जीवन क्या है? श्रुति कहती है कि जीवन के स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उससे जुड़े तथ्यों को स्वीकार किया जाना चाहिए, चाहे वे कितने ही अप्रिय क्यों न प्रतीत होते हों? जीवन एक चुनौती है, एक संग्राम है, एक जोखिम है एवं उसे इसी रूप में अंगीकार करने के अतिरिक्त और चारा नहीं। जीवन ऐ रहस्य है, तिलिस्म है, भूल-भुलैया है, एक प्रकार का गोरखधंधा है। गंभीर पर्यवेक्षण के आधार पर ही उसकी तह तक पहुँचा जा सकता है। इसी आधार पर भ्रान्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों से बचा जा सकता है। कर्त्तव्य के रूप में जीवन अत्यन्त भारी किन्तु अभिनेता की तरह हँसने-हँसाने वाला हल्का-फुलका रंगमंच भी है।
जीवन एक गीत है, जिसे पंचम स्वर में गाया जा सकता है। जीवन एक स्वप्न है, जिसमें स्वयं को खोया जा सके तो भरपूर आनंद का रसास्वादन किया जा सकता है। जीवन अवसर है, जिसे गँवा देने पर सब कुछ हाथ से गुम हो जाता है। जीवन एक प्रतिज्ञा है, यात्रा 8है, जीने की एक कला है। कैसे इसे सफल बनाया जा सता है, जिसने यह जान लिया, इस पर मनन कर लिया, 1?व651 समझ लेना चाहिए कि वही सच्चा पारखी, जौहरी एवं उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने वाला भाग्यशाली है। जीवन सौंदर्य है, जीवन प्रेम है, जीवन आनन्द है, वह सब कुछ है जो नियन्ता की इस सुविस्तृत सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जा सकने योग्य है।
एक बार विष्णु भगवान का मन पृथ्वी पर आकर मनुष्यों की स्थिति का पर्यवेक्षण करने और धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने का हुआ। वे चलने लगे तो लक्ष्मी जी ने रोका और कहा -”प्रभु! मनुष्य अब अपने चिन्तन, चरित्र की दृष्टि से बहुत ही गये गुजरे हो गए है। वे धर्म के बाते मा गाल बजाने की तरह करते है, पर उन्हें हृदयंगम करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है। ऐसी दशा में आपका उनके पास जाना व्यर्थ है।”
विष्णु जी माने नहीं। उनने हठपूर्वक जाने का इरादा बना ही लिया। लक्ष्मीजी अपनी बात की अवहेलना किये जाने पर रुष्ट हो गई। बोली- यदि धर्म शिक्षा मनुष्यों ने स्वीकार न की, आप असफल लौटे तो मैं घर में न घुसने दूँगी।”
विष्णु चले गए। जगह-जगह जाकर उनने मनुष्य को एकत्रित किया, धर्म कर्म की शिक्षा दी। लोगों ने सभी जगह एक-सा उत्तर दिया कि यह तो हम कथा–वार्ताओं में सुनते रहते है। यदि आपकी वस्तुतः कृपा है तो हम लोगों की मनोकामनाएँ पूरी कर दीजिए। कुछ उपहार वरदान दीजिए।
निराश होकर भगवान दूसरी,तीसरी,चौथी जगह गए। पर सर्वत्र एक जैसे ही उत्तर मिले। खिन्न होकर वे जहाँ-तहाँ छिपते भी फिरे पर लोगों ने उन्हें ढूँढ़ ही लिया और कसी प्रकार की शिक्षा देने की अपेक्षा मनोरथ पूर्ण करने की बात ही कही। “मनःस्थिति बदलने पर परिस्थिति बदलती है” “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है” जैसी शिक्षाएं उन्हें बिल्कुल नहीं सुहा रही थी। उनकी तो बस एक ही रट थी कि “यदि आप सही मायने में भक्तवत्सल है तो हमें सम्पदाओं से निहाल कर दीजिए।”
ऐसी अवज्ञा देखकर भगवान बड़े दुःखी हुए। कहाँ तो वे अपने भक्तों को ढूंढ़ने चले थे। मन में उमंग थी कि धर्म परायण बनने की लोगों को शिक्षा देंगे। पर वहाँ तो सब कुछ उल्टा ही उल्टा था। खिन्न मन से पृथ्वी लोक में विचरण करते-करते “आदमी” नामक प्राणी से जान बचाते वे समुद्र के बीच एक टापू पर द्वारिका जैसी नगरी में एकान्त स्थान पर जा छिपे। उनने मनुष्यों से पुनः संपर्क कर उन्हें सत्पथ पर चलने की प्रेरणा देने का विचार ही त्याग दिया।
भगवान के परम भक्तों में नारद को सर्वश्रेष्ठ स्थान मिला हुआ है। कहा जाता है कि उन्हें अव्यवहृत गति प्राप्त है। वे तीनों लोकों में विचरण करते रहते है। नारदजी बैकुण्ठ लोक से खबर लेकर निकले कि विष्णु भगवान धरती पर गये है। अपनी विकालषता के बल पर उन्होंने भगवान को खोज ही लिया। उन्हें उदास देखकर नारदजी ने कारण पूछा-भगवान ने अपनी व्यथा कह सुनाई और करुण स्वर में बोले-” हे देवर्षि! कोई ऐसा स्थान बताइये, जहाँ मैं छिपा बैठा रह सकूँ और लोगों को पता भी न चले। कहीं पता चल गया तो मुझे कही का न छोड़ेंगे। ऐसे दुष्ट होंगे, इसकी तो मुझे कल्पना भी नहीं थी। अपने लोक में तो तब तक वापस जा नहीं सकता जब तक लक्ष्मीजी की घर में न घुसने देने की चुनौती बनी हुई है।”
नारदजी ने सारा वृत्तांत सुना, कुछ सोचा और बोल उठे- “भगवन्! मार्ग मिल गया। आप मनुष्य के हृदय में जा बैठिये। लोग तो आपको बहिर्मुखी होने के कारण जगह-जगह ढूंढ़ते फिरते है। वे आपको उनके ही अन्दर विराजमान होने की कल्पना तक न कर पायेंगे। आप निश्चिंततापूर्वक वहाँ विराजे रहें। जो आपका सच्चा भक्त होगा, वह जब भी अपने अन्दर आपको ढूँढ़ेगा, आपको पा लेगा। उसी को आ सन्मार्ग पर चलने का, त्रिविध भवबंधनों से मुक्त हो स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बताते रहिएगा। आप तो मायापति है प्रभु! एक से अनेक बनकर हृदय क्षेत्र में जा बैठिये। देवी लक्ष्मी कभी आप से दूर रह सकेंगी वे भी नकली भक्तों से व्यथित है? वे भी आपके साथ ही रहेंगी”
भगवान को सलाह पसंद आ गई। वे मनुष्यों के हृदय में तब से बैठे हैं। पर सभी उन्हें ढूंढ़ते बाहर, तीर्थ-देवालयों की दौड़ लगाते रहते है। समय, श्रम व पैसा गँवाते है फलतः भगदड़ से निराशा ही निराशा हाथ लगती है।
महाभारत में घमासान युद्ध हो रहा था। द्रोणाचार्य और अर्जुन आमने-सामने थे। द्रोणाचार्य लड़खड़ा रहे थे। अर्जुन आगे बढ़ता आ रहा है।
कौरवों में से एक ने पूछा -इस आश्चर्य का क्या कारण है कि गुरु हारता और शिष्य जीतता जा रहा है।
द्रोणाचार्य ने कहा-मुझे लम्बा समय राजाश्रय की सुख सुविधाएँ भोगते हो गया, जब कि अर्जुन निरन्तर कठिनाइयों से जूझते रहा है।
सुविधा सम्पन्न अपनी सामर्थ्य गँवा बैठता है और संघर्षशीलों की क्षमता बढ़ती जाती है।
मनुष्य वस्तुतः कैसा है? क्या है? उसकी मूलभूत जन्म-जात प्रवृत्तियां क्या है? मनोविज्ञानियों,तत्ववेत्ताओं के लिए यह लम्बे समय से शोध का विषय रहा है। नीतिशास्त्र,धर्मशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन एवं विज्ञान आदि विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों ने समय-समय पर इस संदर्भ में अपने-अपने मन्तव्य प्रकट किये है। साथ ही सामाजिक परिवेश में उसके व्यक्तित्व-विकास की संभावनाओं का अध्ययन किया है कि किस प्रकार वह अपने स्वभाव-संस्कार का परिष्कार परिमार्जन करके स्वयं को ऊंचा उठाकर दिव्यता का वरण करता है।
अध्यात्मवेत्ताओं का कहना है कि मनुष्य के स्वभाव को जानने से पूर्व उसके उद्गम स्त्रोत को जानना आवश्यक है। मानवी अन्तःकरण की संरचना दैवी तत्वों से मिलकर हुई है। वह स्वयं ईश्वर का ज्येष्ठ पुत्र युवराज है और उसकी विश्व वाटिका को समुन्नत-सुविकसित करने के लिए एक कुशल माली की भूमिका निभाने आया है। उसका जन्मजात स्वभाव भी इस भूमिका का निर्वाह कर सकने के सर्वथा उपयुक्त है। शरीर,मनःतंत्र और भावनाओं-सद्प्रेरणाओं क्रीड़ा स्थल अन्तःकरण का त्रिविध संस्थान ऐसी दिव्य क्षमताओं और विभूतियों से भरा-पूरा मिला है, जिससे वह जीवन सम्पदा को सार्थक बनाने वाली उच्चस्तरीय भूमिका निभा सके।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में भ्रान्त धारणाएँ ही प्रस्तुत की हैं और उसके स्वभाव को हेय स्तर का ठहराया है। कहा है कि जन्मजात रूप से उसे पशु प्रवृत्तियाँ ही मिली हैं। उनकी पूर्ति से ही उसे चैन पड़ता है। वहीं उसे करना चाहिए। इन तथाकथित अन्वेषणकर्ताओं में डार्विन जैसे विकासवादियों का कहना है कि समुद्र में अमीबा जैसे एक कोशीय प्राणियों के रूप में जीवन उत्पन्न हुआ, उसी से विभिन्न प्रकार के प्राणी विकसित हुए। उसी विकास शृंखला में से बन्दर की औलाद के रूप में मानव जीवन प्रकाश में आया। पशु-प्रवृत्तियों के इन विश्लेषणकर्ताओं ने यह कहा है कि सभी जानवर स्वार्थ प्रधान है। जहाँ अवसर मिलता है वहाँ आक्रमण करने में नहीं चूकते। यौन स्वेच्छाचार उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। खतरे की स्थिति में लड़ने या भाग खड़े होने की दोनों ही प्रवृत्तियां अपनाते। चूँकि मनुष्य भी एक तरह का विकसित पशु है, इसलिए उसके स्वभाव में भी यही प्रवृत्तियां भरी रहती है। इस प्रतिपादन के अनुसार मनुष्य चोर-उचक्का,व्यभिचारी, आक्रमणकारी, स्वार्थी बनाता है तो यह उसकी स्वाभाविकता कही जायेगी।
इंग्लैंड के दार्शनिक हॉब्स ने मनुष्य को बहुत बड़ा स्वार्थी प्राणी माना है। उनका कथन है कि मनुष्य-मनुष्य के लिए भेड़िये के समान है यदि उसे मनमानी बरतने की स्वेच्छागामी होने की छूट मिल जाये तो अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए वह दूसरे का गला घोट सकता है। उनके अनुसार मनुष्य हिंसक स्वभाव का होने के कारण ही अपने लिए राज्य-प्रशासन एवं विभिन्न नियमों, कानूनों की व्यवस्था करता है जिससे उसे ऐसा कुछ करने से दंड पाने का भय बना रहे। प्रतिकार के भय से ही वह दूसरों पर आक्रमण नहीं करता। अन्यथा जहाँ इसकी संभावना नहीं होती, वहाँ उद्दण्डता बरतने, दूसरों को सताने, उन्हें विनष्ट करने का दुष्कृत्य क्यों करता।
आधुनिक मनोविज्ञान के प्रवर्तक सिग्मंड फ्रायड ने भी मनुष्य को स्वार्थी कहा है। उनके अनुसार मनुष्य का जीवन अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए है। दूसरों के प्रति प्रेम और उदारता मात्र दिखाने के लिए है। जो व्यक्ति अपने अंतर्मन में जितना अधिक स्वार्थी होता है वह उदारता का उतना ही आडम्बर फैलाकर संसार में प्रसिद्धि पाने की चेष्टा करता है। सुख प्राप्ति की कामना को ही उन सब कामों का मूल स्त्रोत बताया है। उनके अनुसार दान पुण्य परमार्थ इसलिए किये जाते है जिससे कीर्ति बढ़े या आर्थिक लाभ हो। लोगों की दान व्यक्ति पर श्रद्धा जाती रहे। फ्रायड का सम्पूर्ण मनोविज्ञान वासना-तृप्ति के इर्द−गिर्द ही चक्कर काटता है। इसी को उसने मनुष्य की मूल प्रवृत्ति माना है। जब उसे खेलने की खुली छूट मिल जाती है तो मनुष्य स्वस्थ रहता है अन्यथा दमित और अतृप्त वासना से अनेकानेक मनोविकारों का उदय होता है। इस प्रकार फ्रायडवादी प्रतिपादन के हिसाब से नीतिवादी-आदर्शवादी उत्कृष्टता की जड़ कट जाती है और मनुष्य नर पशुओं की श्रेणी में जा खड़ा होता है।
विकासवादी एवं फ्रायडवादी प्रतिपादकों की उपरोक्त मान्यताओं से हटकर मानवी स्वभाव की दिव्यता पर दृढ़ विश्वास रखने वाले मनःशास्त्रियों एवं अध्यात्मवेत्ताओं का कहना है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ सन्तान है। ‘वह पूर्ण से उत्पन्न हुआ, पूर्णता युक्त है और अन्त में पूर्ण होकर ही रहेगा।’ इस श्रुति प्रतिपादन के अनुसार ही उसका स्वभाव एवं मूलवृत्तियां भी होनी चाहिए। फ्रायड द्वारा प्रतिपादित स्वभाव को इन्होंने मनुष्य के वास्तविक स्वभाव का विकृत रूप बताया गया है।
अध्यात्म विज्ञानियों के अनुसार मूलतः मानवी अन्तःकरण की संरचना दिव्य तत्वों से हुई है। स्नेह, सौजन्य, सद्भाव, पराक्रम, उल्लास, ऊर्ध्वगमन सत्प्रवृत्तियां ही उसमें भरी पड़ी है।उस क्षेत्र में जीवन क्रम को श्रेष्ठ बनाने तथा महानता के पथ पर अग्रसर होने की ही अदृश्य प्रेरणाएँ उठा करती है। सामान्यतया इसे अनसुनी करते रहने पर अन्तःकरण की दैवी चेतना प्रसुप्त पड़ जाती है और दुष्प्रवृत्तियों को जीवन सत्ता में प्रवेश करने की छूट मिल जाती है। इस क्षेत्र में निकृष्टताओं की भरमार होते रहने पर वही धीरे-धीरे स्वभाव का अंग बन जाती है। कालान्तर में यही प्रवृत्तियां संस्कार का रूप धारण कर लेती है और उनके दबाव से मनुष्य दुष्कर्मों की ओर आकृष्ट होता है। जन्म-जन्मान्तरों तक यही पशुवत् सरकार मानवी चेतना पर छाये रहते है। उनकी जड़ें मन की अचेतन परतों में गहराई तक जमी रहती है। ऐसी स्थिति में अन्तःकरण में सद्प्रेरणाएँ उभरती तो है किन्तु उस पर छायी मलीनता उन्हें कोई विशेष प्रतिफल प्रस्तुत नहीं करने देती। अन्तःकरण की दैवी सत्ता पर कुसंस्कार हावी रहते है और मनुष्य को श्रेष्ठता के महानतम के मार्ग पर बढ़ने में भारी अवरोध खड़ा करते है। कठोपनिषद् में ऋषि कहते हैं “ प्रमाद्यन्तम् वित्तमोहेन मूढ़्” अर्थात् सत्ता, सम्पत्ति के मोह में मनुष्य अपनी दिक् स्थिति भूल गया है। लगातार भ्रमित हो पथ अवरुद्ध होने का अर्थ है”मृत्यु”। अतः उपनिषद्कार संदेश देता है- कि मनुष्य पुरुषार्थ करे पर वैभव में खो न जाय। वह साध्य की अनुभूति करे। साध्य है अपना दिव्य स्वरूप-सत् चित् एवं आनन्द।
प्रख्यात मनोवैज्ञानिक कार्ल जुँग ने प्रकारान्तर से भारतीय अध्यात्म का ही समर्थन किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक ”टू ऐसे ऑन एनालिटीकल साइकोलॉजी” में कहा है कि मनुष्य स्वभावतः दिव्यता का पक्षधर है। अपने जीवन का परम लक्ष्य वह आत्मोत्कर्ष को मान्यता है। इस दिव्यता की प्राप्ति के लिए वह किसी प्रतीक या देव शक्ति को अपना माध्यम बनाता है। भावनाओं के आरोपण एवं श्रद्धा-विश्वास की प्रगाढ़ता से ही आत्मदर्शन की उपलब्धि होती है। अपने प्रेम-पात्र को वह अपने हृदय में विराजमान पाता है। इसकी उपलब्धि होने पर उसकी स्वार्थपरता समाप्त हो जाती है और वह लोकमंगल के कार्यों में निरत हो जाता है। आत्मज्ञान होने पर तथाकथित फ्रायडवादी मूलवृत्तियों का सर्वनाश हो जाता है, मनुष्य अपनी वैयक्तिक इच्छाओं की तनिक भी परवाह नहीं करता, समष्टिगत ति साध नहीं उसका उद्देश्य बन जाता है।
मनोविज्ञानी होमरलेन ने भी मानवी स्वभाव को दैविक माना है। यूनान के तत्ववेत्ता प्लेटो के अनुसार मनुष्य दूसरों की सेवा अपने दिव्य स्वभाव के कारण ही करता है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “रिपब्लिक” में कहा है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसकी प्रवृत्ति सदैव दूसरों की सेवा सहायता करने की रहती है। यह अलग बात है कि किसी में सेवा के भाव की बहुलता रहती है तो किसी में इसकी न्यूनता देखी जाती है। वस्तुतः यह भिन्नता मनुष्य के व्यक्तित्व के साथ जुड़ी हुई है। प्रायः अल्प विकसित मनुष्य की इन्द्रिय सुखों की ओर दौड़ता है और स्वार्थ पूर्ति में बाधा पड़ने पर दूसरों को सताता है। जिस व्यक्ति का स्वभाव विकसित हो जाता है वह विषम सुख से नहीं वरन् तत्व चिंतन एवं परमार्थ परायणता से तृप्ति पाता है। उचित शिक्षा एवं विद्या के द्वारा ही मनुष्य पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाता और अपने अंदर निहित दिव्यता के दर्शन करता है।
फ्राँस के प्रख्यात दार्शनिक रूसो ने “इमील” नामक पुस्तक में कहा है कि मनुष्य का जन्मजात स्वभाव दैविक है। वह देवताओं की सन्तान है। उसमें जो दुष्प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं, वे समाज के वातावरण के संपर्क से ग्रहण की हुई होती है। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने प्रतिपादित किया है कि शिशु के आरंभिक काल से ही उसे यदि उचित शिक्षा दी जाय, अच्छा वातावरण प्रदान किया जाय तो उसकी दैवी सम्पत्ति उत्तरोत्तर विकसित होती जायेगी और आगे चलकर वह अपनी सेवा से संसार को सुखी-समुन्नत बना देगा।
हालैंड के महान तत्ववेत्ता स्पिनोजा ने भी मनुष्य के वास्तविक स्वभाव को दिव्यता से परिपूर्ण बताया है। उनके अनुसार आत्मा परमात्मा का अंशधर है। सम्पूर्ण संसार में जहाँ तक दृष्टि फैलाई जाय उसी के गुणों का फैलाव है। चराचर जगत में वही व्याप्त है और फिर मनुष्य तो उसका साकार रूप है क्योंकि आत्मा ही परमात्मा का प्रतीक प्रतिनिधि है। अतः; उसके स्वभाव का पुण्य एवं पवित्रमय होना सुनिश्चित है। जब वह अपने से विचलित होता है तभी वह स्वार्थी, दम्भी, कामी और क्रोधी बन जाता है। उसके पतन पराभव का यही मुख्य कारण है। अपने स्वरूप को जान लेने पर समस्त दुष्प्रवृत्तियाँ-विषय लोलुपता समाप्त हो जाती हैं।
प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक इमेनुअल कान्ट का कहना है कि विवेक बुद्धि की उपस्थिति मानवी स्वभाव में दिव्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यदि ऐसा न होता तो धर्म, अधर्म, कर्तव्य, भला-बुरा निर्णय करने वाली विवेकशील बुद्धिमत्ता न रही होती। श्रेय-प्रेय का निर्णय करने की भावना मन में न आती। इन उत्कृष्ट भावनाओं का मन में आना ही मनुष्य के दैवी स्वभाव को सिद्ध करता है। उचित-अनुचित का निराकरण विवेक बुद्धि के सहारे ही बन पड़ता हैं। उचित व्यवहार दैवी स्वभाव के अनुकूल और अनुचित व्यवहार उसके प्रतिकूल है। यह स्वभाव मनुष्य को स्वार्थी नहीं वरन् सबके प्रति सद्व्यवहार करने-सद्भाव बरतने के लिए बाध्य करता है। कान्ट का कहना है कि उसी सिद्धान्त के अनुसार आचरण करो जो सबके लिए अनुकरणीय बन सके।
पिछले दिनों ढर्रे पर चले आ रहे चिन्तन एवं मनुष्य के प्रवृत्तिमूलक प्रतिपादन से विपरीत जो नया वर्ग मनोवैज्ञानिकों का उभर कर आया है, उनमें अमेरिका के मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो का नाम वरिष्ठों में लिया जाता है। अपने प्रतिपादन में उन्होंने कहा है कि “हां व्यक्ति में सर्वोपरि सत्ता का निवास है। समस्त प्राणियों से प्यार-करुणा, दया आदि का भाव रखना उसका मौलिक स्वभाव है। यदि ऐसा न होता तो जितने भी महापुरुष हुए है, अथवा जिन्होंने अपना परिष्कार परिमार्जन करके ऊंचा उठने में सफलता पाई है, वे परमार्थी, परोपकारी एवं रचनात्मक प्रवृत्ति के नहीं होते। वे प्रेम बाँटते और प्रेम पाते है। वे जिस भी अवाँछनीयता पर टूट पड़ते हैं, उसे मिटा कर रख देते है”।
इस तथ्य को प्रायः सभी मनःशास्त्री स्वीकार करते है कि विवेक बुद्धि मानव स्वभाव की सबसे बड़ी दैवी विशेषता है। विवेक एवं मनोबल मिलकर प्रवृत्तियों को बदल देने में सक्षम हैं कुछ सहज वृत्तियाँ जो मनुष्य में जन्मजात रूप में पाई जाती है, उनका परिशोधन-परिष्कार करके मानव से महामानव, देवमानव बना जा सकता है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध व्यवहारिक मनोविज्ञानवेत्ता डॉ.. वाट्सन का कथन उल्लेखनीय है। वे कहते हैं कि “ मनुष्य को ऐसी नैसर्गिक विशेषताएं मिली हुई है कि वह उचित-अनुचित, लाभ-हानि का विचार कर सकता है और विचार मन्थन से युक्ति संगत औचित्यपूर्ण निष्कर्ष निकालकर उन्हें ग्रहण कर सकता है। इसी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता या विवेकशीलता के आधार पर प्रवृत्तियों को विकसित एवं परिष्कृत करके मानव जीवन को उत्कृष्ट बनाया जा सकता है।”
वस्तुतः सामान्य मनुष्य से महामानव स्तर तक वे ही पहुँचे है जिन्होंने अपनी प्रवृत्तियों को औचित्य एवं जीवन की सार्थकता है। यही अध्यात्म की-भारतीय मनोविज्ञान की विशेषता रही है कि उसने देवत्व को मुख्य माना है, विकासवाद के चरम सीमा को महामानव बनना माना है। यही वास्तविक मानवी प्रगति का स्वरूप है,वह नहीं जो पारस्परिक पाश्चात्य मनोविज्ञानवेत्ता सदा से कहते चले आ रहे हैं।
चोरों के गिरोह ने जंगल में रहने वाले एक महात्मा से पूछा-हम लोग मौत के दर्शन करना चाहते है। आपने देखी हो तो हमें बता दें।
महात्मा ने एक गुफा की ओर इशारा किया कि वह उसमें रहती है। तुम जाओ तो मिल जायेगी।
चोर वहाँ गये।देखा कि गुफा में सोना भरा पड़ा है। वे मौत की बात तो भू गये और सोने को घर ले चलने की योजना बनाने लगे। तय हुआ कि उसे रात के समय घर ले चलना चाहिए। दिन में खा-पीकर आराम कर लेना ठीक होगा।
एक चोर बाजार से खाना लेने गया। दूसरा दूसरी जगह खराब लेने। तीनों अलग-अलग हुए तो खली समय में यह योजना बनाने लगे कि शेष दो को मारकर सारा सोना वह अकेला ही हड़प ले।
जो चोर गुफा में पहरेदारी पर बैठा था उसने सोने के टुकड़ों से दो पैनी छुरियाँ बनाई। पहला खाना खाकर चलने की तैयारी की।
जो चोर मर गये थे। वे खाने में और शराब में जहर मिला लाये थे। इनका इरादा भी शेष दो को जहरीले भोजन को खिलाकर मार देने का था। बचे हुए तीसरे चोर ने खाना खाया शराब पी। थोड़ी देर में वह भी मर गया।
महात्मा ने सच ही कहा था कि गुफा में मौत रहती है। मुफ्त में विपुल धन पा लेना अपनी मौत बुला लेने के समान है।
शबरी घने जंगल में कुटी बनाकर भगवान का भजन करती। गुजारे के लिए उसने लकड़ी काटना और पास के गाँव में बेचना अपना रोजगार बना लिया था। परिश्रम की रोटी खाती और भक्ति भाव में अपना समय गुजारती।
समीप ही मातंग ऋषि का आश्रम था। उसमें अनेकों छात्र रहते और पढ़ते। छात्रों को समीपवर्ती सरोवर में प्रातः स्नान के लिए जाना पड़ता, तो मार्ग में पड़े रहे वाले कांटों, कंकड़ों से उनके पैर छिलते। झाड़ियाँ भी घनी हो गई थी, उनने रास्ता घेर लिया था। छात्रों को उसी मार्ग से आना जाना होता। पैरों में शरीर में काँटे चुभ जाते। आये दिन उन्हें इस संकट का सामना करना पड़ता।
शबरी का ध्यान उस ओर गया। उसने सोचा-”क्या मैं इस मार्ग को सुधारने में कुछ सहायता नहीं कर सकती?” वह साधनहीन थी, पर अपने श्रमदान से ऋषि आश्रम से लेकर सरोवर तक का रास्ता तो बुहार ही सकती थी। उसकी उदारता ने जोर मारा।
दूसरे दिन से उसने उस मार्ग को बुहारना आरंभ कर दिया। साथ ही झाड़ियों को काट-छाँट कर रास्ते से अलग करना भी।
विद्यार्थी प्रातः स्नान के लिए अब भी जाते। पर उनमें से किसी को भी काँटे चुभने, कंकड़ों से ठोकरें खाने और झाड़ियों से बदल छिलने की कठिनाई का सामना न करना पड़ा। छात्र आश्चर्य में थे कि जो रास्ता सदा कष्ट दिया करता था, वह अब इतना सरल,सुखद कैसे हो गया? ध्यान से देखा तो प्रतीत हुआ कि कोई उस मार्ग को रोज बुहार जाता है। साथ ही व्यवस्थित भी कर जाता है। वह व्यक्ति कौन है? उससे भेंट तो कभी होती नहीं।
छात्रों ने गुरुदेव से पूछा-”देव, हमारा रास्ता रोज बुहार जाने वाला व्यक्ति कौन है? हम उसके दर्शन तथा कृतज्ञता प्रकट करने के इच्छुक है।”
मतंग मुनि मुस्काये। उनने सहज समाधान किया-”तात्!जो व्यक्ति बिना प्रत्युपकार के आशा से, निस्वार्थ भाव से कार्य करता है, वह यह कार्य सबके सामने नहीं करता है। दिखाने के लिए तो ढोंगी ही ऐसा करते है। तुम उत्सुक ही हो तो बता देता हूँ। वह भगवान को प्रिय जन्म जन्मांतरों से उनसे जुड़ी एक भील महिला है। नाम “शबरी”। तुम देर रात उसे यह सेवा कार्य करते देख सकते हो।”
छात्रों ने उस रात यही किया। वे भील कल में जन्मी अछूत मानी जाने वाली उस साधारण महिला की सेवा साधना देखकर धन्य हो गये। अगले दिन प्रातः अनुग्रह सहित उसे मातंग मुनि के पास लाये व उन्हीं के सक्षम प्रार्थना की कि माता अब आश्रम में ही रहा करें। वहीं का कुछ कामकर निर्वाह वहीं से प्राप्त कर लिया करें। लकड़ी काटने बेचने में तो सभी नष्ट होता है।
शबरी ने यह स्वीकार नहीं किया। बोली-”मैं आपकी सेवा यथावत् करती रहूँगी पर शक्ति रहते पुरुषार्थ से ही निर्वाह की व्यवस्था करूंगी।”समीप ही उसकी झोपड़ी थी। वह वहीं चली गयी व सतत् सेवा कार्य में जुटी रही।
भगवान राम वनवास के दिन बिताते हुए ऋषि मुनियों के आश्रमों में भी उन दिनों जाते व आशीर्वाद लेते थे। शबरी की सेवा साधना का समाचार सुनकर उन से रहा नहीं गया। वे गदगद हो उठे। राम ने मातंग मुनि आश्रम जाने और दर्शन करने का निश्चय किया। तलाश करते हुए वे उसकी कुटी तक पहुँच ही गये। माता शबरी भी कभी भगवान के दर्शन का सुयोग मिले, इसकी कामना किया करत थी।
सुयोग का दिन आया। राम स्वयं शबरी के आश्रम में पहुँचे। इस सुयोग पर वह गदगद हो गई। आतिथ्य की बात सूझ, तो घर में कुछ न था। सूखे बेर किसी कोने में पड़े थे। इनमें से मीठे चख-चख कर छाँट कर राम के सम्मुख रखने लगी। उन्होंने भी सच्ची भक्ति द्वारा दिये गये इस महाप्रसाद को आनंद विभोर होते हुए ग्रहण किया। जातिगत ऊंच-नीच का अभाव प्रभु के मन में आता ही कैसे?
प्रभु राम के शबरी आश्रम में पहुँचने और उसके आतिथ्य को भाव विभोर स्वीकारने की चर्चा दूर-दूर तक फैली। ऐसा मान शबरी को कैसे मिला? एक विज्ञजन ने बताया कि वह आश्रम उपार्जन से गुजारा करने व सेवा धर्म में संलग्न रहने के कारण ही उसे भक्तों में श्रेष्ठ माना गया। भगवान स्वयं अपन भक्त के यहाँ आते है, यह मान्यता सभी ने सत्य पायी।
भारतीय विचारधारा में उपनिषद् वांग्मय का स्थान महत्वपूर्ण है। इसमें मानव के समग्र विकास के मूलभूत सूत्र निहित है। काल की दृष्टि से भले ही इसे चिर पुरातन कहा जा, पर व्यवहार की दृष्टि से इसे चिर नवीन मानना ही उपयुक्त होगा। सच तो यह है कि यह देश-काल की संकीर्ण सीमाओं में तनिक भी आबद्ध नहीं है। इसका संदेश किसी धर्म विशेष-जाति विशेष अथवा देश विशेष के लिए सीमित न होकर सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है। हर किसी को इसमें अपने विकास पथ का समुचित पाथेय उपलब्ध होता है।
इसमें निरूपित सिद्धान्त की गई विवेचनाएँ-व्याख्याएँ मात्र बौद्धिक तर्कणा अथवा मानसिक संकल्पना की उपज नहीं है। प्राचीन भारत के ऋषि कहे जाने वाले शोधकर्ताओं ने दिव्य चेतना प्राप्त करके अतीन्द्रिय व अतिमानसिक ज्ञान द्वारा सम्पूर्ण जीव-जगत के परमार्थिक स्वरूप को प्रत्यक्ष देखा था जिनकी सम्यक् सम्बन्ध चेतना के सामने परम सत्य ने अनावृत और अविदित रूप से अपने स्वरूप प्रकट किया था, उनकी दिव्य वाणियाँ ही संकलित और संग्रहित होकर उपनिषद् वांग्मय के रूप में मानव-समाज में प्रचारित है।
पौरुषष्टि, नाक, मौट्गल्य,ऐतरेय, बुडिल, शार्कराध्य,वामदेव, शाँडिल्य, दथ्यच, आरुणी, याज्ञवल्क्य आदि इन प्राचीनतम दार्शनिक आचार्यों ने रागद्वेष शून्य, हिंसा भय-घृणा विरहित, देहिन्द्रिय मन की आधीनता से मुक्त, जात्यभिमान, सम्प्रदायाभिमान, प्रकृति संकीर्णताओं से अतीत शुद्ध बुद्धि, समाहित चित हो सभी को विकास पथ पर आरुढ़ होने को बताया है तथा मानव जीवन के परम लक्ष्य की ओर प्रेरित किया है।
सच कहा जाय तो आज का मान दिग्भ्रमित है। उसे न तो अपने स्वरूप के बोध है, नहीं संसार की वास्तविकता का पता। जीवन का क्या लक्ष्य है? इस बारे में भी उसे कुछ नहीं मालूम है। वह तो मात्र देहेन्द्रिय सुख को प्रधान माना अपनी चेतना को इन्द्रिय और मन के अनुगत कर इस भवाटवी में भटक रहा है। इस मृगतृष्णा में कभी किन्हीं विषय वस्तुओं से सुख का आभास होता है, कभी अन्य प्रकार के पदार्थ उसे आकर्षित कर सुख प्राप्ति का आभास कराने लगे है। वह भी प्यासे मृग की तरह इधर-उधर भटकता, विषयों के नशे में चूर हो अपने स्वरूप से विमुख हो कभी हँसता, कभी रोता, कलपता जीवन के दिन गुजार देता है। पर सुख और शान्ति इनका दूर-दूर तक अता-पता नहीं रहता।
मानव मन की इस भ्रमित स्थिति का निवारण करने, भटकने से निकालने का कार्य उपनिषद् करते है। कठोपनिषद् का ऋषि सम्पूर्ण मानव जाति को अपने उद्बोधन में बताया है कि इस लोक में दो मार्ग है एक श्रेयस् दूसरा प्रेयस् मार्ग। ये दोनों विभिन्न मार्ग मनुष्य को अपनी ओर खींचने का प्रयत्न करते रहते है। इनमें से हमें श्रेयस् मार्ग
का अनुसरण करना चाहिए। जो श्रेयस् मार्ग का अनुसरण करता उसे अन्त में अपनी लक्ष्य सिद्धि प्राप्त होती है, तथा जो प्रेयस् मार्ग का अनुसरण करता है वह अपने उद्दिष्ट लक्ष्य को खो देता है। श्रेय और प्रेय दोनों ही मनुष्य के सामने उपस्थित होते है। बुद्धिमान मनुष्य इनमें से श्रेयस् मार्ग को चुनता है तथा मूर्ख प्रेयस् को चुनता है।
इस तरह उपनिषद् का ऋषि स्पष्ट करता है कि इन्द्रिय विषयों में चमक -दमक व सम्मोहन तो अवश्य है। मनुष्य स्वभावतः इनकी ओर आकर्षित भी होता है। पर यदि नित्यानित्य विवेक की दृष्टि से युक्त होकर दृष्टिपात किया जाय तो सम्मोहन के सारा जाल-जंजाल छिन्न-विच्छिन्न हो जाता है। यथार्थता प्रकट हो जाती है। बृहदारण्यक उपनिषद् संसार में रहते हुए इसमें लिपायमान होने तथा जीवनोद्देश्य की प्राप्ति का रहस्योद्घाटन करता हुआ बताना है-” जो संचय का जीवन व्यतीत करता है। वही लक्ष्य प्राप्ति करता है। दुष्कर्मों को परास्त कर दिया है। पाप उसे पीड़ित नहीं करता, क्योंकि उसने पापों को भस्म कर दिया है। दोषमुक्त, पापमुक्त अषुचिमुक्त, सन्देहमुक्त होकर वह समुचित रूप से ब्राह्मणत्व का अधिकारी हो जाता है।
छान्दोग्य उपनिषद् इसी स्थिति तथा साँसारिक विषयों सुखों की स्थिति में अन्तर स्पष्ट करते हुए बताता है। इन दोनों में आनन्द तो है। पर एक मैं है यथार्थ दूसरे में प्रतिभासित जिसे उसी तरह नहीं हस्तगत का जा सकता -जिस प्रकार दर्पण में पड़ने वाली अपनी परछाई को यह अल्पानन्द या अवास्तविक आनन्द आत्मा के अतिरिक्त अन्य पदार्थों के दर्शन श्रवण और ध्यान में है। “भूमा” आनन्द शाश्वत है। अल्पानन्द क्षणिक है। अतएव वास्तविक आनन्द की प्राप्ति के लिए मनुष्य को अपने असीम आत्म स्वरूप में प्रतिष्ठित होना चाहिए।
ठस ऋषि वाणी ने भूमण्डल के हर किसी भाग में रहने वाले सत्यान्वेषियों, विचारकों, चिन्तकों को समान रूप से प्रभावित का है। पूर्वी जगत की ही भाँति पश्चिम विद्वानों में उपनिषदीय वांग्मय पर गहन चिन्तन किया है। इन चिंतकों में बेबर, रोअर, मैक्समूलर, बोइटकलिन्क, विटने, डाँयसन, अल्डेन वर्ग, ओल्ट्रामेअर, हर्टेल, हलेब्रान्त आदि प्रमुख है। डाँयसाय का उपनिषद् विषयक ग्रन्थ उसकी महान विद्वता अध्यवसाय और प्रतिभा का प्रतीक है। इसी तरह स्टोरर का “उपनिषदीय अध्ययन” नामक ग्रंथ महत्वपूर्ण है। इसमें यह उदात्त कल्पना के गयी उपनिषद् ही विश्वधर्म की भावना प्रदान कर सकता है। उसने बताया है-”यदि विश्वधर्म का स्वप्न सत्य हो और हमारे पास विश्व का एक ही विज्ञान है और ईश्वर का पितृत्व और मनुष्य का बन्धुत्व सत्य हो तो ऐसे कुटुंब के लिए केवल एक आत्मिक एकता का बन्ध नहीं सम्भव है। एस0डी0 ग्रिस वोल्ड ने “भारतीय दर्शन के इतिहास में एक अध्ययन “में उपनिषदों के ब्रह्मवाद के विस्तृत विवेचन के साथ उसके धार्मिक नैतिक और तात्विक निष्कर्षों की विस्मय विमुग्ध होकर प्रशंसा की है।
ठन विचारकों ने इसका चरम लक्ष्य आध्यात्मिक माना है तथा इसके सामने अन्य सभी अभिप्राय गौण ठहराये है। डॉ. गोल्डस्ट्कर ने कहा है कि उपनिषद् भारत के उच्च और सुसंस्कृत धर्म के आधार है। पै्रट उपनिषदों को उत्कृष्ट धार्मिक शास्त्र मानता है। गोडेन यह स्वीकार करता है कि भारत के प्रत्येक धार्मिक पुनविर्धान का उदय उपनिषदों के अध्ययन से ही आ। मीड़ ने तो निःसंकोच भाव से बिना किसी हिचकिचाहट के इन्हें विश्वधर्म का शास्त्र घोषित किया है।
उपर्युक्त कथन यह स्पष्ट करते है कि ये पश्चिमी विचारवेत्ता इनको किस आध्यात्मिक दृष्टि से देखते रहे। यह आध्यात्मिकता आज धूमिल हो गयी है। ऐसा नहीं है। यह तो नित्य और चिरंजीवी है। आज मानव समाज में जो वैषम्य छाया है उसे इसी तत्व चिंतन में निहित प्राणदायी विचार जड़-मूल से निरस्त कर सकते है। इसके अपनाने से अभिमान ममता -राग और द्वेष, शत्रु-मित्र का भेद बोध अपने-पराए का भेदभाव, हिंसा घृणामय एवं विषय विशेष के प्रति कामना प्रभृति सारे के सारे उसी तरह विनष्ट हो जाएँगे जिस तरह सूर्य के उदय होने से अंधकार।
ये तो भी तक है जब तक हम अपने को भूले इन्द्रिय मन की गुलामी कर रहे है। जिस तरह सिंह-शावक भेड़ों के झुण्ड में पड़ अपने को भेड़ ही समझने लगा था पर जैसे ही एक अन्य सिंह ने उसे आत्म बोध कराया वैसे ही उसने जोरदार गर्जना की सारी भेड़े तितर–बितर हो गई। वही भेड़े जो उसे अपन से छोटा ओर निम्न समझ काम कराया करती थी सामने आन पर भी कतराने लगी। ठीक यही दशा हमारी भी है। इन्द्रिय, मन की भेड़ों के समूह में डरे दुबके उनकी अधीनता स्वीकार कर गुलामी किए जा रही है। जो इन्द्रिय जिस विषय की इच्छा करती है। भयवश आदेश मानकर उसी की प्राप्ति हेतु दौड़ लगा देती है। इस भागदौड़ में जीवन नष्ट होता जा रहा है।
उपनिषद् हमें ऋषियों का संदेश सुना इस गुलामी से मुक्त होने को कहते है। उसका स्पष्टीकरण है इस मुक्ति का राज पौरुष और वीरता है “वीणोव करत सगता मुक्ति न वा का पुरुषाणा” इनमें निहित सूत्रों के अनुसार अपने जीवन को ढालने में पुरुषार्थ युक्त हो प्रयासरत हो जाएँ तो इन्द्रियों साँसारिक विषयों से- ‘‘निर्गच्छति जगज्जाजात पि0जरादिव केशरी।” पिंजरे से मुक्त हुए सिंह के सदृश बाहर असीम में विहार करने लगेंगे।
ऋषिवाणी श्रणवन्त विश्वा अमृतस्य पत्राँः की गुहार लगा रही है। वह हमारी मोह निद्रा के त्यागने के लिए “उतिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” का उद्बोधन मंत्र सुना रहीं है। इस संदेश को सुने और समझे ही ही तद्नुरूप आचरण व्यवहार में भी जुट जाए। ऐसा करने से सारा भेद-विसंवाद नहीं रह जाता। यथार्थ के बोध आत्मानुभूति होने से सारा विश्व” सर्वखल्विदं ब्रह्म” का स्वरूप होकर ब्रह्मधाम, सच्चिदानन्द धाम सौंदर्य-माधुर्य सिन्ध बनर आस्वाद्य हो जाता है इस “अयमात्म् ब्रह्म” के रहस्य को समझने से सत्यं ज्ञानम् नन्तम् ब्रह्म में विभोर हो जायेगा। उस रसौ वै सः के रसामृत से परितृप्त हो स्वयं तो कृतकृत्य होते है दूसरों के लिए भी प्रेरणा पुंज प्रकाश स्तम्भ के तरह मार्ग दर्शक हो उनकी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर उन्हें भी धन्य बना सकेंगे।
सुदामा कृष्ण से मिलने द्वारका गये। भेंट में देने के लिए एक चावल की पोटली ले गये थे। उसे बगल में दबाये हुए थे,संकोचवश दे नहीं रहे थे। कृष्ण ने उसे देख लिया।
कहा जानते नहीं दुनिया की रीति-यहाँ पहले देना पड़ता है बाद में कुछ मिलने का सुयोग बनता है। सुदामा उनका संकेत समझा गये ओर निज की पोटली उनके हाथ पर रख दी। हर भक्त को यही करना पड़ता है।
ज्ञान सम्पदा कस खजाना दो तिजोरियों में भरा हुआ समझा जा सकता है। एक दर्शन की है, दूसरी विज्ञान की। दर्शन की तिजोरी में ज्ञान के वह तत्व निहित है, जिनसे चेतना को प्रभावित करने वाली, भावनागत संवेदनाओं का विवेचन, विश्लेषण किया जाता है। नीति, धर्म, सदाचार, अध्यात्म के खजाना यही है। विज्ञान की तिजोरी में पंचभूतों से विनिर्मित चीजों की गतिविधियों की जानकारी तथा उसके उपयोग की विधियाँ सन्निहित है। आज इसकी अनेकानेक धाराएँ है शरीर विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, रसायन, याँत्रिकी आदि।
सामान्यजनों ने इनके बाह्य कलेवर को देख इन्हें परस्पर पृथक और असम्बद्ध माना है। यही नहीं इन्हें परस्पर विरोधी भी ठहराया है। पर यदि इस विषय पर गहन चिन्तन मनन किया जाये तो पृथकता व असंबद्धता का आवरण हट जाता है यथार्थ प्रकट होने से य समझ में आ जाता है कि ये परस्पर विरोधी नहीं, एक दूसरे के पूरक है।
अध्यात्मिकता की अवमानना तथा विज्ञान को विरोधी ठहराये जाने का प्रधान कारण है कि अध्यात्म तत्वदर्शन रूपी सूर्य पर प्रथा-परम्पराओं-लोक प्रचलनों का कुहासा छा गया है। लोग इस कुहासे को ही आत्मिकी समझ बैठे हैं। पर यदि विवेक की हवा इस कुहासे को हटा दे तो तत्वदर्शन के सूर्य की यथार्थता प्रकट हो जाती है। तत्वदर्शन व विज्ञान दोनों ही एक बिन्दु पर आने लगते है। कारण कि रास्ते की भिन्नता के बावजूद दोनों ही सत्यान्वेषी है। इस सत्य शोधन की प्रक्रिया में दोनों में विभेद होने विरोध जैसी स्थिति पनपने की कोई गुंजाइश नहीं है।
