डर वास्तव में (Kahani)

एक दुबला कुत्ता था। तालाब के किनारे खड़ा उसमें अपनी परछाई देख रहा था। प्यासा तो था पर पीने की हिम्मत न पड़ती थी। क्योंकि परछाई वाले कुत्ते का हमला हो जाने का डर था।

बहुत देर हो गयी। प्यास बढ़ने लगी तो उसने हिम्मत की और जो होगा देखा जायेगा, सोचते हुए पानी में घुस पड़ा। जी भर कर पानी पिया साथ ही सामने खड़ा दीखने वाला डरावना कुत्ता भी गायब हो गया।

डर वास्तव में अपनी परछाई है। जब तक उससे घबराते रहते हैं तभी वह हावी रहता है। कदम बढ़ा देने पर फिर ऐसा कुछ नहीं रहता जो पहले लगता था।


अखण्ड ज्योति का स्वरूप और प्रभाव

ज्योति के साथ आभा और ऊर्जा जुड़ी होती है। प्रकाश चमकता ही नहीं शक्ति स्त्रोत के साथ दमकता भी है। इसी के सहारे भौतिक और आत्मिक जगत की हलचल चलती प्रेरणाएँ उभरती और प्रगति अग्रगामी बनती है।

भौतिक ज्योतियाँ जलती-बुझती रहती है। ग्रह-नक्षत्रों का आदि अन्त है। उनमें से सूर्य जैसे कुछ दिन में उदय होते और रात को अस्त हो जाते है। कुछ की पारी रात को आती जाती है। चन्द्रमा और तारक रात को प्रकाशित होते और दिन में अदृश्य हो जाते है। दीपक से लेकर चूल्हे की आग तक ईंधन के अनुरूप ही प्रकाश देती और समय पूरा होते ही बुझ जाती है। इसलिए उसे खण्डित माना जाता है।

अखण्ड ज्योति मानवी चेतना के अन्तराल में दृश्यमान होने वाला वह तत्व है, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘श्रद्धा’ कहते है। इसका जहाँ जितना उद्भव होता है, वहाँ उतना ही आदर्श के प्रति निष्ठा का परिचय मिलता है। उसी के सहारे पुण्य-परमार्थ बन पड़ता है। वही है जो उत्कृष्टता के प्रति समर्पित होती है और अगणित विघ्न बाधाओं के साथ जूझती-उलझती अपने गन्तव्य तक पहुँचती है।

श्रद्धा में आभा भी है और ऊर्जा भी। उच्चस्तरीय संकल्प उसी के कारण उभरते है और प्रबल प्रयत्न बनकर उस स्तर तक पहुँचते है, जहाँ मानव को महामानव का, देवमानव को स्थान सम्मान मिलता है। जिसके अन्तराल में ‘श्रद्धा’ उभय समझना चाहिए कि उसने महानता के उच्चशिखर पर पहुँचने की आधी मंजिल प्राप्त कर ली। शेष आधी को उस आधार पर उभरा पुरुषार्थ पूरी कर देता है। यही है अखण्ड-ज्योति का परिचय स्वरूप और प्रभाव।


ज्योति जागरण एवं युग धर्म का निर्वाह।

पदार्थ जगत में उत्पादन अभिवर्धन, और परिवर्तन के दृश्य उपस्थिति करने के लिए निरन्तर गतिशील रहने वाली हलचलों का जो महत्व है, वही चेतना क्षेत्र में भाव श्रद्धा का है। शरीर-बल सीमित है। बुद्धि बल भी ससीम है। सम्पदा भी एक सीमा तक ही कमाई और बढ़ाई जा सकती है। चतुरता और कुशलता का भी एक तटबन्ध है। जीवन सीमित है। उसमें भी बहुत सा समय कौशल, वार्धक्य, निद्रा, मनोरंजन, नित्यकर्म, उपार्जन आदि में लग जाता है। ऐसी दशा में व्यक्ति का पराक्रम एक सीमा तक ही भौतिक वैभव का सम्पादन कर पाता है। जो करता है, उसे अशक्त या मृतक होने पद दूसरों के हाथों चले जाने का अनचाहा दृश्य देखना पड़ता है। जनता की स्मृति बहुत धुँधली है। वह कुछ ही दिनों में लोगों के प्रयत्न पुरुषार्थ, वैभव वर्चस्व आदि को भूल जाती है। विस्मृति के गर्त में गिर कर बड़े पराक्रमी भी लोक दृष्टि से ओझल हो जाते है; किन्तु आत्मिक जगत की श्रद्धा शक्ति अखण्ड ज्योति ऐसी है, जिसे शाश्वत ओर अविनाशी तो कहा ही जा सकता है। उसका उत्पादन भी ऐसा है, जो सृजेता की सामर्थ्य को घटाता नहीं, वरन् बढ़ाता ही चलता है। इसके अतिरिक्त उसके उत्पादन भी ऐसे है, जो किसी छोटी परिधि तक सीमित न रहकर अनेकानेक दिशाधाराओं का सूत्र-संचालन एक साथ करने लगते है, जबकि भौतिक शक्तियाँ सीमित प्रयोजनों का सामयिक स्तर ही उपार्जित कर पाती है। परिवर्तन का प्रकृति क्रम उनके स्वरूप को बदल देता है, उपयोगिता समाप्त कर देता है।

यों चेतना के भी अनेक पक्ष है। ऋद्धि-सिद्धि, योग, तप, अतीन्द्रिय क्षमताओं का जागरण जैसे अनेक चमत्कारी प्रयोजन भी उनसे पूरे होते रहते है; किन्तु चेतन तत्व की प्राण धारा श्रद्धा की अदृश्य शक्ति उपरोक्त दृश्य उपलब्धियों से कहीं अधिक बढ़-चढ़ कर है।

उत्कृष्टता श्रद्धा की देन है। निजी जीवन में आदर्शवादिता और व्यवहार जगत में परमार्थ-परायणता का स्तर ऊँचा रहे यह एक मात्र श्रद्धा शक्ति की सघनता और प्रखरता पर अवलम्बित है। अध्यात्म के तत्वदर्शन ने जिन आत्मिक विभूतियों की संभावनाओं पर प्रकाश डाला है। उन सब को श्रद्धा रूपी धागे में पिरोये हुए मणि-माणिक्य ही समझा जा सकता है। श्रद्धा चेतना क्षेत्र की उत्कृष्टता के रूप में ही अदृश्य से दृश्य बनती है। वही सामान्य को असामान्य बनाती है; वहीं दुबले हाथों से पर्वत उठाने जैसे पराक्रम पूरे कराती है; कलेवर रीछ-वानरों जैसा भले ही रहे; पर उपलब्ध स्वल्प साधनों में भी धारणकर्ता से समुद्र-सेतु बाँधने जैसे महान प्रयोजन पूरे करा लेती है। बुद्ध, गाँधी व ईसा की शारीरिक भौतिक विशेषताएँ सामान्यजनों जैसी थीं; पर उनके भीतर जो प्रचण्ड ऊर्जा का भाण्डागार भरा पड़ा था, उसे उनकी श्रद्धा ने ही उत्पन्न किया था। महामानवों की अविस्मरणीय कृतियाँ इसी आधार पर अभिनन्दनीय और अनुकरणीय बनी है। भौतिक जीवन में बलिष्ठता, चतुरता और सम्पन्नता के त्रिविधा समन्वय का जो प्रतिफल है, उससे कहीं अधिक उपलब्धियाँ चेतना क्षेत्र में उनकी श्रद्धाशक्ति के सहारे सम्भव है। क्षुद्र को महान बनाने की क्षमता मात्र उसी में है। जिसने श्रद्धा तत्व को सजीव समर्थ बना लिया, समझना चाहिए कि उसकी आत्म-साधना पूरी हो गयी। समस्त आत्म साधनाओं की चरम परिणति यही है कि व्यक्ति का अन्तःकरण रसमय हो जाय, आनन्द से ओत-प्रोत हो जाय। यही है वह रत्नाकर, जिसके मंथन से पौराणिक गाथाओं के अनुसार असाधारण शक्ति सम्पन्न चौदह रत्न निकले थे। श्रद्धा की गरिमा उससे ऊँची है। उसके गर्भ से चौदह लाभ-किरण पारस, कल्पवृक्ष, और अमृतघट भी निकल सकते है।

श्रद्धा तत्व ही अखण्ड, अविनाशी प्रकाश पुँज और विभूतियों का, ऊर्जाओं का भाण्डागार है। वह उसके अन्तराल में बसने वाला निराकार स्वरूप है। इसी का साकार स्वरूप है- ‘अखण्ड ज्योति’। जिस प्रकार निराकार भगवान की साकार प्रतिमाएँ बना कर देवस्थानों में प्रतिष्ठित की जाती है, उसी प्रकार यह माना जाना चाहिए कि खण्डित होने वाली-निरन्तर जलने वाली ज्योति के रूप में दृश्यमान अखण्ड दीपक का कलेवर प्रदान किया गया।

अब से प्रायः 60 वर्ष पूर्व इस मिशन के सूत्र-संचालक के अन्तराल में इस दिव्य आभा, ऊर्जा का अवतरण हुआ था। उसे अपने को अधिक पवित्र, अधिक प्रखर बनाने के लिए चौबीस वर्षीय गायत्री तपश्चर्या करने को कहा गया। वह यथासमय सम्पन्न हुई। उसी अवधि में न बुझने वाली घृतदीप के रूप में दृश्यमान अखण्ड-ज्योति की स्थापना हुई। प्रयोजन था- दृश्यमान श्रद्धा प्रतीक को अदृश्य अन्तःकरण में प्रकाशवान अनुभव करना। यह निराकार और साकार का संयुक्त समन्वय अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में असाधारण भूमिका निभाता रहा और लक्ष्य के अधिकाधिक निकट पहुँचाने के लिए बलपूर्वक धकेलता रहा। इस प्रगतिक्रम में श्रद्धा का ब्रह्मवर्चस अपने ढंग से समर्थता और तेजस्विता का अभिवर्षण-अवतरण करता चला गया।

यह निजी जीवन का स्वतः अनुभव किया जाने वाला पक्ष हुआ। इस ऊर्जा केन्द्र को पिटारी में बन्द नहीं रखा जा सकता था। वह ‘स्वान्तः सुखाय’ था भी नहीं। उसका मूलभूत प्रयोजन विश्व मानव की वर्तमान चिन्तन-चेतना को उल्टे से उलट कर सीधा करना था। अस्तु आवश्यक समर्थता का संचार होते ही उस उत्पादन को अभीष्ट प्रयोजन में लगा दिया गया।

प्रकाश जलते ही अपने आप को, अपनी शक्ति के अनुरूप विस्तृत क्षेत्र को आलोकित करने का प्रयत्न करता है। वह अपने उदय क्षेत्र में ही सीमाबद्ध होकर नहीं रहता। उसके अस्तित्व का परिचय तो बहुत दूर वालों को भी मिलता है। भले ही वह मार्गदर्शन अपने समीपवर्ती छोटे क्षेत्र का ही कर पाये। ठीक यही बात उस केन्द्र पर लागू होती है। जो महाप्रज्ञा के रूप में दिव्य श्रद्धा के रूप में उदीयमान होता है। उसकी बहुमुखी दिव्य किरणें अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रकार की परिणतियां उत्पन्न करती है।

सूर्योदय पर उसकी अनेक प्रतिक्रियाएँ, अनेक स्थलों पर अनेक रूपों में दीख पड़ती है। कमल पुष्प अनायास ही खिल पड़ते हैं मुरझाई हुई सूर्यमुखी सीधी हो जाती है और अपना मुख इधर-उधर से समेट कर पूर्व की ओर कर लेती है। चिड़ियां अपने घोसलों से निकल कर चहचहाने और फुदकने लगती है। सोये व्यक्ति बिना जगाये ही जग पड़ते और नित्यकर्मों में लगते है। कृषक, विद्यार्थी, शिल्पी सभी अपने-अपने व्यवसायों में लगते है। मंद मरुत शीतलता लिए हुए प्रवाहित होने लगता है। अन्धकार भरी तमिस्रा का समापन होता है। निशाचरों का आतंक समाप्त होता है और वे अपनी माँदों में जा छिपते है। ऐसा ही और भी बहुत कुछ होता है। यह सूर्योदय का प्रभाव है। महाप्रज्ञा की, भावश्रद्धा की अखण्ड-ज्योति का जब और जहाँ भी अवतरण होता है। वहाँ उसका प्रभाव सुदूर क्षेत्रों के अनेकानेक पक्षों को प्रभावित करते देखा जाता है। वह व्यक्ति विशेष तक या क्षेत्र विशेष तक या क्षेत्र विशेष तक सीमाबद्ध होकर बैठा नहीं रहता।

आत्म परिष्कार व्यक्तिगत साधना है। उसमें अपनी धुलाई-रंगाई, गलाई-ढलाई करनी पड़ती है। प्रथम चरण में यह आवश्यक नहीं हैं। तलवार पर धार धरी हुई न हो, तो वह मोर्चे पर कमाल दिखाने में किस प्रकार समर्थ हो सकती है? जंग खाया चाकू किस काम आयेगा? मलमूत्र से लिपटे कपड़े को कौन पहनेगा? कचरा भरे घर में निवास कर सकना किसके लिए सम्भव होगा। इसलिए आत्मशोधन की प्रथम प्रक्रिया पूरी करने के लिए अध्यात्म उत्कर्ष के इच्छुकों को यम-नियम के दसों अनुशासन पालने पड़ते हैं। चिन्तन, चरित्र

और व्यवहार में शालीनता का समावेश करना होता है। संयम की तपश्चर्या व्यवहार में उतारनी पड़ती है। आत्म-समीक्षा, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के आधार अपनाने पड़ते है। व्रतशील बनना होता है और चिरसंचित कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाना पड़ता है। यह अपनी निजी प्रतिभा में प्रखरता लाने की विधा हुई। यह पुण्य पक्ष कहलाता है। दूसरा पक्ष इसका अगला कदम है। उसे परमार्थ कहते है। आत्म चेतना जितनी ही परिष्कृत होती जाती है, उसे उसी अनुपात से व्यापकता अपनानी पड़ती है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का आदर्श हृदयंगम करना होता है, तब मान्यता ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बन जाती है। सबमें अपने को .... में सबको देखना पड़ता है। हिलमिल कर रहने, हँसते-हँसाते जीने और मिल-बाँट कर खाने की सदाशयता को जीवनचर्या में समावेश करना होता है। सुख बाँट देने और दुःख बंटा लेने के लिए हर घड़ी मन चलता और कदम उठता रहता है। गिरों को उठाने, उठों को उछाल देने के लिए अन्तरात्मा बेचैन हो उठती है।

संकीर्ण स्वार्थपरता के दलदल में आकंठ धँसे हुए व्यक्ति मात्र दो ही प्रसंगों पर अपना चिन्तन और कर्तव्य सीमाबद्ध रखते है। एक पेट दूसरा प्रजनन। पेट की भूख उन्हें रोटी कमाने के लिए प्रोत्साहित करती है। वहीं बढ़े हुए रूप में लोभ का, तृष्णा का रूप धारण कर लेती है; यौवन का पदार्पण होते ही कामुकता का नशा भूत-पिशाच की तरह चढ़ता है और वह यौनाचार के लिए आकुल-व्याकुल रहने लगता है। इसी की तृप्ति के लिए आमतौर से विवाह किये जाते है। विवाह कुछ दिन तो उन्मादियों की तरह यौनाचार का प्रतीक बनता है। इसके कुछ दिल बाद बच्चे उत्पन्न होने का सिलसिला चल पड़ता है। संख्या बढ़ती जाती है और लालन-पालन से लेकर उनकी शिक्षा, शादी, आजीविका की चिन्ता लद पड़ती है। यह समूचा परिकर ऐसा है, जिसके जाल-जंजाल में मनुष्य को हर समय व्यस्त, अभावग्रस्त और चिन्तातुर रहना पड़ता है। मोह-पाश इसी को कहते है। इन जंजीरों में कसा हुआ मनुष्य अपने आपको मुश्कें कसे हुए कैदी की तरह असहाय अनुभव करता है। वासना, तृष्णा के अतिरिक्त एक और उन्माद है- अहन्ता का, महत्वकाँक्षाओं का बढ़-चढ़ कर प्रदर्शन करने का। यह रहता तो मन के किसी कोटर में है; पर इतने प्रकार के प्रपंच, पाखण्ड और अनर्थ करने के लिए बाधित करता है। जितने कि क्षुधा निवारण और वंश-वृद्धि के संदर्भ में भी नहीं करने पड़ते। इसलिए वासना, तृष्णा से भी बढ़ कर अहंता के अभिशाप को दुर्भाग्य का प्रत्यक्ष प्रतीक माना गया है। संकीर्ण स्वार्थपरता की यही परिधि है। इन्हीं को भवबन्धन कहते है। नरक के तीन द्वार इन्हीं को कहा गया है।

आत्मिक उत्कृष्टता का उदय होने पर अनायास ही यह बन्धन टूटते है। व्यक्ति परमार्थ परायण बनता है। सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन में प्रवृत्त होता है। वह प्रयास ही उसका लक्ष्य बन जाता है। सेवाधर्म की व्रतशीलता धारण करने और उन्हीं प्रयासों में अपने को होम देने के अतिरिक्त और न तो कुछ सुहाता है और कुछ करते बन पड़ता है। प्रगति पथ पर चलने के लिए यही एक राजमार्ग शेष रह जाता है।

अखण्ड-ज्योति को एक प्रतीक माना जाय, एक आदर्श कहा जाय, या उसे उसके आराधक का प्रतिनिधि स्वरूप माना जाय- हर हालत में उसकी ऐसी प्रकाश किरणें फूटनी चाहिए। जो युगधर्म की महत्ती आवश्यकताओं को पूरी करने में प्राणपण से कटिबद्ध दृष्टिगोचर हो। संक्षेप में एक ही शब्द द्वारा इस प्रयास का स्वरूप प्रस्तुत किया जा सकता है। वह है युग धर्म का निर्वाह। समय की चुनौती का स्वीकरण युग परिवर्तन। इस परिवर्तन के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसके सुविस्तृत होते हुए भी सरंजाम जुटाने का संकल्प अखण्ड-ज्योति ने अब तक पूरा किया है और वह व्यक्ति विशेष का संचालन उठ जाने पर भी अनन्त काल तक अपनी ज्योति-ज्वाला ज्वलन्त रखें रहेंगी।


Quotation

अपना गौरव तथा अपनी शक्ति प्रदर्शित करने के अनेक मार्ग लोगों ने खोज निकाले है। पर यह समझना चाहिए कि जो वस्तु अपने लिए दुःखदायी और हानिप्रद हो सकती है उसे दूसरों पर आरोपित करना उचित नहीं है। जिससे किसी का अहित हो और पीड़ा पहुँचे, उसे ही अधर्म कहा जाता है। अधर्म जीवन की आवश्यकता नहीं है। उसमें कुछ शक्ति भी नहीं है। वह तो पराभूत है।

धर्म की शक्ति ही जीवन की शक्ति है। शक्ति का अर्थ है संरक्षण अर्थात् जिसमें प्राणीमात्र के हितों की सुरक्षा होती है वह धर्म है। इसी की मनुष्य जीवन में अपेक्षा की जाती है। धर्म समाज की अंतः चेतना है। सुख-शान्ति का आधार है। इसी रूप में वह ग्राह्य भी है। धर्म में ही सब की भलाई है। धर्म की दृष्टि ही जीवन की दृष्टि है।

डॉ. राधाकृष्णन


यह आलोक विश्वमानव का अन्तःकरण छुएगा

जिस छपे कागज के पुलिन्दे को पाठक हाथ में लिए हुए हैं वह एक अन्य पत्रिकाओं की तरह प्रकाशित होने वाली देखने में एक सामान्य पुस्तिका है। कागज, छपाई आदि की दृष्टि से उसे अग्रणी या उत्कृष्ट नहीं कहा जा सकता। न उसमें चित्रों की भरमार रहती है और न मनोरंजक मसाला। फिर भी उसका अपना एक स्थान है। 52 वर्षों का अनवरत प्रकाशन और भविष्य में उसका प्रवाह इसी प्रकार जारी रहने की सम्भावना को देखते हुए आश्चर्य ही किया जा सकता है क्योंकि कुछ अपवादों को छोड़कर अन्य सभी पत्र पत्रिकायें विज्ञापन के सहारे जीती है। उससे आमतौर से इतनी आजीविका मिल जाती है। जिससे उनकी कागज, छपाई का खर्चा चलता रहे। प्रतिस्पर्धा में मूल्य सस्ता रखना पड़ता है। बिक्री से इतनी ही आय होती है कि उनके सम्पादन, प्रबन्ध, सज्जा, पोस्टेज आदि का खर्च किसी प्रकार निकल सके। जब व्यावसायिक दृष्टिकोण और रीति-नीति अपनाकर निकलने वाले पत्रों का यह हाल है तो उन व्रतशीलों के लिए तो कहा ही क्या जाए जिनका प्रकाशन काल के बाद अपवाद रूप में कुछ वर्षों के बाद से ही विज्ञापन न लाने का संकल्प रहा है। बड़ी संख्या में छपने वाली पत्रिकाओं को अपेक्षाकृत अधिक महंगे विज्ञापन मिलना स्वाभाविक है। पर वह प्रलोभन से पाठकों के ही गले बँधता है। वे विज्ञापित वस्तुओं में से कितनी ही अनावश्यक होते हुए भी खरीदते है। उसका अधिकाधिक लाभ विक्रेता की जेब में पहुँचता है। छापने वाले को तो उसमें दलाली का एक छोटा अंश ही मिलता है। व्यावसायिक विज्ञापनों के संबंध में प्रायः यही होता रहता है। ऐसी आजीविका कमाना अखण्ड-ज्योति को अपने आदर्शों के अनुकूल नहीं लगा। इसलिए उसने उस नीति का आरम्भ से ही परित्याग कर दिया। यह जानबूझ कर आर्थिक संकट मोल लेना था। ऐसा साहस गान्धी जी जैसे महापुरुष ही कर सके है। उनने भी अपने प्रकाशित अखबारों में से किसी में भी विज्ञापन स्वीकार नहीं किया यद्यपि उनके व्यक्तिगत प्रभाव और पत्रों की विश्वव्यापी बिक्री होने के कारण उन्हें अच्छे दाम के अच्छे विज्ञापन मिल सकते थे और घाटे के स्थान पर लाभ ही रहता और उनके बन्द हो जाने का वह दुर्दिन भी न देखना पड़ता जिसके कारण उनके स्वर्गवासी होने के कुछ ही दिन बाद उनके द्वारा प्रकाशित सभी पत्र सदा के लिए बन्द हो गए।

विज्ञापनों, चित्रों की भरमार से सजधज कर निकलने वाली पत्रिकाओं में ठोस सामग्री उनके कलेवर की तुलना में बहुत ही कम रहती है। इस प्रतियोगिता में अखण्ड ज्योति कहीं आगे है। उसमें रहने वाले कवर सहित .... पृष्ठों में ठोस और ठसाठस भरी हुई इतनी सामग्री रहती है जितनी उसकी तुलना में दूना कलेवर रखने वाली पत्रिकाओं में भी नहीं रहती।

इन परिस्थितियों में अखण्ड-ज्योति जीवित कैसे है? यह व्यावसायिक दृष्टि से एक आश्चर्यचकित कर देने वाला प्रश्न है। दान अनुदान के रूप में कोई राशि स्वीकार न करने पर भी वह कागज, छपाई, पोस्टेज का खर्च किसी प्रकार निकाल लेती है। इस रहस्य की बारीकी में जाने वालों को कुछ समाधान कारक रहस्य और तथ्य हस्तगत हो सकते है। इसमें से प्रथम यह है कि उसके सम्पादन पर एक पैसा खर्च नहीं होता। सभी मिशनरी भावना से बिना मूल्य लिखें हुए होते है। यह कार्य हरिद्वार में होता है। वहाँ इस निमित्त एक पैसा भी खर्च खाते नहीं पड़ता। लेखों की उत्कृष्टता सर्वविदित है। उनमें से प्रत्येक को गहन अन्वेषण और विशाल अध्ययन के आधार पर लिखा जाता है। इसके लिए दूर-दूर के पुस्तकालय छाने जाते है। दुर्लभ पुस्तकों के फोटो प्रिन्ट देश विदेशों से मँगाये जाते है और उनके अवगाहन के उपरान्त कागज से कलम का स्पर्श कराया जाता है। इसे एक प्रकार से समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के समतुल्य ही समझा जा सकता है। इसे अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का सार संक्षेप भी कहा जा सकता है। जैसा कि उपनिषद् समुच्चय का सार गीता के छोटे कलेवर में भर दिया गया है। ऐसे शोधपूर्ण लेखों की कष्ट साध्य परिपाटी का प्रचलन अब नाममात्र ही शेष रह गया है। आमतौर से तो उथले, लोक रंजन के लिए छपने वाले लेख ही प्रकाशित होते रहते है।

प्रश्न स्तर का नहीं, उसके आर्थिक मेरुदण्ड का है। वह सीधा किस प्रकार खड़ा है? अन्यथा उतनी उत्कृष्टता के अभाव और इतनी न्यून आजीविका में उसका मेरुदंड ही टूट जाना चाहिए था।

बात लगभग 45 वर्ष पुरानी है। हिन्दी के एक मूर्धन्य पत्रकार के पास अखण्ड ज्योति के सत्र संचालक आरम्भिक वर्षों की दो तीन प्रतियाँ लेकर गये। उचित उद्देश्य और स्तर की बातें की और पूछा कि इसे किस प्रकार आगे बढ़ाया जा सकता है? उतने .... थोड़ी देर में ही वस्तुस्थिति भाँप ली और .... ही कहा- यह न पूछे कि इसे किस प्रकार चलाया जा सकता है, वरन् यह कहें कि इसे किस प्रकार जीवित रखा जा सकता है। उनने उदाहरण में भी कितनों के नाम गिनाये, उनके प्रकाशकों ने अपने जोश को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया- और अपनी पैतृक सम्पत्ति को क्रमशः इसी में खपाते हुए पत्रिका चलाने का निश्चय किया और अपने जीवन काल में उस प्रण को पूरा करते रहे। इन मूर्धन्य पत्रकार का कहना था कि ऐसा ही कुछ आप भी सोचें, अन्यथा इतने गम्भीर विषय के पाठक तो मिलेंगे नहीं। समय का रुझान हल्के मनोरंजन का है, आपका तत्व दर्शन ऊँचा और रूखा होने के कारण लोकप्रिय न बन सकेगा और विज्ञापन के अभाव में पाठकों के अभाव में उसे अपना दम तोड़ना पड़ेगा। कोई अतिरिक्त स्त्रोत आजीविका का बना पाये तो बात अलग है। जब उन्हें ऐसी कोई सम्भावना सामने न होने की बात कही तो उसका एक ही उत्तर था “अर्थशास्त्र के विपरीत दिशा में चलने के कारण आपको अपनी भूल माननी पड़ेगी और बड़ा सा घाटा देकर इसे बन्द करना पड़ेगा।”

अखण्ड-ज्योति प्रकाशन के पीछे पत्रिका निकालने भर के शौक काम नहीं कर रहा था वरन् उसके साथ लोक-मानस के परिष्कार का अत्यन्त विशाल और कष्ट साध्य लक्ष्य था। उसे पूरा करने के लिए ऋषियों की तरह द्वार-द्वार जाने और जन संपर्क साधने का एक उपाय तो सामने था। पर वह भी समय से पीछे रह गया। उस आधार पर कुछ सौ या कुछ हजारों तक ही अपनी विचारणा पहुँचाने में सफलता मिल सकती है, पर उसे धरती पर रहने वाले विभिन्न भाषा-भाषी विभिन्न धर्मावलम्बी 500 करोड़ मनुष्यों के मानस और जीवन में कायाकल्प जैसी क्रान्ति लाने की उमंग और योजना हो, वहाँ घर घर अलख जगाने और अपनी बात गले उतारने तक रगड़ करते रहने की बात इतनी बेतुकी है कि उसमें एक व्यक्ति को हजार लाख जन्म खपा देने के बाद ही कदाचित कुछ कहने लायक सफलता हस्तगत हो सके, तब विकल्प क्या हो? इसका उत्तर साहित्य सृजन के रूप में सामने आया। प्रेस के आविष्कार ने ज्ञान प्रसार की प्रक्रिया को भी अपेक्षाकृत सरल बना दिया है। आज की स्थिति में बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति का-व्यक्तित्व के परिष्कार उत्कर्ष का मार्ग अपनाने वाले को अपनी योजना के अनुरूप साहित्य सृजन का काम करना चाहिए। साम्यवाद प्रजातंत्रवाद से लेकर अधिनायकवाद तक के प्रवक्ताओं ने अपनी बात जन-जन तक लेखनी के माध्यम से ही पहुँचाई है।

साहित्य का सामान्यतः अर्थ पुस्तक लेखन से लिया जाता है पर उसका सरल तरीका यह नहीं है कि लिखी छपी पुस्तक बुकसेलरों की दुकानों पर ग्राहकों की प्रतीक्षा में मुद्दतों सड़ती रहें और अन्त में .... चूहों की खुराक बन कर रद्दी खरीदने वालों के यहाँ पहुँचे। इसका सरल तरीका सामयिक पत्रों के रूप में ही बनता है। दैनिक, साप्ताहिक पत्र बड़ी पूँजी, बड़ी व्यवस्था, बड़ी सामग्री चाहते है। उनके लिए कम पूँजी से कम सहयोग होने से काम नहीं चल सकता। मात्र मासिक पत्रिकाएँ ही ऐसी विद्या है जो धीमीचाल से चलते हुए अपनी गाड़ी किसी प्रकार घसीटती रह सकती है। अखण्ड-ज्योति ने अपने लिए यही मार्ग अपनाया।

स्थिर ग्राहक होने पर उन तक हर महीने पहुँचना और एक समझदार श्रद्धास्पद की तरह उस व्यक्ति को, उसके संपर्क क्षेत्र को अपनी चेतना से सचेतन बनाने का प्रयोजन पूरा होता है। वही हो भी रहा है। अखण्ड-ज्योति बड़ी संख्या में छपनी है, वह हर महीने लाखों, करोड़ों का अन्तराल नियमित रूप से झकझोरती है। इसका प्रभाव परिणाम भी हाथों सामने आता रहा है। लोकसेवियों का, युग शिल्पियों का, प्रज्ञापुत्रों का एक बड़ा समुदाय उभर कर दूध की मलाई की तरह ऊपर आया है। गायत्री तपोभूमि, युगनिर्माण योजना, शान्ति कुंज ब्रह्मवर्चस 2400 शक्ति पीठों के सम्भालने वाले प्रचण्ड प्रतिभावान ऊँची योग्यता के कार्यकर्ताओं ने मिशन को अपने कंधों पर उठाया हुआ है। वे ही उसको अश्वमेध के घोड़े की तरह दसों दिशाओं में घुमाते फिरते है। उनका संख्या विस्तार और साहस पौरुष जिस क्रम से उभरा है, उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि अब तक 52 वर्ष पूर्व देखा गया सपना अधूरा नहीं रहेगा। वह निर्धारित समय से पूर्व ही पूरा होकर रहेगा। उलटे को उलटकर सीधा करने की बात कभी उपहासास्पद लगती थी। नवयुग का नवीन चेतना का अवतरण कभी असंगत लगता था। पर इन पाँच दशकों की कार्यविधि देखकर सफलता ने यह विश्वास दिलाया है कि असम्भव दिखने वाली बातों को भी प्रचण्ड संकल्प, प्रचण्ड प्रयास और प्रामाणिक व्यक्तित्व द्वारा निश्चित रूप से पूरा किया जा सकता है।

अखण्ड-ज्योति का कलेवर, स्तर और उसका प्रसार तेजी से हो रहा है। इसका कारण एक ही है- उसके पाठकों ने यह विश्वास किया है कि इस सुधा धारा को अपने तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए, वरन् अपने साथी, सहचरों को यह लाभ उठाने के लिए अपने प्रभाव और आग्रह का दबाव डालकर इसे मँगाते रहने के लिए विवश करना चाहिए। यही वह तथ्य और सत्साहस है जिसके कारण अखण्ड-ज्योति अपने पैरों खड़े रह सकने की स्थिति तक पहुँच गई है और यह योजना बन रही है कि भारत की सभी भाषाओं में उसी विचारणा और साज-सज्जा के साथ प्रकाशित किया जाय। इसमें से गुजराती, मराठी, उड़िया, बंगला, तमिल एवं अंग्रेजी में प्रकाशन का कार्य हाथों में है जो अगले ही दिनों नई सज धज के साथ अपने-अपने क्षेत्रों की जनता की भावनात्मक प्यास बुझाने में उत्साह वर्द्धक मात्रा में सफल हो सकेगा।

मशीनों, इमारत आदि बढ़ाने के इस प्रयोजन के लिए आवश्यकता पड़ और बढ़ रही है। इस सम्बन्ध में बैंकों के साथ ताल-मेल बिठाया गया है। उनके सहारे जब बड़े-बड़े कारखाने चल रहे है तो इस बढ़ते हुए बहुमूल्य प्रकाशन के लिए उस माध्यम से पूँजी क्यों न जुटाई जा सकेगी? लेख तो जो हिन्दी में छपते है, उन्हीं का यथावत अनुवाद अन्य भाषाओं में होता रहेगा। कुछ ही समय में आशा यह है कि देश की सभी भाषाओं में होता रहेगा। कुछ ही समय में आशा यह है कि देश की सभी भाषाओं में अखण्ड-ज्योति छपने लगेगी और इस सीमा को पारकर वह विश्व भाषाओं की परिधि में भी प्रवेश करेगी।

पाठकों की सुरुचि ने “अखण्ड-ज्योति” को जागृत रखा है। उसके अभिवर्धन में उनका यह प्रयास ही प्रमुख रूप से सराहा गया है कि हर पाठक हर वर्ष न्यूनतम एक-एक दो-दो ग्राहक नए बनायें। इस आधार के स्थिर रहने पर ही अखण्ड-ज्योति अपने निर्धारित महान लक्ष्य तक पहुँच सकेगी।


गन्दे चिथड़े के पास जाकर गिर पड़ा (kahani)

एक दिन किसी की जेब से निकल कर एक सोने का सिक्का गन्दे चिथड़े के पास जाकर गिर पड़ा, चिथड़े को देखकर सिक्का बोला, ओ गन्दे चिथड़े जरा दूर हट जा, देखता नहीं मैं सोने का सिक्का हूँ, जिसे पाने के लिये रंक से लेकर नृप तक दिन रात यत्न करते रहते है। यह बात चिथड़े को बहुत अखरी किन्तु कर ही क्या सकता था। दिन पलटे और चिथड़े के भी कार्यालय के दिन आये। चिथड़े बीनने वाले में चिथड़े को उठा लिया और साफ सुथरा करके कागज के कारखाने में बेच दिया, उससे जो कागज तैयार हुआ वह दस स्वर्ण मुद्राओं के बराबर मूल्य का आंका गया। जब वह गिर रहा था तब उसने उसी सोने के सिक्के को पहचान लिया और उससे बोला भैया उस दिन तो तुम मुझे दुत्कार रहे थे, किन्तु आज मैं तुमसे अधिक कीमत का बना गया हूँ। तुम जैसे लोग दूसरों की निरर्थक निन्दा करते रहते हैं और जब वे बड़े बन जाते है तो उनकी पूजा करने दौड़ पड़ते हैं।


एक महती आवश्यकता की आश्चर्यजनक आपूर्ति

नियमित रूप से उन्हें जन-जन के, घर-घर तक पहुँचाने और नियमित सत्संग, स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी करने की दृष्टि से अखंड-ज्योति का मासिक प्रकाशन अपने स्थान पर ठीक है, पर उसे स्थायी और सुरक्षित रखने का उद्देश्य पुस्तकाकार पुस्तकों से ही पूरा होता है। उन्हें पुस्तकालय के रूप से घर की बहुमूल्य सम्पदा की तरह सुसज्जित रखा जा सकता है। उन्हें सुविधानुसार स्वयं पढ़ा जा सकता है और परिवार के सदस्यों को पढ़ाया या सुनाया जा सकता है। पड़ौसियों-संबंधियों को भी समय-समय पर दिया और वापस लिया जा सकता है।

पुस्तकों को भगवती विद्या का ज्ञानमंदिर माना गया है। अन्य मंदिरों में स्थूल देव प्रतिमाएँ तो मात्र भाव श्रद्धा उभारती है; पर सरस्वती का ज्ञानमंदिर विचारणा ही नहीं, भावना और जीवन की दिशाधारा को भी प्रभावित करता है। इसलिए उसका महत्व अनेक दृष्टियों से अनेक गुना बढ़ा-चढ़ा है। भले ही वह पुस्तकालय एक-दो अलमारियों तक ही सीमित क्यों न हो, छोटा होते हुए भी उसके सत्परिणामों को असाधारण ही ठहराया जा सकता है।

यह प्रयोजन पत्रिकाओं से पूरा नहीं होता है, क्योंकि वे सस्तेपन की दृष्टि से हल्के कागज पर छपती है। जबकि पुस्तकों में सफेद बढ़िया और टिकाऊ कागज लगता है। पुस्तकें सैंकड़ों वर्ष तक जीवित रह सकती है, जबकि पत्रिकाओं के अंजर–पंजर कुछ महीने में ही बिखर जाते है। आते ही एक महीने के भीतर ही इतने लोग पढ़ लेते है कि उसे मोड़-तोड़ कर ऐसा बना देते है कि फिर उसे सुस्थिर रखना कठिन हो जाता है। किसी को पढ़ने न दिया जाये तभी उसकी सुरक्षा रह सकती है। पर यह कृपणता तो अनेकों को बहु-मूल्य लाभ से वंचित करके ही कदाचित की जा सकता है जो नहीं की जानी चाहिए।

पत्रिका में छोटे-छोटे लेख रहते है। उसकी यही परम्परा है। बहुत विषयों के बहुत प्रकार की जानकारियों का सीमित उल्लेख ही उनमें रहता है। पर यदि किसी को किसी विषय की समग्र जानकारी प्राप्त करनी हो, उसका हर पक्ष समझना हो, तो फिर पुस्तकों का आश्रय लेना ही एक उपाय है।

किसी विषय के पक्ष और विपक्ष में क्या कुछ कहा और अन्ततः किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है, इसकी सुविस्तृत जानकारी प्राप्त करनी हो, तो यह कार्य शंका-समाधान या विचार-विनिमय से नहीं हो सकता। इतना खाली समय किसके पास है, जो हर किसी को उसके इच्छित विषयों पर, इच्छित समय पर सुविस्तृत जानकारी कराता रहें। यह कार्य पुस्तकों से ही सम्भव है। किसी उथले व्यक्ति ने ऐसे ही कागज काले करके उस बंडल को पुस्तक रूप में सीं दिया हो, तो बात अलग है; पर जिम्मेदार और बहुज्ञ वैज्ञानिक, मनीषी अपनी और अपने लेखन की गरिमा का ध्यान रखते है और तद्विषयक ढेरों जानकारियाँ इकट्ठा करने के पश्चात ही साहित्य सृजन आरम्भ करते है। उनकी कृतियाँ प्रायः ऐसी ही होती है जैसे कोई वैज्ञानिक किसी विषय पर शोधा प्रबंध जैसा कुछ लिख रहा हो। उस जानकारी को पढ़कर नियत विषय में पाठक भी अपनी जानकारी कुछ ही समय में इतनी बढ़ा लेता है, मानो वह साहित्य सृजेता के समकक्ष पहुँच गया हो।

ऐसी ही अनेक विशेषताओं के कारण सत्साहित्य को स्वाध्याय और सत्संग की दुहरी आवश्यकताएँ पूरी कर सकने वाला माना गया है और पुस्तकों को उच्चस्तरीय सम्मान दिया गया है। उन्हें सरस्वती की अनेक आकारों में अनेक परिप्रेक्ष्यों में विनिर्मित प्रतिमाएँ कहा गया है।

स्वाध्याय को आत्मिक क्षेत्र का भरण पोषण माना गया है। जिस प्रकार शरीर को आहार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार बुद्धि क्षेत्र को स्वाध्याय की। कभी यह कार्य सत्संग द्वारा भी सम्भव होता था, पर अब विचारशीलों का सत्संग समयाभाव के कारण अथवा उनके दिवंगत हो जाने पर सम्भव नहीं रहता। सत्संग के नाम पर जो बकवादी ऊल–जलूल बकते रहते है। उससे तो हर किसी का समय ही खराब होता है साथ ही अनगढ़ अन्ध मान्यताएँ दिमाग में घुस पैठ करती है। भोले-भावुकों को तो चंगुल में ही जकड़ लेती है। इसलिए कभी जो सत्संग प्रक्रिया सम्मानित थी। उसका स्तर गिर जाने से, ऊँचा सत्संग उपलब्ध न होने से तद्विषयक निराशा ही शेष रह गई है। स्वाध्याय और सत्संग का पुरातन द्विपक्षीय प्रयोजन अब अकेले स्वाध्याय को ही पूरा करना पड़ता है।

आप्तजनों ने स्वाध्याय को मानस क्षेत्र का नित्य कर्म माना है और उसमें कभी प्रमाद न करने का, नियमितता बनाये रहने का, निर्देश किया है। जिस प्रकार शरीर वस्त्र, घर, बर्तन आदि पर नित्य मैल जमने से उनकी नित्य सफाई करनी पड़ती है। उसी प्रकार चिन्तन पर अवाँछनीय वातावरण और अनुपयुक्त संपर्क से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए स्वाध्याय रूपी साबुन से नित्य परिशोधन किया जाना चाहिए। उससे बुहारी का भी काम लिया जाता है। स्वच्छता का सर्वत्र आदर होता है। सम्पन्नता सर्वत्र प्रभावोत्पादक होती है। सद्ज्ञान के आधार पर चिन्तन की स्वच्छता का भी ऐसा ही महत्व है। उसे बौद्धिक क्षेत्र की इतनी बड़ी सम्पन्नता कहा जा सकता है, जिस पर कुबेर जितने धन को भी निछावर किया जा सकें। धन मात्र शारीरिक सुख साध नहीं जुटाता है, पर सद्ज्ञान से चेतना निखर पड़ती है। बुद्धि में समग्रता आती है और भाव-संस्थान को सुसंस्कृत किये जाने की सम्भावना स्पष्ट होती है।

मात्र साक्षरता सम्पादन को शिक्षित होना नहीं कहते। चिट्ठी-पत्री लिखना-पढ़ना आने से भी शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं होता। मुनीमों, क्लर्कों की योग्यता प्राप्त कर लेने से भी उस श्रेणी में प्रवेश नहीं पाया जा सकता। इसके लिए जीवन क्षेत्र की अनेकानेक गुत्थियों को सुलझाना तथा समाधान सुसंस्कृत रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। इसी का बहुज्ञता कहते है। ज्ञानवान कहलाने वालों की चिन्तन चेतना इसी स्तर की बढ़ी-चढ़ी होना चाहिए। इन उपलब्धियों का हस्तगत कर सकना स्कूली पढ़ाई पूरी कर लेने मात्र से सम्भव नहीं होता। इसके लिए बहुमुखी ज्ञान-सम्पदा का गहराई तक अवगाहन होना चाहिए। इसके लिए सत्साहित्य के निरन्तर अध्ययन के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं।

