सफलता के मणि मुक्तक धूल में बिखरे नहीं पड़े हैं। उन्हें पाना है तो गहरे उतरने की हिम्मत जुटाओ। कठोर परिश्रम के लिए शपथ लो। कठोर दम तोड़ और टपकते स्वेद वाला परिश्रम ही जीवन का सबसे महान पुरस्कार है। इसी के परिणाम स्वरूप सफलताओं और विभूतियों को पाया जा सकता है।
सुअवसरों की प्रतीक्षा में न बैठे रहो उद्यम के लिए हर घड़ी शुभ मुहूर्त है और हर पल सुअवसर। सस्ती सफलता के फेर में पड़े रहने से कुछ लाभ नहीं। चिरस्थायी प्रगति के लिए राजमार्ग पर अनवरत परिश्रम और अपराजेय साहस साथ लेकर चलना पड़ता है। पगडण्डियाँ ढूँढ़ना बेकार है। वे भटका सकती हैं। जिनने भी कुछ कहने लायक सफलता पाई है उन्हें गहराई तक खोदने और उतरने के लिए कटिबद्ध होना पड़ा है। विजय-श्री का वरण करने के लिए कमर कसना, आस्तीन चढ़ाना और गहराई तक खुदाई करना आवश्यक है पर ध्यान यह भी रखना चाहिए कि कहीं कुदाली से अपने पैर ही न कट जांय।
परिस्थितियों, साधन-क्षमता का समन्वय करना समझदारी है। पर सफलता केवल समझदारी पर ही तो निर्भर नहीं हैं, उसका मूल्य माथे से टपकने वाले श्रमसीकरों से ही चुकाना पड़ता है।
एक राजा वन विहार के लिए गया। शिकार का पीछा करते-करते राह भटक गया। घने जंगल में जा पहुँचा। रास्ता साफ नहीं दीख पड़ता था। साथी कोई रहा नहीं। रात हो गई। जंगल के हिंसक पशु दहाड़ने लगे। राजा डरा और रात्रि बिताने के लिए किसी आश्रय की तलाश करने लगा।
ऊँचे पेड़ पर चढ़कर देखा तो उत्तर दिशा में किसी झोंपड़ी में दीपक जलता दिखाई दिया। राजा उसी दिशा में चल पड़ा और किसी वनवासी की झोपड़ी में जा पहुँचा।
अपने को एक राह भूला पथिक बताते हुए राजा ने उस व्यक्ति से एक रात निवास कर लेने देने की प्रार्थना की। वनवासी उदार मन वाला था। उसने प्रसन्नता पूर्वक ठहराया और घर में जो कुछ खाने को था, देकर उसकी भूख बुझाई। स्वयं जमीन पर सोया और अतिथि को आराम से नींद लेने के लिए अपनी चारपाई दे दी।
राजा ने भूख बुझाई। थकान मिटाई और गहरी नींद सोया। वनवासी की उदारता पर उसका मन बहुत प्रसन्न था। सवेरा होने पर उस वनवासी ने सही रास्ते पर छोड़ आने के लिए साथ चलने की भी सहायता की।
दोनों एक दूसरे से विलग होने लगे। तो राजा को उस एक दिन के गान और आतिथ्य का बदला चुकाने का मन आया। परन्तु क्या दे? कुछ दे भी तो उस एकान्तवासी पर चोर रहने क्यों देंगे? इसलिए ऐसी भेंट देनी चाहिए जिसके चोरी होने का डर भी नहीं और आवश्यकतानुसार उसमें से आवश्यक राशि उपलब्ध होती रहे।
उसी जंगल में राजा का एक विशाल चंदन उद्यान था। उसमें बढ़िया चंदन के सैकड़ों पेड़ थे। राजा ने अपना पूरा परिचय वनवासी को दिया और अपने हाथ से लिखकर उसे चंदन उद्यान का स्वामी बना दिया। दोनों संतोष पूर्वक अपने-अपने घर चले गये।
वनवासी लकड़ी बेचकर गुजारा करता था। इसने लकड़ी का कोयला बना कर बेचने में कम श्रम पड़ने तथा अधिक पैसा मिलने की जानकारी प्राप्त कर ली थी। वही रीति-नीति अपनायी। पेड़ अच्छे और बड़े थे। आसानी से कोयला बनने लगा। उसने एक के बजाय दो फेरी निकट के नगर में लगानी आरंभ कर दी ताकि दूनी आमदनी होने लगे। वनवासी बहुत प्रसन्न था। अधिक पैसा मिल जाने पर उसने अधिक सुविधा सामग्री खरीदनी आरम्भ कर दी और अधिक शौक मौज से रहने लगा।
दो वर्ष में चन्दन का प्रायः पूरा उद्यान कोयला बन गया। एक ही पेड़ बचा। एक दिन वर्षा होने से कोयला तो न बन सका। कुछ प्राप्त करने के लिए पेड़ से एक डाली काटी और उसे ही लेकर नगर गया। लकड़ी में से भारी सुगंध आ रही थी। खरीददारों ने समझ लिया चह चंदन है। कोयले की तुलना में दस गुना अधिक पैसा मिला। सभी उस लकड़ी की माँग करने लगे। कहा कि- “भीगी लकड़ी के कुछ कम दाम मिले हैं। सूखी होने पर उसकी और भी अधिक कीमत देंगे।
वन वासी पैसे लेकर लौटा और मन ही मन विचार करने लगा। यह लकड़ी तो बहुत कीमती है। मैंने इसके कोयले बनाकर बेचने की भारी भूल की, यदि लकड़ी काटता बेचता रहता तो कितना धनाढ्य बन जाता और इतनी सम्पदा इकट्ठी कर लेता जो पीढ़ियों तक काम देती।
राजा के पास जाने व पुनः याचना कर अपनी मूर्खता दर्शाने में कोई सार न था। शरीर भी बुड्ढा हो गया था। कुछ अधिक पुरुषार्थ करने का उत्साह नहीं था। झाड़ियाँ काटकर कोयले बनाने और पेट पालने की वही पुरानी प्रक्रिया अपना ली और जैसे-तैसे गुजारा करने लगा।
मनुष्य जीवन चंदन उद्यान है इसकी एक-एक टहनी असाधारण मूल्यवान है। जो इसका सदुपयोग कर सकें, वे धन्य होंगे, जिनने प्रमाद बरता वे वनवासी की तरह पछतायेंगे।
सृष्टि का व्यवस्था क्रम आदान-प्रदान के सिद्धान्त पर चल रहा है। जो बिना दिये पाने की इच्छा संजोते हैं, वे आसमान में महल बनाने वाले अबोध बालक की तरह हैं।
पदार्थों को बड़ी मात्रा में एकत्रित करके अधिक वैभव, बल या सुख पाया जा सकता है, यह मान्यता अब बहुत पुरानी हो गई। मात्रा की अपेक्षा अब गुण को महत्व मिलने लगा है। जो उचित भी है। “खोदा पहाड़ निकली चुहिया” वाली कहावत वहाँ लागू होती है जहाँ यह सोचा जाता है कि जो जितना बड़ा है- साधन सम्पन्न है वह उतना ही सशक्त है। शक्ति का श्रोत हर छोटे पदार्थ, व्यक्ति एवं साधन में मौजूद है। यदि हम बारीकी से ढूँढ़ना, परखना और सही रीति से प्रयुक्त करने की विद्या जान जाएँ तो थोड़ी सी सामग्री से ही प्रचुर शक्ति सम्पन्न बन सकते हैं हमारे छोटे-छोटे-व्यक्तित्व ही ऐसे महान कार्य सम्पन्न कर सकते हैं जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़े। अणु से भी सूक्ष्म आत्म सत्ता की शक्ति सामर्थ्य असीम और अनन्त है।
अणु शक्ति इस तथ्य को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करती है। पदार्थ का छोटे से छोटा घटक ‘अणु’ कितना सशक्त है और वह कितने बड़े कार्य कर सकता है इसे देखने, समझने पर इस सच्चाई को हृदयंगम करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि छोटा समझा जाने वाला व्यक्ति भी यदि अपने को पहचान सके तो जो कुछ वह है उतने का ही सही उपयोग कर सके तो वह कर सकता है जिसके लिए सामान्य बुद्धि बहुत बड़े साधनों की आवश्यकता अनुभव करती है।
अब परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई नहीं रहा उसके भीतर 110 से भी अधिक सूक्ष्म ऐलिमेन्टरी पार्टिकल खोज निकाले गये हैं। इनको भी अंतिम इकाई नहीं कहा जा सकता। इनके भीतर जो सूक्ष्मता के अनुपात से अधिक रहस्यमय स्पंदन, स्फुरता भरे पड़े हैं उनका रहस्योद्घाटन होना अभी शेष है। अब विज्ञान अधिक गहराई में प्रवेश कर रहा है। पिछले दशकों के प्रतिपादन अब झुठलाये जा रहे हैं। यथा- ‘ईथर’ की कल्पना का अस्तित्व पिछले दिनों प्रख्यात भौतिक विज्ञानी मोर्स तथा माइकेलसन ने सिद्ध किया था। शब्द तरंगों के वहन करने वाले इस ईथर की खोज पर वैज्ञानिक द्वय फिट्ज गेराल्ड और लारेन्टज को बहुत ख्याति मिली थी और उनकी शोध को बहुत उपयोगी मानकर सर्वत्र मान्यता मिली थी। पर अब उसके नकारात्मक प्रबल प्रतिपादन ने विज्ञान की अन्य मान्यताओं के भी खोखली होने की आशंका उत्पन्न कर दी है। आइन्स्टाइन का सापेक्षवाद अब उतना उत्साहवर्धक नहीं रहा। उसमें बहुत सी शंकाओं और त्रुटियों की संभावना व्यक्त की जा रही है। गैलीलियो-न्यूटन आदि की मान्यताएँ अब पुरातन पंथी वर्ग की कल्पनायें ठहराई जा रही हैं।
महर्षि कणाद ने अपने वैशेषिक दर्शन में अपने ढंग से यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यह संसार छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है। ईसा से 400 वर्ष पूर्व यूनानी दार्शनिक देमोक्रेटस भी अणुवाद का प्रतिपादन करते थे। इससे पूर्व यह जगत पंच तत्वों का बना माना जाता था। अब यह पंच तत्वों वाली वर्गीकरण की मान्यता बहुत मोटी पड़ जाती है। पानी अपने आप में मूल सत्ता नहीं रहा। इसे हाइड्रोजन और आक्सीजन का सम्मिश्रण मात्र स्वीकार किया गया है। पुरानी मान्यताएँ अपने समय में बहुत सम्मानित थीं, पर वे अब त्रुटिपूर्ण ठहरा दी गई हैं।
न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त एक सीमा तक ही सही है। यदि कोई राकेट प्रकाश की गति से एक सेकेंड में तीन लाख किलोमीटर उड़ने लगे तो वे गुरुत्वाकर्षण नियम गलत हो जायेंगे। रेडियम धातु द्वारा उत्पन्न होने वाले विकिरण की खोज होने तक यही मान्यता थी कि पदार्थ को ऊर्जा में नहीं बदला जा सकता है। दोनों का अस्तित्व स्वतंत्र है पर अब अणु विस्फोट के पश्चात् यह स्वीकार कर लिया गया है कि पदार्थ और ऊर्जा वस्तुतः एक ही सत्ता के दो रूप हैं और उन्हें आपस में बदला जा सकता है।
क्वांटम और मैक्सवेल के सिद्धान्तों को आइन्स्टाइन की नई खोजों ने बहुत पीछे छोड़ दिया है। चुम्बक सम्बन्धी पुरातन मान्यताओं में रदरफोर्ड ने नये तथ्य जोड़े। उनने सिद्ध किया कि रेडियो धर्मी विकिरण का एक भाग एक दिशा में मुड़ता है तो उसे ‘अल्फा’ विपरीत दिशा में मोड़ता है तो ‘बीटा’ और बिल्कुल न मुड़ने वाला प्रवाह ‘गामा’ किरणों के रूप में निस्सृत होता है। यह तीनों प्रवाह अपने-अपने ढंग के अनोखे हैं। पुरानी मान्यता का परमाणु ठोस था। पीछे उसमें भी ढोल में पोल पाई गई है। आकाश में घूमने वाले पिण्डों की तरह परमाणु के गर्भ में कुछ प्राथमिक कण भ्रमण तो करते हैं फिर भी उसमें खाली जगह बहुत बच जाती है। यदि इलेक्ट्रॉन रहित परमाणुओं के नाभिकों को पूरी तरह सटाकर दबाया जा सके तो एक घन सेन्टीमीटर नाभिकीय द्रव का भार 10 करोड़ टन के लगभग हो जायगा। यूरेनियम, थोरियम, प्लूटोनियम जैसे रेडियो सक्रिय तत्वों की सामर्थ्य तो सर्वविदित ही है। धूल मिट्टी का अत्यन्त छोटा घटक होने के कारण उसका प्रत्यक्ष मूल्य नगण्य है, पर यदि उसका वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया जा सके तो शक्ति का असाधारण स्रोत करतलगत किया जा सकता है। नाभिक में प्रसुप्त शक्ति की खोज करने वाले प्रख्यात भौतिक विज्ञानी प्रो. एनारेको के शब्दों में- “हम छोटी-छोटी वस्तुओं में उलझे पड़े हैं। वस्तुतः संसार में महान शक्तियाँ भी हैं, जिनसे सम्बन्ध बनाकर हम अपने आप को शक्तिशाली तथा और अधिक प्रसन्न बना सकते है।”
अणु शक्ति की झाँकी तो कर ली गई है और उसकी क्षमता के सदुपयोग या दुरुपयोग की कला भी मानव बहुत कुछ जान गया है, किन्तु जड़ अणु शक्ति से भी उच्चकोटि की वेतन शक्ति मौजूद है। जड़ से चेतन की गरिमा सर्वविदित है। अणु से भी जीवाणु की क्षमता अत्यधिक प्रचण्ड होना स्वाभाविक है। अणु समूह का थोड़ा-सा यूरेनियम इतनी ऊर्जा शक्ति उत्पन्न कर सकता है जिससे उत्पादित विद्युत सारे क्षेत्र को प्रकाशित कर सकती है तो ईश्वर की अंशधारी आत्म चेतना युक्त मानवी व्यक्तित्व की क्षमता कितनी महान हो सकती है कितनों को प्रकाश दे सकती है, इसका अनुमान लगाया जाना कुछ कठिन नहीं होना चाहिए।
वस्तुतः अणु शक्ति से भी बढ़चढ़कर मनुष्य की चेतना शक्ति है। जिसके अंतर्गत मन, बुद्धि, चित्त, आत्मबोध को अन्तःकरण के रूप में जाना जाता है। लगन, तत्परता, एकाग्रता, तन्मयता, निष्ठा, दृढ़ता, हिम्मत जैसे मानसिक गुण ऐसे है जिनके आधार पर अणु शक्ति से भी करोड़ों गुनी अधिक प्रखर आत्मिक शक्ति को जगाया, बढ़ाया, रोका, सँभाला और प्रयुक्त किया जा सकता है।
अणु विज्ञान से बढ़कर आत्म विज्ञान है। जड़ अणु में जब इतनी शक्ति है तो जड़ की तुलना में चेतन का जो अनुपात है, उसी हिसाब से आत्म शक्ति की महत्ता होनी चाहिए। अणु विज्ञानी अपनी उपलब्धियों पर गर्वान्वित हैं और उस सामर्थ्य को युद्ध शस्त्र से लेकर बिजली की कमी को पूरा करने जैसी योजनाओं में प्रयुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। आत्मविज्ञानियों का कर्तव्य है कि वे उसी लगन और तत्परता के साथ आत्म शक्ति की महत्ता और उपयोगिता को इस प्रकार प्रमाणित करें कि सर्वसाधारण को उसकी गरिमा समझा सकना संभव हो सके।
परमाणु के नाभिक की शक्ति की जानकारी से वैज्ञानिक आश्चर्यचकित हैं। वे उसी का विस्फोट कराते और उस ऊर्जा को भले-बुरे प्रयोजनों में प्रयुक्त करते हैं। अध्यात्मवेत्ता योगियों की सूक्ष्म दृष्टि भी वैज्ञानिकों की तरह ही रही है। उन्होंने चेतन सत्ता के नाभिक की जानकारी कर ली है और उसमें सन्निहित ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति की त्रिवेणी को केन्द्रित कर उससे उत्पन्न सामर्थ्य को रचनात्मक दिशा में प्रयुक्त कर सकने की विधि व्यवस्था को अध्यात्म विज्ञान कहा है। पदार्थ का परमाणु हमें सूक्ष्म से सूक्ष्म सत्ता की शक्ति की अनुभूति तो कराता है, पर वह चेतन सत्ता की जानकारी नहीं देता। भारतीय तत्व वेत्ताओं ने भी ऐसे ही चेतन परमाणु और उसके विभु नाभिक का पता लगाया है। उसे चेतन सत्ता आत्मा या ईश्वरीय प्रकाश के रूप में माना है और उसकी विस्तृत खोज की है। उपलब्धियाँ दोनों की एक तरह की हैं। उपनिषद् उसे अणोरणीयात्महतो महीयानात्मा (आत्मोपनिषद्-15/1) अणु से अणु और महान से महान बताती है। योग वशिष्ठ (5/17 /15/5/73/ 10; 4/ 33/ 51) इसे मुक्ति दिलाने वाला, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, दृश्य पदार्थों से विलग रहने वाला तथा सब कुछ जानने वाला बताया गया है।
निःसन्देह इस जड़ जगत में सर्वत्र शक्ति का विपुल सागर भरा पड़ा है। पदार्थ के कण-कण में से ऊर्जा की प्रचण्ड लहरें उठ रही हैं। इस बिखराव को समेटने और सही ढँग से प्रयुक्त करने की विद्या जब मनुष्य के हाथ लग जायगी तो फिर अशक्ति जन्य सभी कठिनाइयों का निवारण हो जायगा। मनुष्य के हाथ में सामर्थ्य का अजस्र स्रोत होगा। इससे भी अधिक असंख्य गुना सामर्थ्य का स्वामी वह तब बनेगा जब चेतना जगत में संव्याप्त आनन्द और उल्लास से लेकर सिद्धियों, समृद्धियों और विभूतियों को वह हस्तगत कर लेगा। जीवन चेतना के प्रत्येक घटक में समाई सत्ता को देखना, परखना, समेटना और प्रयुक्त करने की कला में निष्णात बन जायेगा। इस स्थिति में पहुँच कर ही हम नर से नारायण रूप में विकसित हो सकेंगे। अपूर्णता से पीछा छुड़ाकर पूर्ण बन सकने का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे।
अदृश्य सूक्ष्म शक्तियों का ज्ञान न होने से मनुष्य उनका लाभ नहीं उठा पाता। शरीर बल, बुद्धि, बल तथा अन्यान्य भौतिक सम्पदाएँ जो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती हैं, प्रायः उन्हें ही करतलगत करने का प्रयास किया जाता है। शरीर और उससे जुड़ी इन्द्रियों की बनावट ही ऐसी है कि मनुष्य दृश्य अथवा प्रत्यक्ष लाभ देने वाले घटकों को ही अधिक महत्व देता है। फलतः उनसे सीमित ही लाभ उठा पाता है। इतने पर भी प्रकृति एवं चेतना से समन्वित सर्वांगपूर्ण काय संरचना में सन्निहित सूक्ष्म शक्ति स्रोतों का महत्व कम नहीं हो जाता। उनकी गरिमा एवं सामर्थ्य यथावत् है।
शरीर एवं बुद्धि की तुलना में मन अधिक सूक्ष्म, विलक्षण एवं सामर्थ्यवान् है। जीवन पर प्रमुख रूप से यही छाया रहता है। इसी कारण मनः संस्थान को मनुष्य के व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना गया है। पर उसकी क्षमता का विकास बिरले कर पाते तथा बिरले ही उससे लाभ उठा पाते है। व्यक्तित्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं समर्थ घटक उच्चचेतन मन के उपेक्षित पड़े रहने से ही अधिकाँश व्यक्तियों का जीवन व्यर्थ भटकाव में व्यतीत होता है। शरीर एवं बुद्धि से समर्थ होते हुए भी वे अपने जीवन को सही दिशा एवं प्रेरणा देने में प्रायः असमर्थ सिद्ध होते हैं।
भारतीय ऋषियों की पहुँच प्रकृति एवं चेतना की गहन परतों तक थी। उन्होंने भौतिक जगत एवं उससे जुड़े उपादानों को उतना ही महत्व दिया जितना कि शरीर व्यापार को गतिशील रखने के लिए आवश्यक था। शरीर और बुद्धि का मन न केवल संचालक है, वरन् मनुष्य के उत्थान-पतन का कारण भी है, यह वे भली-भाँति जानते थे। तभी उनका यह उद्घोष था- “जीव के बन्धन और मोक्ष के विद्यान में मन ही प्रधान कारण है।” यदि उसका सुधार, सम्भाल एवं विकास कर लिया जाए तथा उसकी शक्ति को जीवन लक्ष्य की दिशा में नियोजित कर लिया जाए तो मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव न रह जाए। यही कारण था कि उनकी अधिकाँश चेष्टाएँ-जप, तप की प्रक्रियाएँ मानसिक परिष्कार, शोधन, अभिवर्धन एवं विकास के लिए चला करती थीं। अतिमानवी शक्तियों का प्राकट्य भी उस युग में इसी कारण संभव हो सका था।
मनःशास्त्री भी इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि व्यक्तित्व की उत्कृष्टता-निकृष्टता का केन्द्र बिन्दु मानसिक चेतना के गहन अन्तराल में सन्निहित है। मनः संस्थान की इस सबसे गहरी अन्तिम परत को उन्होंने ‘सुपरचेतन’ कहा है। सुपर इसलिए कि उसकी मूल प्रवृत्ति मात्र उत्कृष्टता से ही भरपूर है। उसे यदि अपने वास्तविक रूप में रहने दिया जाय-अवाँछनीयताओं के घेरे में जकड़ा न जाए तो वहाँ से अनायास ही ऊँचे उठने-आगे बढ़ने की ऐसी प्रेरणाएँ मिलेगी। जिन्हें आदर्शवादी या उच्चस्तरीय ही देखा जा सके। प्रकारान्तर से ‘सुपरचेतन’ को ईश्वर के समतुल्य ही माना जा सकता है। वेदान्त में जिसे परिष्कृत अन्तःकरण माना जाता है उसी को विज्ञान की भाषा में “सुपरचेतन” कहते हैं।
मनोविज्ञान के अनुसार मानव मन के तीन स्तर होते हैं जिन्हें क्रमशः अचेतन मन-अनकान्शस माइन्ड, अवचेतन मन-सबकान्शस माइण्ड तथा चैतन्य मन-कान्शस माइण्ड के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इससे आगे उच्चस्तरीय विकसित परत को अतिचेतन सुपर कान्शस या सुपर माइण्ड कहा जाता है। अचेतन से अवचेतन और अवचेतन से चेतन मन को प्रेरणा और प्रकाश मिलता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि कारण से सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म से स्थूल शरीर प्रेरित होता तथा प्राण ऊर्जा प्राप्त करता है।
महर्षि अरविंद के अनुसार सुपर चेतन उच्चतम कोटि की आध्यात्मिक चेतना है। उनका कहना है कि उच्चतर मन, प्रकाशित मन, संबुद्ध मन और ओवर माइण्ड से भी ऊपर सुपर माइण्ड का स्तर है। यह मन का ऐसा उच्चतम सोपान है जिसका उपयोग अभी तक विरले लोग ही कर सके हैं। बुद्धि के धरातल से ऊपर उठकर मन के उच्चतम सोपान अतिमन पर पहुँच कर ही मनुष्य सर्वज्ञ बन सकता है।
वस्तुतः सूक्ष्मातिसूक्ष्म कहे जाने वाले मन का अस्तित्व अब मात्र कोरी कल्पना नहीं रहा गया है। रॉकफेलर यूनिवर्सिटी, न्यूयार्क के प्रख्यात न्यूरोसाइंटिस्ट जोनाथन विन्सन ने कई वर्षों के लगातार अथक प्रयास और श्रम साध्य अनुसंधान करने के पश्चात् मानव मस्तिष्क में मन के निवास स्थान को खोज निकालने में सफलता पाई है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ब्रेन एण्ड साइक” में लिखा है कि मन का निवास स्थान “लिम्बिक सिस्टम” के भीतर होता है। यह तंत्र ही मन का प्रधान कार्यालय है, जो यह निर्णय करता है कि किन स्मृतियों, घटनाओं, आँकड़ों तथा किन बातों को सुरक्षित रखना है और किन्हें विस्मृति के गर्त में धकेलना है। उनके अनुसार अचेतन की परत मन के हृदय केन्द्र में स्थित होती है। यह मानसिक अनुभवों को अपने अंदर संकलित-संग्रहित करता रहता है और अपनी अभिव्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से समयानुसार साँकेतिक भाषा में प्रकट करता रहता है। विन्सन का कहना है कि अचेतन से भी असंख्य गुनी उच्चस्तरीय संभावनाओं से भरा पूरा-सुपर चेतन है। उसको नये सिरे से समझा-खोजा और उसके अभ्युदय का अभिनव प्रयास किया जाना चाहिए।
मनोविज्ञानी, नीतिशास्त्री, तत्व विज्ञानी, समाज शास्त्री आदि सभी इस मिले जुले निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि पतन पराभव से छूटने और वरिष्ठता, उत्कृष्टता उपलब्ध करने के लिए अतिमन की-सुपर चेतन की उच्च स्तरीय परतें खोजी कुरेदी जानी चाहिए। पैरासाइकोलॉजी, सुपर साइकोलॉजी, मैटाफिजिक्स आदि माध्यमों से पिछले दिनों अचेतन की महत्ता बखानी जाती रही है और जगाने उभारने के लिए तरह-तरह के प्रयोग परीक्षणों की चर्चा होती रही है। दूर दर्शन, दूर श्रवण, विचार संप्रेषण, प्राण प्रत्यावर्तन, भविष्य ज्ञान जैसे कितने ही कला-कौशल इस संदर्भ में खोजे और परखे गये हैं। इस दिशा में प्रयास चालू रखते हुए भी मूर्धन्य स्तर के मनीषी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि चेतना के उस उच्चतर परत की कुरेदबीन की जानी चाहिए, जिस क्षेत्र की उपलब्धियाँ व्यक्ति और समाज में उच्चस्तरीय परम्पराओं का समावेश और नये युग का नया सूत्रपात कर सकने में समर्थ हो सकती है।
प्रख्यात मनः शास्त्री काँलिन विलसन का कहना है कि मन की परतों को समझने में कुछ गलती हुई है। दृश्य पक्ष चेतन के क्रिया-कलापों के रूप में सामने आता है, जो बहिर्मुखी इन्द्रियों का प्रायः पक्षधर रहता है। इन्द्रियों की रुझान उपभोग में होती है। वह चेतन मन को भी अपने अनुरूप खींचती है। फ्रायड ने यह देख कर ही प्रतिपादित किया था कि मनुष्य अन्य पशुओं की तरह मूल प्रवृत्तियों का गुलाम तथा इन्द्रियों का दास है। पर विलसन का मत है कि अदृश्य पक्ष अचेतन तथा सुपर चेतन की चमत्कारी सामर्थ्य से अपरिचित होने तथा उपयोग में न आने के कारण ही ऐसा सोचा जाता है। बोध हो सके तो मनुष्य अपनी हर विकृत इच्छा, आकाँक्षा तथा उनसे संचालित होने वाले अवाँछनीय क्रिया कलापों पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है।
प्रचलित फ्रायडवादी मनोविज्ञान से अलग सुपर साइकोलॉजी का प्रतिपादन करने वालों में अमरीकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो का नाम प्रमुख है। उनका मत है कि मनुष्य के अन्तराल में सुपर चेतन केन्द्र का अस्तित्व विद्यमान है जो प्रसुप्त पड़ा है। इस प्रसुप्ति का कारण है उस केन्द्र से उठने वाली दिव्य प्रेरणाओं की उपेक्षा। इस केन्द्र से दिव्य प्रेरणाएँ कभी न कभी उभरती हैं, पर अचेतन का अभ्यस्त स्वभाव उन्हें दबा देता तथा व्यवहार में आने से रोक देता है। यदि उन्हें सुना और तद्नुरूप क्रिया-कलाप अपनाया जा सके तो मनुष्य अपनी सामर्थ्य को कई गुना बढ़ा सकता है। मैस्लो से ही मिलता जुलता प्रतिपादन प्रसिद्ध विद्वान मित्या करागाजोव का भी है। उनके अनुसार श्रेष्ठता की भावना का उद्भव ही मानवी विकास का सही अर्थों में कारण बनता है। ऐसी संभावनाएँ सुपरचेतन से समय-समय पर निस्सृत होती रहती हैं जिसे अधिकाँश व्यक्ति प्रायः अनसुनी कर देते हैं। फलतः व्यक्तित्व विकास की संभावनाएँ धूमिल पड़ी रहती हैं।
“साइकोलॉजी ऑफ इंट्यूशन” नामक अपनी पुस्तक में एमिली मारकाल्ट ने कहा है कि उच्च चेतन मन शरीर एवं व्यक्तित्व का अतिसूक्ष्म एवं उच्चस्तरीय भाग है। ज्ञानेन्द्रियों और तर्क बुद्धि से जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण समाधान सुपर चेतन मन की सहायता से मिल सकता है। इस तंत्र को उजागर कर लेने का अर्थ है एक ऐसे देवता का साथ पा लेना जो उपयोगी सलाह ही नहीं देता वरन् महत्वपूर्ण सहायता भी करता है।
प्रख्यात मनोविश्लेषक जुँग कहते हैं कि मात्र अचेतन ही सब कुछ नहीं हैं, वरन् इससे भी आगे की परत ‘उच्चचेतन’ का भी अलग अस्तित्व है। आदर्शवादी प्रेरणाएँ एवं उमंगे वहीं से उठती है। अचेतन तो अभ्यस्त आदतों का संग्रह-समुच्चय भर है। वे बुद्धि एवं साहसिकता से भी अधिक अग्रणी संकल्प शक्ति का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि व्यक्तित्व को विनिर्मित करने में मनुष्य के विश्वासों का ही प्रमुख योगदान रहता है।
एडलर के मतानुसार-अचेतन की सुदृढ़ता देखते हुए उसके सुधार संदर्भ में किसी को निराश नहीं होना चाहिए। स्वसंचित संकल्प, आत्म विश्वास और आदर्शों के प्रति आस्थावान बनने से उन मूल प्रवृत्तियों में भी परिवर्तन कर सकना संभव है जिन्हें चिरसंचित, दुराग्रही एवं अपरिवर्तनशील माना जाता है।
मनः शास्त्री विलियम मैकडूगल कहते हैं कि-अचेतन से भी ऊँची परत ‘अतिचेतन’ या ‘उच्च चेतन’ की अभी जानकारी भर मिली है। अगले दिनों उसे अच्छी तरह जाना समझा जा सकेगा और यह कहा जायगा कि सामान्य जीवन क्रम का सूत्र संचालन करने वाले अचेतन की कुँजी इस ‘अतिचेतन’ के पास ही है। अगले दिनों जब उच्च चेतन का स्वरूप और उपयोग ठीक प्रकार समझा जा सकेगा तब व्यक्तित्वों में क्राँतिकारी परिवर्तनों के सम्बन्ध में वैसी कठिनाई रहेगी जैसी आज है।”
मानवी अन्तराल में सन्निहित उच्च चेतना की महत्ता एवं उसकी महान संभावनाओं का प्रतिपादन विभिन्न मनीषियों ने अपने-अपने ढँग से किया है। जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने घोषणा की थी कि “स्वयं से परे हट कर स्वयं को देखना ही वस्तुतः सही ज्ञान की प्राप्ति है।” पर क्या यह संभव है? क्या हम स्वयं को अपने शरीर चिन्तन की परिधि से निकाल बाहर कर सकते हैं? जो शान्त चुपचाप खड़ा हो हमारी हर गतिविधि- हर परिस्थिति का अवलोकन करता रहे? वस्तुतः यह क्षमता हमारे भीतर है- जिसे हम ‘सुपरमाइन्ड’ कहते हैं जो एक लाइट हाउस की तरह दूर-दूर तक अपनी घुमावदार किरणें छोड़ता रहता है, पर स्वयं शान्त बिना विचलित हुए खड़ा रहता है।
दार्शनिक हेनरी वर्सो का कथन है कि- समय की जटिलताओं को न सुविधा संवर्धन से सुलझाया जाय और न दाँव पेंच से। प्रवीण बुद्धि कौशल ही पतन पराभव का निराकरण कर सकेगा। प्रस्तुत जटिलताओं और विभीषिकाओं का समाधान पाने के लिए उस ‘महाप्रज्ञा’ को जगाने की आवश्यकता है जो अन्तःकरण की गहराई में बसती है और ईश्वरीय प्रेरणाओं से मनुष्य को अवगत कराती है।
“मैन द अननोन” और “रिफ्लेक्शन ऑफ लाइफ” के नोबुल पुरस्कार प्राप्त लेखक अलेक्सिस कैरेल ने कई स्थानों पर एक ही बात को दुहराया है कि प्रकृति के दोहन से भी बड़ा संसाधनों का क्षेत्र अन्तःकरण की गरिमा उभारने का है। उस उपेक्षित क्षेत्र को नये सिरे से समझा एवं समुन्नत बनाया जाना चाहिए। विचार बुद्धि की उपयोगिता कितनी ही क्यों न हो पर वह रहेगी सीमित ही। मनुष्य के उच्च चेतन का विकास होने पर ही समस्याओं के समाधान और अभ्युदय उत्थान का आधार खड़ा होगा। विश्व मनीषा को अपना ध्यान एक ही केन्द्र पर एकत्रित करना चाहिए कि मनुष्य को सहृदय बनाने के लिए उसकी प्रसुप्त उच्च चेतना को किस प्रकार जागृत किया जाय?
“ह्वाट मैक्स ए लाइफ सिग्नीफिकेण्ट” पुस्तक में सुप्रसिद्ध मनःशास्त्री विलियम मोक्स ने मनुष्य की सुपर चेतन परतों पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि मनुष्य के भीतर अतिमानवी सामर्थ्य विद्यमान है जिन्हें करतलगत कर सकना संभव है। इसका आरंभिक क्रियात्मक चरण है .... की गतिविधियों को उलटने तथा सूझ-बूझ से भरी दूरदर्शितायुक्त महानता के मार्ग का अवलम्बन करने के लिए संकल्पों को परिपुष्ट तथा दृढ़ करना। इच्छा शक्ति-संकल्प शक्ति की प्रबलता पशुवत् अभ्यस्त स्वभावों से छुटकारा पाने तथा आत्म विजय प्राप्त करने का प्रमुख आधार है। इसका सम्पादन तथा अभिवर्धन निरन्तर के अभ्यास से ही संभव है।
बाह्य परिस्थितियों एवं बुद्धि वैभव को ही सब कुछ मानने की अपेक्षा भीतर झाँका जा सके तो मालूम होगा कि कितनी ही प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ अपने ही अन्दर मौजूद हैं जिनका प्रायः सदुपयोग नहीं हो पाता। आत्मविस्मृति के कारण इच्छाओं, आकाँक्षाओं का सुनियोजन नहीं हो पाता। वे मात्र सामान्य प्रयोजन पूरा करने तक रह जाती हैं। सुपर चेतन की दिव्य प्रेरणाओं के अनुरूप उन्हें गतिशील किया जा सके तो महानता को वरण कर सकना हर व्यक्ति के लिए सुगम हो सकता है।
दरिद्र कौन है और सम्पन्न कौन? इसकी किसी सत्संग में दार्शनिक चर्चा चल रही थी।
एक वरिष्ठ ज्ञानी समझा रहे थे कि जो अपने से सम्पन्नों के साथ अपनी तुलना करता है उसे अभाव और दुर्भाग्य का ही भान होता रहता है। पर जो अपने से गये गुजरों के साथ तुलना करते हैं उन्हें अपने पास इतने साधन दिखते हैं जिनके लिए लाखों तरसते हैं।
आदर्शवादी भाव संवेदनों का उद्गम अन्तःकरण है जिसे कारण शरीर भी कहते है। प्राणिवर्ग में जो तुच्छ स्तर के हैं उनका केवल शरीर पौरुष ही गतिशील रहता है। जो इससे अधिक विकसित हैं, उनका मन मस्तिष्क और युद्ध कौशल भी एक सीमा तक काम करने लगता है। कारण शरीर समस्त प्राणि समुदाय में से किसी का भी विकसित और सक्षम नहीं होता है। अकेला मनुष्य ही है जो चेतना क्षेत्र में विकास कर सका है। उसकी अविकसित स्थिति तो नर-वानरों जैसी ही होती है पर जैसे-जैसे मानवी गरिमा की परत खुलती जाती है वैसे-वैसे उसकी भाव संवेदना जगती है। आस्थाओं में परिपक्वता आती है और श्रद्धा का उत्कृष्टता अपनाने के लिए ऐसा प्रयास चल पड़ता है जिसे आत्मिक क्षेत्र का उत्कर्ष एवं अभ्युदय कहा जा सके। वस्तुतः मानवी गरिमा का शुभारंभ यहीं से होता है।
आत्मिक प्रगति का एक ही लक्षण है आदर्श के मार्ग पर चलते को धकेल सकने जैसी क्षमता से सम्पन्न भाव संवेदना का उभरना। यह उभार वस्तुतः मानवी गरिमा का उन्नयन है। डंठल, डाली पत्ते जब सभी परिपक्व हो जाते हैं तो कमल पुष्प खिलता है। पौधा जब तक कच्चा रहे तब तक उस पर सुविकसित पुष्प नहीं खिलता। इस प्रकार शरीरगत संयम और बुद्धिगत चिन्तन, मनन की परिपक्वता ही कारण शरीर को विकसित करती और मनुष्य को इस स्तर तक पहुँचाती है कि वह सद्भाव का श्रद्धा की सुविकसित स्थिति का अनुभव कर सके। यह श्रद्धा ही है जो अन्तराल को परमात्म सत्ता के साथ जुड़ सकने की परिस्थिति पैदा करती है।
श्रद्धा विहीन व्यक्ति साधनों से, दक्षताओं से, बौद्धिक विलक्षणताओं से कितना ही सुसज्जित क्यों न हो उसके अन्तराल की गहराई में श्रद्धा के अंकुर नहीं उग पाते। इस अभाव के रहते उस भूमिका में प्रवेश कर सकना बन नहीं पड़ता जिसे आदर्शवादी भाव संवेदना कहते हैं। करुणा की अनुभूति होती है। आत्मीयता विकसित होती है। महानता का मार्ग अपनाने के लिए उमंग उठती है। मनुष्य में देवत्व का उदय यही है। उसे अपनी आत्मा में सबकी आत्मा और सबकी आत्मा में अपनी आत्मा परिलक्षित होती है। विराट् विश्व के कण-कण में प्रभुसत्ता की उपस्थिति विद्यमान लगती है। जिस लोक में भगवान का निवास है वही- स्वर्ग है। ऐसा स्वर्ग अपनी विकसित श्रद्धा ही अपने लिए अपना स्वतंत्र स्वर्ग गढ़ लेती है। जिनमें निरन्तर निवास करते रहने और आनन्द से ओत प्रोत रहने का अवसर मिलता है। महा मानवों जैसे स्वभाव संस्कार भी उसी स्थिति में विकसित होते हैं। ऐसे कृत्य भी उसी मनोदशा में करते बन पड़ते हैं, जिन्हें मनीषियों और तपस्वियों के जीवन में ही क्रियान्वित होते देखा जाता है।
आत्मा और परमात्मा के मिलने से जो अद्भुत अलौकिक शक्ति उत्पन्न होती हैं उसी के आधार पर देवर्षि, महर्षि, ब्रह्मर्षि स्तर की देवात्माऐं अपनी स्थिति को असामान्य बनाती हैं। उनके क्रिया कलाप सामान्य लोगों की तुलना में कही अधिक उच्चस्तरीय होते हैं। वे सामान्य कायकलेवर में रहते तो हैं पर उनका दिशा निर्धारण, लक्ष्य संकल्प कुछ विशेष स्तर का ही होता है। स्थिति में इतना अन्तर आ जाता है कि गीता के अनुसार जब दुनिया सोती है तो योगी जागता है और जब योगी जागता है तब दुनिया सोती है। दोनों की स्थिति में रात दिन जैसा अन्तर होता है। संसारी लोग जहाँ स्वार्थ के लिए ही निरन्तर मरते खपते रहते हैं वहाँ श्रद्धावान् परमार्थ को लक्ष्य रखता है। उसे कर सकने के लिए अपनी अन्तः स्थिति को कषाय कल्मषों से विरत करते रहने में लगा रहता है। साँसारिक लोगों का लक्ष्य जहाँ संकीर्ण स्वार्थ परता की पूर्ति का होता है वही आध्यात्मवादी परमार्थ संचय के अतिरिक्त और कुछ सोचता ही नहीं। एक जहाँ साधन संपदा से लदने के लिए उचित अनुचित का विचार तक छोड़ देता हैं वहाँ श्रद्धावान् न्यूनतम निर्वाह में काम चलाना और क्षमताओं का अपनी तथा दूसरों की संस्कृतियों को समुन्नत करने में नियोजित किये रहता है। दोनों के लक्ष्य और प्रयास में यह स्पष्ट अन्तर सहज ही जाना जा सकता है।
स्वार्थी लोभ और अहंकार में डूबे पाये जाते हैं जबकि परमार्थी को सत्प्रवृत्तियों को बोने-उगाने बढ़ाने से ही फुरसत नहीं मिलती। इसी को मनुष्य और देवता के बीच पाया जाने वाला अन्तर समझा जा सकता है।
उपरोक्त अन्तर के अनुरूप परिस्थितियाँ भी दोनों की अलग-अलग होती हैं। एक की स्वार्थ साधन में व्यस्तता रहती है तो दूसरे की उत्कृष्टता के चरम शिखर पर जा पहुँचने की ललक लगी रहती है।
एक ही जंक्शन पर खड़ी दो रेल गाड़ियाँ दो विभिन्न दिशाओं के लिए छूटती हैं तो कुछ ही समय में दोनों के बीच भारी फासला पड़ जाता है। यही बात अनास्थावानों और आस्थावानों के बीच भी होती है। एक नर पशु की तरह क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति में कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है और बदले में अशाँति, ईर्ष्या, दुर्व्यसन, भय, आतंक, अपमान में डूबा रहकर अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति को उद्विग्नता की आग में जलाता रहता है। वहाँ दूसरा कल्पवृक्ष की तरह फलता-फूलता और अपनी छाया में असंख्यों को सुख शान्ति भरा आनंद अनुदान प्रदान करता रहता है। यह अन्तर श्रद्धा के भाव और स्थायी अभाव के ऊपर ही निर्भर रहता है।
गीता के अनुसार सद्ज्ञान मात्र श्रद्धा के माध्यम से मिलता है। श्रद्धा ही विवेक की आंखें खोलती है। ऐसे दृष्टिवान को यथार्थता का बोध होता है। आत्म ज्ञान का दिव्य अनुदान मिलता है। अज्ञान का पर्दा हटने पर न दोष रहते हैं न दुर्गुण न शोक रहता है और न संताप। जिसने अपना कल्याण कर लिया वही दूसरे अन्य असंख्यों का कल्याण कर सकने में भी समर्थ होता है।
श्रद्धा का प्रभाव और प्रताप सुविकसित व्यक्तित्व में ही परिलक्षित होता है। यहाँ प्रतिभा के रूप में वह गरिमा के रूप में प्रकट होता है। गाँधी जी चर्म चक्षुओं से देखने पर शरीर की दृष्टि से चकाचौंध उत्पन्न करने वाली प्रतिभा के धनी नहीं थे। फिर भी उनकी महानता हर गतिविधि से, हर उच्चारित शब्द से अपनी गरिमा का परिचय देती थी। श्रद्धावानों का व्यक्तित्व अपने-अपने क्षेम में प्रायः इसी स्तर का हो जाता है। आन्तरिक उल्लास की अजस्र अनुभूति होने के अतिरिक्त उन्हें लोक सम्मान की जन सहयोग की भी कमी नहीं रहती। श्रद्धा अपने आप में परमात्म सत्ता का प्रत्यक्ष अनुदान है। वह जिसने अर्जित कर लिया समझना चाहिए कि उसने जीवन के सर्वांगीण सफलता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया।
पशु और मनुष्य का अन्तर श्रद्धा के आधार पर ही आरंभ होता है। अश्रद्धा को प्रत्यक्षवादी मनः स्थिति में किसी भी आदर्श का महत्व नहीं समझा जा सकता। परमार्थ की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ा जा सकता। क्योंकि प्रत्यक्ष स्वार्थ ही सब कुछ समझा जा सकता है। कोई किसी की परवाह क्यों करे? अपनी विलासिता, लिप्सा, लालसा और महत्वाकाँक्षा पर कोई अंकुश क्यों लगाये? स्वेच्छाचार बरतकर गर्व करने का अवसर क्यों खोये? इस नियंत्रण में तो अपने को रोकना प्रतिबंधित ही करना पड़ेगा और दूसरों को लाभ देने की बात में अपने लिए तो घाटा ही है। आक्रमण से अनाचार से यदि लाभ उठाया जा सकता है तो दया धर्म के कारण असाधारण लाभ उठाने से क्यों चूका जाय? उत्पीड़न, शोषण, छल, प्रपंच आदि पर अंकुश क्यों लगाया जाए? इन सभी प्रसंगों में अनास्थावादी बुद्धि का यही निर्णय हो सकता है कि जिनमें स्वार्थ सधता हो वही किया जाय? इस कारण दूसरों को क्या हानि होती है इसका विचार न किया जाय। ऐसी मनःस्थिति में पुण्य परमार्थ की बात सोचते भी नहीं बन पड़ती। क्योंकि उन सब में अर्थ प्रधान दृष्टि अपना अहित होने की बात ही सोचेगी।
श्रद्धा ही है जो मनुष्य को विराट् के साथ, आदर्शों के साथ, मानवी गरिमा के साथ जोड़ती है। जिसने उसे जिस रूप में पाया वह उसी गति से उत्कृष्टता को आध्यात्मिकता की दिशा में चल पड़ने के लिए तत्पर हुआ समझना चाहिए।
श्रद्धा और अन्ध श्रद्धा में जमीन आसमान जितना अन्तर है। अन्ध श्रद्धा पर अविवेक छाया रहता है। परम्परा का निर्वाह ही सब कुछ लगता है। उसमें उचित अनुचित का विश्लेषण करने का भी समय नहीं रहता। अनेकानेक कुरीतियाँ इस अन्ध श्रद्धा के आधार पर ही पनपी और परिपक्व हुई हैं। इसी के सहारे धूर्तों ने मनगढ़ंत संरचनाएँ रच कर मूर्खों को अपने चंगुल में फँसाया है। अन्ध श्रद्धा के साथ ही जो श्रद्धा शब्द लगा है और अपना कुप्रयोजन सिद्ध करने वाले उस अन्ध श्रद्धा की भी यथार्थता जैसी व्याख्या कर देते हैं पर वस्तुतः बात वैसी है नहीं। दोनों के बीच मृत और जीवित जैसा अन्तर है।
यों देवताओं के प्रति धर्म सम्प्रदायों के प्रति भी मान्यताओं का आग्रह रखा जाता है। पर वस्तुतः श्रद्धा भाव-संवेदनाओं की उत्कृष्टता के साथ ही जुड़ी होती है। उसमें अन्तःकरण का ऐसा उल्लास जुड़ा होता है जिसकी प्रेरणा से हृदयता, सद्भावना और शालीनता को क्रियान्वित करने के लिए असाधारण उत्साह उभरे। कष्ट सहकर भी आदर्शों को अपनाये रहने की सतत् प्रेरणा मिले।
भावुकता और भावसंवेदना में अन्तर है। भावुकता एक आवेश है जब कि संवेदना अन्तःकरण का परिष्कृत स्तर। उसमें संकीर्ण स्वार्थ-परता का लेश मात्र भी अंश नहीं होता। जो कुछ सोचते बन पड़ता है और क्रिया रूप में अपनाया जाता है उसमें आत्मीयता का गहरा पुट होता है। श्रद्धा इसी स्थिति की अभिव्यक्ति है। उसमें अपनी श्रेष्ठतम चेतना का अंश निचोड़ा जाता है और उसे निस्वार्थ भाव से जन कल्याण के लिए अर्पित किया जाता है। इसे कारण शरीर से उभरा हुआ वरदान भी कह सकते हैं।
उस आरण्यक के अन्यान्य ऋषि अपनी व्यक्तिगत साधना में लगे रहते थे। स्वर्ग-मुक्ति उनका लक्ष्य था। पर विश्वामित्र के मन में तो जन-कल्याण ही भरा हुआ था। वे अपने को भूल चुके थे। त्याग मात्र साँसारिक सुखों का ही नहीं किया था वरन् आत्मिक उत्कर्ष की बात भी उन्हें जाँची नहीं। उन्हें परमार्थ ही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ प्रयोजन जँचा। किसी रास्ता चलते की सामयिक सहायता कर देने में भी उन्हें संतोष नहीं था। आकाँक्षा व्यापक थी और प्रबल भी। वे वातावरण को बदलना चाहते थे। पुराने अनुचित प्रचलनों को समाप्त करके वे नयायुग लाना चाहते थे।
उनकी यह योजना बनी तो, पर साधनों के अभाव में चल न सकी। बड़े कार्यों के लिए बड़े साधन भी चाहिए और सहयोग भी। पर उन दिनों विश्वामित्र के पास दोनों का ही अभाव था। यों तप-बल की विपुलता और योजना की समग्रता में कमी नहीं थी, पर साँसारिक प्रयोजनों के लिए साधन और सहयोग भी तो चाहिए।
विश्वामित्र की योजना और उसकी उपयोगिता के संबंध में चर्चा फैली। फैलते-फैलते वह राजा हरिश्चन्द्र के कानों तक पहुँची। वे भी ऐसे ही महान कार्य में अपना जीवन लगाने को उत्सुक थे। सोचा एकाकी ऋषि भी कुछ कर नहीं पर रहे हैं। फिर मैं कैसे कर पाऊँगा? साधन और संयोजन का सुयोग बैठने पर ही वह योजना पूरी हो सकनी संभव है, जो ऋषि ने बना रखी है। मेरे पास साधन भी है, जिनका उनके पास अभाव है। हम लोग मिल जुलकर काम क्यों न करें?
