी प्रकार इसलामी दर्शन में ईश्वर को ‘बातिन’ और ‘जाहिर’ मुदीत और सादी बताया है।

उपर्युक्त विवेचन इस तथ्य को उजागर करता है कि इस्लाम के मूल तत्व किस तरह गीता के सामंजस्य सूत्र में पिरोए है। यह साम्य इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्धों की प्राचीनता को स्पष्ट करता है। इसी के आधार पर डा॰राममूर्ति शर्मा ने अपने शोध प्रबन्ध “अद्वैत वेदान्त में बताया है कि इस्लामी दर्शन पर गीता का किस कदर स्पष्ट प्रभाव है। इसीलिए ब्राउन, मैकस हार्टिल, गोल्ड जीहर आदि पाश्चात्य विद्वानों ने अपने ग्रन्थों में स्पष्ट घोषित किया है कि इस्लाम की विचार धारा के प्रमुख तत्त्व भारतवर्ष से लिए गए हैं।

गीता का तात्पर्य प्रभाव से नहीं है। न ही यह अपने द्वारा प्रदान किए गए विचारों का बदला माँगती है। इसका सूत्र तो प्रेमयोग में अन्तर्निहित है इसी को अपनी भाषा में “ मयि सर्व भिदं प्रोक्त सूत्रे मणि गणंहवा” कहकर घोषित करती है।

इसमें निरूपित जीवन दर्शन के सिद्धान्तों को यदि हम सब व्यवहार में ला सकें। हमारे अपने जीवन में आचरण, व्यवहार तथा सिद्धान्त की एकरूपता स्थापित हो सके तो जिस गीता के सामंजस्य सूत्र में सभी धर्म-दर्शनों के मूल तत्त्व पिरोए हैं। उसी प्रकार सिद्धान्त और व्यवहार के एकरूपता के सूत्र में समूची मानव जाति आबाद हो जायेगी। साम्प्रदायिक कट्टरता की दीवारें ढह जाएँगी। हिंदू मुस्लिम का विभेद समाप्त हो जाएगा। कट्टरता और इससे विभिन्न उपद्रवों की कालिख से पुता धर्म का विकृत स्वरूप पुनः अपना वास्तविक सौंदर्य प्राप्त कर सकेगा। इसी वास्तविकता को प्राप्त करने, अपनाने के लिए गीता अपने सप्तशत मन्त्रों से निरन्तर सन्देश सूना रही है।


सिद्ध पुरुषों का स्वरूप और अनुग्रह

समुद्र को यों अचल और अस्थिर माना जाता है फिर वह गतिविधियों से रहित नहीं रहता। उसके विभिन्न रूप भी बनते रहते है। ऊँची नीची लहरें, ज्वार-भाटे, तूफान, भँवर आदि के कारण वह चंचल भी दिखाई पड़ता रहता है। सूर्य की ऊर्जा एक है जो सर्वत्र अपनी सौर मण्डल परिधि में वितरित होती रहती है, पर उस फरसता में भी अंतर रहता है। समीपवर्ती बुध अग्नि-काण्ड की तरह तपता है, जबकि मध्यवर्ती दूरी वाले पृथ्वी, मंगल जैसे ग्रहों में सह्य तापमान रहता है। दूरवर्ती प्लेटो जैसे ग्रह सदा शीतल ही रहते है। उन तक स्वल्प मात्रा में पहुँचता है। पर ब्रह्म की एकता, प्रचंडता और समस्वरता में कोई व्यवधान नहीं पड़ता, परिस्थितियों के अनुरूप उसकी विराट् सत्ता हलचल नहीं होती। उसकी इच्छा एवं व्यवस्था को पूरा करने के लिए विविध माध्यम भी अपना-अपना काम करते रहते है उत्पादन, अभिवर्द्धन और परिवर्तन की त्रिविध क्रियाएं तो अपने ढंग से चलती ही रहती है, फिर भी समय-समय पर बादलों का उठना, बरसना मेघों का दहकना, चमकना, तूफान, अन्धड़ चक्रवात जैसे दृश्य प्रकृति क्षेत्र में दीख पड़ते है। यों ब्रह्म की तरह प्रकृति भी शान्त और व्यवस्थित माना जाता है। पवन सर्वदा नियत प्रवाह में बहती है। किन्तु उसमें भी यदा-कदा जहाँ-वहाँ भयंकर चक्रवात और तूफान उठते देखे गये हैं। दुष्प्रभाव से उसका तापमान भी न्यूनाधिक हो जाता है। को कहते हैं- एकता के बीच अनेकताओं का रहना। अनेकताओं के बीच एकता के दर्शन करना। पृथ्वी गोल है। भी उसमें पर्वतों खंदकों की कमी नहीं, दीपों महाद्वीपों के कारण वह छिन्न-भिन्न एवं अनेक रूपों में छाई हुई भी दीखती है। इसे नियन्ता की उसकी इच्छा या अवस्था की विचित्रता ही कह सकते है।

परब्रह्म एक है उसे विराट विश्व के रूप में प्रत्यक्ष रूप में भी देख जा सकता है। भूलोक अथवा ब्रह्माण्ड उसकी प्रत्यक्ष छवि है। इस विशालता में चलती रहने वाली विभिन्न हलचलों का क्रियान्वयन में उसकी विभिन्न सामर्थ्य काम करती रही हैं, उसी प्रकार जैसे कि शरीर-के अनेक अवयव मिलजुल कर जीव चेतनाओं के अनुशासन में काम करते रहते हैं। प्रकृति में ताप, ध्वनि और प्रकाश की शक्तियाँ सक्रिय है। पंच तत्वों, पंच प्राणों का अपना एक विशिष्ट परिकर है जो जीवधारियों के उत्पादन अभिवर्द्धन में कार्यरत रहता है।

विश्व व्यवस्था के चेतना क्षेत्र को गतिशील बनाने में पराशक्ति के कितने ही सचेतन घटक है। इनमें सर्वोच्च स्तर के हैं-देव। जो ब्रह्म चेतना के अतीव निकट एवं उसके साथ जुड़े हुए माने जाते है। उनकी संरचना अपेक्षाकृत अधिक प्रत्यक्ष है। वे ईश्वर इच्छा व्यवस्था को कार्यान्वित करने में संदेह वाहक की भूमिका निभाते हैं असन्तुलनों को सम्भालते हैं। क्षतियों की पूर्ति करते हैं। अनौचित्य को औचित्य में बदलते हैं। जीवात्माएँ उनका आश्रय लेकर परमतत्व तक पहुँचने में सुविधा अनुभव करती हैं। सीढ़ियों पर पैर रखते हुए छत तक पहुँच जाना भी ता सरल पड़ता है। प्राणियों के संकटों एवं अभावों की पूर्ति के लिए वे ब्रह्मतत्त्व से आवश्यक समर्थता एवं सम्पन्नता उपलब्ध करके अभावग्रस्तों को उपलब्ध कराते रहते हैं। उनका प्रधान कार्य ही सन्तुलन बनाये रहना है। जब कभी उसमें बिगाड़ आता है तो उसका समाधान करने के लिए उनकी दौड़-धूप विशेष रूप से क्रियाशील होती देखी जाती है। यह देव ही जब तब अवतारों के रूप में प्रकट होते हैं। समूची ब्रह्म सत्ता तो अपना व्यापक रूप यथावत् ही बनाये रहती है। निराकार को साकार नहीं बनना पड़ता। उस प्रयोजन को देव शक्तियाँ ही निपटा देती है।

देव समुदाय का दूसरा वर्ग ऐसा है जो प्रकृति के जन समुदाय के अधिक निकट है। मनुष्यों में, क्षेत्रों में, व्यवस्थाओं में उसकी विशेष दिलचस्पी होती है। अपनी सीमित सामर्थ्य के अनुरूप वह बिना प्रमाद किये अपना कर्त्तव्य पालन भी करता रहता है। इस समुदाय में यक्ष, गंधर्व और सिद्ध पुरुष आते हैं। यक्ष गंधर्व सुरक्षित सेना की तरह हैं, उन्हें कार्य में तभी जुटना पड़ता है जब कहीं महत्त्वपूर्ण कार्य अड़ता है। इन्हें दिक्पाल या दिग्गज के नाम से भी जाना जाता हैं अन्तर्ग्रही विपत्तियों से वे पृथ्वी को बचाते हैं। अभावों को जहाँ-तहाँ से पूरा करते है। गंधर्व, उल्लास के कर्णधार हैं। शरीर को जिस प्रकार अन्न, वस्त्र की-मस्तिष्क को जिस प्रकार ज्ञान अनुभव की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार अन्तःकरण उल्लास भरा विनोद मनोरंजन चाहता है। कला का प्रयोजन यही है। वस्त्र इस का प्रतिनिधित्व करता है। सौंदर्य एवं माधुर्य इसका सहचर है। काम-कौतुक में भी उसका हस्तक्षेप है। यह गंधर्व क्षेत्र है। ये शक्तियाँ भी अपने अंग से हर प्राणी को जिस-तिस सीमा तक अनुदान जुटाती रहती है। देव, यक्ष और गंधर्व उच्च लोक के वासी, उच्च भूमिकाएँ निभाने वाले माने गये है। वे पात्रता के अनुरूप अहैतुकी कृपा करते रहते हैं। कभी-कभी आराधना अनुष्ठान से भी आकर्षित होते और अनुग्रह करते देखे गये है।

भूलोकवासी प्राणियों से अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाले, उनके कार्यों में अधिक रुचि लेने वाले, अधिक सहयोग करने वाले दो वर्ग है,-एक सिद्ध पुरुष दूसरे पितर। दोनों के शरीर तो सूक्ष्म होते है और वे आवश्यकतानुसार अपना परिचय स्थूल शरीर धारियों जैसा भी देने लगते हैं, पर उनकी सत्ता, महता, शक्ति एवं इच्छा के बीच असाधारण अन्तर पाया जाता है। फिर भी दोनों की गणना सूक्ष्म शरीरधारी मान्य स्तर से कुछ ऊँचे उठे हुए मूल्यों में ही की जा सकती है।

सिद्ध पुरुष योग और तप का आश्रय लेकर अपने स्थूल शरीर का ही सूक्ष्मीकरण कर लेते हैं। यह भी हो सकता है कि वे मिट्टी के समान इस शरीर का परित्याग कर दें और सूक्ष्म शरीर द्वारा उन कार्यों में संलग्न हों जो लोक मंगल के लिए नितान्त आवश्यक हैं। शरीर के सीमा बन्धन में बँधे रहने पर जीवात्मा को जहाँ कई प्रकार की सुविधा, सरसता का लाभ मिलता है वहाँ यह कठिनाई भी है कि कार्य उतना ही हो सकता है जितना कि काया की सीमित शक्ति के अंतर्गत बन पड़ता है। सूक्ष्म शरीर सक्रिय हो उठने पर वे सारे व्यवधान दूर हो जाते हैं जो शरीर को सीमित एवं आधि–व्याधि ग्रसित बनाये रहते थे। सीमा टूट जाने पर वे अपने को असीम अनुभव करते हैं। जीवित स्थिति के साधक जिन्हें अतीन्द्रिय क्षमताओं के रूप में प्राप्त करके गौरवान्वित होते थे, उससे अनेक गुनी दिव्य शक्तियाँ सूक्ष्म शरीर धारी सिद्ध पुरुषों को अनायास ही ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में मिल जाती है। वे स्थूल काया का या ता पूर्णतया परित्याग कर देते हैं या फिर उसे प्रबल अध्यात्म प्रयत्नों द्वारा सूक्ष्म कर लेते हैं। सूक्ष्म शरीर की जीवन अवधि असीम है। वह युग-युगान्तरों तक भी उसी स्थिति में रह सकता है। आवश्यकतानुसार वह अपने पुराने शरीर को भी धारण कर सकता है या अन्य किसी की आकृति धारण करके अपने अस्तित्व एवं पराक्रम का परिचय दे सकता है। ऐसे सिद्ध पुरुष प्रकारान्तर से उच्च कोटि के योगी हैं जिनकी क्षमता देवलोक के साथ जुड़ती है और क्रियाशीलता लोक-हित के कामों में लगी रहती है। उनकी भूमिका जिम्मेदारी उद्यान के माली जैसी होती है। वे विशाल अन्तरिक्ष में कहीं भी रह सकते है, आवश्यकतानुसार कहीं भी पहुँच सकते हैं, पर पाया यही गया है कि वे निर्धारित जिम्मेदारी को पूरा करने के उपरान्त वापस हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में ही लौट आते है। वहाँ विश्राम करते हैं, थकान उतारते हैं और गंवाई शक्ति को पूरा करने के लिए अथवा भविष्य के लिए सामर्थ्य संचय करने के लिए अपने ढंग की विशेष साधना आरम्भ कर देते हैं। खाली समय को वे स्वेच्छाचार में नहीं बिताते, वरन् योजनाबद्ध रूप से उसकी उच्च स्तरीय शक्ति संचय का प्रयास करते रहते हैं ताकि समय की पुकार पर किसी भी क्षेत्र की उन्हें जो भी प्रेरणा मिले उसे बिना हिचक क्रियान्वित कर सकें।

इसी अवधि में उनका एक कार्य और भी होता है-वंश वृद्धि। वे भी परब्रह्म की तरह एक से अनेक बनना चाहते हैं। अनेकों को अपने सदृश बनाना चाहते हैं। अपने संचित अनुदानों का एक बड़ा अंश उन्हें प्रदान भी करते रहे है। अभिभावक यही करते हैं। सन्तान पर अपना समय, मनोयोग एवं वैभव निःसंकोच लुटाते है। अल्प समर्थों में अति समर्थ बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते है। हर पिता अपनी सन्तान को अपने ही सदृश तथा अपने से भी अधिक बढ़ा-चढ़ा देखना चाहता है। अभिभावकों और सन्तान के बीच इसी आधार पर आदान-प्रदान चलता रहता है और कई सौभाग्यशाली उत्तराधिकारियों को सहज ही धनाध्यक्ष बनने की तरह सिद्ध पुरुषों के अनुग्रह से वह असाधारण क्षमताएँ एवं सफलताएँ प्राप्त कर लेते हैं जो निजी प्रयत्नों से कदाचित ही उपलब्ध हो पातीं।

सिद्ध पुरुषों की अनुकम्पा, सहायता प्राप्त करने के लिए कितने की लोग लालायित फिरते हैं। उनके दर्शन करने और चमत्कार देखने के लिए आतुर फिरते हैं। इसके लिए वन पर्वतों की खाक छानते हैं, पर ऐसे लोगों को असफलता ही मिलती हैं, क्योंकि दिव्यदर्शी सिद्ध पुरुष घट-घट की जान लेते हैं। उन लोगों का क्षुद्र मनोरथ ऐसा होता है जिसे परखने में उन्हें तनिक भी कठिनाई नहीं होती। वे मदारी के हाथ की कठपुतली बनने में अपना अपमान अनुभव करते हैं। फिर क्षुद्रजनों के मनोरंजन या कामना पूर्ति के लिए वे क्यों अपना तप या समय खराब करें? वे भले प्रकार जानते है कि उन्हें अपना बहुमूल्य अनुग्रह किस व्यक्ति के किस काम के लिए प्रदान करना है? ऐसे सत्पात्रों को वे स्वयं तलाशते फिरते हैं और जहाँ खिला कमल दिखता है उस पर भौंरे की तरह वे स्वयं जा पहुँचते हैं। उद्देश्य स्पष्ट है, प्रामाणिक प्रतिभावानों को सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में जुटाने के लिए आवश्यक सहयोग प्रदान करना। यह हर किसी से करते नहीं बन पड़ता। जिनने पहले से ही अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उदार साहसिकता से ओत-प्रोत कर रखा है, जिनने संयम साधा है। लोभ, मोह, अहंकार से छुटकारा पाया है, उन निस्पृह व्यक्तियों से यह आशा की जा सकती है कि वे लोकमंगल की साधना में निरत हो सकेंगे। पुण्य प्रयोजनों के लिए अपने श्रम, समय मनोयोग एवं साधनों को लगावेंगे। इस स्तर की उत्कृष्ट प्रामाणिकता को सिद्ध करने में जिन्होंने अनेकों बार अग्नि परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने के प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। उन्हें ही देव पुरुष दिव्य प्रयोजनों के लिए वरण करते हैं। दर्शन या अनुग्रह उन्हें ही प्रदान करते हैं। करने के बाद यह भी देखते रहते हैं कि जो दिया गया है वह पुण्य प्रयोजनों में लगा या नहीं। जिन्हें मात्र स्वार्थ ही नशे की तरह सवार है उनकी क्षुद्रता दुर्गन्ध की तरह उड़ती रहती है और किसी सिद्ध पुरुष के समीप पहुँचने पर उसे समीप नहीं आने देती। हेय मनोभूमि के लोग ललक लिप्साओं की पूर्ति के लिए सिद्ध पुरुषों को अपने चंगुल में फँसाने के लिए बहेलिया की तरह जाल बिछाये फिरते हैं, पर वे राजहंस-परमहंस ऐसे हैं जो यह भली भाँति जानते हैं कि कुपात्रों और सुपात्रों की सहायता करने पर उसके क्या बुरे, भले परिणाम होते हैं? कुपात्रों के हाथ पहुँची दिव्य शक्ति वैसे ही विग्रह खड़े करती है जैसे कि भस्मासुर, मारीच, रावण, हिरण्यकश्यप महिषासुर आदि के हाथों सिद्धियाँ पहुँचने में अनर्थ खड़े हुए हैं। सिद्धों को तलाशने के लिए जहाँ तहाँ मारे-मारे फिरने वाले निश्चित रूप से खाली हाथ लौटते हैं। वे असफलता के उपहास से बचने के लिए मन-गढ़न्त झूठे उपाख्यान गढ़ लेते हैं और भोले भावुक-जनों पर अपनी धाक जमाने के लिए उन मनगढ़ंतों का प्रचार करते हैं कि उनकी अमुक क्षेत्रों में किन्हीं सिद्ध आत्माओं से भेंट हुई। उनने यह दिया यह कहा आदि। ऐसी मनगढ़न्त बातें अनेकों के मुँह से सुनी जाती हैं और किंवदन्ती के रूप में जहाँ-तहाँ प्रचारित होती हैं। इनकी सचाई जाँचने के लिए एक ही कसौटी है कि भेंट करने वाला उत्कृष्ट चरित्र का विशिष्ट व्यक्तित्व सम्पन्न था या नहीं। उसने दिव्य अनुग्रह को पाकर लो मंगल के लिए कोई महत्त्वपूर्ण त्याग पुरुषार्थ किया या नहीं।


उन्होंने मंदिर बना दिया (Kahani)

एक उदारचेता, सभी समुदाय के लोगों को एकत्रित देखना चाहते थे सो उन्होंने मंदिर बना दिया।

मंदिर में हिंदू तो आये पर मुसलमानों ने उसमें पैर भी न रखा। बाद में उन्होंने मस्जिद बनवाई और हिन्दुओं से कहा वे उदारता दिखायें और उसमें जाया करें। उनने भी मस्जिद में जाने से इन्कार कर दिया।

दोनों निर्माणों से उद्देश्य पूरा न होते देखकर उनने एक पाठशाला और व्यायामशाला बनाने का तीसरा उपक्रम किया। उसमें सभी वर्गों के लोग पहुँचने लगे। तब कहीं उन्हें संतोष हुआ।


शिष्टाचार सज्जनता का प्रथम चरण

विनम्रता और उद्दंडता मनुष्य में आदत के रूप में धीरे-धीरे विकसित होती हैं। पर जब वे जड़े जमा लेती हैं, तो स्वभाव बन जाती है और बिना विशेष प्रयत्न किये बदलती नहीं।

दूरदर्शी अभिभावक अपने आश्रितों को सद्गुणों की सम्पदा हस्तगत करते रहते हैं। भले ही वे कोई बड़ी धन दौलत उनके लिए न छोड़ सकें। इस गुण सम्पदा के आधार पर ही मनुष्य प्रगतिशील बनता है।

सज्जनता का प्रथम चरण विनम्रता से आरम्भ होता हैं। वह बड़ों के साथ तो बरती ही जानी चाहिए। समान आयु के यहाँ तक कि छोटों के साथ भी वार्त्तालाप एवं व्यवहार इस प्रकार किया जाना चाहिए, मानो उनका महत्व स्वीकारा जा रहा है। उन्हें सम्मान दिया जा रहा है। इसके लिए प्राथमिक प्रयोग यह है कि वाणी से मधुर वचन बोले जायें। किसी को यह अनुभव न होने दिया जाय कि उसकी उपेक्षा की जा रही है या तिरस्कार की दृष्टि से देखा जा रहा है, इससे उसे चोट लगती है। उस की कटु प्रतिक्रिया को भूल नहीं पाता और अकारण शत्रु बन जाता है।

हर व्यक्ति अपना सम्मान चाहता है। यह उसकी आत्मिक आवश्यकता है। आत्मा महान है। उसका अपना गौरव है। भले ही दुर्गुणों के कारण उसे धूमिल कर लिया गया हो। फिर भी यह भौतिक प्रवृत्ति बनी ही रहती है। और उस ओर आकर्षित होती है जहाँ उसे सम्मान मिलता हैं।

आवश्यक नहीं कि किसी की सहायता की जाये और उसकी इच्छानुसार सहयोग दिया ही जाये। यदि कोई गलत इच्छा लेकर आया है तो उसी मना भी किया जा सकता हैं पर इसके लिए उसे लताड़ने बुरा-भला कहने की आवश्यकता नहीं है। इसमें अपनी विवशता बताते हुए भी इनकार किया जा सकता है और उसे इस योग्य समझ कर आशा लेकर आने के लिए धन्यवाद भी दिया जा सकता है।

किसी आगन्तुक के आने पर उसे बिना छोटे-बड़े का ख्याल किये नमस्कार करना, बैठने के लिए आसन देना और आगमन की प्रसन्नता चेहरे की मुस्कान द्वारा प्रकट करते हुए कुशल समाचार पूछना यह एक सामान्य शिष्टाचार है। इतना बरताव तो हर किसी के साथ होना ही चाहिए। आगमन को अनुग्रह मानते हुए पूछा जाना चाहिए कि किस कारण आगमन हुआ? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? आगन्तुक को आधा सन्तुष्ट कर देने के बराबर है। इसमें कुछ पूँजी नहीं लगती और न बड़ा सा समय जाता है, पर अपनी छाप दूसरों पर पड़ती है। आतिथ्य के लिए कोई महंगी चीजें न दी जा सकती हों तो पानी पिलाने का उपक्रम तो किया ही जा सकता है। लोक व्यवहार की दृष्टि से भी सज्जनोचित शिष्टाचार का परिपालन आवश्यक है। इससे दूसरे व्यक्ति को अपनी सज्जनता की छाप स्वीकारते बनती है और मित्र बनते हैं। यह सामान्य शिष्टता भी समय पड़ने पर बड़ा काम देती है और प्रशंसा भरा प्रचार करती है।

