॥कावाविमुक्तिर्विषयेविरक्तिः॥

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आनन्द की उपलब्धि में, सफलता के सुयोग में एक बाधा है - अपनी स्वनिर्मित क्षुद्रता। हेय गतिविधियाँ अपनाकर ही मनुष्य अपने लिए संकट खड़े करता है और विपन्नताओं में फँसता है।

मकड़ी अपने लिए जाला स्वयं बुनती है और उसमें फँसकर स्वयं ही बंधन में बँधती है। जिस शिकार को पकड़ने के लिए यह श्रम किया गया था, उसकी सफलता में संदेह है। हो सकता है कि कोई शिकार न भी फँसे। पर अपने हाथ-पाँव जकड़ जाना तो निश्चित ही है। रेशम की कीड़े अपने लिए स्वयं ही खोल बनाते हैं और उनमें कैद रहकर दुर्भाग्य को कोसते हैं। गूलर के भुनगे उसी छोटे दायरे में दिन गुजारते रहते हैं। वे चाहें तो तनिक से प्रयास से छेद करके अपने को बाहर निकाल सकते हैं और स्वच्छन्द वातावरण का आनन्द ले सकते हैं।

दुर्गुणों को स्वभाव में सम्मिलित कर लेना और कुमार्ग पर चल पड़ना ही वह दुर्भाग्य है जो किसी के बुलाने और अभ्यास करने पर ही साथ देने को तैयार होता है। यह किसी का थोपा हुआ नहीं होता वरन् अपने ही प्रयास द्वारा विनिर्मित किया जाता है। कोई चाहे तो इस प्रयास से अपना हाथ खींच सकता है और वह स्थिति प्राप्त कर सकता है जिसे सुख शान्ति भरी बंधन मुक्ति कहा जा सके। मुक्ति वस्तुतः विषयों से वैराग्य पा लेने की मनःस्थिति का नाम है।


आनन्द बाँटें, - सन्तोष पायें!

हाड़ माँस के टोकरे को मनुष्य नहीं कहते। जो दूसरों के दुःख में दुःखी नहीं होता, जो दूसरों की पीड़ा से व्यथित नहीं होता, जिसे पत्थर की तरह अपनी सीमा तक से ही संबंध है, जो यह नहीं सोचता है कि दूसरों की प्रगति और प्रसन्नता के साथ अपना भी कुछ संबंध है, उसे चेतन होते हुए भी जड़ ही समझना चाहिए। पत्थर दूसरों के दुःख, दर्द में शरीक नहीं होता, किसी भी प्रसन्नता में उसे प्रसन्नता भी नहीं होती। आदमी और पत्थर में कुछ तो अन्तर होना चाहिए।

कुछ चीजें ऐसी है, जिन्हें मिलजुल कर ही उपयोग करना चाहिए। जिनमें सुख दुःख भी है। एक कोने में मृतक रोगी, घायल, पीड़ित पड़े हों, और दूसरे कोने वाले उनकी और लापरवाही बरतें या हँसी खुशी की मौज मनायें, तो समझना चाहिए कि यहाँ आदमी नहीं रहते।

इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं जिस पर बुरे दिन न आयें। बीमारी, लड़ाई, चोरी, कलह का सामना हर किसी को करना पड़ता है। बुरे दिनों में हर कोई चाहता है कि दूसरे लोग उसकी सहायता करें, कम से कम सहानुभूति तो अवश्य दिखायें किन्तु हितैषी, संबंधी कहलाने वाले तक उदासी दिखायें और मुँह मोड़ लें, तो उस दिन के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि यह अकेलापन उनके लिए भी कष्टदायक होगा।

अपना पेट भरने के बाद जिन्हें इस बात की चिन्ता नहीं होती कि पड़ोसी भूखा और दुःखी है तो उन्हें इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि उनकी तंगी में दूसरे लोग मुँह मोड़ लें और हँसी उड़ायें।

मनुष्य की इसलिए प्रशंसा नहीं होती कि वह धनवान या बुद्धिमान है, वरन् उसे इसलिए सराहा जाता है कि वह हिल-मिल कर रहता है। मिल बाँट कर खाता है और सुख दुःख में पड़ोसियों के साथ साझेदारी बरतता है। जो निष्ठुरता बरतता है, किसी से कोई संबंध नहीं रखता उसे इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि जब बुरे दिन आयें तब दूसरे उसका मजाक उड़ायें।

शरीर के अवयवों से कुछ शिक्षा लें। हाथ कमाते है तो उसे मुख को प्रदान करते हैं। मुँह पेट को देता है। पेट पचाने के बाद उससे बने रक्त को नस नाड़ियों द्वारा सारे शरीर को बाँट देता है। यदि यह बँटवारा न हो और हाथ ने जो कमाया है उसे मुट्ठी में ही बंद रखे तो सारा शरीर गड़बड़ा जायगा और मुट्ठी भी इस योग्य नहीं रहेगी कि उस कमाई को सदा सर्वदा अपने पास कैद रख सके।

मनुष्य ने इसलिए प्रगति की है उसने एक दूसरे की सहायता करना सीखा है। अकेला आदमी दूसरों की विशेषताओं का लाभ न उठा सकेगा। तब फिर उसे ऐसा रहना पड़ेगा मानों सुनसान में कैद भुगतनी पड़ी रही हो।

मनुष्य को ईश्वर का अनुदान आत्मा के रूप में मिला है। आत्मा उसे कहते है जो दूसरों के साथ मिलजुल कर रहे। अपना सुख दूसरों को बाँटें और दूसरों का दुःख हलका करने के लिए अपने हाथ बढ़ाये। कठिनाइयाँ ऐसी हैं जो दूसरों की सहायता के बिना हलकी नहीं हो सकतीं। इसी प्रकार खुशी भी ऐसी है कि उसमें किसी को सम्मिलित न किया जाय तो उसका आनंद चौथाई रह जायेगा।

संसार में आनन्द भी बहुत है, पर वह मिलता उन्हें है जो दूसरों की प्रसन्नता के साथ स्वयं प्रसन्न होना जानते है। दूसरों के दुःख दर्द में साथी बनने के बाद मनुष्य न केवल कष्ट पीड़ित की व्यथा हलकी करता है, वरन् स्वयं भी संतोष लाभ करता है। यह संतोष ऐसा है जिसे प्राप्त करने से आदमी खोता कम और पाता अधिक है।


Quotation

ईश्वर भक्ति वेश्यावृत्ति नहीं है जो लौकिक या पारलौकिक प्रलोभनों के लिए नृत्य करती और लुभाने की बात सोचती है। भजन तो पतिव्रत-धर्म है जो समर्पण माँगता है और संतोष प्रदान करता है।


श्रद्धा का आधार और अवलम्बन

भौतिक क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन के लिए ऊर्जा की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। उसके बिना न कुछ उगता है न पकता है न बढ़ता बदलता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्म क्षेत्र की ऊर्जा एक ही है, जिसे श्रद्धा के नाम से जाना जाता है। चेतना को उत्कृष्टता की ओर उभारने के लिए श्रद्धा के बिना एक कदम भी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं।

पानी का स्वभाव नीचे की ओर ढलना है। ऊपर से गिरी हुई वस्तु नीचे की ओर गिरती है। निम्न योगियों में भ्रमण करते हुए मनुष्य भी संचित कुसंस्कारों से प्रभावित बना रहता है। अवसर आते ही वह उन कुसंस्कारों को चरितार्थ भी करने लगता है। यही कारण है कि मनुष्य शरीरधारियों में से अधिकाँश पशु प्रवृत्तियों में संलग्न पाये जाते हैं। उन्हें पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और किसी कार्य में रुचि नहीं होती। मन और बुद्धि का परिकर लोभ, मोह और अहंकार के ताने बाने बुनता रहता है। लालसा और लिप्सा की सनक नशा पीकर उन्मत्त हुए व्यक्ति पर चढ़ी खुमारी की तरह छाई रहती है। इसी में उसे अपनी बुद्धिमता और सफलता भी दिखती है। कई बार तो वह इस स्थिति पर गर्व भी कर लेता है और बढ़ी हुई दुर्भावना तथा दुष्प्रवृत्तियों की दिशा में और भी अधिक बढ़ता है।

यह लोक प्रवाह हुआ। चर्चा इससे प्रतिकूल पक्ष की करनी है - आत्मिक प्रगति की। इसके दो पक्ष हैं एक आत्म सुधार आत्मविकास, दूसरा लोकमंगल का पुण्यपरमार्थ। इन्हीं दो को आत्मिक प्रगति का आधारभूत लक्षण माना गया है। इन प्रयत्नों को कुछ लोग करते भी है, तो वह एक कौतुक कौतूहल की तरह यत्किंचित ही बन पड़ता है। अन्तराल की गहराई तक जमी हुई पशु-प्रवृत्तियों से जूझना सहज काम नहीं है। वे छापामार नीति की अभ्यस्त होती हैं। दबाव पड़ने पर दब भी जाती हैं, पर जब भी चौकीदारों को बेखबर पाती है, तभी हमला बोल देती है। इस प्रकार करा-धरा सब कुछ गुड़ गोबर होता रहता है। आत्मिक प्रगति के लिए किये गये प्रयासों की गर्मी ठंडी होते ही फिर पुराना माहौल अपना आधिपत्य जमा लेता है। साधकों की असफलता का मुख्य कारण प्रायः यही होता है। वे जागरूकता और निष्ठा को सतत निरन्तर बनाये नहीं रह पाते।

आत्मिक प्रगति के लिए दो उपचार निरन्तर करते रहने की आवश्यकता पड़ती है। एक संयम साधना। दूसरी परमार्थ परायणता। इन दोनों में ही प्रत्यक्षतः हर किसी को घाटा दिखता है। संयम की दिशा में जितना बढ़ा जाता है, उतना ही सुख सुविधा में, वासना विलासिता में, ठाटबाट में कटौती आरम्भ हो जाती है। औसत नागरिक स्तर का जीवन यापन करने के लिए तत्पर होने पर दूसरों की तुलना में अपना सरंजाम हलका पड़ जाता है। सुविधाएं घट जाती है। डींग हांकने और वाहवाही लूटने जैसा भी कुछ शेष नहीं बचता। यह त्याग बलिदान जैसा मार्ग है, अपने को आदर्शों के लिए समर्पित करने जैसा। इसे व्यक्तित्व का कायाकल्प करने जैसा माना जा सकता है। विलास प्रिय कुटुम्बी सहयोगी, संबंधी भी इससे चिढ़ने लगते हैं। समर्थन करना तो दूर उलटा उपहास उड़ाते और सनकी ठहराते हैं।

दूसरा अवलम्बन है - परमार्थ। इसमें अपने समय, श्रम, मनोयोग, साधन, प्रतिभा, प्रभाव आदि उपलब्धियों को स्वार्थ साधन से बचा कर पिछड़ों को बढ़ाने और गिरों को उठाने और संभलों को उछालने में लगाना पड़ता है। सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है। इस मार्ग पर चलना संयम साधना से भी भारी पड़ता है। संयम में तो जहाँ के तहाँ तो भी बैठे रहना पड़ता है, परन्तु परमार्थ में तो अपनी संचित सम्पदा को अन्यान्यों के लिए विसर्जित करते रहना पड़ता है। यह प्रत्यक्षतः घाटे का सौदा है। अपना नुकसान सहकर दूसरों की भलाई करने के लिए जिस उदार साहसिकता की आवश्यकता पड़ती है वह कहाँ से आये? आदर्शवादिता की भावसंवेदना ढीली हो तो फिर उस उत्साह में भी स्थिरता नहीं रह पाती। पानी में उठा बबूला कुछ ही समय में शान्त समाप्त हो जाता है। कुछ प्रशंसा दिलाने वाली घटनाओं को स्मरण रख जाता है और उन्हीं का बार-बार ढिंढोरा पीटते रहा जाता है। निरन्तर वह क्रम कहाँ चल पाता है? परमार्थ को नित्य कर्म में सम्मिलित करते रहना कितना कठिन है उसे सभी भुक्तभोगी भली प्रकार अनुभव करते हैं। मन का चोर और तथाकथित हितैषियों का दबाव रास्ता रोकने और पीछे खींचने में कोई कसर नहीं रहने देता। देखा गया है कि जिस-तिस बहाने की आड़ में पुण्य परमार्थ भी शिथिल हो जाता है। निरन्तर की व्रतशीलता निभ नहीं पाती।

इन अवरोधों से कैसे जूझा जाय? लक्ष्य की दिशा में निरन्तर प्रयाण करते रहने की व्रतशीलता का निर्वाह कैसे किया जाय? इन दोनों कठिनाइयों की मिली-जुली चौड़ी धार वाली महानदी को किस नाव पर बैठकर पार किया जाय? इस असमंजस भरे अन्धकार के बीच प्रकाश की एक ही किरण उग सकती है और वह है - श्रद्धा

श्रद्धा क्या है? इसकी एक शब्द में इतनी परिभाषा बताई जा सकती है कि “आदर्शों के प्रति समर्पित अन्तराल की भाव संवेदना।” जिसमें सभी महत्वाकाँक्षाओं का विसर्जन करना पड़ता है। भौतिक महत्वाकाँक्षाएं ही उच्चस्तरीय भाव-संवेदनाओं को कुँठित करती है। इस महाभारत को जाने बिना कोई धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में अवस्थित गाण्डीवधारी साधन न तो विजय–पताका फहराने की स्थिति तक पहुँच सकता है और न उसके रथ को संभालने चलाने के लिए कोई दिव्य तेज सारथी की भूमिका निभाने दौड़ा आ सकता है।

भौतिक क्षेत्र में जो महत्व ऊर्जा का है, ठीक वही भूमिका आत्मिक क्षेत्र में श्रद्धा निबाहती है। चेतना को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाल सकने वाली यह कारगर भट्ठी है। श्रद्धा विहीन को आत्मोत्कर्ष के मार्ग पर कुछ कदम चल सकना भी कठिन पड़ता है। वह पक्षाघात पीड़ित की तरह कुछ कदम चल कर ही लड़खड़ा जाता है और धड़ाम से नीचे गिरता है।

श्रद्धा ही एक मात्र वह अवलम्बन है जिस पर बिठाकर आत्मचेतना को प्रक्षेपास्त्र की तरह गुरुत्वाकर्षण रहते अन्तरिक्ष तक पहुँचाया जा सकता है। अध्यात्मक क्षेत्र के जितने भी चमत्कार हुए हैं, उन्हें सब श्रद्धा की ही परिणति कह सकते हैं। वही पाषाण, प्रतिमा में सशक्त देवता का उद्भव करती है, उसी के प्रताप से मिट्ठी का ढेला गणेश बन जाता है और वैसा ही प्रतिफल उपलब्ध कराता है। एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा का पाषाण खण्ड गिरधर गोपाल, रामकृष्ण परमहंस की काली, शिवाजी की भवानी प्रकारान्तर से श्रद्धा की ही परिणति थी। यदि इन कलेवरों में से श्रद्धा के प्राण को विलग कर दिया जाये तो उनका कलेवर नगण्य स्थिति का बनकर रह जाता है।

भयोत्पादक क्षेत्रों में झाड़ी का भूत बनने और उससे डरकर कइयों को बीमार पड़ते मौत के मुँह में जाते देखा गया है। रस्सी का साँप बन जाता है और भ्रमग्रस्त को उठाकर यमलोक पहुँचाती है। वह कथा बहुतों ने सुनी होगी जिसमें मृत्यु पाँच हार को मारने आई थी, पर पन्द्रह हजार मर गये। यमराज ने जवाब तलब किया तो मौत ने संक्षेप में इतना ही उत्तर दिया कि उसने तो पाँच हजार ही मारे, शेष दस हजार तो डर के मारे मर गये और उसके पीछे लग गये। तंत्र विद्या की सारी प्रक्रिया इस डरने डराने के ऊपर ही टिकी हुई है।

भाव संवेदनाएं अक्सर प्रत्यक्ष दृश्यों से प्रभावित होती है। कल्पना के मानस चित्र भी कई बार हर्ष शोक की मनःस्थिति बना देते है। वह उपक्रम रोते हँसने उठते, अकड़ते और दीन-हीन होकर रोते विलाप करते लोगों के बीच घटित होते हुए देखे जाते हैं। इसमें दृश्य प्रधान है और संवेदना उसका उत्पादन। यह जन-साधारण का स्वभाव है। उत्तेजक परिस्थितियों में कितने ही व्यक्ति आवेशग्रस्त भी होते देखे गये है और ऐसा कुछ भला बुरा कर बैठते हैं जो सामान्य सन्तुलित परिस्थितियों में संभव नहीं था। वैराग्य लेने से लेकर आत्महत्या अथवा आक्रमण प्रतिशोध पर उतारू होने तक की घटनाएं आवेश-ग्रस्त मनःस्थिति में ही घटित होते देखी गई हैं। कुकृत्य कर बैठने वाले जेल जाने पर पछताते देखे गये हैं इन्हें मनःक्षेत्र के ज्वार भाटे ही कह सकते हैं। भाव संवेदना की आवेशग्रस्त स्थिति में बन पड़ी प्रतिक्रिया भी।

श्रद्धा में भाव संवेदना तो प्रधान होती है, पर वह अविवेक पूर्ण नहीं होती। उसमें व्यक्ति आदर्शों को प्राणप्रिय मान कर उसके लिए उसी प्रकार समर्पित हो जाता है, जिस प्रकार की भक्त भगवान के लिए समर्पित होता है। भक्तों में हनुमान का उदाहरण प्रमुख है। राम भक्त भरत की चर्चा भी इसी रूप में होती है। पतिव्रताओं के आत्म-समर्पण का भी उल्लेख इसी रूप में होता है।

यों प्रचलन की हिसाब से भगवान की कोई प्रतिमा कल्पित कर ली जाती है और उसकी पूजा अर्चा, ध्यान–धारणा परक क्रिया–कृत्यों को ही श्रद्धा भक्ति की अभिव्यक्ति मान लिया जाता है। इसे प्रयास का शुभारंभ कह सकते हैं, मार्गदर्शक पट्टिका की तरह। पर इस संकेत से दिशा मात्र का बोध होता है। इतने भर से महायात्रा पूरी नहीं होती। उसके लिए तो लम्बी दूरी पार करने की आवश्यक पाथेय समेत यात्रा करनी होती है।

यह मार्ग है श्रद्धा के अवलम्बन का वह चेतना क्षेत्र की प्रचंड ऊर्जा है। वह न केवल लक्ष्य गढ़ती है, वरन् उस पर चलने के लिए आवश्यक सामर्थ्य भी प्रदान करती है। आदर्शवाद की दिशा में महामानवों द्वारा जो कुछ भी जितनी कुछ भी बढ़त बन पड़ती है। उसके मूल में श्रद्धा की शक्ति ही काम करती रहती है। बिना उसके न तो आत्मसंयम बरतते बन पड़ता है और न त्याग, बलिदान करते। इसके बिना आदर्शवाद का निर्वाह कैसे हो? सेवा साधना के लिए श्रम साधना लागते कैसे बन पड़े? मन कैसे खाली हो जो वासना, विलासिता, अहंता, संकीर्णता से ऊँचा उठकर कुछ ऐसा सोच सके जिसमें उत्कृष्टता अपनाने के लिए उमंग-उमँगे और कारगर योजना बने। श्रद्धाविहीन इस दिशा में कुछ भी सोचने में असमर्थ रहते हैं। यह दूसरी बात है कि लोग दिखावे के लिए अपने को पुण्यात्मा और उदारचेता सिद्ध करने के लिए जब तब कोई शिगूफे छोड़ते रहें। पर वह पोल अधिक समय तक बिना खुले रहती भी तो नहीं। वास्तविक और चिरस्थायी श्रेष्ठता का अर्जन कर सकने में श्रद्धा का अन्तराल की गहराई में उतारे बिना और कोई उपाय भी तो नहीं।

आमतौर से श्रद्धा की यह गरिमा और महिमा समझ सकना सामान्य मनःस्थिति में संभव भी नहीं हो पाता। इसके बिना न देवता अनुकूल बनते हैं, न भगवत् चेतना के साथ अपने को जोड़ सकना संभव होता है। अन्तराल में दबी हुई, सोई हुई, महानता का भी इसके अभाव में स्फुरण नहीं होता। उत्कृष्टता के इन लक्षणों में से एक भी न उभरे तो व्यक्तित्व में वह प्रखरता कैसे उभरे जिसके सहारे स्वयं ऊँचा उठा और दूसरों को आगे बढ़ाया जाता है। आत्म विकास की दिशा में बढ़ने वाले के लिए श्रद्धा का अवलम्बन अनिवार्य है। उसके बिना कोई आत्म प्रवंचना में भले ही लगा रहे, पर ऐसा कुछ पा नहीं सकता, जिसे महत्वपूर्ण कहा और माना जा सके। जब कुछ बोया ही नहीं गया है तो काटने को कैसे मिलेगा? उत्कृष्टता के क्षेत्र में जो बोया गया है वही आत्म-विकास के रूप में उगकर कोठे भरता है। इस बीज का संचय इसी आधार पर बन पड़ता है कि अपने को तप-तितीक्षा की कसौटी पर कसा जाय। लिप्सा-लालसाओं में कटौती करके उस बचत को आत्मोत्कर्ष के लिए नियोजित किया जाय। यह सब करा सकने की शक्ति मात्र श्रद्धा से ही उपलब्ध होती है।

श्रद्धा आकर्षणों, प्रलोभनों, और दबावों के आगे झुकने से निरन्तर इन्कार करते रहने का रुख अपनाने का साहस देती है। गिरावट के ऐसे अवसरों की नहीं जो दुर्बल मन वालों को सहल ही अपनी और खींच लेते हैं। जो संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि को लाँघने से स्पष्ट इन्कार करते और इसके लिए चारों और फैले हुए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है, जब सभी चतुर लोग अपने मतलब से मतलब रखते हैं और दूसरों के झंझट में नहीं पड़ते तो अपने को ही क्या पड़ी है जो स्वयं को निरन्तर कसते रहें और दूसरों पर अपनी क्षमता का लाभ उलीचते चलें। आदर्शवादी कौन बनता है? सभी अपने धन्धे में लगे हैं, फिर हमें ही क्या ऐसा कुछ करना और सोचना चाहिए उसके आदर्शों के नाम पर अपनी दुर्गति बनाने की मूर्खता अपनाई जाय?

ऐसे-ऐसे अनेकानेक तर्कों, उदाहरणों की झड़ी लगती रहती और बढ़े हुए कदम पीछे लौटने के लिए भरपूर दबाव डालती रहती है। पर अकेली श्रद्धा ही है, जो इन अब से जूझती रहती है। चट्टान की तरह पैर जमाने और निर्धारित लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ते रहने की प्रेरणा देती रहती है।

गया-गुजरा जीवन स्वीकार करने के लिए महामानवों की अन्तःचेतना सदा इन्कार करती रहती है। मानवी गरिमा का मूल महत्व समझाती रहती है। मानवी गरिमा का मूल महत्व समझाती रहती है। लोकप्रवाह की अनुपयुक्तता और अन्त में हाथ लगने वाली दुर्गति का स्पष्ट चित्र खड़ा करती रहती है। सावधान करने के लिए इतनी ही पर्याप्त रहता है। उसके सहारे काम चल भी जाता और समूचा जीवन एक सुव्यवस्थित योजना के अनुरूप में ढल भी जाता है। यही है आत्म-सत्ता के प्रति विश्वास, श्रद्धा के अवलम्बन की शक्ति जो किसी साधारण मानव को महामानव, देवपुरुष की श्रेणी में ला खड़ा कर देती है।


सोमवती स्नान (Kahani)

सोमवती स्नान का पर्व था। गंगा घाट पर भारी भीड़ लग रही थी।

शिव पार्वती आकाश से गुजरे। पार्वती ने इतनी भीड़ का कारण पूछा - आशुतोष ने कहा - सोमवती पर्व पर गंगा स्नान करने वाले स्वर्ग जाते है। उसी लाभ के लिए यह स्नानार्थियों की भीड़ जमा है।

पार्वती का कौतूहल तो शान्त हो गया पर नया संदेह उपज पड़ा, इतनी भीड़ के लायक स्वर्ग में स्थान कहाँ है? फिर लाखों वर्षों से लाखों लाख लोग इस आधार पर स्वर्ग पहुँचते तो उनके लिए स्थान भी तो कहीं रहता? छोटे से स्वर्ग में यह कैसे बनेगा? भगवती ने अपना नया सन्देह प्रकट किया और समाधान चाहा भगवान शिव बोले - शरीर को गीला करना एक बात है और मन की मलीनता धोने वाला स्नान जरूरी है। मन को धोने वाले ही स्वर्ग जाते हैं। वैसे लोग जो होंगे उन्हीं को स्वर्ग मिलेगा।

सन्देह घटा नहीं बढ़ ही गया। पार्वती बोलीं - यह कैसे पता चले कि किसने शरीर धोया किसने मन संजोया।

यह कार्य से जाना जाता है। शिवजी ने इस उत्तर से भी समाधान न होते देखकर प्रत्यक्ष उदाहरण से लक्ष्य समझाने का प्रयत्न किया।

मार्ग में शिव कुरूप कोढ़ी बनकर पढ़ रहे। पार्वती को और भी सुन्दर सजा दिया। दोनों बैठे थे। स्नानार्थियों की भीड़ उन्हें देखने के लिए रुकती। अनमेल स्थिति के बारे में पूछताछ करती।

पार्वती जी रटाया हुआ विवरण सुनाती रहतीं। यह कोढ़ी मेरा पति है। गंगा स्नान की इच्छा से आए हैं। गरीबी के कारण इन्हें कंधे पर रखकर लाई हूँ। बहुत थक जाने के कारण थोड़े विराम के लिए हम लोग यहाँ बैठे हैं। अधिकाँश दर्शकों की नीयत डिगती दिखती। वे सुन्दरी को प्रलोभन देते और पति को छोड़कर अपने साथ चलने की बात कहते। पार्वती लज्जा से गढ़ गई। भला ऐसे भी लोग गंगा स्नान को आते हैं क्या? निराशा देखते ही बनती थी।

संध्या हो चली। एक उदारचेता आए। विवरण सुना तो आँखों में आँसू भर लाए। सहायता का प्रस्ताव किया और कोढ़ी को कंधे पर लादकर गंगा तट तक पहुँचाया। जो सत्तू साथ में था उसमें से उन दोनों को भी खिलाया। साथ ही सुन्दरी को बार-बार नमन करते हुए कहा - आप जैसी देवियां ही इस धरती की स्तम्भ हैं। धन्य हैं आप जो इस प्रकार अपना धर्म निभा रही हैं।

प्रयोजन पूरा हुआ। शिव पार्वती उठे और कैलाश की ओर चले गए। रास्ते में कहा - पार्वती इतनों में एक ही व्यक्ति ऐसा था, जिसने मन धोया और स्वर्ग का रास्ता बनाया। गंगा स्नान का महात्म्य तो सही है पर उसके साथ मन भी धोने की शर्त लगी है।

पार्वती तो समझ गई कि गंगा महात्म्य सही होते हुए भी क्यों लोग उसके पुण्य फल से वंचित रहते हैं?


नर-वानर देवमानव कैसे बने?

अन्न के दाने मोटेतौर पर पेट भरने के काम आते हैं। उन्हें पीस कर आटा बनाया जाता है। आटे की रोटियोँ बनती और पेट में जाती है। पेट में पचने के बाद वह मल बनता और कचरे के ढेर में फेंक दिया जाता है। यही है उसकी सामान्य नियति।

किन्तु उसकी सत्ता को इतने तक ही परिसीमित मान बैठना भूल होगी। गंभीर पर्यवेक्षण करने पर उसके अन्य गुण भी प्रकट एवं और प्रत्यक्ष होते है। उसके अदृश्य अन्तराल में एक ऐसी क्षमता भी होती है जिसका प्रयत्न पूर्वक जागरण करने से वह निष्क्रिय से सक्रिय, निर्जीव से सजीव होने लगती हैं। बीज की तरह उसे प्रयुक्त किये जाने पर अपने आकार की वृद्धि करता है। उसके जीवन तत्व बढ़ जाते हैं। उर्वर भूमि का अंश सोखता है और अपने कलेवर के एक कक्ष से अंकुर फोड़ता है।

खाद पानी की अनुकूलता होने पर वह अंकुर बढ़ता है। पौधे के रूप में विस्तार करता है। उसे यदि पशु-पक्षियों द्वारा चर न लिया जाय तो क्रमशः बढ़ता ही रहता है। बढ़ोत्तरी दीर्घकाल तक चलती ही रहती है। समयानुसार परिपक्वता आती है और प्रौढ़ता प्राप्त वृक्ष फूलना-फलना आरंभ कर देता है। यह प्रतिक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि उसका अन्तकाल नहीं आ जाता।

फूल वातावरण को सुवासित करते है। अपनी सुन्दरता से उधर से गुजरने वालों का मन मोहते हैं। तितलियों, मधु–मक्खियों और भ्रमरों के लिए उपयोग का, आकर्षण के केन्द्र बनते है। इसके उपरान्त उनके फलित होने की बारी आती है। फल, पक्षियों-मनुष्यों का आहार बनते हैं। उपभोक्ताओं के पोषण का निमित्त कारण बनते हैं। उन फलों के मध्य में एक या अनेक ऐसे बीच होते हैं जो परिपक्व होने पर वैसी ही सृष्टि आरंभ कर देते हैं, जैसी कि उनके पिता पितामह ने वंशवृद्धि के लिए अपने को प्रस्तुत समर्पित किया था। इन बीजों में से हर एक में अपने पूर्वजों की भाँति प्रत्यक्ष और परोक्ष गुण होते हैं। प्रत्यक्ष में उनका उपयोग साधारण आवश्यकताओं की पूर्ति में हो जाता है। परोक्ष रूप से उनमें अपने को विकसित करने की, आकार की विशालता धारण करने की क्षमता होती है। इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि प्रत्येक बीच वृक्ष बन ही सकेगा। यदि उसका उपयोग सामान्य रीति से हुआ तो वह किसी प्राणी का आहार ही बन सकता है। चलते चलाते दुर्गन्धित कचरे के रूप में ही परिणत हो सकता है। असामान्य स्तर प्राप्त करके वृक्ष रूप में विकसित होना उसका सौभाग्य है। इस स्थिति में वह अपना मूल्य असंख्य गुना बढ़ा लेता है। छाया, ईंधन, प्राणवायु, भू-संरक्षण, भवन बनाने का माध्यम, आदि के रूप में अपना गौरव प्रदर्शित करता है। उद्यान के रूप में धरती की शोभा बनता है। इतनी प्रगति हो तभी पाती है जब बीज की अंतर्निहित क्षमता को विकसित करने का अवसर मिले। उपेक्षित रहने पर तो वह सड़, घुन जाता है और अपनी सामान्य उपयोगिता तक खो बैठता है। उसका बाजारू मूल्य एकाकी और सामान्य रहने पर नगण्य बन कर ही रह जाता है।

मनुष्य का सामान्य स्वरूप तुच्छ है। वह हाड़, माँस का चलता फिरता बोलता, सोचता पिटारा भर है। उसका जीवन इस कुचक्र की धुरी पर घूमता रहता है कि जीवित रहने और वंश परम्परा को बनाये रखने के लिए श्रम करें। समय लगाये। बहुत हुआ तो दूसरों से अधिक समझा जाने की महत्वाकाँक्षाओं में से किसी को चुने, अपनाये और उनके निमित्त असाधारण प्रयास करते हुए उस विधा को भी अपनाये जिसे अन्याय अपराध, कुकर्म, पाप आदि नामों से जाना जाता है। महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति इसके बिना हो नहीं सकती। ऊँचा भवन बनाने के लिए समतल भूमि ही उपयुक्त पड़ती है। ऊबड़-खाबड़ भूमि पर भवन नहीं बन सकता। इसी प्रकार महत्त्वाकाँक्षाएं जो शरीर के साथ जुड़ी रहती है। मन क्षेत्र में संस्कारों का भवन नहीं बनने देतीं। लिप्सा वासना, तृष्णा, अहंता से कुछ प्रसन्नता शोभा शरीर को ही प्राप्त होती है इस एक पक्षीय बढ़ोत्तरी में आत्मा की तो उपेक्षा ही होती रहती है। उसे वह अवसर मिल नहीं पाता जिसके आधार पर सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म की धरोहर का सही उपयोग बन पड़े। अपूर्णता दूर करने का पुरुषार्थ और परमार्थ संचय का पुण्य ही आत्मा की तुष्टि-पुष्टि और शान्ति का आधार है। पर उसे कर पाने का अवकाश ही कहाँ मिलता है? सारतत्त्व को आवश्यकताएं और आकाँक्षाएं ही निगल जाती है। खिलवाड़ में ही आयुष्य खप जाती है। वैसा कुछ बन नहीं पड़ता जिसे महत्त्वपूर्ण कहा जा सके।

जीवन सम्पदा को पशु-प्रवृत्तियों में पेट प्रजनन में समाप्त कर देने का तात्पर्य है कि उसकी स्थूलता ही कार्यान्वित होती रहे। सूक्ष्मता को विकसित होने का अवसर नहीं मिला। बीच का स्थूल कलेवर किसी का आहार भर बनता है। बीच का स्थूल कलेवर किसी का अहार भर बनता है। अपना श्रेय सम्पादित करने की गरिमा का उसे दर्शन भी नहीं हो पाता। इसे दयनीय और दुर्भाग्यपूर्ण नियति ही कहा जा सकता है। जिसका अन्त कचरे के रूप में हो उसे अभागा नहीं तो और क्या कहा जाय?

सौभाग्य का उदय उस स्थिति से आरंभ होता है जिसमें बीच को अपनी अन्तरंग क्षमता को विकसित करने का अवसर मिले। यह उपलब्धि तब हस्तगत होकर जब अन्तर्मुखी बना जाय। अन्तरंग क्षमताओं को समझा और उभारा जाए। मूढ़ता छाई रहे तो यह निरीक्षण पर्यवेक्षण किसी प्रकार संभव हो सके।

प्रत्यक्षतः मनुष्य नर वानर है। उसका शरीर कुदकता और मन फुदकता रहता है। इस उछल कूद की बाल-क्रीड़ा में ही समय बीत जाता है और जीवन का मृत्यु की गोद में अन्त होता है। इसके उपरान्त अन्धकार ही अन्धकार अवशेषों को भी दुनिया कही हलचलें कुछ ही समय में समाप्त कर देती है। न कुछ अपने लिए बन पड़ता है और न दूसरों के निमित्त ऐसा कुछ हो पाता है, जिसे अभिनन्दनीय और अनुकरणीय कहा जा सके।

सामान्य तक सीमाबद्ध रहना मनुष्य का अविवेक और दुर्भाग्य है। हीरक को काँच के समान कौड़ी मोल का बना देने के समान है, समझदारी का उदय आरंभ तब माना जाना चाहिए जब अन्तर्निहित क्षमता को समझने और जानने का सुयोग तलाश जाय। आहार बनने और कचरे में अन्त करने की अपेक्षा बुद्धिमत्ता इसमें है कि बीज बनकर उगने और वृक्ष बनने का महत्व समझा और विधान अपनाया जाय। बड़प्पन इसी में है। सुयोग और सौभाग्य भी इसी दिशा-धारा के साथ जुड़ता है। यह अवसर हर किसी के हाथ में है कि वह अपने अन्तरंग को विकसित करके देवोपम श्रेय प्राप्त करे या कचरे की दुर्गति का चयन करें।

बीच अचेतन है, उसकी स्वेच्छा को कोई मूल्य नहीं। मालिक ही उसका जैसा चाहे उपयोग कर सकता है, किन्तु जीवात्मा को यह विशिष्टता प्राप्त है कि वह इच्छानुसार जिस भी दिशा को अपनाये। इच्छित मार्ग पर चले। अपनी नियति को भली-बुरी चाहे जैसी बनाये। सुयोग या सदुपयोग इसी में है कि जीवन को चंदन-वृक्ष, कल्प-वृक्ष की तरह विकसित, सुन्दर और सौभाग्य सम्पन्न यशस्वी बनाया जाय।


ईसा ने कहा (Kahani)

एक आदमी यरूशलम से यरीहो को जा रहा था, डाकुओं ने उसे घेर कर उसके कपड़े उतार लिये। उसे मार-पीटकर वे अधमरा करके छोड़ गये। एक पादरी वहाँ से निकला। वह उसे देखकर कतराकर चला गया। एक लेबी भी उधर से निकला। वह भी उसे देखकर कतराकर चला गया। तब आया एक सामरी। उसने उस घायल को देखा, तो उसे उस पर तरस आया। उसने उसके घावों पर तेल लगाया। दाख का रस डालकर पट्टी बाँधी। उसे अपनी सवारी पर चढ़ाकर सराय में ले गया और उसने उसकी सेवा टहल की। दूसरे दिन उसने दो चाँदी के सिक्के निकालकर भटियारे को दिये और कहा - इसकी ठीक ढंग से सेवा टहल करना। जो कुछ तेरा और लगेगा, वह मैं लौटने पर तुझे भर दूँगा। बता, इन तीनों में से उस घायल का पड़ोसी कौन ठहरा? ईसा ने पूछा। वह बोला - “वही जिसने उस पर दिया दिखायी।” ईसा ने कहा - “जा, तू भी ऐसा ही कर।”


सविता के रूप में इष्ट का निर्धारण

उपासना मनुष्य जीवन की एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। संसार की विषमताओं और जीवन की विपन्नताओं के बीच वह अपने आपको असहाय अनुभव करता है। प्रतिकूलताओं से अपने बलबूते निपट न पाने पर उसे किसी ऐसे समर्थ साथी की आवश्यकता है जो उसका साथ दे सके, हाथ बंटा सके। भले ही दूरवर्ती या अदृश्य ही क्यों न हो?