दो धाराएँ एक साथ मिली और गंगा यमुना का सम्मिलन एक नया सुयोग बनकर विकसित हुआ। दोनों ने एक दूसरे के साथ गठबंधन किया और दो पहियों की गाड़ी अपने रास्ते पर चल पड़ी। अंधे-पंगे द्वारा मिलकर नदी पार कर लेने की उक्ति चरितार्थ होने लगी।
हरिश्चन्द्र ने अपना राज्य ऋषि विश्वामित्र को सौंप दिया। ऋषि की विशाल युग निर्माण योजना गति पकड़ने लगी और सफलता के निकट तक जा पहुँची। किंतु अंतिम दिनों में साधनों की और अधिक आवश्यकता पड़ गई। जगह-जगह माँगने जाने में विलम्ब लगता था। एक व्यक्ति से साधन मिल पाते तो अधिक सुगमता रहती। विचार हरिश्चन्द्र तक पहुँचे। वे राज्यकोष तो पहले ही ऋषि को सौंप चुके थे। अब उनके पास अपना शरीर ही शेष था। सोचा उसे ही एक मुश्त बेचकर ऋषि की आवश्यकता पूरी क्यों न की जाय? अवसर न चूकने की बात राजा के मन में आई और शरीर बेचने की योजना ऋषि को बताई। इतना त्याग करने की साहसिकता देखकर ऋषि की छाती गर्व से फूल उठी। उनके जीवन दान की बात जब प्रकट हुई तो उनकी स्त्री तथा बच्चे ने भी उसी साहसिकता का परिचय दिया वे भी बिकने को तैयार हो गए।
हरिश्चन्द्र एक श्मशान व्यवस्थापक के हाथों बिक गए। स्त्री तथा बच्चे को एक ब्राह्मण ने खरीद लिया। मिली राशि के आधार पर ऋषि का रुका हुआ प्रयोजन फिर से चल पड़ा।
उदारता अपनाना कठिन है, पर उससे भी अधिक कठिन है-लोभ और मोह पर विजय प्राप्त करना वैसा अवसर भी हरिश्चन्द्र के इकलौते पुत्र रोहिताश्व को सर्प ने डस लिया। रोहित की मृत्यु हो गयी। रानी लाश लेकर मरघट पहुँची। गंगा का यह वही घाट था जिस पर हरिश्चन्द्र पहरा देने के लिए नियुक्त थे। राजा को पुत्र मृत्यु दुःख तो बहुत हुआ पर वे कर्त्तव्य से बँधे थे। बिना कर लिए अन्त्येष्टि उस स्थान पर नहीं होने दे सकते थे। पत्नी और पुत्र के प्रति उनका लगाव तो बहुत था, पर कर्त्तव्य की अवहेलना कैसे की जाए? लाश जलाने की व्यवस्था न बन पड़ी। उनकी पत्नी शैव्या का रुदन एवं हरिश्चन्द्र की कर्तव्यनिष्ठा देखकर विश्वामित्र वहाँ प्रकट हुए और अपना प्रयोजन पूरा हुआ बताकर राज्य भी लौटा दिया, पुत्र के प्राण भी।
परमार्थ प्रयोजनों के लिए उदारता और कर्तव्यनिष्ठा की दुहरी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर हरिश्चन्द्र महामानवों की श्रेणी में गिने गए। उनकी कथा-गाथा अभी भी गायी जाती है। उनके जीवन प्रसंग को सुनकर गाँधी जैसे महामानव उत्पन्न हुए और होते रहेंगे।
पंचभौतिक कायकलेवर की मृत्यु के साथ ही जीव चेतना का अन्त नहीं हो जाता वरन् उसका अस्तित्व पीछे भी बना रहता है, इसके प्रत्यक्ष प्रणाम भी बहुधा मिलते रहते हैं। पिछले दिनों यह तथ्य परंपरागत मान्यताओं एवं कथा पुराणों के प्रतिपादनों पर ही निर्भर था कि मरणोत्तर काल में भी जीवात्मा को अशरीरी किन्तु मानवी अस्तित्व बनाये रहना पड़ता है एवं पुनर्जन्म के चक्र में भ्रमण करना पड़ता है।
इस संदर्भ में अब तक के अन्वेषणों ने कई अनोखे तथ्य प्रतिपादित किये हैं। मरने के उपरान्त अनेकों को शान्ति मिलती है और वे प्रत्यक्ष जीवन में अहर्निश श्रम करने की थकान को दूर करने के लिए परलोक की गुफा में विश्राम लेने लगते हैं। इसी निद्राकाल में स्वर्ग-नरक जैसे स्वप्न दिखाई पड़ते रहते होंगे। थकान उतरने पर जीव पुनः क्षमता सम्पन्न बनता है और अपने संग्रहित संस्कारों के खिंचाव से रुचिकर परिस्थितियों को इर्द-गिर्द मँडराने लगता है। वहीं किसी के घर उसका जन्म हो जाता है।
किन्तु जब कभी कोई मनुष्य मरण के समय विक्षुब्ध मनःस्थिति लेकर मरता है तो प्रायः वे भूत-प्रेत की योनि प्राप्त करते हैं। यह मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच की स्थिति है जिसे न तो जीवित स्थिति कही जा सकती है और न पूर्ण मृतक ही। जीवित इसलिए नहीं कि स्थूल शरीर न होने के कारण वे कोई वैसा कर्म तथा उपयोग नहीं कर सकते जो इन्द्रियों की सहायता से ही संभव हो सकते हैं। मृतक उन्हें इसलिए नहीं कह सकते कि वासनाओं और आवेशों से अत्यधिक ग्रसित होने के कारण उनका सूक्ष्म शरीर काम करने लगता है अस्तु वे अपने अस्तित्व का परिचय यत्र-तत्र देते फिरते है। इस विचित्र स्थिति में पड़े होने के कारण वे किसी का लाभ एवं सहयोग तो कदाचित ही कर सकते हैं, हाँ डराने या हानि पहुँचाने का कार्य वे सरलता पूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। इसी कारण आमतौर से लोग प्रेतों से डरते हैं और उनका अस्तित्व अपने समीप अनुभव करते ही उन्हें भगाने का प्रयत्न करते हैं। प्रेतों के प्रति किसी का आकर्षण नहीं होता वरन् उनसे भयभीत रहते और बचते ही रहते हैं। वैज्ञानिक शोध की दृष्टि से-वस्तु स्थिति जानने एवं कौतूहल निवारण की दृष्टि से अब उस क्षेत्र में प्रवेश करके तथ्यों की जानकारी के लिए अनेकों प्रयास किये गये हैं तथा उत्साहवर्धक परिणाम भी सामने आये हैं।
योरोप एवं अमेरिका के कई देशों में प्रेतात्मा के रहस्यों-तथ्यों को जानने के लिए बैठकों का आयोजन किया जाता है। इसे “सेआँन्स” कहते हैं जिसमें किसी एक व्यक्ति को माध्यम-मीडियम बनाकर उस के द्वारा प्रेतात्माओं से संपर्क कई माध्यमों से साधा जा सकता है। कई मृतात्माएँ स्वयं ही बिना किसी प्रयास के अनपेक्षित तरीके से लोगों को दिखाई देने लगती हैं। वे अलग-अलग प्रकृति के उपयुक्त-अनुपयुक्त व्यक्तियों से संपर्क साधते देखी सुनी गई हैं। उच्चस्तरीय सदाशयी पितर आत्माएँ अपने उच्च स्वभाव संस्कार के कारण सम्बन्धित व्यक्तियों को सहायता देती परिस्थितियों को सँभालती तथा प्रिय वस्तुओं की सुरक्षा के लिए अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं। सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण उनकी जानकारियाँ भी अधिक होती हैं। उनका जिनसे सम्बन्ध हो जाता है उन्हें कई प्रकार की सहायताएँ पहुँचाती हैं। भविष्य ज्ञान होने से वे सम्बद्ध लोगों को सतर्क भी करती हैं तथा कई प्रकार की कठिनाइयों को दूर करने एवं सफलताओं के लिए सहायता करने का भी प्रयत्न करती हैं। ऐसी दिव्य प्रेतात्माएं कुमार्गगामिता से असन्तुष्ट होती तथा सन्मार्ग पर चलने वालों पर प्रसन्न होती हैं। वे अशरीरी होती हैं। देहधारी से संपर्क करने की उनकी अपनी सीमाएँ होती हैं।
हर किसी से वे संपर्क नहीं कर सकती। उपयुक्त मनोभूमि एवं व्यक्तित्व देखकर ही वे अपनी उपस्थिति प्रकट करती और सत्परामर्श, सहयोग-सहायता तथा सन्मार्ग-दर्शन कराती हैं।
वैज्ञानिकों में मूर्धन्य सर विलियम कुक्स और सर ओलीवर लाज की मृतात्माओं से संपर्क स्थापित करने की खोजों को संसार भर में प्रामाणिक माना जाता है। सर ओलीवर लाज की गणना ब्रिटेन के वरिष्ठ वैज्ञानिकों में की जाती है। वे ब्रिटिश एसोसियेशन के प्रधान भी थे। ईथर तत्व का पदार्थ के साथ क्या संबन्ध है, इस विषय पर उनकी खोज अत्यन्त प्रमाणिक मानी जाती है। अपनी शोध दृष्टि का समुचित प्रयोग करके वह न केवल आत्मा का अस्तित्व और मरणोत्तर जीवन की यथार्थता स्वीकार करने की स्थिति में पहुँचे थे, वरन् उन्होंने प्रेतात्माओं को साक्षात् करने और उनके साथ संपर्क बनाने में भी सफलता प्राप्त की थी। अपने पुत्र रेमण्ड के प्रथम विश्व-युद्ध में मारे जाने पर उसकी मृतात्मा से संपर्क बनाने और उसके माध्यम से अनेकों ऐसी अविज्ञात जानकारियाँ प्राप्त करने में वे सफल हुए थे जो परखने पर पूर्णतया सत्य सिद्ध हुई। ओलीवर लाज की खोजों को विज्ञान और मानव विकास, “मैं आत्मा के अमरत्व में क्यों विश्वास करता हूँ?” आदि पुस्तकों में विस्तृत विवरण के साथ प्रकाशित किया गया है। जिनसे मृत्यु के उपरान्त पुनर्जन्म के प्रमाण और नवीन जन्म के बीच कतिपय मनुष्यों को सूक्ष्म शरीर धारण करके प्रेत रूप में भी रहना पड़ता है। इसकी पुष्टि करने वाले विद्वानों में अल्फ्रेड रसेल, सर आर्थरकानन डायल, डॉ. मेयर्स, सर एडवर्ड मार्सल आदि के नाम अधिक प्रख्यात हैं।
इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध परामनोविज्ञानी एण्ड्रयू ग्रीन ने भूत−प्रेतों को 98 किस्मों का वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण किया है। उनके मतानुसार मृतात्माओं से मिलने का अभिप्राय शरीर और मस्तिष्क की चुम्बकीय शक्ति से उनका टकराना होता है। व्यक्ति के मनोभाव एवं विद्युत चुम्बकीय शक्ति आपस में घनिष्ठता स्थापित किये रहते हैं। भूत−प्रेतों का दीखना इन्हीं मनोभावों की तीव्रता पर निर्भर करता है। इस संदर्भ में डॉ. मैप्यर का कहना है कि प्रेतात्माओं के सूक्ष्म शरीर का गठन विशिष्ट प्रकार के अति सूक्ष्म, प्रकाशवान एवं जीवनी शक्ति से भरपूर “एक्टोप्लाज्म” नामक तत्व से होता है। प्रतिक्रियाओं के आधार पर उनके अस्तित्व का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। ये मृतात्माएँ अपने प्रकटीकरण के लिए किसी सहयोगी की तलाश करती हैं और साजिश में अनुकूलता प्रतीत होती है उसे अपना वाहन बनाकर अपनी इच्छित चेष्टाओं को चरितार्थ करती हैं। सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व भर है उसे भौतिक जीवन में कुछ कृत्य करने के लिए किसी अनुकूल माध्यम-सहयोगी की आवश्यकता होती है। मृतात्मा उसी स्तर के व्यक्ति से संपर्क साधती है जिसका मानसिक स्तर उनसे मिलता जुलता है।
जीवितों और मृतकों की मध्यवर्ती कड़ी को खोजने वाले वैज्ञानिक विलियम कुक्स का कहना है कि प्रेत और पितरवर्ग की दो आत्माएँ होती हैं। पितर वे हैं जो सद्भाव सम्पन्न हैं और सेवा सहायता के लिए संपर्क साधते हैं। प्रेत उद्विग्न रहते और हानि पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। पर वे इतने दुर्बल होते हैं कि यदि कोई अपनी प्रबल इच्छा शक्ति से उन्हें अस्वीकृत कर दे तो वे अपनी ओर से फिर कुछ और अधिक हलचल नहीं कर सकते। पितर आत्माएँ भी उन्हीं का सहयोग देती-सहायता करती हैं जो उनका स्वागत करते-उन पर श्रद्धा रखते हैं।
सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जी0 स्टेनले हाल ने मरणोत्तर जीवन सम्बन्धी अपनी पुस्तक “कम्परेटिव एनाटामी ऑफ दि एन्जल्स” में प्रेतात्माओं के स्वरूप एवं स्वभाव का विवरण विशद्रुप से प्रकाशित किया है। उनके अनुसार मृतात्माओं के कई स्तर होते हैं। पितरों के भी अनेक वर्ग हैं और देव सत्ताओं की तरह उनके क्रिया–कलापों के क्षेत्र भी भिन्न हैं। ये सभी प्रतीकात्मक नहीं वरन् जीवन्त देवदूत होते हैं जो कि न तो सर्वोच्च होते हैं और न ही अत्यन्त सुँदर, जैसा कि पौराणिक आख्यानों में वर्णन किया गया है। फिर भी इस जैविक सृष्टि में वे सामान्य मनुष्य से निश्चित ही उच्च श्रेणी की आत्माएँ होती हैं। मानव आकर तो गोलाइयों, खोखलेपन, उभार एवं सतह का एक विचित्र संयोग है जो मानवी संरचना को एक विशिष्ट आदर्शवान्, सुन्दर और आकर्षक कलाकृति बना देता है, किन्तु भूत-प्रेतों में ऐसा नहीं होता। वे प्रकाशमान एवं सूक्ष्म शरीर में रहते हुए भी अदृश्य होते हैं। देव सत्ताओं की तरह वे किसी भी रंग के हो सकते हैं। उसे बढ़ा एवं घटा भी सकते हैं। आकर्षण अथवा घृणा को वे अपने रंगों में परिवर्तित कर व्यक्त कर सकते हैं। ऐसी अदृश्य स्थिति में वे नीचे पृथ्वी पर या ऊपर आकाश में मँडराते रहते है।
प्रेतात्मा विज्ञान के संबंध में वैज्ञानिक “फिचनर” का प्रयास विश्वविख्यात है। उनके निर्धारण की एक विशिष्टता यह भी है कि अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर उन्होंने इस विद्या पर लिखा है। एक लम्बी बीमारी से त्रस्त होने पर उन्होंने इसी स्थिति में “सोल लाइफ ऑफ प्लाण्ट्स” “एलिमेण्टेडर साइकोफिजिक” जैसे कितने ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिख डाले। इस कार्य में उन्हें अदृश्य सहायता उपलब्ध हुई थी। उनके कथनानुसार नयी-नयी प्रेरणायें और अचानक कोई अंतर्दृष्टि जो मनुष्य को कभी-कभी प्राप्त हो जाया करती है, प्रायः वह अन्तरिक्ष स्थित इन देवदूतों की प्रेरणाओं की देन है। इस कार्य में श्रेष्ठ सात्विक पितर आत्माएँ भी भाग लेती है। किंतु कभी-कभी निकृष्ट स्तर की मृतात्माओं से भी व्यक्ति का वास्ता पड़ सकता है। ऐसी दशा में यदि उसका आत्मबल कम हुआ अथवा व्यक्तित्व असंतुलित रहा तो वे उन पर अपना प्रभुत्व जमा सकते हैं। अक्सर मनोविकारग्रस्त व्यक्तियों के साथ ऐसा होता भी है।
न्यूयार्क ट्रिब्यून के ख्यातिलब्ध संपादक हारेस ग्रीले ने फाक्स की प्रेतात्मा संपर्क क्षमता के संबंध में निजी परीक्षण के उपरान्त सही पाया था। इसका विस्तृत विवरण नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक विलियम क्रुक्स के बाद में “नोट्स ऑफ ऐन इन्क्वायरी इन टू दि फिनोमेना काल्ड स्प्रिचुअलिज्म” में प्रकाशित किया था। कुक्स ने फाक्स के साथ एक प्रेतात्मा द्वारा लेखन को भी लिपिबद्ध किया है। उनके अनुसार-एक तेजस्वी हाथ कक्ष के ऊपरी भाग से नीचे आया और कुछ सेकेंड तक मेरे पास मँडराया और फिर मेरे हाथ से पेन्सिल लेकर जल्दी से एक कागज पर उसने कुछ लिखा। तदुपरान्त पेन्सिल फेंककर ऊपर उठा और धीरे-धीरे अंधकार में विलीन हो गया। इसका विस्तृत उल्लेख उन्होंने “एनसाइक्लोपीडिया ऑफ साइकिक साइंस” में किया है।
मृत्यु के पश्चात् एवं पुनर्जन्म ग्रहण करने के पूर्व मृतात्मा सूक्ष्म शरीर में स्थित होकर अपने प्रिय पात्रों के आसपास कुछ समय तक चक्कर काटती रहती है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए एलेन कार्डेक जिनका वास्तविक नाम एलू एचू डी रिवेल था ने कहा है कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा प्रेत का रूप ग्रहण करती है और पुनः जन्म प्राप्त करने का प्रयास करती जैसा कि पैथागोरस का भी मत था कि यही समस्त मानव आत्माओं की नियति है। मृतात्माएँ भूत, भविष्य और वर्तमान को जानती हैं। कभी-कभी वे मूर्तरूप भी धारण कर लेती हैं और भौतिक रूप से कार्य भी करती हैं। कार्डेक का कथन है कि मानव को अच्छी आत्माओं के मार्गदर्शन को स्वीकार करना चाहिए और बुरी प्रेतात्माओं से दूर ही रहना उचित है। “मिस्टीरियस साइकिक फोर्सेस” में यह विवरण विस्तार पूर्वक छपा है। डॉ. राबर्ट कूकल ने भी स्वीकार किया है कि मृत्यु के बाद मनुष्य अपने सूक्ष्म अणुओं के शरीर से बना रहता है। उसके मन की चंचलता, इच्छायें और वासनायें बनी रहती हैं। यदि वे अतृप्त रहें या जहाँ आसक्ति होती है जीव वही मँडराता रहता है।
हमारे पूर्वज ऋषि इसीलिए जहाँ एक ओर मृतात्माओं की प्रिय वस्तुएँ उसी रूप में संजोकर रखने के स्थान पर उन वस्तुओं को उचित लोगों को दान कर देने का आग्रह करते रहे है ताकि वे लोकमंगल के पुण्य-प्रयोजन का अंग बन सकें, वही दैनन्दिन जीवनक्रम में भी आसक्ति-मोह के अतिरेक को दूर करने का परामर्श व प्रेरणा देते रहे हैं ताकि चित्त पर स्मृतियों-आसक्तियों का बोझ नहीं रहे और हलके-फुलके होकर यह जीवन जिया जा सके और अगले जीवन में भी सहज गति में भी कोई बाधा नहीं रहे। वासनाओं और आवेशों का आधिक्य न केवल इस जीवन को भार बना डालता है, वरन् अगले जीवन को भी अभिशापमय बनाकर रख देता है। अतः उनसे पीछा छुड़ाने का अभ्यास किया जाना चाहिए। तभी लौकिक जीवन का स्वाभाविक आनन्द प्राप्त कर जीवनमुक्त हुआ जा सकता है।
एक चूहा था। किसी तपस्वी की कुटी में रहता था। बिल्ली उधर से निकलती तो चूहा डर से काँपने लगता। महात्मा ने उससे भयातुरता का कारण और निवारण पूछा। चूहे ने कहा- बिल्ली का भय सताता है। मुझे बिल्ली बना दीजिए ताकि निर्भय रह सकूँ।
तपस्वी ने वैसा ही किया। चूहा बिल्ली बन गया और सिर उठा कर उस क्षेत्र में विचरण करने लगा।
कुत्तों ने उसे देख पाया तो खदेड़ने लगे। बिल्ली पर फिर संकट छाया और फिर से तपस्वी से अनुरोध किया- इस बार भी संकट से छुड़ाएं और कुत्ता बना दें।
दयालु महात्मा ने उसकी मनोकामना पूरी कर दी। बिल्ली अब कुत्ता बनकर भौंकने लगी।
अधिक दिन बीतने न पाए थे कि जंगली भेड़िये को उसकी गंध मिल गई और उसे मार खाने के लिए चक्कर लगाने लगा। कुत्ते का त्रास फिर लौट आया। डरे, घबड़ाएं कुत्ते ने महात्मा का फिर आँचल पकड़ा। जाकर नया वरदान माँगा, भेड़िया बन जाने का। इस बार की भी मनोकामना पूर्ण हो गई।
भेड़िये को सिंह नहीं देख सकते। वे उससे घोर शत्रुता मानते हैं। सिंह परिवार को सूचना मिली तो वे उस भेड़िये की जान लेने पर उतारू हो गए।
भेड़िये क्या करता। महात्मा ही उसे त्राण दिला सकते थे। सिंह बन कर निश्चिन्त रहने की कामना जगी और गिड़गिड़ाकर किसी प्रकार अब की वार भी उसकी पूर्ति करा ली। अब उसका परिवर्तित रूप सिंह का था पहाड़ में उसने सारा क्षेत्र गुँजाना आरंभ कर दिया।
बहुत दिन नहीं बीते थे कि शिकारियों का एक छकड़ा, सिंहों के शवों से भरा हुआ निकाला। शिकारियों ने उस क्षेत्र के सभी सिंह मार दिए थे। एक बचा था। उसी की तलाश करते वे महात्मा की कुटी वाले सिंह की ढूंढ़ खोज चला रहे थे।
वरदान से बने सिंह को पता चला तो संकट की घड़ी सिर मँडराती दिखी।
उसे कहाँ? तपस्वी के पास ही हर संकट निवारण और मनोरथ पूरा कराने पहुँचता था। इस बार भी जा पहुँचा।
अब की बार तपस्वी मुद्रा बदली हुई थी। उन्होंने कमण्डल से जल छिड़ककर सिंह को फिर चूहा बना दिया। बोले-”संकटों का सामना करने का जिसमें साहस, पराक्रम नहीं, उसके लिए दूसरों की सहायता से भी कब तक काम चल सकता है?”
अध्यात्म क्षेत्र के वैज्ञानिकों ने, तपस्वी ऋषियों ने प्राण तत्व की अति महत्वपूर्ण शोध किसी समय की थी और उससे लाभ उठाने की साँगोपाँग किया पद्धति-”प्राणायाम” को सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत किया था। यह एक सुविस्तृत विज्ञान है जिसे छोटे से छोटे और बड़े से बड़े प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। फेफड़ों को मजबूत बनाने और वायु विकारों के समाधान करने के लिए गहरी श्वास लेना डीप ब्रीदिंग प्राणायाम की हलकी किस्म है। इसे स्वास्थ्य संरक्षण के लिए काम में लाया जाता है। संध्यावंदन में इसी किस्म के प्राणायाम का प्रयोग किया जाता है, ताकि वायु संचारक अंगों का हल्का-सा व्यायाम होता रहे और उन अंगों से संबंधित रोगों से ग्रस्त होने का अवसर न आये।
किन्तु प्राणशक्ति का वह एक छोटा सा चमत्कार है। यदि इस जीवनी शक्ति की प्राण प्रवाह की अतिरिक्त मात्रा को किसी प्रकार बढ़ाया, कमाया जा सके, उसे विकसित और व्यवस्थित किया जा सके तो न केवल रुग्णता पर विजय प्राप्त करके स्वास्थ्य और परिपुष्टता का लाभ उठाया जा सकता है वरन् उस आधार पर व्यक्तित्व को प्रखर तेजस्वी एवं दिव्य क्षमता सम्पन्न भी बनाया जा सकता है।
प्राणायाम के अनेक प्रकार हैं। विविध प्रयोगों के लिए उसकी विभिन्न प्रक्रियाएँ निर्धारित की गई हैं। उन सबके अपने-अपने विद्यान और अपने-अपने लाभ हैं। उन सबका उल्लेख यहाँ न करके केवल तीन निर्धारणों का उल्लेख किया जा रहा है। वह सरल भी है, बेजोखिम भी और सर्वसाधारण के लिए उपयोगी भी।
रक्त नाड़ियों के साथ-साथ प्राण प्रवाह भी जलता है। जिस प्रकार नालियों में कीचड़ जम जाती है, उसी प्रकार इन प्राण नाड़ियों में भी अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं। इन्हें साफ न किया जाय तो प्राण संचार प्रक्रिया अवरुद्ध होती है। इसलिए सर्वप्रथम नाड़ी शोधन प्राणायाम करने का विद्यान है। इस अभ्यास के साथ-साथ प्राणाकर्षण प्राणायाम भी चलाया जा सकता है और तीसरा सूर्यवेधन प्राणायाम भी। सूर्य से प्राणशक्ति आकर्षित करने और अपने में धारण करने की यह विधियाँ एक-एक करके या समन्वित रूप से भी की जा सकती है।
प्राणायाम के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का-ब्रह्ममुहूर्त का है। कारण यह है कि उस समय अन्तरिक्ष में प्राण तत्व का प्रवाह अत्यन्त तीव्र होता है तथा विशिष्ट प्रकार की चैतन्य धाराएँ सूक्ष्म केन्द्रों से समूचे ब्रह्मांड में प्रवाहित होती है। करने को तो कभी भी प्राणायाम किया जा सकता है, उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, पर प्रातःकाल जैसा लाभ अन्य समय में नहीं मिल पाता। अस्तु प्राणायाम के लिए सबसे श्रेष्ठ समय प्रातःकाल को ही माना गया है। तीनों प्राणायामों की प्रक्रियाएँ क्रमशः निम्न प्रकार हैं-
(1) नाड़ी शोधन प्राणायाम
इस प्राणायाम की संक्षिप्त विधि इस प्रकार है-
प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठे। पालथी मारकर सुखासन के अनुरूप बैठा जा सकता है। कमर सीधी हो तथा नेत्र अधखुले।
दाहिने नासिका छिद्र को बन्द रखें। बाएँ से श्वास खींचें और उसे धीरे-धीरे नाभिचक्र तक ले जायें। ध्यान करें कि नाभि स्थान में पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा के समान श्वेतवर्ण शीतल प्रकाश विद्यमान है। खींचा हुआ साँस उसे स्पर्श कर रहा है।
जितने समय में साँस खींचा गया था। उतने ही समय तक भीतर रोकें और ध्यान करते रहें कि नाभिचक्र में स्थित पूर्ण चन्द्र के प्रकाश को खींचा हुआ श्वास स्पर्श करके शीतल और प्रकाशवान बना रहा है।
जिस नथुने से साँस खींचा था उसी बाएँ छिद्र से ही बाहर निकालें और ध्यान करें कि नाभिचक्र के चन्द्रमा को छूकर वापस लौटने वाली प्रकाशवान एवं शीतल वायु इड़ा नाड़ी की छिद्र नलिका को शीतल एवं प्रकाशवान बनाती हुई वापस लौट रही है। साँस छोड़ने की गति अत्यन्त धीमी हो। कुछ देर साँस बाहर रोकिए-बिना श्वास के रहें। बाएँ से ही इस क्रिया को तीन बार दोहराएं।
जिस प्रकार बाएँ नथुने से पूरक, कुँभक, रेचक एवं बाह्य कुँभक किया था, उसी प्रकार दाहिने नथुने से भी करें। नाभिचक्र में चन्द्रमा के स्थान पर इस बार सूर्य का ध्यान कीजिए तथा साँस छोड़ते समय भावना कीजिए कि नाभि स्थित सूर्य की छूकर वापस लौटने वाली वायु पिंगला नाड़ी के भीतर उष्णता और प्रकाश उत्पन्न करती हुई लौट रही है। बाएँ नासिका के छिद्र को बन्द रखकर दाहिने से भी इस क्रिया को तीन बार करें।
अब नासिका के दोनों छिद्र खोल दीजिए। दोनों से सहज क्रम में लम्बा श्वास खींचिए और थोड़ी देर भीतर रोककर तथा मुँह खोलकर साँस बाहर निकाल दीजिए। यह क्रिया मात्र एक बार ही करना चाहिए।
इस तरह तीन बार बाएँ नासिका से साँस खींचते और छोड़ते हुए नाभिचक्र का शीतल ध्यान, तीन बार दाहिने नासिका छिद्र से श्वास खींचते और छोड़ते हुए सूर्य का उष्ण प्रकाश का ध्यान एक बाद दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए मुख से साँस निकालने की प्रक्रिया, इन सबसे मिलकर एक पूर्ण नाड़ी शोधन प्राणायाम बनता है। आरम्भ तीन प्राणायाम से करना चाहिए। हर माह एक-एक क्रमशः बढ़ाते हुए सात माह में दस तक इसकी संख्या पहुँचायी जा सकती है।
(2) प्राणाकर्षण प्राणायामः
इस प्राणायाम की सफलता पूरी तरह इच्छा, भावना एवं संकल्पशक्ति की दृढ़ता के ऊपर निर्भर करती हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है-
प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके सहज आसन में ध्यान मुद्रा की स्थिति में बैठें। आंखें बन्द करके ध्यान करें कि अखिल आकाश में तेज और शक्ति से ओत-प्रोत प्राण तत्व हिलोरें ले रहा है। गरम भाप के सूर्य के प्रकाश में चमकती हुई बादलों जैसी शक्ल के प्राण का उफान हमारे चारों और उमड़ता चला आ रहा है और उस प्राण उफान के बीच हम निश्चिन्त, शान्त चित्त, निर्विकार एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए है।
नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचना आरंभ करे तथा भावना करें कि प्राणतत्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींचे रहे हैं। अपने चारों ओर बिखरा हुआ प्राण प्रवाह नासिका द्वारा श्वास के साथ शरीर के भीतर प्रविष्ट हो रहा है और मस्तिष्क, हृदय, पेट, आँतों से लेकर समस्त अंगों में प्रवेश कर जाता है। जब साँस पूरी खींच लें तो उसे भीतर रोकें और भावना करें कि-जो प्राण तत्व खींचा गया है, उसे हमारे भीतरी अंग-प्रत्यंग सोख रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाय तो वह उसे सोख लेती है, उसी प्रकार हमारे अंग सुखी मिट्टी के समान हैं और जल रूपी इस खींचे हुए प्राण को सोखकर अपने अंदर सदा के लिए धारण कर रहे हैं। साथ ही प्राण तत्व में सम्मिलित चेतना, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम जैसे अनेकों तत्व हमारे अंग-प्रत्यंगों में स्थिर हो रहे हैं।
जितनी देर साँस आसानी से रोकी जा सके उतनी देर रोकने के बाद धीरे-धीरे उसे बाहर निकाल दें। साथ में यह भावना करें कि प्राण वायु का सारतत्व हमारे अंग-प्रत्यंगों द्वारा सोख लिए जाने के बाद अब विकारयुक्त वायु साँस के माध्यम से बाहर निकाला जा रहा है। शरीर, मन और मस्तिष्क में जो विकार थे वे सब इस निकलती हुई साँस के साथ घुल गये हैं और काले हुएँ के समान अनेक दूषणों को लेकर बाहर निकल रहे हैं।
पूरी साँस बाहर निकल जाने के बाद कुछ देर बाहर साँस रोके रहें और भावना करें कि अन्दर के जो दोष बाहर निकल गये थे उनकी वापस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजा बन्द कर दिया गया है और बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर उड़े जा रहें है।
यह प्राणाकर्षण की पूरी प्रक्रिया हुई जिसे आरंभिक चरण में पाँच की संख्या में आरंभ करना चाहिए अर्थात् उपरोक्त प्रक्रिया पाँच बार दोहराई जाय। हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया क्रमशः बढ़ाते हुए एक वर्ष की अवधि में आधे घण्टे समय तक पहुंचायी जा सकती है।
(3) सूर्यवेधन प्राणायामः
सूर्यवेधन प्राणायाम का प्रमुख लक्ष्य मूलाधार स्थित कुण्डलिनी महाशक्ति का उद्दीपन है। इस प्राणायाम की प्रक्रिया इस प्रकार है-
किसी शान्त एकान्त स्थान में प्रातःकाल अथवा सायंकाल की बेला में स्थिर चित्त होकर बैठना चाहिए। आसन सहज हो, मेरुदण्ड सीधा, नेत्र अधखुले, घुटने पर दोनों हाथ, यह प्राण मुद्रा कहलाती है। सूर्यवेधन प्राणायाम के लिए इसी मुद्रा में बैठना चाहिए।
दाएँ नासिका का छिद्र बन्द करके बाएँ से धीरे-धीरे श्वास खींचना चाहिए। भावना यह हो कि वायु के साथ प्राण ऊर्जा की प्रचुर मात्रा मिली हुई है। उस प्राण ऊर्जा को सुषुम्ना मार्ग में वाम मार्ग के ऋण विद्युत प्रवाह इड़ा धारा द्वारा मूलाधार तक पहुँचाना-वहाँ अवस्थित प्रसुप्त चिनगारी को झकझोरना, थपथपाना, जागृत करना-यह सूर्यवेधन प्राणायाम का पूर्वार्द्ध है। उत्तरार्द्ध में प्राण को पिंगला(मेरुदण्ड के दक्षिण मार्ग के धन विद्युत प्रवाह) में से होकर वापस लाया जाता है। जाते समय अंतरिक्ष स्थित प्राण शीतल होता है- ऋणधारा भी शीतल मानी जाती है। इसीलिए इड़ा को-पूरक को चन्द्रवत् कहा जाता है। इड़ा को चन्द्र नाड़ी कहने से यही प्रयोजन है। लौटते समय अग्नि उद्दीपन-प्राण, प्रहार की संघर्ष प्रक्रिया से ऊष्मा बढ़ती और प्राण में सम्मिलित होती है। लौटने के पिंगला मार्ग धन विद्युत का क्षेत्र होने से उष्ण माना गया है। दोनों ही कारणों से प्राण उष्ण रहता है, इसलिए उसे सूर्य की उपमा दी गई है। इड़ा चन्द्र और पिंगला सूर्य है। पूरक चन्द्र और रोचक सूर्य है, योग ग्रन्थों में ऐसा ही वर्णन मिलता है।
साधना में क्रिया-कृत्यों की तुलना में भावना एवं संकल्प का महत्व अधिक है। साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचें हुए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़ता पूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को-प्राणाग्नि को अपने प्रचण्ड आघातों से जगा रहा है। प्रहार के उपरान्त प्राण को सूर्य नाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता को प्रकाशित, अलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
दूसरी बार इससे उलटे क्रम में अभ्यास करना पड़ता है अर्थात् दाहिने नासिका छिद्र से प्राण को खींचना और बाई ओर लौटाना होता है। इस बार पिंगला से प्राण का प्रवेश कराना तथा इड़ा से लौटाना पड़ता है। मूलाधार पर प्राण प्रहार तथा प्राणोद्दीपन की भावना पूर्ववत् करनी पड़ती है। एक बार इड़ा से जाना-पिंगला से लौटना। दूसरी बार पिंगला से जाना इड़ा से लौटना, यही है सूर्यवेधन प्राणायाम का संक्षिप्त विधि-विद्यान। कहीं-कहीं यौगिक ग्रन्थों में सूर्यवेधन प्राणायाम को ही अनुलोम-विलोम प्राणायाम भी कहा गया है। लोम कहते है सीधे को, विलोम उलटे को। एक बार सीधा, एक बार उलटा। फिर उलटा, फिर सीधा। यह सीधा उलटा चक्र ही लोम-विलोम कहलाता है। लोम-विलोम की पूरी प्रक्रिया से एक पूरा सूर्यवेधन प्राणायाम होता है।
कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण के लिए प्राण ऊर्जा की प्रचुर परिणाम में आवश्यकता पड़ती है। यह प्रयोजन सूर्यवेधन द्वारा होता है। प्राण ऊर्जा का अभिवर्धन साधक की भौतिक और आध्यात्मिक सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करता है। सूर्यवेधन की प्रक्रिया सामान्य दीखते हुए भी असामान्य परिणाम प्रस्तुत करने वाली है।
एक दिन युवक एक संत के पास गया व उसके आश्रम में सेवा का कोई काम माँगने लगा। संत के पूछने पर उस युवक ने बताया कि वह बेकार है उसे पेट भरना भी कठिन हो रहा है अतः आश्रम में रह वह सेवा कार्य करेगा तथा उसकी जीविका भी चलती रहेगी। संत ने कहा-”वत्स मैं तुम्हें काम नहीं, मार्ग बता सकता हूँ। तुम अपने को बेकार क्यों समझते हो, तुममें अटूट शक्ति भरी है। तुम आत्म विश्वास के साथ कोई भी परिश्रम साध्य काम करो तो तुम्हारी जीविका का निर्वाह होने लगेगा। यह कह संत ने उसे सौ रुपये दिए व कहा इनसे कुछ काम धंधा करो।”
उस व्यक्ति ने इस राशि से सूत खरीदा और जनेऊ बनाने लगा। जनेऊ बनाकर वह रोज बेचने लगा। प्रारम्भ में तो उसे कम ही आय होती। पर शनैः शनैः उसके यहाँ की बनी जनेऊ की माँग इतनी बढ़ गई कि उसे एक सहायक रखना पड़ा। वह अब 200 रुपये माह कमाने लगा था। एक दिन संत स्वयं जनेऊ खरीदने निकले तो उन्हें यह देख आश्चर्य हुआ कि जनेऊ बेचने वाला तो वही युवक है। युवक संत के चरणों पर गिर गया व कहने लगा--”महात्मन् आप मुझे उस समय कुछ नौकरी दे देते तो मैं अकर्मण्य ही बना रहता। नौकरी न दे आने मेरा आत्म-विश्वास जागृत कर जो मार्ग दर्शन दिया उसी से मैं आज इस आत्म-निर्भरता की स्थिति तक पहुँच सका हूँ।” संत को भी परम संतोष हुआ कि उन्होंने एक युवक को सही राह दिखाई। यह संत आर0एस0एस॰ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार थे जिनकी कल्पना में राष्ट्र की समर्थता और आत्म-निर्भरता में थी।
भगवान को निर्मलता अतिशय प्रिय है। इस सद्गुण से वे जिसे भी अनुप्राणित देखते हैं, उससे सामान्य स्तर का नहीं, वरन् असाधारण प्रेम करते हैं। भगवत् प्रेम की प्राप्ति के लिए अन्य आधार भी हो सकते हैं, पर उन सब में उत्कृष्ट वही है जो निर्मल मन वाला है।
निर्मलता से तात्पर्य है-मलिनता का निराकरण। मलिनता हमारे चारों और संव्याप्त है। उसका आक्रमण निरन्तर होता रहता है। भीतर से भी मलिनता उपजती रहती है। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कार तनिक सी अनुकूलता पाते ही उभरने लगते हैं। इस कार्य में शरीर भी पीछे नहीं। वह भी अनवरत मलों का निर्माण करता रहता है। मल, मूत्र, स्वेद, श्वास तथा अन्य छिद्रों से यह मैल सतत् बाहर निकलता रहता है। यदि किसी कारणवश मल बाहर निकलने से रुक जाय तो विग्रह खड़ा हो जाता है। मलों का निष्कासन वह उपचार है जिसके आधार पर निर्मलता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
जो बात मन के संबंध में है, वही शरीर के संबंध में भी लागू होती है। शरीर ही नहीं निवास और उपकरणों के संबंध में उन सबको बार-बार स्वच्छ करते रहने से ही काम चलता है। घर में बुहारी न लगाई जाय, बर्तनों को माँजा न जाय, रसोईघर आदि की विशेष सफाई का ध्यान न रखा जाय तो उनमें विषाक्तता, मलिनता, कुरूपता भरने लगती है।
कृमि कीटक पलने लगते हैं और उनके द्वारा की गई तोड़-फोड़ में अनेक प्रकार के विग्रह खड़े होते हैं। ऐसी स्थिति में घिरे हुए व्यक्ति को मनुष्य समुदाय में से भी कोई पसंद नहीं करते। उनसे बचने की चेष्टा करता है। तिरस्कार की दृष्टि से देखता है। माता कीचड़ में सने हुए बच्चे को तब गोदी में लेती, दूध पिलाती है जब उसकी गंदगी को धो पोंछकर साफ कर लेती है। यही बात भगवान के संबंध में भी है। जिसे मलिनता प्रिय है उसका परब्रह्म की पुनीत सत्ता के साथ संबंध नहीं जुड़ सकता।
स्वच्छता, सुरुचि का प्रतिनिधित्व करती है। उसे शालीनता का चिह्न भी कहा जा सकता है। सम्पन्न और सुसंस्कारिता का अनुपात जिसमें जितना बढ़ेगा, उसकी जानकारी इसी आधार पर मिलेगी कि उसने स्वच्छता को किस सीमा तक अपनाया।
व्यावहारिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में यह बात समान रूप से लागू होती है। अनगढ़ लोग ही मलिनता से लिपटे रहते हैं। उन्हें ही मैला कुचैलापन रास आता है। आलसी और घिनौने लोग ही शरीर, वस्त्र, घर, उपकरण में मलिनता जमने देना सहन करते हैं। सफाई के लिए उन्हें कोई उत्साह नहीं उभरता। ऐसे लोग दुर्गन्ध से घिरे रहते हैं। जिसके संपर्क में पैर बढ़ाना किसी सभ्य व्यक्ति को रास नहीं आता। ऐसे वातावरण से बच कर निकलने के लिए ही मन करता है। गंदे लोग स्वयं तो उस मलिनता के कारण उत्पन्न होने वाले संकटों में घिरते ही हैं। दूसरों को भी उस छूत के कारण अप्रसन्न करने का कारण बनते हैं। गंदगी की उपेक्षा करने वाले आलसी अपने सम्मान को दूसरों की आँखों में गिरा लेते हैं। उन्हें हेय दृष्टि से देखा और गये गुजरे स्तर का समझा जाता है। यह क्षति ऐसी है जिसके कारण ऐसे लोगों को प्रगति का अवसर ही नहीं मिलता। वे गई-गुजरी स्थिति में ही मौत के दिन पूरे करते रहते हैं। जहाँ जाते हैं वही घृणा, तिरस्कार और उपहास का कारण बनते हैं।
आध्यात्मिक जीवन के संबंध में भी यही बात है। मनोविकारों से ग्रसित व्यक्ति उस परोक्ष विकृति के कारण शरीर को भी बीमार बना लेते हैं और संतुलन सौजन्य गँवा बैठते हैं। मन में अशुभ तत्व, मलिनता भर चले तो वे अन्तरात्मा की आवाज दबाते हैं। उसकी खुराक को छीनकर खाते हैं। फलतः आत्म-ज्योति धूमिल हो जाती है। उसके प्रकाश में इतना दम नहीं रहता कि ठीक तरह मार्ग-दर्शन कर सके। फलतः दिग्भ्रान्त जैसी स्थिति बनती है। अन्तर्द्वन्द्व उठ खड़े होते हैं। विपरीत बुद्धि को सही गलत सूझता है और गलत को सही होने का आभास उभरता है।
आन्तरिक मलिनता उत्पन्न करने वाले विषाणु काम, क्रोध, मोह, मद मत्सर हैं। वे जहाँ भी एकत्रित होते हैं वहीं गंदगी के ढेर लगा देते हैं। अशुभ कल्पनाएँ उठती हैं, हेय योजनाएँ बनती रहती हैं।
मनः स्थिति के अनुरूप क्रिया−कलाप बन पड़ता है। वे यदि हेय स्तर के हैं जो अपनी प्रतिक्रिया संकटापन्न परिस्थितियों के रूप में उत्पन्न करेंगे। विपत्तियाँ बाहर से नहीं आती, वे भीतर से ही उभरती हैं। इस प्रकार सुस-पन्नता और प्रगति का आधार भी भीतर ही रहता है। कहा गया है कि आत्मा ही आत्मा का शत्रु और आत्मा ही आत्मा का मित्र है। उत्थान -पतन की अपनी ही जेब में है। मन को यदि धो लिया जाय तो सारा जगत निर्मल दृष्टिगोचर होगा। आँखों पर जिस रंग का चश्मा चढ़ा होता है उसी रंग का चश्मा चढ़ा होता है उसी रंग का दृश्य जगत प्रकट होता है। मन में मलिनताएँ भरी रहें तो उसके प्रभाव से अपने व्यक्तित्व का स्तर तो गिरता ही है साथ ही यह भी होता है कि निजी चुम्बकत्व के अनुरूप निकृष्ट स्तर का परिकर भी अपने ईद-गिर्द जमा हो जाता है। उस जमघट की परिणति उन प्रेत पिशाचों जैसी होती है जो मरघट में रहते हैं। डरते-डराते समय व्यतीत करते हैं। अपने विकास क्षेत्र को बीभत्स बना लेते हैं।
यह चयन अपनी सूझ-बूझ पर निर्भर है कि मलिनता का मार्ग चुनें निर्मलता को अपनायें। असावधानी आलस्य के रूप में विकसित होती है और दूरदर्शी विवेक को कुँठित बना कर रख देती है। ऐसी स्थिति में कीचड़ में समय गुजारने वाले कृमि कीटकों की तरह दिन गुजारने पड़ते हैं। बाहर न जनता में सम्मान, सहयोग मिलता है और न आत्मिक क्षेत्र में सुख-शाँति का माहौल बनता है।
स्वच्छता एक विभूति है, जिसकी प्रस्थापना जहाँ भी होती है वहीं उत्साह और उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस वास्तविकता को अपने भौतिक संसाधनों के साथ सफाई की जड़ को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। स्वच्छता के पीछे शालीनता और सुसंस्कारिता की आभा झलकती दिखाई पड़ती है। मनुष्य सभ्य प्रतीत होता है। सुसज्जा के अनेकानेक कलात्मक साधनों में स्वच्छता अकेली ही अपना चमत्कार दिखा सकती है।
आत्मिक पवित्रा का तो कहना ही क्या? नहीं जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए आवश्यक आधार खड़ा करने में समर्थ है। इसी के सहारे स्वर्ग, मुक्ति और ईश्वर प्राप्ति का परमानंद प्राप्त किया जा सकता है।
फ्राँस के राजा लुई पर क्रान्तिकारी परिषद के सामने मुकदमा चल रहा था। मुकदमा नाम पात्र का था। लुई और उसके स्त्री बच्चों को मृत्यु के दंड देने का फैसला पहले ही हो चुका था।
राजा का कसूर भी हो सकता था, पर उनके स्त्री बच्चे सर्वथा निर्दोष थे। उनका शासन में काई योगदान या हस्तक्षेप नहीं था, फिर उन्हें मृत्यु दंड जैसी सजा किस कारण मिले।
जब मुकदमा चल ही रहा था, भले ही वह नाटक हो रहा था, पर लुई के परिवार ने उस मुकदमे में अपने बयान देने और पैरवी करने का निश्चय किया।
तलाश किया तो कोई वकील तैयार न हुआ। राजा की वकालत करना अपनी जान के लिए मुसीबत मोल लेना था। उन दिनों मृत्यु दंड सामान्य बात थी। राजभक्त होने के संदेह तक में जान जा सकती थी। राज्यकोष पहले ही जब्त हो चुका था। फीस के नाम पर कुछ मिलना न था। ऐसे मुकदमे की वकालत कौन करता?