विज्ञान और अध्यात्म के पारस्परिक सम्बन्धों पर मेधावी वैज्ञानिक हैराल्ड केषेलिग ने सुविस्तीर्ण गम्भीर अध्ययन किया और प्राप्त निष्कर्षों को शोध प्रबन्ध के रूप में साइन्स एण्ड रिलीज के नाम से पेन्सिलवानियाँ यूनिवर्सिटी को प्रस्तुत किया। इस शोध प्रबन्ध में उन्होंने दोनों के साम्य और एक्य को बताते हुए जोरदार शब्दों में कहा है कि मानव की सर्वांग पूर्ण प्रगति के लिए दोनों ही आवश्यक और अनिवार्य है। अध्यात्म की कई बातें ऐसी है जिनसे विज्ञान दिशा ले सका है और आपने को विध्वंसात्मक नहीं सृजनात्मक क्षेत्र में नियोजित कर सकता है। वहीं अध्यात्म भी तर्क, तथ्य पूर्ण वैज्ञानिक विधि को अपनाकर लोक मान्यताओं, अंध-विश्वासों, चित्र-विचित्र प्रचलनों का कोहरा मिटाकर अपनी यथार्थता प्रखरता-तेजस्विता को प्रकट कर सकता है। उन्होंने आगे बताते हुए लिखा है पिछले दिनों आध्यात्म विज्ञान का संघर्ष इन्हीं मुद्दों पर असहयोग के कारण होता था, जो अब समाप्त हो रहा है।
विज्ञान की हठवादिता भी अब छूटती जा रही है। कारण कि पदार्थ जिसे उसने अपना आधार मान रखा था, सारे के सारे शोध प्रयास उसी में केन्द्रित थे, अब अपना अस्तित्व खोता जा रहा है डेनमार्क के नील्सबोर, फ्राँस के लुइसदे ब्रोगली, आट्या के इरविन स्क्रोड़िंर तथा बुल्फ गैंग पाली, जर्मनी के वारनर हाइजोन वर्ग व इंग्लैंड के पाल डिरैक आदि ने अपने मिले–जुले शोध प्रयत्नों से यह सिद्ध का दिया हैं कि पदार्थ अनित्य है। उसका रूपांतर ऊर्जा में होना अवश्यंभावी है। वैज्ञानिकों की यह भी मान्यता है कि ऊर्जा जड़ चेतन सभी में समाई हुई है। इसे सर्वव्याप्त कहना किसी भी तरह अत्युक्तिपूर्ण नहीं हैं। इनकी यह मान्यता प्रकारान्तर वेदान्त का ही समर्थन करती है।
पदार्थ की अनित्यता का भाव होपे के साथ यह भी समझ में आता जा रहा है कि मानसिक और भावनात्मक सत्य का भी अस्तित्व है। इनका महत्त्व भी कम नहीं है। अपने को जड़वादी कहने में गर्व अनुभव करने वाले विज्ञानवेत्ता पुनर्जन्म परलोक, परमात्मा के अस्तित्व तथा मानव-मानव के बीच के सम्बन्धों को ठुकरा नहीं सकते। उनको सुलझाने के लिए जिस भावनात्मक आधार की आवश्यकता है उसे आध्यात्म ही पूरा कर सकता है।
वैज्ञानिकों द्वारा की जाने वाली नित्य नवीन शोधें महत्वपूर्ण है। इनके महत्व से कोई इन्कार भी नहीं कर सकता है। इस प्रकार के प्रयासों से मानव का दैनंदिन जीवन कितना सहज व सुगम हो गया है। इसे सभी जानते है। इस सहजता व सुगमता में विज्ञान के साथ आध्यात्म का भी हाथ है। उदाहरणार्थ डायनामाइट को ही ले। इसे किसी समय विज्ञान जगत की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता था। पर इसका उपयोग सुन्दर और भव्य भवनों का विनाश करके श्मशान बनाने में भी हो सकता है। ऊबड़-खाबड़ ऊँचे-बीहड़ पहाड़ों-चट्टानों को तोड़कर सड़कें बनाने के काम में भी। इन दोनों में समुचित कौन सा है? और किसे अपनाया जाना उचित है? इस प्रकार की औचित्यपूर्ण दिशा-दर्शन करना विज्ञान के बस की बात नहीं। कल्याणदायी इस दायित्व को निभा सकना आध्यात्मिकता से ही सम्भव है।
विज्ञान किसी वस्तु का वैज्ञानिक निर्णय और तार्किक चिन्तन सही रूप में दे सकता है। जैसे यह मौसम की जानकारी दे सकता है, परमाणु विस्फोट से कितनी ऊर्जा पैदा होगी, यह बता सकता है। पर उसके सुनियोजन के बारे में नहीं बता सकता। देखा जा सकता है कि मानवीय व्यवहार और भावनाओं का भी एक क्षेत्र है। उसे भी यदि विज्ञान अपने तार्किक चिन्तन से बताने लगे तो यह निर्णय गलत ही होगा। यह एक शक्तिशाली साधन है। इससे साध्य के प्राप्ति कैसे होगी, इसे धर्म द्वारा ही निर्धारित किया जा सकना सम्भव है। इसके द्वारा की गई शोधों का मूल्याँकन एवं उन्हें मानवीय जीवन में व्यावहारिक धरातल पर लाना एक महत्वपूर्ण कार्य है, जिसे आत्मिकी ही पूरा कर सकती है।
अध्यात्म-अन्तर्ज्ञान भावसंवेदना व विवेक पर अवलम्बित है। विज्ञान का अवलम्बन बौद्धिक शक्ति पर है। प्रयोग की आवश्यकता दोनों में है। आध्यात्मिक सिद्धान्तों उपनिषदों के श्लोकों को यदि रहते रहा जाय-तो कुछ भी बात नहीं बनेगी। बस एक होने की भूमिका निभाई जा सकेगी। प्रयोग में जुटे पड़ने, इसके लिए समर्पित होने से सत्य का बोध पाकर सामान्य मानव से अतिमानव हुआ जा सकता है। विज्ञान का काम भी मात्र परिकल्पनाओं के आधार पर नहीं चलता। यथार्थता की शोध के लिए जाने वाले प्रयोगों में यह अन्तर अवश्य है कि एक के प्रयोग का क्षेत्र पदार्थ है, दूसरे का चेतना। एक के प्रयोग में बहिरंग जगत की प्रधानता होती है। दूसरे में अन्तरंग की। फिर एक साम्य भी है। प्रयोग के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले उपादानों में दोनों को ही इन दोनों क्षेत्रों का सहारा लेना पड़ता है। वैज्ञानिक बहिरंग जगत में कितनी ही बढ़ी प्रयोगशाला क्यों न बना लें। कितने ही उपकरण क्यों जुटा लें। पर बुद्धि, मन, मस्तिष्क जो अंतरंग क्षेत्र के है इनका समुचित उपयोग किए बिना किसी तरह के प्रयोग परीक्षण संभव नहीं। इसी तरह आध्यात्मिक प्रयोगों में चेतना अर्थात् अंतरंग की प्रधानता रहती है, फिर भी बहिरंग साधन शरीर का पड़ना है। इसी कारण आत्मविदों ने शरीर माद्यं खलु धर्म साधन भी कहा है, शरीर को स्वस्थ-सबल, सक्षम बनाने में वैज्ञानिक साधन भी प्रयुक्त होते है। इस तरह यह स्पष्ट होता है कि पारस्परिक विग्रह जैसी कोई बात नहीं है। इन दोनों का अस्तित्व परस्पर पूरक सहयोगी बने रहने में ही है।
ब्रिटिश विज्ञानविद् सर जेक्सजीन्स ने अपनी पुस्तक फिजिक्स एण्ड फिलासॉफी’ में लिखा है कि विज्ञान व अध्यात्म दर्शन के परस्पर विरोध का काल अब समाप्त हो चुका। दोनों ही क्षेत्र यह अनुभव करने लगे हैं कि पारस्परिक सहायता के बिना किसी का प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। दर्शनशास्त्री बिल डुरण्ड ने अपने ग्रन्थ ‘‘दि स्टोरी ऑफ फिलासॉफी” में ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं। वे कहते हैं “विज्ञान का आरम्भ दर्शन में होता है और अन्तकला में। यदि इसमें मानवी चेतना की सुसंवेदना उत्पन्न करने की क्षमता न होती तो इसके पीछे मानवी सुख शान्ति का जो उत्साह भरा लक्ष्य है उसी ने विज्ञान की उन्नति का पथ प्रशस्त किया है।” विख्यात चिन्तक केसरलिंगने अपनी पुस्तक “क्रिएटिव अण्डर स्टैण्डिग” में कहा है कि ज्ञान की दो धाराएँ विज्ञान एवं आध्यात्म दर्शन अविच्छिन्न है। इन दोनों को मिलाकर एक शब्द “दार्शनिक विज्ञान या वैज्ञानिक
चील आसमान में अपने परों के सहारे उड़ रही थी। उसे किसी का
सहारा नहीं लेना पड़ रहा था।
पतंग ने भी उसकी होड़ की और सोचा मैं क्यों डोरी का सहारा लूँ। अपने बलबूते ही क्यों न उड़ूं? उसने डोरी से अपना संबंध तोड़ दिया।
पतंग को हवा का एक झोंका छितराकर रख गया वह जमीन में गिर कर कीचड़ में मिल गई।
दर्शन” नाम दिया जाना इस युग में सब प्रकार से उपयुक्त होगा।
इन दोनों की अविच्छिन्नता को अब सभी मानने लगे है। अस्तु वैज्ञानिक दर्शन एक नये विषय के रूप में सामने आया है। विज्ञानी वारनगर हाइज़ेनबर्ग ने अपने ग्रन्थ “भौतिक विज्ञान एवं दर्शन” में अनिश्चितता के नियमों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-”विज्ञान वस्तुतः दर्शनशास्त्र की स्थूल जातिक निरूपण करने की शैली मात्र है।”
“फिलासॉफी ऑफ फिजीकल साइन्स” के लेखक सर ए॰ एम॰ एडिगटन ने अपनी मान्यता व्यक्त करते हुए लिखा है विज्ञान के सिद्धांतों का समझना और समझाना अध्यात्मदर्शन के सिद्धांतों के सहारे ही संभव है। ‘‘फ्राँम यूक्लिट टू एडिगटन” के लेखक सर एडमण्ड हेटकार ने लिखा है “ प्राचीन शास्त्रों के विवादस्पद सिद्धांतों को वैज्ञानिक ढंग से अधिक प्रमाणिक रीति से परखा जा सकता है। “दि फिलासाँफी ऑफ स्पेस एण्ड टाइम प्रिफेस” के लेखक हैन्सराइवाय ने लिखा है-” वह जमाना समाप्त हो गया जब विज्ञान और अध्यात्म दर्शन को परस्पर पृथक माना जाता था, अब नवीन शोध निष्कर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि दोनों में ही एकत्व और साम्य है।”
सचमुच इन दोनों के बाह्य स्वरूप भिन्न दिखायी पड़ने पर भी भिन्नता जैसी कोई बात नहीं। जिस तरह से गंगा और यमुना एक ही हिमालय के दो विभिन्न स्थानों से निकलकर मीलों, कोसों का प्रगति पथ पूरा करती हुई भिन्न दिखती हैं। यहाँ तक कि उनका बाह्य रंग भी स्वेत और श्याम होने के कारण विभेद आभास कराता है। पर यह विभेद तीर्थ राज प्रयाग में सम्मिलित होने पर लुप्त हो जाता है। दोनों ही सागर की ओर चल पड़ती है। उसी तरह आध्यात्म व विज्ञान की दोनों धाराएँ अंतराल की जिज्ञासा से ही प्रस्फुटित हुई है। स्थान भेद अवश्य है, एक है -”अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ जो आध्यात्म तत्वदर्शन के उत्कर्ष वेदान्त का मूल स्त्रोत है दूसरे को अथातो प्रकृति जिज्ञासा’कहा जा सकता है। परन्तु इन दोनों अर्थात् अध्यात्म गंगा और विज्ञान यमुना के ब्रह्म स्वरूप श्वेत और श्याम का विभेद चिरस्थाई नहीं। “क्वाँटमथ्योरी” तथा “थ्योरी ऑफ लेटिविटी” रूपी यमुनोत्री से प्रवेश कर विज्ञान की यमुना का प्रवाह तीव्रता से चलकर मिलन बिन्दु जिसे सही माने में तीर्थराज कहा जाना ही उपयुक्त है- पहुँच गा है। अब ये दोनों ही एकाकार होकर परम सत्य के असीम सागर की ओर लहराती-बलखाती तीव्रता से चल पड़ी है।
श्वेत-श्याम का विभेद विज्ञान की प्राचीनता तथा मध्यकाल में आए अध्यात्म में छाए लोक प्रचलनों रूढ़ि मान्यताओं के कारण ही दिखाता है। पर अब प्रगति प्रवाह बहुत आगे बढ़ गया है। अब विभेद की जगह अभेद है। मिलन के इस तीर्थराज को बुद्धिजीवी, मनीषी, चिन्तक सभी इसे स्पष्ट देख सकते है। यह मात्र ऐसी अभेदता नहीं जहाँ इन मूर्धन्यों को ही सन्तोष मिल। समूची मानव जाति इस अपूर्व संगम में अवगाहन कर अर्थात् आध्यात्म विज्ञान दोनों को अपने बहिरंग अंतरंग जीवन के व्यवहार में लाकर, समृद्धि प्राप्त कर तथा व्यवहार में उत्कृष्टता सम्पूर्ण जगत के प्रति प्रेम आत्मभाव के विस्तार जैसे दिव्य गुणों की प्राप्ति कर सांसारिक जीवन को सुनिश्चित रूप से सफल बना सकती है। साथ ही अंतरंग के निर्मल और प्रखर होने तथा प्रवाह के साथ चल पड़ने से वह दिव्य पथ प्रशस्त हो जाता है जिसे अपनाकर कोई भी चिदानन्द सागर का भी आनन्द ले सकता है। यहाँ मात्र शाँति नहीं, परम शाँति है। विकास के उत्कर्ष तीर्थराज संगम में सज्जन-पान कर शरीर व मन की क्लान्ति, सारे सन्देहों, पूर्वाग्रहों से मुक्त प्रसन्नचित हो विकास यात्रा पर चल पड़ने का उत्साह उत्पन्न होता है। समय की माँग है कि दोनों ही विधाओं के पक्षधर अब इस महायात्रा पर चल ही पड़े। उसी में जीवन की सार्थकता भी निहित है।
सावित्री के पिता अपनी गुणवती पुत्री के लिए वैसा ही सुयोग्य वर ढूँढ़ना चाहते थे। उपयुक्त जोड़ा न मिल सका तो पिता ने स्वयंवर वरण की आज्ञा दे दी। सेना के समेत राजकुमारी चल पड़ी उसने इस प्रयोजन के लिए अनेक देश देशांतर छान डाले। राजाओं के रनिवास का घुटन मरा वातावरण उन्हें तनिक भी पसन्द नहीं आया।
वे उभयपक्षीय व्यक्ति विकास के लिए कोई योग्य सहयोगी चाहती थी। इसके लिए वैभव नहीं आदर्श अपेक्षित था। आदर्शवादी युवक ही उन्हें अपेक्षित था।
प्रवास में गहरी खोजबीन करने के उपरांत सावित्री को एक लकड़हारा युवक मिला जो अपने वृद्ध माता-पिता की वानप्रस्थ अवधि में उनके साथ सेवा करने आया था। जंगल से लकड़ी काट कर गुजारा करता। साथ ही अभिभावकों की सेवा में भी लगा रहता। विद्वान पिता के पास बैट अपनी सद्ज्ञान साधना को भी जारी रखता।
सावित्री ने उसी जंगल में डेरा डाला। युवक से संपर्क बढ़ाया और उसके व्यक्तित्व को परखा। उसने उसी से विवाह करने का निश्चय लिया। पति के साथ रहकर वह भी श्रम करेगी और सेवा साधना में लगी रहेगी।
वर वधू की सहमति देखकर उनके अभिभावकों ने भी स्वीकृति दे दी।सावित्री भी अपने पति सत्यवान के साथ उसी वन प्रदेश में रहने लगी और उन्हीं के क्रियाकलाप में पूरी तरह सहयोग करने लगी। वह भी पितृ सेवा से निवृत्त होकर लोक कल्याण के कार्यों में निरन्तर होने लगी।
इसी बीच अचानक सत्यवान पर मृत्यु ने आक्रमण किया। किसी विषैले सर्प ने काट लिया। किंतु सावित्री का मनोबल चरित्र यहाँ काम आया। पिता ने उपचार बताया आश्चर्य यह हुआ कि मृतक जैसी स्थिति में पहुँचे हुए सत्यवान के प्राण फिर लौट आये। इसे कहते- पतिव्रत धर्म की मृत्यु पर विजय।
मनीषियों के अनुसार आत्मा के ऊपर तीन परिधान लिपटे हुए है। जिस प्रकार बनियान कुर्ता, काट एक के बाद एक पहन कर सुसज्जा बनाई जाती है। उसी प्रकार किया के ऊपर भी तीन शरीर रूपी आवरण चढ़े है। एक स्थूल शरीर है जो प्रत्यक्ष देखा व छुआ जाता है और इच्छानुसार कार्यों में लगाया जाता है। दूसरी गहरी पर सूक्ष्म शरीर की है। यह प्राणमय है। मरने के बाद कुहासे के रूप में बिखर जाता है। हृदय स्थान से ज्योतिव् ध्यान करते हुए यह दिखाई देता है। शरीर के इर्द-गिर्द तेजोवलय के रूप में भी यही छाया रहता है। तीसरा शरीर कारण शरीर है। इसका स्थान अन्तःकरण चतुष्टय है। मन, बुद्धि,चित, अहंकार का समुच्चय इसी के साथ जुड़ा हुआ है। यों आकाँक्षा, मान्यता, प्रेरणा, उमंग इसी में उठती है। पर एक शब्द में इसकी प्रमुखता को देखते हुए इसे भावना प्रधान कहा जा सकता है। इसकी स्थिति प्रधानतया भाव संवेदनाओं से ही जानी जाती है।
जीव जन्तु, पशु-पक्षी स्थूल शरीर प्रधान होते है। वे किया की आवश्यकताएं एवं इच्छा पूरी करने में लगे रहते है। पेट भरने के लिए उनकी शारीरिक क्रियाएँ होती हैं और प्रजनन का ताना बाना बुनने में उनका मन कामुकता रहता है। इसके अतिरिक्त सुरक्षा की व्यवस्था बनाने में भी अपनी बुद्धिमता का उपयोग वे करते है। शत्रुओं से आत्म रक्षा के लिए जितना बन पड़ता है, कौशल अपनाते है। झाड़ियों में रहने से लेकर गुफाओं में छिपने और झुण्ड बनाकर रहने की प्रवृत्ति आत्मरक्षा से ही सम्बन्धित है। प्रजनन के लिए घोंसले, खोह, कोतर आदि का प्रबंध उन्हें करना पड़ता है।
मनुष्य भी प्रायः अपनी काया को अधिकांश श्रम शक्ति को इन्हीं प्रयोजनों में जुटाए रहते है। गुजारे के लिए उत्पादन का श्रम करना पड़ता है। कामुकता बेचैन करती है तो जोड़ा बनाते है। विवाह करते है और उस समागम का प्रतिफल सन्तानोत्पादन के रूप में सामने आता है। बच्चों की असमर्थता को देखते हुए अभिभावक उनकी देखभाल तब तक करते है जब तक कि वह शारीरिक मानसिक दृष्टि से स्वावलम्बी नहीं हो जाते। यह उपरोक्त दोनों ही व्यस्त रखने वाले कार्य”पेट और प्रजनन” की परिधि में आते है। स्थूल शरीर को उत्पादन जन्य लोभ अपनाना होता है। भावुकता का फलितार्थ विवाह ओर सन्तान के रूप में सम्मुख आता है। यह सभी नवागन्तुक अपने प्रभाव एवं प्रयत्न से उत्पन्न किए गए होते है। इसलिए उनके प्रति ममता जुड़ती है। ममता अपने प्रियजन की अनेकानेक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आतुरता प्रकट करती है। यही मोह है। मनुष्य का स्तर जब तक शरीर प्रधान, पशु स्तर का रहता है तब तक उसमें लोभ और मोह की ललक लगन सतत् छाई रहती है।
इसके अतिरिक्त मनुष्य बुद्धिमान होने के कारण अपने निजी व्यक्तित्व के बारे में भी विचार करने लगता है। जब तक कि पशु-पक्षियों में उस स्तर का चिन्तन स्वल्प मात्रा में ही उभरता है। मनुष्य की शरीरगत प्रवृत्तियों में एक अहंकार भी है। इसे मानसिक चेतना का उद्भव भी कह सकते है इन्द्रिय भोगों की वासना और उपभोग सामग्री करी तृष्णा इन दोनों का बाहुल्य तो रहता है। पर साथ ही मानसिक विकास के रूप में निज के व्यक्तित्व की कल्पना भी प्रखर होती है। कामनाएँ है। एक यह कि अपना स्तर दूसरों से बढ़ा चढ़ा सिद्ध करना। दूसरा सम्मान उपलब्ध करना। यह कि प्रकार संभव है, इसके लिए शरीर की परिधि में अपनी सत्ता सीमित रखने वालो के लिए स्वकत्य के रूप में ठाट-बाट बढ़ाने का उपाय उपचार समझ में आता है। वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार, साधन ठाट-बाट अमीर जीताने वाले साधनों के एक भी कारण यह इस स्तर के कौतुक है, जनमे समय,श्रम और साधन खर्च करते हुए भी इसलिए प्रवृत्त होना पड़ता है। कि अपने से पिछड़ी स्थिति के लोग तुलनात्मक दृष्टि से विचार करने के उपरान्त यह विचार करे कि अमुक व्यक्ति हमारी तुलना में अधिक वैभववान् होने के कारण बड़प्पन का अधिकारी है। यह उथले दर्जे का बड़प्पन है इसे पाने के लोग विवाह शादियों में अंधाधुन्ध अपव्यय करने, कर्मकांडों का प्रदर्शन करने सभा सोसाइटियों के अधिकारी बनने आदि के प्रपंच रचते रहते है। इस कौतुक के सहारेवे अपना साँसारिक मूल्य दूसरों के मूल्य की तुलना में अधिक सिद्ध करने में किसी कदर सफल भी हो जाते है।
शारीरिक क्षेत्र की तुलना में मानसिक ललकों की मात्रा अधिक है। शरीर तो अन्न, वस्त्र और निवास की आवश्यकताएं पूरी हो जाने पर तृप्त हो जाता है। पर मन को कामुकता की अन्याय इंद्रियों की ललक बुझानी पड़ती है और उसके लिए विवाह सन्तान, परिवार को अपने साथ जोड़कर उनकी आवश्यकताओं को भी अपनी अनिवार्य आवश्यकता मानना पड़ता है। बात ममता की पूर्ति तक ही सीमित नहीं रहती। मोह के अधिक अभीष्ट सुविधा सम्पादन का क्रम बैठ जाने पर भी मन शान्त नहीं होता। विकसित मस्तिष्क अहंकार का उन्माद ही छाया होता है और साधारण होते हुए भी असाधारण आडम्बर बनाकर अपनी वरिष्ठता का वह ढिंढोरा पीटना चाहता है। लोगों की दृष्टि में अधिक वैभववान् सिद्ध होना चाहता है।इतना ही नहीं कई बार उद्धत आचरण अपनाकर अपनी आतंकवादी प्रभुता प्रकट के लिए अनाचार तक अपनाना पड़ता है। अपहरण, आक्रमण, शोषण, उत्पीड़न जैसे नृशंस काम करने पड़ते है।चतुरता का उच्चस्तरीय परिचय देना तो कठिन है पर ठगी, प्रवंचना, शेखीखोरी जैसे प्रपंच खड़े करके व्यक्ति औरों की तुलना में अपने को अधिक चतुर सिद्ध करता है। भले ही वे चतुरताएँ कुटिलता स्तर की हेय या अनैतिक ही क्यों न हों? शरीर लोभ के पूर्ति में और मन मोह का ताना बाना बुनने में लगा रहता है इसके विपरीत विकसित मन को अहंकार का प्रदर्शन करने की ऐसी विडम्बना नहीं रचनी पड़ती।
इससे एक कदम आगे बढ़ने पर कारण शरीर में एक जाग्रति भरी हलचल उत्पन्न होती है।वह है सम्मान की स्नेह सद्भाव की आकाँक्षाएँ भी क्रमशः अधिक समय साध्य, श्रम साध्य एवं बुद्धि साध्य है स्थूल शरीर की आवश्यकताएं सामान्य प्रयास से ही पूरी हो जाती है। पेट और प्रजनन की व्यवस्था पशु-पक्षी, कीड़े मकोड़े तक आसानी से बना लेते है। थोड़ा सा ही चिन्तन और परिश्रम करने से उनके साधन बन जाते है अहंता के नाम पर अन्य प्राणी तो अपनी बलिष्ठता दिखाने के लिए आक्रमण भर करते है। आतंक भर मचाते है। पर मनुष्य को इसके लिए आकुलता भी रहती है और आतुरता भी। जिसे स्नेह नहीं मिला, समझना चाहिए कि उसका जीवन नीरस, निर्जीव, रूखा, कर्कश रह गया। इसी प्रकार जिसे सम्मान ही मिला उसे ऊंचा उठने के लिए जो आधार अवसर मिलना चाहिए था, वहीं छिन गया। इन दोनों के न मिलने या छिन जाने के कारण शरीर की उर्वरता एवं गरिमा की पलायन कर जाती है। पेट-प्रजनन से भी बड़ी भूख अन्तरात्मा के स्नेह सम्मान की रहती है। पर उसे प्राप्त करने के लिए स्तर के अनुरूप पुरुषार्थ करना पड़ता है। पेट भरने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। कामुकता की बेल को समेटने के लिए सुविस्तृत ताना बाना बुनना पड़ता है। जब स्थूल और सूक्ष्म शरीर अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए समुचित श्रमशीलता एवं तन्मयता, तत्परता चाहते है, सतत् व्यस्त बनाये रहते है तो कोई कारण नहीं कि काया का सर्वोच्च स्तर जो माँगता है वह बिना कुछ किए अनायास ही मिल जाय। उसके लिए और भी बढ़ा चढ़ा वैभव अर्जित करना होता है।
कारण शरीर की बलिष्ठता भाव-संवेदना है। ठीक उसी तरह जैसे शरीर में बल और मन में बुद्धि का होना आवश्यक है। पशु भाव रहित होते है। उनमें मैत्री, करुणा, मुदिता, सेवा, सहानुभूति, उदारता जैसी गरिमामयी भाव संवेदनाएँ कदाचित ही नगण्य मात्रा में होती है। उन्हें स्वार्थ ही सूझता है। कष्ट होता है तो अपने ऊपर संकट आने पर ही पीड़ा होती है। किन्तु मनुष्य का दर्जा कही ऊँचा है। वह “आत्मवत् सर्वभूतेषु” व “वसुधैव कुटुम्बकम्’ स्तर की भाव संवेदना संजोए रहता है। यही कारण है कि उसके अन्तराल में करुणा और उदारता का उद्गम उभरता रहता है। दूसरों का दुःख बंटा लेने की और अपना सुख बाँटने के उमंग उठती रहती है। इसी परमार्थ परायणता के मूल्य पद दूसरों का सहयोग एवं श्रद्धा सम्मान खरीदा जाता है।उदारता भरी सेवा साधना ही विचारशील लोगों के अन्तराल में शालीनता प्रदर्शित करने वालों के प्रति श्रद्धा उमगाती है और साथ ही सम्मान भरे सहयोग के वर्षा करती है। उसमें स्थायित्व भी होता है। आदर्शवादियों के चरित्र एवं व्यवहार का अनुकरण- अभिनंदन किया जाता है। भाव संवेदना की आत्मीयता, ममता, मित्रता की जड़ें मजबूत करती है। जिनका अन्तःकरण ऊसर बंजर की तरह भावनात्मक उर्वरता से रहित है, उस पर न तो सहयोग सम्मान के मेघ बरस सकते है और सेवा, उदारता के उपवन उगते, सुरभित फूल खिलते है। निष्ठुर स्वार्थ परायण, सहानुभूति-संवेदना रहित व्यक्ति के संबंध में यही कहा जा सकता है कि उसका अन्तःकरण भाव-संवेदनाओं की उस उर्वरता से सम्पन्न नहीं हो पाया, जिसके कारण व्यक्तिगत स्नेह और समूहगत सम्मान की अमृत वर्षा होती है। व्यक्तित्व को देवी अनुकम्पा और अन्तरंग को सन्तोष एवं उल्लास से निरन्तर भरे रहती है। इसी कारण उपनिषद् बार-बार कहते है,-” हे मानव! तू अपने सच्चे स्वरूप को पहचान और उसी के अनुसार तू अपनी देह को कार्य में लगाकर आगे बढ़े।”
ऋषि -मनीषियों के अनुसार दो प्रकार के मन होते है। एक लघु चेतस् तथा दूसरा उदारचरित्। - जिनका आत्मभाव विश्ववसुधा के स्तर तक विकसित रहा।- वे उदारचरीत् कहलाते रहे उपनिषदों के ऋषि, राम, कृष्ण, बुद्ध, शंकर, चैतन्य, नानक, कबीर, रामकृष्णपरमहंस, विवेकानंद, गाँधी, जैसे व्यक्ति सी श्रेणी में आते है। मनुष्य का अहंभाव व्यक्तित्व भी विराट एवं गरिमामय हो जाता है। इसी बात को मनोविज्ञानी मैक्डूगल अपने शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा है” ईश्वर की मानव को धरती पर भेजने की सार्थकता उससे विकसित रूप, महामानवों के, विकसित पुरुषों के जीवन चरित्रों को देखकर भली−भांति समझी जा सकती है। यही वह लक्ष्य है जिसे प्राप्त कर मनुष्य पूर्णता तक पहुँचता है, देवत्व को प्राप्त होता है।”
शरीरगत आवश्यकताएं तो पशु भी पूरी करते है। मानसिक तृष्णाओं को चतुर लोग पूरा कर लेते हैं। पर मानवी गरिमा इसमें है कि उसके अन्तःकरण में भावनाएँ उमँगे। स्वयं में वह विनम्र, निष्काम एवं संयमी, अपरिग्रही रहे। अपनी क्षमताओं के संवर्धन में समर्पित संलग्न करे। देव मानवों का कारण शरीर इसी आधार पर विकसित होता है। इसी उपलब्ध विशेषता के कारण वे महामानव,नर -नारायण एवं पुरुषोत्तम बनते है। जीवन साधना के अध्यात्म उपचार इसी उद्देश्य से अपनाये जाते है। जिन्हें अध्यात्म क्षेत्र में आगे कदम रखना हो उन्हें यह प्राथमिक पाठ पहले ही समझ लेना चाहिए।
अरस्तू गुरु और उनका शिष्य सिकन्दर। एक दिन दोनों साथ-साथ जा रहे थे। रास्ते में नदी पड़ी। पानी की थाह लेने पहले कौन उतरे? यह विचार चल रह था।
अरस्तू आगे चलने लगे। वे पहले नदी पार करना चाहते थे। सिकन्दर ने उन्हें रोका और कहाँ पहले मुझे जाने दीजिए। एक सिकंदर डूब गया तो जीवित सिकन्दर भी मृत तुल्य हो जाएगा।
सचमुच निर्माता का मूल्य निर्मित की तुलना में अत्यधिक है।
राजा अजातशत्रु पुत्र शोक में विह्वल हो रहे थे। समाधान के लिए सामने विराजमान विद्रुध मुनि ने का-राजन् जन्म की तरह मरण भी मनुष्यों के कर्मानुसार निर्धारित समय पर होता है। उपचार करने पर भी कोई बच सके तो फिर विधि का विधान मानकर संतोष करना चाहिए। इस प्रसंग में विद्रुध ने अजातशत्रु को एक कथा सुनाई।
एक दिन गरुड़ उड़ते हुए शभीक आरण्यक पर से गुजरे। देखा शिला पर बैठा एक कपोत काँप रहा है। गरुड़ नीचे उतर और दयार्द्र होकर पूछा, भला बताओ तो तुम्हें क्या कष्ट है? किसका भय है?
कपोत ने स्तनस्तक होकर कहा-देव कुछ समय पूर्व ही यमराज इधर से गुजरे थे। मुझे देखकर अकारण ही हँस पड़े। मैंने काण पूछा, तो उनने कहा-”आज यह इस प्रकार उदक -फुदक रहा है। कल प्रातःकाल सबेरे इसे सर्प उदरस्थ कर लेगा। एक दिन भी तो उसके जीवन का शेष नहीं है। सो मैं मृत्यु के भय से काँप रहा हूँ।”
गरुड़ को दया आई। उनने यमराज की चुनौती स्वीकार की। कपोत को पंजे में दबाकर गंधमादन पर्वत की ओर उड़ चले। सहस्रों मील की उड़ान भरने के उपरान्त गरुड़ ने कपोत को सरोवर तट पर बिठाया और निश्चिंत हो जाने का आश्वासन दिया।
इतना करने के बाद गरुड़ यमलोक पहुँचे और यमराज का उपवास उड़ाते हुए बोले-आपके विधान को मैंने पलट दिया। कपोत अब अपने घोंसले से सहस्रों योजन दूर सुरक्षित स्थान पर है। सर्प वहां है ही नहीं, उदरस्थ कौन करेगा?
यमराज ने गरुड को सत्कार पूर्वक बिठाया और चित्रगुप्त को कपोत संबंधी जानकारी देने को कहा। चित्रगुप्त ने लेखा पुस्तक ढूँढ़ और कहाँ देव! डस कपोत को अपने घर से सहस्रों योजन दूर गंधमादन पर्वत के सरोवर तट पर आज प्रातःकाल सर्प द्वारा उदरस्थ किये जाने का विधान लिखा था। सो वह यथा समय पूरा हो चुका।
गरुड़ को आश्चर्य चकित देखकर यमराज ने कहा-”भवितव्यता ने आपकी अनुकम्पा बनकर कपोत को वहाँ पहुँचा दिया जहाँ उसका मरण निर्धारित था। इसके बिना घोंसले में ही बैठे रहने पर उसका भाग्य विधान सही न बैठता। आपकी दया उस भवितव्यता का निमित्त कारण बन गई।”
राजा को इस दृश्य से बोध मिला। उनने कथा के घटनाक्रम से अपनी संगति बिठाई और आये दिन सामने आने वाले मानसिक उद्वेगों का वास्तविक कारण जाना।
दूसरे दिन से उन्होंने व्यवस्था बदली। शासन का स्वामित्व प्रज्ञा परिषद को सौंपा और स्वयं उसके एक सामान्य से व्यवस्थापक बनकर काम करने लगे। चिन्ता और भय से पूरी तरह छुटकारा मिल गया।
मृत्यु का क्षण बड़ा मार्मिक एवं डरावना होता है। ऐसे क्षणों में वातावरण में अचानक परिवर्तन आ जाता है।मृतक के विषय में अनेक तरह की चिन्ताएँ उभरती है। क्या उसे वह सब सुख-सुविधाएँ मिलेगी जो यहाँ मिलती थी? मरणोपरान्त मनुष्य कहाँ चला जाता है? वहाँ की क्या-क्या विशेषताएं होती है? आदि। किन्तु इसका उत्तर कोई नहीं दे सकता क्योंकि मरने के पश्चात् किसी का पुनः उसी स्थिति में लौटना हुआ नहीं है। वहाँ सबको खाली हाथ ही जाना पड़ता हैं। वस्तुओं का उपयोग यही तक सीमित है, सीमा के उस पार उन्हें नहीं ले जाया जा सकता।
मृत्यु का नाम सुनते ही प्रायः लोग घबरा जाते है। किसी का मरण देखकर, किसी दुर्घटना का समाचार सुनकर भी अपनी मृत्यु की शंका से आक्राँत हो उठते है। यहाँ तक कि कभी-कभी स्वयं भी अकेले में संसार की नश्वरता का विचार आते अथवा अपनी आयु के बीच गये वर्षों पर विचार करने से मृत्यु भय से मनुष्य उद्विग्न हो उठता है। अन्धेरे अथवा अपरिचित स्थानों में निर्भयता पूर्वक पदार्पण करने से भी उसे अपने मरण की शंका निरुत्साहित कर देती है। निःसन्देह मृत्यु का भय बड़ा ही व्यापक तथा चिर स्थायी होता है।
किन्तु यदि इस पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय तो यह बडा ही क्षुद्र तथा उपहासास्पद प्रतीत होगा। पहले तो जो अनिवार्य है, अवश्यंभावी है उसके विषय में डरना क्या? जब मृत्यु अटल है और एक दिन सभी को मरना है तब उसके विषय में शंका का क्या प्रयोजन हो सकता है? यह बात किसी प्रकार भी समझ में आने लायक नहीं है। हमारे काल पूर्वजों की सृष्टि के अन्य प्राणियों की एक लम्बी परम्परा काल के मुख में समा चुकी है और आगे भी आने वाली प्रजा उनका अनुसरण करती ही जायेगी। तब बीच में हमें क्या अधिकार रह जाता है कि उस निश्चित नियति के प्रति भयाकुल अथवा शंकाकुल होते रहे। वास्तव में मनुष्य शरीर नहीं अजर-अमर अविनाशी आत्मा है। यदि इस सत्य को जाना, समझा और हृदयंगम किया जा सके तो मनुष्य न केवल मृत्यु को प्रस्तुत जीवन का अंतिम एवं अपरिहार्य अतिथि मानकर उसकी ओर से निश्चित हो जायेगा वरन् न जाने अन्य कितने भयों से वह अनायास ही मुक्ति पालेगा।
मरने के बाद मनुष्य का अस्तित्व बना रहता है या मृत्यु सब कुछ समाप्त कर देती है?यह प्रश्न मनुष्य को आदि काल से ही उद्वेलित करता है। कठोपनिषद् में यमराज से नचिकेता ने यही प्रश्न किया था और आत्मदाह का प्रकाश पाकर साँसारिक संतापों से छुटकारा पाया था। वैज्ञानिक मनीषियों ने भी इस संदर्भ में बहुत खोजें की है और पाया है कि इस जीवन के बाद भी जीवन बना रहता है। मरने के पश्चात् फिर से मनुष्य को नवजीवन मिलता है। इस संबंध में अब पुनर्जन्म सहित अनेक उपलब्ध तथ्यों का इतना बाहुल्य है कि संदेश और अविश्वास की कोई गुंजाइश ही नहीं रही। मर कर पुनर्जीवित होने अथवा किसी कारणवश अचेतन अवस्था में चले जाने के बाद पुनः चेतन अवस्था में लौट आने वाले व्यक्तियों के अनुभवों का तथ्यपूर्ण अन्वेषण करने के पश्चात भी वैज्ञानिकों ने उक्त निष्कर्ष निकाला है।
मैसाचुसेट्स मेडिकल सोसायटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मूर रसेल फ्लेचर ने लगातार 24 वर्षों तक इस तथ्य का अन्वेषण किया कि मरने के उपरान्त मनुष्य को किस प्रकार की अनुभूति होती है। इस संदर्भ में उन्हें ऐसे लोगों से भी वास्ता पड़ा जो कुछ समय तक मृत रहने के उपरान्त पुनः जीवित हो उठे थे। ऐसे लोगों को खोज-खोज कर उन्होंने उनके बयान लिए और अपनी पुस्तक “ट्रिटाइज आन संस्पेंडेड ऐनीमेषन में प्रकाशित किये। इनमें से एक घटना गानर्निर नगर निवासी श्रीमती जान डी0 ब्लेक की है जिनके मृत शरीर को तीन दिन तक दफनाया न जा सका, कुछ लक्षण ऐसे थे जिनके कारण घर वालो ने उन्हें दफनाया नहीं और पुनर्जीवन की प्रतीक्षा में लास को सम्भाले रहे। तीन दिन बाद वे जी उठी। पूछने पर उसने बताया कि वे एक ऐसे लोक में गई जिसे परियों का देश कह सकते हैं। वहाँ बहुत आत्माएँ थी। वे बिना परों के आसमान में उड़ती थी। और सभी प्रसन्न थी।
फ्राँस के प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. डेलीकोर ने उक्त विषय में गहन अनुसंधान किया है। मरणकाल की मूर्च्छा छोड़कर आंखें खोलने वाले व्यक्तियों की मनःस्थिति और अनुभूतियों को उनने न केवल निरखा-परखा है वरन् वैज्ञानिक अनुसंधान भी किया है प्रसिद्ध अभिनेता डेनियल जीनल के मरणोत्तर जीवन संबंधित अनुभवों को गहन जाँच पड़ताल के पश्चात् सत्य पाया गया है। उनके अनुसार डेनियल को हृदय रोग विशेषज्ञों ने मृत घोषित कर दिया जिसका स्पष्ट संकेत उपस्थित लोगों ने भी दिल की धड़कन रिकार्ड करने वाली मशीन पर देखा था। पर कुछ देर पश्चात् चिकित्सकों ने देखा कि अचानक ही मशीन की सुई फिर से हिलने–डुलने लगी है। इस पर उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा। डेनियल की आँख खुली तो उससे दिल का दौरा पड़ने से लेकर आँख खुलने तक की समयावधि में क्या अनुभूति हुई? यह पूछने पर उसने यत्किंचित् भय लगने, हवा में तैरने तथा आपने दिवंगत माता-पिता तथा पुत्र से मिलने और सुन्दर रंग बिरंगे फूलों से सुगन्धित बाग में घूमने के बात बताई। इतना ही नहीं उसने बताया कि माँ ने धीरज बंधाते हुए उससे कहा-”डेनियल अभी तुम यथावत् लौटे जाओ क्योंकि जिन्दगी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है।”
अमेरिका के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. वेन राबर्ट्स ने भी इस विषय की खोज में अपना अधिकांश समय व्यतीत किया है। उनके अनुसार अचेतन संसार से वापस चेतन अवस्था में आने वाले व्यक्तियों ने जो अनुभव बताये है उनमें प्रायः बहुत कुछ साम्यता है। जैसे शरीर से बाहर निकलने पर हलकापन अनुभव करना, शरीर की थकावट का विश्राम में बदल जाना एक ऐसी दुनिया में विचरण करना जहाँ न प्रकाश है। और न अंधकार है वरन् धूमिल प्रकाश है जहाँ मृत्यु के उपरान्त का यह अल्पकालीन समय शांति एवं सुखमय व्यतीत होता है। वहाँ कभी स्थिति इसके विपरीत भी दिखने लगती है। दृश्य इतने भयावह एवं कष्टकारक दिखते है कि जिन्हें देखकर दर्शकों के ही नहीं श्रोताओं के भी रोंगटे खड़े हो जाते है। वस्तुतः ऐसे दृश्य जीवन का जटिल एवं अनैतिक बना लेने के परिणाम स्वरूप ही दृष्टिगोचर होते होंगे।
इस तरह की घटनाओं को, अनेकों विख्यात व्यक्तियों की अनुभूतियों को विभिन्न भूतियो को विभिन्न मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने रिकार्ड किया है, जिन्हें अप्रामाणिक नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण एडरबीन विश्वविद्यालय के प्रख्यात मनोविज्ञानी डॉ. राबर्ट कूकल के पुस्तक-”टेक्नीक्सआफ एस्टल प्रोजेक्षन” एन्थोनी वोर्गिया की पुस्तक-”मोर एबाउट लाइफ इन दी वर्ल्ड अनसीन” डॉ. जेम्सपाइक की पुस्तक “दि अदर साइड” डब्ल्यू टी0 स्टेड की ‘आफ्टर तथा सुप्रीमऐडवंचर आदि में संकलित है। इनमें से हैस नामक एक दस वर्षीय बालक की अनुभूतियां बहुत ही रोचक एवं लोमहर्षक है। हैंस एक दुर्घटना में दीवाल के नीचे दब गया जिसे चिकित्सकों ने परीक्षण करने के पश्चात् मृत घोषित कर दिया था। दैवयोग से लाश चौबीस घंटे तक पड़ी रही और उसकी चेतना पुनः वापस लौट आयी। होश में आने पर उसने उपस्थित आत्मीयजनों एवं डाक्टरों को अपने अनुभवों से अवगत कराते हुए बताया मैं एक ऐसी दुनिया में चला गया जहाँ अत्यधिक आनन्द की अनुभूति होने लगी थी। वहाँ के बच्चों को खेलते कूदते देखकर मेरा मन उनके क्रिया-कलापों में भाग लेने का हुआ और मैंने उनसे अनुमति माँगी। इस पर उन्होंने मेरे प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा-कि तुम्हारा अभी यहाँ आने का समय नहीं हुआ है। साँसारिक कर्तव्यों के निर्वाह हेतु पुनः वापस चले जाओ। इस प्रकार वह फिर से अपनी चेतनावस्था में आ गया और स्वस्थ होने पर पूर्व की भाँति अपनी दिनचर्या बिताने लगा।
प्रख्यात परामनोविज्ञान हेलेनवेम्बेक को सम्मोहन विद्या का विशेषज्ञ माना जाता है।
अनुभूतियों का सविस्तार वर्णन उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “लाइफ बिफोर लाइफ” में किया है उन्होंने अचेतन के स्मृति भण्डार का पता लगाने के लिए कई व्यक्तियों को सम्मोहित किया। मृत्यु के बाद और चेतन अवस्था में आने तक के अनुभवों के बारे में पूछा तो प्रत्युत्तर में यही सुनने को मिला कि वहाँ के लोग अर्थात् दिवंगत आत्माएं छाया की भाँति सहायक और मार्गदर्शक का काम करत और अपने स्थान पर पुनः वापस लौट जाने का सत्परामर्श देती है।
अज्ञान जनित माया मोह और आसक्ति ही मनुष्य को भ्रमाते डराते है और मृत्यु न तो कोई अचम्भे की वस्तु है। और न डरने की। वह जीवन-क्रम में अविच्छिन्न रूप से जुड़ी, एक सरल और स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसमें पुरातन के नवीनीकरण का सुखद परिवर्तन जुड़ा हुआ है। मृत्यु वस्तुतः अनायास होने वाली एक सुनिश्चित घटना है। जीन अनवरत बहने वाला एक अनन्त चेतना प्रवाह है। यह तथ्य स्मरण रखा जाये तो मनुष्य व्यर्थ में मौत के नाम से भयभीत क्यों हो?