उद्धत व्यक्ति अशिष्ट होते हैं और अहंकारी भी वे अपने आपको बड़ा और दूसरों को छोटा समझते हैं। अस्तु उपेक्षापूर्ण व्यवहार करते हैं। यह उपेक्षा भी संवेदनशीलों को अखर जाती है और वे उसे अपना अपमान तक मान बैठते हैं। फलतः मन खोल कर बात भी नहीं कर सकते और मूड देख कर निराश वापस लौट जाते हैं। इस प्रकार खिजाये हुए व्यक्ति से प्रशंसा किये जाने तथा सहयोग मिलने की आशा चली जाती है।

कोई व्यक्ति एकाकी जीवन नहीं जी सकता। उसे दूसरों की कृपा न सही अनुकूलता की तो जरूरत पड़ती ही है। इस आवश्यक वस्तु को खरीदने के लिए यदि सौजन्य दर्शाया जा सके तो व्यक्ति नफे में ही रहता है। यह लाभदायक सौदा आरम्भिक जीवन से ही घर परिवार के बीच ही सीखा और सिखाया जाना चाहिए।


व्यक्तित्व परिष्कार का मूलभूत आधार

शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से संयमित एवं सन्तुलित व्यक्तित्व ही सुखी एवं सफल जीवन का आधार बनता है। कार्ल, गुस्तेव, जुँग आदि आधुनिक मनोवैज्ञानिक इसी को “मैच्योर पर्सनालिटी” कहते हैं। इसको परिभाषित करते हुए इन मनःशास्त्रियों का मानना है कि चिन्तन की दृष्टि से प्रौढ़ और स्वस्थ व्यक्तित्व उसी का माना जाना चाहिए जो समस्त परिस्थितियों में शान्त होकर कार्य करे। इस तरह ऐसा व्यक्ति भली प्रकार समंजित होता है और उसमें भावात्मक तथा सामाजिक परिपक्वता होती है।

व्यक्तित्व का गठन विचारों पर निर्भर हैं। चिन्तन मन को ही नहीं शरीर को भी प्रभावित करता है। मनोकायिक गड़बड़ियाँ चिन्तन की गिरावट का ही परिणाम है। इस बात को प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक एकमत से स्वीकार करते हैं। चिन्तन की उत्कृष्टता को अपनाने तथा उसे व्यावहारिक जगत में उतारने से ही भावात्मक तथा सामाजिक समंजन प्राप्त हो सकना सम्भव है।

इस प्रकार के समंजन की सरल किन्तु सक्षम प्रक्रिया बता पाने में आधुनिक मनःशास्त्री असमर्थ पाये जाते हैं। इस विषय पर वे आपसी खींचतान के अतिरिक्त कुछ उपादेय दे पाने में अक्षम ही दिखाई देते हैं। मनोविज्ञान की जाह्नवी का गोमुख सदृश उद्गम स्थल उपनिषद् है। इनमें विशेषतया श्वेताश्वतर उपनिषद् में ऋषियों ने इस प्रकार के भावात्मक एवं सामाजिक समंजन स्थापित करने, रागद्वेष आदि विरोधी भावों से ऊपर उठने हेतु एक पूर्णतया सक्षम सशक्त प्रक्रिया उद्धृत की है जिसे ‘उपासना’ कहते हैं।

निःसन्देह उपासना श्रेष्ठ चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का सशक्त माध्यम है। मन की बनावट कुछ ऐसी है, वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का चिन्तन चल पड़ेगा। तदनुरूप क्रिया कलाप होंगे। निम्न स्तरीय चिन्तन वाले व्यक्ति के क्रिया-कलाप भी घटिया होना स्वाभाविक हैं। ऐसा व्यक्ति अपने जैसे दुराचारी-अनाचारी व्यक्ति विनिर्मित करने में ही सहायक सिद्ध होगा, जबकि उच्चस्तरीय चिन्तन करने वाले सन्त-मनीषी महात्माओं के चिन्तन के अनुरूप उनके क्रिया-कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं। तदनुरूप उनके सान्निध्य में रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी उसी साँचे में ढल कर सुघड़ स्वरूप प्राप्त करता है।

वर्तमान समय में श्रेष्ठ व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्तियों का अभाव है। बहुलता हेय गए-गुजरों की है। इनसे सामाजिक समंजन की उपेक्षा करना एक विडम्बना है। इन परिस्थितियों में समस्या यह खड़ी होती है कि मानवी व्यक्तित्व को श्रेष्ठ कैसे बनाया जाय? विचार करने पर एक ही रास्ता दिखाई पड़ता है ‘उपासना का अवलम्बन’।

उपासना से जुड़ी आदर्शवादी मान्यताएँ एवं प्रेरणाएं ही चिन्तन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती हैं। उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का सबल आधार मिल सकता है। उपासना का लक्ष्य है व्यक्तित्व का परिष्कार। इसके निर्धारण से उससे जुड़े आदर्शों एवं उच्चस्तरीय सिद्धान्तों द्वारा उपासक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उपास्य में तन्मय होने का अभिप्राय है उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों में लीन हो जाना और उसके अनुरूप आचरण करना। उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है। इसमें तन्मयता की पराकाष्ठा उपास्य और उपासक के बीच विभेद का समाप्त कर देती है। द्वैत से उठकर अद्वैत की स्थिति हो जाती हैं। परमहंस रामकृष्ण देव का सर्वत्र काली का दर्शन करना, महाप्रभु चैतन्य का कृष्ण से एकाकार हो जाना, स्वामी रामतीर्थ का ब्रह्मभाव में प्रतिष्ठित हो अपने अस्तित्व को भूल जाना, उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव हैं। यह असामान्य स्थिति न भी हो तो भी उपासक के विचारों का परिशोधन, परिष्कृतीकरण होता जाता है। भाव-संवेदनाओं में आदर्शवादिता जुड़ने लगती है।

उपासना निराकार की करें या साकार की। इष्ट निर्धारण क्या हो? यह व्यक्तिगत अभिरुचि एवं मनः स्थिति के ऊपर निर्भर करता है। चिन्तन को लक्ष्य की ओर नियोजित किए रखने के लिए साकार अथवा निराकार कोई भी अवलम्बन लिया जा सकता है। यह आवश्यक है और उपयोगी भी। इस प्रक्रिया के साथ जुड़े चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा, उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे उपासक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।

आधुनिक मनोविज्ञान ने जिन नए तथ्यों का उद्घाटन किया है वे आध्यात्मिक मूल्यों की पुष्टि करते हैं। चिन्तन को व्यक्तित्व का मूल आधार माना जाने लगा है। इस संदर्भ में हुए शोध प्रयास यह स्पष्ट करते है कि मनुष्य का जैसा आदर्श होगा उसी के अनुरूप उसका व्यक्तित्व विनिर्मित होगा। आदर्श यदि श्रेष्ठ एवं उत्कृष्टता समायेगी। इसके विपरीत निकृष्ट आदर्श निम्नगामी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देंगे, हेय व्यक्तित्व गढ़ेंगे। उपासना में इष्ट निर्धारण परोक्ष रूप से श्रेष्ठ आदर्शों की प्रतिष्ठापना है। जिसके निकट आने तादात्म्य स्थापित करने वाला भी उसी के अनुरूप ढलता-बनता चला जाता है।

एरिक फ्राँम, हैरी स्टैक सुलीवान एवं डा. हेनरी लिड़लहर का मानना है कि हम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को किसी दिव्य सत्ता, देवदूत अथवा सर्वव्यापी चेतना से एकत्व स्थापित करके निश्चयपूर्वक सुधार सकते हैं। उनका कहना है कि हम जिस प्रकार की सत्ता का चिन्तन करते है उससे हमारा संपर्क उसी प्रकार स्थापित हो जाता है जिस प्रकार माइक्रोवेव्स द्वारा संसार के विविध रेडियो स्टेशनों से संपर्क हो जाता है। दिव्य सत्ताओं से संपर्क एवं उनसे मिलने वाली प्रेरणाओं से आध्यात्मिक ही नहीं शारीरिक, मानसिक लाभ भी प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क वायरलेस के रिसीवर की तरह ही है जो हर समय भले बुरे विचारों को ग्रहण करता रहता है। मन में किस प्रकार के विचार उत्पन्न होंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किससे अपना संपर्क जोड़ रहे हैं।

परिष्कृत एवं परिपक्व विचार आस-पास के वातावरण को भी तद्नुरूप बनाने में सहायक होते हैं। प्रख्यात विचारक अपटाँन सिंक्लेयर अपनी पुस्तक “मेन्टल रेडियो” में स्पष्ट करते हैं कि उपासना व्यक्तित्व निर्माण की एक समग्र प्रक्रिया है, जिसका अवलम्बन लेने वाला स्वयं श्रेष्ठ बनता तथा अन्यों को भी प्रभावित करता है। वह अपने विचारों का प्रसारण अभौतिक माध्यमों से अन्य लोगों तक कर सकता है। इसमें व्यक्ति एवं वातावरण को अनुवर्ती बनाने के सभी तत्व विद्यमान हैं।

प्रसिद्ध मनःशास्त्री जुग-उपासना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में स्वीकार करते हैं-उनके अनुसार “सभी धर्मों में प्रचलित उपासनाएँ मानव के स्वास्थ्य एवं सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।” उनकी मान्यता के अनुसार “संसार के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर भी जितने रोगियों को आरोग्य नहीं प्रदान कर पाते जितना कि छोटी से छोटी धार्मिक उपासनाएँ कर देती हैं।”

व्यक्तित्व के अधःपतन एवं चिन्तन-चरित्र व्यवहार की त्रिवेणी में बढ़ते जा रहे प्रदूषण को रोकने तथा इसको परिशोधन कर निर्मल परिष्कृत एवं ऊर्ध्वगामी बनाने में-उपासना की आवश्यकता ही नहीं अनिवार्यता भी है। पुरातन काल के ऋषियों तथा आधुनिक काल के सन्तों ने इसका अवलम्बन कर स्वयं के व्यक्तित्व को सुघड़ बनाने के साथ ही समूची मानव जाति के समक्ष प्रकाश संकेतक के रूप में स्वयं को उभारा। आज भी भावनात्मक एवं सामाजिक समंजन सर्वतोमुखी परिष्कार एवं समग्र प्रगति के सभी आधार इसमें विद्यमान हैं। समस्याओं की जटिलता से उबरने तथा अपने व्यक्तित्व को गढ़ने के लिए यह राजमार्ग ही सर्वाधिक उपयुक्त है। *


समष्टि के घटक ही हैं हम सब

हमारा शरीर एक पावर हाउस की तरह है, जिसमें लो-वोल्टेज विद्युत सदा पैदा होती रहती है। इसी से शरीर के सारे क्रिया-कलाप सुचारु रूप से चलते और हम स्वस्थ बने रहते हैं, किन्तु जब कभी इस निर्माण-प्रक्रिया में कोई व्यवधान उत्पन्न होता है, तो हमारा स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगता और रोग जैसी स्थिति प्रस्तुत होती है। जैव विद्युत के परिणाम में इस प्रकार के परिवर्तन के आधार पर रोग-निदान का सर्वप्रथम अध्ययन येल यूनिवर्सिटी के शरीरशास्त्री हैराल्ड बर्र ने किया।

इसके लिए उन्होंने एक प्रयोग के माध्यम से सबसे पहले यह सिद्ध किया कि प्रत्येक जीव का अपना एक विद्युतीय क्षेत्र होता है। प्रयोग में उन्होंने एक प्लेट पर जीवित सैलामैण्डर रख कर उसे नमकीन जल में तैरता छोड़ दिया। इस प्रयोग में बर्र यह मान कर चले थे कि सैलामैण्डर का भी अपना एक चुम्बकीय क्षेत्र होगा और जब दो क्षेत्रों में परस्पर टकराव होगा, तो उससे विद्युत पैदा होगी। इसीलिए उनने बिजली के अच्छे सुचालक नमकीन बल का ताँबे के तार के आरमेचर की तरह प्रयोग किया। जब उनने प्लेट को बार-बार घुमाना शुरू किया तो इससे सैलामैण्डर के अपने जैव क्षेत्र में व्यतिक्रम उत्पन्न हुआ, जिससे उसमें डूबे इलेक्ट्रोड ने विद्युत प्रवाह दर्शाना शुरू किया। जब इस धारा को गैल्वेनोमीटर द्वारा मापा गया, तो उसकी सुई बारी-बारी से दाँये-बाँये घूमती रही, जो यह दर्शाती थी कि जैव-डायनामों में डी0 सी0 विद्युत पैदा हो रही है। जब प्लेट को सैलामैन्डर विहीन करके घुमाया गया, तो बिजली का बनना बन्द हो गया और गैल्वेनोमीटर की सुई स्थिर हो गयी।

इस प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि जन्तुओं का भी अपना वैद्युतिक क्षेत्र होता है। उपरोक्त प्रयोग में सफलता मिलने के बाद डा. बर्र ने मानवी विद्युत को मापने का प्रयत्न किया। इसके लिए उनने निर्वात-नली वोल्टमीटर कुछ अतिरिक्त उपकरण जोड़ कर एक अत्यन्त सुग्राही विद्युत मापक यंत्र का निर्माण किया। इसमें सिल्वर क्लोराइड के दो इलेक्ट्रोड भी लगे थे। मापक यंत्र की तरह प्रयोग करते समय इन इलेक्ट्रोडों को अंगों के वास्तविक संपर्क में नहीं लाया गया, वरन् दोनों के बीच कोई अति सुग्राहक लेई अथवा नमकीन जल का प्रयोग किया गया।

आरम्भ में बर्र ने 60 व्यक्तियों पर प्रयोग किये। दो पृथक पात्रों में खारा जल लेकर एलेक्ट्रोड को अलग-अलग उनमें रखा गया। फिर प्रत्येक व्यक्ति को बारी-बारी से उनमें तर्जनी उँगली रखने को कहा गया, तत्पश्चात् औसत मापन के लिये पात्र परस्पर परिवर्तित कर दिये गये। यह परीक्षण एक वर्ष तक प्रत्येक दिन निश्चित समय पर ही किये गये। उनमें हर व्यक्ति के साथ प्रतिदिन शरीर विद्युत में कुछ कमीवेशी देखी, यह पुरुषों पर किये गये प्रयोग थे। जब यही प्रयोग महिलाओं पर किये गया। तो उनमें वोल्टेज पैटर्न में कुछ भिन्नता देखी गयी। हर महीने में एक बार उनमें वोल्टेज अति उच्च पाया गया। वोल्टेज की यह अधिकता करीब चौबीस घंटे तक बनी रहती। प्रायः यह वोल्टेज परिवर्तन मासिक चक्र के माध्य ही दिखाई पड़ता। इस आधार पर शोधकर्ता ने अनुमान लगाया कि संभवतः यह प्रक्रिया स्त्रियों के मासिक धर्म के दौरान हो रही ओवूलेशन (अण्ड क्षरण) क्रिया से संबद्ध हो।

इस बात की पुष्टि खरगोश पर किये गये प्रयोग से हो गई। कृत्रिम रूप उनने एक खरगोश को उत्तेजित किया। उनमें अण्ड क्षरण की प्रक्रिया आठ घंटे पश्चात् होती है, अस्तु इस अवधि के उपरान्त उसे बेहोश कर उसका पेट चीरा गया और अण्डाशय के ऊपर एलेक्ट्रोड रख कर लगातार वोल्टेज पैटर्न को रिकार्ड किया जाने लगा। बर्र ने पाया कि फालीकल के फटने के बाद जैसे ही अण्डा बाहर आता है, वोल्टेज अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है।

बाद में इसकी पुष्टि मनुष्यों में भी हो गई। एक महिला, जिसका कि आपरेशन होने वाला था यह प्रयोग दुहराया गया तो परिणाम पहले जैसा ही रहा, जिससे यह बात निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गई कि यह ओवुलेश नहीं है, जो स्त्रियों के जैव वैद्युतिक क्षेत्र में विस्मयकारी परिवर्तन लाता है। वोल्टमीटर जैसे अति सामान्य-से उपकरण के प्रयोग से अण्ड-क्षरण के सही-सही समय की जानकारी मिल जाने से हर व्यक्ति के लिए ऐच्छिक गर्भ निरोध प्रक्रिया भी अब संभव हो गयी है।

इस शरीर-विद्युत को वैज्ञानिक हैरॉल्ड बर्र ने “जैव-क्षेत्र” संज्ञा दी। प्रयोगों के आधार पर जब उन्हें इस बात की जानकारी हुई कि हर जीव का अपना एक “जैव क्षेत्र” है और उसमें परिवर्तन बेतरतीब नहीं, अपितु नियमानुसार होता है तथा ऐसा जैव-क्रियाओं से सम्बद्ध होने के कारण होता है, तो उनने अनुमान लगाया कि बीमारियों का भी इस जैव क्षेत्र पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता होगा। इसी अनुमान के आधार पर एक डॉक्टर की मदद से उनने न्यूयार्क बेलेण्यू अस्पताल की हजारों महिलाओं पर अपने विशेष यंत्र के माध्यम से परीक्षण किये। 102 मामलों में उनने ग्रीवा और उदर के मध्य भाग में किसी न किसी प्रकार की असामान्यता देखी। दूसरी अन्य शिकायतों के कारण जब उनका आपरेशन किया गया, तो इनमें से 95 महिलाओं में या तो गर्भाशय का अथवा गले का कैंसर आरंभिक स्थिति में पाया गया। ज्ञातव्य है कि अन्य किसी परीक्षण में कैंसर की उपस्थिति का पता इनमें नहीं चल पाया था और न इसका कोई लक्षण ही रोगियों में प्रकट हुआ था किन्तु वोल्टमीटर ने वोल्टेज में असामान्य परिवर्तन के आधार पर इसका स्पष्ट संकेत दिया। इस प्रकार जैव क्षेत्र में लक्षण प्रकट होने से पूर्व की भिन्नता को नोट कर छिपे रोगों की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है और समय रहते उपाय उपचार किये जा सकते हैं। यह मानव में छिपी विद्युत के रहस्योद्घाटन का ही चमत्कार है।

इतना ही नहीं उक्त शरीर विज्ञानी ने यहाँ तक दावा किया है कि छोटे-से-छोटे आन्तरिक घाव की जानकारी देने व इस संदर्भ में अति संवेदनशील सुपर एक्स-रे की भूमिका निभा सकने में भी यह वोल्टमीटर अत्यन्त दक्ष है। प्रायः छोटे घाव सामान्य यंत्र-उपकरण की पकड़ से परे होते है।

वे कहते है इस जैव-क्षेत्र का मस्तिष्कीय तरंगों से कोई संबंध नहीं हैं। उसका सीधा संबंध तो हृदय मस्तिष्क एवं इस प्रकार के अन्यान्य अवयवों से है, जिनकी धड़कन और उत्प्रेरणा से हर बार विद्युतीय आवेश उत्पन्न होता है। जैव क्षेत्र ऐसे सभी एवं दूसरे प्रकार के आवेश विभिन्न प्रकार की रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरूप शरीर के भीतर उत्पन्न होते है, जो अनवरत रूप सदा चलते ही रहते है।

जीव में किसी प्रकार के जैनेटिक परिवर्तन को भी जैव-विद्युत सक्षमतापूर्वक अभिव्यक्त करता है। यह दिखाने के लिए प्राणी शास्त्री डा. हेराल्ड ने दो बिल्कुल शुद्ध नस्लों वाले मक्के के पौधों का परस्पर पर-परागण कराया। उससे जो बीज पैदा हुए, वे दोनों प्रकार के थे, शुद्ध नस्ल के व संकर नस्ल के। देखने में बाहर से दोनों बिल्कुल एक जैसे थे, यहाँ तक इलेक्ट्रोन माइक्रोस्कोप से भी उनकी भिन्नता पकड़ में नहीं आती थी। ऐसी स्थिति में शोधकर्मी विज्ञानी ने अपने संवेदनशील वोल्टमीटर का प्रयोग किया। इन बीजों से जो पौधे उत्पन्न हुए उनके वैद्युतिक विभव में स्पष्ट अन्तर दिखाई पड़ा। इस प्रकार बर्र ने विभव में इस महत्वपूर्ण अन्तर के आधार पर दोनों नस्लों को पृथक पहचाना। वस्तुतः उनमें मात्र एक जीन के क्रम में अन्तर था पर इस अन्तर से उसके विद्युतीय क्षेत्र में स्पष्ट अन्तर आया, जो वोल्टमीटर की तीक्ष्ण आँखों से बचा न रह सका।

यदि इस सूक्ष्म प्रक्रिया को जाना-समझा जा सके तो समय रहते ही शरीर में व्याधियों की उपस्थिति का पता लगा कर उनसे बचने का उपाय-उपचार किया जा सकता है। इतना ही नहीं, विद्युत के परिणाम में न्यूनाधिकता के आधार पर यह भी जानना संभव हो सकेगा कि किसने कितना संयम-नियम का पालन कर इस जीवनोपयोगी सत्व का संरक्षण किया व इसे आत्मिक प्रगति की दिशा में नियोजित किया। इस दृष्टि से कार्य विद्युत का सुनियोजन चिकित्सा विज्ञान और आत्म विज्ञान दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है।*


सूक्ष्म शरीर का काया से बाहर विचरण एवं सम्प्रेषण

कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घटित होती देखी जाती है जिनसे यह सिद्ध होता है कि कोई आत्मा अपना शरीर छोड़कर किसी दूसरे के शरीर में प्रवेश कर जाती है और शरीर-धारी का व्यक्तित्व लुप्त होकर अधिकार करने वाली आत्मा जैसा ही आचरण उस शरीर से बन पड़ता है। इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि आत्मा का शरीर पृथक और स्वतंत्र अस्तित्व है। शरीर में सन्निहित प्राण चेतना उसमें घुली रहने पर भी अपना पृथक अस्तित्व बनाये रखती है।

पुराणों में सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व सिद्ध करने वाली अनेक घटनाओं का सुविस्तृत वर्णन मिलता हैं। श्री आद्य शंकराचार्य की वह कथा प्रसिद्ध है जिसमें उनने अपना सूक्ष्म शरीर राजा के मृत शरीर में प्रविष्ट किया था और उद्देश्य पूरा होने पर फिर वापस अपने स्थूल काया में लौट आये थे। रामकृष्ण परमहंस ने महा-प्रयाण के उपरान्त भी विवेकानन्द को कई बार दर्शन तथा परामर्श दिये थे। पुराणों में तो पग-पग पर ऐसे कथानकों का उल्लेख हैं। प्रख्यात परामनोविज्ञानी “एडगर केसी” की कृति “लाइफ रीडिग्स” में भी सूक्ष्म शरीर के बारे में विस्तृत जानकारी हैं। राबर्ट ए॰ मोनरो ने “जर्नीज आउट आफ द बॉडी” नामक पुस्तक में प्राण शरीर सम्बन्धी अपने अनुभवों को लिखा है। उनके अनुसार सूक्ष्म शरीर को भौतिक शरीर की भाँति प्रयुक्त कर मनुष्य एक ही शरीर से दुहरे काम कर सकता हैं।