पूरी तलाश करने के बाद एक वकील तैयार हुआ-लौगार्ड। वह उसके परिणाम जानता था तो भी अपने पेशे के प्रति ईमानदार रहने के कारण उसने पुरा जोखिम उठाते हुए मुकदमे की पैरवी करने का निश्चय किया। स्त्री-बच्चों को निर्दोष सिद्ध करने में उसने कुछ कमी न रहने दी। मुकदमा नाटक मात्र था। पूरे परिवार को मृत्यु दंड मिला।
रानी को इस बात का संतोष था कि कम से कम एक वकील पैरवी करने का साहस तो कर सका।
वकालत की फीस क्या दें? रानी ने अपना निजी बटुआ लौगार्ड के हाथ पर रख दिया।
देखने वालों ने समझा कि अपने पद के अनुरूप और खतरे को समझते हुए उपयुक्त फीस बटुए में दी होगी।
बटुआ सबके सामने खोला गया। उसमें रानी के बालों की लट थी और कृतज्ञता से भरे हुए आँसू।
लौगार्ड ने उसे संभाल कर रख लिया। पेशे की पवित्रा की रक्षा करने की दृष्टि से उसने उपयुक्त साहस किया और बदले में उपयुक्त उपहार भी पाया। पैसे की दृष्टि से रानी पहले ही खाली हाथ हो चुकी थी।
सामान्य बुद्धि तर्कवाद के सहारे भावी संभावनाओं को सुनिश्चित करने के संबंध में नकारती ही रही है। कहा जाता है कि भविष्य भगवान के हाथ है। फिर प्रकृति संयोग उनका ताना-बाना बनते हैं। मनुष्य को पता कहाँ रहता है? यदि भविष्य सुनिश्चित रहा होता तो किसी को उसके संबंध में चिन्तित रहने या दौड़ धूप करने की आवश्यकता ही न पड़ती। जो होना है, वह समय पर हो जाएगा यह मान लेने पर भले बुरे भवितव्यता के संबंध में मनुष्य को निश्चिन्त हो जाना चाहिए था। अनेकों ताने बाने बुनने, योजनाएँ बनाने, साधन जुटाने, प्रयत्नरत होने एवं सहयोग संजोने की आवश्यकता ही न पड़ती। जो होना है, वह होकर ही रहेगा, इस मान्यता के उपरान्त पुरुषार्थवाद के सिद्धांत की कट जाती है। भाग्य में इतनी विद्या लिखी है, इतनी सफलता मिलती है, यह घटना घटित होनी है, इसकी सही जानकारी यदि किसी को हो तो वह निश्चिन्त क्यों न रहेगा? लाभ उठाने और हानि से बचने के लिए उसे प्रयत्न क्यों करने पड़ेंगे? यह मोटा तर्क ऐसा है जो हर समझदार की समझ में आता है। इसी आधार पर भविष्यवक्ताओं, ज्योतिषियों के कथनों पर अविश्वास किया जाता है। कारण कि उसमें कर्म की क्षमता का महत्व ही कट जाता है। यदि सब कुछ पूर्व निश्चित ही हुआ होता तो उसी की प्रतीक्षा करते रहते। परंतु ऐसा कहाँ होता है? रोगी का इलाज करना पड़ता है यदि जीवन-मरण निश्चित ही रहा होता तो चिकित्सा की कोई आवश्यकता ही न रही होती। विद्या पढ़ने में इतना समय, श्रम और धन क्यों लगाना पड़ता? व्यवसायों के उतार-चढ़ाव भरे झंझटों में पड़ने की क्या आवश्यकता होती?
यह तर्क भविष्य कथन को नकारता है। पूछा जाता है कि यदि भवितव्यता सही रही होती तो किसी ज्योतिषी को आजीविका उपार्जन के लिए जन्मपत्री बनाने, यजमान ढूंढ़ने आदि का प्रयत्न क्यों करना पड़ता? जितना लाभ मिलना है, वह समय पर अपने आप घर बैठे मिल जाता, इसी प्रकार विपत्ति भी यदि निश्चित रही होती तो उसे टालने के लिए कोई क्यों चिन्ता करता? पर देखा जाता है कि मनुष्य स्वभाव प्रयत्नशील और कार्यरत रहने का है। इसका सीधा तात्पर्य यह हुआ कि भवितव्यता की सुनिश्चितता को न बुद्धि स्वीकार करती है, न अन्तरात्मा।
एक पुरानी घटना है। किसी राजा को ज्योतिष विद्या पर अटूट विश्वास था। संयोगवश एक ज्योतिषी के साथ भी उनका संपर्क जुड़ गया था जो अपनी विद्या में प्रवीण माने जाते थे उनने राजा की जन्मपत्री देखकर बताया कि साठ वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो जाएगी। इसमें एक वर्ष बाकी थे। राजा को विश्वास हो गया। मृत्यु का भय उसे बुरी तरह सताने लगा। नियत उत्तरदायित्व भी अब उससे निभ न पाते। परिवार और दरबार में घोर निराशा छा गई। सभी शोकातुर रहने लगे। स्थिति का पता चलने पर पड़ोसी राजा चढ़ाई करने और उस राज्य को हड़प लेने की योजना बनाने लगे। सहयोगियों ने भी हाथ खींच लिया। शोकातुर राजा कुछ ही महीनों में सूखकर काँटा हो गया। मृत्यु ही उसे अपने चारों ओर घूमती दिखाई नजर आती।
प्रधानमंत्री चतुर था। इस घुसे हुए बहम से राजा को निकालने और बिगड़ती जाती परिस्थितियों को सँभालने का उसने निश्चय किया। राज दरबार लगा। ज्योतिषी को भी बुलाया गया। मंत्री जी ने पूछा’-भगवन्! आप सब का भविष्य बताते हैं तो आपको अपना भविष्य भी तो विदित होगा ही। ज्योतिषी ने आश्चर्यपूर्वक उसका उत्तर हाँ में दिया। फिर पूछा गया कि आपको कितनी उम्र तक जीना है। उनने गणित करके कहा-”सत्तर साल के अन्त में मेरी मृत्यु होगी। अभी तो पन्द्रह वर्ष बाकी है।”
इस पर मंत्री ने तलवार उठाई और एक ही झटके में ज्योतिषी का शिर काट दिया। इस अद्भुत घटना से सभी सकते में आ गये। राजा भी। मंत्री ने सन्नाटे को तोड़ते हुए राजा से कहा- “ज्योतिषी को सत्तर वर्ष की आयु तक ही जीना था। तब उनकी मृत्यु पंद्रह वर्ष पूर्व ही कैसे हो गई।” इस घटना ने भविष्य कथन की अनिश्चितता को सिद्ध कर दिया न? राजा ने अपनी मनःस्थिति और मान्यता पर नये सिरे से विचार किया। मृत्यु का भय छोड़ दिया। चिंता दूर हुई। अस्त-व्यस्त कारोबार-राजपाट नये सिरे से सँभाला गया। परिवार और दरबार में उत्साह उत्सव और प्रसन्नता की लहर छा गई। सारा कारोबार व्यवस्था पूर्वक चल पड़ा। साथ ही परिकर के सभी लोगों का अन्तःविश्वास बदला कि भविष्य कथन मात्र त्रुटिपूर्ण ही नहीं होते। वह अनिश्चित भी है। यदि उसमें कुछ तथ्य है तो उसे प्रयत्नपूर्वक बदल सकने की क्षमता मनुष्य में है।
भविष्य की अनिश्चितता के संबंध में अनेकों घटनाक्रम आये दिन घटित होते हैं। बाढ़, भूकम्प, ज्वालामुखी, दुर्भिक्ष दुर्घटना आदि की पूर्व जानकारी कहाँ होती है? यदि वे जानकारियाँ समय रहते मिल गई होती तो लोग घटना स्थल में समय रहते पलायन कर जाते और जान-माल की भयंकर क्षति से सहज बचा जा सकता। मृत्यु का समय निश्चित होने की बात यदि सही रही होती तो आक्रमणकारी निश्चिन्त हो जाते। जब उनके लिये जान जोखिम ही नहीं हो तो फिर आक्रमण जारी रखने में जो लाभ उठाया जा सकता है उससे कोई क्यों चूकेगा?
ज्योतिष विद्या का धंधा करने वाले कम से कम निश्चिन्त ही रहते। उन्हें नियत समय पर अभीष्ट लाभ मिलता रहता। तब उन्हें भी हर दृष्टि से पूर्ण निश्चिन्त देखा जाता। पर ऐसा होता कहाँ है? वे अपने व्यवसाय के बारे में अविश्वास और अनिश्चित रहने के कारण ही सामान्य श्रमिकों एवं व्यवसाइयों की अपेक्षा अधिक चिन्तातुर देखे जाते हैं और तीर तुक्के भिड़ाने के लिए अधिक दंद-फंद करते रहते हैं। इससे तर्कवादियों की यह दलील सही प्रतीत होती है कि भविष्य का कोई निश्चय नहीं। उसकी जानकारी किसी को भी नहीं। यदि वैसी कुछ आशंका भी होती उसे बदलने-पलटने में मानवी पुरुषार्थ बहुत अंशों तक निश्चित हो सकते हैं। पुरुषार्थ-पराक्रम के प्रति आस्था इसी कारण जमती है और लोग आमतौर से उसी का आश्रय लेते है।
इतने पर भी सर्वथा यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य को भविष्य के विषय में सर्वथा अन्धकार में ही रहना पड़ता है। उसे उस संबंध में कोई आभास नहीं होता। यदि ऐसा रहा होता तो किसी के लिए भी कार्यविधि निश्चित करना, योजनायें बनाना संभव न रहा होता। आकस्मिक परिवर्तनों के कारण उलट-पलट भी हो सकती है पर आमतौर से पिछले अनुमानों के आधार पर भावी संभावनाओं का अनुमान लगा लेना कुछ बहुत कठिन नहीं होता। सही अनुमानों का सही समय पर सही कसौटी पर खरा उतरना लोक व्यवहार की एक मान्यता प्राप्त विद्या है। इसी के आधार पर वर्तमान को इस प्रकार विनिर्मित किया जाता है जिसमें इच्छित भविष्य की परिकल्पनायें यथासमय सही सिद्ध हो सकें। इस संबंध में प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी एवं चंद्रमा पर जाने वाले दूसरे अंतरिक्ष दल के सदस्य डॉ. जॉन मिचेल का एक कथन यहाँ उल्लेखनीय है। भविष्य विज्ञान (फ्यूचरालॉजी) की वैज्ञानिकता पर अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा था “कि आज हम जो निर्णय लेते हैं, तदनुरूप क्रिया-कलापों का निर्धारण करते हैं, वही भविष्य बन जाता है। यदि हमारे कदम हमें गलत दिशा में ले जाने वाले हैं तो भविष्य कथन आज भी किया जा सकता है कि हम विनाश को प्राप्त होंगे। यदि हम सही दिशा में चल रहे है तो निश्चित ही प्रगति के द्वारा खुलेंगे।”
किसान अपने कृषि कार्य में भविष्य की आशा के आधार पर ही प्रवृत्त होता है। जुताई, बुवाई, निराई, सिंचाई, रखवाली आदि के समस्त कष्ट सहन की क्रिया प्रक्रिया इसी आधार पर अपनाई जाती है कि नियत समय पर नियत परिणाम उपलब्ध होगा। व्यवसायियों की समस्त गतिविधियाँ इसी आधार पर चलती हैं। वे अँधेरे में ढेला नहीं ही फेंकते। अपवाद स्वरूप प्रतिकूलताएँ भी सामने उभरती है कि सभी प्रकार की योजनाएँ बनाने वाले अपने कृत्य की,उसके प्रगति की सभी कल्पना कर लेते हैं जो आमतौर से सही उतरती हैं। विद्यार्थी लम्बे समय तक विद्या अध्ययन में निरत रहने के लिए उसी विश्वास के साथ तत्परता अपनाते हैं कि दूसरों की तरह ही उन्हें भी अध्ययन श्रम का समुचित पारिश्रमिक मिलें।
अन्यत्र घटित होने वाले घटना-क्रमों के साथ तारतम्य बिठाते हुए अपनों या अन्यों के संबंध में वैसी ही परि-कल्पनाएँ की जाती हैं। बच्चा बढ़ता है, किशोर बनता है, प्रौढ़ होता है। अधेड़ स्थिति आती है, ढलान का क्रम चलता है, बुढ़ापा आता है कि फिर अन्ततः मरना पड़ता है। यह प्रकृति क्रम अन्यत्र सभी जगह चलता दिखाई देता है। इस आधार पर अपने और अन्यों के लिए भी वह सम्भावना सुनिश्चित होने की मान्यता बनाई जाती है, जो आमतौर से सही ही होती हैं। वर्षा के बाद सर्दी, सर्दी के बाद गर्मी, गर्मी के बाद वर्षा का ऋतु चक्र चिरकाल से अनुभव में आता रहा हैं, इसलिए भविष्य में भी वैसा ही होते रहने की संभावना को ध्यान में रखते हुए सभी लोग अपनी रीति-नीति से विधि व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन करते रहते हैं। तर्क, तथ्य, प्रमाण, अनुभव के आधार पर यह निश्चय किया जाता है कि क्या करने पर उसकी क्या परिणति हो सकती है। बुद्धिमान दूरदर्शी इस विशेषता को विशेष रूप से अर्जित कर लेते है और अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर ऐसी योजना बना लेते हैं, ऐसी रीति-नीति निर्धारित कर लेते हैं जो समयानुसार यथावत् परिणाम उपस्थित करती है। भवन निर्माण के नक्शे बनाने वाले आर्कीटैक्ट अपने विषय में इतने प्रवीण हो जाते हैं कि उनकी की गई कल्पना समयानुसार भव्य भवन के रूप में प्रस्तुत होती है। श्रम, साधन, पूँजी, व्यवसाय आदि के संबंध में भी वे जिन आवश्यकताओं को लिए रहते हैं वह इस आधार पर जुटानी पड़ती हैं कि अनुभवी प्रस्तुतकर्ता की कल्पना, यथार्थ के अत्यधिक समीप होती है। योजन बनते ही साधन जुटाने और कार्य संचालन का प्रयास विश्वासपूर्वक आरंभ हो जाता है। यह भविष्य की सही परिकल्पना की ही सार्थकता है। यदि इसे कोई चाहे तो भविष्य कथन भी कह सकता है। पर चूँकि यह सारा शोध तथ्यों के आधार पर प्रतिपादित किया गया है। इसलिए उसे अविश्वस्त नहीं ठहराया जाता। यदि वह परिकल्पनाएँ अनिश्चित या अविश्वस्त रही होती तो आर्कीटैक्ट, इंजीनियरों की कोई पूछ न होती और उन्हें भी ज्योतिषियों की तरह बेपंख उड़ाने उड़ने वाला कहा जाता।
वैज्ञानिक एक प्रकार के भविष्यदर्शी ही होते हैं। उनके आविष्कारों का आरंभिक, प्रयास प्रधान तथा परिकल्पनाओं के आधार पर ही होता है। इसी आधार को वे मजबूती से अपनाए रहते हैं। आवश्यकतानुसार उनमें सुधार परिवर्तन के प्रयोग चलते रहते हैं और अन्ततः अद्भुत आविष्कार कर सकने का श्रेय प्राप्त करते हैं।
दार्शनिकों की स्थापना भी इसी आधार पर होती है। वे ऐसे सिद्धान्त गढ़ते हैं जो पिछले किये की अपेक्षा अगले दिनों अधिक सुख शान्ति के आधार खड़े कर सकें। धर्मशास्त्रों, मर्यादाओं, वर्जनाओं का निर्धारण जिन उर्वर मस्तिष्कों द्वारा हुआ है उन्हें दूरदर्शी, युगद्रष्टा, मनीषी, मनस्वी आदि ही नामों से जाना जाता है। इन्हें यथार्थवादिता का अवलम्बन लेने वाले भविष्य निर्माता कहा जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। सुधारकों, आन्दोलनों को जन्म देने वालों की सूझबूझ भी यही काम करती है। वकीलों का व्यवसाय भी इसी सूझबूझ के आधार पर चलता और सफल होता है। चिन्तन और मनन की शक्ति इसी आधार पर आँकी जाती हैं कि उन्हें अपनाकर वस्तुस्थिति समझी और भविष्य की उपयोगी विधिव्यवस्था बनाई जाती है। तत्वदर्शी इसी गहराई में उतरते और जन साधारण के लिए ऐसा मार्ग बना जाते हैं जिस पर चलने वाले प्रगति, समृद्धि, सुख शान्ति का सत्परिणाम उपलब्ध करते रहें। यह सभी भविष्य की सही परिकल्पना कर सकने वाले विशेषज्ञ हैं। इन्हें कोई चाहे तो भविष्यवक्ता भी कह सकता है। विशेषता उनकी यही होती है कि वे जो कुछ सोचते हैं, जैसा कुछ निष्कर्ष निकालते हैं, वह साकार होते हैं। उनका चिन्तन कार्य कारण की संगति बिठाता हैं। तथ्यों की प्रधानता देता है। क्रिया और उसकी परिस्थिति का निर्धारण क्रिया और उसकी परिणति का सही अनुमान लगा सकने की सूझ बूझ को ही प्रमुखता देता है। यही भविष्य विज्ञान का मर्म व तत्व ज्ञान।
एक सेठ जी लक्ष्मी के बड़े भक्त थे। उनकी पूजा अर्चना करते थे। लक्ष्मी जी भी प्रसन्न थी। उनके घर में किसी बात की कमी न थी। भरा-पूरा घर था।
एक रात लक्ष्मी जी ने उन्हें सपना दिया कि अब तुम्हारे पुण्य समाप्त हो गये। इसलिए हम विदा ले रही हैं। अब धन दौलत भी चली जायगी। सेठ जी पहले तो अनुनय विनय करते रहे पर जब लक्ष्मी जी किसी भी प्रकार रुकने को तैयार न हुई तो उनने एक प्रार्थना की कि इतनी सी कृपा का वरदान दे जाइए कि घर के सब लोग मिलजुलकर रहें और मेहनत तथा ईमानदारी कभी न छोड़े। लक्ष्मी जी तथास्तु कहकर विदा हो गई।
गरीबी बढ़ती गई पर घर के सब लोग दूनी हिम्मत के साथ कठिन दिनों का सामना करते रहे। उनने प्रेम सहयोग में और भी अधिक बढ़ोतरी की। दिन भर कड़ी मेहनत करते और नीयत में बेईमानी का प्रवेश न होने देते। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गये।
एक रात सेठ जी को सपने में फिर लक्ष्मी जी ने दर्शन दिया और कहा-तुम लोगों के आचरण को देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं। अब मैं फिर वापस आ रही हूँ। कल से ही गरीबी चले जाने का बनग बन जायगा।
दूसरे दिन सवेरे सेठ जी ने रात वाला सपना सुनाया और कहा- जहाँ पारस्परिक व्यवहार में सदाशयता का समावेश रहता है वहाँ लक्ष्मी को रहना ही पड़ता है।
समझा यह जाता है कि जो सुसम्पन्न होता है वह प्रसन्न रहता है। इसी तथ्य को इन शब्दों में भी कहा जा सकता है कि जो प्रसन्न रहता है वह सुसम्पन्न समझा जाता है। साथ ही प्रतिभावान, दूरदर्शी, कुशल एवं सफलता अर्जित करने वाला माना जाता है। प्रसन्नता इन्हीं परिस्थितियों की प्रतीक है। उसे भले ही प्रयत्नपूर्वक स्वभाव का अंग बनाकर प्रदर्शन करने की कला की तरह उपलब्ध किया गया हो।
वस्तुतः प्रयत्नपूर्वक स्वभाव विनिर्मित का जा सकता है। स्वभाव की प्रतीति चेहरे पर झलकने वाली भाव भंगिमा के आधार पर परिलक्षित होती है। क्रोधी, तुनक मिजाज, निराश, खिन्न, उद्विग्न थके माँदे अपनी स्थिति चेहरे के माध्यम से प्रकट करते हैं। यह भी हो सकता है कि वस्तुतः वैसी बात न हो, पर आदत अपना लेने की आकृति वैसी ही बन जाती हैं यह पता लगाना कठिन है कि वस्तुतः कौन किन परिस्थितियों में निर्वाह कर रहा है। मोटी जानकारी तो चेहरे की भाव भंगिमा ही प्रकट करती है। दुकान के भीतर क्या माल भरा है, इसकी तलाशी लेना तो राह चलते लोगों के लिए कठिन हैं, पर उस पर टँगे साइन बोर्ड पर लिखे अक्षर देखकर यह जान लिया जाता है कि यहाँ क्या मिलता है, क्या बनता है, क्या बिकता है। इसी प्रकार चेहरे पर झलकती भाव-भंगिमा यह बताती है कि इस व्यक्ति का स्तर, स्वभाव और वैभव किस प्रकार का होना चाहिए। हो सकता है कि वास्तविकता कुछ और ही हो पर सर्वसाधारण को तो अनुमान लगाने का यही आधार है।
लोग अपने को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए बढ़िया कपड़े पहनते हैं, श्रृंगार साधनों का उपयोग करते हैं। बड़प्पन का परिचय देने के लिए इसी प्रकार की बनावट की जाती है। इस सब की अपेक्षा यह कही अधिक सरल और फलप्रद है कि स्वभाव को हँसता मुस्कराता, खिलखिलाता बनाया जाय। यह कुछ बहुत कठिन नहीं है। थोड़े दिनों के अभ्यास से यह उपलब्धि हस्तगत हो सकती है।
मित्र मंडली इस संबंध में एक दूसरे की मदद कर सकती है। परिवार के लोग भी इस अभ्यास में सहायक हो सकते हैं। जो साथ रहते हैं, वे यदि नियम बना लें तो एक दूसरे को हँसने के लिए प्रोत्साहित करते रह सकते हैं। भूलने पर स्मरण दिला सकते हैं। यदि उदासी या गंभीरता दीखने लगे तो उसे हटाने के लिए टोक सकते हैं। ऐसा न बन पड़े तो यह कार्य स्वयं भी करते रहा जा सकता है। उदासी हटाने और होठों पर मुसकान लाने के लिए यदि प्रयत्नशीलता रहा जाय, उसके लाभ से अवगत रहा तो उस प्रकार का स्वभाव बना लेना, अभ्यास डाल लेना कुछ कठिन नहीं है।
यह शारीरिक व्यायामों में सबसे सरल एवं तुरंत फलदायी है। इसमें केवल होठों को, आँखों को सही स्थिति में रखने भर की चेष्टा करनी पड़ती है। दर्पण इस बात की साक्षी देता रह सकता है कि मंद मुस्कान को अपनाकर अपनी सुंदरता कितनी बढ़ा ली गई?व्यक्तित्व में कितना निखार उत्पन्न कर लिया? दूसरे पर कितनी प्रभावोत्पादक छाप पड़ने लगी?
हजरत उभर ने एक व्यक्ति को किसी प्रदेश का शासक नियुक्त पत्र उसके हाथ में थमा दिया।
इसके बाद खलीफा एक पड़ोसी के बच्चे को खिलाने लगे। उसे हँसने के लिए मुंह बिचकाने और तरह-तरह की जानवरों की बोलियाँ बोलने लगे।
नव नियुक्त शासक आश्चर्य में पड़ गया। उसने कहा-”मेरे पाँच बच्चे हैं। उनमें से मैंने किसी को इतने प्यार से नहीं खिलाया जितना कि आप पड़ोसी के बच्चे से लिपट रहे हैं।”
खलीफा ने नियुक्त पत्र वापस ले लिया और कहा-जब तुम अपने बच्चों को प्यार नहीं कर सकते तो प्रदेश का शासक कैसे बनोगे/
ईश्वर अनादि और अनन्त है-इसे प्रायः सभी स्वीकारते हैं, पर अनीश्वरवादी इसे यह कह कर सामान्य कर देते हैं कि यदि ईश्वर अनादि अनन्त होता, तो उसकी सृष्टि नाशवान क्यों होती? अनन्त सत्ता की रचना भी अनन्त होनी चाहिए पर ऐसा कहाँ देखा जाता है उसके क्रिया-कौतुक तो सीमित होते हैं, फिर उसके कर्त्ता की अनन्त कैसे माना जाय?
इन प्रश्नों पर यदि गंभीरता से विचार किया जाय, तो इन तर्कों में निहित भ्रान्ति स्पष्ट हो जाती है। वस्तुतः मनुष्य का ज्ञान स्वल्प है। उसे जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसे ही सब कुछ मान बैठता है। इस संसार में हम नित नई-नई घटनाएँ घटित होते देखते रहते हैं, किन्तु उन घटनाओं के कई पक्ष ऐसे होते है जो हमें अविज्ञात होते हैं। सीमित इंद्रिय सामर्थ्य के कारण हम उन्हें जान नहीं पाते। इस पर कोई दृश्य पक्ष को ही पूर्ण मान कर उसकी विवेचना करें, तो यह उसकी भूल ही होगी। सूर्यकिरणों में कितनी ही प्रकार की किरणों विकिरणों का समावेश होता है, पर इन सब को हम आँखों से देख-समझ कहाँ पाते हैं? पदार्थ के बाह्य स्वरूप को देखकर कोई यदि इनके मूल कारणों से इन्कार कर दे, तो विज्ञान की नींव ही ध्वस्त हो जायेगी। फिर तो परमाणु बम का सिद्धान्त ही गलत हो जायें। मगर विज्ञान-जगत इनके अस्तित्व को स्वीकारता है, भले ही प्रत्यक्ष रूप से हम इनका अनुभव न कर सकें।
सृष्टि व पदार्थ संबंधी ऐसे कितने ही नियम हैं, जिन्हें हम अभी जान नहीं पाये हैं। विज्ञान इन्हीं के उद्घाटन में लगा हुआ है। दस साल बाद वह जिन रहस्यों को जान सकेगा, उसे अभी वे ज्ञात नहीं हैं। इस पर विज्ञान यदि इस बात पर गर्व करें कि उसने पदार्थ जगत के सम्पूर्ण रहस्यों को समझ लिया है, उचित न होगा। वस्तुतः अब तक इस संसार को जितना कुछ जाना-समझा गया है, वह उसका एक स्वल्प अंश मात्र है। जिस भी पदार्थ के बारे में हम उसके पूर्ण ज्ञान का दावा करते हैं, वास्तव में उस संदर्भ में हमारा ज्ञान अधूरा होता है। उसका कोई-न-कोई पक्ष ऐसा होता है, जो अविज्ञात रहता है। जब उस पक्ष की जानकारी प्राप्त करते हैं, तो कोई अन्य अधूरापन सामने आता है, फिर कोई अन्य। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस सृष्टि की प्रत्येक घटना व पदार्थ में अनन्त नियमों का समावेश है। जब सृष्टि में अनन्त नियम हैं, तो उसका सृजेता सादि और परिमित कैसे हो सकता है?
संभव है, कुछ लोग ध्वंस व निर्माण की प्रक्रिया को देख कर सृष्टि नाशवान अथवा सादि समझ बैठे हों, पर यह तो इसका स्वभाव है। रात-दिन और जन्म-मृत्यु की भाँति बनना-बिगड़ना तो सृष्टि का स्वाभाविक क्रम है। जिस प्रकार रात के बिना दिन और मृत्यु के बिना जन्म की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार ध्वंस के बिना सृजन कैसे संभव हो सकता है? समग्रता तो दोनों के मिलने से बनती है। भूल तभी हो जाती है जब हम दोनों क्रिया को दो पृथक् घटना मान बैठते हैं। वस्तुतः ये एक ही घटना के दो पक्ष हैं। एक के बाद दूसरा अवश्य घटित होता है। इस प्रकार यह एक प्रवाह का निर्माण करते हैं, जो सदा प्रवाहमान रहता है। यदि कोई यह कहे कि इस सृष्टि से पूर्व कोई सृष्टि थी ही नहीं, अथवा इसके बाद रहेगी ही नहीं, तो यह कैसे संभव है? ध्वंस और सृजन का यह प्रवाह तो अनादि काल से चलता आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा। इसी को संसार का गति चक्र कहा गया है। यह इसलिए, क्योंकि जिस प्रकार रथ के पहिये का कोई आदि-अन्त नहीं होता, वैसा ही यह सृष्टि प्रवाह है। अतः सृष्टि को सादि कहना ठीक न होगा। यदि ऐसा मान भी लिया जाय, तो अनेक ऐसे प्रश्न उठ खड़े होगे, जिनका उत्तर दे पाना संभव न होगा। यथा यदि ईश्वर की यह पहली रचना है, तो अब तक वह चुप क्यों बैठा रहा? फिर अचानक संसार-सृजन की प्रेरणा उसे कहाँ से मिली? इससे संबंधित अनुभव कहाँ से प्राप्त हुआ? ज्ञान और क्रिया कैसे उत्पन्न हुई? क्रिया और शक्ति यदि आरंभ से ही थी, तो अब तक निष्क्रिय क्यों पड़ी रही? आदि-आदि। अस्तु यह मानना ही पड़ेगा कि यह भगवत् सत्ता अनन्त है।
यह तो काल संबंधी सृष्टि की अनन्तता हुई। आकाश संबंधी अनन्तता पर विचार करने से भी यही निष्कर्ष सामने आता है कि यह विश्व-ब्रह्मांड विशाल है। इसकी अनन्तता का दिग्दर्शन भगवान राम ने एक बार माता कौशल्या एवं काकभुशुण्डि को कराया था। वस्तुतः इस सृष्टि में अनेकानेक स्थूल-सूक्ष्म सृष्टियाँ हैं। हम लोग अभी इस दृश्य जगत को ही भली-भाँति नहीं समझ पाये है, तो सूक्ष्म जगत को कैसे जान समझ पायेंगे? इन्द्रिय सामर्थ्य के अभाव में ही हमें उनकी प्रतीति नहीं हो पाती और स्थूल संसार को ही हम सब कुछ मान कर यदि उसे सादि समझ बैठते हैं, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। इस प्रकार जब सृष्टि की अनन्तता सिद्ध हो गई, तो उसे बनाने वाला अनादि अनन्त नहीं होगा- यह कैसे कहा जा सकता है? सच तो यह है कि जो अनन्त नहीं है, वह अनन्त सृष्टि की रचना कर ही नहीं सकता।
यजुर्वेद में इसी बात को स्वीकारते हुए भगवत् सत्ता को अनन्त शिर वाला, अनन्त नेत्रों और पैरों वाला बताया गया है और कहा गया है कि वह सत्ता सृष्टि को हर ओर से घेरे हुए है। एक अन्य स्थान पर कहा गया है कि यह सम्पूर्ण सृष्टि उसका एक चौथाई भाग है। तिगुना अंश तो अमृत है। तात्पर्य यह कि हम जो कुछ देखते हैं, वह उस विराट् सत्ता की स्थूल व नगण्य अभिव्यक्ति मात्र है। इसका अधिकांश अमृत भाग तो हमें दिखाई ही नहीं पड़ता। सृष्टि तो अनित्य है। इसमें उस महत सत्ता का अमृत दिखाई भी कैसे पड़ सकता है? जो सृष्टि के विनाश व निर्माण की प्रक्रिया को देख कर उसके निर्माता को भी ऐसा ही मान बैठते हैं, वे भूल करते हैं। शरीर मरणधर्मा है- इस आधार पर कोई आत्मा को भी नाशवान बताये, तो यह उसकी अल्पज्ञता होगी।
शरीर तो आत्मा का उपकरण मात्र है। इसी प्रकार परमात्मा का उपकरण यह सृष्टि है। यदि सृष्टि न होती तो उसे जान-समझ ही कौन पाता? अतः सृष्टि के आधार पर उसके नियन्ता के गुण-स्वरूप निर्धारित करना समीचीन न होगा। सृष्टा अनन्त है। उसकी अनन्तता उसके अमृतत्व में समाहित हैं क्योंकि अमृतत्व परिमितता की निशानी है। अथर्ववेद इसी का उद्घोष करते हुए कहता है कि “यों भूर्त च भवयं च सर्व यश्चाधितिष्टति”, अर्थात् ईश्वर तीनों कालों से परे है।
कुछ लोगों का कहना है कि मनुष्य सीमित-परिमित है, फिर वह अनन्त ईश्वर को समझने का दावा किस आधार पर करता है? कोई चींटी हिमालय की विशालता को कैसे जान सकती है?