असफलताएं और प्रतिकूलताएं मनुष्य को तोड़ देती हैं, इस स्थिति से उबरने के लिए कोई आशा की किरण चाहिए जो खोये हुए को पुनः वापस दिलाने कहा आश्वासन दे सके। इसी प्रकार आतंक और आक्रमण से तिलमिला जाने पर ऐसे न्यायनिष्ठ की खोज की जाती है जो आहत के बदले प्रतिशोध ले सके।

सृष्टि संरचना और गतिविधियोँ में भी ऐसी विषमताएं पाई जाती है जो तूफान, भूकम्प, बढ़ जैसी अप्रत्याशित घटनाओं के घटित होने पर कोई स्पष्ट कारण नहीं बतातीं। मनुष्य हतप्रभ हो जाता है। जब भी अनसुलझी गुत्थियों के पीछे ईश्वर की मर्जी खोजनी पड़ती है और वैसा कुछ दिन अपने ऊपर न आ पड़े इसलिए भी ईश्वर की शरण लेनी पड़ती है। मरने के बाद परलोक के संबंध में मनुष्य अपने को समर्थों असमर्थ अनुभव करता है। सोचता है कि वहाँ कि परिस्थितियाँ ईश्वर की इच्छा से ही प्राप्त हो सकती है। वर्तमान जीवन में भी कठिनाइयों के समाधान और सुविधाओं के संवर्धन में ईश्वर की अप्रत्याशित सहायता मिल जाने की अपेक्षा रहती है।

कितने ही भावुकजन किसी सर्व समर्थ की मैत्री एवं अनुकम्पा चाहते हैं, इसलिए भी उन्हें उपासना का आश्रय लेना होता है। विचारवान अपने चारों और घिरे हुए वातावरण का कोई कर्ता ढूँढ़ते हैं और वह ईश्वर ही दृष्टिगोचर होता है। कइयों को इस चमत्कारी सृष्टि रचना का निमित्त कारण ईश्वर ही दीखता है और उसकी मनुहार करने - भेंट पूजा का आश्रय लेने में ही अपनी भलाई दीखती है। शास्त्रकारों और आप्तजनों ने सृष्टा की प्रशंसा में - उसकी सत्ता प्रतिपादन में - बहुत कुछ कहा है। इसके अतिरिक्त भजनानंदियों का भी एक बड़ा समुदाय है। जिनकी गतिविधियों से सामान्य जन प्रभावित होते हैं और अनुकरण में बुद्धिमता सोचते हैं। ऐसे ही अनेक कारण हैं जो आस्तिक होने की प्रामाणिकता प्रकट करने के लिए ईश्वर पर विश्वास करते और उसका अवलम्बन लेते हैं। संसार में अधिकाँश जनों की मनःस्थिति ऐसी ही है। डावां–डोल चित्त वाले और भजन न करने वाले भी प्रत्यक्षतः अपने को नास्तिक नहीं कहते हैं। दोष लगाना हो तो पुजारियों पर लगाते हैं। दोषारोपण ईश्वर पर नहीं करते।

इतने पर भी एक बड़ी कठिनाई यह है कि आस्तिक वर्ग के लोग ईश्वर को एक मानते हुए भी उसके अनेक रूप गढ़ लेते हैं और अपनी-अपनी मान्यता पर इतना अधिक बल देते हैं कि दूसरों के निर्धारण को झूठा कहना पड़े। सम्प्रदायों के बीच आये दिन मचे रहने वाले कलह का एक बड़ा कारण यह भी है कि वे ईश्वर की आकृति और प्रकृति के संबंध में अत्यधिक भिन्नता मानते हैं।

अच्छा होता कि ईश्वरवादी और अनीश्वरवादी दो ही पक्ष रहते। कम से कम आस्तिकों को तो ईश्वर के स्वरूप एवं मन्तव्य के संबंध में एक मत होना चाहिए था। उतना भी न बन पड़ने से अनीश्वरवादियों के तर्क ही भारी पड़ते हैं। और बहुमत में होते हुए भी आस्तिक अपने मतभेदों और विग्रहों के कारण हलके पड़ते हैं। अच्छा हो समय रहते यह भूल सुधार ली जाय जैसा कि उसे एक माना जाता है, वैसे ही उसका ऐसा स्वरूप भी निर्धारित कर लिया जाय जिससे एकता की दिशा में आस्तिक समुदाय का बढ़ चलना संभव हो सके।

विचारने पर ऐसा स्वरूप ‘सूर्य’ के रूप में निर्धारित करना अधिक युक्ति संगत प्रतीत होता है, क्योंकि जीवन उसी से आता है और हम सब उसी के आश्रय में अपनी अधिकाँश आवश्यकताएं पूरी करते हैं। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दी रिडल आफ दी यूनिवर्स” में प्रख्यात विद्वान अर्नेस्ट हैकल ने लिखा है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व सूर्योपासना का क्रम प्राकृतिक देव शक्ति के रूप में ही चलता था। आधुनिक खगोल भौतिकी की मान्यताओं के अनुसार भी हमारी पृथ्वी सूर्य से निकला हुआ एक टुकड़ा है, जो कुछ हजार वर्षों बाद उसी की गोद में चली जायगी। शरीर विज्ञानियों का कहना है कि पृथ्वी पर जीवन की जो संभावनाएं दृष्टिगोचर हो रही हैं, सूर्य के ही फलस्वरूप हैं। इसलिए इसे इस सृष्टि का जीवनदाता कहा गया है। धरती पर जीवन का मूलस्रोत ‘प्रोटोप्लाज्म’ को माना जाता है। यहाँ तक कि अजैविकीय पदार्थ, पानी, कार्बनिक एसिड तथा अमोनिया जैसे सम्मिश्रण भी सूर्य से प्रभावित होते हैं। इसी कारण सूर्य की पूजा उपासना करने का विधान आदि काल से चला आ रहा है। सूर्य की पूजा करने वालों को लोग उत्कृष्ट श्रेणी का समझते थे। प्रकाशमान स्वर्णिम सूर्य की उपासना अभी भी विश्व के अनेक भागों में की जाती है।

ईश्वर के संबंध में सर्वाधिक प्रयोग ‘प्रकाश- का होता है। कोई आकाश में मानते हैं। प्रकाश का प्रतीक सूर्य को माना जाना अधिक तर्क संगत है। वह साकार भी है और निराकार भी। दिन में साकार हो जाता है और रात को निराकार। फिर दिन में भी उसका प्रत्यक्ष स्वरूप ही दृष्टिगोचर होता है। उसके अगणित प्रभाव बुद्धि से या उपकरणों से ही जाने जा सकते हैं। प्रकाश का चिन्तन करते ही ऊर्जा और गति का तारतम्य उसके साथ जुड़ा हुआ स्पष्ट होता है। इन्हीं की हमें प्रधानतया समर्थ जीवन के लिए आवश्यकता भी है। बुद्धिमता को भी ज्ञान रूपी प्रकाश में गिना जाता है। यह सारी विशेषताएं सूर्य में सन्निहित मानी जाती है।

इष्ट का निर्धारण या ध्यान करने मनुष्य उसी ढाँचे में ढलता है। यही उपासना का दर्शन है। ईश्वर को हम साकार न मानते हों तो निराकार प्रकाश पुँज के रूप में सविता के रूप में मानें, उसके तमोनाशक-पापनाशक, आनन्दकारक सद्गुणों को जीवन में उतारने का प्रयास करें तो ईश उपासना निश्चित ही फलीभूत होती है।


विज्ञानवेत्ता से पूछा (Kahani)

एक दार्शनिक, एक राजनेता एवं एक विज्ञानवेत्ता एक ही नाव में गंगा के पार जा रहे थे। मल्लाह ने राजनेता से पूछा - कृपया मुझे बतलाइये कि मनुष्य का क्या धर्म है? राजनेता बोला - तुम न तो मनुष्य हो और न तुम्हारे भीतर बुद्धि है, फिर धर्म का तुमसे क्या सरोकार? हमें वोट दो हम तुम्हारे कष्टों का निवारण करेंगे।

मल्लाह ने यही प्रश्न विज्ञानवेत्ता से पूछा। वह कहने लगे - अज्ञानियों का भी कभी कोई धर्म होता है क्या? तुम्हारे प्रश्न पर मुझे हँसी आती है कि तुम्हें भी धर्म चाहिए।

अब दार्शनिक की बारी थी। वह मल्लाह के प्रश्न से झुंझलाकर बोला - तुम्हारी यह तामस देह और इसमें धर्म की अपेक्षा? पहले कर्मफल भोग लो, फिर धर्म की आशा करना।

मल्लाह का मन विचलित हो उठा। उधर नाव भी मझधार के एक जल भंवर से नहीं बच सकी। आगे बढ़ने के बजाय वह वहीं चक्कर काटने लगी। मल्लाह ने घबरा कर तीनों यात्रियों को सूचना दी कि नाव डूबने वाली है, जिसको तैरना आता हो, वह नाव से कूद पड़े। किन्तु वहाँ तो किसी पर भी तैरना नहीं आता था। मल्लाह को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये लोग तैरना नहीं जानते, जो नदी भी पार नहीं कर सकते, वे भव सागर कैसे पार करेंगे? साथ ही उसे दया भी आ गयी। तीनों प्राण बचाने का प्रश्न था। क्या इस प्रश्न का उत्तर मानव धर्म नहीं है? तो फिर उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। उसके भीतर अपूर्व जीवत और शक्ति जाग उठी। उसने जी जान से डांड चलाये। नाव भंवर के पार हो गयी। तीनों को किनारे पर उतार कर वह जैसे उन्हें सुनाते हुए बोला - मनुष्य दूसरों के संकट निवारण में अपने को भूल जाये, यही मानव धर्म है क्योंकि मनुष्य को इससे ज्यादा खुशी और किसी बात से नहीं होती।


दूरदर्शी विवेकशीलता “धीः”

(दिसम्बर 87 अंक से आगे)

सातवाँ चिन्ह धर्म का धीः है। धीः अर्थात् समझदारी, बुद्धिमानी। लोक व्यवहार में तो इन्हीं के सहारे काम चलता है। अनगढ़ बिखरी परिस्थितियों में से जो अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप हैं उन्हें चुन लेना। जो चुना जाने को है उसके लाभ हानि, उचित अनुचित के हर पक्ष पर गंभीरतापूर्वक ऐसा विचार करना, जिसमें गलत चयन करने का बाद में पश्चाताप न करना पड़े। बुद्धिमान ही इस मेले में से अपने काम की सही चीज चुन पाते हैं अन्यथा इस सुविस्तृत मेले में ऐसे आकर्षणों की भरमार है कि हर वस्तु ललचाती है और अपने ऊपर मक्खी की तरह टूट पड़ने का इशारा करती है। उस भ्रम - जंजाल में भटक जाने वाले खरीदते और कड़ुवापन चख कर फेंकते रहने में ही जिन्दगी के दिन पूरे कर लेते हैं।

अक्लमन्द तो कभी-कभी धूर्तता, चतुरता, उच्छृंखलता और अपराधी दृष्प्रवृत्तियों के साथ भी साझीदारी कर लेते हैं। ऐसी दशा में जो जितना अक्लमंद है वह उतना ही धूर्त, ठग अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनाता है और धोखेबाजी विश्वासघात के नये-नये तरीके ढूँढ़ निकालता है। उक्त के सहारे बुरी से बुरी बात के समर्थन में भी तर्क दिये जा सकते हैं। मन ऐसा वकील है जो किसी भी पूर्वाग्रह की वकालत इस तरह कर सकता है कि झूठी बात भी सच प्रतीत होने लगे और सच्चाई के औचित्य पर संदेह उठने लगे।

जेलखानों में जाकर वहाँ बन्द अपराधियों से भेंट मुलाकात की जाय तो प्रतीत होगा कि दुनिया की आधी अभी चतुरता, अक्लमंदी इसी वर्ग के हिस्से में आई है और दुनिया ने उसे स्वतंत्र विचरण करने तक से रोक दिया है। इनके कृत्यों की कथा सुनी जाय तो प्रतीत होगा कि वे चकमा देने और दुस्साहस दिखाने में कमाल ही करते रहते हैं। ऐसी अक्लमन्दी को धिक्कारा ही जा सकता है उसकी तुलना में मूर्ख कहे जाने पर सरल सीधे लोगों की प्रशंसा की धर्म धारणा की सातवीं धारा “धीः” नीति समर्थक और भावी परिणामों का सही चित्र खींच सकने वाली उस दूरदर्शी विवेकशीलता से है जो मनुष्य को भौतिक क्षेत्र में राजहंस और अध्यात्मक क्षेत्र में परमहंस बनाती है।

साधारण हंस तो तालाबों में रहते और कीड़े, मकोड़े खाते रहते हैं। पर राजहंसों के बारे में कवि कल्पना यह है कि वे नीर क्षीर का विश्लेषण और पृथक्करण कर सकते हैं। दूध और पानी मिला हुआ हो तो वे केवल दूध पियेंगे। और पानी को छोड़ देंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि अगणित प्रतिपादनों, क्रिया-कलापों का कोलाहल कितना ही क्यों न मचा रहे वे उस जंजाल में से उसी को चुनते हैं जो आदर्शों की कसौटी पर शत-प्रतिशत खरे उतरते है और जिनका उच्चस्तरीय मेधा, प्रज्ञान समर्थन करती है। इसके अतिरिक्त जो तर्क और उदाहरण घटिया दर्जे के होते हैं। उनका सहज तिरस्कार करते हैं।

राजहंसों की एक और भी विशेषता है कि वे मोती ही चुगते है। कीड़े मकोड़ों के लिए चोंच नहीं खोलते। कवि कल्पना के इस राजहंस का कृत्य हर दृष्टि से सराहनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। हमारी उपभोग्य सामग्री शालीनता की कसौटी पर सर्वथा खरी और सही होनी चाहिए। मोती की प्रतिष्ठा इसी रूप में है। वह दिव्यलोक से बरसने वाली स्वाँति बूँदों का ही अनुदान है। राजमुकुटों में धारण किया जाता है। उसकी चमक साधारणतया उतरती नहीं।” राजहंस अपना आहार इन्हीं मोतियों को बनाता है अन्यथा भूखा मर जाता है। कीड़े मकोड़ों के लिए चोंच नहीं खोलता। इस समूचे दृष्टान्त का तात्पर्य इतना ही है कि मेधावान् विवेकशीलों की सद्बुद्धि ही सराहनीय है वह चिन्तन क्षेत्र पर आच्छादित रहनी चाहिए।

आम आदमी तात्कालिक लाभ को देखता है और यह भूल जाता है कि इसका दूरगामी परिणाम क्या हो सकता है? दूरदर्शी आज के घाटे की परवाह नहीं करते और भावी सत्परिणामों को देखते हुए पूँजी रूप में अपनी समूची क्षमता को दाव पर लगा देते हैं। किसान यही करता है वह निरन्तर जुताई, बुआई, निराई, सिंचाई, रखवाली में लगा रहता है और इसके निमित्त घर की पूँजी भी खर्च कर डालता है। किन्तु समय आने पर जब फसल पकती है तो उसके कोठे अनाज से भर जाते हैं और सम्पदाजन्य सुख और यश उसे मिलता है।

विद्यार्थी को भी यही करना पड़ता है। प्रथम कक्षा से लेकर एक.ए. करने की अवधि में उन्हें चौदह वर्ष का समय एकनिष्ठ होकर लगाना पड़ता है। यह समय राम वनवास के चौदह वर्षों की तरह कटता है। इस अवधि में खाने-पहनने, पुस्तकें खरीदने, फीस चुकाने में काफी खर्च भी पड़ता है। पर शिक्षा पूरी करने के उपरान्त जब उसे विद्वान कहा और अफसर जैसे उच्च पद पर प्रतिष्ठित किया जाता है तब पता चलता है कि दूरदर्शिता किसे कहते और उसमें आरंभिक पूँजी नियोजन का प्रावधान क्यों हैं?

पहलवान लम्बे समय तक कसरत करता पौष्टिक भोजनों का खर्च उठाता और संयम बरतता है। तब कहीं समयानुसार परिपुष्ट होकर दंगल जीतता और यशस्वी बनता है। व्यापारी को कारखानों का ढाँचा खड़ा करने में अपनी पूँजी झोंक देनी पड़ती है और आवश्यकता पड़ने पर कर्ज भी लेना पड़ता है। पर जब यह सब हो चुकता है तो कारखाना चल निकलने और मुनाफे से तिजोरी भरने का अवसर मिलता है।

यदि किसान ने बीज को भुना कर चबेना बना लिया होता, विद्यार्थी फीस न देकर सिनेमा देखता और पहलवान उस साधना से बचकर आवारागर्दी के गुलछर्रे उड़ाता, व्यापारी कारखाने में लगने वाला धन एयाशी में उड़ा देता तो इन सब का भविष्य अन्धकारमय ही बनता। भले ही आरंभ में वे शौक-मौज का मजा चख लेते।

दूरदर्शिता और अदूरदर्शिता का अन्तर यही है। इसी को सच्चे अर्थों में बुद्धिमता एवं मूर्खता समझा जाना चाहिए। विवेकशील दूरदर्शी ही सच्चे अर्थों में बुद्धिमान है। जिन्हें सिर्फ आज का मजा दीखना और भविष्य में अन्धकारमय बनने की कोई चिन्ता नहीं होती, उन्हें उस मंडली द्वारा भी तिरस्कृत होना पड़ता है, जो आरंभिक दिनों में उस आवारागर्दी को प्रोत्साहन प्रदान करते थे और स्वयं भी सम्मिलित रहकर दूसरे की अंगीठी पर रोटी सेकते थे।

नशेबाजी जैसे अनेकों प्रकरण ऐसे है जो लत लगाने के दिनों में बड़े मजेदार प्रतीत होते हैं पर वे जब आदत बनकर स्वास्थ्य, धन, यश, परिवार आदि को जर्जर कर लेते हैं तब भूल का पता चलता है। तब तक यह पिशाच ऐसी मजबूत सवारी गाँठ चुका होता है जिससे पीछा छुड़ाना फिर संभव ही नहीं रहता। यह तात्कालिक लाभ की दृष्टि है। व्यभिचार भी इसी श्रेणी में आता है। इश्कबाजी के आरंभिक दिन कितने मधुर लगते है पर कुछ ही दिन बाद जब सब और से भर्त्सना आ प्रताड़ना बरसती है तब पता चलता है कि आरंभ का मौज मजा इतना महत्वपूर्ण नहीं है। जितना कि भविष्य में दुष्परिणाम सहने से पश्चाताप।

दूरदर्शी विवेकशील भौतिक जगत में प्रगति समृद्धि प्रतिष्ठा और सफलता से ही महान बने है। उनने यश कमाया मान पाया, आभा पायी और सुख उठाया है किन्तु जो अदूरदर्शी है जिन्हें आज का लाभ ही सब कुछ दीखता है वे वंशी में फँसने वाली मछली, जाल में तड़पने वाली चिड़िया और चासनी में पर फंसकर बे मौत मरने वाली मक्खी का उदाहरण बनते है।


एक दिन पहलवान बनूँगा (Kahani)

एक दुर्बल और रोगी लड़का अपने पिता से बोला-पिताजी में एक दिन पहलवान बनूँगा। पिता ने व्यंग्य में उत्तर दिया - बेटा जरूर पहलवान ही नहीं दुनिया के सबसे बड़े पहलवान बनोगे। पासवर्ती लोग हंस पड़े पर लड़का उपहास सहकर भी निराश न हुआ। नियमित व्यायाम प्रारम्भ किया और एक दिन सचमुच ही न केवल अच्छा पहलवान ही बना वरन् कसरत की अनेक विधाएं पी0टी0 के अभ्यास बनाने के कारण सैण्डो के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


उच्चतम ज्ञान का उद्गम स्त्रोत - वेदान्त

वेदान्त दर्शन में भारतीय तत्व ज्ञान की अनुपम व्याख्या की गयी है। दार्शनिक विचारधारा की इस शाखा में भारतीय चिन्तन का सार समाविष्ट है। इसमें अपने आप में पूर्ण समग्रता। वेदों के अन्तिम खण्ड ज्ञान-काण्ड में निहित 208 उपनिषदें ही इस चिन्तन धारा की गंगोत्री अर्थात् उद्गम स्त्रोत हैं। यहीं से चिन्तन की यह भागीरथी अजस्र स्रोतों में प्रवाहित होती हैं।

वेदान्त में निहित तत्व ज्ञान का एक “सार्वभौमिक सिद्धान्त” कि मूल सत्ता एक ही है। यही सारी सृष्टि का स्त्रोत और आधार है। यह सत्ता सार्वभौम और सर्वव्यापक है, इसी के प्रकाश में समस्त अस्तित्व उद्घाटित और प्रकाशित होता है। इसी परम सत्ता को ज्ञानी-मनीषी भिन्न नामों से पुकारते हैं। ईसाइयों का गाॅड, पारसियों का आहुरमज्द, यहूदियों का जेहोवा, मुसलमानों का अल्लाह या खुदा, बौद्धों का शून्य, आर्यों का ब्रह्म एक ही शाश्वत सत्य के विविध नाम है। वेदान्त की शिक्षा - “एकसद् विप्रा बहृधा वदन्ति” इन सबमें अद्भुत सामंजस्य स्थापित करती है। इसी परम सत्य को आधुनिक काल के चिन्तकों जैसे, शोपेनहावर ने इच्छा हर्बर्ट सपेसर ने अज्ञेय, स्पिनोजा ने सबस्टेन्शिया, प्लेटो ने शुभ आदि के द्वारा इंगित किया है। यह दिव्य सत्ता संसार में संव्याप्त होते हुए भी सब से परे है।

इसकी तत्व ज्ञान, सभी को अमृतस्य पुत्रः का संबोधन देते हुए सभी को परमात्म स्वरूप घोषित करते हुए बताता है “त्व स्त्री त्वं पुमानासि त्वं कुमार उत्तवा कुमारी”। त्वं जीर्णां दण्डेन वण्चसि त्वं जातो भावसि विश्वतोमुखः॥ अर्थात् विश्वतोमुख परम सत्ता ही स्त्री, पुरुष, बूढ़े, बच्चे आदि सभी स्वरूपों में अभिव्यक्त हो रही है। इसकी दृष्टि में न तो कोई छोटा है न बड़ा न छूआ–छूत जैसा संकीर्ण भाव है न स्त्री के प्रति उपेक्षित हीन भावना। बिना किसी भेदभाव के जीवन का उद्देश्य और उसकी प्राप्ति के मार्ग को दार्शनिक चिन्तन की यह धारा उद्घाटित करती है।

भगवान न तो किसी की रिश्वत से खुश होकर उसे सिंहासनारूढ़ करता है न ही किसी से नाराज होकर उसके लिए नर्क की व्यवस्था। स्वर्ग-नरक मनुष्य के अपने कर्मों के परिणाम है और किसी लोक लोकान्तर में न होकर यही पर हैं। महत्वाकांक्षी, धन-वैभव, इन्द्रिय लिप्साओं का गुलाम, विषयों के दास होकर हम स्वतः ही अपने लिए नरक का निर्माण करते हैं और दुखी होते कष्ट पाते हैं। सत्कर्मों में स्वयं को नियोजित कर आसक्ति, फलाकांक्षा से रहित उच्च उद्देश्यों में लगा, सत्य का जिज्ञासु उत्तम स्वर्गीय आनन्द का लाभ उठाता है। इस गुह्यतत्त्व को उद्घाटित करता हुआ वैदिक चिन्तन पुरुषार्थ हेतु प्रेरणा देते हुए निर्देश देता है -

“उद्धरेदात्मानपात्सानःनात्मानम् वसादयेत। आत्मे ह्यात्मनों, बन्धुरात्मैं, स्पुँरात्मनः॥

अर्थात् व्यक्ति को स्वयं प्रयत्नशील होना चाहिए। अपने उत्कर्ष का जिम्मेदार वह स्वयं है। उसके अपने ही सद्गुण मित्र और दुर्गुण शत्रु की भूमिका निभाते हैं। दूसरे शब्दों में मनुष्य अपना मित्र-शत्रु स्वयं है अन्य कोई नहीं।

पुरुषार्थ की प्रेरणा देते हुए यह “अभ्य” को सर्वोच्च गुण के रूप में मान्यता देता है। इसके अनुसार भय का कारण मात्र अज्ञान ही है, जैसे किसी को रस्सी में सर्प का भ्रमण हो जाय तो वह तब तक डरता रहेगा, जब तक यथार्थता से अवगत न हो। सत्य का ज्ञान सारे भयों को उसी प्रकार विनष्ट कर देता है जैसे कि प्रकाश अंधकार को। ज्ञान का रहस्य, भक्ति के रहस्य और कर्म के रहस्य को खोलते हुए उसमें अद्भुत समन्वय, असामंजस्य स्थापित करना, इस चिन्तन धारा की विलक्षणता है। ज्ञान का अवलम्बन लें, अर्थात् विवेक से निर्णित कर अपने स्वधर्म रूप कर्मों को अनासक्त भाव से, भावनापूर्ण हृदय से विराट पुरुष के लिए अर्थात् ‘उसकी अभिव्यक्ति रूप इस विश्व वाटिका को अधिकाधिक सुन्दर, परिष्कृत सुगढ़ बनाने पुष्पित, मंजरित करने में किया जाय तो यह उपासना का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप बन सकता है। छोटी-छोटी क्रियाएं भी भावना और विवेक के संयोजन से महत्वपूर्ण बन जाती है। इस प्रकार की उपासना करने के लिए न तो कही पलायन की आवश्यकता है न भागने की। संसार एक रंग-मंच की तरह है। इसमें अपनी भूमिका का निर्वाह भली प्रकार करें। यही सही ज्ञान है।

नीति-शास्त्र का सामान्य कथन है कि हम अपने पड़ोसी को उसी प्रकार प्यार करें जैसा कि स्वयं से। पर प्यार करें क्यों? नीति-शास्त्र के पास इसका कोई समाधान नहीं है। वेदान्त का चिन्तन उत्कृष्ट ढंग से इस गुत्थी को सुलझाते हुए कहता है - “तत्वमसि” अर्थात् समस्त में वही परम तत्व व्याप्त है। वेदान्त के इस भाव को मानने वाला पड़ोसी को इसलिए नहीं चाहेगा कि उसके ऊपर कोई अहसान कर रहा है अपितु पड़ोसी ही नहीं, सभी के लिए समान रूप से होगा। यही भाव “स्प्रिचुअल वननेस” आध्यात्मिक एकता का केन्द्रीय आधार है। इस दृष्टिकोण को स्वीकार करने वाला किसी को दुःख कष्ट पहुँचाने की तो दूर वह इस बारे में सोचेगा भी नहीं। वेदान्तिक ज्ञान विभिन्न मत मतान्तरों के बीच ही नहीं अपितु वास्तविक धर्म और विज्ञान के सच्चे स्वरूप के बीच समस्वरता व सामंजस्य का स्थापन करता है, जो आज की आवश्यकता है।

परम सत्ता एक ही है, चाहे हम किसी मत सम्प्रदाय को मानें। यही न केवल मनुष्यों, मनुष्येत्तर प्राणियों वनस्पतियों में जीवन का संचार करती है अपितु जड़ कही जाने वाली सृष्टि को भी गतिशील बनाती है। क्योंकि जड़ में भी माँलीक्यूलर एक्टीविटी, जैसे इलेक्ट्रान का घूमना आदि हलचल हरदम होती रही है। इसे भले ही लाइफ फोर्स, प्राण जैसे अन्यान्य नाम क्यों न दिए जाएं, पर इसका मूल कारण वैश्व चेतना ही है।

वेदान्तिक चिन्तन बौद्धों की तरह निषेधात्मक नहीं वरन् विधेयात्मक है। इस चिन्तन को समझकर-अपनाकर पूर्व काल में ऋषियों ने और आधुनिक काल में, सदाशिव ब्रह्मदेव, रामकृष्ण, विवेकानन्द, रामतीर्थ, अभेदानन्द आदि सन्तों ने अपने जीवन का समग्र विकास किया और परम सत्य से एकत्व पा सके।

प्रसिद्ध चिंतक एवं “पेरेनिय फिलासॉफी” के लेखक एल्डुअस हक्सले के अनुसार “वेदान्त परम सत्य की खोज का मार्ग प्रशस्त करता है। यह स्पष्ट करता है कि इस शाश्वत सत्य की खोज शुद्ध मन, और ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा संभव है। पूर्णता की प्राप्ति हेतु आवश्यकताओं की सुन्दर वेवेचना व्याख्या अन्यत्र दुर्लभ है।

क्रिस्तेफर ईशरउड अपने एक लेख “व्हाट वेदान्त मीन्स टू मी” में बताते है कि वेदान्त की शिक्षा ने मेरे हृदय में अभव का संसार किया। सही माने में मुझे ज्ञात हो सकता कि अपना सच्चा स्वरूप क्या है।

सुप्रसिद्ध लेखक जेराल्ड हर्ड बताते हैं कि भारतीय चिन्तनधारा का मुकुटमणि वेदान्त एक विचार विज्ञान है जिसमें, वैश्व सत्ता, अपनी वास्तविक प्रकृति एवं मानव के सच्चे स्वरूप को स्पष्ट किया गया है।

प्रख्यात विदुषी डॉ. मेरिआना मासिन वेदान्त की शिक्षाओं को हृदय, मन की शांति एवं पूर्णता की प्राप्ति के लिए अद्वितीय एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानती है। उनके अनुसार इसके विचार जीवन की गुत्थियों को सुलझाकर नूतन दिशा प्रदान करते हैं। इसके अंधविश्वास जैसा कुछ नहीं। चिन्तन की यह विधा, तर्क, नैयामिक दृष्टिकोण तथा अनुभूतियों पर आधारित है।

आँग्लदेश की रुथ फोलिंग का कहना है कि वेदान्त में निहित शिक्षाएं, आध्यात्मिक क्षेत्र के नक्शे की रेखाओं की तरह है जिन्हें उपनिषदों के ऋषियों ने बनाया है।

इस विचारधारा ने पश्चिमी विचारकों में क्रान्तिवादी, उन्हें इसकी यथार्थता का बोध हुआ। सुप्रसिद्ध विद्वान जेराल्ड साइकेस ने अपने एक लेख “टू रिंग इण्डिया एट ए डिस्टेंस” में बताया कि फिप्लिंग फ्रारस्टर, इमर्सन, काण्ट, ह्यूम ने उच्चतम सत्य के बारे में जो बताया है उसका उद्गम स्त्रोत वेदान्त ही है। पश्चिमी विचारकों में इसी के विचार प्रतिविम्बित हुए है।

निःसन्देह इसका महत्व असाधारण है। इसकी शिक्षाओं को अपने जीवन में, आचरण में अपनाकर व्यावहारिक रूप में क्रियान्वित कर कोई भी अपने वास्तविक स्वरूप को जो दिव्य हैं, उसे जानकर शाश्वत सत्य को एकत्व पाकर जीवन का परम लाभ अर्जित कर कृत-कृत्य हो सकता है।


सत्य और अहिंसा के परिपालन की सीमा!

सभी शास्त्रकारों ने सत्य और अहिंसा को धर्म का प्रधान स्वरूप माना है। किन्तु इन दोनों ही तथ्यों का मोटा अर्थ करने से अनेकों शंकाएं उठ खड़ी होती है। अतएव वे तनिक गहराई तक उतरकर उनके भावार्थ और व्यवहार को अधिक अच्छी तरह समझने की आवश्यकता होगी।

सत्य का मोटा अर्थ सच बोलना होता है। जो बात जैसी सुनी या समझी है, उसे उसी रूप में कह देना इसे सत्य–भाषण कहा जा सकता है। पर यह सत्य का एक बहुत छोटा अंश है। सत्याचरण इतने तक ही सीमित नहीं है। कभी-कभी सत्याचरण और सत्य–भाषण के बीच विरोध, विपर्यय भी खड़ा होता है और यह विचारना पड़ता है कि दोनों का साथ-साथ निर्वाह संभव भी है या नहीं।

चोर, डाकुओं, तस्करों, हत्यारों, षडयंत्रकारियों का पता लगाने के लिए सरकारी गुप्तचर विभाग को अपना छद्म परिचय देना पड़ता है और भेद निकालने के लिए भूमिका कई प्रकार से बनानी पड़ती है। शत्रु देश आक्रमण करने वाला हो और अपनी रणनीति का - साज सज्जा का पता लगाना चाहता हो ता बात ज्यों की त्यों नहीं बताई जा सकती। बता देने पर अपने देश का सर्वनाश हो जायगा और अगणित लोगों को धन-जन की हानि उठानी पड़ेंगी।

एक कथा आती है कि किसी कसाई के हाथ से छूटकर गाय भागती चली गई। पीछे कसाई ढूंढ़ता हुआ आ रहा था। उसने एक संत को कुटी के आगे बैठा देखा और पूछा आपने हमारी गाय इधर आती हुई देखी है क्या? संत क्या जवाब देते? यदि सच बोलते तो गाय की हत्या होती है और झूठ बोलते है तो पाप लगता है। इस धर्म संकट में उनने चतुरता से काम लिया। कहा “जिसने देखी है वह बोलता नहीं और जो बोलता है उसने देखी नहीं।” उनका तात्पर्य था कि आँखों ने देखी है, पर वे बोलती नहीं और जो जीभ बोलती है उसने देखी नहीं। इस कथन का तात्पर्य कसाई समझ न सका आगे बढ़ गया। गाय संत की कुटिया की पीछे ही चर रही थी। गाय के प्राण भी बच गये और वाक-चातुरी से असत्य कथन भी बच गया। भगवान कृष्ण के परामर्श से युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य ने पूछने पर कह दिया था कि “अश्वत्थामा मर गया” पीछे बहुत धीमी आवाज से कह दिया था। “नरोवा कुंजरोवा” यह तो इस नाम का हाथी मरा है या मनुष्य। जयद्रथ वध में श्री कृष्ण ने दिन डूब जाने पर भी नकली प्रकाश में रात को दिन बना दिया था। दुष्ट का हनन और सज्जन का संरक्षण होने से वह असत्य नहीं ठहराया गया।

कई व्यक्ति स्वयं व्यभिचारी होते हुए भी पत्नी से सत्य की दुहाई देकर उसकी गलती उगलवा लेते हैं और पीछे उसे असाधारण त्रास देते हैं। इसकी अपेक्षा तो वह बात को छिपा जाती तो दाम्पत्य जीवन के दोनों भागीदारों का जीवन शान्ति-सन्तोष का बना रहता।

विग्रह, कलह, अशान्ति, असंतोष, वैमनस्य उत्पन्न करने वाले, सत्य को भी असत्य को बुरा बताया गया है। वस्तुतः सत्याचरण के अंतर्गत न्याय और नीति की जीवन आता है। इसमें परिणाम को ध्यान में रखते हुए कुछ आगा पीछा करने की पूरी-पूरी गुंजाइश है। अकारण गप्पेबाजी में निंदा-चुगली में दुष्परिणाम के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले असत्य का ही निषेध है।

इसी प्रकार अहिंसा की व्याख्या और प्रयोग नीति अपनाने में भी विवेकशीलता को ध्यान में रखना होगा। वनस्पति में जीवन में होना सिद्ध हो चुका है। पानी में भी सूक्ष्म जीवाणु होते हैं और हवा में भी। इस सब में से किसी की भी हिंसा न होने देना तभी संभव है जब अपना जीवन समाप्त करना हो। यहाँ इतना ही संभव है कि जीवधारी संवेदनशील प्राणियों की ऐसे ही शिकार आदि विनोद के लिए अथवा माँसाहार के लिए प्राणी-वध न किया जाए।

शिर में जुएँ, खाट में खटमल, अन्न में घुन, नाली के कृमि, घर में बैठे साँप बिच्छू यदि न मारे जायँ तो फिर अपनी खैर नहीं। बढ़ने मक्खी-मच्छरों के लिए फिनायल चूना आदि का छिड़काव वर्जित नहीं है। बीमारियों के भी कीटाणु होते हैं, उन्हें औषधि से मारना पड़ता है। रास्ते में अनजाने ही कितने ही चींटी, कीड़े आदि मरते हैं। खेत की सिंचाई करने पर ढेरों दीमक मर जाती है, चूल्हा जलाने में भी कुछ न कुछ प्राणी मरेंगे। इन्हें बचाने का प्रयत्न करना अपने को संकट में डाल लेना है। अनिवार्य अथवा अनजान में होने वाली हिंसा को रोका नहीं जा सकता।

शत्रु का अपने देश पर आक्रमण हो तो उससे लड़ने में अपने अथवा शत्रु के पक्ष का रक्तपात होगा ही। चुप बैठे रहने पर तो जापान पर गिराये गये बमों की तरह अपना सब का सफाया जो जायगा। कहते है कि मिश्र के पिरामिड बनने में एक लाख करीब गुलामों को कोड़े खाते मरना पड़ा था। बिना प्रतिरोध के नृशंसों के ऐसे ही असंख्य अत्याचार होते रहेंगे। तब अहिंसा क्या काम देगी?

गाँधी जी के ‘करो या मरो’ आन्दोलन में अहिंसा निर्वाह नहीं हो सका। दोनों ही पक्ष के ढेरों आदमी मरे थे। अहिंसा नीति हो सकती है पत्थर की लकीर नहीं। बराबरी का मुकाबला न होने पर शस्त्र बल से लड़ा जाने वाला युद्ध सफल नहीं हो सकता था। ऐसी बेबसी में असहयोग, विरोध, सत्याग्रह जैसे ही उपाय कम जोखिम के और शत्रु को हैरान करके दबाने वाले हो सकते थे। यही उपाय अमेरिका की नीग्रो लूथर किंग ने भी अपनाया था। नीति की दृष्टि से यह साधना उपयुक्त थी, क्योंकि कुछ महीने के लिए जेल जाने के लिए हजारों सत्याग्रही मिल गये, पर हिंसा पर उतारू होने पर जो गोलीकाण्ड होते उसके लिए मुट्ठी भर लोग ही मुश्किल से तैयार होते। गाँधी जी के असहयोग सत्याग्रह आन्दोलन को उनकी नीति और धर्म का समन्वय माना गया। यों बीमारी में तड़पते हुए बछड़े को जहर की सुई लगा देने के लिए गाँधी जी ने ही डॉक्टर को परामर्श दिया था।

निजी जीवन में अहिंसा का पालन उस सीमा तक हो सकता है, जहाँ किसी भूले, अनजाने या कमजोर से वास्ता पड़े। खाने के लिए अथवा देवता पर चढ़ाने के लिए पशुबलि का निषेध किया जा सकता है। यह व्यक्तिगत जीवन को घरेलू नीति है। इसका यथासंभव अधिकाधिक पालन करना चाहिए। किन्तु यदि घर पर डाकू चढ़ आवें और बहिन, बेटियों से बलात्कार करने लगें अथवा अत्याचारपूर्वक धन का सामान का अपहरण करें तो उसका सामना ही किया जाना चाहिए। इसमें चाहे हिंसा ही क्यों न अपनानी पड़े।

सामान्यतया निजी व्यवहार में प्रेम का - उदारता का परिचय देना चाहिए। यही अहिंसा धर्म की मर्यादा है। उसे भी पत्थर की लकीर मान लेने से अनीति का त्रास सहना पड़ेगा और अत्याचारी का हौंसला बढ़ेगा। वह ऐसे-ऐसे अनेकानेक कुकृत्य करने के लिए उतारू हो जायगा।

अत्याचार करने की तरह अत्याचार सहना भी पाप है। यही एक नीति वचन सही है तो फिर अत्याचारी का सामना कैसे किया जाय, हाथ जोड़ने, गिड़गिड़ाने से, तो अहिंसक पशु तक नहीं रुकते, फिर मनुष्य कैसे मानेगा जिसके समुदाय में अधिकाँश निष्ठुर और निर्दयी ही भरे पड़े है। पुलिस, कचहरी और जेल का भय न हो तो दिन–दहाड़े कोई भी, किसी का भी, कत्ल कर सकता है। सामन्ती शासन के दिनों यही होता भी रहा है। डाकुओं के गिरोह बनाकर उनका सरदार राजा जागीरदार बन जाता था और चाहे जहाँ हमला करके सैकड़ों नव युवतियों, नव युवकों को गुलाम बना ले जाता था। विरोध करने पर कत्लेआम मचाता था। प्रजा के धन की लूट, लूट नहीं मानी जाती थी। ऐसी स्थिति में बदला लेने और दाँत खट्टे करने की छापामार नीति भी न अपनाई जाय तो आखिर क्या किया जाय? छत्रपति शिवाजी ने यही नीति अपनाई थी।

अहिंसा की अति, कायरता बन जाती है। वह मनुष्य को क्षमाशील, भाग्यवादी, भक्तजन बना देती है। उससे अपना और अपने समूचे समाज का अहित ही होता है। दुष्टता को इससे पोषण ही मिलता है।

सत्य और अहिंसा दोनों ही सराहनीय है। सामान्य जीवन में स्वभावतः इनका उपयोग किया ही जाना चाहिए। किन्तु यह भी समझा जाना चाहिए कि यह पत्थर की लकीर नहीं है। आपत्तिकाल में इनका उल्लंघन भी अपवाद स्वरूप किया जा सकता है।


Quotation

ह्लद्मह्य ष्द्धह् श्चह्नस्रद्म द्वद्यह्य॥द्मख्ब् ह्लद्मक्द्मह्य्न शद्द ब्द्मस्क ह्वद्दद्धड्ड द्यस्रह्द्म्न॥द्मद्धश"; स्रद्ध ष्द्मह् द्यद्मह्यश्चद्मह्य क्द्मस्द्भ द्वद्यह्य द्गख्ख्द्धह्द्गद्मह्व स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, क्द्मह्ल द्दद्ध द्यद्भह्लद्मद्ग ह्लह्नंकद्मक्द्मह्य्न


बुद्धि से परे विराट् का ज्ञान!

दृश्यमान संसार के संबंध में कई बातें कही जा सकती है। एक यह कि भगवान ने इस सृष्टि को अपने स्तर की खेल खिलवाड़ करने के लिए रचा है। एक यह कि इसके अंतर्गत काम करने वाले नियमोपनियम इतने संतुलित है कि एक दूसरे से बिना टकराये अपना रास्ता बनाते और तालमेल बिठाते रहते है।

यह भी कहा जा सकता है। कि प्रकृति के हर घटक में अनन्त शक्ति भरी पड़ी है पर वह प्रसुप्त स्थिति में रहती है। यदि वह किसी प्रकार जग पड़े तो पदार्थ से लेकर मनुष्य का प्रचंड शक्तिशाली हो सकता है।

जहाँ एक ओर नियम हैं, वहाँ साथ ही इसके अपवाद भी मौजूद हैं। ऐसी दशा में यही उचित है कि सृष्टि की उन समस्याओं को जो अविज्ञात हैं - खोजने के स्थान पर अपने कर्तव्यों और आधारों का चिन्तन करना पर्याप्त समझें, जो हमें किसी अनुभूत एवं सुनिश्चित दिशा की ओर ले जाती है।

बड़ी शक्तियाँ छोटी शक्तियों का शोषण करें, यह प्राकृतिक नियम नहीं। प्रकृति आश्रित को जीवन देने और उसके विकास में सहायता करने का कार्य करती है। ‘छोटी पीपल’ महत्वपूर्ण औषधि है वह अपना विकास किसी घने छायादार वृक्ष के नीचे ही कर सकती है। इलायची, नारियल के वृक्ष की छाया में बढ़ती है। बड़ा पेड़ अपने नीचे के छोटे पेड़ों को खा ही जाय यह सार्वभौम नियम नहीं है। धरती से सूर्य और चन्द्रमा दोनों बराबर दिखाई देते हैं पर वस्तुतः सूर्य चन्द्रमा की तुलना में 400 गुना बड़ा है। इतना ही नहीं पृथ्वी से चन्द्रमा जितनी दूरी है, उसकी तुलना में सूर्य की दूरी भी 400 गुनी अधिक है। यही कारण है कि पृथ्वी से दोनों का आकार लगभग समान दीखता है।

इसके अतिरिक्त एक नई बात और भी है कि चन्द्रमा का आकार क्रमशः हर पूर्णिमा से छोटा होता जाता है कारण कि वह पृथ्वी से दूर हटता रहता है। पृथ्वी का सूर्य ज्वार-भाटों के समय उसकी शक्ति खींचता रहता है इसलिए उसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का घटना भी दूर हटने का प्रमुख कारण है। बताया जाता है कि यह दूरी हर महीने 30 हजार मील बढ़ जाती है।

जब चन्द्रमा की दूरी इतनी बढ़ जायगी कि समुद्र में ज्वार-भाटे लाने योग्य न रहे तो वह एक स्थान पर रुक जायगा और दुर्बल होने पर पृथ्वी की आकर्षण शक्ति उसे वापस अपनी ओर खींचने लगेगी। उन दिनों धरती का अपनी धुरी पर घूमना भी धीमा पड़ जायगा। तब दिन भी बड़े होने लगेंगे और महीनों का विस्तार भी बढ़ जायगा। तब सूर्य और चन्द्र ग्रहण भी वैसे सघन न दीखेंगे जैसे अब दीखते हैं। हो सकता है तब महीना 40 दिनों का होने लगे और दिन भी ड्योढ़ा बढ़ जायगा। समुद्र में ज्वार न उठना भी उसके पानी को अस्वच्छ बनाता जायगा। पर यह सब जल्दी नहीं हो रहा है। उसमें अभी हजारों वर्ष लगेंगे।

न्यू कास्टल विश्वविद्यालय, इंग्लैण्ड के लूनर एण्ड प्लेनेटरी साइंस विभाग के मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. केथ रनकोर्न के अनुसार कुछ समय पूर्व इस पृथ्वी कक्ष में दर्जनों चंद्रमा दृष्टिगोचर होते थे। परन्तु 4.2 से 3.9 अरब वर्ष पूर्व उनमें से एक दो को छोड़कर सभी गिरकर धूलि में मिलते चले गये। चन्द्रमा के इस प्रकार पतन का कारण बताते हुए उनने कहा कि उन सबका विषुवत् वृत्त के चारों और परिभ्रमण - पथ अस्थाई एवं अव्यवस्थित था।

नवीनतम खोजों में अपने सौर-मण्डल के उपग्रहों की सदस्यता के बारे में बताया गया कि मंगल पर 2, बृहस्पति पर 12, शनि पर 1, यूरेनस पर 5 और नेपच्यून पर 2 चन्द्रमा भ्रमण करते हैं। मात्र हमारा एक चन्द्रमा ही सौरमण्डल का एक उपग्रह नहीं है। कुल मिलाकर इनकी संख्या 31 है। इनमें से सर्वाधिक तीव्रगामी चन्द्रमा की भी पहचान की गई है, जो प्रत्येक सात घंटे में एक बार बृहस्पति का चक्कर लगा लेता है। इस उपग्रह की भ्रमण गति 70400 मील प्रति घंटा अर्थात् पृथ्वी कक्ष में स्थित चन्द्रमा से तीन गुनी अधिक है।

खगोल विज्ञानियों ने सौर-परिवार के सबसे गरम पिण्ड - ‘आयो- को खोज निकाला है। ‘आयो- बृहस्पति का एक चन्द्रमा है जो अभी तक ज्ञात सभी उपग्रहों से सर्वाधिक गरम है अमेरिकी अंतरिक्ष यान वोयेजर द्वारा इन्फ्रारेड टेलिस्कोप से किये गये एक अध्ययन के अनुसार यह ग्रह पिण्ड करीब 701ग1012 वाँट ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है। जिस प्रकार पृथ्वी का चन्द्रमा समुद्र तल पर खिंचाव उत्पन्न कर उनमें ज्वार भाटे उत्पन्न करता है, उसी प्रकार बृहस्पति भी सम्पूर्ण ‘आयो’ पर एक प्रकार का अकर्षण बल आरोपित करता है, जिससे उसका आकार कुछ टेढ़ा हो जाता है। इस बल के कारण उसमें उत्पन्न झुकाव से गर्मी पैदा होती है और गर्भ में स्थित द्रव्य पिघल कर द्रव अवस्था में आ जाता है। द्रवीभूत सगंधक समय-समय पर चन्द्रमा के बाह्य पटल को छेदकर बाहर निकलता रहता है और ज्वालामुखी का कारण बनता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस चन्द्रमा में गर्मी उत्पादन और उत्सर्जन का एक चक्र चलता रहता है जिसके परिणामस्वरूप ज्वालामुखियों का निर्माण होता है। जिस समय गर्मी बढ़ती है, उस समय ‘आयो’ अत्यन्त ठंडा हो जाता है, क्योंकि उस वक्त इस तपन को वह अपने गर्भ में छिपाये रहता है जो आगामी ज्वालामुखी श्रृंखला के रूप में बाहर आ जाती है, जिसका अस्तित्व कई दशकों तक बना रहता है।

अन्तरिक्ष में सबसे समीपवर्ती तारा प्रथम किन्नरी है जो हमसे प्रायः चार प्रकाश वर्ष दूर है। यह सभी दृश्यमान तारक अपनी आकाश गंगा के सदस्य है। अपनी मंदाकिनी आकाश गंगा का व्यास प्रायः एक लाख, उसकी मोटाई 20 हजार प्रकाश वर्ष है। इस मंदाकिनी परिवार में प्रायः डेढ़ अरब तारे हैं। वे सभी तो अपनी दूरी या प्रकाश न्यूनता के कारण दीख नहीं पाते, पर उनमें से हजारों ऐसे है जिन्हें हमारी आँखें देख पाती है। रात्रि को वे ही आकाश में टँगे, घूमते और जगमगाते दीखते हैं।

तारों का भी अंत होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह तीन प्रकार से हो सकता है। यदि तारा सूर्य के आकार का है तो इसका हाइड्रोजन ईंधन समाप्त हो जायेगा और यह एक लाल महादैत्य के रूप में विस्तृत होकर धीरे-धीरे सिकुड़ जायेगा। अंत में ठंडा होकर काले पदार्थ के रूप में बदल जायेगा जो इतना भारी होगा कि एक माचिस के बराबर पदार्थ में टनों भरा हो। यदि वह सूर्य से कुछ बड़ा हुआ तो एक “सूपरनोवो” के रूप में फूट पड़ेगा। जो और सघन न्यूट्रान छोड़ेगा। जिन्हें खगोलविद् “पुल्सर” कहते हैं। जो हमेशा रेडियो किरणें तथा कभी-कभी प्रकाश छोड़ा करते हैं।

यदि तारक सूर्य से बहुत ज्यादा बड़ा होगा तो इसका अन्त एक तरह की रहस्यमय पहेली है। इसका विस्फोट विपरीत दिशा में हो। इसके न्यूट्रान्स इसके गुरुत्वबल को सहन न कर सके। सभी कण पिसकर नष्ट हो जायं, जिन पर भौतिकी के नियम लागू न किये जा सकें। जिसे “ब्लैक होल” अवस्था कर सकते हैं।