प्राणायाम विद्या में निष्णात कर्नल टाउन सेण्ड के बारे में प्रसिद्ध है कि वे अमेरिका की प्रख्यात अणु विज्ञानी श्रीमती जे0 सी0 ट्रस्ट की तरह अपने प्राण शरीर को स्थूल काया से अलग करने का प्रदर्शन किया करते थे। सूक्ष्म शरीर से यात्रा करके वे दूर रखे श्याम पट तक जाते और उस पर कुछ बातें स्पष्ट करके पुनः अपने शरीर में आ जाते। मूर्धन्य शरीर शास्त्री एवं चिकित्सक उनके शरीर का परीक्षण करके उसे मृत घोषित कर देते। यह प्रयोग वहाँ उपस्थित गण्यमान्य नागरिकों, पत्रकारों, बुद्धि-जीवियों एवं वैज्ञानिकों के समक्ष बार-बार दुहराया गया।

प्रकृति की गोद में भी कुछ ऐसे मानवेत्तर प्राणी पाये गये हैं जिन्हें परकाया प्रवेश की क्षमता जन्मजात मिली होती है। वे भी योगियों जैसे अपने स्थूल और सूक्ष्म शरीर को अलग-अलग करने की विद्या में पारंगत होते हैं। प्रशान्त महासागर में सेमाफ्रो द्वीप के निकट ‘पोलैलो’

नामक ऐसा जीव पाया जाता है जो वर्ष में दो बार-आश्विन एवं कार्तिक के महीनों में छोटे-छोटे ज्वारों के समय अपने घोंसले से बाहर निकलता है। इसी मध्य जल की सतह पर वह अपने अण्डे देता हैं। अपने साथ वह शरीर का केवल वही भाग लेकर आता है जितना उसके तैरने और अण्डा देने के काम आता है। शेष आधा शरीर मृत स्थिति में अपने घोंसले में ही सुरक्षित छोड़ आता है। अण्डे देकर जब पानी की सतह से वापस अपने घोंसले में पहुँचता है तो कुशल योगी भी भाँति अपने मृत शरीर से जुड़ जाता है और उसमें रक्त व प्राण का संचार चालू कर देता है। प्रकारान्तर से यह भी एक यौगिक प्रक्रिया है।

डा. वानडेन फेक ने परकाया प्रवेश से सम्बंधित अनेक तथ्यों की खोजबीन की थी और अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि भारतीयों द्वारा चोटी रखने का स्थान ऐसा जागृत केन्द्र है जिसका मनुष्य के प्राण शरीर से गहरा संबंध रहता है। संभवतः यही वह स्थान है जहाँ से सूक्ष्म शरीर का बहिर्गमन होता है। मनुष्य की मानसिक शक्तियों के विकास में भी इस स्थान का विशेष महत्व हैं।

अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न कितने ही भारतीय योगियों, ऋषियों का उल्लेख मिलता है जो एक स्थान पर बैठकर समस्त विश्व की गतिविधियों एवं भावी घटनाक्रमों का न केवल पता लगा लेते थे, वरन् सूक्ष्म शरीर से सुदूर क्षेत्रों की यात्रा करके अपने प्रिय पात्रों को सहायता प्रदान करते एवं आवश्यक प्रेरणा भरे परामर्श देते थे। प्रख्यात योगी तैलंग स्वामी, स्वामी विशुद्धानंद, स्वामी निगमानन्द, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ, जालन्धरनाथ आदि के बारे में सूक्ष्म शरीर द्वारा यात्रा के ऐसे कितने ही वर्णन मिलते है जिनसे प्राण शरीर की प्रचण्डता और स्थूल काया से उसकी पृथक सत्ता की प्रामाणिकता सिद्ध होती हैं। इटली के विख्यात संत पादरी पियो ने इस तरह से कितने ही जरूरतमंदों की सहायता की थी। थियोसोफिकल सोसाइटी की जन्मदात्री मैडम व्लावटस्की के बारे में कहा जाता है कि वे अपने को कमरे में बन्द करने के उपरान्त भी जनता को सूक्ष्म शरीर से दर्शन और उपदेश देती थी। पाश्चात्य योग साधकों में से हैबर्टलमान, लिण्डार्स, एन्ड्रू जैक्सन, डा. माल्थस, कारिगंटन, डुरावेल मुलडोन, ओलिवर लॉज, पावर्स, डा. मेस्सर, ऐलेकजेण्ड्रा, डेविडनील, पॉल ब्रण्टन आदि के अनुभवों और प्रयोगों में सूक्ष्म शरीर की प्रामाणिकता सिद्ध करने वाले अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये गये है। जे0 मुलडोन अपने स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर को पृथक करने के कितने ही प्रदर्शन भी कर चुके थे। उनने इस सबकी चर्चा अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दी प्रोजेक्शन ऑफ एस्ट्रल बॉडी” में विस्तारपूर्वक की है। शरीर से प्राण भिन्न है। वह शरीर के साथ तो घुला ही रहता है, पर ऐसा भी कई बार देखा गया है कि प्राण निकल जाने पर भी शरीर काम करता रहता है। इसी प्रकार शरीर को सब परीक्षणों द्वारा मृत घोषित कर दिये जाने पर भी आत्मा का एक सूक्ष्म संभाग शरीर के साथ जुड़ा रहता है और वह उसी प्रकार काम करता रहता है मानो वह वस्तुतः जीवित है।

इस प्रकार की एक घटना का वर्णन सुप्रसिद्ध गुह्यविज्ञानी टी0 लाबसाँग रम्पा ने अपनी पुस्तक “यू फार एवर” में किया है। घटना फ्राँस की क्रान्ति के समय की है जिसमें एक फ्राँसीसी सैनिक के सिर से धड़ के अलग कर दिये जाने पर भी कटे सिर के मुँह से फुसफुसाहट भरी कुछ आवाज निकल रही थी। इसका रिकार्ड अभी भी फ्राँस के सरकारी कागजातों में मौजूद है। श्री रम्पा के अनुसार यह सूक्ष्म शरीर का ही कार्य है जो भौतिक शरीर के मृत हो जाने पर भी उसे चैतन्य बनाये रख सकता है।

प्राण की शरीर से पृथक इस सत्ता को अब वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों द्वारा भी सही पाया गया है। स्थूल शरीर के न रहने पर भी इस सूक्ष्म शरीर के बने रहने के बारे में अनेकों प्रमाण जुटाए गये है।

एक व्यक्ति की प्राण चेतना दूसरे के शरीर में प्रवेश करके अपने अस्तित्व का परिचय देती है। शक्तिपात में यही प्रयोग चलता है। रामकृष्ण परमहंस ने अपनी प्राण चेतना विवेकानंद को हस्तान्तरित कर दी थी। उसी शक्ति के प्रताप से वे देवसंस्कृति का व्यापक प्रसार कर सकने में समर्थ हुए। सत्संग और कुसंग में यही प्रयोजन एक सीमित मात्रा में अनायास ही सम्पन्न होता है। बुरों की संगति में एक अच्छा मनुष्य भी बुरा बन जाता है, क्योंकि एक समुदाय की शक्ति एकाकी व्यक्ति को अपनी ओर खींच लेती है। यही बात बहुत सज्जनों के बीच रहकर एक दुर्जन के बदलने के रूप में भी देखी जाती है। माता-पिता के गुणों में से ही बहुतेरे गुण सन्तान में हस्तान्तरित होते हैं। यह भी एक प्रकार का प्राण परिवर्तन ही है।

पति-पत्नी के मध्यवर्ती विद्युत शक्ति एक दूसरे के साथ मिलकर दोनों पक्षों के लिए एक-एक ग्यारह का निमित्त कारण बनती है। इसी प्रकार दुराचारी-दुराचारिणियों का संपर्क उनकी कुटिलता को और भी भड़काता है। अपराधियों के गिरोह बन जाते हैं। नशेबाजों और जुआरियों की मंडलियाँ गठित हो जाती हैं। इन प्रत्यक्ष देखे जाने वाले अनुभवों से भी यही बात सिद्ध होती है कि बलवान प्राण दुर्बल प्राणों पर हावी हो जाता है और उन्हें वशवर्ती बना लेता है।

विभिन्न शारीरिक क्रियाएँ, हलचलें प्राण की सक्रियता पर ही निर्भर हैं। रात्रि को सो जाने के उपरान्त जो स्वप्न दीखते हैं, वह अनुभूतियाँ प्राण शरीर की ही है। दिव्य-दृष्टि, दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, विचार-संचालन, भविष्य-ज्ञान, देव-दर्शन आदि उपलब्धियाँ भी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से ही होती हैं। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्चस्तरीय योग साधना द्वारा इसी शरीर को समर्थ बनाया जाता है। ऋद्धियों और सिद्धियों का स्रोत इस सूक्ष्म शरीर को ही माना जाना चाहिए एवं उसे विकसित कर देवोपम उपलब्धियाँ हस्तगत किये जाने का पुरुषार्थ किया जाना चाहिए। *


अन्तराल में निहित सिद्धि वैभव

बीज में प्राण तत्त्व होता है। वही नमी और आरंभिक पोषक अनुकूलता प्राप्त करके अंकुरित होने लगता है। उसके उपरान्त वह बढ़ता, पौधा बनता और वृक्ष की शकल पकड़ता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर है कि उसे जड़ें माने का आवश्यक खाद पानी व पोषण प्राप्त हुआ या नहीं। यदि उसकी आवश्यकताएँ पूरी होती चले तो बढ़वार कती नहीं, किन्तु यदि बीज अपने स्थान पर बोरे में ही बन्द रखा रहे, उसे सुखाया ओर कीड़ों से बचाया जाता रहे तो वह मुद्दतों तक यथा स्थिति अपनाये रहेगा। बहुत पुराना हो जाने पर काल के प्रभाव से वह हतवीर्य हो जायगा अथवा जैसे कीड़े लगकर उसे नष्ट कर देंगे।

बीज में उगने की शक्ति होती है यदि वह पका हुआ हो। यदि उसे कच्ची स्थिति में ही तोड़ लिया गया है तो वह खाने के काम भले ही आ सके, बोने और उगने की क्षमता विकसित न होगी। वह देखने में तो अन्य बीजों के समान ही होगा, पर परखने पर प्रतीत होगा कि उसमें वह गुण नहीं है जो परिपक्व स्थिति वाले बीजों में पाया जाता है।

हर मनुष्य में प्राणशक्ति होती है, पर उसकी मात्रा में नाधिकता बनी रहती है। यह इस बात पर निर्भर रहता है कि प्राण रूपी बीज को प्रौढ़ बनाने के लिए जानकारी अथवा गैर जानकारी में परिपक्वता लाने वाले प्रयत्न होते है या नहीं।

मानवी प्राणशक्ति का विकास और परिपाक इस बात पर निर्भर है कि उसमें पूर्व संचित संस्कारों का समूह था या नहीं। गर्भधारण करते समय माता-पिता के रज-वीर्य में भीष्ट उत्कृष्टता या परिपक्वता थी या नहीं? प्राण प्रक्रिया के अनुदान समुचित मात्रा में मिले य नहीं? यह सब भ्रूणावस्था में पूरी हो जाने वाली आवश्यकताएँ है। इसके बाद जब परिपक्व बालक संसार के खुले वातावरण में साँस लेता है और समीपवर्ती लोगों द्वारा विनिर्मित वातावरण का प्रभाव ग्रहण करता है, तब भी उस स्थिति में मनुष्य प्रभाव ग्रहण करता है। खान-पान से, जलवायु से स्थूल शरीर के स्तर का निर्माण होता है, किन्तु प्राण प्रभाव समीपवर्ती लोगों की चेतना से ही उपलब्ध होता है। खोटे ओर ओछे लोगों के संपर्क से व्यक्ति स्तर की दृष्टि से वह मोटा, पतला या सुन्दर, कुरूप हो सकता है, पर व्यक्ति में जो प्रतिभा पाई जाती है, विशिष्ट स्तर की विशेषता देखी जाती है। वह इस बात पर निर्भर रहती है कि संपर्क-वातावरण में किस स्तर की जीवट एवं क्षमता विद्यमान थी। अन्न-जल से रक्त माँस बनता है किन्तु व्यक्तित्व विकसित करने की क्षमता उन लोगों में होती है जो अपने बड़प्पन के कारण छोटों पर प्रभाव छोड़ते है। मनुष्य का स्वयं का चिन्तन, मनन भी इस संदर्भ में काम करता है। वह अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति से भी अपने आप को प्रभावित करता है। पूर्व संचित संस्कार भी ऐसा वातावरण पाकर स्वतः उभरते हैं। ग्रीष्म ऋतु में घास सूख जाती है फिर भी जमीन के अन्दर उसकी जड़ों में किसी प्रकार नमी बनी रहती है। वर्षा होते ही वह जड़े अनायास ही अंकुरित हो चलती हैं और तेजी से अपना विस्तार करती हुई जमीन पर फैलकर हरीतिमा बिखेरती हैं।

यह सब वे कारण हैं जिनके बलबूते विशेष साधन न बन पड़ने पर भी मनुष्य का आत्मबल विकसित स्थिति में देखा जा सकता है और उसे भी सिद्ध पुरुषों जैसी विभूतियाँ अनायास ही प्रकट होती हुई प्रकाश में आती दृष्टिगोचर हो सकती हैं। कई व्यक्ति योग, तप, साधना, अनुष्ठान जैसे कृत्य प्रयास न करने पर भी सूक्ष्म विशेषताओं से सम्पन्न पाये जाते है। यह उपहार उन्हें जन्मजात रूप में भी मिलता है अथवा नितान्त बचपन से आगे बढ़ती हुई दृष्टिगोचर होने लगती है। यह अनायास का प्रकटीकरण भी संयोगवश होता। उसके पीछे ऐसे कारण सन्निहित होते हैं जिन्हें घटनाएँ या प्रयास तो नहीं कहा जा सकता, पर अदृश्य और, अविज्ञान कारण ऐसे होते हैं जिनके कारण कुछ विशेष व्यक्ति अपने में चमत्कारी क्षमताएँ प्रकट करते हैं किन्तु उनके साथी पड़ोसी उन विशेषताओं से वंचित बने रहते हैं।

प्रयत्न करने पर तो उसका लाभ कोई भी उठा सकता है। साहित्यकार, संगीतज्ञ, शिल्पकार, चिकित्सक, इंजीनियर आदि विशेषज्ञ अपने में यह विशेषताएँ अभ्यास द्वारा अर्जित करते हैं। पहलवान व्यायामशालाओं में, विद्वान पाठशालाओं में, शिल्पी कारखाने में, आवश्यक अभ्यास करते हुए समयानुसार सुयोग्य बनते हैं। किन्तु आश्चर्य तब होता है जब प्रशिक्षण के अभाव में अथवा स्वल्प प्रशिक्षण के सहारे किसी-किसी की प्रतिभा अनायास ही फूट पड़ती है। उदाहरण के लिए मोजार्ट 9 वर्ष की अल्पायु में ही संगीतज्ञ बन गये थे। पास्कल 12 वर्ष की उम्र में प्रख्यात गणितज्ञों की श्रेणी में गिने जाने लगे थे। 13 वर्ष की किशोरावस्था में वुडरर प्रसिद्ध कलाकार बन गये थे। संत ज्ञानेश्वर ने 16 वर्ष की आयु में गीता का भाष्य किया था तो सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक देव 10 वर्ष की छोटी अवस्था से ही भावपूर्ण शब्द की रचना करने लगे थे। इन प्रतिभाओं को देखने पर मोटी दृष्टि से सुयोग, संयोग, भाग्य, वरदान आदि समझा जाता है, पर वस्तुतः उस अनायास के पीछे भी कारण होते हैं। भले ही यह प्रत्यक्ष घटनाक्रम सामने आया हो या न आया हो।

प्रयास अभ्यास तो कई लोगों का सफल होता है। मनोयोगपूर्वक कड़ा परिश्रम करने पर तो कालिदास और वरदराज जैसे मूर्ख समझे जाने वाले व्यक्ति भी उच्चकोटि के विद्वान बन गये थे। सेंडो और चाँदगी राम ने अपने गये गुजरे स्वास्थ्य को ऐसा बना लिया था कि उनकी गणना विश्व के मूर्धन्य पहलवानों में होने लगी। अमेरिका का जैक ब्लाटिन पिछले दिनों कई वर्ष तक कैंसर से पीड़ित रहने के उपरान्त जब किसी तरह रोगमुक्त हुआ तो वह पहलवानी पर उतर आया। संकल्प, साहस और अभ्यास के सहारे उसने अपना शरीर बल इस स्तर तक बढ़ा लिया कि ओलंपिक कुश्ती के सुपर हैवीवेट का खिताब जीतकर न केवल अपने राष्ट्रीय गौरव को ऊँचा उठाया वरन् समूची मानव जाति के लिए एक अनूठा और प्रेरणाप्रद उदाहरण प्रस्तुत किया। यह प्रयास का प्रत्यक्ष प्रभव हैं।

किन्तु आश्चर्य तब होता है जब प्रत्यक्ष घटनाक्रमों के रूप में अभ्यास न किये जाने पर भी दिव्य क्षमताएँ विकसित हो जाती हैं। विश्व में ऐसे अनेकों व्यक्ति हुए है जिनमें यह प्रतिभा जन्मजात रूप में विकसित पाई गई है। हालैण्ड का क्रोसेट नामक एक बालक बचपन से ही भविष्यवाणियाँ करने के लिए विख्यात था उसके द्वारा किये गये भविष्य कथन शत प्रतिशत सही उतरते थे। इजराइल का यूरीगेलर अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं के लिए प्रसिद्ध है। भविष्य दर्शन की विशेषता के कारण संसार भर में जिन लोगों ने विशेष ख्याति अर्जित की है उनमें एण्डरसन, सेमवैंजोन, पीटर हरकौस, हेंसक्रेजर आदि के नाम प्रमुख हैं। नौस्ट्राडोमस तो अपनी भविष्यवाणियों के लिए विश्वविख्यात ही है। प्लोरेंस र्स्टन फेल्स नामक 9 वर्षीय बालिका में दिव्य दर्शन की क्षमता अनायास ही फूट पड़ी थी। इसका पता लोगों को तब लगा जब उसने सदियों पुरानी टूटी फूटी एक कब्र के खोदे जाने की न केवल तिथि व समय बता दिया था वरन् उसमें सोये हुये व्यक्ति का नाम भी बता दिया था। वह कब्र विलियम जान्सन की थी, जिस पर किसी का नाम तक नहीं खोदा गया था और न किसी को उसकी जानकारी थी। रजिस्टर के पुराने पन्नों को पलटने पर फ्लोरेंस द्वारा दी गई जानकारी सही निकली।

वस्तुतः इस संसार में अनायास कुछ भी नहीं होता है। हाँ इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस असाधारण प्रक्रिया के पीछे कोई अविज्ञात कारण रहे हैं जिन्हें प्रत्यक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता।


मधुर घंटियों की झंकार (Kahani)

दो पादरी एक पहाड़ी रास्ते जा रहे थे। दूर शिखर पर बने देवताओं के एक चर्च से बड़ी मधुर घंटियां बज रही थी।

एक पादरी ने दूसरे से कहा-इन मधुर घंटियों की झंकार में मैं भाव-विभोर हुआ जा रहा हूँ। तुम्हें कैसा लग रहा है?