प्रश्न वस्तुतः सही है पर विलक्षण मानवी मस्तिष्क को दृष्टिगत रख इसका उत्तर दिया जाना चाहिए न कि तर्क द्वारा। प्रायः अनंत उसे कहा जाता है, जिसके अन्त का या तो हमें अनुभव नहीं होता अथवा जिसे तर्क द्वारा हम सिद्ध नहीं कर सकते। किन्तु हमारी बुद्धि इन दोनों कामों को सरलतापूर्वक कर सकती है। हम जिस कुर्सी पर बैठते हैं, उसमें लम्बाई चौड़ाई, ऊँचाई है। वह सीमित जगह घेरती है। अतः देश अथवा आकाश की तुलना में वह अनन्त नहीं है, क्योंकि हमें उसकी निश्चित सीमा का पता है। इसी प्रकार काल की दृष्टि से भी वह अनादि नहीं है, क्योंकि किसी ने अवश्य उसे बनाया है। जब सृजन हुआ है, तो निश्चय ही उसका अन्त भी होगा। हम चाहे जब कभी भी उसे तोड़ सकते हैं। इस तरह मस्तिष्क ने इसे भली प्रकार जान लिया कि कुर्सी के आदि और अन्त दोनों छोर हैं, अतः वह अनन्त न होकर परिमित वस्तु है। आकार की दृष्टि से यह छोटी होती है और इसका बनना बिगड़ना भी हमारी आँखों के सामने घटित होता है, अस्तु इसके सादि होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है। पर जब हम किसी पहाड़ के निकट जाते हैं, तो न तो हमें उसका कोई ओर-छोर दिखाई पड़ता है, न उसके ध्वंस-सृजन की प्रक्रिया हमारे आँखों के सामने होती है, फिर हम उसे अनादि-अनन्त कहाँ मन लेते है? यदि ओर-छोर का न दिखाई पड़ना ही अनन्तता का सूचक होता है, तो निश्चय ही हमारा मस्तिष्क पहाड़ को अनन्त मान लेता, पर व्यवहार में ऐसा होता नहीं देखा जाता है, अतः यह कहना कि मस्तिष्क सादि-अनादि में विभेद नहीं कर सकता, गलत है। समुद्र के निकट जाकर दृष्टि दौड़ाने से जल-ही-जल दिखाई पड़ता है। इतने पर भी मन-मस्तिष्क उसे अनन्त स्वीकार नहीं करता।
इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ईश्वर और उसका सृष्टि-प्रवाह अनन्त है। यदि उसे अनादि के स्थान पर सादि मान भी लिया जाय, तो फिर प्रश्न उठेगा कि ईश्वर को बनाने वाला कौन है? जिसने उसे बनाया, उसे किसने बनाया? इस प्रकार के प्रश्नों का कोई अन्त नहीं होगा। यदि यह माना जाय कि ईश्वर को किसी ने बनाया नहीं, वह स्वतः उत्पन्न हो गया, तो सृष्टि-रचना के लिए उसकी आवश्यकता क्यों? वह भी स्वयं क्यों नहीं हो जाती। फिर तो यह तर्क भी प्रस्तुत किया जाने लगेगा कि जिस ईश्वर को स्वयं उत्पन्न होने की आवश्यकता पड़ती है, वह इतनी सुन्दर और सुव्यवस्थित दुनिया कैसे बना सकता है? यह सही भी है। इस प्रकार इन तर्कों से ईश्वर की उत्पत्ति किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती। जो वस्तु उत्पन्न हुई नहीं, वह अवश्य ही अनादि-अनन्त है, इसमें तनिक भी संशय नहीं किया जाना चाहिए। संशय ही सभी विभ्रमों-कुतर्कों का मूल है। आस्तिकता विज्ञान सम्मत तो है ही, वह हमें चिन्तन के आयाम से ऊँचा उठकर भावनात्मक धरातल पर उठने की प्रेरणा देती तथा भ्रान्तियों से भी मुक्त करती है।
इस विश्व उद्यान को स्थूल दृष्टि से देखने पर इसके नाना घटक अलग-अलग दिखाई देते हैं। पर इसका यह विभेद ऊपरी ही है। सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि ये सभी घटक परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। एकत्व के सूत्र में माला के दाने की तरह पिरोए हुए हैं।
लगभग खरबों कोश मिलकर मानव शरीर का निर्माण करते हैं। पारस्परिक एकता और सद्भाव के द्वारा ही ये अपने को विभिन्न ऊतक समूहों में वर्गीकृत कर लेते हैं और ऊतक मिलकर अवयव बनाते हैं और कई अवयव मिलकर एक संस्थान या तंत्र बनाते हैं। विभिन्न तन्त्रों का समूह ही यह मानवी काया है।
यदि पारस्परिक एकता और सहयोग के इस गुण को हटा दिया जाय तो हम देखते हैं कि शरीर के लगभग सभी कोश स्वतंत्र जीवन जी सकने में सक्षम हैं। शरीर का एक कोश भी जीवित अवस्था में उपयुक्त सेल कल्चर के रूप में रखा जाता है तो वह स्वाभाविक जीवन अवधि पूर्ण करता रह सकता है। वह सभी क्रिया-कलाप पूरे कर सकता है जो कि वह पूर्ण शरीर में करता था। अब प्रश्न वह है कि जब हर कोश स्वयं में पूर्ण है तो यह अपनी स्वतंत्रता क्यों त्यागता है? क्यों नहीं अमीबा पैरामीशियम जैसे एक कोशीय जीवों की तरह एकाकी रहता।
वस्तुतः एक दूसरे के सहयोग सहकार ने ही ज्यादा समर्थ सशक्त रहने की स्थिति उत्पन्न की है। पारस्परिक सहकार का भाव ही ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न करता है, जिसमें उपलब्ध साधनों का श्रेष्ठतम उपयोग हो सकें।
एकता के सूत्र में गुँथे हुए शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों में सहयोग का भाव समाया हुआ है। अनेकों एन्जाइम्स मिलकर भोजन पचाते हैं। प्रोटीन रूप में विद्यमान इन एन्जाइमों का बनाना स्वयं सैकड़ों सहयोगी एन्जाइमों पर निर्भर है। इस प्रकार मात्र भोजन की पाचन प्रक्रिया में ही कई सौ एन्जाइम अपनी भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें से एक भी संकीर्ण स्वार्थपरता अपना ले तो शरीर अस्वस्थ हो जाता है।
पारस्परिक एकता एवं सद्भाव का अनूठा उदाहरण अपनी इस काया में मिलता है। जो बाँटता है उसे स्वयं भी मिलना चाहिए। हृदय का काम है सारी काया में रक्त पम्पकर 99 प्रतिशत वितरित कर देना, परिशोधित रक्त को स्वस्थ ऊतकों तक पहुँचाना। बदले में उसे भी एक प्रतिशत एक पोषण के लिए कोरीनरी धमनियों के माध्यम से मिल जाता है। इस वितरण एवं सहयोग के भाव को हृदय गर्भस्थ अवस्था के तीसवें दिन से अपनाता है और “अहर्निशि सेवामहे” का व्रत ले आजीवन करता रहता है। कभी भी उसमें असहयोग की भावना घर नहीं करती।
इसी तरह हड्डियों का अपना भार तो मात्र 12 प्रतिशत ही है। इतने पर भी बिना न-नुच किए 88 प्रतिशत भार दूसरे अवयवों का ढोती रहती है। जिन पर कम भार पड़ता है वे पतली रहती है। अपना आकार-प्रकार वे वहीं बढ़ाती हैं, जहाँ किसी स्थान पर उन्हें विशेष भार वहन करना पड़ता है। रीढ़ की हड्डियों को देखा जाय तो वे कितनी पतली तथा पोली होते हुए भी सारे शरीर का वजन, सन्तुलन सँभालती हैं। यही बात पैरों के “आर्चेज” पर लागू होती है। वे धनुष की कमान की तरह होते व कमानी की तरह सारी काया का वजन सँभाल लेते हैं। ऐड़ी की मोटी और गले की पतली हड्डियाँ वजन ढोने के अनुपात से ही हैं। उन्हें क्यों पतला रहना पड़ रहा है, दूसरी क्यों बड़ी तथा भारी है। अधिक उत्तरदायित्व उठाने वालों को यदि अधिक सुविधा मिल जाय तो इसमें बराबरी की ईर्ष्या करने की शिकायत कोई क्यों करे? जोड़ों पर संरचना देखते ही बनती है। परस्पर के सहयोग से ही वे कई दिशाओं में मुड़ने में सफल हो जाती हैं।
इस तरह यह दृष्टिगोचर होता है कि अंगों की रचना उनकी कार्य पद्धति में भिन्नता विविधता होते हुए उनमें सहयोग का भाव एक सा है, तथा उन सभी के लक्ष्य की एकता भी सुस्पष्ट है- वह है शरीर को स्वस्थ एवं सन्तुलित बनाए रखना। यह शरीर के समग्र विकास के लिए आवश्यक और अनिवार्य भी है। सहयोग सहकार का सिद्धान्त ही शरीर की तरह ही पूरी सृष्टि को संतुलित बनाए हुए है। प्रकृति के विभिन्न अंगों में अन्तर उनकी रचना आकार और क्रिया पद्धति का हो सकता है, पर लक्ष्य का नहीं। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, विभिन्न ग्रह नक्षत्र, नदी, पहाड़, झरने, समुद्र सभी आपस में भाईचारा निभाकर विश्व ब्रह्मांड को सन्तुलित और उसके प्रवाह को सुव्यवस्थित बनाए हुए हैं। बाह्य दृष्टि से न तो उनकी रचना में एकरूपता है न क्रिया-कलापों में। किन्तु इस भिन्नता के अन्तराल में एक ही भाव गूँज रहा है, वह है सम्पूर्ण सृष्टि को सन्तुलित सुव्यवस्थित रखना। प्रकृति द्वारा सौंपे गए इस महत्वपूर्ण दायित्व को सभी अंग अवयव अपनी-अपनी तरफ से पूरी तरह से निर्वाह करने हेतु प्रयत्नशील हैं।
विराट् ब्रह्मांड का सन्तुलित प्रवाह सहयोग के सिद्धान्त पर ही आधारित है। जड़ प्रकृति की नहीं चेतन कहे जाने वाले प्राणी भी पारस्परिक एकता के सूत्र में आबद्ध हैं। सम्पूर्ण विश्व के प्राणियों की आश्रय एवं प्रकाशक वैश्व चेतना ही है। इसी का प्रवाह ही जड़ पदार्थों में भी सौंदर्य उत्पन्न करता और सक्षमता प्रदान करता है। प्राणि जगत भी उसी से प्रभावित है। मानव मात्र में उसी की सत्ता है। शरीर का कलेवर कितना ही भिन्न क्यों न दिखे पर सबमें मूल सत्ता की एकता ही है। मानवों में उनके स्वभाव-क्रिया–कलापों की विभिन्नता मात्र बहिरंग की ही है।
व्यक्तिगत एवं समष्टिगत विकास अभिवर्धन की दृष्टि से यह विविधता ठीक ही है। पर जब इस भिन्नता को सत्य मानकर मनुष्य चेतन सत्ता के तथ्य को भुला बैठता है, संकीर्ण स्वार्थपरता उत्पन्न होती है। इससे अपने पराए की भेद-दृष्टि का बीजारोपण होता है। फलस्वरूप इस भेद दृष्टि के मोतियाबिन्द से एकत्व का स्वरूप धुँधला दृष्टिगोचर होने लगता है। मनुष्य-मनुष्य, वर्ग-वर्ग के बीच दिखाई पड़ने वाली भिन्नता ठीक भी है और आवश्यक भी। समाज में रहने वाले सभी व्यक्तियों के कार्य एक समान कैसे हो सकते हैं? जुलाहा कपड़ा बुनता है किसान अन्न उपजाता है तेली तेल का काम करता है तो मोची मरे हुए जानवरों के चमड़े का सदुपयोग। इसी तरह अध्यापक बच्चों को शिक्षित सुसंस्कृत बनाने की जिम्मेदारी वहन करता है। व्यक्तिगत कार्यों में दिखाई देने वाली भिन्नता समाज के विकास में सहायक ही है। पर यह सब है एकता के सूत्र आबद्ध रखने के कारण। इसी दृष्टि से विभिन्नता आवश्यक भी है। माला में विभिन्न मणि–माणिक रत्न पिरोये रहने से सौंदर्य की अभिवृद्धि ही होती है। इसी तरह भिन्नता के अन्तराल में एकता सहयोग के प्रवाहित रहने से समाज का सौंदर्य बढ़ता है। यही उसके विकास में सहायक और आवश्यक भी है। भला हर व्यक्ति अपना-अपना काम छोड़कर यदि एक मात्र अन्य उपजाने का कार्य करने लगे तो अन्यान्य आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे हो? व्यवस्था अव्यवस्था के रूप में बदल जाएगी। सामाजिक विकास भी रुक जाएगा।
एकत्व के सूत्र में सभी घटक आबद्ध है। इसी तथ्य को हृदयंगम करते हुए प्रत्येक मनुष्य को सहकारिता-आदान प्रदान का भाव अपनाना चाहिए। बाह्य विभिन्नता होते हुए भी एकता की अनुभूति पा सकना तथा उससे मिल सकने वाले रसामृत की आनन्दानुभूति मिल जाना तभी सम्भव है। व्यष्टि एवं समष्टिगत जो भी क्रिया−कलाप हमें दृष्टिगोचर होते हैं, वे इसी सूत्र को अपनाने का संकेत दिशा निर्देश देते हैं। सच्चे अध्यात्मवादी सृष्टि के कण-कण से प्रेरणा लेते, जीवन में उतारते एवं सिद्धियाँ पाकर निहाल होते देखे जा सकते हैं। अध्यात्म अनुशासनों को अपनाने के लिए क्या इतनी साक्षियाँ भी पर्याप्त नहीं हैं?
कणाद ऋषि के आश्रम में एकबार चातुर्मास का सत्संग चला। गर्मी के दिनों में जितनी जलाने की लकड़ी एकत्रित की गई थी वह सब समाप्त हो गई। भोजन पकाने के लिए ईंधन शेष नहीं रहा। कोई मजदूर भी उपलब्ध न था।
आखिर सभी आगत विद्वानों ने स्वयं चल कर लकड़ी बीनने और काटने का निश्चय किया। कई दिन की लगातार मेहनत से पर्याप्त मात्रा में ईंधन जमा हो गया।
वर्षा खुलने पर विद्वान उस क्षेत्र में घूमने निकले। अबकी आर अचम्भे की बात यह दिखाई दी कि उस क्षेत्र में दुर्लभ फूलों जैसी सुगंध आ रही थी।
सभी ने इसका कारण जानना चाहा। उन दिनों कोई फूल तो कही खिला दिखाई नहीं पड़ता था।
उलझन को सुलझाते हुए महर्षि कणाद ने कहा यह बुद्धि जीवियों के शारीरिक श्रम का प्रतिफल है।
मजदूर तो मेहनत करते ही हैं पर यदि विद्वान जब भी कड़ी मेहनत करने में जुट पड़ें तो उसके परिणाम ऐसे सुन्दर होते हैं, जैसे कि इस क्षेत्र में फैली सुगन्ध के रूप में परिलक्षित होते हैं। आप लोगों का जहाँ पसीना गिरा था वहीं से में फूलों जैसी सुगन्ध उठ रही हैं।
जैसे-जैसे विज्ञान का विकास हुआ है, रोगों के निदान एवं उपचार की नित नूतन पद्धतियाँ प्रकाश में आती गयी हैं। वस्तुतः गत आठ वर्षों में इलेक्ट्रोनिक्स एवं चिकित्सा विज्ञान में जिस तेजी से क्राँति आयी है, वह आश्चर्यजनक है। मानव शरीर की गहराई तक माप करने वाले कम्प्यूटराइज्ड उपकरण अब सर्व साधारण के लिए उपलब्ध हैं। फिर भी क्या कारण है कि नये-नये रोग बढ़ते जा रहे हैं, लाइलाज होते जा रहे हैं।
मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहार विज्ञानी बताते हैं कि “इसका मूल कारण यह है कि रोगों की जड़ कही और है। रोग मन की गहरी परत में जन्म लेते एवं काफी बाद में लक्षणों के रूप में बहिरंग में प्रकट होते हैं। आधुनिक प्रगति की दौड़ में भाग रहा मनुष्य दुहरे व्यक्तित्व वाला जीवन जीता है। अचिंत्य−चिंतन ही रोगों की मूल जड़ बनकर व्यवहार में प्रकट होता है। “वे कहते हैं कि इसके लिए व्यक्तित्व का सर्वांगपूर्ण विश्लेषण एवं उपचार किया जाना जरूरी है।
प्रायः इन दिनों मानवी व्यक्तित्व की दो स्थूल परतों-प्रत्यक्ष शरीर एवं स्थूल बुद्धि को ही सर्वत्र महत्व दिया जाता है और उन्हीं को सजाने, सँभालने-निखारने की बात सोची जाती है। पोषण भी उन्हीं का होता है। रुग्णता के घर-दबोचने पर काया को ध्यान में रखकर ही औषधि उपचार के सरंजाम जुटाये जाते हैं। मन इन दोनों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है। प्रत्यक्षतः उसकी भूमिका नहीं दीख पड़ने से अधिकाँश व्यक्ति उसे महत्व भी नहीं देते। वह उपेक्षित बना रहता है। इतना ही नहीं प्रताड़ना की उपेक्षा भी सबसे अधिक उसे मिलती है। फलतः उसकी असीम संभावनाओं से भी मनुष्य जाति को वंचित रहना पड़ता है। निरुद्देश्य-भटकती हुई इच्छाओं, आकाँक्षाओं का एक नगण्य स्वरूप ही मन की क्षमता के रूप में सामने आ रहा है। मनोबल-संकल्प बल की प्रचंड सामर्थ्य तो यत्किंचित् व्यक्तियों में ही दिखाई पड़ती है। अधिकाँश व्यक्तियों से मन की प्रचंड सामर्थ्य को न तो उभारते ही बनता है और न ही लाभ उठाते। मन की सशक्त बनाना, उसमें सन्निहित क्षमताओं को सुविकसित करना तो दूर, उसे स्वस्थ एवं संतुलित बनाये रखना भी कठिन पड़ रहा है। फलतः रुग्णता की स्थिति में यह विकृति दमित, निकृष्ट इच्छाओं को ही जन्म देती है। इच्छाएँ मानवी व्यक्तित्व की, स्वास्थ्य संतुलन एवं विकास की प्रेरणा स्रोत होती हैं। उनका स्तर निकृष्ट होने पर मनुष्य के चिन्तन और व्यवहार में श्रेष्ठता की आशा भला कैसे की जा सकती हैं? रुग्ण मानस रुग्ण समाज को ही तो जन्म देगा। मन रोगी हो तो काया का अपना स्वास्थ्य भी अधिक दिनों तक स्थिर नहीं रह सकता। जड़ें सूखते ही काया रूपी वृक्ष तुरंत ढह जाता है।
वैज्ञानिक क्षेत्र के नये अनुसंधानों ने प्रचलित कितने ही सिद्धान्तों का खण्डन किया है। कितनी ही नयी प्रतिस्थापनाएँ हुई हैं तथा कितने ही सिद्धान्तों में उलट फेर करने के लिए विवश होना पड़ा है। अब धीरे-धीरे स्थूल के ऊपर से चिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों का विश्वास टूटता जा रहा है। पदार्थ ही नहीं कायिक स्वास्थ्य के संबंध में भी प्रचलित धारणाओं में क्राँतिकारी परिवर्तन होने की संभावना नजर आने लगी हैं। मनोविज्ञान ने मन की रहस्यमय परतों का विश्लेषण करते हुए रहस्योद्घाटन किया है कि शरीर एवं बुद्धि-न केवल मन के इशारे पर चलते हैं, वरन् उसकी भली-बुरी स्थिति से असामान्य रूप से प्रभावित भी होते हैं। तथ्यतः कितने ही शारीरिक रोगों की जड़े मनःसंस्थान में विद्यमान हैं। मन का उपचार यदि ठीक ढँग से किया जा सके तो उन रोगों से भी मुक्ति मिल सकती है, जिन्हें असाध्य एवं शारीरिक मूल का एवं कभी ठीक न होने वाला माना जाता रहा है।
चिकित्सा जगत में “बिहैवियोरलमेडिसन” केविकास से उपचार की सर्वथा एक नयी मनोवैज्ञानिक पद्धति का प्रादुर्भाव हुआ है। इसमें एन्थ्रोपोलॉजी, सोशियोलॉजी, एपीडेमियोलॉजी, साइकोलॉजी, साइकिएट्री, मेडिसन तथा प्रारंभिक जीव विज्ञान जैसे अनेकों विषयों का समन्वित अध्ययन किया जाता है। इस उपचार प्रक्रिया में विशेषज्ञों ने शरीर और मन को एक कड़ी के दो छोर माना है। इसके आधारभूत प्रयोगों में रोगी का व्यवहार बदलकर उसका स्वभाव मधुर बनाया जाता है, मनोबल की प्रचंडता और व्यक्तित्व विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सोचने-विचारने की-चिंतन की प्रक्रिया बदल जाने का स्वभाव का अंग बनी बुरी आदतों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। अधिकाँश मनोकायिक बीमारियाँ विकृति चिन्तन के कारण ही पैदा होती हैं। ऐसी स्थिति में तंत्रिका तंत्र एवं ग्रन्थि तंत्र संजीवनी रसायन उत्पन्न करने के स्थान पर ऐसे रसायनों का उत्पादन आरंभ कर देते हैं जो विष तुल्य प्रभाव डालते और अनेकानेक शारीरिक-मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। व्यवहार चिकित्सा विशेषज्ञों का मत है कि मन के भावनात्मक दबाव एवं तद्जन्य तनाव ही रोगोत्पादन के कारण बनते हैं।
“अण्डरस्टैण्डिंग झूमन बिहेवियर” नामक विश्वकोश में विशेषज्ञों ने रोगों के कारण एवं उपचार पर एक शोध अध्ययन प्रस्तुत करते हुए कहा है कि रोगों की जड़ शरीर में नहीं वरन् मन में होती है। अतः रोगियों को महँगी दवाओं की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी कि उनकी राम कहानी सुनने और अपनेपन का-भाव संवेदना का अहसास कराने की है। प्यार, आत्मीयता, सद्भावना, सहकारिता भरे व्यवहार की वहाँ अनुभूति होगी, मानसिक संतुलन का ठीक तरह बना रहना वही संभव है। अपनेपन का अभाव अनुभव करने वाला व्यक्ति कुपोषणग्रस्त लोगों से भी अधिक दुर्बल रहता और बीमार पड़ता है। उपेक्षा के वातावरण में रहने वाले अपनी मानसिक स्वस्थता खो बैठते हैं और सही सोचने की क्षमता गँवा बैठते हैं।
“व्यवहार चिकित्सा पद्धति” साइकोसोमेटिक मेडिसन पर अपलम्बित परंतु उससे परिष्कृत विद्या है। इस क्षेत्र के अनुसंधानकर्ता विशेषज्ञों का मत है कि मन और शरीर के क्रिया कलाप पूर्णतः एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए है। इनके बीच थोड़ा भी असन्तुलन मानसिक बीमारियों, हृदय रोगों, डायविटीज,अर्थ्राठटिस, कैंसर जैसे रोगों का कारण बन सकता है। ‘न्यूरो एन्डोक्राइनोलॉजों की नवीनतम खोजों ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि तंत्रिका तंत्र एवं ग्रंथि तंत्र एक दूसरे से संबंधित है। वे परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। शरीर के हार्मोन्स न्यूरोट्रांसमीटर के रूप में क्रियाशील होते हैं। इन्हें सक्रिय बनाने के लिए विहेवियोरल मेडिसन के अंतर्गत रोगोपचार हेतु शिथिलीकरण, बायो फीडबैक जैसे उपचार उपक्रमों का आश्रय लिया जाता है। मनोशारीरिक रोगों के निदान में इसके आशाजनक सत्परिणाम भी सामने आये हैं।
जर्मनी के चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. हैमर के मतानुसार कैंसर जैसे घातक रोग की जड़े शरीर में न होकर मनः क्षेत्र में है। इस रोग की उत्पत्ति का कारण भी मानव मन है। यह बीमारी विषैले वातावरण, जीवाणु, अनुवाँशिक खामियों के कारण नहीं वरन् व्यक्ति के स्वयं के मानसिक संघर्षों के कारण पैदा होती है। तीव्र मानसिक विक्षोभों से होकर गुजरने के कारण डॉ. हैमर स्वयं कैंसर ग्रस्त हो गये थे। अपने मत के समर्थन के लिए उन्होंने देश के विभिन्न अस्पतालों से 500 रोगियों को चुना जिन्हें कैंसर था। जाँच परख करने एवं गहन पूछताछ करने के पश्चात् ही उनने उक्त निष्कर्ष निकाले हैं। डॉ. हैमर का कहना है कि मन का संतुलन साधने, प्रसन्नचित रहने, रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने, सुदृढ़ मनोबल आदि से जिस प्रकार उनने छुटकारा पाया, उस प्रकार हर रोगी इस बीमारी से छुटकारा पा सकता है।
फोर्टवर्थ टेक्सास के प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी डॉ. कार्ल साइमन्ट का भी कहना है कि जीवन के प्रति अतिशय निराशाजनक चिन्तन कैंसर रोग को जन्म देता है। ऐसे रोगियों का उपचार वे रेडियेशन, शल्य क्रिया आदि की परम्परागत पद्धतियों से अलग हटकर शिथिलीकरण एवं आत्मनिरीक्षण पद्धति से कर रहे हैं। इसमें रोगियों को नियमित रूप से दिन में तीन बार-प्रातः दोपहर एवं सायंकाल में पंद्रह-पंद्रह मिनट का ध्यान करने को कहा जाता है। इस साधना में रोगी “आत्म सम्मोहन” का अभ्यास करता है तथा यह भावना करता है कि उसका मन शान्त, संतुलित और स्वस्थ हो रहा है। दूसरे चरण में उसे रोग ग्रस्त स्थान पर ध्यान धरने को कहा जाता है। जिसे वह प्रबल भावना का आरोपण करता है कि शरीर के श्वेत रक्त कण रोग ग्रस्त क्षेत्र में एकत्र हो रहे हैं तथा रुग्ण कोशिकाओं को शरीर से बाहर निकाल रहे हैं। प्राण ऊर्जा का भण्डार जमा हो रहा है और उस स्थान की कोशिकाओं को प्राणवान बना रहा है। रोगियों को सदैव प्रसन्नचित रहने तथा जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण अपनाए रखने का ही निर्देश दिया जाता है। डॉ. कार्ल साइमण्टन ने इस उपचार प्रक्रिया से अब तक सैंकड़ों रोगियों को कष्टों एवं रोगों से जिनमें कैंसर जैसी घातक व्याधि भी शामिल है, सफलतापूर्वक मुक्त किया है। स्वास्थ्य लाभ उनमें बड़ी तेजी से होता देखा गया, जिन्होंने अपने आचरण एवं व्यवहार में आमूल चूल परिवर्तन कर लिया था अथवा करने के लिए तैयार थे। यही नहिं उनके साथ काम कर रही पैथालॉजी विशेषज्ञों की टीम ने यही भी प्रमाणित कर दिखाया कि रोग की प्रतिरोधी सामर्थ्य की वक्वद्धि के परिचायक इम्युनोग्लोबुलीन्स ए.जी. एवं ई व्यवहार चिकित्सा, जेस्टाल्ट थेरेपी के माध्यम से रक्त में बड़ी तेजी से बढ़ते हैं। यह स्वयं में एक प्रमाण हैं कि शारीरिक वायटेलिटी मनत्न संकेतों पर निर्भर हैं एवं मन की शक्ति को नियोजित कर उसे बदला बढ़ाया जा सकता है। सिल्वा माइण्ड कंटऊोल पद्धति के अन्वेषक जोस सिल्वा जो लारेडो टेक्सास के निवासी हैं, ने ध्यान व आत्म निर्देश प्रक्रिया द्वारा न केवल बुद्धि&लब्धि दक्द्मद्भ-ष्ठ;ह्न-ड्ट स्तर बढ़ाने अपितु मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य संवर्धन में, प्रसुप्त क्षमताओं को जगाने, विभिन्न मनोविकारों से मुक्ति दिलाने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। उनके सहयोगी डॉ. क्लैंसी दृ डी. मैकेन्जी जो कि फिलाडेल्फिया के एक मनःचिकित्सक हैं, ने पाया है कि उनके रोगी ध्यान प्रक्रिया द्वारा जल्दी स्वस्थ होते चले गए। इनमें चिकित्सक की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिनके माध्यम से उन्होंने च्च् सेल्फ हिप्नोसिसज्ज् के अभ्यास में तेजी से प्रगति की। यहाँ तक कि आत्महत्या की घातक मनोविकृति वाले स्कीजोफ्रनीक्स में उन्हें शत प्रतिशत सफलता मिली।
ये सभी साक्षी हैं उस तथ्य के जो स्पष्ट करता है कि रोग चिन्तन की विकृति एवं आचार व्यवहार की निकृष्टता अस्तव्यस्तता की परिणति होते हैं। यदि आत्म निर्देश की पद्धति का ध्यान योग का आश्रय लिया जाय तो न केवल मनोविकारों से मुक्ति पाई जा सकती है, वरन् अंतराल में निहित शक्तियों को जगाया बढ़ाया भी जा सकता है।
इंग्लैण्ड के बादशाह सप्तम एडवर्ड की पत्नी एलेक्जैण्ड़ास बचपन से ही बड़ी परिश्रमशील थीं। बेकार उनसे एक क्षण के लिए भी नहीं बैठा जाता था।
विवाह होने पर उन्हें और भी अधिक सुविधा साधन मिलें। हर काम के लिए नौकर थे तो वे स्वयं फिर क्या काम करती। अन्ततः उनने अपने लिए एक काम ढूंढ़ निकाला। वे निर्धन लोगों को बाँटने के कपड़े खुद अपने हाथ से सिया करती और उन्हें बाँटने के लिए उन मुहल्लों में जाया करती।
विलास की सुविधा सामग्री से कही अधिक सुख संतोष उन्हें उस परमार्थ कार्य में मिलता।
नौवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वितसता नदी की भीषण बाढ़ों से कश्मीर घाटी दलदली एवं कृषि के अयोग्य बनती जा रही थी। परिणाम स्वरूप अकाल की स्थिती बनती जा रही थी। राजा अवंती वर्मा और मंत्री किंकर्तव्यविमूढ़ थे। ऐसी विषम परिस्थिति में एक तरुण ने, जिसके माँ बाप तक का कोई पता नहीं था उसने कहा मेरे पास इस समस्या को सुलझाने की बुद्धि तो है परन्तु इसे कार्यान्वित करने का साधन नहीं है। क्या करूं
समस्या जब बढ़ती गई तब राजा ने परेशान होकर उसे अपनी योजना कार्यान्वित करने को कहा, स्वर्ण मुद्राओं की बड़ी राशि भी दी। मंत्री इसका विरोध करते ही रहे। उसने फिर तब राजा को भी पागल समझा जब उस व्यक्ति ने सारी स्वर्ण राशि वितस्ता नदी के पहाड़ी भागों में (जहाँ पानी रुका था) फेंक दिया। वह व्यक्ति तो पागल साबित हो ही चुका था।
वितस्ता नदी में स्वर्ण मुद्रायें फेंकी जाने का समाचार हवा की तरह फेल चुका । दुर्भिक्ष पीड़ित ग्रामवासी जल रोकने वाली चट्टानों को हटाने लगे एवं सवर्ण मुद्रायें खोजने लगे। चट्टानों के हटाये जाने से नदी के रास्ते में रुका हुआ जल झील की और तीव्र गति से बहने लगा। जल पलावित क्षेत्र की समस्या हल हो गई।
अब तो उस पागल ठहराये जाने वाले व्यक्ति का सम्मान होने लगा एवं उसकी अग्रिम योजना के लिए राज्य से धन भी दिया गया। योजना का विस्तार कर उसने नदी पर बाँध बंधाया, नहरें निकाली एवं विस्तता झेलम के संगम स्थान भी बदले। उसके बाद कश्मीर में बाढ़ की स्थिति ही नहीं सुलझी उसका भाग्य ही खुल गया। कश्मीर को स्वर्ग बनाने वाला, सड़कों पर पागलों की तरह घूमने वाला, माँ-बाप हीन और कोई नहीं मध्य युग का महान इंजीनियर अन्नपति सुम्य था।
माना जाता है कि प्रतिभाएँ अपने वर्चस्व से वातावरण विनिर्मित करती हैं। यह सच है, पर उनकी संख्या थोड़ी सी ही होती है। हीरे जहाँ तहाँ कभी&कभी ही निकलते हैं। पर काँच के नगीने के ढेरों के ढेरों कारखानों में नित्य ढलते रहते हैं। अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जो वातावरण के दबाव से भले या बुरे साँचे में ढलते हैं। सत्संग&कुसंग का प्रभाव इसी को कहते हैं। ऐसे लोग अपवाद ही हैं जो बुरे लोगों के संपर्क में रहकर भी अपनी गरिमा बनाये रहते हैं। साथ ही अपने प्रभाव से क्षुद्रों को महान बनाने, बिगड़ों को सुधारने में समर्थ होते हैं। प्रधानता वातावरण की हैं। सामान्य जन प्रवाह के साथ बहते और हवा के रुख पर उड़ते देखे जाते हैं। पारस के उदाहरण कम ही मिलते हैं। सूरज चाँद जैसी आभा किन्हीं बिरलों में होती है जो अंधेरों में उजाला कर सकें।
मान्यता वातावरण को ही मिलती है क्योंकि अधिकांश पर प्रभाव उसी का होता है। आत्मोत्कर्ष का लक्ष्य लेकर चलने वालों को तो विशेष रूप से इस आवश्यकता को अनुभव करना चाहिए। उसे जुटाने के लिए प्रयत्नशील भी रहना चाहिए।
अनेक फसलें किसी विशेष खेत में ही उत्साहवर्धक प्रगति करती हैं। तंबाकू,अफीम,चाय जैसी वस्तुएँ किसी विशेष इलाके में ही होती हैं। अन्यत्र बोया जाए तो वे उगाई भले ही जा सकें, आशाजनक स्तर तक बढ़ने,फलने,फूलने में समर्थ नहीं हो पाती। चंदन के पेड़ रोपे तो कहीं भी जा सकते हैं पर मैसूर जैसी सुगंध उनमें नहीं उभरती आम,संतरा आदी की उत्तम फसल निर्धारित क्षेत्रों में ही पनपती है। नारियल, लौंग, मसाले किसी विशेष भूमि में ही उगते हैं। इसी प्रकार किसी विशेष क्षेत्रों में ही कोई विशेष जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं यदि ऐसा न होता तो हनुमान जी को संजीवनी बूटी लेने के लिए सुदूर हिमालय पर्वत पर चढ़कर क्यों जाना पड़ता? जीव जन्तुओं की, फूलों की,धान्यों की भी क्षेत्रीय विशेषता के अनुरूप चित्र विचित्र प्रकार की उत्पत्ति होती है। सोवियत संघ के एक संघीय प्राँत उजेविकिस्तान व अजरबेजान में अधिकांश व्यक्ति सौ से भी अधिक वर्ष तक जीवित रहते हैं। इसे वातावरण की ही विशेषता कहना चाहिए।
आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी अनुकूल अनुरूप वातावरण होना चाहिए। अन्यथा संव्याप्त चिन्तन की भ्रष्टता,चरित्र की दुष्टता प्रमाणित किए बिना नहीं रहती। ढलान की और पानी अनायास ही बहता है। ऊपर से नीचे गिरने का उपक्रम पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही बनाती रहती है। ऊपर उठाने के लिए विशेष प्रयत्न करने की विशेष साधन जुटाने और शक्ति लगाने की आवश्यकता पड़ती हैं। आत्मिक प्रगति के लिए भी लक्ष्य के प्रति उत्साह बढ़ाने वाला मार्ग दिखाने वाला माहौल चाहिए।
इसके दो उपाय एक यह हक जहां इस प्रकार का वातावरण हो वहां जाकर रहा जाए। दूसरा यह कि जहां अपना निवास है वहीं प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति उत्पन्न कि जाए कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि अपने निज के लिए कुछ समय के लिए वैसी ही स्थिति उत्पन्न कर ली जाए। चन्द्रयात्री जब उसके धरातल पर पहुंचे, तब वहां सांस लेने के लिए हवा नहीं पाई गई उन्होंने ऐसे उपकरण साथ लिए जिनमें ऑक्सीजन भरी थी। उसी माध्यम से वे लोग सांस लेते रहे, और चन्द्रमा धरातल सर्वथा प्रतिकूल भ्रमण अन्वेषण करते रहे। पृथ्वी की उतरी दक्षिणी ध्रुवों की स्थिती भी निवास के सर्वथा प्रतिकूल है। इतने पर भी खोजियों ने वहाँ पैर जमाए और साधनों के सहारे बहुत दिन गुजारे। यही प्रयत्न कर अनुपयुक्त वातावरण में भी कम से कम अपने निज के लिए तो विशेष उपायों द्वारा उपयुक्त परिस्थितियाँ गढ़ी जा सकती हैं।
एकान्त स्वाध्याय,मनन चिन्तन ऐसे ही आधार है किसी एकान्त कोठारी या निर्जन क्षेत्र में बैठकर यह अनुभव किया जा सकता है कि संसार में संव्याप्त अवांछनीयता से अपना संबंध टूट गया। बुरे लोगों का बुरा प्रवाह एक एकाँत के कवच को बेध कर भीतर प्रवेश नहीं कर पा सकेगा। यह ढाल बाहरी अनुपयुक्त प्रभावों से बचाने के लिए एल का काम दे सकती है। शर्त एक है कि उस एकान्त में संसार के अवाँछनीय लोगों का विचार,स्वरूप, कृत्य कल्पना में न आने दिया जाय। सर्वथा कोलाहल रहित स्थान मिलने में कठिनाईयाँ दिखे तो यह प्रयोजन आँखें बंद करके, संसार चिन्तन से मन का निरोध करके भी पुरा किया जा सकता है।
अवाँछनीयता को रोकना भर ही पर्याप्त नहीं हैं सर्वथा रिक्त नहीं रहा जा सकता। शून्यता रह नहीं सकती। इसलिए उस स्थान पर श्रेष्ठता की प्रतिष्ठापना तो करनी ही होगी। यह कार्य देवता की ध्यान धारणा में भी अधिक अच्छी तरह उत्कृष्टता, आदर्शवादिता के समर्थक मार्ग दर्शक साहित्य के सहारे हो सकता है। दूरस्थ या दिवंगत महामानवों का सत्संग तो सहज संभव नहीं पर उस अभाव की पूर्ति उनके लिए साहित्य से हो सकती है। एकान्त के खाली मस्तिष्क में सत्साहित्य का महामानवों के जीवन रहस्य का अवगाहन किया जा सकता है। अनुभव किया जा सकता है कि उनकी प्रेरणा को अपने अंतराल में उतारा जा सकता है। उस खाली समय में अपने आदर्शवादी जीवन क्रम की संभावनाओं को भी केंद्रित किया जा सकता है। बार-बार जल्दी-जल्दी ऐसे वर्तमान परिस्थितियों में भी निकाले जा सकते हैं और उस स्वनिर्मित दिव्य कल्पना लोक में अवस्थित रहा जा सकता है।
प्राचीनकाल में साधना के लिए उपयुक्त कितने स्थान थे। उन्हें तीर्थ कहते थे। तीर्थ हर क्षेत्र में थे। ताकि समीपवर्ती लोग सरलतापूर्वक पहुँच सके और वातावरण का मार्ग दर्शन का समस्याओं के समाधान करके परामर्श का समुचित लाभ उठा सकें। तीर्थों में बच्चों के लिए गुरुकुल, गृहस्थों के लिए आश्रम,प्रौढ़ों के लिए वानप्रस्थ आरण्यकों की व्यवस्था रहती थी।हर व्यक्ति वहाँ निवास में पड़ने वाला भोजन व्यय आदी स्वयं उठाने की स्थिती में नहीं होता था। अमीरों के साथ गरीब भी आते थे। सभी को समान सुविधा मिले गरीब अमीर का अंतर न दिख पड़े। किसी पर दीनता और किसी पर अहंता छाई ना रहे इसलिए समता की व्यवस्था बनाए रखने के लिए उपरोक्त सभी आश्रमों में सदावर्त भण्डार चलते थे। सभी आगन्तुकों को समान सम्मान एवं सुविधाओं का सहयोग मिलता था। स्वर्गोपम भाव संवेदनाओं का रसास्वादन करते थे। उन दिनों सभी के लिए आत्मिक प्रगति के लिए उपयुक्त स्थान एवं अवसर प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध था। इस निमित्त बने तीर्थों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती थी कि उनके संचालक तत्व दर्शन, साधन प्रयोजन एवं जीवनोत्कर्ष की विद्या में हर दृष्टि में प्रवीण पारंगत होते थे। यह कार्य गृहस्थ पुरोहित करते थे। परिव्राजक बनकर सदा सर्वदा भ्रमण करते रहते थे। समय समय पर उपयुक्त केन्द्रों पर थोड़े थोड़े विचारशीलों को एकत्रित कर उनके प्रशिक्षण सदा चलते रहते थे।एक एक करके बात करना भी उचित था।पर उस प्रक्रिया में यह दोष है कि कोई प्रतिभाशाली अपना समूचा समय लगाकर भी थोड़े लोगों से संपर्क साध पाता है और एक से दूसरे तक पहुँचने में उसकी सुविधा वाले समय की प्रतीक्षा दूसरे तक पहुंचने में उसकी सुविधा वाले समय की प्रतीक्षा करने में ढेरों समय लग जाता है। उसे व्यक्तिगत समस्याओं के अनुरूप पृथक्−पृथक् परामर्श देना भी संभव हो जाता है। यह प्रयोजन बड़े सभा सत्संगों आयोजनों में नहीं हो पाता। बहुत बड़ी संख्या में जनता के एकत्रित होने पर सामयिक उत्साह तो उभरता है वक्ता के लिए यह सरल पड़ता है कि बहुजन समुदाय तक अपने विचार एक ही समय में पहुँचा देने पर उसे कमी यही रहती है कि व्यक्तिगत समस्याओं के संबंध में प्रथक प्रथक प्रकार के समाधान दे सकना संभव नहीं हो पाता। यों एकान्त विचार विनिमय, विचारगोष्ठी आयोजन और सभा सम्मेलनों का अपना महत्व है।
अब न तीर्थ पुरोहित अपना कर्तव्य पालन करते हैं न आश्रम स्तर की प्रशिक्षण व्यवस्था चलाते हैं और न साधु विरक्तों को ही लोक शिक्षण में निरत देखा जाता है। इन दानों को ही जीवन परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन को लक्ष्य रखकर संपर्क साधना और शिक्षण चलाना चाहिए। पर वैसा कुछ नहीं होता। देव दर्शन और पूजापरक कर्मकाण्डों के सहारे दक्षिणा बटोरने की धुन भर लगी रहती है। देवताओं के एजेन्ट स्वरूप में अपने को प्रस्तुत करके भावुकजनों का सहज lEeku Hkh izkIr djrs gSA bu mHk; i{kh; ykHkksa dks NksM+ dj yksd eaxy dh lsok lk/kuk esa u iqjksfgr oxZ yx jgk gS vkSj u lk/kq leqqnk; dk gh mruk /;ku gS ftruk gksu pkfg,A /kkfeZdtuksa dh nso iwtk ds ihNs euksdkeuk iwfrZ dh bPNk dks?kVk;k gVk;k tkuk pkfg, vkSj /keZ /kkj.kk ls uhfr fu/kkZj.k,oa lekt lsok dks izfrf"Br fd;k tkuk pkfg,A
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वर्तमान समय में विश्व को साँस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखने पर दो प्रकार की संस्कृतियां¡ दृष्टिगोचर होती हैं- दार्शनिक एवं वैज्ञानिक। दार्शनिक संस्कृति के पोषक तत्सम्बन्धी चिन्तन को आज की समस्याओं के युगानुकूल समाधान के रूप में सुझाते हैं तथा विज्ञान को बाã प्रकृति में उलझे रहने वाला कहकर अस्वीकार करते हैं। इसी प्रकार प्रयोगवादी वैज्ञानिक अपने प्रयोगों के माध्यम से प्राप्त उपलब्धियों को मानव जीवन को सरल एवं सुगम बनाने में सहायक होने की बात कहते हैं। उनके अनुसार ये उपलब्धियां¡ को मानवीय जीवन को कहीं अधिक सुखपूर्ण बना सकेंगी, जबकि वैचारिक कल्पना में खोए रहने वाले दार्शनिक मात्र हवाई किले बनाते रहते है।
बाãतः ये दोनों सचमुच दो विपरीत ध्रुवों की तरह ही दिखाई देते हैं। विज्ञान पदार्थ जगत में खोज करता है, जो घटनाओं के दिखाई पड़ने तथा दिखाई न पड़ने तथा इसके दृश्यमान विविध रूपों की व्याख्या करता है। इसके विपरीत दर्शन का कार्य मनुष्य के उन क्रिया–कलापों का चिन्तन करना है, जिन्हें वह स्वयं अपने में महत्वपूर्ण मानता है साथ ही जो उसके जीवन को सुसंस्कृत बनाते है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि दर्शन का प्रमुख कार्य उन मानदंडों की खोज है, जिनके द्वारा विभिन्न साँस्कृतिक क्रियाओं की प्रामाणिकता एवं महत्व को आ¡का जा सकता है।
इसका सर्वांगीण स्वरूप को देखने पर हम मुख्यतः तीन विभागों को पाते है। (1) तर्क (2) आचार शास्त्र (3) सौंदर्य शास्त्र। किन्तु इनमें इसकी परिसमाप्ति या पूर्णता नहीं होती। जहां यह अपनी पूर्णता प्राप्त करता है वह है मोक्ष-धर्म का विवेचन। इसमें मानव द्वारा उपलब्ध की जा सकने वाली सर्वाधिक उच्च अनुभूति का निरूपण है।
कुछ विद्वानों जैसे रिकर्ट, विन्डेल वैण्ड, डिल्टार्ड एवं स्पै्रंगर ने समूची विद्याओं को दो भागों में विभाजित किया है। एक प्राकृतिक, दूसरी साँस्कृतिक। इसकी आगे व्याख्या करते हुए गार्डनर मर्फी, “ए हिस्टाँरिकल इन्टऊोडक्षन टू साइकोलॉजी” में कहते हैं कि प्रथम कोटी की विद्याएँ सामान्य अध्ययन करती है। दूसरी विशेष का। एक बहिरंग तक सीमित है जबकि दूसरी अंतरंग तक अपनी पैठ रखती है।
कुछ विचारकों के अनुसार भारत ने इनमें से प्रथम की अवहेलना कर द्वितीय पर अधिक बल दिया है। अमेरिका के सुप्रसिद्ध) विद्वान एफ.एस.सी. नाथ्राप, “द मीटिंग ऑफ ईस्ट एण्ड वेस्ट” के पृष्ठ 375 पर पूर्व एवं पश्चिम की संस्कृतियों का भेद करते हुए लिखते हैं कि पूर्व के विचारक अपना ध्यान “डिफरेन्षिएटेड एस्थेटिक कन्टीन्युअम” अर्थात् विविध साक्षात्कार सम्बन्धी अनुभवों पर केंद्रित करते रहे हैं, जबकि पश्चिम के विचारक वस्तु जगत की रचना के सम्बन्ध में अभिव्यंजनात्मक परिकल्पनाओं का निर्माण करते रहे हैं।
श्री नार्थ्राप की व्याख्या को डॉ. देवराज ने अन्य प्रकार से स्पष्ट किया है। उनके अनुसार भारतीय विचारकों का मुख्य उÌष्य मानव का दुःख निवारण रहा है। दुःख निवारण से तात्पर्य समूल दुःख के नाष से है। अधिकांश विचारकों ने दुःख के निवारण के समाधान के रूप में मोक्ष धर्म को बताकर भारत के वैज्ञानिक चिन्तन से हीन बताया है।
टाज इस पर पुनः चिन्तन करने की आवश्यकता है। भारत ही एक मात्र वह भूमि है जहां के विचारकों ने प्रारम्भ से दोनों पक्षों को जाना और समझा है। वैदिक साहित्य में चिति और अचिति सम्बन्धी विवेचन ही उपनिषदों में परा और अपरा विद्याओं के रूपों में प्राप्त होता है। यही¡ के ऋषियों ने प्रथम को मुख्य तथा दूसरे को गौण तो कहा है। किन्तु गौण की अवहेलना कर उसे इन्कारा नहीं है।
यही कारण कि यहाँ की साँस्कृतिक विरासत में जहाँ हम दार्शनिक गहराइयों को पाते हैं, वहीं वैज्ञानिक टँचाईयों को भी। गैलीलियो के पहले “पृथ्वी चला स्थिरा भाति” अर्थात् घूमती हैं किन्तु प्रतीत स्थिर होती है तथा डॉल्टन के आणविक सिद्धांत के पूर्व कणाद ने अणु की बात प्रमाणित की थी। चरक सुश्रुत का औषधि विज्ञान, नागार्जुन का रसायन शास्त्र यहाँ की वैज्ञानिक उपलब्धियों की जानकारी देने के लिए पर्याप्त है।
इस सबसे अधिक चमत्कृत कर देने वाला तथ्य यह है कि यहाँ का विज्ञान न तो दर्शन विरोधी रहा है न ही दर्शन विज्ञान विरोधी। यहाँ के वैज्ञानिक एक साथ वैज्ञानिक और दार्शनिक दोनों थे। नागार्जुन ने जहाँ रसायन शास्त्र में प्रवीणता प्राप्त की, वहीं “शून्यवाद” के दार्शनिक सिद्धांतों के संस्थापक रूप में भी ख्याती अर्जित की। इसी प्रकार कणाद ने मात्र आणविक गवेषणा ही नहीं की, अपितु षड् दर्शनों में से एक स्वरचित वैशेषिक दर्शन में ईश्वर, जीव, प्रकृति के सम्बन्धों का पर्याप्त विवेचन भी किया है। ठीक इसी तरह चरक एवं सुश्रुत मात्र औषधियों की खोज तथा उपयोगिता बताकर सन्तुष्ट नहीं हो गए। जन सामान्य के विकसित जीवन के लिए नीति आचार सम्बन्धी चिन्तन भी दिया। आज नीति शास्त्री इस पर चकित हो सकते हैं कि कोई भिषक उत्कृष्ट कोटि का नीति मीमांसक भी हो सकता है।
आर्यावत में वैज्ञानिक दार्शनिक होने के साथ साधना की उच्चतम अनुभूतियों को प्राप्त करने वाले कोरे रहस्यवादी मात्र नहीं रहे। उन्होंने अपने अनुभवों की तर्क सम्मत बौद्धिक व्याख्या भी प्रस्तुत की है। धर्मकीर्ति, गौड़पाद, श्रीहर्ष, कुमारिल आचार्य शंकर, श्री अरविन्द की कृतियाँ इस बात का प्रमाण है। डॉ. एस. के. मैत्र के शब्दों में यहाँ का दर्शन तथ्यों की आलोचना नहीं बल्कि मानव अनुभूतियों को भी सन्तुष्ट करता है। साथ ही यह व्याख्या पूरी तरह से वैज्ञानिक एवं युक्ति सम्मत है।
मानव के दुख निवारण के लिए यही¡ यह कहकर सन्तोष नहीं किया गया कि भगवान पर विश्वास करो उस पर श्रद्धा रखो सारे कष्टों का हरण होगा। इसके लिए एक ऐसी विशुद्ध मनोवैज्ञानिक प्रणाली विकसित की गई, जिसका अनुसरण कर ईश्वर पर विश्वास करने वाले तथा विश्वास न करने वाले दोनों समाना रूप से अपने दुःखों से निवृत्ति पाकर आनंद को प्राप्त कर सकते है। यद्यपि इस प्रणाली के बीज उपनिषदों में प्राप्त होते है। फिर इन्हें सुसम्बद्ध करने का श्रेयस् महर्षि पातंजलि को है। काल गणना की दृष्टि से यह समय पश्चिमी मनोविज्ञान के उदय से सहस्रों वर्ष पूर्व ही होगा। किन्तु विवेचना, उपादेयता एवं व्यवहार की दृष्टि से आज के एडलर, एरिक Ýम, कार्त गुस्ताव जुँग सरीखे आधुनिकतम मनोवैज्ञानिकों को सन्तुष्ट ही नहीं करता अपितु भविष्य की प्रगति के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन भी सुझाता है।
विज्ञान एवं दर्शन का समन्वयात्मक स्वरूप भारतीय संस्कृति की अपनी मौलिक विशेषताओं में से एक है। यहाँ विज्ञान को दर्शन की अपेक्षा निम्न स्थान देने का तात्पर्य इसकी अवहेलना नहीं है, अपितु इनसे उच्चतर ज्ञान की निचली सीढ़ी मानना है, जिस पर चढ़कर उच्चतर ज्ञान की अनुभूति कहीं अधिक सरस है। श्री अरविन्द इसी को अपने ग्रन्थ “एवाल्यूषन” में स्पष्ट करते हुए कहते है “विज्ञान अन्ततः केवल प्रक्रियाओं का ज्ञान है। परन्तु फिर प्रक्रियाओं का ज्ञान भी सम्पूर्ण ज्ञान का अंश है और उसके पीछे छिपे गहन सत्य की ओर के रहस्योद्घाटन हेतु व्यापक एवं स्पष्ट दृष्टि हेतु अनिवार्य भी”
इसको निम्न स्थान पर बिठाने का एक अन्य कारण यह है कि विज्ञान मात्र साधन देता है साध्य नहीं। साध्य के लिए साधनों का उपयोग है न कि साधनों के लिए साध्य का उपयोग। अतएव प्रधानता साध्य की ही होगी न कि साधनों की। स्वयं को समझने पर ही वस्तु जगत को कहीं अधिक समझा तथा अच्छी तरह उपयोग में लाया जा सकता है। यहाँ की इसी साँस्कृतिक विचारधारा को योगीराज श्री अरविन्द “सुमन साइकिल” ग्रन्थ में (पृष्ठ 82) स्पष्ट करते हुए लिखते हैं - “अतिभौतिक प्रकृति के नियम और सम्भावनाओं को जाने बिना सही ढंग से न तो भौतिक प्रकृति के नियम जाने
जा सकते है, न ही संभावनाएं।”
भारत के मनीषियों ने इसलिए इनके सम्बन्ध को अन्योन्याश्रित माना है तथा समन्वयन पर बल दिया है। इसी समन्वयन के कारण ही यही¡ के अन्वेषकों ने विज्ञान को रचनात्मक क्षेत्र में प्रायोगिक बुद्धि को विवेक से अलग कर बैठे है, वहीं दार्शनिक बुद्धि एवं विवेक को प्रयोग तथा अनुभूतियों से पृथक् कर दिया गया है। दोनों को आपसी तालमेल बिठाने, समन्वय स्थापित करने के लिए भारतीय संस्कृति के आगार में अन्वेषण किया जाना चाहिए। इसमें मनीषियों को, ऐसे सूत्र मिल सकेंगे जिसके आधार पर दोनों ही विद्याओं के सम्बन्ध उसी तरह पुनः मधुर हो सकेंगे जैसे कभी बृहत्तर भारतवर्ष आर्यावर्त में थे।
छोटे से विषैले कीड़े ने आम्र वृक्ष से अनुरोध किया कि उसे अपने आश्रय में जीवन यापन करने की आज्ञा दी जाय। उदार वृक्ष ने अपनी सहजशीलता से प्रेरित होकर वैसा करने की छूट दे दी।
कीड़े ने वंशवृद्धि आरंभ कर दी। देखते-देखते वे असीम संख्या में बढ़ गये। उन्होंने फल फूल और पत्तों पर अड्डा जमाया और वृक्ष की समूची उपयोगिता हरीतिमा और शोभा को समाप्त कर दिया।
साथ वाले दूसरे वृक्ष ने उपहास करते हुए कहा कि आप सज्जन रहते पर उसका अतिवाद अपना कर दुर्जनों को आश्रय तो न देते।
आज-कल योग का प्रचार-प्रसार बढ़ रहा है। स्थान-स्थान पर नित्य नए योग केन्द्र खुलते तथा सभी को योग की उच्चतम स्थिति तक पहुंचा देने का दावा करते है। देश की तरह विदेशों में भी अनेकानेक तथाकथित योगीगण अपने इन केंद्रों की स्थापना के उÌष्य से निरन्तर जाते है। सामान्य मानव मन में सहज ही जिज्ञासा उमंगती है कि यह योग है क्या? जिस योग को आज बाजीगरी के रूप में प्रदर्शित कर उसे अर्थकारी विद्या के रूप में अपनाया जा रहा है, क्या पूर्व काल में ऋषियों ने भी इसी का प्रतिपादन किया था?