एक विद्वान अनेक विद्याओं और कलाओं का ज्ञाता था। पर उस वैभव के द्वारा जो कमाता उसे अपने लिए ही खर्च करता। उनके द्वारा किन्हीं दूसरों को लाभान्वित करने का विचार न उठता।
विद्युत ऊर्जा के सहारे यंत्र-उपकरणों के-संचालन की बात सर्वविदित है, पर प्रायः यह कम लोग ही जानते हैं कि मानवी शरीर एक शक्तिशाली यंत्र है और उसके सुसंचालन में जिस ऊर्जा की आवश्यकता होती है वह एक प्रकार की विशिष्ट विद्युत ही है। अध्यात्म की भाषा में इसे “प्राण” कहते हैं! यह एक अग्नि है जिसे ज्वलन्त रखने के लिए ईंधन की आवश्यकता पड़ती है। प्राण रूपी शरीराग्नि आहार से ज्वलन्त बनी रहती है। प्राणियों में संव्याप्त इस ऊर्जा को वैज्ञानिकों ने “जैव विद्युत” नाम दिया है। शरीर संचार की समस्त गतिविधियाँ तथा मस्तिष्कीय हलचलें रक्त माँस जैसे साधनों से नहीं, शरीर में संव्याप्त विद्युत प्रवाह द्वारा परिचालित होती हैं। यही जीवन तत्व बनकर रोम-रोम में व्याप्त है। उसमें चेतना और संवेदना के दोनों तत्व विद्यमान हैं। विचारशीलता उसका विशेष गुण है। मानवी विद्युत की यह मात्रा जिसमें जितनी अधिक होगी वह उतना ही ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी होगा। प्रतिभाशाली, प्रगतिशील, शूरवीर, साहसी लोगों में इसी क्षमता की बहुलता होती है। काय कलेवर में इसकी न्यूनता होने पर विभिन्न प्रकार के रोग शीघ्र ही आ दबोचते हैं। मनः परिलक्षित होने लगते हैं।
‘जैव विद्युत’ उस भौतिक बिजली से सर्वथा भिन्न है जो विद्युत यंत्रों को चालित करने के लिए प्रयुक्त होती है। मानवी प्राण विद्युत का सामान्य उपयोग शरीर को गतिशील तथा मन, मस्तिष्क को सक्रिय रखने में होता है। असामान्य पक्ष मनोबल, संकल्पबल, आत्मबल के रूप में परिलक्षित होता है जिसके सहारे असंभव प्रतीत होने वाले काम भी पूरे होते देखे जाते हैं। “ट्राँसफाँर्मेंशन ऑफ एनर्जी” सिद्धान्त के अनुसार मानवी विद्युत सूक्ष्मीभूत होकर प्राण ऊर्जा और आत्मिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित और एरिषोधित-परिवर्तित हो सकती है। इस ट्राँसफाँर्मेंशन के लिए ही प्राणानुसंधान करना और प्राण साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है।
जैव भौतिकी के नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक हाजकिन हक्सले और एक्लीस ने मानवी ज्ञान तंतुओं में काम करने वाले विद्युत आवेगों की खोज की है। इनके प्रतिपादनों के अनुसार ज्ञान तंतु एक प्रकार के विद्युत संवाही तार हैं जिनमें निरंतर बिजली दौड़ती रहती है। पूरे शरीर में इन धागों को समेटकर एक लाइन में रखा जाय तो उनकी लम्बाई एक लाख मील से भी अधिक बैठेगी। इस प्रकार इतने बड़े तंत्र को विभिन्न दिशाओं में गतिशील रखने वाले यंत्र को कितनी अधिक बिजली की आवश्यकता पड़ेगी, यह विचारणीय है।
मूर्धन्य वैज्ञानिक डाँ मेटुची वैनबर्ग ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में कहा है कि मानवी काया के आन्तरिक संस्थानों में विद्युत शक्ति रूपी खजाने छिपे हैं। इनकी प्रकट क्षमता की जानकारी मांसपेशियों के सिकुड़ने-फैलने से उत्पन्न विद्युत धाराओं से होती है। इस संदर्भ में अँग्रेज वैज्ञानिक वाल्टर ने भी बहुत खोजें कीं और उन खोजों का लाभ चिकित्सा जगत को प्रदान किया है।
तंत्रिका विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक न्यूरान एक छोटा डायनेमो है। कार्य विद्युत का उत्पादन मुख्यतया यही वर्ग करता है। इसका केन्द्र संस्थान मस्तिष्क है। एक सामान्य स्वस्थ युवा व्यक्ति का मस्तिष्क 2 वाट विद्युत उत्पन्न करता है जिससे उसके शरीर की समस्त गतिविधियाँ संचालित होती हैं। सामान्य जाँच प्रक्रिया में हृदय कोशिकाओं में विद्यमान इस बिजली का प्रयोग ईँसीँजीँ में, मांसपेशियों की विद्युत का ईँएमाँजीँ में तथा ब्रेन सेल्स की विद्युत का ईँईँजीँ में प्रयोग किया जाता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवी काया एक उच्चस्तरीय परमाणु बिजली घर है। इससे प्राण विद्युत तरंगों का निरन्तर कम या अधिक मात्रा में विकिरण होता रहता है। येल विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री हेराल्ड बर्र ने अपने शोध निष्कर्ष में बताया है कि प्रत्येक जीवधारी अपने-अपने स्तर के अनुरूप कम या अधिक विभव वाली विद्युत उत्पन्न करता है। मनुष्यों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में इसकी मात्रा अधिक होती है। इस मानवीय विद्युत शक्ति को उन्होंने “लाइफ फील्ड” के नाम से सम्बोधित किया है। उनके अनुसार व्यक्तित्व के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग लाइफ फील्ड होता है। जैव क्रियाओं से संबंधित होने के कारण उसमें परिवर्तन होता रहता है। आवेशग्रस्त होने अथवा घृणा, ईर्ष्या की स्थिति में मनुष्य शरीर से बिजली की सर्वाधिक क्षति होती है।
मूर्धन्य परामनोविज्ञानियों ने भी अपने विभिन्न अनुसंधानों के आधार पर पाया है कि सामान्य मनुष्य के सूक्ष्म शरीर से निस्सृत होने वाली विद्युतीय तरंगें उसके स्थूल शरीर से छः इंच बाहर तक फैली रहती है। पूर्ण स्वस्थ एवं पवित्र अंतःकरण वाले व्यक्ति के शरीर से निकलने वाली इन तरंगों का विकिरण तीन फुट दूर तक फैला रहता है। इसे इन्होंने मानवी तेजोवलय की संज्ञा दी है और कहा है कि मनुष्य जिस स्थान पर निवास करता या साधना-उपासना करता है, काया से निस्सृत प्राण विद्युत का अदृश्य कंपन वहाँ स्थित जड़ पदार्थों के परमाणुओं में तीव्र प्रकंपन पैदा कर देता है। मनुष्य शरीर से निकली विद्युत तरंगें आस-पास के वातावरण में छा जाती हैं और जड़ चेतन दोनों को प्रभावित आकर्षित करती हैं।
प्रख्यात वैज्ञानिक डाँ ब्राउन के मतानुसार एक स्वस्थ नवयुवक के शरीर और मस्तिष्क में व्याप्त विद्युत शक्ति से एक बड़ी मिल को संचालित किया जा सकता है जबकि छोटे बच्चे के शरीर में सन्निहित विद्युत ऊर्जा से एक रेलगाड़ी का इंजन चल सकता है। इस विद्युत शक्ति को उन्होंने “बायोलॉजिकल इलेक्ट्रिसिटी” कहा है। उनके अनुसार यह जैव विद्युत मनुष्य के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होती है और स्थूल काया समेत समस्त गतिविधियों का नियंत्रण नियमन करती है। मस्तिष्क से लेकर अंगुलियों पर्यन्त इसी का आधिपत्य होता है। नेत्र सहित सभी इन्द्रियाँ इस शक्ति के प्रमुख विकिरण केन्द्र हैं। सर जान वुडरफ ने भी अपनी “पुस्तक सर्पेण्टाइन पावर” में बताया है कि नेत्र और हाथ पैरों की अँगुलियों के पोरों पर प्राण विद्युत का विकिरण विशेष अनुपात में पाया जा सकता है।
शरीर में काम करने वाली जैव विद्युत में कभी-कभी व्यतिरेक होने से गंभीर संकटों का सामना करना पड़ता है। भौतिक बिजली का जैव विद्युत में परिवर्तन असंभव है, पर जैव विद्युत के साथ भौतिक बिजली का सम्मिश्रण बन सकता है। कई बार ऐसी विचित्र घटनाएँ देखने में आयी हैं जिनमें मानवी शरीरों को एक जनरेटर डायनेमो के रूप में काम करते पाया गया।
सन् 2934 में इटली के पिरानी अस्पताल में एक ऐसी ही घटना घटित हुई। अन्ना मोनारी नामक एक महिला के शारीरिक कोशिकाओं से बिजली रिसने लगी। शरीर को छूते ही बिजली के नंगे तारों की भाँति तेज झटका लगता था। बिजली का यह उत्पादन सीने के एक वृताकार भाग में विशेष रूप से अधिक होता था। गहन निद्रा के समय सीने पर एक वृत्ताकार गैलेक्सी भी कुछ समय तक छायी रहती थी। यह प्रकाश पुँज कुछ सप्ताह तक बना रहा। इस घटना की जाँच पड़ताल विभिन्न वैज्ञानिकों, चिकित्सा शास्त्रियों एवं भौतिक-विदों द्वारा की गई, पर रहस्य पर से पर्दा नहीं उठ सका। अन्नामोनारी की जाँच कर रहे मूर्धन्य वैज्ञानिक डाँ कोँ सेग के कथनानुसार इस प्रकार की घटनाएँ शरीर में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इन्डक्षनके कारण होती हैं। अन्य वैज्ञानिकों का अभिमत था कि त्वचा में कुछ रासायनिक प्रक्रियाएँ इसके लिए जिम्मेवार हैं। किसी ने इसे “हाईवोल्टेज सिण्ड्रोम” कहा तो किसी ने इसे “साइकोकाइनेटिक शक्ति” के नाम से सम्बोधित किया।
“सोसायटी ऑफ सायकिकल रिसर्च” द्वारा प्रस्तुत एक विवरण के अनुसार केवल अमेरिका में ही 2 से अधिक ऐसे व्यक्ति पाये गये हैं जिनके शरीर से सतत् विद्युत धाराएँ निकलती थीं। तलाश करने पर वे संसार के अन्य भागों में भी मिल सकते हैं। फ्राँसीसी भौतिक विद् फ्रैन्क्वाइसएरैंगों ने अपने देश के “ला पेरियर” शहर की एन्जोलिककोटिन नामक विद्युत महिला का, तथा डाँएफाँकाफ्टने आयरलैण्ड की जोँ स्मिथ का अध्ययन किया था और घटना को प्रामाणिक बताया था। कोलोरेडो के मूर्धन्य वैज्ञानिक डब्लूँ पीजोन्स एवं उनके सहयोगी नार्मन लाँग ने भी इस संदर्भ में गहन अनुसंधान किया है और इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि वस्तुतः यह घटनाएँ शारीरिक व्यतिरेक के परिणाम स्वरूप घटित होती हैं। कोशिकाओं में अधिक विद्युत उत्पादन होने पर वह शरीर से बाहर निकलने लगती हैं। यदि इस बढ़ी हुई विद्युत शक्ति के सुनियोजन की कला ज्ञात हो सके तो मनुष्य अतीन्द्रिय क्षमताओं का धनी बन सकता है।
विभिन्न प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर यह प्रमाणित किया जा चुका है कि काया के सूक्ष्म केंद्रों के इर्द-गिर्द प्रवाहमान विद्युतधारा ही सुखानुभूति का निमित्त कारण है। वैज्ञानिकों का कहना है कि विद्युतीय प्रकंपनों के बिना किसी प्रकार की सुख संवेदना का अनुभव नहीं किया जा सकता। पदार्थों के संयोग से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियाएँ एवं अनुभूतियाँ उनके अभाव में विद्युत कंपनों से भी पैदा की जा सकती हैं। परामनोविज्ञानियों की भी यही मान्यता है कि सुख-दुःख की अनुभूतियाँ जैव विद्युत तरंगों पर निर्भर करती हैं। शारीरिक परिपुष्टता और मानसिक उत्कृष्टता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। एक के पूर्ण स्वस्थ होने पर दूसरे का स्वस्थ होना सुनिश्चित है। गुण,कर्म, स्वभाव में उच्चस्तरीय उत्कृष्टता जीवन में समस्वरता पैदा करती है, फलतः प्राण विद्युत की सशक्तता बढ़ती है, जिससे मनुष्य को असीम सुख शांति की अनुभूति होती है।
मानवी विद्युत प्रवाह ही एक दूसरे को आकर्षित प्रभावित करता है। शिर और नेत्रों में यह विशेष रूप से सक्रिय पाया जाता है। वाणी की मिठास, कड़ा होना अथवा प्रामाणिकता में उसका अनुभव किया जा सकता है। तेजस्वी मनुष्य के विचार ही प्रखर नहीं होते, उनकी आँखें भी चमकती हैं और उनकी वाणी अन्तर की गहराई तक घुस जाने वाला विद्युत प्रवाह उत्पन्न करती है। उभरती आयु में यही प्राण विद्युत काय आकर्षण की भूमिका निभाती है। सदुपयोग होने पर प्रतिभा, प्रखरता, प्रभावशीलता के रूप में विकसित होकर कितने ही महत्वपूर्ण कार्य करती है और दुरुपयोग होने पर मनुष्य निस्तेज, छूँछ एवं अवसादग्रस्त रहने लगता है। ऊर्ध्वरेता संयमी, विद्वान, वैज्ञानिक, दार्शनिक, योगी, तपस्वी, जैसी विशेषताओं से सम्पन्न व्यक्तियों के बारे में यहीं कहा जा सकता है कि उन्होंने अपनी प्राण विद्युत का अभिवर्धन नियंत्रण एवं सदुपयोग किया है।
किस व्यक्ति में कितनी मानवी विद्युत शक्ति विद्यमान है, इसका परिचय उसके चेहरे के इर्द-गिर्द और शरीर के चारों ओर बिखरे हुए तेजोवलय को देखकर प्राप्त किया जा सकता है। यह आभा मण्डल खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता वरन् सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति ही इसे अनुभव कर पाते हैं। अब ऐसे यंत्र भी विकसित कर लिए गये हैं जो मानव शरीर में पायी जाने वाली विद्युत शक्ति और उसके विकिरण का विवरण प्रस्तुत करते हैं। किर्लियन फोटोग्राफी तथा आर्गान एनर्जी के मापन को इस संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
निःसन्देह मनुष्य एक जीता जागता बिजलीघर है, किन्तु झटका मारने वाली बत्ती जलाने वाली सामान्य बिजली की तुलना उससे नहीं की जा सकती। जड़ की तुलना में चेतन की जितनी श्रेष्ठता है उतना ही भौतिक और जीवन विद्युत में अंतर है। प्राण विद्युत असंख्यगुनी परिष्कृत और संवेदनशील है। उसके सदुपयोग एवं दुरुपयोग के भले-बुरे परिणामों को ध्यान में रखते हुए यदि प्राण विद्युत पर नियंत्रण, परिशोधन, उसका संचय-अभिवर्धन किया जा सके तो मनुष्य असामान्य शक्ति का स्वामी बन सकता है। अभी तो वैज्ञानिक स्थूल विद्युत के चमत्कार जानकर ही हतप्रभ हैं। यदि कायपिण्ड में विद्यमान इस जखीरे को विस्तार से जाना-समझाया जा सके तो अविज्ञात के रहस्योद्घाटन के क्षेत्र में एक नया आयाम खुलता है।
अम्बपाली अपने समय की प्रख्यात सुन्दरी थी। उसके रूप लावण्य पर अनेकों मुग्ध रहते थे। उसका नृत्य गायन स्वर्ग की अप्सराओं जैसा था।
एक बार वह भगवान बुद्ध के उपदेश सुनने गई। जीवन की गरिमा और उसके सदुपयोग की आवश्यकता पर उसने बहुत कुछ सुना। आत्म चिन्तन किया। अपनी गतिविधियों के लिए मन ने धिक्कारा। वह शेष जीवन को सुधारने का विश्वास करके लौटी।
भगवान की शरण में वह दुबारा गई। उन्होंने साँत्वना दी और कहा-कि जो बीत चुका सो लौटने वाला नहीं। अब जो शेष रहा है उसी को सुधारना चाहिए। निर्णय यह हुआ कि उसे बौद्ध समुदाय में शिष्य होकर साधना करनी चाहिए और धर्म प्रचार में लग कर अनेकों को कल्याणकारक मार्ग दर्शन कराना चाहिए। बात समझदारी की थी सो अम्बपाली ने अपना ली और भिक्षु समुदाय में सम्मिलित हो गई।
अब दूसरा प्रश्न उभरा कि पिछले दिनों जो पाप कमाया है वह तो कुसंस्कार बना ही रहेगा। साधना को सफल न होने देगा। इसलिए पूर्व अनाचारों का प्रायश्चित भी आवश्यक है। प्रायश्चित का एक ही उपाय है कि जो गड्ढा खोदा गया है उसे भरा जाय। अनाचार का समापन पुण्य परमार्थ द्वारा किया जाय।
अब दूसरा प्रश्न उभरा कि पिछले दिनों जो पाप कमाया है वह तो कुसंस्कार बना ही रहेगा। साधना को सफल न होने देगा। इसलिए पूर्व अनाचारों का प्रायश्चित भी आवश्यक है। प्रायश्चित का एक ही उपाय है कि जो गड्ढा खोदा गया है उसे भरा जाय। अनाचार का समापन पुण्य परमार्थ द्वारा किया जाय।
अम्बपाली ने नर्तकी जीवन में प्रचुर सम्पदा कमाई थी। उसे धर्म प्रचार जैसे पुण्य कार्य में लगाया जाना आवश्यक था। उसने अपना समूचा संचय बौद्ध विहार के धर्म प्रचार के लिए दान कर दिया। स्वयं साधना रत होकर परिमार्जित हुई। और धर्म प्रचार के परमार्थ हेतु देश-विदेश में आजीवन प्रयत्न करती रही। नर्तकी अम्बपाली परम साध्वी कहलाई।
एक साधक ने तंत्र साधना की और अपने गुरु से वह विद्या सीख ली कि नियत नक्षत्र आने पर आकाश से रत्न वर्षा कराई जा सके और विपुल धन सहज ही पाया जा सके। सफलता मिलने के बाद वह ठाट-बाट से रहने लगे।
एक दिन वह साधक वन मार्ग से किसी दूसरे प्रदेश को जा रहा था कि रास्ते में चोरों के समुदाय ने उसे पकड़ लिया और कहा- तुम्हारे वस्त्राभूषण सम्पन्नों के से मालूम पड़ते हैं। जो कुछ पास है उसे तो निकाल कर यहाँ रखो ही साथ ही अपनी दौलत का अता पता बताओ ताकि उसे भी हम लूट कर ला सकें। जब तक इतना काम नहीं हो जाता तब तक तुम्हें पेड़ से बाँध कर रखेंगे और कुछ अतिरिक्त हाथ न लगा तो तुम्हें मार देंगे
साधक बुरी तरह चंगुल में फँस गया। जो पास में था वह उतारकर रख ही दिया पर चोरों को घर भेज कर परिवार की सारी सम्पदा लुटवा लेने की बात गले न उतरी। अतएव उसे एक पेड़ से बाँध दिया गया। समय दिया कि एक सप्ताह के भीतर कुछ न मिला तो फिर उसका अन्त ही कर दिया जायगा।
प्राण जाने की चिन्ता में वह बहुत दुःखी रहने लगा। इतने में एक बात उसकी समझ में आई कि कल ही तो रत्न बरसाने वाला नक्षत्र है। क्यों न एक प्रयोग इन्हीं लोगों के लिए कर दिया जाय और विपुल धन लाभ कराकर अपना छुटकारा पा लिया जाय।
उसने डाकुओं को समीप बुलाया और सारी रहस्य वार्ता कह सुनाई। वह तांत्रिक है। कल वह नक्षत्र है जिसमें मंत्र शक्ति से रत्न बरसाये जा सकते हैं। उसे छोड़ दिया जाय और आवश्यक पूजा करने की छूट दे दी जाय। कल आकाश से रात के समय रत्न बरसेंगे उन्हें वे लोग ले लें। बदले में उसे बंधन मुक्त कर दें। डाकू इस पर सहमत हो गये और उसके बंधन खोल दिये। आवश्यक पूजा अर्चना करने के लिए जो साधन जरूरी थे वे मँगा दिये। साधना सही थी। दूसरे दिन रात को रत्न बरसे, डाकुओं ने उन्हें बटोरा और निहाल हो गये। शर्त के अनुसार उसे छुटकारा भी दे दिया। लूटे गये वस्त्र आभूषण भी लौटा दिये।
साधक ने इस विपत्ति से छुटकारा पाने पर ठंडी साँस ली और आगे के रास्ते पर चल पड़ा। उस डाकू समुदाय का सरगना बहुत चतुर था। उसने साथियों को छोड़कर अकेले उसका पीछा किया। रास्ते में जो और डाकू मिले उन्हें साथ लेता गया। उपर्युक्त निर्जन स्थान देखकर उन लोगों ने साधक को फिर पकड़ लिया और अगली रात फिर रत्न वर्षा करा देने का आदेश दिया। आनाकानी करने पर जान जाने की बात भी स्पष्ट कर दी।
साधक पथिक ने कहा ऐसा नक्षत्र तो एक वर्ष बाद आवेगा तब तक के लिए आप ठहरें। मैं लौटकर उस समय वह लाभ दिला दूँगा। अभी तो मुझे जाने दें आवश्यक काम है।
डाकुओं को उसकी बात पर विश्वास न हुआ और रत्न वर्षा कल न कराने पर जान जाने की बात स्पष्ट करते रहे। उन्हें एक वर्ष बाद नक्षत्र आने की बात पर विश्वास न हुआ। उस कथन को टालने का बहाना मात्र समझा।
निदान दूसरी रात प्रतीक्षा में देखी गई। रत्न वर्षा न करा सकने पर उसकी गरदन काट दी गई।
सिद्धि के चमत्कार में यह जोखिम भी है कि एक का जो काम कर दिया है वही अन्यों के लिए न करने पर शत्रुता बनने और जान जाने का खतरा भी रहता है। सम्पदा की बहुलता अनेक अनर्थ में फँसाती और अप्रत्याशित संकट शिर पर पटकती है। इसीलिए सृष्टि का विधान है कि सत्पात्र को ऐसी शक्तियां श्रेष्ठ प्रयोजनों के लिए मिलती हैं।
शिकारी कुत्ते एक जंगली बकरी का पीछा कर रहे थे। वह भागकर एक हरी-भरी झाड़ी में छिप गई और कुत्तों की आँखों से ओझल हो गई।
जैसे ही दम मिला उसने झाड़ी के पत्तों को चरना शुरू कर दिया, सभी पत्ते खा डाले। अब झाड़ियों में से उसका छिपा शरीर दीख पड़ने लगा। कुत्तों ने उसे देख लिया और मार डाला।
संरक्षक के साथ जो बदी करते हैं वे इसी प्रकार के संकट में फँसते हैं।
मानवी उद्भव और विकास का क्रम भारत भूमि से आरंभ होता है। उसका केन्द्र बिन्दु आर्यावर्त रहा। आर्यावर्त अर्थात् गंगा यमुना का दुआबा। पौराणिक कथानकों में अवतारों का अवतरण एवं कार्य क्षेत्र यही रहा है। हिमालय को देव भूमि माना जाता है। उसका हृदय प्रदेश उत्तराखण्ड में ही है। इसी प्रयोगशाला में ऋषि-तपस्वी अपनी आत्मशक्ति को विकसित करके उसके दिव्य भण्डार बनते रहते हैं। स्वर्ग का संबंध इसी क्षेत्र से बनता है। स्वर्गवासिनी गंगा यहीं धरातल पर अवतरित हुई थी। सुमेरु शिखर पर देवताओं का वास बताया गया है। उसका प्रतीक भी हिमालय में विद्यमान है। नन्दन वन-कैलाश वाला हिमाच्छादित शिवलिंग अभी भी सर्व साधारण की पहुँच से परे है। स्वर्गारोहण के लिए पाण्डव उसी क्षेत्र में गये थे। सप्त ऋषियों की तपश्चर्या के लिए इसी भूमि को अपनाये जाने का इतिहास है। विश्व व्यापी अध्यात्म चेतना का ध्रुव केन्द्र इसी को माना गया है। दिव्य वातावरण की विशेषता को देखते हुए ऋषि, तपस्वी यहीं डेरा डाले रहे हैं। ऋद्धि-सिद्धि का प्रकटीकरण यहाँ सरलता पूर्वक संभव होता रहा है। सतयुग के अवतरण का योजनाबद्ध कार्य-क्रम यहीं बना है। उसे अदृश्य से दृश्य के रूप में परिवर्तित कर सकने में समर्थ प्रतिभाओं का उद्भव परिपाक इसी क्षेत्र में होता रहा है। इसलिए सतयुग का आरण्यक केन्द्र बिन्दु तलाशने वालों को उसके साक्षी प्रमाण इसी क्षेत्र में मिलते हैं। स्वर्ग और सतयुग का मध्यवर्ती आदान-प्रदान सूत्र यहीं जुड़ता है। दशरथ का, अर्जुन का, नारद का स्वर्ग से आवागमन प्रसिद्ध है। इसका श्रेय किस भूमि को मिलना चाहिए इस हेतु हिमालय के ध्रुव केन्द्र को मान्यता देने से ही बात बनती है।
भगवान के दस अवतार आर्यावर्त में ही हुए हैं। पिछले तीन की तो स्थानीय स्मृतियाँ भवन-अवशेषों के रूप में विद्यमान हैं। अयोध्या राम की, मथुरा कृष्ण की, कपिलवस्तु बुद्ध की जन्म भूमि थी। इससे पूर्व वाले भगवान परशुराम उत्तर काशी में जन्मे। वहीं महर्षि जमदग्नि का आश्रम था। सप्तऋषियों की तपस्थली सप्त सरोवर के नाम से हरिद्वार में प्रख्यात है।
गोमुख से लेकर बद्रीनाथ तक की ऊपरी चोटियों वाला भाग स्वर्गोपम माना जाता है। इसके इर्द-गिर्द यक्ष, गंधर्व, किन्नरों के वंशज बसते हैं। नंदनवन गंगा के उद्गम गोमुख से कुछ ही ऊपर है। वास्तविक कैलाश शिवलिंग के रूप में यही दृष्टिगोचर होता है। गंगा ग्लेशियर का उद्गम वही है। इसे शिव का निवास माना जाता हे। ब्रह्म कमल और संजीवनी बूटी जैसी दिव्य वनौषधियां यहीं उगती है। सोम-बल्ली भी यहीं पाई जाती है। जिसका सोमरस पीकर देवत्व का आवेश चढ़ता था।
हिमालय का उत्तराखण्ड भाग देवताओं की लीला भूमि रहा है। ऋषियों की तपस्थली। उन्होंने इस स्थान को सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्तियों से सराबोर देखकर चुना था। तीर्थों ने भी यहाँ अपनी प्रतिनिधि स्थलियाँ स्थापित की थीं। पंच प्रयाग, पंच काशी, पंच शक्ति पीठें, पंच ज्योतिर्लिंग यहाँ पुरातनकाल से ही अवस्थित हैं। गंगा यमुना का दुआबा, हरिश्चंद्र, वशिष्ठ, दधीचि, अर्जुन, हनुमान आदि का जन्म स्थल रहा है। चक्रवर्ती भरत शकुन्तला के गर्भ से कण्व आश्रम में जन्मे थे। राम के समकक्ष उनके दोनों पुत्र लव- कुश इसी प्रदेश में जन्मे थे। अन्यान्य अवतारों, देव पुरुषों, महामानवों, मुनि, मनस्वियों, शास्त्रकारों का उदय विकास इसी क्षेत्र में होता रहा है। अनादिकाल के अध्यात्म वर्चस्व के धनी व्यक्तियों को उसी उर्वर भूमि में जन्मने विकसित होने का सौभाग्य मिला है। इन्हीं सबने अपने-अपने ढंग से अपने-अपने हिस्से के दायित्व निबाहते हुए समस्त संसार में सतयुगी वातावरण विनिर्मित करने में असाधारण योगदान दिया।
पौधशाला में पौधे उगाये जाते हैं। जड़ पकड़ने योग्य हो जाने पर उन्हें उखाड़कर अन्यान्य उद्यानों में लगाया जाता है। वहाँ वे आरोपित होते, बढ़ते और पल्लवित विशाल वृक्ष के रूप में परिणत होते हैं। आर्यावर्त का क्षेत्रीय वातावरण ऐसा उर्वर समझा जा सकता हे कि जहाँ संसार भर से अधिक भारी भरकम दिव्यता फलती-फूलती रही है। काशी, प्रयाग, नैमिषारण्य, चित्रकूट, सारनाथ, श्रावस्ती आदि अगणित तीर्थों का दर्शन इस क्षेत्र में थोड़ी-थोड़ी दूर पर होता है। त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहा जाता है। जिस प्रकार इन सब पावन तीर्थों की भरमार इस प्रदेश में है उसी प्रकार महामानवों के नर रत्नों की खदान भी इस क्षेत्र को समझा जा सकता है। दक्ष, नागार्जुन, विश्वकर्मा, धन्वन्तरि आदि की यह भूमि है। कुँती ने देवपुत्र जने थे। अंजनी के हनुमान की जन्मकथा भी इसी प्रकार की है। यहाँ देवताओं और मनुष्यों के बीच सघन समागम रहा हैं।
यह चर्चा उद्गम केन्द्र की है। उसकी विशिष्टता और वरिष्ठता मानी जा सकती है। पर उनके क्रिया-कलापों को इतने ही क्षेत्र में सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता। वे समस्त विश्व में पृथ्वी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैले हुए देखे जा सकते हैं।
विविध विधि विकासों का विश्व इतिहास खोजा जाय तो प्रतीत होगा कि सभ्यता इसी क्षेत्र में जहाँ-तहाँ गई है और क्षेत्र तथा वातावरण के अनुरूप अपने विशिष्ट ढंग से विकसित होती रही है। फिर पुरातनकाल से विभिन्न क्षेत्रों में जो भाषायें बोली जाती थीं वे संस्कृत के शब्द भण्डार से ही क्षेत्रीय स्वरूप में विकसित हुई हैं। कला कौशल का जो विश्व इतिहास खोजा गया है उसका स्थानीय रूप कुछ भी रहा हो उद्गम एक ही है। एक ही शैली ने विभिन्न रूप धारण किये हैं। विज्ञान उद्योग का स्वरूप कहीं सामयिक आवश्यकता के अनुरूप कुछ भी क्यों न रहा हो उनकी मूल निर्धारणा एक ही है। विभिन्नता में झाँकती हुई एकता पाई जाती है। यह उद्गम की एकता पर ही निर्भर दीखती है। विज्ञान की विभिन्न धाराएँ, विभिन्न रूपों में, विभिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत हुई दीखती है। पर वस्तुतः उसका आधार ऋग्वेद और अथर्ववेद हैं। आयुर्विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्त आयुर्वेद से ही निकले हैं और चरक, सुश्रुत, वाणभटट् प्रभृति वैज्ञानिकों द्वारा वे क्षेत्रीय सुविधाओं, आवश्यकताओं एवं उपलब्धियों के आधार पर विभिन्न रूपों में गढ़े गये हैं।
इस प्रकार संसार भर से उपलब्ध तत्वज्ञान, धर्म, अध्यात्म, नीति, सदाचार, प्रथा प्रचलन से लेकर दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले साधनों तक की एक सुनिश्चित शृंखला है जिसका तारतम्य इस अस्त-व्यस्त स्थिति में भी उद्गम की एकता सिद्ध करता है। निश्चित रूप से यह सब पसारा भारत से ही उपजा और परिस्थितियों के अनुरूप जहाँ-तहाँ फैलता चला गया है। क्षेत्रीय रीति-रिवाजों में आज भारी भिन्नता पाई जाती है। पर उन प्रचलनों के आधारभूत कारण एक ही प्रतीत होते हैं। एक ही मान्यता का प्रयोग व्यवहार थोड़े अन्तर के साथ होने लगे तो इसे परिस्थितियों की भिन्नता ही समझा जा सकता है। किसी भी प्रसंग को लें। उसके विश्व व्यापी प्रयोगों का निरीक्षण परीक्षण करें और मूलभूत कारण आधार तलाश करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि यह पसारा एक ही बीज का बहुमुखी विस्तार है। बीज क्या है? उसके उत्तर में स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय तत्व दर्शन। दैवी निर्धारणा से भरा-पूरा ज्ञान और विज्ञान। एक ही पिता के बच्चों में आकृति-प्रकृति की यत्किंचित् भिन्नता अवश्य पाई जाती है। विश्वव्यापी प्रथा, प्रचलन एवं प्रयोगों में अन्तर दीख पड़ने पर भी उनका आरंभ एक ही परम्परा से उपजा और अग्रगामी हुआ सिद्ध होता है।
प्रस्तुत भिन्नता और पृथकता मूलतः एकात्मता के साथ जुड़ी हुई क्यों है? इसे जानने के लिए यह समझना होगा कि सभ्यता की आरंभिक स्थापना जिन लोगों ने की उन्हीं ने उसे विभिन्न क्षेत्रों में उगाया, फैलाया। यह विस्तार कर्ता, उत्पादक कौन थे? इसका परिचय प्राप्त करने के लिए हमें सतयुग काल तक पहुँचना होगा और उस समय की ‘एकोऽहं बहुस्याम’ की आकाँक्षा में होता है। परब्रह्म ने एक से अनेक बनना चाहा और आकाँक्षा ने प्रेरणा और प्रवृत्ति का रूप धारण करके इसे विश्व ब्रह्मांड के स्थूल और सूक्ष्म परिकर को रच दिया है। परब्रह्म की मानवी चेतना ब्रह्मवर्चस होकर मनुष्यों में अवतरित होती है। ब्राह्मण यही वर्ग है। पुरोहित और परिव्राजक उसी के दो स्वरूप हैं। उनमें यदि धर्म धारणा और भौतिक प्रगति की महत्वाकाँक्षा उदय होती है तो यह स्वाभाविक ही है। उस उभार को यदि व्यापक बनाने की महत्वाकाँक्षा उमगी हो और विश्वव्यापी सुनियोजन के लिए मचल पड़ी हो तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है?
