बढ़ते प्रदूषण एवं विकिरण, अमर्यादित प्रजनन, महामारियों, प्रकृति प्रकोपों जैसी विभीषिकाओं को जो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रही है एक संतुलित मनःस्थिति से देखा जाय तो प्रतीत होता है कि ये सभी विग्रह मनुष्य की अपनी करनी से जन्मे है एवं इनकी प्रतिक्रिया अगले ही दिनों इस रूप में प्रकट होगी कि मनुष्यों का ही नहीं, अन्याय प्राणियों का रहना भी इस धरातल पर दूभर हो जायेगा। जब सर्वत्र विष ही विष का भरा पूरा समुद्र हिलोरें ले रहा हो, तो उसके बीच प्राणिसत्ता का अस्तित्व किस प्रकार अक्षुण्ण बना रह सकेगा, यह विचारणीय प्रश्न हैं।
चेतना की शक्ति अपार है। उससे सृजन भी बन पड़ता है। और महाविनाश का क्षण भी देखते देखते सामने आ खड़ा हो सकता है। अद्यावधि प्रगति चेतनात्मक परिष्कार और विकास के ही आधार पर संभव हुई है। यदि वह उद्गम तंत्र लड़खड़ा गया तो फिर न केवल असहयोग जन्य बिखराव होगा, वरन् आक्रामकता के विस्तार की बाढ़ में मानवी सभ्यता के लिए ही नहीं सत्ता के लिए भी संकट खड़ा हो जायेगा। पतन के गर्त में गिरते गिरते उस स्थित तक पहुँचा जा सकता है, जहां से फिर कभी लौटाना संभव न हो।
विज्ञान की एक धारा विकृत बुद्धिवाद बनकर सामने आयी हैं उसने प्रत्यक्षवादी विचारधारा को भी कम उत्तेजित नहीं किया। प्रत्यक्षवादी अर्थात् तात्कालिक लाभ को ही उसके कारण कुछ ही समय उपरान्त अनेक गुने संकटों को अति कष्टपूर्वक वहन करना पड़ा हो। दूरदर्शी विवेकशीलता को अम्गन्य ठहराने वाली, तुरन्त के लाभ को ही सब कुछ समझने वाली संकीर्ण स्वार्थपरता ही प्रत्येक परायण बुद्धिवाद के रूप में एक नया तत्वदर्शन बनकर लोक चेतना को अपने वशवर्ती बनाने में सफल हुई हैं। इसकी क्रिश्स प्रतिक्रिया और परिणति पग-पग पर प्रकट होती देखी जा सकती है। इस प्रत्यक्षवाद को वैज्ञानिक भौतिकवाद से किसी भी प्रकार कम भयंकर नहीं आँका जा सकता। वस्तुओं की अस्त व्यस्तता मानव समाज को प्रभावित तो करती है, पर उतना नहीं जितना कि चिन्तन के गड़बड़ा जाने पर उद्विग्न कर डालते वाले घटाटोप उमड़ते है एवं अर्ध विक्षिप्तता जैसी स्थिित सामने आ खड़ी होती हैं।
आदर्शों का निर्वाह और असीम सुखोपभोग की आतुर लालसा का उद्वेग एक स्थान पर एक साथ रह नहीं सकते। जहाँ एक रहेगा वहाँ दूसरे को पलायन करना पड़ेगा। अन्धकार और प्रकाश साथ साथ रहने के लिए कहाँ सहमत होते हैं विवशता का दबाव ही एक सीमा तक परस्पर एक दूसरे को सहन कर पाता है। अनियंत्रित लिप्सा तात्कालिक लाभ के लिए कहा सहमत होते है। विवशता का दबाव ही एक सीमा तक परस्पर एक दूसरे को सहन कर पाता है। अनियंत्रित लिप्सा तात्कालिक लाभ के लिए बड़े से बड़ा अनर्थ करने में भी नहीं हिचकती। यहाँ तक कि आत्मघात तक उस उन्माद में अनदेखा बनकर रह जाता है नशे वालों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक पारिवारिक, आर्थिक हर दृष्टि से कैसी दुर्दशा होती है। इसकी जानकारी प्रायः सभी को होती हैं। पर तत्काल मिलने वाली मस्ती को अपनाये बिना उस प्रकार के व्यसनियों से रहा नहीं जाता। दूर की बरत कौन सोचे। परिणाम का अनुमान लगाने की फुर्सत किसे मिलें निषेध और विरोध अपनी लकीर पीटते रहते हैं पर नशे के व्यवसाय एवं नशेबाजों के समुदाय में दिन दूरी रात चौगुनी वृद्धि होती जाती है। विवेक को तिलांजलि देने के उपरान्त उन्माद की तृप्ति ही एक मात्र अवलम्बन बन जाती है। दूसरों को दुष्परिणाम भुगतते देखकर भी आवेशग्रस्तों की आंखें नहीं खुलती।
जीभ के चटोरेपन में हाथों हाथ स्वाद चखने का मजा आता हैं। इस प्रसंग में अत्यधिक मात्रा में अभक्ष्य उदरस्थ किये जाते है। अपच उसी का प्रतिफल है। वह अपच जो कुछ ही दिनोँ में पेट में सड़न भरी विषाक्तता उत्पन्न करके रक्त विकार से लेकर अनेकानेक रोगों का निमित्त कारण बनता है। कई बार तो दुष्परिणाम और भी जल्दी सामने आ खड़े होते है। उल्टी, दस्त, उदरशूल जैसी व्यथाएं चटोरे लोगों को अक्सर हाथों हाथ ही होते ही देखी जाती हैं भारी पेट लेकर चलना, काम करना, गहरी नींद सोना कठिन हो जाता है। फिर भी जिव्हा के स्वाद को ललक इतनी प्रचण्ड रहती हैं के स्वाद के नाम पर विष भक्षण करना पड़े तो भी अपनी हरकत से बाज न आये। लोग प्रायः एक चौथाई जिन्दगी इस चटोरेपन के कारण ही गवाँ बैठते है। जितने दिन जीते है वे भी रुग्णता और दुर्बलता से आये दिन कराहते हुए ही ज्यों त्यों कर गुजारते हैं।
कामुकता अपने ढंग का एक दूसरा उन्माद है। जिसकी चसक और ललक होश संभालने से लेकर मरते दम तक पीछा नहीं छोड़ती। यह जीवन रस को निचोड़ते रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं यह अपने ओजस की फुलझड़ी जलाकर चित्र विचित्र तमाशा देखने के अतिरिक्त और कुछ नहीं। दाद खुजाते खुजाते रक्त निकल आता है पर खुजाने वाले हाथ रुकते कहा हैं। कुत्ता सूखी हड्डी चबाकर अपने मसूड़े छील लेता है और घावों से टपकने वाले खून को चाटकर समझता है कि सूखी हड्डी बड़ी रसदार और जायकेदार है यौनाचार तो कुछ क्षण के लिए ही अवसर मिलने पर संभव होता है पर अश्लीलता का विषम ज्वर तो मस्तिष्क को हर घड़ी आन्दोलित करता रहता हैं ऐसे रंगीन सपने गढ़े और कल्पनालोक में फिल्माये, दिखाये जाते हैं, मानो अब तब में वह प्रत्यक्ष ही होने जा रहा हो यह हवस कुदृष्टि को जन्म देती है, भगिनी पुत्री जैसी पवित्रता विमोहित हो जाती है और संसार भर की युवतियां मात्र ऐसी ही अपना समर्पण करने की प्रतीक्षा कर रही हो। इस ललक से यौनाचार से अधिक घातक और अहर्निशि विषमज्वर की तरह चढ़ा रहने वाला बुखार मानसिक दक्षता को खोखला करके ही रहता है। शरीर तो समय कुसमय निचुड़ता ही रहता है। चरित्र की दृष्टि से भी आचरण पर पशुओं जैसा बन पड़ता है। इस अनर्थ का देखते हुए भी संयम बरतने की सूझ उभरती नहीं। वैयक्तिक और सामाजिक जीवन इसी कारण एहाय भार से दबता जाता है। राष्ट्रीय प्रति तो बन ही कैसे पड़े विकास के जितने साधन जुड़ पाते हैं उनसे अनेक गुने अभ्यागत पहले ही हाथ पसारे अपनी माँगे व्यक्त करते हुए देखे जाते हैं।
साधन, ठाठ बाट, फैशन, श्रृंगार में अमीरी और अहमन्यता की पूर्ति मानने वाली ना समझी आर्थिक भार इतना अधिक बढ़ा देती है कि उनकी आपूर्ति ईमानदारी की सीमित कताई से बन ही नहीं सकती। इस पर भी कुरीतियों और अन्ध विश्वासों की मार जो धूमधाम वाली शादियों के रूप में जब चलती है तो अर्थ संतुलन की पूरी तरह समाप्त कर देती है। श्रम से जी चुराने की, काम में हेठी मानने की, आलस्य प्रमाद में बड़प्पन अनुभव करने वालों की बिरादरी यदि सदा सदा के लिए गरीबी के चंगुल में फंसी रहे तो इसमें आश्चर्य ही क्या? आमदनी बढ़ने की बात सोचना उचित है। पर अपव्यय के स्वभाव का अंब ने रहने पर तो कुबेर का खजाना भी खाली हो सकता है। प्रस्तुत अदूरदर्शिता को व्यापक गरीबी के कारणों में से सबसे प्रमुख और बड़ा माना जा सकता है। मर्यादाओं और वर्जनाओं का अंकुश उतार फैंकने के उपरान्त गगनचुंबी लिप्सा, लालचों महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए एक ही मार्ग रह जाता है - अनाचार। उसके असंख्यों आकर प्रकार हैं। दुर्बल स्तर के व्यक्त चोरी, उठाईगिरी, ठगी, जुआ, प्रपंच पाखण्ड जैसे जाल जंजाल रचते रहते है। भिक्षा माँगने से लेकर विश्वासघात करने तक में नहीं चुकते, पर जो समर्थ है,उनके लिए तस्करी, डकैती, हत्या, गिरोबन्दी, दादागिरी करने के द्वार खुले रहते हैं वे आतंकवादी आक्रमणकारी बनने से लेकर अपहरण और हत्याकाण्ड तक में कोई कसर नहीं रखते। इनके अन्तर्प्रान्तीय, अन्तर्राष्ट्रीय माफिया गिरोह तो ऐसे ऐसे कुकृत्य करते है जिनके विवरण सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते है। जो सजातीय मनुष्यों पर दया नहीं कर सकते उनके लिए पशु पक्षियों और जलचरों की चटनी बना लेना बांये हाथ का खेल ही हो सकता है। निर्दयता ही प्रकारान्तर में अपराधवृत्ति है जिसे मानवी गरिमा गँवा बैठने के उपरान्त ही अपनाया जा सकता है। आखिर यह सब है क्या? इसके उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है। तात्कालिक लाभ को प्रधानता देने वाला प्रत्यक्षवाद को लोक मान्यता मिलना। इसने कर्मफल, नीतिधर्म, लोक-परलोक, कर्तव्य, औचित्य सभी को उठाकर ताक पर रख दिया है। रिश्वत से लेकर मिलावट तक के असंख्य वेशधारी अपराध इस एक ही कन्दरा से निकलने वाले टिड्डी दल है। पागल क्या नहीं करता है? विवेक के पलायन पर जाने पर मनुष्य समझदार दीखते हुए भी वस्तुतः भावना क्षेत्र का उन्मादी ही कहा जा सकता है। तथ्यतः यह सब प्रत्यक्षवाद की तूती बोलना ही कहा जायेगा।
सामाजिकता, नागरिकता, नितिनिष्ठा, उदारता, न्यायशीलता और समाज-मर्यादा आदि सभी मानवी विशेषताओं को वस्तुतः शालीनता के ही विभिन्न पक्ष और प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। जब मनुष्य नितान्त स्वार्थपरायण हो जाये और उसने क्षुद्रतम संकीर्णता अपना ली तो फिर मत्स्य न्याय अपनाना या उसका शिकार करना ही एक मात्र नियति रह जाती हैं यह पशुओं की भी गुजरी स्थिति है। पशुओं पर प्रकृति का अंकुश तो रहता है, वे उसे तोड़ने की सर्वथा स्वतन्त्र जो ठहरा। किसी नियम मर्यादा का पालना करना - न करना पूरी तरह इसकी स्वेच्छा पर निर्भर है। वह ईश्वर से लेकर, समाज शासन के तथाकथित अंकुशों को पूरी तरह अंगूठा दिखा सकता है। फिर कभी कुछ खामियाजा भी भुगतना पड़ा तो निर्लज्जों का इतने में क्या बनता - बिगड़ता है?
यहीं हैं वे सब कारण जिसके कारण न नीतिनिष्ठा बची है, न सामाजिक मर्यादा। धर्म कर्तव्य जैसी बातें तो मनोविनोद की चर्चा भर बनकर रह गई हैं, उन्हें व्यवहार में उतारने की आवश्यकता कौन समझता है? स्पष्ट है कि इस स्तर की मनःस्थिति के रहते परिस्थितियाँ ऐसी रह ही नहीं सकती जिसमें सुख चैन से रहा और रहने दिया जा सके।
शारीरिक रुग्णता, मानसिक उद्विग्नता, आर्थिक अभावग्रस्तता, पारिवारिक विश्रृंखलता, सामाजिक अराजकता के रहते आशंका, अनिश्चितता और आतंक का ही माहौल सर्वत्र छाया रह सकता है। जिस-तिस बहाने उपद्रव और विग्रह उभरते ही रहेंगे। आपसी असहयोग बना रहे, आन्तरिक असंतोष भरा रहे तो बाहरी क्षेत्र की सुविधाएं किसी का क्या हित साधन कर सकती हैं? समाचार सुनने का, पढ़ने का जब भी अवकाश मिलता है तो अनर्थों की ही तूफानी बाढ़-सी आई लगती है, संदेह होता है कि देव निवास कहा जाने वाला धरातल कहीं भूत-प्रेतों की भयावह दुनिया में तो नहीं बदल गया। ऐसी दशा में शान्ति और प्रगति की योजनाएँ बनाना एक स्वप्न संसार गढ़ लेने के समतुल्य ही माना जायेगा।
ऐसे ही वातावरण की प्रतिक्रिया प्रकृति को कुपित करती है और ऐसी देवी प्रकोपों की झड़ी लगाती है जिनके कारण न पूरी तरह जीते रहना बना पड़े और न सर्वथा मर जाना ही संभव हो। इसे साँस चलना रोक देने वाली, घुटन जैसी स्थिति कहा जाये तो अत्युक्ति होगी। इन दिनों हम सब ऐसे ही माहौल में रह रहे हैं। जब-तब इस संदर्भ में बड़े विस्फोट भी फूटते हैं, तब चौंकते है कि यह अनर्थ हम सब को काल के गाल में न झोंक दे।
भविष्य की विभीषिकाओं की अक्सर भविष्यवाणियाँ होती रहती हैं, उनके पीछे विद्यमान कारणों में बढ़ता हुआ प्रदूषण, उभरता अभाव, उद्भिजों जैसा प्रजनन, सामाजिक सद्भावों का विगठन ही नहीं, एक अत्यन्त सबल कारण यह भी है कि मनुष्य ने अपने भावात्मक, चिन्तनपरक, चारित्रिक एवं उदार सहकारिता के अनुबंधों को तिलांजलि देते हुए ऐसी संस्कृति अपना ली है, जिसे बौद्धिक प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित मानवी सत्ता के हर पक्ष में घुस पड़ी अराजकता ही कहा जा सकता है।
- यदि आपने अखण्ड - ज्योति की विचारधारा को पसन्द किया है?
- यदि आप अखण्ड - ज्योति के माध्यम से चलने वाले क्रिया–कलापों को अग्रगामी बनाना चाहते हैं?
- तो इतना अनुग्रह और करें कि उसे अधिक व्यापक क्षेत्र में सेवा कार्य करने, और अधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने का अवसर प्रदान करें। यह सब आपके थोड़े प्रयत्नों से ही संभव हो सकता हैं।
- अपने मित्रों की टोली बनाकर निकलें और सन् 89 के लिए अधिक संख्या में नये ग्राहक बनायें। पुराने ग्राहकों को चन्दा भेजने का स्मरण दिलायें।
वर्ष 52 संस्थापक - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दिसम्बर 1988 अंक 12 वार्षिक चन्दा 25 आजीवन 250 विदेश में 200
*******
नियति की यह इच्छा हैं कि मनुष्य उच्च उठे। उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति की शक्तियाँ निरन्तर सक्रिय रहती हैं। ईश्वर के राजकुमार को सुखी और सुसंपन्न बनाना ही प्रकृति का क्रम हैं। उसे स्रष्टा ने इसीलिए रचा और खड़ा किया है।
इतने पर भी यह अधिकार मनुष्य के हाथों ही सुरक्षित रखा गया है कि वह प्रगति किस दिशा में करे? चयन की यह स्वतंत्रता उसे प्राप्त है। किसी दूसरे को इसमें हस्तक्षेप का अवसर नहीं दिया जाता। ईश्वर विश्व का नियन्ता है। उसका ज्येष्ठ पुत्र स्वभाग्य निर्माता तो होना ही चाहिए। प्रकृति उसकी सहायता भर सकती है।
अंतःकरण की आकाँक्षा का चयन एवं उसका निर्धारण मनुष्य का प्रथम पुरुषार्थ है। यह निर्धारण होते ही आत्म सत्ता उसकी पूर्ति के लिए जुट जाती है। मनःतंत्र अपनी विचारशक्ति को और शरीर तंत्र अपनी क्रियाशक्ति को इसी आदेश के पालन में जुटा देता है। संपर्क क्षेत्र से वैसा ही सहयोग मिलने लगता है और परिस्थितियाँ अभीष्ट मनोरथ की पूर्ति हेतु अनुकूलता उत्पन्न करने लगती हैं। मनुष्य आगे बढ़ता है। उसके निर्धारण और पुरुषार्थ को इस विश्व में चुनौती दे सकने वाला दूसरा कोई है भी तो नहीं, पतन अभीष्ट है या उत्कर्ष? असुरता प्रिय है या देवत्व? क्षुद्रता चाहिए या महानता? यह निर्णय मनुष्य स्वयं करता है। पतन के पथ पर नारकीय दुःख सहने पड़ते हैं और उत्कर्ष के पथ पर स्वर्गोपम सुख शांति मिलती है। चयन में दूरदर्शिता अपनायी गयी या अदूरदर्शिता, इसी से मिलता है मनुष्य की बुद्धिमता का परिचय।
----***----
*******
आर्य सभ्यता उस समय अपने विकास के चरम शिखर पर थी। भारत में कई आर्य प्रान्त थे। सब स्वाधीन, स्वतंत्र, सर्वप्रभुत्व - सम्पन्न और स्वशासित। इन्हीं आर्य प्रान्तों के वन बीहड़ों में रहती थी अनार्य जातियाँ। आर्य जनता के सुखी, सुविधा सम्पन्न और समृद्ध जीवनयापन से ईर्ष्यालु होकर अनार्य जातियों ने एक वाहिनी तैयार कर ली और लोगों को परेशान करने लगे।
उनके उत्पात बढ़ने लगे और इधर आर्य-प्रान्तों की सेनायें नर्वस हो उठीं। अनार्य जातियाँ जब दूसरे राज्यों में भाग जातीं तो वे हाथ मलकर देखते रह जाते और उन दस्युओं का उत्पीड़न चक्र वहाँ चलने लगता। वे भी इसी तरह परेशान हो जाते। आखिर सब हार, थककर पहुँचे ऋषि शौनक के आश्रम में। पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, ईशान आदि प्रान्तों के नरेशों ने ऋषिवर के चरणों में प्रणाम किया और अपनी समस्या सामने रखी तथा विजय का आशीर्वाद माँगा तो शौनक ने कहा - ‘आर्यजन, विजय आशीर्वादों से नहीं शक्ति और सामर्थ्य से मिलती है। तुम शक्तिवान बनो और बल प्राप्त करो।’
‘शक्ति तो हमारे पास कम नहीं। हम दस्युओं से निर्बल नहीं हैं, फिर भी हमें पराजय क्यों भोगनी पड़ती है?’ पूर्व देश के नरेश के ने कहा।
‘शायद तुम्हारा संकेत बाहुबल की ओर है परन्तु वही पर्याप्त नहीं हैं। इससे भी बड़ी और एक शक्ति है।’
‘तो पूज्यपाद उस बल से भी अधिक शक्ति हमारी सैनिक क्षमता में हैं। हमारे पास सैनिकों की कमी नहीं। ‘पहश्चम प्रान्त के राजा का कहना था।
‘सैन्य शक्ति भी अपर्याप्त है उस शक्ति के अभाव में।’
‘शस्त्रों से ही सेना की सामर्थ्य बढ़ती है। उससे भी हम प्रचुर संपन्न हैं।’ दक्षिण नरेश बोले।
‘शस्त्र बल से भी महान शक्ति है एक और जो मेरा आशय हैं’- ऋषि शौनक ने कहा।
संभवतया आपका आशय धन, बल से है ईशान अधिपति ने कहा-’नहीं आर्य शरीर, सेना, शस्त्र और ‘धनबल’ से भी अधिक समर्थ एक और शक्ति है’ उपस्थित नरेशों की मुख मुद्रा पर तैरती आतुरता को पढ़ते हुए ऋषि ने कहा-’एकता का बल।संघशक्ति की सामर्थ्य।’
‘यह बल किस प्रकार अर्जित किया जाय’ - आर्य नरेशों ने जिज्ञासा वश पूछा तो ऋषि बोले-’इस अर्जन का पहला सूत्र है- “सगच्छध्वम”- एक साथ मिलकर चलो। तुम लोग अलग-अलग दस्युओं के आक्रमण का सामना करते हो इसी से वे लोग तुम पर भारी पड़ते हैं। दूसरा सूत्र हैं- “संवदध्वम” एक स्वर मत व्यक्त करना उनके हौसले को बढ़ाना हैं इसलिए मिलकर एक निश्चय करो- “संवो मनासि जानताम”- एक निर्णय लो और एक जुट होकर लड़ो तो विजय तुम्हारे हाथ है यही तीसरा और अन्तिम सूत्र हैं।
ऋषि की प्रसाद वाणी से अपनी त्रुटियों का बोध प्राप्त कर समस्त नरेश वहाँ से चले और उन्होंने एकमत होकर योजना बनायी, उस पर अपनी सहमति व्यक्त की, स्वीकृति दी और समर भूमि में डट गये। जब संगठित होकर आगे आये और समस्त दस्युओं, अनार्यों को उनसे लोहा लेना पड़ा तो आत्म-समर्पण करते ही बना।
मनसा, वाचा ओर कर्मणा, एकता- मिलकर सोचने, एक स्वर में बोलने और एक साथ चलने की त्रिविध योजना-संघ साधना ही महान लक्ष्यों को प्राप्त करने का अभियान, अनुष्ठान है, जिसे कोई भी सम्पन्न कर विजेता बन सकता है, जब भी कभी राष्ट्र या संस्कृति पर कोई संकट आया है, संघ शक्ति ने उससे मोर्चा लिया व उसे निरस्त किया है। आने वाले समय में भी यही शक्ति मानवता को विभीषिका से उबारेगी।
नृतत्त्ववेत्ताओं ने विविध पर्यवेक्षणों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि आदि मानव वनमानुष स्तर का था। उसमें पशु प्रवृत्तियों का ही बाहुल्य था, रहन-सहन और क्रिया कलाप भी उसी स्तर का। वह निज का उपार्जन कुछ भी नहीं करता था। प्रकृति के अनुदानों पर पशु−पक्षियों की तरह अपना निर्वाह करता था। प्रगति की दिशा में उसके कुछ चरण और बढ़े तो पुरुषार्थ परायण हुआ। कृषि, पशुपालन जैसे उद्योग सीखे। वस्त्र, निवास, अग्नि प्रज्ज्वलन जैसी विधि व्यवस्थाओं से अवगत हो गया। बोलना, लिखना, सीख गया और अपने-अपने समुदायों के प्रथा प्रचलनों में अभ्यस्त हो गया। भौतिक प्रगति इसी दिशा में गतिशील होती चली आई है। विज्ञान, यंत्रीकरण, अर्थशास्त्र एवं शासनतंत्र की उपलब्धियों के सहारे वह वहाँ पहुँचा है जहाँ आज है। उसके सामने सुविधा साधनों का बाहुल्य है। यह दूसरी बात है कि अपने व्यक्तित्व को घटिया बनाए रहकर वह उसका सही समुचित उपयोग न कर सके। मानवी प्रगति का यही लेखा जोखा है। मनुष्यों में से कुछ उद्दंड, अत्याचारी, छली, आक्रामक विलासी व अहंकारी बन गए हैं और कुछ को अपनी नासमझी तथा कुशलता, प्रतिभा के अभाव में गई गुजरी स्थिति में रहना पड़ रहा है। मनुष्यों को बन्दर की औलाद इसीलिए कहा जाता है कि उसकी भावना और विचारणा पेट, प्रजनन के इर्द गिर्द ही घूमती हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता ही उसकी प्रकृति है। पेट-प्रजनन के लिए वह मरता खपता है। बहुत हुआ तो ठाटबाट बनाता, दर्प जनाता और आक्रामक बनकर अपनी विशिष्टता सिद्ध करता है। जो इतना नहीं कर पाते वे परिस्थितियों की प्रतिकूलता और भाग्य की विपरीतता को कोसते हुए दिन गुजारते हैं। मनुष्यों में से अधिकाँश इन्हीं आदि मानव, वनमानुष या धूर्त शृंगाल प्रकृति के देखे जाते हैं। जनसंख्या की विपुलता ने न लोगों को निज की गौरव गरिमा प्रदान की है और न समाज को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने में ही कोई योगदान दिया है। चकाचौंध उत्पन्न करने वाली विडम्बना तो चारों ओर बिखरी अवश्य दिखाई देती है पर उसकी परिणति- प्रतिक्रियाओं को देखते हुए निराशाजनक ही हो जाती है और असमंजस होता है कि जिसे ईश्वर का युवराज प्राणिवर्ग में शिरोमणि, देवमानव आदि नामों से सम्मानित किया गया है, क्या वह यही है? जिसे लोभ, मोह, स्वार्थ, वासना, तृष्णा, और अहंता के अतिरिक्त कुछ सूझता ही नहीं।
प्रकृति परायणता की सीमा इतनी है। जीवधारी अपने लिए ही जीते हैं। अपनी ही आवश्यकता जुटाते और अपनी ही प्रसन्नता अनुकूलता संजोने में निरत रहते हैं, प्रकृति परायण रह कर मनुष्य भी उसी गई गुजरी मनः स्थिति में रह सकता है, जिसमें कि अन्य जीवधारी मरते और मारते हैं, गिरते और गिराते हैं।
मानवी गरिमा का उज्ज्वल स्वरूप विकसित प्रस्फुटित तब होता है जब वह उत्कृष्ट आदर्शवादिता के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ता है। अपने चिन्तन, चरित्र व्यवहार और प्रयास को अभिनंदनीय अनुकरणीय बनाता है। इसी ढाँचे में उसे ढालने के लिए ऋषियों, ने शास्त्रों की रचना की है,अध्यात्म दर्शन का ढांचा खड़ा किया हैं, योग तप के अनेकों विधान बनाए हैं, ईश्वर भक्ति के अनेकानेक उपचार कर्म काण्डों का सृजन किया है। इन आत्मोत्कर्ष की अनेकानेक विधि व्यवस्थाओं का मूलभूत उद्देश्य एक ही हैं कि मनुष्य इसी जीवन में स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि प्राप्त करे। यह तीनों ही किसी अन्य लोक से संबंधित या जादू चमत्कार जैसी नहीं हैं। वरन् उन्हें व्यक्तित्व की महानता के रूप में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। दृष्टिकोण का परिष्कार ही “स्वर्ग” है दुष्प्रवृत्तियों से छूट निकलना मुक्ति और अभिनंदनीय स्तर पर जीवनचर्या को बनाए रखना है और जो परिणाम सामने आते हैं वे चमत्कारी स्तर के होते हैं। परमार्थी पुरोहितों को ही ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। वस्तुतः वे ही समाज का स्तर, परिस्थितियों का प्रवाह और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने के लिए आगे बढ़ते और सफल होकर रहते हैं। समय की पुकार हैं कि ऐसे उदार चेता उभरें। अपने इर्द गिर्द के भव बंधनों की पकड़ से अपने को उबारें और साथ ही जन कल्याण की उन प्रवृत्तियों में जुटें जिन्हें प्रकारान्तर से अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन भी कहा जा सकता है। परिस्थितियों की माँग इतनी प्रबल है कि इससे बच निकलने के लिए कोई बहाना नहीं ढूँढ़ा जाना चाहिए। सतयुग का माहौल बनाने के लिए भावनाशीलों को संकल्प पूर्वक आगे आना चाहिए। आज की परिस्थितियाँ में इस रीति नीति को अपनाए जाने की नितान्त आवश्यकता है। साधु और ब्राह्मणों को भूसुर- पृथ्वी के देवता कहा जाता है। वे अपनी योग्यता, श्रमशीलता, सम्पदा का न्यूनतम अंश अपने निर्वाह के लिए रखते हैं और शेष को अन्यान्यों को उठाने, बढ़ाने में खर्च करने के लिए अवसर तलाशते रहते हैं। किसी के निवेदन की प्रतीक्षा नहीं करते। बादलों की तरह बिना बुलाए ही सर्वत्र पहुंचते हैं और हर किसी को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रयत्न करते हैं। ऐसे ही वातावरण स्वर्गोपम बनता है।
लोक सेवियों की जिस जमाने में कमी पड़ती है उन दिनों विकास का स्तर घट जाता है। जन साधारण का भावनात्मक परिष्कार - दृष्टिकोण का उदात्तीकरण नितान्त आवश्यक है। इस कार्य को विलासी, स्वार्थी एवं घटिया स्तर के लोग नहीं कर सकते। भले ही वे क्रिया कौशल में पारंगत अथवा ऊंचे पदाधिकारी ही क्यों न हों? परामर्श उनका माना जाता है, जिनके प्रति सहज श्रद्धा होती है। सह विभूति हर किसी को अनायास ही नहीं मिलती। इसके लिए मात्र सेवा भावना ही उच्चस्तरीय नहीं होनी चाहिए, वरन् चरित्रनिष्ठा आदर्शवादिता भी ऐसी होनी चाहिए जिसे हर कसौटी पर खरा पाया जा सके और जिसे अनुकरणीय अभिनंदनीय ठहराया जा सके
बहुत दिन कठोर साधना के बाद तीन सन्तों ने सिद्धि मार्ग में प्रवेश किया। एक ने पानी पर चलने की सिद्धि प्राप्त कर ली, दूसरे ने हवा में उड़ने की। तीसरा गड्ढा खोद कर उसमें बैठने और बिना हवा में जीवित रहने की कला सीख गया।
उनने अपने चमत्कार जनता को दिखाने, अचंभे में डालकर ख्याति प्राप्त करने की योजना बनाई। ख्याति प्राप्त होने पर भावुक लोगों से धन भी प्राप्त किया जा सकता था।
प्रदर्शन की घोषणा की गई। बड़ी संख्या में जनता भी एकत्र हुई। प्रदर्शन हुए और दर्शकों ने उन्हें कौतूहल भरी दृष्टि से देखा। आश्चर्यचकित लोगों ने प्रसन्नता भी की और उन सफल प्रदर्शनों से भाव विभोर लोगों ने तालियां बजाकर अपनी प्रसन्नता भी व्यक्त की।
आयोजन समाप्त हो जाने पर एक ज्ञानी ने तीनों को एकान्त में बुलाया। आप लोगों को यह क्षमता प्राप्त में कितना समय लगा। तीनों ने कहा- बारह-बारह वर्ष।
ज्ञानी ने कहा- तब फिर तुम लोग इतने ही कर पाये जो एक मछली, एक मक्खी और एक चुहिया निरन्तर कर दिखाती रहती है और उस सामान्य अभ्यास में अपनी कोई विशेषता नहीं मानती। यह कार्य तो नाविक, वायुयान - संचालक और पनडुब्बी में बैठने वाले भी सरलता पूर्वक करते रहते हैं। इसके लिए इतना श्रम करने और प्रदर्शन रोपने की क्या आवश्यकता थी?
