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किस के भाग्य में समृद्धि, प्रगति और प्रतिष्ठा बढ़ी है इसे जानने के लिए किसी के गृह नक्षत्र देखने की आवश्यकता नहीं है और न किसी पंडित ज्ज्योतिषी से पूछने की आवश्यकता है। किसी का भी भला-बुरा भविष्य जानने के लिए इतनी जानकारी पर्याप्त है कि कौन अपने को अधिक सुयोग्य, सक्षम एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए किस सीमा तक प्रयत्न कर रहा है।
आज का प्रयास ही कल परिणति बनकर सामने आता है। दूसरा कोई किसी को न ऊँचा उठाता है और न नीचे गिराता है। मनुष्य अपनी विचारणा और क्रिया पद्धति के सहारे ही अपने को उत्कृष्ट और निकृष्ट बनाता है। तदनुरूप ही उसके सामने परिस्थितियाँ विनिर्मित होती और सामने आ खड़ी होती है।
दूसरों के दिए हुए अनुदान सुरक्षित रखने तथा उनका सदुपयोग कर सकने की क्षमता अपने भीतर से उत्पन्न होती है। जिन्होंने अपने को शालीनता के ढाँचे में ढाला है वे समर्थों और सज्जनों से सम्मान तथा सहयोग प्राप्त करते हैं और अपने क्रिया-कलाप के आधार पर ऊंचे उठते चले जाते हैं।
अनपढ़ व्यक्तियों की वाणी में कर्कशता, क्रिया कलाप में अस्तव्यस्तता, चिन्तन में निकृष्टता का समावेश होने से उनकी प्रकृति ऐसी बन जाती है जिससे भविष्य हर दृष्टि से अन्धकारमय ही बनता चला जाता है।
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एक राजा को बढ़े-चढ़े सिद्ध पुरुष की खोज थी। उसके मिल जाने पर वह उसका शिष्य बन जाता और सिद्ध की करामातों से-प्रकारान्तर से-अनेकों लाभ उठाते रहने की उसकी योजना थी।
सिद्ध की पहचान कैसे हो? इसके लिए चमत्कार प्रदर्शन कर सकना ही आम लोगों की कसौटी है। राजा ने भी परख का वही माध्यम अपनाया। एक बहुत ऊँचा बाँस मैदान में गाड़ा। उसके ऊपर एक सोने का कमण्डलु लटकाया गया। घोषणा की गई कि जो कोई इस बाँस पर चढ़कर स्वर्ण का कमण्डलु उतार लायेगा, उसे कमण्डलु के अतिरिक्त और भी बड़ा पुरस्कार मिलेगा। राजा उसका शिष्य बनेगा। प्रजा भी राजगुरु को ही अपना गुरु मानेगी। सिद्ध पुरुष को राजघराने में ही महल मिलेगा और उसकी सारी आवश्यकताएं राज-कोष से ही पूरी होती रहेगी।
लालच बड़ा था, पर परीक्षा भी कठिन थी। अनेक सन्त विद्वान आये पर इतनी कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होने का कोई साहस न कर सका।
बहुत दिन बाद एक दुर्बल-सा बौद्ध भिक्षु आया। उसने चुनौती स्वीकार कर ली। खुले मैदान में राज दरबार लगा। हजारों की संख्या में दर्शकों ने जय-जयकार किया। राजगुरु के रूप में उसका वरण किया गया। सारी प्रजा भी उसकी शिष्य बन गयी।
यह सब प्राप्त करने के उपरान्त भिक्षु का मन आया कि भगवान बुद्ध के पास जैतवन चलना चाहिए। तथागत को तथा अपने सभी गुरु भाइयों को अपनी विशिष्टता का परिचय देना चाहिए, सभी को अपनी महिमा से परिचित करा दिया जाए। राजा ने सवारी और सेवकों का प्रबन्ध कर दिया। रास्ता पार करते हुए वह अपने गुरु धाम जा पहुँचा।
तथागत ने समाचार सुना तो वे बड़े सोच में पड़ गये। दूसरे दिन सभी भिक्षुओं को गोष्ठी में एकत्रित किया। तथागत ने उसे राजगुरु भिक्षु का उदास मन से विवरण सुनाया। साथ ही यह भी कहा, “वह भिक्षु बनने से पहले नट था। बाँस पर चढ़ने पर चढ़कर सिद्धाई जताई। यदि ऐसा ही होता रहा तो सभी नट, बाजीगर सिद्ध पुरुष बन जायेंगे और अपनी धूर्त्तता से धर्म के नाम पर स्वार्थ साधन करेंगे।
उन्होंने सभी शिष्यों को आगाह किया कि उनमें से कोई ऐसी प्रवंचना न करे। छल-माध्यम अपना कर धर्म प्रचार का आडम्बर न करे।
स्वर्ण कमण्डलु को सबके सामने तोड़ा गया और उन टुकड़ों को नदी में बड़ा देने का आदेश दिया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि बुद्धसंघ का कोई सदस्य न तो चमत्कार दिखाये न सिद्ध बन कर किसी की मनोकामना पूर्ण करें। उसका कर्तव्य तो धर्म-चक्र प्रवर्तन भर है, जो आत्म-शुद्धि के लिए की गई तप-साधना से ही बन पड़ता है।
ज्ञान और धन दोनों में एक दिन अपनी श्रेष्ठता के प्रतिपादन पर झगड़ा उठ खड़ा हुआ। दोनों अपनी-अपनी महत्ता बताते और एक दूसरे को छोटा सिद्ध करते थे। अन्त में निर्णय के लिए वे दोनों आत्मा के पास पहुँचे।
आत्मा ने कहा-”तुम दोनोँ कारण मात्र हो इसलिये श्रेष्ठ बात ही तुममें क्या है? सदुपयोग किये जाने पर ही तुम्हारी श्रेष्ठता है। अन्यथा दुरुपयोग होने पर तो तुम दोनों ही घृणित बन कर रह जाते हो।”
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महामानवों की यशोगाथा के मूल में तथ्य क्या है? इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि बुद्ध, गान्धी, ईसा लिंकन, ताओ आदि की उपलब्धियाँ आत्मिक क्षेत्र की कही जा सकती हैं, पर साथ ही इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि उनके क्रिया-कलापों से लोकहित के अनेकानेक सत्कार्य भी जुड़े हुए थे जिन्हें भौतिक उपलब्धियाँ ही कहा जायेगा।
प्रयोजन कहने का यह है कि सफलताएँ चाहे किसी भी क्षेत्र की क्यों न हो, व्यक्ति के अपने अन्तराल पर निर्भर हैं। उसी से सत्प्रवृत्तियाँ पनपती है। उन्हें जड़ भी कहा जा सकता है। तना, टहनी, पत्र, पुष्प फल उसी जड़ की उपलब्धियाँ है, जिसने आत्मिक क्षेत्र चुना तो उसने उसमें जटिलताएँ पाई। कदाचित उसने भौतिक क्षेत्र चुना होता तो अपनी आत्मिक विशेषताओं के आधार पर उनमें भी सफल होकर रहा गया होता।
तथ्यतः दोनों ही क्षेत्रों को अलग मानना ही गलती है। ऋद्धि के साथ सिद्धि जुड़ी है और सिद्धि के साथ ऋद्धि। आन्तरिक विशिष्टता ही आत्मिक क्षेत्र की प्रगति बनती है। फिर भी अराधे अध्यात्मक से कहीं सफलता नहीं मिलती। आत्म-परिष्कार और लोकमंगल के दोनों ही प्रयोजन व्यक्तित्व की, आन्तरिक विशिष्टता की अपेक्षा करते हैं। साथ ही वे दोनों ही क्षेत्र में सहगमन करते हुए आगे बढ़ते है। विवाद तो सदुपयोग का पृथक फलितार्थ उत्पन्न करता है।
आत्मिक प्रगति के साथ भौतिक अभ्युदय यदि खरा है तो उसमें आत्मिक गुणों का गहरा पुट होना ही चाहिए। दोनों प्रगतियाँ साथ-साथ चलती है। बुद्ध, गाँधी अध्यात्मिक व्यक्ति थे, फिर भी उनके साथ लोकमंगल के सुविस्तृत साधन जुड़े रहे। उनसे लोक-कल्याण का कार्य भी बहुत हुआ और उन कार्यों के लिए जितने साधनों की, जितने सहयोग की आवश्यकता थी, उसमें भी कमी नहीं रही। इसी को कहते हैं अन्योन्याश्रय सम्बन्ध। महा-मानवों की सफलताओं के मूल में भले ही देवी-देवता का नाम दिया जाए। वरदान, आशीर्वाद समझा जाए अथवा अन्तराल के क्षेत्र में की गई कृषि का सौ-गुना होकर लौटने वाला प्रतिफल।
महा-मानवों के जीवन को एक प्रयोगशाला समझा जा सकता है, जिसमें आन्तरिक विभूतियों के उत्पादन का भाव-भरा प्रयास प्राण-पण से चलता है। उसमें जब जितनी प्रखरता पनपती है उसी अनुपात से अन्तःक्षेत्र में विभूतियाँ भी प्रस्फुटित होती गई और उसी आधार पर वे सफलताएं भी हस्तगत हो जाती है, जिसे भौतिक प्रगति समझा जाता है। यह बात दूसरी है कि उन उपलब्धियों का उपयोग स्वार्थ के लिए नहीं, वे परमार्थ के लिए करते हैं। यह बताना जरूरी है कि किसी को वास्तविक सफलता अभीप्सित तो उसे क्या करना चाहिए? इसी प्रकार सर्व-प्रथम अपने अन्तराल में मुँह डालकर अपना आन्तरिक परिमार्जन और परिष्कार करना चाहिए। यह जिससे जितना बन पड़ेगा, उसको उतनी ही महत्वपूर्ण सफलताओं का श्रेय मिलेगा।
इस संदर्भ में इस भ्रम जंजाल से छुटकारा पाया जाना चाहिए कि कोई मात्र साधनों के सहारे, चतुरता के बलबूते, या उपचारों को आगे रख कर किसी ठोस प्रगति का अधिकारी बन सकता है। ऐसा न भौतिक क्षेत्र में न अध्यात्मिक क्षेत्र में संभव है। सर्वतोमुखी उत्कर्ष मनुष्य के दृष्टिकोण, स्वभाव, चिन्तन एवं चरित्र पर निर्भर है। शक्तियों का उद्गम स्रोत वहीं है।
बहिर्मुखी लोक-व्यवहार को अन्तर्मुखी आत्म-विकास में जो संलग्न करता है, उसे परिष्कृत दृष्टिकोण के नाम से जाना जा सकता है। आर्ष साहित्य में उसका उल्लेख ‘प्रज्ञा’ के रूप में हुआ है। प्रज्ञा को देवदृष्टि भी कहते है उसी को ज्ञान-चक्षु भी कहते हैं। साधनाओं के माध्यम से उसी का उन्नयन किया जाता है। देवताओं के माध्यम से उसी का उन्नयन किया जाता है। देवताओं की प्रतिमाओं में कई बार उनके तीन नेत्र दिखाये जाते है। शिव और शक्ति की प्रतिमाओं में यह अंकन विशेष रूप से होना है। शिव द्वारा तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को जला देने की कथा प्रसिद्ध है। संजय को दिव्यदृष्टि प्राप्त थी, उनने घर बैठे ही महाभारत का दृश्य देखा और धृतराष्ट्र को उसका विवरण सुनाया था। दिव्य-दर्शियों के द्वारा घटिया हुई यह घटनाएं तथ्य का संकेत करती है कि वह शक्ति सामान्य नहीं, असामान्य है। उसमें कितनी ही त्रुटि सिद्धि-सिद्धियाँ भी जुड़ी हुई है।
दिव्य दृष्टि ही प्रज्ञा है। उसकी विशेषता एक एक ही है कि जहाँ-साधारण को स्वार्थ ही सब कुछ दीखता है। शरीरगत सुविधाओं का संचय और उपभोग ही सब कुछ लगता है, वहाँ प्रज्ञावान को आत्मा के दर्शन होते हैं, परमात्मा के आह्वान मार्ग वाले संकेत मिलते है। विश्व के महामानव उसे अपने इर्द-गिर्द विचरते दीखते हैं, वे अनुभव करते हैं कि परमार्थ क्षेत्र में प्रवेश करके उनने कुछ भी गलती नहीं की। लिप्सा-लालसाओं के दलदल में कीचड़ खाकर जीने वालों की तुलना में वे अपनी राह बदलने में सफल हुए। फलतः जीवन भर आत्म-सन्तोष और आन्तरिक उल्लास का लाभ लेते रहे। जन साधारण की दृष्टि में उनका स्थान ऊंचा और सम्मानजनक रहा। सत्पुरुषों का सहयोग अनुग्रह बरसा, जिसके सहारे ऐसे प्रयोजन पूरे करते रहते ही सुविधा मिलती चली गई। दिवंगत अदृश्य महा-पुरुष उन्हें अपनी जीवन गाथा फिल्म चित्र की तरह दिखाते हुए यह भी बताते रहते हैं कि परमार्थ पक्ष अपना कर हमने खोया कम और पाया ज्यादा। दूसरे लोग शरीर समाप्त होने के साथ ही अपनी सत्ता का समापन कर देते है, पर महापुरुष है जो यश शरीर से जीवित रहते हैं और अनेकों का अद्यावधि मार्ग दर्शन करते हैं, भविष्य में भी करते रहेंगे। अमर स्तर की पट्टी से इसी कारण प्राप्त करते हैं।
यह अदृश्य दर्शन उन्हें प्रज्ञा के सहारे ही मिलता है। चार चालाकों को दुनिया सामने रहने पर भी उद्देश्य जैसी लगती रही। सतयुगी वातावरण आँखों के आगे तैरता रहता है। भले ही उसे बीते कितना ही लम्बा समय गुजर गया हो पर दिव्य-दृष्टि यही दिखाती रहती है कि उसी युग में हम रह रहे है। वैसा ही वातावरण अपने इर्द-गिर्द है। वैसा ही अपने लिए भी विद्यमान है। भले ही वह औरों के लिए अतीत की बात बन गई हो। इस उपलब्धि को प्रज्ञा का ही चमत्कार कह सकते हैं।
भ्रांतियों से यह संसार और जीवन भरा पड़ा है दिशा भूल करा देने वाली भूल-भुलैयों की कमी नहीं। अनेकानेक गोरखधंधे ऐसे है, जिसमें चिन्तन उलझ कर रह जाता है और कही से कही जा पहुँचता है। इस भ्रम की अनुभूति इसलिए नहीं होती है कि संपर्क क्षेत्र के अन्य लोग भी तो उसी प्रकार सोचते रहते और चलते दिखाई देते है। इन सबसे अपने को अलग छाँट लेना असामान्य बुद्धि का ही काम है। इसी को शास्त्रकारों ने प्रज्ञा कहा है।
इस चिंतन-क्षेत्र की विभूति को उच्चस्तरीय देवी-वरदान माना गया है। भगवान किसी पर वस्तुतः प्रसन्न होते है तो उसे यही वरदान प्रदान करते है। सामान्य अनुदान तो मनुष्य जीवन है। उसकी संरचना समस्त प्राणियों को मिले काय कलेवर की तुलना में अद्भुत और अनुपम है। अन्य हेय प्राणी तो अपनी काया से जीवन निर्वाह भर कर पाते हैं, पर मनुष्य पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। अपने योगदान से विश्व वसुधा को सुरम्य एवं समुन्नत बना सकता है। यह मौलिक अन्तर प्रज्ञा के भाव और अभाव से ही आरम्भ होता है। अन्यथा मनुष्य शरीर में भी कितने ही नर-वानर विचरते देखे जाते है।
प्रज्ञा नीर-क्षीर विवेक का उपक्रम आरंभ करती है। साथ ही इतना साहब भी प्रदान करती है कि उत्कृष्टता के उच्च शिखर पर अकेला चढ़-दौड़ने का बल और साहब प्रदान कर सके। दुनिया एक ओर और प्रज्ञावान एक और होने पर भी वह अपना मार्ग नया बना सकता है और बिना किसी के समर्थन सहयोग की आशा किये अपना मार्ग स्वयं ही बन सकता है और उस पर चल भी सकता है। अदृश्य जगत की इस उपलब्धि को एक महान वरदान कहा जा सकता है क्योंकि इस प्रकार की मनःस्थिति बनने के उपरान्त ही उस प्रकार के संकल्प उठते और प्रयास चलते है जिन्हें अपनाते पर महानता की दिशा अपनाना और उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना संभव हो।
प्रज्ञा के अभाव में व्यक्ति के पास मन और बुद्धि ही शेष रह जाते हैं। वे दोनों ही दर्पण की तरह है। उन पर सामने प्रस्तुत दृश्य ही प्रतिबिंबित होते हैं। सामने जो कुछ है सो प्रत्यक्ष है। वासना विलासिता, अहिंसा, संकीर्ण स्वार्थपरता जैसी हेय प्रवृत्तियाँ ही सब लोग अपनाये हुए दीखते हैं, उन्हीं का ‘अक्स’ मन पर उतरता है। वह मनचली कुकल्पनाओं में विचरने लगता है। आकाँक्षाएं भड़कती है। बुद्धि भी वाहन की तरह उन्हीं का समर्थन करने लगती है। फलतः क्रिया-कृत्यों की योजनाएं बनती हैं और उनके कार्यान्वित होने का क्रम चल पड़ता है। बहुमत का दबाव अल्पमत को अपनी ओर घसीट ले जाता है। फलतः उसी प्रकार का जीवन क्रम बन पड़ता है जैसा कि नर-वानरों का समुदाय अपनी उचक-मचक में निरत रहता है।
बहाव की दिशा में तिनके, पत्ते से लेकर टूट पेड़ और मरे हुए हाथी तक बहते चले जाते हैं। उस प्रतिरोध रहित समूह का अन्ततः खारे समुद्र के ऐसे गर्त में गिरना पड़ता है जिसमें जाकर सड़, गल जाने और समाप्त होने के अतिरिक्त और कोई नियति नहीं।
इस स्थिति से उबारने में मात्र प्रज्ञा ही सहायता करती है। वह मछली जैसा शौर्य, पराक्रम प्रदान करती है जो धारा के विपरीत दिशा में छरछराती हुई उलटी तैर सके। संकीर्ण स्वार्थपरता के प्रवाह में बहने से अपने को बचा लेना आत्मक्षेत्र का परम पुरुषार्थ माना गया है। इसका महात्म्य सुनकर कई व्यक्ति पूजा पाठ कर और गृहत्यागी तो बनते देखे गए हैं, पर उनका मन तो प्रलोभनों में ही रमता रहता है। अहंता की पूर्ति के लिए देखते-देखते आत्मिक गरिमा समाप्त हो जाती है और भीतर कुछ बाहर कुछ का उपहासास्पद प्रपंच रच कर खड़ा हो जाता है। इस जाल-जंजाल में उलझने पर माया मिली न राम वाली उक्ति चरितार्थ होती है।
प्रज्ञा आन्तरिक दुर्बलताओं से जूझती है। संचित कुसंस्कारी दबाव से लड़ती है। वातावरण के गुरुत्वाकर्षण द्वारा अधोगमन के संकट से उबारती है। साथ ही आदर्शवादी संकटाकीर्ण मार्ग पर अनवरत गति से चलते रहने का साहस प्रदान करती है। आत्मापमानों और आघातों को आघातों को सहन करते जाने, उन्हें अपनी शालीनता पर न हावी होने देना यह भी अपने आप में अलौकिक कार्य है। प्रज्ञा ही है जो इन सबके लिए आवश्यक सरंजाम जुटाती है।
महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ। कौरव तो सभी युद्ध में मारे जा चुके थे। पाण्डव भी कुछ समय तक राज्य करके हिमालय पर चले गये। वहाँ पर एक, एक करके सभी भाई गिर गये। अकेले युधिष्ठिर अपने एक मात्र साथी कुत्ते के साथ बचे रहे और वे स्वर्ग गये
कहते हैं युधिष्ठिर जीवित ही स्वर्ग में गये थे। वहाँ उन्होंने स्वर्ग और नरक दोनों को देखा। स्वर्ग में प्रवेश करते ही दुर्योधन दिखाई दिया। अपने भाइयों से भी उनका सामना हुआ। रास्ते में अन्य भाइयों को गिरते समय प्रश्न करने वाले भीम के मन में यहाँ भी जिज्ञासा उठी पूछा “भैया! दुष्ट दुर्योधन तो आजीवन अनीति का ही पक्ष लेता रहा। उसने अपने पूरे जीवन में कोई धर्म कार्य नहीं किया जिसके पुण्य से उसे स्वर्ग मिला हो। क्या ईश्वर के न्याय में भी अंधेरगर्दी है”?
नहीं भीम! ईश्वरीय विधान के अनुसार प्रत्येक पुण्य का परिणाम चाहे वह किंचित ही क्यों न हो, स्वर्ग मिलता है। सभी बुराइयों के होते हुए भी दुर्योधन में एक सद्गुण था जिसके प्रसाद स्वरूप उसे स्वर्ग में स्थान प्राप्त हुआ है।
वह क्या- भीम ने पूछा। वह अपने संस्कारों के कारण जीवन को सही दिशा भले ही न दे सका हो परंतु उसका मार्ग अवश्य सही था। वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने लिये तन्मयतापूर्वक जुटा रहा। ध्येय के प्रति एकनिष्ठ रहना बहुत बड़ा सद्गुण है। इस सद्गुण के पुण्य के परिणाम स्वरूप कुछ समय के लिए उसे स्वर्ग में स्थान मिलना उचित था।
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वस्तुओं की प्रचुर मात्रा भी मनुष्य को सन्तोष नहीं दे सकती, पर इससे ठीक उल्टी विधि अपनाने से काम बन जाता है। मन को सन्तोष का अभ्यस्त कर लिया जाय तो इच्छा की पूर्ति सहज ही हो जाती है। मनुष्य की आवश्यकताएं स्वल्प हैं। उपभोग भी एक सीमा तक ही हो सकता है। उतना उपार्जन करना और साधन जुटाना सरल है। अतएव इच्छाएं सीमित रखने, उपभोग को औचित्य की मर्यादा में रखने तथा कठिन परिश्रम से उपार्जन में जुटे रहने पर कोई कारण नहीं कि इच्छाओं की पूर्ति न हो सके। अभावग्रस्तता और दरिद्रता का रोना आलसी, अपव्ययी रोते है या फिर जिनकी आकाँक्षाएं असीमित है।
संग्रह और उपभोग पर सीमा बाँन लगना चाहिए। इसके लिए औचित्य की मर्यादा और देख वासी के स्तर की होनी चाहिए। एक परिवार के सदस्य आमतौर से एक ही स्तर का रहन सहन तथा निर्वाह अपनाते है। भले ही उनमें से कोई अधिक खाये, पहने भी, यह भी नहीं हो सकता, इससे असमानता बढ़ेगी, मनोमालिन्य पनपेगा और ऐसी परम्परा चल पड़ेगी, जिसके रहते स्नेह सौजन्य का टिक सकना कठिन है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यदि सादगी का जीवन जिया जाए तो कम आजीविका वाले व्यक्ति भी प्रसन्नता भरे गुजार सकते हैं और सन्तोष के साथ रह सकते है।
अपव्यय अपने आप में एक बड़ा दुर्गुण है। कोई व्यक्ति अधिक कमाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस कमाई को फिजूल खर्च में फूँक दिया जाए। इस पैसे से ज्ञान-वृद्धि जैसे स्वार्थ और दूसरों की सहायता करने जैसे परमार्थ साधे जा सकते है। उससे आत्म कल्याण और लोक कल्याण के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। ठाट-बाट का अहंकारी प्रदर्शन तथा विलासी शौक-मौज के अपव्यय में हाथ खुला छोड़ने पर आदत बिगड़ती है और अधिक खर्च करने की इच्छा होने लगती है। वह बढ़ते बढ़ते नशेबाजों जैसी कुटेब बन जाती है। ऐसे कुटैवग्रस्तों का काम उचित उपार्जन से नहीं चलता, वह कम पड़ता है। इसलिए बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए अनुचित मार्ग अपनाने पड़ते हैं। अधिकाँश अपराधियों के मूल रूप में यही देखा जाता है।
यह सोचना सही नहीं है कि जितने ठाट बाट से रहेगा वह उतना ही बड़ा समझा जायेगा। यह बचकाना-चिन्तन समझदारों का नहीं होता। बड़प्पन सज्जनता है और उसकी पहचान सादगी से होती है। सादगी का अर्थ है-नम्रता, निरहंकारिता। अपने को जन-साधारण स्तर का समझने वाला खर्चीला रहन-सहन नहीं अपना सकता, क्योंकि उसमें क्षुद्रता और अहमन्यता की स्पष्ट गंध आती है। जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का अनुभव नहीं करते, वे ही संग्रही, विलासी और अहंकारी की भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे लोगों से स्वार्थ साधने वाले ही चाटुकारी भरी मुँह सामने प्रशंसा कर सकते हैं। पीछे पीछे भी उनके मुँह से यथार्थता निकलती है। स्वार्थी, संकीर्ण और निष्ठुर प्रकृति के व्यक्ति ही प्रायः महत्वाकाँक्षी होते हैं। उदारचेता अधिक कमाने पर भी सीमित साधनों से सादगी का निर्वाह करते हैं और उन महत्वकाँक्षाओं से दूर रहते है। ऐसा न करने पर समय और श्रम का अधिकाँश भाग खप जाता है। इस संदर्भ में कटौती करने पर व्यक्तिपरक कार्यों में संलग्न हो सकता है, जो सद्गुणों की अभिवृद्धि कर सके और सर्वत्र सुख-शान्ति का वातावरण बना सके।
लोग अच्छी बातों की नकल कम और बुरी बातों की अधिक करते हैं। एक अपव्ययी अनेकों को उस का आदि बना देता है। फलतः दोष रोष और असन्तोष तीनों ही बढ़ते और वातावरण को विषाक्त करते हैं। वस्तु इच्छाओं को सन्तोष तथा सादगी की जिन्दगी जीना ही श्रेयस्कर है।
परब्रह्म साकार है या निराकार? इस प्रश्न को लेकर प्रायः विवादात्मक चर्चाएं चलती रहती है। चिन्तन का सूत्र सही न होने से गुत्थी सुलझने के स्थान पर और भी उलझ जाती है। यदि लक्षणों पर विचारपूर्वक गवेषणा की जाय तो वस्तुस्थिति समझने में तनिक भी कठिनाई न पड़े और दोनों ही पक्षों को अपने-अपने अनुकूल समाधान मिल जाये।
सर्वव्यापक वस्तुओं में आकाश की, वायु की, ईश्वर की नियति और व्यवस्था भी अदृश्य रह कर अपना काम करती है। उनका व्यापक होना स्वाभाविक है। व्यापक तत्व एकदेशीय नहीं हो सकते। यदि एक स्थान पर एक स्वरूप में वे बंध जायेंगे तो फिर अन्यत्र उनकी उपस्थिति कैसे देखी जा सकेगी? इसलिए परब्रह्म को सृष्टा, नियन्ता, पोषक मानते हुए उसे घट-घटवासी, सर्वत्र समाहित ही माना जा सकता है। ऐसा हुए बिना वह एक क्षेत्र की सम्पदा बन कर रह जायेगा और वहीं रह कर जितना कुछ करते बन पड़ेगा, उतना ही कर सकेगा। सर्वव्यापी होकर जो विशाल भूमिका निभाई जाती है, उसके लिए समर्थ हो सकना संभव न होगा। यह निराकार पक्ष है। जो सूक्ष्म है वह निराकार हो सकता है। शरीर में मन बुद्धि, चित्त और अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय विसंगति है, पर उसे किसी रूप या चिह्न में विद्यमान नहीं देखा जा सकता। उनकी सूक्ष्म शक्ति उन्हें निराकार होने के लिए ही बाधित करती ह। उनकी दर्शन नहीं हो सकता।
तो क्या ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हो सकता? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि उसके साथ प्रकृति के स्थूल के कुछ तत्व मिल रहने चाहिए। तभी यह संभव प्रकृति स्थूल है। उसके तत्व अणु, परमाणुओं से लेकर विशालकाय भूधरों, सागरों तक दृश्यमान होते हैं। यो उसके भीतर भी परमचेतना की सत्ता भी विद्यमान है। किन्तु दीखता केवल प्राकृतिक कलेवर ही है। शरीर को ही ले उसके कण-कण में चेतना का निवास है तो भी दीखते केवल अंग-अवयव ही है। उनका पंच भौतिक कलेवर ही दीख पड़ता है। इसी प्रकार समग्र सत्ता का दर्शन कहीं भी, कभी भी नहीं हो सकता। उनके साथ मिश्रण आवश्यक होगा। इनके बिना नाम, रूप? शब्द स्वरूप का समुच्चय बन ही नहीं सकता।
कई व्यक्ति इष्टदेव दर्शन के लिए आग्रह प्रकट करते है। वह आग्रह दिवास्वप्न के रूप में ही प्रकट हो सकता है। यान की परिपक्वावस्था में कल्पना ही प्रतिमा बन जाती है। झाड़ी की भूत बनना इसी को कहते हैं। शंका से डाकिन और मनसा से भूत उत्पन्न होने की कहावत प्रसिद्ध है। स्वप्न देखते समय उसमें चल रही हलचलें भी यथावत् प्रतीत होती है। जिनके साथ लगाव अधिक होता है वह प्रेमी, प्रेमिका प्रायः स्वप्न में याद आते रहते है और कई बार दिवास्वप्न बनकर प्रत्यक्षवत् भी दिख पड़ते हैं।
पानी प्रवाही है। हवा अदृश्य गतिशील। पर दोनों के सम्मिश्रण से बुलबुले बन जाते है। वह चलते, फिरते और आकृतिवान भी होते है। किन्तु वह सादा दृश्य क्षणिक होता है। बुलबुले अधिक देर स्थित नहीं रहते। कुछ ही देर में इधर-उधर भटक कर अदृश्य हो जाते है। ठीक यही बात इष्ट-देव दर्शन की होती है। भावुक और आग्रही अपनी साधना की सफलता इसी रूप में आँकते हैं कि इन्हें छवि की झाँकी हो जाए। हो भी ऐसा ही जाता है। कभी कभी चलती-फिरती धुँधली-सी इष्ट कल्पना से मिलती-जुलती छवियाँ दीख भी पड़ती है। भक्त जन इतने से भी अपनी बिगड़ती बात बना लेते हैं। स्वल्प सन्तोष भी डूबते के लिए तिनके का सहारा बन जाता है।
यदि सचमुच इष्ट देव का दर्शन हुआ होता, देवता इतने दूरवर्ती लोक-लोकान्तरों से लचलकर भक्त की पुकार पर दौड़ा आया होता तो उसे कुछ उपहार भी दिया होता। मनोकामनाओं को पूरा किया होता, गई-गुजरी स्थित से ऊँचा उठा कर किसी उच्च स्थान तक पहुँचाया होता। लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं। न लौकिक स्थिति सुधरती है न आत्मिक परलौकिक स्थिति में कोई अन्तर आता प्रतीत होता है। फिर कैसे कहा जाए कि देवता पधारे थे? यदि वे सचमुच पधारे होते तो न ही खाली हाथ आते और न रीति जेब जाते। उनके साथ कुछ न कुछ आदान प्रदान हुआ होता, पर इस बात का कोई चिन्ह नहीं है तो उस प्रतिमा प्रदर्शन का क्या मूल्याँकन किया जाए, उसे किस प्रकार कोई उच्चस्तरीय उपलब्धि माना जाए?