दूसरे ने कहा-इस ध्वनि ढपढप से मेरे कान बहरे हुए जा रहे हैं। यह धमाल बन्द हो तो तुम्हारी बात सुनूँ।


मनुष्य पदार्थों का पिटारा नहीं, भावनाओं का समुच्चय है।

देखने में मनुष्य एक चलता फिरता हाड़-माँस का पुतला दिखाई देता है और आज का वैज्ञानिक बुद्धिवादी समाज ऐसा मानता भी रहा है कि मनुष्य कुछ तत्वों के मिलन संयोग से विनिर्मित शरीर मात्र है। वैज्ञानिकों के अनुसार अति प्राचीन काल में कुछ रसायनों के सम्मिश्रण से एक ऐसी वस्तु उत्पन्न हुई जिसे जीवित कहा जा सके। संभवतः यही अमीबा या अमीबा जैसे एककोशीय जीव का कारण हुआ। इस धारणा की पुष्टि के लिए अनेक प्रयोग- परीक्षण किये गये। सन् 1953 में स्टेनले मिलर नामक एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में वैसी संभावित परिस्थितियाँ उत्पन्न की जैसी कि आरंभिक काल में पृथ्वी पर रही होगी। अमोनिया, मिथेन आदि गैसों से युक्त वातावरण में जब विद्युत स्फुल्लिंग (स्पार्क) गुजारे गये, तो बहुत से अमीनो अम्ल प्राप्त हुए। अमीनों सभी जीवधारियों के शरीरों के अविच्छिन्न घटक माने जाते हैं। इस प्रकार इस प्रयोग से रसायनों के संभावित संयोगों द्वारा जीवन की उत्पत्ति हुई माना जाना सरल हो गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी प्रकार जीवन की उत्पत्ति रसायनों से हो गई, तो इसके बाद उसका विकास स्वयमेव होता चला गया। डार्विन के अनुयायी विकासवादियों के अनुसार रसायनों का यही सम्मिश्रण विकास करता गया और लाखों वर्षों के उपरान्त मनुष्य बन गया।

वैज्ञानिकों के मत में मानवी विकास की यही कथा-गाथा है। वे मानव को मशीन मात्र मानते है। मशीन जटिल जरूर होती है, पर मशीन ही। उसमें रसायनों के अतिरिक्त कोई जीवित तत्त्व नहीं होता है। अमरीकी शरीर-क्रिया विज्ञानी आर्थर जे0 वेनुर ने अपनी “ह्यूमन फिजियोलॉजी” पुस्तक में इस बात को और स्पष्ट कर कहा है कि “पदार्थ तथा ऊर्जा से भिन्न जीवनीशक्ति जैसी कोई चीज जीवन को समझाने के लिए आवश्यक नहीं है।” स्पष्ट है यह कह कर उनने भी उपरोक्त मान्यता का ही समर्थन किया है। लगभग इसी स्तर के प्रतिपादन अन्यान्य भौतिक विज्ञानियों ने भी किये हैं।

इन वैज्ञानिक प्रतिपादनों के आधार पर जब मनुष्य रसायनों का एक पुँज मात्र ही है, तो उसमें होने वाली अव्यवस्था (व्याधि) भी मात्र रसायनों में होने वाली कुछ हेर-फेर ही होनी चाहिए। रसायनों की इस हेर-फेर को उस अव्यवस्था का निराकरण या चिकित्सा कार्य भी फिर सरलता से रसायनों द्वारा ही सम्पन्न होता रह सकता है।

किन्तु वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इस सरल भौतिकवादी प्रतिपादन के आधार पर शायद ही कोई रोग पूर्णरूप से समझा जा सके। प्रथम तो व्याधि की उत्पत्ति समझना ही कठिन है। जब रसायन ही रसायनों से निश्चित रासायनिक नियमों के अनुसार मिल रहे हैं, तो उसमें व्यतिरेक की कहीं कोई गुँजाइश ही नहीं है। हाइड्रोजन के दो परमाणु ही ऑक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर पानी बनाते है। इस शाश्वत नियम में कभी कोई व्यतिक्रम होता आज तक नहीं देखा गया। एक रसायन दूसरे रसायन से निश्चित बाह्य परिस्थितियों में निश्चित अनुपात में मिलता है। इस व्यवस्था में अव्यवस्था (रोग) की कहीं कोई गुँजाइश नहीं है। यदि मनुष्यों की तरह रसायन भी मनमानी करने वाले स्वेच्छाचारी होते, तभी रोग की उत्पत्ति संभव थी। मज। का होना स्वयं इस भौतिकवादी प्रतिपादन का खण्डन करता है।

इससे भी बड़ी मुश्किल वहाँ खड़ी होती है जहाँ मस्तिष्क की कार्य प्रणाली के अध्ययन का प्रश्न उठता है। मन में उठने वाले संकल्पों, विचारों, इच्छाओं आदि का मस्तिष्क से क्या संबंध है तथा ऐसी कौन-सी संभावित रासायनिक प्रक्रियाएँ हो सकती हैं, जो इस प्रकार की मानसिक हलचलों को समझा सकें।

इन सब प्रश्नों से पुनः एक बार यह सवाल पैदा होता है कि क्या सचमुच मनुष्य रसायनों का समुच्चय मात्र है? इस दृष्टि से यदि उसका मूल्यांकन किया जाय तो वह मात्र 32 रुपये का साबित होगा। उसमें जितना कार्बन कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा आदि तत्व हैं, उनकी कुल जमा कीमत इससे कोई बहुत अधिक नहीं होगी। अब प्रश्न उठता है कि यदि वह सिर्फ रसायनों का ही जखीरा है, तो क्या उनके समन्वय से मनुष्य बनाया जा सकता है? उत्तर होगा-नहीं ठीक भी है। आखिर इन निर्जीव द्रव्यों से सजीव मानव कैसे बनाया जा सकता है? उसमें फिर प्राण-चेतना भाव-संवेदना कहाँ से आयेगी? निश्चय ही मानव रसायनों के अतिरिक्त भी और कुछ है। इसे ही चेतना, भावना, संवेदना कहा गया है। काया की रचना तो जड़ पदार्थों से हुई मानी जा सकती है; पर उसे चलाने वाली शक्ति उनसे नहीं मिल सकती। बिजली के यंत्र उपकरणों की उपयोगिता तभी समझी जाती है, जब तक बिजली हो। इसके अभाव में उनके स्वयं के अस्तित्व में होने पर भी वे निरर्थक और अनुपयोगी ही सिद्ध होते हैं। इस प्रकार देखा जाय तो ज्ञात होगा कि विद्युत ही वह प्रमुख आधार है जिसके कारण यंत्रों की महता आँकी जाती है। ऐसे ही मानवी-संरचना में काया का महत्व तो है; पर उसका मुख्य उपादान चेतना है इसकी अनुपस्थिति में शरीर जड़वत बन जाता है। इस चेतना की परिष्कृति ही उच्चस्तरीय भाव-संवेदना के रूप में सामने आती है। यही मानवी प्रगति-समृद्धि का प्रमुख कारण है। देखा जाता है कि सभी को समान आकार-प्रकार की काया मिलने के बावजूद भी प्रगति के सर्वोच्च शिखर तक कुछ इने-गिने ही पहुँच पाते हैं। अधिकाँश उस ऊँचाई को छू पाने में असफल होते हैं। इसका कारण भावना और उसका स्तर ही है। भाव-संवेदनाएँ यदि श्रेष्ठ रही, तो व्यक्ति प्रगति करता चलता है और निकृष्ट होने पर अवगति के गर्त में समा जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि मानवी जीवन में काया गौण और भावना प्रमुख है।

आये दिन इसके उदाहरण भी देखने को मिलते रहते हैं। कई बार देखा जाता है कि क्रिया की दृष्टि से, शारीरिक हलचल की दृष्टि से घटनाओं में एकरूपता दिखाई पड़ने के बावजूद भी भावनात्मक दृष्टि से उनमें जमीन-आसमान जितना अन्तर होता है, फलतः परिणाम में भी भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। उदाहरण के लिए हत्या के दो मामलों को लिया जा सकता है। एक व्यक्ति जानबूझ कर किसी की हत्या कर देता है, जबकि दूसरे से यह घटना अज्ञानतावश घट जाती है। प्रथम प्रकरण में हत्यारा मृत्युदण्ड की कठोरतम सजा पाने का अधिकारी है; जबकि दूसरे केस में न्यायाधीश यह जानने का प्रयास करता है कि अभियुक्त की ‘नीयत’ क्या थी? यदि यह सिद्ध हो जाये कि अभियोक्ता की मृत्यु हुई तो अभियुक्त के हाथों ही है; पर वस्तुतः वह उसे माना नहीं चाहता था, असावधानी या अज्ञानतावश ही वह मारा गया, तो यह मामला हत्या का नहीं बनता। उस पर दण्ड संहिता की अन्य धारा लागू होती है जिसमें अभियुक्त को मृत्युदण्ड की कठोर सजा न मिलकर हल्की सजा दी जाती है। कृत्य की दृष्टि से देखा जाय, तो दोनों घटनाएँ एक-सी लगती हैं। इतने पर भी उनकी परिणतियों में अन्तर आ जाता है; क्योंकि दोनों के पीछे जुड़ी भावनाओं में अन्तर है। इस प्रकार यहाँ भी कृत्य को नकारा और भावनाओं की प्रधानता को स्वीकारा गया है। एक अन्य उदाहरण भी द्रष्टव्य है। यदि कोई अभियुक्त अभियोक्ता पर घातक आक्रमण करता है; पर निशाना चूक जाने के कारण वह अपने उद्देश्य में असफल रहता है। उधर अभियोक्ता उसकी नीयत को पहिचान कर उस पर उल्टा वार कर देता है जिसमें अभियुक्त मारा जाता है, तो न्यायशास्त्र की दृष्टि में वह अभियोक्ता हत्यारा नहीं कहलायेगा। उसका आक्रमण आत्मरक्षा की दृष्टि से हुआ हत्या करने की दृष्टि से नहीं इस प्रकार यहाँ भी भाव-चेतना को ही प्राथमिकता दी गई है।

बाल मनोविज्ञान का सार बताते हुए प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक डा. पीएगेट ने कहा है कि बाल तथा वयस्क मनोविज्ञान में मूलभूत अन्तर यह है कि बालक किसी कृत्य के पीछे छिपी भावना को प्रधानता न देकर भौतिक कृत्य को प्रमुखता देते है। जबकि वयस्क इसका ठीक उल्टा करते हैं। वे एक उदाहरण देते हैं कि यदि किसी व्यक्ति से भूल से तीन प्लेटें टूट जायें तथा एक अन्य व्यक्ति जानबूझ कर एक प्लेट तोड़ दे, तो एक बच्चे की दृष्टि में असावधानीवश तीन प्लेटें तोड़ने वाला व्यक्ति ज्यादा बड़ा दोषी होगा। यह वयस्क मनोविज्ञान से भिन्न दृष्टिकोण है; क्योंकि कोई भी प्रौढ़ जानबूझ कर प्लेट तोड़ने वाले को ही अधिक दोषी मानेगा, न कि उसे, जिससे कुछ प्लेटें अनजाने में टूट गई। स्पष्ट है, कृत्य के पीछे छिपी भावना ही प्रमुख है, अतः प्रधानता उसी को मिलनी चाहिए। जो भावना को महत्व न देकर कृत्य के पीछे भागते है, निश्चय ही बाल बुद्धि के परिचायक है।

कई बार देखने में आता है कि भावनाओं की पूर्ति न होने पर लोग शरीर त्याग कर देते है, बलिदान हो जाते है, फाँसी पर चढ़ जाते हैं। भगत सिंह जब फाँसी पर चढ़े तो उनकी देश प्रेम की भावना ने ही शरीर खत्म करके अपनी अभिव्यक्ति की। ऐसे ही गहरा भावनात्मक सदमा पहुँचने पर कितने ही लोग मरते देखे जाते है, तो कैसे कह सकते है कि भावना शरीर के लिए बनी है और प्रधान शरीर है व भावना गौण। वस्तुस्थिति पर विहंगम दृष्टि डालने के उपरान्त प्रगति एवं समृद्धि के जिस क्षेत्र पर दृष्टि जाती है, उसे आत्मिकी का क्षेत्र कहा गया है। यह कोई अद्भुत-अलौकिक नहीं, वरन् मानवी चेतना के साथ उसी प्रकार सुसंबद्ध है, जैसा कि काया के साथ भौतिक सुख-सुविधाओं का तारतम्य। मछली पानी में ही जन्मती बढ़ती और आदि से अन्त तक उसी पर निर्भर रहती है। काया के संबंध में भी यही बात है। वह भौतिक रसायनों, तत्वों, ऊर्जाओं एवं प्रवाहों के सहारे जन्मती, बढ़ती, जीती और प्रगति करती है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य स्थूल पदार्थों से निर्मित काया मात्र है, वरन् उसमें एक अन्य सूक्ष्म सत्ता भी विद्यमान है जो काया से भी अधिक उच्चस्तरीय ही नहीं, उसकी अधिष्ठात्री भी है। उसे भाव-चेतना के रूप में जाना जाता है। इसका अस्तित्व उस समय और भी सुस्पष्ट हो जाता है, जब इसके विलग हो जाने पर मृतक बनता-तत्काल सड़ता और अपना अस्तित्व स्वयं मिटा डालने के लिये मचलने लगता है।

चूँकि चेतना के संबंध में इस प्रकार विचार नहीं किया जाता, जिस प्रकार कि शरीर की सुख सुविधा पर, यही कारण है कि उस सत्ता के सर्वोपरि होते हुए भी उपेक्षा के कारण एक प्रकार से विस्मृति जैसी स्थिति ही बनी रहती है। स्पष्ट है कि विस्मरण से तो अति महत्वपूर्ण आधार भी विद्यमान रहकर अस्तित्वहीन स्थिति में जा पहुँचते है। मानवी चेतना को गुण कर्म, स्वभाव की दृष्टि से, भावना विचारणा, और जीवन-चर्या की दृष्टि से देखा जाना चाहिये। इन्हीं से व्यक्तित्व निर्मित होता है। जीवन में इनका स्तर जितना ऊँचा होता है। व्यक्तित्व भी उतना उच्चस्तरीय बनता है, अस्तु व्यक्तित्व की उत्कृष्टता काया की सुन्दरता में नहीं, भावनाओं की उदात्तता में देखी जानी चाहिये, क्योंकि मनुष्य भावनाओं का समुच्चय है, भौतिक पदार्थों से बना कोरा पिण्ड नहीं है।


देश की सेवा (Kahani)

सन् 1885। पूना के न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में समारोह के समय प्रमुख द्वार पर स्वयं सेवक को इसलिए नियुक्त किया गया कि वह आने वाले अतिथियों के निमन्त्रण-पत्र देखकर सभा-स्थल पर यथास्थान बिठा सके। उस समारोह के मुख्य अतिथि थे चीफ जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे। जैसे ही वह विद्यालय के फाटक पर पहुँचे वैसे ही स्वयं सेवक ने अन्दर जाने से रोक दिया और निमन्त्रण पत्र की माँग की।

बेटे! मेरे पास तो कोई निमन्त्रण-पत्र है नहीं। रानाडे ने कहा। तब आप अंदर प्रवेश न कर सकेंगे। स्वयंसेवक का नम्रता पूर्ण उत्तर था।

द्वार पर रानाडे को रुका देख स्वागत समिति के कई सदस्य आ गये और उन्हें अन्दर मंच की ओर ले जाने का प्रयास करने लगे। पर स्वयं सेवक ने आगे बढ़कर कहा- ‘श्रीमान! मेरे कार्य में यदि स्वागत-समिति के सदस्य ही रोड़ा अटकायेंगे तो फिर मैं अपना कर्तव्य कैसे निभा सकूँगा? कोई भी अतिथि हो उसके पास निमन्त्रण-पत्र होना ही चाहिए। भेद-भाव की नीति मुझ से नहीं बरती जायेगी। यह स्वयं सेवक आगे चलकर गोपालकृष्ण गोखले के नाम से प्रसिद्ध हुआ और गोखले ने देश की बड़ी सेवा की।


विरोधी से भी शत्रुता न पालें!

मैत्री में यह विशेषता है कि जिसके साथ प्यार किया जाता है उसकी छवि आँखों में बसी रहती है। उसका व्यक्तित्व अपने आपे के साथ जुड़ जाता है, भली ही वह दूर देश में निवास करता हो। बार-बार उसका स्मरण आता है और खाली समय में उसकी प्रतिमा आँखों के सामने घूमती रहती है। ईश्वर से भक्ति के नाम मैत्री इसीलिये की जाती है कि वह अपना निकटतम सम्बन्धी प्रतीत होने लगे। शरीरों की दूरी गहन, घनिष्ठ मैत्री में बाधक नहीं होती, वरन् वह विछोह बनकर और भी अधिक हृदय की गहराई को शूलने लगती है। मीरा, कबीर और सूर के गीतों में घनिष्ठता की स्थिति का अच्छा उभार हुआ है।

मैत्री का एक विपरीत भाव भी है- शत्रुता। उसमें भिन्नता स्तर की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करने की क्षमताएँ है। दोनों के बीच अन्तर तो है, पर वह ऐसा नहीं है जो अपना प्रभाव न छोड़े। मित्र से कुछ पाने की आशा होती है। भले ही वह भावात्मक प्रतिदान ही क्यों न हो? इसे पाने के लिए घाटा भी उठाया जा सकता है।

शत्रुता में भय, क्रोध प्रधान रहते हैं। इनमें भी वे विशेषताएँ विद्यमान है जो किसी को विपक्षी, विरोधी मानते हुए भी उसके साथ एकात्मकता जोड़े रहते ही है जिस प्रकार मित्र को नहीं भुलाया जा सकता, उसी प्रकार शत्रु भी उपेक्षित नहीं होता। वह भी आये दिन सिर पर चढ़ा रहता है। भले ही उसे हानि पहुँचाने, बदला लेने, नीचा दिखाने के भाव ही क्यों न हो? भले ही प्रतिपक्षी का भय, आतंक अपने ऊपर सवार क्यों न रहे? पर स्मृति क्षेत्र में सघनता तो बनी ही रहेगी। स्मृति में स्थान पाने की दृष्टि से मित्र की भाँति ही शत्रु भी अपना स्थान अन्तराल की गहराई में बना लेते है। यह भी उपासक का एक तरीका है।

भृंग कीट की किंवदंती प्रसिद्ध है। भृंग अपने गुँजन से झींगुर को अपनी खाल में बदल लेता है। टिड्डे हरी घास पर रहते हुए हरे रहते है और सूखी घास पर पीले पड़ जाते है। यह संगति का फल है। सुगंध और दुर्गन्ध की उपमा देते हुए सत्संग और कुसंग के लाभ-हानि का बखान किया जाता है।

शत्रुता एक प्रकार का कुसंग है जो अनचाहे ही हमारे पीछे लग लेता है। मित्र का चिन्तन करते रहने पर उस भावनात्मक सान्निध्य का प्रतिफल यह होता है कि उनकी विशेषताएँ अपनी ओर आकर्षित होती रहती है और धीरे-धीरे ऐसा प्रभाव डालती है कि दोनों के मन एवं व्यक्तित्व अधिकाधिक एकता बनालें। अनुकूल अनुरूप बन जायें। शत्रु के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है। जो दोष दुर्गुण उस पर आरोपित किये गये है, वे अपनी मान्यता के अनुरूप यथार्थता जैसी प्रतिक्रिया दिखाने वाले बन जाते है। जिस प्रकार प्रेमी के सद्गुणों को अपने में समाविष्ट करते है, उसी प्रकार शत्रु पर आरोपित दुर्गुण भी एक तथ्य बन जाते है और अपनी दुष्प्रवृत्ति का अनुदान उसे अनायास ही देते रहते है, जिसने शत्रुता परिपक्व की हुई हैं। यह दुहरी हानि है। भय, आक्रोश, प्रतिशोध, कुचक्र आदि की विचारधाराएँ अपने मन में आरम्भ होती हैं और सर्वप्रथम उसी क्षेत्र पर कब्जा करती एवं प्रभाव दिखाती हैं। उस प्रकार शत्रु की क्रियाएँ अपनी उतनी हानि करती है उसकी तुलना में वे मान्यताएँ अधिक हावी होती है जो शत्रुता के कारण किसी व्यक्ति पर आरोपित की गई हैं।

शत्रु के सुधारने के लिए अनेक प्रयत्न किये जा सकते हैं। उनको सफलता मिले या मिले। कम से कम शत्रु भाव मन से तो निकाल ही देना चाहिये। इससे उस प्रभाव से बचा जा सकता है जो शत्रु की दुष्टता का चिन्तन करते रहते अपने ऊपर भी सवार हो जाता है और दुहरी हानि पहुँचाता है इनमें से अपने दुर्भाव हटा कर शत्रु की आक्रामकता को आधी तो हम स्वयं ही घटा सकते है। निपटने के लिये आधा भाग ही शेष रह जाता हैं।


होनहार वीरवान के होता चीकने पात

कभी-कभी छोटी आयु में ऐसी प्रतिभाएँ विकसित हो जाती है जिन्हें देख दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। आश्चर्य तो तब होता है, जब चिर प्रयत्न के बाद भी प्रौढ़ों में जैसी विशिष्टता देखने को नहीं मिलती जो बालकों में अनायास ही प्रकट हो जाती है। कई बार ऐसी घटनाओं में पूर्व जन्मों के संचित संस्कार भी कारण हो सकते है।

वस्तुतः मनुष्य अपने जीवन में; किसी क्षेत्र विशेष में सफल होने का भरपूर प्रयत्न करता है। अधिकाँश में उसे सफलता मिलती भी है। उस विषय विशेष में वह मर्मज्ञ भी बन जाता है, कई लाख बार प्रयत्न के बावजूद भी वह अपनी मेहनत के अनुरूप योग्यता विकसित नहीं कर पाता उसका यह अर्थ कदापि नहीं समझा जाना चाहिए कि उसका इस जीवन का प्रयास सर्वथा निरर्थक गया। वस्तुतः उसे ही पुरुषार्थ अगले जन्म में प्रतिमा बनकर प्रकट होते और लोगों को हैरत में डालते हैं। आये दिन ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आती ही रहती है।

जापान के हनावा होंकाइशी अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण ज्ञान के अवतार कहे जाते थे। सन् 1722 में जन्म लेकर 101 वर्ष की अवस्था में सन् 1823 में मरने वाले हनावा की 7 वर्ष की उम्र में नेत्र ज्योति चली गयी थी। नेत्रहीन होकर भी उन्होंने 40 हजार से अधिक पुस्तकें पढ़ डाली। उनके मस्तिष्क में ज्ञान का असीम भंडार जमा हो गया था। मित्रों के आग्रह पर मस्तिष्क में संचित ज्ञान-भण्डार को जब पुस्तक रुन में छापा गया, तो उसके 820 खंड बने।

स्काटलैंड का जेम्स क्रिस्टन न 12 वर्ष की अल्पायु में ही अरबी, ग्रीक, यहूदी, तथा फ्लैमिश सहित विश्व की 2 भाषाएँ सीख ली थी।

फ्राँसीसी, जर्मन तथा अन्य यूरोपीय भाषाएँ बोल सकते थे। जब वे 6 माह के थे तभी से बाइबिल पढ़ने लगे थे। 6 वर्ष के हुए तो गणित, इतिहास, भूगोल के प्रकाण्ड पंडित बन गये। ब्लेट्स पास्कल ने 12 वर्ष की अवस्था में ध्वनि शास्त्र पर निबंध लिख कर सारे फ्राँस को आश्चर्य में डाल दिया था।

जॉन फिलप बराटेयर को 14 वर्ष की आयु में ही डॉक्टर ऑफ फिलासॉफी की उपाधि मिल गई। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि जो पढ़ते-सुनते उन्हें याद हो जाता उसे बाद में हूबहू वैसा ही सुना देते।

पेरिस विश्वविद्यालय के इतिहास में सबसे छोटी आयु 16 वर्ष का प्रोफेसर डिनेस ली फेवे रहा है। वह यूनानी तथा लैटिन भाषाओं का पारंगत माना जाता था और अपने विषय पढ़ाने में विशिष्ट समझा जाता था।

ट्रिनिटी कॉलेज का एक विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में ही एक दूसरे मेरीलैण्ड कॉलेज में प्रकृति विज्ञान का प्रोफेसर नियुक्त हो गया। वह पढ़ता भी रहा और पढ़ाता भी। नियुक्ति के समय कुछ डिग्रियाँ दो वर्ष के भीतर प्राप्त कर लेने की शर्त उस पर लगायी गई थी। वह उसने समय से पूर्व ही पूरी कर दी, साथ ही अपने कॉलेज की पढ़ाई भी यथावत् जारी रखी।

इसी प्रकार लेबनान के केण्टुकी नगर का मार्टिन जे0 स्पैल्िडग 14 वर्ष की आयु से प्रोफेसर बना। उन दिनों वह सेन्ट मैरीज कॉलेज में विद्यार्थी था, किन्तु गणित संबंधी उसकी अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए उसे उसी कॉलेज में उस विषय के प्रोफेसर की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई। बड़ा होने पर उसे वाल्टीमोर के आर्क विशप पद पर प्रतिष्ठित किया गया। हालैण्ड, लेडन का जान डाइस्की पूरे 17 वर्ष का भी नहीं होने पाया था कि उसे इंग्लैंड के राजा किंग जेम्स प्रथम ने राजकीय धर्मोपदेशक नियुक्त किया। तब तक वह न केवल धर्मशास्त्र का विशेषज्ञ बन चुका था, वरन् हिब्रू और यूनानी भाषाओं में भी प्रवीण था।