धरती का इतिहास तो चिर पुरातन है। उसे अनादि भी कह सकते हैं। उसका प्रारूप निश्चित करना कठिन है। उसे कल्प-कल्पान्तरों की तरह भी सोचा जा सकता है, पर निकटवर्ती सतयुग के संबंध में यह अनुमान सार्थक है कि वह ऋषि परम्परा की प्रधानता वाला समय रहा होगा। यह लम्बी अवधि रामायण, महाभारत काल पर आकर त्रेता-द्वापर के परिवर्तन पर समाप्त हुई होगी।
त्रेता शासन प्रधान था। द्वापर में अर्थ व्यवस्था का दौर रहा। कलियुग में उच्छृंखलता-आदर्शों के आदर्शों के प्रति अनास्था का बोल-बाला है। छूत की बीमारी एक से दूसरे को लगती है। ऋतु प्रभाव सभी को प्रभावित करता है। प्रचलन की चपेट में देखा-देखी अनेकों आते हैं। अमर बेल का एक टुकड़ा किसी पेड़ पर डाला जाता है तो वह फैल कर समूचे वृक्ष पर छा जाता है। युग परम्परा का विस्तार भी इसी प्रकार होता है। वह कुछेक प्रतिभाशालियों के द्वारा आविर्भूत होती है और फिर अपना कलेवर बढ़ाते हुए समूचे वातावरण को अपने शिकंजे में कस लेती है। सतयुग का विकास विस्तार भी इसी प्रकार हुआ। इस अवधि में सभी भावनाशील थे। संयमी और उदात्त। संकीर्ण स्वार्थपरता किसी को छू नहीं पाती था। सादा जीवन उच्च विचार का सब में समावेश था।
संतोषी और परिश्रमी अपनी आवश्यकताएं स्वयं पूरी कर लेते हैं। इसके उपरान्त भी उनके पास इतना कुछ बच जाता है कि दूसरों की सेवा सहायता कर सके। गिरों को उठा सकें और पिछड़ों को बढ़ा सकें। प्रतिभा वालों की उदारता और पिछड़ों की कृतज्ञता मिलकर सहज ऐसी स्थिति उत्पन्न करती है जिसे समता एवं एकता का समन्वय कहा जा सके।
सतयुग में सभी सम्पन्न थे। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके यहाँ सोने-चाँदी के कोठार भरे पड़े थे। न्यूनतम आवश्यकता को पूरा करने के लिए सामान्य साधन जुट सकें और उतने भर से संतोष हो सके तो समझना चाहिए कि परिपूर्ण सम्पन्नता की उपलब्धि हो गई। संतोष की अनुभूति इस सार्थक सम्पन्नता की कसौटी है। अन्यथा असंतोषी कुबेर भी अपनी सम्पदा को अपर्याप्त कहता और दुर्भाग्य का रोना रोता रह सकता है।
सतयुग में सभी को जहाँ साधना के प्रति संतोष था वहाँ आकाश-पाताल वाली महत्वाकाँक्षाओं पर संयम भी। वासना तृष्णा का मदोन्मत्त हाथी संयम अपनाये बिना और किसी प्रकार काबू में नहीं आता। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम अपनाते ही मनुष्य इतना सशक्त हो जाता था कि अपव्यय के रुकते ही वैभव का पर्वत सामने खड़ा हो सके।
हँसते-हँसाते जीना, दुःखों का बँटा लेना, सुखों को बाँट देना, हिलमिल कर रहना, उदार सहकारिता को चरितार्थ करना, ऐसा निर्धारण है जिसे अपनाते ही सतयुग सामने खड़ा हो सकता है और दूर-दूर तक उसका विस्तार हो सकता है। ऐसी ही थी पुरातनकाल की सतयुगी अवधि।
एक दिन नारद ने भगवान से पूछा- माया कैसी है? भगवान मुस्करा दिये और बोले-किसी दिन प्रत्यक्ष दिखा देंगे।
अवसर मिलने पर भगवान नारद को साथ लेकर मृत्युलोक को चल दिये। रास्ते में एक लम्बा रेगिस्तान पड़ा। भगवान ने कहा- नारद बहुत जोर की प्यास लगी है। कहीं से थोड़ा पानी लाओ।
नारद कमंडलु लेकर चल दिये। थोड़ा आगे चलने पर नींद आ गयी और एक खजूर के झुरमुट में सो गये। पानी लाने की याद ही न रही। सोते ही एक मीठा सपना देखा। किसी वनवासी के दरवाजे पर पहुँचे हैं। द्वार खटखटाया तो एक सुन्दर युवती निकली। नारद को सुहावनी लगी सो घर में चले गये और इधर-उधर की वार्ता में निमग्न हो गये। नारद ने अपना परिचय दिया और भील कन्या से विवाह का प्रस्ताव किया। उसका परिवार सहमत हो गया और तुरन्त साज-सामान इकट्ठा करके विवाह कर दिया गया। नारद सुन्दर पत्नी के साथ बड़े आनन्दपूर्वक दिन बिताने लगे। कुछ ही दिनों में क्रमशः उनके तीन पुत्र भी हो गये।
एक दिन भयंकर वर्षा हुई। झोंपड़ी के पास बहने वाली नदी में बाढ़ आ गयी। नारद अपने परिवार को लेकर बचने के लिए भागे। पीठ और कंधे पर लदे हुए तीनों बच्चे उस भयंकर बाढ़ में बह गये। यहाँ तक कि पत्नी का हाथ पकड़ने पर भी वह रुक न सकी और उसी बाढ़ में बह गयी जिसमें उसके बच्चे बह गये थे।
नारद किनारे पर निकल तो आये पर सारा परिवार गँवा बैठने पर फूट-फूट कर रोने लगे। सोने और सपने में एक घण्टा बीत चुका था। उनके मुख से रुदन की आवाज निकल रही थी। पर झुरमुट में औंधे मुँह ही उनींदे पड़े थे।
भगवान सब समझ रहे थे। वे नारद को ढूँढ़ते हुए खजूर के झुरमुट में पहुँचे। उन्हें सोते से जगाया। आँसू पोंछे और रुदन रुकवाया। नारद हड़बड़ाकर बैठ गये।
भगवान ने पूछा-हमारे लिये पानी लाने गये थे सो क्या हुआ? नारद ने सपने में परिवार बसने और बाढ़ में बहने के दृश्य में समय चला जाने के कारण क्षमा माँगी। भगवान मुस्काये-”देखा नारद! यही माया है।”
राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ के आश्रम में पत्नी समेत पहुँचे। उनका अभिप्राय संतान के लिए वरदान प्राप्त करने का था। बड़ी आयु हो जाने पर भी उनको कोई संतान न हुई थी।
गुरु समर्थ तो थे। पर मुफ्त में वरदान देकर किसी पर ऐसा कर्ज नहीं लादना चाहते थे उसका प्रतिदान उसे आगे चलकर ब्याज समेत चुकाना पड़े और उस चुकने में अब से भी अधिक त्रास सहना पड़े। दिलीप के सम्बन्ध में तो संतान का प्रश्न भी जुड़ा था। वरदान ऐसी संतान का होना चाहिए जो बड़ा होने पर महामानवों में गिना जा सके। आदर्शवादी ही महामानव हो सकते है। इसके लिए आवश्यक है कि पिता माता भी पुण्य परमार्थ की सम्पदा से सुसज्जित हों। अन्यथा ऐसी ही सन्तानों को जन्म दिया जा सकता है जो अपयश बटोरें और कुकर्मों में निरत रहकर अपने पूर्वजों की भी प्रतिष्ठा नष्ट करें।
इन सब बातों पर विचार करते हुए आवश्यक प्रतीत हुआ कि राजा रानी की सेवा भावना और आदर्शवादिता को बढ़ाने वाला कोई काम सौंपा जाय।
वशिष्ठ जी ने एक वर्ष तक उनके आश्रम में रहकर गौएँ चराने का काम सौंपा। आश्रम की अधिकांश आवश्यकताएं गौ पालन से ही पूरी होती थीं। इसलिए गौ सेवा की प्रकारान्तर से आश्रम की सेवा-गुरुसेवा के समतुल्य ही समझी जाती थी।
दिलीप ने आदेश शिरोधार्य किया और आश्रम में निवास करने लगे। प्रातः रानी समेत आश्रम की गौएँ चराने जंगल में निकल जाते। शाम को वापस लौटते।
बहुत दिन यह क्रम साधारण रीति से चलता रहा। एक दिन विशेष घटना हुई। एक सिंह ने आश्रम की एक गाय को दबोच लिया। राजा ने सिंह को मारने के लिए धनुष-बाण संधाना पर आश्चर्य यह कि वह चल ही न सका। दिलीप दौड़कर सिंह के पास गये और उसे अन्य उपायों से भगाने का प्रयत्न करने लगे।
सिंह ने मनुष्य की बोली में कहा-कि मैं शिव परिवार का सिंह हूँ। मुझे भी तो भोजन चाहिए। पशु ही मेरा भोजन है। मैं इस गाय को नहीं छोड़ सकता। यदि इसे छुड़ाना है तो बदले में अपना माँस दो। दिलीप ने इसे स्वीकार कर लिया और सिंह के सामने जाकर बैठ गये। आश्रम की गाय को क्षति पहुँचना उसे अपने शरीर देने से भी अधिक भारी पड़ रहा था।
सिंह शिवजी द्वारा राजा की परीक्षा लेने के लिए भेजा गया था। राजा उसमें उत्तीर्ण हो गये। सिंह वापस चला गया। राजा और गौएँ आश्रम सकुशल आ गये। इतने में एक वर्ष की अवधि भी पूरी होने जा रही थी।
वशिष्ठ जी ने दिलीप को सुसंतति का आशीर्वाद देकर विदा किया। दिलीप की अनेक पीढ़ियों तक एक से एक बढ़कर प्रतापी और आदर्शवादी बालक उत्पन्न होते रहे।
सत्परिणाम उपलब्ध करने के लिए सेवा और सदाशयता का बढ़-चढ़ कर परिचय देना पड़ता है।
एक बुढ़िया ने चारों धाम यात्रा के लिए धन जमा किया। वह तैयारी ही कर रही थी कि इतने में दुर्भिक्ष पड़ा। अनेक लोग भूखों मरने लगे। बुढ़िया ने अपना तीर्थ यात्रा वाला धन अकाल पीड़ितों के लिए खर्च कर दिया। उसे तीर्थ यात्रा की योजना छोड़नी पड़ी।
स्वर्गलोक में हर साल तीर्थ यात्रा निरीक्षण वाली समिति की बैठक होती थी, वह पता लगाती थी कि सच्चे मन से कितनों ने तीर्थ यात्रा की ताकि उनके लिए स्वर्ग में स्थान नियत किया जाय।
समिति ने सूक्ष्म दृिष्ट से उस वर्ष के सभी तीर्थ यात्रियों का निरीक्षण किया। मात्र एक यही बुढ़िया इस योग्य ठहराई गई और उसे स्वर्ग में स्थान मिला।
समिति के एक सदस्य ने शंका की कि वह बुढ़िया तो तीर्थ यात्रा के लिए गई ही नहीं। अध्यक्ष ने उत्तर दिया तीर्थ यात्रा का उद्देश्य मन को उदार बनाने की साधना करना है। सो उस बुढ़िया ने भली प्रकार पूरा कर लिया। किसी नदी या स्थान या देव प्रतिमा का दर्शन करना मात्र ही तीर्थ यात्रा नहीं है।
यह विशाल आकाश जिसे हम प्रायः शून्य समझते हैं, वह वस्तुतः ऐसा है नहीं। भौतिक जगत् जिन पदार्थों से विनिर्मित है, वह सारे तत्व सूक्ष्म रूप से यहाँ भी विद्यमान है। स्वामी अभेदानन्द ने एक स्थान पर लिखा है कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं, उन सबके थोड़े-थोड़े अंश ठोस रूप में होता हे, पर उसका कुछ भाग तरल रूप में जल में घुला होता है, जबकि वायु रूप में उसका भाग आकाश में उड़ता फिरता है। हवा में उड़ने वाले पदार्थ के इस सूक्ष्म भाग को हम चाहे तो ग्रहण भी कर सकते हैं, किन्तु इसके लिए सूक्ष्म इन्द्रियों को विकसित करना पड़ता है, जो साधना द्वारा ही संभव है।
एसाँ एडमण्ड्स ने अपनी पुस्तक “हिप्नोटिज्म एण्ड दि सुपरनाँरमल” में प्रख्यात अँग्रेज भौतिकीविद् विलियम बैरेट के एक प्रयोग का उल्लेख किया है। श्री बैरेट ने एक बार एक लड़की के साथ मिल कर प्रयोगों की एक शृंखला आरंभ की। लड़की के बारे में कहा जाता था कि वह किसी छिपे खाद्य पदार्थ का स्वाद ऐसे बता देती थी, मानों उसने स्वयं चख कर देखा हो। प्रयोग आरंभ करने से पूर्व करने से पूर्व उसकी आँखों में अनेक परतों वाली मोटी पट्टी बाँधी गई। इसके बाद प्रयोग आरंभ किया गया। वहाँ उपस्थित एक अजनबी से कुछ खाद्य पदार्थ लाने को कहा गया। उसने एक बन्द पैकेट में कुछ लाकर श्री बैरेट को दिया। बन्द पैकेट को लड़की से दूर उसे पीछे रखा गया, ताकि वस्तु के दिखाई पड़ने की रही-सही संभावना भी समाप्त हो जाय। अब उससे पैकेट की वस्तु के स्वाद के बारे में पूछा गया। पूछते ही वह बुरी तरह थूकने और चिल्लाने लगी। जब कारण पूछा गया, तो बताया कि “आप लोग क्यों मुझे नमक खिलाना चाह रहे है?” देखा गया उस पुड़िया में सचमुच नमक निकला।
दूसरी बार एक अन्य पुड़िया को डिब्बे में बन्द कर उसे एक कमरे में टेबुल पर रखा गया। लड़की को कमरे से बाहर करीब 5 फुट की दूरी पर खड़ा किया गया और पुनः स्वाद पूछा गया। कुछ क्षण पश्चात् उसने प्रसन्नता जाहिर करते हुए ऐसी भाव भंगिमा प्रकट की जैसे जीभ चला-चलाकर वह खुद उसका रसास्वादन कर रही हो। स्वाद पूछे जाने पर मीठा बताया। बाद में जब कमरे के अन्दर डिब्बे में बन्द पैकेट को खोला गया, तो सचमुच उसमें शक्कर रखी गयी थी।
देखा जाय तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है। दुनिया का हर पदार्थ पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश। इन पाँच तत्वों से बना है। इनमें से प्रत्येक तत्व की अपनी सूक्ष्म शक्ति होती है, जिसे ‘तन्मात्रा’ कहते हैं। इन तन्मात्राओं की यदि किसी तरह अनुभूति की जा सके, तो स्थूल पदार्थ की अनुपस्थिति में भी हम उनका आनन्द-लाभ ले सकते हैं।
आकाश तत्व की तन्मात्रा शब्द है। कान द्वारा उसे हम अनुभव करते हैं। कान ही उस शक्ति को ग्रहण करने वाली इन्द्रिय है। संसार में जितने मनुष्य अब तक हो चुके हैं, उन सब की विचार तरंगें इस शून्याकाश में घूम रही हैं। इनमें सत्पुरुषों, संत, महात्माओं, ऋषियों द्वारा छोड़ी उत्कृष्ट भाव तरंगें भी हैं और दुष्ट -दुराचारियों द्वारा उत्सर्जित निकृष्ट विचार-प्रवाह भी। जो इनमें से जिस तरंग को पकड़ने की क्षमता विकसित कर लेता है, उसमें वही भाव-धारा प्रवाहित होने लगती है। उसकी चिन्तन प्रक्रिया उसी के अनुरूप बन जाती है।
अग्नि तत्व की सूक्ष्म शक्ति “रूप” हैं। इसे ग्रहण करने की इन्द्रिय आँखें हैं। स्थूल वस्तु और उसके रूप को तो हम स्थूल आँखों से देखते हैं, पर इनकी दृश्य सामर्थ्य सीमित है। अनेक छोटे जीव-बैक्टीरिया, वाइरस आदि हमारे इर्द-गिर्द उड़ते-फिरते रहते हैं, फिर भी हम उन्हें नहीं देख पाते। विशेष प्रकार के यंत्र-उपकरण का प्रयोग करने के बाद ही उनके अस्तित्व का पता चलता है। इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इन दृश्येन्द्रियों की क्षमता कितनी अल्प है। विज्ञान के अनुसार हम उन्हीं को देख सकते हैं, जिनकी तरंग दैर्ध्य मिली माइक्रोन के बीच हो, जबकि अध्यात्मवादियों के अनुसार ऐसा प्राण-कम्पन के कारण होता है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि वस्तुओं का दीखना, न दीखना वस्तुतः प्राण के कम्पन पर निर्भर करता है। हम अपने समतुल्य प्राण-कम्पन वाले पदार्थों और प्राणियों को ही देख सकते हैं, इससे कम या अधिक वालों को नहीं उनका कहना है कि योगीजन अपने प्राण के कम्पन को
इच्छानुरूप घटा-बढ़ा सकते हैं, फलतः दृश्य-अदृश्य होने की सामर्थ्य रखते हैं। वे कहते हैं कि हमारे चारों ओर कितनी ही सूक्ष्म सत्ताएँ मँडराती रहती हैं, पर हम उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं देख पाते हैं, क्योंकि हमारे प्राण का कम्पन उस आयाम का नहीं होता।
पृथ्वी तत्व की तन्मात्रा को ‘गंध’ कहा गया है। इसे अनुभव करने का मुख्य अंग पृथ्वी गुण प्रधान नासिका है, जबकि जल तत्व की सूक्ष्म शक्ति ‘रस’ कहलाती है, जिसे ग्रहण करने के लिए मनुष्य को जिह्वा मिली हुई है। संसार में जितने प्रकार के रस और गंध हैं, उनका कुछ अंश वायुभूत रूप में विद्यमान होने के कारण व्यक्ति उन्हें प्रयास पूर्वक ग्रहण कर उनकी कमी पूरी कर सकता है।
वायु तत्व की अनुभूति जिस माध्यम से होती है, वह ‘स्पर्श’ कहलाता है। मनुष्यों में इसे अनुभव करने के लिए त्वचा बनाई है। इसके माध्यम से व्यक्ति को वस्तु की आकृति, यथा-मोटी-पतली, ठण्डी-गर्म, भारी-हल्की आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। इस शक्ति को प्राप्त कर लेने से चित्त वृत्तियां शान्त हो जाती हैं और व्यक्ति में तितीक्षा की सिद्धि आ जाती है। फिर वह सर्दी, गर्मी, वर्षा, पीड़ा, चोट आदि को हँसते-हँसते झेल सकता है वस्तुतः विभिन्न प्रकार की संवेदनाओं की जानकारी मस्तिष्क को शरीर में फैले ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से ही मिलती है, और इस प्रकार हम उन्हें अनुभव करने लगते हैं। भौतिक जगत में कष्टकारी संवेदनाओं से बचने के लिए तरह-तरह की युक्तियाँ काम में लायी जाती हैं, जैसे- सर्दी-गर्मी से बचने के लिए अनुकूल वस्त्र एवं उपकरण-फोड़े-फुन्सी पीड़ा से बचाव के लिए दर्द निवारक औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, पर अध्यात्म जगत में इसके लिए स्पर्श-साधना अपनायी जाती है। इस माध्यम से स्पर्श शक्ति विकसित कर लेने से दुःख-दर्दों से राहत पाने के लिए किसी बाह्य माध्यम की आवश्यकता नहीं रह जाती।
इन शक्तियों को सामान्यतः प्रयास पूर्वक विकसित करना पड़ता है, पर किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में यदा-कदा इंद्रियातीत सामर्थ्य के रूप में उद्भूत होते इन्हें देखा जाता है। उपरोक्त प्रयोग में विलियम बैरेट ने उक्त लड़की की इसी शक्ति की विभिन्न प्रयोग-परीक्षणों के माध्यम से पुष्टि की थी। यह उसकी जल तत्व संबंधी ‘रस’ शक्ति थी, जिसके माध्यम से वह पदार्थों का सूक्ष्म स्वाद ग्रहण करने में समर्थ होती थी।
प्राचीन ऋषियों के बारे में कहा जाता है कि वे लम्बे काल तक बिना अन्न-जल के तपस्याएँ किया करते थे। इस मध्य शून्याकाश में विद्यमान सूक्ष्म पौष्टिक आहार से ही उनका काम चलता रहता था। तथा कभी-कभी दूसरों के लिए उन्हें शून्य से स्थूल में इस प्रकार प्रकट कर देते थे जैसे किसी ने कहीं से लाकर दिया हो। हिमालय में आज भी ऐसे अनेक योगी हैं, जो लौकिक दृष्टि से निराहार रहते हुए भी अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। पाँल ब्रण्टन ने ऐसे अनेक योगियों का “द हर्मिट्स ऑफ हिमालयाज” तथा स्वामी योगानन्द जी ने “आँटोबायो ग्राफी ऑफ योगी” में इनका उल्लेख किया है।
जिस व्यक्ति का आकाश तत्व पर अधिकार हो जाता है, वह अन्तरिक्ष में प्रवाहमान सूक्ष्म विचार तरंगों को सफलतापूर्वक पकड़ने लगता है। आज संसार विनाश की ओर अग्रसर हो रहा है, व्यक्ति का प्रवाह पतनोन्मुख होता जा रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि व्यक्ति का चिन्तनतंत्र विकृत हो जाने के कारण वैसे ही विचार-परमाणु अनायास उसकी ओर आकर्षित होते चले जा रहे हैं। आध्यात्मिक पुरुष अपनी चिन्तन-चेतना में परिष्कृति लाकर न सिर्फ उच्चस्तरीय भाव-तरंगों को पकड़ने में सफल होते हैं, वरन् ब्राह्मी चेतना से भी संपर्क साधने में समर्थ होते हैं।
वस्तुतः यह अनन्त अन्तरिक्ष शून्य नहीं है। हम चाहें तो यहाँ से कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने अपनी ‘राजयोग’ पुस्तक में कहा है कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं, सभी कल्प के आदि में आकाश तत्व से उत्पन्न होते और अन्ततः उसी में विलीन हो जाते हैं। इसी का समर्थन करते हुए गीताकार ने “ऊर्ध्वमूलअधःषाखः” कह कर इस सृष्टि-संरचना का उद्गम-स्रोत इस महाकाष को बताया है। जब सृष्टि का आरंभ ही शून्याकाश से हुआ है, तो निश्चय ही उसके सूक्ष्म बीज भी उसमें मौजूद होंगे। जब हर पदार्थ की सूक्ष्म सत्ता विद्यमान है, तो उन्हें प्राप्त करना, उनकी अनुभूति करना भी संभव है। विज्ञान कहता है कि हमें शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि की अनुभूति उससे सम्बद्ध मस्तिष्कीय भाग के उद्दीपन से प्राप्त होती है पर सूक्ष्म तन्मात्राओं को अनुभव करने के लिए मस्तिष्क को उद्दीप्त कैसे किया जाय? इस बात पर वह मौन साध लेता है। इसका उत्तर अध्यात्म के साधना विज्ञान द्वारा मिलता है, जिसमें इसके लिए विभिन्न प्रकार की साधनाओं का निर्धारण है।
मनुष्य के रंग, रूप, आकृति में क्षेत्रीय मौसम और जलवायु के आधार पर भिन्नता भले ही हो किन्तु शरीरगत ढाँचे के निर्माण में विशेष अन्तर नहीं पाया जाता। उसके भले बुरे का निर्धारण मस्तिष्क के आधार पर ही होता है। मनुष्य की प्रगति अवनति का आधार उसका मस्तिष्क ही है। बीज रूप से समस्त सम्भावनाएँ मस्तिष्क की अचेतन परतों में सन्निहित रहती हैं। साहित्यकार, कलाकार, विचारक ऋषि, मनीषी सभी का उद्भव मस्तिष्क जगत में से होता है। यदि इस केन्द्र में थोड़ी सी भी गड़बड़ आती है तो मनुष्य मूर्ख, पागल विक्षिप्तों की श्रेणी में गिना जाने लगता है। शरीर समर्थ रहते भी असमर्थों, असहायों जैसी गर्हित, गई गुजरी जिन्दगी जीने पर मजबूर होना पड़ता है। शरीर के हर अंग अवयव एवं क्रियाओं पर मस्तिष्क का नियंत्रण है। सोचने, विचारने सुख- दुःख की अनुभूति, समस्याओं का निराकरण सब मस्तिष्क के बल पर ही सम्पन्न होता है।
विज्ञान जैसे-जैसे प्रगति कर रहा है उतना ही अविज्ञात रहस्यों से पर्दा उठता जा रहा है। शरीर के अंग अवयवों में जो गतिशीलता दिखाई देती है वह स्वयं की नहीं है यह चेतना मस्तिष्क से मिलती है। यह दूसरी बात है कि मस्तिष्क कहीं अन्यत्र से, अविज्ञात से प्राप्त करता हो किन्तु समस्त अंग अवयवों के संचालन और नियमन के संकेत और प्रेरणाएँ मस्तिष्क से मिलती हैं। भावनाएँ, विचारणाएँ, कल्पनाएँ, उत्तेजनाएँ सब मस्तिष्क की इन सूक्ष्म परतों से उत्पन्न होती हैं। इन्हीं के आधार पर मस्तिष्क में से निकलने वाला स्नायु तंत्र जिनका जाल समस्त शरीर में फैला हुआ है, काम करता है। एच्छिक, अनैच्छिक समस्त क्रियाएँ चलना, फिरना, उठना, बैठना, बोलना, बात करना तथा हृदय की धड़कन, फेफड़ों का संचालन पाचन एवं गुर्दों की क्रिया का संचालन स्नायु तंत्र के निर्देशों पर ही होता है।
पिछले तीन दशकों में मनोविज्ञान के क्षेत्र में अनेकानेक अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो गया है कि भावनाओं द्वारा कितने ही रोग उत्पन्न होते है। ऐसे रोग मानसिक रोग कहे जाते हैं। कितनी ही बार उनके लक्षण इतने अस्पष्ट होते हैं कि उन्हें शारीरिक-व्याधि ही समझकर उपचार में लगे रहते हैं।
मस्तिष्क को यदि सही ढंग से प्रशिक्षित किया जा सके शरीर, स्वास्थ्य एवं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक सफलताएँ अर्जित की जा सकती हैं।
अब यह कहा जाने लगा है कि मस्तिष्क के संचालन में रासायनिक तत्वों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी आधार पर ऐसा विशिष्ट रसायन उनके हाथ लग जाय जिससे मनोरोगों, की चिकित्सा की जा सके और बौद्धिक क्षमता का विकास किया जा सके। इन रसायनों द्वारा नशेबाजी की लत छुड़ाने,दर्द,पीड़ा,कष्ट में सहायता पहुँचाने की बात उचित और सम्भव भी दिखाई देती है किन्तु भावनाओं संवेदनाओं, आस्थाओं, चिन्तन के क्षेत्र में स्थूल प्रयासों से परिवर्तन सम्भव नहीं हो सकते क्योंकि भावनाओं, संवेदनाओं का उद्गम स्रोत मन की सूक्ष्म अचेतन परतों में है, जहाँ स्थूल प्रयासों की पहुँच नहीं है। वहाँ आध्यात्मिक उपचारों की ही पहुँच पकड़ सम्भव है। उन्हीं प्रयासों से इनमें परिवर्तन सम्भव है।
हाल ही में हारमोन ग्रंथियों उनके स्राव, संरचना और कार्य पद्धति पर भी विषद शरीर में अद्भुत परिवर्तन कर दिखाता है। इसलिए स्नायु रसायन शास्त्री ऐसे रसायनों की खोज में है जो भावनाओं पर नियंत्रण कर सकें उनका कहना है कि शरीर गत स्फूर्ति,दर्द और पीड़ा के निवारण में रसायनों द्वारा उपचार में सफलता प्राप्त कर ली गई है। इसके लिए उत्तरदायी घटक भी स्नायु कोषों की सूक्ष्म परतों में विद्यमान हैं। व्यवहार मनोविज्ञानी एण्ड्रयू बैप्ठिस्ट के अनुसार मस्तिष्क में दो प्रकार के हारमोन समूह पाए जाते हैं। मोनो अमीनो आक्सीडेज एन्जाइम्स, दूसरे न्यूरो ट्रान्स मीटर्स जिनमें एपीनेफ्रीन, डोपामीन एवं सिरोटिनिन प्रमुख हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि जब मस्तिष्क में मोनो एमीनो एन्जाइम जिसे “माओ” भी कहा जाता है का स्राव अधिक होता है तब अकर्मण्यता, प्रमाद, निरुत्साह, बेचैनी तथा तनाव की प्रधानता देखी जाती है। जव न्यूरो ट्रान्समीटर सक्रिय होते हैं तब स्फूर्ति, चंचलता, प्रफुल्लता अनुभव होती है।
व्यवहार मनोविज्ञान एवं मनोरोग विशारद
औषधियों को वाष्पीभूत बनाकर उन्हें अधिक सूक्ष्म एवं प्रभावशाली बनाने की प्रक्रिया आयुर्वेद के विज्ञानी चिरकाल से अपनाते रहे है। उसके द्वारा उन्हें रोग निवारण एवं स्वास्थ्य संवर्धन में अपेक्षाकृत अधिक सफलता भी मिलती रही है। कारण, जिन रासायनिक पदार्थों का उपयोग औषधि एवं आहार के रूप में किया जाता है, प्रायः उन्हें हजम करना पड़ता है। यदि पाचन तंत्र दुर्बल हो, या उन पदार्थों को शरीर अस्वीकृत करे तो फिर वह सभी प्रस्तुतीकरण बेकार बन जाता है जो उपयोगी रासायनिक पदार्थों के रूप में रक्त संस्थान तक पहुँचाया जाना है। वाष्पीकृत औषधियों के संबन्ध में ऐसी कोई समस्या नहीं है। कृमि कीटनाशक जड़ी-बूटियों को अग्नि में डालने पर वह वायुभूत बनकर व्यापक क्षेत्र में फैल जाती है और रोग-कृमियों को विनष्ट कर रोगोत्पत्ति के कारणों को ही समाप्त कर देती हे। साथ ही उस परिशोधित प्राणवायु में सभी को साँस लेने का अवसर मिलता है जिससे अंतरंग एवं बहिरंग दोनों क्षेत्रों को स्वस्थ एवं परिपुष्ट रखने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।
अग्निहोत्र की व्यापक वातावरण पर उपयोगी प्रतिक्रिया होती है। पर्जन्य के रूप में प्राणवर्षा, प्राणियों की समर्थता का संवर्धन-ऋतुओं की अनुकूलता, वनस्पतियों का परिपोषण, रोगाणुओं का शमन जैसे कितने ही भौतिक लाभ प्राचीन काल में अग्निहोत्र से मिलते रहे हैं और यदि उस ज्ञान को फिर से खोज निकाला जाय तो पुनः मिल सकते हैं।
यज्ञ में रोग निरोधक शक्ति है। उससे प्रभावित शरीरों पर सहज रोगों के आक्रमण नहीं होते। यज्ञाग्नि में जो जड़ी-बूटी, शाकल्य, आदि होमे जाते हैं। वे अदृश्य तो हो जाते है पर नष्ट नहीं होते। सूक्ष्म बन कर वह वायु में मिल जाते हैं और व्यापक क्षेत्र में फैलकर रोगकारक कीटाणुओं का संहार करने लगते हैं। यज्ञ धूम्र की इस शक्ति को प्राचीन काल में भली प्रकार परखा गया था। इसके उल्लेख शास्त्रों में स्था-स्थान पर उपलब्ध होते हैं। जैसे यजुर्वेद 2-25 में कहा गया है - “ अग्नि में प्रक्षिप्त जो रोगनाशक, पुष्टि प्रदायक और जलादि संशोधक हवन सामग्री है, वह भस्म होकर वायु द्वारा बहुत दूर तक पहुँचती है और वहाँ पहुँचकर रोगादिजनक घटकों को नष्ट कर देती हैं।” इसी तरह अथर्व वेद 1/8 में कहा गया है - “ अग्नि में डाली हुई यह हवि रोग कृमियों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है, जिस प्रकार नदी पानी के झागों को। यह गुप्त से गुप्त स्थानों में छिपे हुए घातक रोग कारक जीवाणुओं को नष्ट कर देती है। “ तपेदिक “ जैसी जानलेवा बीमारियों की चिकित्सा यज्ञोपचार से किये जाने का भी उल्लेख है। चरक चि. स्थान अ. 8 श्लोक 12 में कहा गया है -
प्रयुक्तता यथ चेष्ट्या राजयक्ष्मा पुरोजितः। ताँ वेद विहिता मिष्टभारोग्यार्थी प्रयोजयेत्॥
अर्थात् “ तपेदिक सीखे रोगों को प्राचीन काल में यज्ञ प्रयोग से नष्ट किया जाता था। रोग मुक्ति की इच्छा रखने वालों को चाहिए कि वे इस यज्ञ का आश्रय लें।”
सर्वविदित है कि पदार्थ के तीन स्वरूप होते हैं - ठोस, द्रव और गैस। कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता, वरन् परिस्थितियों के अनुरूप इन्हीं तीन स्थितियों में अदलता–बदलता रहता है। वायुभूत हुआ पदार्थ साँस के माध्यम से सरलतापूर्वक काया के कण-कण में अतिशीघ्र पहुँचाया जा सकता है जबकि चूर्ण, गोली, सीरप आदि के रूप में उसे उदरस्थ करने और पचाने के बाद प्रभावी बनाने में विलम्ब ही नहीं लगता है वरन् अंश भी बहुत थोड़ा ही हाथ लगता है। नसों द्वारा इंजेक्शन में सरलता मानी जाती है और उस माध्यम से उपचार सामग्री भीतर पहुँचाने का उपाय खोजा गया है। फिर भी सफलता का पूरी तरह पथ प्रशस्त हुआ नहीं। क्योंकि रक्त के श्वेतकण चोर दरवाजे से घुसने वालों से सदा संघर्ष करते हैं। कई बार तो विद्रोह तक खड़ा कर देते हैं। इंजेक्शन पद्धति आँशिक रूप से ही सफल हुई है, किन्तु पदार्थ को वायुभूत बनाकर उसे शरीर में प्रवेश कराने की पद्धति ऐसी है जिसे निरापद, सरल और सफल होने का अपेक्षाकृत अधिक अवसर है। अग्निहोत्र की उपचार प्रक्रिया ऐसी ही है जिसमें रासायनिक पदार्थों को अधिक सरल और सशक्त बनाने का नया मार्ग प्रशस्त होता है।
अग्निहोत्र द्वारा रोग निवारक और परिपोषक पदार्थ वायुभूत होकर जब भीतर पहुँचते हैं तो अपनी सूक्ष्मता के कारण स्वभावतः अधिक प्रभावी होते हैं। अन्यान्य चिकित्सा उपचारों की अपेक्षा यज्ञोपचार के माध्यम से औषधियों एवं पोषक तत्वों से शरीर को लाभान्वित कर सकना अधिक सरल है इस प्रक्रिया की एक और विशेषता है कि साँस नाक द्वारा ली जाती है और वह मस्तिष्क मार्ग से फेफड़ों में होती हुई समस्त शरीर में वितरित होती है। अस्तु यज्ञ द्वारा विस्तृत “गैस” का प्रमुख लाभ मस्तिष्क को मिलता है। इस प्रकार एक तीर से दो निशाने सधते हैं और शारीरिक ही नहीं मानसिक उपचार भी बन पड़ता है।
अमेरिका के रेन्डेल टाउन, मेरीलैण्ड स्थित लेडी लिण्डका का “ अग्निहोत्र संस्थान” हवन चिकित्सा के लिए ख्याति प्राप्त कर रहा है। वहाँ नित्य नियमित रूप से यज्ञ होता है और रोगियों पर उसके प्रभाव-प्रतिफल की वैज्ञानिक जाँच पड़ताल की जाती है। अनुसंधान कर्ताओं का कहना है के यज्ञीय धुम-ऊर्जा का लाभदायक परिणाम तो होता ही है, यज्ञ भस्म भी चमत्कारिक सत्परिणाम प्रस्तुत करता है। इसके प्रयोग से हर कोई लाभान्वित हो सकता है।
यज्ञ भस्म-हवन में शेष बची हुई राख है। यों इसे अधिक से अधिक कोई माँगलिक पदार्थ माना जा सकता है, पर कई बार उसके उपयोग से बहुमूल्य औषधियों से भी अधिक प्रभाव परिणाम निकलता देखा गया है। उसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ के रूप में स्वास्थ्य संवर्धन के लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है। सूक्ष्म सामर्थ्य से सम्पन्न यज्ञ भस्म-चरु अथवा कोई भी पदार्थ इतने अधिक स्वास्थ्य-वर्धक-बलवर्धक हो सकते है जिनकी तुलना महंगी औषधियाँ एवं फल-मेवे भी नहीं कर सकते। पश्चिम जर्मनी के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक बर्ट होल्ड जैहल ने हवन की भस्म पर गहन अनुसंधान किया है। वे स राख का विभिन्न बीमारियाँ पर नये-नये परीक्षण करने में निरत हैं। उनका कथन है कि हवन से बची अवशिष्ट राख रोगों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हे। होम्योपैथी दवाओं की विधि द्वारा उसका परिणाम जाँचने परखने के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि सामान्य सी लगने वाली इस भस्म में असामान्य रोग निरोधक क्षमता विद्यमान होती है। होम्योपैथी एवं एलोपैथी दवाओं के उपयोग से होने वाले साइड इफेक्ट का शमन करने की क्षमता इसमें विद्यमान है। अपने अनुसंधान कार्य को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अब तक हवन-भस्म से खाने, मलहम लगाने, अग्निहोत्र आईड्राप, अग्निहोत्र-शलाका, अग्निहोत्र क्रीम इत्यादि के निर्माण में सफलता पाई है।
शारीरिक रोगों से अधिक इन दिनों मानसिक रोग फैले हैं। व्यक्तित्व को विकृत बनाने वाली सनकें तथा आदतें ऐसी मानसिक बीमारियाँ हैं जो मनुष्य को अर्ध विक्षिप्त बनाये रखती हैं। ऐसे व्यक्ति स्वयं दुख भोगते और साथियों को दुख देते हैं। उनका कारगर उपचार अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ तो प्रस्तुत नहीं कर सकीं पर विश्वास है कि यज्ञोपचार से शारीरिक और मानसिक रोगों से उससे कहीं अधिक छुटकारा दिला सकेगा जितना कि अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियाँ मिल-जुलकर दिलाती हैं।
अग्निहोत्र से न केवल मनुष्य लाभान्वित होता है, वरन् अन्यान्य प्राणी स्वास्थ्य संरक्षण एवं संवर्धन प्रक्रिया के अतिरिक्त अग्निहोत्र के अनेकानेक लाभ हैं। उनमें से एक यह भी है कि वायुमंडल में संव्याप्त-विषाक्तता का अनुपात कम करने -उसे निरस्त करने की उसमें अपूर्व क्षमता है। हवन की गैस में कार्बनमोनोऑक्साइड का अत्यल्प अंश रहने पर भी औषधियों, घृत आदि दृव्य पदार्थों का वाष्पीय प्रभाव उसे नष्ट करके लाभकारी बना देता है। इसमें स्थित उड़नशील सुरभित पदार्थ निर्विघ्न रूप से लाभदायक परिणाम प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त हवन-गैस से स्थान, जल, मिट्टी आदि अनेक तत्वों की शुद्धि हो जाती है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है और पोषक अणुओं को बढ़ाने वाले आव-तत्व उसमें बढ़ जाते हैं। इसी कारण अग्निहोत्र धूम्र से पूरित पर्जन्य से युक्त मेघ अणु और औषधियों को निर्मलता और पुष्टि प्रदान करते हैं।
यज्ञोपचार प्रक्रिया में किस रोग में विधान से किस मंत्र एवं औषधि का उपयोग किया जाय, इसकी रहस्यमयी विद्या का मन्थन आज फिर से किया जाना जरूरी है। शाँतिकुँज के ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में यज्ञ विद्या को विशेषतया अग्निहोत्र को अपनी शोध में सम्मिलित किया गया है। जब उसके सत्परिणाम सामने आयेंगे तो निश्चय ही यह चिकित्सा पद्धति संसार की सर्वश्रेष्ठ समूह चिकित्सा का स्थान लेगी।
अग्नि सोने को परखती है, एवं आपत्ति वीर पुरुष को।
अणु में विभु, लघु में महान की व्याख्या करने वाले उपनिषद्कार मानवी सामर्थ्य की संभावना का वर्णन करते कभी नहीं थकते। वे कहते हैं मनुष्य की शारीरिक संरचना रसायन शास्त्र, दृश्य तंतु जाल आदि सभी स्थूल परिकर हैं। इस सारे संयंत्र को चलाने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, उसे अध्यात्म की भाषा में प्राण शक्ति कहा जा सकता हैं। यह न्यूनाधिक मात्रा में सभी में विद्यमान होती है। सर जूलियन हक्ले ने अपनी पुस्तक “ द यूनिकनेस आँव मैन” में लिखा है शारीरिक स्नायुतंत्र एक-सा होते हुए भी एक ऐसी परोक्ष सामर्थ्य किसी मनुष्य के अन्दर होती है कि वह अपने चारों ओर के वातावरण को ही नहीं, एक व्यापक परिकर को प्रभावित करता हैं।
इसे गीताकार ने सात्विक संकल्प शक्ति नाम देते हुए कहा है-
धृत्या यया घारयते मनः प्राणेन्द्रिय क्रियाः। योगेना व्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्विकी॥
अर्थात् वह संकल्प शक्ति जो मन, प्राण व इन्द्रियों की क्रियाओं पर नियन्त्रण करती है ओर उनकी शक्तियों को अंतः स्थिति दिव्य आत्मा की ओर मोड़ देती है, हे पार्थ। वह सात्विक इच्छा शक्ति या धृति है।
यह इच्छा शक्ति किस रूप में होती है? इसका उत्तर देते हुए गुह्य विज्ञानी कहते हैं कि काया की विद्युत व्यवस्था में मूलाधार को ऋण और सहस्रार को धन विद्युत का केन्द्र माना गया है। मेरुदण्ड के माध्यम से उनके मध्यवर्ती प्रवाह गतिशील रहते हैं इसके उपरान्त ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से समस्त शरीर में उस प्राण ऊर्जा का वितरण होता रहता है। इसके आधार पर काया की चेतन और अचेतन गतिविधियाँ तो चलती ही हैं, साथ ही स्फूर्ति, प्रतिभा, मेधा, जीवट जैसी रहस्यमयी विभूतियाँ भी उसी आधार पर जगती और बढ़ती रहती है। पंचतत्वों से बने शरीर को चलाने में पंच प्राणों की सामर्थ्य ही काम करती हैं। इस ऊर्जा की उपयुक्त मात्रा होने से ही मनुष्य प्राणवान बनता है अन्यथा स्वल्प प्राण वाला मात्र सामान्य प्राणी बनकर रह जाता है। इच्छा शक्ति का प्रभाव इसी रूप में देखा जा सकता हैं।
प्राण शक्ति की उपयोगिता जीवनचर्या को गतिशील रखने तथा विभिन्न प्रकार के पुरुषार्थ करने में तो है ही। उसका अब नया उपयोग चिकित्सा प्रयोजन में भी होने लगा है। समर्थ व्यक्ति की प्राणशक्ति दुर्बल को उसी प्रकार दी जा सकती है जैसे कि सम्पन्न लोग अपने वैभव से निर्धनों, अभाव ग्रस्तों की सहायता करते हैं।
प्राचीनकाल में प्राणदान, शक्तिपात आदि अनेक अनुदानों का वर्णन मिलता है। गुरुजन अपने शिष्यों को उत्तराधिकार में बहुत कुछ देते रहते हैं। दुर्बलों और पीड़ितों की सहायता के लिए भी अपनी इस पूँजी का भी आदान-प्रदान संभव होता था।
इन दिनों उस प्रक्रिया का उपयोग हलके रूप में होने लगा हैं। मैस्मेरिज्म सिद्धान्तों के आधार पर की जाने वाली प्राण चिकित्सा को इसी स्तर का माना जा सकता है। उसमें मात्र शरीरगत विद्युत प्रवाह का आदान-प्रदान होता है। उसमें ग्रहणकर्ता को अधिक लाभ होता है पर प्रदाता को कोई अधिक घाटा भी नहीं सहना पड़ता, क्योंकि दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों में इस विद्युत का निरन्तर व्यय होता ही रहता है। चिकित्सा प्रयोजन में इतना ही करना पड़ता है कि प्राण विद्युत का कुछ समय तक बिखराव रोकना पड़ता है और एकाग्रता तथा संकल्प शक्ति के सहारे उसे दुर्बल व्यक्ति को देना पड़ता है। इसे शारीरिक स्तर पर मोटा अनुदान कह सकते है।
सम्मोहन विद्या का वशीकरण, मूर्च्छा प्रयोग आदि के रूप में प्रचलन तो पहले भी था। योग एवं तंत्र ग्रंथों में इसका विशद् वर्णन भी मिलता है। पर उसे व्यवस्थित चिकित्सा के रूप में प्रचलित करने का श्रेय आस्ट्रिया निवासी डॉक्टर फ्रासिस्कम् एण्टोनियर्स मेस्मर को है। उन्होंने मानवी विद्युत का अस्तित्व, स्वरूप और उपयोग सिद्ध करने में घोर परिश्रम किया और उसके आधार पर कठिन रोगों के उपचार में बहुत ख्याति कमाई। वे अपने शरीर की प्राण ऊर्जा का रोगियों पर आघात करते साथ ही लौह चुम्बक भी आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाते। इस दुहरे प्रयोग से न केवल शारीरिक वरन् मानसिक रोगों के उपचार में भी उनने आशातीत सफलता प्राप्त की। इसे उन्होंने “ मैस्मेरिज्म” नाम दिया। आगे चलकर मि. कान्स्टेट युसिगर ने उसमें सम्मोहन विज्ञान की नई कड़ी जोड़ी और कृत्रिम निद्रा लाने की विधि को “ हिप्नोटिज्म “ नाम दिया। फ्राँस के अन्य विद्वान भी इस दिशा में नई खोजें करते रहे। चिकित्सा ला फान्टेन एवं डाँ. ब्रेड ने इन अन्वेषणों को और आगे बढ़ाकर इस योग्य बनाया कि चिकित्सा उपचार में उसका प्रामाणिक उपयोग संभव हो सके।
पिछले दिनों अमेरिका में न्यू आरलीयन्स तो ऐसे प्रयोगों का केन्द्र ही बना रहा हे जहाँ इस विज्ञान को अमेरिकी वैज्ञानिक डारलिग और फ्राँसीसी वैज्ञानिक डाँ. दुराण्ड डे ग्रास की खोजों ने विज्ञान जगत को यह विश्वास दिलाया कि प्राणशक्ति का उपयोग अन्य महत्वपूर्ण उपचारों से किसी भी प्रकार कम लाभदायक नहीं है। इस प्रक्रिया को “ इलैक्ट्रो बायोलाँजिकल साइंस “ नाम दिया गया है। “ दि स्कूल ऑफ नेन्सी “, “दि स्कूल ऑफ चारकोट”, “ दि स्कूल ऑफ मेस्मेरिस्ट “ नामक संस्थाओं ने इस संदर्भ में महत्वपूर्ण शोध संस्थान सम्मोहन चिकित्सा पर अनुसंधानरत रहे हैं।
मूर्धन्य वैज्ञानिक डाँ. एम.ओ.माल तथा जे.एम.वैम्ब्रेल ने अपनी पुस्तक “ हिप्नोटिज्म “ में सम्मोहन चिकित्सा की अनेकों प्रामाणिक घटनाओं का वर्णन किया है। इमोशन्स एण्ड बाँडिली चेन्जेज नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में लेखिका एच.एफ.डनवार ने कहा है कि इस विद्या द्वारा हर प्रकार की हिस्टीरिया, फोबिया, स्नायुविक बीमारियाँ, वाणी का असन्तुलन-हकलाना आदि का सफल उपचार संभव है। डाँ. विन के अनुसार मानसिक रोगों के उपचार में वैज्ञानिक हिप्नोटिज्म का सफल स्तर पर प्रयोग हुआ है।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डाँ. आर्नोल्ड फ्राँस्ट ने सम्मोहन विधि से निद्रित करके कई रोगियों के छोटे ऑपरेशन किये थे। पीछे डैन्टल सर्जनों ने यह विधि अपनाई और उन्होंने दाँत उखाड़ने में सुन्न करके प्रयोग बंद करके सम्मोहन विधि प्रयोग को सुविधाजनक पाया। दक्षिण अफ्रीका-जोहन्सवर्ग के टारा अस्पताल में डाँ. वर्नर्ड लेविन्सन ने बिना एनेस्थीसिया के इसी विधि से कितने ही कष्ट रहित ऑपरेशन करके यह सिद्ध किया कि यह विधि कोई जादू मंतर नहीं वरन् विशुद्धतः वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक जेम्स ब्राइड ने भी नाड़ी संस्थान में पाई जाने वाली विद्युत शक्ति की क्षमता को मात्र शरीर निर्वाह तक सीमित न रहने देकर उससे अन्य उपयोगी कार्य संभव हो सकने का प्रतिपादन किया है।
प्रसूति में भी हिप्नोटिज्म का प्रयोग सफल रहा है। इस दिशा में अनेक मेडिकल अधिकारियों का नाम उल्लेखनीय है। इसमें डाँ. वान ओटिजर, डाँ. जे. रेफ्लर, शूल्ज तथा डाँ. मार अति प्रसिद्ध है। इन चिकित्सा विशेषज्ञों ने बिना वेदना के प्रसव कराने में आशातीत सफलता पाई। कई महिलाएँ जिनकी प्रसूति पहले आपरेशन से हुई थी, इस विधि द्वारा सहज रूप से सम्पन्न हो गई। डाँ. विन के अनुसार जिस परिमाण में सम्मोहन कर्ता के प्रति सम्मान तथा विश्वास रोगी का होगा, उसी मात्रा में वह लाभान्वित हो पायेगा।
प्रख्यात वैज्ञानिक मोडाट्रियूज तथा काउण्ट पुलीगर ने अपने अनुसंधानों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि प्राण शक्ति द्वारा रोग उपचार तो एक हल्का सा प्रयोग मात्र है। वस्तुतः उसके उपयोग बहुत ही उच्चस्तर के हो सकते हैं। उसके आधार पर मनुष्य अपने निज के व्यक्तित्व में बहुमुखी प्रखरता उत्पन्न कर सकता है। प्रतिभाशाली बन सकता है। आत्म विकास की अनेक मंजिलें पार कर सकता है, पदार्थों को प्रभावित करके अधिक उपयोगी बनाने तथा इस प्रभाव से जीवित प्राणियों की प्रकृति बदलने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। जर्मन विद्युत विज्ञानी रीकन बेक इसे एक विशेष प्रकार की “ अग्नि “ मानते है। उसका बाहुल्य वे वे चेहरे के इर्द-गिर्द मानते हैं और “ हीलिंगआँरा “ ना देते हैं। प्रजनन अंगों में उन्होंने इस अग्नि की मात्रा चेहरे से भी अधिक परिमाण में पाई है। दूसरे शोधकर्ताओं ने नेत्रों तथा उँगलियों के पोरुवों में उसका अधिक प्रवाह माना है।
प्राणशक्ति के वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में अभी प्राथमिक जानकारियां ही उपलब्ध हो सकी हैं। उसके थोड़े से सूत्र निर्धारित किये गये हैं ओर यत्किंचित् उपयोग उपचार जाने गये हैं। आत्मविज्ञानी मानवी सम्मोहन रूपी इस अद्भुत सामर्थ्य की गरिमा आरम्भ से ही गाते रहे हैं और कहते हैं कि जो प्राण विद्या को जान लेता है, उसके लिए इस संसार में ऐसा कुछ भी अनुपलब्ध नहीं रह जाता जो समृद्धि, प्रगति और सुख शान्ति के लिए आवश्यक है।
मादक द्रव्यों के भाँति सम्पदाओं का भी एक नशा होता है। जिन्हें असाधारण रूप से बल, वैभव, पद, गौरव आदि मिलता हे वे अहंता की मादकता से उन्मत्त जैसे हो जाते हैं। मर्यादाओं को तोड़ने, वर्जनाओं की उपेक्षा करने और अपराधी स्तर के उद्धत आचरणों में निरत होने लगते हैं। अनुकरण की छूत एक से दूसरे को लगती है। अनाचार उत्पीड़न की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। प्रतिशोध, प्रति-प्रतिशोध का क्रम चल पड़ता है। नियति भी उद्धतों का प्रताड़ना किये बिना चैन से कब बैठती है? मन स्थिति में घुसी हुई विषाक्तता परिस्थितियों में विद्रोह के तत्व उभारती है। संघर्ष खड़े होते है। साथ ही प्रकृति भी अनेकानेक प्रतिकूलताएँ विपत्तियाँ विभीषिकाएँ बरसाने लगती हैं। अशान्ति के अनेकानेक विस्फोट फूटने लगते है। वातावरण संकटों, असंतोषों अभावों से भर जाता है।
मनुष्य चाहे तो चिन्तन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता बनाये रहकर सुख शान्ति का माहौल बनाये रह सकता है। स्नेह सहयोग की नीति अपना कर हँसती-हँसाती जिन्दगी जी सकता है। जितने साधन उपलब्ध हैं मिल बाँटकर खाते हुए प्रगति और प्रसन्नता भरपूर मात्रा में उपलब्ध कर सकता है। पर वह ऐसा करता नहीं है। क्षुद्रता जब भी साधन सम्पन्न होती है तभी विष उगलती है। कुमार्ग अपनाने का प्रतिफल विपत्तियों और विग्रहों के रूप में ही सामने आ सकता है।
यही सब बार-बार होता रहता है। अनैतिकता की अराजकता बार-बार उभरती रहती है। समुद्र में ज्वार और पवन में तूफान आने की तरह जब मानवी क्रिया–कलापों में अनैतिकता की अराजकता उभारती है तो विश्व संतुलन बिगड़ने लगता है। यदि वह उसी रूप में चलता रहे तो महाविनाश जैसे विग्रह खड़े होते है। इनकी रोक थाम आवश्यक है। असंतुलन को संतुलन में बदलने से ही बात बनती है। उफानों को रोकने के लिए चूल्हे में जलती अग्नि बुझानी पड़ती है और उफनते झागों में पानी डालना पड़ता है। इसकी व्यवस्था भी नियन्ता ने बना रखी है। सृष्टि संतुलन की जिम्मेदारी देवात्माओं सिद्ध पुरुषों को सौंपी है। उनकी विशिष्टता का उपयोग इसी में है कि सृष्टि के बिगड़ने वाले संतुलन को समय-समय पर नियंत्रित करते रहें। प्रगति के मार्ग में आये हुए अवरोधों को हटाते रहें। यह एक प्रकार से स्रष्टा का हाथ बँटाना है। विश्व उद्यान के मालियों को यही करना पड़ता है। वे उसे समुन्नत बनाने के लिए खाद पानी की व्यवस्था करते, खरपतवारों को उखाड़ते और उजाड़ने वाले तत्वों से निपटते हैं। देवात्माओं की शक्ति सामर्थ्य इसी प्रयोजन में निरत रहती है। वे अधर्म के उन्मूलन और धर्म के संस्थापन वाली ईश्वरीय इच्छा को पूर्ण करने में अपनी सत्ता और क्षमता को होमते रहते है। गिरों को उठाते, उठने वालों को बढ़ाते, भटकों को राह दिखाते और पीड़ितों की सहायता करते हैं। आत्मा की गरिमा इसी में है कि वह अपना दुलार बिखेरे और वैभव को बाँटें। अनीति से निपटे। नीति को बनाये और बिगड़े हुए संतुलन को बनाये। देवात्माएँ यहीं करती रहती है। अपनी अपूर्णता दूर करने के लिए योग तप का आश्रय लिया जाता है। साथ ही जो कुछ उच्चस्तरीय वैभव प्राप्त होता है उसे सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाया जाता है। सिद्धपुरुषों का यही एकमात्र क्रिया−कलाप रहता है। वे बादलों की तरह सुसम्पन्न बनते है और अपनी विभूतियों को आवश्यक प्रयोजनों के लिए भूखंडों पर बरसा देते हैं।
सिद्ध पुरुष इसी के लिए अवसर की तलाश में रहते हैं। जहाँ अपने सहयोग की आवश्यकता समझते हैं वहाँ उसे बिना माँगें अहेतुकी कृपा के रूप में मुक्तहस्त से बिखेर देते है। साथ ही ऐसे सुसंस्कारी व्यक्तित्वों को भी ढूंढ़ते रहते हैं जिन्हें सामान्य से असामान्य बनाकर अपने ऊपर लदे हुए दायित्वों में भागीदार बनाने के लिए सहयोगी स्तर तक विकसित किया जा सके। साधक ऐसे ही व्यक्तित्वों को कहते हे। पुण्य परमार्थ की उमंगों को उभारना ही साधना है। साधकों को सिद्धों की और सिद्धों को साधकों की आवश्यकता पड़ती हैं दोनों एक दूसरे को खोजते हैं। संयोग मिल जाने पर अंधे पंगों का संयोग बना कर अपूर्णता को पूर्णता में बदलते हैं।
सिद्धपुरुष सूक्ष्म शक्ति प्रधान होते है उनका सूक्ष्म शरीर प्रखर होता है। साधक की स्थिति स्थूल शरीर में समाहित होती है। स्थूल को वरिष्ठता सूक्ष्म के संयोग से प्राप्त होती है। काया की वरिष्ठता प्राण बाहुल्य से है। साधक को काया और सिद्ध को प्राण कहा जा सकता है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एकाकी सिद्ध मात्र सूक्ष्म होने से प्रत्यक्ष हलचलों के संयोजन में असमर्थ रहता हैं। इसी प्रकार एकाकी साधक प्राण शक्ति की न्यूनता के कारण वैसा कुछ कर नहीं पाता जिसे अलौकिक या चमत्कारी कहा जा सके। ऐसा बन पड़ना दोनों के संयोग से ही संभव होता है। इसलिए सिद्ध साधकों को और साधक को तलाशते देखे गये हैं। जब यह संयोग मिल जाता है तो दोनों पक्ष कृतकृत्य हो जाते है। दो पहियों की गाड़ी सरपट दौड़ने लगती हैं।
सिद्ध पुरुषों का प्रधान कार्य सृष्टि का संतुलन बनाये रहना है। इसके लिए उन्हें साथी सहयोगियों की आवश्यकता पड़ती है इसलिए उत्सुकता पूर्वक सत्पात्र साधकों को तलाशते रहते हैं। साधकों के लिए अपने बलबूते अधिक कुछ कर सकना संभव नहीं होता। बालक को अभिभावक का अध्यापक का सहयोग चाहिए। इसके बिना एकाकी निर्वाह या विकास बन नहीं पड़ता। साधक भी उच्चस्तरीय उत्कर्ष के लिए समर्थ सहयोगी की आवश्यकता अनुभव करता और उसे खोजता है।
साधक और सिद्ध आदर्श मार्ग के दो पथिक हैं। दोनों ही दो बैलों की तरह एक जुए में जुतते हैं जिसका ढाँचा विश्व संतुलन का परिवहन करते रहना है। एक दूसरे का सहयोग पाकर कृतार्थ भी होते है और सच्चे मन से सहयोग भी करते हैं। पहुँचना तो दोनों को एक ही गन्तव्य पर है।
इसके विपरीत एक ऐसी अड़चन भी है जो दोनों के बीच कभी सच्चा सहयोग बनने ही नहीं देती। वह है ललक लिप्सा। कामना, स्वार्थपरता। देखा गया है कि तथाकथित आध्यात्मवादियों में से अधिकाँश ऐसे होते हैं जो सम्पन्नता सफलता के भौतिक प्रयोजनों के लिए किन्हीं देवताओं अथवा देवपुरुषों का श्रम उपार्जित वर्चस्व मुफ्त में ही लूटना चाहते है। इसके लिए अपने को भक्त सिद्ध करने का मुखौटा लगाते हैं। आकुल व्याकुल फिरते हैं।
भक्त वेशधारी जो भी सोचते हो पर देवात्माओं की अंतर्दृष्टि आर पार जाने वाली होती है। उन्हें वस्तु स्थिति समझने में कभी भ्रम नहीं होता। उन्हें किसी बहाने फुसलाया नहीं जा सकता।
जिसके नाम की चिट्ठी होती है पोस्टमैन उसका घर तलाशता हुआ स्वयं पहुँच जाता है। खिले फूल की गंध पाकर भौंरे, तितलियाँ, मधु मक्खियाँ स्वयं ही दौड़ जाती हैं, इसी प्रकार जिन आत्माओं में उदात्त चिन्तन आदर्श चरित्र, स्नेह, सद्भाव का विकसित स्वरूप दीख पड़ता है उन्हें सिद्धपुरुष अपने लिए उपयोगी मान लेते हैं और उन्हें समीप लाने के लिए अर्जित विभूतियों द्वारा निहाल करने के लिए स्वयं ही उन्हें खोज लेते हैं। उनके घर पर जा पहुँचते हैं। विवेकानन्द के घर रामकृष्ण परमहंस स्वयं पहुँचे थे। शिवाजी से समर्थ गुरु रामदास ने किसी बहाने स्वयं संपर्क बनाया था। चाणक्य और चन्द्रगुप्त का सुयोग भी इसी प्रकार बना। ऐसे सुयोग घर जाकर भी बनाये जा सकते हैं और अपने आकर्षण से कहीं बाहर बुलाकर उनसे संपर्क साध जा सकता है। हर हालत में परख, चयन, आमंत्रण, आकर्षण समर्थ शक्तियों का ही होता है। अनुग्रह कर्ता तो निमित्त मात्र होते हैं।
कई कौतूहल को कसौटी मान कर उनकी तलाश में निकलते हैं और कामनाएँ पूरी कराने के लिए उनका अनुग्रह चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि कोई निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी पर किस लिए अनुदानों की वर्षा करेगा? परमार्थ के लिए तो उदारचेता बड़े-बड़े दान दे देते हैं। हरिश्चन्द्र, दधीचि, शिवि, भामाशाह आदि ने जब उच्च प्रयोजन सामने खड़े देखे तो उनकी झोली भर दी। पर हट्टे कट्टे भिखारी जब कोई बहाना बना कर भीख माँगने निकलते है तो उन्हें दुत्कार ही मिलती है। आध्यात्म क्षेत्र में समर्थों के विशिष्ट अनुदान सत्पात्रों को मिलने की परम्परा रही है। लालची, स्वार्थी जब मतलब गाँठने के लिए भीख माँगने या जेब काटने के लिए अपने को अध्यात्मवादी लबादे में लपेटते है तो उनकी पोल तत्काल खुल जाती है। ऐसे लोगों को निराश होकर ही वापस लौटना पड़ता है।
जिन लोगों ने इस प्रकार की खोज में लम्बी दौड़ धूप की है वे निराश होने पर अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए मन गढ़ंत कहानियाँ बना लेते हैं और परिचित लोगों के आगे सिद्धों से भेंट के लम्बे चौड़े किस्से सुनाते हैं। इस कौतुक को सुनने से किन्हीं का मनोरंजन तो हो सकता हैं। आरम्भ में कुछ समय के लिए असमंजसयुक्त विश्वास भी कर लेते हैं पर वस्तुस्थिति प्रकट होने में देर नहीं लगती जब व्यक्तित्व और व्यवहार में किन्हीं उच्चस्तरीय गतिविधियों का समावेश नहीं दीखता तो वे समझ लेते हैं कथन में प्रपंच मात्र था। पारस को छूकर लोहा सोना बन जाता है। स्वाति की बूँद से संपर्क होने पर सीप मोती बन जाती है। चन्दन वृक्ष के समीप उगने वाले झाड़ झंखाड़ महकने लगते है तो कोई कारण नहीं कि सिद्धपुरुषों की अनुकम्पा पाने वाला घटिया जीवन जीता रहे और बचकानी प्रवृत्तियों के बाड़े में कैद रहे।
सिद्ध पुरुषों का उद्देश्य किन्हीं लालची अहंकारी लोगों की कामनाएँ पूरी करते फिरना नहीं है। न वे इसके लिए अपनी तपस्या को कूड़े के ढेर पर बखेरते हैं। उनकी स्वयं की सत्ता उत्कृष्टता का परिपोषण करने के लिए समर्पित हुई तो वे अपने बहुमूल्य तप का समापन किसी को कौतूहल दिखाने के लिए किन्हीं की ललक लिप्साएँ पूरी करने के लिए क्यों खर्च करेंगे? इस नग्न सत्य को ऐसे हर व्यक्ति को भली प्रकार समझ लेना चाहिए जो सिद्ध पुरुषों को खोजने और उनसे लाभ उठाने के लिए जहाँ तहाँ भटकते हैं। उन्हें वरदान अनुग्रह प्राप्त करना तो दूर दर्शन तक का लाभ नहीं मिलता।
भले ही उनकी मौजूदगी समीपवर्ती क्षेत्र में ही क्यों न हो?