सिद्ध पुरुषों ने वस्तुस्थिति को समझा। अपने चमत्कारों की बात को कौतूहल माना। गलती सुधारी और भविष्य में आत्मशोधन एवं लोक कल्याण का वह मार्ग अपनाया जिसे सच्चे अध्यात्म प्रेमी सदा से अपनाते रहे हैं।
ईश्वरीय सत्ता में विश्वास कर लेना तथा “ईश्वर” है, इस बात को मान लेना मात्र बौद्धिक आस्था भर है। इसी के आधार पर व्यक्ति को आस्तिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि आस्तिकता विश्वास नहीं वरन् एक अनुभूति है। जिस किसी में भी आस्तिकता के भाव आते हैं, जो सच्चा आस्तिक बन जाता है, उसको अपने हृदय पटल पर ईश्वर के दिव्य प्रकाश की अनुभूति होने लगती है। वह विराट् सत्ता को सम्पूर्ण सचराचर जगत में देखता है तथा उस अनुभूति से रोमाँचित हो उठता है। ऐसा व्यक्ति ईश्वर के सतत् सामीप्य की सहज ही अनुभूति करता है तथा प्राणिमात्र में उसे अपनी ही आत्मा के दर्शन होते हैं। उसकी विवेक दृष्टि इतनी अधिक परिष्कृत परिपक्व हो जाती हैं कि जड़ चेतनमय सारे संसार में परमात्म सत्ता ही समाविष्ट दीखती है।
आस्तिकता कोई भावुक नहीं है। किसी प्रतिमा की पूजा अर्चा भर करते रहने से वह प्रयोजन पूरा नहीं होता। इसे अंतरात्मा की गहराई में जमाने के लिए भक्ति-भाव का आश्रय लेना पड़ता है। यह विश्वास मनोकामना पूरी करने या प्रकट होकर दर्शन देने जैसे बचकाने बाल कौतुक के लिए नहीं वरन् सत्प्रवृत्तियों के समन्वित समुच्चय की सघन आस्थाओं के रूप में अपना लिए जाने पर सम्पन्न होता है - ईश्वर के प्रति समर्पण।
सर्वव्यापी परमेश्वर को किसी शरीर विशेष में अवस्थित नहीं देखा जा सकता। वह नियम शक्ति एवं भाव चेतना के रूप में कण कण में समाहित है। परब्रह्म की यथार्थ सत्ता का यही स्वरूप है। अनुशासन और कर्तव्य पालन ही उसे अभीष्ट हैं। समस्त महर्षि नियम अनुशासन के परिपालन से ही गतिशील रहकर अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। यह अनुशासन ईश्वर ने अपने ऊपर भी स्वेच्छा- पूर्वक ओढ़ा हुआ है। इस मान्यता के परिपक्व होते ही “आत्मवत्सर्वभूतेषु” और “वसुधैव कुटुम्बकम्”‘ की श्रद्धा उभरती है। सेवा साधना और परमार्थ परायणता की दिशा में अग्रसर होना पड़ता है। समस्त प्राणियों को अपने ही समान तथा समस्त जगत को परमात्मा का स्वरूप मानने वाले ईश्वर परायण व्यक्ति से कभी भी असंगत, अनुचित अथवा अकरणीय कार्य बन ही नहीं पड़ते।
ईश्वर की सत्ता और महत्ता पर विश्वास करने का अर्थ है- उत्कृष्टता के साथ जुड़ने और सत्परिणामों पर - सद्गति पा -सर्वतोमुखी प्रगति पर विश्वास करना। आदर्शवादिता अपनाने पर इस प्रकार की परिणति सुनिश्चित रहती हैं। किन्तु कभी कभी उसकी उपलब्धि में देर सबेर होती देखी जाती है। ऐसे अवसरों पर ईश्वर विश्वासी विचलित नहीं होते। अपने सन्तुलन और सन्तोष को नष्ट नहीं होने देते। धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। और हर स्थिति में अपने आन्तरिक आनन्द एवं विश्वास को बनाये रखते हैं। दिव्य सत्ता के साथ मनुष्य जितनी सघनता के साथ जुड़ेगा उसके अनुशासन अनुबंधों का जितनी ईमानदारी, गहराई के साथ पालन करेगा उतना ही उसका कल्याण होगा। आस्तिक न तो याचना करता है और न अपनी पात्रता से अधिक पाने की अपेक्षा करता हैं। उसकी कामना भावना के रूप में विकसित होती है। भाव संवेदना फलित होती है तो आदर्शों के प्रति आस्थावान बनाती है। तनिक-सा दबाव या प्रलोभन आने पर फिसल जाने से रोकती है। पवित्र अन्तःकरण ईश्वर के अवतरण के मार्ग में आये अवरोध समाप्त कर देता है। दुष्प्रवृत्तियों को हटा देने पर उनका स्थान सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय ले लेता है। इस स्थिति के परिपक्व होने पर जो आनन्द आता है, सन्तोष प्राप्त होता है, उल्लास उमगता है, उसे ईश्वर प्राप्ति कहा जा सकता है। यही सच्चा भक्ति भाव, सच्चा धर्म है। ऐसा आस्तिक ही परम तत्व को, अंतिम लक्ष्य को प्राप्त होता है।
संसार बाह्य दृष्टि से कितना सुहाना, व आश्चर्यमय प्रतीत होता है। शैशवकाल से जरावस्था तक इसे इसे देखते नहीं अघाते। इतना ही नहीं देखते देखते ऐसा अपनत्व बोध जाग्रत होता है कि इसे शाश्वत एवं चिर सनातन समझकर सदा अपनाने के लिए लालायित बने रहते हैं। किन्तु यह मोह अपनत्व दर्शाने का भाव उस समय बालुका भीत के सदृश प्रतीत होता है, जब एक एक करके सारी वस्तुएं हमें त्यागती हुई चली जाती हैं अथवा हम उन्हें स्वयं त्याग देते हैं। यहाँ तक कि अपना शरीर भी एक न एक दिन छूट जाता है।
परिवर्तनशीलता एवं गति की निरन्तरता ही इस सृष्टि का नियम है। नेत्रों में व्याप्त भ्रम अथवा इसकी सीमित क्षमता के कारण ही हम इस तथ्य से अनभिज्ञ बने रहते हैं। पैरों के नीचे पड़े मिट्टी के कण गतिहीन लगते है, पर उसके सूक्ष्मतम घटकों को देखा जाय तो यही स्पष्ट होता है, कि उनमें भी तीव्र हलचल हो रही है। शरीर के गति रहित होने पर भी आन्तरिक संस्थानों के क्रिया कलाप में रुकावट नहीं आती। प्रत्येक पल लाखों कोषाणु मरते तथा लाखों नए पैदा होकर उनका स्थान ग्रहण करते हैं। नेत्र तो परिवर्तन के स्थूल पक्ष का ही बोध कर पाने में समर्थ हैं। अधिक सूक्ष्म परिवर्तन इस बोध की परिधि में नहीं आते। पर इससे उस सत्यसत्ता पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता कि सृष्टि के हर परिवर्तन हो रहे हैं।
वस्तुतः स्थिति यह है भी नहीं। जड़ हो या चेतन सभी गतिमान हैं। जिन्हें हम जड़ कहते हैं, स्थिर मानते हैं। उनके भीतर भी स्थिरता नहीं है। प्रत्येक पदार्थ के अणु परमाणुओं में विद्यमान इलेक्ट्रॉन एक निश्चित गति से निर्धारित कक्षा में परिभ्रमण कर रहें है। इन सूक्ष्मतर इलेक्ट्रॉन से लेकर अपने सौर मण्डल के भारी भरकम सदस्यों तक की यही गतिशील है।
शरीर जिसको हम सर्वाधिक अपना मानते हैं। उस पर गौरव करते तथा सनातन शाश्वत मानते रहते है। इसी की बलिष्ठता स्वस्थता पर अभिमान करके दूसरों पर रौब गाँठने परेशान करने जैसी हरकतें भी करते हैं, पर पालने में पराश्रित हो झूलने वाला शैशवकीन शरीर झुकी कमर वाला बनकर लकुटी ग्रहणकर पुनः पराश्रित की स्थिति में जा पहुंचता है, पता ही नहीं चलता। यह विचित्र, समझ में न आने वाला परिवर्तन अकस्मात होता हो ऐसा नहीं है। यह प्रतिपल प्रतिक्षण अबाध गति से चलता रहता है।
शरीर ही क्या, जिस धरती मां की गोदी में यह पलता, बढ़ता मरता है, उसकी भी यही स्थिति है। अपनी पृथ्वी को जिस रूप में हम देखते हैं कभी ऐसी न थी। सतत् परिवर्तन की परिणति स्वरूप इसका वर्तमान स्वरूप बना है। जन्म से लेकर अब तक आकाशीय धुल, उल्का खंडों के द्बक्वस्नशद्ध पर से उसका भार बढ़ता आ रहा है और क्रमशः पक्वस्नशद्ध भारी ही होती चली आई है।
प्राप्त शिला लेखों एवं पुस्तकों के आधार पर पुरातत्वविदों तथा इतिहास वेत्ताओं ने गवेषणा की है कि धरती पर सामाजिक एवं राजनैतिक इतिहास का प्रारंभ लगभग ईसा से 10,000 वर्ष पूर्व हुआ था। जब कि धरती की परतों के नीचे प्राप्त विविध प्राणियों एवं वनस्पतियों के आधार पर जीवाश्म शास्त्रियों का मानना है कि पृथ्वी का इतिहास 52 वर्ष पूर्व से प्रारम्भ हुआ। हिमालय से वनस्पतियों एवं प्राणियों के अवशेष यह बताते हैं कि यह सारा प्रदेश पहले समुद्र में डूबा हुआ था अर्थात् जहाँ आज नगाधिराज हिमालय के विशालकाय उत्तुंग शिखर हैं कभी वहाँ विशाल वारिणि के प्रचण्ड लहरों का कोलाहल गूंजता होगा। भू-गर्भ विशेषज्ञों का कहना है कि दो टापुओं को छोड़कर सम्पूर्ण यूरोप खण्ड लहराया सागर था। एशा का रूसी भू-भाग, इंडोनेशिया, दक्षिणी अरब, दक्षिण भारत, आस्ट्रेलिया के पश्चिमी एवं पूर्वी किनारे को छोड़कर सम्पूर्ण यूरोप एशिया ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड समुद्र के तल में समाए थे। चीन का कुछ हिस्सा पूर्व साइबेरिया से होकर अमेरिका के पश्चिमी भाग से जुड़ा था।
इस तरह के परिवर्तनों के महत्वपूर्ण कारणों में ज्वालामुखियों का आतंक, समुद्री उथल पुथल आदि प्रमुख है। जल के स्थान पर थल एवं थल के स्थान पर जल का नर्वत सतत् चलता रहा है। इन सारे परिवर्तनों से यही सुस्पष्ट होता है कि ब्रह्मांड के समूचे अवयव नित्य निरन्तर गतिशील है। इनमें नित्यता, स्थिरता, का भान होना हमारा अपना भ्रम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मात्र पृथ्वी ही नहीं उसके पिण्ड टुकड़े भी चल रहे है। वे अनेकों बार एक दूसरे से अलग हुए अनेकों बार डे। सप्त महाद्वीपों में पृथ्वी का विभाजित होना इन टुकड़ों के गतिशील होने का परिचायक है। नवीन शोध निष्कर्षों के अनुसार ये महाद्वीप भी अपने स्थानों से खिसककर कर स्थान बदल रहे हैं। विज्ञान की यह शाखा जिसके अंतर्गत विभिन्न भू भागों की गति का अध्ययन किया जाता है ग्लोबल प्लेट टैक्टानिक्स है। इस विद्या के वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि ठोस दिखने पर भी पृथ्वी ठोस नहीं है। इसके केन्द्र में अतिशय गाढ़ा तरल पदार्थ है। जिसकी सतह पर 64 कि.मी. से 15 किमी. तक की मोटी परत के दस टुकड़े तैरते रहते हैं। इस शाखा में अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि 20 करोड़ वर्ष पूर्व में दसों टुकड़ों आपस में मिले थे तथा एक ही महाद्वीप था। गति के कारण कालान्तर में सात द्वीपों में विभाजित हो गया। ये भी स्थिर नहीं हैं। ये 1 सेमी. से लेकर 15 से.मी. तक प्रति वर्ष में विभिन्न दिशाओं में खिसकते जा रहे है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका एक दूसरे से प्रति वर्ष 2.5 से.मी. दूर होते जा रहे है। कभी एटलांटिक नामक एक विकसित महाद्वीप धरती पर था। उसके विलुप्त हो जाने से ही समुद्रों व महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप बना।
गति एवं परिवर्तन का यह क्रम पिण्ड एवं ब्रह्माण्ड में सर्वत्र चल रहा हैं। कितने ही जीव नित्य पैदा होते और कितने ही नित्य मरते है। कितने ही पदार्थों का विखण्डन होता कितने ही आपस में सम्मिलित होते है। परिवर्तन की यह श्रृंखला सर्वत्र परिव्याप्त है। तारों- ग्रह- उपग्रहों में भी कितने ही अपना स्थान बदलते टूटकर नष्ट−भ्रष्ट होते रहते हैं। आवश्यक नहीं कि उन सभी की जानकारी मनुष्य को हो जाय। अभी तो न जाने कितने ग्रह नक्षत्र ऐसे हैं जिनके अस्तित्व का हमें भान भी नहीं है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मरक्यूरी ग्रह जो सूर्य की 5 करोड़ 80 लाख किलोमीटर दूरी पर परिक्रमा लगाता हैं, सबसे तेज गति से अर्थात् ब्रह्माण्ड में सभी ग्रहों–उपग्रहों में तीव्रतम गति से एक लाख 72 हजार किलोमीटर प्रति घण्टे की चाल से घूमता है। यह तो ज्ञात ब्रह्माण्ड के आंकड़े है। इससे भी परे वह है, जो अविज्ञात है।
परिवर्तन के ये नियम मनुष्य पर भी लागू है। एक हालत में न तो मानव की शारीरिक स्थिति रहती है और न ही प्रकृति की शारीरिक स्थिति रहती है और न ही प्रकृति की। जन्मा हुआ शिशु नित्य नए दौर से गुजरता तथा विकास की मंजिल पूरी करता है। शारीरिक परिवर्तनों तरह मनःस्थिति में भी अवस्था के अनुरूप परिवर्तन होते रहते हैं।
परिवर्तनशीलता की इस प्रक्रिया को प्रायः सभी जीव हर्ष स्वीकारते तथा उसके अनुरूप अपनी गतिविधियों का ताल-मेल बिठाते हैं। मनुष्य ही है जो परिस्थिति विशेष से आसक्ति व मोह की डोर में अपने को जकड़े रहता है। इसके परिवर्तित होने पर आवश्यक समायोजन न कर रोता-कलपता रहता है। स्थिरता गतिहीनता तो तमोगुण व मृत्यु का परिचायक है। इसी कारण प्राचीन तत्त्वान्वेषियों ने चरैवेति-चरैवेति का सूत्र प्रतिपादित किया। आत्मक्रम में बंधी इस परिवर्तन प्रक्रिया को स्वीकारने तथा उसके अनुरूप अपने जीवन को ढालने की गतिविधियों का निर्धारण करने से ही जीवन के लक्ष्य उत्कर्ष को पा सकना सम्भव है। सतत् चलना गतिशील सक्रिय बने रहना ही जीवन है।
मनीषियों का अभिमत है कि यह समग्र सृष्टि विभिन्न रंगों का समुच्चय है एवं ये वर्ण जीवन व्यापार के संचालन में महती भूमिका निभाते है, चाहे वह मानव हो, जीव-जन्तु हो या वृक्ष वनस्पति। सूर्य की सप्तवर्णी किरणें तो जीवन का आधार है ही, वैज्ञानिकों ने यह भी माना है कि सम्पूर्ण मानवी काया रंगों का एक पिण्ड है। उसकी प्रत्येक कोशिका से रंगीन ऊर्जा तरंगें फूटती रहती है। मेरी एण्डरसन अपनी पुस्तक “कलर हीलिंग” में कहती है कि “रंग ही जीवन है”। उनके अनुसार मानवी काया में रक्त लाल है तो हड्डियाँ मटमैली सफेद। त्वचा का रंग काला, गोरा या गेहुँआ हो सकता है। इसी प्रकार मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े, यकृत, आँत, गुर्दे, माँस-मज्जा आदि सभी के अपने अपने रंग है। इसी आधार पर चिकित्सकों ने “कलर अमेजिंग” नामक एक नयी तकनीक विकसित की है, जिसमें विभिन्न वर्णों की सामान्यता-असामान्यता, तरंग दैर्ध्य से शारीरिक मानसिक रुग्णता का निदान निर्धारण किया जाता है। वस्तुतः रंग है क्या? इसका उत्तर देते हुए भौतिक विज्ञानी कहते हैं कि रंगों का यह सारा खेल इलेक्ट्रानों और विकिरणों की तरंगों की न्यूनाधिक लम्बाई के कारण उपजता है। प्रत्येक परमाणु के नाभिक के बाहर चक्कर लगाते इलेक्ट्रॉन विशिष्ट लम्बाई की रेडियो तरंगों को सोखने की क्षमता रखते हैं। ये बाहरी इलेक्ट्रॉन स्थिति विशेरु में उत्तेजित हो उठते है एवं बाहरी कक्षाओं में कूद जाते है। ये स्थितियां तब उत्पन्न होती है जब वे पराबैगनी अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणों को अधिक मात्रा में अवशोषित करने लगते है, यह उत्तेजना की स्थिति थोड़ी देर बनी रहती है, वापस सामान्य स्थिति होती रहती है। इस मध्यावधि में परिवर्तन प्रक्रिया से एक निश्चित तरंग लम्बाई के फोटोन कण उत्सर्जित होते है। इस प्रकार के उत्सर्जित विकिरण की तरंग लम्बाई ही सात रंगों में से किसी एक रंग का निर्धारण करती है जिन्हें मस्तिष्क का विजुअल कार्टेक्स पहचानता तथा मस्तिष्क को यह बता है कि यह कौन-सा रंग है। सूर्य की सप्तवर्णी किरणों एवं प्रकृति के विविध वर्णों का ज्ञान इसी आधार पर होता है।
वस्तुतः यह एक अपने आप में सर्वांगपूर्ण विज्ञान हैं। प्रकाश रश्मियों एवं सप्तवर्णों में से किसे किस स्थिति में चुनना है, यह आज के वैज्ञानिक वर्ग के लिए एक शोध का विषय है। सूर्य किरणें एवं प्रकृति में विद्यमान रंगों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का मत है कि भिन्न भिन्न रंग व्यक्ति विशेष की मन स्थिति के आधार पर अनुकूल एवं प्रतिकूल प्रभाव डालते है। रंगों को अवसर या ऋतु विशेष के अनुरूप किस प्रकार चुना जाय, इसका आधार पर उनसे उत्पन्न संवेदन प्रतिक्रिया ही हैं।
प्रकृति के अनुरूप ही रंगों के प्रति आकर्षण विकर्षण होता है किसी को लाल रंग के कपड़े पहनने से चक्कर आने लगते है तो किसी को काले कपड़े पहनने से मानसिक अवसाद आ घेरता हैं। मनःचिकित्सक इस प्रतिक्रिया के आधार पर उन्हें उपयुक्त सुझाव देते है। यू.सी.एल.ए. के मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञान डॉ.हाँस का कथन है कि प्रयोग परीक्षणों के आधार पर यह तथ्य सामने आया है कि प्रमादी अल्प मन्दताग्रस्त विद्यार्थियों के कमरों में लाग रंग पुतवा देने से उनकी कार्यक्षमता भी बढ़ी तथा उनमें स्फूर्ति उत्साह के साथ-साथ उनकी बुद्धिलब्धि में भी वृद्धि हुई। चपल चतुर प्रकृति के विद्यार्थियों पर इसी प्रकार उन्होंने हल्के नीले व आसमानी रंग का प्रयोग किया। इससे शामक प्रतिक्रिया हुई और उनकी चंचलता घटी, तनाव में कमी आयी। सामान्य प्रकृति के मनोविकार ग्रन्थि रहित व्यक्तियों में हल्का पीला वासन्ती था। लेक रंग प्रयुक्त करने पर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पाई गयी।
स्टेनफोर्ड रिसर्च सेण्टर के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. अलबर्ट काहन का मत है कि कई मनोविकार ग्रस्त, तनाव पीड़ित बेचैन व्यक्तियों का उपचार मात्र उनके आसपास के रंगों को बदलकर किया जा सकता है। साथ ही वे यह भी कहते है कि भलीभाँति मनोविश्लेषण कर यदि सही रंग सबको पहले से ही सुझा दिये जाये तो अनेकों मनोरोगों को को टाला जा सकता है। सही रंग के चुनाव में त्रुटि भी बहुसंख्यक व्याधियों के कारण हो सकती, यह एक चौंकाने वाला तथ्य है।
रंगों के आधार पर मनोविज्ञान परक विश्लेषण कैसे संभव है इसे लक्ष्य बनाते हुए पश्चिम जर्मनी के ख्यातिप्राप्त मनःचिकित्सक डॉ. मैक्सल्यूसर ने व्यक्तित्व विश्लेषण की एक पद्धति विकसित की है जिसमें कुल आठ रंगों में से व्यक्ति को अपनी पसन्दगी नापसंदगी के अनुसार रंग चुनने होते हैं। ये आठ रंग है, जामुनी, नीला, हरा, लाल, पीला, कत्थई, भूरा और काला। डॉ. ल्यूसर के अनुसार नीला रंग शाँतिपूर्ण सात्विक प्रभाव के कारण शान्त, सौम्य, सतोगुणी व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता हैं। हरा रंग सक्रियता, काम के प्रति गहरी आसक्ति और गतिशीलता का द्योतक है। ऐसे व्यक्ति जो हरा रंग पसन्द करते हैं, जीवन में खतरा मोल लेकर कार्य करते हैं व कर्मठता के बलबूते ऊँचे उठते चले जाते है। इसी प्रकार लाल रंग स्फूर्ति और आवेश का प्रतीक है। ऐसे व्यक्ति उत्साही तो होते हैं किन्तु बहुत शीघ्र आवेशग्रस्त हो जाते हैं। पीला रंग प्रफुल्लता, हल्की-फुल्की मस्ती भरी जिन्दगी का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे व्यक्ति अल्हड़ काम में रस लेने वाले किन्तु कभी चिन्तित न होने वाली प्रकृति के होते हैं।
जामुनी रंग मानसिक अपरिपक्वता, कच्चेपन एवं बचकानेपन का द्योतक है। जबकि कत्थई रंग इन्द्रिय लिप्सा भोगो में रुचि तथा असंयम का प्रतीक हैं। भूरा रंग तटस्थता और निरपेक्ष भाव का परिचायक है जब कि काले रंग को पसंद करने वाले अधिकाँश व्यक्ति निषेधात्मक चिन्तन के होते हैं। जैसे ही उनकी बाह्य परिस्थितियों से इस रंग के प्रभाव को हटा दिया जाता है, इनमें विधेयात्मक वृत्ति उभरने लगती है।
डॉ. ल्यूसर सामान्य व्यक्तियों एवं असामान्य मनोविकारग्रस्त रोगियों से अपनी पसन्द के रंग चुनने को कहते है। प्राथमिक चुनाव के आधार पर इस रंग के प्रति संवेदनशीलता का परिचय मिलता हैं। उसके साथ ही चुना गया द्वितीय वरीयता का रंग उसकी पसंदगी मनोवृत्ति को स्पष्ट कर देता है। ना पसंदगी अर्थात् इस क्रम में रखे गये अन्तिम वर्ण इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि उस व्यक्ति को किन कितनी वृत्तियों से परहेज है।
पाश्चात्य जगत में रंग विज्ञान के मनोवैज्ञानिक पक्ष के प्रति रुचि जागी तो है, पर है वह मूलतः मनुष्य की अंतःवृत्ति पर आधारित। कार्ल गुस्ताव, जुँग, एडलर एवं मैस्लो जैसे प्रख्यात मनोवैज्ञानिकों ने उपरोक्त परीक्षण के प्रति अपना मत व्यक्त करते हुए इसे सतही प्रभाव वाला बताया था, क्योंकि यह निर्णय मस्तिष्क की उथली परतों द्वारा लिया गया होता है। विशेष कर कार्ल जुँग इस विषय पूर्वार्त मनोविज्ञान के प्रति संकेत करते हुए कहते हैं कि देवी देवताओं, पंच तत्वों के प्रतीक एवं सूर्योपासना, अग्नि आराधना के पीछे मूलतः वर्ण विज्ञान के सिद्धान्त हैं। मानव मूलतः श्रेष्ठ वृत्तियों वाला है तथा वह उन्हीं को उत्तेजना देने वाले आयामों को बहिरंग में ढूंढ़ता है। आधुनिक तड़क भड़क में श्रेष्ठता को बढ़ावा देने वाले पक्ष तो गुम हो गये है एवं “विजुअल पाल्यूशन” को जन्म देने वाले चटकीले उत्तेजक तत्व बहिरंग में प्रचुरता में है। इन्हीं कारण चिन्तन को निषेधात्मक फटक मिलती रहती है। सतत् ऐसे पोषण से तनाव, बेचैनी का होना स्वाभाविक है।
पिछले दिनों चिकित्सा विज्ञान की एक नवीनतम धारा “‘फोटोमेडिसन” के नाम सामने आयी है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा परत को सबल एवं सशक्त बनाने के लिए पराबैगनी किरणों का प्रयोग किया जाता है। वैज्ञानिक का मत है कि दीर्घ तरंग दैर्ध्य वाली ये अल्ट्रावायलेट किरणें शरीर वमन के एन्जाइम, हारमोन्स में सक्रियता लाकर जीवनी शक्ति से जुड़ी कोशिकाओं की संख्या व सामर्थ्य बढ़ाती है।
जैव अणुओं की फोटोकेमिस्ट्री को समझने, कोशिकाओं में लैसर प्रकाश पहुंचाने और ऊतकों की दृश्य क्षमता को पूर्ण रूपेण विकसित करने में वैज्ञानिकों को अब महत्वपूर्ण सफलता मिल रही है। जैसे-जैसे माँलिक्यूलर बायोलॉजी के सूक्ष्मतर आयाम सामने आते जा रहे हैं, वैज्ञानिक रोगों के मूल कारणों तक पहुंचने में समर्थ हो अपनी चिकित्सा उसी स्तर पर करने में सक्षम हो रहे हैं। यह एक क्राँतिकारी उपलब्धि कही जा सकती है।
बैलमैन रिसर्च लेबोरेट्री के अनुसंधानकर्ताओं ने अपनी शोध का केन्द्र बिन्दु लेसर किरणों को बनाया है जो मानवी ऊतकों से गहरा संबंध रखती है। शरीर में कुछ ऊतकों को संरचना विशिष्ट प्रकार की होती है जो निश्चित तरंग दैर्ध्य के विकरण को सोखती है। वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके है कि लैसर किरणें भिन्न-भिन्न ऊतकों को किस तरह प्रभावित कर उन्हें सामान्य स्थिति तक ले आती हैं। विशिष्ट प्रकार के लैसर युक्त प्रकाश उत्सर्जन को नाड़ी स्पंदनों के साथ घुलाया मिलाया जाता है जो एक सेकेंड के एक अरबवें भाग के अंदर शरीर में क्रियाशील हो जाता है एवं अपने पेनिट्रेटिंग पॉवर (बेधक शक्ति) के कारण एक विशिष्ट कोशिका के एक विशिष्ट गुण सूत्र तक पहुंच कर प्रभाव दिखाने की क्षमता रखता है। सूर्य किरणें जिस प्रकार क्रोमोफोर प्रक्रिसर द्वारा अपना प्रभाव दिखाती है, उसी प्रकार लेसर थेरेपी में प्रकाश ऊर्जा को ताप ऊर्जा में बदलकर असामान्य कोशिकीय गठनों को नष्ट कर अनुवांशिकीय प्रक्रिया पर रोकथाम लगायी जा सकती है एवं रिकाम्बीनेन्ट डी. एन. ए. की म्यूटेशन पद्धति द्वारा असाध्य माने जाने वाले रोगों से मुक्ति पायी जा सकती है। ऊर्जा को सुव्यवस्थित कर देना व कोशिका निर्माण प्रक्रिया का संयोजन ही इस चिकित्सा का लक्ष्य होता है जिससे एण्डार्फिन्स जैसे मानसिक हारमोन्स को प्रभावित कर विषाद-अवसाद, चिंता-तनाव आदि मनोविकारों से भी छुटकारा मिल सकता है एवं प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित कर एलर्जी ल्यूकीमिया तथा एड्स जैसी भयावह महामारी से भी निपटा जा सकता है।
गत पाँच वर्षों की स्थिति पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता हैं कि प्रकाश के अभाव में पश्चिम के विकसित देशों में विन्टर डिप्रेशन (शीत अवसार) की स्थिति उत्पन्न होती चली जा रही है जिसे सीजनल अफैक्टिव डिस-आर्डर (एस.ए.डी.) के नाम से पुकारा जाने लगा है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति में निस्तेजता एवं निष्क्रियता का होना स्वाभाविक ही हैं। बारह घंटे साते रहने के बावजूद भी अनिद्रा रोग निरन्तर पीड़ा पहुंचाता रहता हैं अधिक खाने पीने की ललक उन्हें सतत् लगी रहती है, विशेष रूप से वसायुक्त पदार्थों को खाने की। इससे मोटापा जन्म लेता है, साथ ही आलस्य प्रसाद भी। ऐसा रोगी अपने ऊपर सौंपे हुए कार्यों को भी भली प्रकार पूरे नहीं कर पाता। इस विन्टर डिप्रेशन के पीछे वैज्ञानिक को एक ही तथ्य हाथ लगा है कि शरद ऋतु के समय दिन में सूर्य प्रकाश शरीर को कम मिल पाता है जिसके फलस्वरूप पीनियल ग्रन्थि का सक्रियता बढ़ती और मस्तिष्क में अवस्थित मेलाटोनि हारमोन स्राव की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। इस हारमोन का स्राव सघन अंधकार में भी होता है। जो अवसाद का मूल कारण बन जाता हैं।
वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि कृत्रिम रूप से पराबैगनी प्रकाश पहुंचा कर अथवा सूर्य सान्निध्य में रखकर जैविकीय घड़ी (सर्केडियन दिम या बायोलॉजिकल क्लाँक) के असंतुलन को ठीक कर इस अवसाद से निपटा जा सकता है।
वर्ण चिकित्सा की उपयोगिता एवं प्रभावोत्पादकता से इंकार नहीं किया जा सकता। वस्तुतः पिण्ड जिन रंगों से विनिर्मित है, उनकी उसे सतत् आवश्यकता रहती है। उनकी पूर्ति नियमित होती रहे, इसी निमित्त सूर्य किरण चिकित्सा का सारा सरंजाम बुना गया है। मनोरोगों से ग्रस्त प्रदूषण पीड़ित आज की मानव जाति के लिये तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ गई हैं।
आज जब विज्ञान की गति पदार्थ की स्कूल सत्ता से जैसे-जैसे उसके सूक्ष्म स्वरूप की ओर बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे भारतीय प्राचीन विद्याओं की अनेक बातें सत्य प्रतीत होने लगी है। इन्हीं में से एक है मंत्र विद्या। प्राचीन समय में युद्ध के मैदान से लेकर रोग निवारण, स्वास्थ्य संवर्धन जैसे अन्याय क्षेत्रों में इसका उपयोग किया जाता था। आज यह विद्या लगभग लुप्त प्रायः हो चुकी है। अधिकाँश लोग तो इस पर अविश्वास करने लगे थे, पर विज्ञान की अधुनातन खोजो ने उस शास्त्रीय संभावना को बल प्रदान किया है, जिसमें इसकी विलक्षण सामर्थ्य की चर्चा की गयी है। आज विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि ध्वनि में इतनी सामर्थ्य है कि वह भला बुरा किसी भी प्रकार का प्रभाव व्यक्त और वस्तु पर डाल सकती है। भले प्रभाव के रूप में गीत की शक्ति सर्वविदित है और कौतूहल का दुष्प्रभाव आये दिन कितने ही उपद्रव खड़े करता रहता है, इसे सभी जानते है। यह तो स्थूल ध्वनियाँ हुई। विज्ञान ने सूक्ष्म ध्वनियों की भी खोज कर ली है। इनकी शक्ति स्थूल की तुलना में कही अधिक बढ़ी चढ़ी होती है। मंत्र में यही सूक्ष्म ध्वनियाँ काम करती है ओर तरह तरह के प्रभाव परिणाम उत्पन्न करती हैं।
शास्त्रों में मंत्रों की चार शक्तियां बतायी गई है (1) प्रामाण्य शक्ति (2) फल प्रदान शक्ति (3) बहुलीकरण शक्ति (4) आयातयामता शक्ति।
इन सभी का विस्तृत वर्णन महर्षि जैमिनी ने अपने पूर्व मीमंसादर्शन में किया है। उनके अनुसार मंत्रों की प्रामाण्य शक्ति वह है जिसमें शिक्षा, सम्बोधन व आदेश का समावेश रहता है। ऐसे शब्दार्थों से संबोधित माना जा सकता हैं।
पात्र कुण्ड, समिधा, आज्य चरु, हवि, पीठ आदि को अभिमंत्रित करके उनकी सूक्ष्म प्राण शक्ति को प्रखर बनाना, यह ऋत्विजों के मनोयोग, ब्रह्मचर्य, मंत्रोच्चार, तप, आहार और भावना पर निर्भर हैं। इससे मंत्र की फल दायिनी शक्ति सजग होती है। सकाम कर्मों में मंत्र की यही शक्ति सजग होकर इच्छित मनोरथ सिद्ध करती हैं।
इसकी तीसरी शक्ति है ‘बहुलीकरण’ अर्थात् अल्प को अधिक बनाना। अग्नि में मिर्च का छोटा टुकड़ा भर डाल देने से वह वायुभूत होकर पूरे कमरे में फैल जाती है, और उस वातावरण में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है। तेल की कुछ बूंदें जल के विस्तृत सतह को घेर लेती है। विषधर का स्वल्प विष ही पूरे शरीर में फैल कर प्राण संकट खड़ा करता है। इसी प्रकार माँत्रिक का मंत्र और उसे उच्चारण करने वाले अंग अवयव आकार प्रकार में छोटा होने के बावजूद भी उनके पारस्परिक घर्षण से उत्पन्न होने वाली शक्ति चिनगारी की भाँति नगण्य होते हुए भी दावानल बन जाने की सामर्थ्य संजोये रहती है। जहाँ किसी एक व्यक्ति का मंत्र साधना, अनेकों को प्रभावित उत्तेजित करती हो वहाँ बहुलीकरण शक्ति ही क्रियारत समझी जानी चाहिए।
अन्तिम शक्ति आयातयामता है। किसी विशेष क्षमता सम्पन्न व्यक्ति द्वारा विशेष स्थान पर विशेष साधनों के माध्यम से, विशेष विधि विधान के साथ सम्पन्न हुई मंत्रोपासना विशेष शक्ति उत्पन्न करती है। यही आयातयामता शक्ति हैं। विशेष प्रयोजन इसी शक्ति से सधते हैं। कहा जाता हैं कि विश्वामित्र, परशुराम और श्रृंगी ऋषि को यही शक्ति प्राप्त थी। राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न करने में वशिष्ठ ने जब अपनी असमर्थता व्यक्त की तो श्रृंगी ऋषि को बुलाया गया। उनने ही इसे पूरा का। यह श्रृंगी ऋषि की आयातयामता शक्ति ही थी।
शब्द अथवा मंत्र में स्थूल शक्ति तो होती है। पर उसकी सूक्ष्म शक्ति को ग्रहण धरण करने के लिए मंत्र साधक को संयमी होना पड़ता है, तभी वह उस शक्ति का सफलतापूर्वक उपयोग कर उसका लाभ उठा पाता है। महाभारत की कथा है। अश्वत्थामा और अर्जुन ने मंत्रचलित सघन अस्त्र का प्रयोग किया। अस्त्र और स्थिति की भयंकरता को देखकर बीच में व्यासजी आ खड़े हुए और दोनों से अस्त्र वापस लेने का आग्रह करने लगे। अर्जुन ब्रह्मचर्य पालने के कारण ऐसा करने में सफल हुए, पर अश्वत्थामा असंयमी होने के कारण ऐसा न कर सके।
शपथ ब्राह्मण में नृमेध और यरुच्छेप का एक उपाख्यान आता हैं। दोनों में इस बात का विवाद छिड़ा कि कौन सफल माँत्रिक हैं। नृमेध लकड़ी से धुआं भर निकाल सका, पर यरुच्छेप ने मंत्रोच्चार करके गीली लकड़ी में अग्नि प्रकट कर दी। इस पर यरुच्छेप ने कहा कि तू मंत्रोच्चार भर जानता है। हमने उसकी आत्मा से साक्षात्कार किया है।
कौत्स मुनि ने अपने ग्रन्थ में मंत्रों को अर्थ प्रधान नहीं वरन् ध्वनि प्रधान बताया है। उनके अनुसार बीज मंत्र ही, श्री, क्लीं आदि में उनके अर्थ से नहीं, ध्वनि से प्रयोजन सिद्ध होता है। नेषध चरित्र के 13 वें सर्ग में उसके लेखक ने इस बात को और भी अधिक स्पष्टतापूर्वक समझाया है। कहा जाता है कि दक्षिणी इंग्लैण्ड के सैलिसबरी के मैदान में स्थिति पाषाण कालीन स्टोनहेन्ज नामकसंरचना के खण्डहर मध्य में ध्वनि करने से वे बुरी तरह काँपने लगते है। अतः वहाँ संगीत बजाने के साथ साथ गाना भी निषिद्ध है शेर की दहाड़ और हाथी की चिंघाड़ से लोग डर जाते हैं। सैनिकों को यह आदेश होता है कि किसी पुल से गुजरते समय कदम मिला है कि किसी पुल से गुजरते समय कदम मिला कर न चले, अन्यथा उसकी तालबद्ध ध्वनि तरंगें पुल को गिरा सकती है। इसी ध्वनि विज्ञान पर मंत्रों की रचना आधारित है। उनके अर्थों का उतना महत्व नहीं, इसी से कौत्स मुनि ने उन्हें अनर्थक कहा है। वैसे यह बात सभी मंत्रों पर लागू नहीं होती।
मंत्र में निहित इसी शक्ति का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों में किया जाता है। एक घटना 1971 की है, जब मलाया के राजा परमेसुरी अगोंग थे। उनकी पुत्री शरीफा साल्बा का विवाह होने जा रहा था। शादी आरंभ होने में अभी कुछ समय बाकी ही था कि वर्षा आरम्भ हो गई। इतनी घनघोर शुरू हुई कि वह रुकने का नाम ही नहीं लेती। राज परिवार में चिंता व्याप्त हो गई। ऐसा लगने लगा कि शायद अब शादी आगे टल जाय, पर तभी राजा को वहाँ के प्रसिद्ध माँत्रिक रहमान की याद आयी। उसे बुलाया गया उसने कुछ प्रयोग किये और थोड़ी ही देर पश्चात् वहाँ बारिश पूर्णतः थम गई। यद्यपि आकाश में अभी भी सघन बादल थे और उस स्थान को छोड़ कर नगर के समस्त भाग में तेज वर्षा हो रही थी। इस दृश्य को देख कर ऐसा लगता था मानो किसी ने उससे ऊपर छतरी लगा दी हो। विवाह भली भाँति सम्पन्न होकर धूम धाम से समाप्त हुआ। इसके बाद रहमान ने दूसरा मंत्र पढ़ा और उस क्षेत्र में पुनः वर्षा प्रारम्भ हो गई।
एक बार न्यूयार्क के माउण्टसिनाई अस्पताल में एक जख्मी व्यक्ति उपचार के लिए ले जाया गया। उसने गर्म धातु का स्पर्श कर लिया था। औषधि उपचार से काफी हिस्सा नियंत्रण में आ गया, पर हाथ की कुछ अंगुलियों इतनी भयंकरता से जली थी कि डाक्टरों को उन्हें काट देने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझ रहा था, तभी कुछ व्यक्तियों की सलाह पर मंत्र शक्ति को आजमाया, गया। कुछ ही दिनों के मंत्र उपचार से ऊंचाइयां ठीक हो गई। इस घटना का उल्लेख तत्कालीन समय की प्रमुख, चिकित्सा पत्रिका एचीवमेण्टस ऑफ फिजिकल मेडिसिन एण्ड रिहेबिलिटेशन में छपा था।
ऐसी ही एक घटना दिसम्बर 1967 की कादम्बिनी पत्रिका में छपी थी, जिसमें मंत्रोपचार द्वारा पीलिया रोग निवारण भी एक प्रत्यक्ष घटना की चर्चा की गई थी। गांवों में कुत्ते और साँप के विष को मंत्र द्वारा ही निर्विष कर दुर्भाग्यग्रस्त व्यक्ति का उपचार किया जाता हैं।
योगवाशिष्ठ 6/9/81/39) में मंत्र की चिकित्सा शक्ति पर प्रकाश डालते हुए लिखा गया है कि जैसे हर्र खाने में पाचन संस्थान में तीव्र गति होती है और दस्त लग जाते हैं, उसी प्रकार दृढ़ भावना से युक्त यरलव आदि मंत्रों अक्षर शरीर पर असर डालते हैं।
अश्विनी कुमार के भैषज तंत्र में भी मंत्र शक्ति का उपयोग उपचार क्षेत्र में किये जाने का उल्लेख मिलता है। इसमें चार प्रकार के भैषज बताये गये है पवनौकष, जलौकष, वनौकष और शाब्दिक। शाब्दिक भैषज से तात्पर्य है मंत्रोच्चार एवं लयबद्ध गायन। जहाँ आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता में विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिए मंत्रोपचार की चर्चा की गई है, वही सामवेद में ऋचाओं के बायन का माहात्म्य स्वास्थ्य लाभ के क्षेत्र में बताया गया है।
मंत्र की इसी शक्ति का प्रयोग तंत्रशास्त्र में कृत्या-घात, जैसे प्रयोगों में किया जाता है। पर यहाँ उच्चारण संबंधी भूल न सिर्फ वाँछित मनोरथ प्राप्ति से प्रयोक्ता को वंचित कर देती है वरन् उसका दुष्परिणाम भी उसे भुगतना पड़ता है। ऐसी पौराणिक कथा है कि त्वष्टा से मंत्रोच्चारण में एक स्वर ही गलती हुई थी और उसका परिणाम विपरीत हो गया। त्वष्टा इन्द्र को मारने वाला पुत्र उत्पन्न करना चाहते थे, किन्तु स्वर संबंधी उच्चारण की भूल से जिसे इन्द्र ने ही मार डाला, ऐसा वृत नामक असुर उत्पन्न हुआ और उनका प्रयोजन पूरा न हो सका।
इससे प्रमाणित होता हैं कि मंत्रशक्ति में कितनी प्रचण्ड सामर्थ्य विद्यमान है। मनीषियों की मान्यता है कि सृष्टि के आदि में “शब्द” उत्पन्न हुआ। उसका ध्वनि प्रवाह ओंकार जैसा था। उसके बाद अन्यान्य तत्वों की उत्पत्ति हुई। यह आज के भौतिकीविदों की “विंगबैंग” थ्योरी का ही स्वरूप माना जा सकता है। सृष्टि की परोक्ष सत्ता इसी ओंकार से प्रस्फुटित हो प्रत्यक्ष कलेवर धारण करती चली गयी। ओंकार ध्वनि शास्त्र का बीज है। उस अकेले को ही इतने प्रवाहों में गाया जा सकता है कि सातों स्वरों का परिचय उस अकेले से ही प्रादुर्भूत हो सके। हो सकता है - मंत्र चिकित्सा, संगीत उपचार के अनुसंधान के क्षेत्र में अगले दिनों ऐसे भी प्रयोग चल पड़े कि समस्त श्रुति ऋचाओं की बीज मंत्र ओंकार ही विभिन्न ध्वनि लहरियों में प्रयुक्त किया जा सके एवं मंत्र संगीत चिकित्सा का एक परिपूर्ण ढाँचा खड़ा किया जा सके।