छवि दर्शन का आग्रह समय-समय पर और भी कई भक्तजनों को होता रहा है। अर्जुन ने कृष्ण से इसी के लिए अनुरोध किया था। यशोदा यही वांछा संजोये बैठी थी। कौशल्या को अपनी गोदी में भगवान खिलाने का मन था पर वहाँ तो हाड़-माँस का छोटा बालक भर दीख पड़ता था। काकभुशुण्डि ने इन सबसे बढ़ कर साहस कर दिखाया, वे मरने-मारने पर तैयार हो गये। बालक राम यदि वस्तुतः परब्रह्म है तो शंका निवारण के लिए परीक्षा के निमित्त कटिबद्ध हुआ जाए। वे चावल खाते राम के मुँह में घूस गये। किन्तु देखा क्या जो उपरोक्त अन्य सन्तों ने देखा था। उन्हें दिखाया गया था कि भगवान को देखना है तो वह चर्मचक्षुओं के सहारे संभव नहीं, उसके लिए दिव्य नेत्र खोलने होंगे। इस समस्त विश्व ब्रह्माण्ड को ही ईश्वर का विराट रूप समझना होगा। सभी को इतने पर ही सन्तोष करना पड़ा। जिसके किन्हीं जनक-जननी के उदर से उत्पन्न हुए शरीर से भगवान का आरोपण किया, उन्हें इतने भर से ही संतोष करना पड़ा। ऐसा तो कोई भी कर सकता है। प्रति को पत्नि को संरक्षक को अभिभावक को गुरु को भगवान माना जा सकता है। वे तद्नुरूप फलित भी होते हैं। यह श्रद्धा की शक्ति का चमत्कार है उसने मिट्टी की प्रतिमा को द्रोणाचार्य, पाषाण को परमहंस की काली और छोटे खिलौने को मीरा का गिरधर गोपाल बना दिया था। पर उनकी सामर्थ्य, श्रद्धावान तक है सीमित रही। मिट्टी के द्रोणाचार्य ने एकलव्य के अतिरिक्त किसी को भी मनुष्य विद्या नहीं सिखाई। मीरा के अतिरिक्त गिरधर गोपाल ने कहीं भी एक पत्थर तक नहीं उठाया रामकृष्ण की प्रचण्ड चेतना शक्ति काली उन्हीं के लिए जगद्धातृ थी। पर जब चोर प्रतिमा के मुँह में हाथ डाल कर जीभ उखाड़ ले गये तो उनसे आत्म रक्षा तक न बन पड़ी।
प्रतिमा पूजन सार्थक है या निरर्थक? इस प्रश्न के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि जड़ के भीतर भी चेतन की विद्यमानता का दर्शन इस आधार पर विकसित किया जा सकता है। श्रद्धा के बल पर गोबर को गणेश बनाया जा सकता है। गोल पत्थर को शिव शालिग्राम। वे दर्पण की प्रतिच्छवि एवं गुम्बज की प्रतिध्वनि की तरह अपनी ही चेतना को इच्छानुरूप परिलक्षित कर सकती है। देवता या ईश्वर के रूप से भी पर यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि जिसने उस पर श्रद्धा का आरोपण नहीं किया है, उसके लिए वह निर्जीव पदार्थ, एक बुत मात्र है। आकृति और श्रृंगार ही उसका आकर्षण हो सकता है। निजी आरोपण के अभाव में वह श्रद्धा, सम्वर्धन में सहायक नहीं हो सकती और न जाँच-पड़ताल की किसी कसौटी पर खरी ही उतर सकती है।
परमात्मा ने केवल एक तन्त्र नहीं बनाया है जो अपनी एक विधि और एक रीति से अपना काम करता चले, न उसके काम में कोई बाधा आये और न कोई असफलता मिले।
मनुष्य को परमात्मा ने एक स्वतंत्र बुद्धि वाला चेतन प्राणी बनाया है। उसे हाथ-पाँव काम करने के लिए और विवेक काम के औचित्य-अनौचित्य समझने के लिए दिया है। उसकी इच्छा है कि मनुष्य अधिक से अधिक परिश्रमी, कर्मठ और धैर्यवान बनें, इसीलिए उसके सभी काम निर्विघ्न नहीं होते चलते।
यदि सारे काम बिना बाधा के सहज रूप से होते चले तो कर्म-कौशल का महत्व ही समाप्त हो जाये। मेरा विश्वास है कि जिस काम को करने में मनुष्य को बाधायें नहीं आनी, उसे अपनी कार्य-कुशलता का परिचय देने का अवसर नहीं रहता, वह काम मनुष्य के करने योग्य नहीं होता।
-महामना मदनमोहन मालवीय
मनुष्य आहार पर जीवित रहता है। पर वह आहार तीन से मिलकर बना है। अन्न, जल और वायु। इसमें से एक का अभाव हो तो आहर न बनेगा। एक ही हो तो भी काम चलने वाला नहीं है। उसी प्रकार अध्यात्म जीवन के लिए भी जिस आहार की आवश्यकता है वह ज्ञान कर्म और भक्ति के समन्वय से बनता है। इनमें से एक कम पड़े तो भी काम न चलेगा, अथवा मात्र एक ही अपनाया जाए तो भी बात अधूरी रह जायेगी।
ज्ञान का अर्थ है - जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं दिशा धारा का सही निर्धारण। यह जानकारी अधूरी या गलत हो तो मनुष्य भटकता रहेगा। कहीं देखेगा, कहीं चलेगा। भ्रान्त को अर्धविक्षिप्त माना जाता है। हर काम समुचित एवं समग्र जानकारी माँगता है। इसलिए शिक्षा को आवश्यक माना गया है। उसके बिना सही योजना बनाना संभव नहीं होता।
ज्ञान के अतिरिक्त दूसरा है-कर्म। काम किये बिना कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। परिणाम तक पहुँचने के लिए क्रियाशील बनना पड़ता है। निष्क्रियों के लिए कुछ प्राप्त कर सकना तो दूर अंग-अवयवों को संचालन तक नहीं बन पड़ता। स्वास्थ्य को सही रख सकना तक संभव नहीं होता। इस संसार में कुछ भी प्राप्त करना हो तो कर्म के मूल्य पर ही मिलता है।
आध्यात्मिक आधार का तीसरा पक्ष है - भक्ति। भक्ति अर्थात् अनुरक्ति। लगाव, दिलचस्पी, प्रेम के बिना सब कुछ शून्य बना रहता है। दिलचस्पी के बिना प्रयोजन में मन ही नहीं लगता। मन न लगे तो ज्ञान का संकलन कैसे हो? परिश्रम कैसे किया जाए? उदासी छायी रहे तो लकीर भर पिटती है। बेगार भुगतने की तरह जो कुछ भी किया जाता है ठीक तरह बन ही नहीं पड़ता। सोचा और सीखा सब कुछ भूल जाता है।
इन दिनों भक्ति को ही सब कुछ मान लिया गया है। भक्ति माने ईश्वर उपासना पर लंगड़ी उपासना न तो ठीक तरह बन पड़ती है, न उसका कोई स्वरूप ही स्पष्ट होता है न मन लगता है न रस आता है न आनंद। जिस ईश्वर की भक्ति करने का रिवाज है, वह मनोकामना पूरी करने की मशीन है। लाटरी खरीदने की तरह लोग हजार मनोकामनाएं लेकर उल्टी-पुल्टी माला घुमाते है। पुष्य अक्षत चढ़ाते है पर जो चाहा गया है वह इतना सस्ता कहाँ है? यदि इतनी सरलतापूर्वक ईश्वर तथाकथित भक्तजनों की इच्छाएं पूरी कर दिया करे तो फिर किसी को योग्यता प्राप्त करने की, पुरुषार्थ की, साधन जुटाने की तनिक भी आवश्यकता न पड़ा करें। इतना सस्ता सौदा खरीदने से कौन चूकेगा? साँसारिक अनेकानेक कामनाओं की पूर्ति और साथ में मुक्ति आदि का लाभ। यही है आज के पूजा पाठ की पृष्ठभूमि। देखा जाता है कि जो चाहा गया है वह पल्ले नहीं पड़ा तो निराश होकर उस झंझट से हाथ खींच लिया जाता है अथवा आदत अभ्यास की तरह किसी तरह लकीर पिटती रहती है।
भक्ति की परिभाषा तो लोगों के मस्तिष्क में सर्वथा अधूरी हैं। ज्ञान की समग्रता के बिना भ्राँति के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं आता। ज्ञान और भक्ति के बीच की एक बड़ी इकाई है-कर्म। कर्तव्य, फर्ज, जिम्मेदारी, ड्यूटी। यह सारा सरंजाम जब पूरी तरह जुटता है तब अध्यात्मक का आहर पकता है।
ज्ञान का अर्थ है - आत्मज्ञान। वैसा आत्मबोध जैसा भगवान बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और उपयोग समझ में आने पर मनुष्य ईश्वर के इस बहुमूल्य उपहार का श्रेष्ठतम उपयोग करने का प्रयत्न करता है। मणि को काँच समझकर उसे इधर से उधर ठुकराते फिरने वाले जीवन को लिप्सा, तृष्णा, अहंता की पूर्ति में खर्च करते हुए अपने को बुद्धिमान मानते है। वासना और सम्पदा के निमित्त ही वह जीवन समाप्त हो जाता है जो चौरासी लाख योनियों में भटकते के उपरान्त एक बार मिलता है। जीवन पारस पत्थर है, इसका सदुपयोग करने पर कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। ऋषि और देवात्मा बना जा सकता है। अपना तथा असंख्यों का उद्धार किया जा सकता है पर ऐसा कुछ बन नहीं पड़ता, क्योंकि जीवन का स्वरूप ह विदित नहीं हो पाता। आत्मबोध होने पर भेड़ों के झुंड में पले हुए सिंह की तरह हेय स्थिति में नहीं पड़ा रहना पड़ता।
ज्ञानयोग व्यक्तिगत नीति, नियमों का पालन करने संयमी तपस्वी बनने से संबंधित जितने भी व्यक्तिगत अनुशासन है उन्हें समझने और पालन करने के दायरे में घूमता है। जीवन का श्रेष्ठतम स्वरूप क्या हो सकता है। एक आदर्शवादी का चिंतन किन मर्यादाओं के पालन पर निर्भर रहता है? यह सभी बातें विस्तारपूर्वक समझने और उनके पालन में जो उतार चढ़ाव आते है उनका समाधान ज्ञानयोग के अंतर्गत आता है।
मनुष्य में देवत्व की झाँकी किन विशिष्टताओं के समावेश से हो सकती है? उनके पालन का कार्यक्रम और साहस किस प्रकार उगता और निभता है, यही ज्ञानयोग है। संक्षेप में वैयक्तिक नीति मर्यादाओं का पालन करते हुए आत्मा का प्रत्यक्ष जीवन में किस प्रकार निर्वाह होता है। इसे ज्ञानयोग समझा जाना चाहिए।
कर्मयोग का तात्पर्य है-समाज के प्रति निष्ठावान और सेवा-भावी होना। ईश्वर के विश्व उद्यान को सींचना, उसे सुरम्य और सुविकसित बनाना-ईश्वर ने मनुष्य का यह कर्तव्य निर्धारित किया है। इससे व्यक्तियों को सुसंस्कृत और परिस्थितियों को सुविकसित बनाने वाले सभी कार्य सम्मिलित हैं। शरीर पोषण के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपनी क्षमताओं को लोकमंगल के लिए खपा देना कर्मयोग है। कर्तव्य करते हुए जीवन की सफलता मानना और प्रसन्न रहना यही कर्मयोग है।
ज्ञानयोग और कर्मयोग में अपने प्रति कठोरता और समाज के प्रति सेवा भावना को चरितार्थ करना आता है।तीसरा क्षेत्र भावनाओं का रह जाता है। भाव संवेदनाएं ही सरसता का आनंद देती है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। यह प्रेम आदर्शों के प्रति, लोकमंगल के प्रति तो होना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त संपर्क क्षेत्र के प्रत्येक मनुष्य से प्राणी से आत्मीयता को घनिष्ठ करना यह प्रेमयोग का भक्तियोग है। ईश्वर सर्वव्यापी चेतना है। उसके सा प्यार के संबंध बाँधना ईश्वर भक्ति है। इसका अभ्यास करने के लिए उसकी साकार प्रतिमा कल्पित की जाती है और उसके साथ एकाग्रता जोड़ने का अभ्यास किया जाना है। एकात्मता के समर्पण का भाव है। ऐसा किये बिना दैन ही बना रहेगा। जब तक अभ्यास काल चल रहा है। तब तक ईश्वर की एक व्यक्ति विशेष के रूप में मान्यता रखी जा सकती है। राम, कृष्ण हनुमान, अल्लाह, ईशु की छवियां प्राचीन काल से प्रचलित है। उनमें से जो भी अपने को अनुकूल पड़ती हों उसकी छवि की अधिक स्पष्ट कल्पना करना और उसके साथ अधिक प्रेम भरे आत्मीयता की भावना करना - यह भक्ति भावना का प्रचलित उपक्रम है। उस छवि के साथ माता पिता सखा स्वामी आदि के सम्बन्ध जोड़े जा सकते हैं। इतने पर भी यह ध्यान रखना चाहिए कि सर्वव्यापी चेतना सत्ता की कोई वास्तविक छवि नहीं हो सकती। यदि कोई वास्तविक छवि है तो वह है जो अर्जुन और यशोदा को कृष्ण के विराट ब्रह्म के रूप में दिखाई थी। राम ने कौशल्या और काकभुशुंडि जी को उसी विराट ब्रह्म के दर्शन कराए थे। उसकी भक्ति करना, प्राणिमात्र के साथ भाव संवेदना करना, आत्मीयता भरे प्रेम संबंध जोड़ना हो सकता है। वह प्रयोग वस्तुतः अपने अंतःकरण को विराट ब्रह्म के प्रति भाव घनिष्ठ संवेदनाओं से भर लेना है। इसका व्यावहारिक स्वरूप यही हो सकता है कि सब को अपना और अपने को सब का समझा जाए।
संक्षेप में आत्मिक प्रगति का पोषण प्राप्त करने के लिए व्यक्तित्व में उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र का समावेश करने के रूप में ज्ञानयोग चरितार्थ करना चाहिए। लोकमंगल को प्रमुखता देते हुए समाज सेवा में निरत रहने के रूप में कर्मयोग का पालन करना चाहिए और साथ ही अंतरात्मा की आत्मीयता से प्रेम भावना से ओत-प्रोत रखना चाहिए। यह भक्तियोग है। तीनों योगों का व्यावहारिक जीवन में अधिकाधिक समावेश करते हुए पूजा पाठ का जप तप का जितना संभव हो अभ्यास करते रहना चाहिए। किन्तु मूलभूत दर्शन को कभी नहीं भूलना चाहिए। अंतःकरण से उद्भूत श्रद्धा ज्ञानजन्य प्रज्ञा के अभाव में बहिरंग के सारे कृत्य अर्थहीन है।
विद्या का मोटा अर्थ है - विद्या संचय! भगवती सरस्वती को उसी का प्रतीक माना जाता है। बहुप्रचलित उक्ति है कि ‘विद्या विहीन पशु। जिसने विद्या के साथ सघन सम्बन्ध नहीं जोड़ा, वह नर-पशु की संज्ञा में गिना जायेगा। कूप–मण्डूकों की ज्ञान परिधि उतनी ही छोटी होती है जितनी कि कुएं की लम्बाई, चौड़ाई। उसे बाहरी दुनिया का कोई ज्ञान नहीं होता। गूलर के भुनगे के लिए उस फल का पोला भाग ही समूचा ब्रह्माण्ड है पर पक्षी उन्मुक्त आकाश में उड़ सकता है उसे जानकारी होती है कि दुनिया कितनी बड़ी और कितने चित्र-विचित्र दृश्यों और घटनाक्रमों से घिरी हुई है।
अशिक्षित मनुष्य भी कूप मण्डूक की तरह बाड़े में पशु की तरह है। उसकी जानकारी संपर्क क्षेत्र के प्रचलनों और क्रियाकलापों के दायरे भर में घिरी रहती है जो उसके परिचित क्षेत्र में हो रहा है, उसकी दृष्टि में दुनिया की गतिविधियाँ इतनी ही सीमित है, जबकि वस्तुतः ज्ञान क्षेत्र का विस्तार इससे असंख्य गुना बड़ा हे। जिसका ज्ञान विस्तार जितना बड़ा है, समझना चाहिए कि उसकी विज्ञता उतनी ही बड़ी है। वस्तुतः यही सच्च बड़प्पन भी है। बड़प्पन ही नहीं वैभव भी।
अब संसार बहुत छोटा हो गया है, दुनिया बहुत सिकुड़ गयी है। ज्ञान विज्ञान का दायरा इतना बड़ा हो गया है कि उसके संपर्क में न आने से हम गई गुजरी पिछड़ी हुई परिस्थितियों में ही घिरे पड़े रहेंगे। बौद्धिक दृष्टि से पिछड़ापन आर्थिक दरिद्रता से भी गया बीता है। हम चारे धनवान न बन सके पर ज्ञानवान तो बनना ही चाहिए, क्योंकि वह अपेक्षाकृत सरल भी है और व्यक्तित्व के मूल्याँकन की दृष्टि से बहुमूल्य हीरक हार की तरह भी।
सद्शासन रूपी हिमालय की दो प्रमुख धाराएं है। एक शिक्षा दूसरी विद्या। शिक्षा की परिधि में भौतिक जानकारियाँ आती हैं जिनके सहारे उपार्जन करने की क्षमता और बहुज्ञ समझे जाने की प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। स्कूलों में शिक्षा का ही पाठ्यक्रम आदि से अन्त तक है। शिल्पी कलाकार जिस विशिष्टता का परिचय देते है वह शिक्षा की परिधि में ही आता है। विशेषज्ञ वैज्ञानिक साहित्यकार, संगीतज्ञ, याँत्रिक आदि इसी वर्ग में आते है उन्हें शिक्षित कहते है। अधिक बढ़ा चढ़ा होने पर उसे सुशिक्षित भी कहा जाता है।
विद्या इससे भिन्न है। उसे दूसरे शब्दों में सभ्यता या सुसंस्कारिता भी कह सकते है। जीवन एक अनगढ़ धातु की तरह है। उसे जिस भट्टी में तपाया, शोधा, ढाला और निखारा जाता है, उसे विद्या कहते है। मनुष्य के गुण, कर्म स्वभाव कई बार वे इतने उज्ज्वल और उत्कृष्ट होते है कि हाड़ माँस के पुतले में ही देवता विराजमान और गतिशील प्रतीत होता है। व्यक्तित्व की दृष्टि से गिरे हुए व्यक्ति को नर कीटक, नर पशु या नर पिशाच कहते है। पर जिसकी स्थिति उत्कृष्टता और आदर्शवादिता के साथ घुल मिल जाती है, उसे देव मानव ऋषि, तपस्वी, सन्त आदि कहते है और सहज श्रद्धा में द्रवित होकर उसे भाव भरा नमन करते हैं। भले ही भौतिक सम्पदाओं की दृष्टि से वे दरिद्र या अपरिग्रही जैसा अभावग्रस्त परिस्थितियों में ही क्यों न रह रहा हो?
विद्या का क्षेत्र है-चिन्तन, चरित्र और व्यवहार। चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में शालीनता का समावेश करना विद्या का काम है। उसकी बढ़ती हुई मात्रा सुसंस्कारिता के रूप में दृष्टि गोचर होती है। ब्राह्मण और साधु वर्ग के लोग महामानव स्तर के होते है। उनका व्यक्तित्व इतना भारी और वजनदार होता है कि उस दबाव से व्यक्ति, समाज और वातावरण को बदलते, सुधरते देर नहीं लगती।
शिक्षा प्राप्ति के लिए उस्तादों के पास जाना पड़ता है और अपने विषय की प्रवीणता में निष्णात गुरुजनों की शरण में जाना पड़ता है। विभिन्न प्रकार के कलाकौशल वे ही सिखाते है। अपने विषय का प्रवीण, पारंगत होना ऐसे शिक्षकों के लिए पर्याप्त माना जाता है। इनके सम्बन्ध में यह खोज बीन नहीं की जाती है कि वे चरित्रवान है या नहीं? दुर्व्यसनों से तो घिरे हुए नहीं। इनका दृष्टिकोण घटिया तो नहीं है। यदि हो भी तो शिक्षक और शिक्षार्थी मिलकर शिक्षा प्राप्त करने कर गाड़ी धकेलते रहते है।
विद्वान यदि सुशिक्षित भी हो तो सोना सुगन्ध अन्यथा कम पढ़े या बिना पढ़े पढ़े होने पर भी उनका काम चल सकता है। मध्यकालीन सन्तों में बहुत कम सुशिक्षित थे। उनकी कविताओं और कहानियों में शब्द रचना और छन्द शास्त्र कर दृष्टि से ढेरों अशुद्धियाँ भरी पड़ी है। इससे प्रतीत होता है कि उनने शिक्षा की दिशा में विशेष ध्यान नहीं दिया या अवसर नहीं मिला। यह भी हो सकता है कि उनसे वैसे कौशल की आवश्यकता ही न समझी हो।
कबीर ने तो “पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े से पंडित होय” वाले बहुचर्चित दोहे में इस तथ्य को और भी अच्छी तरह उजागर कर दिया है। वे भावना क्षेत्र की मान्यताओं आस्थाओं, आकाँक्षाओं और विचारणाओं को ही मनुष्य की वास्तविक पूँजी मानते हैं। उनमें यदि उत्कृष्टता का समावेश है तो फिर गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता की कमी न रहेगी और कम पढ़े होने पर भी विद्या की आवश्यकता पूरी हो जायेगी।
विद्या का उद्देश्य दृष्टिकोण परिष्कृत और व्यवहार को सज्जनोचित बनाने का लक्ष्य है। वह चरित्र पर पूरा जोर देता है। निजी आवश्यकता में अधिकतम कटौती करके जो कुछ जीवन रस बचता है, उसे परमार्थ प्रयोजन में उड़ेल देने की उमंग भरती है। चरित्र के धनी इतने प्रभावी होते है कि उन पर मोटे पेट वाले ध्नाध्यक्षी हजार धन कुबेरों को निछावर किया जा सकता है। देवता असुरों से सदा हारते रहे है किन्तु निष्ठावान टूट जाते है पर झुकते नहीं, वे अपनी आन पर दृढ़तापूर्वक चट्टान की तरह अडिग खड़े रहते हैं। उनकी प्रत्यक्ष सफलताओं की तो बड़ी सी बड़ी गाथा नहीं मिलती किन्तु यह निश्चित रूप से कहा जाता है कि उनने अपने संपर्क क्षेत्र के अनेक झाड़–झंखाड़ों चन्दन तरु की तरह महाकाया है उन्होंने अपनी नाव पर बिठा कर अनेकानेकों को पार किया है, उन्होंने अनेकों की दिशा-धार मोड़ी और भटकाव में निकाल कर राज-मार्ग तक पहुँचाया है।
शिक्षा की परिणति सम्पदा और प्रतिष्ठा है। इसलिए उसे लोग पढ़ते भी है। इसके लिए निजी स्कूल खुलते तथा सरकारी बनते रहते है। हर साल लाखों लड़के मध्यवर्ती और ऊंची शिक्षा प्राप्त करके उनमें से निकलते भी है। इसके उपरान्त कुछ को ही काम मिल पाता है। शेष अपनी बेकारी की शिकायतें करते हुए उद्विग्न फिरते है पर विद्यावानों को ही ऐसी विपन्नता का सामना नहीं करना पड़ता वे अपनी प्रामाणिकता, चरित्रनिष्ठा, अनुशासन परायणता के आधार पर जहां भी पहुँचते हैं काम और सम्मान पाते है। सद्गुण ही वह पूँजी है जिसकी पूरी तरह परख, परीक्षा न होने तक ही उपेक्षा होती है। जब तक उसका मूल्याँकन कसौटियों पर कस कर नहीं कर लिया जाता है। इस आधार पर निखरे हुए मनुष्य को छोड़ने या छुड़ाने में प्राण हरण जैसा कष्ट होता है। वे जिस भी काम में हाथ डालते हैं उसमें क्रमिक उन्नति करते हुए सफलता की चरम सीमा तक पहुँचते है। सर्वथा अभावग्रस्त परिस्थितियों का घेरा तोड़ते हुए भी उच्च महत्व के शिखरों पहुँचे है, उनकी प्रमुख विशेषता एक ही रही है-उत्कृष्टता। आध्यात्मिक साधनाओं का नन्दनवन चरित्र निष्ठा की उर्वरा भूमि पर ही फलता फूलता है।
शिक्षा प्रसार के लिए बहुत कुछ हो रहा है। होना यह भी चाहिए कि विद्या के प्रति बरती जाने वाली श्रद्धा का अन्त हो विद्यावानों का विद्यालयों का अभाव यथा संभव जितनी जल्दी बन पड़े दूर किया जाए।
.... की सघन तमिस्रा में हाथों हाथ नहीं सूझता। प्रकाश के अभाव में आँख काम नहीं देती। वस्तुओं का सही स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता। कुछ के बदले कुछ दीखता है। ऐसी दशा में कोई क्रिया कलाप सही बन पड़ना संभव नहीं होता। न लेखक लेख लिख सकते हैं और न शिल्पी अपने औजारों का उपयोग वहाँ कर सकते है जहाँ उन्हें प्रयुक्त किया जाना चाहिए। घसियारे अपनी खुरपी उठा कर रख देते है क्योँकि अनुमान के आधार पर वह खुदाई भी नहीं हो सकती। साँप, बिच्छू भी उंगली दे सकते है। पथिक भी रास्ता नहीं चलते। राह भूल जाने, काँटे लगने कंकड़ चुभने और ठोकर लगने की आशंका रहती है न दुकानदार दुकान खोलते हैं और न व्यापारी व्यापार करते है। अंधेरे में भूले होते रहने का खतरा स्पष्ट रहता है। वातावरण का तापमान सूर्य के अस्त होने पर प्रकाश के अभाव में घट जाता है। शरीर भी उससे प्रभावित होता है। फलतः सुस्ती घेर लेती है, थकान चढ़ दौड़ती है और आलस आने लगता है। बढ़ते बढ़ते वह खुमारी की स्थिति में जा पहुँचता है और नींद आ घेरती है। सर्वत्र सन्नाटा छा जाता है। चारों का भय बढ़ता है। दरवाजे बन्द करने पड़ते हैं। जहाँ अधिक खतरा होता है। वहाँ पहरेदार, चौकीदार की व्यवस्था करनी पड़ती है। अंधकार निष्क्रियता का निस्तब्धता का प्रतीक है। उसके खतरे तो बढ़ते ही है साथ ही चोर उचक्के व्यभिचारी, नशेबाज, दस्यु तस्कर भी अपनी गतिविधियाँ तेज करते हैं। असुरक्षा भयानकता, निष्क्रियता निस्तब्धता जैसे न जाने क्या क्या संकट सामने आ खड़े होते है।
रात्रि में फूल खिलना बन्द कर देते हैं। वृक्ष, वनस्पतियों तक की बढ़वार रुक जाती है। प्रकाश ही जीवन है। उसकी जितनी कभी पड़ती जायेगी, उतनी ही प्रगति अवरुद्ध होती जायेगी। रेय का साम्राज्य बदलेगा, सपनों की दुनिया गति पकड़ेगी। कोई किसी की सहायता न कर सकेगा। यहाँ तक कि सद्ग्रंथ भी अक्षर दीख न पड़ने के कारण अपना मार्ग-दर्शन कर सकने में समर्थ न हो सकेंगे। निशाचरों की बन पड़ती है। हिंस्र जंतु इसी अवसर पर आखेट के लिए निकलते हैं।
ऋषि के शब्दों में सार्वभौम अन्तरात्मा के प्रार्थना की है कि तमसो माँ ज्योतिर्गमय अर्थात् - हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल। प्रकाश में वस्तुओं का स्पष्ट रूप दर्शाने की क्षमता तो होती ही है, इसके अतिरिक्त उसमें ऊर्जा भी सन्निहित रहती है। यही कारण है कि सूर्य के उदय होते ही सर्वत्र गतिशीलता का प्रादुर्भाव होता है। पक्षी अपने घोंसले से निकल कर फुदकने, चहकने लगते है। पशु बाड़ा छोड़ कर भोजन की तलाश में निकलते है। सोने वाले नींद छोड़ कर नित्य-कर्म से निपटते और नये दिन के कार्य आरंभ करते हैं। किसान, शिल्पी, कलाकार व्यवसायी, विद्यार्थी सभी अपना अपना काम आरंभ कर देते है। उपार्जन, उत्पादन, निर्माण, उत्थान का क्रम सभी का अपने अपने ढंग से चल पड़ता है। प्रकाश की गरिमा ही ऐसी है। उसके साथ उत्कर्ष, अभ्युदय का क्रम अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। प्रकाश ही जीवन है और अन्धकार ही मरण। संसार की हर जड़ चेतना इकाई जीवन के प्रति उत्सुक रहती और मरण के प्रति अनिच्छुक। इसलिए उसे प्रकाश का आश्रय लेना पड़ता है। अन्धकार से जूझने के लिए दीपक से लेकर शक्तिशाली विद्युत बल्बों तक का प्रबन्ध करना पड़ता है। यदि ऐसी व्यवस्था न बन पड़े तो यह कल्पना करना कठिन हो जाता है कि रात्रि किस प्रकार कटेगी और उस निविड़ता के बीच निर्वाह कैसे बन पड़ेगा।
भौतिक जगत में जो स्थान प्रकाश का है, ऊर्जा का है, वहीं सम्मिश्रित प्रभाव अध्यात्म-जगत में सद्ज्ञान का है। इसलिए श्रुति परिकर में स्थान स्थान पर सद्ज्ञान रूपी दिव्य प्रकाश की उपलब्धि के लिए परब्रह्म से भाव भरी प्रार्थनाएं की गई है। गायत्री महामंत्र में इसी विभूति उपलब्धि को हस्तगत करने का तारतम्य है। सर्वोपरि इस दिव्य वरदान की प्राप्ति के लिए आत्मा ने अपनी प्रबल आकाँक्षा से अभिव्यक्ति की है। इसे प्राप्त कर सकने का विधान, प्रयोग भी उसमें सन्निहित है। इसी कारण गायत्री को वेदमाता, देवमाता, विश्व माता आदि नामों से अलंकृत किया गया है। उसी दिव्य-ज्ञान को भूमा, प्रज्ञा, प्राण सम्वेदना आदि नामों से पुकारा गया। उसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। जिसके हाथ में चिन्तामणि पहुँचती है वह इसी जीवन में स्वर्ग मोक्ष और सिद्धि का आनन्द प्राप्त करता है। अलंकारित भाषा में उसे अमृत कल्पवृक्ष और पारस नाम से निरूपित किया जाता है।
शिक्षा और विद्या का अन्तर स्पष्ट है शिक्षा की परिधि में भौतिक दुनियादारियों का समुच्चय आता है। उसके आधार पर चतुर, अनुभवी क्रिया कुशल बना जाता है और धनोपार्जन से लेकर यशस्वी पदाधिकारी, सफल सम्मानित आदि बना जाता है। इन प्रत्यक्ष लाभों को देखते हुए सरकारी और गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं की धूम है। वे छोटे बड़े रूपों में स्थान स्थान पर विनिर्मित है। व्यक्तिगत परामर्श और आदान प्रदान से भी यह क्रम पारिवारिक वातावरण से लेकर समाज संरचना के अनेक क्षेत्रों में उत्साहपूर्वक चलता रहता है। अगणित पुस्तकें अनेकानेक भाषाओं में प्रायः इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु लिखी जाती, छपती और बिकती है। रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म, अखबार, पत्रिकाएं आदि भी इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है। यह शिक्षा-तंत्र अत्यन्त विशद् और विस्तृत है। इसी के आधार पर मनुष्य अनेकानेक विषयों में प्रवीण, पारंगत बनता है। भौतिक सफलताओं और उपलब्धियों का बहुत कुछ आधार प्रशिक्षण प्रक्रिया के साथ जुड़ा हुआ है। इसलिए उसे उपयोगी भी समझा जाता है और इस दिशा में अधिकाधिक प्रवेश पाने के लिए प्रयत्नरत भी रहा है। यह सर्वविस्तृत और सर्वनिमोदित प्रक्रिया है, जो अपने ढंग से प्रतिष्ठित भी है और गतिशील भी।
विद्या इससे आगे की उच्चस्तरीय उपलब्धि है, उसके अंतर्गत आत्म-चिन्तन और आत्म मनन आता है। चिंतन का तात्पर्य है-वस्तुस्थिति का अध्ययन, अवगाहन। मन का तात्पर्य है-विकृतियों के परिशोधन और सत्प्रवृत्तियों संवर्धन की विचारणा, योजना और संभावनाओं का अभिनव स्थापना। विद्या का शुभारंभ आत्मिक क्षेत्र चिंतन मनन से प्रारंभ होता है। इससे आगे आत्मा समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास के ऊर्ध्वगामी चरण उठते है। ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ आत्म चेतना से सम्बन्ध बिठाने और दोनों के बीच आदान–प्रदान का द्वारा खोलने का उपक्रम आरंभ होता है।
भौतिक और आत्मिकी का अपना अपना क्षेत्र उपयोग एवं महत्व है। भौतिकी साँसारिक जीवन में साधन सम्पन्न जुटाने और उनका समुचित उपयोग करके सुरम्य बनाने का पथ प्रशस्त करती है। इसलिए उसकी आवश्यकता सहज समझ में आ जाती है। उसे समर्थन प्रश्रय भी मिलता है, पर आत्मिकी का क्षेत्र गुह्य है। शरीर और उससे सम्बन्धित वैभव प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है और उसके लाभ भी हाथों हाथ उपलब्ध होते है। इसलिए हम कोई उसे चाहता है। साधन सामग्री की प्रचुरता की आकाँक्षा को भी वहीं पूरा करती है। चतुर लोग अपने के गौरवान्वित अनुभव करते और विलास की सामग्री उपलब्ध करके प्रसन्नता अनुभव करते है। किन्तु आत्मिकी का क्षेत्र अप्रत्यक्ष है। उसे इन्द्रियातीत कहा गया है। अन्तर्मुखी होने की विद्या जिन्हें आती है, वे ही इसके स्वरूप समझने और लाभ उठाने में समर्थ होते है।
पेड़ का तना, पल्लव, बारबार फूलों फलों का समुच्चय प्रत्यक्ष दीख पड़ता है पर उन सबको जीवन तथा विकास देने वाली जड़ें जमीन के अन्दर रहती है। वो सामान्यतया दीख नहीं पड़ती फिर भी विचारशील निश्चयपूर्वक जानते हैं कि जड़ें ही वृक्ष की प्रगति एवं स्थिरता का आधारभूत कारण है। उनके सुदृढ़ होने पर ही वृक्ष की स्थिरता अवलम्बित है। यदि जड़ें सूख जाए, उन्हें दीमक चर जाए तो समझना चाहिए कि वृक्ष का जीवन समाप्त हुआ। वह सूखेगा और हवा के किसी बड़े झोंके में धराशायी हो जायेगा। व्यक्ति को एक वृक्ष समझा जा सकता है, उसका बाह्य वैभव भौतिकी और जड़ों वाला अदृश्य पक्ष आत्मिकी। साधारण बुद्धि आत्मिकी का अर्थ नहीं समझती, वह भौतिकी को ही सब कुछ मान बैठती है। इतने में पर भी तथ्य यथास्थान रहते है। सद्गुणों के बिना मनुष्य मात्र अनगढ़ ही बना रहता है। उसके गुण कर्म, स्वभाव में ऐसी प्रखरता उत्पन्न नहीं होती कि वह साधारण कार्यों को भी सांगोपांग ढंग से सम्पन्न कर सके। कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर सकना तो उसके लिए किसी भी प्रकार शक्य नहीं हो पाता। पेट प्रजनन के कोल्हू में बैल की तरह चलते तो हैं, पर शालीनता के अभाव में वे उसे भी ठीक तरह पूरा नहीं कर पतों। आये दिनों उलझनों में उलझते और संकटों का सामना करते हैं, यह प्राणि सुलभ क्षेत्र में उनके लिए ऐसा जाल जंजाल बन जाता है, जिसके लिए अनेकों संकट सहने और अनर्थ करने पड़ते है। जिनकी जड़ों को पोषण नहीं मिला, वे किसी प्रकार जिन्दगी के दिन तो पूरे करते है। पर काले फूलते वृक्ष जैसा प्रश्रय, गौरव कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते वृक्ष जैसा प्रश्रय, गौरव कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। पुण्य परमार्थ की बात तो उनके चिन्तन तक में प्रवेश नहीं कर पाती और उस प्रयोजन को कार्य रूप में परिणत कर सकना तो बन ही कैसे पड़े?
ज्ञान की गरिमा ‘आत्म-ज्ञान’ के रखने के जाती है। जीवन का स्वरूप, उद्देश्य, सदुपयोग का बोध जैसे सांगोपांग नहीं हु और वह न आदर्शों के साथ जुड़ पाता है और न शालीनता, उत्कृष्टता की राह समझने, उस पर चलने की विधि व्यवस्था से परिचित होता है। ऐसी दशा में व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का शालीनता का समावेश तो हो ही सकता है। इस अभाव के कारण स्थिति अस्त–व्यस्त, अनगढ़, असंस्कृत जैसी ही बनी रहती है। जिस आधार पर उच्चस्तरीय प्रगति बन पड़ती है। स्नेह सहयोग, सद्भाव मिल सकता है, वह सूत्र हाथ ही नहीं आता। ऐसी दशा में पिछड़ेपन की हेय स्थिति ही घेरे रहती है। उस दल दल में से उबर कर मानवी गरिमा के अनुरूप कोई श्रेय सुयोग हाथ ही नहीं लग पाता। आत्मिकी से अनजान रहने का यही दुःखद परिणाम निरंतर सामने खड़ा रहता है।
भौतिकी के क्षेत्र में प्रकाश का अर्थ है-रोशनी,ऊर्जा। यही है वह मौलिक शक्ति जिसके आधार पर संसार का समस्त जड़ चेतन गतिशील हो रहा है। आगे से और बढ़ रहा है। आत्मिकी के क्षेत्र में यही ज्योति ऊर्जा महाप्रज्ञा के नाम से जानी जाती है। चूँकि यह सचेतन आवश्यकताएं परब्रह्म से उद्भव होती है। इसीलिए इसे अखण्ड-ज्योति भी कहते है। जिसका भावार्थ है-चेतनात्मक दिव्य प्रेरणा। ऐसी ऊर्जा जो मनुष्य के अन्तराल तक प्रवेश कर सकने का मार्ग बनानी है और उस क्षेत्र की रहस्यमय परतों का उभार कर उजागर करती है। इतना उजागर कि मनुष्य अपने में देव स्तर का अवतरण होते प्रत्यक्ष देख सके।
यही है वह प्रकाश जिसे प्राप्त करने पर मनुष्य अपने निर्धारित पक्ष को देख सकता है। उस पर बिना लड़खड़ाए चल सकता है और अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकता है
जीवन का हर प्रभात एक सच्चे मित्र की तरह, नित्य अभिनव उपहार लेकर आता है। वह चाहता है कि आप वे उपहार ग्रहण कर और उनसे उस शुभ दिन का श्रृंगार करे। उसकी इच्छा रहती है कि जब दूसरे दिन वह आये तो आपका एक बढ़ा हुआ अदम देखे और उसके लिये उपहारों के ठीक उपयोग के साथ नये उपहार लेने के लिये प्रस्तुत पाये। किन्तु जब आदरपूर्वक उठकर उत्साह से उसका स्वागत नहीं किया जाता है तो वह निराश होकर द्वार से लौट जाता है और दूसरे दिन आने में न उसको वह उत्साह रहता है और न उसके उपहारों में वह सौंदर्य। बार बार निराश होने पर वह आता और अपरिचित राही की तरह द्वार के सामने से निकल जाता है।
ईश्वर मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर क्षणों के रूप में देता है। एक नया क्षण देने के पूर्व वह पुराना क्षण वापस ले लेता है। अतएव मिले हुए प्रत्येक क्षण का ठीक ठीक सदुपयोग करो जिससे तुम्हें नित्य नए क्षण मिलते रहे।
पास ही क्षितिज तट पर तुम्हारा लक्ष्य जगमगा रहा है। किन्तु उसको तुम स्पष्ट नहीं देख पतों, क्योंकि उस पर तुम्हारी कमजोरियों के बादल छाये हुए हैं।
-रविन्द्रनाथ टैगोर
बाइबिल के जैनेसिग 27 में प्राणियों एवं मनुष्य की आत्मा को पृथक-पृथक नामों से संबोधित किया गया है। एक को ‘सोल’ तो-प्रकृति के प्रत्येक जीवित एवं श्वास लेते हुए जीवन धारियों में विद्यमान रहती है। इसका संबंध रक्ताभिषरण प्रक्रिया से जुड़ा हुआ माना गया है। किन्तु ‘स्पिरिट’ ऐसी आत्मा है जिसका विकास केवल मनुष्य में ही हो सकता है, वह जानवरों को कदापि नहीं हो सकती।
मनुष्य के इस ज्ञान को तीन भागों में विभक्त किया गया है। - पहला ईश्वरानुभूति, दूसरा अन्याय लोगों के बारे में जानकारी, तीसरा है-वस्तुओं और पदार्थों के उपयोग का ज्ञान।
प्रकारान्तर से इन्हें ही भावना और विवेकशीलता कह सकते हैं। आत्मा का पुंज है भावना। इसमें अपनी ही आत्मा देखना तथा औरों के साथ वह व्यवहार करना जो हम अपने लिए औरों से चाहते हैं। यही भावना का वास्तविक स्वरूप है। दूसरों के दुखों को बाँट लेना और अपने सुखों का बाँट देना यह मात्र भावनाशीलों से ही बन पड़ता है।
बुद्धि की उत्कृष्टता विवेक है। इसी को ‘स्प्रिट’ कहते हैं। साधारण बुद्धि तो प्रायः स्वार्थ साधन में ही प्रवृत्त रहती है। कभी-कभी वह अपराधी बनने और दुष्कर्म करने में भी प्रवृत्त होती है और ऐसे उपाय सोचती है। जिसमें निंदा और दंड से बच निकलने की चतुरता कारगर हो सके। दूसरों की मजबूरियों का लाभ उठाने और उन्हें आकर्षण भरे तर्क देकर बहकाने में यह चतुरता ही काम आती है। आमतौर से लोग इसी क्षमता को विकसित करते है और सभी लाभों का अपनी कुशलता का परिणाम बताते हैं चाहे उनमें अनीति का ही प्रयोग क्यों न किया गया हो?
ऐसे लोग मानव समुदाय में कम नहीं है। जेलखानों में लाखों व्यक्ति इसी स्तर के भरे पड़े हैं, जिनने औचित्य की ओर से आँख बंद करके अनीतिपूर्वक धन कमाया और स्वार्थ साधा। ऐसी बुद्धिमत्ता को विज्ञान समाज में सराहा न जा सकता।
पशु-प्रवृत्ति इसी को कहते हैं बिना भविष्य का परिणाम सोचे अपने तात्कालिक लाभ के लिए कुछ भी करने लगे जिसे दूसरों के हित अनहित का ध्यान नहीं उन्हें नर पर ही कहा जा सकता है। जंगली सुअर और भैंसे किसी का .... खेत उजाड़ सकते हैं, भले ही उस कारण किसी अपने असहाय के परिवार को भूखों ही क्यों न मरना पड़े या चतुरता है जो केवल स्वार्थ साधना ही जानती है।
एक स्थान पर कई रास्तों से पहुँचा जा सकता है। केन्द्र वही रहता है, पर पहुँचने की राहें कई पगडंडियों से होकर वहाँ तक पहुँचती है। उन सड़कों और पगडंडी की राहें अलग-अलग प्रकार से गढ़े होते हैं। वृक्ष कुएं आदि भी भिन्नता लिए हुए होते है फिर भी सीधे तिरछे सभी पहुँचते वहीं।
यही बात योगसाधना के सम्बन्ध में भी है। लक्ष्य एक ही है- भगवान की प्राप्ति। आत्मा और परमात्मा का संयोग। पर उनके लिए योगाभ्यासों की कई विधियाँ और क्रिया-प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इससे साधक की रुचि, क्षमता, श्रद्धा, भावना, शारीरिक और मानसिक स्थिति, अवगत परम्परा आदि अनेकों बातों का ध्यान रखना पड़ता है। सभी को एक राह नहीं बताई जा सकती। एक ही रोग के रोगियों को चिकित्सक उन की व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए अलग अलग प्रकार की दवाएं देते है। सभी भेड़ों को एक लकड़ी से नहीं हाँकते। शिक्षक की परम्परा और विद्यार्थी की अभिरुचि, पात्रता की दोनों ही प्रकार से देखभाल करनी पड़ती है। इसके उपरान्त ही संभव होता है कि निर्धारण क्या किया जाए? अध्यापक ने यदि मराठी भाषा सीखी है तो वह उसी को पढ़ाने का प्रयत्न करेगा। ऐसे पारगत तो बिरले ही होते हैं, जो सभी भाषाएं जानते हो। ऐसे चिकित्सक बिरले ही होते है जो आयुर्वेद ऐलोपैथी, होम्योपैथी आदि में पारंगत हो और रोगी के उपयुक्त चिकित्सा प्रणाली अपना सके। उनने जो पढ़ा है उसी के आधार पर चिकित्सा करते है फिर चाहे वह अनुकूल पड़े या प्रतिकूल। यही कारण है कि साधकों के व्यक्तित्व और स्तर देखकर शिक्षक के निजी अनुभव का अनुमान लगा कर, निर्धारक स्थिति बनती है। उसी आधार पर योगाभ्यासों का क्रम बिठाना पड़ता है। उसमें भी यह देखना पड़ता है कि कौन कितना वजन उठा सकता है। गधे का वजन बकरे पर नहीं लादा जा सकता। इसलिए यह भी देखना पड़ता है कि किसकी मनःस्थिति कैसी है? किसके अभ्यास और चरित्र कैसे है? पूर्वजन्मों के संचित संस्कार कैसे है? इन सब बातों का पर्यवेक्षण करने के उपरान्त ही अनुभवी मार्ग-दर्शक शिष्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार की साधनाएं बताते हैं। शिष्य ने यदि किसी साधना का महात्म्य बढ़-चढ़ कर बता दिया है और उसकी ललक उसी में लगी हुई है तो गुरु के लिए यह आवश्यक नहीं है कि जिसके लिए हठ किया जा रहा है, वही बताने लगें। पात्रता की कमी रहते हुए भी वजन लाद देना या हिमाच्छादित पर्वतों का मार्ग बता देना दोनों के लिए हानिकारक ही सिद्ध होता है। दोनों ही अपयश पाते है।
योग साधनाओं की संख्या असीम है। विभिन्न धर्मों देशों, कालों में विभिन्न प्रकार की साधनाओं का प्रचलन रहा है। पुस्तकों में उन सभी का वर्णन है कुछ साधनाएं ऐसी भी है, उनका गुरु परम्परा से प्रचलन चला आता है। उनका पुस्तक के रूप में कही उल्लेख नहीं हुआ है। विशेषतया ताँत्रिक साधनाओं का क्रम तो ऐसा ही है, जो परम्परागत चला आता है। गुरु-शिष्यों में से कोई पढ़ा लिखा नहीं होता, फिर उन्हें गोपनीय रखने का प्रतिबंध भी है। आदिवासियों में ऐसी विलक्षण देवी, देवताओं की मान्यताएं और पूजा की विधियाँ चलती है, जिनका पुस्तक रूप में कहीं वर्णन नहीं हुआ है। इसी प्रकार अफ्रीकी देशों में हवशी और उनके पुरोहित नर बलि से लेकर अनेक प्रकार के अभिचार करते रहते हैं। वे किसी को लाभ तो नहीं पहुँचा सकते, पर गुह्य तांत्रिक अभिचारों के आधार पर हानि अवश्य पहुँचा देते है। किन्तु उनकी भी कोई लिखी पुस्तक नहीं है। जब सार समाज अनपढ़ अनगढ़ है तो पुस्तकों के लिखे जाने विधानों के छपने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह प्रशिक्षण एक से दूसरे को गुप्त रूप से बताए जाते है। विश्व भर में किन क्षेत्रों में कितने प्रकार के योग चलते रहे है और कितने चल रहे है। इसका समग्र विवरण तो उपलब्ध नहीं है, पर उनकी संख्या अगणित है। इन दिनों भारतवर्ष में जिनका प्रमुख रूप से प्रचलन है उन्हें राजयोग, हठयोग, मंत्रयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, कुण्डलिनी योग, तंत्रयोग आदि नामों से जाना जाता है। इनमें से जो उत्कृष्टतम है, उनका सारा संक्षेप लेकर प्रज्ञायोग विनिर्मित किया गया है। वह सरल भी है। सुगम भी और हर किसी के लिए अपनाये ज्ञान योग्य भी। उस में उतने प्रतिबंध नहीं है, जितने अन्य योगों में होते है।
अगर इन्हें दो खण्डों में बाँटना चाहे तो उनका वर्गीकरण दो खण्डों में भी किया जा सकता है। एक शारीरिक दूसरा सामाजिक। शारीरिक योगों में आसन, प्राणायाम, जप आदि की गणना होती है। जननेन्द्रिय और ब्रह्मरन्ध्र मस्तिष्क मध्य तक मेरुदण्ड मार्ग से चलने वाली इड़ा- पिंगला विद्युत धाराएं कुण्डलिनी जागरण का प्रयोजन पूरा करती है। यह भी शारीरिक विद्युत का खेचरी चमत्कार ही हे। इसके अतिरिक्त ध्यान प्रमुख है। ध्यान की कितनी ही शाखा प्रशाखाएं है। नादयोग, त्राटकयोग, लययोग इनके साथ प्रायः मानसिक क्षेत्र की गतिविधियाँ ही काम करती है। शरीर और मन दोनों से मिलकर जीवन बनता है। दोनों ही एक गाड़ी के दो पहिए है। इनके मिलकर सहयोगपूर्वक अग्रसर होने से ही प्रगति पथ पर आगे बढ़ना होता है। एक पहिया लड़खड़ा जाए तो दूसरा अकेले उसे लेकर अग्रसर नहीं हो सकता है। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए किये गये योगाभ्यास को सफल नहीं बनाया जा सकता।
शारीरिक साधना को संयम कहते है। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम, यह प्रत्यक्ष जीवन की चार तपश्चर्याएं है, जो प्रत्यक्ष जीवन का परिशोधन करती है। व्यक्ति यदि इन्द्रियों को काबू में रखे, विशेषतया जीभ और जननेन्द्रिय का व्यतिरेक न होने दे तो उसकी जीवनी शक्ति घटेगी नहीं, न दुर्बलता न रुग्णता उसे हैरान करेगी। अकाल मृत्यु भी न मरना पड़ेगा। इसी प्रकार अर्थ संयम बरतने वाले आदमी से कम खर्च का बजट बना कर चलने वाले, सादा जीवन, उच्च विचार की नीति अपनाने वाले आर्थिक तंगी नहीं भुगतने और न किसी के ऋणी होते है। समय का संयम करने वाले, सीमित समय में ही इतने अधिक काम कर लेते है, इतनी योग्यता बढ़ा लेते है कि लोगों को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है विचार संयम बरतने वाले ऊँचा ही सोचते है, ऊँची योजनाएं बनाते है और ऊँचा ही कर गुजरते है। ऐसे महामानवों की गणना देव पुरुषों में होती है। वे भव सागर से स्वयं पार होते है और दूसरों का पार लगाते है। मध्यवर्ती तप साधना है, उससे मनुष्य का भौतिक जीवन हर दृष्टि से प्रगतिशील बनता है और सुखी समुन्नत बनता है।
संयमी जीवन व्यतीत करना योगाभ्यास में यहीं तरीका
एक आदमी ने किसी संत की बहुत सेवा की। सन्त का जी आया और वे वहाँ से चलने लगे। अमीर ने प्रार्थना की कुछ ऐसी सौगात देते जाइये, जिसके सहारे मैं भगवान तक पहुँच सकूं। संत ने उसे तीन चीजें दी। 1. मोम, 2. सुई, 3. थोड़े से बाल, और कह इन्हें गाँठ में बाँध लो। अमीर ने इन सब चीजों को देखा और अचम्भे से पूछा-”इनके सहारे मैं कैसे भगवान से मिल सकूँगा?”