कभी-कभी ऐसा होता देखा गया है एक ठग को दूसरा बड़ा ठग अपने चंगुल में फँसा लेता है ओर पकड़े हुए शिकार को झोले में डालकर अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। प्रेत पिशाचों में से यक्ष गंधर्वों में से कुछ ऐसे मनचले होते हैं जो इन प्रपंची लोगों की मनोभूमि को ताड़ लेते हैं और उन्हें फँसाकर मनमाने कृत्य कराने के लिए वाहन जैसा उपयोग करते हैं। यह वर्ग भी सूक्ष्म शरीरधारी होता है। निकृष्ट वर्ग में गिने जाने पर भी वेष बदलकर किसी भी रूप में प्रकट होने की कला में अभ्यस्त होता है। उनके लिए सिद्धपुरुषों जैसा रूप बना लेने में भी कठिनाई नहीं होती। मूर्खों के साथ वे धूर्तों जैसे व्यवहार करते हैं। कौतुक कौतूहल दिखा कर उन्हें मंत्र मुग्ध कर लेते हैं और सम्मोहित की तरह उन्हें उँगली के इशारे पर कठपुतली की तरह नचाते हैं। इस प्रकार जकड़े पकड़े गये लोग भी अपने को सिद्धपुरुषों के साथ संपर्क होने की मान्यता में जकड़ जाते हैं और उनकी इच्छानुसार उचित अनुचित का विचार किये बिना हेय कृत्य करने लगते हैं। अघोरी, कापालिक, ताँत्रिक स्तर के लोग इसी प्रकार के कुचक्र में फँसे हुए होते हैं। संत का जीवन आदर्शवादी और परमार्थ परायण होना चाहिए।
एक सेठ बड़ा धनवान था। उसे अपने ऐश्वर्य धन सम्पत्ति का बड़ा अभिमान था। अपने को बड़ा दानी धर्मात्मा सिद्ध करने के लिये घर पर नित्य एक साधु को भोजन कराता था। एक दिन एक ज्ञानी महात्मा आये उसके यहां भोजन करने को। सेठ जी ने उनकी सेवा पूजा करने का तो ध्यान नहीं रखा और अपने अभिमान की बातें करने लगा “ देखो महाराज वहाँ से लेकर इधर तक यह अपनी बड़ी काठी है। पीछे भी इतना ही बड़ा बगीचा है। पास ही दो बड़ी मिलें हैं अमुक -अमुक शहर में भी मिलें हैं। इतनी धर्मशालाएँ कुएं बनाये हुये हैं। दो लड़के विलायत पढ़ने जा रहे हैं। आप जैसे साधु संन्यासियों के पेट पालन के लिये यह रोजाना का सदावर्त लगा रखा है।”सेठ अपनी बातें कहता ही जा रहा था। महात्मा जी ने सोचा इसके अभिमान को अब दूर करना चाहिए। बीच में रोक कर सेठ जी से कहा “ आपके यहाँ दुनिया का नक्शा है।” सेठ ने कहा “ महाराज बहुत बड़ा नक्शा हैं।” महात्मा जी ने नक्शा मँगाया। उसमें सेठ से पूछा “ इस दुनिया के नक्शे में भारत कहाँ है? “ सेठ ने बताया। “ अच्छा इसमें मुम्बई कहाँ हैं? “ सेठ ने हाथ रखकर बताया। “ महात्मा जी ने फिर पूछा “ अच्छा इसमें तुम्हारी कोठी, बगीचे, मिलें बताओ कहाँ हैं? सेठ बोला “ महाराज दुनिया के नक्शे में इतनी छोटी चीजें कहाँ से आई? महात्मा ने कहा “ सेठ जी जब इस दुनिया के नक्शे में तुम्हारी कोठी, बगीचे, महल का कोई पता नहीं तो विश्व ब्रह्माण्ड जो भगवान के लीला ऐश्वर्य का एक खेल मात्र है उनके यहाँ तुम्हारे ऐश्वर्य का क्या स्थान होगा? “ सेठ जी समझ गया और उसका अभिमान नष्ट हुआ। वह साधु के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा।
थोड़ी सी समृद्धि ऐश्वर्य पाकर मनुष्य इतना अभिमानी और अहंकारी बन जाता है। यदि वह अपनी स्थिति की तुलना अन्य लोगों से, फिर भगवान के अनन्त ऐश्वर्य से करे तो उसे अपनी स्थिति का पता चले। धन सम्पत्ति ऐश्वर्य का अभिमान वेथ है, सबसे बड़ी मूर्खता है।
बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य के संबन्ध में उल्टा है। मनुष्य अपना मूल्याँकन स्वयं करता है ओर जितना वह मूल्याँकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदापि नहीं मिलती। एक सामान्य परिवार से उठ कर बैंजामिन डिजरायली जब इंग्लैण्ड के संसद सदस्य बने तो अन्य साथियों ने उनकी बड़ी उपेक्षा की। यहाँ तक कि वे जब बोलने के लिये उठते तो उन्हें बोलने भी नहीं दिया जाता।
पर इन परिस्थितियों में भी डिजरायली ने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। उसके प्रति अपनी दृढ़ निष्ठा को व्यक्त करते हुए वे उन सदस्यों से कहते जो उनके भाषण में व्यवधान डाला करते थे कि - “आपको एक दिन मेरी बातें अवश्य सुननी पड़ेंगी।”
यह डिजरायली नहीं, उसका आत्मविश्वास बोल रहा था। उन्हें अपनी आँतरिक शक्तियों पर विश्वास था। वे अपना उचित मूल्याँकन करना जानते थे और इसी का परिणाम है कि प्रयत्न और पुरुषार्थ के बल पर वे एक दिन इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पद पर जा पहुँचें तथा जो लोग उनका उपहास किया करते थे वे ही उनके प्रशंसक और गुणगान करने वाले बन गये।
प्रत्येक व्यक्ति को यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में बनाया और इस रूप में बनाते समय उसने मनुष्य की चेतना में सभी संभावनाओं के बीज डाल दिये है तथा उनके अंकुरित होने की क्षमताएँ भी डाल दी हैं। पर प्रायः देखने में आया है कि हममें से अधिकाँश व्यक्ति अपनी उन सुषुप्त क्षमताओं और संभावना के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही उनके संबन्ध में विचार तक करना नहीं चाहते।
इसके विपरीत आत्मविश्वासी भाग्य को अपने पुरुषार्थ का दास समझता है। न्यू हैम्पशायर में डैनियल वेब्सटर को बड़ी मुश्किल से पन्द्रह डॉलर का एक पद मिला था। इस नौकरी के लिये उसके पिता ने काफी पापड़ बेले और जब वे अपने लड़के को इस पद पर नियुक्ति दिलाने में सफल हो गये तो बहुत प्रसन्न हुये और डैनियल को बधाई भी दे डाली। बधाई के समय डैनियल ने बड़ी उदासीनता से कहा था कि यह मेरा लक्ष्य नहीं है और मैं इस पद पर थोड़े ही समय काम करूंगा। पिता ने नाराज से होकर कहा था - तुम्हें कौन गवर्नर बना देगा। तुम एक गरीब घर में पैदा हुए हो और गरीब आदमी को अपने निर्वाह का साधन मिल जाने पर ही संतुष्ट हो जाना चाहिए। प्रत्युत्तर में डैनियल ने कहा - “ नहीं मैं अपने आपको गरीब नहीं मानता। मुझे आशा है कि मैं इससे अच्छा काम कर सकता हूँ। मैं अदालतों में अपनी वाणी का प्रयोग करना चाहता हूँ दूसरों को काम सिखाने वाला नहीं” और इसी आत्मविश्वास के बल पर डैनियल ने अपने स्वप्नों को साकार कर दिखाया।
नैपोलियन को अपने विजय अभियान में आल्पस पार करने का जब मौका आया तो लोगों ने बहुत समझाया कि आज तक आल्पस कोई पार नहीं कर सका है और इसकी चेष्टा करने वालों को मौत के मुँह में जाना पड़ा है। किन्तु नैपोलियन ने कहा - “मुझे मौत के मुँह में जाना मंजूर है पर आल्पस से हार मानना नहीं। आज या तो यह पर्वत नहीं रहेगा अथवा नैपोलियन नहीं रहेगा “ और इस निश्चय के सामने आल्पस को झुकना पड़ा।
इस संसार में मनुष्य के लिये न तो कोई वस्तु या उपलब्धि अलभ्य है तथा न ही कोई व्यक्ति किसी प्रकार अयोग्य। अयोग्यता है तो इतनी भर कि वह स्वयं अपने को इस उपलब्धि के योग्य नहीं अनुभव करता। यदि अपनी क्षमताओं को पहचान कर उनका विकास किया जाय तथा आत्मबल की संजीवनी द्वारा उन्हें जीवन्त बनाया जाय तो मनुष्य परमात्मा का राजकुमार कहलाने की स्थिति प्राप्त कर सकता है।
स्वर्ग क्या होता है और नरक कैसा? इस प्रश्न पर दो जिज्ञासुओं में वार्ता चल रही थी। विवेचन का कुछ निर्णय न निकल सका तो दोनों सुस्ताने के लिए वन-विहार को निकल पड़े।
देखा कि एक झाड़ी में से खरगोश निकाल-निकाल कर एक अहेरी उनका कतर व्यौंत कर रहा था। थोड़ी दूर आगे चलने पर देखा कि एक लड़का अपनी झोंपड़ी के आगे बैठा कबूतर चुगाने का आनन्द ले रहा था।
उनके विवाद का प्रत्यक्ष समाधान आया। अहेरी के कृत्यों में उनने नरक और लड़के की उदारता में उनने स्वर्ग की झाँकी पाई। विवेचना की तुलना में प्रत्यक्ष दर्शन अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ।
संगीत का मनुष्य जीवन को सरस बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। यह मात्र मनोरंजन नहीं है। यदि उसे भावनाओं और प्रेरणाओं से अनुप्राणित किया जा सके तो इसका परिणाम न केवल गाने सुनने वालों के लिए वरन् सुविस्तृत वातावरण को श्रेयस्कर परिस्थितियों से भरा-पूरा बनाने में सहायक हो सकता है। मानव की कोमल भावनाओं को झंकृत, तरंगित करने और उसमें देवत्व का उदय करने में गायन वादन महती भूमिका निभा सकता है। यदि संगीत का अस्तित्व मिट जाय तो दुनिया बड़ी नीरस, रूखी और कर्कश प्रतीत होने लगेगी। सामान्य पशुओं की अपेक्षा मनुष्य को जो आनन्दमयी स्थितियाँ प्राप्त हैं उनमें साहित्य, संगीत और कला का बहुत बड़ा योगदान है।
कोलाहल और समस्याओं से घनीभूत संसार में यदि ईश्वर का कोई उत्तम वरदान मनुष्य को मिला है तो वह संगीत ही है। इससे पीड़ित हृदय को शाँति और सन्तोष मिलता है। भाव प्रवण गायन से मनुष्य की सृजन शक्ति का विकास होता और आत्मिक प्रफुल्लता मिलती है- सामूहिक संगीत के महत्व पर अनुसंधानरत चिकित्साविदों का मत है कि जब कई व्यक्ति एक साथ गाते हैं तो सब लोगों का स्वर प्रवाह एवं आन्तरिक उल्लास मिलकर एक ऐसी तरंग शृंखला उत्पन्न करता है जो वातावरण में मिलकर सबको उल्लासित कर देता है। फाल्गुन के महीने में फाग की धूम होती है तब बच्चे, बूढ़ों में भी उल्लास फूट पड़ता है और वे युवकों की तरह प्रफुल्लित दिखायी देने लगते हैं। सामूहिक गायनों में सभी को अपने प्रयत्न से अधिक ही लाभ मिलता है परन्तु उन स्वर लहरियों से वातावरण में जो प्रकंपन पैदा होता है वह व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करता है जिससे प्रत्येक श्रोता चाहे वह गाने में भाग न भी ले रहा हो, उस आनन्द सरोवर में डूब जाता है। कभी वर्षा ऋतु में भारत के गाँव-गाँव में मेघ मल्हार राग गाया जाता था जो कठोरतम हृदय में भी प्रेम और उल्लास-आनन्द का झरना प्रस्फुटित-प्रवाहित करने में सफल होता था।
गाने की धुनों के साथ हाथ-पाँव अनायास ही गति करने लगते हैं, इसका तात्पर्य ही यह है कि संगीत का मनुष्य जीवन और आत्मा से सीधा संबन्ध है। आत्मा उसके बिना कुण्ठित हो जाती है। इसलिए आत्मिक प्रगति के प्रत्येक इच्छुक को गाने और संगीत सुनने का लाभ अवश्य लेना चाहिए। वैज्ञानिकों का भी ध्यान अब इस ओर आकृष्ट हुआ है। पाश्चात्य जगत में विज्ञान की तरह ही संगीत पर भी अनुसंधान चल रहा है और अब तक जो निष्कर्ष निकले हैं वह मनुष्य को इस बात की प्रेरणा देते हैं कि यदि मानवी गुणों और आत्मिक आनन्द को जीवित रखना है तो उसे अपने आपको संगीत से जोड़े रहना चाहिए। इसकी तुलना प्रेम से की गई है। दोनों पर ही इनका चमत्कारिक प्रभाव पड़ता है।
संगीत में शरीर, मन और आत्मा तीनों को बलवान बनाने वाले तत्व परिपूर्ण मात्रा में विद्यमान हैं। इसी कारण भारतीय आचार्यों और मनीषियों ने संगीत शास्त्र पर सर्वाधिक जोर दिया है। सामवेद की स्वतंत्र रचना उसका प्रमाण है। भक्ति भावनाओं के विकास में संगीत का योगदान असाधारण है। ऋग्वेद (8/33/2) में कहा गया है - “ कि तुम यदि संगीत के साथ ईश्वर को पुकारोगे तो वह तुम्हारी हृदय गुहा में प्रकट होकर अपना प्यार प्रदान करेगा”। शास्त्रों में उल्लेख है- “स्वरेण सल्लयेत योगी “ अर्थात् स्वर साधना द्वारा योगी अपने को तल्लीन करते हैं। इस प्रकार एकाग्र की हुई मनः शक्ति को विद्याध्ययन से लेकर किसी भी उच्चस्तरीय प्रयोजन में लगाकर चमत्कारिक सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं। ईश्वर प्राप्ति का उपयुक्त साधन बताते हुए ऋग्वेद में आगे (9/85/3) में कहा गया है कि -” अनेक मनीषीगण परमात्मा की ओर संगीतमय स्वर लगाते हैं और उसी के द्वारा उसे प्राप्त करते हैं “। कार्लाइल भी कहा करते थे - “ संगीत के पीछे-पीछे खुदा चलता है।”
योगशास्त्रों में संगीत की बड़ी चर्चा है। तत्ववेत्ताओं का कथन है कि अदृश्य जगत की सूक्ष्म प्रणाली पर जिधर भी दृष्टि डालते है, उधर ही यह प्रतीत होता है कि एक दिव्य नाद से सभी दिशाएँ और विश्व भुवन झंकृत हो रहा है। यह स्वर लहरियाँ वीणा, भ्रमर, झरना, वंशी आदि की तरह सुनाई देती हैं। जिस तरह सर्प बीन की धुन को सुनकर मस्त हो जाता है, उसी तरह चित्त उन स्वर लहरियों में आसक्त होकर सभी प्रकार की चपलताएँ भूल जाता है। नाद में संलग्न होने पर मन ज्योतिर्मय हो जाता है और जो स्थिति कठिन साधनाओं से भी कठिनाई से मिलती है, वह स्वर योग के साधक को अनायास ही मिल जाती है।
अब इस संबन्ध में पाश्चात्य विद्वानों की मान्यतायें भी भारतीय दर्शन की पुष्टि करने लगी हैं। विश्व विख्यात गायक एनरिको कारुसो लिखते हैं- जब कभी गायन की मधुर स्वर लहरियाँ मेरे कानों में गूँजती, मुझे ऐसा लगता मानों मेरी आत्म चेतना किसी अदृश्य जीवन दायिनी सत्ता से सम्बद्ध हो गयी है। मैं शरीर की पीड़ा भूल जाता, भूख-प्यास और निद्रा टूट जाती, मन को विश्राम और हल्कापन मिलता। मैं तभी से सोचा करता था कि सृष्टि में संगीत से बढ़कर मानव जाति के लिए और कोई दूसरा वरदान नहीं है। कारुसो ने जीवन भर इसकी साधना की और उसमें अभूतपूर्व सिद्धियाँ पायीं। उन्होंने स्वर मधुर न होने पर भी यह प्रमाणितकर दिखाया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से होता है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जाग्रत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है। इस संदर्भ में डाँ. लीक का कथन है कि यदि संगीत को एक दैनिक शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया जा सके तो मनुष्य जाति का बहुत हित साधन हो सकता है।
प्रख्यात दार्शनिक पाइथागोरस की मान्यता थी कि संगीत स्वास्थ्य संरक्षण, चरित्र गठन और आत्मिक प्रगति के इन प्रयोजनों को पूरा कर सकने में समर्थ है। यह आत्मोन्नति का भाव संवेदनाओं के उन्नयन का मानसिक प्रसन्नता का सबसे अच्छा उपाय है, इसलिए हमेशा वाद्ययंत्र के साथ गाना चाहिए। इस सम्बन्ध में महर्षि रवीन्द्रनाथ टैगोर का कहना है- “ स्वर्गीय सौंदर्य का कोई साकार रूप और सजीव प्रदर्शन है तो उसे संगीत ही होना चाहिए।” वे कहा करते थे- “ संसार मुझसे चित्रों में बात करता है - मेरी आत्मा के उत्थान, चरित्र की दृढ़ता और सुरुचि के विकास का महत्वपूर्ण साधन माना है।
संगीत की प्रेरणा और प्राण शक्ति इतनी महत्वपूर्ण एवं क्षमता सम्पन्न है कि इसके उपयोग से निराश जीवन को आशा और सन्तोष तथा व्यथित ओर परिक्लान्त जीवन को शाश्वत शान्ति की ओर अग्रसर किया जा सकता है। विद्वान ए.हन्ट के अनुसार संगीत टूटे हुए हृदय की औषधि है। कहा जाता है कि विश्वविख्यात भौतिकविद् आइन्स्टीन ने जब अपने आविष्कारों का दुरुपयोग परमाणु विभीषिका के रूप में देखा तो वह अन्दर से टूट गये। निराश जीवन के अंतिम क्षणों को उन्होंने वायलिन वादन के सहारे काटा। मानसिक एकाग्रता और जागरुकता के विकास में गायन वादन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है।
हास्य रस, वीर रस, श्रृंगार रस, शान्त रस आदि नौ रस गायन के माने गये हैं। उनके लिए विशेष राग–रागनियां और विशेष समय का निर्देश किया गया है। समय, राग और रस - इनके संमिश्रण से एक विशेष प्रकार का ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है और उससे अनेकों मानसिक रोगों की चिकित्सा हो सकती है। प्रातः काल गाये जाने वाले राग भारती और राग भैरवी आदि से भक्ति रस का प्रादुर्भाव होता है जिससे स्वास्थ्य और मानसिक शुद्धता की प्राप्ति होती है। संगीत सुनकर कई व्यक्तियों को वैराग्य हो जाता है। युद्धों में तो वीर रस युक्त संगीत का सदा से प्रयोग होता रहा है। सैनिकों में शौर्य, साहस एवं लड़ने का उत्साह पराक्रम जगाने में वाद्यों की उपयोगिता सदैव स्वीकारी जाती रही है। युद्ध वाद्यों की शृंखला में अब ऐसे वाद्य उपकरणों का भी आविष्कार कर लिया गया है जिनकी ध्वनि प्रवाह से सैनिकों को मानसिक रूप से पंगु बनाया जा सकता है। महाभारत के सूत्रधार भगवान कृष्ण ने स्वयं पाँचजन्य नामक शंख बजाकर कौरव दल का दिल दहला दिया था।
मनुष्यों तक ही संगीत का प्रभाव सीमित नहीं है वरन् उसे पशु-पक्षी भी बड़े चाव से पसन्द करते है और प्रभावित होते हैं। गायन-वादन सुनकर प्रसन्नता व्यक्त करना और उसका आनन्द लेने के लिए ठहरे रहना यही सिद्ध करता है कि तुच्छ समझे जाने वाले प्राणियों को भी वह रुचिकर एवं उपयोगी प्रतीत होता है। बीन की धुन पर सर्पों एवं हिरन-मृगों के नाचने-सम्मोहित होने की बात सर्वविदित है। नारद संहिता में कहा भी गया है -” पक्षी, भ्रमर, पतंगे, मृग आदि जीव-जन्तुओं को भी संगीत से प्रेम होता है। संगीत ब्रह्मांड व्यापी है।”
देखा गया है कि बेहिसाब उछल- कूद करने वाले चंचल प्रकृति के चूहा को भी मधुर वाद्ययंत्र मंत्र मुग्ध कर चुप कर देते हैं। मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डाँ. जार्ज केरविट्स ने पियानो की मधुर ध्वनि सुनाकर चूहों को शान्ति पूर्वक पड़े रहने के लिए बाधित करने के कितने ही प्रयोग किये हैं। सील मछली का संगीत प्रेम प्रसिद्ध है। कुछ समय पूर्व पुर्तगाल के नाविक वायलिन की धुन सुना-सुना कर इन मछलियों को आकर्षित करते थे। नाव के इर्द-गिर्द मंत्र मुग्ध एकत्र मछलियों को तब वे आसानी से पकड़ लेते थे। वन विशेषज्ञ जार्ज हृस्टे ने अफ्रीका के काँगो के जंगलों में पाये जाने वाले चिंपेंजी तथा गोरिल्ला जाति के बंदरों को वाद्ययंत्रों के साथ गायन के प्रति सहज ही आकर्षित होने वाली प्रकृति का पाया है। उनमें से कितनों को उनने इसके प्रभाव से पालतू जैसी स्थिति का अभ्यस्त बनने में सफलता पाई है। दुधारू पशुओं को दुहते समय सरस ध्वनि के प्रभाव से अधिक दूध देते देखा गया है।
संगीत का कठोर मन वालों पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। त्रावणकोर के प्रसिद्ध वायलिन वादक कडिवेल्लु के जीवन में घटित एक घटना से इस तथ्य को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। वह प्रवास में कहीं जा रहे थे कि रास्ते में डाकुओं ने उन्हें लूट लिया। किसी तरह अनुनय विनय करके उनने डाकुओं से अपना वायलिन वापस ले लिया और वहीं बैठकर बजाने लगे। स्वर लहरी पर विमोहित डाकू भाव–विभोर हो गये और लूटा हुआ सारा सामान उन्हें लौटा दिया। कडिवेल्लु को कई दिन अपने साथ रखकर उस वादन का रसपान करते रहे और अन्त में बहुत सा पुरस्कार देकर ससम्मान उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। वस्तुतः संगीत से मनुष्य की किसी भी भावना को उत्तेजित किया जा सकता है और समाज में व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। युवकों के चरित्र निर्माण में इसे एक अत्यन्त प्रभावशाली साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
यहाँ यह स्मरण रखने योग्य है कि संगीत की उपयोगिता तभी है जब उसे उच्च उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया जाय। कलाएँ दुधारी तलवार के समान है यदि उन्हें पशु प्रवृत्तियों को भड़काने के लिए काम में लिया जाय तो वे घातक भी कम सिद्ध नहीं होती। प्रायः आज यही स्थिति है। सस्ते सिनेमा संगीत ने उन महान शास्त्रीय उपलब्धियों को एक तरह से नष्ट करके रख दिया है। स्वर और लय की गति में बंधे भारतीय जीवन की समस्वरता जो तब थी, अब वह कल्पना मात्र रह गई है। संगीत के दुरुपयोग ने आज समाज में अवाँछनीय परिस्थितियाँ उत्पन्न की हैं वह कामुकता एवं कुत्साओं का पर्यायवाची बनता जा रहा है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि गायन-वादन के सनातन स्वरूप को स्थिर रखने के पूरे प्रयत्न किये जांय एवं उसे सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त होने दिया जाय।
संगीत की स्वर लहरियों में असाधारण शक्ति है। उसका दुरुपयोग करके जनमानस और समाज को दिग्भ्रान्त किया जा सकता है और सदुपयोग करके लोगों को कल्याण की प्रगति की दिशा में भी अग्रसर किया जा सकता है। कभी सूरदास, मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु जैसे महान संतों ने इस सम्मोहिनी शक्ति का सदुपयोग करके जन-जन के मन में उत्कृष्टता के भक्ति भाव के बीज बोये थे। लोगों को अपने गुण कर्म स्वभाव को परिष्कृत करने को प्रेषित किया था। उनने गायन को सदाशयता से जोड़ा और उसे नीति सदाचार एवं मर्यादा पालन का पक्षधर बनाया था। सद्भावनाओं को उत्प्रेरित एवं विकसित करने वाला नृत्य एवं संगीत का सनातन तथा उज्ज्वल पक्ष ही ग्राह्य है। गायन-वादन, गीत-संगीत निश्चित रूप से प्रसन्नता की अभिवृद्धि करते हैं। इससे जहाँ शरीर को स्फूर्ति और बल की प्राप्ति होती है, वहीं हृदय, स्नायुओं, मन और भावनाओं को भी स्निग्धता से अनुप्राणित होने का अवसर मिलता है। मानसिक तनावों के निराकरण की यह अचूक औषधि भी है। सरस एवं भाव प्रधान गीत, भजन, कीर्तन, प्रार्थना आदि मानव हृदय को तरंगित कर उसमें दया, प्रेम, करुणा, उदारता, ममता, आत्मीयता, सेवा और सद्गुणों को जीवन का अनिवार्य अंग बना लेने पर तो आत्मिक कायाकल्प ही हो जाता है। संगीत आत्मा की प्यास है। इसके सुनियोजित उपयोग द्वारा जन-जन के मन को तरंगित कर सत्प्रेरणाएँ उभारी जा सकती हैं। यही नहीं मनोरोगों, मनोविकार, तनाव जैसी आधुनिक व्याधियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण चिकित्सा पद्धति भी है। ब्रह्मवर्चस ने इस अनुसंधान को अपनी शोध प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग बनाया है।
एक गाँव में किसी लड़के का विवाह था। ज्योंनार धूमधाम से हुई। जब हलवाई पकवान बना रहे थे तो घर की पालतू बिल्ली के मुंह में पानी आ रहा था। वह रोके न रुकती थी और दौड़-दौड़ कर रसोई घर में घुस जाती थी। अन्त में घर मालकिन ने गुस्से में ड़ाले के नीचे दबा दिया। ताकि भागदौड़ न करे। जूठन न करे।
घर के सब लोग काम में लग गये किसी को बिल्ली की याद न रही। कई दिन बन्द रहने के कारण वह मर गई। जब विवाह होकर वर वधू घर आये तो बिल्ली की याद आई उसे निकाला गया। जब वधू घर में प्रवेश कर रही थी। उसी समय मरी बिल्ली को बाहर पहुँचाया गया। इस संयोग को वधू ने समझा कि यह इस कुल की परम्परा है कि जब वधू प्रवेश करे तो बिल्ली मार कर उसे बाहर निकाला जाय। इसे उसने सदा स्मरण रखा।
कई वर्ष बीत गये। वधू के लड़का हुआ। बड़ा होने पर उसके विवाह का प्रबंध हुआ बारात गई। वधू वर वापस आये। सास ने बिल्ली मरवाई और जिस समय वधू का गृह प्रवेश हुआ, उसी समय मरी बिल्ली को बाहर फिकवाया गया।
यह परम्परा कई पीढ़ी तक चली। समझदार वर वधू का विवाह हुआ तो उनने उस विचित्र प्रथा के कारण का पता लगाया। विदित हुआ कि एक बार की गलती को ही परम्परा माना और उसका दुहराया जाना चल पड़ा है।
समझदार इकट्ठे हुए और उस मूर्खता पूर्ण परिपाटी को बन्द कर दिया गया।
हम शताब्दियों से अपने खाने में नमक का प्रयोग करते आ रहे हैं पर यह सोचने की कभी आवश्यकता अनुभव नहीं की कि भोजन में इसकी क्या उपयोगिता हैं? बायोकैमिस्ट यंग कोलियर ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर बताया है कि पूर्व काल में भूमि में पोटेशियम और सोडियम की मात्रा में ठीक-ठीक संतुलन था। पर सहस्रों वर्ष की वर्षा ने अधिक घुलनशील सोडियम लवणों को धो बहाया। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि भूमि से उत्पन्न खाद्य पदार्थों में पोटेशियम की वृद्धि तथा सोडियम की कमी हो गयी।
मानव और मानवेत्तर प्राणी इस अभाव को पूर्ण करने हेतु आतुर हो उठे। आखिर उन्हें एक चीज मिली-सोडियम क्लोराइड अथवा नमक। यह जितनी सस्ती थी, उतनी ही स्वास्थ्य के लिये खतरनाक पर व्यक्ति स्वाद के लिये अखाद्य वस्तुओं को भी खाने को तैयार हो जाता है जैसे शरीर में कैल्शियम के अभाव को कैल्शियम क्लोराइड से पूर्ण नहीं कर सकते वैसे ही प्राकृतिक सोडियम की कमी नमक खाकर पूरी नहीं की जा सकती है।
शरीर के पाचन यंत्रों के लिये इस प्रकार के रासायनिक पदार्थ हानि कारक है क्योंकि उन्हें कोषाणु खपा नहीं पाते। जब नमकीन भोजन किया जाता है तो थोड़ी देर बाद काफी प्यास लगती है। पाचन तंत्र गुर्दे के मार्ग से उसे बाहर निकालने के लिये तत्पर हो जाते है। इसे आमाशय तंत्र की श्लेष्मिक झिल्ली पर चोट पहुँचती है। शरीर के सब अंगों में गुर्दे को ही नमक से ही अधिक हानि होती है। नमक खाने से गुर्दे के अनेक रोगों को जन्म तो मिलता है। गुर्दे के रोगी जब चिकित्सक के पास पहुँचते है तो परहेज में सबसे पहले नमक ही बन्द किया जाता है।
यदि नमक की मात्रा इतनी अधिक है जिसे गुर्दे बहाकर बाहर निकाल पाते तो वह पैर निचले भाग में जमा हो जाता है। पानी एकत्र होने लगता है उनमें सूजन और दर्द शुरू हो जाता है। नमक रासायनिक प्रणाली में गड़बड़ी पैदा करता है। हृदय की गति तथा रक्तचाप में वृद्धि हो जाती है। कितने ही हृदय रोग ऐसे हैं जिनमें नमक की अल्प मात्रा भी बहुत हानिकारक होती है। शरीर इसका कोई उपयोग नहीं करता क्योंकि इसमें किसी प्रकार का पोषक तत्व नहीं होता। इससे मिरगी तथा पक्षाघात की प्रवृत्ति में वृद्धि होती है। नमक स्नायविक प्रणाली को उत्तेजित करता है।
आहार विशेषज्ञ चिकित्सक रेमाण्ड बर्नार्ड नमक को भोजन नहीं मानते। जिस तरह किसी औषधि विक्रेता की दुकान में रखे पोटेशियम क्लोराइड का प्रयोग तर्क संगत नहीं कहा जा सकता। वही स्थिति भोजन के लिये नमक की भी है।
पक्षियों के लिये नमक एक प्रकार का विष है। नमक की अधिक मात्रा खाने से मृत्यु हो जाती हैं। नमक न खाने वाले व्यक्ति के लिये वह वस्तु उतनी ही आपत्तिजनक है जितनी सिगरेट न पीने वाले व्यक्ति के लिये उसका धुँआ या तम्बाकू न खाने वाले के लिये तम्बाकू।
नमक का प्रयोग बिल्कुल बन्द करने की बात भले ही अस्वाभाविक लगे पर इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि शरीर को जितने सोडियम क्लोराइड की आवश्यकता हो उतनी प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के रूप में ही मिलनी चाहिये तभी शरीर के सेल उसे जज्ब कर सकते हैं। अध्यात्म की दृष्टि से भी नमक का प्रयोग रसना के असंयम को बढ़ावा ही देता है। संयमी ही आत्मिक प्रगति कर पाते हैं। अतः उस दिशा में आगे बढ़ना हो तो भी नमक का प्रयोग यथा संभव कम ही करना चाहिए।
बिहार प्रान्त में हमतपुर नाम की कभी बहुत शानदार रियासत थी। अब तो उसके ध्वंसावशेष ही रह गये हैं। इन खँडहरों में से कभी-कभी एक क्षीण काया वाले साधु की मूर्ति आसमान में उड़ती दिखाई पड़ती है और भीतर प्रवेश करने पर यह भी प्रतीत होती है कि इसमें कोई आदमी रहता है। पानी का भरा घड़ा, बुहारी, मटका आदि वस्तुएँ न जाने किसके लिए इकट्ठी हुई है।
कहते हैं कि एक राजा साहब सिंहासनारूढ़ थे तब उनकी प्रेरणा से उस साधु ने तांबे से सोना बनाने का प्रयोग किया था पूरा होने से पूर्व ही वह गलती से कढ़ाव में गिर कर प्राण गँवा बैठा था। साधु की आत्मा को इस असफलता पर बड़ा क्लेश हुआ। वह अभी तक प्रेत रूप में उस खँडहर में विचरता देखा जाता हैं।
जागृत अवस्था की तुलना में सुषुप्ति को प्रायः कम महत्व दिया जाता हे और स्वप्नों को विसंगत कल्पनाओं का झुण्ड समुच्चय या अकारण कौतूहल और असमंजस में डालने वाली मृग मरीचिका मात्र समझा जाता है। जबकि वास्तविकता कुछ और है। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं परीक्षणों के आधार पर अब यह प्रमाणित हो चुका है कि स्वप्नों के पीछे भी तथ्य और रहस्य सुनिश्चित रूप से छिपे होते हैं। वे अपनी साँकेतिक भाषा में प्रतीकात्मक लिपि में भूत, वर्तमान तथा भविष्य से जुड़े घटनाक्रमों, समस्याओं के संबंध में महत्वपूर्ण संकेत दे जाते हैं। परोक्ष दर्शन, भविष्य बोध, इन्द्रियातीत अनुभूतियों के भी वे माध्यम हैं। स्वप्न हमें अपने अंतर्मन का परिचय देते है और चेतनात्मक परिष्कार का द्वार खोलते हैं। उनके आधार पर मिलने वाली जानकारियों के सहारे आन्तरिक स्तर को सुधारने, सँभालने का प्रयत्न किया जाय तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि हो सकती है।
आध्यात्मिक मान्यता यह है कि स्वप्न पूर्व और वर्तमान जन्मों के संस्कारों और कर्मों के फलस्वरूप दिखाई देते हैं और उनका कुछ न कुछ आशय और परिणाम भी अवश्य होता है। इनमें से अधिकाँश तो व्यर्थ होते हैं और उनमें भूतकालीन घटनाओं का स्फुरण भर होता है पर प्रातः काल ब्राह्ममुहूर्त में देखे गये स्वप्नों में से अधिकाँश ऐसे होते हे जो निकट भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का संकेत देते है। अधिकाँश भारतवासी तो उनको शुभाशुभ घटनाओं का सूचक मानते हैं और उनकी यथार्थता में विश्वास रखते हैं।
स्वप्नों की भाषा भी ऐसी है जिन्हें निरर्थक नहीं समझा जाना चाहिए। जिस प्रकार दर्पण के सहारे हम अपना चेहरा देख सकते हैं, उसी प्रकार स्वप्नों के आधार पर शरीर और मन की भीतरी परत किस स्थिति में है उसकी झाँकी कर सकते हैं। मोटी परख तो उथली जानकारियाँ दे पाती हैं। उनके आधार पर सामान्य स्वास्थ्य, प्रत्यक्ष कष्ट, हर्ष, शोक जैसे प्रत्यक्ष विवरण ही विदित होते हैं। पर इतना ही सबकुछ नहीं है। सूक्ष्म भी बहुत कुछ हैं और वह इतना है कि स्थूल से भी भारी समझा जा सकता है। इसे सही स्थिति में जानकर भावी स्वास्थ्य संकट और मानसिक विग्रह से सहज ही बचा जा सकता है। स्वप्नों का विश्लेषण यदि किया जा सके और उनके आधार पर निकलने वाले निष्कर्षों से अवगत रहा जा सके तो उसे आत्मज्ञान का एक महत्वपूर्ण प्रगति सोपान ही कहा जायेगा।
गेस्टाल्ट साइकोलॉजी के अनुसार स्वप्न मानवी व्यक्तित्व के अपष्कृत व्यापार अनगढ़ स्वभाव के संकेतक होते है। यह अचेतन मन द्वारा दिये गये वह अनुदान हैं जिसके सहारे व्यक्ति अपनी कमजोरियाँ विसंगतियों को ढूंढ़कर अलग कर सकता है और व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से विकसित कर बन्धनों से छुटकारा पा सकता है। इस सिद्धान्त के आधार पर मनः चिकित्सकों ने गेस्टाल्ट थैरेपी नामक एक चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है। डाँ. फ्रेडरिक ए. पर्ल्स इसके विशेषज्ञ माने जाते है। उनका कथन है कि स्वप्न संकेत जीवन की यथार्थ स्थिति को प्रकट करते हैं। इसके आधार पर मानसिक बीमारियों का भी उपचार किया जा सकता है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ गेस्टाल्ट थेरेपी वर्बैटिम “ में उन्होंने कुछ ऐसे सूत्रों का निर्धारण किया है जिनके अनुसार अभ्यास करने पर रचनात्मक स्वप्न देखे जा सकते हैं तथा उसके आधार पर व्यक्तित्व को विकसित किया जा सकता है।
सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी हैवलाक एलिस ने स्वप्नों का गहन अध्ययन किया है और निष्कर्ष निकाला है कि - प्रत्येक स्वप्न अतीत की अनुभूतियों और दैहिक संवेदनाओं, विकारों का संयुक्त परिणाम होता है। स्वप्न यह स्पष्ट करते है कि हमारा चेतन मन हमारी भावनाओं के हाथ का खिलौना मात्र है। इस संबन्ध में स्वप्नशास्त्री कार्लशेरनल का कथन है कि शरीर या मन का प्रत्येक विक्षोभ एक विशिष्ट स्वप्न को उत्पन्न करता है। यह तथ्यों पर आधारित तो होते हैं पर उसकी सीमा में ही बंधे नहीं होते। उनमें कल्पनात्मक उड़ान भी भरपूर होती है। वस्तुतः मन-मस्तिष्क पर पड़ने वाले विभिन्न दबावों, इच्छाओं, वासनाओं के आघातों -प्रतिघातों से उत्पन्न स्वप्न दृश्य ही इस कोटि में आते हैं।
मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ्रायड ने अपनी पुस्तक - “द इन्टर’-प्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स “ में लिखा है कि स्वप्न इच्छा पूरक होते हैं और भूतकालीन समस्याओं के लिए नाटक की तरह हैं अर्थात् मनुष्य दिन में जो कुछ सोचता और करता है, उनमें से कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें वह बहुत चाहता है पर कर नहीं पाता, यद्यपि वह उन पर विचार कर चुका होता है। इसलिए उस दमित विचार की फोटो प्रिन्ट अचेतन मस्तिष्क में बन जाती है और रात को मनुष्य जब सोता है तब वही दृश्य उसे स्वप्न की तरह दिखाई देने लगते हैं। अपनी दूसरी पुस्तक - “ द इमरजेन्स एण्ड डेवलपमेन्ट ऑफ साइकोऐनालीसिस” में उन्होंने कहा है कि प्रत्येक स्वप्न अतीत की अनुभूतियों, संवेदनाओं एवं विकारों का संयुक्त परिणाम है। इसमें मनुष्य अपनी दबी हुई कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं की पूर्ति करता है।
यद्यपि हमारे अधिकाँश हल्के स्वप्न सचमुच शरीर की गड़बड़ी, मन की दबी हुई इच्छाओं के द्योतक होते हैं किन्तु इसका सम्पूर्ण क्षेत्र यहीं तक सीमित नहीं अन्यथा जा स्वप्न भविष्य में शत प्रतिशत सत्य हो जाते है, उनका रहस्य क्या है? इस तथ्य का उद्घाटन करने वाले प्रख्यात मनः शास्त्री कार्ल गुस्ताव जुँग ने फ्रायड के विचारों का खंडन करते हुए अपनी पुस्तक -” मैमोरीज ऑफ ड्रीम्स रिफलैकसन्स “ में कहा कि दैनिक घटनाओं और संवेदनाओं का प्रभाव स्वप्नों में रहता तो है पर वे इतने तक ही सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार ज्ञान प्राप्ति के जितने साधन चेतन मस्तिष्क को प्राप्त हैं उससे कहीं अधिक विस्तृत और कहीं अधिक ठोस साधन अचेतन सत्ता को उपलब्ध हैं। चेतन मस्तिष्क दृश्य, श्रव्य तथा अन्य इन्द्रिय अनुभूतियों के आधार पर ज्ञान संग्रह करता है, पर अचेतन के पास तो असीम साधन हैं। वह ब्रह्मांड-व्यापी शाश्वत चेतना के साथ सम्बद्ध होने के कारण अन्तरिक्ष में प्रवाहित होते रहने वाले ऐसे संकेत कम्पनों को पकड़ सकता है जिनमें विभिन्न स्तर की असीम जानकारियाँ भरी पड़ी हैं। मनुष्य की अनुभूतियाँ उनसे प्रभावित होती है और वह प्रभाव व्यक्ति की निज की स्थिति के साथ सम्मिलित होकर परिचय स्वप्न संकेतों में मिल जाता है। सुप्रसिद्ध मनः शास्त्री डब्ल्यू.स्टेकेल ने भी - “हाऊ टू अन्डरस्टैण्ड योर ड्रीम्स “ तथा “ टैक्नीक ऑफ एनालीटिकल साइकोथेरेपी “ नामक पुस्तकों में जुँग के प्रतिपादन का समर्थन किया है और कहा है कि स्वप्न अंतर्मन की समस्याओं को सुलझाने वाले संकेत सूत्र होते हैं।
मनः शास्त्री जी.एच.मिलर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “ द डिक्शनरी ऑफ ड्रीम्स “में दस हजार स्वप्न - संकेतों का विशद रूप से विवेचन किया है। उनके अनुसार प्रायः मानवी मन विषय, वासनाओं, भौतिक लिप्साओं में ही निमग्न रहता है अतः उसे उसी तरह के स्वप्नों का आभास मिलता है। यदि वह आत्मा की ओर उन्मुख हो और उसकी आवश्यकता को भी जान सके आध्यात्मिकता की ओर मुड़े तो उसे तदनुरूप उच्चस्तरीय स्वप्न संकेत भी मिल सकते हैं जो जीवनोत्कर्ष के मार्ग में मील के पत्थर सिद्ध हो सकते हैं। श्रद्धायुक्त स्वच्छ, पवित्र मन वाले उपासक आत्मचिन्तन करते हुए सार्थक स्वप्न देख मानव कल्याण का हेतु बन सकते है।
सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी नेरियस ने स्वप्नों का गहन अध्ययन किया हैं और इसका विशद वर्णन अपनी पुस्तक - स्वप्न और उनका आशय में किया है। स्वप्न कैसे होते है? क्यों होते हैं? कितने प्रकार के होते हैं? और इनका जीवन में क्या महत्व है? आदि विषयों पर उन्होंने पूर्ण प्रकाश डाला है। उनके अनुसार स्वप्न एक व्यक्तिगत संदेश वाहक होते हैं जो जीवन को दिशा निर्देश और संदेश देते हैं वे हमारे सहयोगी साथी एवं मार्गदर्शक की तरह होते हैं जिनके निर्देश को यदि समझा जा सके तो अपने आपको ऊपर उठाया जा सकता है प्रतिभा एवं व्यक्तित्व सम्पन्न बना जा सकता है। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनने लिखा है कि ऐसे कितने ही व्यक्ति हुए हैं जिन्हें स्वप्नों में ही दिशा निर्देश और सूझबूझ प्राप्त हुई और उसका लाभ उठाकर वे विश्वविख्यात विद्वान, लेखक, कलाकार या राजनेता बने। संसार प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्य - “ पिल्ग्रिमप्रोग्रेस “ को जान बनियन ने स्वप्न के आधार पर ही लिपिबद्ध किया था। इसी प्रकार शेक्सपियर ने - दी टैम्पेस्ट, मैकवेथ, हैमलेट, मिडसमर नाइट ड्रीम जैसे ग्रन्थों की रचना स्वप्न में मिले विचार संकेतों के अनुसार की। ऐतिहासिक दृष्टि से भी स्वप्न बड़े उपयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध हुए हैं और ऐसे व्यक्ति इतिहास में अमर हो गये हैं। उनके नाम है - हिटलर, एलेक्जेंडर द ग्रेट, जूलियस सीजर, जोन ऑफ आर्क, नैपोलियन, विसमार्क आदि जिन्होंने अचेतन के संकेतों समझा और उनका अनुसरण करके अपने युग की परिस्थितियों को ही बदल दिया। आइन्स्टीन, केकुले, फ्रेंकलिन, न्यूटन जैसे कितने ही प्रख्यात वैज्ञानिकों को उनके आविष्कारों की जानकारियाँ स्वप्नों में ही मिली थी।
कई बार स्वप्न ऐसे प्रेरक होते हैं कि उनके प्रकाश में मनुष्य का जीवन क्रम ही बदल जाता हे। भगवान बुद्ध तब राजकुमार थ। नव-यौवन में प्रवेश ही किया था। एक दिन उनने स्वप्न देखा कि श्वेत वस्त्रधारी एक वयोवृद्ध दिव्य पुरुष आया और उनका हाथ पकड़कर श्मशान ले पहुँचा। अँगुली का इशारा करते हुए उसने दिखाया- देखो! यह तुम्हारी मृत देह है। इस तथ्य को समझो और जीवन का सदुपयोग करो। आँख खुलते ही बुद्ध विह्वल हो गये और उनने निश्चय कर डाला कि इस बहुमूल्य सौभाग्य का उन्हें किस प्रयोजन के लिए, किस प्रकार उपयोग करना है। वे राज-पाट छोड़कर सत्य की खोज में चल पड़े और अन्ततः उन्होंने उसे प्राप्त कर भी लिया।
स्वप्नों का सत्य होना इसका स्पष्ट प्रमाण है। उनकी सार्थकता तभी है जबकि हम आत्मा की प्रगति के मूल में मन के महत्व को समझें और उसे शुद्ध- पवित्र बनाने के संकल्पों और साधनाओं का अभ्यास करें। कारण शक्ति का केन्द्र अंतर्मन है। वहीं समूचे व्यक्तित्व का संचालन करता है। उसकी उत्कृष्टता-निकृष्टता के अनुरूप ही स्वप्न आते है। स्वप्न विज्ञान के आधार न केवल शारीरिक दुर्बलता एवं रुग्णता को समझा और हटाया जा सकता है, वरन् चेतना की परतों के संबन्ध में भी उनसे महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है। तदनुरूप आत्म परिष्कार की उपयुक्त पृष्ठभूमि भी बनाई जा सकती है।
वस्तुतः जितनी रहस्यमयी यह प्रकृति है, उतनी ही विलक्षण मस्तिष्कीय चेतन सत्ता है। मनुष्य की श्रेष्ठता, निकृष्टता का मूल्याँकन इसी आधार पर किया जा सकता है कि शुद्ध स्थिति में प्राप्त मन पर परिवेश, संस्कारों एवं भरीपूरी विधा किन्तु सत्यान्वेषी वैज्ञानिकों को इसके अनावरण की चुनौती स्वीकार करनी ही चाहिए।
एक तपस्वी ने ब्रह्माजी की आराधना की। उससे प्रसन्न होकर वे वरदान देने आये। तपस्वी ने इन्द्रासन और उसका वज्र माँगा।
ब्रह्माजी उसकी क्षुद्रता स्वार्थपरता और बाल बुद्धि पर खिन्न होकर वापस चले गये। जिसकी यश लिप्सा और महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ी-चढ़ी हो वह तपस्वी कैसा।
तपस्वी को अपनी भूल प्रतीत हुई। उसने जाना कि मात्र कर्मकांड और शरीर शोषण ही तप नहीं है। उसके लिए मन का शोधन भी आवश्यक है।
उसने नये सिरे से नया तप प्रारम्भ किया जिसमें मन का परिशोधन प्रमुख था। ब्रह्माजी दुबारा आयें। साथ में वे इन्द्रासन और वज्र भी लाये। वरदान के संबन्ध में पूछा। तपस्वी ने कहा अहंकार और लिप्सा को बढ़ाने वाले वे पूर्ण याचित साधन सुख अब निरर्थक प्रतीत होते हैं। मुझे तो ब्रह्मपरायणता चाहिए।
ब्रह्माजी अबकी बार पूर्ण संतुष्ट थे। उनने उसकी नई कामना पूर्ण की।
राजा ने मंत्री से कहा- मेरा मन प्रजाजनों में से जो वरिष्ठ हैं उन्हें कुछ बड़ा उपहार देने का हैं। बताओ ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहाँ से और किस प्रकार ढूंढ़ें जाय?