भौतिक जानकारियों का अर्थोपार्जन का पथ प्रशस्त करने वाली, चतुरता के दाँव-पेंच सिखाने वाली, प्रतिपक्षी को छकाने वाली, विधा बताने में समर्थ अनेकानेक पुस्तकें बाजार में बिकती है। उनमें भ्रान्तियाँ उत्पन्न करने वाली और अन्ध विश्वासों की पुष्टि करने वाली भी कम नहीं है। अनेकों का उद्देश्य हास-परिहास का मनोरंजन का प्रयोजन करना भी होता है। इनकी बिक्री भी खूब होती है। लेखक प्रकाशक, विक्रेता सभी उस लाभ में हिस्सा बंटाते है। यह व्यवसाय अपने ढँग से बढ़ता और सफल होता रहता है, प्रेस से साहित्य सृजन की सुविधा का असाधारण रूप से विकास-विस्तार हुआ है। पर दुर्भाग्य एक ही है कि व्यक्तित्व विकास एवं प्रतिभाओं के निखार करने से संबंधित अनेकानेक समस्याओं पर नगण्य जितना ही ऊहापोह हुआ है। व्यक्ति का अंतरंग वस्तुतः उसकी सर्वांगीण प्रगति का मूल आधार है, उसी के सहारे भौतिक सफलताएँ हस्तगत होती है। वही प्रामाणिकता और प्रतिष्ठा का अर्जन करता है। सहयोग-समर्थन पाने के लिए सशक्त चुम्बकत्व भी वहीं है। लोक व्यवहार में शालीनता का समन्वय करके श्रद्धा और सद्भावना की स्वर्गीय उपलब्धियां भी उसी अवलम्बन को अपनाकर पूरी की जाती है। सद्ज्ञान को जीवन-प्राण कहा गया है और उसी को प्रगति-प्रतिष्ठा का मेरुदण्ड माना गया है। सेवा साधना उसी प्रेरणा के प्रोत्साहन पर बन पड़ती है। नर-पशु को देव मानव बनाने में धरती पर रहते हुए स्वर्गीय आनन्द लेने में इसी की प्रमुख भूमिका रहती है। इसलिए होना यह चाहिए था कि जीवन विज्ञान की संजीवनी विद्या की साँगोपाँग शिक्षा के लिए तीन चौथाई साहित्य का सृजन होता और शेष एक चौथाई मनचले लोगों के लिए छोड़ दिया जाता।

किन्तु गाड़ी ठीक उल्टी दिशा में चल रही है। जीवन साहित्य की तलाश में निकला जाय, तो मुद्दतों बुकसेलरों की दुकानें छानते रहने पर कहीं दस-बीस पुस्तकें हाथ लगती है। वे भी निर्धारित विषय का आधा-अधूरा काना-कुबड़ा ही .... करती है। यह अभाव इतना बड़ा है कि कई बार तो निराशा होती है कि मात्र सम्पन्नता, चतुरता और विनोदप्रियता को बढ़ाना ही कहीं मनुष्यता का लक्ष्य तो नहीं बन गया है। यदि ऐसा न होता तो जीवन कला की, संजीवनी विद्या की जानकारी देने वाली साहित्य-संरचना को प्रमुखता मिली होती। निर्धन देशवासियों को क्रय शक्ति का ध्यान रखते हुए उनकी कीमतें वाजिब रखी जानी और उनका विक्रय तंत्र ऐसा होता कि पिछड़े क्षेत्रों में भी उसे उपलब्ध कराया जाता। विद्यालयों के साथ-साथ पुस्तकालय भी चलते। विद्यार्थी सरकारी पाठ्यक्रम स्कूलों में पढ़ते और जीवन कला में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए ठीक उसी के समकक्ष पुस्तकालय भी अपनी भूमिका निभाते। यहाँ स्मरण रखने योग बात एक ही है कि पुस्तकालयों में कचरे का अम्बार जमा करके उनका कलेवर फुलाने मात्र को प्राथमिकता न मिलती। वहाँ ऐसा चुना हुआ साहित्य रहता, जिसमें बाल, वृद्ध, किशोर प्रौढ़ और लड़कियां-महिलाएँ अपने प्रत्यक्ष और परोक्ष जीवन को समुन्नत सुसंस्कृत, बनाने के लिए अनुभव, परामर्श दर्शन प्राप्त करते। युग मनीषियों का इस दिशा में हुआ अभिनव चिन्तन सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध रहता।

इस महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए कोई सुनियोजित सर्वांगपूर्ण प्रयत्न न होता देखकर अखण्ड ज्योति तंत्र ने ही अपनी स्वल्प सामर्थ्य के अनुरूप कदम उठाने का निश्चय किया। सहायकों का अभाव, पूँजी का अभाव, अन्याय सेवाकार्यों की व्यस्तता में लेखन के लिए स्वल्प समय बच पाना जैसे अनेक अवरोध थे। जिनके कारण समय की महत्ती माँग को पूरा करने में एक निष्टभाव से युग साहित्य का सृजन न हो सका। फिर भी बूँद-बूँद से घट भरने की उक्ति सार्थक होती रही। इस ज्योति परिकर का सूत्र-संचालक अपनी निर्धारित उपासना क्रम को पूरा करने के अतिरिक्त चार घण्टा नित्य युग साहित्य के सृजन में लगाता रहा। इसी का परिणाम है कि कछुआ खरगोश से आगे पहुँचा। चीलों ने गरुड़ों से पहले मंजिल पूरी कर ली।

अब तक जो उद्देश्यपूर्ण साहित्य सृजा और छला है उसे देखते हुए सामान्य बुद्धि के लिए यह समझ सकना कठिन हो सकता है कि क्या एकाकी साधनहीन व्यक्ति इतना कुछ कर सकता है। एक ही कलम क्या एक हजार से अधिक पुस्तकें लिख सकती है। सो भी इतनी उच्चकोटि की, जिनका अनुवाद अन्यान्य भाषाओं में होता चला गया और उसने लाखों की सीमा पार करके करोड़ों का मानस झकझोरा। योजनाबद्ध सत्साहित्य का सृजन अखण्ड ज्योति के प्रकाश पुँज की एक जाज्वल्यमान किरण है। इसका चमत्कारी प्रभाव तो अगले दिनों युग सृजन के रूप में देखने को मिलेगा।


न्यायप्रिय राजा (Kahani)

एक न्यायप्रिय राजा सादा वेश में अपनी प्रजा की खैर खबर लेने निकला। अब कभी वह जनता के दुःख दर्द को सुनने निकलता तो किसी अंगरक्षक को संतरी या मंत्री को साथ में नहीं लेता था और न राज्य के अधिकारियों को किसी प्रकार की सूचना देता।

कितने ही व्यक्तियों से संपर्क करते हुए वह एक बगीचे में पहुँचा। वहाँ एक वृद्ध माली नया पौधा लगा रहा था। उसे देखकर राजा ने पूछा- “यह तो अखरोट जैसा पौधा मालूम पड़ता है।”

“हाँ हाँ। भैया तुम्हारा अनुमान ठीक है”, माली का उत्तर था।

“अखरोट तो बीस बाईस वर्षों में फलता है तब तक क्या इस पौधे के फल खाने के लिये बैठे रहोगे”।

“बात यह है कि हमारे बाप-दादा ने इस बगीचे को लगाया था। खून-पसीना एक करके इसको सींचा, देखभाल की और फल हम लोगों ने खाये। अब हमारा भी तो कर्तव्य है कि कुछ वृक्ष दूसरों के लिये लगा दें। अपने खाने के लिए पेड़ लगाना तो स्वार्थ की बात होगी। मैं यह नहीं सोच रहा हूँ कि आज इस पौधे की क्या उपयोगिता है यह भविष्य में दूसरों को फल प्रदान करे बस यही इच्छा है।”

वृद्धमाली की बात सुनकर राजा बहुत प्रभावित हुआ।


स्वाध्याय, सेवा और सृजन

कृतियाँ और परिस्थितियाँ किसी अदृश्य चेतना की परिणति मात्र है। बीज से वृक्ष बनता है। बीज भूमि में दब जाता है। अंकुर, तना, शाखा, पल्लव, फूल, फल के रूप में उस दबे बीज के ही विकसित मन की परिणति कहा जा सकता है। बीज का ही मानसिक स्तर उसमें चलने वाला विचार प्रभाव यही कार्य रूप में परिणत होता है। चिन्तन ही चरित्र बनता है। वही व्यवहार में उतरता है अपने स्तर के अनुरूप भली-बुरी परिस्थितियों का सृजन करता है। परिस्थितियाँ ही मनुष्य के सुख-दुख का उत्थान-पतन का निमित्त कारण बनती है। इस तत्व-दर्शन को समझ लेने पर आज की अनेकानेक विपन्नताओं का मिश्रित कारण खोजा जा सकता है। निदान सही होने पर उसका उपचार भी ठीक बन पड़ता है। साथ ही व्याधियों से छुटकारा भी मिलता है।

इन दिनों अधिकाधिक लोगों को शारीरिक रुग्णता, मानसिक उत्तेजना, आर्थिक अभावग्रस्तता, पारिवारिक विश्रृंखलता, सामाजिक उच्छृंखलता से घिरा हुआ देखा जा सकता है। किसी को चैन नहीं। चिन्ताओं, उद्विग्नताओं, आशंकाओं, आपत्तियों से दूर किसी का जीवन आकुल-व्याकुल दीख पड़ता है इनसे अपनी बुद्धि के अनुसार लोग छुटकारे का प्रयत्न भी करते है, सुख-शान्ति का उपाय भी खोजते है पर परिणाम दिवास्वप्न बन कर ही रह जाता है। आकाश कुसुम किसके हाथ लगते है? बालू के महल में रहकर किसका निर्वाह होता है? देखा जाता है कि प्रगति के नाम पर किये गये उपाय उपचारों में से अधिकाँश असफल ही रहते है। निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। स्थिति बद से बदतर होती जाती है। प्रगति की बात सोचते रहने पर भी हाथ पाँव मारने का कुछ परिणाम नहीं निकलता। इस विसंगति का कारण क्या है? इसे गम्भीरतापूर्वक जानने का प्रयत्न किया जाय तो निष्कर्ष एक ही हाथ लगता है कि चिन्तन क्षेत्र का उत्कृष्टता की दिवाला पिट जाने पर सर्वत्र गंदगी छा गई है और उस पर मक्खियाँ भिनक रही है।

शरीर तो वाहन या उपकरण मात्र है। उसका मालिक है मन। उसी के संकेतों पर यह कठपुतली नाच नाचती रहती है। अपने भवितव्यता का भला-बुरा सृजन स्वयं करती रहती है। आत्मा को ही आत्मा का शत्रु और मित्र बताया गया है। अपने को अपने बलबूते उठाने का गीताकार ने निर्देश दिया है। यह ‘आपा’ क्या है? उसे मान्यताओं, भावनाओं, आकाँक्षाओं, विचारणाओं का समुच्चय कह सकते है। मोटे शब्दों में उसे ही मन कहते है और विवेचकों द्वारा मस्तिष्कीय उभारों की लहरें भी कहा गया है ग्यारहवीं इन्द्रिय भी। पर हमें प्रयोजन को समझने के लिए संक्षेप में इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि चिन्तन का बहुपक्षीय प्रवाह ही मन है। वह अपने स्तर के अनुरूप अपनी दुनिया का सृजन करता है। जीवन के स्वरूप को वही ढालता है और अपने स्वरूप के अनुरूप ही परिस्थिति का परिकर सामने आ खड़ा होता है। मकड़ी अपना जाला स्वयं बुनती है और जब चाहती है उसे समेट कर निगल लेती है। मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता इसी आधार पर कहा जाता है। वह अपने को नरक में भी धकेल सकता है, स्वर्ग तक उछाल सकता है या त्रिशंकु की तरह अधर में लटक सकता है।

मनुष्य के पास शक्ति सामर्थ्य की कमी नहीं। वह इतिहास के अनेकानेक पराक्रमियों की तरह अपने आपको भौतिक क्षेत्र में भी आश्चर्य जनक सफलताएँ हस्तगत करा सकता है। साथ ही यदि वह थोड़ी दिशा बदले तो प्रातः स्मरणीय महामानवों की पंक्ति में भी अपने को खड़ा कर सकता है, अपनी गणना अनुकरणीय और अभिनन्दनीय देवमानवों में करा सकता है। यह और कुछ नहीं मात्र दिशा परिवर्तन का खेल है। इसी आधार पर आरंभिक जीवन जिनका अत्यन्त गया गुजरा रहा, वे अपने में परिवर्तन लाकर जीवन का कायाकल्प ही कर कुछ से कुछ बन गय। धातुओं को लुहार और स्वर्णकार किसी शकल में किसी दूसरा में बदल देते है। मनुष्य ऐसा शिल्पी है कि अपने व्यक्तित्व को मन चाहे साँचे में ढाल सकता है और परिस्थितियों को इच्छानुसार मोड़-मरोड़ सकता है। यह तथ्य आमतौर से समझा नहीं जाता, पर वस्तुतः यथार्थता यही है।

की तो बहुत कुछ जानकारी होती है, पर अपने संबंध में तो असाधारण, विस्मृति और खुमारी का ही शिकार बना रहता है। यदि यह पर्दा हटाया जा सके तो सारा माहौल ही बदल जाय। रंगीन चश्मा उतरते ही वस्तुओं का रंग यथावत दीखने लगे। मन क्षेत्र पर चढ़े हुए भ्रम जंजालों को ही ‘माया’ कहते है। माया से छुटकारा पाना ही ‘मुक्ति’ है। यह कहीं अन्यत्र से मिलने वाला अनुदान नहीं है, वरन् भीतर से उठने वाला सत्संकल्प ही है, जो समय, श्रम, चिन्तन, साधन, प्रभाव, आदि सभी सम्पदाओं को पतन से उतार कर उत्थान की दिशा में नियोजित कर सकता है। साथ ही बाह्य जीवन की उलझन भरी परिस्थितियों को सुलझे हुए स्वर्गीय वातावरण का रसास्वादन करा सकता है।

समस्या मात्र व्यक्ति की नहीं, समूचे समाज की है। व्यक्तियों का समूह ही समाज है। जिस तरह के घटक होंगे वैसा ही उनका सम्मिलित समुच्चय बनेगा। देशव्यापी, विश्वव्यापी समस्याओं का स्वरूप कुछ भी क्यों न हो पर वस्तुतः उसका आधार प्रजाजनों के दृष्टिकोण, स्वभाव, चिन्तन और चरित्र पर ही निर्भर रहता है। सामाजिक समस्याओं के समाधान यों आन्दोलनों के रूप में किये जाते रहते है। इसके लिए कानून भी बनते और प्रत्यक्ष स्तर के उपाय भी होते रहते है। किन्तु देखा यह गया है कि उनका प्रभाव नगण्य जितना ही होता है। तालाब में ढेला फेंकने पर प्रहार के स्थान पर पानी फैल जाता है। उसमें गड्ढा भी बन जाता है। पर कुछ ही क्षण बाद स्थिति समतल बन जाती है। ऐसे सभी उपाय जो अन्तराल तक न पहुँच सकें और दृष्टिकोण में परिवर्तन न ला सकें, प्रायः सामाजिक विडम्बना मात्र ही बन कर रह जाते है।

परिस्थितियाँ दृश्यमान होती हैं इसलिए वे सभी पर प्रकट होती है। सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। इसलिए सीधे उन्हीं के निवारण, निराकरण के साधन परक उपाय किये जाते है। यह पत्तों का धोकर खोखले वृक्ष को पुनर्जीवन प्रदान करने जैसा है। इससे मन बहलाव भर होता है। सुधार के लिए उमड़े उत्साह का क्रिया रूप में समाधान भर होता है। किन्तु गुत्थी सुलझती नहीं, वह जहाँ की तहाँ बनी रहती है।

वस्तुस्थिति समझने और वास्तविकता जानने के लिए गहराई से उतरने जैसी आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार का पर्यवेक्षण करने पर एक ही निष्कर्ष पाया जाता है। कि खोट मनुष्य के दृष्टिकोण में हैं गड़बड़ी मान्यताओं आस्थाओं में हुई है। उसी क्षेत्र में उपजी फुडिया बढ़ते-बढ़ते नासूर के रूप में प्रकट हुई है। मनःस्थिति में एक चुम्बकत्व होता है जो अपने अनुकूल अनुरूप साधनों, सहयोगियों, परिस्थितियों को अपने इर्द-गिर्द खींच बुलाता रहता है। यदि वे विकृत स्तर की हुई तो उनका कारण अपने को निर्दोष मानते हुए किसी दूसरे के सिर पर थोपा जाता है। ग्रह नक्षत्रों को, भाग्य को, असहयोग को, अंगों को, ईर्ष्यालुओं को कारण बताकर किसी प्रकार मन समझा लिया जाता है। पर इससे क्या होता है, आँसू पोंछने भर से रुकने वाली पीड़ा का निराकरण कहाँ होता है? समस्याएँ जहाँ की तहाँ बनी रहती है। मुद्दतों से प्रगति के, सुख-सुविधा के, कष्ट निवारण के विविध विधि प्रयास चलते रहते है। पर लम्बे समय का निरीक्षण, पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है मात्र कौतुक कौतूहलों की विडम्बना ही बढ़ी है। समाधान कारक उपाय निकलने की दिशा में तनिक भी प्रगति नहीं हुई। उलटे व्यक्तियों के स्तर में भारी गिरावट आई है। उनके द्वारा अपनाई गयी गतिविधियाँ ने तो दिन दूने रात चौगुने संकट खड़े किये है।

बहुमुखी समस्याओं का समाधान कैसे हो? प्रगति का पथ कैसे खुले? इसका सुनिश्चित उपाय मात्र एक ही है कि व्यक्ति के दृष्टिकोण में, चिन्तन में उत्कृष्टता का दूरदर्शिता और आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। उसके मान्यता क्षेत्र में धँसी हुई कुसंस्कारिता-प्रतिगामिता को उखाड़ फेंका जाय। यह कार्य देखने में कठिन मालूम देता है। पर यदि वस्तुतः इस दिशा में प्रतिभावानों के संकल्प उभर तो उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार असम्भव नहीं है। वास्तविकता में इतना बल होता है कि वह अग्नि की तरह चिनगारी से दावानल बन सके ओर विशाल क्षेत्र में फैले कूड़े-कबाड़ को अपने अंचल में समेट सके। अभी कुछ ही दिन पूर्व जनतंत्र और साम्यवाद के पक्ष में हवा चली और उसने पिछड़े लोगों के बलबूते संसार के तीन चौथाई भाग को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया। अनेक क्षेत्रों में उन उद्देश्यों वाली शासन प्रणालियाँ स्थापित कर दी। जनमानस द्वारा निषिद्ध ठहराये जाने पर साम्राज्यवाद, पूँजीवाद, राजतंत्र, सामन्तवाद, गुलाम प्रथा, नारी उत्पीड़न, आदि के परखचे उड़ गये और वे मरणासन्न स्थिति में जहाँ-तहाँ साँस भर लेती दिखाई पड़ती है। इन सब के मूल में विचार क्रान्ति के विभिन्न पक्ष ही काम करते रहे है। अन्तर इतना ही रहा कि जो कार्य एकाकी प्रयत्नों से छुट-पुट ढँग से छोटी परिधि में होते रहते थे, उन्हें सुगठित, सुनियोजित ढँग से व्यापक क्षेत्र में कार्यान्वित किया गया और युग-परिवर्तन जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई। प्रचार तंत्र की ही महत्ता है कि ईसाई धर्म में बिना किसी जोर जुल्म के कुछ ही शताब्दियों में संसार की दो तिहाई जनता को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया। उस प्रयास का अवलम्बन दूसरों के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है। जन मानस के परिष्कार का जनजागरण का विचार क्रान्ति का अभियान प्रयत्न करने पर सुनियोजित ढँग से सफलतापूर्वक आँधी तूफान की तरह अग्रसर हो सकता है।

अखण्ड-ज्योति की प्रधान चेतना इसी विचार क्रान्ति अभियान के रूप में फटी है। उसने त्रिदेव की भाँति त्रिपदा गायत्री की भाँति, तीन लोकों और तीन शरीरों की भाँत बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक कान्ति का पांचजन्य बजाया है और उस तुमुलनाद ने न केवल अपने देश में, वरन् समस्त विश्व के वातावरण में अभूतपूर्व हलचल उत्पन्न की है। उसे विचारशीलों का परिपूर्ण सहयोग भी मिलेगा। व्यक्ति निर्माण परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण उसके त्रिविध क्रिया-कलाप है। उनका घर-घर अलख जगाने और जन-जन को युग चेतना से अवगत कराने के लिए उसके त्रिविध प्रयास विगत आधी शताब्दी में एकनिष्ठ भाव से प्रयत्नशील रहे है और उनमें उसे आशातीत सफलता भी मिली है।

(1) स्वाध्याय (2) सत्संग (3) सत्प्रवृत्ति संवर्धन- यह उसके लक्ष्य साधन है। सत्प्रवृत्ति संवर्धन का ही दूसरा पक्ष दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन भी है। इसे गलाई-ढलाई की तरह साथ-साथ मिला कर चलना होता है। स्वाध्याय के लिए युग साहित्य का अभिनव सृजन करना पड़ा। कारण कि हर युग की अपनी समस्याएँ तथा परिस्थितियाँ भिन्न होती है। आज के लिए ऐसी प्रतिपादन शैली चाहिए जिसमें तर्क, तथ्य, प्रमाणों का गहरा पुट हो। अब ‘बाबा वाक्यं प्रमाणं’ की लकीर पीटते रहने के लिए किसी को भी सहमत नहीं किया जा सकता। युग साहित्य युग के अनुरूप ही सृजा गया है और सत्संग के लिए शान्ति-कुंज से लेकर स्थापित 2400 शक्ति केन्द्रों के माध्यम से जन-जन के मन-मन तक युग चेतना का संचार किया गया है।


फँसने का प्रश्न ही नहीं उठता (Kahani)

रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों के साथ टहलते हुए एक नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ मछुए जाल फेंक कर मछलियाँ पकड़ रहे थे। एक मछुए के पास स्वामी जी खड़े हो गये और शिष्यों से कहा- तुम लोग ध्यानपूर्वक इस जाल में फँसी मछलियों की गतिविधि देखो।

शिष्यों ने देखा कि कुछ मछलियाँ तो ऐसी है जो जाल में निश्चल पड़ी है, उन्होंने निकलने की कोई कोशिश ही नहीं की, कुछ मछलियाँ निकलने की कोशिश तो करती रही पर निकल नहीं पाई और कुछ जाल से मुक्त होकर पुनः जल में क्रीड़ा करने लगी।

परमहंस ने शिष्यों से पूछा - “जिस प्रकार मछलियाँ तीन प्रकार की होती है उसी प्रकार मनुष्य भी तनी प्रकार के होते है। एक श्रेणी उनकी है जिसकी आत्मा ने बन्धन स्वीकार कल लिया है और इस भव-जाल से निकलने की बात सोचते ही नहीं, दूसरी श्रेणी ऐसे व्यक्तियों की है जो वीरों की तरह प्रयत्न तो करते है पर मुक्ति से वंचित ही रहते है और तीसरी श्रेणी उन मनुष्यों की है जो चरम प्रयत्न द्वारा आखिर मुक्ति प्राप्त कर ही लेते है।”

परमहंस की बात समाप्त हुई एक शिष्य बोला “गुरुदेव! एक चौथी श्रेणी भी है जिसके सम्बन्ध में आने कुछ बताया ही नहीं।”

हाँ चौथी प्रकार की मछलियों की तरह ऐसी महान आत्मायें भी होती है जो जाल के निकट ही नहीं आतीं फिर उनके फँसने का प्रश्न ही नहीं उठता।


युगचेतना को व्यापक बनाने का प्रयत्न

अखण्ड ज्योति प्रकाशित होती है और एक महीने बाद अगला अंक आने पर पुरानी मान ली जाती है। यद्यपि उसकी उपयोगिता सदा-सर्वदा यथावत् अक्षुण्ण बनी रहती है, फिर भी उसमें थोड़े-थोड़े पन्नों वाले बहुउपयोगी लेख रहते है। इससे बहुत विषयों की थोड़ी जानकारी भर मिलती है। पर एक ही विषय को गहराई और समग्रता पूर्वक समझने के लिए पुस्तकाकार साहित्य की आवश्यकता पड़ती है। पुस्तकालय स्तर की स्थापना भी उसी आधार पर होती है। किसी प्रसंग को विस्तारपूर्वक और गहराई से समझने के लिए पुस्तकों के अतिरिक्त कोई चारा नहीं।

स्वाध्याय और सत्संग की दुहरी आवश्यकता इन दिनों पुस्तकों से ही पूरी होती है। सत्संग के लिए ऐसी प्रतिमाएँ मिलती नहीं, जो युग समस्याओं को ध्यान में रखते हुए देश-काल-पात्र के अनुरूप मार्गदर्शन कर सके, समस्याओं के समाधान का उपयुक्त परामर्श दे सकें। जो है, वे बहुत व्यस्त है। दूरस्थ देशों में रहती है। कुछ तो दिवंगत भी हो चुकी। ऐसी दिशा में उनसे संपर्क कैसे साधा जाय? और वे हर समय उपलब्ध कहाँ रहें। ऐसी दशा में सत्संग का कार्य भी स्वाध्याय से ही लेना पड़ता है। स्वाध्याय के नाम पर प्रायः कथा-पुराणों का ही अवलम्बन लिया जाता है। ये इतिहास भर है और समय के पीछे के प्रतिपादन करते हैं जबकि आवश्यकता सामयिक और आदर्शवादी यथार्थवादी साहित्य की है। उसका लेखन, प्रकाशन, विक्रय नहीं के बराबर है। बुकसेलरों की दुकानें तो उस कचरे से भरी रहती है, जिनसे घटिया मनोरंजन भर होता है या फिर अंधविश्वास पनपता है।

ऐसी दशा में आवश्यकता इस बात की थी कि जीवन साहित्य कहीं एक जगह उपलब्ध हो। वह भी बाजारू मूल्य का नह हो, जो लागत से कई-कई गुने अधिक मूल्य का होता है। सामयिक, गंभीर चिंतन से सराबोर, अनुभवपूर्ण ऐसा साहित्य जो समय की अनेकानेक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हो, इन दिनों दुर्लभ हो रहा है। जो है वह इतना महँगा कि गरीब देश के स्वल्प शिक्षित नागरिक आसानी से नहीं खरीद सकते। इन सभी कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता यह अनुभव हुई कि सर्वसुलभ सस्ते दामों का युग साहित्य प्रकाशित किया जाय। मात्र हिन्दी में ही नहीं, देश की अन्य भाषाओं में भी, जिससे क्षेत्र विशेष के लोग ही नहीं, समूचे देश के लोग लाभान्वित हो सकें।

यह कार्य मथुरा से संचालित युग-निर्माण योजना ने संभाला है। वह गायत्री तपोभूमि की इमारत में अवस्थित है। स्थापना के समय से ही उसका यह कार्य क्रमबद्ध रूप से चल रहा है। अब तक प्रायः एक हजार छोटी-बड़ी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। यह सभी बहुत लोकप्रिय हुई है। समुचित माँग रहने से उनके कई-कई संस्करण छपे है। अपना निजी प्रेम भी ऐसा है, जो अपने प्रकाशन की मुद्रण-व्यवस्था स्वयं कर सकें।

युग-साहित्य का लेखन-सृजन उसी कलम से हो जाता है, जो अखण्ड-ज्योति को विगत 50 साल से लिखती रही है। कहना न होगा कि यह साहित्य नहीं, वरन जीवित युग चेतना है, जिसे युग-निर्माण योजना-गायत्री तपोभूमि द्वारा निरन्तर प्रकाशित और प्रसारित किया जा रहा है।

गुरुदेव की वाणी को उनके सत्संग-संपर्क से ही सुना जा सकता है। छुटपुट संदेश टेप रिकार्डरों और वीडियो टेपों में भी सुने जा सकते है किन्तु विवेचन, प्रतिपादन और मार्गदर्शन उनके लिए युग साहित्य द्वारा ही उपलब्ध किया जा सकता है। प्रमुख उत्तरदायित्व गायत्री तपोभूमि को यही सौंपा गया है। जिसका निर्वाह वह भली प्रकार कर रही है।

अभी हिन्दी, गुजराती, मराठी, उड़िया आदि भाषाओं में ही इस साहित्य के अनुवाद प्रकाशित हो सके है। इन्हीं भाषाओं की मासिक पत्रिका के रूप में भी प्रकाशित किया जाता रहा है। अब नई योजना यह है कि देश की सभी भाषाओं में यह साहित्य पत्रिकाओं के रूप में भी और पुस्तकों के कलेवर में भी प्रकाशित किया जाय। इस योजना के अंतर्गत वर्तमान क्रियाकलाप का प्रायः दस गुना अधिक बढ़ जाने की सम्भावना है। प्रत्यक्ष है कि जन संपर्क, कार्य क्षेत्र भी उसी अनुपात से बढ़ेगा। यह अभिवृद्धि ही व्यापक रूप से नव निर्माण का, युग अवतरण का उद्देश्य पूरा कर सकेगी। देर सबेर में पहुँचना तो विश्व के 500 करोड़ मानवों तक है। हर देश में वहीं के निवासी युग केन्द्र बनाकर अपनी-अपनी भाषाओं में इस साहित्य का प्रकाशन करेंगे।

इस संदर्भ में पहला प्रकाश तंजानिया (पूर्वी अफ्रीका) में हुआ है। दरेस्सलाम के श्री किशोर भाई ठुकराल ने युग शक्ति का प्रदर्शन विगत छह माह से आरम्भ किया है। उसी देश के निवासी श्री अशोक रावल युग साहित्य की कितनी ही पुस्तकें अँग्रेजी भाषा में बम्बई से प्रकाशित करते रहते हैं। इससे पूर्व ट्रिनिडाड (वेस्टइंडीज) के डॉ. परशुराम ने कई पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित की थी। इंग्लैण्ड से भी स्मारिकाएँ प्रकाशित होती रहीं है। अब यह उपक्रम विदेशों में अधिक तीव्रता से गतिशील होने जा रहा है।

तेलगू भाषा की मासिक अखण्ड-ज्योति अगले ही दिनों प्रकाशित होने जा रही है। बँगला वाले अपनी तैयारी अलग से करने में जुटे हुए है। यह सब प्रकारान्तर से मथुरा के प्रकाशन का ही विस्तार समझा जाना चाहिए, जो अखण्ड ज्योति के गोमुख से निस्सृत होती है और क्रमशः अग्रगामी सुविस्तृत होती चली जा रही है।

युग साहित्य के पठन, मनन, चिन्तन से उसे व्यवहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकना सम्भव हो सकता है इस प्रयोग के लिए उसी आश्रम से युग-निर्माण विद्यालय की स्थापना हुई जो विगत दो दशाब्दियों से सफलतापूर्वक चल रहा है। इसमें प्रायः पचास छात्रों का बोर्डिंग तथा विद्यालय है। यह सभी छात्र परिष्कृत जीवन की विद्या में तो प्रवीण-पारंगत होते ही हैं, साथ ही औद्योगिक स्वावलम्बन की ऐसी शिक्षा प्राप्त करते है, जिससे नौकरी तलाश करने की आवश्यकता न पड़े और घर रह कर ही समुचित आजीविका उपार्जन कर सकें। यह सभी शिक्षा निःशुल्क है। केवल भोजन व्यय का अपेक्षाकृत सस्ता व्यय छात्रों को वहन करना पड़ता है। छात्र संगीत और प्रवचन की शिक्षा भी प्राप्त करते है। ताकि वे विचार क्रान्ति अभियान को व्यापक बनाने में उपयुक्त भूमिका निभा सकें।

युग-निर्माण योजना के प्रकाशनों में प्रज्ञा-पुराण अतीव लोकप्रिय हुए है। उसके पाँच खण्ड है- बड़े आकार और अधिक पृष्ठों के। उनमें पौराणिक कथा-गाथाओं का प्रायः एक हजार से अधिक का संग्रह है। वे है तो पुरातन काल की; पर उन्हें इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है कि वे आज की बहुमुखी समस्याओं का समाधान कर सकें। इन कथाओं की एक फिल्म भी बनने जा रहीं है। इस ग्रन्थ की कथाओं को लोग सायंकाल अपने-अपने परिवार के सदस्यों को एकत्रित कर उन्हें सुनाते है और चरित्रनिष्ठा तथा समाज निष्ठा का सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण देते है। इसका प्रभाव भी असाधारण रूप से पड़ता देखा गया है।

युग-निर्माण योजना का अन्तिम बड़ा प्रकाशन ‘गीता विश्वकोष’ के रूप में छपने की तैयारी हो रही है। उसे उसी लेखनी से लिखा जा रहा है, जिससे अखण्ड-ज्योति लिखी जाती है। इसमें संसार भर में गीता सम्बन्धी प्रायः आठ हजार ग्रन्थों के प्रतिपादनों का सार-संक्षेप होगा। उनमें प्रतिपादित आलोचनाओं, व्याख्याओं, समर्थनों, खण्डनों का समावेश करते हुए यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जायेगा कि यह सभी प्रतिपादन एक-दूसरे के पूरक है, विभेद और विवाद उत्पन्न करने वाले नहीं।

आवश्यकता इस बात की थी कि विश्व का एक धर्मग्रन्थ हो। उसके आधार पर सार्वभौम दार्शनिक एकता स्थापित की जा सके। यही कारण है कि इस गीता विश्वकोष में जहाँ विभिन्न दार्शनिक पक्षों का समावेश किया गया है, वहाँ संसार के समस्त धर्म सम्प्रदायों के मान्य शास्त्रों के उदाहरण भी इस महाग्रन्थ में समन्वित किये जा रहे है। वहाँ संसार के समस्त धर्म-सम्प्रदायों के मान्य शास्त्रों के उदाहरण भी इस महाग्रन्थ में समन्वित किये जा रहे है। इतने सारगर्भित सूक्ति संदर्भों से परिपूर्ण, इतने विशाल ग्रन्थ का लेखन- प्रकाशन अपने ढँग का अनोखा कार्य ही समझा जायेगा। इसके लिखे जाने और छपने में प्रायः दो वर्ष लगेंगे। तैयार होने पर ही उसकी लागत फैला कर उसमें व्यावहारिक कमीशन का मार्जिन छोड़ते हुए उसका मूल्य छापा जायेगा। सम्भवतः वह तीन सौ से लेकर चार सौ रुपयों की परिधि में जा पहुँचे। अभी तो इच्छुकों के नाम ही पंजीकृत किये जा रहे है। इन लोगों को छपने पर सूचना दी जायेगी और माँग के अनुरूप भेजने की व्यवस्था की जाएगी।

गायत्री तपोभूमि द्वारा दीप-यज्ञ आयोजनों के संचालन की भी व्यवस्था की जा रही है। इसके लिए शान्ति-कुंज की तरह वहाँ से भी प्रचार गाड़ियां भेजे जाने की तैयारी की जा रही है। कहना न होगा कि जनसंपर्क और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए इस प्रकार के आयोजनों की आवश्यकता थी, जिनमें नाममात्र का खर्च करके बड़ी संख्या में जनसमुदाय को एकत्रित किया जा सके, उपस्थित जनों को नवसृजन के निर्धारित क्रियाकलापों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

अखण्ड-ज्योति के मस्तिष्क से उपजी गायत्री तपोभूमि और युगनिर्माण योजना के सामने एक प्रश्न अभी भी है कि देश के 75 प्रतिशत अशिक्षितों को युग-चेतना से कैसे जोड़ा जाय? इस संदर्भ में कुछ उपाय निकाले गये है और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए कदम उठाने की तैयारी में जुटा जा रहा है। इन उपायों में एक उपाय है- दीवारों पर आदर्श वाक्यों का बड़े अक्षरों में लेखन, जिन्हें बच्चे भी पढ़ते है और घर जाकर उस नये उल्लेख की चर्चा करते है। बिना पढ़े भी उन्हें दूसरे पढ़ों के मुँह से सुनते हैं।

इसके अतिरिक्त जीवन सुधार और समाज-परिवर्तन से सम्बन्धित रंगीन चित्रावलियाँ छापी जा रही है, जिनसे प्रस्तुत कुरीतियों के कारण होने वाली हानियों को दर्शाया जायगा और यह बताया जायगा कि यदि उनमें सुधार लाया जा सकें, तो उसका सत्परिणाम किस प्रकार उपलब्ध हो सकता है। देश में नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रचलित अनेकों कुरीतियाँ है, जिनका उन्मूलन आवश्यक है। इसी प्रकार उपेक्षित सत्प्रवृत्तियों का महत्व-महात्म्य गले उतारा जा सके, तो लोग अपना हित-अनहित स्वयं सोच सकते है और उस निष्कर्ष के आधार पर प्रगति पथ पर कदम बढ़ा सकते है।

इसी प्रकार टेपों या वीडियो के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं में संगीत और प्रवचन कराये जाने की बड़ी योजना है। बोल चाल की भाषाएँ प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बदल जाती है। स्थानीय निवासी उन्हीं को ठीक तरह समझा पाते है, इसलिए इनके लिए उसी प्रकार के प्रचार साधन कारगर सिद्ध हो सकते है। ऐसे ही अन्य उपाय भी ऐसे सोचे जा रहे है, जो अशिक्षित समुदाय को उन्हीं की अभ्यस्त बोली में युग चेतना से प्रभावोत्पादक शैली में अवगत करा सकें। अधिकाँश देशवासियों को प्रशिक्षित इसी प्रकार किया जा सकेगा, शीघ्र ही इस प्रकार जन-जागरण का उद्देश्य पूरा होते देखा जाने लगेगा।


परम मित्र बन गया (Kahani)

जहाज सान फ्राँसिस्को बन्दरगाह पर रुका। जहाज खड़ा होते ही सभी यात्री जल्दी-जल्दी अपना सामान सँभालने लगे। सबमें उतरने की जल्दी और उत्सुकता दिखाई देने लगी। जहाज में एक तरफ एक व्यक्ति शान्तिभाव से डैक पर खड़ा था। उसे कुछ देर तक एक अमेरिकन व्यक्ति देखता रहा और अन्त में बोला- “क्यों महाशय, आपको यहाँ नहीं उतरना है क्या? अपना सामान क्यों नहीं सँभालते?”

व्यक्ति स्वाभाविक मुस्कराहट की मुद्रा में प्रत्युत्तर देते हुए बोला- मेरे पास कोई सामान नहीं है। तो पास में पैसे तो होंगे ही, जिससे खाने-पीने का काम चलता है? यह तुरन्त दूसरा प्रश्न हो उठा। “मैं अपने पास पैसे भी नहीं रखता।” तब तो यहाँ कोई आपका मित्र होगा, जिसके यहाँ ठहरना होगा? यह उस व्यक्ति का तीसरा प्रश्न था।

स्वामीजी युवक को प्रत्युत्तर देते हुये बोले- “हाँ यहाँ हमारा एक मित्र है, जिसके यहाँ हमें रुकना है और जो हमारी सब सहायतायें करेगा। वह व्यक्ति कौन है? सच्चे वेदान्ती रामतीर्थ जी हँसे और उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए बोले- “आप ही मेरे मित्र है।”

प्रेम की पवित्रता से भीगता हुआ वह व्यक्ति सचमुच ही उनका परम मित्र बन गया।


प्राणाग्नि की ज्योति ज्वाला

कागज बड़ी संख्या में छपते और आये दिन रद्दी का पहाड़ खड़ा करते है। उसका प्रभाव लोगों के मस्तिष्क पर नगण्य जितना ही होता है। इसी प्रकार वाणी की बकवास का भी कोई अन्त नहीं। घर-परिवारों में भली-बुरी कहनी-सुननी होती रहती है। उपदेशक, व्याख्याता लम्बी-चौड़ी डींगें हाँकते और स्टेजों पर उछलते-फुदकते देखे जाते है। इन दोनों क्रियाकलापों को यों पुरातन काल के स्वाध्याय-सत्संग की अनुकृति कहा जा सकता है। इतने पर भी दोनों के बीच मौलिक अन्तर यह है कि जो प्रभाव स्वाध्याय-सत्संग का होता था, वह इन दिनों वाले किन्हीं समारोहों, प्रकाशनों का दीख नहीं पड़ता। लोग इस कान से सुनते और उस कान से निकाल देते है। इधर पढ़ते जाते हैं उधर भूलते जाते है। विचार योग्य प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों होता है? प्राचीन काल में तो प्रेस भी नहीं थे, न कागज ही। पढ़े-लिखे लोग भी कम होंगे। फिर भी जो लिखा होता था वह शास्त्र परम्परा में गिना जाता था। उसे लोग मनोयोगपूर्वक पढ़ते थे, हृदयंगम करते थे और प्रतिपादनों को जीवन में उतारते थे। इसी प्रकार सत्संगों में श्रद्धालु लोग उपस्थित होते थे। वक्ताओं का स्तर सामान्य जनों की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा होता था। वे अपने ज्ञान, अनुभव और चरित्र का निष्कर्ष नवनीत की तरह निकला कर श्रोताओं की आत्मिक भूख बुझाते और सर्वतोमुखी प्रगति के मार्ग पर चलने का मार्ग सुझाते थे। यही कारण था कि स्वाध्याय का महत्व-महात्म्य इतना अधिक माना जाता था कि उसकी तुलना पारस मणि के साथ की जाती थी। परन्तु ऐसा ही प्रभाव प्रत्यक्ष देखने को भी मिलता था।

अब उन दोनों के प्राण निकल गये प्रतीत होते है और मालूम पड़ता है कि खोखले, निष्प्राण, ढकोसले मात्र जहाँ-तहाँ पड़े है। उनके भीतर दुर्गंध और बाहर चमक-दमक है। देखने-सुनने में वे कितने ही मनोरम क्यों न लगते हो? पर वस्तुतः उनका अन्तराल एक प्रकार से निर्जीव हुआ पड़ा है, अन्यथा इतने पढ़ने-सुनने वालों के जीवन में कोई उच्चस्तरीय परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ होता। स्वाध्याय-सत्संग ने अपना चमत्कार दिखाया होता।

एक वेश्या अपने जीवन में हजार भंडुए बना लेती है। एक नशेबाज, जुआरी, लफंगा अपनी बिरादरी के अनगिनत लोग उत्पन्न कर लेता है, क्योंकि उसका कथन और चरित्र, अभिव्यक्ति और प्रवृत्ति एक जैसी है। मन और वचन के चिन्तन और चरित्र के एक रस होने से ही शक्ति उत्पन्न होती है और वह दूसरों को प्रभावित करती है। यदि ऐसा न होता, तो दीखने वाले दृश्य और सुनने वाले शब्द निर्जीव मशीनें भी उत्पन्न करती रहती है। वे अपना उच्चस्तरीय प्रभाव उत्पन्न कर लेती। मनुष्य को उसके लिए श्रम लगाना भी न पड़ता। छपे कागजों और मधुर वचनों की साज-सज्जा में आज बाजार पटा पड़ा है, पर उनका कोई रचनात्मक प्रभाव कहीं देखने को नहीं मिलता। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि व्यक्तियों को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने वाले यह दोनों ही सशक्त उपकरण आज भोंथरे हो गये है। उनका नगण्य प्रभाव देखते हुए निराशा ही होती है।

दोष इसमें उत्पादकों का है, ग्राहकों का नहीं। श्रोता और पाठक अभी भी प्रभावित होते है और लक्ष्य को पूरी तरह सम्पन्न करते हैं। बुद्ध, गाँधी, ईसा आदि की वाणी में प्राण था। उनकी कलम में ओज था। जो कुछ उनके द्वारा प्रतिपादित किया गया, प्रभावशाली सिद्ध हुआ। पिछले दिनों की कार्ल मार्क्स, रूसो आदि की कलमों ने राजनैतिक क्रान्तियाँ की है। हैरिएट स्टोन की लेखनी ने दास प्रथा का न केवल अमेरिका से, वरन संसार से ही समाप्त कर दिया। वाणी के धनी नेपोलियन की गरज से धरती दहलती थी। मुर्दे जी उठते थे। सन्त भक्तों में भी कबीर, रामदास विवेकानन्द, रामतीर्थ जैसे अनेकानेक ऐसे हुए है, जिनके संपर्क से अनेकों का कायाकल्प हुआ, अगणित लोग उन्हीं की प्रेरणाओं से तन्मय हो गये। यह तो इसी युग का घटनाक्रम है।

इसी पंक्ति में एक नाम अखण्ड-ज्योति का भी जुड़ता है। उनकी ऊर्जा ने अनेकों में प्राण-संचार किया है। 24 लाख की गणना सदस्यों-पाठकों की है। फिर उनका संपर्क-सान्निध्य-परामर्श भी तो काम करता रहा है और एक से अनेक होने की पद्धति का अनुसरण करते हुए यह परिकर करोड़ों की संख्या को पार कर चुका है। यह ऐसे हैं, जो निजी जीवन की दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त और सत्प्रवृत्तियों के प्रयोक्ता बनकर संपर्क क्षेत्र को प्रभावित कर रहे है।