हमारी मंदाकिनी में दो प्रकार के तारे हैं। छोटे और बड़े किन्तु तीसरे प्रकार के ब्लैक होल्स अभी खोज का विषय हैं। यह सत्य है कि आकाश में कुछ ऐसे स्थान है जिन्हें ब्लैक होल कहा जा सकता है। इनके पास से एक्स किरणों के विकिरण आ रहे हैं। इन पर खोज करना अभी बाकी है।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार आरंभिक महाविस्फोट के उपरान्त आकाश गंगाएँ एक दूसरे से दूर तेजी के साथ भाग रही है। इस घुड़दौड़ की गति को ‘लाल सरकाव’ (रेड शिफ्ट) कहते हैं। इसमें पड़ने वाले अब तक के अन्तर को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि महाविस्फोट हुए बीस अरब वर्ष बीते है। इस काल अनुमान के विज्ञान को ‘कास्मोगोनी’ कहा जाता है।

खगोल विद्या की अब अनेकों धारा- उपधाराएं बन गई है। रेडियो-एस्ट्रोनाँमी, एक्सरे-एस्ट्रोनाँमी, रे-एस्ट्रोनाँमी जैसी उपधाराओं के सहारे यह पता लगाया जाता है कि तारकों की गति, जवानी, प्रकृति एवं संभावना में क्या अन्तर पड़ा और अगले दिनों क्या परिवर्तन होने जा रहा है।

सौर मण्डल का ताजा नक्शा विज्ञान की प्रसिद्ध पत्रिका “नेशनल ज्योग्राफी” में छपा है। उसके अनुसार सूर्य परिवार के सदस्य ग्रह-उपग्रहों से संबंधित मान्यताओं में भारी सुधार परिवर्तन किया गया है।

ग्रहों की संख्या में कुछ समय पूर्व ही तीन का नया समावेश हुआ है। यदि उनके विस्तार को प्रधानता न दी जाय तो छोटे ग्रह और भी इस परिधि में हैं जिन्हें स्वतंत्रतः सत्ता, धुरी, परिभ्रमण और सूर्य परिक्रमाओं की विशेषताओं के कारण ग्रह ठहराया जा सकता है और उनकी संख्या तीस से भी अधिक हो सकती है। जिस बहुचर्चित दसवें ग्रह की खोज सभी वैज्ञानिकों ने की है उसके बारे में कहा जाता है कि वह उल्टी दिशा में चक्कर काट रहा है। इसी तरह नेपच्यून के सबसे बड़े उपग्रह ‘ट्राइटोन’ के परिभ्रमण पथ के संबंध में भी सोवियत वैज्ञानिकों ने ढूंढ़ निकाला है कि वह अपने मूल ग्रह के विपरीत दिशा में परिभ्रमण कर रहा है, जिसके कारण कुछ लाख वर्ष बाद नेपच्यून से इसके टकरा जाने की पूर्ण संभावना है।

सृष्टि में संव्याप्त भौगोलिक शक्तियों का पारस्परिक संतुलन इतना बढ़िया तथा निर्णायक है कि उनमें कहीं भी व्यतिरेक या व्यवधान नहीं पड़ता है, परन्तु यदि संयोगवश ऐसा हुआ तो उनका आँशिक परिवर्तन भी समस्त मानव जाति के लिए विनाश का सूचक बन सकता है।

ब्रह्माण्ड परिवार के सदस्य ग्रह-नक्षत्र जहाँ विकास की दिशा में बढ़ रहे हैं, वहीं उनमें वृद्धता, मरण और पतन का क्रम भी अपने ढंग से चल रहा है। उसे देखते हुए यह संभावना स्पष्ट है कि इस विशाल ब्रह्माण्ड को भी एक दिन मरण के मुख में जाना पड़ेगा। तारक और आकाश गंगायें स्वाभाविक वृद्धता के शिकार होकर मृत्यु के पास होते रहें और आगे होते रहेंगे। जब समस्त ब्रह्माण्ड बूढ़ा हो जायगा तो महाकाल उसे भी अपनी कराल दाढ़ों से चबाकर रख देगा। जन्म के बाद विकास, विकास के बाद मरण का सिद्धान्त तो ब्रह्माण्ड को भी लपेट में लिये बिना छोड़ने वाला नहीं है।

सूर्य को ही लें तो यह पाँच अरब वर्ष की आयु का है। उसकी परिधि में आये दिन हाइड्रोजन बम जैसे धमाके होते रहते हैं। प्रति सेकेंड उसका हाइड्रोजन 40 करोड़ टन के हिसाब से हीलियम में परिवर्तित होता रहता है। अनुमान है कि उसके पास यह ईंधन इतने ही समय के लिए और बचा है, जितने के सहारे कि अब तक गुजारा हो लिया। इसके बाद सूर्य का बुढ़ापा आ धमकेगा। गर्मी घटते जाने पर उसकी खाल लटकती जायगी और आकार बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में पहुँचे हुए तारे ‘लाल दानव’ कहे जाते हैं। वे पड़ौसियों को निगलते लगते हैं। बुध और मंगल तो पूरी तरह उसके पेट में समा जायेंगे। इसके बाद पृथ्वी की बारी आयेगी। हो सकता है वह उसके पेट की सीमित गर्मी से हजम न हो सके और उसके एक कोने में बैठी अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बनाये रहे।

उस स्थिति में सूर्य का तापमान घटने पर भी इतना होगा कि धरती के समुद्रों का पानी खोलने लगे। गरम बादलों का धुँध एक घेरा बना लें। उसमें प्राणियों का रहना संभव न हो सके। तब कदाचित पृथ्वी का मानव जीवन किसी अन्य उपयुक्त ग्रह की ओर वैसी ही दौड़ पड़े जैसे कि वह कभी पृथ्वी पर किसी अन्य लोक से आया था।

सूर्य का अन्त कैसे होगा, इसके संबंध में अनुमान लगाया जाता है कि दानव के रूप में उसकी चिता बुझते-बुझते मुट्ठी भर सफेद हड्डियों की राख रह जायगी। जब उसे ‘सफेद बौने’ का नाम दिया जाएगा। यह सफेदी भी क्रमशः कालिमा अपनाती जायगी। आश्चर्य इस बात का है कि विस्तार सिकुड़ने पर भी वजन न घटेगा। सफेद या काले बौने की स्थिति में रह रहे सूर्य के एक इंच घेरे में एक टन से अधिक वजन होगा।

कितना भौचक्का कर देते हैं विराट से संबंधित तथ्य हमें? प्रकृति का सम्पूर्ण परिकर जहाँ एक ओर अनुशासित सत्ता के नियमों के अधीन चालित दृष्टिगोचर होता है, वहीं दूसरी ओर अविज्ञात एवं अपवादों से भरा विराट् का यह वैभव यह भी बताता है कि हमारे ज्ञान की एक सीमा है। इससे ऊँचे उठकर अनुभूति के स्तर पर अंतर्दृष्टि के सहारे ही उस परमसत्ता को जाना जा सकता है।


भिक्षुओं की स्थिति का निरीक्षण (Kahani)

वहा बिहार में भिक्षुओं की स्थिति का निरीक्षण करते हुए भगवान बुद्ध एक कुटिया में पहुँचे तो उसमें रहने वाला साधक रुग्ण अवस्था में मल मूत्र से सना पड़ा मिला।

पूछने पर मालूम हुआ कि उसे अतिसार है। कोई दूसरा उसकी सहायता करने नहीं आता।

तथागत ने आनन्द से जल माँगा कर उसे स्वच्छ किया, उठाकर बिस्तर पर सुलाया और चिकित्सा की व्यवस्था की। साथ ही निकटवर्ती कुटियाओं में रहने वाले भिक्षुकों को भुलाकर पूछा-कोई उस रोगी की सहायता क्यों नहीं करता।

उत्तर में सभी ने एक ही बात कही- वह किसी के काम नहीं आता, सदा अकेला रहता और उपेक्षा भाव बरतता है। फिर कोई क्यों उसकी सहायता करे?

तथागत ने कहा-अज्ञान का बदला ज्ञान से और संकुचित वृत्तिका सुधार उदारता से होता है क्या तुम इतना भी नहीं जानते। क्या तुमने नहीं सुना कि परमार्थ बदले के लिए नहीं अपनी ही करुणा को विकसित करने के लिए किया जाता है।


साँची भक्ति रैदास की

एक प्रख्यात सन्त सोमवती अमावस्या पर गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास से उनका पूर्व परिचय था। सोचा उन्हें भी साथ ले लें। दो साथी रहने से रास्ता अच्छा कटेगा और सत्संग भी होता चलेगा। सो वे रैदास के घर पहुँचे और अपना प्रस्ताव कर सुनाया।

रैदास ने आगन्तुक का समुचित सत्कार किया। पधारने के लिए कृतज्ञता प्रकट की, पर साथ ही असामंजस्य भी प्रकट किया कि वे जा न सकेंगे।

कारण पूछने पर उनने बताया, कि कितने ही लोगों के जूते मरम्मत के लिए उनने ले रखें और उन्हें जल्दी ही ठीक करके देने का वचन दिया है। यदि मैं गंगा स्नान को चला जाऊँ तो वचन से झूठा पड़ूंगा और साथ ही काम सौंपने वालों को कई दिन नंगे पैर चलने का कष्ट उठाना पड़ेगा। मैंने कर्तव्य पालन को प्रथम और भजन को सदा दूसरा स्थान दिया है, ऐसी दशा में आपका परामर्श टालते हुए दुःख तो होता है, पर विवशता ऐसी है कि दूसरा कोई रास्ता सूझता नहीं है।

सन्त ने इसे गंगा जी की उपेक्षा समझा। उनमें भक्ति भाव पर संतोष किया। माया लिप्त समझा और अपना रोष असंतोष जताते हुए अकेले ही जाने को उठ खड़े हुए।

बचत पूँजी की कुल राशि दो पैसे मेरे पास हैं। इन्हें कृपापूर्वक लेते जाइये और गंगा माता के हाथ में सोमवती के दिन थमा दीजिए। सन्त ने पूछा - हाथ में? यह कैसे? उनके हाथ कहाँ है? रैदास कहते रहे यदि हाथ न होते तो आप जैसे ज्ञानी उनके दर्शन करने के लिए क्यों जाते?

बहस का अन्त करते हुए रैदास ने कहा-जल में से यदि कोई हाथ ऊपर निकालें तो एक हाथ में एक और दूसरे में दूसरा पैसा था दीजिए। यदि हाथ न निकलें तो पैसे वापस लौटा कर ले आइये। मेरे पैसे पूरे परिश्रम, कर्त्तव्य पालन और गहरे भक्तिभाव से सने है। उन्हें स्वीकार करने में गंगा माता आनाकानी न करेगी।

सन्त का क्रोध असामंजस्य में बदल गया। वे आश्चर्य और अविश्वास कर रहे थे कि भला ऐसा भी कहीं हो सकता है? गंगा माता के हाथ भला क्यों कर पैसे लेने के लिए निकलेंगे? फिर भी उनने दोनों पैसे गाँठ में बाँध लिए और कौतुक देखने के लिए उत्सुकतापूर्वक व्यग्र होने लगे। सन्त एकाकी चल पड़े।

रैदास के शिष्यों ने प्रसंग सुना तो इकट्ठे हो गये। गंगा जाने का अनुरोध करने लगे। जूतों की मरम्मत बाद में होती रहेगी। इतने दिन हम फटे जूतों से भी तो काम चला सकते हैं।

रैदास का एक ही उत्तर था-कर्तव्य पालन और जन हित प्रथम है। पूजा का द्वितीय स्थान है। मेरा निर्णय यदि ठीक है तो उसका प्रमाण देखने के लिए तुम लोग सोमवती अमावस्या के दिन मेरे पास आ जाना और वास्तविकता का प्रमाण देखना।

सोमवती अमावस्या आई। भक्तजन जमा हुए? रैदास की कठौती में से गंगा की धारा उबली और उसमें सभी उपस्थित जनों ने स्नान किया। दूसरी और उन बड़े सन्त ने गंगा से एक भक्त के भेजे दो पैसे और हाथ निकलने पर उन्हें देने की शर्त कह सुनाई।

चमत्कार हुआ, गंगा की धारा में से दो हाथ निकले दोनों में दो पैसे थमाये गये। उन्हें लेकर वे लुप्त हो गये।

दोनों घटनाओं की चर्चा सुनने वालों ने निष्कर्ष निकला कि सच्ची भक्ति इसी प्रकार हो सकती है जैसी कि रैदास करते हैं।


आरोह तमसो ज्योतिः

हम बाह्य जीवन के बारे में सुविस्तीर्ण दृश्य जगत के बारे में बहुत कुछ जानते हैं। इन विषयों की विवेचना करते, व्याख्यान देते जी नहीं अघाता है। बहस करते और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं भी जीतते हैं। पर आश्चर्य तो इस बात का है कि ढेरों की ढेरों जानकारियाँ रखने वाले को अपने बारे में कुछ भी नहीं पता है। अपनी सत्ता और महत्ता के बारे में हमारा ज्ञान नहीं के बराबर है। बहिर्मुखी जीवन बाह्य संसार में ही व्यस्त रहता है और यथार्थता के समझने की न तो आवश्यकता समझता है, और न समय पाता है। यदि अपने वास्तविक स्वरूप, लक्ष्य और कर्तव्य का सही ढंग से भान हो जाय और संसार के साथ अपने संबंधों को ठीक ढंग से जानकर सुधार लिया जाए तो सामान्य सा दीखने वाला मानवी अस्तित्व महानता और दिव्यता से ओत-प्रोत हो सकता है।

अमेरिकन म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री के पक्षी विभाग में एसोसियेट क्यूरेटर द्वारा जो विवरण प्रकाशित किए गए हैं, उनसे पता चलता है कि न्यूगिनी स्थान के आदिवासी किस तरह अपने क्षेत्र में भटक जाने वालों को जिन्दा भून कर खा जाते थे। उसी खतरनाक क्षेत्र में पक्षियों की खोज के लिए एक दल गया। पापुआन क्षेत्र में मियाओं कबीले के लोग अपने क्रूर कर्मों के कारण कुख्यात है। इस इलाके में किसी खास सुरक्षा व्यवस्था के बिना किसी को जाने की अनुमति नहीं है। पर खोजी दल के सदस्य किसी तरह वहाँ जा पहुँचे और सभी सदस्यों को रोमाँचकारी ढँग से मार दिया गया।

पादरी आइवोस्केफर ऐसे क्षेत्र में लगभग 45 वर्ष से इन नरभक्षी दरिन्दों के बीच महात्मा ईसा का सन्देश सुनाने के लिए रहे। उन्होंने अपने कार्य व्यवहार से वहाँ के निवासियों को प्रभावित कर दिया। उन्हें वे सभी पवित्र आत्मा मानते थे और नुकसान की अपेक्षा सम्मान ही करते थे।

शुरू-शुरू में उस निष्ठावान किन्तु क्रिया–कुशल पादरी ने किस प्रकार इन लोगों के बीच अपने सामान्य ज्ञान के बल पर स्थान पाया। इस बारे में उसने अपनी नोट बुक में लिखा है कि इस इलाके में प्रथम बार जाने पर उन्हें इन नर-माँस लोलुपों द्वारा घेर लिया गया। लगभग 40-50 व्यक्ति भाले-बरछी लेकर हमको घेर कर नाचने लगे। यह हर्ष प्रदर्शन इसलिए था कि दो मनुष्यों खासकर गोरों का ताजा सुस्वादु माँस खाने को मिलेगा। इसी कारण निश्चिन्त होकर गीत गा रहे थे और प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं।

इस बीच पादरी ने युक्ति से काम लेने की सोची। उसने अपने झोले से एक दर्पण निकाला और उन आदिवासियों के सरदार के सामने कर दिया। उसने जैसी अपनी शक्ल आइने में देखी डर गया। शीशा तो उन लोगों के लिए बिल्कुल नई चीज थी। एक-एक करके पादरी ने उन सभी को शीशा दिखाया। वे सब भयभीत हो गए। सोचने लगे कि यह आदमी जरूर कोई बड़ा जादूगर है। इसे मारने से कोई विपत्ति आ सकती है। अस्तु वे अपने भाले-बरछी वहीं फेंककर उसे आस-पास आशीष वरदान पाने के लिए सिर झुका कर बैठ गए। अब पादरी ने एक दूसरा चमत्कार प्रस्तुत किया। उसने अपने मुख से नकली दाँतों की बत्तीसी निकाली दाँत उन्हें दिखाए, मुँह का पोपलापन दिखाया फिर दाँतों को लगाकर, पहले जैसा मुँह बना लिया। इस नए चमत्कार को देखकर आदिवासी हैरतंगेज रह गए। उन्हें पूरी तरह से भरोसा हो गया कि यह कोई विलक्षण जादुई व्यक्ति है। इतनी मान्यता बना देने पर पादरी का कार्य सरल हो गया। वह वहाँ चैन से अपना कार्य उस क्षेत्र में करने लगे और अपने धर्म प्रचार के प्रयोजन में सफल रहा।

इन पादरी महाशय के उदाहरण से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है कि नैतिक और सामाजिक विकास के लिए वास्तविकता का बोध कितना आवश्यक है पर ज्ञान संबंधी वे उपकरण जो मनुष्य को माध्यम के रूप में मिले है एक सीमा तक ही जानकारी दे पाने में सक्षम है। वेदान्त ने इसी कारण ऐसी अनुभूतियों को मिथ्या माना है और निरपेक्ष शाश्वत ज्ञान की प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ करने का निर्देश दिया है। ज्ञानेन्द्रियों की एक सीमा मर्यादा है। इन्हें पूर्ण मानना भूल होगी। इस जगत में भिन्न-भिन्न कारणों से भिन्न-भिन्न शब्द कंपन सुनने में सूक्ष्म है जिनकी गति 33 प्रति सेकेंड से 40 प्रति सेकेंड होती है। इससे कम या ज्यादा गति कम्पनों को कान नहीं पकड़ पाते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने एक विशेष सीटी का निर्माण किया है जिसे कुत्ता तो सुन लेता है समझ लेता है पर पास खड़ा मनुष्य बिल्कुल नहीं सुन पाता और हक्का–बक्का देखता रहता है। मनुष्य की सुनने की परिधि के बाहर विचरण करने वाला प्रवाह इतना ज्यादा है। जिसकी तुलना में सुनाई देने वाला हिस्सा लाख करोड़वां ही है। इतनी थोड़ी सही ध्वनि सुन सकने वाले कानों को शब्द सागर की कुछ बूँदों का ही अनुभव होता है। शेष के बारे में तो अनजान ही बने रहते हैं। इस अधूरे उपकरण के द्वारा ध्वनि के माध्यम से विचरण करने वाले ज्ञान को स्वल्प कहा जाना ही नीति संगत होगा। उतने से साधन से मिलने वाली जानकारी के आधार पर वस्तुस्थिति समझने का दावा कोई कैसे कर सकता है?

स्पर्शेंद्रिय के माध्यम से मिलने वाली जानकारी भी कानों की ही भाँति अधूरी है और भ्रान्त भी। हाथ पर थोड़ी देर बर्फ रखें रहे फिर उसी हाथ को साधारण जल में ‘डुबोये’ तो लगेगा पानी गरम है। तत्पश्चात् हाथ पर कोई गरम चीज रखें फिर हाथ को उसी पानी में डुबोये तो लगेगा कि पानी ठण्डा है। जबकि पानी का तापमान तो जैसा का तैसा है। हाथ पर बर्फ और गरम चीज रखने से अनुभव भिन्न-भिन्न हुए। ऐसी त्वचा की गवाही पर क्या भरोसा जो कुछ का कुछ बताती है। इसके माध्यम से तो समग्र सत्य को समझने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अपनी आँखें सघन रात्रि में घोर अंधकार का अनुभव करती है कुछ भी देख पाने असमर्थ होती है। जब कि उसी स्थिति में उल्लू, चमगादड़, चीता, बिल्ली आदि प्राणी भली प्रकार देख सकते हैं। विज्ञान स्पष्ट करता है कि अन्धकार नाम की कोई चीज दुनिया धरती पर है ही नहीं।

मनुष्य की आँखें एक सीमा तक के ही प्रकाश कम्पनों को देख सकती है। जब प्रकाश की गति मनुष्य की नेत्र सीमा से कम होती है तो अंधकार प्रतीत होता है।

आकाश में अनेक रंग के भिन्न-भिन्न गति वाले प्रकाश कम्पन विद्यमान होते हैं। मनुष्य की आँखें उनमें मात्र सात रंगों की थोड़ी - सी प्रकाश तरंगों का ही अनुभव कर पाती है, शेष को देख पाने में असमर्थ होती है।

यदि किसी को “रैटिनाइटिस विग मेन्टोजा” रोग हो जाय तो उसे सीधी रेखा भी धब्बे या बिन्दुओं के रूप में दिखाई देती है। आकाश को ही देखने पर लगता है कि वह नीली चादर वाला गोलाकार पर्दे जैसा है और उसमें समतल सितारों टंके हुए हैं। पर क्या यह ज्ञान सही है? क्या आकाश उतना ही बड़ा है जितना दिखाई देता है? क्या तारे उतने छोटे हैं, जितना कि हमारी आँखें देखती है? क्या वे सभी समतल हैं? क्या आकाश सचमुच नीला है? इन अनेक सवालों का जवाब खगोल शास्त्र के ज्ञान भण्डार में देखें तो ऐसा मात्र होगा नहीं” पर इन आँखों को क्या कहा जाय जो वास्तविकता से भिन्न जानकारी देकर भ्रम में डालती हैं।

यही हाल घ्राणेन्द्रिय का है। हमें कितनी ही वस्तुएं गन्धहीन लगती है। पर वस्तुतः उनमें गन्ध होती है और उनके स्तर अगणित तरह के होते हैं। प्याज लहसुन की महक लगते ही कितने ही ऐसा तिरछा मुँह बनाते वहाँ से भागने लगते हैं, पर कितनों को इस गंध के महसूस होते ही मुख में पानी आ जाता है। यही बात सिगरेट, शराब आदि के बारे में भी है। इन परिस्थितियों में नासिका की गवाही को प्रामाणिक कैसे ठहराया जाय?

जिह्वा तो हमें चित्र विचित्र स्वादों की अनुभूति कराती है। विभिन्न प्रकार की चाट-रसगुल्ले, जलेबी, संदेश की याद आते ही चटखारे भरने लगती है, पर क्या यह सब सही है? वस्तुस्थिति तो यह है कि खाद्य पदार्थ के साथ मुख के स्राव मिलकर एक विशेष प्रकार का सम्मिश्रण बनाते है उसी को मस्तिष्क स्वाद के रूप में अनुभव करती है। यही सच होता तो नीम के पत्ते मनुष्य की तरह ऊँट को भी कड़वे व कसैले लगते और वह उन्हें न खाता? ऊँट को नीम की पत्तियों का स्वाद मनुष्य की जिह्वा अनुभूति से बिल्कुल भिन्न होता है। इसका मतलब यह हुआ कि हमारी जीभ वास्तविक स्वाद को पकड़ नहीं पाती। भिन्न-भिन्न प्राणी अपनी जीभ के अनुसार भिन्न स्वाद अनुभव करते हैं। मलीन वस्तुओं को मनुष्य की जीभ स्वीकार नहीं करती, पर शूकर के लिए वही परम स्वादिष्ट है और वह खूब आनन्द से खाता है। बुखार रहते मुँह में छाले हो जाने पर वस्तु के स्वाद का अनुभव नहीं होता। इस आधी अधूरी जानकारी वाली जिह्वा इन्द्रिय को सत्य की साक्षी के लिए कैसे स्वीकारा जाय?

इसी कारण तत्त्ववेत्ताओं ने यथार्थ ही कहा है “कि हर व्यक्ति का अपना मनोनिर्मित संसार है, वह उसी अपनी बनाई दुनिया में विहार करता है। पर सही माने में यह दुनिया है कैसी? इस सवाल का एक ही जवाब दिया जा सकता है कि यह जड़ परमाणुओं की नीरस व कोलाहलपूर्ण हलचल भर है। यहाँ तो परमाणुओं, अणुओं की धूल बिखरी है और किन्हीं प्रवाह में इधर-उधर दौड़ती-भागती रहती है। इसके अलावा यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं जिसे रूपवान, कुरूप अच्छा बुरा की संज्ञा दी जा सके।”

सही माने में तो संसार वह है ही नहीं जिसे हम देखते और अपने ऊपर आरोपित कर लेते हैं। हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों के भुलावे, भ्रम में न आकर साधना उपासना से प्राप्त अंतर्दृष्टि से निहारें तो स्पष्ट होगा कि सारा का सारा भ्रमण जंजाल मिटता जा रहा है और यथार्थता वास्तविकता सामने आ रही है। इस वास्तविकता के बोध होने पर तो परम सत्ता ही कण-कण में व्याप्त तथा अपना अन्तःकरण भी उसे से ओत-प्रोत दिखाई देगा और सर्वत्र आनन्द का साम्राज्य ही होगा और उसके मध्य में होंगे भली भाँति आनन्दामृत से परितृप्त हम। अच्छा हो ऐसी वास्तविक बोध की दुनिया में जिया जाय। अपनी अंतर्दृष्टि का जाग्रत कर यथार्थता वस्तुस्थिति से समझने पाने में प्रयत्नशील हुआ जाय। इसीलिए ऋषि कहते आए हैं - “अविद्या से निकलकर ज्ञान की ओर प्रकाश और बढ़ो”।


नासमझी (Kahani)

एक राजा भ्रमण के लिए गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोपड़ी पर जा पहुँचा। वहाँ से आतिथ्य मिला तो जान बची।

चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा - हम इस राज्य के शासक है। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुक नगर का चंदन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं। उसके द्वारा जीवन आनन्दमय बीतेगा।

वनवासी उस परवाने को लेकर नगर के अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चंदन का उपवन उसे प्राप्त हो गया। चन्दन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, उसकी जानकारी न होने से वनवासी चन्दन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी।

धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गये। एक अंतिम पेड़ बचा। वर्षा के कारण कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गट्ठा लेकर जब बाजार में पहुँचा तो सुगन्ध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया। आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा - यह चंदन काष्ठ है। बहुत मूल्यवान है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हैं तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो।

वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चाताप करने लगा कि उसने इतना बड़ा बहूमूल्य चन्दन वन कौडी मोल कोयले बनाकर बेच दिया। पछताते हुए नासमझ को सान्त्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा - मित्र, पछताओ मत, यह सारे तुम्हारी ही तरह नासमझ है। जीवन का एक -एक क्षण बहुमूल्य है पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदले कौडी मोल में गँवाते रहते है। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गंवाकर भी कोई मनुष्य अंत में सम्भल जाता है तो यह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।


परमार्थ में स्वार्थ भी समाहित है

भागीरथ का राज्य बहुत बड़ा था। उसमें सिंचाई के साधन न होने से प्रायः हर वर्ष दुर्भिक्ष पड़ जाता था। उनका मनोरथ उठा कि यदि दैव कृपा से कोई नदी इधर होकर बहने लगे तो अपनी कठिनाइयाँ दूर हो जायँ। धन-धान्य की कमी न रहे। उनने अनेक देवताओं के जप अनुष्ठान किये, अनेक सन्तों से वैसा वरदान देने को गिड़गिड़ाये, पर कहीं से भी उन्हें सहयोग न मिला। सभी ने उपेक्षा दिखाई।

एक दिन नारद जी से उनकी भेंट हुई। भागीरथ ने अपनी असफलता का कारण पूछा? देवर्षि ने उत्तर दिया अपने निजी लोभ लालच के लिए माँगने पर न देवता पसीजते हैं और न सन्त अपने तप की पूँजी खर्च करते हैं। आप अपने लिए धन-धान्य चाहते हैं। इस संकीर्ण स्वार्थपरता के रहते हुए आप किसी बड़े वरदान की आशा न करें। संसार व्यवहार भी तो आदान-प्रदान के आधार पर चलता है। दैवी सहायता तभी मिलती है जब कोई सत्पात्र उसे परमार्थ प्रयोजन के लिए माँगे। आप दृष्टिकोण बदलें तो किसी देवी अनुकम्पा की बात सोचें।

भागीरथ ने उस तथ्य पर गंभीरतापूर्वक विचार किया। अपनी भावना और चरित्र निष्ठा में पवित्रता भरने के लिए उनने तप करने का निश्चय किया और जलधारा को अवतरित करने के लिए उनने विश्व-कल्याण को लक्ष्य बनाया। इस परिवर्तन के साथ वे हिमालय तप करने के लिए चले गये।

जैसे-जैसे उनका उद्देश्य और जीवन पवित्र होता गया। वैसे-वैसे आत्मबल की ज्योति सभी और फैलने लगी। उस प्रकाश की आभा स्वर्ग तक पहुँची। किसी पवित्रात्मा द्वारा लोकमंगल के लिए दैवी सहायता की आवश्यकता पड़ रही है। गंगा ने सोचा, तब तो मुझे उसकी सहायता करनी ही होगी। उनने निश्चय कर लिया कि भागीरथ की इच्छा पूरी करेगी। उनने अपना निर्णय भागीरथ तक पहुँचा दिया।

गंगा पृथ्वी पर पहुँचने की तैयारी करने लगी। भागीरथ की खुशी का ठिकाना था, पर तुरन्त ही एक नया प्रश्न सामने आ उपस्थित हुआ। स्वर्ग से गिरकर पृथ्वी पर जब गंगा की धारा तीव्र गति से गिरेगी तो उसका दबाव पृथ्वी सहन न कर सकेगी। धरती में छेद हो जायगा और वे पाताल जा पहुँचेगी। यह कठिनाई बहुत बड़ी थी। उसे हल कैसे किया जाय।

शिवजी ने कहा ऐसे पुनीत प्रयोजन के लिए तो मुझे भी योगदान करना चाहिए। उन्होंने गंगा के पास संदेश भेजा कि वे मेरी जटाओं में गिरें वहाँ से साधारण धारा के रूप में जहाँ भागीरथ कहें वहाँ चलें।

ऐसा ही हुआ। गंगा अवतरण से समस्त विश्व का कल्याण है। भारत भूमि धन्य बनी। जीवितों और मृतकों ने श्रेय साधन में सफलता पाई। इसके साथ-साथ भागीरथ के अधोगति में पड़े हुए पूर्वजों का भी कल्याण हुआ। जहाँ असंख्य जीव जन्तुओं का हित साधन हुआ, जहाँ विशाल भूखण्ड में हरितिमा लहलहाई वहाँ भागीरथ का प्रदेश भी उस लाभ से वंचित न रहा। उनने अपने कल्याण के साथ विश्व का भी कल्याण किया, ऐसा होता है परमार्थ। स्वार्थी तो तात्कालिक लाभ की ललक में अपना भविष्य अन्धकारमय ही बनाते रहते हैं।


लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाय (Kahani)

राहगीर ने पत्थर मारा, आम के वृक्ष से कई पके आम गिरे। राहगीर ने उठाये और खाता हुआ वहाँ से चल दिया।

यह दृश्य देख रहे आसमान ने पूछा - वृक्ष! मनुष्य प्रतिदिन आते हैं, तुम्हें पत्थर मारते हैं। फिर भी तुम इन्हें फल क्यों देते हों?

वृक्ष हंसा और बोला भाई! मनुष्य अपने लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाय तो क्या हमें वैसा पागलपन करना चाहिए?


अन्तराल की सत्ता का परिवर्धन - परिष्कार

मनःशास्त्री अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि व्यक्तित्व को उत्कृष्टता-निकृष्टता का केन्द्र बिन्दु उसके अन्तराल में निहित है। मनःसंस्थान की इस सबसे गहरी परत को ‘सुपर चेतन’ कहा गया है। ‘सुपर’ इसलिए कि उसकी मूल प्रवृत्ति मात्र उत्कृष्टता से ही भरपूर है। उसे यदि अपने वास्तविक स्वरूप में रहने दिया जाय, अवांछनियताओं के घेरे में न जकड़ा जाय, तो वहाँ से अनायास ही ऊँचे उठने, आगे बढ़ने की ऐसे प्रेरणाएं मिलेंगी, जिन्हें आदर्शवादी या उच्चस्तरीय ही कहा जा सके। प्रकारान्तर से सुपर चेतन को ईश्वरीय चेतना का ही प्रतीक-प्रतिनिधि माना जा सकता है। वेदान्त दर्शन में “अयमात्मा ब्रह्म” ‘प्रज्ञानंब्रह्म’ ‘चिदोन्दो’ डहम्, ‘शिवोडहम्’तत्वमसि कहर जिस आत्मा को परमतत्व का सम्बोधन दिया गया है। विज्ञान की भाषा में उसे ही ‘सुपर चेतन’ कहा गया है।

मनोविज्ञानी, नीतिशास्त्री, भौतिकीविद्, समाजशास्त्री, सभी इस एक ही निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि पतन-पराभव से उबरने और वरिष्ठता, विशिष्टता उपलब्ध करने के लिए ‘सुपर चेतन’ की उच्चस्तरीय परतें खोजी-कुरेदी जानी चाहिए। पैरासाइकोलॉजी, साइकोलॉजी, मैटाफिजिक्स आदि माध्यमों से पिछले दिनों अचेतन की महत्ता बखानी जाती रही है और उसे जगाने-उभारने के तरह-तरह के प्रयोगों की चर्चा भी होती रही है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, विचार सम्प्रेषण, प्राण प्रत्यावर्तन, भविष्य ज्ञान जैसे कितने ही कला-कौशल इस संदर्भ में खोजे और परखे गये हैं। इतना सब होने के बावजूद भी मूर्धन्य स्तर के मनीषी विद्वान इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अचेतन से भी असंख्य गुनी उच्चस्तरीय संभावनाओं से भरे-पूरे सुपर चेतन को नये सिरे से समझा, खोजा एवं उसके उन्नयन का अभिनव प्रयास किया जाय। तभी मानवी विनाश की संभाव्यता टाली और विकास के उच्चतर सोपानों तक पहुँचा जा सकना संभव हो सकता है। उनका विश्वास है कि इस क्षेत्र की उपलब्धियाँ व्यक्ति और समाज में ऐसे उच्चस्तरीय परिवर्तन ला सकेंगी, जो नये युग का सूत्रपात करने में समर्थ होंगी।

एमिली मारकाल्ट ने अपनी “साइकोलॉजी ऑफ इंट्यूशन” नामक पुस्तक में अन्तःकरण की चर्चा करते हुए कहा है - यह शरीर एवं व्यक्तित्व की चेतना का अतिसूक्ष्म एवं उच्चस्तरीय भाग है। ज्ञानेन्द्रियों और तर्क बुद्धि से जो निष्कर्ष निकाले जाते है, उनमें भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण समाधान उच्च चेतन मन की सहायता से मिल सकता है। इस तंत्र को सुविकसित कर लेने का अर्थ है एक ऐसे देवता का साहचर्य पा लेना, जो उपयोगी सलाह ही नहीं देता, वरन् महत्वपूर्ण सहयोग भी करता है।”

श्री हम्फ्री अपनी पुस्तक “वैर्स्टन एप्रोच टु मैन” में कहते हैं कि “बुद्धि वैभव के माध्यम से अब तक संसार की जो सेवा हुई है, उसकी तुलना उच्च चेतन की सहायता से थोड़े से लोगों ने जो कार्य किया है, उससे नहीं हो सकती। एक महामानव हजार प्रवक्ताओं से बढ़ कर होता है। इसी प्रकार एक महामनस्वी के द्वारा बनाया गया वातावरण हजारों आचार्यों तथा उपाध्यायों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावोत्पादक सिद्ध होता है। महामनीषियों का कर्तव्य है कि जिस प्रकार प्रकृति के रहस्यों को अनावृत कर सुविधा सम्पन्नता में वृद्धि की गयी, उसी प्रकार वे अन्तराल की उत्कृष्टता को जगाने, उभारने तथा उससे लाभान्वित होने में जन-साधारण का मार्गदर्शन करें।

मनोविज्ञानी जुँग का विचार है कि “मात्र अचेतन ही सब कुछ नहीं है, वरन् इससे भी आगे की परत ‘उच्च चेतना’ की है। आदर्शवादी प्रेरणाएं एवं उमंगें यहीं से उठती हैं। अचेतन तो अभ्यस्त आदतों-प्रवृत्तियों का संग्रह-समुच्चय भर हैं यदि मनुष्य इस परत से आगे की उच्च चेतना की परत को उघाड़ सकें, तो वह, वह सब कुछ कर सकने में समर्थ हो सकेगा, जिसकी अभी मात्र कल्पना भर करता है।”

एडलर के मतानुसार - “अचेतन की सुदृढ़ता को देखते हुए उसके सुधार-संदर्भ में किसी को निराश नहीं होना चाहिए। संकल्प बल की प्रचण्डता, आत्मविश्वास की प्रबलता और आदर्शों के प्रति आस्थावान होने से उन मूल प्रवृत्तियों में भी परिवर्तन कर सकना संभव है, जिन्हें चिर संचित, हेय और अपरिवर्तनशील माना जाता है।”

विलियम मैकेडूगल ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा है -”अचेतन से भी ऊँची परत अतिचेतन या उच्च चेतन की अभी जानकारी भर मिली है। अगले दिनों उसे अधिक अच्छी तरह जाना-समझा जा सकेगा और यह स्वीकार किया जायगा कि सामान्य जीवनक्रम का सूत्र संचालन करने वाले अचेतन की कुँजी इस ‘अति चेतन’ के पास ही है। तब उच्च चेतन का स्वरूप और उपयोग भली भाँति समझा जा सकेगा, जिससे व्यक्तित्व में क्रान्तिकारी परिवर्तन के संबंध में वैसी कठिनाई न रहेगी, जैसी आज हैं।”

प्लेटो लिखते हैं - “अब हमारा परिष्कृत ‘स्व’ से साक्षात्कार होता है, तब हमें अपने सही स्वरूप का, अपने त्रिआयामीय विस्तार का भान होता है। इस स्थिति में आत्मा का परमात्म-तत्व में विलय हो जाने के कारण व्यक्ति को फिर किसी के आश्रय, अवलम्बन की आवश्यकता नहीं पड़ती, वह स्वयं समर्थ हो जाता है।

नीत्से का उद्घोष है कि स्वयं से परे हटकर स्वयं को देखना ही वस्तुतः सही ज्ञान की प्राप्ति है। उनका विश्वास है कि मनुष्य स्वयं को अपने स्थूल शरीर को परिधि से बहार निकाल कर ऐसी स्थिति में ला सकता है, जिसमें उसका प्रभाव ‘लाइट हाउस’ की किरणों की भाँति चारों दिशाओं में व्यापक बनकर तमिस्रा रूपी कठिनाइयों, विपत्तियों, बाधाओं से टक्कर लेकर उन्हें मार भगाता है। मनुष्य के भीतर संव्याप्त इस तत्व को उन्होंने “सुपर माइण्ड” की संज्ञा दी है।

मूर्धन्य दार्शनिक हेनरी बसों का कथन है - “वर्तमान जटिलताओं को न तो भौतिकवाद ही सुलझा सकता है और न आज के सर्वोपरि माने जाने वाले बुद्धिवाद के धरातल पर ही इनका निराकरण किया जा सकता। इनका समाधान बुद्धि से आगे की अन्तःकरण की ‘महाप्रज्ञा’ को जगाकर ही प्राप्त किया जा सकता है।

मार्टिन ट्रिनबी कहते हैं - “विचार-बुद्धि की उपयोगिता कितनी ही क्यों न हो, पर वह मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं है और न वही वह उसका अन्तिम लक्ष्य ही है। चेतना की पूर्णता का केन्द्र अन्तःकरण है, मस्तिष्क नहीं। अब तक की गवेषणा बुद्धि बल और मस्तिष्क के आधार पर होती रही, मगर आगे का अनुसंधान अन्तःकरण के माध्यम से होगा। अब तक प्रकृति के रहस्यों को समझने तक ही मनुष्य सीमित रहा, किन्तु आगे अब परमतत्व की खोज में वह संलग्न होगा और उसे पाकर रहेगा।”

हेनरी गाल्डर ने अपनी चर्चित पुस्तक “इवोल्यूशन एण्ड मैन्स प्लेस इन नेचर” में लिखा है - “विकास की दिशा में किये जा रहे प्रयासों में एक कड़ी और जुड़नी चाहिए कि मनुष्य के हृदय की विशालता एवं गहराई को बढ़ाया जाय। वस्तुओं का लाभ जिसे उठाना है, उसकी अन्तःचेतना यदि हेय-निष्कृष्ट रही, तो सम्पदा का दुरुपयोग ही होगा। सम्पदा कितनी ही क्यों न बढ़े पर यह ध्यान तो रहे कि उपभोक्ता की गरिमा ही साधनों का सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकती है।”

“दि फिनोमिना ऑफ मैन” में प्रख्यात दार्शनिक टेल चार्डिन ने अपना मन्तव्य व्यक्त करते हुए बताया है - “विग्रहों को सहकार में, खीज को मुस्कान में बदलने का एकमेव उपाय है कि मनुष्य के वर्तमान चिन्तन और रुझान में आमूल-चूल परिवर्तन लाया जाय। यह महान कार्य सामान्य प्रयासों से किसी भी प्रकार संभव नहीं। इसके लिए अन्तःकरण को टटोलने और उसमें ईश्वर प्रदत्त महानता को उभारने की आवश्यकता पड़ेंगी।”

लगभग इसी स्तर के मन्तव्य महर्षि अरविंद, कबीर और इकबाल ने भी प्रकट किये हैं। इस प्रकार अब यह बात हर क्षेत्र में स्वीकार की जाने लगी है कि मनुष्य ने अब तक की जो भौतिक प्रगति बुद्धिवाद के सहारे प्राप्त की, वह उसे वही गरिमा प्रदान नहीं कर सकी, जो अभीष्ट थी। यह गौरव उसे अन्तःचेतना की परिष्कृति से ही प्राप्त हो सकता है। तभी वह ‘अयमात्मा ब्रह्म’ और ‘तत्वमसि’ का सपना साकार कर सकेगा। यही हर व्यक्ति का अन्तिम लक्ष्य भी है।


कुण्डलिनी शक्ति का जागरण एवं सृजनात्मक सुनियोजन

योगशास्त्रों में कुण्डलिनी साधना की महत्ता को सर्वोपरि माना गया है और इस पर विस्तृत रूप में प्रकाश डाला गया है। यह वस्तुतः चेतन प्रकृति द्वारा जड़ पदार्थों के नियंत्रण की विद्या कही जा सकती है। पदार्थों, परमाणुओं तथा जड़-जगत की संरचना इसी के अंतर्गत आती हे। विज्ञान की समस्त धाराएं इसी में सन्निहित है। सृष्टि का समस्त व्यापार इसी महाशक्ति से गतिमान है। ‘शक्ति तंत्र’ में कहा भी गया है - “शक्ति कुण्डलिनोति विश्व जनन व्यापार व्रतोद्यमा।” अर्थात् - यह सारा जगत-व्यापार कुँडलिनी महाशक्ति के ही प्रयत्न से चल रहा है। भौतिक एवं आत्मिक सम्पदाओं का मूल यही है। जीवन में पवित्रता का समावेश करके सतत् अभ्यास द्वारा इसे जागृत किया एवं दिव्य विभूतियों से लाभान्वित हुआ जा सकता है।

कुण्डलिनी शक्ति का एक नाम ‘जीवन अग्नि’ - फायर आफ लाइफ भी है। जो कुछ भी चमक, तेजस्विता, आशा, उत्साह, उमंग, उल्लास दिखाई पड़ता है, उसे उस प्राण अग्नि का ही प्रभाव कहा जा सकता है। शरीरों में बलिष्ठता, निरोगता, स्फूर्ति, क्रियाशीलता के रूप में और मस्तिष्क में तीव्र बुद्धि, दूरदर्शिता, स्मरण शक्ति, सूझ-बूझ, कल्पना आदि विशेषताओं के रूप में यही परिलक्षित होती है। आत्मविश्वास और उत्कर्ष की अभिलाषा के रूप में, धैर्य और साहस के रूप में इसी शक्ति का चमत्कार झाँकते हुए देखा जा सकता है। रोगों से लड़कर उन्हें परास्त करने और मृत्यु की संभावनाओं को हटाकर दीर्घजीवन का अवसर उत्पन्न करने वाली एक विशेष विद्युत-धारा जो मन में प्रवाहित होकर समस्त शरीर को सुरक्षा की अमित सामर्थ्य प्रदान करती है, उसे कुण्डलिनी ही समझा जाना चाहिए।

