स्वच्छता एवं सुसंस्कारिता

धूलि ही कहीं बिखरी पड़ी है। वह प्रकृति का उद्भव है। मलीनता और कूड़ा-करकट कहीं भी बिखरा जा सकता है। वह बिना बुलाये भी घर में घुस पड़ता है। कपड़े अनायास ही मैले होते रहते है। मनुष्य का भी ऐसा प्रमादी है जो पानी की तरह नीचे की ओर अनायास ही ढुलता रहता है। प्रमादी लोग कहीं भी कुचैले देखे जा सकते है। उनका रुझान सहज ही पतन-पराभव की दिशा में होता है। यदि सतर्कता न जाय तो मलीनता से लदा और घिरा रहना पड़ेगा।

हमारे मन की आदत भी ऐसी ही है। वह सर्वत्र संव्याप्त मलीनता की ओर अनायास ही खिंच जाता है। .... के साथ बहने में उसे सरलता और सुविधा प्रतीत होती है।

सुरुचि सम्पन्न इस अनुपयुक्तता को ध्यान में रखते हैं और अपने को अनगढ़ समुदाय में सम्मिलित होने से .... रहते है। हाथी नदी में स्नान करने के उपरान्त भी बाहर निकलते ही धूलि अपने ऊपर छिड़क लेता है। धुला हुआ कपड़ा पहनने के बाद भी उसे लोट-पोट कर मैला कर लेते है। क्या हमें भी ऐसा ही करना चाहिए ?

मनुष्य से सुसंस्कृत होने की आशा की जाती है और यह अनुमान लगाया जाता है कि वह अपनी .... का उपयोग भीतरी और बाहरी स्वच्छता बनाये रखने के लिये करेगा।


महायज्ञ

महाभारत की समाप्ति पर पाण्डवों ने एक बड़ा राजसूर्य यज्ञ किया। उसमें देश-विदेश के सभी शासक और ऋषि-मुनि आमंत्रित किये गये। समारोह बड़ा विशाल हुआ और हर दृष्टि से बड़ा सफल रहा।

वहाँ एक नेवला यज्ञस्थली के प्रत्येक कोने में पहुँचकर लोट लगाता रहा। अपने शरीर में कुछ परिवर्तन हुआ क्या? यह देखता रहा। निराश होने पर आँसू बहाता और फूट-फूट कर रोता रहा। इच्छा अधूरी ही रहने के कारण उसे बहुत दुःख हो रहा था।

एक मनीषी ने नेवले को इस प्रकार परेशान होते हुए देखा तो पूछा कि क्या ढूंढ़ते हो? किस कारण इतने दुखी होते हो ?

नेवले ने अपनी मनोव्यथा कह सुनाई। बोल-”हे महात्मन्। एक बार एक महायज्ञ हुआ था। उसके बचे अवशिष्ट पदार्थ एवं जल का अवगाहन करने हेतु मैं उसी भूमि में सो गया था। उठा तो मेरा वह आधा भाग सोने जैसा चमकदार एवं सुन्दर हो गया था। आश्चर्य हुआ कि इस पानी में क्या करामात है।”

बताया गया था कि सामने ही एक ब्राह्मण की झोंपड़ी है। उसमें वह, उसकी पत्नी, पुत्र तथा पुत्री रहते थे। बहुत दिनों से भयंकर दुर्भिक्ष चल रहा था। अन्न के अभाव में सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई थी। ब्राह्मण भिक्षा से आजीविका कमाता था। अच्छे समय में तो भिक्षा आसानी से मिल जाती थी। पर दुर्भिक्ष में जब लोगों के पास अपने लिए ही कुछ नहीं रहा तो किसी को भिक्षा किस प्रकार देते? ब्राह्मण परिवार भी भूखों मरने लगा।

“सात दिनों के प्रयत्न के बाद चार रोटियों जितनी भिक्षा उसे मिली। लेकर घर आया। घर के चार सदस्यों के लिए चार रोटियाँ बनाई। बन जाने पर थाली में रखीं। ग्रास तोड़ने से पूर्व यह ध्यान आया कि कहीं समीप हम से अधिक जरूरतमंद तो कोई नहीं है। यदि है तो पहला हक इस उपार्जन में उसका है। पहले तलाश लें, तब चारों भोजन ग्रहण करें। बाहर निकलते ही ब्राह्मण देवता ने देखा कि एक वृद्ध पास के पेड़ के नीचे ही पड़ा था। एक माह से अन्न नहीं मिला था। मरने के निकट था। ब्राह्मण को रोटी लेकर समीप आता देख बोला-मुझ मरणासन्न को आहार की आवश्यकता है यदि मेरे प्राण बचा लें तो बड़ी कृपा होगी।”

“ब्राह्मण उस वृद्ध को उठाकर अपने घर ले गया। सर्वप्रथम ब्राह्मण ने अपनी रोटी उसे दी, पर इससे उसकी भूख शान्त नहीं हुई है। इस पर पत्नी ने भी अपनी रोटी उसे दे दी। अब तो उसकी भूख और तीव्र हो गई। और माँगने लगा तो पुत्र और कन्या ने भी बारी-बारी अपनी रोटियाँ उसे खिला दीं। तृप्ति हुई। पानी पिया। इस पानी से उस वृद्ध ने कुल्लाकर जहाँ पानी फेंका, उसी पर जाकर मैं लोटा था। उठा तो आधा शरीर सोने जैसा था। अब सोच रहा था कि कहीं और भी ऐसा पुण्यफल वाला यज्ञ हुआ हो तो वहाँ जाया जाय एवं शेष आधे अंग को भी पानी में लेटकर सुनहरा बनाया जाय, ताकि सारी काया एक जैसी बन सके।”

“हे महाभाग! मैं इस राजसूर्य यज्ञ में बड़ी आश्वासन लेकर आया था। यहाँ फैले जल के स्पर्श से मुझे पुनः वैसा लाभ नहीं मिला। इससे लगता है कि यह यज्ञ उतने बड़े पुण्य-फल वाला नहीं है जितना कि मैं पहले देख चुका हूँ। बड़े तपस्वी विद्वान इसमें एकत्र हुए, पूरे विधि-विधान से कर्मकाण्ड हुआ, फिर भी कोई पुण्यदायी प्रतिफल ने देखकर मैं निराश हूँ। यही मेरी व्यथा का मूल कारण है।

नेवले की व्यथा बहुत लोगों ने सुनी। सभी यह निष्कर्ष लेकर लौटे कि अपनी आवश्यकता में दूसरों की जरूरतों को अधि महत्व देने वाले उदारचेताओं का सामान्य कृत्य भी उससे अधिक पुण्य फल वाला होता है जिसमें कि सम्पन्नजन अपनी अथाह सम्पत्ति से कुछ बढ़ा-चढ़ा दीखने वाला धर्मानुष्ठान सम्पन्न करते रहते हैं। कृत्य नहीं, प्रयोजन की श्रेष्ठता ही तदनुसार प्रतिफल देती है।


तमाहुरग्रथं पुरुषं महान्तम

निरन्तर चलायमान इस संसार में सतत् जन्म और मरण का संघात देखने में आता है। नए-नए जीव पैदा होते पर देखते-देखते न जाने कहाँ काल के गर्भ में समाते चले जाते है। पता नहीं कितने काल से जीवन और मरण का यह पहिया अबाध गति से घूम रहा है। इस सबको देखकर यह प्रश्न मानव मन को शताब्दियों-सहस्राब्दियों से आन्दोलित करता चला आ रहा है कि इन सबके पीछे सत्य क्या है ?

जीवन है क्या ? मात्र अणुओं परमाणुओं की हलचल उनका सम्मिश्रण या इसके अलावा अन्य कुछ ? इस अहम् सवाल को हम शक्ति-ऐश्वर्य-वैभव विलास के नशे में भले ही कुछ समय के लिए भूल जायँ। पर नशा उतरते ही यह सवाल फिर से हमारे मन को मथने लगता है। प्रारम्भ से ही मानव मन को सृष्टि प्रवाह के सत्य को जानने की उत्कट जिज्ञासा रही है। समय-समय पर चिन्तन की विविध धाराओं के पण्डितों-मनीषियों ने विविध समाधान भी प्रस्तुत किए है।

ये विविध चिन्तन धाराएँ विज्ञान, मनोविज्ञान व दर्शन क्षेत्र की है। इनमें सर्वाधिक प्रचलित मान्यताएँ तीन तरह की है।

विज्ञान, जीवन को जड़ तत्वों का संघात सम्मिश्रण मानता है जो तत्वों के संगठन-विघटन के कारण पैदा होता तथा नष्ट होता है। शून्यवादी इस सबको शून्य मानते है, उधर दर्शन शास्त्री मानते हैं कि जीवन का आधार भौतिक तत्व नहीं है। इन भौतिक तत्वों से जीवन का पैदा होना या नष्ट होना सम्भव नहीं है। जीवन की सत्ता इस सबसे परे और अविनाशी है।

संसार के सभी चिंतकों, वैज्ञानिकों तथा धर्मग्रन्थों के विचार-मान्यताएँ इन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काटती हैं सभी अपने-अपने स्तर पर प्रतिपादन प्रस्तुत करती है।

वैज्ञानिकगण यह मानते हैं कि सृष्टि की हलचलों का एकमात्र कारण अणु-परमाणुओं का पारस्परिक संघात है। समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में चलने वाली प्रक्रिया स्वचालित है। चेतना की उत्पत्ति का कारण भी यही पारस्परिक संघात ही है। शरीर के विनष्ट होते ही उपस्थित चेतना का भी अस्तित्व नहीं रहता।

विचार करके देखा जाय कि यदि शरीर के गठन का कारण परमाणुओं का पारस्परिक संघात और हलचल ही है, तो परमाणुओं में हलचल पैदा कर उनको सुन्दर पुष्ट अंग अवयवों वाले शरीर में रूपांतरित करने वाली शक्ति कौन सी है ? प्रकृति के कुछ परमाणु अणुओं को लेकर कहीं एक प्रकार के शरीर की रचना होती है, कहीं दूसरे प्रकार की। इस प्रकार ये विविध आकार-प्रकार प्रदान करने वाली शक्ति कौन सी है ? इन सवालों के जवाब में विज्ञान चुप्पी साध लेता है। यह कहना कि चेतना, जीवन का कारण कुछ जड़ तत्वों के परमाणुओं का संघात मात्र है, अविवेकपूर्ण और दुराग्रह से ग्रसित ही कहा जाएगा।

शून्यवादी यह मानते है कि संसार निरन्तर परिवर्तन शील है। यहाँ कोई चीज स्थायी नहीं है। इसीलिए यहाँ किसी चीज का अस्तित्व भी नहीं है। सब कुछ शून्य हैं। भूत-भविष्य भी अस्तित्वहीन हैं, मात्र वर्तमान ही सत्य है।

शून्यवाद की इस मान्यता पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने पर इसका खोखलापन सिद्ध हो जाता है। सापेक्षिता के सिद्धान्त के अनुसार भूत-वर्तमान व भविष्य सभी एक दूसरे के सापेक्ष हैं। वर्तमान के स्वतंत्र अस्तित्व की कल्पना भी कर सकना असम्भव हैं। इस तरह तो यह होगा कि सन्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर माता-पिता के अस्तित्व से इन्कार कर दिया जाय। इसी तरह प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, मात्र इसी कारण सभी कुछ भ्रम है, शून्य है। कहाँ तक सच है ? मात्र परिवर्तनशीलता के कारण सभी वस्तुओं के अस्तित्व को इनकार कर देना न्यायसंगत या विवेकपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता है। यह तो उसी प्रकार हुआ जैसे किसी बच्चे के शरीर में नित्य नए परिवर्तन होते देखकर कोई बच्चे के अस्तित्व से ही इनकार कर दे। शून्यवाद की इस प्रकार की मान्यता सृष्टि के कारणों की सन्तोषजनक व्याख्या कर सकने में सर्वथा अक्षम है। इस मान्यता पर अड़ने वालों को बाल बुद्धि ही कहा जाएगा।

दार्शनिकों के अनुसार आत्मा ही जीवन का आधार है। यही अविनाशी तत्व-चेतना सत्ता है। यह जीवन-मरण से परे है। शरीर के अवयवों के नष्ट हो जाने पर उसका नाश नहीं होता। देश काल की सीमाएँ इसे बाँध नहीं सकतीं। शरीर इसका देश नहीं, आयु इसका काल नहीं। यह आदिकाल से है और अनन्त काल तक रहेगी। यह स्वयं असीम और अनन्त है। कालचक्र से होने वाले विभिन्न परिवर्तनों का प्रभाव ससीम पर ही पड़ता है असीम तक तो इसकी पहुँच भी नहीं। इसी कारण ससीम शरीर में होने वाले परिवर्तन असीम आत्मा को छू भी नहीं पाते। यह मान्यता ही आस्तिकता है। जीवन की व्यापकता और आत्मा की अमरता ही सत्य है। दार्शनिक चिंतन का उत्कृष्ट रूप वेदान्त इसी का समर्थन व प्रतिपादन करता है।

आज के वैज्ञानिक भी अब इस तथ्य को स्वीकारने लगे है कि विश्व की मूल सत्ता कोई वैश्व चेतना है जो अज्ञेय है और यह संसार इसी अज्ञेय, अविश्लेष्य तरंगों का संघात है। जिनके बारे में हमारी जानकारी नहीं के बराबर है। वैज्ञानिकों ने इसे “काँस्मास” भी कहा है।

डा0 डब्लू कार ने कहा है- कि टाइम और स्पेस न तो कन्टेनर है, न ही कन्टेन्ट, वे तो मात्र वेरियन्ट है। इसी बात को मिन्कोवस्की ने अधिक सुस्पष्ट करते लिखा है कि दिक् व काल की अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं। वे मात्र धाराएँ।

आज के वैज्ञानिक जगत में सापेक्षिता का सिद्धान्त सर्वाधिक प्रतिष्ठित माना जाता है। उसके अनुसार सब दृश्यमान, अनुभूयमान जागतिक सत्य मात्र आपेक्षिक सत्य है। आकार गति के अवस्था भेद से बाह्य वस्तु का ज्ञान प्रत्येक दर्शक को भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है और हो सकता है। फिर निरपेक्ष सत्य क्या है ? इसका निरूपण कैसे हो ?

ऐसी स्थिति में मूर्धन्य मनीषियों-वैज्ञानिकों की वाणी लड़खड़ाने लगती है और वे कोई स्पष्ट बात कहने क जगह पहेलियाँ सी बुझाने लगते हैं जब इन्हीं का यह हाल है तो फिर साधारण व्यक्ति कैसे समझें।

विज्ञान की क्षमता सीमित है। सूक्ष्मता के स्तर तक जाने के बाद यह हथियार डाल देता है और स्वीकार करने लगता है कि आगे आ सकना वैज्ञानिक उपकरणों के द्वारा सम्भव नहीं। परम सत्य तो इन सबसे परे है। फिर इसे कैसे जाना जाय। सूक्ष्म और वृहद दोनों दिशाओं में ज्ञान अर्जित करने की मानवी क्षमता सीमित है। जब कि परम सत्य दोनों में से किसी भी सीमा में वृद्धि नहीं। वेदान्त दर्शन इसे “अणोरणीयान्महतो महीयान्” (श्वेत3/20) मानता है।

वेदान्त दर्शन में निहित संकेतों-निर्देशों के अनुरूप तप-साधना करने पर परिशुद्ध चेतना में वह परम ज्योति स्वतः ही प्रकट होती है। यद्यपि यह सभी जगह सभी समय विद्यमान है। किन्तु जब तक बौद्धिक क्रियाओं को ही आत्मानुभूति समझने का भ्रम रहता है। तब एक यह अविज्ञात ही रहती है। बुद्धि तत्व को उस मूल चेतना से जोड़ देने र उसमें पूरी तरह से समर्पित कर देने पर वह परम चेतना अपने आलोक से बुद्धि को प्रकाशित कर देती है स्वयं को प्रकट कर देती है। यह स्थिति अकस्मात् किसी जादू की छड़ी घुमाने से नहीं आती है। इसके लिए साधनात्मक अनुशासनों में बाँधकर अपनी अन्तश्चेतना का परिष्कार करना होता है। ऐसी परिपक्वता विकसित करने तथा अन्तःकरण की निर्मलता अर्जित करने पर जीवन का रहस्य, सत्य का बोध पा सकना सभी के लिए सम्भव है।


प्रभा मण्डल द्वारा पढ़ा जाएगा मनुष्य अब ?

मनुष्य मात्र हाड़ माँस का वह पिण्ड नहीं हैं जो बाह्य रूप से दीखता हैं, वरन् वह चेतना का सूक्ष्म रूप हैं जो मृत्यु के बाद भी बचा रहता हैं। चेतना के इस सूक्ष्म शरीर की जानकारी काया के चारों ओर छाये बादलों जैसे धुन्ध से होती हैं, जिसके प्रभाव से प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया जा सकता हैं। इसका अपना एक विशिष्ट आकर्षण होता हैं। मानवी चुम्बकत्व की इस विशेषता को साधना क्षेत्र में प्रभामंडल या तेजोवलय के रूप में जाना जाता हैं। अँग्रेजी में इसे ही हेलो या आँरा कहा जाता हैं। यों समस्त शरीर में उसकी मात्रा होती हैं, पर आवाज की भाँति शरीर से निकलकर दूर क्षेत्र में जाते ही उसका प्रभाव कम हो जाता हैं। कहा जाता हैं कि शरीर से निकलते समय यह विद्युतधारा अत्यन्त तीव्र होती हैं। जिसके शरीर में तेजोवलय जितना अधिक प्रखर होता हैं। वह उतना ही अधिक प्रभावशाली होता हैं। यह वलय प्रभाव सामर्थ्य के अनुरूप भला भी हो सकता हैं और बुरा भी। अपने-अपने ढंग का आकर्षण और प्रभाव दोना में रहता हैं। समीपवर्ती व्यक्ति तथा वातावरण उसी के अनुरूप प्रभावित होते हैं।

आभामंडल की सर्वाधिक मात्रा चेहरे पर होती हैं। अवतारों, देवताओं एवं महापुरुषों क चित्रों में उनके चेहरे के इर्द-गिर्द सूर्य जैसा एक घेरा चित्रित किया जाता हैं। यह इसी अदृश्य प्रदीप्त मंडल का चित्रण हैं। ज्ञानेन्द्रियों का जमघट तथा मस्तिष्क का विद्युत भण्डार एक ही जगह हैं, इसलिए चेहरा सबसे अधिक आकर्षक एवं प्रभावशाली होता है। मोटे तौर पर चेहरे का देखकर कितने ही व्यक्ति बहुत कुछ जानने और समझने में सफल हो जाते हैं। आकृति देखकर प्रकृति का अनुमान लगाने वाले सूक्ष्मदर्शी नाक, कान, आँख, मुँह आदि की बनावट को नहीं, वरन् चेहरे के चारों और उमड़ते-घुमड़ते तेजोवलय को ही परखते हैं और उसी के आधार पर व्यक्ति के आन्तरिक व्यक्तित्व का प्रभाव एवं परिचय प्राप्त करते हैं।

सामान्यतया रंग, रूप, का आकर्षण हर किसी को मुग्ध करता हैं यदि तेजोवलय तद्नुरूप न हुआ तो कुछ ही समय में वह मूल्याँकन बदल जाता हैं। रूपवान् काया में भी विषधर सर्प जैसी विद्रूपता प्रकट हो सकती हैं एवं अष्टावक्र, सुकरात की तरह कुरूप व्यक्ति भी सिर आँखों पर बिठाये जाने लगते हैं। साज-सज्जा द्वारा तो शरीर की कुरूपता एक सीमा तक छिपायी भी जा सकती हैं, पर तेजोवलय के सूक्ष्म शरीर पर किसी भी प्रकार पर्दा नहीं डाला जा सकता। सुविकसित अन्तःकरण सम्पन्न व्यक्तियों को किसी भीतरी स्थिति को पहचानने में देरी नहीं लगती हैं।

जिस तरह ताप, विद्युत, चुम्बक जैसी ऊर्जाएं अपनी विशेषताओं के अनुरूप व्यक्तियों एवं पदार्थों पर प्रभाव डालती हैं, उसी प्रकार आँरा का विद्युत मंडल समीपवर्ती क्षेत्र, सम्बन्धित व्यक्तियों एवं पदार्थों में अपना प्रकाश-प्रभाव फैलता रहता हैं। यही मनुष्य की चेतना का सूक्ष्म शरीर हैं, जिसकी वास्तविकता को अब वैज्ञानिक खोजों द्वारा भी प्रमाणित किया जा रहा हैं। सेण्ट थामस अस्पताल, लन्दन के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक वाल्टर जे0 किल्नर ने अपनी पुस्तक “द ह्यूमन एटमोस्फियर” में लिखा है कि प्रभामंडल किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों में ही नहीं प्रत्युत सभी व्यक्तियों तथा प्राणिमात्र में होता हैं। प्रत्येक प्राणी की स्थूल काया के चारों ओर वलय रूप में ईथरिक फोर्स फील्ड या बायोप्लाज्मा को घेरा प्रकाश के रंगों और लहरों के रूप में विद्यमान होता हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों में यह भिन्न-भिन्न प्रकार का होता हैं उनके अनुसार यह आशा सदैव एक सी नहीं रहती। समय-समय पर उसमें बदलाव आता रहता हैं और यह रंग परिवर्तन स्वास्थ्य में आये उतार-चढ़ाव की ओर इंगित करता हैं। चिकित्सा क्षेत्र में रोग निदान के रूप में उन्होंने इसका सफल, प्रयोग भी किया हैं।

वस्तुतः हमारी आँखों की देखने की एक निर्धारित के अस्तित्व .... विवेकपूर्ण। वह इस सीमित दायरे की ही वस्तु को देख प्रकार हुआ। भौतिक विज्ञानियों का कहना हैं कि हमारे नेत्र परिवर्तन ह्राश किरणों का पकड़ सकते हैं जिनकी तरंग इनकार क॰ से ... मिली माइक्राँन सीमा क्षेत्र में आती सृष्टि कोसे अधिक या कम तरंग लम्बाई के प्रति नेत्रों के में सर्वन्तु असंवेदनशील होते हैं, फलतः उन्हें हम नहीं देख पाते। प्रभामंडल इसी सीमा के अंतर्गत आता हैं जिसे सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता किन्तु वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से इसे नापा और जाना जा सकता हैं। ह्यूमन आँरा पर पाश्चात्य देशों में विस्तृत अनुसंधान सतत चल रहे हैं। इसका मापन व फोटोग्राफिक अंकन भी अब संभव हो गया हैं।

प्रभामंडल का चित्राँकन सर्वप्रथम रूस के प्रख्यात वैज्ञानिक सेमयन किर्लियन ने किया। उन्हीं के नाम पर बाद में इसे किर्लियन फोटोग्राफी के नाम से जाना जाने लगा। इसकी खोज उस समय हुई जब किर्लियन अपनी प्रयोगशाला में एलेक्ट्रोथेरेपी के ऊँची आवृत्ति वाले यंत्र की मरम्मत कर रहें थे। अचानक उनने अपने शरीर से छोटे-छोटे प्रदीप्त कणों को प्रकट होते देखा तथा अनुभव किया, स्थूल काया के अन्दर कोई विशिष्ट ऊर्जा तत्व विद्यमान हैं। बाद में उनने अपनी पत्नी के सहयोग से आभामंडल का चित्रित करने की विधि खोज निकाली और एक विशेष प्रकार के यंत्र का विकास किया। अब इस यंत्र द्वारा मनुष्य के सूक्ष्म शरीर का-जिसे विज्ञान की भाषा में “बायोप्लाज्मा” अथवा “बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी” कहा जाता हैं, छाया चित्र लेना संभव हो गया हैं। इस क्षेत्र में काफी शोध अनुसंधान भी हुए है। इतना ही नहीं, शरीर शास्त्रियों एवं मनः शास्त्रियों प्राणियों के व्यवहार पर भी इसके प्रभाव का अध्ययन किया हैं।

थियोसोफी के विद्वानों के अनुसार यह आभामण्डल “इथरीक डबल” के रूप में भौतिक शरीर से एक चौथाई इंच बाहर उभरा रहता हैं, किन्तु फोर्स फील्ड के रूप में यह उससे कई इंच और अधिक बाहर तक फैला होता हैं। विज्ञान भी अब इस स्वीकार करने लगा हैं कि मनुष्य शरीर के अन्दर कोई दिव्य चेतन ऊर्जा विद्यमान हैं जिसकी विद्युत चुम्बकीय तरंगें सतत् बाहर विकिरित होती रहती हैं। इसमें चुम्बकत्व तथा विद्युत के कुछ गुण विद्यमान होने पर भी यह स्वयं न तो विद्युत हैं और न चुंबकत्व। तीक्ष्ण रंगों व किरणों के रूप में इसे देखा और ताप के रूप में अंकित किया जा सकता हैं। सामान्यतः जीवधारियों के शरीर से 2 से 4 इंच बाहर तक इस ऊर्जा का प्रसार होता हैं। वैज्ञानिकों ने प्राणियों के इस प्रभावीकरण को “बायोफ्लक्स” नाम दिया हैं। उनके अनुसार मनुष्य की स्थिति में यह आयु स्वास्थ्य, थकावट, मूड एवं भावनाओं के अनुरूप परिवर्तित होता रहता है। योगाभ्यास द्वारा इसे उभारा और शरीर से निकाला जा सकता हैं एवं जीवधारियों तथा मनुष्य को इससे प्रभावित-प्रेरित किया जा सकता हैं। इतना ही नहीं वृक्ष-वनस्पतियों तथा जड़ पदार्थों में भी इसके द्वारा प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता हैं। एकाग्रता के माध्यम से इस दूर तक संप्रेषित किया जा सकना भी संभव हैं।

मात्र मानवी काया से ही नहीं वरन् अन्य प्राणियों व वनस्पतियों में भी प्रभा विकिरण को जाँचा परखा गया हैं और पाया गया हैं कि प्रत्येक प्रजाति के हर सदस्य तथा हर सदस्य के विभिन्न अंग-अवयवों का अपना अलग और स्पष्ट तेजोवलय होता हैं। इस संदर्भ में मूर्धन्य वैज्ञानिक डाँ0 थेल्मा मास ने अनेकों प्रयोग परीक्षण किये तथा जीवित प्राणियों एवं वनस्पतियों के किर्लियन तथा आर्गन विधि द्वारा फोटोग्राफ लिये। उनके अनुसार प्राणियों की दीप्तिशीलता परिवर्तित होती रहती हैं। पौधों से तुरन्त अलग की गई पत्तियों के जब चित्राँकन किये गये तो उनसे चिनगारियों जैसे चमकदार स्फुल्लिंग निकलते दिखाई दिये। जैसे-जैसे पत्तियाँ सूखती जाती हैं। जिससे प्रकट होता हैं कि पत्ती के “बायोप्लाज्मबाडी” की मृत्यु हो गई। हरी पत्ती के कुछ अंश काटकर चित्र लेने पर भी पत्ती के छायाचित्र का पूर्ण तेजोवलय अंकित हो जाता हैं।

मनुष्य शरीर के किसी अंग अवयव के कट जाने पर उसमें समाहित चेतना नष्ट नहीं होती वरन् अपना रूप-रंग और आकार बनाये रखती हैं। इस तथ्य की पुष्टि जैव-भौतिक विज्ञानी विक्टर एडामेन्को तथा जान ह्राबेचर ने अपने अनुसंधानों के आधार पर की हैं। उनके अनुसार कटे हुए भाग का किर्लियन विधि से छायाचित्र लेने पर शेष शरीर के साथ उस अंग का भी प्रभामंडल आ जाता हैं। यह प्रक्रिया चिकित्सा शास्त्रियों की उस धारणा को प्रमाणित करती हैं जिसमें कभी-कभी किसी व्यक्ति के शरीर का कोई भी भाग कट जाने या काट दिये जान पर भी उसे उक्त अंग में दर्द की अनुभूति होती रहती हैं। चिकित्सा क्षेत्र में इसे “फैन्टम लिम्बपेन” कहा जाता हैं। इन वैज्ञानिकों का कहना हैं कि वस्तुतः उस अंग के प्लाज्मा बॉडी का मरण नहीं होता वरन् सम्पूर्ण काया के चेतन शरीर के साथ उसकी एकरूपता सदैव बनी रहती हैं जिससे रोगी को “फैन्टमपेन” का अनुभव होता रहता हैं। एडमेन्को के अनुसार मनुष्य में भावनात्मक, उत्तेजनात्मक तथा सम्मोहन जैसे विभिन्न चेतना स्तरों के साथ किर्लियन फोटो में भी नाटकीय परिवर्तन आते रहते हैं।

नोबुल पुरस्कार विजेता प्रो0 डगलस ए.डीन के अनुसार मानवी अंगुलियों के पोरुओं तथा हथेली के चारों ओर के आभामंडल से किसी के भविष्य में रोगी होने, न होने की संभावना व्यक्त की जा सकती हैं। फरवरी ... के अंतिम सप्ताह में “बायोइलैक्ट्रोग्राफी” पर पाण्डीचेरी में हुई एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध निष्कर्ष बताते हुए प्रोफेसर डीन ने कहा कि उन्होंने पोलेराइड इंस्टाण्ड फिल्म एवं बायोइलैक्ट्रोग्राफ की मदद से मात्र दो मिनट में प्रभामण्डल का मापन व रो का निदान कर पाने में वे सफल हुए हैं। अपने इसी कार्य पर उन्हें नोबुल पुरस्कार भी मिल चुका हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि अगले दिनों “आरामापन” चिकित्सा विज्ञान में एक महत्वपूर्ण स्थान ले ले।

वस्तुतः अब इस विधा का उपयोग चिकित्सा विज्ञान में विभिन्न रोगों के निदान के रूप में किया भी जाने लगा हैं। ट्यूमर, आर्थ्राइटिस, कैंसर जैसे रोग इस विधि में फोटो प्लेट पर गर्म क्षेत्र के रूप में धूमिल, धब्बेदार या फलास्कनुमा परिलक्षित होते हैं। रोगों की निकट भविष्य में होने की संभावना से भी व्यक्ति का प्रभामंडल बदल जाता है। इस आधार पर रोगों की पूर्व सूचना प्राप्त कर उनका पूर्व उपचार निदान भी किया जा सकता हैं। मद्राज यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञानियों ने भी एक ऐसा कैमरा विकसित किया हैं जिसके द्वारा इस प्रकार की फोटाग्राफी ली जा सकती हैं। रोगी व्यक्तियों पर उनने इस प्रकार के कई प्रयोग परीक्षण भी किये हैं। उनका कहना हैं कि स्वस्थ और अस्वस्थ व्यक्तियों की चेतना मंडल का आकार व रंग अलग-अलग प्रकार का होता है। इस आधार पर शरीर के भीतर छिपे रोगों की जानकारी प्राप्त करने में भी उनने सफलता पाई है। अब तक उनने एक हजार से अधिक व्यक्तियों के तेजोवलय के चित्र खींचे हैं और उसके आधार पर यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि प्रत्येक व्यक्ति का प्रभामंडल उसके विचार और व्यक्तित्व के अनुरूप होता है। सिद्ध पुरुषों, महामानवों की तुलना में सामान्य व्यक्तियों के प्रदीप्त मंडल क्षीण होते हैं। इसके अतिरिक्त संकल्पवान, चरित्रनिष्ठ, प्रभावशाली लोगों में यह अधिक देदीप्यमान पाया गया हैं। शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों के प्रभामंडल चमकीले तथा स्पष्ट होते हैं जब कि हेय जीवन जीने एवं दुश्चिंतन में डूबे रहने वालों में यह धुँधला होता हैं। डाँ0 डेविड शीनकिन तथा टेड डान जैसे ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिकों की भी यहीं धारणा है कि आभामंडल की प्रदीप्तिता-उज्ज्वलता मनुष्य की भावना और चेतना की उत्कृष्टता पर अवलम्बित हैं। साधना, समाधि के समय साधकों का प्रदीप्त मंडल बहुत चमकीला एवं विस्तृत जाता हैं। इसका कारण वैज्ञानिकों ने भावना, विचारणा एवं अन्तःकरण की पवित्रता, उत्कृष्टता को माना हैं।

यह सुनिश्चित है कि व्यक्तित्व की आभामंडल पर भारी छाप रहती हैं। प्रायः यह जन्म-जन्मांतरों के प्रयास, अभ्यास एवं संस्कारों के आधार पर विनिर्मित होता हैं, पर मनुष्य अपनी स्वतंत्र चेतना का उपयोग करके उसे बदल सकता तथा बढ़ा सकता हैं। सामान्य स्तर के व्यक्ति इस बने बनाये तेजोवलय के अनुरूप अपना स्वभाव और कर्म बनाये रहते हैं, पर मनस्वी साधक अपनी दृढ़ ़ संकल्प शक्ति से अभ्यस्त बाह्य एवं आन्तरिक स्थिति में आश्चर्यजनक परिवर्तन कर लेते हैं। तत्पश्चात् तेजोवलय भी उसी के अनुरूप बन जाता है। तप साधना के उच्चस्तरीय प्रयोग उपचारों की व्यवस्था प्रभामंडल के प्रखरीकरण की महती उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही बनाई जाती हैं। सत् तत्वों से ओत प्रोत प्रभामंडल में परिवर्तन ही आध्यात्मिक कायाकल्प है।


सत्संकल्प की सुखद परिणति

उषा-काल का मनोरम समय था। अरुण देव भगवान भास्कर के रथ का संचालन करते हुए प्राची दिशा से झाँक रहे थे। उनके तेजोमुख की लालिमा से गगन दीप्त था। धरती की गोद में सुरम्य उद्यान में लगे पादपों की कलियाँ जहाँ मंद-मंद मुस्करा रही थी, वहीं पुष्प खिलखिला रहे थे।

उद्यान के एक कोने में मंदार के पुष्प अपने सौंदर्य के नशे में डूबे, मकरंद के वैभव-विलास के आहं में इतरा रहे थे। वही दूसरे कोने में चाँदनी की छोटी पौध भी थी। उस पर लगे नन्हें-नन्हें पुष्प छुईमुई की तरह मंदार के अहं भाव से घबराए सकुचाएं से थे। मंदार पुष्पों में से एक ने चाँदनी के पुष्प की ओर-उपेक्षा भरी दृष्टि से देखते हुए हँसी उड़ाने वाले भाव से कहा “अरे! तुम्हारा भी कोई जीवन है। रुग्ण जैसी दिखाई पड़ने वाली दुर्बल काया। रंग बिरंगी रूप राशि और मकरंद की विपुल सम्पदा भी मुझे मिली है।”

उसकी हेय दृष्टि से सकुचाई-सी चाँदनी चुपचाप सुनती रही। पर मन ही मन उन सबने संकल्प लिया। अपने को संघबद्ध कर-चतुर माली को सौंप देने का गोधूलि बेला में मालाकार आया। चाँदनी के पुष्पों का मूक आमंत्रण आकर्षित कर उसे उनके पा ले गया। माली ने उन्हें अपनाया और सुन्दर ढँग से एक माला के रूप में पिरो लिया।

साँयकाल-उद्यान के सामने बने देव मन्दिर में देव प्रतिमा के गले में माला अर्पित की गई। चाँदनी के पुष्प प्रसन्न थे। उन्हें अपने सत्संकल्प का सुखद परिणाम पाकर संतोष था।

चाँदनी पुष्पों के सुखद गौरवपूर्ण स्थान को देखकर मंदार पुष्पों का अहं गल गया। उन्होंने चाँदनी से इस गौरवमयी स्थिति का रहस्य पूछा। चाँदनी ने विनम्रता भरे स्वर में उत्तर दिया “बन्धुवर! सहयोग−सहकार-स्नेह का सद्भाव तथा अनुशासन ही इसका रहस्य है। हम सबने अपने को मालाकार के अनुशासन में सौंप दिया। हम में किसी प्रकार का अहं न होकर सहयोग और सहकार की प्रवृत्ति थी। न तो विग्रह था, नहीं द्वेष। हम सभी एक महान लक्ष्य को समर्पित थे। इसी के कारण प्रेम के पवित्र सूत्र में आबद्ध होना सहज ही स्वीकार किया। मालाकार जैसे योग्य गुरु ने इन परिवत्राओं के कारण ही हम सभी को वह स्वरूप प्रदान किया, जिसके कारण हम सभी अब प्रभू की मूर्ति के गले में शोभा पा रहे हैं।”

मंदार पुष्पों ने एक जिज्ञासा और की “क्या इसके लिये तुम्हें कुछ त्याग भी करना पड़ा ?” चाँदनी ने कहा “-कुछ अधिक नहीं! मात्र स्वार्थ की संकीर्ण प्रवृत्ति जिसे मेरे गुरु मालाकार ने सुई से छेद-छेद कर अन्तर मन से निकाल दिया और उसकी जगह दिया प्रेम का सूत्र। बस यही है गौरव प्राप्ति का रहस्य।” अब तो मंदार पुष्पों का अहं पूरी तरह से गल गया। स्वार्थ संकीर्णता को त्याग वह भी पूरी तरह शिष्य भाव से मालाकार के हाथों अर्पित होने की प्रतीक्षा में खड़े थे।


कमजोर मन वाला (Kahani)

एक सन्त समाधि में बैठे थे। स्थान सुनसान जंगल का था। शेर ने संत को सूँघा और वापस लौट गया।

यह दृश्य एक शिष्य देख रहा था। समाधि खुलने पर शिष्य उनके समीप आया। वार्त्तालाप चल रहा था। कि एक कीड़े ने सन्त को काट खाया। वे दर्द से कराहने लगे।

शिष्य ने पूछा जब आप समाधि में बैठे थे तब शेर से नहीं डरे अब छोटे से कीड़े के काटने पर इतने विचलित क्यों होते हो?

सन्त ने कहा- उस समय मेरे साथ ईश्वर था। इसलिए निर्भय था पर अब तो सिर्फ तू ही कमजोर मन वाला मेरे पास बैठा है। ऐसी दशा में कराह न निकले तो और क्या हो ?


अध्यात्म और विज्ञान का मिलन किस स्तर पर हो?

अपने शरीर से लेकर सम्पूर्ण दृश्य जगत में कहीं भी देखें, सर्वत्र जड़ और चेतन की संयुक्त सत्ता दृष्टिगोचर होती हैं। यदि दोनों का संयोग बिखर जाय तो न तो कहीं प्राणी के लिए पदार्थ रहेगा न ही पदार्थ के लिए प्राणी। बुद्धि और मन की परिधि यह संसार ही हैं। वे इसी परिधि के इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं। इन्द्रियों की अनुभूतियाँ हो या मानसिक कल्पनाएँ अथवा अन्तःकरण की भाव संवेदनाएँ इनकी क्षमता का प्रकटीकरण तभी होता हैं जब शरीर या पदार्थों के बीच उनका सम्बन्ध स्थापित हो सके। इसके बिना सारा का सारा चिन्तन का ढाँचा ढह जाएगा।

ऐसे ही अन्योन्याश्रित संबंधों में एक युग्म अध्यात्मक और विज्ञान का है। पदार्थ विज्ञान में बुद्धि और पदार्थ का संयोग काम करता है। आत्मिकी में बुद्धि का स्थूल रूप नहीं अपितु सुपरिष्कृत रूप जिसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं-काम करता है। तत्व चिन्तन के ब्रह्म विद्या प्रकरण में इसी की चर्चा की गई है। इस तरह पारस्परिक तालमेल की आवश्यकता स्पष्ट हो जाती है। यदि ये दोनों परस्पर लड़ने-झगड़ने लगें-एक दूसरे के अस्तित्व को नकारने लगें, अनावश्यक और अप्रामाणिक बताने लगें तब तो यही मानना होगा कि दुःख और दुर्भाग्य ही राहु-केतु के सदृश हमारे चिन्तन क्षेत्र पर ग्रहण की तरह लग गए है।

जीवन के समग्र व परिपूर्ण विकास के लिए दोनों आपस में ही टकराने लगें तो इनकी टकराहट उसी तरह होगी जैसे अपना दायाँ हाथ अनन्यतम सहयोगी बाएं हाथ को काटने के लिए जुट जाय। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि वैज्ञानिकता के बिना धर्म अन्ध-विश्वास बन जाएगा इसी तरह आत्मिकी के बगैर विज्ञान अनैतिक और उच्छृंखल। आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है इन दोनों में ताल-मेल हो। पारस्परिक सहयोग का स्नेह-बंधन हो। असहयोग होने पर तो हानि के सिवा और कुछ न होगा। इनका पारस्परिक विग्रह संसार की प्रगति और संस्कृति को नष्ट करने वाला ही सिद्ध होगा।

आध्यात्मिक उपलब्धियाँ है श्रेष्ठ व्यक्तित्व एवं आदर्श कर्तृत्व। आध्यात्मिकता सच्ची वही है जो मानवी विकास में सहायक हो। उसमें व्यावहारिक जीवन जीने की कला व जीवन की विविध समस्याओं का समाधान निहित हो। मात्र कर्मकाण्डों का अंधानुकरण करने, श्रद्धा विश्वास के नाम पर लकीर पीटने को आज का बौद्धिक वर्ग तैयार न होगा। इन कर्मकाण्डों के साथ परिष्कृत जीवन के सूत्र-सिद्धान्तों का दार्शनिक क्रम भी होना चाहिए। इसके अभाव में तो धर्म की गरिमा गिरेगी। इसकी महानता तो तभी अक्षुण्ण रह सकती है जब यह नव्य जीवन के भव्य निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाएं। मानव-मानव के बीच वह भाव और विचार पैदा करे जिससे वे सार्वभौम तत्व की एकता को एक दूसरे में अनुभव कर सके।

इस तरह अपनी भूमिका का भली प्रकार निर्वाह करके ही धर्म जाग्रत और जीवन्त बना रह सकता है। इस तरह सभी उसे आदर से अपना सकेंगे अन्यथा बुद्धिवाद उसे आसानी से न स्वीकार करेगा, उल्टे उस पर प्रहार करने की सोचेगा।

लन्दन विश्व विद्यालय के एस्ट्रोफिजीसिस्ट प्रो0 हर्बर्ट डिग्ले का कहना है कि “विज्ञान की अपनी परिधि सीमित है। यह मात्र पदार्थ के स्वरूप एवं प्रयोग का ही विश्लेषण करता है। पदार्थ को बनाया किसने? क्यों बना? कैसे बना? इसका उत्तर दे पाना अभी सम्भव नहीं। इसके लिए विज्ञान को ऊँची और विलक्षण कक्षा में प्रवेश लेना पड़ेगा। यह कक्षा लगभग उसी स्तर की होगी जैसे कि अध्यात्म के तत्वांश को समझने के लिए अपनानी होती है।”

तत्वविद् रेनाल्ड का कथन है- धर्म क्षेत्र को अपनी भावनात्मक मर्यादाओं में रहना चाहिए और व्यक्तिगत सदाचार व समाजगत सुव्यवस्था के लिए आचार व्यवहार की प्रक्रिया को परिष्कृत बनाए रखने में जुटा रहना चाहिए। यह कोई कम बड़ी बात नहीं है। यदि अध्यात्म वेत्ता अपनी कल्पनाओं के आधार पर भौतिक पदार्थों की रीति-नीति का निर्धारण करने लगेंगे तो वे सत्य की कुसेवा ही करेंगे और ज्ञान के विकास में बाधक ही सिद्ध होंगे।

विख्यात दार्शनिक पालटिलिच धर्म और विज्ञान का मिलन दार्शनिक स्तर पर होने की घोषणा करते है। उनका कथन है-दोनों के क्रियाकलाप एवं प्रतिपादन की दिशाएँ अलग-अलग ही बनी रहेंगी न तो धर्म शास्त्रों के आधार पर खगोल, रसायन भौतिकी के निष्कर्ष निकाले जा सकते है और न ही दुनिया भर की प्रयोगशालाएँ ईश्वर आत्मा सदाचार भाव-प्रवाह जैसे तथ्यों पर कुछ प्रामाणिक प्रकाश डाल सकती है। मात्र दार्शनिक स्तर ही ऐसा है, जहाँ दोनों धाराओं का मिलन संभव है।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रुनेग्लोविश का भी यही मानना है कि धर्म और विज्ञान का बाह्य स्वरूप भले ही पृथ्वी के दो ध्रुवों अथवा ग्रीष्म-शीत ऋतु के प्रभाव की तरह सर्वथा भिन्न दिखे पर अन्तस्तल में एक है। ये दोनों सर्वथा एक दूसरे के पूरक है। दोनों में से किसी एक की अवहेलना करने पर निकाला गया निष्कर्ष अधूरा ही होगा। पदार्थ में चेतना को सक्रिय तथा चेतन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए भौतिक पदार्थों की आवश्यकता अनिवार्य ही है। दोनों का समत्व ही विश्व को वर्तमान स्वरूप प्रदान कर सका है। इन्हें पृथक् करने पर तो अधूरे और भटकाव भरे परिणाम ही समाने आएंगे।