इससे भी एक कदम आगे बढ़ा हुआ उन लोगों का है, जिनने अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का परित्याग कर दिया है और जो अहर्निश लोकमानस के परिष्कार की सत्प्रवृत्ति संवर्धन की नवसृजन साधना में लगे हुए है। इनने प्राचीन काल की साधु संस्था, ब्राह्मण वर्ग, और वानप्रस्थ परम्परा को युग के अनुरूप धारण किया है, जो अपने-अपने निकटवर्ती कार्यक्षेत्रों में युगशिल्पी की भूमिका निभा रहे है। घर-परिवार की सामान्य देख-भाल करते हुए अधिकाँश समय सार्वजनिक जीवन में रचनात्मक कार्यक्रमों में लगा रहे है। गृहस्थ होते हुए भी विरक्त है। इन्हें पुरातन काल के ब्राह्मण वर्ग में गिना जा सकता है, भले ही वे जन्म से किसी भी जाति में उत्पन्न क्यों न हुए हो। इनकी संख्या इन दिनों एक लाख से किसी भी प्रकार कम नहीं। इन्हीं के बलबूते वे सत्प्रवृत्तियाँ द्रुतगति से अग्रगामी हो रही है। जिन्हें मिशन के बहुमुखी प्रयासों में सम्मिलित किया जाता है कि दुर्दिनों का अन्त हुआ और सद्भावना की श्रेष्ठ श्रृंखला का अरुणोदय हो चला।

अखण्ड-ज्योति के विगत 52 वर्ष के उत्पादन में बहुत बड़ी संख्या उन चन्दन वृक्षों की है। जिनकी सुगन्ध और शोभा से सारा वातावरण महक उठा है। उन्हें शान्ति कुंज, हरिद्वार में गायत्री तपोभूमि, मथुरा में तथा सहस्त्रों शक्ति केन्द्रों में काम करते देखा जा सकता है। इन सबके पारस्परिक मिलन तो यदा-कदा होते है। सभी अपने-अपने निर्धारित कार्यक्रमों में प्राणपण से लगे रहते है। कहीं इनका अधिक झुरमुट देखना हो, तो उन्हें मथुरा और हरिद्वार में जीवनदानी की तरह काम करते हुए देख जा सकता है। इन्हें प्राचीनकाल के सन्तों, मनीषियों, धर्मसेवियों में गिना जा सकता है। इनकी संख्या भी हजारों को पार कर गई है।

अकेले शान्ति-कुंज में ब्रह्मवर्चस में कार्यरत व्रतधारियों को देखा जाय, उनकी योग्यता और त्याग भावना का विवरण जाना जाय, तो प्रतीत होगा कि इतनी बड़ी संख्या में इतने ऊँचे स्तर केनर-रन्त कदाचित ही कहीं एकत्रित दीख पड़ें।

शान्ति-कुंज में प्रायः 250 कार्यकर्ता काम करते है। इनमें से अधिकाँश गृहस्थ है; पर ब्रह्मचारी की तरह जीवन-यापन करते है। पुरुषों की तरह उनकी स्त्रियाँ भी निरन्तर मिशन के कार्यों में कंधे-से-कंधा मिलाकर जुटी रहती है। न इन्हें कभी अवकाश लेने की आवश्यकता पड़ती है, और न छोड़े हुए सम्बन्धियों की याद सताती है। उनके पास जाने या उन्हें बुलाने के लिए सामान्यजनों की तरह मन नहीं भटकता।

उनकी उत्कट आदर्शवादिता ही खींच कर यहाँ लाई है। किसी प्रलोभन के कारण यहाँ नहीं आये और न किन्हीं एषणाओं की पूर्ति के उद्देश्य से इस ओर कदम बढ़ाने के लिए उत्सुक हुए है। स्वयं को आदर्श लोकसेवी के रूप में प्रस्तुत करने और अपनी सेवा-साधना से जन-चेतना उभारने सत्प्रवृत्तियों के उद्यान लगाने, दुष्प्रवृत्तियों के विष वृक्षों को उखाड़ने की श्रद्धा ही इन्हें अहर्निश अपने-अपने हिस्से का काम निपटाने में लगाये रहती है। यह सभी अपने-अपने घरों की सुसम्पन्नता छोड़कर आये है। इनमें से कितने ही उच्च पदाधिकारी और सफल व्यवसायी रहे है। शिक्षा की दृष्टि से उन्हें जनसाधारण की तुलना में कहीं ऊँचा ठहराया जा सकता है। प्रस्तुत जीवनदानियों में प्रायः आधे से ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट स्तर के है। पी.एच.डी., एम.डी., एम.एस, .बी.ए.एम.एस स्तर के डॉक्टर और आयुर्वेदाचार्य जैसे अन्यान्य सरकारी डिग्रियों से सुसम्पन्न भी। इने सोच-समझ कर अपनी नौकरियों से इस्तीफा दिया और अपरिग्रही वानप्रस्थों की तरह युग साधना के लिए समर्पित हुए है। इनमें से कई ऐसे है, जिनने अपनी निजी सम्पत्ति बेचकर बैंक में जमा कर दी है और उसी के सहारे अपना निर्वाह करते है। उनके लिए मिशन को एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता। कई पेंशनर है और कुछ अपने परिवार से अपना गुजारा मँगाकर काम चलाते रहते है अथवा नाम मात्र का निर्वाह लेकर ब्राह्मणोचित जीवन जीते है। यह गरीबी स्वयं की ओढ़ी हुई है व यही इनकी शान है।

पूर्णरूपेण समर्पित और समयदानी प्रज्ञा-पुत्रों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है। उसे देखते हुए लगता है कि अब तक किये जा रहे कार्यक्रमों का विस्तार किये बिना और काई चारा नहीं। सम्भ्रान्त और प्रामाणिक, सुशिक्षित सुयोग्य लोकसेवी किसी समाज की प्रगतिशीलता के लिए मेरुदण्ड के वटकों का काम करते है। उनकी संख्या वृद्धि में उज्ज्वल भविष्य की झाँकी की जा सकती है और आशा की जा सकती है कि लोकमानस का परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन का क्रिया-कलाप देशव्यापी विश्वव्यापी बनकर रहेगा और उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचते हुए नवयुग के अवतरण की भूमिका सम्पन्न करेगा।

आश्चर्य होता है कि इस घोर संकीर्ण स्वार्थपरता के युग में इतने अधिक और इतने उच्चस्तरीय कार्यकर्ताओं का उत्पादन-अभिवर्धन हो किस कारण रहा है? जबकि सभी लोक सेवी संस्थाओं में उच्चस्तरीय निस्पृह कार्यकर्ताओं की कमी अनुभव की जाती है और कार्य रुकता है।

इस प्रश्न का उत्तर एक ही है यह सब मात्र पत्रिका के लेखों से नहीं हुआ। वरन उनके सूत्र-संचालकों के साथ घनिष्टतम संपर्क स्थापित होने के उपरान्त दीपक से, दीपक जलने जैसी प्रक्रिया सम्पन्न हुई है। अखण्ड-ज्योति के लेखों से परमार्थ परायणता की सेवा-साधना की प्रेरणा अवश्य मिली है पर इतने भर से यह नहीं हो सकता कि कोई अपनी सुख-सुविधाओं को लात मारकर संतमय तपस्वी जीवन जीने के लिए आतुर हो उठे और उस प्रकार का व्रत लेकर रहे, .... उच्च वर्ग के सुशिक्षित नहीं। उन्हें गहराई तक वास्तविकता की जाँच-परख भी करनी पड़ती है। यही हुआ भी है। अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखने वाले ऋषि युग्म-माताजी के व्यक्तित्व को चरित्र को आदि से अन्त तक खुली पुस्तक की तरह पढ़ने के उपरान्त ही यह सम्भव हुआ कि अग्रिम पंक्ति पर चलने वाले के पीछे प्रयाण करने का साहस जुट सके। अखण्ड-ज्योति की पंक्तियों में जो प्राणवान ज्योति ज्वाला रहती है। वस्तुतः वह प्रस्तोताओं की प्राणाग्नि ही है। जो चुम्बक का काम करती है। हर कसौटी पर खरी सिद्ध होने के उपरान्त प्राण-ऊर्जा का आदान-प्रदान करती है। यही है एकमात्र वह रहस्य, जिसने न केवल साधु स्तर के, ब्राह्मण स्तर के लोकसेवियों की एक विशालकाय सेना खड़ी कर दी, वरन युग-परिवर्तन के क्रिया-कलापों में आश्चर्यजनक गतिशीलता भी उत्पन्न कर दी।

शान्ति-कुंज आने वाले, इस परिकर के कण-कण में भरी पवित्रता, प्रामाणिकता एवं प्राण ऊर्जा से प्रभावित होते है और अधिकाधिक निकट आते चले जाते है।

मिशन का प्रत्येक कार्यकर्ता विनम्र कर्मठ एवं मितव्ययी देखा जा सकता है। आश्रम में प्रायः 200 शौचालय और इतने ही स्नानघर है। लम्बाई की दृष्टि से दो मील जितनी नालियाँ। इन सभी की सफाई आश्रम के कार्यकर्ता ही करते है। कोई सफाई कर्मचारी यहाँ नौकर नहीं रखा जाता। सभी का निर्वाह एक स्तर का है। एम.एस., एम.डी डॉक्टरों से लेकर सामान्य स्वयंसेवकों का निर्वाह स्तर एक समान है। साथ ही समान सम्मान भी। यही कारण है कि जो यहाँ आते है, देखते है वे इस परिवार से सदा के लिए सम्बद्ध हो जाते है। सतयुग की- साम्यवाद की चर्चा लोगों ने सुनी है; पर उनका प्रत्यक्ष स्वरूप देखा नहीं। किन्तु शांतिकुंज में आकर उसे व्यवहार में उतरते देख जाते है। यही है वह प्राण-प्रेरणा जो संचालकों के व्यक्तित्व से लेकर आश्रम की रीति-नीति तक तथा अखण्ड ज्योति के लेखों में प्रादुर्भूत होती देखी जा सकती है।


Quotation

आकाश के नक्षत्रों से लेकर अणु-परमाणु के कार्यकलाप और संसार की प्रत्येक घटना के पीछे एक अमर चेतन सत्ता का नियत विधान काम करता है। जिस तरह किसी के पथभ्रष्ट हो जाने पर सृष्टि में खलबली मच जाती है। उसी तरह विश्व नियम-नियति के विधान और सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ने पर उनके विरुद्ध चलने पर मनुष्य के आन्तरिक जीवन में भी भयंकर संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उसका परिणाम बाह्य जीवन में भी विनाश और हानि के रूप में ही गुप्त होता है।


शान्ति कुंज-गायत्री तीर्थ

भारत की देव संस्कृति में तीर्थों का, तीर्थ यात्रा का असाधारण महत्व है। धार्मिक प्रथा परम्पराओं को इसी कारण सर्वोपरि महत्व मिला हुआ है। हर साल करोड़ों यात्री तीर्थ यात्रा पर निकलते हैं और इस हेतु अरबों-खरबों रुपया खर्च करते हैं। समय लगने की दृष्टि से भी हर यात्री को औसतन एक सप्ताह इसी निमित्त लग जाता है। लौकिक मनोकामनाएँ पूर्ण करने से लेकर, पापों का क्षय, पुण्य का उदय, स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति, देवता की प्रसन्नता अनुकम्पा जैसे अनेकों मनोरथ लेकर जाते है। श्रद्धा या अन्धश्रद्धा से वे अपनी मान्यता के फलित होने की भी आशा करते है।

विचार करने पर मात्र देव-दर्शन, नदी स्नान, दान दक्षिणा, छुट-पुट कर्मकाण्ड की शारीरिक क्रिया कर लेने भर से कोई कारण समझ में नहीं आता कि इतने सत्परिणामों का पिटारा इतने सस्ते मोल में किसी के हाथ लग सकता है। क्योंकि पुण्य तो सघन श्रद्धा, पवित्रता और उदारता पूर्वक किये गये परमार्थ के सहारे ही उपलब्ध हो सकता है। इससे कम में अध्यात्म क्षेत्र की कोई विभूति हस्तगत नहीं होती। फिर लोगों में तीर्थों के इतने उच्चस्तरीय प्रतिफल प्राप्त करने की मान्यता क्यों कर बनी और वे क्यों कर इस सीमा तक अपनाने के लिए तत्पर हो गये? तीर्थयात्रियों की संख्या हर साल हर तीर्थ में बढ़ती ही जाती है। इसका एक कारण पर्यटन के प्रति लोगों की सहज उत्सुकता भी हो सकती है और यह भी कहा जा सकता है कि सर्वसाधारण के लिए सैरगाहों की आवश्यकता पूरी होने जैसी कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं है, उन्हें तीर्थ का ही एकमात्र अवलम्बन मिलता है। वहाँ जाकर दैनिक जीवन के व्यस्त और नीरस क्रियाकलाप से ऊबा हुआ व्यक्ति कुछ समय के लिए राहत पाता है। पर्यटन का आनंद लेता है और साथ के अनेकानेक लौकिक और पारलौकिक प्रतिफलों की आशा अपेक्षा भी करता है।

इस प्रचलन का आरम्भ किस प्रकार हुआ? इसका पुरातन आधार ढूंढ़ने पर यहाँ पहुँचने पर पैर टिकते हैं कि पुराणों में महात्म्य ग्रन्थों में अनेकानेक तीर्थों का आश्चर्यजनक इतिहास एवं पुण्यफल बताया गया है। इसी को आधार मानकर भावुक-जनों की धर्मश्रद्धा अन्यान्य कठोर साधनाओं की अपेक्षा इसी सरल उपाय की ओर मुड़ गई। अनुकरण प्रियता के लिए मानवी दुर्बलता प्रसिद्ध है। एक को किसी नूतन कार्य में प्रवृत्त होते देख कर उसके साथ अनेकों कौतूहल–प्रिय लग लेते हैं। यह बात स्वभाव तो है ही, बड़े भी इसका अपवाद नहीं है। विशेषतया ढलती आयु में जब सर्वथा निठल्ले रहना और नीरस जीवन बिताना पड़ता है, तब तो कहीं जाने आने की इच्छा और भी तीव्र होती है। वे अपनी अभिलाषा घर वालों पर व्यक्त करते हैं और उन्हें वह दबाव इच्छा या अनिच्छा से स्वीकार करना पड़ता है। कुछ की उत्सुकता इस हेतु अन्यान्य अनेकों पर उत्साह का अतिरेक बन कर सवार हो जाती है और रेल के डिब्बों, बसों की कतारों का मुख निकटवर्ती, दूरवर्ती तीर्थों की ओर मुड़ जाता है। यह है आज तीर्थों में जमा होती और दिन-दिन बढ़ती जा रही भीड़ का प्रधान कारण।

अब प्रश्न उठता है कि आखिर शास्त्रकारों को क्या सूझा कि उन्होंने इस भाग दौड़ के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया और उनके धन, श्रम, समय का सदुपयोग नष्ट न होने के सम्बन्ध में कुछ भी विचार नहीं किया? इतना तो वे भी जानते होंगे कि पुण्य परमार्थ के लिए आत्म शोधन और पुण्य परमार्थ यह दो ही अवलम्बन है, जिन्हें अपनाये बिना किसी आत्मिक क्षेत्र की विभूति का उपलब्ध हो सकना सम्भव नहीं। कर्मकाण्ड तो उस दिशा में प्रतीकात्मक मार्गदर्शन ही करते है।

ऋषियों और शास्त्रकारों के सम्मुख उन दिनों तीर्थ यात्रा का स्वरूप दूसरा था। जिसे आज की भगदड़ से सर्वथा भिन्न ही माना जाता है। उन दिनों तीर्थ प्राकृतिक सौंदर्य वाले जलाशयों की निकटता वाले और भूतकालीन प्रेरणाप्रद प्रसंगों के साथ जुड़े हुए तो थे ही उनकी स्थापना के लिए चयन ऐसे ही स्थानों की किया गया था। पर यह तो चयन और स्थापना की बात रही, उपयोगिता का समावेश इसकी तुलना में और भी अधिक बुद्धिमता ओर श्रम साधना के आधार पर हुआ था।

तीर्थों के देवालय-जलाशय एक शारीरिक उत्साह की ही अभिवृद्धि करते है। मूल लाभ तो उस भावनात्मक उत्थान परिष्कार से होता है, जिसके कारण व्यक्ति अपने दोष-दुर्गुणों को छोड़ता है। भ्रान्तियों से ऊपर उठता है। उत्कृष्ट जीवन की रीति-नीति अपनाता है। यह सब कुछ अनायास ही नहीं हो जाता। इसके लिए उच्चस्तर का ऐसा दबाव पड़ना चाहिए, जो कच्ची धातुओं को गलाने ढालने जैसा ज्वलंत एवं ऊर्जा सम्पन्न हो। यह भूमिका उन दिनों तत्वज्ञानी, तपस्वी एवं महामनीषी ही निबाहते थे। तीर्थों में उनके कई-कई आश्रम रहा करते थे, जिसमें विभिन्न वर्गों के, स्तरों के, व्यक्तियों के प्रशिक्षण की सुनियोजित व्यवस्था मात्र शिक्षा ही पर्याप्त नहीं समझी जाती थी, साथ में साधना प्रक्रिया भी जुड़ी रहती थी। साधना प्रक्रिया में संयुक्त होकर ही उच्च स्तरीय प्रशिक्षण भावना क्षेत्र में उतरता है और जीवन में चरितार्थ होने की स्थिति में पहुँचता है। इस दुहरी प्रक्रिया को सम्पन्न करा सकने में समर्थ थे वे आश्रम, वे शिक्षण संस्थान जिन्हें तीर्थ प्रक्रिया की जीवन-प्राण सार तत्व कहा जा सकता है।

उन दिनों तीर्थ यात्री इन दिनों की तरह देहली छूने के लिए दौड़ते और उलटे पैरों लौटने की उतावली में नहीं होते थे। वरन लम्बी पद यात्रा की थकान उतारने से लेकर संजीवनी विद्या घोट कर पिलाने वाले आश्रमों में कुछ अधिक समय वहाँ रहते थे। वहाँ के दिव्य वातावरण से प्रभाव और प्रेरणा ग्रहण करते थे। साधना चलती थी। संस्कृति के साथ घनिष्ठतापूर्वक जोड़ने वाले उपनयन, वानप्रस्थ और अन्य संस्कार कराये जाते थे। इसके अतिरिक्त बन पड़े पाप कर्मों के प्रायश्चित, आत्म-परिष्कार की तपश्चर्याएँ तथा उलझी हुई गुत्थियों का समाधान करने वाले प्रवचन-प्रशिक्षण एवं परामर्श का लाभ मिलता था। जो सुधार परिवर्तन घर के सामान्य वातावरण में बहुत प्रयत्न करने पर भी सम्भव नहीं होता था, वह वहाँ थोड़े ही समय के तीर्थ सेवन से सम्पन्न हो जाता था।

गुरुकुल तीर्थों में ही होते थे। वहाँ पढ़ने के लिए बालक इसलिए भेजे जाते थे कि नर-रत्नों के स्तर तक विकसित करने की जो प्रक्रिया घर के अस्त-व्यस्त वातावरण में सम्भव नहीं हो पाती, उसे आश्रमों के ऊर्जा भरे आवे जैसे वातावरण में रखकर आसानी से पकाया जा सकेगा। वस्तुतः होता भी ऐसा ही था। छात्र अनुशासन पालते, श्रद्धावनत रहते और जीवन के हर पक्ष को विकसित करने का ऐसा लाभ उठाते थे जिस आधार पर उन्हें महामानवों की श्रेणी में खड़ा होने का सुयोग-सौभाग्य मिलता था। इस प्रयोजन की पूर्ति में शिक्षण का पाठ्यक्रम साधारण होते हुए भी वहाँ का दिव्य वातावरण चमत्कारी प्रतिफल उपस्थित करता था।

बालकों के लिए वर्षों तक गुरुकुल प्रणाली की शिक्षा चलती थी। जो वयस्क है, गृहस्थ है, कार्य व्यस्त है उन्हें भी आत्म-परिष्कार और उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण का लाभ प्राप्त करना तो आवश्यक था ही। समय की कमी को देखते हुए तीर्थों में ऐसे कल्प साधना सत्रों के प्रशिक्षण की व्यवस्था थी जिसे तीर्थ सेवन सत्र के नाम से जाता जाता था। उन दिनों तीर्थ यात्री चित्र-विचित्र इमारतों को देखने दृश्य परक विनोद का मजा लूटने के लिए नहीं वरन कुछ ठोस आधार अपनाने के लिए जाते थे। इसके लिए उन्हें न्यूनतम दस दिन तो अपने को तपाने चमकाने के लिए समय देना ही पड़ता था। स्वर्णकार इससे कम समय में कोई शानदार आभूषण गढ़ भी तो नहीं सकता। इसमें एकनिष्ठ रहने की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। तीर्थ सेवनकर्त्ता इसी तैयारी से वहाँ जाते थे।

देव धर्म को आश्रम व्यवस्था में बँधा हुआ समझा जाता था। ब्रह्मचर्य में विद्याध्ययन, शरीर संवर्धन- गृहस्थ में परिवार पोषण, आजीविका उपार्जन में जीवन का पूर्वार्द्ध लग जाता था। ढलती आयु का उत्तरार्द्ध विशेष रूप से परमार्थ प्रयोजन के लिए- लोक सेवा के लिए निर्धारित था। इस संदर्भ में आवश्यक अनुभव अभ्यास प्राप्त करने के लिए यही तीर्थ, आश्रम, वानप्रस्थ, आरण्यक के रूप में भी अपनी एक महत्वपूर्ण शाखा चलाते थे। इस प्रकार बालकों को, युवाओं को, प्रौढ़ों को, वृद्धों को, महिलाओं को अपने अपने काम आने वाली प्रेरणाएं एवं दिशाधाराएँ प्राप्त करने का अवसर तीर्थों में मिलता था। इसी उपयोग को देखते हुए शास्त्रकारों ने सर्वसाधारण को प्रेरणा दी थी कि वे जीवन के अन्यान्य आवश्यक कार्यों में ही एक कार्य तीर्थ सेवन का माने। उसके लिए समय निकालें और वह लाभ प्राप्त करें जो अन्यत्र कहीं भी किसी भी मूल्य पर प्राप्त नहीं हो सकता।

तीर्थ यात्राएँ शास्त्रीय विधि से पैदल ही हो सकती है। वाहनों का उपयोग करने पर उनका पुण्य फल चला जाता है। इस पद यात्रा का असाधारण महत्व है। यात्री गाँव-गाँव धार्मिकता की चेतना उत्पन्न करते हुए आगे बढ़ते थे। रात्रि को जहाँ भी विश्राम करते थे, वहाँ कथा कीर्तन का आयोजन करते थे। स्थानीय लोगों को वहाँ की स्थिति के अनुरूप परामर्श देते थे। इस आधार पर निरन्तर लोक चेतना को सजीव रखने वाला सिंचन कार्य चलता रहता था। तीर्थयात्री राजमार्ग पर नहीं चलते थे, पर पगडंडियों को अपनाते और गाँव-गाँव से संपर्क साधते थे। एक मार्ग से जाते और दूसरे से लौटते थे, ताकि अधिकाधिक लोगों में अधिकाधिक गाँवों में वे नवचेतना का संचार करते चलें।

यही वे महान उद्देश्य थे जिनके आधार पर इस देश के नागरिक तैंतीस कोटि देवताओं की गणना में गिने जाते रहे। उन्हें जन्म देने वाली इसी भूमि को ‘स्वर्गादपि गरियसी’ होने का श्रेय सौभाग्य मिलता रहा। आज तीर्थों का ढोंग तो है, स्थान भी वे ही हैं, पर उनके माध्यम से जो जन कल्याण बन पड़ता था, उस महान उद्देश्य का तो कहीं दर्शन भी नहीं होता। कलेवर खड़े है, पर लगता है उनमें से प्राण तिरोहित हो गये।

अखण्ड ज्योति का विचार तंत्र इस अति महत्वपूर्ण समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार करता रहा है और यह सोचता रहा है कि तीर्थ संस्था को पुनर्जीवित करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है? जो सम्भव हो उसे समय रहते किया जाना चाहिए।

लम्बे समय के विचार मंथन के उपरान्त यह निश्चय किया गया कि इसके लिए उपयुक्त स्थान चुना जाय और पुरातन काल की तीर्थ संस्था का स्वरूप, उद्देश्य, क्रिया-कलाप और प्रभाव परिणाम इस आधार पर प्रस्तुत किया जाय कि पुरातन की झाँकी को नवीन में किया जा सके। मूर्च्छित में नवचेतना का संचार होता देखा जो सके।

हरिद्वार सप्तसरोवर पर शान्ति-कुंज की स्थापना इसी महान प्रयोजन को सामने रख कर छोटे रूप में किन्तु साँस्कृतिक पुनर्जीवन का महान लक्ष्य सामने रख कर की गयी। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की तपोभूमि, सप्त धाराओं वाले क्षेत्र में इस गायत्री तीर्थ का निर्माण किया गया। संस्कारित भूमि में गायत्री के तत्व दृष्टा विश्वामित्र की पुरातन संस्कार चेतना अभी भी देखी जा सकती है। सातों ऋषि एक ही दिशा धारा के पालक थे, किन्तु उन सभी ने अपने-अपने हिस्से के अपने-अपने काम सम्भाले थे। परिवार के सदस्यों में सभी के काम बँटे होते थे। पर वे सभी परस्पर पूरक बनते और परिवार संस्था को सुविकसित बनाते थे।

अखण्ड-ज्योति की अनेक प्रेरणाओं और स्थापनाओं में से एक शान्ति-कुंज भी है, जिसे तीर्थ परम्परा का- ऋषि युग की रीति-नीति का सार संक्षेप समझा जा सकता है। यहाँ व सभी प्रवृत्तियां चलती है जिनके आधार पर इन दिनों भी इन्हीं कारणों से ऋषि युग का साक्षात्कार किया जा सकता है।


देवात्मा हिमालय में ऋषि कल्प ऊर्जा

प्रमुख ऋषियों के नाम से यों अनेक युग कल्पों में अनेक ऋषियों की नामावली जुड़ती, घटती और परिवर्तित होती रही है। पर उनमें से जिनके आदर्शों की स्थिति को देखते हुए कार्यान्वित किया जा सकना सम्भव हो सका है, उन्हीं के लक्ष्य सामने रखकर उनकी गतिविधियों को कार्यान्वित करने का प्रयत्न किया गया है। इसी को महासागर कह सकते है, जिसमें अनेक नदियों का संगम-समागम हुआ है।

गंगा गोमुख से निकलती है और गंगा सागर में विलीन होती है। इस सुदूर मार्ग में सर्वत्र उसे गंगा ही कहा जाता है। यद्यपि उसमें बीच-बीच में अनेकों छोटी-बड़ी नदियाँ मिलती गयीं है। उसे उन सबकी सम्मिलित सम्पदा भी कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति को ज्ञान गंगा कहा जाय तो मानना पड़ेगा कि वह किसी व्यक्ति या शक्ति का एकाकी प्रयास नहीं है उसके साथ अनेक मूर्धन्य शक्ति केन्द्रों की दिव्य चेतना जुड़ती चली गयी है।

हिमालय का उत्तराखण्ड क्षेत्र ‘देवात्मा’ शब्द से सम्बोधित किया जाता है। यों हिमालय अत्यन्त सुविस्तृत है। वह अनेक देशों की सीमाएँ छूता हुआ एक सुविस्तृत भूखण्ड घेरे हुए है। पर वह सभी ऋषि भूमि के रूप में जाना, माना नहीं जाता। मात्र वह खण्ड ही देवभूमि है जिसमें ऋषियों ने तप साधना की थी। गहन चिन्तन-मनन से ऐसा नवनीत निकाला था जो भू-लोक निवासियों के लिए अमृतोपम सिद्ध हो सके। उनकी तपश्चर्याएँ व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं, वरन विश्व-कल्याण के लिए सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए थी। इन्हीं दोनों में उन्होंने स्वर्ग और मुक्ति का दर्शन किया था। आज देवपूजा तो बहुत है किन्तु ऋषियों द्वारा प्रतिष्ठित मानवी गरिमा की अभ्यर्थना करने का किसी का मन नहीं है। वस्तुतः देव विभूतियाँ ऋषि कल्पों में होकर ही अपना आलोक प्रकट करती और संपर्क साधने वाले को निहाल करती है। देवताओं से प्रत्यक्ष संपर्क साधना कठिन है, पर मनुष्य रूप में अवतरित हुए ऋषियों का जीवित होने पर स्थूल शरीर और दिवंगत होने पर उनका सूक्ष्म शरीर ओर भी अधिक समर्थता के साथ काम करता रहा है। इतिहास साक्षी है कि देवात्माओं के अनुदान मनुष्यों को ऋषियों के माध्यम से ही उपलब्ध होते रहे है। इसीलिए गुरु को गोविन्द से भी बढ़कर माना गया है। वस्तुतः ऋषि परम्परा ही अविनाशी गुरु सत्ता है। उसी को ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उपमा दी जाती रही हैं। मंत्रदाता जीवित गुरु तो ऋषि परम्परा के प्रतीक मात्र होते है। ऋषियों की तपोभूमि होने के कारण ही उस क्षेत्र को ‘देवात्मा हिमालय’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है। शान्ति-कुंज की स्थापना के पीछे उसी महान परम्परा को पुनर्जीवित करने का संकल्प है। इसी संकल्प के अंतर्गत उन सभी प्रवृत्तियों का इस एक स्थान में केंद्रीकरण किया गया है, जिसके लिए ऋषियों की समस्त सत्ता सर्वतोभावेन समर्पित हुई थी।

उद्देश्य की प्रथम झलक झाँकी में दिग्दर्शन कराने के लिए ‘देवात्मा हिमालय’ का एक भव्य देवालय है। उसमें उस क्षेत्र के प्रमुख स्थानों का, उतार-चढ़ावों का, नदी-सरोवरों का दिग्दर्शन कराया गया है। देवालयों की दृष्टि से यह अपने ढंग का अनोखा मंदिर है जैसा अन्यत्र कहीं नहीं दीख पड़ेगा। वस्तुतः इस धरित्री का पुण्यतम और आध्यात्मिक शक्तियों से भरा पूरा क्षेत्र यही है। तपश्चर्या के लिए इसी क्षेत्र को प्रमुखता मिलती रही है।

हिमालय देवालय के समीप ही सप्त ऋषियों के छोटे-छोटे देव मंदिर है। साथ ही इस क्षेत्र के प्रमुख तीर्थों के बड़े चित्र भी सुसज्जित ढंग से लगाये गये हैं। ताकि यदि कोई एक क्षेत्र में इस दिव्य प्रकाश की दर्शन झाँकी करना चाहे तो कुछ ही क्षणों में उसके मन मस्तिष्क पर वहाँ का अक्श खिंच सकें। गणेश जी ने धरती पर राम नाम लिख कर उसकी परिक्रमा करने भर से समस्त संसार के परिभ्रमण का पुण्य लाभ प्राप्त कर लिया था।

देवता कहाँ है? कहाँ नहीं? इसके बारे में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, किन्तु हिमालय क्षेत्र में अभी भी सूक्ष्म शरीरधारी सिद्धपुरुषों की सत्ता मौजूद है। वे अपनी प्रेरणाओं को उपयुक्त सत्पात्रों तक भेजते और उनके द्वारा इच्छित प्रयोजनों की पूर्ति कराते है। जिनमें सूक्ष्म दर्शन की क्षमता है वे उनके साथ अपने प्रयत्नों से भी संपर्क साध सकते है।

अनेकानेक महान सन्त ऋषियों ने अपने जीवन काल में कुछ जानने योग्य प्रयत्न पुरुषार्थ किये थे। उनकी सशक्त गतिविधियों का सूत्र संचालन किया था। इनमें तक कुछ का वर्णन इस प्रकार है-

(1) यमुनोत्री पर भगवान परशुराम की तपश्चर्या संपन्न हुई थी। उन्हें महाकाल का काल कुठार उपलब्ध हुआ था। उन्होंने अनैतिकता अवाँछनीय अन्य विश्वास एवं कुरीति परिकर का व्यापार उन्मूलन किया था।

(2) गंगोत्री में भगीरथ ने तप किया था। उनने भगवती गंगा को स्वर्ग से धरती पर अवतरित होने के लिए बाध्य किया था। उस पुण्यतोया के गंगाजल से अनेक प्राणियों और वनस्पतियों को जीवन प्राण मिला था। सूखी धरती हरी-भरी हुई थी। इसका अध्यात्म विवेचन ज्ञान गंगा के अवतरण रूप में किया जाता है।

(3) केदारनाथ के क्षेत्र में महर्षि चरक ने वनौषधि अन्वेषण किया था। आयुर्वेद परम्परा का वही प्रमुख भाग है।

(4) बद्रीनाथ के निकट व्यास गुफा प्रसिद्ध है। महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी की सहायता से अठारह पुराणों की संरचना की थी। साहित्य सृजन के माध्यम से उन्होंने स्वाध्याय प्रयोजन के लिए व्यापक व्यवस्था की थी।

(5) त्रियुगी नारायण क्षेत्र में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यज्ञ विज्ञान की सुविस्तृत शोध की थी। उस आधार पर इस महाविज्ञान के माध्यम से वातावरण की पवित्रता वायुमंडल की परिशुद्धि मानसिक आत्मिक व्याधियों का निराकरण सम्भव हुआ।

(6) देवर्षि नारद ने गुप्तकाशी में तप किया। उनने संगीत के तत्वज्ञान और प्रत्यक्ष विज्ञान का आविर्भाव किया। उस आधार पर भावना क्षेत्र की संवेदनशीलता को प्रेम रस से सराबोर करने में असाधारण सफलता पायी।

(7) ज्योतिर्मठ- आद्य शंकराचार्य की तपस्थली है। वहाँ शक्ति अर्जित करके उन्होंने चार मठों और अनेकानेक तीर्थों की संस्थापना एवं उनका पुनरुद्धार किया।

(8) महर्षि जमदग्नि का साधनाश्रम उत्तरकाशी था। उनका सुविस्तृत गुरुकुल आरण्यक चलता था। जिसमें अगणित नर-रत्न महामानव विनिर्मित होते थे।

(9) रुद्र प्रयाग में महर्षि पातंजलि का चिरकाल तक साधनात्मक पुरुषार्थ चला। योगविज्ञान की अनेक शाखा-प्रशाखाओं का अनुभव अभ्यास एवं प्रतिपादन किया। विश्व के अनेकानेक साधना विधान पातंजलि के सूत्रों की व्याख्या स्वरूप प्रकट हुए है।

(10) लक्ष्मण झूला में महर्षि पिप्पलाद ने आहार के आधार पर कायाकल्प जैसी विधियों का निर्माण किया था।

(11) महर्षि वशिष्ठ ने देव प्रयाग में राम बन्धुओं को अपने समीपवर्ती क्षेत्र में रखकर वेदान्तपरक अध्यात्म की शिक्षा दी थी। जिसका योगवाशिष्ठ में विस्तारपूर्वक वर्णन है।

(12) महर्षि कणाद ने परमाणु विज्ञान की खोज की थी। उनकी तपस्थली हरिद्वार के सप्तधारा क्षेत्र में थी जहाँ आज ब्रह्मवर्चस की अनुसंधानशाला खड़ी है। जिस अणुशक्ति को आज विश्व की सर्वोपरि शक्ति माना जा रहा है। उसका कणाद ने अध्यात्म उपयोग समझा और उपयुक्त प्रयोजनों में उसके प्रयोग की रूपरेखा तैयार की थी।

(13) महर्षि विश्वामित्र भी हरिद्वार के सप्तधारा क्षेत्र में ही अपना अधिकाँश साधना काल बिताते रहे। उन्होंने गायत्री का तत्वदर्शन प्रकट किया और नाद ब्रह्म-शब्द-ब्रह्म से संबंधित सामगान की रूप रेखा बनाई अभिनव विश्व की संरचना उन्हीं का स्वप्न था। जो कारणवश कभी पीछे के लिए टल गया।

यह संकेत रूप सार संक्षेप है। ऐसे अनेक ऋषि देवात्मा हिमालय के क्षेत्र में असाधारण तप अनुसंधान करते रहे है। वे एक प्रकार के अध्यात्म क्षेत्र की शोध करने वाले वैज्ञानिक ही थे। वे ऐसे उपाय सोचते और निकालते रहे जिससे समस्त विश्व के हर क्षेत्र में शालीनता, सद्भावना, सम्पन्नता एवं सुव्यवस्था का उत्पादन अभिवर्धन होता रहे। उन्हें अपने लक्ष्य में आशातीत सफलता भी मिली। इसी आधार पर इस .... चक्रवर्ती शासक और स्वर्ण सम्पदाओं एवं दिव्य विभूतियों का अधिपति कहलाने का श्रेय उपलब्ध हुआ।

उपरोक्त ऋषि परम्परा के क्रिया-कलापों को यथा-सम्भव शाँति-कुंज में कार्यान्वित करने का प्रयत्न किया गया है जो अब तक आशाजनक परिमाण में सफल एवं अग्रगामी होता रहा है। इनके पीछे ऋषि तत्व का प्रकाश मार्गदर्शन एवं सहयोग रहने के कारण इस उपक्रम की और भी अनेक परतें खुलने वाली है और प्रगति के उच्चशिखर पर पहुँच कर लोकमंगल में महायोगदान दे सकने की स्थिति में पहुँचने वाली है।

मनुष्य की शक्ति सीमित है। उसका शरीरबल एवं बुद्धिबल नगण्य है। साधन और सहयोग भी वह एक सीमा तक ही अर्जित कर सकता है। आकांक्षाओं और संकल्पों की पूर्ति बहुत करके परिस्थितियों पर निर्भर है। यदि प्रतिकूलताओं का प्रवाह चल पड़े तो बनते काम बिगड़ सकते है। इसके विपरीत ऐसा भी हो सकता है कि राई को पर्वत होने का अवसर मिले। ‘मूक होंहि वाचाल, पंगु चढहिं गिरिवर गहन’ वाली रामायण की उक्ति प्रत्यक्ष प्रकट होने लगे और दर्शकों को आश्चर्यचकित कर दे।

जिनने कठपुतली का काम देखा है वे जानते है कि बाजीगर पर्दे के पीछे बैठा हुआ अपनी उँगलियों के साथ बंधे हुए तारों को इधर-उधर हिलाता रहता है और मंच पर एक आकर्षक अभिनय लकड़ी के टुकड़ों द्वारा सम्पन्न होने लगता है। हवा के झोंके तिनके एवं धूलि कणों को आकाश में उड़ा ले जाते है। पानी के प्रवाह में पड़कर झंखाड़ और कचरे के गट्ठर नदी-नालों को पार करते हुए समुद्र तक का लम्बी यात्रा कर लेते है। समझना चाहिए कि देवात्मा हिमालय क्षेत्र में स्थूल शरीरधारी और सूक्ष्म शरीर धारी ऋषि कल्प देव शक्तियों के संयुक्त मार्गदर्शन और अनुदान के सहारे शाँति-कुंज की बहुमुखी गतिविधियां चल रही है। इसी की एक शाखा अखण्ड-ज्योति से निस्सृत होने वाली सप्त रंगों वाली सात किरणों की समुचित भूमिका निभा रही है।

षडानन कार्तिकेय को छै अग्नियों ने मिलकर पाला था। उन्हें प्रमुख छै देवताओं ने अपने -अपने अंश देकर सर्व शक्तिमान बनाया था। कुन्ती को भी सूर्य, धर्मराज, इन्द्र .... की अनुकम्पा से देव पुत्र प्राप्त हुए थे। एक बार पराजित देवताओं ने प्रजापति के तत्वावधान में अपनी-अपनी शक्तियों का महत्वपूर्ण अंश सम्मिलित कर महाकाली का सृजन किया था। उसी संघ ने मधु–कैटभ महिषासुर, शुँभ-निशुँभ, रक्तबीज जैसे दानवों को परास्त किया था। आसुरी आतंक से मुक्ति पाने के लिए ऋषियों ने अपना रक्त एक घड़ा भर कर एकत्रित किया था- और सीता ने जन्म लेकर धरती से दानवता का समापन ओर रामराज्य का संस्थापन किया था। समझा जा सकता है कि दिव्य विभूतियों से सुसम्पन्न ऋषिकल्प देवात्मा हिमालय के सिद्ध पुरुषों का संयुक्त वरदान सम्मिलित अनुदार गायत्रीतीर्थ शान्ति-कुंज की पुण्य-प्रक्रिया है। उसकी अखण्ड-ज्योति अपने दिव्य आलोक से युग चेतना का आलोक दसों दिशाओं में विकीर्ण कर रही है। उसकी प्रस्तुत गतिविधियों में यह देखा जा सकता है कि ऋषियों के भूत कालीन क्रिया-कलापों की मुखाकृति इन दिनों किस सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न हो रही है।

युग अवतरण का तात्पर्य है- मानवी गरिमा का पुनरुत्थान। चरित्र और व्यवहार का पतन से उत्थान की ओर अभिगमन। जहाँ जिस मात्रा में यह प्रयास चल रहा होगा वहाँ समर्थता, सम्पन्नता, सुसंस्कारिता और प्रगतिशीलता की कमी रह ही नहीं सकती।


Quotation

जब तक हम स्वयं अपने छोटे-छोटे दीपकों को न जलायें, तब तक आकाश का दीप-जगत व्यर्थ है, और जब तक हम स्वयं अपनी तैयारियाँ न करें, तब तक संसार की तैयारियों की सारी विधि उसी तरह प्रतीक्षा करती रहती हैं जैसी वीणा अँगुली के स्पर्श की राह देखती है।

-टैगोर


ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं

अखण्ड-ज्योति की प्रकाश प्रेरणा से अनेकों महत्वपूर्ण और दर्शनीय सेवा संस्थाओं की निर्धारण हुआ है। वे अपने-अपने प्रयोजन को आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न कर रहे हैं। उनमें से मथुरा में विनिर्मित गायत्री तपोभूमि युग निर्माण योजना से प्रज्ञा परिवार का हर सदस्य परिचित है। आचार्य जी की जन्मभूमि में स्थित शक्तिपीठ से जुड़े लड़कों के इण्टरमीडिएट कालेज लड़कियों के इण्टर महाविद्यालय तो अधिकाँश ने देखे है। इसके अतिरिक्त देश के कोने-कोने में विनिर्मित चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों की गणना होती है। इन सभी को दूसरे शब्दों में “चेतना विस्तार केन्द्र” कहना चाहिए। इन सभी में प्रधानतया जन-मानस के परिष्कार को प्रशिक्षण ही अपनी-अपनी सुविधा और शैली से अनुशासन में बद्ध रहकर चलता है।

हरिद्वार का शांतिकुंज-गायत्री तीर्थ और ब्रह्मवर्चस देखने में इमारतों की दृष्टि से अपनी स्वतंत्र इकाई जैसे दीखते है। पर यदि कोई इनके निर्माण का मूलभूत आधार गहराई में उतरकर देखे तो वे सभी अखण्ड-ज्योति के अण्डे-बच्चे दिखाई पड़ेंगे। यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक होगा कि वह पत्रिका मात्र नहीं है, उसमें लेखक का सूत्र संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अन्त तक घुला है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी न इतनी बड़ी युग-सृजेताओं की सेवा वाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी अनुयायी ही मिले है। फिर इन अनुयायियों की भी यह विशेषता है कि जिस लक्ष्य को उनने हृदयंगम किया है। उसके लिए निरन्तर प्राणपण से मरते-खपते भी रहते है। देश के कोने-कोने में बिखरी हुई प्रज्ञा पीठें, हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दीखती है उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ-वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान, नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग काम करता देखा जा सकता है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। उन्हें बनाने, पकाने और शानदार बनाने में कोई अदृश्य ऊर्जा काम करती देखी जा सकती है। उसकी तेजस्विता और यथार्थता हजारों बार हजारों कसौटियों पर कसी जाती रही है और सौ टंच सोने की तरह खरी उतरती रही है। चमत्कार उसी का है। कौतूहलवर्धक कौतुक तो मदारी, बाजीगर भी दिखा लेते है पर व्यक्तित्व को साधारण से असाधारण बनाकर उन्हें कठिन कार्य क्षेत्र में उतार देना ऐसा कार्य है जिसकी तुलना करने के लिए किसी सामयिक प्रजापति की ही कल्पना उठती है; बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन और गान्धी के सत्याग्रह आन्दोलन का स्मरण दिलाती है। इन दोनों की सफलता का श्रेय समर्पित प्रतिभाओं को ही दिया जाता है। वे अपने आप ही नहीं उपज पड़ी थीं, वरन किन्हीं चतुर चितेरों द्वारा गढ़ी गई थीं। अपने को कुछ बना लेना एक बात है, किन्तु अपने समकक्ष सहधर्मी-सहकर्मी विनिर्मित कर देना सर्वथा दूसरी। ऐसी संस्थापनाएँ यदा-कदा ही कोई विरले कर पाते है। उन्हीं को देखकर सर्वसाधारण को यह अनुभव होता है कि परिष्कृत व्यक्तित्वों की कार्य क्षमता किस स्तर की कितनी सक्षम होती है और वह जनमानस के उलटी दिशा में बहते प्रवाह को किस सीमा तक उलट सकने में समर्थ होती है।