मंत्री ने कहा - सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं, पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टाँग पकड़कर खींचते हैं। न खुद कुछ पाते हैं और न दूसरों को कुछ हाथ लगने देते हैं। ऐसी दशा में आपकी उदारता को फलित होने का अवसर ही न मिलेगा।
राजा के गले वह उत्तर उतरा नहीं। बोले! तुम्हारी मान्यता सच है यह कैसे माना जाय? यदि कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हो तो करो। मंत्री ने बात स्वीकार करली और प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बना ली। उसे कार्यान्वित करने की स्वीकृति भी मिल गई।
एक छः फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खड़े होने की जगह थी।
घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आवेगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा।
बीसों प्रथम चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दीखता उसकी टाँगें पकड़कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुँह गिर पड़ता। इसी प्रकार सबेरे आरम्भ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गयी। बीसों को असफल ही किया गया और रात्रि होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।
मंत्री ने अपने मत को प्रकट करते हुए कहा - यदि यह एकता कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सकें। एक दूसरे की टाँग खींचते रहे और सभी खाली हाथ रहे।
संसार में प्रतिभावानों के बीच भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती हैं और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गँवा देते है।
अस्तु उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।
समर्थ गुरु रामदास की बालक शिवाजी पर दृष्टि पड़ी। बालक का शरीर तो दुर्बल था पर उसमें आदर्श का निर्वाह करने के लिए साहस बहुत दिखा। समर्थ की इच्छा थी कि उसे आत्मबल का अनुदान देकर देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित भाव से काम करने के लिए तैयार करें। शिवाजी से संपर्क बढ़ाया और वह समर्थ के सत्संगों में आने लगा। उसके साथ घनिष्ठता भी बढ़ी। लगा यह लड़का काम का है। और उपयुक्त प्रयोजन में उसे जुटाया जा सकेगा।
फिर भी उनकी पात्रता परखने का निश्चय किया। कुपात्र के हाथ जो भी लगे वह उसका दुरुपयोग ही करता है। इसलिए अपनी दैवी शक्ति प्रदान करने से पूर्व उसे ठोक बजा लेने की बात उनके मन में आई। वैसी ही योजना भी बनाई।
एक दिन उनने आँख के दर्द का बहाना बनाया और कहा पीड़ा इतनी अधिक है कि जल्दी ही उपचार न हुआ तो आँखें चली जायेंगी।
शिवाजी ने कहा - हम लोग तो अनभिज्ञ है। आप ही कोई उपाय बताएँ। उसे पूरा करने का हर समीप प्रयत्न करेंगे।
समर्थ ने कहा - सिंहनी का दूध चाहिए उसे आंजा जाय तो आंखें अच्छी हो सकती है। सामने वाली पर्वत की एक गुफा में एक सिंहनी ने बच्चे दिये है। कोई वहाँ जाय और सिंहनी का दूध लाए तो काम चले। उसका इशारा शिवाजी को वह कर दिखाने की ओर था।
शिवाजी तैयार हो गये। लोटा लेकर उसी गुफा की ओर निर्भयता पूर्वक बढ़ने लगे। रास्ते में यही सोचते जा रहे थे। सिंहनी ने आक्रमण करके मार डाला तो भी हर्ज नहीं, परमार्थ के निमित्त जीवन जाने से बड़ा सदुपयोग उसका क्या हो सकता है।
सिंहनी बच्चों को दूध पिला रही थी। शिवाजी ने उससे मन ही मन प्रार्थना की वह भी इतनी कृपा करे कि गुरु कि आँखें बच सकें। दूध का पात्र आगे बढ़ाकर दुहना आरंभ कर दिया। सिंहनी शान्त भाव से पड़ी रही। शिवाजी ने दूध लिया। बच्चों ने भी कोई बाधा न पहुँचाई।
दूध लाकर शिवाजी ने गुरु को दिया उनने उसमें से थोड़ा सा लगाकर कहा - आँखें अच्छी हो गई। दर्द चला गया सिंहनी भी उनने अपनी सिद्धि द्वारा उत्पन्न की थी। दूध लाना तो शिवाजी के साहस और परमार्थ की परीक्षा भर थी, जिसमें वे उत्तीर्ण हुए।
समर्थ ने कभी बार न चूकने वाली, कभी हार कर न लौटने वाली भवानी तलवार उन्हें अनुदान स्वरूप दे दी और देश की स्वतंत्रता के लिए संगठन बनाने और संघर्ष करने का आदेश दिया। इतने महत्वपूर्ण कार्य हेतु जिस श्रेणी की चयन प्रक्रिया की अनिवार्यता थी, वह संपन्न हो चुकी थी।
हर अनुदान-उपहार को सस्ती कीमत पर कौड़ी के मोल खरीदने का दिवा स्वप्न देखने वालों को यह समझना चाहिए कि दैवी अनुकम्पाएँ सत्साहसी को ही हस्तगत होती है। पी0 एम॰ टी0 किए बिना मेडिकल कॉलेज में भर्ती नहीं होती। गुरु की कड़ी परीक्षा पर खरे उतरने पर ही विवेकानन्दों पर शक्तिपात होता है एवं शिवाजियों को भवानी तलवार मिलती है। यह एक शाश्वत एवं सुनिश्चित सत्य है। स्रष्टा की यही व्यवस्था भी है।
पोखर का जल सूखता जा रहा है। कही बाहर से कोई जलधारा आकर मिलने को तैयार न थी। वर्ष का भरा जल कितने दिन काम देता। गर्मी की प्रचंडता बढ़ते ही रहा बचा जल भी सूखकर समाप्त होने लगा।
पोखर ने समीपवर्ती नदियों के पास संदेश भेज कि वे समुद्र को इतनी लम्बी यात्रा करके इतना जल पहुँचाती है तो मुझ दीन-हीन की सहायता के लिए थोड़ा सा मोड़ क्यों नहीं ले लेती।
सभी नदियों के एक जैसे उत्तर पोखर के पास पहुँचे। तुमने अपना जल अपने छोटे दायरे में ही सीमित रखा। किसी को देने के लिए आगे नहीं बढ़ी। जबकि समुद्र अपना बादलों के माध्यम से धरती के कोने-कोने में पहुँचाता है। उससे सभी प्राणी तथा वनस्पति समूचे लाभ उठाते हैं। ऐसे उदार चेता के लिए ही हम सब दौड़-दौड़कर उसे अपना समर्पण करने पहुँचती है। क्या तुममें ऐसी कुछ उदारता है?
पोखर क्या जवाब देती उसे आपाधापी ही खाये जा रही थी। सूर्य की तेज किरणों ने उसे गर्मी के पहले चरण में सुखा दिया।
समझा जाता है कि भगवान के विशिष्ट अनुदान का उपहार सिर्फ मनुष्य को मिला है और अन्य मानवेत्तर वाणियों की उपेक्षा कर दी गई है, पर गंभीरतापूर्वक विचार करने पर ज्ञात होगा कि वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। स्रष्टा ने निरीह समझे जाने वाले प्राणियों में भी इस स्तर की क्षमता प्रदान कर अपनी समदर्शिता का ही परिचय दिया हे। यह बात और है कि सृष्टि का मुकुटमणि राजकुमार होने के नाते मनुष्य को विवेक−बुद्धि भी मिली है, जिसका अन्य जीवधारियों में सर्वथा अभाव है। मनुष्य अपनी इसी विशिष्टता के कारण प्रसुप्त शक्तियों का विकास प्रयास का पुरुषार्थ करता है, जबकि पशुओं को यह सुविधा प्रदान नहीं की गई है, तो भी यह नहीं कहा जा सकता है कि परमपिता ने उनके साथ सौतेला व्यवहार किया है। दृष्टि, गंध, स्पर्श, श्रवण जैसी कितनी ही क्षमताएँ उनमें मनुष्य से अपेक्षाकृत अधिक विकसित होती है। इसी आधार पर वे बाढ़, भूकम्प, आँधी, तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वाभास प्राप्त कर अपने जीवन की रक्षा कर पाते है, पर कभी-कभी अपनी इस सामर्थ्य के आधार पर वे अपने मालिकों की भी सहायता करते देखे जाते है।
ऐसी ही एक घटना का उल्लेख रूसी लेखक रोमन मोल्कानोव ने अपनी एक पुस्तक में किया है। उन दिनों लेखक सोवियत रूस के यूकेन प्राँत के निकोलायेव कस्बे में एक तिमंजिली इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल में रहते थे। उनके साथ उन्हीं पालतू बिल्ली भी रहती थी। यही उनकी एकमात्र साथी थी। रंग में मटमैला जोने के कारण उसका नाम भी रूसी भाषा में “भूरी” शब्द का समानार्थी रख दिया गया था। उस भूरी से मोल्कानोव की खूब पटती। दोनों साथ-साथ भोजन करते और घूमने भी जाते। कुछ दूर चलने के उपरान्त बिल्ली, जो मोल्कानोव के कंधे पर सवार रहती, अचानक नीचे कूद पड़ती और अकेली मटरगश्ती करने चल देती। फिर दूसरे दिन सुबह घर लौटती। उसकी “म्याऊं” की आवाज सुन मोल्कानोव दरवाजा खोलते, तत्पश्चात् दानों साथ-साथ नाश्ता करें यही उनका दैनिक क्रम था।
एक दिन की बात है। जब भूरी रास्ते में लेखक को अकेला छोड़कर अन्यत्र घूमने चली गई, तो उस दिन भी मोल्कानोव ने यही समझा कि बिल्ली अब अपने स्वाभाविक क्रम में सुबह ही लौटेगी, पर जब वह टहलने के बाद अपने कमरे पर लौटे, तो वहाँ भूरी पहले से ही इन्तजार कर रही थी। उनने दरवाजा खोला, तो बिल्ली भीतर जाकर कुर्सी में दुबक कर सो गई। आधी रात तक वह सोती रही, फिर अचानक जगी और जोर-जोर से “म्याऊँ-म्याऊँ” बोलने लगी। इससे मोल्कानोव की नींद खुल गई। लाइट जलायी तो बिल्ली ने उनकी ओर देखा जैसे नीचे उतरने का आग्रह कर रही हो। फिर स्वयं दरवाजे की ओर बढ़ चली। मोल्कानोव ने सोचा कि शायद वह बाहर जाना चाह रही है, अतः किवाड़ खोल दिये, पर भूरी बाहर नहीं निकली। मोल्कानेव वापस लौटे और पुनः पलंग पर लेट गये। अभी थोड़ी देर भी न हुई थी कि फिर वही “म्याऊँ-म्याऊँ” की रट। लेखक ने पुनः दरवाजा खोल दिया, किन्तु वह बाहर नहीं गयी। तीसरी बार पुनः उसकी आवाज से उन्हें जागना पड़ा। इससे वे झल्ला उठे। सोचा अब न उठूँगा। आज इस बिल्ली बेकार तंग कर रही है। उस समय बाहर वर्षा हो रही थी और तेज हवा भी चल रही थी।
बिल्ली की बेचैनी उत्तरोत्तर बढ़ती गई। अब वह पलंग के चारों ओर चक्कर काटने और जोर-जोर से आवाज करने लगी, जिससे मोल्कानोव को विवश होकर उठना पड़ा। जैसे ही वे दरवाजे के पास पहुँचें, छत से पलस्तर का एक बड़ा सा टुकड़ा उनके बिस्तर में तकिये के ऊपर गिर पड़ा और वे घायल होने से बाल-बाल बचे। अब उनकी समझ में आया कि क्यों यह भूरी आज “म्याऊँ” की रट लगाये हुए थी। कृतज्ञता के भाव मोल्कानेव ने उसकी ओर देखा, पर तब तक वह दरवाजे से बाहर जा चुकी थी, क्योंकि आज का उसका काम समाप्त हो चुका था।
यह तो पूर्वाभास की घटना हुई, जो जीव जन्तुओं में प्रायः’ देखी-सुनी जाती है। इसी प्रकार उनकी अन्यान्य इन्द्रियाँ भी विकसित होती है। गिद्ध की दृष्टि, साँप की श्रवण-सामर्थ्य, शेर, बिल्ली, हिरण की गंध ग्रहण करने की क्षमता इतनी सुविकसित होती है, कि मनुष्य भी उनसे इस क्षेत्र में काफी पीछे छुट जाता है। घ्राण-क्षेत्र में कुत्ते का वर्चस्व होने के कारण ही लम्बे समय से उसका उपयोग अपराध जगत में किया जा रहा है। सन् 1117 की अक्टूबर क्राँति से पूर्व एक विशेष नस्ल के तेफ नामक कुत्ते ने रूस भर में 15 सौ अपराधियों का पकड़ा था। यह तो कुत्ते की सामान्य क्षमता और विशेषता हुई, जिसे हर कोई जानता है, पर इसे कम ही लाग जानते होंगे कि कुत्ते में असली-नकली की पहचान करने की भी शक्ति होती है। मास्को में “दीता” नामक एक ऐसा कुत्ता है, जिसे असली-नकली की विलक्षण पहचान है। दानों प्रकार के नोट यदि एक साथ रखे हो, तो वह चुन-चुन कर असली नोटों को अपने मुँह में दबा लेता है। इसी प्रकार सोने एवं धातु की बनी अन्य खरी-खोटी वस्तुओं में से असली को वह दक्षतापूर्वक पृथक कर देता है। दीता डबरमन पिशर नस्ल का कुत्ता है। इसके मालिक अलेक्साद तरियाकोवस्की का कहना है कि यह न केवल असली-नकली की पहचान की क्षमता रखता है, वरन् लोगों के हाव-भाव को भी कुशलतापूर्वक समझता है।
पशुओं के पूर्वाभास, दृष्टि, गंध, श्रवण के करतब तो देखे-सुने जाते रहे है, पर उनमें अतीन्द्रिय सामर्थ्य भी होती है- इसके कम ही उदाहरण प्रकाश में आये है। बीसवीं शताब्दी के मध्य अमेरिका के वर्जीनिया प्रान्त में एक ऐसी घोड़ी हुई थी, जो पराशक्ति सम्पन्न थी। इसकी इस अद्भुत क्षमता के कारण ही लोग इसे “लेडी-वण्डर” के नाम से पुकारने लगे थे। घोड़ी की इस क्षमा का पता इसके मालिक श्री एवं श्रीमती फोड़ा को तब चला, जब तीन वर्ष की उम्र में अचानक एक दिन वह अपने स्वामी को घर की एक खोयी सन्दूक की ओर संकेत सा करने लगी, जो काफी खोजबीन के बाद भी नहीं मिल पायी थी। अगली बार एक गुमशुदा बच्चे का पता बताया तो फोड़ा दंपत्ति की उत्सुकता बढ़ी और वे ‘लेडी-वण्डर’ की पराशक्ति का लाभ लेने के लिए एक विशेष युक्ति काम में लाने लगे। घोड़ी के सामने अंग्रेजी-अक्षरों व शून्य से नौ तक के अंकों की तख्तियाँ लटका दी जाती, जिन्हें वह अपने मुँह से उलट-पुलट कर वही अक्षर अथवा अंक उठाती, जो आवश्यक होता। ऐसे एकल्एक अक्षर मिलकर शब्द और वाक्य बन जाते, जो प्रश्नकर्ता का उत्तर होता।
एक बार मेसाचुसेट्स से तीन वर्ष का एक लड़का गायब हो गया। घोड़ी से जब इस बारे में पूछा गया, तो उसने बताया कि लाश यहाँ से 40 मील दूर एक अन्य शहर में पानी से भरे एक गड्ढे में छिपा कर रखी हुई है। इस आधार पर बताये स्थान पर खोज की गई, तो लाश वहीं मिली।
क्लार्क नामक एक व्यक्ति डेनवर से हाउस्टन की हवाई-यात्रा कर रहा था। इसी मध्य उसकी अटैची कही खो गई, जिसमें जरूरी कागजात थे। हवाई अड्डे के कर्मचारियोँ ने हर संभावित स्थान पर उसकी तलाश कर ली। जब नहीं मिली, तो इसकी सूचना क्लार्क को दी गई और यह भी कहा गया कि हम मुआवजा देने को तैयार है। क्लार्क ने इस अद्भुत घोड़ी के बारे में सुन रखा था। जब अधिकारियों की ओर से अन्तिम रूप से सामान नहीं मिलने की संभावना व्यक्त कर दी गई, तो उसने घोड़ी को अजमाना चाहा। उत्तर मिला-सामान न्यूयार्क हवाई अड्डे पर है। यद्यपि वहाँ भी इसकी खोजबीन की जा चुकी थी, तो भी क्लार्क के आग्रह पर दुबारा ढूँढ़ खोज की गई। आखिर सामान मिल गया। खबर क्लार्क को पुनः दी गई। प्रकाण के रूप में वह पत्र आज भी उसके कुटुम्बियों के पास सुरक्षित है।
इस ‘लेडी–वण्डर” की सबसे बड़ी विचित्रता तो यह थी कि संबद्ध वस्तु अथवा व्यक्ति का किसी प्रकार का कोई सूत्र-संकेत के बिना ही तत्संबंधी वस्तु या व्यक्ति की सही-सही जानकारी प्रश्नकर्ता को देती थी।
उसकी दूसरी बड़ी विशेषता यह थी कि प्रत्यक्ष रूप से अपने इस जीवन में वह मनुष्य जाति की किसी भी भाषा का परिचय न पा सकी थी और न ही कभी किसी ने उसे लिखना-पढ़ना सिखाया था, फिर भी उसका अंग्रेजी का ज्ञान असाधारण था। वह न केवल शब्द, वाक्य, वरन् उनकी सही-सही वर्तनी (स्पेलिंग) तक जानती थी।
यह घोड़ी सात वर्ष की होते-होता पूरे अमेरिका में “लेडी वण्डर” के नाम से विख्यात हो गई। 15 वर्ष तक उसने अपनी इस सामर्थ्य का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया और इस बीच सदा सही उत्तर देती रही। 22 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। ये उदाहरण इस बात के प्रमाण है कि सिरजनहार ने किसी के साथ पक्षपात नहीं किया। सभी प्राणियों को उसने आवश्यकतानुरूप क्षमताएँ प्रदान की है एक मनुष्य है जो सदैव अभावों का ही रोना रोता रहता है। यदि वह अपने सोये आपे को जगाने का प्रयास करे तो वह भी ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन सकता है।
अध्यात्म साधना में जीवन शोधन के प्रयोग से आगे बढ़कर जिस अभ्यास को आरंभ करना पड़ता है। उसका नाम है “शरीराध्या से निवृत्ति।” चेतना शरीर में रहती है यह भी ठीक है। उसका उपयोग वाहन या उपकरण के रूप में होता चला आता है यह भी ठीक है। सभी जानते है कि चेतना की इच्छा आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए शरीर को ही विविध क्रिया कलाप करने पड़ते है। इसलिए वह स्वामिभक्त सेवक भी है। इतने पर भी यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि दोनों की सत्ता स्वतंत्र है। चेतना का अस्तित्व अनादिकाल से है और अनंत काल तक रहेगा। किन्तु शरीर के संबंध में ऐसी बात नहीं है। वह माता पिता के संयोग से बनता है और नियम अवधि पूरी करके काल चक्र द्वारा ग्रस लिया जाता है। शरीर के मन जाने पर भी चेतना बनी रहती है और वह अपने कर्म विपाक के अनुसार नया चोला पहन लेती है। नये घोंसले में रहने लगती है।
शरीर आत्मा का आज्ञानुवर्ती सेवक है। किन्तु है वह जड़। उसे अपना निज का ज्ञान प्राप्त नहीं है। जड़ पंच तत्वों के सम्मिश्रण से गति ही उत्पन्न हो सकती है। ज्ञान के लिए एक पृथक् उपकरण है जो चेतना और शरीर का सम्मिश्रण है। यह है-मन। मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है क्योंकि उसमें शरीर की ज्ञानेन्द्रियों के प्रति प्रमुख आकर्षण रहता है। इन्द्रियों के स्वाद उसे लुभाते है। फलतः चेतना का यह स्थूल भाग उन्हीं का अनुकरण करने लगता है। इन्द्रिय भोगों का बाहुल्य संचित करने और उनके उपभोग में सहायक संयोगों की प्राप्ति उसकी सहज लिप्सा बनी रहती है। इन्हें को लोभ, मोह और अहंकार कहते है। यह मन के भौतिकवादी विशेषण है। इन्द्रिय जन्य विलासित शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श के आधार पर चली है निमित्त काया में कान, नेत्र, जिव्हा, नासिका एवं त्वचा का निर्माण हुआ है। कामुकता त्वचा क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं पाँच ज्ञानेन्द्रिय और छठा मन इन्हें का मंत्रिमंडल जीवन तंत्र के ऊपर प्रायः’ पूरी तरह हावी बना रहता है और जैसा चाहता है वैसे कर्म कराता है।
चेतना का स्वरूप, आनन्द एवं लक्ष्य भिन्न है। जाग्रत अवस्था में वह उनकी आवश्यकता भी अनुभव करती है। अपूर्णताओं को पूर्ण करने कुसंस्कारों से मुक्ति पाने और अपने अन्तःकरण को देवोपम बनाने की प्रथम आकाँक्षा चेतना की है। दूसरी इच्छा है नियन्ता के इस विश्व उद्यान को अधिकाधिक समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने में अधिकाधिक योगदान करने की। यह दोनों आकांक्षायें प्रायः दबी रह जाती है। इन्हें जगाने हेतु वस्तु स्थिति को समझना शरीर और आत्मा के स्वार्थों को पृथक् करना जरूरी है। व्यामोह में न फँसना, सेवक को स्वामी न बनने देना, अपने को दासानुदास की स्थिति में पड़कर जीवन का अपव्यय न होने देना, यह सब तभी संभव है जब शरीरगत मन और आत्म चेतना के पृथकीकरण का अभ्यास कर लिया जाय। इतना बन पड़ने पर ही भौतिक आकर्षणों का दबाव घटता है और आत्मा अपने स्वरूप और लक्ष्य को समझते हुये स्रष्टा की इस अनुपम धरोहर का उचित उपयोग कर सकने में समर्थ होती है।
यह पृथक्ता मरण के समय अनुभव होती है। जब शरीर चला जाता है। उसकी बाल क्रीड़ाओं में निरत रहने का स्मरण आता है और भविष्य को अँधेरे में धकेल देने वाला बोझ ऊपर लदा होने से भारी त्रास देता है। तब पश्चाताप और प्रायश्चित का समय भी निकल चुका होता है।
इस स्थित में दुर्गति से बचने के लिए प्रथम उपाय है कि शरीर की और आत्मा की भिन्नता का अनुभव करना। मृत्यु के उपरांत की लम्बी अवधि में आने वाली परिस्थितियों के संबंध में गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय।
प्रज्ञा योग की दैनिक साधना में प्रायः’ बिस्तर से उठते ही नये जन्म की और सोते समय मरण की उपमा निद्रा के साथ देने की विधा समझाई जाती है। पर वह भी थोड़े दिन में एक ढर्रा बन जाती हैं। चिन्तन होता रहता है पर अन्तराल की गहराई तक वह प्रकाश नहीं पहुँचता।
इस अभ्यास को गंभीर एवं अधिक प्रभावोत्पादक बनाने के लिए शिथिलीकरण मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। इसे शवासन भी कहते है। दिन में एक बार इसे जरूर कर लेना चाहिए, मन जब भी हल्का हों। व्यस्तता और उत्तेजना जिस समय कम हो उसी को इस निमित्त निर्धारित कर लेना चाहिए और फिर उस समय को इस प्रयोजन के लिए नित्य ही नियमित बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
जमीन या समतल तख्त पर चित्त लेटना चाहिए। तीन बार लम्बी साँस खींचनी-छोड़नी चाहिए और भावना करनी चाहिए कि चंचलता व्यग्रता हलकी हो गयी। अतः शरीर और मन को इस स्थिति में पहुंचने के लिए संकल्प बल का प्रयोग करना चाहिए माना निद्रा आ गयी। शरीर के एक-एक अवयव को शिथिल हो जाने की भावना करनी चाहिए। हाथ पैर गरदन आदि भारी हो गये वे उठाये नहीं उठते। चलाये नहीं चलते। मन भी योग निद्रा की स्थिति में चला गया उसमें भी कोई संकल्प विकल्प नहीं उठ रहे। नींद जैसी गहरी खुमारी आ रही है।
इसके उपरान्त चेतना को शरीर में से उस प्रकार निकालकर ऊँचा उठा देना चाहिए, मानो पक्षी घोंसला खाली छोड़ कर ऊपर उड़ गया है। अनुभव करना चाहिए कि शरीर मृतक पड़ा है। आत्मा जीवन्त है और आकाश में उड़ते हुये अथवा किसी ऊंचे वृक्ष पर बैठकर उस बिछोह का अनुभव कर रही है। शरीर अलग है और आत्मा अलग। वह पुराने कपड़े या जूते की तरह था, जिसे छोड़ दिया गया। अब अपना सूक्ष्म अस्तित्व जो रह गया। वही वास्तविक “स्व” है-जीवात्मा।
जीवात्मा स्वामी हैं शरीर सेवक था। जीवन आत्मा को सौंपा गया है और उसी के कंधे पर यह दायित्व था कि शरीर और मन को उन ऊँचे उद्देश्यों के लिए लगाये जिसे लिए यह बहुमूल्य धरोहर मिली थी। शरीर रूपी वाहन पर लगाम रखी जाय। उसे किसी भी दिशा में स्वच्छंद विचरने का अवसर न दिया जाय। न शरीर को न मन को। चेतना को ही यह निश्चय करना है कि इस उपकरण समुच्चय का कहाँ उपयोग करे और किसी गलत कदम उठने पर तुरंत रो दे। इस मनःस्थिति में न्यूनतम पन्द्रह मिनट अपने को पड़ा रहने देना चाहिए और सुविधानुसार इसे बढ़ाते हुये आधे घंटे तक पहुँचा देना चाहिए। बायोफीडबैक रूपी यंत्रों के बजाय यदि स्वतः स्वं संकेतों से स्वयं को तनाव रहित किया जा सके तो इससे बढ़कर क्या हो सकता है?
शवासन शरीर और मन की थकान और तनाव को दूर करने का प्रयोजन पूरा करता है। धीरे-धीरे चेतना को लौटाते हुए शरीर को सजग करता है। शवासन के बाद धीमी गति से ही शरीर को उठाने का प्रयत्न करना चाहिए। इससे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों ही स्तर पर एक नई चेतना, नई स्फुरणा प्राप्त होती है।
गुजरात के रविशंकर महाराज को पुरोहित कृत्य वंश परम्परा से मिला। उनके यजमानों में अधिकाँश पाटन काडिया वर्ग के थे। उनका मुख्य व्यवसाय चोरी डकैती करना था। जो न करता उसे उस बिरादरी के लोग कायर समझते। यहाँ तक कि स्त्रियाँ तक रूठ कर तलाक दे जाती, दूसरी ओर पुलिस तंग करती। इस जाति के सभी वयस्क नर नारियों को हर दिन दो बार पुलिस थाने में हाजिरी देनी पड़ती।
पुरोहित रविशंकर ने निश्चय किया कि वे इस यजमान वर्ग को अभ्यस्त अपराधी प्रवृत्ति से छुड़ाकर रहेंगे। वे उन्हीं में घुले रहते। समझा बुझाकर सही रास्ते पर लाते। प्रायश्चित कराते। शपथ दिलाते और अपराध स्वीकार करके दण्ड पाने के लिए सहमत करते। इस प्रकार उस समुदाय के हजारों व्यक्तियों को उन्होंने अपराधी आदतों से विरत करके परिश्रम पूर्वक आजीविका कमाने में लगाया।
एक बार रात में रास्ता चलते डाकुओं के गिरोह से उनका मुकाबला हो गया। उनने बंदूक तान ली। महाराज ने कहा-हम भी चाकू है। पूछा गया किस गिरोह के? इस पर उन्होंने उत्तर दिया गान्धी गिरोह के। वही बिठा कर वे रात भर डाकुओं से बातें करते रहे और सवेरा होते-होते उन्हें यह कुकृत्य छोड़ने के लिए सहमत करके रहे। बन्दूक पुलिस थाने में जमा कर दी गई।
लोग उनसे पूछते आप वृद्ध हो चले फिर भी चैन से कही नहीं बैठते? तो वे हँसकर उत्तर देते-जब तक यजमान लोग मुझे निश्चित नहीं कर देते तब तक विश्राम कैसे कर पाऊं?
रविशंकर महाराज को स्थानीय भाषा में सन्त कहा जा सकता है। वे गुजरात में सरदार पटेल के दाहिने हाथ रहे। बारदौली सत्याग्रह में उन्हीं भूमिका ने सभी को चकित कर दिया। विश्व शांति परिषद के एक बार वे अध्यक्ष भी चुने गये। विद्वता, ज्ञान और सेवा का उन्हें ‘त्रिवेणी संगम कहा जाता है।
शारीरिक संरचना तथा उसकी कार्य विधि के बारे में विज्ञान ने अनेकानेक बाते कहीं इसकी एनाँटमी व फिजियोलॉजी की गाथा से मेडिकल साइन्सेज के ग्रन्थ के ग्रन्थ भरे पड़े है। इतनी सारी अवेषणा प्रयोग परीक्षण करने के बावजूद भी विज्ञान विशारदों के लिये बता पाना सम्भव नहीं हो सका कि शरीर के विविध संस्थानों के ठीक रहने पर भी व्यक्ति मर क्यों जाता है? चेतना के न रहने पर शरीर के विभिन्न अंग-अवयव अपना काम एकाएक क्यों बन्द कर देते है? जिसके रहने पर शरीर हलचल करता, जीवित रहकर विविध क्रियाओं में संलग्न रहता है, वह चेतना है क्या? उसकी उद्गम स्थिति-प्रगति आदि के बारे में विज्ञान की अनेकानेक शाखाएँ-प्रशाखाएँ मिलकर भी कोई समुचित समाधान पा सकने में असफल रही है।
ऐसा नहीं है कि इस बारे में वैज्ञानिकों ने कोई प्रयत्न न किए हों। पर बाह्य साधनों पर गर्व करने वाले विज्ञान-शास्त्रियों को सदैव असफलता ही हाथ लगी। ढूँढ़-खोज की इस ऊहापोह में से यह कहा जाना कि चेतना का अस्तित्व है ही नहीं, “न तो न्याय संगत है-न ही युक्ति संगत। जल्दबाजी में किए गए इस प्रतिपादन से ही अनास्था के विष वृक्ष का बीजारोपण हुआ। परिणाम स्वरूप उन आदर्शों को क्षति पहुँची जिनके सहारे मानव और मानवता की प्रगति आरम्भ हुई और लगातार अभिवर्धन होता चला आया है।
“लिमिटेशन ऑफ साइन्स” नामक सुविख्यात पुस्तक के लेखक डॉ. जे एनू सुलीवान ने एक जगह स्पष्ट किया है-मानव जीवन के बारे में डार्विन द्वारा प्रतिपादित विकासवाद और रेण्डम सिद्धान्त (“मनुष्य पूर्ण रूपेण विकसित जन्मा”) में से कौन यथार्थ है कौन नहीं? इस बारे में कुछ भी स्पष्ट रूप से कह सकने में विज्ञान असमर्थ है। मूर्धन्य कहे जाने वाले वैज्ञानिक भी यह मानने के लिए तैयार हो जाते है कि सही माने में विश्व-ब्रह्माण्ड में कोई ऐसी दिव्य सत्ता क्रियाशील है, जिससे अधिक शक्तिशाली और सामर्थ्यवान और कोई नहीं।
सच कहा जाय तो विज्ञान अभी तक मृत्यु और जीवन के अन्तर को ही नहीं स्पष्ट कर पाया है। कभी हृदय की धड़कन रुकने को मृत्यु बताता है, तो कभी श्वसन किया के रुकने को। कभी इन दोनों को छोड़कर मस्तिष्क की मृत्यु को ही यथार्थ मृत्यु घोषित करता है।
गहराई से चिन्तन करने पर करने पर यही निष्कर्ष सामने आता है कि विज्ञान ने जड़ जगत् के सम्बन्ध में भी जितनी जानकारियाँ दी है वे अल्प ही है। इनके अतिरिक्त न जाने कितनी बाते ऐसी रह जाती है जिनके बारे में जानना समझना शेष ही है। आधुनिक विज्ञान के मुख्यतः दो सिद्धान्त जिन्हें सापेक्षिकता का सिद्धान्त की तमाम बातें इसलिए नहीं समझ में आती क्योंकि उनका स्पर्श मूलतः चेतना जगत् की परिधि से है, जो सामान्य विज्ञान से बहुत परे की है। इसलिए यदि ऐसा कहा जाय कि जहाँ से विज्ञान का अन्त होता है वहीं से आध्यात्म दर्शन की शुरुआत होती है तो कोई अतिशयोक्ति अथवा अतिरंजन नहीं।
किसी समय डॉल्टन के परमाणुवाद को सर्वमान्य ठहराया गया था। डॉल्टन के विचार के अनुसार परमाणु को अविभाज्य, अविनाशी और अजन्मा के रूप में स्वीकारने को ही यथार्थ माना जाना चाहिए। 120 वर्षा तक माना भी जाता रहा।
पर क्या सही सत्य था? 120 वर्षों तक लगातार सत्य की शोध के प्रयत्न चलते रहे और उपरोक्त सिद्धांत आखिर तब ध्वस्त हो ही गया, जब सर जेå जेå थाम्पसन ने कैथोड़ रेज का आविष्कार करके यह बता दिया कि परमाणु विभाज्य है। इस प्रक्रिया से इलेक्ट्रान, प्रोटान-न्यूट्रान जैसे कणों की खोज हुई। आज तो लक्सान, भीसाँन जैसे अनेकानेक कण भी खोजे जा चुके है। फिर भी यह दावे से नहीं कहा जा सकता है कि सत्य का पता लगाया जा चुका है।
वैज्ञानिकों को तो अभी यहीं नहीं पता कि पदार्थों में निहित शक्ति कहाँ से आती है? यदि उनसे पूछा जाय कि स्वप्नाभास, पूर्वाभास वाली शक्ति कौन सी है और क्या वह परमाणु या विराट् ब्रह्माण्ड से किसी प्रकार सम्बन्धित है? मस्तिष्क में विचार कहाँ से आते है? भावनाओं का अस्तित्व क्या है? जैसे प्रश्नों के पूछे जाने पर विज्ञान के पास इन सबका कोई उत्तर नहीं।
यदि सही ढंग से “विज्ञान” शब्द के भाव पर चिन्तन किया जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उसमें पदार्थ और चेतना दोनों ही भागों का समावेश है। पर आज तो उसकी एकांगी व्याख्या को ही समग्र मान लिया गया है। यही नहीं चेतना को भी जड़ तत्वों की प्रतिक्रिया का ही परिणाम सिद्ध करने के लिए एड़ी-चोटी का भरपूर जोर लगाया जा रहा है। क्या इसे हठवादिता नहीं कहा जाएगा?