स्वामी विवेकानन्द ने धर्म की वैज्ञानिकता घोषित करते हुए कहा था कि “मेरा अपना विश्वास है कि बाह्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जिन अन्वेषण पद्धतियों का प्रयोग होता है। उन्हें धर्म क्षेत्र में भी प्रयुक्त किया जाना चाहिए। यह कार्य जितना शीघ्र हो उतना ही अच्छा। यदि कोई धर्म इन अन्वेषणों से ध्वस्त हो जाएं तो यही समझना चाहिए कि वह निरर्थक था। ऐसा धर्म जो तर्क, प्रमाण व उपयोगिता की दृष्टि से खरा न उतरे लुप्त हो जाना एक श्रेष्ठ घटना होगी। इस अनुसंधान के फलस्वरूप सारा मल धुल जाएगा तथा धर्म के उपयोगी और आवश्यक तत्व अपनी प्रखरता के साथ समाने आएँगे।

इस तरह धर्म के क्षेत्र में व्याह रहे अन्ध-विश्वास जैसी अनावश्यक चीजों का सफाया हो जाएगा। वस्तुतः वैज्ञानिक तरीकों से प्राप्त होने वाले ज्ञान में अंतर्ज्ञान तत्व अन्तर्निहित हैं, जबकि आत्मचेतना का प्रकाश भी सत्य को प्रदर्शित करता हैं। दोनों ही रहस्यमय हैं और जैसा कि विलियम जेम्स स्पष्ट करते हैं “जीवन का सत्य रहस्य की दिशा में ही है। रहस्य में वास्तविकता भी हों सकती हैं और अनावश्यक पथ–भ्रष्टता भी। अतएव जब सत्य की दिशा में अग्रसर हुआ जाय तब ध्यान रहें कि मनोवैज्ञानिक सत्य छुपने ने पाए। उसके लिए यह परमावश्यक हैं कि धर्म और विज्ञान दोनों ही मिलकर पथ प्रदर्शन करें। विज्ञान की पहुँच जहाँ तक हैं वहाँ तक का ज्ञान देकर धर्म का मार्ग प्रशस्त करें और धर्म का यह दायित्व बन पड़ता हैं कि वह वैज्ञानिक उपलब्धियों की संगति बिठाकर उस अपूर्णता को दूर करे जो विज्ञान के लिए आगे बढ़ने में आकस्मिक अवरोध के कारण उत्पन्न होती हैं।

यह सुनिश्चित तथ्य व सार्वभौमिक शाश्वत सत्य हैं कि विज्ञान और अध्यात्म एक सिक्के के दो पहलू हैं अथवा दो ऐसे ज्ञान के प्रवाह वाले निर्झर हैं, जिनका उद्गम स्थल एक ही पर्वत हैं। क्षेत्र की भिन्नता के कारण उनका स्वरूप भले ही भिन्नता के कारण उनका स्वरूप भले ही भिन्न दिखाई पड़े पर वे एक ही महाप्रयोजन की पूर्ति करते हैं।

अध्यात्म और विज्ञान एक ही परम सत्य को दो विभिन्न दिशाओं में खोज करने में संलग्न होते हैं। जैसे-जैसे प्रगति की ओर अग्रसर होते है वैसे-वैसे एक दूसरे के अधिकाधिक निकट पहुँचते जाते हैं। विज्ञान जड़ जगत की संरचना व क्रिया पद्धति का निर्धारण, विवेचन करता है साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि उसका अधिक से अधिक सदुपयोग कैसे और किस तरह किया जाय ? धर्म चेतना जगत के आवरण खोलता है और रहस्यों को उद्घाटित करता है और बताता है कि विश्व-ब्रह्माण्ड की इस अद्भुत शक्ति का व्यक्ति और समाज के उन्नयन में श्रेष्ठतम उपयोग उपयोग क्या है ? जड़ और चेतन के द्विविध रहस्यों का अनावरण व सदुपयोग की विधा जानने व सीखने के लिए हमें अध्यात्म व विज्ञान का समन्वय-सन्तुलन बिठाकर ही आगे बढ़ना होगा।


Quotation

दुनिया छोड़ने से पहले यह जान लेना समझदारी हैं कि संसार और जीवन दोनों ही एक से बढ़कर आनंददायक हैं पर उसका अनुग्रह होता उन्हीं पर हैं, जो उनका गौरव और सदुपयोग समझ सकें।


पर्यवेक्षण योग की साधना, ध्यान धारणा

पीला और नीला रंग मिलाकर हरा रंग बनता है। हरे रंग का स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं। यदि इस सम्मिश्रण को बदल दिया जाय तो स्थिति दूसरी बन जायगी। पीला लाल से मिलकर नारंगी बन जाता है। इसी प्रकार जीव भी एक सम्मिश्रण है। वह शरीर के साथ घुला रहता है तो प्राणी या जीव कहलाता है। उस पर प्रकृति का बड़ा भाग शरीर के ऊपर आवरण आच्छादन की तरह चढ़ा होता है। इसलिए वह अपने आप को शरीर मानता रहता और उसी की सुख सुविधा को प्रधान रूप से ध्यान में रखता है। लिप्सा और लालसाएं उसे घसीटती रहती है। इन्द्रियों के रस उसे ललचाते रहते हैं मन की तरंगें गहरे नशे की तरह उस पर छाई रहती है। सामान्यतया यही स्थिति एवं व्याख्या है औसत जीवधारी की।

किन्तु यह सामान्य नहीं असामान्य, स्वाभाविक स्थिति है। वैसी जैसे नदी में बहते हुए रीछ को किसी अनजाने ने तैरकर उस कम्बल को लूट लाने का प्रयास किया था और तैरते हुए समीप पहुँचने पर रीछ ने उसे पकड़ लिया था। प्रयत्न करने पर भी उसे छोड़ नहीं रहा था। दोनों गुत्थम गुत्था हो रहे थे। किनारे पर खड़ा साथी यह सब देख रहा था। उसने यह दृश्य देखा तो आवाज लगाई कि कम्बल पकड़ में नहीं आता तो उसे छोड़ दो और लौटकर आ जाओ। कम्बल के साथ गुथे हुए आदमी ने कहा मजबूरी आ गई। मैं तो कम्बल को छोड़ता हूँ पर यह कम्बल ही मुझे नहीं छोड़ता। किसी ने किसी को छोड़ा नहीं आखिर दोनों ही डूब गये।

शरीर घोड़ा है और आत्मा सवार। घोड़े पर सवार बैठा हो तो यह स्वाभाविक है किन्तु जब सवार पर घोड़ा लद ले तब कैसा विचित्र लगेगा। नाव आदमियों को पार लगाती है पर यदि वही नाव आदमियों के सिर पर लदे तो कैसा अजीब लगेगा। शरीर की प्रभुता और आत्मा की पराधीनता में ऐसी ही विलक्षणता है जिसके हम सब दर्शक ही नहीं भुक्तभोगी भी है। असमंजस इसी द्विविधा का रहता है। शरीर के सहारे सन्मार्ग पर चलते हुए जीवधारी को अपना लक्ष्य पूरा करना था पर होता उल्टा है। आने के समय खाली हाथ नंगे शरीर आता है, पर जाते समय पापों का पिटारा और घोर पश्चाताप लदा होता है।

स्थिति को कैसे बदला जाय? समय रहते कैसे सँभाला जाय ? उसका उपाय एक ही है कि अपना विकृत दृष्टिकोण बदला जाय। शरीर के और प्राणी के संबंधों में जो अवांछनीय भ्रान्ति लद गई हैं उसे मिटाया जाय। उसे मिलना परमात्मा के साथ था और जिस प्रकार लोहा पारस को छू कर सोना बनता है, उसी प्रकार लघु से विभु, तुच्छ से महान, और नर से नारायण बनना था। पर बन गया कुछ ऐसा जिसे देखकर दया भी आती है और हँसी भी।

रंगों के मिश्रण का उदाहरण आरम्भ में इसी विसंगति को देखते हुए दिया था, नारंगी रंग की शाल ओढ़नी थी तो पीले का लाल के साथ सम्मिश्रण करना था। नीले के साथ मिल जाने से सर्वथा दूसरी स्थिति हो गई।

शरीर और जीव का संबंध जिस प्रकार जुड़ गया है उसे शोचनीय ही रहना चाहिए। वह तो ऐसा ही हो गया जैसे कि किसी पुरुष का किसी स्त्री के साथ विवाह हो जाय और अपना घर छोड़कर ससुराल में जोरू का गुलाम बनकर रहे। मालिक को नौकर के यहाँ नौकर बनकर रहना पड़े और दासानुदास कहलाना पड़े।

स्थिति में परिवर्तन लाना आवश्यक है जिसके साथ जुड़ना चाहिए उसको उसी का साथी अनुयायी बनकर रहना चाहिए। आत्मा परमात्मा का अंश हैं। उसकी शोभा उसी के साथ रहने में हैं। पुष्प की शोभा देवता के चरणों में चढ़ने में ही है। कीचड़ की नाली में जा पड़ने से नहीं। मनुष्य के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या यही है कि उसका योग परमात्मा के साथ होना चाहिए न कि सुविधा के लिए मिले हुए उपकरण औजारों का गट्ठा शिर पर लादे लादे फिरने में।

स्थिति को वास्तविक बनाने के लिए जो प्रयत्न करने होते है उनमें से एक पर्यवेक्षण योग भी है। इसी को कहते है सरसरी निगाह से देखते रहने की अपेक्षा उसे गम्भीर वैज्ञानिक दृष्टि से देखना। सामान्य मनुष्य संसार को एक मेला समझकर बाल बुद्धि से कौतुक कौतूहल की तरह देखते रहते है किन्तु जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि मिली है वही उसी दृश्य में से अनेकों काम की बातें जान लेते है और कई उपयोगी शिक्षाएं एवं प्रेरणाएं साथ लेकर वापस लौटते है। इसी को वैज्ञानिक दृष्टि कहते है। वैज्ञानिक सूक्ष्म बुद्धि होते है। उनकी पर्यवेक्षण क्षमता पैनी और गहरी होती है। सामान्यों और असामान्यों के बीच यही अन्तर रहता है।

पर्यवेक्षण योग इस विडम्बना से निवृत्ति पाने का अच्छा तरीका हैं। उसका विधान भी बहुत सरल है। शिथिलीकरण मुद्रा (शरीर और मन को पूरी तरह ढीला छोड़ देना) की स्थिति का सामान्य अभ्यास जब हो जाय तो उसे कुछ और गहरा करना चाहिए। गहराई इस भावना तक ले जानी चाहिए कि जीव अपने आपको शरीर से सर्वथा पृथक हो जाने की स्थिति अपने को अनुभव करे। जीव को किसी बहुत ऊँचे पर उड़ने वाले वायुयान पर सवार होकर अपनी वस्तुस्थिति का संसार के वास्तविक स्वरूप का निरीक्षण पर्यवेक्षण करना चाहिए।

ऊँचे आकाश में गरुड़ पक्षी की तरह देखना चाहिए कि अपना शरीर मृत स्थिति में पड़ा है। कुटुम्बी लोग उसकी अन्त्येष्टि की तैयारी कर रहे है। इस कृत्य को करते समय वे रोते कलपते भी है। पर कुछ ही समय उपरान्त वे अपने-अपने ढँग से स्वावलम्बी हो जाते हैं और कुछ ही महीनों बाद ऐसी स्थिति आ जाती है जिसमें वे एक प्रकार से भूल ही जाते है। यदा कदा ही नाम लेने की जरूरत पड़ती हैं। मोह के बन्धनों से सभी स्वजन परिजन छुट्टी पा लेते है।

अब और आगे बढ़ा जाय कितने ही जन्मों की ऐसी ही कल्पना की जाय जिसमें अगणित बार जन्मना मरना पड़ा। अनेक सम्बन्धी कुटुम्बियों के साथ संयोग बिछोह हुआ। .... समय खुशी और मरते समय रंज मनाया गया। संबंधों में कटुता एवं मिठास भी चलती रही और अन्त में सिनेमा बंद होने की तरह घंटी बजी और चमकते टमकते हाल में अंधेरा छा गया। अन्य योनिय दो मात्र भोगा योनि ही हैं। पर मनुष्य जीवन कर्म योनि भी है। कर्मों का अवलोकन किया गया तो प्रतीत हुआ कि सार्थक कम ही बन पड़ा जो किया गया वह या तो निरर्थक या या अनर्थ। प्रतिफल हाथों हाथ नहीं भुगते जाते। वे पीछे के लिए प्रारब्ध बनते रहते है। स्वर्ग नरक के रूप में या पीड़ा व्यथाओं के रूप में जो भुगतना पड़ता है। उस संचय की गठरी लेकर ही हर बार चलना पड़ा और चिरकाल तक उस कर्मफल का त्रास सहना पड़ा।

यह निषेधात्मक पक्ष हुआ अब उसी स्थिति में जीव को गरुड़ बनकर बहुत ऊँचे आकाश में उड़ते हुए यह भी देखा जाय कि शरीर की घनिष्ठता घटा कर उसे परमात्मा के साथ जोड़ दिया जाये और उनके अनुशासन में चला गया, सान्निध्य में रहा जाय तो कितने .... का रसास्वादन करने को मिलता है। महामानव, ऋषि एवं देवताओं की स्थिति में रहने अथवा और असंख्य का भला करने का अवसर मिलता है।

दोनों स्थितियों की अच्छाई बुराई सोचते हुए शरीर से अलग होने की भावस्थिति से ही यह निर्णय करना चाहिए कि दोनों में से कौन-सी स्थिति का चुनाव श्रेयस्कर है उपयुक्त हो उसे वरण कर लिया जाय। उस आधार पर बिताने का प्रण करते हुए शिथिलीकरण .... समाप्त करके शरीर में लौट आया जाय और जो .... लाभ उस स्थिति में मिला उसे शेष जीवन में कार्यान्वित किया जाय। इस पर्यवेक्षण योग को धारण नित्य नियमित रूप में करते रहने पर मनुष्य उस स्थिति को प्राप्त करते है जो प्रत्येक का लक्ष्य है।


Quotation

भोजन को मुँह से चबा कर तब पेट मैं पहुँचाया जाता है। बड़ों के परामर्श पर भी विवेक पूर्वक विचार करो और उतना ही ग्रहण करो जो पावन के अनुरूप है।


ईश्वर पासे फेंकने वाला बाजीगर नहीं है

वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मनीषियों द्वारा चेतन सत्ता का प्रतिपादन विज्ञान सम्मत ढंग से अब किया जाने लगा है। आधुनिक विज्ञानवेत्ता ऐसी संभावना प्रकट करने लगे है कि निकट भविष्य में ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक आधार पर भी प्रमाणित हो सकेगा। जो आधार विज्ञान को अभी प्राप्त हो सके है, वे अपूर्णता के कारण आज ईश्वर का प्रतिपादन कर सकने में समर्थ भले ही न हों, पर उसकी संभावना से इन्कार कर सकना उनके लिए भी शक्य नहीं।

ईश्वर के अस्तित्व को केवल इसी आधार पर नास्तिकों द्वारा अस्वीकार किया जाता है कि उसका कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। अल्प विकसित विज्ञान की ओर से भी चेतन सत्ता का अनस्तित्व सिद्ध करने के लिए ढेरों तर्क दिये जाते रहे हैं। पर जब हमारे साधन ही स्वल्प हो जिनके आधार पर उस तत्व का प्रत्यक्षीकरण करना संभव है, अथवा हम अज्ञात की कल्पना तत्व होता ही नहीं। यह बात हमारे जीवन व्यवहार में देखने को मिलती भी रहती हैं। यह एक मानी हुई बात है कि वे सभी वस्तुएँ जो प्रत्यक्ष अनुभव में नहीं आते, फिर भी इनका अस्तित्व है। इसी प्रकार परमात्म सत्ता के अस्तित्व से मात्र इस आधार पर इन्कार करना अनुपयुक्त है कि वह इन्द्रियों और यंत्रों की पकड़ में नहीं आता।

ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक पास्कल कहते थे कि “जो तत्व हमारी पकड़ में नहीं आया, उसके संबंध में यह सोचना गलत है कि उसका अस्तित्व हैं ही नहीं।” अब से कुछ शताब्दियों पूर्व भाप, बिजली पेट्रोल, रेडियो, एटम, ईथर आदि शक्तियों की कहीं चर्चा तक नहीं था। भूतकाल में भी कभी उनकी उपस्थिति देखी नहीं गई थी। इन शक्तियों की कल्पना जब किन्हीं मस्तिष्कों में उदय हुई तब भी कोई ऐसे प्रमाण नहीं थे जिनसे उसकी उपस्थिति निश्चित रूप से सिद्ध की जा सके। फिर भी अनस्तित्व से अस्तित्व की संभावना स्वीकार की गई और खोजें चल पड़ी। विभिन्न आविष्कार इस प्रकार प्रकट हुए है।

उपरोक्त खोजें जड़ जगत की है। चेतन जगत संबंधी खोज तो अभी प्रारंभिक अवस्था में है। विज्ञान अब धीरे-धीरे ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने की स्थिति में पहुँचता जा रहा हैं। मिल, हेल्स, होल्ट्स, लाँग हक्सले आदि वैज्ञानिकों ने परमसत्ता के अस्तित्व के बारे में जो कुछ लिखा है, वह अब बहुत पुराना हो गया है। उनकी वे युक्तियाँ जिनके आधार पर ईश्वर का खण्डन किया जाय करता था, अब असामयिक होती जा रही है। डा0 क्लिण्ट ने अपनी पुस्तक “थीइज्म” में इन युक्तियों का वैज्ञानिक आधार पर ही खण्डन करके रख दिया है।

इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जेम्स जीन्स ने “दि न्यू बैक ग्राउण्ड आफ साइन्स” नामक पुस्तक में यह उल्लेख किया है-”उन्नीसवीं सदी में विज्ञान का मूल विषय भौतिक जगत था लेकिन अब प्रतीत हो रहा है कि वही सब कुछ नहीं है। “इससे आगे भी कोई सर्वोच्च सत्ता विद्यमान है। अपनी दूसरी पुस्तक-”दि मिस्टीरियस यूनिवर्स” में उन्होंने लिखा है “वैज्ञानिक विषय के संदर्भ में हमने जो पूर्व में मान्यता बना ली है अब उसकी पुनः परीक्षण की आवश्यकता है। जड़ जगत को जो प्रधानता दे बैठे थे अब प्रतीत हो रहा हैं कि वह गौण है। उनके अनुसार विज्ञान जगत अब पदार्थ सत्ता नियन्त्रण करने वाली चेतन सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा हे और यह खोजने में लगा हैं कि हर पदार्थ को गुण-धर्म की रीति-नीति से नियन्त्रित रखने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है ? पदार्थ को स्वसंचालित अचेतन सत्ता समझने की प्रचलित मान्यता अब इतनी अपूर्ण है कि उसके आधार पर प्राणियों की चिंतन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात नियामक चेतन सत्ता को समझने का प्रयास गंभीरतापूर्वक कर रहे है। दार्शनिक काँट का यह कथन सचाई के बहुत निकट है कि “विश्व की रचना में प्रयुक्त हुई नियमबद्धता और बुद्धिमत्ता को देखते हुए ईश्वर की सत्ता स्वीकार की जा सकती है।”

वैज्ञानिक मनीषी हर्बर्ट स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक “फर्स्ट प्रिंसिपल” में कहा है कि “एक ऐसी विश्वव्यापी चेतन तत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता जी साधारणतया सभी प्राणियों में विशेषकर मानव में जीवन की एक सुरम्य प्रक्रिया का निर्धारण करती है। प्राचीनकाल के धार्मिक या दार्शनिक जिस प्रकार उसका विवेचन करते रहे है भले ही वह संदिग्ध हो, पर उसका अस्तित्व असंदिग्ध रूप से है और वह ऐसा है जिसका गंभीर अन्वेषण होना चाहिए।

इस संदर्भ में सर ए0एस॰ एडिंग्टन का कथन है-”भौतिक पदार्थों के भीतर एक चेतन शक्ति काम कर रही है जिसे अणु प्रक्रिया का प्राण कहा जा सकता है। हम उसका सही स्वरूप और क्रिया-कलाप अभी नहीं जानते पर यह अनुभव करते है कि संसार में जो कुछ हो रहा है- वह अनायास, आकस्मिक या अविचारपूर्ण नहीं है उनके अनुसार चेतन सत्ता ही जड़ जगत की उत्पत्ति का मूल कारण है। जे0बी0एस॰ हेल्डेन भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे है कि पदार्थ या शक्ति ही इस संसार का समग्र स्वरूप नहीं है। उनका कहना है कि एक समष्टिगत मनः तत्व समस्त विश्व पर नियन्त्रण किये गये हुए है। डा0 गार्ल भी मानते हैं कि संसार का मुख्य तत्व पदार्थ नहीं वरन् वह चेतन सत्ता है जो समझती, अनुभव करती, सोचती, याद रखती, और प्रेम करती है। मृत्यु के उपरान्त जीवन की पुनरावृत्ति का सनातन क्रम उसी के द्वारा गतिशील रहता चला आ रहा है।

संसार के प्रमुख विज्ञानवेत्ताओं के सम्मिलित निष्कर्ष व्यक्त करने वाले ग्रन्थ “दी ग्रेट डिजाइन” में प्रतिपादन किया गया है कि यह संसार निर्जीव यंत्र नहीं है। यह सब अनायास ही नहीं बन गया है। चेतन और अचेतन हर पदार्थ में एक ज्ञान शक्ति काम कर रही हैं उसका नाम भले ही कुछ हो। प्रसिद्ध वैज्ञानिक एल्फ्रेड रसेल वैलेस ने भी अपनी पुस्तक “सोशल इनवाइरन-मेण्ट एण्ड मोरेल प्रोग्रेस” में यह स्पष्ट किया है कि चेतना ही जड़ पदार्थों को गति प्रदान करती है।

विश्व विख्यात अणु विज्ञानी आइन्स्टीन के परमाणु प्रक्रिया का विशद् विवेचन करने के उपरान्त अपने निष्कर्ष को घोषित करते हुए कहा है “मुझे विश्वास हो गया है कि जड़ प्रकृति के भीतर एक ज्ञानवान चेतना भी काम कर रही है। इस अविज्ञात सृष्टि के अद्भुत रहस्यों के मूल में वह ईश्वरीय शक्ति ही परिलक्षित होती है। ईश्वर मात्र पासे फेंकने वाला बाजीगर नहीं है।” अब विज्ञान भी इस बात का समर्थन कर आइंस्टीन के कथन की पुष्टि कर रहा है कि सम्पूर्ण सृष्टि का नियमन एक अदृश्य चेतन सत्ता कर रही है।

ईश्वर की मान्यता सृष्टि का सर्वोच्च विज्ञान है और परम सत्य की खोज विज्ञान का का इष्ट। वैज्ञानिक ने समर्थ सत्ता के औचित्य को ज्ञान के अगाध विस्तार और मानवीय विवेक के आधार पर ही स्वीकार किया है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन से एक बार उनके एक मित्र ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा-”आप वैज्ञानिक होकर भी ईश्वर में आस्था रखते हैं? उसकी प्रार्थना किया करते है? यदि भगवान सचमुच है तो वह क्या है? इस पर न्यूटन ने गंभीरतापूर्वक उत्तर दिया-’ज्ञान’। उन्होंने कहाँ-हमारा मस्तिष्क ज्ञान की खोज में जहाँ पहुँचता है वही उसे एक शाश्वत चेतना का ज्ञान होता है। कण-कण में जो ज्ञान की अनुभूति भरी हुई है, वह परमात्मा का ही स्वरूप है। सृष्टि का कोई कण चेतना से वंचित नहीं, परमात्मा इसी रूप में सर्वव्यापी है। ज्ञान की ही शक्ति से संसार का नियंत्रण होता है, विनाश करना चाहो तो भी ज्ञान की ही आवश्यकता होती है। परमसत्ता अपने इस रूप के कारण ही सर्वशक्तिमान है।”


गुरु ने एक गुप्त मंत्र दिया (Kahani)

रामानुज को उनके गुरु ने एक गुप्त मंत्र दिया और उन्हें कहा इसके सहारे वे स्वर्ग जा सकते है और सिद्धि पा सकते है पर इसे किसी को देना नहीं और बताना नहीं चाहिए अन्यथा तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा।

रामानुज सोचते रहे जिससे मुझे इतना लाभ हो सकता है उससे अन्यों को क्यों वंचित रहना चाहिए? उसने वह मंत्र सभी को बताया। जब उन्हें स्मरण दिलाया गया कि ऐसा करने से नरक में जाना पड़ेगा। उन्होंने खुशी-खुशी कहाँ जिससे अनेकों को लाभ मिलता हो उसके लिए मुझे नरक में जाना भी स्वीकार है।


प्राण ऊर्जा का संवर्धन, चेतना का उदात्तीकरण

मानवी काया की परतों को कुरेदने पर चर्मचक्षुओं से तो मात्र उसमें रक्त और हाड़-माँस का तथा सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से देखने पर ऊतकों-कोशिकाओं के ईंट-गारे का जाल जंजाल भर दिखाई पड़ता है। विद्युत विज्ञानी उसके तंत्र समुच्चय में मस्तिष्कीय विद्युत दौड़ती हुई देखते है। इतने पर भी प्रायः यह रहस्य अविज्ञात ही बना रहता है कि इसी काय-कलेवर के गहन अन्तराल में ऊर्जा के निर्झर उछलते, प्रचण्ड ज्वालामुखी धधकते रहते हैं। उसकी सारी विशेषता एक जीवन्त विद्युत शक्ति के ऊपर निर्भर है जिसे अध्यात्म की भाषा में प्राण कहते है। चेतन आत्मा को क्रियाशील बनाये रहने और अभीष्ट लक्ष्य की दिशा में द्रुत गति से बढ़ने की सामर्थ्य प्रदान करने का आधार उस प्राण ऊर्जा को ही माना जाता है। व्यक्तित्व के असाधारण विकास में उसी का चमत्कार देखा जा सकता है।

प्राणतत्व की न्यूनाधिकता ही मनुष्य की दुर्बलता-बलिष्ठता का परिचायक है। इसकी न्यूनता से व्यक्ति हर दृष्टि से लड़खड़ाने लगता है और जब वह समुचित मात्रा में रहता है तो समस्त क्रिया कलाप ठीक तरह चलते है। जब वह बढ़ता है तो उस अभिवृद्धि को सामर्थ्य, प्रतिभा, सतर्कता, तेजस्विता, मनस्विता आदि के रूप में देखा जा सकता है। भौतिक क्षेत्र में उसे गर्मी, रोशनी, बिजली आदि के नाम से जाना जाता है और अन्तः क्षेत्र में उसी को प्रखरता कहते है। प्राण तत्व जीवन तत्व यही है। इसी को “निरपेक्ष ऊर्जा” भी कहा जाता है, जो प्राणि जगत को समान रूप से प्रभावित करती है। शरीर और मन को दिशा एवं क्षमता प्रदान करने वाली अति उत्कृष्ट एवं अति सूक्ष्म सत्ता “वाइटल फोर्स” यही हैं। इस सम्पदा को जो जितनी अधिक मात्रा में उपार्जित अभिवर्धित कर लेता है, वह उतना ही बड़ा शक्तिशाली सिद्ध होता है। ऐसे व्यक्ति ही महाप्राण कहलाते मार्गदर्शन करने में समर्थ होते है।

वैज्ञानिक क्षेत्र में भी अब इस प्राण शक्ति की खोजबीन की जाने लगी है। जैव विद्युत शास्त्र के प्रवर्त्तक सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डा0 एच0ए0बट के अनुसार जीवन का प्रमुख आधार प्राण ऊर्जा ही है जिसमें इच्छा और बुद्धि भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती है। इसके द्वारा मनुष्य अपने क्षेत्र में विशिष्ट परिस्थितियों एवं साधनों की संरचना कर सकता है। प्रो0 हडसन ने उसे सार्वभौमिक जीवन तत्व कहा है और लिखा है कि यदि इसे कामाचार के आकर्षण से बचाकर मस्तिष्कीय अथवा भावनात्मक प्रयोजनों में लगाया जा सके तो सस्ता विनोद करने की अपेक्षा कहीं अधिक सत्परिणाम उत्पन्न करेगा।

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात चिकित्साशास्त्री जे0 ज्योगी ने एक्टीन और मायोसीन नामक दो प्रोटीन तत्वों को मनुष्य शरीर में से खोज निकालता है। यह तत्व माँसपेशियों की सक्रियता बढ़ाते हैं। इनकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण उन्होंने प्राण शक्ति को माना है। उनका कहना है कि शरीर के चारों और जो प्रकाश छाया रहता है, वस्तुतः वह प्राण ऊर्जा के समस्त शरीर में संव्याप्त होने के कारण ही दिखाई देता है। इसके निर्माण में भाग लेने वाले सूक्ष्म परमाणु अत्यधिक शक्तिशाली, प्रकाशवान और प्रज्ज्वलनशील होते हैं। इनमें घट बढ़ होने पर शारीरिक और मानसिक उथल-पुथल होने लगती है। फ्रांसीसी वैज्ञानिक डुरावेल प्राणमय शरीर की स्वतंत्र सत्ता मानते हैं और कहते है कि वह जितना ही प्रबल होकर फिजिकल बॉडी में समाविष्ट होगा, उतना ही मनुष्य प्रतिभाशाली पाया जायेगा।

डा0 राखाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “रीजनल एक्सपोजीशन आफ भारतीय योगा” में लिखा है कि योग विद्या का उच्चस्तरीय आधार प्राण शरीर पर ही अवलम्बित रहता है। वे प्राण सत्ता को शरीर में समाई हुई होने पर भी पृथक् मानते है। डा0 मैकडुगल ने तो प्रत्यक्ष शरीर और प्राण शरीर का पृथक-पृथक् भार तौलने में भी सफलता पाई है। डा0 माल्य की शोधों में ऐसे प्रमाण पाये गये है जिनमें मनुष्य के न रहने पर भी उसका प्राण चिर अभ्यस्त स्थान पर विद्यमान रहता है। सिलवान जे0 मुलडोल की पुस्तक” दि प्रोजेक्शन ऑफ एस्ट्रल बॉडी” में ऐसी अनेकानेक घटनाओं का वर्णन है। जिसमें प्राण शरीर अपने अभ्यस्त स्थान पर चिरकाल तक अपना अधिकार जमाये रहता है भले ही उसे दिवंगत हुए लम्बी अवधि क्यों न बीत गई हो। सुपर नेचर नामक अपनी पुस्तक में लायल वाट्सन ने लिखा है कि किसी व्यक्ति के हाथ पैर कट जाने पर भी उसे उसकी उपस्थिति की अनुभूति होना शरीर में समाविष्ट प्राण शक्ति का ही एक खेल है।

कितने ही वैज्ञानिकों ने मानवी प्राण ऊर्जा की वैज्ञानिकता एवं उसकी प्रयोग प्रक्रिया के पक्ष में अनेकों आधार एवं प्रमाण प्रस्तुत किये है। प्रो0 विलियम क्रुक्स वेलिस इस संदर्भ में सबसे आगे रहे। जर्मन रसायनज्ञ बैरोन कार्य वान रीचेनबैक ने काया में समाहित प्रचण्ड प्राण ऊर्जा भण्डार की मौजूदगी की पुष्टि की है और कहा है कि इसे ने केवल देखा जा सकता है, वरन् मापा भी जा सकता है। उनने इसमें अनेक भौतिक गुणों के उपस्थित होने की पुष्टि की है जिसमें से ध्रुवत्व भी एक गुण है। रूस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एलेक्जेण्डर गुरुविच ने इसे छोटी तरंग लम्बाई वाली किरणों-अल्ट्रावायलेट के एक हिस्से के रूप में पाया और माईटोजेनटिक किरणों के नाम से सम्बोधित किया है। रोम के प्रो0 ग्यूडों क्रीमोनेसा ने इसके फोटोग्राफ भी लिये है। उनने “ओरोस्कोप” नामक एक उपकरण का विकास किया है, जिसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति के प्राण शरीर को चर्मचक्षुओं से देखा जा सकता है।

“फील्ड्स आफ फोर्स” नाम अपनी कृति में विन्फ्रेड डंकन ने कहा है कि यह प्राण ही है जो शारीरिक अंग अवयवों की नियमित एवं नियंत्रित वृद्धि के लिए जिम्मेदार है। मुख्य रूप से यह आँख मस्तिष्क, स्पाइन, जननाँग एवं चक्र संस्थानों में केन्द्रित रहता है। प्राणायाम की विविध साधनाओं द्वारा इसे उभारा और शरीर से बाहर निकाला जा सकता है व जड़-चेतन को प्रभावित भी किया जा सकता है। विद्वान लेखक ए0ई॰ पावेल ने अपनी पुस्तक “दि ईथरिक डबल” में उक्त कार्यों के अतिरिक्त प्राण ऊर्जा को सुपर चेतन से संपर्क सूत्र जोड़ने वाला बताया है। उनके अनुसार प्राण वस्तुतः चेतन ऊर्जा का प्रवाह है। जब उसका संबंध ब्रह्माण्ड व्यापी महाप्राण से हो जाता है तो वही प्राणशक्ति अपनी प्रचंडता और उत्कृष्टता के आधार पर स्तर-भेद एवं रूप भेद से विभिन्न सिद्धियों-समृद्धियों तथा विभूतियों की उद्गाता और प्रदाता सिद्ध होती है। शारीरिक इन्द्रियों की क्रियाशीलता, मन की सजगता और संकल्पशीलता, बुद्धि की प्रखरता तथा अन्तः करण की उदात्त-चेतना का आधार प्राण ऊर्जा ही है। आकाँश को ललक से उठाकर संकल्प स्तर पक पहुँचा देना प्राण की प्रखरता पर ही निर्भर रहता है।

प्राण ऊर्जा की वैज्ञानिकता का प्रतिपादन करने के लिए मैस्मरेज्म, एलेक्ट्रोबायलाँजी, साइको थेरेपी आदि के अनेकों वैज्ञानिकों प्रयोग-परीक्षण चल रहे हैं और शोध निष्कर्षों के अनेक ग्रन्थ छप रहे है। यह प्राणाग्नि आमतौर से अविज्ञात ही रहती है। शरीरगत तापमान और विद्युत प्रवाह की यंत्रों से माप–तौल की जा सकती है पर प्राणाग्नि वैसी नहीं होती जैसी चूल्हे में अग्नि जलती हैं। इतने पर भी देखा गया है कि जब यह प्राणाग्नि शरीर से फूट निकली तो अपने अस्तित्व का प्रमाण ऐसे देने लगी मानो वह भौतिक अग्नि का रूप धारण कर सकने में समर्थ हो।

वस्तुतः यह प्राण ऊर्जा ही जीव चेतना की सर्वोच्च शक्ति, जीवन का सार एवं आत्मोत्थान का आधार है। इसका सम्पादन, संवर्धन कर हर साधक चेतना के उच्चतर आयामों तक पहुँच सकता है।


कंधे पर धनुष बाण (Kahani)

द्रोणाचार्य अपनी साज सज्जा में कंधे पर धनुष बाण और हाथ में शास्त्र रखकर चला करते थे।

किसी ने कहा- इन दोनों की परस्पर क्या संगति ?

द्रोणाचार्य ने कहा-विचारशील को शास्त्र शिक्षा से राह पर लाते है। पर मूढ़मति नरपशु तो प्रताड़ना के बिना बदलते ही नहीं। उनके लिए धनुष धारण करना ही मात्र अवलम्बन है।


आचरण शास्त्र का अनुपम ग्रन्थ-गीता

श्रीमद्भागवत् गीता का स्थान संसार के कुछ गिने चुने ग्रन्थों में है। इस महत्ता का कारण यही है कि यह जाति और देश की संकीर्ण सीमाओं से परे सभी को जीवन जीने का मर्म बताती है। यही कारण है कि बोधायन, आचार्य शंकर, श्रीधर, रामानुज, माधव,मधुसूदन जैसे पूर्ववर्ती आचार्यों की तरह आधुनिक काल में भी लोकमान्य तिलक, गाँधी, विनोबा, विवेकानन्द, श्री अरविन्द, डा0 राधाकृष्णन् सदृश मनीषियों ने इसकी महत्ता को स्वीकारा है। मात्र महत्ता को ही स्वीकार कर इतिश्री कर दी हो, ऐसी बात नहीं है। इसमें निहित प्रेरणाएं ग्रहण करके अपने आचरण में उतार कर शीर्ष स्थान भी प्राप्त किया है।

इसकी सार्वभौमिक विचारधारा को मात्र भारत ही नहीं सुदूर पश्चिम में भी मान्यता मिली है। पश्चिम के प्रो0 मैक्समूलर, डा0 पालडायसनफ् जानडेंविड थाँरों, राल्फ-वाल्डो इमर्सन, सन एडविन एर्नाल्ड, क्रिस्टोफर जैसे अनेकानेक विद्वानों ने भी इसके विचारों की सार्वभौमिकता को स्वीकारा और अपने जीवन में उसे समावेशित कर कृतकृत्यता प्राप्त की है। गाँधी, विनोबा की ही तरह-जान डेविड थारों भी गीता को माँ ही मानते थे। उनके अनुसार गीता में निहित विचारों के पवित्र दुग्धामृत पान करने वाले व्यक्ति को वह शक्ति मिलती है, जिससे कि जीवन समर के कठिनतम क्षणों में भी निराशों-उदासी आदि स्पर्श भी नहीं करती।

यद्यपि गीता, सार्वकालिक होते हुए कालातीत है। फिर भी सामान्य मानव मन में यह जिज्ञासा उठती हैं कि गीता की रचना हुए सुदीर्घ काल बीत चुका है। इस बीच मानव मन की विचारधारा व अनुभूतियों में बहुत सारे परिवर्तन भी आए हैं फिर आज की परिस्थितियों में मानवी चिंतन के लिए इसका संदेश क्या है ? इसकी व्यावहारिक महत्ता और आध्यात्मिक उपयोगिता क्या है ?

आधुनिक चिंतकों के अनुसार मानव मन तो सदा ही आगे की ओर बढ़ता है, अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करता तथा अपने विचारों को विस्तृत करता है। इन्हीं परिवर्तनों का परिणाम है। कि चिंतन की चिर पुरातन प्रणालियों का सूक्ष्म या प्रत्यक्ष रूप से मूल्य ही बदल जाता है। इस तरह प्राचीन सिद्धान्त तभी जीवित रह पाता है, जब वह इस परिवर्तन, संशोधन के लिए अपने को पूरी तरह सौंप दे।

पर गीता एक ऐसी अद्भुत व विलक्षण पुस्तक है जो असाधारण रूप से सहस्रों वर्षों से शाश्वत रूप में जीवित चली आ रही है और आज भी उतनी ही तरोताजा है। इसके वास्तविक सारतत्त्व में अभी भी उतनी ही नवीनता है जितनी कि महाभारत काल में थी। भारत में इसका समादर तो उन महान शास्त्रों के रूप में है जो अतीव प्रमाणित रूप में धार्मिक मानी जाती है इसका महत्व मात्र दर्शन या विद्याध्ययन के क्षेत्र में ही नहीं अपितु व्यावहारिक जीवन में भी जाग्रत और जीवन्त हे। चिन्तन हो या कर्म दोनों ही इससे अछूते नहीं सही माने में इसके विचार भारतीय संस्कृति के पुनुरुन्नयन नव जाग्रति के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक शक्ति के रूप में भूमिका निबाहते आ रहे है और निबाह रहे है। एक प्रख्यात चिन्तक ने तो यहाँ तक कहा है कि आध्यात्मिक जीवन के लिए हमें जिन किन्हीं भी आध्यात्मिक सत्यों की आवश्यकता है वे सभी गीता में उपलब्ध हो सकते है। सम्भव है किसी को यह अविश्वासपूर्ण लगे। तथापि यह कहना किसी भी तरह अतिरंजित नहीं कि अधिकाँश सार्वभौम सूत्र इसमें समावेशित है। यही कारण है कि यह भारतवर्ष की ही सीमा में आबद्ध नहीं है। सर्वत्र विश्व भर में इसे एक महान ग्रन्थ के रूप में स्वीकारा गया है। यद्यपि यूरोप वालों ने इसके साधना संबंधी रहस्यों की अपेक्षा इसकी विचारधारा को हृदयंगम करने की अधिक कोशिश की है। स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि वह कौन सी चीज है जो गीता के विचारों व सत्य को प्राण शक्ति देती है।

वह शक्ति आती है सामंजस्य, सन्तुलन और समन्वय के रूप में। इस महाग्रन्थ में अथ से इति तक ओतप्रोत इसके समस्त दर्शन और योग का केन्द्रीय ध्येय यह है कि अंतरंग की आध्यात्मिक पूर्णता के साथ बाह्य जीवन में कर्म की बाहरी यथार्थताओं का सुसामंजस्य स्थापित किया जाय।

आज यदि हम मानव जीवन में आने वाली समस्त समस्याओं के मूल कारण की खोज करें, तो यही समझ में आता है कि हमारी सत्ता जटिल है- उसका मूल तत्व दुर्ज्ञेय है और जो आन्तरिक शक्ति इसके सभी रूपों का निर्धारण करती, समस्त उद्देश्यों, प्रक्रियाओं का नियमन करती है, वह गुह्य हैं। हम यों भी कह सकते है कि मानवी सत्ता एक त्रिविधि जाल है, जो एक साथ भौतिक-प्राणिक, मानसिक होने के साथ आध्यात्मिक भी है। उसके जीवन और प्रकृति का वास्तविक सत्य क्या है ? उसका भाग्य उसे किस तरफ घसीटता है और पूर्णता का क्षेत्रकिधर है ?

देखा गया है कि आध्यात्मिक आदर्श समाधान सभी ऊहापोहों का हल निकाल सकते हैं पर मानव के बाह्य जीवन की अपरिहार्य समस्याओं का समाधान नहीं निकाल पाते। इसी कारण मानव बुद्धि उनसे विमुख हो जाती है और मात्र शरीर और प्राण को ही स्वीकार कर इसी की स्वस्ति और सुव्यवस्थित तृप्ति को पूरा करने में जुट जाती है। इस तरह उसके लिए अन्य सभी चीजें गौण हो जाती है।

मन के इस तरह विकसित होने पर किसी ऊर्ध्व स्थिति तत्व की अस्पष्ट अनुभूति होती है। उसे एक अवस्था, एक शक्ति, एक उपस्थिति की झाँकी होती है। जो उनके निकट और भीतर है, तथा उसके प्रति अत्यन्त अंतरंग भी है। फिर भी उसकी अपेक्षा अधिक रूप से महान, अपूर्व रूप से दूरस्थ और उसके ऊपर अवस्थित है। विकास की इस अवस्था में ऐसी वस्तु के अंतर्दर्शन होते है, जो चरम आदर्शों से भी अधिक-तात्विक, निरपेक्ष, अनन्त और अद्वितीय है। इसी को ईश्वर या ब्रह्म कहा गया है।

इसी आश्चर्यमय सत्ता के साथ एकत्व पाने के लिए पूर्ण तादात्म्य स्थापित करने के लिए मन पूरी तरह प्रयास करता है। ऐसी ही स्थिति में निरपेक्ष अध्यात्मवादी मानसिक सत्ता का खण्डन और देह आदि भौतिक सत्ता की निन्दा करने लगते है। वे सबको विलय करने के लिए आतुर हो जाती है। पर व्यवहार में मानव मन पर जो चीज निरन्तर दबाव डालती है वह है जीवन-आचार और कर्म की समस्या। इन दोनों के बीच तालमेल न बिठा पाने के कारण विद्वत्जन यह घोषणा कर बैठते हैं कि निर्वाण, यहाँ के शारीरिक जीवन में नहीं अपितु इस जगत के परे विद्यमान किसी अमर लोक में है और सच्ची आध्यात्मिकता वहीं उपलब्ध हो सकती है।

इसी जगह गीता-आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, जगत प्रकृति में सत्य की एक नई संस्थापना प्रस्तुत करती है। सत्य की जिस विचारणा को प्राचीन उपनिषदों से लाकर विकसित किया गया था, उसे वह विस्तृत कर नए साँचे में ढालती है। जीवन तथा कर्म की समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है। गीता जहाँ उस व्यक्ति विशेष का, जो पूर्ण आध्यात्मिक जीवन के योग्य है, आह्वान कर अध्यात्मिक राज्य में प्रवेश करने को कहती है, वही सम्पूर्ण मानव जाती को किसी भी तरह निराश न कर अध्यात्म की और उन्मुख हो, नैतिक उद्देश्य को सामने रख क्रमिक विकास का निर्देश देती है।

जीवनेच्छा, शक्ति प्राप्ति का इच्छा, वासना की पूर्ति, बल पौरुष का गुणगान, अहं की पूजा उग्र स्वेच्छा पूर्ण अर्जन प्रवृत्ति एवं अशाँत स्वार्थदर्शी बुद्धि की उपासना को असुरता का पर्याय-गुण धर्म बताती हुई घोर विनाश और सर्वनाश का द्वार घोषित करती है। देहपरायण मनुष्य को आत्म नियंत्रण करने आदर्शवादी विधान को स्वीकारने तथा विकास यात्रा पर चल पड़ने का संकेत देती है।

गीता अनन्त के चरम पंथी उपासक को ..... ब्रह्म में अपने को लय करने के प्रयत्न की एक मार्ग बताती हुई स्पष्ट करती है। उसे बताती है कि व्यष्टि एवं समष्टि चेतना के मिलन से .... आनन्द को पाने के लिए मनुष्य को कही जंगल या पहाड़ के एकान्त में भागने की आवश्यकता नहीं है। इस आनन्द की प्राप्ति तो अपने कर्तव्य कर्मों को भली प्रकार निर्वाह करने पर सहज ही हो सकती है। यही नहीं मनुष्य मुक्त होकर उस उच्चतम स्तर से अपना मानवी कर्म भी करता रह सकता है। निःसन्देह जीवन के विविध क्रिया कलाप एवं जगत के समस्त प्रयासों का अन्तिम शिखर और मर्म यही है एवं यह मार्गदर्शन श्रीमद्भागवत् गीता से बड़े स्पष्ट सुग्राह्य रूप में मिलता है।


सतयुग का आगमन-कब और कैसे ?