मानव मन को उद्वेलित करने वाली ये जिज्ञासाएँ स्वाभाविक है। इनके समाधान हेतु चिन्तन मनन करने तथा पतंजलि प्रणीत योग दर्शन के पृष्ठ उलटने पर स्पष्ट हो जाता है कि योग शब्द “युज” धातु से निःसृत हुआ है- जिसका तात्पर्य है जोड़ना। अध्यात्म साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है। प्रिय परिजनों से बिछुड़ जाने पर जितना कष्ट होता है उतना अन्यत्र कहीं भी कभी नहीं होता। आत्मा के अपनी परम प्रिय परब्रह्म-परमसत्ता से विलग होने पर अहर्निशि पग-पग पर कुकर्म घेरते है और शोक सन्तोष दुःख देते है।
साधन और सत्प्रयोजन का समन्वय हो सके तो उसे व्यावहारिक जीवन का योग कहा जाएगा। इस सुयोग को जिनने भी बनाया, वे स्वल्प साधनों से भी आशातीत प्रगति कर सकने में समर्थ हुए। जिन्हें यह सन्मार्ग नहीं मिला, जो साधनों को बाल क्रीड़ा के मनोविनोदों में गँवाते रहे, उन्हें दुष्कर्मों में नष्ट करते रहे ऐसे मनुष्यों की जीवन सम्पदा सुर दुर्लभ होते हुए भी अभिशाप-दुर्भाग्य ही सिद्ध होती रहेगी।
मानव जीवन की अमूल्य साधन है तथा परमात्मा की प्राप्ति है-महत् सत्प्रयोजन। इसका समन्वय न हो पाने के कारण ही हेय गतिविधियाँ गले बँधती तथा सर्वनाश का पथ प्रशस्त होता है। जन्म-जन्मान्तरों से संग्रहित पशु प्रवृत्तियां अपने-अपने उन्हीं हेय संस्कारों के अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए आकर्षित करती रहती है। यह वृत्तियां किसी भी तरह मानवी गरिमा के अनुकूल नहीं इनके बहकने पर ही नर के कलेवर में अनुकूल नहीं। इनके बहकने पर ही नर के कलेवर में दिखता मानव वस्तुतः मानव न होकर नर पशु रह जाता है।
आवश्यकता वृत्तियों के नियमन की है। इसी कारण योग दर्शन के सूत्रकार ने योग का यथार्थ अभिप्राय बताते हुए “योगाष्चितवृति निरोध” का सूत्र प्रतिपादित किया है। योगाभ्यास का प्रारम्भ चित्त वृत्तियों के निरोध से ही होता है। आमतौर से इसका अर्थ एकाग्रता का अभ्यास समझा जाता है। पर यह अभ्यास योग का एक छोटा सा अंश है इसे इसका भौतिक भाग भी कहा जा सकता है। एकाग्रता में अध्यात्म साधक ही नहीं अपितु ऐसे अनेक संसारी व्यक्ति भी उसमें परिणत होते है। जिनका आध्यात्मिकता से दूर-दूर का रिश्ता नहीं। सरकस में तमाशा दिखाने वाले नटों के सारे खेल इसी एकाग्रता के बल बूते टिके होते है। यदि उनका ध्यान बटाने लगे तो तार पर चलने, झूलों पर उछलने जैसे करतब दिखा सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा, वैज्ञानिक, कलाकार, मूर्तिकार आदि अपने-अपने विषयों में तन्मय हो सकने की विशेषता उत्पन्न करत तथा सफल होते है। पर इसे एक मस्तिष्कीय कौशल भर कहा जा सकता है। अध्यात्म प्रयोजनों में भी इस विशेषता की आवश्यकता है। इतना होते हुए भी मात्र इसी विशिष्टता के आधार पर किसी को योगी नहीं कहा जा सकता।
चित्त निरोध का अर्थ है मन की अस्त-व्यस्त भाग दौड़ को नियन्त्रित करके किसी विशेष प्रयोजन में लगाये रखने का अभ्यास। यह आवश्यक भी है और सराहनीय भी, पर इससे योग साधना का प्रयोजन पूरा नहीं होता। आत्मिक प्रगति के लिए मात्र चित्त निरोध और चित्त वृत्तियों के निरोध का अन्तर प्रत्येक विचारशील के मन-मस्तिष्क में स्पष्ट रहना चाहिए।
किन-किन चित्त वृत्तियों का अवरोध करना होगा इसका संकेत योगदर्शन के साधन पाद के सूत्र 6 में दिया गया है। समस्त वृत्तियां पाँच प्रकार की होती है तथा उन पाँचों वृत्तियों में से प्रत्येक वृति क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट रूप में होती है। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, एवं स्मृति प्रायः यही पाँच प्रकार की चंचलताएँ मन पर छाई रहती है और उसे उच्च उद्देश्यों से विरत करके पशु प्रवृत्तियों में उलझाती है। प्रमाण वृति उसे कहते हैं जो इन्द्रिय विषयों के पूर्वाभ्यास से वृत्ति सम्बंधित विषयों के प्रसंग आने पर उभरती है। विपर्यय कहते हैं-प्रतिकूल ज्ञान को, वस्तु स्थिति की जानकारी न होने से चित्त कस्तूरी के हिरन के सदृश उद्विग्न फिरता है। विकल्प का अर्थ है-भय, आशंका, सन्देह, अशुभ सम्भावना आदि कुकल्पनाओं से उत्पन्न कातरता। निद्रा का अर्थ है आलस्य प्रमोद-उपेक्षा अवसाद-अनुत्साह। स्मृति वे संस्मरण है जो निष्कृष्ट योनियों में रहते समय अभ्यास में आते रहे स्वभाव के अंग बने रहे। उनकी छाया मनुष्य योनि में भी छाई रहती है। उसके फलस्वरूप कई बार इतने जोर से उभरती है कि विवेक मर्यादाओं के बाँध तोड़ कर ऐसा करा लेती है। जिसके संबंध में पीछे प्रायश्चित करना ही शेष रह जाता है।
जिस युग में समाज में जिस वातावरण में हम रह रहे हैं। उसमें अवांछनीय प्रचलनों की कमी नहीं। उनका आकर्षण मन को अपनी ओर खींचता-लुभाता है। पानी स्वभावतः नीचे गिरता है। अधिकांश लोग अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाकर अनुपयुक्त जीवन जीते है। इससे वे तात्कालिक लाभ भी पाते है पीछे भले ही उन्हें दुष्परिणाम भुगतने पड़े। इस तत्काल लाभ की बात सहज ही मन को आकर्षित करती है और दबी हुई दुष्प्रवृत्तियां उभर कर उस मार्ग पर घसीट ले जाती है जो मनुष्य जैसे विवेकी प्राणी के लिए अशोभनीय है।
योग साधना का मूल उद्देश्य इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के साथ प्रचण्ड संघर्ष खड़ा कर देना है। जिस महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ने सम्मिलित भूमिका निभाई थी, वह आत्म परिष्कार में योग साधना के साथ पूरी तरह से सम्बन्धित है। कुसंस्कार कौरव दल से किसी भी कीमत में कम नहीं। ये निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे तथा वातावरण में घुसी अवांछनीयता से उद्दीप्त हो भड़कते है। जिस तरह से कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा। ठीक उसी तरह से आत्मिक गरिमा पर असुरता आच्छादित हो रही है। उसको इस चंगुल से छुड़ाने के लिए विरोध प्रतिरोध का महाभारत खड़ा करने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं शेष रह गया है। योगाभ्यास में इसी “निरोध” संघर्ष का उल्लेख है। इसमें आत्मा परमात्मा का सत्कर्म सद्ज्ञान का समन्वयन करने पर विजय सर्वथा निश्चित हो जाती है।
इस अभ्यास के आठ सोपान है, जिनको अपनाना व्यूह रचना के सदृश है। इस तरह क्रम-क्रम से अभ्यास करते हुए दुष्प्रवृत्तियों का निरस्त कर अन्तः प्रकृति की परतों का भेदन कर लक्ष्य को पाया जा सकता है। शास्त्रकारों ने योग साधना का माहात्म्य तथा तत्वदर्शन समझाते हुए बताया है कि जिस प्रकार क ख ग घ से अक्षरारम्भ करते हुए तत्वज्ञान प्राप्त हो जाता है।
यह न तो कठिन है, न ही अशक्य। इसकी सुलभता सर्व साधारण के लिए है। उस मार्ग पर न्यूनाधिक जितना भी चला जा सके उतना ही लाभ है। इस तथ्य को समझने तथा अपनाने से ही तथाकथित “योगा” बनाम बाजीगरी के मोह-जाल से भी उबरा जा सकेगा।
जड़ पदार्थों में एक-एक का जोड़ दो बनता है। प्राणियों की चेतना का सहयोग समन्वयन होने से यह तथ्य भिन्न प्रकार से होता है। और एक को बराबर रख देने से वे 11 बन जाते है। दो सच्चे मित्र सहयोगी मिलकर असाधारण काम करते है। इसी प्रकार यदि आत्मा और परमात्मा के समन्वयन होने की स्थिति को सूत्रकार इस प्रकार समझाते है।
“पुरुषार्थ शून्यानाँ गुण्ण्नाँ प्रतिप्ररुपः कैवल्यं स्वरुवं प्रतिष्ठा वा चित्तषक्तिरिति॥4। 34॥”
गुण कारणों में लय होते तथा चैतन्य शक्ति अपने स्वरूप में प्रतिष्ठा पाती है। इस तरह चिर वियोग की दुःख दूर होता तथा योग की वह दुर्लभ स्थिति आती है, जिसमें आनन्द, शक्ति, सिद्धि सभी कुछ है। यही है योग का सही स्वरूप, जिसे समझा व हृदयंगम किया जाना चाहिए।
तपस्वी जावाति को स्वर्ग लोक मिला। देवता उन्हें विमान पर बिठाकर ले गये।
आत्मा ने समूचे स्वर्ग का निरीक्षण किया। वहाँ पर न ज्ञान वृद्धि का अवसर था और न सेवा साधन का। मात्र विलास सामग्री का उपभोग ही वहाँ के लोग करते थे।
जावाति ने देवताओं से अनुरोध किया उन्हें वापस धरती पर भेज दिया जाय। वहाँ पर सही पुरुषार्थ करने वालों को आत्मसंतोष मिलता है। उसका तो कोई अवसर ही यहाँ नहीं है।
देवता सुविधा और विलासताओं का आकर्षण दिखाते रहे पर तपस्वी ने उनमें कोई रुची नहीं दिखाई। आग्रह की अधिकता देखकर उन्हें पुनः पृथ्वी पर भेजना पड़ा। वे वहाँ रहकर प्रसन्नता पूर्वक अपना निर्धारित कृत्य करने लगे।
शास्त्रकारों का मत है कि योगाभ्यास, साधना, इत्यादि में चित्त की वृत्तियों की निरोध प्रक्रिया द्वारा मनुष्य अनेकों अलौकिक क्षमताएँ और दिव्य शक्तियाँ हस्तगत कर सकता है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, भूत-भविष्य का ज्ञान जैसी विलक्षण उपलब्धियों का उद्भव भी सम्भव है। मनीषियों के अनुसार-कितनों को अणिमा, लघिमा, गरिमा जैसी ऋद्धियाँ सिद्धियाँ भी हस्तगत होती है। कुछ लोग इन्हें कल्पना लोक की उड़ान कहते है। किन्तु अनेकों ऐसे उदाहरण यह सिद्ध करते है कि अतीन्द्रिय सामर्थ्य एक तथ्य पूर्ण सत्य है। योग साधनाओं के द्वारा आत्मशोधन तथा आत्मपरिष्कार के माध्यम से उन्हें विकसित किया जाना सम्भव है। व्यष्टि मन द्वारा विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त परम चेतना से तादात्म्य स्थापित करना और अनेकों लौकिक समस्याओं का समाधान खोज लेना, कष्ट कठिनाइयों की पूर्व सूचना प्राप्त कर लेना भी सम्भव है।
एक समय था जब अतीन्द्रिय चमत्कारों को देवी, देवताओं भूत पलीतों की करतूत समझा जाता था। उनके अनुग्रह और दुराग्रह तथा कोप का अनुमान लगाकर पूजा उपचार का ताना बाना बुन लिया जाता था। किंवदंतियों, दन्तकथाओं, मूढ़ मान्यताओं के वे दिन अब नहीं रहे। अतींद्रिय ज्ञान अब एक वैज्ञानिक तथ्य माना जाने लगा है। यों सामान्य जानकारियाँ प्राप्त करता है जो इन्द्रियों के ज्ञान से सर्वथा बाहर की बात होती है। अमेरिकी मनोचिकित्सक डॉ. बर्नार्ड जॉनसन ने अपनी पुस्तक “वियोन्ड टेलीपैथी” में ऐसी अनेकों घटनाओं का उल्लेख किया है। विद्वान लेखक ने प्रमाणित किया है कि कितने ही मनुष्यों में ऐसी क्षमता होती है जिससे वे दूरस्थ स्थानों की घटनाओं की जानकारी बिना किसी संचार साधन के अनायास प्राप्त कर लेते है।
प्राचीन काल की ऐसी अनेकों घटनाओं का वर्णन मिलता है जिनमें अतीन्द्रिय क्षमताओं के आधार पर दूर-श्रवण, दूरदर्शन, श्राप, वरदान आदि के विवरण दिये गये है। महाभारत युद्ध का पूरा विवरण संजय द्वारा हस्तिनापुर में बैठकर धृतराष्ट्र को बिना किसी दूरसंचार साधन के दिव्य दृष्टि के आधार पर ही सुनाया था। जब कि युद्ध कुरुक्षेत्र के मैदान में 50 योजन दूर चल रहा रहा था। ऐसे अनेकों अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न ऋषियों का उल्लेख भारतीय धर्म ग्रन्थों में मिलता है जिन्होंने श्राप अथवा वरदान के बल का प्रयोग कर दुष्टता का दमन और श्रेष्ठता को संरक्षण प्रदान किया था। येग तत्वोप-निषद में कहा गया है कि जैसे-तैसे चित्त की सामर्थ्य बढ़ती है वैसे ही दूर श्रवण, दूरदर्शन, वाक्सिद्धि, कामनापूर्ति आदि की अनेकों विलक्षण सिद्धियाँ मिलती चली जाती है। चित्त की सामर्थ्य मनोनिग्रह जैसे आध्यात्मिक व्यायामों से ही बढ़ना सम्भव है।
अमेरिका के मनः शक्ति संस्थान के निदेशक डॉ. ब्रूकेल्स के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में अतीन्द्रिय क्षमताएँ प्रस्तुत पड़ी है जिन्हें वह प्रयत्न पूर्वक जाग्रत कर सकता है। कभी-कभी यह शक्तियाँ अनायास ही जाग्रत हो जाती है और व्यक्ति में ऐसी विलक्षणताएं¡ उत्पन्न हो जाती है जो दूसरों के लिए कौतूहल का विषय बन जाती है। परामनोविज्ञान की शोधों के अनुसार यह सिद्ध हो चुका है कि मनुष्य की मानसिक शक्तियां इतनी सीमित नहीं है जितनी कि प्रतिदिन के क्रिया कलाप में दिखाई देती है। उसका बहुत बड़ा अंश तो प्रसुप्त ही पड़ रहता है। जिसका लोग उपयोग ही नहीं कर पाते। जिस प्रकार मनुष्य की सारी आर्थिक पूंजी काम नहीं आती उसी प्रकार उसकी मानसिक क्षमताओं का भी उपयोग नहीं हो पाता, ऐसी मान्यता मनीषियों की है।
मैस्मरेजम के आविष्कर्ता डॉ. मेस्मर के अनुसार मन को यदि अनावश्यक संग्रह और तुच्छ इन्द्रिय भोगों से विरत किया जा सके, ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके तो वह ऐसी विलक्षण शुि से सम्पन्न हो सकता है जो साधारण लोगों को चमत्कृत कर सके। किन्तु उन्हें उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लगाकर आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त किया जा सकता है। मन आकाश में भ्रमण कर सकता है और उन घटनाओं का ग्रहण कर सकता है जिन्हें हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ग्रहण नहीं कर पातीं तथा हमारा तर्क व्यु करने में असमर्थ है। अमेरिका के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. जे.बी. राइन ने भी अपनी पुस्तक “न्यू ळन्टियर्स ऑफ माइन्ड” में अनेकों ऐसी घटनाओं का वर्णन किया है। वे भी मानते है कि चिन्तन और अभ्यास द्वारा मन और विचारणाओं को सामान्य से असामान्य बनाया जा सकता है और भूत अथवा भविष्य की घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
शोध निष्कर्ष के उपरान्त वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि शरीर की प्रत्येक कोशिका में एक प्रथक मन होता है। कोशिकाओं के मनों का समुदाय है समग्र मन का निर्माण करता है। इसलिए मन को एक वस्तु न मानकर अध्यात्म च्स्त्र में उसे मनोमय कोष कहा गया है। शरीर के समस्त अंग अवयव इसी के अनुशासन में कार्य करते है। मन की क्षमता इतनी प्रचण्ड होती है कि शरीर और समीपवर्ती परिकर ही नहीं देश देशांतरों की जानकारी पल भर में प्राप्त करने में समर्थ है। इस सम्बन्ध में वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस प्रकार ध्वनि तरंगों को पकड़ने के लिए रेडियो में एक विशेष प्रकार का क्रिस्टल फिट किया जाता है वैसे ही काया का क्रिस्टल मन है। विज्ञानवेत्ता कहते है कि बोले गये शब्द ब्रह्माण्ड में व्याप्त ईथर में समा जाते हैं किन्तु उनकी प्रवाही गति बहुत धीमी होती है। इन्हीं शब्दों को यदि विद्युत तरंगों में परिवर्तित कर दिया जाये तब इनकी शक्ति और गति प्रचण्ड रूप धारण कर लेती है और वे चारों ओर बड़े वेग से फैलने लगती है। इन्हीं शब्द तरंगों को रेडियो पकड़ लेता है जिसे हम दूर बैठकर सुन सकने में समर्थ होते है उसी प्रकार मन भी सृष्टि में घटित घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर लेता है। डॉ. हार्ट लाइन ने नेत्र कोशिकाओं में उत्पन्न विद्युत आवेगों को इलेक्ट्रोरेटीनोग्राम द्वारा बताया है कि प्रत्येक नेत्र कोष में उस बिंब की समस्त बारीकियाँ, रंग, रूप निहित होती है, जो एक सेकेंड के करोड़वें हिस्से में उस प्रतिबिंब को अगले कोष को प्रेषित कर देता है। इस प्रकार बिंब की सूचना प्रकाश की गति से मस्तिष्क के दृश्यमान स्थान में पहुँच जाती है। इसी प्रकार काया के कोषों में सन्निहित जानकारी मन तक सतत् सम्प्रेषित होती रहती है।
ऊर्जा का प्रकाश में बदलना एक जटिल प्रणाली है किन्तु वैज्ञानिक का यह मत है कि जब ऊर्जा किसी वस्तु में प्रवेश करती है तो उसके परमाणु उत्तेजित हो उठते है जब शान्त होकर मूल स्थान को लौटते हैं तो सोखी गई ऊर्जा को प्रकाश में बदल देते है इस क्रिया को “संदीप्ति” कहते है। यह गुण संसार के सभी पदार्थ और प्राणियों में पाया जाता है। हम उसे जानते नहीं, पर वैज्ञानिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिकों का यह कथन सही है कि मनुष्य जो कुछ सोचता और करता है, वह छिपाए नहीं छिपता, क्योंकि सूक्ष्म प्रकाश की तरंगें उसे बाहर निकालती रहती है। यदि हम उन तरंगों से भी सूक्ष्म तरंगों के प्रेषण में सफलता प्राप्त कर लेते है तो आसानी से दूसरों के मन की बात, भविष्य की सम्भाव्य घटनाओं, योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने में सफल हो सकते है। इस तथ्य की पुष्टि श्रीमती जे.सी. टऊस्ट ने “अणु और आत्मा” नामक ग्रन्थ में भी दी है। दूसरों के मन की बात जान लेना, अथवा भविष्य के संकेतों की समझपाने के लिए अतीन्द्रिय क्षमताओं की विकसित करना पड़ता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि मन पर नियंत्रण, अनुशासन रखकर उसकी टह्लर्द्मं स्रद्मह्य द्धष्[द्मद्भह्वह्य द्यह्य द्भद्मह्यस्रद्म ह्लद्म,्न द्धशद्ध॥द्मह्व क्/;द्मक्रद्ग द्वद्बश्चद्मद्भ;स्नद्मद्म ह्वद्मठ्ठ;द्मह्यफ्] =द्मंकस्र;द्मह्यफ्] ब्;;द्मह्यफ् ड्ढक्र;द्मद्धठ्ठ ड्ढद्यद्ध द्धह्वद्धद्गक्रद्म द्धस्र; ह्लद्मह्ह्य द्दस्] क्द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म म्द्मद्गह्द्म द्यश्वद्बह्व ष्ह्वस्रद्भ ट्टट्टद्यद्म/द्मह्वद्म द्यह्य द्धद्य)द्धट्टट्ट स्रद्ध द्यड्ड॥द्मद्मशह्वद्म स्रद्मह्य॥द्मद्ध द्यद्मस्रद्मद्भ ष्ह्वद्मह्ह्य द्दस््न
राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर रचाया। दूर-दूर से प्रतापी राजकुमार आये। विजय की शर्त थी कि जो टद्बद्भ /द्मह्नद्गह्द्ध द्गहृब्द्ध स्रद्ध हृद्म;द्म ह्वद्धश्चह्य द्बद्मह्वद्ध द्गह्यड्ड ठ्ठह्य[द्मस्रद्भ टद्बद्भ ह्द्धद्भ श्चब्द्म;ह्य क्द्मस्द्भ द्गहृब्द्ध स्रद्ध क्द्मँ[द्म॥द्मह्यठ्ठ ठ्ठह्य शद्दद्धड्ड द्धशह्लह्यह्द्म द्गद्मह्वद्म ह्लद्म,्न ठ्ठभ्द्मह्य.द्मद्मश्चर्द्म; द्वद्यस्रह्य द्धह्वद्भद्धम्द्मस्र द्धह्व;ह्नु द्दह्न,्न
ष्द्मद्भद्ध&ष्द्मद्भद्ध द्भद्मह्लस्रह्नद्गद्मद्भ क्द्म;ह्य्न ठ्ठभ्द्मह्य.द्मद्मश्चर्द्म; द्दद्भ,स्र स्रद्मह्य द्बख्हृह्ह्य द्धस्र ह्लब् स्रद्ध हृद्म;द्म द्गह्यड्ड क्द्मद्बस्रद्मह्य द्गहृब्द्ध स्रह्य ष्ठ;द्म&ष्ठ;द्म क्ड्डफ् ठ्ठद्ध[द्मह्ह्य द्दस््न द्भद्मह्लस्रह्नद्गद्मद्भ द्बभ्द्म;त्न द्बख्द्भद्ध द्गहृब्द्ध स्रद्म द्धशशद्भ.द्म ष्ह्द्मह्ह्य्न ठ्ठभ्द्मह्य.द्म द्वद्दह्य क्द्मज्द्मर्द्धंशद्मठ्ठ ह्व ठ्ठह्यह्ह्य स्नद्मह्य क्द्यक्तब् द्दद्मह्यस्रद्भ शद्मद्बद्य ब्द्मस्क ह्लद्मह्ह्य्न
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द्यक्तब्ह्द्म स्रद्म द्धश्चश्,स्रद्मफ्भ्ह्द्म द्दस््न ह्द्ग; द्दद्मह्यस्रद्भ ह्लद्मह्य॥द्मद्ध स्रद्मद्ग द्धस्र;द्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न शद्द द्बख्द्भद्म द्दद्मह्यद्भ द्भद्दह्द्म द्दस््न
हिरन कस्तूरी की खोज में इधर उधर भटकता और परेशान होता है। वन कन्दराओं,में उसे ढूंढ़ता फिरता है, पर बदले में उसे निराशा ही हाथ लगती है। इसी खोजबीन में उसका जीवन व्यर्थ चला जाता है। पर असंतोष, अतृप्ति का भाव यथावत बना रहता है। यदि वह यह जान सके कि जिस सुगंध को पाने के लिए वह व्याकुल हो कर यहाँ वहाँ भटकता रहता है। उसी का स्त्रोत उस के पास है तो उसे तृष्णा की लपटों में दग्ध न होना पड़े न ही वह क्लांत व अशांत हो। सुगन्धि के स्त्रोत की निकटता जानकर वह पूर्णतया परितृप्त सुखी हो सकता है।
हिरन की तरह ही मानव की भी दशा है। यह भी आनन्द की खोज में आजीवन परेशान होता है। मूलतः उसको इसी की चाह है। बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक इसी आकाँक्षा की पूर्ति में वह लगा रहता है। पर मृग की तरह बहिर्मुखी दृष्टि होने के कारण वह विचारता है कि आनन्द का स्त्रोत कहीं बाहर है दृश्य जगत और उसके अस्थाई नित्य परिवर्तनीय पदार्थों की खोज में निरत रहता है। एन्द्रिक तुष्टि हेतु भिन्न भिन्न विषय भोगों की सामग्री जुटाता है। पर इनके उपभोग से असन्तोष अतृप्ति की ज्वाला रंचमात्र भी कम नहीं होती। अपितु दिन भर दिन बढ़ती जाती है।
पैदा होने से मरने तक शारीरिक मानसिक स्थिती में अनेकों तरह के परिवर्तन होते हैं। इनके साथ सुख की खोज के साधन भी बदलते रहते हैं। शैशव काल में केवल एक प्रकार की माँग रहती है, किशोरावस्था में भिन्न भिन्न तरह की। युवाकाल की मन%स्थिती और बुढ़ापे की मानसिकता परस्पर भिन्न रहती है। इस भिन्नता के साथ ही सुख की प्राप्ति के साधन भी व्यक्ति बदलता रहता है छोटे शिशु को अपनी माँ की छाती से चिपटे रहने और दुग्धपान में सामयिक तृप्ति का अनुभव होता है। पर तनिक बड़ा होने पर वह रुचि समाप्त हो जाती है और उसे तरह तरह के खिलौने में सुख महसूस होने लगता है। किशोरावस्था में मित्रों की टोली भाती है। साथ पढ़ने लिखने की पारस्परिक स्पर्धा चल पड़ती है। वही किशोर बालक जो छुटपन में खिलौनों के पीछे भागता था, न मिलने पर, रोता चिल्लाता था। उसे उनसे अब न तो रस मिलता है न ही कोई आकर्षण रह जाता है अब तो उसे इस बात की चिन्ता रहती है कि अमुक परीक्षा कैसे पास की जाय? अधिक से अधिक योग्यता कैसे अर्जित कि जाय? पर संतुष्टि इस कामना की पूर्ति से भी नहीं होती वयस्क होने पर आजीविका के उपयुक्त साधन उपलब्ध होने पर अनुकूल जीवन साथी की तलाश रहने लगती है मिलते ही पत्नी के रूप,लावण्य,यौवन, में कुछ दिन उलझा रहता है धीरे धीरे संतानों का पिता बन बैठने पर शरीराकर्षण भी समाप्त होता चला जाता है।
अब प्रसन्नता और आकर्षण का केन्द्र होती हैं नवजात शिशु की किलकारियां इन्हें सुनकर बच्चे को गोद में बिठाकर वह अपनी कष्ट–कठिनाइयों को भूल जाता है। उसे हंसाने प्रसन्न रखने के लिए अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हो जाता है। पर यह आकर्षण भी धीरे धीरे लुप्त हो जाता है।
संपत्ति के संग्रह यश की लालसा में अब उसे सुख की खोज रहती है। इसी के अनुसार वह भिन्न भिन्न प्रयास करता है पर इन सब के मलने के बाद भी उसे न तो चैन मिलता है न सुख। सारी जिन्दगी इन विविध प्रयासों में खप जाती है। पर आनंद दूर अति दूर चला जाता है।
हर आदमी की मन स्थिति और प्रकृति भी परस्पर अलग अलग होती है उसकी रुचियाँ और शौक भी तदनुरूप अलग अलग होते हैं। पर सब रहते हैं ऐसे सुख आनंद में जो शाश्वत हो चिरस्थाई हो,कुछ स्वास्थ्य, धन, ऐश्वर्य, यश, मान, गौरव,की प्राप्ति में इसे तलाशते हैं। इनमें थोड़े से लोग ऐसे भी होते हैं जो इनकी प्राप्ति हेतु सामान्य रास्ते से हटकर मार्ग चुनते हैं। और दुस्साहस भी करते हैं। जिससे साधारण को तो विश्वास भी नहीं होता पर इन सब की प्राप्ति के बावजूद न तो स्थाई सुख मिलता है न शाश्वत आनंद। कुछ सम्मोहित जैसी मनःस्थिति वाले मनुष्य इसे शराब के प्याले में इसे ढूंढ़ते हैं। कामी, कामतृप्ति, क्षणिक, रसानुभूति के चक्कर में अपने शरीर स्वास्थ्य को चौपट करता और मानसिक शक्ति को नष्ट करता है पर सुख संतोष की वास्तविकता उससे कोसों दूर रहती है।
इस तरह बाह्य संसार में आनंद-सुख की तलाश में भटकते-परेशान होते मनुष्य की स्थिति को देखकर यह सिद्ध होता है कि शाश्वत सुख-आनन्द का रसामृत पान उसके जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसी की ढूंढ़–खोज में वह परेशान और क्लान्त रहता है। इसके लिए कभी एक तरह का माध्यम बनता कभी दूसरी तरह का। किन्तु यदि इन माध्यमों की उपयोगिता आवश्यकता, इस ढूंढ़-खोज के बारे में चिन्तन-विचार करे तो पाते है कि यह भौतिक पदार्थ नितान्त आनन्द से रहित है। यदि इन किसी में आनन्द होता तो मन उसी में लीन रहता। अतएव यह विशेषता इन भौतिक पदार्थों में नहीं है।
इसका तात्पर्य है सुख-आनन्द का उद्गम केन्द्र बाहर नहीं अपितु निज के अन्तराल में ही विद्यमान है। यह आंतरिक भाव ही भिन्न-भिन्न वस्तुओं में प्रतिभासित होकर हमें आनंददायक प्रतीत होता है। अतएव भ्रमवश हम लोग इन जड़ पदार्थों को ही आनन्ददायी समझ बैठने की भूल करते है। इसी कारण हिरन की तरह इस खोज-बीन में निराशा और असफलता ही हाथ लगती है।
अपनी ही आत्मा सत चित आनन्द स्वरूप है। शाश्वत आनन्द का केन्द्रीय स्त्रोत यही है। यही अन्दर से अपने आनन्द के भाव को सम्प्रेषित कर इसका भान कराता है। पर हमारी इंद्रियां और मन है। बहिर्मुखी। ये उद्गम केन्द्र की और न मुड़कर आनन्द की खोज बाह्य जगत में करने का नित्य निरंतर नवीन प्रयास करने में रत रहते हैं। फलतः असफलता के सिवा और हाथ लगे भी क्या।
शाश्वत सुख एवं परम आनन्द के रसामृत का सागर अपना आपा अपनी अन्तरात्मा ही है। चैतन्य गतिविधियों का प्रेरणा केन्द्र भी यही है। पर चेतना की यह विशेषता भी है कि जड़ पदार्थों में उसका प्रकाश आनन्द की किरणें व्यक्ति, वस्तु विभिन्न विषयों पर पड़ती है उनमें आकर्षण रहता है, आनन्द प्रदायक लगता है। जैसे ही किरणें सिमटती है सारा दृश्यमान सौंदर्य आकर्षण का भाव लुप्त हो जाता है। वस्तुतः अंतरात्मा की भाव तरंगों के कारण ही दृश्य संसार में सुख और आनंद का भान होता है। इन्द्रियों, मन की प्रवृत्ति बहिर्मुखी होने के कारण इसकी खोज हम बाहर ही करते रहते है। इसी कारण दृश्यमान जगत की विविध वस्तुओं का सहारा लेने पर यह आनंद की प्यास बुझाती नहीं। अपितु स्थिति उस व्यक्ति कि सी हो जाती है जो गंगा जल की तलाश में निकलता है। और पहुंच जाता है मदिरालय और शराब पीकर अपने होशोहवास गवाँ बैठता है, एवं इधर उधर भटकता फिरता है। यही हालत जीवात्मा कि है, जिसकी आकुलता मिट नहीं पाती।
इसे दुर्भाग्य और विडंबना के अलावा और क्या कहा जाए की जीव स्वयं परमानंद का सागर होते हुए भी पूरे जीवन उस अमृतरस की एक बूंद भी नहीं चख पाता। खेल खिलौने विविध ऐषणाओं की पूर्ति यषमान लिप्सा में बचपन से लेकर बुढ़ापा तक बीत जाता है। और पछतावा शेष रह जाता है। व्यतीत हुए भूतकाल की रिक्तता का स्मरण हर व्यक्ति रोर्बट एंडरसन की भा¡ती करता हुआ कहता है कि मैन विविध ऐश आराम के साधन जुटाए, यश सम्मान अर्जित किया, विभिन्न प्रतियोगिताएं जीती। किन्तु जब मेरा मन अंतर्मुखी हुआ, तभी सोच पाया अनुभव हुआ कि शान्ति आनंद का केन्द्र अपने ही अन्तराल में कहीं बाहर नहीं।
ऐसी व्यथा वेदना प्रायः हर व्यक्ति को जीवन के किसी न किसी क्षण में अवश्य होती है उनका प्रकटीकरण भले ही भिन्न क्यों न हो? इस अभाव की पूर्ति न तो भौतिक सुविधाओं से होती है नहीं यश सम्मान की प्राप्ति से। अंतर्मन की व्यथा यह बताती है। जीवन की प्रमुख आवश्यकता शाश्वत आनन्द की मांग ही है। उसे पाने की इच्छा भी प्रबल है। पर बहिर्मुखी होने के कारण उसका सारा का सारा का सामर्थ्य इसमें खप जाती है, नष्ट हो जाती है अपितु और बलवती हो जाती है। कामनाओं का भी कोई अन्त नहीं, रक्त बीज की तरह एक समाप्त होने पर सौ नवीन हो जाती है। ईश्वर प्रदत्त अलभ्य जीवन इस तरह व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है और हाथ लगती है अशांति, निराशा और पश्चाताप।
यदि अन्तर्मुखी होकर अपने आन्तरिक भावों पर ध्यान दिया जा सके तो पता चलेगा कि शाश्वत सुख परम आनन्द का अजम स्त्रोत अपना अन्तरात्मा ही है जो निरन्तर अपना प्रवाह सम्प्रेषित कर रही है। यह समझते ही कामनाओं की बाढ़ समाप्त होने लगती है, संसार की चमक-दमक का एन्द्रजालिक सम्मोहन टूट जाता है और जीवन की यथार्थता परम सत्य का बोध होता है। साथ ही होती है परम आनन्द असीम-सुख की उपलब्धि, जो कि मानव का चरम लक्ष्य है। इस अमृत का रसास्वादन अपने आप में इतनी बड़ी अनुभूति है कि जिसे एक बार चखने के बाद कोई स्वाद भाता नहीं, मन कहीं और भागता नहीं, मात्र इष्ट से श्रेष्ठता से, परमसत्ता से मिलन हेतु आकुल बना रहता है यही है सच्ची प्रभु भक्ति आत्मिक प्रगति की साधना एवं वह पुरुषार्थ जो “जीवो ब्रहैवनापरः” की उक्ति सार्थक कर दिखाता है।
तीन शरीरों के विकास परिष्कार के लिए यों अनेकों साधनाएँ प्रचलित है। पर उनका वर्गीकरण किया जाय तो सभी को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। जप, ध्यान और प्राणायाम। इन्हीं त्रिविध आधारों के भेद-उपभेद अनेकानेक साधनाओं का स्वरूप विनिर्मित करते है। उन्हें समेटा-सिकोड़ा जाय तो फिर वे तीन में सिकोड़ा भी जा सकता है। इसके अतिरिक्त और कोई ऐसा प्रयोग नहीं है जिसे इस परिधि से बाहर किया जा सके।
जप में किसी मंत्र विशेष की अनवरत रट लगाई जाती है। पुनरावर्तन एक गतिचक्र विनिर्मित करता है। उसमें अपने प्रकार की विशेष शक्ति होती है। ब्रह्मांड के ग्रह नक्षत्र अपनी कक्षा में अनवरत भ्रमण करते है। उसी घुमाव परिभ्रमण से वह चुम्बकत्व उत्पन्न होता है जिसके सहारे स्वयं भी अपनी कक्षा में सुस्थिर बने रहते है और अपने संपर्क क्षेत्र के अन्यान्य ग्रह पिंडों को भी जकड़े रहते है। यदि यह परिभ्रमण क्रिया बन्द हो जाय तो उसका परिणाम बिखराव के रूप में ही होगा। यों शरीर के मूल घटक यह प्रक्रिया अपनाये रहते है। पर उसमें तीव्रता-तालबद्धता और सुव्यवस्था लाने के लिए जप की शब्द प्रक्रिया एक विशेष भूमिका निभाती है। पुनरावर्तन कालान्तर में स्वभाव का अंग बन जाता है और बिना प्रयास के ही अपनी धुरी पर परिभ्रमण करने लगता है। पत्थर से उपकरण को घिस-घिस कर ही धारदार और चमकीला बनाया जाता है।