सन्त ने कहा-”मोमबत्ती की तरह खुद जलो और दूसरों के लिए रोशनी पैदा करो। सुई की तरह अपने को उघारा रखो पर दूसरों के छेद बंद कर दो। बालों की तरह मुलायम और लचीले रहो। यह तीन ही सहारे भगवान तक पहुँचने के हैं सो इन्हें गिरह बाँध लो तो भगवान तक पहुँच जाओगे।
नेत्र न होने पर अन्धा मनुष्य अनेक सुख-सुविधाओं से वंचित रह जाता है। उसे दूसरों पर अधिकांश कार्यों के लिए पराश्रित रहना पड़ता है। समुचित स्थान प्राप्त करना और प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ सकना भी अपेक्षाकृत कम ही सम्भव हो पाता है। इसीलिए “आँख गई तो जहान गया” की लोकोक्ति अक्सर सुनी जाती है। आँखों में विकार भर जाने से, छोटा-मोटा दुःख दर्द खड़ा हो जाने से लोग अधिक चिंतित और चौकन्ने होते है। उपचार में कमी नहीं रहने देते। सोचते है आँखें चली गई तो क्या होगा?
आम-लोग चर्मचक्षुओं को ही देखते और जानते है उन्हीं को सौंदर्य का प्रतीक मानते हैं। आँखों में आँखें डालकर एक दूसरे के मनोभावों को परखते है। उन्हीं क सहारे अपना व्यवहार, व्यवसाय चलाते है। अन्य इन्द्रियों का जीवन में जितना महत्व है उससे कम नहीं, वरन् अधिक बड़ी भूमिका चक्षुओं की है पर यह समस्त गुण गान चर्मचक्षुओं के ही किये जाते है।
मनुष्य को ऐसे अदृश्य चक्षु भी उपलब्ध हैं जो प्रत्यक्षतः चेहरे पर सटे दिखाई नहीं पड़ते, पर उन्हें परोक्ष रूप से महती भूमिका निबाहते देखा जा सकता है। यह है ज्ञानचक्षु। इन्हें प्रजा-चक्षु भी कहते है। इनका कर्तव्य दूरदर्शी विवेकशीलता के रूप में दीख पड़ता है। इन्हें आमतौर से बन्द ही पाया जाता है। प्रायः लोग उतनी ही परिधि में देख-भाल कर पाते हैं, जितना कि प्रत्यक्ष आंखें देख पाती है। इतने ही क्षेत्र को अपनी सीमा समझते हैं। उसी दायरे में कुछ सोचने की, करने की आवश्यकता समझते है। घाटे और नफे को भी इसी सीमा में घटित होने वाले घटना-क्रम के आधार पर मूल्याँकन करते है। प्रगति भी इसी सीमा में सीमित रहती है। एक प्रकार से इतनी ही परिधि में उनका अपना संस्कार सिकुड़ा हुआ होता है।
नेत्रों की दृष्टि कम हो जाने पर दूर की चीजें दीखना बंद हो जाता है और जिसे देखना है उसे आँखों के समीप लाना पड़ता है। दूर रहने पर एक धुँधली-सी छवि ही चलती फिरती दीखती है जो इस विशाल विश्व के कण कण में बिखरा पड़ा है, जो युग युगान्तरों से बढ़ता चला आया है।
यों अशिक्षितों को भी कूप मंडूक कहते हैं, वह भी अपने निकटवर्ती तथा उपलब्ध जानकारी से ही परिलक्षित होते है। उसी से प्रभाव परिष्कार प्राप्त करते है। संसार कितना विस्तृत है और उसमें कितनी विविधताएं, ज्ञान सम्पदाएं भरी पड़ी है, इसे जान सकना उनकी सीमित दृष्टि के लिए संभव ही नहीं हो सकता। पुस्तकों के पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से वे जितना जान सकते है उसके लिए अवसर ही नहीं रहता। सीमित ज्ञान के आधार पर ही उन्हें जानकारियों पाने, निष्कर्ष निकालने और कदम उठाने का अवसर मिलता है। इन परिस्थितियों को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। अशिक्षा एक प्रकार की दरिद्रता है, जिसके कारण ज्ञानधन कमा सकने और सच्चे अर्थों में धनी बनने का सुयोग प्राप्त कर ही नहीं पाते। विद्वानों की, सभ्यजनों की पंक्ति में बैठ सकना उनके लिए संभव ही नहीं हो पाता। बहुज्ञता और सभ्यता की दृष्टि से उनमें अनेकों त्रुटियाँ पाई जाती है।
निरक्षरों और साक्षरों की दृष्टि में स्तर में अन्तर रहने के अतिरिक्त यह भी जानना आवश्यक है कि इन दोनों ही स्थितियों से ऊंची है-दिव्य-दृष्टि। जिसको सम्यक् दृष्टि भी कहा गया है। दूसरे शब्दों में इसे दूरदर्शी विवेकशीलता भी कहा जा सकता है। यह जिन्हें उपलब्ध है, उन्हीं की मेधा तत्व दर्शन कर सकने में समर्थ होती है। यथार्थता का सत्य का दर्शन इन्हीं से बन पड़ता है। ईश्वर का साक्षात्कार भी इन्हीं के सहारे संभव है।
चर्मचक्षुओं से मिट्टी का ढेला अनगढ़ स्थिति में ही दीख पड़ता है। उसका कुछ मूल्य भी नहीं होता। किन्तु जब वैज्ञानिक उपकरणों से उसका वर्गीकरण, विश्लेषण किया जाता है तो उसे परमाणु समुच्चय के रूप में जाना जाता है। इसमें से प्रत्येक परमाणु अपने में असाधारण शक्ति धारण किये होता है। जिसका विस्फोट होने से तहलका मच जाता है। यह सूक्ष्म दृष्टि है इसे प्राप्त कर सकने पर विश्व के कण कण में संव्याप्त ब्रह्म-चेतना का दर्शन होता है।
यही है वह दृष्टि जिसके मिलने पर आत्म-स्वरूप का बोध होता है। अपने को परमात्मा का युवराज होने का भान होता है। साथ ही यह विश्व परिवार भगवान का सुरम्य उद्यान प्रतीत होता है। उसे सींचने संजोने के लिए माली का दायित्व संभालने के लिए मन मचलता है। जीवन एक बहुमूल्य अवसर प्रतीत होता है। जिसका सदुपयोग बन पड़ने पर नर नारायण, पुरुष पुरुषोत्तम बन सकने की संभावना का आधार प्रत्यक्ष रूप में परिलक्षित होता है। साथ ही वह सम्यक् दृष्टि भी प्राप्त होती है, जिसे दूसरे शब्दों में स्वर्ग कहा जाता है।
सम्यक् दृष्टि प्राप्त होने पर संसार अपना नहीं भगवान का प्रतीत होता है। उस पर स्वामित्व जमाने की भ्रान्ति नहीं उभरती है। आत्मीयता तो किसी पर भी आरोपित की जा सकती है पर ममता के आँचल में सबको नहीं समेटा जा सकता। वस्तुओं को व्यक्तियों को मेरा कहने पर उनके संदर्भ में अनेकानेक जिम्मेदारियों सिर पर लदती है और बदलाव आते ही रौब जमाने का सिलसिला चल पड़ता है। अधिकार जमाने के कारण ही बैल भैंसे, भेड़ें और कुत्ते आपस में लड़ते है। वस्तुएं जहाँ की तहाँ रहती है पर अधिकार जमाने वाले खून–खराबा करते और कराते देखे जाते है।
सम्यक् दृष्टि न होने के कारण ही मनुष्य अपने को शरीर मान बैठता है और उसकी ललक लिप्साओं के लिए सारा प्रयत्न खपा देता है। इतना ही नहीं नीति मर्यादाओं के उल्लंघन में भी नहीं हिचकता। यदि उसे भगवान का मंदिर माना जा सके और संयम एवं पुण्य द्वारा उसकी अभ्यर्थना की जा सके तो यह शरीर न केवल स्वस्थ समर्थ रहता है, पर पुण्य यश और वैभव कमाते हुए लोक परलोक को सब प्रकार सुसम्पन्न बनाता है। छोटी दृष्टि शरीर या घर-परिवार का ही सब कुछ मानती है और उसी छोटे परिवार के लिए मरती खपती रहती है पर विशाल दृष्टिकोण के लिए सब अपने होते है। मनुष्य ही नहीं अन्यान्य प्राणी भी प्रकृति के सभी पक्ष और घटक भी इस अपनेपन के दायरे में आ जाते है। तब दूसरों का दुख बंटाने और अपना सुख बाँटने की आकाँक्षा सहज उठती है। आत्मीयता के चरितार्थ होने का यही एक मात्र आधार भर है।
सम्यक्-दृष्टि परिणाम को देखने, परखने के उपरान्त कार्य आरम्भ करती है। वर्तमान को सुखद सम्भावनाओं के लिए आरंभ करती है। वर्तमान को सुखद संभावनाओं के लिए न्यौछावर भी कर सकती है। वृक्ष बनने के लिए बीज को अपना वर्तमान स्वरूप गलाना पड़ता है। विज्ञजन भी आज की सुविधाओँ की इसलिए उपेक्षा करते है कि उज्ज्वल भविष्य का दिग्दर्शन हो सके। अदूरदर्शी .... वर्तमान की सुविधा देखते हैं और उसके लिए आतुर होकर भविष्य को अन्धकारमय बनाते है।
प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ. क्रोनिन बड़े गरीब थे। डॉक्टर बनकर वे धनवान हो गये। किन्तु उनका मन पैसे में पड़ गया। उनकी पत्नी ने कहा-”हम गरीब ही ठीक थे कम से कम दिल में दया तो थी। वे उसे खोकर कंगाल हो गये”। डॉक्टर क्रोनिन राह पर आ गये। सच है धनी धन से नहीं होते, धनी तो मन से होते हैं। सम्पन्नों के साथ तुलना करते और अपने स्वरूप को स्वल्प मान कर आत्म-हीनता की ग्रन्थियों से ग्रसित होते है, किन्तु जिन्हें सही ढंग से सोचना आता है वे पिछड़ों से अपनी तुलना करते है और सोचते है कि जो उपलब्ध है वह भी इतना अधिक है कि उस पर गर्व किया जा सके और मोद मनाया जा सके।
दृष्टिकोण तुच्छ और निकृष्ट रहने पर अपनी स्थिति नाटकीय जैसी बन जाती है। पर उसमें सुधार होते ही चारों और स्वर्ग बिखरा दिखता है।
जिस धरती पर हम बड़े होते, खेलते-कूदते और मस्ती भरा जीवन बिताते हैं, वह कहाँ से आई? यही बात इसी पीने वाले पानी, जिसके बिना क्षण भर नहीं जी सकते, उस सुखद वायु तथा ठंडक की ठिठुरन से बचाने तथा खाना पकाने में सहायक अग्नि पर लागू होती है यह सब कहाँ से टपक पड़?
इसी तरह से एक स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि सुविस्तीर्ण आकाश कहाँ से आया? हम सभी को इस आकाश-जिसे शल्य भी कहते है, कितना प्यारा और भला लगता है। यदि किसी को एक ऐसे कमरे में बन्द कर दे जहाँ से यह शून्य कहा जाने वाला आकाश न दिखाई दे, कितनी ही साधन-सुविधाएं क्यों न दे, टोकरे मिठाइयाँ भले ही रखे पर वह व्यक्ति घुटने का ही अनुभव करेगा और उसकी एक मात्र इच्छा होगी कि कब आकाश के दर्श करें, ऐसा है वह प्यारा शून्य। रात में तो तारों भरा आकाश और भला लगता है। पूर्णिमा का चाँद होने पर उसका यह सौंदर्य द्विगुणित हो जाता है। ऐसे मनोहारी इस शून्य हमसे दूर हो या पास पर लगता अपने घनिष्ठ आत्मीय-सा है। पहले की तरह ही जिज्ञासा मन को मथने लगती है कि ये सब आखिर आए कहाँ से?
हम सभी पृथ्वी के ऊपर नीले गगन की छाया में हंसते मुस्काते नाना प्रकार के खेल खेलते जीवन बिताते हैं। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि शरीर में अपने आस पास के वातावरण में क्रीड़ा कर रही चीजों में शक्ति ऊर्जा कहाँ से आती है? बच्चों के खिलौने तो चाबी भरने से उछलने कूदने लगते है। हम सभी में चाबी भरने वाला कौन है?
यह सब जिज्ञासाएं नई नहीं है। इन्होंने ही बड़े-बड़े ऋषियों के मानस को, मस्तिष्क सागर को मथा है। इसी मन्थन से ही वह ज्ञानामृत निकला जो वेद उपनिषद् गीता तथा वेदान्त आदि में लबालब भरा है। सर हेनरी सेन अपनी गर्वोक्ति की लम्बी छलाँग-मारते हुए भले ही कितना क्योँ न कहें कि कोई वस्तुतः संसार में अपनी सत्ता नहीं रखती जिसकी मूल ग्रीक में न हो, पर यह गर्वोक्ति थोथी ही है। ग्रीक-दर्शन के बाबा-दादा थेलीज व अनेक्जीमेण्डर ने जब शून्य कहे जाने वाली सुविस्तीर्ण नीली छतरी के नीचे पृथ्वी की गोद में अपनी आंखें भी न खोली थी। उससे भी ए दो नहीं हजारों साल पूर्व उपनिषदों व पूर्वार्त्त-दर्शन ने इन सभी प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत किया था।
दर्शन का प्रारम्भ उपरोक्त जिज्ञासाओं से ही हुआ अर्थात् सब का मूल क्या है? समस्त ऊर्जा-शक्ति का स्रोत क्या है? समस्त जगत में प्रायः सभी लोग पंच तत्वों को अवधारण करते है-पृथ्वी जल, वायु, अग्नि और आकाश प्रचलित विज्ञान में जिन 207 या अधिक तत्वों की चर्चा की जाती है, उन्हें तो पृथ्वी जल और वायु अपने आँचल में समेट लेते है। समस्त ऊर्जाओं पर अग्नि अपना हक जमा देती है और आकाश की व्याख्या न कर पाने के कारण विज्ञान इसे अविज्ञात कहकर अपना पिण्ड छुड़ा लेता है।
उपनिषदों में प्रवाहन जैबालि-आकाश तत्व मूलतः सिद्धान्त प्रतिपादित कर इसी की सुस्पष्ट व्याख्या करता है। जबकि ग्रीक दर्शन घिसटते-घिसटते बहुत देर से इस तक पहुँच पाता है। थैलीज अनेक्सीमैण्डर, हैराक्लाईट्स एम्पीडोक्लीज क्रमशः जल, वायु, पृथ्वी और अग्नि के मूल तत्व होने की बात कहते है, पर अरस्तु के मतानुसार आकाश की चरम तत्व है। इस तक पहुँचने में बहुत अधिक दार्शनिक विकास की आवश्यकता है। जब प्रवाहन जैबालि से पूछा गया कि पदार्थों की चरम गति क्या है? तो उन्होंने उत्तर दिया शून्य (आकाश)- इन समस्त पदार्थों, चारों तत्वों का उद्भव आकाश से ही होता है और अन्त में इसी शून्य में विलय हो जाता है। छांदोग्य उपनिषद् इस तरह आकाश को चरम तत्व मानता है और यह भी स्पष्ट करता है कि आकाश की उत्पत्ति और सबका कारण चिदाकाश या महाशून्य ही है।
बौद्धों के महामना-सम्प्रदाय के माध्यमिक दर्श का शून्य वैदिक दर्शन से ही लिया गया है। नागार्जुन का शून्य और आचार्यशंकर का ब्रह्म एक ही है। ब्रडेले और ग्रीन भी इसे स्वीकारते हैं। प्रख्यात मनीषी डॉ. डी टी सर्ज्रक भारतीय चिंतन को स्वीकारते हुए कहते हैं कि शून्य से जगत की उत्पत्ति हुई। मैक्सिको के डॉन जुआन इस सत्य को स्वीकारने पर बल देते है।
वैदिक ऋषियों की हर तरह चीनी सन्तों ने भी स्वीकारा है कि सम्पूर्ण सृष्टि से ही अभिव्यक्त होती है और इसी में लय हो जाती है।
आधुनिक विज्ञान भी ऋषियों के इस कथन को मान्यता देता है। प्रसिद्ध भौतिकीविद् तथा खगोल शास्त्री फेडहाँयल चिदाकाश से रही आकाश आदि पंच तत्वों के उद्भव की बात मानते है। चिदाकाश को उन्होंने वैज्ञानिक भाषा में “कारिमक डस्ट” की संज्ञा दी है। भौतिक शास्त्री व दार्शनिक प्रो. अर्नेस्ट मार्च ने बताया है थ्क शून्य ही पदार्थ व शक्ति का स्रोत है। अलबर्ट आइन्स्टीन का कहना है थ्क हमें इन सब तत्वों की उत्पत्ति शून्य से ही माननी होगी।
चीनी चिन्तक कुआन त्यू भारतीय तत्व चिन्तन की ही तरह बताते है कि परम सत्ता ताओ निराकार और शून्य है- इसी से सबका उद्भव हुआ। लोओं त्यू इसी शून्यता को बताने के लिए अनेक अलंकार लगाते हुए परमतत्व को कभी महाशून्य बताते है कभी अनन्त शून्य। इस शून्यता के बारे में पूर्वी संतों ने कहा कि यह सामान्य शून्यता नहीं है। यह वह महाशून्यता है जिससे शून्य पृथ्वी आदि तत्वों का विकास हुआ। पूर्वी संतों की इस बात को सब एटामिक ऑफ क्वाँटम् फील्ड के वैज्ञानिक एक मत से स्वीकारते हुए निष्कर्ष देते हैं कि ऐसे ही किसी मूलस्रोत से विभिन्नता की उत्पत्ति हुई।
भारतीय तत्वविद यह मानते हैं कि यह महाशून्य ही समस्त शक्तियों व विविध ऊर्जाओं का अक्षय स्रोत है। चीन तत्वशास्त्री चाँगत्साई का भी यही मानना है कि माहशून्य ही चाई (ऊर्जा) का स्रोत है। शून्य आदि विविध तत्व इसी की शक्ति से चल रहे है - गतिमान। शून्य का लय इसी महाशून्य में हो जाता है।
यह ऊर्जा वह शक्ति है जो हमारे शरीर को चलाती है इसी से दुनिया भर के कार्य व्यवहार होते है। वैज्ञानिकों की भाषा में इसके विविध स्वरूप गति ऊर्जा, तापीय ऊर्जा, गुरुत्वीय ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा आदि है। एक ऊर्जा दूसरे प्रकार की ऊर्जा में रूपांतरित होती रहती है पर विनष्ट नहीं होती। यह एक शाश्वत सिद्धान्त है।
विज्ञान जगत में आइन्स्टीन के सापेक्षिता सिद्धान्त के प्रवेश करने से यह स्पष्ट भी हो गया है, द्रव्यमान (पदार्थ भी ऊर्जा का स्वरूप है, अर्थात् ऊर्जा के केवल वे स्वरूप नहीं है जिन्हें शास्त्रीय भौतिकी मानती थी। पदार्थ में भी ऊर्जा निहित है थोड़ी नहीं बहुत-उसका विश्व प्रसिद्ध समीकरण श्व = रुष्ट यह सिद्ध कर देता है। अतएव पदार्थ भी विनष्ट नहीं होता अपितु रूप बदलता रहता है।
भारतीय दर्शन भी-नष्ट होने की बात नहीं करता अपितु यही कहता है कि इस बहुरूपिय संसार में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है और बात में सभी परमतत्व में लय हो जाएगा।
आज कल ऊर्जा के विविध स्रोतों के ढूंढ़े खोज की होड़ लगी है। इस खोज बनी में ऐसे तथ्य प्रकाश में आ रहे है जिनसे वैदिक ऋषियों की बातों की वैज्ञानिक पुष्टि होती है।
भारतीय चिंतन में सर्वत्र शक्ति की व्यापकता बताई गयी है। भौतिकीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, आदि न जाने कहाँ कहाँ से ऊर्जा पाने के तरीके ढूंढ़ निकाले जा रहे है। पृथ्वी, जल, वायु अग्नि के व्यापक उपयोग, उपभोग के बाद भी शून्य ही सबका कारण है एवं ऊर्जा का भण्डार भी होगा ऐसी कल्पना भी पूर्व काल के वैज्ञानिकों को न थी पर आधुनिक वैज्ञानिक आकाश को असंख्य ऊर्जा से भरा पूरा मानने लगे हैं। उनके अनुसार इसमें असंख्य अंतरिक्ष कणों-न्यूट्रिनों की बरसात होती रहती है। आकाश में तारों का विस्फोट होता रहता है और व सुपर नोवा बनकर एक ज्योति पुँज के रूप में बिखर जाता है। यह बिखरना ऐसे ही न्यूट्रिनों कहे जाने वाले कणों में होता है। यह ऐसे सूक्ष्म कण है जो परमाणु के बीच से पार होकर आधुनिकतम यंत्रों से सम्पन्न प्रयोगशाला के मालिक इन वैज्ञानिक को अँगूठा दिखाते, चिढ़ाते हुए अनन्त में लीन हो जाते है। अतएव अब हार मान कर वैज्ञानिकों ने शक्ति की व्यापकता तथा महाशून्य में विलय होने की बात स्वीकार कर ली है।
अब वो शून्य के ऊर्जा से भरे पूरे होने की बात व्यावहारिक व प्रायोगिक स्तर पर परमाणु ऊर्जा विभाग में कार्यरत एक वैज्ञानिक (परम हंस तिवारी) ने सिद्ध कर भारतीय तत्वविदों की महानता को संसार के पलट कर पूरी तरह सिद्ध कर सभी मूर्धन्य विद्वानों का चमत्कृत कर दिया है।
यह तो ऊर्जा को सर्वव्यापकता की बात हुई है पर यह ऊर्जा तो गिरगिट की तरह पल पल में रंग बदलती है। इसका हम अपने जीवन में समुचित उपयोग तो करे, पर इसी को सत्य मानकर विविध ऊर्जाओं द्वारा चालित दृश्यों में उलझकर पागलों की तरह ठगे से न रहे। इस तरह सत्य से मुख न मोड़ने, जीवन लक्ष्य को न भूलने का सन्देश ऋषि मनीषी देते है।
संसार के इस बहुरूपिएपन के कारण ही भगवान बुद्ध ने कहा था कि संसार में दिखाई देने सब कुछ नित्य परिवर्तनशील होने के कारण अनित्य है। अतएव इसमें न उलझकर सत्य को पाने की कोशिश करो। इसी की डॉ. डीटी सजुकी ने अपनी पुस्तक “द एजेन्स ऑफ बुद्धिज्म” में और अधिक स्पष्ट करते हुए बताया है-ऋषियों की तरह बौद्ध भी पदार्थ की अनित्यता, नित्य परिवर्तनशीलता को मानते है और निरपेक्ष सत्ता को पाने में विश्वास रखते हैं। इसका समर्थन भौतिकविद् मैक्सवेल भी करते है।
विविध ऊर्जा शक्तियों के भुलावे की इस गुत्थी को भारतीय तत्वदर्शन सार समझी जाने वाली गीता सुलझाती हुई बताती है कि समणमाम् और वासुदेवः सर्वमित् के इस संसार में दो प्रकार की ऊर्जा शक्तियाँ खेलकर रही है। एक है “अपरा” जिसमें जड़ पदार्थों के परमाणु हलचल करते और नए-नए पदार्थ बनते-बिगड़ते रहे है। नित्य नवीन चीजों का निर्माण होता और मिटता है। दूसरी है “परा” जो जीव अर्थात् प्राणि-वनस्पतियों के चेतन कहे जाने वालों को बनाती और जन्म धारण करती है। इस प्रकार गीता नवीन साँख्य सिद्धान्त का सुन्दर ढंग से प्रस्तुतीकरण करती है। यह अपरा हो या परा-जड़ हो या चेतन-दोनों को “यंत्र रुढानि” घुमाने वाला समस्त ऊर्जा शक्तियों का स्वामी परब्रह्म परमेश्वर है। इसी कारण उस सर्वशक्तिमान भी कहा गया है। इसे महाशून्य कहा जाए या ब्रह्म। ताओ कहा जाए या कुछ और पर शाश्वत सत्य है यह एक। सबको स्पष्ट करते हुए गीताकार मत एवं अर्थात् यह सब मुझ परमेश्वर से अभिव्यक्त हुआ है और चतुर्दिक ऊर्जा शक्ति के जो विविध खेल दिखाई पड़ रहे है, इन खेलों में भागीदार कहे जाने वाले में, बलवानों में बल बलवातास्मि अर्थात् बल शक्ति ऊर्जा कुछ भी कहा- हूँ मैं ही। बाद में इसी को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यह सब लुभावना कितना ही लगे- पर है अनित्य अहकृतस्नस्य जगत-प्रभवं प्रलसस्तया”- मेरे से ही पैदा हुआ है, मुझमें स्थित है और मुझमें ही लय हो जायेगा। जादूगर का जादू चाहे जितना अच्छा लगे, लुभावना, आकर्षक हो, पर सत्य नहीं है। सत्य तो एक मात्र जादूगर है न कि उसका विविध प्रकारों वाला जादू। उसी प्रकार सत्य-नित्य शाश्वत तो परमेश्वर ही है, न कि रंग बिरंगे सृष्टि के खेल।
विभिन्न ऊर्जा शक्तियों की उपयोगिता तो है आवश्यकता भी है। वैदिक ऋषि भी इसे नकारते नहीं है। वे तो “तेन त्येक्तेन भुज्जीया” की बात कहते हुए स्पष्ट करते हैं कि जीव निर्वाह के लिए इन शक्ति साधनों का सदुपयोग करो, पर जीवन के उद्देश्य में मत फंसो। ये साधन तो है पर साध्य नहीं।
साध्य, उद्देश्य तो अपने स्वरूप को जानना, उस मूक सत्ता को पाना है जो विविध ऊर्जाओं-शक्तियों का आदि स्रोत है। मात्र पाना ही नहीं सर्व शक्तिमान जो चिदाकाश या महाशून्य है से एकीकृत होकर सत चित्त, आनन्द की त्रिवेणी में अवगाहन करना है। जीवन का यथार्थ आनन्द वास्तविक सुख इसी स्थिति में है। इसी कारण गीता-व्यक्त करती है “ये लब्ध्वा-चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत्” अर्थात् इसको पाकर किसी को पाना शेष नहीं रहता, किसी ढूंढ़ खोज की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसको पा सकना प्रत्येक के लिए साधनात्मक अनुशासन को स्वीकार कर नहीं सुनिश्चित भी है।
दिन के प्रकाश का विलुप्त होने और रात्रि को अंधकार के आगमन की घड़ी का आ धमकना सामान्यतः घाटे का सौदा प्रतीत होता है, किन्तु इसके साथ ही सूर्य के कान्ति हीन होने, उसके विश्राम करने और पुनः नयी ज्योत्सना साथ उदय होने की आशा भी रहती है। काल निशा में विश्राम करने के लिए जीव पुराने शरीर का परित्याग कर जाता है। यह प्रयाण काल ही मौत के नाम से जाना जाता है। सृष्टि सुव्यवस्था के संचालन की विभिन्न क्रियाओं में जन्म और मृत्यु का यह परिवर्तन चक्र एक सहज स्वाभाविक एवं अनिवार्य प्रक्रिया है। उससे बच सकना किसी भी प्राणी के लिए संभव नहीं।
थकान के बाद हरी नींद आने नींद पूरी होने के बाद जाग पड़ने की तरह मरने और पुनः जन्म लेने की क्या सम्भावना नहीं? कार्योपरान्त थकान मिटाने के लिए विश्राम आवश्यक है। यह न केवल मनुष्य, वरन् समस्त जीवों के लिए अनिवार्य है। प्रकृति चक्र में भी विश्राम की यह प्रक्रिया किसी न किसी रूप में चलती रहती है। दिन भर की थकान के बाद रात्रि को विश्राम किया जाता है। विश्राम की क्रिया शक्तिसंचय की सृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। इसी के आधार पर दूसरे दिन नये उल्लास के साथ कार्य किये जाते है।
दिन भर कार्य करने वाले मजदूर रात को विश्राम करते है, पशु-पक्षी भी अपने घोंसले में सोते है। पुराणों की आख्यायिकाओं के अनुसार सूर्य भी रात्रि की गोद में विश्राम करने जाता है। जीव भी अपनी यात्रा पथ में विश्राम करता है। वह मृत्यु शैया में अपने विगत श्रम से मुक्ति पाता है तथा पुनः नये जीवन में प्रवेश करता है। जीव की यात्रा इसी क्रम से अपने कर्मानुसार अनन्त जीवन की ओर चलती रहती है। अतः मृत्यु भी उसके प्रगति-क्रम की एक अनिवार्य सीढ़ी कही जा सकती है। अविनाशी जीवात्मा अपनी यात्रा को मौत रूपी स्टेशनों पर ठहरती हुई पूर्ण करती है, अपने गन्तव्य लक्ष्य तक पहुँचती है। जन्म और मृत्यु का यह गति चक्र न होता तो शायद ही जीवात्मा यात्रा सफल हो पाती।
मोहासिक्त व्यक्ति को ही मृत्यु से डर लगता है। देख भी जाता है कि लोग मौत का नाम सुनते ही काँपने लगते हैं। इसे अशुभ मानते हैं। किसी सगे सम्बन्धी की होने पर रोते चिल्लाते हैं। स्वयं भी मौत के डर से चिन्तित रहते हैं। जबकि मरण की सुनिश्चितता को जानते हुए भी डरना केवल अविवेक ही कहा जा सकता है।
यात्रा पर निकलने के लिए घर के सदस्यों को त्यागना पड़ता है। उनके मोह को त्यागे बिना यात्रा निकल कर नये व्यक्तियों से परिचय का, नये स्थानों को देखने का आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा नये जीवन का आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा नये जीवन का आनन्द प्राप्त करने की सुख .... आकर्षित करती है। वह जीर्ण आवास से मुक्ति पाक नवजीवन प्राप्त करता है। यही स्थिति मृत्यु है।
पुराना कपड़ा उतारना, पुराना घर छोड़ना और नया धारण करना कितना सुखद और आनंददायक प्रतीत है। सुख और आनन्द लिए प्रयास किया जाना संभव स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। पुराने जीवन को .... जराजीर्ण शरीर को प्रत्यावर्तित कर नव जीवन में .... करने की प्रक्रिया भी इसी तरह सुख है। यह दुखद होती। इसे जीवन यात्रा की अनिवार्य, अत्यन्त उप लाभप्रद तथा आनन्ददायक प्रक्रिया कहा जा सकता है।
अन्धेरे में प्रवेश करते समय भय लगता है रात्रि अंधकार में घर से बाहर जाने पर भी डर लगता अपरिचित व्यक्ति से बातचीत करने में हिचक महसूस होती है। नये स्थान में जाने से पूर्व भय के कारण ही बार उसके सम्बन्ध में विचार किया जाता है, उसका जाना जा जाता है। मौत के वास्तविक स्वरूप की जानकारी अभाव में ही उससे भय लगता है, अन्याय उसे हर्षोल्लास के साथ वरण किया जाता।
कार्य की सफलता में उसकी तैयारी आवश्यक है। इसके लिए कर्ता को अपनी योग्यता क्षमता का अभिवर्धन करना पड़ता है। पूर्व तैयारी के बिन श्रम एवं समय निरर्थक ही नहीं होते, वरन् लक्ष्य की पूर्णता भी संदिग्ध बनी रहती है। लक्ष्य पूर्ति के लिए उपलब्ध अवधि में योजनाबद्ध रूप से तैयारी न कर पाना ही भय क कारण होता है। परीक्षा की तैयारी के लिए लगन के साथ अध्ययन किया जाता है। अध्ययनशील विद्यार्थी को उत्तीर्ण होने की सुखद कल्पना उल्लासित करती रहती है। वह परीक्षा के क्षणों की प्रतीक्षा करता है, किन्तु इसके विपरीत तैयारी न करने वाले के लिए परीक्षा हौवा बन जाती है। उसे परीक्षा नाम से भय लगाता है।
मनुष्य जीवन के साथ जुड़े हुए कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को जीवन काल में ही पूर्ण कर लिया जाए उनके प्रति लापरवाही न बरती जाए, तो ऐसे कर्मनिष्ठ व्यक्ति को मृत्यु का भय क्यों हो? तब महात्मा गाँधी, भगत सिंह, आजाद की तरह हंसते हुए मौत का वरण किया जा सकता है। विवेकानन्द, रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस की तरह मृत्यु को सुखद बनाया जा सकता है। जो भगवान के दरबार में न्याय की परीक्षा के लिए, जीवन कर्मों का विवरण प्रस्तुत करने के लिए, आत्मा-परमात्मा के प्रिय मिलन के लिए सदैव उद्यत रहते है, उन्हें भय किस बात का? डरता तो वह है जो अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही बरतता-उदासीन रहता और कुकर्मों में निरत रहते हुए जीवन को यों ही निरर्थक गंवा देता है।
मौत के इस उज्ज्वल पक्ष के दर्शन की जानकारी प्राप्त कर इसकी तैयारी में जुट पड़ना ही जीवन की सार्थकता है। इसके लिए कितने समय में कितना काम निपटाना है। क्या करना और किन उपायों को अपनाना है। यह सब योजनाबद्ध रूप से ही हो सकता है। हम जीवन की अवधि 75 वर्ष माने और बचपन 15 वर्ष का समझ, तो कार्य करने के लिए 60 वर्ष ही बचते हैं। यह मनुष्य की इच्छा पर निर्भर है कि ऐसे ही निरर्थक कामों में उसे व्यतीत कर दे या ऐसा कुछ करें जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की उपलब्धि हो सके। पर यह हो तभी सकता है जब निश्चित समय में निश्चित कार्य निपटा लेने का स्मरण रहे। मृत्यु तो अनिवार्य है, उसे याद रखना एक प्राकृतिक चेतावनी अपनाना है, जिसका अर्थ होता है-जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग समय रहते कर लिया जाए।
किन्तु जितने लोग है जो ऐसा सोचते और करते है बहुधा लोग मृत्यु से बचने की कपोल कल्पना में ही खोये रहते है अथवा उसे विस्तृत कर देते है, मानों उसे कभी मरना ही न पड़ेगा। मौत को गर्व के साथ वरण करने वाले कुछ ही लोग होते है। इनमें से व्यक्ति सम्मिलित होते है जो अपने आप के प्रति पूर्ण आश्वस्त होते हैं। सृष्टा के विश्व उद्यान को सुन्दर और समुन्नत बनाने के कार्य को निष्ठा के साथ करने वाला व्यक्ति ईश्वर के न्यायालय में अपने सुकृत्यों का विवरण प्रस्तुत करने को उत्साहित रहता है। रणक्षेत्र में विजयी सेनापति विजय पताका लहराता हुआ अपने राजा के पास हर्षोल्लास उपस्थित होता है। उसे अपनी विजय पर गर्व होता है। इसके विपरीत युद्ध क्षेत्र से भागने वाला पराजित सिपाही राजा के सामने उपस्थित
मृत्यु उतनी भयावह नहीं जितना कि लोगों ने इसे समझा है। मृत्यु से डरने की अपेक्षा इसकी सुनियोजित तैयारी करने की आवश्यकता है। इस सत्य को समझकर जीवन व्यवहार में परिष्कार-परिमार्जन प्रारम्भ कर दिया जाए तो कोई कारण नहीं कि मृत्यु का भय बना रहे। अपने चरित्र का आधार लेकर सत्कर्मों में संलग्न व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करता रहे। यही जीवन यात्रा का सच्चा मार्ग है। कर्तव्य परायणता में ही वास्तविक सुख और शान्ति सन्निहित है। इन्हें पालन कर मौत से तो नहीं पर उसे भय से निश्चय ही बचा जा सकता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य भावनाओं का एक पुँज है तथा भावनाओं की पूर्ति के लिए एक पंच भौतिक पुतला रचा गया है। यह शरीर है। शरीर भावनाओं की पूर्ति के लिए है न कि भावनाएं शरीर की पूर्ति के लिये।
जिस प्रकार बुद्धिवादी भौतिक विचारधारा के अनुसार जीवन का उद्भव कुछ रसायनों के सम्मिश्रण से हो गया, उसी प्रकार भारतीय दर्शन की मान्यता है कि जीवन का उदय परब्रह्म की उस भावना से हुआ, जिसमें उसने एक से अनेक होने की इच्छा की। वैदिक मान्यता के अनुसार अनादि ब्रह्म को जब अकेलापन अखरने लगा तो उसके मन में संकल्प उठा “एकोऽहं बहुस्यामि” तथा वह एक से अनेक में विभक्त हो गया। इस प्रकार जीव तथा मनुष्य का उद्भव भावना से हुआ।
इसीलिए मनुष्य भावना से उद्भूत भावनाओं का एक पुतला है। इस भावनाओं ने स्वयं को विचारों तथा पंचभौतिक शरीर के रूप में प्रकट किया है। शरीर भावनाओं की अभिव्यक्ति है-मनुष्य का मूल रूप नहीं।
इसे समझने के लिए मानवी सत्ता की तुलना समुद्र में तैरने वाले आइस–वर्ग से की जा सकती है। इसका 1/9 भाग ही जल के ऊपर तैरता दिखता है, शेष 8/9 भाग पानी के अन्दर होता है। यदि आइस वर्ग का अदृश्य भाग सम्पूर्ण मानवीय सत्ता है तो दृश्य भाग को इसकी काया माना जा सकता है। आज के विज्ञान ने मनुष्य को सिर्फ शरीर मानकर वैसी ही मूर्खता की है, जैसी दस नाविक ने जिसने हिमखंड को छोटा समझकर उसके गोचर भाग को ही उसका वास्तविक स्वरूप मान कर उसमें अपना जहाज भिड़ाया था।
चिकित्साशास्त्र मनुष्य को रसायन मानकर रोगों का कारण व निवारण रसायनों में खोज रहा है। इस प्रयोजन में जो उसके हाथ लगा, वह सर्वविदित है। हाई ब्लड प्रेशर पर जितनी शोध हो रही है, उतना ही वह बढ़ाता जा रहा है। शरीर का कोना-कोना छान मारने पर भी कैंसर का कारण ज्ञात नहीं हुआ। कारण वहाँ हो तो मिले। वह तो पानी के नीचे छिपे हिमखंडों के अदृश्य भाग में है, अब तथ्य सिद्ध होता जा रहा है। देखा जाता है कि अधिकाँश शरीर की व्याधि एक ऐसी भावनात्मक विकृति का बाहरी लक्षण है जो मनुष्य के गहन अन्तराल में होती है पर दीखता वह नहीं। गलती हम यह कर बैठते है कि जो दृश्यमान रोगग्रस्त भाग है, उसे ही सब कुछ मानकर उपचार उसी का करने लगते है, और जो सूत्रधार बना बैठा पूरे तंत्र का संचालन कर रहा होता है, उस अदृश्य व मुख्य कारण पक्ष की उपेक्षा कर बैठते है, फलतः चिकित्सा प्रयास के बावजूद निराशा ही हाथ लगती है। जब तक कारण के मूल तक नहीं पहुँचा जा सकेगा सफलता की आशा दुराशा मात्र ही रह जायेगी। विकृत भावनाएं कस प्रकार कायिक रोग का स्वरूप ग्रहण करती है। इसका अच्छा उदाहरण उस अमेरिकी महिला का है जो खुजली से बुरी तरह परेशान थी। यह खुजली उसे तभी उठती जब वे प्रार्थना करने गिरजाघर जाया करती। अनेकानेक उपचार करवाने पर खुजली ठीक न हो सकी। अंत में वह अमेरिका के प्रख्यात मनःशास्त्री नॉरमन विसेण्ट पिल के पास पहुँची और सारा हाल कह सुनाया। वहाँ विगत जीवन की कुरेदबीन से ज्ञान हुआ कि वह जिस फर्म में नौकरी करती थी, वहाँ से प्रायः कुछ पैसे चुरा लिया करती और अपना अर्थाभाव पूरा करती थी। कुशल विशेषज्ञ ने तुरन्त भाप लिया कि निश्चय ही रोग का कारण इसी चोरी में कहीं छिपा है। उसने महिला को सलाह दी कि वह इस चोरी को अपने मालिक के समक्ष प्रगट कर क्षमा याचना माँग ले और यह भी आश्वस्त करे कि वह आगे ऐसी गलती नहीं करेगी। महिला ने ऐसा ही किया और देखते ही देखते उसका मर्ज समाप्त हो गया।
इस प्रकार दिन प्रतिदिन यह तथ्य अब और सुस्पष्ट होता जा रहा है कि भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए ही शरीर तंत्र की व्यवस्था सृष्टा ने की है। भावनाएं जिस स्तर की होती है, उसका प्रभाव परिमाण भी काया में उसी स्तर का दृष्टिगोचर होता है। स्वच्छ भावनाओं से शरीर सदा स्वस्थ बना रहता है। जबकि रुग्ण अंतःकरण अनेकानेक बीमारियों का निमित्त कारण बनता है। इन दिनों इसके प्रमाण उदाहरण सर्वत्र देखे जा सकते है। क्या ग्रामीण, क्या शहरी, क्या अमीर, क्या गरीब आज सभी स्वास्थ्य की समस्या से परेशान है। आये दिन हट्टे-कट्टे लोग हार्ट अटैक या कैंसर से मरते देखे जाते हैं और यह सब तब हो रहा है जब हर व्यक्ति पिछले दिनों की अपेक्षा स्वास्थ्य के प्रति कहीं ज्यादा जागरूक है। पोषण के सिद्धान्त स्कूलों कॉलेजों में तथा रेडियो टेलीविजन द्वारा जन जन तक पहुँचते जा रहे है। जितनी मेडिकल रिसर्च आज हो रही है, शायद इतनी पहले कभी न हुई हो। अस्पतालों, डॉक्टरों व स्पेसरियों की संख्या उसी तरह बढ़ रही है, जैसे कैंसर का फोड़ा और उसे साथ साथ बढ़ रहे है रोग “सुरसा के मुँह” की तरह। कारण यही है कि आज के विज्ञान की मूलभूत मान्यताएं ही गलत है।