स्वर्ग के संबंध में उसका स्वरूप जैसा कुछ बताया जाता हैं, वैसा इस पृथ्वी पर कहीं दीख नहीं पड़ता है। इसलिए यह मानकर सन्तोष कर लिया जाता हैं कि धरती से ऊपर किसी ग्रह उपग्रह जैसे स्थान में अवस्थित है। खगोल-वेत्ताओं ने सौर मण्डल का को-कोना छान मारा हैं पर वहाँ न कहीं जीवधारी मिले और न सुख सुविधा के साधन। ब्रह्माण्ड के अवस्थित ग्रह नक्षत्रों के सम्बन्ध में यह कल्पना तो की जाती हैं कि इस विशाल विस्तार में कहीं स्थूल या सूक्ष्म शरीर धारी प्राणियों का अस्तित्व सम्भव हैं। पर वहाँ तथा कथित स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ साधन सुविधाएँ होंगी ही यह नहीं कहा जा सकता । यहीं बात नरक के सम्बन्ध में भी हैं। धरती पर मरने वाले उन लोकों तक कैसे पहुँच पाते होंगे यह विषय बड़ा दुरूह है। उस मान्यता पर प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण रखते हुए विश्वास करना कठिन हैं।

वैज्ञानिकों की कल्पना है कि शरीर त्यागने के उपरान्त प्राणी कुछ समय पृथ्वी के ही अन्तरिक्ष में सूक्ष्म शरीर से भ्रमण करता रहता है और पीछे उसे संचित स्वभाव संस्कार के अनुसार नई काया धारण करने का अवसर मिलता होगा। दार्शनिकों की अवधारणा हैं कि मनः स्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ बनती है। उदात्त दृष्टिकोण और शालीनता सम्पन्न व्यवहार को अपनाकर जो सुव्यवस्थित आदर्शवादी जीवन जीत हैं उसे स्वल्प साधनों एवं सामान्य साक्षियों, काम चलाऊ परिस्थितियों, में ही सन्तोष भरा उत्साह उल्लास मिल जाता हैं। उसी भाव भरी मनःस्थिति का नाम स्वर्ग हैं। यह घर घरौंदों में रहते हुए स्वल्प साधना से भी स्वयं के लिए विनिर्मित किया जा सकता हैं। वस्तुस्थिति क्या हैं ? इसका निश्चित उत्तर देने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाणों का संग्रह करने में अभी देर हैं, तब तक इस सम्बन्ध में मान्यताओं के आधार पर ही कुछ अनुमान लगाना और विश्वास करना पड़ेगा। परलोक वाले स्वर्ग की तरह ही यह भी मान्यता हैं कि कभी इस धरातल पर सतयुग था। सतयुग की स्थिति भी स्वर्ग के समतुल्य ही समझी जाती हैं अन्तर इतना ही हैं कि स्वर्ग में विलासिता की राजसी सुविधा का बाहुल्य माना गया हैं जबकि धरती वाले सतयुग में व्यक्ति और वातावरण में सात्विकता, सद्भावना, सहकारिता, सुव्यवस्था से भरी पूरी परिस्थितियाँ रहती हैं। उस सुप्रचलन का लाभ सभी को मिलता था। वस्तुओं के स्वाभाविक निर्वाह के लिए थोड़ी सी ही आवश्यकताएँ होती हैं। उन्हें मध्यवर्ती पुरुषार्थ और कौशल के सहारे उपार्जित किया जा सकता हैं। सन्तोष और सुख पर्यायवाची है। उत्कृष्ट जीवन जीने वालों के उत्साह भी रहता है और आनन्द भी। ऐसी हँसती-हँसाती हिल मिलकर रहने वाली परिस्थितियाँ जिन दिनों धरती पर रहीं होंगी उन दिनों धरती पर सतयुग की प्रतिष्ठापना रहीं होगी।

प्रत्यक्ष साक्षियों पर आधारित अति पुरातन काल का-सतयुग काल क समाधान कारक विवरण नहीं मिलता। फिर भी श्रुति और स्मृति के आधार पर-सुनते आने और परम्परागत विवरणों के सहारे इतना पता चलता हैं कि कभी वैसा सम रहा अवश्य हैं इस अवधि को देव परम्परा अथवा ऋषि परम्परा से प्रभावित परिचालित अवधि कह सकते हैं। सतयुग के समय की प्रामाणिक काल गणना उपलब्ध नहीं हैं और न उस समय का आभास कराने वाला पदार्थ परक प्रमाण ही उपलब्ध हैं। फिर भी उपलब्ध कथा पुराणों के आधार पर यह संगति बिठाई जा सकती हैं कि ऋषि युग हजारों वर्ष पूर्व से आरम्भ होकर रामायण काल तक चलता रहा होगा। उस अति प्राचीन काल की इमारतें वस्तुएँ शिलालेख आदि का अस्तित्व ऋतु प्रभाव और काल प्रवाह से बचा नहीं रह सका। किन्तु जो इतिहास, श्रुति, स्मृति के आधार पर हाथ लगता उससे मनुष्यों की विचारणा एवं कार्य पद्धति का अनुमान अवश्य लगता हैं। इस आधार पर यह निष्कर्ष भी निकलता हैं कि मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की अवधारणा रखने वाले परिश्रमी पुरुषार्थी रहें होंगे। नीति, नियमों को कठोरता पूर्वक अपनाते होंगे। संयम अपनाते और उदात्त सेवा साधना में निरत रहते हुए सहकारी जीवन जीते होंगे। यह प्रयोग तो अभी भी किया जा सकता हैं कि सज्जनों का समुदाय सद्भाव पूर्वक जहाँ रहेगा। मर्यादाओं का पालन करने और वर्जनाओं से बचने की रीति अपनायेगा वहाँ स्वल्प साधनों में प्रसन्न रहने और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने चलने की स्थिति बनती और टिकती रहेगी।

सतयुगी ऋषि परम्परा से तात्पर्य हैं उन लोगों का वर्चस्व जिन्होंने अपने दृष्टिकोण और जीवन यापन की प्रक्रिया में दूरदर्शी विवेकशीलता पुरुषार्थ परायणता और उदात्त सहजीवन की क्रिया-प्रक्रिया को अपने जीवन में भली प्रकार उतारा और दूसरों के लिए अनुकरण का पथ प्रशस्त किया। ऋषि उन्हें कहा जाता था जो आत्मवत् सर्व भूतेषु। की वसुधैव ‘कुटुम्बकम्’ की भावनाओं को निरन्तर क्रियान्वित करते रहते थे। ऐसे लोगों का प्रतिभाशाली होना स्वाभाविक हैं। लोक नेतृत्व कर सकने की कुँजी सहज ही उनके हाथ आ जाती हैं। वष्ठों की छत्र छाया में रहना सभी पसंद करते हैं। वरिष्ठ ही सार्थक रूप से समर्थ होते हैं। शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ, आर्थिक दृष्टि से समर्थ भी दूरदर्शी किया कुशल ही होते हैं। वे निजी जीवन में संयम साधते है। सादा जीवन उच्च विचार की दे परम्परा को व्यावहारिक जीवन ही में उतारते हैं। ऐसी दशा में निर्वाह की न्यूनतम आवश्यकताओं को सरलता पूर्वक जुटा लेने के अतिरिक्त इतना समय साधन बना भी लेते हैं। जो दूसरों को उठाने बढ़ाने के काम आ सके। इस स्तर के लोग जब भी बहुसंख्यक होंगे और अपने प्रभाव वैभव का उपयोग जन कल्याण के निमित्त करेंगे तब ऐसी परिस्थितियाँ अवश्य ही बनती चली जायेंगी जिनमें हर किसी को समुचित सुविधा रहें किसी को भी अज्ञान अशान्त और अभाव के कारण दुखी न रहना पड़े जहाँ छेद दीखा वहाँ उसे भरने के लिए सब ओर से समर्थता दौड़ पड़े तो उस उलझन का समाधान हुए बिना नहीं रह सकता। सद्भावना और सेवा साधना को खाद पानी की तरह समझना चाहिए जिसके उपलब्ध होते रहने से विश्व उद्यान का हर कोना हरा भरा और फूल फला ही दृष्टिगोचर होता है। जब भी ऐसी परम्परा व्यापक रूप से चल रही होगी, जब भी परिस्थितियों में सात्विकता का समुचित समावेश रहा होगा, तब समूचा वातावरण ऐसी सुख शान्ति और प्रगति से भरा पूरा रहा होगा जिसे सतयुग के नाम निःसंकोच दिया जा सके।

ऐसी परिस्थितियाँ कभी रही हैं यह विश्वास करने में कोई अड़चन नहीं अड़ती। इतिहास को काल गति के अनुरूप लिखने की तो परम्परा प्राचीन काल से नहीं रहीं। उसकी आवश्यकता भी नहीं समझी गई। श्रुति और स्मृति ये ही दो आधार ऐसे थे जो पूर्वजों के स्वरूप की चर्चा का विषय बनते और पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृति में अंकित करते चले जाते थे। भाषा और लिपि का विकास भले ही पीछे हुआ हैं। कागज स्याही क उपयोग भले ही बाद में जाना गया हो पर श्रुति और स्मृति की परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहीं हैं और जानकारियों की धारा अखण्डधारा की तरह बहती रहीं हैं। इस प्रवाह का अवगाहन करने पर हम इतिहास के प्रथम प्रमुख-काल की टोह लेने में समर्थ हो जाते हैं। सतयुग की रूपरेखा इसी आधार पर टुकड़ों को मिलाकर एक समूची प्रतिमा के रूप में खड़ी की जा सकती हैं। सतयुग की परिभाषा और परिस्थितियों की रूपरेखा इसी आधार पर उभरती हैं।

हर युग की अपनी-अपनी वरिष्ठता और महत्वाकाँक्षा होती है। आज हर व्यक्ति साज- सम्पन्नता, साज-सज्जा की बहुलता इसलिए चाहता हैं कि उसे अधिकाधिक सुविधा एवं ख्याति मिले। यही मनोवृत्ति अनेक दिशाओं में घुमाती है। इसी प्रवाह में परिवर्तन होने पर युग बदलते हैं। इच्छा और आकाँक्षाओं से ही व्यक्तित्व विकसित होता हैं और वातावरण बदलता है। समझे को तो इसे इस प्रकार समझा जाता हैं कि किन्हीं वैज्ञानिकों, शासकों, सम्पन्नों, विद्वानों ने यह परिस्थितियाँ बनाई, विनिर्मित परिवर्तित की जाती हैं। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। लोक प्रवाह के बीजाँकुरों के ही वे सींचते, विकसित करते हैं। यह लोक प्रवाह मूलतः आता कहाँ से हैं। इस प्रश्न का उत्तर एक ही हैं। वरिष्ठ आत्म शक्ति सम्पन्नों द्वारा ऐसा तूफान चलाना जिससे तिनके पत्ते ही नहीं उड़ते फिरें वरन् पेड़ पौधे भी हिलने उखड़ने लगें। जिन दिनों उत्कृष्ट तर की आत्म-शक्ति विकसित होती हैं उन दिनों जन साधारण की मनःस्थिति और परिस्थिति उसी दिशा को पकड़ती जाती हैं। जब उस स्तर के लोग नहीं रहते, कम या दुर्बल हो जाते हैं जो गये गुजरे स्तर के लोग नहीं रहते, कम या दुर्बल हो जाते हैं जो गये गुजरे स्तर के लोग उभर आते हैं और जन समुदाय में अपना प्रभाव प्रेरित करते हैं। वह सूक्ष्म प्रक्रिया स्थूल गतिविधियों में प्रकट होती हैं। बसन्त में फूल खिलते हैं वर्षा में पौधे उगते हैं, शीत में पत्ते झड़ते हैं और गर्मी में तालाब तक सूखने लगते हैं। ऋतु प्रभाव की तरह वरिष्ठ व्यक्तियों के द्वारा चलाया गया प्रवाह भी काम करता है। फलतः परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। लोग चालू दिशा का अवलम्बन करने लगते हैं। संपर्क से छूत की बीमारी की तरह अन्तर की आस्था और बाहर की चेष्टा में भी अन्तर आता हैं। ऋषि युग के मूर्धन्य महामानव अपने निजी व्यक्तित्वों को इस स्तर तक सशक्त और परिष्कृत बनाते थे कि अपने प्रभाव में जन-साधारण को अपने अनुरूप ढालने में सफलता प्राप्त कर सकें।

यह संसार पदार्थों से भरा पड़ा है। उसमें से एक सीमा तक ही संग्रह कर सकना संभव है। वासना और तृष्णा का कोई अन्तर नहीं। अहंता की पूर्ति के लिए जितने प्रपंच रचने पड़ते हैं उनका ठिकाना नहीं। इन सब का समुच्चय जब मूर्धन्य लोगों की देखा-देखी छोटों पर सवार होता हैं तो उनकी गतिविधियों में भी निकृष्टता, चंचलता, उच्छृंखलता बढ़ने लगती हैं। यही हैं उत्थान का अधःवासना। युग भी इसी प्रकार सूर्य की तरह ढलते और अन्त में अन्धकार के अस्ताचल में जा घुसते है। कलियुग ऐसी ही पतनोन्मुख स्थिति का नाम हैं। क्षीणकाय जर्जर वृद्धावस्था में मनुष्य की जो दुर्गति होती हैं वह युग प्रवाह के अन्तिम चरण में देखी जाती है।

बचपन, कोमल, भावुक निश्छल होता हैं। उठती उम्र में चंचलता आतुरता दीख पड़ती है। प्रौढ़ता में अहंकार का बोल बाला रहता हैं और अन्त में जरा जीर्ण अवस्था अपनी मौत मरती हैं। इसके उपरान्त नया जन्म होता हैं। चार युग जीवन की चार युग जीवन की चार अवस्थाओं की तरह हैं। इन दिनों विश्व मानवता मरण की तैयारी कर रहीं हैं, पर वह दिन दूर नहीं, जब उज्ज्वल भविष्य का नये सिरे से निर्माण होगा। इक्कीसवीं सदी से ऐसा शुभारम्भ, उषा पर्व का अरुणोदय होने जा रहा है।

चक्र घूमते हुए बार-बार अपने आरम्भिक स्थान पर आता हैं। कल्प कल्पान्तरों में यही होता आया हैं। वस्त्र पुराना होने पर नये की अवधारणा ऐसी आवश्यकता हैं जो पूरी हुए बिना रह ही नहीं सकती। देखना इतना भर हैं कि इस शुभारम्भ का श्री गणेश का नव निर्धारण किस प्रकार होगा ? होना वही है जो हर सतयुग के आरम्भ में होता रहा है। ऋषि परम्परा जीवित हुई है। वही अंकुरित होकर फली फूली हैं और समस्त जन समुदाय ने उसका समग्र लाभ उठाया हैं। दृष्टिकोण बदलने से वातावरण का परिवर्तन होता हैं। उत्थान के बाद जिस प्रकार पतन देखा जाता हैं उसी प्रकार पतन के उपरान्त अभ्युदय का विज्ञान भी सुनिश्चित हैं।


राजा के न्याय (Kahani)

काशी नरेश की रानी बड़े सबेरे गंगा स्नान को गई। ठंड के दिन थे। तेज हवा चल रहीं थी। नहाने के बाद वे ठंड से काँपने लगीं। आग तापने का मन हुआ तो नौकरों को हुक्म दिया कि नजदीक दिखने झोपड़ियों को उखाड़ लाया जाय और उन्हें जलाकर शीत मिटाने का प्रबन्ध किया जाय। वैसा ही किया गया। रानी घर वापस आई।

जिन लोगों की झोपड़ियां उखाड़ी गई थीं उनको उसके अभाव से इतना कष्ट सहना पड़ा कि अभी भी वैसी स्थिति में रह रहें है। इसकी सूचना राज दरबार तक पहुँची। राजा स्वयं घटना स्थल पर पहुँचें और उन्हें भी इस अनीति पर कम क्रोध न आया।

वापस लौटकर राजा ने उस रानी को  दरबार में बुलाया और हुक्म दिया कि भीख माँगकर पैसा इकट्ठा करो और उनकी झोपड़ियां फिर से बनवाओ जिनको कि तापने के लिए उखाड़ी गई थी। झोपड़ियां बन  जाने के बाद ही महल में प्रवेश मिलेगा।

रानी को वही करना पड़ा। विस्थापकों के झोंपड़े बने। अनीति का प्रायश्चित हुआ और राजा के न्याय को सर्व साधारण द्वारा सराहा गया।


प्रतिकूलताओं की भट्ठी में तप कर निखरता है “व्यक्तित्व”

प्रगति पथ पर आगे बढ़ने के लिए मार्ग में आये विघ्न-बाधाओं का साहस एवं पुरुषार्थ द्वारा मुकाबला करना पड़ता हैं। मुसीबतों- कठिनाइयों से जो घबरा जाते हैं, उनका सफलता की मंजिल तक पहुँच पाना सन्देहास्पद ही बना रहता हैं। पर जो प्रतिकूलताओं से जूझते हुए अपनी योग्यता-प्रखरता बढ़ाते हैं, उन्हें श्रेय, सम्मान एवं सफलता मिलने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। संसार में वैज्ञानिकों-अनुसंधानकर्ताओं से लेकर महापुरुषों तक में अधिकाँश को अपने जीवन काल में विपन्न परिस्थितियों से जूझना पड़ा हैं।

विश्वविख्यात ज्योतिर्विद् और खगोल शास्त्री एरिग्मे बड़े ही दुर्दिन भरी परिस्थितियों में पले और बड़े हुए थे। बचपन में उन्हें दो समय की रोटी कड़ी मेहनत मजदूरी करने के उपरान्त ही मिल पाती थी। पूरे परिवार का भार उन्हीं पर था। ऐसी स्थिति में स्कूल जाने का अवस भी बहुत कम मिल पाता था। आगे बढ़ने-महानता अर्जित करने की इच्छा सदैव झकझोरती रहती थी, पर विपन्नता ऐसी थी जो उन्हें रोजी रोटी कमाने में ही व्यस्त रखती थी। किशोरावस्था इसी उधेड़ बुन में व्यतीत हो रही थी कि अपनी योग्यता किस प्रकार बढ़ाई जाय ? किसी तरह एक पुस्तक विक्रेता के यहां टूटी-फूटी किताबों पर जिल्दें चढ़ाने का काम मिल गया। एक दिन वे किसी पुरानी किताब पर जिल्द चढ़ा रहे थे कि पास में रखी रद्दी कागज की ढेरी पर हाथ से लिखा हुआ एक कागज का टुकड़ा दिखाई दिया। उसे उठाकर वे पढ़ने लगे। वह कागज एक पत्र की नकल था जो डी0 एलर्म्बट नामक व्यक्ति ने अपने किसी मित्र को लिखा था। उस पर लिखा हुआ था-”आगे बढ़ो श्रीमान् ! आगे बढ़ो ! जैसे-जैसे तुम आगे बढ़ोगे, तुम्हारी कठिनाइयाँ अपने आप दूर होती चली जायेंगी और देखोगे कि उन कष्ट कठिनाइयों के बीच में से ही प्रकाश उदित हुआ हैं और जिसने उत्तरोत्तर तुम्हारा मार्ग आलोकित किया हैं।”

एरिग्मे के लिए यह पंक्तियां मार्गदर्शक बन गई। उन्हें जीव में नया प्रकाश मिला। अब तो दुकान पर मरम्मत के लिए जितनी भी पुस्तक आती, वह उन्हें पढ़ डालते। इसका परिणाम यह हुआ कि आगे चलकर विश्वविख्यात स्तर के ज्योतिर्विद् खगोलवेत्ता एवं विविध विषयों के विद्वान बन गये।

वस्तुतः प्रतिकूलताएँ एवं विपत्तियाँ जीवन की कसौटी है। जिनमें मनुष्य के व्यक्तित्व का रूप निखरता है। इन से खुलकर निबटने से इच्छा शक्ति प्रबल होती हैं और बड़े काम करने की क्षमता प्राप्त होती है। मुसीबतों में मनुष्य की आंतरिक शक्तियाँ एकत्रित और संगठित होकर काम करती हैं। रावन की कोई भी साधना कठिनाइयों में होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है।

अतः ऐसी परिस्थितियों की परवाह न करके जो व्यक्ति इस निश्चय से कार्य में जुटे रहते हैं कि उन्हें अपना उद्देश्य पूरा करना ही हैं, इसके लिए कितना ही उद्योग एवं परिश्रम क्यों न करना पड़े व अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध गणितज्ञ श्री निवास रामानुजम् का उदाहरण सर्वविदित है। मद्रास के एक बहुत ही गरीब घराने में उनका जन्म हुआ था। पढ़ने लिखने में कमजोर थे। अंग्रेजी विषय में अच्छे नम्बर न आने के कारण अगली कक्षा में प्रवेश नहीं मिला। 14 वर्ष की आयु में ही पढ़ाई बन्द हो गई। निराशा और हताशा की इन्हीं घड़ियों में उनके हाथ कहीं से गणित की कोई पुस्तक लग गई। उस पुस्तक के सहारे ही उनने गणित का अभ्यास बढ़ाया और इस विषय में इतनी पारंगतता प्राप्त कर ली कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें अपने यहाँ अध्ययन के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद प्रयत्न और पुरुषार्थ के बल पर उनकी जीवन पुस्तक में सफलता के अध्याय जुड़ते गये। आज जब भी विश्वभर में किसी स्थान पर गणित के विकास में योगदान की चर्चा चलती हैं तो रामानुजम् का नाम सर्वप्रथम लिया जाता हैं। जिनने अल्पायु में ही अपनी विलक्षण प्रतिभा से सारे विश्व को प्रभावित किया था।

सच तो यह हैं कि विघ्न-बाधाएँ मानवी पुरुषार्थ की परीक्षा लेने आती हैं। व्यक्तित्व भी अधिक प्रखर, परिपक्व विपरीत परिस्थितियों में ही बनता हैं। लायोन्स नगर में एक भोज आयोजित था। नगर के सभी प्रमुख विद्वान साहित्यकार एवं कलाकार आमंत्रित थे। प्राचीन ग्रीस की पौराणिक कथाओं के चित्रों से सम्बन्धित एक विवाद की गुत्थी किसी से भी नहीं सुलझ रहीं थी। तभी गृह स्वामी ने अपने एक नौकर को बुलाया और सम्बन्धित विवाद को निपटाने के लिए कहा। सभी को आश्चर्य हुआ कि भला नौक क्या समाधान देगा ? किन्तु नागौर ने सम्बन्धित विषय पर जो तर्क, तथ्य प्रस्तुत किये, उससे न केवल विवाद समाप्त हुआ वरन् सभी विद्वान उसकी तार्किक विवेचना को सुनकर हतप्रभ रह गये। उनमें से एक विद्वान ने नौकर से पूछा- ‘‘महाशय आपने किस विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की हैं ? नौकर ने बड़ी ही विनम्रता से उत्तर दिया-”श्रीमान् कई स्कूलों से शिक्षा प्राप्त की हैं, किन्तु मेरा सबसे अधिक प्रभावशाली शिक्षण ‘विपत्ति’ रूपी पाठशाला में हुआ हैं। विपत्तियों से जूझने वाला यही बालक आगे चलकर जीन जैक रूसो के नाम से प्रख्यात हुआ, जिसकी क्रान्तिकारी विचार-धारा ने प्रजातंत्र को जन्म दिया।

सुप्रसिद्ध विद्वान विलियम काबेट ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि “प्रतिकूलताएँ” मनुष्य के विकास में सबसे कड़ी सहचरी हैं। आज मैं जो कुछ भी बन पाया हूँ विपन्न परिस्थितियों के कारण ही सम्भव हो सका हैं। जीवन की अनुकूलताएँ सहज ही उपलब्ध होती तो मेरा विकास न हो पाता। काबेट के आरंभिक दिन कितनी विपत्ति एवं गरीबी में बीते, यह उनके जीवन चरित्र को पढ़कर जाना जा सकता है।

अभाव, अवरोध मुसीबतें वस्तुतः अभिशाप उनके लिए हैं जो परिस्थितियों को ही सफलता असफलता का कारण मानते है। अन्यथा आत्मविश्वास एवं लगन के धनीध्येय के प्रति दृढ़ व्यक्तियों के लिए तो वे वरदान सिद्ध होता हैं भट्टी में तपने के बाद सोने में निखार आता है। प्रतिकूलताओं से जूझने से व्यक्तित्व निखरता और परिपक्व बनता है। गिने चुने अपवादों को छोड़कर विश्व के अधिकाँश महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने पर यह पता चलता हैं कि वे अभावग्रस्त परिस्थितियों में पैदा हुए पले। पर उन्होंने जीवन की विषमताओं को वरदान मना। संघर्षों को जीवन बनाने तथा पुरुषार्थ को जगाने का एक सशक्त माध्यम समझा। फलतः वे बाधाओं को चीरते हुए सफलता के शिखर पर चढ़े। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि परिस्थितियाँ मानवी विकास में बाधक नहीं बन सकतीं, अवरोध प्रचण्ड पुरुषार्थ के समक्ष टिक नहीं सकते।

संसार में ईसा, सुकरात, कार्लमार्क्स आदि ऐसे ही महापुरुष हुए हैं जिनको जीवन भर असफलताओं संकटों तथा विरोधों का सामना करना पड़ा। किन्तु वे एक क्षण को न तो ध्येय से विचलित हुए और न निराश वे निरन्तर पुरुषार्थरत एवं प्रयत्नशील रहें। फलतः उन्हें लोगों ने अपने जीवन का आदर्श बनाया।

दार्शनिक सुकरात का जन्म एक निर्धन मूर्तिकार के घर हुआ था। पिता की छत्रछाया उठ जाने के बाद माँ के साथ गरीबों में दिन व्यतीत करते हुए भी वह अध्ययन में लगे रहें। मेहनत मजदूरी करते हुए वह अपने अध्यवसाय में निरत रहें। घर का खर्च चलाने का भी अतिरिक्त दायित्व बाल्यावस्था में ही उनके ऊपर आ गया, पर गरीबी उनके विकास में बाधक नहीं बन सकी। अपने पुरुषार्थ एवं मनोयोग से एक दिन वे दर्शनशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान बने।

इसी तरह कार्लमार्क्स का जन्म भी गरीबों में हुआ। मरते दम तक विपन्नताओं ने उनका पीछा नहीं छोड़ा इस निपट निर्धनता में भी वैचारिक साधना करते रहे और एक दिन समाज की नई व्यवस्था “साम्यवाद” के प्रणेता बने। जीवन भर संघर्षरत रहते हुए भी उन्होंने “कैपिटल” जैसे विश्वविद्यालय ग्रन्थ की रचना की इस कार्य में उनकी पत्नी मेरी ने उनकी पूरी मदद की।

अनुकूलताएँ एवं साधन सुविधा ने होते हुए भी कितने ही निर्धन बच्चे विद्वान, ज्ञानी एवं महामानव बने, इससे भारतीय इतिहास के पन्ने भरे पड़े है। ज्ञानेश्वर, तुकाराम, कालिदास, सूरदास, तुलसीदास से लेकर विद्यासागर, प्रेमचंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला आदि का जीवन उठाकर देखा जाय तो वह कठिनाइयों और विपन्नताओं का एक जीत जागता इतिहास मिलेगा। ये संकटों की तनिक भी परवाह किये बिना अपने पक्ष पर अविचल और अबाध गति से बढ़ते रहे। फलतः सफल हुए और अभिनन्दनीय बने।

आपदाएँ मुसीबतें मानव जीवन के लिए खराद का काम करती हैं। उनसे लड़ने और विजय प्राप्त करने से मनुष्य के जीवन में जिस आत्मबल का विकास होता है। वह एक अमूल्य सम्पत्ति होती हैं। जिसको पाकर आर सन्तोष होता हैं। अवरोधों से संघर्ष पाकर जीवन में एक ऐसी तेजी उत्पन्न होती हैं जो मार्ग में आये समस्त झाड़ .... को काटक दूर कर देती है।

स्वामी विवेकानंद की जीवन-गाथा इसका प्रमाण हैं। अपने पिता की मृत्यु के बाद नरेन्द्र को भारी विपत्तियों का सामना करना पड़ा। कई-कई दिनों तक भूखा सोना पड़ा। रोजगार की तलाश में दर-दर भटकने पर भी कहीं सफलता नहीं मिली। संन्यास लेने के बाद कठिनाइयों का अवरोध और बढ़ता गया। अमेरिका के शिकागो शहर में होने वाले सर्वधर्म सम्मेलन में भाग लेने गये तो पहला दिन बहुत ही कष्टमय बीता। बोस्टन शहर के जिस होटल में रात्रि काटने के लिए गये, वहाँ सीढ़ी पर पैर रखते ही दरबान ने काले भारतीय कह कर भगा दिया। सड़क की ओर बढ़े तो बरफ गिरने लगी। जायें तो जायें कहाँ ? भूखे प्यासे तो थे ही। आँखों के सामने अँधेरा छा गया। पैर भी जवाब दे रहें थे। पर करते क्या ? आगे बढ़ना ही जिनके जीवन का लक्ष्य ठहरा। वे आगे बढ़ते गये और एक रेलवे गोदाम के पास जा पहुँचे। गोदाम बन्द था। अतः बाहर पड़े लकड़ी के एक बड़े पैकिंग बॉक्स में घुसकर जैसे-तैसे रात काटी। सुबह बाहर निकले तो ठंडक के मारे शरीर सुन्न पड़ गया था। एक महिला ने उन्हें अपने घर ले जाकर भोजन एवं गर्म कपड़े की पूरी व्यवस्था की। दूसरे दिन उन्हें गन्तव्य स्थल पर पहुँचाया जहाँ 11 सितम्बर ... को हजारों श्रोता उनके भाषण से मन्त्र मुग्ध हो उठे थे। नगर में स्थान-स्थान पर उनके चित्र लगाये गये, जिसके नीच मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था-स्वामी विवेकानन्द। ऐसा नहीं कि संसार में सारे महापुरुष असुविधापूर्ण परिस्थितियों में ही जन्मे और पले हों। ऐसे अनेक महामानव हुए हैं जिनका जन्म बहुत ही सम्पन्न परिस्थिति में हुआ। वे चाहते तो जीवन भर सम्पन्नतापूर्ण परिस्थिति में रहते और कठिनाइयों से बचते हुए बहुत से काम कर सकते थे । किन्तु उन्होंने वैसा नहीं किया, वरन् असुविधापूर्ण परिस्थितियों को स्वेच्छापूर्वक वरण किया। बुद्ध, महावीर, अरविंद गाँधी आदि महापुरुष ऐसे ही थे जिन्होंने जान-बूझकर कंटकाकीर्ण मार्ग चुना। संकट पर संकट आते गये, पर वे अविचल भाव से उनका सामना करते हुए अपने गन्तव्य पथ की ओर बढ़ते ही गये और अंततः अपने उद्देश्य में सफल हुए।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं जा यह बताते हैं कि प्रगति प्रतिकूलताओं के बीच जीते हुए प्राप्त की जाती हैं। ऐसे अपवाद ही होते हैं, जिन्हें सब कुछ बिना परिश्रम के प्राप्त हो जाता हैं, सुख, समृद्धि, प्रतिभा, कीर्ति, यक्ष प्रखर पुरुषार्थ के ही चमत्कार हैं, इसे हमेशा याद रखा जाना चाहिए।


अपना निर्णय नहीं बदला (Kahani)

स्वामी रामतीर्थ को विद्यार्थी जीवन में अनेक कठिनाईयाँ उठानी पड़ी। कभी-कभी तो स्थिति इतनी विकट आ जाती थी कि दीपकों के तेल के खर्च की पूर्ति के लिए भोजन में कटौती करनी पड़ती थी फिर भी अध्ययन के प्रति उनकी रुचि बढ़ती ही रही।

लाहौर महाविद्यालय के प्राचार्य ने स्वामी रामतीर्थ के बुद्धि कौशल से प्रभावित होकर सिविल सर्विस की परीक्षा हेतु उनका नाम भेजने का निर्णय कर लिया था। जब इन्हें इस निर्णय की सूचना मिली तो वह दौड़-दौड़े प्राचार्य के पास गये और बड़े नम्र शब्दों में बोले-”मैंने अपनी फसल इसलिए तैयार नहीं की हैं कि उससे लाभ कमाया जाये अथवा बेचकर आय में वृद्धि की जाये। मैं तो उसे मिल−बांट कर खाना चाहता हूँ और मेरे परिश्रम का उद्देश्य भी यही हैं” मैं अधिकारी बनने का स्वप्न नहीं देखता और न मेरी इच्छा ही हैं। मैं अपने को सेवक मानता हूँ क्योंकि सेवा करना मानव मात्र का धर्म है। फिर मैं इस धर्म से विचलित कैसे हो सकता हूँ ? मैं तो अध्यापक बनकर सेवा करना चाहता हूँ अतः आप सिविल सर्विस की परीक्षा हेतु मेरा नाम प्रस्तावित न कीजिए”।

प्राचार्य के खूब समझने पर भी स्वामी जी ने अपना निर्णय नहीं बदला।


गणितीय नियमों से संचालित सृष्टा के क्रियाकलाप!

सृष्टा को नियन्ता को अनिवर्चनीय, अगम्य कर संबोधित किया गया हैं एवं वह यह कहा जाता रहा हैं उसके खेल निराले हैं। यह सही हैं किन्तु एक तथ्य अपनी जगह सत्य है। वह यह कि .... हर क्रियाकलाप सुव्यवस्थित क्रमबद्ध हैं। सृष्टि के एक घटक मनुष्य को ही लें तो हम पाते हैं कि .... प्रकार गणितीय प्रक्रिया में प्रश्न-उत्तर की जटिलता बावजूद एक से नौ तक के अंक की संख्याओं का ही आयोजित सोद्देश्य प्रयोग होता हैं, उसी प्रकार मानवी .... प्रणाली भी एक स्थिर गणित के आसपास घूमती चाहे हृदय की धड़कन हो, रक्त का प्रवाह हो .... ग्रंथियों का रसस्राव हर प्रक्रिया गणितीय .... से संचालित है। जैसे ही यह गणित गड़बड़ाता है, .... काया विकृति को प्राप्त हो रुग्णता को जन्म देने .... है। वस्तुतः चेतन सत्ता सृष्टि के हर घटक के .... में चाहे वह विज्ञात हो अथवा अविज्ञात, सतत् .... है। इसी नियमबद्धता, सुव्यवस्था के कारण .... वैज्ञानिक श्रुतियों-ग्रन्थों में सृजेता की सत्ता की .... का गान करते आए है।

चेतन सत्ता की सुव्यवस्था की एक छोटी सी एक मानव काया के अवयवों की सुनियोजित शीतलता के रूप में देखी जा सकती है। ये अंग .... मात्र उपकरण हैं जिनके माध्यम से चेतना अपनी .... का विकास कही महान लक्ष्य की ओर अग्रसर .... है।

मानव हृदय का भार पूरी काया के भार का 0.5 प्रतिशत होता है। हृदय की सक्रिय रूप से सतत् रक्त की .... , आकुंचन-संकुचन प्रक्रिया, विभिन्न परिस्थितियों परिवर्तन के साथ तालमेल बिठाने की क्षमता तनिक सूझबूझ से परे के स्तर की कलाकारितायुक्त द्वमत्ता की परिचायक है। कवियों-दार्शनिकों ने .... को भावनाओं की केन्द्र स्थली माना है। शरीर में .... की .... हमारे जीवन में संवेदनशीलता की भी एक निश्चित मात्रा की आवश्यकता है। उसके बिना आदमी आदमी नहीं रहता। यदि यह मात्रा कम हो गयी तो व्यवहार में पशुता बढ़ जाती है और यदि वह अनियंत्रित रूप से बढ़ गई तो अव्यावहारिकता को जन्म देती, अतिभावुकताजन्य मनोरोगों को आमंत्रण देती है। बड़ा और छोटा दिल दोनों ही विकृति के सूचक है। हृदय में निहित भावनाओं की उत्कृष्टता ही उसे देवतुल्य, जगत्वंद्य महामानव बना देती है। वस्तुतः जो भी कुछ नियन्ता ने प्रदत्त किया है उसकी न्यूनाधिकता ही सारी गड़बड़ी का कारण होती है। किसी एक क्षेत्र में अधिक क्रियाशीलता तथा अन्य क्षेत्रों की उपेक्षा विघटनकारी होती है।

दिल की धड़कन का गणित बहुत ही विचित्र है। प्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डा0 अलेक्सीस कैटेल लिखते है कि यह समस्त प्रक्रिया इतनी विलक्षण है कि देखकर आश्चर्य होता है कि कैसे बिना किसी दृश्य संचालक के यह सब क्रिया व्यापार इतना सुव्यवस्थित रूप में चल रहा है। जब बालक गर्भाशय में पल रहा होता है, उसके हृदय की धड़कन 110 से 140 प्रति मिनट होती है। यह एक असामान्य गति है। जन्मोपरांत यह थोड़ी कम होती है व फिर उम्र तथा स्वास्थ्य के अनुरूप 70 तथा 80 के बीच स्वतः निर्धारित हो जाती है। शारीरिक अथवा मानसिक दबाव के पड़ने व बढ़ने पर हृदय की गति भी बढ़ जाती है। चिंता, आतुरता की स्थिति में दिल धक-धक करता है। विश्रान्ति, शिथिलीकरण धैर्य एवं मानसिक समस्वरता की स्थिति में हृदय अपनी स्वाभाविक अथवा थोड़ी कम ही गति से धड़कता है जो कि शुभ चिह्न है। एक विशिष्ट दबाव पर ही हृदय सिकुड़ता व फैलता है व यही दबाव रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) कहलाता है। इसमें थोड़ा भी व्यतिरेक आने पर यह लो या हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी में बदल जाता हैं। केवल सही हृदय की गति एवं सही रक्त दाब की शरीर व मस्तिष्क के सभी अवयवों-जीवकोशों का समुचित पोषण कर पाते है। दिल एक सीमा तक ही अपने गणित को घटा-बढ़ा सकने की क्षमता रखता है। उस सीमा के परे जाते ही वह चीख उठता है-छाती में दर्द होता है एवं इस स्थिति को दिल का दौरा पड़ना अथवा हार्ट अटैक कहा जाता हैं उसके स्वयं की माँसपेशियों का रक्त संचार एवं अंग अवयवों की आक्सीजन रूपी प्राण शक्ति की पूर्ति इससे प्रभावित होती है। हृदय का गति-चक्र हमें एक अनुशासन सिखाता है कि अपना उद्देश्य भुलाकर अनुशासन तोड़ते ही सृष्टा की व्यवस्था हमें दण्ड दे सकती है। हम अपने कर्त्तव्य व उत्तरदायित्वों की उपेक्षा किसी भी स्थिति में न करें। यदि हुई तो जीवन के दैनन्दिन क्रियाकलापों में वैसा ही झटका लगने की संभावना है, जैसा कि दिल के दौरे के समय शरीर को लगता व वह बिस्तर पकड़ लेता है। दिल शायद बिना चीखे मायोकार्डियल इन्फाक्शन के रूप में उसमें स्थायी विकृति को जन्म दे दे पर जीवात्मा की चीख, अन्तरात्मा का रुदन उसे अधोगति की ओर ही ले जायेंगे। शरीर की सूक्ष्म संरचना, रासायनिक क्रिया-प्रति क्रिया, जीवकोषों में विद्युतावेश का परिवहन तथा अवयवों में संभावित व हो चुके परिवर्तन वैज्ञानिकों द्वारा देखे समझे तो जाते है, पर यह जटिल प्रक्रिया किसी असीम सर्वोच्च सत्ता के इशारे पर चल रहा कठपुतली का खेल है, यह विचार सतत् मन में आते रहना चाहिए। चेतन सत्ता से संबंधित स्वयं को मानने पर ही स्वयं के क्रियाकलाप तदनुरूप बन पड़ते हैं। हम शरीर के .... को ही सब कुछ मान बैठते है किन्तु यदि शरीर की .... से प्राप्त ज्ञान का परिष्कार कर माल सत्ता का विस्तार किया जा सके तो हम मात्र शरीर नहीं रहने, चेतना की अनन्तता से जुड़ जाते है।

रक्त में पाये जाने वाले श्वेत कोशों (डब्ल्यू0 बी0 सी0) की संख्या सामान्यतः .... से 11000 प्रति क्यूविक मिलीमीटर तथा उनका जीवनकाल 30 से 120 दिन का होता है। इस गणित में थोड़ा सा भी बदलाव आने पर हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली सीधे प्रभावित होती है। विभिन्न प्रकार के वायरस शरीर पर आक्रमण कर देते है। कैंसर जैसे असाध्य रोग शरीर में घर कर लेते हैं, रक्तकोशों की संख्या निर्धारित संख्या से कम हो तो भी घातक व सीमा रेखा से अधिक हो जाएँ तो भी शरीर को ल्यूकीमिया (रक्त कैंसर) होने का खतरा है। क्षेत्र में शरीर गणितीय नियमों से संचालित है।

पेट में खाना पचाने के लिए अम्ल की आवश्यकता पड़ती है। उसकी स्रवित होने वाली मात्रा तथा आत्म शक्ति एन बाय टेन (हृ/10) सुनिश्चित होती है। इस गणित में थोड़ा भी परिवर्तन हुआ तो पाचन क्रिया कि कृत हो जाती है। भूख नहीं लगती, खट्टी डकार आती हैं, खाना खाने को मन नहीं करता व फिर .... प्रकार की उलझनें जन्मती चली जाती है। पेट में .... जाने वाले अल्सर का निदान एक्सरे में देखे जाने पूर्व ही अम्लता का मापन कर संभव है। उपचार अम्लता की मात्रा के गणित को सही कर देने पर रूपेण हो जाता है। अधिक मात्रा में स्रवित होने व अम्ल को विभिन्न औषधियाँ उस सीमा तक कम देती है, जहाँ तक कि अनिवार्य हैं कष्ट आगे बढ़ नहीं पाता। किन्तु इसके बावजूद मनुष्य का खानपान व्यतिरेक के रूप में खिलवाड़ जारी रहता है तो अलग बढ़ता ही जाता है। एवं खून की उल्टी द्वारा अथवा पेट अंदर फूटकर अंतिम चेतावनी दे देता है। शल्य क्रिया ही तब सहारा रह जाती है। शरीर जिस प्रकार स्वस्थ रहने के लिए गणितीय संतुलन की माँग करता है, व अंतःकरण अपनी स्थिरता बनाये रखने तथा गुण के विकास हेतु सतत् आत्मिक पोषण की माँग करते है ताकि देवत्व का गणित गड़बड़ाने न पाए।

शरीर का साधारण ताप .... डिग्री फरनहीट लगभग होता है। जबकि रक्त का तापमान 100 .... फारेनहाइट। गर्म से गर्म तथा शीतलतम स्थान पर रक्त ताप में 1-2 से एक डिग्री का भी अंतर नहीं आता थर्मांस्टेटिक व्यवस्था द्वारा ताप का संतुलन बिठा लिए जाता है। बाहर चाहे कितनी भी प्रतिकूलताएँ हम अपने आपे को, मनःसंतुलन को बनाये रखें, .... व जिजीविषा की विचलित न होने दें, रक्त तापमान गणित अनायास ही यह शिक्षण दे जाता है।

दिनभर में हम लगभग 1500 मिली लीटर .... ग्रहण करते हैं एवं इतनी ही मात्रा प्रश्वास, त्वचा मूत्र के माध्यम से निकाल देते है। इसमें जरा भी व्यतिक्रम आते ही शरीर का जल लवण (एसिडबेस) संतुलन लड़खड़ा जाता है। यह शरीरगत क्रिया पद्धति को ही नहीं मन को भी प्रभावित करता व कभी कभी “कोमा” की स्थिति ला देता है। इस संतुलन को यथावत् बनाये रखने के लिए नाना प्रकार के लवण, एन्जाइम्स तथा विद्युत्रासायनिक प्रक्रियाओं का जटिल जाल क्रियाशील रहता है। यह इतना विस्तृत, सूक्ष्मतम एवं सुनियोजित है कि इसकी क्रिया पद्धति वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल देती है। एक चेतन सत्ता प्यास को बढ़ाकर, कम कर अथवा विसर्जन की मात्रा को कम-अधिक कर, रक्तवाही नलिकाओं को प्रभावित कर गणित संतुलन बिठाये रखती है। यह एक सीमा तक ही होता है। इससे पेर जाते ही सुव्यवस्था के पाये चरमरा जाते है। जल-लवण संतुलन की तरह ही मनुष्य के अंदर श्रद्धा एवं भावुकता का विवेक सम्मत संतुलन होना चाहिए। यदि दुराचारी के प्रति बैठाली तो रोगी काया की तरह हमारा जीवन भी विकार ग्रस्त होकर ही रहेगा।