आज विज्ञान के पास वह सब कुछ है जिससे प्रयोगों की परिणति को, उनकी क्रिया पद्धति को जांचा परखा जा सकता है। समय आ रहा है कि स्थूल की शोध क्रमशः सूक्ष्म स्तरों को स्पर्श कर रही हैं शब्द शक्ति को चेतना का ईंधन माना गया है जो अंदर विद्यमान प्राणाग्नि को प्रज्वलित कर प्रसुप्त क्षमताओं को जगाती है। ऐसे यंत्र भी आने वाले समय में आविष्कृत होंगे जो इन सूक्ष्म कंपनों को पकड़ सकेंगे जो मंत्रोच्चारण एवं ऋचाओं के गायन की प्रक्रिया में उत्पन्न होते हैं एवं शरीर के अंग-प्रत्यंग को, चारों ओर के वातावरण पर अपना प्रभाव डालते हैं। फिर वे रहस्य भी जाने जा सकेंगे जो अभी तक अविज्ञात हैं।
सब कुछ मानते हुए भी कि यहाँ सब कुछ सुव्यवस्थित-सुनियोजित है, इस दृश्य जगत में कई घटनाक्रम ऐसे देखने को मिलते है, जिनका न कोई वैज्ञानिक समाधान मिल पाता है, न जिज्ञासा की तृप्ति कर सकने वाला ठोस आधार ही दीख पड़ता है। वैचित्र्य विविधता इन घटनाक्रमों के रूप में ऐसी प्रतीत होती है मानो किसी दार्शनिक व्याख्यान के बीच में किसी ने मनोरंजन करने के लिए वातावरण को हल्का बनाने के लिए कोई मजाक कर दिया हो।
अविज्ञात के रूप में घोषित ये विचित्रताएं किसी शाश्वत सत्य की ओर ले जाने वाली गुफा का द्वार खोलती है या सृष्टा की बहुविधि व्यवस्था की द्योतक है, कुछ समय में नहीं आता। पर उनका अस्तित्व यह तो प्रमाणित करता है कि ऐसा भी कुछ है जो विकसित विज्ञान अभी तक जान नहीं पाया है। आईये। कुछ ऐसी ही पिण्ड ब्रह्माण्ड से जुड़ी विलक्षणताओं की चर्चा कर उस सृजेता को नमन करे, जिसने यह बहुरंगी व्यवस्था रची, हमें ऊहापोह में डाला ताकि जिज्ञासुवृत्ति जिन्दा रहे।
चीन के हुन्नात प्रान्त के याँगचुन नामक एक बचे ने तब शोहरत हासिल की जब यह पता चला कि उसे दिन में कुछ नहीं दिखाई देता, किन्तु रात्रि होते ही वह सब काम ऐसे कर लेता है जैसे उसे सब कुछ दिखाई दे रहा हो। चिकित्सकों ने सभी तरह से खोज पड़ताल की पर वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके। एक विचित्र बात यह है कि पूर्ण अंधकार की स्थिति में तो उल्लू को भी बिल्कुल दिखाई नहीं देता, उसे भी थोड़ा प्रकाश चाहिए। पर याँगचुन तो इसमें भी अपवाद है इसकी उपमा मात्र इंफ्रारेड सेंसर्स से की जा सकती है जिनसे रात्रि में सैनिकों को दिखाई दे इसलिए आधुनिकतम टैंकों व स्टेनगनों को युक्त किया जाता है।
फेफड़ों की “आकुपेशनल” बीमारियों में (साँस द्वारा औद्योगिक प्रदूषण युक्त कण फेफड़ों में जमा होना) फारमर्स लंग्स, ब्राउन लंग, मशरुम लंग इत्यादि तो प्रसिद्ध है ही, सिलिकोसिस (धूल, रेत के कणों के कारण) ब्लैक लंग डीसिज (कोलडस्ट के कारण) एवं बेरिलियोसिस (लैम्प इंडस्ट्री में प्रयुक्त बेटीलियम केकारण) भी ऐसा रोग है, जिनमें फेफड़ों की कार्यक्षमता घटती चली जाती है व एक्सरे में सफेद धब्बों या धूलिकणों गुच्छकों के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देता। मंदसौर जिले, जहाँ चाक पेंसिल बनाने का काम होता है, इनमें धूलिकण, जमकर पंद्रह बीस वर्षों में पूरे फेफड़ों में जम जाते हैं व एक्सरे में हृदय के दोनों ओर स्लेट पट्टी दिखाई देती है। तीस वर्ष से अधिक इनमें से बिरले ही जीवित रह पाते हैं।
ऐसी व्याधि जिसमें किसी व्यक्ति को साँस लेने में कठिनाई होती है, आयरन लंग्स (कृत्रिम फेफड़ों या रेस्पायरेटर्स) पर रखा जाता है। इसकी भी एक सीमित अवधि है किन्तु इसमें भी एक महिला लाँरेल निस्वत ने रिकार्ड बनाया है। “ला क्रिसेण्टा” कैलिफोर्निया की यह महिला जिसका जन्म 1912 में हुआ था, 37 वर्ष 58 दिन बेहोशी अर्धमृतक-सी स्थिति में पड़ी रही। अंततः 22 अगस्त 1985 को उनकी मृत्यु हो गयी। ऐसे ही कई मालें ने इच्छा मृत्यु (यूथेनेसिया) का मुद्दा जोरों से उछाला है, क्योंकि संभावना है कि बूढ़ों की व असाध्य रोगियों की संख्या अगले दो दशकों में और बढ़ेगी।
गर्भिणी की मृत्यु के बाद यह माना जाता है कि यथाशीघ्र बच्चे को निकाला जा सके तो वह जीवित रह भी सकेगा। राओनो के वर्जीनिया की एक महिला जिसे मिर्गी का दौरा पड़ने के बाद मृत घोषित कर दिया गया था को मात्र बच्चे की खातिर कृत्रिम श्वांस दी जाती रही। जीवन के कोई चिन्ह माँ में नहीं थे पर बच्चे में थे एवं एक स्वस्थ कन्या ने माँ की मृत्यु (क्लीनिकल डेथ) के 84 दिन बाद 5 जुलाई, 1983 को जन्म लिया, उस कब्रगाह से बाहर आई एवं फिर माँ को दफना दिया गया। पोस्टमार्टम बर्थ का यह अपने आप में एक अद्भुत विलक्षण एवं एकमात्र उदाहरण है।
एक ही परिवार में हर बच्चा एक ही तिथि को हो, वह भी पाँच एक श्रृंखला में - ऐसा अपवाद भरा उदाहरण विश्व में मात्र एक है। इसके होने के अवसर 18 अरब में एक के ही रहते हैं अर्थात् विश्व की आज की जनसंख्या के साढ़े तीन गुना में एक बार। क्लीण्टवुड वर्जीनिया (यू.एस.ए.) के राँल्फ एवं क्रोलीन कमिन्स ने 1952 में कैथेरीन, 1953 में कैरोल को, लार्ल्स को 1956 में क्लाडिया को 1961 में, सेसिलिया को 1966 में जन्म दिया। ये सभी संतानें इन वर्षों में एक ही दिन 20 फरवरी को जन्मीं। ऐसा संयोग और कहीं देखने को नहीं मिलता।
अब तक की जुड़वा सन्तानों के दीर्घायुष्य होने का विश्व रिकार्ड 103 वाँ जन्म दिन मनाकर उत्तरी कैरोलिना अमेरिका की दो बहनों ने तोड़ा है। इन दोनों की 110 के लगभग संतानें हैं।
विचित्रताओं के इन क्रम में अभी और भी कई प्रसंग है। क्या कोई विश्वास करेगा कि 10 औंस यानी कुल मिलकर 283 ग्राम (पावभर से कुछ ज्यादा) वजन का बच्चा परिपक्वावस्था से 6 सप्ताह पूर्व पैदा होकर भी जिन्दा रहे और पैंतालीस वर्ष तक की आयु सुखपूर्वक जी सके। हाँ। ऐसा हुआ है श्रीमती मारियन टेगार्ट जो साउथ शील्ड्स टाउन एण्ड वियर (यू.के.) की रहने वाली थी ने इस पाव भर के माँस के लोथडे को 5 जन, 1938 को जन्म दिया, पर वह जीवित था। लम्बाई इसकी 12 इंच थी। उस समयकोई डॉक्टर भी नजदीक नहीं था न ही दाई। परन्तु एक डॉक्टर ए. शियरर ने उसे एक घण्टे बाद पेन की स्याही भरे वाले ड्रापर से ब्राण्डी, ग्लूकोस व पानी का संमिश्रण पिलाना चालू किया व तीस दिन तक इसी पर जिन्दा रखा। पहली वर्षगाँठ पर उसका वजन था सवा छत किलोग्राम, कोई खास बुरा नहीं। इक्कीसवीं वर्ष गाँठ पर (5/6/91) उसका वजन 48 किलोग्राम रिकार्ड किया गया।
31 मई, 1983 को उसकी अचानक मृत्यु हो गई। किन्तु इतिहास में यही एक ऐसा मेडिकल केस है जिसमें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा न मिलने पर भी पावभर का प्रिमेच्योर बच्चा जीवित रहा व एक निर्धारित आयुष्य जीकर गया। जिसका साईं रखवाला हो, उसे मृत्यू आ ही कैसे सकती हैं।
कहते हैं कि शुकदेव जी पूरे बाहर वर्ष तक अपनी माँ के गंभीर में जीवित रहे थे एवं वहीं से अर्जित ज्ञान लेकर जन्मे थे। यह तो पौराणिक मिथक है, किन्तु चिकित्सा विज्ञान का इतिहास बताता है कि सबसे लम्बा समय जिसमें महिला गर्भवती बनी रही व स्वस्थ बच्चे को जन्म देने में सफल हो सकी, 36 माह का है। इसका रिकार्ड 1951 की हिस्टाँयर डेल अकादेमी (फ्राँस) पत्रिका में मिलता है। इनको भी मई 1961 में बर्मा की एक महिला ने मात दे दी जब 54 वर्ष की उम्र में सीजेरियन द्वारा (पेट मार्ग से) उन्होंने 3 पौंड के कैलसीफाईड मृत बच्चे को 25 वर्ष तक अपने गर्भाशय में रखने के बाद जन्म दिया। वस्तुतः उन्होंने तो मादा गैंडे को भी पीछे छोड़ दिया जिसकी गर्भ वहन करने की अवधि 560 दिन होती हैं।
विलक्षणताओं की कोई सीमा नहीं। जितनी इस धरती पर जीवधारियों की संख्या है, उतने ही प्रकार की भिन्नताएं यहाँ विद्यमान है। हमारी जानकारी तो दृश्य तक ही सीमित है एक उदाहरण लें धरित्री के एक वर्ग मील टुकड़े में जितने कीड़े मकोड़े क्षुद्र जीव होते हैं, उतने ही पूरी धरती पर मनुष्य रहते हैं। इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारा ज्ञान कितना सीमाबद्ध है। प्रत्यक्ष को छोड़ परोक्ष में ढूंढ़ खोज की जाय तो हमें बहुत कुछ ऐसा हस्तगत हो सकता है जिसे पूर्व की अर्जित ज्ञान संपदा से अधिक महत्वपूर्ण कहा जा सके। विविधता में ही वस्तुतः आनन्द है, उस पर भी ऐसी जो विचित्र हो। मानवी काया से लेकर विराट ब्रह्माण्ड तक तथा क्षुद्र अदृश्य जीवाणुओं से लेकर वृक्ष वनस्पतियों तक ऐसा बहुत कुछ है, जिसे जानना अभी शेष है।
कौशल अनेकानेक है। कला की दिशाधाराएं अगणित है। सुयोग और कुयोग का सिलसिला और चलता रहता है। आयुष्य बढ़ती और घटती है अन्धकार और प्रकाश की तरह। सम्पन्नता और विपन्नता का क्रम भी ऐसी ही अनियमित अस्त व्यस्त परिस्थितियों पर निर्भर रहता है। पर जिस सद्गुण में अधिक स्थिरता और अधिक उत्पादन क्षमता है उसका नाम है “सुव्यवस्था” उपलब्धियों का सुनियोजित प्रबंध कर सकने की क्षमता। भौतिक प्रगति के क्षेत्र में यदि इसे सर्वोच्च स्तर की प्रामाणिकता दी जाये तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। सुनियोजन ही है जिसके कारण कम योग्यता और अभाव ग्रस्तता के बीच रहते हुए भी व्यक्ति न केवल प्रसन्न रह सकता है वरन् समुन्नत भी बन सकता हैं।
सुदृढ़ स्वास्थ्य और दीर्घायुष्य बनाने वाली जीवनी शक्ति का भण्डार हर काय कलेवर में विद्यमान है। विषाणुओं को परास्त करने की क्षमता रक्त के श्वेत कणों में इतनी भरी पड़ी है जिसे अजेय कह जा सके। पेट के अपने रासायनिक स्राव इस उच्चकोटि के हैं कि वे भुने सत्तू जैसे शक्तिहीन कहे जाने वाले पदार्थ खाकर भी अपने बलबूते पूर्ण भोजन की आवश्यकता पूरी कराते रह सकते हैं। फिर अस्वस्थता क्यों आ घेरती है अकाल मृत्यु क्यों मरना पड़ता हैं। इसके उत्तर में एक ही उत्तर दिया जा सकता है आरोग्य के नियमों की अवहेलना ही कुछ अपवादों को छोड़कर प्रधान कारण हैं। यदि आरोग्य के अनुबंधों में बंधकर आहार विहार को सुव्यवस्थित रखा जा सके तो अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी निरोग एवं प्रसन्न बना रह सकता है।
देव उद्यान की तरह हरा भरा, फुला फला, शोभा सुषमा से भरापूरा सुगंधित एवं सुरभित है यह अपना संसार, अपना भूलोक। इसे रंगमंच की तरह किसी ने चित्र खचित और मणि मुक्तकों से सज्जित इस स्तर का बनाया है कि इसके कण-कण को निहारते हुए हर घड़ी आनन्द विभोर रहा जा सके। प्रकृति को अपनी शोभा है। उमड़ते बादल, झिलमिलाते सितारे, चहकते पक्षी, हरियाली के बिछे मखमली फर्श, सरिता सरोवरों की हिलोर किसका मन पुलकन से नहीं भर देती। जहाँ सूर्य रोशन गर्मी और चन्द्रमा शान्ति शीतलता बरसाने के लिए अपनी अपनी ड्यूटी देते हो, जहाँ पवन पंखा झलता हो। जहाँ निद्रा की परी अपनी गोदी में सुलाने के लिए रात्रि होते होते दौड़ आती हो, जहाँ की वनस्पतियाँ नन्हे–मुन्ने शिशुओं की तरह खिलती खिलाती हो, जहाँ प्राणीगण सहकार के लिए आगे बढ़कर स्वागत को खड़े रहते हो वहाँ किसी को असुविधा, चिन्ता, हैरानी और विपन्नता से खिन्न रहने की क्या और क्यों आवश्यकता पड़ेगी? इतने पर भी किसी का मन खिन्न विपन्न रता है तो समझना चाहिए कि खोट परिस्थितियों का नहीं, मनःस्थिति में कही से कुछ आँख में घुस पड़ने वाली धूल किरकिरी जैसी किसी अवाँछनीयता का है। दृष्टिकोण के गड़बड़ाने से ही झाड़ी का भूत, रस्सी का सौंप दीख पड़ता हैं। अस्त−व्यस्त मन ही इस सुरम्य उद्यान को जलाते जलाते मरघट जैसा बना देता है और कुकल्पनाओं के भूत पलीत यहाँ नंगे होकर सताने डरने डराने का खेल खेलते हैं।
मन को यदि दिशा विहीन घोड़े की तरह किधर भी बेहिसाब दौड़ पड़ने से रोका जा सके तो वह शत्रु न रहकर मित्र भी बन सकता है। आरोपित विपन्नताओं के स्थान पर संपन्नताओं के अम्बार लग सकते है। छिद्रान्वेषण यदि हर सके तो गुणग्राहकता के उदय होते ही यह सब कुछ शुभ, सुन्दर और सहयोग में निरत ही देखा जा सकेगा। यह अपना मन ही है जो रंगीन चश्मा पहन कर अपनी सृष्टि में स्वयं इच्छित रंग का आरोपण करता हैं चश्मा उतरे तो यथार्थता दीखे। नरक जैसे डरावने भ्रम जंजाल अनगढ़ ही बुनता और उनमें अपने आपको फंसाकर रोता कलपता रहता है।
यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि विप्र नेताओं के पीछे सारा खोट कसूर अपना ही होता है। दूसरे कोई उसमें दोषी नहीं होते। विपरीत परिस्थितियों की उनमें कोई साझीदारी नहीं होती स्पष्ट हैं कि यह संसार गुण दोषमय बना हुआ है। यहाँ प्रकाश भी है और अंधेरा भी। सर्दी और गर्मी की तरह अनुकूलताएं और प्रतिकूलताएं भी आती जाती रहती हैं। उन सबको सुधार या बदल सकना अपने बस की बात नहीं। परिवर्तन प्रयासों से एक सीमा तक ही सफलता प्राप्त हो सकती है। सब कुछ अपनी इच्छा के अनुरूप ही बन कर रहे यह संभव नहीं दूसरों को अपने से सहमत करने के लिए एक सीमा तक ही समझाया या दबाया जा सकता है। ऐसी सर्व शक्तिमान सत्ता किसी को भी प्राप्त कि जो कहना न माने उसे तोप के गोले से उड़ा दिया जाय। यहाँ तालमेल बिठाकर चलने का ही एक सरल ओर संभव तरीका हैं। अनौचित्य के प्रति हम असहयोग का अधिक से अधिक विरोध का ही प्रदर्शन कर सकते हैं। संघर्ष सिद्धांततः जो अच्छा है, पर उससे आक्रमण प्रत्याक्रमण का विरोध प्रतिरोध का सिलसिला चल पड़ता है जो नई समस्याएं उत्पन्न करने के अतिरिक्त भारी भी पड़ता है। इससे भी यह निश्चित नहीं होता कि जैसा चाहा गया है वैसा ही प्रतिफल निकलेगा। एक उलझन सुलझाने के स्थान पर नई दस उलझने खड़ी कर लेने में आक्रोश को तो एक सीता तक हलका किया जा सकता है पर समस्या का इच्छित समाधान निकल सके, इसकी संभावना कम ही रहती है। वस्तु स्थिति को समझते हुए बुद्धिमानी इसी में रहती हैं कि तालमेल बिठाये रखा जाय और विचार विनिमय द्वारा पूरे या आँशिक समाधान का कोई स्वरूप बनाया जाये। इसी में व्यावहारिकता भी है और बुद्धिमता भी।
गड्ढों वाली ऊबड़−खाबड़ सड़कों पर मोटर जैसे वाहन तभी चल पाते है ज उनके स्प्रिंग लचकदार हो। ताली दोनों हाथ से बजती है। एक हाथ उसके लिए तैयार न हो तो दूसरा चाहते हुए भी टकरा नहीं सकता। अनिवार्य संकट आ खड़ा होने पर तो दो देशों की सेनायें भी एक दूसरे के सामने डट जाती है, सामान्य जीवन में तो आये दिन सुलह सफाई की नीति अपनाकर ही चलना पड़ता है। अन्यथा उलझते उलझाते रहने पर और कोई सृजनात्मक प्रयास बन पड़ना और प्रति की दिशा में आगे बढ़ सकना बन ही नहीं पड़ेगा। विग्रहों को इसी नीति के अनुसार टलाया जाये और सुधार दूसरों का बन ही पड़ेगा यह अनिश्चित मानकर अपनी भूलों को सुधारते रहने का एक पक्षीय फैसला करना चाहिए।
मन को खिन्न करने वाले प्रसंगों की यथा संभव उपेक्षा करनी चाहिए ओर वह सोच खोजनी चाहिए जिसके आधार पर मनोबल बनाये रहने वाली, संतुलन बनाये रहने वाली स्थिति बनी रहे। भूतकाल की अनुपयुक्तताओं को भूलकर हमें उज्ज्वल भविष्य की संरचना पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। जो उपलब्ध है उस पर संतोष किया जाय और आगे अधिक प्राप्त करने के लिए आतुर व्याकुल होने की अपेक्षा उस दिशा में योजनाबद्ध रीति से क्रमिक गति से आगे बढ़ा जाये।
अमीरों के साथ तुलना करने पर अपनी स्थिति गरीबी जैसी प्रतीत होती है और गरीबों के साथ माप करने पर अपनी स्थिति आज भी कही अच्छी प्रतीत होती हैं संतोष का सुख पाने लिए यही नीति अपनानी चाहिए। प्रयत्न अच्छे से अच्छे के लिए किया जाय पर तैयार बुरे से बुरा घटित होने के लिए भी रहा जाय। असफलता का प्रभाव इतना न पड़ने दिया जाय कि वह निराशा बनकर ऊपर आ चढ़े और भविष्य की आशा को ही धूमिल कर दे। हमें खिलाड़ियों की तरह जीवन का खेल खेलना चाहिए। जिसमें हार और जीत को हलके मन से लिया जाता है और हर स्थिति में उत्साह बनाये रखा जाता है। हंसती हंसाती हलकी फुलकी जिन्दगी ही सफल और सुखद मानी जाती हैं।
गड़बड़ाती हुई मशीन गड़बड़ाती हुई मशीन को ठीक करने से पहले मिस्त्री यह जाँच पड़ताल करता है कि कहाँ क्या नुक्स आ जाने से मशीन बन्द हुई है। ठीक करने का क्रिया−कलाप इसके बाद ही चलता है। चिकित्सक रोग का करण जानते और इसके बाद इलाज आरंभ करते है। सब कुछ ठीक ठाक रहने पर भी यह देखभाल होती रहती है कि अगले दिनों किसी अड़चन की आशंका तो नहीं। कारण भूतकाल में छिपे मिलते हैं। गड़बड़ी वर्तमान में दीख पड़ती हैं आशंका का अनुमान भविष्य के सम्बन्ध में लगाया जाता है। सड़क पार करते समय सामने ही नहीं दांये बाँये देखकर भी चला जाता है। ठीक इसी प्रकार शरीर और मन की वर्तमान स्थिति के संबंध पिछली गलतियों, अब की आदतों और अगले दिनों घटित हो सकने वाली आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय करना पड़ता हैं कि किस सुधार परिवर्तन की आवश्यकता है और उसे किस प्रकार कार्यरूप में परिणत किया जाना चाहिए। व्यवस्था बुद्धि इसी को कहते है। जो मात्र तात्कालिक स्थिति को ही नहीं, उससे जुड़े हुए भूतकालीन तथ्यों पर भी ध्यान देती है और उनमें जो हेरफेर करना हो तो उसे करने के लिए बिना समय गंवाये कदम उठाती है। भविष्य को और भी अधिक अच्छा बनाने के लिए यह निर्धारण भी किया जाता हैं कि अधिक महत्वपूर्ण को पाने के लिए क्या मूल्य चुकाना पड़ेगा और उसे जुटाने के लिए क्या तारतम्य बिठाना पड़ेगा। इस प्रकार के समग्र चिंतन को ही व्यवस्था कहते हैं, भले ही वह किसी भी प्रयोजन के लिए अपनाई गई हो।
घर में रोज बुहारी लगाई जाती है। उपयोग में आने वाली वस्तुओं को सही स्थिति में रखने के लिए उन्हें हर दिन झाड़ा पोछा जाता है। शरीर और मन चूँकि जीवन का समूचा भार वहन करते हैं उसके लिए उनमें उत्पन्न होती रहने वाली गड़बड़ियों को बिना आलस्य किये सुधारते रहने की आवश्यकता है। घोड़े से लम्बी अवधि तक काम लेना हो तो उसके चारे दाने का प्रबंध तो करना ही पड़ता है साथ ही उसे सर्दी, गर्मी, गन्दगी से बचाने की भी सतर्कता रखनी होती है। शरीर और मन दोनों को साधना दो हाथों या दो घोड़ों को साधने की तरह है। इनके गड़बड़ा जाने पर अपनी समूची क्षमताएं अस्त−व्यस्त हो जाती हैं। प्रति करना तो दूर यथा स्थिति बनाये रहना और अवगत से बचना तक कठिन हो जाता हैं। अन्याय जिम्मेदारियों को वहन करते हुए जिस प्रकार जीवनचर्या चलाई जाती है तो उसी में एक अति महत्वपूर्ण पक्ष यह भी जुड़ा रहना चाहिए कि आरोग्य की स्थिति ठीक है या नहीं। भूख, नींद और मल विसर्जन के तीनों कार्य यथावत हो रहे हैं या नहीं। मन उत्साह, साहस ओर उल्लास की तीनों विशेषताओं को अपने स्थान पर ठीक से रखे हुए है या नहीं। यदि नहीं तो उपेक्षा में समय गंवाने की अपेक्षा तुरन्त उनके उपचार में लगना चाहिए।
यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि चिकित्सकों की सहायता से आरोग्य सुधार में नगण्य जितना ही समाधान होता है। सुधारना तो अपने आप को ही, निज का आहार-विहार व्यवस्थित करने के रूप में ही करना पड़ता है। नियमितता, अपनाना, संयम बरतना और स्वच्छता के लिए स्फूर्ति बनी रहना ऐसा प्रयास है,जिसके आधार पर खोये स्वास्थ्य को फिर से पाया जा सकता है। अच्छा हो तो उसे और भी अधिक अच्छा बनाया जा सकता हैं।
मन के सम्बन्ध में भी यही बात है। दूसरों की ओर से जो अवाँछनीयता बरती गई है उसका प्रतिशोध लेने की अपेक्षा यह सोचना चाहिए कि अपनी ढाल कैसे मजबूत की जाय, जिस पर किसी आक्रमणकारी का प्रहार कारगर न हो सके। इसी प्रकार अपने संतुलन को बनाये रहकर यह सोचना चाहिए कि आगत असुविधाओं से निपटने का क्या उपाय हो सकता है और उसे वर्तमान परिस्थितियों में किस आधार पर, किस सीमा तक निरस्त किया जा सकता है। इतने पर भी यदि कुछ संकट आ ही खड़ा हो तो इतना धैर्य और साहब संजोये रहना चाहिए कि आगत आपदा से हंसते हंसाते किसी प्रकार निबट लेने का उपक्रम बन सके। अपनी स्थिति सुधार लेना बाहर की अनेकों प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल लेने का एक महत्वपूर्ण गुरुमंत्र है। यही शारीरिक व मानसिक कायाकल्प का रहस्य है व महामानव बनने की कुँजी भी।
चुस्त और दुरुस्त रहना सभ्यता का श्री गणेश माना जाना चाहिए। शरीर से चुस्त और मन से दुरुस्त यह अभ्यास उसी प्रकार किए कराये जाने चाहिए जैसे कि आहार विहार, निद्रा, स्नान मलमूत्र विसर्जन जैसे कार्यों के सम्बन्ध में किए जाते हैं। उसमें कमी या गड़बड़ी तभी आती है जब व्यक्ति जागरूकता की मौलिक विशेषता से अपने आपको वंचित किए रहता है। तन्द्राग्रस्त व्यक्ति के सभी काम अटपटे होते है। गहरी नींद में सोया हुआ व्यक्ति अपनी जगह सही होता है। पूर्ण जाग्रत स्थिति में व्यक्ति मुस्तैदी के साथ अपने काम पूरे करते हुए अभीष्ट उपलब्धियां अर्जित करता है। मध्यवर्ती स्थिति बुरी होती है। उसमें अर्द्धजागृत और अर्द्धप्रसुप्त जैसी अवस्था में शरीर क्रिया और मनः चेतना किसी प्रकार घिसटती भर रहती है।
ऐसी स्थिति में प्रकारान्तर से नशे की खुमारी में डूबे मनुष्य के समतुल्य समझा जा सकता है। खुमारी में व्यक्ति उस विचित्र स्थित में होता है जिसे न तो जागता कहा जा सकता है और न सोया हुआ। उस स्थिति में उसकी विचित्र हरकतें देखकर लोगों को आश्चर्य होता है कि उसे क्या कहा जाय? क्या माना जाय? आलसी और प्रमादी प्रायः इस प्रकार की अपनी आदतें बना लेते हैं। मादक पीने वाले किस कोने में विचित्र सनकों में सनकते रहते हैं। यह सनकीपन की बढ़ी चढ़ी स्थिति है जो तुरन्त अखरती और पकड़ में आती हैं परंतु उससे हलके स्तर का सनकीपन और भी होता हैं। उसमें डूबा हुआ व्यक्ति सामान्य कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को भी भूल जाता है। इन्हें एक विचित्र प्रकार का नासमझ या सनकी कह सकते है, जो मानवोचित रीति नीति अपनाने में प्रमाद बरतते और असभ्य स्तर के बन जाते हैं।
अर्थोपार्जन इन दिनों प्राथमिकता प्राप्त किए हुए है। पर उसमें भी खरीदने वाले ग्राहक से, मंगाने वाले स्टाँस्टों से, दुकान सम्हालने वाले कर्मचारियों से व्यवहार तो करना ही पड़ता हैं। जो अनगढ़ स्वभाव अभ्यास में जुड़ा रहता है वह सभी संपर्क में आने वालों को भड़काता है। उनके साथ मधुर संबन्ध रहने में अनगढ़ता एक बड़ी कठिनाई बन कर राह में आ जाती है। यही बात पर गृहस्थ के सम्बन्ध में है। परिवार वालों के साथ उपेक्षा कटुता या तिरस्कार भरा व्यवहार किया जाये तो वे यथा संभव बचते रहने का प्रयत्न करते हैं। विवाद खड़ा करने या कटुता से बचने के लिए उन्हें और कोई उपाय सूझता ही नहीं। वे हटे हटे कटे कटे रहते हैं। फलतः हंसने-हंसाने, विचार विनिमय और सुव्यवस्था बनाने अवसर ही हाथ से चल जाता है। दोनों पक्षों के बीच ऐसी खाई पड़ती और बढ़ती जाती है जिसके कारण एक घर में रहते हुए एकौके में खाते हुए भी सराय में ठहरने वालों की तरह सब कुछ पराया, हीन अनचाहा ही दीखता रहता है।
कारखानों दफ्तरों में भी यही ढर्रा चल रह हो तो समझना चाहिए कि साधन, सहयोग के अभाव में उत्पादन घटेगा। जो काम चल रहा होगा उसमें असंख्यों भूले होती रहेगी। परस्पर साधन सम्मान की मनःस्थिति न रहने पर उपेक्षा तो बरती जायेगी ईर्ष्या भी पनपती रहेगी और अवसर मिलने पर चोट किये बिना भी न रहेगी। ऐसे लोग दफ्तर, कारखाने मालिकों के लिये, मजदूरों के लिए, ग्राहक के लिए, संबंध रखने वालों के लिए भारभूत ही बनकर रहते है। भीतरी असन्तोष के कारण कोई किसी को सन्तोष दिलाने की स्थिति में नहीं रहता। मात्र सभ्यता के अभाव में लोग समस्याओं के तिल का ताड और राई का पहाड़ बना लेते है।
विज्ञजन सदा से इस बात के लिए चिंतित और प्रयत्नशील रहे हैं कि जन जन को मनुष्यता की मर्यादा में प्रवेश करने का पाठ शिष्टाचार के रूप में पढ़ाया जाये। यदि यह बीजारोपण सही प्रकार संभव हुआ तो व्यक्ति निखरेगा।उसके अन्दर विद्यमान अनेकानेक क्षमताओं, दक्षताओं को विकसित होने का अवसर मिलेगा। फलतः वह जो भी कार्य हाथ में लेगा उसे सही ढंग से करने और सफलता के ऊंचे स्तर तक जा पहुंचने का सुयोग क्रमशः मिलता चला जायेगा। यदि यह मौलिक कमी बनी रही तो स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी जैसे अच्छा बीज न बोए जाने पर खाद पानी आदि की व्यवस्था करते रहने पर भी निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ ही नहीं लगता।
किसी का व्यवसाय कुछ भी क्यों न हो, हर हालत में लोगों के संबंध रखना ही पड़ेगा। इसके लिए चुस्त दुरुस्त ही आदतों का बना रहना आवश्यक है। अन्यथा लोग तिरस्कार करेंगे, मूर्ख बनायेंगे, घाटा देंगे ओर असहयोग जन्य अनेकानेक प्रत्यक्ष परोक्ष कठिनाइयों के निमित्त बनेंगे। दोषारोपण दूसरों पर भी किया जा सकता है। पर अपने को सर्वथा निर्दोष मानना और दूसरों को ही सारी गड़बड़ी का कारण मानना एक ऐसी बुरी आदत है जिससे अवरोध का समाधान तो निकला ही नहीं, उल्टी उलझने और भी अधिक उलझ जाती हैं।
मानवी प्रतिभा में प्रवेश करते ही सके साथ जुड़े हुए आरंभिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझना और अपनाना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना जीवन के किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकना तो दूर सभ्य समाज का सदस्य कहना सकना भी कठिन है। उस अभाव में उपेक्षा भर्त्सना और अवनति के अतिरिक्त कुछ पल्ले नहीं पड़ता। इस तथ्य को जिम्मेदारी आरंभ होने से लेकर मरण काल तक स्मरण रखना चाहिए। अपने आपको तो इस स्तर का बनाना ही चाहिए साथ ही जिन किन्हीं के साथ अपनी सघनता हो उसे भी उसी अनुपात में सहमत ही नहीं बल्कि बाधित भी करना चाहिए कि उसे अपन लोक व्यवहार में शिष्टाचार का गहरा पुट लगाए रहने की विद्या अपनानी चाहिए।
प्राचीनकाल में यह प्रकरण हर किसी को समझदारी का उदय होते ही सिखाना आरम्भ कर दिया जाता था। इस सुसंस्कारिता को अभ्यास में उतारने के लिए एक धार्मिक प्रचलन संस्कार ओर पर्व हर व्यक्ति की आयु वृद्धि के साथ साथ संस्कार आयोजन होते थे। उसमें साझेदारी उन सब की होती थी जो उस आयोजन में उपस्थित होते थे। संस्कार प्रवचन धार्मिक कर्मकांडों के माध्यम से उन सबको शिक्षण दिया जाता था, ताकि वे अपने को उस स्तर का ढाले जिसका अनुसरण करते हुए बालक या पालक भी उसी राह पर चल सके। इस प्रक्रिया को सभ्यता का श्री गणेश भी कहा जाता था।
इसी का एक दूसरा पक्ष या पर्व त्यौहारों का आयोजन। उन विशेष अवसरों पर विचारशील नर नारी भावना पूर्वक एकत्रित होते थे और उसके साथ जुड़े हुई प्राचीन परम्परा एवं अर्वाचीन विधि व्यवस्था को सामयिक संदर्भ में समझा समझाया जाता था। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि संस्कृति के यह आधार स्तम्भ एक प्रकार से लड़खड़ा से गए। निहित स्वार्थों पर उनका कब्जा हो गया। नियत कर्म कांडों के विधि विधान इतने जटिल और खर्चीले हो गए कि उनका भार सह सकना सर्व साधारण के लिए संभव ही न रहा। रूढ़िवादी चिन्ह पूजा तो अभी जहाँ तहाँ दृष्टीगोचर होती है, पर उनके लिए उत्साह होने के स्थान पर उपेक्षा ने जड़ जमा ली है। इससे सब से बड़ी खराबी यह हुई कि व्यावहारिक सभ्यता के प्रशिक्षण का वातावरण ही एक प्रकार से समाप्त हो गया। फलतः हम सब पढ़े अनपढ़े धनी निर्धन व्यक्तित्व की दृष्टि से जिस स्थिति में जा पहुंचते हैं, उससे निराशा भी होती है और लज्जा भी आती है।
समस्या एक देशीय नहीं सार्वभौमिक है। उसे सर्वजनीन भी कह सकते हैं। संसार के मूर्धन्य विचारकों और समाज सेवियों ने इस पर गंभीरता पूर्वक विचार किया हैं। ऐसा उपाय ढूंढ़ने का प्रयत्न किया है कि जन समुदाय को उस सभ्यता के साथ जोड़ा जाय तो नागरिक एवं सामाजिक कर्तव्यों की बीच सघनता स्थापित करती है। इस अभाव की पूर्ति कि बिना वर्तमान आस्था संकट और चरित्र विग्रह हट नहीं सकेगा। प्रगति के स्थान पर पराभव, गौरव के स्थान पर पतन, समाज के लिए दुःखदायी वातावरण ही बनाता रहेगा। जो हर दृष्टि से हर किसी के लिए कष्टकारक ही सिद्ध होगा।
इस संदर्भ में एक युग मनीषी “वेडेन पावेल” ने स्काउटिंग नाम के आन्दोलन को जन्म दिया। उसका प्रधान उद्देश्य छात्रों में नागरिक सुसंस्कारिता एवं समाज के प्रति कर्तव्यों के परिपालन की भावना और क्षमता बढ़ाना रखा गया। उपयोगिता को देखते हुए संसार के अनेक देशों में उसका प्रचार हुआ। शिक्षा विभागों ने उसे अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया। स्वतंत्र रूप से भी उसकी प्रशिक्षण प्रक्रिया चलती रही। भारत में स्काउटिंग आन्दोलन की शाखा का बीजारोपण अभिवर्धन करने में श्री श्रीराम वाजपेयी ने पूरी लगन के साथ कार्य किया। उसमें भारतीयता के तत्व सम्मिलित किए ओर उसके प्रयोग अभ्यास का सिलसिला व्यापक रूप से चलाया।
इस आन्दोलन के समानान्तर समय समय पर स्थान स्थान पर अन्य कई आन्दोलनों का जन्म एवं विकास हुआ। इनमें राष्ट्रीय कैडेट कोर, एन.सी.सी. राष्ट्रीय समाज सेवक, रोटनी क्लब, लायन्स क्लब, भारत सेवक समाज, रेड क्रॉस, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, शिवसेना आर्यवीर दल, महावीर दल, आदि संगठनों की स्थापना हुई और उनका अपने अपने अनुभव क्षेत्र में विस्तार भी होता रहा। राष्ट्रीय काँग्रेस, लोकदल जनतापार्टी, दलित संगठन, जैसे राजनैतिक संस्थाओं ने भी इसी स्तर की अपनी स्वयं सेवी शाखाओं का निर्माण किया है। पर वे मतभेदों और निहित स्वार्थों के कारण अपने अपने सीमित प्रयोजनों को आगे रखे रहे। यदि मूल उद्देश्य भुलाया न जाता तो जन जन में सभ्यता के आरम्भिक चरण को परिपुष्ट करते रहने तक की बात को ही प्रमुख माना गया होता। यदि ऐसा बन पड़ता तो राजनैतिक या सामाजिक धाराओं में से किसी को चुन लेने पर भी कोई हानि न होती पर परिपक्व स्तर के नागरिक मानवी गरिमा को गौण और पार्टी स्वार्थों को प्रधानता देने लगते है। फलतः दोनों में से एक भी उद्देश्य पूरी तरह पूरा नहीं हो पाता। वर्तमान स्थित में अनेकों स्काउटिंग स्तर के संगठन बने दिखाई देते हैं, पर उन सब का सम्मिलित प्रयास भी इतना नहीं कर पाता कि अपने प्रभाव क्षेत्र के लोगों को नीति निष्ठा जागरूकता, कर्तव्य परायणता, नागरिकता एवं सामाजिकता के सर्वमान्य नियमों को समझने एवं स्वीकार करने में समर्थ हो सके।
गिनती गिनने में भूल हो जाने पर उसका एक ही समाधान है कि नए सिरे से गिनने आरम्भ कर दिया जाये। हमें एक सार्वभौम प्रयास आरम्भ करना चाहिए, जो मात्र मानवी संस्कृति को प्रखर प्राणवान् बनाने के लिए काम करे। सभ्यता का श्रीगणेश करने की विद्या को जन साधारण के लिए अनिवार्य घोषित करे। छात्रों को प्राथमिकता देना उचित है, पर इस छोटे वर्ग तक किसी सार्वभौमिक आन्दोलन को सीमित कर देने से काम नहीं चल सकता। अपने देश को तो विशेषतया परिस्थितियाँ भिन्न है, यहाँ मात्र 30 प्रतिशत जन संख्या शिक्षित है। उनमें यदि देखा जाय कि जो इन दिनों स्कूल में पढ़ रहे है, तो इन्हें दस पाँच शतप्रतिशत ही पाया जायगा। केवल उन्हीं को स्काउटिंग सिखा देने से व्यक्ति में संस्कारिता संवर्धन का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। करोड़ों की संख्या में ऐसे नर नारी है जो बिना पढ़े है। वे फिर से पढ़ना आरंभ करेंगे और प्रशिक्षण के साथ स्काउटिंग जैसे विशेष प्रशिक्षण को सम्मिलित रखेंगे, इसकी आशा कम ही बंधती है। फिर भी यह आवश्यकता अनिवार्य है, जिसके बिना प्रति रथ पूरी तरह रुक गया है। उसे निराकरण के लिए कुछ पाय उपचार तो करना ही पड़ेगा। कुछ सामयिक हल ढूंढ़ना और निकालना ही पड़ेगा।
सुख साधनों के उपभोग, अधिक और अधिक धन पाने की लिप्सा मनुष्य को कभी शान्त नहीं हुई। उचित या अनुचित किसी न किसी तरीके से वह अपनी यह इच्छा पूरी करने की क्षणमात्र में धन कुबेर बनने की पूरी कोशिश करता है। इसी ललक लिप्सा से रंगे हुए इतिहास के पन्ने बताते है कि कर्म का विधान ही धरित्री पर विद्यमान रहेगा। रातोंरात धनपति बनने का कोई शार्टकट विधाता की व्यवस्था में नहीं है। जो धन अनीति से उपार्जित होता भी है, वह वैसा ही नष्ट भी हो जाता है, उस व्यक्ति के जीवन को भी अभिशप्त बना जाता है। सौभाग्यों व दुर्भाग्यों का सूत्र संचालन किस केन्द्र में होता है, यह तो अभी तक पता नहीं चल पाया पर स्थानों व व्यक्तियों से जुड़ी कई घटनाएं बताती है कि अभिशप्त वस्तु को पाने का प्रयास ऐसे दुर्योगों को जन्म देता है, जिनका कोई अन्त नहीं है।
“द सर्च फॉर गोल्ड - एल्डोरेडो, लैण्ड ऑफ गोल्ड” (ए बेलेण्टान बुक पब्लिकेशन) नामक पुस्तक में इंका स्वर्ण साम्राज्य से जुड़े घटना क्रमों का बड़ा लोमहर्षक विवरण है 13 मार्च, 1932 को फ्रांसिस्को पिजारो नामक एक स्पेनिश व्यक्ति ने इंका की तत्कालीन राजधानी काजामारका की और प्रयाण किया। वैसे तो स्पेन, पुर्तगाल का इतिहास ही लुटेरों को गाथाओं से भरा पड़ा है। पूरा दक्षिण अमेरिका, वेस्टइंडीज, हाइटी, अमेरिका के पूर्वी तट उनके हमलों का सतत् शिकार होते रहे। पर फ्रांसिस्को एक लक्ष्य को लेकर चला था, किसी तरह इंका की राजधानी काजामारका तक पहुंचकर वहाँ चल रहे गृहयुद्ध लाभ उठाकर बहुमूल्य र्व्ण को हासिल करना। इसके लिये उसने खूंखार जलदस्यु साथ लिए व अपने गिरोह को लेकर दक्षिण अमेरिका के घनघोर जंगल में प्रवेश कर गया। से भनक लग चुकी थी कि अभी जो इंका राज्य का अधिपति है वह वहाँ के ग्यारहवें सम्राट एनाविल्हा की रखैल क्विटो से पैदा हुआ पुत्र अताहुअल्या है एवं उसमें तथा वास्तविक उत्तराधिकारी होईस्कूल में घनघोर पदार्थ चल रही है। अताहुअल्या ने षडयंत्र से न केवल हाईस्कर के पुत्रों पत्नियों व अन्य रिश्तेदारों को मरवा डाला, बल्कि उसका पक्ष लेने वाले सभी दरबारियों को खत्म करवा दिया था। इस तरह एक अनैतिक राजशाही का वहाँ अंकुश था। इसे एक सही मौका मानते हुए राज्य की सीमा पर पहुंचकर फ्राँसिस्को ने कूटनीति का आश्रय लेते हुए अपने भाई हरनाण्डो को राजा को आमंत्रित करने भेजा। हरनाण्डो ने बहुमूल्य भेंटें प्रस्तुत करते हुए राजा से बार बार उनके ठहरे हुए स्थान पर भोज के लिए चलने का नम्र निवेदन किया भेंटों से प्रसन्न व खुफिया सैनिकों से यह जानकारी पाकर कि विदेशियों की संख्या अधिक नहीं है, राजा ने हर्ष अनुमति दे दी व अगले दिन वह कुछ सैनिकों को साथ लेकर आया। फ्राँसिस्को ने आस पास अपने डाकू सहयोगियों को छिपा रखा था। स्वयं निःशस्त्र बाहर आते हुए उसने राजा से भी बिना अंगरक्षकों व शस्त्रों के, मैत्री भाव से अंदर आने की प्रार्थना की। भो के तुरन्त बाद तेवर बदलते हुए उसने राजा से ईसाई धर्म स्वीकार करने को कहा नहीं तो बन्दी बना लेने की धमकी दी। राजा ने कहा “ हमारा सूर्य भगवान जिन्दा है, हम ईसाई धर्म स्वीकार नहीं कर सकते।” इतना कह कर उसने अपने सैनिकों आवाज दी, पर तब तक तो उनकी मुश्कें बाँध दी गयी थी व अंगररक्षकों का वध कर दिया गया था। सम्राट की मुक्ति के लिये शर्त रखी गयी उस 22 फुट लम्बे, 20 चौड़े व 15 फीट ऊँचे कमरे में जितना स्वर्ण समा जाय, उतना मिलने पर सम्राट को आजाद कर दिया जायेगा। इंकावासियों ने स्वर्ण इकट्ठा कर पहुंचाया तो राजा को मृत पाया एवं उन्हें धमकी दी गयी कि जितना भी स्वर्ण उनके पास है, वह लगाकर दे। नहीं तो पूरे साम्राज्य को नष्ट कर दिया जायेगा।