कई सोचते है कि वर्तमान विभूतियाँ सफलताएँ गुरु जी-माताजी की प्रचण्ड जीवन साधना और प्रबल पुरुषार्थ को दिशाबद्ध रखने का प्रतिफल है। जबकि बात दूसरी है। शरीर ही प्रत्यक्षतः सारे क्रियाकृत्य करते दीखता है, पर सूक्ष्मदर्शी जानते है कि यह उसके भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान प्राण चेतना का प्रतिफल है। जिन्हें मिशन के सूत्र संचालक की सराहना करने का मन करें उन्हें एक क्षण रुकना चाहिए और खोजना चाहिए कि क्या एकाकी व्यक्ति बिना किसी अदृश्य सहायता के लंका जलाने, पहाड़ उखाड़ने और समुद्र लाँघने जैसे चमत्कार दिखा सकता है। उपरोक्त घटनाएँ हनुमान के शरीर द्वारा भले ही सम्पन्न की गई हो; पर उनके पीछे राम का अदृश्य अनुदान काम कर रहा था। निजी रूप से तो हनुमान वही सामान्य वानर थे जो बालि के भय से भयभीत जान बचाने के लिए छिपे हुए सुग्रीव की टहल चाकरी करते थे और राम-लक्ष्मण के उस क्षेत्र में पहुँचने पर वेष बदल कर नव आगन्तुकों की टोह लेने पहुँचे थे।

बीज के वृक्ष बनने का चमत्कार सभी देखते है, पर अनेक बार क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनते भी देखा जाता है। ऐसे कायाकल्पों में किसी अदृश्य सत्ता की परोक्ष भूमिका काम करती पाई जाती है। शिवाजी और चन्द्रगुप्त किन्हीं अदृश्य सूत्र संचालकों के अनुग्रह से वैसा कुछ करने में समर्थ हुए, जिसके लिए उन्हें असाधारण श्रेय और यश मिला। विवेकानन्द की कथा-गाथा भी ठीक ऐसी ही है।

अखण्ड-ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर किसी की प्राण चेतना लहराती है और पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं-से-कहीं पहुँचाती है। बात लेखन तक नहीं सीमित हो जाती, उसका मार्गदर्शन और अनुग्रह अवतरण किसी ऊपर की कक्षा से होता है। इसका अधिक विवरण जानना हो, तो एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाले ऋषि चेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र संचालन है, अन्यथा साधना विहीन एकाकी, व्यवहार कुशलता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ व्यक्ति बड़े सपने तो देख सकता है; पर बड़े कामों का भार अपने दुर्बल कंधों पर नहीं उठा सकता। विशेषतया उन कामों का जिनकी कल्पनाएँ करते रहने वाले, योजनाएँ बनाते रहने वाले थोड़े बहुत कदम बढ़ाते रहने पर भी हवा में उड़ने वाले गुब्बारों की तरह कुछ ही समय में ठण्डे होते और अपने अस्तित्व को समाप्त करते देखे गये।

सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते है। इस दृष्टि से माताजी भी उतनी आयु का लाभ ले सकेंगी, जितनी कि गुरुदेव। इस महाप्रयाण का समय अब बहुत दूर नहीं है। हाथ के नीचे वाले वाले अनिवार्य कामों को जल्दी-जल्दी निपटाने की बात बनते ही चार्ज दूसरों के हाथों चला जायगा। सन्देह है कि उस दशा में वर्तमान प्रगति रुक सकती है और व्यवस्था बिगड़ सकती है। ऐसे लोग व्यवस्था में आने वाले उतार–चढ़ावों के आधार पर अनुमान लगाते है। उनमें ही प्रतिभावान व्यक्तियों के हट जाने पर भट्ठा बैठ जाता है और सरंजाम बिखर जाता है; पर यहाँ वैसी कोई बात नहीं। न व्यक्ति विशेष ने कुछ असाधारण किया है, और न ही उसे भूतकाल पर गर्व है। न वर्तमान को देखते हुए उत्साह और न भविष्य की गिरावट सम्बन्धी कोई आशंका। कारण स्पष्ट है। कठपुतली न अपने अभिनय पर गर्व करती है, और न पिटारी में बन्द कर दिये जाने की शिकायत। यदि वह समझ होती, तो निश्चित ही उसकी सोच यही होती कि वह बाजीगर की उँगलियों में बँधे हुए धागों से हलचल करने वाली लकड़ी की टुकड़ी मात्र है। उसे गर्व किस बात का होना चाहिए और अपने भविष्य की चिन्ता क्यों करनी चाहिए? यह काम बाजीगर का है। वही कोई गड़बड़ी होते देखेगा और तत्परतापूर्वक सुधारेगा। आखिर लाभ-हानि तो उसी का है। लकड़ी के टुकड़े तो निर्जीव एवं निमित्त मात्र है। मिशन के भविष्य के सम्बन्ध में भी हर किसी को इसी प्रकार सोचना चाहिए और निराशा जैसे अशुभ चिन्तन को पास भी नहीं फटकने देना चाहिए।

जहाँ तक हम दोनों की भावी नियति के बारे में भविष्य बोध कराया गया है, वह सन्तोषजनक और उत्साहवर्धक है। कहा गया है कि पिछले पचास वर्ष से हम दोनों “दो शरीर-एक प्राण” बनकर नहीं, वरन एक ही सिक्के के दो पहलू बनकर रहे है। शरीरों का अन्त तो सभी का होता है; पर हम लोग वर्तमान वस्त्रों को उतार देने के उपरान्त भी अपनी सत्ता में यथावत बने रहेंगे और जो कार्य सौंपा गया है, से तब तक पूरा करने में लगे रहेंगे, जब तक कि लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। युग परिवर्तन एक लक्ष्य है जनमानस की परिष्कार और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन उसके दो कार्यक्रम। अगली शताब्दी इक्कीसवीं सदी अपने गर्भ में उन महती सम्भावनाओं को संजोये हुए है, जिनके आधार पर मानवी गरिमा को पुनर्जीवित करने की बात सोची जा सकती है। दूसरे शब्दों में इसे वर्तमान विभीषिकाओं का आत्यंतिक समापन कर देने वाला सार्वभौम कायाकल्प भी कह सकते है। इस प्रयोजन के लिए हम दोनों की साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी वशिष्ठ-अरुन्धती स्तर की .... जिसका इन दिनों शुभारम्भ किया गया हैं पौधा लगाने के बाद माली अपने उद्यान को छोड़कर भाग नहीं जाता। फिर हमीं क्यों यात्रा छोड़कर पलायन करने की बात सोचेंगे और क्यों उस के लिए उत्सुकता प्रदर्शित करेंगे?

इस बीच छोटे से व्यवधान की आशंका रहती है, जो यथार्थ भी है। प्रकृति के नियम नहीं बदले जा सकते। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्धन और परिवर्तन होते रहना एक शाश्वत क्रम है। इस नियति चक्र से हम लोगों के शरीर भी नहीं बच सकते। बदन बदलने के समय में अब बहुत देर नहीं है। पर वस्तुतः यह कोई बड़ी घटना नहीं है। अविनाशी चेतना के रूप में आत्मा सदा अजर-अमर है। परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड-दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्म सत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहे। वही हम लोगों के लिए मत्स्य बेध जैसा लक्ष्यबेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जायगी और उसे तेल-बाती की पृथक सत्ताओं की एक ही लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा। इसे .... श्रद्धा का एकीकरण भी समझा जा सकेगा।

अभी हम लोगों के शरीर शान्ति-कुंज में रहते हैं। पीछे भी वे इस परिकर के कण-कण में समाये हुए रहेंगे। इसकी अनुभूति निवासियों और आगन्तुकों को समान रूप से होती रहेगी। पर इसका अर्थ यह न समझा जाय कि यह युग चेतना किसी क्षेत्र विशेष में सीमाबद्ध होकर रह जायगी। जब स्थूल शरीर ने समस्त विश्व की प्रतिमाओं को झकझोरा है और उन्हें प्रसुप्ति से उबार कर कर्म क्षेत्र में कुरुक्षेत्र में ला खड़ा किया है, तो यह हम लोगों की तृप्ति-तुष्टि और शान्ति का केन्द्र क्यों अपनी कक्षा छोड़कर किसी अन्य मार्ग को अपनायेगा। स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्ति हजारों-लाखों गुनी अधिक होती है। हम लोग कुछ आगे-पीछे एक ही मोर्चे पर एकत्व अपनाकर कार्यरत बने रहेंगे। अपनी अपेक्षा कार्यक्षेत्र को हजारों गुना बढ़ा लेंगे। सफलता भी अत्यन्त उच्चस्तरीय अर्जित करेंगे। हमारी प्रवृत्तियाँ मरेंगी नहीं, वरन् अखण्ड-ज्योति की बढ़-चढ़ कर अभिनव भूमिका सम्पन्न करेगी। इसलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न हम लोगों का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन, परिजन को होनी चाहिए मिशन तीर की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी। अखण्ड-ज्योति की ज्योति ज्वाला प्रेरणाप्रद लेखों में अबकी ही तरह भविष्य में भी प्राणवान बनी रहें, इसके लिए अगले बीस वर्षों के लिए अभी से सुनिश्चित संग्रह करके रख दिया गया है। सूत्र संचालकों ने इसमें पूरा सहयोग दिया है।


Quotation

यह विश्वास हमें बल देता है कि जीवन चाहे कितना ही कठिन हो, उसे हम अकेले ही जी रहे है और हमारे ऊपर नीचे और अगल-बगल में शाश्वत आत्मा के स्त्रोत है।

बहुधा जब हृदय शोक से विदीर्ण होता है, तब आत्मिक दृष्टि से हम जैसे जंगल में रहा भटके यात्री की तरह भटकते रहते है और राह पाने के प्रयत्न में पेड़ों और पत्थरों से टकराते फिरते है मगर रास्ता मिलता है आस्था से जो हमें कठिनाइयों के जाल से निकाल कर उस खुली सड़क पर पहुँचा सकता है, जिसकी हमें तलाश है।

हेलन केलर


जीवन साधना- एक सुयोग सौभाग्य

लोक व्यवहार में- अर्थोपार्जन में काम आने वाली शिक्षा स्कूलों में पढ़ाई जाती है। अनुभवी लोगों के संरक्षण में भी उसे सीखा जा सकता है, किन्तु व्यक्तित्व का विकास अपने आप में एक विशिष्ट विषय है। उसे यदि प्रवचन परामर्शों से सीखा गया होता तो अब तक न जाने कितने देव मानव विनिर्मित हो गये होते और उनके कारण वह समाज हर दृष्टि से समुन्नत हो गया होता। पर ऐसी शिक्षा के लिए स्वयं भी साधना करनी पड़ती है और दूसरे समर्थ लोगों का आश्रय भी लेना पड़ता है। इसके लिए उपयुक्त वातावरण और व्यक्ति की मनःस्थिति परिस्थिति के अनुरूप उपयुक्त मार्गदर्शन भी चाहिए। इससे कम में यह सम्भव नहीं कि किसी को अनगढ़ से सुसंस्कृत बनाया जा सके। गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से परिष्कृत स्तर का बनाया जा सकें। इसके लिए आत्म-सत्ता की .... को नये सिरे से सुधारने और सुविकसित करने की आवश्यकता पड़ती है।

मनुष्य की वास्तविक सत्ता वह नहीं है, जो शरीर रूप में चलती फिरती दीखती है। यह तो वाहन मात्र है। इसकी संचालक शक्ति अन्तराल की गहराई में सन्निहित रहती है। पेड़ की जड़ें जमीन में नीचे रहती है। खुली आँखें से दीख नहीं पड़ती। पर उन्हीं के कारण तना विनिर्मित होता है। पत्र पुष्प फल यों अलग से दीख पड़ते है, पर वस्तुतः उनकी उत्पत्ति एवं अभिवृद्धि जड़ों द्वारा पहुँचाई गई खुराक से ही होती है। दृश्य के पीछे अदृश्य काम करता है।

यों समझने को तो साधन और वैभव को ही सब कुछ समझा जाता है। उसी में लोग प्रसन्नता अप्रसन्नता अनुभव करते रहते है। उसी की साथ सफलता असफलता का सम्बन्ध भी जोड़ते है पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। शरीर स्वस्थ हो तो परिधान आभूषण सज्जा श्रृंगार सुशोभित होते है। यदि शरीर रुग्ण मलीन हो सुप्त स्थिति में हो या मर गया हो तो उन वस्त्राभूषणों से सुन्दरता का प्रयोजन .... इसी प्रकार परिस्थितियों की अनुकूलता भर से ओछा व्यक्ति न तो संतोष प्राप्त कर सकता है और न सम्मान ही उसके पल्ले पड़ता है। यहाँ शरीर को प्रधान और परिधान वैभव को गौण माना गया है। पर यदि और बारीकी से कुरेदा जाय तो मन संस्थान और अन्तःकरण की अगली परतें सामने आती है। मानसिक प्रखरता शारीरिक सुडौलता से भी बढ़कर है। मन भी अपने आप में पूर्ण नहीं, उसकी कल्पना और निर्णायक बुद्धि क्षमता अन्तःकरण के स्तर से प्रभावित होती है। भावना मान्यता, आस्था की गहराई इच्छा आकाँक्षा उत्पन्न करती है। उसी के आधार पर कल्पना उठती, इच्छा जगती और बुद्धि उसे पूरा करने का ताना बाना बुनती है। अन्तिम परिपाक क्रिया के रूप में होता है। क्रिया कलापों के आधार पर परिस्थितियों का निर्माण होना सर्वविदित है।

जहाँ तक सांसारिक जानकारियों का सम्बन्ध है उसे कानों से सुनकर आंखों से देख कर समझा जा सकता है। अन्य इन्द्रियाँ भी इस संदर्भ में सहायता करती है। यंत्र उपकरणों के सहारे भी इस स्तर की ज्ञानवृद्धि में कुछ काम चलता है, पर व्यक्तित्व का निखार परिष्कार इतने उथले प्रयत्नों के आधार पर नहीं बन पड़ता। यदि ऐसा हुआ होता तो सभी उच्च शिक्षित प्रतिभावान चरित्रवान संकल्पशील कर्मठ और आदर्शवादी रहे होते। तब स्कूल ही महामानव गढ़ दिया करते, पर ऐसा होता नहीं देखा गया। धर्मोपदेशक तक अपने कथन के विपरीत उलटा आचरण करते देखे गये है। उनमें से कितने ही तो प्रपंची अपराधी तक पाये गये है और कड़ी सजा भुगतते देखे गये है। सम्मान और विश्वास तो उनका .... ही जाता है।

आश्चर्य की बात है कि लोग अपनी सामान्य बुद्धि के मान्यता के विरुद्ध आचरण करते पाये जाते है। नशेबाज अपनी कुटैव को आमतौर से बुरा समझते है और उनके द्वारा होने वाली हानियों को भी प्रत्यक्ष देखते है, पर समझाने बुझाने सहमत होने पर भी उस लत को छोड़ नहीं पाते। ऐसी ही बात अन्य अनाचारों-दुर्व्यसनों के सम्बन्ध में भी देखी गई है। इन कुटेवों से घिरे हुए लोग उनका समर्थन नहीं करते, पर जब अवसर आता है तो वही करने लगते है जिसको कि कुछ समय पहले स्वयं बुरा बना रहे थे।

यही है मन संस्थान की गहरी परतें जिनमें भले बुरे संस्कार जड़ जमाकर बैठ जाते है और फिर समूचे व्यक्तिगत पर कब्जा कर लेते है। इस नागपाश से छूटने का कोई उपाय भी उनकी समझा नहीं आता। इसी कठिनाई के कारण सदुपदेश इस कान से सुने जाते पर उस कान से निकल जाते है। यहाँ तक कि उपदेष्टा तक अपने कथन प्रतिपादन के विरुद्ध स्वयं अनाचरण करते देखे गये है। यह असमंजस भरी स्थिति अन्तराल की गहरी परतों में कुसंस्कारों की जड़े जमी होने के कारण उत्पन्न होती है।

व्यक्तित्व के विकास के लिए शिष्टाचार का-व्यवहार कौशल का सामान्य ज्ञान अपने समीपवर्ती वातावरण से लिया जा सकता है। आमतौर से लोग प्रचलन का अनुकरण करते पाये गये है। रिवाजें आदतें इसी आधार पर अपनाई जाती है। फैशन एक दूसरे की देखा देखी ही फैल पड़ती है। इसी प्रकार सामान्य-जन भी अपने संपर्क क्षेत्र से ही प्रभावित होते और उसी प्रकार के आचरण करने लगते है। यह तो हुई सामान्य लोक प्रचलन की बात। पर समझना यह है कि गहराई में जमे हुए कुसंस्कारों को कैसे बदला सुधारा जाय और उनके स्थान पर उच्चस्तरीय सत्प्रवृत्तियों की बीजारोपण किस प्रकार किया जाय?

यह असामान्य कार्य है। इसके लिए असामान्य उपचार ....। भावना आस्था क्षेत्र को कारण शरीर या अन्तःकरण कहते है। भली-बुरी आस्थाएँ मान्यताएँ उसी में जमी होती है। इसमें परिवर्तन करने के लिए साधनाएँ करनी पड़ती है। अघोरी कापालिक ताँत्रिक साधनाएँ करते है और इस आधार पर दूसरों पर हावी होने में सफलताएँ प्राप्त करते है। अनर्थ करते भी देखे गये है। उनकी आस्था निम्न स्तर का बन जाती है। इसके विपरीत सात्विक साधनाएँ है जो अन्तःकरण की गहराई में जमे कुसंस्कारों को उखाड़ने के साथ-साथ उस भूमि में सुसंस्कारों का उत्पादन अभिवर्धन करती है। साधनाओं में जप और ध्यान प्रधान है। उनके साथ कई प्रकार की संयम-साधनाएँ-तपश्चर्याएँ भी जुड़ती है।

इसके आगे मध्यवर्ती मन संस्थान है। यही सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। इसके लिए किन्हीं समर्थों का प्राण अनुदान चाहिए। इसी को शक्तिमान भी कहते है। इसे हर कोई नहीं कर सकता। जिसमें स्वउपार्जित प्राण ऊर्जा प्रचुर मात्रा में हो वही सम्पन्नों द्वारा निर्धनों की सहायता किये जाने की तरह सम्बद्ध अनुचरों की सहायता कर सकता है। प्राणमय वातावरण में पहुँचकर सिंह और गाय अपनी पुरानी प्रकृति भूल कर निर्भयता और मैत्री अपनाते थे। गुरुकुलों के इसी अनुदान के कारण शिक्षार्थी नर-रत्न बन कर निकलते थे। पारस से छूकर लोहे का सोना बन जाना इसी प्राण प्रक्रिया का नाम है।

अतीन्द्रिय क्षमताओं की चमत्कारी सिद्धियाँ इसी क्षेत्र से प्राप्त होती है। दूरदर्शन दूरश्रवण विचार-संचालन भविष्य-कथन सम्मोहन जैसी परामनोवैज्ञानिक सिद्धियाँ भी इसी क्षेत्र का उत्पादन है। दूरदर्शी विवेकशील इसी भूमि में उपजती है। कल्पनाओं इच्छा-आकाँक्षाओं में परिवर्तन करने के लिए इसी भूमि को सँजोना पड़ता है। व्यक्तित्व की गलाई-ढलाई प्रायः इसी परिकर में होती है। सूक्ष्म शरीर की क्षेत्र यही है।

स्थूल शरीर काय कलेवर को कहते है। आदतें इसी में निवास करती है। तरह-तरह के अभ्यास इसी क्षेत्र में किये जाते है। इसे परामर्श मार्गदर्शन से भी प्रभावित किया जा सकता है। वातावरण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता देखा जाता है। जिस प्रकार का माहौल चारों ओर घिरा होता है। प्रायः सामान्यजन उसी प्रकार का क्रिया-कलाप अपना लेते है। यो शरीर आहार के आधार पर पुष्ट होता है पर उसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है। इसलिए शरीर और मन दोनों को साधने के लिए आहार-विहार की सात्विकता अपनानी पड़ती है और संयम बरतना पड़ता है। तप-तितीक्षा इसी को कहते है।

आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में एक कठिनाई और भी है कि कुकर्मों का पाप अन्तःक्षेत्र में भारी अवरोध बनकर जम जाता है। वह सुसंस्कारों के पैर जमने नहीं देता। दुष्परिणाम भुगतने के लिए अधोगामी प्रवृत्ति पनपाता रहता है। फलतः ऊर्ध्वगमन की सत्प्रवृत्ति को पकड़ सकने की बात बन ही नहीं पड़ती। इसके लिए एक ही उपाय है प्रायश्चित जिसके आधार पर खोदे हुए गड्ढे को पाटा जा सके। धुलाई के उपरान्त रँगाई ठीक तरह बन पड़ती है। जुताई के बाद खेत में अच्छी फसल उगती है। गलाई के बाद ढलाई होने का उपक्रम सर्वविदित है।

शांतिकुंज में 9-9 दिन के साधना सत्र निरन्तर चलते है। 1 से 9, 11 से 19, 21 से 29 का क्रम हर महीने चलता है। इन्हें जीवन साधना सत्र कहते है। जीवन विद्या ही पुरातन काल की संजीवनी विद्या है। इसमें शरीर तो पूर्ववत ही रहता है। पर व्यक्तित्व को परिष्कृत विकसित करने का उद्देश्य बहुत हद तक पूरा हो जाता है। कारण कि इस शिक्षण में मात्र परामर्श प्रवचन तक ही सीमित नहीं रहा जाता वरन शिक्षार्थी के तीनों शरीरों को स्वस्थ समुन्नत बनाने का प्रयत्न किया जाता है। इसी के अनुरूप दैनिक कार्यक्रम रहता है और साधनात्मक अनुशासन में इस अभीप्सा की बहुत हद तक पूर्ति होती है। वातावरण इस क्षेत्र का पहले से ही सुसंस्कारित है। वर्तमान प्रयत्नों से उसे और भी अधिक प्रखर बनाया जाता है।

गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की तप वाली सप्त धाराएँ यहीं है। यह पुरातन है। आधुनिक यह है कि यहाँ लम्बे समय से जलती आ रही अखण्ड ज्योति की स्थापना है, नित्य लाखों की संख्या में गायत्री जप होता है। 9 कुण्ड की यज्ञशाला में प्रतिदिन दो घण्टा यज्ञ होता है। कथा कीर्तन सत्संग आदि का दैनिक क्रिया-कलाप चलता है। इस सबके सहारे आश्रम के वातावरण में दिव्य तत्व भरे रहते है। तीर्थ सेवन अन्न क्षेत्र, अतिथि सत्कार गुरुकुल दातव्य चिकित्सालय जैसे पुण्य कार्यों से इस भूमि की पवित्रता निरन्तर बढ़ती ही जाती है।

आश्रम के संचालकों की सूक्ष्म सता को प्रखर प्रज्ञा और सजल श्रद्धा के रूप में जाना जाता है। उन्हें वशिष्ठ और अरुन्धती का युग्म भी माना जाता है। इनका प्राण प्रवाह आश्रम के कण-कण में छाया रहता है। आश्रमवासी जीवन दानी कार्यकर्ताओं की संख्या 250 के लगभग है। इनका साधु-ब्राह्मण स्तर का जीवन-यापन क्रिया-कलाप हर शिक्षार्थी को आदर्शवाद की प्रत्यक्ष प्रेरणा बनकर आँखों के सामने खड़ा रहता है।

यही सब आधार है जो जीवन साधना सत्रों में सम्मिलित होने वालों को अनायास ही प्रभावित करते है। प्रशिक्षण के जितने भी तंत्र है, उनमें वातावरण की प्रभावशीलता को सर्वोपरि माना गया है। शांतिकुंज का वातावरण ऐसा ही है। जिसमें व्यक्तित्व के परिष्कार की साधना ठीक प्रकार बन पड़ती है। यह कार्य घर के लोग व्यवहार सम्बन्धी उतार-चढ़ावों के बीच रहकर सम्भव नहीं हो सकता।

मानव जीवन भगवान का सबसे बड़ा वरदान है। जीने को तो जीव-जन्तु और पशु पक्षी भी मौत के दिन पूरे करते है। पर मनुष्यों को शरीर ही नहीं, अद्भुत मन संस्थान और दिव्य अन्तःकरण भी मिला हुआ है। इन तीनों के मिलन को त्रिवेणी संगम कहा जा सकता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रत्यक्ष अवतार भी। यह इस विश्व ब्रह्माण्ड का अनुपम वरदान एवं सुयोग है। यदि इस सम्पदा का सही प्रकार उपयोग किया जा सके तो बहुमुखी सफलताएँ-सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती है। स्वस्थ समुन्नत, प्रतिष्ठित, सम्पन्न एवं सफल जीवन जीने का अवसर मिल सकता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में सर्वोपरि समझी जाने वाली स्वर्ग और मुक्ति जैसी विभूतियाँ भी जीवन को सही रूप से जी लेने की कला जानने पर इसी लोक में इसी शरीर में उपलब्ध हो सकती है। जीवन साधना से बढ़कर और कोई सुयोग सौभाग्य है नहीं। इन्हीं की झलक झाँकी शांतिकुंज के जीवन साधना सत्रों में उपलब्ध होती है।


ईसा की विदाई (Kahani)

ईसा की विदाई का अन्तिम दिन था। उस रात उन्होंने अपने प्रमुख शिष्यों को बुलाया और सभी के पैर धोए।

शिष्यों ने इस पर आश्चर्य किया तो वे बोले- “जो तुम्हें पूजें उनके प्रति तुम भी पूज्य भाव रखना। क्योंकि वे ही तुम्हें श्रेय प्रदान करते हैं। ऐसा न हो कि सम्मान पाकर इतराओ और अहंकार के दबाव में अपनी श्रद्धा गँवा बैठो”।


सत्रों की रूपरेखा और प्रक्रिया

जीवन साधना, सत्रों की विधि-व्यवस्था, कार्यपद्धति एवं अनुशासन प्रक्रिया ऐसी है, जिसमें जकड़ जाने पर प्रत्येक शिक्षार्थी को वर्तमान को बदलने और भविष्य को उज्ज्वल बनाने में भारी सहायता मिलती है। कारण कि उसमें प्रवचन-सत्संग मात्र नहीं है, वरन ऐसी ऊर्जा जुड़ी है, जो बदलने और सुधारने के दोनों कार्य साथ-साथ सम्पन्न करती चलती है।

अन्तराल की गहराई तक पहुँचने के लिए साधना-विधान को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। उससे कषाय-कल्मष धुलते हैं और प्रसुप्त प्रखरता को उजागर होने का अवसर मिलता है।

इस हेतु नौ दिन का गायत्री पुरश्चरण हर किसी के लिए अनिवार्य है। इसमें प्रायः ढाई घण्टे जप करना पड़ता है। यह कई बार में भी थोड़ा-थोड़ा करके पूरा किया जा सकता है। ज पके साथ सूर्य का ध्यान भी जुड़ा हुआ है, जिसके कारण नाभिचक्र, हृदयचक्र, और ब्रह्मचक्र में दिव्य स्पन्दन होते है। मस्तिष्क और अन्तःकरण में प्रकाश प्रेरणा भरने का सुयोग बनता है। ध्यान-साधना इसके अतिरिक्त है। नित्य यज्ञ करना भी अन्तराल के विकास से सम्बन्धित है। इन सभी को अध्यात्म-साधना के रूप में जीवन साधना का एक अंग माना गया है। इससे अचेतन मन की गतिविधियों को ऊर्ध्वगामी बनने का अवसर मिलता है।

मानसिक परिष्कार के लिए संयम-साधना की तपश्चर्या की निर्धारण है। इस हेतु एक समय भोजन किया जाता है। भोजन आश्रम के भोजनालय में ही बनता है। यह परम सात्विक होता है। जिह्वा पर अंकुश रखने से इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का द्वार खुलता है। जो एक समय भोजन से संतुष्ट नहीं हो सकते, उन्हें दूध, फल आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। ऐसी फलाहारी वस्तुएँ भी समीप ही उपलब्ध हो जाती है। साथ ही प्रज्ञा कल्क सभी के लिए उपलब्ध है। इसमें दूरदर्शी विवेकशीलता जगाने वाली दिव्य वनौषधियों का सम्मिश्रण रहता है।

प्रायश्चित में अपने कुकृत्यों का विवरण संचालक को बताना पड़ता हैं। उसी के अनुरूप यह निर्धारण होता है कि इस पातक के बराबर पुण्य अर्जित किस प्रकार किया जाय, जिससे खोदी खाई पट सके। मन पर चढ़े बोझ को उतारने के लिए यह आवश्यक है। इसी आधार पर बोझ मुक्त होकर प्रगति के पर्वत पर ऊँचा चढ़ सकना सम्भव होता है। यह विधान ऐसा रहता है, जिसे स्थिति के अनुरूप वहन करने में असमंजस ने अड़े।

वातावरण का प्रभाव तो सहज ही हर किसी पर पड़ता है। तीर्थभूमि अपनी विशिष्टता अनुभव कराती है। इसके साथ-साथ संचित तप-साधना के भण्डार से इतना अनुदान मिलता है, कि परिष्कृत जीवन जी सकने के लिए आवश्यक बल और साहस मिल सके। यह शुभारम्भ ऐसा है, जिससे अतीन्द्रिय क्षमता का अवरुद्ध द्वार खुलता है, मूर्च्छित विभूतियों का जागरण सम्भव होता है, अपेक्षाकृत अधिक दूरदर्शी, अधिक विवेकशील बनने का सुयोग उपलब्ध होता है। नित्य गंगा स्नान बन पड़े, तो गंगा तट के पुण्य वातावरण में टहलने, बैठने, आचमन करने में कुछ अड़चन रहती ही नहीं। हिमालय के रूप में प्रकृति शिव का दर्शन तो आँखों के सामने घूमता ही रहता है। ऐसे स्थान पर ही बना है- शान्ति कुंज आश्रम। नित्य अखण्ड दीपक के दर्शन। भाव भरे संगीत का प्रभाती श्रवण। यह सभी मिलकर बिना शिक्षण के भी व्यक्तित्व के हर स्तर को झंकृत करते है।

प्रातः कालीन उपासना कृत्य से निवृत्त होने पर भोजन से पूर्व बौद्धिक प्रशिक्षण का क्रम चलता है। आरम्भ में संगीत, तत्पश्चात प्रवचन। इसमें प्रायः दो घण्टे लगते है। इन बौद्धिक कक्षाओं का विषय होता है- जीवन-साधना।

पेट प्रजनन के लिए तो कृमि−कीटक जीते है। मनुष्य जीवन बहु आयामी है। उसके साथ अनेकानेक कर्तव्य और उत्तरदायित्व जुड़े हुए है। उन्हें समझे और निबाहे बिना मानवी गरिमा को अक्षुण्ण नहीं रखा जा सकता। उसका काम निर्वाह भर के साधन जुटाने से ही नहीं चलता, वरन आगे बढ़ने ऊँचा उठने का उपक्रम बनाने की भी आवश्यकता पड़ती है। यह सब अपने आपे तक ही सीमित नहीं है। अपने परिवार, समुदाय, समाज को भी साथ लेकर अवगति से उबारना और प्रगति पथ पर आगे बढ़ना होता है। इसकी पृष्ठभूमि बनाने के लिए क्या सोचना और क्या करना चाहिए, यह एक ऐसा प्रसंग है जिसे देश की पंचवर्षीय योजना से भी अधिक महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए। उसके लिए गम्भीरतापूर्वक सोचना और निर्धारण करना चाहिए। यही सब कुछ जीवन साधना-सत्रों के बौद्धिक प्रशिक्षण में समाविष्ट किया गया है।

कथा पुराणों की तोता रटंत दुहरा देना सुगम है किन्तु समय के अनुरूप व्यावहारिक मार्गदर्शन करना कठिन। आज का व्यक्ति और समाज बुरी तरह कुरीतियों, अवांछनीयताओं से घिरा हुआ है। उस दल-दल से कैसे उबरा जाये? समग्र प्रगति का आदर्शवादी मार्ग कैसे अपनाया जाय। इसका ढाँचा और खाका प्रस्तुत कर सकना किस आधार पर सम्भव हो?

व्यावहारिक जीवन की कुछ समस्याएँ प्रमुख है जैसे शरीर को स्वस्थ कैसे रखा जाय? मन को किन सिद्धान्तों के धारण करने पर संतुलित प्रसन्न एवं उत्साह की स्थिति में रखे रहा जाय? उत्तेजना आशंका, भय, चिन्ता, उद्विग्नता से किस आधार पर बच सकना सम्भव हो? परिवार को किस प्रकार छोटा, स्वावलम्बी, सुसंस्कृत एवं समुन्नत बनाया जाय? सीमित आजीविका में भी किस प्रकार अभावग्रस्तता के कष्ट से बचे रहना सम्भव हो? शत्रुता का दबाव कैसे घटाया और मित्रता का परिकर कैसे बढ़ाया जाये? संकटों, उलझनों और विपत्तियों के झंझावात में अपनी सुरक्षा और सुव्यवस्था कैसे अक्षुण्ण रखी जाय? जीवन की दिशा धारा क्या हो? हँसती-हँसाती खिलती-खिलाती जिन्दगी किस प्रकार जियी जा सके? पारिवारिक स्नेह-सद्भाव बनाये रहकर आँगन में स्वर्ग कैसे उतारा जाय? विरोधी चिंतन और विरोधियों का सामना कैसे किया जाय? प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में कैसे बदला जाय? आत्म सुधार और आत्म विकास का उभय-पक्षीय क्रम किस प्रकार द्रुतगति से चल पड़े? चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश कैसे किया जाय? शान्ति से रहने और रहने देने के लिए क्या उपाय अपनाया जाय? देश, धर्म, समाज, संस्कृति एवं विश्व मानवता की सेवा साधना किस प्रकार बन पड़े? आदि आदि।

बौद्धिक प्रशिक्षण में इन्हीं समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया जाता रहेगा। साथ ही यह भी बताया जाता रहेगा कि शिविरार्थियों में से कौन अपनी वर्तमान स्थिति में उज्ज्वल भविष्य के निकट पहुँचने के लिए किस प्रकार क्या क्रमिक कदम बढ़ाये?

हर व्यक्ति की अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति होती है। उसकी कठिनाइयों और आवश्यकताओं की स्वरूप भी अपने-अपने ढंग का होता है। इसलिए हर किसी से उसे पूछा या लिखा कर लिया जाता है। साथ ही यह बताया जाता है कि उसे स्वयं क्या करना चाहिए और परोक्ष सहायता की कितनी आशा करनी चाहिए?

एक शब्द में इस प्रशिक्षण को व्यक्तित्व का विकास और प्रतिभा का विस्तार कहा जा सकता है। जीवन कला पर संजीवनी विद्या इसी तथ्य के इर्द-गिर्द घूमती और हर व्यक्ति को उसकी स्थिति के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करती है। यही प्रस्तुतीकरण इन सत्रों में होता है।

कुछ बातें ऐसी है, जिन्हें अपने से सम्बन्धित होते हुए भी स्वयं अनभिज्ञता रहती है। जैसे शारीरिक-मानसिक रोगों के सम्बन्ध में व्यक्ति स्वयं अधिक नहीं जानता। मात्र उनके कारण होने वाले कष्ट को ही समझता है। निदान और उपचार के लिए किसी अनुभवी चिकित्सक या विशेषज्ञ के पास जाना पड़ता है। स्थल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में विद्यमान अपूर्णताओं, विकृतियों एवं रहस्यमयी स्थिति के सम्बन्ध में भी यही बात है। जीवन साधना सत्रों का एक विभाग ऐसा भी है जिसमें विशेषज्ञों द्वारा शिविरार्थियों की अंतरंग स्थिति को बहुमूल्य उपकरणों द्वारा जाँचा परखा जाता है। उसी जानकारी के आधार पर उसे यह बताया जाता है कि अमुक से छुटकारा पाने के लिए उसे क्या करना चाहिए। उपचार की दृष्टि से क्या उपाय अपनाना ठीक रहेगा?

सत्रों में सम्मिलित होने के लिए इच्छुकों को आवेदन पत्र भेजना पड़ता है और स्वीकृति के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। आश्रम में स्थान सीमित है। उसमें सीमित लोग ही ठहराये जा सकते है। सीमितों के लिए ही भोजन व्यवस्था एवं शौचालय स्नानगृह आदि की गुँजाइश है। किन्तु इच्छुकों की संख्या सदा सुविधा की अपेक्षा कहीं अधिक रहती है। सम्मिलित होकर वापस लौटने वाले अपनी उपलब्धियों की दूसरों से चर्चा करते है। फलतः पत्रिकाओं के सदस्यों से बाहर के लोग भी आने की उत्कंठा प्रकट करते है। विवशता की स्थिति में प्राथमिकता उन्हीं को दी जाती है जो मिशन के साथ पहले से ही जुड़े रहे है। जिन्होंने अपनी जानकारी इस संदर्भ में अखण्ड-ज्योति युग निर्माण या युग शक्ति पत्रिकाएँ पढ़ते रहकर इस स्तर की बना ली है कि उन्हें निर्धारित विषयों के सम्बन्ध में अधिकाधिक जानकारी पहले से ही उपलब्ध रहे और शिक्षकों को प्रशिक्षण देने तथा साधना कराने में किसी प्रकार के असमंजस का सामना न करना पड़े।

शिक्षार्थियों को अपने सादे कागज पर लिखे आवेदन पत्र में निम्न बातों का उल्लेख करना चाहिए और उसे शान्ति-कुंज हरिद्वार के पते पर स्वीकृति के लिए भेजना चाहिए।

(1) किस मास के किस तारीख से चलने वाले 9 दिवसीय सत्र में आना चाहते है। (2) नाम एवं पूरा पता। (3) आयु (4) शिक्षा (5) व्यवसाय (6) सत्र के अनुशासन को पूरी तरह पालने का आश्वासन। (7) कोई छूत का रोग, असाध्य रोग या दूसरों को असुविधा उत्पन्न न होने का स्पष्ट उल्लेख।

सभी आगन्तुकों को अपने साथ मौसम के अनुरूप वस्त्र लेकर चलना चाहिए। अनपढ़, अनगढ़ भीड़ को तीर्थ यात्रा कराने के बहाने लेकर न चलें। बिना स्वीकृति के कोई भी न आवे। जिनका उद्देश्य पर्यटन है, वे न स्वयं चैन से बैठते है और न जो साथ लाये है उन्हें शिविर का उपक्रम पूरा करने देते है। अतएव ऐसे लोगों को साथ लेकर न चलने का प्रतिबन्ध ठीक ही लगाया गया है और आशा की गई है कि शिविरार्थी उसे समुचित महत्व देंगे और निर्धारण का पालन करेंगे।

अखण्ड-ज्योति जिन तथ्यों को लेख रूप में स्वाध्याय के लिए प्रस्तुत करती रही है, उन्हीं को क्रियात्मक रूप से अभ्यास से उतारने के लिए इन जीवन सत्रों की व्यवस्था की गई है। इसे प्रस्तुतीकरण का व्यवहार पक्ष भी कह सकते है और उच्चस्तरीय सत्संग भी। इनका लाभ उठाने के लिए अखण्ड-ज्योति के परिजनों को समय रहते लाभ उठाना चाहिए। सूत्र संचालकों की प्रत्यक्ष उपस्थिति न रहने पर शिविरों की प्रशिक्षण प्रक्रिया में कुछ तो कमी आवेगी ही।


Quotation

बड़े होने के लिये यह काई बात नहीं है कि मनुष्य को बड़े अधिकार ही मिलें, वरन दूसरों के अधिकार की प्रतिष्ठा करना ही मनुष्य का कर्तव्य है। कर्तव्य-निष्ठा का मूल्य इसलिये अधिक है कि इससे मानव मात्र की सेवा होती है। एक छोटे से क्षेत्र में भी मनुष्य यदि अपने कर्तव्य-कर्मों का मनोयोग पूर्वक पालन करता है तो इसका प्रभाव समस्त समाज पर पड़ता है।

जिन जातियों ने कर्तव्य-निष्ठा का मूल्य समझा और उसे बाह्य-जीवन में निभाया है, वे इस संसार में सदा सम्पन्न रही है। सभी से उन्हें सम्मान भी मिला है। भूलकर जिन्होंने यह समझ लिया है कि सम्मान उनकी सम्पन्नता को मिला। वे गलत रास्ते पर भटक गये। पर कर्तव्य-निष्ठा का जिन्होंने अनुकरण किया है वे आगे बढ़े है। लोगों ने उनकी जागृति को सर झुकाया है। इतिहास के पन्नों में जिनकी कीर्ति प्रकाशित हुई है उन्होंने अपना कर्तव्य जरूर निभाया होगा।

हम क्या करें? यह पूछने की अपेक्षा किस तरह करें? यह पूछना अधिक सही है। क्योंकि कर्म तो दुष्कर्म भी हो सकते है, किन्तु उदात्त दृष्टिकोण से काम करने पर कहीं कुछ कलुष नहीं है। देखने में लगता है लाभ दूसरे को हुआ किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से कर्तव्य पालन के कारण वस्तुतः मनुष्य का निजी हित ही अधिक होता है। कर्म का उपहार जो किसी भी भौतिक लाभ की तुलना में श्रेष्ठ ठहरता है।


पत्राचार विद्यालय भी

पुरातन काल में डाक व्यवस्था न थी। तब किसी को किसी से मिलने के लिये स्वयं जाना पड़ता था। परामर्श विचार-विनिमय का तब कोई और रास्ता न था। वह समय चला गया। अब सम्पन्न लोग तार टेलीफोन से और गरीब लोग पोस्टकार्ड लिफाफों से अपना काम भली प्रकार चला लेते है। घर बैठ कहने पूछने की आवश्यकता पूरी कर लेते है।

स्कूली पढ़ाई का बहुत कुछ कार्य कुँजियों तथा गाइड बुकों ने हल कर दिया है। अब तो पत्राचार विद्यालय ही नहीं विश्व-विद्यालय तक खुल गये है। जिनके सहारे कोई भी उच्चशिक्षा प्राप्त करता है। रेडियो टेलीविजन नई प्रकार की जानकारियाँ अपने कार्यक्रमों में देते रहते है।

इस संचार सुविधा का लाभ शांतिकुंज द्वारा व्यक्तित्व विकास योजना को अग्रगामी बनाने के लिये भी किया जा रहा है। यह दो प्रकार से सम्पन्न हो रहा है। एक तो जन-जन को उनकी मन स्थिति के अनुरूप वहीं पत्र द्वारा मार्गदर्शन देकर दूसरा उन्हें वातावरण के प्रकम्पनों से लाभान्वित कराने हेतु गायत्री तीर्थ आने का आमंत्रण देकर। जिसकी जैसी स्थिति हो वैसा निर्धारण हो जाता है।

मिशन की पत्रिकाओं के ग्राहक अनुग्राहक पाठक–प्रपाठक मिलकर 50 लाख से भी अधिक व्यक्ति संपर्क क्षेत्र की परिधि में बँध गये है। इन सभी की अपनी-अपनी समस्यायें कठिनाईयाँ, एवं जिज्ञासायें होती है, जिनका समाधान वे किसी अनुभवी प्रामाणिक व्यक्ति या तंत्र से कराना चाहते है। इस हेतु लम्बी यात्रा करने में बहुत समय और धन खर्चने की स्थिति हर किसी की नहीं होती। फिर विचार विनिमय क्रम सुविधापूर्वक किस प्रकार चले? इसका एक ही उत्तर है- पत्र व्यवहार। कुछ परिजनों को मिशन के सूत्र संचालकों से पूछना होता है। साथ ही कुछ ऐसा भी रहता है। जिसके लिए मिशन की ओर से परिजनों को प्रोत्साहित किया जाये। उन्हें उपयुक्त समय पर उपयुक्त परामर्श पत्र-व्यवहार तंत्र को प्रखर बनाये बिना और किसी प्रकार होता ही नहीं।