काया में जहाँ कहीं देखें, गणित का ही खेल दिखाई पड़ता हैं रक्त में प्रोटीन, वसा, शर्करा, कैल्शियम, पोटेशियम, सोडियम आदि की मात्रा गणितीय आधार पर ही ग्रहण की एवं स्थिर रखी जाती है। शरीर को जितना चाहिए, भोजन में उसे उतना ग्रहण कर शेष को बाहर निकाल देता है। रक्त में कैल्शियम 1 से 11 मिलीग्राम प्रति 100 मिली लीटर की सीमा निर्धारित है। रक्त का धर्म अपरिग्रह का है। यदि उसे परिग्रही होने पर विवश कर दिया जाये तो मधुमेह व गुर्दे की बीमारी परिणति के रूप में हो जाते है। आहार का व्यतिक्रम शरीर का सुव्यवस्थित परिष्कार बर्दाश्त नहीं कर पाता व अंततः विद्रोह कर बैठता है क्योंकि अनुशासन की अवहेलना की गयी। सत्पुरुष संग्रही नहीं होते, अनावश्यक अपव्यय नहीं करते, जितना ब्राह्मणोचित है, उतना ही ग्रहण करते है। इसी कारण वे बिना किसी विकार से ग्रस्त हुए अपनी संत प्रकृति सादगी के होते बनाये रहते व अपनी विभूतियों से दूसरों को लाभान्वित करते रहते है।

शरीर का रेखा गणित तो और भी विचित्र है। हमारे पैरों में जो हड्डियों का आर्च बना हुआ है, वह इतना सुनियोजित है कि शरीर भार का पूरा संतुलन बनाये रखने एवं किसी भी प्रकार के “शाक्स” को झेलने की क्षमता रखता है। ऐसा लगता है किसी गणितज्ञ ने निश्चित कोण पर विभिन्न बिंदु एवं त्रिभुज निर्धारित कर सारा ढाँचा रचा हो। रीढ़ की हड्डियों का कर्वेंचर, उंगलियों का नुकीलापन, हथेली में गद्दी तथा सीने का पेट से आगे बढ़ा हुआ होना प्रकृति की सुव्यवस्था का ही संकेत है। इस नियम में, रेखागणित की व्यवस्था में जब कभी गड़बड़ी कर दी जाती है, हमारे क्रियाकलाप प्रभावित होते है, संतुलन बुरी तरह डगमगा जाता है।

गणित के नियमों का परिपालन परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं को बनाने के लिए रक्त के लाल व श्वेतकोश भी करते है। प्रतिकूल परिस्थितियों में कई श्वेत कोश मिलकर बड़े जायण्ट सेल (दैत्य कोश) बन जाते हैं जो कि एक विशेष भूमिका के लिए जन्म लेते है। इनमें कई नाभिक होते है। जीवनी शक्ति बढ़ाने में इनकी, मेक्रोफेज तथा मास्टसेल्स की बढ़ी महती भूमिका होती है। टी0सी0 के जीवाणु का मुकाबला करने के लिए जहाँ टी0बी0 दैत्य जन्म लेते है, वहाँ बाहर के किसी विजातीय विकारों से निबटने हेतु फारेन बॉडी जायण्ट सेल्स की उत्पत्ति होती है। बहुधा इनके आकार व स्वरूप के आधार पर ही बीमारी का निदान होता है।

मानवी काया के दृश्य क्रियाकलापों के मूल में चेतन सत्ता ही मूलतः क्रियाशील होती है। यह एक नियमबद्ध गणितीय प्रणाली में कार्य करती है एवं एक ही संकेत देती है कि यहाँ कुछ भी निरुद्देश्य एवं अनपढ़ नहीं है। जो कुछ भी हलचलें मानवी सत्ता, जीव-जगत, प्रकृति आदि में दृश्यमान हैं, वे एक बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवस्था का ही अंग है। इस तथ्य को समझते हुए हमें उस अविज्ञात, अनिर्वचनीय सत्ता के अनुशासन का मानना व जीवन में भी उतरना चाहिए। यही मूलतः आस्तिकता का तत्वदर्शन है।


हिमक्षेत्र की रहस्यमयी दिव्य सम्पदाएँ

हिमालय क्षेत्र बहुत विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है। उसमें भी अध्यात्म विशेषताओं से सम्पन्न भाग ‘देवात्मा’ कहलाता है। उत्तराखण्ड नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र बहुत छोटा है। यमुनोत्री-बंदरपूँछ ग्लेशियर से आरंभ होकर यह कैलाश–मानसरोवर क्षेत्र तक चला जाता है। इस क्षेत्र की ऊँचाई दस हजार से चौबीस हजार फुट तक की है। शेष भाग वन-पर्वत, वनस्पति, नदी-नद आदि से भरा है। उसमें जहाँ कृषि संभव है, जल की सुविधा है, तापमान सह्य है, वहाँ उस क्षेत्र में रहने के अभ्यासी टिके रहते है और निर्वाह क्रम चलाते रहते है।

अभ्यास पड़ जाने पर व्यक्ति दुर्गम क्षेत्रों में भी अपनी व्यवस्था बना लेता हैं। उत्तरी ध्रुव में एस्किमो जाति के लोग रहते, माँसाहार से पेट भरते व मछलियों, कुत्ते, रेन्डियर की मदद से अपने सारे क्रिया कलाप चलाते है। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव मनुष्य-पशु तो नहीं पेंगुइन जाति के दो पैरों के सहारे चलने वाले प्राणी व टिड्डे स्तर के चींटे रहते हैं। दोनों ध्रुवों पर प्रतिकूल परिस्थिति में भी जीवन का विद्यमान होना यहीं बताया हैं कि प्राणी किसी भी परिस्थिति में रहने के लिए अपने को ढाल सकते है प्रकृति उसके लिए आवश्यक सुविधा साधन भी जुटा देती हैं। घोर शीत वाले हिमाच्छादित प्रदेशों में भी कुछ प्रकार के जीव पाये जाते हैं। श्वेत भालू श्वेत बिलाव, श्वेत पक्षी, श्वेत कछुए एक प्रकार से बर्फ को ही अपना आहार बना लेते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली चट्टानों गुफाओं के नीचे बस जाते हैं, क्योंकि समीपवर्ती क्षेत्रों से ही अपना आहार प्राप्त कर लेते हैं। ऊँचाई पर पाये जाने वाले हिरन और भेड़ें उस वर्ग के लिए भोजन की आवश्यकता पूरी करते रहते हैं। जिन्हें माँसाहार पचता हैं।

यह हिमाच्छादित प्रदेशों के निवासियों के निर्वाह की चर्चा हुई। अब देखना यह है कि महत्वाकांक्षी मनुष्य भौतिक दृष्टि से उस क्षेत्र में जाकर क्या खोज और क्या पा सकता है। इस प्रयोजन के लिए बहुत ऊँचाई तक जाने का मोह छोड़ना होगा। वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन एवं कष्ट साध्य है। जिनने कैलाश मान सरोवर की यात्रा की हैं, जिन्होंने गंगोत्री और बद्रीनाथ का मध्यवर्ती हिमाच्छादित मार्ग पैदल चलकर पार किया हैं, वे जानते है कि इस प्रकार के प्रयत्न कितने कष्ट साध्य, शरीर पर दबाव डालने वाले और कितने खर्चीले होते हैं। जिनके सामने आध्यात्मिक लक्ष्य हैं, उनकी बात दूसरी हैं पर जिनका दृष्टिकोण विशुद्धतः भौतिक हैं, वे इस प्रकार के पचड़े में पड़कर अपनी सुख सुविधा वाली जिन्दगी में क्यों जोखिम खड़ा करेंगे ? अध्यात्म-वादियों के अतिरिक्त दूसरा वर्ग शोधकर्ता वैज्ञानिकों का खोजी वर्ग क आता है। वे भी अपनी गुरुता सिद्ध करने कीर्ति-मान स्थापित करने और कुछ ऐसी उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए समर्पित रहते हैं जो पीछे वालों के लिए उपयोगी बन सकें, सराही जाती रहें।

हिमालय इस दृष्टि से भी खोजने योग्य है जब उत्तरी ध्रुव जैसे शोध कर्ताओं के लिए आकर्षक का केन्द्र बन सकते है, उन्हें वहाँ की परिस्थिति जानने के लिए साहस भरी यात्राओं के लिए प्रोत्साहित करते है तो कोई कारण नहीं कि हिमालय की भौतिक सम्पदा के खोज निकालने के लिए शोध कर्ताओं का उत्साह क्यों न जमें।

जहाँ प्रकृति का दोहन होता रहता है। वे क्षेत्र उजड़ जाते हैं किन्तु जहाँ की मौलिकता अक्षुण्ण .... वहाँ खोजने के लिए बहुत कुछ पाया जा सकता है अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड आदि नये खोजे ... की भूमि में उर्वरता-खनिज आदि का इतना बड़ा वैभव प्राप्त हुआ है कि वहाँ के निवासी कुछ ही समय समृद्ध हो गये। हिमालय का क्षेत्र भी ऐसा है कि अति प्राचीनकाल में ही खोजा गया था। इन दिनों वहाँ पाई जाने, वाली समृद्धि की कल्पना की गई हाथ डाला गया। फलतः वह क्षेत्र एक प्रकार से अत्यधिक बड़ा है। समुद्री किनारे पर पड़े हुए सीप घोंघे जिस प्रकार बालक बीन लाते है, उसी प्रकार हिमालय से अनायास ही मिलने वाले लाभों को ही पर्याप्त मान कर संतोष किया जाता रहा है। यदि समुद्र की गहराई में उत्तर कर मोती बनाने वाले का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके तो वह प्रदेश भी कम विभूतियों से भरा पूरा न ... लेगा।

... हिम खण्डों में ढके पर्वत धरती की ऊपरी सतह पर उनके नीचे सामान्य भूमि है। इस निचली सतह से कभी-कभी गरम गैसें ऊपर आती है और पानी के साथ खेलकर खौलते तप्त कुण्डों का सृजन करती है। इनके .... ढूंढ़े जा सकें, तो असाधारण मात्रा में ऐसी ऊर्जा ... गत हो सकती है, जो अनादि काल से सुरक्षित है, उसका दोहन कभी भी नहीं हुआ। पत्थरों में ऐसे तत्व पड़े है जो बहुमूल्य रसायनों के रूप में बाहर निकाल सकते है, जिनका अति महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता शिलाजीत उन्हीं में से एक है, जिसे असाधारण रूप बलवर्धक माना जा सकता है। हिमालय से आने वाली नदियों की बालू में सोने चाँदी जैसी बहुमूल्य वस्तुओं का अंश पाया गया है। यदि उनके उद्गम खोजे जा सकें तो समतल भूमि में पाई जाने वाली धातु खदानों के अधिक मूल्यवान सम्पदा हाथ लग सकती है। कहीं तो यूरेनियम जैसी धातुओं का सम्मिश्रण भी रेत में किया गया है। कुछ सरिताएँ ऐसी है, जिनके पानी में ऐसे मिले हुए है जो उन्हें प्रभावशाली और मिट्टी के .... बनाती है। यह रसायन उन क्षेत्रों की परतों में जा सकते है। जहाँ से कि वह टकराती हुई प्रवाहित हैं।

कस्तूरी हिरन हिमांचल की ऊंचाइयों में पाये जाते बारहसिंगा के सींग अपने आप में औषधीय विशेषताओं से भरे पूरे हे। चंवरी हिरन की पूँछ न केवल ... होती है वरन् उन के शरीर पर ढुलने से प्रसुप्त ऊर्जा भार आता है। इसी प्रकार अन्य जीव-जन्तु भी साधारण विशेषताओं से भरे होते है। वातावरण का व प्राणियों पर भी पड़ता है और वे इस योग्य बनते गये कि मनुष्य को शारीरिक मानसिक स्तर के विशेष दान दे सके। दुर्भाग्य इसी बात का है कि इन प्राणियों अभिवर्धन करके उनके संपर्क से लाभ नहीं उठाया जा रहा है, वरन, माँस के लिए उनका वध करके महती सम्भावनाओं से दिन-दिन वंचित होते चले आ रहे है।

हिमालय के वृक्षों की अपनी विशेषताएँ है। उनकी लकड़ियों में तेल की इतनी प्रचुर मात्रा पाई जाती है कि उनकी गीली लकड़ी को भी जलाया और ताप का लाभ उठाया जा सकता है। चीड़, देवदारु के तनों से निकलने वाला रस बैरुजा के रूप में बाजार में बिकता है और रासायनिक प्रयोगों के लिए काम आता है। अन्य पेड़ भी अपने-अपने ढंग के गोंद देते है। उनके पुष्प तथा फल औषधियों की तरह काम में लाये जाते है। अन्न तो प्रचुर परिमाण में हिमालय की ऊबड़-खाबड़ भूमि पर पैदा नहीं होता, पर उसकी पूर्ति कर सकने वाले कई प्रकार के कन्द अनायास ही उपलब्ध होते है। उनकी क्षमता अन्न की तुलना में कम नहीं अधिक ही होती है। कितने ही शाक अलग क्षेत्रों में अलग-अलग आकृति प्रकृति के ऐसे पाये जाते है जिन्हें शाक–भाजियों के समतुल्य गुणकारी पाया जाता है। पत्तियों के रूप में पाये जाने पर भी उनमें पोषक तत्व उनसे कम नहीं होते जैसे कि समतल भूमि के शाकों और फलों में होते है।

भोजपत्र एक बहुद्देशीय वृक्ष है। उसके बल्कल का उपयोग वस्त्रों के रूप में, विस्तार के रूप में, एवं झोपड़ी आच्छादन के रूप में हो सकता है। उसके पत्र कागज के रूप में प्रयुक्त होते रहे है। भोजपत्र में उभरने वाली गाँठों का काढ़ा बनाकर पीने से जुकाम मिटाने वाली बलवर्धक चाय की आवश्यकता पूरी होती है।

औषधियों का तो हिमांचल को भण्डार ही समझना चाहिए। ऊँचाई पर पाये जाने वाली औषधियाँ असामान्य गुणों से भरी पूरी पाई गई है। उसी जाति की वनौषधियाँ यदि मैदानी इलाके में गरम जलवायु में लगाई जांय तो या तो वे उग नहीं पायेगी अथवा उनमें वे विशेषताएँ नहीं पाई जायेंगी जो ऊँचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में उगने पर होती है। चट्टानों पर हवा के द्वारा मिट्टी की हलकी परत छोड़ दी जाती है, उसी में जड़ी-बूटियां अपने लिए जड़ें फैलाने का स्थान बना लेती है। वायु मण्डल में उड़ने वाले जल से अपना पोषण प्राप्त करती है। ऐसी दशा में उनका विशेषताओं से सम्पन्न होना स्वाभाविक है।

ऊँचाई पर होने के कारण उनका उपयोग नहीं हो पाता। कोई उन्हें लेने के लिए नहीं पहुँचता यदि मार्ग बना लिया जाय और उन्हें बोने बटोरने का व्यवस्थित क्रम चलाया जाय तो मनुष्य के हाथ अमृतोपम औषधियों का भण्डार लग सकता है। साथ ही उसे अति लाभदायक उद्योग के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।

हिमाच्छादित प्रदेशों में कम ऊँचाई वाले ऐसे भी अनेक क्षेत्र है जहाँ शीत ऋतु में हल्की बर्फ जमती है। गर्मी आने पर वह पिघल भी जाती हैं। पिघलने पर उर्वर भूमि निकल पड़ती है। इस प्रकार भूमि के उभर आने का समय श्रावण भाद्र पद के दो महीने विशेष रूप में होते हैं किन्हीं क्षेत्रों में थोड़ा आगा-पीछा भी रहती हैं। इन्हीं दो महीनों में उस भूमि में दबी वनस्पतियाँ अचानक उभर आती है। अंकुरित और पल्लवित तो वे पहिले से ही किसी रूप में बनी रहती है पर गर्मी पाते ही बसन्त काल की तरह द्रुतगति से वे विकसित होती है। इन दो महीनों में ही उनका जीवनकाल पूरा हो जाता है। इसी अवधि में वे पूरी तरह फल-फूल लेती है। मध्यम ऊँचाई के हिम पर्वतों में दो महीने का बसंत रहता है। उनमें विशेषतया छोटे बड़े आकार की जड़ी-बूटियाँ फूलती है। दूर-दूर तक फूलदार मखमली गलीचे जैसे बिछे दिखाई पड़ते है उसके नयनाभिराम दृश्य को देखते देखते मन नहीं भरता। प्रकृति का यह अद्भुत कला कौशल दर्शकों को भाव विभोर कर देता है। ऐसे फूलों की घाटी देवात्मा हिमांचल क्षेत्र में दर्जनों है उनमें से हेम कुण्ड वाली घाटी अधिक प्रख्यात है। केदारनाथ के ऊपर वाला क्षेत्र भी ऐसा ही है। फूलने के बाद यह वनौषधियाँ फलती है। पकने पर बने हुए बीज धरती पर बिखर जाते है। इसके बाद बर्फ पड़ने लगती है। बीज उसके नीचे दबे रह जाते है। प्रायः छः महीने उपरान्त बर्फ पिघलने पर यह जमीन फिर नंगी होती है। इस बीच वे बीज भूमि में अपनी जड़ें जमा लेते है। अंकुरित हो लेते है। धूप के दर्शन होते ही तेजी से बढ़ने पल्लवित होने और फूलने फलने लगते है। यह उनके दृश्य स्वरूप की चर्चा हुई। इन वनस्पतियों के गुणों की नये सिरे से खोज होने की आवश्यकता है। इन्हें पुष्प वाटिका के समतुल्य नहीं माना जाना चाहिए, वरन् समझना चाहिए कि इनमें से एक से एक नये-नये गुणों वाला शारीरिक और मानसिक रोगों का शमन करने वाली जीवनीशक्ति एवं दीर्घायुष्य प्रदान करने वाली वनस्पतियाँ है। चरक युग में तत्कालीन वनौषधियों की खोज हुई थी। आयुर्वेद शास्त्र का औषधि खण्ड उसी आधार पर बना था उस बात को अब लम्बा समय बीत गया। कितनी ही लुप्त हो गई और कितनी ही प्रजातियाँ नये सिरे से उत्पन्न हो गई है। इन सबका विश्लेषण वर्गीकरण, परीक्षण किया जाय तो नये सिरे से फिर आधुनिक औषधि शास्त्र विनिर्मित हो सकता है।

इस क्षेत्र की कितनी ही वनस्पतियाँ अभी प्रख्यात किन्तु दुर्लभ है। रात्रि को प्रकाश देने वाले ज्योतिष्मती, संजीवनी, रुदन्ती, सोम वल्ली आदि देव वर्ग का माना जाता है। इनमें मृत मूर्छितों को जीवन प्रदान करने की शक्ति मानी जाती है। च्यवन ऋषि ने इन्हीं के आधार पर जरा .... वृद्धावस्था को नवयोवन में परिवर्तित .... कायाकल्प जैसा लाभ उठाया था।


अधिकार के साथ कर्त्तव्य भी जुड़ा (Kahani)

चार ब्राह्मण सगे भाई थे। पर रहा अलग-अलग थे। एक यजमान ने एक गाय दान दी और कहा-चारों इसका मिलजुल कर पालन करें और दूध पियें।

पहली पारी वाले ने दूध तो दुह लिया पर चारे दाने की व्यवस्था दूसरे दिन वाले के जिम्मे छोड़ दी। दूसरे ने भी यही किया। तीसरे ने भी यही, चौथे ने भी ऐसा ही सोचा और वही किया।

गाय का दूध दिन-दिन घटता गया। भूख प्यास से वह दुर्बल होती गईं। चौथे दिन इतनी अशक्त थी दूध देना तो दूर उठना तक कठिन हो गया। अन्ततः वह एक दिन बाद मर ही गई।

चारों दूध से वंचित रहने पर दुःखी थे पर किसी को यह न सूझा कि अधिकार के साथ कर्त्तव्य भी जुड़ा हुआ है।


भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा

विश्व की प्राचीन संस्कृतियों का स्मरण करने पर ...श्र, यूनान, बेबीलोन एवं भारत का नाम सहज ही .... पटल पर उभर आता है। इनमें से भी यदि नवीनतम होने का गौरव किसी को प्राप्त है तो वह भारतवर्ष है। प्राचीन काल से ही यहाँ बाह्य प्रकृति के साथ मानव की अंतः प्रकृति के संबंधों पर शोध होती रही है। ऋषि-मुनि कहे जाने वाले शोधकर्ताओं ने मानव के .... -सामाजिक विकास के लक्ष्य ध्यान में रखकर ये .... कार्य किए थे। विकास के विविध आयामीय .... के अनुसार शोध के भी विविध आयाम है।

हमारी साँस्कृतिक धरोहर वेद, उपनिषद्, षडं्-... आदि अनेकानेक मंजूषाओं में निहित है। इस .... तो किसी प्रकार का ताला है, न ही किसी अन्य प्रकार का निषेध। इस खुली छूट का लाभ उठाकर .... एवं पाश्चात्य द्विविधि गोलार्धों के चिन्तकों ने उसका गहन अध्ययन अपने-अपने ढंग से किया है। .... डायसन, किस्टोफर इशरउड, रोम्या रोलाँ आदि पूर्वाग्रहों से रहित मनीषियों का ढँग तो समीक्षात्मक एवं समालोचनात्मक रहा है। किन्तु कुछ ऐसे भी ... है जो पूरी तरह से हठवादिता, पूर्वाग्रह पर उत्तर .... । ऐसे चिन्तकों में फ्रेंक ब्रिस्टल थामस, एबेनेजर ...... विलियम आर्चर प्रमुख है। स्लाटर .... आर्चय ने भारतीय संस्कृति पर गालियों की बौछार करने की कसम खाकर पुस्तकें भी लिखी है।

श्री स्लाटर की पुस्तक का नाम है “स्टडीज इन उपनिषद्” अर्थात् उपनिषदों का अध्ययन। किन्तु बहुत से पृष्ठों को उलटने पर लेख की मनोवृत्ति ... हो जाती है। पुस्तक का नाम यदि उसने ...... से ईर्ष्या रखा होता तो नाम और गुण में .... तो साबित हो ही जाती। इसमें श्रीमान .... ने अपने नाम के अनुरूप न केवल तथ्यों को समझने में कसाई की भूमिका निभाई वरन् समूचे ..... चिन्तन को जी भर गालियाँ भी दी है।

इस तरह की निन्दा करने, गाली-गलौज देने में एक कदम और आगे बढ़कर शीर्ष स्थानीय होने का गौरव पाया है, मि0 विलियम आर्चर ने। मि0 आर्चर ने साँस्कृतिक गौरव की पिटाई समझे जाने वाले दर्शन, धर्म, काव्य, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि सभी को एक साथ एक ही कोटि में रखकर सबके बारे में कह डाला है कि यह अवर्णनीय बर्बरता का एक घृणास्पद स्तूप हे। इसमें उसने यह भी उपदेश दिया है कि भारतीय संस्कृति से बचे रहने में ही कल्याण है।

मि0 आर्चर द्वारा की गई आलोचनाएं इतनी भद्दी एवं असहनीय है कि किसी भी स्वाभिमानी का उत्तेजित हो जाना स्वाभाविक ही है। एकांगी पक्षपातपूर्ण चिन्तन के अभ्यासी इन आलोचक महोदय की पुस्तक के प्रत्युत्तर में प्रख्यात विद्वान तथा यंत्र संगत तर्क देते हुए “क्या भारत सभ्य है” नामक एक पुस्तक प्रकाशित की थी। इसमें उन्होंने कहा है कि रोमन सम्राट नीरों जिसने अपनी सगी माँ अग्रिप्पिना को भी अपनी कुदृष्टि से नहीं बख्शा, को वीर पुरुष का ताज पहनाने वाले विचारकों को मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा मातृवत् परदारेषु की संस्कृति अच्छी न लगे यह स्वाभाविक ही है। अपनी सम्यता पर घमण्ड रखने वाले आर्चर की पोल आइवन ब्लाक की पुस्तक इन बानब्रूट-बेस्टफार वर्जिन्स, के पृष्ठ उलटने से खुल जाती है। यह स्पष्ट हो जाता है कि एक औसत यूरोपियन कितना सभ्य है।

सभ्य होने का दावा करने वाले ये आलोचक कैसे है ? कोई भी ओटो किफर, हान्स लिच आदि की रचनाऐं पढ़कर जाना जा सकता है। श्री अरविन्द ने अपनी पुस्तक फाउण्डेशन्स आफ इण्डियन कल्चर में भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों का दार्शनिक विवेचन करते हुए कहा है बर्बरता मूर्ख जैसे अभद्र शब्दों का प्रयोग करने वाले यूरोपीय विचारकों को भद्र तथा सुसंस्कृत बनाने के लिए भारत पुनः कटिबद्ध हो चुका है। भारतीय आत्मा जहाँ-जहाँ भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने उत्साह के साथ सृजन करने में समर्थ हुई है, वहाँ यूरोपीय चमक-दमक की सम्मोहिनी शक्ति लुप्त होने लगी है। महर्षि ने आगे स्पष्ट करते हुए बताया है-हमारे धर्म पर यूरोप का आक्रमण प्रारम्भ में अत्यन्त प्रबल था, पर अब किसी को उसका बल महसूस नहीं होता, क्योंकि हिंदू नवजागरण की सर्जनात्मक हलचलों ने भारतीय धर्म को एक प्राणांत विकासशील सुरक्षित और आत्माख्याधिनी शक्ति बना दिया है। इस कार्य पर मुहर जिन दो घटनाओं ने लगाई है। वे है-शिकागो में स्वामी विवेकानन्द का प्रकट होना। स्वामी जी के विश्व धर्म महासभा में दिया गए अभिभाषण को यूरोपीय सभ्यता के शीश पर भारतीय धर्म की पताका लईराने जैसा ही कहा जा सकता है। दूसरी घटना है कि थियोसाफी का वैचारिक आन्दोलन। कारण कि भारत जिन साँस्कृतिक सूत्रों का प्रतिपादन करता है, उन्हें इन दो घटनाओं ने इस रूप में दिखला दिया कि वे अब पहले की तरह केवल अपनी रक्षा ही नहीं कर रहे वरन् आक्रमण में भी तत्पर है एवं पश्चिम की भौतिकता ग्रस्त मनोवृत्ति पर प्रहार कर रहे है तथा सही जीवन जीने की रीति-नीति का शिक्षण दे रहे है।

योगिराज श्री अरविन्द का उपरोक्त कथन शत-प्रतिशत यथार्थ है। “डाइंग कल्चर” की संज्ञा देने वाले विचारकों को अपने कथन पर पुनः एक बार विचार करना होगा। भारतीय संस्कृति आज भी जाग्रत और जीवन्त हे। इसकी दीप-शिखा अखण्ड रूप से प्रज्ज्वलित रहकर मानवता का पथ प्रदर्शन करती आयी है, आज भी कर रही है एवं भविष्य में भी करती रहेगी। संस्कृति की इस अखंड ज्योति में जब भी धृत की आवश्यकता पड़ी है, परम सत्ता की शक्ति आचार्य शंकर .... रामदास, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, अरविन्द बनकर अवतरित हुई है। इन शक्ति स्वरूप संस्कृति के सपूतों ने आत्माहुति देकर भी संस्कृति ज्वाला को बुझने नहीं दिया।

अँग्रेजी शिक्षा-दीक्षा अंगे्रजित्य प्रभाव नया दीर्घकालीन गुलामी के प्रभाव से इसका बाह्य स्वरूप भले ही कुछ गुमिल सा दौख पड़ने लगा हो। पर वस्तुस्थिति राख से लिपटे धधकते अंगारे की तरह इसका प्राण मन्द नहीं पड़ा वरन् कोई शक्ति का संचार कर रहा है।

उत्तिष्ठन-जाग्रत का गुरु गंभीर मेघ गर्जन वाली संस्कृति को निराशावादी हेय बताना अल्पज्ञता एवं मूढ़ता ही है। स्वामी विवेकानन्द अपने एक वक्तव्य में इसकी गरिमा का उल्लेख देते हुए कहा था कि संसार हमारी भारतमाता है। इसकी सांस्कृतिक सम्पदा का बहुत ही ऋणी हैं। भिन्न-भिन्न जातियों की पारस्परिक तुलना कौन तो मालूम होगा कि सारा संसार सहिष्णु एवं हिंदू का जितना ऋणी है उतना और किसी का नहीं। जब ग्रीस का अस्तित्व नहीं था, रोम भविष्य के कार गर्भ में छिपा था, जब आधुनिक यूरोपियन पुरखे जर्मनी के घने जंगलों के अन्दर छिपे हुए और जंगली लोगों की तरह अपने शरीर को नीले रंगा करते थे, तब भी भारतवासी क्रियाशील थे, इसकी गवाही हमें इतिहास दे रहा है। उससे भी पहले, समय की कोई स्थिति इतिहास नहीं बना सकता, सुदूर अतीत की ओर नजर दौड़ाने का साहस किसी को भी नहीं होता, उस अत्यंत प्राचीन काल से अब तक न जाने कितनी ही भाव तरंगें भारत से प्रकट हुई है, पर वे सब तरंगें अपने आगे शान्ति तथा दिव्य अनुदान बरसाती हुई अग्रसर हुई है।

स्वामी जी का उपरोक्त कथन ऐतिहासिक है। वर्तमान समय कुछ करने का है “ .... महान थे, उन्होंने बहुत बड़े कार्य किए थे पर कहने भर से कोई भला होने वाला कर्त्तव्य .... नहीं है। संस्कृतियों की विविध .... से देवमानव .... तथा विश्व को सभ्यताओं धाराओं को जन्म .... आज अपने सपूतों ..... का पाठ पढ़ाने वाला .... ।

अपने को भारतीय संस्कृति का सपूत कहने का पवित्र कर्त्तव्य है कि इस पुकार को तदनुसार आचरण करने के लिए अग्रिम पंक्ति .... ।


मस्तिष्कीय चेतना के बहुमुखी आयाम

मनुष्य शरीर में सबसे अधिक संवेदनशील एवं सक्रिय अवयव मस्तिष्क हैं। वह मात्र सोचने विचारने के ही काम नहीं आता वरन् उसमें उत्पन्न होने वाली विद्युत सम्पूर्ण शरीर का क्रिया संचालन करती है। अचेतन मस्तिष्क से संबंधित असंख्यों न्यूरौनल-फाइबर्स शरीर के प्रत्येक घटक तक पहुँचते हैं। उसकी सुव्यवस्था करते है, आवश्यक आदेश देते है तथा समस्याओं का समाधान करते है। सचेतन भाग द्वारा विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मन और बुद्धि द्वारा जो निर्णय किये जाते है, उनकी पूर्ति के लिए योजना बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने का उत्तरदायित्व उठाया जाता है। मस्तिष्क की स्थिति के अनुरूप व्यक्तित्व का निर्माण होता हैं और प्रगति का पथ-प्रशस्त होता है। इसके प्रखर होने पर ही मनुष्य प्रतिभावान बनता है, अनेक सफलताएँ अर्जित करता है। मस्तिष्क का स्तर मन्द होने पर वह मूर्ख कहलाता हैं और उसका चिंतन अनगढ़ ही बना रहता है।

जीवन के हर क्षेत्र को मस्तिष्क प्रभावित करता है। उसके स्तर के अनुरूप शारीरिक स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आते रहते है। मनोविकार स्वास्थ्य को गिराने और व्यक्तित्व को हेय बनाने के प्रधान कारण होते है। इसी प्रकार किसी के व्यक्तित्व की-गुण, कर्म, स्वभाव की .... आधार पर बनती है कि मस्तिष्क को किसी प्रकार प्रक्षित एवं अभ्यस्त किया गया।

इन्हें अब तक की खोजों के अनुसार यह माने के लिए पर्याप्त आधार .... गये है कि मनुष्य आकांक्षाओं .... अनुरूप अपनी मस्तिष्कीय शक्ति का किसी भी दिशा है। विकास करके कैसी भी सफलता प्राप्त कर सकता है। सोचने की विशेषता ने .... उसको क्रमशः समुन्नत सुरते हुए इस स्थिति तक पहुँचाया है जहाँ वह आज है। ... शिल्प, दर्शन,अध्यात्म,कला, शिक्षा, चिकित्सा आदि ज्ञान की अगणित धाराएँ ही .... विभूतियाँ है। इनका संग्रह करके मनुष्य सामान्य न रहकर सामान्य बनता है। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य जितना विकसित एवं साधन संपन्न दीखता हैं उसे मस्तिष्कीय विकास का चमत्कार-प्रतिफल ही कहना चाहिए।

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात न्यूरोसर्जन डा0 रोजर स्पैरी ने मानवी मस्तिष्क पर गहन अनुसंधान किया है। तत्पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि मनुष्य की आकांक्षा, विचारणा एवं भाव संवेदना का उसके मस्तिष्क से गहरा संबंध है। मस्तिष्कीय विकास के मूल में इन्हीं को कार्यरत देखा जा सकता है। उनके अनुसार मस्तिष्क के दो भाग है जिन्हें क्रमशः दांये एवं बांये गोलार्द्ध-हेमीस्फीयर के नाम से जाना जाता है। इनमें बांये भाग को विचार-बुद्धि द्वारा तथा दांये भाग को भाव संवेदनाओं द्वारा प्रभावित-नियंत्रित देखा गया है। शरीर शास्त्रियों को भी अब लगभग यही मान्यता बनती जा रही है कि बायाँ गोलार्द्ध बुद्धि या वाणी का तथा दांया गोलार्द्ध भावना संवेदनशीलता तथा कला कौशल उस क्षेत्र की प्रतिभा-सम्पदा को हस्तगत किया जाता है।

मस्तिष्क के दोनों भाग सामान्य स्थिति में एक सेतु से जुड़े होते है। जिसे कार्पस कैलोजम कहते है। इसी के कारण जानकारियों-भाव संवेदनाओं का आदान-प्रदान होता रहता है। दोनों गोलार्द्धों को समान रूप से क्रियाशील बनाक ही कोई व्यक्ति अपनी समग्र क्षमता का बहुमुखी प्रतिभा का विकास कर पाने में सफल होता है।

शरीर के अन्यान्य अंग-अवयवों को मनुष्य अपनी इच्छानुसार मोड़ने में एक सीमा तक ही सफल हो सकता है, पर मस्तिष्क के संबंध में बात दूसरी है। उसे सुधारा-बदला ही नहीं उलटा तक किया जा सकता है। इस दृष्टि से वह जितना सशक्त और महत्वपूर्ण हैं, उतना ही कोमल थी। जिस प्रकार आहार का शरीर क्रम के साथ भारी संबंध है, उसी प्रकार आकांक्षा, चिंतन प्रक्रिया और संकल्प शक्ति मनःसंस्थान को प्रभावित करती है। संसार में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए है जिनका आरंभिक जीवन साधारण ही नहीं निम्न स्तर का भी था, किन्तु जब उनने अपने आपे को उच्चस्तरीय बनाने-मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ाने का निश्चय कर लिया तो अभ्यस्त आदतें जो परिवर्तन स्वीकारने में आना-कानी करती थी, संकल्प शक्ति के दबाव से आमूल-चूल परिवर्तित होगी। सामान्य व्यक्ति असामान्य बन गये। कालिदास, वरदराज आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें उनकी आरंभिक स्थिति देखते हुए अनुमान होता था कि ये सदा मूर्ख रहेंगे। विद्याध्ययन में भी इन्हें सफलता न मिलेगी। पर जक उनसे संकल्प पूर्वक विद्वान बनने का निश्चय किया तो प्राकृतिक संरचना को उलटकर इतनी तीक्ष्णता अर्जित कर ली कि सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक ऊंचे स्तर के विद्वान बन गये। अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के बारे में कहा जाता है कि अपने बाल्यकाल में बड़े ही रुग्ण, संकोची, मंदबुद्धि और एकाकी प्रकृति के थे, किन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ जब उनने अपने चिंतन प्रक्रिया में परिवर्तन किया तो न केवल विद्वान बने वरन् महानता के उच्च शिखर पर जा पहुँचे। यही बात महात्मा गांधी के बारे में भी है। विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन के मस्तिष्क का भार सामान्य जनों के समतुल्य एवं संरचना भी वैसी ही थी। पर उनने अपने मानसिक क्षमता असामान्य स्तर तक बढ़ा ली थी।

समझदारी का मस्तिष्क के वजन से कोई सीधा संबंध नहीं है अन्यथा मनुष्य की बुद्धिमत्ता पिछले दस हजार वर्षों में प्रायः सौगुनी अधिक विकसित हुई है। यदि भार और विस्तार से इसका संबंध होता तो उसका सिर उसी अनुपात से बड़ा दिखाई देता। वस्तुतः मानवीय बुद्धिमत्ता का रहस्य इस बात में सन्निहित है कि उसके कपाल के भीतर भरी मज्जा के अंतर्गत सूक्ष्म घटक न्यूरान्स कितने है और वे परस्पर कितनी सघनतापूर्वक एक दूसरे के पूरक बनते है। वे जितने सूक्ष्म, जितने अधिक सक्रिय और जितने सक्षम होते है उसी अनुपात से बुद्धिमत्ता का विकास होता है। यह घटक अगणित वर्गों के है और उन्हीं के वर्ग विकास पर मानसिक गतिविधियों का निर्धारण होता है।

तंत्रिका विशेषज्ञों का कथन है कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता का अनुमान उसकी मस्तिष्कीय संरचना को देखकर लगाया जा सकता है। प्रायः जन्म के समय बच्चे का मस्तिष्क अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक भारी होता है, तदुपरान्त मस्तिष्क का स्थूल भाग तो कम बढ़ता है पर स्नायुतंत्र में आमूल-चूल परिवर्तन-अभिवृद्धि देखने को मिलती है। शैशव काल में मस्तिष्क के बाह्य भाग का लिबलिबापन बुद्धिमत्ता का परिचायक माना जाता है। उसी में वह क्षमता सन्निहित होती है और आगे चलकर विकसित होती है। उसी भाग को अपनी इच्छानुसार क्रियाशील बनाकर मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न बन सकता है।

मूर्धन्य तंत्रिका विज्ञानी डा0 जे0 वी0 ल्यूकों की खोजों ने यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि मानवी मस्तिष्क स्वेच्छाचारी नहीं है। चिन्तन प्रक्रिया द्वारा उसकी दिशा उलटी जा सकती है और नई आदतों से उसे अभ्यस्त कराया जा सकता है। तिलचट्टे एवं बिल्ली-चूहों पर वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा उनके मस्तिष्कीय न्यूरोन्स की सिनेप्टिक हलचलों में हेर-फेर कर मानसिक स्तर पर फेर बदल करके दूसरी तरह सोचने के लिए विवश करने में उन्होंने काफी सफलता पाई है। इस प्रयोग में बिल्ली और चूहे अपनी परम्परागत दुश्मनी भूलकर साथ-साथ हिलमिल कर रहने लगे।

फ्राँसीसी वैज्ञानिक प्रो0 देल्गादों का कथन है कि मस्तिष्कीय चेतना को उलटा अथवा बदला जा सकता है। आदतों और अभ्यासों की उसी तरह काट छाँट की जा सकती है जैसे फोड़े-फुन्सियों की। किसी की नसों में रक्त चढ़ाने की तरह उसके मस्तिष्क में अच्छी आदतों का भी बाहर से प्रवेश करा सकना भी अगले दिनों संभव हो जायेगा।

मैंकग्रील विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी डा0 बेन्टल मिलनर एवं प्रसिद्ध तंत्रिका ने तंत्रिका तंत्र पर किये गये अपने .... उनके सहयोगियों के आधार पर यह निष्कर्ष .... विभिन्न प्रयोग परीक्षणों प्रत्येक गोलार्द्ध अपने आप में प्रबल क्षमता सम्पन्न है। यह दोनों ही भाग अलग-अलग काम करते रहने में भी सक्षम है। इस संदर्भ में .... न्यूरोसर्जन डा0 बोगेन का कहना है कि मस्तिष्कीय क्रिया कलापों के अतिरिक्त उसका दांया भाग शरीर के बांये अंग का तथा बायाँ भाग दायें अंग का नियंत्रण करता है। एक को भाषा की जानकारी है लेकिन दिशा ज्ञान की नहीं, जबकि दूसरे भाग को दिशा ज्ञान तो है, पर भाषा-ज्ञान नहीं है। एलेक्ट्रोएनसिफैलोग्राम द्वारा मस्तिष्कीय तरंगों के अनुलेखन से भी यह प्रमाणित हो चुका है कि मस्तिष्क के दोनों भाग भिन्न-भिन्न प्रकार की क्षमताओं से सम्पन्न है। इनका समुचित एवं समन्वित विकास ही मानवी जीवन में संतुलन बिठाने एवं बहुमुखी प्रतिभा प्रदान करने में सफल हो सकेगा।

वैज्ञानिकों ने विगत कुछ वर्षों में हुई स्नायु विज्ञान संबंधी खोजों से यह निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति के सहारे भावनाओं पर नियंत्रण, उनका नियमन एवं बौद्धिक क्षमता का विस्तरण कर सकता है। व्यक्तित्व के समग्र विकास का यही सरलतम राजमार्ग हैं। कुछ विरले व्यक्ति ही ऐसे होते है जो दोनों प्रकार की चिंतन धाराओं को अपनाते और व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास करके पूर्णता प्राप्त करते है।

प्रायः लोग बौद्धिक क्षमता के विकास को ही प्रमुखता देते है जिससे उनके मस्तिष्कीय विकास की दिशा एकाँगी हो जाती है। विद्वान लेखक द्वय जैकलीन वन्डर एवं प्रिसिला डोनोवल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “होल ब्रेन थिंकिंग” में बताया है कि स्प्लिट पबन विभाजित मस्तिष्क के अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो चुका है कि भौतिकवादी इस युग में अधिसंख्य लोग प्रत्यक्ष उपलब्धियों को ही सब कुछ मानते है, परोक्ष को नहीं। इस तरह के बौद्धिक चिंतन से उनके मस्तिष्क का बायाँ भाग अधिक सक्रिय एवं प्रभावी हो गया है। बौद्धिक विकास जब अपनी चरम अवस्था में पहुँच जाता है। तो ऐसी स्थिति में भावनात्मक स्त्रोत सूखने लगते है और मस्तिष्क के ..... दोनों भागों में असंतुलन पैदा हो जाता है। इसी प्रकार भावनाएँ भी मस्तिष्क को अनेकों प्रकार से प्रभावित करती है। मनुष्य के खण्डित व्यक्तित्व का मूल कारण यही है। मानसिक रोगों का कारण भी यही असंतुलन है।

वर्तमान समय की मूल तपस्या मनोविकारों की हैं। चिन्ता, भय, आशंका, असंतोष, अविश्वास, ईर्ष्या, द्वेष, आत्महीनता, अपराधी, मनोवृत्ति आदि विश्वव्यापी समस्या बन गयी है। मस्तिष्क के दोनों भागों पर समान नियंत्रण न होने से मानसिक संतुलन का गड़बड़ा जाना स्वाभाविक भी हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस बिगड़े असंतुलन को साहित्य, संगीत, कला, अध्यात्म से जुड़ी सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ अपनाकर दूर किया जा सकता है। इससे ने केवल प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती है वरन् मस्तिष्क का दाहिना भाग भी सक्रिय होता प्रबल बनता चला जाता है। आत्मिकी का आश्रय लेकर भावना, संवेदनशीलता आदि सद्गुणों की अभिवृद्धि की जा सकती है। जिनका दांया मस्तिष्क विकसित है उन्हें बांये भाग को सक्रिय बनाने एवं संतुलन बिठाने का प्रयत्न करना चाहिए।

प्राचीनकाल में योग विज्ञान ने मस्तिष्कीय शक्ति को अभीष्ट दिशा में मोड़ने व विकसित करने की पद्धति विकसित करली थी और उस विज्ञान से लाभ भी उठाया गया है। आधुनिक विज्ञान भी अब अपने ढंग से इस दिशा में प्रयोग अनुसंधान कर रहा है। स्वीडेन के गोथेन वर्ग यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक होलगर हाइडन ने यह सिद्ध किया है कि मानवी मस्तिष्क की स्थिति पत्थर की लकीर नहीं है। उसकी क्षमता को रासायनिक पदार्थों की सहायता से घटाया-बढ़ाया और सुधारा-बिगाड़ा जा सकता है। कनाडा के डा0 विल्डर ऐनफील्ड, फ्राँस के प्रोफेसर देल्गादो, टैक्सास विश्वविद्यालय के रावर्ट थाम्पसन आदि वैज्ञानिकों ने अपने अपने विभिन्न प्रयोग परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध कर दिखाया कि विद्युत उपकरणों की सहायता मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को बिजली के झटके देकर आदतों एवं अभ्यासों को बदला जा सकता हैं तथा मस्तिष्कीय क्षमता को घटाया बढ़ाया जा सकता है।

बुखारेस्ट-रोमानिया के विख्यात चिकित्सा विशेषज्ञ डा0 आई0एन॰ रीगा ने श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया को नियंत्रित एवं नियमित करके मानसिक असंतुलन को दूर करने में सफलता पाई है। सैन डिआगो के “बिहैवियोरल न्यूरोबायोलाँजी” के डैविस अनुसंधान केन्द्र में भी इसी प्रकार के प्रयोग परीक्षण चल रहे है।

भारतीय योग शास्त्रों में मस्तिष्कीय गोलार्द्धों में परिवर्तन की प्रक्रिया का संबंध प्राणायाम साधना से बिठाया गया है। प्राणयोग के सम्पादन से अपने मस्तिष्क के दोनों भागों को सबल सक्रिय बनाकर न केवल बौद्धिक एवं भावनात्मक क्षमताओं में संतुलन बिठाकर समग्र प्रगति का द्वार खोला जा सकता है वरन् दिव्य क्षमताओं-अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का स्वामी भी बना जा सकता है। यह राजमार्ग अध्यात्म पथ के सभी जिज्ञासु पथिकों के लिए खुला पड़ा है।


आत्मिक प्रगति का सर्वोपरि आधार श्रद्धा

जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र में अग्नि की शक्ति को प्रमुख माना गया हैं, उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र की ऊर्जा श्रद्धा द्वारा उपलब्ध होती हैं। किसी तथ्य को समझने में तर्क और प्रमाण की आवश्यकता होती हैं। किसी निश्चय -निर्णय पर पहुँचने के लिए प्रमाण और उदाहरणों की जरूरत पड़ती हैं। समाधान हो जाने पर उस निश्चय को कार्यान्वित करने के लिए संकल्प शक्ति का प्रयोग करना पड़ता हैं, ताकि मन की चंचलता उसे उतावले बालक की तरह छोड़नी न पड़े । मान का स्वभाव बन्दर जैसा है। उसमें जल्दी-जल्दी काम बदलने की आतुरता पाई जाती हैं, इसलिए उसकी रोकथाम करके नियत काम में लगाये रहने के लिए अनुशासन की लगाम लगाये रहनी पड़ती हैं, अन्यथा समय साध्य कामों में चंचलता प्रदर्शित करने से वे बीच में ही छूट जाते हैं। उतावली निराशा में बदल जाती हैं। चिरस्थायी वट वृक्ष विकसित होने में देर लगती हैं। बाजीगर हथेली पर सरसों जमा सकते है, पर माली विशाल वृक्षों का उद्यान उतनी जल्दी लगा देने का वायदा नहीं कर सकता। ताश का महल तुरन्त भी खड़ा किया जा सकता हैं, पर किसी सुनियोजित नगर को बसा देना समय साध्य हैं। आत्मिक प्रगति के बार में भी यही बात हैं। इसलिए उस दिशा में कदम बढ़ाने वाले को संकल्प करना होता हैं कि इतना तो पूरा करके ही रहा जायेगा, चाहे असुविधा का सामना ही क्यों न करना पड़े ?