सेना में भर्ती होते समय मारक्लिस डी0 नैनाजिस की आयु मात्र आठ वर्ष की थी। इतनी छोटी आयु में उसने यह प्रवेश नियमानुसार नहीं, अपनी विशिष्ट प्रतिभा का प्रमाण देकर पाया था। उसने पूरे 52 वर्ष तक फ्राँसीसी सेना में काम किया। इस बीच क्रमशः ऊँचे पदों का अधिकारी बनते-बनते फील्ड मार्शल बन गया था। इसी पद में सेव करते-करते उसकी मृत्यु हुई। सेव निवृत्ति के नियम उस पर लागू नहीं किये गये थे।

अंग्रेज कवियित्री अपनी अठारह वर्ष की आयु में ही अपनी ख्याति प्राप्त कर चुकी थी कि उस आयु में संसद सदस्यता के लिए खड़े होने पर उसे भारी बहुमत से सफलता मिली।

अमेरिकी पाल मार्फी ने स्नातकोत्तर परीक्षा ही नहीं वकालत की पदवी भी 19 वर्ष की आयु में प्राप्त कर ली थी। इन दिनों परीक्षा देने में आयु का कोई प्रतिबंध नहीं था। इसलिए प्रवेश और उत्तीर्ण होने पर तो ऐतराज नहीं उठा, पर मासूम को डिग्री देते समय विश्वविद्यालय ने उस पर विशिष्ट प्रतिबंध अंकित किया कि वह 29 साल का होने तक वकालत का व्यवसाय न कर सकेगा।

इंग्लैण्ड के रोज पब्लिक स्कूल में फेलिप हैरिंघम तब विद्यार्थी ही था, पर विद्यालय के प्रबंध समिति ने उसे पढ़ते रहने के साथ-साथ हैडमास्टर का पद सम्भाल लेने के लिए भी सहमत कर लिया। तब वह मात्र 16 वर्ष का था। उसने अपनी शिक्षा जारी रखी और सौंपी गई जिम्मेदारी भी भली-भाँति निबाही।

फ्राँस की ग्राण्ड असेम्बली के संसद सदस्य जीन वैप्टिस्ट टैस्टे को 13 वर्ष की आयु में ही चुन लिया गया था। उसमें उन दिनों बड़े तेजस्वी व्यक्ति ही चुन गए थे। फ्राँसीसी विद्रोह के उपरान्त वही उच्चतम शासन संस्था थी।

पैरिस की रॉयल लाइब्रेरी का सर्वोच्च अधिकारी फैन्कोडसे आगस्टे जब उस पद पर आसीन किया गया, तब 12 वर्ष का था। कुछ ही वर्ष बाद वयस्क होने से पूर्व उसे सम्पूर्ण पुस्तकालयों की संचालन ज्ञान तथा पुस्तकों का संचालन सम्बन्धी कौशल असाधारण था।

जर्मनी के एल्डोर्फ विश्वविद्यालय का रीडर काडण्टवान पैपनेहम नियुक्त हुआ, तब वह 14 वर्ष का था। इसके बाद उसने सेना में प्रवेश किया और जीवन भर हर महत्वपूर्ण लड़ाई में प्रमुख पद सम्भालता रहा। उसने छोटी-बड़ी 101 लड़ाइयों की कमान संभाली और लड़ते-लड़ते ही शहीद हुआ।

विक्टर डी0 ज्वाय जब फ्राँसीसी एकेडमी की सदस्या चुनी गई, तब वे 13 वर्ष की थी। उन्हें वाल्वेटर की कृतियाँ कण्ठस्थ याद थी। साहित्य 36 भागों में है और उसमें तीस लाख ग्रन्थ हैं।

सिओल में एक तीन वर्षीय कोरियाई बालक जोग अंग ने कोरियाई तथा अँग्रेजी भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। वह दोनों भाषाएँ धड़ल्ले से बोलता था और बिना किसी साहित्यिक त्रुटि के ठीक प्रकार लिखता था।

छपरा बिहार में जम्मा एक सन्तोष नामक बालक जन्म के तीसरे वर्ष से ही अपनी संगीत प्रतिभा का असाधारण परिचय देने लगा था। जिन वाद्य यंत्रों को उसने कभी देखा तक नहीं था, उन्हें सामने प्रस्तुत करने पर वह इस प्रकार बजाने लगा, मानो उनमें वह पहले से ही पारंगत हो। इस विलक्षणता के प्रदर्शन भारत के अनेक प्रमुख नगरों में हुए। लाखों दर्शक आश्चर्यचकित रह गए।

स्वीडन के वैरान गुस्ताफ हेमफील्ड जब 14 वर्ष के थे, तब योरोप में प्रचलित 9 भाषाओं में धड़ल्ले से बोलने और लिखने लगे थे। आगे उनने हिब्रू पर भी अधिकार पाया। मात्र प्रतिभा के आधार पर नहीं, उनके चरित्र-चिन्तन की उत्कृष्टता को ध्यान में रखते हुए स्वीडन सरकार ने उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश भी बनाया।

ये सारी घटनाएँ पूर्वजन्म में व्यक्ति द्वारा क्षेत्र विशेष में किये गये प्रयास-अभ्यास की ओर इंगित करती हैं। जो प्रयास पिछले जन्म में अधूरा रह जाता है अथवा कठिन प्रयत्न के बावजूद जिसमें सफलता नहीं मिल पाती, उसमें अगले जन्म में स्वल्प अभ्यास से ही ऐसी प्रतिभा विकसित होती है, जिसे आश्चर्यजनक कहा जा सके। “तत्र तं बुद्धि संयोग लभते पौर्वदेहिकम्...............” के रूप में गीताकार ने भी इसकी पुष्टि की हैं।


गायत्री और यज्ञ का तत्वज्ञान

आत्म-परिष्कार मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। गुण, कर्म, स्वभाव में प्रखरता, प्रामाणिकता और प्रतिभा का विकास, विस्तार इसी आधार पर सम्भव होता है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों को जन्म देती है। अनुकूलता प्रतिकूलता यों बाह्य वातावरण से भी किसी कदर जुड़ी रहती है, पर उनका उद्गम स्रोत अन्तस्थल ही है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माणकर्ता आप है, वह स्वेच्छापूर्वक उत्थान और पतन के मार्ग पर चलता है। इसी आधार पर उसके सामने उत्थान एवं पतन के अवसर सामने आते है। सम्पन्नता और विपन्नता भी इसी आधार पर बहुत कुछ निर्भर रहती हैं।

आत्म-परिष्कार उपक्रम में उपासना का अपना विशिष्ट स्थान है। वह सीधे भावना क्षेत्र को स्पर्श करती है भावनाएँ, विचारणाओं और कल्पनाओं को इच्छानुसार मोड़ती हैं। यह प्रक्रिया, क्रिया-कलाप के रूप में फलित होती है। यही है उत्कर्ष और अपकर्ष का केन्द्र बिन्दु जिसे उपासना साधना के आधार पर प्रभावित किया जाता है। भली या बुरी उपासनाएँ अपने-अपने विकास और विनाश के आधार खड़े करती हैं।

आस्तिक समुदाय में अपने-अपने स्तर की उपासनाओं का विधान और प्रचलन है। परम्परावादी उन्हें संपर्क क्षेत्र के वातावरण से अपना लेते है। किन्तु विचारशीलों के सामने एक कठिनाई यह आती है कि अनेकानेक प्रचलनों में से किसे अपनाएँ किसे न अपनाएँ। इस असमंजस को दूर करने के लिए उन्हें तर्क, तथ्य और प्रमाण की कसौटी लगानी पड़ती है और जानना पड़ता है कि अनेकानेक प्रचलनों में से समाधानकारक क्या है? किसे छोड़ा और किसे अपनाया जाये?

यों उपासना का प्रमुख आधार श्रद्धा है। श्रद्धा के साथ आत्म-क्षेत्र की विशिष्टताएँ, विभूतियाँ जुड़ती हैं। अश्रद्धा रहने पर कोई भी पूजा, पाठ, विधि विधान, जप, तप एक खिलवाड़ बन कर रह जाता है। कौतुक कौतूहल की तरह कई व्यक्ति उपासना, साधना करते तो है, पर उनका कोई कहने लायक परिणाम न मिलने पर और भी अधिक अश्रद्धालु बन जाते हैं। यहाँ भूल विधि-विधान के किसी भी क्रम में नहीं खोजी जानी चाहिए, वरन् देखा यह जाना चाहिए कि उस प्रयोग में श्रद्धा का समावेश कितना रहा? श्रद्धालु को देव प्रतिमाएँ रामकृष्ण परमहंस की तरह, मीरा की तरह, एकलव्य की तरह शक्ति और यथार्थता परिलक्षित होती है; जबकि अश्रद्धालु प्रतिमाओं का उपहास उड़ाते रहते हैं। मूर्तिकारों के देव प्रतिमाएँ विक्रयार्थ रखी गई वस्तु मात्र होती हैं, जबकि भावनाशील उनके सहारे अपनी श्रद्धा को परिपक्व करते और भाव संवेदनाओं को परिष्कृत करते हैं। यहाँ श्रद्धा विश्वास की शक्ति ही प्रधान रूप से काम करती है। उसके अभाव में साधनाएँ एक प्रकार की चिह्न पूजा भर बन कर रह जाती हैं।

इतने पर भी मनुष्य विवेकशील होने के नाते पूजा पद्धतियों में से विशिष्टता की खोज-बीन करे और उनमें से अधिक प्रभावी को चुनने का प्रयत्न करे तो इसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है।

गायत्री मंत्र की अपनी विशेषताएँ हैं। उसका शब्द गुन्थन इस प्रकार का है कि जप या उच्चारण करने वाले के आन्तरिक क्षमता केन्द्र प्रभावित और प्रकाशित होते हैं। इस तथ्य को परीक्षा की कसौटी पर कस कर भी जाना जा सकता है। प्रयोग परीक्षण के रूप में कोई कुछ गायत्री उपासना करके देखे तो उसे अनुभव होगा कि श्रम और समय निरर्थक नहीं गया। उसने अपना प्रभाव उत्पन्न किया। भाव संवेदनाओं में उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ी। बुद्धि में आदर्शवादिता का पक्षधर रुझान आरम्भ हुआ। क्रिया-कलाप में सात्विकता का अनुपात बढ़ा और प्रतिभा तथा प्रखरता का अनुपात पहले की अपेक्षा अधिक समुन्नत हो चला। इस तथ्य को आत्म-निरीक्षण, परीक्षण के आधार पर देखा समझा जा सकता है। जिन्हें साधना विज्ञान की क्षमता पर विश्वास नहीं है, वे भी इसे प्रयोग परीक्षणों के रूप में कुछ समय कार्यान्वित कर सकते हैं। अनुसंधानों में बहुत समय, श्रम लगता रहता है। कोई चाहे तो गायत्री उपासना को अनुसंधान के रूप में प्रयोग, परीक्षण की तरह कसौटी पर कस सकता है। अनेकों का अनुभव सत्परिणाम का साक्षी हैं।

यदि साधना में श्रद्धा का समावेश हो तब तो कहना ही क्या? इस समन्वय से सोना सुगन्ध के सम्मिश्रण जैसा उदाहरण सामने आता है। श्रद्धा की सिंचाई पाने पर साधना का वृक्ष तेजी से बढ़ता और फलता, फूलता देखा गया है। यों अश्रद्धालुओं का प्रयोग परीक्षण भी सर्वथा निरर्थक नहीं जाता। वे अपने में आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की मात्रा क्रमशः आगे बढ़ती हुई देखते हैं।

शब्द साधना की दृष्टि से भी गायत्री के वाचक, उपाशु और मानसिक जप के अपने-अपने महत्व हैं। उनके कारण स्नायु संस्थान और मनःसंस्थान उस प्रकार प्रभावित होते है कि अनुपयुक्ताओं का निराकरण और उपयुक्तताओं का अभिवर्धन अनुभव में आने लगे।

अर्थ की दृष्टि से गायत्री में सद्बुद्धि की देव प्रज्ञा की आराधना हैं। मनुष्य जीवन में यदि इस तत्व के अभिवर्धन की महत्ता समझी जा सके तो सहज ही यह लालसा उठती है कि विचार संस्थान का परिमार्जन किया जाय, बुद्धि को न्यायनिष्ठ और विवेकवान बनाया जाये। कल्पनाओं और आकाँक्षाओं की अनगढ़ न रहने देकर उन्हें आदर्शवादिता के सघन रूप से जोड़ रखा जाये। बुद्धिमता या दूरदर्शी और नीति-निष्ठ रहे तो व्यक्ति का सुसंस्कारी बनना स्वाभाविक हैं। ऐसे ही व्यक्ति महामानव स्तर के बनते और महान कार्य करते देखे गये हैं। गायत्री मंत्र की प्रेरणा इसी दिशा में अग्रसर होने के लिए इंगित करती है। यदि व्यक्ति इस दिशाधारा को अपना सके तो उसका आत्मिक और भौतिक क्षेत्र समुन्नत हो सकना निश्चित है।

गायत्री मंत्र में ‘अहम्’ का नहीं वयम् का प्राधान्य है। उसके निःशब्द का अर्थ होता है हम सब। जो कुछ भी सोचा जाय जो कुछ भी चाहा जाय, जो कुछ भी किया जाय, वह ऐसा होना चाहिए जिससे सर्वजनीन हित साधन होता हो। सार्वभौम प्रगति एवं सुख, शान्ति का आधार खड़ा होता है। यही ब्रह्म की-विश्व मानव की-अर्चना अभ्यर्थना है। इसमें निजी स्वार्थ की संकीर्ण लोभ, मोह की अवहेलना की गई है।

गायत्री के चौबीस अक्षरों की जो व्याख्या, परिभाषा शास्त्रकारों ने की है उसका गम्भीरतापूर्वक अवलोकन करने से प्रतीत होता है कि धर्म-निष्ठा और समाज व्यवस्था के समस्त आदर्शवादी सूत्र इन अक्षरों में गागर में सागर की तरह भर दिये गये है। इन्हें विश्व के सभी धर्मों का तत्वज्ञानों का सार संक्षेप कहा जा सकता है। इस आधार पर गायत्री मंत्र को मानव धर्म की व्याख्या करने वाला अति संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित शास्त्र कहा जा सकता है। इस आधार पर उसे मानवी आस्था का उच्चस्तरीय निर्धारण भी कहा जा सकता है।

भारत में अनेक धर्म संप्रदाय हैं उनकी अपनी-अपनी उपासना विधियों पर गायत्री की उपेक्षा अवज्ञा किसी में भी नहीं है। भले ही वे उसे प्रयोग में न लाते हों। ऐसी दशा में गायत्री उपासना को उसकी व्याख्याओं और प्रेरणाओं का ध्यान में रखते हुए सर्वजनीन उपासना कहा जाये तो कोई अत्युक्ति न होगी

गायत्री में भगवान को नारी रूप में मान्यता दी गई है। उसे वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता कहा गया है। उसकी प्रतिमाएँ नारी रूप में ही बनी है। इससे यह सिद्ध होता है कि नारी की वरिष्ठता और महता को भारतीय संस्कृति में प्रमुखता दी गई है। उसके लिए श्रद्धा रखने, गरिमा स्वीकारने सम्मान देने और प्रगति के उच्चशिखर तक पहुँचाने में योगदान देने की मान्यता है। इस तथ्य को यदि व्यावहारिक रूप दिया ता सके और नारी उत्कर्ष के लिए सर्वतोमुखी प्रयास चल पड़े तो समझना चाहिए कि देवयुग का इसी धरती पर इन्हीं परिस्थितियों में अवतरण हो सकता है। सतयुग की वापसी जैसा काया-कल्प दृष्टिगोचर हो सकता है।

गायत्री का दूसरा पक्ष ‘यज्ञ’ है। दोनों को मिलाकर माता, पिता जैसा युग्म बनता है। यज्ञ का शब्दार्थ है पुण्य, परमार्थ, पराक्रम संगठन। इन उद्देश्यों का प्रतीक अग्निहोत्र के रूप में भी क्रियान्वित होता है; पर वह इतने तक ही सीमित नहीं है। उसके भावार्थ में वे सभी तत्व आते है जो व्यक्तित्व को परिष्कृत और समाज को सुविकसित सुव्यवस्थित बनाते हैं। एक शब्द में यज्ञ को सत्कर्म भी कह सकते है।

गायत्री को सद्ज्ञान का प्रतीक और यज्ञ को सत्कर्म का प्रतिनिधि माना जा सकता है। इसके अभ्यास में गायत्री का जप और यज्ञ का अग्निहोत्र यजन हो सकता है। पर इन दोनों ऊर्जा भरी प्रेरणाओं को इतने तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। जो इन कर्म काण्डों को कर नहीं पाते, उन्हें भी गायत्री और यज्ञ का विरोधी नहीं कह सकते। इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि जो लोग जप और यजन के कर्मकाण्डों को नियमित रूप से करते हैं वे मात्र क्रिया ही चरितार्थ करते हैं और इन दोनों की प्रकाश प्रेरणाओं से वंचित रहते हैं। क्रियाओं का मूल्याँकन उनके साथ जुड़ी रहने वाली भावनाओं के आधार पर ही किया जाता है। भावना रहित क्रिया तो मात्र शारीरिक हलचल भर है। उनसे अंगों की हलचल और पदार्थों का स्थानान्तरण भर होता है। यह समग्र लाभ प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। गायत्री और यज्ञ प्रक्रिया की परिणति भी इसका अपवाद नहीं है। यदि उनका समुचित लाभ उठाना है तो गायत्री और यज्ञ का तत्व-ज्ञान समझना और उन्हें चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में उतारना होगा।

गायत्री के महत्व महात्म्य के सम्बन्ध में शास्त्रकारों ने बहुत कुछ कहा है। यज्ञ के दर्शन और विज्ञान को भी अनेक प्रसंगों और प्रतिपादनों से बहुत महत्व दिया गया है इन प्रतिपादनों की सचाई जाननी है तो उनका कर्मकाण्ड ही नहीं तत्वज्ञान भी समझना होगा। न केवल समझना होगा, वरन् जीवन विधा के साथ जुड़ कर उसके परिणामों की प्रतीक्षा करनी होगी। प्राचीन काल में इस प्रकार के प्रयोग परीक्षण चिरकाल तक होते रहे है। एक को दूसरे के अनुभवों से लाभ मिलता रहा है और उस पारस्परिक प्रोत्साहन से वातावरण ऐसा बनता रहा है जिसे सतयुग के नाम से पुकारा जाता रहा। मनुष्यों में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण परिलक्षित होता रहा। भारतीय संस्कृति का प्रगति रथ जिन पहियों पर आधारित रह कर अग्रगामी बनता रहा, उन्हें गायत्री और यज्ञ कहा जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी। इस प्रयोग परीक्षण को व्यक्तिगत जीवन में और सामूहिक व्यवस्था-क्रम में सम्मिलित करके अब भी वैसा ही लाभ उठाया जा सकता है। सद्ज्ञान और सत्कर्म ही सर्वतोमुखी अभ्युदय के आधारभूत कारण हैं।


बदमिजाज क शहद कड़वा होता है(Kahani)

एक छैल–छबीला आदमी शहद बेचा करता था। उसकी वाणी में इतनी मिठास थी कि खरीददार उस पर मक्खी की तरह टूट पड़ते थे।

एक बदमिजाज आदमी ने उसे देखा और डाह करने लगा। उसने सोचा क्यों न मैं भी यही धन्धा कर लूँ?

दूसरे दिन वह भी शहद का मटका सिर पर लेकर घर से निकल पड़ा। आदत के अनुसार उसके माथे पर तैयारियां पड़ी हुई थी। वह ध्यान से दरवाजों की ओर देखता कि शायद कोई मुझे पुकार न रहा हो। पर ज्यों ही उसकी नजर किसी औरत या मर्द से टकरा जाती, उसे देखने वाला मुँह फेर लेता।

शहद बेचने वाला परेशान था। वह दिन भर चिल्ला-चिल्लाकर आवाज देता रहा--’शहद ले लो, शहद।’ पर उसकी आवाज इतनी तीखी थी कि सुनने वालों के दिल में घिन पैदा कर रही थी।

सारा दिन शहद का मटका लिए-लिए वह भटकता रहा। आखिर थक कर वह चूर हो गया और फिर उसने घर की राह ली।

घर में बीबी उसकी सूरत देखकर सारा किस्सा भाँप गई और हँसी करते हुए बोली ‘बदमिजाज का शहद भी कड़वा होता है, मियाँ। अगर तुम्हारे पास सोना-चाँदी नहीं तो क्या तुम अपनी वाणी में मिठास भी पैदा नहीं कर सकते?’