कुण्डलिनी मूलाधार और सहस्रार दो शक्ति केन्द्रों की अधिष्ठात्री है। मूलाधार भौतिक सामर्थ्य का और सहस्रार आत्मिक विभूतियों का उद्गम केन्द्र है। एक को आत्मा का - दूसरे को परमात्मा का - प्रतीक प्रतिनिधि कह सकते हैं। एक भूलोक है तो दूसरा स्वर्ग लोक। मूलाधार से सहस्रार तक पहुँचने का मार्ग मेरुदण्ड है। इसी को आध्यात्मिक भाषा में ध्रुव केन्द्र कहा गया है। शक्ति को मूलाधार और शिव को सहस्रार कहते हैं। इन्हीं का प्रतिनिधित्व शिव मंदिरों में स्थापित उभय-पक्षीय लिंग प्रतीकों में देखा जाता है। वस्तुतः यह कुण्डलिनी शक्ति का ही अलंकारिक दिग्दर्शन है।

इन दोनों को धन और ऋण विद्युत भी कहा जा सकता है। मानवी काया को -पिण्ड को- इस दृश्य ब्रह्माण्ड का -विश्व विराट् का छोटा नमूना भी कह सकते हैं। जितनी भी शक्तियाँ इस विश्व-ब्रह्माण्ड में कहीं भी विद्यमान हैं उन सबका अस्तित्व इस शरीर में भी मौजूद है। जिस प्रकार वैज्ञानिक जानकारी, प्रयोग विधि और यन्त्र व्यवस्था के आधार पर विद्युत, ईथर आदि शक्तियों से प्रत्यक्ष लाभ उठाया जाता है, ठीक उसी प्रकार योग साधना के वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा शरीरगत अपरा-प्रकृति की प्रचंड शक्तियों का उद्भव किया जा सकता है। इसी को योगियों के दिव्य कर्तव्य के रूप में देखा जा सकता है। अलौकिकताएं- सिद्धियाँ, चमत्कार एवं असाधारण क्रिया-कृत्यों की जो क्षमता साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती है उसे शरीरगत अपरा-प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और इस निर्झर का मूल उद्गम जननेन्द्रिय मूल कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।

इसी प्रकार व्यक्तित्व में गुण, कर्म स्वभाव, संस्कार, दृष्टिकोण, विवेक, प्रभाव, प्रतिभा, मनोबल, आत्मबल, आदि की जो विशेषताएं दृष्टिगोचर होती हैं, उन्हें चेतना तत्व से भाव संवेदन की उपलब्धि माननी चाहिए। इसका केन्द्र मस्तिष्क स्थित सहस्रार कमल है। कालाग्नि यहीं शिव स्वरूप विद्यमान है। व्यक्तित्व की भावनात्मक, चेतनात्मक प्रखरता एवं शरीर की असामान्य क्रियाशीलता-आत्मविद्या के दो लाभ कहे गये हैं। इन्हीं को विभूतियाँ और सिद्धियाँ भी कहते हैं। विभूतियाँ मस्तिष्क केन्द्र से ज्ञान संस्थान से-भाव ब्रह्म से प्रसृत होती है और सिद्धियाँ काम केन्द्र से-शक्ति निर्झर से-कुण्ड-कुण्डलिनी से प्रादुर्भूत होती है। इन दोनों शक्ति केन्द्रों को मानवीय अस्तित्व के दो ध्रुव मानना चाहिए। पृथ्वी के दो सिरों पर उत्तरी दक्षिणी दो ध्रुव है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य का मस्तिष्क केन्द्र उत्तरी ध्रुव और काम केन्द्र दक्षिणी ध्रुव कहा जा सकता है। इन केन्द्रों में सन्निहित असंख्यों दिव्य क्षमताओं का उन्नयन, प्रकटीकरण एवं उपयोग कुण्डलिनी जागरण से हो सकता है।

वस्तुतः कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य मूलाधार से सहस्रार-कामबीज से ब्रह्मबीज तक पहुँचने का है। उन दोनों की असीम एवं अनन्त जानकारी प्राप्त करने और उन सामर्थ्यों को जीवन विकास के अंतरंग और बहिरंग क्षेत्रों में ठीक तरह प्रयोग कर सकने की विद्या का नाम ही कुण्डलिनी विज्ञान है। इस साधना में एक प्रकार से शरीर में प्राण और संकल्प के आघात से परमाणु ऊर्जा उत्पन्न की जाती है और उसका नियंत्रण नियमन किया जाता है। मूर्धन्य वैज्ञानिक एवं अनुसंधानकर्ता प्रो0 वौन वैजसेकर ने कुण्डलिनी जागरण में प्राण तत्व के नियंत्रण और नियमन पर अधिक बल दिया है। उनका कथन है कि इसकी संगति भौतिक विज्ञान के क्वाँटम सिद्धान्त से बिठाई जा सकती है। दोनों के परमाणु सूक्ष्म स्तर के होते हैं। सूक्ष्म शरीर का प्राण प्रवाह ही कुण्डलिनी है। षट्चक्रों को जगाने-बेधन करने की क्षमता इसी प्राण-शक्ति में होती है। इसलिए भौतिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए इसके शोधन, परिष्कार एवं उन्नयन के विविध विधि साधना विधानों को अपनाने का योगशास्त्रों में उल्लेख मिलता है।

योग उपनिषद् में कहा गया है कि “कुण्डलिनी शक्ति जो कुण्डलित स्थिति में मानवी काया में विद्यमान है, यदि उसके जागरण का सही रूप में अभ्यास उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए किया जाय तो ही वह शक्ति ठीक रूप से विकसित हो सकती है अन्यथा विपरीत प्रभाव उत्पन्न करती है।” स्टडीज ऑफ सैवेज एण्ड सैक्स” नामक पुस्तक के मूर्धन्य लेखक श्री क्राबेल का कहना है कि “कुण्डलिनी जागरण का मूलभूत आधार जीवन की पवित्रता है। यह साधक के शारीरिक गठन तथा गुण, कर्म, स्वभाव से प्राप्त होती है।” प्राचीनकाल के भारतीय योगी एवं संत-महात्मा इसके प्रमाण है। आध्यात्मिक नियमों का निष्ठापूर्वक परिपालन करते रहने से एक निश्चल पवित्रता का विकास होता है जो कुण्डलिनी जागरण के लिए अत्यधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। इसी के आधार पर उनने जाना था कि मेरुदंड के नीचे अंतिम छोर पर इस मानव ढाँचे में इतनी रहस्यपूर्ण दिव्य ऊर्जा विद्यमान है। षट्चक्र निरूपण में इसका उल्लेख करते हुए कहा गया है - “कूजन्ती कुल कुण्डली च मधुर ...................... सा मूलाम्बुज गहवरे विलसति॥ अर्थात् कुण्डलिनी मधुर कूँजन करती है। श्वाँस-प्रश्वास का प्रवर्तन करती हुई वह संसार के जीवों को प्राण धारण कराती है तथा मूलाधार पद्धा-गह्वर में विलास करती है। जीवन में बाह्याभ्यांतर शुचिता-पवित्रता का समावेश करके ही इसे जाना और पाया जा सकता है।

सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक श्री ओवे्लान ने अपनी कृति “द सर्पेन्ट पावर” में कहा है कि कुण्डलिनी शक्ति का अभिव्यक्तीकरण सृजनात्मक शक्ति के रूप में सभी मानवों में दृष्टिगोचर होता है। मानवी काया में यह महाशक्ति एक दैवी बीज के रूप में विद्यमान है, जो कालान्तर में गहन अभ्यास के द्वारा पुष्पित और पल्लवित होती है। यदि एक बार भी शक्ति जागृत हो गई और क्रिया-कलापों में आ गई तो साइकिक नर्व से होती हुई मस्तिष्क के सहस्रार अर्थात् सहस्र दल कमल में प्रवेश करती है। इसके जागरण और संचालन से समस्त आध्यात्मिक शक्तियाँ जागृत हो उठती है और सामान्य मनुष्य को असामान्य स्तर का - महामानव-देवपुरुष की श्रेणी में पहुँचा देती है। मूर्धन्य लेखक श्री वेले ने अपनी पुस्तक “ए ट्रीटीज आँन कास्मिक फायर” में लिखा है कि मेरुदण्ड स्थिति कुण्डलिनी शक्ति का जब ऊर्जा के रूप में रूपांतरण होता है तो मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके जागरण और कुण्डलित सर्पिणी के खुलने से मानव जाति का उत्थान श्रेष्ठता और महानता में परिणत होता है। वेले का कथन है कि कुण्डलिनी जागरण की पद्धति विकासात्मक नहीं वरन् प्रयासात्मक है। साधक को बड़े धैयपूर्वक कई वर्षों तक इसका निरंतर नियमित अभ्यास करना पड़ता है साथ शारीरिक, मानसिक एवं वैचारिक पवित्रता का बहुत ध्यान रखना पड़ता है, तभी वह लक्ष्य तक पहुँच सकता है। पवित्रता का अंश जितनी मात्रा में विकसित होता है उसी अनुपात से उत्कृष्टता बढ़ती है और साधक को लक्ष्य के समीप पहुँचाती है।

उसी प्रकार प्रख्यात लेखक श्री लेडवीटर ने अपनी पुस्तक “दी चक्राज” में बताया है कि आचार और व्यवहार को पवित्रता के बिना उत्कृष्ट क्षमता के इस शक्ति के जागरण के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं। अतः इसके लिए कठोर अनुशासनात्मक जीवन-यापन करना अनिवार्य होता है। मूर्धन्य लेखक श्री प्रेसे ने अपनी कृति “द एपोकलिप्स अनसील्ड” ने चेतावनी देते हुए लिखा है कि कुण्डलिनी जागरण एवं उसके विकास में बड़े गंभीर और भयानक खतरे भी जुड़े हुए हैं। पवित्रता के अभाव में यदि साधक का झुकाव साँसारिकता की ओर होता है तो वह पतनोन्मुखी हो जाती है और कामवासना तथा बुरे विचारों के माध्यम से विचारों के माध्यम से जीवन को अधोगामिता की ओर ले जाती है। ऐसी स्थिति में सृजनशक्तियाँ दुर्बल और घटिया बनती चलती है। यही कारण है कि सामान्य व्यक्ति इसका अभ्यास करने और जागृत कर पाने में सर्वथा असफल पाये जाते हैं, किन्तु जो श्रेष्ठ मार्ग पर अवलम्बित होते हैं तथा कठोर नियमों एवं संयम का जीवन में परिपालन करते हैं, वे चमत्कारी शक्तियों के भाण्डागार बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं। किन्तु समाज के लिए मानव जाति के लिए वे हर दृष्टि से उपयोगी और महत्वपूर्ण होते हैं। इसी तथ्य पर प्रकाश डालते हुए विद्वान लेखक एग्यूटरा ने “निकाया” नामक अपनी पुस्तक में कहा है कि प्राचीन तत्वज्ञान के साहित्य का अवलोकन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य जाति का उत्थान करने एवं उसे उत्कृष्ट बनाने में यह सर्पिणी शक्ति अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है। समाज में संव्याप्त बुराईयों और दुर्गुणों के निदान के लिए यह सबसे बड़ा पवित्र और सुनिश्चित मार्ग है, परन्तु इसका लाभ तभी कोई व्यक्ति ले सकता है जब वह अपने अंतर्तम् निहित संवेगों को परिशोधित एवं पवित्र बना लें।

प्रसिद्ध पुस्तक “द एस्ट्रल एडी एण्ड अदर एस्ट्रेल फेनमिना” में लेखक आर्थर ई॰ पावेल ने कहा है कि “कुण्डलिनी जागरण की अभ्यास प्रक्रिया में मादक एवं नशीली वस्तुओं का सेवन करना अत्यन्त अनर्थकारी होता है। इससे षट्चक्रों के प्राण तत्व दूषित हो जाते हैं और उनकी झिल्लियाँ फट जाती है। दूषित तत्वों के प्रवाह से उनमें कड़ापन आ जाता है। जिससे सूक्ष्म तत्वों के प्रवाह में भी बाधा उत्पन्न हो जाती है और चक्रों का प्राण तत्व विकृत शक्तियों के प्रभाव में आ जाता है इससे मनोविकृतियाँ, पागलपन, कंपन जैसी अनेकानेक बीमारियाँ प्रकट होने लगती है और साधक स्वार्थी, हिंसक एवं पशुओं जैसा व्यवहार करने वाला बन जाता है। इसी तरह सामान्य लोगों के चक्रों में शुद्ध सूक्ष्म तत्वों का प्रवाह अवरुद्ध होने के कारण उनकी प्राण चेतना में निम्नस्तरीय परमाणुओं का ही प्रवाह होता रहता है जो उनकी चेतना को अशुद्ध एवं विकृत बना देता है।

कुण्डलिनी शक्ति के जागृत हो जाने पर कभी-कभी असामयिक घटनायें भी घटित हो जाती हैं, जिनसे साधक को सदैव सावधान रहना चाहिए। मस्तिष्क में महत्वाकाँक्षा उत्पन्न हो जाती है। जो सम्पूर्ण कार्य संस्थान को उभार देती है। अहंकार के जागृत हो जाने पर साधक का पतन हो जाता है। शारीरिक, मानसिक शक्तियों का उभार उनकी जागृति, योगियों को जहाँ स्वतंत्रता प्रदान करती है आगे का मार्ग प्रशस्त करती है, वहीं मूर्खों के लिए बन्धन का कारण बन जाती है। शारीरिक, मानसिक एवं वैचारिक पवित्रता ही आधार है जो लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होता है।


भिक्षु कश्यप (Kahani)

भिक्षु कश्यप ने श्रावस्ती में योग के कई चमत्कार दिखाये तो उनका यश दूर-दूर तक फैल गया पर अब कश्यप की आत्म-कल्याण की साधनाओं के लिए समय ही न मिलता प्रशंसकों से घिरे रहते। यह देखकर भगवान बुद्ध वहाँ पहुँचे और बोले बेटा मनुष्य ने सदाचार का ध्यान न दिया, लोगों को प्रभावित करने में ही लग गया तो उसकी उन्नति का द्वार ऐसे ही घिर जाता है जैसे तू अपने प्रशंसकों से घिर गया।


मानवी काया का सूक्ष्म रसायनशास्त्र

मानवी काया की रसायन प्रणाली इतनी सशक्त-सक्षम एवं सुव्यवस्थित है कि अन्न, जल, वस्त्र की तरह अन्तः की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए वह उसे पूर्णतः स्वस्थ बनाये रख सकती है। यदि रसायनों का सन्तुलन एवं सक्रियता बनी रहे तो शरीर सामान्य रोगों, कष्टों तथा विपत्तियों का सामना करते हुए अपने अस्तित्व की रक्षा करता रह सकता है। अंतःस्रावी ग्रन्थियों से स्रवित होने वाले हारमोन रसायन अत्यल्प मात्रा में होते हुए भी मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी थोड़ी भी भी घट-बढ़ मानसिक चेतना को प्रभावित करती एवं तद्नुरूप सोचने और करने के लिए बाध्य करती है। दूसरी और यह कहा जाता है कि इनके सुनियोजन से अविज्ञात को जगाना एवं महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत कर पाना भी संभव है।

चिकित्सा विज्ञान की नवीनतम शोधों के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अंतःस्रावी ग्रन्थियों का बहुत कुछ संबंध मनुष्य की मनोवृत्तियों से है। निराशा और अहंकार जैसे मनोविकारों में प्रायः इनमें हारमोन रसायनों का विकास होता है। नम्र स्वभाव के व्यक्ति में ऐड्रेनालिन की तथा आतंकवादी एवं उत्पीड़न में रस लेने वालों में नार-ऐड्रनालिन की न्यूनता स्पष्ट रूप से देखी गई है।

आज विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों का ध्यान अंतःस्रावी ग्रन्थियों-इण्डोक्राइन सिस्टम तथा उनमें निस्सृत होने वाले हारमोन रसायनों की ओर विशेष रूप से केन्द्रित है। न ग्रन्थियों का नियंत्रणकर्ता मस्तिष्क में अव्यवस्थित “पेटयूटरी ग्लैंड” को ही समझा जाता है। दूसरे शब्दों में पे “मास्टर ग्लैण्ड” या अंतःस्रावी ग्रन्थियों का ‘कंडक्टर’ कहा जाता है। स्त्री-पुरुषों में प्रजनन क्षमता का मूल कण पिट्यूटरी ही है। पुरुषों में ऐन्ड्रोजीन तथा हलाओं में ओस्ट्रोजीन हारमोन के विद्यमान रहने से विभिन्न प्रकार की शारीरिक विविधताएं स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं।

सुप्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री डॉ. एच॰ शैले ने अपनी शोधों द्वारा यह पता लगाया है कि शरीर के स्वास्थ्य संरक्षण का दायित्व पिट्यूटरी ग्रन्थि ही मुख्य रूप में संभालती है। यह ग्रन्थि खासतौर से उस समय ज्यादा कमजोर हो जाती है, जब व्यक्ति के भीतर भावनात्मक द्वन्द्व, मानसिक उथल पुथल मची हुई हो। ऐसी दशा में पेशियों की ऐंटन से लेकर त्वचा विकार, हृदयरोग, पाचन विकार, रक्तचाप से लेकर हमेशा बना रहने वाला सिरदर्द तक पैदा हो सकता है। यह तो सभी जानते हैं कि शरीर के सभी अग-प्रत्यंगों का संचालन मस्तिष्क द्वारा भेजे गये निर्देशों से ही होता है। भावनाओं के कारण मस्तिष्क पर अवाँछनीय दबाव बना रहेगा तो यह निश्चित ही है कि उसकी प्रतिक्रिया शरीर पर भी हो। अधिकाँश रोगों के मूल में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भावनात्मक संक्षोभ ही पाया गया है, भले ही वह कोई दुराव-छुपाव का भाव हो अथवा आक्रोश-क्रोध का भाव।

पिछले दिनों यौन संवेदना को मनःशास्त्रियों ने मनुष्य की प्रेरक शक्ति माना था और कहा था कि मनुष्य के व्यक्तित्व का उत्थान-पतन इसी केन्द्र से होता हे। शूर, साहसी, कायर, निराश, प्रसन्न, दुखी, आदर्शवादी, ईशवरभक्त, अपराधी, अविकसित स्तर का निर्माण इसी केन्द्र से होता है। पर अब नया सिद्धान्त कायम हुआ है कि हारमोन ही यौन संवेदनाओं के लिए उत्तरदायी है। प्रख्यात मनःशास्त्री एडलर ने काम-प्रवृत्ति की शोध करते हुए पाया कि बाहर से अतीव सुन्दर, आकर्षक और कमनीय दिखाई देने वाली अनेक महिलाएं काम-शक्ति से सर्वथा रहित है। उनमें न तो रमणी प्रवृत्ति थी, न नारी सुलभ उमंग। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि यौन-हारमोन्स के स्त्रोत ही इन विशेषताओं के आधार पर है।

इसी तरह एडलर ने अपनी खोज के दौरान देखा कि कितने ही युवकों की शारीरिक स्थिति सामान्य थी, ऊपर से उनमें मर्दानगी भरी ही दिखाई देती थी, पर थे वे वस्तुतः नपुँसक। न तो उनके मन में काम उमंग थी, न जननेन्द्रिय में उत्तेजना। कारण तलाश करने पर उनमें सेक्स हारमोनों का अभाव पाया गया। इसके विपरीत उन्हें ऐसे नर-नारी भी मिले जो अल्पवयस्क अथवा वयोवृद्ध होते हुए भी कामवासना से पीड़ित रहते थे।

चिकित्साशास्त्रियों के अनुसार नपुँसकता नर की हो य नारी की, प्रधानतया पिट्यूटरी ग्रन्थि की खराबी के कारण ही होती है। जननेन्द्रिय की स्थानीय कमी वासना अथवा प्रजनन को अधिक प्रभावित नहीं करती। सन्तान के प्रति माता का प्यार क्यों कम या ज्यादा पाया जाता है, इसका स्त्रोत भी पीयूष ग्रन्थि पिट्यूटरी ग्लैण्ड से स्रवित होने वाले हार्मोन्स में पाया जाता है।

लिंग परिवर्तन की घटनाओं में हारमोनों की ही प्रधान भूमिका होती है। इसमें नारी नर के रूप में या नर नारी के रूप में परिवर्तित हो जाते है। इस तरह की घटनाएं जब-तब घटित भी होती रहती है, जिनमें मनुष्य विपरीत लिंग में परिवर्तित किये जाते हैं। इनमें शारीरिक या मानसिक कारण नहीं, वरन् हारमोन रसायनों का सूक्ष्म प्रभाव ही इस प्रकार की पृष्ठभूमि विनिर्मित करता है।

शरीर की मुख्य अंतःस्रावी ग्रन्थि होने के कारण वैज्ञानिकों ने पिट्यूटरी का गहन अध्ययन, अनुसंधान किया और इससे स्रवित होने वाले नौ हारमोनों का पता लगाया है, साथ ही इनके व्यापक एवं अत्यन्त जटिल कार्यों का विश्लेषण किया है। विशेषज्ञों ने इसके अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्रभावी कार्यों के कुछ ऐतिहासिक व आधुनिक उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं। उनका कहना है कि नेपोलियन के जीवन में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, उसके लिए उसकी पिट्यूटरी ग्रन्थि की बढ़ती निष्क्रियता ही बहुत कुछ जिम्मेदार थी।

शहरी शास्त्रियों का यह भी कहना है कि इसके दो प्रमुख भागों में से जिस व्यक्ति में एण्टीरियर पिट्यूटरी की प्रधानता होती है, वह पुरुषोचित गुणों से युक्त होता है। इसके अतिरिक्त उसमें आत्म नियंत्रण व आत्मानुशासन की विलक्षण क्षमता भी होती है। वह प्रभावशाली, प्रबल पुरुषार्थी, दृढ़ निश्चयी एवं नेतृत्व प्रदान करने वाली उदात्त गुणों से सम्पन्न होता है। इसका ज्वलन्त उदाहरण अब्राहम लिंकन हैं। किन्तु ऐसा होता तभी देखा गया है, जब पीयूष ग्रन्थि के अग्रभाग की अल्फा कोशिकाएं बढ़ जाती है।

दूसरे मामलों में जब एण्टेरियर पिट्यूटरी की बेसोफिलिक कोशिकाओं का स्राव बढ़ जाता है तब व्यक्ति में अपेक्षाकृत मादा लक्षण प्रकट होते हैं। ऐसे व्यक्ति कद में ठिगने, अस्थिर स्वभाव वाले भावुक एवं संवेदनशील प्रकृति के होते हैं। इनमें साइक्लोथिमिया की प्रवृत्ति होती है अर्थात् यदा-कदा तो अति उत्साह दिखाते हैं और कभी-कभी निराश हो जाते है। ऐसे लोग प्रायः कवित्व, कला और संगीत की ओर अधिक आकृष्ट होते देखे जाते हैं। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लेखक बेंजामिन वाकर के अनुसार यह व्यक्तित्व फ्रेडारिक चोपिन में दिखाई देता था, जिसका वर्णन उन्होंने अपनी अनुपम कृति “एनसाइक्लोपीडिया आफ एसोटेरिक मैन” में किया है।

गले में अवस्थित थाइराइड ग्रन्थि मनुष्य की शारीरिक गतिविधियों पर विशेष प्रभाव डालती है। इससे निस्सृत हारमोन-थायरोक्सिन में उपस्थित आयोडीन तत्व की तनिक सी कमी होने पर व्यक्ति को ग्वायटर जैसी व्याधि से ग्रस्त होना पड़ता है। थायरोक्सिन के अभाव में हृदय एवं चयापचय की गति मंद पड़ने लगती है। ये सभी प्रतिक्रियाएं पीयूष ग्रन्थि के अग्रभाग से निकलने वाले हारमोन्स द्वारा नियंत्रित होती है। उसके पार्श्वभाग से स्रवित होने वाले आँक्सीटोसिन हारमोन का निर्माण नव प्रसूता माताओं में होता है जिसके परिणामस्वरूप वक्षस्थल से दूध का स्त्रोत उमगता है।

“दि ग्लैण्ड रेगुलेटिंग पर्सनैलिटी” पुस्तक के लेखक डॉ. लुई वैरमोन ने थाराइड ग्रन्थि की चर्चा करते हुए लिखा है कि यह ग्रन्थि ने केवल रक्तताप और रक्तचाप का नियंत्रण करती है वरन् प्रेम और सहानुभूति बढ़ाने में तथा विकृत स्थिति में ईर्ष्या-द्वेष उभारने में भी उत्तरदायी होती है। उचित मात्रा में रक्तताप तभी बना रह सकता है, जब इससे निस्सृत होने वाले थाइरोक्सिन स्राव का अनुपात सही रहे। इसका संतुलन बिगड़ने से न केवल रक्त की ऊष्मा एवं गति में गड़बड़ी उत्पन्न होती है, वरन् तरह-तरह की दुर्भावनाओं का भी मनुष्य शिकार हो जाता है। थाइराइड की विकृति से व्यक्ति को किस प्रकार से शारीरिक, मानसिक व्यथाएं सहनी पड़ती है, इसका विस्तृत विवेचन उन्होंने हाइपर थारोडिज्म प्रकरण में किया है।

पीनियल ग्रन्थि भ्रूमध्य भाग में स्थित होती है, जहाँ देवताओं का तीसरा नेत्र बताया जाता है। बच्चों की अपेक्षा वयस्कों में इसका आकार बड़ा होता है, लेकिन विकास की दृष्टि से यह महिलाओं में अपेक्षाकृत पुरुषों से अधिक विकसित होती है। प्रख्यात शरीरशास्त्री डॉ. सर अलेक्जेन्डर कैनन का कहना है कि अनेकानेक पोस्टमार्टम परीक्षणों के समय इस ग्रन्थि के अध्ययन से यह तथ्य प्रकाशित हुआ है कि योगियों में पीनियल ग्रन्थि अन्यान्य सामान्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक बड़ी होती है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य जैव रसायनज्ञ डॉ. अल्तशुले ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में कहा है कि मानवी आनन्द का यदि कोई जैव रासायनिक आधार है तो वह पीनियल ग्रन्थि ही है। यहीं पर वे समस्त जैव रसायन बनते हैं जो अन्ततः आनन्द की अनुभूति कराते हैं।

पीनियल ग्रन्थि पर अनुसंधानरत वैज्ञानिकों के अनुसार धान के दाने की बराबर धूसर रंग की इस छोटी सी ग्रन्थि में आश्चर्य ही आश्चर्य भरे पड़े हैं। उन्होंने जिन चूहों में दूसरों चूहों की पीनियल ग्रन्थि का रस भरा, वे साधारण समय की अपेक्षा आधे दिनों में ही यौन रूप से विकसित हो गये और जल्दी बच्चे पैदा करने लगे। समय से पूर्व उनके अन्य अंग भी विकसित हो गये, पर इस विकास में जल्दी भर रही मजबूती नहीं आयी।

24 मार्च, 1929 को इंग्लैण्ड में एक ऐसे अद्भुत बालक का जन्म हुआ जो चार वर्ष की आयु में ही युवकों जैसा प्रतीत होने लगा। कद की दृष्टि से भले ही छोटा रहा पर उसका कार्य क्षमता ठीक नवयुवकों जैसी थी। इस बच्चे का नाम था - चार्ल्स वर्थ। सात वर्ष की अल्पायु में ही बाल किशोर, युवा और बुढ़ापे की अवस्थाओं को पार करके वह दुनिया से चल बसा। इसी तरह विगत वर्ष सूडान की एक नौ वर्षीय लड़की माँ बनी है। उसका पति 20 वर्ष का है। सुप्रसिद्ध चिकित्सक प्लिनी ने एक ऐसे सात वर्ष के लड़के का वर्णन किया है, जो यौन दृष्टि से पूर्ण विकसित हो गया था। हिपोक्रेट्स ने इस तरह की विपरीत वर्गीय कुछ घटनाएं देखी थीं और उनका कारण समझने का प्रयत्न किया था।

महिलाओं में हारमोन स्रावों की उत्कृष्टता और बहुलता पाई गई है, जिसके कारण वे मासिक रक्तस्राव एवं प्रजनन क्षति की पूर्ति भी कर लेती है और व्यस्त श्रम करते हुए भी मर्दां की अपेक्षा अधिक समय तक जीती है। चीन के जनगणना सर्वेक्षण के अनुसार याँगत्से नदी के तटवर्ती डुमेई क्षेत्र में 96 व्यक्ति शतायु हैं। इनमें 69 महिलाएँ और 17 पुरुष हैं। इनमें 79 छोटे देहाती क्षेत्रों में रहते हैं। घनी आबादी में रहने वाले मात्र 9 हैं। प्रान्त भर में सबसे अधिक उम्र वाली महिला 116 वर्ष की हैं। वह गाँव में भी नहीं अपने खेत पर बनी झोपड़ी में रहती है।

वैज्ञानिक शोधें अभी हारमोन स्रावों का अस्तित्व और उनका क्रियाकलाप जान सकी है, पर वे उन स्रावों का मूलभूत कारण एवं केन्द्र का पता नहीं लगा सकीं और न इस बात का पता चला कि उनका नियंत्रण या अभिवर्धन किस प्रकार किया जा सकता है। मात्र गले की थाइराइड पर ही शल्यक्रिया, किसी सीमा तक सफल हुई है।

पशुओं के हारमोन निकालकर उन्हें मनुष्यों के शरीर में पहुँचाने के प्रयत्न भी सफल नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें विजातीय द्रव्य मानकर शरीर ने स्वीकार नहीं किया और उन्हें बाहर निकाल फेंका।

अब यह सोचा जा रहा है कि यह अविज्ञात किन्तु महत्वपूर्ण रसायन संभवतः मनुष्य की मानसिक चेतना में उत्पन्न होता है और उसे घटाने-बढ़ाने में ध्यानयोग जैसी कोई अध्यात्मिक साधना ही सफल हो सकती है और उस क्षेत्र की विकृतियों का निराकरण कर सकती है।


Quotation

अपने प्रति सच्चे रहो और फिर दुनिया में किसी चीज की परवाह न करो।

- रामतीर्थ


देव पुरुष!सिद्ध पुरुष एवं हिमिप्रदेश

ईश्वर का अविनाशी अंश होने के कारण जीवात्मा दिव्य विभूतियों से सम्पन्न है। उसे यह विभूति सत्ता बीज रूप में जन्मजात मिली है, उसकी संभावना इस स्तर की है कि विकास मार्ग पर चलते हुए पुनः ईश्वरत्व में प्रवेश करके तदनुरूप बन सकें। इतनी अद्भुत शक्ति संभावना का धनी होने पर भी उसे अपने समस्त क्रियाकलाप शारीरिक अवयवों के द्वारा ही सम्पन्न कराने पड़ते हैं। जीवात्मा की इच्छा अभिलाषा कुछ भी क्यों न हो पर वह उन्हें संकल्प मात्र से पूरा नहीं कर सकता। इसके लिए उसे शारीरिक अवयवों का, मानसिक संरचना का उपयोग करना ही पड़ता है। बिना इसके हलचलों की सक्रियता दीख नहीं पड़ती। यह वास्तविकता इस सीमा तक प्रकट होती है कि यदि शरीर और प्राण पृथक हो जायं तो अकेला जीवात्मा अदृश्य लोकवासी चेतना स्फुल्लिंग मात्र बनकर रह सकता है। उसके द्वारा किन्हीं निर्धारणों का क्रियान्वित कर सकना संभव नहीं रहता।

ठीक यही बात परब्रह्म के संबंध में भी है। वह सर्वव्यापी हरि व्यवस्थापक होने के नाते निराकार ही रह सकता है। प्रतिभाएं तो ध्यान धारणा के निमित्त ही बनाई जाती रहती हैं। निराकार परमेश्वर की सृष्टि के विभिन्न क्रिया-कलाप सम्पन्न करने के लिए किन्हीं शरीर धारियों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। वे सहयोगी दो प्रकार के होते हैं। एक विशिष्ट दूसरे वरिष्ठ। विशिष्टों में देव शक्तियाँ आती है। उन्हें मोटेतौर पर तीन भागों में विभाजित किया जाता है। सृजेता-ब्रह्मा, अभिवर्धक, विष्णु और परिवर्तन-प्रधान-शिव। इन्हें दैवी रूप में मान्यता दी जाती है। इनके जब त्रिवर्गों के भेद उपभेदों को गिना जाता है तो उनके भेद तैंतीस कोटियाँ है या वे तैंतीस करोड़ हैं। इस विवाद में न पड़कर यहाँ इतना ही जान लेना पर्याप्त हैं कि अनेकानेक है और अपने-अपने हिस्से के काम करते रहते हैं। देवताओं के दो ही काम है, धर्म की स्थापना और अधर्म का निराकरण। शरीर भी यही करते हैं। जो उपयोगी है उसे मुँह, नासिका आदि से ग्रहण-धारण करता रहता है जो कचरा है उसे मल, मूत्र, श्वेद आदि के रूप में बाहर फेंकता रहता है। जहाँ क्रिया होती है वहाँ कचरा भी बनता है। मशीनों में भी यहीं होता रहता है। वे ऊर्जा माँगती है और कचरा उगलती है। सृष्टि में भी यही होता रहता है। दोनों की व्यवस्था करने में ईश्वर की इच्छा के अनुरूप देवशक्तियाँ जुटी रहती है वे सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन और दृष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में निरन्तर निरत रहती है। सृष्टि का संतुलन इसी प्रकार बना रह पाता है।

देवताओं के उपरान्त समुदाय सिद्धपुरुषों का है। वे भी आमतौर से अदृश्य ही रहते हैं, पर आवश्यकतानुसार स्थूल शरीर भी धारण कर लेते हैं। देवता परब्रह्म के अधिक निकट हैं और सिद्धपुरुष प्रकृति के। दैवी इच्छानुसार समस्त शिव ब्रह्माण्ड की सुव्यवस्था बनाये रहने में देवताओं की प्रमुख भूमिका रहती है। सिद्धपुरुषों क कार्य क्षेत्र पृथ्वी तक सीमित है। वे पृथ्वी पर चलने वाली उथल–पुथलों को संतुलित करते हैं। आत्मशक्ति सम्पन्न सात्विक सज्जन प्रकृति के उदारचेताओं को वे ढूंढ़ते रहते हैं और जो भी सत्पात्र दीख पड़ते हैं, उन्हें सत्प्रयोजनों की पूर्ति के लिए अपनी क्षमता का एक अंश धारणकर्ता की आवश्यकता एवं पात्रता के अनुरूप देते रहते हैं। इस प्रकार की अहैतु की कृपा वे बरसाते ही रहते हैं। श्रेष्ठता सम्पन्नों को ऐसे वरदान निरन्तर मिलते रहते हैं। साथ उनका दूसरा कार्य भी चलता है, “अनौचित्य का निराकरण” इसी को अधर्म का उन्मूलन भी कहा जा सकता है। धरातल के दिग्पाल-दिग्गज यह सिद्धपुरुष ही कहे जाते हैं। वे पृथ्वी का भौतिक और आत्मिक पदार्थपरक और चेतनात्मक संतुलन बनाये रहने के लिए यथासंभव प्रयत्न करते रहते हैं। इन्हें धरतीवासियों के लिए परब्रह्म का विशेष अनुग्रह भी समझा जा सकता है।

साधनारत योगी तपस्वी जब अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण कर लेते हैं। साथ ही देवोपम मानवी गरिमा के समस्त आधारों से अपने को सुसज्जित कर लेते हैं तो उन्हें देवात्मा का-सिद्धपुरुष का पद मिल जाता है। फिर वे मिल-जुलकर धरातल की आये दिन उत्पन्न होते रहने वाली समस्याओं के बारे में विचार करते रहते हैं और उसमें समाधान संदर्भ में अपनी भूमिका-योजना का निर्धारण करते रहते हैं।

बिखराव सदा असुविधाजनक होते हैं और सहकार सुविधाजनक। एक जुट होने के लिए समीपवर्ती निवास भी आवश्यक है। सैनिकों की छावनी अपने-अपने क्षेत्रों में होती है। वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएं भी एक क्षेत्र में सटी हुई बनती है ताकि परस्पर सहकार संभव हो सके विश्वविद्यालयों में अनेक मनीषी अपने-अपने काम संभालते हैं। रेल का इंजन बनाने वाले कारखाने हैवी इलैक्ट्रिक जैसे टाटा लोह कारखाने में विशाल कल कारखाने भी एक बड़ी परिधि को घेरते हैं, उन्हें छोटी-छोटी फैक्ट्रियों के रूप में बखेरा नहीं जा सकता। ठीक इसी प्रकार सिद्धपुरुष भी एक-एक करके जहाँ-तहाँ बिखरे नहीं रहते। उन्हें परस्पर विचार विनिमय करना पड़ता है। और योजनाबद्ध कार्य पद्धति अपनाने के लिए तत्पर भी। ऐसी दशा में आवश्यक हो जाता है कि वे किसी सघन क्षेत्र में निवास करें। ऐसा स्थान इस पृथ्वी पर हिमालय का वह क्षेत्र ही है जिसे देवात्मा नाम दिया जाता रहा है। यों तो हिमालय बड़ा विस्तृत है, पर देवात्मा नाम से उत्तराखण्ड उसका हृदय प्रदेश है। “सिद्धपुरुषों की क्रीड़ास्थली भी इसी को समझा जानी चाहिए।

कभी देवताओं का निवास भी यहीं रहा है। उनकी कथा गाथाओं पर ध्यान देने और उनके बुद्धिसंगत निष्कर्ष निकालने के लिए जब प्रयत्न किया जाता है, तो देवताओं का लोक स्वर्ग किसी अन्य ग्रह पर अवस्थिति होने वाली बात गले नहीं उतरती, कारण कि सौर मण्डल के गृह उपग्रहों की पूरी-पूरी छानबीन लगभग पूरी हो चुकी है। वहाँ पदार्थ भर भरा पाया गया हैं सचेतन प्राणियों का अस्तित्व नहीं मिला। इसी प्रकार सौर मंडल के बाहर वाले क्षेत्र का रेडियो तरंगों, प्रकाश विकिरणों, के माध्यम से खोज बीन करने पर ऐसे क्षेत्र नहीं मिले जहाँ किन्हीं बुद्धिमान प्राणियों का अस्तित्व अस्वीकारा जा सके, फिर स्वर्ग कहाँ हो सकता है? जिसमें मानवाकृति के प्राणी निवास करते हों या करते रहे हैं। देव मान्यता को स्वीकारने पर इतना तो मानना ही पड़ता है कि उनका स्वभाव, रुझान, निर्वाह-साधन, सौंदर्य-बोध, सरसता आदि की दृष्टि से वे मनुष्य से मिलते-जुलते रहते हैं। उनका मनुष्यों के साथ संबंध भी रहा है। कहा तो यहाँ तक जाता है कि धरती की सृष्टि के आरंभ में यहाँ देवता ही प्रकट हुए थे और उन्हीं के वंशज रूप में मनुष्य प्रकटे थे। आरंभिक ज्ञान और साधनों की व्यवस्था उन्हीं ने की थी। प्रयोजन पूरा करने के उपरान्त वे अदृश्य हो गये और अपने निर्धारित कार्य में लग गये।

स्वर्ग मान्यता के संबंध में उनकी संगति धरती के साथ ही बैठती है। मनुष्यों का उस क्षेत्र में आवागमन रहा है। देवता भी समय-समय पर पृथ्वी पर आते और मनुष्यों की चेतना में बैठकर उन्हें आवश्यक सामयिक परामर्श देते रहे है। ज्ञान और विज्ञान का आविर्भाव महामानवी के अन्तःकरणों में अनायास ही होता रहा है। इसके बाद उन्हें ऐसा दिशा-निर्देशन मिलता रहता रहा है, जिसके आधार पर वे किसी सुनिश्चित लक्ष्य तक पहुँच सके।

दशरथ के -अर्जुन के- देवलोक जाकर वहाँ वालों की सहायता करने असुरों को परास्त करने की कथाएं प्रख्यात है। नारदजी अक्सर विष्णुलोक जाकर भगवान से परामर्श किया करते थे। नहुष ययाति आदि से सशरीर स्वर्ग जाने का प्रयत्न किया था। युधिष्ठिर को स्वर्ग ले जाने के लिए देवयान आया था। इसी प्रकार देवताओं का भी मनुष्यों के अनेक कार्यों में सहयोग रहा है। कुन्ती के पुत्र देव पुत्र ही थे। शकुन्तला की माँ देवलोक से पृथ्वी पर उतर कर विश्वामित्र के संयोग से उसे जन्म दे गई थी। पांडव अन्त समय में सशरीर स्वर्गारोहण के लिए अग्रसर हुए थे।

इन कथा गाथाओं को यदि मिथक मानकर संतोष न कर लिया जाय और धरती पर स्वर्ग होने की बात पर ध्यान जुटाया जाय तो इसी निश्चय पर पहुँचना पड़ता है कि हिमालय का देवात्मा भाग कभी अति पुरातन काल में स्वर्ग भी रहा है। देवता सुमेरु पर्वत पर रहते थे। उनके उद्यान का नाम नन्दन वन था। यह दोनों ही इसी नाम से उपरोक्त क्षेत्र में अभी भी विद्यमान है। सुमेरु को स्वर्ण पर्वत कहा गया है। उसके शिखर पर अधिकाँश समय सूर्य की पीली किरणें पड़ती हैं। अस्तु बरफ सुनहरी दीखती है और स्वर्ण की बनी जैसी प्रतीत होती हैं। अब भू-भाग नीचा आ गया है। पर्वत ऊँचे हो गये। शीत की अधिकता बढ़ी संभवतः इस कारण देवताओं ने वह क्षेत्र अपने लिए उपयोगी न समझा हो और कारण शरीरों में अन्तरिक्ष क्षेत्र में रहने लगे हों, अपना स्थान सिद्धपुरुषों के लिए स्थानान्तरित कर दिया हो।

जो हो चर्चा सिद्धपुरुषों के संबंध में अभीष्ट हैं। उनके लिए यह स्थान सर्वथा उपयुक्त भी है। पूर्ववर्ती देव निवास होने के कारण उसकी संव्याप्त सुसंस्कारिता भी बढ़ी चढ़ी है। फिर धरती की परिस्थितियों को दूर-दूर तक देखने समझने की क्षमता भी। धरती की निचली पतों पर हवा में उड़ने वाला कचरा तह बनाकर बैठता रहता है। इसी प्रकार जिन स्थानों की समुद्र सतह में ऊँचाई कम हैं, वहाँ स्वस्थता और सम्पन्नता के साधन घटते जाते हैं। सौंदर्य सद्भाव भी अपेक्षाकृत कम होता है। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती जाती है वैसे-वैसे भूमि की उर्वरता और प्राणियों की प्रतिभा का विकास हुआ दृष्टिगोचर होता है। इस दृष्टि से हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्र में जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य की भरमार है वहाँ स्वास्थ्य संरक्षक तत्व भी कम नहीं है।

साधन सम्पन्न लोग गर्मी के दिनों पहाड़ों पर अपनी निवास व्यवस्था बनाते हैं। जो अधिक समय वहाँ ठहरने की स्थिति में नहीं है वे उस क्षेत्र में सैर सपाटे के लिए निकलते हैं। कितने ही सेनेटोरियम पहाड़ी क्षेत्र में बने हैं। जिनमें क्षय जैसे कष्ट साध्य रोगों के रोगी रोगमुक्ति का लाभ प्राप्त करते हैं। सम्पन्न लोगों के विद्यालय भी देहरादून, मंसूरी, नैनीताल, अल्मोड़ा, जैसे स्थानों पर बने हैं, ताकि छात्र विद्या प्राप्ति के अतिरिक्त प्रकृति सान्निध्य एवं उपयुक्त जलवायु के सहारे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में अभिवृद्धि कर सकें। पहाड़ी क्षेत्र में निर्धनता रहते हुए भी वहाँ के निवासियों में सहनशीलता एवं सज्जनता की मात्रा अन्य स्थानों की अपेक्षा कम नहीं अधिक ही पाई जाती है।

तीर्थ यात्रा की धर्म भावना से प्रेरित होकर अब धर्मप्रेमी अन्यान्य भीड़ भरे नगरों में देवदर्शन के लिए जाने की अपेक्षा उत्तराखण्ड की दिशा अधिक उत्साहपूर्वक पकड़ने लगे हैं। अब से 100 वर्ष पहले मुश्किल से 6 हजार यात्री उस क्षेत्र में जाते थे। पर अब उनकी संख्या 20 लाख से भी अधिक होती है। यह प्रमाण बताते हैं कि मानसिक शान्ति की दृष्टि से जन-साधारण के लिए देवात्मा हिमालय वाला भाग कितना उत्साहवर्धक और आनन्ददायक है।


कवि भौंचक्के रह गए (Kahani)

एक कवि ने राजा की प्रशंसा में लम्बी कविता और इस भाव से चावपूर्वक सुनाई कि उसके बदले में राजा कोई बड़ा उपहार देगा।

कवि दरबार में उपस्थित हुआ। राजा ने ध्यान पूर्वक उनकी रचना सुनी साथ ही उद्देश्य भी समझा।

अब पुरस्कार देने की बारी आई। राजा ने कल दस हजार स्वर्ण मुद्राएं देने की बात कही और उन्हें विदा कर दिया।

कवि रात भर मिलने वाली राशि में अनेकानेक मनोरथ पूरे करने की योजनाएं बनाते रहे। फूले नहीं समाते थे। उत्सुकता और प्रसन्नता इतनी छाई रही कि रात को नींद भी न आई।

दरबार लगते ही कवि जा पहुँचे। राजा ने अनजान की तरह पूछा - किस लिए इतनी जल्दी आना हुआ?