पदार्थ विज्ञान में की जाने वाली ढूँढ़-खोज की प्रक्रिया पर चिन्तन करने पर स्पष्ट होता है कि जिन यन्त्र उपकरणों के माध्यम से प्रकृतिगत हलचलों का पता लगाया जाता है, वे जड़ पदार्थों से ही विनिर्मित है। मस्तिष्क का सचेतन, इन्द्रियगम्य ज्ञान भी भौतिक ही है। जानकारियाँ जमा करना इसी का काम है। बुद्धि और अन्वेषण उपकरणों द्वारा तैयार किए गए वैज्ञानिक कहाए जाने वाले इस ढाँचे की अपनी एक सीमा है। चेतन सत्ता की सीमा मन, बुद्धि, इंद्रियों से परे है। इन्द्रियातीत तत्व को इन्द्रियों से पकड़ने की कोशिश को बालकपन ही कहा जाएगा। चेतन सत्ता जो वाणी-मन-बुद्धि से परे है, उसकी विवेचना ब्रह्म विद्या करती है। तत्वदर्शन इसी के लिए आविष्कृत हुआ है। इसके सहारे ही परम तत्व का ज्ञान कर सकना सम्भव है। इनकी उपेक्षा करने के कारण विज्ञान को अपूर्ण ही कहा जाएगा।
विज्ञान विशारद तथा प्रख्यात चिन्तक प्रो एडिंगटन ने अपनी पुस्तक “द फिलॉसफी ऑफ फिजीकल साइन्स” में बताया है कि जब अणुओं या तत्व के गुणों का विवेचन किया जाता है, तो यह माना जाना चाहिए कि यह गुण अणुओं के एक मात्र वास्तविक गुण नहीं है। अपितु ये तो वे गुण है जो हमने अपनी प्रेक्षण विधि द्वारा उन अणुओं पर आरोपित कर दिए है। इस प्रकार उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि विज्ञान जिस जगत का वर्णन-विवेचन करता है, वह तो और भी अधिक-आत्म परक है। जबकि पदार्थवादी वैज्ञानिक इसी बात को प्रतिपादित-प्रमाणित करने की भरपूर कोशिश करते रहे है कि आध्यात्मिक चिन्तकों को चिन्तन पूरी तरह से आत्मपरक होता है, वस्तु परक नहीं। इस तरह के चिन्तन पर तो मात्र विज्ञान का ही एकाधिकार है।
“फ्राम द फिजीकल टू द सोशल साइन्सेज” के लेखक जाँफ रुएफ ने अपनी इसी पुस्तक में लिखा है कि “हमारे पास यह कहने का कोई आधार नहीं है कि भौतिक शास्त्र के सिद्धान्त जिन कारणों का उद्घाटन करते है वही वस्तुओं की असली प्रकृति है।” उदाहरण के लिए न्यूट्रान इलेक्ट्रान को ही लें। इनकी यथार्थ प्रकृति क्या है इसे पूरी तरह से कोई वैज्ञानिक नहीं स्पष्ट कर सकता। जिस रूप में इसे विवेचित किया गया है, वह वैज्ञानिकों के विविध प्रेक्षणों को सम्बद्ध करने के लिए आवश्यक गुण मात्र है। इनकी वास्तविक सत्ता क्या है, इसका विवरण अभी तक पूर्ण रूपेण ज्ञात नहीं है।
वस्तुतः संसार की वास्तविकता का बोध प्राप्त करने की वैज्ञानिक विधियाँ इन्द्रिय ज्ञान तक ही सीमित है। चाहे कितने ही बहुमूल्य यंत्र हो, कम्पाउण्ड लेंस युक्त माइक्रोस्कोप हो या इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप, इन सबसे अर्जित होने वाली जानकारी आती इन्द्रियों के ही माध्यम से हभ्। जबकि हमारी इन्द्रियाँ व मन भ्रम से पूरी तरह परे नहीं है। अतएव इनके आधार पर यथार्थ को जान सकना प्रत्यक्ष जगत में तो सम्भव नहीं। अदृश्य सूक्ष्म तो हमारी सीमा से ही परे है।
वास्तविकता की तह में पैठने, सत्य का साक्षात्कार करने के लिए, साक्षात्कार का आधार विस्तृत करना होगा। इन्द्रियातीत तत्व के बोध के लिए अन्तर्ज्ञान को भी सम्मिलित करना होगा। इमे आध्यात्मिक प्रयोग-परीक्षणों में संलग्न होना होगा। इसके लिए बुद्धि के दीपक को नहीं, अपितु साधनात्मक अनुशासन से प्राप्त ऋतम्भरा प्रज्ञा की सर्च लाइट को जलाना होगा। तभी उस सही मार्ग का निर्धारण होगा जिस पर चलकर परम सत्य का बोध सम्भव है।
गाय को सूखा भूसा खाना रुचता न था। वह मालिक के दिये उन तिनकों को मन मसोस कर खाती थी और आधे पेट रहकर ही किसी प्रकार गुजारा करती थी।
मालिक बात को ताड़ गया। उसने हरे कांच का चश्मा उस गाय की आँखों पर बाँध दिया। गाय प्रसन्नतापूर्वक उसी भूसे को खाने लगी। उसे वह हरियाली का ढेर जो दीखने लगा।
मनुष्य भी भ्रम जंजाल का चश्मा पहनकर वे कुकृत्यों करने लगता है जिसमें स्वभावतः उसकी अभिरुचि थी ही नहीं।
इस धरित्री पर अवतरण के बाद मनुष्य ने सबसे पहले प्रकाश पुज अग्नि गोले सविता देवता का देखा। वही उसका प्रेरणास्रोत बना तथा उसकी आराधना के रूप में परब्रह्म की निराकार शक्ति की उपासना आरंभ हुई ऊर्जा के अनेकानेक रूप है, पर जिस शक्ति समुच्चय ने उसे सर्वाधिक प्रभावित किया, आदिमकालीन स्थिति से वर्तमान में ला बिठाया, वह थी प्रकाश की शक्ति। अग्नि पिण्ड को देखकर उसने पहला आविष्कार अग्नि प्रज्ज्वलन के रूप में किया एवं अपनी प्रारंभिक आवश्यकताएँ जुटाई। प्रकाश व ताप की शक्ति को मनुष्य भूला नहीं है व आज भी ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के पर्याय के रूप में इन्हीं दो शक्तियों को वह प्रमुख मानता आया है। ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राण शक्ति प्रकाश रश्मियों के रूप में जीव जगत को सतत् प्रभावित करती रहती है। क्रमशः परिष्कृत होते-होते वह “लेसर” के रूप में अब मनुष्य के पास विद्यमान है, जिसकी शक्ति सामर्थ्य अपरिमित कूती जाती है।
प्रकाश रश्मियों के द्वारा क्या पीड़ित मानव जाति को लाभान्वित कर पाना संभव है?, इस पर विभिन्न प्रयोग समय-समय पर चलते रहे है। इस संबंध में कास्मिक रेथेरेपी, टेलीथेरेपी, रेडियेस्थैसिया, रेडियोनिक्स माम से विभिन्न समयों पर चिकित्सा पद्धति विकसित हुई है। अब यह तथ्य सुनिश्चित होता चला गया है कि विभिन्न वर्णों द्वारा न केवल शरीर की न्यूनाधिकता को संतुलित किया जा सकता है वरन् जीवनी शक्ति बढ़ाकर विभिन्न रोगों से जूझने व मनोविकार मिटाने में भी सफलता पाई जा सकती है।
भारतीय दर्शन के अनुसार सभी प्राणी पदार्थ पाँच तत्वों से बने है, जिनमें से एक अग्नि तत्व है। इस चिकित्सा पद्धति के सिद्धान्त के अनुसार सजीव अथवा निर्जीव हर पदार्थ में अग्नि अथवा प्रकाश के सातों रंग विद्यमान है। इसका पता त्रिपार्श्व (प्रिज्म) से वस्तु अथवा व्यक्ति को देखने से चलता है। आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकारता है कि पदार्थ ऊर्जा का समुच्चय है। प्रकाश की गणना ऊर्जा के अंतर्गत की जाती है। किलियन फोटोग्राफी एवं बाद में आर्गान एनर्जी के आविष्कार ने तो इसे निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि प्रत्येक पदार्थ एवं प्राणी का एक सूक्ष्म प्रकाश शरीर होता है। प्रिज्म से देखने पर शरीर के भिन्न-भिन्न भाग भिन्न-भिन्न रंगों के बने दिखाई पड़ते है, यथा मनुष्य में बाल नीले रंग के, नाशाग्र हरे रंग का, जीभ नारंगी आदि। ऐसी बात नहीं कि अलग-अलग मनुष्यों में अंगों के ये रंग बदलते रहते है। व्यक्ति चाहे किसी देश का हो, प्रत्येक की नाक सदा हरी, बाल नीले, जीभ नारंगी ही होगी। इन्हें रंगों के क्रम में बदलाव से व्याधि उत्पन्न होती है। अतः यदि किसी व्यक्ति के बालों का रंग नीला नहीं है अथवा जीभ नारंगी नहीं है, तो यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति किसी-न-किसी व्याधि का मरीज है, भले ही उस वक्त तक उसमें किसी प्रकार के रोग के लक्षण प्रकट नहीं हुए हो, पर निश्चित रूप से यह इस बात का प्रतीक है कि जल्द ही व्यक्ति बीमार पड़ने वाला है। किर्लियन फोटोग्राफी से भी इस बात की पुष्टि हो गई कि आँरा अथवा आभामण्डल में रंग-परिवर्तन निकट भविष्य में रोगग्रस्तता का स्पष्ट संकेत देते है।
कास्मिक रे थेरेपी में रंगों के इसी बदलाव को पुनर्व्यवस्थित कर बीमार को रोगमुक्त किया जाता है। यह चिकित्सा प्रणाली इस सिद्धान्त पर काम करती है कि सी वृक्ष को निर्मूल करना हो तो उसकी जड़ काटी जाय, न कि टहनी-पत्तियाँ, पर आज अधिकाँश चिकित्सा पद्धतियाँ जो प्रचलन में है, इसके विपरीत सिद्धान्त पर आधारित है। वे रोग की तह में न जाकर सिर्फ प्रकट लक्षणों को मिटाने का प्रयास करती है, जिससे मूल विकृति तो ज्यों की त्यों बनी रहती है और उसके लक्षण बहरूपिये की तरह नित नये रूप रंग बदल-बदल कर सामने आते रहते है। वस्तुतः बीमारी की पैठ जितनी उथली मानी जाती है, उतनी वह है नहीं। इसकी गहरी जड़े सूक्ष्म शरीर तक धँसी होती है। अस्तु उपचार मूल बिन्दु का होना चाहिए। वर्तमान प्रणालियों की इसी कमी के कारण बड़ी व्याधियों के उपचार में आशाजनक सफलता नहीं मिल पाती और उपचार-प्रक्रिया के प्रति व्यक्ति शंका-शंकित बना रहता है।
रेडिएस्थीसिया की अभिनव चिकित्सा पद्धति में इसी की व्यवस्था है। इसमें सूक्ष्म अथवा प्रकाश शरीर से ही इलाज आरंभ किया जाता है और जिन रंगों की कमी पड़ती है, उन रंगों की पूर्ति प्रकाश-किरणों द्वारा व्याधिग्रस्त को की जाती है, किन्तु इससे पूर्व रोगग्रस्त भाग और उससे सम्बद्ध रंग का निश्चय करना पड़ता है। फिर उक्त रंग की किरणों की बौछार मरीज पर की जाती है। इसके लिए वाँछित रंग के रत्नों का भी प्रयोग किया जाता हे। ज्ञातव्य है कि रत्नों को रोगी के शरीर के ऊपर रख देने अथवा किसी डोरी के माध्यम से हवा में उसके ऊपर लटका देने भर का कोई असर नहीं पड़ता। प्रभावकारी परिणाम तो तब उत्पन्न होता है, जब उसे मरीज के ठीक ऊपर धागे के सहारे चक्कर लगवाया जाय। संभव है इस प्रक्रिया के दौरान रत्न अपनी ही प्रकृति की किरणें हमारे चारों ओर संव्याप्त ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से अवशोषित कर रोगग्रस्त पर फेंकता है।
इस प्रयोग की सत्यता परखने के लिए तीवरपूल यूनिवर्सिटी के शरीरशास्त्री डाँå लाँगफेलो ने एक प्रयोग किया। उनने अपने बीमार कुत्ते के पिल्ले को टेबुल पर रख कर गोमेद पत्थर को धागे से बाँध कर उसे पिल्ले के ऊपर हवा में घुमाना शुरू किया। आरंभ में तो इसका कोई असर दिखाई नहीं पड़ा और कुत्ते का बच्चा ज्यों-का-त्यों निश्चल पड़ा रहा, पर जब चक्र हजार से कुछ ऊपर पहुँचें, तो उसकी पूँछ में हल्की गति हुई। डाँå लोंगफेलो को कुछ आशा बंधी तो उन्होंने यह प्रक्रिया आगे जारी रखी। साढ़े चार हजार चक्रकों तक पहुँचते-पहुँचते पिल्ले की हालत में काफी सुधार झलकने लगा। दो दिनों तक उसे यह उपचार दिया गया, जिससे वह पूरी तरह स्वस्थ होकर उछलने-कूदने लगा।
यह उपचार पद्धति प्रत्यक्ष में बीमारों पर जितनी असरदार व कारगर देखी गई है, दूर स्थित मरीजों के लिए भी उतनी ही सफल व प्रभावोत्पादक सिद्ध हुई है।
ऑक्सफोर्ड, इंग्लैण्ड की डिलावेयर प्रयोगशाला के शोधकर्ताओं ने इस आशय के अनेकानेक प्रयोग-परीक्षण किये है। इसमें दूरवर्ती मरीज को प्रभावित करने के लिए उसकी तस्वीर अथवा उससे संबद्ध कोई अन्य वस्तु काम में लायी जाती है। सबसे लम्बी दूरी के बीच सम्पन्न किये गये इस प्रकार के एक प्रयोग के लिए उन्होंने एक सत्रह वर्षीय बालक को चुना और दो दूरस्थ स्थान इंग्लैण्ड में ऑक्सफोर्ड और अमेरिका में न्यूयार्क निर्धारित किये। प्रयोग इन्हें स्थानों के बीच होना था। बालक को आक्सफोर्ड की डिलावेयर प्रयोगशाला के एक कमरे में रखा गया तथा उसकी एक फोटो व टेलीथेरेपी यंत्र न्यूयार्क भेज दिये गये। प्रयोग आरंभ करने से पहले लड़के को साइकोप्लास्ट नामक एक अतिसंवेदनशील उपकरण से जोड़ दिया गया। समय पूर्व निश्चित था। फोन से सूचना मिलते ही प्रयोग प्रारंभ हुआ। न्यूयार्क में लड़के के चित्र को रेडियोनिक उपचार यंत्र से सम्बद्ध कर 20 मिनट तक उसे चलाया गया, फिर आधे घंटे के विराम के बाद 20 मिनट तक मशीन और चलायी गई इस क्रिया की शारीरिक प्रतिक्रिया का स्पष्ट अंकन लड़के से जुड़ी साइकोप्लास्ट मशीन ने इंग्लैण्ड में किया। भूल और त्रुटियों से बचने के लिए प्रयोग को कई-कई बार दुहराया गया। स्थान-परिवर्तन और सब्जेक्ट-परिवर्तन के साथ भी अनेक बार प्रयोग किए गए, पर हर बार परिणाम एक ही प्रकार का मिला। इससे इस बात की पुष्टि हो गई कि इस दौरान दोनों के बीच कोई परोक्ष सम्बन्ध स्थापित हुआ और फोटो पर जो प्रभाव डाला गया, उसका असर उस दूरवर्ती बालक तक संचारित हुआ। इस प्रयोग का विस्तृत विवरण “माइण्ड एण्ड मैटर” नामक इंग्लैण्ड की त्रैमासिक पत्रिका में आज से कुछ माह पूर्व छपा था।
अब प्रश्न यह है कि टेलीथेरेपी यदि पूर्णतः वैज्ञानिक है, तो यह किस सिद्धान्त पर काम करती है और दूरवर्ती लोग इससे क्यों व कैसे प्रभावित होते है? सर्वविदित है कि प्रत्येक प्रकाश किरण की अपनी एक विशिष्ट तरंग लम्बाई और आवृत्ति होती है। रहस्यवादियों का भी यही कहना है कि स्वभाव के अनुरूप पृथक-पृथक् व्यक्तियों के सूक्ष्म अथवा प्रकाश शरीर (ईथरिक डबल) का रंग अलग-अलग होता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि रिससे (फिन्गर प्रिण्ट) की भाँति दुनिया में जितने लोग है, उनके ईथरिक डबल भी उतने प्रकार के होंगे, अर्थात् उनमें से प्रत्येक की अपनी विशेष फ्रीक्वेंसी व वेब लेन्थ होगी। शोधों के दौरान पाया गया है कि एक व्यक्ति से संबंधित किसी भी वस्तु रक्त, लार, मूत्र, वस्त्र अथवा यहाँ तक कि उसकी तस्वीर की भी वही आवृत्ति होती है, जो मूल व्यक्ति की है। जब तस्वीर अथवा व्यक्ति से सम्बद्ध अन्य वस्तु पर ब्रह्माण्डीय किरणें बरसायी जाती है, तो संभव है, उनसे उसी आवृत्ति एवं तरंग दैर्ध्य की तरंगें विकसित होती हो, जो उस व्यक्ति की है। वह व्यक्ति उन तरंगों का एकमात्र उपयुक्त रिसेप्टर होने के कारण किरणें उन तक पहुँचकर सिर्फ उसी को प्रभावित करती हो।
रेडियो ट्रान्समिशन सेण्टर में जिस फ्रीक्वेंसी पर कार्य कम प्रसारित होते है उस फ्रीक्वेंसी की रेडियो सेट पर मिलाने से ही उस कार्यक्रम को सुन पाते हैं यह संभव है कि इसी प्रकार का रिमोट कन्ट्रोल सिस्टम विभिन्न रंगों व रश्मियों के बीच काम करता हों।
यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का मेडिकल सेण्टर के शरीर-क्रिया विज्ञानी डॉ.. हरबर्ट रेनो का कहना है कि “रंगों में इतनी सामर्थ्य हैं कि वह शरीर-क्रिया को अस्त-व्यस्त कर सकता है एवं उसे सुधार भी सकता है, पर यह सब बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस स्तर के किस रंग के संपर्क में रह रहा है, साथ ही वह स्वस्थ है या अस्वस्थ।” उनका कथन है कि “अलग-अलग प्रकार के रंगों का प्रभाव अलग-अलग होता है एवं स्वस्थ स्थिति में लम्बे समय तक गहरे रंगों के संपर्क में रहने से अंतःस्रावी ग्रन्थियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उनकी क्षमता धीरे-धीरे घटने लगती है, जो समयान्तर में तरह-तरह की शारीरिक-मानसिक असामान्यताओं के रूप में सामने आती है। इसके विपरीत वे रंगों के भल प्रभाव से भी इनकार नहीं करते। एक प्रयोग के दौरान उन्होंने हाइपरटेन्सन के एक मरीज को जब हल्के नीले रंग से पुते कमरे में लम्बे समय तक रखा, तो रक्तचाप में अर्पयाशित परिवर्तन देखा गया। इस प्रकार के अनेकानेक प्रयोग-परीक्षणों के बाद वे इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि यदि रोगी को उचित अवधि तक अनुकूल रंग के संपर्क में रखा जाय, तो इससे स्वास्थ्य-संवर्धन का लाभ हस्तगत किया जा सकता है। इसका वर्णन डॉ. रेनो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “कलर एण्ड ह्मूमन फिजिक” में विस्तारपूर्वक किया है।
रंगों में मौलिक तीन माने गये है-लाल, नीला, पीला। शोधों के दौरान लाल उष्ण और उत्तेजक, नीला शान्ति कारक एवं पली सौम्य व शीलता प्रदायक प्रकृति का ज्ञात हुआ है। जो सदा निरुत्साहित रहते हो, जिनमें उमंग-उत्साह की कमी और स्फूर्ति का अभाव हो, वैसे लोगों के लिए लाल रंग से पुते कमरे में रहना विशेष लाभकारी हो सकता है। क्रोधी व उत्तेजक प्रकृति के लोगों, उच्च रक्तचाप के मरीजों तथा गर्मी बढ़ने से होने वाली शिकायतों का शमन नीले रंग के संपर्क में रह कर किया जा सकता है, जबकि उन्मादग्रस्तों, सनक और आवेश के शिकार लोगों के लिए पीला रंग अनुकूल पड़ता है, सो क्रोमोपैथी विशारदों का मत है।
सात रंगों में बैंगनी, आसमानी, हरा और नारंगी। लाल, नीला, पीला इन तीन के सम्मिश्रण से ही बढ़ते हैं। इनमें से जब, जिनकी, जिस परिमाण में आवश्यकता महसूस हो, उन्हें उस अनुपात में तैयार कर साथ-साथ एक से अधिक वर्णों का फायदा उठाया जा सकता है, किन्तु सामान्य स्वास्थ्य की स्थिति में सफेद अथवा हल्के रंगों के संपर्क में ही रहना उचित है। साधारण प्रयोजन के रहने वाले कमरों को इसीलिए हल्के रंगों से पोता जाता है। हल्के रंग के कपड़े पहनने में इसी कारण अच्छा अनुभव होता है। घरों में हल्के वर्ण का प्रकाश ही पसंद किया जाता है। इन सब का विस्तृत वर्णन प्रसिद्ध अमेरिकी वर्ण चिकित्सा विशेषज्ञा श्रीमती इबान बर्ग बिटन ने अपनी पुस्तक “कलर ब्रीदिंग, दि ब्रेथ ऑफ ट्रान्सम्युटेशन” में किया हे। विगत 50 वर्षों में उन्होंने वर्ण-चिकित्सा के माध्यम से विभिन्न रोगों के अनेकानेक रोगियों को ठीक करने का दावा किया है।
ऐसी बात नहीं कि “कलर थेरपी” प्राचीन काल में थी ही नहीं। श्रीमती विटन का कहना है कि यह चिकित्सा पद्धति पृथ्वी की उन दो सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रागैतिहासिक काजीन एटलाण्टिस एवं लैमूरिया सभ्यताओं के समय में भी विद्यमान थी, जो अब सागर के गर्भ में समा चुकी है।
वस्तुतः इस निखिल ब्रह्माण्ड में जो भी वैभव समया पड़ा है वह अनन्त सामर्थ्य का भाण्डागार हे। इसमें ब्रह्माण्डीय कणों-किरणों तथा प्रकाश रश्मियों के रूप में विराट ऊर्जा भरी पड़ी है। एक भारतीय वैज्ञानिक (डाå परमहंस तिवारी) ने महाशून्य से विद्युत पैदा करके यह प्रमाणित कर दिया है कि यह महाकाश प्राण चेतना का महासमुद्र है। पल्सार्स, क्वाजार्ज, लेसर, मेसर यही से उद्भूत माने जाते है। रेडियोनिक्स एवं कलर थेरेपी की विधाओं का महत्व समझा जा सके तो पदार्थ विज्ञानियों की तरह चिकित्साविज्ञानी भी रोगियों की नीरोग एवं स्वस्थ को जीवन शक्ति सम्पन्न बनाने हेतु इस ऊर्जा का सदुपयोग सुनियोजन कर सकता है। यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं कि यह सब पूर्णतः विज्ञान सम्मत हैं आवश्यकता मात्र व्यापक स्तर पर प्रयोग परीक्षण की है। ब्रह्मवर्चस द्वारा इस शोध कार्य को पिछले दिनों अपने हाथ में लिया गया है।
जिन दोषों के कारण हम दूसरों की भर्त्सना करते है, उनसे अपनी सफाई पहले कर डालों।
गंगा की महिमा से धर्म शास्त्र भरे पड़े है। उसके स्नान, आचमन यहाँ तक कि दर्शन तक का असाधारण पुण्य फल बताया गया है। उसे नदी होते हुए भी प्रत्यक्ष देव स्तर का सम्मान दिया गया हे। पर्वों पर असंख्य धर्म परायण उसकी तीर्थ यात्रा करते है और अनेक श्रद्धा, भावना मनोकामना लेकर उसके सान्निध्य में पहुँचते है। मान्यता यह भी है कि गंगा जल में स्नान से कुष्ठ जैसे रोगों से निवृत्ति होती है। इस आशा से अभी भी इस रोग से पीड़ित गंगा के तट पर कुथ्अया बनाकर निवास करते हे। पापों के प्रायश्चित में गंगा स्नान को एक प्रमुख माध्यम माना जाता है। पितरों की मुक्ति के लिए उनकी अस्थियों को गंगा में विसर्जित किया जाता है। पिण्ड दान, श्राद्ध, तर्पण आदि भी गंगा तट पर अधिक श्रेयष्कर माने जाते हे। प्रमुख तीर्थ गंगा तट पर ही बसे हुए है। गंगा की गोद और हिमालय की छाया में तपस्वियों की तप साधना सम्पन्न होती रही है। किसी से सत्य कहलवाने के लिए गंगा की शपथ दिलाई जाती है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि गंगा का भारत भूमि में कितना महत्व है। घरों में गंगा जली सुरक्षित रखी जाती है। उसकी पूजा आरती होती है। मृतक के मुँह में गंगा जल डाला जाता है। पंचामृत वितरण में गंगा जल का भी एक अंश रहता है। मान्यता हैं कि गंगाजल कितना ही पुराना हो जाने पर खराब नहीं होता, उसमें कीटाणु नहीं पैदा होते।
कितने ही व्यक्ति सदा गंगा जल पीते, गंगा स्नान का व्रत लेकर गंगा के समीप ही अपना निवास बना लेते हे। इतिहास में ऐसे उल्लेख मिलते है कि कई समर्थ सत्ताधीश मात्र गंगाजल ही पीते थे और उनके लिए गंगाजल नियमित रूप से पहुँचाने के प्रमुख प्रसाधन रहते थे। इन तथ्यों को देखते हुए समझा जा सकता है कि इस देश में गंगा को कितनी मान्यता मिलती रही है। अभी भी गंगा, गीता, गाय, गायत्री और गोविन्द की पाँच प्रमुख देव प्रतीकों में गणना होती है।
इतने पर भी समय का दुर्विपाक ही समझना चाहिए कि ख्याति अब बुरी तरह उलट गई जिस पुनीत जल के कारण गंगा के महत्व इस स्तर के बने थे उसमें लगभग आमूल–चूल परिवर्तन हो गया है। श्रद्धा की दृष्टि से उसका महत्व कुछ भी क्यों न हो वस्तु स्थिति की दृष्टि से उस महिमा का बुरी तरह पलायन या लोप हो गया है।
कभी भागीरथ ने तप करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था। एक दैवी वरदान पर भूलोकवासियों के लिए उपलब्ध कराया था। उनके महान कार्य को देखते हुए साक्षात् शिवजी ने अपनी जटाएं खोलकर उस अवतरण को सुलभ बनाया था। गंगा का ही प्रसाद था कि समूचा आर्यावर्त क्षेत्र धन तत्व से परिपूर्ण और मानवी गरिमा से ओत−प्रोत बना था। अब उस स्थिति को वापस लौटाने की भी कोई नहीं सोचता। इतना भी नहीं बन पड़ता है। कि जिन कारणों से गंगा की गरिमा गिरी है, उन्हें फिर से परिमार्जित करने के लिए कोई कारगर कदम उठाया जाय।
नदी जल की स्थिति के संबंध में विश्व के मान्य संस्थान “यूनाइटेड नेशन्स पापुलेशन फण्ड” ने अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट इसी साल में प्रकाशित की है। उसमें गंगा की वर्तमान स्थिति को संसार की सभी बड़ी नदियों की तुलना में अधिक गई बीती बताया है।
फण्ड का कहना है कि 2525 किलोमीटर लम्बी गंगा का 600 किलोमीटर भाग तो ऐसा है जिसे सबसे अधिक खराब कहा जा सकता है। इस प्रदूषण भरे भाग में ही हरिद्वार, कानपुर, प्रयाग, वाराणसी जैसे प्रमुख तीर्थ बसे हुए है। गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक की लम्बाई में प्रमुख पंद्रह सौ बड़े शहर और मंझोले कस्बे बसे हुए है। वे सभी अपना औद्योगिक कचरा तथा मनुष्यों और पशुओं से उत्पन्न होने वाली गंदगी प्रायः गंगा में ही बहाते है। इसी के तट पर प्रायः’ 132 बड़े औद्योगिक कारखाने बने है। उसमें से मात्र 12 ही अपने निस्सृत गंदे जल की सफाई (प्रासेसिंग) करते है। शेष सभी का रासायनिक प्रदूषण अपने मूल रूप में ही गंगा में मिला दिया जाता है एवं यह प्रक्रिया ऋषिकेश (वीरभद्र) स्थित आय.डी.पी.एल कारखाने से ही आरंभ हो जाती है।
अन्यान्य नगरों की गंदगी बहाने का भी प्रधान आधार यह गंगा जल ही है, चाहे वह मानवी मल हो अथवा शहरी गंदगी लेकर बहने वाला नाला। इसके अतिरिक्त अध जले मुर्दे भी तटवर्ती श्मशान से उसी घारा में बहा दिये जाते है। लकड़ी की महंगाई और अधजले शरीर को गंगा में डालने से मृतात्मा को पारलौकिक लाभ मिलने की भ्रान्तिपूर्ण मान्यता भी इसका एक बड़ा कारण है। साधु-संन्यासियों को जल समाधि देने का प्रचलन है इसका प्रभाव भी नदी जल में प्रदूषण बढ़ने का ही एक कारण बनता है।
पिछले दिनों गंगा में अथाह जल रहता था। धारा तेज रहती थी इसलिए आए दिन की गंदगी का उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ सकता था। बड़े कारखाने भी इतनी विषैली रसायनों का उपयोग नहीं करते थे। छोटे कारखाने अपना कचरा इर्द-गिर्द ही खपा लेते थे। पर अब तो सिंचाई के लिए बड़ी नहरें बन गई है। नगरों को पय जल की पूर्ति भी बड़ी नदियोँ से ही होती है। ऐसी दशा में उसका जल स्तर घटता ही जाता हे। कम पानी में गंदगी का अधिक अंश मिल जाने में उसके प्रदूषण का भाग अधिक मात्रा में रहने लगना स्वाभाविक है। ऐसे-ऐसे अन्य कारण भी है जो गंगा जल का प्रदूषण बढ़ाते है। उसमें प्रवाह धीमा और उथला करते चले जाते है। यह आज की स्थिति हैं जिसमें विश्व सर्वेक्षण ने उसे संसार की सबसे अधिक “गंदी नदी” का नाम दिया है। यदि क्रम यही चलता रहा तो बढ़ती आबादी की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ेगी और तदनुसार कचरा अधिक प्रवाहित होने का सिलसिला घटने के स्थान पर बढ़ता ही जायेगा। ऐसी दशा में स्थिति को सुधारने की आशा तो कैसे की जाय? गंदगी की और भी अधिक बढ़ने की आशंका ही बनी रहेगी। यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि ऐसे जल का प्रयाग करने वालों की स्वास्थ्य रक्षा समस्या भी जटिल होती जायेगी। पुण्य परमार्थ का लाभ मिलने की बात तो आगे ही खिसकती जायेगी।
खतरा बड़ा है और वास्तविक भी। इसे मात्र गंगा तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए। यह प्रश्न उन सभी नदियों के संबंध में उत्पन्न होता है जो बड़े नगरों के तट पर बसे हुए हो, या पानी खींच कर अन्यत्र उपयोग के लिए भेजा जाता है। जल तल घटने से नाविकों का जल पर्यटन का उद्योग तो नाम मात्र का ही रह जाता है उन्हें कुछ ही महीने काम मिलता हैं। नदियों की बालू में नमी बनी रहने में जो कृषि होती रहती थी उसमें भी कटौती होती चली जा रही है। आगे उसमें और भी कमी आने की आशंका है। जब पानी न रहेगा और दूषित होता चला जाएगा तो उसमें मछली जैसे जलचर भी कहा रह पायेंगे जो गंदगी खाते और सफाई करते रहते थे।
सरकारी प्रयत्न अपने ढंग से चल रहे है। उनमें बड़े शहरों में सीवर लाइन डालने, कचरा गंगा में न गिरे इसी व्यवस्था करने, गहराई बढ़ाने के लिए खुदाई करने तथा जमी गंदगी को हटाने के प्रयत्न भी शामिल है। इनसे तात्कालिक कुछ प्रयोजन तो सधता है, पर स्थायी समाधान निकल सकना तब तक संभव नहीं, जब तक कि उस मनोवृत्ति को न मिटाया जाय जिसके कारण गंदगी बढ़ती ही चली जाती हो और जल प्रदूषण की विपन्नता बढ़ती हो। सीर लाइनें व कचरे को, गंदे नालों को मोड़ कर उन्हें खेती के प्रयोजनों में लगाने का प्रयास कितना सफल रहा, कितना खोखला है व कितने दिन तक साँस ले पाएगा, कह पाना मुश्किल है, पर जितना दायित्व सरकार का है, उतना ही जनता का भी। जो काम शासन के करने योग्य है, वह करने के लिए उस पर दबाव डाला जाना चाहिए साथ ही जनता को भी सहमत किया जाना चाहिए कि वह इस संबंध में अपना कर्त्तव्य समझे और पवित्र गंगाजल को अपवित्र न बनाने में कम से कम अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह तो करे ही। इसके लिए आए दिन गंगा तट पर बड़े मेले लगाने की परम्परा में कटौती की जा सकती है। कुंभ व अन्यान्य पर्वों पर सीमित संख्या में ही यात्रीगण वहाँ पहुंचा करे, ऐसा अंकुश समय की माँग और परिस्थितियों को देखते हुए स्वयं ही लगाया जा सकता है। स्पष्ट है कि मेलों से अपेक्षाकृत अधिक गंदगी उत्पन्न होती है और उसका प्रभाव जल प्रदूषण पर पड़े बिना नहीं रहेगा।
अधजले या बिना जले मुर्दे नदी में न डाले जाय इसके लिए प्रचलनों में परिवर्तन रखना चाहिए। अन्य किसी प्रकार की गंदगी नदियों में न पड़ने देने के लिए भरसक प्रयत्न करें।
गंगा पूजा के निमित्त अब तक बहुत श्रम, समय और धन खर्च किया जाता हैं। अतः इस वर्तमान आपत्तिकाल में गंगा को नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए उस अनुदान को स्वच्छता प्रयोजन के लिए मोड़ दिया जाना चाहिए। सफाई के लिए धारा को घाटों के निकट लाने के लिए श्रम दान का अभियान चलाया जाय और जो दान देना हो उसे निठल्ले भिखारियों के हाथों न सौंपकर गंगा शुद्धता तंत्र के हाथों सौंपा जाना चाहिए ताकि वह भगवती भागीरथी की वास्तविक सेवा में लग सके। ऐसा तंत्र सार्वजनिक क्षेत्र में गठित किया जा सके और उसका स्वरूप धार्मिक स्तर जैसा हो तो और भी अच्छा रहेगा क्योंकि वह जनश्रद्धा व भावनाओं पर आधारित होगा।
गंगा में गिरने वाले कचरे का खाद बना कर खेतों तक पहुँचाया जाना चाहिए। उसे सौर ऊर्जा के माध्यम से सुखाकर सूखी खाद के रूप में परिणत किया जाना चाहिए। इस कार्य को जनता और सरकार के सहयोग से सफलता पूर्वक किया जा सकता है। नदियों का पानी सूखने लगे तो उन्हीं के किनारे बड़े कुएँ खोदे जा सकता है और उनकी कमी मोटरों द्वारा ऊपर लाया जाकर गंगा को लुप्त होने से बचाया जा सकता है। प्रवाह बनी रहने से गन्दगी पैदा न होगी।
पानी के साथ मिट्टी ऊपर से नीचे आती है उससे सतह उथली होती रहती है। इस कारण बाढ़ आने, धार बदलने, नदी का पाट चौड़ा होने जैसे अनेकों संकट खड़े होते है। गहराई को यथावत् बनाये रहने के लिए उसकी सफाई समय-समय पर होती रहनी चाहिए।
नदी के तेज प्रवाह में प्रायः बरसाती जल सीधा समुद्र में जा पहुँचता हे। एक आकलन के अनुसार इसकी मात्रा लगभग बत्तीस करोड़ हेक्टेयर मीटर के लगभग है जो व्यर्थ ही थल व शहरी संपत्ति को नष्ट करते हुए सागर में विलीन हो जाता है। इसे रोका और सुरक्षित रखा जाना चाहिए। अच्छा हो बड़ी नदियों के आस-पास बाँध और छोटे-छोटे जल क्षेत्र बनाये जांय। इन सरोवरों में संचित जल कृषि क्षेत्र में आवश्यकतानुसार उपयोग होता रह सकता है एवं नदियोँ में भी कमी न पड़ने पायेगी।
कारखानों का जहरीला पानी किसी भी स्थिति में नदियोँ में न मिलने दिया जाय। कारखानों वालों पर यह कड़ा प्रतिबंध रहे कि दूषित जल को शुद्ध करने के उपरान्त ही किसी नदी में मिलने दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में पूरी-पूरी कड़ाई बरती जाय। दोषी कोई भी हो उसे ढूँढ़ने पर ऐसे और भी उपाय मिल सकते है कि जिससे नदी जल प्रदूषित न होने पाये और पानी की कमी भी न पड़ने पाये।
शुद्धता इसी प्रकार सुरक्षित रखी जा सकती है। नदियाँ हमारे जीवन-प्राण वनस्पति जगत की जीवन धाराएँ है। गंगा जैसी पुण्यतोया नदियों का तो धार्मिक महत्व भी है। उन्हें सही और सुरक्षित रखने के लिए जनता को और सरकार को इस प्रयोजन के लिए अपने-अपने ढंग से समुचित प्रयत्न करने चाहिए। यदि वर्तमान प्रचलन चलता रहा तो वह समय दूर नहीं, जब गंगा अपने उद्गम स्थल से ही सिकुड़ते-सिकुड़ते लुप्त होने लगेगी। तब कौन भागीरथ उसे वापस लाने का दुस्साहस कर सकेगा? अभी भी समय है एवं काफी कुछ किया जा सकता है।
बालक ईश्वरचन्द्र अपने पिता ठाकुरदास के साथ वीरसिंह नामक गाँव से कलकत्ता जा रहा था। गाँव से कलकत्ता तक पक्की सड़क थी। जब काफी दूर निकल गये तो बालक का ध्यान जमीन में गढ़े पत्थर की ओर गया उस पर काला-काला कुछ लिखा था। बालक ने उसे देखकर पूछा-पिताजी स्थान-स्थान पर यह पत्थर जमीन में क्यों गोड़े है?