रसना का जादू ऐसा है कि जहाँ मीठी वाणी से लोग खिंचे चले आते हैं वही कड़वी जबान दूसरों के दिल में नफरत का जहर घोल देती है।


सेवा धर्म एक योग साधना

मानवी काय कलेवर अनेकानेक शक्तियों का भाण्डागार है। प्रायः वे प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। बीज के अन्दर एक समूचा वृक्ष अपनी समस्त विशेषताओं के साथ छिपा पड़ा रहता है। पर वह प्रकट तभी होता है जब उसे भूमि, खाद, पानी का सुयोग मिले, इसी प्रकार व्यक्ति के अन्तराल में छिपी हुई विशेषताओं को उभरने के लिए कुछ विशेष प्रयत्नों की-आधार, अवलम्बनों की आवश्यकता होती है। जो इस दिशा में प्रयत्नशील रहते और उभार परिष्कार में सफलता प्राप्त करते है, उन्हें महामानव स्तर तक पहुँचने का अवसर उपलब्ध होता है। वे ऐसे ऐतिहासिक बन सकने योग्य कार्य भी कर दिखाते हैं जो सामान्यजनों को अलौकिक, आश्चर्यजनक जैसे प्रतीत होता है।

प्रसुप्त को जाग्रत करना ही महान पुरुषार्थ है। इसी के लिए अनेकानेक साधनाओं का आश्रय लिया जाता है। योग साधनाओं की विविध परम्पराओं का सृजन इसी निमित्त हुआ है। उनमें अनेकता विविधता देखते हुए किसी को भी भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों के आहार, पोशाक, भाषा, परम्परा एवं विनोद क्रम में अन्तर पाया जाता है, उसी प्रकार यदि आध्यात्म साधनाओं में अन्तर पाया जाता है तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए और न भ्रम में पड़ना चाहिए। वे सभी उपयोगी हैं। लक्ष्य सभी का एक है आत्म-परिष्कार। वह जिस सीमा तक पूरा होता जाता है, उसी क्रम से गुण कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश होता है। इस प्रकार परिपुष्ट हुआ व्यक्ति अपने में सामान्य जनों की अपेक्षा प्रतिभा, प्रामाणिकता सुव्यवस्था और तत्परता की मात्रा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी देखता है। यही ऋद्धि सिद्धियों का बीज है। इसके पल्लवित होने पर सामान्य स्थिति में जन्मे, पले लोग भी उन्नति के उच्चशिखर तक जा पहुँचते हैं, ऐसे काम कर दिखाते हैं, जिन्हें अभिवन्दनीय, अनुकरणीय कहा जा सके। इसी प्रगतिक्रम के साथ-साथ आत्म-सन्तोष और लोक सम्मान उपलब्ध होता चलता है। जन सहयोग की भी कमी नहीं रहती है। स्पष्ट है कि एकाकी व्यक्ति किसी प्रकार मनुष्यों की तरह निर्वाह भर कर सकता है। भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्रों में प्रगति करने के लिए उसे तद्नुरूप वरिष्ठ स्तर की प्रतिभाओं का सहयोग चाहिए, इसे अर्जित करने में निजी पात्रता ही सफल होती है। चुम्बक अपने स्तर के धातु खण्डों को समेट, बटोर कर इर्द-गिर्द एकत्रित कर लेता है। यह बात सत्पात्रों पर भी लागू होती है। परिष्कृत और प्रामाणिक व्यक्तियों के साथ मैत्री साधने, प्रशंसा करने, सहयोग देने के लिए असंख्यों तैयार रहते है। प्रगति के आधारभूत तथ्य यही हैं। इसके लिए आत्म-शोधन की आत्म-परिष्कार की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। इस आधार का अवलम्बन ही योग साधना है। इस उपाय उपचार की असाधारण महिमा गाई जाती है। महात्म्य वर्णन किये जाते हैं। फलश्रुतियों के उत्साहपूर्वक बढ़े-चढ़े अम्बार लगाये जाते हैं। पर तथ्यतः बात इतनी भर है कि अपने को कषाय-कल्मषों की कीचड़ से उबारा जा सके। पवित्रता, प्रामाणिकता के शुद्ध जल से धोया जा सके तो व्यक्ति खरे सोने जैसा दृष्टिगोचर होता अपनी स्वर्णिम शोभा से दर्शकों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करता है।

यह सोचना भूल है कि देवानुग्रह आसमान से बरसता है या किसी हथकण्डे के माध्यम से उन्हें बरगलाया फुसलाया जा सकता है। दैवी शक्तियाँ समदर्शी और न्याय-निष्ठ होती हैं। उन्हें किसी के साथ राग-द्वेष जैसे सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा नहीं होती। वे मात्र पात्रता का परिपोषण करते हैं। उर्वरभूमि पर वर्षा की बूँदें मखमली हरीतिमा उगा देती है; पर कठोर चट्टानों पर घनघोर वर्षा होते हुए भी एक पता तक नहीं जमता हैं। इसमें देवता पर पक्षपात का आरोपण नहीं किया जा सकता, वरन् निष्कर्ष यही निकाला जाना चाहिए कि पात्रता का परिष्कार ही फलदायी होता है। देवीनुग्रह इसके बिना नहीं मिलता साथ ही यह बातें भी गाँठ बाँध लेने योग्य है कि इस तथ्य की उपेक्षा करके कोई अनाचारी दैवी शक्तियों को न तो प्रसन्न कर सकता है और न अनुग्रह बरसाने के लिए बाधित। इस दिशा में विविध कर्मकाण्ड भी कुछ सहायक सिद्ध नहीं होते। अस्तु पतों पर भटकने की अपेक्षा विवेकवानों को आत्म-शोधन के निमित्त ही अपने आत्मिक प्रयासों को केन्द्रीभूत करना चाहिए। उन्हीं के निमित्त साधना क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। उन उपचारों के स्वरूप विभिन्न हो सकते है, पर उद्देश्य में अन्तर नहीं रखा जा सकता। आत्म-परिष्कार ही वास्तविक देवाराधन है।

योगाभ्यासों में, तप साधनाओं में, सभी उपासना परक कर्मकाण्डों में अनुबंधित हो ऐसी बात नहीं है। एक अति सरल और व्यावहारिक योग भी है-सेवायोग। इसे पुण्य परमार्थ का संचय भी कह सकते हैं। इस निमित्त भी आत्मसंयम बरतना पड़ता है। शक्तियों को अनावश्यक कार्यों में क्षरित होने से रोकना पड़ता है। इतना ही नहीं समय साधन चिन्तन आदि की कुछ भी बचत क्यों न हो, उन्हें सत्प्रयोजनों के निमित्त अर्पित करना प्रयास है। संयम साधना में तपश्चर्या सध जाती है और दूसरों की सेवा सहायता में अपनत्व पर विराट के विशालता के किसी घटक के साथ अपनी आत्मीयता सघन होती है। यही योग साधना की पृष्ठभूमि भी है। सेवा, धर्म को सेवायोग भी कहा जा सकता है। उसे अपनाने वाले को प्रथम चरण लोभ मोह और अहंकार का नियमन करने के रूप में उठाना होता है। सादा जीवन और उच्चविचार का जीवन चर्या में सघन समावेश किया जाता है। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाना पड़ता है। सादा जीवन उच्च विचार वाले सिद्धान्त को जीवनचर्या की अविच्छिन्न रूप से गति-विधि में सम्मिलित करना पड़ता है। इतना बन पड़ने पर आत्मिक प्रगति के मार्ग में और कोई बड़ा अवरोध आड़े नहीं आता। सेवा धर्म अपनाने का संकल्प उत्साह मन में तब उठता है जब संकीर्ण स्वार्थपरता के भव-बंधनों से जैसे-जैसे छुटकारा मिलता जाता है वैसे ही जैसे कीचड़ में दब कर तली में बैठी हुई लकड़ी पानी भर चलने पर ऊपर उभरती चलती है। दबाव हटते ही ऊपर उभरना आरम्भ हो जाता है। यही बात आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में भी लागू होती है। अन्तरंग क्षेत्र के कुसंस्कार और बहिरंग क्षेत्र के दुष्कर्म जैसे ही हटने मिटने लगते है वैसे ही आत्म-विकास का ‘कमल’ सद्ज्ञान रूपी सूर्य की किरणें पड़ते ही सहज खिलने लगता है।

सेवा धर्म प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए वही काम करता है जो पौधे के लिए खाद पानी। उसे साबुन पानी भी कह सकते हैं जो कपड़े पर लगी मलीनता को धोकर स्वच्छ चमकीला बनाता है। सद्गुण बढ़ाने पर सेवा धर्म अपनाने की उत्कंठा उमँगती है। साथ ही यह भी देखा गया है कि लोकमंगल के लिए प्रवृत्त होने पर जड़ जमाये गया है कि लोकमंगल के लिए प्रवृत्त होने पर जड़ जमाये हुए दोष दुर्गुणों की आधारशिला उखड़ती है।

सद्भावना फूल है और जन-कल्याण के निमित्त प्रयत्नशीलता उसका प्रतिफल। सेवा कृत्यों में मात्र हलचल ही नहीं होती रहती उसके साथ सत्प्रवृत्तियों का समागम भी चलता रहता है। जो आदर्शवादी न होगा उसे अपनी लोभ-लिप्सा से ही फुरसत न मिलेगी। उसका सोचना और करना स्वार्थपरता की पूर्ति के निमित्त ही कार्यरत बना रहेगा। सस्ती वाहवाही लूटने के लिए ऐसे लोग दिखावटी आडम्बर मात्र ओढ़ पाते हैं। नाम छपने फोटो प्रकाशित होने, पदाधिकारी कहलाने भर में उनकी रुचि होती है। उस विज्ञापन बाजी के लिए ही वे थोड़ा समय और धन खर्च पाते हैं। जहाँ ऐसा अवसर न हो वहाँ से वे दूर ही रहते है, उदार आत्मीयता की भावनाएँ परिपक्व होने पर ही यह सूझता है कि दूसरों का दुःख बँटाया जाये, अपना सुख बाँटा जाय। गिरतों को उठाया जाये। उठतों को बढ़ाया जाये। यह उमंग तभी उठती है जब अन्यों में भी अपनी ही आत्मा का प्रतिबिम्ब परिलक्षित होने लगे। इस स्तर की सद्भावना, सदाशयता अनायास ही नहीं उभर आती इसके लिए लम्बे समय तक आत्मशोधन की साधना करनी पड़ती है। तुच्छता को महानता में, कामना को भावना में बदलना पड़ता है। लेने की अभिलाषा, देने की उत्कंठा में जब परिणत होती है तभी सेवा धर्म अपनाने का सुयोग संयोग बनता है।

सेवा भावना का अस्तित्व तभी प्रकाश में आता है जब उदारता सहृदयता पनपती है। कहना न होगा कि इस प्रकार का अन्तस्तल उन्हीं में दीख पड़ता है जो दया, करुणा, ममता जैसी सत्प्रवृत्तियों से अनुप्राणित होते है। निष्ठुरता के रहते दूसरों का शोषण करते रहने की बात ही सूझती है। उस दिशा में परमार्थ के लिए कुछ करना तो दूर सोचते भी नहीं बनता। जब सेवाभावी चिन्तन जग पड़े और उसे कार्यान्वित करने की विधा चल पड़े तो समझना चाहिए कि चिन्तन क्षेत्र में उत्कृष्टता घर बनाने लगी। जब वह कार्यान्वित होने लगे तो मानना चाहिए कि श्रद्धा ने मूर्ति रूप धारण कर लिया।

स्व धर्म अपनाने पर पग-पग पर उदारता का परिचय देना पड़ता है। स्वार्थों में कटौती करनी पड़ती है। समय और साधनों को बढ़-चढ़ कर उपभोग करने, ठाटबाट बनाने, विलासिता का रसास्वादन करने की दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना पड़ता है। सहृदयता के बिना सेवा बन ही नहीं पड़ती। इसी तथ्य को यों भी कहा जा सकता है कि जन-कल्याण में प्रवृत्त होने वाला क्रमशः अधिकाधिक उदार बनते चलने के लाभ से वंचित नहीं रह सकता। सदाशयता और सेवा एक ही प्रक्रिया के दो अविच्छिन्न पक्ष है। एक के रहते दूसरी का भी जा पहुँचना स्वाभाविक है। प्रकाश के सामने अन्धकार नहीं टिक सकता। उदारता के उभरते ही संकीर्ण स्वार्थपरता का निर्वाह हो नहीं सकता। सेवा परायण व्यक्ति दुर्जन बना नहीं रह सकता। उसे सज्जनता का पक्षधर बनना ही पड़ता है।

अन्य योग−साधनाओं में विधि-विधान सही न होने पर उल्टा परिणाम भी हो सकता है। हानि भी उठानी पड़ सकती है। पर सेवायोग में ऐसा कोई खतरा नहीं है। पुण्य परमार्थ का स्वल्प समयदान भी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करता है। जन-कल्याण में निरत व्यक्ति सज्जन बन कर रहता है। इतना बन पड़ने पर आत्म-कल्याण की दिशा में प्रगति क्रम अनुगामी ही बनता है।


सफलताएँ कर्मनिष्ठ के पीछे फिरती हैं।

कर्म और कर्मफल में अपना अधिकार न मानना ही अनासक्ति कही गई है। कर्म में कर्त्तापन का भाव रखना और उसके फल में अपना अधिकार मानना ही आसक्ति है। आसक्तिवान व्यक्ति जल्दी ही परिस्थितियों तथा परिणामों से प्रभावित हो उठता है। किन्तु कर्म और उसके अच्छे-बुरे, अनुकूल, प्रतिकूल परिणामों का बोझ अपने ऊपर न लेने वाला किन्हीं विषमताओं से प्रभावित नहीं होता--फलतः उसका सुख, चैन, शान्ति और सन्तोष अक्षुण्ण बना रहता है। न तो वह कभी निराश होता है और न हतोत्साहित। वह जीवन पंथ पर निर्द्वंद्व भाव और अप्रतिहत गति से बढ़ता चला जाता है।

डेल कार्नेगी ने अपना एक संस्मरण लिखा है कि हेनरी फोर्ड के पास मैंने जाकर पूछा कि इतना कार्य-भार होते हुए भी आप स्वस्थ कैसे रहते है? इस पर उन्होंने कहा ‘मैं’ ईश्वर को अपने कार्यों का प्रबन्धक, स्वामी मानता हूँ और अपने आपको काम करने वाला श्रमिक। ईश्वर को अपने कार्यों का प्रबन्धक और स्वामी मानने से फिर मुझे कोई चिन्ता नहीं रहती और इसी निश्चिन्तता से मैं अधिक स्वस्थ और सन्तुष्ट रहता हूँ।

कर्म और कर्मफल में आसक्ति रहने से मनुष्य को अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों से गुजरना पड़ता है और इसी के अनुसार आशा निराशा को भी सामना करना पड़ता है और इससे मनुष्य की शक्तियों का काफी क्षय होता है। अपने कर्म और कर्मफल को ईश्वर पर छोड़ देने से निराशा, चिन्ता, असन्तोष को कोई स्थान नहीं रह जाता। मनुष्य का आशावाद ही एकमेव अजर-अमर रहता है। तत्ववेत्ता अरस्तू ने लिखा है---’अपने कर्मों और उसके फल को ईश्वर पर छोड़ देने से आशावाद अजर-अमर बनता है। ईश्वर सभी तरह आशावाद का केन्द्र हैं। आशावाद और ईश्वरवाद एक ही है। ‘ईश्वर का अवलम्बन लेने पर, अपने कर्म और कर्मफल का समर्पण ईश्वर को कर देने से सफलता असफलता मनुष्य को प्रभावित नहीं करती। अजर-अमर आशावाद के सहारे वह दोनोँ में सन्तुलित रह कर कर्म पथ पर अग्रसर होता रहता है।

आज भी लोग आये दिन पचासों मील लम्बी-चौड़ी नदियाँ और उपसागरों को तैर कर पार करते रहते हैं। मनुष्य को स्वाभाविक बल इतना कहाँ कि वह उस कठिन संतरण को केवल तैरने की कला के आधार पर पूरा कर सके। यह उनका अदम्य आत्म-विश्वास ही होता है जो उन्हें थक कर भी थकने और हार कर भी हारने नहीं देता। एक महान नौका की तरह ले जाकर पार लगा देता है। आत्म-विश्वास को मानव जीवन की नौका ही माना गया है। निश्चय ही वह एक सुदृढ़ नौका के समान ही है। यदि मनुष्यों के पास आत्म-विश्वास न हो तो वे संसार की लाखों आपत्तियों विपत्तियों उलझनों और समस्याओं से कैसे पार पा पायें? यह उनका आत्म-विश्वास ही होता है, जो संकटों में भी धीर पुरुषों को सक्रिय तथा साहसी बनाये रहता है। आत्म-विश्वास के समाप्त होते ही मनुष्य का पुरुषार्थ मर जाता है। पराक्रम तिरोधान हो जाता है। आशा और उत्साह के दीप बुझ जाते है। जीवन में भय और आशंकाओं का घटाटोप अन्धकार छा जाता है।

मनुष्य में एक नहीं अनेक प्रकार की शक्तियों का भण्डार भरा पड़ा है। वह सर्व समर्थ ईश्वर का अंश जो है। उसमें उसी प्रकार की विश्व शक्तियों के न होने की कल्पना करना असंगत ही नहीं अन्याय भी है। किन्तु इन शक्तियों का लाभ वही पाता है, जो आत्म-विश्वासी होता है।


गायत्री उपासक की सिद्धि

बूँदी (राज0) में ‘खडकड़’ नामक एक स्थान है। अरावली की विस्तृत पर्वत श्रृंखला के समीप होने के कारण इस स्थान की शोभा-सुषमा और भी बढ़ जाती है। यहाँ से होकर एक नदी बहती है जो वहाँ की प्राकृतिक छटा को निखारने में सोने में सुगंध का काम करती है।

अब से करीब 90 वर्ष पूर्व यहाँ एक महात्मा रहते थे, नाम था पं0 कन्हैया लाल ब्रह्मचारी। वे गायत्री के कई पुरश्चरण सम्पन्न किये और उनकी ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त कीं, जिसका अनुदान वे समीपवर्ती लोगों में सदा वितरित करते रहते, उन्हें कष्ट कठिनाइयों से मुक्ति दिलाते। इसमें उन्हें परम संतोष की अनुभूति होती और लोग भी उनके इस उदार अनुदान से अपने दैनिक जीवन को खुशहाल बनाते। उनके इस प्रभाव की चर्चा पूरे क्षेत्र में थी।

अपनी मृत्यु का छः माह पूर्व ही उन्हें पता चल गया था। जब उनने देखा कि जीवन का पटाक्षेप अब समीप ही है तो वे अपने सगे संबंधियों से, मित्र-कुटुम्बियों से जाकर मिलने और अन्तिम विदाई लेने लगे।

निर्वाण का दिन जब निकट आया तो वे उक्त स्थान छोड़ कर अन्यत्र ‘केशोराय पाटन’ नामक स्थान पर आ गये। यहाँ पर चम्बल नदी पूर्वाभिमुख हो गई है। इसी कारण इस स्थान का अपना विशेष महत्व है। इसे पवित्र क्षेत्र माना जाता है और हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग आते है।

ब्रह्मचारी जी ने यहीं एक किनारे पर अपनी एक छोटी सी कुटिया बनायी और उसी में रहने लगे। प्रतिदिन संध्या समय श्रद्धालु जन उनकी कुटिया में एकत्रित होते और उनसे सत्संग करते। वे उन्हें जीवन-निर्माण व आत्म-विकास की प्रक्रिया समझाते। कहते, इसके बिना जीवन में कोई श्रेष्ठ और महान कार्य करना संभव नहीं। ख्याति तो दुष्ट, दुर्जन भी अर्जित कर लेते है; पर वह जलते तवे पर जल बूँद के समान होती है। यदि तुम्हें अक्षय सम्मान प्राप्त करना है। तो स्वयं को उदात्त बनाना पड़ेगा, अपने चिन्तन-चरित्र को उत्कृष्ट बनाना पड़ेगा, तभी यह संभव है और सम्भव है उस परम लक्ष्य की प्राप्ति, जिसके लिए हमें मनुष्य योनि मिली है।

जब महाप्रयाण की निश्चित तिथि आयी, उस दिन उनने स्वयं ही अपनी कुटिया को गोबर से लीपा-पोता, स्नानादि कर संध्या-वन्दन किया और दूर्वासन बिछाकर पद्मासन पर बैठ गये। उपस्थित लोगों ने जब देखा कि अन्तिम समय निकट हैं, तो उनने महात्मा जी से एक विनती की ‘आपने जिस आद्यशक्ति का अवलम्बन लेकर महान लक्ष्य की प्राप्ति की है, उस संबंध में हम कुछ स्वल्प जानकारी चाहते हैं, ताकि हम भी उस विधा का आश्रय लेकर अपना जीवन धन्य बना सकें। उतर में ब्रह्मचारी जी ने इतना ही कहा ‘गायत्री कामधेनु है। जो इसकी शरण में आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता। लोक और परलोक दोनों सुधर जाते है।’ इस संक्षिप्त-से उत्तर के बाद वे मौन हो गये। इसके बाद लोगों ने उनके पूर्व आदेशानुसार एक नया श्वेत वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिया। संन्यासी जी ने कह रखा था कि जब तक उनका शरीर स्वतः न लुढ़क पड़े, तब तक उसका स्पर्श न किया जाय। तदुपराँत प्राणायाम द्वारा प्राण को सहस्रार में स्थापित कर वे समाधिस्थ हो गये। उत्सुक लोग बड़े कौतूहलपूर्वक उनके निःस्पन्द शरीर को निहार रहे थे। वातावरण में अद्भुत शाँति छायी हुई थी। इसी प्रकार एक प्रहर बीत गया। उपस्थित जन मंत्रमुग्ध से खड़े उनकी महायात्रा का इन्तजार कर रहे थे, तभी उनके सिर में से एक तीव्र ध्वनि हुई और शरीर जमीन पर ढुलक गया। भक्तों ने अन्तिम संस्कार किया। उनकी समाधि आज भी वहाँ मौजूद है। उस स्थान की संस्कारित सिद्ध पीठ के रूप में मान्यता है।


संकल्प और समर्पण का अभिनव संस्करणअन्तःकरण से उमड़ रही है प्रवाह परिवर्तन की आवाज

बसंत पर्व और महा शिवरात्रि पर शान्ति कुज पधारे प्रायः पंद्रह हजार परिजनों ने जिस तरह समर्पित होकर युग के वर्तमान नासमझी पूर्ण प्रवाह परिवर्तन का समवेत संकल्प लिया उससे ऐसा लगता है यह सब किसी अदृश्य शक्ति की प्रेरणा से हो रहा हो।

सारे देश में दीप-यज्ञों के व्यापक विस्तार, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन, सत्प्रवृत्ति संवर्धन और नारी जागरण कार्यक्रमों का जिस गति से प्रवाह उमड़ा है उससे भी उपरोक्त तथ्य की पुष्टि होती है। प्रस्तुत है कुछ इसी आशय के समाचार -

एटा- जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय राष्ट्रीय सेवा योजना के तत्वावधान में दीप-यज्ञ कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। महाविद्यालय के छात्रों द्वारा समूचे क्षेत्र में सद्वाक्य लेखन किया गया। जिला उद्योग विभाग के मार्केटिंग मैनेजर डा. एस. वी. एस. गौतम सेवायोजना अधिकारी प्रथम श्री डा. राकेश मधुकर तथा योजना अधिकारी द्वितीय श्री सुभाष दीक्षित के अतिरिक्त नगर के प्रतिष्ठित नागरिक भी सम्मिलित हुए। रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए संकल्प पत्र भरे गये।

अलीराजपुर- स्थानीय गायत्री परिवार शाखा द्वारा सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन अभियान के अंतर्गत 9 स्थानों पर शतवेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न हुए। 24 और स्थानों पर यह आयोजन कराने का संकल्प परिजनों द्वारा लिया गया। सभी जगह इस वर्ष के निर्धारित रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए संकल्प पत्र भरे गये। अपने क्षेत्र में अखंड-ज्योति के दुगने सदस्य बनाने का प्रयास कार्यकर्ताओं द्वारा चल रहा है।

देवरिया- इस वर्ष पूज्य गुरुदेव के हजार गुने लक्ष्य का आह्वान सुनकर कार्यकर्ताओं ने अखंड-ज्योति पत्रिका के नये सदस्य बनाने की व्यापक योजना बनाई है। इसके अंतर्गत विद्यालयों में छात्रों एवं अध्यापकों के बीच पूज्य गुरुदेव का संदेश सुनाया जाता है। पिछले माह देवरिया तथा गोरखपुर जिले के कुल 21 इन्टर कालेजों में यह कार्यक्रम सम्पन्न हुए जहाँ 1000 अखंड-ज्योति पत्रिका के सदस्य बने। प्रत्येक सदस्य द्वारा एक और नया सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया। प्रत्येक विद्यालय में लगभग हजार रुपये का साहित्य पुस्तकालयों में रखा गया।