मनुष्य शरीर नहीं है तथा रोग का कारण बाह्य परिस्थितियों में विद्यमान नहीं है। इस तथ्य को स्वीकारने पर ही स्वास्थ्य संकट समेट अन्यान्य समस्याओं का सही समाधान हस्तगत होने की आशा की जा सकती है। पिछले दिनों के शोध निष्कर्ष से भी इसकी पुष्टि हुई है।
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में शोध के दौरान पाया गया कि जीवकोश अपने वातावरण में उपलब्ध रसायनों का उपयोग भर कात है। इनसे उसके अंतरंग में चलने वाली मूलभूत प्रक्रियाएं बदलती नहीं और न किसी प्रकार से प्रभावित ही होती है। मनुष्यों तथा जानवरों में बुढ़ापे की प्रक्रिया (एजिंग प्रोसेज) का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों को कुछ ऐसे ही प्रमाण मिले है। इसाडोर रॉसमैंन द्वारा संपादित “विलनिकल जिरिएट्रिक्ट” पुस्तक में बुढ़ापे की मूलभूत प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए डॉ. राल्फ गोल्डमैंन ने लिखा है “बुढ़ापा एक ऐसी प्रक्रिया है जो कोश के अन्दर से ही उपजती है। बाह्य वातावरण (रसायनों आदि) में उसका कारण विद्यमान नहीं है।”
कोशीय बुढ़ापे (सेल्युलर एजिंग) पर की गई आधुनिकतम शोधों में कोशों को रासायनिक दृष्टि से उत्तमोत्तम कल्चर माध्यमों में रखकर देखा गया। यह पाया गया कि कोश के बुढ़ापे को किसी भी पोषक या रासायनिक तत्व से रोका नहीं जा सकता। सब प्रकार के अनुकूल माध्यमों (कल्चर मीडिया) में भी कोशीय बुढ़ापे की दरी नहीं रही।
इस प्रकार सिद्ध हो गया कि दवाएं या रसायन मनुष्य बूढ़ा होने से नहीं रोक सकते। यदि मनुष्य मात्र रसायनों पर आधारित न होता। बुढ़ापे के समान ही कोशों की अन्य मूलभूत प्रक्रियाओं ने भी बाह्य रसायनों से अप्रभावित माना गया है।
जीवकोश का विभाजित होकर 1 से 2 में परिवर्तन हो जाना भी एक मूलभूत कोशीय प्रक्रिया है तथा इसका कैंसर से विशेष सम्बन्ध है कोश 1 से 2 में क्यों और कब परिवर्तित होते है, इसके नवीनतम ज्ञात नियम को “दि कन्सेण्ट ऑफ क्रिटिकल सेल मास” कहा जाता है “दि फिजियोलाजिकल बेसिस ऑफ मेडीकल प्रैक्टिस” ग्रन्थ में इस संदर्भ में विस्तृत प्रकाश डाला गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक कोश विभाजन उसे अन्तरण से सम्बन्ध रखता है। कोश को एक से दो होने की प्रेरणा बाहर से नहीं आती। वह कोश के अन्दर से ही उपजती है। जब कोश का भार किसी निश्चित भार से अधिक हो जाता है तो वह दो में विभक्त हो जाता है। कोश को विभाजित होना चाहिए ऐसी कोई सूचना बाहर से नहीं आती। यह प्रक्रिया उस वैदिक मान्यता से बिल्कुल मेल खाती है, जिसमें कहा गया है कि जीव का उद्भव एक अन्तः स्फुरणा से हुआ।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य मात्र रसायनों का समुच्चय ही नहीं वरन् भावनाओं का पिटारा भी है। जिसमें भावनाएं प्रधान और रसायन गौण है। यदि ऐसा नहीं रहा होता, शरीर मात्र रसायनों पर आधारित होता, तो अभीष्ट रसायन के उपयुक्त परिणाम में इकट्ठा होने पर जीवकोशों का विभाजन आरंभ हो जाना चाहिए पर प्रयोगों के दौरान ऐसा कुछ होता नहीं देखा गया। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि अंतः प्रेरणा ही वह आधारभूत कारण है जो कोशों को विभाजन, अभिवर्धन, परिवर्तन को नियंत्रित करता है। तात्पर्य यह है कि जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत शरीर में जो अनेकानेक परिवर्तन परिलक्षित होते है, उसमें अंतः प्रेरणा भावना का महत्वपूर्ण हाथ होता है।
इस तथ्य पर वर्तमान युग की अभिनव-चिकित्सा विधा “सजेस्टोलाँजी” द्वारा और अधिक प्रकाश पड़ता है। इससे यह सहज ही जाना जा सकता है। कि भावना शरीर को किस हद तक प्रभावित करती है। चूँकि यह पद्धति भाव प्रधान है।, अतः सीधे भाव क्षेत्र को प्रभावित करती है। इसी कारण ऑटोसजेशन और हेट्रोसजेशन से होने वाले स्वास्थ्य लाभ चमत्कारिक स्तर के देखे जाते हैं, क्योँकि इसकी पहुँच रोग की जड़ विकृत भावना तक होती है। इस प्रणाली द्वारा कैंसर तक को ऑटोसजेशन से ठीक करने का दावा किया गया है। सजेशन से होने वाले अप्रत्याशित व चमत्कारी लाभों को देखकर बड़े-बड़ों ने दाँतों तले अंगुली दबा ली है। यह तो सभी मानते है। कि मनः संस्थान शरीर को प्रभावित करता है पर इन उदाहरणों ने शरीर तथा मन के बीच नौकर और मालिक जैसा रिश्ता स्थापित कर दिया है।
ठीक से देखा जाए तो यह कोई चमत्कार या आश्चर्य नहीं है। जिन भावनाओं पर शरीर आधारित है इन्हीं की विकृति से यह रोगी हुआ था, तथा विकृति के निवारण से स्वस्थ हो जाए, तो यह नितान्त स्वाभाविक ही है। सच तो यह है कि भावनात्मक विकृति सही हुए बिना रोग स्थायी रूप से सही हो ही नहीं सकता।
रसायनों द्वारा की गई चिकित्सा कुछ समय के लिए ऊपरी लीपा पोती तो कर सकती है, पर ये बिचारे जड़ रसायन भावनाओं में घुसी रोग की उस सूक्ष्म जड़ तक कैसे पहुँचे जब तक रोग स्रोत रूप में शरीर में विद्यमान रहेगा, तब तक वह इस रासायनिक लीपा पोती को फोड़कर किसी न किसी व्याधि के रूप प्रगट होता ही रहेगा। इसके विपरीत यदि रोगी की भावनाएं स्वस्थ हो जाये तो शरीर का स्वस्थ होना अथवा रोग का निराकरण होना अवश्यंभावी हो जायेगा।
“साईकोसोमेटिक” रोगों का भी रसायनों के आधार पर उत्तर देना असम्भव है तथा इस रोगों का साइकोथैरेपी (मनःचिकित्सा) के आधार पर जिसमें कोई रसायन नहीं खिलाए जाते, ठीक हो जाना भी एक ऐसा प्रश्न है जो रसायनों की थ्योरी से मेल नहीं खाता।
सबसे बड़ा प्रश्न वहाँ उठाता है जहाँ पैरासाइकोलॉजी की बात चलती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का होना वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर सिद्ध किया जा चुका है कि साइफेनोमेना किसी भी भौतिक, रासायनिक आधार पर वहीं समझाई जा सकती है। एक शीशी में रखा हुआ रसायन का डेला (या एक खोपड़ी में बन्द रसायनों का पु मस्तिष्क) यह कैसे जान लेगा कि दूसरी खोपड़ी में रखा, दूसरा व्यक्ति क्या सोच रहा है?
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इस सब जंजालों से बचने के लिए यह मान ला है कि मनुष्य में शरीर सुविधा के लिये एक मानसिक शक्ति या क्षमता भी ....
करती है पर इसका उद्भव रसायनों के शरीर से .... हुआ? इस प्रश्न के उत्तर में वह मौन है?
कुछ भी हो यह अवश्य है कि शरीर रसायनों से बना है। इसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अन्न, जल वस्त्र जैसे माध्यमों की जरूरत होती है, यह भी सही है किन्तु यह गलत है कि रसायन ही मनुष्य शरीर को बना चलाती है और वे ही उसके मनःसंस्थान को प्रभावित कर सोचने तथा करने के लिए प्रेरित करती है। मनुष्य के साथ रसायनें लिपटी तो हैं, पर वे उसकी स्वामिनी नहीं है आत्म चेतना ही वह शक्ति है जो मानवी मस्तिष्क और शरीर की अधिष्ठात्री है। उसके सन्मार्ग, कुमार्ग का चयन करने पर जीवन की प्रगति एवं दुर्गति होती रहती है।
शरीर और मन के बीच स्वस्थता और रुग्णता का अन्योन्याश्रित संबंध है। शरीर रोगी हो तो मन में उदासी, हैरानी, शिथिलता निश्चय ही दिखाई पड़ेगी। फिर भी अधिक सच्चाई यह है कि मन के रोगी होने पर शरीर स्वच्छ नहीं रह सकता। यह आँशिक सत्य है कि आहार विहार का शरीर पर असर पड़ता है। अच्छी खुराक और अच्छा रहन-सहन शरीर को मजबूत बनाता तो है, किन्तु स्वस्थता पूरी तरह इतने पर ही निर्भर नहीं है। खिन्न, क्रुद्ध निराश प्रकृति के विकारग्रस्त मनुष्य अच्छा खान पान खाकर भी निरोग नहीं रह सकते।
पेट के माध्यम से रक्त माँस बनता है। हृदय को ठीक होने .... पर नाड़ी समूह मजबूत रहता है, किन्तु स्मरण रखने .... तथ्य यह है कि मस्तिष्क का सारे शरीर पर नियंत्रण होता है। मनोविकारों से ग्रसित व्यक्ति छोटे बड़े रोग का आकार होकर मरणासन्न स्थिति तक जा पहुँचता है।
शरीर के महत्वपूर्ण अवयव चिन्ता और भय के शिकार होकर गलने लगते हैं। क्षय को फेफड़ों की बीमारी माना जाता है किन्तु वास्तविकता यह है कि यह अधिकतर चिन्ताग्रस्त लोगों को होता है। जिनके फेफड़े मजबूत हैं उनके श्वास तंत्र में कोई खराबी नहीं है वे भी चिन्तातुर रहने पर क्षय रोग के अनायास ही शिकार हो जाते।
परीक्षा के दिनों जिन्हें फेल होने का भय रहता है, उन्हें अकारण ही उन दिनों ज्वर-पेचिश आदि आ घेरते है उन्हें व्यापार में घाटा होने मुकदमा हार जाने, शत्रुओं द्वारा आक्रमण किये जाने की चिन्ता घेरे रहती है, उन्हें अपच,अनिद्रा का शिकायत रहती है। क्रोधी, ईर्ष्यालु, आवेशग्रस्त लोगों को रक्तचाप और हृदय की धड़कन का शिकार बनना पड़ता है। लकवा का आक्रमण आमतौर से क्षयग्रस्त लोगों को होता है।
रोगों की संख्या इन दिनों निरंतर बढ़ती जा रही है। आश्चर्य इस बात का है कि जिन्हें अच्छी खुराक मिलती है। जो खुशहाल साधन सम्पन्न है, वे अपेक्षाकृत अधिक बीमार पड़ते हैं। चिकित्सा की जिन्हें अधिक सुविधा प्राप्त है वे अधिक दुर्बल रहने और आये दिन बीमार पड़ते देखे गये है। गंभीर शोधों से इस आश्चर्यजनक परिणति का प्रधान कारण यह पाया गया है कि स्वार्थी, ईर्ष्यालु और दुष्कर्मों में लिप्त व्यक्ति अपने मनोविकारों के कारण भीतर ही भीतर खोखले होते रहते है और तनिक सा कारण उत्पन्न होने पर कभी छोटी कभी बड़ी बीमारी के शिकार होते है।
इसके विपरीत जो सदा प्रसन्न रहते है, जिनके चेहरे पर मुस्कराहट और निश्चिंतता रहती है वे गरीबी में दिन गुजारते और कड़ी मेहनत करते हुए भी निरोग बने रहते है। कभी किसी छोटी मोटी बीमारी के शिकार हुए भी तो ऐसे ही गुड गिलोय खाकर अच्छे हो जाते है।
जिन्हें आज की काम चलाऊ स्थिति से संतोष है, जिन्हें भविष्य की लम्बी चौड़ी लालसा नहीं है, उन्हें संतोषी कहते है। संतोषी का मन प्रसन्न रहता है। साथ ही शरीर भी स्वस्थ रहता है जो दूसरों की भलाई सोचते हैं और संपर्क वालों की उन्नति सोचते तथा सेवा का अवसर चूकते नहीं उन्हें प्रसन्नता का आनन्द मिलता रहता है। प्रसन्न रहने वाले गरीबों को भी अरोग्य से वंचित नहीं रहना पड़ता।
पाप का फल नरक के रूप में मिलता है, इस कथन में यह सच्चाई हाथों हाथ देखी जा सकती है कि कुकर्मी की आत्मा हर घड़ी कचोटती रहती है और समाज भय राजदण्ड भय के अतिरिक्त आत्म दण्ड के रूप में बीमारियों का आये दिन प्रकोप होता रहता है जो निष्पाप है वह निर्द्वन्द रहेगा और उसे निरोग भी पाया जायेगा।
प्रसुप्त दिव्य शक्तियों का भण्डार मानवी काया में बीज रूप से प्रचुर परिणाम में विद्यमान है। दैनिक क्रिया कलापों में उनका बहुत छोटा भाग ही प्रयुक्त हो पाता है जो वस्तु निष्क्रिय पड़ी रहती है, वह अपनी क्षमता खो बैठती है। पड़े रहने वाले चाकू को जंग खा जाती है। कोठों में बन्द अनाज को कीड़े लग जाते है। बक्से में बन्द कपड़े अनायास ही कड़ने लगते हैं। खाली पड़े रहने वाले मकानों में सीलन, सड़न चढ़ती है और चूहे, छछूँदर, चमगादड़, जैसे जीव उसमें और भी जल्दी अच्छा खासा होल बना देते है। मानवी शक्तियों के बारे में भी यही बात है। वे पेट प्रजनन भर के लिए दौड़-धूप करता रहता है। इतने छोटे काम में शक्तियों का लघु अंश ही काम आता है, शेष उपेक्षित स्थिति में पड़ा, निष्क्रिय निर्जीव हो जाता है। अविज्ञात स्थिति तक वह समुदाय पहुँच जाता है। यदि इस प्रसुप्ति को जागृति में परिणत किया जा सके तो मनुष्य सामान्य मनुष्य न रह कर मनीषी, योगी, तपस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी स्तर का महामानव सिद्ध पुरुष बन सकता है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में विद्यमान अगणित प्रसुप्त शक्ति बीजों को जागृत कैसे किया जाए। इसके लिए साधना वर्ग के दो प्रयोजन ही कार्यान्वित करने होते है। एक तप दूसरा योग। इसके दार्शनिक और क्रियापरक कितने ही स्वरूप है। अपनी स्थिति और सुविधा के आधार पर उनमें से इस विषय में रुचि लेने वाले अपने लिए मार्ग चयन करते है। तत्परता, तन्मयता अपना कर संकल्प पूर्वक अभीष्ट लक्ष्य की ओर साहसिक प्रयास करते है।
आत्मोत्कर्ष की साधनाओं के लिए मात्र कर्म काण्ड ही सब कुछ नहीं है। उसके लिए प्रयुक्त वातावरण भी चाहिए। बीज कितना ही उत्तम क्यों न हो, पर उसे विकसित, पल्लवित होने का अवसर तभी मिलता है जब भूमि उपजाऊ हो। खाद, पानी की व्यवस्था हो और देख रेख करने वाले व्यक्ति का संरक्षण मिले। विशेष क्षेत्र में विशेष प्रकार के फल, शाक, अन्न, वृक्ष वनस्पति, जीव जन्तु आदि जन्मते हैं। हर जगह हर वस्तु का उत्पादन एवं विकास नहीं होता। योग और तप के लिए यो कोई भी स्थान अपनाया जा सकता है। ‘सभी भूमि गोपाल की’ वाली उक्ति के अनुसार मन चंगा होने पर कठौती में गंगा प्रकट हो सकती है। फिर भी विशेष स्थानों का विशेष महत्व बना ही रहेगा। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सिद्ध पुरुषों का संरक्षण यह त्रिविधि विशेषताएं जिन्हें भी उपलब्ध होती है वे अपनी साधना को सिद्धि में बदलने में अधिक सफलता प्राप्त करते देखे गए है।
इस प्रयोजन के लिए हिमालय का उत्तराखण्ड क्षेत्र अधिक उपयुक्त सिद्ध होता है। इसलिए कितने ही मुमुक्षु इस क्षेत्र में अन्न, जल और आच्छादन की सुविधा देख कर अपने काम चलाऊ कुटीर बना लेता बना लेते हैं। उनमें साधनारत रहते है। कभी कभी इन साधकों में कुछ सम्पन्न जन भी होते है। वे प्रेरणा पाने पर इन्हीं कुटीरों के इर्द-गिर्द कोई देवालय बना लेते है। कालान्तर में वह किसी पुरातन कथा गाथा के साथ जुड़ जाता है। दर्शनार्थी आने लगते है और भूमि का, भवन का, परिकर का विस्तार होने लगता है। कई साधन सम्पन्न ऐसे स्थानों में अपने दान का स्मारक बनाने में अधिक उपयोगिता समझते हैं। घने शहरों में घिचपिच अनेकों देवालय धर्मशालाएं बनने होते है। उनके बीच किसी एक एक का विशेष स्मरण रह सकना संभव नहीं होता।
हिमालय का उत्तर खण्ड देवात्मा भाग वस्तुतः तपोवन है। उसमें तीर्थ स्तर की सुविधा नहीं है। तीर्थों में आमतौर से गुरुकुल, आरण्यक और साधन आश्रम हुआ करते थे। उनमें सत्संग, स्वाध्याय की, निवास विश्राम की व्यवस्था रहती थी। अभी भी ऐसे तीर्थों के कितने ही प्रतीक चिन्ह जहाँ तहाँ विद्यमान है। किन्तु हिमालय में समतल भूमि की व्यवस्था नगण्य होने के कारण वैसी बड़ी व्यवस्था का सुयोग नहीं बनता रहा है। छोटे-छोटे कुटीर और आश्रम पर संभव होते रहे है उनमें व्यक्तिगत साधनाएं इस दृष्टि से होती रही है कि अन्तराल में समाहित प्रसुप्त शक्तियों का जागरण संभव हो सके। दिव्य वातावरण मिलता रह सके और उस भूमि की उर्वरता में उनका व्यक्तित्व बीच रूप में समुन्नत होते होते समर्थन सम्पन्न हो सके। साधना बढ़ते बढ़ते सिद्धि स्तर तक पहुँच सके।
हिम क्षेत्र में आधुनिकता के प्रवेश के साथ अन्यान्य कर्मियों के साथ सब से बड़ी कमी हुई है उस क्षेत्र में विचरण करने वाले सिद्ध पुरुषों की। वे मात्र शीतलता के लिए ही नहीं यहाँ बसते थे, वरन् सबसे बड़ी उपलब्धि थी निस्तब्धता। वह एकान्त में ही मिल पाती है। कोलाहल और घिचपिच का प्रभाव वातावरण पर पड़ता है फिर जिनमें व्यवसाय बुद्धि ही प्रधान है वे जन साधारण में पाये जाने वाले दोष, दुर्गुणों से भी भरे रहते हैं। प्रवृत्तियाँ भी क्षेत्र को प्रभावित करती है। योगी तपस्वी यदि वातावरण में उत्कृष्टता का संचार करते हैं तो गये-गुजरे व्यक्ति उस में प्रदूषण भी करते है। कमल पुष्पों में भ्रमण करने वाले भ्रमर दुर्गन्धित स्थानों में घुटने अनुभव करते हैं और टिकने के लिए उद्यत नहीं होते। उसी प्रकार सिद्ध पुरुष भी कोलाहल भरे, व्यवसाय बुद्धि से अनुप्राणित क्षेत्र में टिक नहीं सकते। कोई समय था जब उत्तराखण्ड क्षेत्र में, मध्यम ऊँचाई वाले क्षेत्र में भी जब तब सिद्ध पुरुषों का साक्षात्कार किन्हीं सौभाग्यशालियों को होता था। उनका परामर्श और सहयोग मिल जाया करता था पर अब वैसा नहीं होता। इस प्रयोजन के लिए जो लोग धर जाते हैं, उन्हें निराश ही वापस लौटना पड़ता है।
असल की नकल बनाने में दुनिया बड़ी प्रवीण है, नकली रेशम, नकली रत्न, नकली घी, नकली आँख, नकली दाँत तक बाजार में बहुलता के साथ सस्ते मोल में मिलते है। उनका विज्ञापन भी किया जाता है ताकि सस्ते के लोभ में कम समझ ग्राहकों को आसानी से आकर्षित किया जा सके। जन संकुल क्षेत्र के आस पास अड्डे बना कर बस जाने वाले नकली सन्तों और सिद्ध पुरुषों तक की भी बाढ़ जैसी आने लगी है। भावुक श्रद्धालु लोग आसानी से इनके चंगुल में फंसते है। पुरातन मान्यताओं के अनुरूप उनकी मनोभूमि तो बनी ही होती है। फिर सहज प्राप्ति का प्रलोभन किसी से कैसे छोड़ते बने?चिड़िया जाल में और मछली काँटे में इसी प्रलोभन के कारण फंसती है। सिद्ध पुरुषों की तलाश में निकले व्यक्ति भी आमतौर से इसी भ्रम जाल में फंसते है और जिस तिस के जाल जंजाल में फंस कर अपना मना, धन और समय खराब करते है।
कितने ही भावुक-जनों की अभिलाषा होती है कि सिद्ध पुरुषों से भेंट का सुयोग किसी प्रकार उन्हें मिले? इस कामना के पीछे मोटे रूप से तो उनकी भक्ति भावना ही दिखाई पड़ती है पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं। वे दर्शन मात्र के अभिलाषी नहीं होते। वे उनका कोई कौतूहल, चमत्कार देखना चाहते है। चमत्कार देख चुकने पर उन्हें इस बात का भरोसा होता है कि यह सिद्ध पुरुष है या नहीं। इससे कम प्रदर्शन के बिना उन्हें इस बात का भरोसा ही नहीं होता कि यह कोई दिव्य आत्मा है भी या नहीं। जब कुछ अचम्भा, अनोखापन, जादू तमाशे जैसा कोई कौतूहल दीख पड़े तब उसके बाद अपने मन की गाँठ खोलते है। गाँठ में
मनीषियों का मत है कि मनुष्य से सदैव एक प्रकार की प्राण विद्युत निकलती रहती है, जिसका उद्भव सूक्ष्म शरीर के निर्माण में भाग लेने वाले न्यूट्रान कणों की तीव्रतम गति के कारण होता है। वैज्ञानिकों ने इसे बायोइलेक्ट्रिसिटी, बायोप्लाज्मा, कास्मिक एनर्जी, बाइटल फोर्स, लाइफ-फील्ड आदि अनेकों नामों से सम्बोधित किया है। यह प्राण विद्युत मनुष्य के स्थूल शरीर से कुछ इंचों से लेकर 6 फीट की दूर तक प्रवाहित होती रहती है। इसी को आभामण्डल कहते है। यह प्राण शरीर से विकरित होने वाली विद्युतीय तरंगों से बनता है। समस्त प्राणियों, वृक्ष-वनस्पतियों का अपना अलग-अलग आभामंडल होता है। पाया गया है कि मनुष्य का आभामण्डल उसकी भावनाओं, विचारणाओं तथा आवेग-संवेगों के अनुसार बदलता रहता है।
मनुष्य के अंतर्जगत में सदैव देवा-सुर संग्राम चलता रहता है। दो प्रकार के स्पन्दन सतत् स्पन्दित होते रहते है। मनःसंस्थान और अतः करण में विचारों और भावनाओं की दो धाराएं साथ साथ बहती रहती है। विचारों की धारा ज्ञान से सम्बन्धित होती है। जिनमें बाह्य परिस्थितियाँ और व्यावहारिक जगत भी सम्मिलित है। मनुष्य वातावरण से समाज से शिक्षा स्वाध्याय, सत्संग से अथवा गुरुजनों से जो भी ज्ञान अर्जित करता है, उसी के अनुरूप उसके चिन्तन-मनन और सोचने समझने की एक गोलाकार परिधि सी बनती जाती है। मनःमस्तिष्क में बहते हुए यह विचार ही एक धारा का रूप ले लेते है। अतः करण में प्रवाहित होने वाली क्षुद्र भावनाओं की धारा को कषाय-कल्मषों की धारा भी कहते है। काम क्रोध मद मत्सर, मोह, राग, द्वेष, भय आदि विषय वासनाओं एषणाओं की धारा मनुष्य के सूक्ष्म और कारण जगत में सदैव प्रवाहित होती रहती है, जबकि सब महापुरुषों में उदारता, आत्मीयता, सहृदयता, करुणा, पवित्रता आदि की शुभ कल्याणकारी धाराएं प्रवाहित होती रहती है।
वैज्ञानिकों के मतानुसार विचार-धारा के सतत् प्रवाह से स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर निर्माण में भाग लेने वाले तत्वों के सूक्ष्म परमाणुओं न्यूट्रान कणों में स्पन्दन होता रहता है और उसी से प्रेम ऊर्जा का निर्माण होता है। प्राणमय शरीर भौतिक परमाणुओं से बने होने के कारण दृश्य होता है और उस रंग-रूप भी होता है। अतः उससे विनिर्मित आभामण्डल भी गुण रूप होता है। उसमें अनेकों वर्ण होते है। जैसे पीला, लाल, नीला, हरा, काला आदि।
वैज्ञानिकों ने अनेक अनुसंधान में पाया है कि जैसे व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार होता जाता है। विचारधारा, भावना और गुण, गर्म, स्वभाव में ऊर्ध्वगामी, उच्चस्तर परिवर्तन करने पर व्यक्ति के मन मस्तिष्क और अंतःकरण में जिस गति से उत्कृष्टता का समावेश होता आभामण्डल भी तद्रूप शुभ्र और विकसित होता जाता है। भावनाओं के परिष्कार और रंगों के ध्यान विशेषण प्रातः उदीयमान स्वर्णिम सूर्य के ध्यान द्वारा प्राण ऊर्जा अभिवर्धन होता है। जैसे-जैसे प्राणमय सूक्ष्म .... परिपुष्ट होता और ओजस्वी-तेजस्वी बनता जाता है, शरीर से सतत् विसरित होने वाली प्राण ऊर्जा प्रभाव क्षेत्र-’लाइफ फील्ड’ बढ़ता जाता है। इसमें .... और दूर दूर तक का वातावरण प्रभावित होता है पर पक्षी एवं मानव पवित्र आत्माओं महान संत, योगियों इसी लाइफ फील्ड - अर्थात् आभामण्डल के प्रभाव, जन्मजात विरोध भाव भूलकर शान्तिपूर्वक उन सान्निध्य में पास-पास बैठे रहते है।
आभामण्डल को रंगों के आधार पर 6 भागों में विभक्त किया गया है (1) काला-परा बैंगनी से बैंगनी तक (2) नीला (3) हरा (4) लाल (5) हल्का पीला और (6) .... के समान श्वेत। ये सभी रंग भौतिक परमाणुओं के सम्मिश्रण के कारण होते है।
थियोसोफिकल सोसायटी की जन्मदात्री मैडम ब्लैवेटस्की अनुसार मनुष्य का आभामण्डल एक बहुत ही जटिल और उलझा हुआ अभिव्यक्तिकरण है, जो उस क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न प्रभावों से निर्मित होता है। आभामण्डल में लगे लेने वाले कुछ तत्व स्थूल शरीर से बाहर निकलते होते है तो कुछ सूक्ष्म और कारण शरीर से। तीनों शरीर निकलते वाले प्रकाश पुँज एक दूसरे में मिल जाते है। मिश्रित रूप में उसी एक स्थान में छाये रहते है। विशेषज्ञों ने आभामण्डल को पाँच भागों में विभक्त किया है।
(1) हेल्थ ऑरा (2) वाइटल आँरा (3) कास्मिक आँरा (4) आँरा आफ करेक्टर (5) आँरा आफ द स्प्रिचुअल।
हेल्थ आँरा या स्वास्य आभामण्डल प्रायः रंगहीन होता और स्थूल शरीर के चारों और से सीधी रेखा के रूप में स्फुटित होता रहता है। वाइटल आँरा को सक्रिय आभा कहते है। इसे सूक्ष्म शरीर से विकरित माना गया है। वह इच्छा शक्ति द्वारा नियंत्रित होता है। सूक्ष्म शरीर से निकलते समय इसका रंग हल्का गुलाबी आभायुक्त होता है र बाहर आते ही नीले रंग में परिवर्तित हो जाता है। कॉस्मिक आँरा को जीवन दर्पण या अभिव्यक्तिकरण का .... भी कहते है जिससे मनुष्य की भावनाएं इच्छाएं प्रतिविम्बित होती है। इस आभामण्डल का रंग नियमित रूप से परिवर्तित होता रहता है। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध आदि विषय विकारों की एक लहर से ही इसका रंग बदल तो है। क्रोध की एक चिनगारी अंदर सुलगते ही आभा रंग गहरा सुर्ख लाल हो जाता है। अचानक भयभीत होने पर आभामण्डल का रंग बदल कर कुछ ही क्षणों में .... धूसर रंग का हो जाता है। चरित्र आभा स्थायीक्षणों वाला होता है और मनुष्य के व्यक्तित्व की वर्तमान भाव भूतकालीन चारित्रिक विशेषताओं को दर्शाता है। आध्यात्मिक ज्योतिर्मंडल-द आँरा ऑफ द स्प्रिचुअल वर- विशेष प्रकार के प्रकाश पुँजों से निर्मित पवित्र आत्माओं संत, ऋषियों में एक देदीप्यमान आभामंडल के रूप में पाया जाता है।
आँरा का सर्वप्रथम वैज्ञानिक अध्ययन लंदन के सेण्ट सेमस अस्पताल के चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. वाल्टर .... ने किया। विशेष प्रकार के रंगीन काँच के माध्यम से जब उन्होंने शरीर एवं उसके विभिन्न अंग अवयवों का पर्यवेक्षण किया, तो उन्हें उनके चारों और एक चमत्कार आभा दिखाई पड़ी, जिसे उन्होंने आँरा की संज्ञा दी और शरीर से निकलने वाली एक प्रकार की बिजली इसे कहा।
.... के बाद कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के .... बैग्नाँल ने इसके कार्य विद्युत होने को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया। उन्होंने पहली बार भौतिकी भाषा में इसकी व्याख्या की। उनका कहना था कि आभामण्डल हवा द्वारा प्रभावित नहीं किया जा सकता, किन्तु यदि त्वचा के अति निकट कोई चुम्बक रखा जाए, तो उसकी ओर इसके आकर्षण को स्पष्ट देखा जा सकता है। इतना ही नहीं एक आवेशित कन्डक्टर के चारों और वैद्युतिक क्षेत्र की तरह यह उभरे हुए स्थानों, यथा - नाक उंगलियों के पैरों से बाहर की ओर तथा जननांगों के चारों और अधिक उभरा दिखाई पड़ता है। बैग्नाँल ने आँरा को दो स्पष्ट भागों में विभक्त किया है - बाहरी धुन्ध वाला भाग तथा भीतर का तेजपूर्ण चमकदार भाग। बैग्नाँल एवं अन्य अनेकों का कहना है कि इस अंदरूनी हिस्से में त्वचा से समकोण बनाती हुई अनेक नाड़ियां होती है। इन नाड़ियों से थोड़े थोड़े समय पर सर्चलाईट की भाँति तीक्ष्ण प्रकाशयुक्त किरणें निकलती रहती है जो शरीर से अनेकों फुट बाहर आकर फिर तिरोहित हो जाती है। इन्हें देखने के लिए बैग्नाँल ने एक विशेष प्रकार का चश्मा तैयार किया, जिसके लेन्स खोखले थे। इनमें विशेष प्रकार का रंग डायसाईनिन भरा था। इस रंग की विशेषता यह है कि इसके माध्यम से देखने से आँख की दृश्य सीमा बढ़ जाती है, वह अधिक संवेदनशील बन जाती है और वह सब कुछ देख सकती है, जो सामान्य स्थिति में उसकी क्षमता से परे हो।
इसके पश्चात् किर्लियन ने अपने विशेष यंत्र से आँरा का अध्ययन किया। उन्होंने इस यंत्र से जब एक ताजी पत्ती का पर्यवेक्षण किया तो उसके रोग-छिद्रों से तीक्ष्ण प्रकाश पुँज निकलते पाया, किन्तु देखा गया कि जैसे जैसे कोशिकाएं मरती गई ये पुज भी बुझते गए। एक ही प्रजाति की जातियों में आँरा-पैटर्न समान पाया गया, मगर रोगी पत्तियों में यह पृथक प्रकार का दिखाई पड़ा। जन्तुओं में यह उसके आन्तरिक मनोभावों की अभिव्यक्ति है और उसमें आये परिवर्तन के आधार पर बदलता रहता है। इस उपकरण से पहल बार जाना जा सका कि क्यों कोई हाथ पैर कट जाने के बाद भी उसकी उपस्थिति का अहसास करता रहता है। विर्लियन ने देखा कि स्थूल अंग के पृथक हो जाने के बावजूद भी उसका सूक्ष्म भाग स्थूल अंग के पृथक हो जाने के बावजूद भी उसका सूक्ष्म भाग स्थूल शरीर से जुड़ा रहता है। जब एक आधी कटी पत्ती का चित्र इस यंत्र से लिया गया, तो उसमें सम्पूर्ण पत्ती की तस्वीर मौजूद थी। इसे “फैण्टम इफेक्ट” नाम दिया गया।
इन सारे प्रयोग-परीक्षणों से एक बात स्पष्ट हो गई कि सभी जीवधारियों में किसी न किसी प्रकार का ऊर्जा मैट्रिक्स होता अवश्य है, भले ही उसका रूप आकार भिन्न भिन्न हो। यह बात भी सुनिश्चित है कि वह स्थूल शरीर से पूर्णतः यह है क्या? इसके कार्य क्या है और भौतिक शरीर में इसकी आवश्यकता क्यों पड़ती है? इस आशय पर गहन अध्ययन रूस में चल रहा है। किरोव स्टेट यूनिवर्सिटी, अलमा-अता के जैववैज्ञानिक इस ऊर्जा का अध्ययन इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से कर रहे है। उनका कहना है कि यह और कुछ नहीं, आयनीकृत कणों का प्लाज्मा-समूह है। वे यह स्वीकारते है कि पदार्थों की प्लाज्मा अवस्था अति उच्च तापक्रम पर प्राप्त होती है और शरीर तापमान पर इस प्रकार की किसी प्रक्रिया का अब तक कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है, किन्तु शरीर शास्त्री यह भी मानते है कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा संभव हो सकता है, क्योंकि विज्ञान की यह शाखा बिल्कुल नई है। अभी तक हमने इसके बारे में जो कुछ जाना-समझा है, वह नगण्य सा है और काफी कुछ जानना अभी शेष है।
वैसे तो आँरा हर व्यक्ति में न्यूनाधिक मात्रा में पाया जाता है, पर महापुरुषों और पवित्र आत्माओं के शरीर व मस्तक के चारों ओर पाया जाने वाला आभामण्डल अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत व विशेष आभायुक्त होता है। ऐसी स्थिति में इसे “आँरिओल-ज्योतिचक्र” कहते है। सिर के चारों ओर छाये रहने वाले प्रकाश पुँज को “प्रभामण्डल” या हैलो” कहा गया है। जब मस्तिष्क का सहस्रार चक्र जाग्रत हो जाता है, तो सहस्र दल कमल से सहस्रों-सहस्र प्रकाश-रश्मियाँ प्रस्फुटित होती है और सिर के चारों ओर वृत्ताकार रूप में प्रभामण्डल का निर्माण करती है। इसका रंग सुनहरा चमकीला होता है। यह वर्ण स्थायी होता है और इसे पवित्र मनुष्यों द्वारा चर्म-चक्षुओं से भी देखा जा सकता है।
ग्रन्थों में प्रभामण्डल की उत्पत्ति केवल आध्यात्मिक और महान पुरुषों में ही होती बतायी गयी है। रामकृष्ण परमहंस और योगी अरविंद के बारे में कहा जाता है कि जब वे गहन ध्यान की स्थिति में होते थे तो उनके सिर के चारों और बादलों जैसा एक चमकीला धुन्ध दिखाई पड़ता था। यह घेरा तब तक बना रहता था, जब तक वे ध्यानावस्था में रहते थे। ध्यानभंग होते ही यह तिरोहित हो जाता था। देवी देवताओं और राजे-महाराजाओं के मुकुट के साथ लगाया
यह एक सुनिश्चित अकाट्य तथ्य है कि व्यक्ति अपनी अंत की शक्तियों को जगाकर अपना आभामण्डल, प्रभाव क्षेत्र बढ़ाते रह सकता है। सामान्य से सामान्य मानव से महामानव बनने की विद्या का क्षेत्र हर किसी के लिए खुल पड़ा है। विचारणा-भावनाओं के परिष्कार एवं अंतः वे उदात्तीकरण की प्रक्रिया से प्रसुप्त शक्तियों को जगा लेना सबके लिए संभव है।
क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति सशरीर कहीं और उपस्थित हो एवं उसके माध्यम से कहीं ओर किसी घटनाक्रम को घटते कई व्यक्तियों ने देखा हो व स्वयं वह .... उसकी स्वीकारोक्ति कर रहा हो? यह एक ऐसा प्रसंग है जिस पर काफी समय से वैज्ञानिक विवाद करते रहे व व्यक्तियों में उलझते रहे है। फिर भी इसकी यथार्थता को स्वीकारने में वे असफल रहे है।
हम आर्षग्रन्थों में, पौराणिक मिथकों में ऐसे कई प्रसंग व मानवों, ऋषियों, महापुरुषों से जुड़ पढ़ते आ रहे है जिसमें यह वर्णन है कि एक ही व्यक्ति को एक ही समय दो से अधिक स्थानोँ पर एक साथ उपस्थित बताया गया है। क्या यह कपोल कल्पना मात्र है? इस पर परामनोविज्ञान, ह्यविज्ञान के अध्येता अपना निष्कर्ष प्रकट करते हुए कहते है कि यह सूक्ष्मशरीर को सत्ता का चमत्कार ही है जो .... ओ.बी.ई. (आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरीएन्स) एवं .... प्रवो के घटना क्रम देखते त्रव सुनते है। इतिहास .... पृष्ठों में ऐसी कई घटनाएं पृष्ठाँकित है।
घटना 18 जुलाई 1896 की है। न्यूयार्क के एक न्यायालय में विलियम मैक्डोनाल्ड नामक एक व्यक्ति पर मुकदमा चलाया गया। आरोप यह था कि 15 अप्रैल के .... मेनहैटन शहर में साँय 5 बजे कुछ व्यक्तियों पर प्राणघातक हमला करके उन्हें घायल कर दिया। इसकी विपक्षी रूप में अभियोग पक्ष ने चार गवाह भी पेश किये, उनमें शहर का ईमानदार और सत्यनिष्ठा समझा जाने वाला एक व्यक्ति भी था।
दूसरी ओर प्रतिपक्ष ने कई साक्षी प्रस्तुत कर न्यायालय ने यह बताया कि उक्त दिन उक्त समय अभियुक्त मेनहेटन पर पाँच मील दर ब्रुकलीन उपनगर के एक थियेटर में कुख्यात हिपनोटिस्ट डॉ. ह्वाइनर का “माध्यम” बना करोड़ों व्यक्तियों के सामने संज्ञा शून्य पड़ा था। फिर यह से संभव है कि वह दूसरे शहर में आकर हत्या करे?।
ज्यूरी के सामने जटिल समस्या थी। दोनों ही पक्ष अपराधी को एक ही दिन एक ही समय दो भिन्न स्थलों में उपस्थित बता रहे थे, जो सर्वथा असंभव था। निदान स्वरूप डॉ. ह्वाईनर को बुलाया गया। डॉ. ह्वाईनर तत्कालीन समय में सम्मोहन विद्या के निष्णात् माने जाते थे। न्यायालय ने उनसे सप्रश्न किया कि क्या वे मैक्डोनाल्ड को जानते है? उन्होंने उत्तर में कहा- ‘‘हाँ मैक्डोनाल्ड एक अच्छश्रा माध्यम है और उक्त दिन वह उस पर सम्मोहन विद्या के कुछ प्रयोग कर रहा था “ “ क्या ऐसी स्थिति में सम्मोहित व्यक्ति का साक्ष्य शरीर कहीं अन्यत्र भी प्रकट हो सकता है?” ज्यूरी का अगला प्रश्न था। ह्वाईनर ने कहा “ऐसा संभव है।”
किन्तु न्यायालय को इतने से ही संतोष नहीं हुआ। उसने बचाव पक्ष से अपराध जगत के इतिहास में किसी ऐसी घटना के पक्ष में दिये गये फैसले का सबूत माँगा। प्रतिपक्ष ने रिकार्ड की पुरानी फाइल से एक ऐसा ही मामला ढूंढ़ निकाला। बात सन् 1774 की है 12 सितम्बर रविवार के दिन स्थानीय चर्च के फादर अलफान्सर लिगोरी प्रातः प्रवचन देने के लिए तैयार हो रहे थे अचानक कुर्सी से टकरा कर गिर पड़े और बेहोश हो गये। बड़ी मुश्किल से शाम तक होश में आये तो अपने विश्वास पात्र शिष्यों से कहने लगे कि वे बिलकुल स्वस्थ है और अभी अभी रोम से आ रहे है। उन्होंने आगे बताया कि रोम के पोप को उनने जहर दे दिया है। शिष्यों ने समझा कि शायद फादर सपने की बात कर रहे हो, अतः उनने उस पर विशेष ध्यान नहीं दिया, किन्तु कुछ दिनों बाद जब पोप के संबंधियों ने फादर अलफान्सर पर हत्या का मुकदमा चलाया, तब शिष्यों को विश्वास हुआ कि फादर जो कुछ कह रहे थे, वह सच था, मगर उन्हें आश्चर्य इस बात कहा था कि शरीर से यहाँ रहते हुए भी सैकड़ों मील दूर जाकर उन्होंने हत्या कैसे की?