सत्र-शिविरों में प्रशिक्षण के लिये सुविधा अनुसार थोड़े-थोड़े लोग ही आ पाते है। हर किसी से हर समय इतनी दूर यात्रा करके पूछताछ करने की सुविधा कहाँ होती है फिर हो भी तो वर्ष में कुछ हजार लोगों को ही आने की स्वीकृति मिल पाती है। आश्रम में स्थान भी तो सीमित है। फिर व्यक्तिगत परामर्शों के लिये उन सबके लिये सुविधा कहाँ से जुट पाये? भाषण, प्रवचन सुना देना एक बात है और उलझी गुत्थियों को सुलझाने के लिये उपयुक्त मार्गदर्शन करना उलझनों के स्तर के अनुरूप समाधान कर सकना सर्वथा दूसरी। इन कारणों को देखते हुए प्रधान मार्ग एक ही रह जाता है कि समाधान सुलझाने के लिए पत्र व्यवहार का ऐसा तंत्र खड़ा किया जाय, जिसके माध्यम से अनेकों को उनकी उलझनों से उबारा जा सके। प्रगति का व्यावहारिक मार्ग सुझाया जा सके।

शांतिकुंज में जीवन साधना सत्र और सरकारी कर्तव्य निष्ठा सत्र अपने-अपने ढंग से चलते रहते है। इन सब में मिलकर सीमित लोग ही तद्विषयक प्रशिक्षण प्राप्त कर पाते है। जो बच जाते है। उन्हें भी बहुत कुछ पूछना जानना होता है। कई बार पेचीदगियाँ इतनी विषम होती है कि उनके लिये सही निष्कर्ष तक पहुँचना कई-कई बार के पत्र व्यवहार से ही सम्भव होता है। यह प्रसंग ऐसा होता है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। उसे टाला भी नहीं जा सकता। जहाँ टालना हो वहाँ परिवार कैसा? स्वजनों तक की उपेक्षा करने पर तो सौजन्य तक की इतिश्री हो जाती है।

स्थिति का गम्भीरतापूर्वक विवेचन करने के उपरान्त शांतिकुंज में पत्र-व्यवहार का एक स्वतन्त्र विभाग स्थापित किया गया है। इसमें मात्र आये हुए पत्रों के उत्तर ही नहीं दिये जाते वरन् जीवन्त लोगों में प्राण प्रेरणा भरते हुए और अधिक कर्तव्य परायण बनने के लिये बहुत कुछ अपनी ओर से भी कहा जाता रहता है।

सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि पचास लाख स्वजनों के साथ पत्र-व्यवहार द्वारा सघन संपर्क बनाये रहने और उन्हें उपयुक्त मार्गदर्शन करने के लिये कितनी अधिक चिट्ठियाँ पढ़ी और कितनी अधिक लिखी जानी चाहिए। निश्चय ही इसका परिणाम बढ़ा-चढ़ा ही होना चाहिए।

शांतिकुंज में प्रतिदिन प्रायः एक हजार पत्रों की आवक-जावक बनी रहती है इसके बढ़े-चढ़े कार्य विस्तार को देखते हुए सरकार को “शांतिकुंज” नाम से एक स्वतन्त्र सत्र पोस्ट ऑफिस भी खोलना पड़ा है जिसके माध्यम से मात्र मिशन से सम्बन्धित डाक ही आती जाती है। इस प्रयोजन को हाथों हाथ निपटाते रहने के लिये आमतौर से 6 दर्जन कार्य कर्ताओं को जुटा रहना पड़ता है। परामर्श मार्गदर्शन का ढाँचा तो सूत्र संचालक ही बनाते है पर लिपिबद्ध करने में उस विभाग के कार्यकर्ताओं को श्रम ही काम करता नियोजित होता है।

अखण्ड-ज्योति पत्रिका मथुरा की प्रेस से छपती है। उसका प्रभाव विस्तार अपनी जगह है पर हरिद्वार का पत्र व्यवहार तंत्र अपनी भूमिका इस प्रकार निभाता है कि उसे पत्रिका द्वारा मिलने वाले शिक्षण की तुलना में किसी भी प्रकार कम विस्तृत और कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। सामान्यतया सभी परिजन अपने पत्रों के साथ जवाबी लिफाफा भेजते है ताकि मार्गदर्शन क्रम सुनिश्चित रूप से चलता रहे एवं मिशन पर आर्थिक बोझ न आये। पत्रिका वितरण सम्बन्धी पत्राचार अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा एवं विषय वस्तु तथा व्यक्तिगत समस्याओं संगठन सम्बन्धी पत्र-व्यवहार शांतिकुंज परिवार से चलता है।

मिशन के साथ परिजनों की पारिवारिकता के स्तर पर घनिष्ठता बनाये रहना और उनके सम्बन्ध सूत्र को सघन बनाये रहना उन आधारों में से प्रमुख है जिनके कारण युग चेतना का इतना व्यापक विकास हो सका। उज्ज्वल भविष्य का ढाँचा खड़ा हो सका।

शांतिकुंज के सम्बन्ध में आरम्भ से ही यह कल्पना ओर योजना थी कि इसे नालन्दा एवं तक्षशिला स्तर का विश्वविद्यालय बनाया जाये। भले ही उनके जैसे इतने भव्य भवन न बनें। भले ही उसमें उतने अधिक छात्रों अध्यापकों के लिए स्थान तथा निर्वाह की व्यवस्था न हो पर प्रशिक्षण का आधार एवं स्तर वही हो। इन कल्पनाओं ने अपना साकार स्वरूप बनाया है और शुभारम्भ के दिनों उपजी योजना ने अपना व्यावहारिक ढाँचा खड़ा किया है।

सत्रों में सम्मिलित होने वाले मिशन के कार्यकर्ता तथा सरकारी अधिकारी तो अपने-अपने स्तर की शिक्षा प्राप्त करते ही है साथ ही आश्रम के कार्यकर्ताओं की टीम भी सेवा कार्यों में संलग्न रहने के साथ-साथ अपनी योग्यता बढ़ाने तथा भावनाओं को परिपोषण करने वाली विधि व्यवस्था में अभ्यस्त होती रहती है। सभी कार्यकर्ताओं को न्यूनतम वह शिक्षा मिलती है। जिसके सहारे वे अगले दिनों अधिक बढ़े-चढ़े कार्यों में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें।

बच्चों के लिए अलग से गायत्री गुरुकुल है। जिसे सरकारी मान्यता भी प्राप्त है। उसमें शिक्षा-विद्या का निर्धारित पाठ्यक्रम तो पूरा कराया ही जाता है। इसके अतिरिक्त अलग से उन्हें वह सब कुछ बताया, कराया जाता है। जिससे नूतन पीढ़ी के नव-निर्माण का लक्ष्य पूरा हो सके।


सूर्य का सिर (Kahani)

“दिन भर आपको धूप दी, आपके पुत्र-पौत्रों को प्रकाश और गर्मी प्रदान की और आप है कि मुझे थोड़ी ही देर में विदा कर रहे हैं, कुछ अधिक देर रहने देते तो आपका क्या बिगड़ जाता” ढलते हुए सूरज ने मुस्कराते हुए क्षितिज के पास लिखित उलाहना भेजा।

गम्भीर क्षितिज स्याही लेकर उत्तर लिखने बैठे तो कुल एक पंक्ति से आगे नहीं बढ़ सके, प्रातः के प्रकाश में सूर्य ने उसे पढ़ा। लिखा था- “ इसलिये कि तुम हर बार एक नई चमक, नई रोशनी लेकर आओ और पहले से भी अधिक प्रकाश फैलाओ।”

सूर्य का सिर श्रद्धा से नीचे झुक गया।


लोक शिक्षण के बहु आयामीय प्रयोग!

ऋषियों की कार्यपद्धति में प्रधानतया लोक-शिक्षण की प्रक्रिया जुड़ी रही है। देवात्मा हिमालय को उसी का केन्द्र माना जा सकता है। दृश्य अदृश्य जगत में उन्हीं के द्वारा दिव्य चेतना का अजस्र अनुदान दिया जाता रहा है। उसी दिव्य सत्ता का प्रतीक केन्द्र गायत्री तीर्थ है जिसे शान्ति कुंज के नाम से जाना जाता है। वह भी कलेवर भर है उसमें प्राण-चेतना का संचार उसी उद्गम से होता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप में अखण्ड-ज्योति में सन्निहित प्राण-ऊर्जा कहा जा सकता है। इस माध्यम से उसी प्रशिक्षण की सर्वांगपूर्ण व्यवस्था होती है जिसे लोक-शिक्षण, जनमानस का परिष्कार, व्यक्ति निर्माण प्रतिमा संवर्धन आदि के रूप में देखा जाना जाता है। इसे ऋषि-परम्परा का निर्वाह भी समझा जा सकता है। अब तक की प्रगति का पर्यवेक्षण करते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि यह दैवी चेतना की अनुकृति है, जिसका श्रेय भले ही किन्हीं मनुष्य देहधारियों को मिलता हो।

शिक्षण की कई विधाएँ हैं और वे एक दूसरे की पूरक है। समस्त अवयवों के मिलने से एक सम्पूर्ण काया बनती है। इसी प्रकार दिव्य शिक्षण की गंगा में अनेक छोटी-बड़ी सरिताएँ मिलकर उसे सुनियोजित-सुसम्पन्न बनाती है। उन सहायक धाराओं में से स्वाध्याय और सत्संग का उल्लेख पिछले पृष्ठों पर किया जा चुका है। स्वाध्याय की सर्वांगीण एवं सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए युग साहित्य की एक हजार से ऊपर छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखी गई और छपी है। उनका अनुवाद, प्रकाशन देश की अधिकाँश भाषाओं में हुआ है। यह प्रवाह अभी रुका नहीं है अखण्ड-ज्योति पत्रिका उद्बोधन की प्रमुख धारा है। वह पढ़ने के बाद किसी कोने में फेंक नहीं दी जाती; पर पन्ने फट-टूट जाने पर भी सम्बन्ध बनाने वालों में न बुझने वाली प्राण प्रेरणा फूँकती रहती है। यह स्वाध्याय पक्ष हुआ।

सत्संग के लिए बहुत बड़े समारोह, सम्मेलनों को अब बन्द कर दिया गया है; क्योंकि उनसे उत्साह भर उभरता है, पारस्परिक विचार-विनिमय के लिए समय ही नहीं मिला पाता। इसके बिना सत्संग धमाल भर बन कर रह जाता है। नई नीति-गोष्ठियाँ आयोजित करके विचार-विनिमय की परामर्श की है। इसके लिए शान्ति-कुंज में 500 प्रज्ञा परिजनों का जीवन-साधना प्रशिक्षण दस-दस दिनों के खण्डों में पूरे वर्ष भर चलता है और उसे सदा-सर्वदा जारी रखने का योजनाबद्ध चिरस्थायी निर्धारण है। सरकारी कर्मचारियों के लिए संस्थागत कार्यकर्ताओं के लिए प्रायः एक-एक सप्ताह के प्रशिक्षण शिविर अलग से लगते है। उसके लिए निवास भोजन, प्रवचन कक्ष आदि की सुव्यवस्था इसके अतिरिक्त रखी गई है। वह धारा भी इन दो वर्षों में आशाजनक सत्परिणाम लेकर बहती रही है। योजना यह है कि समस्त भारत के सत्ता-सम्पन्नों को इसी प्रकार अगले बीस वर्ष तक कर्तव्यनिष्ठ और लगन भरी ईमानदार सेवासाधना का पाठ पढ़ाते हुए उनकी क्षमता एवं प्रतिभा को बढ़ाते हुए नवसृजन में महती भूमिका निभाने के लिए कटिबद्ध किया जाय।

अखण्ड-ज्योति कार्यक्षेत्र अब तक हिन्दी भाषियों तक रहा है। अब अगले ही दिनों उसे इसी रूप, कलेवर, एवं चिन्तन से ओत-प्रोत रखते हुए भारत की सभी भाषाओं में प्रकाशित किया जाये। ऐसा ही सर्वतोमुखी साहित्य प्रकाशन तंत्र भी खड़ा किया जाय। आवश्यकता पड़ने पर उसे विकेन्द्रित करते हुए बहुक्षेत्रीय भी बनाया जा सकता है।

संपर्क क्षेत्र में ज्ञान गोष्ठियों की अभिनव योजना बनी है। लक्ष्य का प्रतीक यज्ञ को कहा जाता रहा है। यज्ञ अर्थात् निजी जीवन में पुण्य और सामाजिक क्षेत्र में परमार्थ। इस प्रतीक को स्थिर रखा जाय, ताकि उसे उद्घोष के रूप में दृश्यमान रखा जा सके और उस आकर्षण के सहारे अधिक लोगों को उनकी श्रद्धा-भावना उभारते हुए उन्हें सहज एकत्रित किया जा सके। इसके उपरान्त उन्हें मन स्थिति और परिस्थिति के अनुरूप अधिक प्रगतिशील बनाने के लिए संकल्पशील व्रतबद्ध किया जा सके। यही है उन्हें रचनात्मक कामों में समय लगाते रहने के लिए वचन बद्ध करने का उपाय। यही है संक्षेप में दीप यज्ञ प्रक्रिया जो आर्थिक दृष्टि से नितान्त सस्ती दृश्य की दृष्टि से नितान्त मनोरम और विचारशीलों को एकत्रित करने के लिए चुम्बक जैसी प्रक्रिया है। सौ रुपये जैसी स्वल्प पूँजी में सौ कुण्डी यज्ञ हो जाता है और उन वेदियों पर प्रायः 400 याजक आसानी से बैठ सकते है। एक घण्टे में यज्ञीय कर्मकाण्ड के हर पक्ष पर प्रेरणाप्रद व्याख्या करते हुए और दो घण्टे का ज्ञान यज्ञ जिसमें संगीत और प्रवचन दोनों का समावेश रहता है। पूरा कार्यक्रम तीन घण्टे में निपट जाता है। प्रातः 7 से 10 तक। जहाँ रात्रि अनुकूल पड़ती हो वहाँ समय आगे-पीछे करके वैसी व्यवस्था भी बन जाती है। यह बड़े सत्संगों की बात हुई जिसमें हर दिन प्रात-सांय व्यवस्था जुटती रहे तो दोनों मिलकर 800 व्यक्ति युग-चेतना का आलोक उपलब्ध करते रह सकते है। उन्हें बौद्धिक नैतिक और सामाजिक प्रगति का पक्षधर बनाया जा सकता है। यह सब तेजी स चल पड़ा है और अगले दिनों उनकी गतिशीलता निश्चित रूप से तीव्र होगी। इस आधार पर लोक-मानस का लक्ष्य प्राप्त करने में बड़ी सीमा तक अग्रगामी बना जा सकता है। इस अभियान की लपेट में सारे सारे जनसमुदाय को समेटा जा सकता है। समेटा भी जा रहा है।

बात व्यक्ति निर्माण और परिवार निर्माण की आती है। उसके लिए एक कुण्डी दीप यज्ञ हर घर परिवार में किये जा रहे है। थाली में पाँच गुच्छे अगरबत्तियों के पाँच छोटे घृत दीप बस इतना भर है कर्मकाण्ड का समग्र सरंजाम जिसका खर्च एक घण्टे के आयोजन में एक रुपया आत है। यह धार्मिक एवं श्रद्धासिक्त वातावरण बनाने के लिए है। साथ ही इस माध्यम से यह शिक्षण सम्पन्न होता है कि कोई भी व्यक्ति अपने यहाँ या पड़ोस में छोटा-बड़ा दीप यज्ञ सम्पन्न कराने के कर्मकाण्ड का अभ्यस्त हो सकें। व्यापक प्रसार कार्य सस्ते में हो सके और धर्म श्रद्धा के साथ जुड़ा होने के कारण उत्साहवर्धक प्रतिफल भी उपस्थित कर सके।

हर परिवार में दीप यज्ञ होने के पीछे यह उद्देश्य सन्निहित है कि उस परिवार की बहुमुखी प्रगति के लिए परिस्थितियों के अनुरूप पथ-प्रदर्शन किया जा सके। इसमें व्यक्ति और समाज निर्माण के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला जाना सम्भव है। परिवार वस्तुतः व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती कड़ी है। यदि परिवार को सुसंस्कृत और प्रगतिशील बनाया जा सके तो उसके दोनों सिरे स्वयमेव सभ्य सुसंस्कृत एवं समुन्नत बनते चले जायेंगे। अग्निहोत्र के अवसर पर उपस्थित रहने वाले हर किसी को एक अभ्यस्त बुराई छोड़ने और एक अधूरी सत्प्रवृत्ति को पूर्ण-परिपक्व करने का व्रत लेना पड़ता है। यही है वह कारगर कदम जिसके सहारे पतन को निरस्त और उत्थान को गतिशील परिपुष्ट बनाया जा सकता है।

आशा की गई है उपरोक्त दीप यज्ञ माध्यम को अपना कर सामूहिक आयोजन और परिवार गोष्ठी आयोजन समर्थ बनाये जा सकेंगे। घर-घर में अलख जगाने का गाँव-गाँव नवयुग का संदेश पहुँचा सकने का उद्देश्य थोड़े ही समय में पूरा किया जा सकेगा। इस आधार पर आदिवासियों के झोपड़ों से लेकर सुसम्पन्नों के घर-बँगलों तक पहुँचा जा सकेगा। उन्हें समय की चुनौती से अवगत कराने-उसे स्वीकार करने के लिए सहमत किया जा सकेगा। शिक्षण की यह एक नवीनतम दिशा धारा है।

प्रौढ़शिक्षा बाल -संस्कारशाला श्रम सेवा स्वास्थ्य-संवर्धन कुरीति उन्मूलन के लिए खड़ा किये जाने वाले रचनात्मक, कार्यक्रम अपने साथ एक सशक्त विचार धारा भी भरे रहते है। जिसे क्रिया करते-करते साथ संक्षेप में, किन्तु अतिप्रभावशाली ढँग से समझा-समझाया जा सकता है।

रेडियो-टेलीविजन की इन दिनों बड़ी धूम है। उनके प्रसारण करोड़ों लोग सुनते है, किन्तु विवशता यह है कि उन पर पूरी सरकारी नियंत्रण है। वहाँ तक पहुँच बनाना और युग-चेतना के प्रसारण की आवश्यकता समझाना कठिन है। ऐसी दशा में अपने स्वल्प साधनों पर सीमित रहने के अतिरिक्त फिलहाल कोई और चारा है नहीं। वर्षा बरसने की प्रतीक्षा में नियत कर्म किये बिना बैठा रहता है। अपने उपलब्ध साधनों से ही हर कोई काम चलाता है। महँगे थियेटरों और सिनेमाघरों का बोलबाला होते हुए भी कठपुतलियों का तमाशा अभी भी जीवित है। करोड़ों की लागत वाले सरकस अपनी जगह मुबारक, पर बाजीगर मदारियों की बिरादरी अभी भी छोटे ग्रामीणों का मनोरंजन करते हुए अपना निर्वाह व्यवसाय चलाती ही रहती है। हमें भी उनसे प्रेरणा क्यों नहीं लेनी चाहिए।

रेडियो की आँशिक आवश्यकता टेप और टेप रिकार्डर पूरी करते है। उनमें प्राण फूँकने वाले युग-संगीत का समावेश किया जा सकता है। नवजीवन का संचार कर सकने वाले प्रवचन भरे जा सकते है। कभी ग्रामोफोनों की धूम थी। शक्तिशाली लाउडस्पीकर बजते थे और कर्ण भेदी कोलाहल होता था। उतना न बन पड़े, तो हर्ज नहीं। टेप रिकार्डर झोली में डाल कर घर-घर जाया जा सकता है। अलावों-चौपालों पर एकत्रित दस पाँच की भीड़ को भी इन टेप रिकार्डरों द्वारा पारंगत प्रतिभाओं का गायन एवं भाषण सुनाया जा सकता है। इस प्रक्रिया को अपनाने के लिए सभी प्रज्ञापुत्रों को उत्साहित किया गया है। टेप पुराने हो जाने पर उन्हीं पर नये अंकन करा लेने की शान्ति-कुंज में व्यवस्था बनी हुई है। इसे स्वल्प साधन वालों को छोटा घरेलू रेडियो स्टेशन कहा जा सकता है। यह युग निर्माण योजना के अंतर्गत चल रहा है और आगे उसे और भी अधिक प्रोत्साहन मिलेगा।

टिटहरी ने समुद्र से अंडे वापस लेने के लिए चोंच से बालू भर कर पाटने और अपना प्रण पूरा करने की हठ ठानी थी और समुद्र न पट सकने पर भी वह अण्डे वापस लेने में सफल हुई थी। गिलहरी का उदाहरण भी ऐसा ही है। वह अंगद-हनुमान नल-नील जैसी समर्थ तो नहीं थी, फिर भी उसने स्वल्प सामर्थ्य को दाँव पर लगा कर सेतु बाँधने के लिए अपने बालों में भर कर बालू पहुँचाई थी। युग बदलने का समय कब आयेगा? यह तो नहीं कहा जा सकता; पर यह निश्चित है कि अखण्ड-ज्योति और उसका समूचा परिकर इस प्रयास के लिए अपने आपको समर्पितों की श्रेणी में खड़ा करेगा कर रहा है।

वरिष्ठ प्रचार माध्यमों से दूसरा सशक्त माध्यम है-दूरदर्शन। अपने हाथ उतनी ऊँचाई छू सकने जितने तो नहीं है, पर सस्ता उपकरण वीडियो अपना लिया गया है। उस पर लोकशिक्षण के समस्त आवश्यक आधारों को फिल्माया गया है। गायन अभिनय संवाद, कथानक, प्रवचन, रचनात्मक कार्यक्रमों का स्वरूप उसी के कैसेटों में भर दिया गया है। अनीति अवाँछनीयता, मूढ़मान्यता, कुरीतियाँ जैसी विकृतियों के उन्मूलन का स्वरूप एवं परिणाम भी कथानक रूप में इन्हीं वीडियो कैसेटों में अंकित रहता है। मूर्धन्य लोकसेवियों के लोक संदेश भी इन्हीं कैसेटों पर टेप कर लिये जाते है, इन्हें शान्ति-कुंज के प्रवचन हाल में तो आगन्तुकों को दिखाया ही जाता रहता है।, इसके अतिरिक्त अपना वीडियो कैसेट लाने वालों के लिए उसकी नकलें उतार दी जाती है। इन दिनों वीडियो छोटे देहातों में भी पहुँच चुके है। गली-मुहल्लों में भी वी. सी. पी. मिल ही जाते है। इस प्रकार घर में बैठकर थोड़े- से आदमी भी इन्हें सुनते रहते है और दूरदर्शन प्रदर्शन की आवश्यकता छोटे रूप में पूरी करते रहते है। यही है लोक शिक्षण के अनेकानेक प्रयोग जिन्हें अखण्ड-ज्योति का पौत्र शान्ति-कुंज अपने ढंग से पूरा करता रहता है।


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आप जिस रास्ते चल रहे है, वह सँकरा है और प्रतिकूल परिस्थितियों के तीखे आघात प्रतिक्षण आपको परेशान कर रहे हैं, उस समय भी अपना धैर्य मत खोइये। आपके भीतर जो एक चैतन्य शक्ति समाई हुई है, वही आपका प्रकाश, पथ-प्रदर्शक और साथी है। उस पर विश्वास करते हुए आगे बढ़ते चलिए, विपरीत परिस्थितियाँ आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकेंगी।

याद रखिये- आपके संकल्प में उतनी जीवट है जितनी समुद्र के हाहाकार में। उसके आगे कोई आँधी, कोई तूफान आपकी राह न रोक सकेगा। अन्धकार में भी आपको प्रकाश मिलेगा, अकेलेपन में भी आपका साहस स्थिर रहेगा, पर अपने अडिग विश्वास को खोइये मत।

विश्वास है कि आप आगे बढ़ेंगे। उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ेंगे। देश जाति और धर्म का उच्च-आदर्श भावी-पीढ़ी के आगे रखेंगे। सब कुछ करने का .... स्त्रोत आपके अन्दर छिपा हुआ है। इस शक्ति को जगाने का उपक्रम कीजिये। अपनी शक्तियों पर विश्वास कीजिये- आपका भविष्य कीर्तिमान होकर आ रहा है।

-जापान के गाधा “कागावा”


वनौषधि विज्ञान का पुनर्जीवन!

शरीर वनस्पतियों का ही रूपांतरण है। अन्न, शाक, फल, दूध, शहद, शक्कर आदि वनस्पतियों से ही बनते है। वायु में पोषक आक्सीजन वनस्पतियों का ही उत्पादन है। इन्हीं के आधार पर मनुष्य जीवित रहता है। यहाँ तक कि माँस भी शाकाहारी प्राणियों के ही खाने योग्य होता है। जिन वनस्पतियों से शरीर बना है उनमें कतिपय प्रकार के रासायनिक तत्व होते है। उनमें कतिपय प्रकार के रासायनिक तत्व होते है। इनका संतुलित मात्रा में बने रहना सुदृढ़ स्वस्थता का आधार है। आहार-विहार मौसम चोट असंयम आदि के कारण जब रुग्णता आ घेरती है तो विश्लेषण करने पर पता चलता है कि शरीर में कहीं रासायनिक संतुलन बिगड़ गया। विषाक्तता इसी कारण उत्पन्न होती है। विकृतियों के लक्षण उभरने का यही कारण है।

गड़बड़ियों को सुधारने के लिए बिगड़े हुए रासायनिक संतुलन को बनाना पड़ता है। इसमें निष्कासन और अभिवर्धन के दोनों ही पक्ष कार्यान्वित करने होते है। इन प्रयोजनों के लिए वनस्पतियों का आश्रय लेना ही कारगर सिद्ध होता है। यों शरीर में खनिज, लवण, तरल, स्निग्ध, प्रोटीन आदि कई प्रकार के पदार्थ पाये जाते है; पर वे अवयवों में टिकते, रमते तभी है जब वनस्पतियों से उन्हें उपलब्ध किया जाय। यदि इन्हें अन्य माध्यमों द्वारा शरीर में प्रवेश कराया जाय तो वे टिकते नहीं। संरचना उन्हें खदेड़ कर बाहर फैंक देती है। उदाहरण के लिए अन्न-शाक आदि में रहने वाला क्षार ही पचता है। यदि उसे खनिज रूप में प्राप्त करके शरीर ठूँसा जाय तो वह मल, द्वारों से स्वेद साँस आदि से होकर बाहर निकल जायेगा। अवयवों पर उन्हें खदेड़ने का अनावश्यक भार पड़ेगा। खनिज लवण पचता नहीं। यही बात अन्य रसायनों के सम्बन्ध में भी है। यदि उन्हें रोग निवारण अथवा पौष्टिकता अभिवर्धन के लिए प्रयुक्त किया जाता है, तो सही मार्ग यही है कि उन्हें वनस्पतियों के माध्यम से ही प्राप्त किया जाय। सफाई और पुष्टाई के सम्बन्ध में उन्हीं का उपयोग कारगर सिद्ध होता है। अन्य माध्यमों से अपनाई गई चिकित्सा प्रणाली क्षणिक चमत्कार भले ही दिखा दे। उनका स्थाई एवं उपयोगी प्रभाव नहीं हो सकता। अस्तु शारीरिक दुर्बलता एवं रुग्णता का निवारण करने के लिए ऐसी वनस्पतियाँ ढूंढ़नी पड़ती है जो कमियों को पूरा कर सकें। विषाणुओं का दमन कर सके।

प्रकृति की यह महत्ती कृपा है कि हर प्राणी को उसकी आवश्यकताओं को पूरा कर सकने वाले माध्यम उसी के निकटवर्ती क्षेत्र में उपस्थित कर दिये है साथ ही वे ऐसे भी है जिन्हें थोड़े श्रम से आसानी के साथ ढूंढ़ा जा सके। अन्य प्राणी तो धन कहाँ खर्च कर सकते हैं? उनके पास तो मात्र श्रम की ही सम्पदा है। इसी के सहारे जीवधारी शरीर संकट खड़ा होने पर अपना उपचार आप कर लेते है। उन्हें किन्हीं चिकित्सकों का भी आश्रय नहीं लेना पड़ता।

देखा गया है कि पेट में गड़बड़ी उत्पन्न होने पर वन्य प्राणी एक विशेष प्रकार की घास ढूंढ़ कर खाते है और कुछ ही देर में वमन कर देते है। न्यौले के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध है कि जब उसे विषैले साँप से लड़ना होता है तो विष नाशक बूटी ढूंढ़ कर उसे खाना और दंश का विष उतारता रहता है। अन्य प्राणी भी रुग्ण होने पर इसी विद्या को अपनाते है। वनस्पतियों में अगणित गुण तत्व भरे पड़े है। मधुमक्खियाँ फूलों से ही शहद जैसा रसायन खींचती और जमा करती रहती है।

महर्षि चरक ने अपना समूचा जीवन शिष्य मण्डली को साथ लेकर विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनौषधियों का अन्वेषण प्रयोग-परीक्षण किया था। उस आधार पर उन्होंने यह प्रत्यक्ष कर दिखाया कि रुग्णता और दुर्बलता से वनौषधियों के सहारे भली प्रकार निपटा जा सकता है। वे बिना मूल्य आस-पास खोजने पर ही मिल जाती है। मात्रा प्रयोग की सीमा और अनुपान व्यवस्था ही किसी अनुभवी से जाननी पड़ती है। इस सुविधा के होते हुए भी किसी निर्धन को यह शिकायत करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए कि वह पैसे के अभाव में उपयुक्त चिकित्सा न करा सका।

प्राचीन काल के ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जिनमें शरीर संकट को वनस्पतियों के आधार पर हटाया जा सका। प्रसिद्ध है कि लक्ष्मण जी पर मेघनाद ने अमोघशक्ति शस्त्र का प्रहार किया था और वे प्रायः मरणासन्न स्थिति में पहुँच गये थे। उपचार के लिए सुषेण वैद्य बुलाये गये उसने बताया कि संजीवनी बूटी लाई जा सके तो प्राण बच सकते है। हनुमान जी उस पर्वत को ही उखाड़ लाये। सुषेण ने संजीवनी पहचानी और उसे पिला कर लक्ष्मण जी को प्राण संकट से बचाया। इसी प्रकार का एक उदाहरण च्यवन ऋषि का भी है। वे जराजीर्ण हो चुके थे। नेत्र ज्योति गँवा चुके थे। उन्हें पुनः यौवन प्रदान करने के लिए अश्विनी कुमारों ने एक वनस्पति योग प्रदान किया जिससे उनकी वृद्धावस्था युवावस्था में बदल गयी। उसी घटना का स्मरण दिलाते हुए तब से ही च्यवनप्राश अवलेह जनसाधारण के लिये वैद्यों द्वारा उपलब्ध कराया जाता रहा है।

कभी काया कल्प का प्रचलन था। उसमें जीर्ण कोशाओं को नवीनता में बदल दिया जाता था और उस प्रयोग को करने वाले साँप के दंश को उतार कर स्फूर्तिवान बना जाने जैसा लाभ उठाते थे। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि पड़ौस के खेत मैदानों में बिना मूल्य उपलब्ध होने वाले इस प्रकृति के दिव्य अनुदान को ठुकराया गया और इंजेक्शनों, कैप्सूलों, टॉनिकों, एन्टीबायोटिकों पर लोग बुरी तरह टूट पड़े। चकाचौंध में बुद्धि भ्रम बढ़ा और उसे डाक्टरों ने पूरे उत्साह के साथ बढ़ाया। यह नहीं समझा, समझाया गया कि इस तीव्र उत्तेजक और मारक उपचार के पीछे क्या प्रतिक्रिया होती है? रोग तो समयानुसार चला जाता है पर विषाक्त औषधियों की प्रतिक्रिया जीवन भर तक एक नई व्याधि बन कर पल्ला पकड़ लेती है। उसे छोड़ने का नाम नहीं लेती। उपचार कराने वाले नये-नये कष्ट, व्यथाएँ साथ लेकर लौटते हैं।

इस व्यापक भ्रम जंजाल से कैसे निकला जाय? रुग्णता से ही नहीं दुर्बलता से भी कैसे छुटकारा पाया जाय। इसका सरल बिना जोखिम का बिना खर्च का, उपाय क्या खोजा जाय? इसका उपाय एक ही हो सकता है कि ऋषि परम्परा का पुनर्निरीक्षण किया जाय और वनौषधि विज्ञान को पुनर्जीवित किया जाय।

यों आयुर्वेद प्रणाली के ज्ञाता न्यूनाधिक रूपों में काष्ठौषधियों का भी प्रयोग करते हैं। पर देखा गया है कि वे ऐलोपैथी की दवाओं की तुलना में ठहरती नहीं, वैसा प्रभाव नहीं दिखाती। फलतः चिकित्सकों का भी उत्साह ठण्डा होता है और रोगी भी उन्हें लेने से नाक भौं सिकोड़ते हैं। इसी उपेक्षा के बढ़ते-बढ़ते मूर्धन्य चिकित्सक आयुर्वेद को “तीर-तुक्का” तक कह गुजरते है। इस असमंजस भरी स्थिति में हर भारतीयता के प्रति स्वाभिमान रखने वाले को चोट पहुँचती है। शासन के क्षेत्र में हम स्वतन्त्र जरूर हुए, पर भाषा के क्षेत्र में, चिन्तन के क्षेत्र में विशेषतया चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान के क्षेत्र में हम अभी भी पराधीन परावलम्बी बने हुए है। अपना कुछ ऐसा बन पड़ा जिस पर सिर गर्व से ऊँचा किया जा सकता। चिकित्सा के क्षेत्र में तो यह स्थिति और भी अधिक चिन्ता जनक है। देश में 75 प्रतिशत निर्धन बसते है। देहातों में रहते है और छोटे साधन रहित गाँवों में रहकर किसी प्रकार गुजर करते है। वहाँ न अस्पताल है और डाक्टर। हों भी तो उनकी तगड़ी फीस और दवाओं की महँगी कीमत कहाँ से जुटाई जाय? इस विवशता की स्थिति में असंख्यों असहाय रह कर रुग्णता से पीछा नहीं छुड़ा पाते और मौत के मुँह में चले जाते है। इस प्रकार अकाल मृत्यु की कल्पना करने मात्र से सिहरन उत्पन्न होती है।

समस्या का समाधान क्या होना चाहिए? इस सम्बन्ध में विचार करने पर एक ही प्रकाश किरण आशा बँधाती है कि किसी प्रकार वनौषधि-विज्ञान का पुनर्जीवन हो चुका होता तो कितना अच्छा होता। जीवन-मरण जैसी एक महत्ती समस्या का समाधान निकल आता। इस संदर्भ में कठिनाई एक ही है कि शुद्ध रूप में वनौषधियाँ मिल सकना अति दुर्लभ हो गया है। पंसारियों की दुकानों पर बीसियों वर्ष पुरानी जड़ी बूटियाँ मिलती है, जबकि उनका गुण एक बरसात निकलने पर समाप्त हो जाता है। नकली शकल सूरत वाली घास पातों की भी भरपूर मिलावट होती है। पकने पर वनस्पतियों को लाया जाना चाहिए; पर नई, कच्ची, पुरानी, सूखी भी उसी ढेर में सम्मिलित करके बेचने वाले लाते है। उन्हें उपयुक्त खाद पानी न मिलने पर उपयुक्त गुणों का समावेश नहीं हो पाता इन कठिनाइयों के रहते उपलब्ध वनौषधियों में से अधिकाँश गुणहीन और अप्रामाणिक होती है। तब वे अपना प्रभाव उस स्तर का कैसे दिखाये? जैसा कि उनके सम्बन्ध में शास्त्रों में वर्णन है।

मात्र चिन्ता करना और दुर्भाग्य को कोसना पर्याप्त नहीं। इसके लिए कारगर उपाय करने की आवश्यकता थी। उसके लिए साहसिक कदम शान्ति-कुंज ने उठाया है। अपने निजी उद्यान में इसका प्रयोग आरम्भ किया है। देश के विभिन्न क्षेत्रों से दुर्लभ किन्तु अतीव गुणकारी औषधियों .... और इस स्थिति तक पहुँचाया गया है जिसमें से इस संदर्भ में हुए ऋषि प्रतिपादनों को सत्य सिद्ध करके दिखा सकें। इस दिशा में उठे कारगर कदमों से महर्षि चरक जैसों को सच्ची श्रद्धांजलि भी हो सकती है और उसे आयुर्वेद के पुनर्जीवन जैसा नाम भी दिया जा सकता है। यों अभी शान्ति-कुंज और ब्रह्मवर्चस का वनौषधि उद्यान छोटा है, पर प्रयत्न यह चल रहा है कि उसके लिए किसी बड़े फार्म की व्यवस्था की जा सकें। जहाँ से पौध और बीज समूचे देश में भेज सकने और गाँव-गाँव जड़ी-बूटी उद्यान उगाने का प्रबन्ध हो सके। इस प्रयत्न की सफलता पर देशवासियों की स्वास्थ्य रक्षा का एक अति महत्वपूर्ण आधार खड़ा हो सकेगा। तब निर्धनता किसी को भी अकाल मृत्यु का ग्रास न बनने देगी और न किसी को साधनों के अभाव में रुग्णता की व्यथा लम्बे समय तक सहन करते रहने के लिए विवश होना पड़ेगा। वनौषधियों के चमत्कारी गुणों से अवगत होने और उसका सही रीति से उपयोग कर सकने की सुविधा होने पर अपना निर्धन देश चिकित्सा क्षेत्रों में परदेशी पराधीनता से भी मुक्ति पा सकेगा और आरोग्य संवर्धन स्वास्थ्य संरक्षण के सम्बन्ध में महत्ती सफलता प्राप्त कर सकेगा। शुद्ध सही सार्थक और जीवन्त वनस्पतियाँ यदि बोई, बढ़ाई और उपलब्ध की जा सकें तो समझना चाहिए कि देश आरोग्य के सम्बन्ध में स्वावलम्बी हुआ। इसे भी स्वतंत्रता संग्राम का एक पक्ष माना जा सकता है। उन लाभों से भी लोकहित साधन का एक महत्वपूर्ण द्वार खुल सकता है।

अस्पताल-दवाखाने खोल देना एक बात है। उन्हें अर्थ सुविधा के आधार पर सरकारी गैर-सरकारी तौर पर कहीं भी खोला और साज-सज्जा से भरपूर बनाया जा सकता है। किन्तु यदि औषधियाँ उपयुक्त गुण वाली न हुई तो उन भव्य भवनों से भी क्या बात बनी। इसी प्रकार यदि तथाकथित उच्च शिक्षा प्राप्त चिकित्सकों की भर मार तो हुई, पर उनके खर्चीले ठाट-बाट को पूरा करने के लिए उपयुक्त फीस चुकाने का प्रबन्ध न हो सका तो उसका लाभ मात्र धनिकों को ही मिलेगा। निर्धन तो उनके इर्द-गिर्द चक्कर काटते, हसरत भरी निगाहों से देखते और निराश ही वापस लौटते है। आवश्यकता इसी वर्ग को राहत देने की है। दरिद्रनारायण कहलाने वाले बहुमत वाला वर्ग ही ऐसा है, जिसे भारत का वास्तविक रूप समझा और उसके लिए गम्भीरतापूर्वक प्रयत्न किया जाना चाहिए।

अखण्ड-ज्योति के पौत्र शान्ति-कुंज ने वनौषधि अनुसन्धान का जो कार्य हाथ में लिया है उसकी अपनी विशेषता है। इसलिए उसे अपने ढंग का अनोखा भी कह सकते है। कारण कि यहाँ इस उत्पादन के साथ प्रयोग परीक्षण भी चलता रहता है। अभी बाहर के रोगियों की बहुत बड़ी सेवा कर सकने की व्यवस्था तो नहीं बनी है। पर आरम शिविरार्थियों और स्थाई कार्यकर्ताओं की प्रायः एक हजार जितनी उपस्थिति से भरा रहता है। उन्हें सुयोग्य चिकित्सकों के तत्वावधान में रुग्णता निवारण के लिए जड़ी-बूटी उपचार से लाभान्वित किया जाता है। जो परिणाम सामने आये है, उन्हें देखते हुए यह विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि यदि इस दिशा में अधिक कार्य हो सका तो देश की ही नहीं विदेशों की भी समस्त मानव जाति की रोग निवारण समस्या का समाधान हो सकेगा। इसे एक शब्द में आरोग्य का पुनर्जीवन भी कर सकते है।


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आनन्द बाँटा जा सकता है, क्योंकि उसे लेने के लिये अनेकों तैयार है। दुःख का वितरण करके अपना बोझ घटाना कठिन है, क्योंकि उसे लेने के लिये कोई तैयार नहीं।


सर्वांगपूर्ण स्वास्थ्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

यदि किसी भवन की नींव कमजोर हो, तो वह अधिक समय तक अपना अस्तित्व नहीं रख पाता। शहतीर में घुन लगा हो तो वह शीघ्र ही खोखला हो टूटकर आ गिरता है। लगभग यही तथ्य आज मनुष्य समाज पर भी लागू होता है, जब हम सर्वांगपूर्ण स्वस्थ समुदाय की परिकल्पना करते है। जीवनी-शक्ति के क्षीण होते चले जाने एवं चिन्तन की विकृति के कारण मनुष्य निरन्तर खोखला होता चला जा रहा है। मौसम में तनिक-सा बदलाव भी उसे अस्वस्थ कर चिकित्सक की शरण में जाने को विवश कर देता है। चाहे कितनी ही बहुमूल्य औषधियाँ प्रयुक्त की जाय, खोये स्वास्थ्य को लौटाने की कोई सूरत नजर आती नहीं। रोग हेतु जीवाणु, विषाणु को दोष देना व्यर्थ है। जब अपना भीतर का ढाँचा ही जीर्ण-शीर्ण है तो कितने ही एंटीबायोटिक्स प्रयोग कर लिये जायँ, टॉनिक ले लिये जायँ, कुछ परिवर्तन नहीं आने वाला। उल्टे संश्लेषित रसायनों के घातक परिणाम और दृष्टिगोचर होते है।

ऐसा क्यों हुआ व स्वास्थ्य को लौटाने के निमित्त क्या कुछ किया जाय? इस पर विचार करते है तो लगता है प्रगति की इस घुड़दौड़ में आपाधापी में हमसे कहीं कुछ भूल हुई है। वह है- चिरपुरातन आयुर्विज्ञान पद्धति की वनौषधि चिकित्सा पद्धति की अवहेलना-अवमानना। ब्रह्मवर्चस ने गतवर्षों में यही प्रयास-पुरुषार्थ किया है कि सर्वोपलब्ध अपने प्राकृतिक रूप में विद्यमान वनस्पतियों के द्वारा साध्य एवं असाध्य सभी रोगों के उपचार पक्ष पर आज की परिस्थितियों को सामने रखते हुए शोध-अनुसंधान किया जाय। आधुनिक यंत्र उपकरणों द्वारा औषधीय पौधों का रासायनिक विश्लेषण कर उनकी विशिष्टताओं को जानने एवं रोगों का निदान कर विभिन्न व्याधियों के लिये भिन्न-भिन्न वनौषधियों के एकौषधि एवं सम्मिश्रण प्रयोग यहाँ किये गये है कि रुग्ण मानव जाति के लिये एक सुरक्षित चिकित्सा पद्धति को अभी भी पुनर्जीवित किया जा सकता है।

वृक्ष-वनस्पतियों को आर्ष ग्रन्थों में मध्ययोनि प्राप्त देव पुरुष कहा गया है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में ऋषि कहते है कि “जो परमात्मा जल में है, अग्नि में हैं, समस्त लोकों में समाविष्ट है, जो औषधियों में है, सभी वृक्ष-वनस्पतियों में है, उस परमात्मा को हमारा नमस्कार है।”