पिता ने समझाया बेटा-”यह मील के पत्थर है। इनसे किसी स्थान की दूरी ज्ञात होती है। इस पत्थर पर अंग्रेजी में लिखा है कि कलकत्ता यहाँ से 11 मील है।”
लगभग 10 मील की यात्रा बातचीत में निकल गयी। मील का पत्थर आता और वह बालक यह पूछ लेता “पिताजी यह क्या लिखा है?” इस प्रकार अंग्रेजी के अंकों की बनावट उसके मस्तिष्क में जमती जा रही थी और यात्रा के पूर्ण होने तक उसे अंग्रेजी की गिनती का पूरा अभ्यास हो गया।
शाम तक पिता पुत्र कलकत्ता पहुँच गये और सेठ जगदुर्लभसिंह के यहाँ ठहरे। सुबह वे दोनों सेठ की दुकान पर गये वहाँ सेठ ने ठाकुरदास को कुछ हिसाब मिलाने के लिये दिया। वह बालक भी पास में बैठकर सारे हिसाब को देखता रहा जब हिसाब करके पिता ने सेठ को वापस कर दिया तो ईश्वरचन्द्र ने कहा-”पिताजी। यह हिसाब मुझको भी आता है।”
“बालक की बात सेठ ने सुनी तो पूछ बैठा ठाकुरदास से क्या आपके बेटे ने कही अंग्रेजी की शिक्षा भी ली है”
नहीं। नहीं। “एकाग्रचित्त होकर जब यह किसी कार्य को देखता है और समझने का प्रयास करता है तो उसे सीखने में देर नहीं लगती।” इस प्रतिभा का कारण पूछने पर बालक ने यही कहा- “किसी बात पर पूरा ध्यान देने से वह कठिन होते हुये भी-किसी के लिए-भी सरल हो सकती है।”यही बालक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
शरीर के साथ चेतना का उद्भव और मृत्यु के साथ ही उसका अंत नहीं हो जाता, वरन् कायकलेवर के न रहने पर भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहता है और वह पुनर्जन्म धारण करती है। भारतीय धर्म, दर्शन में आत्मा की अमरता एवं पुनर्जन्म की सुनिश्चितता को आरंभ से ही मान्यता प्राप्त है। अध्यात्म-तत्व ज्ञान की आधारशिला समझी जाने वाली इस मान्यता के संबंध में विश्व के विभिन्न धर्मों में अलग-अलग विचारधाराएँ प्रचलित है किन्तु चेतना प्रवाह की अविच्छिन्नता और काया की नश्वरता को सभी न समान रूप से स्वीकार किया है।
आत्मा की अमरता एवं मरने के बाद दूसरा जन्म मिलने का तथ्य हिन्दू धर्म में सदा से माना जाता रहा है। भारतीय धर्म-शास्त्रों में पग-पग पर मरणोत्तर जीवन के तथ्य का प्रतिपादन किया गया है। पुराणों एवं आप्त वचनों में जीवात्मा के पुनर्जन्म लेने की बात कही गई है। गीता में इस बात का उल्लेख किया गया है कि शरीर छोड़ना वस्त्र बदलने की तरह है। प्राणी को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। शुभ कर्म करने वाले श्रेष्ठ लोग तो सद्गति को प्राप्त करते है और दुष्कर्म करने वालों को नरक की दुर्गति भुगतनी पड़ती है। गीता के दूसरे अध्याय के 22 वे श्लोक में कहा गया है-”जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग करके नया वस्त्र धारण करता है, इससे वस्त्र बदलता है, मनुष्य नहीं बदलता। इसी प्रकार देहधारी आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करती है।” गीता 4/5 में ही कृष्ण ने कहा है-”अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत गये है। ईश्वर होकर मैं उन सबका जानता हूँ, परन्तु हे परंतप! तू उसे नहीं जान सकता।”
सामान्यतया यह कहा जाता है कि विश्व के दो प्रमुख धर्मों-ईसाई और इस्लाम में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है, पर उनके धर्म ग्रन्थों एवं मान्यताओं पर बारीकी से दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि प्रकारांतर से वे भी मरणोत्तर जीवन की वास्तविकता को मान्यता देते है और परोक्ष रूप से उसे स्वीकार करते है।
प्रख्यात विद्वान प्रो. मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ-”सिक्स सिस्टम ऑफ इण्डियन फिलॉसफी” में ऐसे अनेक आधार पुनर्जन्म की आस्था से सर्वथा मुक्त नहीं है। प्लेटो एवं पैथागोरस के दार्शनिक ग्रन्थों में इस मान्यता को स्वीकारा गया है। दूसरी शताब्दी के सुप्रसिद्ध अँग्रेज विद्वान ऐरीगन ने स्पष्ट लिखा है- “बार-बार जन्म लेने पर फरिश्ते आदमी बन सकते है ओर आदमी फरिश्ते और बुरे-बुरे लोग भी उन्नति करते-करते अच्छे आदमी या फरिश्ते बन जाते है। ईसाई धर्म के प्रख्यात विद्वान जोजेफस ने अपनी पुस्तक में उन यहूदी सेनापतियों का हवाला दिया है जो अपने सैनिकों को मरने के बाद भी फिर से पृथ्वी पर जन्म मिलने का आश्वासन देकर उत्साह पूर्वक लड़ने के लिए उभारते थे। उन्होंने लिखा है- “रूहें सब शुद्ध होती है, अच्छे मनुष्यों की आत्मा फिर से अच्छे शरीर में जाती है जबकि दुष्कर्मियों की रूहें सजा भुगतती है। थोड़े दिनों पश्चात् वह फिर से नया जन्म लेने के लिए भेजी जाती है। अच्छी रूहें अच्छे शरीर में और बुरी रूहें बुरे जिस्मों में, परन्तु जो लोग आत्महत्या करते है उन्हें पाताल की अँधेरी दुनिया में भेजा जाता है जिसे “हैडेस” के नाम से जाना जाता है।” जोजेफस का यह कथन ईशोपनिषद् की उस आख्यायिका से अक्षरशः मिलता है जिसमें कहा गया 5ह5- “अन्धं तमः प्रविशन्ति ये के चात्महनों जनाः। “अर्थात् जो लोग आत्म हत्या करते है वह घोर अन्धकार में जाते है।
यहूदी धर्म में पुनर्जन्म को “गिलगूलिम” कहा जाता है। यहूदी परम्परा “कब्बालह” में भी इस मान्यता की प्रधानता है। उनके धर्म ग्रन्थ “जुहर” से स्पष्ट रूप से उद्धृत है। कि “सब रुहों को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। “ईसाई धर्म का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय-ग्नास्टिक सम्प्रदाय है जिसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि वे सभी विद्वान, समझदार और नेक आदमी थे और सभी की मरणोत्तर जीवन पर पूर्ण आस्था थी। ईसा से चौथी-पांचवीं सदी के “मनीशियन” सम्प्रदाय के लोग भी पुनर्जन्म को मानते थे इतिहासकार गिबन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक-”डिक्लाइन एण्ड फाल ऑफ द रोमन एम्पायर” में लिखा है कि ईसा के शिष्य पुनर्जन्म को मानते थे। उनके अनुसार प्रख्यात ईसाई आचार्यों में क्लीमैन्स, एलेगजैन्ड्रिनस, सिनेसियम, चैलसीडियम जैसे विद्वान इसे मानते थे। बाद में योरोपीय विद्वानों और दार्शनिकों में गिआरडानो, बान हैमान्ट, स्वीडिन बर्ग, गेटे, लैसिंग, चार्ल्स बौनेट, हरडर, ह्यूम, शोपनहावर जैसे ख्यातिलब्ध विचारक भी मरने के पश्चात् फिर से नया जन्म मिलने पर विश्वास रखने लगे थे। “विजडम ऑफ सोलेमन” ग्रन्थ में महाप्रभु ईसा के वे कथन उद्धत है। जिसमें उनने पुनर्जन्म का प्रतिपादन किया है। उन्होंने अपने शिष्यों से एक दिन कहा था-”पिछले जन्म का एलिज (इल्यास) ही अब”जान दी बैपटिस्ट” के रूप में जन्मा है। “बाइबिल के चैप्टर 3 पैरा 3-7 में ईसा कहते है-”मेरे इस कथन पर आश्चर्य मत करो कि तुम्हें निश्चित रूप से पुनर्जन्म लेना पड़ेगा।” सेंटपाल को तो ईसा की प्रतिमूर्ति माना जाता रहा है। ईसाई धर्म के प्राचीन आचार्य ओरिगन कहते थे-”प्रत्येक मनुष्य को अपने पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार अगला जन्म धारण करना पड़ता है।” पाश्चात्य दार्शनिक प्लेटो, प्लोटिनस, कान्ट एवं टेनीशन, जान मैसफील्ड जैसे विचारकों की पुनर्जन्म में आस्था थी।
सुविख्यात यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस का अभिमत था कि मरणोपरान्त आत्मा पुनः किसी भी प्रकृति के प्राणी में जा पहुँचती है। यह निर्धारण कर्मफल व्यवस्था के अनुसार ही होता है। प्लेटो ने भी यह स्वीकारा है-”जो आत्मायें शुद्ध हो चुकी है और शरीर पर जिनका तनिक भी मोह नहीं है, वे फिर से शरीर धारण नहीं करेंगी। पूर्ण रूप से अनासक्त होने पर वे आवागमन के चक्र से मुक्त हो जायेंगी।” उनका कहना है कि “आत्माएँ इस जीवन में बार-बार जन्म लेती रहती है।” “अनिश्चित सीमा” नामक अपनी पुस्तक में श्री जी एलू फ्लेअर ने इसकी पुष्टि करते हुए लिखा है कि “यह बात नहीं कि हम यहाँ से कही जाते है, हम तो यहाँ पहले से ही थे।”
वस्तुतः पुनर्जन्म की मान्यता जीवन को अनवरत रूप से गतिशील रहने एवं उत्तरोत्तर विकास करते जाने का विश्वास दिलाती है। अरबी में इसे तनासुख कहते है। इस्लाम के पवित्र धर्म ग्रंथों- इंजील और कुरान में इस संबंध में कोई स्पष्ट बात नहीं खिली है, पर इससे इन्कार भी नहीं किया गया है कि कुरान में कहा है-”ऐ इनसान! तुझे फिर अपने रब-(खुदा) की तरफ जाना है। वही तेरा अल्लाह है। तुझे मेहनत और तकलीफ के साथ दरजे बदरजे अर्थात् सीढ़ी चढ़कर उस तक पहुँचना है।”
कुरान में बहुत सी आयतें है जिनका गहराई से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य बार-बार जन्मता और मृत्यु को प्राप्त होता है ठीक उसी तरह जैसे कि यह सृष्टि बनती और विनष्ट होती रहती है। इनमें से कुछ आयत इस प्रकार है- “हमने तुम्हें जमीन में से पैदा किया है और हम तुम्हें फिर उसी जमीन में भेज देंगे और फिर उसी में पैदा करेंगे, बार बार आखिर तक।” एक दूसरी आयत में कहा गया है-कैफा तकफुरुना बिल्लाहे,..........। अर्थात् तुम अपने अल्लाह से कैसे इन्कार कर सकते हों। तुम मर चुके थे, उसने तुम्हें पुनः जीवित किया। वह तुम्हें फिर मारेगा और फिर जिलायेगा। यहाँ तक कि आखिर में तुम फिर उसके पास लौट जाओगे।” इस तरह कितनी ही आयतें है जो मृत्यु के पश्चात् जीवन की निरन्तरता पर प्रकाश डालती है।
प्रसिद्ध सूफी सन्त - मौलाना रुम ने लिखा है - “मैं पेड़-पौधे, कीट-पतंग, पशु-पक्षी योनियों में होकर मनुष्य वर्ग में प्रवेश हुआ हूँ और अब देव वर्ग में स्थान प्राप्त करने की तैयारी कर रहा है।” कुरान की आयतों के आधार पर पुनर्जन्म में विश्वास रखने वाले सूफी सन्तों में अहमदबिन साबित, अहमद बिन यबूस, अबु मुस्लिम खुरासानी, शेख-उलइश्राक, उमर खययाम, अल गिजाली आदि प्रमुख है। इन्होंने कुरान की सूरतुलमबरक आयत 61 से 12 तथा सूर-तुलमायदा आयत 55 को प्रमुख रूप से अपनी मान्यता का आधार बनाया है।
“दी एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम” में तनासुख अर्थात् पुनर्जन्म पर विशद् रूप से प्रकाश डाला गया है। उसने अनुसार इस्लाम के बहुत से फिरके है जो पुनर्जन्म को मानते है विशेषकर शिया सम्प्रदाय के लोग।” दी एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन्स एण्ड एथिक्स” में कहा गया है कि भारतीयों के अतिरिक्त ईरानियों जर थुसियों, मिस्तियों, यहूदियों, यूनानियों, रोमियो, कैलटिक एवं टियोटोनिक आदि सभी ने पुनर्जन्म को माना है। इसी महाग्रंथ के बारहवें खण्ड में अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के आदिवासियों के सम्बन्ध में यह अभिलेख है कि वे सभी समान रूप से मरणोत्तर जीवन को मानते है।
कभी पुनर्जन्म धर्म और दर्शन का ही प्रतिपाद्य विषय था। यह दानों ही क्षेत्र श्रद्धा प्रधान है। जिनमें तथ्यान्वेषी जिज्ञासायें है, उनको बिना आधार प्रमाण पाये सन्तोष नहीं होता। अतः अब इस मान्यता को वैज्ञानिक अनुसन्धान का विषय स्वीकार कर लिया गया है। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों एवं परामनोविज्ञानियों ने जो प्रत्यक्ष प्रमाण जुटाये है उनसे पुरातन असमंजस की स्थिति धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। लोगों को अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना या शिथिल करना पड़ रहा है। पुनर्जन्म वस्तुतः’ जीवन यात्रा का अगला चरण है। सतत् गतिशीलता का अगला आयाम है। इसकी मान्यता जीवनक्रम में आस्तिकता की भावना नीतिमत्ता एवं भविष्य की आशा बनाये रहने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है।
मनुष्य जितना छोटा होता है, उसका अहंकार उतना ही बड़ा होता है।
आयुर्वेदिक रसायन बनाने की प्रक्रिया में उन्हें कितनी ही क्रियाओं से गुजारा जाता है। कई प्रकार के रस मिलाये जाते है। कितनी ही बार उन्हें गजपुट प्रक्रिया द्वारा अग्नि में तपाया, संस्कारित किया जाता है, तब कही वह रसायन ठीक तरह तैयार हो पाता है और साधारण-सी दीखने वाली लोहा, ताँबा, जस्ता, अभ्रक जैसी कम महत्व की धातुएँ चमत्कारिक शक्ति सम्पन्न बन जाती है। यह वस्तुतः “संस्कार” की परिणति है। संस्कारित होने के बाद ही लोहा मजबूत इस्पात बन पाता है और मिट्टी उपजाऊ बन कर फसलें उगाती है।
कुम्हार यदि मिट्टी के कच्चे बरतनों को आवे में पकाये नहीं, तो वह किसी काम नहीं आ सकते। ठोकर बर्दाश्त करने और उपयोग लायक बनाने के लिए उसकी अपरिपक्वता मिटानी पड़ती है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य को भी समय-समय पर विभिन्न आध्यात्मिक उपचारों द्वारा संस्कृत बनाने का महत्वपूर्ण निर्धारण भारती सुसंस्कृति में है। भारती तत्ववेत्ताओं द्वारा विकसित यह पद्धति “संस्कार-पद्धति” के नाम से जानी जाती है।
मनुष्य जब जन्म लेता है, तो जन्म जन्मान्तरों के अनेक कषाय–कल्मष अपने साथ लाता है। उनका परिमार्जन-परिष्कार आवश्यक होता है। यदि उन्हें यों ही छोड़ दिया जाय तो वे आगे चलकर चित्र-विचित्र कल्पनाएँ अपरिष्कृत चिन्तन तंत्र, विलक्षण मनोवृत्तियों का एक मिला जुला मानवी स्वरूप निर्धारित करते है। ऐसी स्थिति में चिन्तन और क्रिया में, योग्यता, बुद्धि, रुचि और लक्ष्य में एकरूपता न होने के कारण उसके जीवन की कोई एक निश्चित दिशा निर्धारित नहीं हो पाती।
डाक्टर जानते है कि रक्त में जब विजातीय द्रव्य, जीवाणु विषाणु प्रवेश करते है, तो रोगों को जन्म देते है। ओझा-माँत्रिकाकं की मान्यता है। कि शरीर में जब किसी बाहरी सत्ता का हस्तक्षेप होता है, तो व्यक्ति उन्मादग्रस्त बन कर औंधे-सीधे कार्य करने लगता है। विपरीत विचारधारा के व्यक्ति से घर में कलह उत्पन्न होता, वैमनस्य बढ़ता और उससे पूरा परिवार प्रभावित होकर अवगति की राह पर आ जाता है।
संचित कषाय-कल्मष मनुष्य की ऐसी ही गति बनाते हैं। इन्हें संवारने और आत्मिक प्रगति के पथ की ओर अग्रसर करने के लिए ऋषियों ने “संस्कार पद्धति” की व्यवस्था की थी। इसे देव संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता मानी जानी चाहिए क्योंकि इसमें जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन पर्यन्त व्यक्तित्व को सफल-सार्थक बनाने हेतु सतत् शोधन एवं आत्मसत्ता के अभिवर्धन का प्रावधान है। यह उस विद्या रूपी विभूति की विधा है, जो गुरुकुल शिक्षण प्रणाली का अंग रही है। संस्कृति के अंतर्गत जीवन क्रम में इन्हें इस प्रकार समाविष्ट कर दिया गया कि यथासमय वाँछित श्रेष्ठ संस्कार व्यक्ति को स्वयमेव मिलते रहें।
पशु यह नहीं जानते कि उनकी मर्यादाएँ क्या है? कैसे रहना, खाना, पीना और जीवन यापन करना है? उनका यह सारा क्रिया-व्यापार प्रकृति प्रेरणा से चलता है किन्तु मनुष्य को इस बात की भली भाँति जानकारी होती है कि वह अपना आत्म विकास कैसे करे? कैसी योजनाएँ बनाए और कार्यक्रम अपनाये कि अन्ततः वह उस मार्ग पर चलते-चलते परमलक्ष्य को प्राप्त करें। इस दिशा में अड़चन एक ही आती है वह है - कुसंस्कार। वही मार्ग में बाधक बन कर उद्देश्य की ओर बढ़ते व्यक्ति को च्युत करते है। इनके रहते उससे वैसा कुछ करते नहीं बन पड़ता, जो उसे सुसंस्कृत - सुविकसित बना सके। यह बात नहीं, कि सुसंस्कारिता के बीज किसी-किसी में ही होते है। यह न्यूनाधिक होते तो सभी में है, पर कुसंस्कारिता के झाड़ - झंखाड़ से इस प्रकार दबे रहते है कि उन्हें पनपने का मौका ही नहीं मिल पाता। यह उभयपक्षीय प्रयोजन संस्कार पद्धति पूरा करती है।
भारतीय संस्कृति की आदि काल से यह विशेषता रही है कि उसमें उद्देश्यपूर्ण, आदर्शयुक्त, पारमार्थिक, जीवन को ही प्रमुखता दी गई है। इस देश में उस व्यक्ति को ही सच्चा मनुष्य माना जाता रहा है, जो संस्कारवान आदर्श जीवन जीता रहा है। अज्ञान, अशक्ति, अभाव, कषाय-कल्मष से संघर्ष करने का व्रत लेने वाले ही “द्विज” कहे जाते है। जो द्विज नहीं है, अर्थात्!् जिनमें संघर्ष क्षमता क्षीण हो चुकी है, वे आजीवन शूद्र बने रहते है। ऐसे स्वार्थी, लोभी, विषयी, विकारी मनुष्य का अर्ध-सामाजिक बहिष्कार किया जाता रहा है। वस्तुतः जन्म से सभी शूद्र ही होते है, पर बाद में सूक्ष्म आध्यात्मिक उपचारों क्षरा संस्कारित होकर, अपनी चिन्तन-चेतना को परिष्कृत कर वे द्विजत्व की प्राप्ति करते है।
आज शिक्षा, भौतिक प्रगति, मानवी सूझबूझ सभी उत्कर्ष पर है, किन्तु फिर भी इनसे समृद्ध व्यक्ति को सुसंस्कृत नहीं कहा जा सकता, यह व्यक्ति को सभ्य तो बना सकती है, पर संस्कृत कहलाने का श्रेय-सम्मान इनसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। संस्कारवान तो वह तभी कहला सकता है, जब अपने अन्त’करण की मलीनता को धोकर गुण, कर्म, स्वभाव को समुन्नत स्तर का बना सकें। भारतीय संस्कृति में संस्कार-पद्धति के आध्यात्मिक उपचार इसी की व्यवस्था करते है।
इस प्रकार मानव जीवन को प्रखर-पवित्र बनाने की उपचार-प्रक्रिया को ही संस्कार कहा गया है। मेदिनी कोश में इसका एक अर्थ “प्रभाव” भी बताया गया है-”यन्नवे भाजने लग्नःः संस्कारों नान्यथा भवेत्”, अर्थात् जो संस्कार या प्रभाव नूतन पात्र पर पड़ जाता है, वह फिर बदलता नहीं। अतः संस्कार की श्रेणी में उन्हीं सद्गुणों को रखा जाता रहा है जो चिरस्थायी प्रभाव डालते हो।
प्रतिकूल संस्कारों को निष्ट कर अनुकूल उत्कृष्ट संस्कारों को स्थापित करने के लिए देव संस्कृति में प्रभावोत्पादक कर्मकाण्डों की व्यवस्था है, पर इनकी संख्या कितनी हो? इस सम्बन्ध में कोई निश्चित निर्धारण नहीं है। “दशकर्म पद्धति” के अनुसार संस्कार दस है। ऋषि अंगिरा ने पच्चीस संस्कार गिनाये है, जबकि गौतम सूत्र में इनकी संख्या चालीस बताई गई है-”चत्वारिशत्सं-स्कारैः संस्कृतः” अर्थात् व्यक्ति को चालीस संस्कारों से सुसंस्कृत होना चाहिए। कही-कही इनकी संख्या इड़तालीस भी बताई गई है।
इतने संस्कारों को करने-कराने का न तो आज के लोगों के पास समय रह गया है और न यह सभी आज के समयानुकूल है। अतः समय, सुविधा, परिस्थिति और अनुकूलता को देखते हुए षोडश-संस्कारों को ही प्रधानता दी गई है। भगवान वेद व्यास ने भी इनकी संख्या सोलह बताई है। इनमें भी इस अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ये है-पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारीं, उपनयन, विवाह, वानप्रस्थ, अन्त्येष्टि और श्राद्ध। इन सभी में महत्वपूर्ण शिक्षाओं का समावेश है।
पुंसवन में माता तथा परिवार को गर्भावस्था में एवं जन्म के उपरांत शिशु को सुविकसित बनाने की आवश्यक जानकारी दी जाती है। नामकरण में किसी ऐसे महापुरुष, देवशक्ति के नाम के चयन पर बल दिया जाता है, जो उसके सद्गुणों को गरिमा का भान कराये ताकि बालक धीरे-धीरे स्वयं को उसी के अनुरूप ढालता चले। बालक के आहार-विहार संबंधी जानकारी अन्नप्राशन के अंतर्गत दी जाती है। मुण्डन में मानसिक विकास की शिक्षा निहित है। विद्यारम्भ संस्कार सभ्य - सुशिक्षित बनने की प्रेरणा देता है। उपनयन के अंतर्गत जीवन को महान बनाने वाले विभिन्न सद्गुणों का महत्व समझना, जीवन में उनका समावेश करना और आजीवन निबाहना मुख्य है। एक-एक मिलकर ग्यारह बनने, परिवार-समाज के अधिकाधिक काम आने तथा जीवन को यज्ञीय बनाने का संदेश विवाह के माध्यम से दिया जाता है। ढलती आयु का सुनियोजन साधना सेवा के क्षेत्र में हो- यह वानप्रस्थ संस्कार उद्देश्य है। अन्त्येष्टि द्वारा जीवन की नश्वरता और उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की शिक्षा लोगों को हृदयंगम करायी जाती है। श्राद्ध के अंतर्गत - मृतक द्वारा छोड़ी सम्पदा का परमार्थ प्रयोजनों में सदुपयोग कर मृतात्मा को सद्गति प्रदान करने का महत्वपूर्ण निर्देश है।
संस्कार एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक उपचार है, जो मनुष्य को सत्परायण बनने की दिशा देते हैं। कर्मकाण्ड से अधिक इनमें भावना का महत्व होता है। हर वर्ण-जाति के व्यक्ति को हर संस्कार के लिए खुली छूट मिली है। कही किसी प्रकार का बंधन नहीं है। वस्तुतः संस्कारों से ही व्यक्ति ब्राह्मणत्व की प्राप्ति करता है। महर्षि गौतम ने कहा है-”स ब्रह्मणः बह्मणः सायुज्यमाप्नोति” अर्थात् ऐसा संस्कारी व्यक्ति ब्रह्मसायुज्य (साक्षात्कार) का श्रेय प्राप्त कर लेता है। यह प्रतिपादन आज के युग में भी पूर्णतः तथ्य सम्मत है। शांतिकुंज गायत्री तीर्थ में इन संस्कारों को शास्त्र सम्मत विधान से किये जाने की बड़ी उत्तम व्यवस्था बनाई गई है जिसका कोई शुल्क नहीं लिया जाता। सभी यहाँ आते व वातावरण से अनुप्राणित होकर जाते है।
हलवाई की दुकान पर चासनी की कढ़ाई भरी हुई थी। उसकी गंध पाकर मक्खियाँ चारों ओर भिनभिनाने लगी।
उनमें से कुछ समझदार थी कुछ मूर्ख। मूर्ख बेतहाशा दौड़ी और तुरंत-फुरत आगे शक्कर चासनी उदरस्थ करने के लिए लपकी उनके पंख और पैर चासनी में भीग गये। उड़ न सकी। तड़प कर मर गई।
पर कुछ समझदार थी। वे चासनी के एक कोने पर बैठी और शरीर को बचाते हुए जीभ से थोड़ा मीठा रस चखने लगी। इस नीति को अपनाने में अपना मन तो कुछ देर को मारा पर सभी सुरक्षित रूप से वापस लौट गई।
आतुर लोग बुद्धि गँवा बैठते है और जल्दबाजी में अपना सर्वनाश करते है। इसके विपरीत बुद्धिमान सावधानी बरतने, लाभ कमाते और सुरक्षित रहते है।
भुज (कच्छ, गुज0) आयोजकों की कल्पना के प्रतिकूल नारी जागरण सम्मेलन में महिलाओं की विशाल उपस्थिति देखकर कार्यकर्ता आश्चर्य चकित रह गये। प्रौढ़ शिक्षा विस्तार, कुटीर उद्योग जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए व्यापक स्तर पर जन संपर्क करने की योजना बनाई गई।
कठघोरा (म0प्र0) नारी–जागरण सम्मेलन आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। विद्यालय के विशाल प्रांगण में महिलाओं से खचाखच भरे पंडाल में परम पूज्य गुरुदेव का सन्देश सुनाया गया। फलस्वरूप समीपवर्ती क्षेत्र में 24 नारी जागरण शाखायें स्थापित करने का संकल्प लिया गया।
इन्दौर (म0प्र0) श्रीमती ऊषा तिवारी तथा श्रीमती शाँता साहनी ने महिला जागरण सम्मेलन में युग निर्माण परिवार द्वारा नारी जागरण के लिए किए जा रहे प्रयासों की विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए महिलाओं को चहार दीवारी से निकलकर आगे आने का आहृन किया गया। समीपवर्ती क्षेत्र में अधिकाधिक नारी जागरण शोखाओं के गठन का संकल्प लिया गया।
भोपाल (मåप्रå) भारत के उपराष्ट्रपति की धर्मपत्नी और विधायिका श्रीमती विमला शर्मा के आतिथ्य में महिला जागरण सम्मेलन अभूतपूर्व स्तर पर संपन्न हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता राज्य की पंचायत एवं महिला कल्याण राज्य मंत्री राय ने की। श्रीमती राय ने नारी जागरण के लिए युग निर्माण योजना द्वारा किए जा रहे प्रयासों को अभूतपूर्व बतलाया।
खरगौन (मåप्रå) महिला जागरण सम्मेलन अभूतपूर्व सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। नारी जागरण सम्मेलन में श्रीमती इन्दुमती जैन तथा विधायिका श्रीमती करुणा ढ़ाँगी ने भाग लिया। नारी की सुप्त शक्ति को जगाने के लिए युग निर्माण योजना द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। इन कार्य-क्रमों को जन-जन तक पहुंचाने का आहृन किया गया। हर मुहल्ले में नारी जागरण शाखा की स्थापना का संकल्प लिया गया।
जोबट (झाबुआ, मåप्रå) इन्दौर की शोभा श्रीवास्तव, गनावर की कल्पना गुप्ता तथा नगर कार्यवाहिका श्रीमती विन्देश्वरी सोनी के प्रयासों से महिला जागरण सम्मेलन आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। घर-घर युग साहित्य पहुँचाने की व्यापक व्यवस्था टोलीबद्ध रूप से महिलाओं ने की।
डालटन गंज (बिहार) समीपवर्ती क्षेत्र में अधिकाधिक नारी जागरण शाखाओं के गठन तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के संकल्प के साथ नारी जागरण सम्मेलन सम्पन्न हुआ। समूचे क्षेत्र में महिलाओं को ऊँचा उठाने के लिए घर-घर सत्साहित्य पहुँचाने की व्यापक व्यवस्था कार्यकर्ता महिलाओं द्वारा की जा रही है।
नारी जागरण सम्मेलन सम्पन्न
सुल्तानपुर (उåप्रå) महिला जागरण सम्मेलन का उद्घाटन श्रीमती शकुन्तला पाण्डेय तथा श्रीमती मालती ने किया। इस अवसर पर दहेज उन्मूलन तथा आदर्श विवाहों के प्रचलन कार्यक्रम में अंतर्गत आदर्श विवाह भी सम्पन्न कराये गये। कर्म-काण्ड की व्याख्या एवं प0ति ने सभी को प्रेरणा दी।
राष्ट्रीय एकता हेतु सजीव सक्रिय प्रयास
भोपाल (मåप्रå) यहाँ सम्पन्न राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में मुसलमान, सिख तथा जैन धर्म के अनुयायियों ने भी श्रद्धापूर्वक भाग लिया। उपस्थित विशाल जन समूह ने एक स्वर से राष्ट्रीय एकता की शपथ ली।
इन्दौर (मåप्रå) राष्ट्रीय एकता सम्मेलन उल्लास भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। हर धर्म के अनुयायियों का विशाल जन समूह राष्ट्रीय एकता की शपथ लेने के लिए उपस्थित हुआ। नगर के अनेकानेक गणमान्य व्यक्ति इसमें उपस्थित थे।
बाग बहरा (मåप्रå) राष्ट्रीय एकता सम्मेलन का उद्घाटन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री खेमचन्द्र श्रीमाल जी ने किया। सामूहिक रूप से राष्ट्रीय एकता की शपथ ली गई।
सुल्तानपुर (उåप्रå) राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में सभी धर्मों के अनुयायी उत्साह पूर्वक सम्मिलित हुए। उपस्थित जन समूह ने हाथ उठाकर राष्ट्रीय एकता की शपथ ली। इन प्रयासों को समूचे क्षेत्र में व्यापक समर्थन मिल रहा है।
अभूतपूर्व अद्वितीय दीपयज्ञ
भोपाल (मåप्रå) इक्यावन हजार दीपों के एक साथ प्रज्वलित होते ही नया दशहरा मैदान जगमगा उठा। विशाल जल कलश यात्रा के दृश्य ने नगरवासियों का मन मोह लिया। राजधानी में ऐसा विशाल आयोजन लोगों ने पहली बार देखा। राज्य के गैस राहत मंत्री श्री हसनात सिद्दी की तथा विधायक श्री बाबूलाल गौर भी कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।
इन्दौर (मåप्रå) चिमन बाग मैदान पर आयोजित चौबीस हजार वेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम ऐतिहासिक छाप छोड़ता हुआ सम्पन्न हुआ। दीप यज्ञ की शोभा यात्रा का स्वागत मध्य प्रदेश विधान सभा के उपाध्यक्ष श्री कन्हैयालाल यादव ने किया। दीप यज्ञ कार्यक्रम का उद्घाटन राज्य सरकार के उद्योग मंत्री श्री चन्द्रशेखर ने सपत्नीक दीप प्रज्वलित कर किया। श्री शेखर ने मनुष्य में देवत्व के उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए युग निर्माण परिवार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को अभूतपूर्व बतलाया।
सुल्तानपुर (उåप्रå) चौबीस सौ वेदीय दीप यज्ञायोजन आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। नगर के लिए यह आयोजन कौतूहल पूर्ण रहा। दीप यज्ञ में अभूतपूर्व उपस्थिति की सी को भी कल्पना नहीं थी। सर्व श्री लखपत राय जी, रामचन्द्र अग्रवाल, माता प्रसाद तथा आद्या प्रसाद विद्यार्थी का सम्मिलित श्रम विशाल जन समूह के मध्य ज्योति प्रकाश के रूप में झिलमिला उठा। झिलमिलाते दीपकों के मनोहारी दृश्य को सभी भाव-विभोर होकर देखते एवं प्रेरणा को हृदयंगम करते रहे।
लखनऊ (उåप्रå) डाå गायत्री शर्मा के प्रयासों से लाल बाग काँलानी में भव्य दीप यज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ इसमें कालोनी के सभी वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहकर जन सामान्य के लिए प्रेरणा के श्रोत रहे। डाå ओम प्रकाश शर्मा द्वारा दीप यज्ञ की व्याख्या एवं उपयोगिता सुनकर सभी अधिकारी इस पावन ज्योति को जन-जन तक पहुँचाने के लिए संकल्पित हुए।
जूनागढ़ (उड़ीसा) समीपवर्ती क्षेत्र के हर गाँव में दीप यज्ञ आयोजन कराने के संकल्प के साथ विशाल दीप यज्ञायोजन सोल्लास सम्पन्न हुआ। बाल, वृद्ध, नर-नारी सभी का उत्साह अभूपूर्व था। कर्म-काण्ड की व्याख्या तथा पूज्य गुरुदेव का संदेश अपनी ही भाषा उड़ीसा में प्रदीप वानप्रस्थी द्वारा सुनकर उपस्थित जन समुदाय भाव-विभोर हो उठा।
दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की देव दक्षिणाएँ
अलीराजपुर (मåप्रå) यहाँ सम्पन्न दीप यज्ञायोजन के अवसर पर दहेज उन्मूलन एवं आदर्श विवाहों के प्रचलन कार्यक्रम के अंतर्गत आदिवासियों के अनेक जोड़े वैदिक परम्परा के साथ दाम्पत्य सूत्र में बँध। क्षेत्र के विधायक मगन सिंह पटेल ने वर-वधुओं को आशीर्वाद दिया।
इस अवसर पर उपस्थित विशाल जन समूह ने हाथ उइकर दहेज की कुरीति को त्यागने तथा आदर्श वावाहों की परम्परों को अपनाने के संकल्प लिए।
राणीप (अहमदाबाद) दीप यज्ञायोजन के अवसर पर देव दक्षिणा स्वरूप 432 व्यक्तियों ने दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन के अंतर्गत नशा का त्याग तथा सत्साहित्य के स्वाध्याय का संकल्प लिया।
बडोदरा (गुजå) दहेज यथायोजन में उपस्थित जन समुदाय ने देव दक्षिणा स्वरूप तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, शराब तथा माँस का त्याग कर नियमित रूप से सत्साहित्य पढ़ने का संकल्प लिया।
राजूपुर (मिर्जापुर, उåप्रå) यहाँ सम्पन्न दीप यज्ञ आयोजन नवयुवकों के लिए वरदान सिद्ध हुआ। बचपन से पड़ी नशा की आदत छोड़ने का संकल्प सामूहित रूप से दीप-ज्योति की साक्षी में किया गया।
बस्तर (मåप्रå) आदिवासी बहुल क्षेत्र में दहेज उन्मूलन तथा नशा निवारण कार्यक्रम आशातीत सफलतायें हस्तगत करा रहा है। अशिक्षा के कारण व्याप्त जन-जन में नशा की आदत छुड़ाने के लिए युग निर्माण कार्यकर्ताओं द्वारा व्यापक स्तर पर प्रयास किये जा रहे है। ऐसे व्यक्तियों का सामूहिक रूप से सम्मान किया जाता है जो अधिक से अधिक व्यक्तियों को इन दुर्व्यसनों को छोड़ने की प्रेरणा देकर संकल्प दिलाता है।
जिन दिनों गायत्री प्रज्ञापीठों की स्थापना का प्रचण्ड प्रवाह चला था, उन दिनों भावनाशील और विचारशील लोगों में अत्यधिक उत्साह था। इन निर्माणों के उद्देश्यों को जिनने भी पढ़ा, सुना, समझा, वे सभी भाव विभोर और रोमांचित हो उठ। आशा की गयी थी कि इन देवालयों के माध्यम से धर्म तंत्र का पुनर्जीवन होगा। नव निर्माण का माहौल बनेगा। लोक मानस के परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन की सभी योजनाएँ इन स्थापनाओं में सन्निहित समझी गई। अनुमान लगाया गया था कि यह मात्र प्रतिमा पूजन की परम्परा का निर्वाह भर नहीं है। वरन् ये निर्माण व्यक्ति-परिवार और समाज के नवोत्थान का उद्देश्य लेकर नवयुग के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में अवतरित हो रहे है। इन्हें संभावनाओं को ध्यान में रखकर निर्माणकर्ताओं ने भारी दौड़−धूप की थी। लोगों ने अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुरूप सहयोग भी दिया था। अमीरों के पैसे से नहीं, गरीब एवं मध्यमवर्ग के भावनाशीलों के के अंशदान की बूँद-बूँद से यह पीठें बनी थी। कहा यही गया कि इन्हें ईसाई गिरजाघरों की पीठें अनुकृति बनाया जा रहा है, जिनमें पूजा-अर्चा का सीमित और विचार परिवर्तन का सेवा प्रयोजनों का कार्य प्रमुखता-पूर्वक किया जाता है। संसार की एक तिहाई जनता को पिछली कुछ शताब्दियों में ईसाई बना लेने का श्रेय इस गिरजाघर प्रक्रिया और उसके साथ जुड़े हुए पादरियों की समर्पण भावना को ही जाता है।
समर्थ गुरु रामदास ने गाँव–गाँव महावीर मन्दिर इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाये थे। महामना मालवीय जी ने ग्राम प्रधान भारत के नवनिर्माण के लिए यही योजना बनाई थी। गाँधी के सर्वोदय आश्रमों के पीछे भी यही स्वप्न था। ऐसे-ऐसे अनेक मनोरथों का समन्वय करके प्रज्ञापीठों की योजना बनी थी। इस कार्य को हाथ में लेने वालों को यह तथ्य भली प्रकार समझा भी दिया गया था। जब यह देवालय बने तो उनका उद्घाटन करने गुरुदेव प्रायः’ इन सभी आश्रमों में गये थे और समारोहों में उपस्थित जनता को बताया था कि अभी इमारत भर बनी है। प्रतिमा की स्थापना भर हुई है। महत्वपूर्ण कार्य वह है जो आगे करना है। प्राण प्रतिष्ठा तभी हुई कहाई जाएगाभ् अन्यथा यह निजी इमारतें एक और नया मखौल बनकर रह जायेगी। अपने देश में मंदिर तने अधिक बन चुके है कि उनकी सफाई और नित्य पूजा का क्रम तक नहीं निभ पाता। अनुपयोगिता के कारण उपेक्षा बढ़ना स्वाभाविक है। उपेक्षा इस बात का प्रतीक है कि उपयोगिता का प्राण विद्यमान नहीं है।
इन कुछ ही वर्षों में स्थित यह बन चुकी है कि कितनी ही प्रज्ञा पीठें जन संपर्क और सहयोग से वंचित रहने लगी है और निष्प्राण बनती जा रही है। इस दुखद स्थित का मात्र एक ही कारण है कि इन देवालयों की साज–संभाल कर दायित्व जिन कंधों पर है, वे उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वैसा पुरुषार्थ नहीं कर पा रहे है जैसा कि निर्माण के उद्घाटन के दिनों दिखाया गया था। यिस्थित जहाँ भी रह रही होगा, वहाँ आरोपों, आक्षेपों, भर्त्सनाओं का ढेर लगेगा, यश के स्थान पर अपयश मिलेगा, संतोष के स्थान पर असंतोष और पश्चाताप का भाजन बनाना पड़ेगा।
शिथिलता जहाँ भी हो, उसे अविलम्ब दूर किया जाय। धीमी गति में फिर से उत्साह और साहस का संचार किया जाय। इस पुनर्जीवन के लिए नये सिरे से नया संस्कार किया जाय, वैसा ही जैसा कि लक्ष्मण की मूर्च्छा जगाने के लिए संजीवनी बूटी प्रयोग द्वारा किया गया था। प्रज्ञा संस्थानों प्रज्ञा पीठों की मूर्च्छा जगाने का ठीक यही समय है। इसे चूका नहीं जाना चाहिए।
इस वर्ष “दीपयज्ञ” आयोजनों का तूफानी प्रयोग चल रहा है। गतवर्ष जहाँ भी प्रज्ञा आन्दोलन की जड़े हरी थी वहाँ सभी जगह हजार वेदी दीप यज्ञ संपन्न हुए है। उत्सवों में असाधारण सफलता मिली है। दैवी प्रेरणा जिन भी संकल्पों के पीछे रहती है, उनमें असफलता का मुह कदाचित ही देखना पड़ता है। देखना भी नहीं पड़ा है। इनका प्रधान उद्देश्य वातावरण में ऐसी प्राण-चेतना भर देना था, जिसके कारण वे प्रयास द्रुतगामी हो उइ, जिन्हें प्रज्ञापीठों के साथ-प्रज्ञा आन्दोलनों के साथ अविच्छिन्न यप् से जोड़ कर रखा गया है। यही कारण है कि जहां भी दीपयज्ञ हुए है, वहाँ से निष्क्रियता, उदासी और उपेक्षा का असमंजस समाप्त हुआ हैं।
इस बार सभी प्रज्ञा संस्थानों से कहा जा रहा है कि वे इस बार फिर एक दीपयज्ञ आयोजन की योजना बनाये। प्रज्ञापीठों को जीवन्त बनाने की नई योजना उसके साथ जोड़े। यहाँ नई इमारत नहीं बन पाई है, वहाँ माँगे या किराये के किसी स्थान में प्रज्ञा केन्द्र का नये सिरे से सूत्र संचालन करे। दीपयज्ञ आयोजन में उपस्थित सभी लोगों में स्थानीय प्रज्ञा केन्द्र से जुड़ने की प्राण प्रेरणा इस प्रकार भरे कि वह भविष्य में स्थित ही बना रहे।
दूसरा कार्य इन्हीं दिनों प्रत्येक प्रज्ञा संस्थान में यह किया जाना है कि पाँच-पाँच शिक्षित महिलाओं की मण्डलियाँ “नारी जागरण अभियान” नाम से गठित की जाय। वे पाँचों अपने संपर्क की पाँच नई अन्य महिलाओं को इस संगठन के साथ जोड़े। इस प्रकार “पाँ से पच्चीस” की शृंखला चल पड़े। पच्चीस महिलाओं की ये नारी जागरण मढदलिसरँ अपने साप्ताहिक सत्संग नियमित रूप से करती रहे और अपने अपने प्रभाव क्षेत्र में व्यक्ति निर्माण, परिवार निमार्ण और समाज निर्माण की बहुमुखी कार्य पद्धति को गतिशील बनाये रखने में कुछ उठा न रखे।
आत्मशक्ति का अभिनव जागरण उपासना, साधना और आराधना का खाद पानी चाहता है। तीसरा कार्य यही है कि वातावरण परिशोधन के लिए, उसमें अध्यात्म तत्वों का अभिवर्धन करने के लिए साधना को अनिवार्य कर्तव्य मानें। स्वयं करे और अपने प्रभाव क्षेत्र में अन्यान्यों को उसके लिए प्रोत्साहित करे। एक माला गायत्री जप का भी यदि नियमित क्रम चल पड़े तो अपने चौबीस लाख सदस्य हर दिन चौबीस करोड़ जप का दैनिक अनुष्ठान करते रह सकते है। इससे वातावरण में देव-तत्वों की समर्थता बढ़ेगी और नवयुग के अनुरूप वातावरण बनेगा।
कुछ कार्य ऐसे है, जिन्हें ज्ञान यज्ञ का, जनमानस के परिष्कार का प्रमुख अंग माना जाय और उन्हें प्रत्येक प्रज्ञापीठ की कार्य पद्धति में अनिवार्य रूप से जोड़ा जाय। वे कार्य इस प्रकार है-
(1) मिशन से प्रभावित परिचित परिजन को एक घण्टा समय और बीस पैसा न्यूनतम योगदान देते रहने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध किया जाय। इसी के आधार पर नवजागरण प्रयासों का सूत्र संचालन सरलतापूर्वक होता रहे।
(2) हर शिक्षित तक युग साहित्य बिना मूल्य निरन्तर पढ़ने के लिए पहुँचाने और वापस लाने का क्रम चलाया जाय। जो पढ़े, वे अपने संपर्क के पाँच अन्यों को पढ़ाने, अनपढ़ों को पढ़कर सुनाते रहने की शृंखला चलाये।
(3) जो परिवार मिशन के संपर्क में है, उनके यहाँ आदर्श वाक्यों के स्टीकर्स चिपकाने की प्रक्रिया चलाई जाय। इन प्रेरणाप्रद सूत्रों पर परिचय क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि बार-बार पड़ती है और स्थापित प्रेरणा मनःक्षेत्र में सतत् उतरती रहती है।
(4) अपने नगर कार्य क्षेत्र में “ज्ञानरथ” चलती फिरती साहित्य गाड़ी चलाने का प्रबन्ध या जाय। उसमें युग साहित्य पढ़ने देने, वापस लेने के अतिरिक्त विक्रय का भी प्रबन्ध हो। ज्ञानरथों में टेपरिकार्डर एवं एम्पलीस्पीकर भी लगे हो। ये जिस भी मार्ग से निकले, उस पर युग संगीत सुनाते चले और युग चेतना से जन-जन को अनुप्राणित करते चलें। साथ में अखण्ड-ज्योति पत्रिका एवं युग निर्माण योजना, युग शक्ति गायत्री भी कम मूल्य पर वितरण हेतु रखें। साथ-साथ इस प्रकार अन्य साहित्य भी बिकता रहता है।
(5) स्लाइड प्रोजेक्टर यंत्र से घर-घर रात्रि के समय ऐसे आयोजन होते रहे जिसमें पड़ोसी भी सम्मिलित हो लोक रंजन के साथ लोक मंगल का क्रम चलता रहें। चित्रों की व्याख्या करने वालों को कुछ ही दिनों में भाषण कला का अच्छा अभ्यास हो जाता है।
(6)टेपरिकार्डर के साथ एम्पलीस्पीकर लगाकर जगह-जगह ज्ञान गोष्ठियाँ आयोजित की जाती रहे। इन टेपों में युग, संगी प्रवचन, प्रज्ञापुराण कथा, मिशन के आँदोलनों की रूपरेखा समझाई जाती रह सकती है और युग चेतना का आलोक वितरण होता रहता है।
(7) जहाँ भी निजी इमारत की अथवा माँगे के मकानों में स्थापित प्रज्ञापीठ है, वहाँ प्रातः सायं पूजा आरती के टेप बजाये जाते रहे। यह कार्य लाउडस्पीकर एवं टेपरिकार्डर्स की सहायता से भली प्रकार सम्पन्न होता रह सकता है। उपस्थिति कम हो तो भी उस क्षेत्र में सामूहिक उच्चारण की ध्वनि विस्तृत होती रहती है।
(8) साप्ताहिक सत्संगों क्रम अपने संपर्क क्षेत्र में नियमित रूप से चलाया जाता रहे, ताकि मिशन की प्रेरणाएँ व्यापक बनती रहे। इन सत्संगों में विगत सप्ताह भर में जिन परिजनों के जन्म दिन हुए हो, उन्हें भी सामूहिक रूप में मनाया जा सकता है। अवकाश निकालकर जन्म दिन संस्कार के रूप में प्रेरक गोष्ठी घरों में भी आयोजित होती रहे तो और भी उत्तम है।
(9) प्रौढ़ शिक्षा, बाल संस्कारशाला, व्यायामशाला, शाकवाटिका एवं वृक्षारोपण की रचनात्मक प्रवृत्तियां बढ़ाई जाय एवं नशा निवारण, दहेज, जेवर बहिष्कार, जाति लिंग भेद के आधार पर चल रही असमानता को हटाने के लिए हर आयोजन में प्रचार करते रहा जाय।
(10) शांतिकुंज हरिद्वार में वर्ष भर हर माह एक महीने के युग शिल्पी सत्र तथा नौ-नौ दिन के जीवन साधना सत्र चलते रहते है- तारीख 1 से 19। 11 से 19। 21 से 29 तक। इनमें से जिनमें भी सुविधा हो, सम्मिलित होने तथा मिशन से परिचित प्रभावित उत्साही नर नारियों को सम्मिलित होने के लिए भेजते रहे।
उपरोक्त तीन प्रमुख तथा दस प्रज्ञा आंदोलन से संबंधित कार्यक्रम कुल 13 प्रवृत्तियाँ ऐसी है जिन्हें आसानी से हर जगह चलाया जा सकता है। ये चल पड़े तो आगे अन्य कार्य भी हाथ में लिये जा सकते है और नवनिर्माण की की पृष्ठभूमि बनाने में देखने में छोटा किन्तु प्रभाव में अतिमहत्वपूर्ण कार्य निरन्तर होता रह सकता है। जहाँ यह प्रवृत्तियाँ चलेगी, वहाँ स्थापित प्रज्ञापीठें सफलता पूर्वक चलने लगेगी और अपना निर्धारित लक्ष्य पूरा करने लगेगी।
उपरोक्त प्रवृत्तियों के संचालन हेतु स्लाइड प्रोजेक्टर, टेपरिकार्डर, लाउडस्पीकर, ज्ञानरथ, आदि उपकरणों की आवश्यकता पड़ेगी। जिनके पास जिनकी कमी हो वह शाँतिकुँज हरिद्वार में मंगा सकते है। कीमतें वस्तुओं के दामों में उतार–चढ़ाव आने के अनुपात से घटती-बढ़ती रहती है। इसलिए जो उपकरण लेने हो, उनकी कीमतें पूछकर मालूम कर लेना चाहिए।
प्रज्ञापीठें जहाँ भी बनी है, वहाँ उन्हें जाग्रत जीवन्त बने रहना चाहिए। इसके लिए वहां उपरोक्त कार्य सम्पन्न होना ही चाहिए। नये सिरे से नये उत्साह के साथ दीपयज्ञ आयोजनों के साथ यह पुनर्जीवन का कार्य आरंभ कर ही देना चाहिए। जहाँ उत्साही परिजनों का मण्डल क्रियाशील हो, वह भी एक प्रकार का प्रज्ञापीठ है। उन्हें भी क्रमबद्ध रूप से ये गतिविधियाँ
आरम्भ कर देना चाहिए। जहाँ उत्साह जागेगा, श्रद्धा जोर मारेगी, साहस और पराक्रम उभरेगा। वहाँ प्रज्ञा पीठों में नवजीवन का संचार निश्चित रूप में होगा। अपनी और अपने समीपवर्ती क्षेत्र की अन्य प्रज्ञा पीठों को सजीव, सक्रिय बनाने हेतु प्रत्येक प्रज्ञापुत्र को प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिए।
देव दानवों में विवाद छिड़ा कि दोनों समुदायों में श्रेष्ठ कौन है? फैसला कराने के लिए प्रजापति के पास पहुंचे। उन्होंने दोनों वर्गों को सान्त्वना दी और सम्मान पूर्वक ठहरा दिया।
दूसरे दिन दोनों बुलाये गये। अलग-अलग स्थानों पर दोनों को भोजन के लिए बुलाया गया। थालियाँ व्यंजनों से सजी थी।
ब्रह्मा जी ने एक कौतूहल किया। मंत्र शक्ति से दोनो वर्गों को कोहनियों पर से हाथ मुड़ने में अवरोध उत्पन्न कर दिया। भोजन किया जाय तो कैसे?
दैत्य वर्ग के लोग हाथ ऊपर ले जाते। ऊपर से ग्रास पटकते। कोई मुँह में जाता कोई इधर-उधर गिरता। पूरा चेहरा गन्दा हो गया। पानी पर से गिराया तो उसने सारे वस्त्र भिगो दिये। इस स्थिति में उन्हें भूखे रहकर दुखी मन से उठना पड़ा।
यही प्रयोग देव वर्ग के साथ भी हुआ। उनने अपने सहज स्वभाव के अनुसार हल निकाल लिया। एक ने अपने हाथ से तोड़ा उसे दूसरे में मुँह में दिया। दूसरे ने तीसरे के मुँह में। इस प्रकार पूरी मंडली ने उसी कार्यवाई से भोजन कर लिया। पानी इसी प्रकार एक ने दूसरे को पिला दिया। सभी प्रसन्न थे और पूरा भोजन खाकर उठे।
ब्रह्मा जी ने दोनों को बुलाया। कहा- “तुम लोगों के प्रश्न का उत्तर मिल गया। जो अपने लिए ही सोचता और करता है वह असंतुष्ट रहता अपमानित होता है। पर जिसे दूसरों के हित का ध्यान है उसे संतोष भी मिलता है यश भी और सम्मान भी। इस कसौटी पर देव खरे उतरे है।”
समर्पण की सामर्थ्य अपार, समर्पण का बल पहिचानो।समर्पण ऋद्धि, सिद्धि का सार, बिंदु में सिंधु इसे मानो॥1॥
समर्पण करता नन्हा बीज, वृक्ष बन देता मीठे आम।लहराते खेत और खलिहान, समर्पण का ही है परिणाम॥
कोयला देता अपने आप, दहकती भट्टी को जब सोप।वही बन जाता है अंगार, समर्पण की गरिमा आरोप॥
समर्पण कायाकल्प करे, समर्पण की गरिमा जानो।समर्पण की सामर्थ्य अपार, ...........................॥2॥
हो गये वानर से बजरंग, समर्पण के बल पर हनुमान।सारथी बने, पार्थ के नहीं-समर्पण के, ही तो भगवान॥
बिक गये खुद गिरधर गोपाल, समर्पित-मीरा जी के हाथ।समर्पित हुई अम्बपाली, जुड़ गया नाम बुद्ध के साथ॥
दयानन्द और विवेकानन्द, समर्पण का जादू जाना।समर्पण की सामर्थ्य अपार, ..........................॥3॥
असंभव, संभव हो जाता, इसी जादू के बलबूते।समर्पण में जो शक्ति दुपी, उसे कब तक कोई कूते॥
फिरंगी की सत्ता काँपी, डेढ़-पसली के गाँधी से।हिल गये तख्तों ताज सभी, समर्पण की ही आँधी से।
समर्पित-राष्ट्र शहीदों की, तनिक जीवट तो अनुमानो।समर्पण की सामर्थ्य अपार, ................................॥4॥
आज बादल विभीषिका के, मनुजता पर फिर छाये है।बचाने मानवता को आज, समर्पण के क्षण आये है॥
सृजन-सैनिक जो करें अगर, समर्पण सुर-संस्कृति के लिये।लक्ष्य युग-परिवर्तन का पूर्ण न हो क्यों? युग शिल्पी के किये॥
समर्पित-शूर अगर जूझे, अनय की हार हुई माना।समर्पण की सामर्थ्य अपार, ...........................॥5॥
सिद्धि का सिन्धु सामने है, साधना-बिंदु समर्पित हो।ज्योति का पुँज प्रकाशित है, साध के दीप प्रज्वलित हो॥
इन दिनों “युग प्रज्ञा” हुलसित, प्रखर-प्रतिभाएँ विकसाने।और युग करुणा छलक रही, स्नेह-संवेदन सरसाने॥
तुले है महाप्राण देने, सहेजो! प्राणवान-प्राणो।समर्पण की सामर्थ्य अपार, .......................॥6॥
-मंगल विजय
*समाप्त*