राजा तो अवैध उत्तराधिकारी था ही अपनी मौत को वैसे ही प्राप्त हुआ। इंका वासियों ने भी अकर्मण्य बने रह विरोध न कर सारा स्वर्ण लाकर दे दिया व उधर गिने चुने स्पेनी लुटेरे उनके साम्राज्य को लूटते रहे आग लगाते हरे। जब वे लौटकर आए तो अपने सरदार को सारा सोना लदवाकर भागते हुए देखा, सभी लुटेरे आपस में लड़ कर वहाँ मर गए जिनमें फ्राँसिस्को भी था। एक ही व्यक्ति इसमें से जीवित बचा जो किसी तरह बचकर बिना कुछ लिए सब कुछ उबारकर इंका साम्राज्य को धूल धूसरित व सारे साथियों को खोकर वापस स्पेन लौटकर आया व यह सारी जानकारी दी। इस घटना से अन्दाज लगाया जा सकता है कि स्वर्ण चरीचिका किस प्रकार विनाश लाती है। कहते है कि इस सोने को आज तक कोई नहीं पा सका, आज उस स्वर्ण का मूल्य खरबों डॉलर होगा पर वह अविज्ञात खंडहरों में घन घोर जंगलों में लुप्त है एवं पंद्रहवीं सदी से लेकर अब तक अगणित व्यक्ति उसकी खोज में अपनी जान गंवा चुके है। इनका ही नहीं, ऐसे अवैध धन को हस्तगत करने का जिन जिन के प्रयास किया है, उन्हें काल का ग्रास बनना पड़ा है। दक्षिण अमेरिका में जो संस्कृति देखने में आती है, वह भारतीय संस्कृति से बहुत मेल खाती है। उनका रहन, सहन, पहनाव, उड़ावा, मंदिर महलों की बनावट को देखकर लगता है कि मय दानव का कभी यह क्षेत्र रहा होगा व यही भारत वर्ष से आकर बसे व्यक्तियों ने समृद्ध राज्य विकसित किया होगा। सोलहवीं सदी का एक प्रसंग है। इक्वेडोर जो पेरु से उत्तर में दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थिति है को स्पेनिश सरदार को जानकारी मिली कि पूर्व की और 2000 मील की दूरी पर एक राज्य है, जिसका राजा सुवर्ण की रेत से सतत् आवृत रहता है। यह रेत उस राज्य के मध्य से बहने वाली नदी के किनारे है जो सरोवर में समाप्त हो जाती है। सुवर्ण पुरुष को स्पेनिश भाषा में एल्डोरेडो कहते है। इस राजा को जिस पर रत्न निछावर होते ही देखने तथा समृद्ध प्रज्ञा को लूटने गोन्नालो क्वेस्डा नामक एवं यूरोपियन डाकू को साथ लेकर इम्बेडोर का वह स्पेनिश सरदार चल पड़ा। उन्होंने घाटी में पहाड़ काट कर चट्टानें नदी में डाल कर, राज्य व सरोवर के बीच का मार्ग बंद करने का प्रयास किया ही था कि चारों और से चट्टानें गिरने लगी व सभी लुटेरे उस स्वर्ण रेत में ही मृत्यु को प्राप्त हुए।
यह रक्त रंजित इतिहास दक्षिण अमेरिका के इस अपार स्वर्ण साम्राज्य से जुड़ा है जिसमें से बहुत-सा अभी तक अविज्ञात है। जो व्यक्ति लूटने की दृष्टि से गया, वह कभी लौट कर नहीं आया। पिछली एक शताब्दी में जो नृतत्वविज्ञानी, पुरातत्ववेत्ता सभ्यता की खोज में गए है, उन्हें स्वर्ण पात्र भी मिलते है व विनष्ट सभ्यता के अवशेष भी। परन्तु वे अक्षय स्वर्ण भण्डार तक अभी तक नहीं पहुंच पाये। इन्हीं से प्राप्त जानकारियों व संग्रहालयों में एकत्र स्वर्णपात्रों, आभूषणों से अनुमान लगाया जा सकता है कि कभी कोई अति समृद्ध संस्कृति वहाँ रही होगी।
समुद्रमंथन से चौदह रत्न प्राप्त हुए थे, यह सभी जानते हैं। इसमें सर्व प्रथम था काल कूट जहर जिसे नीलकंठ महादेव ने पिया था, फिर अन्याय रत्न मिले थे। जो भी व्यक्ति, रत्नों, हीरे के भांडागारों सुवर्ण सम्पदाओं को बिना पात्रता के लूटने खसोटने का कार्य करता है, उसका वही हाल होता है जो दक्षिणी अमेरिका में सोने की खोज में गए व्यक्तियों का हुआ। यह एक सनातन सत्य है व हमेशा रहेगा कि लोकहित के लिए ही किसी धन सम्पदा को प्राप्त किया जा सकना संभव है व वह प्रताप भामाशाह परंपरा की तरह सदैव मिलती रही रहेगी। छत्रसाल को महाप्रभु प्राणनाथ से पन्ना में हीरों से भरा भण्डार अनुदान रूप में प्रदत्त किया था ताकि वे यवनों से लड़ने हेतु सेना जुटा सके। उन्होंने वही किया व वे इतिहास में अमर बन गए। अनीति से अर्जित व अभिशप्त सम्पदा कष्ट कर मृत्यु लाती है एवं इस ललक लिप्सा में न जाने कितनी को अपनी गोदी में हमेशा के लिए सुला देती है। इस सनातन तथ्य को जानते हुए भी न जाने क्यों मनुष्य सही मार्ग पर नहीं चल पाता एवं अनीति का मार्ग ही खोजता हैं।
विज्ञानविदों ने अनवरत शोध प्रयासों के बाद प्रकृति के कुछ ही रहस्य उजागर करने में सफलता पाई है। उनकी यह मान्यता है कि इस समूचे दृश्य जगत में इतना अविज्ञात बिखरा पड़ा है, जिसकी न हमें जानकारी है न उस संबंध में पक्ष विपक्ष में कहने का कोई तर्क ही हमारे पास है। सूक्ष्म एवं अविज्ञात शक्तियों की न जाने व कितनी धाराएं अभी भी प्रकृति के अन्तराल में विद्यमान है। रहस्यमयी असीम संभावनाओं के समक्ष अभी तक प्राप्त भौतिक शक्तियों की सामर्थ्य नगण्य ही है। सामर्थ्यों के जो वर्तमान स्त्रोत हाथ आये है, उन्हें भी कभी अकल्पनीय असम्भव ही माना जाता था।
विशाल ब्रह्माण्ड के प्रतिरूप पिण्ड मानवी काया के रहस्य भी कम अनोखे नहीं हैं स्थूल को छोड़ सूक्ष्म को ही देखे तो पाते है कि उसके सामान्य क्रिया कलाप इच्छा आकांक्षा विचारणा के रूप में समझ में आते है एवं स्थूल गतिविधियों का कारण बनते है। इन सबका अध्ययन मनोविज्ञान के अंतर्गत किया जाता रहा है। आधुनिक मनोविज्ञान भी मुख्यतः सचेतन में ही उलझा है। अवचेतन की वह मात्र ऊपरी परत को स्पर्श कर पाया है। छिपे हुए चमत्कारी सुपरचेतन की बात तो उसे समझ में आयी ही नहीं। यही शक्ति और प्रेरणा का केन्द्र बिंदु है। इसे समझना अभी शेष है। जानकारी के अभाव में मनुष्य प्रायः अपनी प्रसुप्त शक्तियों का उपयोग नहीं कर पाता, जैसा कि भौतिकी के सागर में निहित शक्तियों के संदर्भ में चिरकाल से होता आया है।
मानवी सत्ता को भलीभाँति समझ पाना मनोवैज्ञानिकों के लिए तब ही संभव है, जब वे मन के अध्ययन विश्लेषण के संकीर्ण दायरे से निकल पाने का साहस जुटा सके। इसके लिए सुविस्तृत अनंत आत्म क्षेत्र में प्रवेश अनिवार्य है। अन्यथा फ्रायडवादी मनोविज्ञान के चश्मे से नेत्र वही देखेंगे जो उन्हें घिसी पीटी मान्यताओं में आबद्ध मनोवैज्ञानिक मूल प्रवृत्ति का गुलाम मनुष्य को ठहराते हुए दिखाते रहे हैं। इस तरह आत्म विकास को सभी संभावनायें अवरुद्ध ही रहेगी।
मनोविज्ञान के उद्गम एवं विकास का मूल स्त्रोत भारतीय अध्यात्म है। इसे अध्यात्म का एक अभिन्न अंक कहा जाए तो अत्युक्ति नहीं है। अध्यात्म से अलग कर देने पर मनोविज्ञान की अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं हो पाती। ऐतिहासिक कालक्रम का अवलोकन करने पर तय हुआ है कि सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक अध्ययन का आविर्भाव उपनिषदों से हुआ। उपनिषद्कार ही प्राचीनतम दार्शनिक तथा मनोवैज्ञानिक चिन्तक है। प्रमाण छांदोग्योपनिषद् में संकल्पवाद (वालण्ट्रीज्म) एवं प्रज्ञावाद (इन्टलेक्युअलिज्म), ऐतरेय उपनिषद् में मनोवृत्ति-वर्गीकरण तथा बृहदारण्यक उपनिषद् में स्वप्न मीमाँसा आदि के रूप में देखे जा सकते हैं। उपनिषदों का प्रभाव ग्रीक दर्शन पर पड़ने के कारण वहाँ भी मनोविज्ञान का विकास हुआ। ग्रीक चिन्तकों ने इसे यथावत स्वीकारने के कारण इसका नाम साइकोलॉजी रखा। यह शब्द लैटिन भाषा के साइक तथा लोगोस शब्दों से मिलकर बना है। साइक अर्थात् आत्म, लोगोस अर्थात् ज्ञान। अर्थात् आत्मा का विज्ञान ही मनोविज्ञान है। इसके प्राचीन अध्येता अरस्तू, सुकरात, प्लेटो आदि ने आत्म तत्व पर चिन्तन करके इस संबंध में बहुत कुछ लिखा है। ये बातें इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि आत्मानुसंधान प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक अध्ययन की महत्ता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी थी।
आज से तीन शताब्दियों पूर्व से भारत तथा साँस्कृतिक दृष्टि से सुविकसित कुछ पाश्चात्य देशों में मनोविज्ञान, अध्यात्मविज्ञान का एक अविच्छिन्न अंग माना जाता रहा है। जैसे-जैसे प्रत्यक्षवाद-भौतिकवाद मानवी चिन्तन में अपनी जड़ें जमाता चला गया, इसी क्रम में मान्यताओं एवं प्रतिपादनों में उलटफेर होता चला गया। परिभाषाएं बदलती चली गई।
मनःशास्त्री टिंचनर ने मनोविज्ञान का मन के विज्ञान के रूप में उल्लेख करते हुए मन की विशिष्टताओं को तीन भागो संवेदना, प्रतिभा तथा भावना के रूप में विभक्त किया है। अन्य मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को चेतना के विधान के रूप में परिभाषित किया है। चेतन के अर्थों में विभिन्नता अवश्य हैं प्रो. बोर्ड तथा अन्य व्यवहारवादी मनःशास्त्रियों ने चेतना को अनुभव के रूप में प्रयुक्त किया है। वाट्सन ने उसे आत्मा के स्थानापन्न के रूप में माना है। उस तरह चेतना शब्द को अभी भी विवाद की दृष्टि से देखने वाले मनोविज्ञान के क्षेत्र में उसे प्रयुक्त करते देखा जा सकता है। प्रो. विलियम जेम्स ने अपनी कृतियों में मन शास्त्र को चेतना की अवस्थाओं में निरूपित किया है। इन अव्यवस्थाओं से उनका अभिप्रायः संवेदनाओं, संवेगों तथा संकल्पों के अध्ययन से है।
डॉ. नॉरमन एलमन ने अपने अध्ययन में अनुभव एवं व्यवहार का सामंजस्य प्रस्तुत किया है। उनकी मान्यता है कि चेतन अनुभव के विज्ञान से तथा ज्ञान व्यवहार से आन्तरिक एवं बाह्य जीवन की अभिव्यक्तियां है। व्यवहारवाद के जन्म के पश्चात् मनोविज्ञान तथा शरीर विज्ञजन में भेज स्थापित कर विलियम मैकडूगल ने मनोविज्ञान को परिभाषित करते हुए बताया है कि यह एक ऐसा विज्ञान है जो संपूर्ण शरीर के व्यवहार का ज्ञान कराता है।
मनःशास्त्र को नई दिशा देने तथा मन की चेतन अचेतन परतों की नवीन जानकारियां देने में जुँग एडलर आदि मुख्य माने जाते है। पर इनकी जानकारी भी मन के दृश्य पक्षों तक ही सीमित है। दृश्य के पार अदृश्य में संभावनाओं के रहस्यमय, सामर्थ्यवान स्त्रोत मानवी सत्ता में विद्यमान है जिनके बारे में जाना जाना अभी शेष है। कुछ मनःशास्त्री अपनी अपूर्णता एवं अल्पज्ञता स्वीकार कर पूर्णता एवं समग्रता हेतु भारतीय चिंतन में प्रविष्ट होने पर जोर देते है। उनके अनुसार इनमें वे सूत्र हैं जिनसे मानवी सत्ता के रहस्यमय स्वरूप का उद्घाटन हो सकता है।
“इन विजिवल इन्फ्लुएन्स” पुस्तक के लेखक डॉ. कैनल लिखते हैं कि भारतीय मनोविज्ञान में प्रतिपादित शाश्वत ज्ञान मात्र चिन्तन पर नहीं अपितु अनुभूतियों पर अवलंबित है। भारतीय मनीषियों, उपनिषद्कारों ने मन एवं बुद्धि के परे आत्मा के क्षेत्र में प्रविष्ट हो गहन मंथन किया है। इन गहन अनुभूतियों में उन्होंने जाना कि आत्मा का रहस्य जानकर ही पिण्ड एवं ब्रह्मांड की अविज्ञात शक्तियों तथा संपूर्ण रहस्यों का समग्रता से उद्घाटन किया जा सकता है।”
“वर्ल्ड एवं पॉवर नियलीटी” के लेखक सर जॉन वुडरफ अपने विख्यात ग्रंथ में लिखते हैं कि “वेदान्त” मनोविज्ञान के विकास की चरम अभिव्यक्ति है। इसमें निरूपित सिद्धान्त आधुनिकतम मनोविज्ञान के ज्ञानकणों के समक्ष उन्नत पर्वत शिखरो समान है।”
“विस्डम ऑफ ओवर सेल्फ” पुस्तक में डॉ. पाल ब्रण्टन स्पष्ट करते हैं कि भारत के पास उसके आध्यात्मिक ज्ञान की प्राचीन सम्पत्ति है, जिसमें दर्शन एवं मनोविज्ञान का उत्कर्ष समाया है। वे कहते हैं कि अपरिमित सामर्थ्य का स्त्रोत मानवी सत्ता में विद्यमान है। इन्हें जानने समझने के लिए शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान के दायरे को पार कर आत्म विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ेगा। इस यात्रा के मार्गदर्शक प्रकाश संकेतन रूप में ऋषि प्रणीत सिद्धान्तों को ही आधार बनाना पड़ेगा।”
इसी राजमार्ग पर चलकर वह तथ्य सुस्पष्ट होने लगता है जिसमें हम ब्रह्मांड के प्रतिरूप पिण्ड के स्थूल, सूक्ष्म, कारण विविध स्वरूपों तथा इन सबसे परे महाकारण का रहस्य मर्म जान पाते हैं। ब्रह्माण्ड की यथार्थता का बोध “सर्वखल्विदं ब्रह्म” के रूप में होने लगता है। अविज्ञात को जानकर जीवन्मुक्ति के राजमार्ग पर चल पड़ने हेतु भारतीय मनोविज्ञान सभी को समान रूप से आमंत्रण देता है। इस आह्वान को स्वीकारने वाले बंधनों से मुक्त हो जाते है, इसमें कोई संशय नहीं।
ने अपने अंधे माता-पिता को काँवर से नीचे उतार दिया था। आगे बढ़ चलने पर जब यह प्रभाव क्षेत्र समाप्त हो गया तो श्रवण कुमार को अपनी भूल का आभास हुआ और अपने माता-पिता से क्षमा माँग कर उन्हें फिर कंधे पर बिठा लिया। दण्डकारण्य में असुरों का शासन चिरकाल तक रहा। कुकृत्य होते रहे, फलतः उस क्षेत्र में बहुत समय बीत जाने पर भी ऋषि-तपस्वियों ने निवास करने का साहस नहीं किया। हिमालय जैसे पुण्य क्षेत्र को साधना के लिए अभी भी अधिक फूल प्रद इसलिए माना जाता है है कि वहाँ चिर पुरातन में अनेक ऋषियों ने तपस्या के उद्देश्य से अपना कार्य क्षेत्र बनाए रखा। उनके व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व में अभी भी उन क्षेत्रों की विशिष्टता विद्यमान है। यद्यपि उस निवास को युगों की अवधि बीत गई। भूमि की विशेषता है कि वह न केवल, वर्षा गर्मी से प्रभावित होती है। वरन् वहाँ जो कुछ होता रहा है। उसका प्रभाव भी विद्यमान रहता है। तीर्थ परम्परा के पीछे ऐसे ही उत्कृष्टता से भरे घटनाक्रम अपनी छाप छोड़ते रहे हैं। यही हैं वे सब निमित्त कारण जिनकी महत्ता को समझते हुए लोग तीर्थ यात्रा करते और वहाँ रह कर अपनी आध्यात्म साधनाएँ सम्पन्न सम्पन्न करते हैं। श्रद्धा के अनुरूप उन्हें प्रतिफल भी प्राप्त होता है।
हरिद्वार का शाँति कुँज अपने समय का एक ऐसा गायत्री तीर्थ है जो स्थान की महिमा को अपने साथ पूरी तरह संजोए हुए हैं। हिमालय का प्रवेश द्वार होने से हरिद्वार नाम पड़ा है। एक ओर शिवालिक पहाड़ियाँ, दूसरी और गढ़वाल हिमालय की छत्रछाया उस पर घनीभूत रहती है। गंगा का तट सटा हुआ है। जब गंगा का अवतरण हुआ था तो इस तपोमय क्षेत्र में सप्तऋषि तप करते थे। गंगा ने उनकी समाधि साधना में विघ्न डालना उचित न समझा और अपनी सात धाराएँ काट कर उन्हें अपने स्थान पर अवस्थित रहने दिया। इसी लिए भूमि का नाम सप्त सरोवर पड़ा है। जिस स्थान पर गायत्री के ऋषि, महर्षि विश्वामित्र तप करते थे उसी पर शाँति कुँज बना है। हिमालय की प्रतीक देवालय प्रतिमा मात्र भारत वर्ष में इसी एक स्थान पर हैं। प्रायः आधी शताब्दी से जलती आ रही अखण्ड ज्योति की यहाँ स्थापना है, जिसके आलोक में अब तक करोड़ों की संख्या में जप किया जा चुका हैं। गायत्री माता का देवालय तो अवस्थिति है ही। नौ कुण्डों वाली यज्ञ शाला में नित्य दो घण्टे तक गायत्री महामंत्र से अग्निहोत्र होता है। सप्त ऋषियों की प्राण प्रतिष्ठा की हुई प्रतिभाएँ भी इसी देवालय में स्थापित है।
शाँतिकुंज विगत 27 वर्षों से स्थापित है। इस अवधि में नित्य प्रति गायत्री उप अनुष्ठानों की नियमित श्रृंखला चलती रही है। दोनों नवरात्रियों में तो यहाँ इतने अधिक साधक हर वर्ष आते हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि अभी भी साधना तपश्चर्या के प्रति लोक निष्ठा का अन्त नहीं हुआ है। स्थापना से लेकर अब तक जितना जप और हवन हुआ है उसे देखते हुए इसे गायत्री तीर्थ का नाम दिया जाना उचित ही है। इतनी नियमित साधना अन्यत्र कहीं भी कदाचित ही नहीं होगी।
नित्य प्रति के आध्यात्मिक प्रवचन यहाँ की परम्परा है। प्रायः सांय आरती जिस क्रम से यहाँ होती है वह मन मोह लेती है और भाव श्रद्धा उमगाती है। रात्रि को युग संगीत और सहगान कीर्तन इस कला में प्रवीण मंडली द्वारा सम्पन्न होता है। देश देशान्तरों में युगान्तरीय चेतना का आलोक वितरण करने वाले धर्म प्रचारक परिव्राजकों का यहाँ अनवरत प्रशिक्षण क्रम चलता रहता है। नौ दिवसीय साधना सत्रों का क्रम तो कभी टूटने ही नहीं पाता। इन विशेषताओं के कारण इस क्षेत्र में प्रवेश एवं निवास करने वाला यह अनुभव करता है कि उसे दिव्य संरक्षण और सान्निध्य प्राप्त हो रहा है।
इसी केन्द्र में बारह वर्ष तक चलने वाले युग-सन्धि महापुरश्चरण का संकल्प हुआ है। जिसके अंतर्गत स्थानीय गायत्री जप और सूर्योपस्थान का अनवरत क्रम तो चलेगा ही। हजारों स्थानों पर यही प्रक्रिया इसी संकल्प के अंतर्गत चलने लगी है, जिसकी पूर्णाहुति सन् 2000 में अभूतपूर्व स्तर पर सम्पन्न होगी, घर की अपेक्षा ऐसी दिव्य भूमि में साधना का कितना अधिक प्रतिफल हो सकता है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
गायत्री महामंत्र के तीन चरण हैं। तीनों में एक-एक सत्प्रेरणाओं का समावेश है। वे वैसी हैं जिनको यदि हृदयंगम किया जा सके- जीवनक्रम में उतारा जा सके तो समझना चाहिये कि सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त हो गया। भौतिक और आत्मिक अभ्युदय का द्वार खुल गया।
प्रथम चरण में सविता का वरण-अधिग्रहण किया गया है। ‘सविता’ तेज पुज सूर्य को कहते हैं। सूर्य में आभा और ऊर्जा की प्रमुखता है। आभा अर्थात् चमक, रोशनी ऊर्जा अर्थात् गर्मी-शक्ति। प्रगतिशील व्यक्ति इन दोनों गुणों को अपनाते हैं। प्रखर प्रतिभावान बनते हैं। ओजस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी बनकर अपनी समर्थता को विकसित करते हैं। जो असमर्थ हैं, दुर्बल हैं, दीन हीन स्तर की अनगढ़ एवं पिछड़ी हुई स्थिति में रहने के अभ्यस्त हैं, उनकी विशिष्टताएँ मूर्च्छित ही पड़ी रहेगी। किसी प्रकार दिन ही कट सकेंगे। निर्वाह के अतिरिक्त और कुछ पराक्रम उनसे करते न बन पड़ेगा। इस दुर्गति से बचने के लिए आवश्यक है कि अपने को सशक्त बनाया जाए। शारीरिक दृष्टि से भी और मानसिक स्तर पर भी। पराक्रम साहस को स्वभाव का अंग बनाया जाय। कार्यरत रहा जाय। उद्योगी, पुरुषार्थी, जागरूक एवं उमंगों आशाओं से अपने को भरा पूरा रखने के लिए प्रयत्नरत रहा जाय। आलस्य पास न फटके। उदासी रहे नहीं। कठिन समय आने पर धैर्य न खोया जाय और उपस्थित अड़चनों से जूझने कठिनाइयों से निबटने का साहस सँजोये रहा जाए। प्रगति की दिशा में बढ़ने का यह प्रथम आधार है। संकोची, दब्बू, कायर, बन कर न रहा जाय। आत्म निर्भर रहने और आत्म विश्वास को दुर्बल न पड़ने देने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा जाय। अपनी सामर्थ्य को इसी स्तर पर बढ़ाया जाय कि उसके सहारे दूसरों की सेवा सहायता कर सकना भी बन पड़े।
गायत्री के दूसरे चरण के देवस्य में संकेत है कि अपना मानस, चिन्तन देवोपम रहे। चरित्र पर निकृष्टता का दाग धब्बा न लगने दिया जाय। देवत्व से प्रयोजन है- व्यक्तित्व के परिष्कार का। गुण, धर्म, स्वभाव में सज्जनोचित आदर्शवादिता को समाविष्ट किये रहना। इसी में मानवी गरिमा की शोभा है। मर्यादाओं का परिपालन, वर्जनाओं का उल्लंघन न करने का व्रतधारण, यही है मनुष्य में देवत्व के उदय का स्वरूप। शालीनता का निर्वाह इसी प्रकार बन पड़ता है।
नर पशुओं की तरह असंख्य लोग जीवित रहते हैं। उन्हें पेट प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। इन्हीं के निमित्त निरन्तर मरते-खपते रहते हैं। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति के लिए अपनी समूची क्षमता नियोजित करते रहते हैं, फिर अपनी समूची क्षमता नियोजित करते रहते हैं, फिर भी तृप्ति का दर्शन नहीं मिल पाता। तृष्णा की खाई इतनी गहरी है कि उसमें सभी संभव उपलब्धियों को झोंकते रहा जाय तो भी पट सकने की संभावना बन नहीं पड़ती। आगम में ईंधन डालते जाने पर वह बुझती नहीं वरन् अधिकाधिक प्रज्वलित होती जाती है। यही हाल वासना-तृष्णा का है। उसमें अब तक कोई भी तृप्त नहीं हो सका। विचारशील जन सादा जीवन-उच्च विचार की नीति अपनाते हैं औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में संतुष्ट रहते हैं। उपार्जन में कमी नहीं करते। संयम बरतते है। जो बचता है उसे ऐसे पुण्य प्रयोजन में लगाते हैं जिनसे आत्म-संतोष और सेवा धर्म का निर्वाह होता रहे। लोक परलोक के उज्ज्वल होने कमा सुयोग बनता रहे।
गायत्री के तीसरे चरण में सद्बुद्धि की महिमा बखानी गयी है और अर्जित करने की प्रेरणा दी गई है। दृष्टि कोण ही है जो उच्चस्तरीय होने पर स्वर्ग का सृजन करता है और निकृष्टता पर उतर आने से सब ओर नरक ही बिखरा दीख पड़ता है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। जो जैसा सोचता है वह वैसा बन जाता है। उत्थान और पतन अपने ही नीति निर्धारण पर अवलम्बित रहते हैं। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता इसीलिए कहलाता है कि वह अपने चिन्तन को दिशा धारा देने में पूर्णतया समर्थ है। प्रेरणाएँ मस्तिष्क में उभरती है। शरीर उनका परिपालन करने लगता है। दुर्बुद्धि अपनाने वाले दुर्गति के भाजन बनते हैं। जिनकी समझ-सूझबूझ नीति निष्ठा अपनाती हैं उन्हें न कुसंग जन्य दुख भोगना पड़ता है और न कुकर्म करने पर जो संकट उठाने पड़ते हैं उनमें फँसने की आवश्यकता होती है। मनुष्य जन्म देकर भगवान ने अपने चरम अनुग्रह का परिचय दिया है और इसके लिए स्वतंत्र छोड़ा है कि वह सद्बुद्धि का उपार्जन करके, सुख शान्ति भरे स्वर्गीय वातावरण का अपने तथा सम्बन्धियों के लिए सृजन करें, अथवा दुर्बुद्धि अपना कर स्वयं नरक के गत में गिरे और साथी सम्बन्धियों को भी उसी में गिरने के लिए बाधित करें।
प्रत्यक्षतः जो कुछ भी वैभव, सुयश सहयोग किसी को उपलब्ध होते हो तो समझना चाहिये कि वे सद्बुद्धि की देन हैं। उसी के प्रकाश में सन्मार्ग पर चल सकना संभव होता है। सन्मार्ग अपनाने वाले ही उन उपलब्धियों का पग-पग पर रसास्वादन करते हैं, जिनके हस्तगत करने में जीवन की सार्थकता है।
‘धिर्यः’ की याचना का अर्थ है, अपने से उसे उपार्जित करने के लिए कटिबद्ध होने का प्रकाश प्राप्त करना। यह किसी दूसरे से वरदान अनुग्रह की तरह उपलब्ध नहीं होती। विभूतियाँ स्वयं ही उपार्जित करनी पड़ती है। प्रयत्नशीलों को अभीष्ट स्तर का सहयोग भी मिल जाता है और अनुकूलताओं की भी कमी नहीं रहती है। काँटे तो उनके पैरों में गड़ते हैं जो झाड़ झंखाड़ भरे कुमार्ग पर चल पड़ने के लिए अनर्थ और अनिष्ट को जान बूझकर आमन्त्रित करते हैं। सद्बुद्धि के प्रकाश में यदि सन्मार्ग पर आरुढ़ रहा जाय तो फिर सुख शान्ति से भरी पूरी परिस्थितियाँ आजीवन साथ रहती है। कभी प्रारब्धवश अनिष्ट आ भी पड़े तो वे सहज अपनाये रहने पर देर तक टिक नहीं पाते।
गायत्री के इसी चरण में एक शब्द आता हैं- ‘नः” अर्थात् हम सब। “आई” नहीं “वी” इन दिनों हर किसी पर व्यक्तिवाद का नशा बुरी रह चढ़ा है। हर कोई अपनी ही सुख सुविधा बढ़ाने में लगा है। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए यदि दूसरों का अहित करना पड़े तो इसमें भी नहीं चूकता। यह संकीर्ण स्वार्थपरता ही अनाचारों, भ्रष्टाचारों, अपराधों का निमित्त कारण बनकर रह रही है। क्रिया की प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक है। आक्रमण, प्रत्याक्रमण का, प्रतिशोध, प्रति-प्रतिशोध का कुचक्र चल पड़ता है। फलतः समय, कौशल और साधन ऐसे कृत्यों में ही लगाने लगता है। जिसमें अपनी और दूसरों की केवल हानि ही बन पड़ती है।
स्थिति को उलटने के लिए आवश्यक है कि समूहवाद के प्रति सर्व साधारण में निष्ठा उत्पन्न की जाय। सहकारिता का, सहिष्णुता का वातावरण बने और हिलमिल कर रहने, मिल बाँट कर खाने की परम्परा को प्रश्रय मिले। व्यक्ति अपने आपको समाज का एक अविच्छिन्न घटक समझे। सबके लाभ में अपना लाभ और सबके हित में अपना हित समझे। यही वह रीति नीति है जो संगठन शक्ति को विकसित करती और सत्प्रवृत्तिसंवर्धन के लिए हर किसी उत्साह उमगाती है। व्यक्ति और समाज का बहुमुखी हित साधन इसी में है।
गायत्री मन्त्र का संक्षिप्त साराँश दूरदर्शी विवेकशीलता का अभिवर्धन है। तात्कालिक लाभ के लिए अदूरदर्शी अक्सर भावना भविष्य अंधकारमय बनाते रहते हैं। दूरदर्शिता भविष्य की संभावनाओं का स्मरण कराती है और बताती है कि श्रेय पथ पर चलने से ही सबका सब प्रकार कल्याण है। सज्जनों की संघ शक्ति हो सके तो समझना चाहिये कि धरनी अवतरित होने में विलंब नहीं। दूरदर्शिता और प्रखर प्रतिभा के अर्जन में संलग्न रहना यही है गायत्री मन्त्र का तत्वदर्शन।
स्नायु तंत्रिकाओं को सुव्यवस्थित कर मन शक्ति बढ़ाने तथा स्नायु रस स्रावों के किसी असंतुलन से उपजे मानसिक तनाव, अवसाद, अल्पमंदता इत्यादि विकारों को दूर करने हेतु पिछले दिनों ध्यान-धारणा के प्रयोगों पर काफी विस्तार से संसार भर में कार्य हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि एक स्वस्थ व्यक्ति सुनियोजित ढंग से ध्यान योग का अवलम्बन लेकर एकाग्रता तन्मयता के साथ जब आदर्शवादी उत्कृष्टता को जोड़ता है तो न केवल अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाकर विभूतियों का स्वामी बनता है, अपितु विश्व वसुधा को भी लाभान्वित करता है। इस विद्या के इन दिनों स्थूल व सूक्ष्म शरीर के स्तर पर चल रहे प्रयोग यह बताते हैं कि मन को प्रशिक्षित किया जा सकता है। अपनी स्वचालित (आटोनॉमिक) एवं अन्याय गतिविधियों को इच्छा शक्ति द्वारा नियंत्रित भी किया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक मेडीटेशन नामक विद्या में ध्यान योग के ही बायोफीडबैक पद्धति द्वारा प्रयोग किये जाते हैं एवं ये प्रयोग अचेतन मन के प्रशिक्षण आत्म नियंत्रण में बड़े सफल सिद्ध हुए हैं।
ध्यान साधना से शरीर-क्रिया विज्ञान पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की खोज का कार्य तंत्रिका विशेषज्ञों ने ई.ई.जी., ई.सी.जी., ई.एम.जी., पॉलीग्राफ जैसे आधुनिक उपकरणों के माध्यम से किया है और पाया है कि ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताएँ विकसित हो जाती हैं। लम्बे समय तक ध्यान का अभ्यास करते रहने पर व्यक्ति के मस्तिष्क और शरीर में कई तरह की जैव रासायनिक प्रक्रियायें सक्रिय हो उठती है। कई अवाँछनीय प्रक्रियाएँ तो उसी समय निष्क्रिय हो जाती है। ध्यान की गहराई में उतरने पर चेतन मन की शक्तियों का विकास होता है। फलतः मनुष्य का सम्बन्ध सृजनात्मक बौद्धिकता से जुड़ता और उसी परिणति को प्राप्त होने लगता है। यह ऐसी श्रमहीन शारीरिक मानसिक प्रक्रिया है जिसे सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है। केवल घंटे भर के दैनिक अभ्यास से मनुष्य प्रसन्न चित्त और सृजनशील बना रह सकता है।
“ऑटोनॉमिक स्टैबिलिटी एण्ड मेडीटेशन” नामक अपने अनुसंधान निष्कर्ष में प्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डेविड डब्ल्यू ओर्मे जान्सन ने बताया है कि ध्यान योगी के तंत्रिका तंत्र में एक नवीन चेतना आ जाती है और उसके सभी क्रिया कलाप नियमित स्थायी रूप से होने लगते हैं। शरीर की त्वचा बाह्य वातावरण के प्रति प्रतिरोधी क्षमता धारण कर लेती हैं और उस पर आये दिन पड़ने वाले वातावरण के दबाव, साइको सोमेटिक बीमारियाँ, व्यावहारिक अस्थायित्व एवं स्नायु तंत्र की विभिन्न कमजोरियाँ आदि दूर हो जाती हैं शरीर के अंदर शक्ति का संरक्षण और भण्डारण होने लगता है और यह अतिरिक्त ऊर्जा शरीर और मन के विभिन्न कार्यों व्यवहारों को अच्छे ढंग से सम्पादित करने में प्रयुक्त होती है।
डॉ. थियोफोर के अनुसार ध्यान योग से मनुष्य की साइकोलॉजी में असाधारण रूप से परिवर्तन होता है। उन्होंने अपने अनुसंधान में बताया है कि नियमित अभ्यास से घबराहट, उत्तेजना मानसिक तनाव, मनोकायिक बीमारियों आदि से जल्दी ही छुटकारा पाया जा सकता है। स्वार्थपरता में कमी, आत्मसंतोष एवं सहनशक्ति में वृद्धि होती है जीवटता, भावनात्मक स्थिरता, कार्यदक्षता, विनोद प्रियता, एकाग्रता जैसे सद्गुणों की वृद्धि ध्यान के प्रत्यक्ष लाभ मिलते हैं। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक विलियम सीमेन ने भी अपने अध्ययन में पाया है कि ध्यान का अभ्यास नियमित क्रम से करते रहने पर अन्तःवृत्तियों- अन्तःशक्तियों पर नियन्त्रण पाया जा सकता है और चिन्ता मुक्त हुआ जा सकता है। इतना ही नहीं, इससे व्यक्तित्व विकास की महत्वपूर्ण प्रक्रिया को भी सम्पादित किया जा सकता है।
नीदरलैण्ड के वैज्ञानिक विलियम पी. वानडेनबर्ग और बर्ट मुल्डर ने ध्यान योग पर गहरा अनुसंधान किया है। विभिन्न उम्र, लिंग और शैक्षणिक योग्यता वाले ध्यान के अभ्यास कर्ताओं पर किये गये प्रयोगों के आधार पर इन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि इससे दृष्टिकोण को परिवर्तित करने में भारी सहायता मिलती है। अभ्यासियों में भौतिक और सामाजिक अपर्याप्तता, दबाव एवं कठोरतायुक्त व्यवहार में कमी आती तथा आत्म सम्मान की वृद्धि होती है।
सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक राबर्टकीथ वैलेस ने अपनी पुस्तकें “इश्यूज ऑफ साइन्स” में लिखा है कि ध्यान के समय आक्सीजन की खपत तथा हृदय की गति कम हो जाती है। श्वास क्रिया शिथिल होने से शरीर की आक्सीजन की पूर्ति में कमी आती है। परीक्षण में पाया गया है कि आक्सीजन उपभोग की यह क्षमता 20 प्रतिशत तक कम होती चली जाती है। इससे चयापचय की प्रक्रियाओं में खपत होने वाली ऊर्जा की बचत होती है। ध्यान अभ्यासी की औसत कार्डियक आउट पुट हृदय से पम्प किये गये रक्त की मात्रा में भी कमी आँकी गई है। देखा गया है कि औसत हृदय की धड़कन की दर में अभ्यास के समय 4 बार प्रति मिनट तक की कमी आ जाती है। इससे उच्च रक्त चाप को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। हर्बट बेन्सन एवं राबर्ट कीथ वैलेस ने उच्च रक्तचापयुक्त 22 बीमार व्यक्तियों का ध्यान के पूर्व और उसके पश्चात् 1111 बार उनका सिस्टोलिक एवं आर्टीरियल ब्लड प्रेशर रिकार्ड किया। पाया गया कि ध्यान के बाद उक्त रोगियों के रक्तचाप में महत्वपूर्ण कमी आई। यह ध्यान निराकार अन्तर्मुखी कमी आई। यह ध्यान निराकार अन्तर्मुखी साधना के रूप में था जिसमें टेपरिकार्डर से संदेश दिये गये थे।
शरीर की माँस-पेशियों में होने वाली रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरूप रक्त में विद्यमान अम्ल रूपी विष-ब्लड लैक्टेट काफी मात्रा में बढ़ जाता है। फलतः मानसिक व्यग्रता तनाव, चिन्ता, थकान जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। ध्यानस्थ साधक के शरीर में इस विषैले पदार्थ का स्तर 33 प्रतिशत बहिरंग में प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है। शरीर शिथिल होकर योगनिद्रा जैसी स्थिति में चला जाता है। इस अल्पकालीन नींद के परिणाम स्वरूप ही साधक ध्यान के अंत में मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से स्वस्थ एवं हल्का-फुलका महसूस करता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 24 मिनट की ध्यान साधना 3 घंटे की गहरी नींद के बराबर स्फूर्ति प्रदान करती है।
मानवी मस्तिष्क में विद्यमान विद्युत्स्फुल्लिंग परिस्थितियों के अनुसार अल्फा, बीटा, थीटा एवं डेल्टा नामक चार प्रकार की विद्युत तरंगों को छोड़ते रहते हैं। अन्तर्मुखी ध्यान की स्थिति में क्रियाशीलता आने पर इनमें जो भी परिवर्तन होते हैं। इन्हें ई.ई.जी. में स्पष्ट देखा जा सकता है। ध्यान में प्रगाढ़ता आने पर अल्फा तरंगें मस्तिष्क के अग्रभाग से सतत् उभरती रहती हैं, जिससे मन और शरीर शिथिल एवं विश्रान्ति की दशा को प्राप्त होता है। इससे साधक को गहरी नींद आने का भी अनुभव होता है। ध्यान सहज रूप में टूटने पर जागरूकता एवं स्फूर्ति का अनुभव होता है इस स्थिति में मनोबल इतना सशक्त हो जाता है कि अभीष्ट प्रयोजन को भली प्रकार पूरा कर सके, चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक।
ध्यानयोग अब चिकित्सा विज्ञान में एक विद्या के रूप में प्रतिष्ठा पा चुका है और उससे विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक रोगों का उपचार भी संभव हुआ है। ध्यान योग की प्रभावोत्पादक सामर्थ्य को यहीं तक सीमित न रहने देकर अन्तराल की गहराई में उतरने, उत्कृष्ट भाव संवेदनाओं को विकसित करने का अभ्यास किया जाना चाहिये। चाहे आत्म निर्देशन द्वारा अथवा गंध स्पर्श, दृश्य वर्ण, संगीत, मंत्र इत्यादि के सहारे ध्यान किया जाए, उसे अभ्यास द्वारा इतना गहरा बनाया जाए कि आत्म सत्ता अपने मूल लक्ष्य को पहचान कर अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सके। यही तो ध्यान धारणाओं का मूल प्रयोजन भी है।
बादल ऊपर से बरसते हैं। इसलिये समझा जाता है कि जलाशय आकाश में भरे पड़े होंगे। किन्तु जब थोड़ी गंभीरता के साथ वस्तुस्थिति समझने का प्रयत्न किया जाता है तो पता चलता है कि गहरे समुद्र का पानी ही भाप बनकर ऊपर उठता है और घनीभूत होकर बादल बन जाता है। भारी होने पर वही जब अपना भार बहन नहीं कर पाता तो नीचे बरस पड़ता है। वास्तव में वर्षा का जल समुद्र का ही अनुदान है, जो गहराई तक भीतर सैकड़ों मील नीचे तक जमीन में धँसा हुआ है।
ऊपर से कुछ मिलता न हो सो बात नहीं है। सरोवरों में वर्षों का जल ही जमा होता है। पवन आकाश में ही बहता है। जिनमें साँस लेने की क्षमता है वे उस प्राण वायु को समुचित मात्रा में खींचते और जीवन धारण किये रहते हैं। इसी प्रकार सूर्य ऊर्जा तथा अन्य अदृश्य शक्तियाँ आकाश से ही बरसती है।