इस घटना की सुन कर ज्यूरी के सदस्यों ने वादी प्रतिवादी दोनों पक्षों को सही माना पर अपराधकर्मी मैक्डोनाल्ड को यह कह कर बरी कर दिया कि अपराध सूक्ष्म शरीर ने किया है, अतः उसका दण्ड स्थूल शरीर को नहीं दिया जा सकता।
यह सच है कि सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से पृथक्करण संभव है और इसके माध्यम से विश्व के किसी भी कोने का क्षण मात्र में भ्रमण किया जा रसकता है, मगर दैनिक जीवन में निद्रा की स्थिति में घटने वाली इस घटना का स्मरण अधिकाँश लोग नहीं रख पाते, फलतः विस्मय की दृष्टि से देखते और अचम्भा करते है। रहस्यवाद में इस घटना को पृथक्करण, बाह्यकरण मूर्तकरण अथवा आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियन्स (शरीर से बाहर परिभ्रमण) जैसे अनेकानेक नामों से जाना जाता है।
इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि चूँकि सूक्ष्म शरीर अथवा एस्ट्रल बॉडी में चेतना और अनुभूति के दोनों गुण होते है, अतः पृथक्करण की घटना जब घटती है, तो अस्थायी रूप से स्थूल शरीर अचेतन की स्थिति में आ जाता है और ठीक इसी समय भौतिक शरीर से सूक्ष्म शरीर में चेतना और अनुभूति का स्थानान्तरण हो जाता है। किन्तु रहस्यवादियों का कहना है कि ऐसी स्थिति में भी दोनों शरीरों के बीच सदा एक सूक्ष्म संबंध बना रहता है। दोनों को एक दूसरे से जोड़ने वाला यह संपर्क सूत्र “एस्ट्रल कार्ड” कहलाता है। प्रायः ऐसी घटनाएं प्रकाश में आती रहती है, जब किसी दुर्घटना प्रकाश में आती रहती है, जब किसी दुर्घटना अथवा आपरेशन के दौरान व्यक्ति अपने ही निष्क्रिय स्थूल शरीर को देखता रहता है अथवा देखने की अनुभूति होती है। ऐसा एस्ट्रल बॉडी के पंच भौतिक शरीर से पृथक्करण के कारण होता है। एस्ट्रल प्रोजतेक्शन की यह घटना योगियों अथवा आध्यात्मिक पुरुषों के साथ घटने वाली उस घटना से सर्वथा भिन्न है, जिसमें आध्यात्मिक शक्तिसम्पन्न व्यक्ति एक समय में विभिन्न स्थलों पर प्रकट होकर विभिन्न प्रकार के काम करते देखे जाते है “भारत के संत महात्मा” पुस्तक में ऐसे कई घटनाक्रम दिए गए है।
सामान्य परिस्थितियों में भी स्वतः बहिर्गमन की यह घटनाएं घटती है पर यह कब और कैसे घटित होती है। यह अविज्ञात है। कुछ व्यक्तियों में यह घटना सतत्! स्वतः होती रहती है। विशेषज्ञों का विश्वास है कि इसमें व्यक्ति के अनुवाँशिक कारक भी जिम्मेदार हो सकते है। रहस्यवादियों का कहना है कि शैशवावस्था और अत्यन् बुढ़ापे की स्थिति में एस्ट्रल बॉडी और स्थूल शरीर परस्पर पूरी तरह बंधे नहीं होते, उनके बीच कुछ विलगाव होता है। यही कारण है कि इन स्थितियों में बोली अस्पष्ट व तुतली होती है तथा विभिन्न अंगों का पारस्परिक तालमेल भी ठीक ठीक नहीं बन पड़ता, क्योंकि एस्ट्रल शरीर पूरी तरह नियंत्रण में नहीं होता। इसी प्रकार बीमारी, उपवास थकान, श्रम, तपश्चर्या के दौरान जब जीवनी शक्ति धक जाती है, तो एस्टल शरीर अपने बन्धनों से ढीला हो जाता है और भौतिक शरीर से बाहर आ जाता है। मादक द्रव्यों के सेवन से भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है गहन एकाग्रता, प्रबल इच्छा, दारुण दुःख, व मरणासन्न स्थिति में भी दोनों शरीरों का संपर्क-सूत्र कमजोर पड़ जाती है जिसमें एस्ट्रल बॉडी आँशिक अथवा पूर्णरूप से स्थूल शरीर से पृथक हो सकता है। मृत्यु से ठीक पूर्व अथवा किसी गंभीर संकट की घड़ी में एस्ट्रल शरीर व्यक्ति व किसी घनिष्ठ संबंधी के समक्ष प्रकट होकर इसकी सूचना उसे दे सकता है। इस क्षेत्र के शोधकर्ताओं का कहना है कि एस्ट्रल शरीर का बहिर्गमन कोई असामान्यता अथवा अस्वाभाविक घटना नहीं है, हर व्यक्ति के जीवन में यह घटित होता रहता है। यह बात दूसरी है कि अधिकाँश व्यक्ति इसे याद नहीं रख पाते, सिवाये बेसिर-पैर सपनों के।
एस्ट्रल बहिर्गमन शुरू से अन्त तक पूर्ण चैतन्य रह करा भी संभव है, पर यह कुछ कठिन है। इस दौरान वह अनुभूतियों में भी काफी भिन्न देखी गयी है।
सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार का बहिर्गमन .... की स्थिति में होता है। कुछ घण्टे की नींद के बाद व्यक्ति को ऐसा अनुभव होता है, जैसे वह धीरे धीरे जाग रहा है किन्तु उसे अपनी स्थिति और अवस्थिति का भान न होता। कुछ समय तक वह स्वयं को निश्चल अनुभव करता है। इसके बाद उसका एस्ट्रल शरीर हवा में अनुप्रस्थ रुख से ऊपर उठने लगता है। तत्पश्चात् धीरे - धीरे उस स्थिति ग्रहण कर लेता है और वहाँ से दूर जाने की तैयारी करने लगता है। इस दशा में अभौतिक शरीर जो अब जड़ जैसी अवस्था में था, चैतन्य बनने लगता है। चेतना स्थूल शरीर की उसमें प्रवाहित होती है। अधिक मामलों में एस्ट्रल बॉडी के बहिर्गमन और भौतिक शरीर में फंसके लौटने से पूर्व की मध्यावधि में “ब्लेकआउट अथवा चेतना” की एक कल्पकालिक स्थिति भी आती है।
इस आयाम में सब कुछ अत्यंत सुस्पष्ट होता है। यहाँ कि सामान्य थान भी विशेष प्रभायुक्त दीखते हैं। बाकी वास्तविक संसार अपेक्षाकृत अवास्तविक अस्पष्ट प्रतिबिम्ब जैसा प्रतीत होता है। ज्ञान तंतु अधिक संवेदनशील उठते है एवं बोध क्षमता बढ़ जाती है। शारीरिक दोष समाप्त हो जाते है। एस्ट्रल शरीर के आयाम में काल स्थान और द्रव्य का अर्थ पूरी तरह बदल जाता है। इस स्थिति में बस शरीर के लिए फिर सारे व्यवधान, सारी विघ्न–बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। यह बन्द दरवाजे से निकल सकता है, हजारों मील की दूरी पलक झपकते तय कर सकता है। चूँकि यह शरीर सूक्ष्म होता है, अतः भौतिक संसार में यह कुछ विशेष अवसरों पर ही लोगों को दिखाई पड़ता है।
साधन द्वारा शक्ति अर्जित कर के भी एस्ट्रल बॉडी को भौतिक शरीर से पृथक कर उस आयाम में पहुँचा जा सकता है एवं अन्य आयामों में निवास कर रह सूक्ष्म सत्ताओं से संपर्क साधा जा सकता है।
बहिर्गमन के बाद कुछ समय पश्चात् जब सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर में वापस लौटता है, तो स्थूल शरीर की वेदना इसी के साथ लौट आती है। सामान्यतः यह घटना इतने शान्त और सहज रूप में घटित होती है कि व्यक्ति को इसका आभास तक नहीं मिल पाता और कुछ क्षण तक वह अचेतन अथवा निद्रा की स्थिति में ही पड़ा रहता है। किन्तु इस समय यदि यकायक कोई तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न की जाए, अथवा सोते व्यक्ति को जोर से झकझोरा जाए, तो एस्ट्रल कार्ड में तीव्र हलचल उत्पन्न हो जाती है और इसी के साथ सूक्ष्म शरीर शीघ्रता से स्थूल शरीर में प्रवेश कर जाता है, जिससे भौतिक शरीर को काफी कष्ट पहुँचता है और व्यक्ति का हृदय बुरी तरह धड़कने लगता है। यही कारण है कि सोते व्यक्ति को झकझोर कर अथवा तेज आवाज देकर कभी नहीं उठाया जाता।
यद्यपि मनोवैज्ञानिक बहिर्गमन की इस घटनाओं को मात्र मतिभ्रम कह कर निजात पा लेते है, पर रहस्यवाद में इस विधा को वास्तविक और असीम संभावनाओं से युक्त बताया गया है एवं उसके माध्यम से रहस्यवादी दैनिक जीवन में घटित होने वाली अनेक प्रकार की घटनाओं की व्याख्या करते हैं, यथा- स्वप्नदर्शन, दूरदर्शन, इसे वे एस्ट्रल आयाम की प्रथम अनुभूति बताते है, भूत-पिशाच एवं अन्य सूक्ष्म सत्ताओं त्रके प्रत्यक्ष दर्शन इसे एस्ट्रल शरीर का मूर्तकरण कहा गया है, उन्माद, पागलपन को सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर में स्थायी स्थान परिवर्तन (डिजलोकेशन) बतलाया जाता है, अचेतन अवस्था, निद्रा, बेहोशी आदि में एस्ट्रल बॉडी की अस्थायी अनुपस्थिति मानी गयी है, आत्माओं के लिए माध्यम बनना, पिशाचग्रस्त होना, बहुव्यक्तित्व प्रदर्शन, प्राण प्रत्यावर्तन इन्हें भौतिक शरीर पर अन्य सूक्ष्म सत्ताओं द्वारा आधिपत्य कुछ भी हो, है यह सब कुछ अतिविलक्षण एवं अद्भुत। सूक्ष्म जगत के क्रिया-कलापों की तो यह एक झलक मात्र है। संभावनाएं असीम अपरिमित हैं। इस शक्ति समुच्च को कुरेदा जगाया जा सकते तो ऋद्धि सिद्धियों का वैभव भाण्डागार हस्तगत हो सकता है।
आधुनिक भौतिक वैज्ञानिकों को अपने नित नूतन आविष्कारों, शोध प्रक्रियाओं एवं निर्माणों पर गर्व है। वह उचित भी है पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि भूतकाल में इस विद्या की जानकारी किसी को भी नहीं थी। सच तो यह है कि पुरातन काल में विज्ञान की अपनी विशिष्ट दिशाधारा थी, जिसमें पदार्थों का ही आश्चर्यजनक परिवर्तन नहीं होता था, वरन् शरीरगत विद्युत शक्ति का भी भूचुम्बकीय धाराओं से सुनियोजन स्थापित किया जाता था, जिसकी दिशाधारा को अभी तक समझा नहीं जा सकता।
दिल्ली की कुतुबमीनार के समीप लगी लाट की धातु और मिस्र के पिरामिडों की संरचना इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है। त्रेता में पुष्पक विमान और द्वापर में महाभारत कालीन दिव्य अस्त्रों का प्रयोग भी भूतकालीन वैज्ञानिक प्रगति की साक्षी प्रस्तुत करता है।
मिस्र के सैकड़ों मील क्षेत्र में फैले हुए गगनचुम्बी पिरामिडों में रखे शवों में हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक बदबू या सड़ांध नहीं आई है। इसके निर्माणकर्ता ‘फैराओं” की रूहें तो अब किसी सूक्ष्म जगत में होगी किन्तु उनके स्मारकों के रूप में बृहदाकार पिरामिड आज भी सुसभ्य कहे जाने वाले संसार का ध्यान बलात् अपनी ओर आकर्षित करते है। इस विचित्र निर्माण को देखकर विज्ञान वेत्ता भी आश्चर्यचकित है।
सुप्रसिद्ध लेख प्लिनी और रामनों ने लिखा है कि मिस्र के तीन पिरामिडों ने अपनी ख्याति से सम्पूर्ण पृथ्वी को गुँजित कर दिया है। हजारों वर्षों से प्राकृतिक थपेड़ों को सहने के बाद भी उनकी संरचना में कोई अंतर नहीं आया है। उन्हें देखकर सबसे बड़ा आश्चर्य यह होता है कि प्रारंभिक काल में मानवों ने रेगिस्तानी पठार में प्राकृतिक संरचनाओं से स्पर्धा करते हुए ये कृत्रिम पर्वत कैसे बनाये होंगे? किन महाबली पुरुषों ने विशालकाय चट्टानों को सुदूर पर्वत श्रृंखलाओं से तोड़कर उन्हें मरुस्थल में जुटाया होगा और किन वास्तुकला विशेषज्ञों ने इसकी अद्भुत ज्यामितीय प्रक्रिया में अपना पसीना बहाया होगा।
विश्व ने अनेक भागों जैसे दक्षिणी अमेरिका, जीन साइबेरिया, फ्राँस, इंग्लैण्ड आदि देशों में पिरामिड मिले है, किन्तु इनमें सबसे अधिक विख्यात ‘गीजा का पिरामिड’ है। इसका आधार क्षेत्र 13 एकड़ से अधिक और ऊंचाई 150 मीटर है, इसमें 26 लाख विशालकाय पत्थर के टुकड़े लगे हैं जिनका भार दो टन से 80 टन तक का है। ये पत्थर ग्रेनाइट और चूने से विनिर्मित है। सुप्रसिद्ध अंग्रेज पुराविद् फ्लिंडर्स पेट्री के अनुसार 450 फीट की ऊंचाई पर इन भारी चट्टानों को बिना किसी याँत्रिक सहायता के ऊपर चढ़ाया गया है। इनकी जुड़ाई में कहीं भी एक इंच के किसी भी भाग का अन्तर नहीं आया है। इन पिरामिडों के निर्माण में इतना ठोस पदार्थ लगाया गया है। जितना कि उस समय के निर्मित गिरिजाघरों तथा अन्य भवनों में कहीं प्रयुक्त नहीं हुआ है।
विलियम पीटरसन कॉलेज, न्यूजर्सी में प्राचीन इतिहास के मूर्धन्य प्राध्यापक डॉ. लिविओं सी. स्टेचिर्न के अनुसार मिस्र के लोग ईसा से तीन हजार वर्ष पूर्व भी आधुनिक टेलिस्कोप और कोनोमीटर से भली भाँति परिचित थे। उन्होंने पिरामिड के निर्माण में उच्च स्तरीय वैज्ञानिक यंत्रों का प्रयोग किया था। पिरामिड की चोटी ध्रुव के एवं परिधि भूमध्य रेखा के सदृश्य है। इसका जब वैज्ञानिक पर्यवेक्षण किया गया और इसके त्रिभुजाकार दीवारों की माप ली गई तो उनके विभिन्न आयामों में गणितीया स्थिराँक पाई (3.24 एवं ‘फाई’ (1.619) का महत्वपूर्ण अनुपात पाया गया। पुनर्जागरण काल में इन अनुपातों का शिल्पकला में बहुतायत से प्रयोग किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह अनुपात मानवी काया में सौंदर्य व आकर्षण उत्पन्न करता है। टी. ब्रून्स ने अपनी पुस्तक “सिक्रेट्स ऑफ एन्शीएंट ज्यामेटी” में पिरामिडों के रहस्यमय आकार व उनके प्रभावों का गहराई से विवेचन किया है।
वैज्ञानिकों ने आकृति व आयामों की विभिन्न माप एवं उनके पारस्परिक अनुपातों से अन्य अनेक रहस्यों का पता लगाया है। इससे गीजा पिरामिड के रचनाकाल की भी .... मिली है। इन मापों से अंतरिक्षीय ग्रह पिंडों की .... की भी जानकारी मिलती है। उन्नीसवीं सदी के विख्यात खगोलवेत्ता प्रोक्टर ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में कहा था-कि इन पिरामिडों का उपयोग ग्रह-नक्षत्रों के अध्ययन के लिए वेधशालाओं के रूप में किया जाता रहा था। उनके अनुसार इतनी बहुमूल्य वेधशालाएं न तो कभी पहले तैयार की गई थी न ही भविष्य में कोई संभावना थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि गीजा का पिरामिड निखिल ब्रह्माण्ड का एक छोटा सा मॉडल है। इस महान पिरामिड की स्थिति मिस्र के लिए ही नहीं वरन् समस्त भूमण्डल के लिए सेन्ट्रल मेरीडियन केन्द्रीय याम्योत्तर है। सम्पूर्ण विश्व मानचित्र को दो बराबर भागों में बाँटने वाली रेखा के बिन्दु पर यह स्थित है। यदि इससे गुजरती हुई कोई रेखा खींची जाए तो इस रेखा पूर्वी और पश्चिमी छोर परस्पर बराबर होंगे। इस प्रकार इसका केन्द्रीय मोत्तर भरूमण्डल के देशान्तर का प्राकृतिक शून्य है। मानव निर्मित यह स्मारक पृथ्वीवासियों की तत्कालीन तीक्ष्ण प्रतिभा का अद्वितीय परिचायक है।
महान पिरामिड निर्माताओं ने वृत्तों में वर्गीकरण कर घनत्वीकरण इस प्रकार से निर्मित किया है कि .... ने अपने पर्यवेक्षण में पाया है कि कॉस्मिक ऊर्जा शक्ति पिरामिड के क्षेत्र अणु-अणु में व्याप्त है। भौतिक, नासिक आध्यात्मिक-आत्मिक सभी प्रकार की ऊर्जाएं, वहाँ विद्यमान है। वहाँ पर जीवन पूर्णरूपेण भावना से सम्बन्धित हो जाता है। ऐसे अनेकों प्रमाण प्राप्त हुए है कि पिरामिड की ऊर्जा पदार्थिय और सूक्ष्मीय चेतना को प्रभावित करने में सक्षम है। प्रयोग परीक्षणों के समय ऐसा देखा गया है कि इसके अन्दर उत्तर दक्षिण अक्ष में रखे गये फल फूल माँस बहुत दिनों तक यथावत् ताजे बने रहते है। पानी तथा अन्य द्रवीय पदार्थों को पात्रों में भर कर रखने से उनके गुणों में आश्चर्यजनक परिवर्तन पाया गया। फ्रांस और इटली की दो विभिन्न फर्मों ने पिरामिड की आकृति के कन्टेनरों का निर्माण किया और उनमें दूध रखकर उसका परीक्षण किया है। इसमें पाया गया कि चौकोर आकृति की अपेक्षा पिरामिड आकृति के कन्टेनरों में दूध ताजा और अधिक सुरक्षित रहता है। शंकु की आकृति वाले कन्टेनरों में पौधे अपेक्षाकृत अधिक तीव्रता से बढ़ते देखे गये है।
मूर्धन्य फ्रांसीसी इंजीनियर एल. तुरीनी ने अपनी पुस्तक “वेव्स फ्राम फ्रार्म्स” में लिखा है कि कोण, पिरामिड, स्फियर्स, क्यूब्स आदि में विभिन्न प्रकार की ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएं-जैसे कास्मिक, सोलर जियोमैग्नेटिक करेण्ट्स आदि का समावेश रहता है। यही कारण है कि पिरामिड ऐसे चमत्कारिक कार्यों को सम्पादित करते है। प्रख्यात नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. लुईस अलवरेज के अनुसार पिरामिड की संरचना ऐसे हुई है कि उसके अन्दर की खुली हुई जगह सदैव इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रतिबिम्बीय ऊर्जा उत्पादित करती है तथा ऊपर से अन्तरिक्षीय ऊर्जा किरणें प्रविष्ट होती रहती है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार पिरामिड से न केवल ऊर्जा प्रवाहित होती है, वरन् ऊर्जाओं को वहाँ रूपांतरित भी किया जाता है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक येथ और नेलसन ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध का है कि पिरामिड की ऊर्जा मध्याह्न को विस्तृत भी होती हैं।
मिश्र के पिरामिड प्राचीन प्रतिभा की ऐसी अमूल्य निधि है जिसमें क्यों और कैसे का बाहुल्य है और पूर्णरूपेण गणित पर आधारित है। इसकी आकृति मायावी है, जिसमें ज्ञात और अज्ञात ऊर्जा जीवित और निर्जीव पदार्थों को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए पिरामिड की संरचना आज भी चुनौती बनी हुई है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने अपने नये शोध कार्य में आकृति- संरचना के प्रभावों की विवेचना के अंतर्गत पिरामिडालॉजी को भी सम्मिलित किया है। पाये गए निष्कर्ष अतिमहत्वपूर्ण है, उपरोक्त मान्यताओं की पुष्टि ही करते है।
सपने सच्चे होते है और झूठे भी पर सामान्य जीवन में जो सपने दिखाई पड़ते है, उनमें से अधिकाँश में बेसिर पैर के दृश्यों की ही भरमार होती है। इनसे कैसे बचा जाए और सार्थक- सोद्देश्य-स्वप्न कैसे प्राप्त किया जाए? इस दिशा में विज्ञान अभी तक कोई सुनिश्चित हल नहीं दे सका है। हाँ, समय-समय पर इसमें शोधकार्य अवश्य हुए है। और शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्ष के आधार पर स्वप्न सिद्धान्त भी प्रतिपादित किये है, मगर इनमें से अधिकाँश ऐसे है। जिसमें स्वप्न संबंधी क्रियाविधि की ही चर्चा की गई है और मूल उद्देश्य को गौण रखा गया है।
किन्तु यस की “डी ला वार” प्रयोगशाला में इसी उद्देश्य को लेकर अनुसंधान किये जा रहे है। वहाँ के वैज्ञानिक निरंतर इस बात के लिए प्रयत्नशील है, कि मानवी सपने को नियंत्रित कर उच्चस्तरीय स्वप्न कैसे प्राप्त किये जांय। इस दिशा में उन्हें कतिपय सफलता मिली भी है। यही कार्य भारत में विशाखापट्टम की ड्रीम रिसर्च लेबोरेट्री में भी सम्पन्न हो रहा हे। रूस में सर्वप्रथम बिल्लियों पर प्रयोग कर यह जानने का प्रयास किया गया है कि सपनों के लिए मस्तिष्क का कौन सा अवयव जिम्मेदार है। इस क्रम में जब वैज्ञानिकों ने बिल्ली का ब्रेन स्टेम नष्ट किया तो पाया कि बिल्ली को स्वप्न आने बन्द हो गये। इस आधार पर उनने यह निष्कर्ष निकाला कि स्वप्न संबंधी भाग ब्रेन स्टेम ही है। इतना सुनिश्चित होने के पश्चात् अब वे मनुष्यों पर प्रयोग कर रहे है। उनका कहना है कि यही वह भाग है जिसका सीधा संपर्क समष्टिगत चेतना से होता है और वहीं से भविष्य संबंधी तरह तरह की सूचनाएं लाता है। शोधकर्ता वैज्ञानिक अब .... के लिए प्रयासरत है कि यदि सचमुच ही दिमा के किसी भाग स्वप्न के लिए उत्तरदायी है तो उसका सघन संपर्क वैश्व-चेतना से लगातार कायम कैसे रखा जा सकता है? ताकि सार्थक जानकारियाँ ग्रहण की जा सके। अनुसंधान अभी जारी है।
उधर ब्रिटिश मनोविज्ञानी क्रिस्टोफर इवान्स हॉल ही में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “लेण्डस्कैप ऑफ दि नाईट” में लिखते है कि “स्वप्न चैत्यावस्था में ही काम करना शुरू कर देते है। यह बात दूसरी है कि इसकी जानकारी हमें निद्रावस्था में मिल पाती है” उनका कहना है कि व्यक्ति यदि चाहे तो कठिन समस्याओं का हल इसके माध्यम से वह प्राप्त कर सकता है। इसका उपाय बताते हुए इवान्स कहते है कि समस्या पर यदि लगातार गहन चिंतन किया जाए और कुछ दिन पश्चात् उसका उत्तर निद्रावस्था में संकेत रूप में मिल जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसका समर्थन न्यूयार्क राकफेलर यूनिवर्सिटी के तंत्रिका विज्ञानी डॉ. जोनाथन पिन्सन ने भी किया है। वे अपनी “बेन एण्ड साइक” रचना में कहते है कि “प्रसुप्त मस्तिष्कीय क्षमता को यदि जगाया-उभारा जा सके, तो वह हमें न सिर्फ सपनों के माध्यम से अनागत की सूचना दे सकती है, वरन् पूर्ण चेतना की अवस्था में भी हम उससे उसी स्तर का कार्य ले सकते है”
शोध के दौरान दोनों अनुसंधानकर्ता एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते है। शोधार्थी द्वय का विचार है कि स्वप्न, निद्रा का कोई आकस्मिक बाईप्रोडक्ट नहं हे, वरन् नींद की यह एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। दोनों ने जन्तुओं पर ही अपने अनुसंधान कार्य किये। इवाइन्स ने स्वप्न संबंधी तथ्य एक जलकौवे पर अध्ययन करके ढूंढ़ा। एक बार उनने देखा कि एक जलकौवा जलाशय में एक टाँग पर खड़ा सो रहा है। शोध का अच्छा अवसर देखा वह दबे पाँव कौवे के निकट गये उसे स्पर्श किया और धीमे स्वर में कहा -”क्या हो रहा है” तत्क्षण पक्षी जाग पड़ा, उसे खते का एहसास हुआ एक पल तक दोनों की आंखें चार हुई फिर वह पंख फड़फड़ाते उड़ पड़ा।
इवान्स का कहना है कि ऐसी खतरनाक स्थिति में कोई भी जंतु अथवा पक्षी स्वयं को नहीं रखना चाहेगा। फिर .... क्यों? उनने निष्कर्ष निकाला कि स्वप्न, केजियोलाँजी और जीवन का इतना आवश्यक अंग है कि पशु-पक्षी (विशेषकर उष्णरक्तीय) नींद की स्थिति में इसके स्वप्न के) बदले ऐसे खतरे उठाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
ज्ञातव्य है, स्वप्न सदा “रेम स्लीप” के दौरान ही आते है पर आस्ट्रेलियाई पिप्पिलिका पक्षी एकमेव ऐसा ज्ञात स्तनपायी है, जिसमें “रेम स्लीप” का सर्वथा अभाव होता है। इस जन्तु का अग्रमस्तिष्क अन्य स्तनपायी जन्तुओं की तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा होता है। विन्सन इसी विलक्षणता में स्वप्न रहस्य छिपा मानते हे। उनका कहना है कि यद्यपि इस जन्तु में रेम स्लीप नहीं होती, किन्तु फिर भी वे इस क्षति की पूर्ति कर लेते है, क्योंकि ये ग्रतावस्था में स्वप्न देखते है। तात्पर्य यह कि कीट पक्षी अपने विशाल फ्रण्टल लोब का प्रयोग जानकारियों के सुसंगठन में तब करता है, जब वह पूर्ण से क्रिय और क्राशील होता है, जबकि दूसरे उष्णरक्तीय जन्तुओं को उसके लिए रेम स्लीप का इन्तजार करना पड़ता है। किन्तु यदि किसी कारणवश किसी व्यक्ति की रेम स्लीप में कोई व्यक्तिक्रम आ जाए तो क्या होगा? मनोविज्ञानी इवान्स कहते है कि इसके लिए ब्रेन को किसी नये सिरे की प्रोग्रामिंग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह उस पहले के ही प्रोग्राम में कुछ आवश्यक फेर बदल कर अपना अभीष्ट पूरा कर लेता है। उदाहरण के लिए मादक द्रव्यों के सेवन करने वालों को लिया जा सकता है। ये द्रव्य उन्हें ऐसी गहन निद्रा की स्थिति में पहुँचा देते है कि वे भी भाँति स्वप्न नहीं देख पाते। जब वह स्थिति चरमोत्कर्ष पर पहुँच जाती है (और व्यक्ति रेम स्लीप की दशा में बिलकुल ही नहीं पहुँच पाता) तो स्वप्न प्रक्रिया स्वतः चालू हो जाती है, जबकि व्यक्ति और उसका मस्तिष्क पूर्णतः सक्रिय और जागरूक अवस्था में होता है। परिणाम मतिभ्रम होता है। जैसा कि डेलीरियम टिमेन्स की स्थिति में शराबियों में देखा जाता है।
एक शरीरशास्त्री होने के नाते विन्सन ने अनेक वर्षों तक मस्तिष्क और उसकी संरचना व क्रिया का गहन अध्ययन किया है। इससे पूर्व तक शरीर में मन का स्थान अविज्ञान था, पर अपने श्रमसाध्य शोध कार्य के दौरान विन्सन ने मन का सही सही निवास शरीर में ढूंढ़ निकालने का दावा किया है। उनने मन का स्थान लिम्बिक सिस्टम के भीतर मान है। उनका कहना है कि यह तंत्र मन के प्रधान कार्यालय की तरह है, जो यह निर्णय करता है कि किन स्मृतियों, घटनाओं, आंकड़ों, बातों को सुरक्षित रखना है और किन्हें भुला देना है। विन्सन का मानना है कि यही स्वप्न प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती है। वे कहते है कि महत्व के आधार पर जानकारियों की छंटनी स्वप्नावस्था में ही संभव है। इसके बिना नये पुराने अनुभवों का मिलन समागम संभव नहीं न ही दैनन्दिन जीवन में आवश्यक अल्पावधि स्मृति ही संभव है। यह सारा कार्य मानों किसी कंप्यूटर की प्रोसेसिंग यूनिट की तरह यहाँ होता रहता है।
विन्सन का कहना है कि यदि हम अपने अपनों को याद क्या यह अचेतन व्यक्तित्व हमारे कुछ काम आ सकता है। इससे व्यावहारिक कठिनाइयों का हल प्राप्त किया जा सकता है? दोनों शोधकर्मी इसका सकारात्मक जवाब देते है। उनके अनुसार सपने ग्रहण करने की यदि बहुत उच्चकोटि की क्षमता योग्यता रही तो व्यक्ति उनमें लाभ उठा सकता है और जीवन का अपेक्षाकृत अधिक आनन्द ले सकता है।
समय समय पर ऐसे व्यावहारिक सपनों द्वारा लोग जीवन की जटिल समस्याओं का कठिन प्रश्नों का हल पाते रहे है। मूर्धन्य मनीषी व गणितज्ञ। बर्जेण्ट रसेल ने अपने व्यक्तिगत जीवन संबंधी उलझनों का हल सपने में ही प्राप्त किया था, सुविख्यात लेखक राबर्ट लुईस स्टीवेन्सन अपनी इच्छानुसार अपने विचारों को सपने में देख लेते थे। अभी हाल ही में प्रकाशित प्रसिद्ध उपन्यासकार ग्राह्म ग्रीक की आत्मा “वेज ऑफ एस्केप” में इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस प्रकार सपनों की सहायता से वह एक गहरे षडयंत्र से बच सके।
विन्सन का कहना है कि हमारी मन के हृदय केन्द्र में ही अचेतन मन स्थित है। यह एक ऐसी सतत् क्रियाशील मानसिक संरचना है जो हमारे जीवन के अनुभवों से नोट लेती रहती है और इसकी प्रतिक्रिया वह अभिव्यक्ति की अपनी योजनानुसार साँकेतिक भाषा में प्रकट करती रहती है। रात में सपनों के माध्यम से यही प्रतिक्रिया अभिव्यक्त होती है। इवान्स ने भी सपनों को मानसिक जीवन का एक आवश्यक अंग माना है और कहा है कि अनागत भविष्य की जानकारियों का यह इतना विशाल भण्डार है कि यदि व्यक्ति चाहे तो इससे लाभान्वित हो सकता है।
विवेकानन्द ने अपनी “राजयोग” पुस्तक में लिखा है कि हम उन्हीं वस्तुओं-ध्वनियों को देख समझ सकते है, जिनकी आवृत्ति हमारी इन्द्रियों के समतुल्य हो। जिस प्रकार रेडियो प्रसारण विभिन्न फ्रीक्वेंसियों पर होता रहता है पर हम उन्हें सुन तभी पाते है, जब अपने ट्राँजिस्टर सेट में उन फ्रीक्वेंसियों को मिलाते है। ऐसा नहीं करने पर प्रसारण होने के बावजूद हम उन्हें सुन नहीं पाते। वे कहते है कि ठीक ऐसी ही स्थिति हमारे समक्ष प्रस्तुत होती है। हमारे इर्द गिर्द के वातावरण में अनेक सूक्ष्म सत्ताएं अनेक सूक्ष्म जीव और भावी घटनाओं के ब्लूप्रिन्ट हो सकते है, किन्तु हम उन्हें देख इसलिए नहीं पतों कि हमारी प्राण चेतना के स्पन्दन व उसकी आवृत्ति उनसे मेल नहीं खाती। योगी लोग देखते देखते गायब हो जाते है क्योंकि वे अपने प्राण की आवृत्ति को उच्चतर कर लेते हैं जो हमारी इन्द्रियों को पकड़ से परे होने के कारण हमें दिखाई नहीं पड़ते।
सामान्य निद्रा की स्थिति में प्राण का कम्पन कुछ बढ़ जाता है, फलतः हमें ऊल-जलूल सपनों के मध्य कुछ ऐसे उच्चस्तरीय सपने भी दीख जाते है, जो भावी जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना की ओर संकेत करते है। ज्ञातव्य है कि घटनाएं घटित होने से बहुत समय पूर्व प्रकृति के गर्भ में आ जाती है। यदि प्राण की गति को नियंत्रित करने की विध हस्तगत की जा सके, तो व्यक्ति जाग्रत अवस्था में भी उद्देश्यपूर्ण सपने देख सकता है। साधन के माध्यम से योगी इसी स्थिति को प्राप्त करते है और भावी जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को जानने में सफल होते है। ध्यानयोग भावयोग एवं साधन के उच्चतर सोपानों से अचेतन, अवचेतन को जगाकर वह सब कुछ हस्तगत किया जा सकता है जो भविष्य के गर्त में छिपा पड़ा है, वहाँ पक रहा है। यह विधा पूर्णतः विज्ञान सम्मत है।
लम्बी कष्ट साधना के उपरान्त आपने क्या पाया।
वे बोले जल पर चलने की सिद्धि प्राप्त हो गई है।
स्वामी जी ने कहा यह काम तो नाव वाले को दस पैसा देने भर से पूरा हो सकता था। भला इतने छोटे लाभ के लिए इतना कष्ट क्यों उठाया गया ह?