कोठी (बाराबंकी) इसरौली सारी गाँव में आयोजित दीप-यज्ञ कार्यक्रम दहेज उन्मूलन, नशा निवारण, हरीतिमा संवर्धन जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों के संकल्प के साथ पूरा हुआ। युग निर्माण के गीतों को सुनकर हजारों श्रोता झूम उठे। शान्ति कुँज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने हेतु गणमान्य व्यक्तियों ने आवेदन पत्र भरे। अखण्ड-ज्योति पत्रिका के माध्यम से परम पूज्य गुरुदेव का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प भी कर्मठ कार्यकर्त्ताओं द्वारा लिया गया।

रामकोला (देवरिया)- जनता इन्टर कालेज रामकोला के प्रधानाचार्य श्री पारसनाथ सिंह द्वारा आयोजित दीप-यज्ञ कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। विद्यालय के छात्रों द्वारा प्रस्तुत प्रज्ञागीत ने जन समुदाय का मन मोह लिया। विद्यालय प्राँगण में आयोजित इस कार्यक्रम में नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के अतिरिक्त अपार जनसमूह सम्मिलित हुआ। प्राचार्य जी के प्रयासों से अखंड-ज्योति के सदस्यों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है।

महाशिवरात्रि पर्व और बसंत पर्व एक समान।

शान्ति-कुँज (हरिद्वार)- महाशिवरात्रि पर्व पर प्रायः 6 हजार परिजन आये और सच्चे अर्थों में शिव अभिषेक किया। आगन्तुकों ने एक स्वर से समर्पित होकर राष्ट्र के अभ्युत्थान का संकल्प लिया।

15 और 17 फरवरी को वंदनीय माताजी ने उद्बोधन किया। उन्होंने नये कार्यक्रमों- (1) गाँव-गाँव दीप-यज्ञ (2) समय दान (3) नारी जागरण (4) अखण्ड-ज्योति आलोक विस्तार (5) प्रवाह परिवर्तन कार्यक्रमों की व्याख्या की। उपस्थित जन समुदाय भाव विभोर हो उठा। प्रत्येक कार्य इतने अनुशासित ढंग से सम्पन्न हुए कि दर्शक आश्चर्यचकित रह गये। परम पूज्य गुरुदेव की हजार भुजायें बनने के आह्वान को हजार से भी अधिक लोगों ने लिखित संवरण देकर पूर्ण किया।

राजपुर- शत कुण्डीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम श्रद्धा-सिक्त वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर उपस्थित जन समूह ने युग-निर्माण योजना द्वारा नशा निवारण, दहेज उन्मूलन; वृक्षारोपण तथा प्रौढ़ शिक्षा विस्तार जैसे कार्यक्रमों को सामयिक मानकर इन्हें क्रियान्वित करने के लिए भाव-भरे संकल्प लिए। सद्वाक्य लेखन द्वारा रास्ते चलते प्रेरणा देने का कार्यक्रम व्यापक स्तर पर चलाने का संकल्प लिया गया।

बम्बई- गायत्री प्रज्ञा मंदिर मुलुपवाड़ी में बसंत पर्व भाव भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। मिशन और उसके क्रिया कलापों पर प्रकाश डाला गया। सामूहिक विवाह बच्चों के संस्कार एवं अन्य धार्मिक कृत्य सफल हुए। अखण्ड-ज्योति, युग शक्ति गायत्री के सदस्य बनाये गये। इस अभियान को तीव्र करने का निश्चय किया गया।

रतवाड़ा (होशंगावाद)- श्री चम्पालाल मण्डलोई तथा श्री सतीश कुमार जोशी के प्रयास से दीप-यज्ञ कार्यक्रम आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। ग्राम में यह कार्यक्रम उत्सव के रूप में मनाया गया। रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए शाखा गठन कर श्री धनपाल सिंह राजपूत को कार्यवाहक बनाया गया। आयोजन के समय ही 25 अखण्ड-ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य बनाये गये। समीपवर्ती क्षेत्र में 100 नए सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।

दोन्ता (देवास)- शाजापुर शाखा के प्रयास तथा श्री नारायण सिंह सोलंकी के सहयोग से दीप-यज्ञ कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। सरपंच श्री नारायण सिंह अस्वस्थ होने के बावजूद ग्राम वासियों का उत्साहवर्धन करने के लिए कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित रहें। ग्रामवासियों ने नशा निवारण दहेज उन्मूलन, वृक्षारोपण कार्यक्रम के लिए भाव भरे संकल्प लिए। 10 अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्य तुरंत बने। यह संख्या 100 तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

आरुवा (पाली)- सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के संकल्पों के साथ दीप-यज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। ग्राम वासियों ने उत्साहपूर्वक संकल्प पत्र भरे। शाखा कार्यवाहक श्री कुन्दन सिंह द्वारा अपने क्षेत्र में अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।

अनपरा (मिर्जापुर)- अनपरा तापीय परियोजना में दीपयज्ञ कार्यक्रम सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में अधिकाँश प्रबुद्ध वर्ग उपस्थित रहा। सभी ने देश की वर्तमान स्थिति में इस सामयिक कार्यक्रम द्वारा जन-जागरण के प्रयास की सराहना की। समूचे क्षेत्र में महाप्रज्ञा के आलोक के विस्तार के लिए परमपूज्य गुरुदेव के व्यक्तिगत पत्र के रूप में अधिकाधिक स्वजनों तक अखण्ड-ज्योति पत्रिका पहुँचाने का संकल्प शाखा कार्यकर्ताओं ने लिया।

डोंगरगाँव- वार्षिकोत्सव के रूप में दीप-यज्ञ कार्यक्रम उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। समूचे क्षेत्र में सद्वाक्य लेखन कार्यक्रम उत्साहपूर्वक कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया। अखण्ड-ज्योति पत्रिकाओं के अधिकाधिक सदस्य बनाने का संकल्प स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा लिया गया।

तेलडीहा (पूर्णिया)- शतवेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक स्तर पर सम्पन्न हुआ। यह विशाल आयोजन इस पूरे क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा का श्रोत सिद्ध हुआ। कार्यक्रम में सभी धर्मानुयायी बड़े उत्साह के साथ सम्मिलित हुए। इस आयोजन में कुल उपस्थिति लगभग 50 हजार तक रही। जन समुदाय के इस उत्साह को बनाये रखने के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं ने योजना बनाई है। टोली-बद्ध रूप से अपने संपर्क क्षेत्र में अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्य बनाकर आयोजन की ऊर्जा से समूचे क्षेत्र को अनुप्राणित करने में संलग्न है।

गौरा (सुल्तानपुर)- शतवदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के संकल्पों के साथ सोल्लास सम्पन्न हुआ। श्री आद्याप्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में सुल्तानपुर से पहुँची टोली द्वारा प्रेरणादायी उद्बोधन सुनने के लिए भारी संख्या में जन समूह इकट्ठा हुआ। लगभग 200 व्यक्तियों ने नशा निवारण, दहेज उन्मूलन के लिए संकल्प पत्र भरे।

बलीपुर (सुल्तानपुर)- प्रबुद्ध जन समुदाय की भारी संख्या के बीच शतवेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा अखण्ड-ज्योति पत्रिका के अधिकाधिक नियमित सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया। 150 से भी अधिक नये कार्यकर्ता इस आयोजन में उभरकर आये।

पाँढुर्णा - शतवेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम भाव-भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। श्री दामोदर बेन्डे के नेतृत्व में सौंसर शाख की टोली समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के विस्तार में अभूतपूर्व उत्साह के साथ संलग्न है। कार्यक्रमों की सफलता में श्री

धनंजय मोयर मैनेजर बजाज ग्राम का सराहनीय योगदान मिल रहा है। श्री मोयर अपने वाहन से कार्यक्रम स्थल पर टोली पहुँचाने व वापस भिजवाने का महत्वपूर्ण कार्य करते है। इस वर्ष कार्यकर्ता विशेष रूप से अखण्ड-ज्योति के नये सदस्य बनाने में लगे हुए है।

नेपानगर - श्री रमेश कुमार शर्मा के नेतृत्व में श्री गिरधारी लाल बख्क्षी तिवारी तथा श्रीमती विद्यादेवी तिवारी द्वारा समूचे क्षेत्र में जन जागरण का महत्व पूर्ण प्रयास किया जा रहा है। पत्रिकाओं की संख्या दूनी करने के लिए विशेष प्रयास किये जा रहे हैं। समीपवर्ती क्षेत्र में अभी तक 21 स्थानों पर दीप-यज्ञ कार्यक्रम दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन संकल्पों के साथ हो चुके हैं।

कोरबा - सारे क्षेत्र में प्रायः 30 स्थानों में दीप-यज्ञ आयोजनों की श्रृंखला बहुत उत्साह पूर्वक सफल हो रही है। इन आयोजनों का व्यापक प्रभाव पड़ा है। अनेक सदस्य बने है और वर्तमान नारी जागरण समयदान और दीप यज्ञों के प्रति व्यापक उत्साह जगा है।


अपनों से अपनी बात - प्राणवान परिजन यह कर गुजरें!

-- सद्ज्ञान की सार्थकता-सजीवता इसमें है कि वह सत्कर्म रूप में परिणत हो सके। घुने बीज की तरह उस अध्ययन को भी निरर्थक माना जाना चाहिए जो अंकुर तो उगाता नहीं, अपने खोखले आकार को भी बोये जाने पर गला बैठता है।

-- अखण्ड-ज्योति मनोरंजन नहीं है। उसे प्रेरणातंत्र माना जाता है क्योंकि उसने अपने पाठकों को उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने और सेवा साधना में निरत होने हेतु सहमत सक्रिय किया है। यही कारण है कि अखण्ड-ज्योति पाठक चरित्रवान, लोकसेवी के रूप में विकसित हुए है। उनने नवसृजन का दायित्व अपने कंधों पर उठाया है।

-- शिक्षार्थियों की तत्परता और तन्मयता किस स्तर की है, यह परीक्षा अनिवार्य रूप से होती है। जो उत्तीर्ण होते हैं, उन्हें कोई महत्वपूर्ण पद पाने का गौरव मिलता है। हर छात्र उस लाभ से लाभान्वित नहीं होता।

-- इन दिनों अखण्ड-ज्योति परिजनों की परीक्षा हो रही है। उसके सूत्र संचालक अपनी प्रत्यक्ष गतिविधियों का स्थानान्तरण कर रहे हैं। अपने दायित्व वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों को सौंप रहे हैं। जो उन्हें उठा सकेंगे, वे ही सच्चे अनुयायी, उत्तराधिकारी, घनिष्ठ एवं आत्मीय हैं।

-- राजकुमारों के समर्थ होने पर राजा निवृत्ति लेते थे। राजकुमारों को राजकाज सौंपते थे। यह निश्चिन्तता मिलने पर वे किन्हीं बड़े परमार्थिक कार्यों में निरत होते थे। वृक्षों के पते गिरते हैं, कोपलें उनका स्थान लेती और देखते-देखते फूलों से फलों से लद जाती है। वरिष्ठ निवृत्त होकर पदोन्नति जैसा श्रेय प्राप्त करते है। कनिष्ठों को उस रिक्त स्थान की पूर्ति करनी पड़ती है। अखण्ड-ज्योति के संचालक और पाठक इसी प्रकार अपनी भूमिका निबाहें, इसी में उनकी परीक्षा और सफलता है।

-- अखण्ड-ज्योति के पाठक प्रज्ञा पुत्र कहे जाते है। उन्हें अपने भाव क्षेत्र की वंश परम्परा का अनुसरण करना है। सौंपे जा रहे दायित्वों का समग्र श्रद्धा के साथ अपनाना है और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए प्राण-पण से जुटना है। इसके लिए आज का दिन ही सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है।

-- चार दायित्व जो हर प्रज्ञापुत्रों को सौंपे जा रहे हैं वे हैं (1) आत्मपरिष्कार (2) सद्ज्ञान संवर्धन (3) नारी जागरण (4) दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। यह चारों ही वे पाये है जिनके ऊपर नवयुग का राजसिंहासन बनना और सुशोभित होना है।

(1) आत्म-परिष्कार -

प्रत्येक प्रज्ञा-पुत्र चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को प्रखर प्रामाणिक बनाये। उस साँचे के सदृश सिद्ध हो जिसके संपर्क से महत्वपूर्ण पुर्जे सिक्के ढलते रह सकें। जलता दीपक ही दूसरे दीपक को जलाता है। व्यक्तित्व सम्पन्नों की ही प्रतिभा निखरी है। उन्हीं का प्रभाव दूसरे ग्रहण करते है। जिसे कुछ महत्वपूर्ण करना या कराना है उसे प्रामाणिकता पर आधारित प्रतिभा अर्जित करनी ही पड़ती है। प्रज्ञा पुत्रों को वही प्रधानशक्ति अर्जित करने को प्रमुखता देनी है।

-- प्रतिभा चार आधारों पर निखरती है (अ) समझदारी (आ) ईमानदारी (इ) जिम्मेदारी (ई) बहादुरी। इन्हें स्वभाव का अंग बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। अपनी आदतों में श्रमशीलता, शिष्टता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, सहकारिता को अधिकाधिक मात्रा में समाविष्ट करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। व्यक्तित्व इसी आधार पर निखरता है। प्रभावी, प्रतापी, मनस्वी एवं समर्थ समुन्नत बनने के यही प्रमुख आधार हैं।

-- आत्म-परिष्कार की तरह ही लोक-मंगल को भी अपनी जीवनचर्या का महत्वपूर्ण अंग, अविच्छिन्न अंग बनाना चाहिए। सद्ज्ञान संवर्धन की, लोक कल्याण की प्रधान आवश्यकता अनुभव करनी चाहिए। इसके लिए नित्य अपने समय में से कुछ घण्टे नियमित रूप से निकालना चाहिए। अपने उपार्जन का एक भाग इसी निर्मित अंशदान के रूप में नियोजित करते रहना चाहिए। उन्हीं दो साधनों के सहारे वह पुण्य परमार्थ बन पड़ता है जिसमें उच्चस्तरीय स्वार्थ एवं अजस्र लाभ का समावेश।

-- औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकारा जाय। परिवार छोटा रखा जाय। उसके सदस्यों को शिक्षित, स्वावलम्बी, सुसंस्कारी बनाने का प्रयत्न भर पर्याप्त समझा जाये। संपत्ति संग्रह के लोभ, परिवार के लिए संपत्ति छोड़ मरने के मोह से मुँह मोड़ा जाय। अहंकार प्रेरित उद्धत प्रदर्शनों में मन न डुलाया जाय। सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धान्तों के ढाँचे में अपनी जीवनचर्या को ढाला जाय। स्वयं विनम्र रहा जाय और दूसरों को सम्मान दिया जाय।

(2) सद्ज्ञान संवर्धन -

अखण्ड-ज्योति की ज्ञान गंगा ने अनेकों उद्यानों खलिहानों को सुसम्पन्न बनाया है। इस प्रकाश पुँज को व्यापक और विस्तृत बनाने के लिए प्रयत्नशील रहा जाये। अपनी पत्रिका कम से कम दस को पढ़ाते रहने का नियम निभाया जाय। विचारशीलों से नये सदस्य बनने का आग्रह किया जाय। इन प्रयत्नों से अखण्ड-ज्योति को पचास वर्षों में हजार गुनी होने का श्रेय मिल सकता है। बढ़े सदस्यों के माध्यम से युगान्तरीय चेतना का आलोक कई गुना ज्योतिर्मय एवं व्यापक बन सकता है।

पाँच निरक्षरों को साक्षर बनाने का संकल्प लिया जाय। परिवार के, पड़ोस के, संपर्क के लोगों में साक्षरता प्रसार का नियमित प्रयत्न किया जाय। प्रौढ़ पाठशालाएँ स्थापित की जायें। बाल संस्कारशालाएँ चलाकर स्कूली बच्चों को अधिक सुयोग्य, सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न किया जाय। शिक्षा संवर्धन को प्रगति प्रयासों में मूर्धन्य मानकर चला जाय। निरक्षरता से जूझने में, शौर्य, पराक्रम दिखाने में सार्थक स्तर की बहादुरी समझी जाये।

शिक्षितों को युग-चेतना से अवगत कराने के लिए ‘झोला पुस्तकालय’ योजना के अंतर्गत हर शिक्षित तक युग साहित्य घर बैठे बिना मूल्य पहुंचाने और वापस लेने का क्रम चलाया जाय। जहाँ संभव हो, वहाँ ‘ज्ञान-रथ’ की साहित्य गाड़ियाँ चलाई जायँ और युग-साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने का व्यापक प्रयत्न किया जाय। ‘स्लाइड प्रोजेक्टर यंत्र’ द्वारा घर-घर सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन का प्रचलन अधिक सरलता और अधिक सफलतापूर्वक संभव किया जा सकता है।

दीप-यज्ञों के माध्यम से भावनाशीलों का एकत्रीकरण, संगठन एवं सत्प्रयोजनों के लिए व्रत लेने हेतु उपस्थित जनों को संकल्पित किया जा सकता है। धर्म-तंत्र से लोक शिक्षण का यह अतीव सस्ता सरल एवं प्रभावी माध्यम है। इसे सभी सत्कार्यों में सम्मिलित किया जाय। हर व्यक्ति द्वारा मात्र पंद्रह अगरबत्तियाँ और एक घृत दीप घर से थाली में सजाकर लाने एवं ऐसे कई व्यक्तियों के सम्मिलित होने से दीप-यज्ञ बड़े समारोह पूर्ण भाव भरे वातावरण में सम्पन्न हो जाते हैं। कर्मकाण्ड एक घण्टे का और दो घण्टे का संगीत प्रवचन इन आयोजनों में होता है जो हर कहीं, हर किसी के लिए सरल है। सद्ज्ञान संवर्धन का यह महत्वपूर्ण सामुदायिक प्रयास है। उसे सीखा और व्यापक बनाया जाय।

-- संगीत मण्डलियाँ गठित की जाय। गायन वादन के साथ परामर्श-प्रवचनों का समावेश छोटे-बड़े सभी आयोजनों में लोक शिक्षण की महती भूमिका सम्पन्न करता है। लोक सेवकों को संगीत अभ्यासी बनाने के लिए स्थान-स्थान पर उस स्तर की शिक्षण व्यवस्था की जाय।

(3) नारी-जागरण -

-- जिस देश की आधी जनसंख्या नारी रूप में अशिक्षित, अनगढ़, असमर्थ स्थिति में पड़ी हो उसकी प्रगति की संभावना कभी भी समग्र न बन सकेगी। नारी को नर के समतुल्य, सुयोग्य, समर्थ और समुन्नत बनाने के लिए भावनाशीलों को व्यक्तिगत और सामूहिक समर्थ प्रयास करने चाहिए। व्यक्तिगत रूप से अपने प्रभाव क्षेत्र से इसका साहसिक शुभारम्भ किया जाये और सामूहिक रूप से प्रचण्ड नारी जागरण अभियान चलाया जाय।

-- कन्या और पुत्र का नर और नारी का अंतर समाप्त किया जाय। नर और नारी में से किसी को भी ऊँचा-नीचा न समझा जाय। दोनों को समान अधिकार और समान कर्तव्य पालन हेतु सहमत किया जाय। पुरुष को दबाव देने नारी को हीनता अपनाने से रोका जाय। नर को इसके लिए सहमत किया जाय कि वह अपने वर्ग द्वारा अनुचित प्रतिबन्धों में नारी को जकड़ने की अनीति का प्रायश्चित कर परिमार्जन करेगा। नारी में उठने की उमंगे भरेगा।

-- अपने घरों की नारियों को शिक्षित बनाते चलने का क्रम जारी रखा जाये। उन्हें युग-साहित्य पढ़ने या सुनने का अवसर दिया जाय। स्वावलम्बी बनाने के लिए कुटीर उद्योगों से अभ्यस्त कराया जाय। ऐसे साप्ताहिक महिला सत्संग चलाते रहने का क्रम बिठाया जाये जिसमें गाँव-मुहल्ले की महिलाएँ एकत्रित होकर बहुमुखी प्रति का उत्साह एवं मार्ग-दर्शन प्राप्त करें। शिक्षा, स्वावलम्बन एवं प्रेरक सत्संग की व्यवस्था ही नारी जागरण की आरम्भिक प्रक्रिया मानी जाये।

-- जहाँ सामूहिक व्यवस्था बन पड़े वहाँ नारी प्रशिक्षण-कक्षाएँ चलाई जायें। इनमें उपरोक्त तीनों प्रयासों का समन्वय हो। छोटे-बड़े समारोह समय-समय पर होते रहें। घर-घर जाकर स्लाइड प्रोजेक्टरों व चित्र प्रदर्शनियों के माध्यम से परिवार-निर्माण में, समाज-निर्माण में नारी की महती भूमिका सम्पादित किये जाने का समग्र शिक्षण दिया जाय। गायन एवं वक्तृता के अभाव में वह कार्य टेपरिकार्डरों के माध्यम से भी हो सकता है।

-- शिक्षित महिलाएँ इस प्रयोजन में आगे रहें। वे समीपवर्ती क्षेत्रों में नारी संपर्क के लिए टोली बनाकर निकलें। नारी के द्वारा नारी-जागरण अधिक अच्छी तरह सम्पन्न हो सकता है। आरम्भ अपने घरों की महिलाओं से हो इसके लिए आगे बढ़ने का अवसर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन दें। नारी-जागरण की योजना पुरुष बनायें, वातावरण विनिर्मित करें और साधन जुटायें। पर प्रत्यक्ष संपर्क और सेवा कार्यों में अपने घरों की संपर्क की नारियों को ही आगे रखें। इक्कीसवीं सदी नारी-प्रधान होगी। उसी की शालीन सेवा साधना से समाज का काया-कल्प होगा। उस तैयारी के लिए अभी से कार्य आरम्भ कर देना चाहिए। नारी-जागरण प्रयासों में अब हर विचारशील नर-नारी को बढ़-चढ़ कर भाग लेना चाहिए।

(4) दुष्प्रवृत्ति-उन्मूलन

-- सत्प्रवृत्ति संवर्धन का अविच्छिन्न है-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। खेत उद्यान को जहाँ सींचना पड़ता है, वहाँ उनके बीच उगे हुए खरपतवार भी उखाड़ने पड़ते हैं। चर जाने वाले पशु-पक्षी भगाने पड़ते है। पौष्टिक आहार ही नहीं शरीर में घुसने वाले रोगों का उपचार भी आवश्यक है। सज्जनों का सहकार जहाँ जरूरी है, वहाँ दुष्ट दुराचारियों से निबटना भी आवश्यक है। व्यक्तिगत दुर्गुणों-अभावों की तरह ही सामाजिक प्रचलन में व्याप्त अवांछनियताओं से लोहा लेने का लक्ष्य रखना चाहिए।

-- नशे-बाजी की आदत एक प्रकार की महामारी होने के समतुल्य है। इससे सेवनकर्त्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, नैतिक, पारिवारिक सभी परिस्थितियाँ गड़बड़ाती है। इस कुटैव से स्वयं बचना चाहिए, औरों को भी बचाना चाहिए। जो फँसे हुए है, उन्हें समझाने से लेकर दबाव देने तक के उपाय अपनाकर इस कुचक्र से उबारने का भरपूर प्रयत्न करना चाहिए।

-- खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। नारी का अवमूल्यन करती और नर का अहंकार बढ़ाती हैं। यह कुप्रचलन देशव्यापी दरिद्रता का सबसे बड़ा कारण है। इसे साहस और उभारकर किसी भी कीमत पर हटाना चाहिए। अभिभावक प्रतिज्ञा करें, विवाह योग्य लड़के-लड़कियाँ शपथ लें कि वे दहेज, जेवर और धूमधाम वाली शादियाँ न करेंगे। जहाँ यह हो रहा है, उन आयोजनों में सम्मिलित न होंगे, भले ही वह सगे संबंधियों के यहाँ ही क्यों न हो?