इतने पर भी यह मानकर चलना चाहिये कि जीवनोपयोगी अधिकाँश वस्तुएँ धरती के भीतर से ही उत्पन्न होती हैं। बहुमूल्य पत्थर, धातुएँ, कोयला, खनिज तेल, कितने ही रसायन धरती से खोजकर निकाले जाते हैं। वृक्ष वनस्पतियाँ धरती पर ही उगते हैं और उसी के भीतर अपनी जड़े फैला कर बड़े बनते, फल-फूलों से लदते हैं। प्राणियों के लिए खाद्य पदार्थ भी धरती से उगाये जाते है। कुओं का पानी उसी के अंतराल में भरा होता है। नदियों का प्रवाह भी तभी बनता है जब धरती उसके लिए जगह देती है जल भंडार भी पृथ्वी पर भी भरा पड़ा हैं। समुद्र तक उसी के अंचल में छिपा बैठा है। पर्वतों की सुरम्य श्रृंखलाएं उसी पर अवस्थित है। धरती पर ही मनुष्य चलते फिरते और उसी पर अपना आवास निवास बनाते हैं।
मनुष्य की धरती उसकी काया है उसके अनेकानेक अंग अवयव जीवनचर्या का निर्वाह क्रम चलाये रहने के लिए तो निरन्तर कार्य करते ही रहते हैं साथ ही जो अनेकों विशिष्टताएं एवं विभूतियाँ है, वे भी पूरी तरह इसी कार्य कलेवर में उद्भूत होती है। उन्हें प्रयत्नपूर्वक जाग्रत किया जाता है।
शिक्षा, कला, सम्पन्नता, प्रतिभा आदि को शरीर में ही प्रयत्नपूर्वक समाविष्ट किया जाता हैं शरीर यदि अपंग असमर्थ स्तर का है तो कोई भी शिक्षक ऐसे व्यक्ति को कोई कौशल सिखा सकने में समर्थ नहीं हो सकता।
शरीर का ऊपरी आवरण तो तरह-तरह की हलचलें ही कर सकता हैं पर उसकी भीतरी परतें विचारशीलता, भावसंवेदना, आस्था आदि की विशेषताओं को भीतर से ही उभारती हैं उन्हें समुन्नत बनाने में शिक्षा व्यवस्था तो सहयोग भर देती है। यदि शिक्षा पद्धति में ही समग्र सामर्थ्य रही होती तो वह अन्य जीवधारियों को भी वैसा ही सुयोग्य बना लेती जैसे कि मनुष्य बनते है। मनुष्य में भी जो मानसिक रोगी या विक्षिप्त है, वे दूसरों के द्वारा बहुत प्रयत्न किये जाने पर भी प्रायः असफल ही रहते है। इससे सिद्ध हैं कि मौलिक क्षमताओं अपने ही भीतर है जो उन्हें विकसित कर लेते है, वे प्रतिभावान बनते है। जो उसको मात्र काम काज में ही लगाते हैं। वे सामान्य स्तर के बने रहते है। किन्तु जो उनकी उपेक्षा करते हैं वे नर पशु जीवन जी पाते हैं। इसके विपरीत जो अपनी क्षमताओं को कुमार्गगामी बनाते हैं वे पतित स्तर को अपराधी जिन्दगी जीते हैं। भर्त्सना और प्रताड़ना के भाजन बनते हैं।
“साधना से सिद्धि” का सिद्धान्त सर्वविदित है। साधना को मोटे तौर पर देवी देवताओं को प्रसन्न करने का उपाय, उपचार माना जाता है पर देवताओं का अनुग्रह भी इसी शर्त पर मिलता है कि अपनी पा.ता और उत्कृष्टता प्रमाणित करने के लिए व्यक्तित्व को परिष्कृत स्तर का बनाने में प्रयत्नपूर्वक सफलता प्राप्त कर ली जाये। कुपात्रों को देवी अनुग्रह या तो मिलते ही नहीं, यदि कुछ ही समय में जब उस अहंकार में कुकर्म चल पड़ते हैं तो फिर जड़ मूल सहित उखाड़ना पड़ता है। जो सामान्य पुरुषार्थ से कमाया गया था उसका भी लाभ नहीं मिल पता। जो सही रीति से कमाया था वह भी उसी आँधी में उड़ जाता है।
महत्वपूर्ण शक्तियाँ कुपात्र जनों को एक तो उपलब्ध ही नहीं हो पाती। यदि किसी प्रकार प्राप्त भी हो चले तो वह टिकती नहीं। भ्रष्ट व्यक्तित्व दृष्ट आचरण अपनाता है और कुछ ही समय में व्यक्तित्व को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
योगाभ्यास से कई प्रकार की अतीन्द्रिय स्तर की दिव्य क्षमताएं प्राप्त होती है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, दूरानुभूति, विचार, संप्रेषण, भविष्य ज्ञान, व्यक्तित्व अध्ययन जैसी विलक्षणताएं कई व्यक्तियों में पाई जाती है और वे मनुष्य को सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में ला बिठाती हैं। शारीरिक मानसिक लाभ भी ऐसे व्यक्ति दूूसरों को पहुंचाते देखे गये है। शाप वरदान की क्षमता भी उनमें उत्पन्न हो जाती है। इस दिशा में और भी खोजे इन दिनों हो रही हैं प्राचीन काल में ऋषि मुनि तो उन प्रयोगों में पारंगत थे ही।
इतने पर भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह किसी का दिया हुआ वरदान है। वह अपने पुरुषार्थ से आत्मपरिष्कार की पृष्ठभूमि पर ही उगता है। जो उगा है उसे तद्नुरूप बाहरी सहायता भी मिलते रहने का प्रकृतिगत नियम हैं।
अंकुर जब उत्पन्न होता हैं तो बाहर से धूप, वर्षा, हवा आदि की अनायास ही सहायता मिलती है, और वह ऊंचा उठता जाता है। जिस चीज में अंकुर उत्पन्न करने की आरंभिक क्षमता ही नहीं, उसे बाहर की वे उपलब्धियाँ प्राप्त करने से वंचित ही रहना पड़ता है जो अन्य उगने में सर्माि अंकुरों को सहज ही मिलती रहती हैं।
स्वाति की बूंदें बरसती तो सर्वत्र है, पर उनसे लाभ केवल वे सीपियाँ ही उठा पाती है जिनमें मोती पैदा करने की मौलिक क्षमता पहले से ही उत्पन्न हो गई है कहते है कि स्वाति बूंदों की सहायता से केले में कपूर, बाँस में वंशलोचन उत्पन्न होता है है पर यह संभव तभी है जब वे उस लाभ को उठा सकने की अतिरिक्त विशेषता से पहले ही सम्पन्न हो चुके हो। अन्यथा वह लाभ हर सीप को हर बाँस के, हर केले को कहा मिलता है। मरे हुए को तो अमृत भी नहीं जिला सकता। जीवित व्यक्ति ही उसे प्राप्त करके अमर बनने सुने जाते हैं। कठोर चट्टानों पर पूरी वर्षा ऋतु गुजर जाने पर भी एक तिनका तक पैदा नहीं होगा।
देवी अनुग्रह हो या पुरुषार्थ उपार्जित वैभव। दोनों ही स्तर की सफलताएं प्राप्त करने के लिए प्रारंभिक प्रयास यही करना पड़ता है कि अपनी पात्रता, प्रामाणिकता और प्रतिभा को ऊंचे स्तर तक विकसित किया जाये। यह सिद्धान्त जिनने हृदयंगम कर लिया, समझना चाहिए उनने भौतिक और आत्मिक स्तर की दिव्य विभूतियाँ अर्जित करने का राज मार्ग प्राप्त कर लिया। चुम्बक का निजी आकर्षण ही उसी जाति के अन्य कणों को कही से भी खींच घसीट कर उसके समीप ही ले आता है। सफलताएं भी इसी प्रकार सत्पात्रों के समीप आती और अपनी विभूतियों से सत्पात्रों को सुसज्जित करती हैं।
कुपात्रता को यथावत बनाये रहने, दोष दुर्गुणों से भरे रहने पर सामान्य जीवन भी श्ति पूर्वक जी सकना कठिन पड़ता है। अयोग्य व्यक्ति जहाँ भी जाते है वहाँ से दुत्कारे जाते और खाली हाथ लौटते हैं, अध्यात्म क्षेत्र में भी यह नियम समग्ररूप से चरितार्थ होता है प्रगति किसी भी दशा में क्यों न की जाय? चलना ही पैरों पड़ता है।
सार्थक एवं समग्र जीवन साधना
पदार्थ से शरीर और शरीर से आत्मा का महत्व अधिक है। इसी प्रकार समृद्धि संपन्नता का प्रगति और योग्यता का आत्मिक प्रखरता, प्रतिभा का स्तर भी कम से, एक से एक सीढ़ी ऊंचाई का समझा जा सकता है। आन्तरिक आस्थाएं ही वे विभूतियाँ है जो व्यक्ति के चिंतन चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करती है। व्यक्तित्व को प्रखर, प्रमाणिक एवं प्रतिभावान बनाती है। इसी आधार पर वे क्षमतायें उभरती है, जो अनेकानेक सफलताओं की उद्गम स्त्रोत हैं।
आत्मबल के आधार पर अन्य सभा बल हस्तगत किए जा सकते हैं। इसी के आधार पर उपलब्धियों का सदुपयोग बन पड़ता हैं। परिस्थितियों की प्रतिकूलता रहने पर भी उन्हें व्यक्तित्व की उत्कृष्टता के आधार पर अनुकूल बनाया जा सकता है। संसार के इतिहास में ऐसे गणित व्यक्ति हुए है, जिनकी प्रारंभिक परिस्थितियां गई गुजरी थी। निर्वाह के साधनों तक की कमी पड़ती थी, फिर प्रगति के सरंजाम जुट सकना और भी कठिन, लगभग असंभव दीख पड़ता था। इतने पर भी वे व्यक्तित्व की प्रामाणिकता के आधार पर सभी के लिए विश्वस्त एवं आकर्षक बन गए। उनका चुम्बकत्व व्यक्तियों, साधनों ओर परिस्थितियों को अनुकूल बनाता चला गया और वे अपने पुरुषार्थ के साथ उस सद्भाव का ताल मेल बिठाते हुए दिन दिन ऊंचे उठते चले गये ओर अंततः सफलता के सर्वोच्च शिखर तक जा पहुंचने में समर्थ हुए। ऐसे अवसरों पर व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को ही श्रेय दिया जाता है। इस उपलब्धि को ही आत्मबल का चमत्कार कहते है।
इसके विपरीत ऐसे भी अनेकानेक प्रसंग सामने आते रहते हैं जिसमें सभी अनुकूलतायें रहने पर भी लोग अपनी दुर्बुद्धि के कारण दिन दिन घटते और रिसते चले गये। पूर्वजों के कमाये धन को दुर्व्यसनों में उड़ा दिया। आलस्य और प्रमाद में ग्रसित रहकर अपनी क्षमताओं और संपदाओं को गलाते चले गये। कई अनाचार के मार्ग पर चल पड़े और दुर्गति भुगतने के लिए मजबूर हुए। इसमें उनसे मानस की गुण कर्म स्वभाव की निकृष्टता ने अनेक सुविधायें रहते हुए भी उन्हें असुविधा भरी परिस्थितियों तक पहुंचा दिया।
चेतना की शक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। मनुष्य ही रेल, जहाज कारखाने आदि बनाता है। विज्ञान के नित नए आविष्कार करता है। यहाँ तक की धर्म और दर्शन, आचार और विचार भी उसी के रचे हुए हैं ईश्वर का साकार रूप में कल्पना तथा स्थापना करना भी उसी का बुद्धि कौशल है। इस अनगढ़ धरातल को सुविधाओं, सुन्दरताओं, उपलब्धियों से भरा पूरा बनाना भी मनुष्य का ही काम है। यहाँ मनुष्य शब्द से सी शरीर या वैभव को नहीं समझा जाना चाहिए। विशेषताएं चेतना के साथ जुड़ी होती हैं इसे भी प्रयत्नपूर्वक उठाया या गिराया जा सकता है। शरीर को बलिष्ठ या दुर्बल बना लेना प्रायः मनुष्य की अपनी रीति नीति पर निर्भर रहता है। सम्पन्न और विपन्न भी लोग अपनी हरकतों से ही बनते हैं। उठना और गिरना अपने हाथ की बात है। मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता आप कहा जाता है। यहाँ व्यक्ति का मतलब आत्म चेतना से ही समझ जाना चाहिए वही प्रगतिशीलता का उद्गम है। उसी क्षेत्र में पतन पराभव के विषैले बीजांकुर भी जमे होते हैं। सद्गुणी लोग अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सुख शान्ति का वातावरण बना लेते हैं, अन्त चेतना के समुन्नत होने पर समूचा वातावरण, संपर्क क्षेत्र सुख शान्ति से भर जाता है। इसके विपरीत जिनका मानस दोष दुर्गुणों से भरा हुआ है, वे अच्छी भली परिस्थितियों में भी दुर्गति और अवगति का कठोर दुख सहते है।
वैभव अर्जित करने के अनेक तरीके सीखे और सिखाए जाते है। शरीर को निरोग रखने के लिये भी व्यायामशालाओं, स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर अस्पतालों तक की अनेक व्यवस्थायें देखी जाती हैं। औद्योगिक, वैज्ञानिक शैक्षणिक शासकीय प्रबंध भी अनेक है पर ऐसी व्यवस्थायें कम ही कही दीख पड़ती है जिनसे चेतना को परिष्कृत एवं विकसित करने के लिए सार्थक, समर्थ एवं बुद्धि संगत, सर्वोपयोगी आधार बन पड़ा हो।
प्रज्ञायोग ऐ ऐसी ही विद्या है। इसे बोलचाल की भाषा में जीवन साधना भी कहा जा सकता है। इसमें जप, ध्यान, प्राणायाम, संयम जैसे विधानों की व्यवस्था है पर सब कुछ इतने तक ही सीमित नहीं हैं उपासना में ध्यान धारण स्तर के सभी कर्मकांडों आ जाते है। इसके साथ ही जीन के हर क्षेत्र में मानवी गरिमा को उभारने और रुकावटें हटाने जैसे सभी पक्षों को जोड़कर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम, विचारसंयम, इस धरा के अलग न हो सकने वाले अंग हैं। दुर्गुणों के, कुसंस्कारों के निराकरण पर जहाँ जोर दिया गया है वहाँ यह भी अनिवार्य माना गया है कि अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक विवेकवान्, चरित्रवान और पुरुषार्थ परायण बनने के लिए चिंतन तथा अभ्यास जारी रखा जाये। वास्तव में यह समग्रता ही जीवन साधना की विशेषता है। साधक को कर्तव्य क्षेत्र में धार्मिकता, मान्यता क्षेत्र में आत्म परायणता और अध्यात्म क्षेत्र में दूरदर्शी विवेकशीलता उत्कृष्ट आदर्शवाद को अपनाने के लिए कहा जाता है। इन सर्वतोमुखी दिशा-धाराओं में समुचित जागरूकता बरतने पर ही यह लाभ मिलता है, जिसे आत्म परिष्कार के नाम से जाना जाता है। यह हर किसी के लिए सरल, संभव और स्वाभाविक भी है।
आत्म–परिष्कार के अन्य उपाय भी हो सकते हैं पर जहाँ तक प्रज्ञा परिवार के प्रयोग का सम्बन्ध है वहाँ यह कहा जा सकता है कि वह अपेक्षाकृत अधिक सरल, तर्क संगत और व्यवस्थित है। इस संदर्भ में अनेक अभ्यास रस अनुभवियों की साक्षी भी सम्मिलित हैं।
आत्मिक प्रगति का महत्व समझा जाना चाहिए। व्यक्ति या राष्ट्र की उन्नति उसकी सम्पदा, शिक्षा, कुशलता आदि तक ही सीमित नहीं होती। शालीनता सम्पन्न व्यक्तित्व ही वह उद्गम होता है जिसके आधार पर अन्यान्य प्रकार की प्रतियाँ तथा व्यवस्थाएं अग्रणी बनती है। समर्थता का केन्द्र बिन्दु यही है। इस विभूति के बल पर किसी भी उपयोगी दिशा में अग्रसित हुआ जा सकता है किन्तु यदि आत्मबल के अभाव रहा तो संकीर्ण स्वार्थपरता ही छायी रहेगी और उसके रहते कोई ऐसा महाप्रयोजन संघ ने सकेगा जिसे आदर्शवादी एवं लोकोपयोगी भी कहा जा सके। यहाँ वह उक्ति पूरी तरह से फिट बैठती है, जिसमें कहा गया है कि एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।”
अनेक प्रकार की समृद्धियों और विशेषताओं से लदा हुआ व्यक्ति अपने कौशल के बलबूते सम्पदा बटोर सकता हैं। सस्ती वाहवाही भी लूट सकता है, पर जब कभी मानवी गरिमा को कसौटी पर कसा जायेगा तो वह खोटी ही सिद्ध होगी। खोटा सिक्का अपने अस्तित्व से किसी को भ्रम में डाले रह सकता हैं, पर उस सुनिश्चित प्रगति का अधिकारी नहीं बन सकता जिसे महामानव के नाम से जाना जाता है। जिसके लिए सभ्य सुसंस्कृत, सज्जन, समुन्नत जैसे शब्दों का प्रयोग होता है।
सन्त परम्परा के अनेकानेक महान ऋषियों, लोक सेवियों एवं युग निर्माताओं से जो प्रबल पुरुषार्थ बन पड़े उनमें उनकी आन्तरिक उत्कृष्टता ही प्रमुख कारण रही। उसी के आधार पर वे निजी जीवन में आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और देवी अनुग्रह की निरन्तर वर्ष होती अनुभव करते है। अपने व्यक्तित्व कर्तृत्व के रूप में ऐसा अनुकरणीय उदाहरण पीछे वालों के लिए छोड़ जाते है जिनका अनुकरण करते हुए गिरो को उठाने और उठो को उछालने जैसे अवसर हस्तगत होते रहे। यही है जीवन की लक्ष्य पूर्ति एवं एक मात्र सार्थकता। प्रज्ञायोग की जीवन साधना इस महती प्रयोजन की पूर्ति करती हैं।
मानवी गतिविधियाँ एवं क्रिया–कलापों को ध्यान से देखने पर उसके जीवन के तीन स्तर स्पष्ट होते हैं। स्वर्णिम नियमों के उद्घोषक कन्फ्यूशियस ने इन्हें पशु, मनुष्य एवं देवता के रूप में समझाया है। इसी तथ्य को दार्शनिक शैली में अविकसित, विकासशील एवं विकसित कहा जाता रहा है।
अंतराल की संरचना के अनुरूप ही मनुष्य का चिंतन बन पड़ता है। तदनुसार चरित्र गठित होता है, जिसकी अभिव्यक्ति व्यवहार में बन पड़ती हैं। इस तरह चिंतन, चरित्र व्यवहार तीनों को संचालित करने वाला मनुष्य का अपना अंतराल है। इसकी विकसित, विकासशील एवं विकसित स्थितियों के अनुरूप इन तीनों के स्वरूप भी दृश्यमान होते हैं।
व्यवहार विज्ञानियों व मनःशास्त्रियों ने मानवीय व्यवहार को उत्कृष्ट, चरित्र को उन्नत एवं चिंतन को परिष्कृत करने के लिए काफी सोच विचार किया है। उन्होंने अपने निष्कर्ष में यही स्पष्ट किया है कि अंतराल के दोषमुक्त होते ही चिंतन चरित्र व्यवहार भी सहज दोष मुक्त हो सकेंगे। जे.एम.आर. डिलागो ने अपनी कृति “फ्री बिहेवियर एण्ड स्टीमुलेशन” में तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बतलाया है कि क्रूरता, बर्बरता, आक्रामक प्रवृत्ति पशुओं में थोड़े से उद्दीपन से सहज संभाव्य बन जाती है। पशु व्यवहार और मानवीय व्यवहार को विभाजन करने वाली रेखा मनुष्य की विनम्रता है। यही तथ्य अमेरिका के जे.पी. स्कॉट ने अपनी रचना एनीमल बिहेवियर में प्रमाणित करते हुए कहा है कि पशुओं में जहाँ स्गसटिक बिहेवियर सहज बन पड़ता है ही उन्नत श्रेणी के मनुष्यों में नम्रता सहज दृश्यमान होती हैं।
भारतीय तत्वविदों ने भी विनम्रता को गुणोत्पादक रूप में स्वीकारा है अर्थात् यह गुणों की जननी हैं। इसके पनपते ही अन्य गुण सहज विकसित होने लगते हैं। श्री अरविन्द इसे सर्वांगीण साधना पद्धति के रूप में उपदिष्ट करते हैं। उन्होंने आत्म-विकास की साधना को तीव्र अभीप्सा, सतत् समर्पण, पूर्ण निवेदन के तीन चरणों के रूप में बताते हुए कहा कि तीव्र अभीप्सा से तात्पर्य हैं “अहं” विसर्जन की लालसा किन्तु अहं विसर्जन तुरंत एकदम नहीं बन पड़ता है। इस प्रक्रिया में सातत्य की आवश्यकता है, जो सतत् समर्पण के द्वारा पूर्ण होती है। इस क्षुद्र अहं पूर्णतया विसर्जित हो जाना ही पूर्ण निवेदन है। यह विसर्जन “स्व” का विराट” में, क्षुद्रता का महानता में हैं।
महर्षि आगे कहते हैं कि विनम्रता का तात्पर्य हैं- अहं का विसर्जन इसकी विनम्रता का तात्पर्य हैं- अहं का विसर्जन। इसकी सततता ही पूर्णता की ओर से जाने वाली होती है। यह दीनता नहीं है, जैसा कि अक्सर समझ लिया जाता है। यह इस बात का उद्घोष है कि हम जैसे है, वैसे है। हमें बिना किसी से प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या किये विकास करना है एवं यह प्रक्रिया बिना किसी से तुलना किये सम्पन्न होगी।
बहिरंग दृष्टि से दब्बूपन और चापलूसी भी विनम्रता के सदृश प्रतीत होते हैं, किन्तु यह प्रतीत होना प्रतीत भर है। वास्तविकता इससे विपरीत है। विनम्र व्यक्ति “अहं विसर्जन” साधक है। जबकि दब्बू और चापलूस व्यक्ति अहं से प्रेरित एक दीनहीन व्यक्ति मात्र है। अहं विसर्जन के चिन्तन में उसके विराट् में समाहित होने की प्रक्रिया के कारण संकीर्ण स्वार्थ बुद्धि लुप्त होती जाती है। उसका चिन्तन संकीर्णता से उभर कर सदाशयता के लिए नियोजित होने लगता है। तद्नुरूप उसके व्यावहारिक क्रिया-कलापों में परमार्थ परायणता भी स्पष्ट होती है। जबकि चापलूस दब्बू अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता की श्रृंखलाओं में आबद्ध हो अपने चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को क्षुद्रता में ही समेटे रहता है, जैसे रेशम का कीड़ा अपने ककून में ही बँधा जाल बुनता रहता है।
विनम्रता का साधन ऊर्ध्वमुखी प्रगति करता है। पूर्णता में प्रतिष्ठित होने पर वह ईश्वर से एकत्व प्राप्त करता है। इसी कारण महात्मा गाँधी ने अपने एकादश व्रतों में इसे महत्वपूर्ण स्थान दिया था। साथ ही ईश्वर में विनम्रता का पूर्ण अधिष्ठान होने के कारण ईश्वर को विनम्रता के अधिदेव, अधिपति कहकर सम्बोधित किया है।
हमारा सामान्य जीवन अहं से ही परिचालित होता है। यही कारण है कि हमारी विनम्रता मात्र एक प्रदर्शन या चापलूसी का स्वरूप बनकर रह जाती है। इस अहं में कहीं बाधा पड़ने पर पीड़ा होने लगती है। हिटलर के बारे में उक्ति है कि एक बार उसकी दीवार घड़ी खराब हो गई। उसकी ऊँचाई कम होने के कारण वह इसे उतार न पाया। उसके सात फीट लम्बे अर्दली ने घड़ी उतार कर ठीक कर दी, एवं यथा स्थान लगा दिया। इस घटना का वर्णन करते हुए वह लिखता हैं- “आज मुझे ऐसी पीड़ा हुई, जैसे मैं संसार हार गया।” उसकी यह पीड़ा मात्र हीनता के कारण है। उसे यह दुख मात्र इस कारण हुआ कि जो काम वह न कर सका वह उसके मातहत अर्दली ने कर दिखाया। छोटी-सी बात पर उसके अहं को इससे चोट पहुँची व उसने उसे बाकायदा अपनी डायरी में लिखा।
विनम्रता, हीनता के विपरीत है क्योंकि इसके उपजते ही अहंकार जाने लगता है, विसर्जित हो जाता है। साथ ही दीन हीनता भी समाप्त हो जाती है। विनम्र व्यक्ति को कभी भी दीन-हीन नहीं कहा जा सकता। ताओ धर्म के प्रवर्तक लाओत्से ने एक स्थान पर कहा है- “मुझे कोई हरा नहीं पाया, क्योंकि मैंने कभी जीत की आकाँक्षा नहीं की। मेरा कोई अपमान नहीं कर सका क्योंकि मैंने कभी सम्मान नहीं चाहा।”
उनके बारे में कहा जाता है कि किसी सभा में वे सबसे अंत में बैठते थे। इस पर उन्हें दीन, हीन भाव से ग्रस्त नहीं माना जा सकता। क्योंकि वे अपनी आत्म सत्ता के बारे में पूर्णरूपेण आश्वस्त थे। उनका व्यक्तित्व अहं से परिचालित नहीं, बल्कि “अहं ब्रह्मास्मि” वाली उक्ति के अनुसार उस जीव सत्ता का विकसित रूप था, जो कि विराट् का लघु संस्करण है।
लाओत्से विनम्रता अर्थात् अहं विसर्जन की साधना को विकास के लिए उपयुक्त पाथेय बताते हैं। भारतीय मनीषी भी “विद्या ददाति विनयं” अर्थात् विनयशीलता को विद्या की ही देन एवं परिणति मानते हैं। जो विनयशील नहीं वह अभी भी “अविद्या” अर्थात् बहुसंख्य हैं जो स्वयं को न जाने क्या मान बैठते हैं, परन्तु उपरोक्त कसौटी पर क्षुद्र अहंकारी ही सिद्ध होते हैं।
व्यक्तित्व गठन एवं जीवन विकास की प्रक्रिया का शुभारंभ विनयशीलता की अवधारणा से सहज ही बन पड़ता है। इस सहज संभाव्य आधार को ग्रहण कर प्रत्येक साधक अपनी विकास प्रक्रिया को पूर्ण कर सकता है। साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले न जोन क्या-क्या कपोलकल्पित मान्यताएँ लेकर आते हैं, साथ ही अपना अहंकार भी। बुद्धि का आवरण भाव सत्ता पर, मन इस तरह छाया होता हैं कि वे कभी “मैं की सीढ़ी को पार ही नहीं कर पाते। भक्त विनयशील होता हैं, समर्पित होता है अतः एक छलाँग में बुद्धि को पार कर जाता है। कोई तर्क नहीं करता। उसका अहं होता ही नहीं क्योंकि मैं की हस्ती मिट जाती है। यही पूर्णता की निशानी है। योग का अर्थ ही होता है आत्म सत्ता व परमात्म सत्ता का मिलन। विनम्रता को अपना कर सफलता पूर्वक यह लक्ष्य सिद्धि की जा सकती है, यह भक्ति योग का संदेश हैं।
ज्ञान और कर्म के संयोग से ही प्रगतिपथ चल सकना, सफलता वरण करने की स्थिति तक जा पहुँचना संभव होता है। अध्यात्म विज्ञान में भी तत्व दर्शन का सही स्वरूप समझने के उपरान्त दूसरा चरण यही रहता है कि उसे क्रियान्वित करने की, पूजा अर्चा की विधि व्यवस्था ठीक बने। अध्यात्म का तत्व दर्शन, परिष्कार और आत्म विकास के दो शब्दों में सन्निहित समझ जा सकता है। उपासना पक्ष की प्रतीक पूजा का तात्पर्य है- क्रिया एवं साधनों के सहारे आत्म शिक्षण की आवश्यकता पूरी करना। कोई भी कर्मकाण्ड उसकी भावनाओं को हृदयंगम किये बिना पूर्ण नहीं हो सकता।
सार्वजनिक सुलभ साधना का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए इन पंक्तियों में प्रज्ञा योग नाम से वह विधान प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसके सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में अन्याय, उपचारों की अपेक्षा अधिक सरलता पूर्वक कम समय में अधिक सफलता मिल सकती है।
प्रज्ञायोग की दो संध्याएँ अत्यधिक सरल और अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। एक सबेरे आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े पड़े पन्द्रह मिनट हर दिन “नये जन्म” की भावना करने का उपक्रम हैं। दूसरा रात्रि को सोते समय यह अनुभव करना कि शयन एक प्रकार दैनिक मरण है। जन्म और मरण यही दो जीवन सत्ता के ओर छोर हैं। इन्हें यही रखा जाय तो मध्यवर्ती भाग सरलता पूर्वक सम्पन्न हो जाता है। बीजारोपण और फसल काटना, यही दो कृषि कार्य के प्रमुख अंग है। शेष तो लम्बे समय तक चलने वाली किसान की सामान्य क्रिया प्रक्रिया तक चलने वाली किसान की सामान्य क्रिया प्रक्रिया हैं। उसे तो सामान्य बुद्धि और सामान्य अभ्यास से भी चलाया जा सकता है। जाग्रति को प्रातः काल की संध्या और शयन को रात्रि की संध्या कहा जा सकता है। दो बार की संध्या कहा जा सकता है। दो बार की संध्या यों सूर्योदय और सूर्यास्त के समय वाली मानी जाती है, पर उसके साथ जुड़ी आध्यात्मिक साधना प्रातःकाल आँख खुलते समय और रात्रि को सोने आँख बन्द होने के समय की जा सकती है।
प्रज्ञायोग की प्रथम साधना को आत्मबोध कहते हैं। आँख खुलते ही यह भावना करनी चाहिये कि आज अपना नया जन्म हुआ। एक दिन ही जीना है। रात्रि को मरण की गोद में चले जाना है। इस अवधि का सर्वोत्तम उपयोग करना ही जीवन साधना का महान लक्ष्य है। यही अपना परीक्षा क्रम है और इसी में भविष्य में सारी संभावना सन्निहित है।
मनुष्य जन्म जीवधारी के लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है। इसका सदुपयोग बन पड़ना ही किसी की उच्चस्तरीय बुद्धिमत्ता का प्रमाण परिचय है। उठते ही यह विचार करना चाहिये कि आज के दिन को सम्पूर्ण जीवन माना जाए और स्रष्टा की इस बहुमूल्य धरोहर का उन कार्यों में उपयोग किया जाए जिनके लिए इसे दिया गया है। इस आधार पर दिन भर की दिनचर्या इसी समय निर्धारित की जाय चिंतन, चरित्र और व्यवहार की वह रूपरेखा विनिर्मित की जाए जिसे सतर्कता पूर्वक पूरी करने पर यह माना जा सके कि आज का दिन एक बहुमूल्य जन्म, पूरी सार्थक हुआ। इस चिन्तन के सभी पक्षों पर विचार करने में जितना अधिक समय लगे, उतना कम हैं, पर इसे नित्य प्रति, नियमित रूप से करते रहने पर पन्द्रह मिनट भी पर्याप्त हो सकते हैं। एक दिन की छूटी बात को अगले दिन पूरा किया जा सकता है।
दूसरी संध्या रात को सोते समय पूरी की जाती है। उसमें यह माना जाना चाहिये कि अब मृत्यु की गोद में जाया जा रहा है। भगवान के दरबार में जवाब देना होगा कि आज के समय का एक दिन के जीवन का किस प्रकार सदुपयोग बन पड़ा। इसके लिए दिन भर के समय-यापन परक क्रिया कलापों और विचारों के उतार चढ़ावों की समीक्षा की जानी चाहिये। उसके उद्देश्य और स्तर को निष्पक्ष होकर परखना चाहिये कि कितना उचित बन पड़ा और कितनी उसमें भूल या विकृति होती रही। जो सही हुआ उसके लिए अपनी प्रशंसा की जाय और जहाँ जो भूल हुई हो अपनी प्रशंसा की जाय और जहाँ जो भूल हुई हो उसकी भरपाई अगले दिन करने की बात सोची जाय। पाप का प्रायश्चित्त शास्त्रकारों ने यही माना है कि उसकी क्षति पूर्ति की जाय। आज का दिन जो गुजर गया, उसे लौटाया तो नहीं जा सकता, पर यह हो सकता है कि उसका प्रायश्चित अगले दिन किया जाय। अगले दिन के क्रिया−कलाप में आज की कमी को पूरा करने की बात भी जोड़ दी जाए। इस प्रकार कुछ भार तो अवश्य बढ़ेगा, पर उसके परिमार्जन का और कोई उपाय भी तो नहीं है।
मृत्यु अवश्यंभावी है। लोग उसे भूल जाते हैं और बाल क्रीड़ा की तरह महत्वहीन कार्यों में जीवन बिता देते हैं। यदि यह ध्यान रखा जाए कि चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त जो अलभ्य हस्तगत हुआ है उसे इस प्रकार व्यतीत किया जाय जिससे भविष्य उज्ज्वल बने। देव मानव स्तर तक पहुँचने की आशा बंधे। दूसरों को अनुकरण की प्रेरणा मिले। स्रष्टा को, दायित्व निर्वाह की प्रामाणिकता का परिचय पाकर प्रसन्नता हो। पदोन्नति का सुयोग इस आधार पर उपलब्ध हो।
रात्रि को जिस प्रकार निश्चितता पूर्वक सोया जाता है उसी प्रकार मरणोत्तर काल से लेकर पुनर्जन्म की मध्यावधि में भी ऐसी ही शान्ति रह सकती है। इसकी तैयारी इन्हीं दिनों करनी चाहिये। हँसी-खुशी से दिन बीतता हो तो रात्रि को गहरी नींद आती है। दिन यदि शान्तिपूर्वक गुजारा जाए-श्रेष्ठता के साथ जुड़ता रहे तो मरणोत्तर विश्राम काल में नरक नहीं भुगतना पड़ेगा। स्वर्ग जैसी शान्ति का रसास्वादन मिलता रहेगा। इस प्रक्रिया को तत्व बोध कहा गया है।
प्रज्ञायोग के दो और चरण है- जिनको दिन में पूरा किया जाता है। इनमें एक है- भजन दूसरा मनन। भजन के लिए नित्य कर्म से निवृत्त होकर नियत पूजा स्थान पर पालथी मारकर बैठा जाता है। शरीर, मन और वाणी की शुद्धि के लिए जल द्वारा पवित्रीकरण, सिंचन, आचमन किया जाता है देव प्रतिमा के रूप में गायत्री की छवि अथवा धूप-दीप में से कोई प्रतीक स्थापित करके इसे इष्ट, आराध्य माना जाता है। धूप, दीप, नैवेद्य, जल, अक्षत, पुष्प में से जो उपलब्ध हो उससे उसका पूजन किया जाता है। पूजन में प्रयुक्त वस्तुओं की तरह अपने जीवन में उन विशेषताओं को उत्पन्न करने की भावना की जाती है जो इन उपचार, साधनों में पायी जाती है। चन्दन समीपवर्तियों में सुगन्ध भरता है। दीपक अपने प्रभाव क्षेत्र में ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाता है। पुष्प हंसता और खिलता रहता है। जल शीतलता का प्रतीक बन कर रहता है। अक्षत, नैवेद्य के पीछे समयदान, अंशदान परमार्थ प्रयोजन के लिए निकाले जाने की भावना है। इष्टदेव को सत्प्रवृत्ति का समुच्चय माना जाय। इन मान्यताओं के आधार पर देव पूजन समग्र बन पड़ता है।
अब जप और ध्यान की बारी आती है। दोनों एक साथ चल सकते हैं। गायत्री जप मानसिक हो तो भी ठीक है। जितनी देर करने का निश्चय हो उसका हिसाब माला या घड़ी के सहारे किया जाता है। जिन्हें गायत्री की अपेक्षा कोई अन्य मन्त्र रुचिकर होवे उसे अपना सकते है। ॐकार भी सार्वभौम स्तर की जप मान्यता बन सकता है।
जप के साथ प्रातः काल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य का ध्यान किया जाय। भावन करनी चाहिये कि अपना खुला शरीर सूर्य के सम्मुख बैठा है। इष्ट की सूक्ष्म किरणें अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों में प्रवेश कर रही है। किरणें ऊर्जा और आभा की प्रतीक है। ऊर्जा अर्थात् शक्ति, आभा अर्थात् प्रकाश प्रज्ञा। दोनों का समन्वय तीनों शरीरों में प्रवेश करके उन्हें प्रभावित करता है ऐसी भावना की जानी चाहिये। प्रत्यक्ष शरीर में स्वास्थ्य और संयम, सूक्ष्म शरीर मस्तिष्क में विवेक और साहस, कारण शरीर अर्थात् अन्तःकरण में श्रद्धा, सद्भावना सूर्य किरणों के रूप में प्रवेश करके अस्तित्व की समग्र सत्ता को अनुप्रमाणित कर रही है। यह ध्यान धारणा और मंत्र जप साथ-साथ नियत निर्धारित समय तक चालू रखे जाय और अन्त में पूर्णाहुति के रूप में सूर्य सम्मुख जल अर्घ्य दिया जाय। इसका तात्पर्य है। परम सत्ता के सम्मुख जल रूपी आत्म सत्ता का समर्पण। भजन भावना इतनी ही है। यदि नियत स्थान पर बैठ सकना संभव नहीं, सफर में चलने जैसे स्थिति हो तो वह सारे कृत्य मानसिक रूप से बिना किसी वस्तु की सहायता के भी किये जा सकते हैं।
प्रज्ञायोग साधना का चौथा चरण है- मनन। यह मध्याह्नोत्तर कभी भी नहीं किया जा सकता है। समय पन्द्रह मिनट हो, तो भी काम चल जायेगा। इसमें अपनी वर्तमान स्थिति की समीक्षा की जाती है और आदर्शों के मापदण्ड से जाँच पड़ताल करने पर जो कमी प्रतीत हो, उसे पूरा करने की योजना बनानी पड़ती है। यही मनन है। इसके लिए एकान्त स्थान ढूँढ़ना चाहिये। आंखें बन्द कर के अन्तर्मुखी होना और आत्मसत्ता के सम्बन्ध में परिमार्जन परिष्कार की उभयपक्षीय योजना बनानी चाहिये। इसमें आज के दिन को प्रधान माना जाय। प्रातः से मध्याह्न तक जो सोचा और किया गया हो, उसे आदर्शों के मापदण्ड से जाँचना चाहिये और उस समय से लेकर सोते समय तक जो कुछ करना हो उसकी भावनात्मक योजना बनानी चाहिये, ताकि दिन के पूर्वार्ध की तुलना में उत्तरार्ध और भी अच्छा बन पड़े।
आत्म समीक्षा के चार माप दण्ड हैं- (1) इन्द्रिय संयम, (2) समय संयम, (3) अर्थ संयम, (4) विचार संयम। देखना चाहिये कि इन चारों में कही कोई व्यक्तिक्रम तो नहीं हो रहा है? जीभ स्वाद के नाम अभक्ष्य भक्षण तो नहीं करने लगी? वाणी से असंस्कृत वार्तालाप तो नहीं होती? कामुकता की प्रवृत्ति कहीं कुदृष्टि से तो नहीं उभर रही? असंयम से शरीर और मस्तिष्क खोखला तो नहीं हो रहा? शारीरिक और मानसिक स्वस्थता बनाये रखने के लिए इन्द्रिय निग्रह अमोघ उपाय है।
समय संयम का अर्थ है- एक-एक क्षण का सदुपयोग। आलस्य प्रमाद में, दुर्व्यसनों में, दुर्गुणों के कुचक्र में फँस कर समय का एक अंश भी बर्बाद होने पाये। इसकी सुरक्षा और सदुपयोग पर पूरी पूरी जागरूकता बरती जानी चाहिये। समय ही जीवन है, जिसने समय का सदुपयोग किया, समझो कि उसने जीवन का परिपूर्ण लाभ उठा लिया।
तीसरा संयम हैं अर्थसंयम। पैसा ईमानदारी और परिश्रम कमाया जाय। मुफ्तखोरी और बेईमानी का आश्रय न लिया जाय। औसत भारतीय स्तर का जीवन जिया जाय। “सादा जीवन उच्च विचार” की नीति अपनायी जाय। विलास प्रदर्शन की मूर्खता में कुछ भी खर्च न होने दिया जाय। कुरीतियों के नाम पर भी बर्बादी न चले। बचत का एक बड़ा अंश परमार्थ प्रयोजन में लगा सकने और पुण्य की पूँजी जमा करने का श्रेय उन्हीं को मिलता है, जो विवेकपूर्ण औचित्य का ध्यान रखते हुए खर्च करते हैं।
चौथा संयम है- विचार संयम। मस्तिष्क में हर घड़ी विचार उठते रहते हैं, कल्पनाएँ चलती रहती है। ये अनर्गल, अस्त−व्यस्त एवं अनैतिक स्तर के न हो, इसके लिए विवेक को एक चौकीदार की तरह नियुक्त कर देना चाहिये। उसका काम हो कुविचारों को सद्विचारों की टक्कर मार कर परास्त करना। अनगढ़ विचारों के स्थान पर रचनात्मक चिन्तन का सिलसिला चलाना। विचार मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। वही कर्म के रूप में परिणत होती और परिस्थिति बनकर सामने आती है। जीवन को कल्प वृक्ष बनाने का श्रेय रचनात्मक विचारों का ही होता है। इस तथ्य को भली प्रकार समझते हुए चिन्तन को मात्र रचनात्मक एवं उच्चस्तरीय विचारों में ही संलग्न रखना चाहिये।
साधना, स्वाध्याय, संयम सेवा के चार पुरुषार्थ में जीवन की प्रगति एवं सफलता बन पड़ती है इसलिये दिनचर्या में उन चारों के लिए समुचित स्थान रहे, उसकी जाँच-पड़ताल आत्म समीक्षा के समय में निरन्तर करनी चाहिये। आत्मसमीक्षा,, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की चतुर्दिक् प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिए मध्यान्तर काल की मनन साधना करनी चाहिये। इसे आत्मदर्शन ही समझा जाना चाहिये, जो थोड़ी विकसित अवस्था में ईश्वर दर्शन के रूप में फलित होता है।
उस दिन लहर बड़ी निराशा और दुखित बैठी थी। समुद्र उसे आगे बढ़ने ओर बिखरने के लिए कह रहा था। किन्तु वह डर रही थी। अपने आश्रयदाता के अंचल में छिपकर बैठे रहना ही उसे प्रिय था। वह इतने में ही सन्तुष्ट रहना चाहती थी।
समुद्र ने उसे समझाया भद्रे! आगे बढ़ो। मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं गति के साथ जुड़ा हैं। विद्रोह के बिना प्रणय की सरसता की अनुभूति कैसी होगी? शीत के अभाव में आतप का स्वाद कैसे चखा जा सकेगा।
लहर चाहती नहीं कि उसे आगे बढ़ने के झंझट में पड़ना पड़े। भविष्य न जाने कैसा होगा? इस अनिश्चितता की कल्पना उसे भयभीत कर रही थी। उसने संतृष्ण नेत्रों से अपने प्रियतम को देखा और चाहा कि उसे जहाँ का तहाँ रहने दिया।
समुद्र गम्भीर हो गया उसने कहा देखती नहीं मेरे अन्दर कितना दर्द है? जो क्षण भर भी चैन से नहीं बैठने देता। उस दर्द में हिस्सा बटाये बिना तुम कैसे मेरी प्रियतमा बन सकोगी। अन्तर को छूना चाहोगी तो दर्द भी तुम्हारे हिस्से में आवेगा। ज्वार भाटों के रूप में उछलती मेरी पीड़ा में से क्या तुम हराती हलचल जितना हिस्सा भी नहीं बड़ा सकोगी, प्रेम के साथ क्या मेरा दर्द भी अंगीकार न करोगी?