1.प्रकाशन स्थान - मथुरा
2.प्रकाशन अवधि - मासिक
3.मुद्रक का नाम - मृत्युंजय शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है) - भारतीय
पता - अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
5.सम्पादक का नाम - माता भगवती देवी शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है) - भारतीय
पता - शान्ति कुंज हरिद्वार
6.उन व्यक्तियों के नाम व पते जो समाचार - पत्र के स्वामी हो तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदारी या हिस्सेदार हो - मृत्युंजय शर्मा
मैं मृत्युंजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता है कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य है।
दिनाँक 19.02.88
प्रकाशक के हस्ताक्षर
मृत्युंजय शर्मा
भगवान महावीर का जन्म आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व हुआ था। काल की दृष्टि से देखा जाए तो यही कहा जा सकता है कि वे पुराने पड़ गये। यह सही भी है क्यों कि महावीर का अवतरण जिस युग में हुआ था, वह गणतंत्र का वर्चस्व-काल था। आज जनतंत्र का विकास हो रहा है। परिस्थितियों में जमीन आसमान जितना अन्तर आ गया। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनके सिद्धान्त बेकार हो गये, जरा-जीर्ण हो गये, उसकी धार समाप्त हो गयी। उनने जिस अनेकान्त दर्शन की नींव रखी, उसके शाश्वत सिद्धान्त मानवी विकास और सह अस्तित्व के उन्हीं तथ्यों का प्रतिपादन करते है, जो समान और राष्ट्र की प्रगति के लिए, सुख शान्ति के लिए आवश्यक है।
यह बात नहीं कि उनने मात्र थोथे सिद्धान्त भर प्रतिपादित कर अपनी छुट्टी पा ली, वरन् उन सिद्धान्तों व जीवन मूल्यों को समाज में प्रतिष्ठापित करने के लिए चोर संघर्ष भी किया। ऐसा संघर्ष, जिसे व्यक्तिगत जीवन का अपूर्व पराक्रम कहा जा सके। कथनी और करनी में समानता के प्रबल पक्षधर होने के कारण उनने जो कुछ कहा, उसे उनके दिखाया। तत्कालीन तमसाच्छन्न समाज में चित्र विचित्र प्रकार की प्रथा परम्पराएं धर्म के नाम पर जी रही थी। कही देवताओं को प्रसन्न करने के लिए निरीह पशुओं की बलियाँ चढ़ायी जा रही थी तो कहीं ऐसे कृत्य हो रहे थे, जिन्हें पैशाचिक ही कहा जाता है। चारों ओर अनैतिकता और अमानवीयता ही सिर उठाये थी। नारी शक्ति प्रतिबन्धित थी। उसे पुरुषों के हाथ की कठपुतली माना जाता था।
इन पाखण्डों ने अपनी जड़ें इतनी मजबूत जमा ली कि समाज व्यवस्था ही चरमरा गयी थी। ऐसे में भगवान महावीर ने समाज से इन प्रपंचों को दूर करने का कठोर
संकल्प लिया। वे शान्तिप्रिय थे और अहिंसा में विश्वास रखते थे। अतः अहिंसक समाज रचना के लिए सदा प्रयत्नशील रहे। उनका कहना था कि समाज परिवर्तन के लिए क्रान्ति आवश्यक है, पर वह क्रान्ति अहिंसक हो, रक्तहीन हो। उनका मानना था कि जिस क्रान्ति में हृदय परिवर्तन की क्षमता हो, वहीं सबसे बड़ी क्रान्ति है। इसीलिए वे जीवन भर सदा प्यार प्रेम की शिक्षा देते रहे और इसी के माध्यम से समाज के शहतीर को खोखला करने वाले चुनों को निकालने में सफल हो सके। उनने ना तो कभी जातिवाद का समर्थन किया, न सम्प्रदायवाद क्षेत्रीयतावाद का। मनुष्य को सदा मनुष्य जाति के रूप में देखा। एक ऐसी जाति के रूप में जिसमें न कोई ऊंच हो, न नीच कोई बड़ा न छोटा वरन पूरा समुदाय स्नेह, सद्भाव, सहयोग, सहकार की धुरी पर खड़ा हो। उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में ही उस आदर्श समाज का निर्माण संभव हो सकता है, जिसमें व्यक्ति का, समाज का और युग का समग्र विकास शक्य हो। वे दूसरों पर अपना रौब–दौब गाँठने, अधिकार जताने के प्रबल विरोधी थे। आत्मानुशासन को भगवान महावीर सबसे पवित्र शासन मानते थे। वे कहते थे कि यदि शासन ही करना हो तो स्वयं पर करो, अपने शरीर, वाणी मन और आत्मा पर करों आत्मसाधना सबसे उत्तर शासन हैं यदि इससे स्वयं पर अधिकार और नियंत्रण पा सको, तो हर प्रकार से कल्याण ही होगा। इस राह पर लोगों को ले जाने के लिए उनने स्वयं आत्मा साधना की, अपने को कसौटी पर खरा सिद्ध किया और इस प्रकार समाज में मानवी मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वयं प्रेरणा स्रोत बने, तभी आज युग उनकी जय गाथा गा रहा है।
उनका जीवन दर्शन सार्वकालिक है-चिरप्राचीन और चिरनवीन के सीमा बन्ध से सर्वथा परे। जैसी सामर्थ्य उनमें तब थी वह शक्ति उनकी विचारधारा में आज है। भगवान महावीर हमारे बीच नहीं है उन उनसे शाश्वत सिद्धान्तों में जीवन को दिशा देने की वही क्षमता अक्षुण्ण विद्यमान है।
निरीह समझे जाने वाले पशु पक्षियों, कीट पतंगों को भी प्रकृति के ऐसे अनुदान मिले है जिनके आधार पर वे अपना सुखमय जीवन व्यतीत करते रहते है। कई प्राणी सभ्य मनुष्य की तरह आदर्श गृहस्थ का जीवन पर्यन्त परिपालन करते हुए देखे जाते है। इनकी प्रेम सम्बन्धी क्रियायें प्रतिक्रियायें अतिरोचक एवं आकर्षक होती है। प्रेम प्रस्तावित करने के लिए यह कैसे कैसे तरीकों का प्रयोग करते हैं, यह जानकार सचमुच आश्चर्य होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार मूक पशु पक्षी भी स्वयंवर प्रथा को अपनाते हैं एवं एक पत्नीव्रत धारण कर जीवन पर्यन्त इसका निर्वाह करते है। ऐसी धार्मिकता एवं त्याग प्रवृत्ति को अपनाकर यह सफलतापूर्वक जीवन जीते है। डिग डिग जाति का हिरन एक पत्नि व्रतधारी होता हैं हाथियों की प्रणय कहानी भी इसी तरह की है। हाँ, अपनी बिरादरी के विपरीत लिंग के प्रति वे तभी आकर्षित होते हैं जब जोड़े में से एक की मृत्यु हो जाती है। मनुष्यों में से कम ही ऐसे नियम पालन करने वाले होंगे।
चिंपेंजी बन्दर एक आदर्शवादी जीवन जीता है। इनके विश्राम गृह वृक्षों पर होते है। रात्रि में उसके पत्नि, बच्चे विश्राम करते हैं। और नर चिंपेंजी उनके रक्षार्थ वृक्ष के नीचे बैठा रहता हैं यह जीवन भर पत्नीव्रत धर्म का परिपूर्ण निष्ठा से पालन करता है। अन्य प्राणियों की तुलना में यह अधिक बुद्धिमान भी होता है। मानव शिशु के समतुल्य ही चिंपेंजी शिशुओं का विकास होता है।
कई चिंपेंजी महिलाओं को भी अपने मनोरंजन का केन्द्र बना लेता है। मास्को की मैडम कोहिता ने चिंपेंजी के अध्ययन हेतु एक को कठघरे में बन्द करके रखा। एक सुनहरे वाला वाली खूबसूरत लड़की रसोईघर में भाजन बनाया करती थी। कुछ समय बाद चिंपेंजी ने रीझकर विभिन्न अदाओं से उस पर अपने स्नेह सद्भाव का प्रकटीकरण प्रारंभ किया। इसी बीच नौकर ने एक अवरोधक पर्दा मध्य में डाल दिया। इस पर क्रुद्ध होकर चिंपेंजी ने नौकर को खाना रखते समय आक्रोश का शिकार बनाया और काट खाया।
सामान्यतया मनुष्य अपने प्रेम भाव को व्यक्त करने के लिए जो जो क्रियायें करता है, वे सभी क्रियाएं छोटे जीव जन्तुओं में भी पाई गयी है- जैसे कि अभिवादन, शिष्टाचार, उपहार देना, सुगन्धित पदार्थ देना, गले मिलना आदि। झींगुर साधारण रूप से सामान्य अवसरों पर अपने पंखों के आरी जैसे दाँतों में 87 प्रतिशत का ही उपयोग करता है। किन्तु प्रेम प्रस्ताव के समय 89 प्रतिशत का ही उपयोग करता है किन्तु प्रेम प्रस्ताव के समय 59 प्रतिशत दाँतों का उपयोग करके विशेष ध्वनि उत्पन्न करता है। इतना ही नहीं उनके पंखों के जोड़ों से एक प्रकार का मधुर एवं स्वादिष्ट चाकलेट जैसा पदार्थ स्रवित होता रहता है जिसको मादा झींगुर आनन्द से ग्रहण करती हैं
महान कवि कीट्स ने प्रकृति में कीट पतंगों की प्रेम चेष्टाओं से मुग्ध होकर अपनी अत्युत्तम कविता “ओड टू आटम” में उनके संगीतों एवं नृत्यों का विशद वर्णन किया हैं वैज्ञानिकों में कवि हृदय की रसिकता पाना तो मुश्किल है परन्तु डॉक्टर मोरिस बर्दन ने में फ्लाई नामक मक्खियों के झुण्डों को नदियों के किनारे प्रारंभ में तेजी से पंख फड़फड़ाते हुए ऊपर उड़ते और फिर मंद गति से ताल एवं लयबद्ध होकर समूह में मंडराते देखा तो उन्होंने भाव विभोर होकर कहा “ कीट पतंगों की भावनाओं का पत्ता लगाने का तो हमारे पास कोई साधन नहीं है लेकिन उनकी इन कलात्मक चेष्टाओं के रसास्वादन करने से हमें कोई वंचित नहीं कर सकता”
पक्षियों में नर पक्षी प्रणय प्रस्ताव के साथ साथ अपनी कुशलता एवं सद्भावना प्रकट करने के लिए माद की मनुहार करते है। उनका प्रयत्न भर रहता है पर अन्तिम फैसला मर्जी का साथी चुनने की छूट होती है। निराश नर मुंह लटकाये वापस चले जाते है पर प्रतिशोध किसी से भी नहीं लेते है - न प्रस्तावित प्रेयसी से, न उसके वरण किये साथी से। मनुष्य ही है जो मादा की वरिष्ठता स्वीकार करने के अननुनच करते और अपनी इच्छा थोपते देखे गये हैं। मोर हंस जैसे नर पक्षी नृत्य करते, उपहार देते तो देखे गये हैं पर आक्रमणात्मक रुख कभी भी नहीं अपनाते। इस संबंध में उन्हें नारी की स्वतंत्रता और वरिष्ठता का सदा सम्मान करते देखा गया है। मनुष्यों की तरह वे मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते है।
बर्ड ऑफ पैराडाईज नाम की न्यूजीलैण्ड में पायी जाने वाली चिड़िया एक विशेष ऋतु में विवाह करती है। एक शक्ति में नर और दूसरी में मादायें खड़ी हो जाती हैं। बाल एवं वृद्ध पक्षी तीसरी पंक्ति में विवाहोत्सव देखने के लिए खड़े रहते हैं। नर पंक्ति में से स्वस्थ एवं परिपक्व उम्र के अपनी पंक्ति से निकल कर बाहर आते और नृत्य करते हैं। इस नृत्य से खुश होकर कोई मादा अपनी पंक्ति से आती है और नर की चोंच से चोंच मिलाकर प्रणय स्वीकृति दी है। इसी तरह का नृत्य आयोजन दक्षिण अफ्रीका की दी डार्न्सस बर्ड भी करती है। इसे सभ्य स्वयंवर की संज्ञा दी जा सकती हैं ध्रुवों पर के पेंगुइन पक्षी मुँह में पत्थर ले जाकर प्रणय स्वीकृति की याचना भर करते हैं और स्वीकृति को अपना सौभाग्य मानते हैं।
हंस सामान्यतः प्रवासी पक्षी है। ठंड से बचने के लिए प्रतिवर्ष प्रायः 3000 मील से अधिक दूरी की यात्रा करके वे अपने निश्चित स्थान पर जाते है और लगभग छः महीने पश्चात् पुनः अपने स्थान पर लौट आते हैं। प्रवास यात्रा में सफल होने की प्रौढ़ता के संबंध में आश्वस्त हो जाने के उपरान्त हंस अपनी गृहस्थी बसाने की बात सोचते हैं और उसके लिए पत्नि ढूंढ़ने से पूर्व घर बनाने के प्रयत्न में जुटते है। इसके लिए वे सबसे ऊंचे पेड़ का चुनाव करते है। जो प्रायः चालीस पचास फुट के होते है तथा गहरे पानी के समीप होते है। इस पुरुषार्थरत नर का पराक्रम देख कर इसी बीच कोई दा उसे अपना सहचर वरण कर लेती है और भवन निर्माण में उसका पूरा पूरा साथ देती है। नर और मादा दोनों मिल कर सूखी घास के तिनके एकत्र करते है। मादा उनको घोंसले के निर्माण में लगाती सजाती है। अपने पुराने पंखों का भी उपयोग कर लेती है।
घोंसला बन जाने पर मादा उसमें गृहणी बन कर बैठ जाती है, नर हंस पहरेदारी ही नहीं मनुहारी भी करता रहता है। समयानुसार मादा का प्रसव काल आने पर अंडे सेने का काम दोनों मिल कर करते है। जून की गर्मी में अंडों से पीले रंग की चोंचे निकल आती है जिन्हें देखकर दोनों प्रसन्नता से झूम उठते है। डों से बच्चे बाहर निकलने के तुरन्त बाद नर हंस पेड़ के नीचे बैठ जाता है और मादा अपनी चोंच से हल्के किन्तु निर्दयतापूर्वक नवजात शिशु को घोंसले से बाहर नीचे की ओर धक्का दे देती है। जमीन पर पहुँचते ही नर अपने पंखों से उसको सहारा देता है इसी तरह क्रमशः वे सब बच्चों को उड़ना सिखाते है। तैरने की कला तो उनमें जन्म जाता रूप से पाई जाती है। मादा आगे आगे चलती है, बच्चे पंख फड़फड़ाते हुए उसके पीछे चलते हैं और नर सबसे पीछे उनकी देखभाल करने के लिए चलता है। जलचर प्राणी, शिकारी पक्षी, बिल्ली आदि से बचने के लिए वे अपने बच्चों को कुछ साँकेतिक भाषा सिखाते है। हंस के पंख साढ़े पाँच फुट तक के लम्बे होते है और बिल्ली आदि को तो एक झपट्टे में भगा देते है। अपने चारों ओर का वातावरण सुरक्षित है या नहीं, यह जानने के लिए हंस अपने बच्चों को विभिन्न साँकेतिक प्रक्रियाएं भी सिखाते है। लगभग तीन महीने में बच्चे ऊंची उड़ाने भरना सीख जाते हैं बच्चों की सुरक्षा, भरण पोषण ही नहीं वे उन्हीं सुयोग्य बनाने में भी कुछ उठा नहीं रखते।
हंस समाज बना कर रहते और सहकारी जीवन जीते है। आवश्यकतानुसार एक दूसरे की सहायता भी करते है। किसी के चोट लगने या घाव हो जाने पर बड़े स्नेह से एक दूसरे की देख भाल किया करते है। सितम्बर, अक्टूबर में ठंडक शुरू होते ही वे हजारों की संख्या में अंग्रेजी अक्षर वी के आकार में किसी एक नेता के अनुशासन में हजारों मील की उड़ान आरंभ करते है। इस लम्बी यात्रा में समूह के प्रत्येक सदस्य को अपने झुण्ड का नेतृत्व करने का कठिन उत्तरदायित्व भी सौंपा जाता है। प्रतिदिन वे 10 से 15 घंटे तक उड़ते रहते हैं। रास्ते में विभिन्न स्थानों में ठहरे हंस साथ हो लेते है और नये नये साथी मिलते पर हंस व्यक्त करते है। जीवन यात्रा का सच्चा आनन्द उठाने के लिए हीन पशु-पक्षियों से मनुष्य बहुत कुछ सीख सकता है।
रेल, मोटर आदि यंत्रों को यदि लगातार चलने दिया जाए तो वे अत्यधिक गरम होकर बिगड़ने लगते है। मनुष्य शरीर की भी यही बात है दिमाग की भी वे लम्बे समय तक काम तो कर सकते है, पर बीच बीच में विश्राम माँगते है। रात को सो लेने पर प्रातः नई स्फूर्ति लेकर उठा जाता हैं। साप्ताहिक विश्राम ले लेने पर अगले सप्ताह अधिक अच्छी तरह काम करते बन पड़ता है। बीच बीच में उपवास करके पेट को छुट्टी मना लेने का अवसर मिल जाने पर पाचन तंत्र में जो गड़बड़ी होती है वह ठीक हो जाती है। इसी प्रकार दैनिक कार्य विधि चाहे कितनी ही लम्बी या कठिन हो बीच बीच में विश्राम चाहती है।
पर यह सब कैसे संभव हो? दफ्तर में पलंग थोड़े ही बिछा होता है। कारखाने में मध्यकालीन एक घंटे का अवकाश तो मिलता है, पर वहाँ इतना खाली स्थान नहीं होता कि मजदूर पैर फैला कर देर तक सो सके। ऐसे बहुत कम लोग होते है, जिन्हें मध्याह्न काल में थोड़ा सो लेने की निश्चिन्तता पूर्वक सुविधा मिल जाती हो। सामान्य जन तो उस से वंचित ही रहते है। ऐसी दशा में दोपहर बाद उनकी कार्य क्षमता घट जाती है। और जितना काम दोपहर तक निपटा लेते है उसकी तुलना में मध्याह्नोत्तर कहीं कम कर पाते है। यद्यपि वे अपने दायित्व को निभाने में प्रयत्न तो बन ही रहते है।
विश्राम की मध्यवर्ती आवश्यकता का वर्तमान परिस्थितियों में किस प्रकार तालमेल बैठ सकता है। इसका उत्तर ‘शिथिलीकरण मुद्रा’ के रूप में मिल जाता है। यह क्रिया सरल है। इसे किसी भी समय पन्द्रह मिनट खाली दीखने पर सहज ही किया जा सकता है, किसी भी परिस्थिति में। दुकानदार भी तब कर सकते है जब उनकी दुकान पर भीड़ न हो। अपने स्थान पर बैठे हुए भी उसे किया जा सकता है। किसी ऐसे स्थान की जयरत नहीं पड़ती जो एकान्त हो और जिसमें सोने जितने पैर फैलाने पड़। उसके लिए थोड़ी सी जगह से भी काम चल सकता है। आराम कुर्सी जैसे कुछ प्रबंध हो जाए तो बात अधिक अच्छी तरह बन जाती है। अन्यथा दीवार से पीठ लगा कर कमर के पीछे तकिया लगा कर पैर उतने आगे तक फैलाये जा सकते है, जितनी दूर कि वे आसानी से फैल सके।
शिथिलीकरण मुद्रा में करना इतना भर होता है कि शरीर को पूरी तरह ढीला कर दिया जाता है। मन को भी कोई कल्पना, चिन्ता आदि करने से रोक देना पड़ता है। दोनों की प्रत्यक्ष गतिविधियों बन्द हो जाने से भी उतना विश्राम मिल जाता जिससे पिछली थकान उतर सके और अगला काम करने के लिए ताजगी मिल सके।
स्थान यथासंभव ऐसा चुनना चाहिए जिसमें कोलाहल न हो रहा हो ऐसा होने से ध्यान बंटता है और वह एकाग्रता नहीं आने पाती जिसकी कि इस हेतु आवश्यकता है।
पैर फैला कर हाथों को लम्बा करके बैठने का उद्देश्य यह है कि किसी भी अंग अवयव पर तनाव न हरे। सभी रुई के ढेर जैसे हलक फुलके प्रतीत हो। ध्यान जमाना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि निद्रा की स्थिति में अवयवों पर जैसी शिथिलता चढ़ती है वैसी चढ़ने लगी है। मस्तिष्क भी निद्रा के समय अपनी घुड़ दौड़ बन्द कर देता है। ऐसी स्थिति बिना गहरी निद्रा आये पूरी तरह तो नहीं बन सकती, पर संकल्प शक्ति के आधार पर उसका आधा अधूरा रूप तो बन ही जाता हैं इस स्थिति में उतनी देर रहने का प्रयत्न करना चाहिए, जितना अवकाश हो। जितनी देर इस तन्द्रा में रहने का निश्चय किया हो।
आरंभ में थोड़ी कठिनाई पड़ती है। चैतन्य और उत्तेजित अवयवों को तन्द्रा की स्थिति में कैसे पहुँचाया जाय। इसमें संकल्प शक्ति का अधिक प्रयोग करना पड़ता है। यथार्थता से विपरीत स्थिति बनाने के लिए समर्थ मनोबल की आवश्यकता पड़ती है। इससे ढीलापन रहे तो अंग पड़े ही बने रहते हैं और जिस प्रयोजन के लिए यह किया गया था वह पूरा नहीं होता।
अच्छा हो आरम्भिक अभ्यास घर पर रह कर किया था। मुलायम बिस्तर पर पैर फैला कर चित्त स्थिति में इस प्रकार लेटा जाए जैसे कि सोते समय शरीर की स्थिति की है। आँखें बन्द कर ली जाए। तेज प्रकाश जल रहा हो। उसे बुझा दिया जाए। ध्यान किया जाए कि गहरी नींद होने के बिलकुल समीप हैं। निद्रा से पूर्व जो स्थिति शरीर मन की बनती है वह बन रही है। अंग निश्चेष्ट हो रहे उनमें से अकड़न धीरे धीरे समाप्त होती चली जा रही मनन भी थक कर अपनी कोठरी में बैठ गया। कल्पनाएं, चिन्ताएं सभी समाप्त हो गई। यह कृतिक निद्रा की स्थिति है। यह मनोबल के आधार उत्पन्न की जाती है। आरम्भ में शरीरगत उत्तेजना और इच्छा शक्ति की आकाँक्षा के बीच संघर्ष चलता है। शरीर अपनी जागृति का परिचय देना चाहता है, जबकि इच्छा शक्ति उसे शयन जैसे स्थिति में चले जाने के लिए बाधित करती है। यह संघर्ष आरम्भ में कई दिन चलता रहता है। फलता धीरे धीरे मिलती है, किन्तु अंततः विजय मनोबल की ही होती है। इच्छित शिथिलता प्रकट होने लगती है और निद्रा विजय का लाभ मिलने लगता है। अभ्यास हो जाने पर यह सरल हो जाता है कि दफ्तर या कारखाने में भी इस तंद्रा स्थिति को उत्पन्न करके उसके सहारे थकान दूर करने का लाभ उठाया जा सके। भले ही हर सफलता थोड़ी ही देर की क्यों न हो।
निद्रा आवाहन का यह उपयोगी प्रयोग है। जिन्हें निद्रा की शिकायत रहती है वे इस अभ्यास के सहारे नींद में कुछ ही देर के प्रयोग से बुला सकते है। आमतौर से नींद अपनी मन मर्जी से आती है उसके लिए कई लोग तरसते रहते है। देर से या कम मात्रा में हलकी नींद आने पर थकान बनी रहती है। बिस्तर, छोड़ने पर भी आलस्य छाया रहता है। बिस्तर, छोड़ने पर भी आलस्य छाया रहता है। शरीरी थका, टूटा सा लगता है। किन्तु जिन्हें गहरी और पूरी नींद आती है। उन्हें स्फूर्ति भी मिलती है और प्रसन्नता भी। नींद एक प्रकार का पोषण है जो थके, माँदे अवयवों को अथनव पोषण प्रदान करता है। क्षुधित व्यक्ति को भोजन मिलने पर जिस प्रकार का संतोष होता है वैसा ही सोकर उठने पर भी अनुभव होता है। निद्रा को बुलाना और भगाना अपने वश में हो जाए तो समझना चाहिए कि एक बड़ी सिद्धि हाथ लग गई। इस उपलब्धि को हस्तगत करने के लिए कुछ दिनों उपरोक्त शिथिलीकरण मुद्रा की साधना करनी पड़ती है। आरम्भ में यत्किंचित सफलता ही मिलती है। पर निरंतर लगे रहने पर अभ्यास न छोड़ने पर उस प्रयोग की सफलता सुनिश्चित हो जाती है। नींच को समय पर बुला सकना इस आधार पर संभव हो जाता है। इसके अतिरिक्त दिन में कई बार इस प्रयोग को करते हुए थकान से छुटकारा पाया जा सकता है और कई स्फूर्ति का लाभ लिया जा सकता है।
अभ्यास काल में निरंतर यह अनुभव करना होता है कि सभी अंग शिथिल हो रह है। इच्छा शक्ति के आदेश का पालन कर रहे है। कठोरता त्याग रहे है और निर्जीव जैसे बन रहे है। चेतनाजन्य उत्तेजना से छुटकारा पा रहे है। इस प्रयोग को आंखें बन्द करके किसी भी समय किया जा सकता है। कोलाहल रहित किसी भी स्थान पर, आवश्यक एवं सुविधा के अनुरूप इच्छित समय तक यह स्थिति बनाये रहना संभव हो जाता है।
उन दिनों जापान में खाद्य पदार्थों पर कन्ट्रोल था। प्रत्येक व्यक्ति को भोजन तौल कर दिया ता था। फौजी सेवा से निवृत्त जनरल यामागुची की खुराक मिलने वाले भोजन से कहीं अधिक थी। कन्ट्रोल से प्रतिदिन जो भोजन उन्हें मिलता था, वह तो केवल उनके नाश्ते के लिए ही पूरा हो पाता था। भोजन की कमी के कारण बूढ़े जनरल दिनों दिन कमजोर होने लगे। आस पास के लोगों को असलियत का पता लगा। तब मुहल्ले भर के लोगों ने अपने अपने हिस्से में से थोड़ा थोड़ा अंश भोजन का बचा कर उनके पास ले गये। उन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और कहा “भाई मैं तो साल दो साल में मर जाऊंगा। उन लोगों के हिस्से का भोजन कैसे ले सकता हूँ, जो अभी स्वस्थ है, जवान हैं और जिन पर दो का भार है”
प्राणियों एवं वृक्ष वनस्पतियों का जीवनदाता सूर्य को माना गया है। प्रकाश किरणों के अभाव में पेड़ पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाने पर वे पीले पड़ते और दम तोड़ते हुए देखे जाते है। उपयुक्त नमी एवं खाद्य सामग्री के साथ सूर्य ताप की पर्याप्त मात्रा मिलते रहने पर उनकी नयनाभिराम हरियाली देखते ही बनती है। वनस्पति जगत पर सूर्य का यह प्रत्यक्ष प्रभाव है। अन्यान्य ग्रह नक्षत्र भी अपने सूक्ष्म प्रभाव से इन्हें प्रभावित करते रहते है। सूर्य के बाद चन्द्रमा का इन पर अधिक प्रभाव पड़ता है। यहीं कारण है कि वनौषधि विज्ञान के ज्ञाता विशेषज्ञ जड़ी बूटियों का रोपण एवं उनका संग्रहण किन्हीं विशेष तिथियों नक्षत्रों में करते है। इस समय विशेष में उनके गुणों में वृद्धि होती है साथ ही वे पूर्ण परिपक्व भी हो जाती है।
.... वैज्ञानिक हैविड काम्बे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “द मैजिक ऑफ हर्ब्स” में लिखा है कि वनौषधियों का ज्योतिर्विज्ञान से सीधा सम्बन्ध है। इन पर ग्राह नक्षत्रों का प्रभाव कैसे पड़ता हे, यह जानने के लिए एस्ट्रोहर्बल मेडिसिन के इतिहास का अध्ययन करना आवश्यक है। वनौषधि विज्ञान का प्रणेता महर्षि चरक को माना जाता है। उनने प्रत्येक जड़ी बूटी का गहन अध्ययन किया और गुण धर्मों के आधार पर उनका वर्गीकरण किया। पाश्चात्य वैज्ञानिकों में एस्ट्रोलाजिकल हर्बेलिस्ट के रूप में निकोलस कप्पिर अधिक विख्यात है। इनका जन्म 1616 में एक पादरी के यहाँ हुआ था। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उनने चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु राष्ट्रीय संघर्ष के दौरान पार्लियामेण्ट में अत्यधिक व्यस्तता के कारण हृदय एवं क्षय रोग से ग्रस्त हो गये। इसी मध्य उनने ज्योतिर्विज्ञान का अध्ययन किया और तद्नुरूप जड़ी बूटियों की चिकित्सा प्रारंभ कर दी। स्वस्थ हो जाने पर अपने अनुभवों के आधार पर चिकित्सा उपचार कने लगे, जिससे उनके पास मरीजों की भीड़ बनी रहती। अपने अनुभवों को उन्होंने “कल्पिपर हर्बल्स” नामक प्रसिद्ध पुस्तक में लिपिबद्ध किया है। आज भी वह पुस्तक अपने विषय की प्रामाणिक कृति मानी जाती है। उनकी स्मृति में लंदन में कल्पपर हाउस नामक मकान में सोसायटी ऑफ हर्बलिस्ट काम कर रही है। इस संस्था की मान्यता है कि वैज्ञानिकों द्वारा ईजाद की जाने वाली नई नई दवाओं की अपेक्षा प्राकृतिक वातावरण में पाई जाने वाली वनौषधियाँ कहीं अधिक उपयोगी, लाभकारक एवं सस्ती है। आवश्यकता इतनी भर है कि सही समय पर उपयुक्त स्थलों से ही उनका चयन किया जाए।
पंद्रहवीं शताब्दी के प्रख्यात चिकित्साविद् मर्सेलो फिक्नों ने अपनी पुस्तक “लिबडी विटा” में बताया है कि जिस प्रकार विभिन्न राशियों एवं ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव मानवी काया के विभिन्न भागों पर पड़ता है, उसी तरह पेड़ पौधे भी इनसे प्रभावित होते है। हैपोक्रेटस, गेलेन तथा रेनसाँ आदि की यह मान्यता थी कि प्रत्येक वनौषधि चिकित्सक को ज्योतिर्विज्ञान का विधिवत् ज्ञाता होना आवश्यक है। इंग्लैण्ड के वनौषधि शास्त्री डॉ कैरिचर तथा जर्मनी के प्राँक की भी यहीं मान्यता है। इंग्लैंड के राबर्ट अर्नर ने “बोटानोलाँजिया” नामक चिकित्सा विज्ञान की शाखा का विस्तार किया है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने अंतर्ग्रहीय प्रभावों का शारीरिक क्रियाओं एवं वनौषधियों पर होने वाले असर के अनेकों प्रयोगों का संकलन “एस्ट्रोलाजिकल काँरेस्पोन्डेन्स” के रूप में किया है, जिसमें विभिन्न रोगों के लिए अलग अलग वनौषधियों को ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के अनुरूप उपयोग करने की विधि बतलाई गई है।
इस संदर्भ में नार्थ वैर्स्टन युनिवर्सिटी इसीनोटा के मूर्धन्य जीवविज्ञानी डॉक्टर फ्रैंक ब्राउन द्वारा की गई खोजबीन अधिक महत्वपूर्ण हैं उन्होंने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में कहा है कि मनुष्य के अतिरिक्त वृक्ष वनस्पतियों पर ग्रह नक्षत्रों का विशेषकर चन्द्रकलाओं का प्रभाव पड़ता है। उन पर किये गये ग्यारह वर्षों के गहन अध्ययन के तहत उन्होंने पाया कि इनका विकास क्रम चन्द्रमा की .... के घटने बढ़ने से संबंधित है। अंकुरित आलू के हुए टुकड़ों को प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में इन तापमान और आर्द्रता में रखकर उसके अन्दर होते पोषक पदार्थों के मेटोबोलिज्म तथा पौधों द्वारा वीजन की खपत की स्थिति का मापन किया गया। इस .... में डॉक्टर ब्राउन ने पाया कि उस चयापचय में चन्द्रमाओं के समान उतार चढ़ाव था। चयापचय की गति के समय सबसे कम और जब चन्द्रमा का आकार तीन .... होता है तो इस अवधि में आक्सीजन की खपत अधिक होती है। इस तथ्य की पुष्टि दूसरे पौधे पर किये गये विभिन्न प्रयोग परीक्षणों से भी हुई है।
वस्तुतः जड़ी बूटियों की एक प्रौढ़ परिपक्वावस्था होती सी में उनके उपयोगी रसायन अधिक मात्रा में भरते कच्ची स्थिति में उन्हें काट लिया जाए तो रसायनों .... से आधी चौथाई मात्रा में उन्हें काटा लिया जाए तो रसायनों से आधी चौथाई मात्रा में ही विकसित हो पाती है बात समय निकल जाने के बाद भी लागू होती है। कि उनकी वृद्धावस्था आ जाती है और प्रभाव शक्ति जाती है।
धान के पौधे पशु बड़े चाव से खाते है और जिन्हें अवसर मिले वे मजबूत होते है। ठीक इसी प्रकार पक्षियों की एक जवानी होती है। धान पक जाने कट .... जो डंठल पुआल रूप में रह जाते है, उनका फिर .... उपयोग नहीं होता इसी प्रकार जड़ी बूटियाँ .... जाती है उनके बीज बनकर बिखर जाते हैं तो फिर समझना चाहिए कि वह वयोवृद्ध सत्रवनस्पति चिन्ह पूजा जैसी ही रह गई।
ज्योतिष में वनस्पतियों के उस समय का निर्धारण है जिसमें ये प्रौढ़ होती है। नक्षत्र विद्या के ज्ञाता आसानी से समझ सकते है कि किन दिनों किस वनस्पति का गुण पूर्ण या न्यून रहेगा। इसी चिरपुरातन विधा के आधार पर आदि काल से वनौषधियों का प्रयोग मनुष्यों एवं जीव मात्र के लिए होता चला आ रहा है। अब समय क्षेप के साथ उपचार प्रक्रिया कृत्रिम होती चली गई है जो कि वातावरण के साथ साथ मानव जीवन के लिए भी हानिकारक है। कहते है कि इतिहास अपने को दुहराता है। आज पाश्चात्य जगत जो अत्याधुनिक प्रगति कर शीर्ष शिखर पर जा पहुँचा है, तनाव उद्वेग विक्षोभ संक्षोभों से पीड़ित है। उसे राहत के लिए लौटकर वनौषधि विज्ञान की ही शरण लेनी पड़ी है। फ्राँस, पश्चिम जर्मनी, हंगरी, इंग्लैण्ड आदि देशों में गत पाँच वर्षों में वनौषधियों का प्रचलन बड़ी तेजी से बढ़ा है। यही नहीं उनकी ज्योतिर्विज्ञान के साथ विलक्षण संगति को अब विज्ञान सम्मत सिद्ध किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं कि हम जो कि इस विद्या के मूल प्रणेता है, अपने देश में पुनः इस चिकित्सा पद्धति की स्थापना कर लोकोपयोगी बनाये। कहीं ऐसा न हो कि हम वनौषधियों को टोना टोटके से थोड़े रहकर उनकी उपेक्षा करते रहे एवं बाद में “योगा” के पाश्चात्य देशों को सिखाने के बजाए उनसे सीखने की विडंबना हमें अपनानी पड़ जाए।
एक चींटी कही चली जा रही थी। बीच में दूसरी चींटी मिल गयी। दोनों ने बात चीत की। अतिथि .... ने सुख संवाद पूछा, तो वहाँ खड़ी चींटी ने कहा “बहन! और तो सब ठीक है, पर मुँह खारा बना रहता है।” अतिथि चींटी ने कहा “तुम नमक के पर्वत पर रहती हो, फिर मुँह खारा क्यों नहीं होगा? .... मेरे पास। मैं मिश्री के पहाड़ पर रहती हूँ। वहाँ तुम्हारा मुंह मीठा हो जायेगा। वह अतिथि चींटी के साथ चल पड़ी। वहाँ पहुँचने पर भी उसका मुँह मीठा नहीं हुआ। उसने कहा मुँह में नमक की डली ही नहीं लाई हो।?” वह तो है, पहली चींटी ने कहा। बहन नमक को छोड़े बिना मुंह कैसे मीठा होगा।
पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाये बिना कोई आदमी सैन्य को नहीं पा सकता।
मनुष्यों में से अधिकाँश का जीवन किसी न किसी प्रकार के सपने देखते हुए बीतता है। ऐसे कम ही लोग है जो वस्तुस्थिति जानते और यथार्थता की पृष्ठभूमि में समय बिताते है। तत्वज्ञान का उद्देश्य मनुष्य को सत्य और असत्य की पहिचान कराना है और उस भगवान तक ले पहुँचना है जिसे सत्य नारायण कहते है। हम सत्य नारायण की कथा तो कहते सुनते है, पर निर्वाह झूठ वातावरण में करते है।
मनुष्य बचपन से ही सीखना आरम्भ करता है। अभिभावक और परिवार जन जो भाषा बोलते है, जैसा भोजन करते है जैसी गतिविधियां अपनाते है, वैसी ही बालक भी अपनाने लगता है। अनुकरण प्रिय स्वभाव उसे नियति के उपहार रूप में मिला है। यह जो देखता है, उसी की नकल करने लगता है। कालान्तर में यही उसका स्वभाव बन जाता है। धीरे धीरे यह मान्यता आस्था बनती और उसी ढाँचे में चरित्र व्यक्तित्व ढल जाता है।
आवश्यक नहीं कि एक व्यक्ति की जो मान्यता हो, जैसी आदतें हो, वैसी ही अन्य वातावरण में पले व्यक्ति का स्वभाव भी हो। दोनों के बीच भारी असमानता हो सकती है यहाँ तक कि सर्वथा विपरीत रुख भी हो सकता है। कसाई के घर जन्मे और जैन धर्मी के यहाँ पले बालक की प्रवृत्ति सर्वथा भिन्न हो सकती है। एक माँसाहार में स्वाद लेता और औचित्य देखता है जबकि दूसरे को उससे सर्वथा घृणा होती है और पाप भी प्रतीत होता है।
ये स्वभाव अभ्यास की परतें इतनी मोटी और गहरी बन जाती है कि अपना पक्ष ही तथ्य और सत्य प्रतीत होता है। बुद्धि पूर्वाग्रही का ही समर्थन करती है। उसकी उपमा चतुर वकील से दी गई है जो मोटी फीस देने वाले मुवक्किल के पक्ष में ढेरों तर्क और सबूत जुटा देती है। वेश्या को जहाँ भी लालच दीखता है, वहीं प्रेम प्रदर्शित करने लगती है। उचित अनुचित का विभाजन उनके लिए बहुत ही झीना होता है। आत्मा समीक्षा बहुत कठिन है। यह तभी संभव है जब अनेक मान्यताओं का बारीकी से अध्ययन किया गया हो साथ में इतनी निष्पक्षता भी हो कि आपने पराये पूर्वाग्रह को निरस्त करके सच्चाई की गहराई तक पहुँच सकने की भी संभव हो। कभी कभी ऐसा भी होता है कि सहानुभूति के झुकाव किसी एक स्थापना की ओर ढुलकने लगे तो फिर यह संभव हो नहीं रहता कि समग्र यथार्थता की रक्षा हो सके। जिस धर्म, जाति, पड़ोस का वातावरण के साथ आना गहरा सम्बन्ध रहा है, उसकी छाप न्यूनाधिक मात्रा में रहती है। तराजू का काँटा तनिक सा फर्क रहने पर पल को ऊंचा नीचा कर देता है। सच्चाई को खोज निकालना कठिन है, फिर उसका अपनाना तो और भी अधिक जटिल है। मान्यताओं का भ्रम भी एक प्रकार का सपना है। जिस दबाव से मनुष्य उसी प्रकार से सोचता और वैसा ही क्रिया कलाप अपना लेता है। इस संदर्भ में उसे यह सन्देह नहीं होता कि जो अपना लिया गया है वह अपने लिए सर्वसाधारण के लिए कितना उपयोगी एवं उचित है।
अन्याय मान्यताओं वाले लोगों की भी यही गति होती है। वे अपनी मान्यताओं को अपनाये रहते हैं। इस प्रकार विभेद की खाई चौड़ी रहती है और वह बैर विग्रह के रूप तकाजा पहुँचती है। सम्प्रदाय सम्प्रदायों के बीच देश-देश के बीच, जाति जातियों के बीच इसी प्रकार मारकाट मच रहती है कि पक्ष विपक्ष को अपनी ही मान्यता सच मालूम पड़ती है और भिन्न विचार वालों पर सारा दोष थोप दिया जाता है। सब ओर से न्याय और औचित्य की गुहार जाती है पर वस्तुतः किस की बात में कितना सच्चाई अंश है यह कहना कठिन है। ऐसी दशा में सत्य अवलम्बन किस प्रकार बन पड़े और वास्तविकता है कि औचित्य किस प्रकार सूझे?