स्थूल शरीर का केन्द्र नाभिचक्र माना गया है पर उसका प्रभाव क्षेत्र अधोभाग की दशा में एक बड़ी परिधि तक फैला हुआ है। मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों वाला मेरुदंड भाग इसी का प्रभाव क्षेत्र समझा जाता है। विशेषतया जननेन्द्रिय मूल और सुषुम्ना का अन्तिम छोर नाभिचक्र से प्रभावित होता है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया पूरी तरह इसी परिकर से संबद्ध है। कुण्डलिनी स्थूल शरीर की बीज शक्ति है जो जननेन्द्रिय मूल से उठकर मेरुदंड का देवयान मार्ग पार करती हुई मस्तिष्क के मध्य वाले ब्रह्मरंध्र सहस्रार कमल तक पहुँचती है और आज्ञाचक्र द्वारा बाहर निकलकर संपर्क क्षेत्र को अपनी विद्युत शक्ति से प्रभावित करती है।
जप के साथ-साथ पूजन अर्जन वाली प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है। उनके माध्यम से आत्म परिष्कार का प्रशिक्षण क्रम चलता है। चंदन, अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्य-जल आदि को सद्गुणों में से एक-एक का प्रतीक मानकर अपने आप को यह सिखाया समझाया जाता है कि सर्वतोमुखी शालीनता की अवधारणा, अभिवृद्धि किस प्रकार की जानी चाहिए। मंत्र जप के साथ इष्ट देव की छाँव को सम्मुख रखना होता है और उस पर श्रद्धा समर्पण का आरोपण करते हुए अपने क्रिया–कलापों में आदर्शवादिता का बढ़ा-चढ़ा समावेश करने की मनःस्थिति बनानी पड़ती हे। उसे उस स्तर तक बढ़ाना पड़ता है ताकि व्यावहारिक जीवन में उसका कार्यान्वयन भी हो सके। इस समस्त पक्षों के समन्वय से स्थूल शरीर में उत्कर्ष अभ्युदय बन पड़ने की सम्भावना परिपक्व होती है।
नाभिचक्र में कमल पुष्प का ध्यान करना पड़ता है जिसमें उसकी प्रत्येक पंखुड़ी उस क्षेत्र की अगणित दिव्य शक्तियों का प्रतीक बन कर निरन्तर विकसित होती रहे और समग्र रूप में विकसित शोभायमान कमल का रूप प्रस्तुत कर सके।
इसका शरीर सूक्ष्म शरीर है जिसे एक शब्द में मानसिक संस्थान कह सकते हैं। कल्पना, विचारणा, निर्धारणा इसी के अंग है। तर्क वितर्क इसी में उठते है। शिक्षण, अनुभव, स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन आदि उपायों के द्वारा व्यावहारिक रूप में इसे विकसित किया जाता है। बुद्धिमान, विद्वान, कुशल, पारंगत, समुन्नत बनने का अवसर इसी क्षेत्र के परिसर में बन पड़ता है।
मनःक्षेत्र को विकसित करने के लिए प्राण प्रवाह का अवलम्बन लेना पड़ता है। प्राण एक ऐसी विद्युत शक्ति है और वायु के साथ घुली रहती है। इसे संकल्प शक्ति से खींचा और धारण किया जाता है। साधारणतया साँस चलती रहती है। उसके साथ जीवनोपयोगी ऊर्जा प्रदान करने वाली आक्सीजन भी समुचित मात्रा में घुलती रहती है। गहरी साँस लेना इसी दृष्टि से आवश्यक माना गया है कि आक्सीजन की समुचित मात्रा फेफड़ों से लेकर छोटे-छोटे सभी घटकों को आवश्यक ऊर्जा मिल सके। साथ ही भीतरी क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली गंदगी की सफाई भी होती रहे। गहरी साँस लेना छोड़ना एक स्वसंचालित व्यायाम है। इसे अपनाया तो जाना चाहिए पर इतना ही सूक्ष्म शरीर के परिष्कार के लिए पर्याप्त नहीं है।
प्राणायाम में संकल्प भरी इच्छा शक्ति का समुचित प्रयोग होता है। भावना करनी पड़ती है कि ब्रह्माण्डव्यापी प्राण तत्व साँस के साथ खिंचता चला आता है और नाम द्वारा प्रवेश करके स्थूल शरीर में ही नहीं सूक्ष्म शरीर के अदृश्य प्रकोष्ठों में भी भर जाता है। इस प्रकार की संकल्प युक्त साँस खींचने की प्रक्रिया जितनी लम्बी हो सके करनी चाहिए। इसके बाद साँस रोकने का कुँभक आता है। इसे खींचने में जितना समय लगा था उससे आधा समय ही रोकने को कुंभक में लगाना चाहिए। साथ ही अवधारणा करनी चाहिए कि साँस में धुला हुआ जो प्राण तत्व कण-कण में भरा है वह नव जीवन प्रदान कर रहा है।
अवधारणा के समय मस्तिष्क क्षेत्र के अन्तराल का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए उसमें सद्प्रवृत्तियां और सद्विचारणाएँ अतीन्द्रिय क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में छिपी पड़ी रहती है। प्राणायाम द्वारा खींचा गया प्राण उन्हें झकझोरता और प्रसुप्ति से जाग्रत स्थिति में लाता है। संतुलन, उत्साह, विवेक, इस आधार पर सरलतापूर्वक उभारा जा रहा है और जो अवाँछनीय तत्व सूक्ष्म शरीर के किसी क्षेत्र में जम गये है उन्हें प्राण युक्त साँस छोड़ने को रेचक प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाला जा सकता है।
सूक्ष्म शरीर का प्रतिनिधि केन्द्र हृदय चक्र माना गया है। साधारण स्थिति में वह मूँदी हुई कला जैसा रहता है पर प्राण की ऊर्जा एवं प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य सविता के ध्यान द्वारा उसे खिले कमल की स्थिति में लाया जाय। इसकी पंखुड़ियाँ मानसिक विशेषताओं की कुंजियां है। हृदय जब खिलता है तो उससे सम्बन्धित मानसिक विशेषताएँ भी उभर पड़ती है। साधक के अधिक प्राणवान होने की संभावना बढ़ती है।
तीनों शरीरों के जागरण उन्नयन का क्रम एक साथ चलता है। एक-एक करके अलग-अलग समयों में पृथक्-पृथक् विकास की परम्परा नहीं है। शरीर के सभी अंगों का साथ-साथ विकास होता हैं ऐसा नहीं कि पहले हाथ पुष्ट करले इसके बाद पैर को संभालेंगे। स्कूलों में, छात्रों में, भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास आदि की पुस्तकें एक ही समय में क्रमपूर्वक चलानी पड़ती है। ऐसा नहीं होता कि पहले भाषा पढ़ ले, पीछे गणित, व्याकरण। इसी प्रकार तीनों शरीरों का उन्नयन क्रम विविध चक्रों को प्रस्फुटित करने की प्रक्रिया के साथ चलना पड़ता है। साधनाक्रम में तीनों का समावेश साथ-साथ किन्तु क्रमिक रूप से करना पड़ता है। इस समग्र साधन को ग्रंथिभेद कहते है। इसमें नाभि, हृदय और ब्रह्मरंध्र के अतिरिक्त तीनों कमलों की मुंदी हुई प्रसुप्त स्थिति में उबारकर जाग्रति में परिणत करना होता है। मुँदी कलियों को खिले हुए कमलों के स्तर तक पहुँचाना होता है। इसके लिए प्रातः कालीन सूर्य सविता की ऊर्जा को ध्यान धारणा द्वारा तीनों शरीरों में उनके प्रतीक केन्द्रों में ओत−प्रोत करना होता है।
तीसरा कारण शरीर भाव शरीर कहलाता है इसमें आस्थाएँ, मान्यताएँ आकाँक्षाएँ, संवेदनाएँ निवास करती है। इस सभी को आदर्श की दिशा में धकेलना पड़ता है और मैत्री करुणा मुदिता के स्तर पर सेवा साधना में नियोजित करना होता है। पुण्य परमार्थ की ओर बढ़ चलने के लिए प्रोत्साहित करने वाली योजना एवं क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित करना होता है। उसे संयम और उदारता का समन्वय भी कह सकते है।
मस्तिष्क, मध्य, जिसे ब्रह्मरंध्र या सहस्रार कमल कहते है। यही कारण शरीर के संवेदन परिकर का मध्य केन्द्र है। यहाँ भी मुँदी कली की स्थिति रहती है। इसे ध्यानयोग द्वारा कमल पुष्प की तरह खिलाया जाता है। पूर्व दिशा में प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य का ध्यान इस समूचे प्रयोग के लिए आधारभूत अवलम्बन है। उदीयमान सूर्य को एक सेकेंड खुली आँख देखने के उपरान्त उसी दृश्य की ध्यान धारणा प्रायः दस पन्द्रह सेकेंड तक आंखें बंद करके करनी होती है। जब अनुभूति झीनी होने लगे तो फिर आँख खोलकर एक सेकेंड उदीयमान सूर्य को देखा जा सकता है और पुनः आँखें बंद करके उसी दृश्य की अनुभूति की क्रिया दुहरायी जा सकती है। सूर्य के प्रत्यक्ष दर्शन का उपरोक्त क्रम अधिक से अधिक एक सप्ताह चलाना चाहिए और वह अवधि पन्द्रह मिनट से अधिक नहीं होनी चाहिए। क्योंकि जैसे-जैसे सूर्य के प्रकाश में तीव्रता आती जाती है वैसे-वैसे वह खुली आँखों से देखने जैसी स्थिति में नहीं रहता। विकसित सूर्य को देखने पर आँखों को हानि पहुँचती है। उदीयमान को भी देर तक नहीं देखना चाहिए। यह प्रयोग आरंभिक अभ्यास के लिए है। प्रायः एक सप्ताह में ऐसी स्थिति बन जाती है कि बिना प्रत्यक्ष दर्शन के ही भावनात्मक ध्यान द्वारा भी सविता देव का दिव्य दर्शन होने लगे। इस आलोक को नाभिचक्र हृदयचक्र और ब्रह्मचक्र में अपनी आभा को प्रवेश कराते हुए अनुभव करना चाहिए।
जीवन वृक्ष का तना है। ज्ञान पल्लव, सत्कर्मों का नियोजन है। फूल-उज्ज्वल चरित्र और फल-सेवा साधना का रसास्वादन।
मनुष्य के असफलता के कारणों में एक कारण आयोग्यता भी है। जिसने किसी काम को करने का सही ढंग सीखने में प्रमाद किया है, उसकी रीति-नीति के सम्बन्ध में ज्ञान अर्जित करने का कष्ट नहीं उठाया है, वह उस काम को ठीक से अंजाम दे सकने की आशा अपने से नहीं रख सकता। यदि वह हठ अथवा लोभ के वशीभूत उस काम को हाथ में ले भी लेगा तो दूसरों के साथ अपनी दृष्टि में भी उपहासास्पद बन जायेगा। किसी काम को सफलता पूर्वक करने के लिए तत्सम्बन्धी योग्यता का होना नितान्त आवश्यक है।
योग्यता किसी दैवी वरदान के रूप में नहीं मिलती। वह एक ऐसा सुफल है, जिसकी प्राप्ति परिश्रम एवं पुरुषार्थ के पुरस्कार स्वरूप ही होता है। जो असली है, अकर्मण्य है, काम करने में जिनका जी नहीं लगता, परिश्रम के नाम से जिन्हें पसीना आता हैं, वह किसी विषय में समुचित योग्यता अर्जित कर सकते है, ऐसी आशा दिवा-स्वप्न के समान मिथ्या सिद्ध होगी। योग्यता की उपलब्धि परिश्रम एवं पुरुषार्थ के द्वारा संभव है।
किसी विषय में सफलता हस्तगत करने के लिए, उस विषय की पर्याप्त योग्यता को होना आवश्यकता है, और योग्यता की उपलब्धि परिश्रम एवं पुरुषार्थ पर निर्भर है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि सफलता का मूलभूत हेतु परिश्रम एवं पुरुषार्थ ही है।
जिनको संसार में कुछ सराहनीय दिखाने की इच्छा है अथवा जो चाहते है कि सफलतायें उनके जीवन का श्रृंगार करें, उन्हें चाहिए कि वे तन-मन और पूरी सच्चाई के साथ अपने में परिश्रम तथा पुरुषार्थ का स्वभाव विकसित करे। एक बार ध्येयपूर्वक परिश्रमी स्वभाव का विकास कर लेने पर फिर वह ऐसा सहज स्वभाव बन जाता हैं कि किसी के लिए अकर्मण्य रहकर कुछ क्षण बिता सकना ही पहाड़ हो जाता है।
कर्मण्य स्वभाव वाला व्यक्ति इतना कर्मशील बन जाता है कि यदि विवशता वश उसे एक आध दिन निकम्मा होकर बैठना पड़े तो उसके लिए वह समय कारावास की दुःखदायी स्थिति से कम नहीं बैठ सकता। परिश्रमी स्वभाव वाला व्यक्ति एक क्ष के लिए भी बेकार नहीं बैठ सकता। उसे काम करने की आवश्यकता उसी प्रकार अनुभव होती है जिस प्रकार भूख लगने पर खाने की आवश्यकता। भूख लगने पर जब तक कि कुछ खा न लिया जाये तब तक चैन नहीं पड़ता उसी प्रकार परिश्रम स्वभाव वाला व्यक्ति काम के अभाव में तब तक बेचैन बना रहता है, जब तक कि उसे मन माना काम करने को नहीं मिल जाता। जिसने अपने स्वभाव को इस सीमा तक परिश्रमी एवं पुरुषार्थी बना लिया है, मानना होगा कि उसने अपने भाग्य का निर्माण कर लिया हैं, और सफलता की जयमाला लेकर विचरण करने वाले दैव दूतों को अपनी और आकर्षित करने कि योग्यता उपलब्ध कर ली है।
जिन सुविधाजनक परिस्थितियों को प्रारब्ध कि संज्ञा दी जाती है, जिन साधनों और उपादानों को मानव-जीवन की सफलता का सहायक माना जाता हैं और जो सौभाग्यफलों के रूप जन-जन को स्पृहणीय होते हैं, वे सब परिश्रम एवं पुरुषार्थ के पुरस्कार के सिवाय और कुछ नहीं होते। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है-इस सूक्ति-वाक्य को कर्मठ व्यक्तियों ने, पुरुषार्थ द्वारा, असंभव को संभव सिद्ध करके, विचारकों को, संसार के सम्मुख एक सिद्ध मंत्र के रूप में प्रस्तुत करने के लिए विवश कर दिया।
सुख-दुख, हानि-लाभ, सफलता-असफलता दैवाधीन है, इनमें मनुष्य की गति नहीं है-इस प्रकार की भावना आध्यात्मिक-साधन के क्षेत्र में भले ही कुछ अर्थ रखती हो किन्तु भौतिक धरातल पर इसका अधिक महत्व नहीं माना जा सकता। यदि इस दार्शनिक भावना को देशकाल और परिस्थितियों का विचार कि ये बिना सामान्य जीवन-कर्म में प्रवृत्त कर दिया जाय तो निश्चय ही संसार का विकास अवरुद्ध हो जाय, और इस कर्म-लोक में अकर्मण्यता का साम्राज्य स्थापित होते देर न लगे। लोग असमय में अकारण ही उक्त भावना का बहाना लेकर कंधा डाल दे और तब सब संसार का यह सक्रिय स्वरूप वैसे ही समाप्त हो जायें जैसे पक्षाघात का आक्रमण होने पर चलते-फिरते मनुष्य की गति स्थगित हो जाती हैं।
कभी-कभी देखा जाता है कि प्रयत्न करने पर भी कुछ लोग वाँछित सफलता नहीं पा पाते, और तब दृष्टिकोण में इस भ्रम की संभावना हो उठती है कि प्रयत्न और पुरुषार्थ व्यर्थ है, मनुष्य का भाग्य ही प्रबल होता है। किन्तु यह भ्रम सर्वथा भ्रम ही है, सत्य का इससे दूर का भी संबंध नहीं होता। ऐसे प्रयत्नशील व्यक्ति की असफलता को लेकर भाग्यवाद में आस्था की स्थापना करने लगना मानसिक निर्बलता का लक्षण है। निश्चय ही उस असफल व्यक्ति के प्रयत्न में कुछ न कुछ खोट अथवा कमी रहीं होगी जिससे कि उसे उस समय असफलता का मुँह देखना पड़ा। यदि प्रयत्न पूरा और सावधानी के साथ किया जाय तो किसी के सम्मुख असफलता के आने का अवसर ही शेष नहीं रह जाता। पूरा और सुचारु प्रयत्न सफलता कि एक ऐसी गारंटी है जो कभी असिद्ध नहीं हो सकता।
किसी एक प्रयत्न से कोई निश्चित सफलता मिल ही जायें, यह आवश्यक नहीं। सफलता के लिए कभी-कभी प्रयत्नों की परम्परा लगा देनी होती हैं। परिश्रम एवं पुरुषार्थ के रूप में उसका उतना मूल्य चुका ही देना होता है जितना चुकाना उसके लिए अनिवार्य है। एक बार असफलता का सामना हो जाने पर किसी को असफल मान लेना उस के साथ अन्याय करने के समान है। संसार में लिंकन जैसे हजारों व्यक्ति हुये है जिन्होंने सैकड़ों बार असफल होकर भी, अन्त में अभीष्ट सफलता का वरण कर ही लिया। सच्चा पुरुषार्थी वास्तव में वहीं है जो बार-बार असफलता को देखकर भी अपने प्रयत्न में शिथिलता न आने दे और हर सफलता के बाद एक नये उत्साह से सफलता के लिए उद्योग करता रहे। जो पत्थर एक आघात में नहीं टूटता उसे बार-बार के आघात से तोड़ा ही जा सकता हैं।
असफलता का अंगीकार करने का अर्थ है निराशा को निमंत्रण देना। निराशा के दुष्परिणामों के विषय में अधिक कुछ कहना व्यर्थ हैं। निराशा को भावना की यदि नागपाश कि भांति कह दिया जाये तो कुछ अनुचित न होगा। निराशा मनुष्य की क्रियाशीलता पर सर्प की भांति लिपट कर न केवल उसकी गति ही अवरुद्ध कर देती है प्रत्युत अपने विषैले प्रभाव से उसके जीवन तत्व को भी नष्ट करती रहती है।
यह अधिक अस्वाभाविक नहीं है कि असफलता की स्थिति में कभी-कभी निराशा मनुष्य के विचारों पर अपनी कालीछाया डालने का साहस कर ही जाती है। किन्तु उस छाया को देर तक ठहरने न देना चाहिए। यदि यह गलती कि जायेगी तो, सच्च मानिये, आपके वर्तमान पर ही नहीं भविष्य पर भी उसका दूरगामी कुप्रभाव पड़े बिना न रह सकेगा। वह सारे स्वप्न, सारी स्वर्ण-कल्पनाएँ, जिनको मूर्तिमान करनी कि आकाँक्षा लेकर आपने कर्म-क्षेत्र में कदम बढ़ाया है सहसा धूमिल पड़ जायेगी। आपका का आत्म विश्वास, उत्साह और साहस धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगेगा। विचारों के माध्यम से जीवन-क्षितिज पर अंधकार घनीभूत हो उठेगा और तब कुण्ठा और कायरता के सिवाय आप के पास कुछ भी तो शेष न बचेगा। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि असफलता के साथ निराशा को जोड़कर ऐसी हानि न की जायें जो कभी पूरी हो सके।
इस अनुभव सिद्ध सत्य को स्वीकार कर लेने में सब प्रकार से हित ही हित है कि निरन्तर काम में जुटा रहना निराशा का सर्वश्रेष्ठ और सृजनात्मक उपचार है। काम में संलग्न रहने से मन की सारी वृत्तियाँ एकाग्रता के साथ उस काम की और प्रवृत्त रहती है। विचारों का प्रवाह कार्य के साथ चलता रहता है। इस संलग्नता के कारण विचारों में ऐसा कोई स्थान रिक्त नहीं रहता जहाँ आकर निराशा अपना अधिकार जमा सके। जहाँ अकर्मण्यता की स्थिति में निराशा के विचार मस्तिष्क को घेरने लगते हैं, वहाँ इसके विपरीत सक्रियता की स्थिति में सृजनता के कारण आशापूर्ण विचारों का उदय होता चलता है।
जीवन में सफलता की आकांक्षा रखने वालो को चाहिए की सामयिक असफलता को एक चुनौती की भाँति स्वीकार करें और सृजन शक्ति के बल पर असफलता की पोषक निराशा को पास न फटकने दे। जिसने निराशा से दूर रहकर असफलता को सफलता में बदल देने का संकल्प लेकर अपने उद्योग को और अधिक बढ़ा देने का दृढ़ निश्चय किया होता है, उसने मानो दूर तक अपनी मंजिल का मार्ग स्पष्ट और निरापद बना लिया होता है।
सफलता के मार्ग में कठिनाइयों का आना असंभव नहीं। संभव नहीं क्यों, उनका आना स्वाभाविक है जिस मार्ग में कोई कठिनाई नहीं, जिस पर विरोध एवं अवरोध की संभावना नहीं, वह मार्ग किसी महान ध्येय की और जा रहा है-ऐसा मान लेने में जल्दी नहीं करनी चाहिए। आजतक के प्रत्येक महापुरुष का जीवन बतलाता है कि महानता की ओर जाने वाला आजतक ऐसा कोई मार्ग अन्वेषण नहीं किया जा सका जिस पर कठिनाइयों का सामना न करना पड़े बीच बीच में आने वाली कठिनाईयाँ इस बात की साक्षी है कि अमुक मार्ग किसी असामान्य ध्येय की ओर जाता है।
अपने ध्येय मार्ग पर विघ्न-बाधाओं को देखकर अनेक लोग हतोत्साह हो उठते हे। ऐसे व्यक्तियों को यह मानने में संकोच न करना चाहिए कि किसी महान सफलता को वरण करने की आकाँक्षा परिपक्व नहीं है। इस प्रकार की आकाँक्षा जिनके हृदय में लगन बनकर लगी होती है वे हंसते-खेलते विघ्न-बाधाओं से टक्कर लेते हुए साहस पूर्व अपने ध्येय मार्ग पर बढ़ते चले जाते हैं। मार्ग की कठिनाइयों से टकराने में जिस आत्मिक-आनंद की उपलब्धि होती हैं, उसे पाने के अधिकारी ऐसे पुरुषार्थी पुरुषों के सिवाय कौन हो सकता है?
ध्येय मार्ग का कोई सच्चा पथिक इस सत्य के समर्थन में उत्साह प्रकट नहीं कर सकता कि मार्ग में यदि कठिनाइयों से टकराने का अवसर न मिले तो असहनीय नीरसता का समावेश हो जायें, और वह नीरसता लक्ष्य पर पहुँचकर दूर नहीं हो सकती। जिस समरसता के साथ मंजिल पर पहुँचने पर कौन सी नवीनता, कौनसा संतोष और कौन सा हर्ष उपलब्ध हो सकता हैं? यह मार्ग की बाधायें दूर करने में किये गये संघर्ष की ही विशेषता है जो मंजिल पर पहुँच कर विश्राम, संतोष और आनन्द के रूप में अनुभव होती हैं। प्रगति का वास्तविक आनंद है कि कठिनाइयों का सहयोग आता रहें ओर उन पर विजय प्राप्त की जाती रहे। हलचल के बिना जीवन सूना ओर नीरस हो जाता है।
कठिनाइयों से भय मानना अंतर में छिपी कायरता का द्योतक है। अपनी इस कायरता के कारण ही मार्ग में आई कठिनाई पहाड़ के समान दुरूह मालूम होती हैं। किन्तु जब उस कठिनाई को दूर करने के लिए साहस पूर्वक जुट पड़ा जाता है तो यह विदित होते देर नहीं लगती कि जा कठिनाई को हम पर्वत के समान दुर्गम समझ रहे थे वह उस बादल के समान हीन अस्तित्व थी जो थोड़ी सी हवा लगने पर टुकड़े-टुकड़े होकर छितरा जाता है!
सफलता का आसान समझकर उसकी कामना करने वाले व्यक्ति प्रौढ़ वृद्धि के नहीं माने जा सकते।सफलता की उपलब्धि सरलता से नहीं कठोर संघर्ष से ही संभव होती है। अध्ययन, अध्यवसाय और अनुभव की साधना किये बिना अभीष्ट सफलता का ना सकने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपने को योग्य बनकर पूरे संकल्पना के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा। मार्ग में आने वाली बाधाओं का, यह मानकर स्वागत करना होगा कि वे हमारे साहस, निश्चय और संकल्प की परीक्षा लेने आई हैं। कठिनाइयों को देखकर भयभीत होने के स्थान पर उन्हें दूर करने के लिए जीजान से जुट जाना होगा। इस प्रकार पूरे समारोह और साहस के साथ लक्ष्य की ओर अभियान करने पर सफलता की आशा की जा सकती है। इसमें संदेह नहीं कि ऐसा अदम्य उत्साह और उद्योग की क्षमता प्रकट करने वाले पुरुषार्थी पुरुषों के गले में जयमाला पड़ती ही है और वे समाज द्वारा अभिनंदित होकर उन्नति के उच्च सिंहासन पर अभिषेक के अधिकारी बनते है।
सफलता की सिद्धि मनुष्य का जन्म सिद्ध करके यथा तथा जी लेने में ही संतोष मानते हैं वे इस महामल्य मानव-जीवन का अवमूल्यन कर ऐसे सुअवसर को खो देते हैं जिसका दुबारा मिल सकना संदिग्ध है, अस्तु उठिये और आज से ही अपनी वांछित सफलता को वरण करने के लिए उद्योग में जुट पड़िये।
एक गाड़ीवान हनुमान जी का बड़ा भक्त था। नित्य उनके मन्दिर में दर्शन को जाता और वहीं बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करता। ताकि हनुमान जी आपने कान से उसे सुन ले और यह मान लें कि भक्त जब इतनी प्रशंसा करता है तो अवश्य ही यह गहरा भक्तिभाव रखता होगा।
एक दिन गाड़ीवान अपनी गाड़ी लेकर कहीं दूर गाँव जा रहा था। रास्ते में एक जगह भारी कीचड़ भरी हुई थी। पहिये उसमें फंस गये। बैल उसे खींच नहीं पा रहे थे। वह स्वयं कीचड़ में धंसना नहीं चाहता था। फिर गाड़ी बाहर कैसे निकले।
गाड़ीवान उसे में बैठकर जोर-जोर से हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा। उसका अभिप्राय था कि हनुमान जी आयें और गाड़ी खींचकर बाहर निकालें।
पाठ करते बहुत देर हो गई। पर हनुमान जी नहीं आयें। वह झल्लाने लगा और बुरे-भले शब्द कहने लगा।
एक किसान पास के खेत में हल जोत रहा था। उसने यह तमाशा देखा और बोला, मूर्ख, हनुमान जी तो अनदेखे पर्वत को उखाड़ लाए थे। तू उनका भक्त बनता है तो कीचड़ में उतर कर पहियों जोर क्यों नहीं लगाता ताकि धकेले जाने पर वे आगे बढ़े। हनुमान जी समुद्र में कूद पड़े थे तुझसे कीचड़ में भी नहीं उतरा जाता।
अन्धविश्वासी भक्त को चेत हुआ। उसने अपनी गलती समझी। कीचड़ में उतरा पहियों को जोर लगाया। गाड़ी आगे चली और कीचड़ से पार हो गई। जो काम अपने पुरुषार्थ से हो सकता है उसके लिए आलसी बन कर देवता को क्यों पुकारा जाय?
प्रकृति की अपनी सुनियोजित विधि-व्यवस्था है। उसका घटक सुव्यवस्था से संचालित इतना क्रमबद्ध, नियमानुकूल होता है जिसे देखकर मानवी बुद्धि आश्चर्यचकित ही नहीं, हतप्रभ भी रहना पड़ जाता है। इस समूचे तंत्र को विज्ञानविदों ने अपनी भाषा में परिस्थिति की तंत्र अथवा “इकोसिस्टम “ कहकर निघ्यपित किया हैं इस तंत्र में कहीं भी होने वाली अराजकता सूची व्यवस्था को गड़बड़ा देती है। इस गड़बड़ाने को प्राकृतिक असंतुलन को ही दैवी प्रकोप, विभीषिकाएँ जैसे नाम दिण् जात रहे है।
मानव भी इसी सुच्चय, का परस्पर अन्योन्याश्रित तंत्र का एक घटक है। गत कुछ शताब्दियों से उसने संकीर्ण स्वार्थपरता के जाल में उलझकर इस तंत्र में मनमानी उलटफेर करना शुरू कर दिया हैं। इस अव्यवस्था अनुशासनहीनता ने समूची परिस्थिति को ही गड़बड़ाया हैं। इसी कारण जो प्रकृति अभी तक सीधी सादी गौमाता की भाँति तरह-तरह की सम्पदा का दुग्ध पिला कर मानव अभिवर्धन-पोषण करती आयी थी, वहीं अब क्रुद्ध सिंहनी की तरह सूखा-अतिवृष्टि, भूकंप-ज्वालामुखी-विस्फोट अप्लवार्षाष् महामारी आदि प्रकोपों के रूप में उसकी जान लेने को उतारू है।
प्रकृति का सरलता से आवश्यकता की सीमा के भीतर उपयोग करने की जगह पेट फाड़कर सारा दुग्ध निकाल लेने की प्रक्रिया यूरोपीय देशों ने ही आरंभ की। इसी कारण चिन्तक ओसवाल्ड स्पेन्गरनर ने अपनी एक कृति “हुमनरेस एण्ड इट्स प्रोगेस” में आधुनिकता की दौड़ में भागने वाले यूरोप एवं अमेरिका जैसे राष्ट्रों का पतन (“डिक्लाइन ऑफ नार्थ ब्लॉक”) नाम दिया।
“प्राब्लम्स ऑफ द कन्टेम्पररी वर्ल्ड” नामक पुस्तक में कई विद्वान लेखकों के निबन्ध है॥ इनमें डॉ. ईगार मैक्सीमाँर एवं यूरी प्लेन्टीकोव ने “द इकॉलाजिकल सिचुएशन टुडे एण्ड फ्यूचर ऑफ मैनकाइण्ड” नामक लेख में लिखा है कि प्रकृति के रोष से उत्पन्न प्रकोपों को देखते हुए फैक्ट्री में कार्यरत मजदूरों से लेकर, दफ्तरों के क्लर्क, उच्च श्रेणी वर्ग के अधिकारी तथा इंजीनियर, डाक्टर, प्रशासन वर्ग सभी अपने अस्तित्व के बारे में अनिश्चितता महसूस करने लगे हैं एवं यह बढ़ते हुए तनाव का इन दिनों सबसे प्रमुख्चा कारण है
इटली के अर्थशास्त्री तथा क्लब ऑफ रो के संस्थापक श्री आँरिलियों पैक्की अपने शोध प्रबन्ध “ द प्रिडिकामेण्ट ऑफ मनकरइएड” में लिखते है कि “प्रकृति उत्तेजना से हुई गड़बड़ियों तथा उत्पन्न या संपन्न या आसन्न विभीषिकाओं से विश्व का हर सत्य सोचने वाला नागरिक चिन्तित है। किन्तु हर स्थान के वैज्ञानिक, मनीषी समस्या निवारण संबंधी जो उपाय खोज रहे हैं, उनसे ऐसी समस्याएँ कम होने के स्थान पर बढ़ रही है।” उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करत हुए अपनी इस कृति को समझा जा रहा है जब कि वास्तविकता यह है कि विभीषिकाओं की जड़ प्रकृति न होकर मानव स्वयं हैं, उसकी अपनी दुर्बुद्धि है।” अ अपनी इस कृति में वे आगे कहते हैं कि समष्टिगत इन समस्याओं को किसी राष्ट्र अथवा क्षेत्र विशेष की समस्या न मानकर विश्व भूमण्डल की ‘ग्लोग’ की समस्या माना जाना चाहिए। श्री पैक्की ने इन्हें वृहत वैश्व समस्याएँ (वर्ल्ड मेक्रोप्राब्लम्स) नाम दिया है तथा इन समस्याओं को मुख्यतः पाँच भागों में विभाजित करते हुए स्पष्ट किया हैं। इनमें से प्रथम है-जनसंख्या की अमर्यादित अभिवृद्धि तथा पृथ्वी द्वारा इस भार को सह पाने की अक्षमता। द्वितीय है प्राणदायक स्रोतों का अभाव। तृतीय है वातावरण में मिली विषाक्तता। चतुर्थ है मनुष्य के चिंतन के स्तर में रुकावट एवं गिरावट तथा पांचवीं समस्या जिसे वह कहते है कि उसके समाधान में ही सभी का समाधान है। वह है-वर्तमान समय के अनुरूप एक ऐसे सजि और ग्रारह दर्शन की आवश्यकता, जो मनुष्य की बुद्धि एवं चिन्तन को उलटकर उसे संहारक की जगह सृजनात्मक बना दे। मूलतः तथ्य वहीं है अध्यात्म के स्तर तक पहुँचकर वान द्वारा अपनी दिशा अधो से ऊर्ध्वगामी बनाना।
उपरोक्त विचारो का समर्थन “द लिमिट्स टु ग्रौथ” नामक पुस्तक में ‘म्साचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी “ के डी. एच. मीडीज, डी.एल.मीडीज, जे. रेण्डस्र आदि अध्येताओं ने किया है। पर्यावरण का “डीप एकालोजी” के स्तर पर अध्ययन का समर्थन का समर्थन करने वाले इन वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी के अंतराल में छिपे भण्डागार की एक सीमा है। यदि मनुष्य अपनी जनसंख्या को स्थिर नहीं कर लेता तथा अपने जीवनक्रम से विलासिता को हटाकर व्यवहार में सादगी एवं साधकों के सदुपयोग की नीति का समावेश नहीं कर लेता तथा मनुष्य जाति अगली शताब्दी का मध्याह्न शायद ही देख पाए। इन्हीं विचारों को सू.एस.ए.केत्रजेत्र फाँस्टरर ने “अबन्नडायनेमिक्स” नामक ग्रंथ में स्वीकार किया हैं। उन्होंने अपनी कृति में शहरीकरण की वृति को लताड़ते हुए भारत के प्राचीन जीवन दर्शन एवं समस्वरता-सादगी से भरे जीवनक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उसे अनुकरणीय बताया है, साथ ही यह भी लिखा है कि विडम्बना यही है कि भारतवासी दूसरों द्वारा अनुकरणीय कहे जाने वाले चिन्तन को स्वयं भुलाते एवं छलावे भरे पाश्चात्य जीवन को अपनाते चले जा रहे हैं।
ऐसे भी चिन्तक हैं जो जे. फारेस्टर, मीडोज व रेर्ण्डस की मान्यताओं की हँसी उड़ाते हुए उन्हें आदिम−युग की ओर लौटने की प्रेरणा देने वाली विचारधारा मरनते है। संसेक्स विश्वविद्यालय के ये अध्येता कहते हैं कि शहरों से गाँवों की और लौटकर स्वच्छ हवा एवं शुद्ध जल का उपयोग करने तथा स्वस्थ जीवन जीने की बात पिछड़ेपन की निशानी है। वे कहते हैं कि पूर्वात दर्शन की प्रशंसा करने वाले संभवतः अगले दिनों यह कहने लगेंगे कि जंगल में जाकर पेड़ों की छाल के वस्त्र पहनो, बन्दरों की तरह उछलो, कूदो, नाचो एवं फल खाते हुए प्रगति युग से दूर निर्जन में जीवन खपा दो। ऐसे व्यक्तियों में कैनेथ डेहल बर्ग, डीमोल एवं गिबी को प्रमुख है। इन आलोचकों का अभिमत है कि “विकेन्द्रीकरण की पद्धति को माना जाय तो मनुष्य को जंगल में बन्दर की तरह पुनः रहना होगा। बाज की आधुनिकता के जीवन की बहुमूल्य उपलब्धियां से स्वयं को वंचित कर डार्विन की उक्त “मनुष्य का पुरखा बन्दरि” इसे प्रमाणित करना कहाँ की बुद्धिमानी हैं?”