प्रसिद्ध दार्शनिक चिन्तक मूर का मत हैं कि अच्छे काम को करने में धन की आवश्यकता कम पड़ती हैं, परÞक्क्कहृह्य द्दभ्ठ्ठ; क्द्मस्द्भ द्यड्डस्रंघद्ब स्रद्ध क्द्ध/द्मस्रव ्न ;द्द ,स्र द्यह्नद्धह्वद्ध'श्चह् ह्स्न; ,शड्ड द्बद्भद्धद्धम्द्मह् द्बभ्;द्मह्यफ् द्दस्ड्ड द्धस्र द्धह्लद्य स्रर्द्म; स्रह्य द्बद्धहृह्य द्गह्वद्मह्य;द्मह्यफ् द्बर्ख्शंस्र ड्ढक्कहृद्म 'द्मद्धु स्रह्य द्यद्मस्नद्म ब्फ्द्म ह्लद्मह्द्म द्दस्ड्ड] शद्द ॥द्मब्द्ध ॥द्मद्मड्डद्धह् द्बख्द्भद्म द्दद्मह्यस्रद्भ द्भद्दह्द्म द्दस्ड्ड्न द्यद्मड्डद्यद्मद्धद्भस्र क्स्नद्मशद्म क्द्म/;द्मद्धक्रद्गस्र द्दद्भ म्द्मह्य= द्गह्यड्ड ;द्द ष्द्मह् ब्द्मफ्ख् द्दद्मह्यह्द्ध द्दस्ड्ड्न

द्यड्डठ्ठह्यद्दद्मह्यड्ड स्रद्म] द्धह्लय़द्मद्यद्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म द्यद्गद्म/द्मद्मह्व द्धह्व'श्च; द्बद्भ द्बद्दह्नँश्चह्वह्य द्यह्य द्बद्दब्ह्य द्दद्ध स्रद्भ ब्ह्यह्वद्म श्चद्मद्धद्द, ]ह्द्मद्धस्र क्ह्वह्यस्र द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्य द्गह्&द्गह्द्मह्द्भद्मह्यड्ड द्गह्यड्डड्ड ष्द्दस्र स्रद्भ क्द्यद्गड्डह्लद्य द्गह्यड्ड ह्व द्बरु+ह्वद्म द्बरु+ह्य्न द्भद्मरुह्ह्य क्ह्वह्यस्र द्दस्ड्ड] द्बद्भ द्वह्वद्गह्यड्ड द्यह्य ,स्र द्बद्भ द्दद्ध श्चब्द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस्ड्ड] द्धश्चद्धस्रक्रद्यद्म ,स्र द्यह्य द्दद्ध स्रद्भद्म;द्ध ह्लद्मह्द्ध द्दस््न म्द्म.द्म&म्द्म.द्म द्गह्यड्ड द्धश्चद्धस्रक्रद्यस्र क्द्मस्द्भ द्वद्बश्चद्मद्भ ष्ठ्ठब्ह्ह्य द्भद्दह्वह्य द्यह्य द्भद्मह्यफ्द्ध स्रद्ध द्दद्मद्धह्व द्दद्ध द्दद्मद्धह्व द्दस्ड्ड्न ड्ढद्यद्धब्, ह्लद्मह्य स्रठ्ठद्ग द्वक्चद्म;ह्य ह्लद्म;] द्गह्लष्ख्ह्द्ध द्यह्य द्वक्चद्म;ह्य ह्लद्म;्न ब्द्मह्यस्र ह्र;शद्दद्मद्भ स्रद्ध ह्द्भद्द ;द्दद्ध ष्द्मह् क्/;द्मक्रद्ग द्बभ्;द्मह्यह्लह्वद्मह्यड्ड स्रह्य द्धब्, ॥द्मद्ध द्यद्दद्ध द्धद्य) द्दद्मह्यह्द्ध द्दस्ड्ड्न

द्गह्वद्मह्यशस्य़द्मद्धह्वस्र ,रुफ्द्भ स्रद्म द्गह् द्दस्ड्ड द्धस्र द्दह्य; स्रद्गर्द्मंह्य स्रद्ध क्द्मह्यद्भ ह्द्मह्य द्गह्व स्रद्ध रुशद्म॥द्मद्मद्धशस्र द्बभ्शक्वद्धनद्म द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्वद्यह्य द्धद्य[द्मद्मह्वह्य स्रद्ध ॥द्मद्ध क्द्मश';स्रह्द्म ह्वद्दद्धड्ड द्बरु+ह्द्ध्न ष्क्कश्चद्म द्बस्ठ्ठद्म स्रद्भह्वह्य स्रद्ध द्धय;द्म ह्द्मह्य द्ब'द्मह्न द्बम्द्मद्ध ॥द्मद्ध द्यद्ग; क्द्मह्वह्य द्बद्भ क्ह्त्न द्बभ्ह्यद्भ.द्मद्म स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ द्यद्ध[द्म ह्लद्मह्ह्य द्दस्ड्ड] द्बद्भ द्यड्डफ्द्धह्&द्ध'द्मंघद्ब स्रह्य द्यश्वष्/द्म द्गह्यड्ड ,ह्यद्यद्ध ष्द्मह् ह्वद्दद्धड्ड द्दस्ड्ड्न द्वद्यस्रह्य द्धब्, क्/;द्मद्बस्र श्चद्मद्धद्द, क्द्मह्यद्भ द्यद्मस्नद्म द्दद्ध ब्फ्ह्व द्बर्ख्शंस्र क्॥;द्मद्य ॥द्मद्ध श्चब्ह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न द्यद्म/द्मह्वद्म ,ह्यद्यद्म द्दद्ध द्वक्कश्चरुह्द्भद्ध; स्रक्वक्र; द्दस्ड्ड] द्धह्लद्यह्य ;द्धठ्ठ ॥द्मद्मशद्मशह्य'द्म द्गह्यड्ड क्द्मद्भश्व॥द्म द्धस्र;द्म ह्लद्मह्द्म द्दस्ड्ड क्द्मस्द्भ ;द्मह्यह्लह्वद्मष्) द्धस्रद्य द्बभ्स्रद्मद्भ द्भ[द्मद्म ह्लद्म;] ;द्द स्रर्द्म;यद्ग ह्वद्दद्धड्ड ष्ह्वद्म;द्म ह्लद्मह्द्म ह्द्मह्य द्वद्यस्रद्म द्बख्द्भद्म द्दद्मह्यह्वद्म क्द्मस्द्भ द्बद्मद्भ द्दद्मह्य द्बद्मह्वद्म स्रद्धक्चह्व द्दस््न

;द्द शद्द क्द्म/द्मद्मद्भ द्दस्] ह्लद्मह्य ॥द्मद्मस्द्धह्स्र क्द्मद्भ क्द्म/;द्मद्धक्रद्गस्र द्य॥द्मद्ध स्रद्म;र्द्मंह्य द्बद्भ द्यद्गद्मह्व :द्ब द्यह्य ब्द्मफ्ख् द्दद्मह्यह्द्म द्दस्ड्ड] द्धस्रह्ह्नह्न द्यद्म/द्मह्वद्म म्द्मह्य= द्गह्यड्ड द्वह्द्भह्वह्य शद्मब् स्रद्म क्द्बह्वद्म क्द्मँशद्मँ ..... ,स्र द्धश'द्मह्य"द्म द्बभ्स्रद्मद्भ स्रद्ध टह्लर्द्मं स्रद्म ..... द्गह्यड्ड द्बरु+ह्द्म द्दस्ड्ड] क्द्मस्द्भ शद्द द्दस् & छ्व)द्म ..... क्शब्श्वष्ह्व ब्ह्यह्वद्म स्रद्दह्ह्य स्नद्मह्य] *द्यठ्ठ−द्धशश्चद्मद्भ द्बद्भ ..... क्शब्श्वष्ह्वट्ट ्न द्धशह्वद्मह्यष्द्म वछ्व)द्मÞ द्दस््न ;द्दद्ध छ्व)द्म द्गह्वह्न"; स्रद्मह्य ष्ठ्ठब् ठ्ठह्यह्द्ध द्दस्ड्ड] द्यष् ह्द्भद्द द्यह्य द्बभ्ह्यद्भ.द्मद्म ठ्ठह्यह्द्ध द्दस्ड्ड क्द्मस्द्भ द्वद्यस्रह्य ह्लद्धशह्व स्रद्मह्य द्यद्मस्नर्द्मंस्र ष्ह्वद्मह्द्ध द्दस्ड्ड्नट्ट&द्भद्मद्गद्म;.द्म ..... द्गह्यड्ड *॥द्मशद्मह्वद्ध 'द्मड्डस्रद्भद्मस्& शठ्ठह्य&छ्व)द्म द्धश'शद्मद्य:द्धद्ब.द्मद्मस्ड्डव स्रद्द स्रद्भ द्धश'शद्मद्य स्रद्मह्य द्ध'द्मश स्रद्ध क्द्मस्द्भ छ्व)द्म स्रद्मह्य द्बर्द्मशंह्द्ध स्रद्ध द्वद्बद्गद्म ठ्ठद्ध द्दस्ड्ड] ह्लद्मह्य द्यठ्ठद्म द्यद्मस्नद्म&द्यद्मस्नद्म द्भद्दह्ह्य द्दस्ड्ड्न द्यद्मस्नद्म द्दद्ध ;द्द ॥द्मद्ध स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस्ड्ड द्धस्र ड्ढह्वस्रद्ध द्यद्दद्म;ह्द्म स्रह्य द्धष्ह्वद्म क्द्बह्वह्य क्ह्द्भद्मब् द्गह्यड्ड द्धशस्त्रद्गद्मह्व द्बद्भद्गद्मक्रद्गद्म स्रह्य ठ्ठ'र्द्मंह्व ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्य द्यस्रह्ह्य्न द्धश'शद्मद्य द्गह्यड्ड द्धह्व'श्च; स्रद्म ॥द्मद्मश द्दस्ड्ड्न द्धश'शद्मद्य द्दद्मह्यह्वह्य द्बद्भ द्गह्व ॥द्मंकस्रह्द्म ह्वद्दद्धड्ड्न ,स्र द्धह्व.र्द्मं; स्रद्भ ब्ह्यह्द्म द्दस्ड्ड क्द्मस्द्भ द्धह्व/द्मर्द्मंद्धद्भह् द्गद्मफ् द्बद्भ श्चब् द्बरु+ह्द्म द्दस््न द्यद्मड्डद्यद्मद्धद्भस्र द्बभ्;द्मह्यह्लह्वद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यक्तब्ह्द्म ह्स्र द्बद्दह्नँश्चह्वह्य स्रह्य द्धब्, य़द्मह्व क्द्मस्द्भ स्रर्द्गं स्रद्म द्यद्गश; द्दद्ध द्ब;र्द्मंढ्ढह् द्दस्ड्ड] द्बद्भ क्/;द्मक्रद्ग ड्ढद्यद्यह्य ,स्र द्यद्ध य़द्मह्व द्गद्धरुह्"स्र स्रद्म क्द्मस्द्भ स्रर्द्गं 'द्मद्भद्धद्भ स्रद्म द्धश"द्म; द्दस्ड्ड्न क्/;द्मक्रद्ग स्रद्म द्वठ्ठ−फ्द्ग ड्ढद्यद्यह्य टँश्चद्म द्दस््न ;द्द फ्ड्डफ्द्मह्य=द्ध छ्व)द्म स्रह्य फ्द्मह्यद्गह्न[द्म द्यह्य द्बभ्रुक्तह्नद्धंकह् द्दद्मह्यह्द्ध द्दस्ड्ड्न छ्व)द्म स्रद्म ॥द्मद्मश&द्यड्डशह्यठ्ठह्वद्म स्रद्म द्धद्गछ्व.द्म द्भद्दह्द्म द्दस्ड्ड्न द्बभ्ह्यद्ग स्रद्म क्शब्श्वष्ह्व] द्भद्य स्रद्ध क्ह्वह्न॥द्मख्द्धह् ;द्दद्ध छ्वक्व)द्म स्रद्ध ह्र;द्म[;द्म द्दस््न द्वद्यस्रह्य द्यद्धश्वद्गद्धब्ह् द्दद्मह्य ह्लद्मह्वह्य द्बद्भ द्धशश्चद्मद्भद्मह्यह्यड्ड स्रद्ध] ह्स्र स्रद्ध] द्धश'शद्मद्य स्रह्य द्वब्क&द्बह्नब्क स्रद्ध स्रद्मह्यर्ड्ढं क्द्म'द्मड्डस्रद्म ह्वद्दद्धड्ड द्भद्दह्द्ध्न क्ह्त्नस्रद्भ.द्म स्रद्ध फ्द्दद्भद्मर्ड्ढं ह्स्र द्धह्लद्य छ्व)द्म ह्वह्य द्बभ्शह्य'द्म द्बद्म द्धब्;द्म द्दस्ड्ड] द्वद्यद्ध स्रह्य द्भड्डफ् द्गह्यड्ड द्यख्द्गख्श्चद्ध श्चह्यह्ह्वद्म फ्द्धह्द्म स्रद्म स्रस्नद्मह्व द्दस्ड्ड & छ्व)द्म द्ग;द्मह्यंग;ड्ड द्बह्न:"द्मद्मह्यड्ड ;द्मह्यड्ड ;क्कहृह्न)त्न द्य ,शड्ड द्यत्न ्न क्स्नद्मर्द्मंह्− ;द्द द्गह्वह्न"; छ्व)द्म द्बद्भ क्शब्द्धश्वष्ह् द्दस्ड्ड्न द्धह्लद्यस्रद्ध ह्लस्द्यद्ध छ्व)द्म द्दस्] शद्द शस्द्यद्म द्दद्ध ष्ह्व ;द्म छ्व)द्म द्बभ्;क्रह्व द्बर्ख्शंस्र ह्लद्गद्मह्वद्ध द्बरु+ह्द्ध द्दस्ड्ड्न फ्ड्डफ्द्म ठ्ठह्यशद्ध द्दस््न .... ठ्ठह्यशद्मक्रद्गद्म द्दस्ड्ड्न ड्ढ"क ठ्ठह्यश स्रद्ध द्यनद्मद्म द्यह्नद्धह्वद्ध'श्चह् द्दस््न .... द्गह्यड्ड द्बभ्द्धह्द्गद्म क्स्नद्मशद्म फ्ह्न: स्रह्य द्गद्म/;द्ग द्यह्य क्द्बह्वद्ध ॥द्मद्मशह्वद्मक्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ह्लद्गद्मह्वद्म क्द्मस्द्भ द्बस्रद्मह्वद्म द्बरु+ह्द्म द्दस्ड्ड्न द्धह्लद्यह्य ड्ढद्यद्गह्यड्ड .... द्धद्गब् फ्;द्ध] द्यद्ग>ह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र ड्ढ"क द्बभ्द्मद्धढ्ढह् स्रद्ध .... द्गड्डद्धह्लब् द्बद्मद्भ द्दद्मह्य फ्ड्ढ्न छ्व)द्म स्रह्य क्॥द्मद्मश द्गह्यड्ड फ्ड्डफ्द्म ,स्र ह्वठ्ठद्ध] द्धद्दद्गद्मब्; द्बक्रस्नद्मद्भद्मह्यड्ड श श"र्द्मं स्रद्म द्यद्गह्नक्कश्च;] ठ्ठह्यश&द्बभ्द्धह्द्गद्म द्ध[द्मब्द्मस्ह्वद्म] क्द्मस्द्भ फ्ह्न: द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म रुह्द्भ स्रद्म द्गह्वह्न"; द्गद्म= द्दस्ड्ड्न ह्ष् ॥द्मफ्शद्मह्व− ॥द्मद्ध द्बभ्स्रक्वद्धह् ह्र;शरुस्नद्मद्म स्रद्म ,स्र क्ठ्ठक्व'; द्धह्व;द्ग ॥द्मद्भ द्गद्मब्ख्द्ग द्बरु+ह्द्म द्दस्ड्ड्न

छ्व)द्म द्बभ्द्म.द्म द्दस्ड्ड क्द्मस्द्भ रुश:द्ब द्वद्यस्रद्म स्रब्ह्यशद्भ्न छ्व)द्म द्दद्मह्य ह्द्मह्य फ्द्म; क्द्मस्द्भ ष्स्रद्भद्ध द्गह्यड्ड स्रद्मह्यर्ड्ढं क्ह्द्भ ह्वद्दद्धड्ड द्भद्द ह्लद्मह्द्म ्न द्गड्ड= ॥द्मद्ध क्म्द्मद्भद्मह्यड्ड स्रद्म द्यद्गह्नक्कक्कद्म; द्दद्ध द्बभ्ह्द्धह् द्दद्मह्यह्ह्य क्द्मस्द्भ द्वह्वस्रद्म ह्लद्मह्य 'द्मष्टठ्ठद्मस्नर्द्मं द्धह्वस्रब्ह्द्म द्दस्ड्ड द्गद्म= द्वह्ह्वद्म ॥द्मद्भ द्दद्ध द्वद्यस्रद्म द्गद्दक्रश द्बभ्ह्द्धह् द्दद्मह्यह्द्म द्दस्ड्ड्न ह्ष् ;य़द्मद्धंगह्व क्द्मस्द्भ द्बक्रस्नद्मद्भ स्रह्य स्रद्मह्य;ब्ह्य शद्मब्द्ध क्फ्द्धक्चद्ध द्गह्यड्ड स्रद्मह्यर्ड्ढं क्ह्द्भ ह्वद्दद्धड्ड द्भद्द ह्लद्मह्द्म्न /द्मद्मद्धर्द्गंस्र स्रर्द्गंस्रद्म.रुद्मह्यड्ड स्रद्म ॥द्मद्ध 'द्मद्मद्भद्धद्धद्भस्र छ्वद्ग ;द्म द्यद्म/द्मह्व&द्यञ्जह्लद्म स्रह्य क्ह्वह्न:द्ब द्दद्ध द्गख्घ; द्गद्मब्ख्द्ग द्बरु+ह्द्म द्दस््न द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं स्रद्मह्य ;द्म द्गद्म;ह्द्म स्रद्मह्य ॥द्मद्मशह्वद्मद्बख्.र्द्मं ष्ह्वद्मह्वह्य क्द्मस्द्भ ठ्ठह्यश द्यद्मद्धह्व/द्म; ह्लस्द्यद्ध द्वद्गड्डफ्ह्य द्वक्चह्द्ध द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड्न ड्ढद्दद्धड्ड द्वद्गड्डफ्द्मह्य स्रद्म ह्वद्मद्ग ॥द्मद्धु ॥द्मद्मशह्वद्म द्दस््न ड्ढद्दद्धड्ड स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ॥द्मु स्रद्म ॥द्मफ्शद्मह्व− द्यह्य ह्द्मठ्ठद्मक्रश्व; द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्म द्दस्ड्ड्न द्यद्गर्द्बं.द्म द्गह्यड्डक्द्बह्वद्म क्द्धरुह्क्रश द्दद्ध क्ब्फ् द्यह्य ह्वद्दद्धड्ड ष्श्चह्द्म्न ड्ढ"क ठ्ठह्यश स्रद्ध द्यद्गख्श्चद्ध द्यनद्मद्म द्दद्ध क्द्बह्वह्य टद्बद्भ हृद्म ह्लद्मह्द्ध द्दस्ड्ड्न

,स्रब्ह्र; ह्वह्य ठ्ठभ्द्मह्य.द्मद्मश्चर्द्म; स्रद्ध द्धश्वद्मंक−कद्ध स्रद्ध क्ह्वफ् द्गद्धद्भद्म स्रद्म द्धफ्द्भ/द्मद्भ फ्द्मह्यद्बद्मब् ,स्र हृद्मह्यंकद्म&द्यद्म द्बक्रस्नद्मद्भ स्रद्म कह्नस्ररु+द्म स्नद्मद्म] द्बद्भ द्वद्यद्ध द्गह्यड्ड ॥द्मफ्शद्मह्व द्बभ्स्रंक द्दद्मह्यस्रद्भ द्वद्यस्रह्य द्वद्य द्बभ्स्रद्मद्भ क्/द्मद्धह्व द्दद्मह्य फ्;ह्य स्नद्मह्य द्धह्लद्यस्रह्य द्यश्वष्/द्म द्गह्यड्ड शद्द र्फ्शं द्बर्ख्शंस्र स्रद्दह्द्ध स्नद्मद्ध द्धस्र & ट्टद्य[द्मद्धद्भद्ध द्गस्ड्डह्वह्य द्धफ्द्भ/द्मद्भ ब्द्धह्वद्मह्य द्गद्मह्यब्* द्भद्म.द्मद्म ह्वह्य द्धश"द्म स्रद्म ढ्ढ;द्मब्द्म क्द्मस्द्भ द्यर्द्बं द्धद्बंकद्मद्भद्म ॥द्मह्यह्लद्म ह्द्मह्य द्गद्धद्भद्म ह्वह्य द्वद्दह्यड्ड द्यद्द"र्द्मं रुह्रद्मद्धस्रद्मद्भ द्धस्र;द्म] द्बद्भ द्वह्वस्रद्म द्धश"द्म द्धफ्द्भ/द्मद्भ फ्द्मह्यद्बद्मब् स्रह्य 'द्मद्भद्धद्भ द्गह्यड्ड श्चब्द्म फ्;द्म क्द्मस्द्भ द्गद्धद्भद्म द्दँद्यह्द्ध&[द्मह्यब्ह्द्ध द्भद्दद्धड्ड्न

द्भद्मद्गस्रक्व".द्म द्धह्लद्य स्रद्मब्द्ध स्रद्ध द्बख्ह्लद्म स्रद्भह्ह्य स्नद्मह्य] द्वह्वस्रह्य श्चद्गक्रस्रद्मद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध स्रद्मह्यर्ड्ढं फ्.द्मह्वद्म ह्वद्दद्धड्ड्न द्धशशह्यस्रद्मह्वठ्ठ स्रद्मह्य द्वद्यद्ध ह्वह्य ठ्ठ'र्द्मंह्व ठ्ठह्यस्रद्भ द्धह्वद्दद्मब् द्धस्र;द्म स्नद्मद्म्न ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड ह्वह्य स्रद्मब्द्ध स्रद्मह्य द्बद्भद्गद्दड्डद्य स्रह्य द्यद्मस्नद्म ॥द्मद्मह्यफ् ब्फ्द्मह्ह्य ठ्ठह्य[द्मद्म स्नद्मद्म्न ;द्द द्यष् छ्व)द्म स्रह्य श्चद्गक्रस्रद्मद्भ द्दस्ड्ड्न द्वद्यस्रह्य क्॥द्मद्मश द्गह्यड्ड ,स्रब्ह्र;] द्गद्धद्भद्म क्द्मस्द्भ द्बद्भद्गद्दड्डद्य स्रह्य द्दद्मस्नद्म द्गह्यड्ड द्धश्वद्मंक−कद्ध&द्बक्रस्नद्मद्भ स्रह्य क्द्मफ् ,स्र ह्र;द्धु स्रह्य द्बद्मद्य ,ह्यद्यद्म क्द्गक्वह् ह्लब् स्नद्मद्म द्वद्यस्रद्ध ,स्र ष्ख्ड्डठ्ठ द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म द्बद्मह्वद्ध द्गह्यड्ड द्धद्गब्द्मस्रद्भ द्धद्बब्द्मह्द्म ह्द्मह्य स्रद्धक्चह्व&द्यह्य&स्रद्धक्चह्व द्भद्मह्यफ् क्क्कहृह्य द्दद्मह्य ह्लद्मह्ह्य्न द्वद्यस्रद्ध [;द्मद्धह् ठ्ठख्द्भ&ठ्ठख्द्भ ह्स्र क्तस्ब्द्ध क्द्मस्द्भ द्दह्द्मद्भद्मह्यड्ड ह्र;द्धु द्धह्वक्र; ब्द्म॥द्म द्वक्चद्मह्वह्य स्रह्यद्धब्, क्द्मह्वह्य ब्फ्ह्य्न

द्वद्य ह्र;द्धु स्रह्य फ्ह्न: ह्वह्य क्द्बह्वह्य द्ध'द्म"; स्रद्ध द्बभ्'द्मड्डद्यद्म द्यह्नह्वद्ध ह्द्मह्य ष्द्दह्नह् श्चद्धस्रह् द्दह्न, क्द्मस्द्भ क्द्बह्वद्ध स्रर्ड्ढं ष्द्धद्गद्मद्धद्भ;द्मँ ठ्ठख्द्भ स्रद्भद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्वद्य ह्र;द्धु स्रह्य द्बद्मद्य द्बद्दह्नँश्चह्यड्ड द्वद्यह्वह्य क्द्मठ्ठ द्धस्र;द्म क्द्मस्द्भ शद्दद्ध ठ्ठशद्म द्धद्बब्द्म स्रद्भ द्वद्दह्यड्ड ॥द्मद्ध क्क्कहृद्म स्रद्भ द्धठ्ठ;द्म्न फ्ह्न: स्रह्य द्गह्व द्गह्यड्ड ;द्द द्धशश्चद्मद्भ क्द्म;द्म द्धस्र ;द्धठ्ठ ड्ढद्य ठ्ठशद्म स्रद्म ह्वह्नरु[द्मद्म द्गद्मब्ख्द्ग स्रद्भ द्धब्;द्म ह्लद्म; ह्द्मह्य द्दद्गह्यड्ड ॥द्मद्ध ,ह्यद्यद्ध द्दद्ध [;द्मद्धह् द्धद्गब्ह्य्न द्वह्वह्वह्य द्ध'द्म"; द्यह्य ठ्ठशद्म स्रद्म द्भद्दरु; द्बख्हृद्म] ह्द्मह्य द्ध'द्म"; ह्वह्य द्यक्कश्चह्य द्दभ्ठ्ठ; द्यह्य 'द्मद्बस्नद्म द्बर्ख्शंस्र ष्ह्द्म द्धठ्ठ;द्म द्धस्र ;द्द क्द्मद्बस्रह्य श्चद्भ.द्मद्मह्यड्ड स्रद्म /द्मद्मह्य;द्म द्बद्मह्वद्ध द्दस्ड्ड] द्धह्लद्यह्य द्गस्ड्ड द्दद्भ द्यद्मब् क्द्मद्बस्रद्ध द्यह्यशद्म द्गह्यड्ड द्वद्बद्धरुस्नद्मह् द्दद्मह्यस्रद्भ ,स्र ष्रुद्ध ष्द्मह्यह्ब् ॥द्मद्भ ब्द्मह्द्म द्दख् क्द्मस्द्भ द्वद्यद्ध स्रद्ध ,स्र&,स्र ष्ख्ठ्ठ स्रद्भ क्द्यड्ड[;द्मह्यड्ड स्रद्म ॥द्मब्द्म स्रद्भह्द्म द्दख््न

फ्ह्न: स्रद्मह्य क्द्बह्वद्ध स्रद्भद्मद्गद्मह् द्बद्भ ष्रु+द्म र्फ्शं द्दह्नक्द्म्न द्वह्वह्वह्य द्यद्मद्भह्य फ्द्मँश द्गह्यड्ड द्भद्मह्यफ् द्गह्नद्धु स्रद्ध ठ्ठशद्म ह्लद्मह्व ब्ह्यह्वह्य स्रद्ध ?द्मद्मह्य"द्म.द्मद्म स्रद्ध्न द्गद्भद्धह्ल क्द्म;ह्य्न द्वह्वह्वह्य ,स्र ष्रु+द्ध द्बद्भद्मह् द्गह्यड्ड क्द्बह्वह्य श्चद्भ.द्म /द्मद्मह्य;ह्य क्द्मस्द्भ ,स्र&,स्र स्रंकद्मह्यद्भद्म द्यष् स्रद्मह्य द्धद्बब्द्म;द्म] द्बद्भ स्रद्मह्यर्ड्ढं क्क्कहृद्म ह्व द्दह्नक्द्म] ह्द्मह्य द्य॥द्मद्ध द्वह्वद्यह्य ब्रु+ह्वह्य क्द्म;ह्य्न फ्ह्न: द्धक्तद्भ द्ध'द्म"; स्रह्य द्बद्मद्य द्बद्दह्नँश्चह्य क्द्मस्द्भ द्यक्तब्ह्द्म स्रद्म स्रद्मद्भ.द्म द्बख्हृद्म ह्द्मह्य द्वद्यह्वह्य द्यद्ध/द्मद्म&द्यद्मठ्ठद्म द्वनद्मद्भ द्धठ्ठ;द्म द्धस्र द्गह्यद्भह्य श्चद्भ.द्मद्मह्यठ्ठस्र द्गह्यड्ड छ्व)द्म स्रद्म फ्द्दद्भद्म द्बह्नंक क्द्मस्द्भ क्द्मद्बस्रह्य द्बस्द्भ /द्मद्मह्यशह्व द्गह्यड्ड क्द्दड्डस्रद्मद्भ स्रद्ध क्द्ध॥द्मह्र;द्धु द्दस््न ड्ढद्यद्धब्, ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड ,स्र शरुह्ह्न द्दद्मह्यह्ह्य द्दह्न, ॥द्मद्ध द्वह्वस्रह्य फ्ह्न.द्मद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ह्लद्गद्धह्व&क्द्मद्यद्गद्मह्व ह्लस्द्यद्म क्ह्द्भ द्दद्मह्य फ्;द्म्न द्यद्मद्गर्स्न; ह्लब् द्गह्यड्ड ह्वद्दद्धड्ड] छ्व)द्म द्गह्यड्ड द्यद्गद्मद्धद्दह् द्दस््न

,स्र क्द्मस्द्भ ॥द्मद्ध ,ह्यद्यद्ध द्दद्ध स्रस्नद्मद्म द्दस्ड्ड्न ,स्र द्यड्डह् फ्ड्डफ्द्म ह्क द्बद्भ द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य्न ह्वद्मश ह्व द्दद्मह्यह्वह्य द्बद्भ द्बद्मद्भ ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्मह्यड्ड स्रह्य स्रद्मह्व द्गह्यड्ड द्भद्मद्ग द्गड्ड= ष्ह्द्म ठ्ठह्यह्ह्य क्द्मस्द्भ स्रद्दह्ह्य ड्ढद्य ह्लद्बह्ह्य द्दह्न, द्बद्मद्भ द्धह्वस्रब् ह्लद्मह्वद्म्न ह्लद्मह्वह्य शद्मब्ह्य द्यद्दह्ल द्दद्ध द्बद्मद्भ द्वह्द्भ ह्लद्मह्ह्य्न

स्रह्नहृ ठ्ठख्द्भ ह्स्र ,स्र क्तस्रद्धद्भ द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य शह्य ॥द्मद्ध ,ह्यद्यद्म द्दद्ध श्चद्गक्रस्रद्मद्भ द्धठ्ठ[द्मद्मह्ह्य्न द्वह्द्भह्वह्य शद्मब्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य [द्मह्नठ्ठ स्रद्म ह्वद्मद्ग द्धद्य[द्मद्म ठ्ठह्यह्ह्य्न शह्य ॥द्मद्ध द्यष् द्बद्मद्भ द्धह्वस्रब् ह्लद्मह्ह्य्न

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Kahani

द्यख्[द्मद्ध द्धद्गंक−कद्ध ह्वह्य स्रह्नश्वद्दद्मद्भ द्यह्य स्रद्दद्म&द्गह्न>ह्य क्क्कहृद्ध द्दद्मड्डरुद्ध ष्ह्वद्म ठ्ठद्धद्धह्ल, द्धह्लद्यद्यह्य द्दद्भ स्रद्मह्यर्ड्ढं द्गख्घ; द्यद्ग>ह्य क्द्मस्द्भ स्रद्मद्ग द्गह्यड्ड ब्द्म;ह्य्न

स्रह्नश्वद्दद्मद्भ ह्वह्य स्रद्दद्म&;द्द द्दद्मह्य ह्द्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस्ड्ड द्बद्भ ड्ढद्यस्रह्य द्धब्, द्बद्मह्वद्ध द्गह्यड्ड रुख्ष्ह्वह्य] रुड्डरुह्य द्यह्य द्धद्बंकह्वह्य क्द्मस्द्भ श्चद्मस्र द्बद्भ ?द्मख्द्गह्वह्य क्द्मस्द्भ क्द्मँशद्मँ द्गह्यड्ड द्बस्रह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्भह्लद्मद्गड्डठ्ठ द्दद्मह्यह्वद्म द्बरुह्य+ह्यफ्द्म्न


क्रूरता को जीतिये, स्नेहमय सद्भाव से

बाहुबल और साधन शक्ति के द्वारा दूसरे व्यक्तियों को जितना प्रभावित किया जा सकता हैं, उससे असंख्य गुना अधिक स्नेह-सद्भाव से प्रभावित किया जा सकता हैं उन्हें वशवर्ती बनाया जा सकता है। उसका कारण यही हैं कि सारा संसार और उसका एक-एक घटक संघर्ष व टकराव के आधार पर नहीं, सद्भाव और घनिष्ठता के आधार पर ही परस्पर सुसम्बद्ध सुसंचालित है।

सद्भावनाओं को बढ़ाकर स्नेह और आत्मीयता का क्षेत्र विकसित कर दूसरों को प्रभावित करने में जितनी सफलता पाई गयी हैं उतनी संघर्ष, शक्ति प्रयोग और आक्रमण द्वारा कहीं भी नहीं मिली है। आत्मीयता और सौजन्य, करुणा और वात्सल्य के आगे मनुष्य को क्रूरता छोड़ने और साधु प्रकृति का बनने के उदाहरण नारद और बुद्ध के समय से चले आ रहें है। कितने ही दुर्दान्त-क्रूर और हत्यारे व्यक्ति आज भी सद्भाव सम्पन्न आत्माओं के संपर्क में आकर अपना स्वभाव बदलते देखे सुने जाते हैं। स्नेह सद्भाव अर्थात् प्रेमपूर्ण अन्तःकरण का प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं पशु पक्षियों पर भी पड़ता है। मनुष्य चाहे तो हिंस्र पशुओं को भी अपने बच्चों के समान प्रिय बना सकता है।

विजय प्रेम की होती हैं- घृणा की नहीं। जीत करुणा की सद्भावना की होती हैं। हिंसा या क्रूरता की नहीं। .... का विश्लेषण और उनके सही गलत होने का इन तथ्यों .... आधार पर नहीं किया जा सकता वरन् निर्णय तर्क के .... कुछ साहसी और सद्भाव सम्पन्न व्यक्तियों ने इस तरह के प्रयोग किये भी हैं कि क्या जन्मजात हिंसक प्रवृत्ति के क्रूर स्वभाव वाले पशुओं को ... सद्भाव के द्वारा वशवर्ती किया तथा इस शक्ति के आधार पर उन्हें सौम्य प्रकृति का बनाया जा सकता हैं ? क्या कोई प्राणी अपने मूल स्वभाव को छोड़कर स्नेह तथा सौजन्य से प्रभावित हो सकता हैं ? और अपने आप को तद्नुरूप बदल सकता हैं। इस तरह के परीक्षणों से जो निष्कर्ष सामने आये हैं उनसे यही सिद्ध होता हैं कि प्रेम तथा आत्मीयता की अपनी विशिष्ट शक्ति है और उसके द्वारा क्रूर से क्रूर हिंसक स्वभाव को भी बदला जा सकता हैं। क्रूरता और हिंसा पर प्रेम से विजय प्राप्त की जा सकता है।

इस तथ्य को प्रतिपादित करने में एक .... महिला सबसे अग्रणी रहीं है। अफ्रीका के तंज़ानिया क्षेत्र में उसने प्रायः एक दर्जन शेल पाले थे और उन्हें कुत्तों की तरह आज्ञाकारी बना लिया था। लंदन में ऐसा हो अद्भुत उदाहरण एक व्यक्ति ने प्रस्तुत किया और सिंह का वैसा ही दुलार प्राप्त किया जैसा बच्चे अपने अभिभावकों को प्रदान करते है। आत्मीयता गहरी होने पर इन खूंख्वार जानवरों को भी अपने पालकों का वैसा ही स्नेह-दुलार चाहिए जैसे मनुष्य अपने बच्चे को देता है। कुछ बच्चे तब तक नहीं सोते जब तक उन्हें माता की ममता पूरी थपथपी या मधुर लोरियाँ सुनने को न मिल जांय। कुछ ऐसी ही आदत टावर ऑफ लन्दन के एक पालतू शेर की थी। वह तब तक सोता नहीं था जब तक कि उसका संरक्षक अपनी गोदी में उसका सिर रख कर सुलाता नहीं था।

पूर्वी अफ्रिका के तंजानिया प्रान्त स्थित सिरेनगेटी अभयारण्य काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है, जिस की देखभाल की जिम्मेदारी हालैण्ड निवासी वरिष्ठ अभियंता जार्ज पर है। जंगल में भ्रमण करते हुए एक दिन उनका सामना एक आदमखोर-शेरनी से हो गया, जिसने उनके एक नौकर को चबा डाला था। इसके पूर्व भी उस नरभक्षी ने कई व्यक्तियों को अपना शिकार बनाया था। अतः जार्ज ने उसे मार डालना ही उचित समझा क्योंकि कहा जाता हैं कि यदि शेर को एक बार मानस-माँस भक्षण को मिल जाय ता वह नरभक्षी अवश्य बन जाता हैं। जैसे ही वह शेरनी का काम-तमाम कर आगे बढ़े कि कुछ दूर

पर एक गुफा से बाहर झाँकते हुए अपने माँ की प्रतीक्षा करते तीन सिंह शावक दिखाई दिये।

जार्ज को वस्तुस्थिति समझते देर नहीं लगी और उन्हें उठाकर वह अपने घर लाये। शावक अभी छोटे ही थे अतः किसी प्रकार दूध पिलाकर पोसा और बड़ा किया। जार्ज की पत्नी श्रीमती जाय एडमसन ने इस कार्य में बढ़−चढ़ कर सहयोग दिया और अपनी ममता भरी दृष्टि से उन बच्चों की देखभाल उसी तरह करती रहीं जिस प्रकार अपने बच्चों को प्यार दुलार किया जाता हैं। इस स्नेह सद्भाव का प्रभाव यह हुआ कि वह जहाँ भी जाती तीनों सिंह शावक पालतू बिल्ली की तरह उनके आगे पीछे घूमते रहते। बाद में दो बच्चे हालैण्ड के चिड़ियाघर को सौंप दिये गये और एक मादा बच्चे को उन्होंने अपने पास रख लिया और उसका नाम रखा-एल्सा। श्रीमती एडमसन का उसे पशुवत् नहीं वरन् पुत्रीवत् लाड़-प्यार मिलने लगा। नहलाने-धुलाने से लेकर खिलाने-पिलाने तक उसकी खूब देख-भाल की जाती। लाड़ में आकर कभी एल्सा अपने पालनहार की गोद में सिर रखकर लेटी रहती तो कभी प्यार पाकर स्वयं एडमसन का तकिया बनकर पड़ी रहती। यह स्नेह सद्भाव का ही चमत्कार था कि सिंह की प्राकृतिक क्रूरता इस तरह मृदुल हो गई कि उसके परम्परागत आक्रमणकारी स्वभाव में ममता और आत्मीयता के गहरे अंकुर जग गये और उसकी भयंकरता जाती रहीं। एल्सा माँस तो खाती परन्तु उसे शिकार करना नहीं आता था। अतः जार्ज के निवास स्थान के आस पास कितने ही वन्य पशु-पक्षी-जैसे जिराफ, हिरन, खरगोश, मुर्गे, तीतर आदि बेखटके निर्भय होकर विचरते घूमते किन्तु एल्सा उनमें से किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाती। जार्ज सम्पत्ति के वह अब इशारे समझने लगी थी अतः उठने, बैठने, चले जाने की बात वह संकेतों से समझ लेती और तद्नुरूप व्यवहार करती। उसे जंजीर में बाँधकर पालतू कुत्ते की तरह वे घुमाने भी ले जाते।

युवा होने पर उसे जंगल में छोड़ दिया गया जहाँ उसे एक साथी मिल गया और वह गर्भिणी बनी। अब वह स्वतंत्र थी फिर भी अपने संरक्षकों को भूली नहीं थी-देर-सबेर अवश्य आती रहती। उसका साथी सिंह दूर बैठा रहता और एल्सा। जाय एडमसन से मिलकर और उन्हें सूँघ चाटकर अपना प्यार-उपकार जताती और फिर .... में चली जाती। कुछ दिनों बाद अपने दो शावकों को लेकर वह अपने पुराने घर को लौटी। देखने वालों ने भी आश्चर्य किया कि अनभिज्ञ बच्चे भी जाय एडमसन से उसी तरह घुल मिल गये जैसे मानव शिशु अपनी नानी से हिल मिल जाते हैं।

जर्ज दम्पत्ति ने यह प्रमाणित कर दिखाया कि स्नेह सद्भावना और आत्मीयता के सहारे पराये तो क्या हिंसक पशु भी अपने बनाये जा सकते है और उनकी क्रूरता छुड़ाई जा सकती हैं। एडमसन और जार्ज के इस तरह वन्य जीवों के प्रति प्रेम और वात्सल्य प्रदर्शन की सर्वत्र सराहना की गई।

इसी तरह वन्य “पशुविशेषज्ञ” डेस्माण्ड बैकले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक गारा याका में उस मादा चीता का वर्णन किया हैं। जिसे उन्होंने एक झाड़ी में .... और अपनी बेटी की तरह पाला था। उनका .... जाय एडमसन एवं जार्ज के उक्त परीक्षण की श्रृंखला में आता हैं। ऐसा ही एक प्रयोग .... नामक महिला का हैं जिसने हिंस्र पशुओं को स्नेहिल प्रकृति का बनाने में आश्चर्यजनक सफलता पाई।

समस्त प्राणियों में वस्तुतः एक ही सर्वव्यापी चेतना कार्य करती हैं सद्भाव-स्नेह, सहयोग आदि उसके विभिन्न रूप है। यदि इन्हें ठीक प्रकार प्रयोग किया जा सके तो बर्बरता को सौजन्य के सम्मुख नतमस्तक ही होना पड़ेगा। स्नेह और विश्वास की आत्मीयता और निर्भयता की शक्ति अपरिमित हैं।


तपस्वी की साधना (Kahani)

किसी तपस्वी की साधना से प्रसन्न होकर देवता ने वरदान माँगने के लिए कहा।

तपस्वी ने माँगा कि उसकी छाया जहाँ भी पड़े वहाँ कल्याण होता रहें, सुख-शाँति बरसती रहें।