कवि भौंचक्के रह गए। स्मरण दिलाया कि उन्हें आज दस हजार स्वर्ण मुद्राओं का उपहार राज्य कोष से मिलना जो है।

राजा हंस पड़े बोले - आपने हमें बातें बता कर खुश कर दिया। खुशी की बात सुनाकर अपने मन हरा कर दिया वस्तुतः स्वर्ण मुद्राएँ लेनी हों तो उसके बदले का परिश्रम राज्य व्यवस्था के लिए करना।

कवि निराश लौट गए। रास्ते भर सोचते रहे - शायद ईश्वर के यहाँ भी यही व्यवस्था है। जिसके कारण मेरी ही तरह भक्तजनों को भी निराश रहना पड़ता है।


भीम की मुनादी

उसी दिन गले में ढोल डालकर भीम स्वयं ही नगर में मुनादी पीटने निकल पड़े। लोगों को आश्चर्य हो रहा था कि जहाँ यह कार्य एक साधारण कर्मचारी किया करता था वहाँ उसे भीम स्वयं ही करने क्यों निकल पड़े है? संभवतः कोई बड़ी और महत्वपूर्ण बात होनी चाहिए। जिसको पता चला वही सुनने के लिए दौड़ पड़ा। भारी भीड़ जमा होने लगी।

भीम की घोषणा विचित्र थी। वे जगह-जगह ढोल बजाते, जनता को एकत्रित करते और कहते कि “सज्जनो कितनी प्रसन्नता की बात कि महाराज युधिष्ठिर ने कालबली को जीत लिया है। यह विजय हम सभी के लिए गर्व की बात है।

मुनादी दिन भर बजती रही। चर्चा एक से दूसरे के कानों पहुँची। सारा नगर अवगत हो गया, साथ ही आश्चर्यचकित भी। भला काल किस प्रकार जीत लिया गया? इससे तो मृत्यु को भी टाला जा सकेगा।

मुनादी की सूचना गुप्तचरों ने महाराज युधिष्ठिर तक पहुँचाई। वे स्वयं आश्चर्यचकित थे कि ऐसी अनहोनी बात भीम जैसे जिम्मेदार द्वारा जनता तक स्वयं पहुँचाई गई? यह तो और भी अधिक असामंजस्य की बात है।

भीम को दरबार में बुलाया गया। महाराज ने कड़ककर पूछा- क्या तुमने काल जीतने वाली मुनादी की है? यदि की है तो एक मिथ्या भ्रम फैलाने का क्या कारण था?

भीम अविचल थे। वे न तो झिड़की पर डरे और न तनिक भी लज्जित हुए। उनमें शान्त भाव से उत्तर देते हुए कहा- राजन कल आपने ही तो एक ब्राह्मण के दान माँगने पर यह उत्तर दिया था कि “कल आना तब मिलेगा।”

इस उत्तर से मैंने जाना कि आपको जीवन का पूरा पक्का विश्वास हो गया है कि कल तक आप भी जीवित रहेंगे और वह ब्राह्मण भी। यदि इसमें कुछ संदेह होता तो आप कल की बात कैसे कहते? आप दोनों में से मृत्यु किसी को उठा ले जाती तो आपका वचन झूठा पड़ जाता और आप पर मिथ्यावादी होने का दोष लगता। काल को बस में करने वाला ही किसी को ऐसा वचन दे सकता है जैसा कि आपने उस ब्राह्मण को दिया। इसलिए मैंने जो निष्कर्ष निकाला वह वास्तव में बड़ा आनन्ददायक था। मैं भी आनन्द विभोर हो गया और सेवक को बुलाने की अपेक्षा उत्साह के आवेश में स्वयं ही मुनादी करने निकल पड़ा। इसमें कोई भूल हुई हो तो बतायें?

युधिष्ठिर गंभीर हो गये। कल के लिए ब्राह्मण को टाल देने की बात पर दार्शनिक दृष्टि से गंभीर विचार करने लगे। घटना तो छोटी थी। उस समय व्यस्त रहने के कारण याचक को कल आने के लिए कह दिया गया था। पर इतनी गहराई से नहीं सोचा गया कि काल का क्या ठिकाना? वह कभी भी आ धमक सकता है। ऐसी दशा में वचन भंग का दोष लगने की बात तो निश्चय ही सारगर्भित थी।

याचक को सेवक भेजकर तुरन्त बुलाया गया। जो देना था सो दे दिया गया। युधिष्ठिर को बोध हुआ। उनने प्रतिज्ञा की कि वे वहीं कहेंगे जो आज कर सकते हैं। कल की बात तो कल की परिस्थितियों पर ही निर्भर रह सकती है।

याचक को सेवक भेजकर तुरन्त बुलाया गया। जो देना था सो दे दिया गया। युधिष्ठिर को बोध हुआ। उनने प्रतिज्ञा की कि वे वहीं कहेंगे जो आज कर सकते हैं। कल की बात तो कल की परिस्थितियों पर ही निर्भर रह सकती है।


जीभ को क्यों नहीं काटते (Kahani)

दाँतों से किसी ने पूछा - तुम हर चीज को काटते हो पर अपने शिकंजे में रहने वाली जीभ को क्यों नहीं काटते?

दांतों ने कहा - हम इससे डरते हैं कि कोई कड़वी बात कह बैठी तो किसी से हम बत्तीसों को तुड़वा देगी।


व्यक्ति निर्माण - उत्कृष्ट वातावरण पर निर्भर

व्यक्ति निर्माण एवं समाज निर्माण के लिए ऐसी शिक्षा-प्रणाली और वातावरण व्यवस्था की आवश्यकता है जिसके प्रभाव से अनुप्राणित होकर पिछड़े हुए लोग ऊँचे उठ सकें और नई पीढ़ी को उपयुक्त दिशा-धारा का सम्बल मिल सके।

वातावरण के प्रभाव और सत्संग-कुसंग की प्रशंसा-निन्दा से शास्त्र भरे पड़े हैं। सत्संग की महिमा का तो इतना भावनापूर्ण उल्लेख है जिसे पढ़ने सुनने पर अत्युक्ति की गंध आती है, पर विचार करने पर उस प्रतिपादन को तथ्य पूर्ण ही माना जायगा। इतिहास में इस बात के अनेकों प्रमाण है कि सामान्य मनःस्थिति और परिस्थिति के व्यक्ति किन्हीं महामानवों के उच्चस्तरीय संपर्क में आकर तेजी से अपने व्यक्तित्व को समुन्नत और परिष्कृत करते चले गये और प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचे। यदि उन्हें वैसा अवसर और वातावरण न मिलता तो संभवतः वे उसी स्थिति में पड़े रहते जिसमें कि उनके अन्य साथ कुटुम्बी निर्वाह करते हुए जिन्दगी के दिन पूरे कर गये। इस प्रकार ऐसी घटनाओं की भी कमी नहीं है जिनमें अच्छे, खासे-भले, चंगे मनुष्य हेय वातावरण के दबाव से कुसंग में फँसे और क्रमशः गिरते-गिरते पतन के भयंकर गर्त में जा गिरे। नई उम्र के किशोर और युवक प्रायः इसी कुचक्र में फँसकर अपना भविष्य अंधकारमय बनाते देखे गये हैं। आवारागर्दी, गुण्डागर्दी, उच्छृंखलता, चोरी, नशेबाजी जैसी बुरी आदतों में भले घर के बालकों को फँसते और अपना सर्वनाश करते बहुधा देखा जाता है।

ऐसा क्यों हुआ है? इसका पता करने पर यही बात सामने आती है कि कुसंग के फौलादी शिकंजे में फँसकर वे बाज द्वारा दबोचे हुए कबूतर की तरह निराश मनःस्थिति में कही से कहीं घिसटते चले गये हैं। नारद के संपर्क से ध्रुव, प्रहलाद, पार्वती, सावित्री जैसे अनेकों नर-नारियों ने ऐसी प्रेरणाएं पाई जिनके सहारे वे असामान्य बन गये। अंगुलिमाल, अजामिल, अम्बपाली जैसे ओछे जीवन भी किन्हीं प्रतिभाओं के प्रभाव से अपने में पूर्णतया परिवर्तन करके निकृष्ट से उत्कृष्ट बनने में समर्थ हुए थे। भगवान बुद्ध के संपर्क में आकर असंख्यों को देवमानव बनने का अवसर मिला। गाँधी जी की निकटता और घनिष्ठता ने कितनों को युग पुरुष बनाया। वे अपने को धन्य बनाने और उस समय को बदलने में सफल हुए। अरस्तू के द्वारा सिकन्दर का, चाणक्य द्वारा चन्द्रगुप्त का, समर्थ गुरु रामदास द्वारा शिवाजी का, रामकृष्ण परमहंस द्वारा विवेकानन्द का, विरजानन्द द्वारा दयानन्द का निर्माण हुआ था। उनमें अपनी मौलिक प्रतिभा भी थी, पर खराद ने से हीरे का मूल्य निखरता है।

संसार के विभिन्न क्षेत्रों का पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि क्षेत्रीय विशेषता का वहाँ के पदार्थों और प्राणियों पर कितना प्रभाव पड़ता है। ठंडे देशों के निवासी गोरे रंग के सुदृढ़ और दीर्घजीवी होते हैं, परन्तु जहाँ गर्मी अधिक पड़ती है, वहाँ लोगों के स्वास्थ्य गिरे, शरीर दुर्बल और रंग काले पाये जाते हैं। यही बात वनस्पतियों के संबंध में भी है। जड़ी-बूटियाँ वहीं है, पर विभिन्न क्षेत्रों में उगाये जाने पर उनके गुणों में न्यूनाधिकता उत्पन्न हो जाती है। हिमालय क्षेत्र में गंगातट पर उगी ब्राह्मी की तुलना में मैदानी क्षेत्रों में नहर, चरागाहों के किनारे उगी हुई ब्राह्मी के गुणों में भारी अन्तर पाया जाता है। यही बात अन्यान्य वनौषधियों के संबंध में भी है।

मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान में पाया कि किसी स्थान विशेष के वातावरण का जीवों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए हिमालय की तराई में हरने वाले पहाड़ियों में अपराधवृत्ति कम पाई जाती है दूसरे दुश्चरित्र व्यक्ति भी यदि इस क्षेत्र में पहुँच जायँ तो उनकी विचारणाएं-भावनाएं भी बदलती देखी गयी है। इसका प्रमुख कारण उस क्षेत्र में चिरकाल से निवास करने वाले तपस्वी ऋषियों के द्वारा विनिर्मित पवित्र एवं प्रखर वातावरण को माना गया है। सुप्रसिद्ध विद्वान जान स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “प्रिंसिपल आफ पाँलिटिकल इकोनाँमी” में लिखा है कि स्थान-स्थान पर विभिन्न जातियों एवं समुदायों में रहने वाले व्यक्तियों के स्वभाव, मान्यताओं, आकाँक्षाओं एवं क्रियाकलापों में भारी अन्तर दिखाई पड़ता है। कही के निवासी अधिक बहादुर व साहसी होते हैं तो कही के खूँखार। किन्हीं-किन्हीं जातियों में चरित्रनिष्ठा अधिक दिखाई पड़ती है। जापान, इजराइल, डेनमार्क आदि देशों के निवासी अधिक परिश्रमी होते है। सरहदी पठानों का खूँखारपन प्रसिद्ध है। मिल के अनुसार स्थान विशेष के निवासियों में ऐसी विशेषताएं उस स्थान के वातावरण के प्रभाव का ही परिणाम है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जूलियन हक्सले ने इस विशेषता को ‘साँस्कृतिक विशेषता’ की संज्ञा दी है और कहा है कि इस विशेषता को कोई भी उस वातावरण में रहकर प्राप्त कर सकता है।

मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षा शास्त्रियों ने अनेकानेक प्रयोगों के द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है कि व्यक्ति के ऊपर वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। श्रेष्ठ एवं प्रेरणादायक वातावरण से व्यक्तित्व में निखार आता है, जबकि दूषित वातावरण के प्रभाव से होनहार, प्रतिभावान एवं सच्चरित्र व्यक्ति भी पशुतुल्य हेय जीवन जीते देखे गये हैं। समय-समय पर जंगली जानवरों के साथ पकड़े गये बालकों के जीवन स्तर को देखकर इस तथ्य की वास्तविकता को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।

फ्राँस के एविरोन नामक जंगल में कुछ शिकारियों ने सन 1977 में एक बारह वर्षीय बालक को बंदरों के साथ पेड़ों पर उछलते-कूदते देखा तो उसे पकड़कर वे पेरिस ले आये और वहाँ के प्रसिद्ध मनःचिकित्सक डॉ. ज्याँइनार्द के सुपुर्द कर दिया। उन्होंने उसका नाम विक्टर रखा तथा लम्बे समय तक उसका प्रशिक्षण किया। विक्टर चार वर्ष तक जीवित रहा लेकिन तब तक उसे मात्र खाने और वस्त्र पहनने जितना ही सिखाया जा सका। इसी तरह सीरिया के मरुभूमि में हिरनों के झुंड के साथ रहते हुए 1946 में एक बालक पकड़ा गया था। उस पर भी प्रशिक्षण के सभी प्रयास विफल रहे थे।

डॉ. ज्याँ इनार्द के अनुसार प्रस्तुत समय के वातावरण में विभिन्न स्तर के भरते जा रहे प्रदूषण में यदि इसी तरह अभिवृद्धि होती रही तो आने वाली पीढ़ी को इसके दुष्परिणाम निश्चय ही भुगतने पड़ेंगे और तब वे जंगली जानवरों के साथ पकड़े गये बालकों की तुलना में थोड़ा बहुत ही सभ्य कहलाने योग्य होंगे। इसी से मिलती-जुलती मान्यता मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. क्रुक शैंक की है। उनका कहना है कि मनुष्य अपनी संतति या भावी पीढ़ी को अपनी प्रवृत्तियाँ एक अचल सम्पत्ति के रूप में सौंपता है। भली-बुरी जैसे भी वे रहती है, वातावरण उन्हें कई गुना बढ़ा देते हैं और यही उनके उत्थान पतन का कारण बनती है। व्यक्तित्व को सुधारने के लिए शिक्षणपरक उपायों की उपयोगिता को मानते हुए भी वे कहते हैं कि यदि प्रवृत्तियों की दृष्टि से भी मनुष्य को परिष्कृत बनाना है तो यह कार्य उनके जन्मदाताओं को प्रजनन की बात सोचने के पूर्व अपने जिन के सुधार-परिष्कार के साथ ही अपने आसपास के वातावरण को भी श्रेष्ठ बनाने के रूप में आरम्भ करना चाहिए। इतना ही नहीं यह कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी चले तभी ऐसा संभव है।

श्रेष्ठ वातावरण के निर्माण में सामूहिक उपासना, साधना महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्राचीन काल में सामूहिक प्रार्थना, उपासना एवं यज्ञ आयोजनों आदि का बाहुल्य था। परिशोधित वातावरण के कारण जन-जीवन उत्कृष्टता की चरम सीमा पर था। सभी का जीवन आनन्दमय था। उस काल में धार्मिकता ही नैतिकता की पर्यायवाचक थी। अब परिस्थितियाँ बदल गई है। साम्प्रदायिकता बहुमुखी हो गई है और परस्पर विरोधी भी। ऐसी दशा में वातावरण बनाने के प्रश्न पर विचार करने वालों को नैतिकता और सामाजिकता की आस्थाओं को ही सामूहिक सम्मिलन का माध्यम बनाना होगा। प्राचीन धर्म तत्वों का आधार समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी की भावनाओं में सन्निहित समझा जा सकता है। इसके लिए स्काउटिंग भावना को साथ लेकर हमें सामूहिक आयोजन की संरचना प्रेरणाप्रद वातावरण बनाने के निमित्त करनी चाहिए।


मनुष्य का उच्च दृष्टिकोण (Kahani)

सुन्दर वस्तुओं में मनुष्य का उच्च दृष्टिकोण और आदर्श ही सबसे अधिक सुन्दर है।


अणु में विभु, लघु में महान!

काया में विद्यमान उस विराट का अनुमान करना ही तो इसके लिए स्थूल जगत पर एक दृष्टि आवश्यक है। इससे सहल ही अन्दाज लगाया जा सकता है कि यह ब्रह्माण्ड कितना विशाल है। हम जिस निहारिका के अंग है उसे देवयानी कहा गया है। प्रत्येक निहारिका में लाखों करोड़ों सौरमण्डल है। हरेक के अनेक ग्रह, उपग्रह है। हम जिस सौर-मण्डल में रह रहे हैं, उसमें सूर्य को छोड़कर कुल नौ ग्रह है - बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून, प्लूटो। ये सभी ग्रहपति सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इनमें से प्रत्येक के पुनः कई-कई उपग्रह है। पृथ्वी का एक, मंगल के दो, बृहस्पति के 16, शनि के 16, यूरेनस 5, प्लूटो 1, नेपच्यून 2 इस प्रकार अपने सौरमंडल में कुल 43 चन्द्रमा है जो अपने ग्रहों के ईद-गिर्द परिभ्रमण करते हैं। सूर्य से इनकी दूरियाँ क्रमशः 297, 1090, 1521, 2491, 8957, 15070, 30040, 45370, 73750 लाख कि.मी. है। अर्थात् मोटेतौर पर अपने सौर मण्डल का विस्तार लगभग 73750 लाख वर्ग कि.मी. माना जा सकता है। यह तो सिर्फ अपने सौरमंडल की एक सामान्य सी झलक-झाँकी हुई। इस प्रकार के अनेकानेक सौर परिवार देवयानी में है। देवयानी जैसी अरबों निहारिकाओं के मिलने से आकाश गंगा बनती है। ब्रह्माण्ड में ऐसी अगणित आकाश गंगाएं हैं। अपने सूर्य जैसे करीब 500 करोड़ ताराओं के सौर-मण्डल तथा अकल्पनीय विस्तार वाले धूल एवं गैस वर्तुलों के मेघ मिलकर एक आकाश गंगा बनाते है। ऐसी 10 करोड़ से भी अधिक आकाश गंगाओं व उनके मध्य के अनन्त आकाश को एक ब्रह्माण्ड कहा गया है।

अपनी आकाश गंगा ध्रुव द्वीप की 19 आकाश गंगाओं में से एक है। इसमें लगभग एक अरब सूर्य है, जिसके पृथ्वी जैसे असंख्य ग्रह-उपग्रह हैं। इन ताराओं में से कई तो अपने सूर्य से अनेक गुना बड़े है। व्याध तारा सूर्य से विस्तार में 21 गुना अधिक है। ज्येष्ठा तो इससे भी कई गुना बड़ा है। उसका विस्तार इतना अधिक है कि उसमें लगभग 700 खराब पृथ्वी समा सकती है। अंतरिक्ष में ऐसे द्वीपों की संख्या भी कोई कम नहीं है। माउण्ट पैलोमर में लगी 200 इंच व्यास वाली विशाल दूरबीन से अनन्त अंतरिक्ष में अब तक कम से कम ऐसी एक अरब आकाश गंगाएं खोजी गयी है। मूर्धन्य अमेरिकी खगोलविद् ई0पी0 हब्बल के अनुसार आकाश गंगाएँ इससे भी कई गुना अधिक अस्तित्व में हो सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि परिमित सामर्थ्य वाली दूरबीनों से अपरिमित आकाश का पर्यवेक्षण संभव नहीं हो सकता। उनका विश्वास है कि अबतक अंतरिक्ष की जितनी ढूंढ़ खोज की जा चुकी है, वह विराट् का एक नगण्य सा भाग है। इससे कई गुना अधिक अविज्ञात के गर्त में अभी भी पड़ा हुआ है। जिसका अन्वेषण प्रायः असंभव है। इसी से विराट् ब्रह्माण्ड की विशालता का अनुमान लगता है। यदि इन आँखों से अपने ही सौर मण्डल की हलचलें देख लें, तो हम चकराये बिना न रहेंगे, इससे भी करोड़ों गुने विराट् के दिग्दर्शन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।

आत्मवेत्ताओं का विचार इससे भिन्न है। उनका कहना है कि यह बात भले ही भौतिक जगत के लिए शत-प्रतिशत सही हो, किन्तु आत्मिकी के क्षेत्र में ऐसी कोई बात नहीं, जो असंभव प्रतीत हो। वे काया को ब्रह्माण्ड का लघु-संस्करण मानते हैं और कहते हैं कि ब्रह्माण्ड में जो-जो संरचनाएं है वह सब कुछ इस काया में देखी जा सकती है। मगर वह सब इस शरीर में माइक्रोफिल्म की तरह है। जिस प्रकार माइक्रोफिल्म में अंकित चित्रों और अक्षरों को सीधे आँखों द्वारा देख-समझ नहीं पाती। इसके लिए ज्ञान-चक्षु, दिव्य-चक्षु की आवश्यकता पड़ती है, जिसे पराक्रमपूर्वक विकसित करना पड़ता है।

ऐसी बात नहीं कि आत्मविदों का यह कथन मात्र कपोल-कल्पना और चर्चा भर है, वरन् इसमें सच्चाई भी है। हमारे धर्म ग्रन्थों में इसकी अनेक साक्षियाँ उपलब्ध है। रामचरित मानस में इस संदर्भ में दो आख्यायिकाएं हैं।

माँ कौशल्या अपने पुत्र राम को पय-पान कराने की इच्छा से शिशु-ग्रह में प्रवेश करती है। राम सोते हुए पाकशाला में बैठे अन्न ग्रहण करते दिखाई देते हैं। कौशल्या को भय, भ्रम और विस्मय होता है। वह फिर भागकर शिशुगृह पहुँचती है, तो वहाँ राम पूर्ववत् निद्रालीन दिखाई पड़ते है। आश्चर्य से माता का सिर चकरा जाता है। उसी अवस्था में भगवान राम अपना विराट् रूप दिखाते हैं - अगणित ब्रह्माण्ड, उनके अपने लोकपाल, दिग्पाल, खरबों नक्षत्र, अरबों लोक, सर्वत्र जीवन-पालन-प्रगति, सर्वत्र मरण और सर्वत्र प्रलय के विनाशकारी दृश्य।

कौशल्या परेशान हो उठती है। राम अपनी माया समेट लेते है। जननी को पिण्ड में ब्रह्माण्ड की उपस्थिति और विराट् ईश्वरीय सत्ता का बोध हो जाता है फिर वे सुस्थिर चित्त अपने कर्त्तव्य पालन में निरत हो जाती है।

दूसरे प्रसंग में काकभुशुण्डि को इसका दिव्य-दर्शन हुआ। किसी ने उनसे बताया कि राम ईश्वरीय-सत्ता के प्रतीक-प्रतिनिधि हैं, आपको उनके दर्शन करना चाहिए। इसी इच्छा से वे अयोध्या पहुँचे। मुँडेर पर बैठे-बैठे वे राम को आँगन में सामान्य बालकों जैसी क्रीड़ा करते, खाते-पीते, हँसते-बोलते देखकर भ्रमित हो जाते हैं। सोचते है - यह कैसा अवतार, जो साधारण बालकों जैसी अठखेलियाँ करें? राम उनकी मनःस्थिति भाँप लेते हैं और मुँह फाड़कर उन्हें उदरस्थ कर लेते हैं। उनके उदर में काकभुशुण्डि जी को विराट्-विश्व के दर्शन होते हैं। उस अनुभूति का वर्णन वे बड़े ही सुन्दर ढंग से गरुड़ जी से करते हैं “हे गरुड़ जी! मैंने राम के मुँह में अनेक ब्रह्माण्ड देखे, अनेक लोक, अनेक रचनाएं, अनेक शक्तियाँ, देवी-देवता, कोटि-कोटि तारागण, सूर्य-चन्द्र, अगणित भूखण्ड, सागर, सर, वन और तरह-तरह की सृष्टियाँ। जो कुछ इस पृथ्वी पर नहीं है, वह सब भी देखा, जिसका वर्णन करना भी कठिन है। एक-एक ब्रह्माण्ड में मैंने सौ-सौ वर्ष बिताये। ऐसे अनेक ब्रह्माण्डों में मैं कुल दो घड़ी में घूम आया। उस विराट को देखकर मैं अत्यन्त भ्रमित हो उठा हूँ।”

श्रीकृष्ण ने ऐसा ही विराट स्वरूप अपनी माँ यशोदा तथा सखा अर्जुन को भी दिखाया था और लोगों को बता दिया था कि यदि व्यक्ति चाहे, तो इस व्यष्टि सत्ता में ही उसे समष्टि के दर्शन हो सकते हैं, पर इसके लिए दिव्य दृष्टि चाहिए। हमारी स्थूल आँखें उतनी समर्थ नहीं कि उस विराट् को देख सकें। इसीलिए भगवान ने अर्जुन को यह कहते हुए दिव्य चक्षु प्रदान किया कि -

न तु माँ शक्यसे द्रष्टफमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम्॥

अर्थात् हे अर्जुन! तू मेरे विराट स्वरूप को इन सामान्य आँखों से नहीं देख सकता। इसलिए मैं तुझे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूँ। उससे तू मेरे विस्तार, प्रभाव और योग शक्ति को देख। सचमुच, इसके बाद अर्जुन ने जो कुछ भी देखा उससे हतप्रभ रहे गये। एक अन्य अवसर पर महाभारत से पूर्व जब दुर्योधन श्रीकृष्ण को बाँधने चले थे, तब भी उनने अपने विराट् स्वरूप का प्रदर्शन किया था, जिसे देख वह चकरा गये थे।

इन आख्यायिकाओं में जिस तथ्य की ओर संकेत किया गया है, वह है ब्रह्माण्ड की विराट् संरचना इतनी बड़ी रचना को और उनके नियन्ता को स्थूल आँखों से देख सकना संभव नहीं। इसलिए ज्ञान की परिधि की विराट् तक चौड़ा तो किया जाय पर अन्ततः उस मूल चेतना को मानवीय अस्तित्व के रूप में स्वीकारा जाय। विराट् को देख सकना संभव नहीं, पर अणु को, आत्मा को देख सकना शक्य है। इस आवश्यकता को पूरा कर लिया जाय, तो अणु में ही विराट् के दर्शन और अनुभूति संभव है। इतना ही नहीं, साँसारिक जीवन में कर्तव्य-कर्म से बँधे रह कर भी उस मूल सत्ता को प्राप्त करने की आकाँक्षा को पूरा किया जा सकता है पर इसके लिए व्यक्तित्व में उत्कृष्टता ओर कर्तव्य में परमार्थ परायणता का एक आवश्यक अनुबन्ध पूरा करना पड़ता है। यदि यह सम्भव हो सके स्वयं को सामान्य स्तर से कुछ ऊँचा उठाकर भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाया जा सके तो इसी काय-पिण्ड में विशाल ब्रह्माण्ड की अनुभूति की जा सकती है। मानव जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य भी यही है।


हम अकेले नहीं है!

मनुष्य, सृष्टि के जिस छोटे से घटक पृथ्वी पर निवास करता है, प्राणियों का अस्तित्व इसी तक सीमित नहीं है। अनन्त अन्तरिक्ष में अनेकानेक ग्रहों, उपग्रहों, निहारिकाओं तथा मंदाकिनियों की परिस्थितियाँ, जलवायु एवं वातावरण ऐसा है, जहाँ जीवन की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से जो तथ्य सामने आये हैं, उनसे स्पष्ट होता है कि हमसे भी कही अधिक बुद्धिमान स्तर का जीवन, समाज और सभ्यता अन्य ग्रहों पर विद्यमान है।

मनुष्य सृष्टि के जिस छोटे से घटक पृथ्वी पर निवास करता है। प्राणियों का अस्तित्व इसी तक सीमित नहीं है। अनन्त अन्तरिक्ष में अनेकानेक ग्रहों, उपग्रहों निहारिकाओं तथा मंदाकिनियों की परिस्थितियों, जलवायु एवं वातावरण ऐसा है जहाँ जीवन की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से जो तथ्य सामने आये है। उनसे स्पष्ट होता है कि हमसे भी कहीं अधिक बुद्धिमान स्तर का जीवन, समाज और सभ्यता अन्य ग्रहों पर विद्यमान है।

लोकान्तर स्थित बुद्धिमान प्राणियों के पता लगाने एवं संपर्क साधने में निरत अमेरिका के मेरीलैण्ड विश्वविद्यालय के रासायनिक विकास संस्थान के निर्देशक डॉ. सिरल पोन्नेमपेरुपा के अनुसार हमारे नभ मण्डल में दस लाख सभ्यताएं अस्तित्व में है। उनका अध्ययन करने के लिए विभिन्न देशों में विशालकाय रेडियो टेलिस्कोप, कम्प्यूटर आदि लगाये गये हैं। उनसे संदेश प्राप्त करने का प्रयास निरन्तर चल रहा है। रेडियो एस्ट्रोनोमी के विकास ने हमारे लिए सुदूर ग्रह नक्षत्रों के प्राणियों से संबंध स्थापित करने एवं उनसे विचारों का आदान-प्रदान करने की एक नई खिड़की खोल दी है।

लोकान्तर स्थिति सभ्यता का अनुसंधान कार्य पश्चिम एर्जीनिया स्थित ग्रीनबैंक की ‘नेशनल रेडियो एस्ट्रोनामी आब्जरवेट्री’ में सन् 1949-60 में मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. फै्रक ड्रैक् की देख-रेख में आरम्भ हुआ था। इस योजना का नाम “प्रोजेक्ट ओज्मा” रखा गया था। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक फिलिप मौरसन के निर्देशन में नासा प्रोजेक्ट कमेटी, मौशाचुसेट्स इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नोलॉजी की स्थापना की गई। इन वैज्ञानिकों ने शोध परीक्षणों के पश्चात् जजो प्रतिवेदन प्रस्तुत किया उसमें कहा गया है कि इस दिशा में अभी और अत्यधिक शक्तिशाली रेडियो, कम्प्यूटर, टेलीविजन आदि की आवश्यकता पड़ेगा, जिसके आधार पर दूरस्थ प्राणियों से आदान-प्रदान की संभावना साकार हो सके।

न्यूयार्क के इटाहका शहर स्थित “नक्षत्र मंडल अध्ययन प्रयोगशाला” के निर्देशक प्रख्यात वैज्ञानिक कार्ल सैगन ने खगोल विद्या के अति महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डालते हुए प्रतिपादित किया है कि हमारी पृथ्वी सभ्यता से अन्तरिक्ष स्थित ग्रह नक्षत्रों की सभ्यता कहीं अधिक उन्नतिशील है। उन्होंने अपनी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुस्तकों- ‘‘दि ड्रैगन्स आफ इडन, “ब्रोकास ब्रेन” तथा “कास्माँस” में भी इसी प्रकार का वर्णन किया है। उनका कहना है कि आकाश गंगा में दस लाख तकनीकी सभ्यताएं निवास करा रही है। यदि उनमें किसी प्रकार संबंध जोड़ा जा सकेगा सके और आदान प्रदान का क्रम चल पड़े तो मनुष्य उन्नति पथ पर कहाँ से कहाँ पहुँच सकता है।

विश्व की सबसे बड़ी वेधशाला पोर्टारिकों में है। उसमें अन्तर्ग्रही ध्वनि प्रवाहों के जो भी संकेत प्राप्त किये गये हैं उनमें वीप-वीप की आवाज के साथ 1, 2, 3, 4, 5, 11, 13, 17, 19, 23, 29, 31 संख्याओं के अंक भी नोट किये गये हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार संभवतः ये अन्तरिक्षीय लोकों के बुद्धिमान प्राणियों के संकेत सूत्र हैं, जिनके माध्यम से वे अपनी उपस्थिति की जानकारी देते हैं, साथ ही पृथ्वी वासियों से संपर्क साधने का भी प्रयत्न करते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अब वैज्ञानिकों ने उनसे विचार विनिमय के लिए अंक गणितीय संख्याओं के संक्षिप्त सूत्र बना कर भेजे जाने पर अनुसंधान कार्य आरम्भ कर दिया है। कम्प्यूटर के माध्यम से प्राप्त किये गये आँकड़ों से भी यह स्पष्ट हो चुका है कि वहाँ पाँच रासायनिक तत्व विशेष मात्रा में विद्यमान है जैसे हाइड्रोजन, मीथेन, नाइट्रोजन, आक्सीजन तथा फास्फोरस। इसके अतिरिक्त कार्बन तथा अमोनिया की मात्रा भी अधिक है। आज से अरबों वर्ष पहले यही सब तत्व पृथ्वी की आरंभिक अवस्था में बिखरे पड़े थे। कालान्तर में अणु परमाणुओं के संगठन, स्वरूप रासायनिक तत्वों के उथल-पुथल होते रहने से पृथ्वी वर्तमान स्वरूप में आ सकी है। अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस प्रकार के तत्व वाले ग्रहों पर जीवन, समाज सभ्यता अवश्य ही होंगे।

अन्तरिक्षीय अन्तर्ग्रही सभ्यताओं और पृथ्वी की सभ्यता के मध्य अत्यधिक दूरी का अंतर है। परन्तु यदि प्रकाश से अधिक तीव्र गति से चलने वाले फोटोन प्रवाह पर नियंत्रण किया जा सके तो उसके माध्यम से यह दूरी कुछ ही वर्षों में पूरी की जा सकती है। इस संदर्भ में अंतरिक्ष भौतिकी की सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री वैलेस सालीवाल ने एक पुस्तक लिखी है - “हम अकेले नहीं है।” इसमें ब्रह्माण्डव्यापी संचार व्यवस्था पर बल देते हुए उन्होंने नई वेवलेंथ प्रस्तुत की है जो प्रकाश गति से कई गुनी तीव्र बताई गई है। यह वेवलेंथ पद्धति 1420 मेगासाइकिल्स वेवलेंथ के रेडियो कंपनों पर आधारित है। अणु विकिरण की यह स्वाभाविक गति है। अंतरिक्ष संचार व्यवस्था में इस गति को यदि अपनाया जा सके तो अन्य लोकों के प्राणियों से आसानी से संपर्क साधा जा सकता है। हमारे लिए जो दूरी पार करना संभव नहीं, अंतरिक्षवासी संभवतः इस गति को प्राप्त कर चुके हैं तभी वे ऐसे यान बनाने में सफल हुए हैं।

अंतरिक्ष में उन्नत सभ्यता के अवस्थित होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए वैज्ञानिकों ने कहा है कि न केवल मनुष्य उनसे संपर्क साधने का प्रयत्न कर रहा है वरन् लोकांतरवासी भी पृथ्वी के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है। इसका अनुमान धरती पर उड़न तश्तरियों के आवागमन से सहज ही लगाया जा सकता है। सन् 1947 से अब तक हजारों उड़न तश्तरियाँ सामान्यजनों, वैज्ञानिकों, अंतरिक्ष विज्ञानियों द्वारा आकाश में मँडराते एवं धरती पर उतरते देखी गयी है।” इनके अनेकों प्रमाण भी मौजूद है। राडारों एवं फोटो कैमरों द्वारा भी इनकी पुष्टि की जा चुकी है।

आस्टे्रलियन अंतरिक्ष विशेषज्ञ प्रोफेसर रोनाल्ड ब्रेसवेल ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि उड़न तश्तरियाँ वस्तुतः दूसरे ग्रहों के सर्वेयान है जो पृथ्वी की उन्नत सभ्यता और विज्ञान का पता लगाने के लिए यहाँ आते हैं। ये संकेत सूत्रों के माध्यम से यहाँ की जानकारी अपने देश को भेजते हैं। फ्रेंच परमाणु वैज्ञानिक जैक्स वेल्ली का कहना है कि ब्रह्माण्ड की सर्वोत्कृष्ट शक्तियाँ इन तश्तरियों के द्वारा मानव से संबंध स्थापित करने आती है। इनके संचालक कद में छोटे होते है किन्तु इनकी बुद्धि प्रखर है। इनकी भाषा हमारी समझ में नहीं आती फिर भी उनकी सभ्यता हमारे लिए अनुकरणीय है। इवान सैंडर्सन एवं अमेरिका के एलन हाइनेक जैसे मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने इन्हें उच्च मनःशक्ति सम्पन्न एवं अतीन्द्रिय सामर्थ्ययुक्त माना है। इंग्लैण्ड के गार्डन क्रीटर ने लोकान्तर वासियों से घनिष्ठ संपर्क स्थापित करने को बहुत महत्वपूर्ण बताया है।

प्रख्यात मनोवैज्ञानिक कार्लजुंग का कहना है कि उड़न-तश्तरियाँ अन्य ग्रहों से आने वाले अद्भुत शक्ति सम्पन्न लोगों के यान हैं। ये अनेक प्रकार की होती है और विश्व के सब देशों में देखी गई है सन् 1957 के एक लेख में उन्होंने कहा कि सारा संसार इनकी यथार्थता को अब मानने लगा है। ये चेतना के अज्ञात रहस्यों के द्योतक है। इन्हें एकता, मित्रता एवं सहानुभूति का द्योतक माना जा सकता है। सुविख्यात वैज्ञानिक विशेषज्ञ डेविड टान्सले के अनुसार ये तश्तरियाँ मनुष्य को दूसरे लोकों की समर्थता एवं रहस्यों का बोध कराती है। मानवी चेतना में नये भाव एवं विचार पैदा करके मानसिक एवं भौतिक उन्नति करने को प्रेरित करती है।

मनोवैज्ञानिकों का मत है कि मानव जाति दूसरे ग्रहों के अनुदान से जीवित है। अपनी प्रजा के सुख दुःख एवं उन्नति का पता लगाने के लिए ये ग्रहवासी उड़नतश्तरियों से पृथ्वी का भ्रमण करते हैं। जर्मन विशेषज्ञ एरिक वान डानिकेन ने अपनी कृति - रिटर्न टू दि स्टार्स” एवं “चैरियटस आफ द गाड्स” में ऐसे अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिनसे प्रतीत होता है कि अन्य ग्रहों में उन्नत सभ्यता वाले बुद्धिमान प्राणी विद्यमान हैं जो समय-समय पर धरती वासियों की सहायता करने के लिए आते हैं। मनीषियों की मान्यता है कि निकट भविष्य में अन्तरिक्ष वासियों के साथ हमारे संबंध जुड़ेंगे और प्रतिभा के आदान प्रदान का नया क्रम आरंभ होगा।


मरणोत्तर जीवन एक परिचय

कई घंटे तक अनवरत कार्य करने पश्चात् व्यक्ति थक कर चूर हो जाता है। फिर उसे विज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। यदि इस समय उसे कुछ सुस्ताने का अवसर न मिले, तो आगे का कार्य वह उस दक्षता से न कर पायेगा, जैसा कि आरंभ में करता था, पर जब वह कुछ समय आरा कर लेता तो पुनः उसमें नवजीवन का संचार हो जाता है और कई उमंग व स्फूर्ति से कार्यारंभ करता है। मरणोत्तर जीवन को भी दो जन्मों के बीच का विश्रान्ति काल माना जा सकता है जिसमें जीवात्मा अपनी थकान मिटाती और अगले जन्म की तैयारी करती है। यह अब सर्वमान्य तथ्य है कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं, वरन् कलेवर-परिवर्तन मात्र है, इस मध्यान्तर काल में भी वह सर्वथा निष्क्रिय नहीं बन जाती, अपितु सक्रिय रहकर अपनी प्रकृति के अनुरूप लोगों को संत्रास देती अथवा सहयोग सहकार कर निहाल बनाती रहती है।

इस सूक्ष्म स्थिति में व्यक्ति स्वयं को लगभग उसी दशा में अनुभव करता है जैसा कि जीवित अवस्था में था। अन्तर मात्र इतना होता है कि भौतिक शरीर में स्थूल इन्द्रियों के माध्यम से उसे जो प्रत्यक्ष सुख मिल सकता था वही नहीं मिल पाता। किन्तु यह बात नहीं कि सूक्ष्म शरीर स्वाद की अनुभूति कर ही नहीं सकता। इस शरीर की इन्द्रियाँ इसका आनन्द उठा सकती है, मगर वह स्थूल अंग-अवयवों की भाँति पदार्थों का उपभोग और उदरस्थ करने का रसास्वादन नहीं ले पाती। इस दशा में मृतात्मा को इस भौतिक संसार के सब कुछ उसी प्रकार सुस्पष्ट दीखते हैं, जैसा कि रक्त-माँस के शरीर में उसे दिखाई पड़ता था, पर स्वयं वायुभूत होने के कारण वह दूसरों को नहीं दीखती। हाँ इतना जरूर है कि अन्यों के शरीर एवं मस्तिष्क में प्रवेश कर वही अपनी उपस्थिति व अस्तित्व की अनुभूति उन्हें करा सकती है। पंचभौतिक शरीर नहीं होने के कारण वह अपने विचार स्वयं तो प्रकट नहीं कर सकती, परन्तु दूसरों को माध्यम बनाकर ऐसा करने में समर्थ होती है। मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व एवं उसके क्रियाकलापों का प्रमाण ऐसे आधारों से मिलता है, जिनकी यथार्थता तथ्यों की कसौटी पर कसे जाने के बाद सर्वथा सत्य सिद्ध हुई है।

सर ओलिवरलॉज ब्रिटेन के चोटी के वैज्ञानिकों में रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों से उच्चस्तरीय डिग्रियाँ व स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया एवं “ब्रिटिश साइंस एसोसियेशन” के अध्यक्ष पद पर आसीन रहकर अनेक महत्वपूर्ण खोजें उनने की। विज्ञान की ही तरह अध्यात्म में भी उनकी गहरी रुचि थी, अतः इस क्षेत्र में भी उनने अनेक शोध कार्य किये। आत्मा के अस्तित्व की सत्यता परखने के लिए उन्होंने “साइकिक रिसर्च सोसायटी” की स्थापना की व अपने गहन अनुसन्धानों एवं शोध सर्वेक्षणों से न केवल आत्मा की अनश्वरता का पता लगाया, वरन् मरणोत्तर जीवन की यथार्थता को भी सिद्ध किया। इतना ही नहीं, मृतक आत्माओं से संपर्क साधने में भी असाधारण सफलता प्राप्त की। सर ओलिवर लॉज के शोध कार्यों एवं गहन अनुभवों का उल्लेख उनके समकालीन वैज्ञानिक सर विलियम कुक्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “रिसर्च इन टु दि फेनोमेनन ऑफ स्प्रिचुएलिज्म” में किया है।