उपरोक्त आधुनिक विचारकों के उपभोगवादी चिन्तन का प्रत्युत्तर “इकालाँजिस्ट” पत्रिका में डॉ. पेस्टल एवं मजाँकोविक ने “ए स्टे्रटजी ऑफ सरवाइवल” नामक निबन्ध में दिया है। अपने विद्वतापूर्ण निबन्ध में पर्यावरण की महत्ता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा है कि “ससैक्स विश्वविद्यालय के उपरोक्त विद्वानों के कथन को किसी भी स्थिति में वाक्चातुर्य से अधिक नहीं माना जाना चाहिए। आज की परिस्थितियाँ व तद्जन्य परिणतियाँ किसी से छिपी नहीं हैं। यदि मनुष्य ने अपनी जीवनशैली में अछपी परिवर्तन नहीं किया तो संभवतः वह जंगलों में रहने के लिए भी अपना अस्तित्व न बचा पाए, यहाँ तक कि आश्रय लेने को जंगल भी शेष न बचे।”
डॉ. आरेलियो पेकी अपने एक ग्रन्थ “जीरोग्रोथरेट” में जनसंख्या की स्थितरता की बात बताते हुए इस तथ्य पर विशेष बल देते हैं कि प्रकृति के साथ समस्वरता स्थापित की जाय। वे कहते है कि मनुष्य मात्र इसी को लक्ष्य बना ले तो अधिकाँश समस्याओं से मुक्ति पा जाएगा। इ.के. जयोदोरोवच अपनी कृति “इन्टरएक्शन ऑफ सोसाइटी एण्ड नेचर” में उपरोक्त कथन पर अपनी सहमति व्यक्त करते हुए कहते है कि प्रकृति पर पूर्णतया नियंत्रण स्थापित करने में जो बुद्धिमत्ता समझी जा रही है तथा उसके घटकों काँ जिस तरह नष्ट कर उसे दुहा जा रहा है, वह प्रस्तुत बुद्धिमत्ता न होकर बुद्धिहीनता ही है।
क्लब ऑफ रोम नामक संस्था के विचारकों ने “ग्लोगल इक्वीलिब्रिसम” या वैश्व सामंजस्य की बात कहत हुए मनुष्य एवं प्रकृति के विभिन्न घटकों के साथ सामंजस्य स्थापित किये जाने की बात पर बल देते हुए पूर्व में की गई भूलों के परिमार्जन की बात कही है। राजनैतिक स्तर पर श्री विली ग्राँट (भूतपूर्व चाँसलर पत्र जर्मनी) ने अपनी पुस्तक “नार्थ-साउथ ए प्रोग्राम फॉर सरवाइवल” (कैंब्रिज, ण्म.आय.टी. प्रेस) में एवं अभी-अभी पिछले दिनों सोवियत रिपब्लिक के कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव मिखइल गोर्वेचाव ने सोवियत काँग्रेस के समक्ष विश्व की समस्याओं पर अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “हम सभी को प्रकृति के हितों का संरक्षण करना चाहिए तभी वह हमारा संरक्षण कर सकेगी। पर्यावरण को ग्लोबल स्तर पर ही देखा जाने पर विश्व कर समस्याएं सुलझ सकेंगी।
ब्ी.आ. वेनेंदस्की ने अपनी कृति “बायोजियों केमीकल ऐसेज” ने मानव के तीन स्तरों तथा अद्यतन परिस्थितियों का सुसंबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया है। उन्होंने ये तीन स्तर नूध्स्फियर अर्थात् मानवी चिन्तन, बायोस्फियर अर्थात् जैविक स्तर एवं टेक्नोस्फियर अर्थात् तकनीकी उपलब्धियों का स्तर बतायें है। वे अपनी इस कृति में लिखते है कि मनुष्य की मानसिक गड़बड़ी के कारण ही उसके चिन्तन ने दिशा विहीन होकर असम्बद्ध एवं अमर्यादित टेक्नोस्फियर का निर्माण किया है, जिसने सभी वर्जनाओं को लांघना आरंभ कर दिया है। यही आज की व्यक्तित्व समष्टिगत विभीषिकाओं का मूलभूत कारण है।
इसी तथ्य को यदि और सरल ढंग से लिखा जाय तो सह कहा जा सकता है कि मनुष्य के दिमागी स्तर की गड़बड़ से उत्पन्न विकृत चिन्तन ने ही कल-कारखाने, सुविधा के साधन, परमाणु हथियारों से पृथ्वी को पाट देने की होड़ शुरू की है। इससे उत्पन्न प्रदूषण से जैविक स्तर का अस्तित्व खतरे में पड़ गया दीखता है। इसी कारण डॉ. वेर्नेद्स्की सारी गड़बड़ियों का मूल कारण नूस्फियर अर्थात् मानवी चिन्तन को मानते हैं।
एम.एम. कैम्शिलोव “मैन एण्ड लिविंग नेचर” में उपरोक्त कथन में विश्वास व्यक्त करते हुए तकनीकी स्तर क्रम को मर्यादित करने तथा मशीनों से किये जाते है उनमें से अधिकाँश मनुष्य स्वयं अथवा अपने कनिष्ठ गंधु यथा पशुओं के माध्यम से कर सकता है। इस प्रकार इस कथन से वे स्वयं के गाँधीवादी होने की झलक देते व ग्राम स्वराज्य की नीति को प्रधानता देते देखे जाते है। वे कहते है कि ग्रामीण जीवन का अवलम्बन नहीं देते लिया गया, तो हो सकता है मनुष्य अपना अस्तित्व ही खो बैठे एवं डाँयपासोयर्स, पेरोपेट्स आदि की तरह उसकी गिनती एक्सटिंक्ट एनिमल्स में होने के लगे। हैनरी बर्ग साँ के अनुयायी इ.ले. राँय ने अपनी फ्रेंच कृति “ल एक्सीजेन्स आयडिएकलस्अ एट ले. फेंट डे ल इवाँल्यूशन “ में तथा पियरे टेलहार्टद चार्डिन ने भी “नू स्फियर के परिवर्तन, परिवर्तन तथा विकास की आवश्यकता पर बल दिया है। उनके अनुसार इस स्तर को उलट कर सीधा किये बिना परिथति की तन्त्र का सुचारु रूप से चलाने की बात उसी तरह होगी, जिस तरह पेड़ बढ़ाने के लिए उसकी जड़ें काटकर पत्ती को सींचा जाए।
“इ कालाँजिकल सियुएशन टुडै एण्ड द फ्यूचर टुडं एण्ड ऑफ मैनकाइण्ड “ नामक ग्रंथ में डॉ. इगार मैक्सीभोव स्वीकार करते हैं कि वर्तमान में मनुष्य के मानसिक चिन्तन की विकृति को सुधारने की तथा सर्वग्राही तर्क-समस्त दर्शन तथा जीवन शैली को अपनाने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही संभावना है कि संभावना है कि स्थिति में विधेयात्मक परिवर्तन हो सके।
वस्तुतः चिन्तन ही वह आयाम है जहाँ से स्थूल कार्यों की अभिव्यक्ति की दिशा नहीं बदली तो भविष्य में प्रकृति का कोई एक परमाणु अथवा परमाणु समुच्चय मात्र नहीं प्रभावित होगा बल्कि समूचा वातावरण एक ऐसा जंजाल बनकर रह जाएगा। यह कहा जा सकता है कि भविष्य वाणियाँ हमेशा सत्य नहीं होतीं किंतु वे असत्य तभी होती है जब वर्तमान का ढर्रा बदला जाय, स्थिति में परिवर्तन आए। आने वाले दिनों में मानव जाति का भविष्य उसकी मनःस्थिति पर निर्भर है यदि उसमें क्रान्ति लायी जा सकी, उसके वर्तमान निषेधात्मक संकल्प बदले जा सके तो निश्चित ही भविष्य उज्ज्वल होगा।
एक सन्त खेल बरामदे में गहरी नींद सो रहे थे। पुजारी उधर से घूमता हुआ आया, देखा कि एक व्यक्ति मन्दिर की ओर पैर करके सोया हुआ है।
उसने उसे झकझोर कर उठाया और कहा - भगवान के घर की ओर पैर करके सो रहा है। दूसरी तरफ पैर कर।
मुसाफिर हड़बड़ाकर उठ बैठा। उसने झकझोरने वाले से कहा - “कृपया इतना कष्ट और कीजिए कि पैरों को उस तरफ घुमा दीजिए जिस ओर भगवान का घर न हो।”
पुजारी से कुछ उत्तर देते न बन पड़ा।
मृत आत्मीयजनों के प्रति मोह स्वाभाविक होता है। ऐसे बिरले ही होते है जो उस बेला में अपने आपको संतुलित रख होनी को स्वीकार कर सकें। मरण को स्वाभाविक क्रिया मान कर जीवात्मा की शाश्वतता, चिरन्तनता को स्वीकार किया जाना चाहिए, इस तथ्य की पुष्टि अनेकों पौराणिक आख्यानों से होती हैं।
राजा प्रद्युम्न बीमार पड़े। बहुत चिकित्सा कराने पर भी कोई लाभ नहीं हुआ। अन्ततः मरण-बेला आ पहुँची और उनके प्राण निकल गए। राजमहल में शोक छा गया। रानी, राजपुत्रों समेत सभी विलाप करने लगे। सोचने लगे कि किसी प्रकार राजा का मृत शरीर पुनर्जीवित हो उठता तो कितना अच्छा होता।
उन दिनों महर्षि पुरंध्र अनेक ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता थे। उनकी कृपा से बड़ी से बड़ी विपत्ति टल जाने एवं असंभव भी संभव हो जाने की ख्याति फैली हुई थी। संयोगवश राजा की मृत्यु के तुरन्त बाद वे उधर आ निकले। उन्होंने उचित समझा कि शोक संतप्त परिवार को सान्त्वना दी जाय एवं राज्य की भावी व्यवस्था की रूपरेखा देख देख जाए। मृत राजा उनके भक्तों में से एक जो थे।
महर्षि पुरन्ध्र का आकस्मिक आगमन देखकर सभी उपस्थित लोगों में आशा का संचार हुआ। वे सभी एक स्वर से एक ही आर्त निवेदन करने लगे कि किसी प्रकार राजा को पुनर्जीवित कर दिया जाय।
महर्षि ने उन्हें लाख समझाया। जन्म मरण की अनिवार्यता कर विवेचन वे काफी देर करते रहे व धैर्य बँधाते रहे। पर उस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सभी कर आग्रह एक ही रहा कि राजा को जीवित कर दिया जाय।
पीछा छूटने का कोई मार्ग न दीखने एवं स्वजनों का अत्यधिक मोह दिखाई पड़ने पर महर्षि उस शर्त पर तैयार हुए कि राजा की आत्मा ने जिस नये शरीर में जन्म ले लिया हैं, वहाँ सब लोग मिलकर चलें। उनसे वापस लौट चलने का अनुरोध करे। यदि वे स्वीकार कर लेंगे तो उनका नया शरीर नष्ट करके पुराने में लौटाने की व्यवस्था बनाने कर प्रयास करें।
राजा प्रद्युम्न ने एक पेड़ पर काष्ठ कीट के रूप में जन्म ले लिया था। वहीं समूचे राज परिवार को ले जाया गया। कीड़े का दिखाया गया। साथ ही महर्षि ने यह सुविधा भी बना दी कि कीटक के साथ उपस्थित परिवारीजनों कर संभव हो सके।
यह ज्ञात होते ही कि यह काष्ठ कीट ही राजा प्रद्युम्न हैं, सभी परिवारीजन उनसे वापस लौट चलने का आग्रह करने लगे। उनके नये शरीर को नष्ट करने के लिए सभी उतारू थे एवं बार-बार आश्वस्त कर रहे थे कि आपकी काया का हमने संभाल कर रखा है।
कीटक शरीरधारी राजा ने कहा-”सज्जनो! आप व्यर्थ मोह कर रहे हैं। अब मेरा पिछले परिवारीजनों से कोई लगाव नहीं रहा। आप सब को तो मैं जानता तक नहीं। नयी काया वनये परिकर में रहते हुए ही मुझे संतोष है। अपना परिवार भी शीघ्र बसाने जा रहा हूं। इसमें आप व्यवधान मत डालिए। प्रस्तुत चोले में परिवर्तन की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं हैं।”
सभी हतप्रभ थे। महर्षि ने पहले ही यह व्यवस्था बनी दी थी कि राजा वापस लौटने को तैयार होंगे तो उन्हें पुराने शरीर में लें जाया जाएगा। जब देखा कि राजा का पुराने संबंधियों से कोई लगाव नहीं रहा अपना हठ छोड़ सभी दुखी मन से लौट आए।
प्रद्युम्न के मृत शरीर का अंत्येष्टि संस्कार किया गया। कुटुम्बियों का शोक क्रमशः घटता चला गया। सभी को यह बात भली प्रकार समझ में आ गई कि जो जिस योनि में रहता है, वही उसे प्रिय लगने लगती है। आत्मा का न कोई घर है, वही उसे प्रिय लगने लगती हैं। आत्मा का न कोई घर संबंधी होता हैं, न रिश्तेदार अतः मृत परिजन के प्रति व्यर्थ मोह न कर उचित अंतिम क्रम आदि कर मोह से मुक्ति एवं मृतात्मा को शान्ति दी जानी चाहिए।
ऊँट और गधा साथ-साथ नदी पार कर रहे थे। ऊँट ने थाह लेने के लिए पहले पार जाने का निश्चय किया। नदी का पानी ऊंट के पेट तक ही पहुँच पाया।
ऊँट ने आवाज दी कि पानी आधे पेट जितना ही है। गधे ने कहा आपके आधे पेट का पानी है सो ठीक है। पर मैं तो इतने में ही डूब जाऊँगा। मुण् आपकी नकल नहीं करनी है वरन् अपनी हैसियत देखनी है।
अब सह निर्विवाद रूप से प्रमाणित होता जा रहा है कि मानव-मानव के बीच कोई ऐसी प्रक्रिया अवश्य काम करती है, जिसके द्वारा सूचनाओं का सूक्ष्म स्तर पर आदान-प्रदान संभव हो पाता हैं। आध्यात्म के क्षेत्र में दूरवर्ती लोगों को प्रभावित करने, विचारों को सम्प्रेषित करने का यह माध्यम काफी फलितार्थों की साथ ग्रन्थों में वर्णित है, इस पर अब विज्ञान जगत से भी मान्यता मिल गयी है। इस दिशा में अनेकानेक प्रयोग परीक्षण हुए हैं, जिनसे टेलीपैथी, थॉट ट्रांसफर एवं थॉट रीडिंग जैसी मान्यताओं की यथार्थता पर वैज्ञानिकों ने भी आनी मोहर लगा दी है।
इन सामर्थ्यों के अस्तित्व में होने का प्रथम वैज्ञानिक परीक्षण वे उसकी पुष्टि सर्वप्रथम कम्युनिस्ट देश रूस में हुई। वहाँ पर “पोपोव-ग्रुप “ नारमक मुर्धन ने वैज्ञानिकों के एक दल ने इस दल के लिए पहला प्रयास आरंभ किया। इसके लिए कैमेन्स्की एवं निकोलाई नामक दो सबजेक्ट चुने गए। कैमेन्सकी को मास्को में रखा गाया एवं निकोलाई को चार सौ मील दूर लैनिन ग्राद कि एक साण्ड पू्रफ प्रयोगशाला में। कुछ समय पश्चात निकोलाई ने संदेश ग्रहण करने के लिए जब स्वयं को मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार कर लिया तो उससे संबद्ध ई.ई.जी. मशीन में अल्का मस्तिष्कीय तरंगें प्रदर्शित करनी शुरू कीं। निकोलाई को इस बात की तनिक भी जानकारी नहीं थी कि दूसरी ओर से विचार संप्रेषण प्रक्रिया कब प्रारम्भ होगी। थोड़ी देर उपरान्त जब मास्को से संदेश संप्रेषण की क्रिया आरम्भ हुई तो निकोलाई की ब्रेन वैव्स में महत्वपूर्ण परिवर्तन परिलक्षित हुआ, जो इस ओर संदेश सफलतापूर्वक ग्रहण करने योग्य बनता देखा गया। रिसेप्टर के मस्तिष्क से निकलने वाली अल्फा तरंगें इसी बात की द्योतक थीं। इसके प्रमाण स्वरूप जब ग्रहीता के स्थान पर निकोलाई की जा जगह एक ऐसे व्यक्ति को रखा गया जो आक्रामक प्रवृत्ति का व निषेधात्मक चिन्तन काथा, तो तो वह उन विचारों को पकड़ने में सर्वथा विफल रहा, जो दूसरी ओर से उसके लिए भेजे जा रहे थे।
वस्तुतः विचार के रूप में संप्रेषित यह और कुछ नहीं वरन् विशेष स्तर की विशिष्ट वेंवलेंग्थ वाली मस्तिष्कीय विद्युतीय तरंगें ही होती है। ग्रहण करने वाली व्यक्ति से भी जब इस स्तर की तरंगें निकलती है तभी वह उन्हें आकर्षित कर पाता है, अन्यथा नहीं। रेडियो कार्यक्रम में प्रसारण केन्द्र से संगीत को एक विशेष आवृत्ति पर भेजा जाता है और उस उसे सुन पाते हैं। मनुष्य में उसकी भिन्न-भिन्न मानसिक तरंगों के लिए उसका चिन्तन तंत्र जिम्मेदार है व्यक्ति यदि सात्विक प्रकृति का रहा है तो उसकी विचारणा भावना भी सौम्य-सात्विक होती है, जो आपनी ही प्रकृति की सतोगुणी व उच्चस्तरीय मस्तिष्कीय रिद्म उत्सर्जित करती हैं। ऐसे ही व्यक्ति सूक्ष्म संदेशों को पकड़ने में सफल होते पाये गये हैं।
प्रयोगों के दौरान यह भी देखा गया है कि ग्रहीता और प्रेषक जब उच्चस्तरीय भाव धारा से जुड़े होते हैं, तो उनमें से एक की दिमागी तरंग में परिवर्तन वही बदलाव दूसरे में भी संचालित होता है। रूसी शोधकर्ताओं द्वारा सम्पन्न किये गए एक ऐसे ही प्रयोग का उल्लेख एमू तिजल ने “इण्टरनेशनल जनरल ऑफ पैरासाइकोलॉजी” नामक पत्रिका के एक लेख में किया है। इस प्रयोग में कैमेन्स्की के सक्षम जलने-बुझने वाली एक प्रेज्ञश ट्यूब (स्ट्रोबोस्कोप) रखी गई, जिसकी ओर जब निकोलाई ने स्वयं को संदेश प्राप्त करने के अनुकूल बनाया, तो थोड़ी देप पश्चात् देखा गया कि उसकी तरंगों की आवृत्ति भी बिल्कुल वही हो गई जो सम्प्रेषक की थी। ऐसा ही निष्कर्ष जैफरसन मेडिकल कालेज फिलाडेल्फिया के दो नेत्र विशेषज्ञों दो जुड़वा भाइयों पर किए गए प्रयोगों से मिला जिसका वर्णन न्यूयार्क के “हैराल्ड ट्रिब्यून” पत्र के “ट्वीन पू्रूव एलेन्ट्रोनिक ईएसूपी नामक निबन्ध में से जे हिक्सन द्वारा किया गया है।
वैज्ञानिक कहना है कि शब्द शक्ति कभी नष्ट नहीं होती। हम जो कुछ सोचते विचारते हैं वह विचार तरंगों के रूप में अन्तरिक्ष में घूमता रहता है। वैज्ञानिकों ने इस परिधि को “आइडियोस्फियर” नाम दिया है। उनका कहना है कि भाव तरंगें इसी क्षेत्र में मंडराती रहती है। यदि हम अपनी चेतना विचार को उस स्तर तक परिष्कृत कर सके तो ऊपर चक्कर काटती उदात्त विचारणाएँ सहज ही मि तक आकर्षित होकर हमारे कार्य में सहयोग दे सकती हैं। अमरीकी शरीर शास्त्री डब्ल्यू पेनफील्ड एवं एचूएचू जास्फर अपनी पुस्तक “एकपीलेप्सी एण्ड दि फन्क्शनल एनाटाँमी ऑफ दि ह्यूमन ब्रेन “ में लिखते है कि सापेक्षवाद के जनक एवं विज्ञान जगत के मूर्धन्य भौतिकीविद् अल्बर्ट आइन्स्टीन की मस्तिष्कीय तरंगों की जाँच से पता चला था कि उनके मस्तिष्कों अनवरत अल्फा वैव्स अल्फा तरंगें निकलती थी, चाहे वह जटिल से जटिल गणितीय गणना में ही निकलती थी, चाहे वह जटिल से जटिल गणितीय गणना में ही क्यों न उलझे हो। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि अल्फा तरंगें मस्तिष्क की समग्र सक्रियता की स्थिति में निकलती हैं। उनके अनुसार आइन्स्टीन की अधिकाँश समस्याओं के इल दिमाग में अकस्मात आते थे और इस प्रकार वे अपनी गणितीय जटिलताओं को बड़ी आसानी से सुलझा लेते थे। उनका कहना है कि सापेक्षवाद का प्रसिद्ध सिद्धान्त भी ऐसी ही एक चिन्तन प्रक्रिया के दौरान उनके मस्तिष्क में अनायास कौंधा था, जो बाद में भौतिकी का आधार स्तम्भ बना।
स्पष्ट है - आइन्स्टीन का मस्तिष्क सदा संवेदनशील अनुल पिसेप्टर की दशा में बना रहता था। संभव है उनकी यह स्थिति आइडियोस्फियर की उच्चस्तरीय विचारणाओं की फ्रीक्वेंसी से ट्यूण्ड हो जिसके कारण हर वक्त उन्हें वहाँ से मार्ग दर्शन मिलता रहता था। यदि उनके व अन्यान्य आविष्कारकों, अचन्तको के साथ सचमुच ही ऐसा होता था तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई गात नहीं होनी चाहिए।
सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी यदाकदा ऐसा घटित हो जाता है। मि किसी विषय पर सोचते होते है गंभीर चिन्तन की स्थिति में होते हैं पर तभी कोई ऐसा चार यकायक क्रोध उठता है जिससे हल आसान हो जाता है?। यह शक्य है कि ऐसे समय हमारा संपर्क सूत्र कुछ क्षण के लिए आइडियोस्फियर से जुड़ जाता हो पर अधिक देर तक यह अवस्था न बनाये रख पाने के करण संपर्क टूट जाता हो और कोई अनय जानकारी न मिल पाती है।
अब प्रश्न यह है कि ऐसा ही होता है तो वह कौन सा माध्यम है जिसके कारण अन्तरिक्ष में विद्यमान स्वतंत्र विचार तरंगें किसी व्यक्ति में संचालित होती है अथवा एक स्थान से दूसरे स्थान तक एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक द्रुतगति से पहुँचती है?
ज्ञातव्य है कि हम ऊर्जा के अनन्तः सोगर में रह हैं। समस्त जीव जगत में उसी का कगीड़ी कल्लोल संव्याप्त है अपनी व्यष्टि सत्ता भी उसी की अभिव्यक्ति है। जो प्राण हम में है वहीं अन्सो में और इस शून्याकाश में भी है। इस प्रकार देखा जाय तो ज्ञात होगा कि सब में एक ही प्राण प्रवाह संचारित हो रहा है और परोक्ष रूप से मि सब एक दूसरे से जुड़े हुए है।
स्वामी अभिदान्नद ने अपने ग्रंथों में लिखा है कि आध्यात्मिक पुरुष अथवा योगीजन दूसरों के मनोभावों को इसलिए जान लेते हे क्योंकि हमारे प्राण-परमाणु निकल कर वातावरण में आते जाते रहते है। इसी माध्यम से वे सामने वाले के विचारों को समझ पाते हैं।
सर्वविदित है समानधर्मी विचार आपस में मिलते और घनीभूत होने रहते हैं। बुरे व्यक्ति सदा अपनी ही प्रकृति के लोगों की ओर आकर्षित होते है और सर्वदा औंधे सीधे कृत्य में संलग्न रहते हैं, जबकि सदाचारियों का संपर्क भले व्यक्तियों से होता है। इस संदर्भ में जीव विज्ञानी डॉ. जैम्बीसमोनाड का कथन अधिक युक्ति अपसंगत जान पड़ता है। कि दुराचारी व्यक्ति अपनी ही प्रकृति के विचारों को अनजाने में अंतरिक्ष से खींचते रह कर कुमार्ग के दलदल में इस प्रकार फँस जाते हैं कि उससे बाहर आ पाना स्वयं के बलबूते असंभव सा हो जाता हैं इस आधार पर यदि व्यक्ति अपनी धारणा को सुव्यवस्थित ओर भावनाओं को परिष्कृत सुविकसित कर सके तो न सिर्फ विचार संप्रेषण ग्रहण और वातावरण से बहुमूल्य अनुदान ग्रहण करने में ही वह सफल होगा, वरन् ब्राह्मी चेतना से भी तब संपर्क साधना संभव बन पड़ेगा।
वृत्रासुर का पराक्रम असाधारण था। उसने देवताओं का परास्त करके इन्द्रासन पर अधिकार कर लिया।
वृत्रासुर को हरा सकने जैसा कोई अस्त्र देवताओं के पास नहीं था। मुसीबत की घड़ी में नारद जी से भेंट हुई उनसे संकट निवारण का उपाय पूछा गया।
नारद जी ने बताया कि महर्षि दधिची की अस्थियों में इतना प्रचंड तप बल है कि वे किसी प्रकार मिल जाय और उनका वज्र बन सके तो उससे असुरों का परास्त किया जा सकता है।
देवता दधिची के पास पहुँचे। अपनी व्यथा और इच्छा बताईं उदारमना दधीचि ने इतना बड़ा त्याग करना भी सहज स्वीकार कर लिया और अपनी अस्थियाँ देवताओं को दान में दे दी।
वज्र बना और असुरों को परास्त किया गया।
जीवन जीते समय खिलाड़ी द्वारा खेले जाने जैसी मनःस्थिति होनी चाहिए। आये दिन घटित होने वाले घटना-क्रमों को संसार में निरन्तर चलने वाली अनुकूल प्रतिकूल लहरों में से एक मानना चाहिए। समुद्र में ज्वार-भाटे आते रहते है। तालाबों में लहरे उठाती रहती है, पर इससे उनके अन्तराल में स्थिरता ही बनी रहती है। कोई विक्षेप नहीं होता। उसी प्रकार समय–समय पर आती जाती रहने वाली अनुकूलताओं प्रतिकूलताओं के संबंध में भी मन को समय-संतुलित बनाये रहना चाहिए। यह तभी संभव हो सकता है जब बदलती परिस्थितियों की क्रमबद्धता को सामान्य माना जाये। उन्हें असामान्य होने का महत्व न दिया जाये।
मनोविज्ञान जैम्स का कथन है कि “यह संभव नहीं कि सदा अनुकूलता ही बनी रहे कभी प्रतिकूलता ही बनी रहे। कभी प्रतिकूलता न आये। “ दिनमान की कितनी ही महत्ता क्यों न हो पर उसका भी संध्याकाल में अवसान होता ही है। दिन के समय जो प्रकाश था, ऊष्मा का जैसा प्रवाह था उस सबका रात्रि का आगमन होते ही अन्त हो जाता है। परिस्थिति सर्वथा विपरीत बन जाती है, सघन अंधकार छा जाता है। इस परिवर्तन को रोका नहीं जा सकता। अंधकार से कितना ही डरा जाय कोसा जाय वह नियति क्रम के अनुरूप आता ही है। उस आगमन को रोकने के लिए सिर खपाने की अपेक्षा सही उचित है कि अपनी गतिविधियों में ऐसा हेरफेर कर लिया जाय तो परिवर्तित परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा सके।
रात्रि के आमतौर से सभी सो जाते है। इस विवशता के पीछे एक लाभ भी है कि दिन भर के किये हुए श्रम की थकान मिटती है। दूसरे दिन नई स्फूर्ति के साथ काम करने का अवसर मिलता है। दिन छिपने पर सभी घर लौट आते हैं है ओर परिवार के साथ रहने, मौज मनाने का अवसर प्राप्त करते है। रात्रि निरर्थक असुविधाजनक और डरावनी प्रतीत होती है तो भी विचार करने पर प्रतीत होता है। कि उसकी भी अपनी उपयोगिता और आवश्यकता थी। प्रकृति ने इसी आधार पर उसका अहर्निश चलते रहने वाला चक्र घुमाया है।
ऋतु परिवर्तन में एक दूसरे से सर्वथा भिन्नता रहती है। वर्षा के दिनों वाली स्थिति सर्दी में नहीं रहती। जो दृश्य सर्दी और शरद की परिस्थितियां अपने ढँग की अनोखी हैं। उस समय जैसी परिस्थितियाँ अन्य किसी ऋतु के साथ नहीं बनती। हो सकता है किसी को कोई ऋतु अनुकूल पड़ती हो किसी को प्रतिफल। बुवाई के दिनों में वर्षा उपयोगी लगती है और कटाई के दिनों गरम मौसम सुहाता है। कुम्हार पूरे साल सूखा पसंद करता है ओर माली का उद्यान तब उमंगता है, जब बदली छाई रहे, बूंदा–बांदी होती रहती रहे। भावुकों की उमंग बसन्त में इतराती है। कास फूलने से शरद में समूचा क्षेत्र सुवाहना लगता है। यह पसंदगियाँ कितनी प्रिय क्यों न लगती हो पर उनका सदा बने रहना संभव नहीं।
थोड़े-थोड़े समय के लिए वे अपनी छटा दिखाती हैं और फिर दूसरे दौर में बदल जाती है। उन्हें इस बात की परवाह नहीं और किनको अप्रिय। नियति का क्रम नहीं बदला जा सकता, अपने को ही उस परिवर्तन के अनुरूप ढालना बदलना पड़ता है।
खेल-खिलाड़ी निरन्तर हारते जीतते रहते है। ताश-शतरंज में भी हार-जीत होती रहती है। किन्तु खेलने वाले उसकी परवाह नहीं करते। चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देते। जो इतना कर पाते हैं उन्हीं को खेल का आनंद आता है। जो हर हार उदास होते हैं और हर जीत पर इतराते हैं उनका खिलाड़ी होना व्यर्थ है।
मध्यवर्ती संतुलित स्वाभाविक स्थिति हैं। तापमान बढ़ जाने से ज्वर माना जाता है। शरीर ठंडा रहे तो वह भी शीत प्रकोप माना और चिन्ताजनक समझा जाता है। रक्तचाप बढ़ने की ही तरह उसका घटना भी रुग्णता का चिन्ह है। किसी अनुकूलता से लाभान्वित होने पर असफलता की प्रतिकूलता का सामना करने पर विषाद में डूबे जाना और सिर धुनना भी अविकसित अनपढ़ व्यक्तित्व का चिन्ह है। इन असंतुलनों से बचा ही जाना चाहिए।
सभी व्यक्ति इच्छानुकूल आचरण करेंगे यह आशा रखना व्यर्थ है। सभी अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व रखते हैं। जन्म जन्मान्तरों के संचित भले-बुरे संस्कार साथ लेकर आते पलने और विकसित होने की परिस्थितियों में भिन्नता रहती है। किसी पेड़ के पत्तों का गठन आपस में मिलता-जुलता है पर उनमें भिन्नता अवश्य रहती है। हर आदमी के अंगूठे के निशानों में अन्तर होता है। एक आकृति प्रकृति के दो मनुष्य कहीं नहीं देखे गये भिन्नता ही इस संसार की विशेषता है। उसके आधार पर बहुत तरह से सोचने और स्थिति के अनुरूप बदलने, व्यवहार करने की कुशलता आती है। मनुष्य बहुज्ञ, बहुज्ञ, कहु कौशल सम्पन्न इसी आधार पर बनता है। उतार चढ़ावों का सामना करते रहने सक ही व्यावहारिकता में निखार आता है।
हलके बर्तन चूल्हे पर चढ़ते ही आग-बबूला हो जाते है और उसमें डाले गये पदार्थ उफनने लगते है। पर भारी भरकम बर्तनों में जो पकता है उसकी गति धीमी होती है पर परिपाक उन्हीं में ठीक से बन पड़ता है। हमें बबूले की तरह फूलना, फुदकना और इतराना नहीं चाहिए। ऐसी रीति नीति स्थिर नहीं रहती। वह कुछ क्षण में टूट-टूट जाती है। प्रवाहमान रहे तभी वह अपने स्वरूप को सही काम कर सकता है।
चंचलता वयगता की मनःस्थिति में सही निर्धारण और सही प्रयास करते धरते नहीं बन पड़ता। असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति जो सोचता है, एक पक्षीय होता है और जो करता है उसमें हड़बड़ी का समावेश रहता है ऐसी मनःस्थिति में किये गये निर्धारण या प्रयास प्रायः असफल ही होते है। उन्हें यशस्वी बनने का अवसर नहीं मिलता।
आवेश या अवसाद दोनों ही व्यक्ति को लड़खड़ाती स्थिति में धकेल देते हैं। ऐसी दशा में निर्धारित कार्यों को पूरा कर सकना साथियों के साथ उपयुक्त ताल-मेल बिठाये रह सकना कठिन जान जितनी आती है। उससे कहीं अधिक परिस्थितियों के कारण जितनी आती है उससे कहीं अधिक निज का असन्तुलन काम को बिगाड़ता है। व्यक्ति को उपहासास्पद, अस्थिर अप्रामाणिक बनाता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि उत्तेजना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। आक्रोश में भरे हुए उद्विग्न व्यक्ति न चैन से रहते है, न दूसरों को रहने रहता है। रक्त उबलता रहता हैं, विचार क्षेत्र में तूफान उठता रहता हैं। फलतः जो व्यवस्थित था वह भी यथा स्थान नहीं नहीं रह पाता। पाचन तंत्र बिगड़ता है, रक्त प्रवाह में व्यतिरेक उत्पन्न होता है, असंतुलित मस्तिष्क अनिद्रा, अर्द्धविक्षिप्तता जैसे रोगों घिरकर स्वास्थ्य संतुलन को गड़बड़ाता है। हमें हँसती -हँसाती स्थिति में ही रहना चाहिए। सफलता और प्रसन्नता का रहस्य इसी में सन्निहित है। यही जीवन जीने की सही रीति है।
चीन में उन दिनों कुछ थोड़े से शहर को छोड़कर शेष स्थानों में विदेशियों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। कभी भूल से कोई विदेशी वहाँ पहुँच जाता तो चीनी मरने-मारने को उतारू हो जाते, उसकी जान संकट में पड़ जाती।
एक बाद स्वामी विवेकानन्द चीन भ्रमण पर गये। उनकी किसी गाँव के भ्रमण की इच्छा हुई। दो दर्जन पर्यटकों की इच्छा वहाँ का ग्राम्य जीवन देखने की थी पर साहस के अभाव में उनकी प्रवेश की हिम्मत नहीं हो रही थी। उन्होंने यह बात स्वामी जी से कही तो स्वामी जी ने कहा - सारी मनुष्य जाति एक है हमें विश्वास है कि यदि हम सच्चे हृदय से वहाँ के लोगों से मिलने चले तो वे लोग हमें मारने की अपेक्षा प्रेम से ही मिलेंगे।
वे जर्मन पर्यटकों को लेकर गाँव की ओर चल पड़े। दुभाषिया उसके लिए तैयार नहीं हो रहा था पर जब स्वामी जी नहीं रुके तो वह भी साथ चला तो गया पर अंत उसे यही भय बना रहा कि कहीं वे लोग उन्हें मारे नहीं।
गाँव विदेशियों को देखकर लाठी लेकर मारने दौड़े। स्वामी विवेकानंद ने उनकी ओर स्नेह पूर्ण दृष्टि डालते हुये कहा - क्या आप लोग अपने भाइयों से प्रेम नहीं करते? दुभाषिये ने यही प्रश्न उनकी भाषा में ग्रामीणों से पूछा- तो वे बेचारे बड़े लज्जित हुये और लाठी फेंक कर स्वामी जी के स्वागत सत्कार में जुट गये। यह देखकर जर्मन पर्यटक बोले- सच है यदि आप जैसा निश्छल प्रेम सारे संसार के लोगों में हो जाये तो धरती पर कहीं भी कष्ट और कलह न रह जायेंगा।
हमारा शरीर शक्ति का भण्डागार है। अपनी इसी काया में समस्त तीर्थों, समस्त ऋषियों, देवताओं एवं समस्त शक्तियों का निवास है। विराट् में सन्निहित सब कुछ इस छोटे से काय कलेवर में सार रूप में विद्यमान है। आत्मसत्ता में सन्निहित विश्व की समस्त विभूतियों को यदि खोजा और जगाया जा सके तो जीवात्मा का देवात्मा एवं परमात्मा बनने का अवसर मिल सकता है। इस अन्वेषण प्रयास को ब्रह्म-बल उच्चकोटि का लाळा उळाने की प्रक्रिया चक्रबेधन रूप में जानी जाती है।
पृथ्वी पर छः कवच चढ़े हुए है। इन्हीं के कारण वह उल्कापातों, धूमकेतु और तड़ित वर्षायों से आत्मरक्षा कर पाती और निरन्तर विकसित होती है। यह कवच है (1) आयनोस्फियर (2) स्ट्रेटोस्फीयर (3) ट्रोपोस्फीयर (4) मीजास्फीयर (5) थर्मोस्फीयर ओर (6) एक्जोस्फीयर। यह सैकड़ों मील ऊपर तक के घेर को संभाले रहते है इसी प्रकार छः चक्रों का शक्तिशाली आवरण आत्मा के उपर सुदृढ़ आच्छादन की तरह फैला हुआ है और उसकी दैत्य-दुर्गमों से रक्षा करता है इतना ही नहीं यह चक्र विद्युत उत्पादन पावर स्टेशन की तरह चैतन्य ऊर्जा उत्पन्न करत है, जिनके सहारे मनुष्य महत्वपूर्ण काम कर सकने में समर्थ होता है।
योग शास्त्रों के अनुसार नीचे से ऊपर की ओर काया में स्थित अन षट्चक्रों के नाम क्रमशः (1) मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपुर (4) अनाहत (5) विशुद्ध और (6) आज्ञाचक्र है। सातवाँ “सहस्रार” इनका अधिपति सूत्र संचालक हैं। इन सभी चक्र प्रवाहों को झरने के उद्गम की उपमा दी जा सकती हैं जहाँ पानी बहता है। इन्हें ज्वालामुखी भी कहा जा सकता है, जहाँ से कि प्रचण्ड आग, धुआं और लावा निकलता है। इन्हें चक्रवात एवं भंवर के रूप में भी माना जा सकता है जिनमें असीम शक्ति होती है। यह स्थान छोटे रूप में हैं, पर उनका उद्गम जहाँ तहाँ से फूटता है और प्रवाह को मूल धारा से सहस्रार तक नियमित रूप से जारी रखे रहता है। यदि इन चक्र संस्थानों को योगाभ्यास द्वारा जाग्रत कर लिया जाए तो अपने भीतर ही वह सबकुछ मिल सकता हैं जिसकी तलाश हम बाहर करते और भटकते है।
यों दैव मन्दिरों में तथा लोक लोकान्तरों में देवशक्तियाँ संव्याप्त है, पर जिनकी समीप और जितनी संजीव अपने अंतरंग में हैं- उतनी अन्यत्र नहीं। जितनी सुविधापूर्वक उन्हें अपने भीतर पाया जा सकता है, उतनी सरलता और सफलता अन्यत्र नहीं मिल सकती। अन्तरंग में कहा क्या है, इसका वर्णन करते हुए संहिता (2/1/2) में कहा है - “ यह शरीर ब्रह्माण्ड संज्ञक है। जो ब्रह्माण्ड में है वहीं इस शरीर में भी मौजूद है। इसी शरीर में सुमेरु सप्तदीप तथा समस्त सरिताऐं, सागर, पर्वत, क्षेत्रपाल ऋषि, मुनि, नक्षत्र ग्रह, तीर्थ, पीठ देवता निवास करते है।” महायोग विज्ञान एवं जाबाल दर्शनों में भी इसी तरह की विशद व्याख्या की गई है। योग चूड़ामणि उपनिषद् में कहा गया है।
“षट्चक्र, षोडश आधार और पंच आकाशों को जो अपनी देह के भीतर नहीं देखता, उसका सिद्धि कहा मिल सकती है?