ऐसा ही हुआ। तपस्वी तब चलते जब छाया पीछे रहती। कल्याण होने का लाभ तो सब उठाते पर यह जान न पाये कि किसकी कृपा से यह अनुदान मिला।

पीछे छाया रख कर चलने का कारण जब तपस्वी से पूछा गया तो उसने कहा मैं न तो किसी पर अपना उपकार जताना चाहता हूँ और न वरदानी होने का यश बटोरना चाहता हूँ। ऐसा करने पर तो मेरी साधना और वरदान का उद्देश्य ही नष्ट हो जायेगा।


यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह

परमसत्ता ने इस निखिल ब्रह्माण्ड में एक सुनिश्चित आचार संहिता लागू कर रखी हैं। जब भी कोई उसकी व्यवस्था में व्यतिक्रम पैदा करता हैं, कोई न कोई समर्थ प्रतिपक्षी तैयार होता व उसे ऐसा करने से रोकता हैं। यह एक स्वचालित प्रक्रिया हैं जो निरंकुशता पर अंकुश लगाती हैं। खगोल जगत के क्रियाकलाप इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

विराट् ब्रह्मांड में यो तो प्रत्यक्षतः शाँति एवं स्थिरता बनी रहती है, किन्तु “ब्लैक होल” की उपस्थिति इस संतुलन को गड़बड़ाने का सदा प्रयास करती रहती हैं। जब तक वह सामाय सा तारा बना रहता हैं। उसके क्रियाकलाप सौम्य होते है। किंतु जैसे ही वह “ब्लैक होल बनता हैं, अपनी अपरिचित शक्ति के मद में आकर आतंक फैलाना चालू कर देता हैं।

बिल्ली, शेर और चीते को जब शिकार करना होता हैं, तो वे छुपकर घात लगाते हैं। किसी झाड़ी की ओट में छिपकर शिकार के सामने आते ही वे उस पर टूट पड़ते हैं व अपनी क्षुधा मिटाते है। “ब्लैक होल” की प्रवृत्ति भी लगभग ऐसी ही हैं। अनजाने में रास्ता भटक कर जब कोई खगोलीय पिण्ड उस ओर निकल पड़ता हैं तो उसकी भी ऐसी ही दुर्गति होती हैं। श्याम .... तत्क्षण निगल जाता हैं। वैज्ञानिकों का कहना हैं कि यदि कोई स्पेश शूट में तैरता अंतरिक्ष यात्री असावधानीवश “ब्लैक हाँल” के निकट पहुँच जाय तो उसके उच्चतम गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सर्वप्रथम वह लम्बे-पतले तारों की शक्ल में खिंच जायेगा। इसके बाद .... उसे अपने विशाल उदर में खींचकर सूक्ष्म कणों के रूप में उसकी अन्तिम क्रिया करेगा और पचा लेगा। इसकी वह दानवी क्रिया बड़ी ही सुनियोजित और योजनाबद्ध ढंग से होती है। जिस प्रकार आक्रमण से पूर्विहंसक जन्तु घात लगाते और छिपकर बैठते है उसी प्रकार यह आकाशीय दानव भी करता हैं। अन्तर सिर्फ इतना है कि शिकार के बाद हिंस्र पशुओं को छिपने-छिपाने की आवश्यकता नहीं पड़ती पर यह महादानव सदा दूसरों की आँखों से अदृश्य रहता और शिकार को भ्रमित कर उसे अपने चंगुल में फँसाता है। पेटू भी इतना कि चाहे जितना खा जाय, कोई अन्तर नहीं पड़ता। एक बार जो इसकी शक्तिशाली गिरफ्त में आ जाता है, तो फिर वह किसी भी प्रकार नहीं बच पाता, सदा-सदा के लिए उसके उदर में समा जाता है। राक्षसों जैसे इसके मजबूत और विशाल पंजे भी होते हैं। खगोलज्ञों ने इनका नाम “स्वार्ज्सचाइल्ड रेडियस” अथवा “इवेण्ट हराइजन” रखा है। यदि शिकार शक्तिशाली हैं और इसके पंजों से मुक्त होने की सामर्थ्य रखता हैं, तो निश्चय ही वह इससे छूट कर भाग सकता हैं, किन्तु संघर्ष में यदि व पिछड़ गया और किसी प्रकार इसके जबड़े की पकड़ में आ गया, तो फिर वह किसी को भी नहीं छोड़ता उसे उदरस्थ कर ही लेता हैं, भले ही दुर्भाग्यग्रस्त वस्तु या पिण्ड कितना ही शक्तिशाली क्यों न हों ? मूर्धन्य ब्रिटिश भौतिकविद् एवं विद्वान गणितज्ञ प्रो0 जान टेलर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ब्लैक होल, दि एण्ड ऑफ दि यूनिवर्स” में किसी ऐसे स्पेशशीप के भाग्य के बारे में कई संभावनाओं का उल्लेख किया हैं, जो उसके गर्भ में समा चुक हैं। इनमें से एक संभावना के अनुसार श्याम विहार की एक लम्बी पतली गर्दन होती हैं, जो किसी अन्य ब्रह्माण्ड में जाकर निकलेगा। वे कहते है कि इस वक्त तक यदि यान यात्री किसी प्रकार जीवित भी बचे रहे, तो भी वे अपनी इस विलक्षण अनुभूति से हमें अवगत नहीं करा सकेंगे, क्योंकि पृथ्वी वासियों से संपर्क-सूत्र स्थापित करने में वे सदा विफल रहेंगे। ऐसी स्थिति में उनका प्रयास पुनः अपने यान को ब्लैक होल के भीतर प्रवेश कराने का होगा। इस आशा में कि शायद वे इस प्रक्रिया के दौरान पुनः अपने ब्रह्माण्ड में निकल सकें, पर वास्तविकता यह होगी कि इस तरह के प्रत्येक प्रयास के बाद वे हमेशा किसी नूतन ब्रह्माण्ड में पहुँच जायेंगे और अपने मूल ब्रह्माण्ड में वापस लौटने का उनका सपना कदापि पूरा न हो सकेगा।

प्रो0 टेलर अपनी उक्त पुस्तक में आगे लिखते है कि यद्यपि हमारी मंदाकिनी में ऐसा एक ही ब्लैक होल हैं, पर वह एक ही महादानव हम सब के लिए सर्वनाश उपस्थित कर सकता हैं। वे निराशा से अपना मन्तव्य व्यक्त करते हुए लिखते है कि निश्चय ही हम सब उसके द्वारा एक न एक दिन निगल लिए और बेमौत मारे जायेंगे। प्रो0 टेलर की यह संभावना कल्पनाओं और सिद्धांतों पर आधारित हैं। यथार्थता तो यह है कि उसके भीतर किस प्रकार की प्रक्रिया चलती हैं। और निगले गये पिण्ड का भाग्य क्या होता हैं ? इसे अब तक जाना नहीं जा सका है।

अब प्रश्न यह है कि आखिर यह ब्रह्माण्ड पिण्ड इतना आक्रामक कैसे बन जाता हैं ? और क्यों वह अपनी ही बिरादरी के सदस्यों को अपना ग्रास बनाने पर उतारू रहता है ? इसका भी अपना एक इतिहास है। सूर्य से भी अनेकों गुने बड़े तोर जब प्रकृति की मार से सुपरनोवा विस्फोट के माध्यम से टूट कर बिखर जाते हैं तो उनका चूरा फिर से एकत्रित-संगठित होकर प्रत्याक्रमण के भाव से पहले से कही मजबूत हाइट ड्वार्फ का निर्माण होता है, मगर इसकी शक्ति बढ़ जाती है। इस शक्ति का अन्दाज इसी से लगाया जा सकता हैं कि इसकी एक माचिस की डिबिया जितनी मिट्टी का भार 10 हजार किलोग्राम या एक डबल डेकर बस जितना होता हैं। इतने पर भी इसका संकुच थमता नहीं, जारी रहता है और अन्त में वह 10 मील त्रिज्या जितना रह जाता हैं। इस स्थिति में यह “यूटूँनस्टार” कहलाता हैं। इसकी शक्ति ह्राइट ड्वार्फ से भी बढ़ी चढ़ी होती है। इसका एक माचिस डिबिया जितना पदार्थ .... किलो ग्राम (20 खरब किलोग्राम) अथवा .... लाख (2 अरब लाख) डबल डेकर बस के भार के बराबर होता हैं। इस वक्त तक इसकी आन्तरिक शक्ति (गुरुत्वाकर्षण बल) इतनी बढ़-चढ़ जाती हैं कि वह स्वयं भी अपना बल बर्दाश्त नहीं कर पाता और निरन्तर घटता-घटता छोटा होकर अदृश्य मगर खूँख्वार बन जाता है। महादानव ब्लैक होल के नाम से जाना जाता हैं। इसका आकार जितना छोटा होता हैं, उतनी ही विनाशक इसकी शक्ति होती है। खगोलज्ञों के अनुसार इस महाकाश में ऐसे अनेकानेक महादैत्य हैं, जो आकार-प्रकार में छोटे होते हुए भी अपनी आसुरी वृत्ति से तनिक भी बाज नहीं आते और सदा प्रत्याक्रमण की ताक में लगे रहते है।

पृथ्वी पर भी फलोरिडा वारमूडा और कोस्टारिका के बीच एटलाण्टिक महासागर में वारमूडा त्रिकोण के रूप में ऐसा ही एक ब्लैक होल हैं, जो अपने अस्तित्व में आने के समय से लेकर अब तक न जाने कितने जलयानों वायुयानों को निगल चुका हैं। अब से कोई पाँच वर्ष पूर्व की घटना है। हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता पीटर सेलर्स एक बार अपना विमान उड़ाते -उड़ाते भटक गये और अमेरिका के पूर्वी तट पर स्थित इस रहस्यमय त्रिकोण में आ फंसे। उनका संपर्क यकायक कन्ट्रोल टावर से टूट गया। सारे यंत्र उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया। वायुयान नियंत्रण से बाहर जाने लगा। उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा मानो जहाज किसी अदृश्य शक्ति के चंगुल में फँस कर खिंचा चला जा रहा हो। यान बड़ी तेजी से समुद्र की ओर नीचे गिरने लगा। वह घबरा उठे, किन्तु तभी उन्हें भारत भ्रमण के दौरान एक भारती योगी द्वारा सिखाये गए गायत्री मंत्र का स्मरण हो आया। वे मन .... उसका उच्चारण करते रहें और विमान पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करने लगे। देखते-देखते उनका विमान उस जानलेवा त्रिभुज से सुरक्षित बाहर निकल आया एवं वे उसका ग्रास बनते-बनते बचे। इसका विवरण अमेरिका के तत्कालीन प्रमुख समाचार पत्रों में विस्तारपूर्वक छपा था।

महाभारत के ... पर्व के अंतर्गत तीर्थ-यात्रा पर्व के एक सो बत्तीस अध्याय में कोहड़ मुनि और अष्टावक्र की कथा आती हैं। शास्त्रार्थ में पराजित होने के कारण मुनि कोहड़ को जल समाधि दे दी गई थी। बाद में मुनि पुत्र .... ने अपने पिता के अपराधी पण्डित बन्दी को पराजित कर उसे भी समुद्र में डुबाने की सजा दी, तो वरुण पुत्र बन्दी ने क्षमा याचना सहित कहा कि पण्डितों को जान से मार डालने का मेरा तनिक भी इरादा नहीं है। वस्तुतः मेरे पिता के राज्य में विशाल यज्ञ हो रहा है। यहाँ से विद्वान पण्डितों को चुन-चुन कर मैं वही भेज रहा था। शास्त्रार्थ में हराकर जल में डुबोना तो एक निमित्त मात्र था। अब यज्ञ समाप्ति पर है और सभी ब्राह्मण लौटने ही वाले है। कुछ समय पश्चात् समस्त ऋषिगण सामने से आते दिखाई पड़े। इनमें कोहड़ भी थे।

संभव है, उन्हें किसी समुद्री ब्लैक होल के माध्यम से वरुण लोक भेजा गया हो और ज्ञान-विज्ञान के चरमोत्कर्ष के उस युग में वे कोई ऐसी रहस्यमय विद्या जानते हो, जिसके कारण उसके चंगुल से उनका सकुशल पृथ्वी लोक में पुनः वापस लौट सकना शक्य हो सका, अन्यथा वे भी उसके गर्भ में समा कर अपनी जान गँवा चुके होते।

वैज्ञानिकों ने अब प्रतिकण और प्रतिपदार्थ की खोज कर ली है। जिनकी प्रकृति कण और पदार्थ से नितान्त विपरीत है। इनकी प्रथम कल्पना करने वाले अंग्रेज वैज्ञानिक डिराक का कथन है कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु की प्रतिवस्तु विद्यमान है। यह बात दूसरी है कि इनमें से अधिकाँश का पता अभी नहीं लगाया जा सका है। हर क्रिया की प्रतिक्रिया और ध्वनि की प्रतिध्वनि सर्वविदित है। इस आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि एण्टी पार्टिकल ..... मैटर का अस्तित्व है तो निश्चय ही इनसे और एण्टी .... यूनिवर्स भी होगा, जिसकी शक्तियाँ यूनिवर्स से कही अधिक बढ़ी-चढ़ी होंगी। जब यह संभव है तो इस आधार पर यह संभावना बनती है कि “ब्लैकहोल” का भी कोई “एण्टी ब्लैकहोल” होना चाहिए, भले ही इसकी खोज अब तक नहीं हो पायी हो, पर हो सकता है कि निकट भविष्य में इसका पता लगाया जा सके। यदि यह अस्तित्व में हुआ, तो इसका स्वभाव भी ब्लैक होल से बिलकुल विपरीत होगा और प्रतिपक्षी होने के नाते क्षमता में वह इससे कहीं अधिक सामर्थ्यवान होगा। इस स्थिति में वह श्याम बिवर को निगलेगा तो नहीं, पर उठा कर उसे इस प्रकार फेंकेगा, ऐसी पटक लगायेगा कि शायद उसका अस्तित्व ही न रहें। आततायियों की जो दुर्गति होती है, वैसी ही दुर्गति उसकी भी होगी।

परमसत्ता की यह व्यवस्था सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। जीव जगत भी इसका अपवाद नहीं। अफ्रीका के जंगलों में खरगोश और एक जन्तु पाया जाता है। जब यह पागल होता है, तो अपने प्रेम सद्भाव को त्याग कर मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। अपनी ही जाति के सदस्यों को समाप्त करने लगता है। ऐसी स्थिति में उस समुदाय के जन्तु उसका आतंक समाप्त करने के लिए एकत्रित संगठित होते व उसका अन्त कर डालते है। शेर जब नरभक्षी बनता और पागल होकर हाथी उत्पात मचाना आरंभ करता है, तो उनके भी मौत के दिन निकट समझे जाते है।

परमसत्ता की यह व्यवस्था सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। जीव जगत भी इसका अपवाद नहीं। अफ्रीका के जंगलों में खरगोश और एक जन्तु पाया जाता है। जब यह पागल होता है, तो अपने प्रेम सद्भाव को त्याग कर मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। अपनी ही जाति के सदस्यों को समाप्त करने लगता है। ऐसी स्थिति में उस समुदाय के जन्तु उसका आतंक समाप्त करने के लिए एकत्रित संगठित होते व उसका अन्त कर डालते है। शेर जब नरभक्षी बनता और पागल होकर हाथी उत्पात मचाना आरंभ करता है, तो उनके भी मौत के दिन निकट समझे जाते है।

ताड़का, सुबाहु, मारीच को, हिरण्यकश्यप एवं हिरण्याक्ष को अपनी करनी के बदले दुर्गति मिली। रावण-कंस की नीति अनीति उनके समूल नाश का कारण बनी। वृत्रासुर का अहंकार बढ़ने व भस्मासुर के अनैतिक मार्ग पर चलने पर वे नाश को प्राप्त हुए। वस्तुतः वह परमसत्ता न्यायाधीश की तरह से ही व्यवहार करती है। खगोल जगत का “ब्लैकहोल” भी उससे अछूता नहीं है। हम निरंकुशता की ओर बढ़ने न पायें, व्यवस्था में कही हस्तक्षेप न कर बैठे, इसे रोकने के लिए सृष्टा ने कितनी सुन्दर व्यवस्था बनाई है।


Quotation

झाडू से घर बुहारा जाता है और प्रायश्चित से पापों की निवृत्ति होती है।


तेजसाँ हि न वयः समीक्ष्यते

कायिक संरचना की दृष्टि से आनुवाँशिकी को मान्यताओं को भले ही अंगीकार कर लिया जाय, किन्तु बुद्धि और भावना के क्षेत्र में ऐसी विलक्षणताएँ संततियों में उभरनी पाई गयी है, जिन्हें देख कर यही कहने को बाध्य होना पड़ता है कि व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ या तो पूर्व जन्म की अर्जित-वर्धित, संचित-सुरक्षित है अथवा इसी जन्म में अभिभावकों द्वारा प्रदत्त सुसंस्कारिता के वातावरण के कारण है। विश्व भर में कितने ही बालक ऐसे हुए है जो अल्पायु में ही असामान्य प्रतिभा सम्पन्न देखे गये है।

बिना किसी प्रशिक्षण अध्ययन के बचपन से ही प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों के जीवन क्रम का अवलोकन करते है उनके असामान्य होने का प्रत्यक्ष कोई कारण हाथ नहीं लगता। वस्तुतः हम मस्तिष्क को एक सामान्य-सा अंग अवयव भर मान लेते है। किंतु देखा जाता है कि यदि मनुष्य अपनी लगन, एकाग्रता और कुशलता को एक स्थान पर केन्द्रित करने लगे तो साधा-रंग जान पड़ने वाला मस्तिष्क भी असाधारण प्रति कर दिखाता है और अल्पायु में ही ऐसी प्रतिभा का परिचय देता है, जिसे देख दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि बुद्धिमत्ता के लिये आयु कोई मापदण्ड नहीं है।

केरल का एक सात वर्षीय बालक एडमण्ड थामस क्िलट ... अप्रैल, ... को दुनिया से विदा हो गया किंतु इतनी छोटी सी उम्र में ही क्िलट ने लगभग 20,000 ऐसी अद्भुत कलाकृतियों का निर्माण कर दिखाया जो बड़ी आयु के बाद एक कुशल कलाकार द्वारा भी संभव नहीं हो पाता। क्लिंट स्टेट बैंक ऑफ ट्रेवेनकोर के एक अधिकारी एम0टी0 जोसेफ का इकलौता बेटा था। उसके माता-पिता बड़े ही धार्मिक प्रवृत्ति के है। जन्म से एक वर्ष बाद ही वह घर की दीवारों पर पत्थर, कोयला और लकड़ी से लकीरें खींचने लगा। माँ ने पहले तो बच्चे की इन गतिविधियों को बचपन का कौतुक-कौतूहल भर समझा और दीवार खराब होने की आशंका में डाँटा-डपटा भी। लेकिन बाद में वह भी बच्चे की जन्मजात विशेषताओं को समझने लगी। तीन वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते क्लिंट को गुर्दे की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहाँ भी उसकी चित्रकला का अभ्यास निरन्तर चलता रहा। रात हो अथवा दिन जब कभी भी उसे मौका लगता तभी वह कुछ न कुछ चित्रकारी का चमत्कार प्रस्तुत करता ही रहता था। एक बार उसके हाथ में गहरी चोट पहुँची फिर भी उसने अपनी क्रियाशीलता में कमी नहीं आने दी। शैक्षणिक योग्यता तो उसकी मात्र अपर के0जी0 तक ही थी। इतनी कम आयु में ही उसने स्वर्ण पदक हस्तगत कर दिखाये। क्लिंट ने उसकी मृत्यु के कुछ समय पूर्व अपनी माँ से कहा-मैं निद्रा जैसी स्थिति में कुछ समय के लिए जा रहा हूँ। मुझे कोई जगाने की कोशिश न करे और वह इतनी छोटी आयु में ही अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देकर इस दुनिया से चला गया। यूनीसेफ ने उसकी कलाकृतियों, बधाई पत्रों और कलेंडरों को अपनी प्रदर्शनी हेतु सुरक्षित रखा है। ताकि बच्चों को अल्पायु से ही कुछ कर दिखाने की प्रेरणा सतत् मिलती रहे।

सन् ... में कलकत्ता में जन्मे देवाँगन दत्त नामक बालक 1 वर्ष की आयु तक पहुँचते ही संगीत के क्षेत्र में असाधारण प्रतिभा अर्जित कर दिखाई, जिसके फलस्वरूप .... में उसे “सर्वश्रेष्ठ संगीतकार” की उपाधि से विभूषित किया गया। तीन वर्ष की आयु पूरी करते ही देवाँगन के मूख से संगीत की स्वर लहरियाँ सहज ही फूट पड़ी थी। उसके तालबद्ध और लयबद्ध गायन विशेष रूप से रवीन्द्र संगीत और ... के भक्ति-गीतों से प्रभावित होकर देश की संगीत प्रिय जनता ने उसे साँस्कृतिक आयोजनों में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रण पत्र भेजना आरंभ कर दिया। नई दिल्ली में अखिल भारतीय सँगीत प्रतियोगिता के हीरक जयन्ती समारोह में जब देवाँगन को बुलाया गया तो उसकी इस विलक्षण मेधा के उपहार स्वरूप उसे “बाँर्नट सिंह” की विभूति से सम्मानित किया गया। संगीत ही नहीं खेल-कूद के क्षेत्र में भी उसे विशिष्ट योग्यता का परिचय दिया है।

हैदराबाद के एक इंजीनियर अमेरिका के ह्रास्टन शहर में वैकटेल कौरपोरेसन में कार्यरत है। उनका चार वर्षीय पुत्र रोहन बारावडेकर प्री-किंडर गार्टन का छात्र है। रोहन अपनी बोल चाल एवं लेखन की शैली में ऐसे शब्दों का प्रयोग करता हैं जो उससे दूनी आयु के बच्चों भी नहीं कर पाते। ह्रास्टन वर्ण वर्ण-विन्यास प्रतियोगिता में उसकी असाधारण प्रतिभाओं को देख कर नेशनल चैम्पियनशिप की उपाधि से विभूषित किया जा चुका हैं। बच्चे के पास-पड़ौस में रह रहें लोगों का कहना हैं कि जिन शब्दों के बारे में रोहन को कोई पूर्व जानकारी नहीं हैं फिर भी वह उन्हें सुगमतापूर्वक लिख सकता है। उसकी स्मरण शक्ति भी बड़ी विचित्र हैं। किसी भी पुस्तक या समाचार पत्र की घटनाओं को एक बार पढ़ लेने पर उन्हें ज्यों का त्यों सुना देने की क्षमता रखता हैं।

भारतवर्ष में तो ऐसी प्रतिभाएँ महामानव के रूप में सतत् अवतरित होती रहीं हैं। महर्षि अरविंद जब छोटे थे, तभी से उन्होंने अँग्रेजी में कविताएँ लिखनी शुरू कर दी थी, तथा अनेक विदेशी भाषाओं पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। संत ज्ञानदेव ने बारह वर्ष की अवस्था में गीता भाष्य ज्ञानेश्वरी लिखी। चौदह वर्ष की छोटी आयु में ही रविंद्रनाथ टैगोर ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक .... का बंगला अनुवाद कर लिया था। भारत श्रीमती सरोजनी नायडू ने तेरह वर्ष की अल्प-कोकिला पंक्तियों की अँग्रेजी कविता लिख डाली ..... प्रख्यात नाटककार हरीन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय जब चौदह वर्ष के थे, तभी विख्यात नाटक अब्ब हसन की रचना की थी। पं0 .... ने सात वर्ष की आयु में हो संस्कृत भाषा सीख ली थी। विवेकानन्द ने किशोरावस्था में ही अपने गुरु का कार्यभार अपने ऊपर ले रामकृष्ण मिशन का विस्ताद समग्र विश्व में कर दिखाया था। 30 वर्ष की आयु में विश्व धर्म सम्मेलन में वे भारतवर्ष का डंका बजाकर आए। अपनी विलक्षण प्रतिभा, स्मरण शक्ति से उनने पाश्चात्य जगत को हतप्रभ कर दिया था। पुस्तक को एक बार पलट भर जाने पर ही वह उन्हें कण्ठस्थ हो जाती थी। 31 वर्ष की आयु में वे उतना कुछ कर गए जिस के लिए सौ प्रतिभाशाली भी कम पड़ेंगे।

पाश्चात्य देशों में भी ऐसे बालक जिन्हें “प्रोडिर्ज कहा जाता हैं ने समय-समय पर अपनी प्रतिभा से वैज्ञानिक को हतप्रभ किया हैं। सेंट मेरीज कॉलेज बाल्टीमोर का एक विद्यार्थी मार्टिन स्नातक होने से दो वर्ष पूर्व 28 वर्ष की आयु में ही गणित का प्रोफेसर नियुक्त हो गया था। बाद में वह बाल्टी मोर का आर्क विशप बना। स्वीडन का बैरान गुस्तफ 10 वर्ष की आयु में योरोप की 9 भाषाएँ बोलने लगा था। ... वर्ष की आयु में वह स्वीडन के उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त हुआ। पेरिस विश्व विद्यालय के डेविस लीफ्रेत्स को .... वर्ष की आयु में ही यूनानी तथा लैटिन भाषाओं को प्रोफेसर बना दिया गया था।

जर्मनी का एक विद्यार्थी एंड्रस मुलर ... वर्ष की आयु में सभी यूरोपियन भाषाओं का ज्ञाता बन गया था और उनमें कविताएँ करने लगा था। जार्ज ड्राइस्की ... वर्ष की आयु में इंग्लैंड का प्रधान धर्मोपदेशक नियुक्त हुआ। उसने ... वर्ष की आयु में यूनानी और हिब्रू भाषाएँ सीख ली थी।

जर्मनी के कार्लविट नामक बालक ने अल्पायु में आश्चर्यजनक बौद्धिक प्रगति करने वाले बालकों में अपना कीर्तिमान स्थापित किया हैं। वह ... वर्ष की आयु में माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करके लिपजिंग विश्व विद्यालय में प्रविष्ट हुआ और ... वर्ष की आयु तक पहुँचने पर उसने न केवल स्नाकोत्तर परीक्षा पास की वरन् विशेष अनुमति लेकर पी0एच0डी0 की डिग्री भी प्राप्त कर ली। .... वर्ष की आयु में उसने उससे भी ऊँची एल.एल.डी. की उपाधि अर्जित की और उन्हें दिनों वह बर्लिन विश्व विद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त किया गया।

ऐसी प्रतिभाएँ सिर्फ ज्ञान व अध्ययन क्षेत्र में ही नहीं दिखाई पड़ती वरन् यदा-कदा शासन क्षेत्र में भी ऐसे नक्षत्र उदित होते रहते हैं, जिनकी विलक्षण सूझबूझ, विचारशीलता-विवेकशीलता, निर्णय क्षमता और शासन सामर्थ्य अद्वितीय होती हैं। बड़ी आयु और अनुभवी लोगों में यह विशेषता तो समझ में आती हैं, पर छोटी उम्र में ऐसे कौशल उपज पड़ना निश्चय ही, आश्चर्य की बात है। पिछली शताब्दियों में ऐसे अनेक शासक पैदा हुए हैं, जिन्होंने अल्पायु में ही ऐसे करतब कर दिखाये।

23 वर्ष की आयु में फ्राँस का काउण्ट टेण्डे शासनाध्यक्ष और सेनापति बन गया था।

फ्राँसीसी सेना का कर्न मारक्विस ... वर्ष की आयु में भर्ती हुआ और 42 वर्ष सेना में नौकरी करता रहा। 42 वर्ष की आयु में जब उसकी मृत्यु हुई, तब वह फील्ड मार्शल भी था।

छत्रपति शिवाजी ने 11 वर्ष की आयु में ही तोरण के पहाड़ी दुर्ग पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया था और दो वर्ष बाद पुरन्दर के किले को भी जीत लिया। इसी प्रकार महाराजा रणजीत सिंह ने भी 11 वर्ष की आयु में ही लाहौर पर विजय प्राप्त की थी।

फ्राँस का लुई चौदहवाँ यद्यपि 8 वर्ष की आयु में राजगद्दी पर बैठा था, किंतु राज्य का शासन का वास्तविक कर्ता-धर्ता उसका मंत्री मेजिरा ही था। फिर भी 22 वर्ष की आयु में उसने शासनतन्त्र पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया। उल्लेखनीय है कि यूरोप के इतिहास में लुई चौदहवें जितनी लम्बी अवधि तक किसी भी राजा ने राज्य नहीं किया।

रूस का पीटर महन ... वर्ष की आयु में राजगद्दी पर बैठा। उसने अपने देश का पिछड़ापन दूर करने के लिए जितने प्रयास किये सम्भवतः रूस के किसी भी शासक ने उतने कार्यक्रम नहीं चलायें। आज भी रूस के इतिहास में पीटर का पीटर महान कहकर उल्लेखित किया जाता हैं।

नेपोलियन बोनापार्ट 25 वर्ष की आयु में ही फ्राँसीसी सेना में जनरल बन गया था और तीन वर्ष बाद ही उसने इटली की सेना की बागडोर भी सम्भल ली। यद्यपि इस बीच वह विरोधियों द्वारा सताया और दबाया भी गया। यहाँ तक तक उसे जेल में भी डाल दिया गया किन्तु तीन वर्ष जैसी छोटी सी अवधि में पतन के बाद एकदम इतनी शीघ्रता से उठ खड़े होने का उदाहरण इतिहास में अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।

महारानी लक्ष्मीबाई ने जब राजकाज संभाला तो वह मात्र अट्ठारह वर्ष की थी, किन्तु शासन-सत्ता की दृष्टि से इस अल्पवय में भी उनने जिस खूबी से गद्दी सँभाली और अंग्रेजों का मुकाबला किया उसे देख आश्चर्य ही होता है।

यदा-कदा ऐसी प्रतिभा विलक्षण स्मरण शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह सामर्थ्य किसी-किसी में कभी-कभी ही प्रकट क्यों होती हैं ? हर कोई इसे हस्तगत क्यों नहीं कर पाता? इस दिशा में शोधकार्य अभी चल रहे है। विभिन्न प्रकार के अध्ययनों से वैज्ञानिक अभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि व्यक्ति यदि चाहे, तो वह अपनी मस्तिष्कीय क्षमता का विकास उच्च स्तर तक कर सकता हैं। उनका कहना है कि मानवी मस्तिष्क में ऐसे तत्व है, जो 20 अरब पृष्ठों से भी अधिक ज्ञान भण्डार सुरक्षित रख सकने में समर्थ है। एक व्यक्ति एक दिन में .... चित्र देखता हैं तथा उनकी बनावट, रूप, रंग, ध्वनि की भी जानकारी प्राप्त करता हैं। अभिव्यक्त ने कर सकने पर भी अनुभूत ज्ञान के रूप में उसमें से विशाल भण्डार मस्तिष्क में बना रहता हैं, जिसका यत्किंचित लोग ही उपयोग कर पाते है।

उपरोक्त सभी घटनाक्रम इस तथ्य की साक्षी हैं कि जीवसत्ता अपरिमित सामर्थ्य .... देनन्दिन जीवन में चूँकि मानवी क्षमता का स्वल्प भग ही प्रयुक्त होता हैं, एक बहुत बड़ा अंश अनुपयोगी ही पड़ा रहता हैं, ये विभूतियाँ प्रत्यक्षतः सामने नहीं आती। किंतु जो प्रसुप्त पड़ा हैं। वह जिनमें अल्पायु में ही जगा-विकसित हुआ देखा जाता हैं, वह प्रमाणित करता हैं कि यदि व्यक्ति प्रयास करें तो असामान्य कौशल का प्रतिभा का सम्पादन कर सकता है। आयु का बंधन चेतना के क्रिया कलापों पर लागू नहीं होता। वे कभी भी प्रकट ही चुनौती देती रहती हैं कि आधुनिक प्रगति के बावजूद चिकित्सा विज्ञानी अभी तक मस्तिष्कीय चेतना की संभावनाओं को जान नहीं पाए।


वर माँगने के लिए कहा (Kahani)

रन्तिदेव ने लम्बे समय तक तप किया। उसका प्रतिफल तो मिलना था।

जप उससे वर माँगने के लिए कहा गया तो उनने कहा-मेरे लिए कुछ चाहिए । मेरे पुण्य के बदले जितने लोगों के कष्ट दूर किये जा सकें वो कम करा दिये जांय। उन्हें सुखी होते देख ही मैं इतनी प्रसन्नता प्राप्त कर लूँगा कि माना अक्षय भंडार मिल गया।


जन्म मरण का गतिचक्र

जन्म और मृत्यु के समय परिवर्तित उत्पन्न होने के कारण आश्चर्य अवश्य होता हैं पर इसमें ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे अनहोनी या अस्वाभाविक कहा जा सके। अब तक जो भ्रूण दिखाई नहीं पड़ रहा था, आँखों से ओझल उदरदारी में बैठा था उसका अचानक प्रकट हो जाना, दृष्टिगोचर होने लगना ऐसा प्रतीत अवश्य होता हैं कुछ अघटित हुआ पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं। जो पर्दे के पीछे बैठा था वही अगर निकल कर बाहर आ गया तो इसमें क्या अनहोनी बात हुई ? फिर भी लोग कौतुक, कौतूहल भरी दृष्टि से देखते है- इसके लिए क्या किया जाय ?

रंग मंच का पर्दा गिरता हैं अभिनय करते हुए सभी नर उसके पीछे चले जाते है। कोई नासमझ यह भी अनुमान लगा सकता है कि उनका अन्त हो गया। पर वस्तुतः वैसा होता नहीं। दर्शकों की आँखों और अभिनेता मण्डल के बीच एक व्यवधान अड़ जाता है। इसी को अदृश्य होना कहा जा सकता है। कोई बढ़ी-चढ़ी कल्पना करे तो यह अनुमान भी लगा सकता है कि अभी-अभी तो नाचते गाते घूम रहे थे, उनका अन्त हो गया। मृत्यु उन्हें समेट ले गई। कल्पना करने में कोई भी स्वतंत्र है, पर इतने भर से वह वास्तविकता तो नहीं बन जाती।

इस संसार का प्रत्येक पदार्थ अनादि और अनन्त है। प्रकृति के घटक अणु परमाणु अपनी अपनी धुरी और कक्षा में भ्रमण करते आ रहे है और प्रलय काल तक उनका वही क्रम बना रहेगा। सूर्य उदय और अस्त होता दीखता है, पर वस्तुतः वैसा होता नहीं। वह अपने स्थान पर यथाक्रम गतिशील है। पृथ्वी घूमती हुई जिस क्षेत्र में पीठ फेर लेने जैसी स्थिति में आती जाती है तब उसके दूसरे पक्ष पर अंधेरा छा जाता है। यही रात्रि है। रात्रि होने पर भी सूर्य का अन्त नहीं हो जाता फिर हमारा प्रत्यक्षवाद यही कहता है कि जब वह दीखता ही नहीं तो उसका अन्त ही हुआ होगा। इस हिसाब से सूर्य नित्य प्रातःकाल जन्म लेता है और संध्या होते-होते मृत्यु के मुख में चला जाता है। यह दृश्य बुद्धि है। इसे वास्तविकता नहीं कह सकते। सूर्य तो अनादि काल से था और अनन्त काल तक बना ही रहेगा। सृष्टि का अन्त होने और नया सृजन बन पड़ने पर भी प्रकृति का यह परिवर्तन क्रम चालू ही रहेगा। उसको बनाना, बढ़ाना, और बदलना अपनी क्रिया पद्धति का अविच्छिन्न अंग है। उसे कोई न इच्छा पूर्वक बदल सकता है और न अनिच्छा से किसी प्रकार प्रतिबन्ध लगा सकता है जो अनिवार्य है, उसके लिए हमें ही वस्तुस्थिति को समझने पर जन्मने का हर्ष और मरण का शोक अनायास ही धीमा पड़ जाता है। वह सरल सहज और स्वाभाविक प्रतीत होता है।

मानवी सहज प्रकृति परिस्थितियों से प्रभावित होती है। उस पर मौसम अपने-अपने ऐसे प्रभाव डालते है जो एक दूसरे से भिन्न होते है। सर्दी और गर्मी की परिस्थितियों में भारी अन्तर है। वर्षा और बसन्त के दृश्य एक दूसरे से भिन्न होते है। इस विचित्रता को देखते हुए भी व्यक्ति का संतुलन बना रहता है। ऋतुएँ जो अपना परिवर्तन क्रम नहीं छोड़ती पर व्यक्ति उनकी प्रतिकूलता से अपने को बचाने के उपकरण खोज निकालता है। छाता, जूता, अँगीठी, पंखे आदि इन्हीं के आधारों का नाम है। जिनके सहारे ऋतु प्रतिकूलता से निपटने का बहुत हद तक अवसर मिल जाता है।

पर्दा खुलने पर कौतुक भरे दृश्य दीखते है और पटाक्षेप होने पर उस हलचल का अंत हो जाता है इतने पर भी नाटक के दर्शकों में कोई बड़ी खलबली नहीं मचती। सहज रीति से उन परिवर्तनों से चित्र−विचित्र सा अनुभव करते रहते है यही रीति उचित भी है और आवश्यक भी। अन्यथा दृश्य परिवर्तन होने पर नाटक के सभी दर्शक उत्तेजित हो उठेंगे और आवेशग्रस्त होकर भली-बुरी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगेंगे। नाट्य व्यवस्था के समूचे सरंजाम का मजा किरकिरा कर देंगे।

उपलब्धि से प्रसन्नता और हानि से क्षोभ यह मनुष्य की स्वाभाविक मनोदशा है। इस आधार पर पुत्र जन्म पर कोई खुशी मनाये और प्रियजन की मृत्यु पर आँसू बहाये तो इसे स्वाभाविक ही कहा जायेगा। पर उनका आवेश में बदल जाना और अत्यधिक प्रभावित होना बुरा है। न तो लाभ का प्रतिफल अहंकारी उन्माद होना चाहिए और न हानि का दृश्य सामने आते ही रुदन विलाप की स्थिति बना देना चाहिए न कातर होना चाहिए और न अव्यवस्थित असंतुलित होने की आवश्यकता है। परिवर्तनों को सहज स्वाभाविक रीति से समझना, देखना और सहन करना चाहिए। संतुलन हर दृष्टि से लाभदायक है। विवेक अपना कर ही व्यक्ति अपने को यथा स्थान बनाये और यथावत् चलाये रह सकता है। समुद्र के बीच गढ़े हुए प्रकाश स्तम्भ ही उस क्षेत्र से गुजरने वाली नावों का मार्ग दर्शन कर सकते है। स्वयं तो अपनी स्थिरता एवं प्रामाणिकता उपयोगिता बनाये ही रह सकते है, अपने को स्थिर रख सकने वाले ही दूसरों को स्थिरता प्रदान कर सकने में समर्थ होते है। धैर्यवान ही धैर्य देते है। विवेकवानों से ही दूसरों को विवेक मिलता है। आतुर, विह्वल कातर अथवा हर्षोन्मत्त लोग भी वैसा ही करने लगते है।

जो जन्मा है सो बढ़ेगा जो बढ़ा रहा है वह झुकेगा। झुकने के उपरान्त मरण निश्चित है। इस गति चक्र से उलझना किसी के भी वश की बात नहीं। अच्छा यही है कि प्रवाह की गतिशीलता को स्वीकार करें और जिस तिस को दोष देने की अपेक्षा भवितव्यता को स्वीकार करें।

परिवर्तन-जन्य परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठाये और असंतुलन को संतुलन में बदलें। इसी में बुद्धिमानी है और इसी में भलाई।

हर्ष शोक के जंजाल में उलझने की अपेक्षा यह अधिक उत्तम है कि बदलती परिस्थितियों के साथ बदलते उत्तरदायित्वों और बदलते कर्तव्यों को समझें उनका परिपालन करें। घर में यदि नवजात शिशु जन्मा है तो उचित यही है कि उसके भरण-पोषण, शिक्षा, दीक्षा, स्वावलम्बन, सुसंस्कारिता आदि प्रगतिशीलता के आधारों का समुचित निर्वाह करने की बात सोचें। उस दिशा में कदम बढ़ायें और जब तक सामर्थ्य है तब तक उस प्रक्रिया को पूरा करते रहने के लिए सन्निद्ध रहें।

अपने जीवन का मूल्य महत्व समझें उसका अन्त मृत्यु के रूप में समझें। साथ ही यह भी ध्यान में रखे कि उस प्रकार का पटाक्षेप कभी भी हो सकता है। मृत्यु का कोई दिन नहीं कोई मुहूर्त नहीं। वह कभी भी आ सकती और कभी भी अपना चबेना झोले में समेट कर दाँतों तले कुचल सकती है।

इस संदर्भ में प्रमुख समस्या एक ही है कि जो समय शेष जीवन जीने के लिए उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम उपयोग किस प्रकार किया जाय ? मानवी काया सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में अगणित विशेषता युक्त तो है ही उसका मनःक्षेत्र भाव संस्थान और भी अधिक अद्भुत है। उस खान में एक से एक अधिक मूल्यवान मणि मुक्तकों का भाण्डागार भरा पड़ा है उसे यदि खोज निकाला जाय और महत्वपूर्ण प्रयोजनों में नियोजित किया जा सके तो समझना चाहिए कि सौभाग्य सुयोग की, वरदान स्तर की देव अनुकम्पा बरस पड़ी। जीवन का कितना समय शेष है यह कहा नहीं जा सकता। इसलिए हर क्षण को बहुमूल्य समझकर उसका श्रेष्ठतम उपयोग करने की योजना बनानी चाहिए। इसी में जन्म और मरण की सार्थकता है।

मरने से पूर्व इस बात की तैयारी की जाय कि पापों के गट्ठर पीठ पर लादकर परलोक के मार्ग को विपन्न न करें। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि पुण्य परमार्थ की कमाई इतनी हो रही है या नहीं जो जीवित रहने के शेष दिनों और मरणोपरान्त भी सुख शान्ति का उज्ज्वल भविष्य का सुयोग बन सके।

अपने मरण की चिन्ता करने जैसा कोई बात नहीं है। जो अवश्यम्भावी है उससे भयभीत होने की क्या आवश्यकता? परलोक भी इस लोक से कम सुहावना नहीं है। जीव इसी भू-मण्डल की परिधि में घुमड़ता रहता है। अन्य संबंधी कुटुम्बियों को देखता और उनकी गतिविधियों में सहायता करता रहता है। इतने पर भी हर जीवधारी की सत्ता स्वतंत्र है उनमें से कितने ही संबंधों में बँधते और बिछुड़ते रहते हैं। ऐसी दशा में शोक क्यों, किसके ए कितने दिन तक करें ?