सत्य का अवलम्बन लिए बिना न कोई चैन से सो सकता है और न बैठने दे सकता है। न जीतता है न जीतने दे सकता है। जिस ममता और एकता की नितान्त आवश्यकता है, उन्हें इन विभेदों के रहते प्राप्त नहीं किया जा सकता। उस उपलब्धि के बिना न्याय की रक्षा नहीं हो सकती और न ऐसा कुछ हो सकता है कि मैत्री निभ सके और हंसती हंसाती जिन्दगी जी सकना संभव हो सके।
दार्शनिक विचारणायें भी इतनी ही जटिल है। ईश्वर आत्मा, परलोक अवतार, चमत्कार एवं पौराणिक मिथकों के सम्बन्ध में किसे सच माना जाए किसे झूठ? विशेषतया तब जबकि भिन्न मत मतान्तरों में न केवल भिन्न वरन् सर्वथा प्रतिकूल अभिव्यक्तियों की भरमार है। इनमें से किसी एक को सच तथा अन्य सबों को झूठ भी नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार सब को सही ठहराने पर भी जमीन आसमान जैसी भिन्नताओं के रहते समन्वय की बात भी नहीं बनती। यह हो सकता है कि अपनी मान्यता को प्रमुखता देते हुए अन्य मतों के प्रति अपेक्षा सहिष्णुता के भाव रखे जांय। यह मन समझाने और किसी प्रकार तालमेल बनाये रहने का काम चलाऊ उपचार मात्र है।
अच्छा होता निष्पक्ष मनीषियों की एक प्रतिनिधि पंचायत बनती और यह तथ्यों का पता लगाने की अपेक्षा इतना भर निष्कर्ष निकालती कि किन मान्यताओं को अपनाने से व्यक्तिगत चरित्रनिष्ठा और समाजगत न्यायशीलता की रक्षा किस प्रकार हो सकती है। इस निष्कर्षों को स्वीकारने अपनाने के लिए मूर्धन्य विज्ञजन सहमत हो। उनका तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरणों समेत प्रतिदिन प्रचार करे तो धीरे धीरे अन्य विचार शक्ति वाले लोग भी उसे अपनाते चले जायेंगे मनुष्य में जहाँ हठवादिता की प्रवृत्ति है, वहाँ उसे विवेक के प्रति भी श्रद्धा है। विवेक एवं न्याय के पक्षधर यदि आगे आये तो दुराग्रहों की कट्टरता का बहुत हद तक समाधान हो सकता है।
विलास, व्यामोह, अहंकार, पूर्वाग्रह के स्वप्नों में उलझते सुलझते लोग अपना अपना ताना बाना बुनते रहते हैं। सपने भी तो हर रात हर व्यक्ति अलग अलग प्रकार के देखता है। उन्हें मनोरंजक उड़ाने समझ कर संतोष कर लेता है। संसार में फैली हुई विविध मान्यताओं के सम्बन्ध में यदि ऐसी ही उड़ती दृष्टि रखी जाए तो कहीं अच्छा है कि उनमें से किसी एक ही परिपूर्णता पर ध्यान दिया जाए।
सत्य की तलाश एवं उपलब्धि के लिए यह उपयुक्त होगा कि प्रचलित अनेकानेक मान्यताओं में उलझने की अपेक्षा मात्र मानवी गरिमा और सामाजिक सद्भावना की बात सोची जाए और उतने पर ही जोर दिया जाए, जिससे कि न्याय औचित्य की एकता और समता की समझदारी ईमानदारी की रक्षा होती हो।
मनुष्य प्राणियों में श्रेष्ठ और धरती का देवता माना जाता है। उसे स्मरण रखना चाहिए कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता हर हालत में बनाये रखी
आइन्स्टीन अपना बैग उठाये राजमहल पहुँच और महारानी को अपने आने की सूचना भिजवायी। जब रानी ने अपने अधिकारियों की अज्ञानता के कारण हुई असुविधा के लिए खेद बात के लिए दुख न करे मुझे पैदल चलना बहुत अच्छा लगता है।
दैवी सहायता में उच्चकोटि के देवताओं की अनुकम्पा तो सम्मिलित है ही साथ ही दिवंगत पितरों के अनुदान भी आते है जो कि अपने स्वभाववश किन्हीं की उपयोगी सहायता करना चाहते है। पर उनका संपर्क उच्चस्तरीय व्यक्तियों से ही बनता है। घिनौने और कुकर्मियों का साथ न तो पितर देते है। और न देवता। दुर्गन्धित स्थान से हर कोई बच निकलना चाहता है। उसी प्रकार दिव्य शक्तियाँ भी कुकर्मियों के आह्वान अनुरोध को स्वीकार नहीं करती, जब कि सत्पात्रों को वे स्वयं ही तलाश करती रहती है। और अच्छे साथी के साथ सहयोग का आदान प्रदान करते हुए वे अपने सहयोग की सार्थकता अनुभव करते हुए प्रसन्न भी होती है। सत्पात्रों को वे सद्प्रेरणाएं एवं मातृपितृवत् स्नेह प्रदान करती हैं ऐसी अदृश्य सहायता के बलबूते अपनी निजी सामर्थ्य की तुलना में उन्हें कहीं अधिक कार्य कर गुजरते देखा जाता है।
विश्व में ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान है जिसमें लोगों पर पितर आत्माओं का स्नेह बरसा, उनकी सहायता मिली। इतना ही नहीं वे संबंधित व्यक्ति के पास प्रमाण स्वरूप अपना स्मृति चिन्ह भी छोड़ गये। रोम में विश्व का एक ऐसा ही अद्भुत एवं आश्चर्यजनक संग्रहालय है जिसमें पितर चिन्हित वस्तुओं के अनेकानेक प्रमाण संग्रहित है। इस संग्रहालय को “हाउस ऑफ शैडोज” के नाम से जाना जाता है। इसे “पितरों का गृह” भी कहते है। इसमें तरह तरह के छाया चित्र, तैल चित्र वस्त्र आभूषण, तख्त तथा मूर्तियां आदि रखी हुई है, जिन्हें मरने के बाद वापस आई हुई सूक्ष्म शरीर धारी आत्माओं की निशानी कहा जाता है।
इसी संग्रहालय में सदाम लीलियों नामक एक महिला के पुत्र की ब्रुशर्ट भी रखी है, जिसकी आस्तीन पर सूक्ष्म शरीर धारी मृतात्मा माँ की हथेली का जला हुआ निशान भी है। घटना 12 जून, सन् 1987 की है। जब मृत्यु के सत्ताईस वर्ष बाद मद्रास की दिवंगत आत्मा पुनः अपने बेटे से मिलने और उसकी सहायता करने आई। अपने लाडले बेटे को उसने बड़े अरमानों से पाला पोसा, पढ़ाया-लिखाया और योग्य बनाया था। पर दुर्भाग्यवश माँ की मृत्यु के पश्चात् वह कुसंगति में फंसकर दुर्व्यसनों का आदि हो गया। प्रयत्न करने पर भी छुटकारा नहीं मिल रहा था। इन परिस्थितियों में उसे अपनी माँ की बराबर याद आती रहती। उसकी स्थिति को देखकर मृतात्मा माँ को बड़ा कष्ट हुआ। आकर उसने दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणामों से बेटे को अवगत कराया और उससे छूटने के उपाय सुझाए। सद्प्रेरणाएं दी। इस अलौकिक सत्परामर्श को सुनकर लड़के ने अपनी पाप वृति का प्रायश्चित माँ के सामने ही किया और भविष्य में ऐसे दुष्कृत्य न करने का दृढ़ संकल्प लिया। दिवंगत माँ की आत्मा ने विदा होते समय प्रमाण के लिए बेटे की ब्रुशर्ट पर अपने हाथ का जला हुआ चिन्ह भी छोड़ दिया, जिससे उसका विश्वास बना रहे कि माँ की आत्मा से सचमुच ही उसका साक्षात्कार हुआ था! इस घटना ने बेटे की दिनचर्या तथा आचरण में आमूल चूल परिवर्तन कर दिया। धीरे धीरे उसने अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पा लिया।़
इसी तरह की एक प्रार्थना पुस्तकों को इसी संग्रहालय में 1900 ईसा में रखा गया, जिस पर पितरात्माओं की उंगलियों के प्रतीक चिन्ह है जिसकी वजह से पुस्तक के पन्नों में जलने के छेद जैसे हो गये है। इसकी घटना भी बड़ी ही विचित्र है। मारगेरिटा डेमर नाम की एक महिला की सास को मरे करीब 30 वर्ष हो चुके थे। अचानक ही उसकी आत्मा मारगेरिटा के पास आई और कहने लगी “मेरी शाँति एवं सद्गति के लिए तुम्हें एक तीर्थ यात्रा तथा दो प्रार्थना सभाओं का आयोजन करना चाहिए” मारगेरिटा ने उनकी इच्छा आकाँक्षाओं के अनुरूप वैसा ही किया। पितरात्मा प्रसन्न चित्त होकर बोली - मैंने अब साँसारिक भव बन्धनों को पार कर लिया है और मुक्ति पा चुकी हूँ। लम्बे वार्तालाप के बाद आत्मा विदा होने लगी, तोरह गगेरिटा ने उससे कोई स्मृति चिन्ह छोड़ जाने का अनुग्रह किया जिसे वह हमेशा देखती रहे। सास ने बहू के विनम्र निवेदन को स्वीकार करते हुए पास में रखी प्रार्थना .... पर हाथ रख दिये जिससे वह झुलस सी गयी .... उसके कुछ पृष्ठों में सूराख भी हो गये। संग्रहालय में भी अनेकानेक वस्तुओं का संग्रह है, जो बड़ी ही रहस्यमय और आश्चर्यजनक प्रतीत होती है। संग्रहालय संरचना ही बड़ी विचित्र है। उसमें चारों तरफ अंधेरा अंधेरा दीखता है एक भी रोशनदान नहीं मिलेगा। दर्शकों को अंधेरी गलियों में होकर ही गुजरना पड़ता है।
अवांछनियताओं के निवारण और अनीति के निराकरण की सत्प्रेरणा पैदा करने तथा उस दिशा में आगे बढ़ने वालों की मदद करने का काम भी ये सदाशयी पितरात्माएं करती है। उदात्त आत्माएं पितर के रूप में .... की सहायता के लिए सदैव प्रस्तुत रहती है। इसकी आत्मीयता की परिधि अति विस्तृत होती है। पथभ्रष्ट लोगों को कल्याण पथ में नियोजित कर देना ही अपना कर्तव्य मानती है।
ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में आजकल भटकती पितरात्माओंकक की घटनाएं कोई नई बात नहीं रह गई। अपितु तेरहवीं सदी से ही यह ताँता अब तक चला आ रहा है। वर्ष 1231 में गरीब वर्ग के छात्रों के सहायतार्थ सेंट पाल अस्पताल का निर्माण हुआ था। ब्रिटेन के एक पादरी रेवरेंड जेफरी जान के अनुसार जब से इस अस्पताल में नींव की खुदाई हुई है, तभी से इसमें भटकती हुई तरह तरह की चित्र विचित्र आकृतियाँ नजर आ रही है। नहीं खाली कमरों में गाने बजाने तथा नाचने की कृतियाँ भी छात्रों को स्पष्ट सुनाई देती है। इन आत्माओं के शांति के लिए समय समय पर प्रार्थना सभाएं भी आयोजित की जा चुकी है। धर्म पुरोहितों का कहना है कि उनसे भयभीत होने की कोई बात नहीं है। ये पितरों की ही दिवंगत आत्माएं हैं जो छात्र जीवन को कल्याणकारी मार्ग पर चलने क लिए प्रेरणास्पद संकेत दे रही हैं।
पद्म पुराण का एक प्रसंग बहुचर्चित है कि राजा दशरथ के अतिशय पुत्र मोह वृत्ति के कारण मुक्ति नहीं हो पाई थी, तो भगवान राम ने पुष्कर में अपने पिताश्री का श्राद्ध कर्म सम्पन्न कर उनको अर्पण किया था। तभी उनका साँसारिक मोह से पीछा छूटा। आज भी वहाँ का जल कुण्ड जनश्रद्धा का आकर्षण केन्द्र बना हुआ है। लोग मान्यता है कि इस पवित्र कुण्ड में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के साथ मंगल का योग बिठाने की स्नान किया जाए तो विशेष प्रकार की शाँति मिलती और श्रद्धास्पद वातावरण नवनिर्मित होता है। इसी के फलस्वरूप पुष्कर को ब्रह्मा के तीर्थ, तीर्थराज की मान्यता मिली है।
पितृ लोक को चन्द्र लोक के नाम से भी जाना जाता है। आश्विनी मास के कृष्ण पक्ष की मृतक तिथि में पितरों के श्राद्ध किये जाने का विधान शास्त्रोक्त है। वैज्ञानिकों ने भी अब इसकी महत्ता को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। उनके कथनानुसार इन दिनों चन्द्रमा अन्य महीनों की तुलना में पृथ्वी के अधिक निकट हो जाता है। फलतः उसकी आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी तथा उसमें नित्रासरत प्राणियोँ पर अधिक पड़ता है। ऐसी स्थिति में चन्द्र लोक के ऊपरी भाग में रहने वाली सूक्ष्म शरीर धारी पितरात्माएं भूलोक की संपत्ति से सहज ही श्रद्धा स्वरूप श्राद्ध स्वीकार कर लेती है। सशक्त रेडियो क्रिस्टल देश देशान्तरों तक की सूचनाओं को खींच सकने में सक्षम होता है उसी तरह की सच्ची श्रद्धा पितरों के प्रति विकसित कर ली जाए तो उनके स्नेह, सहयोग और सत्परामर्शों का लाभ आसानी से उठाया जा सकता है।
सामान्य स्तर के लोग पितरों की छाया को देखते ही डरने लगते है, जबकि डराना उनका उद्देश्य नहीं होता। यदि हम अपने आश्रित व्यक्तियों की सेवा सुश्रूषा करके उन्हें मृत्यु पर्यन्त प्रसन्नचित्त रखे तो वे पितर योनि में पहुँच कर भी हमारे लिए अपने अन्त करण में स्नेहसिक्त भावनाएं संजोए रहते है। प्रेम और ममत्व की यही भावना हमारे दुख सुख में साथी सहयोगी बन जाती है। प्रतिकूल या अनुकूल परिस्थितियों में हम अपने पूर्वजों को श्रद्धासिक्त होकर स्मरण करे तो वे हमारे साथ निश्चित रूप से उपस्थित रह कर सत्प्रेरणा का स्रोत सिद्ध होते है। अपने अनुदान सतत् बरसाते हैं।
व्रत यों प्रधानतया आत्मिक होते है। उनका प्रयोजन दोष, दुर्गुणों, स्वभाव, संस्कारों का उदात्तीकरण है। अनौचित्य को दृढ़तापूर्वक छोड़ना और अभीष्ट को संकल्प पूर्वक अवधारण करना, यही है-व्रतशीलता। अन्तरंग पर छाये हुए मलीनता के कुहासे को हटा देने से आत्म ज्योति की आभा उभरती है। उसी के प्रकाश में दिशा धारा का अवलंबन करने पर वास्तविक और सर्वतोमुखी प्रगति बन पड़ती है।
आमतौर से मनुष्य पर चंचलता, असिरता छायी रहती है। किसी निश्चय पर देर तक स्थिर रहना बन नहीं पाता। विशेषतया आदर्शवादी निश्चयों के लिए संकल्पवान होना तो ओर भी कठिन है। पानी का नीचे की ओर बहना स्वाभाविक है। ऊपर उठाने के लिए विशेष उपाय अपनाने और विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ती है। अध्यात्म विज्ञान की उपलब्धि एक ही है-अन्तरंग क्षेत्र की पवित्रता, प्रखरता एवं उत्कृष्टता। इस लक्ष्य की उपलब्धि के लिए मनोनिग्रह की साधना करनी पड़ती है। वह संकल्प बल की स्थिति सुदृढ़ न हो तो कुसंस्कारों से पीछा छूटता ही नहीं और उत्कर्ष की कल्पना कार्यान्वित होने के स्तर तक पहुँचती ही नहीं अस्तु साधना क्षेत्र में कारगर प्रगति करने के लिए संकल्प शक्ति को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया से कार्यारंभ करना होता है।
यह कार्य छोटे छोटे व्रत लेते रहने और उन्हें पूरा करते रहने से बन पड़ता है। संकल्प टूटने से निराश होती है और भविष्य में कोई बड़ा कदम उठाने की, बड़ी हिम्मत करने की उमंग नहीं उठती जबकि प्रतिज्ञाएं पूरी होते चलने पर आत्म विश्वास बढ़ता है और साहस का परिपोषण होता है।
इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए व्रत संकल्पों को लेते रहने और उन्हें पूरा करते चलने का विधान है। इस अवधारणाओं को शास्त्रकारों ने तप तितीक्षा के नाम से निरूपित किया है।
अध्यात्म-आदर्शों के मार्ग पर चलने के लिए अभ्यस्त आदतों में व्यवधान पड़ता है। कुटुम्बी संबंधी उस दिशा में कदम बढ़ाने से रोते है, कारण कि इससे असीम उपार्जन में भी कभी आती है और पुण्य परमार्थ जैसा कुछ करने पर भी घर के सुख साधनों में कटौती होती दीखते है। अतएव उनका विरोध असहयोग स्वाभाविक भी है। प्रचलन भी वैसा नहीं है। आदर्शों पर आधारित गतिविधियाँ अपनाते हुए इर्द–गिर्द के लोग दीखते भी नहीं सभी को संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति के लिए आपाधापी करते देखा जाता है। इसलिए तथाकथित स्वजनों द्वारा पूजा पाठ के लिए तो कुछ छूट तो इसलिए मिल जाती है कि उस आधार पर देवी देवताओं को वशवर्ती बनाकर सुविधा सम्पन्नता प्रदान करने वाले वरदान मिलने की आशा रहती है, किन्तु यथार्थवादी अध्यात्मक में तो आत्मपरिष्कार एवं पुण्य परमार्थ के लिए कुछ करना आवश्यक होता है। इसके लिए न अपना अभ्यास होता है और न स्वजनों का सहयोग समर्थन। जिन्हें चलना है एकाकी संकल्प अपना कर ही आगे बढ़ने का संकल्प जुटाना पड़ता है। उसका अभाव रहने पर आदर्शवादी आकाँक्षाएं मात्र कल्पना बन कर रह जाती है। कदम बढ़ाने पर आन्तरिक दुर्बलता और वातावरण की प्रतिकूलता समाने आ खड़ी होती हैं इससे निपटने के लिए साहस भरे संकल्प को अपनाते के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। अन्त प्रेरणा के अनुरूप आत्मविश्वास उभारना और मानवी गरिमा को प्रखर बनाने वाले प्रयासों में निरत होना उच्चस्तरीय संकल्प शक्ति पर ही अवलम्बित।
इस विशिष्टता को अंकुरित करने, सींचने और परिपक्वता की स्थिति तक पहुँचाने के लिए सर्वप्रथम व्रतशीलता को समर्थ साधना के रूप में अपनाना पड़ता है। स्वाध्याय-सत्संग से सद्विचार तो उठते है और सद्भाव भी उभरते है पर उन्हें प्रत्यक्ष परिपोषण न मिलने से समुन्नत चिन्तन पोषण के अभाव मुरझाते सूखते ही जाता है। इस अड़चन से निपटने के लिए छोटी छोटी दिक्षाएं अपनाने और उन्हें पूरा करते रहने का सिलसिला चलाया जाना चाहिए। तितिक्षाएं प्रमुखतया आदर्शवादी साहसिकता को उभारने के लिए ही की जाती है।
सामंत सुविधाओं एवं आदतों को कुछ समय के लिए की सीमा तक रोक देने का दुस्साहस ही व्रत तप है। खान पान के संबंध में उपवास प्रसिद्ध है। कुछ समय के लिए नमक छोड़, शक्कर त्यागना, उबला आहार छोड़ना, घी छोड़ देना, पक्वान्न मिष्ठान न लेने जैसी प्रतिज्ञा ना व्रतशीलता का एक अंग है। मन इन्हें ग्रहण करने के लिए लिए ललचाता है। बार बार इच्छा उठती है। पर उनको संकल्प का स्मरण करते हुए निरस्त करना पड़ा है। मनोनिग्रह है, आत्म विजय भी।
आहार के अतिरिक्त अमुक अवधि तक ब्रह्मचर्य करने की प्रतिज्ञा करना भी इस स्तर की साधना है। शीत कम को सहन शक्ति की सीमा तक सहन करना भी इसी का व्रत गिना जाता है। थोड़ी सर्दी लगती ह रहे, थोड़ी सदी अपना प्रभाव डालती रहे, ऐसी तितिक्षा भी मनोबल .... है। जूते न पहनना, बाल बढ़ा कर सौंदर्य प्रदर्शन के संदर्भ में मन मारना भी ऐसा ही साहस है। ऐसे छोटे छोटे .... थोड़ी थोड़ी अवधि के लिए यदि एक एक करे किये जाते रहे तो उनके पूरा होते रहने पर मन की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है और वह भौतिकता के आकर्षण में बहते जाने जैसे दुर्बल स्थिति में नहीं रहता। उसमें चौड़ी .... को तैरकर पार कर सकने जैसा पराक्रम उभर आता है। छोटी सफलताएं प्राप्त करने पर मानसिक स्तर इतना समर्थ हो जाता है कि और बड़े संकल्प कर सके, बड़े कदम उठा सकने और उनके पूरा होने तक प्रगति पथ पर दृढ़ता पूर्वक अड़ा रहे। महामानवों द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले महान कार्यों की पृष्ठभूमि यही रहती रही है। अणुव्रत की महत्ता इसीलिए गाई गई है।
द्रौपदी ने कौरवों द्वारा अपमान किये जाने का प्रतिशोध करने की प्रतिज्ञा पूरी न होने तक के लिए बाल बखेर लिए थे। उन्हें फिर तभी बाँधा जब वह प्रण पूरा हो गया चाणक्य ने भी अपने अपमान का बदला लेने के लिए तब तक चोटी में गाँठ न लगाने की घोषणा की थी जब तक कि प्रतिशोध पूरा न हो जाए। यह आक्रोश भरे संकल्प थे पर उदार चेता किसी। सत्प्रयोजन के निमित्त ही व्रत धारण करते है। उनका लक्ष्य रचनात्मक और सुधारात्मक होता है।
परिवार के लोग पढ़ने लिखने में रुचि नहीं लेते तो उनमें उत्साह उभारने के लिए गृहपति जमीन पर सोने की चारपाई का उपयोग न करने की घोषणा करते देखे गए है। इस प्रकार के छोटे सत्याग्रह भी उपेक्षा को उलट कर सत्प्रयोजन के लिए उत्साह उत्पन्न करते देखे गये है। पुस्तकालय ने बनने तक प्रौढ़ शिक्षा न चल पड़ने तक के लिए कुछ व्रत लिये जा सकते है। इसका प्रभाव अपना निज का उत्साह प्रयास अक्षुण्ण बनाये रखने में सहायक होता हैं। दूसरे लोगों में भी सहानुभूति जगती है और वे पहले जिस प्रसंग में उपेक्षा बरतते थे, उसमें सहानुभूति
गंगा तट पर नरोरा क्षेत्र में हर वर्ष बाढ़ का पानी आकर नुकसान पहुँचाता था। वहाँ रहने वाले हरी बाबा ने औरों में उत्साह न देखकर स्वयं ही बाँध बनाने का संकल्प लिया और फावड़ा टोकरी लेकर अकेले ही उस काम में जुट गये। देखा देखी उस गाँव के ही नहीं अन्य गाँवों के लोग भी स्वेच्छा से श्रमदान के लिए आने लगे। फलतः कुछ ही महीनों में बाँध बंधकर तैयार हो गया। फरियाद द्वारा नहर खोद जाने का संकल्प वालों को निज का साहस, दूसरों का सहयोग और दैवी अनुग्रह साथ देता है और महान प्रयोजनों की पूर्ति कराता है
हर व्यक्ति अपनी स्वतंत्र ईकाई है। उसे अपनी समस्यायें सुलझाने और प्रगति की व्यवस्था बनाने का ताना बाना स्वयं ही बुनना पड़ता है। कठिनाइयाँ आती और चली जाती है। सफलता मिलती और प्रसन्नता की झलक झाँकी कर देने के उपरान्त स्मृतियाँ छोड़ जाती है। दिन और रात की तरह यह चक्र चलता ही रहता है। कोई जीवन ऐसा नहीं बना जिसमें ज्वार भाटे न आते हो। निष्क्रियता की तरह निश्चिंतता भी मरण का चिन्ह है। जीवन एक संग्राम है जिसमें एक एक कदम पर गुत्थियों को सुलझाते हुए चलना पड़ता है। पहाड़ों की चोटियों पर जम जाने के उपरान्त दूसरे के लिए जगह बनाने की सोचते है। नीचे कितनी गहरी खाई रह गई, इसे देखने से डर लग सकता है, ऊपर कितना चढ़ना बाकी है यह जानने के लिए चोटी की ऊंचाई आँकना हैरानी उत्पन्न करेगा।
इस यात्रा के लिए अटूट धैर्य और साहस की आवश्यकता है, इससे भी अधिक इस बात की कि हर हालत में सन्तुलन बना रहे। सन्तुलन डगमगा जाना आधी सफलता हाथ से गवाँ देना और वजन को दूना बढ़ा लेना है। हर समझदार आदमी को हर गाँठ बाँध रखनी चाहिए कि जन्म के समय वह अकेला आया था। मरने के समय भी चिता पर अकेले ही सोना है। अपना खाया ही अंग लगता है। अपने पढ़ने से ही शिक्षित बना जाता है। यह काम किसी और से नहीं कराये जा सकते। अपने बदले में किसी और को सोने के लिए नौकर रखा जाए तो नींद की आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती। रास्ता अपने पैरों ही चल कर पार करना पड़ता है। रोग की व्यथा स्वयं ही सहनी पड़ती है। पड़ोसी और संबंधी, सहायता करने के जो काम है।, उन्हें कर सकते है पर चढ़ी हुई बीमारी को सहन करने के लिए अपने ऊपर नहीं ले सकते। इसलिए स्वावलम्बी बनने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। स्वावलम्बन से ही स्वाभिमान की रक्षा होती हैं। नौकरों और सहायकों की बहुलता काम सरल तो बना सकती है पर उन पर सब कुछ छोड़कर निश्चित हो जाना भूल है। इंजन बुझा दिया जाए और डिब्बों को दौड़ते हुए आगे स्टेशन पर जा पहुँचने का हुक्म देना समझदारी नहीं है।
यों प्रत्यक्ष काम तो हाथ पैर ही करते है, पर वास्तविकता यह है कि उनके पीछे जुड़ी रहने वाली मन की शक्ति ही अधिकाँश जुगाड़ बिठाती है। इसलिए छोटा बड़ा जो भी काम करना हो उसमें मन को सही स्थिति में संलग्न होना आवश्यक है। मन डगमगाया तो समझना चाहिए कि नाव का संतुलन बिगड़ा। बुद्धिमान वे है जो अपने मन को सही स्थिति में रखे रहते है। सड़क पर मोटर के पहिये दौड़ते है और सवारियाँ सीटों पर बैठती है, पर ढक्कन के नीचे लिया हुआ इंजन ही यात्रा पूरी करता है। तेल पानी चुक जाए या गड़बड़ा जाए तो अच्छी तरह रंग रोगन की हुई गाड़ी भी मंजिल पार न कर सकेगी।
चूल्हा बिलकुल ठंडा हो, नाम मात्र की गर्मी हो तो रसोई पकने की प्रतीक्षा में ही बैठा रहना पड़ेगा। इसके विपरीत यदि ईंधन अन्धाधुन्ध जलने लगे तो जो पकाया जा रहा है, उबल कर नीचे गिरेगा अथवा जल भुन कर राख हो जाएगा। रसोई सही समय पर सही ढंग से पके इसके लिए आवश्यक है कि चूल् की आग समतुल्य बनी रहे। मस्तिष्क ऐसा ही चूल्हा है जिस पर उपयोगी सामान सही तरह से पकने के लिए तापमान संतुलित रहना चाहिए। सही तरह से सोचना और करना इससे कम में बन ही नहीं सकता।
कठिनाई या असफलता के लक्षण देखने ही हड़बड़ा जाना बुरी बात है। सफलता की हल्की सी झलक झाँकी देखने ही फूले न समाने जैसी अहंकारी स्थिति बना लेना ओछेपन का लक्षण है। ऐसे आदमी बड़े काम कभी पूरा नहीं कर पतों। उन्हें आधी अधूरी स्थिति में ही काम की इति श्री समझनी पड़ती है। शेष मंजिल को छोड़कर बीच में ही बैठे रहते है। बिगड़ा हुआ संतुलन पूरी बात सोचने और मंजिल के अन्तिम चरण तक पहुँचने की स्थिति ही नहीं बनने देता। कछुए और खरगोश की दौड़ में खरगोश इसलिए बाजी हरा कि ओछेपन ने उसे लगातार श्रम नहीं करने दिया और थोड़ी सी सफलता को ही काम बन जाना मान बैठा कछुआ इसलिए जाता कि अपनी धीमी चाल और लम्बी मंजिल की बात को भली प्रकार समझते हुए भी निराश नहीं हुआ और लगातार हिम्मत के साथ चलते रहने में ढीला नहीं पड़ा। धीरज और हिम्मत बनाए रहने वाला हर कछुआ बाजी जीतता है तब कि उतावले खरगोश सक्षम होते हुए भी मात खाते है।
जीवन कर्मभूमि है। इसमें खिलाड़ी का मन लेकर ही उतरा जाता है। खिलाड़ियों के सामने पग पग पर हार जीत भी उछलती कूदती रहती है। अभी लगता है कि हार अभी दीखता है कि जीते। दोनोँ ही परिस्थितियों में वे समान मन से जुटे रहते है। हार जाने पर जीतने वाले से लड़ने मरने पर उतारू नहीं होते वरन् हाथ मिलाते और बधाई देते है। जीत जाने पर इस तरह इठला कर नहीं चलते मानों कोई किला जीत कर आये हो। हारने वालों का तिरस्कार करना बेहूदों का काम है। वे कुशल खिलाड़ी नहीं माने जाते।
ओछे आदमियों की एक और पहचान है कि अपनी राई रत्ती सफलता को दस जगह सुनाते और बढ़ चढ़ कर गीत गाते है। उनका मतलब रौब गाँठना और दूसरों के मुंह से अपनी प्रशंसा सुनना होता हैं अपने पौरुष पराक्रम को वे पर्याप्त नहीं मानते। सुनने वाले उसकी बड़ाई के गीत गाये तब उन्हें विश्वास होता है कि वे समर्थ है और सफल रहे हैं। इसी प्रकार अपनी कठिनाइयों को भी दस जगह कहते है ताकि उन्हें अधिक लोगों की सहानुभूति सुनने को मिले। इतने में ही कठिनाई का हल हो जाए तो बात दूसरी है अन्यथा यदि यह आशा लगाई गई हो कि सहानुभूति के साथ साथ सहायता भी बरसेगी, लोग हाथ बंटायेंगे तो यह मान्यता गलत है। हारे हुए को अयोग्य और मूर्ख माना जाता है। अपनी ख्याति इसी रूप में करना अपेक्षित हो तो अपनी कठिनाइयों और असफलता को जगह जगह गाते फिरने में हर्ज नहीं सफल होने वालों की प्रशंसा करने तो कई लोग सुनते है और उन्हें समझदार भी मानते है पर कठिनाइयों में फंसे हुए लोगों से बचने की कोशिश करते है कि कहीं हमें भी उनकी सहायता के झंझट में न फंसना पड़े। फलता की शेखी बघारने वाले को शेखीखोर और अहंकारी कहा जाता है। इसलिए दोनों ही प्रकार की चर्चायें न केवल निरर्थक वरन हानिकारक भी है। गंभीर व्यक्ति की मेहनत जिम्मेदार और सूझबूझ ही उसका सम्मान बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।
आवश्यक नहीं कि परिस्थितियाँ सदा आपके अनुकूल ही हो। आवश्यक नहीं कि दूसरे आपको सही समझ ही और न्याय करें ही। हो सकता है कि बिलकुल उलटी चल पड़। ऐसी दशा में क्रोध से भर जाना और आवेश में आना भी आपकी कठिनाई को हल नहीं कर सकता। दूसरों की गलती सुधारने के लिए क्रोध प्रकट करना और आवेश में आना ही कोई हल नहीं निकालता वरन बिगड़ी बात को और भी अधिक बिगाड़ सकता है। हो सकता है आपके क्रोध को दूसरा आदमी अपना अपमान समझ और बदले में दूना क्रोध प्रकट करें और अपमान पर उतर आये। ऐसी दशा में गुत्थी और भी दूनी उलझ जाती है। समाधान के लिये, अब क्या करना चाहिए, दूसरा कोई सही रास्ता सूझता ही नहीं। प्रसंग एक ओर रखा रह जाता है। मानापमान, शत्रुता एवं प्रतिशोध का नया सिलसिला चल पड़ता है। बात को इतनी आगे बढ़ाने की अपेक्षा यही उचित था कि ठंडे दिमाग और मधुर शब्दों में अपना पक्ष प्रस्तुत करते रह जाता। चुप हो गा होता अथवा प्रसंग बदल कर कोई ऐसी दूसरी बात आरंभ की गई होती। एक बार बाजी हार जाने पर खिलाड़ी दूसरा दौरा शुरू करते है। यही रवैया हमें हर प्रसंग में अपनाना चाहिए, विशेषतया प्रतिकूल अवसर खड़ा होने पर।
किसी मित्र या सहयोगी से आड़े वक्त में आप सहायता की आशा करते थे पर उसने सहानुभूति तक न दिखाई। इसमें भी आवेश क्रोध करने की आवश्यकता नहीं। किन्हीं से आपके अच्छे सम्बन्ध रहे हो, इसे आप अपनी सज्जनता का तकाजा समझे। जितने अधिक लोगों के साथ आपके सद्भाव रहे उतना ही अच्छा पर इसका मूल्य कोई आपकी सहायता करके चुकाये यह आवश्यक नहीं। आप अपने निज के बल पर विश्वास कीजिए। इतना साहस रखिये कि अपनी गुत्थियों को अपने बलबूते सुलझा लेंगे न सुलझेगी तो उस अन सुलझा स्थिति से भी काम चलायेंगे आपकी इच्छानुरूप सारी समस्याओं का हल निकलता रहे यह आवश्यक नहीं। गुत्थियाँ और भी अधिक उलझ सकती है। प्रतिकूलताओं का दबाव और भी अधिक बढ़ सकता है। यह अनुमान लगाकर चलेंगे तो आप जीवन संग्राम के सच्चे खिलाड़ी कहे जा सकते है। खिलाड़ी का पहला और आवश्यक गुण यह है कि वह हारती हुई मुख मुद्रा में भी संतुलित मन स्थिर और निश्चय वाला होना चाहिए। उसके लिए तैश, आवेश किन्हीं भी परिस्थितियों में क्षम्य नहीं है। हर आदमी खिलाड़ी तो नहीं हो सकता, पर उसे समझदार तो होना ही चाहिए। समझदारी की जिम्मेदारियाँ खिलाड़ी जिम्मेदारी से किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसका स्वभाव उससे भी घटिया नहीं होना चाहिए। उसका मानसिक स्वास्थ्य सही रहना चाहिए।
बीमारियों को यदि दो भागों में विभक्त करना पड़े तो उनमें एक आवेशजन्य और दूसरी अवसादजन्य होगी। रक्तचाप के उदाहरण से इसे और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक हाई ब्लड प्रेशर दूसरा लो ब्लड प्रेशर। मानसिक रोगियों में एक किस्म उत्तेजितों की है। दूसरी अवसाद ग्रस्तों की। अवसाद ग्रस्त अर्थात् निराश, उदास, आलसी, अकर्मण्य, डरपोक, कायर आदि। उत्तेजितों में क्रोधी, आवेश ग्रस्त, जल्दबाज, झगड़ालू आदि दुःस्वभाव ग्रस्त। दो ही प्रकृति वाले अस्वाभाविक जीवन जीते है और अर्ध विक्षिप्त कहलाते है। यदि उनके सामने कोई गुत्थी या कठिनाई आए तो वे उसे हल करना तो दूर अपनी मानसिक अस्त–व्यस्तता के कारण दूनी बढ़ा लेंगे। सफलता के अवसर सामने होंगे तो उन्हें जल्दी ही गंवा देंगे। ऐसे लोग इस या उस प्रकार असफल ही रहेंगे। हैरानी उन्हें हर घड़ी घेरे रहेगी
शारीरिक रोगों के मूल्य में भी इन दो को गिना जा सकता है। डरपोक आदमी अपनी भीरुता और कुकल्पना के कारण ही बेमौत मरते है। एक बार ब्रह्माजी ने मौत को दो हजार आदमी मार लाने का आदेश दिया। जब वह वापस लौटी तो चार हजार साथ थे। जवाब तलब किया गया तो मौत ने सफाई दी कि उसने तो दो हजार ही मारे। शेष तो मरने के डर से भयभीत होकर अपने आप मर गये और उसके साथ साथ चल दिये। आवेश ग्रस्तों के बारे में यह बात और भी बढ़ा चढ़ा कर सही जा सकती है। ठंडक लगने से जितने समय में मौत होती है आग में झुलसने पर उससे कहीं जल्दी प्राण निकल जाते है। क्रोधी अपने रक्तमांस को ही नहीं जीवनी शक्ति को भी निरन्तर जलता है और अपने को खोखला बनाता रहता है। फिर कोई नाम मात्र का बनाहा मिलने पर बीमारियों से ग्रसित होकर स्वेच्छापूर्वक मौत के मुँह में घुस पड़ता है। ऐसे लोग निश्चित रूप से अकाल मृत्यु मरते हैं। अपने आपको निरंतर जलाते रहने का और क्या परिणाम हो सकता है?