वस्तुतः वनस्पतियाँ अपने आप में पूर्ण है। उनमें विद्यमान यौगिक, क्षार, रसायन, खनिज उन्हें इस तरह परिपूर्ण बनाते है कि उन्हें किसी रोग विशेष में दिए जाने पर अपने गुण-कर्मों के आधार पर वे लाभ ही दिखाती है, किसी प्रकार का दुष्परिणाम देखने को नहीं आता। वैज्ञानिकों ने पाया है कि औषधीय पौधों के अंग-अंग में जो कार्यकारी घटक विद्यमान होता है, वह अपने साथ दुष्प्रभावों को निरस्त करने वाले यौगिक भी साथ लिये होता है। इस तरह “प्रोटागोनिस्ट” एवं “एण्टागोनिस्ट” दोनों एक ही औषधि में विद्यमान होते है। किसी तरह के साइट इफेक्ट्स के होने की आशंका हो तो यह सम्मिश्रण उसे निरस्त कर देता है। पत्तियों, त्वक, फलों, पुष्पों, बीज, जड़ों व कन्द आदि के रूप में जहाँ-जहाँ जो घटक अधिक मात्रा में सक्रिय रूप में हों, उनका उपयोग आयुर्वेद में वर्णित चिकित्सा-पद्धति के अनुसार किया जाता है।

शांतिकुंज के सूत्र संचालकों ने पूरे आयुर्वेद में से मात्र वनस्पतियों काष्ठौषधियों को ही क्यों चुना? क्या रस-भस्म प्रकरण व अन्यान्य योगों के प्रयोग निरर्थक है? इस प्रश्न का उत्तर कुछ शब्दों में इस प्रकार के अस्तित्व में आने के अनुमानित सहस्त्रों वर्षों में जो भी उपचार सूत्र ऋषि-मनीषियों द्वारा दिये गए है, उनमें से नब्बे प्रतिशत में विशुद्धतः वनौषधियों का प्रयोग हुआ है। यही आयुर्वेद का प्राण है। कोई भी पौधा धरती पर ऐसा नहीं है, जिसमें औषधीय गुण न हों। चिर पुरातन काल में आधि-व्याधियों का सामूहिक उपचार वनौषधि-यजन द्वारा उन्हें सूक्ष्मीकृत कर वाष्पीकृत स्थिति में औषधीय घटकों द्वारा किया जाता था। यह वैदिक एवं वैदिकोत्तर काल की प्रमुख चिकित्सा पद्धति थी। कालान्तर में इन्हें सूक्ष्मीकृत रूप में चूर्ण रूप में मुख से भी दिया जाने लगा। ताजा स्थिति में कल्क स्वरस के रूप में प्रयोग होता था। यह तो गत दो सहस्त्राब्दियों में परिवर्तन आया है कि आयुर्वेद में मोदक पाक अवलेह आसव अरिष्ट के रूप में विभिन्न योग प्रयुक्त होने लगे। बाद में रस शास्त्र भी साथ में जुड़ा व इस प्रकार एक सर्वांगपूर्ण चिकित्सा-पद्धति की नींव डाली।

वनौषधियों की सही पहचान न होना परिपक्व स्थिति में कहाँ उपलब्ध होगी? यह जानकारी न होने से पंसारी के यहाँ से वर्षों पुरानी घुन लगी औषधियाँ प्रयुक्त होने से उनका प्रभावहीन बन जाना साध्य व असाध्य रोगों में तुरन्त लाभ इनसे नहीं होता इस भ्रान्ति का जनमानस में संव्याप्त होना- ये कुछ ऐसे कारण है जिनकी वजह से लोग सामान्यतया तत्काल परिणाम दिखाने वाली एलोपैथी की शरण में जाते है। घातक दुष्परिणाम सहन करते हुए भी वे एलोपैथी की गोलियाँ, कैप्सूल व इंजेक्शन्स पर निर्भर होते चले जा रहे है। यह चिकित्सा पद्धति महँगी भी है। हमारे देश की विपन्न परिस्थितियों को देखते हुए वनौषधियों का प्रचुर भण्डार विद्यमान होते हुए भी महँगी दवाओं की शरण में जाना न तो तर्क सम्मत कहा जा सकता है न ही व्यावहारिक। किन्तु ऐसा हो रहा है व इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। आवश्यकता थी कि जन साधारण को इन दिव्य वनौषधियों के लाभों से परिचित कराया जाय, सही औषधि कौन सी है व कब-किस स्थिति में कब तक लाभ दिखाती है यह विज्ञान की भाषा में समझाया जाय।

शान्ति-कुंज-ब्रह्मवर्चस की प्रयोगशाला में विभिन्न उपकरण वनौषधियों की जाँच पड़ताल, शुद्धा–शुद्ध परीक्षा एवं रासायनिक विश्लेषण हेतु लगाये गए है। वनस्पति विज्ञान में एक ही जाति-प्रजाति की परस्पर मिलती जुलती कई औषधियाँ होती है। इनमें से कौन सी प्रभावकारी है एवं जिस नाम से प्रचलित है उसमें सही की पहचान क्या है इसके लिये विशद अध्ययन की आवश्यकता है साथ ही अनुभव की भी। इसके लिये संसार भर में वनौषधियों पर की जा रही शोध से सतत संपर्क बनाये रख विभिन्न ग्रन्थों विश्वकोषों एवं पत्रिकाओं को मँगाते रहने का यहाँ प्रबन्ध है। “स्टीरियोमाइक्रोस्कोप” “डिसेक्िटग माइक्रोस्कोप”, “माइक्रोटोम” इत्यादि उपकरणों द्वारा वनौषधि-पंचांगों का विस्तार से अध्ययन किया जाता है। प्रयोग परीक्षण हेतु इन्हें यहीं उगाया जाता है तथा चिकित्सा प्रयोग हेतु वितरण के लिये हिमालय एवं शिवालिक पर्वत की तलहटी एवं ऊँचाई पर उगने वाली औषधियों को एकत्रकर शुद्ध गंगाजल से धोकर छाया में सुखाया जाता है। किस मौसम में किस औषधि को एकत्र किया जाना चाहिए। इसका पूरा ध्यान रखते हुए औषधियों को वाँछित समय में एकत्रकर छाया में सुखाकर सूक्ष्मीकृत चूर्ण के रूप में आर्द्रतारहित स्थान पर रख कर सुरक्षित कर लिया जाता है। इस समय से लेकर इनके गुण, कर्म प्रभाव की क्षमता मात्र 6 माह से 12 माह तक की होती है। यह पहला ऐसा स्थान है जहाँ आयुर्वेद की औषधियों पर पैकिंग का दिनाँक एवं उनके गुणहीन हो जाने की तिथि उनके लेबिल पर अंकित कर दी जाती है। इस मामले में एलोपैथी वाले ही ईमानदार हैं जो कि हर औषधि की “एक्सपायरी डेट” लिख देते है। इस प्रामाणिकता को यदि आयुर्वेद में प्रयुक्त किया जा सका होता तो इस पर जो आक्षेप उठाया जाता है वह न उठता। इस दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम शोध संस्थान द्वारा उठाया गया है।

“गैस-लिक्विड क्रोमेटोग्राफी” उपकरण द्वारा वनौषधियों को सूक्ष्मीकृत स्थिति में वाष्पीकृत तथा चूर्ण के जल-सत्व भाग का विश्लेषण कर यह जाना जाता है कि इनमें कौन-कौन से कार्यकारी घटक है। जो गुण शास्त्रों में विभिन्न संहिताओं में वर्णित हैं क्या उनकी .... घटकों के प्रभाव से मेल खाती है? यह इस प्रयोगशाला में देखा जाता है। कम्प्यूटर युक्त इस यंत्र में एक चार्ट पर विभिन्न एल्केलॉइड्स क्षार खनिजतत्व तैलीय तत्वों की उपस्थिति का अनुपात अंकित होता चला जाता है। इस परीक्षण से सही औषधि के चुनाव में बड़ी मदद मिलती है। “थिन लेयर क्रोमेटोग्राफी” एवं “कालम क्रोमेटोग्राफी” द्वारा भी औषध पौधे के विभिन्न अंशों में कार्यकारी घटक की स्थिति देखी जाती है।

अभी तक शान्ति-कुंज की प्रयोगशाला ने लगभग 100 औषधियों को उनके प्रयुक्त होने वाले अंश के रूप में उपलब्ध कराया है। यह या तो चूर्ण रूप में है या तैल-तत्व के रूप में। अब इन्हें आयुर्वेद के आसव-अरिष्ट-अवलेह के रूप में भी उपलब्ध कराने की योजना है। इससे एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि औषधि की कार्यक्षमता 1 वर्ष से बढ़कर 3 से 5 वर्ष तक की हो जाती है। जन-साधारण को मुखमार्ग से लेने में भी सुविधा होगी।

“रिजनल रिसर्च लेबोरेट्री” (जम्मू एवं भुवनेश्वर), “फाँरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट” देहरादून एवं “सेण्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट” तथा “सेण्ट्रल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिसिन एण्ड एरोमेटिक प्लाण्ट्स (सिमप)” लखनऊ ने पौधों के विश्लेषण में महत्वपूर्ण कार्य किया है। किन्तु रासायनिक विश्लेषण के बाद उन्हें किस रूप में जन-साधारण के प्रयोग हेतु बनाया जाय। इस सम्बन्ध में सभी दिग्भ्रांत है। 2800 से लेकर 3000 पौधों की परिपूर्ण जाँच के बाद भी ये सभी विशुद्ध आयुर्वेदिक रूप में कोई औषधि जन-साधारण को उपलब्ध नहीं करा पाये है, जो कि इन्हें स्थापित किये जाने के पीछे प्रमुख प्रयोजन था। यदि रसायनों को अलग कर उन्हें संश्लेषित कर एलोपैथी फार्म में बनाया जाने लगे तो उसके वही दुष्परिणाम होंगे जो कि आज लगभग सभी आधुनिक औषधियों के साथ देखे जाते हैं। वही हो भी रहा है।

रस-भस्मों का शोधन-एवं निर्माण एक विशिष्ट समय साध्य क्रिया-पद्धति द्वारा सम्भव हो पाता है। उतना समय आज किसी के पास नहीं है। सभी प्रगति की घुड़ दौड़ में द्रुतगति से भाग रहे है। ऐसे में शुद्ध हानि रहित रूप में रस-भस्म उपलब्ध कराना तो दूर की बात है। जो बाजार में विभिन्न योग उपलब्ध है, उन्हें लिये जाने पर गुर्दे त्वचा एवं लीवर को जो हानि पहुँचती है, उसके सैंकड़ों केस प्रतिवर्ष एलोपैथी के चिकित्सकों के पास पहुँचते देखे जाते है। इस विडम्बना से बचने के लिए ही नितान्त सुरक्षित वनौषधि विधा को ही “अखण्ड-ज्योति” द्वारा हाथों में लिया गया है क्योंकि वे सर्व सुलभ हैं जाती स्थिति में कल्क के रूप में सूखी स्थिति में चूर्ण के रूप में कभी-भी ली जा सकती हैं।

अभी तक मधुमेह मिर्गी चिंता अवसाद उच्चरक्तचाप हृदयरोग, रक्तावरोध त्वचा के विकारों पेट की व्याधियों तपेदिक एवं दमा जैसी विभिन्न आधि-व्याधियों के लिए विभिन्न औषधियों पर अनुसंधान यहाँ सम्पन्न किया गया है। वनौषधियों का भांडागार विशाल है। अभी तो और भी औषधियों व रोगों पर प्रयोग किये जाने है। शान्ति-कुंज एक सेनेटोरियम नहीं है। यहाँ तो मात्र प्रयोग परीक्षण कर शास्त्रोक्त औषधियों को शुद्ध रूप में जन साधारण को उपलब्ध करा दिया जाता है। अभी तक लक्षाधिक व्यक्ति लाभान्वित हुए है। मूल उद्देश्य है आयुर्वेद का पुनर्जीवन एवं जन-जन की जीवनी शक्ति का अभिवर्धन। इसे कितनी सफलता मिली है। इसे स्वयं अपनी आँखें से देख कर स्वयं तथा औरों को लाभान्वित किया जा सकता है।


ध्यान में मग्न (Kahani)

महाराज युधिष्ठिर ध्यान में मग्न हुए वन में बैठे थे। ध्यान से उठे, तो द्रौपदी ने कहा- “धर्मराज! इतना भजन आप भगवान का करते है, इतनी देर तक ध्यान में बैठे रहते हैं, फिर उनसे यह क्यों नहीं कहते कि इन संकटों को दूर कर दे? इतने वर्ष से आप और दूसरे पाँडव वन में भटक रहे है। इतना कष्ट होता है? इतना क्लेश! कहीं पत्थरों पर रात्रि व्यतीत करनी पड़ती है, कहीं काँटों में! कभी प्यास बुझाने को पानी नहीं मिलता, कभी भूख मिटाने को खाना नहीं। फिर आप भगवान से क्यों नहीं कहते कि इन कष्टों का अंत कर दें?

युधिष्ठिर जी बोले- “सुनो द्रौपदी! मैं भगवान का भजन सौदे के लिए नहीं करता। मैं भजन करता हूँ केवल इसलिए कि भजन करने में आनन्द मिलता हैं। फैली हुई उस पर्वतमाला को देखो, उसे देखते ही मन प्रफुल्लित हो जाता है। हम कुछ माँगते नहीं। हम देखते हैं, इसलिए कि देखने से प्रसन्नता होती है। इसी प्रसन्नता के लिए मैं भगवान का भजन करता हूँ।


ब्रह्मवर्चस के तीन विशिष्ट शोध प्रयोजन

क्या भौतिक विज्ञान का प्रत्यक्षवाद और अध्यात्म का चेतना पक्ष किसी केन्द्र पर एकत्रित भी हो सकते है- यह एक जटिल समस्या है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का समाधान कर सकने में सफल नहीं हो पाये और विरोध-विग्रह यथावत बना रहा।

इस विग्रह को समर्थन में बदलने के लिए अखण्ड-ज्योति ने एक ऐसा तंत्र खड़ा किया है। जो युग की सबसे बड़ी दार्शनिक कठिनाई का हल प्रस्तुत कर सके। यह है ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान। उसका ढाँचा इस प्रकार खड़ा किया गया है, कि चेतना की स्वतंत्र सत्ता और क्षमता सिद्ध हो सके। साथ ही भौतिक विज्ञान की भी उसके साथ संगति बैठ सके। इसे गाय सिंह को एक घाट पानी मिला देने जैसा असम्भव किन्तु साथ ही प्रत्यक्ष रूप से भी प्रस्तुत कर दिखाया जा सकता है, दिखाया जा रहा है।

भौतिकी पदार्थ सत्ता पर अवलम्बित है। वह शरीर को एक चलता-फिरता पेड़-पौधा भर मानती है और उसे किसी नैतिक, भावनात्मक, आदर्शवादी सिद्धान्त के साथ नहीं जोड़ना चाहती है क्योंकि समूचा क्षेत्र अध्यात्म तत्वज्ञान के अंतर्गत आता है। जिसे प्रत्यक्षवाद स्वीकार नहीं करता है। आदर्शों को उपहासास्पद कहा जाता है। इस मान्यता की जड़ जमने का परिणाम यह हुआ कि उस मान्यता के पक्षधर देह सुखों को ही सर्वोपरि मानने लगे। उनने पुण्य-परमार्थ का, संयम-सदाचार का सामाजिक आवश्यकता के रूप में यत्किंचित ही समर्थन किया है। यही है वह प्रतिक्रिया, जिसने स्वार्थ-सिद्धी को प्रधानता दी और दूसरों के साथ सेवा सद्भावना का परिचय देने की कोई भी आवश्यकता नहीं मानी। प्रस्तुत व्यापक चरित्र पतन का यह अनास्थावादी दर्शन ही मूलभूत कारण रहा है।

कभी संसार में सतयुग था। उसमें संयम सदाचार और पुण्य-परमार्थ की प्रधानता थी। इसका कारण अध्यात्मवादी दृष्टिकोण ही रहा। उसने व्यक्तित्वों को उत्कृष्ट स्तर का बनाया और प्रचण्ड पुरुषार्थ को प्रोत्साहन देकर सुसम्पन्नता प्रगतिशीलता की चरम उपलब्धियों के साथ-साथ सुसंस्कारिता की भी कमी नहीं रहने दी। आज की और पुरातन काल की परिस्थितियों में जो जमीन-आसमान जैसा अन्तर है इसे दार्शनिक युग में प्रत्यक्षवाद का, पदार्थवाद का आधिपत्य ही प्रमुख कारण कहा जा सकता है। आत्मवाद इसके सम्मुख इतने पैने तर्क तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत न कर सका कि वह मानवी गरिमा को अपनाने के लिए लोक मानस पर प्रभाव छोड़ पाता। मात्र शास्त्रों की, परम्पराओं की दुहाई देना ही उसका एक हथियार रहा। ऐसा न बन पड़ा कि उस कुरुक्षेत्र में तर्क तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत करते हुए विजय दुदुंभि बजा सकता और सदाशयता को, परमार्थ बुद्धि को सींचता-पोषता रहता है।

जो पिछले दिनों नहीं बन पड़ा, उसे अब किया जा रहा है क्योंकि आज बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद ही सब कुछ बन गया है। उसे नकारा भी नहीं जा सकता। इसलिए समय की यह महत्ती आवश्यकता हो गई कि अध्यात्म तत्वज्ञान को भौतिक विज्ञान की प्रयोगशाला में अपनी सच्चाई की परीक्षा देने के लिए खड़ा किया जाय। यही है हरिद्वार में शान्ति-कुंज के तत्वावधान में चलने वाले ब्रह्मवर्चस का स्वरूप, उद्देश्य और उपक्रम। इसमें आरम्भ हुए कार्यों को विज्ञान में गति रखने वाले आश्चर्यचकित होकर देखते और सोचते है कि भौतिकवाद को सर्वोपरि समझने की मान्यता पर अब नये सिरे से पुनर्विचार करना पड़ेगा।

ब्रह्मवर्चस की शोध प्रक्रिया वस्तुतः अखण्ड-ज्योति में निरन्तर किये जाने वाले अध्यात्म आधारों को ही प्रत्यक्ष की कसौटी पर खरा सिद्ध करने का एक विनम्र प्रयास है जिसके अब तक के प्रयासों को असाधारण सफलता भी मिली है। ध्यानपूर्वक देखने वालों ने यह माना है कि यह सम्भावना दीख पड़ती है कि अध्यात्म और विज्ञान परस्पर विरोधी न रह कर एक-दूसरे का सहयोग करते हुए मानवी प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बनेंगे। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति के दार्शनिक प्रतिपादनों को, प्रत्यक्ष प्रतिपादनों को यह दृश्य रूप में प्रस्तुत करने की एक सशक्त प्रक्रिया है।

ब्रह्मवर्चस में तीन सिद्धान्तों का, परीक्षण-विवेचन मुख्य है। इनमें से प्रथम है- विचारों की असाधारण शक्ति मस्तिष्क में सन्निहित अतीन्द्रिय क्षमताओं मन का शरीर, परिवार, समाज और वातावरण पर प्रभाव; इन विषयों के माध्यम से यही सिद्ध कर दिखाना है कि यदि मनुष्य की भावनाएँ आकाँक्षाएँ, विचारणाएँ, आस्थाएँ उच्चस्तरीय रहीं तो भौतिक और आत्मिक क्षेत्र की अनेकानेक सफलताएँ, विभूतियाँ हस्तगत कर सकना सम्भव है।

दूसरा विषय है- पदार्थ की वह सूक्ष्म सत्ता जो चेतना को भी प्रभावित करती है। आमतौर से यह समझा जाता है कि वस्तुएँ मात्र सुविधा-साधना के रूप में प्रयुक्त होती है। यह उनका स्थूल उपयोग है; पर जाना यह भी चाहिए कि उनके भीतर सशक्त अदृश्य शक्ति भी काम करती है। परमाणु ऊर्जा उसका सर्वविदित स्वरूप है। इसके अतिरिक्त असंख्यों अदृश्य पक्ष भी है जिन्हें भाप, बिजली, रेडियो दूरदर्शन आदि के रूप में करते हुए देखा जाता है। इन्हीं में से एक हीं नहीं करती। उस ने ऑक्सीजन जैसे प्राणधारक तत्व भी सम्मिलित रहते है। सर्वविदित है कि कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता। वह ठोस द्रव और वाष्प के रूप में अदलता-बदलता रहता है। वनस्पतियों का आहार और औषधि की तरह तो उपयोग होता ही है। इसके अतिरिक्त उन्हें गैर रूप में परिणत करके शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन एवं वातावरण परिशोधन के लिए भी काम में लाया जा सकता है। एक शब्द में इसे अग्निहोत्र प्रक्रिया कह सकते है। इतिहास साक्षी है कि इस आधार को अपनाकर अभीष्ट उपलब्धियों के प्राप्त करने के अतिरिक्त कारगर परिवर्तनों, अवतरणों, उत्पादनों तक की आवश्यकता पूरी की जाती थी। दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, कृष्ण का सर्वमेध यज्ञ राम का अश्वमेध यज्ञ किन्हीं महाप्रयोजनों की पूर्ति के लिए ही सम्पन्न हुए थे। विश्वामित्र का वह युग परिवर्तन यज्ञ प्रख्यात है जिसकी सुरक्षा का दायित्व राम-लक्ष्मण ने स्वयं उठाया था।

उस महाविद्या का अब लोप जैसा हो गया है। मात्र कर्मकाण्डों की ही थोथी लकीर पिटती है। ब्रह्मवर्चस ने उस महान विज्ञान का नये सिरे से शोध कार्य आरम्भ किया है और इस आशा का संचार किया है कि समय की अनेकानेक समस्याओं के निराकरण में भी अग्निहोत्र विज्ञान का प्रयोग किया जा सकता है।

अग्निहोत्र द्वारा शरीरगत विकारों का शमन मानसिक उत्कर्ष में योगदान, वातावरण परिशोधन का परोक्ष प्रयोजन जैसे अनेकों उपयोगी एवं महत्वपूर्ण कार्य इस विद्या के माध्यम से किस प्रकार बन पड़ते है, इसे बहुमूल्य यंत्र-उपकरणों द्वारा यहाँ प्रत्यक्ष स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है। पदार्थ की सूक्ष्म शक्ति का चेतना क्षेत्र में किस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है और उससे क्या लाभ उठाया जा सकता है यह इस शोध धारा का उद्देश्य है।

तीसरा आधार है- शब्द शक्ति की प्रचण्डता। इसे शास्त्रों में शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म आदि नामों से इंगित किया गया है। शब्द–बेधी वाणों की चर्चा रही है। स्वर शास्त्र इसी की एक शाखा है। सामगान से लेकर मंत्रोच्चार की विभिन्न शैलियाँ इसी के अंतर्गत आती है। मंत्र शक्ति की महिमा का बखान अध्यात्म तत्व ज्ञान में सुविस्तृत रूप से विवेचित है।

ब्रह्मवर्चस की तीसरी महत्वपूर्ण शोध शब्द-शक्ति की इसी रहस्यमयी गरिमा के ऊपर हो रही है। यह अविज्ञात पक्ष रहा है। शब्द आमतौर से जानकारियों के आदान-प्रदान में प्रयुक्त होता है। उसके द्वारा किसी को प्रसन्न-रुष्ट भी किया जा सकता है। संगीत की मोहकता-मादकता अपने स्तर की है। मेघ-मल्हार, दीपक राग आदि में उसका चमत्कार देखा गया है। यह इस सम्बन्ध में जाना गया सामान्य ज्ञान है। बीन की ध्वनि पर साँप लहराते देखे गये है। संगीत-प्रयोग से जीव-जन्तुओं की प्रजनन शक्ति बढ़ाई गई है। दुधारू पशुओं ने अधिक दूध दिया है। पेड़-पौधे तेजी के साथ बढ़े है। स्नायविक और मानसिक रोगों के निवारण में संगीत का प्रयोग बहुत सफल हुआ है।

वेद मंत्रों को जब शक्ति रूप में प्रयुक्त किया जाता है, तो वे सामगान के रूप में सस्वर गाये जाते है। इस गायन का उद्गाता, यजमान और श्रवणकर्ता जनसमुदाय पर दिव्य चेतना की वर्षा करता है। मंत्र शक्ति का सभी धर्मों में सभी अध्यात्म सम्प्रदायों में सबसे अधिक महत्व माना जाता है। जप, कीर्तन, भजन आदि में स्वर शक्ति के माध्यम से विशिष्ट विभूतियों का लाभ मिलते माना जाता है। ताँत्रिक और वैदिक मंत्रों का अपने-अपने प्रयोजन के लिए अपना-अपना महत्व है।

ताल-लय की रिद्म अपना प्रभाव अलग ही छोड़ती है। पुलों पर से गुजरते हुए सैनिक को कदम मिला कर चलने की मनाही कर दी जाती है; क्योंकि उस सामूहिक ताल की शक्ति से वह पुल टूट कर गिर भी सकता है। यह शब्द शक्ति का असाधारण प्रभाव है। धमाके की आवाज से हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है। गर्भपात हो जाना सम्भव है। युद्ध के बिगुल बजने पर सैनिकों में जोश भर जाता हैं। शंख ध्वनि से उस क्षेत्र के विषाणुओं का तेजी से विनाश होते देखा गया है।

वस्तुतः शब्द भी बिजली, भाप, ऊर्जा स्तर की एक समर्थ शक्ति है। इसका किस प्रयोजन के लिए, किस प्रकार क्या उपयोग किया जाय, जिससे व्यक्तित्व के विकास और वातावरण के परिशोधन में अभीष्ट लाभ मिल सके। इसी की खोज ब्रह्मवर्चस के शोध-निर्धारणों में से एक है। इसकी जाँच-पड़ताल के लिए, प्रयोग-परीक्षण के लिए दुर्लभ यंत्र-उपकरणों को देश-विदेश से मँगा कर लगाया गया है। इसे प्रकारान्तर से मंत्र विज्ञान का प्रभाव-परीक्षण भी कहा जा सकता है।

अखण्ड-ज्योति में चरित्र, चिन्तन, व्यवहार का परिष्कार-उत्कृष्टता का पक्षधर तत्वदर्शन अतीन्द्रिय क्षमताओं की प्रभाव क्षेत्र आदि विषयों पर तो प्रामाणिक विवेचन रहता ही है, इसके अतिरिक्त उसमें गायत्री मंत्र और अग्निहोत्र के संदर्भ में भी विवेचनात्मक चर्चा रहती है। गायत्री यज्ञों का आन्दोलन भी चलता रहा है। कमी इसी बात की थी कि वह प्रतिपादन दार्शनिक एवं शास्त्रीय पृष्ठ भूमि पर ही होता रहा है। उसका वैज्ञानिक अन्वेषण परीक्षण नहीं बन पड़ा था, इसलिए प्रत्यक्षवादी समय-समय पर उस सम्बन्ध में संदेह अविश्वास व्यक्त करते रहते थे। इस विषय को जब वैज्ञानिक प्रयोगशाला के सुपुर्द किया गया तो ऐसे तथ्य उभर कर आये कि उपरोक्त युग्म की उपयोगिता प्रत्यक्ष के आधार पर भी सिद्ध करने की बात बहुत आगे तक बढ़ गई।

अग्निहोत्र पदार्थ की सूक्ष्म-शक्ति का वाष्पीकरण है। भाप से रेल चल सकती है। बादल बन और बरस सकते है, तो कोई कारण नहीं कि दिव्य औषधियों का वाष्पीकरण व्यक्ति समुदाय और वातावरण के लिए महत्वपूर्ण न सिद्ध हो सके। इसे पुरातन विज्ञान का एक असाधारण पक्ष कह सकते है। उन दिनों अग्निहोत्रों द्वारा अनेकों मानवी आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रयोग होते रहते थे। उनके अभीष्ट लाभ भी मिलते थे।

अध्यात्म विज्ञान का एक पक्ष मंत्र शक्ति का प्रयोग भी है। इसे ध्वनि विज्ञान कहा जा सकता है। यह अपने ढंग की विशिष्ट ऊर्जा है। साइंस में ताप, प्रकाश और ध्वनि को विश्व ब्रह्माण्ड की तीन प्रमुख शक्तियाँ माना गया है। इन्हीं की तरंगें विश्व का गठन और विघटन करती रहती है। इनका उच्चस्तरीय प्रयोजनों में अभीष्ट प्रयोग कैसे हो? इसी को मस्तिष्कीय चेतना, अग्निहोत्र और शब्द शक्ति के रूप में ब्रह्मवर्चस का शोध लक्ष्य बनाया गया है। आशा की जानी चाहिए कि यह पदार्थ और चेतना के समन्वय से उत्पन्न होने वाली प्रक्रिया को प्रत्यक्ष कर सकेगा और समस्त संसार उसकी आशातीत उपलब्धियों से लाभान्वित हो सकेगा।


सन्त ने आँखें खोली (Kahani)

सन्त एकनाथ किसी पर क्रोध न करने के लिये प्रसिद्ध थे। उनकी नम्रता और सहिष्णुता की सभी प्रशंसा करते।

एक दिन कुछ शरारती लोगों ने उन्हें क्रुद्ध करने की ठानी। उसके लिये एक उत्पाती व्यक्ति को चुना गया। और क्रुद्ध कर देने पर इनाम मिलने का लालच दिया गया।

एकनाथ जहाँ भजन कर रहे थे, वहाँ उत्पाती व्यक्ति पहुँचा और उनके कन्धे पर चढ़ बैठा।

सन्त ने आँखें खोली और मुस्कराते हुये कहा- बन्धु! आप जैसी आत्मीयता बरसाने वाला तो कोई अतिथि मेरे घर आज तक नहीं पधारा। अब आपको भोजन कराये बिना मैं वापस जाने नहीं दूँगा।


शोध अनुसंधान की प्रगति एवं-भावी संकल्पनाएँ

आस्था संकट की विभीषिका से मोर्चा लेने हेतु अखण्ड-ज्योति ने अति महत्वपूर्ण दायित्व ब्रह्मवर्चस को सौंपा है। प्रत्यक्षवादी चिन्तन ने जिस नास्तिकता एवं अनैतिकता को जन्म दिया है। उसे तर्कों तथ्यों प्रमाणों तथा वैज्ञानिक प्रयोगों के निष्कर्षों के माध्यम से निरस्त किया जाना एक ऐसा भागीरथ कार्य था। जिसे प्रत्यक्ष कर दिखाना असम्भव नहीं तो दुष्कर अवश्य कहा जाएगा। यह भी अपने प्रकार का इस युग का समुद्र मंथन है। अध्यात्म तत्व ज्ञान रूपी देव शक्ति और भौतिकी पदार्थ विज्ञान रूपी असुर शक्ति में ताल मेल कैसे बैठे यह सबसे बड़ा असमंजस है। दो विपरीत ध्रुवों पर चलती हुई मानी जाने वाली शक्तियों में परस्पर सहयोग की स्थिति कैसे बनायी जाय? इस ऊहापोह को सुलझाने हेतु ही ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना हुई।

आग और पानी दोनों अपने आप में शक्तिशाली हैं व एक दूसरे के विरोधी भी। आग पानी को नहीं टिकने देती एवं पानी आग को बुझा कर रहता है। किन्तु इसी पानी को जब आग के सहयोग से गर्म किया जाता है तो वह वाष्प पैदा होती है जिसकी शक्ति असीम होती है जिसकी सामर्थ्य से भीमकाय लौह इंजिन चल पड़ता है। अध्यात्म और विज्ञान की स्थिति भी प्रायः इसी प्रकार की है। यदि अध्यात्म अनुशासनों व्याप्त वचनों शास्त्र प्रमाणों को आधुनिक विज्ञान की भाषा में समझाया जाय उनकी प्रासंगिकता का तर्क सम्मत विवेचन किया जाय तो कोई कारण नहीं कि आधुनिक पीढ़ी आस्तिकतावादी दर्शन की अवहेलना करे। यही दृष्टिकोण सामने रखकर ब्रह्मवर्चस ने अपने तीन लक्ष्य चुने। इनमें पहला है यही विचार पद्धति से अरोग्य एवं कौशल का अभिवर्धन।

मनःक्षेत्र से भ्रांतियां विकृतियाँ मिटाने हेतु तर्कों तथ्यों का संकलन भी उपरोक्त प्रयोजन के अंतर्गत आता है विचारशक्ति संकल्पबल को योग साधनाओं से समन्वित कर मानसोपचार कर पाना भी सम्भव है। आधुनिक यंत्रों के प्रयोगों द्वारा प्रत्यक्ष यथासम्भव तथा परोक्ष रूप से तर्कों एवं प्रतिपादनों के माध्यम से यह प्रमाणित करने का प्रयास यहाँ किया गया है कि मानवी–काया में सन्निहित अभूतपूर्व सम्भावनाओं विलक्षण क्षमताओं को ध्यानयोग-.... एवं क्रियायोग की विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा जगा पाना सम्भव है। योग साधना एवं तप .... के साथ जुड़े विभिन्न तथ्यों जिनका वर्णन शास्त्रों में होता रहा है का वैज्ञानिक अनुसंधान एवं उपलब्ध यंत्रों द्वारा प्रत्यक्षीकरण इसी शोध श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। इस प्रयोजन हेतु सूक्ष्म शरीर की महता बनाने वाले प्रभामण्डल अदृश्य किन्तु प्रभावशाली प्राण विद्यूत्परिकर को किसी सीमा तक विज्ञान सम्मत ढंग से प्रमाणित किया जा सकता है यह ब्रह्मवर्चस की शोध का महत्वपूर्ण अंग है।

दूसरा प्रयोजन है-पदार्थ में छिपी ऊर्जा के चेतन पक्ष का कारण शक्ति का उभार एवं विकास। यह प्रक्रिया के सम्बन्ध में जनमानस में बड़ी भ्रान्तियाँ है। अन्नादि तथा दूध-घी को अग्नि में डालकर नष्ट कर देने का आक्षेप याजकों पर लगाया जाता है। जबकि शास्त्रोक्त पद्धति विशुद्ध वनौषधि यजन की है जिसमें सुनिश्चित ताप मान पर औषधियाँ की सूक्ष्म चेतन सत्ता को उभारा जाता है वाष्पीभूत स्थिति में औषध घटकों द्वारा मानवी काया मन सूक्ष्मशरीर एवं समीपवर्ती वायु मण्डल तथा पर्यावरण को प्रभावित किया जाता है, गिने चुने प्रसंगों में नाम मात्र के अन्न की आवश्यकता पड़ती है वह भी चरु निर्माण हेतु जो यज्ञाग्नि में पकाया जाता है। इस प्रक्रिया से संबंधित विभिन्न पक्षों का विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण ब्रह्मवर्चस की प्रयोगशाला में किया गया है। साथ ही सूक्ष्मीकृत औषधियाँ पौधों से यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि व्यक्ति की जीवनी शक्ति एवं मनोबल को यह किस प्रकार बढ़ाती है? अस्वस्थ को सदस्य एवं स्वस्थ को दीर्घायु निरोग बनाने वाली अमृतोपम वनौषधियाँ पदार्थगत ऊर्जा के कारण पक्ष के विकसित होने की परिणाम स्वरूप ही अपनी प्रतिक्रियाएँ दिखाती है। इस परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक शोध नूतन पीढ़ी के सृजन आत्मबल सम्पन्न मानवों के निर्माण हेतु आध्यात्मिक दृष्टि से भी जरूरी है।

तीसरा प्रसंग है-यंत्र शक्ति से भी बढ़कर मंत्र शक्ति की प्रभाव क्षमता का अन्वेषण। जैसे स्थूल काया का ईंधन भोजन एवं जल है इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर का ईधन वाक शक्ति है। मंत्र शक्ति की शब्द ब्रह्म-साधना द्वारा न केवल सूक्ष्म काय संस्थान को प्राणाग्नि रूपी कुण्डलिनी संस्थान एवं चक्र-उपत्यिकाओं को अपितु भाव संवेदनाओं को प्रभावित कर वाँछित परिवर्तन ला पाना संभव है। शब्द शक्ति की महता को विज्ञान ने स्वीकारा है एवं अब विभिन्न रोगों के निदान में अल्ट्रासाउण्ड तथा चिकित्सा में भी इनका लेसर की तरह प्रयोग होने लगा है। मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के मिलन से एकाकी अथवा सामूहिक मंत्रोच्चारण से मंत्रगायन अथवा विभिन्न रागों में सूक्तों के प्रयोग से क्या कुछ परिवर्तनकाय पिण्ड एवं सूक्ष्म वातावरण में संभव है यह एक महत्वपूर्ण शोध प्रसंग है। संगीत चिकित्सा मंत्र चिकित्सा को पूर्णतः विज्ञान सम्मत सिद्ध करने के लिए यह अनिवार्य है कि इनकी प्रभाव क्षमता को आधुनिक यंत्रों के माध्यम से मापा जाये। वनस्पतियों जीव−जंतुओं मानव−शरीर एवं मन तथा वातावरण में ये कम्पन क्या किस सीमा तक परिवर्तन लाते है इसे प्रमाणित किया जाये। यही प्रक्रिया ब्रह्मवर्चस् की प्रयोगशाला में अपनाई जा रही है।

अभी तक प्रयोगशाला का विस्तार क्रम चल रहा है व आगे भी वह अनवरत गति से चलता रहेगा। विज्ञान ने जितनी तेजी से पिछले दिनों प्रगति की है इलेक्ट्रोनिकी एवं कंप्यूटर साईंस ने जिस तरह प्रौद्योगिकी को कायाकल्प कर दिखाया है उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। आज इन्हीं सब का सहारा लेकर अपनी बात को प्रामाणिक ढंग से कहना होगा। ध्यानयोग-मानसोपचार प्रक्रिया यज्ञ विज्ञान एवं वनौषधि प्रयोग द्वारा सूक्ष्मीकृत पदार्थ ऊर्जा से चिकित्सा एवं शब्दशक्ति की प्रभाव सामर्थ्य का विश्लेषण करने हेतु विभिन्न जटिल उपकरण देश-विदेश से मंगाकर लगाये गये है जिनका संचालन उच्चस्तरीय वैज्ञानिकों की एक टीम करती हैं। इन उपकरणों में प्रमुख है - रक्त के विभिन्न रसायनों-एन्जाइम्स को विश्लेषण करने वाला स्पेक्ट्रोफोटोमीटर फोटोकेलोरी मीटर जीवनीशक्ति के लिए उत्तरदायी इम्युनोग्लोबुलीन्स का मापन करने वाला इलेक्ट्रोफोरेसिस उपकरण एवं जीवाणु-विषाणुओं पर प्रभाव देखने हेतु इन्वयुबेटर-ओवन विभिन्न प्रकार के माइक्रोस्कोपों से युक्त एक परिपूर्ण माईक्रोबायोलाँजी विंग। शरीर व मन की विद्युत तंरगों के मान हेतु एक चार चैनल का पाँलीग्राफ यहाँ पर है जिससे मस्तिष्क का “इलेक्ट्रोएनसेफलो ग्राम” (ई.सी.जी.) हृदय का इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ई.सी.जी.) हृदय की ध्वनियाँ का फोनोकार्डियोग्राम तथा श्वास की गति हेतु सेन्सर-ये चारों एक साथ रिकार्ड किये जा सकते है। साधना उपचारों वनौषधि सेवन अग्निहोत्र शब्द शक्ति एवं नादब्रह्म का क्या प्रभाव मनुष्य के सूक्ष्म संस्थान पर पड़ रहा है यह मंत्र पर देखा जा सकता है। चारों चैनल पर ई ई जी भी लिया जाता है साथ ही त्वचा का प्रतिरोध, मनोभावों का त्वचा विद्युत पर प्रभाव (जी. एस. आर.) मापन भी इससे किया जा सकता है। अलग से दो इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम मशीनें और है जिसके द्वारा माँनीटर पर हृदय विद्युत एवं कार्यक्षमता का व्यायाम शिथिलीकरण एवं ध्यानस्थ स्थिति में आकलन किया जाता हैं .... फोटोग्राफी द्वारा न्यूरान्स तथा अन्यान्य जीव कोशों में विद्यमान डी.सी. पोटेन्शियल्स को नापने की व्यवस्था भी संस्थान में शीघ्र की जा रही है।

स्पायरोग्राफ द्वारा श्वास संस्थान पर एवं फेफड़ों की रक्त शोधन क्षमता पर प्राणायाम आदि उपचारों का साधना के पूर्व बाद में मान कर तुलनात्मक अध्ययन किया जाता हैं। साइकोमेट्री के लगभग पन्द्रह उपकरणों तथा मनोआध्यात्मिक प्रश्नावली के माध्यम से बुद्धिलब्धि (आई.क्यू.) एकाग्रता की शक्ति इल्युजन रिएक्शन टाइम एप्टीट्यूड व्यक्तिगत विश्लेषण स्मरण शक्ति के साधना उपचारों के पूर्व एवं बाद मापन किये जाने एवं हर साधक को अनुकूल साधनाएं एवं वनौषधि सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है।

वनौषधियों की शुद्धा–शुद्ध परीक्षा, क्वाथ निर्माण, जल द अल्कोहल सत्व बनाने हेतु चार कमरों की एक पृथक प्रयोगशाला शान्तिकुँज में है। इनका चूर्ण रूप में व वाष्प रूप में प्रयोग होता है। वाष्पीकृत वनौषधियों का याजक के शरीर व मन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है इसे जाने के लिए अति संवेदनशील सेंसर उपकरणों द्वारा विभिन्न आँकड़े एकत्र किये जाते है। तदनुसार यज्ञोपचार पद्धति का निर्धारण होता है। यज्ञ प्रक्रिया के विज्ञान पक्ष की पूरी जानकारी देने वाली सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला ब्रह्मवर्चस की यज्ञशाला के साथ विनिर्मित की गयी है। यज्ञ धूम्रों का विश्लेषण कर वाष्पीभूत औषधि घटकों का जी.एल.सी. एवं तीन अन्य गैस एनालाइजर्स द्वारा विश्लेषण, यज्ञाग्नि की तीव्रता (लक्स), स्पेक्ट्रम एवं रेडियेशन का मापन इस प्रयोगशाला की विशेषताएं हैं। यज्ञ प्रक्रिया को विज्ञान सम्मत ढंग से इस रूप से समझाने वाली विश्व की यह एकमात्र प्रयोगशाला है।

शब्दशक्ति एवं संगीत प्रक्रिया का जीव जन्तुओं (मछली एवं गिनीपिग), पौधों तथा मनुष्य पर प्रभाव बताने वाली एक नयी प्रयोगशाला के समीप बनायी गयी है। आँसीलोस्कोप, मैग्नेटिक, डिस्क रिकार्डर डेसीबल मीटर जैसे उपकरण यहाँ लगाये गये है जिनसे मंत्र व संगीत ध्वनि के विभिन्न आयामों का मापन सम्पन्न होता है। इनका मानवी काया जो प्रभाव पड़ता है, उसे विभिन्न सेंसर्स शरीर पर लगाकर रक्त चाप, तापमान, रक्तप्रवाह, नाड़ी की गति एवं हृदय की मस्तिष्क की-विद्युत देखने के लिए तीन अत्याधुनिक उपकरण मँगाये गये है। एक आय.बी.एम. (पी.सी.) कम्प्यूटर इन यंत्रों के साथ जोड़ा गया है व पूरा कक्ष वातानुकूलित बनाया गया है। आकृति-संरचना का प्रभाव जानने हेतु एक पिरामिड भी इस कक्ष में बनाया गया है।

ब्रह्मवर्चस की प्रयोगशाला ही नहीं इसका ग्रन्थालय स्वयं में इतना परिपूर्ण है कि विश्वभर में हो रहे शोध-कार्यों को यहाँ नियमित आने वाली विज्ञान व दर्शन-मनोविज्ञान की पत्रिकाओं से जाना जा सकता है। सभी विधाओं के विश्वकोश सहित लगभग बारह हजार पुस्तकें इस ग्रन्थालय में है।

जिस स्वयंसेवी समर्पित भावना से कार्यकर्ता यहाँ क्रियाशील है, जो कार्य अब तक बन पड़ा है व जो आगे की योजना है उसे देखते हुए यह आशा बलवती होने लगी है कि इन सीमित साधनों से ही विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय को सार्थक कर दिखाया जा सकेगा। तर्कों तथ्यों के संकलन तो अखंड-ज्योति पत्रिका में छपते ही रहते ह अब वैज्ञानिक निष्कर्षों को भी क्रमशः इसमें प्रकाशित किया जाता रहेगा, ताकि जन मानस इस प्रयोग पुरुषार्थ से लाभान्वित हो सके।


विद्वान प्रतापचन्द्र राय (Kahani)