संगीत की जीवनदात्री सामर्थ्य

संगीत की कभी मनोरंजन का एक साधन समझा जाता था, पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। वैज्ञानिकों का ध्यान उसकी जीवनदात्री क्षमता की ओर गया है और उसे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की विकृतियों के निराकरण के लिए प्रयुक्त करने के प्रयोग बड़े उत्साह पूर्वक हो रहे है। पीड़ित व्यक्ति के लिए तो संगीत उस रामबाण औषधि की तरह सिद्ध हुई है जिसका श्रवणपान करते ही तात्कालिक शांति मिलती है। संगीत की स्वर लहरियों की कोमलता और लयबद्धता में कुछ ऐसी शक्ति है जो शारीरिक और मानसिक लाभ पहुँचाने के साथ सहज ही आत्मा को भी ऊर्ध्वमुखी बना देती है।

पाश्चात्य देशों में पिछले दिनों संगीत द्वारा रोग आवरण की दिशा में बहुत शोध कार्य हुआ है। तदनुसार से सूत्र ढूँढ़ निकाल गये है जिनके सहारे विभिन्न रोगों के .... की चिकित्सा विभिन्न स्वर प्रवाहों और वाद्य यंत्रों की सहायता से की जाती है। इंग्लैण्ड के चिकित्सा व ज्ञानी डा0 मीड और अमेरिका के एडवर्ड पोडीलास्की अपने अनुसंधान का सार निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया है कि संगीत से नाड़ी संस्थान में एक विशेष प्रकार की उत्तेजना उत्पन्न होती है जिसके सहारे शरीरगत विसर्जन की-दूषित तत्वों की शिथिलता दूर होती है। पश्चिम जर्मनी के डा0 रोनाल्ड ड्रोह के अनुसार संगीत के द्वारा रुग्ण शरीर में उत्पन्न एड्रिनेलिन की मात्रा में कमी हो जाती है। इससे रोगियों के दर्द को एकदम सीमित किया जा सकता है। उन्होंने बच्चों के मानसिक .... को इस विधि से दूर करने में काफी सफलता पाई है। अमेरिका के ही प्रख्यात मनःचिकित्सक डा0 जार्च .... एवं डा0 नार्मन विन्सेन्ट पील ने संगीत को .... -मानसिक तनाव के निराकरण की अचूक औषधि कहा है। संगीत के अभ्यास और श्रवणकाल .... में मन को विश्रान्ति ही नहीं, आनन्द भी प्राप्त होता है।

गायन और वाद्य यदि स्वर शास्त्र के अनुरूप हो तो सुनने वालों पर उपयोगी प्रभाव पड़ता है। अमेरिका के संगीत चिकित्सक डा0 हार्ल्स एस्टले ने इस प्रक्रिया पर अधिक व्यवस्थित अनुसंधान किया है। उनने लगातार बीस वर्ष इसी पद्धति से उपचार किया है और बताया है कि एलोपैथी द्वारा रोग-मुक्त होने वालों की अपेक्षा संगीत उपचार से अच्छे होने वालों का अनुपात कही अधिक है। विशेषतया मानसिक रोगों में तो वह अचूक काम करती है। माँसपेशियों और नाड़ी संस्थान की गड़बड़ी तो निश्चित रूप से अन्य उपायों की अपेक्षा संगीत द्वारा अधिक सफलतापूर्वक और अधिक जल्दी अच्छी की जा सकती है। उनके अनुसार जो न गाना जानते है न बजाना वे भी अपनी शारीरिक-मानसिक स्थिति के अनुरूप स्वर लहरी उपयुक्त मात्रा में सुनकर बहुत हद तक लाभान्वित हो सकते है।

पिट्सवर्ग-अमेरिका के ही सुप्रसिद्ध वायलिन वादक राल्फ लारेन्स होय को संगीत से बड़ा प्रेम है उनकी धर्मपत्नी ग्रेश्चेन भी अच्छी पियानोवादिका है। उन्होंने “आर-फोरआर” अर्थात् रिकार्डिग फॉर रिलेक्जेशन, रिफ्लेक्शन, रिस्पान्स एण्ड रिकवरी” नामक एक संस्था की स्थापना की है। संगीत चिकित्सा की इस संस्था की अनेकों शाखायें अमेरिका एवं योरोप के कई भागों में कार्यरत है। इस प्रतिष्ठान की संगीत चिकित्सा ने हजारों रोगियों को अच्छा किया है ओर वह एक अति साधन सम्पन्न संस्था की तरह विकसित होकर लोक-कल्याण की दिशा में प्रवृत्त है।

प्रारंभ में लारेंस इस उपचार प्रक्रिया का प्रयोग पीटर्सवर्ग के अस्पतालों से आरंभ किया जहाँ घायल सैनिक एवं वृद्ध लोग भर्ती थे। इससे रोगियों को जो शारीरिक तथा मानसिक लाभ हुआ उससे उनका उत्साह और भी बढ़ गया। उनकी सेवा भावना एवं परिश्रम के साथ संगीत के समन्वय ने ऐसा प्रभाव वर्ग वरन् पूरे अमेरिका सहित अन्याय योरोपीय देशों में भी इस संस्था की चर्चाएँ होने लगी। तदुपरान्त वहाँ भी इस प्रकार की संस्थायें स्थापित की गई। लारेन्स की इस उपचार पद्धति ने अब तक मानसिक अवसाद, निराशा, पोलियों, रक्तवाही नाड़ियों की बीमारियों से ग्रस्त हजारों लोगों को अच्छा कर नवजीवन प्रदान किया है। उनका कहना है कि संगीत मनुष्य के लिए एक ईश्वरीय वरदान के समान है ओर तब जबकि मनुष्य का रोग सब ओर से असाध्य हो गया हो, उसकी चेतना के अंतिम स्रोत तक को संगीत की अदृश्य स्वर लहरियों से प्रभावित और ठीक किया जा सकता है। लारेंस का पूरा जीवन इसी के लिए समर्पित है। उन्होंने न्यूयार्क राज्य के शेटूगें झील के पास एक छोटे से गाँव ब्रेनाडे्स विल में एक आश्रम-सा बना रखा है जहाँ से सब कार्यक्रमों का संचालन, पत्र व्यवहार तथा शोध कार्य सम्पन्न होता है। उनका विश्वास है कि एक दिन वह भी आयेगा जब मानवीय आदर्शों का नियमन सचमुच संगीत द्वारा होने लगेगा क्योंकि उसमें आश्चर्यजनक आकर्षण और मधुरता है।

संगीत के संबंध में यदि आधुनिक यंत्रों द्वारा गंभीरता-पूर्वक शोध की जाय तो उससे प्रस्तुत समय के अगणित शारीरिक मानसिक रुग्णता को दूर किया और आरोग्य के अभिवर्धन में महत्वपूर्ण सहायता ली जा सकती है। इस प्रकार के प्रयोग योरोप एवं अमेरिका के वैज्ञानिक कर भी रहे है और उन्हें आशाजनक सफलता भी मिली है। मानसिक व्याधियों से ग्रस्त लोगों पर संगीत से आश्चर्यजनक लाभकारी प्रभाव होने का निष्कर्ष सामने आया है। सोवियत रूस के क्रीमिया स्वास्थ्य केन्द्र ने चिकित्सा में औषधि उपचार के साथ-साथ संगीत को भी एक उपाय माना है। इस संदर्भ में वहाँ देर से प्रयोग चल रहे है जिनमें उत्साहवर्धक सफलता मिल रही है। अनिद्रा, उदासी, सनक जैसी मस्तिष्कीय रोगों में तो इस उपचार को बड़ी सफलता मिली है। वहाँ के अस्पतालों में मूर्धन्य वैज्ञानिक प्रो0 एस0सी0 फैकफ ने संगीत के प्रभाव का अन्वेषण करके यह निष्कर्ष निकाला है कि उस उपचार का प्रभाव नाड़ी संस्थान की विकृतियों पर और मनोविकारों पर बहुत ही सन्तोषजनक मात्रा में होता है। डा0 वाल्टर एच॰ वालेस के अनुसार जुकाम, पीलिया, यकृतशोच, रक्तचाप जैसे रोगों की स्थिति में उपयोगी संगी का अच्छा प्रभाव होता है। प॰ जर्मनी के मनःरोग चिकित्सक डा0 वाल्टर क्यूग का कथन है कि पागलपन-हिस्टीरिया, अन्य नस्ता-मेलेन कोलिया जैसे मनोविकारों के निवारण में संगीत को सफल उपचार के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। इटली में एक “ टोरेन्टेला” नामक नृत्य होता है, तब अनेक मधुर वाद्य बजते है, उनसे अनेक पागलपन के रागी अच्छे होते देखे गये है।

भारतवर्ष में शास्त्रीय संगीत की शक्ति और महत्ता के संबंध में इतिहास के पन्ने भरे पड़े है। अब उस दिशा में नई खोजे की जाने की आवश्यकता है, पर सामान्य व्यक्तियों को कथा-कीर्तन, भजन, संगीत एवं छोटे-छोटे वाद्य यंत्रों के वादन और गायन के द्वारा उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। संगीत को लय में बाँधने वाले गायन में तन्मयता आवश्यक है पर उतनी तन्मयता न हो तो भी संगीत का मनुष्य के मस्तिष्क, हृदय और शरीर पर विलक्षण प्रभाव अवश्य पड़ता है। नास्तिक और रूखे स्वभाव के समझे जाने वाले व्यक्ति भी उसकी तरंग में बहते देखे जाते है। अमेरिका की प्रमुख कला पत्रिका “दि अदर ईस्ट विलेज” ने भारतीय संगी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए लिखा है कि मनुष्य की भीतरी सत्ता को राहत देने और तरंगित करने की भारतीय संगी के ध्वनि प्रवाह में अपने ढंग की अनोखी क्षमता है। उसकी उपयोगिता और सम्मोहिनी शक्ति अपने आप में विलक्षण और अद्वितीय है जिस पर किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति को विरोध नहीं। वस्तुतः मानव का संगी के प्रति स्वाभाविक प्रेम ही इस बात का प्रमाण है कि वह कोई नैसर्गिक तत्व और प्रबन्ध क्रिया है।

इस संदर्भ में अन्नामलाई विश्वविद्यालय के मूर्धन्य वनस्पतिशास्त्री डा0 टी0एन॰ सिंह ने अपने सहयोगियों के साथ वनस्पति एवं प्राणियों पर उल्लेखनीय परीक्षण किये है। उन्होंने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध किया है कि संगी की मधुर ध्वनि तरंगों द्वारा पेड़ पौधों की-फसलों की उन्नति में आशाजनक सहायता मिल सकती है। संगीत एक प्रभावी शक्ति सिद्ध हो सकती है। जिस प्रकार प्रकृति और प्राणि जगत में प्रकाश और गर्मी का प्रभाव होता है। उससे उनके शरीर बढ़ते, पुष्ट और स्वस्थ होते है। उसी प्रकार ध्वनि में भी तापीय और प्रकाशीय ऊर्जा होती है और वह प्राणियों के विकास में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखती है जितना कि पोषक तत्व और जल। रोग निवारण में संगीत ककी विशिष्ट भूमिका होती है। जोधपुर मेडिकल कालेज के चिकित्सकों ने भी रोगियों पर संगीत चिकित्सा के प्रभाव के कारण रोगी अपनी चिन्ताएँ तथा दुःख भूज जाते है तथा जल्दी ठीक होते है।

बैंगलौर में ‘पवानी’ नामक एक संस्था है जो संगीत का मनुष्य पर मनोवैज्ञानिक तथा जैव-वैज्ञानिक रूप से पड़ने वाले प्रभावों पर अनुसंधान कर रही है। अब तक जो निष्कर्ष सामने आये हैं उसके अनुसार संगीत की अभूतपूर्व आरोग्यकर क्षमता की पुष्टि हुई है। चयापचय, बायोरिदम एवं न्यरोकेमीकल्स में संगीत प्रवाह महत्वपूर्ण परिवर्तन लाता है। जब मृदु–ध्वनियों के प्रभाव से मस्तिष्क शाँतिमय स्थिति में पहुँचता है तो रक्त शर्करा का स्तर कम हो जाता है और त्वचा के तापमान में उतार चढ़ाव आता है। इसी तरह भिन्न-भिन्न प्रकार के राग अलग-अलग भावों को उत्पन्न करते है तथा उनसे प्रसारित होने वाली ऊर्जा श्रोताओं के तंत्रिका तंत्र एवं रसायन तंत्र को प्रभावित करती है। इसका विस्मयकारी परिणाम रोगशमन के रूप में परिलक्षित होता है। चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि संगीत द्वारा एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे मनुष्य अपनी शक्ति पर आधारित हो जाता है। यही वह तथ्य है जो रोगी को स्वस्थ बनाता है।

लन्दन के कुछ अनुभवी चिकित्सक गर्भस्थ शिशु के लिए संगीत की धुनें बजाकर यह पता लगाने की चेष्टा कर रहे है कि गर्भस्थ शिशु की श्रवण शक्ति का विकास किस प्रकार होता है और मधुर ध्वनियों से स्नायविक प्रणाली पर क्या प्रभाव होता है ? देखा गया है कि यदि गर्भवती स्त्री को नियमित रूप से संगीत सुनने को मिले तो उससे न केवल प्रसव काल का कष्ट कम किया जा सकता है वरन् अपने वाली सन्तति को भी शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक दृष्टि से दृढ़ और बलवान बनाया जा सकता है। मनः चिकित्सकों का कथन है कि गर्भवती महिलाओं को संगीत का अभ्यास अथवा रसास्वादन अवश्य करना चाहिए। जो गा बजा नहीं सकतीं उन्हें अच्छे भजन-कीर्तन, भक्ति करुणा, प्रेम, दया, साहस और सेवा के प्रेरक गीत सुनने के लिए कोई साधन अवश्य बनाना चाहिए।

पूर्व जर्मनी के गोटिगंन नगर के संगीत द्वारा चिकित्सा करने वाले जौहान्स शूमिलिन नाम वैज्ञानिक ने अपने प्रयोगों और अनुसंधानों से यह सिद्ध किया है कि मनुष्यों की तरह ही बीमार पशुओं को भी संगीत उपचार से रोगमुक्त किया जा सकता है। उन्होंने अनुभवों और परीक्षणों का विस्तृत विवरण प्रकाशित करते हुए यह बताया है कि किस प्रकार बिना औषधि के ही कितने कष्ट साध्य रोगों से ग्रस्त मनुष्यों ने ही नहीं पशुओं ने भी रुग्णता से छुटकारा पाया। दुधारू पशुओं को दुहते समय अमुक ध्वनि का संगीत सुनाकर अधिक दूध प्राप्त करने में भी वैज्ञानिकों को सफलता मिली है।

स्वस्थ एवं प्रेरणाप्रद मधुर संगीत गायन एवं श्रवण के अनेकों लाभ है। शरीर के विजातीय द्रव्य और विषैले पदार्थों की निकाल बाहर करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गायन और वादन की श्रोताओं पर जो प्रतिक्रिया होती है उसके फलस्वरूप मानसिक विकृतियाँ, विक्षिप्तता, आलस्य, पीड़ा, मूर्च्छा, निद्रा का अभाव, रक्तचाप, कान के दर्द, हृदय की धड़कन और श्वास रोग आदि में आराम मिलता है। कई बार कुछ रोग असाध्य हो जाते है और उन पर संगीत का असर धीरे-धीरे पड़ता है। धीरे-धीरे विकारों का शमन होता है पर यह निश्चित है कि नियमित रूप से गायन का अभ्यास करने अथवा सुमधुर भावप्रवण संगीत सुनने से इनसे छुटकारा अवश्य मिलता है।

संगीत चिकित्सा का प्रचलन अब क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। मनोविकारों के समाधान में उसके आधार पर भारी सफलता मिल रही है। शरीरगत रुग्णता पर नियंत्रण प्राप्त करने में भी निकट भविष्य में संगीत की स्वर लहरियाँ महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करने जा रही है। इन दिनों गीत वाद्य का उथला उपयोग मनोरंजन और लोकरंजन तक सीमित होकर रह गया है। भविष्य में उसे एक कदम आगे बढ़कर मनुष्य की शारीरिक और मानसिक स्वस्थता का सन्तुलन बनाये रखने का उत्तरदायित्व वहन करना है। इससे आगे उसे आत्मा के महासागर में से उल्लास और आनन्द के मणिमुक्तक ढूंढ़कर बाहर लाने है, निश्चित ही संगीत की सृजनात्मक शक्ति द्वारा यह कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकेगा।


गंगा स्नान का पुण्यफल किसे ?

गंगा स्नान का पर्व था भारी भीड़ स्नान का पुण्य लाभ करने के लिए जा रही थी। सभी गंगा माता की जय बोल रहे थे।

शंकर पार्वती सूक्ष्म शरीर से आकाश मार्ग से उधर होकर निकले। पार्वती ने इतनी भीड़ को एक ही दिन गंगा स्नान के लिए जाने पर आश्चर्य व्यक्त किया और शंकर जी से इसका कारण पूछा।

शंकर जी ने कहा-आज सोमवती अमावस्या पर्व है। शास्त्रों में इस पर्व का बहुत महात्म्य बताया है, और स्नान करने वाले स्वर्ग जाते है ऐसा लिखा है। इसी कारण हर पर्व पर इतने लोग गंगा स्थान को आते है। पार्वती जी का असमंजस और भी बढ़ गया। उनने कहाँ स्वर्ग से तो हम लोगों का संपर्क निरन्तर रहता है। वहाँ तो थोड़ी जगह है। इतने लोग हर पर्व पर आते है हर साल कई-कई सोमवती अमावस्याएं पड़ती हैं एक वर्ष में ही करोड़ों लोग डुबकी लगाते है। सौ वर्ष में तो उनकी संख्या इतनी हो जायेगी जितनी के लिए वहाँ खड़े होने को भी जगह नहीं है। इसलिए यह महात्म्य गलत मालूम पड़ता है। साथ ही शास्त्र लिखने वाले ऋषि झूठ क्यों बोलेंगे ? यह बात भी समझ में नहीं आती। देव! इस संदेह का निवारण कीजिए।

शिवजी बोले देवि! स्नान के साथ मन को स्वच्छ बनाने की भी शर्त है। उसका पालन यह स्थान करने वाले करते नहीं। ऐसी दशा में वे मेला मनोरंजन भर कर पाते है। उस पुण्य के भागीदार नहीं बनते जो शास्त्रकारों ने स्वर्ग जाने के रूप में कहा है।

पार्वती जी की शंका का निराकरण ने होते देखकर शिवजी ने उन्हें उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वस्तुस्थिति समझाने का प्रयत्न करने की बात सोची। उनने एक नाटक रचा। जिस रास्ते दर्शनार्थी जा रहे थे, उसी से सटकर दोनों वेष बदल कर बैठ गये। शिवजी ने वयोवृद्ध कोढ़ी का रूप बनाया। पार्वती को असाधारण सुन्दरी बनाकर पास में बिठा लिया।

इस विचित्र जोड़े को देखकर दर्शनार्थी पूछते कि आप लोग आपस में कौन है? यहाँ किस प्रयोजन से बैठे है? पूर्व गढन्म के अनुसार पार्वती कहती है यह वृद्ध मेरे पति है। इनकी इच्छा गंगा स्नान की हुई। अंग इनके काम नहीं देते सो इन्हें में अपनी पीठ पर लादकर यात्रा पुरी कर रही हूँ। बहुत थक जाने के कारण हम लोग यहाँ बैठे सुस्ता रहे है। जल्दी ही शेष यात्रा फिर आरम्भ करेंगे। कल ही तो सोमवती अमावस्या है।

पूछने वालों में से अधिकाँश की कुटिल दृष्टि थी। इशारों-शब्दों में उनमें से प्रत्येक ने अपने-अपने ढंग से एक ही परामर्श दिया कि इस बुड्ढे को गंगा में छोड़ देना चाहिए और रूपसी को उनके साथ चलना चाहिए। उनके लिए हर प्रकार की सुख सुविधा उपलब्ध कराई जायगी, चैन की जिन्दगी कटेगी।

इन परामर्शों को सुनते-सुनते पार्वती हैरान हो गई कि यह कैसे धर्मात्मा लोग है ? वे भी गंगा पर स्नान करने जा रहे है। इनके मन इतने कलुषित है तो धर्माडम्बर रचने से क्या लाभ ? पार्वती जी पूछ बैठी नाथ! क्या सभी धर्माडंबरी ऐसे ही होते है ? इस पर शिवजी बोले हाथ की पाँचों उँगली एक समान नहीं होती। इस भीड़ में कुछ सच्चे लोग भी होते हैं। वह भी तुम्हें देखने को मिलेंगे।

प्रतीक्षा के बाद एक भावुक भक्त उधर आया। ध्यान पूर्वक इन पति-पत्नी की परिस्थिति और मनोदशा परखता रहा। गदगद हो गया। सुन्दरी के पद वन्दन करता हुआ बोला-देवी तुम धन्य हो। तुम्हारी जैसी नारियों की धर्म भावना से यह धरती आकाश अपनी जगह पर स्थित है, मैं कुछ आप लोगों की सेवा करना चाहता हूँ। मेरे पास कुछ सत्तू है। इसे आप लोग भी ग्रहण करें। भूखे होंगे न? इसके बाद इन बुद्ध सज्जन को मैं अपनी पीठ पर बिठा कर गंगा स्थान कराऊँगा। आप कहेंगी तो आपके घर तक भी इन्हें पहुँचा आऊँगा।

शिवजी ने पार्वती से कहा-देखा, इतनी भीड़ में केवल यह आदमी तीर्थ सेवन की गंगा स्नान की शर्तों को पूरी कर रहा था। यही है वह जिसको स्वर्ग जाने का वह प्रतिफल मिलेगा, जिसका प्रतिफल वर्णन गंगा स्नान के संबंध में ऋषि मनीषियों ने किया है।


मनुष्येत्तर प्राणियों के बारे में भी सोचिए

अनादिकाल में मनुष्य इतना बुद्धिमान नहीं था, जितना की आज है। नारियल, लौकी के बर्तन, पत्थर के औजार थे आग का आविष्कार हुआ तब पाक विद्या सीखी गई और धातु के उपकरणों का निर्माता हुआ। कृषि के उपरान्त पशुपालन ही मनुष्य की सबसे बड़ी सफलता थी। बोलने में, लिखने में प्रगति बहुत पीछे हुई है। आदिमकाल का मनुष्य लगभग नर बानरों के स्तर पर ही निर्वाह करता था।

सहकारिता के बल पर क्रमशः प्रगति के चरण बढ़े और मनुष्य सुख-सुविधाओं का अधिपति तथा प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करके वैज्ञानिक बना और सृष्टि का मुकुट मणि कहलाया।

जो क्षमता मनुष्य में है उससे मिलती जुलती या भिन्न प्रकार की क्षमताएँ अन्य प्राणियों में भी है। पर एक ही कमी है-बुद्धि बल की। यह किसी को उपहार में जन्मजात रूप में नहीं मिला है। अब भी वन क्षेत्रों के निवासी प्रायः हजारों वर्ष पुराने स्तर का जीवन ही जीते है और वनमानुषों की तरह गुजारा करते है। बुद्धिमत्ता एक ने दूसरे को सिखाई है, तथ्य ध्रुव सत्य है।

मनुष्य ईश्वर का बड़ा बेटा है। अन्य प्राणी उसके छोटे भाई-बहिन। बुद्धिमत्ता में वे पिछड़ गये है। मनुष्य का कर्तव्य है कि उनके अनाड़ीपन का अनुचित लाभ न उठाये वरन् जिस प्रकार अपने संगों को सुयोग बनाया जाता है, उसी प्रकार पशु जगत के साथ थोड़ा परिश्रम किया जाये और उन्हें भी न्यूनाधिक मात्रा में उतना ही विकसित बुद्धिमान बनाया जाय जैसा कि मनुष्य स्वयं। इस प्रकार वे भी सुखी और सम्मानित जीवन जी सकें और धरती के पुत्र होने के नाते इसी पृथ्वी पर उसी प्रकार .... कर सकेंगे जिस प्रकार मनुष्य करता है।

पशुओं को आसानी से बुद्धिमान एवं उपयोगी बनाया जा सकता है। मदारी, बाजीगर, रीछ, वानरों को सधाकर उनकी कमाई में अपना गुजारा करते है। सरकस वाले जानवरों को इतना हिला लेते हैं कि वे मनुष्यों को आश्चर्य चकित करने वाले करतब दिखा सकें।

कबूतरों से डाक लाने ले जाने का काम लिया जाता था। तोता-मैना मनुष्य की बोली की नकल करते है। बन्दर, लुहारों की धोंकनी धोंकते हैं। कुत्ते घर की रखवाली करते है। यह आम बातें हैं। कभी-कभी तो वे अपनी बुद्धिमता का परिचय ऐसा देते हैं, जिसे देखकर उनके कमाल को देखे हुए दंग रह जाना पड़ता है।

फिल्मों में कितने ही बन्दर ओर कुत्ते ऐसे पार्ट करते है कि उन्हें किसी कलाकार से कम नहीं ठहराया जा सकता। कुछ दिन पूर्व एक कुत्ता पोस्टमैन की भूमिका निभाने, घर-धर चिट्ठियाँ बाँटने में यशस्वी हो चुका है। उनकी गंध शक्ति का उपयोग करके पुलिस वाले अभी भी चोरों और अपराधियों का पता लगाते है। यह प्रशिक्षण का ही प्रतिफल है। ऐसी आश्चर्यजनक घटनाएँ संसार भर में होती रहती हैं, जिनमें पशुओं ने मनुष्य से बढ़कर सद्भावना का परिचय दिया है। कुत्ते और बिल्ली बिछुड़ जाने पर सैकड़ों मील का रास्ता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मालिकों के घर आ जाते हैं।

अभी-अभी कुछ दिन की बात है कि इंग्लैंड के जान हानसन ओर रोडरीफ लकी ने बर्फीले प्रदेश में एक खास किस्म के वनमानुष को पाया। उसे घर लाकर घर के सदस्य जैसा बेझिझग बनाया फिर उसे पढ़ना शुरू किया, उसने .... शब्द अंग्रेजी के सीख लिए। इतने से ही वह अपनी बात कह लेती है और दूसरों की समझ लेती है। वह साइकिल पर सवार होकर बिना भटके अभीष्ट स्थान तक पहुँच जाती है। यह बंदरिया अमेरिका तथा इंग्लैंड के कई फिल्मों में भी काम करती है और अपने मालिकों के लिए ढेरों पैसे कमाती है।

मध्यकाल में सामन्त आये दिन एक दूसरे से लड़ाइयाँ ठानते रहते थे और बार-बार युद्ध होते रहते थे। इस कार्य के लिए घोड़े और हाथी ऐसी अच्छी तरह सिखाये और सधाये जाते थे कि मनुष्य का कम उनका अधिक अभ्यास तथा पराक्रम कौशल काम आता था। थोड़े से घोड़े और हाथियों के बल पर उन दिनों बड़ी-बड़ी लड़ाइयां जीती जाती थी।

पालतू हाथी जंगली हाथियों को पकड़कर लाने में इतने प्रशिक्षित होते है कि उनकी चतुरता को देखकर अचंभे में रह जाना पड़ता हैं असम के जंगलों में लकड़ी के भारी लट्ठे ढोने का काम पालतू हाथियों से ही लिया जाता है। राजाओं के यहाँ ऐसे शिकारी कुत्ते रहते थे जिनकी सहायता से शेर, चीते आदि का शिकार भी आसानी से कर लिया जाता था। अफ्रीका की एक कुतिया मालिक की भेड़ों का झुण्ड घर से चराने ले जाती थी और शाम को उन्हें घेर कर ले आती थी। एक भी भेड़ यदि पिछड़ जाती तो उसे ढूँढ़ कर ले आती। बर्फीले स्थानों पर हिरन और कुत्ते ही बिना पहिये की गाड़ी चलाते है और मालिकों को तथा उनके सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाते है। तंज़ानिया की एक फ्राँसीसी महिला ने शेरों का एक पूरा परिवार पाल रखा था जो उसके साथ ही रहता था। वे सभी बहुत भोले और प्रेमी थे। उनकी फिल्में बनाने संसार भर की कई कम्पनियाँ आई। जिस बात पर लोग बिल्कुल यकीन नहीं करते थे उस स्वभाव परिवर्तन की बात पर लाखों करोड़ों को विश्वास करना पड़ा।

“आत्मवत् सर्व भूतेषु” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सिद्धान्त भारतीय संस्कृति के नहीं मानव संस्कृति के प्राण है। इन्हें मौखिक कथनोपकथन तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए वरन् शोभा और शान तब है जब इन्हें कार्यान्वित किया जाय। मनुष्यों तक की बात सोचने में हमें सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् सोचना यह चाहिए कि यह धरती सब की है और उस पर समतुल्य बिरादरी के पशुओं को ज्ञान बल से सम्पन्न किया जाना चाहिए। यह कार्य हम कर सकते है और उनका ही नहीं साथ ही अपना भला भी कर सकते है। साथ ही मनुष्य का भी कम हित साधन नहीं हुआ है। इसी प्रकार आगे उन्हें प्रशिक्षित समझदार बनाया जा सके तो वे अधिक सम्पन्न और अधिक सुविधा प्राप्त करेंगे, साथ ही इसमें मनुष्य का भी कम हित साधन नहीं होगा। उसे श्रेय मिलेगा और आदर्शों के परिपालन में उसे तत्पर भी कहीं देखा जा सकेगा।

पशुओं को बुद्धिमान एवं उपयोगी बनाने का कार्य कठिन है तो है पर असम्भव नहीं। यदि इस कार्य में हाथ डाला जाय तो कोई कारण नहीं कि प्राणि जगत को अधिक समुन्नत बनाने में तत्पर होकर मनुष्य सच्चे अर्थों में भगवान का ज्येष्ठ पुत्र न कहला सके और अपने छोटे भाइयों की सहायता करने का यश एवं सुयोग प्राप्त न कर सके।

यदि यह उचित लगता हो तो सचमुच ही आदर्श अपनाने का मन हो तो धरती का कुछ भाग पशुओं को जीवित रहने के लिए भी छोड़ना होगा। आज तो स्थित ऐसी है कि बढ़ती हुई अन्धाधुन्ध आबादी के लिए अन्न, मांस सब कुछ कम पड़ रहा है। जब मनुष्य के लिए ही रहने की जगह कम पड़ रही है। भोजन में असमंजस है और पशु-पक्षियों से लेकर जलचरों तक को उदरस्थ करने की योजना बन रहीं है, तो अन्य जीवधारी पृथ्वी पर बचेंगे कैसे ? रहेंगे कहाँ ? खायेंगे क्या ? और काम किसके आयेंगे ? जब मनुष्य बढ़ते-बढ़ते धरती का कोई कोना खाली नहीं छोड़ रहे है।

अच्छा हो हम प्रजनन रोकें और जो मनुष्य है उन्हीं को समुन्नत करने की व्यवस्था करें। बन पड़े तो पशुओं को भी समुन्नत बनाने का सुयोग प्रदान करें। पर यह संभव तभी है जब मनुष्य अपनी संख्या बढ़ाने में रोकथाम करने की बात सोचे।


भाग्य बताने पर दैवी रोक (Kahani)

विधाता के पास एक सिद्ध पुरुष पहुँचे। देखा कि वे लोगों का भाग्य लिख रहे हैं। इस क्रिया को सिद्ध पुरुष आकर ध्यान देकर देखने लगे।

विधाता ने देखने से रोका और कहा- यह लिखा तो जा रहा है पर उसे किसी को जानने पर रोक है ?

प्रश्न किया गया कि ऐसा क्यों ? ब्रह्मा जी ने कहा-बताने में अनर्थ ही अनर्थ है। किसी को अच्छा भाग्य बताया जायगा तो उसका पुरुषार्थ घट जायगा अहंकारी बन जायेगा और यदि भाग्य खोटा बताया जाय तो निराशा छायेगी और कोई बड़ा काम करने की हिम्मत न पड़ेगी। दोनों ही प्रकार मानवी पुरुषार्थ को हानि पहुँचेगी और संसार के गति-चक्र में व्यवधान पड़ जायेगा। इसी कारण भाग्य बताने पर दैवी रोक है। जो जानते है बताते नहीं, जो बताते है वे जानते नहीं।


तनाव मिटाइये-शिथिलीकरण द्वारा

शिथिलीकरण मुद्रा या श्वसन में समस्त शरीर को उसके अंग प्रत्यंग को शिथिल करना पड़ता है, मानों वह गहरी निद्रा में चला गया हो। साथ में मन को भी इस स्थिति में ले जाना पड़ता है मानों क्लोरोफार्म जैसी वस्तु सूँघ-सुध खो बैठा हो।

स्वाभाविक तौर पर ऐसी स्थिति गहरी निद्रा में ही बनती हैं। सभी जानते है कि गहरी नींद आजाने पर थकान दूर होती और ताजगी आती है। रात को थककर चूर हुआ व्यक्ति जब रात भर गहरी नींद सो लेता है तो सबेरे उठते ही ऐसी स्फूर्ति प्रसन्नता और ताजगी का अनुभव होता है, मानों कोई बहुमूल्य टानिक लिया है। नया काम हाथ में लेने की उमंगे उठने लगती है। प्रकृति का कितना अनुग्रह है कि हम अनेकों कारणों से शारीरिक और मानसिक थकान आमंत्रित करते है और उसकी पूर्ति प्रकृति अपने ढंग से इस प्रकार कर देती है कि उसके लिए हमें कोई विशेष प्रयत्न या खर्च नहीं करना पड़ता।

कभी-कभी ऐसा होता है कि शरीर या मन इतना अधिक अस्त-व्यस्त या उत्तेजित होता है कि उसके सामने प्रकृति प्रेरणा उतना काम नहीं कर पाती जितना कि उसे करना चाहिए। ऐसी दशा में या तो नींद आती ही नहीं या इतनी हल्की उथली आती है उसका प्रभाव .... जितना होता है और थकान मिटने का सुयोग बन नहीं पाता। ऐसी दशा में लोग आमतौर से नशीली वस्तुएँ लेते है। कैमिस्टों की दुकानों पर ऐसी वस्तुएँ विभिन्न नामों और रूपों के ट्रंकोलाइजरों के रूप में बिकती है। उन्हीं का सेवन करते है। उनके कारण खुमारी भर आती है। मनुष्य सुध-बुध भर भूलता है पर उसकी ताजगी का लाभ नहीं ले पाता जो स्वाभाविक रूप से आने वाली गहरी नींद द्वारा मिलती है। फिर एक कठिनाई और भी है टं्रकोलाइजर आदत का अंग बनते जाते हैं। उनका प्रभाव घटता जाता है। अधिक मात्रा लेने की जरूरत पड़ती है। इतना ही नहीं उनके अन्य रूप में दुष्प्रभाव साइड एफेक्ट भी उभरते है। उन कारणों में शरीर नई व्याधियों से ग्रसित होता है।

इस स्थिति में सरल उपाय शिथिलीकरण मुद्रा के अभ्यास का है। इसमें प्रधानतया मनोबल का उपयोग करना पड़ता है। अपने आपको स्वसंकेत देने पड़ते है कि हम गहरी निद्रा में जा रहे है। अंग शिथिल हो रहे है ओर मन में भाग दौड़ सर्वथा बन्द कर दी। उसकी सब प्रकार की भली बुरी कल्पनाओं से छुटकारा पा लिया।

आरम्भ में मन इस परामर्श को मानने में आना कानी करता है। पर पीछे लगातार प्रयत्न पर कुछ दिन में वह प्रशिक्षित हो जाता है और आज्ञानुसार काम करने लगता है। जब हिंस्र पशु सरकसों में आशातीत विचित्र कार्य करने के लिए रिंग मास्टरों द्वारा प्रशिक्षित कर लिए जाते है तो कोई कारण नहीं कि अपना शरीर अपना मस्तिष्क सदा अपने निर्देशनों की अवज्ञा ही करता रहे।

नेपोलियन और क्लाइव में यह विशेषता पाई जाती थी कि वे हफ्तों घोड़े पर सवार रह कर युद्ध मोर्चे पर जागते रहते थे। थकान मिटाने के लिए इतना भर करते थे कि घोड़े को किसी पेड़ से सटाकर सवारी की स्थिति में ही पेड़ के सहारे थोड़ी देर गहरी नींद ले लेते थे। बस इतने भर से उनका काम चल जाता था और फिर नये उत्साह से काम में जुट जाते थे। ऐसा अभ्यास दूसरे लोग भी कर सकते है। अभ्यास ही विधा एक ही है शिथिलीकरण।

अभ्यास के आरम्भिक दिनों कोलाहल रहित स्थान पर चारपाई पर लेट जाना चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि शरीर सर्वथा भार रहित स्थिति में है। वह रुई जैसा हल्का हो गया। सारा वजन चारपाई पर चला गया।

मन को शाँत करने के लिए एक कल्पना चित्र बहुत ही कारगर है। संसार में कही कोई व्यक्ति मकान, पदार्थ, प्राणी नहीं रहा। न उनसे संबंधित काई समस्या, विचारणा शेष रही। सर्वत्र प्रलय काल जैसी अथाह जल राशि भरी हुई है। उसमें हम मात्र अकेले है। छोटे बालक की तरह पत्ते की नाव पर पड़े हुए धीमे-धीमे हवा के साथ किसी अज्ञात दिशा में बहते जा रहे है। कहीं कोई अवरोध नहीं। न कोई समस्या और न उसके संबंध में विचारणीय प्रसंग।

इस प्रकार के प्रलय काल वाले चित्र तस्वीर वालों की दुकानों पर भी बिकते है जिसमें भगवान को जल में पत्ते के ऊपर पड़ा हुआ और पैर का अँगूठा चूसते हुए दिखाया गया है। कल्पना को ठीक तरह जमाने में यह चित्र एक आधार की तरह सहायक सिद्ध हो सकता है।

अपनी मृत्यु की कल्पना यदि डरावनी न लगे तो वह भी कारगर सिद्ध हो सकती है। कल्पना करनी चाहिए कि शरीर और मन मूल अवस्था में शान्त निःचेष्ट पड़े है। हमारा प्राण उसमें से निकल गया और परलोक में ऐसी व्यवस्था हो गई कि जिन्दगी भर की थकान दूर करने के लिए लम्बी अवधि तक एक मुलायम पंडाल पर ऐसे वातावरण में सोने को मिल गया-जहाँ सर्दी, गर्मी, मक्खी, मच्छर आदि का कोई व्यवधान नहीं है। जो चिंताएं, समस्याएँ, जिम्मेदारियाँ सिर पर थी वे मरे हुए शरीर के साथ हजारों मील नीचे रह गई और हम उस स्थिति में बहुत ऊँचे उठकर सर्वत्र नये वातावरण में आ गये।

युवावस्था में कठोर श्रम करने के बाद तुरंत नींद आ जाती है पर वृद्धावस्था में ठीक उसका उल्टा होता है। बूढ़े लोग थकान से कराहते और नींद न आने की शिकायत करते है। ऐसी अवस्था में गरम पानी की बाल्टी में पैर रखकर बैठना और फिर पैर पोंछ कर सो जाना लाभदायक पड़ता है। किन्हीं-किन्हीं को किसी गम्भीर विषय की किताब पढ़ते-पढ़ते नींद आ जाती हैं सिर और पैरों की मालिश मन ही मन करा लेना या उस प्रकार की भावना करने लगने से भी राहत मिलती है।

मानसिक चिन्ताएँ घाटा, अपमान, मुकदमा, आशंका, भय, निराशा जैसे विचार, मानसिक तनाव उत्पन्न करते है। तनाव की स्थिति में नींद उड़ जाती है और तब थकान का दूना अनुभव होता है। ऐसी स्थिति में कोई मनोरंजन, किस्से कहानी कहने या सुनने लगना विचारों का केन्द्र बिन्दु बदल देता और नींद आने लगती है। टेपरिकार्डर पर किसी वादन की मोहक ध्वनि सुनने पर ध्यान बट जाता और नींद आने लगती है। जो थकान मिटाने का प्रधान आधार है। थकान और अनिद्रा का घनिष्ठ संबंध है। खासतौर से मानसिक तनाव इस संदर्भ में विशेष रूप से बाधक होता है। इन परिस्थितियों में सिर पर छाये हुए विचारों से मुक्ति पाने के लिए कोई रोचक प्रसंग याद करने लगना ठीक पड़ता है।

शरीर की थकान गुम-सुम पड़ जाने और चुप्पी साध लेने से कुछ देर में नींद आने पर उतर जाती है। किन्तु मानसिक उलझनों का जंजाल ऐसा बुरा है जो थकान न होने पर भी नींद में विक्षेप डालता और थकान बढ़ाता है। ऐसी दशा में चिन्तन का जो उद्विग्न करने वाला प्रवाह चल रहा हो उसे उलट देने वाले दूसरे हल्की फुलकी विचारधारा का आश्रय लेना ही उपयुक्त है।

सर्दी, गर्मी, मच्छर, खटमल, जूँ आदि के कारण नींद न आ रही हो तो स्थान और बिस्तर बदल देना चाहिए। मानसिक, राम नाम जपने लगना भी नींद बुलाने का एक तरीका है।

सर्दी, गर्मी, मच्छर, खटमल, जूँ आदि के कारण नींद न आ रही हो तो स्थान और बिस्तर बदल देना चाहिए। मानसिक, राम नाम जपने लगना भी नींद बुलाने का एक तरीका है।


अहिंसाधारी संत बन गया (Kahani)

एक बहेलिया किन्हीं पहुँचे हुए संत से दीक्षा लेना चाहता था। संत का नियम था कि गुरु-दीक्षा में अहिंसा व्रत निबाहने की प्रतिज्ञा कराते थे।

बहेलिया का निर्वाह पक्षी पकड़ने पर ही चलता था। वह उसके लिए तैयार न हुआ। निराश लौटते देखकर संत ने उसे सरल उपाय सुझाया और क्रमशः धीरे-धीरे कदम बढ़ाने का मार्ग बताया। उनने कहा-अभी तुम कम से कम एक पक्षी पर दया व्रत निबाहने का व्रत निभाओ। पीछे उस व्रत की परिधि बढ़ाते चलना। इस पर बहेलिया तैयार हो गया। उसने सर्वप्रथम “कौवा” न मारने का व्रत लिया। और अहिंसा धर्म में प्रवेश किया।

बहेलिया अहिंसा तत्व पर विचार करता रहा धीरे-धीरे उसकी परिधि बढ़ाता रहा। कुछ दिन में वह पूर्ण अहिंसाधारी संत बन गया।


अविज्ञात से डरकर पीछे न हटें वैज्ञानिक

अन्याय ग्रहों पर जीवन है, यह तथ्य पूर्णतः सत्य न होने पर भी ऐसे अनेकानेक घटनाक्रम यह सोचने पर मानवी अन्वेषण बुद्धि को विवश करते है कि यदि ऐसा है तो दूसरी और से मनुष्य से संपर्क साधने का प्रयास क्यों कर किया जाता है ? मात्र मनुष्य ही उनके संबंध में जानने को उत्सुक हो, यह बात नहीं। उड़नयानों का अचानक प्रकट होकर लुप्त हो जाना व ऐसी घटनाएँ संयोग की सीमा से परे होते रहना इस तथ्य का द्योतक है कि अन्य लोकों के वासी, यदि वे है, पृथ्वी वासियों के साथ मिल विनाश अथवा पृथ्वी पर कब्जा जमाना उनका लक्ष्य नहीं है।

अभी तक तो यही कहा जाता रहा है कि ये किम्वदंतियां मात्र हैं। किन्तु उड़न तश्तरियों के आवागमन के जो प्रमाण मिले है, वे ऐसे है कि झुठलाये नहीं जा सकते। सन् .... की गर्मी का एक प्रसंग है। अमेरिका के पश्चिमी तट पर साक्रामेण्टो के समीप मोटरबोद पर बैठे तट-रक्षक एच0ए0डुहल तथा फ्रेड॰ क्रैसवेल समुद्र की निगरानी कर रहें थे। अचानक उन्हें आकाश में दो हजार फीट की ऊँचाई पर गोल आकृति की प्रकाशमान छः वस्तुएँ दिखाई दी जो स्वचालित मशीन जैसी लग रहीं थी। एक मशीन मध्य में थीं जिसके चारों ओर अन्य पाँचों चक्कर लगा रहीं थीं। धारे-धीरे नीचे उतर कर छहों आकृतियाँ 500 फूट की ऊँचाई पर रुक गई। डुहल ने उनके फोटो लेने के लिए अपने कैमरे का स्विच दबाया ही था कि अचानक उनकी मोरटरबोट की टंकी विस्फोट के साथ फट गई। डर के मारे वे दोनों तुरँत छलाँग लगा कर पास की एक गुफा में घुस गये पर उनका सहायक कुत्ता बाहर ही रह गया और मारा गया। कुछ देर बाद बाहर निकलने पर उनने देखा कि एक तश्तरी नुमा मशीन के चमकीले टुकड़े तट पर बिखरे थे जो अभी भी गरम थे। नौका में लगे ट्राँसमीटर जाम हो गये थे। वैज्ञानिकों ने उक्त टापू पर फैले 20 टन धातु के टुकड़ों को एकत्र करके परीक्षण किया तो ज्ञात हुआ कि ये टुकड़े ... धातुओं के सम्मिश्रण से बने हैं। जिस पर कैल्शियम की मोटी चादर चढ़ी हैं। वैज्ञानिकों के लिए यह एक आश्चर्य ही बना रहा हैं कि इन धातुओं में से एक भी धातु पृथ्वी पर नहीं पाई जाती। वे इनके नाम तक बता पाने में असमर्थ रहें।

धरती पर उड़न तश्तरियों के आवागमन के अनेकों प्रमाण मौजूद है। एनिड ओकला होमा के पुलिस स्टेशन में ... जुलाई .... को सिड यूनैक नामक एक व्यक्ति ने प्रवेश किया। डर के मारे वह थर-थर काँप रहा था। पुलिस अधिकारी के उसने बताया कि एक उड़न तश्तरी उसका अपहरण करना चाहती थीं। वाइसा और वाकोमिस के मध्य .... हाइवे पर वह अपनी कार चला रहा था कि एक उड़नतश्तरी बड़े वेग से कार के ऊपर झपटी। इस झपट के कारण हवा का इतना तीव्र झोंका आया कि कार थपेड़ा खाकर सड़क से बाहर जा गिरी। उड़नतश्तरी थोड़ी देर तक कार से चिपकी रहीं फिर एकाएक आसमान में उड़ गई।

सन् .... में ही अगस्त माह की .... तारीख वाशिंगटन-अमेरिका के आकाश पर एक साथ .... उड़नतश्तरियां मँडरा रहीं थीं। अमेरिका रैडार सिस्टम ने भी इन अपरिचित यानों को अंकित किया था। अनेक वैज्ञानिकों एवं बुद्धि-जीवियों ने भी इसकी पुष्टि की थी। तरह .... अगस्त .... को ब्लैकहाक, साउथ डैकोटा में वायुयान चालकों ने रात्रि में आकाश से अपनी ओर आते हुए चमकदार अद्भुत वस्तुएँ देखीं। वे उनके यान से दोगुनी गति से उड़ रहीं थी। वायुसेना के अड्डे पर स्थित रैडार ने इन उड़नतश्तरियों को देखा। पीछा करने पर वे आकाश में कहीं अदृश्य हो गई।