सर लाँजी की सफलता से प्रोत्साहित होकर इंग्लैण्ड में “सोसायटी फॉर साइकिक रिसर्च” नामक और भी बड़ी संस्था की स्थापना इस विषय पर और व्यापक अध्ययन के लिए की गई। संस्था के सदस्यों ने मरणोपरान्त जीवन की सत्यता परखने के लिए अनेकानेक गोष्ठियाँ आयोजित की जिनमें मृतात्माओं से संपर्क साधने वाले उपयुक्त माध्यमों का चुनाव किया गया। ऐसे माध्यमों में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो0 श्रीमती बैराल व उनकी पुत्री कु0 हेलेन, प्रख्यात अंग्रेजी कवि रुडयार्ड किपलिंग उनकी बहज श्रीमती फ्लेमिंग और अमेरिकी भूभौतिकीविद् श्रीमती पाइपर जैसे मूर्धन्य स्तर के वैज्ञानिक एवं विद्वान सम्मिलित थे। इन व्यक्तियों ने जिन दिवंगत आत्माओं से संपर्क साधे, उनके विचारों, सूचनाओं और जानकारियों को जनसामान्य की तुष्टि के लिए रिकार्ड कर प्रमाण स्वरूप सुरक्षित रखा गया। यहाँ तक कि संपर्क साधने वाले व्यक्तियों के माध्यम से मृतात्माओं द्वारा लिखी गई हस्तलिपि भी रिकार्ड रूप में रखी गयी। इसी प्रकार “क्राँस-कारेस पाँण्डेन्स” प्रक्रिया के माध्यमों द्वारा सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं के संबंध में ऐसे प्रामाणिक तथ्य हस्तगत हुए है।

एक घटना प्रथम विश्वयुद्ध के समय की है। युद्ध लगभग समाप्त हो चुका था। 7 दिसम्बर अपराह्न साढ़े तीन बजे “रॉयल फ्लाइंग कौर्प्स” के लेफ्टिनेंट जे0जे0 लारेकिन अपने कमरे में आग तापते हुए पुस्तक पढ़ रहे थे तभी कमरे के बाहर बरामदे में किसी की पदचाप सुनाई पड़ी। मुड़कर देखा तो उनके चिर–परिचित मित्र अफसर डेविड मैक काँनेल अपनी वायुसेना की वर्दी में खड़े थे। संक्षिप्त बातचीत के दौरान उनने बताया कि “मैं एक महायात्रा पर जा रहा हूँ। मेरे परिवार की जिम्मेदारी अब तुम सम्भालना।” इतना कह कर वह गायब हो गये। लारकिन को कुछ समझ में नहीं आया। क्योंकि एक सप्ताह पूर्व ही मैक काँनेल की चिट्ठी आयी थी, जिसमें उनने अपने एक माह बाद आने की बात लिखी थी। फिर इतनी जल्दी बिना पूर्व सूचना के कैसे आ गये और अचानक पुनः गायब कहा हो गये? यह सब कुछ उन्हें तिलिस्म–सा प्रतीत हो रहा था, मानो वास्तविकता इसमें कुछ हो ही न। अभी वे इसी ऊहापोह में थे कि उन्हें समाचार मिला कि अभी-अभी मैंक काँनेल की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। श्री लारकिन ने अपनी पुस्तक में लिखा है - “मुझे इस घटना पर सहसा विश्वास नहीं हुआ किन्तु जब एक अन्य मित्र ने मुझे काँनेल की मृत्यु के समय की उसकी पोशाक व दुर्घटना के समय का उल्लेख किया, तभी मैं इस पर विश्वास कर सका।

शोध के दौरान इस प्रकार के अगणित प्रमाण उदाहरण प्रकाश में आये, जो मरणोत्तर जीवन की वास्तविकता को असंदिग्ध सिद्ध करते हैं। इस संदर्भ में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के परामनोविज्ञानी प्रो0 एच0पी0 प्रायस का कहना है कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है। यह लगभग वैसी ही प्रक्रिया है जैसी पानी से भाप बनने की है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार पानी से भाप बन जाने के बाद जल का अस्तित्व सूक्ष्म और अदृश्य हो जाता है किन्तु इतने पर भी जल की सत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता। ठीक उसी प्रकार जीवन और मृत्यु के मध्य एक अविच्छिन्न संबंध है। जब उपयुक्त समय आता है। तो यह सूक्ष्म सत्ता भौतिक शरीर धारण कर अपनी अमरता का प्रमाण परिचय देती है। वे आगे कहते है कि मरने के बाद भी हमारी गतिविधियों में कोई अन्तर नहीं आता। वे वैसी ही बनी रहती है जैसी स्थूल शरीर में थी। इस आधार पर उनने अशरीरी आत्माओं को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा है - दुरात्माएं और सदात्माएं। दुरात्माएं वे है जो इहलौकिक जीवन की भाँति ही मृत्युपरान्त भी अपने विध्वंसक क्रियाकलापों में संलग्न रहकर दूसरों को प्रताड़ित करती है, जबकि सदात्माओं की प्रवृत्ति वैसी ही सहयोग सहकारजन्य बनी रहती है। उनका मत है कि इन आत्माओं से संपर्क सान्निध्य के जो सामान्य प्रयोग-प्रयास चलते हैं उनमें से अधिकाँश में बुरी आत्माएं ही संपर्क में आती है, जो उल्टी सीधी जानकारियों देकर लोगों को बहकाने की कोशिश करती रहती है।

उनके इस कथन की पुष्टि “दि सोसायटी फॉर साइकिकल रिसर्च” संस्था ने भी की है। शोध सर्वेक्षण के आधार पर अनुसंधानकर्मियों का कहना है कि श्रेष्ठ आत्माएं उच्चस्तरीय आत्माएं होती है पर उनसे संपर्क साधना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। ऐसे ही व्यक्ति उनसे सूक्ष्म संबंध स्थापित करने में सफल हो पाते हैं, जो शुद्ध हृदय, पवित्र मन और सात्विक वृत्तियों वाले होते हैं। इस संदर्भ में लिखी गई पुस्तकों में “दि टीचिंग्स ऑफ दि ट्वेल्व अपोस्टलस” एवं “दि शेफर्ड ऑफ हर्म्स” अत्यधिक लोकप्रिय व प्रामाणिक मानी जाती है। इनमें लेखक ने ऐसे अनेक प्रामाणिक घटनाओं का वर्णन किया है, जिसमें अनेक व्यक्ति ऐसे पितर एवं देव स्तर की आत्माओं से संपर्क कर संकटकालीन घड़ी से उबरे और अनेक अवसरों पर लाभान्वित हुए। यदि हम भी अपनी भावनाओं और वृत्तियों में यत्किंचित परिष्कृति ला सकें, तो कोई कारण नहीं कि ऐसी आत्माओं से सत्परामर्श प्राप्त कर लाभ नहीं उठा सकते।


सृष्टि का हर प्राणी विशिष्टता सम्पन्न

प्रकृति ने सुविधा वितरण में प्राणियों के साथ पक्षपात नहीं किया है। उसने अपनी संतानों में से किसी को भी ऐसा नहीं रखा जिसके लिए यह कहा जा सके कि वह अभावग्रस्त है।

हर प्राणी की एक जीवन परिधि है। उसकी अपनी दुनिया तथा अपनी आवश्यकता है। प्रकृति के अनुदान प्राणियों को इस आधार पर मिले हैं, जिससे वे निर्धारित जीवनचर्या को सुविधापूर्वक सम्पन्न कर सकें।

एक प्राणी की दूसरे से तलना आवश्यक है क्योंकि उनकी जीवनचर्या एक जैसी नहीं है। प्राणि-जगत के असंख्य समुदाय अपने-अपने ढंग से निर्वाह करते हैं। उनकी आवश्यकता भी एक जैसी नहीं है। एक के लिए जो सुविधाजनक है, वह दूसरे के लिए सर्वथा अनावश्यक हो सकती है। बंदर और शेर को पूँछ के सहारे लम्बी छलाँग लगाने में सहायता मिलती है किन्तु यदि वही मनुष्य के लगी होती तो अनावश्यक ही नहीं असुविधाजनक भी होती। घोड़ा अपनी पूँछ से मक्खियोँ उड़ाने का काम लेता है, पर मनुष्य के शरीर में यदि वह अवयव रहा होता तो उससे उलटे कठिनाई का सामना करना पड़ता।

हाथी की आवश्यकता को देखते हुए प्रकृति ने उसे लम्बी सूंड ठीक ही दी है, पर यदि वह घोड़े को मिली होती तो उससे उलटे कठिनाई में फँसना पड़ता। मनुष्य को जिस स्तर की जीवनचर्या अपनानी पड़ती है, उसे उसी के अनुरूप शारीरिक तथा मानसिक संरचना वाली काया मिली है। अन्य प्राणियों को न उन साधनों की आवश्यकता थी न प्रकृति ने उनके ऊपर उन्हें लादा ही है। ऐसी दशा में किसी प्राणी को किसी से तुलना करना और एक को समृद्ध एवं दूसरे को अभावग्रस्त ठहराना व्यर्थ है।

अन्य प्राणियों में भी ऐसी विशेषताएं पाई जाती है, जिन्हें देखते हुए यह कहना पड़ सकता है कि प्रकृति ने मनुष्य को उन सुविधाओं से वंचित रखकर पक्षपात किया है। अपने-अपने क्षेत्र में हर प्राणी साधन सम्पन्न है और शान्तिपूर्वक जीवन-यापन कर रहा है। उनकी तुलना में मनुष्य अपने को पिछड़ा हुआ भी अनुभव कर सकता है।

असाधारण परिस्थितियों की पृष्ठभूमि बनने पर जहाँ मनुष्य को इसका कोई आभास नहीं होता वहाँ साधारण पशु-पक्षियों को भी निकट भविष्य में घटित होने वाली दुर्घटनाओं-प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वाभास हो जाता है और वे असामान्य व्यवहार करने लगते हैं। चूहे बिलों में छिप जाते हैं, बिल्ली भी कही नहीं दिखती। घोड़े बेलगाम दौड़ने लगते हैं, चिड़ियां चहचहाने लगती है। चीतल, हिरन, शेर आदि जंगली जानवर समूह बनाकर चुपचाप सुरक्षित स्थान पर जा खड़े होते हैं।

प्रसिद्ध जीवशास्त्री विलियम जे0 लाग ने अपनी पुस्तक “हाऊ एनीमल्स टाक” में इस तरह की अनेक घटनाओं का वर्णन किया है, जिसके आधार पर पशु-पक्षियों की अतीन्द्रिय क्षमताओं का परिचय मिलता है। अमेरिका के माउंट पीरो पर्वत के इर्द-गिर्द अनेकों बस्तियाँ थी जिनमें लाखों लोग निवास करते थे। लगभग 90 वर्ष पूर्व एक दिन लोगों ने देखा कि उस क्षेत्र में रहने वाले प्राणियों के व्यवहार में अचानक परिवर्तन आ गया है। उनके क्रियाकलाप असामान्य हो गये हैं। सभी प्राणियों में एक विचित्र सी घबराहट, बेचैनी है, जो किसी खतरे का पूर्वाभास था। जो पालतू जानवर थे वह तो कुछ न कर पाये, पर साँप, कुत्ते, सियार पास वाले क्षेत्र से विदा होने लगे। जंगली जानवरों के झुण्ड उस पर्वतीय अंचल को छोड़कर अन्यत्र चले गये। कुछ समय पश्चात् ही माउंटपीरो पर एक भयानक विस्फोट के साथ ज्वालामुखी फटा और देखते-देखते आसपास की बस्ती को निगल गया। तीस हजार से अधिक लोग उसके पेट में समा गये।

जीव विज्ञानियों का कहना है कि ये मूक प्राणी बदलते घटनाक्रम का पूर्वाभास सरलतापूर्वक शीघ्रता से कर लेते हैं। अभिव्यक्ति की क्षमता भी यदि इनमें होती तो यह भविष्यवाणियाँ भी किया करते। यूगोस्लाविया में 1936 में आये भूकम्प से पूर्व चिड़ियाघर के सभी पक्षी जोर-जोर से चहचहाने लगे थे, मानो वे बुद्धिमान मनुष्य से कुछ कहना चाहते थे। इसी तरह चीन में दो दशक पूर्व टिन्टसिन क्षेत्र में आये भूकम्प के पूर्व चूहे अपनी माँद में नहीं गये। शेर उतावले हो गये एवं नाक याक ने भोजन लेना बन्द कर दिया। घोड़े और भेड़-बकरियाँ अनवरत रूप से दौड़ने लगे थे। 1966 में सिंगटाई में आये भूकम्प से पहले ही चूहे अपने बिलों में छिप गये थे।

प्राचीन काल में जंगली हंसों के चीखने से रोम के लोग अनेक बार प्राकृतिक विपदाओं से बच गये थे। पीत चिड़िया का उपयोग कोयला खान के मजदूरों को गैस रिसने से सावधान करने में किया जाता था। वैज्ञानिकों ने अपने एक अध्ययन में बताया कि कोबरा जाति का सर्प आँधी, तूफान और अतिवृष्टि को बहुत पहले से ही जान लेता है और स्वयं सुरक्षित पेड़ों पर चढ़ जाता है और तब तक वहीं रहता है जब तक कि तूफान शान्त नहीं हो जाता। चीतल और हिरन जो दिन भर कुलाचें भरते रहते हैं ऐसे अवसरों पर समूह बनाकर किसी ऊँचे एवं सुरक्षित स्थान पर चले जाते हैं। मौसम खराब होने से पूर्व मधुमक्खियाँ दिन में भी अपने छत्ते में एकत्र होकर भिनभिनाने लगती हैं जो सामान्यतः ऐसा नहीं करतीं। मैना भी तूफान और चक्रवात के पहले जोरों से चीखती है। बर्फीले प्रदेशों के भालू वर्षा होने या बर्फ गिरने के भय से अपनी गुफाओं में आहार एकत्र करने लगते हैं।

प्रकृति ने सभी प्राणियों को उनकी स्थिति के अनुरूप विशिष्टताएं प्रदान की है। कुत्ते, भेड़िये मीलों दूर की गंध सूँघ लेते हैं। चील और गिद्ध दूर पृथ्वी पर, आकाश में उड़ते हुए भोजन तलाश लेत हैं। गोशल्व जाति का बाज लड़ाकू विमानों की तरह बिना वेग को कम किये उलटने-पलटने की कलाबाजियाँ जानता है। गरुड़ पक्षी विशालकाय होने पर भी 200 किलोमीटर प्रति घंटे की तीव्र गति से उड़ता है। थलचर प्राणियों में चीता तीव्रगति सम्पन्न है। वह 60 मील प्रति घंटे के हिसाब से आसानी से दौड़ सकता है। विशेष अवसरों -प्रतिरक्षा या आक्रमण के समय वह 90 से 100 मील प्रति घंटे की तीव्रतम गति से भी दौड़ लेता है। ऑस्ट्रेलिया का कंगारू 40 फुट ऊँची छलाँग लगाता है। सर्प की लचीली और मजबूत माँसपेशियाँ उसे कुण्डलित होने में सहायक होती है। हाथी की सूँड चार हजार माँस पेशियों से निर्मित होने पर भी जमीन पर पड़ी हुई सुई उठाने में सक्षम है।

अंगों की मजबूती के दृष्टिकोण से शेर का पंजा और ह्वेल मछली सशक्त है। अन्य प्राणियों के कोई भी अंग इतने मजबूत नहीं है। आक्टोपस नामक जलचर की भुजाओं में जो भी प्राणी जकड़ जाये उसका जीवित बचना मुश्किल है।

उल्लू भी विचित्र जीव है। वह मनुष्य की अपेक्षा दस गुनली कम रोशनी में भी देख लेता है। मछलियाँ पानी के भीतर तैरते हुए ऊपर-नीचे दोनों और देख लेती है। कुत्ता स्मरणशक्ति की दृष्टि से विलक्षण है। दूरस्थ स्थापन पर छोड़े जाने के बाद भी पूर्व परिचित स्थान पर पुनः वापस लौट आता है। इनकी अतीन्द्रिय क्षमताएं विलक्षण होती है। इस पर अनुसंधानरत मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. विदलाग ने “न्यूयार्क टाइम्स” में एक लेख प्रकाशित किया है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि क्रेन के नीचे सोता हुआ एक कुत्ता एकाएक चौंककर भाग खड़ा हुआ। इसके कुछ समय पश्चात ही क्रेन की जंजीर की कड़ी टूटी और एक लौह खण्ड ठीक उसी स्थान पर जा गिरा जहाँ कुत्ता सोया था।

अपृष्ठवंशी कीट-पतंगों की दुनिया बहुत ही निराली है। प्रख्यात एण्टोओलाजिस्ट ‘आवेड’ के अनुसार -जैसे माताएं अपने कमजोर, मंदबुद्धि बालकों का विशेष ध्यान रखती है, ऐसे ही प्रकृति माता भी इन मूक प्राणियों पर सहज ही ऐसी कृपा किये हुए है जिससे ये इतने विधि आकार-प्रकार धारण करते हुए भी सृष्टि की किसी भी परिस्थिति में जीवित रह सकते हैं। कीटों में हड्डियाँ नहीं होती। अपने बचाव के लिए वे बाहरी कवच धारण किये होते हैं। इनमें हृदय पीट के बगल में ऊपर होता है। टाँगें खोखली नलिकाओं जैसी होती है जिनकी इंजीनियरिंग अपने आकार में विश्व के सबसे शक्तिशाली उपकरण जैसी होती है। वैज्ञानिकों ने एक प्रकार के कीट पर भार लादने का प्रयोग किया तो वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि वह अपने वजन से 750 गुना अधिक भार बड़ी आसानी से ले जाने में समर्थ रहा। जबकि सामान्य मनुष्य अपने वजन का अधिक से अधिक दो तिहाई भार ही उठा सकता है। कीटों का बाहरी कवच उन्हें आश्चर्यजनक दृढ़ता प्रदान करता है।

एक प्रकार की राजा तितली जिसे फूँकमार कर उड़ाया जा सकता है सतत् तीन हजार मील से भी अधिक का यात्रा-प्रवास करती रहती है। वैज्ञानिकों ने जब ‘पेन्टेड लेडी बटर–फ्लाई’ को विशेष चिन्ह द्वारा अंकित करके उत्तर अफ्रीका से छोड़ा जो वे रास्ते में आने पर भयंकर तूफानों, झंझावातों एवं वर्षा को झेलते हुए कटे-फटे पंख होने पर भी आइलैंड पहुँच गयी।

कीटकों के फेफड़े नहीं होते। उनके शरीर के दोनों ओर छोटे-छोटे छिद्र होते है जिनके द्वारा उनके शरीर के प्रत्येक अवयव में वायु का आवागमन होता रहता है। विश्राम के समय इन्हें बहुत कम आक्सीजन की जरूरत होती है, लेकिन उड़ते समय विश्रामावधि की अपेक्षा 50 गुनी अधिक आवश्यक होती है। इनके पंखों की संरचना ऐसी जिसमें गति विज्ञान के प्रत्येक सिद्धान्तों का बारीकी से पालन किया गया है अन्यथा ड्रेगन–फ्लाई, जिसके पंख तले कागज से भी बारीक होते हैं, वह 40 मील प्रति घंटे को गति से कैसे उड़ सकती? मच्छर तो हवाई गति विज्ञान व आश्चर्यजनक उपयोग करके अपने वजन का दुगुना लेकर ऊँची उड़ान भर कसता है। ऐसा करने के लिए उसे अपने पंखों के प्रति सेकेंड 300 से अधिक बार लाना पड़ता है। कुछ ऐसे सूक्ष्म कीट होते है जो आँखों से तो दिखाई नहीं पड़ते पर प्रति सेकेंड 1000 से भी अधिक बार वे अपने पंखों को हिला सकते हैं। कुछ कीटक ऐसे भी होते हैं जिनके पंख काम नहीं करते अथवा होते ही हीं वे अपनी ऊँचाई से सौ गुनी अधिक ऊँची छलाँग लगा सकते हैं। पर मनुष्य में इतनी क्षमता कहाँ जो ऊँचे से ऊँचे स्थान से बिना किसी यंत्र उपकरण के छलाँग लगा सके।

देखने में नाजुक लगने वाले ये क्षुद्र जीव इतने मजबूत होते हैं कि अचानक परिस्थितियों के प्रतिकूल हो जाने पर जीवित बने रहते हे। प्राकृत इतिहास के अमेरिकन संग्रहालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एफ0ई॰ लुत्ज ने कुछ मधुमक्खियों एवं तितलियों को एक काँच की नली में बन्द करके उसकी हवा निकल कर वैवक्यूम-निर्वात कर दिया था बाद में उस नली को तोड़ दिया। इस प्रकार के अचानक दबाव परिवर्तन से कोई भी अन्य प्राणी जीवित नहीं रह सकता लेकिन इन छोटे-छोटे कीटक कैदियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और नली टूटते ही वे प्रसन्नता पूर्वक उड़ गये। इनकी जगह पर यदि सबसे मजबूत जानवर हाथी भी रहा होता तो वह तत्काल मर जाता।

प्राथमिक स्तर का अविकसित मस्तिष्क होने एवं कर्णेन्द्रिय के अभाव में भी कीड़े दो तरह से सुन सकते हैं। एक तो शरीर पर या अन्य अंग अवयवों, उपाँगों पर उपस्थित सूक्ष्म बालों की सहायता से स्पर्श द्वारा ध्वनि तरंगों का अनुभव कर सकते हैं। दूसरे कुछ विशेष प्रकार की झिल्लियाँ विभिन्न कीटों में विभिन्न स्थानों पर होती है जो श्रवण अंग का कार्य करती है - जैसे - झींगुर में ये घुटनों पर होती है। ये पराश्रव्य ध्वनियों की सुनने की क्षमता रखते हैं और 135000 आवृत्ति तक की ध्वनियों को सुन लेते है जब कि मनुष्य अधिक से अधिक 2000 आवृत्ति तक की ध्वनि को ही सुन सकता है।

गन्ध एवं स्वाद की परख की क्षमता कीटों में अन्य सभी प्राणियों से पराकाष्ठा तक विकसित हुई है। मनुष्य के मिठास को परखने की क्षमता का एक भाग शक्कर और 200 भाग पानी तक ही होती है, पर कुछ कीटों की यह क्षमता इतनी अधिक विकसित होती है कि वे एक भाग शक्कर और तीन लाख भाग पानी तक की परख कर सकते हैं। कुछ कीटकों में गंध परखने की शक्ति इस हद तक विकसित होती है कि एक नर कीटक मादा की गंध की पहचान 9 मील तक कर सकता है। यह वे फेरामाँन्स के माध्यम से करते हैं।

ने अपनी दुनिया को चित्र-विचित्र साधनों और विभिन्नताओं से सुसज्जित किया है। प्राणि-जगत की भिन्नता और विचित्रता को देखते हुए उन सब में सृजनकर्ता की कुशलता और कलाकारिता छलकती दृष्टिगोचर होती है।


अभिशप्त राजमहल!

विश्व में ऐसे अनेकों स्थान, राजमहल, वस्तुएं अथवा उपकरण जिनके बारे में कहा जाता है कि वे अभिशप्त है। जिसने भी उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र में करना और उपयोग में लाना चाहा या जिसके पास भी वे रहे, उन्हें न केवल सुख शान्ति से वंचित होना पड़ा, वरन् कितनों को तो अपने जीवन से भी हाथ धोना पड़ा।

एड्रीआटिक समुद्रतट पर ट्रिएस्ट नगर में खड़ा भव्य राज-महल “केसल ऑफ मिरामर” एक ऐसा ही शापित राजभवन है जिसका निर्माण प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व आस्ट्रिया के तत्कालीन सम्राट ने अपने भाई आर्क ड्यूक मेकिस मिलेन के लिए करवाया था। किन्तु न जाने उस स्थान के साथ कौने से ऐसे चिर संस्कार जुड़े थे कि इस राजप्रसाद में जिस किसी ने निवास किया व चैन से न रह पाया और अन्ततः बेमौत मारा गया।

सर्वप्रथम ‘केसल आफ मिरामर’ नामक इस भव्य भवन में आस्ट्रिया के सम्राट फ्रांस जोसेफ ने अपने छोटे भाई आर्कड्यूक मेसि को एक विशेष समारोह के साथ प्रवेश कराया था। इस अवसर पर नगर के गणमान्य लोग भी उपस्थित थे। राजमहल को देखकर सभी ने उसके स्थापत्य कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उसमें हर प्रकार की सुख सुविधा के साधन उपलब्ध थे किन्तु मेकिस मिलेन को वहाँ एक दिन के लिए भी चैन नहीं मिला। वह रात को उसमें सो नहीं सकता था। हर समय एक प्रकार की बेचैनी घेरे रहती थी। स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गितर जा रहा था, जिसे देखकर सम्राट ने उसे स्थान परिवर्तन की सलाह दी और मेक्सिको उपनिवेश सम्राट बनाकर भेजा, किन्तु वहाँ पहुँचने से पूर्व किसी अज्ञात व्यक्ति ने मार्ग ही उसकी हत्या कर दी।

उत्तराधिकार में वह राजप्रासाद मेकिस मिलेन की भगिनी एलिजाबेथ को मिला। वह बड़े शान शौक से उसमें रहने आई। अपने साथ राजकुमार रुडोल्फ को भी लेती आई। वहाँ आने के कुछ ही दिनों पश्चात् किसी ने रुडोल्फ को एवं उसकी पत्नी की भी हत्या कर दी जिसके दुःख से एलिजाबेथ टूट सी गई। वह उदास और पागल सी रहने लगी। छठे वर्ष उसका भी किसी ने अंत कर दिया।

अब तो लोगों में इस राजमहल के अभिशप्त होने की आशंका होने लगी। लेकिन रुडोल्फ का चेचरा भाई आर्क ड्यूक फ्रान्सिस फरर्नान्डिस इस प्रकार की आशंकाओं को निर्मूल एवं अन्धविश्वास मानता था। वह उसमें निवास करने लगा। दुर्भाग्यवश ट्रिएस्ट नगर के समीप ही सर्जांवा नामक ग्राम से प्रथम विश्वयुद्ध का सूत्रपात इसकी हत्या से ही आरम्भ हुआ इस युद्ध में राजमहल के सभी कर्मचारियों को मौत के घाट उतार दिया गया। साथ ही आस्ट्रिया पर इटली का आधिपत्य हो गया। मुसोलिनी से इस राजभवन में अपने वफादार सैनिक अधिकारी ड्यूक एओस्टा को रहने के लिए भेजा। पर उसी बेचैनी और अदृश्य भय ने उसे दबोच लिया जिसके चंगुल में फंसकर अब तक कई राजकुमारों और कर्मचारियों ने अपनी जान गंवाई थी। विवश होकर मुसोलिनी को उसे अभियोपिया का वायसराय बनाकर विदेश भेजना पड़ा। लेकिन दुर्भाग्य ने उसका पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा। रास्ते में ही ब्रिटिश ईस्ट अफ्रीका में वह युद्ध कैदी बना लिया गया और अमानवीय यातनाएं देने के बाद उसे गोली मार दी गई।

‘केसल आफ मिरामर’ नामक इस राजभवन में न केवल निवास करने वाले व्यक्तियों को अकाल मृत्यु का वरण करना पड़ा, वरन् जिस राज्य के अधीनस्थ वह रहा उसे भी भारी क्षति उठानी पड़ी। द्वितीय विश्व युद्ध में यह नगर इटली से छिन गया और अमेरिका के आधिपत्य में आ गया। उस राजमहल में दो सैनिक अधिकारियों-मेजर जनरल पियन्ट मुर एवं बिरनिस को निवास करने का आदेश मिला और वे रहने भी लगे। किन्तु कुछ ही महीनों पश्चात् लोगों ने देखा कि लाशें क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ी थी, किसी ने उनकी हत्या कर दी थी।

केवल अर्ध शताब्दी जिने स्वल्प समय में ही इस राजमहल से जुड़े कितने ही शासनाध्यक्षों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को समय से पूर्व की अकाल मृत्यु का वरण करना पड़ा, तीनों की हत्या की गई। आस्ट्रिया, इटली, अमेरिका आदि भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के शासक इस में रहे पर कोई भी उसमें चैन से रहने नहीं पाया। भय का केन्द्र बना हुआ जनशून्य वह भव्य राजभवन आज के बुद्धिजीवियों एवं वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती बना हुआ है।


क्या स्वप्न सिद्धि - सम्भव है?

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द्बह्यस्क स्रद्म क्द्बश्च] द्धद्यद्भ स्रद्म॥द्मद्मद्भद्धद्बह्व] द्गद्मह्वद्धद्यस्र ह्ह्वद्मश] द्धश्चह्द्म] द्भद्मह्यफ्] त्त्ह्य"द्म]॥द्मद्मशद्मह्यत्त्ह्यफ् ह्लस्द्यद्ध 'द्मद्मद्भद्धद्धद्भस्र&द्गद्मह्वद्धद्यस्र क्रुह् ह्र;शरुस्नद्मद्मह्द्म,ड्डँ रुशढ्ढह्वद्मह्यड्ड स्रद्म स्रद्मद्भ.द्म द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न क्ह्क्वढ्ढह् क्स्रद्मड्डम्द्मद्म,ड्डँ॥द्मद्ध द्धश्च=&द्धशद्धश्च= द्यद्बह्वद्मह्यड्ड स्रद्म स्रद्मद्भ.द्म द्दद्मह्य द्यस्रह्द्ध द्दस््न द्धस्रह्ह्न,ह्यद्यह्य रुशढ्ढह्व द्यद्मद्गद्म; रुह्द्भ स्रह्य द्दद्मह्यह्ह्य द्दस््न द्गद्मह्यंकद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य ड्ढद्दह्यड्ड द्गद्दक्रशद्दद्धह्व द्दद्ध स्रद्दद्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न;द्मह्यड्ड द्धश'ब्ह्य";द्म.द्म स्रद्भह्वह्य द्बद्भ द्वह्वस्रह्य द्यद्दद्मद्भह्य द्गह्वत्नद्धरुस्नद्मद्धह् स्रद्म द्धह्वठ्ठद्मह्व द्धह्व:द्ब.द्म द्वह्ह्वद्म द्दद्ध द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस्] द्धह्लह्ह्वद्म द्धस्र 'द्मद्मद्भद्धद्धस्र द्भद्मह्यफ् द्धह्वठ्ठद्मह्व द्गह्यड्ड द्गख्ब्] द्गख्=] द्भष्ठह्],ष्ठद्यद्भह्य क्द्मद्धठ्ठ स्रद्ध ह्लद्मड्डश्च स्रह्यद्भस्रह्य ष्द्धद्गद्मद्भद्ध स्रद्म रुश:द्ब क्द्मस्द्भ स्रद्मद्भ.द्म ह्लद्मह्वद्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न द्धस्रह्ह्न द्यद्म/द्मह्व द्गह्वत्नद्धरुद्धद्मह् द्गह्यड्ड क्द्मह्वह्य शद्मब्ह्य द्यद्बह्वह्य स्रह्नहृ द्धश'द्मद्ध"कह्द्म द्धब्, द्दद्मह्यह्ह्य द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध द्यड्डस्रह्यह् द्धहृद्बद्मद्य, द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न

रुशढ्ढह्व शरुह्ह्नह्त्न क्ह्द्धद्धठ्ठभ्; द्गह्व स्रद्ध] क्शश्चह्यह्ह्व स्रद्ध द्यद्मड्डस्रह्यद्धह्स्र॥द्मद्म"द्मद्म द्दस््न शह्य क्ह्वष्ख्> द्बद्दह्यद्धब्;द्मह्यड्ड स्रद्ध ह्द्भद्द द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं ठ्ठह्यह्ह्य द्दस््न ह्र;शद्मद्दद्मद्धद्भस्र ह्लद्धशह्व स्रद्ध क्ह्वह्न॥द्मख्द्धह्;द्मड्डँ क्श्चह्यह्ह्व द्गह्व स्रह्य क्ह्द्भद्मब् द्गह्यड्ड द्यह्न"द्मह्नढ्ढह् द्बरुद्ध द्भद्दह्द्ध द्दह्य] शह्य द्दद्ध द्यद्बह्वद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्बद्धद्भब्द्धम्द्मह् द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न;द्धठ्ठ द्गह्व स्रद्मह्य द्यद्म/द्म द्धब्;द्म ह्लद्म;] ह्ष् क्शश्चह्यह्ह्व द्गह्व स्रह्य द्वद्ब;द्मह्यफ्द्ध द्यड्डस्रह्यह् रुशढ्ढह्वद्मह्यड्ड स्रह्य द्गद्म/;द्ग द्यह्य द्धद्गब्ह्वद्म द्यड्ड॥द्मश द्दस््न स्रद्मब्ह्लह्नड्डफ् ह्वह्य,स्र द्धद्य)द्मह् द्बभ्द्धह्द्बद्मद्धठ्ठह् द्धस्र;द्म द्दस् & ट्टट्ट;ख्ह्वद्धशर्द्यंब् द्बह्यंकर्ह्वं क्द्मक्त स्रब्ह्यद्धष्ठंकश क्ह्वस्रद्म'द्मद्यट्टट्ट ड्ढद्यद्गह्यड्ड रुशढ्ढह्वद्मह्यड्ड स्रद्ध ह्र;द्म[;द्म द्धशश्चह्यह्वद्म स्रद्भह्ह्य द्दह्न, शह्य स्रद्दह्ह्य द्दस् द्धस्र ड्ढक्कहृद्मह्वह्नद्यद्मद्भ रुशढ्ढह्व ठ्ठह्य[द्म द्यस्रह्वद्म ह्द्मह्य ष्द्य स्रद्ध ष्द्मह् द्दस् ह्वद्दद्धड्ड] द्धस्रह्ह्न ष्द्मद्भद्धस्रद्ध द्यह्य रुद्बढ्ढह्व द्यड्डस्रह्यह्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्यद्ग>ह्वह्य स्रद्ध स्रब्द्म द्धशस्रद्धद्यह् स्रद्ध ह्लद्म द्यस्रह्य ह्द्मह्य क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड ब्द्म॥द्म ब्द्मस्द्धस्रस्र ह्लद्धशह्व द्गह्यड्ड द्धद्गब् द्यस्रह्ह्य द्दस्ड्ड्न

रुशढ्ढह्वद्मह्यड्ड स्रद्ध द्यद्मस्नर्द्मंस्रह्द्म क्द्मस्द्भ द्बख्शर्द्मं॥द्मद्मद्य स्रद्ध म्द्मद्गह्द्म द्बद्भ द्बभ्द्धद्य) द्धशय़द्मह्वशह्यह्द्म रुद्म0 ह्लह्य0ष्द्ध0 द्भद्मड्ढह्व ह्स्नद्मद्म छ्वद्धद्गह्द्ध द्भद्मड्ढह्व ह्वह्य द्धद्गब्द्भ श"द्मर्द्मंह्यड्ड क्शह्य"द्म.द्म द्धस्र;द्म द्दस््न द्वह्वस्रह्य द्धशश्चद्मद्भ ष्द्ध0ष्द्ध0 रुक्तख्द्धह् द्गद्दद्यख्द्य द्दद्मह्यह्द्ध द्दस्] शद्दद्ध द्गह्व द्गह्यड्ड द्वक्रद्यद्मद्द क्द्मस्द्भ द्वंघब्द्मद्य द्वद्गरुह्द्म द्भद्दह्द्म द्दस््न द्ब द्गद्दद्मक्रद्गद्म फ्द्मड्डँ/द्मद्ध ह्वह्य क्द्मक्रद्ग&'द्मद्मह्य/द्मह्व,शड्ड क्द्म/;द्मद्धक्रद्गस्र 'द्मद्धष्ठह् द्यश्वद्बद्मठ्ठह्व द्दह्यह्ह्न द्वद्बशद्मद्भ स्रद्मह्य,स्र द्गद्दक्रशद्बख्.र्द्मं द्वद्बस्रद्भ.द्म ष्ह्द्म;द्म स्नद्मद्म क्द्मस्द्भ द्यद्ग;&द्यद्ग; द्बद्भ शह्य ड्ढद्यस्रद्म ब्द्म॥द्म॥द्मद्ध द्वक्चद्मह्ह्य द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य्न द्यद्मद्गद्म; ह्र;द्धष्ठह्॥द्मद्ध द्यह्नद्धश/द्मद्मह्वह्नद्यद्मद्भ द्यद्मढ्ढह्द्मद्धद्दस्र] द्बद्मद्धम्द्मस्र;द्म द्गद्मद्धद्यस्र द्वद्बशद्मद्य स्रद्भह्द्म द्भद्दस्रद्भ 'द्मद्भद्धद्भ श द्गह्व 'द्मद्मह्य/द्मह्व स्रद्म द्व॥द्म;&द्बम्द्मद्ध; ब्द्म॥द्म द्दरुह्फ्ह् स्रद्भ द्यस्रह्द्म द्दस््न श"र्द्मं द्गह्यड्ड ठ्ठद्मह्य ष्द्मद्भ ह्वशद्भद्मद्ध= द्वद्बशद्मद्य स्रद्भ ब्ह्यह्वह्य,शड्ड क्द्मद्दद्मद्भ&द्धशद्दद्मद्भ स्रद्म द्यड्डह्ह्नब्ह्व द्धष्क्चद्म;ह्य द्भ[द्मह्वह्य द्यह्य द्दद्भ ह्र;द्धष्ठह् क्द्बह्वह्य 'द्मद्भद्धद्भ श द्गह्व स्रद्मह्य रुशरुस्नद्म द्धह्वद्भद्मह्यफ् ष्ह्वद्म;ह्य द्भद्द द्यस्रह्द्म द्दस््न स्रह्नहृ ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध द्गद्म;ह्द्म द्दस् द्धस्र,स्र द्धठ्ठह्व॥द्मद्मह्यह्लह्व ह्वद्दद्धड्ड स्रद्भड्डफ्ह्यड्ड ह्द्मह्य स्रद्गह्लद्मह्यद्भ द्दद्मह्य ह्लद्म;ह्यड्डफ्ह्यड्ड] द्बद्भ ह्रद्मरुह्ह्नह्त्न,ह्यद्यद्ध ष्द्मह् ह्वद्दद्धड्ड द्दस््न 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य द्धशह्लद्मह्द्ध; ठ्ठभ्ह्र; द्भद्दह्ह्य द्दस््न] द्वद्बशद्मद्य स्रह्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व द्वह्वस्रद्म द्धह्व"स्रद्मद्यह्व द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्द्म द्दस् ह्लद्धशह्वद्ध 'द्मद्धष्ठह् ड्ढद्यद्ध द्धठ्ठ'द्मद्म द्गह्यड्ड द्वह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ह्र;; द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्द्ध द्दह्य क्तब्ह्त्न क्द्मद्भश्व॥द्म द्गह्यड्ड स्रह्नहृ स्रद्गह्लद्मह्यद्भद्ध ब्फ्ह्वद्म रुशद्म॥द्मद्मद्धशस्र द्दस्] द्गफ्द्भ;द्द द्धरुस्नद्मद्धह् क्द्ध/द्मस्र द्धठ्ठह्व ह्स्र ह्वद्दद्धड्ड ष्ह्वद्ध द्भद्दह्द्ध द्दस््न ह्लंघठ्ठ द्दद्ध 'द्मद्भद्धद्भ क्द्बह्वह्य रुशद्म॥द्मद्मद्धशस्र यद्ग द्गह्यड्ड क्द्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न ड्ढद्य द्ग/; स्रद्म;द्म द्गह्यड्ड स्रह्नहृ म्द्मद्ध.द्मह्द्म क्श'; क्द्म ह्लद्मह्द्ध द्दस् द्धस्रह्ह्न रुस्नद्मख्ब्ह्द्म?द्मंकह्वह्य स्रह्य द्यद्मस्नद्म&द्यद्मस्नद्म द्यख्म्द्ग 'द्मद्धष्ठह्;द्मह्यड्ड स्रद्म॥द्मद्ध द्बभ्द्मठ्ठख्॥द्मर्द्मंश द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्गह्न[द्मद्ग.रुब् द्गह्यड्ड क्द्मह्यह्लह्द्य&ह्ह्यह्लद्य ष्< ह्लद्मह्ह्य द्दस््न द्भद्मह्यफ्द्ध स्रद्म ठ्ठह्नष्ब् 'द्मद्भद्धद्भ स्नद्मस्रद्म&स्नद्मस्रद्म द्यद्म द्गब्द्धह्व क्द्मस्द्भ द्धह्वरुह्ह्यह्ल द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं द्बरुह्द्म द्दस््न ह्लष्द्धस्र द्यद्म/द्मद्भ स्रह्य 'द्मद्भद्धद्भ क्द्मस्द्भ श्चह्यद्दद्भह्य द्बद्भ श्चद्गस्र द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्वद्यस्रद्म [द्मद्मब्द्ध द्बह्यंक द्भद्दह्वद्म द्वठ्ठ−ठ्ठह्य';द्बख्.र्द्मं द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्वद्यस्रह्य द्यद्मस्नद्म द्वद्यस्रद्म द्यड्डस्रंघद्ब ष्ब् क्द्मस्द्भ ब्म्; ह्लह्नरुद्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस् क्ह्त्न द्दद्मस्नद्मद्मह्यड्ड&द्दद्मस्नद्म द्वद्यस्रद्म द्यक्रद्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग॥द्मद्ध क्द्मह्यह्लद्य&ह्ह्यह्लद्य&शर्श्चंद्य द्गह्यड्ड क्द्ध॥द्मशक्वद्ध) स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्धद्गब्द्म द्दस्] ह्लष्द्धस्र द्गद्भद्धह्ल स्रद्ध द्धह्वद्भद्मद्दद्मद्भ द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्लष्ख्द्भद्ध श'द्म द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्वद्यस्रह्य द्गह्व द्गह्यड्ड ड्ढद्यस्रह्य द्बभ्द्धह् ह्व द्यड्डस्रंघद्ब द्दद्मह्यह्द्म द्दस् ह्व द्वद्गड्डफ्&द्वक्रद्यद्मद्द द्धह्लद्यद्यह्य ड्ढद्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व द्वद्यस्रद्ध 'द्मद्मद्भद्धद्धस्र म्द्मद्गह्द्म?द्मंकह्द्ध द्बभ्ह्द्धह् द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्धह्व:ठ्ठ−ठ्ठह्य'; क्स्नद्मशद्म क्॥द्मद्मशश'द्म॥द्मख्[द्मह्य द्भद्दह्वह्य शद्मब्ह्य द्वद्बशद्मद्य स्रह्य क्द्म/;द्मद्धक्रद्गस्र ब्द्म॥द्म द्यह्य द्यठ्ठद्म शड्डद्धश्चह् द्भद्द ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न क्रुक्रद्मह्न द्धह्लद्दह्यड्ड ड्ढद्यद्यह्य ब्द्म॥द्म ब्ह्यह्वद्म द्दद्मह्य] द्वद्दह्यड्ड द्वद्बशद्मद्य स्रह्य द्यद्मस्नद्म द्दद्ध क्द्बह्वह्य द्यड्डस्रंघद्ब स्रद्मह्य॥द्मद्ध ह्लद्मह्यरु+ह्वद्म श्चद्मद्धद्द, क्द्मस्द्भ ष्भ्द्द−द्गद्म.रु द्गह्यड्ड द्यड्डह्र;द्मढ्ढह् द्बभ्द्म.द्म स्रद्ध क्द्ध/द्मस्रद्मद्ध/द्मस्र द्गद्म=द्म क्द्मस्रद्ध"द्मह् स्रद्भह्वह्य स्रद्म द्बभ्;द्मद्य स्रद्भह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न द्वद्बशद्मद्य ह्॥द्मद्ध द्यक्तब् क्द्मस्द्भ द्यक्रद्बद्धद्भ.द्मद्मद्गठ्ठद्म;स्र द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न