ब्गला के एक निर्धन विद्वान प्रतापचन्द्र राय ने महाभारत ग्रन्थ के अंग्रेजी अनुवाद का भागीरथ कार्य प्रारम्भ किया गया था। अनेक राजा-महाराजाओं और सेठ साहूकारों ने उनकी सहायता की, परन्तु लोगों को ऐसा प्रतीत होता था कि विशाल ग्रन्थ का अनुवाद प्रकाशित करना सरल काम नहीं है। इधर प्रतापचन्द्र जी ने अपनी समस्त शक्ति इस कार्य में लगाकर इस दुसाध्य कार्य को सिद्ध कर दिखाया। “आश्वमेधिक पर्व” तक ग्रन्थ का अनुवाद प्रकाशित होने पर प्रतापचन्द्र जी का देहावसान हो गया। मृत्यु के समय भी प्रतापचन्द्र जी को महाभारत की ही चिन्ता थी। अन्त समय में उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-”मेरे श्राद्ध के लिए किसी प्रकार का व्यय मत करना। आधे पेट रहकर भी सम्पूर्ण महाभारत के प्रकाशन का प्रबन्ध करना। समझ लेन, यही मेरा सच्चा श्राद्ध है। “पत्नी ने उनके आदेश का पालन किया और एक वर्ष के अन्दर ही सम्पूर्ण महाभारत का अनुवाद प्रकाशित हो गया।


ज्योतिर्विज्ञान का दृश्य गणित

पृथ्वी अपने आप में जितनी सुन्दर है उसकी गरिमा और महता से इन्कार नहीं किया जा सकता। किन्तु साथ ही यह भी समझा जाना चाहिए कि उसकी समुन्नत स्थिति में अन्यान्य ग्रहों का भी कम योगदान नहीं है विशेषतया सौरमण्डल के सदस्यों का अनुदान तो उसे असाधारण रूप से मिलता रहता हैं।

सूर्य के अनुदानों को ही ले तो प्रतीत होता है कि उसकी संतुलित दूरी के कारण नपी-तुली मात्रा से इतना प्रकाश और ताप अवतरित होता है, जिससे प्राणी जीवित रह सकें वनस्पतियाँ उग सके और पदार्थों में अभीष्ट हलचलें संतुलित ढंग से होती रहे। यदि यह तापमान अधिक होता, तो पृथ्वी जलते अंगारे की तरह एक अग्नि-पिंड बनकर रहती। यदि यह किरणें कम मात्रा में आती तो नेपच्यून-प्लूटो की तरह यहाँ भी असाधारण शीत होती सर्वत्र निस्तब्धता छाई होती। किसी प्रकार की हलचलों का यहाँ दर्शन भी न होता। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन उभरा है और वहीं उसका पोषण-परिवर्तन भी करता रहता है।

चन्द्रमा यों रात का निकलते दीखता है और न्यून ऊर्जा वाला भी दीखता है, पर उसी के कारण चाँदनी एवं चांदनी रातों का सौंदर्य धरती वालों को उपलब्ध होता है। समुद्र में ज्वार-भाटे उसी के कारण आते है। यदि वे न आते तो अचल समुद्र का पानी सड़ने लगता और उसकी विषाक्तता से प्राणियों को जीवित रहना कठिन पड़ जाता। चन्द्रमा को वनस्पतियों को राजा कहा गया है। उनसे जो असाधारण गुण और रसायन पाये जाते है यह उसी की देन है।

सूर्य-चन्द्र के प्रत्यक्ष प्रभावों से हम यत्किंचित परिचित है। हवा सूर्य की गर्मी से चलती है। बादल उसी की ऊर्जा से बनते दौड़ते और बरसते है। सात रंगों की सात किरणों में अपने-अपने ढंग की चमत्कारी विशेषतायें भरी पड़ी है। वे जड़ और चेतन जगत पर अद्भुत प्रभाव छोड़ती है और प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल देती है। अनेकानेक बहुमूल्य रसायनों का उत्पादन-अभिवर्धन इन्हीं सप्त किरणों के विभिन्न सम्मिश्रणों के द्वारा होता है। उसी से सृष्टि की सुन्दरता और सक्षमता बढ़ती है। पृथ्वी को सूर्य के गर्भ में पकता-विकसित होता हुआ एक अंडा बच्चा ही कहा जा सकता है। उसके अनुदानों का अवतरण यदि संतुलन से न्यूनाधिक हो जाये तो समझना चाहिए कि धरती की विकसित स्थिति का कहीं अता-पता भी न चलेगा। वह एक निर्जीव निस्तब्ध पिण्ड मात्र बनकर रह जायेगा।

सूर्य चन्द्र को पृथ्वी की प्राण धाराओं के रूप में हम प्रत्यक्ष देखते है। इसके अतिरिक्त सौरमण्डल के सभी ग्रह और उपग्रह अपना प्रभाव-अनुदान पृथ्वी को प्रदान करते है। साथ ही वे आदान-प्रदान के सिलसिले में बहुत कुछ लाभ भी देते है तथा अपनी उदारता बनाये रखते है। पृथ्वी का उतरी ध्रुव इन अन्तर्ग्रही-प्रभावों में से जो उपयोगी है उन्हें खींचता है और अपने भीतर उत्पन्न हुए कचरे को दक्षिण ध्रुव मार्ग से अनन्त आकाश में फेंक देता है। सौर मण्डल से बाहर का अन्तरिक्षीय प्रभाव पृथ्वी के साथ आदान-प्रदान का सम्बन्ध बनाये रहता है। इसी सिद्धांत के आधार पर न केवल पृथ्वी का वरन् अन्याय ग्रह गोलकों का भी व्यवस्था क्रम चलता रहता है।

इस अदृश्य प्रभाव से पृथ्वी का समस्त परिकर प्रभावित होता है। उसके प्राणी वनस्पति, जलाशय, पर्वत, पदार्थ आदि सभी को उस प्रभाव से लाभ भी मिलते है और हानि उठाने के भी अवसर आते है। तूफानों-बवन्डरों में उनका हाथ होता है। मौसम भी इस प्रवाह से प्रभावित होकर सही रूप से चलते या व्यतिक्रम करते रहते है। कई बार महामारियों के प्रकोप भी उतरते है। मनुष्य का संवेदनशील मस्तिष्क इस कारण विशेष रूप से प्रभावित होता है और उसके चिन्तन-स्वभाव में असाधारण अन्तर आ जाता है। युद्धोन्माद भड़क उठने वाले भयंकर मार-काट मचाने में भी यह अंतर्ग्रही बदलाव बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

आमतौर से इन अदृश्य परिवर्तनों की जानकारी सर्व-साधारण को नहीं होती, पर सूक्ष्मदर्शी उसे जान लेते है और परिवर्तनों के अनुरूप सुरक्षा का लाभ उठाने के लिए पूर्व सतर्कता बरतते है। इस अन्तरिक्ष विज्ञान को खगोल विद्या कहते हैं-ज्योतिष भी। खगोल विद्या की महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त करके मनुष्य राकेट छोड़ने और उस वाहन पर सवारी गाँठकर ग्रह-नक्षत्रों की खोज-खबर लेने निकला है। उन यानों को पृथ्वी से रेडियो तरंगें भेज कर नियन्त्रण रखा और निर्देशन दिया जाता है।

यदि इस विज्ञान की उस धारा का भी पता लगाया जा सके कि ग्रहों का पृथ्वी पर कितने प्रकार का कितना प्रभाव पड़ता है, तो उस पूर्व सूचना के अनुसार अनर्थों से समय रहते बचाव कर सकना सम्भव हो सकता है। अनुकूलताओं से भरपूर लाभ उठाया जा सकता है। ऐसी जानकारी न केवल मनुष्यों से संबंधित होती है, वरन् वातावरण में होने वाले परिवर्तनों तथा उनके प्रभाव को भी समझा जा सकता है।

यह ज्योतिर्विज्ञान के समूची पृथ्वी पर और उसके क्षेत्र विशेष पर पड़ने वाले प्रभाव की बात हुई। इससे भी सूक्ष्म बात यह है कि मनुष्य जब जन्म लेता है, तो उसकी सता अत्यन्त संवेदनशील होती है। वह पृथ्वी पर चल रहे अन्तर्ग्रही वातावरण द्वारा असाधारण रूप से प्रभावित होती है। उसकी मानवी व्यक्तित्व का स्वरूप बनाने-ढालने में महती भूमिका होती है। जन्म कुण्डलियाँ इसी आधार पर बनती है। उनके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि शिशु के भविष्य का रुझान किस ओर है। यह सम्भावना भर होती है। यदि समय रहते उसे जाना, समझा जा सके, तो बचाव का सुधार का परिवर्तन का अभिवर्धन का उपाय भी किया जा सकता है। इस आधार पर सम्भावित परिस्थितियों की अनुकूलता का लाभ उठाना और प्रतिकूलताओं से लोहा ले सकना संभव होता है। यह बात सार्वभौम परिस्थितियों के संबंध में भी लागू होती है। मनुष्य की सम्मिलित इच्छा-शक्ति साधना माध्यम से एकत्रित करके उसे सशक्त तोप की तरह अनिष्ट को हटाने के लिए दागा जा सकता है। उसे चुम्बक स्वरूप में बदलकर उस अनुकूलता को आकर्षित भी किया जा सकता है।

ज्योतिष विद्या को तो आजकल बहुतों ने भविष्य कथन भाग्य निरूपण आदि के लिए प्रयुक्त करना शुरू कर दिया है और उस आधार पर लोगों को डरा कर उनसे उल्लू सीधा करने का धंधा भी पकड़ रखा है। इतने पर भी खगोल विज्ञान और उसके धरती पर पड़ने वाले प्रभावों का आधार पर अनर्थ से बचा और सुयोगों से जुड़ा जा सकता है। सुरक्षा की पूर्व तैयारी का अवसर मिल जाने पर सम्भावित अदृश्य अनिष्टों से बहुत सीमा तक बचा जा सकता है।

पुरातन काल में ज्योतिर्विज्ञान की प्रौढ़ता थी। तब हर पाँच हजार वर्ष बाद निर्धारित गणना में सुधार परिवर्तन दृश्य गणित के आधार पर कर लिया जाता था क्योंकि संसार की कालगणना बहुत स्थूल है। इससे ग्रहों की सही चाल की पटरी सम्भावित स्तर ही बैठती है, पूर्णतया सही नहीं। एक निर्धारण जब हुआ, उसके बाद ही अन्तर पड़ना शुरू हो जाता है और पाँच हजार वर्ष में स्थिति कही से कहीं जा पहुँचती है। इसका संशोधन दृश्य गणित के आधार पर ही करना होता है। वेधशालाओं को प्रामाणिक मानकर उनकी कसौटी पर कसते हुए ग्रह चाल में पड़े हुए अन्तर को सुधारा और नया निर्धारण किया जाता है। आवश्यक नहीं कि इस सुधार के लिए पाँच हजार वर्ष तक ही बड़ा अन्तर पड़ जाने तक की प्रतीक्षा की जाय। उस सुधार को हर महीने या हर दिन भी साथ-साथ करते रहा जा सकता है। इसके लिए वेधशालाओं के माध्यम से नित्य होने वाले परिवर्तनों-अन्तरों को समझा और सुधारा जा सकता है। इसके लिए खगोल विद्या के समस्त अनुमान खंडित हो जाते है। पंचांग झूठे पड़ जाते हैं। ग्रहों के उदय-अस्त तक में भारी अन्तर पड़ते देखा जा सकता है।

इन दिनों छपे पंचांगों के आधार पर सारी ज्योतिष गणना चलती है, जब कि होना यह चाहिए कि हर क्षेत्र की स्वतंत्र “पलमा” का ध्यान रखते हुए हर क्षेत्र का अपना स्वतंत्र पंचाँग बनना चाहिए। उसी आधार पर किया गया ग्रह-गणित सही हो सकता हैं पर कठिनाई यह है कि इतना कठिन परिश्रम कौन करे? इतनी बारीकियों में उतरने की विद्या समझने और उसे कार्यान्वित करने की विद्या को आरम्भ से अन्त तक कौन पढ़े? यह सब न बन पड़ने के कारण ज्योतिर्विज्ञान की धुरी ही लड़खड़ा गई है। इस स्थिति में उस विज्ञान के ऊपर ही अप्रामाणिकता का आक्षेप लगता है।

ज्योतिर्विज्ञान भारत का महान विज्ञान था। भाष्कराचार्य आर्यभट्ट तक के समय में उसकी स्थिति सही बनी रही। वेधशालायें बाद में भी बनी रही। अभी भी उन्हें उज्जैन जयपुर, वाराणसी, दिल्ली आदि स्थानों में किसी रूप में जीवित देखा जा सकता है। भले ही उनका रहस्य बताने वाले गणित सिखाने वाले पारंगतों का मार्गदर्शन वहाँ उपलब्ध न होता हो।

इस महती कमी को पूरा करने के लिए शान्तिकुँज में एक सुनियोजित वेधशाला बनाई गई हैं। उसमें पुरातन काल के प्राय सभी महत्वपूर्ण ढांचे खड़े किये गये और आधुनिक दूरबीनों का प्रबन्ध किया गया। इस आधार पर ग्रहों की स्थिति का निरीक्षण-परीक्षण निरन्तर चलता रहता है। दृश्य गणित का नियमित उपयोग करने वाली यह वेधशाला देख में अपने ढंग की अनोखी है। इस के द्वारा निकले हुए निष्कर्ष ही शान्तिकुँज से प्रकाशित होने वाले पंचाँग “दृश्य गणित पंचाँग” में हर वर्ष प्रकाशित होते रहते है। इसमें यह भी पाठ है कि हर स्थान का अपना स्वतंत्र पंचाँग किस प्रकार बनाया जा सकता है।

प्राचीन काल में खुली आँखों से सात ग्रह ही देखे गये थे। राहु केतु तो सूर्य पृथ्वी चन्द्रमा की चाल में आने वाले छाया केन्द्र भर है। चन्द्रमा उपग्रह हैं। इतनी भर की जानकारी के आधार पर पुरातन ज्योतिष का सारा ढाँचा खड़ा है। पर अब खगोलवेत्ताओं ने दूरवीक्षण यन्त्रों के सहारे अपने सौर-मण्डल के तीन सदस्य और ढूंढ़ निकालें है-प्लूटो नेपच्यून और यूरेनस। इन नए ग्रहों से भी सौर मण्डल प्रभावित होता रहा है। अब ही होता हैं। इसलिए आवश्यक है कि आधुनिक पंचाँगों में उनको भी स्थान मिले। उनसे भी गणित किया जाये। पर पुरातन आधार के मिलने पर और नए निर्धारण न कर पाने के कारण वह प्राय बन हीं नहीं पड़ता। इस प्रकार प्रचलित पंचाँग आज की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इस कमी को पूरा करने के लिए मिशन ने “दृश्य गणित पंचाँग” में उपरोक्त नए ग्रहों का समग्र गणित भी उसी तरह सम्मिलित किया है जैसे पुरातन काल के नव ग्रहों का अंकित होता रहा है। इस प्रकार अपना पंचाँग समय की कसौटी पर सर्वांगपूर्ण सिद्ध होता है।

मुहूर्तवाद के निरर्थक जंजाल को इस पंचाँग में स्थान नहीं दिया गया हैं। व्यक्ति का भविष्य कथन जन्मपत्रियों के आधार पर तो नहीं किया जाता, पर जन्मस्थान और प्रसव का समय ठीक मालूम होने पर स्थानीय स्थिति के आधार पर ऐसी जन्म कुण्डली बन जाती है, जिसके आधार पर कोई विशेषज्ञ यदि गहन गणित के आधार पर विचार कर सके तो व्यक्ति विशेष के संबंध में कुछ उपयोगी परामर्श दिये जा सकते है।

पुरातन विद्याओं में ज्योतिर्विज्ञान का महत्वपूर्ण आधार है। उसका सही स्वरूप सामने रहने पर यह भी सम्भव है कि धरती के वातावरण में प्रस्तुत होने वाली सम्भावनाओं के संबंध में कुछ उपयोगी पूर्व सूचना दे सकें। उस आधार पर अनर्थ से बचने और सुयोग से लाभ उठाने का अवसर मिल सके।

अखण्ड ज्योति अध्यात्म और विज्ञान को परस्पर सहयोगी बनाने के निमित्त दार्शनिक स्तर पर हीं नहीं, अनेक आधारों को लेकर लक्ष्यपूर्ति के लिए प्रयत्नरत है। इन्हीं अनेकों में से एक ‘ज्योतिर्विज्ञान’ का पुनरुत्थान भी कहा समझा जा सकता है। इससे ऋषि परम्पराओं के आधार पर चलते रहे भूतकालीन प्रयासों की गरिमा को समझा जा सकता है और उसका आधुनिक विज्ञान सम्मत स्वरूप देखा जा सकता है। इस संदर्भ में शान्ति कुंज के ज्योतिर्विज्ञान खण्ड को अपने ढंग का अनोखा ही समझा जा सकता है। इस प्रयास के पीछे अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का कष्ट साध्य प्रयास भी काम करते देखा जा सकता है। यह प्रयास अभी आरम्भिक रूप में है। क्रम यथावत चलता रहा तो अन्तर्ग्रही परिवार के साथ वैसा ही आदान-प्रदान चल पड़ने की संभावना है जैसा कि कुटुम्बी पड़ोसियों के साथ आमतौर से चलता रहता है।


प्रभाव का ज्वलंत उदाहरण

अखंड-ज्योति का प्रधान लक्ष्य है- ऋषि परम्पराओं का पुनर्जीवन’। इसी को आधुनिक परिवेश में ‘अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय भी कह सकते है। इस प्रयास की प्रत्यक्ष परिणति दो स्वरूपों में सामने आ रहीं है- एक है जनमानस का परिष्कार व्यक्तित्व का निखार, प्रतिभा का प्रखरीकरण। दूसरा है-सत्प्रवृत्ति संवर्धन, पुण्य-परमार्थ का विवेकपूर्ण अवलम्बन के साथ-साथ किया गया क्रियान्वयन।

इस प्रयास की परिणति दार्शनिक क्रान्ति के-दृष्टिकोण के उदारीकरण रूप में हाथों हाथ उपलब्ध होती देखी जा सकती है। जिस क्षेत्र में इस युग-चेतना को प्रवेश करने का अवसर मिला है वहाँ आदर्शवाद का संस्थापन, उत्कृष्टता का अभिवर्धन निखर कर सामने आया है।

प्रयास की गतिविधियों को लेखन, वाचन, पठन, श्रवण तक सीमित नहीं रखा गया है। यह तो अनेक लेखक उपदेशक सरलतापूर्वक करते भी रहते है, साथ ही अपनी आजीविका तथा प्रशंसा भी लगे हाथों प्राप्त कर लेते है। इतने भर से कुछ सुनने पढ़ने का मसाला तो जन-साधारण को मिलता है पर प्रत्यक्ष क्रियाशीलता के अभाव में ऐसा कुछ बन नहीं पड़ता जिससे लोगों को अपने में प्रगतिशीलता लोन के लिए प्राणवान प्रेरणा मिल सके। इसके लिए ऐसा कुछ चाहिए जिससे क्रियाशीलता को उभरने का अवसर मिले। प्रेरणाप्रद वातावरण से उभरने वाली उमंग उमगे।

यह असमंजस चिन्तन और कर्म का सघन समन्वय न होने के कारण ही उत्पन्न होता है। ज्ञान और कर्म दोनों का संबंध घनिष्टतापूर्वक जुड़ पड़ने पर ही ऐसा कुछ बन पड़ता है जिसे आदर्शवाद का पक्षधर समग्र परिवर्तन कहा जा सके। इस स्तर का सर्वांगपूर्ण प्रयास गंभीरतापूर्वक कुछ उँगलियों पर गिनने लायक स्थानों पर ही हुआ है। इस दिशा में राजा महेन्द्र प्रताप का प्रेम महा विद्यालय अरविन्द घोष का नेशनल कालेज, कन्याकुमारी का विवेकानन्द पीछ रामकृष्ण मिशन जैसे ज्ञान और कर्म का समन्वय करने वाले आधार खड़े करने में अन्य सुधारवादी व्रतरत रहें है। उनने स्कूल कालेज गुरुकुल जैसे शिक्षा संस्थान तो खोले पर यह नहीं सोचा कि पढ़ने के उपरान्त शिक्षार्थी आजीविका उपार्जन में लग जाने के लिए अतिरिक्त और भी कुछ सोचेंगे करेंगे क्या?

हो सकता है कि देश को लोकसेवी देने की कल्पना इन ज्ञानपीठों के निर्माता अपने मनों में संजोयें रहें हों पर उतने भर से न कुछ बनने वाला था न बन सका। सरकारी मशीन, कर्मचारी-अफसर तो बड़ी संख्या में प्रशिक्षित करती है, पर उस प्रशिक्षण के पीछे ऐसा कुछ नहीं होता जिसके आधार पर इन उत्तीर्ण लोगों में कर्मनिष्ठा का, ईमानदारी-जिम्मेदारी का भाव कूट-कूट कर भरा गया हो। इसी अभाव के कारण लापरवाही और बेईमानी का माहौल बनता है। सुविधा और सम्पदा हर किसी के गले चिपकती है। ऐसे नररत्न निकालने वाली कोई खदान खुली हुई नहीं है जिसने से लोक मंगल के लिए अपना उत्कर्ष करने वाले भावनाशील उभरे और स्वयंसेवक स्तर का जीवनक्रम अपनाकर जन साधारण पर छाप छोड़े। अन्यान्यों को भी अपनी ही तरह साहस प्रदर्शित करे। देवमानवों की बिरादरी का विस्तृतीकरण एवं नवयुग का अवतरण कहा जा सकता है।

इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए आवश्यक समझा गया कि सभी विचारशीलों को निजी कामों में कटौती करके परमार्थ प्रयोजनों में रुचि लेने योगदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाये। जो समयदान दे सके उन्हें लोकमंगल के रचनात्मक कामों में जुटाया जाय। भावनायें क्रियाशीलता के सहारे ही जीवित रहती है अन्यथा वे भी पानी के बुलबुले की तरह उठती है और विलीन हो जाती हैं। डायनुमा चलती है तो बैटरी चार्ज होती रहती हैं। लोक सेवा का कार्यक्रम अपनाकर ही कोई अपनी बढ़ी हुई श्रद्धा एवं भावना को जीवन्त रख सकता है। निष्क्रियता की स्थिति में दुष्प्रवृत्तियां भर जीवित रह सकती है। सत्प्रवृत्तियों को तो सेवा साधना का खाद पानी नियमित रूप से मिलना चाहिए। अखण्ड-ज्योति जहाँ दार्शनिक स्तर पर पुण्य-परमार्थ के पक्षधर तर्क तथ्य, प्रमाण उपस्थित करती रहीं है वहाँ उसने “अपनों से अपनी बात” शीर्षक के अंतर्गत प्रत्येक संबंधित व्यक्ति का इस हेतु भी उकसाया गया है कि वह समयदान अंशदान को आवश्यक नित्य कर्मों में सम्मिलित करे ओर जनमानस के परिष्कार को-सत्प्रवृत्ति संवर्धन को अनिवार्य धर्म कर्तव्यों की तरह जीवन-चर्या में सम्मिलित करे। शरीर और परिवार तक ही सीमित न रह कर समाज की हित साधना में भी बढ़-चढ़ कर योगदान दे।

यह मात्र प्रतिपादन या उपदेश भर नहीं था। जिस प्रकार किसी को समीप बिठाकर विचार-विनिमय द्वारा मार्गदर्शन किया जाता है ठीक उसी प्रकार छपे कागजों में प्राण प्रेरणा लपेट कर दूरवर्ती पाठकों के घरों में नवजीवन का संदेश विगत दर्शकों में पहुँचाया गया। प्रसन्नता की बात है कि उच्चस्तरीय प्रेरणा काम आई। उसने वही काम किया जो निकटवर्ती लोगों तक कोई प्राणवान अपनी प्राण चेतना से लाभान्वित करके करना है।

पत्र व्यवहार की आवश्यकता और क्षमता सभी लोग जानते हैं, लिखने वाला अपने भाव कागजों पर उड़ेल देता है और मन हल्का करता है। उसी प्रकार पान वाला भी प्रतीक्षा में बैठा रहता है। दरवाजे पर खड़ा पोस्टमैन का इन्तजार करता रहता है। अखण्ड-ज्योति ने यही भूमिका निभाई है। इसकी पंक्तियों में इतना सारगर्भित भावना भरा और प्राण चेतना से परिपूर्ण अंकन रहा है कि लिखने वाले की लेखनी उतनी ही तृप्त रही है जितनी की गाय अपने बच्चे को दूध पिलाकर राहत अनुभव करती है। पाठकों ने भी वस्तुस्थिति के अनुरूप प्रतिक्रिया व्यक्त की है उनने उसे दैवी वरदान का अवतरण समझा है और एक ++++ को अनेक-अनेक बार पढ़ा है। घर वालों को सुनाया है पड़ोसियों का पढ़ाया है मित्र-संबंधियों तक पहुँचाया है मित्र मण्डली में समय-समय पर उसका भरपूर गुणगान किया है। यही कारण है कि आरम्भ में 500 की संख्या में छपी अखंड-ज्योति अब ढाई लाख तक जा पहुँची है। धार्मिक पत्रों में उसे सबसे अधिक संख्या में प्रकाशित होने वाला माना जाता है। इसका कारण उसके मूल्यवान पाठ्य सामग्री वाले पृष्ठों को देखते हुए चरम सीमा तक सस्ता होना ही नहीं है वरन यह है कि जो पढ़ता है वह प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इसका प्रमाण यह है कि व्यक्तिगत निर्माण की परमार्थ परायणता में संलग्न व्यक्ति भी लाखों की संख्या में सृजन प्रयोजनों में संलग्न देखे जाते है। संगठित अनुयायियों के क्षेत्र में यह एक अद्भुत उदाहरण है। किसी पत्रिका के पाठक तो अनेक हो सकते है, पर उसके परामर्श के अनुरूप अपना जीवनक्रम ढाल लेने वाले इतनी बड़ी संख्या में कदाचित हीं कहीं देखे गये है।

पाठकों को कार्यक्रम में दिये गये है। उन्हें आत्मनिर्माण परिवार निर्माण समाजनिर्माण, के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कार्यक्रम अपनाने के लिए कहा गया है जो कहा गया है उसे अपनाया गया है। यही कारण है कि नीति-निष्ठा अपनाने वाले जितने व्यक्ति अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों में दीख पड़ते हैं उतने अन्यत्र कहीं नहीं। परिवारों में शालीनता का परिवार के पंचशीलों का समावेश जितनी मात्रा में हुआ है उतना अन्यत्र कदाचित हीं कहीं देखा जा सके। समाज-निर्माण के निमित्त भी इस समुदाय ने जितना काम किया है उसी बूँद-बूँद को एकत्रित किया जाये, तो वे घड़ा भरने जितनी ही जाती है। समाज सुधार के कितने ही आन्दोलन बड़े-बड़े मंचों से चल रहें हैं। धूम-धड़ाके समारोह जुलूस, प्रदर्शन गायन भाषण तो अन्य मंचों से भी होते देखे जाते है पर उनका प्रभाव प्रदर्शन तक ही सीमित रह जाता है। धूम-धाम सिमटते ही मूल प्रयोजन भी हवा में तिरोहित हो जाता है, पर अखंड-ज्योति परिवार के संबंध में यह बात नहीं हैं। उसके सदस्यों को विज्ञापनबाजी से दूर रहने के लिए कहा गया है, क्योंकि इससे व्यर्थ अहंकार बढ़ता है ललक को पूरा करने के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा का विषवृक्ष उगता है। सेवा को धर्म के रूप में समझा गया है। उसे लोकेषणा की पूर्ति का भौंड़ा आधार न बनने देने के लिए कहा गया है। यही कारण है कि परखे हुए, तपे हुये लोकसेवी चरित्रवान प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति इस परिकर में असाधारण अनुपात में देखे जा सकते है। सद्गुणों की सम्पदा न केवल देश धर्म समाज, संस्कृति की समर्थ सेवा करती है वरन व्यक्ति के निजी जीवन को भी सुख-शान्तिमय बनाती है, प्रसन्नता सम्पन्नता सफलता से भरती है। सज्जन स्तर के मित्रों का घनिष्ठ भाव और गहरा सहयोग मिलते जाना भी सफलता का कम महत्वपूर्ण अवलम्बन नहीं है। इन लाभों से अखंड-ज्योति परिवार के अधिकाँश सदस्य लाभान्वित हुए हैं। उनने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में युग चेतना का विकास, विस्तार करने में भी कोई कसर रहने नहीं दी है।

देश के कोने-कोने में प्राय चौबीस सौ सद्ज्ञान संवर्धन केन्द्र अपनी निजी इमारतों में चल रहें है। इन्हें गायत्री शक्तिपीठ और प्रज्ञापीठों के नाम से जाना जाता है। इनमें से प्रत्येक के साथ प्रायः पाँच कर्मठ कार्यकर्ता जुड़े रहते है और अपने प्रभाव क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति संवर्धन का दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन का कार्य करने में निरन्तर जुटे रहते है। इस प्रकार 12 हजार कार्यकर्ता युग अवतरण के आगमन की आरती उतारने के लिए भावभरी भूमिका निभाते रहते है।

हर संस्था अर्थ चिन्ता में डूबी रहती है या अपनी सम्पन्नता बढ़ाने के लिए दौड़-धूप करती रहती है। युगसृजेता जीवनदानियों को ऐसी किसी भी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता है। हर घर में उनके आगमन की प्रतीक्षा होती रहती है ओर भोजन के समय क्षुधा निवारण की व्यवस्था सहज ही बन जाती हैं। इसके लिए घरों में रखे अन्नघट सहज ही उस आवश्यकता को पूरा कर देते है। वस्त्र मार्ग व्यय प्रचार उपकरण आदि की आवश्यकता दस पैसा नित्य जमा करने वाले श्रद्धालुओं के ज्ञानघट से पूरी हो जाती है।

विनोबा कहते रहते थे कि “किसी संस्था को तभी तक जीवित रहना चाहिए जब तक उसके कार्यकर्ता निस्पृह और सच्चे सेवाभावी हों। वे न रहे घट जाये तो उन्हें विलासी प्रलोभन के सहारे रोके रहना व्यर्थ है” इस कसौटी पर अखण्ड-ज्योति के प्रज्ञा परिजन अब तक निरन्तर खुद उतरते रहें है और उनके सेवा कार्यों से संतुष्ट जनता उन्हें इतना सम्मान और सहयोग प्रदान करती है कि उनकी ब्राह्मणोचित निर्वाह आवश्यकताएँ निरन्तर पूरी होती रहती है साथ ही इस परमार्थी वर्ग की संख्या भी बढ़ती रहती है। आमतौर से सादगी का ब्राह्मणोचित जीवन लोगों को रास नहीं आता। सभी आलसी और विलासी रहना चाहते है। समय-प्रवाह के सर्वथा विपरीत शक्ति केन्द्र के साथ जुड़े हुए और निजी जीवन में बढ़-चढ़ कर आदर्श उपस्थित करने वाले सद्गृहस्थ घर रहकर भी पुरातन काल के ब्राह्मणों जैसी जीवनचर्या अपनाते है। जो गड़बड़ करते रहते है मार्ग भ्रष्ट होते है वे या तो हट जाते हैं या हटा दिये जाते है। जन-समुदाय ऐसे व्यक्तियों को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं करता व लोकेषणा में उलझा व्यक्ति स्वयं अपने पैरों कुल्हाड़ी मार कर ग्लानि भरा भारभूत जीवन जीता देखा जाता है।

आज जबकि सर्वत्र कर्मठ लोकसेवियों की भारी कमी अनुभव की जाती है तब .... बाहुल्य क्यों है? इसका एक ही कारण नहीं है-पत्रिका के पृष्ठों पर अंकित सजीव प्रतिपादन वरन् दूसरा गहरा और ठोस कारण है-उसके सूत्र–संचालकों की कथनी और करनी की एकता वाला ज्वलन्त जीवन अनुकरणीय अभिनन्दनीय स्तर का जीवनयापन जिसे खुली पुस्तक की तरह हर कोई देखता और पढ़ता रहता है।


पाँव जल गये (Kahani)

शेखसादी नमाज पढ़ने जा रहे थे। गाँव में जूते न होने के कारण उनके पाँव बुरी तरह जल गये थे। तभी उन्हें एक साहूकार दिखाई दिया जिसके पाँवों में चमचमाती जूतियाँ थी। शेखसादी ने कहा-वाह! अल्लाह! तू भी कितना पक्षपाती है, एक को तो चमचमाते जूते और मुझे फटे पुराने भी नहीं।

शेख अभी यही सोच रहे थे कि पीछे खटखट की आवाज सुनाई दी। पीछे मुड़कर देखा तो एक अपंग बैसाखी के सहारे चला आ रहा था। शेख ने अपने को एक तमाचा लगाया और कहा -या परवरदिगार यह क्या कम है कि तूने मुझे पैर तो दिये।


आन्दोलन का महत्व एवं अभियान की सार्थकता

लेखनी और वाणी का अपना महत्व है। उनसे स्वाध्याय और सत्संग की आशिक आवश्यकता पूरी होती है फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि इन दो के सहारे ही नव-निर्माण की समस्त आवश्यकताएँ पूरी हो जायेगी। यदि ऐसा होता तो रेडियो, दूरदर्शन जैसे याँत्रिक माध्यम ही लोक-शिक्षण की आवश्यकता पूरी कर लेते। लेखक ओर प्रकाशकों में से भी कितने ही ऐसे है जिनके द्वारा सदाशयतापूर्ण साहित्य ही सृजन किया जाता है। इतने पर भी वे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति इसलिए नहीं कर पाते कि उनके साथ व्यक्तिगत ऐसा संपर्क नहीं जुड़ पाता जो क्रमिक एवं प्रखर हो। दीप से दीप जलते है। व्यक्ति के प्रभाव से आदर्शवादी प्रतिभाएँ उभरती है। उन्हीं के द्वारा बड़े रचनात्मक एवं आन्दोलनपरक क्रिया-कलाप चल पड़ते है। उस प्रगतिशीलता से ही वे प्रयोजन पूरे होते है जिनका उद्देश्य अवांछनियताओं का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों को जन-जीवन में उतारना है। इस प्रकार का लोक शिक्षण हमेशा चलते रहने की आवश्यकता है।

प्राचीनकाल में साधु और ब्राह्मणों वर्ग के लोग व्यक्तिगत चरित्रनिष्ठा का सम्पादन, व्यक्तिगत का प्रामाणिक विस्तार घूमने के साथ-साथ समूचा समय जन-संपर्क और लोक कल्याण के प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों का ढाँचा खड़ा करने में सतयुगी वातावरण बनने में कठिनाई उत्पन्न नहीं होती थी व्यक्तित्वों के प्रखर और गतिविधियों के उत्कृष्ट रहने पर प्रकृति भी साथ देती है प्रेरणाप्रद वातावरण भी बनता है और उज्ज्वल भविष्य विनिर्मित करने वाला प्रगति-क्रम भी सहज चल पड़ता हैं।

अखण्ड-ज्योति के सूत्र संचालक ने इस वस्तुस्थिति पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया और ऐसी सुव्यवस्थित .... बनायी जिससे युग परिवर्तन के स्वप्न साकार होने का व्यावहारिक ढाँचा खड़ा हो सके। इनमें प्रथम निर्धारण था धर्मतंत्र से लोक-शिक्षण, जिसके आधार पर ऐसी अनेक गतिविधियाँ विनिर्मित और अग्रसर की गई जो व्यावहारिक भी हो बोधगम्य भी ओर गति पकड़ने की दृष्टि से लोक-प्रिय एवं सर्वसुलभ भी।

सर्वविदित है कि भौतिक क्षेत्र पर शासन का प्रमुख अधिपत्य है। सुविधा-संवर्धन के लिए सुरक्षा शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था, विकास आदि कार्यों के लिए राजतंत्र से ही आशा की जाती है। कार्यकर्ताओं और साधनों की विपुलता के कारण वह उस प्रकार के दायित्व वहन भी कर पाता है। इस क्षेत्र में प्रवेश पाने के लिए उसके लाभों को देखते हुए कितने ही लोग उत्सुक भी रहते हैं।

चेतना पर शासन करने वाली दूसरी शक्ति है-धर्मतंत्र। कभी उसमें साधु- ब्राह्मणों वर्ग के लोग ही आते थे, पर अब उसमें अनेक धाराऐं सम्मिलित हो गई हैं। प्रजातंत्र अपने स्थान पर सही है, पर इसके अतिरिक्त रचनात्मक प्रवृत्तियों का उभार करने वाले आन्दोलनों को भी उसमें सम्मिलित किया जा सकता है। आर्थिक सुविधा प्राप्त करने के लिए श्रमिक आन्दोलन चलते रहते है। पर भावना, विचारणा, आस्था आदत और मान्यताओं को ऊंचा उठाने वाले रचनात्मक आन्दोलन कदाचित ही कहीं चलते हैं। गान्धी का खादी आन्दोलन कदाचित ही कहीं चलते है। गान्धी का खादी आन्दोलन, विनोबा का भूदान आन्दोलन दीखते तो आर्थिक जैसे थे, पर वस्तुतः उनके पीछे सदृश्यता, उदारता, सादगी जैसी आस्थाओं को उभारने का प्रबल आग्रह छिपा हुआ था। सत्याग्रह आन्दोलन यों दीखता तो राजनैतिक था, पर उसके साथ मात्र संघर्ष ही नहीं, सृजन के भी अनेक पक्ष जुड़े हुये थे। विश्नोई सम्प्रदाय के संचालकों ने भी वृक्ष-रक्षा अहिंसा जैसे अनेक सृजनात्मक कार्य अपनी रीति-नीति में सम्मिलित किये गये थे।

धर्मतंत्र की मूर्च्छित और दिग्भ्रांत स्थिति को उबारने के लिए उस अजस्र क्षमता स्त्रोत को उत्कर्ष प्रयोजनों में लगाने के लिए अखंड-ज्योति ने युग निर्माण योजना आन्दोलन को जन्म दिया। उसे प्रकारान्तर से धर्मतंत्र माध्यम से किया जाने वाला लोक-शिक्षण एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन ही कहा जा सकता है।

इसका आरम्भ सन 1952 में गायत्री तपोभूमि को आन्दोलन की धुरी मान कर किया गया। भवन निर्माण के उपरान्त देश भर के प्रगतिशील धर्म प्रेमियों को एक स्थान पर सम्मेलन समारोह के रूप में एकत्रित करके उन्हें धर्मतंत्र माध्यम से लोकनिर्माण प्रयोजनों में लगाना था साथ ही बिखराव को एक केन्द्र पर केन्द्रीकृत करना भी।

सन् 1958 में मथुरा में सम्पन्न हुये इस आयोजन को सहस कुण्डी गायत्री महायज्ञ का नाम दिया गया। उसमें देश के कोने-कोने से प्रायः चार लाख विचारशील व्यक्ति सम्मिलित हुये। सबके आवास भोजन आदि की समुचित व्यवस्था की गई। दर्शक तो 10 लाख तक एकत्रित हो गये थे। सम्मेलन अपने ढंग का अभूतपूर्व था। उसकी विशालता व्यवस्था और भव्यता देखते ही बनती थी, पर उसकी रहस्यमय विशेषता यह थी कि सभी प्रतिभाशाली लोगों को अपने-अपने क्षेत्रों में प्रगतिशील धर्मप्रेमियों को संगठित करने का काम सौंपा गया। हिन्दू धर्म अनेक संप्रदायों-उपसम्प्रदायों में विभाजित है। उन्हें एकत्रित करने के लिए समन्वय नीति को अपनाने का भी निश्चय किया गया। साथ ही हाथों हाथ सद्भाव उभारने वाले आयोजनों की विधि-व्यवस्था करना भी। वह प्रयास सर्वथा सफल रहा और उसी के कारण धर्मतंत्र माध्यम से जन-जीवन ने आदर्शवादिता भरने वाला बहुमुखी प्रयास भी द्रुतगति से चल पड़ा। उसकी को युग-निर्माण योजना के आरम्भ या विस्तार-शुभारंभ भी कहा जा सकता है।

उपर्युक्त निर्धारण से लेकर व्यवस्था तथा कार्यान्वयन तक मूलभूत उद्गम एवं शक्ति स्त्रोत अखंड-ज्योति ही रही। योजना का स्वरूप सुनने वाले तब इसे दिवास्वप्न ही समझते थे और उपहास ही करते थे, पर जब संकल्प शक्ति अपने विकराल रूप में प्रकट हुई और उद्देश्य पूर्ति के लिए सहस्र भुजाओं से दसों दिशाओं में लपकी तो जाना गया कि पत्रिका छपे कागजों का पैकेट भर नहीं है इसमें प्रचण्ड प्राण ऊर्जा काम करती है और वह संयोजन के .... है।

.... जन-समारोह करने सबके द्वारा सृजन और सुधार की दोनों प्रवृत्तियों को गतिशील बनाने के रूप में किया गया। देश भर में छोटे-बड़े सहस्रों गायत्री यज्ञ किये गये। उनमें मितव्ययता का तो पूरा ध्यान रख ही गया साथ ही सुधार प्रयोजनों को अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखना भी अभीष्ट था। अग्निहोत्र पर बैठने वाले प्रत्येक याजक को एक बुराई छोड़ने और एक श्रेष्ठ अपनाने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी, साथ ही उसे आजीवन निबाहते रहने की अग्नि साक्षी में शपथ भी उठानी पड़ती थी। परित्याग की शपथों में नशा निषेध छूत-अछूत की, ऊंच-नीचपरक भेदभाव, पर्दा प्रथा, दहेज महँगी फैशन परस्ती आदि को प्रमुख रखा गया था। सत्प्रवृत्तियों में प्रौढ़ शिक्षा बाल–संस्कारशाला का स्थान-स्थान पर प्रबन्ध करना व्यायामशाला चलाना वृक्षारोपण परिवार-नियोजन जैसी प्रवृत्तियों को प्रमुखता दी गई। इस प्रकार गायत्री यज्ञ आन्दोलन की लहर में लाखों व्यक्तियों ने सृजन-संवर्धन और अनौचित्य उन्मूलन के व्रत लिये। इसे विचार-क्रान्ति अभियान का दूसरा चरण कहा जा सकता है।

तीसरे चरण में ऐसे शक्ति केन्द्रों की स्थापना को लक्ष्य बनाया गया, जिनमें कुछ लोक सेवकों स्थायी रूप से निवास करें, निर्वाह प्राप्त करे और समीपवर्ती दस गाँवों को कार्य क्षेत्र बनाकर उनमें सृजनात्मक प्रवृत्तियां का संस्थापन एवं अभिवर्धन करते रहें। इन छोटे-बड़े केन्द्रों की संख्या देश भर में दो हजार से ऊपर निकल गई। इनमें रहने के लिए वानप्रस्थ स्तर के कार्यकर्ताओं को नये सिरे से उत्पन्न करना पड़ा, उन्हें युगशिल्पी के रूप में प्रशिक्षण देना पड़ा। शान्ति-कंज में ऐसे लोग प्रशिक्षण प्राप्त करने निरन्तर आते रहें और उपयुक्त चरित्र एवं कौशल निखरने पर वे अपने समीपवर्ती शक्ति केन्द्रों में काम करने जाते रहें। इनके प्रयासों से नवसृजन का अभियान इतना व्यापक एवं सफल हुआ, जिसे अपने ढंग का अनोखा ही कहा जा सकता है।

समस्या इन लोकसेवियों के ब्राह्मणोचित निर्वाह की थी, उसे मुट्ठी फण्ड से पूरा किया गया। प्रत्येक घरों में एक मुट्ठी अनाज या दस पैसा नित्य जमा करने वाले घटों का स्थापना कराई गई। कार्यकर्ताओं का उपयोगी प्रयत्न देखते हुए जिनने अपने यहाँ अन्न घट रखें, उन सभी ने उदारतापूर्वक अंशदान दिया। व्यक्ति-निर्माण की यह योजना लम्बे समय से चल रहीं है और भविष्य में भी यथावत् चलती रहेगी। दो हजार शक्तिकेन्द्रों के प्रायः दस हजार कार्यकर्ताओं का युग अवतरण के प्रयत्नों में निरन्तर संलग्न रहना एक ऐसा आयोजन है, जिसकी योजना बनाने से लेकर कार्यान्वयन की लम्बी मंजिल पूरी करने का श्रेय अखण्ड-ज्योति के हिमगिरि को दिया जा सकता है जिससे अनेकों पुण्य धाराएँ निकली और सुविस्तृत भूभाग को सींचती रहीं।