.... में पश्चिमी जर्मनी के ऊपर अनेक तश्तरीनुमा प्रकाशवान वस्तुएँ देखी गई। इनमें से कुछ के वहाँ धरती पर उतरने के भी प्रमाण मिले हैं। जर्मन अंतरिक्ष विशेषज्ञों ने परखने पर पाया कि ये उड़न तश्तरियाँ बाह्य अंतरिक्ष के किसी अन्य ग्रह से आती हैं। इनके चालक हमसे अधिक बुद्धिमान एवं उन्नतिशील हैं। जर्मनी के मेयोट हेरलिंक ने अपनी आँखों देखे विवरण में बताया हैं कि दिन के प्रकाश में एक तश्तरीनुमा चमकीला यान धरती पर उतरा जिसमें लगभग साढ़े तीन फिट लम्बा ठिगना एक व्यक्ति चमकीले सूट पहने और सिर पर पारदर्शी हेल्मेट लगाये बैठा था। उसकी पोशाक से नीली रोशनी निकल रहीं थी। कुछ मिनटों बाद वह व्यक्ति अपना यान लेकर उड़ गया।

इसी तरह .... अगस्त .... को पेरिस से कोई 50 मील दूर वरनान नगर में पुलिस स्टेशन पर कितने ही व्यक्तियों ने, जिनमें सेना का एक इंजीनियर, दो सिपाही तीन महिलाएं एवं वर्नाड माहसरे आदि सबने एक ही प्रकार की रिपोर्ट लिखाई। सभी भिन्न स्थानों पर थे किन्तु एक ही वस्तु को सबने एक स्थान पर एक जैसा देखा। रात्रि के अंधेरे में बारह बजे के लगभग शहर से डेढ़ फलाँग दूर 100 गज लम्बी कोई वस्तु आकाश में लटक रहीं थी। उसमें से हरा प्रकाश फूट रहा था। उसके पेंदे से एक तश्तरीनुमा कोई वस्तु निकली और नदी की ओर गई। अन्य लोगों ने देखा कि वह बेलनाकार ट्यूब में प्रवेश करने के पश्चात् यान सहित आकाश में ऊपर चली गई। इस रहस्यमय यान की खोज वैज्ञानिक अभी तक नहीं कर पाये हैं।

... नवम्बर ... को रात्रि के 1 बजे थे कि ओटावा के वास्काटाँग झील के पास एक उड़न तश्तरी देखी गई जिसकी उपस्थिति के कारण रेडियो की शार्ट एवं मीडियम वेव फ्रीक्वेंसी ने काम बंद कर दिया था। एक इलेक्ट्रोनिक इंजीनियर ने अपने रिसीवर के पुनः चालू करने के अनेक प्रयत्न किये पर तीव्र किट-किट की आवाज के अतिरिक्त कुछ न सुनाई पड़ा वह आवाज उड़न तश्तरी के माध्यम से किसी अन्य लोक के नियंत्रण केन्द्र का संकेत थी या और कुछ, इसकी कोई भी जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकी।

एरियल फेनामिना रिसर्च आर्गनाइजेशन के डायरेक्टर श्री कोरल लारेन्जन के कथानुसार .... अगस्त .... को डबरलैण्डिया के पाव हाउस की चार स्वसंचालित चाबियाँ अचानक खुल गई और पूरे शहर की विद्युत सप्लाई बंद हो गई। निरीक्षण करने पर पावर हाउस अथवा लाइनों में कोई खराबी नहीं मिली। गहराई से छानबीन करने पर ज्ञात हुआ कि एक विचित्र चमकदार उड़न तश्तरी उसके ऊपर चक्कर काट रहीं थीं जिससे विद्युत प्रवाह बंद हो गया था। उसके वहाँ रहने तक बिजली चालू करने के सभी प्रयत्न विफल हो गये थे किन्तु जैसे ही वह गायब हुई, विद्युत लाइनों में फिर से दौड़ने लगी और सब कुछ पहले जैसा हो गया।

ऐसे घटनाक्रम भारत में भी घटे हैं। जन-संचार माध्यमों की कमी एवं अज्ञानतावश सभी प्रकाश में न आ पाए हों, यह संभव हैं। लगभग बारह वर्ष पूर्व एक ऐसा ही चुम्बकीय तूफान दिल्ली में आया था जिसमें सड़क पर चलते वाहन मकान की छतों पर पहुँच गए। हाई टेंशन लाइन में भीमकाय स्तम्भ मुड़तुड़ कर जमीन पर आ गिरें। वैज्ञानिकों ने प्रत्यक्षदर्शियों से चर्चा करने पर पाया कि सभी ने सिगारनुमा एक चमकीला वाहन आकाश में तेजी से जाता उसी अवधि में देखा था। जिन स्थानों पर यह घटना घटी थी, वहाँ अतिसघन परिणाम में रेडियोधर्मिता पायी गयी। भौतिकीविदों का यह भी निष्कर्ष था कि यह अन्य ग्रहों से आया कोई यान ही था जो तूफान का कारण बन गया।

अमरीकी कमाण्डर मैक्लाफलिन ने अपने खोज निष्कर्ष में कहा हैं कि उड़न तश्तरियाँ निश्चय ही किसी अन्य ग्रहों से प्रेषित की जाती हैं जहाँ के निवासी हमसे कहीं अधिक बुद्धिमान हैं। उनके अंतरिक्ष यान का औसत आकार .... फीट चौड़ा, .... फीट लम्बा होता है। .... मील प्रति घंटे की तीव्र गति से दो लाख फिट की ऊँचाई तक उन्हें उड़ते देखा गया हैं। कितने ही बार इन्हें झपट्टा मार कर भी उड़ते देखा गया हैं। सन् .... में केप कैनेडी अंतरिक्ष केन्द्र पर उड़न तश्तरी ने इसी प्रकार झपट्टा मारा। .... जून .... को कैलीफोर्निया हवाई अड्डे पर उड़ते एक लड़ाकू विमान का उसने पीछा किया। आस्ट्रेलिया तथा लिस्वन की वेधशाला ने भी इनके आक्रमण नोट किये हैं।

विश्व के अनेक मूर्धन्य वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, रक्षा-विशेषज्ञों, अंतरिक्ष वैज्ञानिकों आदि ने इस तरह के विभिन्न स्वरूपों और आकारों वाले अद्भुत यानों को देखा हैं। अपना अभिमत प्रकट करते हुए उन्होंने कहा हैं कि ये अंतरिक्षवासी हमसे संपर्क बनाने के लिए ही यहाँ आत-जाते रहते हैं। प्रायः देखा गया है कि ये उड़न तश्तरियाँ रक्षा संस्थानों, संचार केन्द्रों, औद्योगिक इकाइयों के इर्द−गिर्द मँडराती हैं और कहीं-कहीं उतरती भी हैं। इससे स्पष्ट होता हैं कि ये पृथ्वी का सर्वेक्षण करती हैं और यहाँ की प्रगति का रहस्य जानना चाहती हैं।

साँताआना, कैलीफोर्निया में .... अगस्त .... को एक उड़न तश्तरी देखी गई। रोड इन्सपेक्टर रेक्स हैफ्लिन के अनुसार वह बाँई ओर से आकर सड़क पर देर तक इस तरह चक्कर लगाती रही, मानो किसी वस्तु को ढूंढ़ रहीं हो। इसके बाद दांये ओर मुड़कर खेतों का चक्कर लगाने लगी। इसी मध्य रेक्स ने उसकी फोटो खींच ली जो कई पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो चुकी है।

.... अगस्त .... को नार्थ डेकोटा में एक वायु सेना अधिकारी को रेडियो तरंगों द्वारा स्टेशन भेजने में अचानक बाधा का सामना करना पड़ा। खोजबीन करने पर पता चला कि इसी समय गहरे लाल रंग का प्रकाश बिखेरती कोई तश्तरीनुमा वस्तु ऊपर-नीचे उड़ रही थी, जिसकी सूचना रैडार ने भी दी थी। थोड़ी देर बाद वह दक्षिण की ओर चली गई और कोई 25 मील दूरी पर पृथ्वी पर उतर गई। जब उस स्थान पर वायु सेना का एक खोजी दल पहुँचा तो ज्ञात हुआ कि आठ मिनट पहले ही वह वहाँ से गायब हो चुकी थी। इसी बीच दूसरी तश्तरी उत्तर की ओर दिखाई दी। उसे भी रैडार ने देखा, पर जब तक खोजी दस्ता उधर दौड़े वह आँखों से ओझल हो गयी।

इसी तरह कनाडा के समुद्री तट पर तटरक्षकों के अतिरिक्त शकाहार्बर के सैकड़ों निवासियों ने ... अक्टूबर ... की शाम को आकाश में कोई चमकदार उड़ती हुई वस्तुतः देखी। देखते-देखते ही वह समुद्र में जाकर विलीन हो गई। पुलिस कर्मचारी 20 मिनट के अंदर ही उस स्थान पर पहुँच गये परन्तु वे समुद्र के एक स्थान से मात्र पीला झाग निकलता ही देख सके। उड़न तश्तरी का कहीं कोई पता नहीं चला।

अमेरिका के मूर्धन्य रेडियो खगोलवेत्ता प्रो0 कोनाल्ड ब्रेसवेल का कहना है कि उड़न तश्तरियाँ किसी विकसित सभ्यता वाले ग्रह से सूचना यान के रूप में आती है। संभव है वे यहाँ की स्थिति की जानकारी अपने उद्गम स्थान को रेडियो संदेशों एवं टेलीविजन चित्रों के रूप में संप्रेषित करती हों।

एक विचित्र संयोग यह हैं कि उड़न तश्तरियों की खोज करने वाले वैज्ञानिकों में से प्रायः सभी की तारीख 25 को मृत्यु होती हैं। एडवर्ड, क्वीथम, आर्थर, रिचर्ड, फ्रेंच सकली, पियेंजी सभी इस विषय के शोधकर्ता थे। प्रत्यक्षदर्शी विलियम आँखों देखा वर्णन छापने ही वाले थे कि उनका हार्टफेल हो गया। डा0 टैमेण्ड ने कुछ विवरण छापे थे कि वे अचानक लुप्त हो गये, कुछ पता न चला कि वे कहाँ गये ?

कुछ भी हो, ये सभी घटनाक्रम रहस्यों के घेरे में तब तक बने रहेंगे।, जब तक सत्य का उद्घाटन नहीं होता। विज्ञान का प्रथम पाठ यह है कि जब तक खण्ड कर सकने योग्य समुचित प्रमाण ने मिलें, किसी तथ्य को नकारना नहीं चाहिए। ऐसा न कर अपनी ही बात कहने वाले दुराग्रही-पक्षपाती-हठधर्मी ही कहें जायेंगे। फिर उनमें व पुरातन मान्यताओं की दुहाई देने वाले शास्त्रार्थियों में अंतर ही क्या रहा ? विवेकशीलता का तकाजा है कि हम पूर्वाग्रहों से ग्रसित न होकर सत्य की शोध निरन्तर करते रहें। अन्तर्ग्रही आवागमन की घटनाएँ भी उस अविज्ञात की परिधि में आती हैं, जिसे अभी जाना नहीं जा सका हैं। पर इसका यह मतलब तो नहीं कि उनका अस्तित्व हीं नहीं हैं।


बादशाह का अंगरक्षक (Kahani)

बादशाह का अंगरक्षक उनका वफादार नौकर था। एक दिन बादशाह ने गहरी शराब चढ़ा ली। और वे सद्गृहस्थों के घर में घुसकर अशिष्टता करने लगे।

इस पर अंगरक्षक ने उन्हें रोका नहीं पर हाथ पकड़कर राजमहल तक घसीटता लाया और कमरे में बन्द कर दिया।

दूसरे दिन दरबार में नौकर की पेशी हुई। सभी अनुमान लगा रहें थे कि उसे कोई कड़ा दण्ड मिलेगा। पर ऐसा हुआ नहीं।

राजा ने नौकर द्वारा रोकथाम किये जाने की बड़ी प्रशंसा की और कहा- सच्चे शुभ चिंतक का एक कर्त्तव्य यह भी हैं कि मालिक को बुरी राह पर चलने से रोके।

इस कसौटी पर वह अंगरक्षक खरा उतरा और उसे मंत्री का पद दिया गया।


भय- एक काल्पनिक संकट

आवश्यकता नहीं कि संकट अपने ऊपर से गुजरे, की आदमी को विपत्ति से घिरा हुआ समझे, कष्ट उठाये और प्राण त्यागे। ऐसा भी हो सकता हैं कि स्वाभाविक काल्पनिक भय किसी के ऊपर हावी हो जाँय और उसके प्राण ले ले अथवा वैसी ही मुसीबत में ... जिससे जीवन तबाह होकर रहें।

भूत, पलीतों का भय प्रायः काल्पनिक होता हैं। .... डायन-मनसा भूत”की उक्ति गलत नहीं हैं। काल्पनिक भय से असंख्यों व्यक्ति जान गवाँ बैठे और गल जैसी स्थिति में पहुँच गये।

कभी−कभी ऐसे घटनाक्रमों का स्थायी प्रभाव मन मस्तिष्क पर पड़ता हैं व आजीवन वह अचेतन मन में ... ही रहता है। एक घटना 21 जनवरी .... की है। ... लुहरवेट अपने 8 वर्षीय पुत्र आरमण्ड को .... फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें की हत्या इतनी अदेयतापूर्वक की गई कि वहाँ का नृशंस दृश्य देखकर आरमण्उ बहुत सहम गया। मादाम लुहरवेट अपने बच्चे को लेकर घर लौट आयी और आरमण्ड खेलने लगा। खेलते-खलते उसे वह वीभत्स दृश्य याद आया पर वह बेहोश होकर गिर पड़ा। बेहोश आरमण्ड को अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर ने जाँच की और बताया कि बच्चे के मन पर किसी घटना का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है।

आरमण्ड होश में तो आ गया, पर उस घटना का प्रभाव उसके मन मस्तिष्क पर इस बुरी तरह हावी हो गया कि वह सो नहीं सका। एक दिन, दो दिन, सप्ताह, सप्ताह उपचार किया गया। महीनों तक कुलाइजर्स, हिप्नोटाइजर्स (नींद की औषधि) दिये गए, मालिश भी की गई। किन्तु नींद नहीं आई तो नहीं ही आई।

माता-पिता के इस बात की चिन्ता हुई कि उनके बच्चे के स्वास्थ्य पर न सोने के कारण प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एक दो दिन ही न सोने से मन में उद्विग्न हो उठता हैं। व्यक्ति विक्षिप्त हो जाता है। सामान्य व्यक्ति यदि आठ घण्टे प्रतिदिन नींद न ले तो उसे अपना सामान्य जीवनक्रम भी चलाना कठिन हो जाय। परन्तु आरमण्ड को देखकर यह सारी धारणाएँ निर्मूल सिद्ध हुई।

न सोने के बावजूद भी नियमित रूप से पढ़कर वह वकील बना व .... वर्ष की आयु में ... में स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हुआ। परन्तु अक्सर ऐसा होता था कि उनका अचेतन सचेतन पर हावी हो जाता व वे बैठे-बैठे चीखने लगते थे। जो जानकार थे, उन्हें कारण मालूम था पर जो वास्तविकता से अनभिज्ञ थे, उन्हें सामान्य अवस्था में आने पर भाँति-भाँति के परामर्श देते। यह स्थिति उनकी आजीवन रहीं।

वस्तुतः भय की कल्पना मात्र ही कमजोर मनः स्थिति के व्यक्ति को अकाल मृत्यु का ग्रास बना देती हैं। एक प्रयोग जो मनोवैज्ञानिकों ने इस सम्बन्ध में किया था, विगत शताब्दी में बहुत चर्चित रहा। एक व्यक्ति को फाँसी की सजा हुई थी। चिकित्सक उसे अदालत से अनुमति लेकर प्रयोग हेतु अस्पताल लाये। उसकी आँखों पर पट्टी बाँध कर मेज पर सुला दिया गया, गरदन पर एक पिन चुभोकर वहीं से नली द्वारा पानी छोड़ना शुरू किया जो नीचे टपक-टपक कर गिरता रहा। डाक्टर आपस में चर्चा करते रहें कि काफी खून निकल गया। अब तक तो इसे मर जाना चाहिए था। उस व्यक्ति को विश्वास हो गया कि उसकी खून की नली काट दी गयी हैं और वह मर गया। शरीर से मात्र दस बूँद खून निकलने के बावजूद वह मात्र भय की प्रतिक्रिया वश मृत्यु को प्राप्त हो गया। यह आत्म सम्मोहन की प्रक्रिया हैं जो व्यक्ति के अचेतन पर हावी होकर आशंका को सत्य में बदल देती है। हमारे रोजमर्रा के जीवन पर यह तथ्य सतत् चरितार्थ होता रहता हैं।


अंतिम अभूतपूर्व दीप यज्ञ श्रृंखला जिसने शिक्षित जन मानस को नवनिर्माण का संदेश दिया

.... अनायास अविरत दिव्य चेतना की तरह दीप–यज्ञों का पावन प्रकाश राष्ट्रव्यापी बनता जा रहा .... आयोजन होता हैं वहीं सौ नये संकल्प प्रस्फुटित हो उठते है।

.... समाचार पढ़कर लगता है धरती पर महाप्रज्ञा का अवतरण हो रहा हैं दीप-यज्ञ उनकी प्रत्यक्ष आभा .... है। इन आयोजनों से जन मानस का प्रवाह सद्भाव और सत्कर्म की ओर मुड़ चला है :-

.... (बिहार) दीप–यज्ञ कार्यक्रम से पूर्व किए गये जन संपर्क के फलस्वरूप आयोजन आशातीत .... के साथ सम्पन्न हुआ। पिछले वर्ष तक पत्रिकाओं का .... के लगभग थी, जो बढ़कर 2400 तक पहुँच गई कार्यक्रम का उद्घाटन रेल कारखाने के चीफ वर्क्स सरदार कटारी ने किया। नारी जागरण शाखाओं का अवसर पर गठन किया गया। कार्यक्रम की सफलता श्री विजय कुमार, पवन कुमार, केशव प्रसाद, भरत, स्वराज चन्द्र, योगेन्द्र, राजेन्द्र प्रताप, विष्णु दयाल, .... कुमार तथा के0सी0 चौरसिया का सराहनीय योगदान .... अम्बावाडी (गुज0) सहम्रवेदीय दीप यज्ञ कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। आयोजन के अंतर्गत महिला जागरण सम्मेलन रखा गया। नारी जागरण शाखा का गठन समीपवर्ती क्षेत्र में ऐसी ही शाखाओं की स्थापना का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम की सफलता में श्री बलवंत भाई त्रिवेदी, श्री जयंती भाई, श्रीमती सरस्वती बहन, श्री .... भाई रावल, जशोदा बहन का सराहनीय योगदान है।

रायबरेली (उ0प्र0) स्थानीय प्रज्ञानगर, फील्ड हाँस्टल के सामने आयाकन सहम्रवेदिका दीप यज्ञ कार्यक्रम एवं नारी जागरण सम्मेलन आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ माननीय अजीत कुमार तिवारी सिविल जज द्वारा दीप प्रज्वलित करके किया गया। माननीय जज महोदय ने पूज्य गुरुदेव के अमृत वचनों को जीवन में उतारने की ओर विशेष जोर दिया। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए भाव-भर संकल्प लिए गये।

पटना (बिहार) वर्षा और आँधी के बावजूद कार्यक्रम प्रभावशाली हुआ। बिहार विधान परिषद के सभापति श्री उमेश्वर प्रसाद वर्मा ने कार्यक्रम च?का उद्घाटन किया। पूज्यवर का संदेश सुनकर बहुत प्रभावित हुए। प्रातः दीप-यज्ञ के बाद दो स्थानों पर महिला गोष्ठियाँ हुई और दोनों ही स्थानों पर नारी जागरण शाखा स्थापित हुई।

10 स्थानों पर 108 वेदीय यज्ञ के संकल्प हुए। प्रेसीडेन्ट हाल में पत्रकार वार्ता में पत्रकार बहुत प्रभावित हुए। मिशन का प्रचार करने के साथ-साथ शान्तिकुँज दर्शन का भी वायदा किया। इस अभियान क्रम में अखण्ड-ज्योति के ग्राहक 500 से 100 हो गये हैं। सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं ने समयदान के संकल्प लिए।

.... (बिहार) कार्यक्रम का उद्घाटन श्री जे0के0 कृष्णन् कमिश्नर महोदय ने किया। दीपयज्ञ की भव्यत् अद्भुत थी। स्थानीय आकाशवाणी केन्द्र वालों ने पूरे कार्यक्रम एवं गीतों की रिकार्डिंग की। भडवारी, छतवान, रतनपुर रामपुरा, कटहलबाडी, सहित अनेक शाखाओं के परिजन सम्मिलित हुए। सभी ने अधिक सक्रिय होने के आश्वासन दिये।

महिला सम्मेलन में नारी जागरण शाखा का गठन हुआ। गर्ल्स टीचर्स ट्रेनिंग कालेज में भी कार्यक्रम हुआ प्रचार्या महोदया ने बहुत रुचि ली। कार्यक्रम की सफलता हेतु सक्रिय योगदान दिया। स्थानीय पत्रकार तथा मिथल विश्वविद्यालय के प्रवक्ता एवं छात्रों ने अपनी शंकाओं के समाधान प्राप्त करते हुए साहित्य के प्रति गंभीर रुचि दिखायी।

मुजफ्फरपुर (बिहार) भेल कालोनी के निकट ग्राम खण्डरा में आयोजन हुआ। वहाँ क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं ने एक सप्ताह पूर्व से ही प्रज्ञा पुराण कथा का क्रम चला या था बड़ा सुन्दर वातावरण बना था। जल यात्रा शानदार हुई विशाल पंडाल, दो बुक स्टाल, एक प्रज्ञापेय का स्टाल आदि उल्लेखनीय आकर्षण थे।

महिला गोष्ठी मुजफ्फरपुर के-रामवृक्ष बेनापुरी (गर्ल्स) विद्यालय में बहुत सफल रही। रात्रि में राष्ट्रीय एकता सम्मेलन हुआ। इस्लाम, ईसाई, सिख सभी सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा जनकल्याण के लिए प्रार्थना की।

महौली (उ0प0) दीप यज्ञ का उद्घाटन उ0प्रा0 राज्य चीनी निगम लि0 ईकाई महौली के सामान्य प्रबन्धक ओम प्रकाश त्रिपाठी द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर नगर एवं क्षेत्र के हजारों प्रबुद्ध नर-नारी सम्मिलित हुए। नशा निवारण, दहेतज उन्मूलन, वृक्षारोपण तथा प्रौढ़ शिक्षा विस्तार कार्यक्रम चलाने के लिए परिजनों द्वारा भाव भरे संकल्प लिए गये। समीपवर्ती ग्राम चन्दा, उरदौली, कारोपाकर तथा ब्रह्मावली में भी ऐसे ही आयोजन करने की व्यवस्था बनाई जा रहीं हैं।

लुधियाना (पंजाब) श्री तीर्थराम शर्मा के प्रयासों से दीप यज्ञ आयोजन शान्ति एवं भाई-चारा का संदेश देने के साथ-साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में सभी मतावलम्बी उत्साह एवं उल्लास के साथ सम्मिलित हुए। श्री सनातन धर्म महोत्सव कमेटी की सहायता से आयोजित यह कार्यक्रम समूचे क्षेत्र के लिए प्रेरणादायी बन गया। देश में व्याप्त वर्तमान अशान्ति को दूर करने के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता स्थानीय अधिकारियों ने अनुभव की।

ढोका (बिहार) दीप-यज्ञ कार्यक्रम उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। आयोजन का उद्घाटन क्षेत्रीय विधायक श्री मोतीउर्ररहमान ने किया। इस अवसर पर भू0पू0 लोकसभा सदस्य श्री हरिकिशोरिसंह तथा विधायक श्री रघुनाथ झा भी उपस्थित रहें। रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं ने भाव-भरे संकल्प लिए।

बेगूसराय (बिहार) गाँधी स्टेडियम में आयोजित विशाल दीप यज्ञ कार्यक्रम समूचे क्षेत्र को युग चेतना से अनु प्राणित करता हुआ सम्पन्न हुआ। अपार जन-समूह के कारण आयोजन ने भले का रूप धारण कर लिया। कार्यक्रम का उद्घाटन पुलिस सुपरिडेन्ट श्री राज्यव वर्द्धन शर्मा द्वारा तथा सभापति व मुख्य न्यायाधीश द्वारा कराया गया। सभी भाई बहनों के पीले दुपट्टे एकरूपता का मनोहरी दृश्य उपस्थित कर रहें थे। कार्यक्रम के अवसर पर नारी जागरण शाखा का गठन किया गया। रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए कार्यकर्ताओं द्वारा व्यापक स्तर पर प्रयास किए जा रहें हैं। शान्तिकुँज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने के लिए सैकड़ों परिजनों ने आवेदन पत्र भरे।

अजमेर (राज0) सुभाष उद्यान में आयोजित वेदीय दीप यज्ञ कार्यक्रम उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। 2008 थालियों में सजे दीपकों से हो रहीं आरती मनमोहक दृश्य उपस्थित कर रहीं थी। उपस्थित जनसमुदाय ने नशा निवारण, दहेज उन्मूलन, वृक्षारोपण तथा प्रौढ़-शिक्षा विस्तार के लिए भाव-संकल्प लिए। कार्यक्रम की सफलता में सर्व श्री किशोर लोढ़ा, डा0 गोपाल बाहेती, इन्दर चैनानी आदि का विशेष योगदान रहा।

कलोल (गुज0) सहग्र वेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। बीस हजार भावनाशील परिजनों ने शाँतिकुँज के संदेश को सुना। रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए भाव-भरे संकल्प लिए गये। अपने समीपवर्ती क्षेत्र में अधिकाधिक परिजनों तक मिशन के प्रणेता का संदेश पत्रिकाओं के माध्यम से पहुँचाने की व्यापक योजना कार्यकर्ताओं ने बनाई।

मोदीनगर (उ0प्र0) दस ट्रेक्टर ट्रालियों में सजी झाँकियों सहित भव्य कलश यात्रा ने दीप यज्ञायोजन की विशालता का विस्तृत परिचय दिया। परिणाम स्वरूप कार्यक्रम में समुद्र की लहरों की भाँति जनसमुदाय उमड़ पड़ा। कार्यक्रम का उद्घाटन ब्लॉक प्रमुख श्री सेठ विनोद कुमार माहेश्वरी ने किया। समूचे क्षेत्र में हर शिक्षित तक पत्रिकायें पहुँचाने का संकल्प कार्यकर्ताओं द्वारा लिया गया। आयोजन की सफलता में सर्व री जी0सी0जैन, एन0पी0बंसल, श्री पचौरी, ए0के0सिंह, लाला रामविलास, जवाहरलाल, मंशाराम गुप्ता, रामकिशोर के अतिरिक्त समीपवर्ती शाखाओं के परिजनों की भी सराहनीय भूमिका रहीं।

कुम्भराज (म0प्र्र0) गायत्री शक्तिपीठ के कार्यकर्ताओं ने 25 गाँवों में अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बनाने का अभियान चलाया हैं। इस इलाके के मीना समाज में दहेज बहुत अधिक लिया दिया जाता हैं। शाखा झडेरा के कार्यवाहक श्री निरन्जन सिंह भील ने अपने पुत्र चि0 बाबूलाल का विवाह बिना देन दहेज के श्री अमरलाल मीना की पुत्री सौ0 का0 लताबाई से यज्ञीय वातावरण में कराया। इस आदर्श परिपाटी के प्रति अनेक लोगों में उत्साह उभरा है।

औराई-वाराणसी (उ0प्र0) नगर के गण्यमान उद्योगपति श्री सुरेन्द्र कुमार वर्नवाल एवं श्री राजेन्द्र कुमार वर्नवाल द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ सम्मेलन प्रारम्भ हुआ। 2000 से अधिक श्रोताओं ने प्रेरणा ली।

दीप यज्ञ अभियान प्रारंभ करने के लिए मुख्य अतिथि सुश्री डाँचला खन्ना, उप-शिक्षा निदेशक पधारीं। प्रथम दिन मौसम खराब होने से दीप यज्ञ अगले दिन के लिए बढ़ा दिया गया। दीप यज्ञ में 1000 वेदियों पर लगभग 14000 याजकों ने बैठकर यज्ञ सम्पन्न किया। श्रोता भी बड़ी संख्या में थे। 300 से अधिक व्यक्तियों ने नशा छोड़ने के, 500 के लगभग ने दहेज न लेने और उसका प्रतिरोध करने के, 500 ने साक्षरता अभियान के लिए तथा लगभग .... ने हरीतिमा संवर्धन के संकल्प लिए।


अपनों से अपनी बातें आधी जन-शक्ति का पुनरुत्थान

अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन का महत्व केवल उसे व समझ भर लेने में समाप्त नहीं हो जाता, वरन् उसकी सार्थकता इसमें है कि अपनी स्थिति के अनुरूप सुझाये गये निर्धारणों में से कुछ को तो कार्यान्वित करने ही लग .... जाँय। अनुभव और अभ्यास बढ़ते चलने पर कुछ और उत्तरदायित्व वहन करने के लिए उत्साह जगाया और साहस जुटाया जा सकता है।

इस वर्ष का सबसे सरल और सबसे महत्वपूर्ण कार्य जारी जागरण है। इसे अपने घरों से ही प्रारंभ किया जा सकता है। हर परिवार में पुरुषों की तरह वयस्क महिलाएँ भी होती हैं। उन्हें अपने को, अपने वर्ग को समुन्नत बनाने का लाभ समझाये जाने चाहिए और प्रगति की दिशा में कुछ कदम बढ़ाने के लिए उत्साहित, सहमत किया ही जाना चाहिए। इसके लिए समग्र जानकारी के लिए “महिला जागरण अभियान” पुस्तक अभी-अभी प्रकाशित हुई है।

नारी जागरण की उपयोगिता, आवश्यकता और प्रतिक्रिया को जितने अधिक नर-नारियों को बताया जा सके, बताना चाहिए। यह कार्य नव प्रकाशित पुस्तक को पढ़ाने या सुनाने से अधिक अच्छी तरह से सकता है। छोटे-छोटे नारी संगठन अपने संपर्क क्षेत्र में खड़ा करने के लिए प्रत्येक प्रगतिशील परिजन को सच्चे मन से प्रयत्न करना चाहिए। यदि कार्य की महत्ता को समझा जा सके तो अपने संपर्क क्षेत्रों के परिवारों में से ही एक-एक, दो-दो उत्साही महिलाओं को लेकर “नारी जागरण संगठन” खड़े किये जा सकते है। न्यूनतम पाँच सदस्याओं की एक शाखा बन सकती है। संरक्षक अलग से रहें। वे मार्गदर्शन भर करेंगे, साधन जुटाने और वातावरण बनाने भर में योगदान देंगे। संगठन में सीधी घुसपैठ न करेंगे। अपने देश में नर-नारियों का मिलना जुलना संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही प्रचार, प्रोत्साहन, संगठन एवं गतिविधियों के संचालन की रूपरेखा बनानी चाहिए। आधार भले ही पुरुष खड़ा करे, पर जहाँ तक नारी संगठन के प्रत्येक गतिविधियों का संबंध हैं, उसमें महिलाओं को ही आगे रखना चाहिए।

संगठित महिला-मंडल की सदस्याएँ अपने-अपने संपर्क क्षेत्र में टोलियाँ बनाकर संपर्क साधें और इस निमित्त नई सहयोगिनी खोजें। पाँच सदस्याओं के आरंभिक संगठन का प्रत्येक सदस्य यदि पाँच-पाँच नई सदस्यों और बनाले तो उनकी संख्या पच्चीस हो सकती है। “हम पाँच हमारे पच्चीस” का संकल्प हर जगह साकार हो सकता है। शर्त एक ही है कि विचारशील नर-नारी सच्चे मन से इस प्रयोजन का महत्व समझें और उसका ढाँचा खड़ा करने का भाव भरा प्रयत्न करें। सदस्यता की कोई आर्थिक फीस न रखना ही ठीक होगा। समयदान को ही उनका आरंभिक सहयोग मान लिया जाय।

जहाँ भी नारी संगठन बनें उन्हें शान्ति-कुँज हरिद्वार में पंजीकृत करा लिया जाय ताकि उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन और सहयोग समय-समय पर प्राप्त होता रहे। इन संगठनों के आरंभिक कार्यक्रम इस प्रकार है (1) शिक्षा-संवर्धन (2) स्वास्थ्य संरक्षण (3) परिवार निर्माण (4) कुरीतियों का उन्मूलन (5) स्वावलम्बन के लिए कुटीर उद्योगों का शुभारंभ (6) साप्ताहिक सत्संग। जिसके अंतर्गत नारी समस्याओं और उनके संगठनों को प्रवचनों या प्रश्नोत्तरी के रूप में समझा, समझाया जा सके।

उपरोक्त छः सूत्री कार्यक्रमों की क्रिया प्रक्रिया को क्रियान्वित किया जाय, इसका विस्तृत विवरण उपरोक्त मार्ग–दर्शिका पुस्तिका में विस्तारपूर्वक छपा है। इन निर्धारणों को क्रियान्वित करने में कहीं कोई कठिनाई खड़ी नहीं हुई है। सर्वत्र सफलता मिली है। अब आन्दोलन को अग्रगामी बनाने की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए शान्तिकुँज एक महीने के प्रशिक्षण में कोई भी नर-नारी शान्तिकुंज आ सकते है। लौटने पर सभी क्षमता सम्पन्न हो सकेंगे और अपने क्षेत्र में इस आलोक को सफलता पूर्वक व्यापक बना सकेंगे।


व जागरण के अग्रदूत-दीपयज्ञ

दीप-यज्ञ देखने सुनने में एक छोटा-सा धार्मिक खण्ड भर प्रतीत होता है, पर उसके साथ जो व्याख्या, .... व्यवस्थाएँ, क्रिया-प्रक्रियाएँ जुड़ी हुई है उन भीरुतापूर्वक विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण के सभी तथ्य रह गूँथ दिये गये है। एक दिवसीय इस आयोजन हाँ कहीं भी सम्पन्न किया गया है वहाँ लोगों में शीलता की ओर असाधारण रूप से आकर्षण बढ़ा .... आन्दोलन में सहयोग करने के लिए परिचितों का ही अपरिचितों का भी मन चलता है।

पिछले दिनों अखण्ड-ज्योति परिवार में प्रायः 2540 पीठें बनी है। स्वाध्याय मंडलों की स्थापना 15000 के .... बनी हैं। स्थापना के समय जो उत्साह था वह .... शिथिल होने लगा तो जिन रचनात्मक क्रियाकलापों के निरन्तर चलने की आवश्यकता थी, उनमें आ गई। स्पष्ट है कि आग में ईंधन न डाला जायगा। .... बुझेगी। पौधे को सींचा न जायगा तो वह सूखेगा। .... स्थापित प्रज्ञा संस्थानों में से केवल वे ही जीवंत गतिशील हैं जहाँ जन जागृति के लिए आवश्यक .... कृत्य होते रहते है। जहाँ अनख आलस्य आया, .... आरंभ हुई वहाँ शिथिलता उत्पन्न होना स्वाभाविक था। होने भी वही लगता है, पर वैसा होना चाहिए। इसमें संस्थापकों और सूत्र संचालकों को .... रूप से अपयश का भागीदार बनना पड़ेगा।

आर्थिक लाभ के काम तो लोग लोभ की प्रेरणा से .... रहते है, पर परमार्थिक कामों के लिए सहयोगियों समर्थकों का उत्साह बनाये रहने के लिए बार-बार कुछ सामूहिक आयोजन स्तर के कार्यक्रम करने पड़ते है। .... धार्मिक समारोहों में अन्य सभी समय साध्य, .... साध्य और साधन साध्य है। उनके लोग दौड़ धूप करने वाले,व्यवस्था के अनुभवी तथा अर्थ व्यवस्था .... सकने में समर्थ होने चाहिए। ऐसे लोग न मिलें तो .... ऐसा बड़ा आयोजन नहीं हो सकता जो जन-साधारण में प्रेरणा भर दे और निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति में .... सहयोग देने लगें।

इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए “दीप-यज्ञों” का उपक्रम इस वर्ष से आरंभ हुआ है। उसे जहाँ भी कार्यान्वित किया गया है वहाँ उन्हें असाधारण जन सहयोग मिला है और पूरी तरह सफलता मिली है। एक आयोजन को देखकर दूसरे अनेकों ने उसी का अनुसरण करने की उत्कंठा व्यक्त की है। वही कारण है कि गत एक वर्ष में ही एक हजार से अधिक सफल आयोजन संभव हो सके। जहाँ भी वे सम्पन्न हुए हैं वहाँ लोक चेतना असाधारण रूप से उभरी है और शिथिल पड़े संगठन एवं कार्यक्रमों में जान आ गई है।

जहाँ भी प्रज्ञा-पीठें स्थापित है। जहाँ स्वाध्याय मण्डल गठित हुए है। जहाँ भी नारी जागरण के अभिनव संगठन खड़े हुए है। वहाँ सामूहिक दीप-यज्ञ करने की योजना बननी चाहिए। यह कार्य अति सरल है। एक दिवसीय होने के कारण उसमें व्यस्तता भी बाधक नहीं होती। खर्च भी नहीं के बराबर पड़ता है। इस प्रक्रिया में प्रातः दीप यज्ञ, तीसरे पहर महिला जागरण सम्मेलन एवं रात्रि को ज्ञान यज्ञ होते है। ज्ञान यज्ञ अर्थात् भावनाओं में भर जाता है। इस समारोह में दुष्प्रवृत्तियों के संवर्धन की आवश्यकता बताई जाती और उन प्रेरणा भरे प्रवचनों को युग धर्म के रूप में अपनाने की ऐसी प्रस्तुति की जाती है जो निरर्थक नहीं जाती। अंध-विश्वासों, कुरीतियों, अवांछनियताओं के विरुद्ध बगावत जैसा वातावरण बनता है साथ ही सत्प्रवृत्तियां अपनाने के लिए लोग भाव श्रद्धा से ओत-प्रोत रचनात्मक संकल्प लेते है। आयोजन के बाद वातावरण में ऐसी गर्मी रहती है जिसे युग चेतना में अग्रगामी बनाने में कुशल लोग ही भली प्रकार प्रयोग कर सकते है।

जहाँ की प्रज्ञापीठें स्त्राध्याय मण्डल शाखा संगठन शिथिल पड़े है वहाँ एक दीपयज्ञ का बड़ा आयोजन करना चाहिए और देखना चाहिए कि अभिनव उत्साह से निर्धारित कार्यक्रमों में उमंग उभरने का कैसा सुयोग बनता है ? इस अवसर पर प्रचार मंडली आनी हो तो शाँतिकुँज से संपर्क साधना चाहिए।


सदाशयता का पक्षधर वातावरण बनाएँ

हनुमान ने लंका में किसी राम भक्त का पता लगाने के लिए यह देख भाल की थी किसी के दरवाजे पर नाम तो नहीं लिखा है। इसी आधार पर उनने .... बढ़ाया और विभीषण को साथ लेकर राम काज सम्पन्न किया।

नवयुग के शुभारम्भ में यह कार्य हमें घर-घर आदर्श .... अंकित करने के रूप में आरंभ करना चाहिए। .... पर आदर्श वाक्य लेखन भी एक अच्छी पद्धति है, उसमें कठिनाई एक है कि जहाँ भीड़ पहुँचती है वहाँ आदर्श वाक्य लिखने के लिए जगह नहीं मिलती।

सरल समाधान दूसरा निकाला है- स्टीकर चिपकाने, उन्हें घरों, दफ्तरों के दरवाजे पर चिपकाया सकता है। अलमारियों पर, फर्नीचर पर, बाक्स-.... पर उन्हें लगाया जा सकता है। ये वर्षों स्थिर रहते है, जो कोई भी उधर से गुजरता है, उन्हीं की नजर पड़ती है। निवास करने वाले तो आये दिन कई-कई बार उन्हें .... रहते है। बाहर का व्यक्ति पीछे किसी नगर गाँव में, हल्ले या घर में पहुँचता है तो वहाँ आदर्श वाक्य की मार देख कर मोटे तौर से यह अनुमान लगा लेता है । इन लोगों की मनःस्थिति किस स्तर की होनी चाहिए। इनका चिन्तन, चरित्र, व्यवहार इसी स्तर का किया। यह मान्यता उस विश्वास को उलटती है जिसमें .... जाता है। कि दुनिया में बुराइयाँ ही बढ़ गई है। आदर्श वातावरण अधिक स्थानों पर दृष्टिगोचर होने से दर्शक के अचेतन में एक मान्यता जमती है कि वस्तुतः युग परिवर्तन की हवा बनने और बहने लगी है। यह एक बहुत बड़ी बात है। लोगों को व्यक्तिगत रूप से .... आदर्शों की महिमा महत्ता समझनी और जीवन उतारनी पड़ती है। पर उसे ठोस क्रिया का अवलंबन रहने में वातावरण भी असाधारण रूप से सहायक होता है।

लोग जैसे वातावरण में रहते है वैसा ही उनका रुझान बनने लगता है और अचेतन में जमने वाले वे संस्कार कालान्तर में अनुकूलता पाकर फलते-फूलने .... लगते है। नशेबाजों, व्यभिचारियों, उचक्कों और कुकर्मियों की हरकत देखते भर रहने से उनके प्रति आक्रोश ठंडा होने लगता है और किसी प्रकार तालमेल बैठ जाता है। यह वातावरण का ही प्रभाव है।

सदाशयता का पक्षधर वातावरण बनाने के लिए हमें ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिससे यह प्रतीत होने लगे कि अवाँछनीयता घट रही है। उसका स्थान सत्प्रवृत्तियाँ ले रही हैं। यह कार्य जिन उद्योगों से हो सकता है उनमें स्टीकर आन्दोलन सबसे सरल और सबसे प्रभावशाली है। हर अखण्ड ज्योति परिजन को निजी रूप से यह प्रयत्न करना चाहिए कि अपने प्रभाव और परिचय क्षेत्र में कोई घर, दुकान, दफ्तर, कमरा ऐसा न बचे जहाँ आदर्श वाक्यों वाले स्टीकर न चिपके हुए हों।

स्टीकरों को अपने घरों में शाखाओं में प्रयत्न से बनाया जाने लगे तो लागत में और भी अधिक कमी हो सकती हैं। इच्छित संख्या में बिना प्रतीक्षा किये उन्हें बनाया और अन्य साथियों की माँग को पूरा किया जा सकता है। शान्ति कुँज में, गायत्री तपोभूमि में, यह निर्माण कार्य नये सिरे से हाथ में लिया गया है। हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में भी उन्हें बनाने का काम हाथ में लिया गया है। माँग आने पर उसकी पूर्ति की जा सके इसके लिए स्वतंत्र प्रबन्ध किया गया। साथ ही यह भी प्रबन्ध किया गया है कि जो बनाने के इच्छुक हों उन्हें इस प्रक्रिया को घरेलू उद्योग की तरह सिखा दिया जाय।

डाक खर्च बढ़ जाने के कारण कही भी इन्हें पोस्ट पार्सल में नहीं भेजा जा सकता क्योंकि डाक व्यय स्टीकर की कीमतों से प्रायः दूने भाव पड़ेंगे। इसलिए जिन्हें जब भी माँगने हों किसी आते जाते व्यक्ति के हाथों ही मँगाने चाहिए, उधार लेने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए क्योंकि लागत की पूँजी घूमते रहने से ही यह विभाग चलता रह सकता है। कोई उधार रोकेंगे तो पूँजी के अभाव में यह प्रयास ठप्प हो जायेगा।

अखण्ड ज्योति परिवार के समीपवर्ती सभी क्षेत्रों में आदर्श वाक्यों वाले स्टीकर चिपकाये जा सकें, इसका प्रयत्न पूरे उत्साह के साथ चलना चाहिए।


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“मुक्ति-सन्देश”


मुक्ति-सन्देश (Kavita)

शाँति और संतोष छोड़, मृग तृष्णा मत पालो। बनू मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥1॥

परम पिता ने स्वतंत्रता से युक्त किया तुम को। जननी ने दे जन्म, धर्म से मुक्त किया तुमको॥

हो बंधन से मुक्त, गले में फंदे मत डालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥2॥

साँसों की निर्मल सरिता को गंदी नहीं करो। लोभ, मोह के छल-छिन्दों में बंदी नहीं करो॥

मुक्त धरा पर, मुक्त गगन में, मुक्ति गान गालो॥ बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥3॥

बढ़ा महत्वाकाँक्षाएँ, मत नींद हराम करो। सादा जीवन-उच्च विचारों को आयाम करो॥

सादा रह लो, सादा पहनो, सादा ही खालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥4॥

तृष्णाएँ उंगलियाँ पकड़कर, पोंचा पकड़ेंगी। जितनी छूट मिलेगी उनकों, उतना जकड़ेंगी॥

इन पर अंकुश रख कर, भावी-विपदाएँ टालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥5॥

शक्ति और क्षमताएँ, अपने लिये नहीं केवल। कई अशक्त, अभाव ग्रसित हैं, उनकों दें संबल॥

जीवन-अर्घ्य लोक मंगल की प्रतिमा पर ढालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥6॥

ख्

‘साधन-धाम’ मोक्षकर द्वारा जेल न बन जाये॥ सुर दुर्लभ-सम्पदा, स्वार्थ का खेल न बन जाये॥

शोषित, पीड़ित, दीन जनों को भी देखो भालों। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥7॥

मंगल विजय

*समाप्त*