-- विवाह सर्वथा पारिवारिक उत्सव की तरह बिना प्रदर्शन के करें। यदि स्थानीय रूढ़िवादी इस निर्धारण में बाधक बनते हैं, तो शान्ति-कुँज हरिद्वार में आकर ऐसे विवाह कराये जा सकते हैं। वर-कन्या दोनों पक्षों के पाँच-पाँच व्यक्तियों से अधिक नहीं आएँ ऐसे विवाह बड़ी संख्या में हर वर्ष शान्ति-कुंज में होते हैं। अखण्ड-ज्योति परिजन यदि अपने यहाँ नितान्त सादगी का विवाह न कर सकें तो शान्ति-कुंज आकर उसे सम्पन्न करने की व्यवस्था बनायें।

-- जाति-पाँति के आधार पर ऊँच-नीच की भावना का समापन किया जाय। नर और नारी एक समान, जाति-वंश सब एक समान के मिशन उद्घोष को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न किया जाय।

-- फैशन के नाम पर अहंकारी प्रदर्शन के लिए जो अपव्यय होता रहता है, उसे रोका जाय। ‘सादाजीवन-उच्चविचार’ के सिद्धान्त का परिपालन किया जाय। महंगे जेवर, महंगे-कपड़े और ठाट-बाट प्रदर्शन के, भौंड़े-श्रृंगार के लिए जो अनावश्यक खर्च होता रहता है, उसे रोका जाय। बचत को प्रोत्साहित किया जाय। बचत, बैंकों, पोस्ट–ऑफिसों में रहे, ताकि उस पूँजी से देश में उद्योग-व्यवसाय की वृद्धि होती रहे, अनेकों को काम मिलता रहे।

शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाद यह दो बड़े कारण हैं पिछड़ेपन और दरिद्रता के। इन दोनों से जूझने के लिए व्यस्तता की आदत डालनी चाहिए। इस निमित्त कुटीर-उद्योगों का प्रचलन आवश्यक है। जापान आदि देश इसी आधार पर सुसम्पन्न बने हैं। जहाँ जिस उद्योग में प्रचलन की गुंजाइश हो, वहाँ उस स्तर के उपाय अपनाये जायँ। हर किसी को उपार्जन में कार्यरत रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाय।

अस्वस्थता का प्रथम कारण है। अस्वच्छता, सर्वांगीण सफाई का महत्व, स्वरूप और प्रतिफल हर किसी को समझाया जाना चाहिए। स्वच्छता की सभ्यता का प्रथम चिन्ह माने जाने की मान्यता पनपाई जाय।

स्वास्थ्य संवर्धन के दो आधार हैं-आहार का सही चयन और व्यायाम का नियमित अभ्यास। कुपोषण निवारण के लिए आहार विद्या के सभी पक्षों का ज्ञान रहना चाहिए। पाक विद्या का ऐसा अभिनव निर्धारण होना चाहिए जिसमें पोषक तत्वों की बर्बादी न होने पाए। व्यायाम अपनी स्थिति के अनुरूप हर कोई किया करे। इसके पृथक-पृथक स्वरूप सर्वत्र जानकारी में उतारे जायँ। फर्स्ट एड, होमनर्सिंग स्काउटिंग जैसी आवश्यक शिक्षाएँ सर्वत्र मिलें। व्यायाम शालाएँ चलें और उनमें लाठी चलाने जैसी शिक्षाएँ अनिवार्य रहें।

प्रदूषण निवारण के लिए हरीतिमा संवर्धन आवश्यक है। वृक्षारोपण के लिए भरपूर प्रयास किया जाय। वृक्षों को अनावश्यक कटने से रोका जाय। घर-घर में शाकवाटिकाएँ उगाई जाती रहें। पुष्प-वाटिकाओं से रहित कोई घर न हो। लकड़ी के ईंधन की बचत हो। ऐसे उपाय अपनाने पर हरीतिमा संवर्धन का क्रम चलता रह सकता है और बढ़ते हुए प्रदूषण की रोकथाम होती रह सकती है।

रूढ़िवादिता, मूढ़मान्यताएँ, कुरीतियाँ, अनैतिकताएँ समाज के हर क्षेत्र में चित्र−विचित्र परेवेशों में फैली हुई हैं। वे जहाँ जिस प्रकार जड़ जमाए हुए हों; उनके कारणों को खोजते हुए निराकरण के उपाय उपचार अपनाये जाते रहने चाहिए। न्याय, नीति, विवेक और औचित्य का प्रचलन हो, इसके लिए स्थानीय परिस्थितियों को दृष्टिगत रख अपनी-अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप प्रयास चलते रहने चाहिए। एकता, समता, और न्याय-निष्ठा अक्षुण्ण और जीवन्त बनी रहे, इसके लिए अनवरत प्रयत्न चलते रहना चाहिए।

अनुरोध और आग्रह

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रायः पाँच लाख सदस्य है। उसका प्रभाव क्षेत्र प्रायः पच्चीस लाख सुशिक्षितों तक जा पहुँचता है। इतने परिवारों में उसका प्रवेश है। हर परिवार में छोटे-बड़े सदस्य हैं। यह समूचा परिकर यदि उपरोक्त चार सूत्री योजना अपनालें तो उसके कृत्यों से करोड़ों अनुप्राणित हो सकते हैं। इस आधार पर बने वातावरण से अगणित लोगों को प्रगति प्रेरणा से अभिसिंचित होने का आधार बन सकता है। इस सुखद संभावना को मूर्तिमान करने के लिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी घटकों को अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना ही चाहिए।

जिन्हें जो करने का उत्साह उठा हो, जिनने जिस प्रकार जो करने की योजना बनाई हो, जितनी प्रगति की हो, जिस स्तर की सफलता पाई हो, उस सम्बन्धी आवश्यक जानकारियाँ शान्ति-कुँज हरिद्वार भेजते रहना चाहिए ताकि क्रिया-कलापों में पारस्परिक विचार विनिमय से और भी अधिक युग सृजन के अनुरूप वातावरण बन सकें।

उपरोक्त चारों निर्धारणों को क्रियान्वित करने के लिए शान्ति-कुँज में तीन-तीन माह के एवं दस-दस दिन के सत्र एक साथ चल रहे है। अखण्ड-ज्योति परिवार के शिक्षित नर-नारी जिनकी आयु पच्चीस वर्ष से अधिक हो, इन सत्रों में इच्छित मास अथवा सत्र में सम्मिलित होने का आवेदन कर सकते हैं। प्रशिक्षण में उपरोक्त चारों निर्धारणों का संक्षिप्त एवं सारगर्भित प्रशिक्षण पूरा कराने का प्रयत्न किया जाता है।


इन दिनों कोई निष्क्रिय न रहे

शावत धर्मधारणा और समय की महती आवश्यकता का समन्वय उन चार निर्धारणों में हुआ है जो अखण्ड-ज्योति के विज्ञ परिजनों के सम्मुख अपनाने के लिए प्रस्तुत की गई हैं। आत्म-परिष्कार, शिक्षा संवर्धन, नारी जागरण, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के चार निर्धारणों को जिस रूप में, जितने अंशों में कार्यान्वित किया जा सके उसी अनुपात में कर्ता की, और वर्तमान समाज की उतनी ही बड़ी सेवा साधना बन पड़ेगी। यों करने को तो संसार में अनेकानेक क्षेत्र और कृत्य खाली पड़े है। उनमें से जो अपनी रुचि और योग्यता के अनुरूप सत्प्रवृत्ति संवर्धन की दिशा में अग्रगामी हो सके, वह उतना ही श्रेयाधिकारी और लोक सेवी महामानव बनने की दिशा में अग्रसर हो सकेगा। उपरोक्त चारों कृत्य ऐसे है, जिन्हें हर स्थिति का व्यक्ति अपने क्रिया कृत्यों में सम्मिलित कर सकता है। आवश्यक नहीं कि एक व्यक्ति इन सभी निर्धारणों को एक साथ अपनी क्रिया-प्रक्रिया में सम्मिलित करें, पर यह तो हो ही सकता है कि जितनी मात्रा में जो बन पड़े, उसे उस प्रकार क्रियान्वित किया जाता रहे। भावनाशीलों में से एक भी ऐसा नहीं हो सकता जो इच्छा होने पर भी कुछ न कर पाने की असमर्थता व्यक्त करे। बहाना बनाना हो तो बात दूसरी है। आदर्शों के परिपालन की उपयोगिता आवश्यकता जिन्हें विदित नहीं, वे पेट और प्रजनन को ही सब कुछ मानकर उसी कोल्हू में पिलते हुए व्यस्तता जैसी कोई मजबूरी व्यक्त कर सकते है, पर किसी भी आस्थावान के लिए यह सर्वथा सरल और संभव ही रहेगा कि महाकाल द्वारा सौंप युगधर्म का किसी रूप में परिपालन करता रहे।

सामान्यजनों की दिनचर्या में उपार्जन, उपभोग और परिवार, यह तीन तत्व ही सम्मिलित रहते हैं। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति के अतिरिक्त उन्हें और कुछ सूझता सुहाता ही नहीं। पर जिन्हें मानवी गरिमा और उसकी जिम्मेदारी का ज्ञान है, वे आत्म-परिष्कार और लोक मंगल की परमार्थ साधना से विरत नहीं हो सकते। उन्हें वह भी आवश्यक और अनिवार्य स्तर का प्रतीत होता है। ऐसे लोग युग धर्म के निर्वाह को भी ऐसे लाभदायक कामों में सम्मिलित करते है जिसमें आत्म-सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह का विविध समन्वय है। इच्छा यदि बलवती हो तो न समय की कमी रहती है, न अवसर की अथवा सहयोग ही कम पड़ता है।

निर्धारित चार कार्यक्रमों में आत्म-परिष्कार तो मात्र चिन्तन और स्वभाव का स्तर ऊँचा उठाने का है जो पूरी तरह अपने हाथ में है। उसके लिए अतिरिक्त समय की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। अन्य कार्यों के साथ वह भी होता चलता है। शिक्षा संवर्धन से साक्षरता तो कुछ ढूंढ़ खोज भी कराती है, पर स्वाध्याय-सत्संग अपने परिवार या संपर्क में भी चलता रह सकता है। नारी जागरण अवश्य ऐसा है जिसके लिए थोड़ी अधिक चेष्टा करनी पड़ती है। इसके लिए अपने परिवार की महिलाओं का सुव्यवस्थित क्रम बना देने से भी कार्य आरम्भ हो सकता है। कुरीतियाँ अधिकतर नारी समुदाय के स्वभाव में ही अपना कोंतर बनाये रहती है। उनमें साहस और विवेक बढ़ाया जा सके तो उसका प्रभाव पड़ोसियों, परिचितों पर भी पड़े बिना न रहेगा।

वस्तुतः यदि समाज सुधार के क्षेत्र में बहुमुखी प्रगति करनी है तो इसके लिए महिला समुदाय में प्रगति प्रेरणा करनी अनिवार्य होगी। ‘हम सुधरेंगे जग सुधरेगा’ का उद्घोष जितना सत्य है उतना ही यह भी सही है कि “नारी अभ्युदय-समस्त समाज का भाग्योदय”। जिन चार निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिए कहा गया है, उनमें से अधिकांश की प्रगति इस एक ही आधार पर बन पड़ती है कि नारी उत्कर्ष की सुव्यवस्थित योजना बनाई जाये और उसे अपने परिवार परिकर से ही आरम्भ किया जाये। सामान्य महिलाओं को शिक्षा, स्वावलम्बन, सत्संग, संगठन की सुविधा देकर क्रमशः आगे बढ़ाया जा सकता है। पर उनका मार्ग-दर्शन करने के लिए ऐसी प्रतिभावान महिलाओं की आवश्यकता है जो समीपवर्ती क्षेत्र में घर-घर जा कर महिलाओं से संपर्क साधने में झिझक अनुभव न करें। ऐसी दो महिलाएँ साथ-साथ निकल सकें, रूढ़िवादिता से उन्हें विरत कर के प्रगति पथ पर चलने के लिए प्रयत्नशील रह सकें, तो यह प्रयास ही अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति कर देगा। विचारशील पुरुषों को अपने घरों की प्रतिभावान महिलाओं को इस सेवा साधना के लिए प्रोत्साहित एवं प्रशिक्षित करना चाहिए। स्वयं पीछे रहकर उन्हें आगे बढ़ाना चाहिए। अपने देश में नारी संपर्क के लिए पुरुषों को उपयुक्त नहीं समझा जाता। उन पर संदेह एवं अविश्वास किया जाता है। इसलिए यदि उन्हें कार्य करना है तो साथ ही घर की महिलाओं को अवश्य ले लेना चाहिए। पुरुषों का एकाकी प्रयत्न उतना सफल नहीं हो सकता, जितना होना चाहिए।

अशिक्षित नारियों को साक्षरता से लाभान्वित करने का प्रयत्न किया जाय। इसके लिए मोहल्ले-मोहल्ले प्रौढ़ पाठशालाएँ चलें। इसके अतिरिक्त इसी प्रयास में सिलाई जैसे कुटीर उद्योगों का समावेश रहे। अर्थ लाभ का आकर्षण अशिक्षित वर्ग में शिक्षा प्राप्त करने से भी अधिक समझा जाता है। इसलिए जहाँ जिन कुटीर उद्योगों को आरम्भ किये जाने एवं माल के खपत की सुविधा हो, वहाँ उन्हें हाथ में लिया जाय। घरेलू शाकवाटिका भी ऐसी ही विद्या है जिसे हर घर से आरम्भ कराया जा सकता है और स्वास्थ्य रक्षा तथा बचत का नया द्वार खोला जा सकता है।

साप्ताहिक सत्संगों में संगीत शिक्षा का गायन-वादन का मनोरंजन भी होता रहे और साथ ही अनुपयुक्तताओं को हटाने एवं सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने की परामर्श प्रक्रिया का भी क्रम चलता रहे। स्वास्थ्य रक्षा, शिशुपोषण, गृहव्यवस्था, कुरीतियों का उन्मूलन जैसी कितनी ही योजनाएँ इसी साप्ताहिक सत्संग का अंग बन सकती हैं। उज्ज्वल भविष्य की प्रगतिशील योजनाएँ बनाना व उनके कार्यान्वयन का प्रयास चल पड़ना इन साप्ताहिक सत्संगों का अविच्छिन्न अंग रह सकता है। छोटे-बड़े आयोजनों समारोहों से भी इस प्रकार का उत्साह बढ़ाया जा सकता है। मिलजुलकर किये जाने पर हर कार्य अधिक सफल होता है। नारी उत्कर्ष के लिए भी संगठित सामूहिक शक्ति ही विकसित करनी होगी। विज्ञजनों को इसके लिये छोटे-छोटे नारी संगठन खड़े कर आवश्यक वातावरण बनाने एवं साधन जुटाने का दायित्व अपने कंधों पर उठाना चाहिए। इतने भर से नारी जाग्रति की एक उत्साहवर्धक लहर दौड़ पड़ेगी जो कभी घटेगी नहीं, बढ़ती ही रहेगी।

अवसर न हो तो एकाकी प्रयत्न तो करते ही रहना चाहिए। पर यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि संगठन में भारी शक्ति होती है। मिल-जुल कर काम करने से प्रगति की संभावना अनेक गुनी बढ़ जाती है। अखण्ड-ज्योति परिजन यह लक्ष्य निर्धारित कर लें कि ‘हम पाँच-हमारे पच्चीस’। परिवार नियोजन वाले ‘हम दो-हमारे दो का नारा लगाते है पर अपना लक्ष्य परिसीमन नहीं अभिवर्धन हैं। यहाँ विस्तार अभीष्ट है। साथ ही अभियान को प्रबल एवं प्रचण्ड भी बनाना है। इसलिए सम्मिलित प्रयत्नों को संगठित रूप से कार्य करने की योजना बनानी चाहिए। अपने जैसे चार साथी ढूंढ़ कर पाँच का एक मण्डल बनाया जाय। प्रत्येक को संपर्क साधने और उत्साह भरने मार्ग-दर्शन करने का दायित्व सौंपा जाये। इस प्रकार एक से पाँच और पाँच से पच्चीस बनने की प्रक्रिया चल पड़ेगी। पाँच लाख वरिष्ठ परिजन पाँच-पाँच की टोलियों में गठित होकर एक महती भूमिका सम्पादित करेंगे। इसी प्रकार हर परिजन अपने घर की एक महिला को आगे बढ़ाकर अपने जितने ही संगठन खड़े कर सकता है। दोनों पक्षों में असाधारण रूप से प्रगति प्रयासों को चमत्कारी गति से अग्रगामी होते देखा जा सकता है।

इस स्तर के उत्साहीजनों के सर्वांगीण प्रशिक्षण की व्यवस्था शान्ति-कुँज में है। उसमें नर और नारी समान रूप से भाग लेते रहते हैं। समग्र पाठ्य-क्रम तो तीन माह का है, पर जिन्हें इतना अवकाश नहीं हैं, उनके लिए आवश्यक मार्ग-दर्शन प्राप्त करने व व्यवहार में उतारने की संक्षिप्त शिक्षा दस-दस दिनों के सत्रों में भी उपलब्ध हो सकती है। ऐसे सत्र हर माह 1 से 10, 11 से 20, 21 से 30 तारीखों में अनवरत रूप से चलते रहते हैं। दोनों प्रकार के सत्रों में से जब जिन्हें जिस सत्र में सम्मिलित होना अभीष्ट हो, आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। तीन मास का सत्र संबंधी ज्ञातव्य फरवरी अंक में विस्तार से छप चुका है। जिन्हें अत्यधिक समयाभाव है, वे दस दिन वाले संक्षिप्त सत्रों में आकर काम चलाऊ रूप-रेखा तो समझ ही सकते हैं। विस्तृत प्रशिक्षण बाद में कभी लिया जा सकता है। जिन्हें युग-धर्म के निर्वाह की कुछ उमंगें उठती हों, उन्हें इन अभिनव सत्रों में से किसी में सम्मिलित होने की चेष्टा करनी ही चाहिए।

अनभ्यस्त कार्य सरल होने पर भी कठिन लगते है। उन्हें अपनाते समय मन अचकचाता है और अनेक व्यवधान पड़ने की कल्पना करता है, पर जब प्रयोग चल पड़ता है तो सर्कस करने वाले कलाकारों की तरह लोगों को अति कठिन दीखने वाले कार्य भी सरल हो जाते हैं। आत्मोत्कर्ष और लोकमंगल की सम्मिश्रित गतिविधियाँ अपनाने के संबंध में भी यही बात है। जब तक उन्हें प्रयोग में लाने का साहस नहीं जुटता तभी तक वे कठिन लगते हैं। पर जब उस दिशा में कदम उठते हैं और रस आने लगता है तो फिर वे इतने लोकप्रिय लगने लगते है कि किये बिना रहा ही नहीं जाता। न बन पड़ने पर ऐसा लगता है, मानो कोई अपराध बन पड़ा।

अखण्ड-ज्योति परिजनों की विशिष्टता देखते हुए उनके कंधों पर नव सृजन के कुछ उत्तरदायित्व सौंपे गये है, जिनमें से चार अनिवार्य स्तर के हैं, जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है। इन चारों में भी यदि किसी को प्राथमिकता देनी हो तो वा नारी-जागरण अभियान है, कारण कि उससे कर्त्ता को सीधा और तत्काल लाभ मिलता है। ग्रह संचालिकाएँ यदि उत्कृष्ट प्रगतिशीलता अपनाने होंगे तो उसका प्रभाव समूचे पारिवारिक वातावरण पर पड़ना निश्चित है। जो औरों से कहा जाता व कराया जाता है, वह अपने घर से ही क्यों न आरम्भ किया जाय? अपने घर की महिलाओं को ही आगे धकेला जा सके तो निश्चित ही इसका प्रभाव संपर्क क्षेत्र पर पड़े बिना न रहेगा। देखते-देखते उस आधार पर सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन का सशक्त वातावरण बनेगा। माँझी अपनी नाव खेता है, स्वयं पार उतरता है और उसमें बिठाकर अनेकों ऐसों को पार करता है जो अपने बलबूते नदी पार करने में परिजन अपने समविचार वालों को ढूँढ़ कर उनमें से पाँच के साथ संगठन का ताल-मेल बिठाये और उस मण्डली द्वारा निर्धारित कार्यों को पूरा करने की योजना बने। उसे पूरा करने के लिए योजनाबद्ध रूप से कार्यरत रहने का क्रम चले।

यह परीक्षा की बेला हैं प्रस्तुत समय को युग चेतना का अरुणोदय काल कह सकते हैं। यह अवसर गँवाया नहीं जाना चाहिए। स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित इस विधि व्यवस्था को अपनाना चाहिए जो चार सूत्री योजना के रूप में इन पृष्ठों पर प्रस्तुत है।

जिनको गृह कार्यों से अवकाश मिल सकता हो, वे शाँति-कुँज आकर पूरा समय व्यापक क्षेत्र में युगान्तरीय चेतना जगाने में संलग्न होने का साहस करें। जिनकी वैसी स्थिति नहीं है, वे अपने निजी जीवनचर्या को इस प्रकार बनायें जिसमें इन निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिए अधिकाधिक श्रम समय मनोयोग एवं साधनों का समावेश हो सके।


Quotation

अथो खल्वाहु काममय एवाअयं पुरुष इति। स य्रथा कामो भवति तत्क्रतुर्भवति। यत्क्रतुर्भवति तर्त्कम कुरुते। यर्स्कम कुरुते तदभिसम्पद्यते। -वृहदारण्यक 30। 4। 4। 5

यह मनुष्य भावना-मय है। जैसी कामना करता है वैसे विचार आने लगते हैं। जैसे विचार उठते हैं वैसा निश्चय करता है। जैसा निश्चय करता है वैसे काम होने लगते हैं। जैसे काम करता है वैसा फल भोगता है।

*समाप्त*