लहर सुबह रही थी। अतीत की सरसता और आगत की अनिश्चितता के बीच वह असमंजस में खड़ी थी उस स्तब्धता को तोड़ती हुई आगे वाली लहरें हंस पड़ीं और बोली, सहेली हमें देखा न, उद्गम से बिछुड़ कर ही तो हम भी अनंत की और जा रही हैं, अपने प्रियतम की महानता के अंतर्गत ही तो क्रीड़ा कल्लोल कर रही है हम उससे बिछुड़ी कहां है? सीमित से असीम बनकर हमने प्रणय की सरसता को खोया कहा बढ़ाया ही तो है, फिर तुम क्यों डरती हो?
चर्चा बड़ी मधुर थी। सो उसे सुनकर सूर्य की किरणें भी ठिठक गई। प्रौढ़ाओं के समर्थन में सिर हिलाते हुए उनने भी कहा हमें अपने प्रियतम की विशालता में विचरण करते हुए तब की अपेक्षा अब अधिक उल्लास है जब हम निकटता की निष्क्रियता को जकड़े बैठी थी।
प्रसंग पूरा नहीं हो तपाया था कि महकती गन्ध भी वहीं आ पहुँची और बोली पुष्प की गरिमा के सुविस्तृत क्षेत्र को बढ़ाती हुई हम बिछुड़न का नहीं पुलकन का अनुभव करती है, फिर छोटी सहेली तुम्हीं क्यों कर रुक बैठने के लिए मचल रही हो।
समुद्र इस बोध चर्चा को मनोयोग पूर्वक शांत चित्त से सुन रहा था। इतने में इंद्र ने द्वार खटखटाया और कहा। चलने में विलम्ब न करो। प्यारी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से बैठी है?
सागर सकपका कर उठ खड़ा हुआ। मेघों का वाहन तैयार था। भाप बनकर वझा ने उस पर आसन जमाया और इन्द्र के इशारे पर सुदूर यात्रा पर चल पड़ा।
नवोढ़ा से संतृष्ण नेत्रों से देखा और पूछा - मेरे आश्रय दाता, क्यों तुम्हें भी वियोग सहना पड़ता है? क्या बिछुड़न तुम्हारा भी पीछा नहीं छोड़ती?
सागर की आँखें छलक पड़ी। उसने कहा भद्रे। यह बिछुड़न नहीं-नवीनीकरण है। जीवन इसी का नाम है। मैं मेघ बनकर आकाश में गमन करता हूँ और सरिताओं की जल राशि बनकर फिर वापस लौट आता हूँ। इस गतिशीलता से किसी जीवित को छुटकारा नहीं गमन का परित्याग करने पर तो मरण ही हाथ रह जायेगा। सड़ना मुझे कब सुहाता है - कल्याणी?
लहर की आंखें खुल गई। उसने चलना आरंभ कर दिया वस्तुतः चलना ही तो जीवन हैं।
मानवी जीवन की प्रगति यात्रा का क्रम क्या हो? कैसे इसे दु्रुत बनाया जाय? यह प्रारम्भ से ही मनीषियों को चिन्तन का केन्द्र रहा है मानव की काया, प्राण व मन की सुगठित बनाते हुए अतिमानस तक की विकासयात्रा सम्पन्न करने के साथ सामाजिक परिप्रेक्ष्य में व्यावहारिक जीवन श्रेष्ठ, समुन्नत व आदर्श कैसे बनाया जाय। इस पर सैद्धान्तिक विवेचन एवं व्यवहारिक मार्गदर्शन प्रदान कर व्यष्टिगत एवं समष्टिगत जीवन के सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए सर्वतोमुखी विकास की जो प्रणाली आविष्कृत हुई, महापुरुषों ने उसका नाम ‘धर्म’ दिया।
यद्यपि मानवीय ज्ञान की समस्त विद्याएं मनुष्य के विकास के लक्ष्य को लेकर ही विकसित हुई है, किन्तु इनमें से प्रत्येक का गहनता से अवलोकन करने पर स्पष्ट होता हैं कि ये सभी एकांगी हैं। सर्वांगीणता एवं सार्वभौमिकता की दृष्टि से विकसित जीवन के लिए आवश्यक सूत्रों को हृदयंगम कराना धर्म की अपनी विशिष्टता है। इन सूत्रों को हृदयंगम कर जीवन लक्ष्य की और पहुंचने का विवेकपूर्ण सचेतन प्रयास करना ही यथार्थ अर्थों में धार्मिक होना है। प्रख्यात चिन्तक स्वामी पवित्रानन्द अपनी कृति “माडर्न मेन इन सर्च ऑफ रिलीजन” में इसको और अधिक स्पष्ट करते हुए बताते है - धर्म का तात्पर्य है “वर्तमान एक जीवन में ही अनेक जीवनों का निचोड़ लेना।” यही कारण है कि सच्चे धार्मिक व्यक्ति का जीवन के प्रति दृष्टिकोण उसके आदर्शों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों के अतिरिक्त अन्य सभी के लिए अबोधगम्य रहता है।
सर्वांगीण विकास के इन सूत्रों का अन्वेषण तथा कालक्रम परिस्थितियों परिवेश की दृष्टि से संशोधन समय-समय पर विभिन्न महापुरुषों ने किया है। इन अन्वेषकों तथा संशोधनकर्ताओं के निर्धारण के आधार पर सार्वभौमिक विकास की एक ही प्रणाली धर्म ने परिस्थितियों एवं परिवेश के अनुरूप विभिन्न स्वरूप पाए। इसी तथ्य पर गहन चिन्तन के उपरान्त अपने प्रतिपादित निष्कर्ष में उल्लेख करते हुए बर्नार्डशा ने श्रुति के कथन को दुहराया कि “धर्म एक है उसके स्वरूप अवश्य भिन्न है।”
कालक्रम की दृष्टि से हिन्दू धर्म को इतिहासविज्ञ सर्वाधिक प्राचीन मानते हैं धर्म के साथ हिन्दू जोड़ने का तात्पर्य केवल इतना है कि सूत्रों के अन्वेषक हिन्दीवासी थे। इसके पश्चात् परिस्थितियों एवं परिवेशन के अनुसार संशोधन व अन्वेषण हुए तथा परसिया में पारसी धर्म का उदय हुआ। प्रो. ए.वी. डब्ल्यू जैक्सन अपनी कृति परसिया पास्ट एंउ प्रोजेण्ट में पारसी धर्म के अधिष्ठाता जरथुस्त्र को एक ऐतिहासिक व्यक्ति की मान्यता प्रदान करते है। कुछ इतिहासकार पौरष्य व दुग्धोवा की इन सन्तान का काल ईसा से 6़000 ई. पूर्व तथा कुछ ईसा से 12000 ई. पूर्व मानते है। इनके पश्चात् मूसा, ईसा, मुहम्मद आदि महापुरुषों के द्वारा यहूदी, ईसाई एवं इस्लाम धर्मों का उदय हुआ। इसी तरह चीन में ईसा से 604 वर्ष पूर्व लाओत्से के द्वारा ताओ धर्म लगभग 424 वर्ष पूर्व कन्फ्यूशियस द्वारा कन्फ्यूशियस धर्म प्रकाश में आए। जापान में शिन्तो धर्म तथा भारत में बौद्ध धर्म व जैन धर्म का उदय इसी संशोधन व अन्वेषण की परम्परा में हुआ।
यद्यपि ये सभी धर्म सार्वभौमिकता के एक ही शाश्वत सिद्धान्त व लरु का बोध कराने वाले हैं किन्तु प्रत्येक में मत–मतांतरों तथा व्याख्यानों की बहुलता के अम्बार में शाश्वतता छुप-सी गई हैं सर्वसामान्य को यह प्रतीत होने लगा है कि यह विभिन्नता धर्म के स्वरूपों की न होकर स्वयं धर्म की हैं।
प्रत्येक स्वरूप में उल्लिखित सिद्धान्तों का गहन अध्ययन व गवेषणात्मक विवेचन वस्तु स्थिति को प्रकट करता है। सिद्धान्तों की दृष्टि से पारसी, यहूदी, ईसाई, धर्म एक है। पारसियों का आहुरमज्द ही यहूदियों का यहोवा, ईसाइयों का स्वर्गस्थ पिता तथा मुसलमानों का अल्लाह है। ईश्वर व जीव के पारस्परिक सम्बन्ध स्नेहमय है। इसी तरह बौद्ध धर्म, जैन धर्म, कन्फ्यूशियस धर्म, ताओ-धर्म, शिन्तो धर्म सभी स्वर्णिम नियमों की बात करते हैं। इन धर्मों को प्रकारान्तर से नीति का विशद विवेचन कहा जा सकता है। बौद्ध एवं जैन विवेचन की कुछ दार्शनिक मीमांसाओं में विभेद होने पर भी दोनों ही आदर्शोन्मुखी जीवन जीने की नीतियों का प्रायः एक जैसा प्रतिपादन करते हैं। यही स्थिति कन्फ्यूशियस धर्म में है। इसमें उल्लेखित स्वर्णित नियम भी उपरोक्त जैसे ही हैं इन नियमों के पाँच प्रकारों में जैन का तात्पर्य है अच्छाई मनुष्य-मनुष्य में प्रेम सम्बन्ध। चुन त्स का भाव है सच्ची श्रेष्ठ मनुष्यता, “लि” का मतलब है। औचित्य उत्तम व्यवहार इसका एक व्यर्थ जीवन का नियम व्यवस्था से भी है। “ते” का अर्थ है शक्ति किन्तु कन्फ्यूशियस के मन्तव्य से शक्ति का शारीरिक, भौतिक स्तर पर नहीं मौखिक स्तर में होता है। पाँचवे नियम वेन का अर्थ है शंति का कलाएं। इसी तरह ताओ धर्म में ताओ का अर्थ है मार्ग। इसे लाओत्से परम कारण मानते हुए इसकी प्राप्ति तु नैतिक व अनंत जीवन जीने का मार्ग निर्देशित करते है। जापान के शिन्तो धर्म का मर्म समझाते हुए टोकियो विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्राध्यापक डॉ. शिशिजी इशीकावा अपने विचारपूर्ण निबन्ध इन्ट्रोडक्शन टू शिन्तोथियोलॉजी में कहते है- कि शिन्तो का तात्पर्य है ईश्वरीय मार्ग इसमें ईश्वर के केनकार्ड अर्थात् सगुण व यूकार्ड अर्थात् निर्गुण दोनों ही पक्ष स्वीकारने के साथ जीवन को उन्नत व विकसित बनाने हेतु नीति नियमोँ का सुनियोजित विवेचन है।
विश्व के सभी महत्वपूर्ण धार्मिक स्वरूपों पर किया गया चिन्तन इनकी एकात्मता पर सोचने के लिए हमें बाध्य करता है। इनका यह अनितीय भाव भारतीय वाङ्मय के वेद अर्थात् ज्ञान के शीर्षस्थ भाग अर्थात् वेदान्त में स्पष्ट भावित होता है। यह अपने प्रथम सिद्धान्त नाम रूप मिथ्या में सारे द्वंद्वों का निराकरण करता है। इसका तात्पर्य है कि नाम रूप का मोह ही सारे झगड़े की जड़ हैं। वास्तविकता भी यही हैं। अर्नाल्ड टायनवी एन हिस्टोरियन अप्रोच टू रिलीजन में कहते है ‘6 धर्म के नाम पर हुए प्रायः सभी झगड़े सिद्धान्तों के लिए नहीं वान् स्वरूपों के लिए हुए हैं।
स्वरूपों को कुछ अधिक महत्व देने के कारण ही जहाँ यह कहा जाता है कि जो ईसा को नहीं मानता वह ईसाई नहीं, मूसा, मुहम्मद, बुद्ध, जैन, ताओवादी, कन्फ्यूशियस आदि को न मानने वाला, क्रमशः यहूदी, मुसलमान, बौद्ध, जैन, ताओवादी, कन्फ्यूशियस मतावलम्बी नहीं वहीं, राम, कृष्ण कोन मानने वाले, सगुण या निर्गुण को स्वीकारने अथवा अस्वीकार करने वाले सभी सहता से इस सनातन भाव को ग्रहण कर सकते हैं। स्वामी अभेदानन्द अपने एक वक्तव्य में कहते हैं कि “यहाँ आस्तिक व नास्तिक के मध्य भी काई तकरार नहीं, क्यों कि इसके सिद्धान्त मनोवैज्ञानिक है जो सभी को सहज स्वीकार्य है।”
नाम, रूप का आवरण हटा देने पर विश्व के सभी धर्म यहाँ अपना एकत्व प्राप्त कर लेते हैं नैतिक नियमों का प्राधान्य मानने वाले बौद्ध, जैन कन्फ्यूशियस वेदान्त में वर्णित साधन चतुष्टय व षट् सम्पत्ति ग (शमुँ, दम, उपरति, तितीक्षा, भुभुक्षत्व, नित्यानित्य विवेक) में एकत्व प्राप्त करते है। जबकि पारसी, यहूदी, ईसाई इसलाम इसके द्वैत भाव से एकीकृत होते हैं। किन्तु ईसा के आय एण्ड माय ओन सेल्फ तथा सूफियों के अनहल हक् क स्वर निनाद के साथ इनका एकत्व विशष्टाद्वैत से होता है। यही स्थिति शिंतों के सगुण निर्गुण के साथ है जबकि ताओ पूर्णतया अद्वैत सिद्धान्त के ब्रह्म के सदृश्याही हैं इसे ताओं-ते- किंग नामक कृति में निराकार मन वाणी से परे बताया गया है यही नहीं सभी धर्म स्वरूपों का मोह छोड़ने के साथ जहाँ परमोच्च भाव में प्रतिष्ठित होते हैं। वही वे अद्वैत तत्व में समाहित हो जाते है।
फ्राँस के प्रसिद्ध पत्रकार तथा विचारक जीन हर्बर्ट अपनी कृति डायवर्सिटी इन यूनिटी में उपरोक्त तथ्य से सहमति व्यक्त करते हुए कहते हैं कि सिद्धांतों एवं शाश्वत मँलयो की अपेक्षा मतों एवं मतवादों तथा तत्सम्बन्धी वर्गीकरण के नाना विभेदों में अपना सारा चिन्तन केन्द्रित करन के कारण ही हमें एकत्व में अनेकत्व भासित होने लगा हैं। इसी को वास्तविकता समझ बैठने के कारण ही शाश्वत मूल्यों से विमुखता तथा प्रेम के स्थान पर द्वेष ही हमारे पल्ले पड़ रहा हैं।
आवश्यकता एकतत्व बोध की है। इसी को प्रतिपादित करते हुए सुविख्यात विचारक डॉ. भगवानदासअपीन रचना “द इसेन्शियल यूनिटी ऑफ ऑल रिलीजन्स” में कहते है कि द वन टू गाँड, विश्वात्मा, ओवरसोल, एनिमा मुण्डी, द टोटल माइण्ड, द यूनिर्वल सेल्फ ऑफ ऑल आदि नामे की अख्ज्ञराभिव्यंजना से भ्रमित न होकर धर्म के उस शाश्वत स्वरूप का अनुकरण, अनुसरण करना चाहिए जो एक है किन्तु अनेक स्वरूपों में प्रतिभासित हो रहा है। इसी तथ्य को स्वामी विश्वानन्द सत्य स्वीकारते हुए अपनी कृति यूनिटी ऑफ रिलीजन्स में कहते हैं कि प्रत्येक धर्म के मुख्यतः तीन पक्ष है दर्शन, आधारभूत सिद्धान्त व नीति। तीनों ही दृष्टिकोणों से परखने पर स्पष्टतया धर्म एक है, उसके स्वरूपों में भले ही विविधता गोचर हो।
वेदान्त इन भासित होने वाले स्वरूपों की कमणमुक्त को अपनी माला में यथोचित स्थान देता हुआ गीता के कथन की भवि सर्व मिदं प्रोक्त सूत्रें मणि गणाँ इवा को प्रमाणित करता हुआ स्पष्ट करता हैं कि कि धर्म के विभिन्न स्वरूप मणियों के सदृश है, जबकि धर्म की शाश्वतता सूत्र की तरह एक है। यही सूत्र इन सभी का आधार हैं इसके नष्ट होने से सभी का अस्तित्व नष्ट होने की संभावना है आवश्यकता इस सूत्र को समझने तदनुरूप आचरण की महत्ता प्रतिपादित करने की है।
वेदान्त के द्वारा इ परमोच्च भाव की व्याख्या के कारण ही प्रो. मैक्सूमूलन सिक्स सिस्टम्स ऑफ इंडियन फिलॉसफी नामक कृति में में इसे उस वास्तविकता के नाम से बताते है जो मानव मन द्वारा प्राप्य है। जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर इसे जीवन व मृत्यु का सहचर व शान्ति प्रदाता मानते है। प्रो. ई. डढब्लयू हाँपकिन्स इसे थेल्स, पैरमिनिडीज की विचारणा का आधार बताते हुए मानव मात्र के लिए कल्याणकारी मानते है। कील विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्राध्यापक दर्शनशास्त्री पालडायसन ने इसकी कल्याण कारित तथा सार्वभौमिकता के ही कारण इस पर ग्रन्थों की रचना (वेदान्त दर्शन का भाव्य आदि) भी की।
विविध स्वरूपों के व्यामोह में न उलझकर शाश्वत मूल्यों के परिपालन को आधार मानकर ही जीवन लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव है। स्वामी विवेकानन्द एक स्थान पर कहते है कि स्वरूपों के व्यामोह ने ही समय समय पर मनुष्य का पशु के स्तर पर उतारा है जबकि एकत्व के बोध ने महापुरुष उपजाकर मानवता का सुशोभित किया है। इस भाव को हृदयंगम कर तद्नुरूप व्यवहार करने से मानव जाति सही अर्थों में धर्मपरायण हो सकती है। मानवता अपना खो सौंदर्य पुनः पाकर उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला रख सकती है। यह मात्र यूटोपिया नहीं, एक सुनिश्चित संभावना भी हैं।
गर्भवती को नौ महीने तक आये दिन रुग्णता का सामना करना पड़ता है। अपच, अनिद्रा, उल्टी दस्त, जैसी मुसीबतें उन दिनों विशेष रूप से छाई रहती हैं। उन्हें सामान्य और स्वाभाविक मानकर गर्भिणी से लेकर उस के कुटुम्बी, सम्बन्धी सभी प्रसन्न और आशान्वित रहते हैं। नवजात शिशु की उपलब्धि उसकी प्रगति और बड़े होने पर सभी के लिए सुविधा, सहकार देने की कल्पना छाई रहती है। उसी कल्पना में सभी विभोर बने रहते हैं। यों प्रसूता की प्रसव वेदना का अनुभव लगाया जाय तो वह एक भयंकर दुर्घटना जैसी दृष्टिगोचर होगा। कई घंटे तक चाकुओं से गोदे जाने जैसी भयंकर वेदना होती है, कई बार तो उस संकट में प्राण तक चले जाने का खतरा बन पड़ता है। इतने पर भी गर्भधारण को शुभ समाचार के रूप में लिया जाता है। वर्तमान की कठिनाई को उज्ज्वल भविष्य की संभावना पर निछावर कर दिया जाता है।
बीज बातें समय घर के भरे कोठे खाली हो जाते हैं। किसान साल भर जुताई, गुड़ाई, सिंचाई, रखवाली आदि के कष्ट साध्य कार्यों में लगा रहता है या सब करने में न तो उदासी आती है और न कष्ट की अनुभूति होती है, क्योंकि अगले ही दिनों धनधान्य से घर भर देने वाली फसल की छवि मानस पर छाई रहती है। मोती बीनने वाले पनडुब्बे गहरे समुद्र में डुबकियाँ लगाते समय जोखिम झेल लेते हैं। फिर भी ऐसा दुस्साहस हाथ लगने की आशा, उत्साह और उमंग प्रदान करती रहती है।
नवयुग के अवतरण की संभावना में ही हमें अपने आशा-विश्वास की सराबोर रखना चाहिए इससे पूर्व युग संधि की बेला में कुछ प्रकृति प्रकोप, मानवी अनाचार और सामूहिक उन्माद में बने पड़े विग्रह भी समाने आते रह सकते हैं। उनका सामना अधिक जागरूकता और साहसिकता के साथ करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक तत्परता पूर्वक कटिबद्ध होना चाहिए। इतने पर भी निराशा को पास नहीं फटकने देना चाहिए। सतयुग की वापसी जैसी महान उपलब्धि के स्वप्न ही संजोये रहने चलिए।
पहलवानी करने वाली को चोटें भी खानी पड़ती हैं, पर दंगल जीतने का गौरव और पुरस्कार उनमें उमंगे भरे रहता है। विद्यार्थी को फीस देने, पुस्तकें खरीदने आदि के रूप में कुछ न कुछ खर्चते भी रहना पड़ता है और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रायः बारह वर्ष तक अनवरत अध्ययनरत भी रहना पड़ता है। फिर भी स्कूल के साथ जुड़े रहने से इनकार नहीं किया जाता। न अच्छे छात्र ऐसा सोचते हैं न अभिभावक बैठे रहने को समर्थन देते हैं। अध्यापक भी ऐसी उपेक्षा दिखाने वालों का अप्रसन्न होते हैं। हितैषियों में से भी सभी प्रकार कंधा डालने वालों से अप्रसन्न रहते हैं। युग संधि के दिनों प्रतिभावानों का अन्यमनस्क रहना ऐसा ही अपनाया गया अवरोध है जिससे तात्कालिक सुविधा भले ही सूझ पड़ती हो पर भविष्य तो निश्चय ही अंधकारमय स्तर का विपन्न ही बना रह सकता है।
प्रतिस्पर्धाओं में सम्मिलित होने वाले डटकर तैयारी करते हैं। विजय को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हैं। अग्नि परीक्षा में प्रवेश करते समय कुछ भी भले ही उस धातु खण्ड पर बीता हो पर जब कसौटी पर कसे जाने और तपाने में अधिक चमकने की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है तो फिर किसी को स्तर पर संदेह नहीं रह जाता। खरे सोने की प्रामाणिकता का समुचित मूल्याँकन होता है। यही बात अपने समय के बारे में भी कही जा सकती है और उन वरिष्ठों के सम्बन्ध में भी जिनकी विकट परिस्थितियों द्वारा परीक्षा होती रहती है। इसमें उत्तीर्ण होने पर वैसा ही कुछ उपलब्ध होता है जैसा कि चयन प्रतियोगिता में सफल होने वाले बड़े स्तर के अफसर बनते हैं। चुनाव जीतने वाले साँसद, पार्षद, मंत्री आदि बनते है।
युग संधि की बारह वर्षीय अवधि ऐसी है जिसमें प्रतिभा सम्पन्नों को निर्वाह भर में संतुष्ट रहकर प्रस्तुत अवाँछनीयताओं से लड़ना पड़ेगा और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए प्रबल प्रयत्न करने में किसी से पीछे नहीं रहकर पुरुषार्थरत रहना होगा। यात्रा में एक पैर पीछे से उठता है तो अगला आगे बढ़ता है। राजहंस नीर क्षीर का, विवेक अपनाते और दोनों को पृथक करते है। अधर्म के निवारण और धर्म के अभिवर्धन की द्विधा इन्हीं दिनों अपनी पूर्ण प्रखरता पर है। दो मोर्चे पर दुधारी तलवार से लड़ने की चुनौती ऐसे ही विशेष अवसरों पर समाने आती है।
त्रेता में असुरता का निराकरण और सतयुगी रामराज्य के संस्थापन का क्रम चला था। इसके लिए राम सहित अनेक ऋषि मुनियों ने पंचवटी में तप किया था। उसमें बारह वर्ष साधना चली और दो वर्ष असुरता से युद्ध लड़ा गया। चौदह वर्ष वनवास में बारह वर्ष तप साधना के थे। पाँडवों का सृजन इन्हीं दो कार्यों के लिए हुआ था। उन्हें जरासंध, कंस, दुर्योधन, शिशुपाल आदि द्वारा फैलाई गई अनीति की निरस्त करना था। साथ ही सिकुड़े हुए अस्त व्यस्त भारत को विशाल बनाने का महाभारत प्रयोजन पूरा करना था। इसके लिए भी प्रचण्ड आत्म शक्ति की आवश्यकता पड़ी। किसी बहाने उन्हें वनवास जाना पड़ा बारह वर्ष आत्मसाधना में बीते तथा एक वर्ष और अज्ञातवास में रहना पड़ा।
बुद्ध ने धर्म चक्र प्रवर्तन आन्दोलन को विश्वव्यापी बनाने से पूर्व बारह वर्ष तक निजी तपश्चर्या सम्पन्न की थी। एक गणना के अनुसार बारह वर्ष का भी एक युग माना जाता है। गान्धी युग सन् 1930 के नमक सत्याग्रह से लेकर सन 1942 के “करो या मरो” आन्दोलन के रूप में बारह वर्ष तक सामूहिक तप के रूप में गतिशील रहा। इन दिनों भी युग संधि का उपक्रम इतनी ही अवधि का चल रहा है। समुद्र मंथन की पुनरावृत्ति इसे समझा जा सकता है। इसमें आर्थिक, राजनैतिक स्तर के प्रगति प्रयास तो होंगे ही साथ ही आत्मशक्ति को उभारने की साधनात्मक प्रक्रिया भी प्रौढ़ता के स्तर तक पहुँचेगी।
सप्त ऋषियों की तप साधना प्रसिद्ध है।इसी आधार पर वे अजर अमर बने हुए आकाश में चमकते दमकते हैं। ध्रुव एवं ब्रह्मांड का ध्रुव केन्द्र बनने का अवसर तप साधना से मिला था। च्यवन ऋषि जब तप में निरत हुए तो वे सुकन्या जैसी पत्नी, अश्विनी कुमारी जैसे चिकित्सक पा सके और जराजीर्ण शरीर का कायाकल्प करके खोले यौवन को पुनः प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए।
तपस्वी विश्वामित्र का मन नये संसार की अभिनव संरचना करने का था। तपोबल के अनुरूप वे वैसा संकल्प और साहस कर सके। उपक्रम साधन जुटे। उनके शिष्ट हरिश्चन्द्र ने न केवल अपना समस्त वैभव उनके चरणों पर समर्पित किया वरन् सेवा धर्म स्वीकार करने हेतु अनोखे ढंग की तपश्चर्या में निरत रहे। उन दिनों धरती ने असुरता के आतंक से मुक्ति पाई थी। त्रेता के रामावतार के दिव्य चरित्रों में विश्वामित्र के अनुदान समर्थ भूमिका निभा सके। तपोनिष्ठ ऋषि अगस्त्य का भी इस प्रयोजन में समर्थ योगदान था।
पार्वती ने लम्बा तप करके शिव को पति रूप में वरण कर सकने का सुयोग पाया था। अनुसुइया की तपस्या भी भागीरथ की गंगा की तरह पुण्य सरिता मंदाकिनी की धरती पर ला सकी। अनुसुइया, गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी आदि ने भी अपने अपने स्तर के तप किये थे और उसी कारण वे उच्चस्तरीय ऋषियों के समकक्ष अपनी गणना करा सकीं। कुंती की साधना से द्रवित होकर सूर्य, धर्मराज, इन्द्र, पवन आदि इनकी गोदी में खेलने के लिए सहमत हुए थे। पाण्डव ऐसी दिव्य शक्तियों से सम्पन्न थे। अंजनी की साधना ही हनुमान जैसी प्रतापी को जन्म दे सकी। कण्व के संरक्षण में साधना करने वाली शकुन्तला ही चक्रवर्ती भरत की माता कहलाने का श्रेय प्राप्त कर सकी। स्वयं मनु और शतरूपा रानी की तपस्या ही उन्हें अवतारों को जन्म दात्री बना सकी।
पाषाण परिकर हिमालय को “देवात्मा” नाम इसलिए मिला कि उनकी कंदराओं में रहकर अगणित ऋषि तपस्वी उसमें अपनी प्रचंड प्राण ऊर्जा का समावेश करते रहे। अनेक दिव्य तीर्थों और दिव्य सरिताओं का क्षेत्र भी वहीं इसी वरदान के आधार पर बन सका। शिव तक ने इसे अपना क्रीड़ा क्षेत्र बनाया। राम देवप्रयाग में रहकर तप करते रहे और कृष्ण रुक्मणी सहित बद्रीनाथ क्षेत्र में तप करना आवश्यक समझा।
असुर समुदाय ने भी तप की शक्ति से ही अपने को असाधारण शक्तिशाली बनाया। वह दूसरी बात है कि उस उपलब्धि का दुरुपयोग करने वाले भस्मासुर, महिषासुर, वृत्रासुर, रावण, कुँभकरण आदि भी असाधारण शक्ति सम्पन्न बने एवं विनाश को प्राप्त हुए। इससे तप की महिमा तो स्पष्ट ही है, यह दूसरी बात है कि कोई गौ घृत को आग में डालकर समूचे नगर को भस्म कर डालने वाला अग्नि काण्ड उपस्थिति कर दे या आत्मदाह कर ले।
जमीन से सभी धातुएँ मिट्टी मिली हुई ही निकलती है। उन्हें भट्टी में तपाने के उपरान्त ही महत्वपूर्ण कामों में आ सकने योग्य बनाया जाता है। उपकरण औजारों के निर्माण की प्रक्रिया अग्नि संस्कार के साथ गलाई ढलाई करने के साथ जुड़ी हुई है। समुद्र का खारा पानी सूर्य ताप से उड़कर भाप बना और बादल बनकर बरसता, पेय जल बनता है। पारे जैसी विषाक्त धातुएँ अग्नि संस्कारों के सहारे संजीवनी का काम देने वाली औषधियों के रूप में विनिर्मित होती हैं। आयुर्वेद की गुणकारी रस भस्म तपाये जाने पर ही गुणकारी बनती हैं। खाद्यान्न पकाये जाने पर ही सुपाच्य बनते है। ईंट आवे में पककर मजबूत होती हैं। यह तप संस्कार सामान्य जनों को तपस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी बनाते हैं और उसे ऋद्धि सिद्धियों से सुसज्जित एवं शाप वरदान दे सकने वाली क्षमताओं से सम्पन्न करते हैं।
संकटों से निपटने, सुयोग जैसी परिस्थितियां विनिर्मित करने, वातावरण, में भरे प्रदूषणों की शुद्धि परिष्कार करने में भी तप ऊर्जा की क्षमता अपना चमत्कार दिखाती है। ईंधन जब तपता है तो शक्ति में परिणत होता है।
युग चेतना का उद्भव भी ऋषिकल्प मानसिक तपश्चर्या पर बहुत कुछ निर्भर है। रचनात्मक प्रत्यक्ष प्रयास तो होने ही चाहिए। श्रम, साधन, मनोयोग, कौशल के साथ साधनों को रचनात्मक कामों में लगाया जाना प्रत्यक्ष तप है। इस प्रकार के भौतिक प्रयास अपने स्थान पर सही एवं आवश्यक हैं। पर उनके साथ अध्यात्म साधना का समन्वय हो सके तो उसे “सोना और सुगन्ध” के सम्मिश्रण जैसा सुयोग समझा जा सकता है।
युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया में विशिष्ट आत्माओं का विशिष्ट आत्माओं का विशिष्ट तप नियोजित तो होगा ही। उसकी जानकारी संभवतः सर्व साधारण तक पहुँचेगी भी नहीं। पर इस पुण्य प्रयोजन में सर्व साधारण का भी योगदान होना चाहिए। समुद्र सेतु बाँधने में वानरों का गोवर्धन उठाने में ग्वाल बालों का योगदान रहा। अपनी सीमित सामर्थ्य के कारण गीध-गिलहरी तक चुप नहीं बैठे रहे। युग संधि पुरश्चरण की सरल भावना में सम्मिलित होकर सभी भावनाशील युग धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। संयुक्त देवशक्ति द्वारा देवों दुर्गा के अवतरण का यह अभिनव प्रयोग है।
विगत अंक में नवयुग की संभावनाएँ - लेखमाला के अंतर्गत आज की समस्याएँ, कल की संभावनाओं एवं उज्ज्वल भविष्य की संरचना के क्रिया-कलापों की चर्चा की गयी थी। विगत अंक में प्रकाशित पाँच लेखों की कड़ियों के आगे बढ़ाते हुए अंतिम तीन लेखमालाएँ इस अंक में प्रस्तुत है।
साधारण लोग चिन्तन भर करते हैं पर जिन्हें दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर चिरस्थायी समाधान खोजने की क्षमता प्राप्त होती है, उन्हें मनीषियों के वर्ग में गिना जाता है। इसके अतिरिक्त व प्रतिभावान हैं जो हाथ के लिए कामों को आवश्यक सामर्थ्य और कौशल प्राप्त करके सफलता के मार्ग पर बढ़ते-बढ़ते बहुत कुछ कर दिखाते हैं इन दिनों भौतिक क्षेत्र में प्रतिभाएँ तो काम करती दीखतीं हैं, पर लोक चिन्तन को परिष्कृत करने वाले मनीषी बुरी तरह पिछड़ रहे हैं। यही कारण है कि नीति, धर्म, सदाचार, कर्तव्य के अभाव में वह सफलता नहीं मिल रही, जो सम्मिलित प्रयत्नों से मिल सकती थी।
प्रत्यक्ष आवश्यकताओं की पूर्ति और उपस्थित कठिनाइयों का निराकरण, इन्हीं दो प्रयोजनों पर मनुष्य की अधिकाँश क्षमताएँ नियोजित रहती हैं। अदृश्य होने के कारण चिन्तन की उत्कृष्टता न तो आवश्यक समझी जाती है और न उसके लिए गंभीरतापूर्वक प्रयत्न किये जाते हैं। इस प्रकार से हम भौतिक जीवन में घिर गये हैं वह सरल भी तो नहीं रहा। इतना विपन्न हो गया है कि सही तरह जीवन यापन की सुविधाएं जुटाने में ही सारा समय, श्रम, धन एवं कौशल चुक जाता है। इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है, क्योंकि प्राथमिकता तो प्रत्यक्ष जीवन की गतिशील रखने वाले साधनों एवं उपक्रमों को ही देनी पड़ती है।
मनुष्य जीवन के साथ इन दिनों अगणित समस्याएँ जुड़ गयी हैं। जनसंख्या इस तेजी से बढ़ रही है कि अपने ही देश में इस शताब्दी के अन्त तक उसके एक अरब से अधिक हो जाने की आशंका हैं नवागन्तुकों के लिए भोजन, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा, निवास, आजीविका आदि सभी तो चाहिए। पृथ्वी उतना उगा नहीं पाती परम्परागत जल स्रोत कम पड़ते हैं। सघनता के बढ़ने पर सड़कों और वाहनों की आवश्यकता पड़ेगी ही। स्कूल खुलने ही चाहिए। ऐसे-ऐसे अनेकों कार्य हैं जिन्हें भौतिक क्षेत्र की साल संभाल करने वाले शासन तन्त्र, अर्थतन्त्र, कुशल निष्णात लोगों को पूरे प्रयत्न के साथ हल करने की आवश्यकता पड़ती है। शहर बढ़ रहे हैं प्रदूषण उभर रहा है। गंदगी बीमारी में परिणत होती जाती है। पिच पिच में घुटन ही नहीं बढ़ते अनाचार भी पनपते है। गरीबी और बेकारी की दोनों समस्यायें ऐसी हैं जो अपने साथ अनेकों संकट लिये-लिये फिरती हैं। ऐसे समय में अनाचारियों अपराधियों की भी बन जाती है। वे भी अपनी कसर नहीं छोड़ते। इनसे निबटना भी तो एक बड़ा काम है।