सत लोक आकाश में एढना व्यर्थ है। वे किसी ग्रह नक्षत्र के रूप में नहीं है, वरन् आत्म सत्ता में सप्तचक्रों के रूप में ही उसका अस्तित्व है। महायोग विज्ञान में कहा गया है कि भूःलोक मूलाधार में भुवःलोक स्वाधिष्ठान में, स्वःलोक नाभि स्थान में, महःलोक हृदय में, जनःलोक कंठ में तपःलोक ललाट में एवं सत्य लोक ब्रह्मरंध्र में विद्यमान है। जहाँ स्थान मात्र गिना दिये गये है वहाँ उन स्थानों में अवस्थित चक्रों का ही संकेत समझा जाना चाहिए। प्राणायाम मन्त्र में गायत्री के सात सात व्याहृतियों का प्रयाग होता है। भूः भवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्। यह सात व्याहृतियां है। इन्हें सप्त ऋषि व सप्त लोक भी कहा गया है। अग्नि पुराण के अनुसार वे सातों ऋषि है- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज। इन सातों की सतता सप्त चक्रों में विद्यमान है। “प्राणः वाऋषयः” अर्थात् सात प्राण ही सात ऋषि है। चक्रों में अवस्थित प्राण चेतना के अधिपति यही हैं। यजुर्वेद में भी कहा जाता है”शरीर में सात ऋषि निवास करते है। वे सतर्कता पूर्व निरन्तर उसकी रक्षा करते है। इनका अनुग्रह सात लोकों, सात द्वीपों, सप्त सरोवर, सात समुद्रों, सात पर्वतों, सात नदियों का स्वामित्व उपलब्ध होने के रूप में मिलता है” तात्पर्य यह हुआ कि ब्रह्माण्ड सत्ता की प्रतीक आत्म सत्त पर अपना अधिकार आधिपत्य स्थापित होता है। अपनी क्षमताओं को समझने, उन्हें उभारने और उपभोग करने का कौशल प्राप्त होता है। जिसे यह सफलता मिल सकी समझना चाहिए, उसे ब्रह्माण्ड का साम्राज्य मिल गया।
आत्म सूर्य के सप्त अश्व प्रमुख चेतना केंद्रों के रूप में माने गये है-प्राण, चक्षु, जिह्वा, त्वचा, कान, मन और बुद्धि इन सातों को अश्व की संज्ञा दी गई है। दिव्य जीवन सता में इन्हीं सातों का वर्णन इस प्रकार मिलता है-देव, ऋषि, गंधर्व, पन्नग, अप्सरा, यक्ष और राक्षस। वैदिक देवताओं में इन्हीं का दूसरे रूप में वर्णन है प्रजापति, अर्यमा पूषा, त्वष्टा, जिन सात छन्दों में किया गया है वे है गायत्री, उष्णिक, अनुष्टप, बृहती, पक्ति, त्रित्रट एवं जगती।
स्वर मंजूषों में सप्त चक्रों का सप्त स्वरों की संज्ञा दी है और कहा है कि इस सितार की कोई साधना ठीक प्रकार कर सके तो उससे जैसी भी, जिस प्रकार की भी राग-रागिनी को बनाने, सुनने-सुनाने की आवश्यकता हो उसकी पूर्ति इसी माध्यम से पूरी की जा सकती है।
वस्तुतः षट्चक्र नाम ही भ्रामक है। एक तरह से उन्हें सप्त चक्र ही कहना चाहिए। सहस्रार को इस चक्र श्रृंखला से अलग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक चक्र भी सात आधारों से बना होता है। उनके स्वरूप निर्धारण की जो व्याख्या विवेचना योगशास्त्रों साधना शास्त्रों में की गई उसमें प्रत्येक के सात-सात विवरण दिये गये है (1) तत्व बीज (2) वाहन (3) अधिदेवता (4) दल (5) यन्त्र (6) शब्द (7) रंग। इन्हीं विशेषताओं की भिन्नता से उनके अलग विभेद किये गये है। अन्यथा बाहर से तो उनकी आकृति एक जैसी ही है। उनकी क्षमताओं, विशेषताओं प्रतिक्रियाओं का विवरण इन्हीं सात संकेतों के रूप में समझा जा सकता है।
महर्षि अरविन्द ने सहस्रार सहित षट्चक्रों की अतिमानसिक चेतना की सात परतों अतिमानस के सात सूर्यों के रूप में वर्णन किया है। इनके अनुसार सहस्र दल ज्ञानशक्ति का - सत्य का केन्द्र है, जो विकसित होने पर अतिमानसिक सृष्टि को जन्म देता है। आज्ञाचक्र अतिमानसिक ज्योति-संकल्प शक्ति का केन्द्र है जो अपने भीतर से ज्ञानशक्ति को विकीर्ण करता है। विशुद्ध चक्र शब्द ब्रह्म का एवं अनाहत चक्र-प्रेम, सौंदर्य और आनन्द का केन्द्र है। नाभिचक्र अतिमानसिक जीवनी शक्ति का स्त्रोत है। स्वाधिष्ठान-शक्ति किरणों का सूर्य हैं जो क्रिया शक्ति को वितरित करता और उसे ठोस आकारों में ढाल देता है। मूलाधार चक्र पदार्थ शक्ति और आकार शक्ति का सूर्य है जो अतिमानसिक जीवन को साकार रूप सृष्टि को स्थायित्व प्रदान करने की शक्ति से युक्त है। सप्त चक्रों का जागरण मनुष्य को अतिमानव देवमानव तक ऊँचा उठा देता है।
शारदा तिलक तंत्र में चक्रों के जागरण होने पर अनेक प्रकार के दोष दुर्गुणों का शमन और अभावों की पूर्ति होने की चर्चा की गई है जो बुद्धि संगत भी मालूम पड़ती है और अनुभूति परक भी। इसमें ग्रन्थकार ने लिखा है कि मूलाधार से विनोदीवृत्ति जाग्रत होती है। यह काम क्रीड़ा, उत्साह और रसास्वादन का उद्गम है। स्वाधिष्ठान के जानने पर क्रूरता, संदेह-आशंका जैसे दुर्गुणों का नाश होता है। मणिपूर चक्र के जागरण से तृष्णा, ईर्ष्या, भय, निराशा, हीनता, मोह, अरुचि, घृणा-भावनाओं का समापन होता है। अनाहत चक्र के न जागने पर लिप्सा, छद्म, कुतर्क, चिन्ता, दंभ, अविवेक, दर्प आदि छाये रहते है। इनके मिटते ही दूरदर्शी विवेकशीलता जाग्रत होती एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना विकसित होती है। विशुद्ध चक्र के जागरण से कला-कौशल की विभूतियाँ और विशेषताओं का जागरण हाता हैं आज्ञा चक्र में दूर दृष्टि, दिव्य दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि और अष्ट सिद्धियों का निवास है। सहस्रार ब्रह्मसत्ता का निवास स्थान है।
ग्रन्थकार ने मूलाधार का स्थान मल-मूल छिद्रों के मध्य, स्वाधिष्ठान का उससे कुछ ऊपर, मणिपूर का नाभि की सीध, अनाहत को अदय की सीध, कंठदेश में विशुद्धि का और भू मध्य भाग में आज्ञाचक्र बताया है। अनुमान परक उल्लेख मात्र है। वस्तुतः यह सब होते मेरुदण्ड की मध्यवर्ती सुषुम्ना नाड़ी में ही है।
इन सप्त चक्रों का जागरण गायत्री की उच्च स्तरीय साधना से संभव होता है। तन्त्र कौमुदी में कहा भी गया है कि “मूलाधार से लेकर ब्रह्मरंध्र तक विस्तृत षट्चक्र जिसके अवगाहन से जागरण होता है उसे गायत्री कहते है। “इसकी उपासना से सहस्रार सहित सभी चक्रों और पंकरघ्शों की साधना एक साथ सम्पन्न होती है। इसी में देव साधना, ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष, जीवन लक्ष्य, सर्वतो मुखी प्रगति विकास उल्लास की समस्त तत्वों का समावेश हैं।
उपरोक्त प्रतिपादनों यह स्पष्ट संकेत है कि हर स्तर की क्षमता बीज रूप से अपन भीतर विद्यमान है। समस्त दैव शक्तियाँ, ऋषि तत्व हमारी जीवन सत्ता में सप्त चक्र बनकर विद्यमान है। जो इन शक्तियों, ऋषियों के सान्निध्य में रहने की उनका अनुग्रह प्राप्त करने की साधना करता हैं वह उन आकाश स्थित सात तारागणों की श्रृंखला के रूप में चमकने वाले अमर सप्तऋषियों की तरह ब्रह्मवर्चस सम्पन्न बनता हैं श्रद्धा−विश्वास पूर्वक की गई गायत्री की उच्चस्तरीय साधना इस संदर्भ में सुखदायी सत्परिणाम प्रस्तुत करती है।
रेल उस पटरी पर चलना आरंभ करती है, जिसके लिए उसे सिगनल और लाइन क्लीयरा दिया जाता हैं। मनमर्जी से वह किसी भी दिशा में नहीं दौड़ पड़ती है। ठीक इसी प्रकार जीवनक्रम किस मार्ग पर चले इसका निर्धारण मस्तिष्क में उठने वाले विचार करते हैं। यों विचारों के झूले पर झूलते और बिना पंख के आकाश-पाताल चूमने वाली उड़ाने उड़ते रहना मन का स्वभाव है तो भी वह आमतौर से उसी क्षेत्र में दौड़ धूप करता है जिसकी कि अन्तराल में कामना जाग्रत रहती हैं अनेकानेक कामनाओं में से किन्हें अपने लिए रुचिकर माना जाय यह निर्णय करना अन्तराल का काम हैं। मेले में अनेक चीजें बिकती हैं। पर बालक उनमें से उन्हीं का चुनते है जो उन्हें पसंद आ जाती है। का कुछ उस क्षेत्र में सजधज की साथ रखा हुआ है उस सभी का नहीं बटोरते। जिसे रुचिकर या हितकर मानते हैं उसी के लिए मचलते है। यह मनचला मात्र कल्पना के आधार पर हुआ प्रतीत होता है किन्तु वास्तविकता यह है कि भीतरी रुझा नहीं दाके लिए प्रेरणा देती है।
विचारों को कर्म का बीज माना हैं। बीज ही अवसर पवाकर अंकुरित पल्लवित होता हैं। कल्पना क्षेत्र में उठते रहने वाले विचार ही दिशा में रुचि लेने लगते है। बारबार का प्रयास ही स्वभाव बन जाता है और उससे रुझान अनपढ़ होते हैं जो कल्पनाओं की असंयत उड़ानों के कारण ढले है। इनमें अधिक मजबूती का समझते हुए पे्रसतन पूर्वक उसे उभारने के लिए प्रयत्न किया जाता है। जबकि प्रौढ़ता उन्हें विचारो में होती है जिनके साथ रुझान का गहरा पुट हो अन्यथा बेतुके विचार में होती है जिनके साथ रुझान का गहरा पुट हो अन्यथा अन्यथा बेतुके विचार इस डाली से उस डाली पर फुदकने वाले पक्षी की तरह अकारण भगदड़ मचाये रहते हैं। उनसे मस्तिष्क घिरा रहता है और चिन्तन का महत्वपूर्ण उपक्रम ऐसे ही दिशा विहीन भटकना बौर बर्बाद होता रहता है। जो योजनाबद्ध जीवन जीना चाहते हैं सर्वप्रथम अपनी अभिरुचि इच्छा आकाँक्षा का चुनाव करना चाहिए। इसके उपरान्त उस सीमा में विचारा की कार्यपद्धति एवं संभावना को कल्पना चित्र बनाने की छूट देनी चाहिए। लक्ष्य निर्धारित करने तीर छोड़ने पर उसके निशाने पर लगने की संभावना रहती है। पर यदि उन्हें कौतुक रूप में किसी भी दिशा में चलाते रहा जा तो श्रम की बर्बादी और कुछ न कुछ पाने की लोग हँसाई ही हाथ आती है।
विचारों को दिवास्वप्न नहीं मानना चाहिएं कल्पनाओं की संरचना परलोक में विचरण करने जैसी असंगत नहीं होनी चाहिए। वरन् यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कल्पनाओं की डत्रडाया में ही रुझान ढलता है और चिन्तन की अपनाई हुई दिशा ही स्वभाव बन जाती है। प्रिय लगने लगती है।
यों कर्म शरीर से ही बन पड़ते है। पर उन्हें कर गुजरने के लिए हाथ पैर समर्थ हैं न इन्द्रिय समूह की स्वेच्छापूर्वक कुछ कर गुजरने में तत्परता होती हैं। इसके लिए मानसिक सहमति जरूरी हैं। घोड़ा चलता तो अपने पैरों है। पर उसे किस दिशा में चलना है कितनी तेजी से चलना है इसका निर्धारण वह सवार करता है जिसे हाथ में संकेत देने वाली लगाम है। हाथी भी महावत के इशारे को समझता है इसी आधार पर वह अपने भारी भरकम शरीर को किसी दिशा में निर्धारित गति को स्वीकार करके चलना आरंभ करता है। मन का क्रिया−कलाप ही शरीर को कुछ करने के लिए उकसाता और तत्पर करता हैं। इसलिए विचारों का ही कार्यों का प्रेरक माना गया है।
काल्पनिक उड़ाने मनोरंजन मात्र लगती है। उनकी सनक में पड़े-पड़े लोग मकड़ी जैसा जाल जंजाल बुनते रहते है। खाली समय को गुजरते रहते है। उन्हें अपने कल्पनाएँ मनः क्षेत्र पर अपनी छाप छेड़ती है। उन्हें अपने अनुकूल अनुरूप बनाती है। कालान्तर में असंगत विचार ही स्वभाव बन जाते हैं। उत्कंठा बढ़कर फलित होने लगती है। बुद्धि अपने ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर उसका ताना बना बुनती और साधन सरंजाम अवसर प्राप्त करने के लिए कार्य बताती हैं। इतनी खिचड़ी पका लेने के उपरान्त ही शरीर को निश्चित कार्य करने के लिए अपनी ज्ञानेन्द्रियों कर्मेंद्रियों का दशा विशेष में नियोजित करने के लिए साहस करना और कौशल दिखाना पड़ता हैं। इस लम्बी मंजिल का पार कर लेने के उपरान्त ही विचारणा क्रिया प्रक्रिया के रूप में परिणत होती है।
किसी के कार्यों को देखकर ही उसके भले-बुरे होने की कल्पना बनती है। कार्य का अर्थ है श्रम, समय, कौशल और पराक्रम का नियोजन। यह साधन जिस भी प्रयोजन में लगते है उसे पूरा करने के लिए तत्परता बरतते देखो जाते हैं। इसी आधार पर किये गये अधूरे कार्यों को असफलता और समग्र प्रयास को सफलता कहते है। शरीर और मन का समान योगदान जिस प्रयोजन के लिए जुटता है, उसके लिए आवश्यक साधन, सहयोग भी जुटा है, इसके लिए आवश्यक साधन, सहयोग भी जुटा लेता है। उत्कंठा का अपना आकर्षण है। उसका चुम्बकत्व इच्छित अवसर को खींच बुलाने में समर्थ होता देखा जाता हैं।
विचारणा और क्रिया के तारतम्य कस समझा जा सके तो कृत संकल्प होने के साथ ही विचार तंत्र की अस्तव्यस्तता से छुड़ाकर उसी दिशा में चिन्तन मंत्र में भटकने से रोककर नियत दिशा में नियोजित करना होता है। यदि दोनों के बीच खींच तान रही तो प्रगति का कदम आगे न बढ़ सकेगा।
शरीर को इच्छित कार्यों के लिए अभ्यस्त करना होता है।अनजानी दिशा में पैर रुक-रुक कर बढ़ते है। भटकाव का संदेह रहने पर पैर कभी आगे गढ़ती पीछे हटते हैं। सुनिश्चित यात्रा उन्हीं की होती है जिनने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आवश्यक जानकारी जुटाली है तथा सम्यक् सामग्री एकत्रित करली है। विचार से कार्यों तक और कार्यों से सफलता तक पहुँचने के लिए जिस कौशल को अर्जित करना आवश्यक माना गया है। उसके लिए शरीर को समुन्नत करना होता हैं। इसमें कार्य को दुहराना ही पर्याप्त नहीं वरन् यह भी आवश्यक है कि रुझान उसी दिशा में ढुले। करते समय रस मिले और बुद्धि सजगता पूर्वक मार्ग खोजे ओर उसके सही होने का विश्वास दिलायें। किन्हीं कार्यों कर पूर्णता इसी प्रकार सध पाती है।
कुछ करना या बनना है तो उसका श्रीगणेश विचार संस्थान को तदनुरूप सोचने समझने, चिन्तन मनन करने ओर सींव का निष्कर्ष निकालने में लगाना चाहिए। चित्त का घोड़ा यदि सड़क पर दौड़ने लगे तो उसके साथ बँधा हुआ ताँगा भी लुढ़कने लगता है। मन के पीछे पीछे ही शरीर चलता है। कर्म ही सफलता के निकट तक ले पहुँचते हैं।
संत एकनाथ हरिद्वार से काँवर में जल भर कर रामेश्वर पर चढ़ाने के लिए लम्बी यात्रा पर निकले। दो महीनों में पूरी होने वाली थी।
रास्ते में एक रेगिस्तान मिला। दूर-दूर तक पानी नहीं था। संत ने देखा कि एक गधा प्यास से व्याकुल होकर जमीन पर गिरा है और प्यास से तड़पकर प्राण देने के निकट जा पहुँचा हैं। वह पैर पीट रहा था।
संत को दया आईं उनने गंगा जल की काँवर में से एक घड़ा जल निकाला और उसे गधे के मुँह में डाल दिया। गधा होश में आया। आँखें खोली और कहा - इतनी कृपा की है तो दूसरों घड़ा भी मुझे पिला दीजिए। एक घड़े से प्यास बुझी नहीं और मैं चलकर इस जंगल से निकल जाने योग्य हुआ नहीं।
संत ने दूसरा घड़ा गंगा जल भी गधे के मुँह में उड़ेल दिया। उसने संतोष की साँस ली खड़ा हो गया ओर चलने का उपक्रम करने लगा।
धन्यवाद देने के लिए गधा संत के निकट पहुँचा और उनसे गले मिलने की अभिलाषा व्यक्त करने लगा। संत को आश्चर्य हुआ और वे गधे के गले मिलने में अपवित्रता के भय से आना कानी करने लगे।
गधे ने कहा - असमंजस में न पड़े। मैं रामेश्वर हूँ। इस स्थान पर इसलिए वेश बदल कर पड़ा था कि मेरे ऊपर गंगा जल चढ़ाने वालों में कोई सच्चे हृदय संत हों तो उनके दर्शन करके अपने को धन्य कर लिया और कृतार्थ हो गया। वे वहीं से घर वापस लौट गये।
समझा गया कि दुखियों की सहायता में सच्ची भगवद् भक्ति सन्निहित है।
नूतन प्रेरणा व दिशाएं लेकर गए श्री रामानन्द सागर
पिछले दिनों शान्तिकुँज -गायत्री तीर्थ में पूज्य गुरुदेव के दर्शन तथा उनसे मार्गदर्शन प्रेरणा लेने सुप्रसिद्ध टेलीविजन धारावाहिक “रामायण” के निर्माता-निर्देशक श्री रामानन्द सागर एवं उनके पुत्र सुभाष सागर आएं ज्ञातव्य है कि श्री रामकथा पर आधारित विगत डेढ़ वर्षों से दूरदर्शन पर दिखाया जा रहा रामायण सीरियल अत्यन्त लोकप्रिय हुआ एवं इसे न केवल हिंदू जनता वरन् देश के बहुसंख्य अन्यान्य धर्मावलम्बियों ने भी देखा सराहा। 31 जुलाई का प्रस्तुत धारावाहिक की अंतिम कड़ी प्रस्तारित होनी थी। भारतीय संस्कृति के उन्नयन को संकल्पित श्री सागर ने पूज्यवर से भाव विभोर होकर कहा कि उन्हें इसके निर्माण हेतु सूक्ष्म प्रेरणा कहाँ से मिल रही थी, इसका आभास तो होता था, पर प्रत्यक्ष मिलन, साक्षात्कार अब हुआ है। गुरुदेव के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उन्होंने भावी क्रिया पद्धति संबंधी मार्ग-दर्शन लेना चाहा। गुरुदेव ने उन्हें देवात्मा हिमालय, श्री कृष्ण चरित्र, श्री हनुमत्वरित्र पर भावी धारावाहिक बनाने हेतु प्रेरणा दीं व तत्संबंधी प्रत्यक्ष दिशा निर्देश देने का भी आश्वासन दिया। श्री रामानंद एवं सुभाष सागर पुनः अगस्त माह के अंत शाँतिकुँज इसी उद्देश्य विशेष के लिए आ रहे हैं।
शोध-श्रृंखला में जुड़ी नई विद्याएँ
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में नूतन विस्तार−क्रम में अब ध्यान, प्राणायाम एवं वाष्पीकृत स्थिति में वनौषधियों के प्रभाव विश्लेषण हेतु अत्याधुनिक उपकरणों को लगाया जा चुका हैं। अल्फार ई.ई.जी. आयोफीड बैंक, ई.एम.जीत्र बायोफीडबैक व जी. एस.आर. बायोफीड बैंक यंत्र खरीद लिये गये हैं व इनमें माध्यम से साधकों को तनाव शैथिल्प का अभ्यास कराया जा सकता है। वर्णा के ध्यान के माध्यम से क्या परिवर्तन शरीर की विभिन्न क्रिया प्रणालियों में आता है व कैसे ध्यान को ओर प्रभावशाली बनाया जा सकता है यह अनेक माध्यम से सीखा व समझ जा सकता है। मेडस्पायर नामक यंत्र भी यहाँ इन्हीं दिनों लगाया गया है जो फेफड़ा की श्वास खींचकर अशुद्ध वायु का निकाल बाहर फेंकने की क्षमता का विश्लेषण कर अंदर विनिर्मित (बिल्ट इन) कंप्यूटरों द्वारा ग्राफ व प्रिंट आउट के माध्यम से यह बता देता है कि अग्निहोत्र, वनौषधि सेवन अथवा प्राणायाम आदि कि पूर्व क्या स्थिति थी व बाद में कितना परिवर्तन आया। गैसलिक्विड, क्रोमेटोग्राफ यंत्र द्वारा नवनोषधि विश्लेषण कार्य आरंभ कर दिया गया है। विप्रो पी.सी. एक्स टी कंप्यूटर की मददो विगत आठ वर्षों की आंकड़ों का विश्लेषण कर यह जानकारी ली जा रही है कि साधना आिर उपचार वनौषधि चिकित्सा से साधकों की क्रिया प्रणाली में क्या-क्या परिवर्तन आया। अब साधकों को चिकित्सा परामर्श उसी के द्वारा दिया जाएगा।
स्वास्थ्य संरक्षण यंत्रों हेतु व्यापक स्तर पर तैयारी
इन दिनों शान्तिकुँज में बड़े पैमाने पर फेर बदल हो रहा है। समग्र स्वास्थ्य संवर्धन के शिक्षण हेतु पूरे जड़ी-बूटी उन में उलट पुलट की गयी है। सभी महत्वपूर्ण वनौषधियों गुण-कर्म के वर्णन सहित लगाई गयी है तथा उनकी पहचान आरोपण, पौधशाला बनाने का शिक्षण देने की तैयारी पूरी हो चुकी है। स्काउटिंग, फर्स्ट एड, रोगी परिचर्या, आहार विज्ञान रोगों के कारण निवारण संबंधी विभिन्न चार्ट गचा कैसे जाय व किस प्रकार रोग निवारण की सेवा साधना का आश्रय लेकर जन-जन तब पहुँचा जाय, इसका शिक्षण जिन स्लाइडों व वीडियो फिल्मों द्वारा किया जाएगा, वे बन कर तैयार है। यह अंक पाठकों के हाथों में पहुँचने तक सह अभिनव सत्र आरंभ हो चुके होंगे।
नारी जागरण अभियान चरमावस्था को पहुँचा
नारी जागरण हेतु नूतन “नारी अभ्युदय सत्र. आरंभ हो चुके है। शुभारंभ गायत्री जयंती से हो चुका है। शांतिकुंज परिवार की महिलाओं से ही शिक्षण प्रक्रिया का श्री गणेश हुआ है। उन्हें संगीत, संभाषण, दीपयज्ञ, कर्मकाण्ड, स्वावलम्बन हेतु लघु उद्योग तथा स्वास्थ्य संरक्षण का शिक्षण दिया जा रहा है। बाहर कार्य क्षेत्र में दो सौ से अधिक “नारी जागरण मंडलों” की स्थापना व पंजीयन हो चुका है व यह प्रक्रिया द्रुतगति से चल रही है।
किसी निश्चित संकल्प का मन में रखकर जब हम थोड़े समय तक अन्न इत्यादि का खाना छोड़ देते है तो उसे ही उपवास कहा जाता है। उपवास के लक्ष्य अनेक हो सकते है। उदाहरणार्थ रोगों को निवारण के लिए, मानसिक शान्ति के लिए, इच्छानुसार वस्तु पाने के लिए, किसी के कल्याण के लिए इत्यादि। इन सभी लक्ष्यों में सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य शरीर भौतिक सुख सम्पदाएँ हो और हमारे शरीर में पीड़ा उठती है रहे तो हमारा मस्तिष्क उद्विग्न हो उठता है और मन एक दम अशान्त हो जाता है। जब मन अशान्त रहेगा तो “ अशान्तस्य कुतों सुख” (अर्थात् अशाँत व्यक्ति को सुख नहीं उठती। ऐसे समय में तो महान् मनोबल वाला व्यक्ति ही शान्त रह सकता है।
हमारे शरीर के विभिन्न रोगों में आँख, नाक, कान जिह्वा, त्वचा, हाथ’पैर आदि सम्बन्धी रोग आते है। इन रोगों के निवारण में उपवास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुछ पाश्चात्य चिकित्सकों का निर्णय अब प्रकाश में आ रहा है। उनमें इस बात का बड़े जोरों से समर्थन है कि लाख रुपये की गोलियों खाने से जितना लाभ होता है उनका लाभ थोड़े समय उपवास कर लेने से ही प्राप्त हो जाता है।
उपवास के समय शरीर का शोधन होने लगता है। हमारे शरीर में जो विजातीय जीवाणु उत्पन्न हो जाते है वे जीवाणु रोगाणु हमारे भोजन में से ही भोजन लेना प्रारंभ कर देते है और इन जीवाणुओं में से अधिकतर जीवाणु ऐसे होते है जो बिना भोजन के देर तक जीवित नहीं रह सकते। अतः यदि उपवास की लिया जाय तो वे समाप्त होना प्रारंभ कर देते है। इसके अतिरिक्त हमारे आमाशय की कार्यक्षमता भी बढ़ने लगती है। इंजन लगातार काम करता रहे तो उसकी कार्यक्षमता क्षीण होने लगती है।घोड़ा लगातार दौड़ता रहे, मजदूर लगातार काम करता रहे तो थोड़े ही दिनों में हम अनुभव करेंगे कि हमारा कार्य उतना ही हो पा रहा है जितने की हमको आशा थी। अतः पुनः कार्य को सुचारु रूप से चलने के लिये थोड़ा विश्राम लेना आवश्यक है। आमाशय पर भी यही बात लागू होती है। एक दिन भी उपवास किया जाय तो उसकी कार्यक्षमता में वृद्धि हो सकती है और पेट के रोगों से अनायास ही मुक्ति पायी जा सकती है।
अपनी रुचि के अनुसार कभी भी उचित क्रम के अनुसार उपवास किया जा सकता है उचित का अर्थ है उम्र, शरीर का वजन तथा आहार को देखकर ही उपवास करने चाहिए जो व्यक्ति सदैव संतुलित आहार ही लेता है उसे उपवास करने की इतनी आवश्यकता नहीं होती जितना कि गरिष्ठ भोजन करने वाले की आवश्यकता होती है। चर्बी और अधिक प्रोटीन वाले पदार्थ खाने वालों के लिये तो यह नितान्त आवश्यक है। उपवास को अनेकों ढंगों से निभाया जाता है। जैसे एक समय भोजन कर लिया तो दूसरे समय भोजन न करें। इसे एकाहार कहते हैं। दूसरा दोनों समय भोजन तो किया जाय परन्तु भर पेट न किया जाय आधा पेट ही भोजन करें। तीसरे में केवल फल या दूध या छाछ पीकर फलों का रस पीकर ही रहें। चौथे में अपने भोजन में किसी वस्तु की कमी कर ले, जैसे दाल में नमक या हल्दी न डालें, तरकारी में मसाला न डालकर केवल उबालकर ही ले। पाँचवे प्रकार में दिन भर जल केवल पीकर ही समय काट ले। इस प्रकार कई भाग किये जा सकते है। इनमें से जिनको जैसा पसन्द आये उस प्रकार के उपवास का पालन अवश्य कर लेना चाहिए। यदि इसे नियमपूर्वक कर ले तो रोगों का आक्रमण कभी-कभी नहीं होगा यह सुनिश्चित है।
हमें मन करने से शरीर अवश्य निकाल देनी चाहिए कि उपवास करने से शरीर कमजोर हो जायगा। यह उपवास तो कमरे में झाडू लगाकर सफाई करने के समान है उपवास से भी पेट व पाचन संस्थान की इसी प्रकार सफाई होती है और शरीर सदैव स्वस्थ रहता है। इसके आध्यात्मिक लाभ तो अपनी जगह है ही,
किसी ने नदी से पूछा-तुम्हारा पानी मीठा और समुद्र का खारी क्यों है?
नदी ने कहा-हमने देते रहने का व्रत लिया और वही शीतलता तथा मिठास हमारे पानी में है। समुद्र लाता और जमा करता रहता है उसी दुष्प्रवृत्ति ने उसे खारी बना दिया है।
सम्राट अशोक के विशाल साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र और भागीरथी का उफनता हुआ कोप, बढ़ती हुई जलराशि का निरन्तर तीव्र होता जा रहा वेग, सम्राट अपने मंत्रियों, सेनापतियों और पुरोहितों को साथ अवश भाव से खड़े देख रहे थे। गंगा का जल स्तर निरन्तर बढ़ता जा रहा था, किसी भी क्षण कुपित नदी की विपुल जल राशि तट बंधनों को तोड़कर राजधानी को अपने से समेटने के लिए बढ़ सकती थी पर किया क्या जाय?
सम्राट ने बाढ़ के सनसनाते हुए जल की ओर एक दृष्टि दौड़ाई और फिर दूसरे ही क्षण महामंत्री और खड़ी भीड़ की ओर टुकुर-टुकुर देखने लगे। फिर कहा, क्या अपने साम्राज्य में ऐसी कोई पुण्यात्मा नहीं जो इस भीषण बाढ़ पर काबू पा सके?
यह अनुरोध अकेले महामंत्री से ही नहीं किया गया था। वरन् वहाँ उपस्थित लाखों नगरवासियों से भी था। सम्राट के दाँये सहस्रों लोगों का जमघट था। सभी इस समस्या के लिये अपने-अपने ढँग से सोच रहे थे, समाधान का उपाय खोज रहे थे। तभी पशोपेश में पड़ी हुई बड़ी भीड़ को चीरती हुई एक महिला आगे बढ़ी। उसे देखकर कितनों के ही मुंह घृणा से दूसरी ओर घूम गये। बहुतों ने तो यहाँ तक कहा”रोको इसे। नहीं तो विनाश नहीं होगा। तो भी हो जायेगा। इस अधम नारी के जल स्पर्श से गंगा और कुपित हो उठेगी।”जन आक्रोश का कारण यह था। कि इतने लोगों की भीड़ को चीर कर बढ़ने वाली यह महिला रूपजीवा वेश्या बिन्दुमती थी।
अनेकों कंठों से निकले तिरस्कार और अपमान भरे स्वरों को हंसते हुए भरे कंठ से उसने सम्राट को अपना परिचय दिया। “मैं हूँ बिन्दुमती रूपजीवा। अपना रूप और यौवन बेचकर जीविका चलाने वाली एक वेश्या। पर माँ भागीरथी से एक प्रार्थना करने का अवसर चाहती हूँ सम्राट!” उन्होंने स्वीकृति दे दी और बिन्दुमती भयंकर गर्जना करती हुई गंगा के समीप पहुँची। उसने नदी की ओर हाथ उठाते हुए कहा,” माँ गंगे! यदि मेरे पाप कर्मों के बीच पुण्य कर्म के तनिक भी संस्कार रहे हो, यदि मैं सत्यनिष्ठ रही हूँ तो इन पुण्यों का फल परलोक में देने के स्थान पर इसी लोक में दीजिये। आप अपने कोप को समेट ले माँ।”
यह कह कर बिन्दुमती के नेत्रों से एक और गंगा दो धाराओं में बह उठी। उन आँसुओं का स्पर्श गंगा के गर्जन करते जल से होना था की निरन्तर वेगवान होता जा रहा जल प्रवाह घटने लगा। कुछ क्षणों में ही गंगा का उफान शनैः-शनैः शान्त होने लगा।
सम्राट को आश्चर्य हुआ इस वेश्या के ऐसे कौन से पुण्य संस्कार है जिनके प्रताप से उफनता हुआ गंगा का जल प्रवाह भी शान्त हो गया। सम्राट ही नहीं, वहाँ खड़े सहस्रों नागरिक भी विस्मय विमुग्ध थे। अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए सम्राट बिन्दुमती को अपने पास बुलाने के स्थान पर उसके पास गये और बोले” भद्रे! तुम जैसी पाप पंक में पली हुई नारी ने किस प्रकार इतना पुण्य अर्जित किया कि भागीरथी को तुम्हारी बात माननी पड़ी।
“राजन्! आपकी प्रत्येक बात सत्य है” बिन्दुमती ने कहा,” पर मैं धन,जाति, शिक्षा, कुल
और रूप के आधार पर किसी से पक्षपात नहीं करती।परिस्थितियों ने मुझे रूपजीवा बनाया पर सत्य,व्यवसाय के प्रति मेरी ईमानदारी, प्रत्येक व्यक्ति के सम्मुख निश्छलता के साथ उसे संतुष्ट करने का प्रयास ही वह पुण्य हो सकता है जिसे गंगा ने स्वीकार किया”
सम्राट ने तथ्य को स्वीकार किया और राजकीय सम्मान से विभूषित करते हुए एक समारोह में यह शिलालेख भी खुदवाया कि अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति पुण्यात्मा है।
एक घर में बरों ने कुछ छत्ते लगाये। साथ ही एक मधुमक्खी का भी छत्ता था।
बरें जहाँ भी छत्ता लगाती। वही सेवा तो दिया जाता। किन्तु मधुमक्खियों के लिए पानी का प्रबंध करते और उनके लिए फूल उगाते।
बरें और मधुमक्खियाँ बैठ कर विचार करने लगी और इस भेदभाव के लिए मनुष्यों को कोसने लगी।
मधुमक्खियों ने कहा-हम परिश्रम करते और मनुष्यों के लिए शहद जुटाते हैं। तुम भी यदि ऐसा कर सकती तो तुम्हारा भी स्वागत होता।
सेवा भावी ही सम्मान और सहयोग प्राप्त करते हैं।
स्वास्थ्य मनुष्य की प्रथम और प्रमुख आवश्यकता है। इसके गड़बड़ाने पर जीविकोपार्जन से लेकर अन्यान्य उत्तरदायित्वों में से किसी का भी निर्वाह ठीक तरह नहीं बन पड़ता। स्वस्थता मात्र शरीर की ही पर्याप्त नहीं। मानसिक असंतुलन भी मनुष्य को एक प्रकार से अपंग असमर्थों जैसी स्थिति में ही पहुँचा देता है। शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ हों। तो समझना चाहिए कि सही तरह से जीवन निर्वाह एवं प्रगति के पथ पर चल सकना संभव होगा।
दुर्भाग्य से प्रचलन यह है कि लोग अनेक छोटे -मोटे रोगों से घिरे रहते है, उनकी परवाह नहीं करते। चेतते तब है,तब चारपाई पकड़ने की स्थिति आ जाती है। काम रुक जाता है। तब चिकित्सकों के पास दौड़ने और दवा-दारु लेकर आपदा से निपटने का एक मात्र उपाय रह जाता है। पथ्य का महत्व न देने के कारण रोग की जड़े तो कटती है, मात्र दब भर जाता है। आगे चलकर फिर किसी अन्य रूप में उभर कर सामने आता है। होना यह चाहिए कि पीड़ा का लाक्षणिक चिकित्सापरक उपचार चलाने के अतिरिक्त उन्हीं दिनों शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक नियमोपनियमों का पालन करने के लिए भी जोर दिया जाता। बीमारी के समय ऐसा प्रशिक्षण साधारण समय की अपेक्षा अधिक कारगर होता है।
इस मुहीम पर काम करने के लिए शांतिकुंज हरिद्वार ने व्यापक स्तर की एक सुविस्तृत योजना बनाई है। स्वास्थ्य संरक्षण के प्रति जन चेतना जगाने के लिए एक समग्र स्वास्थ्य संरक्षण प्रतिक्षण कार्यक्रम शांतिकुंज से आरंभ किया गया है इस केन्द्र की यह मान्यता है स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से प्रारंभिक स्तर ही निपटा जा सकता है। इसके लिए शरीर व मन की संरचना, क्रिया प्रणाली, रोगों के कारण व लक्षण तथा वनौषधियों के ताजी अथवा सुखी स्थिति में निरापद प्रयोग तथा पथ्य संबंधी कुछ सावधानियों संबंधी जानकारी से पूर्णरूपेण प्रशिक्षित कार्यकर्ता एक व्यापक स्तर पर तैयार करने की योजना है। ऐसे कार्यकर्ता जनसाधारण औषधियों के तात्कालीन लाभ की तुलना में वनौषधि उपचार सर्वथा निरापद है। इस प्रक्रिया में लाभ भले ही देर से मिल पाता हो, पर कोई प्रतिक्रिया या संकट उत्पन्न होने का खतरा बिल्कुल भी नहीं रहता रहता। वनौषधियों की मौलिक विशेषता यह है कि वे जीवनी शक्ति बढ़ाती है और रोग निरोधक सामर्थ्य को सुदृढ़ बनाती है। इससे सामयिक रोग तो टलता ही है, भविष्य में स्वस्थ बने रहने के द्वार भी खुलता है। वे यह भी समझाती है कि मात्र उपचार प्रक्रिया संपन्न कर लेने से ही स्वास्थ्य रक्षा का प्रयोजन पूरा नहीं होता। मूलतः स्वास्थ्य संरक्षण की प्रक्रिया का समग्र प्रशिक्षण होना चाहिए। इसके अंतर्गत प्रत्यक्ष रोगी एवं वे जो रोगी ता नहीं है, पर आज के प्रदूषित पर्यावरण भरे युग में कभी रोगी हो सकते है तथा वे जो प्रशिक्षण को माध्यम से स्वास्थ्य संरक्षण की भूमिका निभा सकते है, तीनों को ही यह बनाया जाना चाहिए कि रोग होते क्यों है? इसके लिए शरीर की संरचना एवं कार्य पद्धति की मोटी-मोटी जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वे शरीर के विभिन्न अंगों, उनके उत्तरदायित्वों एवं विभिन्न परामर्श किस स्तर पर काम करेंगे, यह भली-भाँति समझ सके। रोगों के कारण यदि बाहर के वातावरण में है तो वे क्या है व उनसे कैसे बचा जाय? इसका समग्र शिक्षण अनिवार्य है। स्वच्छता का महत्व समझते हुए तनाव शैथिल्य की महत्ता भी समझाई जानी चाहिए ताकि मनोविकारों की जड़े काटी जा सके। इस सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण में आहार विज्ञान की जानकारी भी दी चाहिए ताकि उचित आहार से,विभिन्न ऋतुओं के अनुरूप आहार ग्रहण कर, कुपोषण के कारणों को समझकर प्रतिरोध सामर्थ्य बढ़ायी जा सके।
विभिन्न रोगों के लक्षणों का शिक्षण भी इस रूप में जरूरी है कि रोगों के निदान में उससे मदद मिल सकें सही निष्कर्ष तक पहुँचकर तदनुसार रोग का उपचार आरम्भ किया जा सके। रोगी के द्वारा स्वयं बरता जाने वाला पथ्य एवं समय तथा दूसरों के द्वारा उसकी परिचर्या के मोटे-मोटे नियम तथा व्यावहारिक शिक्षण दिया जाना भी जरूरी है प्राथमिक सहायता तथा सर्वसुलभ व्यायामों, आसन, प्राणायाम आदि के द्वारा आरोग्य रक्षा किस प्रकार संभव है, यह शिक्षण भी स्वास्थ्य संरक्षण के अंतर्गत कराया जाना जरूरी है। इन सबके अतिरिक्त मानसिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य की जानकारी व महत्व समझाया जाना चाहिए। इतना सब समझ लेने के उपरान्त उपचार का क्रम आता है जो विभिन्न वनौषधियों द्वारा अनुपान भेद से एकाकी या सम्मिश्रित प्रयोगों द्वारा की जाती है। किन रोगों में कौन-सी एवं किस रोगी को किस परिमाण में किस अनुमान के साथ औषधि कब तक दी जानी है, यह प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण अंग है सही वनौषधि की पहचान, शुद्धाशुद्ध परीक्षा,बोने-उगाने की विधि,ताजे रूप में कैसे दिया जाय एवं सूखे चूर्ण या द्रव क्वाथ रूप में किस प्रकार, यह भी प्रशिक्षण में बताया जाता है।
वस्तुतः जड़ी बूटी विज्ञान ही प्राचीन काल का आयुर्वेद है। यह वही विद्या है, जिसमें मूर्च्छित लक्ष्मण का जनजीवन प्रदान करने और वृद्ध च्यवन ऋषि को पुनः युवा बनाने की क्षमता कभी विद्यमान थी। कभी आयुर्वेद विश्वभर में मान्यता प्राप्त चिकित्सा विज्ञान था। पर अब्र बूटियों के सही रूप में न मिलने, वर्षों पुरानी, घुन लगी, सड़ी-गली नकली से काम चलाने जाने के कारण उसका वैसा प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता। पर यदि उन्हें सही मार्गदर्शन व संरक्षण में उत्पादित किया जा सके। समयानुरूप शोध प्रयास उनके साथ जुड़ते रहें तो कोई कारण नहीं कि उनके प्रभाव से सामान्य रोगों कष्टों का निवारण संभव न हो सके। इस मान्यता के आधार पर शांतिकुंज की पूरी खाली भूमि में जड़ी-बूटी उद्यान लगाया गया है। उनके गुण-दोषों, कर्म एवं प्रभाव की समीक्षा-विश्लेषण हेतु एक साथ सम्पन्न मेडिकल कालेज स्तर की प्रयोगशाला है जिसमें एलोपैथी, आयुर्वेद एवं रसायनशास्त्र के पोस्टग्रेजुएट स्तर के अनुभवी चिकित्सा-वैज्ञानिक निरन्तर अनुसंधान कार्य करते है।
शान्तिकुँज के कार्यकर्त्ताओं की संख्या प्रायः पाँच सौ है, जो स्थायी रूप से यहीं परिवार के रूप में रहते है। लोक सेवी कार्यकर्ता भी एक मास का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए लगभग इतनी संख्या में सतत् यहाँ बने रहते है। इस एक हजार के परिवार को आरोग्य संबंधी जाँच पड़ताल का एवं रोगियों को जड़ी-बूटी उपचार से लाभान्वित कराने का प्रयत्न निरन्तर चलता रहता है। इसमें इस विज्ञान की वस्तुस्थिति समझने का अवसर सभी को मिलता है। पिछले दस साल के अन्वेषण उपचार के अनुभव से यह बात भली प्रकार स्पष्ट हो जाती है। कि जड़ी-बूटी उपचार किसी अन्य चिकित्सा पद्धति से उपयोगी नहीं है।
उपरोक्त समूची प्रक्रिया स्वास्थ्य संरक्षकों को प्रशिक्षित राष्ट्र के हर कोने-कोने तक पहुँचने की है। लम्बे समय से हर गति से चलते आ रहे इस प्रयोग का अब नया,उत्साहवर्धक व्यापक क्षेत्र में चलने वाला रूप दिया गया है। शांतिकुंज एक-एक माह के लोक सेवी शिक्षण में जूनियर हाईस्कूल तक शिक्षा विद्यार्थियों को स्वास्थ्य संरक्षण की समर्थ शिक्षा के साथ -साथ जड़ी बूटी उत्पादन और उपयोग की जानकारी भी प्रस्तुत माह से ही दी जाने लगी है पौध एवं बीज उन्हें यही से उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गयी हैं पौधे तैयार कैसे की जा सकती है तथा किस फलोरा में उन्हें लगाया जाना चाहिए, यह शिक्षण उपलब्ध जानकारी के आधार पर दिया जाता है। यह बताया जाता है कि वनौषधियों से सामान्य रोगों का उपचार व स्वास्थ्य संवर्धन भली भाँति संभव हैं बड़े रोगों, गंभीर लक्षणों की स्थिति में तो कुशल चिकित्सा व निदान हेतु साधन सम्पन्न अस्पतालों का आश्रय के अलावा और कोई चारा नहीं।
शांतिकुंज के तत्वावधान में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं के प्रायः पाँच लाख स्थायी ग्राहक है, पच्चीस लाख पाठक। इनमें से अधिकाँश समाज सेवी प्रकृति के है। इन सभी को लोकमंगल के प्रयत्नों में सहयोगी बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहता है। ऐसी आशा है कि उपरोक्त स्वास्थ्य संरक्षण योजना में अधिकाँश लोग उत्साहपूर्वक भाग लेंगे। एक मास का प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले, जड़ी-बड़ी उद्यान उगाने वाले स्थानीय स्तर पर भी स्वास्थ्य संरक्षण सत्र लगाने में नये उत्साह के साथ सम्मिलित होंगे एवं ऐसा क्रिया−कलाप गतिशील करेंगे जिससे लोक स्वास्थ्य की सुरक्षा एवं प्रगति उत्साहवर्धक मात्रा में हो सके।
प्रस्तुत योजना के पीछे दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला एक टाौर भी लाभ जुड़ा हुआ है, जिसे सर्वतोमुखी प्रगति में असाधारण योगदान कर सकने वाला समझा जा सकता है। इस आधार पर घर-घर पहुँचने और जन-जन से संपर्क साधने का कार्यकर्ताओं को उत्साहवर्धक अवसर निरन्तर मिलता रहेगा। स्वास्थ्य समस्या हर घर में किसी न किसी रूप में बनी रहती है। कोई रोग मुक्त होना चाहता है तो कोई बलिष्ठ बनना चाहता है। कोई मनोविकारों से परेशान है ततो कोई भ्रान्तियों के कुहासे से घिरा अकारण ही रुग्ण बना रहता है। स्वास्थ्य परामर्श के आधार पर अधिक घनिष्ठता और सफलता हस्तगत हो सकती है। जन सहयोग के आधार पर बहुमूल्य सफलताएँ हस्तगत हो सकती है।
जिस प्रकार विश्व भर में फैले ईसाई चर्चा में पूजा आराधना के साथ-साथ चिकित्सा उपचार भी अनिवार्यतः जुड़ा रहता है एवं प्रचारक उस माध्यम से जन संपर्क साधते एवं निर्धारित कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न करते है। उसी प्रकार शाँतिकुँज देश भर में फैले कार्यकर्ताओं एवं जड़ी-बूटी उद्यानों के माध्यम से स्वास्थ्य संरक्षण अभियान चलाने जा रहा है। प्रस्तुत अभियान में राष्ट्र निर्माण की समग्र साधना का योजनाबद्ध समन्वय है।
कौन पराया यहाँ? जगत में किससे झूठा बंधन? घट-घट में, अणु-अणु में होता, उस प्रभु का ही दर्शन॥
रंग बिरंगे फूल खिले जिनमें उसकी ही छवि है। उसके ही स्वरूप का उद्गाता, यह भास्कर रवि है॥
जिसकी ऊष्मा ही पैदा करती हर अणु में धड़कन॥
कितना प्यारा लगता है यह कामधेनु का छौना। कितना सुँदर यह खरगोश, प्रकृति का भव्य खिलौना॥
इन्हें देखकर ही अंतर में जगता है अपनापन॥
एक पिता वह हम तुम सारे उसके ही अंशी है। जिससे सोये प्राण जगें वह कान्हा की वंशी है।
आज चाहिए भेद रहित वह महारास का चिंतन॥
भेद-भाव तज सभी गोपिका, ग्वाह हुए एकत्रित। अपनेपन की और प्यार की यमुना हुई प्रवाहत॥
झूठा है बस स्वार्थ, अहं ही - जग है पावन नंदन॥
आमंत्रण यह मनुज मात्र को, एक बार तो आओ। स्नेह सलिल की गंगा है, यह इसमें डूब नहाओ॥
यह समदृष्टि जगी तो यह जग तुम्हें लगेगा तपवन॥
-माया वर्मा
*समाप्त*