वासंती उल्लास के साथ नूतन गतिविधियों का शुभारम्भ

शांतिकुंज गायत्री तीर्थ में शीत ऋतु के समापन के साथ बसंत पर्व की शुभ बेला में नूतन क्रिया कलापों का शुभारंभ हुआ जिसमें प्रज्ञा परिजनों का एक बहुत बड़ा समुदाय सम्मिलित हुआ। यह विदित ही है कि बसंत पर्व हर वर्ष मिशन के सूत्र संचालक के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। परिजन शांतिकुंज हरिद्वार आकर युग देवता के चरणों में अपनी श्रद्धांजलि समर्पित करते है अथवा अपने अपने स्थानों पर पर्व सोल्लास मनाते है। इस बसंत पर्व पर त्रैमासिक नूतन सत्र श्रृंखला आरम्भ हुई। शाँतिकुँज की छटा इन दिनों देखने योग्य है। वनौषधि उद्यान की अपनी रमणीय शोभा है, जिसमें न केवल अलभ्य दुर्लभ जड़ी बूटियाँ है, अपितु सुन्दर मन को मोहने वाली पुष्प वाटिका भी है। इन सबके साथ स्वावलंबन प्रधान शिक्षण का नया आरण्यक आरम्भ हुआ है जिसमें बुद्धिमत्ता, स्वस्थता, आजीविका से सम्बन्धित सेवा साधना साधना प्रशिक्षण के निर्मित नये दस कक्ष बनाये गए हैं। इसे युगनायक शिक्षण नाम दिया गया है। प्रौढ़शिक्षा, बाल संस्कार शाला, पुस्तकालय संचालन का शिक्षण, वक्तृत्व कला व संगीत विद्या का अभ्यास, स्वास्थ्य रक्षा से सम्बन्धित विभिन्न विद्याओं का शिक्षण एवं आजीविका अर्जन हेतु सहकारिता व लघु उद्योगों से सम्बन्धित जानकारियाँ सैद्धांतिक व व्यावहारिक रूप में देने का प्रशिक्षण यहाँ आरम्भ किया जा चुका है। इसके लिए विभिन्न स्थानों से मॉडल्स, चार्ट, खादी ग्रामोद्योग व ग्राम्य विकास संबंधित नए उपकरण मंगाकर लगाये गये है जिनके द्वारा शिविरार्थी 3 माह की अवधि में रहकर ऐसा कुछ सीखकर जा सकेंगे। जिसे कार्य क्षेत्र में लागू करने पर व न केवल अनौपचारिक शिक्षा का एक नया तंत्र खड़ा कर सकेंगे, अपितु अनेकों का आजीविका अर्जित कर स्वावलम्बी बनने का लाभ दिला सकेंगे। पहले सत्र में स्थान पूरा भर चुका है। नित्य अनेकों पत्र प्रस्तुत शिक्षण में भाग लेने के लिए आ रहे है। प्रस्तुत युग नेतृत्व प्रशिक्षण की सम्भावनाएँ इस उत्साह को देखकर उज्ज्वल प्रतीत

विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय हेतु संकल्पित इस प्रतिष्ठान के साथ पिछले दिनों नये आयाम जुड़े है एवं इनका शुभारंभ इस बसंत पर्व से ही कर दिया गया है। एक पक्ष है - गीता विश्व कोष के सृजन हेतु अनेकानेक ग्रन्थों में से महत्वपूर्ण अंशों का, तथ्यों का संकलन। यह ब्रह्मवर्चस की दार्शनिक शोध का अब एक महत्वपूर्ण अंग है। कई शोधार्थी इस कार्य में जुट गए है। संदर्भ ग्रन्थों का संकलन किया जा चुका है, विभिन्न विश्व विद्यालयों से संपर्क बना हुआ है। यह लम्बे समय तक चलने वाला कार्य है।

दूसरा वैज्ञानिक शोध सम्बन्धी पक्ष है। जैसी कि पूर्व के अंकों में जानकारी दी जा चुकी है, आधुनिकतम उपकरण इस कार्य के लिए जुटाये गए है। शब्द शक्ति की महत्ता दर्शाने वाले, संगीत चिकित्सा मंत्र विज्ञान का विज्ञान सम्मत स्वरूप प्रतिपादित करने वाले उपकरण ब्रह्मवर्चस की प्रयोगशाला में आ गए है। आयुर्वेद के पुनर्जीवन एवं अग्निहोत्र परम्परा की वैज्ञानिकता के प्रस्तुतीकरण हेतु गैस लिक्विड क्रोमेटोग्राफ यंत्र संस्थान में लग चुका है। इससे धूम्र विश्लेषण प्रक्रिया के आधुनीकरण तथा वनौषधि विश्लेषण के कार्य में महत्वपूर्ण योगदान मिला रहा है। बायोमाँनीटर एवं 2 चैनेल पालीग्राफ यंत्र द्वारा साधकों पर संगीत यज्ञ वनौषधि आहार चिकित्सा के प्रभाव का आँकलन का नूतन क्रम आरम्भ हो चुका है। हम जिस युग में जी रहे है, उसे कम्प्यूटर युग का जा सकता है, जिसके प्रयोग ने साँख्यिकी, गणितीय प्रक्रिया को अत्यन्त सरल बना दिया है। ब्रह्मवर्चस के वैज्ञानिक ने कम्प्यूटर को अध्यात्म प्रयोगों से जोड़ने का एक विलक्षण प्रयास किया है जिसे यहाँ के विप्रो पीसी/एक्स. टी. कम्प्यूटर पर होती अपनी आंखों से अनेकों दर्शकों द्वारा देखा जा रहा है। अपने आपको युगानुकूल बनाते हुए वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों का जो अत्याधुनिक सिलसिला आरम्भ हुआ है उससे भविष्य के प्रति नई सम्भावनाएँ उदित हुई है।

बड़वानी- शाँतिकुँज सम्मेलन में कार्यकर्ताओं ने समीपवर्ती क्षेत्र में 2000 दीप यज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न कराने का संकल्प लिया था। इस संकल्प को पूरा करने के लिए सभी कार्यकर्ता मिल जुलकर टोली बद्ध रूप से जुट पड़े है। जहाँ भी कार्यक्रम होता है पहले दीवाल लेखन द्वारा ग्रामवासियों में कार्यक्रम के प्रति उत्कंठा पैदा कर दी जाती है। कार्यक्रम में सम्मिलित होने वाले व्यक्तियों का नाम रजिस्टर में लिखकर व्यापक जनसंपर्क कार्यक्रम चलाया जाता है।

करेली कालोनी, इलाहाबाद - यहाँ पर प्रारम्भ में 208 वेदी के दीपयज्ञ कार्यक्रम की व्यवस्था की गई थी, पर प्रबुद्ध जन समुदाय की बढ़ती संख्या के कारण वेदियों की संख्या भी बढ़ाई गई। इस कार्यक्रम में स्थानीय अधिकारी वर्ग ने सोत्साह सम्मिलित होकर दहेज उन्मूलन, नशा निवारण, वृक्षारोपण तथा प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को सफल बनाने के संकल्प पत्र भरे।

जूनागढ़ - शरद पूर्णिमा से दीप यज्ञ की श्रृंखला आरम्भ करते हुए प्रथम कार्यक्रम 2008 वेदी का करने की व्यवस्था कार्यकर्ताओं ने बनाई, पर जनसमूह का अपार उत्साह इस तरह उमड़ा कि वेदियों की संख्या दो हजार से भी ऊपर करनी पड़ी। सूर्यास्त के बाद जैसे ही दो हजार वेदियों में एक साथ दीप जल उठे। दर्शक इस मनोहारी दृश्य को देखते ही रहे। कार्यकर्ताओं का ध्यान उपस्थित जनसमुदाय को मिशन की विचार धारा से जोड़ने की ओर रहा फलतः इस अवसर पर युगशक्ति गायत्री (गुजराती) के न्यूनतम 5 हजार सदस्य बनाने का विशाल कार्यक्रम चलाया गया।

पटना - दीप यज्ञ कार्यक्रम सोल्लास सम्पन्न हुआ। अभी तक यहाँ 935 अखण्ड ज्योति पत्रिकायें आती थी। नए वर्ष से यह संख्या दूनी करने के लिए परिजनों में भारी उत्साह है। टोली–बद्ध रूप से सभी कार्यकर्ता इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जुट पड़े है।

बिलासपुर - शरद पूर्णिमा का शतवेदी दीपयज्ञ कार्यक्रम प्रभावशाली ढंग से सम्पन्न हुआ। इस पुण्य बेला से विद्यादान अभियान का शुभारंभ प्रौढ़शिक्षा पाठशालाओं के रूप में किया गया। समूचे क्षेत्र में इस कार्यक्रम को चलाने के लिए परिजनों में भारी उत्साह है। समीपवर्ती क्षेत्र में तथा नगर के मुहल्ले मुहल्ले में यह दीप यज्ञ कार्यक्रम चलाने का संकल्प कार्यकर्ताओं ने लिया। अखण्ड ज्योति पत्रिका को अधिकाधिक परिजनों तक पहुँचने की व्यापक व्यवस्था बनाई गई।

उरई - शरद पूर्णिमा से व्यापक स्तर पर दीपयज्ञ कार्यक्रम की श्रृंखला आरम्भ की गई है। श्री ओम प्रकाश चौरसिया की अगुवाई में नित्य प्रति किसी न किसी मुहल्ले में यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक चल रहा है। कार्यक्रम में सम्मिलित परिजनों से नशा निवारण, दहेज उन्मूलन, प्रौढ़शिक्षा विस्तार तथा वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाने के साथ अखण्ड ज्योति के सदस्य बढ़ाने के संकल्प पत्र भराये जाते है।

शिवपुरी (म0प्र0) - जनता से कोई चन्दा लिए बिना दीपयज्ञ कार्यक्रम विशाल रूप से सम्पन्न होने पर स्थानीय जनता में अभूतपूर्व छाप पड़ी है। इस अवसर पर कार्यकर्ताओं द्वारा लगभग चार हजार अखण्ड ज्योति पत्रिका के नये सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया। लगभग इतने ही स्थानों पर दीपयज्ञ कार्यक्रम कराने का संकल्प भी लिया गया।

कुषीनगर कसिया (उ0प्र0) - दीपयज्ञ कार्यक्रम की श्रृंखला के अंतर्गत श्री कृष्णचन्द्र जैन के यहाँ कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में सम्मिलित परिजनों ने इस वर्ष के निर्धारित कार्यक्रम को कार्यान्वित करने हेतु संकल्प पत्र भरे। आयोजन के दूसरे ही दिन वृक्षारोपण कार्यक्रम के अंतर्गत 250 पौधे लगाये गये।

अजरपुरा, खेड़ा (गुजरात) - समीपवर्ती क्षेत्र में 500 दीपयज्ञ सम्पन्न कराने का संकल्प परिजनों ने शान्तिकुँज में सम्पन्न सम्मेलन में लिया था। अब तक 940 आयोजन सम्पन्न हो चुके। इस कार्यक्रम के प्रति कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय जनता का अपार उत्साह देखते ही बनता है। जहाँ भी यह कार्यक्रम सम्पन्न होते है, युग शक्ति गायत्री पत्रिका के नये सदस्य बनाने की ओर कार्यकर्ताओं का विशेष ध्यान रहता है।


युग नेतृत्व का प्रशिक्षण

मनुष्य जीवन की तीन प्रमुख आवश्यकताएं (1) बुद्धिमता (2) स्वस्थता (3) आजीविका। इन तीनों के जुट आने पर ही वह वातावरण बनता है। जिसमें व्यक्तित्व का विकास और सामाजिक नव-निर्माण सम्भव हो सकें। भौतिकता और आध्यात्मिकता एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। दृष्टिकोण और संवेदन आदर्शवादी होगा तो ही बाह्य जीवन प्रगतिशील एवं समुन्नत बन सकेगा। इसी बात को यों भी कहा जा सकता है कि सुव्यवस्थित वातावरण में ही आत्मोन्नति का आधार बनता है। इन दोनों में से यदि एक ही हाथ रहे तो एक पहिए की गाड़ी की तरह, अधंग पक्षाघात से पीड़ित काया की तरह हर क्षेत्र में विपन्नता और विसंगति उत्पन्न होगी। प्रगति रथ आगे बढ़ने से रुक जायगा।

आत्मिक प्रगति की लिए आमतौर से पूजा−पाठ, जप, तप, ध्यान, धारणा, कथा-कीर्तन आदि को प्रमुख माना जाता है। किन्तु यह भुला दिया जाता है कि हरी भरी फसल उगाने के लिए जिस प्रकार खाद पानी की भी अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए आत्म-परिष्कार और लोकमंगल की सेवा साधना भी अविच्छिन्न रूप से समन्वित रखे जाने की आवश्यकता है। समग्र और सफल आत्मिक प्रगति इसी प्रकार बन पड़ती है।

आत्मपरिष्कार के लिए इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम आवश्यक है। जो इसे कर सकेगा उसका व्यक्तित्व उच्चस्तरीय बनेगा ही साथ ही उसके पास इतनी क्षमता भी बच सकेगी जिससे परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियमित रूप से कुछ न कुछ किया जाता रहे। उभय-पक्षीय सुयोग बन जाने पर व्यक्ति का ही नहीं समाज का भी अभ्युत्थान सुनिश्चित है।

शान्ति-कुँज आरम्भ से ही एक प्रशिक्षण तंत्र रहा है। उसे नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय की छोटी अनुकृति के रूप में विकसित किया जाता रहा है। सामयिक आवश्यकता के अनुरूप यहाँ अनेक सत्रों का क्रम बदलता और उनमें परिवर्तन होता रहा है। अब एक सुनिश्चित रूप रेखा बन गई है ताकि सन् 2000 तक आगामी 13 वर्षों में यथाशक्ति यह प्रशिक्षण यथावत् चलाया जाता रहे और उसकी सफलता के लिए प्राणपण से प्रयत्न किया जाता रहेगा।

शान्तिकुँज, हरिद्वार में दो प्रकार के सत्र चलेंगे। एक अत्यन्त व्यस्त प्रयोजनों में से अधिक दिन का समय, अवकाश प्राप्त नहीं कर सकते। उनके लिए 9 दिन के सत्र होंगे और लगातार पूर्ववत् चलते रहेंगे। 1 से 9 तक। 11 से 19 तक। 21 से 29 तक। इन्हें जीवन-साधना सत्र कहा जायगा। आत्म-विकास की प्रतिभा एवं प्रखरता संवर्धन की सभी दिशा धाराएं, परिवार को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने की दिशाधाराएं, समीपवर्ती समाज को अधिक सुव्यवस्थित, समुन्नत बनाने की क्रिया-प्रक्रियाएं जैसी अनेक उपयोगी ऐसी शिक्षाओं का समन्वय रहेगा जो उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में असाधारण योगदान दे सकें। इन सत्रों में एक लघु गायत्री अनुष्ठान का जप, यज्ञ और ध्यान-धारणा की क्रिया-प्रतिक्रिया भी सम्मिलित रहेगी।

दूसरे सत्र उन लोगों के लिए है - जिनके पास तीन महीने जितना समय एक साथ प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अवकाश है। इसमें सम्मिलित होने वाले 25 वर्ष से अधिक आयु के न्यूनतम मिडिल तक की शिक्षा प्राप्त ही होंगे। वे मात्र आजीविका उपार्जन में पूरी तरह व्यवस्था रहने वाले नहीं होंगे वरन् अपने को इस स्थिति में अनुभव करेंगे कि उनके पास आत्म निर्माण के अतिरिक्त परिवार-निर्माण में, समीपवर्ती समाज-निर्माण के क्रिया-कलापों में समय लगा सकने जैसी मनःस्थिति और परिस्थिति है।

तीन महीने वाले इस प्रशिक्षण में बुद्धिमत्ता, स्वस्थता और आजीविका ने नये आधार खड़े कर सकने की अनेकों विधि-व्यवस्थाएं सम्मिलित रहेंगी। यह शिक्षण वस्तुतः इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, आर्चीटेक्ट जैसे कौशल सीखने जैसा है जिसमें सामान्यतया पाँच वर्ष का समय लगना चाहिए। किन्तु आश्रम में सीमित स्थान और प्रशिक्षण के सीमित साधन होने के कारण तीन महीने जैसी यथा सम्भव अल्पावधि में ही समग्र रूप से पूरा करने का प्रयत्न किया गया है, ताकि अधिक लोगों को इस प्रक्रिया से लाभ उठाने का अवसर मिल सके।

अखण्ड ज्योति के लाखों ग्राहकों, पाठकों में से हजारों निश्चित रूप से ऐसे होंगे जो नौ दिन वाली या तीन महीने वाली शिक्षा में सम्मिलित होने के लिए तुरन्त उत्सुकता एवं आतुरता प्रकट करेंगे। इन सबको लम्बे समय तक रोका जा सके और थोड़े से शिक्षार्थियों को लम्बे समय तक रोक रखने पर संतोष किया जा सके तो बात दूसरी है, अन्यथा यही एक मात्र उपाय शेष रहा जाता है कि कम से कम समय शिक्षाएं चलाई जायं और उनमें अधिकाधिक लोगों को सम्मिलित करके अनेकों को कम से कम समय में आवश्यक लाभ देने की नीति अपनाई जाय। वही किया भी जा रहा है।

नौ दिवसीय जीवन-साधना सत्रों के बारे में अधिक कुछ कहना नहीं है, क्योंकि वे पिछले कई वर्षों से लगातार चल रहे है और अपनी असाधारण उपयोगिता सिद्ध कर चुके है। लौट कर जिनने भी उपलब्ध लाभों का वर्णन अपने क्षेत्र में किया है वहाँ से नये लोग अधिकाधिक संख्या में अत्यधिक उत्साहपूर्वक आते रहे हैं।

नये सिरे से जानकारी तीन महीने वालों को देनी हैं, जिनमें बुद्धिमता, स्वस्थता और आजीविका के संबंध में ऐसा बताया गया, सिखाया और अभ्यास कराया जाता है, जिसके आधार पर इन तीनों तथ्यों को निजी जीवन में समाविष्ट किया जा सके। अपने परिवार में इन्हें नये उत्साह से नये सिरे आरम्भ किया जा सके। अपने संबंधी, पड़ोसी, मित्रों और परिचितों में उस अभिनव चेतना का विस्तार किया जा सके। इसमें स्वार्थ और परामर्श का समान रूप से समावेश है।

अपने परिकर में स्वावलम्बन और सुसंस्कारिता की शिक्षा दी जानी चाहिए। आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी, शारीरिक दृष्टि स्वस्थ एवं सुन्दरता का अर्जन और साथ ही भावना, आकाँक्षा, विचारणा एवं दूरदर्शी विवेकशीलता आ अभिवर्धन ऐसा प्रयास है जिसके आधार पर इस उत्कर्ष प्रयास में लगने वाले हर किसी का सब प्रकार लाभ ही लाभ है। इस हित साधक को एक उच्चस्तरीय उपलब्धि ही माना जा सकता है।

प्रत्येक जाग्रत आत्मा को जन नेतृत्व करने की क्षमता अर्जित करनी है, ताकि लोक मानस को वातावरण के प्रवाह को शालीनता की दिशा में मोड़ने मरोड़ने का लक्ष्य पूरा हो सके। यह कार्य अखण्ड-ज्योति के प्रज्ञा परिजनों को ही करना होगा।

राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र में नेतृत्व के अभिलाषी तो अनेकों हैं, पर बुद्धिमत्ता, स्वस्थता एवं आजीविका के रचनात्मक कार्यों में लगने के लिए किसी का साहस नहीं। क्योंकि उसमें प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिलने एवं यश लिप्सा पूरी होने की अधिक गुँजाइश नहीं है। किन्तु इतना निश्चित है कि सार्वजनीन प्रगति के लिए उनकी अनिवार्य आवश्यकता है। इसी कौशल का प्रशिक्षण शान्तिकुँज के तीन-तीन महीने वाले सत्रों में सम्भव हो सकने की व्यवस्था बनी है।


तो तुम्हें क्या आपत्ति है (Kahani)

घटना उन दिनों की है जब लाल बहादुर शास्त्री केन्द्रीय गृह मन्त्री थे। उनके निवास स्थान का एक दरवाजा जनपथ की ओर और दूसरा अकबर मार्ग की ओर था। एक बार दो श्रमिक स्त्रियाँ सिर पर घास का गट्ठर रखकर उस मार्ग से निकलीं तो चौकीदार ने उन्हें धमकाना शुरू किया। उस समय शास्त्री जी अपने घर में बैठे कुछ कार्य कर रहे थे उन्होंने सुना तो तुरन्त बाहर आ गये और पूछने लगे - क्या बात है? चौकीदार ने सारी बातें बता दी।

शास्त्री जी ने कहा - क्या तुम देख नहीं रहे कि इनके सिर पर कितना बोझ है। यदि वे निकट के मार्ग से जाना चाहती है तो तुम्हें क्या आपत्ति है? जाने क्यों नहीं देते?


शिक्षा संवर्धन की व्यावहारिक योजना

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आखेट खेल रहा था (Kahani)

निविड़ वन प्रान्त में एक शिकारी आखेट खेल रहा था। अचानक उसे हरिण दिखाई दिया और वह उसके पीछे दौड़ा। प्राणों  पर बन आयी देखकर हरिण वहाँ से भागा और शिकारी बड़ी मुश्किल से हाथ लगे इस शिकार को यों ही न जाने देने के लिए उसके पीछे दौड़ा।

अचानक उसने एक झुरमुट देखा और सोचा कि इसमें छुपकर जान बचा लूँगा, हरिण उसमें छुप गया। उस झुरमुट में लगी हुई थी अंगूर की बेल। पके अंगूर देखे तो मुँह में पानी भर आया और वह उनको ही खाने लगा। तब तक शिकारी भी वहाँ पहुँच गया था और हरिण को खोज रहा था। हरिण ने जैसे ही अंगूर की बेल खा ढाली, वह दिखाई दे गया और शिकारी ने तीर से उसे मार डाला।


लोक नायकों का अभिनव निर्माण

तीन महीने की शान्ति-कुँज की अभिनव शिक्षण व्यवस्था का प्रथम चरण है- शिक्षा संवर्धन। दूसरा सोपान है -विद्या का सद्ज्ञान का-उन्नयन। विद्या के बिना मात्र शिक्षा में उदरपूर्णा वाला कौशल भर हाथ आता है। व्यक्तित्व में मानवी गरिमा का समावेश तो उन आधारों के सहारे पूरा होता है जिन्हें सद्ज्ञान -संवर्धन कहते है। धर्म और अध्यात्म यही है। इसी के सहारे धर्मतन्त्र में लोक शिक्षण की प्रक्रिया पूरी होती है। मानवी गरिमा के अनेकानेक पक्षों का उच्चस्तरीय समाधान इसी आधार पर बन पड़ता है। पर्व संस्कार, धर्मानुष्ठान, सत्संग, तीर्थ यात्रा आदि कृत्यों को इसी निमित्त सम्पन्न किया जाता है।

प्राचीन काल में यह कार्य साधु, ब्राह्मण अपना समूचा जीवन समर्पित करके पूरा किया करते थे। पर वे दोनों ही वर्ण मात्र वेष और वंश तक सीमित रह गये है। उस महान उत्तरदायित्व को विचारशील, सेवाभावी वर्ग ही अपने समय का कुछ अंश देकर पूरा कर सकेगा। इसी प्रक्रिया को अति सफलतापूर्वक किस प्रकार किया जा सकता है।, इसकी शिक्षा तीन महीने वाले पाठ्यक्रम में समुचित रीति से समाविष्ट की गई है।

धर्म, अध्यात्म, अनेकानेक धर्मानुष्ठान मात्र मनुष्य के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का अधिकाधिक समावेश करने के लिए है। दृष्टिकोण का परिष्कार, व्यक्तित्व का निखार और सामाजिक गतिविधियों का सुधार इसी आधार पर बन पड़ना सुगम है कि दृष्टिकोण परिमार्जित किया जाये। मान्यताओं, आस्थाओं आकाँक्षाओं विचारणाओं को इस स्तर का बनाया जाय कि व्यक्ति निजी जीवन में आदर्शवादी और सार्वजनिक जीवन में सेवाभावी बन सके। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिये इन दिनों साम्प्रदायिक प्रचलनों और कर्मकाण्डों की तो धूम है। वे ही सब कुछ बन बैठे हैं। इन्हीं के सहारे, मुक्ति, सिद्धी मिलने की कामना कर ली गई है। इस भ्रम जाल में उलझ जाने के कारण जन साधारण की न ता आत्मिक प्रगति हो पाती है, न ही लौकिक प्रयोजन सध पाते हैं। धर्म का प्रावधान इस उद्देश्य के लिए किया गया था कि व्यक्ति और समाज को भ्राँतियों, विकृतियों से बचाकर उन्हें मानवी गरिमा के अनुरूप ढाला जाए और प्रस्तुत असंख्य संख्याओं, उलझनों, संकटों, विग्रहों का सुस्थिर समाधान निकाला जाये। जीवन और समाज में छायी हुई अनेकानेक विकृतियों से जूझने, सुधारने का यह अति सरल और सर्वोत्तम मार्ग है कि पुरातन धार्मिक विधि-विधानों को समय के अनुरूप इस प्रकार ढाला जाए जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान भी जुड़ा हुआ हो और व्यक्तित्व का निखार भी। आयोजन भी ऐसे हों, जिनमें कम से कम खर्च पड़े और अधिक से अधिक लोग उनमें सम्मिलित होकर उपयोगी मार्गदर्शन प्राप्त करें।

इस प्रयोजन के लिए दीपयज्ञ की योजना बहुत सही और सफल सिद्ध हुई है। अपनी थाली में, अपने घर में तीन-तीन के पाँच गुच्छक और एक दीपक रखकर यज्ञकर्ता लाते हैं सभी एक स्थान पर एकत्रित होकर उस देव यज्ञ के समक्ष गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हैं। अन्त में देव दक्षिणा के रूप में एक सत्प्रवृत्ति अपनाने की प्रतिज्ञा करते है। इन दिनों पाँच प्रौढ़ अशिक्षित व्यक्तियों को शिक्षित बनाना अपने प्रभाव क्षेत्र में बिना धूम धाम, बिना दहेज की शादियाँ करना, हरीतिमा-संवर्धन वृक्षारोपण नशा-निषेध जैसी प्रतिज्ञाओं को प्रतिज्ञाओं को प्रमुखता दी जा रही है। यह आयोजन प्रवचन सम्भवतः प्रायः तीन घंटे में पूरे जो जाते है। उन्हें प्रातः काल भी किया जा सकता है और रात को भी। इनके प्रति लोकप्रियता असाधारण रूप से बढ़ी है और इस प्रवचन को व्यापक बनाने का आशातीत सुयोग बना है।

तीन-तीन महीने वाले सत्रों में सम्मिलित होने वाले सभी शिक्षार्थियों को अपने क्षेत्र के सभी गाँवों, नगरों, मुहल्लों में इन बिना खर्च वाले, आयोजनों की व्यवस्था कराने का ऐसा प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे उत्साह उत्पन्न करने, व्यवस्था जुटाने और सफल बनाने के सभी पक्षों में से इस प्रकार का अभ्यास उन्हें करा दिया जाय कि व अपने समीपवर्ती सभी क्षेत्र में इन आयोजनों की धूम मचा सकें और सत्प्रवृत्ति-संवर्धन के लिए एक नया द्वार खोल सके।

इसके अतिरिक्त विद्या विस्तार के और भी कितने ही प्रयोजन है, जिनमें प्रज्ञा-पुराण की कथाओं का, रामायण भागवत की कथाओं की तरह सुनियोजित विस्तार किया जा सकता है। युग-संकीर्तन भी ऐसे ही कृत्यों में से एक है। वाद्य यन्त्रों समेत सामूहिक सहगान की प्रक्रिया ही युग-कीर्तन है, इनमें भी भगवान का नाम लेने के अतिरिक्त, अनेकानेक उपयोगी प्रेरणाएं भरी रहती है, जिनमें साथ बीच बीच में टिप्पणी जोड़ते चलने पर उन्हें लोक शिक्षण का महत्वपूर्ण अंग बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त स्लाइड प्रोजेक्टर के सहारे घरों में, मुहल्लों में आसानी से ज्ञान गोष्ठी की जा सकती है और जहां जिस स्तर के लोक शिक्षण की आवश्यकता है, वहाँ उसके लिए उसी प्रकार की विवेचना जोड़ी जा सकती है।

सद्ज्ञान प्रचार के लिए भी दो बातों की महती आवश्यकता है - 1. भाषण कला 2. संगीत कला। इन दोनों को ही छः महीने के प्रशिक्षण का प्रमुख अंग माना गया है। अन्य विषय तो ऐसे हैं, जिन्हें एक दिन बीच में छोड़कर भी सीखने का विधान रखा गया है, पर वक्तृत्व कला और संगीत शिक्षा के दो पाठ्यक्रम ऐसे हैं जो नित्य नियमित रूप से चलेंगे। प्रयत्न यह किया जाय कि हर शिक्षार्थी कुशल वक्ता होकर निकले। यह बड़े आयोजन और छोटी ज्ञान संगोष्ठियों का भली प्रकार संचालन कर सकें घरों में जन्म दिवस मनाने जैसे कार्यक्रमों के सहारे हर परिवार की विशेष स्थिति को समझते हुए उसके अनुरूप स्पष्ट मार्गदर्शन कर सकें और सत्प्रवृत्ति -संवर्धन की प्रतिज्ञाएँ करा सकें। यह सब कार्य बिना वक्तृत्व कला का विकास हुए समझ संभव नहीं। जन नेतृत्व के लिए यह एक अनिवार्य गुण है। इसकी क्षमता इन्हीं छः महीने वाले सत्रों में विकसित कर दी जाती है।

संगीत का अपना महत्व है। उसके आकर्षण और प्रभाव से सभी परिचित हैं। लोगों को एकत्रित करने और तक बिठाये रहने, अभीष्ट मार्ग दर्शन करते रहने का यह एक सरल उपाय है। देहातों में तो इसी माध्यम से छोटे बड़े आयोजन सफलतापूर्वक किये जा सकते है।

तीन महीने में हारमोनियम काम चलाऊ ही बजाना आ सकता है। समग्र कुशलता हेतु तो घर लौटते पर ही अभ्यास करना होगा। जिन्हें तीन महीने के स्थान पर छः माह या एक वर्ष तक ठहरने की विशेष अनुमति मिल जायगी वे हारमोनियम, बैंजो जैसे वाद्ययंत्रों को परिपूर्ण रूप में सीख सकेंगे। सिखाने की व्यवस्था तो सभी प्रकार की है, जो कम समय में सीखे जा सकते हैं, जिनका समुचित अभ्यास किया जा सकता है, उन्हीं को प्रधानतः तीन महीने के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है। ढोलक, नाल बंगाली तम्बूरा, खड़ताल, मंजीरा, घुंघरू चिमटा, घड़ा जैसे सरलतापूर्वक सीख जाने वाले सुविधापूर्वक हर जगह मिल सकने वाले वाद्य यंत्र इस पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये गये है।

उपरोक्त समूची क्रिया प्रक्रिया ऐसी है, जिसके सहारे सद्ज्ञान संवर्धन का विद्या विस्तार का कार्य कोई भी लगनशील व्यक्ति अपने अपने क्षेत्र में भली प्रकार सुसंचालित कर सकता है।

इन सभी विद्यावर्धन के शिक्षणों के सहारे शिक्षार्थी इस योग्य बनता है कि अपने क्षेत्र में लोक नेतृत्व कर सकने में भली प्रकार सफल हो सके। इसके लिए आरंभिक रूप में धर्म प्रचार को माध्यम बनाया जा सकता है। पीछे आवश्यकतानुसार इस क्षमता का उपयोग सामाजिक, राजनीतिक, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन जैसे अनेकों क्षेत्र में इच्छानुसार किया जा सकता है। वस्तुतः इस समूचे प्रशिक्षण को लोकनायक युग सृजेता बनाने की उस योजना का अंग समझा जा सकता है जिसके अनुसार युग बदलने की सफल भूमिका निभा सकने वाले युग नायकों का नये सिरे से नव-निर्माण किया जाना है।


स्वास्थ्य - रक्षा की अतिमहत्वपूर्ण शिक्षा

शिक्षा और विद्या के व्यापक विस्तार का काम जहाँ भाव संवेदना सम्पन्न प्रतिभाओं को अपने हाथ में लेना है, वहाँ उन्हें भौतिक क्षेत्र की महत्ती आवश्यकता “स्वास्थ्य रक्षा” को भी अपने कार्यक्रमों का अविच्छिन्न अंग मानकर चलना है।

अस्वस्थ रहने वाला व्यक्ति स्वयं कष्ट सहता है। घर वालों को अपनी सेवा सहायता जुटाये रहता है। उपार्जन कुछ कर नहीं पाता, उल्टे दवा दारु, विशेष आहार आदि में अतिरिक्त धन खर्च कराता रहता है। ऐसे व्यक्ति आरम्भ में तो थोड़ी बहुत सहानुभूति पाते भी हैं पर अन्ततः वे अपने लिए और सबके लिए भार बन जाते हैं। समाज के लिए भी वे अनुत्पादक किन्तु व्यय भार बढ़ाने वाली निरर्थक इकाई समझ जाते है।

दुर्भाग्य से अपने देश में शारीरिक मानसिक रोगियों की संख्या दिन-दिन बढ़ती ही जाती है। इसका कारण जहाँ आर्थिक सुविधाओं, पोषक आहार का उपलब्ध न होना एक है, वह दूसरा यह कि आहार, विहार, स्वच्छता, उपयुक्त श्रम, मानसिक संतुलन सही न रखना भी एक बड़ा कारण है। आदतों में घुसी जिन्दगी, अन्यमनस्कता, अस्त-व्यस्तता भी रुग्णता और दुर्बलता का एक बड़ा कारण है। जब तक जीवन चर्या में आवश्यक परिवर्तन नहीं होते तब तक यह सम्भव नहीं कि कोई व्यक्ति आवश्यक सुविधाएँ रहने पर भी स्वस्थ रह सकें। इस संदर्भ में बड़ी आयु वालों को भी, सुशिक्षितों को भी इसी प्रकार की समग्र शिक्षा देने पड़ेगी जैसी कि अनगढ़ों और अनपढ़ों को देनी पड़ती है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने की विद्या से आम आदमी एक प्रकार से अपरिचित ही है। इस क्षेत्र में वैसे ही शिक्षण की आवश्यकता है जैसी कि नौसिखियों और बालकों को आरम्भिक शिक्षण से शुरुआत करनी पड़ती है। जानना एक बात है और मानना दूसरी। मानने के क्षेत्र में लोग इतने अधिक पिछड़े हुए हैं मानों उसमें उनने न कभी स्वस्थ रहने की मूलभूत आधारों पर ध्यान दिया हो और न उन्हें अभ्यास में उतारने की आवश्यकता समझी हो। स्वास्थ्य रक्षा को जन-जन का एक अतीव आवश्यक विषय मानकर उस संदर्भ में उदार चेताओं को इस हेतु सुनिश्चित सेवा साधना करते रहने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।

स्वास्थ्य रक्षा के कुछ प्रमुख अग हैं - (1) सात्विक, सुपाच्य और सीमित आहार (2) वस्त्र, मकान, उपकरण आदि में कहीं गंदगी न पनपने देना (3) शारीरिक श्रम उतना करना जिसमें न आलस्य पनपे ओर न थकान बढ़े (4). दिनचर्या को नियमित रखना (5) प्रकृति के समीप रहना और उसके निर्देशों के अनुरूप चलना (6) मनोविकारों को न पनपने देना, सदा प्रसन्न चित, निश्चित और हल्की फुलकी हंसती-हंसाती जिन्दगी जीना (7) असंयम न बरतना (8) रोग होने पर चिकित्सा हेतु तेज दवाइयां न लेकर जड़ी-बूटियों पर रहना आदि आदि।

उपरोक्त सभी बातों को जन-जन के मानस में बिठाने के लिए लोक सेवियों को स्वास्थ्य रक्षा के लिए हर स्थिति में, हर क्षेत्र में कुछ ना कुछ करते ही रहना चाहिए। इसके लिए गाँव-गाँव आरोग्यशालाएं बननी चाहिए, प्राचीनकाल की व्यायामशालाओं की तरह। उन दिनों व्यायाम-शालाओं में कसरत प्रधान थी, पर अब उतने को ही पर्याप्त नहीं माना जाता, वरन् स्वास्थ्य रक्षा के हर पक्ष को हृदयंगम करने, व्यवहार में उतारने की योजना बनाकर चलना चाहिए और उसमें उपरोक्त विषयों को भी साँगोपाँग शिक्षा मिलनी चाहिए। तीन महीने में शांतिकुंज शिविरों में उपरोक्त सभी विषयों की इतनी जानकारी देने की व्यवस्था है जिसके आधार पर आपने-अपने परिवार के एवं संपर्क क्षेत्र के सभी जनों को स्वास्थ्य रक्षा के मार्ग पर चलाया जाता रहे। जिनके पास समय है, वे अपने यहाँ एक स्वास्थ्यशाला चलाने की भी व्यवस्था कर सकते हैं। यह कार्य अस्पताल खुलवाने की तुलना में कहीं अधिक egRowiw.kZ gSA mldk iq.; Hkh de ughaA foKkiu u gksus ij Hkh bl vk/kkj ij yksd lEEku ikus vkSj J)k Hkktu cuus dk volj feyrk gSA

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आजीविका उपार्जन और गृह उद्योग

शहरों, कस्बों के सुसम्पन्न व्यक्ति अपनी आजीविका के लिए बड़े उद्योग, व्यवसाय, फर्म, कारखाने लगा लेते हैं। सुशिक्षित सरकारी नौकरियों में खप जाते है। कला, साहित्य, शिल्प आदि के सहारे अपने लिए अच्छी आजीविका कमा लेते हैं, पर वह वर्ग दस प्रतिशत से अधिक नहीं है। अधिकाँश जनता देहातों में रहती है। उनके सामने कृषि पशुपालन और मजदूरी के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। गृह उद्योगों का प्रचलन नाम मात्र का है। उसमें एक-दो प्रतिशत लोग ही लगे हैं। शेष का खेती से बचा हुआ समय प्रायः बेकार ही जाता है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि देहात में रहने वाले बहुसंख्यक समाज को गृह उद्योगों में लगाया जाय। उनके उत्पादन को खपाने के लिए नये सिरे से ‘स्वदेशी आन्दोलन’ जैसी नई लहर चलाई जाय। खादी को सैद्धान्तिक आधार पर ही लोकप्रिय बनाया गया था। अब स्वदेशी के प्रति जन साधारण को वैसा ही उत्साहित किया जाय। मिल के सस्ते और आकर्षक उत्पादन की तुलना में दोहती कुटीर उद्योगों को प्रतिद्वन्द्विता से बचाने और उन्हें पनपने का अवसर इसी आधार पर मिलेगा। गरीबी और बेकारी से पिण्ड इसी प्रकार छूटेगा। बहुमत के लिए आजीविका उपार्जन में सहायता करने के लिए इसी प्रयास को नये उत्साह और नये संकल्प के साथ आरम्भ करना होगा।

तीन-तीन महीने के युग-नायक सूत्रों में इसी विषय की बौद्धिक जानकारी और व्यावहारिक अभ्यास का समावेश इसी निमित्त किया गया है। कुटीर उद्योगों की संख्या स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार हजारों प्रकार की हो सकती है। उन सभी के सिद्धान्त तो बताये जा सकते हैं, पर व्यवहारिक अभ्यास कराने के लिए विशालकाय बहुमुखी प्रयोगशाला चाहिए। उसकी सम्भावना शांतिकुंज की वर्तमान स्थिति को देखते हुए है नहीं। बड़े के इन्तजार में देर तक रुके बैठने के अवसर नहीं। इसलिए जितना संभव हो सका, उतने कुटीर उद्योगों संबंधी सिद्धान्त और अभ्यास शिक्षण प्रक्रिया में समाविष्ट किया गया है। चूँकि समय तीन महीने जितना अल्प है। उसमें भी बुद्धिमता और स्वास्थ्य रक्षा जैसे महत्वपूर्ण प्रकरण जुड़े हुए है। इतने पर भी कुटीर उद्योगों के प्रशिक्षण में जितना अधिक संभव था, समावेश किया गया है। सिद्धान्त तो पूरी तरह सिखा ही दिए जायेंगे। व्यवहार भी समय के अनुसार सभी को प्रयोग में लाने का अवसर मिलेगा, पर पूर्णता और पारंगतता तो कार्य हाथ में मिलने पर लम्बे अभ्यास के उपरान्त ही मिल सकेगी।

जो कुटी उद्योग 3 माह के सत्र की अवधि में जिस प्रकार सिखाये जायेंगे, उसका विवरण इस प्रकार है -

(1) सहकारिता और कुटीर उद्योगों का पारस्परिक संबंध, दोनों को साथ-साथ चलाने की प्रक्रिया।

(2) कृषि और पशुपालन के पुरातन तरीकों और अन्वेषणों को समझाते हुए उनमें सुधार करने की आवश्यकता। इस संदर्भ में अधिकाधिक जानकारियां उपलब्ध कराना। दीमक और कृषि कीटकों से बचाव।

(3) वस्त्र उद्योग, कताई बुनाई संबंधी अभ्यास। इस संदर्भ में हुए नवीनतम सुधारोँ का प्रदर्शन और अभ्यास।

(4) काम चलाऊ सिलाई की मशीनों, का प्रयोग।

(5) रसायन, साबुन तथा साबुन पाउडर बनाना, अगरबत्तियाँ बनाना, मोमबत्तियाँ बनाना।

(6) घरेलू प्रयोग में आ सकने वाली थोड़ी बिजली से चलने वाली आटा चक्की, धुलाई मशीन, तेल निकालने की घरेलू मशीन (कोल्हू) जो बिजली से चलेगी।

(7) टूट-फूट की मरम्मत

(8) वृक्षारोपण आन्दोलन, सब्जियों से अधिक से अधिक लाभ लेने की विधि, पुष्पोद्यान, उनके बीज भण्डार चलाना और पौध उगाकर बेचना।

(9) मधुमक्खी पालन एवं सामूहिक स्तर पर गोबर गैस प्लांट लगना।

(10) स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जो उद्योग पनप सकते हैं, उनकी सम्भावनाओं पर परामर्श।

उपरोक्त दस विषयों में सैद्धान्तिक एवं अभ्यास की यथा संभव व्यवस्था है। इन्हें अपने क्षेत्र में प्रचलित किया जा सकता है और अनेकों की बेकारी गरीबी दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकना संभव हो सकता है। जो दूसरों की इस स्तर की सहायता करेंगे उन्हें सिखाने और कराने में जुटेंगे, वे निश्चय ही अधिक लोकप्रिय बनेंगे। उनकी सेवा, साधना सर्वत्र सराही जायगी। सेवा-साधना के आधार पर ही किसी को लोकनायक स्तर पर सम्मान मिला है - इस तथ्य को भली प्रकार गाँठ बाँध रखना चाहिए।

इन उद्योगों के सीखने का एक लाभ यह है कि अपने क्षेत्र में इन प्रशिक्षणों में से जो सम्भव है, उनके प्रशिक्षण का केन्द्र चलाया जा सकता है। उस उत्पादन की खपत का सहकारी स्तर पर विक्रय विभाग चलाया जा सकता है। नई सहकारी समिति गठित की जा सकती है और उसके सहारे पूँजी का प्रबन्ध सरकार के माध्यम से किया जा सकता है। इस प्रकार निजी रूप में भी उन्हें किया जा सकता है और सहकारिता के आधार पर बड़े क्षेत्रों में भी और बड़े रूप में भी।

यदि निजी रूप में इनमें से कोई व्यवसाय करना हो, तो उसे घरेलू सुविधा संवर्धन का आधार भी बनाया जा सकता है और यह भी हो सकता है कि उसे थोड़ा विस्तार देकर स्वयं ही नियोजित किया जाय। डेरी उद्योग के पनपने की हर जगह आवश्यकता है। मसाले पीसने, आटा पीसने, घर के कोल्हू पर शुद्ध तेल निकालने और जन-साधारण को उपलब्ध कराना ऐसा उद्योग है कि उसके सहारे अनेकों, की खाद्य पदार्थों में मिलावट की हानियों से भारी हानि उठाने वालों की जीवन रक्षा की जा सकती है। साथ ही अपने लिए भी घर-गाँव में रहकर इतनी आजीविका अर्जित की जा सकती है जिसके लिए नौकरी तलाश करने और आये दिन बदली का झंझट उठाने की विवशता रहती है। उस फेर में संयुक्त परिवार भी अस्त-व्यस्त हो जाता है। देहात छोड़कर लोग शहरों की गन्दगी में घुस पड़ने के लिए इसी लिए दौड़ते है कि ग्राम्य जीवन में कुटीर उद्योगों के आरम्भ करने और खपाने की पूँजी जुटाने का कोई सुप्रबन्ध नहीं है। यदि कोई व्यवसाय बुद्धि का लोकसेवी इस क्षेत्र में प्रवेश करें, तो अपनी निजी आजीविका का प्रश्न तो स्थायी रूप से हल कर ही सकता है, साथ ही अपने प्रभाव क्षेत्र में घरेलू उद्योगों द्वारा आजीविका उपार्जन के नये आधार खड़े कर सकता है।