चिन्ता का विषय यह है कि आस्था संकट से निबटने के लिए, जन मानस परिष्कार सम्पन्न करने के लिए इतनी गंभीरता से नहीं सोचा और उतनी तत्परता से कुछ किया नहीं जा रहा हैं जितना कि किया जाना चाहिए। चिन्तन अदृश्य है। उसका कोई रोल ऐसा भी नहीं होता जो तत्काल अपने क्रिया कौशल का परिचय दे सके। ऐसी दशा में प्रस्तुत प्रवाह को देखते हुए उस प्रमुखता को उपेक्षा के गर्त में धकेल दिया जाये तो उसके लिए सामान्य जनों को दोष नहीं दिया जा सकता। दोष उन पर जाता है जिन्हें मनीषा के कर्णधार कहा जा सकता है। जिन्हें दूर दृष्टि प्राप्त है और जो वस्तुस्थिति को समझते हैं। जिन्हें सर्वत्र पेट ही पेट नहीं दिखता। जो इस तथ्य को भी जानते हैं कि लोक-चिन्तन को भटकाव के, दिशा शूल के संकट से उबारा जाना चाहिए। मानवी गरिमा को उत्कृष्ट आदर्शवादिता से रहित नहीं होने देना चाहिए। जिन्हें ज्ञान है कि परिस्थितियों की जन्मदात्री मन स्थित ही हैं जो सोचा जाता है वह क्रिया में परिणत होता है जैसा किया जाता है वैसा ही भुगता जाता है। इस तथ्य पर जिनका भी विश्वास हो, उन्हें मनीषा के पक्षधर कहा जा सकता हैं उनका प्रयत्न होना चाहिए कि अपनी पहुँच वाले क्षेत्र में संभालने सुधारने में वैसा प्रमाद न होने दें जैसा कि इन दिनों चल रहा है। लोक चिन्तन को यदि सदाशयता के साथ न जोड़ा गया तो भौतिक जीवन को सुखी बनाने के प्रयास सफल नहीं हो सकेंगे। दुर्बुद्धि अनेक अवरोध खड़े करेगी और प्रगति की दिशा को अवगति की ओर मोड़ देंगी। मात्र साधनों के सहारे ही सब कुछ बन पड़ता हो, ऐसी बात नहीं, उसके साथ आदर्शों के अनुरूप सूझ-बूझ और लगन भी होनी चाहिए। अन्यथा जो किया जायेगा उसमें अनेक खोट रहेंगे और लक्ष्य तक पहुँचने की स्थिति लाने में अवरोध ही बने रहेंगे। आदर्शवादिता मात्र स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि आदि तक ही सीमित नहीं है। उसके आधार पर भौतिक क्षेत्र का हर काम सही, सुदृढ़ और परिपक्व स्तर का बन कर रहता है। गतिविधियाँ सुसम्पन्नता प्राप्त करने की दिशा में नियोजित हो और उत्साह पूर्वक चल पड़े तो ठीक है, पर देखना यह भी होगा कि निर्धारणकर्ताओं का मानस और कार्यान्वित करने वालों का प्रयास इस उत्कृष्टता के साथ जुड़ा हुआ है या नहीं जिसे पुरातन भाषा में धर्म, अध्यात्म, दर्शन आदि के नाम से जाना जाता था। उसकी आवश्यकता मात्र पर परलोक संभालने भर के लिए ही नहीं है वरन् गहराई में सोचने पर विदित होगा कि साँसारिक क्षेत्र का हर काम सदाशयता की अपेक्षा करता है। इसके बिना जो बन पड़ेगा उसमें खोखली विडम्बना के अतिरिक्त और कोई सार तत्व न रहेगा। सीमेन्ट के बिना ईंट की दीवार कब तक खड़ी रह सकती है।
विज्ञानी अपना काम करता रहे। उस पक्ष से संबंधित शासनतंत्र, अर्थतंत्र, उद्यमी-शिल्पी आदि अपना-अपना काम करें। पर असमंजस में उन्हें भी नहीं रहना चाहिए। जिन्हें मनीषा का कर्णधार कहते हैं। कभी इस वर्ग के लोगों को “पुरोधा” या “पुरोहित” कहते थे। आज उन्हें धर्म क्षेत्र के प्रवक्ता, साहित्यकार, कलाकार, दार्शनिक आदि के सम्मिलित रूप से देखा समझा जा सकता है। आवश्यक नहीं कि इसके लिए उच्च शिक्षा का होना आवश्यक ही हो। भाव संवेदनाओं के धनी भी अपनी परमार्थ परायणता को सचेतन बनाकर ऐसे कुछ कर सकते हैं जैसा कि तथाकथित विद्वानों-प्रबुद्धों में से कदाचित ही कितनों से बन पड़ता हो। बहुत जानना है तो उत्तम पर उसकी सार्थकता तभी है जब वह अपने और दूसरों के स्तर को ऊँचा उठाने में प्रयत्नरत हो सके। निष्क्रिय मनीषा तो और भी अधिक भारभूत होता है, क्योंकि समय की अवनति का दोष प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हीं पर लगता हैं सेना हारती है तो सेनापति ही दोषी ठहराया जाता है। मस्तिष्क उनींदा हो तो चलते पैर खड्डे में जा गिरें तो इसमें अचरज क्या है? युग मनीषा जब भी जगी है तब उसने अपने समय का कायाकल्प किया है लोक तंत्र का मंत्र संसार को मनीषा ने दिया और प्रतिभाओं ने उसे विश्व-व्यापी कर दिखाया। साम्यवाद की सूत्रधार मनीषा है प्रतिभाएँ तो उसे कार्यान्वित करने भर में जुटी रही हैं। उसके विस्तार की वर्तमान सफलता उन दोनों के समन्वय की ही परिणति है और भी संसार में जो कुछ बना बिगड़ा है उसका निर्धारण मनीषा ने अपने स्तर के अनुरूप किया है। विचारशील श्रेय उस निर्धारण को ही देते रहेंगे जिसने प्रतिभाओं को झकझोर और अपने निर्धारण के अनुरूप वातावरण बनाकर दिखाया।
वाणी और लेखनी का विचार क्रान्ति में क्या योगदान हो सकता है और उस आधार पर इक्कीसवीं सदी से आरंभ होने वाले नवयुग को किसी प्रकार अग्रगामी बनाया जा सकता है, इसकी झलक-झाँकी इस लेखमाला के प्रारंभिक लेखों में गत माह दी गयी थी।
अब प्रश्न यह उठता है कि बिल्ली के गले में घण्टी कौन बाँधे? इन अस्त्र शस्त्रों को सही रीति से चला सकने वाली प्रतिभा कहाँ से उत्पन्न या उपलब्ध हो? बिना कुशल चालक के मोटर कैसे चले? अनाड़ी ड्राइवर तो दुर्घटना भी प्रस्तुत कर सकते है। अनजान व्यक्ति के बंदूक चलाने पर उसका जो धक्का पीछे लगता है, उससे अपनी पसली भी तोड़ लेता है। लेखनी और वाणी के अस्त्र-शस्त्र उठाने वाले यदि रुग्ण, कायर और भयभीत मानसिकता लिये फिरते हो तो वे मात्र उन साधनों से अनर्थ ही नियोजित करेंगे।
परीक्षित को जब मरने में एक सप्ताह भर बचा तो उनमें भागवत पुराण सुनने की इच्छा व्यक्त की। अनेकों प्रवचन कर्ताओं के नाम सुझाये गये, पर उन्हें कोई रास न आया। शुकदेव का नाम उन्हें सूझा। उन्हें ही बुलाया भी, क्योंकि परीक्षित जानते थे कि उपदेश नहीं, वस्तुतः उसे प्रस्तुत करने वाले का व्यक्तित्व ही काम करता है। यदि वह हेय स्तर का है तो लेखनी और वाणी में प्रस्तुत किये गये मार्गदर्शन के सही होते हुए भी उपहासास्पद ही बनेंगे। युग सृजन के मध्यवर्ती नाभिक की भूमिका ही प्रमुख होगी उनका व्यक्तित्व हर कसौटी पर खरा उतरने योग्य होना ही चाहिए। इतना बन पड़ने पर योग्य होना ही चाहिए। इतना बन पड़ने पर सुयोग्य साथियों की न तो कमी रहेगी, न कर्मठ कार्यकर्ताओं की। हनुमान के साथ अनपढ़ अनजाने बन्दर भी प्राण हथेली पर लेकर चल पड़े थे। बुद्ध के विहारों में भी प्रतिभाओं की कमी न थी। गाँधी को सुयोग्य साथी मिल ही गए थे। चुम्बक अपने वर्ग के अणुओं को खींचता और साथ में चिपकता देखा जाता है। विदूषकों की वाचालता मनोरंजन भर कर सकती है, किसी का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन कर सकने की क्षमता उसमें कहाँ होती है? महान कार्य हमेशा महान व्यक्तित्वों से ही बन पड़े हैं। क्षुद्रजन तो नकल बनाते और उपहास करते रहते है। श्रद्धा के क्षेत्र में प्रवेश करने पर तो कलई खुलने पर और भी अधिक दुर्गति होती है। परमाणु हों या सौर मण्डल, उनका उद्गम स्त्रोत मध्य केन्द्र नाभिक में ही होता है। युगसृजन के लिए ऐसी प्रतिभाओं को अग्रगामी बनना चाहिए जो प्रामाणिकता और प्रखरता की कसौटी पर अपनी समर्थता सिद्ध कर सकें।
शाँतिकुँज के नीति निर्धारण, व्यवस्था, क्रम, अर्थतंत्र के साथ उच्चस्तरीय प्रबुद्ध प्रतिभाएँ आश्चर्यजनक संख्या में जुड़ी हुई हैं। वे अपना उत्तरदायित्व अहर्निशि सतत् सतर्कता बरतते हुए निभाती है। शोध, शिक्षण और प्रचार प्रक्रिया के विविध पक्षों को कार्यान्वित करने में संलग्न व्यक्तित्वों तो हाथ पैरों की तरह अपना कार्य संपादन करते हैं। परंतु मिशन का स्तर उच्चस्तरीय बनाये रखने की जिम्मेदारी सीमित लोग ही चलाते है। इस प्रबुद्ध वर्ग में न्यायाधीश, वकील, चार्टर्ड एकाउन्टेंट, इंजीनियर, सिविल सर्जन, पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के चिकित्सक, आयुर्वेदाचार्य, पी.एच.डी. डबल एम.ए.एम.एस.सी. स्तर की सौ से भी अधिक प्रतिभाएँ सम्मिलित है। इनमें से कई उच्च सरकारी पदों को छोड़कर आए हैं। एक लाँ कौलेज के प्रोफेसर जिनकी योग्यता एल.एल.एम. स्तर की हैं, यही के स्थायी निवासी पिछले दिनों बने हैं इस प्रकार आश्रम की कानूनी व्यवस्था जानने संभालने वाले चार वकील-प्लीडर आश्रम निवासी ही हैं। महिलाओं में एक दर्शन से अधिक पोस्ट ग्रेजुएट स्तर की हैं जो आश्रम की शिक्षण प्रक्रिया में निरन्तर संलग्न रहती है। यद्यपि शिक्षण का महत्व अपनी जगह हैं, पर आश्रम के संचालन-तंत्र के भावनाशीलों, कर्मठों को अधिकाधिक महत्व दिया है। यहाँ पढ़ाई का मापदण्ड नहीं, श्रेष्ठता के प्रति समर्पण, त्याग-बलिदान सबसे बड़ी कसौटी है। इस आधार पर तीन सौ से भी अधिक व्यक्ति एक विशाल परिवार बनाकर स्नेह-सद्भाव में रहते, सृजन प्रयोजनों में निरत यहाँ देखे जा सकते हैं। सभी स्वयंसेवक हैं नेता नहीं।
सात ट्रस्टी मिलकर संचालक-संरक्षक के मार्गदर्शन में यहाँ की सारी व्यवस्था संभालते हैं सातों ट्रस्टी अपने दायित्वों को निभाने और मिशन के स्तर को निरन्तर उच्चस्तरीय बनाने में समग्र श्रद्धा के साथ इस प्रकार संलग्न रहते हैं मानो लोक सेवियों के आदर्श को प्रस्तुत करते रहना उन्हीं के जिम्मे आया हो इनसे विभिन्न योग्यताओं के पच्चीस वर्षों से भी अधिक समय से जुड़े भली-भाँति परखे निष्ठावान व्यक्ति हैं, जिनकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है। आश्रम का हिसाब किताब प्रामाणिकता व्यक्तियों का तंत्र संभालता हैं, जिनका अपना कठोर नियंत्रण तो है ही, आर्थिक तंत्र में गड़बड़ी करने की कोशिश करने की रंचमात्र भी गुँजाइश कही नहीं है।
संचालकों की संलग्न सभी प्रतिभाओं को कड़ी हिदायत है कि आर्थिक या नैतिक छिद्र अपनी प्रक्रिया में कहीं भी बनने न पाए, अन्यथा प्रामाणिकता पर उंगली उठाने लगने पर वह तेजस्विता समाप्त जो जाएगी, जिसके आधार पर असंभव समझे जाने वाले कार्य सम्पन्न होने जा रहे हैं। प्रगति का क्रम कभी तक तूफानी गति से चल सकेगा, जब तक उसकी पवित्रता और प्रामाणिकता हर कसौटी पर खरी सिद्ध होती रहेगी। अन्य आदेशों में संभव है किसी से कहीं कुछ प्रमाद हुआ हो, पर संगठन की मूलभूत शक्ति सामर्थ्य में कही कोई छिद्र बन सके, ऐसा नहीं ही होने दिया गया है। सभी प्रहरी इस मोर्चे पर एकमत और एक जुट हैं। वे सभी जानते हैं कि आदर्शों के मिशन के साथ जुड़ता रहेगा जब तक कि उसके स्तर की उत्कृष्टता अपनी गरिमा की यथावत् बनाये रहेगी।
जबकि अधिकाँश संगठनों को प्रतिभाशाली, निर्लोभी, कर्मठ और समर्पित कार्य-कर्ताओं की कर्मी अनुभव की जाती है जब मिशन के परिकर में सम्मिलित होते चलने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। पर यह सब अनायास नहीं होता। भावावेश भी उन्हें घसीटकर नहीं लाता। तर्क, समीक्षा और जाँच पड़ताल के आधार पर खरापन सिद्ध होने से ही जो प्रभावित हो सकते हैं, उन्हें कोई सहज ही बहका नहीं सकता। बहका लें तो देर तक भ्रम में नहीं रख सकता और न टिक सकता है। किंतु कार्य संलग्न नैष्ठिकों में से अधिकाँश ऐसे हैं जिन्होंने मिशन के लक्ष्य उद्देश्यों ऐसे हैं जिन्होंने मिशन के लक्ष्य उद्देश्यों को भलीभांति परखा व समझा तो है ही, साथ ही यह भी जाँचा है कि कहीं कोई मिलावट-बनावट तो नहीं है। साथ ही उनको खींचा है सूत्र संचालकों के आदर्श भरे जीवन ने, उनके अगाध स्नेह ने एवं पारिवारिक स्तर पर निभने वाले स्नेह सौजन्य ने इतना सब कहुए बिना उन लोगों का जुड़ जाना कठिन था जो ऊँची आजीविका कमाते हैं और सुसम्पन्न स्थिति में निर्वाह करते थे। यहाँ तो हर किसी को उतनी ही सुविधाएं मिलती है, जिसमें रोटी, कपड़ा और मकान ब्राह्मणोचित निर्वाह व्यवस्था जुट सके। ऐसी दशा में किसी को क्या पड़ी है जो सुविधा सम्पन्न परिस्थितियों को छोड़कर दिन और रात एक करके बिना थके ऊबे, प्रफुल्ल भाव से निरन्तर काम में जुटा रहे।
समयदानी भी इच्छानुसार आते और आवश्यक काम निभने पर वापस भी चले जाते है। उन पर समय का कोई प्रतिबंध नहीं होता, फिर भी उनमें से अधिकाँश को यहाँ का ब्राह्मणोचित जीवन रास आ जाता है और देर तक या अन्त तक वे यहाँ बने भी रहते हैं।
वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं में से प्रायः ऐसे हैं जो अपनी पेन्शन या संचित सम्पदा से ही अपना खर्च चलाते हैं मिशन से एक पैसा नहीं लेते। कईयों ने तो अपने जेवर, जमा पूँजी इत्यादि मिशन को ही समर्पित कर दी हैं व यहाँ से मात्र निर्वाह भत्ता तथा भोजन मात्र लेते हैं। आर्थिक दृष्टि से आत्म निर्भर कई हैं, पर सभी अपने को मात्र एक स्वयं सेवक मानकर निष्ठा पूर्वक दिये हुए कार्य में संलग्न रहते हैं। यहाँ उदार भावनाएँ उनकी तब जगीं जब उनने सूत्र संचालकों को ऋषिकल्प प्रमाण प्रस्तुत करते देखा। अन्यथा चोरी के माल की हिस्सेदारी बाँटने का ही तो लसोक प्रचलन है वह यहाँ भी दीख पड़ता और असंख्यों को ऐसा कहते न सुना जाता कि सतयुगी वातावरण शाँतिकुँज आकर देखा जा सकता है।
आमतौर से लोकसेवी संस्थाओं को धन याचना के कार्य में अधिकाँश शक्ति खपानी पड़ती है पर शाँतिकुँज ही एक ऐसा संस्थान है जिसने किसी के सामने हाथ न पसारने और मुंह न खोलने की प्रतिज्ञा आरंभ से निभाई है। और अन्त तक निभाती रहेगी। स्वेच्छा सहयोग की अयाचित वृत्ति से ही सभी आवश्यक काम चलते रहते है। कभी कहीं कोई रुकावट नहीं आती। भोजनालय में प्रायः एक हजार व्यक्तियों की रसोई बनती है पर बिना पूर्व योजना के नियम समय पर आवश्यक खाद्य सामग्री उपलब्ध होती रहती है। भवन-निर्माण, बिजली, आवश्यक उपकरण भी पैसा माँगते हैं, पर कही हाथ रुकता नहीं। इसे ईश्वर कृपा और सहयोगियों की उदारता के अतिरिक्त तीसरी बात यह भी समझी जानी चाहिए कि सेवा प्रयासों की उत्कृष्टता, कार्यकर्त्ताओं की निस्पृहता तथा व्यवस्था की प्रमाणिकता हर किसी को ऐसे पुण्य प्रयोजन में सहयोग करने के लिए उकसाती है। विनोबा कहते थे कि किसी संस्था को तभी तक जीवित रहना चाहिए जब तक जनता उसे उपयोगिता की कसौटी पर खरा समझे और सहयोग के लिए स्वेच्छापूर्वक उल्लसित हो। यदि ऐसा न बन पड़े तो अच्छा यह है कि जहाँ तहाँ से जुगाड़ बैठाने की अपेक्षा उस ढकोसले को बन्द ही कर दिया जाये।
प्रसन्नता की बात है कि वह आदर्श कहीं अन्यत्र निभा हो या न निभा हो, पर वह युग सृजन चेतना के संबंध में पूरी तरह लागू हुआ है। दस पैसा या एक मुट्ठी अनाज के अनुदान से ही असंख्यों श्रद्धालु इस संस्थान को चलाते और अग्रगामी बनाते हैं ईसाई मिशन का भी ऐसा ही उदाहरण है। मदर टेरेसा, रामकृष्ण मिशन से लेकर अनेक स्वयंसेवी संगठन इसी आदर्श के साथ अपने क्रिया कलापों को बिना किसी अड़चन के अग्रगामी बनाये हुए हैं। गाँधी का सत्याग्रह और बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन भी कम खर्चीला न था, पर वे सभी सफलतापूर्वक चलते रहे।
युग सृजन की आवश्यकताओं में उच्चस्तरीय प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों का सहयोग और अर्थ-व्यवस्था का प्रबंध, यह दो आवश्यकताएँ प्रमुख हैं। विश्वव्यापी विचार क्रान्ति के लिए भी इन दोनों ही प्रयोजनों की पूर्ति अनिवार्य होगी। लेखनी और वाणी के सहारे विनिर्मित दो पहिए वाला रथ भी इस व्यवस्था धुरी के बिना गतिशील होने वाला नहीं है। वह कैसे संभव हो सकेगा? इसका एक छोटा “मॉडल” शान्तिकुँज की गतिविधियों के साथ शुरू हुआ देखा जा सकता है। उसके सूत्र संचालक की ऋषिकल्पों जीवनचर्या उन सभी की प्रगति मार्ग में व्यवधान न पड़ने का विश्वास दिलाती है, जो नव निर्माण के लिए वस्तुतः कुछ करना चाहते हैं।
मिल, कारखानों और सरकारी विभागों में कर्मचारियों की भर्ती आसानी से हो जाती है। आकर्षक वेतन की अतिरिक्त फण्ड, पेन्शन आदि की सुविधाएं जुड़ी होती हैं, पर उन सेवा संस्थानों की गतिविधियाँ चलाने में अत्यन्त कठिनाई पड़ती है जो कार्यकर्ताओं के लिए अभीष्ट सुविधाएं जुटा नहीं पाती। सेवा प्रयोजनों की प्रगाढ़ अभिरुचि होते हुए भी निर्वाह चाहिए ही। जिनके पास स्थाई आजीविका का प्रबंध है वे तो कार्यकर्ताओं को जमा किये भी रहते हैं, पर जिनका सब कुछ आकाशी वृत्ति पर टिका हुआ है। वे किसके बूते तो सेवाकर्मियों को जुटायें और जो सेवा क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं वे निश्चित आजीविका के अभाव में किस प्रकार कहीं देर तक टिक पाये। यह एक पेचीदा प्रश्न है जिसका उपेक्षा करने पर वह नहीं हो सकता है, जिसे व्यापक विचार क्रान्ति के लिए सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन हेतु इन्हीं दिनों किया जाना आवश्यक है। इन दिनों संसार की जनसंख्या 400 करोड़ के ऊपर है। वह सन् 2000 तक 1000 करोड़ हो जाने की संभावना है। यदि एक हजार के पीछे एक युग शिल्पी भी जोड़ा जाये तो एक करोड़ नव निर्माण में निरत व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी। दूर की बात न सोची जाये, मात्र अपने देश की योजना जन गणना 100 करोड़ के आसपास होगी। इनके लिए भी तो उस अनुपात से भारी संख्या में युग सृजेताओं को अपना पूरा समय लगाते हुए निर्धारित कठिन कार्य में अहर्निशि निरत रहना चाहिए।
सेवा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की आवश्यकता सब से प्रमुख है। देवालय खड़े कर देगा सुगम है पर इनके साथ यदि महत्वपूर्ण कार्यक्रम जुड़ें तो उनके लिए सुयोग्य कार्यकर्ता चाहिए। एक तो इस संकीर्ण स्वार्थपरता के वातावरण में सच्चे उदारचेता और चरित्रवान् कार्यकर्ता मिलना ही दूभर हो रहा है। फिर यदि वे मिले तो जीवित रहने के लिए निर्वाह तो चाहिए ही। वह कहाँ से आये? आरंभ में उभरा उत्साह कुछ समय बाद आवश्यकताओं के दबाव से या तो अपना मन बदल लेता है छद्म का आश्रम लेकर ऐसे प्रपंच रचने लगता है जो लोक सेवियों की प्रामाणिकता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देता है। अपने देश की साधु, ब्राह्मण संस्था को इस प्रकार डगमगाते गड़बड़ाते देखा जा सकता है।
विदेशों के ईसाई समाज में यह विचारशीलता देखी जाती है कि वे व्यक्तिगत दान न तो देते है और न लेते है अभीष्ट सेवाओं में निरत प्रामाणिक संस्थाओं को ही वे दान देते है। उन्हीं के माध्यम से कार्यकर्ताओं को ही वे दान देते है। उन्हीं के माध्यम से कार्यकर्ताओं की नियुक्ति तथा दूसरी व्यवस्थाएँ की जाती हैं। इस प्रकार निश्चिन्तता पूर्वक योजनाएँ बनतीं और चलती हैं। संसार भर में फैले हुए गिरजों, पादरियों की व्यवस्था तथा कार्यक्रमों निश्चिन्तता - पूर्वक चलते रहते है, पर अपने देश में तो वैसा कुछ है नहीं। सम्पन्न धर्म संस्था तथा धनी मानी लोगों द्वारा स्थापित पुण्यार्थ न्यास भी किस प्रकार बहकी-बहकी गतिविधियाँ चलाते हैं इसे कुछेक उदाहरण देख कर भी समझा जा सकता है। इसे कुछेक उदाहरण देख कर भी समझा जा सकता है। इसे अपने धर्म परायण देश का तो दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि सुयोग्य और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को निश्चिन्ततापूर्वक सृजन सेवा में निरत रहने का कोई ठोस आधार नहीं बन पाया।
काँग्रेस आन्दोलन के जमाने में कुछ ऐसे प्रबंध हुए थे। कुछ इस दिशा में गंभीरतापूर्वक सोचा गया था। गोखले द्वारा ‘सर्वेण्ट ऑफ इण्डिया सोसाइटी” स्थापित हुई थी। लाला लाजपतराय के प्रयास से “पीपुल्स ऑफ इण्डिया” का गठन हुआ था। वह उत्साह उसी जोश खरोश के दिनों तक सीमित रहा। बाद में तो आन्दोलन के साथ उस प्रयास में शिथिलता आ गई। कुछेक गिनी चुनी संस्थाओं के अतिरिक्त प्रायः सभी को राज सहायता पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
वह समय भी अब नहीं रहा। जब साधु-ब्राह्मणों स्तर के लोक सेवियों की परमार्थ-परायणता और प्रामाणिकता के कारण उत्पन्न होने वाली श्रद्धा से लोग अनुप्राणित होते थे और भिक्षाटन से, दान दक्षिणा से अथवा देवालयों में संचित होने वाले साधनों के आधार पर उन लोक सेवियों का निर्वाह चल जाया करता था। गुरुकुल भी अभावग्रस्त नहीं रहते थे। सुदामा के गुरुकुल भी अभावग्रस्त नहीं रहते थे। सुदामा के गुरुकुल को कृष्ण द्वारा अपनी समस्त सम्पदा का हस्तान्तरित होना प्रसिद्ध है। बुद्ध संस्थानों को हर्ष-वर्धन, अशोक आदि ने अभावग्रस्त स्थिति में नहीं रहने दिया था। पर इन दिनों तो अन्धविश्वासों का ही बोल-बाला है। गुण पारखियों और सृजन सेवा को प्रमुखता देने वाला चिन्तन कहाँ है? साहस करना तो बहुत आगे की बात है।
इन विषम परिस्थितियों में शांतिकुंज के संचालकों को युग निर्माण जैसी विशालकाय योजनाओं को कंधे पर लेने के साथ साथ सब कुछ परिस्थितियों के अनुरूप सोचना पड़ा है और ऐसा तंत्र बनाना पड़ा है जिसके सहारे सतयुग की वापसी जैसे सर्वांगपूर्ण और विश्वव्यापी क्रिया–कलापों का गतिचक्र व्यावहारिक पृष्ठभूमि पर खड़ा किया जा सके।
अखण्ड ज्योति और उसकी सहेली पत्रिकाओं के माध्यम से युग-साहित्य के प्रसारण से ऐसी भावनाओं को उभारा गया है जो मात्र अपने ही निर्वाह की बात सोचते रहने तक सीमित न रहकर समय के परिवर्तन हेतु अपना योगदान करने के लिए भी उत्साह दिखा सकें, साहस संजों सकें। इन लोगों में से जो अधिक भावनाशील हैं उन्हें एक महीने के और दस दिन वाले सत्रों में सम्मिलित किया जाता रहता है। जीवन साधना का पक्ष सत्रों का प्रमुख अंग रहता है। उसी में युग-सृजन के लिए कुछ करने की प्रेरणा को इस स्तर पर सम्मिलित रखा जाता है कि वह गले के नीचे उतर से और व्यावहारिक जीवनचर्या में स्थान प्राप्त कर सके।
शिक्षार्थियों में से कुछ लोग इस स्थिति में होते है कि अपने क्षेत्र में आत्म परिष्कार और लोक निर्माण के बहुमुखी कार्यक्रमों का उत्तरदायित्व अपनी सामर्थ्य के अनुरूप कंधों पर उठा सकें और निरन्तर नियमित रूप से अपने अपने क्षेत्र में अपने समय एवं साधनों का अंश नियमित रूप से लगाते रह सकें। ऐसे व्रतधारियों का संकल्प ही, आगे की भूमिका निभाने लगता है। कोई साथी न मिलने पर एकाकी सृजन सेवा में संलग्न रहने का व्रत लेता और निबाहता है।
ऐसे व्रतधारी युगशिल्पी इस प्रयास में निष्ठापूर्वक लगे रहते है कि युग साहित्य के माध्यम से अपने निजी विचारों की अभिव्यक्ति से अपने जैसे चार व्यक्ति और भी अपने संपर्क क्षेत्र में से उभार सकें। जब एक से पाँच हो जाते हैं तो उनका एक नियमित प्रज्ञा मण्डल बन जाता है। साप्ताहिक सत्संग का वे लोग अनवरत क्रम चलाते है। बारी-बारी वे एक दूसरे के घर पर एकत्रित होकर घनिष्ठता बढ़ाते और आत्म शोधन तथा नवसृजन के संदर्भ में विचारों का आदान-प्रदान करते रहने का क्रम चलाते है।
उत्साह का अगला चरण उठता है इन पाँचों द्वारा अपने अपने क्षेत्र में से चार और ढूंढ़ना। उन्हें युग चेतना से अनुप्राणित करना। इस प्रकार एक से पाँच और पाँच से पच्चीस बनाते चलने की एक सेवाधर्मी इकाई बन जाती हैं। पच्चीस का संगठन पूर्ण माना गया है। इससे अधिक के बीच घनिष्ठता रह सकना और पारस्परिक विचार विनिमय के आधार पर कुछ ठोस प्रयास करते बन नहीं पड़ता। इसलिए एक सेवा घटक को पच्चीस तक सीमित रहना व्यवस्था बनाये रहने की दृष्टि से पर्याप्त समझा गया है। अधिक बढ़ते हों तो उनका एक पृथक-प्रज्ञा मण्डल बनने लगता है। मधु मक्खियाँ एक सीमा तक ही एक छत्ते में रहती है। संख्या बढ़ने पर नये छत्ते बनने लगते हैं।
यह उपक्रम सुनने में दिवास्वप्न जैसा लगता है। शेखचिल्ली की रंगीली कल्पना उड़ान जैसी भी। पर कुछ लोग होते हैं जिनका व्यक्तित्व ही असंभव को संभव बनाने के लिए ही विनिर्मित हुआ जैसा लगता है। यह असंभव दीखने वाली योजना प्रचण्ड प्रेरणा पीछे लगी रहने के कारण संभव होते हुए इन्हीं आँखों से प्रत्यक्ष देखी जा रही है। ऐसी संगठन हजारों की संख्या को पार करके लाखों की गणना में विकसित होने के लिए उन्मुख हो रहे हैं। यह संगठन क्या करें। इसके लिए आत्मनिर्माण, परिवार निर्माण और समीपवर्ती क्षेत्र का सामाजिक निर्माण प्रमुख है। इसी को दूसरे शब्दों में विचारक्रान्ति नाम दिया गया है। जिसके अंतर्गत नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रगतिशीलता के अनेक पक्षों का समावेश हो जाता है। बीस सूत्री रचनात्मक कार्यों में शक्ति भर योगदान देना भी इसी प्रक्रिया का एक अंश है। विवाह विकृतियों का उन्मूलन सुधारात्मक प्रयासों में प्रमुख है। नशेबाजी, आलस्य, प्रमाद, अस्वच्छता, जातिगत, ऊंच–नीच, नारी का अवमूल्यन जैसी अवाँछनीयताओं से लोहा लेना भी इन्हीं प्रयासों के अंग के रूप में सम्मिलित किया गया है।
उपरोक्त स्तर के लोक सेवियों में से प्रत्येक को न्यूनतम दो घंटे नित्य का समय देना होता है। इसका दूसरा विकल्प यह है कि सप्ताह में एक छुट्टी का दिन इसी प्रयोजन के निमित्त लगाते रहा जाये। इस प्रकार समयदान के छोटे छोटे टुकड़े जुड़कर सम्मिलित रूप से इतने अधिक बन जाते हैं कि उन्हें हजारों कार्य कर्ताओं की स्थाई नियुक्ति के समतुल्य माना जा सकें।
कुछ ही समय में एक छोटी-सी टीम के सहारे इतनी सफलता मिली है कि और विश्वास किया जा सकता है कि और विश्वास किया जा सकता है कि प्रस्तुत निर्धारण कल्पना नहीं वरन् पूर्ण रूपेण व्यावहारिक है। इसे आगे भी चलाया, बढ़ाया और उस स्तर तक पहुँचाया जा सकता है जिसमें अवैतनिक स्तर पर आश्चर्यजनक संख्या में कार्यकर्ताओं की उपलब्धि कहीं जा सके। आशा की जानी चाहिए इस आधार को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहने पर देश की ही नहीं संसार भर की सृजन-शिल्पियों की महती आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है।
दूसरा प्रश्न उठता है उपरोक्त प्रयोजनों में कदम कदम पर पड़ने वाली आर्थिक आवश्यकताओं का साधन, उपकरण आदि का। सत्संग और स्वाध्याय जैसे सामयिक प्रयोजनों में भी इनकी आवश्यकता पड़ती है। फिर जब प्रौढ़ शिक्षा, गरीबी उन्मूलन समाज सुधार जैसे कार्यों को बड़े रूप में करने पर लिया जायेगा तो हर जगह पैसे की आवश्यकता पड़ेगी। इसकी पूर्ति करने के लिए सार्वजनिक चंदा, सरकारी अनुदान, धनीमानियों की मनुहार यह तीन उपाय ही प्रयोग में लाये जाते है। पर इस तंत्र के चिन्तन ने इसकी पूर्ति भी अपने बलबूते करने का निश्चय किया है। पचास वर्ष के अनुभव ने यह बताया है कि योजनाओं की, कार्यकर्ताओं की प्रामाणिकता यदि असंदिग्ध हो तो सहयोगी अयाचित रूप में भी मिल सकता है। विनोबा ठीक ही कहते थे कि जो संस्था लोक श्रद्धा अर्जित कर और स्वेच्छा, सहयोग जुटाने में असफल रहे उसे बन्द हो जाना चाहिए। इस प्रतिपादन को प्रायः आदि शताब्दी से कसौटी पर कसा जाता और खरा पाया जाता रहा है।
अपना निर्धारण यह है कि न्यूनतम दस पैसा नित्य हर उपार्जनकर्ता नव-सृजन के लिए अनुदान रूप में निकालें और उसे अपनी देख रेख में अपने संगठन द्वारा अपने से खर्च किये जाने की व्यवस्था बनाये तथा उसके सदुपयोग की देखभाल रखना अपनी जिम्मेदार समझे।
दस पैसा प्रति व्यक्ति के हिसाब से 25 व्यक्तियों का ढाई रुपया होता है। अर्थात् महीने में 85 रुपया। इतने से झोला पुस्तकालय का, लाउडस्पीकर का, स्लाइड प्रोजेक्टर का, बिजली बैटरी तथा संबंधित - पूजा अर्चा का खर्च चल जाना चाहिए, चल भी जाता है। इस प्रकार मंडल की आर्थिक आवश्यकता अपने ढंग से अपनी पटरी पर आसानी से गति अपनाये रहती है।
जहाँ अधिक उत्साह है वहाँ लोगों ने अपने अपने स्तर की प्रज्ञा पीठें विनिर्मित कर ली हैं। उनमें सेवाभावी कार्यकर्ताओं के निवास की भी व्यवस्था है। वे लोग या तो अपने घर परिवार से पेन्शन रूप में प्राप्त कर लेते है, या फिर व्रतधारी कार्यकर्ताओं के घरों में रखे गये मुट्ठीफंड जमा करने वाले घड़ों के मासिक संग्रह से उनकी पूर्ति हो जाती है, मुट्ठी फण्ड की योजना प्राचीनकाल की उस साधु परम्परा की पुनरावृत्ति है जिसमें हर धर से एक पेटी माँग कर लोक सेवी अपना निर्वाह चलाते थे। अब समय के अनुरूप यही सुविधाजनक समझा गया है कि गृहस्थ अपने यहाँ नवसृजन की आवश्यकता पूरी करने हेतु धर्मघट रखें और उसे हर महीने संग्रह करके प्रज्ञापीठ पर स्थायी निवास करने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता की पूर्ति करते रहें। विवाह आदि हर्षोत्सवों पर कुछ दान दक्षिणा देने की पुरातन धर्म परम्परा है उसे यदि प्रामाणिकता के आधार पर जीवन्त किया जा सके तो कितने ही स्थानीय एवं क्षेत्री सेवा कार्य उतने भर से अपनी आर्थिक आवश्यकता पूरी कर सकते हैं और बिना सरकारी अनुदान के, बिना चंदा संग्रह एवं धनीमानियों की मनुहार के भी काम चल सकता है।