लोकसेवी शिक्षण के साथ-साथ यह भी आवश्यक समझा गया कि इस बुद्धिवादी युग में अध्यात्म विचारणा को तर्क, तथ्य, प्रमाण एवं प्रत्यक्षवाद के आधार पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इसके लिए एक समर्थ प्रयोगशाला एवं शोध संस्थान बनना चाहिए। हरिद्वार शान्तिकुँज और ब्रह्मवर्चस उसी की देन है। इनकी विशाल इमारतें कार्य की आवश्यकता के अनुरूप बनानी पड़ी। आवश्यक साधन उपकरण जुटाने पड़े। इससे भी बड़ी बात थी लगनशील और उच्च शिक्षित कार्यवाहकों का बड़ी संख्या में उपलब्ध करना। यह कार्य भी अखण्ड-ज्योति ने ही सम्पन्न किया। उसके पाठकों में ही ऐसे प्रतिभावान भावनाशील निकल पड़े। जिनने हरिद्वार संस्थानों में आजीवन सेवा करके लिए संकल्प लिये और जीवनदानी के रूप में सदा-सर्वदा के लिए आ गये एवं अहर्निश सौंपे काम को करने में जुट गये। इन्हीं कर्मवीरों का चमत्कार है .... दी जाती है। 250 के करीब कार्यकर्ता ब्राह्मणोचित जीवन जीकर निर्वाह कर अपनी महत्वकाँक्षाओं को पैरों तले कुचल दे ऐसे उदाहरण कठिनाई से ही कहीं अन्यत्र देखने को मिलेंगे। यह चौथा चरण हुआ जिसके माध्यम से हर वर्ष लाखों व्यक्ति प्राण-प्रेरणा ग्रहण करते है।

पांचवां चरण है-धर्मतंत्र के समस्त क्रिया-कलापों कर्मकांडों का अत्यंत सरलीकरण कर देना, यह है द्वीप यज्ञ योजना। इनमें खर्च जो उँगलियों पर गिनने जितने रुपयों का ही आता है, पर इस माध्यम से बड़ी संख्या में लोग सहज हो जाते है। चंदा नहीं करना पड़ता। कार्यकर्ता मिलजुल कर ही उस आवश्यकता को पूरा कर लेते है। जहाँ माँग होती है, वहाँ शान्ति-कुँज की प्रचार गाड़ियां भी सभी आवश्यक उपकरणों समेत पहुँच जाती है। बुलाने वालों को अगले पड़ाव तक के लिए ईंधन भर देना पड़ता है। पाँच प्रचारकों से इन छोटे आयोजनों में भी समा बँधा जाता है।

गत वर्ष एक हजार स्थानों पर राष्ट्रीय एकता सम्मेलन हुए है जिससे साम्प्रदायिक जातिगत सद्भाव का वातावरण बना था। इस बार सद्भाव सम्मेलन हो रहे है जिनमें चार बातों पर प्रधान रूप से जोर दिया जाता है और उपस्थित जनों को इन प्रयासों में संलग्न होने के लिए उत्साह और साहस भरा जाता हैं। इस वर्ष चार कार्यक्रम हाथ में लिये गये है -

प्रौढ़ शिक्षा। हर शिक्षित पाँच अशिक्षितों को प्राथमिकशाला स्तर की पढ़ाई पूरी कराये। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए दो घण्टे नित्य की बाल संस्कारशाला चलायी जाये, जिसमें स्कूली पढ़ाई को पक्का कराया जाय।

बिना खर्च की, बिना दहेज-दिखावे की शादियों का प्रचलन। लड़के वालों से प्रथम प्रतिज्ञा करना। वयस्क लड़की-लड़कों से खर्चीली शादी न करने का संकल्प कराना। धूम-धाम वाली शादियों में सम्मिलित न होने का प्रचार करना।

नशा पीने वालों से छुड़ाना। जो नहीं पीते है, उन्हें उसकी चपेट में न आने के लिए सावधान करना।

हरीतिमा संवर्धन। वृक्षारोपण बीज तथा पौध का आवश्यकतानुसार वितरण। घरेलू शाक-वाटिका तथा तुलसी पौधों का आरोपण।

यह चारों प्रवृत्तियों इस वर्ष के दीप-यज्ञ आन्दोलन के साथ जुड़ गयी है। भविष्य में ऐसे-ऐसे अनेकों अभियान-आन्दोलन चलाने और प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों को उलट कर सीधा करने की विशाल योजना है। अखण्ड-ज्योति का उन भावी सम्भावनाओं का प्रेरणा-स्त्रोत समझा जा सकता है।


बसन्त की प्रेरणाएँ-नयी स्थापनाएँ

शोध-श्रृँखला में जुड़ रही नई कड़ियाँ

प्रस्तुत युग यंत्र युग है। आधुनिक उपकरणों के माध्यम से नित नवीन अनुसंधान सम्पन्न हो रहें है। मानवी मेधा की उपलब्धियों पर पहुँचती है। माइक्रोप्रोसेसर्स, सेमीकण्डर्क्टस, कम्प्यूटर आदि के अनुसंधान इन्हीं गत दो दशकों के है। इनने मानवी प्रगति की गति को और तीव्र बना दिया है।

समय की आवश्यकता को समझते हुए शान्ति-कुँज के सूत्र–संचालकों ने ब्रह्मवर्चस स्थित अनुसंधान प्रक्रिया को और भी प्रखर तीव्र बनाने तथा नये उपकरणों से सुसज्जित करने का निश्चय किया हैं। एक कक्ष अभी इन्हीं दिनों ब्रह्मवर्चस में विनिर्मित किया गया, जिसे पूरी तरह वातानुकूलित कर उसके अन्दर यज्ञ विज्ञान एवं मंत्र विज्ञान से संबंधित उपकरण एवं एक कम्प्यूटर लगाया गया है। शब्दशक्ति की प्रभाव क्षमता को मापने, गायन का तथा संगीत श्रवण का प्रभाव मानवी काया एवं मन पर प्रत्यक्ष रूप से देखने हेतु प्रयोगशाला में हयुअलबीम रिसर्च रिजाँल्यूशन आँसीलोस्कोप एवं एक टु-चैनल पालीराइट लगाया गया है। रक्तचाप, नाड़ी की गति, तापमान, मस्तिष्क की तरंगों एवं हृदय की विद्युत पर क्या प्रभाव मंत्रोच्चारण एवं मंत्र गायन का होता है, इसका आकलन करने के लिए ऐसे संवेदनशील सेंसर्स जुटाये गये हैं जो एफ0एम॰ स्तर पर सक्रिय रहते है अर्थात् साधक बिना तारों के सीधा उपकरणों से जुड़ जाता है।

यज्ञ ऊर्जा धूम्र एवं अवशिष्ट तथा वनौषधियों के रासायनिक विश्लेषण हेतु इन्हीं दिनों, ‘गैस-लिक्विड क्रोमेटोग्राफ” से प्रयोगशाला को सुसज्जित किया गया है। इससे वनौषधि के स्थूल व वाष्पीभूत स्वरूप के विज्ञान सम्मत विवेचन में महती भूमिका को योगदान मिलेगा। परिजन आने वाले समय में इन अनुसंधानों की महता का अनुमान लगा सकते हैं।

आकृति व संरचना के प्रभावों पर नूतन अनुसंधान

मन्दिरों के शिखर, बुर्ज, गुम्बद आदि की संरचना के मूल में कई विज्ञान-सम्मत तथ्य निहित है। पुरातत्व विज्ञानी आदि कल से यही विचारते रहें हैं कि इन विशिष्ट निर्माणों के पीछे अवश्य ही कोई कारण रहा होगा। मन्दिर, चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारों में प्रवेश करते ही अप्रतिम शान्ति का अनुभव होता है। मन्दिरों के गर्भगृह भी विशेष रूप से साधना प्रयोजन हेतु बनाये गये थे। बर्फीली चोटियों के मध्य ध्यान लगाने वाले योगीजनों का अनुभव है कि स्थान विशेष के कम्पनों का, उत्तराखण्ड के दिव्य वातावरण का, परोक्ष दैवी सत्ता को तो अपना विशेष महत्व है ही किन्तु संरचना विशेष का अपना महत्व है। परोक्ष से संपर्क स्थापित करने में सम्भवतः पर्वतशिखर “एण्टिना” की भूमिका निभाते है। प्रस्तुत विवेचन पाश्चात्य जगत में इन दिनों “पिरामिहालाँजी” पर चल रहें अनुसंधानों के परिप्रेक्ष्य में किया जा रहा है। पिरामिड जहाँ-जहाँ स्थित है, वहाँ भू-चुम्बकीय धाराओं की सघनता पाई गई है साथ ही यह भी देखा गया है कि उनमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा को केन्द्रीभूत करने की महती सामर्थ्य होती है। पिरामिडों के एक तिहाई अंश के मिलन स्थान पर रखी गयी वस्तु हमेशा ताजी पायी गयी, वह कभी सड़ी नहीं।

प्रस्तुत शोधों के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्मवर्चस के वैज्ञानिक समुदाय ने भी चिन्तन कर एक पिरामिड बनाकर उसका प्रभाव पौधों, जन्तुओं प्रयोगशाला के कल्चरमीडिया इत्यादि पर देखने का निश्चय किया। पिरामिड वस्तुतः उलट कर रखा गया यज्ञ-कुण्ड ही है। जहाँ यज्ञकुंड अन्दर संग्रहित ऊर्जा को वातावरण में फेंकता व व्यापक बना देता है, वहाँ पिरामिड ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आकर्षित कर अपने केन्द्र पर घनीभूत कर देता है। अभी तो प्रायोगिक परीक्षण हेतु यज्ञशाला के पीछे बनी संगीत विज्ञान वाली नयी प्रयोगशाला में एक मीटर ऊंचा काँच का पिरामिड बनाया गया है। योजना यह है कि ऊपर प्रयोगशाला के एक कक्ष में एक 9 फीट ऊंचा पिरामिड बनाकर 1/3 व 2/3 के मिलन स्थल पर साधक को बिठाया जाय व साधना की अवधि में इसका ई ई जी व ई सी जी पल्स, ब्लडप्रेशर आदि का विश्लेषण किया जाय। इस संबंध में महत्वपूर्ण ग्रन्थ एवं शोध प्रबन्ध भी जुटाये गये है।

ऊर्जा के नये स्त्रोतों का प्रचार विस्तार

अब बड़ी गम्भीरता से सोचा जा रहा है कि संसाधनों का जखीरा अधि दिन टिकने नहीं वाला। विकल्प जल्दी ही ढूंढ़ा जाना चाहिए। प्रज्ञा अभियान युग निर्माण योजना ने इस दिशा में जन-चेतना को जागृत करने का अभियान काफी पूर्व से छेड़ रखा हैं। सौर ऊर्जा से चलने वाले विभिन्न उपकरणों की उपयोगिता परिजन जानते ही हैं। सोलर हीटर्स व कुकर्स के उपयोगों से सभी परिचित है। मीडिया ने भी जन-जन तक इन सूचनाओं को पहुँचाया है इस दिशा में कृषिकार्य से निकला कूड़ा-कचरा एवं जलावन की लकड़ी की छीलन या टूटे हुए अंशों से सब्जियों के सूखे डंठलों से बिजली पैदा करने वाले एक “गैसीफायर” उपकरण का अनुसंधान वैज्ञानिकों ने किया है। “अंकुर” बड़ौदा की एक कम्पनी है जिसने भारत में अपना पहला गैसीफायर उपकरण जो 20 किलोवाट विद्युत उत्पन्न करेगा शान्ति कुँज में लगाया गया है। बिना धुँआ पैदा किये यह उपकरण 10 किलोवाट की शक्ति से चलने वाली जड़ी बूटी पिसाई की मशीन चलायेगी व शेष 10 किलोवाट से आश्रम परिसर की विद्युतीकरण की जाएगी। इससे विद्युत की वर्तमान खपत में लगभग तीस से चालीस प्रतिशत कमी होगी जो महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

वीडियो विभाग की नई उपलब्धियाँ

दूरदर्शन के माध्यम से लोक-शिक्षण प्रक्रिया की एक आँशिक पूर्ति ही हो सकी है। मनोरंजन के लिए उसमें अधिक समय नियोजित है एवं वह भी स्तर का नहीं है। शान्ति कुँज के वीडियो विभाग ने दिशा बोधक मार्गदर्शन छोटी-छोटी 10-10 मिनट की फिल्में बनाई है ताकि जन-साधारण को उनकी ही भाषा में समझाया जा सके। स्वास्थ्य स्वच्छ शिक्षा .... विस्तार समाज-सुधार की विभिन्न गतिविधियों पर प्रश्नोत्तरी एवं एक्शन साइंस के माध्यम से जन-रुचि को आकर्षित करने वाली फिल्में इस विभाग ने तैयार की है। एक वीडियो स्टूडियो .... रचनात्मक कार्यों में सक्रिय विभिन्न प्रतिभावान व्यक्तियों को आमंत्रित कर उनके विचार मीडिया द्वारा रिकार्ड कर चित्रों को जोड़ते हुए उनके व्यापक विस्तार की शान्ति-कुँज योजना है।

दीप-यज्ञों सम्बन्धी एक ज्ञातव्य

शान्ति-कुँज हरिद्वार से सभी नैष्ठिक गायत्री उपासकों के नाम एक संदेश प्रसारित किया गया है कि - “समय की विषमता से जूझने और निजी व्यक्तित्व को प्रखर प्रतिभावान बनाने के लिए इन दिनों सभी को अपनी उपासना में अधिक-तत्परता संजोनी चाहिए। जिनकी साधना नियमित नहीं चल रहीं है, वे उसे सुनियोजित कर लें। जो नियमित रूप से कर रहें है वे उसमें कुछ और वृद्धि कर लें। सूर्योदय का समय न चूकें। भले ही स्नानादि न कर पाने के कारण मौन मानसिक रूप से ही क्यों न करना पड़े? जप के साथ उगते स्वर्णिम सूर्य का ध्यान करना चाहिए। जो अपनी संकल्पित साधना का विवरण शान्ति-कुँज भेज देंगे। उन्हें उसके संरक्षण एवं संवर्धन की शक्ति प्राप्त होती रहेगी।

“नियमित साधना के साथ-साथ अग्निहोत्र भी आवश्यक है। उसकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। अब अधिक खर्च अधिक समय की व्यवस्था वाले यज्ञ चल रहें है। यज्ञ भी अति सरल और बिना खर्च के है। उनकी सामूहिकता परिपक्व होती है। और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए देव दक्षिणा के रूप में कुछ व्रत लेने का अवसर मिलता है। प्रौढ़-शिक्षा प्रसार बाल संस्कारशाला वृक्षारोपण दहेज विरोध नशा निषेध इस वर्ष के ये पाँच व्रत संकल्प है। सामूहिक यज्ञों में बैठने वाले इनमें से कोई एक व्रत संकल्प है। सामूहिक यज्ञों में बैठने वाले इनमें से कोई एक व्रत लिखित रूप में ले और इन संकल्पों को गायत्री माता के चरणों में अर्पित किया जाय। बाद में उन्हें शान्ति-कुँज भेजा जाय। ताकि यह पूछताछ होती रहें कि लिये संकल्प किस हद तक के पूरे किये जा रहें है।”

“सभी गायत्री उपासक माह में एक दिन मिल-जुल कर सामूहिक दीप-यज्ञ सम्पन्न करें। मंत्रोच्चार और सामूहिक गायत्री पाठ समेवत रूप में हों। पूर्णिमा या माह का अन्तिम छुट्टी वाला दिन इसके लिए सर्वोत्तम रहेगा। अन्त में संकीर्तन की व्यवस्था रखी जाय इस वर्ष ऐसे आयोजन हर क्षेत्र में अधिक से अधिक संख्या में होने चाहिए।


अपनों से अपनी बात - सृजन के लिये समयदान की याचना

अखण्ड ज्योति के प्रज्ञापुत्र इन दिनों ढाई लाख है। पिछले 50 वर्ष में वे 500 प्रतियों से आरम्भ होने वाली इस पत्रिका के सदस्य 500 गुने अधिक बढ़े हैं और वर्तमान स्थिति तक पहुँचे है। प्रगति के इस क्रम को देखते हुए सन् 88 में इनकी संख्या पाँच लाख की परिधि तक जा पहुँचना स्वाभाविक है। हर पत्रिका को 20 से कम व्यक्ति नहीं पढ़ते। इस प्रकार उनकी ग्राहकों और पाठकों की संख्या 50 लाख हो जाती है यह बहुत बड़ा- अपने ढंग का अनोखा परिकर है।

इसकी थोड़ी-थोड़ी सामर्थ्य भी यदि रचनात्मक कामों में लग सके तो युग सृजन के कार्य में चमत्कारी उपलब्धियां अर्जित की जा सकती है। सकती हैं शब्द में कुछ आशंका झलकती है। विश्वास किया जाना चाहिए कि वह संकल्प मूर्तिमान होकर ही रहेगा। देवताओं की संयुक्त-शक्ति से दुर्गा का अवतरण हुआ था। रीछ-वानरों से समुद्र-सेतु बाँधा था। ग्वाल बालों के सहयोग से गोवर्धन उठा था। अखण्ड ज्योति के प्रज्ञा पुत्र भी कुछ दिखा कर ही रहेंगे। ऐसा कुछ जिसके लिए वह अनुकरणीय और अभूतपूर्व शब्दों के साथ स्मरण रखा जा सके।

विश्वास किया गया है कि अखण्ड-ज्योति के प्रज्ञापुत्र अब तक इतनी प्रेरणा ग्रहण कर चुके है कि वे व्यवहारिक रूप से कुछ करने के लिए कटिबद्ध होंगे ही। इसके लिए आज का दिन ही सबसे उत्तम शुभ मुहूर्त है।

इस वसन्त पर्व से अखण्ड ज्योति परिवार के सभी परिजनों को नवसृजन के लिए नित्य कुछ समय निकालना है। यह समयदान ही वह आधार है जिनकी ईंटें मिलकर नवयुग का भव्य भवन खड़ा करेगी।

पिछले दिनों बतायी जाती रही कार्यपद्धति में इस बार कुछ ठोस और महत्वपूर्ण परिवर्तन-अभिवर्धन किया गया है। बौद्धिक नैतिक और सामाजिक क्रान्ति को अब (1) विचार क्रान्ति (2) आर्थिक-क्रान्ति (3) सामाजिक-क्रान्ति के रूप में समझा जा सकता है। बौद्धिक और नैतिक क्रान्ति को विचारक्रान्ति के अंतर्गत लिया गया है। आर्थिक–क्रान्ति का नया आधार जोड़ा गया है। सामाजिक क्रान्ति अपने स्थान पर यथावत है। यदि संघर्ष की भाषा में निरूपित किया जाय तो (1) अशिक्षा (2) गरीबी (3) संकीर्णता के विरुद्ध बोला गया जिहाद भी कहा जा सकता है। वस्तुतः यह तीन पिशाचिनी ऐसी है जिन्होंने समूचे मानव समुदाय को अपने शिकंजे में कस कर सब प्रकार दीन-मलीन बना दिया है। उन्हें सूर्पनखा ताड़का, और सुरसा की संज्ञा दी जा सकती है। इन्हें निरस्त करने में हममें से प्रत्येक को किसी न किसी रूप में भागीदार बनना है। इसी को यों भी कहा जा सकता है कि महाकाल के अंतःकरण की पुकार के अनुरूप अपने चिन्तन और क्रिया कलाप में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुका है। बात केवल समयदान की रह जाती है। वह भी संकीर्ण स्वार्थपरता में थोड़ी-सी कटौती कर लेने से सरलतापूर्वक हस्तगत हो सकता होगा। इस समयदान का उपयोग उपर्युक्त तीन प्रयोजनों में ही होगा।

अशिक्षा के विरुद्ध कुछ निर्धारित कदम पहले से भी उठ रहे थे अब वे सुनिश्चित और व्यवस्थित रूप से उठेंगे। (1) प्रौढ़शिक्षा (2) बाल-संस्कारशाला (3) युग साहित्य बिना मूल्य हर शिक्षित को घर बैठे उपलब्ध कराने की पुरानी प्रक्रिया में नये जोश-आवेश का समावेश करना है। बच्चों को स्कूल भेजने की बात तो अब प्रचलन में जुड़ गई है। उसके लिए चलती गाड़ी में और धक्के लगा देना ही जैसा कुछ करना पर्याप्त है। महत्वपूर्ण बात प्रौढ़शिक्षा की है। यदि उनके लिए व्यवस्थित पाठशालाऐं न बन सके तो दो-दो, चार-चार घरों की महिलाओं को एकत्रित करके 1 से 4 तक के समय में एक-एक घंटे की तीन प्रौढ़शालाएँ महिलाओं के लिए चल सकती है। पुरुषों के लिए रात्रि पाठशालाएँ ही उपयुक्त पड़ती है। इस संदर्भ में व्यक्तिगत रूप से भी इतना हो सकता है कि हर शिक्षित व्यक्ति न्यूनतम पाँच अशिक्षितों को साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा ले और उसे निबाहें। स्कूल जाने वाले बच्चों के अवकाश के समय उनकी पढ़ाई पूरी कराने के लिए, उनमें सुसंस्कारिता का बीजारोपण करने के लिए खेल-कूद के लिए, रचनात्मक कामों में, स्काउटिंग में प्रवृत्ति पैदा करने के लिए यह व्यवस्था की जा सकती है। पढ़ाने के लिए खाली समय वाले शिक्षितों से समयदान माँगा जा सकता है।

जो पढ़े-लिखे, उन्हें सत्संग, युग साहित्य पढ़ने का चस्का लगाने के लिए उनके घर बैठे पुस्तकें पहुँचाने और वापस लेने का सरल किन्तु अतिमहत्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है। शिक्षा-संवर्धन के लिए यह उपयोगी प्रयास है। विचार-क्रान्ति के लिए यह प्रारम्भिक प्रयास हर दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है, साथ ही सरल भी।

सामाजिक क्रान्ति के लिए विचार क्रान्ति वाले तरीके अपनाने पड़ेंगे। लोक-शिक्षण के लिए विचार गोष्ठियाँ ही कारगर उपाय है। लोगों को एकत्रित करने और उनकी भावश्रद्धा को झकझोरने के लिए “दीपयज्ञ” आगाजन अत्यन्त सफल हो रहें है। इनमें नाम मात्र का एक खर्च आता है। दो तीन घंटे में ही समूचा कर्मकाण्ड और भावभरा लोक शिक्षण पूरा हो जाता है। इन आयोजनों में सम्मिलित होने वालों को दुष्प्रवृत्तियों को छोड़ने और सत्प्रवृत्तियां अपनाने की देव-दक्षिणा देनी पड़ती है। अग्निदेव की साक्षी में लिया हुआ यह व्रत-संकल्प अन्तराल की गइराई तक उतरता है, स्मरण रहता है और पूरा होकर भी रहता हे।

प्रौढ़शिक्षा को अपने आन्दोलन में प्रमुखता इसलिए दी गई है कि देश के अधिकाँश प्रौढ़ नर-नारी अशिक्षित है। आज के समय में उन्हीं की प्रमुख भूमिका है। स्कूल तो वे जा नहीं पाते है। उनके लिए पढ़ाई की विशेष व्यवस्था से ही समय की माँग पूरी हो सकेगी।

दुष्प्रवृत्तियों में खर्चीली धूमधाम वाली, दहेज वाली शादियाँ अपने देश में एक आर्थिक अभिशाप है। इस प्रचलन को हटाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न होना चाहिए। अभिभावक प्रतिज्ञा करे कि हम अपने बच्चों की शादियाँ बिना दहेज के करेंगे। वयस्क बालक प्रतिज्ञा करें-उनके विवाह नितान्त सादगी के साथ बिना दहेज के ही होंगे, अन्यथा वे आजीवन कुँवारे रहेंगे। ऐसे विवाहों का सुयोग यदि स्थानीय परिस्थितियों में न बन पड़े तो उनके लिए शान्ति कुँज में बिना खर्च की व्यवस्था है।

जाति-पाति, ऊँच-नीच, मृतक-भोज, बाल-विवाह, नशेबाजी आदि और भी ऐसे कुप्रचलन है, जिनके छोड़ने-छुड़ाने बचे रहने की प्रतिज्ञाएँ करनी चाहिए, जहाँ वे हो रहें हैं, वहाँ प्रदर्शन किये जाने चाहिए और सामाजिक दबाव डालने वाले अन्य प्रयत्न करने चाहिए।

धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया अपने परिवार में बहुत समय से चल रही है। ज्ञानपीठें इसी निमित्त बनी है। अब जीवन शाखा-संगठन को वहाँ मान्यता दी गई हैं, जहाँ अखण्ड ज्योति के, युगशक्ति के, युगनिर्माण योजना के अधिक संख्या में ग्राहक-पाठक है। इन सभी केंद्रों में ऐसे कार्यकर्ता रहते है। अगले दिनों और भी बढ़ेंगे, जो अपने नगर में तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में युगान्तरीय चेतना का अलख जगायें और उलटे को उलट कर सीधा करें, उसी को अपनी श्रम साधना से हरितिमा से भरी पूरी उर्वर भूमि बनायें।

विचारक्रान्ति में और भी कई बातें जुड़ती है। जिनमें सर्व प्रथम हैं-संकीर्ण स्वार्थपरता। व्यक्तिवाद ही सबके ऊपर भूत की तरह सवार है। निजी सम्पन्नता, अहंकार की पूर्ति, विलासिता के अतिरिक्त चिन्तन आगे बढ़ता ही नहीं। समूह की-समाज की-परमार्थ की-लोकमंगल की बात कोई सोचता नहीं। सम्प्रदाय, जातिवाद, प्रान्तवाद, भाषावाद के नाम आये दिन फूट-फिसाद होते हैं। राष्ट्रीय एकता-अखण्डता खतरे में पड़ती है। इन सभी समस्याओं का एक मात्र हल है-व्यक्तिवाद के स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापन। यही विचारक्रान्ति का केन्द्र बिन्दु होना चाहिए। धर्म और अध्यात्म का समूचा कलेवर इसी एक प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ है। उस तत्वदर्शन से जन-जन को अवगत कराया जाना चाहिए।

एक सर्वथा नया कार्यक्रम इसी बार इसी वर्ष से आरम्भ किया गया हैं। वह है - आर्थिक–क्रांति। गरीबी से नीचे जीवन यापन करने वाले को उपार्जन के साधन प्रदान करके स्वावलम्बी और खुशहाल बनाने के लिए कार्य करना है। यह कार्य कुटीर उद्योगों के संवर्धन से हो सकता है। कृषि और पशुपालन के समुन्नत तौर तरीके अपना कर भी। या इन कार्यों को किसी प्रकार सरकार भी करती है। जहाँ कुछ हो रहा है वहाँ उनके कार्या में सहायता तो देनी चाहिए पर साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि लाल फीताशाही और आरामतलबी के वातावरण में ये उतना कुछ कर पायेंगे जितना कि अभीष्ट है तो इसकी आशा कम ही करनी चाहिए। इस क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के परिजनों को अपने ढंग से प्रवेश करना चाहिए। अपने घर से आरम्भ करके उस प्रक्रिया को अपने संपर्क क्षेत्र में दूर-दूर तक पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए।

बचत के कई अन्य तरीके भी है। उन्हें अपनाया जाय तथा सुविधा संवर्धन की दृष्टि से जो आवश्यक है उन कामों को हाथ में लिया जाय। इस दशा में एकाकी प्रयास तो अपने घर से आरम्भ किये जा सकते है। उनके अनुकरण का क्रम सहज ही आगे भी चल पड़ने की सम्भावना है।

बौद्धिक-नैतिक स्तर की विचारक्रान्ति के लिए अखण्ड ज्योति मिशन द्वारा युग निर्माण योजना के नाम से पहले भी बहुत कुछ कहा और किया जाता रहा है। पर आर्थिक-क्रान्ति को अभी इसी वर्ष से अपनी कार्यपद्धति में समाविष्ट किया गया है। इस निमित्त कितने ही नये कार्यक्रम हाथ में लिये गये है जिन्हें प्रत्येक समयदानी अपने क्रिया-कलापों में किसी न किसी रूप में सम्मिलित करें। घर परिवार में उनका प्रचलन करें और अपने संपर्क क्षेत्र में प्रभाव क्षेत्र में उसका प्रचलन करने के लिए ऐसा ही प्रयत्न करना चाहिए मानो वह सब निजी लाभ कमाने के लिए किया जा रहा हो। परमार्थ भी एक प्रकार से उच्चकोटि का निजी लाभ ही है।

वस्तुतः उसमें निजी लाभ भी कितने ही है। एक तो इस बहाने अधिक से अधिक लोगों के साथ संपर्क साधने का अवसर मिलता है, जो कभी भी किसी भी काम आ सकता है। दूसरा यह कि जो उद्योग दूसरों को चलाने के लिए कहा जाता है .... किसी को यदि बड़े पैमाने पर व्यावसायिक स्तर पर स्वयं करने लगा जाय तो अच्छी खासी आमदनी का एक अतिरिक्त स्त्रोत खुल सकता है। तीसरा यह है कि जिस क्षेत्र में अपना संपर्क है उसमें यदि खुशहाली का प्रगतिशीलता का कोई नया माहौल बनता है तो उसका श्रेय अपने को मिलेगा। यहाँ से आरम्भ किया गया लोक नेतृत्व जन सहानुभूति अर्जित करने के उपरान्त किन्हीं बड़े कार्या में हाथ डालने पर उनमें भी असाधारण सफलता मिलने की सम्भावना बनती है। इसके अतिरिक्त देश-सेवा का जन-कल्याण का पुण्य-परमार्थ तो प्रत्यक्ष है ही। जिसके कारण आत्मसंतोष जनसहयोग और पुण्य फल के आधार पर देवी अनुग्रह हस्तगत होने की प्रत्यक्ष सम्भावना रहती ही है।

आर्थिक–क्रांति का चूँकि इससे पहले कोई शिक्षण नहीं दिया गया इसलिए नये सिरे से छै-छै महीने के सत्र इस निर्मित शाँतिकुँज में इसी वसंत–पंचमी से आरम्भ किये जा रहें है। शिक्षार्थियों के लिए भोजन की आवास की निःशुल्क व्यवस्था रखी गई है। जो समर्थ है वे अपने भोजन व्यय का पूरा या आँशिक व्यय स्वेच्छा पूर्वक संस्था में जमाकर भी सकते है।

परिजनों से आग्रह किया गया है कि वे अपने लोगों में से ही एक शिक्षार्थी छै महीने के लिए शांतिकुंज भेजे। वह ऐसा प्रतिभावान होना चाहिए जो इस शिक्षा का अपने क्षेत्र में विस्तार कर सकने की क्षमता रखता है जिनका मानस भी इस प्रकार का है। इस छै मास की शिक्षा में 25 वर्ष से अधिक आयु के शिक्षार्थी ही लिये जायेंगे। पहला सत्र इसी वसन्त पंचमी (23 जनवरी 1988) से आरम्भ होगा। जिन्हें आना हो पत्र व्यवहार कर लें।


अरे मूर्ख गौरैया (Kahani)

अरे मूर्ख गौरैया तू दिन भर ऐसे ही तिनके चुनने में लगी रहेगी क्या? छिः छिः तू भी अजीब है, न कुछ मौज न मस्ती बस वही दिन रात परिश्रम-परिश्रम।

कौवे की विद्रूप वाणी सुनकर भी गौरैया चुपचाप तिनका चुनने और घोंसला बनाने में लगी रही। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ दिन ही बीते थे, वर्षा ऋतु आ गई। एक दिन बादल घुमड़े और जोर का पानी बरसने लगा। गौरैया अपने बच्चों सहित घोंसले में छिप रही और कौवा इधर-उधर मारा-मारा फिरता रहा। शाम को वह गौरैया के पास जाकर बोला-बहन! सचमुच मुझ से भूल हो गई जो तुझे भला-बुरा कहा, तुम्हें इस प्रकार सुरक्षित बैठे देखकर अब मुझे मालूम हुआ कि मेहनत का फल सदा मीठा होता है।


स्वार्थ और परमार्थ का शानदार समन्वय अतिमहत्वपूर्ण अभिनव प्रशिक्षण

अखंड ज्योति परिवार के सभी प्रज्ञापुत्रों को अब पठन-श्रवण तक सीमित न रहकर युग सृजन के रचनात्मक कार्या के लिए अपना समयदान भी नियमित रूप से करना चाहिए। अपने नित्य कर्मों में उपार्जन प्रयोजनों में एक आवश्यक पक्ष इस प्रयोजन को भी मानकर चलना चाहिए।

अभिनव क्रिया कलापों में कुछ संशोधन किये गये है। (1) विचारक्रान्ति (2) आर्थिक क्रान्ति (3) सामाजिक क्रान्ति की अभिनव योजना बनी है। बौद्धिक और नैतिक क्रान्ति का संयुक्त रूप विचार क्रान्ति कहा जायेगा समाज सुधार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन की प्रक्रिया भी पूर्ववत् रहेगी। नितान्त नया कार्यक्रम आर्थिक क्रान्ति का सम्मिलित किया गया है। बिखरे देहातों में बसा हुआ अशिक्षित और गरीबी की रेखा से नीचे जीने वाला समुदाय ही असली भारत है। सम्पन्न वर्ग और मध्यम वर्ग तो ऊंची नौकरियों से अच्छे कारोबार से अपना काम चला लेता हैं। विचार और प्रयास उसी वर्ग के लिए करता है जो प्रगति की घुड़दौड़ में पीछे रह गया है।

इस वर्ग के लिए आर्थिक प्रगति का माध्यम कृषि पशुपालन के अतिरिक्त कुटीर उद्योग ही हो सकते है इसका प्रशिक्षण करना एवं साधन जुटाना हर भावनाशील का कर्तव्य होना चाहिए। उनमें प्रगति की आकाँक्षा जगाना और जिरा भटकाव में वे फँस गये हैं उससे उबारना भी उतना ही आवश्यक है। इसी प्रयोजन के लिए समयदान लगाने का आग्रह किया जा रहा है। इसके लिए आवश्यक प्रशिक्षण छै-छै मास का देते रहने की नई योजना बनी है।

नौ नौ दिन के व्यक्तित्व निर्माण परिवार निर्माण समाज निर्माण के सत्र तो पूर्ववत् चालू रहेंगे। हर महीने तारीख .... तक वे चला करेंगे। उनमें साधनाक्रम तो पूर्ववत् रहेगा। पर नव निर्धारण की नूतन प्रक्रिया से परिचित कराने और उस संदर्भ में आवश्यक मार्ग दर्शन करने की बात भी अतिरिक्त रूप से जोड़ी गई है।

छै महीने के सत्रों में 25 वर्ष से अधिक आयु के शिक्षार्थी सम्मिलित किये जायेंगे। वे स्वस्थ प्रतिभावान शिक्षित सहनशील अनुशासनप्रिय परिश्रमी एवं मिलनसार प्रकृति के होने चाहिए। बूढ़े बीमार आलसी, असमर्थ लोगों को स्थान न मिल सकेगा। जो स्वयं अपने लिए ही एक समस्या बने हुए है वे दूसरों के लिए क्या कुछ कर सकेंगे? पुनरुत्थान के क्षेत्र में क्या योगदान दे सकेंगे?

शिक्षार्थियों की भोजन आवास तथा शिक्षण व्यवस्था निःशुल्क है। वस्त्र पुस्तकें वाद्ययंत्र आदि का खर्च स्वयं वहन करना होगा। इस शिक्षण से उपलब्ध योग्यता द्वारा समाज कल्याण में जो योगदान मिला ही है। साथ में निजी लाभ भी है। जन संपर्क जन सहयोग सम्मान, आत्म संतोष एवं भविष्य में नेतृत्व कर सकने की योग्यता का विकास होना निश्चित है। इन्हीं आधारों पर लोग ऊँचे उठते आगे बढ़ते एवं सफल जीवन जीते हुए महापुरुष बनते रहें है। यह लाभ प्रस्तुत सेवा कार्यों के साथ जुड़े हुए है। साथ ही यह भी सम्भावना है कि जिस आधार पर दूसरों की आर्थिक प्रगति की जानी है उन्हें यदि बड़े रूप में स्वयं भी करने लग जाय तो आर्थिक स्वावलम्बन का एक ऐसा स्त्रोत हाथ लगता है जिसके सहारे आजीविका भी चल सके और सेवा-साधना का सुयोग भी मिलता रहे। सभी प्रज्ञापीठों-स्वाध्याय मण्डलों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने क्षेत्र से अनेक शिक्षार्थी प्रशिक्षण के लिए भेजें। ताकि वे लौटने पर उस क्षेत्र में नवजीवन का आलोक वितरण कर सके। नव जागृति का पुनरुत्थान का आधार खड़ा कर सके।

ग्राम्य–जीवन के हर पक्ष को समुन्नत करने के लिए कोई भी व्यक्ति अपने समय का थोड़ा-थोड़ा भाग लोक मंगल के लिए लगा सकता है। जिनके पास अधिक समय है वे इस हेतु बड़ा कार्य क्षेत्र बना सकते हैं। इतना तो हर किसी से बन पड़ेगा कि अपने घर परिवार में इन प्रवृत्तियों का समावेश करें और अपना तथा अपने परिवार का एक सीमा तक उत्कर्ष कर सकें। इस प्रशिक्षण को स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय समझा जा सकता है।


पाँच सौ गुना होना अपर्याप्त है!लक्ष्य हजार गुने का है!

अखण्ड ज्योति की अपनी प्रारम्भिक वर्षों में 500 प्रतियाँ छपती थी। प्रचार विज्ञापन कमीशन आदि का कोई तारतम्य नहीं बैठ पा रहा था क्योंकि उसकी नीति कागज छपाई पोस्टेज भर जितना मूल्य रखने की रही नफे की कोई गुँजाइश नहीं रखी गई थी। नुकसान देने की सामर्थ्य न थी इसलिये ‘न नफा न नुकसान’ की नीति प्रारम्भ से ही अपनाई गई। फिर उसके प्रचार पर खर्च कैसे किया जाता है? यह किस बिना विस्तार की आशा आरम्भिक दिनों में धूमिल ही रहीं।

पर दूसरा अप्रत्याशित मार्ग निकला। जिनने पत्रिका पढ़ी उनसे उसने दिशा ही नहीं शक्ति भी प्राप्त की। जो छपा था उसे पढ़ा ही नहीं वरन वह बलपूर्वक गले भी उतरा और इस अभिनव ओजस ने पाठकों का जीवन-क्रम ही बदल दिया। उनकी अगणित समस्याएं जो पग-पग पर उठती थी वे सभी शान्त हुई सुलझी। प्रगति का द्वार खुला। वे इस संपर्क काल में अपने में अपने वातावरण में असाधारण परिवर्तन देखने लगे। अधिकाँश पाठको को ऐसे ही अनुभव होते रहें। वे आकर्षित होकर सूत्र संचालक के अधिकाधिक होते रहें। उन्हें अनुभव होता गया कि कथनी और करनी की एकता का ही यह प्रभाव है जो पत्रिका के माध्यम से प्रकाश बनकर पाठकों तक पहुँचता है और उनके अंतःकरण को स्पर्श करते हुए जीवनचर्या के साथ घुल मिल जाता है।

समझने वालों ने उचित समझा कि इस आलोक वितरण का लाभ अपने संपर्क क्षेत्र का भी दिया जाय। फलतः पत्रिका की सदस्य संख्या अनायास ही बढ़ती चली गई। प्रकाश वितरण का क्षेत्र अधिकाधिक विस्तृत हो गया। उनने ने केवल व्यक्तित्व विकास में आशाजनक सफलता पाई, वरन् नवनिर्माण की सृजन योजना में उनके अनुदान की आशातीत भूमिका बनती गई। यही है पत्रिका के विगत जीवन का संक्षिप्त स्वरूप और फलितार्थ।

पचास वर्षों के जीवन काल में अखण्ड ज्योति इसी क्रम से एक-एक कदम आगे बढ़ती जा रही है और अपने पैर चट्टान की तरह सुदृढ़ आधार पर जमाती रही है अखण्ड ज्योति अब प्रायः ढाई लाख छपती है। 500 .... का गुना बढ़कर इस स्थान पर आ पहुंचा है। यह पत्र पत्रिकाओं के जीवन्त होने का एक अभिनव उदाहरण है। इनकी उपयोगिता तो सिद्ध इससे होती ही है उससे भी बड़ी बात यह है कि पाठकों ने उसे अपना व्यक्तिगत रूप से रोपा और सींचा गया वटवृक्ष समझा और उसके समर्थ स्वावलम्बी होने की अवधि तक पूरा-पूरा ध्यान रखने का प्रयत्न किया। लेखन एक बात है कि उसके साथ परिजनों ने पारिवारिकता का संबंध जोड़ा और उसके विस्तार हेतु समुचित ध्यान रखा।

जितना कार्य हो चुका उस पर गर्व तो किया जा सकता है पर उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। अस्सी करोड़ तो भारतीय जनता एवं 500 करोड़ की विश्व जनसंख्या को देखते हुए यह प्रकाश वितरण अत्यन्त अल्प है। अखण्ड ज्योति परिवार के घनिष्ठ आत्मीय सोचते हैं कि इस प्रकाश–तंत्र का विस्तार करने के लिए एक लम्बी छलाँग लगानी चाहिए एक आदर्श स्थापित किया जाना चाहिए। एक कीर्तिमान बनना चाहिए।

500 का पाँच गुना विस्तार जब हो सकता है तो इसे एक बारगी दूना कर देना क्यों संभव नहीं हो सकता? पाँच सो गुना दुखकर थका क्यों जाये? ढाई लाख हो सकता है तो पाठकों का उत्साह भरा प्रयास उसे पाँच लाख भी देखते देखते बन सकता है। यह आकाँक्षा मात्र मनोरथ बनकर क्यों रहे? उसे लक्ष्य बनकर साकार रूप धारण करने का अवसर क्यों न मिल सके।

इस वर्ष सभी प्रतिभावान परिजनों को अपने संपर्क क्षेत्र को छान डालना है और देखना है कि उनका प्रभाव कितना काम कर सकता है।? उसमें कितनी सफलता प्राप्त करने का दमखम है? यदि विचारशीलों के साथ जन संपर्क पर निकला जाये अपनी पत्रिकाओं के नमूने नये लोगों को दिखाये जाये ज्योति की ....


चाहिये कुछ और ही आराध्य को


चाहिये कुछ और ही आराध्य को (Kavita)

चाहिये, कुछ और ही, आराध्य को आराधना में। पड़ गई पूजा पुरानी, और बासी भावनायें, भर रहीं कितनी उदासी, हैं रुँवासी अर्चनायें

चाहिये उपचार नूतन, आज पूजन अर्चना में। चाहिये कुछ और ही, आराध्य को आराधना में,

फूल की गर्दन मरोड़ी पंखुड़ी नोंची चढ़ाई। दैव की सुषमा, उजाड़ी, हो निठुर माला बनाई।

हो गये पाषाण, निर्दय, प्राण ही, देवार्चना में। चाहिये कुछ और ही, आराध्य को आराधना में।

कल्पवृक्ष, कराहते हैं कामधेनु पछाड़ खाती, साधकों की दीनता लख, थरथराते, दीप बाती।

चाहिये कुछ और ही, आराध्य को आराधना में। बोधमय, आनन्द, उफनाता न, प्राण, उपासना में। प्रार्थनायें याचना का गीत बन कर, रो रही है। भावनायें गिड़गिड़ाती, दीनतायें दो रही है।

शान्त, मृदु मुस्कान में, उभरी न अंतस् की विमलता शील-सिक्त, स्वभाव में, निखरी न साधक की सरलता

भीगती पलकें न करतीं, दिव्य दर्शन, भावना में। चाहिये कुछ और ही, आराध्य को आराधना में।

हो पसीना, अर्घ्य, आँसू की पिलाओ नीर पावन सर्जना में।

मंत्र हो मधुसिक्त वाणी भेंट हो, चैतन्य जीवन। हो समर्पित भक्ति जाग्रत मानवी-सम्वेदना में।

चाहिये कुछ और ही, आराध्य को आराधना में।

लाखन सिंह भदौरिया

*समाप्त*