तीन महीने के सत्रों में इस विषय के पाठ्यक्रम है उनका पूरी तरह अभ्यास कर सकना तो शायद न बना पाय, पर इतना निश्चित है कि समुचित जानकारी इस स्तर की बन पड़ेंगी कि वापस लौटने पर जिन भी कार्यों को हाथ में लिया जाय उनकी प्रवीणता काम करने की साथ-साथ सम्पन्न कर ली जाय। यह भी हो सकता है कि इन विषयों के कारीगरों को नौकर, रखकर अभ्यास प्रकरण को पूरा कराते रहा जाय।

कुटीर उद्योगों के लिए पूँजी और खपत का प्रबन्ध करने के लिए जहाँ सरकारी समितियों की स्थापना आवश्यक है, वहाँ वह भी जरूरी है कि ‘स्वदेशी आन्दोलन’ को एक प्रचण्ड आंदोलन के रूप में गतिशील किया जाय, ताकि लोग बड़े कारखानों की बनी वस्तुएं खरीदने के स्थान पर गृह उद्योगों से बने माल को अपनाने के लिए सहमत और प्रतिज्ञा बद्ध हो।

निजी रूप में घरेलू शाक वाटिका, टूट-फूट की मरम्मत जैसी कार्यों को घर-परिवार की आवश्यकता पूर्ति के लिए अपनाया जा सकता है, पर अधिक लोगों को अधिक काम देते हुए आर्थिक क्षेत्र का लोक नेतृत्व करना हो, तो उस प्रक्रिया को व्यापक बनाने की बात सोचनी पड़ेंगी। यही बात बुद्धिमता और स्वास्थ्य रक्षा क्षेत्रों में भी लागू होती है। उन्हें भी सीमित न रहकर व्यापक बनाना पड़ेगा, तभी लोक नेतृत्व का श्रेय समुचित रूप में मिल सकेगा।


Quotation

जाति जन्म से नहीं कर्म से बनती है। जो ब्रह्म पारायण है वह ब्राह्मण। जो अनीति के विरुद्ध लड़ता है सो क्षत्रिय। जो आदान-प्रदान की व्यवस्था बनाता है वह वैश्य। जो श्रम करता है सो शूद्र। इनमें काई ऊँच नीच नहीं।


उपवास से सूक्ष्म शक्ति की अभिवृद्धि

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इस हिन्दू संस्कृति में ही इतना महत्व मिला हो क्या बात नहीं है। अन्य धर्म-सम्प्रदायों में भी उपवास का अपना विशिष्ट स्थान है। मुसलमानों में रमजान के महीने में रोजा रखने का विधान है। कहा जाता है कि मोहम्मद साहब को तीस दिन की उपवास युक्त साधना के उपरान्त ही दैवी शक्तियों का साक्षात्कार हुआ था। ईसामसीह के बारे में भी विख्यात है कि 40 दिन की उपवास तपश्चर्या के पश्चात ही उन्हें दिव्य अनुभूतियाँ हुई थीं। ईसाई धर्म में अब भी लेण्ट के रूप में ईस्टर पर्व से पूर्व चालीस दिन का उपवास रखने की प्रथा परम्परा है। इसमें व्रतधारी उपवास करता हुआ अपने पापों का प्रायश्चित करता हैं ईसाई समुदाय में ऐसी मान्यता है कि इस प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं। जैन धर्म में व्रत उपवास पर्यूषद पर्व के रूप में मना जाता है। यहूदी बौद्ध सिण्टो, ताओ आदि धर्मों में भी किसी न किसी रूप में साधना विधानों के अंतर्गत उपवास किये जाने की परम्परा अभी भी जीवित है।

ह्लद्धशह्व स्रह्य द्धब्, शस्द्यह्य ह्द्मह्य द्बक्वस्नशद्ध ह्लब् क्द्धंगह्व] शद्म;ह्न,शड्ड क्द्मस्रद्म'द्म द्बद्मंखड्डश्चद्मह्यड्ड ह्क्रश द्दद्ध क्द्मश';स्र द्दस्] द्धस्रह्ह्न ड्ढह्वद्गह्यड्ड द्यख्म्द्ग द्बभ्द्म.द्म स्रद्ध द्गद्म=द्म यद्ग'द्मत्न क्द्ध/द्मस्र द्दद्मह्यह्द्ध ह्लद्मह्द्ध द्दस्ड्ड ड्ढद्य ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य क्द्मस्रद्म'द्मह्क्रश स्रद्ध द्गद्दक्रह्द्म,शड्ड द्वद्ब;द्मह्यद्धफ्ह्द्म ष्ष्ख्> द्बभ्क्र;ह्नक्रद्बह्वद्गद्धह् स्रंघद्बह्वद्म'द्मद्धष्ठह् रुद्गद्भ.द्म'द्मद्धष्ठह् क्द्मद्धठ्ठ द्गह्यड्ड॥द्मद्ध रुद्ब"क ष् द्गद्दद्मक्रद्गद्म फ्द्मंखड्ड/द्मद्ध ह्वह्य क्द्मक्रद्ग&'द्मद्मह्य/द्मह्व,शड्ड क्द्म/;द्मद्धक्रद्गस्र 'द्मद्धष्ठह्&द्यश्वद्बद्मठ्ठह्व द्दह्यह्ह्न द्वद्बशद्मद्य स्रद्मह्य,स्र द्गद्दक्रशद्बख्.द्मभ् द्वद्बस्रद्भ.द्म ष्ह्द्म;द्म स्नद्मद्म क्द्मस्द्भ द्यद्ग;&द्यद्ग; द्बद्भ शह्य ड्ढद्यस्रद्म ब्द्म॥द्मद्ध॥द्मद्ध द्वक्चद्मह्ह्य द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य्न द्यद्मद्गद्म; ह्र;द्धष्ठह्॥द्मद्ध द्यह्नद्धश/द्मद्मह्वह्नद्यद्मद्भ द्यद्मढ्ढह्द्मद्धद्दस्र] द्बद्मद्धम्द्मस्र;द्म द्गद्मद्धद्यस्र द्वद्बशद्मद्य स्रद्भह्द्म द्भद्द स्रद्भ 'द्मद्भद्धद्भ श द्गह्व 'द्मद्मह्य/द्मह्व स्रद्म द्व॥द्म;&द्बम्द्मद्ध; ब्द्म॥द्म द्दरुह्फ्ह् स्रद्भ द्यस्रह्द्म द्दस््न श"र्द्मं द्गह्यड्ड ठ्ठद्मह्य ष्द्मद्भ ह्वशद्भद्मद्ध= द्वद्बशद्मद्य स्रद्भ ब्ह्यह्वह्य,शड्ड क्द्मद्दद्मद्भ&द्धशद्दद्मद्भ स्रद्म द्यड्डह्ह्नब्ह्व द्धष्क्चद्म;ह्य द्भ[द्मह्वह्य द्यह्य द्दद्भ ह्र;द्धष्ठह् क्द्बह्वह्य 'द्मद्भद्धद्भ श द्गह्व स्रद्मह्य रुशरुस्न;&द्धह्वद्भद्मह्यफ् ष्ह्वद्म;ह्य द्भद्द द्यस्रह्द्म द्दस््न स्रह्नहृ ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध द्गद्म;ह्द्म द्दस् द्धस्र,स्र द्धठ्ठह्व॥द्मद्मह्यह्लह्व ह्वद्दद्धड्ड स्रद्भह्यड्डफ्ह्य ह्द्मह्य स्रद्गह्लद्मह्यद्भ द्दद्मह्य ह्लद्म;ह्यफ्ह्य द्बद्भ शरुह्ह्नह्त्न,ह्यद्यद्ध ष्द्मह् ह्वद्दद्ध द्दस््न 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य द्धशह्लद्मह्द्ध; ठ्ठद्वभ्ह्र; द्भद्दह्ह्य द्दस् द्वद्बशद्मद्य स्रह्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व द्वह्वस्रद्म द्धह्व"स्रद्मद्यह्व द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्द्म द्दस्स् ह्लद्धद्धशह्वद्ध 'द्मद्धष्ठह् ड्ढद्यद्ध द्धठ्ठ'द्मद्म द्गह्यड्ड द्वह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ह्र;; द्दद्मह्यह्वह्य ब्फ्ह्द्ध द्दस्स् क्तब्ह्त्न क्द्मद्भश्व॥द्म द्गह्यड्ड स्रह्नहृ स्रद्गह्लद्मह्यद्भद्ध ब्फ्ह्वद्म रुशद्म॥द्मद्मद्धश द्दस् द्गफ्द्भ;द्द द्धरुस्नद्मद्धह् क्द्ध/द्मस्र द्धठ्ठह्व ह्स्र ह्वद्दद्धड्ड ष्ह्वद्ध द्भद्दह्द्ध द्दस््न ह्लंघठ्ठ द्दद्ध 'द्मद्भद्धद्भ क्द्बह्वह्य रुशद्म॥द्मद्मद्धशह् यद्ग द्गह्यड्ड क्द्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न ड्ढद्य द्ग/; स्रद्म;द्मर्ह्यं द्गह्यड्ड स्रह्नहृ म्द्मद्ध.द्मह्द्म क्श'; क्द्म ह्लद्मह्द्ध द्दस् द्धस्रह्ह्न रु;ख्ब्ह्वद्म?द्मंकह्व स्रह्य द्यद्मस्नद्म&द्यद्मस्नद्म द्यख्म्; 'द्मद्धष्ठह्;द्मह्यड्ड स्रद्म॥द्मद्ध द्बभ्द्मठ्ठह्न॥द्मर्द्मंश द्दद्मह्यद्मह्द्म द्दस््न द्गह्न[द्मद्ग.रुब् द्गह्यड्ड क्द्मह्लद्य&ह्ड्डह्लद्य ष्< ह्लद्मह्ह्य द्दस््न फ्फ्द्ध स्रद्म ठ्ठह्नष्ब् 'द्मद्भद्धद्भ स्नद्मस्रद्म&स्नद्मस्रद्म द्यद्म द्गद्धह्व क्द्मस्द्भ द्धह्वरुह्ह्यह्ल द्धठ्ठ[द्मद्मर्ड्ढं द्बरुह्द्म द्दस््न ह्लष्द्धस्र द्यद्म/द्मस्र स्रह्य 'द्मद्भद्धद्भ क्द्मस्द्भ श्चह्यद्दद्भह्य द्बद्भ श्चद्गस्र द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्वद्यस्रद्म [द्मद्मब्द्ध द्बह्यंक द्भद्दह्वद्म द्व)ह्य';द्बख्.र्द्मं द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्वद्यस्रह्य द्यद्मस्नद्म द्वद्यस्रद्म द्यड्डस्रंघद्ब ष्ब् क्द्मस्द्भ ब्म्; ह्लह्नरुद्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस् क्ह्त्न द्दद्मस्नद्मद्मह्य द्दद्मस्नद्म द्वद्यस्रद्म द्यक्रद्बद्धद्भ.द्मद्मद्ग॥द्मद्ध क्द्मद्यह्यह्लद्य द्यह्लद्य शर्श्चंद्य द्गह्यड्ड क्द्ध॥द्मशक्वद्ध) स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्धद्गब्ह्द्म द्दस््न ह्लष्द्धस्र द्गद्भद्धस्र स्रद्ध द्धह्वद्भद्मद्दद्मद्भ द्धरुस्नद्मद्धह् द्गह्लष्ख्द्भद्ध श'द्म द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्वद्यस्रह्य द्गह्व द्गह्यड्ड ड्ढद्यस्रह्य द्बभ्द्धह् ह्व द्यड्डस्रंघद्ब द्दद्मह्यह्द्म द्दस् ह्व द्वद्गड्डफ् द्वक्रद्यद्मद्द द्धह्लद्यद्यह्य ड्ढद्य ठ्ठद्मस्द्भद्मह्व द्वद्यस्रद्ध 'द्मद्मद्भद्धद्धद्भस्र म्द्मद्गह्द्म?द्मंकह्द्ध द्बभ्ह्द्धह् द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्धह्व:)ह्य'; क्स्नद्मशद्म क्॥द्मद्मशश'द्म॥द्मख्[द्मह्य द्भद्दह्वह्य शद्मब्ह्य द्वद्बशद्मद्य स्रह्य क्द्म/;द्मद्धक्रद्गस्र ब्द्म॥द्म द्यह्य द्यठ्ठद्म शड्डद्धश्चह् द्भद्द ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड ्न क्रुह्ह्न द्धह्लद्दह्यड्ड ड्ढद्यद्यह्य ब्द्म॥द्म ब्ह्यह्वद्म द्दद्मह्य द्वद्दह्यड्ड द्वद्बशद्मद्य स्रह्य द्यद्मस्नद्म द्दद्ध क्द्बह्वह्य द्यड्डस्रंघद्ब स्रद्मह्य॥द्मद्ध ह्लद्मह्यरुह्वद्म श्चद्मद्धद्द, क्द्मस्द्भ ष्भ्द्द−द्गद्म.रु द्गह्यड्ड द्यड्डह्र;द्मढ्ढह् द्बभ्द्म.द्म स्रद्ध क्द्ध/द्मस्रद्मद्ध/द्मस्र द्गद्म=द्म क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् स्रद्भह्वह्य स्रद्म द्बभ्द्यद्मद्य स्रद्भह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न द्वद्बशद्मद्य ह्॥द्मद्ध द्यक्तब् क्द्मस्द्भ द्यक्रद्बद्धद्भ.द्मद्मद्गठ्ठद्म;स्र द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न


लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ (Kahani)

न्यूयार्क (अमेरिका) में एक अमीर ने वसीयत लिखी उनकी मृत्युपरान्त पढ़ी गई। वसीयत सुनकर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि वसीयत विचित्र व रोचक थी। इसमें परिवार के सयाने सदस्यों चालाक ड्राइवरों, चोर नौकरों के कारनामों का वास्तविक विवरण भी था।

उसने पत्नी को मात्र एक डालर की राशि देते हुए वसीयत में लिखा “पत्नी ने मुझे जीवन भर बुद्धू समझा उसकी लालची निगाहें मेरी सम्पत्ति पर ही लगी रहीं। मेरे सुख दुःख में कभी भी हाथ तक न बटाया। किन्तु न मैं बुद्धू था न मूर्ख।”

इकलौते आवारा, हरामखोर पुत्र के लिए वसीयत में मात्र इतना ही लिखा। “तुम्हें पीसने की गाढ़ी कमाई का एक भी धेला देने का अर्थ होगा कि मैं भी तुम्हारी हराम खोरी और आवारागर्दी से सहमत था।”

बेटी जिसने पिता को बुढ़ापे में देख भाल सेवा सुश्रूषा की, उसके नाम एक लाख डालर की राशि देते हुए लिखा “मेरे दामाद के केवल एक ही समझदारी की  कि मेरी पुत्री से विवाह किया। अपने दामाद के निकम्मेपन को देखते हुए उक्त राशि बेटी के नाम कर रहा हूँ जिसमें उसका भविष्य सुरक्षित बना रहें।”

“वसीयत में खटारा कारें ड्राइवरों को जान बूझ कर दे रहा हूँ क्योंकि इनकी चालाकी से हमेशा नये पुर्जों की जगह पुराने पुर्जे ही डाले जाते रहे और रकम बीच में डकारी जाती रही। अब ये खटारा कारें जीवन पर्यन्त इनका भी सिर दर्द बनी रहेंगी। इनकी बेईमानी और हेरा-फेरी फिर-फिर कर इन्हें ही सालती रहेगी।

“पुराने बर्तन, कपड़े आदि नौकरों, चाकरों को इसलिए सौंपे जा रहा हूँ जिससे इन्हें भविष्य में अपने मालिकों के यहाँ से न चुराने पड़ें।”


प्रशिक्षण सम्बन्धी अन्य ज्ञातव्य

ठ्ठह्य'द्म द्गह्यड्ड फ्द्भद्धष्द्ध स्रद्म,स्र ष्रुद्म स्रद्मद्भ.द्म द्दस् /द्मख्द्ग /द्मद्मद्ग शद्मब्ह्य ठ्ठद्दह्यह्ल शद्मब्ह्य [द्मश्चर्द्धंब्ह्य द्धशशद्मद्दद्मह्यड्ड स्रद्म द्बभ्श्चब्ह्व्न ड्ढद्य स्रद्मद्भ.द्म क्द्ध/द्मस्र स्रद्गद्मह्वह्य शद्मब्ह्य॥द्मद्ध द्यष् स्रह्नहृ ड्ढद्यद्ध र्फ्ह् द्गह्यड्ड द्धफ्द्भद्म स्रद्भ [द्मद्मह्य[द्मब्ह्य ष्ह्वह्वह्य क्द्मस्द्भ ष्ह्यर्ड्ढंद्गद्मह्वद्ध स्रह्य ह्द्भद्धस्रह्य क्द्बह्वद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्धशश'द्म द्दद्मह्यह्ह्य द्भद्दह्ह्य द्दस््न;द्धठ्ठ ठ्ठह्य'द्म स्रद्मह्य द्यद्गक्व) क्द्मस्द्भ ह्वस्द्धस्रह्वस्र ष्ह्वद्मह्वद्म द्दस् ह्द्मह्य ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ स्रद्ध द्यद्मद्गद्मद्धह्लस्र स्रह्नद्धद्भद्धद्धह्ह्;द्मह्यड्ड स्रह्य द्धश:) क्द्मठ्ठद्मह्यब् श्चब्ह्वद्म द्बरुह्यफ्द्म्न क्द्बह्र;; स्रद्ध क्; द्गठ्ठद्मह्यड्ड स्रद्मह्य॥द्मद्ध द्भद्मह्यस्रह्वद्म द्दस््न क्तस्'द्मह्व&द्बद्भरुह्द्ध&क्चद्मंक&ष्द्मंक छ्वक्वड्डफ्द्मद्भ] ह्लह्यशद्भ क्द्मद्धठ्ठ द्गह्यड्ड द्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्द्म [द्मर्श्चं;द्धठ्ठ?द्मंकद्म;द्म ह्लद्म द्यस्रह्य क्द्मस्द्भ द्वद्यह्य क्घद्ब ष्श्चह्;द्मह्यह्लह्वद्मक्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ब्फ्द्म;द्म ह्लद्यस्रह्य ह्द्मह्य क्द्बह्र;; स्रद्म त्त्द्मद्भद्म ष्ठ्ठ द्दद्मह्यह्वह्य द्बद्भ ठ्ठह्य'द्म स्रद्म क्द्मद्धस्नर्द्मंस्र द्यह्न/द्मद्मद्भ ह्ह्यह्लद्ध द्यह्य द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस््न

छ्वद्ग स्रह्य द्बभ्द्धह् क्शय़द्म स्रद्म॥द्मद्मश॥द्मद्ध द्बभ्फ्द्धह् द्गद्मफ् द्गह्यड्ड॥द्मद्मद्भद्ध ष्द्म/द्मद्म द्दस््न;द्दद्मड्ड क्द्मद्भद्मद्ग द्यह्य ष्स्क्चस्रह्यह्यख् द्धठ्ठह्व फ्ह्नह्लद्मद्भह्वह्य शद्मब्ह्यद्मड्ड स्रद्मह्य॥द्मद्मंग;शद्मह्व] क्द्गद्धद्भ] द्वक्कश्च द्गद्मह्वद्म ह्लद्मह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ छ्वद्गह्लद्धशद्ध स्रद्मद्भद्धफ्द्भ क्॥द्मद्मफ्ह्य द्यद्ग>ह्य ह्लद्मह्ह्य क्द्मस्द्भ द्वद्बद्दद्मद्मद्य स्रद्ध ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य ठ्ठह्य[द्मह्यड्ड ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड्न छ्वद्गह्लद्धद्धश;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्वद्धश्च ह्लद्मद्धह् द्गद्मह्वह्वह्य स्रद्ध द्बभ्स्नद्मद्म ड्ढद्यद्ध क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ श्चब्द्ध द्दस््न क्द्मश';स्रह्द्म ड्ढद्य ष्द्मह् स्रद्ध द्दस् द्धस्र छ्वद्ग स्रद्ध द्बभ्द्धह्"क्चद्म ष्रुद्मर्ड्ढं ह्लद्म; क्द्मस्द्भ क्द्मद्भद्मद्ग द्दद्गद्भद्म द्दस् द्धस्र द्गद्म;ह्द्म ब्द्मह्यस्र द्गद्मह्वद्य द्गह्यड्ड ह्व;ह्य द्धद्यद्भह्य द्यह्य द्बभ्द्धह्द्ध"क्चह् स्रद्ध ह्लद्म;] ह्द्मद्धस्र द्गद्म= क्द्मह्लद्धद्धशस्रद्म द्दद्ध ह्व ष् ह्व'द्मह्यष्द्मह्लद्ध द्गह्यड्ड द्भद्म"कऊद्ध; /द्मह्व स्रद्ध ड्ढह्ह्वद्ध ष्रुद्ध द्भद्मद्ध'द्म ह्र;; द्दद्मह्यह्द्ध द्धस्र द्वद्यह्य ष्श्चद्मद्भ द्ध'द्मम्द्मद्म,शड्ड रुशद्मस्न; स्रद्म;द्मह्यह्लह्वद्मष्) द्धशस्रद्मद्य द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस््न ह्र;द्धष्ठह्फ्ह् :द्ब द्यह्य ड्ढद्य ष्द्मठ्ठह् स्रद्म द्ध'द्मस्रद्मद्भ ह्र;द्धष्ठह् द्धह्व/र्द्मं क्रुशरुस्नद्म द्दद्मह्यह्द्म द्गख्[र्द्मं ष्ह्वह्द्म द्दस््न द्बद्धद्भशद्मद्भ स्रद्ध॥द्मड्ड;स्रद्भ ठ्ठह्नठ्ठफ्'द्मद्म ष्ह्वद्मह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्यद्गद्मह्ल द्गह्यड्ड क्द्बह्वह्य ह्लस्द्यह्य क्ह्वह्यस्रद्मह्यड्ड स्रद्मह्य स्रह्नंकह्यश फ्भ्रुह् स्रद्भ र्द्यशंह्वद्म'द्म स्रह्य र्फ्ह् द्गह्यड्ड /द्मस्रह्यब्ह्द्म द्दस््न ह्वह्य'द्मष्द्मह्लद्ध हृह्नरुद्मह्वह्य] ड्ढद्यद्गह्यड्ड ह्व;ह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्व क्तँद्यह्वह्य ठ्ठह्यह्वह्य स्रह्य द्धब्, ह्लद्मह्य॥द्मद्ध श्चभ्;क्रह्व ष्ह्व द्बरुह्य द्वह्वस्रह्य द्धब्, द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य /;द्मह्व द्गह्यड्ड द्भ[द्मह्ह्य द्दह्न, क्द्मश';स्र ह्द्मह्वद्म ष्ह्वह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न

क्द्बह्वह्य ठ्ठह्य'द्म स्रद्ध द्धरु=;द्मड्डँ?द्मद्भह्यद्मड्ड स्रह्य द्धद्बड्डह्लरुह्य द्गह्यड्ड द्बर्ठ्ठंह्यड्ड द्गह्यड्ड स्रस्ठ्ठ द्दस््न द्वद्दह्यड्ड ह्व द्ध'द्मम्द्मद्म स्रद्ध द्यह्नद्धश/द्मद्म द्बभ्द्मढ्ढह् द्दस् ह्व रुशद्मब्श्वष् ह्वद्मद्भद्ध ह्लद्मफ्द्भ.द्म स्रद्ध;द्मह्लह्वद्म॥द्मद्ध द्दद्मस्नद्म द्गह्यड्ड ब्ह्वह्यह्य स्रद्म ह्र;द्मद्बस्र द्बभ्;क्रह्व द्धस्र;ह्य ह्लद्मह्वह्य श्चद्मद्धद्द,्न ड्ढद्यद्गह्यड्ड रुशरुस्नद्मह्द्म क्द्मस्द्भ ष्ह्नद्ध)द्गश्र्द्मद्म द्यड्डश/र्द्मंह्व स्रद्ध द्यद्गरु;द्म॥द्मद्ध द्दब् द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न

क्द्मद्धठ्ठशद्मद्यद्ध शह्वशद्मद्यद्ध रुह्द्भ स्रह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म द्धद्बहृरुद्म शफ् क्द्बह्वह्य द्गद्म;ह्द्मक्द्मह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड द्धस्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ड्ढद्य ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य द्धद्बहृरुद्म द्भद्द फ्;द्म द्दस््न द्वद्दह्यड्ड टँश्चद्म द्वक्चद्मह्वह्य क्द्मफ्ह्य ब्द्मह्वह्य क्द्मस्द्भ द्य॥द्म; द्यद्गह्नठ्ठद्म; स्रह्य द्यद्मस्नद्म ह्लद्मह्यरुह्वह्य स्रद्ध क्द्मश';स्रह्द्म द्दस््न क्द्मद्बह्वह्य ठ्ठह्य'द्म द्गह्यड्ड ह्लद्मद्धह्&द्बद्मँद्धह्] टँश्च ह्वद्धश्च स्रद्म॥द्मद्मश॥द्मद्ध द्धद्गस्न;द्म क्द्दड्डस्रद्मद्भ द्बस्ठ्ठद्म स्रद्भह्वह्य क्द्मस्द्भ क्स्रद्मद्भ.द्म क्द्मक्रद्गद्दद्धह्वह्द्म द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्वह्य स्रद्म,स्र ष्रुद्म स्रद्मद्भ.द्म द्दस््न द्यह्न/द्मद्मद्भ ड्ढद्य द्यड्डष्ड्ड/द्म द्गह्यड्ड॥द्मद्ध द्दद्मह्यह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न

ह्र;द्धष्ठह्फ्ह् श्चद्धद्भ= द्धह्व"क्चद्म द्वक्रद्बह्व स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, ह्व;ह्य द्धद्यद्भह्य द्यह्य क्द्मढ्ढठ्ठद्मह्यब् स्रद्भह्वह्य स्रद्ध क्द्मश';स्रह्द्म द्दस््न /द्मर्द्गं क्द्मस्द्भ क्/;द्मक्रद्गस्र स्रद्मह्य द्बभ्फ्द्धह्'द्मद्धब्ह्द्म स्रह्य द्यद्मस्नद्म ह्लद्मह्यरुद्म ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न द्वद्यह्य द्बभ्द्धह्फ्द्मद्धद्गह्द्म क्द्मस्द्भ :द्धद्मह्यब्द्म द्बह्नरुह्स्रद्मब्;॥द्मद्ध ब्द्मह्यस्र श्चह्यह्ह्वद्म स्रद्मह्य >स्र>द्मह्यद्भह्वह्य क्द्मस्द्भ द्वद्य;ह्नफ् /द्मर्द्गं स्रद्म द्धह्वशर्द्मंत्र स्रद्भह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्बभ्द्मक्रद्यद्मद्धद्दह् स्रद्भद्गद्ध द्दस््न ब्द्मह्यस्रह्वद्म;स्र द्यख्=द्मह्यड्ड द्यह्य द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् द्वद्दद्मह्यह्वह्य शद्मब्ह्य ड्ढह्व द्बभ्द्यड्डफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध द्यस्)द्मद्धह्स्र द्बक्व"क्च॥द्मख्द्धद्ग द्यद्ग>ह्यड्डफ्ह्य क्द्मस्द्भ द्यद्मस्नद्म द्दद्ध ड्ढद्य द्यड्डठ्ठ॥र्द्मं द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य द्धस्र;द्म ह्लद्मह्वद्म द्दस् द्वद्यस्रह्य द्धब्, क्द्बह्वद्मर्ड्ढं ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्ध द्धशद्ध/द्म ह्र;शरुस्नद्मद्म स्रद्म॥द्मद्ध द्बद्धद्भश्च; द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भह्यड्डफ्ह्य्न

ह्द्मक्रर्द्ब;;द्द द्दस् द्धस्र शह्द्गद्मह्व द्बद्धद्भद्धरुस्नद्मद्धह्;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य स्रह्नहृ ह्र;द्धष्ठह्] द्बद्धद्भशद्मद्भ क्द्मस्द्भ द्यद्गद्मह्ल स्रह्य ह्वशद्धह्वद्गर्द्मं.द्म द्दह्यह्ह्न द्धस्र;द्म ह्लद्मह्वद्म क्द्मश;स्र द्दस् द्वद्यद्यह्य द्ध'द्मम्द्मद्मस्नद्मर्द्धं क्शफ्ह् द्दद्मह्य द्यस्रह्यड्डफ्ह्य्न द्बभ्द्धह्॥द्मद्म द्बद्धद्भ"स्रद्मद्भ] द्बद्धद्भशद्मद्भ स्रद्म क्द्ध॥ह्वश द्धह्वद्गर्द्मं.द्म,शड्ड द्यद्गद्मह्ल स्रद्ध द्वक्कश्चह्द्भद्मद्ध; द्यड्डश्चद्भह्वद्म स्रह्य द्य॥द्मद्भद्ध द्बम्द्मद्मह्यड्ड द्यह्य द्ध'द्मम्द्मद्मस्नद्मर्द्धं क्शफ्ह् द्दद्मह्य द्यस्रह्यड्डफ्ह्य्न ह्वस्द्धह्स्र ष्द्मस्द्ध)स्र क्द्मस्द्भ द्यद्मद्गद्मद्धह्लस्र यद्मद्धह् स्रद्मह्य क्फ्भ्फ्द्मद्गद्ध ष्ह्वद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, शद्द द्यष् स्रह्नहृ ह्लद्मह्व द्यस्रह्यड्डफ्ह्य ह्लद्मह्य;ह्नफ् /द्मर्द्गं स्रह्य क्ह्वह्न:द्ब ह्लद्मह्वह्वह्य;द्मह्यंग; द्दस््न ह्द्धह्व द्गद्दह्वह्य ह्लस्द्यद्ध क्घद्ब क्शद्ध/द्म द्गह्यड्ड ड्ढह्ह्वह्य द्धश"द्म;द्मह्यड्ड स्रद्ध द्यस्)द्मद्धह्स्र,शड्ड ह्र;द्मशद्दद्मद्धद्भस्र ह्लद्मह्वस्रद्मद्धद्भ;द्मड्डँ द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भ द्यस्रह्वद्म,स्र द्बभ्स्रद्मद्भ द्यह्य फ्द्मफ्द्भ द्गह्यड्ड द्यद्मफ्द्भ॥द्मद्भ ठ्ठह्यह्वद्म॥द्मद्ध स्रद्दद्म द्यस्रह्द्म द्दस््न

ड्ढद्य द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म स्रह्य द्धब्, फ्द्मह्यष्द्भ फ्.द्मह्य'द्म]॥द्मह्लह्वद्मह्वड्डठ्ठ] स्नद्मह्यस्र द्दद्मद्भह्य] क्/र्द्मंद्धशद्धम्द्मढ्ढह् ष्ख्ह्यड्ड द्वद्दह्यड्ड [द्मद्मह्यह्लह्यड्ड क्द्मस्द्भ द्बभ्द्मह्यक्रद्यद्मद्धद्दह् स्रद्भस्रह्य द्य= द्गह्यड्ड द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् द्दद्मह्यह्वह्य स्रह्य द्धब्,॥द्मह्यह्लह्यड्ड्न

द्बभ्द्मश्चद्धह्वस्रद्मब् स्रद्ध फ्ह्न:स्रह्नब् द्ब)द्धह्;द्द स्नद्मद्ध द्धस्र क्द्मछ्वद्ग द्यड्डश्चद्मब्स्र द्य॥द्मद्ध हृद्म=द्मह्यड्ड स्रह्य द्धब्,॥द्मद्मह्यह्लह्व] द्धह्वशद्मद्य] द्ध'द्मम्द्म.द्म क्द्मद्धठ्ठ स्रद्ध द्धह्वत्न'द्मह्नंघस्र ह्र;शरुस्नद्म स्रद्भह्ह्य स्नद्मह्य] ह्द्मद्धस्र द्य॥द्मद्ध फ्द्भद्धष्&क्द्गद्धद्भ द्वद्यस्रद्म द्यद्गद्मह्व :द्ब द्यह्य ब्द्म॥द्म द्वक्चद्म द्यस्रह्यड्ड्न ह्लद्मह्य र्द्यशंस्नद्मद्म द्धह्व/र्द्मंह्व ह्वद्दद्धड्ड स्नद्मह्य्न शह्य ठ्ठद्मह्व :द्ब द्गह्यड्ड क्द्बह्वह्य टद्बद्भ क्द्मह्वह्य शद्मब्द्म क्द्मछ्वद्ग [द्मर्श्चं ब्द्मस्कद्मह्ह्य द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य] ह्द्मद्धस्र द्धह्व/र्द्मंह्व स्रद्म द्दस्र ह्व द्गद्मद्भद्म ह्लद्म;्न;द्दद्ध द्ब)द्धह् ड्ढद्य द्बभ्द्ध'द्मम्द्म.द्म द्गह्यड्ड॥द्मद्ध क्द्बह्वद्मर्ड्ढं फ्ड्ढ द्दस््न शरु= क्द्मस्द्भ द्धशरुह्द्भ क्द्बह्वह्य द्यद्मस्नद्म ब्ह्यस्रद्भ श्चब्ह्यड्ड्न द्वस्त्रद्मह्यफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड [द्मह्यब्स्रख्ठ्ठद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड [द्मद्मस्रद्ध ह्वह्यस्रद्भ स्रद्गह्लद्ध स्रद्म द्वद्ब;द्मह्यफ् द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न शह्य॥द्मद्ध ठ्ठद्मह्य ह्लद्मह्यरुद्ध द्यद्मस्नद्म ब्ह्यस्रद्भ श्चब्ह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न द्बह्नरुह्स्रह्यड्ड शद्मस्त्र;ड्ड= द्धह्लह्वस्रद्ध द्धह्वह्लद्ध द्दद्मह्य] शह्य द्वद्यस्रद्ध ह्र;शरुस्नद्मद्म॥द्मद्ध स्रद्भस्रह्य श्चब्ह्य्न द्गद्मफ् ह्र;; द्य॥द्मद्ध स्रद्मह्य क्द्बह्वद्म&क्द्बह्वद्म स्रद्भह्वद्म द्दद्मह्यफ्द्म्न द्बद्दब्ह्य द्य= स्रद्म 'द्मह्न॥द्मद्मद्भश्व॥द्म ड्ढद्य ष्द्यड्डह् द्बर्ख्शं 13 ह्लह्वशद्भद्ध द्यह्य द्धस्र;द्म फ्;द्म द्दस््न ठ्ठख्द्यद्भद्म,स्र द्गर्ड्ढं द्गह्यड्ड श्चब्ह्यफ्द्म्न द्ध'द्मम्द्मद्म;ख्ह्वह्द्ग ह्लख्द्धह्व;द्भ द्दद्मर्ड्ढं रुस्रख्ब् रुह्द्भ ह्स्र स्रद्ध द्दद्मह्यह्वद्ध श्चद्मद्धद्द,्न क्द्म;ह्न;ख्ह्वह्द्ग 29 श"र्द्मं्न द्बभ्स्नद्मद्ग द्य= स्रद्ध॥द्मह्द्ध क्तद्भशद्भद्ध द्ग/; ह्स्र श्चब्ह्यफ्द्ध्न

द्बभ्शह्य'द्म द्बद्मह्वह्य स्रह्य ड्ढक्कहृह्नस्र द1ड्ट क्द्बह्वद्म द्बख्द्भद्म ह्वद्मद्ग&द्बह्द्म द2ड्ट द्ध'द्मम्द्मद्म द3ड्ट ह्र;शद्यद्म; द4ड्ट क्द्म;ह्न द5ड्ट ह्लद्ग ह्लद्मद्धह् द6ड्ट द्धद्ग'द्मह्व स्रद्ध द्बद्ध=स्रद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य द्यठ्ठरु; द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्म द्बभ्द्गद्म.द्म द7ड्ट 'द्मद्मद्भद्धद्धद्भस्र&द्गद्मह्वद्धद्यस्र ठ्ठक्वद्ध"क द्यह्य रुशरुस्नद्म द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्म क्द्म'शद्मद्यह्व द8ड्ट क्द्मछ्वद्ग स्रद्ध द्ग;र्द्मंठ्ठद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म छ्व)द्मद्बर्ख्शंस्र द्बद्मब्ह्व स्रद्भह्वह्य स्रद्म द्धश'शद्मद्य्न ड्ढह्व द्य॥द्मद्ध ष्द्मह्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्यद्मठ्ठह्य स्रद्मफ्ह्ल द्बद्भ द्धब्[द्म स्रद्भ॥द्मह्यह्लह्वद्म श्चद्मद्धद्द, क्द्मस्द्भ क्ष् ह्स्र स्रह्य क्द्बह्वह्य ह्लद्धशह्व स्रद्ध फ्द्धह्द्धशद्ध/द्म;द्मह्यड्ड स्रद्म द्धशशद्भ.द्म॥द्मद्ध द्धब्[द्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न;द्दद्मड्डँ स्रद्ध द्बद्मह्य'द्मद्मस्र /द्मद्मह्यह्द्ध&स्रह्नह्द्ध द्दस्] पाजामा व पैण्ट नहीं चलता।

आवेदन पत्र आने पर छाँट की जाती है और जिन्हें प्रवेश मिलना हैं, उन्हें स्वीकृति दी जाती है। स्वीकृति पाने के बाद भी किसी को अपने की तैयारी करनी चाहिए। अनावश्यक आ धमकने पर प्रवेश न मिल सकेगा। इच्छुकों की संख्या अधिक है और स्थान की कमी से शिक्षार्थी सीमित ही लिए जाते हैं। जगह भर जाने पर किसी अगले सत्र में प्रवेश मिलने की प्रतीक्षा भी की जा सकती है।

हर प्रशिक्षार्थी से यह आशा की गई है कि वे इस प्रशिक्षण से स्वयं तो लाभ उठावेंगे ही साथ ही इस आधार को अपने क्षेत्र में विकसित करने एवं शिक्षण देने की भी यथा सम्भव व्यवस्था करेंगे।


सेनानायक नेलसन (Kahani)

उन दिनों ब्रिटिश सेना के सेनानायक नेलसन थे। नील नदी का युद्ध आरम्भ होने वाला था। जंगी ब्रिटिश बेडे के अनेक सेनाधिकारियों की आँखों में निराशा तथा आशंका थी परन्तु नेलसन अद्भुत आत्म विश्वास से भरे थे। सहसा बेडे के कप्तान ने कहा - अगर हमारी जीत हो जाय तो दुनियाँ दंग रह जायेगी।

नेलसन ने गंभीर ओर दृढ़ स्वरों में कहा कप्तान हम जीतेंगे। अवश्य जीतेंगे, अपनी बहादुरी साहस ओर निष्ठा के बल पर जीतेंगे। सेनापति के इन शब्दों ने मंत्र सा प्रभाव दिखाया और वे विश्वास तथा साहस पूर्वक लड़कर विजयी हुए।


नौ दिवसीय जीवन साधन सत्र

नौ दिवसीय जीवन साधना सत्रों का कार्यक्रम अब और भी अधिक सघन एवं व्यस्त कर दिया गया है। किस-किस प्रयोजन के लिए क्या आत्म साधना करनी चाहिए? इसका निर्णय करने से पूर्व शिक्षार्थी की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति की जाँच पड़ता बहुमूल्य वैज्ञानिक यंत्रों से की जाती है। अब तक के जीवन का विवरण, वर्तमान में अड़े हुए अवरोध एक उज्ज्वल भविष्य के लिए किस दिशा में चलने का विचार है यह विस्तारपूर्वक पूछा जाता है और तद्नुसार साधना विषयक परामर्श दिया जाता है। साधारणतया गायत्री का एक लघु अनुष्ठान आवश्यक है। जिन्हें किसी अन्य साधना मार्ग पर विश्वास है उनका तद्नुरूप निर्धारण कर दिया जाता है।

साधारण जप, ध्यान, हवन, संचम का स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए सर्वतोमुखी प्रगति क लिए व्यक्तित्व के अन्तराल में जमे नये और पुराने संस्कारों का परिशोधन, परिष्कार करने के लिए यह साधना विद्या दूरगामी परिणाम उत्पन्न करती है, जो इन सत्रों में सम्मिलित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति से कहीं उसकी शक्ति एवं स्थिति के अनुरूप कराई जाती है। सभी साधनाएं ऐसी है। जिन्हें सरलता पूर्वक बिना किसी जोखिम के हर कोई अपना सके।

जीवन साधन सत्रों में (1) आत्म परिष्कार व्यक्तित्व का निखार (2) परिवार निर्माण इस छोटी दुनिया में सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन का अभ्यास (3) वे लोक व्यवहार “समाज का पुनर्निर्माण”। जैसे महत्वपूर्ण विषयों को जटिल गुत्थियों का सहज समाधान उपलब्ध कराया जाता है। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, भावनात्मक परिस्थितियों में किस प्रकार सुधार किया जाय संतुलन बिठाया जाय। जैसे विषयों का ऐसा मार्गदर्शन प्रस्तुत किया जाता है। जिसका अनुसरण करना हर किसी के लिए संभव हो सके। इस प्रशिक्षण को उज्ज्वल भविष्य की संरचना का महत्वपूर्ण चरण समझा जा सकता है।

इन दिनों शांतिकुंज में जीवन साधना के अतिरिक्त तीन मास की लोकनायक युगनायक शिक्षा पद्धति भी चल रही है। इसमें शिक्षा संवर्धन (1) स्वस्थता संरक्षण (3) कुटीर उद्योगों के माध्यम से गरीबी उन्मूलन की अनेक विद्याएं सिखाई जा रही है। भाषण कला एवं संगीत शिक्षा को प्रमुखता दी जा रही है ताकि लोकमानस का परिष्कार करने के साथ-साथ अपनी प्रतिभा में भी चार चाँद लग सकें।

नौ दिवसीय सत्रों में आने वाले इन विद्याओं को इतने अल्प समय में सीख तो नहीं सकते पर देखने समझने का अवसर उन्हें भी मिल जाता है। इस आधार पर नौ दिवसीय सत्रों में सम्मिलित होने वाले भी यह अनुमान लगा सकते हैं। इन विद्याओं में से उनके अपनाने योग्य क्या हो सकती है? यहाँ देखे आधार पर वे जिन्हें उपयोगी समझें उन्हें सीखने के लिए भविष्य में कभी यहाँ आने की और तीन महीने रहने की योजना बना सकते हैं।

इन नौ दिवसीय सूत्रों में दो दिन का इतना अवकाश मिल जाता है, जिनमें ऋषिकेश, लक्ष्मणझूला, हरिद्वार, कनखल के प्रमुख देवालयों को देखा जा सके और तीर्थ यात्रा या पर्यटन का उद्देश्य भी एक सीमा तक पूरा किया जा सके।

अब तक जितने शिक्षार्थी इन सत्रों में सम्मिलित होकर गये है उनमें से अधिकाँश ने ऐसी प्रेरणा प्राप्त की है जिसके सहारे पिछले जीवन की तुलना में भावी गतिविधियों में अति उपयोगी परिवर्तन हो सका और उज्ज्वल भविष्य की संरचना का नया मार्ग खुल सका। उनमें उत्साहवर्धक परिवर्तन देखकर नये शिक्षार्थियों के आने पर उत्साह जगता रहता है और पिछले शिविरों की तुलना में अगले शिविरों की संख्या का काल तथा स्तर बढ़ता रहता है।

यह अनुमान सही नहीं है कि हरिद्वार में ठंड अधिक पड़ती है। अब क्रमशः मौसम में आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगा है। हरिद्वार का मौसम भी लगभग वैसा ही रहता है जैसा अन्य समशीतोष्ण स्थानों का।

*समाप्त*