उत्साह शिथिल या समाप्त हो जाय तो बात दूसरी है, अन्यथा प्रेरणा, संगठन एवं योजना यथावत् चलती रहे तो इसी आधार पर व्यापक क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की तथा आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती रह सकती है और नव सृजन का गति चक्र भी अपनी पटरी पर अग्रगामी बन कर अनवरत रूप से चलता रह सकता है।
एक से पाँच, पाँच से पच्चीस का क्रम यदि चक्र वृद्धि गति से बढ़ता रहे तो कुछ की छलाँग में देश भर की, विश्व भर की, सृजन शिल्पियों वाली आवश्यकता पूरी होती रह सकती है। कभी परम्परा थी कि परिवार पीछे एक व्यक्ति परमार्थ प्रयोजनों के लिए दिया जाय और उसका उत्तरदायित्व शेष परिवार निबाहे। राजपूत घरानों से एक समय एक व्यक्ति सेना में भर्ती होने के लिए दिया जाता था। ब्राह्मण परिवार एक ब्रह्मचारी, संन्यासी समाज को देते थे। सिख धर्म के आरंभिक दिनों में भी, घर पीछे एक व्यक्ति “सत्श्रीअकाल” को समर्पित किया जाता था। उन दिनों वाली भावनाएँ यदि आज पुनर्जीवित की जा सकें तो वानप्रस्थ आश्रम को पुनर्जीवन मिल सकता है और आधी आयु परिवार के लिए लगाने के उपरान्त शेष आयु नवसृजन जैसे परमार्थ हेतु समर्पित की जा सकती है। यही प्रचलन इन दिनों भी उभारा जा सके तो उन सृजन शिल्पियों की आवश्यकता सहज ही पूरी हो सकती है, जिनके अभाव में विचार क्रांति के नव-निर्माण के असंख्यों कार्य रुके पड़े है।
भारत की दिव्य चेतना के नव जागरण के ही यह चिन्ह हैं कि समय दानी - अंशदानी कार्यकर्ता पुरातन देव परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए इस प्रकार उभर रहे है, मानों स्रष्टा ने उन्हें इस पुण्य प्रयोजन का भार वहन करने के लिए ही विशेष रूप से भेजा हो। इससे उज्ज्वल भविष्य की रूप रेखा साकार होती दिखती है।
चूरु (राज.) श्री हरीराम शर्मा द्वारा लगभग 4 जार स्टीकर समूचे क्षेत्र में लगाने का संकल्प लिया गया है। अभी तक दो हजार स्टीकर दुकानों घरों तथा में लगाये जा चुके है।
बड़ौदा (गुज.) श्री दिनकर भाई द्वारा एक लाख स्टीकर संपर्क क्षेत्र में लगाने का भाव - भरा संकल्प क्या गया है। हर शिक्षित को मूक प्रेरणा देने का यह प्रयास अन्यों के लिए प्रेरणादायी बन रहा है।
भीलवाड़ा (राज.) संकल्प सत्र में सम्मिलित होकर श्री बनवारी लाल झँवर द्वारा एक लाख स्टीकर घर-घर पहुँचाने, दुकानों, बसों, में लगाकर मूक प्रेरणा देने का प्रेरणादायी संकल्प लिया गया है।
प्रतापगढ़ (उ.प्र.) नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों की उपस्थिति में डॉ. सम्पूर्णानन्द जी द्वारा समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के वितरण की व्यापक व्यवस्था बनाई गई। इस वर्ष दो हजार अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।
झाँसी (उ.प्र.) शतवेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम में उपस्थित कई लोगों ने देव दक्षिणा स्वरूप अपने दोष दुर्गुणों का त्याग किया। प्रायश्चित स्वरूप अपने क्षेत्र में प्रज्ञा साहित्य पहुँचाने के लिए संकल्पित हुए।
लीमड़िया, पंचमहाल (गुज.) समूचे क्षेत्र में 111 गाँवों में दीपयज्ञ आयोजन के माध्यम से महाप्रज्ञा के आलोक वितरण की व्यवस्था बनाई गई है। श्री रामजी भाई जी. गरासीया के नेतृत्व में पाँच सदस्यों की टोली स्टीकर आन्दोलन के अंतर्गत घरों, दुकानों, ऑफिसों एवं बसों में स्टीकर लगाने, सद्वाक्य लिखने तथा प्रज्ञा साहित्य पहुँचाने में संलग्न है।
पाथाखेड़ा (बैतूल, म.प्र.) युगशिल्पी सत्र से वापस जाने के बाद से परिजनों में अभूतपूर्व उत्साह है। समूचे क्षेत्र में दीपयज्ञ, स्टीकर आन्दोलन, सद्वाक्य लेखन के साथ-साथ अब तक आ रही 160 पत्रिकाओं की संख्या दुगुनी करने का प्रयास सामूहिक रूप से चल रहा है।
वाराणसी (उ.प्र.) वाराणसी मंडल के कार्यकर्ताओं की गोष्ठी समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के विस्तार की व्यापक योजना बनाने के साथ सम्पन्न हुई समीपवर्ती शाखाओं से आये कार्यकर्ताओं को युगसंधि महापुरश्चरण में सम्मिलित होने, शांतिकुंज में चल रहे सत्रों में भावनाशील परिजनों को भेजने तथा समचू क्षेत्र में दीपयज्ञों की व्यापक श्रृंखला निर्धारित करने की प्रेरणा दी गई।
मण्डावली, बिजनौर (उ.प्र.) सहस्रवेदीय दीप यज्ञायोजन सानन्द सम्पन्न हुआ। श्रद्धावान ग्रामीण जनता ने देव दक्षिणा स्वरूप अपनी एक-एक बुराई छोड़ने तथा एक अच्छाई ग्रहण करने का संकल्प लिया।
अंजड़, खरगोन (म.प्र.) स्थानीय महिला शाखा द्वारा कुटीर उद्योग के अंतर्गत सिलाई, बुनाई का निःशुल्क प्रशिक्षण आरम्भ किया है। महिला मण्डलों की स्थापना तथा दीपयज्ञों के माध्यम से महाप्रज्ञा के आलोक वितरण की व्यवस्था भी बनाई जा रही है।
बरेली (उ.प्र.) चौबीस सहस्रवेदीय दीपयज्ञ का भव्य कार्यक्रम भाव-भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। त्रिदिवसीय कार्यक्रम का उद्घाटन जिलाधिकारी श्री आर.के. शर्मा ने किया। समारोह का शुभारम्भ करते हुए श्री शर्मा ने किया। समारोह का शुभारम्भ करते हुए श्री शर्मा ने आशा व्यक्त की कि वर्तमान विभीषिकाओं से बचाकर मानवता को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने में गायत्री परिवार जैसी संस्थायें ही समर्थ हो सकती है। उद्घाटन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री केवलानन्द भट्ट द्वारा किया गया।
पटना (बिहार) कर्मठ कार्यकर्ताओं की पदयात्रा टोली पटना से शान्तिकुँज के लिए उत्साहपूर्ण वातावरण में विदा हुई। मार्ग में पड़ने वाले नगरों में युगचेतना के विस्तार के लिए वाहनों, घरों, दुकानों, ऑफिसों में स्टीकर चिपकाने, सद्वाक्य लिखने तथा अखण्ड-ज्योति के नियमित सदस्य बनाने के प्रयास व्यापक स्तर पर किए जा रहे है।
मेरठ (उ.प्र.) गायत्री ज्ञान मन्दिर शास्त्रीनगर में आयोजित दीप यज्ञायोजन उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। युगधर्म के अनुरूप दीप यज्ञायोजनों की व्यवस्था का शिक्षित जन समुदाय पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। महानता से जुड़ने के लिए शान्तिकुँज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों भावनाशील परिजन तैयार हुए।
पन्तनगर (उ.प्र.) फिल्म निदेशक डॉ. ए. अरविन्द की उपस्थिति में दीप यज्ञ कार्यक्रम सोल्लास सम्पन्न हुआ। अनचीन्हे अनजाने टी.वी. सीरियल की शूटिंग के लिए आये श्री अरविन्द दीपयज्ञ कार्यक्रम से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकार्डिंग करवाई। इसके महत्वपूर्ण अंशों को अपने सीरियल में सम्मिलित करने की भी इच्छा व्यक्त की।
शान्तिकुँज की पावन तीर्थस्थली से 22 अक्टूबर को दस प्रज्ञा टोलियों क्षेत्र में अलख जगाने, युगसंधि महापुरश्चरण की महत्ता समझाकर अगणित नये साधकों को इसका सहभागी बनाने रवाना हो गई हैं। प्रज्ञा मण्डल बनाकर वे संगठन को एक सुनियोजित दिशा देती चली जा रही है। निमित्त हैं - वातावरण में सुरभि बिखेर कर अंत को ज्योतिर्मय करने वाले दीपयज्ञ।
मोदीनगर (उ.प्र.) मोटर-साइकिलों, स्कूटरों, कारों, ट्रकों तथा बसों से सुसज्जित एक विशाल जुलूस मोदीनगर से शांतिकुंज पहुंचा। माग्र के सभ नगरों में नवयुग का संदेश दिया गया। सद्वाक्य लेखन, साहित्य वितरण तथा स्टीकर चिपकाने का कार्य भी कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया। संगीत मण्डली द्वारा स्थान स्थान पर प्रेरक संगलत प्रस्तुत किए गये।
रीवाँ (म.प्र.) विन्ध्यक्षेत्र के कार्यकर्ताओं द्वारा क्षेत्र के लगभग एक हजार भावनाशील परिजनों को स्पेशन ट्रेन द्वारा संकल्पसत्र में सम्मिलित करने की व्यवस्था बनाई जा रही है। इस निमित्त पूरे विन्ध्यक्षेत्र के कार्यकर्ताओं की विशेष गोष्ठी बुलाई गई, जिसमें लगभग 100 शाखाओं के सक्रिय कार्यकर्ता सम्मिलित हुए। प्रत्येक शाखा से भावनाशील परिजनों को तैयार करने, संपर्क क्षेत्र में दीपयज्ञ आयोजित करने तथा स्टीकर आन्दोलन को गति देने की विशेष प्रेरणा दी गई।
सतना (म.न्र.) पाँच सो एक वेदीय दीपयज्ञ गायत्री शक्तिपीठ मुख्त्यार गंज में भाव भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए नगर के प्रबुद्ध वर्ग में होड़ जैसी लग गई। समूचा कार्यक्रम स्थल खचाखच भर गया। दीपयज्ञ की महत्ता से प्रभावित होकर अपने अपने संपर्क क्षेत्र में ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित करने तथा शाँतिकुँज पहुंचकर महानता से जुड़ने के लिए लगभग 200 परिजन संकल्पित हुए।
रामपुर मथुरा (उ.प्र) दीपयज्ञायोजन भाव भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की सफलता में नवयुवकों का सराहनीय योगदान रहा। वर्तमान परिस्थितियों में दीपयज्ञों की उपयोगिता से जन समूह अत्यधिक प्रभावित हुआ। अपने संपर्क क्षेत्र में अधिकाधिक पत्रिकाओं के सदस्य बनाने का संकल्प सभी ने मिल कर लिया।
बवराल बदायूँ (उ.प्र.) क्षेत्रीय विधायक तथा मंत्री श्री बृजेन्द्रपाल सिंह जी की उपस्थिति में सहस्वेदीय दीपयज्ञ आयोजन उल्लास भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। आपसी मतभेदों को भुला कर हर वर्ग के लोगों ने ज्ञात गंगा में स्नान कर अपने को कृत कृत्य अनुभव किया। मंत्री महोदय ने भी इस कार्यक्रम को अत्यधिक प्रेरक बताया।
नेलोर (आँध.पव्र.) दीपयज्ञायोजन आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन गुटूर शाखा के कर्मठ कार्यकर्ता डॉ.टी.शिवरामकृष्ण रेड्डी ने किया। अधिकाधिक प्रज्ञा मंडलों की स्थापना का संकल्प लिया गया।
पहाडपुर (उ.प्र.) सत्संग मण्डलों के गठन तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की व्यवस्था बनाने के साथ दीपयज्ञायोजन प्रेरणादायी वातावरण में सम्पन्न हुआ। दीपयज्ञ की व्याख्या से प्रबुद्धवर्ग अत्यधिक प्रभावित हुआ।
जमुका, उन्नाव (उ.प्र.) दीपयज्ञ कार्यक्रम भाव भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में अधिकाँश प्रबुद्धवर्ग ही उपस्थित रहा। सत्संग मण्डलों की स्थापना के साथ स्टीकर आन्दोलन के माध्यम से मूल प्रेरणा देने हेतु भी संकल्प लिये गये
माधोगंज, हरदोई (उ.प्र.) प्राणप्रतिष्ठा समारोह तथा दीपयज्ञायोजन उल्लास भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। शान्ति कुँज में संकल्पसत्र में सम्मिलित होने तथा युगसंधि पुरश्चरण में भागीदारी बनने हेतु सैकड़ों परिजन संकल्पित हुए।
चन्दौसाी, मुरादाबाद (उ.प्र.) डॉ. देवेन्द्र पाठक के सराहनीय प्रयास से दीपयज्ञ कार्यक्रम आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। स्टीकर आन्दोलन को गति देने तथा हर शिक्षित तक युग साहित्य पहुँचाने की व्यवस्था स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा करने का संकल्प लिया गया।
चूरु (राज.) श्री हरीराम शर्मा द्वारा लगभग 4 जार स्टीकर समूचे क्षेत्र में लगाने का संकल्प लिया गया है। अभी तक दो हजार स्टीकर दुकानों घरों तथा में लगाये जा चुके है।
बड़ौदा (गुज.) श्री दिनकर भाई द्वारा एक लाख स्टीकर संपर्क क्षेत्र में लगाने का भाव - भरा संकल्प क्या गया है। हर शिक्षित को मूक प्रेरणा देने का यह प्रयास अन्यों के लिए प्रेरणादायी बन रहा है।
भीलवाड़ा (राज.) संकल्प सत्र में सम्मिलित होकर श्री बनवारी लाल झँवर द्वारा एक लाख स्टीकर घर-घर पहुँचाने, दुकानों, बसों, में लगाकर मूक प्रेरणा देने का प्रेरणादायी संकल्प लिया गया है।
प्रतापगढ़ (उ.प्र.) नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों की उपस्थिति में डॉ. सम्पूर्णानन्द जी द्वारा समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के वितरण की व्यापक व्यवस्था बनाई गई। इस वर्ष दो हजार अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।
झाँसी (उ.प्र.) शतवेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम में उपस्थित कई लोगों ने देव दक्षिणा स्वरूप अपने दोष दुर्गुणों का त्याग किया। प्रायश्चित स्वरूप अपने क्षेत्र में प्रज्ञा साहित्य पहुँचाने के लिए संकल्पित हुए।
लीमड़िया, पंचमहाल (गुज.) समूचे क्षेत्र में 111 गाँवों में दीपयज्ञ आयोजन के माध्यम से महाप्रज्ञा के आलोक वितरण की व्यवस्था बनाई गई है। श्री रामजी भाई जी. गरासीया के नेतृत्व में पाँच सदस्यों की टोली स्टीकर आन्दोलन के अंतर्गत घरों, दुकानों, ऑफिसों एवं बसों में स्टीकर लगाने, सद्वाक्य लिखने तथा प्रज्ञा साहित्य पहुँचाने में संलग्न है।
पाथाखेड़ा (बैतूल, म.प्र.) युगशिल्पी सत्र से वापस जाने के बाद से परिजनों में अभूतपूर्व उत्साह है। समूचे क्षेत्र में दीपयज्ञ, स्टीकर आन्दोलन, सद्वाक्य लेखन के साथ-साथ अब तक आ रही 160 पत्रिकाओं की संख्या दुगुनी करने का प्रयास सामूहिक रूप से चल रहा है।
वाराणसी (उ.प्र.) वाराणसीमंडल के कार्यकर्ताओं की गोष्ठी समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के विस्तार की व्यापक योजना बनाने के साथ सम्पन्न हुई समीपवर्ती शाखाओं से आये कार्यकर्ताओं को युगसंधि महापुरश्चरण में सम्मिलित होने, शांतिकुंज में चल रहे सत्रों में भावनाशील परिजनों को भेजने तथा समूचा क्षेत्र में दीपयज्ञों की व्यापक श्रृंखला निर्धारित करने की प्रेरणा दी गई।
मण्डावली, बिजनौर (उ.प्र.) सहस्रवेदीय दीप यज्ञायोजन सानन्द सम्पन्न हुआ। श्रद्धावान ग्रामीण जनता ने देव दक्षिणा स्वरूप अपनी एक-एक बुराई छोड़ने तथा एक अच्छाई ग्रहण करने का संकल्प लिया।
अंजड़, खरगोन (म.प्र.) स्थानीय महिला शाखा द्वारा कुटीर उद्योग के अंतर्गत सिलाई, बुनाई का निःशुल्क प्रशिक्षण आरम्भ किया है। महिला मण्डलों की स्थापना तथा दीपयज्ञों के माध्यम से महाप्रज्ञा के आलोक वितरण की व्यवस्था भी बनाई जा रही है।
बरेली (उ.प्र.) चौबीस सहस्रवेदीय दीपयज्ञ का भव्य कार्यक्रम भाव-भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। त्रिदिवसीय कार्यक्रम का उद्घाटन जिलाधिकारी श्री आर.के. शर्मा ने किया। समारोह का शुभारम्भ करते हुए श्री शर्मा ने किया। समारोह का शुभारम्भ करते हुए श्री शर्मा ने आशा व्यक्त की कि वर्तमान विभीषिकाओं से बचाकर मानवता को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने में गायत्री परिवार जैसी संस्थायें ही समर्थ हो सकती है। उद्घाटन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री केवलानन्द भट्ट द्वारा किया गया।
पटना (बिहार) कर्मठ कार्यकर्ताओं की पदयात्रा टोली पटना से शान्तिकुँज के लिए उत्साहपूर्ण वातावरण में विदा हुई। मार्ग में पड़ने वाले नगरों में युगचेतना के विस्तार के लिए वाहनों, घरों, दुकानों, ऑफिसों में स्टीकर चिपकाने, सद्वाक्य लिखने तथा अखण्ड-ज्योति के नियमित सदस्य बनाने के प्रयास व्यापक स्तर पर किए जा रहे है।
मेरठ (उ.प्र.) गायत्री ज्ञान मन्दिर शास्त्रीनगर में आयोजित दीप यज्ञायोजन उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। युगधर्म के अनुरूप दीप यज्ञायोजनों की व्यवस्था का शिक्षित जन समुदाय पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। महानता से जुड़ने के लिए शान्तिकुँज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों भावनाशील परिजन तैयार हुए।
पन्तनगर (उ.प्र.) फिल्म निदेशक डॉ. ए. अरविन्द की उपस्थिति में दीप यज्ञ कार्यक्रम सोल्लास सम्पन्न हुआ। अनचीन्हे अनजाने टी.वी. सीरियल की शूटिंग के लिए आये श्री अरविन्द दीपयज्ञ कार्य क्रम से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकार्डिंग करवाई। इसके महत्वपूर्ण अंशों को अपने सीरियल में सम्मिलित करने की भी इच्छा व्यक्त की।
मिशन के साथ किसी भी रूप में जुड़ने वाले व्यक्ति को व्रतशील बनने के लिए कहाँ जाता है। व्रतशील अर्थात् आत्मशोधन और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के अंतर्गत आने वाले क्रिया-कलापों एवं उत्तरदायित्वों का प्रतिज्ञापूर्वक शपथ लेकर पूरा करना। मिशन की प्रचार-प्रक्रिया का यही स्वरूप एवं उद्देश्य भी है।
लोक शिक्षण मात्र उपदेश देने भर से ही पूरा नहीं हो जाता वरन् उसकी सार्थकता, सफलता तभी मानी जाती है जब सुनने वाले उसे गंभीरता पूर्वक लें, हृदयंगम करें और कुछ करने के लिए कटिबद्ध हो चलें। अपने अगले कदमों की घोषणा सर्वसाधारण के सामने करें। पूरा न होने पर उनके सामने सकुचाये जिनके सामने कुछ आदर्शवादी प्रयासों के सामने प्रतिज्ञा की थी। उपेक्षा की स्थिति में आत्मग्लानि और लोकभर्त्सना की आशंका से भी डरें।
ऐसे प्रयोजन में धार्मिक कार्यक्रमों का समावेश बहुत ही फलप्रद होता है। देवताओं की अग्निदेव की साक्षी में जल हाथ में लेकर की गयी प्रतिज्ञाओं में किये हुए संकल्प प्रायः जीवन भर निभते ही रहते है। विवाह संस्कार इसका उदाहरण है। अग्नि की साक्षी में सात फेरे पड़ जाने के उपरान्त वर वधू, उनके कुटुम्बी, सम्बन्धी, इष्ट मित्र सभी निश्चिन्त हो जाते हैं कि लिया हुआ व्रत दोनों ही जीवन भर निभायेंगे। परस्पर सघन श्रृंखला में बंधकर एक जुट रहेंगे। वानप्रस्थ, संन्यास आदि की प्रतिज्ञाएँ भी इसी प्रकार धर्मसाक्षी में की जाती है। उनसे फिर कोई लौटते नहीं देखा गया। जो लौटते हैं वे अपनी प्रामाणिकता और प्रतिष्ठा खो बैठते हैं।
इसी मान्यता को ध्यान में रखते हुए ‘दीपयज्ञ’ की प्रथा प्रज्वलित की गई है। यह पुरातन परम्परा का अभिनव संस्करण है। पिछले दिनों में बहुत खर्च पड़ता था और बड़ा सरंजाम जुटाना पड़ता था। अब न लोगों में उतनी भाव श्रद्धा रही, न समय की बहुलता और आर्थिक खुशहाली। ऐसी दशा में समय की सहज माँग है कि साधन, श्रम और समय की बचत वाले कर्मकाण्ड की सर्वसाधारण द्वारा अपनाये जाने योग्य हो सकते है। दीपयज्ञ इसी आवश्यकता की पूर्ति करते है। थाली में तीन अगरबत्ती और एक दीपक अग्निदेव के प्रतीक रूप में स्थापित किया जाता है। चौबीस बार गायत्रीमंत्र का सहउच्चारण करने भर से यज्ञ विधान पूरा हो जाता है। इतने सरल क्रियाकृत्य में सम्मिलित होने के लिए अधिकाँश धर्म प्रेमी सम्मिलित हो जाते हैं। नर नारी का, जाति-पाँति का कोई अन्तर रहता नहीं इसलिए धर्मप्रेमी भारतीय जनता की एक बड़ी संख्या उस समारोह में सहज सम्मिलित हो जाती है। थोड़े ही प्रयास में उस क्षेत्र के आस्तिक जनों को बड़ी संख्या में एकत्रित कर लेना सरल पड़ता है और दीपयज्ञ आयोजन सफलतापूर्वक स्थान-स्थान पर स्थानीय लोगों के प्रयत्न से ही सम्पन्न होते रहते है।
एकत्र जन समुदाय को, समय की माँग एवं युग प्रत्यावर्तन में उनकी भूमिका के सम्बन्ध में आयोजन से पूर्व ही संगत प्रवचनों के माध्यम से इतना कुछ समझा दिया गया होता है कि उपस्थित जन यह जान सकें कि उन्हें क्या करना है? इस धर्मानुष्ठान में उन्हें किन सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का व्रत लेना है और किन दुष्प्रवृत्तियों के परित्याग हेतु संकल्प लिया जाना है? न्यूनतम एक त्याग और एक ग्रहण की मन स्थिति भावनाशील लोग बना सकें, इस प्रकार की भाव संवेदना उभार देना उन वक्ताओं, गायकों का लक्ष्य रहता है ताकि आयोजन में लगाया श्रम, समय, साधन सफल हो सके और अनेक नये व्रतशील उभर सकें।
सत्प्रवृत्ति - संवर्धन में - शिक्षा संवर्धन, वृक्षारोपण, सृजनात्मक प्रयोजनों में नियमित समयदान देते रहना प्रमुख है। छोड़ी जाने वाली बुराइयों में नशेबाजी, जातिगत ऊँच नीच, पर्दाप्रथा, भिक्षा-व्यवसाय, दहेज, जेवर धूम-धाम वाली खर्चीली शादियाँ आदि प्रमुख है। इनमें से जो जिन्हें अपने अनुरूप समझते हैं वे दीपयज्ञ की पूर्णाहुति के समय उनका शास्त्रोक्त विधि-व्यवस्था के साथ संकल्प लेते हैं और अग्नि साक्षी में घोषणा करते हैं कि इन वचनों का वे तत्परतापूर्वक निर्वाह करेंगे। व्रत टूटने का अवसर न आने देंगे।
उपरोक्त उद्देश्य और विधान को लेकर स्थान-स्थान पर, समय-समय पर होते रहने वाले दीपयज्ञों का नितान्त सस्ता और प्रायः दो तीन घंटे में सम्पन्न हो जाने वाला प्रवचन समेत कर्मकाण्ड बिना खर्च का होने के कारण उसकी व्यवस्था सरलता पूर्वक बन जाती है और प्रत्येक समारोह में बड़ी संख्या में लोग ऐसे संकल्प लेते हैं जिनके सहारे उनका वर्तमान जीवन क्रम अधिक परिष्कृत एवं प्रखर बन सके। साथ ही वे समाज की अभिनव संरचना में सत्प्रवृत्ति संवर्धन में भावभरा योगदान दे सकें।
जहाँ दीपयज्ञ होते हैं वहाँ साप्ताहिक सत्संग की स्थापना भी होती है। इसके लिए रविवार को प्रमुखता दी गयी है। इसमें गायत्री जप, सूर्य का ध्यान, संक्षिप्त दीपयज्ञ यह तो धर्मकृत्य रहते हैं। इसके अतिरिक्त युग संगीत का सहगान कीर्तन और किसी सामयिक प्रसंग पर मिशन के किसी प्रतिपादन का वाचन होता है। निर्धारित साप्ताहिक सत्संग का उपक्रम शान्ति पाठ के साथ इतने में ही पूरा हो जाता है।
इसके उपरान्त एक अति महत्वपूर्ण कार्य इसी साप्ताहिक सत्संग के अन्त में होता है वह है सत्साहित्य के स्वाध्याय का व्यापक निर्वाह। अब तक इस कार्य को व्यक्तिगत रूप से झोला पुस्तकालय माध्यम से चलाया करते थे। घर-घर जाकर शिक्षितों को पढ़ाने के लिए बिना कोई फीस लिये पढ़ने के लिए देते थे। बाद में जाकर वापस ले आया करते थे। अब उस प्रक्रिया को साप्ताहिक सत्संगों के अवसर पर सामूहिक रूप से करते रहने का नया प्रावधान चल पड़ा है।
साप्ताहिक सत्संगों का विस्तार एक से “पाँच-पाँच से पच्चीस” के चक्रवृद्धि गति से आगे बढ़ता है। न्यूनतम पच्चीस व्यक्ति तो हर सत्संग में होते ही है वे सात-सात पुस्तकें अपने साथ ले जाते हैं और सात व्यक्तियों में बारी-बारी घुमाकर सभी में पूरा करा देते है। एक दिन में एक व्यक्ति एक पुस्तक को आसानी से पढ़ लेता है, क्योंकि वे पचास-साठ पन्ने की होती है। जिन्हें पढ़ने में डेढ़ दो घण्टे का समय पर्याप्त होता है। इस योजना के आधार पर प्रत्येक साप्ताहिक सत्संग व्यक्तियों के लिए स्वाध्याय व्यवस्था सम्पन्न करता रहता है। शिक्षित अपने संपर्क के अशिक्षितों को युग साहित्य पढ़ कर सुनायें ऐसा क्रम भी सभी चलाते है। इस प्रकार विचारक्रान्ति अभियान को इस स्वाध्यायशीलता के माध्यम से विस्तार आगे बढ़ते रहने का अवसर मिलता है।
संकल्पित एक घण्टे का समय इसी प्रयोजन के लिए संपर्क साधने, पुस्तकें देने, वापस लेने, पढ़े हुए विषय पर विचार विनिमय करने जैसे कार्य में लग जाता है। इसके लिए सुविधा का समय कोई भी श्रद्धावान सहज सरलता पूर्वक निकालता रहता है। आलस्य प्रमाद करने वाले की तब खिंचाई होती है जब वह साप्ताहिक सत्संग के अवसर पर अपने कार्य की रिपोर्ट सुनाते हुए काम का हीना पोला विवरण बताता है। देखा गया है कि यह साप्ताहिक सत्संग, स्वाध्याय का उपक्रम भी साथ-साथ बड़ी सुगमता पूर्वक चलते रहते है। साधना-उपासना की आध्यात्मिकता जुड़ी रहने से श्रद्धा संवर्धन का पुट भी लगता रहता है। किसी को ऊब नहीं आती और सभी अगले सत्संग का दिन पहले से ही सोचते रहते है। सत्संग यों तो प्रायः किसी स्थिर सुविधाजनक स्थान पर होते रहते है। पर यदि किन्हीं सदस्यों का आग्रह हो तो उनके घरों पर भी आयोजन किये जाते है। आतिथ्य के रूप में किसी को किसी प्रकार का खर्च करने का प्रतिबन्ध है ताकि सभी गरीब अमीर समान रूप से उस सुविधा का लाभ उठा सकें। कोई किसी प्रकार का दबाव अनुभव न करे।
एक से पाँच-पाँच से पच्चीस बनना यही सत्संगों की सीमा है। सदस्य बढ़ें तो नये मण्डल बना दिये जाते है। ताकि अनपढ़ व्यक्तियों पर कड़ी नजर रखी जा सके और उनकी काट छाँट होती रहे। पच्चीस प्रतीत होने वाले व्यक्ति भी वस्तुतः पच्चीस नहीं होते। उनके द्वारा जिन 165 व्यक्तियों को पुस्तकें निःशुल्क नित्यप्रति एक नई पुस्तक देने और वापस लेने का क्रम चलाया जाता है, वह परिकर बिल्कुल अलग होते हैं। इस प्रकार मूल 25 सदस्य ओर 175 स्वाध्यायशील मिलकर 200 हो जाते है। इस समूचे परिकर में जहाँ उत्साह उभरा है वहाँ एक सत्संग मण्डल के दस विभाग हो गये है। इस प्रकार एक से दस होते हुए और कालान्तर में वे सदस्य भी उतने ही न रहकर सौ बन जाते है। आशा की गई है कि साप्ताहिक सत्संगों के बढ़ते हुए क्रम निरन्तर अग्रगामी भी होंगे और अगले वर्षों ये एक लाख बनकर करोड़ों तक नये युग का सन्देश पहुँचाने लगेंगे।
हर कार्य साधन चाहता है। प्रस्तुत विचार-क्रान्ति के निमित्त भी कुछ न कुछ खर्च तो स्थानीय व्यवस्था के लिए लगेगा ही। इसके लिए यही नियम अपनाया गया है कि पाँच और पच्चीस सदस्य समयदान की तरह अंशदान भी नियमित रूप से प्रस्तुत करें। बीस पैसे का अनुदान नियमित रूप से निकालें और सात दिन के संचय को साप्ताहिक सत्संग के अवसर पर जमा कर दिया करें। हर सप्ताह आय व्यय का विवरण सभी उपस्थित जनों को सुना दिया जाय ताकि कोई उंगली उठा न सकें।
वार्षिक समारोह करने हो तो उसमें सभी मुहल्ले-मुहल्ले वाले सत्संग मण्डल मिलकर एक विशाल समारोह कर लें। वक्ता, गायक अपने ही मिशन के सर्वत्र उपलब्ध होने लगे है। जहाँ कम पड़ते हों वहाँ से एक महीने के युगशिल्पी सत्र में हरिद्वार भेजकर इसके लिए प्रशिक्षण प्राप्त करा भी लिया जाता है। युगशिल्पी सत्रों में गायन, वादन, वक्तृत्व एवं दीपयज्ञ स्तर के कर्मकाण्डों की साँगोपाँग प्रवीणता प्राप्त हो जाती है। ऐसे ही समीपवर्ती लोगों से अपने कार्यक्रम पूरे कर लेने चाहिए। बड़े लोगों को बुलाने के फेर में समय और शक्ति बर्बाद नहीं करनी चाहिए।
युग संधि के बारह वर्षों में एक लाख कर्म कार्यकर्ता बनाकर नव सृजन के क्षेत्र में उतार देने का शान्तिकुँज का महापुरश्चरण के साथ आरंभ हुआ संकल्प इन्हीं उपरोक्त आधारोँ के सहारे पूर्ण होकर रहेगा, ऐसी आशा विश्वासपूर्वक संजोनी चाहिए। प्रामाणिकता, प्रखरता, प्रतिभा का जहाँ समर्पित प्रयास चलेगा वहाँ लक्ष्य की पूर्ति क्यों नहीं होगी? विश्व मानव को एकता समता के सुदृढ़बंधनों में बाँधने वाली ईश्वरेच्छा पूरी होकर रहेगी।
इस विराट् जीवन पथ को मत निज लघुता से तोलो। पाना है यदि लक्ष्य पथिक! तो पंख हृदय के खोलो॥
इतने आकर्षण! मन उनकी ओर दौड़ सकता है इतनी भ्रान्ति!सगा भी तेरा साथ छोड़ सकता है
इतनी धूल भरी आँधी में दगा कुछ न दिखायी फिर क्यों इस मेले में तूने अंधी दौड़ लगायी?
मत जीवन में अमृत कलश में तृष्णा के विष घोलो। पाना है यदि लक्ष्य पथिक! तो पंख हृदय के खोलो।
साँसों का सिलसिला अन्त तक साथ न चलने वाला खड़ा मिलेगा कुछ ही दूरी पर वह विषधर काला
जिसके सर्प दंश से अब तक कोई नहीं बचा है, अविनाशी ने ही विनाश का शाश्वत सत्य रचा है
साँसें साथ छोड़ दें इससे, पहले ही मन धोलो। पाना है यदि लक्ष्य पथिक! तो पंख हृदय के खोलो।
आज नहीं कल ही हलचल में जीवन चला न जाये ऐसा कहाँ न हो तू रोये, हाथ मले पछताये
साँस रोक क्षण भर, अथाह अंबर में दृष्टि लाग तू कहीं काल के क्रूर हाथ में जाये नहीं ठगा तू
विभूता को बाँधे बैठे वह मन के बंधन खोलो। पाना है यदि लक्ष्य पथिक! तो पंख हृदय के खोलो॥
रंग ढंग तो क्या? न यहाँ के अंग संग कुछ अपने देख रहा फिर भी आंखें मूंदे, मायावी सपने
हर अगला पग अंधकार की ओर बढ़ा जाता है जीवन का हर कर्म काल का कौर बना जाता है
जगा आत्म विश्वास! ज्योति-पथ; पथ पर एकाकी हो लो। पाना है यदि लक्ष्य पथिक! तो पंख हृदय के खोलो।
*समाप्त*