क्रोधी आदमी समझता है कि वह सत्य का पक्षपाती है। जो लोग गलती करते है, उन पर गुस्सा आता है। यह शब्द कहने सुनने से निर्दोष मालूम पड़ते है, पर है तथ्यों से विपरीत। गलती करने वाले को क्रोध करने से कैसे दंडित किया जा सकता है या सुधारा जा सकता है। सह समझ से परे ही उसके विरोधी बन जाते है। इस प्रकार वह अनायास ही जीती बाजी हारता है।
जिस कारण क्रोध किया गया था। उसका निराकरण हुआ या नहीं, यह बहुत पीछे की बात है। इससे पहले ही अपने स्वभाव की बदनामी, जीवनी शक्ति की घटोत्तरी और समस्या को सुझा सकने की मानसिक दक्षता में कमी आदि अनेकों हानियाँ पहले ही हो लेती है। इसी प्रकार संकोची, डरपोक व्यक्ति भी अपनी बात स्पष्ट न कर पाने के कारण निर्दोष होते हुए भी दोषी बनते रहते है।
शरीर की स्थिरता, आर्थिक सुव्यवस्था, परिवार की सुख शान्ति, गुत्थियों का समाधार, प्रगति का सुनियोजन आदि कितनी ही बातें जीवन की सफलता के लिए आवश्यक मानी जाती है। उन सब के मूल में मानसिक संतुलन की आवश्यकता है। हंसती हंसाती आदतें बनाकर ही हम जीवन रथ को प्रगति पथ पर सही रीति से अग्रगामी कर सकते हैं।
दीप यज्ञों की अभिनव श्रृंखला को इतना व्यापक रूप देख कर लगता है युग शिल्पियों के अन्तःकरण से नव ना स्वयं अंगड़ाई ले रही है। ऐसे में भला कौन होगा जो पड़ा रहना चहेगा?
आलोक कितना व्यापक होता जा रहा है। उसकी झलक झाँकी प्रस्तुत करते है - यह वृत्तांत जो देखने में क्षिप्त लगते है पर प्रत्येक अपने आप में एक महान व्यापक है:-
बैतूल प्रज्ञापीठ के वार्षिकोत्सव के रूप में दीप कार्यक्रम सानन्दर सम्पन्न हुआ। समीपवर्ती शाखाओं सैकड़ों कार्यकर्ता इसमें सम्मिलित हुए। नगर में अभी 700 पत्रिकायें आती थी। अब इस वर्ष के परम पूज्य रुद्रव के आह्वान पर यह संख्या दूनी करने का प्रयास परिजनों द्वारा उत्साहपूर्वक चल रहा है। स्वजनों के इस विकल्प से प्रभावित होकर सम्मिलित क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं का भी उत्साह बढ़ा है। सभी ने नशा निवारण दहेज उन्मूलन, वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रमों को गति प्रदान करने का संकल्प तो लिया ही है। साथ ही परम पूज्य गुरुदेव के हजार गुने लक्ष्य की पूर्ति के लिए भी अधिकाधिक पत्रिकाओं के सदस्य बनाने का प्रयास भी आरंभ कर दिया है।
दुर्ग। गायत्री शक्तिपीठ का छटवाँ वार्षिकोत्सव कार्यक्रम हर्षोल्लास से साथ सम्पन्न हुआ। श्रीमती ज्ञानदेवी श्रीमती धनवती शुक्ला, श्री अंतर सिंह, श्री गूजरमल जैन तथा श्री ज्ञान चंदानी द्वारा रचनात्मक कार्यक्रमों पर प्रकाश डाला गया। उपस्थित जन समुदाय ने इन्हें पूरा करने के लिए भाव भरे संकल्प लिए।
तापीन (हजारी बाग) अण्डर ग्राउण्ड प्राजेक्ट कोलियरी में दीप यज्ञ कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। इस आयोजन में प्रोजेक्ट के अधिकतर अधिकारीगण उपस्थित हुए। श्री मुरलीधर तर्वे तथा नरेन्द्र मालवीय के प्रयासों से समूचे क्षेत्र में सद्वाक्य लेखन किया गया। नशा निवारण तथा दहेज उन्मूलन के लिए अत्यधिक लोगों ने संकल्प पत्र भरे। आयोजन के समय बड़ी मात्र में साहित्य बिक्री हुआ। अखण्ड ज्योति पत्रिका की संख्या दुगुनी करने का संकल्प कार्यकर्त्ताओं द्वारा लिया गया।
राजगकढ। स्थानीय कार्यकर्ताओं के सहयोग से समीपवर्ती प्रत्येक गाँव में दीप यज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न कराने का प्रयास सफल हो रहा है। तभी अब तक 10 स्थानों में कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुए। नगर में अभी तक 250 अखण्ड ज्योति पत्रिकाएं आती थी। अब यह संख्या 500 तक पहुँच गई। इससे भी अधिक संख्या बढ़ाने का प्रयास परिजनों द्वारा किया जा रहा है।
उज्जैन। तीन दिवसीय शतवेदीय दीपयज्ञ एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। जिले की सभी शाखाओं के कर्मठ कार्यकर्ता इसमें आमंत्रित किये गये थे। इसी अवसर पर समीपवर्ती क्षेत्र में दीपयज्ञ कार्यक्रमों की तिथियाँ निर्धारित की गई। परम पूज्य गुरुदेव के हजार गुने लक्ष्य की पूर्ति के लिए सभी शाखाओं के कर्मठ कार्यकर्ताओं से पत्रिकाओं की संख्या दुगुनी करने के बजाए परम पूज्य गुरुदेव की भावनाओं के अनुरूप पाँच गुनी करने का आह्वान किया गया। उपस्थित कार्यकर्ताओं ने इसे पूरा करने का संकल्प लिया।
सेमरा (गाजीपुर) श्री रामचन्द्र सिंह व श्री विजय बहापुद सिंह के सराहनीय प्रयास से वाराणसी, आजमगढ़, गाजीपुर व जौनपुर जिलों में जन जागरण के प्रयासों को गति देने के लिए व्यापक स्तर पर जन संपर्क किया जा रहा है। समूचे क्षेत्र में परम पूज्य गुरुदेव के संदेश को पहुंचाने के लिए प्रत्येक जिले में चार कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे है।
मावली जक्शन। नगर के प्रतिष्ठित एवं गणमान्य व्यक्तियों के अतिरिक्त क्षेत्रीय विधायक श्री हनुमन्त प्रसाद प्रभाकर, प्रधान सरपंच तहसीलदार तथा अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में दीप यज्ञायोजनसानन्द सम्पन्न हुआ। परम पूज्य गुरुदेव के संदेश से प्रभावित होकर सैकड़ों नागरिकों ने दहेज उन्मूलन, नशा निवारण वृक्षारोपण तथा प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को क्रियान्वित करने के संकल्प पत्र भरे। स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्य बनाने के लिए संकल्प लिया गया।
....सराबाजार। सहजनत्राँ प्रज्ञापीठ के अंतर्गत नित्य प्रति दीप यज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न कराये जा रहे है। इसी श्रृंखला में 20 दिसम्बर को यहाँ पर दीपयज्ञ कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। 24 अखण्ड ज्योति पत्रिका के सदस्य तुरन्त ही बन गये। अब अधिकाधिक सदस्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
रायबरेली। स्थानीय गायत्री परिवार शाखा द्वारा आयोजित दीपयज्ञ कार्यक्रम फील्ड होस्टल के सामने हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्घाटन श्री ए के तिवाडी सिविल जज द्वारा दीप प्रज्ज्वलित करके किया गया। नशा निवारण दहेज उन्मूलन, हरीतिमा संवर्धन के लिए श्रद्धालु परिजनों द्वारा सामूहिक रूप से संकल्प लिए गए। इसी अवसर पर आदर्श विवाह की श्रृंखला में आयु विमला देवी का शुभ विवाह श्री महादेव सिंह के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ। विवाहोपराँत जिला कृषि एवं योजनाधिकारी श्री जी एन यादव सहित उपस्थित जन समूह द्वारा पुष्पों की बौछार के साथ वर वधू का स्वागत किया गया।
बमेतरा दुग। दीपयज्ञ कार्यक्रमों की श्रृंखला में विगत दिनों ग्राम जेबरा, सिधोरी, जाता तथा जेवर में दीप यज्ञायोजन सानन्द सम्पन्न हुआ। सक्रिय कार्यकर्त्ताओं की टोली सद्वाक्य लेखन स्लाईड प्रोजेक्ट प्रदर्शन द्वारा समूचे क्षेत्र को प्रज्ञा आलोक से अनुप्रमाणित करने का प्रयास कर रही है। अभी तक 343 स्थानों में यह कार्यक्रम सम्पन्न हो चुके है। सभी जगह रचनात्मक कार्यक्रमों के लिए संकल्प पत्र भराये जा रहे है। साथ ही अखण्ड-ज्योति के अधिकाधिक सदस्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रमों के संचालन में सर्वश्री गणेश प्रसाद, तुलसीराम, जोहनलाल, पंचराम, होलसाय, विश्राम प्रसाद, आर बी अग्रवाल तथा पंडरियाजी का सराहनीय सहयोग मिल रहा है।
मंदसौर। शतवेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। स्थानीय टाउन हाल में नगर के प्रबुद्ध व्यक्तियों की गोष्ठी रखी गई, जिसमें वर्तमान विभीषिकाओं के समाधान के लिए मिशन द्वारा चलाये जा रहे रचनात्मक कार्यक्रमों पर प्रकाश डाला गया। इससे उपस्थित प्रबुद्ध वर्ग अत्यधिक प्रभावित हुआ। कार्यक्रमों के व्यापक विस्तार के लिए अखण्ड ज्योति पत्रिका को अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने का संकल्प भी लिया गया।
लोची खेरा। श्री लक्ष्मीशंकेर व श्री राज बहादुर सिंह के प्रयासों से अब तक ग्रामीण अंचल में लगभग 100 पत्रिकाओं के नये सदस्य बनाये गये। श्री दिनेश चन्द्र बाजपेयी आचार्य के सहयोग से यहाँ दीपयज्ञ कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। प्रौढ़-शिक्षा-विस्तार, वृक्षारोपण, नशा निवारण तथा दहेज उन्मूलन कार्यक्रमों को चलाने के लिए उपस्थित समुदाय द्वारा भाव भरे संकल्प लिए गए। श्री लक्ष्मीशंकर सिंह द्वारा घर घर जाकर दीपयज्ञ कार्यक्रम कराने का क्रम भी सफलतापूर्वक चल रहा है।
सूरतगंज। रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रान्वयन के साथ ही दीपयज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के अतिरिक्त साँसद श्री कमला प्रसाद रावत भी कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। परम पूज्य गुरुदेव के संदेश से बहुत ही प्रसन्न हुए। समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के विस्तार में यथा योग्य सहयोग देने का आश्वासन दिया।
अमेठी। दीपयज्ञ कार्यक्रम प्रेरणाप्रद वातावरण में सम्पन्न हुआ। स्थानीय इंटर कॉलेज तथा डिग्री कालेज में भी डॉक्टर ओ पी शर्मा द्वारा परम पूज्य गुरुदेव का संदेश सुनाया गया। लगभग 3500 छात्रों, अध्यापकों ने अपना हाथ उठाकर मिशन द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए सहयोग देने की सहमति दी। विद्यालयों में अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका मंगाने का संकल्प लिया गया। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नशा निवारण दहेज उन्मूलन। वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाने के भाव भरे संकल्प लिए।
कोरबा। शाखा की ओर से तीन महीने में एक हजार आठ वेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम कराने का संकल्प लिया है। वेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम कराने का संकल्प लिया है। स्थानीय प्रज्ञा संस्थान में दीपयज्ञ कार्यक्रम भावनात्मक विवरण में सम्पन्न हुआ। समीपवर्ती क्षेत्र में अखण्ड ज्योति के अधिकाधिक नियमित सदस्य बनाने की व्यापक आस्था कार्यकर्ताओं ने की है। चार सौ क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं को इस अवसर पर रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए विभिन्न उत्तरदायित्व सौंपे गये।
साबेल। 108 थालियों में सजे दीप अपने प्रकाश से ज्वलित जन समूह को स्वयं भी प्रज्ञा प्रकाश से चकित होने की प्रेरणा दे रहे थे। इससे प्रेरणादायी विवरण में कार्यकर्ताओं ने 108 घरों में दीपयज्ञ कराने 1008 व्यक्तियों से संपर्क कर नशा निवारण, दहेज उन्मूलन, वृक्षारोपण तथा प्रौढ़ शिक्षा विस्तार हेतु संकल्प भराने का संकल्प लिया।
....। गायत्री शक्तिपीठ के अंतर्गत प्रतिदिन दिन में दीपयज्ञ कार्यक्रम कराने तथा माह में दो तीन सामूहिक बड़े आयोजन कराने की व्यवस्था बनाई है। जिले में जहाँ भी बड़े आयोजन होते है। वहाँ के कार्यकर्ता पहले से ही पहुँच कर सद्भाव लेखन व अन्य पूर्व पारियाँ कर कार्यक्रम को प्रभावशाली बनाने में अथक श्रम करते है। कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद भी नियमित जनसंपर्क की व्यवस्था बनाते है।
मुकुल बाजार। शत वेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम सानन्द सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम से प्रभावित होकर सैकड़ों लोगों ने अपने जीवन की दिशा धारा बदलने की प्रतिज्ञा की। भावनात्मक कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने के संकल्प पत्र भरे। आयोजन का उद्घाटन भेल के डिप्टी जनरल मैनेजर वंशीधर पाण्डेय तथा जिला विद्यालय निरीक्षक ने किया। 1008 घरों में दीपयज्ञ कराने व अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।
.... 251 वेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम समूचे क्षेत्र को जन जागृति का संदेश देते हुए सम्पन्न हुए। इसके साथ ही करनी तथा दमोह में शतवेदीय कार्यक्रम सम्पन्न हुए। दीप यज्ञ कार्यक्रम के प्रति जन समुदाय का अपार उत्साह देखते ही बनता था। पाँच सूत्री कार्यक्रम के अंतर्गत सैकड़ों संकल्प पत्र भराये गये। इस अवसर पर नवनिर्मित यज्ञशाला का उद्घाटन श्री रामाधीन दुबे ने किया। अखण्ड ज्योति को हर शिक्षित तक पहुँचाने का संकल्प कार्यकर्ताओं ने लिया।
उन्नाव। शुक्लागज शक्ति पीठ के अर्न्यगत शतवेदीय दीप या कार्यक्रम ग्राम बदरका में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्री शिव कुमार अवस्थी श्री शारदा प्रसाद शुक्ला एवं पण्डित रधुवर दयाल बाजपेयी द्वारा किया गया। वृक्षारोपण नशा निवारण, दहेज उन्मूलन तथा प्रौढ़ शिक्षा विस्तार के लिए सम्मिलित परिजनों द्वारा संकल्प पत्र भरे गये। अखण्ड ज्योति को संपर्क क्षेत्र में अधिकाधिक परिजनों तक पहुंचाने का संकल्प कार्यकर्ताओं ने लिया।
अखण्ड ज्योति का तेलगू संस्करण
गुन्टुर (आन्ध्र प्रदेश) से अखण्ड ज्योति का तेलगू वार्षिक चंदा 15/
डॉक्टर टी.शिवराम कृष्ण रेड्डी
3.9.43/24 स्तम्बल गरवु
गुन्टूर-522006
(आन्ध्र प्रदेश)
महात्मा ईसा बहुत से जिज्ञासुओं से घिरे हुए उन्हें उपदेश कर रहे थे। तभी किसी ने आकर उनसे कहा कि -”तुम्हारे भाई और माता वहाँ बाहर खड़े तुमसे बात करना चाहते है। तुम जाकर उनसे मिल लो”
महात्मा ईसा बड़े साधारण भाव से यह उत्तर देकर अपने उपदेश कार्य में लग गये “संसार में मेरा भाई और मेरी माता अन्य कोई नहीं, यही जिज्ञासु जानता ही मेरे भाई और मेरी माता है, क्योंकि जो मेरे स्वर्गीय पिता के आदेश पर चले वहीं मेरे भाई बहन व माता पिता है। मैं परमात्मा के आदेशों का पालन करने वाले को ही बन्धु-बान्धव मानता हूँ।
भारतीय संस्कृति में द्विजत्व को अत्यधिक महत्व दिया गया है। उसे प्रमुख संस्कारों में सम्मिलित करके उपनयन या दीक्षा का नाम दिया गया है। द्विजों को श्रेष्ठ और वरिष्ठ ठहराया गया है, जबकि उससे रहित लोगों को हेय दृष्टि से देखा गया है। चतुर्थ वर्ण कहकर अनगढ़ लोगों में गिना गया है। द्विजत्व प्राप्त कर लेना किसी के लिए भी गर्व गौरव भरी उपलब्धि समझा गया है।
प्रयोजन जातिगत वंश परम्परा से नहीं। वरन् गुण कर्म, स्वभाव स्तर के साथ जुड़ता है। शरीर संरचना की दृष्टि से सभी मनुष्य समान है। नस्ल की दृष्टि से मनुष्य प्राणी सभी समान है। उनमें किसी को भी जन्म जाता रूप से न छोटा माना जा सकता है न बड़ा न कोई ऊंच न नीच। व्यक्ति के साथ जुड़ी हुई उत्कृष्टता, निकृष्टता ही किसी को श्रेष्ठ या हेय बनाती है। रावण ब्राह्मण ही किसी को श्रेष्ठ या हेय बनाती हैं। रावण ब्राह्मण होते हुए भी असुर माना गया और केवल शबरी अद्विज होते हुए भी परम भक्तों में गिने गये। इस में जन्म को नहीं कर्म को प्रमुखता दी गई समझी जा सकी हैं
द्विज की अर्थ है दूसरी बार जन्मना। एक जन्म हर किसी का माता पिता के सहयोग से होता हैं सामान्य जन्म प्राणिमात्र का इसी प्रकार होता है, मनुष्य का भी दूसरा जन्म मनुष्य को अपनी आस्थाओं के बलबूते स्वयं लेना पड़ता है। उसका प्रतीक यज्ञोपवीत दीक्षा को माना गया है। यह आत्मज्ञान परक है। गुरु को इसका श्रेय दिया जाता है। क्योंकि उसी के माध्यम से उस तत्व ज्ञान की उपलब्धि होनी है, जिसके आधार पर नर पशु को नर देव बनने का अवसर मिलता है। सद्ज्ञान का प्रतीक गुरु है गुरु व्यक्ति को नहीं ज्ञान गरिमा को कहते है। इसमें स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन को आधार माना गया है। यह वातावरण के प्रभाव से ही हस्तगत हो सकता है और पूर्व सचिव संस्कारों के आधार पर अन्तः प्रेरणा से भी जब मनुष्य सोचता है कि वह पशु पक्षियों से जीव जन्तुओं से अधिक विकसित एवं समर्थ है तो उसे अपनी वरिष्ठता का बोध होता है। इस बोध को व्यावहारिक जीवन में उतारने की उत्कंठा मचलती है। यहीं है वह प्रसव पीड़ा जिसमें होकर गुजरने पर दूसरा जन्म द्विजत्व उपलब्ध होता है। ऐसी दशा में पेट प्रजनन गौण हो जाता है और मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को जीवन चर्या में घुला देने की योजना बनती है। इसी उत्कंठा का क्रियान्वयन दूसरा जन्म हैं
यह सुयोग हस्तगत हुआ उसी का उत्सव यज्ञोपवीत संस्कार के रूप में समारोह पूर्वक उत्साह के वातावरण में मनाया जाता है। अनेक क्षेत्रों तथा वर्गों में यज्ञोपवीत संस्कार को विवाह जैसी धूम धाम के साथ मनाया जाना है। अब उस समारोह के साथ व्यक्तित्व के निखार की अन्तराल को हिला देने वाली परिपाटी नहीं रही। मात्र शुष्क कर्मकाण्ड और खर्चीली परिपाटी उसके साथ जुड़ी रह गई है। ऐसी दशा में उसकी उपेक्षा होना स्वाभाविक ही था। इन दिनों द्विजत्व का प्रतीक यज्ञोपवीत संस्कार किसी प्रकार चिन्ह पूजा के रूप में ही पूरा होता हैं अनेकों बार उसे आडम्बर मात्र समझ कर छोड़ भी दिया है।
महत्व कर्मकाण्ड का नहीं उस भाव परिवर्तन में निर्धारण का है, उसमें नर पशु के स्तर का परित्याग आवश्यक हो जाता है और उस त्याग के साथ उच्च स्तर का परित्याग आदर्शों को चिन्तन चरित्र एवं व्यवहार में अधिकाधिक गहराई तक सम्मिलित करते चलना आवश्यक हो जाता है। यही आत्मिक प्रगति का सोपान भी है।
पशु पेट प्रजनन के लिए जीते हैं। मन की मौज ही उनकी दिशा निर्धारित करती है। स्वार्थ के अतिरिक्त और कुछ समझदारी नहीं। अपना सुख बटा देने एवं दूसरों का दुख बटा लेने जैसी प्रवृत्ति न उठती है न बनती है। संकीर्ण स्वार्थपरता की बात सोचने और वैसी ही क्रिया प्रक्रिया अपनाने के अतिरिक्त और कुछ उन्हें समझ हो नहीं। फिर ऐसे कदम उठाना तो संभव ही कैसे हो, जिसमें आत्मानुशासन जग सके संयम बरता जाए और अपनी क्षमता का पुण्य परमार्थ में नियोजन करते बन पड़े। यह पशु स्तर सर्व विदित है। मनुष्य काया में भी असंख्य नर पशु इसी स्तर के निवास करते पाये जाते है। उनकी जिन्दगी लिप्सा, लालसा में ही व्यतीत हो जाती है। वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति ही इसका एक मात्र लक्ष्य रह जाता है। जो कुछ करते और सोचते है, उनमें लाभ मोह, अहंकार को अधिकाधिक मात्र में पूरी करते रहना है। कर्तव्य का प्रधान अंग गबन जाता है। इस स्थिति को ही भव बंधन कहते है। माया पक्ष भी इसी को कहा जाता है। ऐसा दृष्टिकोण नरक जैसे निन्दित बन जाता है। उन्हें नीति, कर्तव्य, परमार्थ जैसे आधार अपनाने की इच्छा ही नहीं होती। इन्हें मानवी काया में निवास करने वाले भूत प्रेत भी कहा जा सकता है। अन्धकार में जीने की यहीं स्थिति है। आदर्शों का प्रकाश न उनके चिन्तन में उतरता है और न आचरण में इस स्तर के लोग अपनी लालसाओं को पूरा करने के लिए प्रायः न्याय नीति अपना कर सफल नहीं हो पाते। इसलिए उन्हें अनाचरण अत्याचार का मार्ग अपनाना पड़ता है। अपराधी कृत्य करते रहते है। स्वयं जलते और दूसरों को जलाते, स्वयं गिरते और दूसरों को गिराते रहते है।
द्विजत्व ठीक इससे विपरीत स्थिति है। उसमें निजी महत्वाकाँक्षाओं को आरम्भ से ही पैरों तले कुचलना पड़ता है। स्वार्थ के नाम पर शरीर पोषण की अनिवार्य आवश्यकताएं पूरी करने भर के प्रयत्न चलते है है। औसत नागरिक स्तर का गुजारा पर्याप्त लगता है। इतना उपलब्ध कर लेना किसी के लिए भी कुछ भी कठिन नहीं पड़ता। जब कीट पतंग, पशु पक्षी अपने शरीर निर्वाह की व्यवस्था सरलता पूर्वक कर लेते है। तो मनुष्य जैसे अनेकानेक शारीरिक मानसिक विशेषताओं से सम्पन्न, बुद्धिमान प्राणी के लिए उतना कुछ कर सकना क्यों कुछ कठिन होना चाहिए। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी छोटी आवश्यकताओँ की पूर्ति में क्यों अधिक समय लगाने की अधिक श्रम करने की आवश्यकता पड़नी चाहिए। जिसे आत्म कल्याण के लिए लोक मंगल के लिए सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाया जा सके। स्वयं उठना और दूसरों को उठाना निरंतर बनता पड़ता रहे। लिप्सा, लालसाओं से बचाई हुई क्षमता ही परमार्थ में प्रयुक्त हो सकी है और उसी के आधार पर आत्म कल्याण तथा लोक कल्याण का दुहरा प्रयोजन साथ साथ पूरा हो सकता है।
देव स्तर का द्विजत्व किस प्रकार प्राप्त हो, इसका प्रथम चरण यही है कि आत्म संयम की साधना की जाए। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम विचार संयम की चार कसौटियों पर अपने को खरा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाए। ऐसा करने पर ब्राह्मणोचित जीवन जी सकना सरल और सन्तोषप्रद बन जाता है। न्यूनतम में शरीर यात्रा चलाने की योजना बनाने पर फिर हर किसी के पास इतना समय श्रम कौशल और साधन शेष बच जाता है। जिसे जनहित के परमार्थ में लगाया जा सके। महामानवों जैसा पुण्य जीवन जिया जा सके। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लोक कल्याण के लिए इतना कुछ किया जा सके जिसके बल पर आत्मसन्तोष जन सहयोग और देवी अनुग्रह का पुण्य प्रसाद प्रचुर परिमाण में हस्तगत किया जा सके। इस राजमार्ग पर चल पड़ना ही द्विजत्व है। उसे मानवी महानता का गौरव भी समझा जा सकता है।
व्यक्ति उच्चस्तरीय क्षमताओं का असामान्य भण्डार है एवं परमात्मा का ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार होने के कारण उसे उपलब्ध है, पर प्रसुप्त स्थिति में ही उनका अस्तित्व अन्तराल में विद्यमान रहता है। उनका उभार, जागरण उन्नयन न बने पड़े तो फिर व्यक्ति मात्र कार्य कलेवर तक ही सीमित रह जाता है। अनगढ़ स्थिति में जन मनुष्यों जैसा जीवन जीना पड़ता है। आत्म बोध और आत्म जागरण के युग्म को अध्यात्मक की तत्व दर्श की विधा माना गया है इसके लिए आत्म परिष्कार की अन्तराल परिमार्जन की आवश्यकता पड़ती है। इसी को कर पाना आमतौर से कठिन पड़ता है। बाहर के दृश्यों को हर कोई देखता है किन्तु आत्म निरीक्षण में न किसी को ज्ञान होता है और न उसके लिए उत्साह ही पाया जाता है। इसलिए समीक्षा, निन्दा दूसरों की ही सूझ पड़ती है। दूसरों के दोष ढूंढ़ना और उन्हें उजागर करते रहना ही सरल लगता है। आत्म निरीक्षण का क्रम चले तो यह सूझे कि अपने गुण कर्म, स्वभाव में कहाँ कितनी त्रुटियों का समावेश हैं उनका निराकरण किस प्रकार किया जाए। अनुपयुक्त आदतों को उखाड़ कर उनके स्थान पर किस तरह सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाया जाए। इसके लिए निरीक्षण, निर्धारण करना होगा। उसी से यह भी बन पड़ेगा कि मनुष्य में देवत्व का उदय कर सके। महामानवों जैसी जीवनचर्या अपना कर अपने को धन्य बना सके और अपने संपर्क क्षेत्र को श्रेष्ठ समुन्नत बना सकने में समर्थ हो सके। इतना उनसे बन पड़े, समझना चाहिए कि उनने द्विजत्व की भूमि का में प्रवेश किया और मानवी गरिमा को अपनाकर संपर्क क्षेत्र को व्यापक वातावरण को श्रेष्ठता से भरा पूरा बनाने में उत्साहवर्धक सफलता प्राप्त करने की संभावना बन गई।
द्विजत्व की अवधारणा में वाणी को परिमार्जित करना पड़ता है, क्योंकि उसी के माध्यम से सत्परामर्श का, विचार–विनिमय का मार्ग दर्शन का सुयोग बन पड़ता है। दूसरों की सेवा करते हुए ही अपनी सेवा करते बन पड़ती है। मेंहदी पीसने वाले के हाथ अनायास ही रंग जाते है। इस बेचने का व्यवसाय करने वाले के कपड़े अपने आप महकने लगते है। अपने परिवार के पड़ोस के लोगों को सत्परामर्श देते रहने की सेवा साधना अपनाने पर जो दूसरों से कहा जा रहा है। उसे स्वयं करने के लिए भी दबाव पड़ता है। सेवा धर्म अपनाने वाले जिस प्रकार की शिक्षा दूसरों को देते है। उसका अनुकरण उन्हें स्वयं भी करना पड़ता है। न करें तो उपहास होता है। व्यंग बरसते है और किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस प्रकार तथ्यतः सेवा धर्म अपनाना प्रकारान्तर से अपना परिष्कार, परिमार्जन करना भी है। कहना न होगा कि व्यक्तित्व ही प्रगति के सभी मार्ग खोलती है। वस्तुतः परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ साधन है। द्विजत्व की यही एक मात्र शिक्षा है कि जन् जन्मान्तरों से संचित पशु प्रवृत्तियों से नाता तोड़ा जाए और देवत्व की गौरव गरिमा को जीवन चर्या में सफलतापूर्वक सम्मिश्रित किया जाय।
मनुष्य जन्म दो आधारों पर ही सफल सार्थक होता है। कि अपने आपको सर्वतोमुखी संयम की कसौटी पर निरन्तर कसते रहा जाय। उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अनुरूप जीवन ढला या नहीं इसका निरीक्षण परीक्षण करते रहा जाय तो कमियाँ दृष्टिगोचर हो उन्हें ढूंढ़ ढूंढ़ कर निरस्त बहिष्कृत किया जाए। ऐसा बन पड़े जो अंतर्मुखी होकर कड़ाई के साथ आत्म समीक्षा करते रहने पर ही बन पड़ता है। आमतौर से सभी अपने को हर दृष्टि से भला बेकसूर और सर्वांगपूर्ण मानते है। दूसरों में ही दोष देखते और लोइना लगाते हैं। यह प्रवृत्ति उलटनी चाहिए। अन्यथा दूसरों के गुणों पर प्रसन्न होना और उनसे कुछ सीख सकना बन ही न पड़ेगा। दूसरों के दोषों का ही ध्यान रखने पर अपनी प्रवृत्ति ऐसी बन जायेगी जैसी कि कूड़ेदान में कचरा भरते जाने पर उसकी स्थिति दिन प्रतिदिन बुरी होती जाती है। पुनर्जन्म का द्विजत्व धारण करने का सीधा अभिप्रायः एक ही है कि अपने को अधिक श्रेष्ठ, अधिक वरिष्ठ, अधिक प्रखर और अधिक प्रतिभावान बनने के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहा जाए। किसी भी
नेहरू जी ने मुस्कराकर कहा -”इसके लिये यहाँ कुछ भी नहीं करना पड़ता। पण्डित जी का पत्रा ही मुहूर्त निकाल देता हैं और पुण्य लाभ की आस्था से प्रेरित यह लोग अनायास ही दौड़ते चले आते है।
ऋषियों की मान्यता है कि मनुष्य का सर्वतोमुखी निष्कर्ष होना चाहिए। इस उत्कर्ष में जहाँ ज्ञान, वैभव, प्रतिभा, प्रखरता की आवश्यकता पड़ती है वहीं धन सम्पदा की भी आवश्यकता पड़ती है। धन के अभाव में जीवन जटिल हो जाता है। उसकी कमी न रहे इसलिए उसकी प्राप्ति के लिए दैवी अनुग्रह का आह्वान करते हुए में .... प्रार्थना की की गई है -
“वयंस्याम पतयों रयीणाम” अर्थाित् हम सब अनेक .... के धनों के स्वामी बने।
समृद्धि की कामना करना और उसे सम्मान देना अनुचित नहीं है। पर इससे पूर्व इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह किस प्रकार अर्जित की गई है। आज धन सम्पदा का महत्व बढ़ता जा रहा है, लोग उसे ही अपना सच्चा साथी मानने लगे है एवं उचित अनुचित हर परियाय को काम में लेकर जल्दी सम्पन्न हो जाना चाहते है। प्राचीन काल में धन का सम्मान इसलिए किया जाता था कि उसके पीछे व्यक्ति के परिश्रम और पुरुषार्थ की बनी लिखी रहती थी। ऐसा नहीं होता था कि व्यक्ति जिस तिस तरह से अमीर हो जाए और उसे मान प्रतिष्ठा .... लगे। नीति न्यायपूर्वक उपार्जित संपदा को भी वर अनुग्रह के साथ सम्बद्ध करके रखा तथा उसे पवित्र पुनीत कार्यों में ही व्यय किया जाता था। उपार्जित संपदा कुसंस्कारी होकर उत्कर्ष की जगह पतन का कारण बन जाए, इसलिए उसके साथ देव अनुग्रह की प्रार्थना की गई है। देव अनुग्रह धनशक्ति को सुसंस्कारी और ऊर्ध्वगामी बनाये रखेगा, ऐसा विश्वास किया गया है।
इच्छित मात्र में सुख समृद्धि सम्पत्ति मनुष्य अपने स्वार्थ के बल पर कमा सकता है और कमाता भी है। स्वार्थ के अभाव में तो दैवी सहयोग भी व्यर्थ चला जाता दैवी सत्ता का सहयोग यहाँ इसलिए माँगा गया है कि सम्पत्ति मानवी उत्थान का ही माध्यम बने। दुर्बुद्धि होकर मनुष्य कहीं उसका दुरुपयोग करके अवनति .... होकर मनुष्य कहीं उसका दुरुपयोग करे अवनति .... में न जा गिरे।
धन से अपनी आवश्यकताएं पूरी करने और परमार्थ करने का क्रम चलता रहे, इसके लिए कमाई का क्रम टूटता नहीं चाहिए। धनार्जन में लगने वाला धन कम नहीं पड़ता चाहिए। इसके लिए पाँच देव शक्तियों का सहयोग चाहा गया है। प्रकारांतर से यह उन पाँच देववृत्तियों का अंकुश अपने ऊपर लगा लेना है जो मानवी वृत्ति को सन्मार्गगामी बनाती है। इन्द्र अर्थात् देवेन्द्र के सहयोग से जहाँ सर्वोच्च स्तर तक प्रगति की कामना की गई, वहाँ देवशक्तियों को सशक्त, संगठित बनाने का उत्तरदायित्व भी साथ में जुड़ा है। प्रजापति का अर्थ है - प्रजा का परिपालन करने वाली दिव्य सत्ता। जिसके सहयोग से आने वाला धन न तो किसी का हक छीन कर पाया जा सकता है न किसी का खून चूसकर बेईमानी से मिलावट आदि कर लोगों को मौत के मुँह में धकेल कर भी ऐसा धन प्राप्त किया जा सकता है। उपार्जन और उपयोग दोनों में जन सामान्य के पालन का भाव अनिवार्य रूप से साथ लेकर चलना पड़ता है। इसी प्रकार सविता शक्ति प्रकाश जीवनी शक्ति, स्फूर्ति देने वाली होने के कारण व्यक्ति को धन का सदुपयोग गिरों को उठाने आगे बढ़ाने, आरोग्य प्रदान करने को प्रेरित करती है।
सोम शान्ति और पुष्टिदायक है। धन क्लेश, कलह, कारक न हो। बेचैनी अस्थिरता पैदा न करे ऐसा संस्कार धन में सोम के संस्पर्श से आता है। अग्नि तेजस्विता, उर्ध्वगामिता, अग्रणी बनाने वाली शक्ति है। पतन पराभव से बचाने, उन्नतिशील, यशस्वी, ऊर्जा सम्पन्न बनाने का संस्कार इस शक्ति से प्राप्त किया जाता है।
धन कमाया जाए, खून कमाया जाए, उसमें कमी न पड़ने पाये। पर वह होना चाहिए न्यायोचित एवं नैतिक मर्यादा में रहकर धन प्राप्ति के लिए जहाँ प्रार्थना की गई है वहाँ यह निर्देश भी है -
“अग्निना रयिमश्नवत पोष्मेव दिने दिने। यशसं वीरवत्तमस्। अर्थात् धन का अर्जन करो, पर इस प्रकार कि वह तुम्हारी (मानवों) शक्ति को दिनोंदिन पोषण दे। ऐसा धन कमाओ जो सुयश बढ़ाये और वीरों-सत्पुरुषों के काम आये।
*समाप्त*